Hindi crime story: इज्जत लुटा कर इलाज

Hindi crime story: तंत्रमंत्र की दुकानदारी   करने वाले ठग तांत्रिकों को पता होता है कि इज्जत लुटा कर भी जल्दी कोई औरत विरोध में खड़ी नहीं होगी, क्योंकि उसे बदनामी का डर होता है. इसी का वे फायदा भी उठाते हैं.

परिवार में किसी एक पर मुसीबत आ जाए तो इसे सहज रूप में लिया जा सकता है, लेकिन अगर पूरा परिवार ही किसी न किसी परेशानी से ग्रस्त हो तो दिमाग बहुत दूर तक की सोचने लगता है. इंसानी फितरत है कि परेशानी में आदमी जो भी सोचता है, उलटा ही सोचता है.

वीना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. परेशानी आने पर उस के दिमाग में भी उलटेसीधे विचार आने लगे थे. उसे लगने लगा था कि हो न हो, किसी ने ‘कुछ करा दिया है’. उस के दिमाग में यह बात गहरे तक बस गई थी. इस के बाद आसपड़ोस के लोगों से वह कहने लगी थी कि ‘किसी ऐसे तांत्रिक के बारे में बताओ, जो अपनी अलौकिक शक्तियों से उस के परिवार को परेशानियों से निजात दिला सके.’

कोई 7-8 साल पहले वीना की शादी महेश से हुई थी. 6 और 4 साल के उस के 2 बेटे थे. चंडीगढ़ के सब से बड़े कस्बे मनीमाजरा में किराए का मकान ले कर वह परिवार के साथ रहती थी. महेश का चावलों का कारोबार था. कुछ दिनों पहले तक इस परिवार में सब ठीकठाक था. वीना खुद भी सेहतमंद थी और उस के दोनों बच्चे तथा पति भी स्वस्थ थे. महेश का स्वास्थ्य ठीक था तो वह काम भी डट कर करता था. लिहाजा मेहनत के हिसाब से कमाई भी होती थी. परिवार में सब खुश थे.

लेकिन हालात ने करवट बदली तो सब बिगड़ता चला गया. वीना और उस के परिवार की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई. बिना किसी बीमारी के ही महेश के स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. इस का सीधा असर उस के काम पर पड़ा, आमदनी घट गई. इसी के साथ दोनों बच्चे भी अकसर बीमार रहने लगे. वीना और महेश को तीसरे बच्चे की चाहत नहीं थी. उसी परिस्थिति में लाख एहतियात बरतने के बावजूद वीना गर्भवती हो गई. पांव भारी हुए तो उस का भी स्वास्थ्य गिरने लगा. गर्भपात कराने के लिए वह डाक्टर के पास गई तो उस के स्वास्थ्य को देख कर डाक्टर ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. फलस्वरूप गर्भ 7 महीने का था.

इस सब से वीना के दिमाग में एक बात बैठ गई कि उन से जलने वाले किसी आदमी ने उस के परिवार पर ‘कुछ’ करवा दिया है. ऐसे में उठतेबैठते हर किसी से एक ही बात कहती थी कि अगर पहचान का कोई तांत्रिक हो तो बताओ. एक दिन वीना की पड़ोसन राधा ने उसे बताया, ‘‘हां, एक तांत्रिक है, जिसे सब बंगाली बाबा कहते हैं. वह मनीमाजरा के मढ़ीवाला टाउन में रहता है. भला और होशियार आदमी है. तुम एक बार उस के पास चली जाओ, समझो सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया. उस का इलाज थोड़ा अजीबोगरीब जरूर है, मगर है पक्का. रूहानी ताकतों का मालिक है वह बंगाली बाबा.’’

वीना हैरानी से आंखें फाड़े राधा की बातें सुनती रही. दूसरी ओर राधा तांत्रिक का बखान करती जा रही थी, ‘‘यह हम लोगों के लिए संयोग की ही बात है कि उस जैसा पहुंचा हुआ तांत्रिक मनीमाजरा में रह रहा है. पैसे का भी उसे कोई लालच नहीं है. जो चाहो दे दो. न मन हो तो कोई बात नहीं. कुछ भी नहीं कहता.’’

राधा की बातों से वीना काफी प्रभावित हुई. उस समय वीना मात्र 26 साल की थी. अभी तो पूरी जिंदगी उस के सामने पड़ी थी. परेशानियों में घिरी जिंदगी वैसे ही बेमजा हो जाती है. यह सोच कर उस ने राहत महसूस की कि अब तांत्रिक बंगाली बाबा की बदौलत उस की सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी. शाम को महेश घर आया तो वीना ने उसे तांत्रिक के बारे में बता कर उस के डेरे पर चलने को कहा. लेकिन महेश ने मना करते हुए कहा, ‘‘ऐसे लोगों के पीछे समय और पैसा मत बरबाद करना. ये लोग ठग होते हैं. बिना मतलब तुम्हें किसी चक्कर में डाल देंगे.’’

वीना को पहले से ही पता था कि उस का पति नास्तिक है. तंत्रमंत्र, पूजापाठ, साधुसंतों पर उसे जरा भी विश्वास नहीं है. वह था भी अडि़यल स्वभाव का. दूसरे की बात जल्दी नहीं मानता था. इसलिए वीना ने इस बारे में उस से और ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा. अगले दिन शाम को वह राधा के घर पहुंची और उस से अपने साथ तांत्रिक के पास चलने को कहा. राधा उस समय घरेलू कामों में व्यस्त थी. इसलिए उस ने वीना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम अकेली ही चली जाओ. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी है, फालतू बातें नहीं करता. तुम जरा भी मत घबराओ, कहीं कोई परेशानी नहीं होगी. फिर ऐसी पाक जगहों पर कोई सिफारिश थोड़े ही चलती है. आज तुम अकेली ही चली जाओ, अगली बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.’’

उस समय शाम के 5 बज रहे थे. राधा के मना करने पर निराश हो कर वीना पहले अपने घर गई. वहां से दोनों बच्चों को साथ ले कर 6 बजे तांत्रिक बंगाली बाबा के यहां जा पहुंची. तांत्रिक बुजुर्ग आदमी था. शक्लसूरत से भी शरीफ लग रहा था. दाढ़ी के पीछे उस का गंभीर चेहरा उस के रूहानियत से जुड़ा होने का आभास दिला रहा था.

तांत्रिक का व्यक्तित्व देख कर वीना को लगा कि निश्चित उस के परिवार पर आई मुसीबतें दूर हो जाएंगी. तांत्रिक के दरबार में उस समय 5-6 लोग बैठे थे. उन के सामने वह तांत्रिक आसन पर बैठा था. वह आए लोगों को बारीबारी से बुलाता, उन की समस्याएं सुनता और झाड़फूंक करने के बाद इलायची का प्रसाद दे कर कहता, ‘‘फिर कोई परेशानी आए तो सीधे मेरे पास आ जाना. वैसे तुम्हें आने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इतने में ही ठीक हो जाएगा.’’

इस के बाद वह उसे विदा कर देता. वीना दोनों बच्चों के साथ बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करने लगी. उस ने बच्चों को पहले ही सहेज दिया था, इसलिए वे खामोश बैठे थे. एक बार भी नजर उठा कर तांत्रिक ने उस की ओर नहीं देखा था. जो आदमी नंबर आने पर उस के पास पहुंचता था, वह उस से भी नजरें मिला कर बात नहीं करता था. कुछ बोलता भी तो बस नीचे देखते हुए बुदबुदाने के स्वर में बोलता था.

नंबर आने पर वीना तांत्रिक के सामने जा कर बैठ गई. दोनों बच्चे उस के अगलबगल बैठ गए. तांत्रिक ने नजरें झुकाए हुए ही वीना के पैरों की ओर देखा, फिर धीरेधीरे नजरें ऊपर करते हुए उस के चेहरे पर गड़ा दीं. वीना काफी खूबसूरत थी, लेकिन उसे एक बार भी यह नहीं लगा कि तांत्रिक उस की खूबसूरती को निहार रहा है. उस ने इस सब को एकदम सहज रूप से लिया. वीना ने अपनी समस्या बताने के लिए जैसे ही मुंह खोला, तांत्रिक ने हाथ के इशारे से उसे कुछ कहने से रोक दिया. उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए हुए ही उस ने कहा, ‘‘मेरी बच्ची, तुम्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

मैं तुम्हारी आंखों में ही सब कुछ देख रहा हूं. अभी यह जान लेना थोड़ा मुश्किल है कि इसे किस ने भेजा है, मगर हकीकत पूरी तरह मेरे सामने है. उस ने भीतर से तुम्हें पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया है. यह शैतानी ताकत तुम्हारे जरिए तुम्हारे परिवार को बरबाद करना चाहती है.’’

वीना ने तो पहले ही से यह बात अपने मन में बैठा रखी थी. इसलिए हैरान होते हुए वह बोली, ‘‘यह बात एकदम सही है. मेरे परिवार में एकएक कर के सभी धीरेधीरे परेशानियों में घिरते जा रहे हैं. आप के पास मैं आई ही अपनी इसी परेशानी के लिए हूं.’’

‘‘मुझे तुम्हारी इस बरबादी का जिम्मेदार तुम्हारे भीतर बैठा दिखाई दे रहा है.’’

‘‘लेकिन बंगाली बाबा, किस ने यह सब किया या करवाया है? वह कौन सी ताकत है, जिस ने मुझे अपने काबू में कर रखा है?’’ वीना ने भयभीत होते हुए पूछा.

‘‘मैं पहले ही तुम से कह चुका हूं, मेरी बच्ची कि करने या करवाने वाले की बाबत अभी नहीं बताया जा सकता. वक्त आने पर इस बात का खुलासा भी कर दूंगा.’’ तांत्रिक ने कहा.

इस के बाद अपनी दोनों आंखें बंद कर के दोनों हाथ ऊपर उठा कर मंत्र पढ़ने के अंदाज में बुदबुदाने लगा. कुछ देर यही क्रम चलता रहा. उस के बाद आंखें खोल कर बोला, ‘‘जिस ने तुम्हें काबू में कर रखा है, वह एक बदजात जिन्न है. उस के बारे में तुम्हें बाद में खुल कर बताऊंगा. बहरहाल इस सब की तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तुम्हारे शरीर के अंदर ही इस जिन्न को मसलमसल कर मार दूंगा. उस का वजूद मिटते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. यह सब करने से पहले तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं.’’

‘‘जी बंगाली बाबा, बताइए. मैं आप की हर बात मानूंगी. बस आप मेरे परिवार पर आई. मुसीबतों को हमेशा के लिए खत्म कर दीजिए.’’

‘‘उन्हें तो खत्म समझो. देखो, अब मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूं, उसे गौर से सुनना.’’ तांत्रिक ने कहा.

‘‘जी बाबा.’’

‘‘मैं अपने काम की किसी से कोई फीस तो लेता नहीं. रोटी कमाने के मेरे पास दूसरे तमाम काम हैं. हां, तुम्हारा यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस की फीस जरूर लेता हूं.’’

‘‘जी बाबा.’’

‘‘दरअसल, यह जो काम मैं करने जा रहा हूं, इस के लिए मुझे कई बार वह सब भी करना पड़ता है, जो करने को मेरा मन गवाही नहीं देता. लेकिन न करूं तो मेरी पनाह में आया आदमी ठीक नहीं होगा. इसलिए करने से पहले मैं अपने किए की खुदा से माफी मांग लेता हूं और अपनी पनाह में आए आदमी से उम्मीद करता हूं कि पूरी तरह ठीक हो जाने पर वह अपनी हैसियत के मुताबिक 11, 21 या फिर 31 गरीबों को भरपेट खाना खिलाए. इस काम की मैं तुम से भी यही फीस चाहता हूं मेरी बच्ची.’’

‘‘बिलकुल बंगाली बाबा. बस एक बार सब ठीक काम हो जाए. मैं वैसा ही करूंगी, जैसा आप कहेंगे.’’ वीना ने कहा.

अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेर कर तांत्रिक ने कहा, ‘‘दूसरी बात यह कि तांत्रिक क्रियाएं बहुत नाजुक होती हैं. जैसा मैं कहूं, तुम्हें वैसा ही करना होगा. अगर तुम इस क्रिया को आज ही शुरू करवाना चाहती हो तो अपने बच्चों को घर छोड़ कर अकेली आ जाओ. बच्चों की मौजूदगी में वे तांत्रिक क्रियाएं नहीं की जा सकतीं, जिन्हें इस मामले में अमल में लाना है.’’

तांत्रिक की हर बात पर वीना हां में हां करती जा रही थी. इस के बाद उस के कहे अनुसार वह बच्चों को अपनी एक परिचिता के यहां छोड़ आई. उस के लौट कर आने के बाद तांत्रिक ने बेझिझक कहा, ‘‘अंदर वाले कमरे में पलंग बिछा है, जा कर उस पर एकदम सीधी लेट जाओ.’’

वीना पूरी तरह तांत्रिक के कहे में आ चुकी थी. शक की कोई गुंजाइश उसे नजर नहीं आ रही थी. इसलिए बिना किसी झिझक के वह अंदर जा कर पलंग पर लेट गई. तांत्रिक बाहर बैठा क्या कर रहा है, उसे पता नहीं था. करीब आधे घंटे तक वह उसी तरह लेटी रही.

इस के बाद तांत्रिक आया तो वह कुछ बुदबुदा रहा था. उस के हाथ में नीले रंग के धागों में बंधी ताबीजें थीं. उस में से एक ताबीज उस ने वीना के गले में डाल दी. बाकी ताबीजें उस के हवाले करते हुए बोला, ‘‘इन्हें अपने पति और बच्चों को पहना देना.’’

‘‘जी बंगाली बाबा.’’ कह कर वीना ने ताबीज ले कर माथे से लगा लिए.

इस के बाद, ‘‘ये प्रसाद खा लो.’’ कह कर तांत्रिक ने एक छोटी इलायची वीना के मुंह में डाल दी और बाहर चला गया.

इलायची चबाते ही वीना पर नशा सा छाने लगा. उसे लगने लगा, वह मदहोश होती जा रही है. तभी तांत्रिक अंदर आया और गौर से वीना को देखने लगा. इस बार भी वह पहले की ही तरह कुछ बुदबुदा रहा था. फिर वह उस की बगल में लेट गया. नशे जैसी स्थिति में होने की वजह से चाह कर भी वीना उस की किसी हरकत का विरोध नहीं कर सकी. वीना को सब दिखाई दे रहा था, उस के साथ क्या किया जा रहा है, इस का भी उसे आभास हो रहा था, लेकिन वह किसी भी तरह का विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. इलायची में कोई नशीली चीज खिला कर तांत्रिक ने उसे बेबस कर दिया था. अंत में उस ने अपनी मनमरजी कर डाली.

मुंह काला करने के बाद तांत्रिक ने कहा, ‘‘इसी तरह तुम्हें लगातार 3 दिनों तक अकेली आना होगा. 4 दिनों की क्रिया के बाद जिन्न खुदबखुद खत्म हो जाएगा. जिन्न मर गया तो समझो तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गईं.’’

वीना ने उठ कर कपड़े पहने और धीमेधीमे कदमों से अपनी परिचिता के यहां से बच्चों को ले कर घर आ गई. जो कुछ उस के साथ हुआ था, उसे सब याद था. इस सब से अब उसे आत्मग्लानि होने लगी थी, साथ ही तांत्रिक पर गुस्सा आ रहा था. सोचने लगी, ‘यह इंसान है या पिशाच, जिस ने 7 महीने की गर्भवती का भी लिहाज नहीं किया.’

तांत्रिक के बारे में सोचसोच कर वीना की कनपटियां सुलगने लगीं. पति काम से लौटा तो तबीयत खराब होने का बहाना कर के चुपचाप लेटी रही. पति से इस बारे में बात करना उसे ठीक नहीं लगा. मर्दों का क्या भरोसा, बात का बतंगड़ बना दें. गलती खुद उसी की थी, जो कथित रूहानी ताकतों से इलाज कराने अपनी मरजी से तांत्रिक के पास चली गई. पति ने उसे इस सब के लिए पहले ही मना किया था. जैसेतैसे वीना ने वह रात गुजारी. रात भर में वह जितना अपनेआप को कोस सकती थी, कोसती रही. इस के साथ मन ही मन वह निर्णय भी लेती रही कि ढोंगी तांत्रिक बंगाली बाबा को उस के किए की सजा जरूर दिलाएगी.

अगले दिन जब महेश काम पर चला गया तो वीना फिर तांत्रिक के बारे में सोचने लगी. उस ने सोचा कि अगर वह चुप रहती है तो तांत्रिक आगे भी इसी तरह अन्य औरतों को खराब करता रहेगा. मैला तन ले कर वीना अपने पति को धोखा नहीं देना चाहती थी. काफी कशमकश के बाद उस ने सोच लिया कि अंतत: जो होगा, देखा जाएगा. पहली जरूरत तांत्रिक को सजा दिलाने की है. उस ने तांत्रिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने के लिए सोचा, मगर अकेली थाने जाने की हिम्मत नहीं हुई. लिहाजा इस बारे में रायमशविरा करने वह अपनी जेठानी के घर चली गई.

जेठानी चंडीगढ़ के सेक्टर 20 में रहती थी. देवरानी के मुंह से तांत्रिक की घिनौनी करतूत सुन कर वह हैरान रह गई. वह उसे तत्काल समाजसेवी परमजीत कौर और भजन कौर के पास ले गई. दोनों ने सारी बातें सुन कर सुझाव दिया कि आज शाम वीना फिर तांत्रिक के पास जाएगी. वे तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले करना चाहती थीं. वे तांत्रिक बंगाली बाबा की घिनौनी करतूत की चश्मदीद गवाह भी बनना चाहती थीं. फिर ऐसा ही किया गया. उसी रात 8 बजे वीना को बंगाली बाबा के ‘दरबार’ में भेजा गया. परमजीत कौर और भजन कौर कुछ अन्य लोगों के साथ बाहर चौकन्नी हो कर खड़ी थीं.

पहले दिन वाली प्रक्रियाएं करने के बाद बंगाली बाबा ने वीना के मुंह में इलायची डाली. वीना ने उस की आंख बचा कर झट से इलायची उगल दी. इस के बाद बंगाली बाबा तंत्रमंत्र की नौटंकी करते हुए जैसे ही उस की बगल में लेटा, उस ने शोर मचा दिया. बस फिर क्या था, महिलाओं ने तेजी से भीतर घुस कर तांत्रिक को रंगेहाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया. वीना के बयान के आधार पर भादंवि की धाराओं 356 व 341 के तहत थाना मनीमाजरा में तांत्रिक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया.

जब इस बात की जानकारी डीएसपी (ईस्ट) विजयपाल सिंह को मिली तो वह भी थाने पहुंच गए. उन्होंने इस मामले की जांच इंसपेक्टर धनराज शर्मा को सौंपी गई. तांत्रिक को रात भर हवालात में रखा गया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर के उसे पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. अभी तक पूछताछ में तांत्रिक यही कह रहा था कि वह काले इल्म का जबरदस्त जानकार है. इस इल्म के तहत जिन्नों को इसी तरह भगाया जाता है. चूंकि प्रक्रिया में विघ्न पड़ गया है, इसलिए वीना के अलावा वे लोग भी बरबाद हो जाएंगे, जिन्होंने उस का अमल तोड़ने की जुर्रत की है. काले इल्म से उस ने कुछ पुलिसकर्मियोंको भी बरबाद करने की धमकी दी. लेकिन जब पुलिस ने उस पर सख्ती की तो वह सारी हेकड़ी भूल कर असलियत बताने को तैयार हो गया.

उस की उम्र 50 साल के आसपास थी. उस का नाम था शाहिद तौफीक. वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के कस्बा मलिहाबाद का रहने वाला था. उस के परिवार में बीवी मल्लिका खातून के अलावा 4 बेटे थे. कामधंधे की तलाश में वह 20 साल पहले अकेला ही चंडीगढ़ आया था. काम जम जाने के बाद वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था. धीरेधीरे उस ने अपनी बीवी और चारों लड़कों को भी काम से लगा दिया था. इस से उस की अच्छीखासी कमाई होने लगी थी. सब कुछ बहुत बढि़या चल रहा था कि अचानक शाहिद तौफीक तांत्रिक बन गया. इस के बाद वह अकेला ही रहने लगा. पहले वह मियांजी के नाम से, फिर बंगाली बाबा के नाम से मशहूर हो गया.

शाहिद को पहले तंत्रमंत्र की कोई जानकारी नहीं थी. करीब 5 साल पहले वह कुछ दिनों के लिए एक धार्मिक डेरे पर पहुंच गया, जहां तंत्रक्रियाएं की जाती थीं. वहीं वह थोड़ा तंत्रमंत्र सीख गया. वहां से लौट कर उस ने खुद को तांत्रिक घोषित कर तंत्र विद्या से समस्याओं के समाधान की अपनी ढोंग की दुकान खोल ली. शाहिद खर्च भर का कमा लेता था. ज्यादा पैसे कमाने की उसे कोई जरूरत भी नहीं थी. इसीलिए उस ने इस विद्या को लोकसेवा घोषित कर के बिना फीस के कथित रूहानी इलाज करना शुरू कर दिया. इस से उस का अच्छाखासा प्रचार हुआ और दूरदूर से लोग उस के पास आने लगे.

कथित तंत्रक्रियाओं के दौरान शाहिद ने 2 बातें देखीं, एक तो इस में तीरतुक्के ज्यादा चलते थे. अपनी परेशानियों के कारण उस के पास आने वाले लोग दरअसल मानसिक तनाव से ग्रस्त होते थे. तंत्रक्रियाओं के नाटक के चलते पीडि़त व्यक्ति स्वयं को हलका महसूस करने लगता था. मानसिक तनाव में कमी आती थी तो वह अपने काम में तवज्जो देने लगता, इस से उस का काम संवरने लगता. दूसरी बात उस ने यह देखी कि तंत्र के नाम पर किसी भी औरत को भैरवी बना कर उस से आराम से मनमानी की जा सकती थी. यही सब वह करता भी था. तंत्रमंत्र की आड़ में उस ने न जाने कितनी औरतों को खराब किया, इस का हिसाब खुद उस के पास नहीं था.

इज्जत लुटा कर भी कभी कोई औरत उस के विरोध में खड़ी नहीं होती थी. उस के पकड़े जाने पर भी कोई पीडि़ता उस के खिलाफ बयान देने थाने नहीं आई. भला हो वीना का, जिस ने उस पाखंडी तांत्रिक के चेहरे से शराफत का मुखौटा नोच फेंका था, वरना तंत्रमंत्र में आस्था रखने वाली न जाने कितनी औरतें अपनी इज्जत लुटवाती रहतीं. Fपुलिस ने तांत्रिक के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे 7 साल की बामशक्कत कैद की सजा हुई. ऊपरी अदालतों में अपील करने से भी उसे कोई लाभ नहीं मिला. अपनी सजा भुगत कर कुछ साल पहले वह जेल से बाहर आया. इस बीच उस का परिवार मनीमाजरा छोड़ कर उत्तर प्रदेश चला गया था. शाहिद भी शायद वहीं चला गया है.

वीना और उस के घर वालों के बारे में यही सुखद समाचार है कि अपनी मेहनत से महेश ने जहां अपना अच्छाखासा धंधा जमा लिया है, वहीं वीना खुद भी बेकरी का कारोबार करती है. महेश ने उस की महाभूल को गलती की संज्ञा दी, जो उस के लिए सबक बन कर काम आई. आज उन के 2 नहीं, 3 बेटे हैं और तीनों शहर के बेहतरीन एवं नामचीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं. तीनों की गिनती मेधावी छात्रों में होती है. Hindi crime story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

True Crime Story: अधेड़ उम्र का इश्क – पति की कातिल दुलारी

True Crime Story: बांदा जिले के बुधेड़ा गांव के रहने वाले शिवनारायण निषाद 18 जून, 2021 की रात को गांव में रामसेवक के घर एक शादी के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटे तो घर पर मौजूद पत्नी दुलारी की चिंता बढ़ने लगी. उस समय दुलारी घर पर अकेली थी. उस का 20 वर्षीय बेटा और 17 वर्षीय बेटी राधा गांव अलमोर में स्थित एक रिश्तेदारी में गए हुए थे. दुलारी ने पति की चिंता में जैसेतैसे कर के रात काटी.

सुबह होने पर दुलारी ने अपने बेटे को फोन कर के रोते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी गांव में ही रामसेवक चाचा के घर मंडप पूजन के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, लेकिन अभी तक वह घर वापस नहीं लौटे हैं.’’

बेटे दीपक ने जब अपने पिता के गायब होने ही बात सुनी तो वह भी घबरा गया. फिर वह मां को समझाते हुए बोला, ‘‘घबराओ मत मां, मैं घर आ रहा हूं. हो सकता है पिताजी रात होने पर वहीं रुक गए हों. फिर भी आप उन के घर जा कर पूछ आओ.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं रामसेवक चाचा के घर पता करने जा रही हूं.’’ दुलारी ने दीपक से कहा.

दुलारी जब रामसेवक के घर पहुंची तो रामसेवक ने बताया कि शिवनारायण गांव के ही 2 लोगों सूबेदार और चौथैया के साथ रात 10 बजे ही वहां से लौट गए थे.

यह बात दुलारी ने दीपक को फोन कर के बताई तो दीपक के मन में तमाम तरह की आशंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. उसी दिन दीपक अपनी बहन के साथ गांव अलमोर से घर वापस  लौट आया. दुलारी और घर के लोग सोचने लगे कि जब रामसेवक चाचा के यहां से वह लौट आए तो कहां चले गए. अभी तक वह घर क्यों नहीं आए? उस दिन दीपक अपने ताऊ पिता रामआसरे, मां दुलारी और परिजनों के साथ पिता को आसपास खोजने में लगा रहा.

इस के बाद परिजनों ने सूबेदार और चौथैया से शिवनारायण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात में 10 बजे साथ ही लौटे थे और गांव के शिवलाखन की पान परचून की दुकान पर गए, लेकिन उस समय उस की दुकान बंद थी. तब हम लोग अलगअलग हो कर अपनेअपने घरों को वापस लौट गए थे. इस के बाद शिवनारायण कहां गया, हमें नहीं पता. शिवनारायण की 2 बेटियां, जो अपनी ससुराल में थीं, वह भी पिता के लापता होने की सूचना मिलने पर मायके आ चुकी थीं.

अब शिवनारायण के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. बेटे दीपक और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान बेटे ने अपने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर उन के बारे में जानना चाहा. लेकिन सभी जगह निराशा ही हाथ लग रही थी.

शिवनारायण को गायब हुए 2 दिन होने वाले थे, फिर भी घर वाले पुलिस के पास न जा कर इधरउधर खोजने में ही लगे हुए थे. इसी दौरान 20 जून, 2021 की सुबह गांव के सूबेदार और अन्य लोग जब यमुना नदी किनारे से जा रहे थे. तो उन्होंने हाथपैर बंधे घुटनों के बीच डंडा फंसे एक लाश पड़ी देखी. यह बात उन्होंने गांव के अन्य लोगों को बताई. इस के बाद वह लाश देखने के लिए यमुना किनारे गए. वहां ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी.

गांव वालों ने वह लाश पहचान ली. मृतक और कोई नहीं 2 दिन से गायब हुआ शिवनारायण ही था. इधर ग्रामीणों ने नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना स्थानीय थाने जसपुरा के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को भी दे दी. थानाप्रभारी सुनील इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के बाद अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर रवाना हो गए. नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना पा कर शिवनारायण निषाद के परिजन भी रोतेबिलखते वहां पहुंच चुके थे. पति की लाश देख कर दुलारी दहाड़ें मार कर रोने लगी.

सूचना पा कर बांदा के एसपी अभिनंदन के अलावा एएसपी महेंद्र प्रताप सिंह चौहान, सीओ (सदर) सत्यप्रकाश शर्मा के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस नें अपनी जांच में पाया कि लाश पानी में फूल कर उतरा कर नदी के किनारे आई है. ऐसे में अनुमान लगाया कि शिवनारायण की हत्या 18 जून की रात में कर दी गई थी. क्योंकि पानी में पड़ा शव करीब 24 घंटे बाद ही उतरा कर ऊपर आता है. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने वहां से कुछ सबूत भी जुटाए.

पुलिस ने लाश को देख कर यह कयास लगाया कि हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल रहे होंगे. क्योंकि पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान और न ही दोपहिया व चार पहिया वाहनों के टायरों के निशान मिले, जिस से यह कहा जा सके कि हत्या इसी जगह पर की गई थी. इसी को आधार बना कर पुलिस यह मान रही थी कि हत्या कहीं और की गई है. लाश को नदी में ठिकाने लगाने के उद्देश्य से यहां ला कर फेंका गया था.

जिस समय बुधेड़ा गांव में पुलिस अधिकारी व थाने की पुलिस घटनास्थल का मौकामुआयना कर रही थी, पुलिस को वहां जमीन पर खून पड़ा भी दिखा. साथ ही कुछ दूरी पर चूडि़यों के टुकड़े भी बरामद हुए थे. जिन्हें फोरैंसिक टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद गांव वालों ने बताया कि टूटी चूडि़यां मृतक की पत्नी दुलारी की हैं. उन का कहना था कि मामले की जानकारी होने पर दुलारी वहां बैठ कर रो रही थी. हो सकता है उस दौरान चूडि़यां टूट कर बिखर गई हों.

लेकिन पुलिस किसी भी साक्ष्य को हलके में नहीं ले रही थी, इसलिए वहां मौजूद हर संदिग्ध वस्तु को अपने कब्जे में ले रही थी. इस दौरान हत्या से जुड़े साक्ष्यों को इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने शव मिलने वाले स्थान से पैदल ही नदी किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर तक छानबीन की, लेकिन वहां से पुलिस को कोई अन्य और खास सबूत नहीं मिला.

पुलिस ने जरूरी साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस दौरान पुलिस ने परिजनों से शिवनारायण के घर वालों से किसी से रंजिश होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. दोपहर तक पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंट कर हत्या करने और फेफड़ों में पानी न होने की पुष्टि हुई. इस के बाद पुलिस ने शिवनारायण के बेटे दीपक की तहरीर पर हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत दर्ज कर लिया.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एसपी के निर्देश पर जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल शुभम सिंह, सौरभ यादव, अमित त्रिपाठी, महिला कांस्टेबल अमरावती व संगीता वर्मा को शामिल कर जांच शुरू की. थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को शुरुआती पूछताछ में मृतक शिवनारायण के बड़े भाई रामआसरे और बेटे दीपक ने बताया कि 6 महीने पहले गांव के ही एक दुकानदार ने शिवनारायण से विवाद किया था और धमकी दी थी.

इस के बाद पुलिस दुकानदार और रात में दावत में साथ रहे व लाश मिलने की सूचना देने वाले सूबेदार सहित 4 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले गई. लेकिन पुलिस को उन लोगों से पूछताछ में ऐसी कोई बात नहीं मिली, जिस से उन पर हत्या का शक किया जा सके. जसपुरा थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह शिवनारायण निषाद के हत्या की हर एंगल से जांच कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने मृतक के घर के हर सदस्य का बयान दर्ज किया था.

उन्हें जांच में पता चला कि शिवनारायण रात के 9 बजे ही दावत से अपने घर के लिए वापस लौट लिए थे. चूंकि उस समय हलकी बारिश हो रही थी, ऐसे में 45 साल की उम्र में उन के कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता था. ऐसे में पुलिस यह मान कर चल रही थी कि शिवनारायण घर लौटे थे और उन के साथ घर पर ही कोई घटना हुई थी. उस दिन घर पर मृतक शिवनारायण की पत्नी ही मौजूद थी. क्योंकि उस के बच्चे रिश्तेदारी में पैलानी थानांतर्गत अमलोर गांव गए हुए थे. मौके पर मिली चूडि़यों के टुकड़ों के आधार पर पुलिस का शक पत्नी दुलारी पर और भी पुख्ता होता जा रहा था.

उधर पुलिस को मृतक के हाथपांव के बांधने और घुटनों के बीच डंडा बांधने की बात समझ आ चुकी थी. यह हत्या के बाद लाश को उठा कर ले जाने में उपयोग किया गया होगा. इसी दौरान पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि उसी गांव के रहने वाले जगभान सिंह उर्फ पुतुवा का अकसर शिवनारायण निषाद के घर आनाजाना था. चूंकि शिवनारायण जगभान के खेतों में बंटाई पर खेती करता था. इसी दौरान जगभान का  शिवनारायण की पत्नी दुलारी से अवैध संबंध हो गए थे. जिस की जानकारी होने पर शिवनारायण और जगभान के बीच खटास पैदा हो गई थी.

अब पुलिस शिवनारायण की पत्नी दुलारी और जगभान पर अपनी जांच केंद्रित कर आगे बढ़ रही थी. इसी सिलसिले में थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जगभान के घर जा कर पता करना चाहा तो वह घर पर नहीं मिला. लेकिन उस की पत्नी दुलारी ने पुलिस को बताया कि वह शाम को 6 बजे पास के एक गांव में शादी में गए थे. वहां से वह साढ़े 11 बजे रात में लौट कर आए थे. दुलारी ने यह भी बताया कि उन के साथ ही गांव के भोला निषाद की 4 बेटियां भी शादी में गई थीं. जहां भोला की 3 लड़कियां वहीं रुक गई थीं, जबकि एक उन के साथ वापस आई थी.

इस के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जहां शादी थी, वहां पता किया तो लोगों ने बताया कि जगभान वहां से साढ़े 8 बजे ही निकल  गया था. फिर पुलिस ने भोला निषाद के घर जा कर पूछताछ की तो  लड़कियों ने बताया कि जगभान उन के घर 9 बजे आए थे, उस के बाद तुरंत वह वापस चले गए. अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि जगभान जब भोला के घर से साढ़े 8 बजे चला आया तो वह अपने घर साढ़े 11 बजे रात में पहुंचा था. तो इन ढाई घंटों के दौरान वह कहां रहा.

इस आशंका के आधार पर पुलिस ने जगभान सिंह से ढाई घंटे गायब रहने का कारण पूछा तो वह उस का सही जबाब नहीं दे पाया. पुलिस ने जब कड़ाई से मृतक की पत्नी दुलारी और जगभान सिंह से पूछताछ की गई तो उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या किए जाने की बात स्वीकारते हुए हत्या का राज उगल दिया. उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जसपुरा थाना क्षेत्र के बुधेड़ा गांव के निवासी शिवनारायण गांव में रह कर खेती करता था. वह दूसरों के खेत बंटाई पर ले कर भी खेती करता था.

शिवनारायण ने गांव के ही जगभान सिंह का खेत भी बंटाई पर ले रखा था. खेत बंटाई में लेने के कारण खेत मालिक जगभान शिवनारायण के घर आनेजाने लगा था. इस बीच जगभान और शिवनारायण की पत्नी दुलारी के बीच नजदीकियां बढ़ाने लगी थीं. दोनों की ये नजदीकियां कब शारीरिक संबंधों में बदल गईं, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन शिवनारायण ने जगभान और दुलारी को साथ में देख लिया तो वह आगबबूला हो गया और जगभान सिंह को घर न आने कि कड़ी हिदायत दे डाली. इस के बावजूद भी जगभान सिंह शिवनारायण के घर आता रहा.

लेकिन बारबार शिवनारायण द्वारा जगभान को घर आने से मना करने की वजह से बीते साल जगभान ने शिवनाराण को अपना खेत बंटाई पर नहीं दिया, तभी से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. इसी बात से जगभान और दुलारी शिवनारायण से खार खाए बैठे थे. वह इसी उधेड़बुन में थे कि किसी तरह शिवनारायण को ठिकाने लगाया जाए. हत्यारोपी दुलारी ने बताया कि घटना वाले दिन उन के अविवाहित बेटाबेटी गांव अलमोर में अपने एक दिश्तेदार के घर गए हुए थे. उस दिन घर में कोई नहीं था. उसी दिन दोनों ने शिवनरायण को ठिकाने लगाने के लिए तानाबाना बुन लिया था.

जगभान दावत से लौटने के बाद  रात के 9 बजे दुलारी के घर पहुंच गया. इधर मंडप कार्यक्रम से घर लौटे शिवनरायण ने दुलारी को जगभान के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा तो गुस्से में उस का खून खौल गया और वह पत्नी को मारनेपीटने लगा और जगभान से गालीगलौज करने लगा. तभी दुलारी ने प्रेमी जगभान के साथ मिल कर अपने पति को चारपाई पर पटक दिया और गला दबा कर उस की हत्या कर दी. उसी दौरान उन लोगों नें लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास किया, लेकिन गांव के लोग उस समय जाग रहे थे. ऐसे में उन्होंने शिवनारायण की लाश चारपाई के नीचे छिपा दी. इस के बाद जगभान रात के 11 बजे अपने घर चला आया.

जगभान ने बताया कि रात करीब 2 बजे जब मोहल्ले के लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह रात के सन्नाटे में फिर से शिवनारायण के घर पहुंचा. जहां उस ने और दुलारी ने शिवनारायण की लाश के हाथपांव बांध कर दोनों पैरों के बीच डंडा डाल कर लाश को यमुना नदी में फेंक आए. इतना सब करने के बाद दुलारी और जगभान अपनेअपने घर चले गए. घर आने के बाद दुलारी ने पति के गायब होने की खबर पूरे गांव में फैला दी और जानबूझ कर पति को खोजने का नाटक करती रही. लेकिन पुलिसिया जांच में उन का जुर्म छिप नहीं सका.

पुलिस ने शिवनारायण की पत्नी दुलारी और उस के आशिक जगभान से पूछताछ करने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया. वहीं एसपी अभिनंदन ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को ईनाम देने की घोषणा की है. True Crime Story

 

Crime Stories: मौज के बाद मौत

Crime Stories: शिवानी मनोज से प्यार ही नहीं करती थी, बल्कि उसे अपना सब कुछ सौंप भी चुकी थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे मनोज की हत्या करनी पड़ी मनोज कैनवास पर अपनी कल्पना के रंग भरने में मशगूल था. बीचबीच में वह गहरे चिंतन में खो जाता था, जैसे ही कोई बिंब उस के मस्तिष्क में उभरता, उस का ब्रुश हरकत में आ जाता. अपने कमरे के शांत वातावरण में वह पूरी तरह पेंटिंग बनाने में लीन था. तभी किसी महिला की हंसी की आवाज ने उस का ध्यान भंग कर दिया. उस ने पलट कर देखा तो शिवानी खड़ी थी, जो रिश्ते में उस की भाभी लगती थी.

मनोज ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ओह तो आप हैं.’’

‘‘क्यों… मैं यहां नहीं आ सकती क्या?’’ शिवानी ने शरारती लहजे में पूछा.

‘‘क्यों नहीं आ सकतीं भाभी. आप जब चाहें तब आ सकती हैं. बात यह थी कि मेरा पूरा ध्यान पेंटिंग में था, इसलिए मुझे पता ही नहीं चला कि आप कब आ गईं. आप की हंसी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, तब आप के आने का पता चला.’’

‘‘इस का मतलब कि मेरे आने से तुम डिस्टर्ब हो गए. इस वक्त मेरा यहां आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा होगा?’’ शिवानी ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है. आप के आने से तो मुझे बहुत खुशी होती है. एक तरह से प्रेरणा मिलती है. अरे आप खड़ी क्यों हैं, बैठिए न.’’ मनोज ने कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

शिवानी कुरसी पर बैठ गई और पेंटिंग को गौर से देखने लगी. पलभर बाद उस ने कहा, ‘‘मनोज, मैं तुम से एक बात कहूं?’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत सुंदर पेंटिंग बनाते हो, तुम्हारे हाथों में कमाल का जादू है. इतनी अच्छी पेंटिंग मैं पहली बार देख रही हूं.’’

‘‘आप लोगों का आशीर्वाद है भाभी.’’

इस पर शिवानी उस के नजदीक आ कर चुलबुलेपन से बोली, ‘‘अच्छा पक्की बात है यह.’’

‘‘हां, इस में कोई शक नहीं है. दुनिया में जो कुछ भी है, उस में बड़ों का आशीर्वाद है.’’ मनोज ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे तो नहीं लगता कि मुझे कुछ मिला है.’’ शिवानी की बात में शरारत छिपी थी.

मनोज ने गहरी नजरों से शिवानी को नीचे से ऊपर तक देखा. उस के बाद उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘कभी आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को निहार लेना, पता चल जाएगा कि आप को क्या मिला है.’’

इस के जवाब में शिवानी खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद अपनी आवाज में शरारत का रंग घोलते हुए बोली, ‘‘लेकिन मेरे पति तो मुझे साधारण कहते हैं. पता नहीं तुम्हारी नजर में मैं इतनी अच्छी क्यों हूं?’’

‘‘सौंदर्य का पुजारी ही सुंदरता की परिभाषा जानता है. मेरी नजर में तो आप सुंदरता की मूर्ति हो.’’

‘‘सच.’’ शिवानी ने चहक कर पूछा तो मनोज ने मुसकरा कर सहमति में सिर हिला दिया. इस से शिवानी खुशी से गदगद हो गई. दोनों के बीच बातचीत चल रही थी कि शिवानी का पति पवन आ गया.

मनोज और पवन गहरे दोस्त थे. उस के आने से दोनों दोस्तों में बातें होने लगीं. कुछ देर बैठ कर शिवानी पति के साथ घर चली गई. लेकिन जाते समय शिवानी ने मनोज की आंखों में जिस तरह झांक कर मुसकराई थी, मनोज के दिल में हलचल मच गई थी. इस के बाद मनोज का मन पेंटिंग बनाने में नहीं लगा. मध्य प्रदेश के सतना जिले के थाना सिविल लाइन के अंतर्गत गांधीग्राम में 32 वर्षीय पवन चौधरी उर्फ नंदू रहता था. पवन आजीविका के लिए पेंटिंग का काम करता था. उस के पिता रामसजीवन चौधरी मजदूरी करते थे. वह अपने बड़े बेटे रामाश्रय चौधरी के साथ रहते थे. रामाश्रय औटो चलाता था.

पवन का विवाह करीब 10 साल पहले शिवानी से हुआ था. विवाह के बाद दोनों गृहस्थ जीवन में रम गए थे. वैसे तो इन के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन उन्हें एक चीज खटकती थी. जिस के लिए वे हर समय चिंतित रहते थे. उन की शादी को कई साल हो गए थे, लेकिन उन की बगिया सूनी की सूनी थी. दोनों अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे थे, लेकिन शिवानी मां नहीं बन सकी थी. मनोज चौधरी पवन का रिश्ते का भाई था. उस की उम्र भी यही कोई 22 साल थी. वह अविवाहित था. वह भी पवन की तरह ही पेंटिंग करता था. उस के हाथों में गजब का हुनर था. उस की शुरू से ही कला में रुचि थी. वह किशोर उम्र में आर्ट पेपर पर ही किसी न किसी की तसवीर बनाता रहता था. समय के साथ वह बड़ा हुआ तो उस का ब्रुश कैनवास पर चलने लगा.

लेकिन उस का यह शौक उस का पेट नहीं भर सकता था. ऐसे में उसे मजबूरी में गाडि़यों की नंबर प्लेट, दीवारों और बैनरों पर लिखने का काम करना पड़ा. लेकिन समय मिलने पर वह तसवीर बनाने का अपना शौक पूरा कर लेता था. मनोज और पवन रिश्तेदार थे और एक जैसा काम करते थे, इसलिए उन के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों ही शराब के जबरदस्त शौकीन थे. मनोज के घर तो मांबाप के कारण शराब की महफिल जम नहीं सकती थी, इसलिए पवन अपने घर शराब की महफिल जमाता था.

मनोज रोजाना शाम को पवन के घर पहुंच जाता. पवन के अलावा घर में उस की पत्नी शिवानी होती थी. शिवानी के तीखे नयननक्श और छरहरा बदन उस की खूबसूरती में चार चांद लगाते थे. ऐसे में मनोज की आंखें हर समय उसी पर टिकी रहती थीं. बच्चे पैदा न होने की वजह से शिवानी के सौंदर्य में कोई कमी नहीं आई थी. वह शिवानी के घर आता था तो शिवानी भी उस के घर जाती थी. लेकिन उस के साथ पवन होता था. फिर भी मनोज और उस की बातें हो जाती थीं. शिवानी भी मनोज को चाहने लगी थी. शादीशुदा होते हुए भी उस ने मनोज को अपने दिल में बसा लिया था. मनोज की हर बात उसे भाती थी.

उस के बात करने का अंदाज और उस की बनाई हुई पेंटिंग, सब उस की आंखों को सुहाती थीं. बस दिल में तमन्ना थी कि मनोज का सान्निध्य उसे मिल जाए और उसे वह जी भर कर प्यार करे. जबकि पवन उसे प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह उस का भरपूर खयाल रखता था. शिवानी भी पवन के प्यार में कोई कमी महसूस नहीं करती थी, लेकिन उसे न जाने मनोज में ऐसा क्या दिखा था कि वह अपने आप को उस की तरफ खिंचने से नहीं रोक पा रही थी.

वह सारी मर्यादाएं तोड़ कर उस के आगोश में समाने को आतुर थी. वह जब भी मनोज से मिलती, उस की और उस की पेंटिंग की खूब तारीफ करती. उस की बातें सुन कर मनोज को भी यकीन हो गया था कि शिवानी के भी दिल में उस के लिए कुछ है. एक दिन जब शिवानी उस के घर आई तो दोनों में खूब बातें हुईं. अगले दिन दोपहर में वह शिवानी के घर पहुंच गया. अपने साथ वह पेंटिंग का सामान भी ले गया था. अपने घर अचानक मनोज के आया देख कर शिवानी बहुत खुश हुई. उस के हाथ में पेंटिंग का सामान देख कर वह बोली, ‘‘आज कौन सी पेंटिंग बनाई है पेंटर बाबू? वैसे तुम्हारे अंदर यह खूबी है कि तुम किसी का भी चित्र बनाते हो तो लगता है वह अभी साकार हो उठेगा.’’

‘‘मैं तो सिर्फ अच्छा बनाने की कोशिश करता हूं. यह देखने वालों का नजरिया होता है. तुम जैसी कला की कद्रदानों के कारण ही कला जिंदा है.’’ मनोज ने एक कलाकार की हैसियत से बहुत कुछ कह दिया.

मनोज ने शिवानी की खूबसूरत आंखों में झांका. शिवानी उस की हर बात को बड़ी संजीदगी से अपने जेहन में उतारने की कोशिश कर रही थी. एकएक बात उस के अंदर खलबली मचा रही थी. मनोज द्वारा साथ में लाई गई अधूरी पेंटिंग को देखते हुए बोली, ‘‘इस पेंटिंग में प्रेम की कौन सी भाषा उकेर रहे हो?’’

‘‘बनाने से पहले बता दूंगा तो तुम्हारे लिए इस पेंटिंग का महत्त्व कम हो जाएगा. अभी यह अधूरी है, जब पूरी हो जाएगी, तब देखना. बस शर्त यह है कि इसे आंखों से नहीं दिल से देखना. कभीकभी जो चीज आंखों से नहीं दिखाई देती, वह आंखें बंद करने पर दिखाई देती है.’’ कह कर मनोज ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

पहले तो शिवानी उस की बात पर हंसी, इस के बाद उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीरे से बोली, ‘‘पेंटर बाबू, क्या मुझे नहीं बताओगे कि आंखें बंद कर के तुम क्या देख रहे हो?’’

मनोज ने हड़बड़ा कर आंखें खोल लीं. कला के पारखी मनोज ने शिवानी की आंखों की भाषा पढ़ ली. उस में प्रेम की गहरी कशिश और आमंत्रण था. शिवानी के शब्द ‘पेंटर बाबू’ और ‘मुझे नहीं बताओगे’ अपनेआप का अधिकार जता रहे थे.

तभी शिवानी ने कहा, ‘‘मैं भी पेंटिंग सीखना चाहती हूं, क्या मुझे सिखाओगे?’’

‘‘इस के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी.’’ मनोज मजाकिया अंदाज में बोला.

शिवानी के होंठों पर कटीली मुसकान उभर आई. वह शरारती लहजे में बोली, ‘‘बड़े लोभी कलाकार हो, एक कला के कद्रदान से भी कीमत वसूलना चाहते हो. बताओ, क्या कीमत लोगे?’’

‘‘पहले वादा करो कि तुम मुझ से नाराज तो नहीं होगी.’’ मनोज ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘चलो, मैं वादा करती हूं कि नाराज नहीं  होऊंगी. जो भी कहना है, खुल कर कह डालो.’’ शिवानी बोली.

‘‘शिवानी, मैं जानता हूं कि तुम शादीशुदा हो, फिर भी पता नहीं तुम ने मेरे ऊपर कैसा जादू कर दिया है कि मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. दिनरात उठतेबैठते तुम ही तुम मेरे खयालों में छाई रहती हो. यहां तक कि पेंटिंग बनाने का जुनून भी तुम्हारे प्यार के आगे फीका पड़ गया है. यदि तुम ने मेरे प्यार को ठुकरा दिया तो मैं मर जाना पसंद करूंगा.’’

‘‘ऐसी अशुभ बात मत बोलो मनोज. मैं तो कब से तुम्हें अपना मान बैठी हूं. बस यही बात तुम्हारे मुंह से सुनने के लिए तरस रही थी.’’

शिवानी ने मनोज के प्यार को कबूल किया तो उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. फिर क्या था, दोनों के तन में वासना की आग भड़क उठी, जो हसरतें पूरी होने के बाद ही शांत हुई. उस दिन से दोनों के जीवन में एक नई बहार आ गई. उन के मिलन का सिलसिला अनवरत चलने लगा. 30 मई, 2015 की सुबह नकटी मोड़ पर राहगीरों ने एक प्लास्टिक की बोरी देखी, जिस में से सड़ांध आ रही थी. लोगों को शक हुआ तो इस की सूचना थाना सिविल लाइंस को दे दी. सूचना मिलते ही टीआई अशोक सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने बोरी खुलवाई तो उस में एक युवक की लाश निकली.

मरने वाले की उम्र 22-23 साल थी. देखने से ही लग रहा था कि लाश कई दिनों पुरानी है, इसलिए सड़ गई है. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी लाश को पहचान नहीं पाया. अचानक टीआई अशोक सिंह को याद आया कि एक दिन पहले थाने में एक युवक की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. उन्होंने थाने में फोन कर के इस की जानकारी की तो पता चला कि कोठी थाने के सोनोर निवासी हरिदीन चौधरी ने अपने बेटे मनोज चौधरी की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

मनोज की उम्र भी 22-23 साल थी. इसलिए उन्होंने मनोज के घर वालों को घटना की सूचना भिजवा दी. सूचना मिलते ही घर वाले मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश देखते ही उस की शिनाख्त मनोज के रूप में कर दी. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद टीआई अशोक सिंह ने जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. थाने आ कर उन्होंने मृतक मनोज के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि मनोज 27 मई को अपनी बुआ के घर हाटी गया था. वहां से वह रात 11 बजे यह कह कर निकला था कि वह अपनी बहन के घर कुसियारा जा रहा है, लेकिन वह वहां नहीं पहुंचा.

जब वह अपनी बहन के यहां नहीं पहुंचा तो उस की काफी तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. तब पिता हरिदीन चौधरी ने 29 मई को थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अगले दिन उस की लाश मिल गई. पिता ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. टीआई ने सोचा कि ऐसी कोई न कोई वजह तो जरूर रही होगी, जिस की वजह से मनोज की हत्या की गई. उन्होंने हरिदीन चौधरी से मनोज के दोस्तों व परिचितों के नाम पूछे तो उन्होंने बताया कि उस का खास दोस्त एक ही था, वह था गांधीग्राम में रहने वाला पवन चौधरी. वह बस उसी के घर ज्यादा आताजाता था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. इस पूछताछ के बाद टीआई अशोक सिंह ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

अशोक सिंह को मुखबिरों से पता चला कि पवन की पत्नी शिवानी काफी रंगीनमिजाज थी. पवन की गैरमौजूदगी में मनोज उस से मिलने भी जाता था. इस से पुलिस को शक हुआ कि कहीं शिवानी और मनोज के बीच कोई चक्कर तो नहीं था? अशोक सिंह ने पवन व शिवानी के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि शिवानी के नंबर से हर रोज पवन के नंबर पर कईकई बार लंबीलंबी बातें होती थीं. 27 मई की रात 11 बजे के करीब मनोज ने शिवानी को फोन किया था. उस के बाद से ही मनोज लापता था. इस का मतलब यह था कि मनोज की हत्या के तार शिवानी से जुड़े थे.

अशोक सिंह ने शिवानी को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. उस से पूछताछ शुरू की गई तो शातिरदिमाग शिवानी ने उन्हें काफी देर तक गुमराह किया. लेकिन जब महिला कांस्टेबल ने उसे सवालों में उलझाया तो वह टूट गई. उस ने अपना गुनाह कबूल करते हुए अपने पति पवन उर्फ नंदू और देवर देवानंद उर्फ देवा का नाम उगल दिया. इस के बाद पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए पवन और देवानंद को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उन्होंने मनोज की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मनोज और शिवानी के बीच एक बार संबंध बने तो बारबार दोहराए जाने लगे. लेकिन ऐसे संबंधों की गुप्त जिंदगी अधिक लंबी नहीं होती, एक दिन सामने आ ही जाती है. मनोज रोजाना दोपहर को अपने काम से गायब हो जाता था. इस से पवन के मन में शंका हुई कि यह आखिर जाता कहां है? एक दिन पवन भी दोपहर में अचानक अपने घर आ गया. घर का दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से उस की पत्नी और किसी युवक के हंसने की तेजतेज आवाजें आ रही थीं. पवन का मन शंका से घिर गया.

उस ने दरवाजा खटखटाया और शिवानी को आवाज दी. लेकिन दरवाजा काफी देर बाद खुला. वह अंदर घुसा तो कमरे में मनोज खड़ा मिला. पवन को माजरा समझते देर नहीं लगी. उस ने दोनों को काफी फटकारा. मनोज से कहा कि वह आइंदा उस के घर में कदम न रखे, नहीं तो उस के लिए अच्छा नहीं होगा. मनोज वहां से चला गया और शिवानी ने भी पति से गलती के लिए माफी मांग ली. अब मनोज का शिवानी के यहां आनाजाना बंद हो गया. एकदूसरे से अलग रहने की वजह से वे बेचैन रहने लगे. वे फोन पर तो बातें कर लेते थे, लेकिन मिलन के लिए जुगत लगाते रहते.

27 मई, 2015 को मनोज अपनी बुआ से मिलने उस के घर हाटी गया. वहां से रात 11 बजे वह अपनी बहन के घर कुसियारा जाने की बात कह कर निकला. वहां से निकलते ही उस ने मोबाइल से शिवानी से बात की तो उस ने उसे अपने घर बुला लिया, क्योंकि उस समय वह घर पर अकेली थी. मनोज जैसे ही शिवानी के घर पहुंचा उसे अकेली पा कर उस ने उसे बांहों में भर लिया और प्यार करने लगा. इत्तफाक से उसी समय पवन आ गया. उसे देख कर मनोज की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उस ने बात बनाते हुए कहा कि उसे बहन के यहां कुसियारा जाना था, पर रात ज्यादा हो गई, इसलिए वह रात बिताने के लिए यहां आ गया.

लेकिन पवन ने उसे अपनी आंखों से दूसरी हालत में देखा था, इसलिए उसे उस पर गुस्सा आ रहा था. लिहाजा पवन उस पर टूट पड़ा. उस ने उस की लानतमलामत शुरू कर दी. दोनों के बीच हाथापाई होने लगी, इस में मनोज पवन पर भारी पड़ने लगा. उस ने पवन को उठा कर पटक दिया और उस के सीने पर सवार हो गया. जब शिवानी ने देखा कि मनोज उस के पति की जान ले सकता है तो वह हरकत में आ गई. पति की जान बचाने के लिए वह कमरे में रखा टीवी का तार उठा लाई और प्रेमी मनोज के गले में डाल कर खींचने लगी. इस से मनोज की पकड़ ढीली पड़ गई.

इस का फायदा उठा कर पवन ने मनोज को गिरा दिया. इस के बाद दोनों ने मिल कर मनोज के गले में फंसे तार को कस कर खींचा. दम घुटने से मनोज की कुछ ही देर में मौत हो गई. हत्या करने के बाद शिवानी और पवन के सामने मनोज की लाश को ठिकाने लगाने की समस्या आई. दोनों ने रायमशविरा कर के तय किया कि बाथरूम में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया जाए. सुबह 4 बजे तक दोनों ने बाथरूम में गड्ढा खोदा और उस में मनोज की लाश डाल कर उस में मिट्टी डाल दी. इस के बाद निश्चिंत हो कर दोनों अपनी दिनचर्या में लग गए. अभी 2 दिन ही बीते थे कि लाश सड़ने की वजह से तेज बदबू उठने लगी. इस से दोनों को अपने पकड़े जाने की चिंता हुई तो उन्होंने लाश को कहीं बाहर ठिकाने लगाने का फैसला किया.

इस के लिए पवन ने गांधीग्राम में ही रह रहे अपने छोटे भाई देवानंद चौधरी उर्फ देवा को सारी बात बता कर लाश ठिकाने लगाने में मदद मांगी. भाई को मुसीबत में पड़ा देख कर देवानंद उस की मदद करने को तैयार हो गया. शिवानी, पवन और देवानंद ने लाश को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. 29 मई, 2015 की रात तकरीबन 11 बजे देवानंद अपने भाई रामाश्रय चौधरी का औटो नंबर एमपी 19 आर 1438 ले कर पवन के घर पहुंचा. तीनों ने बाथरूम के गड्ढे से मनोज की लाश को निकाला और एक प्लास्टिक की बोरी में भर कर औटो से नकटी मोड़ पर फेंक आए.

लेकिन उन का गुनाह कानून की नजर से बच नहीं सका और वे कानून के शिकंजे में फंस गए. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त तार, फावड़ा और औटो बरामद कर लिया. इस के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Crime Story: सपनों से सस्ता सिंदूर – पति को बनाया शिकार

Hindi Crime Story: 31 वर्षीय कल्पना बसु कर्नाटक के जिला बीवी का धोखा में आने वाले तालुका माहेर की रहने वाली थी. उस का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था. उस के जन्म के कुछ दिनों पहले ही पिता का निधन हो गया था. मां ने मेहनतमजदूरी कर उसे पालापोसा. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाईलिखाई भी नहीं कर पाई थी.

कल्पना खूबसूरत होने के साथसाथ महत्त्वाकांक्षी भी थी. वह चाहती थी कि उसे ऐसा जीवनसाथी मिले जो उस की तरह हैंडसम हो और उस की भावनाओं की कद्र करते हुए सभी इच्छाओं को पूरा करे. लेकिन उस के इन सपनों पर पानी तब फिर गया जब उस की शादी एक ऐसे मामूली टैक्सी ड्राइवर बसवराज बसु के साथ हो गई, जो उस के सपनों के पटल पर कहीं भी फिट नहीं बैठता था.

38 वर्षीय बसवराज बसु उसी तालुका का रहने वाला था, जिस तालुका में कल्पना रहती थी. प्यार तो उसे बचपन से ही नहीं मिला था. उस के पैदा होने के बाद ही मांबाप दोनों की मौत हो गई थी. उसे नानानानी ने पालपोस कर बड़ा किया था. नानानानी की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह भी पढ़लिख नहीं सका. जिंदगी का बोझ उठाने के लिए जैसेतैसे वह टैक्सी ड्राइवर बन गया था. ड्राइविंग का लाइसैंस मिलने पर वह माहेर शहर आ कर कैब चलाने लगा. जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो नातेरिश्तेदारों ने उस की शादी कराने की सोची. आखिरकार उस की शादी कल्पना से हो गई.

खुले विचारों वाली कल्पना से शादी कर के वह खुश था. लेकिन कल्पना उस से खुश नहीं थी. ड्राइवर के साथ शादी हो जाने से उस की सारी ख्वाहिशों और सपनों पर जैसे पानी फिर गया था. पति के रूप में एक मामूली टैक्सी ड्राइवर को पा कर उस के सारे सपने कांच की तरह टूट कर बिखर गए थे.

कुल मिला कर बसवराज बसु और कल्पना का कोई मेल नहीं था, लेकिन मजबूरी यह थी कि वह करती भी तो क्या. बसवराज बसु अपनी आमदनी के अनुसार पत्नी की जरूरतों को पूरी करने की कोशिश करता था, पर पत्नी की ख्वाहिशें कम नहीं थीं. उस की आकांक्षाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करना बसवराज के वश की बात नहीं थी. लिहाजा वह अपनी किस्मत को ही कोसती रहती.

समय अपनी गति से चलता रहा. कल्पना 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद कल्पना की जरूरतें और ज्यादा बढ़ गई थीं, जिन्हें बसवराज बसु पूरा नहीं कर पा रहा था. ऐसी स्थिति में कल्पना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. उस का पति जब घर से टैक्सी ले कर निकलता था तो तीसरेचौथे दिन ही घर लौट कर आता था. घर आने के बाद भी वह कल्पना का साथ नहीं दे पाता था. ऐसे में कल्पना जल बिन मछली की तरह तड़प कर रह जाया करती थी.

उड़ान के लिए कल्पना को लगे पंख

कल्पना खूबसूरत और जवान थी. बस्ती में ऐसे कई युवक थे, जो उस को चाहत भरी नजरों से देखते थे. एक दिन कल्पना के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसे युवकों से लाभ उठाया जाए. इस से उस के सपने तो पूरे हो ही सकते हैं, साथ ही शरीर की जरूरत भी पूरी हो जाएगी.

यही सोच कर कल्पना ने उन युवकों को हरी झंडी दे दी. कई युवक उस के जाल में फंस गए. बच्चों के स्कूल और पति के काम पर जाने के बाद वह मौका देख कर उन्हें घर बुला कर मौजमस्ती करने लगी, साथ ही उन से मनमुताबिक पैसे भी लेने लगी.

कल्पना का रहनसहन और घर के बदलते माहौल को पहले तो बसवराज समझ नहीं सका, लेकिन जब सच्चाई उस के सामने आई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पत्नी को वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है, जिस के लिए वह रातदिन मेहनत करता है, उस के पीठ पीछे वह इस तरह का काम करेगी. उस ने यह भी नहीं सोचा कि दोनों बच्चों पर इस का क्या असर पड़ेगा.

मामला काफी नाजुक था. मौका देख कर बसवराज बसु ने जब कल्पना को समझाना चाहा तो वह उस पर ही बरस पड़ी. उस ने पति को घुड़कते हुए कहा कि तुम्हारे और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अगर मैं अकेली रहती हूं. ऐसे में अगर मैं किसी से दोचार बातें कर लेती हूं तो इस में बुरा क्या है. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता तो मैं आत्महत्या कर लेती हूं.

कल्पना का बदला व्यवहार और माहौल देख कर बसवराज बसु यह बात अच्छी तरह से समझ गया कि कल्पना को समझानेबुझाने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए उस ने उस जगह को छोड़ देना ही सही समझा. वह पत्नी और बच्चों को ले कर बेलगांव शहर चला गया.

वहां बसवराज कुड़चड़े थाने के अंतर्गत आने वाले अनु अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. उस ने टैक्सी चलानी बंद कर दी और किसी की निजी कार चलाने लगा. उसे विश्वास था कि बेलगांव में रह कर पत्नी के आशिक छूट जाएंगे और वह सुधर जाएगी.

लेकिन बसवराज की यह सोच गलत साबित हुई. कल्पना चतुर और स्मार्ट महिला थी. बेलगांव आ कर वह और भी आजाद हो गई. यहां उसे न समाज का डर था और न गांव का. उस ने उसी अपार्टमेंट में रहने वाले पंकज पवार नाम के युवक को फांस लिया. पंकज एक निजी कंपनी में डाटा एंट्री औपरेटर था. वह मडगांव का रहने वाला था.

बसवराज की सोच हुई गलत साबित

31 वर्षीय पंकज पवार की शादी हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे भी थे. लेकिन वह कल्पना के लटकोंझटकों से बच नहीं सका. कल्पना से संबंध बन जाने के बाद पंकज पवार उस के फ्लैट पर आनेजाने लगा. एक दिन पंकज कल्पना से मुलाकात कराने के लिए अपने 3 दोस्तों सुरेश सोलंकी, अब्दुल शेख और आदित्य को भी साथ ले आया. पहली ही मुलाकात में ही कल्पना ने उस के तीनों दोस्तों पर ऐसा जादू किया कि वे भी उस के मुरीद हो गए. उन तीनों से भी कल्पना के संबंध बन गए.

कुछ ही दिनों में कल्पना के यहां आने वाले युवकों की संख्या बढ़ने लगी. धीरेधीरे कल्पना के कारनामों की जानकारी इलाके भर में फैल गई. उस की वजह से बसवराज बसु की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की बदनामी होने लगी. ऐसे में बसवराज का वहां रहना मुश्किल हो गया. दोनों बच्चे अब काफी बड़े हो गए थे. बसवराज बसु ने अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनजर कल्पना को काफी समझाया, लेकिन अपनी मौजमस्ती के आगे उस ने बच्चों को कोई अहमियत नहीं दी.

कल्पना पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो वह उसे छोड़ कर वहीं पर जा कर रहने लगा, जहां वह नौकरी करता था. इस के बावजूद वह अपनी पूरी पगार ला कर कल्पना को दे जाता था.
हालांकि कल्पना के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. बसवराज बसु के जाने के बाद वह और भी आजाद हो गई थी. वह अपने चारों दोस्तों के साथ बारीबारी से घूमतीफिरती और मौजमजा करती. इस के अलावा वह उन से अच्छीखासी रकम भी ऐंठती थी. वह पूरे समय अपने रूपयौवन को सजानेसंवारने में लगी रहती थी. यहां तक कि अब वह घर पर खाना तक नहीं बनाती थी. खाना पकाने के लिए उस ने अपने प्रेमी अब्दुल शेख की पत्नी सिमरन शेख को सेवा में रख लिया था.

2 अप्रैल, 2018 को बसवराज बसु की जिंदगी का आखिरी दिन था. एक दिन पहले उसे जो पगार मिली थी, उसे पत्नी को देने के लिए वह 2 अप्रैल को दोपहर में फ्लैट पर पत्नी के पास पहुंचा. घर का जो माहौल था, उसे देख कर उस का खून खौल उठा. कल्पना ने बेशरमी की हद कर दी थी. वहां पर सुरेश सोलंकी, आदित्य और अब्दुल शेख जिस अवस्था में थे, उसे देख कर साफ लग रहा था कि कल्पना उन के साथ क्या कर रही थी. यह देख कर बसवराज का खून खौल गया.

वह पत्नी को खरीखोटी सुनाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें खर्चे के लिए पैसे देने के लिए आता हूं. लेकिन तुम्हारा यह घिनौना रूप देख कर तुम्हें पैसा देने और यहां आने का मन नहीं होता. लेकिन बच्चों के लिए यह सब करना पड़ता है.’’

बसवराज की मौत आई रस्सी में लिपट कर

पति की बात सुन कर कल्पना डरी नहीं बल्कि वह भी उस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘तो मत आओ. मैं ने तुम्हें कब बुलाया और पैसे मांगे. तुम क्या समझते हो, मेरे पास पैसे नहीं हैं? तुम कान खोल कर सुन लो, मैं जिस ऐशोआराम से रह रही हूं, वह तुम्हारे पैसों से नहीं मिल सकता. तुम्हारी पूरी पगार से तो मेरा शैंपू ही आएगा. रहा सवाल बच्चों का तो उन की चिंता तुम छोड़ दो.’’

कल्पना की यह बात सुन कर बसवराज बसु को जबरदस्त धक्का लगा. इस के बाद पतिपत्नी के बीच झगड़ा बढ़ गया. तभी गुस्से में आगबबूला कल्पना ने अपने तीनों प्रेमियों को इशारा कर दिया. कल्पना का इशारा पाते ही उस के तीनों प्रेमियों ने मिल कर बसवराज बसु को पीटपीट कर बेदम कर दिया.
शारीरिक रूप से कमजोर बसवराज बसु बेहोश हो कर जमीन पर गिर गया. उसी समय अब्दुल शेख की बीवी सिमरन भी वहां आ गई. तभी कल्पना के घर के अंदर बंधी नायलौन की रस्सी खोल कर बसवराज के गले में डाल कर पूरी ताकत से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. यह देख कर सिमरन सहम गई.

टुकड़ों में बंट गया पति

अब्दुल शेख और कल्पना ने सिमरन को धमकी दी कि अपना मुंह बंद रखे. अगर मुंह खोला तो उस का भी यही हाल होगा. डर की वजह से सिमरन चुप रही. कल्पना और उस के प्रेमियों का गुस्सा शांत हुआ तो वे बुरी तरह घबरा गए. हत्या के समय पंकज वहां नहीं था.

थोड़ी देर सोचने के बाद कल्पना और उस के प्रेमियों ने बसवराज बसु की लाश ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. कल्पना ने शव ठिकाने लगवाने के मकसद से पंकज को फोन कर के बुला लिया. लेकिन पंकज को जब हत्या का पता चला तो वह घबरा गया. पहले तो पंकज ने इस मामले से अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अपनी प्रेमिका कल्पना को मुसीबत में घिरी देख कर वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया.
चारों ने मिल कर बसवराज बसु के शव को बाथरूम में ले जा कर उस के 3 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को कपड़ों में लपेट कर प्लास्टिक की 3 बोरियों में भर दिया. मौका देख कर उसी रात 12 बजे इन लोगों ने तीनों बोरियों को अब्दुल शेख की कार की डिक्की में रख दिया. इस के बाद ये लोग कुड़चड़े महामार्ग के अनमोड़ घाट गए और उन बोरियों को एकएक किलोमीटर की दूरी पर घाट की घाटियों में दफन कर के लौट आए.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त बेखबर होते गए. उन का मानना था कि इस हत्याकांड से कभी परदा नहीं उठेगा और उन का राज राज ही रह जाएगा. लेकिन वे यह भूल गए थे कि उन के इस राज की साक्षी अब्दुल शेख की बीवी सिमरन शेख थी, जिस की आंखों के सामने बसवराज बसु की हत्या का सारा खेल खेला गया था. वह इस राज को अपने सीने में छिपाए हुए थी.
पता नहीं क्यों सिमरन को हत्या में शामिल लोगों से डर लगने लगा था. यहां तक कि अपने पति से भी उस का विश्वास नहीं रहा. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उस की जान को खतरा है. वे लोग अपना पाप छिपाने के लिए कभी भी उस की हत्या कर सकते हैं. इस डर की वजह से सिमरन शेख बेलगांव की जानीमानी पत्रकार ऊषा नाईक देईकर से मिली और उस ने बसवराज बसु हत्याकांड की सारी सच्चाई बता दी.

आखिर राज खुल ही गया

बसवराज बसु की हत्या की सच्चाई जान कर ऊषा नाईक के होश उड़ गए. उन्होंने सिमरन शेख को साहस और सुरक्षा का भरोसा दे कर मामले की सारी जानकारी बेलगांव कुड़चड़े पुलिस थाने के थानाप्रभारी रवींद्र देसाई और उन के वरिष्ठ अधिकारियों को दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में थानाप्रभारी रवींद्र देसाई ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी.

उन्होंने 24 घंटे के अंदर बसवराज बसु हत्याकांड में शामिल कल्पना बसु के साथ पंकज पवार, अब्दुल शेख और सुरेश सोलंकी को गिरफ्त में ले कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश किया, जहां सीपी अरविंद गवस ने उन से पूछताछ की. पुलिस गिरफ्त में आए चारों आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

9 मई, 2018 को उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस अनमोड़ घाट की उस जगह पर ले कर गई, जहां उन्होंने बसवराज बसु के शव के टुकड़े दफन किए थे. उन की निशानदेही पर पुलिस ने शव के तीनों टुकड़ों को बरामद कर लिया. घटना के समय बसवराज जींस पैंट पहने हुए था. उस की पैंट की जेब में उस का ड्राइविंग लाइसेंस मिला, जिस से यह बात सिद्ध हो गई कि शव बसवराज का ही था. शव को कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मडगांव के बांबोली अस्पताल भेज दिया.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कल्पना बसु, पंकज पवार, सुरेश सोलंकी और अब्दुल शेख से विस्तृत पूछताछ कर के उन के विरुद्ध भांदंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर चारों को मडगांव मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी आदित्य गुंजर फरार था, जिस की पुलिस बड़ी सरगरमी से तलाश कर रही थी. Hindi Crime Story

True Crime Story: बेमेल प्यार का एक अनूठा फसाना

True Crime Story: तबरेज इलाहाबाद के विवेकानंद मार्ग पर चमेलीबाई धर्मशाला के पास स्थित प्रभात सिंह की मशीनरी पार्ट्स की दुकान पर नौकरी करता था. वह रोजाना सुबह 10 बजे के करीब दुकान पर पहुंचता तो कुछ देर बाद प्रभात भी वहां पहुंच जाता था. इस के बाद ही तबरेज दुकान खोल कर उस की साफसफाई करता था. 30 नवंबर, 2016 को भी जब तबरेज निर्धारित समय पर दुकान पर पहुंचा तो दुकान का शटर खुला मिला. यह देखते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘लगता है भैया आज सुबहसुबह ही दुकान आ गए हैं.’’

लेकिन जब दुकान के भीतर गया तो वहां प्रभात नहीं दिखा. वह मन में बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐसे दुकान खोल कर कहां चले गए भला?’’

दुकान के अंदर आड़ातिरछा रखा सामान निकाल कर उस ने दुकान के बाहर लगा दिया. फिर दुकान की साफसफाई कर के वह दुकान में बैठ कर प्रभात के लौटने का इंतजार करने लगा. आधे घंटे से ज्यादा बीत गया पर प्रभात नहीं लौटा तो तबरेज पास की दुकान पर चाय पीने चला गया. प्रभात का जिनजिन दुकानों पर उठनाबैठना था, तबरेज वहां भी गया पर उसे उस का मालिक दिखाई नहीं दिया तो बुदबुदाते हुए वह वापस दुकान पर आ कर बैठ गया.

उसी समय चित्रा दौड़ती हुई बदहवास सी दुकान पर आई. जिस मकान में प्रभात की दुकान थी, चित्रा उसी मकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी थी. उस के साथ उस का चचेरा भाई गोलू भी था. वह बोली, ‘‘त…तब… तबरेज…’’

‘‘हां बताओ, तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आओ मेरे साथ, खुद ही चल कर देख लो.’’

किसी अनहोनी की आशंका के साथ तबरेज चित्रा और गोलू के पीछेपीछे उस के घर पहुंच गया. घर दुकान के एकदम पीछे ही था. जैसे ही वह कमरे में पहुंचा तो उस का मालिक प्रभात फांसी के फंदे पर झूला हुआ दिखा. यह देख कर उस की चीख निकल गई, ‘‘यह कैसे हो गया?’’

तभी चित्रा बोली, ‘‘पता नहीं, इन्होंने आत्महत्या क्यों कर ली? इन के हाथ में सुसाइड नोट भी है. तबरेज तुम इन के घर वालों को फोन कर के जानकारी दे दो.’’

तबरेज ने तुरंत अपने मोबाइल से प्रभात के पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह को फोन कर के उस की आत्महत्या की जानकारी दे दी. प्रभात का घर वहां से कुछ ही दूरी पर था इसलिए थोड़ी ही देर में वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने घर वालों और पड़ोसियों के साथ वहां पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी.

उस समय भी प्रभात रसोईघर के बगल वाले कमरे में फांसी पर लटका पड़ा था. खबर मिलने पर अनेक व्यापारी भी वहां पहुंच गए. घर के जवान आदमी की मौत पर घर वाले बिलखबिलख कर रो रहे थे. किसी ने सूचना थाना कोतवाली पुलिस को भी दे दी.

चूंकि घटनास्थल से थाना कोतवाली महज आधा एक किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए 10 मिनट में ही एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा व कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा मय फोर्स घटनास्थल पर पहुंच गए.

अब तक सत्येंद्र सिंह के मकान के बाहर भारी संख्या में भीड़ मौजूद हो चुकी थी, जिस के कारण रोड पर जाम लग गया था. पुलिस ने फांसी पर लटके प्रभात सिंह को नीचे उतारा. उस की मौत हो चुकी थी. शव की बारीकी से जांच की तो पहली ही नजर में मामला संदिग्ध नजर आया. प्रभात के सिर व शरीर पर चोटों के निशान थे.

यह देख प्रभात के घर वाले और अन्य व्यापारी हंगामा करने लगे. उन का आरोप था कि प्रभात की हत्या करने के बाद उसे फांसी पर लटकाया गया है, जिस से मामला आत्महत्या का लगे. मृतक के हाथ में 2 पेज का एक सुसाइड नोट भी था.

उस सुसाइड नोट में एक लड़की से प्रेम संबंध और उस की बेवफाई का जिक्र था. प्रभात और उस की तथाकथित प्रेमिका का कितना पुराना रिश्ता था, इस बात का उल्लेख उस नोट में किया गया था. सुसाइड नोट में कितनी सच्चाई है, यह बात जांच के बाद ही पता चलती.

मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर दुकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी चित्रा सिंह पर आरोप लगाया कि उस ने ही अपने सहयोगियों के साथ मिल कर प्रभात की हत्या की है. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए.

प्रभात की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद उस के भाई प्रदीप की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद शाम को जब पुलिस को रिपोर्ट मिली तो उस में भी बताया गया कि प्रभात के सिर पर लोहे की रौड जैसी किसी चीज से वार किया गया था, जिस से उस की मौत हुई थी.

मकान मालिक सत्येंद्र सिंह घटना से एकदो दिन पहले अपनी पत्नी राशि के साथ प्रतापगढ़ चले गए थे. वहां उन के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. घर पर उन की बेटी चित्रा और उस का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू मौजूद था.

एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा के समक्ष चित्रा सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा, ‘‘सर, प्रभात सिंह का उस के प्रति एकतरफा प्यार था. वह मुझ से उम्र में भी दोगुना बड़ा था. भला मैं उस से कैसे प्रेम कर सकती हूं. मेरा उस की हत्या या आत्महत्या से कोई वास्ता नहीं है.’’

‘‘जिस वक्त प्रभात तुम्हारे कमरे में घुस कर फांसी पर लटका, उस वक्त तुम कहां थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं रोज सुबह नहाने के बाद पूजा करती हूं. बुधवार को भी रोजाना की तरह नहाने के बाद मैं पूजा करने चली गई थी. पूजा के बाद मैं ने बालकनी से नीचे की ओर देखा तो नीचे प्रभात की कार दिखी. मैं यह सोचते हुए सीढि़यों से नीचे उतरी कि प्रभात आज दुकान पर इतनी जल्दी कैसे आ गए. तभी देखा कि वह हमारी रसोई के बगल वाले कमरे में लटका हुआ था. मैं समझ नहीं पाई कि यह काम करने के लिए उस ने मेरा घर ही क्यों चुना?’’ वह बोली.

घर में फर्श पर जो खून का धब्बा मिला था, उस के बारे में पुलिस ने उस से पूछा तो उस ने उसे चुकंदर का रस बताया.

पुलिस को लग रहा था कि यह झूठ बोल रही है इसलिए उस से और उस के चचेरे भाई गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने कहा कि प्रभात की हत्या करने का उन का कोई इरादा नहीं था. पर हालात ऐसे बन गए जिस से उस का कत्ल हो गया.

प्रभात सिंह इलाहाबाद शहर के कीडगंज थाना क्षेत्र के कृष्णानगर निवासी वीरेंद्र प्रताप सिंह का बेटा था. कारोबारी वीरेंद्र प्रताप सिंह के 4 बेटे और एक बेटी थी. उन की पत्नी कनकलता का देहांत हो चुका था. मांगलिक होने की वजह से प्रभात की शादी नहीं हुई थी.

वीरेंद्र प्रताप सिंह के एक दोस्त थे सत्येंद्र सिंह, जो प्रतापगढ़ में एक सरकारी मुलाजिम थे. कोतवाली थानाक्षेत्र के विवेकानंद मार्ग पर रहते थे. वीरेंद्र प्रताप ने सन 2003 में उन की एक दुकान किराए पर ली थी, जहां उस ने बंधु ट्रेडर्स के नाम से मशीनरी पार्ट्स बेचने का काम शुरू कर दिया. उस दुकान को प्रभात संभालता था.

दोस्ती के नाते सत्येंद्र उन से दुकान का किराया तक नहीं लेते थे. प्रभात का सत्येंद्र सिंह के घर में खूब आनाजाना था. दुकान के पीछे ही सत्येंद्र सिंह का आवास था. उन की एक बेटी चित्रा थी, घर में आनेजाने के कारण उन दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. उस समय प्रभात की उम्र 36 साल और चित्रा की 16 साल थी.

कुछ दिनों बाद ही उन के संबंधों की खबर उन के घर वालों को भी हो गई. घर वालों ने उन्हें लाख समझानेबुझाने की कोशिश की लेकिन इस का उन पर कोई असर नहीं हुआ. बल्कि उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों की उम्र में काफी अंतर था. लेकिन प्यार का भूत जिन के सिर पर सवार होता है, उन के बीच उम्र आड़े नहीं आती.

धीरेधीरे समय आगे बढ़ने लगा. चित्रा जहां जवान थी तो दूसरी ओर प्रभात की उम्र ढलान की ओर बढ़ रही थी. शायद यही कारण था कि उस पर जान छिड़कने वाला प्रभात अब उसे नीरस नजर आने लगा था. वह उस से इतना प्यार करता था कि वह उसे कालेज तक छोड़ने और लेने जाने लगा था.

लेकिन चित्रा प्रभात से दूरी बनाने लगी थी और अपनी उम्र के लड़कों से मोबाइल पर घंटों बतियाती थी. प्रभात जब भी उसे फोन करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती. बारबार फोन करने के बाद वह उस का फोन उठाती तो बेमन से बात करती.

प्रभात समझ नहीं पा रहा था कि पिछले 10 सालों से प्यार करने वाली चित्रा के अंदर यह बदलाव कैसे आ गया. प्रभात के मना करने के बावजूद भी वह वाट्सऐप और फेसबुक पर पता नहीं किसकिस से चैटिंग करती रहती थी. किसी भी तरह वह प्रभात से अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन प्रभात उसे किसी भी हाल में छोड़ने या भुलाने को तैयार नहीं था.

29 नवंबर, 2016 की रात को प्रभात ने चित्रा से बात करने के लिए कई बार उस का नंबर मिलाया. पहले तो उस का मोबाइल व्यस्त आ रहा था पर बाद में वह स्विच्ड औफ हो गया. प्रभात ने सुबह उठ कर फिर से उस का मोबाइल नंबर डायल किया. घंटी बजने के बावजूद चित्रा ने फोन नहीं उठाया.

गुस्से में वह सुबह 8 बजे ही अपने घर से निकल गया और दुकान खोलने के बाद सीधे चित्रा के कमरे में पहुंचा. वहां चित्रा बिलकुल अकेली थी. मोबाइल रिसीव न करने की बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगा. उन का शोर सुन कर चित्रा का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू उठ गया.

उस ने देखा कि गुस्से से लालपीला प्रभात चित्रा के साथ मारपीट कर रहा है तो उस ने बीचबचाव करने की कोशिश की. उस समय प्रभात चित्रा का गला दबाए हुए था. गोलू ने बताया कि उस ने चित्रा दीदी को बचाने की कोशिश की. तब प्रभात उस से उलझ गया और हाथापाई करने लगा.

उसी दौरान गोलू की नजर दीवार से सटा कर रखे सरिए पर गई. किसी तरह उस ने प्रभात के चंगुल से खुद को छुड़ाया तो प्रभात चित्रा से भिड़ गया. तभी गोलू ने सरिया उठा कर पीछे से प्रभात के सिर पर दे मारा. एकदो वार और करने पर प्रभात नीचे गिर गया और मर गया.

इस के बाद दोनों ने एक रस्सी गले में बांध कर उसे कुंडे से लटका दिया ताकि मामला आत्महत्या का लगे. जहांजहां उस का खून गिरा था, उसे साफ कर के चुकंदर का जूस डाल दिया. फिर दोनों रोने का नाटक करने लगे. चित्रा को जब पता चला कि दुकान पर नौकर तबरेज आ चुका है तो वह घबराई हुई उस के पास गई और उसे कमरे में ला कर बताया कि प्रभात ने आत्महत्या कर ली है.

इधर मृतक के छोटे भाई सुधीर सिंह ने बताया कि प्रभात ने चित्रा के नाम लाखों रुपए की प्रौपर्टी और जायदाद कर दी थी. प्रभात उस से प्रौपर्टी वापस न मांग ले, इसलिए उस ने अन्य लोगों के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी. उधर चित्रा का कहना है कि वह प्रभात से प्यार नहीं करती थी. प्रभात एकतरफा उसे चाहता था.

पुलिस ने चित्रा और उस के चचेरे भाई गोलू को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभी यह पता नहीं लग सका है कि मृतक के हाथ में जो सुसाइड नोट मिला, वह किस ने लिखा था. फोरैंसिक जांच के बाद ही यह स्थिति साफ हो सकेगी. केस की विवेचना कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा कर रहे हैं. True Crime Story

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बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.

11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.

शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.

शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.

शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.

सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.

शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’

‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.

‘‘कहां हैं वह?’’

‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’

‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.

उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.

शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’

‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’

शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.

परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.

शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.

जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.

पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.

शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.

पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’

इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’

‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.

‘‘सोच कर बताओ?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.

पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.

तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.

निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.

लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.

इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.

निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.

निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा  है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.

शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.

देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.

कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.

उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’

शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.

इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’

कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.

योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’

दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.

इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.

शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Stories: प्यार में ऐसा तो नहीं होता

Crime Stories: बेडि़या समाज का दंगल सिंह अपनी प्रेमिका शिल्पा को भगा कर उस से शादी करना चाहता था, जबकि शिल्पा का कहना था कि वह समाज के रिवाज के अनुसार ही शादी करेगी. आखिर दोनों की इस लड़ाई का नतीजा क्या निकला महानगर मुंबई से सटे जनपद थाणे के कोपरी गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले गहरे नाले पर बने पुल पर अचानक काफी लोग एकत्र हो गए थे. इस की वजह उस गहरे नाले में पड़ी किसी आदमी के बैडशीट में बंधी एक गठरी थी, जिस में से पैर की अंगुलियां दिखाई दे रही थीं.

साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Crime News: मासूम बच्चों का सीरियल किलर – पुलिस की गिरफ्त में

Crime News: सीरियल किलर रविंद्र एकएक कर के करीब 40 मासूमों के साथ कुकर्म कर उन की हत्याएं कर चुका था. निशा की हत्या करने के बाद यदि वह अपनी मां के प्रेमी सन्नी को फंसाने की कोशिश न करता तो शायद अब भी गिरफ्तार नहीं हो पाता.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव के नजदीक जैननगर में काफी बड़ी झुग्गी बस्ती है. यह इलाका बेगमपुर थाने के अंतर्गत आता है. इसी बस्ती के रहने वाले संतोष कुमार की 6 वर्षीया बेटी निशा रोजाना की तरह 14 जुलाई को भी नित्य क्रिया के लिए सूखी नहर की तरफ गई थी. सुबह 6 बजे घर से निकली निशा जब आधापौने घंटे बाद भी घर नहीं लौटी तो मां पुष्पा देवी चिंतित हुई. चिंता की बात इसलिए थी क्योंकि निशा को तैयार हो कर 7 बजे स्कूल के लिए निकलना था. वह नजदीक के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. कुछ देर और इंतजार करने के बाद भी वह नहीं आई तो पुष्पा बेटी को देखने के लिए सूखी नहर की तरफ चली गई.

पुष्पा ने सूखी नहर की तरफ जा कर बेटी को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली. उधर आनेजाने वाली महिलाओं और बच्चों से भी उस ने बेटी के बारे में पता किया, पर कोई भी उस की बच्ची के बारे में नहीं बता सका. तब परेशान हो कर वह घर लौट आई. उस ने यह बात पति संतोष को बताई तो वह भी परेशान हो गया. अब तक बेटी के स्कूल जाने का समय हो गया था. मियांबीवी एक बार फिर बेटी को ढूंढने निकल गए. उन के साथ पड़ोसी भी उन की मदद के लिए गए थे. एक, डेढ़ घंटे तक वह बेटी को इधरउधर ढूंढते रहे, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

बस्ती के लोग इस बात से हैरान थे कि आखिर घर और सूखी नहर के बीच से बच्ची कहां गायब हो गई? संतोष की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह बच्ची को कहां ढूंढे? आखिर वह पड़ोसियों को ले कर थाना बेगमपुर पहुंचा. थानाप्रभारी रमेश सिंह उस दिन छुट्टी पर थे. थाने का चार्ज अतिरिक्त थानाप्रभारी जगमंदर दहिया संभाले हुए थे. संतोष कुमार ने उन्हें बेटी के गुम होने की बात बताई.

बच्ची की उम्र 6 साल थी, इसलिए पुलिस यह भी नहीं कह सकती थी कि वह अपने किसी प्रेमी के साथ चली गई होगी. दूसरे बच्ची के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. संतोष ने बताया था कि उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी. इन सब बातों को देखते हुए पुलिस को यही लग रहा था कि या तो बच्ची खेलतेखेलते कहीं चली गई है या फिर उसे बच्चा चुराने वाला कोई गैंग उठा ले गया है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तमाम बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे थे. इसी बात को ध्यान में रख कर उन्होंने उसी समय निशा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी और इस की जांच हेडकांस्टेबल शमशेर सिंह को सौंप दी. बच्ची के अपहरण का मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली के समस्त थानों में उस का हुलिया बता कर वायरलैस से सूचना दे दी गई. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया कुछ पुलिसकर्मियों के साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां से बच्ची लापता हुई थी. उन्होंने संतोष के घर से ले कर सूखी नहर तक का निरीक्षण किया. उसी दौरान उन्होंने कुछ लोगों से बात भी की, लेकिन उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस के सहारे लापता बच्ची का पता लगाया जा सकता.

वह उधर की झाडि़यों में भी यह सोच कर खोजबीन करने लगे कि कहीं किसी बहशी दरिंदे ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो. क्योंकि आए दिन बच्चों के साथ कुकर्म करने जैसे मामले सामने आते रहते थे. झाडि़यों में भी उन्हें कुछ नहीं मिला. संतोष के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत दिखाई दे रही थी. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया ने अपने आसपास खड़े बस्ती वालों से उस इमारत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिल्डिंग किसी जैन की है, लेकिन पिछले काफी दिनों से इस के निर्माण का काम रुका हुआ है.

जिज्ञासावश वह उस बिल्डिंग की तरफ चल दिए. जैननगर की गली नंबर 6 में निर्माणाधीन उस 3 मंजिला बिल्डिंग में जब वह घुसे तो एक कमरे में उन्हें एक बच्ची निर्वस्त्र हालत में पड़ी मिली. वह मृत अवस्था में थी. उन के साथ मौजूद संतोष उस बच्ची को देख कर चीख पड़ा. वह उसी की बेटी निशा थी. बच्ची का निचला हिस्सा खून से सना हुआ था. उस के कपड़े पास पड़े हुए थे. निशा की हालत देख कर इंसपेक्टर दहिया समझ गए कि यह किसी दरिंदे की शिकार बनी है. निशा की हत्या की खबर सुन कर बस्ती के सैकड़ों लोग थोड़ी देर में वहां जमा हो गए. इंसपेक्टर दहिया ने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी.

कुछ देर बाद बाहरी दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत, डीसीपी-2 श्वेता चौहान, एसीपी ऋषिदेव कराला भी जैननगर पहुंच गए. डीसीपी ने मौके पर क्राइम ब्रांच को भी बुलवा लिया. क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम भी मौके से सबूत जुटाने लगी. इन टीमों का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उसी बिल्डिंग में दूसरी मंजिल पर एक ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट से संबंधित कुछ कागज मिले. पुलिस ने वह सब अपने कब्जे में ले लिया.

लाश का मुआयना करने पर यही लग रहा था कि किसी ने उस बच्ची के साथ गलत काम कर के उस का गला घोंट दिया है. निशा की हत्या पर बस्ती के लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इस से पहले कि वे कोई आक्रामक कदम उठाते, पुलिस ने उन्हें समझाबुझा कर शांत कर दिया. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुल्तानपुरी के संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल भेज दिया.

इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी विक्रमजीत ने एसीपी ऋषिदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर जगमंदर दहिया, एएसआई सुरेंद्रपाल, हेडकांस्टेबल नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल टी.आर. मीणा आदि को शामिल किया गया. जिस बिल्डिंग में निशा की लाश मिली थी, उसी बिल्डिंग में पुलिस को जो ड्राइविंग लाइसेंस और कागजात मिले थे, उन की जांच शुरू की गई. ड्राइविंग लाइसेंस पर सन्नी पुत्र सुरेंद्र कुमार नाम लिखा था. उस पर जो पता लिखा था, वह कराला के जैननगर का ही था. यानी यह पता वही था, जहां मरने वाली बच्ची रहती थी.

खैर, पुलिस सन्नी के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पता चला कि वह डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती है. जब पुलिस अस्पताल पहुंची तो जानकारी मिली कि सन्नी को कुछ देर पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था. लिहाजा उलटे पांव पुलिस जैननगर लौट आई. सन्नी घर पर ही मिल गया. उस के हाथपैर और शरीर के अन्य भागों पर चोट लगी हुई थी. पुलिस ने 14 जुलाई को ही सन्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कल रात पड़ोस के ही रविंद्र, उस के भाई सुनील और उस के दोस्त हिमांशु ने उस की खूब पिटाई की थी. पिटाई करने के बाद रविंद्र उस की जेब से मोबाइल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैसे आदि निकाल कर ले गया था. मुझे उम्मीद है कि उसी ने यह सब किया होगा.

रविंद्र का घर सन्नी के घर के पास ही था. पुलिस उस के घर गई तो वह और उस के भाई में से कोई नहीं मिला. घर पर मौजूद उस के पिता ने पुलिस को बताया कि दोनों भाई अपने किसी दोस्त के यहां गए हुए हैं. पुलिस उस के पिता को हिदायत दे कर चली आई. पुलिस ने रविंद्र के बारे में छानबीन की तो जानकारी मिली कि पिछले साल उस ने बेगमपुर थानाक्षेत्र में ही एक बच्चे के साथ कुकर्म कर के उस की गला काट कर हत्या कर दी थी. इस की रिपोर्ट थाना बेगमपुर में ही भादंवि की धारा 363/307/377 के तहत लिखी गई थी. इस मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के 6 महीने बाद सन्नी के पिता सुरेंद्र सिंह ने उस की जमानत कराई थी. तब वह जेल से बाहर आया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को रविंद्र पर शक हुआ. उस का जो मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था, वह स्विच्ड औफ था. पुलिस टीम रविंद्र को सरगर्मी से तलाशने लगी. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने 16 जुलाई, 2015 को उसे थाना क्षेत्र के ही सुखवीरनगर बस स्टौप से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब रविंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने निशा की हत्या का जुर्म तो स्वीकार कर ही लिया, इस के अलावा उस ने ऐसा खुलासा किया कि पुलिस हैरान रह गई.

उस ने बताया कि वह निशा की तरह तकरीबन 40 बच्चों की हत्या कर चुका है. पुलिस तो केवल मर्डर के एक केस को खोलने के लिए रविंद्र को तलाश रही थी, लेकिन वह इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, पता नहीं था. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उन्होंने उसी समय डीसीपी विक्रमजीत को यह जानकारी दी तो आधे घंटे के अंदर वह भी बेगमपुर थाने पहुंच गए.

एक लाश और ड्राइविंग लाइसेंस ने ऐसे गुनाह से परदा उठा दिया था, जिसे सुन कर इंसानियत भी शर्मशार हो जाए. उस ने डीसीपी के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली बच्चों की हत्या की जो कहानी बताई, वह नोएडा के निठारी कांड से कम नहीं थी. रविंद्र ने बताया कि वह बच्चों की हत्या करने के बाद ही उन से कुकर्म करता था. उस के खुलासे पर डीसीपी भी चौंके. 24 साल के रविंद्र ने एक के बाद एक कर के करीब 40 बच्चों की हत्या करने और सैक्स एडिक्ट बनने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोरने वाली थी.

रविंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा गंज डुंडवारा के रहने वाले ब्रह्मानंद का बेटा था. रविंद्र के अलावा उस के 3 और बेटे थे. ब्रह्मानंद प्लंबर का काम करता था, इसलिए उस की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ा सकता. लिहाजा जब उस के 2 बेटे बड़े हुए तो वह उन से भी मजदूरी कराने लगा. बेटे कमाने लगे तो उस के घर की माली हालत सुधरने लगी. उसी दौरान सन 1990 में गंज डुंडवारा में दंगा भड़क गया तो ब्रह्मानंद अपनी पत्नी मंजू और बच्चों को ले कर दिल्ली आ गया.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव में उस की जानपहचान के तमाम लोग रहते थे. लिहाजा वह भी उन के साथ कराला में रहने लगा. उस समय मंजू गर्भवती थी. कुछ दिनों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रविंद्र रखा. घर में सब से छोटा होने की वजह से वह सब का प्यारा था. ब्रह्मानंद्र अपने बाकी बच्चों को तो पढ़ा नहीं सका था, लेकिन वह रविंद्र को पढ़ाना चाहता था. जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो उस ने उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. लेकिन मोहल्ले के बच्चों की संगत में पड़ कर वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. वह नशा करने वाले बच्चों की संगत में पड़ गया, जिस से वह भी चरस, गांजा आदि पीने लगा. घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने उसे डांटा भी, लेकिन वह नहीं माना.

रविंद्र नहीं पढ़ा तो ब्रह्मानंद उसे अपने साथ काम पर ले जाने लगा. लेकिन उस की आदत तो दोस्तों के साथ घूमने की थी. पिता के साथ मेहनत का काम भला वह क्यों करता. इसलिए वह पिता के साथ भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका. उसे जब खर्च के लिए पैसों की जरूरत होती, वह अपनी जानपहचान वाले ड्राइवर सन्नी के साथ हेल्परी करने चला जाता. सन्नी उसी के पड़ोस में रहता था और वह ट्रेलर चलाता था. उस का ट्रेलर मुंडका मैट्रो स्टेशन के निर्माण के कार्य में लगा हुआ था. रविंद्र वहां से जो भी कमाता, अपने नशा के शौक पर उड़ा देता था.

सन 2008 की बात है. उस समय रविंद्र करीब 17 साल का था. एक बार वह आधी रात को दोस्तों से फारिग हो कर अपने घर लौट रहा था. उस ने कराला में एक झुग्गी के बाहर मांबाप के साथ सो रही बच्ची को देखा. उस बच्ची की उम्र कोई 6 साल थी. उस बच्ची को देख कर रविंद्र की कामवासना जाग उठी. वह चुपके से गहरी नींद में सो रही उस बच्ची को उठा ले गया. बच्ची के मांबाप को पता ही नहीं चला कि उन की बेटी उन के पास से गायब हो चुकी है. रविंद्र उस बच्ची को सूखी नहर की तरफ ले गया. जैसे ही उस ने उस बच्ची को जमीन पर लिटाया वह जाग गई.

खुद को सुनसान और अंधेरे में देख कर वह डर गई. वहां उस के मांबाप की जगह एक अनजान आदमी था. वह रोने लगी तो रविंद्र ने डराधमका कर उसे चुप करा दिया. उस के बाद उस ने उस के साथ कुकर्म किया. बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी तो उस ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में वह बेहोश हो गई. भेद खुलने के डर से उस ने बच्ची की  गला दबा कर हत्या कर दी और अपने घर चला गया. अगली सुबह झुग्गी के बाहर सो रहे दंपति को जब अपनी बेटी गायब मिली तो वह उसे खोजने लगे. उसी दौरान उन्हें सूखी नहर में बेटी की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे. इस मामले की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस केस को नहीं खोल सकी.

केस न खुलने से रविंद्र की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सन 2009 में बाहरी दिल्ली के ही विजय विहार, रोहिणी इलाके से 6-7 साल के एक लड़के को बहलाफुसला कर वह सुनसान जगह पर ले गया और कुकर्म करने के बाद उस की हत्या कर दी. इस मामले को भी पुलिस नहीं खोल सकी. रविंद्र को अपनी कामवासना शांत करने का यह तरीका अच्छा लगा. क्योंकि वह 2 हत्याएं कर चुका था और दोनों ही मामलों में वह सुरक्षित रहा, इस से उस के मन का डर निकल गया. इस के बाद वह कंझावला इलाके में एक बच्ची को बहलाफुसला कर सुनसान जगह पर ले गया और उस के साथ कुकर्म कर के उस की हत्या कर दी.

वह कोई एक काम जम कर नहीं करता था. कभी गाड़ी पर हेल्परी का काम करता तो कभी बेलदारी करने लगता. नोएडा के सेक्टर-72 में वह एक बिल्डिंग में काम कर रहा था. वहां भी उस ने अपने साथ काम करने वाली महिला बेलदारों की 2 बच्चियों को अलगअलग समय पर अपनी हवस का शिकार बनाया. वह उन बच्चियों को चौकलेट दिलाने के लालच में गेहूं के खेत में गया. वहीं पर उस ने उन की गला दबा कर हत्या कर दी थी.

उस के पिता ब्रह्मानंद का दिल्ली आने के बाद अपने गांव जाना नहीं हो पाता था, लेकिन रविंद्र कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. खानदान के और लोग भी दिल्ली और नोएडा चले आए थे. रविंद्र जब भी गांव जाता, गंज डुंडवारा के पास गांव नूरपुर में अपनी मौसी मुन्नी देवी के यहां ठहरता था. वहीं पास के ही बिरारपुर गांव में उस की बुआ कृपा देवी का घर था. कभीकभी वह उन के यहां भी चला जाता था. उस की हैवानियत वहां भी जाग उठी तो उस ने वहां भी अलगअलग समय पर 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया.

अब तक रविंद्र सैक्स एडिक्ट हो चुका था. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह अपने शिकार को तलाशता रहता. बच्चे उस का शिकार आसानी से बन जाते थे, इसलिए वे उस का सौफ्ट टारगेट बन जाते थे. ज्यादातर वह झुग्गीझोपडि़यों या गरीब परिवारों के बच्चों को ही निशाना बनाता था, ताकि वे लोग ज्यादा कानूनी काररवाई न कर सकें. इस तरह उस ने दिल्ली के निहाल विहार, मुंडका, कंझावला, बादली, शालीमार बाग, नरेला, विजय विहार, अलीपुर हरियाणा के बहादुरगढ़, फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के सिकंदराऊ, अलीगढ़ आदि जगहों पर 6 से 9 साल के करीब 40 लड़केलड़कियों को अपना निशाना बनाया. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह कुकर्म के बाद हर बच्चे की हत्या कर देता था. ज्यादातर के साथ उस ने मारने के बाद कुकर्म किया था.

उस ने कई बच्चों की लाशें ऐसी जगहों पर डाली थी कि पुलिस भी उन्हें बरामद नहीं कर सकी. 4 जून, 2014 को उस ने अपने दोस्त राहुल के साथ अपनी ही बस्ती जैननगर के कृष्ण कुमार के 6 साल के बेटे शिबू को सोते हुए उठा लिया. दोनों उसे आधा किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर ले गए और उस के साथ कुकर्म किया. राहुल नाई था. वह अपने साथ उस्तरा भी ले गया था. बाद में उस ने उसी उस्तरे से उस का गला काट कर लाश सूखी गटर में डाल दिया था. बच्चे को गटर में डालते हुए उन्हें किसी ने देख लिया था. उन दोनों ने तो यही समझा था कि शिबू मर चुका है, लेकिन वह जीवित था. अगले दिन जब खोजबीन हुई तो वह सूखी गटर में पड़ा मिला.

जिस शख्स ने रविंद्र और राहुल को देखा था, उसी ने अगले दिन पुलिस को सब बता दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने रविंद्र और राहुल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. रविंद्र जिस सन्नी के साथ ट्रेलर पर हैल्परी करता था, उसी सन्नी के रविंद्र की मां मंजू से अवैधसंबंध थे. बेटे के जेल जाने के बाद मंजू परेशान हो गई. वह बेटे की जमानत की कोशिश में लग गई. कहसुन कर उस ने सन्नी के पिता सुरेंद्र से बेटे की जमानत करवा ली. लिहाजा 20 मई, 2015 को रविंद्र जेल से बाहर आ गया.

बात 13 जुलाई, 2015 की है. मंजू अपने घर में अकेली थी. उस ने फोन कर के अपने प्रेमी सन्नी को घर पर बुला लिया. दोनों अपनी हसरतें पूरी करते, अचानक रविंद्र घर आ गया था. सन्नी उस समय मंजू से बातें कर रहा. इसलिए रविंद्र को उस पर कोई शक वगैरह नहीं हुआ. रविंद्र के आने के बाद मंजू और सन्नी की योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही थी. बेटे को बाहर भेजने के लिए मंजू ने घर में पड़ा टेप रिकौर्डर रविंद्र को देते हुए कहा कि वह उसे ठीक करा लाए. मां के कहने पर रविंद्र टेप रिकौर्डर ठीक कराने चला गया.

बेटे के जाते ही मंजू और सन्नी अपनी हसरतें पूरी करने लगे, लेकिन मैकेनिक की दुकान बंद होने की वजह से रविंद्र जल्द ही वापस लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा नहीं खुला, फिर वह गली में जा कर खड़ा हो गया. उधर दरवाजा खटखटाने पर मंजू और सन्नी की कामलीला में व्यवधान पड़ गया. फटाफट दोनों ने कपड़े पहने और सन्नी दरवाजा खोल कर चला गया. सन्नी रविंद्र को नहीं देख सका. अपने घर से सन्नी को निकलता देख रविंद्र का माथा घूम गया. वह समझ गया कि उस की मां के साथ सन्नी का जरूर कोई चक्कर चल रहा है.

उस ने उसी समय तय कर लिया कि वह सन्नी को सबक सिखा कर रहेगा. उस ने यह बात अपने भाई सुनील को बताई तो सुनील का भी सन्नी के प्रति खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने सन्नी के खिलाफ योजना बना ली. इस योजना में रविंद्र ने अपने दोस्त हिमांशु को भी शामिल कर लिया. उसी दिन शाम को रविंद्र ने सन्नी से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह इस समय मुंडका में है. योजना को अंजाम देने के लिए रविंद्र, हिमांशु और सुनील को ले कर मुंडका पहुंच गया. सन्नी उन्हें वहीं मिल गया. सन्नी के साथ उन्होंने एक जगह बैठ कर शराब पी. सन्नी पर जब थोड़ा नशा चढ़ गया तो उसी दौरान तीनों ने सन्नी की जम कर पिटाई की और रविंद्र ने उस की जेब से उस का मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य कागजात निकाल लिए.

रविंद्र ने सन्नी को जिंदा जलाने के लिए उसी की मोटरसाइकिल से पेट्रौल निकाल कर उसी के ऊपर छिड़क दिया. लेकिन सुनील ने उसे आग लगाने से रोक दिया. सुनील यह कहते हुए भाई को समझा दिया कि अभी इस के लिए इतनी ही सजा काफी है. अगर यह अब भी नहीं मानेगा तो इसे दुनिया से ही मिटा देंगे. उसी वक्त मौका मिलते ही सन्नी वहां से खेतों की तरफ भाग गया. सन्नी की बाइक ले कर रविंद्र, सुनील और हिमांशु अपने घर चले गए.

सन्नी रात भर खेतों में ही रहा. डर की वजह से वह घर तक नहीं गया. सुबह होने पर वह अपने घर गया और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी. तब पुलिस ने सन्नी को रोहिणी के डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया और रविंद्र, सुनील व हिमांशु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. 14 जु़लाई को सुबह 6 बजे के करीब रविंद्र नित्य क्रिया के लिए घर से निकला, तभी उस ने रास्ते में संतोष की 6 साल की बेटी निशा को अकेली जाते हुए देखा. वह भी नित्य क्रिया के लिए जा रही थी. उसे अकेली देख कर उस का शैतानी दिमाग जाग उठा. उस ने उस बच्ची को 10 रुपए दिए और किसी बहाने से उसे वहां से 50 मीटर की दूरी पर स्थित निर्माणाधीन इमारत में ले गया.

वह इमारत खाली पड़ी थी. नादान बच्ची उस के इरादों को नहीं समझ पाई. उस ने अन्य बच्चों की तरह निशा के साथ भी कुकर्म कर के उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. शातिर दिमाग रविंद्र ने इस बच्ची के मामले में सन्नी को फंसाने के लिए सन्नी का ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर डाल दिए, ताकि पुलिस सन्नी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दे. रविंद्र ने सन्नी को फंसाने का जाल तो अच्छी तरह बिछाया था, पर अपने जाल में वह खुद फंस जाएगा, ऐसा उस ने नहीं सोचा था. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

रविंद्र से पूछताछ के बाद डीसीपी भी हैरान रह गए कि यह एक के बाद एक 40 वारदातें करता गया और पुलिस को पता तक नहीं चला. अगर यह क्रूर हत्यारा अब भी नहीं पकड़ा जाता तो न मालूम कितने और बच्चों को अपना निशाना बनाता. बहरहाल, पुलिस ने 17 जुलाई को रविंद्र को रोहिणी जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव के समक्ष पेश किया. रविंद्र ने पुलिस को बताया था कि वह लगभग 40 बच्चों को अपना शिकार बना कर उन की हत्या कर चुका है. ये सारी वारदातें उस ने दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी की थीं.

घटनास्थल का सत्यापन और केस से संबंधित सबूत जुटाने के लिए उस से और ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए पुलिस ने कोर्ट से उस का 7 दिनों का रिमांड मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. रिमांड मिलने के बाद पुलिस रविंद्र को उन जगहों पर ले गई, जहांजहां उस ने वारदातों को अंजाम दिया था. रविंद्र ने पुलिस को अलगअलग जगहों पर ले जा कर 27 केसों की पुष्टि करा दी. बाकी केसों के बारे में उसे खुद को ध्यान नहीं रहा कि उस ने कहां वारदात की थी. जिन जगहों पर वारदात कराने की उस ने पुष्टि कराई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के थाने में संपर्क किया तो पता चला कि उन में से केवल 15 केसों की ही अलगअलग थानों में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.

पुलिस किसी और बच्चे की लाश बरामद नहीं कर पाई. इस की वजह यह थी कि उसे वारदात को अंजाम दिए काफी दिन बीत चुके थे, जिस से अनुमान यही लगाया गया कि बच्चों की लाशें जंगली जानवरों द्वारा या अन्य वजह से नष्ट हो गईं. जैसेजैसे सीरियल किलर रविंद्र की क्रूरता के खुलासे लोगों को पता लगते गए, उन का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के जिन गायब हुए बच्चों का कोई सुराग नहीं लग रहा था, उन के मांबाप भी यही सोचने लगे कि कहीं उन का बच्चा भी रविंद्र का शिकार तो नहीं हो गया. वे भी थाना बेगमपुर पहुंचने लगे.

रिमांड अवधि खत्म होने से पहले पुलिस ने 23 जुलाई, 2015 को जब रविंद्र को फिर से न्यायालय में पेश किया गया तो उसे देखने के लिए कोर्ट में और कोर्ट से बाहर तमाम लोग जमा हो गए. वे सभी गुस्से से भरे थे. वे उसे जनता के सुपुर्द करने की मांग करने लगे, ताकि उस क्रूर हत्यारे को अपने हाथों से सजा दे सकें. भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उसे कोर्ट में पेश किया गया.  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने रविंद्र को जेल भेजने के आदेश दिए. पुलिस जब उसे कोर्ट से बाहर ले जा रही थी, तभी वकीलों ने रविंद्र पर हमला कर उस की पिटाई शुरू कर दी. बड़ी मशक्कत से पुलिस ने उसे बचाया. इस के बाद बार एसोसिएशन के सचिन ने ऐलान कर दिया कि कोई भी वकील वहशी दरिंदे का मुकदमा नहीं लड़ेगा.

कथा संकलन तक रविंद्र जेल में बंद था. रविंद्र के घर वालों ने भी कह दिया कि वह उस की जमानत की पैरवी नहीं करेंगे. बहरहाल रविंद्र को जानने वाले सभी लोग उस के कारनामे से आश्चर्यचकित हैं. सीधासादा दिखने वाला रविंद्र इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, ऐसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जांच अधिकारी इंसपेक्टर जगमंदर दहिया उस के केसों से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इस सीरियल किलर को उस के गुनाहों की उसे सजा मिल सके. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: खून सने इश्क की टेढीं राहें

Hindi Stories: तेजिंदर और हिम्मत सिंह को पतिपत्नी के रूप में देख कर एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी मैं चकरा गया, इस की वजह यह थी कि उस ने हिम्मत और उस के जीजा को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में मैं ने 50 हजार से भी अधिक क्रिमिनल मुकदमे लड़े हैं. इन में कुछ ऐसे भी मुकदमे थे, जिन की चर्चा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी.

आज मैं जिस मुकदमे की बात करने जा रहा हूं, उस तरह का रोचक और अनूठा मुकदमा मेरे पास दोबारा नहीं आया. अपनी तरह का वह एक ऐसा अनोखा मुकदमा था, जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया. वह इतवार का दिन था. 6 दिनों के काम की थकान उतारने को मैं बिस्तर पर अधलेटा चाय की चुस्कियां लेते हुए टीवी देख रहा था. उस समय दिन के साढ़े 11 बज रहे थे. घर के किसी सदस्य ने आ कर बताया कि मुझ से मिलने के लिए हिम्मत सिंह नाम का कोई आदमी कोठी के गेट पर खड़ा है. हिम्मत एक कत्ल के मुकदमे में फंसा था, जिस की पैरवी मैं ने की थी. उस मुकदमे में वह बरी हो गया था. मुझे तुरंत वह सब याद आ गया. लगा, शुक्रिया अदा करने आया होगा. मैं ने उसे भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कह दिया.

कुछ देर बाद मैं सहज रूप से ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला था. मेरे ठीक सामने वाले सोफे पर तेजिंदर शादी के लाल सुर्ख जोड़े में बैठी थी और उस की बगल में हिम्मत सिंह बैठा था. वह भी खूब बनठन कर आया था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों ने शादी कर ली है. हिम्मत सिंह के हाथ में बड़ा सा मिठाई का डिब्बा था. उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उस के साथ बैठी औरत उस की पत्नी है. इस का मतलब तेजिंदर ने उस से शादी कर ली थी.

मेरे लिए यह अविश्वसनीय एवं विचित्र बात थी. मैं असमंजस में फंस गया था. इसलिए बिना किसी संबोधन के मैं ने सीधे पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’

हिम्मत सिंह के बजाय जवाब तेजिंदर ने दिया, ‘‘जी हां वकील साहब, कल हम ने शादी कर ली. आज आप से आशीर्वाद लेने आए हैं. आप बहुत ही नेक इंसान हैं. आप हम दोनों को हमेशा सुखी रहने का आशीर्वाद दीजिए. मेरी जीत में आप का बहुत बड़ा योगदान है.’’

‘‘सचमुच तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ मैं ने हिम्मत सिंह की ओर देखते हुए वही सवाल इस तरह दोबारा किया, जैसे तेजिंदर की बात पर मुझे विश्वास न हुआ हो.

तेजिंदर मेरी बात का आशय शायद समझ गई, इसलिए फटाक से बोली, ‘‘जी वकील साहब, मैं ने हिम्मत से सचमुच शादी कर ली है.’’

मुझ से रहा नहीं गया. आशीर्वाद की बात भूल कर मैं ने हिम्मत से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम ने उसी से शादी कर ली, जिस ने तुम्हें फांसी पर चढ़वाने का पूरा इंतजाम कर दिया था? यह सब क्या रहस्य है, मेरी कुछ समझ में नहीं आया?’’

‘‘इस के बारे में तो मैं यही कह सकता हूं वकील साहब कि औरत को समझ पाना दुनिया में किसी के वश का नहीं है. तेजिंदर ने न केवल मुझे फांसी के फंदे से बचाया, बल्कि अपने प्यार के फर्ज को निभाते हुए मेरा उजड़ा हुआ घर भी बसा दिया.’’ हिम्मत ने तेजिंदर की ओर देखते हुए कहा. हिम्मत की यह बात मुझे और ज्यादा हैरान करने वाली लगी. इतने दिनों से वकालत के पेशे में रहने के बावजूद मैं उस की बातों का एकदम से कोई मतलब नहीं निकाल सका. फिलहाल मैं ने दोनों को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया. उन के जाने के बाद मैं उन के बारे में गहराई से सोचने लगा.

लुधियाना की तहसील खन्ना में अपने पति बलवान सिंह के साथ रहती थी तेजिंदर कौर. जब वह मेरे पास आई थी तो उस पर 2 साथियों के साथ मिल कर अपने पति का कत्ल करने का आरोप था. उस समय उस ने मुझे जो बताया था, वह सब कुछ इस तरह था. तेजिंदर का पति बलवान सिंह खन्ना के किसी सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह सीधासादा आदमी था. तेजिंदर को पत्नी के रूप में पा कर वह जितना खुश था, उसी तरह उसे भी खुश रखने की कोशिश करता था. पत्नी की एकएक बात का खयाल रखता था. रात में भी वह उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करता.

इतना सब करने के बावजूद भी बलवान के खजाने में शायद किसी रत्न की कमी थी. भले ही वह पत्नी को हर सुख देने की कोशिश करता था, लेकिन तेजिंदर औरत थी. उसे जरूरत थी उस परमसुख की, जिस की चाह में औरतें किसी पर भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. अफसोस की बात यह थी कि वह अनमोल सुख उसे बलावान सिंह से नहीं मिल पा रहा था. यही वजह थी कि इतना प्यार करने के बावजूद बलवान सिंह पत्नी का मन जीत लेना तो दूर, दिन पर दिन वह उस की उपेक्षा एवं नफरत का शिकार होता गया.

फिर एक समय ऐसा भी आ गया, जब तेजिंदर को बलवान से हद से ज्यादा नफरत हो गई. वह हर रात उसे नई उमंग एवं नए उत्साह से अपनी बांहों में समेटता और भरपूर प्यार करने की कोशिश करता, लेकिन अंत में तेजिंदर तड़पती और छटपटाती रह जाती. वह खर्राटे भरने लगता. ऐसे में तेजिंदर की उस के प्रति नफरत बढ़ती ही गई. वह उसे छोड़ कर कहीं और जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी. उन्हीं दिनों उन के बीच एक तीसरा आदमी आ टपका, जो बलवान सिंह का दोस्त हिम्मत सिंह था. कुछ दिनों पहले उस की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी. इसी के बाद उस ने कहीं भी आनाजाना बंद कर दिया था.

एक दिन बलवान जबरदस्ती उसे अपने घर ले आया और उस का दुख कम करने की कोशिश करने लगा. इस कोशिश में उस ने तेजिंदर को भी शामिल कर लिया था. तेजिंदर लगातर उस के साथ रहती थी. उन की बातों से हिम्मत को काफी हौसला और हिम्मत आई. वह सोचने लगा कि अब वह पिछले गम को भुला कर सहज जिंदगी जिएगा. इस के बाद हिम्मत सिंह अकसर बलवान के घर जाने लगा. कभी ऐसा भी मौका आता, जब बलवान सिंह घर पर नहीं होता. ऐसे में अपना फर्ज निभाते हुए तेजिंदर उस की खूब आवभगत करती और पत्नी की मौत का गम भुलाने वाली बातें करती.

ऐसे में ही एक दिन जब हिम्मत उस के यहां आया तो कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद हिम्मत ने तेजिंदर का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जब से रानो वाहेगुरु को प्यारी हुई है भाभी, मेरा इस दुनिया से जी भर गया था. सुबह उठ कर ऊपर वाले से यही दुआ करता था कि रानो की तरह मुझे भी अपने पास बुला ले. लेकिन अब तुम्हारी यह मनमोहिनी सूरत मेरे मन में ऐसी बस गई है कि मैं इस सूरत का गुलाम बन कर रह गया हूं. सच कहूं भाभी, तुम से ज्यादा खूबसूरत औरत इस दुनिया में दूसरी कोई नहीं हो सकती.’’

तेजिंदर को किसी पराए मर्द से इस तरह अपनी तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, लेकिन इस मामले में समझ से काम लेना जरूरी था. जरा सी भूल उस की जिंदगी तबाह कर सकती थी. इस के बावजूद हिम्मत के मुंह से अपनी तारीफें सुनसुन कर वह उस की ओर खिंचने लगी. उस का मन करता कि वह हमेशा उस के पास बैठा उस की खूबसूरती की तारीफें करता रहे. दूसरी ओर हिम्मत जब तेजिंदर की तारीफें करता, उस वक्त उस की आंखों में एक निमंत्रण दिखाई देता था. तेजिंदर को यही लगता था कि अगर उस ने हिम्मत कर के हिम्मत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया तो निश्चित ही वह उस की हर इच्छा पूरी कर देगा.

फिर एक दिन ऐसा हो भी गया. उस रात हिम्मत और बलवान ने घर पर महफिल जमा रखी थी. खातेपीते आधी रात हो गई तो बलवान ने हिम्मत को वहीं सो जाने को कहा. उसे बैडरूम में सुला कर बलवान पत्नी को साथ ले कर छत पर सोने चला गया. अप्रैल का महीना था, ठंडीठंडी हवा चल रही थी. जरा ही देर में बलवान और तेजिंदर गहरी नींद सो गए. रात को तेजिंदर को लगा, उसे कोई उठाने की कोशिश कर रहा है. जैसे ही उस की आंखें खुलीं, उठाने वाले ने फटाक से उस का मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया. उस के बाद कान में धीरे से बोला, ‘‘भाभी, आज अपना प्यार दे दो या फिर जहर दे कर मुझे मेरी रानो के पास भेज दो.’’

तेजिंदर ने आवाज पहचान ली थी. लेटेलेटे उस ने तिरछी नजरों से बलवान को देखा. वह गहरी नींद सो रहा था. उस ने मुंह पर रखा हिम्मत कर हाथ हटा कर प्यार से कहा, ‘‘तुम नीचे चल कर अपने बिस्तर पर लेटो, मैं वहीं आ कर तुम से बात करती हूं.’’

हिम्मत चला लेकिन उस ने तेजिंदर के जिस्म को जैसे झकझोर कर रख दिया था. इस के बाद बिना आगेपीछे की सोचे वह हिम्मत के पीछेपीछे आ कर उस के बगल लेट गई. इस के बाद हिम्मत ने रानो की कमी तेजिंदर से पूरी कर ली. दूसरी ओर तेजिंदर को हिम्मत से जो सुख मिला, उस ने जीवन के प्रति उस का नजरिया ही बदल दिया. शादी के बाद उस ने पहली बार महसूस किया था कि जिंदगी इस तरह भी रंगीन हुआ करती है. अपनी इस नई सोच के साथ वह छत पर पहुंची तो बलवान सिंह पहले की ही तरह गहरी नींद में सो रहा था. एक बार झिझक मिटी तो सिलसिला शुरू हो गया. हिम्मत और तेजिंदर को जब भी मौका मिला, दोनों ने उस का फायदा उठा लिया.

कहते हैं, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. बलवान सिंह को भी किसी तरह पत्नी और हिम्मत के संबंधों की भनक लग गई. पहले तो उस ने समाज की ऊंचनीच बता कर तेजिंदर को समझाया. कोई असर न होते देख उस ने तेजिंदर पर सख्ती करनी शुरू कर दी. लेकिन बलवान की ऐसी किसी भी कोशिश का तेजिंदर पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि अब तक वह हिम्मत के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. वह पति के सामने ही हिम्मत के साथ के अपने संबंधों को स्वीकार करने लगी थी. इस स्थिति में कोई भी होता, आपा खो बैठता. बलवान भी अब और सख्त हो गया और भूत की तरह पत्नी के आगेपीछे घूमने लगा.

तेजिंदर के लिए यह बरदाश्त के बाहर की बात हो गई थी. आखिर एक दिन उस ने इस बारे में हिम्मत से बात की तो हिम्मत ने कहा, ‘‘पागल है साला, सारी सच्चाई जानता है, फिर भी अपना मुंह काला करवाने पर तुला है. मैं तो कहता हूं कि तुम अपने हिसाब से रहो. अगर ज्यादा चूंचपड़ करे तो झिड़क दिया करो.’’

‘‘हां, यह भी ठीक है. अब ऐसा ही करूंगी.’’ तेजिंदर ने कहा.

दूसरी ओर बलवान सिंह ने दूसरा ही इरादा बना रखा था. उस ने पत्नी को सही राह पर लाने के लिए और अधिक सख्ती शुरू कर दी. एकाध बार उस ने उस की पिटाई भी कर दी.

इस से तेजिंदर को उस से और ज्यादा नफरत हो गई. अगली मुलाकात में उस ने हिम्मत से साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘अगर तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी बना कर रखना चाहते हो तो इस आदमी को हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से निकाल दो.’’

‘‘उस से तलाक दिलवा दूं?’’ हिम्मत ने मन की बात जानने के लिए हंस कर पूछा.

‘‘मेरी बातों को हंसी से मत टालो. मैं पूरी तरह से गंभीर हूं. वह इस जनम में मुझे तलाक दे नहीं सकता. मेरी मानो तो उसे इस दुनिया से ही विदा कर दो. इस में मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘अरे तुम ने तो बहुत दूर तक सोच लिया. उसे मरवा कर खुद भी जेल जाओगी और मुझे भी भिजवाओगी.’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर इस का कुछ नहीं किया गया तो वह निश्चित मुझे मार डालेगा. वह पागल होता जा रहा है. उस के अंदर का जानवर जाग उठा है.’’ कह कर तेजिंदर फूटफूट कर रोने लगी.

हिम्मत को उस के रोने के पीछे कोई बनावट नजर नहीं आई. उस के रोने में भय और मजबूरी साफ झलक रही थी. इसलिए उस की आंखों में खून उतर आया. वह तैश में आ कर बोला, ‘‘वह ऐसावैसा कुछ करे, उस के पहले ही मैं उस का टेंटुआ दबा दूंगा. तू चिंता मत कर, मैं आज ही गांव से अपने जीजा कुलवंत को बुलाए लेता हूं. इस के बाद हम दोनों बलवान की सारी पहलवानी निकाल देंगे. बस आज रात 9 बजे तुम किसी बहाने उसे रेलवे लाइन पर ले जाना.’’

‘‘ठीक है,’’ तेजिंदर ने खुश हो कर कहा, ‘‘ऐसा ही करूंगी. बस तुम तैयार रहना. और हां, तुम्हें यह काम बड़ी होशियारी से करना होगा. यह कांटा निकल गया तो जिंदगी भर मैं तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूंगी.’’

इतना कह कर तेजिंदर ने हिम्मत का हाथ पकड़ लिया तो उस का हाथ अपने सीने पर रख कर हिम्मत ने कहा, ‘‘तुम अपने इस यार पर भरोसा रखो, यारी की है तो मरते दम तक निभाऊंगा भी.’’

यह 11 मई, 1979 की बात थी. घर पहुंच कर आगे की योजना और स्थितियों से निबटने के लिए तेजिंदर विचार करने लगी. इस के बाद सजधज कर बलवान सिंह का इंतजार करने लगी. शाम को ठीक साढ़े 5 बजे बलवान सिंह घर लौटा तो पत्नी को इस तरह सजीधजी देख कर उसे हैरानी हुई. इस से भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि आते ही उस की आवभगत में लग गई. उसे चाय दे कर उस से बड़े प्यार से बातें भी करने लगी.

बलवान उस में आए इस बदलाव के बारे में कुछ पूछता, उस ने खुद ही कहा, ‘‘मेरा बदला हुआ रूप देख कर तुम्हें हैरानी हो रही होगी न? दरअसल आज एक साधु बाबा आए थे. मुझे दुखी देख कर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा अपने पति से झगड़ा रहता है न?’

‘‘यह बात उस ने कही या तुम ने खुद ही उस की बातों में आ कर कही?’’

‘‘भला मैं क्यों कहने लगी. फिर हमारा झगड़ा ही कहां है, मैं तो तुम्हारे दोस्त पर तरस खा कर उस से थोड़ा हंसबोल लेती थी, बस इतनी सी बात पर तुम मेरे चरित्र पर लांछन लगा कर मुझे परेशान करने लगे. जान से मारने की धमकियां देने लगे.’’

‘‘देखो तेजिंदर अब तुम बिना मतलब…’’

‘‘आप फिर बनाबनाया मूड खराब करने लगे. आज साधु बाबा जो कुछ मुझ से कह गए हैं, उस से हमारे बीच का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. बाबा ने कहा कि मैं हमेशा तुम्हारा सहयोग करूं, हमेशा तुम्हारी आवभगत करूं. उन्होंने कहा है कि अब हमारा बुरा वक्त टल गया है, जल्दी ही मुझे सारी खुशियां मिल जाएंगीं. अब आप रोजाना मेरा ऐसा ही रूप देखेंगे.’’

तेजिंदर ने ये बातें कुछ इस तरह कहीं कि बलवान को ताज्जुब होने के बावजूद उस का प्यार करने का यह अंदाज बहुत अच्छा लगा. वह खुशी से झूम उठा. तेजिंदर कौन सा षडयंत्र रच रही है, इस बात का उसे जरा भी अंदाजा नहीं हो सका. शाम को दोनों मुख्य बाजार की ओर घूमने भी गए.  खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे फिर से टहलने निकले. घर से थोड़ी दूर जाने पर तेजिंदर ने बलवान का हाथ पकड़ लिया और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ी. उस की प्यारीप्यारी बातों में खोया बलवान यंत्रचालित सा उस के साथ आगे बढ़ता गया. उस समय चारों ओर गहन अंधेरा छाया था. बलवान घर लौटना चाहता था, लेकिन तेजिंदर ने चालाकी से उसे प्यार भरी बातों में उलझाए रखा. तभी उन्हें गुरु सिंह मिल गया.

वह पंजाब पुलिस में सिपाही था और उसी मकान में किराए पर रहता था, जिस में बलवान सिंह रहता था. उतनी रात को सुनसान जगह में उन्हें घूमते देख कर उस ने पूछा, ‘‘इतनी रात को आप लोग रेलवे लाइन की ओर क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, ऐसे ही तेजिंदर का मन हो आया, इसलिए इधर चला आया. और क्या हालचाल है, ड्यूटी कर के आ रहे हो क्या?’’ बलवान ने पूछा.

लेकिन उस की बात का उत्तर दिए बगैर मुसकराता हुआ गुरु सिंह आगे बढ़ गया. तेजिंदर और बलवान बातें करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ गए. उस समय दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले रेलवे लाइन के बीचोबीच चल रहे थे. तेजिंदर ने देखा कि हिम्मत सिंह अपने जीजा कुलवंत के साथ रेलवे लाइन के दाईं ओर कच्चे रास्ते से चला आ रहा है. बलवान की नजर हिम्मत और कुलवंत पर पड़ती, उस के पहले ही वे उस के सामने आ कर खड़े हो गए. उन्हें देखते ही उस ने उन के इरादे भांप लिए. उसे तेजिंदर पर भी संदेह हो गया, इसलिए झटके से हाथ छुड़ा कर वह रतनहेड़ी गांव की ओर भागा.

लेकिन हिम्मत ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस के बाएं पैर पर गड़ासे से वार कर दिया. इस के बावजूद बलवान रेलवे लाइन पार करने में कामयाब हो गया. वह लंगड़ाता हुआ भागने लगा. वह भाग पाता, कुलवंत ने दौड़ कर उस के पेट में तलवार घुसेड़ दी. खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वह जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. इस के बाद हिम्मत ने गंडासे से उस पर 4-5 वार कर दिए तो थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए हिम्मत और कुलवंत ने बलवान की लाश को उठा कर रेलवे लाइन के बीचोबीच रख दिया. उन का सोचना था कि रात में ट्रेन गुजरेगी तो उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे. तब लोग यही समझेंगे कि उस ने ट्रेन के नीचे आ कर आत्महत्या कर ली है.

तीनों वहां से लौट रहे थे तो मुख्य सड़क पर बलवान सिंह का ममेरा भाई नेगा सिंह मिल गया. उतनी रात को तेजिंदर को 2 गैरमर्दों के साथ घूमने के बारे में उस ने पूछा तो तेजिंदर ने उसे इस तरह झिड़क दिया कि वह अपना सा मुंह ले कर चला गया. इस के बाद हिम्मत और कुलवंत सलौदी की ओर चले गए तो तेजिंदर अपने घर आ गई. अगले दिन यानी 12 मई, 1979 की सुबह खन्नानगर में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि बलवान सिंह रेलगाड़ी के नीचे कट कर मर गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई दुर्घटना कह रहा था तो कोई आत्महत्या मान रहा था. घटनास्थल पर भीड़ लग गई थी.

किसी ने बलवान सिंह की मौत के बारे में तेजिंदर को बताया तो रोतीबिलखती वह लाश के पास पहुंची. उस के वहां पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर एक सबइंसपेक्टर और 3 सिपाही आ चुके थे. आते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले कर अपनी कानूनी काररवाई शुरू कर दी थी. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर के तमाम जानकारी भी जुटा ली थी. इसलिए तेजिंदर जब लाश से लिपट कर रोने का नाटक करने लगी तो वहां मौजूद सबइंसपेक्टर ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि रात में तेजिंदर को मिले सिपाही गुरु सिंह ने पहले ही सब बता दिया था.

इसलिए सबइंसपेक्टर को उसी पर शक था. वह उसे थाने ले जाना चाहते थे. उसे थाने ले जाने के लिए उन्होंने बहाना बनाया कि उन्हें उस से कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने हैं, जिस से बलवान के बाद उसे सरकारी नौकरी आसानी से मिल सके. तेजिंदर कभी थाने तो गई नहीं थी. उसे यह भी मालूम नहीं था कि थाने में पुलिस अपराधियों से किस तरह से पेश आती है? इसलिए पुलिस के रौद्ररूप के आगे वह ज्यादा देर टिक नहीं सकी और बलवान की हत्या का अपना अपराध उस ने स्वीकार कर के हिम्मत और कुलवंत के बारे में भी बता दिया.

हिम्मत को अपनी गिरफ्तारी की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सबइंसपेक्टर ने कुलवंत और हिम्मत को तेजिंदर के सामने खड़े कर पूछताछ शुरू की तो पुलिस की परवाह किए बगैर वह एकदम से तेजिंदर पर टूट पड़ा. 4 सिपाहियों ने मिल किसी तरह तेजिंदर को उस के चंगुल से छुड़ाया. तेजिंदर को मारते समय वह कह रहा था, ‘‘तेजिंदर, तू ने जो तिरिया चरित्तर दिखाया है न, वह तुझे बहुत महंगा पड़ेगा. तू ने ही मुझ से कह कर अपना आदमी मरवाया और अब पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया.’’

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ में ही तेजिंदर वादामाफ गवाह बन गई. अदालत में चालान पेश हुआ तो उस ने हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ अपना बयान इस तरह दिया, जैसे किसी फिल्म की पटकथा सुना रही हो. बलवान सिंह पर किस ने किस तरह किस हथियार से वार किए थे, फटाफट बकती चली गई.  लुधियाना की सेशनकोर्ट में जब मुकदमा चला तो मैं हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह के वकील की हैसियत से अदालत में पेश हुआ. हर वकील अपने मुवक्किल को बचाना चाहता है. मैं ने भी दोनों को बचाने के लिए कानून के खूब तर्क दिए.

29 फरवरी, 1980 को सैशन जज ने इस मुकदमे का जो फैसला सुनाया, वह इस तरह से था :‘श्रीमती तेजिंदर कौर जाति की जाट है, जबकि उस का प्रेमी हिम्मत सिंह हरिजन. तेजिंदर कौर का कहना कि उस के हिम्मत सिंह से अवैधसंबंध हो गए थे, जिस की जानकारी उस के पति बलवान सिंह को हो गई थी, यह विश्वसनीय नहीं लगता. पंजाब का जाट अपनी पत्नी का अवैधसंबंध किसी और जाति के साथ होने की बात को बड़ी गंभीरता से लेता है.

‘अगर बलवान सिंह को इस की जानकारी होती तो वह और उस के रिश्तेदार पहले ही तेजिंदर कौर अथवा उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार चुके होते. तेजिंदर कौर ने अपने बयान में एक जगह कहा है कि एक बार वह और उस का प्रेमी पतिपत्नी के अंदाज में थे, तभी उस के पति ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया था, लेकिन तब थोड़ाबहुत झगड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं हुआ था, यह भी अविश्वसनीय सा लगता है.

‘अपने बयान में तेजिंदर कौर ने यह भी कहा है कि हिम्मत और कुलवंत सिंह ने बलवान की मौत निश्चित हो जाने के बाद भी उस पर तलवार से अनगिनत वार किए, यह सब भी झूठ लगता है. तेजिंदर कौर के बयानों को सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वादामाफ गवाह के रूप में उस का बयान अविश्वसनीय है.

‘उस ने हिम्मत और कुलवंत सिंह को फंसाने के लिए इस जघन्य हत्या की ऐसी कहानी गढ़ी है, जिस से उन दोनों को फांसी हो जाए. कहानी में पर्याप्त दम नहीं है और अभियोगपक्ष भी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप साबित करने में असफल रहा है. लिहाजा हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बलवान सिंह की हत्या के आरोप से दोनों को बरी किया जाता है.’ फैसला आए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि हिम्मत सिंह और तेजिंदर कौर पतिपत्नी के रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए थे. ऐसा कैसे संभव हुआ, यह फिलहाल मेरी समझ में नहीं आ रहा था. काफी प्रयास के बाद भी जब मैं इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं ढूंढ सका तो मैं ने 2 दिनों बाद अपने मुंशी को खन्ना भेज कर तेजिंदर को बुलवा लिया.

इस बार भी तेजिंदर हिम्मत सिंह के साथ ही आई. मेरे पूछने पर उस ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था :

पुलिस ने थाने में जब तेजिंदर से पूछताछ की तो वह पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. लेकिन एक बात उस के हक में यह रही कि हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद भी उस का मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ा. उसी का नतीजा था कि जब पुलिस ने उसे वादामाफ गवाह बना कर उसे अपने ही साथियों के खिलाफ गवाही देने को कहा तो उस ने मन ही मन तय कर लिया कि अदालत में वह हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ इतना बढ़चढ़ कर बोलेगी कि उस के बयान पर जज साहब को यकीन नहीं होगा. तब शायद वह उस के बयान पर यकीन न कर के उन लोगों को बरी कर दें.

थाने में हिम्मत ने जब गालीगलौज करते हुए उस पर हमला किया था, तब उसे क्या पता था कि वह अपना त्रियाचरित्र दिखा रही थी, वह उसे बचाने की जबरदस्त योजना बना रही थी. आखिर वही सब हुआ, जैसा उस ने सोचा था. उस ने अदालत में जो बयान दिया था, जज साहब को सचमुच यकीन नहीं हुआ. संदेह का लाभ पा कर हिम्मत सिंह अपने जीजा के साथ बरी हो गया. उस समय भी दोनों उस से खफा थे. लेकिन जब उन के घर जा कर तेजिंदर ने असलियत बताई तो दोनों ने उस की तारीफ की. इस के बाद जब हिम्मत को उस पर विश्वास हो गया तो उस ने उस से शादी कर ली.

तेजिंदर की दास्तान सुन कर एक वरिष्ठ वकील होने के बावजूद एकबारगी मेरी बुद्धि चकरा गई. फिलहाल वह 2 नौजवान लड़कों की मां है, जिन में से एक की हाल ही में शादी हुई है. अपने परिवार के साथ वह खूब मजे का जीवन बसर कर रही है. वह नहीं चाहती कि अब कोई उस के पुराने जीवन के बारे में पूछे. Hindi Stories

—कथा में प्रमुख पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.