Crime News: 7 साल बाद पकड़ में आए हत्यारें

Crime News: इफ्खिर अहमद सुनहरे सपनों की चाह में इंग्लैंड गया था. वहां उसे सब कुछ मिला भी. लेकिन 2 शादियों और मजहबी चक्रव्यूह के कारण वह अपनी ही बेटी का हत्यारा बन बैठा. इस चक्कर में वह तो जेल गया ही, उस की पत्नी फरजाना भी नहीं बच सकी. इफ्तिखार अहमद मूलत: पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव उत्ताम का निवासी था. वर्षों पहले जब वह युवा था, एक हसीन जिंदगी जीने का सपना संजो कर पाकिस्तान से इंग्लैंड आ गया था.

इफ्तिखार अहमद कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, पर ड्राइविंग अच्छी जानता था, जो विदेश में आ कर उस के रोजगार का साधन बन गई. उस का बचपन भले ही बेहद गरीबी में गुजरा था, पर वह शुरू से महत्वकांक्षी था. बंदिशें उसे पसंद नहीं थीं. अलबत्ता अपने धर्म के प्रति वह पूरी तरह आस्थावान था. वह 6-7 वर्ष का था, तभी उस का रिश्ता उस के दूर के मामा की बेटी फरजाना से तय हो गया था. बड़ेबड़े सपने देखने वाला इफ्तिखार अकसर अपने दोस्तों से कहा करता था, ‘‘देखना एक दिन मैं बहुत बड़ा आदमी बनूंगा, दुनिया का हर ऐशोआराम मेरे कदमों में होगा.’’

दोस्त उसे टोक देते, ‘‘जमीन पर ही रह, हवा में मत उड़. घर में दो वक्त की रोटी नहीं, बनेगा बड़ा आदमी.’’

इफ्तिखार गुस्सैल स्वभाव का था. ऐसे तानें भला कैसे सुनता? उस ने दोस्तों से 2-4 हाथ कर लिए और चीख कर कहा, ‘‘तुम लोग यहीं सड़ते रहोगे. देखना, बड़ा हो कर मैं विदेश जाऊंगा. वहां जा कर हर कीमत पर अपने हालात बदल दूंगा.’’

खैर, किसी तरह बचपन अभावों में गुजरा. इफ्तिखार ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और बचपन के सपनों में रंग भरने की कोशिश शुरू कर दी. यह अलग बात थी कि कुछ घर की माली हालात के चलते तो कुछ पढ़ाई में मन न लगने की वजह से वह जैसेतैसे नौवीं कक्षा ही पास कर पाया. पढ़ न पाने के कारण उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल सकती थी, ऊपर से घर वालोें का दबाव कि हमारा ना सही, अपना ही पेट भर ले. कोई और रास्ता न देख इफ्तिखार ने अपने एक जानकार ट्रक ड्राइवर के साथ कंडक्टरी शुरू कर दी. इसी दौरान उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. धीरेधीरे हाथ साफ हो गया तो उस ने कंडक्टरी छोड़ दी और लाहौर आ कर किराए की टैक्सी चलाने लगा. उस ने 2 साल वहीं बिताए. फिर वह अपने घर वापस आ गया. इस बीच उस ने कुछ पैसे जोड़ लिए थे. अपना ख्वाब पूरा करने के लिए उस ने अपना पासपोर्ट बनवाया और फिर एक दिन फ्लाइट पकड़ कर इंग्लैंड आ गया.

इंग्लैंड में उसे हमवतन एजाज मिल गया, जिस ने उस की मदद की और उसे किराए पर चलाने के लिए टैक्सी दिलवा दी. इफ्तिखार मन लगा कर काम करने लगा. उसे यह बात अखरती थी कि उस की कमाई का ज्यादा हिस्सा तो टैक्सी मालिक के पास चला जाता है, सो उस ने बचत शुरू कर दी. 3-4 साल में उस ने काफी पैसे जोड़ लिए. कुछ पैसे कम पड़े तो एजाज ने मदद कर दी. पैसे एकत्र हो गए तो इफ्तिखार ने खुद की टैक्सी खरीद ली. अपनी टैक्सी आने के बाद सारा पैसा इफ्तिखार की जेब में आने लगा. पैसा आया तो उसे कई ऐब लग गए. इफ्तिखार को औरत के जिस्म का चस्का लग गया. वह अकसर देह बेचने वालियों के पास रातें बिताने लगा.

इसी दरम्यान उस की मुलाकात लोन एंडरसन नाम की एक लड़की से हुई, जो मूलत: डेनमार्क की रहने वाली थी और इंग्लैंड में एक बुकशौप में काम करती थी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं. वे अकसर मिलते रहते थे. इफ्तिखार उसे अपनी टैक्सी में भी घुमाता था. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. इफ्तिखर ने एक दिन अपने प्यार का इजहार किया तो लोन एंडरसन ने भी अपने दिल की बात कह दी. लोन एंडरसन बेशक पश्चिमी देश की थी, पर सभ्य और शालीन थी. एक दिन जब दोनों एकांत में मिले तो इफ्तिखार ने उस के सामने शारीरिक दूरी खत्म करने की चाहत बयान करते हुए कहा, ‘‘इस के बिना हमारा प्यार अधूरा है. मैं इसे मुकम्मल कर देना चाहता हूं.’’

लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के चेहरे को गौर से देखा. फिर गंभीर आवाज में कहा, ‘‘शादी से पहले नहीं. मैं खुले विचारों की जरूर हूं, पर शादी के बाद ही अपना तन किसी पुरुष को सौपूंगी. इसीलिए मैं ने आज तक अपने नारीत्व की गरिमा को कायम रखा है.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे, लेकिन आज दिल न तोड़ो.’’ इफ्तिखार ने गुजारिश की.

‘‘नहीं, कतई नहीं. मैं शादी से पहले इस की मंजूरी किसी हाल में नहीं दूंगी.’’ लोन एंडरसन ने साफ लहजे में सख्ती से मना कर दिया.

सुन कर इफ्तिखार का चेहरा उतर गया. वह मायूस हो गया. जबरदस्ती वह कर नहीं सकता था, सो मन मार कर रह गया. इस घटना के कुछ महीनों बाद आखिरकार इफ्तिखार और लोन एंडरसन ने कोपेनहेगन स्थित चर्च में शादी कर ली. यह सन 1981 के जून महीने की बात है. उसी रात दोनों ने एक होटल में हनीमून मनाया. 2 दिनों बाद इफ्तिखार होटल से उसे अपने घर ले आया. इस के बाद लोन एंडरसन के कहने पर इफ्तिखार उस के साथ डेनमार्क चला गया. वहां भी उस ने अपना टैक्सी ड्राइवर वाला काम कर लिया. दोनों खूब खुश थे और हंसीखुशी जिंदगी बिता रहे थे. शादी के एक साल बाद लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम टोनी एंडरसन रखा गया. इफ्तिखार चाहता था कि उसे अपनी मरजी का कोई मुसलिम नाम दे, पर लोन एंडरसन की इच्छा और डेनमार्क के नियम के चलते वह ऐसा नहीं कर पाया.

सन 1985 के जनवरी माह में इफ्तिखार के नाम पाकिस्तान से एक खत आया. खत उस के घर वालों ने भेजा था. इफ्तिखार और उस के परिवार के बीच पत्र व्यवहार चलता रहता था, इसलिए यह कोई खास बात नहीं थी. लेकिन इस पत्र को पढ़ कर वह सोच में पड़ गया. उसे गंभीर देख कर लोन एंडरसन ने कारण पूछा तो इफ्तिखार ने कहा, ‘‘मेरी मां बहुत बीमार है. मुझे पाकिस्तान जाना होगा.’’

‘‘बिलकुल जाओ, वैसे भी तुम्हें जाना चाहिए. आखिर वह तुम्हारी मां है.’’ लोन एंडरसन ने बिना कोई आपत्ति जताए कहा. उस वक्त वह यह बिलकुल नहीं समझ पाई कि इफ्तिखार उस से फरेब कर रहा है. हकीकत में उस की मां बीमार नहीं थी, बल्कि खत में लिखा था कि बचपन में फरजाना नाम की जिस लड़की से उस का निकाह तय हुआ था, वह अब जवान हो चुकी है. उस के घर वाले निकाह के लिए दबाव बना रहे हैं. इसलिए वह फौरन स्वदेश लौट आए और घर वालों द्वारा फरजाना के परिवार से किए वादे को पूरा करे.

खैर, इफ्तिखार अहमद जनवरी, 1985 के आखिर में अपनी पत्नी लोन एंडरसन और 3 साल के बेटे टोनी एंडरसन को डेनमार्क में छोड़ कर पाकिस्तान आ गया. पाकिस्तान आ कर उस ने फरजाना के साथ निकाह कर लिया. उस ने अपने घर वालों और फरजाना पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पहले से शादीशुदा है और साथ ही एक बेटे का बाप भी. कुछ महीने इफ्तिखार पाकिस्तान में ही रहा. वजह यह कि उस पर दबाव था कि वह फरजाना को भी अपने साथ ले जाए. फरजाना का पासपोर्ट बनने और वीजा लगने में समय लग रहा था. अंतत: इफ्तिखार अपनी दूसरी पत्नी फरजाना को ले कर ब्रैडफोर्ड, इंग्लैंड आ गया. उस ने डेनमार्क में इंतजार कर रही लोन एंडरसन से कोई संपर्क नहीं किया.

कई महीने गुजर गए, इफ्तिखार नहीं लौटा तो लोन एंडरसन को चिंता हुई. पाकिस्तान का पता उस के पास था नहीं, जो वहां से कोई पूछताछ करती. अत: वह ब्रैडफोर्ड आई और इफ्तिखार के पुराने घर पर गई. वहां उसे पता चला कि इफ्तिखार ने पड़ोस में ही दूसरा घर ले लिया है. लोन एंडरसन वहां पहुंची तो फरजाना को देख कर उसे लगा कि इफ्तिखार की कोई रिश्तेदार होगी. उसी समय इफ्तिखार आ गया. उस ने यह बात छिपा ली कि फरजाना उस की बीवी है. इत्तफाक से तभी फरजाना की तबीयत खराब हो गई. इफ्तिखार और लोन एंडरसन उसे ले कर डाक्टर के पास गए. वहां पता चला कि फरजाना गर्भ से है. इस जानकारी के बाद इफ्तिखार लोन एंडरसन से सच नहीं छिपा पाया. उस ने बता दिया कि फरजाना उस की पत्नी है. वह पाकिस्तान निकाह करने गया था.

इस से लोन एंडरसन का दिल टूट गया. वह कुछ नहीं बोली और वापस डेनमार्क लौट गई. कुछ दिनों बाद वह अपने बेटे टोनी एंडरसन के साथ वापस आई और इफ्तिखार से कहा कि उस ने उस के साथ जो किया सो किया, पर वह उस के बेटे को पिता की सरपस्ती से दूर न करे. वह उसे अपने पास रखे. लेकिन इफ्तिखार इस के लिए राजी नहीं हुआ. उस ने कहा कि अगर बेटी होती तो वह उसे अपने पास रख लेता, पर बेटे को नहीं रखेगा. लोन एंडरसन ने उस पर कोई दबाव नहीं बनाया. वह बेटे को ले कर वापस लौट गई. अलबत्ता इस के बाद भी वह इफ्तिखार से संपर्क जरूर बनाए रही. दूसरी ओर इफ्तिखार बेखौफ फरजाना के साथ अपना गृहस्थ जीवन जी रहा था. 14 जुलाई, 1986 को फरजाना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया शेफीलिया अहमद.

इस के ठीक एक साल बाद फरजाना ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस का नाम रखा गया अलेशा अहमद. फिर फरजाना ने एक बेटे को जन्म दिया. तीनों बच्चे कुछ बड़े हुए तो इफ्तिखार ब्रैडफोर्ड छोड़ कर परिवार सहित वारिंगटन आ बसा. शेफीलिया पढ़ाई में काफी होशियार थी. वह वकील बनना चाहती थी. वहीं उस से छोटी अलेशा की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी. वह पिता के दबाव में जबरदस्ती पढ़ रही थी. बात 2003 की है. शेफीलिया का हाईस्कूल का आखिरी साल था. 11 सितंबर, 2003 को शेफीलिया की टीचर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी कि वह एक सप्ताह से ना तो स्कूल आ रही है और ना ही घर पर है. घर वाले भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे रहे हैं.

पुलिस ने इफ्तिखार अहमद से पूछताछ की तो उस ने बताया कि शेफीलिया की उसे भी कोई खबर नहीं है. उन लोगों ने उस की सहेलियों से भी संपर्क किया, पर उस का कोई पता नहीं चला. शेफीलिया लापता है, इस की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? यह पूछने पर इफ्तिखार अहमद ने कहा कि बेटी का मामला है. वह नहीं चाहता था कि शेफीलिया के गुम होने पर उस के परिवार वालों को किसी प्रकार की जगहंसाई का सामना करना पड़े. वैसे भी यह शेफीलिया के भविष्य का भी सवाल था. अगर एक बार चरित्र पर दाग लग जाता तो उन के समाज में शेफीलिया का निकाह होना मुश्किल है.

खैर, पुलिस ने प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में शेफालिया के गायब होने की सूचना प्रसारित करवा दी. पुलिस खुद भी अपने स्तर पर उस की खोज करने लगी. न्यूज चैनलों पर उस की खोज के लिए बड़े पैमाने पर कैंपेन चलाए गए. इस के तहत अंगे्रजी फिल्मों की अभिनेत्री शोभना गुलाटी ने टीवी पर शेफीलिया द्वारा लिखित कविताओं का पाठ किया. पर शेफीलिया का कोई सुराग नहीं मिल पाया. इसी तरह कई महीने बीत गए. 24 फरवरी, 2004 को पुलिस कंट्रोल में किसी ने सूचना दी कि वारिंगटन से करीब 110 किलामीटर दूर कंब्रिया के सेडविक शहर स्थित केंट नदी के किनारे किसी लड़की का सड़ागला शव पड़ा हुआ है. नदी में भारी बाढ़ आने की वजह से शव नदी के किनारे आ लगा था. पुलिस तुरंत नदी किनारे पहुंची.

सूचना सही थी, लेकिन लड़की की लाश इतनी सड़ गई थी कि उस की पहचान करना मुश्किल था. हां, लाश के बाएं हाथ में जिगजेग गोल्ड बे्रसलेट और हाथ की एक अंगुली में ब्ल्यू टोपाज रिंग अब भी मौजूद थी. इफ्तिखार अहमद ने बेटी की गुमशुदगी के समय इन चीजों का जिक्र किया था. पुलिस ने इस की सूचना इफ्तिखार अहमद को दी और तुरंत नदी पर आने को कहा. इफ्तिखार अहमद पत्नी फरजाना सहित वहां पहुंचा. उस ने गोल्ड ब्रेसलेट और रिंग को पहचानते हुए लाश की शिनाख्त अपनी 17 वर्षीया बेटी शेफीलिया अहमद के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो गई तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम में मौत का कारण पता नहीं लग पाया. वजह थी, लाश का अत्यधिक सड़ जाना. पुलिस ने लाश का दूसरी बार पोस्टमार्टम करवाया, पर इस बार भी कोई परिणाम नहीं निकला. अब की बार पुलिस ने मृतका शेफीलिया के बाएं थाई बोन का डीएनए टेस्ट करवाया. इस से साफ हो गया कि लाश शेफीलिया की ही थी. वहीं निचले जबड़े को भी शेफीलिया के दंत चिकित्सक को दिखाया गया. उस ने भी पुष्टि कर दी कि लाश शेफीलिया की ही थी. पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच शुरू की तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं. इस जांच के लिए पुलिस ने इफ्तिखार अहमद, उस की पत्नी फरजाना, इफ्तिखार के साथी टैक्सी ड्राइवर व 5 अन्य परिचितों को हिरासत में ले लिया.

सभी से अलगअलग तरहतरह से पूछताछ की गई. पर उस की हत्या का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला. इस पर बिना चार्ज लगाए सभी को छोड़ दिया गया. बावजूद इस के पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच जारी रखी. जांच के दौरान इफ्तिखार के घर से शेफीलिया के सामान से उस की डायरी बरामद हुई, जिस में काफी कविताएं लिखी हुई थीं. उस की कविताओं में एक कविता ‘आई फील टे्रप्ड’ शीर्षक से थी. यह कविता शेफीलिया की मनोदशा व्यक्त करती थी. इस से उस के निराशाजनक जीवन का साफ पता चल रहा था.

जांच के दौरान ही इफ्तिखार की पड़ोसन शैला कोस्टेलो ने बताया था कि शेफीलिया को उस का परिवार उपेक्षित रखता था. परिवार द्वारा पीडि़त करने की वजह से वह कई बार घर से भाग गई थी. 2 बार पुलिस में उस के लापता होने की रिपोर्ट भी लिखाई गई थी. दोनों बार वह अपने बौयफ्रेंड के घर पर पाई गई थी. पड़ोसन ने यह भी बताया कि उस ने सुना था कि शेफीलिया के घर वाले उस की इसी उम्र में अरेंज मैरिज करने के लिए दबाव बना रहे थे. इफ्तिखार के घर से एक वीडियो भी बरामद हुआ. यह वीडियो उस समय का था, जब सन 2003 के शुरू में इफ्तिखार अहमद परिवार सहित पाकिस्तान गया था. इस वीडियो में शेफीलिया पाकिस्तान में मस्ती करती हुई दिखाई दे रही थी.

बहरहाल, शेफीलिया की हत्या की जांच चलती रही. जनवरी, 2008 में मृत्यु समीक्षक जोजफ द्वारा की गई जांच में कहा गया कि शेफीलिया की हत्या का केस बहुत ही जघन्य हत्याकांड की श्रेणी में आता है. उस ने शंका भी व्यक्त की कि हो सकता है, इस में उस के घर वालों का हाथ रहा हो. इस के बाद पुलिस ने फिर से इफ्तिखार से पूछताछ की. उस ने बताया कि यह सही है कि शेफीलिया गुस्सैल स्वभाव की जिद्दी लड़की थी. उसे पश्चिमी पहनावा पसंद था. जबकि उस का परिवार इस के खिलाफ था. उस पर रोक लगाई जाती थी तो वह विद्रोह पर उतर आती थी. पूछताछ के दौरान कोई ऐसी बात नहीं निकल कर आई कि इफ्तिखार पर शक किया जाता.

देखतेदेखते शेफीलिया की मौत को 7 साल बीत गए. पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई. पर कहते हैं कि पाप एक न एक दिन जरूर बेपरदा हो जाता है. आखिर शेफीलिया अहमद हत्याकांड के ताले की चाबी बन कर उस की छोटी बहन अलेशा सामने आई. शुरू से पढ़ाई चोर और बिगड़ैल मिजाज की अलेशा गलत सोहबत में पड़ गई थी. उस के खर्चे बेपनाह थे, जबकि घर से उसे नाममात्र का ही जेबखर्च मिलता था. अपने खर्चे पूरे करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी. यहां तक कि उस ने अपने खुद के ही घर में डकैती डलवा दी थी. यह घटना 25 अगस्त, 2010 की है. घटना के समय वह अपने मातापिता व भाईबहन के साथ घर में ही मौजूद रही, ताकि उस पर घर वालों या पुलिस को कोई शक न हो. इस के लिए उस ने अपने बौयफ्रेंडों के साथ मिल कर सुरक्षित योजना बनाई थी. इस डकैती में घर से काफी गहने व नकदी लूटी गई.

डकैती की सूचना पुलिस को दी गई तो उस ने जांच शुरू की. अलेशा से पूछताछ के दौरान उस के बदले हुए भाव को देखते ही पुलिस को उस पर शक हो गया था. पर वह सहज रूप से सच नहीं उगल पा रही थी. आखिर उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वह टूटने लगी. आखिर उस ने सारा सच उगल दिया. साथ ही उस ने अपने घर वालों के भय से 7 साल से दिल में छिपा कर रखा अपनी बड़ी बहन शेफीलिया की हत्या का राज भी उगल दिया. बतौर अलेशा, शेफीलिया शुरू से आजाद ख्याल की थी. उसे पश्चिमी रहनसहन, खुलापन और पहनावा पसंद था. जबकि घर वाले इस सब के खिलाफ थे. वह चाहते थे कि शेफीलिया उन के मजहब की परंपरा के अनुसार आचरण अपनाए, घर की चारदीवारी तक सीमित रहे. बुर्का पहने और लड़कों से दोस्ती न करे. पर वह ऐसा नहीं करती थी.

वह पश्चिमी पहनावा पहनती और लड़कों से खुल कर दोस्ती करती. इसी वजह से इफ्तिखार अकसर उस की पिटाई तक कर देता था. उसे भूखा रखा जाता और अन्य तरीकों से भी प्रताडि़त किया जाता. इस से उस का स्वभाव विद्रोही हो गया. 15 वर्ष की होतेहोते उस का यह स्वभाव अपने चरम पर पहुंच गया था. अब जब भी उसे प्रताडि़त किया जाता, वह घर से भाग जाती. फिर 2-4 दिन में वापस लौट आती. उस का एक बौयफ्रेंड था मुश्ताक बगास. वह ब्लेकबर्न में रहता था और 28 साल का था. यानी वह उस से करीब 11 साल बड़ा था. 2002 में जब शेफीलिया का परिवार ब्लेकबर्न में रहता था, तब दोनों की दोस्ती हुई थी, जो प्यार के बाद शारीरिक संबंधों में बदल गई थी. इस की पहल शेफीलिया ने ही की थी.

बगास ने तो उसे रोका था कि अभी वह नाबालिग है और शादी से पहले यह उचित नहीं है, पर शेफीलिया ने जिद पकड़ ली थी. वह बोली, ‘‘मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करती हूं. फिर प्यार में किसी प्रकार की दीवार क्यों? जब मैं ने तुम्हें अपना मन सौंप दिया है तो तन सौंपने में क्या हर्ज है. आखिर शादी के बाद भी तो यही सब करना है. फिर शादी तक हम क्यों समय बर्बाद करें. जिंदगी मौजमस्ती का नाम है. कल किस ने देखा है. जो करना है, आज ही क्यों ना कर लें.’’

‘‘लेकिन यह गलत होगा.’’ बगास समझदार था और इस तरह का कोई फायदा नहीं उठाना चाहता था.

‘‘प्यार में गलत सही कुछ नहीं होता. फिर तुम कौन सा मुझ से जबरदस्ती कर रहे हो. मैं अपनी इच्छा से तुम्हें अपना सब कुछ सौंपना चाहती हूं.’’ शेफीलिया ने कहा. आखिर उस की दलीलों के आगे बगास की एक न चली और उस ने वैसा ही किया जैसा शेफीलिया चाहती थी.

अब जब भी शेफीलिया घर से भागती. बगास के घर ही पहुंच जाती. दोनों खुल कर मौजमस्ती करते. बातचीत के लिए बगास ने उसे एक मोबाइल फोन भी दे दिया था, जो वह छिपा कर रखती थी. मौका मिलने पर वह अपने दुखसुख की बात उस से कर लेती थी. शेफीलिया यूं तो कई बार घर से भागी थी, पर पुलिस में उस की रिपोर्ट 2-3 बार ही दर्ज कराई गई थी. दिसंबर, 2002 में उस ने बगास को स्कूल के लंच समय में मिलने के लिए बुलाया. उस दिन तो वह नहीं आया, पर अगले दिन दोनों मिले. शेफीलिया ने उसे अपने पिता द्वारा की गई पिटाई के निशान दिखाते हुए कहा, ‘‘अब सहन नहीं होता बगास. कुछ करो, वरना मैं यूं ही किसी दिन दम तोड़ दूंगी. अब हद हो गई है. मेरे घर वाले मेरा निकाह पाकिस्तान में मेरे कजिन से करना चाहते हैं, जो मुझ से 30 साल बड़ा है. मुझे अब सारा भरोसा तुम्हारे प्यार पर है, वरना…’’

बगास उस के हर दर्द से वाकिफ था. वह भी चाहता था कि शेफीलिया सदा खुश रहे. इसलिए वह उस की मदद करने को तैयार हो गया. दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया. 2 जनवरी, 2003 को सुबहसवेरे ही बगास कार ले कर उस के घर से कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. उस ने मिसकाल दे कर शेफीलिया को अपने आने की सूचना दे दी. शेफीलिया मौका देख कर एक बैग में अपने कुछ कपड़े रख कर सावधानीपूर्वक घर की खिड़की से कूद कर बाहर आ गई और बगास की कार में जा बैठी. बगास ने फौरन कार आगे बढ़ा दी. इस बार वह शेफीलिया को अपने घर नहीं ले गया. क्योंकि पहले 2 बार शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद उसे वहां से बरामद कर चुके थे.

बगास शेफीलिया को ब्लेकबर्न में ही अपने भाई के घर ले गया. वहां रात में दोनों ने एकदूसरे को खूब प्यार किया. दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध भी बने. इस दौरान शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन इफ्तिखार अहमद ने किसी तरह शेफीलिया का पता लगा ही लिया. वह सीधे बगास के भाई के घर पहुंचा और शेफीलिया को जबरदस्ती साथ ले आया. उस ने चलते समय बगास को चेतावनी भी दी, ‘‘अगर अब की बार मैं ने तुम्हें इस के साथ देख लिया तो इस के साथ तुझे भी काट डालूंगा.’’

घर आ कर इफ्तिखार ने शेफीलिया की खूब पिटाई की और फरमान सुना दिया कि 2-4 दिन में सब लोग पाकिस्तान चले जाएंगे. वहां उस का निकाह कर दिया जाएगा. शेफीलिया बेबस हो गई. वह घर में कैद थी. जनवरी, 2003 के आखिर में पूरा परिवार पाकिस्तान गया. वहां शेफीलिया के निकाह की तैयारी भी कर ली गई. शेफीलिया को इस से बचने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उस ने अपनी इहलीला समाप्त करने की ठान ली. उस ने मौका देख ब्लीच पी लिया. इस से उस की हालत बिगड़ने लगी. लेकिन समय रहते घर वालों ने उसे बचा लिया. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों को बताया गया कि अंधेरा होने के कारण शेफीलिया ने दवा की जगह कोई जहरीली चीज पी ली थी.

अभी तक इफ्तिखार के रिश्तेदारों को इस की भनक नहीं लगी थी. सो मई में वह शेफीलिया और परिवार सहित वापस इंग्लैंड लौट आया. यहां उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया. क्योंकि वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी. न तो उस के गले से कुछ नीचे उतरता था, न ही वह कमजोरी के कारण ठीक से चल पाती थी. यहां कई सप्ताह तक उस का इलाज चला. उस के बगल वाले बेड की मरीज ने जब शेफीलिया से पूछा कि उस ने ब्लीच क्यों पी तो उस ने बताया कि जबरन उस की शादी उस से की जा रही थी, जिसे वह पसंद ही नहीं करती.

उस का पासपोर्ट भी उस के पिता ने छीन लिया था. इफ्तिखार ने यहां अस्पताल की एक एशियन मूल की नर्स को कहा कि वह गोरी नर्सों को न बताए कि शेफीलिया ने ब्लीच पी थी. उस नर्स ने शेफीलिया से कहा कि वह कैसे अपने घर वालों के साथ रहती है. उस की फैमिली तो लवलेस फैमिली है. स्वस्थ होने के बाद शेफीलिया पर फिर से शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा. पर उस ने साफ मना कर दिया. उस के पिता को उस पर शक भी होने लगा था कि वह गर्भ से है. उन्हें जब विश्वास हो गया कि अब वह किसी भी तरह नहीं मानेगी तो 11 दिसंबर, 2003 को इफ्तिखार और उस की पत्नी फरजाना ने शेफीलिया की खूब पिटाई की. अलेशा थोड़ी सी खुली खिड़की से सब देख रही थी. फरजाना ने अपने पति से कहा, ‘‘यह लड़की हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. बेहतर है, इसे खत्म कर दो.’’

इफ्तिखार इस के लिए तैयार हो गया तो फरजाना कंबल, चादर, टेप के 2 रोल, एक काला विग और बैग ले आई. इस के बाद इफ्तिखार ने एक प्लास्टिक बैग से शेफीलिया का मुंह तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस ने दम नहीं तोड़ दिया. तत्पश्चात दोनों ने उस की लाश को चादर व कंबल में लपेट कर बैग में भर दिया. फिर दोनों ने मिल कर बैग को चारों तरफ से टेप से पैक कर दिया. इस के बाद दोनों ने लाश को बाहर खड़ी कार में रख दिया. इफ्तिखार अकेले ही कार ले कर चला गया. उस ने लाश केंट नदी में फेंक दी और घर लौट आया. इस के कई महीने बाद पुलिस ने लाश बरामद की. शक इफ्तिखार पर गया. पर उस के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला. यह केस यहीं दफन हो जाता अगर 7 साल बाद अलेशा सच उजागर न करती.

डकैती के आरोप में अलेशा को 6 महीने की सजा सुनाई गई. उस की सजा ज्यादा होती, पर उस ने मानवीयता दिखाते हुए अपनी बहन शेफीलिया की हत्या का राज खोला था, इस का उसे लाभ दिया गया. जज इरविन ने कहा, ‘‘जब सच्चाई व्यक्त करने की इच्छा होती है, तो कोई भी व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता. अलेशा ने कानून की मदद की है, इस के लिए उस का यह कदम सराहनीय है. इस से उस के मन को शांति मिलेगी, जो उस की आगे की जिंदगी को सामान्य बनाने में मदद करेगी.’’

खैर, अब फिर से इफ्तिखार अहमद तथा फरजाना को गिरफ्तार कर लिया गया. एक पेशी के दौरान जज जान स्मिथ ने कहा, ‘‘शेफीलिया हत्याकांड एक जघन्य कृत्य है. वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती थी. वह होनहार थी और ला की पढ़ाई करना चाहती थी. उसे अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार था. पर उस के मातापिता उसे इस अधिकार से वंचित रखना चाहते थे. शेफीलिया 2 संस्कृतियों के बीच फंसी हुई थी. उसे अपने तरीके से जीने देना चाहिए था, पर उस के मातापिता ने जीवन की जगह उसे मौत दे दी. ये किसी भी तरह रहम के काबिल नहीं हैं.’’

कोर्ट में कई सुनवाई हुईं. इस दौरान शेफीलिया के जानकारों के भी बयान दर्ज किए गए. नार्थवेस्ट के नए चीफ प्रौसिक्यूटर नाजिर अफजल ने कोर्ट को बताया कि एशियन समाज में अभिभावक औनर क्राइम करने से नहीं डरते. शेफीलिया की हत्या के कई सुबूत मिले हैं. वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी. घर वालों ने उस से अपनी मर्जी की जिंदगी जीने का अधिकार छीन लिया था. शेफीलिया के दोस्त साराह बैनट ने कोर्ट में बयान दिया कि शेफीलिया ने अपने बालों को रंग लिया था और नाखून बढ़ा लिए थे. इस पर उस की मां फरजाना ने कैमिकल की सहायता से उस के बालों का रंग धो दिया और उस के नाखून काट दिए थे. साथ ही उस की बेरहमी से पिटाई भी की थी. उसे गंदी गालियां भी दी जाती थीं. उस की मां उसे पकड़ती तो पिता उस की पिटाई करता था.

शेफीलिया के दूसरे दोस्त बुड्स ने बताया कि उसे शेफीलिया ने एक नोट दिया था. उस ने वही नोट कोर्ट में पढ़ कर सुनाया. उस में लिखा था, ‘‘पिछले कुछ सालों से घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है. वे मुझे कालेज जाने से रोकना चाहते थे. वे मुझ से जबरदस्ती नौकरी करवाना चाहते थे. मैं ने जेब खर्च से 2 हजार यूरो बचा कर अपने खाते में डलवाए तो मेरे पिता ने वे भी निकलवा लिए. मुझे डर रहता है, क्योंकि मेरे मातापिता मुझे पाकिस्तान ले जा कर मेरी शादी करवाना चाहते हैं. वे लोग मुझे वहीं छोड़ देना चाहते हैं. जबकि मुझे वह कल्चर कतई पसंद नहीं है. मुझे घर में घुटन होती है. मैं ने पिता द्वारा लाए गए कई रिश्ते ठुकरा दिए थे. इस कारण मुझे मार खानी पड़ती थी.’’

शेफीलिया की टीचर जोएनी कोड ने कोर्ट में बयान दिया, ‘‘शेफीलिया की मौत से करीब 11 महीने पहले उस के स्कूल से अनुपस्थित रहने पर जब मैं ने उसे फोन किया और पूछा कि क्या कोई चिंता की बात है? तब शेफीलिया ने हां कहा था. जब वह दूसरे दिन स्कूल लौटी तो मैं ने उस की गर्दन पर खरोचों के निशान देखे थे. उस के होंठों पर भी कट का निशान था. पूछने पर शेफीलिया ने बताया कि उस की मां ने उसे नीचे कर के पकड़े रखा और पिता ने पीटा. इसी से वे निशान आए थे. उसे अकसर कमरे में बंद कर के भूखा रखा जाता था. उस के उत्पीड़न की बात एक सोशल वर्कर को पता लगी तो वह स्कूल में उस से पूछताछ करने आया. पर शेफीलिया ने उसे कुछ नहीं बताया था.’’

7 सितंबर, 2011 को तमाम गवाहों के बयानों के बाद पुलिस ने इफ्तिखार अहमद और फरजाना के विरुद्ध कोर्ट में चार्जशीट पेश की. जिस में उन पर बेटी शेफीलिया की हत्या का चार्ज लगाया गया था. दोनों के खिलाफ ट्रायल मई, 2012 से 3 अगस्त, 2012 तक हुआ. इस दौरान इफ्तिखार अहमद और फरजाना ने अपना अपराध कुबूल लिया था. उन्होंने बताया कि शेफीलिया की हरकतों से वे तंग आ गए थे. वह हर तरह से उन की बदनामी करवाना चाहती थी. इसी कारण उन्हें उस की हत्या करनी पड़ी.

तमाम पेशियों के बाद 14 दिसंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. इफ्तिखार अहमद और फरजाना को शेफीलिया की हत्या का दोषी करार देते हुए दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. सजा सुनते ही दोनों रो पड़े. Crime News

Kanpur Crime News : अपना अपराध दूसरे के सिर

Kanpur Crime News : परशुराम का पत्नी और बेटी के साथ गांव वापस आना उस के भाई जयराम को जरा भी अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उस ने अपने हिस्से की जमीन और घर बंटा लिया था. जमीन और घर पर कब्जा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है…

घर के अंदर का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. खून से लथपथ 3 लाशें पड़ी थीं. मृतकों में परशुराम यादव, उस की कथित पत्नी विमला देवी और मासूम बेटी हिमांशी थी. तीनों की हत्या गोली मार कर की गई थी. परशुराम और विमला की लाशें कमरे के अंदर खून में डूबी पड़ी थीं, जबकि मासूम हिमांशी की लाश बरामदे में पड़े तखत पर पड़ी थी.लकमरे से ले कर बरामदे तक खून ही खून फैला था. कमरे के अंदर का सामान अस्तव्यस्त था और फर्श पर चूडि़यों के टुकड़े बिखरे थे. वहां की हालत देख कर साफ लग रहा था कि मरने से पहले परशुराम और विमला का हत्यारों से जम कर संघर्ष हुआ था. दिल दहलाने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा में 13 दिसंबर, 2014 की रात घटी थी.

चूंकि हत्याएं गोली मार कर की गई थीं, इसलिए गांव वालों को तुरंत हत्याओं की जानकारी हो गई थी. मृतक के भाई जयराम सिंह ने हत्यारों को भागते देखा भी था, इसलिए गांव वालों की सलाह पर उस ने तुरंत घटना की सूचना थाना उसराहार पुलिस को दे दी थी. मामला 3-3 हत्याओं का था, इसलिए घटना की जानकारी होते ही रात को ही एसएसपी राकेश सिंह, सीओ अनिल यादव के साथ थाना ऊसराहार के थानाप्रभारी संजय यादव भी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम भी एसएसपी राकेश सिंह साथ लाए थे. पहले पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के बाद मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह से पूछताछ की गई.

जयराम सिंह ने बताया कि 2 मंजिला बने मकान में भूतल पर वह अपने परिवार के साथ रहता था, जबकि पहली मंजिल पर उस का बड़ा भाई परशुराम अपनी पत्नी विमला और 3 वर्षीया बेटी हिमांशी के साथ रहता था. रात में गोलियां चलने की आवाज सुन कर जब वह घर से बाहर निकला तो देखा रामकिशन और धर्मेंद्र तमंचा लिए 2 अन्य लोगों के साथ भागे जा रहे थे. मैं ने उन्हें अच्छी तरह पहचान लिया था. शोर भी मचाया था, लेकिन अन्य लोगों के आतेआते वे अंधेरे का फायदा उठा कर निकल गए.

‘‘ये रामकिशन और धर्मेंद्र कौन हैं, मृतक की उन से क्या दुश्मनी थी?’’ एसएसपी राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बड़े भाई परशुराम के रामकिशन की पत्नी विमला से नाजायज संबंध बन गए थे. रामकिशन ने विरोध किया तो परशुराम विमला को दिल्ली भगा ले गया और पत्नी बना कर रहने लगा. पिछली होली पर परशुराम गांव लौट आया तो रामकिशन आ धमका. उस ने गांव में पंचायत बुलाई और विमला को अपने साथ भेजने के लिए पंचायत से गुहार लगाई. लेकिन विमला ने रामकिशन के साथ जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद पंचायत क्या करती, बेइज्जत हो कर रामकिशन चला तो गया, लेकिन जातेजाते अंजाम भुगतने की धमकी देता गया. उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने ये तीनों हत्याएं की हैं.’’

फिंगर एक्सपर्ट टीम ने घटनास्थल से फिंगर प्रिंट उठा लिए तो खोजी कुत्ता टीम ने कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटनास्थल और लाशों को सूंघ कर भौंकता हुआ नीचे आया. जयराम सिंह के घर के सामने आ कर कुछ देर वह भौंकता रहा, उस के बाद जयराम सिंह को पकड़ लिया. इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि कहीं भाई और उस के परिवार की हत्या भाई ने ही तो नहीं की. क्योंकि अक्सर जर, जोरू जमीन के लिए इस तरह हत्याएं होती रही हैं. इन हत्याओं में जोरू भी थी और जरजमीन भी. हत्याओं की सही वजह क्या हो सकती थी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था.

इस पूछताछ के बाद एसएसपी राकेश सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी संजय यादव ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और जरूरी सुबूत जुटा कर थाने वापस आ गए, जहां उन्होंने मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह की तहरीर पर रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर खुद ही जांच शुरू कर दी. चूंकि जयराम सिंह ने तीनों हत्याओं का आरोप मृतका विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाया था, इसलिए थानाप्रभारी संजय यादव ने रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए गांव चौबिया स्थित उस के घर छापा मारा.

रामकिशन और उस का बेटा धर्मेंद्र घर पर ही मिल गया था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाना ऊसराहार ले आई. थाने पर जब रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र से परशुराम, उस की पत्नी और बेटी की हत्या के बारे में पूछा गया तो रामकिशन ने कहा कि यह सच है कि परशुराम से उस की दुश्मनी थी, क्योंकि वह उस की पत्नी विमला को भगा ले गया था और उस के साथ शादी कर ली थी. लेकिन जहां तक हत्याओं की बात है तो उस ने ये हत्याएं नहीं कीं. कोई अपने फायदे के लिए उस की दुश्मनी का फायदा उठा कर उसे फंसाना चाहता है.

‘‘ऐसा कौन हो सकता है, जो अपने फायदे के लिए तुम्हें फंसाएगा?’’ थानाप्रभारी संजय यादव ने पूछा.

‘‘साहब, पूरे यकीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मुझे परशुराम के भाई जयराम सिंह पर शक है. उसी ने मकान और जमीन हथियाने के लिए यह खूनी खेल खेला है.’’ रामकिशन ने कहा.

थानाप्रभारी संजय यादव असमंजस में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच्चा है और कौन झूठा? दोनों हत्याओं की वजह ऐसी बता रहे थे कि अविश्वास करने का सवाल ही नहीं उठता था. सचझूठ का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी संजय यादव ने अपने खास मुखबिर को रामकिशन और जयराम सिंह के पीछे लगा दिया. यही नहीं, वह खुद भी सुरागरसी करते रहे. थानाप्रभारी संजय यादव के उस खास मुखबिर ने जयराम सिंह और रामकिशन से दोस्त गांठ ली और वह उन के साथ खानेपीने लगे. एक दिन जयराम सिंह के साथ महफिल जमी तो मुखबिर ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘यार जयराम! तू ने खेल तो बहुत अच्छा खेला भाई. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.’’

‘‘कौन सा खेल?’’ जयराम शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए बोला.

‘‘अरे वही, जमीनजायदाद भी मिल गई और पुलिस से भी बच गए. बड़ी सफाई से हत्याओं का इल्जाम दूसरे के सिर मढ़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’ जयराम ने शराब का गिलास नीचे रख कर हैरानी से पूछा.

‘‘दोस्त हूं तुम्हारा, दिल की बात जान लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’ मुखबिर ने टकराने के लिए अपना गिलास ऊपर उठा कर कहा.

‘‘तुम जान गए हो तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम तो अपने हो. लेकिन किसी दूसरे के सामने जुबान मत खोलना.’’ जयराम ने गिलास से गिलास टकराते हुए कहा.

महफिल खत्म कर के मुखबिर सीधे थाना ऊसराहार पहुंचा. थानाप्रभारी संजय यादव थाने में ही मौजूद थे. मुखबिर के चेहरे की चमक देख कर ही संजय यादव समझ गए कि यह जरूरी संदेश लाया है. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बिठा कर पूछा, ‘‘कोई खुशखबरी?’’

‘‘जी सर, खुशखबरी ही है.’’

‘‘तो जल्दी बताओ, ताकि तुरंत काररवाई की जा सके.’’

‘‘साहब, परशुराम, उस की पत्नी विमला और बेटी हिमांशी का कत्ल उस के भाई जयराम सिंह ने ही किया है. मकान और जमीन हथियाने के लिए उसी ने तीनों को गोली मार कर मारा है और इल्जाम विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगा दिया है.’’

‘‘तुम यह बात इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो?’’ संजय यादव ने पूछा.

‘‘सर, अभी थोड़ी देर पहले हम दोनों की महफिल जमी थी. उसी में मुझे जुबान न खोलने की नसीहत देते हुए जयराम ने तीनों की हत्या की बात स्वीकार की है.’’

थानाप्रभारी संजय यादव को भी जयराम सिंह पर ही शक था. क्योंकि खोजी कुत्ते ने उसी को पकड़ा था. लेकिन जयराम सिंह ने हत्या की जो वजह बताई थी, उस से वह गुमराह हो गए थे. मुखबिर ने सच्चाई पता लगा ली तो उन्होंने देर करना उचित नहीं समझ. पुलिस बल के साथ वह गांव इकघरा पहुंचे और जयराम सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में उस से पूछताछ शुरू हुई तो पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन जब उन्होंने अपना अंदाज दिखाया तो उस ने तीनों हत्याओं का अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जयराम सिंह ने खून से सने कपडे़ और वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने भूसे वाली कोठरी में छिपा रखा था. जयराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने मुकदमे से रामकिशन और धर्मेंद्र का नाम हटा कर उस का नाम दर्ज कर दिया. इस के बाद पूछताछ एवं पुलिस जांच में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना चौबिया के गांव गंगापुरा में कुल्फ सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे बालकिशन और रामकिशन थे. कुल्फ सिंह के पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए उस की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी.

गुजरबसर के लिए वह अपने खेतों पर काम करने के बाद दूसरे के यहां मेहनतमजदूरी कर लेता था. दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी मेहनतमजदूरी कर के पिता की मदद करने लगे. बड़ा बेटा बालकिशन जवान हुआ तो कुल्फ सिंह ने उस का विवाह इटावा के ही थाना ऊसराहार के गांव इकघरा के रहने वाले हुकुम सिंह यादव की बेटी अमृता के साथ कर दिया. अमृता फैशन परस्त व खुले विचारों की लड़की थी. वह सासससुर के आगे परदा नहीं करती थी, जिस से नाराज हो कर सासससुर ने घरजमीन का बंटवारा कर के उसे अलग कर दिया.

बालकिशन से छोटे रामकिशन की शादी विमला के साथ हुई. गोरीचिट्टी आकर्षक कदकाठी की विमला थाना इकदिल के गांव तीरवा के रहने वाले राम सिंह की 3 संतानों में सब से छोटी थी. राम सिंह के पास अपनी इतनी जमीन थी कि उस में खेती कर के वह अपना गुजारा आसानी से कर रहा था. रामकिशन विमला को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, विमला वैसी ही थी. उस की मोहक मुसकान, कजरारी आंखे एवं गठीले बदन ने उसे दीवाना बना दिया था. लेकिन विमला अपनी इस शादी से खुश नहीं थी, क्योंकि उस का पति रामकिशन उम्र में उस से 10 साल बड़ा था. उस ने भी अपनी उम्र के युवक की कल्पना की थी, लेकिन रामकिशन वैसा नहीं था.

समय के साथ विमला एक बेटे की मां बनीं, नाम रखा धर्मेंद्र सिंह. बेटे के पैदा होने के बाद रामकिशन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने गांव से बाहर जा कर पैसा कमाने का विचार किया. मातापिता से बात की तो वे भी राजी हो गए. उस ने कुछ जरूरी सामान लिया और आगरा चला गया. वहां उसे एक बिल्डिंग बनवाने वाले ठेकेदार के यहां नियमित काम मिल गया. रामकिशन सुबह 9 बजे ड्यूटी पर जाता तो शाम को ही लौटता. वह अपनी तरह के अन्य मजदूरों के साथ कच्ची बस्ती में रहता था. सब मिलजुल कर खाना बनाते और एक साथ बैठ कर खाते. कभीकभी उन के बीच पीनेपिलाने का भी दौर चलता. धीरेधीरे रामकिशन को आगरा शहर पसंद आ गया. अब उस का एक ही लक्ष्य था, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना.

2-3 महीने में वह घर आता और जो कमा कर लाता, पिता के हाथों पर रख देता. विमला को खर्च के लिए अलग से पैसे देता. हफ्तादस दिन घर में रह कर वह नौकरी पर वापस चला जाता. गांव में विमला पति की यादों को दिल में संजोए बच्चे का मुंह देख कर दिन काट रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार वह जेठानी अमृता के घर चली जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात अमृता के भाई परशुराम से हुई. परशुराम जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हुकुम सिंह यादव था. हुकुम सिंह के 2 बेटे, परशुराम, जयराम और एक बेटी अमृता थी. हुकुम सिंह ने दोनों बेटों की शादी कर के घरजमीन का बंटवारा कर दिया था.

छोटा भाई जयराम तो परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहा था, जबकि परशुराम की जिंदगी में भूचाल आ गया था. बीमारी से उस की पत्नी सूर्यमुखी की मौत हो गई थी. वह तनहा जिंदगी काट रहा था. अकेला होने की वजह से अक्सर वह अपनी बहन अमृता के यहां चला जाता था. वहीं उस की मुलाकात बहन की देवरानी विमला से हुई. अमृता के घर विमला और परशुराम का आमनासामना हुआ तो इसी पहली मुलाकात में दोनों ही एकदूसरे को देख कर कुछ इस तरह मोहित हुए कि पलकें झपकाना भूल गए. विमला की आकर्षक देहयष्टि परशुराम की आंखों में बस गई. वहीं परशुराम का गठीला बदन देख कर विमला मंत्रमुग्ध सी हो गई.

बातचीत के दौरान परशुराम की नजरें विमला पर ही जमी रहीं. वह बारबार कनखियों से उसे ही ताकता रहा. विमला की नजरें जब भी उस की नजरों से टकरातीं, वह कुछ इस तरह मुसकराता कि विमला का दिल मचल उठता. उस की इस मुसकराहट से विमला के दिलोदिमाग में हलचल मचने लगी. उस दिन विमला अपने घर आई तो उसे लगा जैसे वह अपना कुछ खो आई है. परशुराम का अक्स उस के दिमाग में बस गया था. दूसरी ओर परशुराम का भी वही हाल था. उसे साफ महसूस हो रहा था कि विमला की आंखों में उस के लिए चाहत थी.

पति के दूर रहने से विमला को जब भी परशुराम की मुसकान याद आती, उस का मन विचलित होने लगता. रामकिशन ने उस की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था. महीनों हो गए थे, वह गांव नहीं आया था. पति की उपेक्षा से विमला व्याकुल रहने लगी थी. यही वजह थी कि उस ने परशुराम को खयालों में बसा लिया था. परशुराम से मिलने और उस से बातें करने का विमला का जब भी मन होता, वह जेठानी के यहां आ जाती. बहाना जेठानी से मिलने का होता था, जबकि नजरें परशुराम को खोजा करती थीं. जल्दी ही परशुराम और विमला के बीच अंतरंगता बढ़ गई और आंखों ही आंखों में इशारे भी होने लगे. एक दिन विमला ने कहा, ‘‘मैं रोज यहां आती हूं, जबकि तुम कभी हमारे घर नहीं आते. अब मैं तभी यहां आऊंगी, जब तुम मेरे घर आओगे…’’

‘‘अगर तुम्हारे सासससुर ने ऐतराज किया तो..?’’ परशुराम ने कहा.

‘‘मेरे सासससुर एक सप्ताह के लिए रिश्तेदारी में भागवत कथा सुनने गए हैं. मैं घर में बिलकुल अकेली हूं. इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है. तुम मेरे घर आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’ शरारत से आंखें नचाते हुए विमला ने कहा.

परशुराम समझ गया कि विमला क्या अच्छा लगने की बात कर रही है. आग दोनों ओर लगी थी. इसलिए अगले दिन परशुराम विमला के घर जा पहुंचा. विमला घर में सचमुच अकेली थी. इस का परिणाम यह निकला कि मर्यादा टूट गई. एक बार मर्यादा क्या टूटी, परशुराम अब महीने में पंद्रह दिन बहन के घर ही पड़ा रहने लगा. परशुराम बहन के घर क्यों पड़ा रहता है, इस बात की गांव में चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ाते बात रामकिशन के कानों तक पहुंची. रामकिशन ने परशुराम और विमला को अलग करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रेम दीवानी विमला ने परशुराम का साथ नहीं छोड़ा. तंग आ कर रामकिशन गांव में ही रहने लगा, जिस से दोनों को मिलने में परेशानी होने लगी.

तब किसी तरह एक दिन विमला ने परशुराम से मिल कर कहा, ‘‘परशुराम, अब मैं तुम्हारे लिए और मार नहीं खा सकती. तुम मजा ले कर दीदी के घर जा कर चैन से सो जाते हो, जबकि मेरा पति मुझे जानवरों की तरह पीटता है. अगर तुम मुझे सचमुच चाहते हो तो मुझे इस मारपीट से मुक्ति दिला दो. मुझे यहां से कहीं और ले चलो.’’

‘‘सच विमला.’’ परशुराम ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए पति और बेटे, दोनों को छोड़ने को तैयार हूं.’’

और फिर सचमुच एक दिन विमला ने अपना सामान समेटा और परशुराम के साथ भाग गई. परशुराम विमला को ले कर दिल्ली चला गया. वहां उस ने लक्ष्मीनगर में मदर डेयरी के पास झोपड़पट्टी में एक कमरा किराए पर लिया और विमला के साथ आराम से रहने लगा. रोजीरोटी के लिए वह सब्जी बेचने लगा. दूसरी ओर विमला के भाग जाने से रामकिशन की बड़ी बदनामी हुई. उस ने विमला को खोजने की खुद तो कोशिश की ही, थाने में भी परशुराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन विमला और परशुराम का कुछ पता नहीं चला. हार कर वह शांत हो कर बैठ गया.

लगभग 8 सालों बाद परशुराम मार्च, 2014 में अचानक अपने गांव इकघरा लौटा. साथ में उस की कथित पत्नी विमला और 3 साल की बेटी हिमांशी भी थी. गांव आ कर वह पत्नी और बेटी के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगा. जमीन का अपना आधा हिस्सा भी उस ने बंटा लिया. परशुराम का घर लौटना उस के छोटे भाई जयराम सिंह को अच्छा नहीं लगा. इस की वजह यह थी कि अभी तक घर और जमीन पर उसी का कब्जा था. उसे लगता था कि डर की वजह से परशुराम कभी लौट कर नहीं आएगा. विमला के आने की जानकारी रामकिशन को हुई तो वह इकघरा आया और गांव में पंचायत बैठा कर विमला को अपने साथ भिजवाने की गुहार लगाई. लेकिन विमला ने भरी पंचायत में उस के साथ जाने से मना कर दिया. बेटे धर्मेंद्र को देख कर भी उस का दिल नहीं पसीजा.

जब वह उसे छोड़ कर गई थी, तब वह 8 साल का था. अब वह 16 साल का हो गया था.  धर्मेंद्र ने भी मां से वापस चलने को कहा. समाज में हो रही बदनामी का भी वास्ता दिया, उस के बाद भी विमला राजी नहीं हुई. उस के बाद रामकिशन विमला और परशुराम को अंजाम भुगतने की धमकी दे कर वापस चला गया. भाई के आने से जयराम सिंह परेशान रहता था. उस का दिन का चैन और रातों की नींद छिन गई थीं. उस का सोचना था कि अगर परशुराम लौट कर न आता तो मकान और जमीन उसी की होती. लेकिन अब यह नामुमकिन था. इसी सोचविचार में जयराम सिंह ने एक रात एक तीर से 2 निशाने साधने की तरकीब निकाली.

उस ने बड़े भाई परशुराम, उस की कथित पत्नी विमला और बेटी हिमांशी की हत्या कर के इल्जाम विमला के पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाने की योजना बना डाली. योजना बना कर जयराम सिंह ने एक बदमाश से 4 हजार रुपए में एक तमंचा और 5 कारतूस खरीदे. 13 दिसंबर, 2014 की रात जब गांव में सन्नाटा पसर गया तो जयराम तमंचा लोड कर के पहली मंजिल पर पहुंचा और बरामदे में सो रही मासूम हिमांशी के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर परशुराम और विमला ने समझा कि बदमाश आ गए हैं. वे कमरे में दुबक गए.

इस के बाद जयराम सिंह कमरे में आया तो परशुराम ने भाई को पहचान लिया. वह उस से भिड़ गया. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. लेकिन मौका मिलते ही जयराम ने परशुराम के सीने में गोली मार दी. वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. विमला ने भी जयराम को पहचान लिया था. वह भी उसे से भिड़ गई. लपटाझपटी में विमला की चूडि़यां टूट कर बिखर गईं. वह चीख पाती, उस के पहले ही जयराम ने विमला के सीने में गोली मार दी. विमला भी खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी.

तीनों को मौत के घाट उतार कर जयराम ने तमंचा तथा खून से सने कपड़े भूसे की कोठरी में छिपा दिए और घर के बाहर आ कर जोरजोर से शोर मचाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी को जयराम ने बताया कि विमला के पति रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अन्य लोगों ने ये हत्याएं की हैं. भागते समय उस ने रामकिशन तथा धर्मेंद्र को पहचान लिया था. कुछ देर बाद ग्रामप्रधान अंगद सिंह यादव ने इन तीनों हत्याओं की सूचना थाना ऊसराहार पुलिस को दी.

पूछताछ के बाद 21 दिसंबर, 2014 को थाना ऊसराहार पुलिस ने अभियुक्त जयराम सिंह को इटावा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. Kanpur Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Crime Stories : कत्ल एक दिलदार का

Crime Stories : कबड्डी खेलते समय नासिर ने चौधरी आफताब की जो बेइज्जती की थी, उस का बदला लेने के लिए उस नेहैदर अली के साथ मिल कर नासिर के साथ ऐसा क्या किया कि उसे और हैदर अली को पछताना पड़ा. उन दिनों मैं जिला छंग के एक देहाती थाने में तैनात था. वह जगह दरिया के करीब थी. मई का महीना होने की वजह से अच्छीभली गरमी पड़ रही थी. अचानक एक दिन पास के गांव से एक वारदात की खबर आई. कांस्टेबल सिकंदर अली ने बताया कि गुलाबपुर में एक गबरू जवान का बड़ी बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया है, जिस की लाश खेतों में पड़ी है. गुलाबपुर मेरे थाने से करीब एक मील दूर था.

वहां से फैय्याज और यूनुस खबर ले कर आए थे. वे दोनों खबर दे कर वापस जा चुके थे. मैं ने पूछा, ‘‘मरने वाला कौन है?’’

‘‘उस का नाम नासिर है, वह कबड्डी का बहुत अच्छा और माहिर खिलाड़ी था.’’ सिकंदर अली ने बताया.

मैं 2 सिपाहियों के साथ गुलाबपुर रवाना हो गया. हमारे घोड़े खेतों के बीच आड़ीतिरछी पगडंडी पर चल रहे थे. जिस खेत में लाश पड़ी थी, वह गांव से एक फर्लांग के फासले पर था. कुछ लोग हमें वहां तक ले गए. वहां एक अधूरा बना कमरा था, न दीवारें न छत. जरूर कभी वहां कोई इमारत रही होगी. नासिर की लाश कमरे के सामने पड़ी थी. लाश के पास 8-9 लोग खड़े थे, जो हमें देख कर पीछे हट गए थे. मैं उकड़ूं बैठ कर बारीकी से लाश की जांच करने लगा. बेशक वह एक खूबसूरत गबरू जवान था. उस की उम्र 23-24 साल रही होगी. वह मजबूत और पहलवानी बदन का मालिक था, रंग गोरा और बाल घुंघराले.

लाश देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस पर तेजधार हथियार या छुरे से हमला हुआ होगा. मारने वाले एक से ज्यादा लोग रहे होंगे. उस के हाथों के जख्म देख कर लगता था कि उस ने अपने बचाव की भरपूर कोशिश की थी. नासिर कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, इसलिए गुलाबपुर के लोग उसे गांव की शान समझते थे. लाश पर चादर डाल कर मैं लोगों से पूछताछ करने लगा. नासिर का 60 साल का बाप वहीं था, उस की हालत बड़ी खराब थी, आंखें आंसुओं से भरी हुईं. उस का नाम बशीर था. मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘चाचा, आप फिकर न करो, आप के बेटे का कातिल पकड़ा जाएगा.’’

उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा बेटा तो चला गया. कातिल के पकड़े जाने से मेरा बेटा लौट कर तो नहीं आएगा.’’

बेटे के गम ने उस की सोचनेसमझने की ताकत खत्म कर दी थी. उसे बस एक ही बात याद थी कि उस का जवान बेटा कत्ल हो चुका है. मुझे उस पर बड़ा तरस आया. मैं ने उसे एक जगह बिठा दिया और अपनी काररवाई करने लगा. सब से पहले मैं ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया. वहां मुझे कत्ल का कोई सुराग नहीं मिला. यहां तक कि वह हथियार भी नहीं, जिस से उस का कत्ल किया गया था.n मैं ने वारदात की जगह पर मौजूद लोगों के बयान लिए. लेकिन सिवाय नासिर की तारीफ सुनने के कोई जानकारी नहीं मिली. मैं ने नासिर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मेरे दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि इतनी रात को नासिर इस सुनसान जगह पर क्या कर रहा था. मेरे अंदाज से कत्ल रात को हुआ था. मैं ने मौजूद लोगों से घुमाफिरा कर कई सवाल किए, पर काम की कोई बात पता नहीं चली. मैं ने यूनुस और फैयाज से भी पूछताछ की. पर वे कुछ खास नहीं बता सके. इलियास जिस ने सब से पहले लाश देखी थी, मैं ने उस से भी पूछा, ‘‘इलियास, तुम सुबहसुबह कहां जा रहे थे?’’

‘‘साहबजी, मैं कुम्हार हूं. मैं मिट्टी के बरतन बनाता हूं. मैं रोजाना सुबह मिट्टी लाने के लिए घर से निकलता हूं. मेरा कुत्ता मोती भी मेरे साथ होता है. वह मुझे इस तरफ ले आया, तभी लाश पर मेरी नजर पड़ी. लाश देख कर मैं ने ऊंची आवाज में चीखना शुरू कर दिया. उस वक्त खेतों में लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. कुछ लोग जमा हो गए. मौजूद लोगों से पता चला कि बशीर लोहार के बेटे नासिर का किसी ने कत्ल कर दिया है.’’

बशीर लोहार का घर गांव के बीच में था. उस का छोटा सा परिवार था. घर में नासिर के मांबाप के अलावा एक बहन थी. बशीर ने अपने घर के बरामदे में भट्ठी लगा रखी थी. वहीं पर वह लोहे का काम करता था. जब मैं उस के घर पहुंचा तो वह मुझे घर के अंदर ले गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा बशीर, जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, बहुत अफसोसनाक है. मैं तुम्हारे गम में बराबर का शरीक हूं. मेरी पूरी कोशिश होगी कि जैसे भी हो, कातिल को कानून के हवाले करूं. लेकिन तुम्हें मेरी मदद करनी होगी. हर बात साफसाफ और खुल कर बतानी होगी.’’

उस की बीवी जुबैदा बोल उठी, ‘‘साहब, आप से कुछ भी नहीं छिपाएंगे. हमारी दुनिया तो अंधेरी हो ही गई है, लेकिन जिस जालिम ने मेरे बच्चे को मारा है, उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’’

‘‘आप दोनों को किसी पर शक है?’’

‘‘साहब, हमें किसी पर शक नहीं है. मेरा बेटा तो पूरे गांव की आंख का तारा था. अभी पिछले महीने ही उस ने कबड्डी का टूर्नामेंट जीता था. इस मुकाबले में 4 गांवों की टीमों ने हिस्सा लिया था. गुलाबपुर की टीम में अगर नासिर न होता तो यह जीत नजीराबाद के हिस्से में जाती. सुल्तानपुर और चकब्यासी पहले दौर में आउट हो गए थे. असल मुकाबला गुलाबपुर और नजीराबाद में था. जीतने पर गांव वाले उसे कंधे पर उठाए घूमते रहे. बताइए, मैं किस पर शक करूं?’’ बशीर ने तफ्सील से बताया.

‘‘नासिर कबड्डी का इतना अच्छा खिलाड़ी था, जहां 10 दोस्त थे, वहां एकाध दुश्मन भी हो सकता है.’’ मैं ने कहा.

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं साहब, पर मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है.’’ बशीर ने बेबसी जाहिर की.

‘‘मुझे उस दसवें आदमी की तलाश है, जिस ने नासिर का बेदर्दी से कत्ल किया है. जरूर यह किसी दुश्मन का काम है. हो सकता है, गांव के बाहर का कोई दुश्मन हो?’’ मैं ने कहा.

‘‘बाहर का भी कोई दुश्मन नहीं है साहब.’’ उस की बीवी जुबैदा ने कहा तो मैं सोच में पड़ गया. अचानक बशीर बोल उठा, ‘‘वह तो सारा दिन मेरे साथ काम में लगा रहता था. शाम को अखाड़े में कसरत वगैरह करता था.’’

‘‘यह अखाड़ा कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अखाड़ा ट्यूबवेल के पास है. उस टूटीफूटी इमारत के करीब, जहां यह वारदात हुई.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘मेरे अंदाज से कत्ल देर रात को हुआ है, इतनी रात को वह अखाड़े में क्या कर रहा था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात हमारी भी समझ में नहीं आ रही है.’’ जुबैदा बोली.

‘‘रात को क्या वह रोजाना की तरह समय पर सोया था?’’

‘‘सोया तो रोजाना की तरह ही था.’’ कहतेकहते जुबैदा रुक गई.

‘‘मुझे खुल कर बताओ, क्या बात है?’’ मैं ने कहा तो वह बोली, ‘‘आप हमारे साथ ऊपर छत पर चलिए. आप खुद समझ जाएंगे.’’

हम छत पर पहुंचे तो जुबैदा कहने लगी, ‘‘मैं रोजाना नासिर को उठाने छत पर आती थी और वह 2 पुकार में उठ जाता था. लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. मैं ने आगे बढ़ कर चादर उठाई तो उस के नीचे एक तकिया रखा हुआ था, जिस पर चादर ओढ़ाई हुई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सो रहा है.’’

मैं खामोश खड़ा रहा तो जुबैदा ने कहा, ‘‘इस का मतलब है कि पिछली रात नासिर अपनी मरजी से घर से निकला था. वह नहीं चाहता था कि किसी को उस के जाने के बारे में पता चले.’’ जुबैदा बोली.

‘‘नहीं जुबैदा, ऐसा नहीं है. वह पहले भी जाता रहा होगा, पर सुबह होने से पहले आ जाता होगा. इसलिए तुम्हें पता नहीं चला. तुम्हारा बेटा रात के अंधेरे में कहीं जाता था और जल्द लौट आता होगा, इसलिए तुम्हें खबर नहीं मिल सकी. मुझे तो किसी लड़की का चक्कर लगता है.’’ मैं ने कहा तो वे दोनों बेयकीनी से मुझे देखने लगे, ‘‘लड़की का चक्कर…’’

बशीर ने कहा, ‘‘साहब, नासिर ऐसा लड़का नहीं था. वह तो गुलाबपुर की लड़कियों और औरतों को मांबहनें समझता था. वह कभी किसी की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.’’

‘‘मैं नहीं मान सकता कि लड़की का चक्कर नहीं था. पिछली रात वह किसी लड़की से मुलाकात करने ही खेत में पहुंचा था. अगर आप लोग लड़की का नाम बता दो तो केस जल्द हल हो जाएगा. मैं कातिलों तक पहुंच जाऊंगा, क्योंकि वही लड़की बता सकती है कि खेत में क्या हुआ था?’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जनाब, हम कसम खा कर कह रहे हैं कि हम ऐसी किसी लड़की को नहीं जानते.’’ दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘मैं आप की बात का यकीन करता हूं, पर इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. मैं कहीं न कहीं से इस का सुराग लगा ही लूंगा. आप यह बताएं कि गुलाबपुर में नासिर का सब से करीबी दोस्त कौन है?’’

‘‘जमील से उस की गहरी दोस्ती थी.’’ बशीर ने कहा.

‘‘ठीक है, अब मैं पता कर लूंगा. दोस्त दोस्त का राज जानते हैं. मुझे जमील से मिलना है. तुम उसे यहां बुला लो?’’ मैं ने कहा.

‘‘उस का घर पड़ोस में है, मैं अभी बुलाता हूं.’’ कहते हुए बशीर बाहर निकल गया.

उस ने वापस लौट कर बताया कि जमील 2 दिनों से टोबा टेक सिंह गया हुआ है.

‘‘ठीक है, कल वह वापस आएगा तो उस से पूछ लूंगा. अभी उस के घर वालों से बात कर लेता हूं.’’ मैं ने कहा.

सामने ही उस की परचून की दुकान थी. उस का बाप वहीं मिल गया. मैं ने करीब 15 मिनट तक उस से बात की, पर कोई काम की बात पता नहीं चल सकी. वह भी कबड्डी की वजह से नासिर का बड़ा फैन था. उसे उस की मौत का बहुत गम था. मेरा दिमाग गहरी सोच में था. मुझे पक्का यकीन था कि जरूर लड़की का चक्कर है. जहां लाश मिली थी, वहां एक अधूरा कमरा था. रात में मुलाकात के लिए वह बेहतरीन जगह थी. मुझे ऐसी लड़की की तलाश थी, जो नासिर से मोहब्बत करती थी और नासिर उस के इश्क में पागल था.

वह जगह गुलाबपुर के करीब ही थी, इसलिए लड़की भी वहीं की होनी चाहिए थी. मेरी सोच के हिसाब से कातिल इस राज से वाकिफ था कि लड़की और नासिर वहां छिपछिप कर मिलते हैं. उसे इस बात का भी यकीन रहा होगा कि नासिर वहां जरूर आएगा. निस्संदेह कातिल उन दोनों की मोहब्बत और मिलन से सख्त नाराज रहा होगा. उस ने वक्त और मौका देख कर नासिर को मौत के घाट उतार दिया होगा. मुझे उस लड़की को तलाश करना था.

दोपहर के बाद मैं ने हमीदा को थाने बुलाया. वह कस्बे में घरघर जा कर क्रीमपाउडर और परांदे वगैरह बेचा करती थी. हर घर की लड़कियों को वह खूब जानती थी और कई की राजदार भी थी. पहले भी वह मेरे कई काम कर चुकी थी. मैं उसे कुछ पैसे दे देता था तो वह खुश हो जाती थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘हमीदा, तुम गुलाबपुर के हर घर से वाकिफ हो. मुझे नासिर के बारे में जानकारी चाहिए. तुम जो जानती हो, बताओ.’’

‘‘साहब, वह तो गुलाबपुर का हीरो था. बच्चाबच्चा उस पर जान देता था.’’ उस ने दुखी हो कर कहा.

‘‘मुझे गुलाबपुर की उस हसीना का नाम बताओ, जो उस पर जान देती थी और नासिर भी उस का आशिक रहा हो.’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘ओह, तो कत्ल की इस वारदात का ताल्लुक नासिर की मोहब्बत की कहानी से जुड़ा हुआ है.’’ उस ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘सौ फीसदी, उस के इश्क में ही कत्ल का राज छिपा है.’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

हमीदा कुछ सोचती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सच क्या है, यह तो नहीं कह सकती. पर मैं ने उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि रेशमा से उस का कुछ चक्कर चल रहा था. रेशमा शकूर जुलाहे की बेटी है.’’

मैं ने हमीदा को इनाम दे कर विदा किया. मैं पहले भी उस से मुखबिरी का काम ले चुका था. उस की खबरें पक्की हुआ करती थीं. अगले दिन गरमी कुछ कम थी. मैं खाने और नमाज से फारिग हो कर बैठा था कि जमील अपने बाप के साथ आ गया. मैं ने उस के बाप को वापस भेज कर जमील को सामने बिठा लिया. वह गोराचिट्टा, मजबूत जिस्म का जवान था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जमील, तुम्हें नासिर के साथ हुए हादसे का पता चल गया होगा?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखें भीग गईं. वह दुखी लहजे में बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपना सब से प्यारा दोस्त खो दिया है. पता नहीं किस जालिम ने उसे कत्ल कर दिया.’’

‘‘तुम उस जालिम को सजा दिलवाना चाहते हो?’’

‘‘जरूर, साहब मैं दिल से यही चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी मदद मुझे कातिल तक पहुंचा सकती है. जमील मुझे यकीन है कि बिस्तर पर तकिया रख कर वह पहली बार रात को घर से बाहर नहीं गया होगा. जरूर वह पहले भी जाता रहा होगा. यह खेल काफी दिनों से चल रहा था. तुम उस के दोस्त हो, राजदार हो, तुम्हें सब पता होगा. मैं सारी हकीकत समझ चुका हूं, पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

कुछ देर सोचने के बाद वह बोला, ‘‘आप का अंदाजा सही है, इस मामले में एक लड़की का चक्कर है.’’

‘‘रेशमा नाम है न उस का?’’ मैं ने बात पूरी की तो वह हैरानी से मुझे देखने लगा. फिर बोला, ‘‘साहब, उस का नाम रेशमा ही है. दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे. धीरेधीरे उन की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया था. मैं उन का राजदार था या यूं कहिए मेरी वजह से ही ये मुलाकातें मुमकिन थीं. रेशमा हमारी दुकान पर सामान लेने आती थी. उसे पता था कि मैं कब दुकान पर रहता हूं. मैं ही रेशमा को बताया करता था कि उसे कब खेतों में पहुंचना है. नासिर उस की राह देखेगा, अगर वह आने को हां कह देती थी तो मैं नासिर को बता देता था. फिर वह उस जगह पहुंच जाता था. इस तरह उन दोनों की मुलाकात हो जाती थी.’’

‘‘क्या मुलाकात के वक्त तुम भी आसपास होते थे?’’

‘‘नहीं साहब, मैं कभी उस तरफ नहीं गया. हां, दूसरे दिन नासिर मुझे सब बता दिया करता था.’’

‘‘दोनों के बीच बात किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी?’’

‘‘दोनों की मोहब्बत शादी तक पहुंच गई थी. रेशमा जल्दी शादी करने का इसरार कर रही थी. नासिर भी शादी करना चाहता था, लेकिन उसे इतनी जल्दी नहीं थी. जबकि रेशमा जल्दी रिश्ता तय करने की बात कर रही थी.’’

‘‘रेशमा की जल्दी के पीछे भी कोई वजह रही होगी?’’

‘‘हां, दरअसल रेशमा की मां सरदारा बी उस का रिश्ता अपनी बहन के लड़के से करना चाहती थी और उस का बाप उस का रिश्ता अपने भाई के लड़के से करना चाहता था. पर बात सरदारा बी की ही चलनी थी, क्योंकि वह काफी तेज है. वही सब फैसले करती है. रिश्ता खाला के बेटे से न तय हो जाए, इस डर से रेशमा नासिर को जल्दी रिश्ता लाने को कह रही थी.’’ जमील ने तफ्सील से बताया.

‘‘एक बात समझ में नहीं आई जमील, तुम्हारे मुताबिक उन की मुलाकातों के तुम अकेले राजदार थे. जबकि कत्ल वाले दिन के पहले से तुम गांव से बाहर थे. फिर उस दिन दोनों की मुलाकात किस ने तय कराई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, जिस दिन मैं टोबा टेक सिंह गया था, उसी दिन मैं ने उन की दूसरे दिन की मुलाकात तय करा दी थी. नासिर ने दूसरे दिन मिलने को कहा था. मैं ने यह बात रेशमा को बता दी थी. उस के हां कहने पर मैं ने नासिर को भी प्रोग्राम पक्का होने के बारे में बता दिया था.’’

‘‘इस का मतलब प्रोग्राम के मुताबिक ही नासिर अगली रात रेशमा से मिलने खेतों में पहुंचा था. यकीनन वादे के मुताबिक रेशमा भी वहां आई होगी और उस रात नासिर के साथ जो खौफनाक हादसा हुआ, वह उस ने भी देखा होगा. उस का बयान कातिल तक पहुंचने में मदद कर सकता है. मुझे रेशमा का बयान लेना होगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘साहब, मामला बहुत नाजुक है. नासिर तो अब मर चुका है, आप रेशमा से इस तरह मिलें कि बात फैले नहीं. नहीं तो बेवजह वह मासूम बदनाम हो जाएगी.’’

‘‘तुम इस की चिंता न करो, मैं उस से बहुत सोचसमझ कर इस तरह मिलूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया जनाब, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

‘‘जमील, तुम एक बात का खयाल रखना, जो बातें हमारे बीच हुई हैं, उन का किसी से जिक्र मत करना.’’

जब मैं नासिर की लाश ले कर गुलाबपुर पहुंचा तो बशीर लोहार के घर तमाम लोग जमा थे. लाश देख कर एक बार फिर रोनापीटना शुरू हो गया. मौका देख कर मैं ने शकूर को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘शकूर, मुझे नासिर के कत्ल के सिलसिले में तुम से कुछ पूछना है. यहां खड़े हो कर बात करने से बेहतर है तुम्हारे घर बैठ कर बात की जाए.’’

उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं उस के साथ उस के घर चला आया और उस की बैठक में बैठ गया. उस की एक बेटी थी रेशमा और एक बेटा शमशाद. बेटा 12-13 साल का रहा होगा, जो उस वक्त बाहर खेल रहा था. अभी थोड़ी ही बातचीत हुई थी कि सरदारा बी चाय की ट्रे ले कर आ गई. शकूर ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, चाय पीएं और सवाल भी पूछते रहें. ये मेरी बीवी सरदारा बी है, इस से भी जो पूछना है पूछ लें.’’

उन की बातचीत से मैं ने अंदाजा लगाया कि उन्हें रेशमा के इश्क के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मैं ने उन से नासिर के बारे में कुछ सवाल पूछे, उन दोनों ने उस की बहुत तारीफें कीं. बातचीत के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप की बेटी रेशमा कहां है?’’

‘‘वह घर में ही है जनाब, कल से उसे तेज बुखार है. हकीमजी से दवा ला कर दी, पर उस का कुछ असर नहीं हुआ.’’ सरदारा बी ने कहा.

‘‘रेशमा का बुखार हकीमजी की दवा से कम नहीं होगा. यह दूसरी तरह का बुखार है.’’ मैं ने कहा तो शकूर ने चौंक कर मेरी ओर देखा. मैं ने आगे कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं, यह इश्क का बुखार है. नासिर की मौत ने रेशमा के दिलोदिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया है.’’

दोनों उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे, ‘‘हमारी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह सब क्या है?’’

‘‘मैं समझाता हूं. यही सच्चाई है. रेशमा और नासिर एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे. दोनों रातों को मिलते भी थे. रेशमा को उस की मौत से बहुत दुख पहुंचा है.’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘मुझे बिलकुल यकीन नहीं आ रहा है.’’ सरदारा बी बोली.

हकीकत जान कर वे दोनों परेशान थे. मैं ने कहा, ‘‘परेशान न हों, आप के घर की बात इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी. रेशमा मेरी बेटी की तरह है और बिलकुल बेगुनाह है. मुझे उस की इज्जत का पूरा खयाल है. आप मुझे उस के पास ले चलो, मैं उस से कुछ बातें करूंगा. इस बात की कानोंकान किसी को खबर नहीं हो पाएगी. आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’

उन्होंने मुझे रेशमा के पास पहुंचा दिया. मैं ने उन दोनों को बाहर भेज दिया. वे दरवाजे के पीछे जा कर खड़े हो गए. मैं ने रेशमा से नरम लहजे में कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. दरअसल मैं तुम से नासिर के बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूं. वैसे तो मैं सब जानता हूं, फिर भी तुम्हारे मुंह से सुनना जरूरी है.’’

‘‘मैं जो जानती हूं, सब बताऊंगी.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘कत्ल की रात तुम खेतों में नासिर से मिलने गई थीं, मुझे यह बताओ कि उस पर हमला किस ने किया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं उस रात नासिर से मिलने नहीं गई थी.’’ वह मजबूती से बोली. उस के लहजे में विश्वास और यकीन साफ झलक रहा था.nमैं ने अगला सवाल किया, ‘‘जमील ने मुझे बताया है कि तुम्हारी और नासिर की मुलाकात पहले से तय थी. यह बात इस से भी साबित होती है, क्योंकि नासिर तुम से मिलने खेतों में गया था.’’

‘‘यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि नासिर वहां क्यों गया था? जबकि उस ने खुद ही प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था.’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

‘‘प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था, यह तुम क्या कह रही हो?’’ उस की बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रही हूं थानेदार साहब, मुझे नहीं पता प्रोग्राम कैंसिल करने के बाद नासिर वहां क्यों गया था. कल से मैं यही बात सोच रही हूं.’’ रेशमा ने सोचते हुए कहा.

‘‘एक मिनट, तुम दोनों के बीच खबर का आदानप्रदान जमील ही करता था न, पर जमील पिछले 2 दिनों से गुलाबपुर में नहीं था. फिर प्रोग्राम कैंसिल होने की खबर तुम्हें किस ने दी?’’ मैं ने उसे देखते हुए पूछा.

‘‘इम्तियाज ने.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘इम्तियाज कौन है?’’

‘‘माजिद चाचा का बेटा.’’

‘‘क्या इम्तियाज को भी तुम दोनों की मोहब्बत की खबर थी?’’

‘‘नहीं जी, वह तो 8 साल का बच्चा है. हमारे पड़ोस में ही रहता है.’’

‘‘इम्तियाज ने तुम से क्या कहा था?’’

‘‘मुझे तो यह जान कर ही बड़ी हैरानी हुई थी कि नासिर ने इम्तियाज के हाथ यह पैगाम क्यों भिजवाया था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैं ने चेक करने के लिए उस से पूछा, ‘कहां नहीं जाना है.’ इस पर उस ने कहा था कि वह इस से ज्यादा कुछ नहीं जानता. नासिर भाई ने कहा है कि रेशमा को कह दो कि आज नहीं आना है. कुछ जरूरी काम है.’’ उस ने रुकरुक कर आगे कहा, ‘‘मैं जमील की दुकान पर जा कर पता कर लेती, पर वह टोबा टेक सिंह चला गया था. इम्तियाज से कुछ पूछना बेकार था. बहरहाल मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं नासिर से मिलने नहीं जाऊंगी.’’

‘‘इस का मतलब है कि नासिर को पूरी मंसूबाबंदी से साजिश के तहत कत्ल किया गया है. मुझे यकीन है कि इम्तियाज उस आदमी को पहचानता होगा, जिस ने नासिर के हवाले से तुम्हारे लिए संदेश भेजा था.’’ मैं ने सोचते हुए कहा.

‘‘आप यह बात इम्तियाज से पूछें. मेरी तबीयत बहुत बिगड़ रही है. चक्कर आ रहे हैं.’’ वह कमजोर लहजे में बोली.

‘‘तुम आराम करो रेशमा, पर इन बातों का किसी से जिक्र मत करना और परेशान मत होना.’’ मैं ने उसे समझाया.

जब मैं कमरे से निकला तो उस के मांबाप ने मुझे घेर कर पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कुछ पता चला?’’

‘‘कुछ नहीं, बल्कि सब कुछ पता चल गया है.’’

‘‘हमें भी तो कुछ बताइए न?’’ शकूर ने कहा.

‘‘पहले आप पड़ोस से इम्तियाज को बुलाएं.’’

थोड़ी देर में सरदारा बी इम्तियाज को बैठक में ले आई. वह 8 साल का मासूम सा बच्चा था. मैं ने उसे प्यार से अपने पास बिठा कर पूछा, ‘‘बेटा इम्तियाज, तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?’’

‘‘हां, आप पुलिस हैं.’’ वह मुझे गौर से देखते हुए बोला.

इधरउधर की एकदो बातें करने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम स्कूल जाते हो, एक अच्छे बच्चे हो, सच बोलने वाले. यह बताओ, परसों शाम को तुम ने रेशमा बाजी से कहा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैं ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा हुआ था न?’’

‘‘हां, ऐसा हुआ था साहब.’’ इम्तियाज बोला.

‘‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो. मैं तुम्हें टाफियां दूंगा. अब यह भी बता दो कि तुम ने रेशमा बाजी को कहां जाने से मना किया था?’’

‘‘यह मुझे नहीं पता.’’ वह मासूमियत से बोला, ‘‘आप को यकीन नहीं आ रहा है तो रब की कसम खाता हूं.’’

‘‘नहीं बेटा, कसम खाने की जरूरत नहीं है. मुझे तुम पर भरोसा है. तुम ने तो रेशमा बाजी से वही कहा था, जो नासिर भाई ने तुम से कहलवाया था, है न?’’

‘‘नहीं जी.’’ वह उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगा.

‘‘क्या नहीं?’’

‘‘यह बात मुझे नासिर भाई ने नहीं कही थी.’’

उस ने कहा तो मैं ने तपाक से सवाल किया, ‘‘फिर किस ने कही थी?’’

‘‘हैदर भाई ने.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है हैदर अली? सरदारा बी का भांजा हैदर अली, जुलेखा का बेटा.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, जी वही हैदर भाई.’’ उस ने जल्दी से कहा.

सरदारा बी की बहन जुलेखा का घर भी गुलाबपुर में ही था. हैदर अली उसी का बेटा था और वह इसी हैदर से रेशमा की शादी करना चाहती थी. यह भी सुनने में आया था कि हैदर का दावा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. मैं सोचने लगा कि जब उसे रेशमा और नासिर की मोहब्बत का पता चला होगा तो उस ने अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाने की कोशिश की होगी. मुझे लगा कि अब केस हल हो जाएगा. जैसे ही वह मेरे हत्थे चढ़ेगा, उसे डराधमका कर मैं उस की जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

जब मैं जुलेखा के घर पहुंचा तो हैदर अली घर पर नहीं था. मैं ने जुलेखा से पूछा, ‘‘हैदर अली कहां गया है?’’

‘‘मुझे तो पता नहीं, बता कर नहीं गया है जी. वैसे आप हैदर को क्यों ढूंढ रहे हैं?’’ वह परेशान हो कर बोली.

उस की परेशानी स्वाभाविक थी. अगर पुलिस किसी के दरवाजे पर आए तो घर के लोग चिंता में पड़ जाते हैं. मैं जुलेखा को अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें यह पता है न कि गुलाबपुर में एक लड़के का कत्ल हो गया है?’’

‘‘जी…जी मालूम है, बशीर लोहार के जवान बेटे का कत्ल हो गया है. किसी जालिम ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा है.’’ उस ने कहा.

‘‘किसी ने नहीं, एक खास बंदे ने जिस की तलाश में मैं यहां आया हूं. तुम्हारा लाडला हैदर अली.’’

‘‘नहींऽऽ.’’ उस ने एक चीख सी मारी, ‘‘मेरा बेटा कातिल नहीं हो सकता. आप को कोई गलतफहमी हुई है थानेदार साहब.’’ वह रोनी आवाज में बोली.

‘‘हर मां का यही खयाल होता है कि उस का बेटा मासूम है. पर मैं तफ्तीश कर के पक्के सुबूत के साथ यहां आया हूं.’’

‘‘कैसा सुबूत साहब?’’ वह परेशान हो कर बोली.

‘‘हैदर अली को मेरे हाथ लगने दो, उसी के मुंह से सुबूत भी जान लेना.’’ मैं ने तीखे लहजे में कहा.

काफी देर राह देखने के बाद मैं ने गांव में अपने 2 लोग उस की तलाश में भेजे. पर वह कहीं नहीं मिला. इस का मतलब था, वह गांव छोड़ कर कहीं भाग गया था. गुलाबपुर में भी किसी को उस के बारे में कुछ पता नहीं था. हैदर अली के गांव से गायब होने से पक्का यकीन हो गया कि वारदात में उसी का हाथ था. मैं काफी देर तक गुलाबपुर में रुका रहा. फिर जुलेखा से कहा, ‘‘जैसे ही हैदर घर आए, उसे थाने भेज देना.’’

एक बंदे को टोह में लगा कर मैं थाने लौट आया. अगले रोज मैं सुबह की नमाज पढ़ कर उठा ही था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कांस्टेबल न्याजू खड़ा था. पूछने पर बोला, ‘‘साहब, जिस सिपाही को हैदर पर नजर रखने के लिए गांव में छोड़ कर आए थे, उस ने खबर भेजी है कि वह देर रात घर लौट आया है.’’

‘‘न्याजू, तुम और हवलदार समद फौरन गुलाबपुर रवाना हो जाओ और हैदर अली को साथ ले कर आओ.’’ मैं ने उसे आदेश दिया.

तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा तो थोड़ी देर बाद हवलदार समद हैदर को गिरफ्तार कर के ले आया. उस के साथ रोती, फरियाद करती जुलेखा भी थी. मैं ने कहा, ‘‘देखो, रोनेधोने की जरूरत नहीं है. यह थाना है शोर मत करो.’’

‘‘साहब, आप मेरे जवान बेटे को पकड़ कर ले आए हैं, मैं फरियाद भी न करूं.’’ वह रोते हुए बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे बेटे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है, फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं. अगर वह बेकुसूर है तो अभी थोड़ी देर में छूट जाएगा. यह मेरा वादा है तुम से.’’

‘‘अल्लाह करे, मेरा बेटा बेगुनाह निकले.’’

‘‘मेरी सलाह है, तुम घर चली जाओ. अगर हैदर बेकुसूर है तो शाम तक घर आ जाएगा.’’

हैदर को मैं ने अपने कमरे में बुलाया. हवलदार समद भी साथ था. मैं ने उसे गहरी नजर से देख कर तीखे लहजे में कहा, ‘‘हैदर, इसी कमरे में तुम्हारी जुबान खुल जाएगी या तुम्हें ड्राइंगरूम की सैर कराई जाए.’’

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उतर गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं ने ऐसा क्या किया है?’’

‘‘क्या के बच्चे, मैं बताता हूं तेरी काली करतूत. तूने नासिर का कत्ल किया है.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने किसी का कत्ल नहीं किया.’’ वह घबरा उठा.

‘‘फिर नासिर का कातिल कौन है?’’ मैं ने उस की आंखों में देखते हुए कहा.

‘‘मुझे कुछ पता नहीं थानेदार साहब.’’ वह हकलाया.

‘‘तुम्हें यह तो पता है न कि रेशमा तुम्हारी बचपन की मंगेतर है.’’ मैं ने टटोलने वाले अंदाज में कहा.

‘‘जी, जी हां, यह सही है.’’ उस ने कहा.

‘‘और यह भी तुम्हें मालूम होगा कि मकतूल नासिर और तुम्हारी मंगेतर रेशमा में पिछले कुछ अरसे से इश्क का चक्कर चल रहा था?’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं थानेदार साहब?’’ उस ने नकली हैरत दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं जो कह रहा हूं, तुम अच्छी तरह समझ चुके हो. सीधी तरह से सच्चाई बता दो, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ मैं ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रहा हूं, मैं ने नासिर का कत्ल नहीं किया.’’ वह नजरें चुराते हुए बोला.

‘‘नासिर के कत्ल वाली बात पहले हो चुकी है. अभी मेरे इस सवाल का जवाब दो कि तुम्हें रेशमा और नसिर के इश्क की खबर थी या नहीं? सच बोलो.’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’’

‘‘तो क्या तुम इम्तियाज को भी नहीं जानते?’’

‘‘कौन इम्तियाज?’’ वह टूटी हुई आवाज में बोला.

‘‘माजिद का बेटा, रेशमा का पड़ोसी बच्चा. याद आया कि नहीं?’’ मैं ने दांत पीसते हुए कहा.

‘‘अच्छाअच्छा, आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं.’’

‘‘हां…हां, वही बच्चा, जिस के हाथ तुम ने रेशमा के लिए संदेश भेजा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैंने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा तो वह हैरानी से बोला, ‘‘मैं ने? मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की…’’

‘‘तुम्हारे इस कारनामे के 2 गवाह मौजूद हैं. एक तो इम्तियाज, जिस के हाथ तुम ने संदेश भेजा था, दूसरी रेशमा, जिस के लिए तुम ने यह पैगाम भेजा था. अब बताओ, क्या कहते हो?’’

मेरी बात सुन कर वह हड़बड़ा गया. हवलदार समद ने कहा, ‘‘आप इस नालायक को मेरे हवाले कर दें, एक घंटे में फटाफट बोलने लगेगा.’’

मैं ने हैदर अली को हवलदार के हवाले कर दिया. थोड़ी देर में उस की चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. एक घंटे के पहले ही हवलदार ने खुशखबरी सुनाई.

‘‘हैदर अली ने जुर्म कुबूल लिया है. आप इस का बयान ले लें.’’

‘‘मतलब यह कि उस ने नासिर के कत्ल की बात मान ली है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी नहीं, बात कुछ और ही है, आप उसी से सुनिए.’’

हैदर अली ने नासिर का कत्ल सीधेसीधे नहीं किया था. अलबत्ता वह एक अलग तरह से इस कत्ल से जुड़ा था. यह भी सच था कि नन्हे इम्तियाज से रेशमा को पैगाम उसी ने भिजवाया था. यह पैगाम उस ने चौधरी आफताब के कहने पर रेशमा को भिजवाया था, ताकि रेशमा वारदात की रात मुलाकात की जगह न पहुंच सके और नासिर को ठिकाने लगाने में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े. चौधरी आफताब नजीराबाद के चौधरी का बेटा था. वह भी कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था. हाल ही में खेले गए टूर्नामेंट में वह नजीराबाद से खेल रहा था. फाइनल मैच में नजीराबाद की बुरी तरह से हार हुई थी. कप और इनाम गुलाबपुर के हिस्से में आए. ढेरों तारीफ व जीत की खुशी भी नासिर के नाम लिखी गई.

एक कबड्डी का दांव नासिर और आफताब के बीच पड़ा था, जिस में नासिर ने चौधरी आफताब को इतनी बुरी तरह से रगड़ा था कि उस की नाक और मुंह से खून बहने लगा था. एक तो गांव की हार, ऊपर से अपनी दुर्गति पर उस का दिल गुस्से और बदले की आग से जलने लगा था. उस का वश चलता तो वह वहीं नासिर का सिर फोड़ देता. उस ने मन ही मन इरादा कर लिया कि नासिर से बदला जरूर लेगा. इस तरह उस का अपने सब से बड़े प्रतिद्वंदी से भी पीछा छूट जाएगा. आफताब से हैदर ने कह रखा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. किसी तरह उसे यह भी पता चल गया था कि नासिर और रेशमा के बीच मोहब्बत और मुलाकात का सिलसिला चल रहा है. इसलिए उस ने एक तीर से दो शिकार करने का खतरनाक मंसूबा बना लिया.

हैदर अली को रेशमा और नासिर के संबंध का शक तो था ही, पर जब आफताब ने इस बारे में उसे शर्मसार किया तो वह आपे से बाहर हो गया. चौधरी आफताब ने उसे समझाया कि जोश के बजाय होश और तरीके से काम लिया जाए तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी. हैदर अली ने चौधरी आफताब का साथ देने का फैसला कर लिया. हैदर अली ने अपने हाथों से नासिर का कत्ल नहीं किया था, पर वह इस साजिश का एक हिस्सा था. जिस में चौधरी के भेजे हुए दो लोगों ने तेजधार चाकू की मदद से नासिर का बेदर्दी से कत्ल कर दिया था. जब कातिल उसे मौत के घाट उतार रहे थे तो हैदर अली थोड़ी दूर अंधेरे में खड़ा यह खूनी तमाशा देख रहा था.

हैदर अली के इकबालेजुर्म और गवाही पर मैं ने उसी रोज खुद नजीराबाद जा कर नासिर के कत्ल के सिलसिले में चौधरी आफताब को भी गिरफ्तार कर लिया था. आफताब गांव के चौधरी का बेटा था, इसलिए उस की गिरफ्तारी को रोकने के लिए मुझ पर काफी दबाव डाला गया था, पर मैं ने उस के असर व पैसे की परवाह न करते हुए चौधरी आफताब और उस की निशानदेही पर उन दोनों कातिलों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख चौधरी ने मुझे धमकी दी थी, ‘‘मलिक साहब, आप को मेरी ताकत का अंदाजा नहीं है. मैं अपने बेटे को अदालत से छुड़वा लूंगा.’’

मैं ने विश्वास से कहा, ‘‘चौधरी साहब, मैं सिर्फ खुदा की ताकत और कानून से डरता हूं. आप को जितना जोर लगाना है, लगा लो. आप का होनहार बेटा अदालत से सीधा जेल जाएगा.’’

मैं ने हैदर अली, चौधरी आफताब और नासिर के दोनों कातिलों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट बनाई और उन्हें अदालत के हवाले कर दिया. दोनों कातिल अपने जुर्म का इकबाल कर चुके थे, इसलिए उन की बाकी जिंदगी जेल में ही गुजरनी थी. Crime Stories

 

Crime Stories : आस्था की चोरी

Crime Stories : उदय कोलते को आस्था से इसलिए नफरत हो गई थी क्योंकि उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी और जेल जाने की वजह से घर वाले उस से नफरत करने लगे थे. इसलिए उस ने बदला लेने के लिए मंदिरों में चोरियां शुरू कर दीं. एक बड़ी चोरी में उस के हाथ मोटा माल लगा भी, लेकिन…

बोरीवली थाने के एपीआई जी.एस. घार्गे डिटेक्शन रूम में अपने सहकर्मियों के साथ एक शातिर बदमाश से पूछताछ कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. असमय आई इस काल को वह रिसीव नहीं करना चाहते थे. काल डिस्कनेक्ट करने के लिए उन्होंने जेब से फोन निकाला तो उन की नजर फोन की स्क्रीन पर आ रहे नंबर पर पड़ी. उस नंबर को देख कर घार्गे की आंखों में चमक बढ़ गई क्योंकि वह नंबर उन के एक खास मुखबिर का था.

एपीआई घार्गे तुरंत डिटेक्शन रूम से बाहर लौबी में आ गए और काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘यस थर्टी फोर, बहुत दिनों से गायब हो. कोई काम की खबर भी नहीं दे रहे?’’

तभी मुखबिर बोला, ‘‘सर, कोई आप के काम की खबर होती तो जरूर फोन करता. अब जो खबर देने जा रहा हूं उसे सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

‘‘बताओ क्या खबर है?’’ घार्गे ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘सर, रत्नागिरी का कुख्यात सेंधमार और सजायाफ्ता चोर उदय मुंबई में देखा गया है. पता चला है कि वह आज करीब 3 बजे बोरीवली के गोखले कालेज के पास स्थित वामन हरी पेठे ज्वैलर्स के पास वाली गली में किसी को चोरी का मोटा माल देने या बेचने आने वाला है.’’

एपीआई घार्गे ने यह सुना तो उन की आंखों में चमक बढ़ गई. उन्होंने कलाई घड़ी में देखा. उस समय दोपहर के 12 बज रहे थे. उन्होंने मुखबिर से कहा, ‘‘तुम 2 बजे गोखले कालेज के पास पहुंच जाना, मैं स्टाफ के साथ वहीं मिलूंगा. मैं देखता हूं, आज उदय पुलिस के हाथों से कैसे बच कर जाएगा?’’

मुखबिर से बात कर के घार्गे फिर से डिटेक्शन रूम में पहुंच गए. वे मन ही मन संकल्प कर चुके थे कि आज हर हालत में उदय को दबोचना है. उदय नाम के उस सेंधमार ने महाराष्ट्र पुलिस की नींद उड़ा रखी थी. करीब डेढ़ बजे एपीआई घार्गे अपने सहयोगी औफिसर एपीआई जी.डी. पिसाल, हवलदार नेहरू पाटिल, बबन बबाटे, अशोक खोत, शकील शेख, रंजीत शिंदे, निलेश सांबरेकर, सचिन केलजी और सचिन खताते के साथ सादा वेश में प्राइवेट कारों से बोरीवली पश्चिम स्थित शिंपोली रोड पर गोखले कालेज के पास पहुंच गए. मुखबिर वहां पहले से मौजूद था.

वहां पहुंचते ही सभी पुलिसकर्मियों ने 2-2, 3-3 के ग्रुपों में विभाजित हो कर शिंपोली रोड पर अपना जाल फैला लिया. पुलिस को वहां इंतजार करतेकरते साढ़े 4 बज गए लेकिन उदय कहीं नजर नहीं आया. घार्गे को लगने लगा था कि खबर शायद गलत मिली है. वह दूर खड़े मुखबिर से इस सिलसिले में फोन पर बातें कर ही रहे थे कि तभी मुखबिर ने कहा, ‘‘शिकार जाल में फंसने आ चुका है साहब. हाथों में ट्रौली वाली बैग थामे हरे रंग की शर्ट वाला जो शख्स आप की ओर आ रहा है, वही उदय है. आप उसे संभालिए, मैं यहां से जा रहा हूं.’’

घार्गे ने चौंकते हुए सड़क के दूसरे किनारे की तरफ देखा तो सचमुच एक शख्स हाथ में एक ट्रौली बैग उठाए चला आ रहा था. घार्गे ने अपने स्टाफ को इशारा किया और वह खुद भी तेजी से उदय की ओर बढ़ गए. 2 मिनट के अंदर पुलिस दल ने सेंधमार उदय को दबोच कर उस का बैग अपने कब्जे में ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना नाम उदय बताया. पुलिस ने जब बैग की तलाशी ली तो उस में देवीदेवताओं की अनेक मूर्तियां व सोनेचांदी के आभूषण निकले. इतना बहुमूल्य सामान देख कर एपीआई घार्गे दंग रह गए थे. पुलिस ने जब पूछा कि ये सोनेचांदी के आभूषण किस के हैं और सारी मूर्तियां वह कहां से लाया है तो वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाया.

इस बीच वहां तमाम लोग इकट्ठे हो गए थे. वहां मौजूद लोगों के सामने बैग के सामान की गिनती की गई तो उस में बहुमूल्य धातु की 8 मूर्तियां, चांदी के 8 मुखौटे, सोने की 61 अनुकृतियां, 2 सोने व 2 चांदी की चेन, एक सोने का गंडा (बे्रसलेटनुमा), एक चांदी का पालना, चांदी के 6 पत्ते, चांदी के 15 सिक्के आदि चीजें मिलीं. इस सामान की कीमत अनुमानत: 15-20 लाख रुपए थी. पुलिस को अनुमान नहीं था कि उस के पास से चोरी का इतना सामान मिल जाएगा.

पुलिस उदय को गिरफ्तार कर के बोरीवली थाने ले आई. शातिर चोर के गिरफ्तार होने की बात पता चलते ही डीसीपी बालसिंह राजपूत एवं सीनियर पीआई नारायण खैरे भी बोरीवली थाने पहुंच गए. इस उपलब्धि पर पुलिस अधिकारियों ने एपीआई घार्गे की सराहना की. उदय ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस ने सारा सामान मंदिरों से चुराया है. चूंकि उस से विस्तार से पूछताछ करनी थी, इसलिए पुलिस ने उदय को बोरीवली मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर के 29 नवंबर, 2014 तक के लिए उस का पुलिस रिमांड ले लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने जब उदय से पूछताछ की तो पता चला कि उस का चोरी का तरीका बिलकुल फिल्मी था. चोरियां करतेकरते यह आस्तिक चोर देवीदेवताओं से अचानक नफरत क्यों करने लगा, इस की एक दिलचस्प कहानी सामने आई. महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले की तहसील लांजा में एक छोटा सा गांव है शिपुशी. इसी गांव के रहने वाले सुधाकर कोलते का बेटा था उदय. उदय बचपन से ही कामचोर और उद्दंड प्रवृत्ति का था. मांबाप के लाड़प्यार में वह बिगड़ गया था.

वह दिन भर गांव के आवारा युवकों के साथ घूमता. उन के साथ रह कर उस ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. बातबात पर गांव वालों से झगड़ा व मारपीट करने की वजह से गांव में वह दबंग के रूप में जाना जाने लगा था. उस की करतूतों से उस के घरवाले परेशान रहने लगे थे. उन्होंने उसे बहुत समझाया लेकिन उदय ने मांबाप की एक नहीं सुनी. जब उदय के परिजनों को लगा कि उदय उन के समझाने से सुधरने वाला नहीं है तब उन्होंने तय किया कि उस की शादी करा दी जाए. हो सकता है, पत्नी के समझाने पर वह अपनी जिम्मेदारियों को समझे और अपनी बुरी आदतें छोड़ दे. उन्होंने अपने रिश्तेदारों आदि से उदय के लिए कोई लड़की देखने को कहा. पर आवारा, बेरोजगार व शराबी उदय को भला कौन शरीफ बाप अपनी बेटी का हाथ देता.

काफी कोशिशों के बाद भी उदय की शादी नहीं हो सकी तो वह बाजारू औरतों के पास जाने लगा. रोजरोज उन के पास जाने के लिए उसे पैसों की जरूरत पड़ने लगी. शराब व अय्याशी के लिए पैसे जुटाने के लिए उस के कदम जरायम की तरफ बढ़ गए. ज्यादा पैसे कमाने के लिए उस ने दोस्तों के साथ सेंधमारी शुरू कर दी. शुरुआत उस ने पड़ोस के गांव के एक मकान से की थी. मकान मालिक पूरे परिवार के साथ अपने एक रिश्तेदार की शादी में गया हुआ था, तभी उस ने रात करीब 2 बजे खाली पड़े मकान का ताला तोड़ा और घर में रखी नकदी, ज्वैलरी आदि सामान चुरा लिया. मकान मालिक जब घर लौटा तो उस ने घर का कीमती सामान गायब पाया.

इस की रिपोर्ट उस ने थाना लांजा में दर्ज कराई. पुलिस ने इस मामले को लाख खोलने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली. पहली वारदात की कामयाबी से उदय की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वह धड़ाधड़ वारदातें करता चला गया. एक साल के अंदरअंदर सेंधमारी के करीब 8 मामले लांजा व आसपास के पुलिस स्टेशनों में दर्ज तो हुए परंतु पुलिस उदय तक नहीं पहुंच पाई. दूसरी ओर वारदात की रकम से उदय व उस के साथी ऐश करते रहे. उदय अब बनठन कर रहने लगा. कोई पूछता तो वह कह देता कि वह शहर में बिजनैस करता है.

जब उस के बिजनैस करने की बात फैली तो रंजना नाम की एक लड़की से उस की शादी हो गई. रंजना अत्यंत सुंदर व संस्कारी थी. वह तो यही समझती थी कि उस का पति कोई बिजनैस करता है. इसलिए वह भी ठाठबाट से रहती. लेकिन उसे क्या पता था कि पति का असली बिजनैस चोरी है. कई साल बीत गए लेकिन शातिर उदय ने पत्नी को सच्चाई पता नहीं चलने दी. इस बीच वह 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. शातिरदिमाग उदय अपने खास दोस्त के साथ ही वारदात करता था. इसलिए उस के कारनामों का किसी को पता नहीं चला. लोग यह तो जानते थे कि उदय दबंग है और लड़नेमरने को तैयार रहता है. लेकिन वह शातिर चोर है, इस हकीकत से कोई वाकिफ नहीं था. इसी के चलते वह एक के बाद एक वारदात करता चला गया.

इस दौरान रत्नागिरी के विभिन्न पुलिस थानों में 24 वारदातें दर्ज की गईं. लेकिन पुलिस यह तक पता नहीं लगा पाई कि इन वारदातों को अंजाम किस ने दिया. उधर अखबारों में पुलिस की नाकामी की खबरें छपने से पुलिस की किरकिरी हो रही थी. इस से संबंधित थानाप्रभारियों पर जिले के पुलिस अधिकारियों का दबाव बढ़ रहा था. इस के बाद पुलिस ने रातदिन एक कर के जैसेतैसे चोर का पता लगा ही लिया. जब उन्हें पता चला कि वह शातिर चोर उदय है तो एक दिन लांजा पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने चोरी के कई मामलों का खुलासा किया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

रंजना को जब पति की सच्चाई पता चली तो उसे बड़ा दुख हुआ. गुस्से में वह बच्चों को साथ ले कर वहां से चली गई. उस के खिलाफ न्यायालय में कई साल केस चला और उसे 4 साल की सजा सुनाई गई. जेल में रहते हुए उदय को जब पत्नी के चले जाने की जानकारी मिली तो उसे गहरा सदमा पहुंचा. वह इस कुदरत का खेल समझने लगा, इसलिए उसे भगवान के नाम से ही नफरत हो गई. उस ने तय कर लिया कि उस ने अब तक इंसानों के घरों की तिजोरियां साफ की हैं, लेकिन जेल से रिहा होने के बाद अब मंदिरों की दानपेटियों आदि सामान पर हाथ साफ करेगा. उदय ने जेल में रहने के दौरान ही साथी कैदियों से सुना था कि पंचधातु व अष्टधातु की मूर्तियां करोड़ों में बिकती हैं.

रत्नागिरी से उदय का मन पूरी तरह से उचट गया था, इसलिए उस ने तय कर लिया कि वहां से किसी दूसरे शहर चला जाएगा. 4 साल की सजा पूरी करने के बाद उदय जेल से छूट कर घर पहुंचा तो उस ने महसूस किया कि गांव के लोग ही नहीं बल्कि उस के घर वाले भी उसे नफरत की निगाह से देखते हैं. मांबाप की निगाहों में नफरत थी और पत्नी उसे छोड़ कर चली ही गई थी. पुराने यारदोस्त भी उस से कन्नी काटने लगे थे. इन सब के लिए भी वह भगवान को ही दोषी मान रहा था. अब वह ऐसे मंदिरों की तलाश में था जहां से उसे मोटा माल मिल सके. चोरी कर के वह भगवान से प्रतिशोध ले सके. तभी उसे लांजा तहसील से 18 किलोमीटर दूर रुण गांव में स्थित अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के बारे में जानकारी मिली.

उसे पता चला कि वहां रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं. मुराद पूरी होने पर तमाम लोग वहां नकदी के अलावा कीमती ज्वैलरी आदि भी दान देते हैं. किस तरह काम को अंजाम दिया जाए इस की रेकी करने के लिए वह श्रद्धालु बन कर कई बार उस मंदिर में गया. उसे पता चला कि मंदिर में सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है. वहां सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे. उसे यह भी जानकारी मिली कि सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ही मंदिर के मुख्य गेट का ताला खोलता है. फिर रात 8 बजे की आरती के बाद मुख्य गेट पर ताला लगा कर वह अपने घर चला जाता है. उस का घर पास के ही गांव में था. यानी रात 8 बजे से सुबह 7 बजे तक मंदिर में कोई नहीं होता था. वह समझ गया कि एक ताले के भीतर लाखों की संपत्ति बंद रहती है.

उदय ने तय कर लिया कि इसी मंदिर की संपत्ति व मूर्तियों पर हाथ साफ कर के वह मुंबई भाग जाएगा और वहां अलग नाम व अलग पहचान के साथ शान की जिंदगी जीएगा. इस के बाद वह फिर कभी चोरी नहीं करेगा. रेकी करने के बाद उदय को लगा कि मंदिर से इतने सामान की वह अकेले चोरी नहीं कर पाएगा. इसलिए वह एक ऐसे साथी की तलाश में लग गया जो विश्वसनीय हो. उस ने दिमाग दौड़ाया तो उसे अपना एक पुराना बेराजगार मित्र सचिनधनाजी बुवड याद आया. उदय को भरोसा था कि पैसों के लालच में सचिन उस का साथ देने के लिए तैयार हो जाएगा.

उदय ने सचिन से संपर्क किया और उसे रत्नागिरी के एक बीयर बार में ले गया. बातचीत के दौरान ही उदय जान गया था कि सचिन अब भी बेरोजगार है और वह भुखमरी के दौर से गुजर रहा है. मौके का फायदा उठाते हुए उदय ने उसे अपनी योजना बताई. लालच में आ कर सचिन उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद योजना को किस तरह अंजाम देना है, दोनों ने इस की रूपरेखा तैयार कर ली. 23 सितंबर, 2014 की रात 9 बजे उदय व सचिन ने लांजा में शराब पी और ताला आदि तोड़ने के कुछ औजार ले कर रात करीब 11 बजे बस द्वारा रुण गांव जा पहुंचे. रात 2 बजे तक वे एक खेत में छिपे रहे. सुनसान होने के बाद वे अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के मुख्य गेट पर पहुंचे. उदय ने अपने साथ लाए औजार से मुख्य गेट का ताला काट दिया.

ताला काट कर वे दोनों मंदिर के भीतर पहुंच गए. सब से पहले इन लोगों ने दानपेटी का ताला तोड़ कर उस की सारी रकम प्लास्टिक की एक बोरी में भर ली. इस के बाद इन्होंने दूसरी बोरी में मंदिर की सभी 8 मूर्तियां, 6 अनुकृतियां, सोने व चांदी के आभूषण आदि भर लिए. अपना काम करने के बाद वे वहां से निकल लिए. सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी मंदिर पहुंचा तो मंदिर के मुख्य द्वार का ताला कटा देख उस के होश उड़ गए. वह भागाभागा मंदिर के भीतर गया तो वहां न मूर्तियां थीं और न मूर्तियों के आभूषण. दानपेटी भी पूरी तरह खाली थी. मंदिर खुलते ही श्रद्धालु भी आने लगे थे. मंदिर में चोरी की बात सुन कर सभी आश्चर्यचकित रह गए. पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ने लांजा थाने में फोन कर के चोरी की सूचना दे दी.

मंदिर में चोरी होने की बात सुन कर थानाप्रभारी भी हैरान रह गए. वह पुलिस टीम के साथ तुरंत मंदिर की तरफ रवाना हो गए. तब तक वहां आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे. थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी, डीएसपी, डीएम भी वहां पहुंच गए. मंदिर में इतनी बड़ी चोरी होने पर वहां मौजूद लोगों में आक्रोश था. वे पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मंदिर के गेट पर ही धरनाप्रदर्शन करने लगे. मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच चुके थे. पुलिस प्रदर्शनकारियों को समझाने की कोशिश में लगी थी.

पुलिस अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि पुलिस चोरों को जल्द ही गिरफ्तार कर के चोरी गया सामान बरामद करने की कोशिश करेगी. इस आश्वासन के बाद लोग शांत हुए और उन्होंने प्रदर्शन बंद किया. इस के बाद लांजा पुलिस ने अज्ञात चोरों के खिलाफ मामला दर्ज कर के अभियुक्तों की तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने इलाके के तमाम मुखबिरों और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से पूछताछ की परंतु लाख कोशिशों के बावजूद वह चोरों तक नहीं पहुंच सकी. इस से लांजा पुलिस की किरकिरी हो रही थी. मीडिया वाले पुलिस की जम कर खिंचाई कर रहे थे. स्थानीय राजनीतिज्ञ भी पुलिस पर दबाव बना रहे थे.

उधर उदय ने सचिन को कुछ आभूषण व नकदी दे कर जिले से बाहर भगा दिया. जबकि वह खुद नहीं भागा. शातिरदिमाग उदय को पता था कि अगर वह घर से गायब हुआ तो पुलिस को उस पर शक हो जाएगा. सारा माल घर के कबाड़ में छिपा कर उदय मामला शांत होने का इंतजार करता रहा. सितंबर से नवंबर तक जब पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकी, तब उसे भरोसा हो गया कि अब उस पर कोई भी शक नहीं करेगा. इस के बाद एक ट्राली बैग खरीद कर उस ने सारा माल उस में भरा व चुपचाप मुंबई चला गया.

उस ने सोचा था कि वह चोरी का माल धीरेधीरे बेचेगा. मूर्तियां बेचने के लिए वह किसी ऐसे एजेंट की तलाश करेगा जो सारी मूर्तियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकवा कर ज्यादा पैसे दिलवा सके. अपने मकसद में वह कामयाब होता इस से पहले ही एक मुखबिर की सूचना पर एपीआई घार्गे, एपीआई पिसाल की टीम ने उदय को सारे माल के साथ धर दबोच लिया.

बोरीवली पुलिस की सूचना पर रत्नागिरी के लांजा थाने की पुलिस भी मुंबई पहुंच गई और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के वह उदय को अपनी हिरासत में लांजा ले गई. लांजा थाना पुलिस के उदय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. चोरी में शामिल दूसरे अभियुक्त सचिन की तलाश में कई जगहों पर दबिशें डाली गईं, लेकिन कथा संकलन तक वह गिरफ्तार नहीं हो सका. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित. कथा में कु

Chhattisgarh News : 16 साल की प्रेगनेंट गर्लफ्रेंड ने किया बौयफ्रेंड का मर्डर

Chhattisgarh News : एक ऐसी सनसनीखेज घटना सामने आई है, जिस ने सभी को झकझोर कर कर रख दिया है. जहां एक गर्लफ्रेंड ने अपने ही बौयफ्रेंड की हत्या कर डाली. आखिर क्या वजह थी, जिस से गर्लफ्रेंड अपने ही बौयफ्रेंड की कातिल बन गई. आइए जानते हैं इस अपराध से जुड़ी पूरी जानकारी विस्तार से.

यह हैरान कर देने वाली वारदात छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले से सामने आई है, जहां 16 साल की प्रेगनेंट गर्लफ्रेंड ने सोते हुए अपने 20 वर्षीय बौयफ़्रेंड मोहम्मद सद्दाम की चाकू मारकर हत्या कर दी. सद्दाम बिहार का रहने वाला था. कुछ समय से वह छत्तीसगढ़ में रह रहा था. वहीं उस की गर्लफ्रेंड बिलासपुर की रहने वाली थी. वह अपनी मम्मी के साथ रहती थी.

पुलिस के अनुसार, जांच में सामने आया कि बौयफ्रेंड सद्दाम की हत्या करने के बाद किशोरी खुद अपनी मम्मी के साथ पुलिस स्टेशन पहुंची और अपना अपराध स्वीकार कर लिया. किशोरी लंबे समय से अपने बौयफ्रेंड के साथ लिवइन रिलेशन में रही थी.

जांच में सामने आया कि किशोरी प्रेगनेंट थी. वह अपने बौयफ्रेंड सद्दाम से शादी करना चाहती थी, लेकिन सद्दाम शादी करने के बजाय उस पर अबौर्शन कराने का दबाव बना रहा था. इस बात को ले कर दोनों में अक्सर झगड़ा होता रहता था. वह उस से नाराज थी. इसलिए 27 सितंबर, 2025 को शहर के गंज थाना क्षेत्र में स्थित ‘ए वन लौज’ में सोते हुए ही किशोरी ने उस की चाकू मार कर हत्या कर दी. हत्या के बाद वह बौयफ्रेंड का मोबाइल भी अपने साथ ले कर चली गई.

हत्या करने के बाद किशोरी ने रूम का ताला बंद कर चाबी रेलवे ट्रैक पर फेंक दी थी.
इस के बाद वह बिलासपुर लौट आई. किशोरी ने आते ही अपनी मम्मी को इस घटना के बारे में बताया तो मम्मी ने नजदीक के कोनी पुलिस स्टेशन पहुंच कर बेटी का आत्मसमर्पण कर दिया.

कोनी थाना पुलिस ने यह जानकारी गंज थाना पुलिस को दे दी, तब थाना गंज पुलिस ‘ए वन लौज’ पहुंची और लौज के कमरे से मोहम्मद सद्दाम का खून से लथपथ शव बरामद कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामला दर्ज कर लिया. अब पुलिस आगे की काररवाई कर रही है. Chhattisgarh News

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के पाखंडी को मिली सजा

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के संत राम रहीम ने अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के लिए डेरे को अनैतिक कार्यों का केंद्र और अकूत संपत्ति हासिल करने का माध्यम बना लिया था. सब कुछ जानने के बाद उस के डर से डेरे में कोई मुंह तक नहीं खोल पाता था. लेकिन उस के काले कारनामों की जिस तरह कोर्ट द्वारा सजा सुनाई जा रही है, उस से तो यही लगता है कि…

18 अक्तूबर, 2021 को सुबह से ही पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. अदालत के आसपास धारा 144 लागू कर दी गई थी. हत्या के जिस मामले में विशेष सीबीआई कोर्ट के जज सुशील कुमार गर्ग सजा का ऐलान करने वाले थे, उस में 5 आरोपी उन के सामने कठघरे में खडे़ थे. जबकि एक आरोपी पिछले कई घंटों से रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए जुड़ा था. इसी शख्स के कारण सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए गए थे. क्योंकि प्रशासन को आशंका थी कि उस के खिलाफ सजा का ऐलान होने से कहीं उस के भक्त भड़क कर हिंसा पर उतारू न हो जाएं. यह शख्स कोई छोटामोटा व्यक्ति नहीं, बल्कि डेरा सच्चा सौदा का मुखिया संत गुरमीत राम रहीम था, जिस के देशविदेश में लाखों समर्थक थे.

सरकारी वकील और बचाव पक्ष के वकीलों की कई घंटे दलील चली. आखिरकार कई घंटों की बहस के बाद सीबीआई जज सुशील कुमार ने अपना फैसला देते हुए डेरे के सेवादार रणजीत कुमार की हत्या के आरोप में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम, अवतार सिंह, जसबीर सिंह, सर्बदिल सिंह और कृष्णलाल को धारा 120बी, 302 एवं 506 के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई. इस मामले में आरोपित इंद्रसेन की सुनवाई के दौरान 8 अक्तूबर, 2020 को मौत हो गई थी. जज ने गुरमीत राम रहीम को 32 लाख रुपए का जुरमाना अदा करने की सजा भी सुनाई. यह रकम पीडि़त परिवार को देने का आदेश दिया. सजा का ऐलान होते ही रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए कोर्ट के साथ जुड़े राम रहीम ने अपना सिर पकड़ लिया और वहीं जमीन पर बैठ गया.

ये वही गुरमीत राम रहीम था, जिस के आगेपीछे कुछ साल पहले तक लाखों अनुयायियों की भीड़ जुटी रहती थी. लेकिन अपने कर्मों के कारण आज वह सलाखों के पीछे एक नहीं बल्कि 3 आपराधिक मामलों में सजा भोग रहा है. रणजीत सिंह हत्याकांड की कहानी को समझने के लिए हमें पहले राम रहीम और उस के उस साम्राज्य की बात करनी होगी, जिस के गुमान में वह अपराध दर अपराध करते हुए आज सलाखों के पीछे है. गुरमीत सिंह के डेरा प्रमुख राम रहीम बनने की कहानी  गुरमीत सिंह अपने मातापिता की इकलौती संतान था. उस का जन्म 15 अगस्त, 1967 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के गुरुसर मोदिया में जट सिख परिवार में हुआ था. उस के पिता का नाम मघर सिंह व मां का नाम नसीब कौर है. मातापिता हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी थे.

महज 7 साल की उम्र में मातापिता ने 31 मार्च, 1974 को अपने बेटे गुरमीत सिंह को तत्कालीन डेरा प्रमुख शाह सतनाम सिंह के चरणों में समर्पित कर दिया था. जिस के बाद डेरे में ही उस की शिक्षादीक्षा शुरू हुई. 23 सितंबर, 1990 को शाह सतनाम सिंह ने देशभर से अनुयायियों का सत्संग बुलाया. उसी समय उन्होंने गुरमीत सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. गुरमीत सिंह हरियाणा के सिरसा में स्थित आध्यात्मिक संस्था डेरा सच्चा सौदा के तीसरे प्रमुख बने. जिस की स्थापना 1969 में शाह सतनाम सिंह के गुरु शाह मस्तानाजी ने की थी.

डेरा प्रमुख बनने से पहले ही गुरमीत सिंह का गृहस्थ जीवन शुरू हो चुका था. गुरमीत सिंह की 2 बेटियां और एक बेटा है. बड़ी बेटी चरणप्रीत और छोटी का नाम अमरप्रीत है. उस ने इन 2 बेटियों के अलावा एक बेटी हनीप्रीत को गोद लिया हुआ था. इस की बड़ी बेटी चरणप्रीत कौर के पति का नाम डा. शान-ए-मीत इंसां जबकि छोटी बेटी अमरप्रीत के पति का नाम रूह-ए-मीत इंसां है. गुरमीत सिंह के बेटे जसमीत की शादी बठिंडा के पूर्व एमएलए हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी हुस्नमीत इंसां से हुई थी. डेरा सच्चा सौदा का साम्राज्य विदेशों तक फैला हुआ है. अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड से ले कर आस्ट्रेलिया और यूएई तक उन के आश्रम व अनुयायी हैं. डेरे की तरफ से दावा किया जाता है कि दुनिया भर में उन के करीब 5 करोड़ अनुयायी हैं, जिन में से 25 लाख अनुयायी अकेले हरियाणा में ही मौजूद हैं.

बहरहाल, गद्दी संभालने के बाद गुरमीत सिंह ने सर्वधर्म समभाव का संदेश देने के लिए अपने नाम में सभी धर्मों के नाम शामिल किए और अपना नाम गुरमीत सिंह से बदल कर गुरमीत राम रहीम सिंह रख लिया. जिस कारण चौतरफा उन की प्रशंसा हुई. उन्होंने जाति प्रथा की समाप्ति का आह्वान किया तथा अपने भक्तों से जातिवाचक नाम हटा कर ‘इंसां’ नाम लगाने को प्रेरित किया. गुरमीत राम रहीम ने कई वेश्याओं को अपनी पुत्री का दरजा दे कर अपनाया व अनुयायियों से आह्वान कर उन के घर बसाए. उन्होंने सफाई के कई अभियान चलाए. ऐसे कई काम थे, जिस कारण संत गुरमीत राम रहीम की शोहरत दुनिया भर में फैलने लगी और उन के भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.

लेकिन इंसान चाहे साधारण हो या कोई संत, अगर अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर अंकुश न रख सके तो शोहरत को कलंक लगने में देर नहीं लगती. गुरमीत राम रहीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. गुरमीत राम रहीम सन 2002 में पहली बार सुर्खियों में तब आए, जब उन के ऊपर डेरे की साध्वियों के यौनशोषण के आरोप लगे. उसी साल उन के खिलाफ यौन शोषण की खबर छापने वाले सिरसा के एक स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या हो गई. इस के आरोप भी डेरामुखी पर ही लगे. अचानक शोहरत की बुलंदियां छूते राम रहीम अपने किसी न किसी कारनामे के कारण आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनने लगे. डेरामुखी राम रहीम ने अपने ऊपर लगे आरोपों से निकलने के लिए एक के बाद ऐसी गलतियां कीं, जिस से वह अपराध की दलदल में गहरे तक फंसते चले गए.

जब हुआ बेनकाब डेरे में चल रही अय्याशगाह का खेल  28 अगस्त, 2017 को सीबीआई कोर्ट ने पहली बार गुरमीत राम रहीम को 4 साध्वियों के बलात्कार मामले में 20 साल की जेल व 30 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई थी. डेरे में चल रहे साध्वियों के यौन उत्पीड़न के खुलासे की कहानी बेहद रोचक है. हुआ यूं कि साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक गुमनाम पत्र मिला. इस में एक गुमनाम साध्वी ने लिखा कि वह पंजाब की रहने वाली है और सिरसा के डेरा सच्चा सौदा में 5 साल से रह रही है. डेरे में साध्वियों का यौन शोषण किया जा रहा है. लेटर में बठिंडा, कुरुक्षेत्र की कुछ साध्वियों के यौन शोषण किए जाने की बात भी लिखी थी.

साध्वी के पत्र में लिखी बातों का कुछ हिस्सा बेहद आपत्तिजनक था. इस गुमनाम पत्र के बाद से ही बवाल शुरू हो गया था.  2002 में गुमनाम साध्वी की लिखी चिट्ठी की गोपनीय जांच शुरू हो गई, लेकिन इसी बीच ये चिट्ठी मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो गई, जिस पर संज्ञान लेते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी. सीबीआई ने डेरे के मैनेजर इंद्रसेन से 1999 से 2001 तक की साध्वियों की लिस्ट मांगी तो 2005 में सीबीआई को 3 लिस्ट मिलीं. पहली लिस्ट में 53, दूसरी में 80 और तीसरी लिस्ट में 24 साध्वियों के नाम थे.

राम रहीम के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सीबीआई ने 1997 से 2002 के बीच डेरा छोड़ चुकी 24 साध्वियों पर फोकस किया. इन में से 18 को ही सीबीआई ट्रेस कर पूछताछ कर पाई. इन में भी सिर्फ 2 ही साध्वियां अदालत तक पहुंचीं और और अपने बयान दर्ज कराए. इन शादीशुदा साध्वियों के बच्चे भी हैं. जो साध्वी सीबीआई के सामने आईं, उस में से फतेहाबाद की एक पूर्व साध्वी ने 4 मई, 2006 को सीबीआई के सामने बयान दर्ज कराया. उस ने बताया कि 1998 में डेरा में बतौर साध्वी जौइन किया था. वह शाह सतनामजी स्कूल में पढ़ाती थी. 6 महीने बाद उस की बहन भी साध्वी बन गई. बाबा ने उस का नाम नाजम और बहन का तसलीम रखा.

बाबा गर्ल्स हौस्टल के पास बनी अपनी गुफा में रहता था और गुफा के बाहर साध्वियों को ही संतरी रखता था. जिन की ड्यूटी रात 8 बजे से 12 और 12 बजे से 4 बजे 2 शिफ्टों में होती थी. एक दिन उसे रात को 10 बजे गुफा में बुलाया गया, जहां बाबा ने उस के साथ जबरन रेप किया. वह रोती हुई गुफा से निकली और हौस्टल चली गई. वहां पर उस ने किसी को कुछ नहीं बताया. मगर उस दिन उस की बहन ने बताया कि बाबा उस के साथ भी रेप कर चुका है. रेप होने के एक साल बाद उसे डेरे के मैनेजर ने बुलाया और कहा कि बाबा ने उसे गुफा में बुलाया है. मगर पहले हुई घटना के कारण उस ने गुफा में जाने से मना कर दिया. इस के बाद मैनेजर ने उसे ऐसा करने पर भूखा रखने की धमकी दी. मजबूर हो कर उसे गुफा में दोबारा जाना पड़ा और बाबा ने उस के साथ फिर रेप किया.

दोनों बहनों ने हौस्टल की दूसरी साध्वियों को भी बाबा की गुफा से कई बार रोते हुए निकलते देखा था. एक बहन ने तो अपने साथ हुई घटना के तुरंत बाद डेरा छोड़ दिया. दूसरी साध्वी बहन भी डेरा छोड़ना चाहती थी, मगर उस के भाई की बेटियां डेरे में बीए की पढ़ाई कर रही थीं. इस कारण उसे वहां रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा. फिर अप्रैल, 2001 में उस ने अपने भाई और उस की दोनों बेटियों समेत डेरा छोड़ दिया. दोनों बहनों के डेरा छोड़ने के बाद ही प्रधानमंत्री कार्यालय को गुमनाम चिट्ठी मिली थी. बहरहाल, साध्वी के बयान कोर्ट में दर्ज कराने के बाद सीबीआई ने बाबा के साथ एक आरोपी अवतार सिंह, डेरा मैनेजर इंद्रसेन और मैनेजर कृष्णलाल को आरोपी बना कर उन का चंडीगढ़ और दिल्ली में लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया.

जहां झूठ पकड़ने वाली मशीन से खुलासा हुआ कि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम साध्वियों का यौन शोषण करता था. दोनों साध्वियों ने सीबीआई और अदालत को अपनी जो आपबीती सुनाई, उस में कहा था कि बाबा हर रोज साध्वियों को गुफा में बुलाता था और रेप करता था. उस के शीश महल जिसे वह गुफा कहता था, वहां से साध्वियां हर रोज रोते हुए बाहर निकलती थीं. गुफा के आसपास बने हौस्टलों में 200 से ज्यादा सुंदर साध्वियों को रखा गया था.  बाबा की गुफा के आसपास रात के वक्त महिला साध्वियों को गार्ड के रूप में तैनात किया जाता था.  साध्वियों से दुष्कर्म का यही वो केस था, जिस के बाद गुरमीत राम रहीम नायक से खलनायक और संत से अपराधी बन गया था.

प्रधानमंत्री कार्यालय में भेजे गए गुमनाम साध्वी के इस पत्र को पहले गृह मंत्रालय को सौंपा गया था. जहां से बाद में पत्र की जांच का जिम्मा सिरसा के सेशन जज को सौंपा गया. इसी दौरान हाईकोर्ट ने भी इस पर संज्ञान ले लिया था. दिसंबर 2002 में  राम रहीम के खिलाफ धारा 376, 506 और 509 आईपीसी के तहत केस दर्ज किया गया था. दिसंबर 2003 में  इस केस की जांच सीबीआई को सौंपी दी गई. जांच अधिकारी सतीश डागर ने केस की जांच शुरू की और आखिर साल 2005-2006 में उस साध्वी को ढूंढ निकाला, जिस का यौन शोषण हुआ था.

जुलाई 2007 में  सीबीआई ने केस की जांच पूरी कर अंबाला सीबीआई कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी. अंबाला से केस की सुनवाई पंचकूला शिफ्ट कर दी गई. चार्जशीट के मुताबिक, डेरे में 1999 और 2001 में कुछ और साध्वियों का भी यौन शोषण हुआ, लेकिन वे मिल नहीं सकीं. अगस्त 2008 में साध्वियों से दुष्कर्म  केस का ट्रायल शुरू हुआ और डेरा प्रमुख राम रहीम के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए. साल 2011 से 2016 तक  केस का ट्रायल चला और डेरा प्रमुख राम रहीम की ओर से बड़ेबड़े वकील लगातार जिरह करते नजर आए. जुलाई 2016 तक चली केस की सुनवाई के दौरान कुल 52 गवाह पेश किए गए, इन में 15 प्रौसिक्यूशन और 37 डिफेंस के थे. और फिर वह दिन आ गया, जब राम रहीम की गरदन इस केस में पूरी तरह फंसी नजर आई और जून 2017 में कोर्ट ने डेरा प्रमुख के विदेश जाने पर रोक लगा दी.

17 अगस्त, 2017 को दोनों पक्षों की ओर से चल रही जिरह खत्म हो गई और फैसले के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की गई. 25 अगस्त, 2017 को पंचकूला सीबीआई कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने राम रहीम को उम्र कैद की सजा सुनाई. राम रहीम के खिलाफ सजा दिए जाने के आदेश के बाद डेरा सर्मथकों ने पंचकूला और सिरसा में जम कर उत्पात मचाया और हिंसा की, जिस में करीब 41 लोगों की मौत हुई. अदालत के फैसले के खिलाफ सिरसा व पंचकूला में हुई हिंसा के बाद गुरमीत राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा पर पुलिस के छापे पडे़ तो वहां से हथियारों का जखीरा बरामद हुआ.

हरियाणा पुलिस ने हिंसा फैलाने के आरोप में राम रहीम की गोद ली बेटी और उस की कथित प्रेयसी कहीं जाने वाली हनीप्रीत को भी चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. हनीप्रीत हिंसा होने के बाद से ही फरार थी. फ्रीज हुए डेरा के 90 बैंक एकाउंट साध्वियों से बलात्कार मामले में गुरमीत राम रहीम का सजा होने व गिरफ्तारी के बाद से ही डेरा सच्चा सौदा के रहस्य लोक की कहानियां सार्वजनिक होने लगीं. इधर, डेरा सर्मथकों की हिंसा के बाद डेरा के 90 बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए. गुरमीत राम रहीम के खिलाफ एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने भी जांच शुरू कर दी. क्योंकि डेरा की 700 करोड़ की संपत्ति में मनी लांड्रिंग की आशंका नजर आ रही थी.

गुरमीत राम रहीम को रेप मामले में सजा होने के बाद पंचकूला और सिरसा के अलावा करीब 5 राज्यों में हिंसक प्रर्दशन हुए थे. इस मामले में दरजनों केस दर्ज हुए. चंडीगढ़ व पंचकूला में हिंसा फैलाने के मामले में डेरा प्रवक्ता दिलावर सिंह को भी देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया. दिलावर सिंह एमएसजी ग्लोरियस इंटरनैशनल स्कूल सिरसा का एडमिनिस्ट्रेटर था. उस ने डेरामुखी के गनमैन ओमप्रकाश सिंह, डेरा सर्मथक दान सिंह व चमकौर सिंह के साथ मिल कर पंचकूला में आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया था. करीब 177 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 1137 आरोपियों को अरेस्ट किया गया था.

बहरहाल, गुरमीत राम रहीम के पापों की कलई खुलनी शुरू हो चुकी थी और कानून ने सख्त रुख अपना लिया था. उस के खिलाफ मुंह न खोलने वाले लोग भी अब अदालत में सच बयां कर रहे थे. एक तरफ राम रहीम साध्वियों से बलात्कार के मामले में जेल से बाहर आने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रहा था कि 17 जनवरी, 2019 को पंचकूला की विशेष सीबीआई के जज जगदीप सिंह  ने सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या के मामले में भी गुरमीत राम रहीम को उम्रकैद की सजा सुना दी. इस मामले में डेरा प्रमुख के साथ 3 अन्य लोगों कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को भी दोषी ठहराया गया था. इन्हें भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

दरअसल, सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति वकालत छोड़ कर ‘पूरा सच’ नाम से एक अखबार निकालते थे. रामचंद्र अपने अखबार के नाम की तरह ही पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे. निर्भीक छवि के रामचंद्र छत्रपति की हत्या का मामला कहीं न कहीं साध्वियों के दुष्कर्म से ही जुड़ा था.  2002 में रामचंद्र छत्रपति के हाथ वह चिट्ठी लग गई, जो गुमनाम साध्वी ने लिखी थी. रामचंद्र ने उस चिट्ठी को अपने अखबार में छाप दिया. इसी अखबार में छपी खबर के बाद लोगों को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम द्वारा डेरे में साध्वियों के साथ दुष्कर्म करने की जानकारी मिली थी. इस खबर के छपने के बाद छत्रपति को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं.

आखिरकार 19 अक्तूबर, 2002 की रात छत्रपति को घर के बाहर गोली मारी गई. इस के बाद 21 अक्तूबर को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उन की मौत हो गई. हालांकि इस दौरान छत्रपति होश में आए लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण छत्रपति का बयान तक दर्ज नहीं किया गया. दरअसल, छत्रपति अपने अखबार में डेरा सच्चा सौदा की अच्छी और बुरी खबरों को छापते थे, जिस कारण उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती थीं. यह बात सिरसा के सभी पत्रकार जानते थे. मृतक पत्रकार के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका जनवरी, 2003 में मृतक के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर मामले को सीबीआई को सौंपने की मांग की. इस याचिका में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के भी इस में संलिप्त होने के आरोप लगाए.

सोशल मीडिया में रामचंद्र छत्रपति को इंसाफ दिए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी. इसी दौरान डेरामुखी पर डेरे के एक पूर्व मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के भी आरोप लगने लगे. इस मामले में भी पीडि़तों की तरफ से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया. हाईकोर्ट ने पत्रकार छत्रपति और डेरा मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के मामलों को जोड़ते हुए 10 नवंबर, 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. सीबीआई ने दिसंबर, 2003 में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. मामला दर्ज होते ही डेरा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर जांच पर रोक लगाने की अपील की गई, जिस के बाद उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और मामले की जांच पर उस वक्त रोक लगा दी गई.

लेकिन नवंबर, 2004 में दूसरे पक्ष की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डेरा की याचिका को खारिज कर दिया और सीबीआई जांच को जारी रखने के आदेश दिए. सीबीआई ने दोबारा दोनों मामलों की जांच शुरू की और डेरा प्रमुख समेत कइयों को अभियुक्त बनाया. इसी मामले में सीबीआई कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम समेत 4 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. साध्वी रेप केस मामले और पत्रकार छत्रपति हत्याकांड की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद से उस की खास राजदार हनीप्रीत सब से ज्यादा सुर्खियों में रही है. उस पर भी पंचकूला में दंगा भड़काने, राजद्रोह और राम रहीम को पुलिस कस्टडी से भगाने की साजिश रचने के आरोप लगे और बाद में उसे गिरफ्तार किया गया.

हालांकि कुछ महीने बाद हनीप्रीत को अदालत से जमानत मिल गई और उस के बाद हनीप्रीत ने डेरा सच्चा सौदा की कमान अपने हाथों में ले ली. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर हनीप्रीत कौन है, जो गुरमीत राम रहीम के बाद डेरा सच्चा सौदा की सब से ताकतवर बनी है. आखिर इतना बड़ा परिवार होते हुए राम रहीम क्यों हर वक्त हनीप्रीत को याद करता रहा और हनीप्रीत से उस का क्या खास रिश्ता है. हनीप्रीत इंसां का जन्म 21 जुलाई, 1980 को हरियाणा के फतेहाबाद में हुआ था. उस का स्कूली नाम प्रियंका तनेजा है.  प्रियंका तनेजा का पूरा परिवार करीब ढाई दशक से डेरे का अनुयायी था. हनीप्रीत के दादा ने पाकिस्तान से आ कर हरियाणा के सिरसा में कपड़े की दुकान खोली थी. जहां गुरमीत राम रहीम के गुरु शाह मस्तानाजी आते रहते थे. तभी से उन की फैमिली डेरे की अनुयायी हो गई.

कुछ ही दिनों में हनीप्रीत के दादा डेरे के प्रशासक बन गए और वहां खजाने से संबंधित काम देखने लगे थे. 1996 में प्रियंका के दसवीं पास करते ही दादा ने उस का एडमिशन डेरे के ही स्कूल में करवा दिया. हनीप्रीत के पिता रामानंद तनेजा पहले पुरानी दिल्ली एमआरएफ टायर्स का ‘सर्च टायर्स’ नाम से शोरूम चलाते थे. लेकिन बाद में उन्होंने डेरे में ही एक बड़ा सीड प्लांट डाल लिया. बाद में गुरमीत राम रहीम ने उस के पिता रामानंद तनेजा को डेरा की पर्चेजिंग कमेटी का हेड बना दिया, जो डेरे के सारे सामान की खरीदफरोख्त का काम देखने लगे.

प्रियंका के भाई साहिल तनेजा को भी गुरमीत का आशीर्वाद मिल गया और वह भी डेरे में बड़े स्तर पर कारोबार करने लगा. बाद में प्रियंका की छोटी बहन नीशू तनेजा की गुरुग्राम में जो शादी हुई, उस में भी बाबा का खास योगदान रहा. हनीप्रीत के चाचा और मामा समेत दूसरे कई रिश्तेदार सिरसा के मुख्य मार्गों पर टायरों का कारोबार करते हैं. आज भी डेरे में कई बड़े प्रोजेक्ट हनीप्रीत के नाम से चल रहे हैं. बताते हैं कि गुरमीत राम रहीम 1996 में डेरे के स्कूल में जब छात्राओं को आशीर्वाद देने गया था तो वहां उस की नजर पहली बार प्रियंका तनेजा पर पड़ी थी. बस उसी के बाद बाबा ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि वह प्रियंका को अपना खास आशीर्वाद देने के लिए डेरे में अपने निजी कक्ष में बुलाने लगा.

बाबा की खासमखास बन गई हनीप्रीत कुछ ही दिनों में प्रिंयका पूरी तरह बाबा के वश में हो गई. कुछ समय बाद बाबा ने उस का नया नामकरण किया और उस का नाम हनीप्रीत इंसां रख दिया. क्योंकि डेरे में सभी राजदारों व साधुसाध्वियों को ‘इंसां’ सरनेम दिया जाता है. उम्र का काफी फासला होने के बावजूद धीरेधीरे गुरमीत राम रहीम और हनीप्रीत इंसा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. जल्द ही हनीप्रीत बाबा की खास बन गई और उस की पहुंच बेरोकटोक बाबा के बैडरूम तक होने लगी. हनीप्रीत ने 12वीं तक की पढ़ाई डेरे के स्कूल में ही की. बाबा ने उस का डेरे से बाहर आनाजाना बंद करा दिया. डेरे में उस के लिए एक खास आवास की व्यवस्था कर दी गई और वहीं पर उस के टीचर उसे पढ़ाने के लिए आते.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत के लिए एक विशेष जिम बनवा दिया. हनीप्रीत के नाम पर डेरे के अंदर एक बुटीक भी खोल दिया गया. बताते हैं कि धीरेधीरे हनीप्रीत और राम रहीम की नजदीकियां कुछ इस तरह बढ़ गईं कि हनीप्रीत बाबा के हर राज की राजदार हो गई. हनीप्रीत अब गुरमीत की सब से करीबी बन गई थी. गुरमीत उस पर इतना मेहरबान था कि उस ने हनीप्रीत के नाम पर डेरे में कई बड़े कारोबार शुरू किए.  बताते हैं कि डेरे के अंदर बाबा और हनीप्रीत के रिश्ते को ले कर हमेशा लोगों के मन में सवाल रहते थे. लेकिन बाबा के डर से कोई अपनी जबान नहीं खोलता था, क्योंकि बाबा राम रहीम उसे लोगों के सामने अपनी बेटी, अपनी ‘परी’ कहता था. लेकिन हकीकत यह थी कि वो बाबा की ‘परी’ नहीं बल्कि बाबा की ‘हनी’ थी.

बताते हैं कि जब बाबा को लगा कि एक अविवाहित लड़की इस तरह उस की सेवा में रहेगी तो इस से उस की छवि और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हो सकते हैं. इसलिए उस ने 14 फरवरी, 1999 वैलेनटाइंस डे के दिन हनीप्रीत की शादी विश्वास गुप्ता से करा दी. हनीप्रीत के परिवार की तरह करनाल के रहने वाले विश्वास गुप्ता का परिवार भी बाबा का अनुयायी था. बाबा ने ही शादी की सारी व्यवस्थाएं कराई थीं. राम रहीम ने हनीप्रीत की शादी तो गुप्ता से करा तो दी, लेकिन दोनों को आदेश दिया कि वे बच्चा पैदा न करें.

हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद मीडिया को बताया था कि शादी के 2 या 3 दिन बाद बाबा राम रहीम ने उसे हनीप्रीत के साथ डेरे में मुलाकात के लिए बुलाया था. तब बाबा ने कहा था कि तुम हमारे साथ बाहर यात्राओं पर जाती हो, अगर बच्चा हुआ तो उस के स्कूल जाने और लालनपालन के चलते हमारी सेवा नहीं कर पाओगी, इसलिए बच्चा पैदा न करो. बाबा ने कहा था कि हम तुम्हें बेटा मानते हैं, उसी तरह हनीप्रीत भी हमारी बेटी है. हम उसे भी उतना ही प्यार देंगे. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाया था कि बाबा हर सप्ताह हनीप्रीत और उसे डेरे में बुलाने लगा. वह गुफा के अंदर बने बैडरूम में हनीप्रीत को बुलाता था और उसे लिविंग रूम में ही बैठने को कहता था.

पूछने पर बाबा कहता था कि बेटी अकेले में ससुराल के हर सुखदुख बता सके, इसलिए उस से अकेले में हालचाल पूछता हूं. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाए थे कि राम रहीम और हनीप्रीत की सभी मुलाकातें हर बार एक से डेढ़ घंटे तक होती थीं. इस दौरान बाबा के चेले और दूसरे सेवादार विश्वास गुप्ता को बातों और कुछ कामों में उलझाए रखते थे. बाद में बाबा ने विश्वास गुप्ता को सप्ताह में 2 दिन पत्नी के साथ गुफा में रहने का आदेश दिया. बताते हैं कि उसी दौरान एक रात जब  विश्वास गुप्ता डेरे में बाबा की गुफा के लिविंग रूम में सो रहा था तो उस ने रात के वक्त बाबा के बैडरूम में अपनी पत्नी हनीप्रीत व बाबा को कामक्रीड़ा करते देखा. बस इसी के बाद से बाबा और हनीप्रीत से उस का मोहभंग हो गया.

बाद में हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता के संबध बिगड़ने लगे तथा दोनों में अकसर तकरार होने लगी. विश्वास गुप्ता और हनीप्रीत का रिश्ता केवल 11 साल चला. बाबा राम रहीम ने साल 2009 में हनीप्रीत को बेटी के रूप में गोद ले लिया. जिस के बाद हनीप्रीत बाबा के साथ डेरे की गुफा में ही रहने लगी. हनीप्रीत को गोद लेने के बाद गुप्ता से हनी के मतभेद और गहरे हो गए. गुप्ता ने जब हनीप्रीत पर घर वापस चलने का दबाव डाला तो उस के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करवा दिया गया, जिस में उसे जेल की हवा खानी पड़ी. बाद में जेल से रिहा होने पर  साल 2011 में विश्वास गुप्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर राम रहीम के कब्जे से अपनी पत्नी यानी हनीप्रीत को मुक्त कराने की मांग की थी. अदालत में दी गई याचिका में विश्वास गुप्ता ने राम रहीम पर हनीप्रीत के साथ अवैध संबंध होने का भी आरोप लगाया था.

डेरे के सारे फैसले लेने लगी हनीप्रीत बताते हैं कि बाद में डेरे के कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण विश्वास गुप्ता के परिवार वालों ने हनीप्रीत से उस का तलाक करवा दिया. लेकिन इस दौरान गुप्ता परिवार को बाबा के ऊंचे रसूख के कारण कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा. विश्वास गुप्ता से तलाक के बाद हनीप्रीत पूरी तरह बाबा के लिए समर्पित हो गई. हनीप्रीत डेरा के हर महत्त्वपूर्ण फैसले लेने लगी. बाबा राम रहीम के साथ वह साए की तरह चौबीसों घंटे रहने लगी. बाबा हर फैसला हनीप्रीत से सलाह ले कर ही करता था.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत की फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश को देखते हुए ‘एमएसजी’ नाम से एक फिल्म कंपनी बनाई जिस के तहत बनी फिल्म ‘एमएसजी’, ‘जट्टू इंजीनियर’, ‘द वारियर लायन हार्ट’ समेत दूसरी और भी फिल्मों का निर्देशन हनीप्रीत ने ही किया. एमएसजी नाम की फिल्म में तो बाबा ने खुद हीरो के रूप में काम भी किया. बाबा की बेबी हनीप्रीत इतनी ताकतवर हो चुकी थी कि उसी के हाथ में डेरे की सभी चाबियां रहती थीं. पैसे से ले कर हर वो फैसला जो डेरे से संबंधित होता था, वह हनीप्रीत ही करती थी. हनीप्रीत भले ही दिखावे के लिए बाबा की बेबी रही हो, लेकिन लोग अब खुली जुबान से कहते हैं कि वह बाबा की हनी थी. शायद यही वजह थी कि गुरमीत राम रहीम की अपनी बीवी और बेटेबहू से दूरियां रहती थीं.

राम रहीम को अपने तौरतरीकों से चलाने वाली हनीप्रीत जेल जाने तक उस के साथ नजर आई थी और बाद में उसी ने डेरे का प्रबंध अपने हाथों में लिया. गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद 600 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाले उस के एमएसजी प्रोडक्ट्स की कमान भी बाद में हनीप्रीत के हाथों में आ गई. एमएसजी के सिरसा में 5 बड़े शोरूम थे, जिन में करीब 150 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बेचे जाते थे. हालांकि बाबा की गिरफ्तारी के बाद एमएसजी का यह कारोबार आर्थिक संकट का शिकार हो कर बंद हो गया, जिस से इस में निवेश करने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रकम भी डूब गई. साध्वियों के साथ रामचंद्र छत्रपति के परिवार को इंसाफ मिल चुका था, लेकिन राम रहीम के दामन पर लगे डेरा प्रेमी रणजीत सिंह की हत्या के दागों का इंसाफ होना अभी बाकी था.

18 अक्तूबर, 2021 को रणजीत सिंह हत्याकांड में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के जज सुशील कुमार ने राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी ठहरा कर उम्रकैद की सजा सुनाई. 19 साल तक अदालत में चले इस मामले की 250 पेशी हुई और 61 गवाही के बाद अदालत ने 5 आरोपियों को दोषी माना. रणजीत सिंह एक समय राम रहीम के डेरे का मैनेजर और उस का भक्त हुआ करता था, लेकिन 10 जुलाई, 2002 को अचानक रणजीत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हत्या का रहस्य बहुत गहरा था. हत्या के आरोप में राम रहीम के साथ उस का सहयोगी कृष्ण लाल भी फंसा था.

रणजीत सिंह हत्याकांड में 3 गवाह महत्त्वपूर्ण थे. इन में 2 चश्मदीद गवाह सुखदेव सिंह और जोगिंद्र सिंह थे. इन का कहना था कि उन्होंने आरोपियों को रंजीत सिंह पर गोली चलाते हुए देखा था. तीसरा गवाह गुरमीत का ड्राइवर खट्टा सिंह था, जिस के सामने रंजीत को मारने की साजिश रची गई थी. हालांकि बाद में खट्टा सिंह अदालत के सामने बयान से मुकर गया था. कई साल बाद खट्टा सिंह फिर से कोर्ट में पेश हो गया और गवाही दी. रणजीत का साला परमजीत सिंह भी इस मामले में गवाह था, जिस ने सीबीआई के स्पैशल मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज कराए थे. परमजीत ने अदालत को बताया था कि रणजीत की बहन भी जुलाई, 1999 में साध्वी बनी थी.

परमजीत ने कोर्ट के सामने डेरे से जुड़ी घटनाओं की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए बताया कि रणजीत सिंह की साध्वी बहन डेरा प्रमुख की गुफा के बाहर पहरेदारी का काम करती थी. उसी ने अपने भाई को डेरा प्रमुख की गुफा में साध्वियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की बात बताई थी. जिस के बाद रणजीत सिंह ने डेरा छोड़ दिया और अपने गांव कुरुक्षेत्र चला गया. डेरा प्रमुख को शक था कि साध्वियों को डेरे से भगाने और उन के खिलाफ प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट में चिट्ठी लिखवा कर उसे बदनाम करने का काम रणजीत सिंह ने अपनी साध्वी बहन के जरिए किया है, इसीलिए रणजीत सिंह की हत्या करा दी गई.

चूंकि डेरे में 20 साल तक सेवादार रहे रणजीत सिंह की 2002 में गुमनाम साध्वी का पत्र सामने आने के बाद ही हत्या हुई थी. इसीलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कडि़यां जोड़ते हुए अदालत ने बाबा को उस की हत्या का दोषी माना. वैसे साध्वियों से दुष्कर्म, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरे के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के अलावा भी डेरामुखी राम रहीम के खिलाफ कई संगीन आरोप हैं. 2010 में डेरा के ही एक पूर्व साधु रामकुमार बिश्नोई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर डेराप्रमुख पर डेरे के पूर्व मैनेजर फकीर चंद की हत्या कराने का आरोप लगाया था. 400 साधुओं को बनाया नपुंसक फकीरचंद की गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग पर अदालत ने सीबीआई को जांच के आदेश तो दिए लेकिन जांच एजेंसी मामले में सबूत नहीं जुटा पाई और क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. हालांकि बिश्नोई ने क्लोजर रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है.

इस के अलावा फतेहाबाद जिले के कस्बा टोहाना के रहने वाले डेरे के एक पूर्व साधु हंसराज चौहान ने जुलाई 2012 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राम रहीम पर डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाए जाने का गंभीर आरोप लगाया था. अदालत के सामने उन्होंने 166 साधुओं का नाम सहित विवरण प्रस्तुत करते हुए गुरमीत राम रहीम की करतूतों की पोल खोली थी. अदालत ने इस शिकायत की जांच का काम भी सीबीआई को सौंपा, जिस के बाद ये मामला भी अब अदालत में विचाराधीन है. साधु हंसराज ने बताया कि उस के मातापिता डेरे के अनुयायी थे, इसलिए वह भी साल 1996 में 17 साल की उम्र में डेरे के अनुयायी बन गए थे. जहां डेरामुखी ने यह कहते हुए अनुयायियों को नपुंसक बनाया कि वे अगर खुद नपुंसक बनते हैं तो भगवान को पाने में सफल होंगे.

उन्हें साल 2002 में श्रीगंगानगर स्थित डेरे के अस्पताल में नपुंसक बनने के लिए मजबूर किया गया, जहां उन के अलावा कई अन्य साधु (डेरा अनुयायी) भी थे. डेरामुखी का मानना था कि नपुंसक बनने के बाद अनुयायी डेरा छोड़ कर नहीं जा सकेंगे. डेरामुखी ऐसे अनुयायियों से खाली कागज पर दस्तखत भी करवा लेता था. उस के बाद उन के नामों पर डेरामुखी को दान की गई जमीन ट्रांसफर करवाता और कुछ समय बाद उस जमीन को डेरा ट्रस्ट के नाम पर ट्रांसफर करवा लिया जाता. दरअसल, गुरमीत राम रहीम के गलत कामों की कुंडलियां खुलने के बाद ही पता चला कि डेरे का आकार बढ़ाने के लिए उस ने डेरे के आसपास की जमीन हथियाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया हुआ था.

गुरमीत राम रहीम ने 1990 में गद्दीनशीं होने के बाद डेरे के चारों ओर की जमीन हासिल करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए. लोगों को डराधमका कर औनेपौने दामों पर 700 एकड़ जमीन हासिल की. इसी वजह से महज कुछ एकड़ में फैला डेरा आज बड़े शहर में तब्दील हो चुका है. गांव शाहपुर बेगू, नेजियाखेड़ा और फूलकां बाजेकां के जिन लोगों ने बाबा को जमीन देने का विरोध किया, उन्हें परेशान करने के लिए बाबा के गुंडों ने पहले उन्हें धमकाया फिर समझाया और जो इस के बाद भी नहीं माना, उस की जमीन को रातोंरात ओपन टौयलेट बना दिया जाता था.

डेरे पर आने वाले हजारों लोग ऐसे लोगों के खेतों और फसल की ऐसी दुर्दशा कर देते थे कि गंदगी की वजह से खेतों के आसपास जाना भी मुश्किल हो जाता था. परेशान हो कर लोग उस जमीन को जमीन बेचने में ही भलाई समझते थे. अदालत से जिन मामलों में गुरमीत राम रहीम को अपने कुकर्मों की सजा मिल चुकी है, वे तो महज उदाहरण हैं. लेकिन यौन उत्पीड़न से ले कर हत्या और लोगों की संपत्ति हड़पने के ऐसे सैकड़ों गुनाह हैं, जिन की पीडि़तों ने शिकायत ही नहीं की. लेकिन ऐसे तमाम लोग आज इस बात से खुश हैं कि सच्चे डेरे की आस्था को कलंकित करने वाला संत अब सलाखों के पीछे है. Crime Stories

 

Chhattisgarh Crime News : बीमा रकम पाने को भाई ने भाई की ली जान

Chhattisgarh Crime News : 11 मई, 2024 को सुबह घाघरा जंगल की सड़क पर 24 वर्षीय उत्तम जंघेल का शव क्षतविक्षत स्थिति में पड़ा हुआ था. लोगों ने देखा तो किसी ने यह खबर पुलिस को दे दी. कुछ लोगों ने लाश के फोटो खींच कर वाट्सऐप ग्रुप में डाल दिए.

एसपी (खैरागढ़) त्रिलोक बंसल के निर्देश पर सुश्री प्रतिभा लहरे (प्रशिक्षु एसपी) घटनास्थल पर पहुंच गईं. थाना पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. मौके पर डौग स्क्वायड को बुलवाया गया. युवक के शव को एकबारगी देखने के बाद प्रशिक्षु एसपी प्रतिभा लहरे ने यह पाया कि मृतक के गले पर निशान हैं, जिस से यह अनुमान लगाया गया कि शायद मृतक का गला दबा कर हत्या की गई है.

एसपी त्रिलोक बंसल को घटना के संदर्भ में जानकारी दी और उन से निर्देश मिलने के बाद मामले पर से परदा उठाने के लिए छुई खदान खैरागढ़ पुलिस मुस्तैदी से लग गई.

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उत्तम जंघेल घर पर ही बैठा था कि उस के मोबाइल पर गोंदिया (महाराष्ट्र) में रहने वाले उस के मामा के बेटे हेमंत ढेकवार की काल आई, ”अरे भाई उत्तम, तुम कहां हो, बुआजी कैसी हैं, सब ठीकठाक है न! सुनो, मैं डोंगरगढ़ पहुंच रहा हूं, बहुत जरूरी काम है, तुम भी आ जाना.’’

”भैया, यहां पर सब ठीकठाक है और मैं तो आज घर पर ही हूं. कहेंगे तो आ जाऊंगा, वैसे क्या खास बात हो गई?’’ उत्तम बोला.

”मिलोगे तो सब बताऊंगा, सच कहूं तो तुम मिलोगे तो खुश हो जाओगे.’’ हेमंत ने कहा.

”फिर भी कुछ तो बताओ भैया, आखिर बात क्या है?’’ उत्तम जंघेल ने हंसते हुए ममेरे भाई हेमंत से कहा.

”अरे भाई, तुम्हारे लिए एक गाड़ी लेनी है, यह एक जो ली है उसे तो मैं चला रहा हूं, सोच रहा हूं कि एक स्कौर्पियो तुम्हारे लिए भी खरीदवा दूं. बस, कुछ ऐसी ही प्लानिंग है. इसलिए तुम शनिवार को सुबह डोंगरगढ़ पहुंच जाना.’’

”ठीक है, मैं राजन से बात करता हूं, हम दोनों कल सुबह जल्दी पहुंच जाएंगे.’’ उत्तम ने कहा.

”अरे भाई, तुम किसी और को मत लाना, अकेले आओ, हर बात हर किसी को नहीं बताई जाती…’’ हेमंत ढेकवार ने कहा, ”हार्वेस्टर और स्कौर्पियो के बारे में भी किसी को नहीं बताना कि ये मैं ने तुम्हारे नाम पर लिए हैं. यह दुनिया बड़ी अजीब है भाई, किसी की तरक्की पसंद नहीं करती.’’

”कोई बात नहीं भैया, मैं अकेला ही सुबह डोंगरगढ़ पहुंच जाऊंगा.’’ उत्तम जंघेल ने हंसते हुए कहा.

हेमंत ढेकवार महाराष्ट्र के गोंदिया जिले का निवासी था और उत्तम जंघेल का रिश्ते में वह ममेरा भाई था. दोनों ममेरे फुफेरे भाई थे. दोनों में उम्र का फासला था, मगर उन में अच्छी बनती थी. वे अपने दुखसुख की बातें एकदूसरे से खुल कर करते थे.

दूसरे दिन शनिवार को हेमंत के कहे अनुसार उत्तम जंघेल ने आननफानन में डोंगरगढ़ जाने की तैयारी कर बाइक से निकल पड़ा.

उत्तम जंघेल पुत्र अमृत लाल उर्फ बल्ला वर्मा निवासी आमापारा, खैरागढ़ का बेटा था. अमृत लाल सरपंच रहे हैं, मां रेखा वर्मा भी उदयपुर क्षेत्र से जिला पंचायत की सदस्य रह चुकी थीं. कांग्रेस पार्टी की राजनीति में होने के कारण शहर की राजनीति में अच्छा खासा दबदबा था. उसे डोंगरगढ़ पहुंचते पहुंचते शाम के 5 बज गए थे.

निर्धारित होटल में जब वह पहुंचा तो ममेरा भाई हेमंत ढेकवार 2 अनजान लोगों के साथ वहां मौजूद था. सामने शराब की बोतल खुली हुई थी. उस ने दोनों से परिचय करवाया, ”इन से मिलो, यह है सुरेश मच्छिरके और प्रेमचंद लिलहारे मेरे खास दोस्त.’’

उत्तम जंघेल ने दोनों से हाथ मिलाया और सामने की कुरसी पर बैठ कर शराब पीने लग गया.

”भाई उत्तम, तुम्हारे नाम पर एक स्कौर्पियो लेनी है, मैं ने सारी व्यवस्था कर ली है.’’ आगे हेमंत ढेकवार ने मानो रहस्य पर से परदा उठाते हुए कहा, ”चलो, जल्दी चलते हैं और औपचारिकताएं पूरी कर लेंगे.’’

फिर थोड़ा रुक कर हेमंत ढेकवार ने कहा, ”मगर सुनो, यह जो तुम मोबाइल ले कर आए हो, उसे कहीं छोड़ देते हैं.’’

”क्यों भला?’’ उत्तम चौंकते हुए बोला.

”अरे! थोड़ा समझा करो, जिस शोरूम से हम गाड़ी लेंगे, वहां तुम्हारे पास मोबाइल नहीं होना चाहिए, ताकि सारी फौर्मेलिटी मेरे मोबाइल नंबर से हो जाए.’’

”अच्छा यह बात है,’’ उत्तम मुसकरा कर  बोला, ”यहां पास ही पिताजी के दोस्त रहते हैं, उन के पास मोबाइल छोड़ देता हूं.’’

”हां, यह ठीक रहेगा, तुम अकेले चले जाओ और कुछ भी बोल कर मोबाइल छोड़ कर आ जाओ.’’ हेमंत ढेकवार ने कहा.

शराब पी कर चारों वहां से झूमते हुए स्कौर्पियो गाड़ी से रवाना हो गए.

आगे थाने के पास से स्कौर्पियो गतापारा घाघरा मार्ग पर आगे बढ़ गई. जबकि एजेंसी तो राजनांदगांव में थी. उधर गाड़ी मुड़ते ही उत्तम बोला, ”अरे, किधर जा रहे हो?’’

”अरे भाई चलते हैं चिंता मत करो.’’ कह कर हेमंत ने उत्तम के कंधे पर धीरे से हाथ मारा.

जब गाड़ी दूसरी दिशा में आगे बढऩे लगी तो उत्तम जंघेल परेशान हो गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि जब स्कौर्पियो लेनी है तो ये लोग राजनांदगांव के बजाय इधर जंगल में क्यों जा रहे हैं.

थोड़ा आगे जा कर के उन्होंने गाड़ी रोक दी. जैसे ही उत्तम नीचे आया, हेमंत ढेकवार ने तत्काल अपना गमछा उस के गले में डाल दिया और गला दबाने लगा. यह सब अचानक से घटित हो गया और उत्तम एकदम घबरा गया. उस के मुंह से कोई आवाज तक नहीं निकली.

इसी बीच हेमंत के दोनों साथी सुरेश और प्रेमचंद ने उसे जोर से पकड़ लिया. हेमंत उस का गला दबाता चला गया और थोड़ी ही देर में उत्तम जंघेल की मौत हो गई. इस के बाद उन्होंने उत्तम को स्कौर्पियो में ही डाल दिया फिर वे घाघरा जंगल की ओर आगे बढ़ गए.

आगे जा कर के सुनसान जगह पर तीनों ने उत्तम के शव को सड़क पर डाल दिया और किसी को यह पता न चले कि इसे गला दबा मारा है, इसलिए उत्तम के शरीर पर स्कौर्पियो 2-3 बार चढ़ा दी, ताकि देखने वाले को ऐसा लगे कि सड़क दुर्घटना से उत्तम जंघेल की मौत हुई है.

लाश की कैसे हुई शिनाख्त

दोपहर होतेहोते यह स्पष्ट हो गया कि घाघरा कुम्हीं रोड पर मिला शव उत्तम जंघेल पुत्र अमृतलाल वर्मा (उम्र 24 साल) का है.

शहर में लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे कि आखिरकार उत्तम जंघेल खैरागढ़ से डोंगरगढ़ कैसे पहुंच गया. यह बात भी चर्चा का विषय बन गई कि यह एक्सीडेंट नहीं हत्या का मामला हो सकता है.

पुलिस ने मृतक के पिता और पूर्व सरपंच अमृत वर्मा से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उत्तम एक दिन पहले 10 मई, 2024 की सुबह घर से निकला था. घर से निकलने के बाद कहां गया, उस की जानकारी परिवार के किसी भी सदस्य को नहीं थी.

वह अपने गांव और घर से लगभग 40 किलोमीटर दूर किस के साथ और क्यों गया होगा, यह सवाल भी खड़ा था. मृतक उत्तम की मौत को ले कर कई सवाल खड़े हो गए थे और स्थानीय मीडिया में कई तरह की बातें प्रकाशित हो रही थीं, जो पुलिस के लिए चिंता का सबब थी.

पुलिस को घटनास्थल के आसपास कोई भी वाहन नहीं मिला था और न ही ऐसी कोई वजह सामने आ रही थी जिस से कि इसे सड़क दुर्घटना या कोई हादसा माना जा सके. इसी के चलते लोगों में चर्चा थी कि मृतक उत्तम जंघेल की लाश यहां कैसे और कहां से आई और उस की मौत कैसे हुई.

पुलिस के सामने चुनौती यह थी कि इस केस को कैसे सौल्व करे.

बहरहाल, पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. शव का पोस्टमार्टम जिला सिविल अस्पताल के वरिष्ठ डा. पी.एस. परिहार ने किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस के शक की पुष्टि हो गई और स्पष्ट हो गया किसी ने गला दबा कर उत्तम की हत्या की थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद एसडीपीओ सुश्री प्रतिभा लहरे ने उसी दिन एक पुलिस टीम बना कर जांच शुरू कर दी.

टीम में एसडीओपी सुश्री प्रतिभा लहरे, साइबर सेल प्रभारी अनिल शर्मा,  इंसपेक्टर शक्ति सिंह, एसआई बिलकीस खान, वीरेंद्र चंद्राकर, एएसआई टैलेश सिंह,  हैडकांस्टेबल कमलेश श्रीवास्तव, कांस्टेबल चंद्रविजय सिंह, त्रिभुवन यदु, जयपाल कैवर्त, कमलकांत साहू, सत्यनारायण साहू, अख्तर मिर्जा की टीम बनाई.

सब से पहले उत्तम जंघेल के घर वालों से फिर से पूछताछ कर उन के बयान लिए गए. एकएक कड़ी मिलने से स्पष्ट होता चला गया कि उत्तम जघेल के नाम पर हेमंत ढेकवार ने गोंदिया शहर की एक बैंक से लोन लिया है और उत्तम जंघेल का मोटी धनराशि का जीवन बीमा भी करवा रखा है.

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         आरोपी हेमंत ढेकवार

इस के बाद शक की सूई ममेरे भाई हेमंत की ओर घूमती चली गई. पुलिस ने जाल बिछा कर के हेमंत के बारे में जानकारी निकालनी शुरू कर दी. पता चला कि हेमंत एक अपराधी किस्म का व्यक्ति है.

बैंक और बीमा कंपनी से भी पुलिस ने सारी जानकारी निकाली तो यह स्पष्ट होता चला गया कि 80 लाख रुपए का खेल उत्तम जंघेल के नाम से हेमंत ढेकवार कर चुका है.

अब पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि रुपयों की खातिर ही हेमंत ने अपराध किया है. जांचपड़ताल कर के आखिर 13 मई, 2024 को खैरागढ़ पुलिस टीम ने हेमंत  ढेकवार को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया और उस से पूछताछ की.

पहले तो वह रोने लगा जैसे कि उत्तम जंघेल की मौत से उसे काफी दुख हुआ है. वह कुछ भी बताने से आनाकानी करता रहा, मगर कड़ी पूछताछ से पुलिस को सफलता मिलती चली गई.

एसडीपीओ प्रतिभा लहरे ने हेमंत से दोटूक शब्दों में पूछा, ”आखिर तुम ने स्कौर्पियो और हार्वेस्टर उत्तम जंघेल के नाम पर क्यों लिया? अपने नाम पर या अपने किसी स्थानीय रिश्तेदार के नाम पर क्यों नहीं लिया?’’

इस बात का हेमंत गोलमोल जवाब देने लगा. पुलिस ने फिर पूछा, ”स्कौर्पियो और हार्वेस्टर का बीमा करवा कर तुम ने उत्तम की हत्या की योजना क्यों बनाई थी?’’

और जब पुलिस ने यह पूछा कि तुम शनिवार को 10 मई को कहां थे? तो हेमंत ढेकवार की पोल खुलती चली गई. कुछ सीसीटीवी कैमरों में चारों डोंगरगढ़ में दिखाई दिए थे. इस सच्चाई के खुलासे के बाद हेमंत असहाय हो गया और उस ने आखिरकार पुलिस के सामने सारा सच स्वीकार कर लिया. उस ने जो कुछ बताया, वह इस तरह था—

10 मई को सुरेश और प्रेमचंद के साथ डोंगरगढ़ आ कर के तीनों ने उत्तम के साथ शराब पी और उसे जाल में फंसाया. फिर जंगल में ले जा कर गमछे से उस की हत्या कर के सड़क पर डाल उस के ऊपर स्कौर्पियो चढ़ा दी, ताकि देखने वाले यह समझें कि उत्तम जंघेल की दुर्घटना में मौत हुई है.

जांच अधिकारी सुश्री प्रतिभा लहरे और सायबर टीम प्रभारी अनिल शर्मा ने जांच के दौरान सैकड़ों सीसीटीवी फुटेज चैक किए और तकनीकी साक्ष्य के आधार पर जानकारी हासिल कर ली. पता चला कि मृतक के नाम पर कुछ माह पहले हार्वेस्टर और एक स्कौर्पियो खरीदी और बीमा की राशि हत्या का कारण थी.

आखिरकार, हेमंत ढेकवार टूट गया और बताता चला गया कि उस ने लाखों रुपए के लालच में सुनियोजित योजना के तहत अपनी सगे बुआ के बेटे उत्तम जंघेल के नाम पर एक स्कौर्पियो जनवरी 2024 में एवं एक हार्वेस्टर फरवरी 2024 में खरीद कर दोनों गाडिय़ों का करीब 30 लाख रुपए का फाइनेंस करवा लिया था.

साथ ही उसे यह भी पता लग गया था कि यदि फाइनेंस अवधि में उत्तम जंघेल की सामान्य या किसी दुर्घटना में मौत हो जाती है तो उस के नाम पर लिए गए संपूर्ण ऋण की रकम इंश्योरेंस कंपनी द्वारा भुगतान की जाएगी.

यह जानकारी होने के बाद उस के मन में लालच आ गया था. उस ने इसी लालच में  उत्तम जंघेल का भारतीय जीवन बीमा निगम से 40 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा एवं एक्सिस बैंक आमगांव से 40 लाख का दुर्घटना बीमा करा दिया था, जिस की किस्तों का भुगतान भी हेमंत स्वयं करता था.

हेमंत घर का रहा न घाट का

उक्त रकम के लालच में आ कर 10 मई, 2024 को हेमंत ने योजना के मुताबिक उत्तम को कार दिलाने के नाम पर फोन कर डोगरगढ़ बुलाया और अपने साथी सुरेश मच्छिरके निवासी कंवराबंध एवं प्रेमचंद लिल्हारे निवासी खेड़ेपार दोनों को पैसों का लालच दे कर उत्तम की हत्या की योजना में शामिल कर लिया.

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                    आरोपी सुरेश एवं प्रेमचंद

फिर तीनों योजना के मुताबिक उत्तम के नाम पर ली गई स्कौर्पियो में बैठ कर आए और डोंगरगढ़ में उत्तम को साथ में गाड़ी में बैठा कर होटल में चारों ने शराब पी. फिर तीनों आरोपियों ने मृतक को गाड़ी में बैठा कर खैरागढ़ होते गातापार थाने से आगे ले जा कर सुनसान सड़क किनारे उत्तम की गला घोंट कर हत्या कर दी और महाराष्ट्र लौट गए.

आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त गमछा घाघरा पुल से एवं घटना में प्रयुक्त स्कौर्पियो हेमंत के यहां से बरामद कर ली.

छुई खदान पुलिस ने भादंवि की धारा 302 के तहत मामला दर्ज कर के आरोपी हेमंत ढेकवार (38 साल) और सुरेश कुमार मच्छिरके (55 साल), प्रेमचंद लिलहरे (52 साल) को गिरफ्तार कर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. ­­Chhattisgarh Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : कंकाल से आखिर किस तरह सामने आया हत्या का सच

Crime News : कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने सब से पहले कंकाल का निरीक्षण किया. इस के बाद उन्होंने आसपास की झाडिय़ों पर नजर दौड़ाई. पास में एक फटा सलवारसूट पड़ा था, जिसे देख कर लग रहा था कि यह कंकाल किसी युवती का रहा होगा. इस के बाद उन्होंने आसपास पड़ी किसी अन्य वस्तु को भी खोजना शुरू किया जिस से उन्हें इस कंकाल के बारे में और जानकारी प्राप्त हो सके.

3 दिन बीत गए थे. मगर युवती के कंकाल की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. इस के बाद एसएसपी अजय सिंह ने इस कंकाल की शिनाख्त के लिए एसओजी प्रभारी विजय सिंह तथा थाना सिडकुल के एसएचओ नरेश राठौर को लगा दिया था. साथ ही पुलिस टीम कंकाल मिलने वाली जगह के आसपास चलने वाले मोबाइल फोनों की डिटेल भी जुटा रही थी.

हरिद्वार के रानीपुर क्षेत्र में स्थित शिवालिक पर्वत की निचली सतह की ओर घनी झाडिय़ां फैली हुई थीं. कई दिनों से क्षेत्र में हो रही मूसलाधार बारिश के कारण ये झाडिय़ां काफी घनी हो गई थीं. इन्हीं झाडिय़ों के पास से हो कर गांवों से एक रास्ता जिला मुख्यालय की ओर जाता है. सैकड़ों लोग अकसर सुबहशाम इसी रास्ते से हो कर अपने घर आतेजाते थे.

कई दिनों से कुछ लोग यह महसूस कर रहे थे कि झाडिय़ों के एक कोने से काफी बदबू आ रही है. पहले तो लोगों को यह लग रहा था कि यह बदबू किसी कुत्ते या बिल्ली की लाश से आ रही होगी, मगर जब यह बदबू ज्यादा हो गई थी और इसे सहन करना भी असहनीय हो गया था तो कुछ लोगों ने नाक पर रुमाल रख इसे देखने का फैसला किया था.

उधर से गुजरने वाले कई लोग उत्सुकता से जब झाडिय़ों से लगभग 100 मीटर अंदर की ओर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख कर उन सब की चीख निकल गई थी. वहां पर एक मानव कंकाल पड़ा हुआ था.

कंकाल के पास ही किसी युवती के कपड़े भी पड़े थे, जो बारिश के कारण भीगे हुए थे. तब सभी लोग सहम कर वापस सड़क पर आ गए थे और उन्होंने झाडिय़ों में कंकाल पड़ा होने की जानकारी पुलिस को देने का विचार बनाया था.

यह स्थान उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के रोशनाबाद मुख्यालय के निकट कोतवाली रानीपुर के क्षेत्र टिबड़ी में पड़ता है. घटनास्थल कोतवाली रानीपुर से मात्र 3 किलोमीटर तथा एसएसपी कार्यालय से केवल 5 किलोमीटर दूर है. इस के बाद राहगीरों ने टिबड़ी क्षेत्र में कंकाल पड़े होने की सूचना कोतवाल रानीपुर नरेंद्र बिष्ट को दे दी. अपने क्षेत्र में कंकाल मिलने की सूचना पा कर नरेंद्र बिष्ट चौंक पड़े थे.

सब से पहले उन्होंने यह सूचना एसपी (क्राइम) रेखा यादव, सीओ (ज्वालापुर) निहारिका सेमवाल व एसएसपी अजय सिंह को दी. इस के बाद नरेंद्र बिष्ट अपने साथ कोतवाली के एसएसआई नितिन चौहान तथा अन्य पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम 10 मिनट में ही मौके पर पहुंच गई थी.

जब पुलिस टीम मौके पर पहुंची थी तो उस वक्त कुछ लोग उस कंकाल के आसपास खड़े थे. जिस स्थान पर कंकाल मिला था, वह स्थान सुनसान होने के साथसाथ वन्य क्षेत्र से लगा हुआ है. हिंसक पशु गुलदार व जंगली हाथी अकसर इस क्षेत्र में घूमते हुए देखे जा सकते हैं.

आखिर किस का था वह कंकाल

कोतवाल नरेंद्र बिष्ट अभी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर ही रहे थे कि तभी वहां एसएसपी अजय सिंह, एसपी (क्राइम) रेखा यादव तथा (सीओ) ज्वालापुर निहारिका सेमवाल सहित कुछ मीडियाकर्मी भी पहुंच गए थे. इस के बाद पुलिसकर्मियों ने कंकाल के अलगअलग कोणों से फोटो लिए थे.

कंकाल की शिनाख्त करने के लिए अजय सिंह ने कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को निर्देश दिए कि वह आसपास के पुलिस स्टेशनों से यह जानकारी करे कि इस हुलिए की कोई युवती उन के क्षेत्र से कहीं लापता तो नहीं है. शिनाख्त न होने पर इस बाबत अखबारों में कंकाल के इश्तहार छपवाने को कहा था. यह बात 26 जुलाई, 2023 की है.

पुलिस ने कंकाल का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए हरमिलापी अस्पताल हरिद्वार भेज दिया था. अब सब से पहले कोतवाल नरेंद्र बिष्ट के सामने युवती की शिनाख्त न होने की समस्या थी. यदि युवती की शिनाख्त हो जाती तो पुलिस उस की काल डिटेल्स आदि के आधार पर जांच में जुट जाती. अगले दिन जब कंकाल के फोटो अखबारों में छपे तो कोई भी व्यक्ति उसे पहचानने वाला पुलिस के पास नहीं आया था.

इस के अलावा पुलिस स्टेशनों से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. एक बार तो नरेंद्र बिष्ट के दिमाग में यह भी आया कि युवती को कहीं किसी नरभक्षी गुलदार ने निवाला न बना लिया हो. मगर बाद में उन्हें ऐसा नहीं लगा था.

युवती के कंकाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली जिस से कि पुलिस कातिल तक पहुंच पाती.

वह 30 जुलाई, 2023 का दिन था. थाना सिडकुल के एसएचओ नरेश राठौर के पास करीब 55 वर्षीय राम प्रसाद निवासी कस्बा किरतपुर बिजनौर उत्तर प्रदेश अपनी बेटी प्रवीना के साथ वहां पहुंचा था. राम प्रसाद ने नरेश राठौर को बताया कि उस की 21 वर्षीया बेटी रवीना इसी महीने की 11 जुलाई से लापता है.

राम प्रसाद ने बताया कि रवीना सिडकुल की एक कंपनी में नौकरी करती थी तथा उस के बाद से ही वह लापता हो गई थी.

इस के बाद राठौर ने राम प्रसाद को कोतवाली रानीपुर भेज दिया था. राम प्रसाद व उन की बेटी रवीना कोतवाल नरेंद्र बिष्ट से मिले और उन्हें 11 जुलाई से रवीना के लापता होने की बात बता दी. जब बिष्ट ने राम प्रसाद को गत 26 जुलाई को उन के क्षेत्र में रवीना जैसी युवती का कंकाल मिलने की जानकारी दी थी तो राम प्रसाद ने कंकाल के पास मिले कपड़े देखने की इच्छा जताई.

जब कोतवाल ने कंकाल के पास मिले कपड़े ला कर दिखाने को कहा तो मुंशी कपड़े ले आया. राम प्रसाद व उन की बेटी प्रवीना उन कपड़ों को देखते ही फफक कर रो पड़े थे.

इस से पुष्टि हो गई कि टिबड़ी क्षेत्र में मिला कंकाल रवीना का ही था. खैर, किसी तरह बिष्ट ने दोनों बापबेटी को चुप कराया था और उन से रवीना के बारे में जानकारी हासिल की.

पुनीत से रवीना की कैसे हुई दोस्ती

राम प्रसाद ने बिष्ट को बताया कि पिछले 2 साल से रवीना की धामपुर बिजनौर निवासी पुनीत धीमान से खासी दोस्ती थी तथा उन की आपस में शादी करने की योजना भी थी. मगर बीच में कुछ गड़बड़ हो गई थी. कुछ समय पहले पुनीत ने किसी अन्य युवती से शादी कर ली थी. पुनीत व रवीना सिडकुल की कंपनी ऋषिवेदा में साथसाथ काम करते थे. पुनीत कंपनी में सुपरवाइजर था.

यह जानकारी मिलते ही नरेंद्र बिष्ट ने तुरंत पुनीत धीमान व रवीना के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगालने के लिए एसओजी प्रभारी विजय सिंह को कहा था. उसी दिन शाम को ही पुलिस को दोनों के नंबरों की काल डिटेल्स मिल गई थी.

दोनों की काल डिटेल्स जब पुलिस ने देखी तो उस से पुनीत खुद ही संदेह के दायरे में आ गया. इस के बाद पुलिस ने पुनीत से पूछताछ करने की योजना बनाई.

उसी दिन रात को ही पुलिस टीम ने पुनीत को पूछताछ के लिए सिडकुल से हिरासत में ले लिया था. इस के बाद पुलिस उसे पूछताछ करने के लिए कोतवाली रानीपुर ले आई. पुनीत से पूछताछ करने के लिए एसपी (क्राइम) रेखा यादव व एसएसपी अजय सिंह भी वहां पहुंच गए.

पहले तो पुलिस ने पुनीत से रवीना के उस के साथ प्रेम संबंधों व उस की हत्या की बाबत पूछताछ की थी, मगर पुनीत पुलिस को गच्चा देते हुए बोला कि मेरा तो रवीना से या उस की हत्या से कोई लेनादेना नहीं है.

पुनीत के मुंह से यह बात सुन कर वहां खड़े कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को गुस्सा आ गया और उन्होंने पुनीत को डांटते हुए कहा, ”पुनीत, या तो तुम सीधी तरह से रवीना की मौत का सच बता दो अन्यथा याद रखो, पुलिस के सामने मुर्दे भी सच बोलने लगते हैं.’’

बिष्ट के इस वाक्य का पुनीत पर जादू की तरह असर हुआ था. पुनीत ने रवीना की हत्या की बात कुबूल करते हुए पुलिस को जो जानकारी दी, वह इस प्रकार है—

क्यों नहीं हो सकी प्रेमी युगल की शादी

बात 4 साल पुरानी है. पुनीत और रवीना सिडकुल की कंपनी ऋषिवेदा में साथसाथ काम करते थे. हम दोनों में पहले दोस्ती हुई थी, जो बाद में प्यार में बदल गई थी. फिर दोनों ने भविष्य में शादी करने की भी योजना बना ली थी. यह अंतरजातीय प्यार गहरा हो गया. इस बाबत जब पुनीत ने अपने घर वालों से बात की तो दोनों की जातियां अलगअलग होने के कारण घर वालों ने शादी करने से साफ मना कर दिया था.

इस के बाद पुनीत के घर वाले किसी और सजातीय लड़की से उस की शादी कराने के प्रयास में जुट गए. उन्होंने फरवरी 2023 में उस की शादी कर दी थी. दूसरी ओर रवीना के पिता राम प्रसाद ने भी उस की सगाई कहीं और कर दी थी. इस के बाद पुनीत ने रवीना पर अपनी सगाई तोडऩे के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. रवीना ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

रवीना के मना करने से पुनीत तिलमिला गया. इस के बाद रवीना ने उस का फोन अटैंड करना भी बंद कर दिया था और अपना फोन नंबर भी बदल लिया. यह बात पुनीत को बहुत बुरी लगी. वह गुस्से में पागल हो गया था. तभी उस ने रवीना की हत्या की योजना बनाई.

योजना के अनुसार, पुनीत 11 जुलाई, 2023 को रवीना से मिला था और उसे घुमाने के लिए टिबड़ी रोड पर ले गया था. वहां सुनसान होने के कारण उस ने रवीना की गला घोंट कर हत्या कर दी और धामपुर आ कर रहने लगा था.

इस के बाद कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने पुनीत के ये बयान दर्ज कर लिए थे. फिर बिष्ट ने रवीना की गुमशुदगी को हत्या की धाराओं 302 व 201 में तरमीम कर दिया था. अगले दिन रोशनाबाद स्थित पुलिस कार्यालय में एसएसपी अजय सिंह ने प्रैसवार्ता का आयोजन कर के इस ब्लाइंड मर्डर केस का परदाफाश कर दिया.

अजय सिंह ने इस केस को सुलझाने वाली पुलिस टीम में शामिल कोतवाल नरेंद्र बिष्ट, एसओजी प्रभारी विजय सिंह, एसएचओ (सिडकुल) नरेश राठौर की पीठ थपथपाई.

इस के बाद पुलिस ने हत्या के आरोपी पुनीत धीमान को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. इस हत्याकांड की विवेचना कोतवाल नरेंद्र बिष्ट द्वारा की जा रही थी. वह शीघ्र ही इस केस की विवेचना पूरी कर के पुनीत के खिलाफ चार्जशीट अदालत में भेजने की तैयारी कर रहे थे. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : Driver के साथ मिलकर किया आम आदमी पार्टी के नेता कत्ल

Crime News : किरनदीप कौर का पति हरविंदर कबड्डी का राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी का नेता भी था. हर तरह से साधनसंपन्न होने के बाद भी उस की पत्नी किरनदीप कौर को जाने क्या सूझा कि उस ने अपने ड्राइवर (Driver) संदीप कुमार के साथ अवैध संबंध बना लिए. इस के बाद…

जिला परिषद चुनाव में बठिंडा के जोन गिल कलां से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी हरविंदर सिंह उर्फ हिंदा की हत्या ने पूरे राजनीतिक क्षेत्र में तहलका मचा दिया था. हिंदा की हत्या उसी के घर पर की गई थी. 10 सितंबर की सुबह जो खबर आई थी, वह यह थी कि हिंदा की हत्या किन्हीं अज्ञात व्यक्तियों ने गोली मार कर कर दी है. पर बाद में पुलिस ने स्पष्ट किया कि हिंदा की हत्या गोली से नहीं, बल्कि तेजधार हथियार से की गई थी. पंजाब में जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव 19 सितंबर, 2018 को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच होने थे. मतदान सुबह 8 बजे शुरू हो कर शाम 4 बजे तक चलना था. जबकि मतगणना 22 सितंबर, 2018 को होनी थी.

Aam Aadmi Party leader was murdered with the help of the driver

पूरे राज्य में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी. इस के बावजूद दिनांक 9-10 सितंबर की आधी रात को सदर रामपुर क्षेत्र के गांव जेठूके में हिंदा को उसी के घर पर मौत के घाट उतार दिया गया था. हिंदा की लाश सब से पहले उस की पत्नी किरनदीप कौर ने सुबह 6 बजे उस समय देखी थी, जब वह उठ कर पति के कमरे की तरफ आई थी. उस की खून से लथपथ लाश उस के कमरे में बैड पर पड़ी थी. लाश देखते ही किरनदीप ने अपने देवर जसविंदर सिंह और पड़ोस में रहने वाले गांव के सरपंच धर्म सिंह को बुलाया, फिर उन्होंने ही पुलिस को सूचना दी.

सूचना मिलते ही थाना सदर रामपुर प्रभारी निर्मल सिंह, एएसआई अमृतपाल सिंह, मनजिंदर सिंह, हवलदार शेर सिंह, गुरसेवक सिंह, सिपाही गुरप्रीत और गुरप्रीत सिंह तथा लेडी सिपाही अमनदीप कौर के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. चुनाव से मात्र 10 दिन पहले किसी प्रत्याशी की हत्या होने से बहुत बड़ा बवाल मच सकता था, इसलिए प्रभारी निर्मल सिंह ने इस घटना की सूचना तुरंत अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. सूचना मिलते ही आईजी (बठिंडा जोन) एम.एफ. फारुकी, एसएसपी डा. नानक सिंह और कई आला अफसर मौके पर पहुंच गए.

मामले की जांच के दौरान पुलिस को हरविंदर सिंह के बैड के पास से शराब की एक बोतल बरामद हुई थी. मृतक की पत्नी किरनदीप कौर ने पुलिस को बताया कि हरविंदर सिंह रात 3 लोगों के साथ सफेद कार में बैठ कर कहीं गए थे. वे सभी लोग देर रात घर लौटे. चारों ने शराब पी हुई थी. पहले तीनों युवक हरविंदर को घर छोड़ कर चले गए थे, लेकिन रात 11 बजे वे लोग दोबारा वापस आए थे. पति ने उसे और बेटे मनदीप सिंह को ऊपर वाले कमरे में भेज दिया था. यह उन का रोज का ही काम था और इन दिनों तो चुनाव की तैयारियां चल रही थीं, सो नएनए लोगों का घर में आनाजाना लगा रहता था. इसलिए उस ने अधिक ध्यान नहीं दिया.

वह ऊपर के कमरे में जा कर बेटे के साथ सो गई थी. फिर उन चारों ने मिल कर दोबारा शराब पी थी. अगली सुबह हरविंदर का शव खून से लथपथ हालत में बैड पर मिला था. वे 3 लोग कौन थे, कहां से आए थे, इस बारे में किरनदीप कौर कुछ नहीं बता सकी थी. कौन थे वो 3 लोग किरन ने बताया था कि इस के पहले उस ने उन युवकों को कभी नहीं देखा था. दोबारा सामने आने पर वह उन्हें पहचान सकती है. पुलिस ने इस मामले में 3 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या की धारा 302 के तहत केस दर्ज कर लिया. फिर लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हरविंदर सिंह उर्फ हिंदा की हत्या का कारण दम घुटना बताया गया था. हरविंदर की हत्या गला दबाने से हुई थी. हालांकि उस के सिर पर चोटों के गहरे जख्म थे, पर हत्या दम घुटने से हुई थी. इस का मतलब यह था कि हत्यारों ने पहले उस की गला घोंट कर हत्या की होगी और बाद में किसी तेजधार हथियार से उस पर वार किए होंगे. इस वारदात की सूचना मिलते ही मृतक के घर आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का जमावड़ा लग गया. हरविंदर की हत्या से गुस्साए आम आदमी पार्टी के नेताओं और ग्रामीणों ने बठिंडा-बरनाला नैशनल हाईवे पर धरना दे कर जाम लगा दिया. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि हरविंदर की हत्या के तीनों आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए. जब तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, शव का अंतिम संस्कार नहीं होगा.

बता दें कि गिल कलां जोन आप के गढ़ मौड़ विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है. यह सीट आप विधायक जगदेव सिंह कमालू ने जीती थी. राजनीतिक दलों के लिए यह क्षेत्र काफी महत्त्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए चुनाव से ठीक पहले हुई हरविंदर की हत्या ने राजनीतिज्ञों को हिला कर रख दिया. धरनेप्रदर्शनों में बेकाबू होती जनता को देख कर पुलिस की अतिरिक्त टुकडि़यां बुलाई गईं. जब आईजी (बठिंडा जोन) एम.एफ. फारुकी ने भीड़ को आश्वासन दिया कि हत्यारों को जल्दी ही पकड़ लिया जाएगा, तब जा कर भीड़ का आक्रोश कम हुआ. पुलिस पर हरविंदर की हत्या का दबाव था, इसलिए वह फूंकफूंक कर कदम रख रही थी. जरा सी लापरवाही कोई बड़ा बवाल खड़ा कर सकती थी. पुलिस ने इस मामले को सुलझाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. पूरे इलाके में खबरियों का जाल फैला दिया गया था.

क्राइम सीन किया रीक्रिएट क्राइम सीन को कई बार रीक्रिएट किया गया. हरविंदर के परिवार में मात्र 4 लोग थे. खुद हरविंदर, पत्नी किरनदीप कौर, 14 वर्षीय बेटा मनदीप सिंह और 76 वर्षीय पिता कुलदीप सिंह. पिता कुलदीप सिंह को कम सुनाई और कम दिखाई देता था. हरविंदर सिंह का छोटा भाई जसविंदर सिंह कोठी के पीछे बने पशुओं के बाड़े में रहता था. घर का कोई भी सदस्य हरविंदर के काम और उस की बातों में दखलंदाजी नहीं करता था. पुलिस ने हरविंदर के फोन की काल डिटेल्स भी खंगाली, पर उस में कोई संदिग्ध बात दिखाई नहीं दी. क्षेत्र के हिस्ट्रीशीटरों और सुपारी किलर्स से भी पूछताछ की गई, पर इस हत्याकांड के 2 दिन गुजर जाने के बाद भी पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा.

ज्योंज्यों चुनाव के दिन नजदीक आ रहे थे, पुलिस पर जनता और राजनैतिक पार्टियों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था. पुलिस अभी तक यह पता नहीं लगा पाई थी कि हरविंदर के साथ शराब पीने वाले 3 लोग कौन थे. पुलिस बारबार किरनदीप कौर के बयानों में सचझूठ तलाशने में लगी हुई थी. किरनदीप के बयान पुलिस को संदेहास्पद लग रहे थे. लेकिन समय की नजाकत को देखते हुए पुलिस उस पर कोई सख्ती नहीं कर सकती थी. हरविंदर की हत्या का मामला पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया था. इस केस को ट्रेस करने के लिए पुलिस की 12 टीमें लगी हुई थीं. एसएसपी डा. नानक सिंह खुद इस केस का सुपरविजन कर रहे थे. अचानक पुलिस को आशा की एक किरण दिखाई दी.

दरअसल, पुलिस को पता चला कि मृतक हरविंदर की पत्नी किरनदीप और मानसा निवासी संदीप के पिछले कई सालों से अवैध संबंध हैं. वैसे भी पुलिस को शुरू से ही यह मामला राजनीति से अलग लग रहा था. संदीप का नाम सामने आने से अब यह बात भी स्पष्ट हो गई कि हरविंदर की हत्या में कहीं न कहीं उसी की पत्नी का हाथ होना संभव है. किरनदीप ने अपने एक बयान में कहा था कि 3 लोग उस के घर आए थे और हरविंदर उन के साथ शराब पीने ढाबे पर गया था. लेकिन सीसीटीवी फुटेज में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई थी. यहीं से यह बयान संदेह के दायरे में आ गया था. वैसे भी किरनदीप के बयानों में काफी झोल था और वह बारबार अपना बयान बदल भी रही थी.

किरनदीप ने खोला हत्या का राज आखिर 13 सितंबर को पुलिस ने किरनदीप कौर को हिरासत में ले कर जब सख्ती से पूछताछ की तो उस ने हत्या का खुलासा करते हुए बताया कि उस ने अपने प्रेमी संदीप के साथ मिल कर अपने पति हरविंदर की हत्या को अंजाम दिया था. किरनदीप के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने आननफानन में उसी दिन उसे अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. किरनदीप की निशानदेही पर पुलिस ने मारी गांव से 37 वर्षीय माखन राम, 26 वर्षीय चमकौर सिंह और भैनी गांव से 26 वर्षीय जेमल सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

इस हत्याकांड का मुख्य आरोपी यानी किरनदीप कौर का प्रेमी संदीप पुलिस से बच निकला था. उसे किरनदीप और बाकी लोगों के पकड़े जाने की खबर लग गई थी. 4 लोगों की गिरफ्तारी के बाद आईजी एम.एफ. फारुकी और एसएसपी डा. नानक सिंह ने एक प्रैसवार्ता कर इस बात को स्पष्ट किया कि हरविंदर हत्याकांड में कोई भी राजनीतिक ऐंगल नहीं था. बता दें कि सीनियर आप नेताओं ने हिंदा की हत्या के मामले में पुलिस पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा था कि यह सोचीसमझी राजनीतिक साजिश के तहत की गई हत्या है. आप ने इसी के साथ राज्य में निकाय चुनाव रद्द कराने की मांग भी की थी और धरनेप्रदर्शन कर के माहौल खराब करने का भी प्रयास किया था.

पुलिस ने यह भी खुलासा किया कि किरनदीप ने 6 महीने पहले भी अपने पति की हत्या की कोशिश की थी. लेकिन जिन लोगों से उस ने मदद मांगी थी, उन्होंने हत्या करने से इनकार कर दिया था. पुलिस ने इस बात का भी खुलासा किया था कि किरनदीप के ड्राइवर संदीप कुमार के साथ अवैध संबंध थे और वह उस से शादी करना चाहती थी, इसलिए उस ने 3 कौन्ट्रैक्ट किलर्स को पति की हत्या के लिए 50-50 हजार रुपए दिए थे. तांत्रिक से भी बनाए संबंध किरनदीप ने बताया कि पति को उस के अवैध संबंधों के बारे में पता चल गया था. जिस की वजह से घर में झगड़ा रहने लगा था. घर में क्लेश दूर करने के लिए वह माड़ी निवासी तांत्रिक बाबा मक्खन राम के पास जाने लगी थी. इस दौरान उस के बाबा मक्खन राम से भी संबंध बन गए थे.

उस ने संदीप के कहने पर मक्खन बाबा से हरविंदर को मरवाने की बात की थी. बाबा ने अपने चेले चमकौर सिंह कोरी, निवासी माड़ी व जैमल सिंह, निवासी भैणी को 50-50 हजार रुपए का लालच दे कर हरविंदर की हत्या करने के लिए तैयार कर लिया था. साजिश के तहत किरनदीप कौर ने पति को अंडे के आमलेट में नशीली दवा मिला कर खिला दी थी. खाना खाने के बाद शराब और गोलियों के नशे से वह बेसुध हो गया था. उस के बेहोश होने पर किरनदीप कौर ने तीनों को फोन कर के घर बुला लिया था. उन्होंने तकिए से मुंह बंद कर के हरविंदर की हत्या कर दी और बाद में हौकी स्टिक से वार कर के उसे घायल कर दिया था.

हत्या करने के बाद तीनों हत्यारे चुपचाप घर से निकल गए थे. योजना के अनुसार सुबह उठ कर किरनदीप ने पति की हत्या की बात कह कर शोर मचा दिया था. आरोपियों की निशानदेही पर मोटरसाइकिल व हौकी भी पुलिस ने बरामद कर ली थी. प्रैसवार्ता के दौरान ही एसएसपी डा. नानक सिंह ने बताया था कि पुलिस को शुरू से ही यह बात हजम नहीं हो रही थी कि मात्र 3 लोगों ने हरविंदर जैसे आदमी की हत्या की होगी. क्योंकि हरविंदर कबड्डी का नैशनल लेवल का खिलाड़ी था, इसलिए वह आधा दरजन लोगों पर भी भारी पड़ सकता था. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस की पत्नी ने पुलिस को झूठा बयान दिया और पुलिस ने प्रत्येक ऐंगल से इस की जांच शुरू कर दी. इसी दौरान पुलिस के हाथ कुछ ऐसे ठोस सुराग मिले, जिस से शक की सुई पूरी तरह से उस की पत्नी किरनदीप कौर की ओर घूम गई थी.

किरनदीप और उस के प्रेमी संदीप ने हरविंदर की हत्या के लिए बड़ा उचित समय चुना था. उन्हें इस बात की पूरी उम्मीद थी कि चुनाव के दिनों में हरविंदर की हत्या को राजनीतिक हत्या कहा जाएगा और उन की ओर किसी का ध्यान नहीं जा पाएगा. पर किरनदीप के बारबार बयान बदलने से पूरा मामला सामने आ गया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद इस हत्याकांड से जुड़े चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत के आदेश पर सभी को जिला जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का मुख्य आरोपी और किरनदीप कौर का प्रेमी ड्राइवर संदीप कुमार गिरफ्तार नहीं हो सका था. पुलिस उसे बड़ी सरगर्मी से तलाश कर रही थी. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Stories : 20 साल में एक-एक कर 5 कत्ल करने वाला कातिल

Crime Stories : उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मुरादनगर से सटा गांव है बसंतपुर सैंथली. यहां भी तेजी से शहरीकरण के चलते जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं. बिल्डर आते हैं, किसानों को लुभाते हैं और उस भाव में खेतीकिसानी की जमीनों के सौदे करते हैं, जिस की उम्मीद किसानों ने कभी सपने में भी नहीं की होती. एक बीघा के 50 लाख से ले कर एक करोड़ रुपए सुन कर किसानों का मुंह खुला का खुला रह जाता है कि इतना तो वे सौ साल खेती कर के भी नहीं कमा पाएंगे. और वैसे भी आजकल खेतीकिसानी खासतौर से छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है.

लिहाजा वे एकमुश्त मिलने वाले मुंहमांगे दाम का लालच छोड़ नहीं पाते और जमीन बेच कर पास के किसी कसबे में बस जाते हैं. इसी गांव का एक ऐसा ही किसान है 48 वर्षीय लीलू त्यागी, जिस के हिस्से में पुश्तैनी 15 बीघा जमीन में से 5 बीघा जमीन आई थी. बाकी 10 बीघा 2 बड़े भाइयों सुधीर त्यागी और ब्रजेश त्यागी के हिस्से में चली गई थी. जमीन बंटबारे के बाद तीनों भाई अपनीअपनी घरगृहस्थी देखने लगे और जैसे भी हो खींचतान कर अपने घर चलाते बच्चों की परवरिश करने लगे. बंटवारे के समय लीलू की शादी नहीं हुई थी, लिहाजा उस पर घरगृहस्थी के खर्चों का भार कम था.

गांव के संयुक्त परिवारों में जैसा कि आमतौर पर होता है, दुनियादारी और रिश्तेदारी निभाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, इसलिए भी लीलू बेफिक्र रहता था और मनमरजी से जिंदगी जीता था. साल 2001 का वह दिन त्यागी परिवार पर कहर बन कर टूटा, जब सुधीर अचानक लापता हो गए. उन्हें बहुत ढूंढा गया पर पता नहीं चला कि उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया. कुछ दिनों की खोजबीन के बाद त्यागी परिवार ने तय किया कि उन की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी जाए. लेकिन इस पर लीलू बड़ेबूढ़ों के से अंदाज में बोला, ‘‘इस से क्या होगा. उलटे हम एक नई झंझट में और फंस जाएंगे.

पुलिस तरहतरह के सवाल कर हमें परेशान करेगी. हजार तरह की बातें समाज और रिश्तेदारी में होंगी. उस से तो अच्छा है कि उन का इंतजार किया जाए. हालांकि वह किसी बात को ले कर गुस्से में थे और मुझ से यह कह कर गए थे कि अब कभी नहीं आऊंगा.’’

परिवार वालों को लीलू की सलाह में दम लगा. वैसे भी अगर सुधीर के साथ कोई अनहोनी या हादसा हुआ होता तो उन की लाश या खबर मिल जानी चाहिए थी और वाकई पुलिस क्या कर लेती. वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो घर का रास्ता भूल जाएं.  यह सोच कर सभी ने मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया.  उन्हें चिंता थी तो बस उन की पत्नी अनीता और 2 नन्हीं बेटियों पायल और पारुल की, जिन के सामने पहाड़ सी जिंदगी पड़ी थी. यह परेशानी भी वक्त रहते दूर हो गई, जब गांव में यह चर्चा शुरू हुई कि अब सुधीर के आने की तो कोई उम्मीद रही नहीं, अनीता कब तक उस की राह ताकती रहेगी. इसलिए अगर लीलू उस से शादी कर ले तो उन्हें सहारा और बेटियों को पिता मिल जाएगा. घर की खेती भी घर में रहेगी.

गांव और रिश्ते के बड़ेबूढ़ों का सोचना ऐसे मामले में बहुत व्यावहारिक यह रहता है कि जवान औरत कब तक बिना मर्द के रहेगी. आज नहीं तो कल उस का बहकना तय है इसलिए बेहतर है कि अगर देवरभाभी दोनों राजी हों तो उन की शादी कर दी जाए. बात निकली तो जल्द उस पर अमल भी हो गया. एक सादे समारोह में लीलू और अनीता की शादी हो गई जो कोई नई बात भी नहीं थी. क्योंकि गांवों में ऐसी शादियां होना आम बात है, जहां देवर ने विधवा भाभी से शादी की हो. इतिहास भी ऐसी शादियों से भरा पड़ा है. देखते ही देखते अपने देवर की पत्नी बन अनीता विधवा से फिर सुहागन हो गई और वाकई में पारुल और पायल को चाचा के रूप में पिता मिल गया.

इस के बाद तो बड़े भाई सुधीर की जमीन भी लीलू की हो गई. जल्द ही लीलू और अनीता के यहां बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम विभोर रखा गया. घर में सब उसे प्यार से शैंकी कहते थे. कभीकभार जरूर गांव के कुछ लोगों में यह चर्चा हो जाती थी कि चलो जो हुआ सो अच्छा  हुआ, लेकिन कभी सुधीर अगर वापस आ गया तो क्या होगा. मुमकिन है जी उचट जाने से वह साधुसंन्यासियों की टोली में शामिल हो गया हो और वहां से भी जी उचटने के कारण कभी घर आ जाए. फिर अनीता किस की पत्नी कहलाएगी? सवाल दिलचस्प था, जिस का मुकम्मल जबाब किसी के पास नहीं था. पर एक शख्स था जो बेहतर जानता था कि सुधीर अब कभी वापस नहीं आएगा. वह शख्स था लीलू.

5 साल गुजर गए. अब सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही साल 2006 में पारुल की मृत्यु हो गई. घर और गांव वाले कुछ सोचसमझ पाते, इस के पहले ही लीलू ने कहा कि उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था और आननफानन में उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया. गांवों में ऐसे यानी सांप वगैरह के काटे जाने के हादसे भी आम होते हैं, इसलिए कोई यह नहीं सोच पाया कि यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोचसमझ कर की गई हत्या है. और आगे भी त्यागी परिवार में ऐसी हत्याएं होती रहेंगी, जो सामान्य या हादसे में हुई मौत लगेंगी और हैरानी की बात यह भी रहेगी किसी भी मामले में न तो लाश मिलेगी और न ही किसी थाने में रिपोर्ट दर्ज होगी.

इस के 3 साल बाद ही पायल भी रहस्यमय ढंग से गायब हो गई तो मानने वाले इसे होनी मानते रहे. लेकिन अनीता अपनी दोनों बेटियों की मौत का सदमा झेल नहीं पाई और बीमार रहने लगी, जिस का इलाज भी लीलू ने कराया. अब सुधीर की जमीन का कोई वारिस नहीं बचा था, सिवाय अनीता के जो अब हर तरह से लीलू और बड़े होते शैंकी की मोहताज रहने लगी थी. लीलू की तो जान ही अपने बेटे में बसती थी और वह उसे चाहता भी बहुत था. लेकिन यह नहीं देख पा रहा था कि उस के लाड़प्यार के चलते शैंकी गलत राह पर निकल पड़ा है. और देख भी कैसे पाता क्योंकि वह खुद ही एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था, जिसे कलयुग का महाभारत कहा जा सकता है और वह उस का धृतराष्ट्र है, जो पुत्र मोह में अंधा हो गया था.

इसी अंधेपन का नतीजा था कि बीती 9  जुलाई को लीलू गाजियाबाद के सिहानी गेट थाने में पुलिस वालों के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था कि शैंकी मेरा इकलौता बेटा है, आप जितने चाहो पैसे ले लो लेकिन उसे छोड़ दो. बेटा छूट जाए, इस के लिए वह 10 लाख रुपए देने को तैयार था. लेकिन जुर्म की दुनिया में दाखिल हो चुके बिगड़ैल शैंकी ने जुर्म भी मामूली नहीं किया था, लिहाजा उस का यू छूटना तो नामुमकिन बात थी. दरअसल, शैंकी ने केन्या की एक लड़की, जिस का नाम रोजमेरी वाजनीरू है, से 7 जुलाई को 12 हजार रुपए नकद और एक मोबाइल फोन लूटा था. रोजमेरी से उस का संपर्क सोशल मीडिया के जरिए हुआ था.

जब वह दिल्ली आई तो शैंकी बहाने से उसे अपनी कार में बैठा कर गाजियाबाद ले गया और हथियार दिखा कर लूट की इस वारदात को अंजाम दिया. दूसरे दिन सुबह रोजमेरी ने सिहानी गेट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तो शैंकी पकड़ा गया. वारदात में उस का साथ देने वाला शुभम भी गिरफ्तार किया गया था. वह भी मुरादनगर का रहने वाला है. दोनों से वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार, 11 हजार रुपए नकद और वह कार भी बरामद की गई थी, जिस में बैठा कर रोजमेरी से लूट की गई थी. कुछ दिनों बाद दोनों को अदालत से जमानत मिल गई थी. लेकिन अब खुद जेल में बंद लीलू को जमानत मिल पाएगी, इस में शक है. क्योंकि उस के गुनाहों के आगे तो बेटे का गुनाह कुछ भी नहीं.

बीती 24 सितंबर को लीलू को गाजियाबाद पुलिस ने अपने भतीजे रेशू की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया तो सख्ती से पूछताछ में उस ने खुलासा किया कि उस ने कोई एकदो नहीं बल्कि 20 साल में एकएक कर 5 हत्याएं की हैं. और ये पांचों ही उस के खून के रिश्तेदार हैं. यह सुन कर पुलिस वालों के मुंह तो खुले के खुले रह गए, साथ ही जिस ने भी सुना उस के भी होश उड़ गए कि कैसा कलयुग आ गया है, जिस में जमीन के लालच में एक सगे भाई ने दूसरे सगे बड़े भाई और 2 भतीजियों जो अनीता से शादी के बाद उस की बेटियां हो गई थीं, सहित 2 सगे भतीजों को भी इतनी साजिशाना और शातिराना तरीके से मारा कि किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ.

रेशू की हत्या के आरोप में वह कैसे पकड़ा गया, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले की 4 हत्याएं उस ने कैसे की थीं. इन में से 2 का जिक्र ऊपर किया जा चुका है. अपने बड़े भाई सुधीर की हत्या लीलू ने एक लाख की सुपारी दे कर मेरठ में करवाई थी और लाश को नदी में बहा दिया था. इसलिए अनीता से शादी करने के बाद वह बेफिक्र था कि सुधीर आएगा कहां से, उसे तो मौत की नींद में वह सुला चुका है  यह कातिल कितना खुराफाती है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 20 साल पहले ही अपने गुनाहों की स्क्रिप्ट लिख चुका था और हरेक कत्ल के बाद किसी को शक न होने पर उस के हौसले बढ़ते जा रहे थे.

जब शैंकी पैदा हुआ तो उसे लगा कि सुधीर की जमीन उस की बेटियों के नाम हो जाएगी, लिहाजा पहले उस ने पारुल को खाने में जहर दे कर मारा और फिर पायल की भी हत्या कर उस की लाश को नदी में बहा दिया. इस दौरान जमीनजायदाद का धंधा करने के लिए उस ने अपने हिस्से की जमीन बेच दी और मुरादनगर थाने के सामने एक आलीशान मकान भी बनवा लिया. जब इस निकम्मे और लालची से दलाली का धंधा नहीं चला तो उस की नजर दूसरे भाई ब्रजेश की जमीन पर जा टिकी. उसे लगा कि अगर ब्रजेश और उस के बेटों व पत्नी को भी इसी तरह ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की ढाई करोड़ की जमीन भी उस की हो जाएगी.

नेकी तो नहीं बल्कि बदी और पूछपूछ की तर्ज पर उस ने साल 2013 में  ब्रजेश के छोटे बेटे 16 वर्षीय नीशू की भी हत्या कर लाश नदी में बहा दी और अपनी गोलमोल बातों से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से ब्रजेश को रोक लिया था. यह उस के द्वारा की गई चौथी हत्या थी. अब तक उसे समझ आ गया था कि और साल, 2 साल या 4 साल लगेंगे, लेकिन जमीन तो उस की हो ही जाएगी. असल में वह चाहता था कि पूरे कुटुंब की जमीन उस के बेटे शैंकी को मिल जाए, जिस से उसे जिंदगी में मेहनत ही न करनी पड़े जैसे कि उसे नहीं करनी पड़ी थी. जाहिर है रेशू की हत्या के बाद वह ब्रजेश और उन की पत्नी को भी ऊपर पहुंचा देने का मन बना चुका था.

ब्रजेश का बेटा 24 वर्षीय रेशू बीती 8 अगस्त को गायब हो गया था. यह उन के लिए एक और सदमे वाली बात थी. क्योंकि नीशू को गुजरे 8 साल बीत गए थे, अब रेशू ही उन का आखिरी सहारा बचा था जिस की सलामती के लिए वे दिनरात दुआएं मांगा करते थे. लेकिन यह अंदाजा दूसरों की तरह उन्हें भी नहीं था कि परिवार को डसने वाला सांप आस्तीन में ही है. लीलू ने इस बाबत और लोगों को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया था. उस ने योजना के मुताबिक रेशू को फोन कर गांव के बाहर मिलने बुलाया और घूमने चलने के बहाने कार में बैठा लिया. इस आई ट्वेंटी कार में इन दोनों के अलावा विक्रांत, सुरेंद्र त्यागी, राहुल और लीलू का भांजा मुकेश भी मौजूद थे.

चलती कार में ही इन लोगों ने रेशू की हत्या रस्सी और लोहे की जंजीर से गला घोंट कर दी और उसे सीट पर जिंदा लोगों की तरह बिठा कर बुलंदशहर की तरफ चल पड़े. कहीं किसी को शक न हो जाए, इसलिए कुछ दूर जंगल में इन्होंने रेशू की लाश को कार की डिक्की में डाल दिया. असल काम हो चुका था, बस लाश और ठिकाने लगाना बाकी था. इस के लिए मूड बनाने इन लोगों ने बुलंदशहर में विक्रांत के ट्यूबवैल पर जोरदार पार्टी की. जब रात गहराने लगी तो इन वहशियों ने रेशू की लाश को एक बोरे में ठूंसा और पहासू इलाके में ले जा कर गंगनहर में बहा दिया. इस के बाद सभी अपनेअपने रास्ते हो लिए. आरोपियों में से सुरेंद्र त्यागी हापुड़ का रहने वाला है और पुलिस में दरोगा पद से रिटायर हुआ है जबकि राहुल उस का नौकर था.

लीलू ने सुरेंद्र को रेशू की हत्या की सुपारी दी थी, जिस ने बुलंदशहर के आदतन अपराधी विक्रांत को भी इस वारदात में शामिल कर लिया था.  इन दोनों का याराना विक्रांत के एक जुर्म में जेल में बंद रहने के दौरान हुआ था. लीलू ने हत्या के एवज में 4 लाख रुपए नकद दिए थे और बाकी बाद में एक बीघा जमीन बेचने के बाद देने का वादा किया था. रेशू के लापता होने के बाद ब्रजेश ने बेटे को काफी खोजा और फिर थकहार कर 15 अगस्त को मुरादनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि लीलू ने इस बार भी उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से क्या फायदा होगा. लेकिन फायदा हुआ. 24 सितंबर को वह पकड़ा गया और अपने साथियों सहित जेल में है. लीलू इत्तफाकन पकड़ा गया, नहीं तो पुलिस भी हार मान चुकी थी कि अब रेशू नहीं मिलने वाला.

पुलिस के पास रेशू को ढूंढने का कोई सूत्र नहीं था, सिवाय इस के कि उस के और लीलू के फोन की लोकेशन एक ही जगह की मिल रही थी, जो उसे हत्यारा मानने के लिए पर्याप्त नहीं था. लेकिन इनवैस्टीगेशन के दौरान एक औडियो रिकौर्डिंग पुलिस के हत्थे लग गई, जिस में लीलू रेशू की हत्या का प्लान बाकी चारों में से किसी को बता और समझा रहा था. फिर उस ने 5 हत्याओं की बात कुबूली. हत्याओं में 2-3 साल का गैप वह इसीलिए रखता था कि हल्ला न मचे और लोग पिछली हत्या का दुख भूल जाएं. पुलिस हिरासत में लीलू कभी यह कहता रहा कि उसे उन हत्याओं का कोई मलाल नहीं. तो कभी यह कहता रहा कि सजा भुगतने के बाद वह भाईभाभी की सेवा कर प्रायश्चित करना चाहता है.

हैरानी की बात सिर्फ यह है कि 5 हत्याओं का यह गुनहगार लीलू जेल से छूट जाने की उम्मीद पाले बैठा है. वह शायद इसलिए कि 5 में से एक भी लाश बरामद नहीं कर सकी. लेकिन अब लोगों की मांग है कि ऐसे आस्तीन के सांप का जिंदा रहना ठीक नहीं है, लिहाजा उसे फांसी की सजा मिलनी चहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह जरूर एक बड़ी कानूनी खामी साबित होगी. Crime Stories