Crime Stories: एक और निर्भया

लेखक – कस्तूरी रंगाचारी    

Crime Stories: बलात्कार अक्षम्य अपराध है, लेकिन कभीकभी हकीकत जानने के बाद भी लोग इसे छिपाने की कोशिश करते हैं. इस से बलात्कारियों के हौसले बढ़ते हैं. विद्या के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था, लेकिन…

कालेज से आते ही मैं ने और भइया ने मम्मी को परेशान करना शुरू कर दिया था. हम ने उन से गरमगरम पकौड़े बनाने के लिए कहा था. मम्मी पकौड़े बनाने की तैयारी कर रही थीं, तभी नीचे से तेजतेज आती आवाजें सुनाईं दीं.

‘‘ये कैसी आवाजें आ रही हैं?’’ कहते हुए रमेश भइया बालकनी की ओर भागे. उन के पीछेपीछे मैं और मम्मी भी बालकनी में आ गए. हम ने देखा, हमारी बिल्डिंग के नीचे एक जीप खड़ी थी, जिस से 4 लोग आए थे. वे स्वाति दीदी के फ्लैट के बाहर खड़े उन्हें धमका रहे थे. वे शक्लसूरत से ही गुंडेमवाली लग रहे थे. दरवाजा बंद था. इस का मतलब वह अंदर थीं, क्योंकि अब तक उन के औफिस से आने का समय हो गया था. यह बात पक्की थी कि वह उन गुंडों की धमकी को सुन रही थीं. कुछ देर तक नीचे से धमकाने के बाद भी जब दीदी बाहर नहीं आईं तो उन्हें लगा कि अब उन्हें उन के सामने आ कर धमकाना चाहिए. वे सीढि़यां चढ़ने लगे. उन के जूतों की आवाज स्वाति दीदी के दरवाजे की ओर बढ़ रही थी.

रमेश दरवाजे की ओर बढ़ तो मैं भी उस के पीछेपीछे चल पड़ी. मैं ने पीछे से पुकारा, ‘‘तुम दोनों कहां जा रहे हो?’’

‘‘वे सभी स्वाति दीदी के फ्लैट के सामने आ गए हैं,’’ रमेश ने हैरानी से कहा, ‘‘वह घर में अकेली होंगी. हमें उन की मदद के लिए जाना चाहिए, पता नहीं वे लोग क्या चाहते हैं? उन की बातों से साफ लग रहा है कि वे किसी अच्छे काम के लिए नहीं आए हैं.’’

‘‘तो क्या तुम दोनों उन गुंडेमवालियों से निपट लोगे?’’ मम्मी ने कहा.

‘‘भले ही निपट न पाएं, पर इन स्थितियों में कुछ तो करना ही होगा. हम घर में बैठ कर तमाशा तो नहीं देख सकते.’’ रमेश ने कहा.

मम्मी हमें रोक पातीं, इस से पहले ही हम दोनों दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. जीप से आए चारों आदमी स्वाति दीदी के दरवाजे के सामने खड़े हो कर दरवाजा खोलने के लिए कह रहे थे. उन का सरगना दरवाजे पर ठोकर मारते हुए कह रहा था. ‘‘जल्दी दरवाजा खोल कर बाहर आओ, वरना हम दरवाजा तोड़ देंगे.’’

‘‘हमारे नेता को बदनाम करने का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’ उस के पीछे खड़े दूसरे आदमी ने कहा.

अब तक मैं और रमेश वहां पहुंच चुके थे. रमेश ने कहा, ‘‘तुम लोग यहां क्या कर रहे हो, क्यों इतना शोर मचा रखा है?’’

उन में से एक आदमी ने पलट कर रमेश को घूरते हुए कहा, ‘‘तू अपना काम कर न, क्यों बेकार में बीच में पड़ रहा है.’’

रमेश भइया कुछ कहते, तब तक स्वाति दीदी का दरवाजा खुल गया. मैं ने उन की ओर देखा सलवार सूट पहने वह आराम से दरवाजे पर खड़ी थी. उस स्थिति में भी उन के चेहरे पर शांति झलक रही थी, साफ लग रहा था कि उन्हें इन लोगों से जरा भी डर नहीं लग रहा है. वह उन गुंडों की ओर देखते हुए मुसकरा रही थी. दरवाजे पर दीदी को देख कर उन चारों में से एक आदमी ने आगे आ कर कहा, ‘‘आप ने हमारे नेता का अपमान किया है, सरेआम उन की खिल्ली उड़ाई है. अब उस का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही होगा.’’

स्वाति दीदी उसी तरह खामोशी से खड़ी उन्हें देख रही थीं. उस आदमी की बात पूरी  होते ही उन्होंने पूछा, ‘‘कौन हैं तुम्हारे नेताजी, जिन का मैं ने अपमान कर दिया है?’’

‘‘मूलचंदजी, जिन्होंने कल रेप वाले मामले में बयान दिया था.’’

रेप की बात सुन कर मुझे लगा, जैसे किसी ने गरम सलाख मेरे शरीर पर रख दी हो. मन किया, यहां से चली जाऊं, लेकिन उस समय स्वाति दीदी उन चारों से घिरी थीं, इसलिए मजबूरन मुझे रुकना पड़ा. स्वाति दीदी ने बहुत ही ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा तो तुम लोग मूलचंद के आदमी हो.’’

‘‘जी. अब तुम्हें उन से माफी मांगनी होगी.’’

‘‘माफी किस बात की?’’

‘‘जब हमारे नेताजी ने कहा कि जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ, वह खुद इस के लिए जिम्मेदार थी, तो तुम ने हमारे नेताजी को गलत बताया. उस के बाद से सारे चैनल तुम्हारी इसी बात को बारबार दोहरा रहे हैं, जिस से हमारे नेताजी झूठे साबित हो रहे हैं. अखबारों ने इसे प्रमुखता से छापा है.’’

‘‘उन्होंने जो कहा, वह गलत था, इसलिए मैं ने विरोध किया है.’’

‘‘उन के खिलाफ मीडिया में बयान दे कर तुम ने हमारे नेता का अपमान नहीं किया?’’

‘‘मैं ने उन का अपमान नहीं किया, बल्कि उन्हें सही राह दिखाई है. 15 साल की लड़की के साथ बलात्कार हुआ है, जो दसवीं में पढ़ रही थी. उस समय वह ट्यूशन पढ़ कर घर आ रही थी. शाम के 5 बज रहे थे, दिनदहाड़े उन लोगों ने उस का अपहरण कर लिया और सुनसान में ले जा कर उस के साथ बलात्कार किया. ऐसे में उस बच्ची की गलती कैसे कही जा सकती है?’’

एक 15 साल की लड़की, जो स्कूल में पढ़ रही थी, उस के साथ बलात्कार हुआ था. वह मुझ से केवल एक साल छोटी थी. मुझे लगा, एक बार फिर वह गरम सलाखें मेरे शरीर पर रख दी गईं. मेरे मुंह से कुछ निकलने वाला था कि मैं ने मुंह पर अपना हाथ रख लिया. स्वाति दीदी ने हैरानी से मेरी ओर देखा, ‘‘बेटा, क्या बात है?’’

मैं ने एक आदमी को हटाते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं दीदी, मुझे घर जाना चािहए.’’

मैं अपने फ्लैट की ओर बढ़ी. मैं दरवाजे के पास पहुंची ही थी कि मैं ने सुना, स्वाति दीदी कह रही थीं, ‘‘क्या तुम्हारी कोई बहन स्कूल नहीं जाती है? उस के साथ ऐसा हो जाए तो? वैसे मैं तुम्हें बता दूं कि मैं ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया है.’’

मैं घर आई तो मम्मी काफी शांत थीं. मुझे पता था कि पापा आएंगे तो वह हमारी शिकायत जरूर करेंगी कि हम लोगों ने उन की बात नहीं मानी और उन के मना करने के बाद भी हम स्वाति दीदी की मदद करने चले गए. जबकि वे गुंडे थे. मैं उन की ओर ध्यान दिए बगैर अपने कमरे में चली गई. रमेश मेरे आने के एक घंटे बाद आया. उस के आते ही मैं ने पूछा, ‘‘पुलिस आ गई थी?’’

‘‘नहीं, पुलिस नहीं आई. स्वाति दीदी ने पुलिस बुलाई ही कहां थी. वह तो उन्होंने गुंडों को सिर्फ डराने के लिए कहा था.’’ रमेश ने स्वाति दीदी की बुद्धि की सराहना करते हुए कहा, ‘‘जैसे ही उन्होंने पुलिस का नाम लिया, चारों गुंडे तुरंत भाग निकले थे.’’

रमेश ने बताया कि उन गुंडों के जाने के बाद स्वाति दीदी उसे अपने फ्लैट में ले गई थीं.

खूबसूरत और शांत स्वभाव की स्वाति दीदी 2 महीने पहले ही हमारे पड़ोस वाले फ्लैट में रहने आई थीं. रमेश उन से बहुत प्रभावित था, मुझे भी वह पसंद थीं. बातचीत से ही वह पढ़ीलिखी और बुद्धिमान लगती थीं. रमेश अपने और स्वाति दीदी के बीच हुई बातचीत बताने को बेचैन था. उस ने कहा, ‘‘जानती हो वह वकील और एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह एक ऐसी सामाजिक संस्था की सदस्य हैं, जो रेप की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने का काम करती है. इस के अलावा वह रेप की शिकार मासूमों को समाज में उन का स्थान दिलाने में भी मदद करती हैं. उन की संस्था का नाम है ए सेकेंड लाइफ यानी एएसएल.’’

थोड़ी खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘रेप महिलाओं के साथ होने वाला सब से खतरनाक अपराध है. लेकिन इस बात को समझ कर रेप की शिकार मासूमों की काउंसलिंग करा कर उन में आत्मविश्वास वापस लाने में मदद करने के बजाय हम उन के बारे में अफवाहें फैला कर उन्हें बदनाम करते हैं.’’

‘‘रमेश, मुझे तुम्हारी इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’ कह कर मैं ने उसे चुप कराना चाहा, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करे. लेकिन रमेश ने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया. उस ने कहा, ‘‘एएसएल के सदस्य पीडि़त के साथ खड़े हो कर उस के जीवन को फिर से सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं. हम सभी को भी यह काम करना चाहिए.’’

रमेश क्षण भर के लिए रुका. उसी बीच मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मैं ने कहा न, इन बातों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. रेप कितने शर्म की बात है.’’

रमेश ने जैसे मेरी बात सुनी ही नही. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं भी एएसएल का सदस्य बनने की सोच रहा हूं.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी रेप पीडि़तों की मदद करना चाहते हो? लगता है स्वाति दीदी से तुम्हें कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है?’’ मैं ने कहा, ‘‘ओह माई गौड! रमेश, वह उम्र में तुम से काफी बड़ी हैं. तुम उन्हें दीदी कहने के बजाय उन का नाम ले रहे हो. मालूम है न, वह तुम से कम से कम 8 या 9 साल बड़ी होंगी?’’

‘‘उम्र का इस मामले से क्या संबंध?’’ रमेश जोर से हंसा, ‘‘उम्र तो एक गिनती है.’’

इस तरह मैं ने बात का रुख स्वाति दीदी की ओर मोड़ दिया और रेप की बात समाप्त करने में कामयाब हो गई. लेकिन अपने मन से इस बात को नहीं निकाल सकी कि जब पापा को इस बारे में पता चलेगा तो वह हमें डाटेंगे जरूर, क्योंकि हम ने ऐसे मामले में टांग अड़ाई थी, जिस का संबंध हम लोगों से बिलकुल नहीं था. हम ने खुद को खतरे में डाला था लेकिन न जाने क्या सोच कर मम्मी ने इस मामले में हम बहनभाई को बचा लिया था. मुझे रमेश पर खतरा मंडराता दिखाई देर रहा था. अब वह अक्सर स्वाति दीदी के घर जाने लगा था. वह उन के घर घंटों बैठा रहता. एएसएल की बैठकों में भी जाने लगा था. उस की इन हरकतों का मम्मीपापा में से किसी को पता नहीं था.

कभी आने में देर हो जाती तो वह कोई न कोई कहानी सुना देता, कभी कहता कि वह अपने किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में चला गया था तो कभी किसी सहपाठी की बीमारी का बहाना बना देता. उस के इन बहानों पर मुझे यह सोच कर कोफ्त होती कि बच्चे मातापिता को कितनी आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं. मांबाप को लगता है कि वे अपने बच्चों के बारे में सब कुछ जानते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे अपने बच्चों की असलियत के नजदीक तक नहीं पहुंच पाते. वे अपने असली बच्चों की आदतों, रुचियों, हरकतों के बारे में नहीं जान पाते. एक दिन सारे के सारे न्यूज चैनलों पर एक ही खबर दिखाई जा रही थी कि एक लड़की देर रात जब काम से घर लौट रही थी तो 4 लड़कों ने बस अड्डे से उस का पीछा किया. जब वह सुनसान जगह पर पहुंची तो वे उसे झाडि़यों में खींच ले गए और उस का मुंह बंद कर के उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया.

लेकिन वह बहादुर लड़की निर्भया की तरह थी. इतनी तकलीफ और दर्द में भी उस ने होश नहीं खोया. उस स्थिति में भी उस ने हर एक बलात्कारी की सूरत अपने दिमाग में बैठा लीथी. उस ने यह भी याद रखा कि वे क्या बातें कर रहे थे. उन में से किसी ने अपने साथी को चिंटू कहा तो दूसरे ने उसे डांट कर चुप करा दिया. उन में से एक के गाल पर लंबे घाव का निशान था, जबकि 2 लोगों ने अपने चेहरों पर उस के सामने ही कपड़ा बांधा था, लेकिन उस ने उन का चेहरा अच्छी तरह से देख लिया था. उन लफंगों की मनमरजी से लड़की की हालत बहुत खराब हो गई थी, जब उन्हें लगा कि लड़की बेहोश हो गई है या मर चुकी है, तब उन्होंने किसी जगह का नाम लिया था. उस जगह पर वे तब तक छिपे रहने की बात कर रहे थे, जब तक यह मामला ठंडा नहीं पड़ जाता.

चारों लड़कों के जाने के बाद, लड़की ने हिम्मत बटोरी और लड़खड़ाती हुई किसी तरह पास के एक मकान तक पहुंच गई. उस की हालत देख कर लोगों ने पुलिस बुलाई, जिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया. लड़की ने अपने ऊपर हुए जुल्म की पूरी कहानी विस्तार से सुना दी. साथ ही उन चारों लड़कों के हुलिए बता कर उन की आपस की बातचीत भी बता दी. इस के बाद पुलिस उन चारों की तलाश में लग गई. ऐसा लग रहा था जैसे समाचार चैनल और अखबार वालों के पास दूसरा कोई समाचार ही नहीं था. हर जगह बस उसी लड़की को ले कर हायतौबा मची थी. हर कोई सिर्फ रेप के बारे में ही बातें कर रहा था. स्टूडेंट्स और औरतें प्रदर्शन कर रही थीं, सभाएं कर रही थीं, कैंडल लाइट मार्च निकाले जा रहे थे. बहसें हो रही थीं कि औरतें कैसे सुरक्षित रह सकती हैं.

लोग इस बारे में भी चर्चा कर रहे थे कि क्या रेप करने वालों को फांसी की सजा देनी चाहिए, जिस से इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकें. जैसे ही कोई अभियुक्त पकड़ा जाता, शोरशराबा मचता. धीरेधीरे चारों अभियुक्त पकड़े गए. जैसेजैसे उस लड़की के बारे में टीवी और अखबारों में खबरें आ रही थीं, मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हर कोई इतनी बेशर्मी से क्यों बातें कर रहा था, मेरी समझ में नहीं आ रहा था. स्वाति दीदी की संस्था भी इस मामले में लगी थी. दीदी और रमेश भी लगे हुए थे. एएसएल के सदस्य जुलूस निकाल रहे थे, मीडिया के माध्यम से बयान जारी किए जा रहे थे. अब तक रमेश को लगने लगा था कि वह अपनी हरकतों को मम्मीपापा से छिपा नहीं सकता, इसलिए एक दिन उस ने पापा को बता दिया कि वह एएसएल से जुड़ गया है और उस के कार्यक्रमों में भाग ले रहा है.

पापा ने मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘यह तो अच्छी बात है. सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना ही चाहिए. तुम भी विरोध में भाग लो. इस बुराई के खिलाफ लड़ो और ऐसा बुरा काम करने वालों को सजा दिलवाओ.’’

मैं चुप बैठी रही. पापा को शायद मेरी इस चुप्पी पर हैरानी हुई कि मैं ने यह क्यों नहीं कहा कि रमेश के साथ जाऊंगी. इस की वजह यह थी कि रेप की बात सुन कर मेरा दिमाग घूम जाता था. अगले कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा. यही लग रहा था कि शहर में रेप के अलावा और कोई मुद्दा नहीं है. मैं इस सब से बहुत दूर रहती थी क्योंकि ‘रेप’ शब्द मुझे बीमार सा कर देता था, इसलिए मैं ने अखबार पढ़ना और टीवी देखना भी बंद कर दिया था. मैं उस जगह से हट जाती थी, जहां लोग रेप के बारे में बातें कर रहे होते थे. मैं उस दिन स्कूल भी नहीं गई थी, जिस दिन पुलिस यह बताने आने वाली थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए. मम्मी से मैं ने कह दिया था कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है.

एक शनिवार को रमेश ने मेरे कमरे में आ कर कहा, ‘‘वृंदा जल्दी तैयार हो जा. आज एएसएल एक सेमिनार करवा रहा है और हमें उस में अधिक से संख्या में पहुंचना चाहिए. इसलिए तुम भी चलो.’’

‘‘मैं नहीं जा सकती.’’ मैं ने बड़ी बेरुखी से कहा.

‘‘क्यों नहीं जा सकती भई? मैं देख रहा हूं इधर तुम कुछ बदलीबदली सी रहती हो. पहले तो तुम ऐसे कामों में मेरे साथ बड़े जोशोखरोश से भाग लेती थीं, अब ऐसा क्या हो गया, जो जाने से मना कर रही हो? जबकि यह लड़कियों का ही कार्यक्रम है.’’

‘‘मुझे पढ़ना है.’’

‘‘मुझ से बहाना बनाने की जरूरत नहीं है, तुम आलसी और स्वार्थी हो गई हो. तुम घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहती. किसी के दुख तकलीफ में उस का साथ नहीं देना चाहती.’’

‘‘तुम्हें जो सोचना है सोचते रहो, मुझे नहीं जाना तो नहीं जाना.’’

रमेश मुझे घूरता हुआ गुस्से में तेजी से मेरे कमरे से चला गया. उस पूरे दिन वह घर से बाहर ही रहा. मैं अपने कमरे में अकेली पड़ी रही, अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी, इसलिए सोचा चलो पड़ोस में रहने वाली सहेली के यहां चली जाऊं. जैसे ही मैं दरवाजे से बाहर निकली एक आवाज ने मुझे रोक लिया. स्वाति दीदी अपने दरवाजे पर खड़ी थीं. मैं अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए उन की ओर मुड़ी. उन्होंने कहा, ‘‘वृंदा यहां आओ.’’

‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘दीदी, अभी मैं अपनी एक दोस्त से मिलने जा रही हूं.’’ मैं ने उन से बचने के लिए कहा.

‘‘चली जाना, पहले इधर आओ. आज तुम्हारे सकूल की छुट्टी है ना?’’

मैं मना नहीं कर सकी और चेहरे पर झूठी मुसकान लिए बोझिल कदमों से स्वाति दीदी के घर की ओर बढ़ी. वह बड़े प्यार से मुझे अंदर ले गई. अंदर पहुंच कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम से बात किए हुए काफी समय हो गया. सुनाओ, आजकल क्या चल रहा है, तुम क्या कर रही हो?’’

‘‘कुछ खास नहीं, आजकल आप बहुत व्यस्त हैं न, इसलिए मैं आप के यहां नहीं आई.’’ मैं ने कहा.

लेकिन तुरंत ही मुझे अपने इन शब्दों पर अफसोस हुआ, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करें, पर मैं जो गलती कर गई थी, उस से तय था कि वह उस बात का उल्लेख जरूर करेंगी.

‘‘हां, आजकल मैं थोड़ा व्यस्त हूं. दरअसल वह भयानक रेप था,’’ स्वाति दीदी ने मुझ पर नजरें गड़ा कर कहा, ‘‘लेकिन तुम रेप के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में भाग क्यों नहीं लेती, क्या बात है वृंदा?’’ रमेश कह रहा कि तुम उस दिन स्कूल भी नहीं गई थीं, जिस दिन पुलिस तुम्हारे स्कूल में यह बताने आई थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए?’’

‘‘हां, नहीं गई थी.’’

‘‘क्यों? पुलिस ने जो बातें बताई थीं वे लड़कियों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थीं. उस से लड़कियों को अपनी सुरक्षा करने में मदद मिलेगी.’’

अब मैं चुप नहीं रह सकी. मैं ने कहा, ‘‘सच दीदी, क्या ऐसा हो सकता है? लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर किसी इंसान या लड़के के अंदर छिपा वहशी जानवर किसी औरत या लड़की को नुकसान पहुंचाना चाहे तो ऐसा करने से क्या उसे रोका जा सकता है, क्या वह ऐसा नहीं करेगा?’’

स्वाति दीदी ने मेरी ओर हैरानी से देखा. उस के बाद एकएक शब्द पर जोर देते हुए बोलीं, ‘‘यह सच है कि शारीरिक रूप से पुरुष औरत से अधिक मजबूत होते हैं, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि लड़कियां मजबूर और बेबस हैं. वह यह तो सीख ही सकती हैं कि अपनी सुरक्षा कैसे की जाए? अगर उन में लगन और इच्छाशक्ति है तो वह खुद को वहशी जानवरों से जरूर बचा सकती हैं.’’

‘‘नहीं बचा सकती दीदी. बहादुर से बहादुर और मजबूत से मजबूत लड़की भी ऐसा नहीं कर सकती. कोई और भी कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि हर कोई उसे अपने नीचे दबाना चाहता है.’’

मेरी इन बातों से मेरा डर बाहर आ गया. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैं ने जल्दी से खुद पर काबू पाने की कोशिश की, क्योंकि मुझे पता था कि अगर मैं चुप नहीं हुई तो दीदी को पता चल जाएगा कि मेरे साथ कुछ बुरा हो रहा है. लेकिन न मैं खुद पर काबू रख पाई और न दीदी को मूर्ख बना पाई, क्योंकि ये दोनों ही काम मेरे लिए बहुत मुश्किल थे. मेरी हालत देख कर वह जल्दी से उठ कर मेरे पास आईं और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ? अगर तुम मुझे सब बता दोगी तो तुम्हारे दिल और दिमाग से बोझ हट जाएगा. उस के बाद तुम काफी आराम महसूस करोगी.’’

‘‘नहीं दीदी, मुझे कोई परेशानी नहीं है, मैं ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मैं तो किसी दूसरे के बारे में सोचसोच कर परेशान हूं.’’

‘‘यह सच नहीं है.’’ दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जरूर कुछ हुआ है, जिसे तुम छिपा रही हो. तुम्हारे साथ, जरूर यौन हिंसा जैसा कुछ हुआ है. वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ है?’’

मैं कुछ बोल नहीं सकी, क्योंकि हिचकियां लेले कर रोने से मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. दीदी ने खींच कर मुझे सीने से लगा लिया. वह धीरेधीरे मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘‘मुझे बताओ न वृंदा, क्या बात है? अपनी बात कह कर तुम बहुत शांति महसूस करोगी.’’

मैं ने खड़ी हो कर घबराई आवाज में कहा, ‘‘मुझे अब जाना चाहिए.’’

मैं दरवाजे की ओर बढ़ी, लेकिन आंखों में आंसू होने के कारण मुझे रास्ता दिखाई नहीं दिया, जिस से मैं लड़खड़ा गई. दीदी ने आगे बढ़ कर मेरा हाथ थाम लिया और मुझे सोफे पर बैठा कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारे साथ भी बलात्कार जैसा कुछ हुआ है क्या?’’

अब मैं चुप नहीं रह सकती थी. मैं ने कहा, ‘‘नहीं दीदी, मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेकिन मेरी सब से अच्छी सहेली विद्या, जो मेरी क्लासमेट भी है. उस के साथ रेप हुआ है. एक नहीं, 2 लड़कों ने उस के साथ जबरदस्ती की है.’’

दीदी ने एक लंबी सांस ले कर जल्दी से पूछा, ‘‘कब और कैसे हुआ यह सब?’’

दीदी की प्रतिक्रिया से मुझे डर सा लग रहा था, मैं जल्दी से थूक गटक कर बोली, ‘‘दीदी, यह तीन महीने पहले की बात है. वह दोनों लड़कों में से एक लड़के, जिस का नाम महेश है को जानती थी. वह उस के पड़ोस के फ्लैट में ही रहता था. महेश उस का पड़ोसी ही नहीं था, उस के पिता विद्या के पिता के साथ भागीदारी में कारोबार करते हैं. वह उसे अक्सर छेड़ा करता था. लेकिन इस बात को न महेश के मातापिता जानते थे और न ही विद्या के.’’

‘‘विद्या ने कभी किसी से उस की शिकायत भी नहीं की?’’

‘‘नहीं, उस की चुप्पी ने महेश को हिम्मत बढ़ा दी और एक दिन मौका मिलने पर महेश ने दोस्त के साथ मिल कर उस के साथ जबरदस्ती कर डाली.’’

‘‘यह सब कैसे हुआ?’’ स्वाति दीदी ने पूछा.

अब तक मेरी आंखों के आंसू थम गए थे. मैं उन्हें सब बता देना चाहती थी, जो मेरे अंदर दबा था, वह भी जो अपराधबोध महसूस कर रही थी. मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘उस दिन वह स्कूल से घर आई तो उस के घर में ताला लगा था. उसे इस बात पर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि कभीकभी ऐसा होता रहता था. उस की मम्मी कहीं जाती थी, तो ताला लगा कर चाबी महेश के घर छोड़ जाती थीं. विद्या ने चाबी लेने के लिए महेश के घर की डोरबेल बजा दी, क्योंकि उस समय महेश कालेज में होता था. घर में सिर्फ उस की मां ही होती थी.’’

‘‘लेकिन जब महेश ने दरवाजा खोला तो विद्या को झटका सा लगा. तभी महेश ने पलट कर कहा, ‘मम्मी, विद्या आई है चाबी लेने.’

विद्या को उस की मम्मी की आवाज सुनाई नहीं दी, इस के बावजूद किसी तरह का संदेह नहीं हुआ. महेश अंदर गया और वहीं से बोला, ‘‘विद्या तुम्हें मम्मी बुला रही हैं.’’

विद्या जैसे ही अंदर हौल में आई, महेश ने लपक कर दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा बंद करने की आवाज सुन कर विद्या पलटी. लेकिन अब वह फंस चुकी थी. उस के दिमाग में खतरे की घंटियां बजने लगीं. वह कुछ कर पाती या कहती, इस से पहले ही महेश उस के पास आया और उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘तुम मूर्ख की मूर्ख ही रहीं. तुम्हें बता दूं कि मेरी और तुम्हारी मम्मी दिनभर के लिए बाहर गई हैं. इस वक्त मैं अपने दोस्त के साथ घर में अकेला हूं. तुम उस से मिलोगी? सचिन, जरा यहां तो आना.’’

महेश के मुंह से शराब की बदबू आ रही थी. विद्या ने चीखना चाहा, लेकिन दूसरे लड़के को देख कर उस की चीख गले में घुट कर रह गई. वह हाथ में बीयर की बोतल लिए था यानी वह भी पिए हुए था.  मैं थोड़ी देर के लिए चुप हुई. उस के बाद फिर कहना शुरू किया, ‘‘दोनों लड़कों ने उसी हाल में विद्या के साथ मनमानी की. उस के बाद वे सलाह करने लगे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए. सलाहमशविरे के बाद उन्होंने विद्या के फ्लैट का दरवाजा खोला और उसे अपने फ्लैट से उठा कर उस के फ्लैट में पहुंचा दिया. इस बीच सचिन बाहर खड़ा निगरानी करता रहा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा. बिल्डिंग में हर मंजिल पर 2 ही फ्लैट हैं, इसलिए वे अपने उद्देश्य में आसानी से सफल हो गए.

‘‘विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ कर जाने से पहले महेश ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उसी की बदनामी होगी. पापा का साझे का जो कारोबार है वह भी बंद हो जाएगा. इसलिए उस ने किसी से कुछ नहीं कहा.’’ मैं ने स्वाति दीदी को पूरी बात बता दी.

‘‘जब उस ने तुम्हें यह बात बताई तो तुम ने उसे क्यों नहीं समझाया कि उसे यह बात अपने मातापिता को बता देनी चाहिए?’’ दीदी ने उत्तेजित लहजे में कहा, ‘‘जानती हो, उस के चुप रहने से महेश और सचिन मौका मिलने पर फिर वैसा कर सकते हैं.’’

मैं खामोश बैठी रही. दीदी ने कुछ देर तक मेरे बोलने का इंतजार किया, जब मैं नहीं बोली तो उन्होंने पूछा, ‘‘अब विद्या कैसी है, वह इस सदमे से उबर गई है या अभी उस पर उस का असर है?’’

मैं ने उन के सवाल का जवाब नहीं दिया तो दीदी ने जोर डालते हुए पूछा, ‘‘वृंदा, मुझे बताओ न इस घटना का उस पर क्या असर पड़ा है. वह पहले की तरह पढ़लिख और खेलकूद रही है?’’

मुझे अपना दम घुटता हुआ सा महसूस हुआ. मेरा सिर घूमने लगा और फिर से मेरी आंखों में आंसू बहने लगे. मैं ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘पहले के मुकाबले अब वह काफी चुपचुप रहती है, पढ़ाई में भी उस का ध्यान नहीं लगता. दरअसल, उस दोपहर उस के साथ जो हुआ, उस ने उस के बारे में मुझे बता तो दिया लेकिन साथ ही कहा कि इस बारे में मैं किसी को कुछ न बताऊं. इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया.’’

‘‘और तुम चुप रह गईं,’’ दीदी ने ताना सा मारा, ‘‘तुम ने अपने दोस्त की मदद करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘मैं उस के साथ होने वाली जबरदस्ती के बारे में किसी से कैसे बता सकती थी? सचमुच मैं ने उसे पूरी तरह से बर्बाद होने दिया? मैं ने उस समय भी कुछ नहीं किया, जब मेरे सामने ही उस के साथ दोनों जुर्म ढा रहे थे. मदद करने के बजाय मैं ने शर्म से अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपा लिया था. मदद के लिए गुहार लगाने के बजाय रो रही थी.’’

इस के बाद मैं ने दीदी को आगे की वह शर्मनाक घटना भी सुना दी, ‘‘उस दिन एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए मैं स्कूल से सीधे विद्या के घर गई. उस के दरवाजे का ताला बंद था. वह चाबी लेने बराबर वाले फ्लैट में अंदर गई. मैं बाहर खड़ी हो कर इंतजार करने लगी. पलभर बाद मुझे उस की चीख सुनाई दी. मैं दरवाजे से सट कर खड़ी हो गई. अंदर महेश और सचिन जो बातें कर रहे थे, वे मुझे साफ सुनाई दे रही थीं. मुझे उन के मजे लेने की वे सिसकारियां भी सुनाई दे रही थीं, जो विद्या को नोचतेखसोटते हुए उन के मुंह से निकल रही थीं. मैं ने उन के भद्दे कमेंट्स भी सुने, जो वे विद्या के कपड़े उतारते हुए कर रहे थे.

‘‘मैं इस तरह सकते में आ गई कि मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी. विद्या का विरोध धीरेधीरे कमजोर पड़ता जा रहा था, और फिर उस की आवाज खामोश हो गई. उस के बाद उन्होंने वह सबकुछ किया जो उन्हें करना था.’’

‘‘तुम ने कुछ भी नहीं किया?’’ दीदी ने मरे से स्वर में पूछा, ‘‘तुम ने तब भी कुछ नहीं किया, जब यह सब कुछ हो रहा था?’’

‘‘हां, दीदी यह सच है कि मैं ने कुछ नहीं किया.’’ मैं ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘मुझे लकवा सा मार गया था. मैं ने आंखों से देखा तो नहीं, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसे कानों से सुना.’’

‘‘उस के बाद क्या हुआ?’’ दीदी ने उत्तेजित हो कर पूछा.

‘‘दीदी, मुझे होश तब आया जब महेश और सचिन ने विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ने की बात की. वे उसे धमकी दे रहे थे कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उस की इज्जत मिट्टी में मिला देंगे. भय के मारे मैं दौड़ती हुई सीढि़यां उतरने लगी. नीचे वाले फ्लोर पर आ कर मैं काफी देर कांपती हुई खड़ी रही. मैं दौड़ कर विद्या के फ्लैट के बाहर पहुंची और घंटी बजाई. विद्या ने दरवाजा नहीं खोला, तो मैं ने उस का नाम ले कर पुकारा. मेरी आवाज पहचान कर उस ने दरवाजा खोला.

‘‘जिस लड़की ने दरवाजा खोला, उस का नाम तो विद्या था, लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, वह विद्या ही है. उस के ऊपर जो कयामत गुजरी थी, उस से वह मृतक की तरह लग रही थी. मैं फूटफूट कर रोने लगी और उसे गले से लगा कर उस से माफी मांगने लगी कि मैं उस के लिए कुछ नहीं कर सकी.

मैं ने रोते हुए कहा, ‘‘मुझे बहुत दुख है विद्या कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकी. मुझे तुम्हारी मदद के लिए शोर मचाना चाहिए था, पुलिस को बुलाना चाहिए था.’’

‘‘भगवान का शुक्र है कि तुम ने ऐसा नहीं किया,’’ विद्या ने मरी सी आवाज में कहा, ‘‘और वादा करो कि आगे भी किसी से कुछ नहीं कहोगी.’’

‘‘लेकिन तुम्हें पुलिस के पास जाना चाहिए, मम्मीपापा से बताना चाहिए.’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों… मान लो तुम्हें किसी तरह की बीमारी हो गई या गर्भवती हो गई तो…?’’

‘‘तुम मेरे साथ डाक्टर के पास चलना. मैं अपना इलाज करा लूंगी या अबार्शन करा लूंगी. इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है. लेकिन तुम किसी और से यह बात कहना मत.’’ मैं ने उस से वादा किया था. दीदी, इसलिए मैं ने किसी से कुछ नहीं बताया.

‘‘न विद्या गर्भवती हुई और न ही उसे किसी प्रकार की बीमारी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘लेकिन अभी भी वह उसी रेपिस्ट के पड़ोस में रहती है?’’

‘‘जी.’’

‘‘इस के बाद उस ने फिर दोबारा उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘जहां तक मुझे पता है, नहीं.’’

‘‘वह घर के अंदर कैसा महसूस कर रही है, तुम ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की? तुम ने उसे किसी काउंसलर के पास जाने को भी नहीं कहा.’’

‘‘नहीं’’

‘‘उसे ही नहीं, तुम्हें भी काउंसलर के पास जाना चाहिए.’’

‘‘मुझे क्यों? मेरे साथ क्या हुआ है?’’

‘‘तुम भी अपने दोस्त के साथ हुए हादसे की वजह से सदमे में हो. तुम्हें अपराधबोध हो रहा है. तुम ने अपने दोस्त की मदद नहीं की. तुम्हें भी काउंसलिंग की जरूरत है.’’

मैं ने दीदी की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘हां दीदी, मुझे और विद्या, दोनों को मदद की जरूरत है.’’

‘‘दीदी अपने काम पर लग गईं. उन्होंने सब से पहले मेरे मम्मीपापा और रमेश से वह सब कुछ बताया. मेरे मम्मीपापा हैरान रह गए. उन्हें जैसे होश ही नहीं रहा, जबकि भाई तो गुस्से से पागल हो गया. वह खुद पर आरोप लगाने लगा कि उस की समझ में यह बात क्यों नहीं आई कि मेरे व्यवहार में बदलाव आ गया है.’’

इस के बाद दीदी ने विद्या को बहाने से अपने घर बुलवाया. उस के आने पर दीदी और मेरे मम्मीपापा ने उस से बात की. पहले तो विद्या पागलों की तरह इस तरह की किसी बात से इनकार करती रही. लेकिन जल्दी ही वह टूट गई और मेरी मम्मी की बाहों में रोते हुए उस ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की पूरी कहानी सुना दी. दीदी ने उस की यह बात मान ली कि उस के मम्मीपापा को इस बारे में कुछ नहीं बताएंगी. लेकिन एएसल के सदस्यों ने महेश और सचिन को पकड़ कर कहा कि उन्होंने एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया है, इसलिए पुलिस से शिकायत कर के उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. लेकिन वे अपना अपराध लिखित में स्वीकार कर के वादा करें कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें माफ किया जा सकता है.

दोनों ने वही किया, जैसा एएसएल के सदस्यों ने कहा. इस के बाद स्वाति दीदी ने दोनों की काउंसलिंग कराई. विद्या की भी काउंसलिंग कराई गई. कई सत्र के बाद विद्या रेप के सदमे से उबरी. इस से उस का खोया आत्मविश्वास वापस आ गया. अब मैं भी खुद को काफी बेहतर महसूस कर रही हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इस अपराधबोध से उबर सकूंगी कि मैं ने तब अपनी दोस्त की मदद नहीं की, जब उसे मेरी सब से ज्यादा जरूरत थी. Crime Stories

 

Crime Stories: पहली ही रात भागी दुल्हन

Crime Stories: 26 साल के छत्रपति शर्मा की आंखों में नींद नहीं थी. वह लगातार अपनी नईनवेली बीवी प्रिया को निहार रहा था. जैसे ही प्रिया की नजरें उस से टकराती थीं, वह शरमा कर सिर झुका लेती थी. 20 साल की प्रिया वाकई खूबसूरती की मिसाल थी. लंबी, छरहरी और गोरे रंग की प्रिया से उस की शादी हुए अभी 2 दिन ही गुजरे थे, लेकिन शादी के रस्मोरिवाज की वजह से छत्रपति को उस से ढंग से बात करने तक का मौका नहीं मिला था.

छत्रपति मुंबई में स्कूल टीचर था. उस की शादी मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर के एक खातेपीते घर में तय हुई थी और शादी मुहूर्त 23 नवंबर, 2017 का निकला था. इस दिन वह मुंबई से बारात ले कर सिंगरौली पहुंचा और 24 नवंबर को प्रिया को विदा करा कर वापस मुंबई जा रहा था. सिंगरौली से जबलपुर तक बारात बस से आई थी. जबलपुर में थोड़ाबहुत वक्त उसे प्रिया से बतियाने का मिला था, लेकिन इतना भी नहीं कि वह अपने दिल की बातों का हजारवां हिस्सा भी उस के सामने बयां कर पाता.

बारात जबलपुर से ट्रेन द्वारा वापस मुंबई जानी थी, जिस के लिए छत्रपति ने पहले से ही सभी के रिजर्वेशन करा रखे थे. उस ने अपना, प्रिया और अपनी बहन का रिजर्वेशन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस के एसी कोच में और बाकी बारातियों का स्लीपर कोच में कराया था. ट्रेन रात 2 बजे के करीब जब जबलपुर स्टेशन पर रुकी तो छत्रपति ने लंबी सांस ली कि अब वह प्रिया से खूब बतियाएगा. वजह एसी कोच में भीड़ कम रहती है और आमतौर पर मुसाफिर एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. ट्रेन रुकने पर बाराती अपने स्लीपर कोच में चले गए और छत्रपति, उस की बहन और प्रिया एसी कोच में चढ़ गए. छत्रपति की बहन भी खुश थी कि उस की नई भाभी सचमुच लाखों में एक थी. उस के घर वालों ने शादी भी शान से की थी.

जब नींद टूटी तो…

कोच में पहुंचते ही छत्रपति ने तीनों के बिस्तर लगाए और सोने की तैयारी करने लगा. उस समय रात के 2 बजे थे, इसलिए डिब्बे के सारे मुसाफिर नींद में थे. जो थोड़ेबहुत लोग जाग रहे थे, वे भी जबलपुर में शोरशराबा सुन कर यहांवहां देखने के बाद फिर से कंबल ओढ़ कर सो गए थे. छत्रपति और प्रिया को 29 और 30 नंबर की बर्थ मिली थी.

जबलपुर से जैसे ही ट्रेन रवाना हुई, छत्रपति फिर प्रिया की तरफ मुखातिब हुआ. इस पर प्रिया ने आंखों ही आंखों में उसे अपनी बर्थ पर जा कर सोने का इशारा किया तो वह उस पर और निहाल हो उठा. दुलहन के शृंगार ने प्रिया की खूबसूरती में और चार चांद लगा दिए थे. थके हुए छत्रपति को कब नींद आ गई, यह उसे भी पता नहीं चला. पर सोने के पहले वह आने वाली जिंदगी के ख्वाब देखता रहा, जिस में उस के और प्रिया के अलावा कोई तीसरा नहीं था.

जबलपुर के बाद ट्रेन का अगला स्टौप इटारसी और फिर उस के बाद भुसावल जंक्शन था, इसलिए छत्रपति ने एक नींद लेना बेहतर समझा, जिस से सुबह उठ कर फ्रैश मूड में प्रिया से बातें कर सके. सुबह कोई 6 बजे ट्रेन इटारसी पहुंची तो प्लैटफार्म की रोशनी और गहमागहमी से छत्रपति की नींद टूट गई. आंखें खुलते ही कुदरती तौर पर उस ने प्रिया की तरफ देखा तो बर्थ खाली थी. छत्रपति ने सोचा कि शायद वह टायलेट गई होगी. वह उस के वापस आने का इंतजार करने लगा.

ट्रेन चलने के काफी देर बाद तक प्रिया नहीं आई तो उस ने बहन को जगाया और टायलेट जा कर प्रिया को देखने को कहा. बहन ने डिब्बे के चारों टायलेट देख डाले, पर प्रिया उन में नहीं थी. ट्रेन अब पूरी रफ्तार से चल रही थी और छत्रपति हैरानपरेशान टायलेट और दूसरे डिब्बों में प्रिया को ढूंढ रहा था. सुबह हो चुकी थी, दूसरे मुसाफिर भी उठ चुके थे. छत्रपति और उस की बहन को परेशान देख कर कुछ यात्रियों ने इस की वजह पूछी तो उन्होंने प्रिया के गायब होने की बात बताई. इस पर कुछ याद करते हुए एक मुसाफिर ने बताया कि उस ने इटारसी में एक दुलहन को उतरते देखा था.

इतना सुनते ही छत्रपति के हाथों से जैसे तोते उड़ गए. क्योंकि प्रिया के बदन पर लाखों रुपए के जेवर थे, इसलिए किसी अनहोनी की बात सोचने से भी वह खुद को नहीं रोक पा रहा था. दूसरे कई खयाल भी उस के दिमाग में आजा रहे थे. लेकिन यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी कि आखिरकार प्रिया बगैर बताए इटारसी में क्यों उतर गई? उस का मोबाइल फोन बर्थ पर ही पड़ा था, इसलिए उस से बात करने का कोई और जरिया भी नहीं रह गया था. एक उम्मीद उसे इस बात की तसल्ली दे रही थी कि हो सकता है, वह इटारसी में कुछ खरीदने के लिए उतरी हो और ट्रेन चल दी हो, जिस से वह पीछे के किसी डिब्बे में चढ़ गई हो. लिहाजा उस ने अपनी बहन को स्लीपर कोच में देखने के लिए भेजा. इस के बाद वह खुद भी प्रिया को ढूंढने में लग गया.

भुसावल आने पर बहन प्रिया को ढूंढती हुई उस कोच में पहुंची, जहां बाराती बैठे थे. बहू के गायब होने की बात उस ने बारातियों को बताई तो बारातियों ने स्लीपर क्लास के सारे डिब्बे छान मारे. मुसाफिरों से भी पूछताछ की, लेकिन प्रिया वहां भी नहीं मिली. प्रिया नहीं मिली तो सब ने तय किया कि वापस इटारसी जा कर देखेंगे. इस के बाद आगे के लिए कुछ तय किया जाएगा. बात हर लिहाज से चिंता और हैरानी की थी, इसलिए सभी लोगों के चेहरे उतर गए थे. शादी की उन की खुशी काफूर हो गई थी.

प्रिया मिली इलाहाबाद में, पर…

इत्तफाक से उस दिन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस खंडवा स्टेशन पर रुक गई तो एक बार फिर सारे बारातियों ने पूरी ट्रेन छान मारी, लेकिन प्रिया नहीं मिली. इस पर छत्रपति अपने बड़े भाई और कुछ दोस्तों के साथ ट्रेन से इटारसी आया और वहां भी पूछताछ की, पर हर जगह मायूसी ही हाथ लगी. अब पुलिस के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. इसी दौरान छत्रपति ने प्रिया के घर वालों और अपने कुछ रिश्तेदारों से भी मोबाइल पर प्रिया के गुम हो जाने की बात बता दी थी.

पुलिस वालों ने उस की बात सुनी और सीसीटीवी के फुटेज देखी, लेकिन उन में कहीं भी प्रिया नहीं दिखी तो उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. इधर छत्रपति और उस के घर वालों का सोचसोच कर बुरा हाल था कि प्रिया नहीं मिली तो वे घर जा कर क्या बताएंगे. ऐसे में तो उन की मोहल्ले में खासी बदनामी होगी. कुछ लोगों के जेहन में यह बात बारबार आ रही थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रिया का चक्कर किसी और से चल रहा हो और मांबाप के दबाव में आ कर उस ने शादी कर ली हो. फिर प्रेमी के साथ भाग गई हो. यह खयाल हालांकि बेहूदा था, जिसे किसी ने कहा भले नहीं, पर सच भी यही निकला.

पुलिस वालों ने वाट्सऐप पर प्रिया का फोटो उस की गुमशुदगी के मैसेज के साथ वायरल किया तो दूसरे ही दिन पता चल गया कि वह इलाहाबाद के एक होटल में अपने प्रेमी के साथ है. दरअसल, प्रिया का फोटो वायरल हुआ तो उसे वाट्सऐप पर इलाहाबाद स्टेशन के बाहर के एक होटल के उस मैनेजर ने देख लिया था, जिस में वह ठहरी हुई थी. मामला गंभीर था, इसलिए मैनेजर ने तुरंत प्रिया के अपने होटल में ठहरे होने की खबर पुलिस को दे दी.

एक कहानी कई सबक

छत्रपति एक ऐसी बाजी हार चुका था, जिस में शह और मात का खेल प्रिया और उस के घर वालों के बीच चल रहा था, पर हार उस के हिस्से में आई थी. इलाहाबाद जा कर जब पुलिस वालों ने उस के सामने प्रिया से पूछताछ की तो उस ने दिलेरी से मान लिया कि हां वह अपने प्रेमी राज सिंह के साथ अपनी मरजी से भाग कर आई है. और इतना ही नहीं, इलाहाबाद की कोर्ट में वह उस से शादी भी कर चुकी है. बकौल प्रिया, वह और राज सिंह एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं, यह बात उस के घर वालों से छिपी नहीं थी. इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी छत्रपति से तय कर दी थी. मांबाप ने सख्ती दिखाते हुए उसे घर में कैद कर लिया था और उस का मोबाइल फोन भी छीन लिया था, जिस से वह राज सिंह से बात न कर पाए.

4 महीने पहले उस की शादी छत्रपति से तय हुई तो घर वालों ने तभी से उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था. लेकिन छत्रपति से बात करने के लिए उसे मोबाइल दे दिया जाता था. तभी मौका मिलने पर वह राज सिंह से भी बातें कर लिया करती थी. उसी दौरान उन्होंने भाग जाने की योजना बना ली थी. प्रिया के मुताबिक राज सिंह विदाई वाले दिन ही जबलपुर पहुंच गया था. इन दोनों का इरादा पहले जबलपुर स्टेशन से ही भाग जाने का था, लेकिन बारातियों और छत्रपति के जागते रहने के चलते ऐसा नहीं हो सका. राज सिंह पाटलिपुत्र एक्सप्रैस ही दूसरे डिब्बे में बैठ कर इटारसी तक आया और यहीं प्रिया उतर कर उस के साथ इलाहाबाद आ गई थी.

पूछने पर प्रिया ने साफ कह दिया कि वह अब राज सिंह के साथ ही रहना चाहती है. राज सिंह सिंगरौली के कालेज में उस का सीनियर है और वह उसे बहुत चाहती है. घर वालों ने उस की शादी जबरदस्ती की थी. प्रिया ने बताया कि अपनी मरजी के मुताबिक शादी कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया है, लेकिन उस ने एक बड़ी गलती यह की कि जब ऐसी बात थी तो उसे छत्रपति को फोन पर अपने और राज सिंह के प्यार की बात बता देनी चाहिए थी.

छत्रपति ने अपनी नईनवेली बीवी की इस मोहब्बत पर कोई ऐतराज नहीं जताया और मुंहजुबानी उसे शादी के बंधन से आजाद कर दिया, जो उस की समझदारी और मजबूरी दोनों हो गए थे.

जिस ने भी यह बात सुनी, उसी ने हैरानी से कहा कि अगर उसे भागना ही था तो शादी के पहले ही भाग जाती. कम से कम छत्रपति की जिंदगी पर तो ग्रहण नहीं लगता. इस में प्रिया से बड़ी गलती उस के मांबाप की है, जो जबरन बेटी की शादी अपनी मरजी से करने पर उतारू थे. तमाम बंदिशों के बाद भी प्रिया भाग गई तो उन्हें भी कुछ हासिल नहीं हुआ. उलटे 8-10 लाख रुपए जो शादी में खर्च हुए, अब किसी के काम के नहीं रहे.

मांबाप को चाहिए कि वे बेटी के अरमानों का खयाल रखें. अब वह जमाना नहीं रहा कि जिस के पल्लू से बांध दो, बेटी गाय की तरह बंधी चली जाएगी. अगर वह किसी से प्यार करती है और उसी से शादी करने की जिद पाले बैठी है तो जबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं, उलटा नुकसान ज्यादा है. यदि प्रिया इटारसी से नहीं भाग पाती तो तय था कि मुंबई जा कर ससुराल से जरूर भागती. फिर तो छत्रपति की और भी ज्यादा बदनामी और जगहंसाई होती.

अब जल्द ही कानूनी तौर पर भी मसला सुलझ जाएगा, लेकिन इसे उलझाने के असली गुनहगार प्रिया के मांबाप हैं, जिन्होंने अपनी झूठी शान और दिखावे के लिए बेटी को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया. इस का पछतावा उन्हें अब हो रहा है. जरूरत इस बात की है कि मांबाप जमाने के साथ चलें और जातिपांत, ऊंचनीच, गरीबअमीर का फर्क और खयाल न करें, नहीं तो अंजाम क्या होता है, यह प्रिया के मामले से समझा जा सकता है. – कथा में प्रिया परिवर्तित नाम है. Crime Stories

Punjab News: यह कैसी इंसानी फिसरत

 Punjab News: घरपरिवार से दूर अकेला रह रहा राजेश पड़ोस में रहने वाली औरतों को बुरी नजर से ही नहीं देखता था, बल्कि मौका मिलने पर शरीरिक छेड़छाड़ भी कर लेता था. परेशान हो कर महिलाओं ने जब विरोध किया तो ऐसा क्या हुआ कि 3 घर बरबाद हो गए. मैं उन दिनों जिला संगरूर के शहर मलेरकोटला में बतौर थानाप्रभारी तैनात था. मलेरकोटला एक ऐतिहासिक नगर माना जाता है. सिख इतिहास में इस नगर का और नगर के नवाब का विशेष महत्त्व एवं योगदान रहा है. मानवता के रक्षक एवं सिखमुसलिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले इस नगर में आज भी अमन और शांति है.

स्वयं को धन्य मानते हुए इस नगर में मैं शांति से नौकरी कर रहा था कि एक दोपहर 12 बजे के आसपास मुझे जो सूचना मिली, मैं उस से बेचैन हो उठा. सूचना के अनुसार बड़ाघर, ईदगाह रोड पर स्थित मामदीन मोहल्ला के वार्ड नंबर 4 में मोहम्मद सादिक, शौकत अली के मकान में हत्याएं हुई थीं. हत्या शब्द से ही डर लगता है, बात हत्याओं की आ जाए तो आम आदमी की छोड़ो, एक इंसपेक्टर होते हुए भी मैं घबरा गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही मैं एक सबइंसपेक्टर, एक हेडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया था. जिस मकान में वारदात हुई थी, उस के सामने मोहल्ले वालों की अच्छीखासी भीड़ जमा थी. मकान किसी परकोटे जैसा था. ऊंचीऊंची दीवारों वाले हवेलीनुमा उस मकान का किले जैसा विशाल फाटक अंदर से बंद था.

फाटक के नीचे से बहा खून बाहर गली तक आ गया था.  मौजूद लोगों से पूछने पर पता चला कि कुछ देर पहले अंदर से मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आई थीं. उन आवाजों को सुन कर वे लोग वहां पहुंचे. उन्होंने फाटक खुलवाने के लिए बाहर लगी सांकल बजाई. दरवाजा तो नहीं खुला, फाटक के नीचे से खून जरूर बह कर बाहर आ गया. चूंकि उस मकान में कई लोग रहते थे, अगर कोई जीवित होता तो जरूर फाटक खोलता. इसी से उन लोगों ने अंदाजा लगाया कि लगता है अंदर रहने वाले सभी लोगों को मार दिया गया है. यही सोच कर उन्होंने हत्याओं की सूचना दे दी थी.

मैं ने सिपाहियों से कहा कि मोहल्ले से किसी की सीढ़ी ला कर मकान की दीवार पर लगा कर भीतर जाएं और अंदर से फाटक खोल दें, ताकि अंदर जा कर देखा जा सके कि यहां क्या हुआ था? सिपाहियों ने तुरंत एक सीढ़ी की व्यवस्था कर के फाटक खोल दिया. फाटक खुलते ही मैं ने देखा, फाटक के पास ही अंदर एक औरत की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. फाटक के नीचे से बह कर बाहर आने वाला खून उसी औरत का था. जांच आगे बढ़ाने से पहले मकान की संरचना को समझना जरूरी था. मकान मुगल शासनकाल के किसी मुसलिम अफसर या नगरसेठ की हवेली रहा होगा.

मुख्यद्वार यानी फाटक के बाद एक बेहद खूबसूरत बरामदा था, जिस के खत्म होने से पहले बाईं ओर एक बहुत बड़ा कमरा था. उस के ठीक सामने दाईं ओर भी वैसा ही एक कमरा था. बरामदा खत्म होने के बाद बाईं ओर कमरे के बजाय खुले आंगन में दीवारों के साथ खूबसूरत फूलों की क्यारियां बनी हुई थीं, जबकि दाईं ओर लाइन से 3 कमरे बने हुए थे. उस के बाद छत पर जाने के लिए सीढि़यां बनी थीं. उस के आगे सामने की दीवार से सटा लैट्रीन और बाथरूम बना था. मकान देख कर यही लगता था कि मकान में आनेजाने के लिए फाटक के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. मैं ने इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया था. इस के बाद मैं घटनास्थल का निरीक्षण करने लगा.

फाटक के पास बरामदे में पड़ी मृतका की उम्र 30-32 साल रही होगी. वह निहायत ही खूबसूरत और सलीके वाली औरत लग रही थी. मृतका के शरीर पर तेज धार वाले हथियार के कई घाव थे, जो काफी गहरे थे. लाश के पास ही चूडि़यों के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ टुकड़े मृतका की कलाई में भी धंसे हुए थे, जहां से खून रिस रहा था. मृतका के सिर के बाल बिखरे हुए थे, पास ही बालों में लगाई जाने वाली क्लिप पड़ी थी. कुछ बरतन बरामदे में फैले हुए थे. वहां की स्थिति से साफ लग रहा था कि मृतका ने मरने से पहले खुद को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की मुट्ठी में भी ढेर सारे बाल दबे दिखाई दिए. जिस कमरे के बाहर बरामदे में लाश पड़ी थी, उस कमरे में भी संघर्ष के निशान नजर आ रहे थे. कमरे के अंदर भी खून फैला हुआ था.

कमरे और बरामदे से खून सने पैरों के निशान दाईं ओर वाले कमरों की ओर गए हुए थे. निशानों का पीछा करते हुए जब मैं दूसरे कमरे में पहुंचा तो वहां भी एक 30-32 साल की महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस महिला के शरीर पर भी तेजधार वाले हथियार के कई घाव थे. फर्श पर खून ही खून फैला था. उस कमरे में भी संघर्ष के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. खून सने पैरों के निशानों के आधार पर मैं तीसरे कमरे में पहुंचा तो वहां खून से लथपथ एक युवक औंधे मुंह फर्श पर पड़ा था. उस के आसपास फर्श पर खून फैला हुआ था. नजदीक से देखने पर उस की गरदन में एक हंसिया फंसा दिखाई दिया. खून गरदन से ही बह रहा था. मुझे उस में कुछ हरकत दिखाई दी तो मैं ने झट से उस की नब्ज पकड़ी. वह चल रही थी. इस का मतलब वह युवक जीवित था. मैं ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया.

मेरी सूचना पर एसपी भूपिंदर सिंह विर्क, डीएसपी (डी) हरमिंदर सिंह, डीएसपी मलेरकोटला गुरप्रीत सिंह, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए थे. अधिकारियों की उपस्थिति में फोरेंसिक टीम ने अपना काम कर लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया. लाश के पास पड़ी चूडि़यों के टुकड़े, वहां बिखरे बरतनों में से एक लोटे पर खून लगा था, उसे कब्जे में ले लिया था. मृतका की मुट्ठी में दबे बाल भी सुबूत के लिए रख लिए गए थे. खून सने पैरों के जो निशान थे, फोरेसिंक टीम ने उन्हें बड़ी सफाई से उठा लिए थे. इस के अलावा अंगुलियों के निशान भी उठा लिए गए. खून सनी 3 जोड़ी चप्पलें मिली थीं, उन्हें भी जब्त कर लिया गया था. बाकी के सारे सुबूत जुटाने के बाद अन्य जरूरी काररवाई निपटाई और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पूछताछ द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, वह मकान मोहम्मद सादिक का था, जिसे उस ने किराए पर उठा रखा था. जबकि वह खुद लोहभन में गुलजार अस्पताल के पास रहता था. मकान के बरामदे के बाईं ओर फाटक के पास जो लाश पड़ी थी, वह रिंकू की थी. वह बाईं ओर वाले कमरे में पति विजय और 2 बच्चों के साथ रहती थी. बरामदे के दाईं ओर वाले कमरे में 2 भाई रामा मंडल और सागर मंडल रहते थे. उस के आगे वाले कमरे में लालू साहू पत्नी बीना देवी और 4 बच्चों के साथ रहता था. उस कमरे में मिली लाश बीना देवी की थी. उस के आगे वाले तीसरे और अंतिम कमरे में राजेश गुप्ता अकेला ही रहता था. वही अपने कमरे में घायलावस्था में मिला था.

मकान में रहने वाले सारे किराएदार अलगअलग राज्यों के रहने वाले थे, जो कामधंधे की वजह से यहां आ कर रह रहे थे. लालू साहू मध्य प्रदेश का रहने वाला था तो रामा और सागर मंडल पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. जबकि विजय बिहार के जिला बेगूसराय का रहने वाला था. अपने कमरे में घायल मिला राजेश गुप्ता उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर का रहने वाला था. इस मकान में रहने वाले किराएदार अपनेअपने काम से मतलब रखने वाले लोग थे. इन में राजेश ही एक ऐसा आदमी था, जो दूसरों के मामलों में दिलचस्पी रखता था. खास कर औरतों के मामले में वह कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था.

लालू साहू कबाड़ी का काम करता था. वह सुबह अपने गोदाम पर चला जाता था तो देर रात को ही घर लौटता था. विजय किसी फैक्ट्री में काम करता था. उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी. वह सुबह साढ़े 7 बजे घर से निकलता तो रात साढ़े 8 बजे तक लौटता था. रामा और सागर मंडल मकानों में टाइल्स लगाने का काम करते थे, जिस से वे सुबह 7 बजे ही घर से निकल जाते थे तो उन के लौटने का कोई निश्चित समय नहीं था.  बाकी बचा राजेश, जो किसी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड था. वह रात की ड्यूटी करता था, इसलिए जब अन्य पुरुष घर आते थे तो वह ड्यूटी पर चला जाता था और जब सभी अपनेअपने काम पर जाते थे तो वह वापस कमरे पर आ जाता था.

इस तरह दिन में वही अकेला मर्द उस मकान में रहता था. उस हवेलीनुमा मकान में दिन में केवल 3 लोग रहते थे, एक राजेश, दूसरी बीना और तीसरी रिंकू. क्योंकि इन के पति काम पर चले जाते थे तो बच्चे स्कूल चले जाते थे. पूछताछ में पता चला था कि राजेश दिलफेंक किस्म का युवक था, इसलिए ड्यूटी से आने के बाद अपने काम निपटा कर वह बीना और रिंकू के कमरों में ताकझांक किया करता था. वह जब तक जागता रहता, औरतों से छेड़छाड़ किया करता था. अश्लील फब्तियां कस कर दोनों की नाक में दम कर देता था.

राजेश की इन घटिया हरकतों की वजह से बीना और रिंकू ज्यादातर कमरों में बंद रहती थीं. लेकिन जरूरी कामों के लिए उन्हें कमरों से बाहर आना ही पड़ता था. घात लगा कर बैठा राजेश इसी मौके की तलाश में रहता था. पूछताछ में लालू और विजय ने बताया था कि कभीकभी तो वह अपने सारे कपड़े उतार कर अपने कमरे में डांस भी करने लगता था. ऐसा करने के लिए उसे मना किया जाता तो वह बेशरमी से हंसते हुए कहता, ‘‘यह मेरा कमरा है. मैं इस का किराया देता हूं, इसलिए अपने कमरे में मैं चाहे नंगा रहूं या कपड़े पहन कर घूमूं, इस में आप लोगों को क्या परेशानी है? अगर इस स्थिति में मैं आप लोगों को अच्छा लगता हूं तो आप लोग आराम से मेरे कमरे में आ सकती हैं. मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगा. पड़ोसी होने के नाते आप लोगों की सेवा करना मेरा धर्म बनता है.’’

इस तरह की बातें सुन कर रिंकू और बीना का दिमाग भन्ना उठता. उन का मन करता कि ईंट उठा कर उस के सिर पर दे मारें, जिस से उस का गंदा भेजा बाहर आ जाए. लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर पा रही थीं. वे राजेश की शिकायत अपनेअपने पतियों से भी नहीं कर पा रही थीं. इस की वजह यह थी कि एक तो उन के पतियों का राजेश से झगड़ा हो जाता, जिस में किसी को भी चोट लग सकती थी. अगर चोट उन के पतियों को लग जाती तो उन के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती. अगर कहीं चोट राजेश को लग जाती तो वह थाने चला जाता. उस के बाद उन के पतियों को पुलिस पकड़ ले जाती. यह भी उन के लिए मुसीबत बन जाती. इस के अलावा यह भी हो सकता था कि उनके पति उन्हीं पर संदेह करने लगते. दोनों ही औरतें असमंजस की स्थिति में थीं. इसलिए संभलसंभल कर कदम रख रही थीं.

लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई. दोपहर का समय था. बीना घर के काम निपटा कर आराम करने के लिए लेट गई. रिंकू अपने कमरे में दरवाजा बंद किए लेटी थी. गरमियों के दिन थे और बिजली नहीं थी, इसलिए बीना ने कमरे का एक किवाड़ खुला छोड़ दिया था. थकी होने की वजह से लेटते ही उस की आंख लग गई. अचानक बीना को लगा कि कोई उस के शरीर से छेड़छाड़ कर रहा है. उस की आंखें खुलीं तो देखा राजेश उस की बगल में लेटा उस से छेड़छाड़ कर रहा था. वह उछल कर उठी और जोरजोर से राजेश को गालियां देने लगी. शोर सुन कर रिंकू भी बाहर आ गई. इस के बाद दोनों औरतें राजेश को भलाबुरा कहने लगीं. तब बेशरमी से हंसते हुए उस ने रिंकू से कहा, ‘‘चिल्लाती क्यों हो, तुम्हारी सहेली ने ही तो मुझे अपने कमरे में बुलाया था. अब इस में मेरा क्या दोष है?’’

राजेश की बात से दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजेश की धूर्तता से डर कर दोनों ने उस की शिकायत अपनेअपने पतियों से नहीं की. ऐसे आदमी का क्या भरोसा, कब क्या बक दे? डर के मारे दोनों चुप रह गईं. इस से राजेश की हिम्मत बढ़ गई. लेकिन जब राजेश की हरकतें बढ़ती ही गईं तो काफी सोचविचार कर दोनों ने अपनेअपने पतियों से कहा कि दिन में अकेली रहने पर राजेश उन्हें परेशान करता है. उन के साथ बदतमीजी भी करता है. विजय और लाल ने राजेश को समझाना चाहा तो उलटा वह उन्हीं के गले पड़ गया. वह जोरजोर से कहने लगा, ‘‘मैं तुम्हारी बीवियों को परेशान करता हूं या तुम्हारी बीवियां मुझे परेशान करती हैं. उन्हें संभाल कर रखो वरना अच्छा नहीं होगा.’’

दोनों सन्न रह गए. अपनी इज्जत बचाने की खातिर वे आगे कुछ नहीं बोले. इसलिए यह सब यूं ही चलता रहा. बीना और रिंकू काफी परेशान थीं और बेबस भी. आखिर उस दिन छेड़छाड़ की अति हो गई. रोज की तरह राजेश अपने कमरे में था. घर का काम निपटाने के बाद रिंकू नहाने के लिए बाथरूम की ओर जा रही थी. बीना अपने कमरे में कुछ कर रही थी. बाथरूम जाने के लिए राजेश के कमरे के सामने से ही जाना पड़ता था. रिंकू को बाथरूम की ओर जाते देख कर राजेश के शैतानी दिमाग में खुराफात सूझ गई. वह अपने कमरे से निकला और दबेपांव बाथरूम की ओर चल पड़ा.

रिंकू कपड़े उतार कर नहाने के लिए बैठने जा रही थी कि राजेश ने अचानक दरवाजे को इतनी जोर से धक्का दिया कि अंदर की सिटकनी टूट गई और दरवाजा खुल गया. रिंकू को उस हालत में पा कर वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. डर और शरम से रिंकू का बुरा हाल था. पहले तो वह सकपकाई, लेकिन बाद में जोरजोर से चिल्लाने के साथ बाथरूम में रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा कर उसे पीटने लगी. रिंकू की चीखें सुन कर बीना भी कमरे से बाहर आ गई थी. वस्तुस्थिति समझ कर वह भी बाथरूम पहुंची. राजेश का कौलर पकड़ कर बाथरूम से बाहर निकाला और चप्पल से पीटने लगी. तब तक रिंकू भी कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आ गई थी. दोनों ने मिल कर राजेश की जम कर धुनाई कर दी.

इस तरह रिंकू और बीना इज्जत को बचाना मुश्किल हो गया तो रात में पतियों के वापस आने पर उन्होंने राजेश की अगलीपिछली सारी हरकतें उन से बता दीं. इस के बाद विजय और लालू ने राजेश की जम कर पिटाई की और उस की हरकतों की शिकायत थाने में कर दी. पुलिस राजेश को पकड़ कर थाने ले गई. थाने में भी उस की धुनाई की गई. इस के बाद राजेश ने गलती की लिखित माफी मांगी तो उसे छोड़ दिया गया. इस घटना के बाद कुछ दिनों तक तो राजेश शांत रहा, लेकिन उस के बाद फिर छोटीमोटी हरकतें करने लगा. उस दिन यानी जिस दिन हत्याएं हुई थीं, रोज की तरह सभी अपनेअपने कामों पर चले गए थे. रात की ड्यूटी कर के सुबह साढ़े 8 बजे के करीब राजेश कमरे पर लौटा. 9 बजे तक सभी बच्चे भी स्कूल चले गए. इस के बाद उस हवेलीनुमा मकान में रिंकू, बीना और राजेश ही रह गए. 12 बजे तक घर के काम निपटा कर रिंकू और बीना अपनेअपने कमरों में लेट गईं.

अगस्त का महीना था. हवा बंद थी, इसलिए उमस बहुत ज्यादा थी. ऊपर से बिजली भी नहीं थी. हवा आने के लिए बीना ने अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था. अपने कमरे में बैठे राजेश के मन में न जाने क्या सूझी कि वह कमरे से निकला और बीना के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया. खुले दरवाजे से उस ने भीतर झांक कर देखा तो बीना गहरी नींद सो रही थी. बेखबरी में उस का पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक खिसक गया था. पलक झपकाए बिना राजेश कुछ देर तक बीना की नंगी टांगे देखता रहा. उस के बाद वह इस कदर उत्तेजित हो उठा कि दरवाजा धकेल कर कमरे में जा पहुंचा और भूखे भेडि़ए की तरह बैड पर सो रही बीना पर टूट पड़ा.

अचानक हुए इस हमले से बीना घबरा कर चिल्लाने लगी. राजेश ने जल्दी से अपना एक हाथ उस के मुंह पर रख कर धमकाया, ‘‘चुपचाप मुझे अपने मन की कर लेने दो. अगर चीखीचिल्लाई तो गला दबा कर दम निकाल दूंगा.’’

बीना को धमका कर राजेश उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. अचानक बीना ने पूरी ताकत लगा कर राजेश को धक्का दिया तो वह फर्श पर गिर पड़ा. लेकिन फुरती से उठ कर उस ने एक जोरदार थप्पड़ बीना के मुंह पर मारा. राजेश उत्तेजना में इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वह तेजी से बीना के कमरे से निकला और अपने कमरे से सब्जी काटने के लिए रखा हंसिया उठा लाया. बीना को डराने के लिए उस के सामने हंसिया लहराते हुए बोला, ‘‘खामोश, अगर मुंह से आवाज निकाली तो गला काट कर रख दूंगा.’’

लेकिन बीना पर राजेश की धमकी का कोई असर नहीं हुआ. वह खामोशी से अपनी इज्जत नहीं लुटवाना चाहती थी. इसलिए वह इज्जत बचाने के लिए संघर्ष करती रही. वह राजेश के चंगुल से खुद को छुड़ा कर बाहर की ओर भागना चाहती थी. जबकि राजेश की स्थिति यह थी कि जैसे किसी भूखे शेर के मुंह से मांस छीन लिया गया हो. उस ने बाहर की ओर भाग रही बीना पर हंसिये से प्रहार कर दिया. जहां हंसिया लगा था, वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह फर्श पर गिर पड़ी. वह जोरजोर से चिल्लाने लगी. उस के गिरते ही राजेश तो उस पर लगातार कई वार कर दिए. अब तक उस की चीखपुकार सुन कर रिंकू भी आ गई थी. वहां की हालत देख कर उस की घिग्घी बंध गई.

बीना को राजेश से बचाने के लिए रिंकू कोई हथियार लेने के लिए अपने कमरे की ओर भागी. लेकिन राजेश पर उस समय खून सवार था, इसलिए वह भी उस के पीछे दौड़ा. रिंकू कोई चीज उठा पाती, इस का मौका दिए बिना ही राजेश ने हाथ में लिए हंसिये से उस पर वार कर दिया. रिंकू जान बचाने के लिए चीखते हुए कमरे से निकल कर फाटक की ओर भागी. लेकिन काल बने राजेश ने उसे बरामदे में घेर लिया और हंसिये से ताबड़तोड़ वार करने लगा. किसी कटे पेड़ की तरह लहरा कर रिंकू फर्श पर गिर पड़ी और तड़पतड़प कर थोड़ी देर में शांत हो गई. कुछ देर राजेश वहीं खड़ा रहा. इतनी देर में उस का जुनून शांत हो गया था. जब होश आया तो 2-2 लाशें और चारों ओर खून ही खून फैला देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी.

वह कोई पेशेवर हत्यारा तो था नहीं, इसलिए यह सब देख कर उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उसे आंखों के सामने फांसी का फंदा लहराता दिखाई दिया. पलभर में ही एक ऐसा जुनून आया, जो तूफान बन कर अपने पीछे तबाही छोड़ कर चला गया था. भविष्य की कल्पना मात्र से ही राजेश का शरीर कांप उठा. वह मकान के भीतर पागलों की तरह भागभाग कर अपने छिपने के लिए जगह ढूंढने लगा. जब उसे कोई जगह सुरक्षित नहीं दिखाई दी तो पुलिस से बचने के लिए वह हाथ में लिए हंसिये से अपनी गरदन पर वार करने लगा. पहला वार गहरा पड़ा, लेकिन उस के बाद वाले वार हलके होते गए. चौथा वार पहले वार पर पड़ा, जिस से घाव तो गहरा हो ही गया, पीड़ा की वजह से हाथ में ताकत न रहने की वजह से वह हंसिया निकाल नहीं सका, जिस से वह उसी में फंसा रह गया. राजेश बेहोश हो कर फर्श पर औंधे मुंह गिर पड़ा.

अब तक की पूछताछ से पता चला था कि राजेश द्वारा की गई दोनों महिलाओं की हत्याएं और आत्महत्या की कोशिश की वजह दुष्कर्म का प्रयास था. बहरहाल मैं दोनों महिलाओं के पतियों और मोहल्ले वालों के बयान दर्ज करने के बाद अस्पताल के लिए चल पड़ा. अस्पताल में पता चला कि राजेश की हालत काफी गंभीर थी, जिस की वजह से डाक्टरों ने उसे पटियाला के  राजेंद्रा अस्पताल के लिए रेफर कर दिया था. राजेंद्रा अस्पताल के डाक्टरों ने अथक प्रयास कर के राजेश को बचा लिया था. इस पूरे मामले में राजेश ही अकेला दोषी था. अगर उस की मौत हो जाती तो मामले की फाइल उसी दिन बंद हो जाती. लेकिन अब स्थिति बदल गई थी. राजेश बच गया था, इसलिए अब इस मामले को अदालत तक ले जाना था. मामले को मजबूत बनाने के लिए मैं साक्ष्य जुटाने लगा, जिस से मृत महिलाओं के परिजनों को न्याय मिल सके.

सिविल अस्पताल मलेरकोटला से राजेश की जो एमएलसी बनाई गई थी, उस के अनुसार राजेश की गरदन पर बाईं ओर तेजधार हथियार के 5 घाव थे. वह एमएलसी मुझे अधूरी लगी, इसलिए मैं ने पटियाला के राजेंद्रा अस्पताल से एक अन्य एमएलसी बनवाई, जिस में राजेश की बाईं आंख से ले कर गरदन तक तेजधार हथियार की 5 गंभीर चोटें थीं. बाएं हाथ पर कटे के 3 निशान और दाहिने हाथ पर भी चोट का एक निशान था, जो शायद छीनाझपटी में लग गया था. डाक्टरों की कोशिश से राजेश की हालत में तेजी से सुधार हो रहा था. अब वह बिना किसी की मदद के चलनेफिरने लगा था. लेकिन एक समस्या यह खड़ी हो गई थी कि गरदन पर हंसिये की चोट की वजह से उस की आवाज चली गई थी. अब वह बोल नहीं सकता था. आगे चल कर यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन सकती थी. अदालत में वह अपनी बात किस तरह कहेगा, यह सोचसोच कर मैं परेशान था.

बहरहाल, मैं ने रिंकू और बीना की हत्या तथा आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा राजेश के विरुद्ध दर्ज कर के सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. एक दिन सवेरे पता चला कि राजेश निगरानी पर तैनात सिपाही को चकमा दे कर फरार हो गया है. मेरे लिए यह बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी. भले ही राजेश गंभीर रूप से घायल था, लेकिन उस ने जो जघन्य अपराध किया था, उस के लिए उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी. मेरी नौकरी खतरे में पड़ गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि मेरी पूरी उम्र की बेदाग नौकरी के अंत में एक ऐसा कलंक लगने वाला था, जो लाख प्रयास के बाद भी नहीं छुड़ाया जा सकता था. मेरे रिटायरमेंट के मात्र 2 साल बाकी थे. बहरहाल अस्पताल में राजेश की निगरानी पर लगे सिपाही को लाइनहाजिर करा कर राजेश की तलाश में जगहजगह दबिश डालनी शुरू कर दी.

राजेश के भाई रामसंजीव गुप्ता को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. वह भी मलेरकोटला में ही रहता था. उस ने बताया कि कई सालों से वह राजेश से नहीं मिला था. राजेश की हरकतों की वजह से वह न तो उसे अपने घर में घुसने देता था और न ही उस से कोई संबंध रखता था. मैं ने राजसंजीव से उस के रिश्तेदारों के पते पूछ कर उन के यहां छापे मारे, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शहर की मैं ने पहले ही नाकेबंदी करवा दी थी. उस की शिनाख्त के लिए इतना ही काफी था कि उस के सिर से ले कर गरदन तक पट्टियां लिपटी थीं. वह आसानी से पहचाना जा सकता था और शायद इसीलिए 2 दिनों बाद वह मोहम्मद अयूब नामक एक इज्जतदार आदमी के साथ थाने आ कर मेरे सामने खड़ा हो गया. शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था या उसे अपने असहाय होेने का अंदाजा लग गया था.

थाने में मैं ने राजेश से पूछताछ शुरू की. इशारों से उस ने वे सारी बातें बता दीं, जो लोगों ने मुझे जांच के दौरान बताई थीं. बहरहाल मैं ने उस का बयान ले कर 2 गवाहों के सामने उस के दस्तखत करवा लिए. अगले दिन मैं ने उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री पुष्मिंदर सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. हतयाओं का हथियार अभियुक्त की गरदन से बरामद हो गया था. धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान अभियुक्त ने इशारों में दर्ज करवा दिए थे. खून आलूदा एवं फिंगरप्रिंट की रिपोर्ट आने के बाद मैं ने अदालत में आरोपपत्र पेश कर दिया.

लगभग 2 सालों तक तारीखें पड़ने के बाद इस केस की गवाहियां अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश श्री बी.के. मेहता की अदालत में शुरू हुईं.  इस मुकदमे में कुल 23 गवाह थे. इस मुकदमे में ठोस सुबूत फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने पेश किए. अभियुक्त के पैरों के निशान इस मुकदमे में सजा दिलाने के लिए अहम सुबूत थे. इस के अलावा अहम सुबूत थे मृतका रिंकू की मुट्ठी में मिले राजेश के सिर के बाल. अभियुक्त राजेश की ओर से मुकदमे की पैरवी मशहूर वकील नरपाल सिंह धारीवाल कर रहे थे, जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से अमरजीत शर्मा और हरिंदर सूद थे.

अभियुक्त राजेश गुप्ता ने सफाई में कुछ नहीं कहा था. जज साहब के आदेश पर राजेश को एक प्लेन पेपर दिया गया तो उस ने उस पर अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना का विवरण लिख कर जज साहब को थमा दिया था कि वह किस प्रकार वासना में अंधे हो कर रिंकू और बीना को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. जब वह इस प्रयास में सफल नहीं हुआ तो उन की किस तरह हत्या कर दी. अपने इस अपराध के लिए उस ने अदालत से माफी भी मांगी थी. जज साहब ने इस मुकदमे में अभियुक्त राजेश गुप्ता को रिंकू और बीना की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीने की सजा और भोगनी थी.

जज साहब ने अपने फैसले में कहा था कि राजेश ने अपनी हवस पूर्ति के लिए 2 महिलाओं की हत्या कर के 2 परिवारों को बरबाद किया है. उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए. लेकिन यह अपराध करने के बाद पश्चाताप में अभियुक्त ने आत्महत्या की कोशिश की और स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी, इसलिए उस के लिए उम्रकैद की सजा उपयुक्त है. Punjab News

 

Hindi stories: अबू सलेम की आवाज पर धड़कता था इस अभिनेत्री का दिल

Hindi stories: 1993 में मुंबई बम धमाकों के मामले की सुनवाई कर रही टाडा अदालत अबू सलेम समेत 5 अन्य दोषियों को सजा सुना दी है. इस वजह से अबू सलेम तो चर्चा में हैं ही, एक्ट्रेस मोनिका बेदी का नाम भी सुर्खियों में आ गया है. मोनिका लंबे समय तक अबू सलेम की गर्लफ्रेंड रही थीं. इन दिनों वह बेशक फिल्मी दुनिया से दूर हैं, लेकिन एक समय वो भी था जब अबू की वजह से ही उन्हें फिल्में मिलनी शुरू हुई थी.

ये जानना दिलचस्प है कि एक अंडरवर्ल्ड डौन और एक स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस के बीच प्यार की ये कहानी कहां और कैसे पनपी. मोनिका बेदी मूल रूप से पंजाब की हैं. उन्होंने ब्रिटेन की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की. डांस और माडलिंग में भी मोनिका को काफी दिलचस्पी थी. यही दिलचस्पी उन्हें मुंबई लाई और यहां आकर 1995 में उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘सुरक्षा’ मिली.

कहा जाता है कि अबू सलेम से मोनिका की मुलाकात एक बौलीवुड पार्टी के दौरान हुई थी. लेकिन एक मुलाकात ने ही दोनों के बीच कुछ ऐसा आकर्षण पैदा किया कि फिर मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया.

मोनिका की मानें तो थोड़े वक्त के लिए ही सही, मोनिका का दिल अबू के लिए धड़का जरूर था. मोनिका के मुताबिक उन्हें नहीं पता था कि जिस शख्स के लिए उनका दिल धड़क रहा था वो अंडरवर्ल्ड का मोस्ट वान्टेड है. उन्हें नहीं पता था कि जिसके साथ वो प्यार कर बैठी हैं उसका असली नाम अबु सलेम है.

साल 1998 में मोनिका पहली दफा फोन पर सलेम के संपर्क में आईं. मोनिका दुबई में थीं, फोन पर उन्हें दुबई में एक स्टेज शो करने का आफर मिला. बस उसी के बाद वो अबू को चाहने लगीं. मोनिका सलेम की आवाज पर फिदा हो गई थीं. अबू सलेम भी मोनिका से बेहद प्यार करता था.

बताया तो यहां तक जाता है कि मोनिका को उनकी पहली हिट फिल्म ‘जोड़ी नंबर वन’ में भी सलेम ने ही काम दिलवाया था. बौलीवुड में मोनिका के लिए वह एक ऐसा दौर था, जब सब उनकी इज्जत करने लगे थे. हर कोई उन्हें खुश करने की कोशिश करता था. जबकि ये सब मोनिका की परफार्मेंस की वजह से नहीं, बौलीवुड में सलेम के खौफ की वजह से हो रहा था.

1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट के आरोपी अबू सलेम को साल 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था. बताया जाता है कि जब यह गिरफ्तारी हुई, तब होटल में उनके साथ मोनिका बेदी भी थीं.

सुनने में आया था कि इसके बाद मोनिका ने सलेम का साथ छोड़ दिया था और सरकारी गवाह बन गई थीं. बता दें कि मोनिका फर्जी पासपोर्ट के मामले में चार साल जेल में बीता चुकी हैं.

अपने हिस्से की सजा काटकर वह कई टीवी रिएलिटी शोज में भी नजर आ चुकी हैं. वह बिग बौस सीजन 2 के अलावा झलक दिखला जा में भी नजर आई थीं. उन्होंने यूनिवर्सल म्यूजिक के एक एलबम के लिए इक ओंकार भी गाया है. साल 2013 में उन्होंने स्टार प्लस के शो सरस्वतीचंद्र में नेगेटिव रोल भी किया था.

Crime News: 7 साल बाद पकड़ में आए हत्यारें

Crime News: इफ्खिर अहमद सुनहरे सपनों की चाह में इंग्लैंड गया था. वहां उसे सब कुछ मिला भी. लेकिन 2 शादियों और मजहबी चक्रव्यूह के कारण वह अपनी ही बेटी का हत्यारा बन बैठा. इस चक्कर में वह तो जेल गया ही, उस की पत्नी फरजाना भी नहीं बच सकी. इफ्तिखार अहमद मूलत: पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव उत्ताम का निवासी था. वर्षों पहले जब वह युवा था, एक हसीन जिंदगी जीने का सपना संजो कर पाकिस्तान से इंग्लैंड आ गया था.

इफ्तिखार अहमद कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, पर ड्राइविंग अच्छी जानता था, जो विदेश में आ कर उस के रोजगार का साधन बन गई. उस का बचपन भले ही बेहद गरीबी में गुजरा था, पर वह शुरू से महत्वकांक्षी था. बंदिशें उसे पसंद नहीं थीं. अलबत्ता अपने धर्म के प्रति वह पूरी तरह आस्थावान था. वह 6-7 वर्ष का था, तभी उस का रिश्ता उस के दूर के मामा की बेटी फरजाना से तय हो गया था. बड़ेबड़े सपने देखने वाला इफ्तिखार अकसर अपने दोस्तों से कहा करता था, ‘‘देखना एक दिन मैं बहुत बड़ा आदमी बनूंगा, दुनिया का हर ऐशोआराम मेरे कदमों में होगा.’’

दोस्त उसे टोक देते, ‘‘जमीन पर ही रह, हवा में मत उड़. घर में दो वक्त की रोटी नहीं, बनेगा बड़ा आदमी.’’

इफ्तिखार गुस्सैल स्वभाव का था. ऐसे तानें भला कैसे सुनता? उस ने दोस्तों से 2-4 हाथ कर लिए और चीख कर कहा, ‘‘तुम लोग यहीं सड़ते रहोगे. देखना, बड़ा हो कर मैं विदेश जाऊंगा. वहां जा कर हर कीमत पर अपने हालात बदल दूंगा.’’

खैर, किसी तरह बचपन अभावों में गुजरा. इफ्तिखार ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और बचपन के सपनों में रंग भरने की कोशिश शुरू कर दी. यह अलग बात थी कि कुछ घर की माली हालात के चलते तो कुछ पढ़ाई में मन न लगने की वजह से वह जैसेतैसे नौवीं कक्षा ही पास कर पाया. पढ़ न पाने के कारण उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल सकती थी, ऊपर से घर वालोें का दबाव कि हमारा ना सही, अपना ही पेट भर ले. कोई और रास्ता न देख इफ्तिखार ने अपने एक जानकार ट्रक ड्राइवर के साथ कंडक्टरी शुरू कर दी. इसी दौरान उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. धीरेधीरे हाथ साफ हो गया तो उस ने कंडक्टरी छोड़ दी और लाहौर आ कर किराए की टैक्सी चलाने लगा. उस ने 2 साल वहीं बिताए. फिर वह अपने घर वापस आ गया. इस बीच उस ने कुछ पैसे जोड़ लिए थे. अपना ख्वाब पूरा करने के लिए उस ने अपना पासपोर्ट बनवाया और फिर एक दिन फ्लाइट पकड़ कर इंग्लैंड आ गया.

इंग्लैंड में उसे हमवतन एजाज मिल गया, जिस ने उस की मदद की और उसे किराए पर चलाने के लिए टैक्सी दिलवा दी. इफ्तिखार मन लगा कर काम करने लगा. उसे यह बात अखरती थी कि उस की कमाई का ज्यादा हिस्सा तो टैक्सी मालिक के पास चला जाता है, सो उस ने बचत शुरू कर दी. 3-4 साल में उस ने काफी पैसे जोड़ लिए. कुछ पैसे कम पड़े तो एजाज ने मदद कर दी. पैसे एकत्र हो गए तो इफ्तिखार ने खुद की टैक्सी खरीद ली. अपनी टैक्सी आने के बाद सारा पैसा इफ्तिखार की जेब में आने लगा. पैसा आया तो उसे कई ऐब लग गए. इफ्तिखार को औरत के जिस्म का चस्का लग गया. वह अकसर देह बेचने वालियों के पास रातें बिताने लगा.

इसी दरम्यान उस की मुलाकात लोन एंडरसन नाम की एक लड़की से हुई, जो मूलत: डेनमार्क की रहने वाली थी और इंग्लैंड में एक बुकशौप में काम करती थी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं. वे अकसर मिलते रहते थे. इफ्तिखार उसे अपनी टैक्सी में भी घुमाता था. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. इफ्तिखर ने एक दिन अपने प्यार का इजहार किया तो लोन एंडरसन ने भी अपने दिल की बात कह दी. लोन एंडरसन बेशक पश्चिमी देश की थी, पर सभ्य और शालीन थी. एक दिन जब दोनों एकांत में मिले तो इफ्तिखार ने उस के सामने शारीरिक दूरी खत्म करने की चाहत बयान करते हुए कहा, ‘‘इस के बिना हमारा प्यार अधूरा है. मैं इसे मुकम्मल कर देना चाहता हूं.’’

लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के चेहरे को गौर से देखा. फिर गंभीर आवाज में कहा, ‘‘शादी से पहले नहीं. मैं खुले विचारों की जरूर हूं, पर शादी के बाद ही अपना तन किसी पुरुष को सौपूंगी. इसीलिए मैं ने आज तक अपने नारीत्व की गरिमा को कायम रखा है.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे, लेकिन आज दिल न तोड़ो.’’ इफ्तिखार ने गुजारिश की.

‘‘नहीं, कतई नहीं. मैं शादी से पहले इस की मंजूरी किसी हाल में नहीं दूंगी.’’ लोन एंडरसन ने साफ लहजे में सख्ती से मना कर दिया.

सुन कर इफ्तिखार का चेहरा उतर गया. वह मायूस हो गया. जबरदस्ती वह कर नहीं सकता था, सो मन मार कर रह गया. इस घटना के कुछ महीनों बाद आखिरकार इफ्तिखार और लोन एंडरसन ने कोपेनहेगन स्थित चर्च में शादी कर ली. यह सन 1981 के जून महीने की बात है. उसी रात दोनों ने एक होटल में हनीमून मनाया. 2 दिनों बाद इफ्तिखार होटल से उसे अपने घर ले आया. इस के बाद लोन एंडरसन के कहने पर इफ्तिखार उस के साथ डेनमार्क चला गया. वहां भी उस ने अपना टैक्सी ड्राइवर वाला काम कर लिया. दोनों खूब खुश थे और हंसीखुशी जिंदगी बिता रहे थे. शादी के एक साल बाद लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम टोनी एंडरसन रखा गया. इफ्तिखार चाहता था कि उसे अपनी मरजी का कोई मुसलिम नाम दे, पर लोन एंडरसन की इच्छा और डेनमार्क के नियम के चलते वह ऐसा नहीं कर पाया.

सन 1985 के जनवरी माह में इफ्तिखार के नाम पाकिस्तान से एक खत आया. खत उस के घर वालों ने भेजा था. इफ्तिखार और उस के परिवार के बीच पत्र व्यवहार चलता रहता था, इसलिए यह कोई खास बात नहीं थी. लेकिन इस पत्र को पढ़ कर वह सोच में पड़ गया. उसे गंभीर देख कर लोन एंडरसन ने कारण पूछा तो इफ्तिखार ने कहा, ‘‘मेरी मां बहुत बीमार है. मुझे पाकिस्तान जाना होगा.’’

‘‘बिलकुल जाओ, वैसे भी तुम्हें जाना चाहिए. आखिर वह तुम्हारी मां है.’’ लोन एंडरसन ने बिना कोई आपत्ति जताए कहा. उस वक्त वह यह बिलकुल नहीं समझ पाई कि इफ्तिखार उस से फरेब कर रहा है. हकीकत में उस की मां बीमार नहीं थी, बल्कि खत में लिखा था कि बचपन में फरजाना नाम की जिस लड़की से उस का निकाह तय हुआ था, वह अब जवान हो चुकी है. उस के घर वाले निकाह के लिए दबाव बना रहे हैं. इसलिए वह फौरन स्वदेश लौट आए और घर वालों द्वारा फरजाना के परिवार से किए वादे को पूरा करे.

खैर, इफ्तिखार अहमद जनवरी, 1985 के आखिर में अपनी पत्नी लोन एंडरसन और 3 साल के बेटे टोनी एंडरसन को डेनमार्क में छोड़ कर पाकिस्तान आ गया. पाकिस्तान आ कर उस ने फरजाना के साथ निकाह कर लिया. उस ने अपने घर वालों और फरजाना पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पहले से शादीशुदा है और साथ ही एक बेटे का बाप भी. कुछ महीने इफ्तिखार पाकिस्तान में ही रहा. वजह यह कि उस पर दबाव था कि वह फरजाना को भी अपने साथ ले जाए. फरजाना का पासपोर्ट बनने और वीजा लगने में समय लग रहा था. अंतत: इफ्तिखार अपनी दूसरी पत्नी फरजाना को ले कर ब्रैडफोर्ड, इंग्लैंड आ गया. उस ने डेनमार्क में इंतजार कर रही लोन एंडरसन से कोई संपर्क नहीं किया.

कई महीने गुजर गए, इफ्तिखार नहीं लौटा तो लोन एंडरसन को चिंता हुई. पाकिस्तान का पता उस के पास था नहीं, जो वहां से कोई पूछताछ करती. अत: वह ब्रैडफोर्ड आई और इफ्तिखार के पुराने घर पर गई. वहां उसे पता चला कि इफ्तिखार ने पड़ोस में ही दूसरा घर ले लिया है. लोन एंडरसन वहां पहुंची तो फरजाना को देख कर उसे लगा कि इफ्तिखार की कोई रिश्तेदार होगी. उसी समय इफ्तिखार आ गया. उस ने यह बात छिपा ली कि फरजाना उस की बीवी है. इत्तफाक से तभी फरजाना की तबीयत खराब हो गई. इफ्तिखार और लोन एंडरसन उसे ले कर डाक्टर के पास गए. वहां पता चला कि फरजाना गर्भ से है. इस जानकारी के बाद इफ्तिखार लोन एंडरसन से सच नहीं छिपा पाया. उस ने बता दिया कि फरजाना उस की पत्नी है. वह पाकिस्तान निकाह करने गया था.

इस से लोन एंडरसन का दिल टूट गया. वह कुछ नहीं बोली और वापस डेनमार्क लौट गई. कुछ दिनों बाद वह अपने बेटे टोनी एंडरसन के साथ वापस आई और इफ्तिखार से कहा कि उस ने उस के साथ जो किया सो किया, पर वह उस के बेटे को पिता की सरपस्ती से दूर न करे. वह उसे अपने पास रखे. लेकिन इफ्तिखार इस के लिए राजी नहीं हुआ. उस ने कहा कि अगर बेटी होती तो वह उसे अपने पास रख लेता, पर बेटे को नहीं रखेगा. लोन एंडरसन ने उस पर कोई दबाव नहीं बनाया. वह बेटे को ले कर वापस लौट गई. अलबत्ता इस के बाद भी वह इफ्तिखार से संपर्क जरूर बनाए रही. दूसरी ओर इफ्तिखार बेखौफ फरजाना के साथ अपना गृहस्थ जीवन जी रहा था. 14 जुलाई, 1986 को फरजाना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया शेफीलिया अहमद.

इस के ठीक एक साल बाद फरजाना ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस का नाम रखा गया अलेशा अहमद. फिर फरजाना ने एक बेटे को जन्म दिया. तीनों बच्चे कुछ बड़े हुए तो इफ्तिखार ब्रैडफोर्ड छोड़ कर परिवार सहित वारिंगटन आ बसा. शेफीलिया पढ़ाई में काफी होशियार थी. वह वकील बनना चाहती थी. वहीं उस से छोटी अलेशा की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी. वह पिता के दबाव में जबरदस्ती पढ़ रही थी. बात 2003 की है. शेफीलिया का हाईस्कूल का आखिरी साल था. 11 सितंबर, 2003 को शेफीलिया की टीचर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी कि वह एक सप्ताह से ना तो स्कूल आ रही है और ना ही घर पर है. घर वाले भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे रहे हैं.

पुलिस ने इफ्तिखार अहमद से पूछताछ की तो उस ने बताया कि शेफीलिया की उसे भी कोई खबर नहीं है. उन लोगों ने उस की सहेलियों से भी संपर्क किया, पर उस का कोई पता नहीं चला. शेफीलिया लापता है, इस की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? यह पूछने पर इफ्तिखार अहमद ने कहा कि बेटी का मामला है. वह नहीं चाहता था कि शेफीलिया के गुम होने पर उस के परिवार वालों को किसी प्रकार की जगहंसाई का सामना करना पड़े. वैसे भी यह शेफीलिया के भविष्य का भी सवाल था. अगर एक बार चरित्र पर दाग लग जाता तो उन के समाज में शेफीलिया का निकाह होना मुश्किल है.

खैर, पुलिस ने प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में शेफालिया के गायब होने की सूचना प्रसारित करवा दी. पुलिस खुद भी अपने स्तर पर उस की खोज करने लगी. न्यूज चैनलों पर उस की खोज के लिए बड़े पैमाने पर कैंपेन चलाए गए. इस के तहत अंगे्रजी फिल्मों की अभिनेत्री शोभना गुलाटी ने टीवी पर शेफीलिया द्वारा लिखित कविताओं का पाठ किया. पर शेफीलिया का कोई सुराग नहीं मिल पाया. इसी तरह कई महीने बीत गए. 24 फरवरी, 2004 को पुलिस कंट्रोल में किसी ने सूचना दी कि वारिंगटन से करीब 110 किलामीटर दूर कंब्रिया के सेडविक शहर स्थित केंट नदी के किनारे किसी लड़की का सड़ागला शव पड़ा हुआ है. नदी में भारी बाढ़ आने की वजह से शव नदी के किनारे आ लगा था. पुलिस तुरंत नदी किनारे पहुंची.

सूचना सही थी, लेकिन लड़की की लाश इतनी सड़ गई थी कि उस की पहचान करना मुश्किल था. हां, लाश के बाएं हाथ में जिगजेग गोल्ड बे्रसलेट और हाथ की एक अंगुली में ब्ल्यू टोपाज रिंग अब भी मौजूद थी. इफ्तिखार अहमद ने बेटी की गुमशुदगी के समय इन चीजों का जिक्र किया था. पुलिस ने इस की सूचना इफ्तिखार अहमद को दी और तुरंत नदी पर आने को कहा. इफ्तिखार अहमद पत्नी फरजाना सहित वहां पहुंचा. उस ने गोल्ड ब्रेसलेट और रिंग को पहचानते हुए लाश की शिनाख्त अपनी 17 वर्षीया बेटी शेफीलिया अहमद के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो गई तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम में मौत का कारण पता नहीं लग पाया. वजह थी, लाश का अत्यधिक सड़ जाना. पुलिस ने लाश का दूसरी बार पोस्टमार्टम करवाया, पर इस बार भी कोई परिणाम नहीं निकला. अब की बार पुलिस ने मृतका शेफीलिया के बाएं थाई बोन का डीएनए टेस्ट करवाया. इस से साफ हो गया कि लाश शेफीलिया की ही थी. वहीं निचले जबड़े को भी शेफीलिया के दंत चिकित्सक को दिखाया गया. उस ने भी पुष्टि कर दी कि लाश शेफीलिया की ही थी. पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच शुरू की तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं. इस जांच के लिए पुलिस ने इफ्तिखार अहमद, उस की पत्नी फरजाना, इफ्तिखार के साथी टैक्सी ड्राइवर व 5 अन्य परिचितों को हिरासत में ले लिया.

सभी से अलगअलग तरहतरह से पूछताछ की गई. पर उस की हत्या का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला. इस पर बिना चार्ज लगाए सभी को छोड़ दिया गया. बावजूद इस के पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच जारी रखी. जांच के दौरान इफ्तिखार के घर से शेफीलिया के सामान से उस की डायरी बरामद हुई, जिस में काफी कविताएं लिखी हुई थीं. उस की कविताओं में एक कविता ‘आई फील टे्रप्ड’ शीर्षक से थी. यह कविता शेफीलिया की मनोदशा व्यक्त करती थी. इस से उस के निराशाजनक जीवन का साफ पता चल रहा था.

जांच के दौरान ही इफ्तिखार की पड़ोसन शैला कोस्टेलो ने बताया था कि शेफीलिया को उस का परिवार उपेक्षित रखता था. परिवार द्वारा पीडि़त करने की वजह से वह कई बार घर से भाग गई थी. 2 बार पुलिस में उस के लापता होने की रिपोर्ट भी लिखाई गई थी. दोनों बार वह अपने बौयफ्रेंड के घर पर पाई गई थी. पड़ोसन ने यह भी बताया कि उस ने सुना था कि शेफीलिया के घर वाले उस की इसी उम्र में अरेंज मैरिज करने के लिए दबाव बना रहे थे. इफ्तिखार के घर से एक वीडियो भी बरामद हुआ. यह वीडियो उस समय का था, जब सन 2003 के शुरू में इफ्तिखार अहमद परिवार सहित पाकिस्तान गया था. इस वीडियो में शेफीलिया पाकिस्तान में मस्ती करती हुई दिखाई दे रही थी.

बहरहाल, शेफीलिया की हत्या की जांच चलती रही. जनवरी, 2008 में मृत्यु समीक्षक जोजफ द्वारा की गई जांच में कहा गया कि शेफीलिया की हत्या का केस बहुत ही जघन्य हत्याकांड की श्रेणी में आता है. उस ने शंका भी व्यक्त की कि हो सकता है, इस में उस के घर वालों का हाथ रहा हो. इस के बाद पुलिस ने फिर से इफ्तिखार से पूछताछ की. उस ने बताया कि यह सही है कि शेफीलिया गुस्सैल स्वभाव की जिद्दी लड़की थी. उसे पश्चिमी पहनावा पसंद था. जबकि उस का परिवार इस के खिलाफ था. उस पर रोक लगाई जाती थी तो वह विद्रोह पर उतर आती थी. पूछताछ के दौरान कोई ऐसी बात नहीं निकल कर आई कि इफ्तिखार पर शक किया जाता.

देखतेदेखते शेफीलिया की मौत को 7 साल बीत गए. पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई. पर कहते हैं कि पाप एक न एक दिन जरूर बेपरदा हो जाता है. आखिर शेफीलिया अहमद हत्याकांड के ताले की चाबी बन कर उस की छोटी बहन अलेशा सामने आई. शुरू से पढ़ाई चोर और बिगड़ैल मिजाज की अलेशा गलत सोहबत में पड़ गई थी. उस के खर्चे बेपनाह थे, जबकि घर से उसे नाममात्र का ही जेबखर्च मिलता था. अपने खर्चे पूरे करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी. यहां तक कि उस ने अपने खुद के ही घर में डकैती डलवा दी थी. यह घटना 25 अगस्त, 2010 की है. घटना के समय वह अपने मातापिता व भाईबहन के साथ घर में ही मौजूद रही, ताकि उस पर घर वालों या पुलिस को कोई शक न हो. इस के लिए उस ने अपने बौयफ्रेंडों के साथ मिल कर सुरक्षित योजना बनाई थी. इस डकैती में घर से काफी गहने व नकदी लूटी गई.

डकैती की सूचना पुलिस को दी गई तो उस ने जांच शुरू की. अलेशा से पूछताछ के दौरान उस के बदले हुए भाव को देखते ही पुलिस को उस पर शक हो गया था. पर वह सहज रूप से सच नहीं उगल पा रही थी. आखिर उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वह टूटने लगी. आखिर उस ने सारा सच उगल दिया. साथ ही उस ने अपने घर वालों के भय से 7 साल से दिल में छिपा कर रखा अपनी बड़ी बहन शेफीलिया की हत्या का राज भी उगल दिया. बतौर अलेशा, शेफीलिया शुरू से आजाद ख्याल की थी. उसे पश्चिमी रहनसहन, खुलापन और पहनावा पसंद था. जबकि घर वाले इस सब के खिलाफ थे. वह चाहते थे कि शेफीलिया उन के मजहब की परंपरा के अनुसार आचरण अपनाए, घर की चारदीवारी तक सीमित रहे. बुर्का पहने और लड़कों से दोस्ती न करे. पर वह ऐसा नहीं करती थी.

वह पश्चिमी पहनावा पहनती और लड़कों से खुल कर दोस्ती करती. इसी वजह से इफ्तिखार अकसर उस की पिटाई तक कर देता था. उसे भूखा रखा जाता और अन्य तरीकों से भी प्रताडि़त किया जाता. इस से उस का स्वभाव विद्रोही हो गया. 15 वर्ष की होतेहोते उस का यह स्वभाव अपने चरम पर पहुंच गया था. अब जब भी उसे प्रताडि़त किया जाता, वह घर से भाग जाती. फिर 2-4 दिन में वापस लौट आती. उस का एक बौयफ्रेंड था मुश्ताक बगास. वह ब्लेकबर्न में रहता था और 28 साल का था. यानी वह उस से करीब 11 साल बड़ा था. 2002 में जब शेफीलिया का परिवार ब्लेकबर्न में रहता था, तब दोनों की दोस्ती हुई थी, जो प्यार के बाद शारीरिक संबंधों में बदल गई थी. इस की पहल शेफीलिया ने ही की थी.

बगास ने तो उसे रोका था कि अभी वह नाबालिग है और शादी से पहले यह उचित नहीं है, पर शेफीलिया ने जिद पकड़ ली थी. वह बोली, ‘‘मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करती हूं. फिर प्यार में किसी प्रकार की दीवार क्यों? जब मैं ने तुम्हें अपना मन सौंप दिया है तो तन सौंपने में क्या हर्ज है. आखिर शादी के बाद भी तो यही सब करना है. फिर शादी तक हम क्यों समय बर्बाद करें. जिंदगी मौजमस्ती का नाम है. कल किस ने देखा है. जो करना है, आज ही क्यों ना कर लें.’’

‘‘लेकिन यह गलत होगा.’’ बगास समझदार था और इस तरह का कोई फायदा नहीं उठाना चाहता था.

‘‘प्यार में गलत सही कुछ नहीं होता. फिर तुम कौन सा मुझ से जबरदस्ती कर रहे हो. मैं अपनी इच्छा से तुम्हें अपना सब कुछ सौंपना चाहती हूं.’’ शेफीलिया ने कहा. आखिर उस की दलीलों के आगे बगास की एक न चली और उस ने वैसा ही किया जैसा शेफीलिया चाहती थी.

अब जब भी शेफीलिया घर से भागती. बगास के घर ही पहुंच जाती. दोनों खुल कर मौजमस्ती करते. बातचीत के लिए बगास ने उसे एक मोबाइल फोन भी दे दिया था, जो वह छिपा कर रखती थी. मौका मिलने पर वह अपने दुखसुख की बात उस से कर लेती थी. शेफीलिया यूं तो कई बार घर से भागी थी, पर पुलिस में उस की रिपोर्ट 2-3 बार ही दर्ज कराई गई थी. दिसंबर, 2002 में उस ने बगास को स्कूल के लंच समय में मिलने के लिए बुलाया. उस दिन तो वह नहीं आया, पर अगले दिन दोनों मिले. शेफीलिया ने उसे अपने पिता द्वारा की गई पिटाई के निशान दिखाते हुए कहा, ‘‘अब सहन नहीं होता बगास. कुछ करो, वरना मैं यूं ही किसी दिन दम तोड़ दूंगी. अब हद हो गई है. मेरे घर वाले मेरा निकाह पाकिस्तान में मेरे कजिन से करना चाहते हैं, जो मुझ से 30 साल बड़ा है. मुझे अब सारा भरोसा तुम्हारे प्यार पर है, वरना…’’

बगास उस के हर दर्द से वाकिफ था. वह भी चाहता था कि शेफीलिया सदा खुश रहे. इसलिए वह उस की मदद करने को तैयार हो गया. दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया. 2 जनवरी, 2003 को सुबहसवेरे ही बगास कार ले कर उस के घर से कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. उस ने मिसकाल दे कर शेफीलिया को अपने आने की सूचना दे दी. शेफीलिया मौका देख कर एक बैग में अपने कुछ कपड़े रख कर सावधानीपूर्वक घर की खिड़की से कूद कर बाहर आ गई और बगास की कार में जा बैठी. बगास ने फौरन कार आगे बढ़ा दी. इस बार वह शेफीलिया को अपने घर नहीं ले गया. क्योंकि पहले 2 बार शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद उसे वहां से बरामद कर चुके थे.

बगास शेफीलिया को ब्लेकबर्न में ही अपने भाई के घर ले गया. वहां रात में दोनों ने एकदूसरे को खूब प्यार किया. दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध भी बने. इस दौरान शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन इफ्तिखार अहमद ने किसी तरह शेफीलिया का पता लगा ही लिया. वह सीधे बगास के भाई के घर पहुंचा और शेफीलिया को जबरदस्ती साथ ले आया. उस ने चलते समय बगास को चेतावनी भी दी, ‘‘अगर अब की बार मैं ने तुम्हें इस के साथ देख लिया तो इस के साथ तुझे भी काट डालूंगा.’’

घर आ कर इफ्तिखार ने शेफीलिया की खूब पिटाई की और फरमान सुना दिया कि 2-4 दिन में सब लोग पाकिस्तान चले जाएंगे. वहां उस का निकाह कर दिया जाएगा. शेफीलिया बेबस हो गई. वह घर में कैद थी. जनवरी, 2003 के आखिर में पूरा परिवार पाकिस्तान गया. वहां शेफीलिया के निकाह की तैयारी भी कर ली गई. शेफीलिया को इस से बचने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उस ने अपनी इहलीला समाप्त करने की ठान ली. उस ने मौका देख ब्लीच पी लिया. इस से उस की हालत बिगड़ने लगी. लेकिन समय रहते घर वालों ने उसे बचा लिया. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों को बताया गया कि अंधेरा होने के कारण शेफीलिया ने दवा की जगह कोई जहरीली चीज पी ली थी.

अभी तक इफ्तिखार के रिश्तेदारों को इस की भनक नहीं लगी थी. सो मई में वह शेफीलिया और परिवार सहित वापस इंग्लैंड लौट आया. यहां उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया. क्योंकि वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी. न तो उस के गले से कुछ नीचे उतरता था, न ही वह कमजोरी के कारण ठीक से चल पाती थी. यहां कई सप्ताह तक उस का इलाज चला. उस के बगल वाले बेड की मरीज ने जब शेफीलिया से पूछा कि उस ने ब्लीच क्यों पी तो उस ने बताया कि जबरन उस की शादी उस से की जा रही थी, जिसे वह पसंद ही नहीं करती.

उस का पासपोर्ट भी उस के पिता ने छीन लिया था. इफ्तिखार ने यहां अस्पताल की एक एशियन मूल की नर्स को कहा कि वह गोरी नर्सों को न बताए कि शेफीलिया ने ब्लीच पी थी. उस नर्स ने शेफीलिया से कहा कि वह कैसे अपने घर वालों के साथ रहती है. उस की फैमिली तो लवलेस फैमिली है. स्वस्थ होने के बाद शेफीलिया पर फिर से शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा. पर उस ने साफ मना कर दिया. उस के पिता को उस पर शक भी होने लगा था कि वह गर्भ से है. उन्हें जब विश्वास हो गया कि अब वह किसी भी तरह नहीं मानेगी तो 11 दिसंबर, 2003 को इफ्तिखार और उस की पत्नी फरजाना ने शेफीलिया की खूब पिटाई की. अलेशा थोड़ी सी खुली खिड़की से सब देख रही थी. फरजाना ने अपने पति से कहा, ‘‘यह लड़की हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. बेहतर है, इसे खत्म कर दो.’’

इफ्तिखार इस के लिए तैयार हो गया तो फरजाना कंबल, चादर, टेप के 2 रोल, एक काला विग और बैग ले आई. इस के बाद इफ्तिखार ने एक प्लास्टिक बैग से शेफीलिया का मुंह तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस ने दम नहीं तोड़ दिया. तत्पश्चात दोनों ने उस की लाश को चादर व कंबल में लपेट कर बैग में भर दिया. फिर दोनों ने मिल कर बैग को चारों तरफ से टेप से पैक कर दिया. इस के बाद दोनों ने लाश को बाहर खड़ी कार में रख दिया. इफ्तिखार अकेले ही कार ले कर चला गया. उस ने लाश केंट नदी में फेंक दी और घर लौट आया. इस के कई महीने बाद पुलिस ने लाश बरामद की. शक इफ्तिखार पर गया. पर उस के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला. यह केस यहीं दफन हो जाता अगर 7 साल बाद अलेशा सच उजागर न करती.

डकैती के आरोप में अलेशा को 6 महीने की सजा सुनाई गई. उस की सजा ज्यादा होती, पर उस ने मानवीयता दिखाते हुए अपनी बहन शेफीलिया की हत्या का राज खोला था, इस का उसे लाभ दिया गया. जज इरविन ने कहा, ‘‘जब सच्चाई व्यक्त करने की इच्छा होती है, तो कोई भी व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता. अलेशा ने कानून की मदद की है, इस के लिए उस का यह कदम सराहनीय है. इस से उस के मन को शांति मिलेगी, जो उस की आगे की जिंदगी को सामान्य बनाने में मदद करेगी.’’

खैर, अब फिर से इफ्तिखार अहमद तथा फरजाना को गिरफ्तार कर लिया गया. एक पेशी के दौरान जज जान स्मिथ ने कहा, ‘‘शेफीलिया हत्याकांड एक जघन्य कृत्य है. वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती थी. वह होनहार थी और ला की पढ़ाई करना चाहती थी. उसे अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार था. पर उस के मातापिता उसे इस अधिकार से वंचित रखना चाहते थे. शेफीलिया 2 संस्कृतियों के बीच फंसी हुई थी. उसे अपने तरीके से जीने देना चाहिए था, पर उस के मातापिता ने जीवन की जगह उसे मौत दे दी. ये किसी भी तरह रहम के काबिल नहीं हैं.’’

कोर्ट में कई सुनवाई हुईं. इस दौरान शेफीलिया के जानकारों के भी बयान दर्ज किए गए. नार्थवेस्ट के नए चीफ प्रौसिक्यूटर नाजिर अफजल ने कोर्ट को बताया कि एशियन समाज में अभिभावक औनर क्राइम करने से नहीं डरते. शेफीलिया की हत्या के कई सुबूत मिले हैं. वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी. घर वालों ने उस से अपनी मर्जी की जिंदगी जीने का अधिकार छीन लिया था. शेफीलिया के दोस्त साराह बैनट ने कोर्ट में बयान दिया कि शेफीलिया ने अपने बालों को रंग लिया था और नाखून बढ़ा लिए थे. इस पर उस की मां फरजाना ने कैमिकल की सहायता से उस के बालों का रंग धो दिया और उस के नाखून काट दिए थे. साथ ही उस की बेरहमी से पिटाई भी की थी. उसे गंदी गालियां भी दी जाती थीं. उस की मां उसे पकड़ती तो पिता उस की पिटाई करता था.

शेफीलिया के दूसरे दोस्त बुड्स ने बताया कि उसे शेफीलिया ने एक नोट दिया था. उस ने वही नोट कोर्ट में पढ़ कर सुनाया. उस में लिखा था, ‘‘पिछले कुछ सालों से घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है. वे मुझे कालेज जाने से रोकना चाहते थे. वे मुझ से जबरदस्ती नौकरी करवाना चाहते थे. मैं ने जेब खर्च से 2 हजार यूरो बचा कर अपने खाते में डलवाए तो मेरे पिता ने वे भी निकलवा लिए. मुझे डर रहता है, क्योंकि मेरे मातापिता मुझे पाकिस्तान ले जा कर मेरी शादी करवाना चाहते हैं. वे लोग मुझे वहीं छोड़ देना चाहते हैं. जबकि मुझे वह कल्चर कतई पसंद नहीं है. मुझे घर में घुटन होती है. मैं ने पिता द्वारा लाए गए कई रिश्ते ठुकरा दिए थे. इस कारण मुझे मार खानी पड़ती थी.’’

शेफीलिया की टीचर जोएनी कोड ने कोर्ट में बयान दिया, ‘‘शेफीलिया की मौत से करीब 11 महीने पहले उस के स्कूल से अनुपस्थित रहने पर जब मैं ने उसे फोन किया और पूछा कि क्या कोई चिंता की बात है? तब शेफीलिया ने हां कहा था. जब वह दूसरे दिन स्कूल लौटी तो मैं ने उस की गर्दन पर खरोचों के निशान देखे थे. उस के होंठों पर भी कट का निशान था. पूछने पर शेफीलिया ने बताया कि उस की मां ने उसे नीचे कर के पकड़े रखा और पिता ने पीटा. इसी से वे निशान आए थे. उसे अकसर कमरे में बंद कर के भूखा रखा जाता था. उस के उत्पीड़न की बात एक सोशल वर्कर को पता लगी तो वह स्कूल में उस से पूछताछ करने आया. पर शेफीलिया ने उसे कुछ नहीं बताया था.’’

7 सितंबर, 2011 को तमाम गवाहों के बयानों के बाद पुलिस ने इफ्तिखार अहमद और फरजाना के विरुद्ध कोर्ट में चार्जशीट पेश की. जिस में उन पर बेटी शेफीलिया की हत्या का चार्ज लगाया गया था. दोनों के खिलाफ ट्रायल मई, 2012 से 3 अगस्त, 2012 तक हुआ. इस दौरान इफ्तिखार अहमद और फरजाना ने अपना अपराध कुबूल लिया था. उन्होंने बताया कि शेफीलिया की हरकतों से वे तंग आ गए थे. वह हर तरह से उन की बदनामी करवाना चाहती थी. इसी कारण उन्हें उस की हत्या करनी पड़ी.

तमाम पेशियों के बाद 14 दिसंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. इफ्तिखार अहमद और फरजाना को शेफीलिया की हत्या का दोषी करार देते हुए दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. सजा सुनते ही दोनों रो पड़े. Crime News

Kanpur Crime News : अपना अपराध दूसरे के सिर

Kanpur Crime News : परशुराम का पत्नी और बेटी के साथ गांव वापस आना उस के भाई जयराम को जरा भी अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उस ने अपने हिस्से की जमीन और घर बंटा लिया था. जमीन और घर पर कब्जा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है…

घर के अंदर का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. खून से लथपथ 3 लाशें पड़ी थीं. मृतकों में परशुराम यादव, उस की कथित पत्नी विमला देवी और मासूम बेटी हिमांशी थी. तीनों की हत्या गोली मार कर की गई थी. परशुराम और विमला की लाशें कमरे के अंदर खून में डूबी पड़ी थीं, जबकि मासूम हिमांशी की लाश बरामदे में पड़े तखत पर पड़ी थी.लकमरे से ले कर बरामदे तक खून ही खून फैला था. कमरे के अंदर का सामान अस्तव्यस्त था और फर्श पर चूडि़यों के टुकड़े बिखरे थे. वहां की हालत देख कर साफ लग रहा था कि मरने से पहले परशुराम और विमला का हत्यारों से जम कर संघर्ष हुआ था. दिल दहलाने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा में 13 दिसंबर, 2014 की रात घटी थी.

चूंकि हत्याएं गोली मार कर की गई थीं, इसलिए गांव वालों को तुरंत हत्याओं की जानकारी हो गई थी. मृतक के भाई जयराम सिंह ने हत्यारों को भागते देखा भी था, इसलिए गांव वालों की सलाह पर उस ने तुरंत घटना की सूचना थाना उसराहार पुलिस को दे दी थी. मामला 3-3 हत्याओं का था, इसलिए घटना की जानकारी होते ही रात को ही एसएसपी राकेश सिंह, सीओ अनिल यादव के साथ थाना ऊसराहार के थानाप्रभारी संजय यादव भी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम भी एसएसपी राकेश सिंह साथ लाए थे. पहले पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के बाद मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह से पूछताछ की गई.

जयराम सिंह ने बताया कि 2 मंजिला बने मकान में भूतल पर वह अपने परिवार के साथ रहता था, जबकि पहली मंजिल पर उस का बड़ा भाई परशुराम अपनी पत्नी विमला और 3 वर्षीया बेटी हिमांशी के साथ रहता था. रात में गोलियां चलने की आवाज सुन कर जब वह घर से बाहर निकला तो देखा रामकिशन और धर्मेंद्र तमंचा लिए 2 अन्य लोगों के साथ भागे जा रहे थे. मैं ने उन्हें अच्छी तरह पहचान लिया था. शोर भी मचाया था, लेकिन अन्य लोगों के आतेआते वे अंधेरे का फायदा उठा कर निकल गए.

‘‘ये रामकिशन और धर्मेंद्र कौन हैं, मृतक की उन से क्या दुश्मनी थी?’’ एसएसपी राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बड़े भाई परशुराम के रामकिशन की पत्नी विमला से नाजायज संबंध बन गए थे. रामकिशन ने विरोध किया तो परशुराम विमला को दिल्ली भगा ले गया और पत्नी बना कर रहने लगा. पिछली होली पर परशुराम गांव लौट आया तो रामकिशन आ धमका. उस ने गांव में पंचायत बुलाई और विमला को अपने साथ भेजने के लिए पंचायत से गुहार लगाई. लेकिन विमला ने रामकिशन के साथ जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद पंचायत क्या करती, बेइज्जत हो कर रामकिशन चला तो गया, लेकिन जातेजाते अंजाम भुगतने की धमकी देता गया. उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने ये तीनों हत्याएं की हैं.’’

फिंगर एक्सपर्ट टीम ने घटनास्थल से फिंगर प्रिंट उठा लिए तो खोजी कुत्ता टीम ने कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटनास्थल और लाशों को सूंघ कर भौंकता हुआ नीचे आया. जयराम सिंह के घर के सामने आ कर कुछ देर वह भौंकता रहा, उस के बाद जयराम सिंह को पकड़ लिया. इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि कहीं भाई और उस के परिवार की हत्या भाई ने ही तो नहीं की. क्योंकि अक्सर जर, जोरू जमीन के लिए इस तरह हत्याएं होती रही हैं. इन हत्याओं में जोरू भी थी और जरजमीन भी. हत्याओं की सही वजह क्या हो सकती थी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था.

इस पूछताछ के बाद एसएसपी राकेश सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी संजय यादव ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और जरूरी सुबूत जुटा कर थाने वापस आ गए, जहां उन्होंने मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह की तहरीर पर रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर खुद ही जांच शुरू कर दी. चूंकि जयराम सिंह ने तीनों हत्याओं का आरोप मृतका विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाया था, इसलिए थानाप्रभारी संजय यादव ने रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए गांव चौबिया स्थित उस के घर छापा मारा.

रामकिशन और उस का बेटा धर्मेंद्र घर पर ही मिल गया था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाना ऊसराहार ले आई. थाने पर जब रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र से परशुराम, उस की पत्नी और बेटी की हत्या के बारे में पूछा गया तो रामकिशन ने कहा कि यह सच है कि परशुराम से उस की दुश्मनी थी, क्योंकि वह उस की पत्नी विमला को भगा ले गया था और उस के साथ शादी कर ली थी. लेकिन जहां तक हत्याओं की बात है तो उस ने ये हत्याएं नहीं कीं. कोई अपने फायदे के लिए उस की दुश्मनी का फायदा उठा कर उसे फंसाना चाहता है.

‘‘ऐसा कौन हो सकता है, जो अपने फायदे के लिए तुम्हें फंसाएगा?’’ थानाप्रभारी संजय यादव ने पूछा.

‘‘साहब, पूरे यकीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मुझे परशुराम के भाई जयराम सिंह पर शक है. उसी ने मकान और जमीन हथियाने के लिए यह खूनी खेल खेला है.’’ रामकिशन ने कहा.

थानाप्रभारी संजय यादव असमंजस में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच्चा है और कौन झूठा? दोनों हत्याओं की वजह ऐसी बता रहे थे कि अविश्वास करने का सवाल ही नहीं उठता था. सचझूठ का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी संजय यादव ने अपने खास मुखबिर को रामकिशन और जयराम सिंह के पीछे लगा दिया. यही नहीं, वह खुद भी सुरागरसी करते रहे. थानाप्रभारी संजय यादव के उस खास मुखबिर ने जयराम सिंह और रामकिशन से दोस्त गांठ ली और वह उन के साथ खानेपीने लगे. एक दिन जयराम सिंह के साथ महफिल जमी तो मुखबिर ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘यार जयराम! तू ने खेल तो बहुत अच्छा खेला भाई. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.’’

‘‘कौन सा खेल?’’ जयराम शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए बोला.

‘‘अरे वही, जमीनजायदाद भी मिल गई और पुलिस से भी बच गए. बड़ी सफाई से हत्याओं का इल्जाम दूसरे के सिर मढ़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’ जयराम ने शराब का गिलास नीचे रख कर हैरानी से पूछा.

‘‘दोस्त हूं तुम्हारा, दिल की बात जान लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’ मुखबिर ने टकराने के लिए अपना गिलास ऊपर उठा कर कहा.

‘‘तुम जान गए हो तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम तो अपने हो. लेकिन किसी दूसरे के सामने जुबान मत खोलना.’’ जयराम ने गिलास से गिलास टकराते हुए कहा.

महफिल खत्म कर के मुखबिर सीधे थाना ऊसराहार पहुंचा. थानाप्रभारी संजय यादव थाने में ही मौजूद थे. मुखबिर के चेहरे की चमक देख कर ही संजय यादव समझ गए कि यह जरूरी संदेश लाया है. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बिठा कर पूछा, ‘‘कोई खुशखबरी?’’

‘‘जी सर, खुशखबरी ही है.’’

‘‘तो जल्दी बताओ, ताकि तुरंत काररवाई की जा सके.’’

‘‘साहब, परशुराम, उस की पत्नी विमला और बेटी हिमांशी का कत्ल उस के भाई जयराम सिंह ने ही किया है. मकान और जमीन हथियाने के लिए उसी ने तीनों को गोली मार कर मारा है और इल्जाम विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगा दिया है.’’

‘‘तुम यह बात इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो?’’ संजय यादव ने पूछा.

‘‘सर, अभी थोड़ी देर पहले हम दोनों की महफिल जमी थी. उसी में मुझे जुबान न खोलने की नसीहत देते हुए जयराम ने तीनों की हत्या की बात स्वीकार की है.’’

थानाप्रभारी संजय यादव को भी जयराम सिंह पर ही शक था. क्योंकि खोजी कुत्ते ने उसी को पकड़ा था. लेकिन जयराम सिंह ने हत्या की जो वजह बताई थी, उस से वह गुमराह हो गए थे. मुखबिर ने सच्चाई पता लगा ली तो उन्होंने देर करना उचित नहीं समझ. पुलिस बल के साथ वह गांव इकघरा पहुंचे और जयराम सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में उस से पूछताछ शुरू हुई तो पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन जब उन्होंने अपना अंदाज दिखाया तो उस ने तीनों हत्याओं का अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जयराम सिंह ने खून से सने कपडे़ और वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने भूसे वाली कोठरी में छिपा रखा था. जयराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने मुकदमे से रामकिशन और धर्मेंद्र का नाम हटा कर उस का नाम दर्ज कर दिया. इस के बाद पूछताछ एवं पुलिस जांच में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना चौबिया के गांव गंगापुरा में कुल्फ सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे बालकिशन और रामकिशन थे. कुल्फ सिंह के पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए उस की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी.

गुजरबसर के लिए वह अपने खेतों पर काम करने के बाद दूसरे के यहां मेहनतमजदूरी कर लेता था. दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी मेहनतमजदूरी कर के पिता की मदद करने लगे. बड़ा बेटा बालकिशन जवान हुआ तो कुल्फ सिंह ने उस का विवाह इटावा के ही थाना ऊसराहार के गांव इकघरा के रहने वाले हुकुम सिंह यादव की बेटी अमृता के साथ कर दिया. अमृता फैशन परस्त व खुले विचारों की लड़की थी. वह सासससुर के आगे परदा नहीं करती थी, जिस से नाराज हो कर सासससुर ने घरजमीन का बंटवारा कर के उसे अलग कर दिया.

बालकिशन से छोटे रामकिशन की शादी विमला के साथ हुई. गोरीचिट्टी आकर्षक कदकाठी की विमला थाना इकदिल के गांव तीरवा के रहने वाले राम सिंह की 3 संतानों में सब से छोटी थी. राम सिंह के पास अपनी इतनी जमीन थी कि उस में खेती कर के वह अपना गुजारा आसानी से कर रहा था. रामकिशन विमला को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, विमला वैसी ही थी. उस की मोहक मुसकान, कजरारी आंखे एवं गठीले बदन ने उसे दीवाना बना दिया था. लेकिन विमला अपनी इस शादी से खुश नहीं थी, क्योंकि उस का पति रामकिशन उम्र में उस से 10 साल बड़ा था. उस ने भी अपनी उम्र के युवक की कल्पना की थी, लेकिन रामकिशन वैसा नहीं था.

समय के साथ विमला एक बेटे की मां बनीं, नाम रखा धर्मेंद्र सिंह. बेटे के पैदा होने के बाद रामकिशन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने गांव से बाहर जा कर पैसा कमाने का विचार किया. मातापिता से बात की तो वे भी राजी हो गए. उस ने कुछ जरूरी सामान लिया और आगरा चला गया. वहां उसे एक बिल्डिंग बनवाने वाले ठेकेदार के यहां नियमित काम मिल गया. रामकिशन सुबह 9 बजे ड्यूटी पर जाता तो शाम को ही लौटता. वह अपनी तरह के अन्य मजदूरों के साथ कच्ची बस्ती में रहता था. सब मिलजुल कर खाना बनाते और एक साथ बैठ कर खाते. कभीकभी उन के बीच पीनेपिलाने का भी दौर चलता. धीरेधीरे रामकिशन को आगरा शहर पसंद आ गया. अब उस का एक ही लक्ष्य था, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना.

2-3 महीने में वह घर आता और जो कमा कर लाता, पिता के हाथों पर रख देता. विमला को खर्च के लिए अलग से पैसे देता. हफ्तादस दिन घर में रह कर वह नौकरी पर वापस चला जाता. गांव में विमला पति की यादों को दिल में संजोए बच्चे का मुंह देख कर दिन काट रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार वह जेठानी अमृता के घर चली जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात अमृता के भाई परशुराम से हुई. परशुराम जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हुकुम सिंह यादव था. हुकुम सिंह के 2 बेटे, परशुराम, जयराम और एक बेटी अमृता थी. हुकुम सिंह ने दोनों बेटों की शादी कर के घरजमीन का बंटवारा कर दिया था.

छोटा भाई जयराम तो परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहा था, जबकि परशुराम की जिंदगी में भूचाल आ गया था. बीमारी से उस की पत्नी सूर्यमुखी की मौत हो गई थी. वह तनहा जिंदगी काट रहा था. अकेला होने की वजह से अक्सर वह अपनी बहन अमृता के यहां चला जाता था. वहीं उस की मुलाकात बहन की देवरानी विमला से हुई. अमृता के घर विमला और परशुराम का आमनासामना हुआ तो इसी पहली मुलाकात में दोनों ही एकदूसरे को देख कर कुछ इस तरह मोहित हुए कि पलकें झपकाना भूल गए. विमला की आकर्षक देहयष्टि परशुराम की आंखों में बस गई. वहीं परशुराम का गठीला बदन देख कर विमला मंत्रमुग्ध सी हो गई.

बातचीत के दौरान परशुराम की नजरें विमला पर ही जमी रहीं. वह बारबार कनखियों से उसे ही ताकता रहा. विमला की नजरें जब भी उस की नजरों से टकरातीं, वह कुछ इस तरह मुसकराता कि विमला का दिल मचल उठता. उस की इस मुसकराहट से विमला के दिलोदिमाग में हलचल मचने लगी. उस दिन विमला अपने घर आई तो उसे लगा जैसे वह अपना कुछ खो आई है. परशुराम का अक्स उस के दिमाग में बस गया था. दूसरी ओर परशुराम का भी वही हाल था. उसे साफ महसूस हो रहा था कि विमला की आंखों में उस के लिए चाहत थी.

पति के दूर रहने से विमला को जब भी परशुराम की मुसकान याद आती, उस का मन विचलित होने लगता. रामकिशन ने उस की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था. महीनों हो गए थे, वह गांव नहीं आया था. पति की उपेक्षा से विमला व्याकुल रहने लगी थी. यही वजह थी कि उस ने परशुराम को खयालों में बसा लिया था. परशुराम से मिलने और उस से बातें करने का विमला का जब भी मन होता, वह जेठानी के यहां आ जाती. बहाना जेठानी से मिलने का होता था, जबकि नजरें परशुराम को खोजा करती थीं. जल्दी ही परशुराम और विमला के बीच अंतरंगता बढ़ गई और आंखों ही आंखों में इशारे भी होने लगे. एक दिन विमला ने कहा, ‘‘मैं रोज यहां आती हूं, जबकि तुम कभी हमारे घर नहीं आते. अब मैं तभी यहां आऊंगी, जब तुम मेरे घर आओगे…’’

‘‘अगर तुम्हारे सासससुर ने ऐतराज किया तो..?’’ परशुराम ने कहा.

‘‘मेरे सासससुर एक सप्ताह के लिए रिश्तेदारी में भागवत कथा सुनने गए हैं. मैं घर में बिलकुल अकेली हूं. इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है. तुम मेरे घर आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’ शरारत से आंखें नचाते हुए विमला ने कहा.

परशुराम समझ गया कि विमला क्या अच्छा लगने की बात कर रही है. आग दोनों ओर लगी थी. इसलिए अगले दिन परशुराम विमला के घर जा पहुंचा. विमला घर में सचमुच अकेली थी. इस का परिणाम यह निकला कि मर्यादा टूट गई. एक बार मर्यादा क्या टूटी, परशुराम अब महीने में पंद्रह दिन बहन के घर ही पड़ा रहने लगा. परशुराम बहन के घर क्यों पड़ा रहता है, इस बात की गांव में चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ाते बात रामकिशन के कानों तक पहुंची. रामकिशन ने परशुराम और विमला को अलग करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रेम दीवानी विमला ने परशुराम का साथ नहीं छोड़ा. तंग आ कर रामकिशन गांव में ही रहने लगा, जिस से दोनों को मिलने में परेशानी होने लगी.

तब किसी तरह एक दिन विमला ने परशुराम से मिल कर कहा, ‘‘परशुराम, अब मैं तुम्हारे लिए और मार नहीं खा सकती. तुम मजा ले कर दीदी के घर जा कर चैन से सो जाते हो, जबकि मेरा पति मुझे जानवरों की तरह पीटता है. अगर तुम मुझे सचमुच चाहते हो तो मुझे इस मारपीट से मुक्ति दिला दो. मुझे यहां से कहीं और ले चलो.’’

‘‘सच विमला.’’ परशुराम ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए पति और बेटे, दोनों को छोड़ने को तैयार हूं.’’

और फिर सचमुच एक दिन विमला ने अपना सामान समेटा और परशुराम के साथ भाग गई. परशुराम विमला को ले कर दिल्ली चला गया. वहां उस ने लक्ष्मीनगर में मदर डेयरी के पास झोपड़पट्टी में एक कमरा किराए पर लिया और विमला के साथ आराम से रहने लगा. रोजीरोटी के लिए वह सब्जी बेचने लगा. दूसरी ओर विमला के भाग जाने से रामकिशन की बड़ी बदनामी हुई. उस ने विमला को खोजने की खुद तो कोशिश की ही, थाने में भी परशुराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन विमला और परशुराम का कुछ पता नहीं चला. हार कर वह शांत हो कर बैठ गया.

लगभग 8 सालों बाद परशुराम मार्च, 2014 में अचानक अपने गांव इकघरा लौटा. साथ में उस की कथित पत्नी विमला और 3 साल की बेटी हिमांशी भी थी. गांव आ कर वह पत्नी और बेटी के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगा. जमीन का अपना आधा हिस्सा भी उस ने बंटा लिया. परशुराम का घर लौटना उस के छोटे भाई जयराम सिंह को अच्छा नहीं लगा. इस की वजह यह थी कि अभी तक घर और जमीन पर उसी का कब्जा था. उसे लगता था कि डर की वजह से परशुराम कभी लौट कर नहीं आएगा. विमला के आने की जानकारी रामकिशन को हुई तो वह इकघरा आया और गांव में पंचायत बैठा कर विमला को अपने साथ भिजवाने की गुहार लगाई. लेकिन विमला ने भरी पंचायत में उस के साथ जाने से मना कर दिया. बेटे धर्मेंद्र को देख कर भी उस का दिल नहीं पसीजा.

जब वह उसे छोड़ कर गई थी, तब वह 8 साल का था. अब वह 16 साल का हो गया था.  धर्मेंद्र ने भी मां से वापस चलने को कहा. समाज में हो रही बदनामी का भी वास्ता दिया, उस के बाद भी विमला राजी नहीं हुई. उस के बाद रामकिशन विमला और परशुराम को अंजाम भुगतने की धमकी दे कर वापस चला गया. भाई के आने से जयराम सिंह परेशान रहता था. उस का दिन का चैन और रातों की नींद छिन गई थीं. उस का सोचना था कि अगर परशुराम लौट कर न आता तो मकान और जमीन उसी की होती. लेकिन अब यह नामुमकिन था. इसी सोचविचार में जयराम सिंह ने एक रात एक तीर से 2 निशाने साधने की तरकीब निकाली.

उस ने बड़े भाई परशुराम, उस की कथित पत्नी विमला और बेटी हिमांशी की हत्या कर के इल्जाम विमला के पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाने की योजना बना डाली. योजना बना कर जयराम सिंह ने एक बदमाश से 4 हजार रुपए में एक तमंचा और 5 कारतूस खरीदे. 13 दिसंबर, 2014 की रात जब गांव में सन्नाटा पसर गया तो जयराम तमंचा लोड कर के पहली मंजिल पर पहुंचा और बरामदे में सो रही मासूम हिमांशी के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर परशुराम और विमला ने समझा कि बदमाश आ गए हैं. वे कमरे में दुबक गए.

इस के बाद जयराम सिंह कमरे में आया तो परशुराम ने भाई को पहचान लिया. वह उस से भिड़ गया. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. लेकिन मौका मिलते ही जयराम ने परशुराम के सीने में गोली मार दी. वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. विमला ने भी जयराम को पहचान लिया था. वह भी उसे से भिड़ गई. लपटाझपटी में विमला की चूडि़यां टूट कर बिखर गईं. वह चीख पाती, उस के पहले ही जयराम ने विमला के सीने में गोली मार दी. विमला भी खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी.

तीनों को मौत के घाट उतार कर जयराम ने तमंचा तथा खून से सने कपड़े भूसे की कोठरी में छिपा दिए और घर के बाहर आ कर जोरजोर से शोर मचाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी को जयराम ने बताया कि विमला के पति रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अन्य लोगों ने ये हत्याएं की हैं. भागते समय उस ने रामकिशन तथा धर्मेंद्र को पहचान लिया था. कुछ देर बाद ग्रामप्रधान अंगद सिंह यादव ने इन तीनों हत्याओं की सूचना थाना ऊसराहार पुलिस को दी.

पूछताछ के बाद 21 दिसंबर, 2014 को थाना ऊसराहार पुलिस ने अभियुक्त जयराम सिंह को इटावा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. Kanpur Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Crime Stories : कत्ल एक दिलदार का

Crime Stories : कबड्डी खेलते समय नासिर ने चौधरी आफताब की जो बेइज्जती की थी, उस का बदला लेने के लिए उस नेहैदर अली के साथ मिल कर नासिर के साथ ऐसा क्या किया कि उसे और हैदर अली को पछताना पड़ा. उन दिनों मैं जिला छंग के एक देहाती थाने में तैनात था. वह जगह दरिया के करीब थी. मई का महीना होने की वजह से अच्छीभली गरमी पड़ रही थी. अचानक एक दिन पास के गांव से एक वारदात की खबर आई. कांस्टेबल सिकंदर अली ने बताया कि गुलाबपुर में एक गबरू जवान का बड़ी बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया है, जिस की लाश खेतों में पड़ी है. गुलाबपुर मेरे थाने से करीब एक मील दूर था.

वहां से फैय्याज और यूनुस खबर ले कर आए थे. वे दोनों खबर दे कर वापस जा चुके थे. मैं ने पूछा, ‘‘मरने वाला कौन है?’’

‘‘उस का नाम नासिर है, वह कबड्डी का बहुत अच्छा और माहिर खिलाड़ी था.’’ सिकंदर अली ने बताया.

मैं 2 सिपाहियों के साथ गुलाबपुर रवाना हो गया. हमारे घोड़े खेतों के बीच आड़ीतिरछी पगडंडी पर चल रहे थे. जिस खेत में लाश पड़ी थी, वह गांव से एक फर्लांग के फासले पर था. कुछ लोग हमें वहां तक ले गए. वहां एक अधूरा बना कमरा था, न दीवारें न छत. जरूर कभी वहां कोई इमारत रही होगी. नासिर की लाश कमरे के सामने पड़ी थी. लाश के पास 8-9 लोग खड़े थे, जो हमें देख कर पीछे हट गए थे. मैं उकड़ूं बैठ कर बारीकी से लाश की जांच करने लगा. बेशक वह एक खूबसूरत गबरू जवान था. उस की उम्र 23-24 साल रही होगी. वह मजबूत और पहलवानी बदन का मालिक था, रंग गोरा और बाल घुंघराले.

लाश देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस पर तेजधार हथियार या छुरे से हमला हुआ होगा. मारने वाले एक से ज्यादा लोग रहे होंगे. उस के हाथों के जख्म देख कर लगता था कि उस ने अपने बचाव की भरपूर कोशिश की थी. नासिर कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, इसलिए गुलाबपुर के लोग उसे गांव की शान समझते थे. लाश पर चादर डाल कर मैं लोगों से पूछताछ करने लगा. नासिर का 60 साल का बाप वहीं था, उस की हालत बड़ी खराब थी, आंखें आंसुओं से भरी हुईं. उस का नाम बशीर था. मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘चाचा, आप फिकर न करो, आप के बेटे का कातिल पकड़ा जाएगा.’’

उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा बेटा तो चला गया. कातिल के पकड़े जाने से मेरा बेटा लौट कर तो नहीं आएगा.’’

बेटे के गम ने उस की सोचनेसमझने की ताकत खत्म कर दी थी. उसे बस एक ही बात याद थी कि उस का जवान बेटा कत्ल हो चुका है. मुझे उस पर बड़ा तरस आया. मैं ने उसे एक जगह बिठा दिया और अपनी काररवाई करने लगा. सब से पहले मैं ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया. वहां मुझे कत्ल का कोई सुराग नहीं मिला. यहां तक कि वह हथियार भी नहीं, जिस से उस का कत्ल किया गया था.n मैं ने वारदात की जगह पर मौजूद लोगों के बयान लिए. लेकिन सिवाय नासिर की तारीफ सुनने के कोई जानकारी नहीं मिली. मैं ने नासिर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मेरे दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि इतनी रात को नासिर इस सुनसान जगह पर क्या कर रहा था. मेरे अंदाज से कत्ल रात को हुआ था. मैं ने मौजूद लोगों से घुमाफिरा कर कई सवाल किए, पर काम की कोई बात पता नहीं चली. मैं ने यूनुस और फैयाज से भी पूछताछ की. पर वे कुछ खास नहीं बता सके. इलियास जिस ने सब से पहले लाश देखी थी, मैं ने उस से भी पूछा, ‘‘इलियास, तुम सुबहसुबह कहां जा रहे थे?’’

‘‘साहबजी, मैं कुम्हार हूं. मैं मिट्टी के बरतन बनाता हूं. मैं रोजाना सुबह मिट्टी लाने के लिए घर से निकलता हूं. मेरा कुत्ता मोती भी मेरे साथ होता है. वह मुझे इस तरफ ले आया, तभी लाश पर मेरी नजर पड़ी. लाश देख कर मैं ने ऊंची आवाज में चीखना शुरू कर दिया. उस वक्त खेतों में लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. कुछ लोग जमा हो गए. मौजूद लोगों से पता चला कि बशीर लोहार के बेटे नासिर का किसी ने कत्ल कर दिया है.’’

बशीर लोहार का घर गांव के बीच में था. उस का छोटा सा परिवार था. घर में नासिर के मांबाप के अलावा एक बहन थी. बशीर ने अपने घर के बरामदे में भट्ठी लगा रखी थी. वहीं पर वह लोहे का काम करता था. जब मैं उस के घर पहुंचा तो वह मुझे घर के अंदर ले गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा बशीर, जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, बहुत अफसोसनाक है. मैं तुम्हारे गम में बराबर का शरीक हूं. मेरी पूरी कोशिश होगी कि जैसे भी हो, कातिल को कानून के हवाले करूं. लेकिन तुम्हें मेरी मदद करनी होगी. हर बात साफसाफ और खुल कर बतानी होगी.’’

उस की बीवी जुबैदा बोल उठी, ‘‘साहब, आप से कुछ भी नहीं छिपाएंगे. हमारी दुनिया तो अंधेरी हो ही गई है, लेकिन जिस जालिम ने मेरे बच्चे को मारा है, उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’’

‘‘आप दोनों को किसी पर शक है?’’

‘‘साहब, हमें किसी पर शक नहीं है. मेरा बेटा तो पूरे गांव की आंख का तारा था. अभी पिछले महीने ही उस ने कबड्डी का टूर्नामेंट जीता था. इस मुकाबले में 4 गांवों की टीमों ने हिस्सा लिया था. गुलाबपुर की टीम में अगर नासिर न होता तो यह जीत नजीराबाद के हिस्से में जाती. सुल्तानपुर और चकब्यासी पहले दौर में आउट हो गए थे. असल मुकाबला गुलाबपुर और नजीराबाद में था. जीतने पर गांव वाले उसे कंधे पर उठाए घूमते रहे. बताइए, मैं किस पर शक करूं?’’ बशीर ने तफ्सील से बताया.

‘‘नासिर कबड्डी का इतना अच्छा खिलाड़ी था, जहां 10 दोस्त थे, वहां एकाध दुश्मन भी हो सकता है.’’ मैं ने कहा.

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं साहब, पर मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है.’’ बशीर ने बेबसी जाहिर की.

‘‘मुझे उस दसवें आदमी की तलाश है, जिस ने नासिर का बेदर्दी से कत्ल किया है. जरूर यह किसी दुश्मन का काम है. हो सकता है, गांव के बाहर का कोई दुश्मन हो?’’ मैं ने कहा.

‘‘बाहर का भी कोई दुश्मन नहीं है साहब.’’ उस की बीवी जुबैदा ने कहा तो मैं सोच में पड़ गया. अचानक बशीर बोल उठा, ‘‘वह तो सारा दिन मेरे साथ काम में लगा रहता था. शाम को अखाड़े में कसरत वगैरह करता था.’’

‘‘यह अखाड़ा कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अखाड़ा ट्यूबवेल के पास है. उस टूटीफूटी इमारत के करीब, जहां यह वारदात हुई.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘मेरे अंदाज से कत्ल देर रात को हुआ है, इतनी रात को वह अखाड़े में क्या कर रहा था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात हमारी भी समझ में नहीं आ रही है.’’ जुबैदा बोली.

‘‘रात को क्या वह रोजाना की तरह समय पर सोया था?’’

‘‘सोया तो रोजाना की तरह ही था.’’ कहतेकहते जुबैदा रुक गई.

‘‘मुझे खुल कर बताओ, क्या बात है?’’ मैं ने कहा तो वह बोली, ‘‘आप हमारे साथ ऊपर छत पर चलिए. आप खुद समझ जाएंगे.’’

हम छत पर पहुंचे तो जुबैदा कहने लगी, ‘‘मैं रोजाना नासिर को उठाने छत पर आती थी और वह 2 पुकार में उठ जाता था. लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. मैं ने आगे बढ़ कर चादर उठाई तो उस के नीचे एक तकिया रखा हुआ था, जिस पर चादर ओढ़ाई हुई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सो रहा है.’’

मैं खामोश खड़ा रहा तो जुबैदा ने कहा, ‘‘इस का मतलब है कि पिछली रात नासिर अपनी मरजी से घर से निकला था. वह नहीं चाहता था कि किसी को उस के जाने के बारे में पता चले.’’ जुबैदा बोली.

‘‘नहीं जुबैदा, ऐसा नहीं है. वह पहले भी जाता रहा होगा, पर सुबह होने से पहले आ जाता होगा. इसलिए तुम्हें पता नहीं चला. तुम्हारा बेटा रात के अंधेरे में कहीं जाता था और जल्द लौट आता होगा, इसलिए तुम्हें खबर नहीं मिल सकी. मुझे तो किसी लड़की का चक्कर लगता है.’’ मैं ने कहा तो वे दोनों बेयकीनी से मुझे देखने लगे, ‘‘लड़की का चक्कर…’’

बशीर ने कहा, ‘‘साहब, नासिर ऐसा लड़का नहीं था. वह तो गुलाबपुर की लड़कियों और औरतों को मांबहनें समझता था. वह कभी किसी की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.’’

‘‘मैं नहीं मान सकता कि लड़की का चक्कर नहीं था. पिछली रात वह किसी लड़की से मुलाकात करने ही खेत में पहुंचा था. अगर आप लोग लड़की का नाम बता दो तो केस जल्द हल हो जाएगा. मैं कातिलों तक पहुंच जाऊंगा, क्योंकि वही लड़की बता सकती है कि खेत में क्या हुआ था?’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जनाब, हम कसम खा कर कह रहे हैं कि हम ऐसी किसी लड़की को नहीं जानते.’’ दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘मैं आप की बात का यकीन करता हूं, पर इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. मैं कहीं न कहीं से इस का सुराग लगा ही लूंगा. आप यह बताएं कि गुलाबपुर में नासिर का सब से करीबी दोस्त कौन है?’’

‘‘जमील से उस की गहरी दोस्ती थी.’’ बशीर ने कहा.

‘‘ठीक है, अब मैं पता कर लूंगा. दोस्त दोस्त का राज जानते हैं. मुझे जमील से मिलना है. तुम उसे यहां बुला लो?’’ मैं ने कहा.

‘‘उस का घर पड़ोस में है, मैं अभी बुलाता हूं.’’ कहते हुए बशीर बाहर निकल गया.

उस ने वापस लौट कर बताया कि जमील 2 दिनों से टोबा टेक सिंह गया हुआ है.

‘‘ठीक है, कल वह वापस आएगा तो उस से पूछ लूंगा. अभी उस के घर वालों से बात कर लेता हूं.’’ मैं ने कहा.

सामने ही उस की परचून की दुकान थी. उस का बाप वहीं मिल गया. मैं ने करीब 15 मिनट तक उस से बात की, पर कोई काम की बात पता नहीं चल सकी. वह भी कबड्डी की वजह से नासिर का बड़ा फैन था. उसे उस की मौत का बहुत गम था. मेरा दिमाग गहरी सोच में था. मुझे पक्का यकीन था कि जरूर लड़की का चक्कर है. जहां लाश मिली थी, वहां एक अधूरा कमरा था. रात में मुलाकात के लिए वह बेहतरीन जगह थी. मुझे ऐसी लड़की की तलाश थी, जो नासिर से मोहब्बत करती थी और नासिर उस के इश्क में पागल था.

वह जगह गुलाबपुर के करीब ही थी, इसलिए लड़की भी वहीं की होनी चाहिए थी. मेरी सोच के हिसाब से कातिल इस राज से वाकिफ था कि लड़की और नासिर वहां छिपछिप कर मिलते हैं. उसे इस बात का भी यकीन रहा होगा कि नासिर वहां जरूर आएगा. निस्संदेह कातिल उन दोनों की मोहब्बत और मिलन से सख्त नाराज रहा होगा. उस ने वक्त और मौका देख कर नासिर को मौत के घाट उतार दिया होगा. मुझे उस लड़की को तलाश करना था.

दोपहर के बाद मैं ने हमीदा को थाने बुलाया. वह कस्बे में घरघर जा कर क्रीमपाउडर और परांदे वगैरह बेचा करती थी. हर घर की लड़कियों को वह खूब जानती थी और कई की राजदार भी थी. पहले भी वह मेरे कई काम कर चुकी थी. मैं उसे कुछ पैसे दे देता था तो वह खुश हो जाती थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘हमीदा, तुम गुलाबपुर के हर घर से वाकिफ हो. मुझे नासिर के बारे में जानकारी चाहिए. तुम जो जानती हो, बताओ.’’

‘‘साहब, वह तो गुलाबपुर का हीरो था. बच्चाबच्चा उस पर जान देता था.’’ उस ने दुखी हो कर कहा.

‘‘मुझे गुलाबपुर की उस हसीना का नाम बताओ, जो उस पर जान देती थी और नासिर भी उस का आशिक रहा हो.’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘ओह, तो कत्ल की इस वारदात का ताल्लुक नासिर की मोहब्बत की कहानी से जुड़ा हुआ है.’’ उस ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘सौ फीसदी, उस के इश्क में ही कत्ल का राज छिपा है.’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

हमीदा कुछ सोचती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सच क्या है, यह तो नहीं कह सकती. पर मैं ने उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि रेशमा से उस का कुछ चक्कर चल रहा था. रेशमा शकूर जुलाहे की बेटी है.’’

मैं ने हमीदा को इनाम दे कर विदा किया. मैं पहले भी उस से मुखबिरी का काम ले चुका था. उस की खबरें पक्की हुआ करती थीं. अगले दिन गरमी कुछ कम थी. मैं खाने और नमाज से फारिग हो कर बैठा था कि जमील अपने बाप के साथ आ गया. मैं ने उस के बाप को वापस भेज कर जमील को सामने बिठा लिया. वह गोराचिट्टा, मजबूत जिस्म का जवान था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जमील, तुम्हें नासिर के साथ हुए हादसे का पता चल गया होगा?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखें भीग गईं. वह दुखी लहजे में बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपना सब से प्यारा दोस्त खो दिया है. पता नहीं किस जालिम ने उसे कत्ल कर दिया.’’

‘‘तुम उस जालिम को सजा दिलवाना चाहते हो?’’

‘‘जरूर, साहब मैं दिल से यही चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी मदद मुझे कातिल तक पहुंचा सकती है. जमील मुझे यकीन है कि बिस्तर पर तकिया रख कर वह पहली बार रात को घर से बाहर नहीं गया होगा. जरूर वह पहले भी जाता रहा होगा. यह खेल काफी दिनों से चल रहा था. तुम उस के दोस्त हो, राजदार हो, तुम्हें सब पता होगा. मैं सारी हकीकत समझ चुका हूं, पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

कुछ देर सोचने के बाद वह बोला, ‘‘आप का अंदाजा सही है, इस मामले में एक लड़की का चक्कर है.’’

‘‘रेशमा नाम है न उस का?’’ मैं ने बात पूरी की तो वह हैरानी से मुझे देखने लगा. फिर बोला, ‘‘साहब, उस का नाम रेशमा ही है. दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे. धीरेधीरे उन की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया था. मैं उन का राजदार था या यूं कहिए मेरी वजह से ही ये मुलाकातें मुमकिन थीं. रेशमा हमारी दुकान पर सामान लेने आती थी. उसे पता था कि मैं कब दुकान पर रहता हूं. मैं ही रेशमा को बताया करता था कि उसे कब खेतों में पहुंचना है. नासिर उस की राह देखेगा, अगर वह आने को हां कह देती थी तो मैं नासिर को बता देता था. फिर वह उस जगह पहुंच जाता था. इस तरह उन दोनों की मुलाकात हो जाती थी.’’

‘‘क्या मुलाकात के वक्त तुम भी आसपास होते थे?’’

‘‘नहीं साहब, मैं कभी उस तरफ नहीं गया. हां, दूसरे दिन नासिर मुझे सब बता दिया करता था.’’

‘‘दोनों के बीच बात किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी?’’

‘‘दोनों की मोहब्बत शादी तक पहुंच गई थी. रेशमा जल्दी शादी करने का इसरार कर रही थी. नासिर भी शादी करना चाहता था, लेकिन उसे इतनी जल्दी नहीं थी. जबकि रेशमा जल्दी रिश्ता तय करने की बात कर रही थी.’’

‘‘रेशमा की जल्दी के पीछे भी कोई वजह रही होगी?’’

‘‘हां, दरअसल रेशमा की मां सरदारा बी उस का रिश्ता अपनी बहन के लड़के से करना चाहती थी और उस का बाप उस का रिश्ता अपने भाई के लड़के से करना चाहता था. पर बात सरदारा बी की ही चलनी थी, क्योंकि वह काफी तेज है. वही सब फैसले करती है. रिश्ता खाला के बेटे से न तय हो जाए, इस डर से रेशमा नासिर को जल्दी रिश्ता लाने को कह रही थी.’’ जमील ने तफ्सील से बताया.

‘‘एक बात समझ में नहीं आई जमील, तुम्हारे मुताबिक उन की मुलाकातों के तुम अकेले राजदार थे. जबकि कत्ल वाले दिन के पहले से तुम गांव से बाहर थे. फिर उस दिन दोनों की मुलाकात किस ने तय कराई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, जिस दिन मैं टोबा टेक सिंह गया था, उसी दिन मैं ने उन की दूसरे दिन की मुलाकात तय करा दी थी. नासिर ने दूसरे दिन मिलने को कहा था. मैं ने यह बात रेशमा को बता दी थी. उस के हां कहने पर मैं ने नासिर को भी प्रोग्राम पक्का होने के बारे में बता दिया था.’’

‘‘इस का मतलब प्रोग्राम के मुताबिक ही नासिर अगली रात रेशमा से मिलने खेतों में पहुंचा था. यकीनन वादे के मुताबिक रेशमा भी वहां आई होगी और उस रात नासिर के साथ जो खौफनाक हादसा हुआ, वह उस ने भी देखा होगा. उस का बयान कातिल तक पहुंचने में मदद कर सकता है. मुझे रेशमा का बयान लेना होगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘साहब, मामला बहुत नाजुक है. नासिर तो अब मर चुका है, आप रेशमा से इस तरह मिलें कि बात फैले नहीं. नहीं तो बेवजह वह मासूम बदनाम हो जाएगी.’’

‘‘तुम इस की चिंता न करो, मैं उस से बहुत सोचसमझ कर इस तरह मिलूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया जनाब, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

‘‘जमील, तुम एक बात का खयाल रखना, जो बातें हमारे बीच हुई हैं, उन का किसी से जिक्र मत करना.’’

जब मैं नासिर की लाश ले कर गुलाबपुर पहुंचा तो बशीर लोहार के घर तमाम लोग जमा थे. लाश देख कर एक बार फिर रोनापीटना शुरू हो गया. मौका देख कर मैं ने शकूर को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘शकूर, मुझे नासिर के कत्ल के सिलसिले में तुम से कुछ पूछना है. यहां खड़े हो कर बात करने से बेहतर है तुम्हारे घर बैठ कर बात की जाए.’’

उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं उस के साथ उस के घर चला आया और उस की बैठक में बैठ गया. उस की एक बेटी थी रेशमा और एक बेटा शमशाद. बेटा 12-13 साल का रहा होगा, जो उस वक्त बाहर खेल रहा था. अभी थोड़ी ही बातचीत हुई थी कि सरदारा बी चाय की ट्रे ले कर आ गई. शकूर ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, चाय पीएं और सवाल भी पूछते रहें. ये मेरी बीवी सरदारा बी है, इस से भी जो पूछना है पूछ लें.’’

उन की बातचीत से मैं ने अंदाजा लगाया कि उन्हें रेशमा के इश्क के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मैं ने उन से नासिर के बारे में कुछ सवाल पूछे, उन दोनों ने उस की बहुत तारीफें कीं. बातचीत के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप की बेटी रेशमा कहां है?’’

‘‘वह घर में ही है जनाब, कल से उसे तेज बुखार है. हकीमजी से दवा ला कर दी, पर उस का कुछ असर नहीं हुआ.’’ सरदारा बी ने कहा.

‘‘रेशमा का बुखार हकीमजी की दवा से कम नहीं होगा. यह दूसरी तरह का बुखार है.’’ मैं ने कहा तो शकूर ने चौंक कर मेरी ओर देखा. मैं ने आगे कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं, यह इश्क का बुखार है. नासिर की मौत ने रेशमा के दिलोदिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया है.’’

दोनों उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे, ‘‘हमारी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह सब क्या है?’’

‘‘मैं समझाता हूं. यही सच्चाई है. रेशमा और नासिर एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे. दोनों रातों को मिलते भी थे. रेशमा को उस की मौत से बहुत दुख पहुंचा है.’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘मुझे बिलकुल यकीन नहीं आ रहा है.’’ सरदारा बी बोली.

हकीकत जान कर वे दोनों परेशान थे. मैं ने कहा, ‘‘परेशान न हों, आप के घर की बात इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी. रेशमा मेरी बेटी की तरह है और बिलकुल बेगुनाह है. मुझे उस की इज्जत का पूरा खयाल है. आप मुझे उस के पास ले चलो, मैं उस से कुछ बातें करूंगा. इस बात की कानोंकान किसी को खबर नहीं हो पाएगी. आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’

उन्होंने मुझे रेशमा के पास पहुंचा दिया. मैं ने उन दोनों को बाहर भेज दिया. वे दरवाजे के पीछे जा कर खड़े हो गए. मैं ने रेशमा से नरम लहजे में कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. दरअसल मैं तुम से नासिर के बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूं. वैसे तो मैं सब जानता हूं, फिर भी तुम्हारे मुंह से सुनना जरूरी है.’’

‘‘मैं जो जानती हूं, सब बताऊंगी.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘कत्ल की रात तुम खेतों में नासिर से मिलने गई थीं, मुझे यह बताओ कि उस पर हमला किस ने किया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं उस रात नासिर से मिलने नहीं गई थी.’’ वह मजबूती से बोली. उस के लहजे में विश्वास और यकीन साफ झलक रहा था.nमैं ने अगला सवाल किया, ‘‘जमील ने मुझे बताया है कि तुम्हारी और नासिर की मुलाकात पहले से तय थी. यह बात इस से भी साबित होती है, क्योंकि नासिर तुम से मिलने खेतों में गया था.’’

‘‘यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि नासिर वहां क्यों गया था? जबकि उस ने खुद ही प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था.’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

‘‘प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था, यह तुम क्या कह रही हो?’’ उस की बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रही हूं थानेदार साहब, मुझे नहीं पता प्रोग्राम कैंसिल करने के बाद नासिर वहां क्यों गया था. कल से मैं यही बात सोच रही हूं.’’ रेशमा ने सोचते हुए कहा.

‘‘एक मिनट, तुम दोनों के बीच खबर का आदानप्रदान जमील ही करता था न, पर जमील पिछले 2 दिनों से गुलाबपुर में नहीं था. फिर प्रोग्राम कैंसिल होने की खबर तुम्हें किस ने दी?’’ मैं ने उसे देखते हुए पूछा.

‘‘इम्तियाज ने.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘इम्तियाज कौन है?’’

‘‘माजिद चाचा का बेटा.’’

‘‘क्या इम्तियाज को भी तुम दोनों की मोहब्बत की खबर थी?’’

‘‘नहीं जी, वह तो 8 साल का बच्चा है. हमारे पड़ोस में ही रहता है.’’

‘‘इम्तियाज ने तुम से क्या कहा था?’’

‘‘मुझे तो यह जान कर ही बड़ी हैरानी हुई थी कि नासिर ने इम्तियाज के हाथ यह पैगाम क्यों भिजवाया था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैं ने चेक करने के लिए उस से पूछा, ‘कहां नहीं जाना है.’ इस पर उस ने कहा था कि वह इस से ज्यादा कुछ नहीं जानता. नासिर भाई ने कहा है कि रेशमा को कह दो कि आज नहीं आना है. कुछ जरूरी काम है.’’ उस ने रुकरुक कर आगे कहा, ‘‘मैं जमील की दुकान पर जा कर पता कर लेती, पर वह टोबा टेक सिंह चला गया था. इम्तियाज से कुछ पूछना बेकार था. बहरहाल मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं नासिर से मिलने नहीं जाऊंगी.’’

‘‘इस का मतलब है कि नासिर को पूरी मंसूबाबंदी से साजिश के तहत कत्ल किया गया है. मुझे यकीन है कि इम्तियाज उस आदमी को पहचानता होगा, जिस ने नासिर के हवाले से तुम्हारे लिए संदेश भेजा था.’’ मैं ने सोचते हुए कहा.

‘‘आप यह बात इम्तियाज से पूछें. मेरी तबीयत बहुत बिगड़ रही है. चक्कर आ रहे हैं.’’ वह कमजोर लहजे में बोली.

‘‘तुम आराम करो रेशमा, पर इन बातों का किसी से जिक्र मत करना और परेशान मत होना.’’ मैं ने उसे समझाया.

जब मैं कमरे से निकला तो उस के मांबाप ने मुझे घेर कर पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कुछ पता चला?’’

‘‘कुछ नहीं, बल्कि सब कुछ पता चल गया है.’’

‘‘हमें भी तो कुछ बताइए न?’’ शकूर ने कहा.

‘‘पहले आप पड़ोस से इम्तियाज को बुलाएं.’’

थोड़ी देर में सरदारा बी इम्तियाज को बैठक में ले आई. वह 8 साल का मासूम सा बच्चा था. मैं ने उसे प्यार से अपने पास बिठा कर पूछा, ‘‘बेटा इम्तियाज, तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?’’

‘‘हां, आप पुलिस हैं.’’ वह मुझे गौर से देखते हुए बोला.

इधरउधर की एकदो बातें करने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम स्कूल जाते हो, एक अच्छे बच्चे हो, सच बोलने वाले. यह बताओ, परसों शाम को तुम ने रेशमा बाजी से कहा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैं ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा हुआ था न?’’

‘‘हां, ऐसा हुआ था साहब.’’ इम्तियाज बोला.

‘‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो. मैं तुम्हें टाफियां दूंगा. अब यह भी बता दो कि तुम ने रेशमा बाजी को कहां जाने से मना किया था?’’

‘‘यह मुझे नहीं पता.’’ वह मासूमियत से बोला, ‘‘आप को यकीन नहीं आ रहा है तो रब की कसम खाता हूं.’’

‘‘नहीं बेटा, कसम खाने की जरूरत नहीं है. मुझे तुम पर भरोसा है. तुम ने तो रेशमा बाजी से वही कहा था, जो नासिर भाई ने तुम से कहलवाया था, है न?’’

‘‘नहीं जी.’’ वह उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगा.

‘‘क्या नहीं?’’

‘‘यह बात मुझे नासिर भाई ने नहीं कही थी.’’

उस ने कहा तो मैं ने तपाक से सवाल किया, ‘‘फिर किस ने कही थी?’’

‘‘हैदर भाई ने.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है हैदर अली? सरदारा बी का भांजा हैदर अली, जुलेखा का बेटा.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, जी वही हैदर भाई.’’ उस ने जल्दी से कहा.

सरदारा बी की बहन जुलेखा का घर भी गुलाबपुर में ही था. हैदर अली उसी का बेटा था और वह इसी हैदर से रेशमा की शादी करना चाहती थी. यह भी सुनने में आया था कि हैदर का दावा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. मैं सोचने लगा कि जब उसे रेशमा और नासिर की मोहब्बत का पता चला होगा तो उस ने अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाने की कोशिश की होगी. मुझे लगा कि अब केस हल हो जाएगा. जैसे ही वह मेरे हत्थे चढ़ेगा, उसे डराधमका कर मैं उस की जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

जब मैं जुलेखा के घर पहुंचा तो हैदर अली घर पर नहीं था. मैं ने जुलेखा से पूछा, ‘‘हैदर अली कहां गया है?’’

‘‘मुझे तो पता नहीं, बता कर नहीं गया है जी. वैसे आप हैदर को क्यों ढूंढ रहे हैं?’’ वह परेशान हो कर बोली.

उस की परेशानी स्वाभाविक थी. अगर पुलिस किसी के दरवाजे पर आए तो घर के लोग चिंता में पड़ जाते हैं. मैं जुलेखा को अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें यह पता है न कि गुलाबपुर में एक लड़के का कत्ल हो गया है?’’

‘‘जी…जी मालूम है, बशीर लोहार के जवान बेटे का कत्ल हो गया है. किसी जालिम ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा है.’’ उस ने कहा.

‘‘किसी ने नहीं, एक खास बंदे ने जिस की तलाश में मैं यहां आया हूं. तुम्हारा लाडला हैदर अली.’’

‘‘नहींऽऽ.’’ उस ने एक चीख सी मारी, ‘‘मेरा बेटा कातिल नहीं हो सकता. आप को कोई गलतफहमी हुई है थानेदार साहब.’’ वह रोनी आवाज में बोली.

‘‘हर मां का यही खयाल होता है कि उस का बेटा मासूम है. पर मैं तफ्तीश कर के पक्के सुबूत के साथ यहां आया हूं.’’

‘‘कैसा सुबूत साहब?’’ वह परेशान हो कर बोली.

‘‘हैदर अली को मेरे हाथ लगने दो, उसी के मुंह से सुबूत भी जान लेना.’’ मैं ने तीखे लहजे में कहा.

काफी देर राह देखने के बाद मैं ने गांव में अपने 2 लोग उस की तलाश में भेजे. पर वह कहीं नहीं मिला. इस का मतलब था, वह गांव छोड़ कर कहीं भाग गया था. गुलाबपुर में भी किसी को उस के बारे में कुछ पता नहीं था. हैदर अली के गांव से गायब होने से पक्का यकीन हो गया कि वारदात में उसी का हाथ था. मैं काफी देर तक गुलाबपुर में रुका रहा. फिर जुलेखा से कहा, ‘‘जैसे ही हैदर घर आए, उसे थाने भेज देना.’’

एक बंदे को टोह में लगा कर मैं थाने लौट आया. अगले रोज मैं सुबह की नमाज पढ़ कर उठा ही था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कांस्टेबल न्याजू खड़ा था. पूछने पर बोला, ‘‘साहब, जिस सिपाही को हैदर पर नजर रखने के लिए गांव में छोड़ कर आए थे, उस ने खबर भेजी है कि वह देर रात घर लौट आया है.’’

‘‘न्याजू, तुम और हवलदार समद फौरन गुलाबपुर रवाना हो जाओ और हैदर अली को साथ ले कर आओ.’’ मैं ने उसे आदेश दिया.

तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा तो थोड़ी देर बाद हवलदार समद हैदर को गिरफ्तार कर के ले आया. उस के साथ रोती, फरियाद करती जुलेखा भी थी. मैं ने कहा, ‘‘देखो, रोनेधोने की जरूरत नहीं है. यह थाना है शोर मत करो.’’

‘‘साहब, आप मेरे जवान बेटे को पकड़ कर ले आए हैं, मैं फरियाद भी न करूं.’’ वह रोते हुए बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे बेटे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है, फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं. अगर वह बेकुसूर है तो अभी थोड़ी देर में छूट जाएगा. यह मेरा वादा है तुम से.’’

‘‘अल्लाह करे, मेरा बेटा बेगुनाह निकले.’’

‘‘मेरी सलाह है, तुम घर चली जाओ. अगर हैदर बेकुसूर है तो शाम तक घर आ जाएगा.’’

हैदर को मैं ने अपने कमरे में बुलाया. हवलदार समद भी साथ था. मैं ने उसे गहरी नजर से देख कर तीखे लहजे में कहा, ‘‘हैदर, इसी कमरे में तुम्हारी जुबान खुल जाएगी या तुम्हें ड्राइंगरूम की सैर कराई जाए.’’

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उतर गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं ने ऐसा क्या किया है?’’

‘‘क्या के बच्चे, मैं बताता हूं तेरी काली करतूत. तूने नासिर का कत्ल किया है.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने किसी का कत्ल नहीं किया.’’ वह घबरा उठा.

‘‘फिर नासिर का कातिल कौन है?’’ मैं ने उस की आंखों में देखते हुए कहा.

‘‘मुझे कुछ पता नहीं थानेदार साहब.’’ वह हकलाया.

‘‘तुम्हें यह तो पता है न कि रेशमा तुम्हारी बचपन की मंगेतर है.’’ मैं ने टटोलने वाले अंदाज में कहा.

‘‘जी, जी हां, यह सही है.’’ उस ने कहा.

‘‘और यह भी तुम्हें मालूम होगा कि मकतूल नासिर और तुम्हारी मंगेतर रेशमा में पिछले कुछ अरसे से इश्क का चक्कर चल रहा था?’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं थानेदार साहब?’’ उस ने नकली हैरत दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं जो कह रहा हूं, तुम अच्छी तरह समझ चुके हो. सीधी तरह से सच्चाई बता दो, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ मैं ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रहा हूं, मैं ने नासिर का कत्ल नहीं किया.’’ वह नजरें चुराते हुए बोला.

‘‘नासिर के कत्ल वाली बात पहले हो चुकी है. अभी मेरे इस सवाल का जवाब दो कि तुम्हें रेशमा और नसिर के इश्क की खबर थी या नहीं? सच बोलो.’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’’

‘‘तो क्या तुम इम्तियाज को भी नहीं जानते?’’

‘‘कौन इम्तियाज?’’ वह टूटी हुई आवाज में बोला.

‘‘माजिद का बेटा, रेशमा का पड़ोसी बच्चा. याद आया कि नहीं?’’ मैं ने दांत पीसते हुए कहा.

‘‘अच्छाअच्छा, आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं.’’

‘‘हां…हां, वही बच्चा, जिस के हाथ तुम ने रेशमा के लिए संदेश भेजा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैंने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा तो वह हैरानी से बोला, ‘‘मैं ने? मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की…’’

‘‘तुम्हारे इस कारनामे के 2 गवाह मौजूद हैं. एक तो इम्तियाज, जिस के हाथ तुम ने संदेश भेजा था, दूसरी रेशमा, जिस के लिए तुम ने यह पैगाम भेजा था. अब बताओ, क्या कहते हो?’’

मेरी बात सुन कर वह हड़बड़ा गया. हवलदार समद ने कहा, ‘‘आप इस नालायक को मेरे हवाले कर दें, एक घंटे में फटाफट बोलने लगेगा.’’

मैं ने हैदर अली को हवलदार के हवाले कर दिया. थोड़ी देर में उस की चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. एक घंटे के पहले ही हवलदार ने खुशखबरी सुनाई.

‘‘हैदर अली ने जुर्म कुबूल लिया है. आप इस का बयान ले लें.’’

‘‘मतलब यह कि उस ने नासिर के कत्ल की बात मान ली है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी नहीं, बात कुछ और ही है, आप उसी से सुनिए.’’

हैदर अली ने नासिर का कत्ल सीधेसीधे नहीं किया था. अलबत्ता वह एक अलग तरह से इस कत्ल से जुड़ा था. यह भी सच था कि नन्हे इम्तियाज से रेशमा को पैगाम उसी ने भिजवाया था. यह पैगाम उस ने चौधरी आफताब के कहने पर रेशमा को भिजवाया था, ताकि रेशमा वारदात की रात मुलाकात की जगह न पहुंच सके और नासिर को ठिकाने लगाने में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े. चौधरी आफताब नजीराबाद के चौधरी का बेटा था. वह भी कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था. हाल ही में खेले गए टूर्नामेंट में वह नजीराबाद से खेल रहा था. फाइनल मैच में नजीराबाद की बुरी तरह से हार हुई थी. कप और इनाम गुलाबपुर के हिस्से में आए. ढेरों तारीफ व जीत की खुशी भी नासिर के नाम लिखी गई.

एक कबड्डी का दांव नासिर और आफताब के बीच पड़ा था, जिस में नासिर ने चौधरी आफताब को इतनी बुरी तरह से रगड़ा था कि उस की नाक और मुंह से खून बहने लगा था. एक तो गांव की हार, ऊपर से अपनी दुर्गति पर उस का दिल गुस्से और बदले की आग से जलने लगा था. उस का वश चलता तो वह वहीं नासिर का सिर फोड़ देता. उस ने मन ही मन इरादा कर लिया कि नासिर से बदला जरूर लेगा. इस तरह उस का अपने सब से बड़े प्रतिद्वंदी से भी पीछा छूट जाएगा. आफताब से हैदर ने कह रखा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. किसी तरह उसे यह भी पता चल गया था कि नासिर और रेशमा के बीच मोहब्बत और मुलाकात का सिलसिला चल रहा है. इसलिए उस ने एक तीर से दो शिकार करने का खतरनाक मंसूबा बना लिया.

हैदर अली को रेशमा और नासिर के संबंध का शक तो था ही, पर जब आफताब ने इस बारे में उसे शर्मसार किया तो वह आपे से बाहर हो गया. चौधरी आफताब ने उसे समझाया कि जोश के बजाय होश और तरीके से काम लिया जाए तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी. हैदर अली ने चौधरी आफताब का साथ देने का फैसला कर लिया. हैदर अली ने अपने हाथों से नासिर का कत्ल नहीं किया था, पर वह इस साजिश का एक हिस्सा था. जिस में चौधरी के भेजे हुए दो लोगों ने तेजधार चाकू की मदद से नासिर का बेदर्दी से कत्ल कर दिया था. जब कातिल उसे मौत के घाट उतार रहे थे तो हैदर अली थोड़ी दूर अंधेरे में खड़ा यह खूनी तमाशा देख रहा था.

हैदर अली के इकबालेजुर्म और गवाही पर मैं ने उसी रोज खुद नजीराबाद जा कर नासिर के कत्ल के सिलसिले में चौधरी आफताब को भी गिरफ्तार कर लिया था. आफताब गांव के चौधरी का बेटा था, इसलिए उस की गिरफ्तारी को रोकने के लिए मुझ पर काफी दबाव डाला गया था, पर मैं ने उस के असर व पैसे की परवाह न करते हुए चौधरी आफताब और उस की निशानदेही पर उन दोनों कातिलों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख चौधरी ने मुझे धमकी दी थी, ‘‘मलिक साहब, आप को मेरी ताकत का अंदाजा नहीं है. मैं अपने बेटे को अदालत से छुड़वा लूंगा.’’

मैं ने विश्वास से कहा, ‘‘चौधरी साहब, मैं सिर्फ खुदा की ताकत और कानून से डरता हूं. आप को जितना जोर लगाना है, लगा लो. आप का होनहार बेटा अदालत से सीधा जेल जाएगा.’’

मैं ने हैदर अली, चौधरी आफताब और नासिर के दोनों कातिलों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट बनाई और उन्हें अदालत के हवाले कर दिया. दोनों कातिल अपने जुर्म का इकबाल कर चुके थे, इसलिए उन की बाकी जिंदगी जेल में ही गुजरनी थी. Crime Stories

 

Crime Stories : आस्था की चोरी

Crime Stories : उदय कोलते को आस्था से इसलिए नफरत हो गई थी क्योंकि उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी और जेल जाने की वजह से घर वाले उस से नफरत करने लगे थे. इसलिए उस ने बदला लेने के लिए मंदिरों में चोरियां शुरू कर दीं. एक बड़ी चोरी में उस के हाथ मोटा माल लगा भी, लेकिन…

बोरीवली थाने के एपीआई जी.एस. घार्गे डिटेक्शन रूम में अपने सहकर्मियों के साथ एक शातिर बदमाश से पूछताछ कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. असमय आई इस काल को वह रिसीव नहीं करना चाहते थे. काल डिस्कनेक्ट करने के लिए उन्होंने जेब से फोन निकाला तो उन की नजर फोन की स्क्रीन पर आ रहे नंबर पर पड़ी. उस नंबर को देख कर घार्गे की आंखों में चमक बढ़ गई क्योंकि वह नंबर उन के एक खास मुखबिर का था.

एपीआई घार्गे तुरंत डिटेक्शन रूम से बाहर लौबी में आ गए और काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘यस थर्टी फोर, बहुत दिनों से गायब हो. कोई काम की खबर भी नहीं दे रहे?’’

तभी मुखबिर बोला, ‘‘सर, कोई आप के काम की खबर होती तो जरूर फोन करता. अब जो खबर देने जा रहा हूं उसे सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

‘‘बताओ क्या खबर है?’’ घार्गे ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘सर, रत्नागिरी का कुख्यात सेंधमार और सजायाफ्ता चोर उदय मुंबई में देखा गया है. पता चला है कि वह आज करीब 3 बजे बोरीवली के गोखले कालेज के पास स्थित वामन हरी पेठे ज्वैलर्स के पास वाली गली में किसी को चोरी का मोटा माल देने या बेचने आने वाला है.’’

एपीआई घार्गे ने यह सुना तो उन की आंखों में चमक बढ़ गई. उन्होंने कलाई घड़ी में देखा. उस समय दोपहर के 12 बज रहे थे. उन्होंने मुखबिर से कहा, ‘‘तुम 2 बजे गोखले कालेज के पास पहुंच जाना, मैं स्टाफ के साथ वहीं मिलूंगा. मैं देखता हूं, आज उदय पुलिस के हाथों से कैसे बच कर जाएगा?’’

मुखबिर से बात कर के घार्गे फिर से डिटेक्शन रूम में पहुंच गए. वे मन ही मन संकल्प कर चुके थे कि आज हर हालत में उदय को दबोचना है. उदय नाम के उस सेंधमार ने महाराष्ट्र पुलिस की नींद उड़ा रखी थी. करीब डेढ़ बजे एपीआई घार्गे अपने सहयोगी औफिसर एपीआई जी.डी. पिसाल, हवलदार नेहरू पाटिल, बबन बबाटे, अशोक खोत, शकील शेख, रंजीत शिंदे, निलेश सांबरेकर, सचिन केलजी और सचिन खताते के साथ सादा वेश में प्राइवेट कारों से बोरीवली पश्चिम स्थित शिंपोली रोड पर गोखले कालेज के पास पहुंच गए. मुखबिर वहां पहले से मौजूद था.

वहां पहुंचते ही सभी पुलिसकर्मियों ने 2-2, 3-3 के ग्रुपों में विभाजित हो कर शिंपोली रोड पर अपना जाल फैला लिया. पुलिस को वहां इंतजार करतेकरते साढ़े 4 बज गए लेकिन उदय कहीं नजर नहीं आया. घार्गे को लगने लगा था कि खबर शायद गलत मिली है. वह दूर खड़े मुखबिर से इस सिलसिले में फोन पर बातें कर ही रहे थे कि तभी मुखबिर ने कहा, ‘‘शिकार जाल में फंसने आ चुका है साहब. हाथों में ट्रौली वाली बैग थामे हरे रंग की शर्ट वाला जो शख्स आप की ओर आ रहा है, वही उदय है. आप उसे संभालिए, मैं यहां से जा रहा हूं.’’

घार्गे ने चौंकते हुए सड़क के दूसरे किनारे की तरफ देखा तो सचमुच एक शख्स हाथ में एक ट्रौली बैग उठाए चला आ रहा था. घार्गे ने अपने स्टाफ को इशारा किया और वह खुद भी तेजी से उदय की ओर बढ़ गए. 2 मिनट के अंदर पुलिस दल ने सेंधमार उदय को दबोच कर उस का बैग अपने कब्जे में ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना नाम उदय बताया. पुलिस ने जब बैग की तलाशी ली तो उस में देवीदेवताओं की अनेक मूर्तियां व सोनेचांदी के आभूषण निकले. इतना बहुमूल्य सामान देख कर एपीआई घार्गे दंग रह गए थे. पुलिस ने जब पूछा कि ये सोनेचांदी के आभूषण किस के हैं और सारी मूर्तियां वह कहां से लाया है तो वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाया.

इस बीच वहां तमाम लोग इकट्ठे हो गए थे. वहां मौजूद लोगों के सामने बैग के सामान की गिनती की गई तो उस में बहुमूल्य धातु की 8 मूर्तियां, चांदी के 8 मुखौटे, सोने की 61 अनुकृतियां, 2 सोने व 2 चांदी की चेन, एक सोने का गंडा (बे्रसलेटनुमा), एक चांदी का पालना, चांदी के 6 पत्ते, चांदी के 15 सिक्के आदि चीजें मिलीं. इस सामान की कीमत अनुमानत: 15-20 लाख रुपए थी. पुलिस को अनुमान नहीं था कि उस के पास से चोरी का इतना सामान मिल जाएगा.

पुलिस उदय को गिरफ्तार कर के बोरीवली थाने ले आई. शातिर चोर के गिरफ्तार होने की बात पता चलते ही डीसीपी बालसिंह राजपूत एवं सीनियर पीआई नारायण खैरे भी बोरीवली थाने पहुंच गए. इस उपलब्धि पर पुलिस अधिकारियों ने एपीआई घार्गे की सराहना की. उदय ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस ने सारा सामान मंदिरों से चुराया है. चूंकि उस से विस्तार से पूछताछ करनी थी, इसलिए पुलिस ने उदय को बोरीवली मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर के 29 नवंबर, 2014 तक के लिए उस का पुलिस रिमांड ले लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने जब उदय से पूछताछ की तो पता चला कि उस का चोरी का तरीका बिलकुल फिल्मी था. चोरियां करतेकरते यह आस्तिक चोर देवीदेवताओं से अचानक नफरत क्यों करने लगा, इस की एक दिलचस्प कहानी सामने आई. महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले की तहसील लांजा में एक छोटा सा गांव है शिपुशी. इसी गांव के रहने वाले सुधाकर कोलते का बेटा था उदय. उदय बचपन से ही कामचोर और उद्दंड प्रवृत्ति का था. मांबाप के लाड़प्यार में वह बिगड़ गया था.

वह दिन भर गांव के आवारा युवकों के साथ घूमता. उन के साथ रह कर उस ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. बातबात पर गांव वालों से झगड़ा व मारपीट करने की वजह से गांव में वह दबंग के रूप में जाना जाने लगा था. उस की करतूतों से उस के घरवाले परेशान रहने लगे थे. उन्होंने उसे बहुत समझाया लेकिन उदय ने मांबाप की एक नहीं सुनी. जब उदय के परिजनों को लगा कि उदय उन के समझाने से सुधरने वाला नहीं है तब उन्होंने तय किया कि उस की शादी करा दी जाए. हो सकता है, पत्नी के समझाने पर वह अपनी जिम्मेदारियों को समझे और अपनी बुरी आदतें छोड़ दे. उन्होंने अपने रिश्तेदारों आदि से उदय के लिए कोई लड़की देखने को कहा. पर आवारा, बेरोजगार व शराबी उदय को भला कौन शरीफ बाप अपनी बेटी का हाथ देता.

काफी कोशिशों के बाद भी उदय की शादी नहीं हो सकी तो वह बाजारू औरतों के पास जाने लगा. रोजरोज उन के पास जाने के लिए उसे पैसों की जरूरत पड़ने लगी. शराब व अय्याशी के लिए पैसे जुटाने के लिए उस के कदम जरायम की तरफ बढ़ गए. ज्यादा पैसे कमाने के लिए उस ने दोस्तों के साथ सेंधमारी शुरू कर दी. शुरुआत उस ने पड़ोस के गांव के एक मकान से की थी. मकान मालिक पूरे परिवार के साथ अपने एक रिश्तेदार की शादी में गया हुआ था, तभी उस ने रात करीब 2 बजे खाली पड़े मकान का ताला तोड़ा और घर में रखी नकदी, ज्वैलरी आदि सामान चुरा लिया. मकान मालिक जब घर लौटा तो उस ने घर का कीमती सामान गायब पाया.

इस की रिपोर्ट उस ने थाना लांजा में दर्ज कराई. पुलिस ने इस मामले को लाख खोलने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली. पहली वारदात की कामयाबी से उदय की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वह धड़ाधड़ वारदातें करता चला गया. एक साल के अंदरअंदर सेंधमारी के करीब 8 मामले लांजा व आसपास के पुलिस स्टेशनों में दर्ज तो हुए परंतु पुलिस उदय तक नहीं पहुंच पाई. दूसरी ओर वारदात की रकम से उदय व उस के साथी ऐश करते रहे. उदय अब बनठन कर रहने लगा. कोई पूछता तो वह कह देता कि वह शहर में बिजनैस करता है.

जब उस के बिजनैस करने की बात फैली तो रंजना नाम की एक लड़की से उस की शादी हो गई. रंजना अत्यंत सुंदर व संस्कारी थी. वह तो यही समझती थी कि उस का पति कोई बिजनैस करता है. इसलिए वह भी ठाठबाट से रहती. लेकिन उसे क्या पता था कि पति का असली बिजनैस चोरी है. कई साल बीत गए लेकिन शातिर उदय ने पत्नी को सच्चाई पता नहीं चलने दी. इस बीच वह 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. शातिरदिमाग उदय अपने खास दोस्त के साथ ही वारदात करता था. इसलिए उस के कारनामों का किसी को पता नहीं चला. लोग यह तो जानते थे कि उदय दबंग है और लड़नेमरने को तैयार रहता है. लेकिन वह शातिर चोर है, इस हकीकत से कोई वाकिफ नहीं था. इसी के चलते वह एक के बाद एक वारदात करता चला गया.

इस दौरान रत्नागिरी के विभिन्न पुलिस थानों में 24 वारदातें दर्ज की गईं. लेकिन पुलिस यह तक पता नहीं लगा पाई कि इन वारदातों को अंजाम किस ने दिया. उधर अखबारों में पुलिस की नाकामी की खबरें छपने से पुलिस की किरकिरी हो रही थी. इस से संबंधित थानाप्रभारियों पर जिले के पुलिस अधिकारियों का दबाव बढ़ रहा था. इस के बाद पुलिस ने रातदिन एक कर के जैसेतैसे चोर का पता लगा ही लिया. जब उन्हें पता चला कि वह शातिर चोर उदय है तो एक दिन लांजा पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने चोरी के कई मामलों का खुलासा किया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

रंजना को जब पति की सच्चाई पता चली तो उसे बड़ा दुख हुआ. गुस्से में वह बच्चों को साथ ले कर वहां से चली गई. उस के खिलाफ न्यायालय में कई साल केस चला और उसे 4 साल की सजा सुनाई गई. जेल में रहते हुए उदय को जब पत्नी के चले जाने की जानकारी मिली तो उसे गहरा सदमा पहुंचा. वह इस कुदरत का खेल समझने लगा, इसलिए उसे भगवान के नाम से ही नफरत हो गई. उस ने तय कर लिया कि उस ने अब तक इंसानों के घरों की तिजोरियां साफ की हैं, लेकिन जेल से रिहा होने के बाद अब मंदिरों की दानपेटियों आदि सामान पर हाथ साफ करेगा. उदय ने जेल में रहने के दौरान ही साथी कैदियों से सुना था कि पंचधातु व अष्टधातु की मूर्तियां करोड़ों में बिकती हैं.

रत्नागिरी से उदय का मन पूरी तरह से उचट गया था, इसलिए उस ने तय कर लिया कि वहां से किसी दूसरे शहर चला जाएगा. 4 साल की सजा पूरी करने के बाद उदय जेल से छूट कर घर पहुंचा तो उस ने महसूस किया कि गांव के लोग ही नहीं बल्कि उस के घर वाले भी उसे नफरत की निगाह से देखते हैं. मांबाप की निगाहों में नफरत थी और पत्नी उसे छोड़ कर चली ही गई थी. पुराने यारदोस्त भी उस से कन्नी काटने लगे थे. इन सब के लिए भी वह भगवान को ही दोषी मान रहा था. अब वह ऐसे मंदिरों की तलाश में था जहां से उसे मोटा माल मिल सके. चोरी कर के वह भगवान से प्रतिशोध ले सके. तभी उसे लांजा तहसील से 18 किलोमीटर दूर रुण गांव में स्थित अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के बारे में जानकारी मिली.

उसे पता चला कि वहां रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं. मुराद पूरी होने पर तमाम लोग वहां नकदी के अलावा कीमती ज्वैलरी आदि भी दान देते हैं. किस तरह काम को अंजाम दिया जाए इस की रेकी करने के लिए वह श्रद्धालु बन कर कई बार उस मंदिर में गया. उसे पता चला कि मंदिर में सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है. वहां सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे. उसे यह भी जानकारी मिली कि सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ही मंदिर के मुख्य गेट का ताला खोलता है. फिर रात 8 बजे की आरती के बाद मुख्य गेट पर ताला लगा कर वह अपने घर चला जाता है. उस का घर पास के ही गांव में था. यानी रात 8 बजे से सुबह 7 बजे तक मंदिर में कोई नहीं होता था. वह समझ गया कि एक ताले के भीतर लाखों की संपत्ति बंद रहती है.

उदय ने तय कर लिया कि इसी मंदिर की संपत्ति व मूर्तियों पर हाथ साफ कर के वह मुंबई भाग जाएगा और वहां अलग नाम व अलग पहचान के साथ शान की जिंदगी जीएगा. इस के बाद वह फिर कभी चोरी नहीं करेगा. रेकी करने के बाद उदय को लगा कि मंदिर से इतने सामान की वह अकेले चोरी नहीं कर पाएगा. इसलिए वह एक ऐसे साथी की तलाश में लग गया जो विश्वसनीय हो. उस ने दिमाग दौड़ाया तो उसे अपना एक पुराना बेराजगार मित्र सचिनधनाजी बुवड याद आया. उदय को भरोसा था कि पैसों के लालच में सचिन उस का साथ देने के लिए तैयार हो जाएगा.

उदय ने सचिन से संपर्क किया और उसे रत्नागिरी के एक बीयर बार में ले गया. बातचीत के दौरान ही उदय जान गया था कि सचिन अब भी बेरोजगार है और वह भुखमरी के दौर से गुजर रहा है. मौके का फायदा उठाते हुए उदय ने उसे अपनी योजना बताई. लालच में आ कर सचिन उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद योजना को किस तरह अंजाम देना है, दोनों ने इस की रूपरेखा तैयार कर ली. 23 सितंबर, 2014 की रात 9 बजे उदय व सचिन ने लांजा में शराब पी और ताला आदि तोड़ने के कुछ औजार ले कर रात करीब 11 बजे बस द्वारा रुण गांव जा पहुंचे. रात 2 बजे तक वे एक खेत में छिपे रहे. सुनसान होने के बाद वे अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के मुख्य गेट पर पहुंचे. उदय ने अपने साथ लाए औजार से मुख्य गेट का ताला काट दिया.

ताला काट कर वे दोनों मंदिर के भीतर पहुंच गए. सब से पहले इन लोगों ने दानपेटी का ताला तोड़ कर उस की सारी रकम प्लास्टिक की एक बोरी में भर ली. इस के बाद इन्होंने दूसरी बोरी में मंदिर की सभी 8 मूर्तियां, 6 अनुकृतियां, सोने व चांदी के आभूषण आदि भर लिए. अपना काम करने के बाद वे वहां से निकल लिए. सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी मंदिर पहुंचा तो मंदिर के मुख्य द्वार का ताला कटा देख उस के होश उड़ गए. वह भागाभागा मंदिर के भीतर गया तो वहां न मूर्तियां थीं और न मूर्तियों के आभूषण. दानपेटी भी पूरी तरह खाली थी. मंदिर खुलते ही श्रद्धालु भी आने लगे थे. मंदिर में चोरी की बात सुन कर सभी आश्चर्यचकित रह गए. पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ने लांजा थाने में फोन कर के चोरी की सूचना दे दी.

मंदिर में चोरी होने की बात सुन कर थानाप्रभारी भी हैरान रह गए. वह पुलिस टीम के साथ तुरंत मंदिर की तरफ रवाना हो गए. तब तक वहां आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे. थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी, डीएसपी, डीएम भी वहां पहुंच गए. मंदिर में इतनी बड़ी चोरी होने पर वहां मौजूद लोगों में आक्रोश था. वे पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मंदिर के गेट पर ही धरनाप्रदर्शन करने लगे. मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच चुके थे. पुलिस प्रदर्शनकारियों को समझाने की कोशिश में लगी थी.

पुलिस अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि पुलिस चोरों को जल्द ही गिरफ्तार कर के चोरी गया सामान बरामद करने की कोशिश करेगी. इस आश्वासन के बाद लोग शांत हुए और उन्होंने प्रदर्शन बंद किया. इस के बाद लांजा पुलिस ने अज्ञात चोरों के खिलाफ मामला दर्ज कर के अभियुक्तों की तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने इलाके के तमाम मुखबिरों और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से पूछताछ की परंतु लाख कोशिशों के बावजूद वह चोरों तक नहीं पहुंच सकी. इस से लांजा पुलिस की किरकिरी हो रही थी. मीडिया वाले पुलिस की जम कर खिंचाई कर रहे थे. स्थानीय राजनीतिज्ञ भी पुलिस पर दबाव बना रहे थे.

उधर उदय ने सचिन को कुछ आभूषण व नकदी दे कर जिले से बाहर भगा दिया. जबकि वह खुद नहीं भागा. शातिरदिमाग उदय को पता था कि अगर वह घर से गायब हुआ तो पुलिस को उस पर शक हो जाएगा. सारा माल घर के कबाड़ में छिपा कर उदय मामला शांत होने का इंतजार करता रहा. सितंबर से नवंबर तक जब पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकी, तब उसे भरोसा हो गया कि अब उस पर कोई भी शक नहीं करेगा. इस के बाद एक ट्राली बैग खरीद कर उस ने सारा माल उस में भरा व चुपचाप मुंबई चला गया.

उस ने सोचा था कि वह चोरी का माल धीरेधीरे बेचेगा. मूर्तियां बेचने के लिए वह किसी ऐसे एजेंट की तलाश करेगा जो सारी मूर्तियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकवा कर ज्यादा पैसे दिलवा सके. अपने मकसद में वह कामयाब होता इस से पहले ही एक मुखबिर की सूचना पर एपीआई घार्गे, एपीआई पिसाल की टीम ने उदय को सारे माल के साथ धर दबोच लिया.

बोरीवली पुलिस की सूचना पर रत्नागिरी के लांजा थाने की पुलिस भी मुंबई पहुंच गई और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के वह उदय को अपनी हिरासत में लांजा ले गई. लांजा थाना पुलिस के उदय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. चोरी में शामिल दूसरे अभियुक्त सचिन की तलाश में कई जगहों पर दबिशें डाली गईं, लेकिन कथा संकलन तक वह गिरफ्तार नहीं हो सका. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित. कथा में कु

Chhattisgarh News : 16 साल की प्रेगनेंट गर्लफ्रेंड ने किया बौयफ्रेंड का मर्डर

Chhattisgarh News : एक ऐसी सनसनीखेज घटना सामने आई है, जिस ने सभी को झकझोर कर कर रख दिया है. जहां एक गर्लफ्रेंड ने अपने ही बौयफ्रेंड की हत्या कर डाली. आखिर क्या वजह थी, जिस से गर्लफ्रेंड अपने ही बौयफ्रेंड की कातिल बन गई. आइए जानते हैं इस अपराध से जुड़ी पूरी जानकारी विस्तार से.

यह हैरान कर देने वाली वारदात छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले से सामने आई है, जहां 16 साल की प्रेगनेंट गर्लफ्रेंड ने सोते हुए अपने 20 वर्षीय बौयफ़्रेंड मोहम्मद सद्दाम की चाकू मारकर हत्या कर दी. सद्दाम बिहार का रहने वाला था. कुछ समय से वह छत्तीसगढ़ में रह रहा था. वहीं उस की गर्लफ्रेंड बिलासपुर की रहने वाली थी. वह अपनी मम्मी के साथ रहती थी.

पुलिस के अनुसार, जांच में सामने आया कि बौयफ्रेंड सद्दाम की हत्या करने के बाद किशोरी खुद अपनी मम्मी के साथ पुलिस स्टेशन पहुंची और अपना अपराध स्वीकार कर लिया. किशोरी लंबे समय से अपने बौयफ्रेंड के साथ लिवइन रिलेशन में रही थी.

जांच में सामने आया कि किशोरी प्रेगनेंट थी. वह अपने बौयफ्रेंड सद्दाम से शादी करना चाहती थी, लेकिन सद्दाम शादी करने के बजाय उस पर अबौर्शन कराने का दबाव बना रहा था. इस बात को ले कर दोनों में अक्सर झगड़ा होता रहता था. वह उस से नाराज थी. इसलिए 27 सितंबर, 2025 को शहर के गंज थाना क्षेत्र में स्थित ‘ए वन लौज’ में सोते हुए ही किशोरी ने उस की चाकू मार कर हत्या कर दी. हत्या के बाद वह बौयफ्रेंड का मोबाइल भी अपने साथ ले कर चली गई.

हत्या करने के बाद किशोरी ने रूम का ताला बंद कर चाबी रेलवे ट्रैक पर फेंक दी थी.
इस के बाद वह बिलासपुर लौट आई. किशोरी ने आते ही अपनी मम्मी को इस घटना के बारे में बताया तो मम्मी ने नजदीक के कोनी पुलिस स्टेशन पहुंच कर बेटी का आत्मसमर्पण कर दिया.

कोनी थाना पुलिस ने यह जानकारी गंज थाना पुलिस को दे दी, तब थाना गंज पुलिस ‘ए वन लौज’ पहुंची और लौज के कमरे से मोहम्मद सद्दाम का खून से लथपथ शव बरामद कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामला दर्ज कर लिया. अब पुलिस आगे की काररवाई कर रही है. Chhattisgarh News

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के पाखंडी को मिली सजा

Crime Stories : डेरा सच्चा सौदा के संत राम रहीम ने अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के लिए डेरे को अनैतिक कार्यों का केंद्र और अकूत संपत्ति हासिल करने का माध्यम बना लिया था. सब कुछ जानने के बाद उस के डर से डेरे में कोई मुंह तक नहीं खोल पाता था. लेकिन उस के काले कारनामों की जिस तरह कोर्ट द्वारा सजा सुनाई जा रही है, उस से तो यही लगता है कि…

18 अक्तूबर, 2021 को सुबह से ही पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. अदालत के आसपास धारा 144 लागू कर दी गई थी. हत्या के जिस मामले में विशेष सीबीआई कोर्ट के जज सुशील कुमार गर्ग सजा का ऐलान करने वाले थे, उस में 5 आरोपी उन के सामने कठघरे में खडे़ थे. जबकि एक आरोपी पिछले कई घंटों से रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए जुड़ा था. इसी शख्स के कारण सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए गए थे. क्योंकि प्रशासन को आशंका थी कि उस के खिलाफ सजा का ऐलान होने से कहीं उस के भक्त भड़क कर हिंसा पर उतारू न हो जाएं. यह शख्स कोई छोटामोटा व्यक्ति नहीं, बल्कि डेरा सच्चा सौदा का मुखिया संत गुरमीत राम रहीम था, जिस के देशविदेश में लाखों समर्थक थे.

सरकारी वकील और बचाव पक्ष के वकीलों की कई घंटे दलील चली. आखिरकार कई घंटों की बहस के बाद सीबीआई जज सुशील कुमार ने अपना फैसला देते हुए डेरे के सेवादार रणजीत कुमार की हत्या के आरोप में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम, अवतार सिंह, जसबीर सिंह, सर्बदिल सिंह और कृष्णलाल को धारा 120बी, 302 एवं 506 के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई. इस मामले में आरोपित इंद्रसेन की सुनवाई के दौरान 8 अक्तूबर, 2020 को मौत हो गई थी. जज ने गुरमीत राम रहीम को 32 लाख रुपए का जुरमाना अदा करने की सजा भी सुनाई. यह रकम पीडि़त परिवार को देने का आदेश दिया. सजा का ऐलान होते ही रोहतक की सुनारिया जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए कोर्ट के साथ जुड़े राम रहीम ने अपना सिर पकड़ लिया और वहीं जमीन पर बैठ गया.

ये वही गुरमीत राम रहीम था, जिस के आगेपीछे कुछ साल पहले तक लाखों अनुयायियों की भीड़ जुटी रहती थी. लेकिन अपने कर्मों के कारण आज वह सलाखों के पीछे एक नहीं बल्कि 3 आपराधिक मामलों में सजा भोग रहा है. रणजीत सिंह हत्याकांड की कहानी को समझने के लिए हमें पहले राम रहीम और उस के उस साम्राज्य की बात करनी होगी, जिस के गुमान में वह अपराध दर अपराध करते हुए आज सलाखों के पीछे है. गुरमीत सिंह के डेरा प्रमुख राम रहीम बनने की कहानी  गुरमीत सिंह अपने मातापिता की इकलौती संतान था. उस का जन्म 15 अगस्त, 1967 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के गुरुसर मोदिया में जट सिख परिवार में हुआ था. उस के पिता का नाम मघर सिंह व मां का नाम नसीब कौर है. मातापिता हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी थे.

महज 7 साल की उम्र में मातापिता ने 31 मार्च, 1974 को अपने बेटे गुरमीत सिंह को तत्कालीन डेरा प्रमुख शाह सतनाम सिंह के चरणों में समर्पित कर दिया था. जिस के बाद डेरे में ही उस की शिक्षादीक्षा शुरू हुई. 23 सितंबर, 1990 को शाह सतनाम सिंह ने देशभर से अनुयायियों का सत्संग बुलाया. उसी समय उन्होंने गुरमीत सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. गुरमीत सिंह हरियाणा के सिरसा में स्थित आध्यात्मिक संस्था डेरा सच्चा सौदा के तीसरे प्रमुख बने. जिस की स्थापना 1969 में शाह सतनाम सिंह के गुरु शाह मस्तानाजी ने की थी.

डेरा प्रमुख बनने से पहले ही गुरमीत सिंह का गृहस्थ जीवन शुरू हो चुका था. गुरमीत सिंह की 2 बेटियां और एक बेटा है. बड़ी बेटी चरणप्रीत और छोटी का नाम अमरप्रीत है. उस ने इन 2 बेटियों के अलावा एक बेटी हनीप्रीत को गोद लिया हुआ था. इस की बड़ी बेटी चरणप्रीत कौर के पति का नाम डा. शान-ए-मीत इंसां जबकि छोटी बेटी अमरप्रीत के पति का नाम रूह-ए-मीत इंसां है. गुरमीत सिंह के बेटे जसमीत की शादी बठिंडा के पूर्व एमएलए हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी हुस्नमीत इंसां से हुई थी. डेरा सच्चा सौदा का साम्राज्य विदेशों तक फैला हुआ है. अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड से ले कर आस्ट्रेलिया और यूएई तक उन के आश्रम व अनुयायी हैं. डेरे की तरफ से दावा किया जाता है कि दुनिया भर में उन के करीब 5 करोड़ अनुयायी हैं, जिन में से 25 लाख अनुयायी अकेले हरियाणा में ही मौजूद हैं.

बहरहाल, गद्दी संभालने के बाद गुरमीत सिंह ने सर्वधर्म समभाव का संदेश देने के लिए अपने नाम में सभी धर्मों के नाम शामिल किए और अपना नाम गुरमीत सिंह से बदल कर गुरमीत राम रहीम सिंह रख लिया. जिस कारण चौतरफा उन की प्रशंसा हुई. उन्होंने जाति प्रथा की समाप्ति का आह्वान किया तथा अपने भक्तों से जातिवाचक नाम हटा कर ‘इंसां’ नाम लगाने को प्रेरित किया. गुरमीत राम रहीम ने कई वेश्याओं को अपनी पुत्री का दरजा दे कर अपनाया व अनुयायियों से आह्वान कर उन के घर बसाए. उन्होंने सफाई के कई अभियान चलाए. ऐसे कई काम थे, जिस कारण संत गुरमीत राम रहीम की शोहरत दुनिया भर में फैलने लगी और उन के भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.

लेकिन इंसान चाहे साधारण हो या कोई संत, अगर अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर अंकुश न रख सके तो शोहरत को कलंक लगने में देर नहीं लगती. गुरमीत राम रहीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. गुरमीत राम रहीम सन 2002 में पहली बार सुर्खियों में तब आए, जब उन के ऊपर डेरे की साध्वियों के यौनशोषण के आरोप लगे. उसी साल उन के खिलाफ यौन शोषण की खबर छापने वाले सिरसा के एक स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या हो गई. इस के आरोप भी डेरामुखी पर ही लगे. अचानक शोहरत की बुलंदियां छूते राम रहीम अपने किसी न किसी कारनामे के कारण आए दिन मीडिया की सुर्खियां बनने लगे. डेरामुखी राम रहीम ने अपने ऊपर लगे आरोपों से निकलने के लिए एक के बाद ऐसी गलतियां कीं, जिस से वह अपराध की दलदल में गहरे तक फंसते चले गए.

जब हुआ बेनकाब डेरे में चल रही अय्याशगाह का खेल  28 अगस्त, 2017 को सीबीआई कोर्ट ने पहली बार गुरमीत राम रहीम को 4 साध्वियों के बलात्कार मामले में 20 साल की जेल व 30 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई थी. डेरे में चल रहे साध्वियों के यौन उत्पीड़न के खुलासे की कहानी बेहद रोचक है. हुआ यूं कि साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक गुमनाम पत्र मिला. इस में एक गुमनाम साध्वी ने लिखा कि वह पंजाब की रहने वाली है और सिरसा के डेरा सच्चा सौदा में 5 साल से रह रही है. डेरे में साध्वियों का यौन शोषण किया जा रहा है. लेटर में बठिंडा, कुरुक्षेत्र की कुछ साध्वियों के यौन शोषण किए जाने की बात भी लिखी थी.

साध्वी के पत्र में लिखी बातों का कुछ हिस्सा बेहद आपत्तिजनक था. इस गुमनाम पत्र के बाद से ही बवाल शुरू हो गया था.  2002 में गुमनाम साध्वी की लिखी चिट्ठी की गोपनीय जांच शुरू हो गई, लेकिन इसी बीच ये चिट्ठी मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो गई, जिस पर संज्ञान लेते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी. सीबीआई ने डेरे के मैनेजर इंद्रसेन से 1999 से 2001 तक की साध्वियों की लिस्ट मांगी तो 2005 में सीबीआई को 3 लिस्ट मिलीं. पहली लिस्ट में 53, दूसरी में 80 और तीसरी लिस्ट में 24 साध्वियों के नाम थे.

राम रहीम के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सीबीआई ने 1997 से 2002 के बीच डेरा छोड़ चुकी 24 साध्वियों पर फोकस किया. इन में से 18 को ही सीबीआई ट्रेस कर पूछताछ कर पाई. इन में भी सिर्फ 2 ही साध्वियां अदालत तक पहुंचीं और और अपने बयान दर्ज कराए. इन शादीशुदा साध्वियों के बच्चे भी हैं. जो साध्वी सीबीआई के सामने आईं, उस में से फतेहाबाद की एक पूर्व साध्वी ने 4 मई, 2006 को सीबीआई के सामने बयान दर्ज कराया. उस ने बताया कि 1998 में डेरा में बतौर साध्वी जौइन किया था. वह शाह सतनामजी स्कूल में पढ़ाती थी. 6 महीने बाद उस की बहन भी साध्वी बन गई. बाबा ने उस का नाम नाजम और बहन का तसलीम रखा.

बाबा गर्ल्स हौस्टल के पास बनी अपनी गुफा में रहता था और गुफा के बाहर साध्वियों को ही संतरी रखता था. जिन की ड्यूटी रात 8 बजे से 12 और 12 बजे से 4 बजे 2 शिफ्टों में होती थी. एक दिन उसे रात को 10 बजे गुफा में बुलाया गया, जहां बाबा ने उस के साथ जबरन रेप किया. वह रोती हुई गुफा से निकली और हौस्टल चली गई. वहां पर उस ने किसी को कुछ नहीं बताया. मगर उस दिन उस की बहन ने बताया कि बाबा उस के साथ भी रेप कर चुका है. रेप होने के एक साल बाद उसे डेरे के मैनेजर ने बुलाया और कहा कि बाबा ने उसे गुफा में बुलाया है. मगर पहले हुई घटना के कारण उस ने गुफा में जाने से मना कर दिया. इस के बाद मैनेजर ने उसे ऐसा करने पर भूखा रखने की धमकी दी. मजबूर हो कर उसे गुफा में दोबारा जाना पड़ा और बाबा ने उस के साथ फिर रेप किया.

दोनों बहनों ने हौस्टल की दूसरी साध्वियों को भी बाबा की गुफा से कई बार रोते हुए निकलते देखा था. एक बहन ने तो अपने साथ हुई घटना के तुरंत बाद डेरा छोड़ दिया. दूसरी साध्वी बहन भी डेरा छोड़ना चाहती थी, मगर उस के भाई की बेटियां डेरे में बीए की पढ़ाई कर रही थीं. इस कारण उसे वहां रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा. फिर अप्रैल, 2001 में उस ने अपने भाई और उस की दोनों बेटियों समेत डेरा छोड़ दिया. दोनों बहनों के डेरा छोड़ने के बाद ही प्रधानमंत्री कार्यालय को गुमनाम चिट्ठी मिली थी. बहरहाल, साध्वी के बयान कोर्ट में दर्ज कराने के बाद सीबीआई ने बाबा के साथ एक आरोपी अवतार सिंह, डेरा मैनेजर इंद्रसेन और मैनेजर कृष्णलाल को आरोपी बना कर उन का चंडीगढ़ और दिल्ली में लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया.

जहां झूठ पकड़ने वाली मशीन से खुलासा हुआ कि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम साध्वियों का यौन शोषण करता था. दोनों साध्वियों ने सीबीआई और अदालत को अपनी जो आपबीती सुनाई, उस में कहा था कि बाबा हर रोज साध्वियों को गुफा में बुलाता था और रेप करता था. उस के शीश महल जिसे वह गुफा कहता था, वहां से साध्वियां हर रोज रोते हुए बाहर निकलती थीं. गुफा के आसपास बने हौस्टलों में 200 से ज्यादा सुंदर साध्वियों को रखा गया था.  बाबा की गुफा के आसपास रात के वक्त महिला साध्वियों को गार्ड के रूप में तैनात किया जाता था.  साध्वियों से दुष्कर्म का यही वो केस था, जिस के बाद गुरमीत राम रहीम नायक से खलनायक और संत से अपराधी बन गया था.

प्रधानमंत्री कार्यालय में भेजे गए गुमनाम साध्वी के इस पत्र को पहले गृह मंत्रालय को सौंपा गया था. जहां से बाद में पत्र की जांच का जिम्मा सिरसा के सेशन जज को सौंपा गया. इसी दौरान हाईकोर्ट ने भी इस पर संज्ञान ले लिया था. दिसंबर 2002 में  राम रहीम के खिलाफ धारा 376, 506 और 509 आईपीसी के तहत केस दर्ज किया गया था. दिसंबर 2003 में  इस केस की जांच सीबीआई को सौंपी दी गई. जांच अधिकारी सतीश डागर ने केस की जांच शुरू की और आखिर साल 2005-2006 में उस साध्वी को ढूंढ निकाला, जिस का यौन शोषण हुआ था.

जुलाई 2007 में  सीबीआई ने केस की जांच पूरी कर अंबाला सीबीआई कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी. अंबाला से केस की सुनवाई पंचकूला शिफ्ट कर दी गई. चार्जशीट के मुताबिक, डेरे में 1999 और 2001 में कुछ और साध्वियों का भी यौन शोषण हुआ, लेकिन वे मिल नहीं सकीं. अगस्त 2008 में साध्वियों से दुष्कर्म  केस का ट्रायल शुरू हुआ और डेरा प्रमुख राम रहीम के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए. साल 2011 से 2016 तक  केस का ट्रायल चला और डेरा प्रमुख राम रहीम की ओर से बड़ेबड़े वकील लगातार जिरह करते नजर आए. जुलाई 2016 तक चली केस की सुनवाई के दौरान कुल 52 गवाह पेश किए गए, इन में 15 प्रौसिक्यूशन और 37 डिफेंस के थे. और फिर वह दिन आ गया, जब राम रहीम की गरदन इस केस में पूरी तरह फंसी नजर आई और जून 2017 में कोर्ट ने डेरा प्रमुख के विदेश जाने पर रोक लगा दी.

17 अगस्त, 2017 को दोनों पक्षों की ओर से चल रही जिरह खत्म हो गई और फैसले के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की गई. 25 अगस्त, 2017 को पंचकूला सीबीआई कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने राम रहीम को उम्र कैद की सजा सुनाई. राम रहीम के खिलाफ सजा दिए जाने के आदेश के बाद डेरा सर्मथकों ने पंचकूला और सिरसा में जम कर उत्पात मचाया और हिंसा की, जिस में करीब 41 लोगों की मौत हुई. अदालत के फैसले के खिलाफ सिरसा व पंचकूला में हुई हिंसा के बाद गुरमीत राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा पर पुलिस के छापे पडे़ तो वहां से हथियारों का जखीरा बरामद हुआ.

हरियाणा पुलिस ने हिंसा फैलाने के आरोप में राम रहीम की गोद ली बेटी और उस की कथित प्रेयसी कहीं जाने वाली हनीप्रीत को भी चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. हनीप्रीत हिंसा होने के बाद से ही फरार थी. फ्रीज हुए डेरा के 90 बैंक एकाउंट साध्वियों से बलात्कार मामले में गुरमीत राम रहीम का सजा होने व गिरफ्तारी के बाद से ही डेरा सच्चा सौदा के रहस्य लोक की कहानियां सार्वजनिक होने लगीं. इधर, डेरा सर्मथकों की हिंसा के बाद डेरा के 90 बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए. गुरमीत राम रहीम के खिलाफ एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने भी जांच शुरू कर दी. क्योंकि डेरा की 700 करोड़ की संपत्ति में मनी लांड्रिंग की आशंका नजर आ रही थी.

गुरमीत राम रहीम को रेप मामले में सजा होने के बाद पंचकूला और सिरसा के अलावा करीब 5 राज्यों में हिंसक प्रर्दशन हुए थे. इस मामले में दरजनों केस दर्ज हुए. चंडीगढ़ व पंचकूला में हिंसा फैलाने के मामले में डेरा प्रवक्ता दिलावर सिंह को भी देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया. दिलावर सिंह एमएसजी ग्लोरियस इंटरनैशनल स्कूल सिरसा का एडमिनिस्ट्रेटर था. उस ने डेरामुखी के गनमैन ओमप्रकाश सिंह, डेरा सर्मथक दान सिंह व चमकौर सिंह के साथ मिल कर पंचकूला में आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया था. करीब 177 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 1137 आरोपियों को अरेस्ट किया गया था.

बहरहाल, गुरमीत राम रहीम के पापों की कलई खुलनी शुरू हो चुकी थी और कानून ने सख्त रुख अपना लिया था. उस के खिलाफ मुंह न खोलने वाले लोग भी अब अदालत में सच बयां कर रहे थे. एक तरफ राम रहीम साध्वियों से बलात्कार के मामले में जेल से बाहर आने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रहा था कि 17 जनवरी, 2019 को पंचकूला की विशेष सीबीआई के जज जगदीप सिंह  ने सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या के मामले में भी गुरमीत राम रहीम को उम्रकैद की सजा सुना दी. इस मामले में डेरा प्रमुख के साथ 3 अन्य लोगों कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को भी दोषी ठहराया गया था. इन्हें भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

दरअसल, सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति वकालत छोड़ कर ‘पूरा सच’ नाम से एक अखबार निकालते थे. रामचंद्र अपने अखबार के नाम की तरह ही पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे. निर्भीक छवि के रामचंद्र छत्रपति की हत्या का मामला कहीं न कहीं साध्वियों के दुष्कर्म से ही जुड़ा था.  2002 में रामचंद्र छत्रपति के हाथ वह चिट्ठी लग गई, जो गुमनाम साध्वी ने लिखी थी. रामचंद्र ने उस चिट्ठी को अपने अखबार में छाप दिया. इसी अखबार में छपी खबर के बाद लोगों को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम द्वारा डेरे में साध्वियों के साथ दुष्कर्म करने की जानकारी मिली थी. इस खबर के छपने के बाद छत्रपति को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं.

आखिरकार 19 अक्तूबर, 2002 की रात छत्रपति को घर के बाहर गोली मारी गई. इस के बाद 21 अक्तूबर को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उन की मौत हो गई. हालांकि इस दौरान छत्रपति होश में आए लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण छत्रपति का बयान तक दर्ज नहीं किया गया. दरअसल, छत्रपति अपने अखबार में डेरा सच्चा सौदा की अच्छी और बुरी खबरों को छापते थे, जिस कारण उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती थीं. यह बात सिरसा के सभी पत्रकार जानते थे. मृतक पत्रकार के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका जनवरी, 2003 में मृतक के बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर मामले को सीबीआई को सौंपने की मांग की. इस याचिका में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के भी इस में संलिप्त होने के आरोप लगाए.

सोशल मीडिया में रामचंद्र छत्रपति को इंसाफ दिए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी. इसी दौरान डेरामुखी पर डेरे के एक पूर्व मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के भी आरोप लगने लगे. इस मामले में भी पीडि़तों की तरफ से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया. हाईकोर्ट ने पत्रकार छत्रपति और डेरा मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के मामलों को जोड़ते हुए 10 नवंबर, 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. सीबीआई ने दिसंबर, 2003 में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. मामला दर्ज होते ही डेरा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर जांच पर रोक लगाने की अपील की गई, जिस के बाद उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और मामले की जांच पर उस वक्त रोक लगा दी गई.

लेकिन नवंबर, 2004 में दूसरे पक्ष की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डेरा की याचिका को खारिज कर दिया और सीबीआई जांच को जारी रखने के आदेश दिए. सीबीआई ने दोबारा दोनों मामलों की जांच शुरू की और डेरा प्रमुख समेत कइयों को अभियुक्त बनाया. इसी मामले में सीबीआई कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम समेत 4 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. साध्वी रेप केस मामले और पत्रकार छत्रपति हत्याकांड की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद से उस की खास राजदार हनीप्रीत सब से ज्यादा सुर्खियों में रही है. उस पर भी पंचकूला में दंगा भड़काने, राजद्रोह और राम रहीम को पुलिस कस्टडी से भगाने की साजिश रचने के आरोप लगे और बाद में उसे गिरफ्तार किया गया.

हालांकि कुछ महीने बाद हनीप्रीत को अदालत से जमानत मिल गई और उस के बाद हनीप्रीत ने डेरा सच्चा सौदा की कमान अपने हाथों में ले ली. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर हनीप्रीत कौन है, जो गुरमीत राम रहीम के बाद डेरा सच्चा सौदा की सब से ताकतवर बनी है. आखिर इतना बड़ा परिवार होते हुए राम रहीम क्यों हर वक्त हनीप्रीत को याद करता रहा और हनीप्रीत से उस का क्या खास रिश्ता है. हनीप्रीत इंसां का जन्म 21 जुलाई, 1980 को हरियाणा के फतेहाबाद में हुआ था. उस का स्कूली नाम प्रियंका तनेजा है.  प्रियंका तनेजा का पूरा परिवार करीब ढाई दशक से डेरे का अनुयायी था. हनीप्रीत के दादा ने पाकिस्तान से आ कर हरियाणा के सिरसा में कपड़े की दुकान खोली थी. जहां गुरमीत राम रहीम के गुरु शाह मस्तानाजी आते रहते थे. तभी से उन की फैमिली डेरे की अनुयायी हो गई.

कुछ ही दिनों में हनीप्रीत के दादा डेरे के प्रशासक बन गए और वहां खजाने से संबंधित काम देखने लगे थे. 1996 में प्रियंका के दसवीं पास करते ही दादा ने उस का एडमिशन डेरे के ही स्कूल में करवा दिया. हनीप्रीत के पिता रामानंद तनेजा पहले पुरानी दिल्ली एमआरएफ टायर्स का ‘सर्च टायर्स’ नाम से शोरूम चलाते थे. लेकिन बाद में उन्होंने डेरे में ही एक बड़ा सीड प्लांट डाल लिया. बाद में गुरमीत राम रहीम ने उस के पिता रामानंद तनेजा को डेरा की पर्चेजिंग कमेटी का हेड बना दिया, जो डेरे के सारे सामान की खरीदफरोख्त का काम देखने लगे.

प्रियंका के भाई साहिल तनेजा को भी गुरमीत का आशीर्वाद मिल गया और वह भी डेरे में बड़े स्तर पर कारोबार करने लगा. बाद में प्रियंका की छोटी बहन नीशू तनेजा की गुरुग्राम में जो शादी हुई, उस में भी बाबा का खास योगदान रहा. हनीप्रीत के चाचा और मामा समेत दूसरे कई रिश्तेदार सिरसा के मुख्य मार्गों पर टायरों का कारोबार करते हैं. आज भी डेरे में कई बड़े प्रोजेक्ट हनीप्रीत के नाम से चल रहे हैं. बताते हैं कि गुरमीत राम रहीम 1996 में डेरे के स्कूल में जब छात्राओं को आशीर्वाद देने गया था तो वहां उस की नजर पहली बार प्रियंका तनेजा पर पड़ी थी. बस उसी के बाद बाबा ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि वह प्रियंका को अपना खास आशीर्वाद देने के लिए डेरे में अपने निजी कक्ष में बुलाने लगा.

बाबा की खासमखास बन गई हनीप्रीत कुछ ही दिनों में प्रिंयका पूरी तरह बाबा के वश में हो गई. कुछ समय बाद बाबा ने उस का नया नामकरण किया और उस का नाम हनीप्रीत इंसां रख दिया. क्योंकि डेरे में सभी राजदारों व साधुसाध्वियों को ‘इंसां’ सरनेम दिया जाता है. उम्र का काफी फासला होने के बावजूद धीरेधीरे गुरमीत राम रहीम और हनीप्रीत इंसा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. जल्द ही हनीप्रीत बाबा की खास बन गई और उस की पहुंच बेरोकटोक बाबा के बैडरूम तक होने लगी. हनीप्रीत ने 12वीं तक की पढ़ाई डेरे के स्कूल में ही की. बाबा ने उस का डेरे से बाहर आनाजाना बंद करा दिया. डेरे में उस के लिए एक खास आवास की व्यवस्था कर दी गई और वहीं पर उस के टीचर उसे पढ़ाने के लिए आते.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत के लिए एक विशेष जिम बनवा दिया. हनीप्रीत के नाम पर डेरे के अंदर एक बुटीक भी खोल दिया गया. बताते हैं कि धीरेधीरे हनीप्रीत और राम रहीम की नजदीकियां कुछ इस तरह बढ़ गईं कि हनीप्रीत बाबा के हर राज की राजदार हो गई. हनीप्रीत अब गुरमीत की सब से करीबी बन गई थी. गुरमीत उस पर इतना मेहरबान था कि उस ने हनीप्रीत के नाम पर डेरे में कई बड़े कारोबार शुरू किए.  बताते हैं कि डेरे के अंदर बाबा और हनीप्रीत के रिश्ते को ले कर हमेशा लोगों के मन में सवाल रहते थे. लेकिन बाबा के डर से कोई अपनी जबान नहीं खोलता था, क्योंकि बाबा राम रहीम उसे लोगों के सामने अपनी बेटी, अपनी ‘परी’ कहता था. लेकिन हकीकत यह थी कि वो बाबा की ‘परी’ नहीं बल्कि बाबा की ‘हनी’ थी.

बताते हैं कि जब बाबा को लगा कि एक अविवाहित लड़की इस तरह उस की सेवा में रहेगी तो इस से उस की छवि और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हो सकते हैं. इसलिए उस ने 14 फरवरी, 1999 वैलेनटाइंस डे के दिन हनीप्रीत की शादी विश्वास गुप्ता से करा दी. हनीप्रीत के परिवार की तरह करनाल के रहने वाले विश्वास गुप्ता का परिवार भी बाबा का अनुयायी था. बाबा ने ही शादी की सारी व्यवस्थाएं कराई थीं. राम रहीम ने हनीप्रीत की शादी तो गुप्ता से करा तो दी, लेकिन दोनों को आदेश दिया कि वे बच्चा पैदा न करें.

हनीप्रीत के पूर्व पति विश्वास गुप्ता ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद मीडिया को बताया था कि शादी के 2 या 3 दिन बाद बाबा राम रहीम ने उसे हनीप्रीत के साथ डेरे में मुलाकात के लिए बुलाया था. तब बाबा ने कहा था कि तुम हमारे साथ बाहर यात्राओं पर जाती हो, अगर बच्चा हुआ तो उस के स्कूल जाने और लालनपालन के चलते हमारी सेवा नहीं कर पाओगी, इसलिए बच्चा पैदा न करो. बाबा ने कहा था कि हम तुम्हें बेटा मानते हैं, उसी तरह हनीप्रीत भी हमारी बेटी है. हम उसे भी उतना ही प्यार देंगे. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाया था कि बाबा हर सप्ताह हनीप्रीत और उसे डेरे में बुलाने लगा. वह गुफा के अंदर बने बैडरूम में हनीप्रीत को बुलाता था और उसे लिविंग रूम में ही बैठने को कहता था.

पूछने पर बाबा कहता था कि बेटी अकेले में ससुराल के हर सुखदुख बता सके, इसलिए उस से अकेले में हालचाल पूछता हूं. विश्वास गुप्ता ने आरोप लगाए थे कि राम रहीम और हनीप्रीत की सभी मुलाकातें हर बार एक से डेढ़ घंटे तक होती थीं. इस दौरान बाबा के चेले और दूसरे सेवादार विश्वास गुप्ता को बातों और कुछ कामों में उलझाए रखते थे. बाद में बाबा ने विश्वास गुप्ता को सप्ताह में 2 दिन पत्नी के साथ गुफा में रहने का आदेश दिया. बताते हैं कि उसी दौरान एक रात जब  विश्वास गुप्ता डेरे में बाबा की गुफा के लिविंग रूम में सो रहा था तो उस ने रात के वक्त बाबा के बैडरूम में अपनी पत्नी हनीप्रीत व बाबा को कामक्रीड़ा करते देखा. बस इसी के बाद से बाबा और हनीप्रीत से उस का मोहभंग हो गया.

बाद में हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता के संबध बिगड़ने लगे तथा दोनों में अकसर तकरार होने लगी. विश्वास गुप्ता और हनीप्रीत का रिश्ता केवल 11 साल चला. बाबा राम रहीम ने साल 2009 में हनीप्रीत को बेटी के रूप में गोद ले लिया. जिस के बाद हनीप्रीत बाबा के साथ डेरे की गुफा में ही रहने लगी. हनीप्रीत को गोद लेने के बाद गुप्ता से हनी के मतभेद और गहरे हो गए. गुप्ता ने जब हनीप्रीत पर घर वापस चलने का दबाव डाला तो उस के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करवा दिया गया, जिस में उसे जेल की हवा खानी पड़ी. बाद में जेल से रिहा होने पर  साल 2011 में विश्वास गुप्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर राम रहीम के कब्जे से अपनी पत्नी यानी हनीप्रीत को मुक्त कराने की मांग की थी. अदालत में दी गई याचिका में विश्वास गुप्ता ने राम रहीम पर हनीप्रीत के साथ अवैध संबंध होने का भी आरोप लगाया था.

डेरे के सारे फैसले लेने लगी हनीप्रीत बताते हैं कि बाद में डेरे के कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण विश्वास गुप्ता के परिवार वालों ने हनीप्रीत से उस का तलाक करवा दिया. लेकिन इस दौरान गुप्ता परिवार को बाबा के ऊंचे रसूख के कारण कई तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा. विश्वास गुप्ता से तलाक के बाद हनीप्रीत पूरी तरह बाबा के लिए समर्पित हो गई. हनीप्रीत डेरा के हर महत्त्वपूर्ण फैसले लेने लगी. बाबा राम रहीम के साथ वह साए की तरह चौबीसों घंटे रहने लगी. बाबा हर फैसला हनीप्रीत से सलाह ले कर ही करता था.

इतना ही नहीं, बाबा ने हनीप्रीत की फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश को देखते हुए ‘एमएसजी’ नाम से एक फिल्म कंपनी बनाई जिस के तहत बनी फिल्म ‘एमएसजी’, ‘जट्टू इंजीनियर’, ‘द वारियर लायन हार्ट’ समेत दूसरी और भी फिल्मों का निर्देशन हनीप्रीत ने ही किया. एमएसजी नाम की फिल्म में तो बाबा ने खुद हीरो के रूप में काम भी किया. बाबा की बेबी हनीप्रीत इतनी ताकतवर हो चुकी थी कि उसी के हाथ में डेरे की सभी चाबियां रहती थीं. पैसे से ले कर हर वो फैसला जो डेरे से संबंधित होता था, वह हनीप्रीत ही करती थी. हनीप्रीत भले ही दिखावे के लिए बाबा की बेबी रही हो, लेकिन लोग अब खुली जुबान से कहते हैं कि वह बाबा की हनी थी. शायद यही वजह थी कि गुरमीत राम रहीम की अपनी बीवी और बेटेबहू से दूरियां रहती थीं.

राम रहीम को अपने तौरतरीकों से चलाने वाली हनीप्रीत जेल जाने तक उस के साथ नजर आई थी और बाद में उसी ने डेरे का प्रबंध अपने हाथों में लिया. गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद 600 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाले उस के एमएसजी प्रोडक्ट्स की कमान भी बाद में हनीप्रीत के हाथों में आ गई. एमएसजी के सिरसा में 5 बड़े शोरूम थे, जिन में करीब 150 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बेचे जाते थे. हालांकि बाबा की गिरफ्तारी के बाद एमएसजी का यह कारोबार आर्थिक संकट का शिकार हो कर बंद हो गया, जिस से इस में निवेश करने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रकम भी डूब गई. साध्वियों के साथ रामचंद्र छत्रपति के परिवार को इंसाफ मिल चुका था, लेकिन राम रहीम के दामन पर लगे डेरा प्रेमी रणजीत सिंह की हत्या के दागों का इंसाफ होना अभी बाकी था.

18 अक्तूबर, 2021 को रणजीत सिंह हत्याकांड में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत के जज सुशील कुमार ने राम रहीम समेत 5 लोगों को दोषी ठहरा कर उम्रकैद की सजा सुनाई. 19 साल तक अदालत में चले इस मामले की 250 पेशी हुई और 61 गवाही के बाद अदालत ने 5 आरोपियों को दोषी माना. रणजीत सिंह एक समय राम रहीम के डेरे का मैनेजर और उस का भक्त हुआ करता था, लेकिन 10 जुलाई, 2002 को अचानक रणजीत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हत्या का रहस्य बहुत गहरा था. हत्या के आरोप में राम रहीम के साथ उस का सहयोगी कृष्ण लाल भी फंसा था.

रणजीत सिंह हत्याकांड में 3 गवाह महत्त्वपूर्ण थे. इन में 2 चश्मदीद गवाह सुखदेव सिंह और जोगिंद्र सिंह थे. इन का कहना था कि उन्होंने आरोपियों को रंजीत सिंह पर गोली चलाते हुए देखा था. तीसरा गवाह गुरमीत का ड्राइवर खट्टा सिंह था, जिस के सामने रंजीत को मारने की साजिश रची गई थी. हालांकि बाद में खट्टा सिंह अदालत के सामने बयान से मुकर गया था. कई साल बाद खट्टा सिंह फिर से कोर्ट में पेश हो गया और गवाही दी. रणजीत का साला परमजीत सिंह भी इस मामले में गवाह था, जिस ने सीबीआई के स्पैशल मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज कराए थे. परमजीत ने अदालत को बताया था कि रणजीत की बहन भी जुलाई, 1999 में साध्वी बनी थी.

परमजीत ने कोर्ट के सामने डेरे से जुड़ी घटनाओं की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए बताया कि रणजीत सिंह की साध्वी बहन डेरा प्रमुख की गुफा के बाहर पहरेदारी का काम करती थी. उसी ने अपने भाई को डेरा प्रमुख की गुफा में साध्वियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की बात बताई थी. जिस के बाद रणजीत सिंह ने डेरा छोड़ दिया और अपने गांव कुरुक्षेत्र चला गया. डेरा प्रमुख को शक था कि साध्वियों को डेरे से भगाने और उन के खिलाफ प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट में चिट्ठी लिखवा कर उसे बदनाम करने का काम रणजीत सिंह ने अपनी साध्वी बहन के जरिए किया है, इसीलिए रणजीत सिंह की हत्या करा दी गई.

चूंकि डेरे में 20 साल तक सेवादार रहे रणजीत सिंह की 2002 में गुमनाम साध्वी का पत्र सामने आने के बाद ही हत्या हुई थी. इसीलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कडि़यां जोड़ते हुए अदालत ने बाबा को उस की हत्या का दोषी माना. वैसे साध्वियों से दुष्कर्म, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरे के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के अलावा भी डेरामुखी राम रहीम के खिलाफ कई संगीन आरोप हैं. 2010 में डेरा के ही एक पूर्व साधु रामकुमार बिश्नोई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर डेराप्रमुख पर डेरे के पूर्व मैनेजर फकीर चंद की हत्या कराने का आरोप लगाया था. 400 साधुओं को बनाया नपुंसक फकीरचंद की गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग पर अदालत ने सीबीआई को जांच के आदेश तो दिए लेकिन जांच एजेंसी मामले में सबूत नहीं जुटा पाई और क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. हालांकि बिश्नोई ने क्लोजर रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है.

इस के अलावा फतेहाबाद जिले के कस्बा टोहाना के रहने वाले डेरे के एक पूर्व साधु हंसराज चौहान ने जुलाई 2012 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राम रहीम पर डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाए जाने का गंभीर आरोप लगाया था. अदालत के सामने उन्होंने 166 साधुओं का नाम सहित विवरण प्रस्तुत करते हुए गुरमीत राम रहीम की करतूतों की पोल खोली थी. अदालत ने इस शिकायत की जांच का काम भी सीबीआई को सौंपा, जिस के बाद ये मामला भी अब अदालत में विचाराधीन है. साधु हंसराज ने बताया कि उस के मातापिता डेरे के अनुयायी थे, इसलिए वह भी साल 1996 में 17 साल की उम्र में डेरे के अनुयायी बन गए थे. जहां डेरामुखी ने यह कहते हुए अनुयायियों को नपुंसक बनाया कि वे अगर खुद नपुंसक बनते हैं तो भगवान को पाने में सफल होंगे.

उन्हें साल 2002 में श्रीगंगानगर स्थित डेरे के अस्पताल में नपुंसक बनने के लिए मजबूर किया गया, जहां उन के अलावा कई अन्य साधु (डेरा अनुयायी) भी थे. डेरामुखी का मानना था कि नपुंसक बनने के बाद अनुयायी डेरा छोड़ कर नहीं जा सकेंगे. डेरामुखी ऐसे अनुयायियों से खाली कागज पर दस्तखत भी करवा लेता था. उस के बाद उन के नामों पर डेरामुखी को दान की गई जमीन ट्रांसफर करवाता और कुछ समय बाद उस जमीन को डेरा ट्रस्ट के नाम पर ट्रांसफर करवा लिया जाता. दरअसल, गुरमीत राम रहीम के गलत कामों की कुंडलियां खुलने के बाद ही पता चला कि डेरे का आकार बढ़ाने के लिए उस ने डेरे के आसपास की जमीन हथियाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया हुआ था.

गुरमीत राम रहीम ने 1990 में गद्दीनशीं होने के बाद डेरे के चारों ओर की जमीन हासिल करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए. लोगों को डराधमका कर औनेपौने दामों पर 700 एकड़ जमीन हासिल की. इसी वजह से महज कुछ एकड़ में फैला डेरा आज बड़े शहर में तब्दील हो चुका है. गांव शाहपुर बेगू, नेजियाखेड़ा और फूलकां बाजेकां के जिन लोगों ने बाबा को जमीन देने का विरोध किया, उन्हें परेशान करने के लिए बाबा के गुंडों ने पहले उन्हें धमकाया फिर समझाया और जो इस के बाद भी नहीं माना, उस की जमीन को रातोंरात ओपन टौयलेट बना दिया जाता था.

डेरे पर आने वाले हजारों लोग ऐसे लोगों के खेतों और फसल की ऐसी दुर्दशा कर देते थे कि गंदगी की वजह से खेतों के आसपास जाना भी मुश्किल हो जाता था. परेशान हो कर लोग उस जमीन को जमीन बेचने में ही भलाई समझते थे. अदालत से जिन मामलों में गुरमीत राम रहीम को अपने कुकर्मों की सजा मिल चुकी है, वे तो महज उदाहरण हैं. लेकिन यौन उत्पीड़न से ले कर हत्या और लोगों की संपत्ति हड़पने के ऐसे सैकड़ों गुनाह हैं, जिन की पीडि़तों ने शिकायत ही नहीं की. लेकिन ऐसे तमाम लोग आज इस बात से खुश हैं कि सच्चे डेरे की आस्था को कलंकित करने वाला संत अब सलाखों के पीछे है. Crime Stories