Real Crime Story: इश्क में फिर बहा खून

Real Crime Story: पासपड़ोस में रहने के कारण दीपक और जावित्री को एकदूसरे से कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला. एक दिन जावित्री के पिता वीरपाल ने उन दोनों को ऐसी हालत में देखा कि वह अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर सका और फिर…

जावित्री जैसे ही स्कूल जाने के लिए साइकिल से निकली, रास्ते में इंतजार कर रहे दीपक ने अपनी साइकिल उस के पीछे लगा दी. जावित्री ने दीपक को पीछे आते देखा तो उस ने साइकिल की गति और तेज कर दी. दीपक ने भी अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाई और कुछ देर में जावित्री की साइकिल के आगे अपनी साइकिल इस तरह खड़ी कर दी कि अगर जावित्री ने पूरी ताकत से ब्रेक न लगाई होती तो उस की साइकिल से टकरा जाती. साइकिल संभालते हुए जावित्री खीझ कर बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो मैं स्कूल जा रही हूं. एक तो वैसे ही देर हो गई है, ऊपर से तुम ने रास्ता रोक लिया. अभी किसी ने हम दोनों को इस तरह देख लिया तो बिना मतलब का बात का बतंगड़ बनने लगेगा.’’

‘‘जिसे जो कहना है, कहता रहे. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ दीपक ने अपनी यह बात इस तरह अकड़ कर कही, जैसे सचमुच उसे किसी का कोई डर नहीं है.

जावित्री को स्कूल जाने के लिए देर हो रही थी. इसलिए वह बेचैन थी. उस ने दीपक को देखा, उस के बाद विनती के स्वर में बोली, ‘‘दीपक, मुझे सचमुच देर हो रही है, बिना मतलब स्कूल में झूठ बोलना पड़ेगा. अभी जाने दो, मैं तुम से बाद में मिल लूंगी, तब जो बात कहनी हो, कह देना’’

जावित्री की विनती पर दीपक नरम पड़ गया. साइकिल हटाते हुए उस ने जावित्री के सुंदर मुखड़े को देखते हुए कहा, ‘‘जावित्री, तुम मेरी आंखों में देखो, प्यार का सागर लहराता नजर आएगा. तुम्हें पता है, तुम्हारे प्यार में मैं सब कुछ भूल गया हूं. दिनरात सिर्फ तुम्हारी ही यादों में खोया रहता हूं.’’

‘‘वह सब ठीक है दीपक, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि हम एक ही गांव में रहते हैं. हमारे और तुम्हारे घरों के बीच ज्यादा दूरी भी नहीं है. अगर हम दोनों इसी तरह प्यारमोहब्बत की पींगे बढ़ाते रहे तो मोहल्ले वालों से यह बात छिपी नहीं रहेगी. तुम मेरे पापा को तो जानते ही हो, वह बातबात में गुस्सा हो जाते हैं. कही उन्हें हम दोनों के प्रेम की भनक लग गई तो मैं बदनाम हो जाऊंगी. उस के बाद मेरे पापा मेरी क्या गत बनाएंगे, तुम सोच भी नहीं सकते.’’

‘‘जावित्री, मैं तुम्हें सपने में भी बदनाम करने के बारे में नहीं सोच सकता. तुम मेरा प्यार हो और प्यार के लिए लोग न जाने क्याक्या करते हैं. एक तुम हो कि जरा सी बदनामी से डर रही हो. मैं तुम से मिलने और 2 बातें करने के लिए कितने तिकड़म भिड़ाता हूं. तब कहीं जा कर तुम से मुलाकात होती है. जबकि तुम बदनामी का बहाना कर के मुझ से पीछा छुड़ाना चाहती हो. मैं तुम्हें भला क्यों बदनाम होने दूंगा. तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी तुम्हीं से करूंगा. तुम्हारे अलावा मेरी दुलहन कोई दूसरी नहीं हो सकती. तब बदनामी कैसी?’’

दीपक की बातों के जवाब मे लंबी सांस ले कर जावित्री बोली, ‘‘अच्छा अब बस करो. मुझे स्कूल जाना है. वैसे ही देर हो चुकी है. अब और देर मत करो.’’

कह कर जावित्री साइकिल पर चढ़ी और चल पड़ी तो दीपक ने पीछे से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अभी तो प्यार की शुरुआत है, इसलिए मिलने के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करो.’’

जावित्री बिना कुछ बोले चली गई. दीपक अकसर जावित्री के स्कूल जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का रास्ता रोकता और कभी प्रेम से तो कभी थोड़ा गुस्से से अपने प्रेम का मनुहार करता. उत्तर प्रदेश के महानगर बरेली के फतेहगंज पश्चिमी थाना कस्बा के मोहल्ला लोधीनगर में वीरपाल मौर्य रहता था. उस के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. परिवार में पत्नी कमला देवी और 4 बेटियां थीं. सभी अववाहित थीं. जावित्री सब से छोटी थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खुबसूरत और चंचल थी. घर में सब से छोटी होने की वजह से मांबाप भी उसे ज्यादा प्यार करते थे.

जावित्री उम्र के उस पायदान पर खड़ी थी, जब शरीर में अनेक बदलाव आते हैं और दिल में उमंग की लहरें हिचकोले लेने लगती हैं. लोग उसे गहरी नजरों से देखने लगे थे. वह उन नजरों को पहचानने भी लगी थी. लेकिन दीपक उन सब से अलग था, उस की नजरें हमेशा उसे प्यार से देखती थीं. उस की आंखों में उस के लिए अलग तरह की चाहत थी. दीपक भी कम स्मार्ट और खूबसूरत नहीं था. वह भिठौरा मोहल्ले में रहता था. जावित्री और उस के घर के बीच की दूरी दो, ढाई सौ मीटर रही होगी. दीपक के पिता कांताप्रसाद मौर्य उर्फ पप्पू मेहनतमजदूरी करते थे. घर में पिता के अलावा मां रामवती और 2 बड़े भाई थे.

वीरपाल और कांताप्रसाद का ही नहीं, पूरे परिवार का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसी आनेजाने में जवान हो रही जावित्री पर दीपक की नजर पड़ी तो बरबस वह उस की ओर खिंचने लगा. घर में अन्य लोगों के होने की वजह से दीपक जावित्री से मन की बात कर नहीं पाता था. इसलिए वह इस फिराक में रहने लगा कि जावित्री अकेले में मिल जाए. संयोग से एक दिन ऐसा ही मौका उस के हाथ लग गया. जावित्री के घर वाले किसी समारोह में शामिल होने के लिए गए थे. जावित्री घर पर ही रह गई थी. इस बात का पता चलते ही किसी बहाने से दीपक उस के घर पहुंच गया. दरवाजे पर दस्तक दी तो जावित्री ने दरवाजा खोला. दीपक को देखते ही वह बोली, ‘‘सभी लोग शादी में गए हैं, घर में कोई नहीं है.’’

जावित्री की बात खत्म होते ही दीपक ने कहा, ‘‘जावित्री, मैं घर वालों से नहीं, सिर्फ तुम से मिलने आया हूं. चाचा से मिलना होता तो बाहर ही मिल लेता.’’

‘‘ठीक है, अंदर आ जाओ और बताओ मुझ से क्या काम है?’’ बगल होते हुए ही जावित्री बोली.

दीपक अंदर आ कर कमरे में खड़ा हो गया. तभी जावित्री ने कहा, ‘‘अब बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

दीपक जावित्री को घूरते हुए बोला, ‘‘दरअसल, मैं बहुत दिनों से तुम से अकेले में मिलना चाहता था. क्योंकि मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिल नहीं माना तो तुम से मिलने चला आया.’’

दीपक आगे कुछ और कहता, जावित्री को हंसी आ गई. उस ने हंसते हुए ही कहा, ‘‘आतेजाते तुम मुझे जिस तरह से देखते थे, उसी से मुझे तुम्हारे दिल की बात का पता चल गया था.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी मुझे पंसद करती हो. तुम्हारी बातों से तो यही लगता है कि जो मेरे दिल है, वही तुम्हारे दिल में भी है.’’

दीपक कुछ और कहता, जावित्री झट से बोली, ‘‘मम्मीपापा के आने का समय हो रहा है. वह कभी भी आ सकते हैं, इसलिए तुम अभी यहां से चले जाओ. मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम से बात कर लूंगी.’’

जावित्री के यह कहने के बावजूद भी दीपक वहीं खड़ा रहा और उस की खूबसूरती का बखान करता रहा. जावित्री को इस बात का डर था कि कहीं उस के मम्मीपापा न आ जाएं, इसलिए उस ने दीपक का हाथ पकड़ कर उसे  बाहर कर के अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन जातेजाते दीपक ने जावित्री को याद करा दिया कि उस ने बाहर मिलने का वादा किया है. जावित्री वादे को नहीं भूली और अगले दिन स्कूल जाते समय रास्ते में हमेशा की तरह दीपक दिखाई दिया तो इशारे से समझा दिया कि स्कूल से लौटते समय वह उस से मिलेगी. दीपक समय से पहले ही जावित्री के लौटने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का बेसब्री से इंतजार करने लगा.

जावित्री स्कूल से लौटी तो दीपक से उस की मुलाकात हुई. दीपक के प्यार को स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘हमें इस बात का खयाल रखना होगा कि हमारे प्यार को किसी की नजर न लगे. इस के लिए हमें सावधान रहना होगा. दीपक जावित्री के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, कौन प्रेमी चाहेगा कि उस की प्रेमिका की रुसवाई हो. तुम मुझ पर पूरा भरोसा रखो, मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हारा सिर नीचा हो.’’

समय बीतता रहा, लोगों की नजरों से बच कर दोनों मिलते रहे. जल्दी ही दोनों का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे एकदूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे, यहां तक कि जान भी दे सकते थे, पर एकदूसरे से कतई अलग नहीं हो सकते थे. लेकिन उन के यह प्रेमिल संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. दोनों के ही घर वालों तक उन के संबंधों की बात पहुंच गई. रिश्तेदारों को पता चला तो वे भी नाराज हो उठे. उस दिन जिंदगी में पहली बार वीरपाल ने बेटी को मारने के लिए हाथ उठाया. उस ने जावित्री की खूब पिटाई की. कमला ने किसी तरह पति को शांत कर के जावित्री को सामने से हटाया.

इस के बाद वीरपाल सीधे कांताप्रसाद के घर गया और उसे हिदायत दी कि वह दीपक को रोके वरना ठीक नहीं होगा. दीपक मिला तो वीरपाल ने उसे भी समझाया, लेकिन वह नहीं माना. इस के बाद वीरपाल और उस का भाई राजेंद्र तनाव में रहने लगे. उन्हें चिंता थी कि जावित्री और दीपक के प्रेमसंबधों की बात खुल गई तो समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन ऐसी बातें कहां छिपती हैं. घर वालों ने दीपक पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो पूरे समाज में बात फैल गई. एक दिन वीरपाल के चाचा प्रेमशंकर दीपक को रोक कर समझाने लगे तो वह उस से भिड़ गया. इस पर प्रेमशंकर ने उसे थप्पड़ मार दिया. उस समय तो दीपक खून का घूंट पी कर चला गया. लेकिन अगले दिन जब प्रेमशंकर घर के बाहर बैठे थे तो दीपक अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा और बेल्टों से उन्हें जम कर पीटा. इस तरह उस ने अपने अपमान का बदला ले लिया.

प्रेमशंकर ने थाना फतेहगंज पश्चिमी में दीपक और उस के दोस्तों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. प्रेमशंकर के साथ घटी घटना की जानकारी वीरपाल को हुई तो उस ने कुछ दिनों बाद दीपक के दोस्तों से मारपीट की. अब तक जावित्री और दीपक का मिलना आम हो गया था. इस बात से वीरपाल बेहद खफा रहता था. ढाई महीने पहले उस ने वार्ड मेंबर को बीच में डाल कर एक पंचायत बुलाई. पंचायत ने दीपक को जावित्री से मिलने से मना किया तो उस ने भरी पंचायत में कह दिया कि यह संभव नहीं है. वह जावित्री से हरगिज दूर नहीं रह सकता. इस पर वीरपाल भड़क उठा और पंचायत के सामने ही दीपक को लातघूंसों से मारा.

इस के बाद दीपक दिल्ली चला गया. मार्च में होली पर घर लौटा तो 10 दिनों के लिए कांवर लेने हरिद्वार चला गया. वहां से वह 15 मार्च को लौटा. उस का एक दोस्त था सोनू, जो ट्रैक्टर मैकेनिक था और वीरपाल के मकान में किराए पर रहता था. 24 मार्च को उस की बेटी का नामकरण संस्कार था, जिस में दीपक को भी निमंत्रण दिया गया था. 24 मार्च की रात दीपक दावत में पहुंचा, लेकिन वहां से वह लौट कर नहीं आया. दावत में जावित्री भी थी, वह भी गायब हो गई थी. अगले दिन दोनों के घर वालों ने उन की तलाश शुरू की. जब वे नहीं मिले तो दोनों के घर वाले थाना फतेहगंज पश्चिम पहुंचे. वीरपाल ने दीपक के खिलाफ जावित्री के अपहरण की रिपोर्ट लिखवाई तो कांताप्रसाद ने वीरपाल, राजेंद्र, प्रेमशंकर और कमला देवी के खिलाफ दीपक के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर वे अपनेअपने घर लौट आए.

6 अप्रैल को भिठौरा के एक तालाब में एक बोरा तैरता दिखाई दिया, जिस में से इंसानी पैर बाहर निकले थे. मोहल्ले वालों ने इस बात की जानकारी थाना फतेहगंज पश्चिमी पुलिस को दी. थानाप्रभारी अखिलेश सिंह यादव छुट्टी पर थे, इसलिए थाने का प्रभार देख रहे एसआई अवधेश कुमार पुलिस बल के साथ उस तालाब के किनारे पहुंचे. उन्होंने बोरे को तालाब से निकलवाया तो उस में से एक लड़की की लाश बरामद हुई. लोगों ने उस लाश की शिनाख्त जावित्री के रूप में की. लाश के साथ बोरे से 8 ईंटें भी बरामद हुईं. अनुमान लगाया गया कि लाश को पानी में डुबोने के लिए लाश के साथ बोरे में ईंटें भी रखी गई थीं. लाश सड़ गई तो बोरा तालाब की सतह पर आ गया. जावित्री के घर वाले भी वहां मौजूद थे.

पुलिस ने उन से पूछताछ की तो वे जावित्री की हत्या का आरोप दीपक पर लगाने लगे. उसी बीच एसआई अवधेश कुमार के इशारे पर सिपाहियों ने वीरपाल के मकान का मुआयना किया तो वहां से पुलिस को जो सुराग मिले, वे कुछ और ही कहानी कह रहे थे. एक तो जिस तालाब में जावित्री की लाश मिली थी, वह वीरपाल के मकान के ठीक पीछे था. इस के अलावा जिस तरह के बोरे में जावित्री की लाश मिली थी, उसी तरह के धान भरे हुए बोरे वीरपाल के घर में रखे थे. बोरे से ईंटें बरामद हुई थीं, उसी मार्का की ईंटें वीरपाल के घर में लगी थीं. लेकिन पुलिस ने उस समय वीरपाल से कुछ नहीं कहा, उन्होंने घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इसी बीच घटना की जानकारी मिलने पर थानाप्रभारी अखिलेश यादव थाने आ गए. उन्होंने पूरी घटना पर गंभीरता से विचार किया. इस के बाद पुलिस ने वीरपाल और उस के भाई राजेंद्र को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी. वीरपाल का कहना था कि दीपक ने उस की बेटी की हत्या की है. लेकिन जब सुबूतों का हवाला देते हुए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने जावित्री की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. हत्या में उस का भाई राजेंद्र और लाश ठिकाने लगाने में उस का साढ़ू राजाराम और साथी टेनी उर्फ अरविंद ने साथ दिया था. राजाराम और टेनी भिठौरा में ही रहते थे. पुलिस ने उसी दिन टेनी को भी गिरफ्तार कर लिया. राजाराम घर से फरार था.

उस ने थानाप्रभारी को बताया कि दीपक खुद गायब नहीं हुआ, बल्कि उसे गायब कर के उस की हत्या कर दी गई है. जो बाप अपनी बेटी की हत्या कर सकता है, उस के लिए दीपक का कत्ल करना कोई बड़ी बात नहीं है. इस के बाद पुलिस ने 8 अप्रैल को सभी से अलगअलग पूछताछ की तो उन्होंने दीपक और जावित्री की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

24 मार्च को दीपक सोनू के यहां दावत में पहुंचा तो वहां जावित्री से उस की मुलाकात हो गई. दीपक ने उसे इशारे से पीछे आने को कहा. जावित्री सब की नजरें बचा कर उस के पीछेपीछे चली गई. उधर वीरपाल को जावित्री नहीं दिखी तो उस ने दीपक के बारे में पता किया. वह भी वहां नहीं था. वह समझ गया कि दीपक उस की बेटी को अपने साथ कहीं ले गया है. उस ने वहां मौजूद अपने भाई राजेंद्र को यह बात बताई और उसे साथ ले कर उस की खोज में निकल पड़ा. कुछ ही दूरी पर उन्हें एक खंडहर में दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिल गए. उन्हें उस स्थिति में देख कर उन का खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने दीपक को पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. जावित्री घर की ओर भागी कि वह लोगों को दीपक को बचाने के लिए बुला लाए. वीरपाल और राजेंद्र ने दीपक को पीटपीट कर अधमरा कर दिया.

इस के बाद ईंटों से उस का सिर और चेहरा कुचल कर मार डाला. तभी जावित्री लौट कर आ गई. उस ने दीपक को मरा पाया तो वह बगावत पर उतर आई. उस ने कहा कि वह सब कोबता देगी कि दीपक की हत्या उन्होंने की है. वह उन्हें सजा दिलवा कर रहेगी. इस पर दोनों भाइयों ने जावित्री को पकड़ लिया और बेल्ट से उस का गला कस कर उसे भी मार डाला. रात 12 बजे वीरपाल ने मोहल्ले में ही रहने वाले साढू राजाराम और उस के साथ काम करने वाले टेनी को फोन कर के बुलाया. दोनों के आने पर उस ने उन्हें पूरी बात बता कर मदद मांगी. इस के बाद वह घर गया और धान के 2 बोरे ले आया. एक बोरे में उस ने जावित्री की लाश भरी और दूसरे में दीपक की.

जावित्री की लाश वाला बोरा वीरपाल, राजाराम और टेनी घर ले गए और उस में 8 ईंटें डाल कर बोरे का मुंह बंद करके घर के पीछे वाले तालाब में फेंक दिया. वजन की वजह से बोरा तलहटी में बैठ गया. इस के बाद टेनी अपने घर चला गया. राजाराम वहां से अपने छोटे भाई के घर गया और मोटरसाइकिल ले आया. राजाराम और राजेंद दीपक के लाश वाले बोरे को ले कर मोटरसाइकिल से नेशनल हाईवे पर मीरगंज के पहले भखड़ा नदी के पुल पर ले गए और ऊपर से ही बोरे को नीचे फेंक दिया. नदी सूखी थी, इसलिए लाश जमीन पर जा गिरी. वे घर लौट आए और घर से फावड़ा ले कर फिर वहां पहुंचे. नदी में बने टापू पर करीब तीन फुट गहरा गड्ढा खोद कर उस में दीपक की लाश वाला बोरा गाड़ दिया और घर लौट आए.

वीरपाल ने तो अपने हिसाब से सब कुछ बड़े अच्छे तरीके से किया था. लेकिन बेटी की लाश ने पानी के ऊपर आ कर उस की चुगली कर दी तो पुलिस के हाथ उस तक पहुंच ही गए. उस की निशानदेही पर पुलिस ने भखड़ा नदी में बने मिट्टी के टापू से दीपक की लाश बरामद कर ली और पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने दीपक के अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं जोड़ कर सभी अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त ईंटें, बेल्ट और फावड़ा बरामद कर लिया. 9 अप्रैल को पुलिस ने वीरपाल, राजेंद्र और टेनी को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 10 अप्रैल को पुलिस ने राजाराम को भी गिरफ्तार कर कर के जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.

Hindi Crime Stories: एक थी प्रिया

Hindi Crime Stories: डा. प्रिया की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन के और डा. कमल के संबंध पतिपत्नी की तरह नहीं बन पाए थे. आखिर इस की वजह क्या थी, आगे इस का परिणाम क्या हुआ?  दिल्ली के थाना नबी करीम पुलिस की जीप 18 अप्रैल की रात करीब 2 बजे पहाड़गंज स्थित होटल प्रेसीडेंसी पहुंची तो मैनेजर बाहर ही मिल गया. थानाप्रभारी जीप से जैसे ही उतरे, मैनेजर ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हमारे होटल के कमरा नंबर 302 में ठहरी डा. प्रिया वेदी  के कमरे में कोई हलचल नहीं हो रही है. हमें डर लग रहा है कि उस में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?’’

‘‘डा. प्रिया वेदी कौन हैं, होटल में कब से ठहरी हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘वह अकेली ही थीं या उन के साथ कोई और भी था?’’

‘‘सर, आज ही दिन के साढ़े बारह बजे के आसपास वह अकेली ही आई थीं. सामान के नाम पर उन के पास एक ट्रौली बैग था. पहचान पत्र के रूप में उन्होंने राजस्थान ट्रांसपोर्ट अथौरिटी की ओर से जारी किया गया ड्राइविंग लाइसेंस दिया था.’’

‘‘वह जब से आईं, बाहर बिलकुल नहीं निकलीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कमरे में जाने के बाद से उन्होंने न तो रूम अटेंडेंट को बुलाया है और न ही कमरे से बाहर निकली हैं. सर, जब वह यहां आई थीं तो कुछ तनाव में लग रही थीं. रिसैप्शन पर ही मैं ने उन्हें ठंडा पानी मंगा कर पिलाया था, ताकि वह रिलैक्स महसूस करें. मैं ने उन से पूछा भी था, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था. वैसे भी किसी से उस की व्यक्तिगत बातों के बारे में ज्यादा नहीं पूछा जा सकता.’’

‘‘इस बीच आप ने उन के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘सर, आधी रात तक जब उन के कमरे से किसी तरह की सर्विस की कोई काल नहीं आई तो मैं ने रूम अटेंडेंट को भेजा कि जा कर मैडम से पूछ लो कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है. लेकिन बारबार बेल बजाने के बाद भी जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ और मैं ने पुलिस को सूचना दे दी.’’ मैनजर ने एक ठंडी सांस ले कर कहा.

‘‘चलो, मुझे वह कमरा दिखाओ, जिस में डा. प्रिया वेदी ठहरी हुई हैं.’’

मैनेजर पुलिस टीम को तीसरी मंजिल स्थित कमरा नबंर 302 पर ले गया. थानाप्रभारी ने कमरे का दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की. जब दरवाजा खुलवाने की उन की हर कोशिश नाकामयाब हो गई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब कमरे का दरवाजा तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.’’

मैनेजर ने रिसैप्शन से 2-3 कर्मचारियों को बुलवा लिया तो उन्होंने कमरे के दरवाजे पर जोरजोर धक्के दिए, जिस से अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर कमरे में पड़ा बैड खाली मिला. कमरे से अटैच बाथरूम खोला गया तो उस में डा. प्रिया खून से लथपथ पड़ी थीं. उन के एक हाथ की नस कटी थी तो दूसरे में ड्रिप लगी थी. होटल मैनेजर ने बताया कि यही डा. प्रिया वेदी हैं. थानाप्रभारी ने डा. प्रिया की नब्ज देखी तो वह थम चुकी थी. उन में जीवन का कोई भी लक्षण नहीं था. थाना नबी करीम पुलिस डा. प्रिया की लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि उन के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर थाना डिफेंस कालोनी पुलिस भी उन के घर वालों के साथ होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई.

घर वालों ने भी उस लाश की शिनाख्त डा. प्रिया के रूप में कर दी. उन्होंने बताया कि यह दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट थीं और अपने पति डा. कमल वेदी के साथ एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहती थीं. पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो डा. प्रिया वेदी का लिखा साढ़े 3 पेज का एक सुसाइड नोट मिला. होटल के कमरे का हर सामान अपनी जगह रखा था. डा. प्रिया का भी सामान सुरक्षित था. इस से साफ लग रहा था कि यह हत्या का नहीं, खुदकुशी का ही मामला है. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद डा. प्रिया वेदी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इतनी काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी.

19 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने डा. प्रिया की लाश घर वालों को सौंप दी तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंतिम संस्कार में एम्स के भी कई डाक्टर शामिल हुए थे. वे डा. प्रिया की मौत को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डा. प्रिया वेदी ने आत्महत्या की है. उन का कहना था कि वह बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थीं. साथी डाक्टरों से उन के काफी अच्छे संबंध थे. उन का कहना था कि उन्होंने अपने दिल में छिपे दर्द का  कभी किसी को अहसास नहीं होने दिया. डा. प्रिया एम्स में अगस्त, 2014 से एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के पद पर काम कर रही थीं. उन के पति डा. कमल वेदी भी एम्स में ही स्किन के डाक्टर थे. वह डा. कमल से एक साल जूनियर थीं.

होटल के कमरे में पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, उस में डा. प्रिया ने पति पर समलैंगिक होने का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने भी आई है कि डा. प्रिया ने खुदकुशी करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर कई बातें लिखी थीं. डा. प्रिया ने फेसबुक पर लिखा था कि मैं पिछले 5 सालों से डा. कमल वेदी के साथ शादीशुदा जिंदगी बिता रही हूं, लेकिन हमारे शारीरिक संबंध नहीं बने, जो कि दांपत्य के लिए जरूरी होते हैं. शादी ही इसी के लिए होती है. मुझे एक फर्जी ईमेल आईडी मिली थी, जिस के द्वारा मेरे पति समलैंगिकों से बातें करते थे. मुझे जब इन सब बातों का पता चला तो मुझे प्रताडि़त किया जाने लगा.

उसी दिन डा. प्रिया के घर वालों ने दिल्ली के नबी करीम पुलिस थाने में डा. कमल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करा दिया. दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जांच में मिले साक्ष्यों एवं डा. प्रिया के घर वालों के बयान के आधार पर 19 अप्रैल को डा. कमल को गिरफ्तार कर लिया. डा. प्रिया कौन थीं, कितने संघर्षों के बाद डाक्टर बन कर उन्होंने पिता का सपना पूरा किया था? इतना संघर्ष कर के जीवन को संवारने वाली डा. प्रिया ने आखिर आत्महत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हमें जयपुर से शुरुआत करनी होगी.

राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो गुलाबी नगर के नाम से मशहूर है, के चांदपोल बाजार में एक छोटी सी गली है, जिसे गोविंदरावजी का रास्ता कहते हैं. इसी रास्ते में कान महाजन बड़ के पास रामबाबू वर्मा रहते हैं. वह टेलरिंग यानी कपड़ों की सिलाई की दुकान से गुजरबसर करते थे. उन के 3 बच्चे थे, सब से बड़ा बेटा विजय, उस से छोटी बेटी प्रिया और सब से छोटा बेटा लोकेश. उन के तीनों ही बच्चे पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थे. रामबाबू वर्मा खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, लेकिन वह बच्चों को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे. यही उन का सपना भी था, जिसे पूरा करने के लिए वह जम कर मेहनत कर रहे थे. उन का चूनेमिट्टी का मकान था. सीमित आय थी. जाहिर है, घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. कपड़ों की सिलाई की आमदनी से किसी तरह परिवार की दालरोटी चल रही थी. बच्चे पढ़ने लगे तो खर्च बढ़ता गया.

लेकिन रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी. वह बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन दूनी और रात चौगुनी मेहनत करने लगे. पत्नी भी उन का साथ देती थीं. इस तरह बच्चों की पढ़ाई के लिए पतिपत्नी न दिन देख रहे थे न रात. पतिपत्नी की दिनरात की मेहनत रंग लाई और बड़े बेटे विजय का सिलेक्शन मैडिकल में हो गया. प्रिया उस से छोटी थी. भाई के सिलेक्शन के बाद उस ने भी डाक्टर बनने का मन बना लिया. पढ़ाई में वह तेज थी ही, भाई का सपोर्ट मिला तो उस ने भी मातापिता को निराश करने के बजाय उन के सपनों में रंग भर दिया.

प्रिया ने प्रीमैडिकल टैस्ट पास कर लिया. बड़ा बेटा विजय मैडिकल की पढ़ाई कर ही रहा था. रामबाबू वर्मा के लिए 2 बच्चों की मैडिकल की पढ़ाई का खर्च वहन करना मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बैंक से बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, लेकिन उन की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. प्रिया का अजमेर के जेएलएन मैडिकल कालेज में दाखिला हुआ था. वह पूरी लगन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. बीचबीच में वह घर भी आती रहती थी. इस तरह चांदपोल की गली में प्रिया आइडियल गर्ल बन गई थी. क्योंकि पुराने से मकान में रह कर गरीबी में पलबढ़ कर वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब प्रिया एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर के डाक्टर बन गई. रामबाबू वर्मा के लिए वह सब से ज्यादा खुशी का दिन था. उन का सब से बड़ा सपना पूरा हो गया था. बड़े बेटे विजय के डाक्टर बनने से ज्यादा खुशी उन्हें प्रिया के डाक्टर बनने से हुई थी. इस के बाद 24 अप्रैल, 2010 को उन्होंने प्रिया की शादी डा. कमल वेदी से कर दी. डा. कमल वेदी राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले महेश वेदी के बेटे थे. परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी धूमधाम से हुई थी. रामबाबू वर्मा के लिए खुशी की बात थी कि उन्हें डाक्टर बेटी के लिए डाक्टर दामाद भी मिल गया था. वह निश्चिंत थे कि बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.

दोनों की जोड़ी खूब जमेगी. प्रिया भी अपने ही पेशे का जीवनसाथी मिलने से खुश थी. वह जानती थी कि एक डाक्टर की भावना को दूसरा डाक्टर ही अच्छी तरह समझ सकता है. बेटी को डाक्टर बना कर और उस की शादी कर के रामबाबू वर्मा  एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे. अब उन के ऊपर छोटे बेटे लोकेश की जिम्मेदारी रह गई थी. लोकेश भी पढ़ाई में तेज था. वह बैंक की नौकरियों की तैयारी कर  रहा था. वह भी अपने प्रयासों में सफल हो गया और उसे बैंक में नौकरी मिल गई. फिलहाल वह कोटा में एक बैंक में प्रोबेशनरी अफसर है. डा. कमल वेदी को उसी बीच सन 2012 में दिल्ली के एम्स में नौकरी मिल गई. वह एम्स में स्किन के डाक्टर हैं. इस के बाद सन 2014 में डा. प्रिया भी एम्स में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के रूप में तैनात हो गईं. पतिपत्नी को एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहने के लिए मकान भी मिल गया था.

डा. प्रिया को भले ही एम्स में पति डा. कमल के साथ नौकरी मिल गई थी, लेकिन वह खुश नहीं थीं. डा. प्रिया के मायके वालों के अनुसार डा. कमल ने प्रिया को कभी पति का प्यार नहीं दिया. वह अपने वैवाहिक जीवन को ले कर परेशान रहती थी. जब इस बात की जानकारी रामबाबू को हूई तो उन्होंने कमल के पिता महेश वेदी से बात की. महेश वेदी ने रामबाबू को भरोसा दिलाया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. डा. कमल ने भले ही प्रिया के वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनों को चूरचूर कर दिया था, लेकिन प्रिया अपने पति कमल से बेहद प्यार करती थी. वह न तो पति को छोड़ना चाहती थी और न ही अपने परिवार को टूट कर बिखरने देना चाहती थी.

करीब ढाई साल पहले रामबाबू वर्मा को जब बेटी पर हो रहे जुल्मों की जानकारी मिली तो प्रिया ने उन्हें मां की कसम दिला  कर चुप करा दिया था. वह चुपचाप मानासिक और शारीरिक अत्याचार सहन करती रही. डा. प्रिया ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द बयां किया था. उन्होंने लिखा था कि शादी के 6 महीने बाद ही मुझे यकीन हो गया था कि मेरा पति डा. कमल समलैंगिक है और उस के कई लोगों के साथ समलैगिक संबंध हैं. उनहोंने लोगों के नाम भी फेसबुक पर लिखे थे. उन्होंने जब कमल के लैपटौप में उस के समलैंगिक संबंधों के सबूत दिखाए तो कमल ने कहा कि किसी ने उस का एकाउंट हैक कर के इस तरह की चीजें डाल दी हैं.

डा. प्रिया ने आगे लिखा था कि मैं सच जान चुकी थी. फिर भी मैं कमल से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह मेरे प्यार को समझ नहीं पाए. अगर हमारे समाज में ऐसे लोग हैं तो कभी उन से शादी मत कीजिए. अपने जीवन के अंतिम समय से कुछ घंटे पहले डा. प्रिया ने फेसबुक पर जो स्टेटस अपडेट किया था, उस में डा. कमल को गुनहगार बताया था. उन का कहना था कि वह कमल से बेहद प्यार करती थीं, इस के बावजूद उस ने उसे छोटीछोटी चीज के लिए तरसाया. केवल एक महीने पहले उस ने खुद को समलैंगिक माना. इस सब के बावजूद वह उस की मदद करना चाहती थीं, लेकिन वह उसे टौर्चर करता रहा.

इसी फेसबुक पेज पर डा. प्रिया ने एक रात पहले के वाकए का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘तुम ने मुझे इतना अधिक टौर्चर किया है कि अब तुम्हारे साथ सांस भी नहीं ले सकती. तुम इंसान नहीं, राक्षस हो, क्योंकि तुम ने मेरी खुशी छीन ली. तुम्हारे जैसे लोग केवल लड़की और उस के घर वालों की भावनाओं से खेलते हैं. डा. कमल, मैं ने तुम से कभी कुछ नहीं चाहा था, क्योंकि मैं तुम्हें बेहद प्यार करती थी, जबकि तुम ने कभी मेरे प्यार की अहमियत नहीं समझी. कमल तुम मेरे गुनहगार हो. 18 अप्रैल की सुबह डा. प्रिया जब उठीं तो बेहद तनाव में थीं. बीती रात ही डा. कमल ने उस से झगड़ा किया था. वह फ्रेश हुईं और एक ट्रौली बैग में जरूरी सामान रख कर कुछ देर वह सोचती रहीं, फिर एकाएक मन को कठोर कर के अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी होने की बात कह कर घर से निकल पड़ीं.

सुबह करीब साढ़े 9 बजे प्रिया ने जयपुर में अपने पिता को फोन किया कि प्लीज पापा, जल्दी आ जाओ. आप नहीं आओगे तो मेरा मरा मुंह देखोगे. उसी दिन सुबह करीब 11 बजे प्रिया ने कोटा में रहने वाले अपने छोटे भाई लोकेश को फोन कर के यही बातें कही थीं. प्रिया की बातों से उस के घर वालों की चिंता बढ़ गई थी. रामबाबू वर्मा तुरंत घर वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. दूसरी ओर कोटा से छोटा भाई लोकेश भी अपने एक कजिन के साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा था. रास्ते से उन्होंने कई बार प्रिया को फोन किए, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इस बीच प्रिया का भी कोई फोन नहीं आया.

जब रामबाबू वर्मा, लोकेश और उन के अन्य रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे तो रात हो चुकी थी. प्रिया के बारे में जब उन्हें कोई सही सूचना नहीं मिली तो सभी थाना डिफेंस कालोनी पहुंचे और प्रिया की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर प्रिया के मोबाइल के आधार पर उस की लोकेशन पता की तो वह पहाड़गंज इलाके में मिली. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह पहाड़गंज में होंगी. पुलिस ने प्रिया के पति डा. कमल एवं घर के अन्य लोगों से भी बात की. वे भी प्रिया के बारे में कुछ नहीं बता सके थे. इस के बाद पुलिस मिली मोबाइल लोकेशन के आधार पर रामबाबू वर्मा, लोकेश एवं डा. कमल आदि को साथ ले कर पहाड़गंज के होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई, जहां डा. प्रिया की लाश मिली.

पूछताछ में पता चला कि डा. प्रिया एवं डा. कमल के रिश्तों में इतनी दूरियां आ चुकी थीं कि इसी साल 26 जनवरी को जब जयपुर में प्रिया के छोटे भाई लोकेश की शादी थी तो उस में केवल प्रिया ही गई थी. लेकिन प्रिया ने अपने व्यवहार से किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि हालत यहां तक पहुंच चुकी है. बहरहाल, डा. प्रिया की मौत ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं. उस के घर वाले प्रिया को इंसाफ दिलाने की मांग कर रहे हैं. जयपुर के स्टैच्यू सर्किल पर प्रिया की याद में कैंडल मार्च भी निकाला गया. फेसबुक पर तेजी से वायरल होने के बाद डा. प्रिया का सुसाइड नोट उस में से हटा दिया गया. डा. प्रिया का वाल पोस्ट उस की मौत के बाद करीब साढ़े 3 हजार लोगों ने शेयर किया था. इस के बाद फेसबुक ने प्रिया की प्रोफाइल को रिमेंबरिंग प्रिया वेदी कर दिया, साथ ही उन का वाल पोस्ट फेसबुक से हटा दिया. Hindi Crime Stories

 

Crime Stories: एक और निर्भया

लेखक – कस्तूरी रंगाचारी    

Crime Stories: बलात्कार अक्षम्य अपराध है, लेकिन कभीकभी हकीकत जानने के बाद भी लोग इसे छिपाने की कोशिश करते हैं. इस से बलात्कारियों के हौसले बढ़ते हैं. विद्या के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था, लेकिन…

कालेज से आते ही मैं ने और भइया ने मम्मी को परेशान करना शुरू कर दिया था. हम ने उन से गरमगरम पकौड़े बनाने के लिए कहा था. मम्मी पकौड़े बनाने की तैयारी कर रही थीं, तभी नीचे से तेजतेज आती आवाजें सुनाईं दीं.

‘‘ये कैसी आवाजें आ रही हैं?’’ कहते हुए रमेश भइया बालकनी की ओर भागे. उन के पीछेपीछे मैं और मम्मी भी बालकनी में आ गए. हम ने देखा, हमारी बिल्डिंग के नीचे एक जीप खड़ी थी, जिस से 4 लोग आए थे. वे स्वाति दीदी के फ्लैट के बाहर खड़े उन्हें धमका रहे थे. वे शक्लसूरत से ही गुंडेमवाली लग रहे थे. दरवाजा बंद था. इस का मतलब वह अंदर थीं, क्योंकि अब तक उन के औफिस से आने का समय हो गया था. यह बात पक्की थी कि वह उन गुंडों की धमकी को सुन रही थीं. कुछ देर तक नीचे से धमकाने के बाद भी जब दीदी बाहर नहीं आईं तो उन्हें लगा कि अब उन्हें उन के सामने आ कर धमकाना चाहिए. वे सीढि़यां चढ़ने लगे. उन के जूतों की आवाज स्वाति दीदी के दरवाजे की ओर बढ़ रही थी.

रमेश दरवाजे की ओर बढ़ तो मैं भी उस के पीछेपीछे चल पड़ी. मैं ने पीछे से पुकारा, ‘‘तुम दोनों कहां जा रहे हो?’’

‘‘वे सभी स्वाति दीदी के फ्लैट के सामने आ गए हैं,’’ रमेश ने हैरानी से कहा, ‘‘वह घर में अकेली होंगी. हमें उन की मदद के लिए जाना चाहिए, पता नहीं वे लोग क्या चाहते हैं? उन की बातों से साफ लग रहा है कि वे किसी अच्छे काम के लिए नहीं आए हैं.’’

‘‘तो क्या तुम दोनों उन गुंडेमवालियों से निपट लोगे?’’ मम्मी ने कहा.

‘‘भले ही निपट न पाएं, पर इन स्थितियों में कुछ तो करना ही होगा. हम घर में बैठ कर तमाशा तो नहीं देख सकते.’’ रमेश ने कहा.

मम्मी हमें रोक पातीं, इस से पहले ही हम दोनों दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. जीप से आए चारों आदमी स्वाति दीदी के दरवाजे के सामने खड़े हो कर दरवाजा खोलने के लिए कह रहे थे. उन का सरगना दरवाजे पर ठोकर मारते हुए कह रहा था. ‘‘जल्दी दरवाजा खोल कर बाहर आओ, वरना हम दरवाजा तोड़ देंगे.’’

‘‘हमारे नेता को बदनाम करने का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’ उस के पीछे खड़े दूसरे आदमी ने कहा.

अब तक मैं और रमेश वहां पहुंच चुके थे. रमेश ने कहा, ‘‘तुम लोग यहां क्या कर रहे हो, क्यों इतना शोर मचा रखा है?’’

उन में से एक आदमी ने पलट कर रमेश को घूरते हुए कहा, ‘‘तू अपना काम कर न, क्यों बेकार में बीच में पड़ रहा है.’’

रमेश भइया कुछ कहते, तब तक स्वाति दीदी का दरवाजा खुल गया. मैं ने उन की ओर देखा सलवार सूट पहने वह आराम से दरवाजे पर खड़ी थी. उस स्थिति में भी उन के चेहरे पर शांति झलक रही थी, साफ लग रहा था कि उन्हें इन लोगों से जरा भी डर नहीं लग रहा है. वह उन गुंडों की ओर देखते हुए मुसकरा रही थी. दरवाजे पर दीदी को देख कर उन चारों में से एक आदमी ने आगे आ कर कहा, ‘‘आप ने हमारे नेता का अपमान किया है, सरेआम उन की खिल्ली उड़ाई है. अब उस का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही होगा.’’

स्वाति दीदी उसी तरह खामोशी से खड़ी उन्हें देख रही थीं. उस आदमी की बात पूरी  होते ही उन्होंने पूछा, ‘‘कौन हैं तुम्हारे नेताजी, जिन का मैं ने अपमान कर दिया है?’’

‘‘मूलचंदजी, जिन्होंने कल रेप वाले मामले में बयान दिया था.’’

रेप की बात सुन कर मुझे लगा, जैसे किसी ने गरम सलाख मेरे शरीर पर रख दी हो. मन किया, यहां से चली जाऊं, लेकिन उस समय स्वाति दीदी उन चारों से घिरी थीं, इसलिए मजबूरन मुझे रुकना पड़ा. स्वाति दीदी ने बहुत ही ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा तो तुम लोग मूलचंद के आदमी हो.’’

‘‘जी. अब तुम्हें उन से माफी मांगनी होगी.’’

‘‘माफी किस बात की?’’

‘‘जब हमारे नेताजी ने कहा कि जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ, वह खुद इस के लिए जिम्मेदार थी, तो तुम ने हमारे नेताजी को गलत बताया. उस के बाद से सारे चैनल तुम्हारी इसी बात को बारबार दोहरा रहे हैं, जिस से हमारे नेताजी झूठे साबित हो रहे हैं. अखबारों ने इसे प्रमुखता से छापा है.’’

‘‘उन्होंने जो कहा, वह गलत था, इसलिए मैं ने विरोध किया है.’’

‘‘उन के खिलाफ मीडिया में बयान दे कर तुम ने हमारे नेता का अपमान नहीं किया?’’

‘‘मैं ने उन का अपमान नहीं किया, बल्कि उन्हें सही राह दिखाई है. 15 साल की लड़की के साथ बलात्कार हुआ है, जो दसवीं में पढ़ रही थी. उस समय वह ट्यूशन पढ़ कर घर आ रही थी. शाम के 5 बज रहे थे, दिनदहाड़े उन लोगों ने उस का अपहरण कर लिया और सुनसान में ले जा कर उस के साथ बलात्कार किया. ऐसे में उस बच्ची की गलती कैसे कही जा सकती है?’’

एक 15 साल की लड़की, जो स्कूल में पढ़ रही थी, उस के साथ बलात्कार हुआ था. वह मुझ से केवल एक साल छोटी थी. मुझे लगा, एक बार फिर वह गरम सलाखें मेरे शरीर पर रख दी गईं. मेरे मुंह से कुछ निकलने वाला था कि मैं ने मुंह पर अपना हाथ रख लिया. स्वाति दीदी ने हैरानी से मेरी ओर देखा, ‘‘बेटा, क्या बात है?’’

मैं ने एक आदमी को हटाते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं दीदी, मुझे घर जाना चािहए.’’

मैं अपने फ्लैट की ओर बढ़ी. मैं दरवाजे के पास पहुंची ही थी कि मैं ने सुना, स्वाति दीदी कह रही थीं, ‘‘क्या तुम्हारी कोई बहन स्कूल नहीं जाती है? उस के साथ ऐसा हो जाए तो? वैसे मैं तुम्हें बता दूं कि मैं ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया है.’’

मैं घर आई तो मम्मी काफी शांत थीं. मुझे पता था कि पापा आएंगे तो वह हमारी शिकायत जरूर करेंगी कि हम लोगों ने उन की बात नहीं मानी और उन के मना करने के बाद भी हम स्वाति दीदी की मदद करने चले गए. जबकि वे गुंडे थे. मैं उन की ओर ध्यान दिए बगैर अपने कमरे में चली गई. रमेश मेरे आने के एक घंटे बाद आया. उस के आते ही मैं ने पूछा, ‘‘पुलिस आ गई थी?’’

‘‘नहीं, पुलिस नहीं आई. स्वाति दीदी ने पुलिस बुलाई ही कहां थी. वह तो उन्होंने गुंडों को सिर्फ डराने के लिए कहा था.’’ रमेश ने स्वाति दीदी की बुद्धि की सराहना करते हुए कहा, ‘‘जैसे ही उन्होंने पुलिस का नाम लिया, चारों गुंडे तुरंत भाग निकले थे.’’

रमेश ने बताया कि उन गुंडों के जाने के बाद स्वाति दीदी उसे अपने फ्लैट में ले गई थीं.

खूबसूरत और शांत स्वभाव की स्वाति दीदी 2 महीने पहले ही हमारे पड़ोस वाले फ्लैट में रहने आई थीं. रमेश उन से बहुत प्रभावित था, मुझे भी वह पसंद थीं. बातचीत से ही वह पढ़ीलिखी और बुद्धिमान लगती थीं. रमेश अपने और स्वाति दीदी के बीच हुई बातचीत बताने को बेचैन था. उस ने कहा, ‘‘जानती हो वह वकील और एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह एक ऐसी सामाजिक संस्था की सदस्य हैं, जो रेप की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने का काम करती है. इस के अलावा वह रेप की शिकार मासूमों को समाज में उन का स्थान दिलाने में भी मदद करती हैं. उन की संस्था का नाम है ए सेकेंड लाइफ यानी एएसएल.’’

थोड़ी खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘रेप महिलाओं के साथ होने वाला सब से खतरनाक अपराध है. लेकिन इस बात को समझ कर रेप की शिकार मासूमों की काउंसलिंग करा कर उन में आत्मविश्वास वापस लाने में मदद करने के बजाय हम उन के बारे में अफवाहें फैला कर उन्हें बदनाम करते हैं.’’

‘‘रमेश, मुझे तुम्हारी इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’ कह कर मैं ने उसे चुप कराना चाहा, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करे. लेकिन रमेश ने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया. उस ने कहा, ‘‘एएसएल के सदस्य पीडि़त के साथ खड़े हो कर उस के जीवन को फिर से सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं. हम सभी को भी यह काम करना चाहिए.’’

रमेश क्षण भर के लिए रुका. उसी बीच मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मैं ने कहा न, इन बातों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. रेप कितने शर्म की बात है.’’

रमेश ने जैसे मेरी बात सुनी ही नही. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं भी एएसएल का सदस्य बनने की सोच रहा हूं.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी रेप पीडि़तों की मदद करना चाहते हो? लगता है स्वाति दीदी से तुम्हें कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है?’’ मैं ने कहा, ‘‘ओह माई गौड! रमेश, वह उम्र में तुम से काफी बड़ी हैं. तुम उन्हें दीदी कहने के बजाय उन का नाम ले रहे हो. मालूम है न, वह तुम से कम से कम 8 या 9 साल बड़ी होंगी?’’

‘‘उम्र का इस मामले से क्या संबंध?’’ रमेश जोर से हंसा, ‘‘उम्र तो एक गिनती है.’’

इस तरह मैं ने बात का रुख स्वाति दीदी की ओर मोड़ दिया और रेप की बात समाप्त करने में कामयाब हो गई. लेकिन अपने मन से इस बात को नहीं निकाल सकी कि जब पापा को इस बारे में पता चलेगा तो वह हमें डाटेंगे जरूर, क्योंकि हम ने ऐसे मामले में टांग अड़ाई थी, जिस का संबंध हम लोगों से बिलकुल नहीं था. हम ने खुद को खतरे में डाला था लेकिन न जाने क्या सोच कर मम्मी ने इस मामले में हम बहनभाई को बचा लिया था. मुझे रमेश पर खतरा मंडराता दिखाई देर रहा था. अब वह अक्सर स्वाति दीदी के घर जाने लगा था. वह उन के घर घंटों बैठा रहता. एएसएल की बैठकों में भी जाने लगा था. उस की इन हरकतों का मम्मीपापा में से किसी को पता नहीं था.

कभी आने में देर हो जाती तो वह कोई न कोई कहानी सुना देता, कभी कहता कि वह अपने किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में चला गया था तो कभी किसी सहपाठी की बीमारी का बहाना बना देता. उस के इन बहानों पर मुझे यह सोच कर कोफ्त होती कि बच्चे मातापिता को कितनी आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं. मांबाप को लगता है कि वे अपने बच्चों के बारे में सब कुछ जानते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे अपने बच्चों की असलियत के नजदीक तक नहीं पहुंच पाते. वे अपने असली बच्चों की आदतों, रुचियों, हरकतों के बारे में नहीं जान पाते. एक दिन सारे के सारे न्यूज चैनलों पर एक ही खबर दिखाई जा रही थी कि एक लड़की देर रात जब काम से घर लौट रही थी तो 4 लड़कों ने बस अड्डे से उस का पीछा किया. जब वह सुनसान जगह पर पहुंची तो वे उसे झाडि़यों में खींच ले गए और उस का मुंह बंद कर के उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया.

लेकिन वह बहादुर लड़की निर्भया की तरह थी. इतनी तकलीफ और दर्द में भी उस ने होश नहीं खोया. उस स्थिति में भी उस ने हर एक बलात्कारी की सूरत अपने दिमाग में बैठा लीथी. उस ने यह भी याद रखा कि वे क्या बातें कर रहे थे. उन में से किसी ने अपने साथी को चिंटू कहा तो दूसरे ने उसे डांट कर चुप करा दिया. उन में से एक के गाल पर लंबे घाव का निशान था, जबकि 2 लोगों ने अपने चेहरों पर उस के सामने ही कपड़ा बांधा था, लेकिन उस ने उन का चेहरा अच्छी तरह से देख लिया था. उन लफंगों की मनमरजी से लड़की की हालत बहुत खराब हो गई थी, जब उन्हें लगा कि लड़की बेहोश हो गई है या मर चुकी है, तब उन्होंने किसी जगह का नाम लिया था. उस जगह पर वे तब तक छिपे रहने की बात कर रहे थे, जब तक यह मामला ठंडा नहीं पड़ जाता.

चारों लड़कों के जाने के बाद, लड़की ने हिम्मत बटोरी और लड़खड़ाती हुई किसी तरह पास के एक मकान तक पहुंच गई. उस की हालत देख कर लोगों ने पुलिस बुलाई, जिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया. लड़की ने अपने ऊपर हुए जुल्म की पूरी कहानी विस्तार से सुना दी. साथ ही उन चारों लड़कों के हुलिए बता कर उन की आपस की बातचीत भी बता दी. इस के बाद पुलिस उन चारों की तलाश में लग गई. ऐसा लग रहा था जैसे समाचार चैनल और अखबार वालों के पास दूसरा कोई समाचार ही नहीं था. हर जगह बस उसी लड़की को ले कर हायतौबा मची थी. हर कोई सिर्फ रेप के बारे में ही बातें कर रहा था. स्टूडेंट्स और औरतें प्रदर्शन कर रही थीं, सभाएं कर रही थीं, कैंडल लाइट मार्च निकाले जा रहे थे. बहसें हो रही थीं कि औरतें कैसे सुरक्षित रह सकती हैं.

लोग इस बारे में भी चर्चा कर रहे थे कि क्या रेप करने वालों को फांसी की सजा देनी चाहिए, जिस से इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकें. जैसे ही कोई अभियुक्त पकड़ा जाता, शोरशराबा मचता. धीरेधीरे चारों अभियुक्त पकड़े गए. जैसेजैसे उस लड़की के बारे में टीवी और अखबारों में खबरें आ रही थीं, मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हर कोई इतनी बेशर्मी से क्यों बातें कर रहा था, मेरी समझ में नहीं आ रहा था. स्वाति दीदी की संस्था भी इस मामले में लगी थी. दीदी और रमेश भी लगे हुए थे. एएसएल के सदस्य जुलूस निकाल रहे थे, मीडिया के माध्यम से बयान जारी किए जा रहे थे. अब तक रमेश को लगने लगा था कि वह अपनी हरकतों को मम्मीपापा से छिपा नहीं सकता, इसलिए एक दिन उस ने पापा को बता दिया कि वह एएसएल से जुड़ गया है और उस के कार्यक्रमों में भाग ले रहा है.

पापा ने मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘यह तो अच्छी बात है. सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना ही चाहिए. तुम भी विरोध में भाग लो. इस बुराई के खिलाफ लड़ो और ऐसा बुरा काम करने वालों को सजा दिलवाओ.’’

मैं चुप बैठी रही. पापा को शायद मेरी इस चुप्पी पर हैरानी हुई कि मैं ने यह क्यों नहीं कहा कि रमेश के साथ जाऊंगी. इस की वजह यह थी कि रेप की बात सुन कर मेरा दिमाग घूम जाता था. अगले कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा. यही लग रहा था कि शहर में रेप के अलावा और कोई मुद्दा नहीं है. मैं इस सब से बहुत दूर रहती थी क्योंकि ‘रेप’ शब्द मुझे बीमार सा कर देता था, इसलिए मैं ने अखबार पढ़ना और टीवी देखना भी बंद कर दिया था. मैं उस जगह से हट जाती थी, जहां लोग रेप के बारे में बातें कर रहे होते थे. मैं उस दिन स्कूल भी नहीं गई थी, जिस दिन पुलिस यह बताने आने वाली थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए. मम्मी से मैं ने कह दिया था कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है.

एक शनिवार को रमेश ने मेरे कमरे में आ कर कहा, ‘‘वृंदा जल्दी तैयार हो जा. आज एएसएल एक सेमिनार करवा रहा है और हमें उस में अधिक से संख्या में पहुंचना चाहिए. इसलिए तुम भी चलो.’’

‘‘मैं नहीं जा सकती.’’ मैं ने बड़ी बेरुखी से कहा.

‘‘क्यों नहीं जा सकती भई? मैं देख रहा हूं इधर तुम कुछ बदलीबदली सी रहती हो. पहले तो तुम ऐसे कामों में मेरे साथ बड़े जोशोखरोश से भाग लेती थीं, अब ऐसा क्या हो गया, जो जाने से मना कर रही हो? जबकि यह लड़कियों का ही कार्यक्रम है.’’

‘‘मुझे पढ़ना है.’’

‘‘मुझ से बहाना बनाने की जरूरत नहीं है, तुम आलसी और स्वार्थी हो गई हो. तुम घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहती. किसी के दुख तकलीफ में उस का साथ नहीं देना चाहती.’’

‘‘तुम्हें जो सोचना है सोचते रहो, मुझे नहीं जाना तो नहीं जाना.’’

रमेश मुझे घूरता हुआ गुस्से में तेजी से मेरे कमरे से चला गया. उस पूरे दिन वह घर से बाहर ही रहा. मैं अपने कमरे में अकेली पड़ी रही, अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी, इसलिए सोचा चलो पड़ोस में रहने वाली सहेली के यहां चली जाऊं. जैसे ही मैं दरवाजे से बाहर निकली एक आवाज ने मुझे रोक लिया. स्वाति दीदी अपने दरवाजे पर खड़ी थीं. मैं अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए उन की ओर मुड़ी. उन्होंने कहा, ‘‘वृंदा यहां आओ.’’

‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘दीदी, अभी मैं अपनी एक दोस्त से मिलने जा रही हूं.’’ मैं ने उन से बचने के लिए कहा.

‘‘चली जाना, पहले इधर आओ. आज तुम्हारे सकूल की छुट्टी है ना?’’

मैं मना नहीं कर सकी और चेहरे पर झूठी मुसकान लिए बोझिल कदमों से स्वाति दीदी के घर की ओर बढ़ी. वह बड़े प्यार से मुझे अंदर ले गई. अंदर पहुंच कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम से बात किए हुए काफी समय हो गया. सुनाओ, आजकल क्या चल रहा है, तुम क्या कर रही हो?’’

‘‘कुछ खास नहीं, आजकल आप बहुत व्यस्त हैं न, इसलिए मैं आप के यहां नहीं आई.’’ मैं ने कहा.

लेकिन तुरंत ही मुझे अपने इन शब्दों पर अफसोस हुआ, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करें, पर मैं जो गलती कर गई थी, उस से तय था कि वह उस बात का उल्लेख जरूर करेंगी.

‘‘हां, आजकल मैं थोड़ा व्यस्त हूं. दरअसल वह भयानक रेप था,’’ स्वाति दीदी ने मुझ पर नजरें गड़ा कर कहा, ‘‘लेकिन तुम रेप के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में भाग क्यों नहीं लेती, क्या बात है वृंदा?’’ रमेश कह रहा कि तुम उस दिन स्कूल भी नहीं गई थीं, जिस दिन पुलिस तुम्हारे स्कूल में यह बताने आई थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए?’’

‘‘हां, नहीं गई थी.’’

‘‘क्यों? पुलिस ने जो बातें बताई थीं वे लड़कियों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थीं. उस से लड़कियों को अपनी सुरक्षा करने में मदद मिलेगी.’’

अब मैं चुप नहीं रह सकी. मैं ने कहा, ‘‘सच दीदी, क्या ऐसा हो सकता है? लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर किसी इंसान या लड़के के अंदर छिपा वहशी जानवर किसी औरत या लड़की को नुकसान पहुंचाना चाहे तो ऐसा करने से क्या उसे रोका जा सकता है, क्या वह ऐसा नहीं करेगा?’’

स्वाति दीदी ने मेरी ओर हैरानी से देखा. उस के बाद एकएक शब्द पर जोर देते हुए बोलीं, ‘‘यह सच है कि शारीरिक रूप से पुरुष औरत से अधिक मजबूत होते हैं, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि लड़कियां मजबूर और बेबस हैं. वह यह तो सीख ही सकती हैं कि अपनी सुरक्षा कैसे की जाए? अगर उन में लगन और इच्छाशक्ति है तो वह खुद को वहशी जानवरों से जरूर बचा सकती हैं.’’

‘‘नहीं बचा सकती दीदी. बहादुर से बहादुर और मजबूत से मजबूत लड़की भी ऐसा नहीं कर सकती. कोई और भी कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि हर कोई उसे अपने नीचे दबाना चाहता है.’’

मेरी इन बातों से मेरा डर बाहर आ गया. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैं ने जल्दी से खुद पर काबू पाने की कोशिश की, क्योंकि मुझे पता था कि अगर मैं चुप नहीं हुई तो दीदी को पता चल जाएगा कि मेरे साथ कुछ बुरा हो रहा है. लेकिन न मैं खुद पर काबू रख पाई और न दीदी को मूर्ख बना पाई, क्योंकि ये दोनों ही काम मेरे लिए बहुत मुश्किल थे. मेरी हालत देख कर वह जल्दी से उठ कर मेरे पास आईं और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ? अगर तुम मुझे सब बता दोगी तो तुम्हारे दिल और दिमाग से बोझ हट जाएगा. उस के बाद तुम काफी आराम महसूस करोगी.’’

‘‘नहीं दीदी, मुझे कोई परेशानी नहीं है, मैं ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मैं तो किसी दूसरे के बारे में सोचसोच कर परेशान हूं.’’

‘‘यह सच नहीं है.’’ दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जरूर कुछ हुआ है, जिसे तुम छिपा रही हो. तुम्हारे साथ, जरूर यौन हिंसा जैसा कुछ हुआ है. वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ है?’’

मैं कुछ बोल नहीं सकी, क्योंकि हिचकियां लेले कर रोने से मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. दीदी ने खींच कर मुझे सीने से लगा लिया. वह धीरेधीरे मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘‘मुझे बताओ न वृंदा, क्या बात है? अपनी बात कह कर तुम बहुत शांति महसूस करोगी.’’

मैं ने खड़ी हो कर घबराई आवाज में कहा, ‘‘मुझे अब जाना चाहिए.’’

मैं दरवाजे की ओर बढ़ी, लेकिन आंखों में आंसू होने के कारण मुझे रास्ता दिखाई नहीं दिया, जिस से मैं लड़खड़ा गई. दीदी ने आगे बढ़ कर मेरा हाथ थाम लिया और मुझे सोफे पर बैठा कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारे साथ भी बलात्कार जैसा कुछ हुआ है क्या?’’

अब मैं चुप नहीं रह सकती थी. मैं ने कहा, ‘‘नहीं दीदी, मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेकिन मेरी सब से अच्छी सहेली विद्या, जो मेरी क्लासमेट भी है. उस के साथ रेप हुआ है. एक नहीं, 2 लड़कों ने उस के साथ जबरदस्ती की है.’’

दीदी ने एक लंबी सांस ले कर जल्दी से पूछा, ‘‘कब और कैसे हुआ यह सब?’’

दीदी की प्रतिक्रिया से मुझे डर सा लग रहा था, मैं जल्दी से थूक गटक कर बोली, ‘‘दीदी, यह तीन महीने पहले की बात है. वह दोनों लड़कों में से एक लड़के, जिस का नाम महेश है को जानती थी. वह उस के पड़ोस के फ्लैट में ही रहता था. महेश उस का पड़ोसी ही नहीं था, उस के पिता विद्या के पिता के साथ भागीदारी में कारोबार करते हैं. वह उसे अक्सर छेड़ा करता था. लेकिन इस बात को न महेश के मातापिता जानते थे और न ही विद्या के.’’

‘‘विद्या ने कभी किसी से उस की शिकायत भी नहीं की?’’

‘‘नहीं, उस की चुप्पी ने महेश को हिम्मत बढ़ा दी और एक दिन मौका मिलने पर महेश ने दोस्त के साथ मिल कर उस के साथ जबरदस्ती कर डाली.’’

‘‘यह सब कैसे हुआ?’’ स्वाति दीदी ने पूछा.

अब तक मेरी आंखों के आंसू थम गए थे. मैं उन्हें सब बता देना चाहती थी, जो मेरे अंदर दबा था, वह भी जो अपराधबोध महसूस कर रही थी. मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘उस दिन वह स्कूल से घर आई तो उस के घर में ताला लगा था. उसे इस बात पर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि कभीकभी ऐसा होता रहता था. उस की मम्मी कहीं जाती थी, तो ताला लगा कर चाबी महेश के घर छोड़ जाती थीं. विद्या ने चाबी लेने के लिए महेश के घर की डोरबेल बजा दी, क्योंकि उस समय महेश कालेज में होता था. घर में सिर्फ उस की मां ही होती थी.’’

‘‘लेकिन जब महेश ने दरवाजा खोला तो विद्या को झटका सा लगा. तभी महेश ने पलट कर कहा, ‘मम्मी, विद्या आई है चाबी लेने.’

विद्या को उस की मम्मी की आवाज सुनाई नहीं दी, इस के बावजूद किसी तरह का संदेह नहीं हुआ. महेश अंदर गया और वहीं से बोला, ‘‘विद्या तुम्हें मम्मी बुला रही हैं.’’

विद्या जैसे ही अंदर हौल में आई, महेश ने लपक कर दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा बंद करने की आवाज सुन कर विद्या पलटी. लेकिन अब वह फंस चुकी थी. उस के दिमाग में खतरे की घंटियां बजने लगीं. वह कुछ कर पाती या कहती, इस से पहले ही महेश उस के पास आया और उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘तुम मूर्ख की मूर्ख ही रहीं. तुम्हें बता दूं कि मेरी और तुम्हारी मम्मी दिनभर के लिए बाहर गई हैं. इस वक्त मैं अपने दोस्त के साथ घर में अकेला हूं. तुम उस से मिलोगी? सचिन, जरा यहां तो आना.’’

महेश के मुंह से शराब की बदबू आ रही थी. विद्या ने चीखना चाहा, लेकिन दूसरे लड़के को देख कर उस की चीख गले में घुट कर रह गई. वह हाथ में बीयर की बोतल लिए था यानी वह भी पिए हुए था.  मैं थोड़ी देर के लिए चुप हुई. उस के बाद फिर कहना शुरू किया, ‘‘दोनों लड़कों ने उसी हाल में विद्या के साथ मनमानी की. उस के बाद वे सलाह करने लगे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए. सलाहमशविरे के बाद उन्होंने विद्या के फ्लैट का दरवाजा खोला और उसे अपने फ्लैट से उठा कर उस के फ्लैट में पहुंचा दिया. इस बीच सचिन बाहर खड़ा निगरानी करता रहा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा. बिल्डिंग में हर मंजिल पर 2 ही फ्लैट हैं, इसलिए वे अपने उद्देश्य में आसानी से सफल हो गए.

‘‘विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ कर जाने से पहले महेश ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उसी की बदनामी होगी. पापा का साझे का जो कारोबार है वह भी बंद हो जाएगा. इसलिए उस ने किसी से कुछ नहीं कहा.’’ मैं ने स्वाति दीदी को पूरी बात बता दी.

‘‘जब उस ने तुम्हें यह बात बताई तो तुम ने उसे क्यों नहीं समझाया कि उसे यह बात अपने मातापिता को बता देनी चाहिए?’’ दीदी ने उत्तेजित लहजे में कहा, ‘‘जानती हो, उस के चुप रहने से महेश और सचिन मौका मिलने पर फिर वैसा कर सकते हैं.’’

मैं खामोश बैठी रही. दीदी ने कुछ देर तक मेरे बोलने का इंतजार किया, जब मैं नहीं बोली तो उन्होंने पूछा, ‘‘अब विद्या कैसी है, वह इस सदमे से उबर गई है या अभी उस पर उस का असर है?’’

मैं ने उन के सवाल का जवाब नहीं दिया तो दीदी ने जोर डालते हुए पूछा, ‘‘वृंदा, मुझे बताओ न इस घटना का उस पर क्या असर पड़ा है. वह पहले की तरह पढ़लिख और खेलकूद रही है?’’

मुझे अपना दम घुटता हुआ सा महसूस हुआ. मेरा सिर घूमने लगा और फिर से मेरी आंखों में आंसू बहने लगे. मैं ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘पहले के मुकाबले अब वह काफी चुपचुप रहती है, पढ़ाई में भी उस का ध्यान नहीं लगता. दरअसल, उस दोपहर उस के साथ जो हुआ, उस ने उस के बारे में मुझे बता तो दिया लेकिन साथ ही कहा कि इस बारे में मैं किसी को कुछ न बताऊं. इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया.’’

‘‘और तुम चुप रह गईं,’’ दीदी ने ताना सा मारा, ‘‘तुम ने अपने दोस्त की मदद करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘मैं उस के साथ होने वाली जबरदस्ती के बारे में किसी से कैसे बता सकती थी? सचमुच मैं ने उसे पूरी तरह से बर्बाद होने दिया? मैं ने उस समय भी कुछ नहीं किया, जब मेरे सामने ही उस के साथ दोनों जुर्म ढा रहे थे. मदद करने के बजाय मैं ने शर्म से अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपा लिया था. मदद के लिए गुहार लगाने के बजाय रो रही थी.’’

इस के बाद मैं ने दीदी को आगे की वह शर्मनाक घटना भी सुना दी, ‘‘उस दिन एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए मैं स्कूल से सीधे विद्या के घर गई. उस के दरवाजे का ताला बंद था. वह चाबी लेने बराबर वाले फ्लैट में अंदर गई. मैं बाहर खड़ी हो कर इंतजार करने लगी. पलभर बाद मुझे उस की चीख सुनाई दी. मैं दरवाजे से सट कर खड़ी हो गई. अंदर महेश और सचिन जो बातें कर रहे थे, वे मुझे साफ सुनाई दे रही थीं. मुझे उन के मजे लेने की वे सिसकारियां भी सुनाई दे रही थीं, जो विद्या को नोचतेखसोटते हुए उन के मुंह से निकल रही थीं. मैं ने उन के भद्दे कमेंट्स भी सुने, जो वे विद्या के कपड़े उतारते हुए कर रहे थे.

‘‘मैं इस तरह सकते में आ गई कि मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी. विद्या का विरोध धीरेधीरे कमजोर पड़ता जा रहा था, और फिर उस की आवाज खामोश हो गई. उस के बाद उन्होंने वह सबकुछ किया जो उन्हें करना था.’’

‘‘तुम ने कुछ भी नहीं किया?’’ दीदी ने मरे से स्वर में पूछा, ‘‘तुम ने तब भी कुछ नहीं किया, जब यह सब कुछ हो रहा था?’’

‘‘हां, दीदी यह सच है कि मैं ने कुछ नहीं किया.’’ मैं ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘मुझे लकवा सा मार गया था. मैं ने आंखों से देखा तो नहीं, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसे कानों से सुना.’’

‘‘उस के बाद क्या हुआ?’’ दीदी ने उत्तेजित हो कर पूछा.

‘‘दीदी, मुझे होश तब आया जब महेश और सचिन ने विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ने की बात की. वे उसे धमकी दे रहे थे कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उस की इज्जत मिट्टी में मिला देंगे. भय के मारे मैं दौड़ती हुई सीढि़यां उतरने लगी. नीचे वाले फ्लोर पर आ कर मैं काफी देर कांपती हुई खड़ी रही. मैं दौड़ कर विद्या के फ्लैट के बाहर पहुंची और घंटी बजाई. विद्या ने दरवाजा नहीं खोला, तो मैं ने उस का नाम ले कर पुकारा. मेरी आवाज पहचान कर उस ने दरवाजा खोला.

‘‘जिस लड़की ने दरवाजा खोला, उस का नाम तो विद्या था, लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, वह विद्या ही है. उस के ऊपर जो कयामत गुजरी थी, उस से वह मृतक की तरह लग रही थी. मैं फूटफूट कर रोने लगी और उसे गले से लगा कर उस से माफी मांगने लगी कि मैं उस के लिए कुछ नहीं कर सकी.

मैं ने रोते हुए कहा, ‘‘मुझे बहुत दुख है विद्या कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकी. मुझे तुम्हारी मदद के लिए शोर मचाना चाहिए था, पुलिस को बुलाना चाहिए था.’’

‘‘भगवान का शुक्र है कि तुम ने ऐसा नहीं किया,’’ विद्या ने मरी सी आवाज में कहा, ‘‘और वादा करो कि आगे भी किसी से कुछ नहीं कहोगी.’’

‘‘लेकिन तुम्हें पुलिस के पास जाना चाहिए, मम्मीपापा से बताना चाहिए.’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों… मान लो तुम्हें किसी तरह की बीमारी हो गई या गर्भवती हो गई तो…?’’

‘‘तुम मेरे साथ डाक्टर के पास चलना. मैं अपना इलाज करा लूंगी या अबार्शन करा लूंगी. इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है. लेकिन तुम किसी और से यह बात कहना मत.’’ मैं ने उस से वादा किया था. दीदी, इसलिए मैं ने किसी से कुछ नहीं बताया.

‘‘न विद्या गर्भवती हुई और न ही उसे किसी प्रकार की बीमारी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘लेकिन अभी भी वह उसी रेपिस्ट के पड़ोस में रहती है?’’

‘‘जी.’’

‘‘इस के बाद उस ने फिर दोबारा उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘जहां तक मुझे पता है, नहीं.’’

‘‘वह घर के अंदर कैसा महसूस कर रही है, तुम ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की? तुम ने उसे किसी काउंसलर के पास जाने को भी नहीं कहा.’’

‘‘नहीं’’

‘‘उसे ही नहीं, तुम्हें भी काउंसलर के पास जाना चाहिए.’’

‘‘मुझे क्यों? मेरे साथ क्या हुआ है?’’

‘‘तुम भी अपने दोस्त के साथ हुए हादसे की वजह से सदमे में हो. तुम्हें अपराधबोध हो रहा है. तुम ने अपने दोस्त की मदद नहीं की. तुम्हें भी काउंसलिंग की जरूरत है.’’

मैं ने दीदी की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘हां दीदी, मुझे और विद्या, दोनों को मदद की जरूरत है.’’

‘‘दीदी अपने काम पर लग गईं. उन्होंने सब से पहले मेरे मम्मीपापा और रमेश से वह सब कुछ बताया. मेरे मम्मीपापा हैरान रह गए. उन्हें जैसे होश ही नहीं रहा, जबकि भाई तो गुस्से से पागल हो गया. वह खुद पर आरोप लगाने लगा कि उस की समझ में यह बात क्यों नहीं आई कि मेरे व्यवहार में बदलाव आ गया है.’’

इस के बाद दीदी ने विद्या को बहाने से अपने घर बुलवाया. उस के आने पर दीदी और मेरे मम्मीपापा ने उस से बात की. पहले तो विद्या पागलों की तरह इस तरह की किसी बात से इनकार करती रही. लेकिन जल्दी ही वह टूट गई और मेरी मम्मी की बाहों में रोते हुए उस ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की पूरी कहानी सुना दी. दीदी ने उस की यह बात मान ली कि उस के मम्मीपापा को इस बारे में कुछ नहीं बताएंगी. लेकिन एएसल के सदस्यों ने महेश और सचिन को पकड़ कर कहा कि उन्होंने एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया है, इसलिए पुलिस से शिकायत कर के उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. लेकिन वे अपना अपराध लिखित में स्वीकार कर के वादा करें कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें माफ किया जा सकता है.

दोनों ने वही किया, जैसा एएसएल के सदस्यों ने कहा. इस के बाद स्वाति दीदी ने दोनों की काउंसलिंग कराई. विद्या की भी काउंसलिंग कराई गई. कई सत्र के बाद विद्या रेप के सदमे से उबरी. इस से उस का खोया आत्मविश्वास वापस आ गया. अब मैं भी खुद को काफी बेहतर महसूस कर रही हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इस अपराधबोध से उबर सकूंगी कि मैं ने तब अपनी दोस्त की मदद नहीं की, जब उसे मेरी सब से ज्यादा जरूरत थी. Crime Stories

 

Emotional Hindi Story: एक बेबसी एक अफसाना

Emotional Hindi Story: बरसों बाद जमील अपने पुराने घर के दरवाजे पर खड़ा था. इस के बावजूद वह अपने घर की सांकल खटका कर अपनी मां से क्यों नहीं मिल सका. हर किसी की नजरें उस के थिरकते पैरों पर टिकी थीं. लाल बौर्डर का गुलाबी अनारकली कुर्ता, काला पैजामा और काला सितारे जड़ा दुपट्टा लहरालहरा कर वह लशकारे मार रहा था. उस के दोनों साथियों की आवाजें जोश में बुलंद हो रही थीं. तालियों की थाप ने एक समां सा बांध रखा था. उन के फिल्मी गाने की लय मदहोश करने वाली थी, इसलिए सुनने वालों के भी कदम थिरक रहे थे.

औरतें और मर्द दूल्हे के सिर पर बेल उतार कर रुपए उन दोनों की झोलियों में डाल रहे थे. कदमों की थिरकन ऐसी थी, जैसे पांवों में बिजली भरी हो. अब तक गोरे खूबसूरत चेहरे पर पसीने के कतरे चमकने लगे थे. अचानक सुर रुक गए, कदम थम गए और वह थकी सी दरवाजे से टिक कर बैठ गई. उसे भीड़भाड़, रुपएपैसे और इस तमाशे से घबराहट सी होने लगी. किसी मेहरबान हाथ ने उस का थका चेहरा देख कर शरबत का गिलास पकड़ा दिया. शरबत पी कर उसे ताजगी सी महसूस हुई. वह चुपचाप दरवाजे से बाहर निकल गई. खानापीना बाकी था. उन्हें भी खा कर जाने के लिए कहा गया था.

शादी ठेकेदार के बेटे की थी. उन्हें खास खबर भिजवा कर पेटलाद से बड़ौदा बुलवाया गया था. अच्छीखासी कमाई की उम्मीद थी. लेकिन बड़ौदा की जमीन पर कदम रखते ही जैसे उस का दिल बेकाबू होने लगा था. एक अजीब सी उदासी उस की रगरग में उतरने लगी थी. गलियां जानीपहचानी थीं, वह घना बरगद का पेड़, उस के पास पुराने मकान की ड्योढ़ी, लकड़ी के दरवाजे, लंबी, जंग लगी सांकल, वह दरवाजे से टेक लगा कर बैठ गई. अंदर ही अंदर घुटती बेआवाज सिसकियां आंसुओं के रूप में उमड़ पड़ीं. जुदाई का अनकहा दुख प्यासी ड्योढ़ी को भिगोने लगा. लाख दिल चाहा कि सांकल बजा दे, पर हिम्मत नहीं हुई. इस दरवाजे से निकलने का मंजर एक बार फिर आंखों के आगे ताजा हो गया.

इस दुनिया में मर्द औरत के अलावा एक तीसरी जिंस भी है. उन्हें क्यों बनाया गया, इस का राज तो बनाने वाला ही जाने. उन का अस्तित्व दुनिया वालों में कभी मजाक तो कभी घृणा तो कभी तरस की वजह बनता है. लोग इन्हें किन्नर, जनखा, हिजड़ा वगैरहवगैरह कह कर बुलाते हैं. इन किस्मत के मारों की अपनी कोई खुशियां नहीं होतीं. न उन की शादी होती है न बालबच्चे. हां, ये बेचारे दूसरों की शादियों या जन्म पर नाचगा कर दुआएं दे कर जरूर खुशियां हासिल करते हैं, उन्हीं खुशी में अपने अरमान पूरे करते हैं, दुआएं दे कर नजराना वसूल करते हैं. ज्यादातर लोग खुशी से इनाम देते हैं. कभीकभी झिड़कियां और गालियां भी मिलती हैं, पर इन की रोजीरोटी ही नाच, गाना और दुआएं देना है.

आज से 18-19 साल पहले इसी ड्योढ़ी के अंदर एक हंसतीमुसकराती मां एक गोरेचिट्टे, खूबसूरत बच्चे को रेशमी कपड़े पहनाए गोद में लिए बैठी थी और किन्नर नाचगा कर दुआएं दे कर नजराना वसूल रहे थे. सारे घर में खुशी का माहौल था. मेहमान खानेपीने में व्यस्त थे. खाने की खुशबू, लोगों से उसे जो बधाइयां मिल रही थीं, उस से बच्चे की मां मैमूना के चेहरे पर बेटे की मां होने का गर्व और ममता का नूर था. पहले बच्चे के जन्म पर जी भर कर खुशियां मनाई गईं. उस का जन्म शानदार याद बन गया. दूसरा बेटा सजल जमील के एक साल बाद पैदा हुआ. मैमूना को अहसास हो गया कि जमील में कुछ गड़बड़ है. वह आम बच्चों की तरह नहीं है. शरम और हिचक से वह जमील को सब से छिपा कर तैयार करती, किसी पर कुछ जाहिर न होने देती.

उस के बारे में सोचसोच कर दुखी होती, लेकिन जमाल का चेहरा देख कर दिल खुश हो जाता. गोरा रंग बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, खड़ी नाक, गुलाब की पंखुडि़यों की तरह नाजुक गुलाबी होंठ, ऐसी मोहनी सूरत कि निगाह हटाने को जी न चाहे. इतना खूबसूरत बच्चा तीसरी जिंस से ताल्लुक रखता है, यह सोच कर उस का दिल खून के आंसू रोता. इस के बाद बच्चे की मोहनी अदाएं, मीठी आवाज सुन कर खुद को बहला लेती. जमील 5 साल का हुआ तो मैमूना ने बड़े अरमानों से उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. पर उस के दिल में यही डर बना रहता कि कोई उसे कुछ कह न दे. कुछ वक्त तो ठीकठाक गुजरा, लेकिन उस के बाद जब भी जमील स्कूल से आता, उस की आंखें गीली रहतीं. अनमने ढंग से थोड़ाबहुत खाना खाता तो कभी मां के आंचल में मुंह छिपा कर सिसकने लगता. उस के लिए मां की गोद पेड़ की घनी छांव की तरह थी.

जब बच्चे गलियों में खेलते, मस्ती करते, खामोश उदास जमील मां के पास बैठा काम में उस की मदद करता या चुपचाप कमरे में पड़ा रहता. उसे अहसास हो गया था कि वह दूसरे बच्चों से अलग है. उन के मजाक और तानों ने शायद उस चेता दिया था. ऐसे लोग जिन्हें समाज न मर्दों में गिनता है न औरतों में, उन के लिए पता नहीं क्यों जिंदगी का दायरा इतना तंग हो जाता है, जबकि न वे किसी का कुछ बिगाड़ते हैं न किसी को कुछ तकलीफ पहुंचाते हैं, फिर भी न जाने क्यों उन के लिए लोगों की नजरों में नफरत होती है. 3-4 सालों में ही स्कूल जमील के लिए एक दहशतगाह बन गया. जहां उस के मासूम जेहन पर अश्लील वाक्यों और तानों के हथौड़े पड़ते रहते थे.

कभी उस की चाल का तो कभी उस की आवाज का मजाक बनाया जाता. कभी उस की कमर पकड़ कर गोलगोल घुमा दिया जाता. आखिर उस की हिम्मत जवाब दे गई और उस ने मां से साफसाफ कह दिया कि अब वह स्कूल नहीं जाएगा. मैमूना उस का दुख समझती थी. सोचा कुछ दिनों में समझाबुझा कर राजी कर लेगी. मगर उस पर कयामत तब टूटी, जब छोटे बेटे सजल ने उस से कहा, ‘‘मैं भाई के साथ स्कूल नहीं जाऊंगा. अगर भाई उस स्कूल में पढ़ेगा तो मैं पढ़ाई छोड़ दूंगा. सब लड़के उस के साथ मेरा भी मजाक उड़ाते हैं, आप भाई को घर पर ही रखो.’’

यह सुन कर मैमूना सन्न रह गई. उस दिन देर रात तक मैमूना और उस का शौहर आसिम इस मसले का हल ढूंढ़ते रहे, पर मायूसी के सिवा कुछ हाथ न आया. आसिम भी जमील को बहुत प्यार करता था. उसे जमाने की गरम हवा से बचा कर रखना चाहत था. पर समस्या ऐसी थी कि वह कुछ करने में नाकाम था सिवाय आंसू भरी आंखों से देखने के. अब तो हमदर्दी भी बेअसर लगती थी. जमील ने स्कूल जाना बंद कर दिया था. अब वह सिर्फ मसजिद जाता था. मौलाना उसे बहुत पसंद करते थे. वह उसे कुरानशरीफ के साथसाथ दूसरी किताबें भी पढ़ाते थे, पर वहां भी कभी कोई मिल जाता, जो उस के दिल को चोट पहुंचा देता.

कभीकभी जमील जिंदगी से बेजार हो कर कहता, ‘‘अम्मी, आप ने मुझे क्यों पैदा किया? काश! पैदा होते ही मुझे मार दिया होता तो आज मुझे ये कष्ट नहीं सहने पड़ते. आखिर मेरे साथ ऐसा क्या हुआ है, जो लोग मुझे छेड़ते हैं, परेशान करते हैं? सजल को तो कोई कुछ नहीं कहता, वह तो अच्छा है.’’

मैमूना के पास बेटे के इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता. उस दिन शाम को वह मसजिद से पढ़ कर लौट रहा था तो कुछ आवारा लड़कों ने उसे घेर लिया और छेड़ने लगे, ‘‘ओए जमीले जरा मटक कर दिखा. क्या लचक है तेरी कमर में क्या नजाकत है, क्या हुस्न है.’’

वह उन से जान छुड़ा कर ड्योढ़ी में दाखिल हुआ. हांफता हुआ वह दहलीज पर बैठ गया. उस का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था. मां ने दौड़ कर उसे सीने से लगाया, आंचल से आंसू पोंछे. फिर दरवाजा खोल कर उन लड़कों पर चिल्लाने लगी, जो अपनी मस्ती में बरगद के नीचे खडे़ कहेकहे लगा रहे थे. वह कह रही थी, ‘‘नामुरादों, क्यों मेरे बच्चे के पीछे पड़े हो, उस मासूम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? खुदा का शुक्र अदा करो कि उस ने तुम्हें ठीकठाक पैदा किया, उस के अधूरे बंदों का क्यों मजाक उड़ाते हो?’’

जमील मां की बांहों में बेहोश हो गया. उसे तेज बुखार चढ़ गया. कई दिनों तक वह बुखार में तपता रहा. दूसरी ओर जमील की ज्यादा देखभाल और लाडप्यार से सजल का दिमाग अलग खराब रहता. धीरेधीरे उस की चिढ़ नफरत में बदल गई थी. मैमूना जैसे तलवार की धार पर खड़ी थी. वह उसे कैसे समझाए, कैसे अपनी मजबूरी बताए? काश! वह अपने मासूम बेगुनाह बच्चे को अपने सीने में छिपा सकती. बुखार के बाद से जमील काफी खामोश रहने लगा. वह घर में पड़ा रहता. मौलाना अकसर उस से मिलने आते, उसे दुनिया के दूसरे दुखी लोगों के बारे में बताते. अच्छीअच्छी जानकारी दे कर उसे ढांढ़स बंधाते. धीरेधीरे वह मसजिद जाने लगा और मौलाना से पढ़ने भी लगा. मांबाप ने राहत की सांस ली.

वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा. उस दिन सजल को किसी ने जमील के नाम से छेड़ दिया. फिर तो उस ने सारा घर सिर पर उठा लिया. जमील को बहुत बुराभला कहा. मैमूना ने बड़ी मुश्किल से उसे शांत किया. जमील उदास आंखों से आसमान देखता रहा, दिल ही दिल खुदा से शिकवा करता रहा. अजान की आवाज सुन कर वह मसजिद चला गया. दरवाजे पर शोर सुन कर मैमूना दौड़ी आई. दरवाजा खोला तो देखा 2-3 किन्नर खड़े थे. उन्होंने जमील को गोद में उठा रखा था. उसे कई जगह चोटें लगी थीं, नाक और मुंह से खून बह रहा था. उन्होंने बताया कि जमील नमाज पढ़ कर लौट रहा था तो कुछ बदमाश बच्चों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया. बच्चों ने उसे नाचने के लिए कहा. जमील से बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने उन्हें पत्थर उठा कर मार दिया.

बस फिर तो कयामत आ गई. सब ने मिल कर जमील को पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने देखा तो दौड़ कर उसे उन लड़कों से छुड़ाया और उठा कर यहां ले आए. मैमूना ने उन की मदद से उसे चारपाई पर लिटाया. उस के जख्मों को साफ कर के दवा लगाई. हल्दी डाल कर दूध पिलाया. आसिम भी खबर पा कर दुकान से भागा आया. बेटे को जख्मी और बेहाल देख कर परेशान हो गया. जमील बेबसी से मांबाप और उन किन्नरों को देख रहा था. सब खामोश और उदास थे. उन में से एक बड़ी उम्र का किन्नर अदब से बोला, ‘‘यह बच्चा हमारी तरह है, इसे आप के समाज के लोग जीने नहीं देंगे. यह हमारी अमानत है, इसे आप हमें दे दीजिए. इसे हम बड़े प्यार से रखेंगे. हमारे बीच बच्चे को कुछ अलग होने का अहसास भी नहीं होगा. यह हमारे साथ रचबस जाएगा, वरना यहां यह पिटता रहेगा और घुटघुट कर जीता रहेगा.’’

वह मैमूना और आसिम के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. मैमूना बिलख उठी, ‘‘मैं अपने दिल के टुकड़े को कैसे तुम्हें दे दूं, मैं इस के बिना कैसे रहूंगी?’’

सजल चीख पड़ा, ‘‘अम्मी इसे जाने दो, यहां यह न खुद सुख से रहेगा और न हमें रहने देगा. हमेशा हमारी जिंदगी में परेशानी और जिल्लत बना रहेगा.’’

वही किन्नर फिर बोला, ‘‘साहब, आप क्यों इस मासूम बच्चे की जिंदगी नरक बना रहे हैं. यहां इसे सिवाय दुख के और कुछ नहीं मिलेगा. यह हमेशा हीनभावना में घुटता रहेगा.’’

आसिम ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैमूना, जमील को इन के साथ जाने दो. शायद वहां यह इन सब के साथ खुश रह सके. यहां तो हम इसे नफरत और तिरस्कार के अलावा और कुछ नहीं दे सकते. यही इस का नसीब है. हम कुदरत से नहीं लड़ सकते.’’

जमील को मैमूना ने सीने से लगा लिया. रो कर कहने लगी, ‘‘नहीं…नहीं, मैं अपने लाल को किसी को नहीं दे सकती.’’

आसिम ने उठ कर उस से जमील को अलग करते हुए कहा, ‘‘मैमूना, तुम्हारी ममता जमील को बरबाद कर देगी, इसे जाने दो.’’

जमील को खूब प्यार करने के बाद आसिम ने उसे किन्नरों को सौंप दिया. उन्होंने बड़े प्यार से किसी कीमती चीज की तरह उसे समेट लिया. जमील फटीफटी आंखों से अपनी किस्मत का फैसला होते देख रहा था, पर जुबां चुप थी, आंसू बह रहे थे. तीनों किन्नर उसे संभाल कर रिक्शे पर बैठ कर चले गए. ड्योढ़ी पर बैठी मां सिसकती रही. जहां वे लोग जमील को ले कर गए थे, वह कस्बा पेटलाद का पुराना सा मोहल्ला था. लकड़ी के फाटक वाला एक बड़ा सा पुराना घर था. एक अधेड़ उम्र किन्नर ने दरवाजा खोला. उस ने सफेद सादी सी साड़ी पहन रखी थी. जब उसे जमील के बारे में बताया गया तो वह प्यार से आगे बढ़ी और जमील का माथा चूम कर गले से लगाते हुए बोली, ‘‘मेरी सोहनी, मेरे चांद परेशान न हो, मुझे अपनी मां समझ. यह दुनिया बड़ी जालिम है. यह हमारा मजाक तो बना सकती है, पर हमें चैन से जीने नहीं दे सकती.’’

जमील के दिमाग में एक कौंध सा लपका, ‘‘क्या अब मुझे इन्हीं लोगों की तरह रहना होगा?’’ उस का मासूम दिल लरज उठा. फिर एक ढांढ़स सी बंधी कि जब लड़के की तरह जीना मुमकिन नहीं तो यही सही. भीगी आंखों से उस ने इस सच को स्वीकार कर लिया. जिंदगी का यही रूप सही.

‘‘न…न मेरी सोहनी रोते नहीं, यह कुदरत की तरफ से एक इम्तहान है, इस में तुझे कामयाब होना है, मुकाबला करना है. खुदा ने तुझे कुछ गुण भी दिए हैं. यह खूबसूरती यह मासूमियत, जिस्म में लचक.’’ एक बुजुर्ग किन्नर ने उसे तसल्ली दी.

अब जमील की जिंदगी एक नए ढर्रे पर चल पड़ी. धूमधाम से उस का नया नाम रखा गया, ‘सोहनी.’ ढेर से रेशमी रंगबिरंगे कपड़े दिलाए गए. मेकअप का सामान, आर्टीफिशियल गहने भी. इन चीजों से उस का हुस्न लड़कियों को मात देता था. एक डांस मास्टर रखा गया, जिस ने उसे अलगअलग अंदाज के डांस सिखाए. एक तो जमील खूबसूरत था, दूसरे नाजुक जिस्म और होशियार भी, इसलिए जल्दी ही नाचगाने में निपुण हो गया. इस के बाद वह किन्नरों के साथ जाने की तैयारी करने लगा. उस के लिए बढि़या कपड़े बनवाए गए, गहने लाए गए. किसी बड़े आदमी के यहां बरसों बाद बच्चा हुआ था, वे जमील को वहां ले कर गए.

उस के हसीन नाजुक जिस्म, उस के नाचगाने और अदाओं ने धूम मचा दी. खूब महफिल जमी. उस के डांस की फरमाइश किसी हाल न रुक रही थी. आखिर वह थक कर बैठ गई. उस दिन उन की आमदनी हजारों में हुई, कपड़े भी मिले. दूसरे किन्नर भी नाच रहे थे, पर जो बात जमील में थी, वह किसी और में न थी. वह उन लोगों के लिए बहुत लकी साबित हुआ. उन के यहां धन की बरसात होने लगी. उस घर में कुल 6 किन्नर रहते थे. बुर्जुग का नाम चंपा था, जो उन सब की गुरु थी. किन्नरों की बिरादरी का भी एक निजाम होता है. बड़ी उम्र का किन्नर दल का मुखिया होता है, उसे सब गुरु कहते हैं, साथ रहने वाले उस के चेले कहलाते हैं.

जब गुरु बनाया जाता है तो पगड़ी बांधने की रस्म होती है. दावत रखी जाती है, जिस में उन्हीं के बिरदारी के लोगों को बुलाया जाता है. मेहमान तोहफे और पैसे भेंट में देते हैं. शानदार जश्न होता है, जिस में नाचगाने की महफिल भी जमती है. गुरु का काम घर चलाना, खर्च देखना, चेलों को ट्रेंड करना होता है. बीमार पड़े तो दवा इलाज की भी जिम्मेदारी उसी की होती है. प्रोग्राम की तैयारी करवाना, कपड़ों का इंतजाम करना, सब वही करता है. खर्च के बाद हर एक की कमाई का हिसाब रखना, उन के पैसे जमा करना यानी कि पूरा मैनेजमेंट वही देखता है. सब से अच्छी बात यह है कि उन के यहां न कोई हिंदू होता है, न कोई मुसलमान. वहां सब एक हैं. सभी अधूरेपन के धागे से बंधे एक दूसरे के सुखदुख के साथी होते हैं.

कुछ अरसा जमील अपसेट रहा, फिर उस ने अपनी असलियत के साथ जीने का हुनर सीख लिया. उस के रूप और अच्छे नाचगाने की वजह से काफी कमाई होती थी, जो उस के नाम से बैंक में जमा हो रही थी. आज भी वह हाथ बढ़ा कर पैसे नहीं लेता था, उस के साथी ही पैसे जमा करते थे. आज सवेरे जब वह टैक्सी में बैठा तो उसे पता नहीं था कि वे लोग बड़ौदा जा रहे हैं. यहां पहुंच कर उस के जख्म हरे हो गए थे. उसी के मोहल्ले में ठेकेदार के यहां शादी थी. नाचगाने के बाद वह बेहाल, बेखुद सा अपने घर की ड्योढ़ी पर बैठा सिसक रहा था. उस के कांपते हाथों में इतनी ताकत नहीं थी कि वह हाथ उठा कर सांकल खटका देता.

वह फिर से दुखियारी मां को नया गम नहीं देना चाहता था. पीछे टैक्सी से गुलाबी और लाली उतर कर आगे आईं और उसे बांहों में समेट कर गाड़ी में बैठाया. जमील हसरत से अपने घर के दरवाजे को देखता रहा, जो किस्मत ने उस के लिए कब का बंद कर दिया था. Emotional Hindi Story

Love Story: एक बहन ऐसी भी

Love Story: आरती जिस अनमोल को प्यार करती थी, उस की बड़ी बहन पूजा भी उसी से प्यार करती थी. जबकि अनमोल सिर्फ आरती से प्यार करता था. अंत में पूजा ने ऐसा क्या किया कि अनमोल न उस का हो सका और न आरती का  पूजा ने अपनी छोटी बहन को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आरती, मैं ने तुम से कितनी बार कहा कि पड़ोसियों के घरों में ताकझांक मत किया करो, पर तुम हो कि सुनती ही नहीं हो.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं ताकझांक नहीं कर रही थी. बिल्ली रसोई की ओर जा रही थी, मैं तो उसे भगा रही थी.’’ आरती ने अपनी सफाई में कहा तो पूजा हलके गुस्से में बोली, ‘‘जानती हूं, कौन सी बिल्ली थी और कौन सा बिल्ला. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, टयूशन का वक्त हो गया है. और हां, सीधे जाना और सीधे लौट आना. रास्ते में बिल्लीबिल्ले का खेल मत खेलना, समझी.’’

आरती बड़बड़ाती हुई कमरे में चली गई और पूजा घर के कामों में लग गई. 17 वर्षीया आरती शर्मा और 20 वर्षीया पूजा शर्मा, दोनों सगी बहनें थीं. दोनों में बहुत प्रेम था. दोनों बहनों की तरह नहीं, बल्कि सखीसहेलियों की तरह मिलजुल कर रहती थीं, मिलबांट कर खाना, मिलबांट कर पहनना, सब कुछ साथसाथ चलता था. लेकिन पिछले करीब 2 महीनों से दोनों बहनें एकदूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाती थीं, खास कर पूजा को आरती. आरती पूजा की आंखों में हर समय खटकती रहती थी, इसीलिए दोनों बहनों में छोटीछोटी बात को ले कर तकरार होने लगती थी. ऐसे में छोटी होने के नाते आरती को ही चुप रह जाना पड़ता था.

लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र ढंडारी खुर्द में वीरेंद्र शर्मा का परिवार रहता था. शर्माजी के परिवार में पत्नी संजू शर्मा व 3 बेटियां क्रमश: पूजा, आरती और कुसुम तथा 10 साल का एक बेटा था. वीरेंद्र शर्मा मूलत: समस्तीपुर, बिहार के निवासी थे. कई साल पहले वह यहां काम की तलाश में आए थे. बाद में जब उन्हें एक इलैक्ट्रिकल फैक्ट्री में काम मिल गया तो उन्होंने किराए का मकान लेकर अपनी पत्नी और बच्चों को भी लुधियाना बुलवा लिया. फिलहाल वह मकान नंबर 950, नजदीक सुजीत सिनेमा, बलदेव सिंह दा बेहड़ा, ढंडारी कला, लुधियाना में रह रहे थे. वीरेंद्र शर्मा ने अपनी पत्नी संजू को भी पास की एक एक्सपोर्ट गारमेंट की फैक्ट्री में अच्छे मासिक वेतन पर लगवा दिया था. परिवार का गुजरबसर बड़े मजे से हो रहा था. पूजा और आरती 10वीं में पढ़ रही थीं. छोटी बेटी कुसुम भी सातंवी में थी. घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी.

वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी पूजा पढ़ाई के साथसाथ एक डाक्टर के क्लिनिक पर नर्सिंग एंड कंपाउंडर का काम भी सीख रही थी. शर्मा दंपति के काम पर चले जाने के बाद पूजा ही छोटी बहनों एवं भाई का ख्याल रखती थी. उन के खानपान से ले कर स्कूल भेजने तक का जिम्मा उसी पर था, जिसे वह बखूबी निभा रही थी. लेकिन इन दिनों अपनी छोटी बहन आरती को ले कर पूजा काफी परेशान थी. उस की इस परेशानी का कारण था अनमोल. अनमोल जिस दिन शर्मा परिवार के पड़ोस में रहने आया था, उसी दिन से पूजा की मुश्किलें बढ़ गई थीं. अनमोल 20 साल का सुदंर और स्मार्ट युवक था, स्वभाव से हंसमुख और मिलनसार. वह मूलत: गया, बिहार का रहने वाला था और लुधियाना के फोकल प्वाइंट क्षेत्र की किसी फैक्ट्री में काम करता था.

अपने अच्छे व्यवहार के कारण वह जल्दी ही पूरे मोहल्ले वालों से घुलमिल गया था. मोहल्ले की कई जवान लड़कियां उसे पसंद करती थीं. जबकि अनमोल किसी की ओर आंख तक उठा कर नहीं देखता था. वह बस अपने काम से मतलब रखता था. सुबह जल्दी उठ कर वर्जिश करना, फिर स्नान वगैरह से फारिग हो कर खाना बनाना और साढ़े 8 बजे तक काम पर चले जाना. शाम को 7 बजे काम से लौट कर खाना बनाना, अपने कमरे में बैठ कर टीवी देखना, खाना और उस के बाद सो जाना. अनमोल की रोजाना की यही दिनचर्या थी. छुट्टी वाले दिन भी अधिकांश समय वह अपने कमरे में बैठ कर गुजारता था. आरती ने जब से अनमोल को देखा था, तभी से वह उस की दीवानी बन गई थी. उस की नजरें अक्सर अनमोल का पीछा किया करती थीं.

सुबह काम पर जाने से ले कर, छत पर एक्सरसाइज करने तक आरती अनमोल को देखा करती थी, इस के बावजूद अभी तक उसे अनमोल से बात करने का एक भी मौका नहीं मिला था. उस के मन में यह डर भी बना हुआ था कि कहीं अनमोल उस की किसी बात का बुरा न मान जाए. कमोबेश यही हालात अनमोल की भी थी. वह भी मन ही मन आरती को चाहने लगा था. आरती भी इतनी खूबसूरत थी कि कोई भी उसे देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था. गोरा रंग, गोल चेहरा, पूरी पीठ पर घने बाल, गुदाज शरीर और गजगामिनी जैसी चाल. मोहल्ले के कई युवक उसे देख कर आहें भरा करते थे, परंतु आरती केवल अनमोल की ओर आकर्षित थी.

चाहत दोनों ओर थी. आखिर एक दिन अनमोल के दिल ने आरती के दिल की बात सुन ली. उस दिन अनमोल के मकान मालिक घर पर नहीं थे. आरती का परिवार भी कहीं गया हुआ था. दोनों अपनेअपने घरों में अकेले थे. आरती को यह मौका सही लगा. वह अपनी नोटबुक उठा कर गणित का एक सवाल पूछने के बहाने अनमोल के कमरे पर जा पहुंची. आरती को इस तरह अपने सामने, अपने कमरे में देख कर अनमोल चौंका. उस ने अपनी घबराहट पर काबू पा कर आरती से पूछा.‘‘आप,आप यहां..?’’

‘‘जी हां, आप से मिलना चाहती थी, इसलिए चली आई.’’

‘‘अच्छा किया आपने. आइए बैठिए.’’ अनमोल ने कहा तो आरती कमरे में बिछे एकमात्र तख्त पर बैठते हुए बोली,‘‘अनमोलजी, सच कहूं, मैं आई तो गणित का सवाल पूछने के बहाने हूं, पर सच्चाई यह है कि मैं आप से दोस्ती करना चाहती हूं,’’ आरती ने अनमोल की आखों में झांकते हुए कहा, ‘‘बताइए, करेंगे मुझ से दोस्ती?’’

आरती द्वारा दिए गए इस खुले निमंत्रण से अनमोल गदगद हो उठा. वह आरती के पास आ कर पर बैठ गया और उस का हाथ अपने हाथ में ले कर बोला, ‘‘आरती, मैं तुम्हें दिल की गहराइयों से प्यार करता हूं. अगर तुम मुझ से शादी करने का वादा करो तो मुझे तुम्हारी दोस्ती स्वीकार है, मैं केवल टाइम पास करने के लिए तुम से दोस्ती नहीं करना चाहता.’’

अनमोल की बातें सुन कर आरती जैसे उस की दीवानी हो गई. उस ने अपने आप को अनमोल की बाहों के  हवाले करते हुए मन की गहराइयों से कहा, ‘‘मैं मरते दम तक अपना प्यार निभाऊंगी अनमोल.’’

उस दिन के बाद से आरती और अनमोल के बीच प्रेम का अटूट बंधन बंध गया. इस के बाद आरती के स्कूल जाते समय रास्ते में, अनमोल के काम पर जाने या वापस लौटते वक्त, फिर सुबह छत पर उस के वर्जिश करते समय, जहां कहीं भी मौका मिलता, दोनों मिल लेते. इस मामले में दोनों बहुत ऐहतियात बरतते थे कि किसी को उन के प्रेम की भनक न लगे. पर इश्कमुश्क ऐसी चीजें हैं, जो कभी छिपाए नहीं छिपतीं. आखिर एक दिन उन दोनों की प्रेम कहानी की भनक आरती की बहन पूजा को लग ही गई. एक बार अनमोल के मकान मालिक 2 दिनों के लिए शहर से बाहर गए हुए थे. शर्मा दंपति अपनेअपने काम पर चले गए. पूजा की छोटी बहन और भाई स्कूल गए हुए थे. दोपहर बाद पूजा डाक्टर के क्लिनिक पर चली गई. घर पर केवल आरती ही थी. उस दिन अनमोल ने भी काम से छुट्टी ले रखी थी और अपने कमरे पर आरती का इंतजार कर रहा था.

पूजा के क्लिनिक पर चले जाने के बाद आरती अनमोल के कमरे पर पहुंच गई. अंदर से कमरे का दरवाजा बंद कर के दोनों एकदूसरे की बाहों में समा गए. जब 2 युवा दिल एकदूसरे की बाहों में सिमट कर एक साथ धड़कने लगते हैं तो सारी दूरियां खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं. आरती और अनमोल के साथ भी यही हुआ. सारे बंधन तोड़ कर अनमोल और आरती एकाकार हो गए. इत्तफाक से उस दिन किसी वजह से पूजा क्लिनिक से घर लौट आई . उस वक्त घर पर आरती नहीं थी.

‘घर खुला छोड़ कर कहां चली गई यह लड़की?’ बड़बड़ाते हुए पूजा आरती को खोजने के लिए घर से बाहर निकल आई. तभी अचानक उस की नजर साथ वाले मकान पर गई. पूजा ने देखा, आरती अनमोल के कमरे से बाहर निकल रही थी. उस के पीछे अनमोल भी था. आरती के बाल और कपड़े अस्तव्यस्त थे. आरती की हालत देख कर पूजा को समझते देर नहीं लगी कि आरती अनमोल के साथ बंद कमरे में कौन सा खेल खेल कर निकली है. पूजा को खड़ा देख कर अनमोल अपने कमरे में लौट गया, जबकि आरती सिर झुकाए अपने घर आ गई. पूजा ने आरती को आड़े हाथों लिया और साथ ही कभी फिर अनमोल से न मिलने की चेतावनी दी.

पूजा ने उसे कलमुंही, बदचलन और बेशरम तक कहा. आखिर अपने अपमान से तिलमिला कर आरती ने अपने और अनमोल के संबंधों के बारे में सब कुछ उजागर करते हुए कह दिया, ‘‘दीदी, मैं कोई आवारा या बदचलन नहीं हूं. मैं अनमोल से प्यार करती हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘अच्छा, अपनी अय्याशी को प्यार का नाम दे कर प्रेम शब्द को ही बदनाम करने लगी. अभी तू इतनी बड़ी नहीं हुई है कि अपनी शादी के फैसले खुद ही करने लगी,’’ पूजा ने चीखते हुए कहा, ‘‘एक बात कान खोल कर सुन ले. तेरी या मेरी शादी वहीं होगी, जहां मम्मीपापा चाहेंगे.’’

अनमोल को ले कर दोनों बहनों में खूब तकरार हुई. बढ़तेबढ़ते बात यहां तक पहुंच गई कि आरती ने चुनौती दे दी कि वह अनमोल से शादी कर के दिखाएगी. जबकि पूजा कह रही थी कि उस के जीते जी उस का यह सपना पूरा नहीं होगा. दरअसल, आरती को अनमोल से मिलने के लिए रोकना पूजा का फर्ज नहीं, बल्कि स्वार्थ था. वह अनमोल पर बुरी तरह से फिदा थी और चाहती थी कि उस की शादी अनमोल से हो जाए. अपने इसी स्वार्थ की वजह से पूजा ने आरती और अनमोल के संबंधों को ले कर अपने मम्मीपापा के कान भरने शुरू कर दिए. उन्होंने भी आरती को खूब बुराभला कहा और घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी.

दरअसल, आरती पटना में अपने दादादादी के पास रह कर पढ़ती थी. यहां वह केवल एग्जाम की तैयारी के लिए आई थी, ताकि पढ़ने में आसानी रहे. पटना में आरती के एग्जाम 17 मार्च को शुरू होने थे. 13 मार्च, 2015 को आरती को अपने पिता वीरेंद्र शर्मा के साथ एग्जाम देने पटना जाना था. इस के लिए अभी एक, डेढ़ महीने का समय था. इसलिए वीरेंद्र शर्मा ने पूजा को सख्त निर्देश दे कर आरती पर नजर रखने का जिम्मा सौंप दिया. कहते हैं, प्रेमियों पर अगर अंकुश लगा दिया जाए तो उन की भावनाएं और ज्यादा भड़कती हैं. यही हाल आरती का भी हुआ. हर वक्त पूजा द्वारा रोकटोक करने से आरती इतना परेशान हो गई कि एक दिन दोपहर के समय वह पूरी तैयारी के साथ अनमोल की फैक्ट्री जा पहुंची.

उस ने अनमोल को सब कुछ साफसाफ बता कर कहा ‘‘अनमोल, मैं रोजरोज के लड़ाईझगड़ों से तंग आ चुकी हूं. इसलिए आज मैं हमेशा के लिए अपना घर छोड़ कर तुम्हारे पास आ गई हूं. हम दोनों शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसाएंगे, जहां रोकनेटोकने वाला कोई नहीं होगा.’’

आरती का इरादा जानने के बाद अनमोल घबरा गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे कैसे समझाए. ऐसा नहीं था कि अनमोल आरती से प्यार नहीं करता था. वह वाकई उसे बहुत चाहता था, वह उस से अलग रहने की कल्पना तक नहीं कर सकता था, लेकिन जैसा आरती कह रही थी, ऐसा करने के लिए उस ने अभी सोचा नहीं था. अनमोल चाहता था कि यह शादी आरती के मातापिता के आशीर्वाद से हो. लेकिन जब आरती अपनी जिद पर अड़ी रही तो वह उसे अपने एक दोस्त के घर ले गया. 2 दिनों तक दोनों उस दोस्त के घर ठहरे. इस बीच वह आरती को हर तरह से समझाने का प्रयास करता रहा. उस ने आरती से वादा किया कि जल्द ही वह अपने मातापिता से बात कर के उन्हें उस के मम्मीपापा के पास भेजेगा. इस वादे के बाद आरती अपने घर वापस लौटने को तैयार हो गई.

इधर आरती के लापता होने से शर्मा दपंति परेशान थे, सब से अधिक पेरशानी पूजा को थी. उसे डर था कि कहीं आरती और अनमोल शादी न कर लें. खैर, सब मिल कर आरती को ढूंढते रहे. इसी बीच 2 दिनों बाद आरती सकुशल घर लौट आई तो सब ने चैन की सांस ली. शर्मा दंपति ने तय किया कि आरती पर अब भविष्य में इतनी सख्ती न की जाए. लेकिन पूजा अपनी हरकतों से बाज नहीं आई. मौका मिलते ही वह आरती को जलीकटी सुनाने से बाज नहीं आती थी. बहरहाल वक्त इसी तरह गुजरता रहा. आरती और अनमोल का छिपछिप कर मिलना जारी रहा, दोनों मोबाइल फोन पर भी आपस में बातें कर लिया करते थे. चाह कर भी पूजा आरती का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी.

28 फरवरी, 2015 की बात है. प्रदीप सिंह अपने घर से खेतों की ओर जा रहा था. रास्ते में उस के ताऊ बलदेव सिंह का मकान पड़ता था. हालांकि बलदेव सिंह इस मकान में नहीं रहते थे. यह मकान उन्होंने वीरेंद्र शर्मा को किराए पर दे रखा था. इस मकान की देखभाल का जिम्मा उन्होंने अपने भतीजे प्रदीप सिंह को सौंप रखा था. प्रदीप सिंह जब अपने ताऊ के घर के पास पहुंचा तो उस ने मकान के अंदर चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुनीं.

‘‘बचाओ… बचाओ, मार दिया… ओह.’’ का शोर सुन कर वह रुक गया. तभी उस ने देखा वीरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी तेजी से मकान से निकल कर एक ओर चली गई. उस के पीछे शर्मा की छोटी बेटी कुसुम चिल्लाते हुए निकली, ‘‘पूजा ने आरती को मार डाला, बचाओ.’’

शोर सुन कर प्रदीप सिंह ने मकान के भीतर जा कर देखा तो आरती रसोई में फर्श पर खून से लथपथ पड़ी थी. उस के शरीर पर गहरेगहरे घाव साफ दिखाई दे रहे थे. आरती की छोटी बहन कुसुम जोरजोर से रो रही थी. प्रदीप सिंह ने नीचे झुक कर आरती की नब्ज टटोल कर देखी, वह मर चुकी थी. समय व्यर्थ न करते हुए प्रदीप सिंह ने तुरंत इस घटना की सूचना थाना फोकल प्वाइट को दी, साथ ही उस ने वीरेंद्र शर्मा को भी आरती की मौत के बारे में बता दिया. वह अभी फोन कर के हटे ही थे कि अस्पताल की एंबुलैंस वहां आ गई. दरअसल पुलिस को गुमराह करने के लिए पूजा ने ही 108 नंबर पर एंबुलैंस के लिए फोन किया था कि उस की छोटी बहन आरती गिर कर घायल हो गई है.

कुछ ही देर में थाना फोकल प्वाइंट के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह पुलिस चौकी ढडारी के इंचार्ज एएसआई जोगिदंर सिंह, चौकीइंचार्ज ईश्वर कालोनी एएसआई जसबीर सिंह, हेडकांस्टेबल जसपाल सिंह, कांस्टेबल बलजीत कुमार व लेडी कांस्टेबल किरनपाल घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया गया. मृतका आरती के शरीर पर अनगिनत गहरे घाव थे, जिन में से उस समय भी खून रिस रहा था. घाव देख कर ऐसा लगता था, जैसे मृतका की हत्या गहरी रंजिश और नफरत के तहत की गई थी. जिस छुरी से उस की हत्या की गई थी, वह भी घटनास्थल से बरामद हो गई थी. कुछ ही देर में क्राइम टीम व डीसीपी जसवंत संधु, एसीपी रूपेंद्र कौर तथा मृतका के मातापिता भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. क्राईम टीम ने कई कोणों से लाश के फोटो लिए और कई जगह से फिंगरप्रिंट उठाए.

सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता वीरेंद्र शर्मा और मां संजू शर्मा के बयान लिए गए. वीरेंद्र शर्मा के अनुसार, मृतका आरती के पड़ोस में रहने वाले युवक अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. घटना वाले दिन से पहले 27 फरवरी को अनमोल उन के पड़ोस वाला कमरा खाली कर के कहीं चला गया था. इसी बात को ले कर आरती की अपनी बड़ी बहन पूजा के साथ तकरार हुई थी. शायद वैसा आज भी हुआ हो और उसी झगड़े में आरती की हत्या हो गई हो. बहरहाल, सुरेंद्र सिंह ने मृतका के पिता व पड़ोसियों के बयान दर्ज करने के बाद लाश को अपने कब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. थाने लौट कर सुरेंद्र सिंह ने इस मामले को पूजा को नामजद करते हुए हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी.

अपनी बहन आरती की हत्या कर के पूजा घटनास्थल से फरार तो हो गई थी, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए? क्योंकि उस समय उस के पास एक भी पैसा नहीं था. यह बात सुरेंद्र सिंह भी अच्छी तरह जानते थे. वह यह भी समझते थे कि अक्सर बिना पैसे वाले लोग ट्रेन में ही यात्रा करते हैं. इसलिए उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह को ढंडारी रेलवे स्टेशन की ओर भेजा. इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह का अनुमान सही निकला. ढंडारी रेलवे स्टेशन के पास से ही एएसआई जसबीर सिंह ने पूजा को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में हुई पूछताछ में पूजा ने स्वीकार कर लिया कि गुस्से में उसी ने अपनी छोटी बहन आरती की हत्या की थी. पूजा ने बताया कि आरती के पड़ोस में रहने वाले अनमोल के साथ प्रेमसंबंध थे. आरती के संबंध का पूरा परिवार विरोध करता था. पिताजी की इच्छा थी कि आरती पढ़लिख कर उच्चशिक्षा प्राप्त करे. 17 मार्च, 2015 को आरती के एग्जाम पटना सरकारी स्कूल में होने वाले थे. पिताजी उसे ले कर 13 मार्च को पटना जाने वाले थे. अनमोल ने जब हमारे पड़ोस वाला कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि कहीं आरती और अनमोल की यह कोई चाल न हो. अनमोल ने शायद किसी योजना के अंतर्गत कमरा खाली किया है.

अब दोनों घर से भाग जाना चाहते हैं. क्योंकि इस घटना से लगभग डेढ़ महीना पहले आरती कहीं चली गई थी. अनमोल भी 2 दिन अपने घर से गायब रहा था. 2 दिनों बाद आरती घर लौट आई थी. हमें संदेह था कि आरती अनमोल, दोनों घर से भागने की नीयत से गायब हुए थे और किन्हीं कारणों से वापस लौट आए थे. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जब अनमोल ने अपना कमरा खाली किया तो हमें संदेह हुआ कि यह आरती और अनमोल के घर से भागने की योजना है. यह बात मैं ने मातापिता को बता कर अपना संदेह व्यक्त किया और उसी दिन से मैं आरती पर नजर रखने लगी. अनमोल के कमरा बदलने के बाद आरती लगातार फोन द्वारा अनमोल से संपर्क बनाए रही.

घटना वाले दिन भी सुबहसुबह काफी देर आरती फोन पर किसी से बातें करती रही. मुझे यकीन था कि वह फोन अनमोल का ही था. उस के बाद मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई. नहाने के लिए जैसे ही मैं कपड़े उतारने लगी, तभी जिद कर के आरती जबरदस्ती नहाने बैठ गई. उस ने कहा.‘‘सौरी दीदी, मुझे जरा जल्दी है, कहीं जाना है.’’

उस की यह बात सुन कर मुझे विश्वास हो गया कि आरती अनमोल के साथ भाग जाने वाली है. अभी मैं यह सोच ही रही थी कि तभी आरती के फोन पर किसी का फोन आया. नहाना छोड़ कर आरती फोन सुनने लगी. मैं ने आरती को यह कहते सुना, ‘तुम थोड़ा इंतजार करो, मैं तैयार हो कर अभी आती हूं.’

यह सुनते ही मेरा संदेह विश्वास में बदल गया. मैं ने आरती से पूछा, ‘‘क्या तुम अनमोल के साथ कहीं भाग जाना चाहती हो?’’

मेरी बात सुन कर आरती आगबबूला हो गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उस ने चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम ऐसे ही मेरा पीछा करोगी तो नहीं भागना होगा, तब भी भाग जाऊंगी.’ आरती की इस विद्रोही भाषा से मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं ने आव देखा न ताव, पास में पड़ी सब्जी काटने वाली छुरी उठा कर आरती पर अंधाधुंध वार कर के उस की हत्या कर दी. जो लड़की कुल की मर्यादा को कलंकित करे, उस का मर जाना ही बेहतर है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, आरती के शरीर पर कुल 20 घाव थे. सब से घातक घाव वे थे जो आरती के पेट पर किए गए थे. इन्ही घावों की वजह से आरती के फेफड़े फट गए थे और हार्ट पंक्चर हो गया था, जिस से उस ने दम तोड़ दिया था.

पूछताछ के बाद एसआई अश्विनी कुमार ने 1 मार्च, 2015 को पूजा को सीजीएम रणजीव कुमार की आदलत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. हत्या में प्रयुक्त छुरी पहले ही बरामद हो चुकी थी, सो रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पूजा को 3 मार्च, 2015 को अदालत में दोबारा पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जिला कारगार भेज दिया गया. Love Story

कथा पुलिस सुत्रों पर आधारित.

 

Gujarat Crime Story: पूत जब बना कपूत

Gujarat Crime Story: अदनान की बुरी आदतों से परेशान हो कर पिता ने उसे घर से ही नहीं निकाल दिया, बल्कि अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. इस के बाद अपना हक पाने के लिए अदनान ने जो किया, क्या वह उचित था.रोज की तरह शुक्रवार 20 मार्च, 2015 की रात लगभग 8 बजे फर्नीचर सामग्री के व्यापारी खुजेमा बैगवाला अपनी दुकान बंद कर के मोटरसाइकिल से सैफीनगर स्थित अपने घर की ओर चल पड़े. अलग मोटरसाइकिल से उन के 2 कर्मचारी भी उन के साथसाथ चल रहे थे. 57 वर्षीय खुजेमाभाई ने जैसे ही अपने मोहल्ले में प्रवेश किया, अचानक एक मोटरसाइकिल उन के बराबर में आई, जिस पर 2 लोग सवार थे. मोटरसाइकिल चला रहे व्यक्ति ने हेलमेट पहन रखा था, जबकि पीछे बैठे व्यक्ति ने अपने चेहरे पर कपड़ा बांध रखा था.

उस के पीछे एक अन्य मोटरसाइकिल पर अपने चेहरों पर कपड़े बांधे 2 युवक और चल रहे थे. दोनों मोटरसाइकिलें खुजेमाभाई के करीब आईं तो उन चारों में से किसी ने चिल्ला कर कहा, ‘यही है खुजेमा?’ उस का इतना कहना था कि खुजेमाभाई कुछ समझ पाते, उन के बगल चल रही मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे व्यक्ति ने तमंचा निकाला और उन पर गोली चला दी. गोली खुजेमाभाई के बाएं कान के पास लगी. गोली लगते ही वह मोटरसाइकिल सहित सड़क पर गिर पड़े और बेहोश हो गए.

आसपास के लोग मामला समझ पाते, खुजेमाभाई पर हमला करने वाले दोनों मोटरसाइकिल सवार फरार हो गए. खुजेमाभाई के साथ चल रहे उन के दोनों कर्मचारी घबरा गए. तुरंत भीड़ लग गई. एंबुलैंस को फोन किया गया. एंबुलैंस आई, साथ आए डाक्टर ने खुजेमा की जांच की. गोली बाईं ओर कान के पास लगी थी, जिस से खून बह रहा था. खुजेमा की सांस चल रही थी. उन्हें तुरंत घटनास्थल से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित इंदौर के चोईराम अस्पताल ले जाया गया. खुजेमाभाई को तुरंत भरती कर के औपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गई. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी गई थी, जिस से घटनास्थल से संबंधित थाना जूनी के थानाप्रभारी पवन सिंघल तो अस्पताल पहुंचे ही, अन्य पुलिस अधिकारी भी धीरेधीरे वहां पहुंचने लगे. अस्पताल के डाक्टरों ने तुरंत औपरेशन कर के खुजेमाभाई के कान के पास फंसी गोली, जो खोखे सहित थी, निकाल लिया था.

खुजेमाभाई पर हमले की खबर जैसेजैसे सैफीनगर मोहल्ले में फैलती गई, लोग इकट्ठा होते गए. सैफीनगर में लगभग 95 प्रतिशत बोहरा समाज के लोग रहते हैं और खुजेमाभाई भी बोहरा समाज के ही हैं. खुजेमाभाई न केवल एक बड़े और प्रतिष्ठित व्यापारी थे, समाज में भी उन की काफी इज्जत थी. वह मृदुभाषी होने के साथ समाज की सेवा के लिए भी हमेशा सब से आगे रहते थे. यही वजह थी कि पूरी रात उन की समाज के लोग अस्पताल में मजमा लगाने के साथसाथ वे पुलिस से जल्दी से जल्दी हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग करते रहे.

अगले दिन यानी 21 मार्च, दिन शनिवार की सुबह जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को खतरे से बाहर बताया तो उन के घर वालों को ही नहीं, समाज और पुलिस की भी जान में जान आई. अस्पताल में खुमेजाभाई का हालचाल पूछने वालों का तांता लगा था. लेकिन डाक्टरों ने साफ कह दिया था कि अभी वह किसी से नहीं मिल सकते. केवल घर के 2 लोग ही उन के पास रह सकते थे. वह भी इस शर्त पर कि कोई भी खुजेमाभाई से बात नहीं करेगा. इस के बावजूद अस्पताल के बाहर उन के समाज के लोगों की भीड़ लगी थी. बोहरा समाज के दबाव की वजह से पुलिस तेजी से हरकत में आ गई थी. थानापुलिस एवं क्राइम ब्रांच की टीमें जांच में जुट गई थीं. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. सुधीर शर्मा ने खुजेमाभाई के कान के पास से निकली गोली देखी तो वह सिहर उठे. गोली खोखा समेत थी.

उन्होंने बताया कि यह गोली जिस तमंचे से चलाई गई थी, उस में कोई खराबी थी, वरना अगर यह गोली सही तरीके से सही तमंचे से चली होती तो खुजेमाभाई के सिर के परखच्चे उड़ जाते. ऐसी गोली को ‘बर्स्ट बोल’ कहा जाता है. यह गोली पिस्टल से निकल कर आदमी के शरीर से टकराती है तो बम की तरह फट जाती है. उस स्थिति में आदमी का बचना बेहद मुश्किल होता है. 2 दिनों बाद खुजेमाभाई को आईसीयू से प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट किया गया तो वह स्वयं को काफी अच्छा महसूस कर रहे थे. इस के बाद डाक्टरों ने मिलने की इजाजत दे दी थी, लेकिन बात करने और एक समय में 2 से अधिक लोगों के अंदर जाने से साफ मना कर दिया था.

पुलिस अपने हिसाब से हमलावरों तक पहुंचने की पूरी कोशिश में लगी थी. दूसरी ओर बोहरा समाज के जो लोग पुलिस के आला अधिकारियों से ज्ञापन देने की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हें एक बड़ा झटका तब लगा, जब समाज में हो रही यह खुसुरफुसुर उन के कानों में पड़ी कि खुजेमाभाई पर परिवार के ही किसी सदस्य ने हमला किया है या फिर किराए के हमलावरों से कराया है. इस के बाद समाज के लोगों ने पुलिस अधिकारियों से मिलने का अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया. थानाप्रभारी पवन सिंघल को जांच के दौरान अपने किसी मुखबिर से पता चला था कि खुजेमाभाई का बड़ा बेटा अदनान इस घटना के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

क्योंकि उस की अपने पिता से गहरी अनबन चल रही थी. इस के बाद पवन सिंघल ने अदनान को उस के घर से उठवा लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो वह अकड़ गया, ‘‘मेरे ही बाप को गोली मारी गई है और आप लोग हमलावरों को पकड़ने के बजाय मुझे ही पकड़ लाए हैं.’’

लेकिन ज्यादा समय तक अदनान की अकड़ कायम नहीं रह सकी. जब पुलिस ने अपने सवालों से उसे घेरा तो वह टूट गया. उस ने पिता को जान से मरवाने की जो साजिश रची थी, उस का अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पिता की हत्या की जो साजिश रची थी, उस की पूरी कहानी पुलिस को सुना दी, जो कुछ इस तरह थी. इंदौर के मोहल्ला सैफीनगर में रहने वाले बोहरा समाज के खुजेमा बैगवाला की 3 संतानें थीं, 27 साल का बड़ा बेटा अदनान, उस से छोटा 22 साल का अली अकबर और सब से छोटी 12 साल की बेटी. खुजेमाभाई का फर्नीचर सामग्री का विशाल शोरूम इंदौर के महंगे इलाके सपना संगीता रोड पर था, जिस में फोम, रैक्सीन, कपड़े आदि मिलते थे.

उन के इस शोरूम का नाम एलिगेंट फोम एंड फर्निशिंग प्रा.लि. था. खुजेमा ने अपनी सूझबूझ से कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की थी. कई नौकरों और अपने बड़े बेटे अदनान के साथ वह अपने इस शोरूम को चला रहे थे. कारोबार बढि़या चल रहा था, किसी चीज की कमी नहीं थी. दौलत की रेलमपेल थी. लेकिन कभीकभी अधिक पैसा भी अभिशाप बन जाता है. कुछ ऐसा ही खुजेमाभाई के साथ भी हुआ. उन का बड़ा बेटा अदनान गलत संगत में पड़ गया. उस की गलत आदतों और अनापशनाप खर्च को देख कर खुजेमाभाई चिंतित रहने लगे थे.

उन्होंने अदनान को खूब समझाया कि वह गलत संगत और गलत आदतें छोड़ दे. पिता के आगे वह आज्ञाकारी बेटे की तरह सिर झुकाए उन की हिदायतें सुनता रहता और भविष्य में कोई गलत काम न करने की बात भी कहता, लेकिन आगे से हटते ही वह सब भूल जाता. परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान पर आर्थिक पाबंदियां लगानी शुरू कर दीं. इस से अदनान सुधरने के बजाए और उग्र हो गया. परिणामस्वरूप बापबेटे में तकरार होने लगी. उसी बीच अदनान को एक लड़की से प्यार हो गया और वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगा. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने साफ मना कर दिया.   इस की वजह थी अंधविश्वास. वैसे तो वह लड़की उन्हीं की बिरादरी की थी, लेकिन उन्हें कहीं से पता चला था कि उस के घर वाले जादूटोना करते हैं, इसीलिए उन्होंने शादी से मना कर दिया था. यह सन 2012 की बात थी.

खुजेमाभाई ने अदनान को भले ही पैसे देने बंद कर दिए थे, लेकिन उस के खर्च में कोई कमी नहीं आई थी. अब वह अपने खर्च के लिए जानपहचान वालों से कर्ज लेने लगा था. कुछ दिनों बाद कर्ज देने वालों के तकादे आने लगे तो परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान को अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर दिया. वह सब कुछ बरदाश्त कर सकते थे, लेकिन बदनामी उन्हें बरदाश्त नहीं थी. घरपरिवार से बेदखल होने के बाद अदनान को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस के पास बैंक में भी ज्यादा पैसे नहीं थे. घर से निकाले जाने के बाद सब से पहले तो उस ने अपने रहने के लिए एक बेडरूम का छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया.

इस के बाद अपने बचपन के अजीज दोस्त अली असगर से सलाहमशविरा कर के साझे में कोई कारोबार करने का विचार किया. आखिर थोड़ीबहुत जो पूंजी थी, उस से दोनों ने रियल एस्टेट एम.सी. एक्स एवं कपड़ों का कारोबार करने की बात की. अली असगर भी अच्छी हैसियत वाला था. उस के पिता हकीम थे. हकीमी शफाखाना यूनानी के नाम से इंदौर की घनी आबादी वाले मारोठया बाजार में उन का यह शफाखाना पुरखों के समय से चला आ रहा था. चूंकि यहां भी बोहरा समाज की आबादी एवं दुकानें अधिक हैं, इसलिए इसे बोहरा बाजार के नाम से भी जाना जाता है. उन के इस शफाखाने की एक शाखा मुंबई में भी है, जहां अली असगर के पिता हकीम सादिक अली हर महीने की 5 से 10 तारीख तक मरीजों को देखते हैं.

संयोग से अदनान और अली असगर का कारोबार चल निकला. ठीकठाक कमाई होने लगी तो अदनान ने किराए का फ्लैट छोड़ कर अपना एक बड़ा फ्लैट खरीद लिया. इस के बाद अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ अपनी प्रेमिका से शादी कर ली और हनीमून मनाने के लिए स्विटजरलैंड गया. इतना सब होने के बाद भी अदनान की बुरी आदतों ने पीछा नहीं छोड़ा. जबकि दोस्त और पार्टनर अली असगर ने भी उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर दोस्त के समझाने का भी जरा असर नहीं हुआ. हालांकि कारोबार में होने वाले फायदे को वे आधाआधा बांट लेते थे. अदनान अपने हिस्से से ही अपनी जरूरी और गैरजरूरी जरूरतें पूरी करता था.

अदनान ने एक आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल खरीद ली थी. इस के बाद 2 बातें हुईं. एक तो उन के कारोबार में नुकसान होने लगा, दूसरे इस नुकसान की भरपाई के लिए वे कर्ज लेने लगे. धीरेधीरे यह कर्ज बढ़तेबढ़ते 75 लाख रुपए तक पहुंच गया. अली असगर ने तो अपनी साख बचाए रखी, लेकिन अदनान बुरी आदतों की वजह से अपनी साख नहीं बचा सका. नुकसान और कर्ज की वजह से उन का साझे का यह कारोबार बंद हो गया. कर्ज देने वालों के तकादे बढ़ने लगे तो अदनान परेशान रहने लगा. तब अली असगर ने उसे सलाह दी कि वह पिता से माफी मांग कर कर्ज चुकाने के लिए पैसा या जायदाद में हिस्सा मांग ले. अदनान अकेला नहीं जाना चाहता था, इसलिए उस ने उस से भी साथ चलने को कहा. लेकिन अली असगर ने यह कह कर मना कर दिया कि इस मामले में वह बीच में नहीं पड़ना चाहता.

मरता क्या न करता, अदनान पत्नी को साथ ले कर जायदाद में हिस्सा मांगने अपने पिता के घर पहुंच गया. लेकिन खुजेमाभाई ने साफ कह दिया कि न वह हिस्सा देंगे और न किसी तरह की मदद ही करेंगे. उन्होंने अदनान की पत्नी को भी बहू मानने से मना कर दिया था. अदनान मायूस हो कर लौट आया. यह 4-5 महीने पहले की बात थी. मायूसी और परेशानियों ने खतरनाक मनसूबों को जन्म देना शुरू कर दिया. खुजेमाभाई के पास बड़ा कारोबार ही नहीं, अथाह धनदौलत और काफी जमीनजायदाद थी. उन्हें अपने छोटे बेटे अली अकबर से भी कम ही उम्मीद थी. वह भी शानोशौकत से रहता था. वैसे खुजेमाभाई को इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए था,  क्योंकि अली अकबर अभी बच्चा ही तो था. लेकिन खुजेमाभाई उस से ज्यादा अपने वफादार मैनेजर हुसैन पर भरोसा करते थे.

कहने को तो हुसैन खुजेमाभाई का नौकर था, लेकिन अब वह परिवार का एक अहम सदस्य बन चुका था और एकएक पाई का हिसाब रखता था. खुजेमाभाई और हुसैन ने अपने कारोबार पर ऐसी पकड़ बना रखी थी कि एक तिनका भी इधर से उधर नहीं हो सकता था. जब अदनान को पता चला कि उस के पिता अपनी सारी संपत्ति का वारिस मैनेजर हुसैन को बनाने वाले हैं तो उस का दिमाग खराब हो गया. फिर जैसी कहावत है कि ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ वैसा ही अदनान ने पिता खुजेमाभाई को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

अदनान ने बाजार में पिता की हैसियत का लाभ लेते हुए एक कारोबारी से 5 लाख रुपए उधार लिए. ये रुपए उस ने एक ऐसे गिरोह को देने के लिए लिए थे, जो रुपए ले कर हत्याएं करता था. उस ने उन रुपयों में से उस गैंग को पिता की हत्या के लिए ढाई लाख रुपए एडवांस दे दिए. बाकी रकम काम होने के बाद देने की बात हुई. उस गैंग ने रुपए तो ले लिए, पर काम नहीं किया. अदनान उन से जब भी काम की बात करता, वे यही कहते कि उस का काम हो जाएगा. अदनान उन से जबरदस्ती भी नहीं कर सकता था. मजबूर हो कर अदनान ने किसी दूसरे गिरोह से बात की. इस दूसरे गिरोह से खुजेमा के मुनीम सुरेश यादव ने बात कराई थी. किसी बात से नाराज हो कर वह खुन्नस में अदनान से मिल गया था.

खुजेमा की हत्या करने के लिए सुरेश अदनान को निमरानी गांव के एक बाबा के पास ले गया, जो जादूटोना से ले कर हत्या तक करवाता था. बाबा ने अदनान को धरमपुरी के रहने वाले कुख्यात गुंडे इदरीस का मोबाइल नंबर दे दिया. इदरीस ने अदनान को इंदौर के पिपली बाजार के रहने वाले विशाल उर्फ सोनू पहलवान से मिलवाया. सोनू ने खुजेमा भाई की हत्या के लिए 25 लाख रुपए मांगे. एडवांस में भी उस ने आधे पैसे देने को कहा, तब अदनान ने अपनी आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल को 3 लाख रुपए में बेच कर, बाकी रुपए इधरउधर से ले कर 12 लाख रुपए की व्यवस्था कर के सोनू को दे दिए.

पैसे मिलने के बाद सोनू ने अपने गुर्गों को तैयार किया और खुद भी कार से खुजेमाभाई की रेकी करने लगा. पूरी तैयारी कर लेने के बाद 20 मार्च, 2015 को खुजेमाभाई की हत्या की तैयारी कर ली गई. उस दिन उन की निगरानी में करीब दरजन भर लोग लगे थे. खुजेमाभाई का घर दुकान से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर था. 8 बजे दुकान बंद कर के वह घर के लिए रवाना हुए. उन के निकलते ही मुनीम सुरेश यादव ने अदनान को सूचना दे दी कि खुजेमाभाई रवाना हो गए हैं, उन के साथ अलग मोटरसाइकिल से 2 कर्मचारी भी हैं. खुजेमाभाई अपने घर पहुंचते, उस के पहले ही शूटरों ने अपना काम कर दिया. यह संयोग ही था कि तमंचा और गोली ने धोखा दे दिया. पूछताछ में पता चला कि देशी पिस्तौल और 25 कारतूस अदनान ने इदरीस के माध्यम से जिला धार के गांव गुजरी के रहने वाले प्रताप सिंह से 50 हजार रुपए में खरीदा था. देशी पिस्तौल 315 बोर का था.

लेकिन इदरीस ने प्रताप सिंह को मात्र 15 हजार रुपए ही दिए थे. प्रताप सिंह पुलिस में वांटेड था और उस पर 5 हजार रुपए का इनाम था. उधर जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को पूरी तरह खतरे से बाहर बताया तो अदनान सन्न रह गया. उस के किए पर पानी फिर गया था. शूटरों से पिस्तौल और बचे कारतूस वापस लिए और खुद ही पिता को मारने का निश्चय ही नहीं किया, बल्कि पिस्तौल ले कर अस्पताल गया भी, लेकिन भीड़ लगी होने के कारण वह अपने इरादे में कामयाब नहीं हुआ. अदनान मौके की तलाश में था. लेकिन वह अपना काम कर पाता, उस के पहले ही पकड़ा गया. अदनान के पकड़े जाने के बाद मात्र 24 घंटे में थानाप्रभारी पवन सिंघल ने इस घटना में शामिल विशाल पहलवान, प्रताप सिंह, इदरीस, शहनवाज, मोहम्मद आसिफ, अब्दुल मन्नान, मुनीम सुरेश यादव को गिरफ्तार कर लिया, जबकि अली असगर, मोंटी, शूटर सलमान शेख एवं राजू दूधवाला फरार हो गए.

अली असगर पर आरोप है कि उस ने पिता की हत्या के लिए सुपारी देने के लिए अदनान को 5 लाख रुपए उधार दिए थे. पुलिस ने पूछताछ के बाद पकड़े गए सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां बाकी आरोपियों को तो जेल भेज दिया, लेकिन अदनान और विशाल उर्फ सोनू को साक्ष्य जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान अदनान और विशाल की निशानदेही पर इंदौर से 80 किलोमीटर दूर धरमपुरी से अदनान की वह सफेद रंग की आल्टो कार, जिस का नंबर एमपी09सी ई4616 था, को बरामद कर लिया गया.

पुलिस ने वह देशी पिस्तौल और कारतूस भी बरामद कर लिए थे, जिस से खुजेमाभाई पर गोली चलाई गई थी. रिमांड समाप्त होने पर पुलिस ने अदनान एवं विशाल उर्फ सोनू पहलवान को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें भी जेल भेज दिया गया. 30 मार्च, 2015 को शूटर सलमान शेख और मोहम्मद जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया गया. ये दोनों कुछ दिनों तक शहर से बाहर कहीं छिपे थे. जब उन्हें लगा कि शायद उन का नाम सामने नहीं आया है, तब वे अपनेअपने घर वापस आ गए थे. उन के घर आते ही पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ लिया था. पुलिस ने वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली थी, जिस पर सवार हो कर शूटरों ने उन पर गोली चलाई थी.

पुलिस की अब तक की जांच में पता चला है कि खुजेमाभाई की हत्या की योजना में अदनान की मदद उस के दोस्त अली असगर ने भी की थी. यह बात उन के फोन के काल डिटेल्स से पता चली है. पुलिस अन्य अभियुक्तों की भी काल डिटेल्स निकलवा कर जांच कर रही है. शूटर सलमान शेख, इंदौर के नंदलाल पुरा, कबूतर खाना का रहने वाला था. जीशान और शूटर शेख ने अपना अपराध स्वीकार कर के मामले से जुड़ी सारी बातें विस्तार से पुलिस को बता दी हैं. दोनों ने बताया है कि उन्होंने जो भी किया है, वह अदनान, अली असगर और विशाल उर्फ सोनू पहलवान के कहने पर किया है. 31 मार्च को बजरिया के रहने वाले उन के साथी शहनवाज उर्फ गोलू कुरैशी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने इन तीनों को भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया है.

अली असगर और राजू दूधवाला अभी पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं. कथा लिखे जाने तक जेल गए मुजरिमों में से किसी की भी जमानत नहीं हुई थी. पुलिस फरार अभियुक्तों की तलाश कर रही थी. Gujarat Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

UP Crime: दबंगई का तेजाब

UP Crime: एडवोकेट मनी बिश्नोई अपने फार्महाउस में काम करने वाले हरिसिंह की बेटी राधिका पर बुरी नजर रखता था. एक दिन उस ने जबरदस्ती करनी चाही, जिस का राधिका ने विरोध किया…

मुरादाबाद से 30 किलोमीटर दूर हरिद्वार रोड पर स्थित है कस्बा कांठ. इसी कस्बे के मोहल्ला पट्टीवाला में नए साल 2015 के पहले दिन दबंगई का एक ऐसा खेल खेला गया, जिस की गूंज मीडिया द्वारा पूरे देश में पहुंच गई. गौर करने वाली बात तो यह है कि इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस घटना को रफादफा करने की पुलिस ने पूरी कोशिश की थी. बात पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय की है. राधिका सैनी अपने घर में कपड़े सिल रही थी. उस समय वह घर में अकेली थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. उस के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वह खाली समय में घर पर ही कपड़े सिल लिया करती थी, जिस से कुछ पैसों की आमदनी हो जाती थी.

उसी समय कांठ का ही रहने वाला मनी बिश्नोई नाम का एक युवक उस के घर आ गया. वह वकील था. अपने घर में अचानक उसे देख कर वह डर गई. इस से पहले कि वह उस से कुछ कहती, मनी ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका ने इस का विरोध किया, लेकिन वह नहीं माना. राधिका ने शोर मचाने की धमकी दी तो मनी ने अपने साथ लाए डिब्बे का तेजाब उस के मुंह पर उड़ेल दिया. तेजाब की जलन से राधिका चीखनेचिल्लाने लगी. उस की नानी प्रेमवती सैनी उस समय घर के बाहर बैठी कुछ औरतों से बातें कर रही थीं. जैसे ही उन्होंने राधिका के चीखने की आवाज सुनी, वह तेजी से घर की तरफ भागीं. घर से उन्होंने मनी बिश्नोई को भागते देखा, उस के हाथ में प्लास्टिक का एक डिब्बा था. उन्होंने कमरे में राधिका को दर्द से छटपटाते देखा.

उस का चेहरा जैसे उधड़ा हुआ था. कमरे से तेजाब की गंध भी आ रही थी. वह समझ गईं कि मनी ही उस के ऊपर तेजाब डाल कर भागा है. प्रेमवती ने उसी समय शोर मचा दिया तो मोहल्ले के तमाम लोग घर में आ गए. प्रेमवती ने सब को बता दिया कि मनी राधिका के ऊपर तेजाब डाल कर भाग गया है. मनी बिश्नोई का घर थोड़ी ही दूर पर था. वह दबंग परिवार से था, इसलिए सब कुछ जानते हुए भी किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कोई उस के यहां जा कर शिकायत करे. खबर मिलते ही राधिका के पिता हरिसिंह सैनी और मां भारती सैनी भी घर पहुंच गईं. वे मनी बिश्नोई के फार्महाउस पर ही काम करते थे. बेटी की हालत देख कर उन का दिल कांप उठा. वे शिकायत करने के लिए दौड़ेदौड़े मनी बिश्नोई के घर गए और उस के पिता अनिल बिश्नोई से इस हादसे की शिकायत की.

अनिल बिश्नोई ने बेटे की करतूत को गंभीरता से लेने के बजाय उलटे जवाब दिया, ‘‘ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई, जो मुंह फाड़े जा रहे हो. बेटे ने गलती कर दी है तो तुम्हारी बेटी का इलाज करवा दूंगा और मनी को भी डांट दूंगा.’’  अनिल ने उन्हें धमकाते हुए कहा, ‘‘यदि कोई पूछे तो बता देना कि टौयलट में रखी तेजाब की बोतल धोखे से गिर गई थी. याद रखो, तुम ने मेरा नमक खाया है यदि नमकहरामी की तो अंजाम बुरा होगा. मैं जो कह रहा हूं, उसी में तुम्हारी भलाई है. इसलिए जो मैं कह रहा हूं, एक कागज पर मुझे लिख कर दे दो और हां, ध्यान रखो कि तुम पुलिस के पास गए तो तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है.’’

हरिसिंह अपनी पत्नी के साथ उस के फार्महाउस पर काम करते थे. इसलिए जैसा उस ने कहा, मजबूरी में उन्होंने उसे लिख कर दे दिया. उधर तेजाब की जलन से राधिका बुरी तरह तड़प रही थी. वह छटपटा रही थी. अनिल बिश्नोई उस का इलाज कराने के लिए एक निजी चिकित्सक के पास ले गया. वह काफी झुलस चुकी थी. उस की हालत गंभीर बनी हुई थी. डाक्टर ने प्राथमिक उपचार करने के बाद राधिका को सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी. लेकिन अनिल उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय उसे उस के घर छोड़ आया. राधिका की हालत गंभीर होने के बावजूद भी उस का इलाज न कराना गांव वालों को भी बुरा लगा. मोहल्ले के कुछ असरदार और पढ़ेलिखे लोगों ने हरिसिंह को थाने जाने की सलाह दी.

यह बात हरिसिंह की भी समझ में आ गई तो वह पत्नी को ले कर थाना कांठ पहुंच गए. थानाप्रभारी को उन्होंने बेटी पर तेजाब डालने वाली बात बताई तो थानाप्रभारी ने मनी बिश्नोई के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के राधिका को कांठ के सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया. उस की गंभीर हालत देख कर कांठ के अस्पताल से उसे मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल भेज दिया गया. उस की हालत गंभीर होने की वजह से पुलिस ने कोर्ट में उस के बयान भी नहीं कराए. हालत में सुधार होने पर 2 जनवरी को कोर्ट में बयान कराना था. अनिल को जब पता चला कि हरिसिंह ने उस के बेटे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने धमकी दी कि यदि उस ने रिपोर्ट वापस नहीं ली तो पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

इतना ही नहीं, 2 जनवरी को अनिल अपने 25-30 समर्थकों के साथ हरिसिंह के घर पहुंच गया और अपनी हेकड़ी दिखाते हुए परिवार को धमकाया तथा उसी समय राधिका के छोटे भाई सचिन का अपहरण कर के ले गया. जाते समय अनिल ने यह धमकी दी थी कि 2 जनवरी, 2015 को राधिका ने कोर्ट में हमारे खिलाफ बयान दिया तो सचिन की हत्या कर दी जाएगी. इस धमकी पर राधिका ही नहीं, उस के घर वाले भी डर गए. भाई की जान बचाने के लिए राधिका ने कोर्ट में वही बयान दिया, जैसा अनिल बिश्नोई चाहता था. उस ने कोर्ट में कहा कि टौयलट में रखा तेजाब उस के ऊपर धोखे से गिर गया था, जिस से वह झुलस गई.

जब मनी के घर वालों को पता चला कि राधिका ने उन के पक्ष में ही बयान दिया है तो वे बहुत खुश हुए. अब उन्हें तसल्ली हो गई कि पुलिस भी उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. पक्ष में बयान देने के बावजूद भी उन्होंने सचिन को रिहा नहीं किया. हरिसिंह ने उस से अपने बेटे को रिहा करने की गुहार लगाई, तब कहीं जा कर 2 दिनों बाद उस ने उसे आजाद किया. उधर मीडिया द्वारा यह तेजाब कांड सुर्खियों में आया तो कई सामाजिक संगठन कांड के विरोध में सामने आ गए. सैनी समाज हरिसिंह के साथ जुड़ गया. मुरादाबाद की समाजसेविका व अधिवक्ता सीता सैनी ने हरिसिंह के परिवार वालों से मुलाकात की और उन्हें विश्वास दिलाया कि वह उन्हें हर तरह का सहयोग देने को तैयार हैं और जब तक उस दरिंदे को सजा नहीं मिल जाती, वह भी चुप नहीं रहेंगी. उन्होंने डरीसहमी राधिका की भी हिम्मत बंधाई और शांत न बैठने की सलाह दी.

उधर मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल में भरती राधिका की हालत दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी. उस का संक्रमण बढ़ रहा था, जिस की वजह से अस्पताल के डाक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने सुझाव दिया कि यदि राधिका का अच्छा इलाज करवाना है तो उसे दिल्ली के बड़े अस्पताल ले जाएं. पीडि़त लड़की के घर वालों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे उसे दिल्ली ले जाएं. मगर इस काम में राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षक समिति के सदस्य आगे आए. वे 18 जनवरी, 2015 को राधिका को मुरादाबाद से दिल्ली ले गए और दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में उन्होंने उसे एडमिट करवा दिया. सीता सैनी और अन्य लोगों के समझाने पर राधिका और उस के घर वालों की उम्मीद जागी कि अब शायद उन्हें न्याय मिलेगा.

फिर 9 जनवरी, 2015 को राधिका के मातापिता ने सीता सैनी के साथ मुरादाबाद के एसएसपी लव कुमार से मुलाकात कर के कहा कि राधिका ने 2 जनवरी को कोर्ट में जो बयान दिया था, वह अपने भाई की जान बचाने के लिए डर की वजह से दिया था. उन्होंने कोर्ट में फिर से बयान दर्ज कराने की मांग की. साथ ही गुहार लगाई कि इस केस की जांच कांठ के थानाप्रभारी के बजाय अन्य किसी अधिकारी से कराई जाए. उन की मांग पर एसएसपी ने यह मामला एसपी (ग्रामीण) प्रबल प्रताप सिंह के हवाले कर दिया और भरोसा दिया कि पीडि़त परिवार की सुरक्षा की जाएगी. घर वालों की मांग पर एसएसपी ने मामले की जांच कांठ के थानाप्रभारी से हटा कर कांठ के सीओ राहुल कुमार को सौंप दी.

एसएसपी के आदेश देते ही कांठ पुलिस हरकत में आ गई. सीओ राहुल कुमार ने अभियुक्त मनी बिश्नोई की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम उस के घर भेज दी. लेकिन उस के घर पर कोई नहीं मिला. घर के सभी लोग फरार हो चुके थे. इस के बाद पुलिस को चकमा दे कर अभियुक्त मनी बिश्नोई ने मुरादाबाद के एसीजेएम-5 के न्यायलय में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. चूंकि अनिल बिश्नोई एक दबंग व्यक्ति था. अपने वकील बेटे के जेल जाने पर वह अपनी बेइज्जती महसूस कर रहा था. इसलिए थाने में दर्ज कराई रिपोर्ट वापस कराने के लिए वह हरिसिंह सैनी को धमकियां देने लगा. हरिसिंह ने इस की शिकायत सीओ से की तो उन्होंने केस में पीडि़त परिवार को धमकाने और अपहरण की धाराएं बढ़ा दीं.

पुलिस को अभियुक्त मनी से पूछताछ भी करनी थी. इसलिए जांच अधिकारी ने अदालत में दरख्वास्त की तो अदालत ने उसे 6 घंटे के पुलिस रिमांड पर दे दिया. रिमांड अवधि में उस से पूछताछ के बाद तेजाब का खाली डिब्बा भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. उस ने राधिका के ऊपर तेजाब फेंकने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के बंगला गांव निवासी हरिसिंह सैनी की शादी करीब 22 साल पहले कांठ के पट्टीवाला मोहल्ले की भारती के साथ हुई थी, जिस से उस के 2 बेटियां व एक बेटा पैदा हुआ. राधिका परिवार में बड़ी बेटी थी. हरिसिंह पहले मुरादाबाद की ही एक पीतल फर्म में काम करता था. काम मंदा होने पर वह परेशान हो गया’ तब वह अपनी सास प्रेमवती के कहने पर बीवीबच्चों के साथ अपनी ससुराल कांठ चला गया. कांठ के ही अलगअलग स्कूलकालेज में उस ने अपने बच्चों का दाखिला करा दिया. प्रेमवती ने अपनी बेटी भारती और दामाद हरिसिंह की कांठ में ही अनिल बिश्नोई के फार्महाउस में नौकरी लगवा दी.

खेतों में दोनों पतिपत्नी मेहनतमजदूरी कर के जो कमा रहे थे, उस से उन के परिवार की गाड़ी चल रही थी. बच्चों की पढ़ाई भी ठीक चल रही थी. राधिका बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. 19 साल की राधिका पढ़ाई में होशियार थी. घर पर उस का जो खाली समय बचता था, उस में वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा देती और कपड़े सिल लिया करती थी. जबकि उस के मातापिता अनिल बिश्नोई के फार्महाउस पर काम करने निकल जाते थे. वैसे तो उन्हें खाना देने के लिए उस के छोटे भाईबहन चले जाते थे, लेकिन कभीकभी राधिका भी उन्हें खाना देने फार्महाउस चली जाती थी. उसी दौरान अनिल बिश्नोई के बेटे एडवोकेट मनी बिश्नोई की नजर उस पर पड़ी तो वह उस के पीछे पड़ गया.

राधिका उस के मंसूबों को समझ गई थी, लेकिन वह उस का विरोध इसलिए नहीं कर रही थी कि वह एक दबंग आदमी का बेटा था और दूसरे उस के मांबाप भी उस के यहां काम करते थे. राधिका के चुप रहने पर मनी की हिम्मत और बढ़ गई. अब वह उस से अश्लील मजाक करने लगा. किसी न किसी बहाने उस ने उस के घर भी आना शुरू कर दिया. वहां भी वह उसे ही टकटकी लगाए देखता रहता था. एक दिन राधिका ने मनी की शिकायत अपने मातापिता से कर दी. मातापिता मनी से तो कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने उस बिगड़ैल की शिकायत उस के पिता अनिल बिश्नोई से की. बेटे द्वारा अपने नौकर की बेटी का पीछा करने की बात अनिल बिश्नोई को भी बुरी लगी. उन्होंने मनी को बहुत डांटा और कहा कि यह कदम उठाने से पहले वह कम से कम अपना और उस का स्तर तो देख लेता.

परंतु बेटे के ऊपर तो राधिका को पाने का जुनून सवार था, लिहाजा पिता की डांट और समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. वह उसे हासिल करने की जुगत में लगा रहा. कालेज आतेजाते समय वह उसे परेशान करता. इस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल से की. बेटे की शिकायतें सुनसुन कर अनिल भी परेशान हो गया. तब उस ने मनी की यह सोच कर शादी कर दी कि बीवी के आने पर उस की नकेल कस जाएगी. लेकिन अनिल की यह सोच भी गलत साबित हुई. शादी होने के बावजूद भी वह राधिका को परेशान करता रहा. दिसंबर, 2014 के आखिरी सप्ताह में एक दिन उस ने राधिका को रास्ते में रोक लिया और उस ने धमकी दी कि यदि उस ने उस के साथ शादी नहीं की तो उस के पूरे परिवार को खत्म कर देगा.

डरीसहमी राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया. घर आ कर उस ने यह बात अपने घर वालों को बता दी. जिस की शिकायत हरिसिंह ने फिर से अनिल बिश्नोई से की. तब अनिल बिश्नोई ने भी मनी को डांटा. इस से मनी और ज्यादा बौखला गया. उस ने घटना से 2 दिनों पहले राधिका को कालेज जाते समय रास्ते में रोक कर कहा कि अगर तू मेरी नहीं हुई तो तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा. राधिका उस की हरकतों से परेशान हो चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसे उस से निजात कैसे मिले. पहली जनवरी, 2015 को दोपहर के समय वह अपने घर में बैठी कपड़े सिल रही थी. उस के मांबाप अपने काम पर गए हुए थे, तभी मनी बिश्नोई तेजाब का डिब्बा ले कर उस के यहां पहुंचा. उस ने राधिका के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. राधिका के विरोध करने पर जब उसे लगा कि उस का मकसद पूरा नहीं होगा तो उस ने डिब्बे में भरा तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया.

अभियुक्त मनी बिश्नोई से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रिमांड अवधि खत्म होने से पूर्व ही उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी और राधिका का दिल्ली के डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, राधिका परिवर्तित नाम है.

True Crime Hindi: दौलत बनी दुश्मन

True Crime Hindi: ललिता शर्मा मशहूर हरियाणवी गायिका थी. उस के पति मोनू शेख को शराब पीने की लत थी. घर के नौकर सलमान के साथ उस के शराब पीने पर ललिता को ऐतराज था, इस से खिन्न हो कर सलमान ने अपने दोस्त के साथ ऐसी खौफनाक साजिश रची कि…

दिन निकलते ही एरा गार्डन के फ्लैट संख्या एन-103 के बाहर आसपास के दर्जनों लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. वजह यह थी कि उस फ्लैट में रहने वाले दंपति की किसी ने धारदार हथियार से गोद कर हत्या कर दी थी. हत्यारों ने घर में लूटपाट भी की थी. जिन की हत्या हुई थी, उन में 35 वर्षीया ललिता शर्मा उर्फ नाजिया शेख व उस का पति मोनू शेख था. ललिता शर्मा हरियाणवी रागिनी की जानीमानी गायिका थी. बाहर खड़े लोगों के चेहरों पर इस वारदात की दहशत साफ दिखाई दे रही थी. उसी समय किसी ने इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

एरा गार्डन थाना ब्रह्मपुरी क्षेत्र में आता है. यह एक पौश कालोनी है, इसलिए सूचना मिलते ही थानाप्रभारी रणबीर सिंह यादव सीनियर एसआई अजय कुमार, मनोज शर्मा, एसआई चंदगीराम, कांस्टेबल निशांत चौधरी, सुरेंद्र यादव, नौशाद अली व नजर अब्बास के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह फ्लैट पहली मंजिल पर था. पुलिस जब फ्लैट में पहुंची तो वहां का नजारा दिल दहला देने वाला था. बिस्तर पर ललिता खून से लथपथ पड़ी थी जबकि नीचे उस के पति की लाश पड़ी थी. देख कर ही लग रहा था कि हत्यारों ने दोनों पर किसी भारी चीज व धारदार हथियार से वार किए थे. ललिता की गरदन को धारदार हथियार से गोदा गया था. देखने से ही लग रहा था कि मृतका गर्भवती थी और वह हत्यारों से संघर्ष नहीं कर सकी थी, जबकि उस के पति ने संघर्ष किया था.

बेडरूम में लगी अलमारी व उस के अंदर की तिजोरी खुली हुई थी. इस के अलावा घर का सामान इधरउधर बिखरा हुआ था. दोहरे हत्याकांड की खबर मिलने पर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा, एसएसपी एस.एस. बघेल, एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह आदि भी मौके पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो रसोई की सिंक में खून के निशान मिले. प्रथमदृष्टया लगा कि हत्याएं लूटपाट के लिए की गई हैं. वहीं पर मीट काटने वाला छुरा, जेनरेटर का हैंडल, शराब की खाली बोतल और 2 गिलास मिले. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि शराब पीने के बाद हत्यारों ने इसी छुरे व जेनरेटर के हैंडल से दोनों की हत्याएं की होंगी.

पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. घटना के वक्त दंपति का 6 वर्षीय बेटा अयान ही जिंदा बचा था. वह डरासहमा लोगों के बीच खड़ा था. पुलिस ने लोगों से पूछताछ की तो एक व्यक्ति ने बताया, ‘‘साहब, अयान को पता है कि हत्याएं किस ने की हैं.’’

उस की बात सुन कर पुलिस अधिकारी चौंके, ‘‘क्या?’’

‘‘जी साहब.’’ वह व्यक्ति पूरे विश्वास से बोला.

उस की बात सुनसुन कर एसएसपी को हत्या की गुत्थी सुलझती नजर आई. उन्होंने अयान से प्यार से पूछताछ की तो उस ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. अयान के अनुसार, हत्याएं घर के नौकर सलमान ने अपने दोस्त आदिल के साथ मिल कर उस के सामने ही की थीं. हत्यारे उसे भी खत्म कर देना चाहते थे, लेकिन उन्हें उस पर दया आ गई थी. साथ ही उन्होंने उसे डराधमका दिया था कि वह किसी को कुछ न बताए. हत्या का पता लोगों को सुबह अयान से ही चला था. पुलिस ने लोगों से पूछताछ के आधार पर सलमान व आदिल के नामपते नोट कर लिए. सलमान थाना लिसाड़ी गेट क्षेत्र के मोहल्ला ऊंचा सद्दीकनगर में रहता था, जबकि आदिल एरा गार्डन में ही एक प्रौपर्टी डीलर के यहां एजेंट था. पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

एसएसपी एस.एस. बघेल ने थानाप्रभारी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम को दोनों की तलाश में लगा दिया. ललिता हरियाणा की मशहूर गायिका थी. हरियाणा के अलावा अन्य प्रदेशों में भी उस की धूम थी. हरियाणा में ललिता के घर वालों को भी पुलिस ने हत्या की खबर भिजवा दी. पुलिस टीम ने दोनों आरोपियों के घरों में दबिश दी. वे अपने घरों से लापता मिले. पुलिस जांच में पता चला कि सलमान को 3 साल पहले ही ललिता ने अपने बेटे अयान की देखभाल के लिए नौकरी पर रखा था. इसी बीच आदिल उस का दोस्त बन गया था. ललिता के घर से एक मोटरसाइकिल भी गायब थी. अयान ने पुलिस को बताया कि वे दोनों उस के पापा की मोटरसाइकिल भी ले गए थे. पुलिस ने पूरे जिले में मोटरसाइकिल का नंबर वायरलैस पर फ्लैश करा कर चैकिंग अभियान चलाने के निर्देश दिए.

पुलिस को उम्मीद थी कि दोनों हत्यारे जिले से बाहर नहीं भागे होंगे. इसी बीच पुलिस को सूचना मिली कि नूरनगर फाटक वाली रोड पर 2 संदिग्ध युवक मोटरसाइकिल पर घूम रहे हैं. सूचना पा कर थानाप्रभारी रणबीर सिंह चेकिंग के लिए पहुंच गए. पुलिस के पास मोटरसाइकिल नंबर था ही. थोड़ी देर बाद उसी नंबर की एक मोटरसाइकिल पर 2 लड़के आए. पुलिस ने उन दोनों को रोक कर उन से पूछताछ की तो पता चला कि दोनों सलमान व आदिल हैं और वह मोटरसाइकिल वही है, जो उन्होंने ललिता शर्मा के घर से लूटी थी. जामातलाशी के दौरान उन के पास से सोने के आभूषण व नकदी भी मिली. पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया. थाने में जब उन से पूछताछ की तो इस दोहरे हत्याकांड की एक बेहद चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

आखिर एक अचार बेचने वाले की बेटी का गायिका से शुरू हुआ जिंदगी का सफर प्रेम विवाह से होता हुआ मौत की दहलीज तक कैसे पहुंचा? दरअसल, ललिता शर्मा उर्फ नाजिया शेख मूलरूप से हरियाणा के हिसार जिले के हांसी क्षेत्र के रहने वाले रूपचंद की बेटी थी. रूपचंद साधारण व्यक्ति थे. उस के परिवार में ललिता के अलावा 5 और भी बच्चे थे. वह अचार बना कर बेचने का काम कर के किसी तरह परिवार की गाड़ी खींच रहे थे. ललिता को बचपन से ही गाने का शौक था. वह वक्तबेवक्त कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती थी. एक बार कालेज के प्रोग्राम में उसे स्टेज पर गाने का मौका मिला तो उस ने जम कर तालियां बटोरीं. कार्यक्रम खत्म होने के बाद एक शिक्षक ने उस की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘ललिता, तुम्हारी आवाज बहुत अच्छी है. तुम अभ्यास करो. मुझे उम्मीद है कि एक दिन तुम बहुत ऊंचे मुकाम पर जाओगी.’’

शिक्षक की सलाह को ललिता ने गंभीरता से लिया. वह अपने गायन पर और भी ज्यादा ध्यान देने लगी. अब कालेज में कोई भी प्रोग्राम होता तो वह झूम कर गाती. ललिता के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह चाहती थी कि यदि इसी गायन से उसे थोड़ीबहुत आमदनी होने लगे तो परिवार की हालत सुधर जाए. लगातार अभ्यास करने पर उस की गायिकी सुधरती गई. उस के पास गायिकी का हुनर था. 22 साल की उम्र में ही उस ने कालेज के स्टेज से निकल कर गायिकी को अपना कैरियर बनाने की ठान ली. उस ने कोशिश भी की, सफलता इतनी आसानी से नहीं मिलती, यह बात उसे बहुत जल्द समझ में आ गई. लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने कोशिश करनी नहीं छोड़ी.

कहते हैं, कोशिशें लगातार की जाएं तो कामयाबी जरूर मिलती है. इलाके की एक जागरण मंडली ने उसे अपने साथ रख लिया. जागरण में वह भजन गाने लगी. इस से उसे कुछ पैसे भी मिल जाया करते थे. यानी यहां से उसे अपने हुनर के पैसे मिलने शुरू हो गए. इस से उस के हौसले और बढ़ गए. वह ऊंचाइयों पर जाना चाहती थी. इसी दौरान उस ने हरियाणवी रागिनी जगत में पहचान बनाने के प्रयास किए तो कुछ लोगों से उस के संपर्क हो गए. मौका मिला तो उस ने ‘जीव जंतु और पशे पखेरू नाच्चे दुनिया सारी’ नामक रागिनी गाई. इस से उसे एक नई पहचान मिली. लोगों ने इसे खूब पसंद किया. इस के बाद उसे रागिनी समारोह में बुलाया जाने लगा. वह धीरेधीरे सफलता की सीढि़यां चढ़ रही थी. धीरेधीरे उस की रागिनियों में मांग बढ़ने लगी.

ललिता युवावस्था में ही गायिका बन गई. जिस परिवेश में वह पलीबढ़ी थी, वहां बेटियों की फिक्र करना आम बात है. उस के पिता को उस की शादी की फिक्र होने लगी. वह चाहते थे कि समय रहते उस की शादी हो जाए तो ठीक रहेगा. इस बारे में उन्होंने ललिता से बात की तो ललिता ने फिलहाल शादी के लिए मना कर दिया. वह कोई मुकाम हासिल करने के बाद ही शादी करना चाहती थी. पिता को उस की बात समझ में आ गई. ललिता अपने कार्यक्रमों में अकेली ही जाती थी. बेटी को कोई परेशानी न हो, इस के लिए रूपचंद ने अपने पड़ोस में रहने वाले मोनू शेख से बात की. मोनू कार चलाता था. उन्होंने उसे ललिता के साथ आनेजाने के लिए तैयार कर लिया. ललिता भी इस से खुश थी.

कहते हैं, जब सफलता मिलती है तो फिर रुकती नहीं. ललिता के साथ भी यही हुआ. उस की रागिनी की सीडी बना कर बाजार में बेची जाने लगीं. इस से उसे अच्छे पैसे भी मिलने लगे. कुछ सालों में ही दर्जनों सीडियां बाजार में आ गईं. कई छोटीबड़ी कंपनियों ने उस की आवाज को रेकार्ड कर के बेचा. इस के बाद तो हरियाणा में रागिनी गायिका के रूप में ललिता का नाम सम्मान के साथ लिया जाने लगा. जब आमदनी बढ़ी तो उस के परिवार की दशा भी सुधर गई. परिवार व नातेरिश्तेदार भी ललिता की प्रगति से बेहद खुश थे. ललिता रागिनी जगत में तेजी से उभरता सितारा थी. कहते हैं, जिंदगी में कब कौन सा मोड़ आ जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. ललिता के साथ अकसर बाहर सफर में मोनू शेख रहता था. वह ललिता की हमउम्र था.

वक्त के साथ दोनों का झुकाव एकदूसरे की तरफ हो गया. दोनों साथ रहते थे और खूब बातें किया करते थे. धीरेधीरे आंखों के रास्ते दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. मोनू पहला शख्स था, जिस ने उस के दिल के दरवाजे पर दस्तक दी थी. एक दिन बातोंबातों में मोनू ने अपने प्यार का उस से इजहार भी कर दिया. प्यार का इजहार हुआ तो दोनों एकदूसरे को देखने को बेकरार रहने लगे. मोनू ललिता का सब से विश्वासपात्र साथी था. समय के साथ दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. यह बात अलग थी कि अपने इस प्यार को दोनों ने जमाने से छिपाए रखा. ललिता ने हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान व अन्य स्थानों पर सैकड़ों कार्यक्रम किए, हर जगह मोनू साथ रहा.

ललिता अपनी प्रगति और मोनू के प्यार, दोनों से ही बहुत खुश थी. प्यार में डूबा मोनू भी उस के साथ जीनेमरने की कसमें खाता. हालांकि दोनों अलगअलग धर्मों के थे, इस के बावजूद भी उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे. जाहिर है, यह बात किसी को भी अच्छी लगने वाली नहीं थी. निस्संदेह ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. धीरेधीरे क्षेत्र में दोनों को ले कर चर्चाएं होने लगीं. रूपचंद को यह बात नागवार गुजरी. उन्होंने मोनू को इसलिए रखा था कि वह सुरक्षित रहे, लेकिन वे दोनों प्रेम डगर पर चल निकले थे. उन्होंने इस बात को ले कर ललिता को फटकारा तो उस ने दो टूक कह दिया कि वह मोनू से प्यार करती है.

इस पर रूपचंद बोले, ‘‘ठीक है, तुम कलाकार बन गई हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि कुछ भी करो. अब तुम मोनू के साथ जाना बंद कर दो.’’

‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकती.’’ ललिता का टका सा जवाब सुन कर रूपचंद सकते में आ गए. रूपचंद ने जमाना देखा था. उन्होंने बेटी को जमाने की ऊंचनीच समझाई. वह जिस समाज में रह रहे थे, वहां ऐसी बातों को गंभीरता से लिया जाता था. इसलिए उन्होंने बेटी को काफी समझाने की कोशिश की.

ललिता और मोनू शादी करने का फैसला कर चुके थे, जबकि घरों में रहते हुए यह मुमकिन नहीं था. ललिता अपने परिवार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं करना चाहती थी, इसलिए सन 2007 में दोनों ने घर छोड़ दिया. रूपचंद ने बेटी को बहुत समझाया, लेकिन जब वह अपने निर्णय पर अटल रही तो उन्होंने उस से रिश्ते तोड़ लिए. ललिता और मोनू मेरठ जा कर मोहल्ला तीरगरान में रहने लगे. ललिता ने मोनू से निकाह कर के अपना नाम नाजिया शेख रख लिया. जबकि गायिकी के क्षेत्र में उस का पुराना नाम ही चलता रहा. उसे इसी नाम से पहचान मिली थी, इसलिए वह गायन के क्षेत्र में अपना नाम बदलना नहीं चाहती थी. ललिता के पास खूब पैसा आ रहा था. उस के पास लग्जरी कार थी. उसे सोने के गहने पहनने का भी बहुत शौक था. विवाह के एक साल बाद ललिता ने एक बेटे को जन्म दिया. दोनों ने बेटे का नाम अयान शेख उर्फ अनु शर्मा रखा. दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. ललिता गायिकी के क्षेत्र में नाम और दाम दोनों कमा रही थी.

ललिता की इस कमाई ने मोनू को नकारा बना दिया था. कहते हैं, इंसान के पास जब पैसा आता है तो साथसाथ बुरी आदतें भी आ जाती हैं. मोनू के साथ भी यही हुआ. उसे महंगी शराब पीने की लत लग गई. ललिता ने शुरूशुरू में तो कुछ नहीं कहा, बाद में उस ने मोनू को टोकना शुरू कर दिया. लेकिन ऐसी आदतें आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं. ललिता ने सोचा कि शायद मोनू का खाली रहना ही सब से बड़ी परेशानी है. भविष्य की सोचते हुए उस ने उसे प्रौपर्टी के काम में लगा दिया. अयान को ललिता व मोनू, दोनों ही बहुत प्यार करते थे. 2 साल पहले ललिता ने एरा गार्डन में प्रथम तल पर फ्लैट नंबर 103 खरीद लिया था. वक्त के साथ जैसेजैसे पैसा आता रहा, ललिता उसे प्रौपर्टी में लगाती रही. उस ने करोड़ों की प्रौपर्टी बना ली. उस के शरीर पर हर वक्त लाखों रुपए का सोना रहता था.

ललिता की रागिनियों की सीडियां बाजार में हाथोंहाथ बिक रही थीं. ललिता प्रोग्राम करने के लिए अकसर बाहर जाती रहती थी. इसलिए बेटे की देखभाल के लिए उस ने मेरठ के लिसाड़ी गेट थानाक्षेत्र के मोहल्ला ऊंचा सद्दीकनगर निवासी बाबू कुरैशी के बेटे सलमान उर्फ सेम को बतौर नौकर रख लिया था. सलमान अच्छा लड़का था. बहुत जल्द उस ने अपने व्यवहार से पतिपत्नी दोनों का दिल जीत लिया. सलमान घर का नौकर था, मोनू उसे भेज कर अपने लिए शराब मंगा लिया करता था. हालांकि इस बात पर ललिता मोनू व सलमान दोनों को ही डांट देती थी. सलमान की दोस्ती एरा गार्डन में एक प्रौपर्टी डीलर के हमउम्र एजेंट आदिल उर्फ आदि से थी. इसी नाते कभीकभी वह भी ललिता के घर आ जाता था.

मोनू की शराब की लत से ललिता परेशान थी. उस ने उसे कई बार समझाया भी, लेकिन वह उस की बात को एक कान से सुन कर दूसरी से निकाल देता था. ललिता को पता चला कि मोनू सलमान से शराब मंगाता है तो उस ने एक दिन सलमान को भी फटकार दिया. इसी दौरान ललिता गर्भवती हो गई. इतने लंबे अरसे में मोनू व ललिता का अपने परिवारों से संपर्क नहीं हुआ था. ललिता की बहन पिंकी भी गायिकी के क्षेत्र में आ गई थी. इस नाते उस की ललिता से बातें हो जाया करती थीं. अयान मातापिता के अलावा सभी रिश्तेदारों से अनजान था, क्योंकि वह कभी किसी रिश्तेदारी में नहीं गया था. मोनू की शराब की लत के अलावा ललिता को कोई परेशानी नहीं थी. मोनू खुद शराब पीता था, यहां तक तो ठीक था. हालात तब बिगड़े, जब मोनू सलमान को भी अपने पास बिठा कर शराब पिलाने लगा.

शराब के मामले में नौकर को बराबर का दरजा मिल रहा था, इस बात से सलमान खुश था. एक दिन ललिता ने अपनी आंखों से यह देखा तो उसे एकाएक भरोसा नहीं हुआ. उस ने सलमान को खूब डांटाफटकारा. पहले भी ऐसे कई मौके आए थे, जब उस ने ललिता की डांट खाई थी. सलमान मोनू को तो पसंद करता था. लेकिन डांटने की आदत के चलते ललिता को पसंद नहीं करता था. फलस्वरूप वह अंदर ही अंदर उस से खार खाने लगा. 6 अप्रैल, 2015 की शाम मोनू, सलमान व आदिल ने शराब की महफिल सजा ली. ललिता ने यह देखा तो जम कर हंगामा किया. मजबूरन करीब 8 बजे उन्हें महफिल खत्म करनी पड़ी. सलमान व आदिल वहां से चले गए. आदिल सलमान को अपने घर ले गया. वह जिस प्रौपर्टी डीलर के यहां नौकरी करता था, उसी के फ्लैट में रहता भी था. इस से फ्लैट की भी देखभाल हो जाती थी.

ललिता के लिए सलमान के मन में पहले ही बहुत गुस्सा था. उस दिन मस्ती में खलल पड़ने से उस का गुस्सा अंगार बन गया. फलस्वरूप उस ने मन ही मन एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. ललिता लाखों में खेलती थी, घर में भी लाखों रुपए रहते थे. सलमान ने सोचा कि यदि उसे रास्ते से हटा दिया जाए तो अमीर बन जाएगा. उस ने उसी रात आदिल के साथ मिल कर ललिता को रास्ते से हटा कर लूट की योजना बना ली. आदिल भी लालच और दोस्ती में उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया. रात करीब साढ़े 9 बजे दोनों दोबारा ललिता के घर पहुंचे तो ललिता उन्हें देख कर भड़क गई.

‘‘मेमसाहब, इस को माफ कर दो. यह अपनी गलती पर बहुत रो रहा था.’’ आदिल ने भोलेपन से कहा.

ललिता उन के खतरनाक इरादों से अनजान थी. वह नहीं जानती थी कि भोलेपन का नाटक कर के उसे झांसे में लिया जा रहा है. सो उस ने कह दिया, ‘‘ठीक है, अब कभी ऐसी गलती नहीं करना.’’

‘‘खुदा की कसम, अब कभी ऐसा नहीं होगा.’’ सलमान ने तुरंत कान पकड़ते हुए कहा.

उसे समझा कर ललिता बैडरूम में चली गई. कुछ देर बाद उसे नींद आ गई. मोनू व अयान पहले ही सो चुके थे. सब सो गए, लेकिन सलमान व आदिल नहीं सो सके. सलमान व आदिल करीब 12 बजे रसोई में पहुंचे और वहां बैठ कर दोनों ने शराब पी. दोनों पर नशा हावी होने लगा तो उन्होंने रसोई से मीट काटने वाला छुरा ले लिया. आदिल इस बीच बाहर से जेनरेटर स्टार्ट करने वाला हैंडल ले आया था. इस के बाद दोनों बैडरूम में दाखिल हो गए. ललिता, मोनू व अयान एक ही बिस्तर पर सो रहे थे.

सलमान ने डे्रसिंग टेबल से अलमारी की चाबी निकाली और उसे खोल कर लूटपाट शुरू कर दी. इस बीच ललिता की आंखें खुल गईं तो दोनों उस की तरफ दौड़े. सलमान ने ललिता के बाल पकड़े और मुंह दबा कर उसे दबोच लिया, जबकि आदिल ने छुरे से उस की गरदन और शरीर के अन्य हिस्सों पर एक के बाद एक कई वार कर दिए. अचानक हुए हमले का ललिता विरोध नहीं कर सकी. उस की घुटीघुटी सी चीख निकली और लहूलुहान हो कर उस ने दम तोड़ दिया. इस बीच मोनू जाग गया. पत्नी का ऐसा हश्र देख कर उस के होश उड़ गए. मोनू खड़ा हुआ और दोनों से भिड़ गया.

सलमान व आदिल के सिर पर खून सवार था, उन्होंने जेनरेटर के हैंडल से मोनू के सिर पर प्रहार किया. वार होते ही मोनू नीचे गिर गया और तड़प कर कुछ ही देर में उस ने भी दम तोड़ दिया. इस बीच अयान की आंखें भी खुल गईं, लेकिन वह दहशत में कुछ नहीं बोला. दोनों ने उसे घूर कर देखा.

‘‘इस का क्या करें?’’ आदिल ने सलमान से पूछा तो वह बोला, ‘‘बच्चा है, डरा हुआ है. यह किसी को कुछ नहीं बताएगा, समझा देते हैं.’’

‘‘किसी को कुछ मत बताना वरना तुझे भी ऐसे ही मार देंगे.’’ सलमान ने डरेसहमे अयान को धमकी दी. इस के बाद दोनों ने गहने व नकदी लूटी और रसोई में जा कर हाथ धोए. तत्पश्चात अयान को साथ ले कर उन्होंने घर में खड़ी मोटरसाइकिल भी निकाल ली. अयान को ले कर आदिल ने फिर कहा, ‘‘इसे साथ ले चलते हैं, मार कर कहीं नहर में फेंक देंगे.’’

‘‘नहीं, इस ने अपनी आंखों से खूनखराबा देखा है. यह किसी को कुछ नहीं बताएगा.’’ सलमान ने आदिल को समझाया. अयान को वहीं छोड़ कर दोनों मोटरसाइकिल ले कर फरार हो गए.

उन के चले जाने पर अयान ने बाहर आ कर शोर मचा दिया. शाम होतेहोते सलमान व आदिल पुलिस की गिरफ्त में आ गए. दूसरी तरफ पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया कि ललिता के गर्भ में पल रहे 7 महीने के शिशु की भी मौत हो चुकी थी. आरोपियों के कब्जे से पुलिस ने ललिता के यहां से लूटे गए आभूषण व नकदी भी बरामद कर ली थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. उधर अयान की सुपुर्दगी को ले कर मोनू व ललिता के परिजन आगे आ गए. अयान किसी को नहीं पहचानता था. दोनों परिवारों में उसे ले कर खींचतान होने लगी. मामला पेचीदा होने पर पुलिस ने अयान को बाल सदन भेज दिया. अदालती आदेश पर ही अब उस की सुपुर्दगी होगी.

कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. शराब की लत में मोनू ने नौकर को इस तरह सिर पर न चढ़ाया होता और ललिता ने दौलत की चकाचौंध न दिखाई होती तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. True Crime Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Inspiring Hindi Stories: मुट्टी भर कालिख

Inspiring Hindi Stories: शमा को लगता था कि कोई आदमी गलत काम करता है तो उस की सजा उस की आने वाली पीढ़ी को भुगतनी पड़ती है. आखिर उस के साथ ऐसा क्या हुआ कि यह बात झूठी साबित हुई. मैं सुरैया खाला के मोहनजोदड़ो जैसे वजूद की खुदाई कर के उस में दबी भावनाओं के उस खजाने को बाहर निकालना चाहती थी, जो किसी सुरक्षित की हुई ममी की तरह उन के अंदर सोई हुई थी. समझ में नहीं आता था कि इतनी सुंदर, समझदार और हुनरमंद खाला अपनी सारी इच्छाओं, भावनाओं और खुशियों को मन के अंधेरे कोने में बंद कर के क्यों बैठी रह गईं? कोई भी अपने जीवन मे ंआने वाले उजाले को रोकने के लिए दीवार नहीं बनाता, तब खाला ने ऐसा क्यों किया? उन का वजूद दीवार नहीं, बल्कि एक चट्टान की तरह था, जिस से टकराटकरा कर जिंदगी की सारी खूबसूरती और खुशियां दम तोड़ गई थीं.

यूं तो खाला अपने लिए अंधेरा और दूसरों के लिए सूरज थीं. उन की मीठीमीठी आवाज, हंसमुख चेहरा और पवित्र मुसकान मुझे ही नहीं, मेरे परिवार के हर आदमी को दीवाना बनाए हुए थी. मैं ने जब से होश संभाला था, कभी भी किसी भी आदमी से उन के लिए बुराई का एक भी शब्द नहीं सुना था. पिताजी उन का बहुत आदर करते थे, मम्मी उन की इस हद तक प्रशंसक थीं कि घर में होने वाले हर अहम काम में उन की राय जरूर लेती थीं. यही हाल परिवार के अन्य लोगों का भी था. खाला ने शादी नहीं की थी. मम्मी से उन के बारे में मुझे यही मालूम हुआ था कि जवानी में वह बहुत सुंदर थीं. अपनी बुद्धिमानी, हाजिर जवाबी और हंसमुख स्वभाव की वजह से अपने समय में वह मोहल्ले की अन्य लड़कियों में अपनी विशिष्ट छाप रखती थीं.

उन के पिताजी के मेरे दादाजी से बहुत अच्छे संबंध थे. दोनों में गहरी दोस्ती थी. खाला मेरी सगी खाला नहीं थीं, वह मम्मी की दूर के रिश्ते से बहन लगती थीं, लेकिन वह मम्मी को सगी बहन की तरह मानती थीं और उन से बड़े प्रेम और आत्मीयता से पेश आती थीं. इस के बावजूद उन्होंने मम्मी को भी कभी नहीं बताया था कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की थी? सुना है, शुरूशुरू में उन के विवाह से इनकार को उन का बचपना और जिद समझ कर अहमियत नहीं दी गई थी. लेकिन जब उन के इनकार की वजह से कई अच्छे रिश्ते हाथ से निकल गए तो उन के अम्मीअब्बू को चिंता हुई. बेटी का गौर से जायजा लिया तो उसे एकदम बदली हुई पाया. चंचलता, चपलता और जीवन की उमंग जैसे उन में रह ही नहीं गई थी.

मम्मी का कहना था कि 20-22 साल की उम्र में ही खाला ने स्वयं को गंभीरता, प्रौढ़ता और पवित्रता के एक ऐसे आवरण से ढक लिया था, जिसे उन के अम्मीअब्बू ही नहीं, पूरा परिवार मिल कर भी नहीं हटा सका. उन की दिलचस्पी धर्म की ओर बढ़ गई थी. पांचों वक्त की नमाज पढ़ने के अलावा वह धार्मिक ग्रंथों को पढ़ कर अपना समय बिताया करती थीं. उन के अम्मीअब्बू उन्हें बहुत प्यार करते थे, क्योंकि वह उन की एकलौती बेटी थीं. उन से बड़े 2 भाई थे, जो अपनी एकलौती बहन पर जान छिड़कते थे. इसी प्रेम का नतीजा था कि वे लोग जबरदस्ती अपना कोई निर्णय खाला पर नहीं थोप सके थे. इसी का नतीजा था कि हमेशाहमेशा के लिए वह अकेली रह गईं.

उन का चरित्र इतना पवित्र और साफ था कि कोई उन पर झूठा आरोप भी लगाने का साहस नहीं कर सकता था. सब ने यही मान लिया था कि उन का ध्यान मजहब की ओर हो गया है और वह उसी के सहारे अपना जीवन गुजारना चाहती हैं. इस बात को ध्यान में रख कर घर वालों की गुजारिश कम होती गई. उन के अम्मीअब्बू जब तक जीवित रहे, विवाह के लिए कोशिश करते रहे, लेकिन खाला की ‘ना’ को ‘हां’ नहीं करवा सके. खुद टूट कर मिट्टी में मिल गए. उन के जाने के बाद भाई बहन के लिए छाया बने. भाइयों की भी हार्दिक इच्छा थी कि उन की बहन विदा हो कर अपने घर चली जाए. मगर बहन तैयार नहीं हुई तो उन्होंने भी दबाव नहीं डाला और उन की इच्छा को स्वीकार कर लिया. वैसे तब तक खाला के सिर में चांदी के तार झिलमिलाने लगे थे और रिश्ते आने बंद हो गए थे.

जीवन तरहतरह के रूप बदलबदल कर आगे बढ़ता रहा. परिवार में आने वाली पीढ़ी ने जवान हो कर जिन खाला को देखा, वह 50-55 साल की एक मजहबी औरत थीं. खाला का घर हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं था. समझदार होते ही मैं खाला के घर पढ़ने जाने लगी थी. वह मोहल्ले के बहुत सारे बच्चों को पढ़ाती थीं. उन के दोनों भाई विदेश चले गए थे, लेकिन खाला को खर्च के लिए नियमित पैसे भेजते रहते थे. वैसे भी वह आर्थिक रूप से सुदृढ़ थीं. एक नौकरानी उन के घर काम करने आती थी. उस का नाम रेशमा था. इतनी उम्र होने के बाद भी उन के चेहरे पर कठोरता नहीं थी. बड़ीबड़ी आंखों में हर पल एक सच्चाई, पवित्रता का उजाला चमकता रहता था. सुर्ख व सफेद चेहरे पर इतनी पवित्रता होती थी कि देखने वाले की निगाह अपने आप झुक जाती थी. माथे पर सिजदे का निशान उन की इबादत का गवाह था.

उन का लहजा इतना मीठा था कि अगर कभी वह किसी गलत बात पर डांटती भी थीं तो बुरा नहीं लगता था. मैं ने खाला से बहुत कुछ सीखा था. छोटी थी तो स्कूल से आते ही उन के घर भाग जाती थी. लेकिन मैट्रिक करने के बाद जब मैं ने कालेज जौइन किया तो खाला के घर आनाजाना थोड़ा कम हो गया. फिर भी जब मुझे समय मिलता, मम्मी से पूछ कर खाला के यहां चली जाती थी. मैं जब भी उन के यहां जाती, उन्हें इबादत करते हुए पाती. मुझे देख कर वह अपनी इबादत से उठ कर मुझे अपने पास बिठा लेतीं और मुसकराते हुए शहद जैसे मीठे लहजे में पूछतीं, ‘‘शमा बेटी, मम्मी ठीक हैं?’’

वह हमेशा केवल मम्मी की ही खैरियत पूछती थीं. जवाब में मैं कहती, ‘‘खाला, मम्मी तो ठीक हैं, आप कैसी हैं?’’

वह मीठी आवाज में कहतीं, ‘‘मैं भी ठीक हूं.’’

इस के बाद मैं शुरू हो जाती. कालेज के किस्से, घर की छोटीछोटी बातों से ले कर और न जाने कहांकहां की कितनी बातें कर डालती. मेरी समस्या यह थी कि मम्मीपापा की एकलौती बेटी होने की वजह से घर में कोई बात करने वाला नहीं था. मम्मी मेरी बातों में कोई भी दिलचस्पी नहीं लेती थीं. पापा मम्मी की तुलना में मुझे ज्यादा चाहते थे, इसलिए मेरी बातें वह बड़े ध्यान से सुनते थे. लेकिन उन के पास सिर्फ छुट्टी वाले दिन ही समय होता था. आम दिनों में वह अपने बिजनैस में उलझे रहते थे. यही वजह थी कि मैं खाला के पास जाने के लिए बेचैन रहती थी और उन से खुल कर अपने दिल की हर बात कह डालती थी. जब तक उन से एकएक बात न बता देती, मुझे चैन न मिलता.

मेरी जिंदगी खाला के लिए आईने की तरह थी. उन की भी जिंदगी मेरे सामने खुली किताब की तरह थी. लेकिन मैं उस किताब का वह पन्ना पढ़ना चाहती थी, उस लड़की की कहानी जानना चाहती थी, जिस का नाम सुरैया था और अब उस सुरैया पर खाला का लेबल चिपका दिया गया था. अब बच्चाबूढ़ाजवान हर कोई उन्हें खाला कह कर पुकारने लगा था. अक्सर बात मेरे होंठों तक आतेआते रुक जाती थी. एक अनजाना सा रौब मुझ पर छा जाता और मैं खाला के गुजरे जीवन में झांकतेझांकते लौट आती. मैं सोचती थी कि जो राज खाला ने आज तक किसी पर नहीं खोला, किसी को हवा तक नहीं लगने दी, भला मुझे कल की लड़की को कैसे बता सकती थीं. लेकिन फिर विचार आता कि किसी बात की तह तक पहुंचने के लिए जिस लगन की आवश्यकता होती है, हो सकता है दूसरों में वह लगन न रही हो.

बहरहाल, कारण जो भी रहा हो, मैं दिनरात जब भी खाला से मिलती, मेरे दिल में यही इच्छा होती कि किसी तरह दरवाजा खुल जाए और मैं उस रहस्य को देख लूं, जिस ने उन के जीवन की धारा बदल दी थी. एक दिन बातोंबातों में अचानक मुझे एक बात सूझ गई. मैं ने कहा, ‘‘खाला मैं ने एक कहानी लिखी है.’’

‘‘कैसी कहानी?’’

‘‘वैसी ही कहानी, जैसी होती है. और आप को पता है मेरी वह कहानी एकदम सच्ची है.’’ मैं ने बड़े विश्वास से कहा.

उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘‘शमा बेटा, तुम ने कहानी लिखी है. मगर सुनाने से पहले यह तो बता दो किस की है?’’

‘‘आप की कहानी है खाला.’’ मैं ने दिल कठोर कर के कहा.

खाला ने हैरानी से मुझे देखते हुए कहा, ‘‘मेरी कहानी, तुम क्या जानो मेरी कहानी. मेरी तो कोई कहानी ही नहीं है शमा बेटा. बिलकुल सीधीसादी, आकाश जैसी साफ नजर आने वाली है मेरी जिंदगी.’’

‘‘नहीं खाला, आप की जिंदगी आकाश की तरह जरूर है, लेकिन उस आकाश पर बादल का एक झीना सा टुकड़ा भी है और यह उसी बादल के टुकड़े के पीछे छिपी सच्चाई की कहानी है.’’

उन्होंने कुछ कहना चाहा, लेकिन मैं ने रोक दिया, ‘‘प्लीज खाला एक मिनट, मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए. उस के बाद मुझे जी भर कर डांट लीजिएगा या मार लीजिएगा. लेकिन आज मैं आप से वह बात जरूर कहूंगी, जिसे सोचसोच कर मेरा दिमाग फटने लगता है.

‘‘खाला हर दृश्य के पीछे कोई न कोई भूमिका जरूर होती है. आंसू आंखों में तभी आते हैं, जब दिल को कोई दुख पहुंचता है. हंसी भी होंठों तक बिना कारण नहीं पहुंचती. हर बात, हर काम का कोई न कोई कारण जरूर होता है. इसलिए मैं नहीं मानती कि आप ने जो यह संन्यास लिया है, यह बिना किसी वजह के है. मैं वही कारण जानना चाहती हूं.

‘‘आप से मुझे सिर्फ प्रेम ही नहीं, श्रद्धा भी है. और जब किसी से अत्यधिक श्रद्धा और अत्यंत प्रेम हो तो वह अपना ही रूप नजर आता है, मैं अपने रूप से पूर्ण परिचय प्राप्त करना चाहती हूं. आप ने मुझे बचपन से इतना प्यार दिया है कि कोई मां भी नहीं दे सकती. फिर आखिर आप मुझे वह राज, वह दुख मुझ से क्यों नहीं बांट सकतीं, जो आप अकेली ढो रही हैं?’’ मैं ने खाला के दोनों हाथ थाम कर कहा.

हंसीहंसी में शुरू होने वाली बात अत्यंत गंभीर मोड़ पर आ गई थी. खाला ने बड़ी गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम ने क्या कहानी लिखी है?’’

‘‘मैं ने बहुत सोचविचार कर कहानी लिखी है कि कुछ ऐसा ही हुआ होगा. एक लड़की, जो गुडि़या की तरह सुंदर थी. मां उसे संभालसंभाल कर रखती थीं और उस के लिए किसी प्यारे से गुड्डे की खोज में थीं कि अचानक गुडि़या का दिल एक बहुत सुंदर राजकुमार को देख कर धड़क उठा. वह गुडि़या उसी राजकुमार के स्वप्न देखने लगी. मुलाकातें हुईं. वादे किए गए, वचन दिए गए, कसमें खाई गईं, वह सब हुआ, जो इस जुनून में होता है.

‘‘लेकिन राजकुमार गुडि़या को छोड़ कर दूर देश चला गया, कभी वापस न आने के लिए, सब वादे, कसमें तोड़ कर. इस के बाद गुडि़या ने सब त्याग दिया. अपने दिल के सारे दरवाजे बंद कर के बैठ गई. किसी की भी दस्तक पर दरवाजा नहीं खोला. ऐसा ही हुआ था ना खाला जान.’’

मैं ने डरतेडरते खाला की ओर देखा. उन का चेहरा सफेद पड़ गया था. वह जैसे गहराई से बोलीं, ‘‘हां शमा बेटा, कुछ ऐसा ही हुआ था. मगर अंजाम तुम्हारी सोच से भी ज्यादा भयानक था. बहुत भयानक, बहुत तकलीफदेह.’’

‘‘अंजाम, क्या अंजाम हुआ था. मेरी कहानी पूरी कर दें खाला, प्लीज.’’ मैं ने उत्सुकता से कहा.

‘‘अंजाम यह हुआ था कि एक दिन गुडि़या घर में अकेली थी, अचानक वह आ गया, जिस के लिए गुडि़या के दिल में सब से ऊंचा स्थान था. लेकिन उस दिन वह इंसान नहीं, शैतान बन कर आया था. उस ने गुडि़या की नेकनामी और इज्जत को शोकेस से उतार कर कीचड़ में फेंक दिया. गुडि़या का उजला लिबास, सुंदर बाल और मासूम चेहरा, सब के सब गंदगी में लिथड़ गए.

‘‘वह मर्द था, अत्याचारी और जालिम, जबरदस्ती छीन लेने वाला लुटेरा, जबकि गुडि़या मासूम, कमजोर और अकेली लड़की थी. उस लड़की का सब कुछ छीन कर वह उस की जिंदगी से निकल गया और दूसरी लड़की से शादी कर ली. इस तरह कहानी खत्म हो गई. लड़की ने अपने रौंदे हुए शरीर को समेट कर खुद को तनहाइयों को सौंप दिया. क्योंकि वह धोखेबाज नहीं बनना चाहती थी. धोखा देना और धोखा खाना नहीं चाहती थी.’’

खालाजी खामोश हो गईं. मैं भी गूंगी बनी बैठी थी. थोड़ी देर बाद मैं संभल कर दुखी मन से बोली, ‘‘मुझे क्षमा कर दें खाला, मैं ने बेकार ही जिद कर के आप को दुखी कर दिया.’’

‘‘नहीं बेटी, सब संयोग से होता है. जिस के हिस्से में जितने दुख होते हैं, वे उसे मिल कर रहते हैं.’’ खाला उदास लहजे में बोलीं.

‘‘खाला, वह आदमी भी तो मांबहन वाला होगा, उस की जवान बेटी भी होगी? देख लीजिएगा, जो कुछ उस ने किया है, वही उस की औलाद या बहन के साथ होगा. बड़ेबूढ़े कहते हैं कि भाई या बाप का गुनाह उस की बहन या बेटी के साथ जरूर दोहराया जाता है. आप देख लीजिएगा उस की…’’

‘‘ना… बेटी ना, खाला ने मेरे मुंह पर हाथ रख कर नरमी से कहा, ‘‘पागल, यह सब सिर्फ कहने की बातें हैं. लोग बकवास करते हैं. अरे जो गुनाह करेगा, वही उस की सजा भोगेगा. किसी के गुनाह की सजा दूसरे को कैसे मिलेगी? ऐसा सोचना भी गुनाह है बेटी.’’

मैं उन की बात से सहमत नहीं थी, लेकिन उस समय बहस के मूड में नहीं थी, इसलिए बात बदल कर बोली, ‘‘अच्छा खाला, यह बताइए कि वह व्यक्ति मेरे परिचितों में से है, मेरा मतलब…?’’

खाला ने मुझे डांटते हुए कहा, ‘‘बस, अब इस बारे में कोई बात मत करना, मेरी इबादत का समय हो रहा है. अब तुम उधर बैठ कर किताबें पढ़ो.’’

खाला उठ खड़ी हुईं. मैं सिर झुका कर बुकशेल्फ के पास जा कर बैठ गई. मुझे पता था कि अब अगर मैं ने कुछ और कहा तो वह सचमुच नाराज हो जाएंगी. वैसे भी मेरे दिमाग की फांस निकल चुकी थी. फर्स्ट ईयर का अंतिम पेपर दे कर निकली तो दिमाग काफी हलकाफुलका था. कालेज से लौटते समय मैं घर जाने के बजाय सीधे खाला के घर चली गई, क्योंकि परीक्षा की वजह से लगभग 15-20 दिनों से मैं उन के घर नहीं गई थी. उन के आने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था, क्योंकि वह बहुत मजबूरी में ही घर से निकलती थीं. मैं ने जब से होश संभाला था, कभी उन्हें अपने घर की दहलीज पार करते नहीं देखा था. वह किसी और के यहां भी नहीं जाती थीं, इसलिए कुछ कहनासुनना बेकार था.

मैं खाला के यहां पहुंची तो वह सब्जी बना रही थीं. किताबें मेज पर रख कर मैं ने कहा, ‘‘खाला, मैं एक खुशखबरी लाई हूं.’’

‘‘एक खुशखबरी मेरे पास भी है.’’ खाला ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, फिर जल्दी से सुना दें.’’ मैं ने उन के हाथ से कलछी ले कर कहा.

‘‘पहले तुम सुनाओ.’’ उन्होंने कहा.

‘‘खाला, मेरे पेपर बहुत अच्छे, बल्कि शानदार और जोरदार हुए हैं. अब आप बताइए.’’ मैं ने सब्जी चलाते हुए उन की ओर देखा. वह बहुत खुश थीं. उन्होंने कहा, ‘‘शमा बेटा, 11 तारीख को राहिल आ रहा है अमेरिका से.’’

‘‘शमीम चाचा का बेटा राहिल?’’ मेरी आंखों के सामने 12-13 साल का राहिल घूम गया. दुबलापतला, बांस की तरह लंबा, बेहद बेवकूफ. वह खाला के बड़े भाई शमीम का बेटा था. उस से छोटी बहन सबीला मेरी सहेली थी. मैं सबीला और राहिल मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ खाला के बड़े से आंगन में खूब खेलते थे.

खाला की आवाज मुझे गुजरे वक्त से निकाल लाई. उन्होंने कहा, ‘‘शमा बेटा, रेशमा के साथ मेरे बराबर वाला कमरा ठीक करवा दो. उसे आने में 3 दिन ही रह गए हैं, पलक झपकते बीत जाएंगे. अभी परदे भी सीने हैं.’’

मैं उन के गले में बांहें डाल कर लाड से बोली, ‘‘माई स्वीट हार्ट खाला, आप चिंता न करें. मैं यह सब काम बहुत अच्छे से कर लूंगी, परदे भी सिल जाएंगे. कमरा भी ठीक हो जाएगा. हम अपनी प्यारी खाला के भतीजे का स्वागत भव्य तरीके से करेंगे, क्योंकि अब मैं फुरसत में हूं.’’

खाला ने सच ही कहा था, 3 दिन पलक झपकते बीत गए और वह पल आ गया, जब राहिल हमारे सामने बैठा कौफी पी रहा था. वह इतना बदल गया था कि पहचान में ही नहीं आ रहा था. बचपन के दुबलेपतले, लंबे बेवकूफ लड़के ने एक लंबेचौड़े, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति का रूप धारण कर लिया था. उस की आंखों में चंचलता और आश्चर्य बसा हुआ था. मुझे देख कर वह बनावटी हैरानी से बोला, ‘‘फूफी, यह रेशमा कौन सा टौनिक पीती रही, जो इतनी सुंदर नजर आ रही है?’’

‘‘अरे बावला हुआ है क्या, यह शमा है, जो तेरे साथ खेला करती थी.’’ खाला ने घूरते हुए कहा.

‘‘अच्छा तो तुम शमा हो?’’ उस ने गौर से मेरी ओर देखते हुए कहा.

‘‘जी हां, मैं शमा हूं. वही शमा जो बचपन में आप की पिटाई किया करती थी.’’ मैं ने गंभीरता से कहा.

खाला जोर से हंसी.

‘‘यह पिटाई वाली बात तो मुझे याद नहीं है.’’ राहिल सिर खुजाते हुए बोला.

‘‘कोई बात नहीं, यहां रहेंगे तो धीरेधीरे सब याद आ जाएगा.’’ मैं ने धीरे से कहा.

राहिल ने मुसकरा कर कौफी का कप मुंह से लगा लिया.

‘‘अच्छा बच्चों, तुम बातें करो. मैं अभी आती हूं.’’ खाला ने उठते हुए कहा.

राहिल मुझ से और मैं राहिल से बहुत जल्दी घुलमिल गए. उस के आने से खाला के घर में मेरी दिलचस्पी के सामान बढ़ गए थे, क्योंकि अब मैं वहां कार्ड्स, कैरम, लूडो, बैडमिंटन और ऐसे ही छोटेमोटे बहुत से गेम खेल सकती थी. फिल्मों पर लंबीलंबी बहसें कर सकती थी. और सब से बढ़ कर अमेरिका के रहनसहन और समाज के बारे में काफी जानकारी हासिल कर सकती थी. कालेज बंद था, जिस से रातदिन बड़े दिलचस्प अंदाज में गुजर रहे थे. कभी राहिल मेरे घर आ जाता तो कभी मैं खाला के घर चली जाती. जिंदगी अचानक बहुत सुंदर और मजेदार हो गई थी. लेकिन धीरेधीरे राहिल के व्यवहार में बदलाव आने लगा. अब वह अकेले में कुछ रोमांटिक होने की कोशिश करने लगा. लेकिन मैं उस की इस कोशिश को हमेशा मजाक का रंग दे देती थी.

मैं सीरियस नहीं होना चाहती थी, क्योंकि मुझे पता था कि मम्मी कभी यह बात पसंद नहीं करेंगी. भले ही रिश्ता तय नहीं था, लेकिन मम्मी अपनी सहेली के लड़के समीर को बहुत पसंद करती थीं और उन की सहेली भी मुझे बहुत चाहती थीं. समीर की पसंदगी का भी मुझे पता था. वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बाहर गया हुआ था. उस के आने तक मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी. उस के बाद घर वाले हमें एक बंधन में बांध देंगे. यह सब मुझे पता था, इसलिए राहिल की आंखों में झांक कर उस की भावनाओं को पढ़ने की कोशिश मैं क्यों करती? मैं उस से मिलने के लिए केवल समय गुजारने के लिए बेचैन रहती थी. वह एक अच्छा दोस्त था. उस की बातें बड़ी दिलचस्प होती थीं.

वह मिमिक्री करने में भी एक्सपर्ट था. कभीकभी वह अपने अमेरिकी पड़ोसियों की मिमिक्री इस खूबी से करता कि हंसतेहंसते मेरी आंखों में पानी आ जाता. खाला पहले की ही तरह लंबीलंबी इबादतों में लगी रहती थीं. एक दिन मैं खाला के घर गई तो राहिल आम दिनों की अपेक्षा उस दिन कुछ गंभीर नजर आ रहा था. उस ने मेरे सामने बैठ कर कहा, ‘‘ऐ लड़की, तुम्हारे बारे में कुछ सुना है.’’

‘‘क्या सुन लिया मेरे बारे में?’’ मैं ने पूछा. मुझे उस की गंभीरता, बल्कि किसी हद तक दुख भरी शक्ल देखदेख कर हंसी आ रही थी.

‘‘देखो, प्लीज मेरा मजाक मत उड़ाओ. मुझे सचसच बताओ कि क्या तुम्हारा रिश्ता बचपन में ही तय हो गया था?’’ राहिल ने चिंतित हो कर पूछा.

अब मैं भी थोड़ा गंभीर हो गई. मैं ने कहा, ‘‘हां राहिल, तुम ने ठीक सुना है. मेरा रिश्ता बचपन में ही तय हो गया था. समीर पढ़ाई पूरी कर के आ जाए तो शादी भी हो जाएगी.’’ मैं ने कहा.

‘‘तुम खुश हो इस रिश्ते से?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. अम्मीअब्बू का फैसला बेहतर होता है राहिल.’’ मैं ने सहजता से कहा.

कुछ देर तक वह गूंगा सा मेरे सामने बैठा मुझे देखता रहा, उस के बाद उठा और तेजी से कमरे से निकल गया.

मैं हैरानपरेशान सी अपने घर आ गई. मुझे राहिल की सोच पर गुस्सा भी आ रहा था और दुख भी हो रहा था. ये मर्द भी कितने अजीब होते हैं. अगर दोस्त या भाई समझ कर उन के निकट जाओ तो तुरंत गलत मतलब निकाल लेते हैं. जरूरी नहीं कि जिस से अंडरस्टैंडिंग हो, हंसीमजाक चलता हो, प्रेम भी उसी से किया जाए. मैं ने सोचा था कि छुट्टियों के दिन यूं ही हंसतेबोलते गुजर जाएंगे, लेकिन राहिल ने मूड खराब कर दिया. अगले 2-3 दिनों तक न तो राहिल हमारे घर आया और न ही मैं उस के यहां गई. चौथे दिन खाला ने रेशमा को भेज कर मुझे बुलवाया.

‘‘क्या बात है बेटा, तुम ने आना छोड़ दिया? राहिल भी तुम्हारे यहां नहीं जाता. तुम दोनों में लड़ाई हो गई क्या?’’  खाला ने प्यार से पूछा.

मैं ने सारी बातें उन्हें बता कर कहा, ‘‘अब आप ही बताइए खाला, एक तो मुझ से इस तरह की उलटीसीधी बातें करता है, फिर खुद ही रूठ जाता है.’’

‘‘कोई बात नहीं शमा बेटा, तुम चिंता न करो, मैं उसे समझा दूंगी. मेरा ख्याल है 1-2 दिन में वह खुद ही ठीक हो जाएगा.’’ खाला ने मुसकरा कर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

न जाने खाला के समझाने का असर था या मेरी साफगोई का कि राहिल एक बार फिर पहले की ही तरह मुझ से मिलने लगा. जिंदगी एक बार फिर दिलचस्प और सुंदर हो गई. समय तेजी से गुजर रहा था. मेरा कालेज खुल गया और राहिल के जाने का दिन भी नजदीक आ गया. उस के जाने में केवल 3 दिन बाकी थे, जब मैं उस दिन शाम को खाला के घर जा पहुंची. उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा घर में सन्नाटा पसरा हुआ था.

मुझे लगा, खाला नमाज पढ़ रही होंगी और राहिल घर में नहीं होगा. मैं लौटने के बारे में सोच रही थी कि तभी राहिल ने कहा, ‘‘शमा, जरा इधर तो आना.’’

राहिल की आवाज सुन कर मैं पलटी. वह बैड पर अधलेटा कुछ पढ़ रहा था. मेरी ओर देखते हुए उस ने किताब बंद कर के कहा, ‘‘बड़े सही मौके पर आई हो शमा, मैं तुम्हारे ही यहां आने वाला था.’’

‘‘हैरानी हो रही है, तुम्हारे होते हुए यहां इतना सन्नाटा है.’’ मैं ने उस से किताब लेते हुए कहा.

‘‘दिल में भी सन्नाटा उतर आया है न?’’ वह धीरे से बोला.

मैं किताब पलटने लगी. वह अंगे्रजी की रोमांटिक नौवेल थी.

‘‘तुम यह नौवेल मत पढ़ो. अच्छे बच्चे खराब हो जाते हैं ऐसी किताबें पढ़ कर.’’ राहिल ने मेरे हाथ से किताब छीन कर कहा.

‘‘तभी तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.’’ मैं कमरे की अव्यवस्था को आलोचनात्मक नजरों से देखते हुए बोली, ‘‘चलो तुम नहा लो, तब तक मैं तुम्हारा यह कमरा ठीक कर देती हूं.’’

मैं उठ कर किताबें शेल्फ में लगाने लगी. चंद पल खामोशी से गुजर गए. मैं ने पलट कर देखा, राहिल खड़ा था. मैं ने कहा, ‘‘तुम अभी गए नहीं?’’

आगे के शब्द मेरे मुंह में ही अटक गए. क्योंकि राहिल मेरे बगल में खड़ा मुझे विचित्र निगाहों से घूर रहा था. उस के चेहरे पर कोई ऐसी बात थी, जिस से डस्टर मेरे हाथ से गिर गया.

‘‘खुलेखुले बालों में तुम बहुत अच्छी लगती हो.’’ उस ने हाथ बढ़ा कर मेरे बालों को छूते हुए कहा.

‘‘यह क्या बदतमीजी है राहिल?’’ मैं ने उस का हाथ झटक दिया. तभी मेरी निगाह बंद दरवाजे पर पड़ी. जब मैं आई थी, तब दरवाजा खुला था. लेकिन इस समय दोनो पट बंद थे.

‘‘तुम घबरा क्यों रही हो?’’ राहिल मुझे ध्यान से देखते हुए बोला.

वह मेरी ओर बढ़ रहा था. जबकि मैं पीछे नहीं हट सकती थी, क्योंकि पीछे बुकशेल्फ थी.

‘‘हटो मेरे सामने से, मैं खाला के पास जा रही हूं.’’ मैं ने दोनों हाथ बढ़ा कर उसे हटाने की कोशिश की.

लेकिन रहिल ने मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर आवारगी से हंसते हुए कहा, ‘‘फूफी तो 2 घंटे बाद आएंगी. वह रेशमा के साथ डाक्टर के यहां गई हैं. इस समय घर में केवल मैं और तुम ही हैं. यहां तनहाई भी है.’’

उस की ये बातें सुन कर मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं रुआंसी हो कर चीखी, ‘‘राहिल, मुझे घर जाने दो, छोड़ो मुझे. खाला, अरे ओ खाला…’’

यह जानते हुए भी कि खाला घर में नहीं हैं, मैं उन्हीं का नाम ले कर चीखने लगी. बेबसी आंसू बन कर मेरी आंखों में चमकने लगी थी. मैं दुआ कर रही थी. शायद दिल की गहराइयों से निकलने वाली दुआ स्वीकार हो गई. अचानक दरवाजा खुला. सामने खाला अपने चिरपरिचित सफेद लिबास में खड़ी थीं. उस क्षण मुझे वह आकाश से उतरने वाली देवी सी लगीं. दरवाजा खुलते ही राहिल की बांहों का घेरा खुद ही टूट गया था. मैं भाग कर खाला के पास गई और उन की छाती पर सिर रख कर सिसकने लगी. उन से लिपट कर यही लग रहा था, जैसे मैं ने किसी मजबूत किले में पनाह ले ली हो.

खाला को पहली बार मैं ने इतने क्रोध में देखा था. वह कांप रही थीं. उन का चेहरा लाल हो रहा था. वह गरज कर बोलीं, ‘‘पापी, थोड़ी देर के लिए तनहाई पाते ही इंसान से शैतान बन गया. अब तो तुझे अपना भतीजा कहते हुए भी मुझे शरम आएगी. मैं तुझे कितना ऊंचा और अच्छे किरदार का लड़का समझती थी, मगर वह भूल थी मेरी. आखिर तू भी तो मर्द है ना, औरत को कमजोर चिडि़या समझ कर झपटने वाला बाज, दूर हो जा मेरी नजरों से. मैं आज के बाद तेरे वजूद से घृणा करूंगी. अब कोई रिश्ता नहीं रहा तेरे और मेरे बीच.’’

राहिल सिर झुकाए कमरे से निकल गया.

‘‘खाला.’’ मेरे होंठ कांपे. हाथ से आंसू साफ करते हुए मैं ने उन की ओर देखा, ‘‘देख लीजिएगा खाला, राहिल ने जैसा मेरे साथ किया है, वैसा ही सबीला के साथ कोई करेगा, तब इसे अहसास होगा कि इज्जत और सम्मान क्या चीज होती है. उस की बहन की जिंदगी में भी ऐसा जरूर होगा.’’

खाला ने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया.

‘‘मैं बद्दुआ नहीं देती, मगर यह तो दस्तूर है कि जैसी करनी वैसी भरनी. राहिल जैसा आवारा आदमी जब किसी मासूम लड़की को बरबाद कर सकता है तो उस की बहन या बेटी के आगे भी यह बरबादी जरूर आएगी. जो व्यक्ति किसी दूसरे की बहन या बेटी की इज्जत का ख्याल नहीं करता, उस की अपनी बहन या बेटी कैसे सुरक्षित रह सकती है.’’ मैं जोश में बोली.

‘‘यह सोच बिलकुल गलत है शमा और आज यह बात साबित भी हो गई कि यह सोच गलत है.’’ खाला ने सामने दीवार की ओर देखते हुए धीमे से कहा.

‘‘कैसे साबित हो गया खाला?’’ मैं उन के सामने जा खड़ी हुई. मेरी आंखों में हैरानी थी.

खाला ने मेरी ओर देखा. उन का चेहरा किसी अनदेखी आंच में धीरेधीरे सुलग रहा था और जब वह बोलीं तो उन की आवाज में चिंगारियां भरी हुईं थीं. उन्होंने कहा, ‘‘शमा, तुम्हें याद होगा कि एक बार पहले भी मैं ने तुम से कहा था कि दुनिया में इतना अन्याय नहीं है कि किसी के पाप की सजा बरसों बाद उस की मासूम औलाद को भुगतना पड़े. आज तुम्हारी इज्जत एक शैतान से बच जाना, उसी का उदाहरण है.’’

मैं हैरान सी खाला को देख रही थी. उन की बात मेरी समझ में नहीं आई. वह चुप थीं, मगर उन के शब्द मेरे दिमाग में गूंज रहे थे. अचानक उन्होंने रहस्य से परदा हटा दिया था. सच्चाई सामने आ गई थी. मुझे उस लड़की की कहानी याद आ गई, जो खाला ने मेरे जोर देने पर सुनाई थी. खाला की बात का मतलब समझते ही मेरा सिर चकराने लगा था, नजरों के सामने अंधेरा छा गया था. मैं खाला की दफन सच्चाइयों को बाहर निकालना चाहती थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि वह सच्चाई तमाचे की तरह मेरे अपने चेहरे पर पड़ेगी. घबरा कर मैं ने दीवार का सहारा ले लिया और फटी आंखों से खाला को ताकने लगी, जिन की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे. मैं ने उन आंसुओं में एक छवि उभरते देखी.

सौम्य चेहरा, ममता लुटाती आंखें और सफेद दाढ़ी, ‘पापा.’ मेरे कांपते होंठों पर यह शब्द आ कर थम गया, जम गया. मुझे ऐसा लगा, जैसे इस पवित्र नाम में छिपी पवित्रता दम तोड़ रही है और खाला के आंसुओं में उभरने वाले पवित्र चेहरे पर कालिख भरा हाथ फेर दिया हो. Inspiring Hindi Stories