Crime Stories: प्यार में ऐसा तो नहीं होता

Crime Stories: बेडि़या समाज का दंगल सिंह अपनी प्रेमिका शिल्पा को भगा कर उस से शादी करना चाहता था, जबकि शिल्पा का कहना था कि वह समाज के रिवाज के अनुसार ही शादी करेगी. आखिर दोनों की इस लड़ाई का नतीजा क्या निकला महानगर मुंबई से सटे जनपद थाणे के कोपरी गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले गहरे नाले पर बने पुल पर अचानक काफी लोग एकत्र हो गए थे. इस की वजह उस गहरे नाले में पड़ी किसी आदमी के बैडशीट में बंधी एक गठरी थी, जिस में से पैर की अंगुलियां दिखाई दे रही थीं.

साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Crime News: मासूम बच्चों का सीरियल किलर – पुलिस की गिरफ्त में

Crime News: सीरियल किलर रविंद्र एकएक कर के करीब 40 मासूमों के साथ कुकर्म कर उन की हत्याएं कर चुका था. निशा की हत्या करने के बाद यदि वह अपनी मां के प्रेमी सन्नी को फंसाने की कोशिश न करता तो शायद अब भी गिरफ्तार नहीं हो पाता.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव के नजदीक जैननगर में काफी बड़ी झुग्गी बस्ती है. यह इलाका बेगमपुर थाने के अंतर्गत आता है. इसी बस्ती के रहने वाले संतोष कुमार की 6 वर्षीया बेटी निशा रोजाना की तरह 14 जुलाई को भी नित्य क्रिया के लिए सूखी नहर की तरफ गई थी. सुबह 6 बजे घर से निकली निशा जब आधापौने घंटे बाद भी घर नहीं लौटी तो मां पुष्पा देवी चिंतित हुई. चिंता की बात इसलिए थी क्योंकि निशा को तैयार हो कर 7 बजे स्कूल के लिए निकलना था. वह नजदीक के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. कुछ देर और इंतजार करने के बाद भी वह नहीं आई तो पुष्पा बेटी को देखने के लिए सूखी नहर की तरफ चली गई.

पुष्पा ने सूखी नहर की तरफ जा कर बेटी को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली. उधर आनेजाने वाली महिलाओं और बच्चों से भी उस ने बेटी के बारे में पता किया, पर कोई भी उस की बच्ची के बारे में नहीं बता सका. तब परेशान हो कर वह घर लौट आई. उस ने यह बात पति संतोष को बताई तो वह भी परेशान हो गया. अब तक बेटी के स्कूल जाने का समय हो गया था. मियांबीवी एक बार फिर बेटी को ढूंढने निकल गए. उन के साथ पड़ोसी भी उन की मदद के लिए गए थे. एक, डेढ़ घंटे तक वह बेटी को इधरउधर ढूंढते रहे, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

बस्ती के लोग इस बात से हैरान थे कि आखिर घर और सूखी नहर के बीच से बच्ची कहां गायब हो गई? संतोष की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह बच्ची को कहां ढूंढे? आखिर वह पड़ोसियों को ले कर थाना बेगमपुर पहुंचा. थानाप्रभारी रमेश सिंह उस दिन छुट्टी पर थे. थाने का चार्ज अतिरिक्त थानाप्रभारी जगमंदर दहिया संभाले हुए थे. संतोष कुमार ने उन्हें बेटी के गुम होने की बात बताई.

बच्ची की उम्र 6 साल थी, इसलिए पुलिस यह भी नहीं कह सकती थी कि वह अपने किसी प्रेमी के साथ चली गई होगी. दूसरे बच्ची के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. संतोष ने बताया था कि उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी. इन सब बातों को देखते हुए पुलिस को यही लग रहा था कि या तो बच्ची खेलतेखेलते कहीं चली गई है या फिर उसे बच्चा चुराने वाला कोई गैंग उठा ले गया है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तमाम बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे थे. इसी बात को ध्यान में रख कर उन्होंने उसी समय निशा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी और इस की जांच हेडकांस्टेबल शमशेर सिंह को सौंप दी. बच्ची के अपहरण का मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली के समस्त थानों में उस का हुलिया बता कर वायरलैस से सूचना दे दी गई. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया कुछ पुलिसकर्मियों के साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां से बच्ची लापता हुई थी. उन्होंने संतोष के घर से ले कर सूखी नहर तक का निरीक्षण किया. उसी दौरान उन्होंने कुछ लोगों से बात भी की, लेकिन उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस के सहारे लापता बच्ची का पता लगाया जा सकता.

वह उधर की झाडि़यों में भी यह सोच कर खोजबीन करने लगे कि कहीं किसी बहशी दरिंदे ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो. क्योंकि आए दिन बच्चों के साथ कुकर्म करने जैसे मामले सामने आते रहते थे. झाडि़यों में भी उन्हें कुछ नहीं मिला. संतोष के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत दिखाई दे रही थी. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया ने अपने आसपास खड़े बस्ती वालों से उस इमारत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिल्डिंग किसी जैन की है, लेकिन पिछले काफी दिनों से इस के निर्माण का काम रुका हुआ है.

जिज्ञासावश वह उस बिल्डिंग की तरफ चल दिए. जैननगर की गली नंबर 6 में निर्माणाधीन उस 3 मंजिला बिल्डिंग में जब वह घुसे तो एक कमरे में उन्हें एक बच्ची निर्वस्त्र हालत में पड़ी मिली. वह मृत अवस्था में थी. उन के साथ मौजूद संतोष उस बच्ची को देख कर चीख पड़ा. वह उसी की बेटी निशा थी. बच्ची का निचला हिस्सा खून से सना हुआ था. उस के कपड़े पास पड़े हुए थे. निशा की हालत देख कर इंसपेक्टर दहिया समझ गए कि यह किसी दरिंदे की शिकार बनी है. निशा की हत्या की खबर सुन कर बस्ती के सैकड़ों लोग थोड़ी देर में वहां जमा हो गए. इंसपेक्टर दहिया ने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी.

कुछ देर बाद बाहरी दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत, डीसीपी-2 श्वेता चौहान, एसीपी ऋषिदेव कराला भी जैननगर पहुंच गए. डीसीपी ने मौके पर क्राइम ब्रांच को भी बुलवा लिया. क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम भी मौके से सबूत जुटाने लगी. इन टीमों का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उसी बिल्डिंग में दूसरी मंजिल पर एक ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट से संबंधित कुछ कागज मिले. पुलिस ने वह सब अपने कब्जे में ले लिया.

लाश का मुआयना करने पर यही लग रहा था कि किसी ने उस बच्ची के साथ गलत काम कर के उस का गला घोंट दिया है. निशा की हत्या पर बस्ती के लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इस से पहले कि वे कोई आक्रामक कदम उठाते, पुलिस ने उन्हें समझाबुझा कर शांत कर दिया. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुल्तानपुरी के संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल भेज दिया.

इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी विक्रमजीत ने एसीपी ऋषिदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर जगमंदर दहिया, एएसआई सुरेंद्रपाल, हेडकांस्टेबल नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल टी.आर. मीणा आदि को शामिल किया गया. जिस बिल्डिंग में निशा की लाश मिली थी, उसी बिल्डिंग में पुलिस को जो ड्राइविंग लाइसेंस और कागजात मिले थे, उन की जांच शुरू की गई. ड्राइविंग लाइसेंस पर सन्नी पुत्र सुरेंद्र कुमार नाम लिखा था. उस पर जो पता लिखा था, वह कराला के जैननगर का ही था. यानी यह पता वही था, जहां मरने वाली बच्ची रहती थी.

खैर, पुलिस सन्नी के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पता चला कि वह डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती है. जब पुलिस अस्पताल पहुंची तो जानकारी मिली कि सन्नी को कुछ देर पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था. लिहाजा उलटे पांव पुलिस जैननगर लौट आई. सन्नी घर पर ही मिल गया. उस के हाथपैर और शरीर के अन्य भागों पर चोट लगी हुई थी. पुलिस ने 14 जुलाई को ही सन्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कल रात पड़ोस के ही रविंद्र, उस के भाई सुनील और उस के दोस्त हिमांशु ने उस की खूब पिटाई की थी. पिटाई करने के बाद रविंद्र उस की जेब से मोबाइल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैसे आदि निकाल कर ले गया था. मुझे उम्मीद है कि उसी ने यह सब किया होगा.

रविंद्र का घर सन्नी के घर के पास ही था. पुलिस उस के घर गई तो वह और उस के भाई में से कोई नहीं मिला. घर पर मौजूद उस के पिता ने पुलिस को बताया कि दोनों भाई अपने किसी दोस्त के यहां गए हुए हैं. पुलिस उस के पिता को हिदायत दे कर चली आई. पुलिस ने रविंद्र के बारे में छानबीन की तो जानकारी मिली कि पिछले साल उस ने बेगमपुर थानाक्षेत्र में ही एक बच्चे के साथ कुकर्म कर के उस की गला काट कर हत्या कर दी थी. इस की रिपोर्ट थाना बेगमपुर में ही भादंवि की धारा 363/307/377 के तहत लिखी गई थी. इस मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के 6 महीने बाद सन्नी के पिता सुरेंद्र सिंह ने उस की जमानत कराई थी. तब वह जेल से बाहर आया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को रविंद्र पर शक हुआ. उस का जो मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था, वह स्विच्ड औफ था. पुलिस टीम रविंद्र को सरगर्मी से तलाशने लगी. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने 16 जुलाई, 2015 को उसे थाना क्षेत्र के ही सुखवीरनगर बस स्टौप से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब रविंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने निशा की हत्या का जुर्म तो स्वीकार कर ही लिया, इस के अलावा उस ने ऐसा खुलासा किया कि पुलिस हैरान रह गई.

उस ने बताया कि वह निशा की तरह तकरीबन 40 बच्चों की हत्या कर चुका है. पुलिस तो केवल मर्डर के एक केस को खोलने के लिए रविंद्र को तलाश रही थी, लेकिन वह इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, पता नहीं था. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उन्होंने उसी समय डीसीपी विक्रमजीत को यह जानकारी दी तो आधे घंटे के अंदर वह भी बेगमपुर थाने पहुंच गए.

एक लाश और ड्राइविंग लाइसेंस ने ऐसे गुनाह से परदा उठा दिया था, जिसे सुन कर इंसानियत भी शर्मशार हो जाए. उस ने डीसीपी के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली बच्चों की हत्या की जो कहानी बताई, वह नोएडा के निठारी कांड से कम नहीं थी. रविंद्र ने बताया कि वह बच्चों की हत्या करने के बाद ही उन से कुकर्म करता था. उस के खुलासे पर डीसीपी भी चौंके. 24 साल के रविंद्र ने एक के बाद एक कर के करीब 40 बच्चों की हत्या करने और सैक्स एडिक्ट बनने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोरने वाली थी.

रविंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा गंज डुंडवारा के रहने वाले ब्रह्मानंद का बेटा था. रविंद्र के अलावा उस के 3 और बेटे थे. ब्रह्मानंद प्लंबर का काम करता था, इसलिए उस की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ा सकता. लिहाजा जब उस के 2 बेटे बड़े हुए तो वह उन से भी मजदूरी कराने लगा. बेटे कमाने लगे तो उस के घर की माली हालत सुधरने लगी. उसी दौरान सन 1990 में गंज डुंडवारा में दंगा भड़क गया तो ब्रह्मानंद अपनी पत्नी मंजू और बच्चों को ले कर दिल्ली आ गया.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव में उस की जानपहचान के तमाम लोग रहते थे. लिहाजा वह भी उन के साथ कराला में रहने लगा. उस समय मंजू गर्भवती थी. कुछ दिनों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रविंद्र रखा. घर में सब से छोटा होने की वजह से वह सब का प्यारा था. ब्रह्मानंद्र अपने बाकी बच्चों को तो पढ़ा नहीं सका था, लेकिन वह रविंद्र को पढ़ाना चाहता था. जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो उस ने उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. लेकिन मोहल्ले के बच्चों की संगत में पड़ कर वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. वह नशा करने वाले बच्चों की संगत में पड़ गया, जिस से वह भी चरस, गांजा आदि पीने लगा. घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने उसे डांटा भी, लेकिन वह नहीं माना.

रविंद्र नहीं पढ़ा तो ब्रह्मानंद उसे अपने साथ काम पर ले जाने लगा. लेकिन उस की आदत तो दोस्तों के साथ घूमने की थी. पिता के साथ मेहनत का काम भला वह क्यों करता. इसलिए वह पिता के साथ भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका. उसे जब खर्च के लिए पैसों की जरूरत होती, वह अपनी जानपहचान वाले ड्राइवर सन्नी के साथ हेल्परी करने चला जाता. सन्नी उसी के पड़ोस में रहता था और वह ट्रेलर चलाता था. उस का ट्रेलर मुंडका मैट्रो स्टेशन के निर्माण के कार्य में लगा हुआ था. रविंद्र वहां से जो भी कमाता, अपने नशा के शौक पर उड़ा देता था.

सन 2008 की बात है. उस समय रविंद्र करीब 17 साल का था. एक बार वह आधी रात को दोस्तों से फारिग हो कर अपने घर लौट रहा था. उस ने कराला में एक झुग्गी के बाहर मांबाप के साथ सो रही बच्ची को देखा. उस बच्ची की उम्र कोई 6 साल थी. उस बच्ची को देख कर रविंद्र की कामवासना जाग उठी. वह चुपके से गहरी नींद में सो रही उस बच्ची को उठा ले गया. बच्ची के मांबाप को पता ही नहीं चला कि उन की बेटी उन के पास से गायब हो चुकी है. रविंद्र उस बच्ची को सूखी नहर की तरफ ले गया. जैसे ही उस ने उस बच्ची को जमीन पर लिटाया वह जाग गई.

खुद को सुनसान और अंधेरे में देख कर वह डर गई. वहां उस के मांबाप की जगह एक अनजान आदमी था. वह रोने लगी तो रविंद्र ने डराधमका कर उसे चुप करा दिया. उस के बाद उस ने उस के साथ कुकर्म किया. बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी तो उस ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में वह बेहोश हो गई. भेद खुलने के डर से उस ने बच्ची की  गला दबा कर हत्या कर दी और अपने घर चला गया. अगली सुबह झुग्गी के बाहर सो रहे दंपति को जब अपनी बेटी गायब मिली तो वह उसे खोजने लगे. उसी दौरान उन्हें सूखी नहर में बेटी की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे. इस मामले की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस केस को नहीं खोल सकी.

केस न खुलने से रविंद्र की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सन 2009 में बाहरी दिल्ली के ही विजय विहार, रोहिणी इलाके से 6-7 साल के एक लड़के को बहलाफुसला कर वह सुनसान जगह पर ले गया और कुकर्म करने के बाद उस की हत्या कर दी. इस मामले को भी पुलिस नहीं खोल सकी. रविंद्र को अपनी कामवासना शांत करने का यह तरीका अच्छा लगा. क्योंकि वह 2 हत्याएं कर चुका था और दोनों ही मामलों में वह सुरक्षित रहा, इस से उस के मन का डर निकल गया. इस के बाद वह कंझावला इलाके में एक बच्ची को बहलाफुसला कर सुनसान जगह पर ले गया और उस के साथ कुकर्म कर के उस की हत्या कर दी.

वह कोई एक काम जम कर नहीं करता था. कभी गाड़ी पर हेल्परी का काम करता तो कभी बेलदारी करने लगता. नोएडा के सेक्टर-72 में वह एक बिल्डिंग में काम कर रहा था. वहां भी उस ने अपने साथ काम करने वाली महिला बेलदारों की 2 बच्चियों को अलगअलग समय पर अपनी हवस का शिकार बनाया. वह उन बच्चियों को चौकलेट दिलाने के लालच में गेहूं के खेत में गया. वहीं पर उस ने उन की गला दबा कर हत्या कर दी थी.

उस के पिता ब्रह्मानंद का दिल्ली आने के बाद अपने गांव जाना नहीं हो पाता था, लेकिन रविंद्र कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. खानदान के और लोग भी दिल्ली और नोएडा चले आए थे. रविंद्र जब भी गांव जाता, गंज डुंडवारा के पास गांव नूरपुर में अपनी मौसी मुन्नी देवी के यहां ठहरता था. वहीं पास के ही बिरारपुर गांव में उस की बुआ कृपा देवी का घर था. कभीकभी वह उन के यहां भी चला जाता था. उस की हैवानियत वहां भी जाग उठी तो उस ने वहां भी अलगअलग समय पर 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया.

अब तक रविंद्र सैक्स एडिक्ट हो चुका था. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह अपने शिकार को तलाशता रहता. बच्चे उस का शिकार आसानी से बन जाते थे, इसलिए वे उस का सौफ्ट टारगेट बन जाते थे. ज्यादातर वह झुग्गीझोपडि़यों या गरीब परिवारों के बच्चों को ही निशाना बनाता था, ताकि वे लोग ज्यादा कानूनी काररवाई न कर सकें. इस तरह उस ने दिल्ली के निहाल विहार, मुंडका, कंझावला, बादली, शालीमार बाग, नरेला, विजय विहार, अलीपुर हरियाणा के बहादुरगढ़, फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के सिकंदराऊ, अलीगढ़ आदि जगहों पर 6 से 9 साल के करीब 40 लड़केलड़कियों को अपना निशाना बनाया. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह कुकर्म के बाद हर बच्चे की हत्या कर देता था. ज्यादातर के साथ उस ने मारने के बाद कुकर्म किया था.

उस ने कई बच्चों की लाशें ऐसी जगहों पर डाली थी कि पुलिस भी उन्हें बरामद नहीं कर सकी. 4 जून, 2014 को उस ने अपने दोस्त राहुल के साथ अपनी ही बस्ती जैननगर के कृष्ण कुमार के 6 साल के बेटे शिबू को सोते हुए उठा लिया. दोनों उसे आधा किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर ले गए और उस के साथ कुकर्म किया. राहुल नाई था. वह अपने साथ उस्तरा भी ले गया था. बाद में उस ने उसी उस्तरे से उस का गला काट कर लाश सूखी गटर में डाल दिया था. बच्चे को गटर में डालते हुए उन्हें किसी ने देख लिया था. उन दोनों ने तो यही समझा था कि शिबू मर चुका है, लेकिन वह जीवित था. अगले दिन जब खोजबीन हुई तो वह सूखी गटर में पड़ा मिला.

जिस शख्स ने रविंद्र और राहुल को देखा था, उसी ने अगले दिन पुलिस को सब बता दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने रविंद्र और राहुल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. रविंद्र जिस सन्नी के साथ ट्रेलर पर हैल्परी करता था, उसी सन्नी के रविंद्र की मां मंजू से अवैधसंबंध थे. बेटे के जेल जाने के बाद मंजू परेशान हो गई. वह बेटे की जमानत की कोशिश में लग गई. कहसुन कर उस ने सन्नी के पिता सुरेंद्र से बेटे की जमानत करवा ली. लिहाजा 20 मई, 2015 को रविंद्र जेल से बाहर आ गया.

बात 13 जुलाई, 2015 की है. मंजू अपने घर में अकेली थी. उस ने फोन कर के अपने प्रेमी सन्नी को घर पर बुला लिया. दोनों अपनी हसरतें पूरी करते, अचानक रविंद्र घर आ गया था. सन्नी उस समय मंजू से बातें कर रहा. इसलिए रविंद्र को उस पर कोई शक वगैरह नहीं हुआ. रविंद्र के आने के बाद मंजू और सन्नी की योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही थी. बेटे को बाहर भेजने के लिए मंजू ने घर में पड़ा टेप रिकौर्डर रविंद्र को देते हुए कहा कि वह उसे ठीक करा लाए. मां के कहने पर रविंद्र टेप रिकौर्डर ठीक कराने चला गया.

बेटे के जाते ही मंजू और सन्नी अपनी हसरतें पूरी करने लगे, लेकिन मैकेनिक की दुकान बंद होने की वजह से रविंद्र जल्द ही वापस लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा नहीं खुला, फिर वह गली में जा कर खड़ा हो गया. उधर दरवाजा खटखटाने पर मंजू और सन्नी की कामलीला में व्यवधान पड़ गया. फटाफट दोनों ने कपड़े पहने और सन्नी दरवाजा खोल कर चला गया. सन्नी रविंद्र को नहीं देख सका. अपने घर से सन्नी को निकलता देख रविंद्र का माथा घूम गया. वह समझ गया कि उस की मां के साथ सन्नी का जरूर कोई चक्कर चल रहा है.

उस ने उसी समय तय कर लिया कि वह सन्नी को सबक सिखा कर रहेगा. उस ने यह बात अपने भाई सुनील को बताई तो सुनील का भी सन्नी के प्रति खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने सन्नी के खिलाफ योजना बना ली. इस योजना में रविंद्र ने अपने दोस्त हिमांशु को भी शामिल कर लिया. उसी दिन शाम को रविंद्र ने सन्नी से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह इस समय मुंडका में है. योजना को अंजाम देने के लिए रविंद्र, हिमांशु और सुनील को ले कर मुंडका पहुंच गया. सन्नी उन्हें वहीं मिल गया. सन्नी के साथ उन्होंने एक जगह बैठ कर शराब पी. सन्नी पर जब थोड़ा नशा चढ़ गया तो उसी दौरान तीनों ने सन्नी की जम कर पिटाई की और रविंद्र ने उस की जेब से उस का मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य कागजात निकाल लिए.

रविंद्र ने सन्नी को जिंदा जलाने के लिए उसी की मोटरसाइकिल से पेट्रौल निकाल कर उसी के ऊपर छिड़क दिया. लेकिन सुनील ने उसे आग लगाने से रोक दिया. सुनील यह कहते हुए भाई को समझा दिया कि अभी इस के लिए इतनी ही सजा काफी है. अगर यह अब भी नहीं मानेगा तो इसे दुनिया से ही मिटा देंगे. उसी वक्त मौका मिलते ही सन्नी वहां से खेतों की तरफ भाग गया. सन्नी की बाइक ले कर रविंद्र, सुनील और हिमांशु अपने घर चले गए.

सन्नी रात भर खेतों में ही रहा. डर की वजह से वह घर तक नहीं गया. सुबह होने पर वह अपने घर गया और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी. तब पुलिस ने सन्नी को रोहिणी के डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया और रविंद्र, सुनील व हिमांशु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. 14 जु़लाई को सुबह 6 बजे के करीब रविंद्र नित्य क्रिया के लिए घर से निकला, तभी उस ने रास्ते में संतोष की 6 साल की बेटी निशा को अकेली जाते हुए देखा. वह भी नित्य क्रिया के लिए जा रही थी. उसे अकेली देख कर उस का शैतानी दिमाग जाग उठा. उस ने उस बच्ची को 10 रुपए दिए और किसी बहाने से उसे वहां से 50 मीटर की दूरी पर स्थित निर्माणाधीन इमारत में ले गया.

वह इमारत खाली पड़ी थी. नादान बच्ची उस के इरादों को नहीं समझ पाई. उस ने अन्य बच्चों की तरह निशा के साथ भी कुकर्म कर के उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. शातिर दिमाग रविंद्र ने इस बच्ची के मामले में सन्नी को फंसाने के लिए सन्नी का ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर डाल दिए, ताकि पुलिस सन्नी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दे. रविंद्र ने सन्नी को फंसाने का जाल तो अच्छी तरह बिछाया था, पर अपने जाल में वह खुद फंस जाएगा, ऐसा उस ने नहीं सोचा था. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

रविंद्र से पूछताछ के बाद डीसीपी भी हैरान रह गए कि यह एक के बाद एक 40 वारदातें करता गया और पुलिस को पता तक नहीं चला. अगर यह क्रूर हत्यारा अब भी नहीं पकड़ा जाता तो न मालूम कितने और बच्चों को अपना निशाना बनाता. बहरहाल, पुलिस ने 17 जुलाई को रविंद्र को रोहिणी जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव के समक्ष पेश किया. रविंद्र ने पुलिस को बताया था कि वह लगभग 40 बच्चों को अपना शिकार बना कर उन की हत्या कर चुका है. ये सारी वारदातें उस ने दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी की थीं.

घटनास्थल का सत्यापन और केस से संबंधित सबूत जुटाने के लिए उस से और ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए पुलिस ने कोर्ट से उस का 7 दिनों का रिमांड मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. रिमांड मिलने के बाद पुलिस रविंद्र को उन जगहों पर ले गई, जहांजहां उस ने वारदातों को अंजाम दिया था. रविंद्र ने पुलिस को अलगअलग जगहों पर ले जा कर 27 केसों की पुष्टि करा दी. बाकी केसों के बारे में उसे खुद को ध्यान नहीं रहा कि उस ने कहां वारदात की थी. जिन जगहों पर वारदात कराने की उस ने पुष्टि कराई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के थाने में संपर्क किया तो पता चला कि उन में से केवल 15 केसों की ही अलगअलग थानों में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.

पुलिस किसी और बच्चे की लाश बरामद नहीं कर पाई. इस की वजह यह थी कि उसे वारदात को अंजाम दिए काफी दिन बीत चुके थे, जिस से अनुमान यही लगाया गया कि बच्चों की लाशें जंगली जानवरों द्वारा या अन्य वजह से नष्ट हो गईं. जैसेजैसे सीरियल किलर रविंद्र की क्रूरता के खुलासे लोगों को पता लगते गए, उन का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के जिन गायब हुए बच्चों का कोई सुराग नहीं लग रहा था, उन के मांबाप भी यही सोचने लगे कि कहीं उन का बच्चा भी रविंद्र का शिकार तो नहीं हो गया. वे भी थाना बेगमपुर पहुंचने लगे.

रिमांड अवधि खत्म होने से पहले पुलिस ने 23 जुलाई, 2015 को जब रविंद्र को फिर से न्यायालय में पेश किया गया तो उसे देखने के लिए कोर्ट में और कोर्ट से बाहर तमाम लोग जमा हो गए. वे सभी गुस्से से भरे थे. वे उसे जनता के सुपुर्द करने की मांग करने लगे, ताकि उस क्रूर हत्यारे को अपने हाथों से सजा दे सकें. भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उसे कोर्ट में पेश किया गया.  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने रविंद्र को जेल भेजने के आदेश दिए. पुलिस जब उसे कोर्ट से बाहर ले जा रही थी, तभी वकीलों ने रविंद्र पर हमला कर उस की पिटाई शुरू कर दी. बड़ी मशक्कत से पुलिस ने उसे बचाया. इस के बाद बार एसोसिएशन के सचिन ने ऐलान कर दिया कि कोई भी वकील वहशी दरिंदे का मुकदमा नहीं लड़ेगा.

कथा संकलन तक रविंद्र जेल में बंद था. रविंद्र के घर वालों ने भी कह दिया कि वह उस की जमानत की पैरवी नहीं करेंगे. बहरहाल रविंद्र को जानने वाले सभी लोग उस के कारनामे से आश्चर्यचकित हैं. सीधासादा दिखने वाला रविंद्र इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, ऐसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जांच अधिकारी इंसपेक्टर जगमंदर दहिया उस के केसों से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इस सीरियल किलर को उस के गुनाहों की उसे सजा मिल सके. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: खून सने इश्क की टेढीं राहें

Hindi Stories: तेजिंदर और हिम्मत सिंह को पतिपत्नी के रूप में देख कर एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी मैं चकरा गया, इस की वजह यह थी कि उस ने हिम्मत और उस के जीजा को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में मैं ने 50 हजार से भी अधिक क्रिमिनल मुकदमे लड़े हैं. इन में कुछ ऐसे भी मुकदमे थे, जिन की चर्चा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी.

आज मैं जिस मुकदमे की बात करने जा रहा हूं, उस तरह का रोचक और अनूठा मुकदमा मेरे पास दोबारा नहीं आया. अपनी तरह का वह एक ऐसा अनोखा मुकदमा था, जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया. वह इतवार का दिन था. 6 दिनों के काम की थकान उतारने को मैं बिस्तर पर अधलेटा चाय की चुस्कियां लेते हुए टीवी देख रहा था. उस समय दिन के साढ़े 11 बज रहे थे. घर के किसी सदस्य ने आ कर बताया कि मुझ से मिलने के लिए हिम्मत सिंह नाम का कोई आदमी कोठी के गेट पर खड़ा है. हिम्मत एक कत्ल के मुकदमे में फंसा था, जिस की पैरवी मैं ने की थी. उस मुकदमे में वह बरी हो गया था. मुझे तुरंत वह सब याद आ गया. लगा, शुक्रिया अदा करने आया होगा. मैं ने उसे भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कह दिया.

कुछ देर बाद मैं सहज रूप से ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला था. मेरे ठीक सामने वाले सोफे पर तेजिंदर शादी के लाल सुर्ख जोड़े में बैठी थी और उस की बगल में हिम्मत सिंह बैठा था. वह भी खूब बनठन कर आया था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों ने शादी कर ली है. हिम्मत सिंह के हाथ में बड़ा सा मिठाई का डिब्बा था. उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उस के साथ बैठी औरत उस की पत्नी है. इस का मतलब तेजिंदर ने उस से शादी कर ली थी.

मेरे लिए यह अविश्वसनीय एवं विचित्र बात थी. मैं असमंजस में फंस गया था. इसलिए बिना किसी संबोधन के मैं ने सीधे पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’

हिम्मत सिंह के बजाय जवाब तेजिंदर ने दिया, ‘‘जी हां वकील साहब, कल हम ने शादी कर ली. आज आप से आशीर्वाद लेने आए हैं. आप बहुत ही नेक इंसान हैं. आप हम दोनों को हमेशा सुखी रहने का आशीर्वाद दीजिए. मेरी जीत में आप का बहुत बड़ा योगदान है.’’

‘‘सचमुच तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ मैं ने हिम्मत सिंह की ओर देखते हुए वही सवाल इस तरह दोबारा किया, जैसे तेजिंदर की बात पर मुझे विश्वास न हुआ हो.

तेजिंदर मेरी बात का आशय शायद समझ गई, इसलिए फटाक से बोली, ‘‘जी वकील साहब, मैं ने हिम्मत से सचमुच शादी कर ली है.’’

मुझ से रहा नहीं गया. आशीर्वाद की बात भूल कर मैं ने हिम्मत से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम ने उसी से शादी कर ली, जिस ने तुम्हें फांसी पर चढ़वाने का पूरा इंतजाम कर दिया था? यह सब क्या रहस्य है, मेरी कुछ समझ में नहीं आया?’’

‘‘इस के बारे में तो मैं यही कह सकता हूं वकील साहब कि औरत को समझ पाना दुनिया में किसी के वश का नहीं है. तेजिंदर ने न केवल मुझे फांसी के फंदे से बचाया, बल्कि अपने प्यार के फर्ज को निभाते हुए मेरा उजड़ा हुआ घर भी बसा दिया.’’ हिम्मत ने तेजिंदर की ओर देखते हुए कहा. हिम्मत की यह बात मुझे और ज्यादा हैरान करने वाली लगी. इतने दिनों से वकालत के पेशे में रहने के बावजूद मैं उस की बातों का एकदम से कोई मतलब नहीं निकाल सका. फिलहाल मैं ने दोनों को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया. उन के जाने के बाद मैं उन के बारे में गहराई से सोचने लगा.

लुधियाना की तहसील खन्ना में अपने पति बलवान सिंह के साथ रहती थी तेजिंदर कौर. जब वह मेरे पास आई थी तो उस पर 2 साथियों के साथ मिल कर अपने पति का कत्ल करने का आरोप था. उस समय उस ने मुझे जो बताया था, वह सब कुछ इस तरह था. तेजिंदर का पति बलवान सिंह खन्ना के किसी सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह सीधासादा आदमी था. तेजिंदर को पत्नी के रूप में पा कर वह जितना खुश था, उसी तरह उसे भी खुश रखने की कोशिश करता था. पत्नी की एकएक बात का खयाल रखता था. रात में भी वह उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करता.

इतना सब करने के बावजूद भी बलवान के खजाने में शायद किसी रत्न की कमी थी. भले ही वह पत्नी को हर सुख देने की कोशिश करता था, लेकिन तेजिंदर औरत थी. उसे जरूरत थी उस परमसुख की, जिस की चाह में औरतें किसी पर भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. अफसोस की बात यह थी कि वह अनमोल सुख उसे बलावान सिंह से नहीं मिल पा रहा था. यही वजह थी कि इतना प्यार करने के बावजूद बलवान सिंह पत्नी का मन जीत लेना तो दूर, दिन पर दिन वह उस की उपेक्षा एवं नफरत का शिकार होता गया.

फिर एक समय ऐसा भी आ गया, जब तेजिंदर को बलवान से हद से ज्यादा नफरत हो गई. वह हर रात उसे नई उमंग एवं नए उत्साह से अपनी बांहों में समेटता और भरपूर प्यार करने की कोशिश करता, लेकिन अंत में तेजिंदर तड़पती और छटपटाती रह जाती. वह खर्राटे भरने लगता. ऐसे में तेजिंदर की उस के प्रति नफरत बढ़ती ही गई. वह उसे छोड़ कर कहीं और जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी. उन्हीं दिनों उन के बीच एक तीसरा आदमी आ टपका, जो बलवान सिंह का दोस्त हिम्मत सिंह था. कुछ दिनों पहले उस की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी. इसी के बाद उस ने कहीं भी आनाजाना बंद कर दिया था.

एक दिन बलवान जबरदस्ती उसे अपने घर ले आया और उस का दुख कम करने की कोशिश करने लगा. इस कोशिश में उस ने तेजिंदर को भी शामिल कर लिया था. तेजिंदर लगातर उस के साथ रहती थी. उन की बातों से हिम्मत को काफी हौसला और हिम्मत आई. वह सोचने लगा कि अब वह पिछले गम को भुला कर सहज जिंदगी जिएगा. इस के बाद हिम्मत सिंह अकसर बलवान के घर जाने लगा. कभी ऐसा भी मौका आता, जब बलवान सिंह घर पर नहीं होता. ऐसे में अपना फर्ज निभाते हुए तेजिंदर उस की खूब आवभगत करती और पत्नी की मौत का गम भुलाने वाली बातें करती.

ऐसे में ही एक दिन जब हिम्मत उस के यहां आया तो कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद हिम्मत ने तेजिंदर का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जब से रानो वाहेगुरु को प्यारी हुई है भाभी, मेरा इस दुनिया से जी भर गया था. सुबह उठ कर ऊपर वाले से यही दुआ करता था कि रानो की तरह मुझे भी अपने पास बुला ले. लेकिन अब तुम्हारी यह मनमोहिनी सूरत मेरे मन में ऐसी बस गई है कि मैं इस सूरत का गुलाम बन कर रह गया हूं. सच कहूं भाभी, तुम से ज्यादा खूबसूरत औरत इस दुनिया में दूसरी कोई नहीं हो सकती.’’

तेजिंदर को किसी पराए मर्द से इस तरह अपनी तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, लेकिन इस मामले में समझ से काम लेना जरूरी था. जरा सी भूल उस की जिंदगी तबाह कर सकती थी. इस के बावजूद हिम्मत के मुंह से अपनी तारीफें सुनसुन कर वह उस की ओर खिंचने लगी. उस का मन करता कि वह हमेशा उस के पास बैठा उस की खूबसूरती की तारीफें करता रहे. दूसरी ओर हिम्मत जब तेजिंदर की तारीफें करता, उस वक्त उस की आंखों में एक निमंत्रण दिखाई देता था. तेजिंदर को यही लगता था कि अगर उस ने हिम्मत कर के हिम्मत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया तो निश्चित ही वह उस की हर इच्छा पूरी कर देगा.

फिर एक दिन ऐसा हो भी गया. उस रात हिम्मत और बलवान ने घर पर महफिल जमा रखी थी. खातेपीते आधी रात हो गई तो बलवान ने हिम्मत को वहीं सो जाने को कहा. उसे बैडरूम में सुला कर बलवान पत्नी को साथ ले कर छत पर सोने चला गया. अप्रैल का महीना था, ठंडीठंडी हवा चल रही थी. जरा ही देर में बलवान और तेजिंदर गहरी नींद सो गए. रात को तेजिंदर को लगा, उसे कोई उठाने की कोशिश कर रहा है. जैसे ही उस की आंखें खुलीं, उठाने वाले ने फटाक से उस का मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया. उस के बाद कान में धीरे से बोला, ‘‘भाभी, आज अपना प्यार दे दो या फिर जहर दे कर मुझे मेरी रानो के पास भेज दो.’’

तेजिंदर ने आवाज पहचान ली थी. लेटेलेटे उस ने तिरछी नजरों से बलवान को देखा. वह गहरी नींद सो रहा था. उस ने मुंह पर रखा हिम्मत कर हाथ हटा कर प्यार से कहा, ‘‘तुम नीचे चल कर अपने बिस्तर पर लेटो, मैं वहीं आ कर तुम से बात करती हूं.’’

हिम्मत चला लेकिन उस ने तेजिंदर के जिस्म को जैसे झकझोर कर रख दिया था. इस के बाद बिना आगेपीछे की सोचे वह हिम्मत के पीछेपीछे आ कर उस के बगल लेट गई. इस के बाद हिम्मत ने रानो की कमी तेजिंदर से पूरी कर ली. दूसरी ओर तेजिंदर को हिम्मत से जो सुख मिला, उस ने जीवन के प्रति उस का नजरिया ही बदल दिया. शादी के बाद उस ने पहली बार महसूस किया था कि जिंदगी इस तरह भी रंगीन हुआ करती है. अपनी इस नई सोच के साथ वह छत पर पहुंची तो बलवान सिंह पहले की ही तरह गहरी नींद में सो रहा था. एक बार झिझक मिटी तो सिलसिला शुरू हो गया. हिम्मत और तेजिंदर को जब भी मौका मिला, दोनों ने उस का फायदा उठा लिया.

कहते हैं, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. बलवान सिंह को भी किसी तरह पत्नी और हिम्मत के संबंधों की भनक लग गई. पहले तो उस ने समाज की ऊंचनीच बता कर तेजिंदर को समझाया. कोई असर न होते देख उस ने तेजिंदर पर सख्ती करनी शुरू कर दी. लेकिन बलवान की ऐसी किसी भी कोशिश का तेजिंदर पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि अब तक वह हिम्मत के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. वह पति के सामने ही हिम्मत के साथ के अपने संबंधों को स्वीकार करने लगी थी. इस स्थिति में कोई भी होता, आपा खो बैठता. बलवान भी अब और सख्त हो गया और भूत की तरह पत्नी के आगेपीछे घूमने लगा.

तेजिंदर के लिए यह बरदाश्त के बाहर की बात हो गई थी. आखिर एक दिन उस ने इस बारे में हिम्मत से बात की तो हिम्मत ने कहा, ‘‘पागल है साला, सारी सच्चाई जानता है, फिर भी अपना मुंह काला करवाने पर तुला है. मैं तो कहता हूं कि तुम अपने हिसाब से रहो. अगर ज्यादा चूंचपड़ करे तो झिड़क दिया करो.’’

‘‘हां, यह भी ठीक है. अब ऐसा ही करूंगी.’’ तेजिंदर ने कहा.

दूसरी ओर बलवान सिंह ने दूसरा ही इरादा बना रखा था. उस ने पत्नी को सही राह पर लाने के लिए और अधिक सख्ती शुरू कर दी. एकाध बार उस ने उस की पिटाई भी कर दी.

इस से तेजिंदर को उस से और ज्यादा नफरत हो गई. अगली मुलाकात में उस ने हिम्मत से साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘अगर तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी बना कर रखना चाहते हो तो इस आदमी को हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से निकाल दो.’’

‘‘उस से तलाक दिलवा दूं?’’ हिम्मत ने मन की बात जानने के लिए हंस कर पूछा.

‘‘मेरी बातों को हंसी से मत टालो. मैं पूरी तरह से गंभीर हूं. वह इस जनम में मुझे तलाक दे नहीं सकता. मेरी मानो तो उसे इस दुनिया से ही विदा कर दो. इस में मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘अरे तुम ने तो बहुत दूर तक सोच लिया. उसे मरवा कर खुद भी जेल जाओगी और मुझे भी भिजवाओगी.’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर इस का कुछ नहीं किया गया तो वह निश्चित मुझे मार डालेगा. वह पागल होता जा रहा है. उस के अंदर का जानवर जाग उठा है.’’ कह कर तेजिंदर फूटफूट कर रोने लगी.

हिम्मत को उस के रोने के पीछे कोई बनावट नजर नहीं आई. उस के रोने में भय और मजबूरी साफ झलक रही थी. इसलिए उस की आंखों में खून उतर आया. वह तैश में आ कर बोला, ‘‘वह ऐसावैसा कुछ करे, उस के पहले ही मैं उस का टेंटुआ दबा दूंगा. तू चिंता मत कर, मैं आज ही गांव से अपने जीजा कुलवंत को बुलाए लेता हूं. इस के बाद हम दोनों बलवान की सारी पहलवानी निकाल देंगे. बस आज रात 9 बजे तुम किसी बहाने उसे रेलवे लाइन पर ले जाना.’’

‘‘ठीक है,’’ तेजिंदर ने खुश हो कर कहा, ‘‘ऐसा ही करूंगी. बस तुम तैयार रहना. और हां, तुम्हें यह काम बड़ी होशियारी से करना होगा. यह कांटा निकल गया तो जिंदगी भर मैं तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूंगी.’’

इतना कह कर तेजिंदर ने हिम्मत का हाथ पकड़ लिया तो उस का हाथ अपने सीने पर रख कर हिम्मत ने कहा, ‘‘तुम अपने इस यार पर भरोसा रखो, यारी की है तो मरते दम तक निभाऊंगा भी.’’

यह 11 मई, 1979 की बात थी. घर पहुंच कर आगे की योजना और स्थितियों से निबटने के लिए तेजिंदर विचार करने लगी. इस के बाद सजधज कर बलवान सिंह का इंतजार करने लगी. शाम को ठीक साढ़े 5 बजे बलवान सिंह घर लौटा तो पत्नी को इस तरह सजीधजी देख कर उसे हैरानी हुई. इस से भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि आते ही उस की आवभगत में लग गई. उसे चाय दे कर उस से बड़े प्यार से बातें भी करने लगी.

बलवान उस में आए इस बदलाव के बारे में कुछ पूछता, उस ने खुद ही कहा, ‘‘मेरा बदला हुआ रूप देख कर तुम्हें हैरानी हो रही होगी न? दरअसल आज एक साधु बाबा आए थे. मुझे दुखी देख कर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा अपने पति से झगड़ा रहता है न?’

‘‘यह बात उस ने कही या तुम ने खुद ही उस की बातों में आ कर कही?’’

‘‘भला मैं क्यों कहने लगी. फिर हमारा झगड़ा ही कहां है, मैं तो तुम्हारे दोस्त पर तरस खा कर उस से थोड़ा हंसबोल लेती थी, बस इतनी सी बात पर तुम मेरे चरित्र पर लांछन लगा कर मुझे परेशान करने लगे. जान से मारने की धमकियां देने लगे.’’

‘‘देखो तेजिंदर अब तुम बिना मतलब…’’

‘‘आप फिर बनाबनाया मूड खराब करने लगे. आज साधु बाबा जो कुछ मुझ से कह गए हैं, उस से हमारे बीच का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. बाबा ने कहा कि मैं हमेशा तुम्हारा सहयोग करूं, हमेशा तुम्हारी आवभगत करूं. उन्होंने कहा है कि अब हमारा बुरा वक्त टल गया है, जल्दी ही मुझे सारी खुशियां मिल जाएंगीं. अब आप रोजाना मेरा ऐसा ही रूप देखेंगे.’’

तेजिंदर ने ये बातें कुछ इस तरह कहीं कि बलवान को ताज्जुब होने के बावजूद उस का प्यार करने का यह अंदाज बहुत अच्छा लगा. वह खुशी से झूम उठा. तेजिंदर कौन सा षडयंत्र रच रही है, इस बात का उसे जरा भी अंदाजा नहीं हो सका. शाम को दोनों मुख्य बाजार की ओर घूमने भी गए.  खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे फिर से टहलने निकले. घर से थोड़ी दूर जाने पर तेजिंदर ने बलवान का हाथ पकड़ लिया और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ी. उस की प्यारीप्यारी बातों में खोया बलवान यंत्रचालित सा उस के साथ आगे बढ़ता गया. उस समय चारों ओर गहन अंधेरा छाया था. बलवान घर लौटना चाहता था, लेकिन तेजिंदर ने चालाकी से उसे प्यार भरी बातों में उलझाए रखा. तभी उन्हें गुरु सिंह मिल गया.

वह पंजाब पुलिस में सिपाही था और उसी मकान में किराए पर रहता था, जिस में बलवान सिंह रहता था. उतनी रात को सुनसान जगह में उन्हें घूमते देख कर उस ने पूछा, ‘‘इतनी रात को आप लोग रेलवे लाइन की ओर क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, ऐसे ही तेजिंदर का मन हो आया, इसलिए इधर चला आया. और क्या हालचाल है, ड्यूटी कर के आ रहे हो क्या?’’ बलवान ने पूछा.

लेकिन उस की बात का उत्तर दिए बगैर मुसकराता हुआ गुरु सिंह आगे बढ़ गया. तेजिंदर और बलवान बातें करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ गए. उस समय दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले रेलवे लाइन के बीचोबीच चल रहे थे. तेजिंदर ने देखा कि हिम्मत सिंह अपने जीजा कुलवंत के साथ रेलवे लाइन के दाईं ओर कच्चे रास्ते से चला आ रहा है. बलवान की नजर हिम्मत और कुलवंत पर पड़ती, उस के पहले ही वे उस के सामने आ कर खड़े हो गए. उन्हें देखते ही उस ने उन के इरादे भांप लिए. उसे तेजिंदर पर भी संदेह हो गया, इसलिए झटके से हाथ छुड़ा कर वह रतनहेड़ी गांव की ओर भागा.

लेकिन हिम्मत ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस के बाएं पैर पर गड़ासे से वार कर दिया. इस के बावजूद बलवान रेलवे लाइन पार करने में कामयाब हो गया. वह लंगड़ाता हुआ भागने लगा. वह भाग पाता, कुलवंत ने दौड़ कर उस के पेट में तलवार घुसेड़ दी. खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वह जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. इस के बाद हिम्मत ने गंडासे से उस पर 4-5 वार कर दिए तो थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए हिम्मत और कुलवंत ने बलवान की लाश को उठा कर रेलवे लाइन के बीचोबीच रख दिया. उन का सोचना था कि रात में ट्रेन गुजरेगी तो उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे. तब लोग यही समझेंगे कि उस ने ट्रेन के नीचे आ कर आत्महत्या कर ली है.

तीनों वहां से लौट रहे थे तो मुख्य सड़क पर बलवान सिंह का ममेरा भाई नेगा सिंह मिल गया. उतनी रात को तेजिंदर को 2 गैरमर्दों के साथ घूमने के बारे में उस ने पूछा तो तेजिंदर ने उसे इस तरह झिड़क दिया कि वह अपना सा मुंह ले कर चला गया. इस के बाद हिम्मत और कुलवंत सलौदी की ओर चले गए तो तेजिंदर अपने घर आ गई. अगले दिन यानी 12 मई, 1979 की सुबह खन्नानगर में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि बलवान सिंह रेलगाड़ी के नीचे कट कर मर गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई दुर्घटना कह रहा था तो कोई आत्महत्या मान रहा था. घटनास्थल पर भीड़ लग गई थी.

किसी ने बलवान सिंह की मौत के बारे में तेजिंदर को बताया तो रोतीबिलखती वह लाश के पास पहुंची. उस के वहां पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर एक सबइंसपेक्टर और 3 सिपाही आ चुके थे. आते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले कर अपनी कानूनी काररवाई शुरू कर दी थी. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर के तमाम जानकारी भी जुटा ली थी. इसलिए तेजिंदर जब लाश से लिपट कर रोने का नाटक करने लगी तो वहां मौजूद सबइंसपेक्टर ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि रात में तेजिंदर को मिले सिपाही गुरु सिंह ने पहले ही सब बता दिया था.

इसलिए सबइंसपेक्टर को उसी पर शक था. वह उसे थाने ले जाना चाहते थे. उसे थाने ले जाने के लिए उन्होंने बहाना बनाया कि उन्हें उस से कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने हैं, जिस से बलवान के बाद उसे सरकारी नौकरी आसानी से मिल सके. तेजिंदर कभी थाने तो गई नहीं थी. उसे यह भी मालूम नहीं था कि थाने में पुलिस अपराधियों से किस तरह से पेश आती है? इसलिए पुलिस के रौद्ररूप के आगे वह ज्यादा देर टिक नहीं सकी और बलवान की हत्या का अपना अपराध उस ने स्वीकार कर के हिम्मत और कुलवंत के बारे में भी बता दिया.

हिम्मत को अपनी गिरफ्तारी की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सबइंसपेक्टर ने कुलवंत और हिम्मत को तेजिंदर के सामने खड़े कर पूछताछ शुरू की तो पुलिस की परवाह किए बगैर वह एकदम से तेजिंदर पर टूट पड़ा. 4 सिपाहियों ने मिल किसी तरह तेजिंदर को उस के चंगुल से छुड़ाया. तेजिंदर को मारते समय वह कह रहा था, ‘‘तेजिंदर, तू ने जो तिरिया चरित्तर दिखाया है न, वह तुझे बहुत महंगा पड़ेगा. तू ने ही मुझ से कह कर अपना आदमी मरवाया और अब पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया.’’

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ में ही तेजिंदर वादामाफ गवाह बन गई. अदालत में चालान पेश हुआ तो उस ने हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ अपना बयान इस तरह दिया, जैसे किसी फिल्म की पटकथा सुना रही हो. बलवान सिंह पर किस ने किस तरह किस हथियार से वार किए थे, फटाफट बकती चली गई.  लुधियाना की सेशनकोर्ट में जब मुकदमा चला तो मैं हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह के वकील की हैसियत से अदालत में पेश हुआ. हर वकील अपने मुवक्किल को बचाना चाहता है. मैं ने भी दोनों को बचाने के लिए कानून के खूब तर्क दिए.

29 फरवरी, 1980 को सैशन जज ने इस मुकदमे का जो फैसला सुनाया, वह इस तरह से था :‘श्रीमती तेजिंदर कौर जाति की जाट है, जबकि उस का प्रेमी हिम्मत सिंह हरिजन. तेजिंदर कौर का कहना कि उस के हिम्मत सिंह से अवैधसंबंध हो गए थे, जिस की जानकारी उस के पति बलवान सिंह को हो गई थी, यह विश्वसनीय नहीं लगता. पंजाब का जाट अपनी पत्नी का अवैधसंबंध किसी और जाति के साथ होने की बात को बड़ी गंभीरता से लेता है.

‘अगर बलवान सिंह को इस की जानकारी होती तो वह और उस के रिश्तेदार पहले ही तेजिंदर कौर अथवा उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार चुके होते. तेजिंदर कौर ने अपने बयान में एक जगह कहा है कि एक बार वह और उस का प्रेमी पतिपत्नी के अंदाज में थे, तभी उस के पति ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया था, लेकिन तब थोड़ाबहुत झगड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं हुआ था, यह भी अविश्वसनीय सा लगता है.

‘अपने बयान में तेजिंदर कौर ने यह भी कहा है कि हिम्मत और कुलवंत सिंह ने बलवान की मौत निश्चित हो जाने के बाद भी उस पर तलवार से अनगिनत वार किए, यह सब भी झूठ लगता है. तेजिंदर कौर के बयानों को सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वादामाफ गवाह के रूप में उस का बयान अविश्वसनीय है.

‘उस ने हिम्मत और कुलवंत सिंह को फंसाने के लिए इस जघन्य हत्या की ऐसी कहानी गढ़ी है, जिस से उन दोनों को फांसी हो जाए. कहानी में पर्याप्त दम नहीं है और अभियोगपक्ष भी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप साबित करने में असफल रहा है. लिहाजा हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बलवान सिंह की हत्या के आरोप से दोनों को बरी किया जाता है.’ फैसला आए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि हिम्मत सिंह और तेजिंदर कौर पतिपत्नी के रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए थे. ऐसा कैसे संभव हुआ, यह फिलहाल मेरी समझ में नहीं आ रहा था. काफी प्रयास के बाद भी जब मैं इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं ढूंढ सका तो मैं ने 2 दिनों बाद अपने मुंशी को खन्ना भेज कर तेजिंदर को बुलवा लिया.

इस बार भी तेजिंदर हिम्मत सिंह के साथ ही आई. मेरे पूछने पर उस ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था :

पुलिस ने थाने में जब तेजिंदर से पूछताछ की तो वह पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. लेकिन एक बात उस के हक में यह रही कि हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद भी उस का मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ा. उसी का नतीजा था कि जब पुलिस ने उसे वादामाफ गवाह बना कर उसे अपने ही साथियों के खिलाफ गवाही देने को कहा तो उस ने मन ही मन तय कर लिया कि अदालत में वह हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ इतना बढ़चढ़ कर बोलेगी कि उस के बयान पर जज साहब को यकीन नहीं होगा. तब शायद वह उस के बयान पर यकीन न कर के उन लोगों को बरी कर दें.

थाने में हिम्मत ने जब गालीगलौज करते हुए उस पर हमला किया था, तब उसे क्या पता था कि वह अपना त्रियाचरित्र दिखा रही थी, वह उसे बचाने की जबरदस्त योजना बना रही थी. आखिर वही सब हुआ, जैसा उस ने सोचा था. उस ने अदालत में जो बयान दिया था, जज साहब को सचमुच यकीन नहीं हुआ. संदेह का लाभ पा कर हिम्मत सिंह अपने जीजा के साथ बरी हो गया. उस समय भी दोनों उस से खफा थे. लेकिन जब उन के घर जा कर तेजिंदर ने असलियत बताई तो दोनों ने उस की तारीफ की. इस के बाद जब हिम्मत को उस पर विश्वास हो गया तो उस ने उस से शादी कर ली.

तेजिंदर की दास्तान सुन कर एक वरिष्ठ वकील होने के बावजूद एकबारगी मेरी बुद्धि चकरा गई. फिलहाल वह 2 नौजवान लड़कों की मां है, जिन में से एक की हाल ही में शादी हुई है. अपने परिवार के साथ वह खूब मजे का जीवन बसर कर रही है. वह नहीं चाहती कि अब कोई उस के पुराने जीवन के बारे में पूछे. Hindi Stories

—कथा में प्रमुख पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

 

 

Rajasthan Crime Story: हत्यारा निकला प्रशासनिक अधिकारी

Rajasthan Crime Story: 2 बच्चों के पिता आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच ने गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपनी पत्नी नेहा की सुनियोजित तरीके से हत्या कर के उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन…

नेहा को जब पता चला कि उस का रिश्ता एक आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच से पक्का हो गया है तो वह फूली नहीं समा रही थी. उस के मांबाप व घर के अन्य लोग भी खुश थे कि एक प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप के साथ शादी के बाद नेहा राज करेगी. लड़का नेहा को हर वह खुशी देगा, जो उसे चाहिए. प्रदीप बालाच राजस्थान के बाड़मेर जिले के गांव गडरा रोड के रहने वाले प्रेम प्रकाश बालाच का बेटा था. प्रेम प्रकाश कोई बड़े आदमी नहीं थे, वह एक साधारण आदमी थे.

खेतीकिसानी से होने वाली आमदनी से उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ायालिखाया था. प्रदीप शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था. स्कूली पढ़ाई पूरी कर के कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी. बाद इस के वह राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की तैयारी करने लगा. उस की मेहनत रंग लाई और आरएएस में उस का चयन हो गया. राजस्थान इंस्टीट्यूट औफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (रीपा), जोधपुर में ट्रेनिंग करने के बाद 13 नवंबर, 2006 को प्रदीप की पहली नियुक्ति जैसलमेर में उपजिलाधिकारी के पद पर हुई. इस के बाद वह जैसलमेर में करीब 2 सालों तक विभिन्न पदों पर प्रशिक्षु के रूप में कार्य करते रहे.

जैसलमेर में तैनाती के दौरान ही 31 जनवरी, 2007 को प्रदीप की शादी बाड़मेर के रहने वाले भीमाराम की बेटी निर्मला उर्फ नेहा के साथ हुई थी. यह शादी बड़ी धूमधाम से हिंदू रीतिरिवाज से हुई थी. शादी में जैसलमेर के तत्कालीन जिलाधिकारी सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इलाके के अनेक प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हुए थे. गोरे रंग और शर्मीले स्वभाव की नेहा जब अपनी ससुराल पहुंची तो अपने मृदु  व्यवहार से उस ने सब का मन मोह लिया. ससुराल में नेहा की सभी तारीफ कर रहे थे. इस से नेहा भी खुश हो रही थी. नेहा ने अपने दिल में ढेरों सपने संजोए थे. वह दुनिया की वे सब खुशियां पाना चाहती थी, जो एक लड़की चाहती है.

शादी के बाद प्रदीप और नेहा के नवजीवन की शुरुआत हुई. दोनों ही बेहद खुश थे. प्रदीप की छुट्टियां कब बीत गईं, पता ही नहीं चला. छुट्टियां समाप्त होने पर प्रदीप जैसलमेर में अपनी ड्यूटी पर चले गए. एक बार मायके जाने के बाद नेहा भी प्रदीप के साथ जैसलमेर में रहने लगीं. हंसीखुशी के साथ उन का समय गुजर रहा था. इसी बीच नेहा एक बेटे की मां बन गईं. बेटा पैदा होने के बाद घर में खुशी और बढ़ गई. नेहा का समय बच्चे के लालनपालन में व्यतीत होने लगा.

जैसलमेर में लगभग 2 साल रहने के बाद प्रदीप का ट्रांसफर भरतपुर हो गया. भरतपुर के बाद जहांजहां भी प्रदीप का ट्रांसफर हुआ, नेहा उन के साथ ही रही. लेकिन जब प्रदीप को जोधपुर का जिला आबकारी अधिकारी बना कर भेजा गया तो नेहा के पारिवारिक जीवन में अचानक बदलाव आ गया. वह एक और बेटे की मां बन गई. नेहा के साथ उस के सासससुर भी रह रहे थे. जोधपुर आने के बाद नेहा महसूस कर रही थी कि उस का पति उस से कुछ ज्यादा ही चिड़ाचिड़ा सा रहने लगा है. उस ने इस पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया. वह सोचती थी कि ड्यूटी की भागादौड़ी की वजह से यह सब हो रहा है, सब ठीक हो जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. ठीक होने के बजाय घर में हर समय कलह रहने लगी.

बातबात पर प्रदीप व उस की मां उसे डांटतेफटकारते थे. नेहा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग उस के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में आखिर वह क्या करे. रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर नेहा ने एक दिन अपनी मां पार्वती देवी व सहेलियों को यह बात बता दी. मां ने नेहा को ही समझाया कि पारिवारिक विवाद हर घर में होता है. आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा. लेकिन घर का माहौल ठीक नहीं हुआ. दिनप्रतिदिन घर में कलह बढ़ती ही गई. नेहा जैसे ही प्रदीप के सामने पड़ती, वह उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहता, ‘‘मैं ने तुम से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. काश, मैं अपनी मनमरजी से शादी करता तो मेरा जीवन आज नरक नहीं बनता.’’

पति के मुंह से यह बात सुन कर नेहा समझ गई कि प्रदीप ने अपने घर वालों के दबाव में शादी की है. तभी तो वह इस तरह की बातें कह रहा है. नेहा कुछ कहती तो प्रदीप उस पर चिल्लाने लगता. सास तो उसे चैन से बैठने तक नहीं देती. नेहा कहां तो प्रदीप से शादी करने के बाद खुद को किस्मत वाली समझ रही थी. लेकिन अब उस के व्यवहार को देख कर सोचती थी कि इस से तो भला था वह किसी गरीब लड़के से ब्याही होती. एक रोज तो हद ही हो गई. प्रदीप ने अपने मोबाइल में एक लड़की का फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी जिंदगी में नहीं आई होती तो मैं इस से ब्याह रचाता. क्योंकि मैं इस से प्यार करता हूं और यह मुझ से. हम दोनों अच्छे मित्र हैं.’’

यह बात सुन कर नेहा के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. अब पति की बेरुखी का कारण उस की समझ में आ गया था. नेहा ने एक दिन मौका मिलते ही प्रदीप के मोबाइल से उस की गर्लफ्रैंड की फोटो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर ली. नेहा जब मायके गई तो वह फोटो उस ने मां को दिखाते हुए अपना दुखड़ा रोया. दामाद की हकीकत जान कर पार्वती भी हक्कीबक्की रह गई. पार्वती ने बेटी की समस्या के बारे में पति और बेटे को भी अवगत कराया. तब भीमाराम अपने कुछ रिश्तेदारों को ले कर प्रदीप के यहां गए और बेटी को तंग करने के मुद्दे पर बात की. उस समय प्रदीप ने उन से वादा किया कि वह आईंदा नेहा को तंग नहीं करेगा.

बात आईगई हो गई. नेहा भी मायके से जोधपुर लौट आई. उस के लौटने पर प्रदीप आंखें तरेर कर बोला, ‘‘अपने मांबाप से मेरी शिकायत कर के तुम ने अच्छा नहीं किया. मैं आबकारी अधिकारी हूं. इसलिए पुलिस के बड़ेबड़े अधिकारियों से मेरे अच्छे संबंध हैं. तुम पुलिस के पास जाओगी, तब भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

पति की बात सुन कर नेहा अवाक सी रह गई. कहां तो वह समझ रही थी कि प्रदीप अब उस से कुछ नहीं कहेगा, लेकिन उस ने तो पहले जैसे ही तेवर दिखाने शुरू कर दिए. नेहा की आंखें भर आईं. पति से बहस करने के बजाय वह चुप हो गई, ताकि बात न बिगड़े. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. सास और प्रदीप ने उस का जीना हराम कर दिया था. प्रदीप अकसर देर रात को घर लौटने लगा. नेहा जब उस से देर से आने की वजह पूछती तो वह कहता कि वह अपनी महिलामित्रों के साथ ऐश कर रहा था. यह सब वह नेहा को चिढ़ाने के लिए कहता था या फिर वह जो कह रहा था सच था, इस बात को वह ही जानता था.

कोई भी महिला सब कुछ सहन कर सकती है, पर यह हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती कि उस का पति किसी दूसरी महिला से नजदीकी बनाए. उसी बीच नेहा ने एक दिन पति को घर में ही एक महिला से हंसहंस कर बातें करते देख लिया. वह वही महिला थी, जिस का फोटो उस ने पति के मोबाइल में देखा था. बात गंभीर थी, इसलिए नेहा ने यह बात अपनी मां को फोन पर बता दी. बेटी की बात सुन कर मायके वाले भी बहुत आहत हुए. नेहा की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी.

वह भी चाहते थे कि किसी तरह प्रदीप पर दबाव बना कर उसे लाइन पर लाया जाए. इसलिए वह अपने गांव के कुछ संभ्रांत लोगों को ले कर प्रदीप के गांव गडरा रोड चले गए. जोधपुर से प्रदीप और उस के घर वाले भी अपने गांव चले गए. गांव में पंचायत हुई. पंचायत में प्रदीप ने फिर से वादा किया कि वह नेहा को अब तंग नहीं करेगा. मगर यह उस का मात्र दिखावा था. वह मन से नेहा को निकाल चुका था. उस के दिल में नेहा की जगह कोई और बस गई थी. यही कारण था कि नेहा के सामने वह इस तरह के हालात खड़े कर रहा था कि नेहा परेशान हो कर खुदबखुद मायके जा कर रहने लगे.

लेकिन वह उस से दूर नहीं होना चाहती थी.  प्रदीप को जब लगा कि नेहा उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है तो वह उस से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. इस के लिए उस के दिमाग में यही उपाय आया कि किसी भी तरह नेहा को ठिकाने लगा दिया जाए. इस से उस का नेहा से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा और कुछ समय बाद वह अपनी उस प्रेमिका से शादी भी कर लेगा, जिस का फोटो नेहा को दिखाया था. भोलीभाली नेहा अपने फरेबी पति के शौतानी दिमाग में मच रही खलबली से नावाकिफ थी. उस के लिए पति और दोनों बेटे ही संसार की सारी खुशियां थीं. नेहा का सोचना था कि हर काली रात के बाद उजाला जरूर होता है. आज नहीं तो कल उस के जीवन से भी अंधकार के बादल छंट जाएंगे और जीवन में उजियारा आएगा. मगर यह उस की सोच भर साबित हुई.

योजना को अंजाम देने के लिए प्रदीप नेहा को ले कर कई बार अपने गांव भी गया, लेकिन मौका न मिलने पर योजना सफल नहीं हो सकी. फिर एक दिन प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘यदि तुम मेरी बीवी बनी रहना चाहती हो तो अपने बाप से 10 लाख रुपए और एक बंगला दिलवा दो. अगर यह नहीं हुआ तो तुम्हें ठिकाने लगा कर मैं अपनी गर्लफ्रैंड से शादी कर लूंगा. मैं अधिकारी हूं, इसलिए पुलिस भी मेरा कुछ नहीं कर पाएगी.’’

यह बात नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लगी. उस ने इस की चर्चा अपने मायके में की. मगर मायके वालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वे प्रदीप की यह मांग पूरी करते. नेहा ने मांबाप की असमर्थता प्रदीप से बता दी. अब प्रदीप ने अपनी चाल चली. 15 अप्रैल, 2015 को प्रदीप नेहा को जोधपुर से ले कर बाड़मेर गया. प्रदीप अपने साथ छोटे भाई हितेश को भी ले गया था. बाड़मेर में एक रात रुक कर अगले दिन वह अपने गांव गडरा रोड गया. पति के बदले मिजाज को देख कर नेहा को शक हो गया. उस ने फोन से अपनी मां पार्वती से बात करते हुए कहा कि मुझे प्रदीप और उस के छोटे भाई हितेष पर शक हो रहा है. ये मेरे साथ कोई अनहोनी कर सकते हैं.

मां ने समझाते हुए कहा कि यह तेरा वहम है. भला वे ऐसा क्यों करेंगे?

‘‘मम्मी, वहम नहीं, न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अब मैं आप से कभी नहीं मिल सकूंगी.’’ इतना कह कर नेहा रोने लगी. मां ने धैर्य रखने को कहा.

3-4 दिन गांव में रुकने के बाद 19 अप्रैल, 2015 की रात प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘चलो, कोई पूजा करनी है, जिस से घर की सुखशांति लौट आए और रोजरोज के क्लेश से मुक्ति मिल जाए.’’

नेहा भी घर में शांति चाहती थी, इसलिए पति के साथ चली गई. पति के साथ वह चली तो गई, लेकिन उस समय कार में बैठने पर उसे डर लग रहा था. बहरहाल वह कार में बैठ कर चली तो गई, लेकिन वापस जीवित नहीं लौटी. दो-ढाई घंटे बाद प्रदीप उस की लाश ले कर वापस अपने घर लौटा. उस समय उस के साथ उस का छोटा भाई हितेष और भाजपा नेता दशरथ मेघवाल भी थे. पड़ोसियों और मोहल्ले वालों के पूछने पर प्रदीप ने विस्तार से बताया, ‘‘चलती गाड़ी का दरवाजा अचानक खुल जाने से नेहा सड़क पर गिर गई. घायल अवस्था में इसे गडरा रोड अस्पताल ले जाया गया, जहां डा. अशोक मीणा ने हालत नाजुक बताई और ऐंबुलैंस से इसे बाड़मेर ले जाने की सलाह दी. तब मैं बाड़मेर अस्पताल ले गया. लेकिन वहां के डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया.

‘‘चूंकि मामला दुर्घटना का था, इसलिए डाक्टर ने पुलिस को सूचना दे दी. उस समय आधी रात का समय था. एक कांस्टेबल अस्पताल आया. उस ने कहा कि शव मोर्चरी में रखवा देते हैं, सुबह पोस्टमार्टम के बाद ले जाना. मैं ने सिपाही को अपना परिचय देते हुए कहा कि इन की मौत कार का गेट खुलने पर गिरने से हुई है. मैं इन का पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहता. सिपाही को मेरी बात समझ आ गई और मैं लाश को घर ले आया.’’

प्रदीप ने नेहा की मौत की खबर उस के मायके वालों को देने के बजाय सुबह नेहा का अंतिम संस्कार कर दिया. शव के ऊपर उस ने नमक डाल दिया था. नेहा मेघवाल जाति की थी और राजस्थान में मेघवाल जाति के लोगों का अंतिम संस्कार जमीन में दफना कर ही किया जाता है. मेघवाल जाति हिंदू धर्म में ही आती है, इस के बावजूद भी इस जाति के लोग चिता जलाने के बजाय अंतिम संस्कार लाश को दफना कर करते हैं. नेहा एक जिला आबकारी अधिकारी की पत्नी थी, इसलिए मीडिया वालों को जब घटना की जानकारी हुई तो प्रिंट और इलेक्ट्रौनिक मीडिया में नेहा की मौत की खबर प्रसारित हुई तो प्रदीप को जानने वाले अनेक लोग उस के गांव पहुंचने लगे.

नेहा के मायके वालों को जब नेहा की ऐक्सीडैंट में मौत होने की खबर मिली तो उस के मायके में चीखपुकार मच गई. मायके वाले प्रदीप के गांव पहुंचे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चलती कार का गेट अचानक कैसे खुल जाएगा. अगर मान भी लिया जाए कि नेहा की मौत ऐक्सीडैंट में हुई थी तो प्रदीप ने उन्हें सूचना क्यों नहीं दी. सूचना दिए बगैर और बिना पोस्टमार्टम कराए ही, उस ने जल्दबाजी में उस का अंतिम संस्कार क्यों कर दिया. ऐसे कई सुलगते सवाल थे, जो नेहा के पिता भीमाराम एवं माता पार्वती के साथ उस के भाइयों के दिमाग में घूम रहे थे.

उन्हें ऐसा लग रहा था कि प्रदीप ने नेहा को मार कर ऐक्सीडैंट का रूप दिया है. पार्वती और भीमराम ने 22 अप्रैल, 2015 को बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख अनिल से मुलाकात कर के बेटी की शादी होने के बाद से उसे प्रताडि़त करने, दहेज मांगने की पूरी बात बताई. उन्होंने बताया कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या का मामला है. उन्होंने नेहा के पति प्रदीप बालाच, देवर हितेष और सास के ऊपर शक जताते हुए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी काररवाई करने की मांग की. नेहा की लाश का पोस्टमार्टम नहीं करवाने और मायके वालों को मौत की सूचना दिए बगैर आननफानन में लाश का अंतिम संस्कार कराने पर एसपी को भी शक हो गया.

उन्होंने गडरा रोड के थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि प्रदीप बालाच और उस के भाई को थाने बुला कर पूछताछ की जाए, ताकि नेहा की मौत की सच्चाई सामने आ सके. उधर मीडियाकर्मी अपने स्तर पर नेहा की मौत के राज से परदा उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े. प्रदीप बालाच ने जहां नेहा की दुर्घटना होने की बात बताई थी, उस जगह रात 10 बजे रियाज खां नाम का एक शख्स अपनी गाड़ी ले कर गुजर रहा था. रियाज ने सड़क किनारे बोलेरो देख कर अपनी गाड़ी रोक दी थी. उसे बोलेरो में लाल शर्ट पहने ड्राइवर व एक बच्चा बैठा दिखा. सड़क से दूर एक व्यक्ति टौर्च लिए खड़ा था.

रियाज ने जब ड्राइवर से पूछा कि कहां से आए हो तो उसने जवाब देने के बजाय जीप के गेट का शीशा ऊपर चढ़ा दिया. इस के बाद रियाज वहां से गाड़ी ले कर चला गया. रियाज को पत्रकारों ने ढूंढ़ निकाला था और उस से बात कर के यह साबित कर दिया था कि जरूर नेहा को मारा गया था. प्रदीप आबकारी विभाग, जोधपुर की बोलेरो जीप नंबर आरजे19यू आर1069 ले कर जोधुपर से गडरा रोड आया था. उस समय नेहा का 4 वर्षीय बेटा रजत भी था. पत्रकारों ने आबकारी विभाग, जोधपुर के ड्राइवर सुगनलाल से बात की तो उस ने बताया कि उस दिन जीप प्रदीप बालाच के पास थी. नेहा की मौत की खबर मिलने पर वह 20 अप्रैल को प्रदीप बालाच की इनोवा गाड़ी में प्रदीप के मातापिता को ले कर गडरा रोड गया था. इनोवा को गडरा में छोड़ कर वह सरकारी बोलेरो गाड़ी ले कर जोधपुर लौट आया था.

मीडिया द्वारा पुलिस को यह खबरें मिलीं तो एसपी के निर्देश पर चोहटन के सीओ नीरज पाठक ने भाजपा के पदाधिकारी दशरथ मेघवाल से पूछताछ की. दशरथ ने बताया, ‘‘मुझे फोन पर प्रदीप बालाच ने बताया था कि कार का गेट खुलने से नेहा का ऐक्सीडैंट हो गया है और मैं गाड़ी ले कर पहुंचूं. चूंकि उन से मेरे घनिष्ठ संबंध थे, इसलिए मैं गाड़ी ले कर घटनास्थल पर गया और नेहा को ले कर गडरा रोड अस्पताल गया. नेहा की हालत गंभीर थी, इसलिए वहां के डाक्टर ने उसे बाड़मेर रैफर कर दिया. बाड़मेर के डाक्टर ने नेहा को मृत घोषित कर दिया था.’’

इस के बाद सीओ नीरज पाठक ने गडरा रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डा. अशोक मीणा के बयान भी नोट किए. इन बयानों के बाद सीओ को जो चौंकाने वाले तथ्य मिले, उस से लगा कि प्रदीप की ससुराल वालों द्वारा लगाए आरोप सही हैं. पुलिस प्रदीप के खिलाफ पहले सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए 24 अप्रैल, 2015 को मैडिकल बोर्ड और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नेहा का शव जमीन से निकाल कर पोस्टमार्टम कराया. नमक डालने की वजह से शव सड़गल चुका था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नेहा की मौत सड़क हादसे में नहीं हुई थी. उस के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिस से लगे कि उस की मौत हो गई. नेहा की मौत के कारणों को जानने के लिए विसरा को मैडिकल कालेज, जोधपुर भेज दिया गया.

पुलिस को पूछताछ में पता चला कि प्रदीप बालाच की सरकारी बोलेरो गाड़ी घटनास्थल पर मौजूद थी. इस के बाद उसे बाड़मेर रैफर करने तक प्रदीप ने 3 बार गाडि़यां बदलीं. अपनी सरकारी गाड़ी से नेहा को वह अस्पताल क्यों नहीं ले गया? उस ने अस्पताल ले जाने के लिए भाजपा नेता को क्यों बुलाया? ये सारे सबूत मिल जाने के बाद प्रदीप बालाच और उस के छोटे भाई से पूछताछ करनी जरूरी थी. पुलिस जब उस के घर पहुंची तो हितेष घर से गायब मिला और प्रदीप ने थाने आने से मना कर दिया. सीओ ने इस बात से एसपी को अवगत कराया. एसपी को प्रदीप की यह बात नागवार लगी. उन का मानना था कि सरकारी अधिकारी होने के नाते आबकारी अधिकारी प्रदीप को पुलिस जांच में सहयोग करना चाहिए.

उन्होंने सीओ नीरज पाठक के नेतृत्व में भारी पुलिस बल प्रदीप के घर 25 अप्रैल, 2015 को भेज दिया. पुलिस प्रदीप को पूछताछ के लिए गडरा रोड थाने ले आई. पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख, सीओ चोहटन नीरज पाठक, गडरा रोड थानाप्रभारी बाबूलाल विश्नोई ने प्रदीप से नेहा की हत्या से संबंधित मनोवैज्ञानिक तरीके से रातभर पूछताछ की. लेकिन वह पुलिस को गुमराह करने के लिए बारबार रोने का नाटक करता रहा. पूरी रात ऐसे ही बीत गई. सुबह को अधिकारियों ने उस से फिर पूछताछ की. इस बार वह पुलिस अधिकारियों के सवालों के चक्रव्यूह में फंस गया. आखिर उस ने पत्नी नेहा की हत्या का राज उगल दिया. वह फफकफफक कर रोते हुए बोला, ‘‘हां, मैं ने नेहा की हत्या की है. लंबे समय से कलह के कारण मैं परेशान हो गया था और बस इसी कारण मैं ने उस की जान ले ली.’’

प्रदीप ने बताया कि वह नेहा को टोनेटोटके के बहाने हेलीपैड पर ले गया. वहां टोटका करने के लिए अगरबत्ती जलाई, गेहूं, ज्वार के दाने रखे. जब नेहा पूजा कर रही थी, उस समय गाड़ी में रखे डंडे से नेहा के सिर पर वार किया, जिस से वह घायल हो गई. उसी समय उस ने अपने छोटे भाई हितेष को वहां बुला लिया. फिर वे दोनों नेहा को गाड़ी में डाल कर जैसिंधर गांव से दूर सुनसान सड़क पर ले गए. वहां उन्होंने गाड़ी रोकी और नेहा को धक्का दे कर गिरा दिया ताकि हत्या को हादसे का रूप दे सकें. बाद में उस का गला घोंट दिया.

पुलिस टीम ने जोधुपर से आबकारी विभाग की बोलेरो गाड़ी भी जब्त कर ली. इस के अलावा घटनास्थल से माचिस, लकड़ी के टुकड़े व अन्य सामग्री जब्त की. भीमाराम की तहरीर के आधार पर नेहा की हत्या का मुकदमा गडरा रोड थाना में भादंवि की धारा 302, 498ए, 201 के तहत प्रदीप बालाच, उस के छोटे भाई हितेष बालाच व मां के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. जांच एसआई बाबूलाल बिश्नोई को सौंप दी गई. पुलिस ने हितेष की गिरफ्तारी के लिए अलगअलग टीमें गठित कर उस की तलाश शुरू कर दी. प्रदीप बालाच को 27 अप्रैल को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, वहां से उसे 3 दिन के रिमांड पर ले कर उस से विस्तार से पूछताछ की और घटनास्थल की तफ्तीश कराने के साथ कई सबूत भी जुटाए.

प्रदीप ने पुलिस अधिकारियों से कहा कि पत्नी की हत्या कर के उस ने बड़ा अपराध किया है. उधर 27 अप्रैल, मंगलवार को हितेष बालाच ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. पुलिस टीम उसे भी घटनास्थल पर ले गई और मौका मुआयना कर नेहा की हत्या से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल की. हितेष को 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया. 30 अप्रैल को पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर प्रदीप व हितेष को बाड़मेर कोर्ट में पेश कर और रिमांड मांगा. प्रदीप को 2 दिनों के रिमांड पर दिया, वहीं हितेष को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

2 दिनों के रिमांड अविध पूर्ण होने पर गडरा पुलिस द्वारा प्रदीप बालाच को 2 मई, 2015 को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, जहां न्यायाधीश द्वारा प्रदीप बालाच को भी न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के आदेश दिए. दोनों भाई न्यायिक अभिरक्षा में बाड़मेर जेल में बंद अपने किए की भूल पर पछताते हुए आंसू बहा रहे हैं. नेहा के दोनों मासूम बेटे मां की ममता की छांव से हमेशा के लिए दूर हो गए. 5 मई को पुलिस ने नेहा की सास को भी गिरफ्तार कर लिया. उसे धारा 498ए (दहेज के लिए प्रताडि़त करना) के तहत गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बाड़मेर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

5 मई, 2015 को राज्य सरकार ने पत्नी की हत्या के आरोपी प्रदीप को निलंबित कर दिया है. 48 घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में रहने के कारण राज्य सरकार ने निलंबन आदेश जारी किए. कथा लिखने तक प्रदीप व हितेष बाड़मेर जेल में बंद थे. Rajasthan Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों/समाचार पत्रों/नेहा के मायके पक्ष द्वारा दी जानकारी पर आधारित)

 

Crime Stories: शादी पर दिया मौत का तोहफा

Crime Stories: ‘‘मैं जया को बेइंतहा चाहता था, बहुत प्यार करता था उस से. इतना प्यार कि मैं पागल हो गया था उस के लिए. अपने जीतेजी मैं उसे किसी और की जागीर बनते नहीं देख सकता था. इसलिए मैं ने उसे मौत के घाट उतार दिया.’’ कहतेकहते अनुराग पलभर के लिए रुका, फिर आगे बोला, ‘‘अब ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, फांसी हो जाएगी. मुझे फांसी भी मंजूर है. कम से कम एक बार में ही मौत तो आ जाएगी. वह किसी और की हो जाती तो मुझे रोजरोज मरना पड़ता.’’

पुलिस हिरासत में यह सब कहते हुए अनुराग नामदेव अपना गुनाह कुबूल कर रहा था या फिर अपनी मोहब्बत की दास्तां सुना कर दिल की भड़ास निकाल रहा था, समझ पाना मुश्किल था. उस की ये बातें सुन कर वहां मौजूद पुलिसकर्मी भी हैरान थे. वजह यह कि इस कातिल के चेहरे पर शर्मिंदगी या पछतावा तो दूर की बात, किसी भी तरह का डर नहीं था.पुलिस हिरासत में अच्छे अच्छे अपराधियों के कसबल ढीले पड़ जाते हैं, पर अनुराग का आत्मविश्वास वाकई अनूठा था. उस की हर बात जया से अपनी मोहब्बत के इर्दगिर्द  घूम रही थी. मानों दुनिया में उस के लिए जया और उस के प्यार के अलावा और कुछ था ही नहीं.

लालघाटी क्षेत्र भोपाल का वह हिस्सा है, जहां शहर खत्म हो जाता है और उपनगर बैरागढ़ शुरू होता है. लालघाटी का चौराहा और रास्ता दोनों भोपाल-इंदौर मार्ग पर पड़ते हैं, जहां चौबीसों घंटे आवाजाही रहती है. एयरपोर्ट भी इसी रास्ते पर है और शहर का चर्चित वीआईपी रोड भी इसी चौराहे पर आ कर खत्म होता है.पिछले 15 सालों में लालघाटी चौराहे और बैरागढ़ के बीच करीब 2 दर्जन छोटेबड़े मैरिज गार्डन बन गए  . इन्हीं में एक है सुंदरवन मैरिज गार्डन. शादियों के मौसम में यह इलाका काफी गुलजार हो उठता है. रास्ते के दोनों तरफ बारातें ही बारातें दिखती हैं. घोड़ी पर सवार दूल्हे, उन के आगे नाचतेगाते बाराती और आसमान छूती रंगबिरंगी आतिशबाजी. नजारा वाकई देखने वाला होता है. शादियों के चलते इस रास्ते पर ट्रैफिक जाम की समस्या आम बात है.

8 मई को सुंदरवन मैरिज गार्डन में रोजाना के मुकाबले कुछ ज्यादा रौनक और चहलपहल थी. रात 8 बजे से ही मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. इस मैरिज गार्डन में डा. जयश्री नामदेव और डा. रोहित नामदेव की शादी होनी थी. वरवधू दोनों ही भोपाल के हमीदिया अस्पताल में कार्यरत थे. डा. जयश्री बाल रोग विभाग में थीं और डा. रोहित सर्जरी डिपार्टमेंट में कार्यरत थे.

जयश्री और रोहित की शादी एक तरह से अरेंज मैरिज थी. जयश्री नामदेव 4 साल पहले ही जबलपुर मेडिकल कालेज से पीजी की डिग्री ले कर भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर तैनात हुई थीं. जयश्री के आने से पहले हमीदिया अस्पताल में एक ही डाक्टर नामदेव थे डा. रोहित. अब दूसरी नामदेव डा. जयश्री आ गई थीं. डा. जयश्री स्वभाव से बेहद हंसमुख और मिलनसार थीं. अस्पताल में स्वाभाविक तौर पर उन की खूबसूरती की चर्चा भी होती रहती थी.

अस्पताल में नामदेव सरनेम वाले 2 डाक्टर थे और दोनों कुंवारे. अगर दोनों शादी कर लें तो कितना अच्छा रहेगा. जयश्री और रोहित को ले कर अस्पताल में अकसर इस तरह का हंसीमजाक होता रहता था. डा. जयश्री के पिता घनश्याम नामदेव को जब पता चला कि उन्हीं की जाति का एक लड़का हमीदिया अस्पताल में डाक्टर है तो उन्होंने अपने स्तर पर पता लगा कर जयश्री की शादी की बातचीत चलाई.रोहित के पिता रघुनंदन नामदेव जिला हरसूद के गांव छनेरा के रहने वाले थे और सिंचाई विभाग में कार्यरत थे. जयश्री और  की शादी की बात चली तो रोहित के घर वाले भी तैयार हो गए. दोनों ही परिवारों के लिए यह खुशी की बात थी, क्योंकि नामदेव समाज में गिनती के ही लड़के लड़कियां डाक्टर हैं.

घनश्याम नामदेव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के कर्मचारी थे, जो रिटायरमेंट के बाद भोपाल के करोंद इलाके में बस गए थे. करोंद में उन्होंने खुद का मकान बनवा लिया था. उन की पत्नी लक्ष्मी घरेलू लेकिन जिम्मेदार महिला थीं. नामदेव दंपति की एक ही बेटी थी जयश्री. होनहार और मेधावी जयश्री ने 2003 में प्री मेडिकल परीक्षा पास करने के बाद भोपाल के गांधी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस किया था और फिर जबलपुर मैडिकल कालेज से पोस्ट ग्रेजुएट.

बहरहाल, डा. रोहित और डा. जयश्री की शादी तय हो गई. 3 फरवरी, 2014 को पुराने भोपाल के एक होटल में रोहित और जयश्री की सगाई की रस्म पूरी की गई. सगाई के बाद दोनों पक्ष शादी की तैयारियों में लग गए.घनश्याम की छोटी बहन अंगूरीबाई का विवाह सागर जिले के गढ़ाकोटा कस्बे में हुआ था. अब से डेढ़ साल पहले उस के पति कल्लूराम की कैंसर से मौत हो गई थी. बहनोई के अंतिम संस्कार का सारा  घनश्याम ने ही उठाया था. अंगूरीबाई के 2 बेटे थे अनुराग नामदेव और अंबर नामदेव. अंबर अभी पढ़ रहा था.  इस परिवार का खरचा कपड़ों के पुश्तैनी व्यापार से चलता था. लेकिन उन का यह व्यापार मामूली स्तर का था, जिसे कल्लूराम के छोटे भाई उमाशंकर नामदेव संभालते थे.

पति की मृत्यु के बाद अंगूरी की सारी दुनिया अपने दोनों बेटों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थी, क्योंकि वह खुद भी कैंसर की चपेट में आ गई थी. बहन की वजह से घनश्याम उस के और उस के बच्चों को ले कर चिंतित रहते थे. समयसमय पर वह उन की हर मुमकिन मदद भी करते रहते थे.जब कल्लूराम जीवित थे तो  दफा उन्होंने घनश्याम से अनुराग की नौकरी के लिए बात छेड़ी थी. इस पर उन्होंने उसे भोपाल आ कर बैंकिंग की कोचिंग लेने को कहा था. अनुराग को सहूलियत यह थी कि रहने और खानेपीने के लिए मामा का घर था. घनश्याम ने कोचिंग की फीस देने के लिए भी कह दिया था. यह सन 2005 की बात है. तब जयश्री एमबीबीएस के दूसरे साल में थी.

मामा से बातचीत के बाद अनुराग भोपाल आ गया और सबधाणी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करने लगा. मामा मामी और ममेरी बहन जयश्री उस का पूरा खयाल रखती थी. सभी को उस के घर के हालात की वजह से सहानुभूति थी. कोचिंग के दौरान एक बार अनुराग गंभीर रूप से बीमार पड़ा तो जयश्री और उस के मामा मामी ने उसे हमीदिया अस्पताल में भरती करवाया. उस की देखभाल से ले कर उस के इलाज का सारा खर्च भी उन्होेंने ही उठाया. मामा के यहां रहते हुए अनुराग जयश्री को एकतरफा प्यार करने लगा था.

कोचिंग के बाद अनुराग का चयन एचडीएफसी बैंक में पीओ के पद पर हो गया. उसे पोस्टिंग मिली सागर में. नौकरी जौइन करने के बाद वह सागर के पौश इलाके सिविल लाइंस में किराए का मकान ले कर रहने लगा. लेकिन सागर जाने के बाद भी भोपाल से उस का नाता नहीं टूटा. अनुराग जयश्री को प्यार से जया कहता था, लेकिन उस का यह प्यार एक भाई का नहीं, बल्कि एक ऐसे आशिक का था, जिसे न तो रिश्तेनातों का लिहाज था और न मान मर्यादाओं की परवाह.

दरअसल अनुराग मन ही मन जयश्री को चाहने लगा था और यह मान कर चल रहा था कि वह भी उसे चाहती है. नजदीकी रिश्तों में इस उम्र में दैहिक आकर्षण स्वाभाविक बात है, पर समझ आने के बाद वह खुद ब खुद खत्म हो जाता है. लेकिन अनुराग यह बात समझने को तैयार नहीं था कि हिंदू सभ्यता में सामाजिक रूप से भी और कानूनी रूप से भी ऐसे रिश्तों में प्यार, सैक्स और शादी सब कुछ वर्जित है.

अनुराग ने जब अपना प्यार जयश्री पर जाहिर किया तो वह सकते में आ गई. अनुराग उस का फुफेरा भाई था और जयश्री को सपने में भी उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. जयश्री ने अपने स्तर पर ही अनुराग को समझाने की कोशिश की. लेकिन अनुराग आसानी से समझने वालों में नहीं था. जब भी मौका मिलता, वह उस से अपने प्यार की दुहाई दे कर शादी की बात कहता रहता. जब अनुराग जयश्री पर बराबर दबाव बनाने की कोशिश करने लगा तो मजबूरी में उस ने यह बात अपने मातापिता को बता दी.

हकीकत जान कर लक्ष्मी और घनश्याम के पैरों तले से जमीन खिसक गई. फिर भी उन्होंने बेटी को सब्र और समझदारी से काम लेने की सलाह दी और जल्दी ही इस परेशानी का हल निकालने का भरोसा दिलाया. निकट की रिश्तेदारी का मामला था. ऐसे में इस का एक ही रास्ता था कि अंगूरी से बात की जाए, ताकि संबंध खराब न हों. बात की भी गई. बड़े भाई के उपकारों तले दबी अंगूरी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह अनुराग को समझाएगी.

लेकिन अनुराग के तथाकथित प्यार का पागलपन समझने समझाने की हदें पार कर चुका था. मां के समझाने पर वह मान भी गया, पर दिखावे और कुछ दिनों के लिए. वक्त गुजरता रहा, लेकिन अनुराग के दिलोदिमाग से ममेरी बहन जयश्री की प्रेमिका की छवि नहीं मिट सकी. मायूस हो कर वह लुटेपिटे आशिकों की तरह दर्द भरे गानों और शेरोशायरी में अपने बीमार दिल की दवा ढूंढने लगा. लेकिन इस से उस का दर्द बढ़ता ही गया.

3 फरवरी को जयश्री और रोहित की सगाई थी. जयश्री के पिता घनश्याम ने इस की भनक अनुराग को नहीं लगने दी. लेकिन रोहित ने सगाई के 2 दिनों बाद 5 फरवरी को अपनी सगाई के फोटो फेसबुक पर शेयर किए तो उन्हें देख कर अनुराग बिफर उठा. उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उस के जख्मों पर नमक छिड़क दिया हो.

उस ने बगैर वक्त गंवाए घनश्याम और जयश्री से संपर्क कर के न केवल शादी की अपनी बेहूदी ख्वाहिश जाहिर की, बल्कि न मानने पर उन्हें देख लेने की धमकी भी दे डाली. उस की बात सुन कर घनश्याम चिंता में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्योंकि कोई कानूनी काररवाई करते तो बदनामी का डर था. वैसे भी एक तो सगी बहन के लड़के का मामला था, दूसरे ऐसे मामलों में बात उछलने पर बदनामी लड़की की ही होती है.

डा. जयश्री इसलिए ज्यादा चिंतित नहीं थी, क्योंकि उन्होंने अपने मंगेतर डा. रोहित को अनुराग के बारे में सब कुछ बता दिया था. यह एक पढ़ीलिखी युवती का अपने भविष्य और दांपत्य के मद्देनजर समझदारी भरा कदम था. उधर फेसबुक पर जयश्री और राहुल की सगाई के फोटो देखदेख कर अनुराग का जुनून और बढ़ता जा रहा था. धमकी के बावजूद घनश्याम और जयश्री पर कोई असर न होता देख वह और भी बौखला गया था. उसे लग रहा था कि अब जयश्री उसे नहीं मिल पाएगी.

दूसरी ओर भोपाल में शादी की तैयारियों में लगे घनश्याम चिंतित थे कि कहीं अनुराग कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे. उस की बेहूदी हरकतों के बारे में सोचसोच कर कभीकभी वह यह सोच कर गुस्से से भी भर उठते थे कि जिस भांजे को बेटे की तरह रखा, वही आस्तीन का सांप निकला. उन के दिमाग में अनुराग की यह धमकी बारबार कौंध जाती थी कि अगर मेरी बात नहीं मानी तो अंजाम भुगतने को तैयार रहना.

उन के डर की एक वजह यह भी थी कि वह अनुराग के स्वभाव को जानते थे. लेकिन जवान बेटी का बाप होने की बेबसी उन्हें कोई कदम नहीं उठाने दे रही थी. इसलिए शादी के कुछ दिनों पहले उन्होंने अपने भतीजे शैलेंद्र नामदेव से इस बारे में सलाहमशविरा किया तो उस ने फोन पर अनुराग को ऊंचनीच समझाने की कोशिश की. इस पर अनुराग का एसएमएस आया कि तू अपनी दोनों बेटियों का खयाल रख, उन्हें अभी बहुत जीना है.

आखिरकार डरते सहमते 8 मई आ गई. उस दिन जयश्री और रोहित की शादी थी. रात के करीब 8 बजे रोहित और जयश्री स्टेज पर बैठे थे. परिचित और रिश्तेदार आने शुरू हुए तो 9 बजे तक मैरिज गार्डन में काफी भीड़ जमा हो गई. हर कोई खुश था. खासतौर से दोनों के घर वाले और हमीदिया अस्पताल के बाल रोग विभाग और शल्य चिकित्सा विभाग के डाक्टर्स और कर्मचारी. खाने के पहले या बाद में लोग स्टेज पर जा कर वरवधू को शुभकामनाएं और आशीर्वाद दे रहे थे. घनश्याम और लक्ष्मी भी लोगों की शुभकामनाएं लेते यहां वहां घूम रहे थे. उन की जिंदगी का वह शुभ समय नजदीक आ रहा था, जब उन्हें एकलौती बेटी के कन्यादान की जिम्मेदारी निभानी थी.

तभी अचानक भीड़ में अनुराग को देख कर लक्ष्मी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं तो वह पति को ढूंढने लगी. घनश्याम नहीं दिखे तो कुछ सोच कर वह एकांत में जा कर खड़ी हो गईं. उसे इस तरह खड़ा देख, उस की एक पड़ोसन ने आ कर पूछा भी कि क्या हुआ जो इस तरह घबराई हुई हो. इस पर लक्ष्मी ने इशारा कर के पड़ोसन को दरवाजे के पास खड़े अनुराग के बारे में बताया.

अनुराग एकदम सामान्य नजर आ रहा था और मेहमानों की तरह ही घूम रहा था. उस के गले में सफेद रंग का गमछा लटका था. तब तक रात के 10 बज चुके थे और भीड़ छटने लगी थी. इस के बावजूद स्टेज के पास वरवधू के साथ फोटो खिंचवाने वालों की लाइन लगी हुई थी. दूसरी ओर अनुराग की निगाहें स्टेज पर ही जमी थीं.

अचानक अनुराग स्टेज की तरफ बढ़ा और पास जा कर रोहित को बधाई दी. इस से पहले कि डा. रोहित उसे धन्यवाद दे पाते, अनुराग ने फुरती से रिवाल्वर निकाला और जयश्री की तरफ तान कर 2 फायर कर दिए. दोनों गोलियां जयश्री के सीने में धंस गईं. कोई कुछ समझ पाता, इस के पहले ही डा. जयश्री स्टेज पर गिर  पड़ीं. इसी बीच अनुराग ने अविलंब रोहित को निशाने पर ले लिया, लेकिन तब तक वह संभल चुके थे. नतीजतन गोली स्टेज के पीछे जा कर लगी, जिस के कुछ छर्रे रोहित के दोस्त कचरू सिसोदिया के पैर में लगे.

करीब 2 मिनट सकते में रहने के बाद जब लोगों को समझ में आया कि दुलहन पर गोली चली है तो उन्होंने गोली चलाने वाले अनुराग को पकड़ कर उस की धुनाई शुरू कर दी. उधर स्टेज पर रोहित जयश्री को संभाल रहे थे. इस बीच वहां मौजूद लेगों में से किसी ने पुलिस और अस्पताल में खबर कर दी थी. जयश्री को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. लेकिन डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. फायर से भगदड़ मच गई थी. डर कर कई लोग वहां से भाग भी गए थे. जहां कुछ देर पहले तक हंसीमजाक चल रहा था, रौनक थी, वहां अब सन्नाटा पसर गया था. स्टेज पर रखे तोहफे और गुलदस्ते डा. जयश्री के खून से सन गए थे.

गुस्साई भीड़ ने अनुराग की जम कर धुनाई की थी, जिस से वह बेहोश हो कर गिर गया था. पुलिस आई तो पता चला कि वह जिंदा है. उसे तुरंत इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. अब तक किसी को यह नहीं मालूम था कि अनुराग दुलहन का ममेरा भाई है. दूसरे दिन जिस ने भी सुना, स्तब्ध रह गया. अपनी ममेरी बहन को माशूका मानने वाले इस सिरफिरे आशिक की चलाई 2 गोलियों की गूंज भोपाल में ही नहीं, पूरे देश भर में सुनाई दी. जब जयश्री की मौत की पुष्टि हो गई तो रात 2 बजे रोहित और उस के पिता बारात वापस ले कर अपने गांव छनेरा चले गए. एक ऐसी बारात, जिस के साथ दुल्हन नहीं थी.

बाद में पता चला कि वारदात के दिन अनुराग सागर से अपने एक दोस्त की मोटरसाइकिल मांग कर लाया था और देसी रिवाल्वर उस ने कुलदीप नाम के एक दलाल से 17 हजार रुपए में खरीदी थी. कत्ल की सारी तैयारियां उस ने पहले ही कर ली थीं. सुंदरवन मैरिज गार्डन में प्रवेश के पहले ही वह पूरी रिहर्सल कर चुका था. उसे इंतजार बस मौका मिलने का था, जो उस वक्त मिल गया जब डा. रोहित और जयश्री स्टेज पर लोगों की शुभकामनाएं ले रहे थे.

पुलिस हिरासत में अनुराग ने बताया कि जैसे ही जयश्री ने राहुल के गले में माला डाली, मैं ने अपना आपा खो दिया था. मुझे नहीं मालूम कि लोगों ने मुझे मारा भी था. मैं तो खुद को भी गोली मारने वाला था, लेकिन मौका नहीं मिला. घायल अनुराग को हमीदिया अस्पताल के बजाय दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. दरअसल पुलिस को डर था कि कहीं अस्पताल के लोग उसे मार न डालें. क्योंकि जयश्री वहां काम करती थी. इस बीच कोहेफिजा थाना पुलिस ने उस के खिलाफ जयश्री की हत्या का मामला दर्ज कर लिया था.

दूसरे दिन पोस्टमार्टम के बाद जब जयश्री की अर्थी उठी तो नामदेव दंपत्ति का दुख देख सारा मोहल्ला रो उठा. लक्ष्मी और घनश्याम रह रह कर बेटी की अर्थी पर सिर पटक रहे थे. हमीदिया अस्पताल में भी मातम छाया था. एकतरफा प्यार में डूबा अनुराग दरअसल मनोरोगी बन गया था. जिस जुनून में उस ने वारदात को अंजाम दिया था, उसे इरोटोमेनिया भी कहते हैं और डिल्यूजन औफ लव भी. इस रोग में मरीज अपनी बनाई मिथ्या धारणा को ही सच मान कर चलता है और किसी के समझाने पर भी नहीं मानता. ऐसा मरीज बेहद शातिर और खतरनाक होता है.

जयश्री और अनुराग के बीच में क्या कभी प्रेमिल संबंध रहे थे, जैसा कि अनुराग कह रहा है, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. बहरहाल सच जो भी रहा हो, जयश्री के साथ चला गया. घनश्याम नामदेव ने बदनामी से बचने की जो कोशिश की थी, वह उन्हें काफी महंगी पड़ी. अगर वह वक्त रहते भांजे के खिलाफ कानूनी काररवाई करते तो जयश्री बच सकती थी. Crime Stories

Film: सलमान खान का नया रूप – बजरंगी भाईजान

Film: बड़े फिल्म स्टार तो कई हैं, लेकिन सलमान खान की बात ही अलग है, जब भी उन की कोई नई फिल्म आती है तो दर्शक उत्साह से भर उठते हैं. ईद पर आई उन की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर वह खुद भी उत्साहित हैं और उन के चाहने वाले भी…

शाहरुख खान, आमिर खान, रितिक रोशन, अजय देवगन, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर सभी बड़े फिल्मी सितारे हैं. इन सभी की फिल्मों ने 100-100 करोड़ से ज्यादा कमाए हैं लेकिन लोगों में जो क्रेज सलमान खान का है, वह किसी का नहीं. इस मामले में बौलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान भी कहीं पीछे छूट जाते हैं. इस की वजह शायद यह है कि जो इंसानियत, सहृदयता, संस्कार, मासूमियत, दूसरों की मदद करने का जज्बा, सुगठित बदन, जबरदस्त अभिनय क्षमता और खूबसूरती सलमान में है, वैसा पूरा पैकेज किसी दूसरे हीरो में नजर नहीं आता. इस से भी बड़ी बात है उन की स्क्रिप्ट की समझ, जो शायद उन्होंने अपने पिता सलीम खान से सीखी, जो फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज लेखक रहे हैं.

शायद इन्हीं खूबियों की वजह से सलमान खान की फिल्म ‘वांटेड’ के बाद लगभग सभी फिल्मों ने सौ करोड़ से ज्यादा कमाए. उन की 2009 में आई ‘वांटेड’, 2010 में आई ‘दबंग’ 2011 में आई ‘रेडी’ और ‘बौडीगार्ड’ ने बहुत मोटी कमाई की. ये सभी उन की सुपरहिट फिल्में थीं.

आजकल बड़े सितारों की फिल्मों का 100-200 और 300 करोड़ क्लब में शामिल होने का क्रेज सा बन गया है. सलमान की लगातार हिट हुई फिल्मों की बात करें तो उन की ‘एक था टाइगर’ ने 198 करोड़, ‘दबंग’ ने 145 करोड़, ‘दबंग-2’ ने 158 करोड़, ‘बौडीगार्ड’ ने 142 करोड़, ‘रेडी’ ने 120 करोड़, ‘जय हो’ ने 111 करोड़ और ‘किक’ ने 233 करोड़ रुपए कमाए. ‘किक’ उन की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी. इस मामले में शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 226 करोड़ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ भी 203 करोड़ पर सिमट कर रह गई थीं. हां, आमिर खान की ‘धूम-3’ ने 280 करोड़ और ‘पीके’ ने 339 करोड़ की कमाई कर के जरूर सलमान खान से बाजी मारी.

अब जब सलमान की ‘बजरंगी भाईजान’ रिलीज हो गई है तो उन की चाहत है कि उन की यह फिल्म ‘पीके’ की तरह 300 करोड़ क्लब में शामिल हो. दर्शकों ने जिस तरह फिल्म को हाथोंहाथ लिया है, उस से यह असंभव भी नहीं लगता. निस्संदेह ‘बजरंगी भाईजान’ बहुत अच्छी फिल्म है. इस फिल्म के डाइरैक्टर कबीर खान और सलमान खान इस से पहले भी फिल्म ‘एक था टाइगर’ में साथसाथ काम करचुके हैं, जो इन दोनों की सुपरहिट फिल्म थी. वहीं से दोनों की कैमिस्ट्री भी बनी.

कबीर खान की बात करें तो डाक्युमेंट्री फिल्मों की दुनिया से व्यावसायिक सिनेमा में आए कबीर खान ‘एक था टाइगर’ के अलावा ‘काबुल एक्सप्रेस’ और ‘न्यूयार्क’ फिल्में बना चुके हैं जो हिट फिल्में थीं. कबीर खान पहले यशराज फिल्म्स के लिए काम कर रहे थे. स्वतंत्र रूप से यह उन की पहली फिल्म है, जिस के निर्माता खुद सलमान खान हैं. फिल्म का टाइटल भी कबीर खान ने ही फाइनल किया है. इस फिल्म के लेखक हैं दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक बी. विजेंद्र प्रसाद.

बी. विजेंद्र प्रसाद दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक राजमौली के पिता हैं, जिन की फिल्म ‘बाहुबली’ ने पिछले दिनों उत्तर और दक्षिण भारत में ही नहीं, विदेशों तक में खूब धूम मचाई. यह शायद पहली ऐसी भारतीय फिल्म थी जिस का पहले दिन का ही कलेक्शन 60 करोड़ रहा. उम्मीद है यह फिल्म 500 करोड़ तक कमाएगी. यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब फिल्म की कहानी इतनी अच्छी थी तो बी. विजेंद्र प्रसाद ने इसे अपने बेटे राजमौली को क्यों नहीं दिया? दरअसल इस के पीछे भी एक कहानी है.

असल में ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी कुछ इस तरह की थी कि विजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि यह फिल्म पहले हिंदी में बने, इस के बाद तमिल या तेलुगू में. विजेंद्र प्रसाद को लग रहा था कि इस फिल्म में हीरो की भूमिका सलमान खान ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं, इसलिए वह पहले सलमान खान से ही मिले. सलमान को कहानी बहुत पसंद आई क्योंकि इस में हीरो की भूमिका रियल करेक्टर जैसी थी. वह इस कहानी को मुंहमांगी कीमत पर खरीदने को तैयार हो गए, लेकिन विजेंद्र प्रसाद ने शर्त रखी कि वह इस फिल्म में सहनिर्माता बनना चाहते हैं.

यह बात सलमान को मंजूर नहीं थी, सो बात नहीं बनी. इस के बाद विजेंद्र प्रसाद राकेश रोशन से मिले. कहानी उन्हें भी पसंद आई पर बात सहनिर्माता बनने पर अटक गई. अलबत्ता राकेश रोशन कहानी की पूरी कीमत चुकाने को तैयार थे. दोनों जगह बात न बनती देख अंतत: विजेंद्र प्रसाद ने फैसला किया कि जब कहानी ही देनी है तो क्यों न सलमान खान को दी जाए जो कहानी के नायक के किरदार के हिसाब से एकदम फिट हैं. और इस तरह विजेंद्र प्रसाद की कहानी सलमान के हाथों में आ गई. चूंकि स्क्रिप्ट दमदार थी इसलिए सलमान ने इसे खुद ही बनाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने बतौर डाइरैक्टर चुनाव किया कबीर खान का, जो ‘एक था टाइगर’ के समय से उन के अच्छे दोस्त बन गए थे.

फिल्म की स्टार कास्ट में उन्होंने करीना कपूर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, 6 वर्षीय बच्ची हर्षाली मल्होत्रा, नजीम खान, अलीकुली मिर्जा, दीप्ति नवल, ओम पुरी और शरत सक्सेना का चुनाव किया. फिल्म में अदनान सामी की एक कव्वाली के अलावा उन्होंने उन का स्पैशल अपीयरेंस भी रखा. वैसे फिल्म की बात करें तो इस की पूरी कहानी सलमान खान यानी (फिल्म में) पवन कुमार  चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी और हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी के ही इर्दगिर्द घूमती है. यह एक ऐसे साधारण युवक की कहानी है जो अजीब हालात में फंस कर असाधारण काम कर गुजरता है. हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी इस फिल्म का अहम किरदार है. फिल्म में यह ऐसी अनपढ़ पाकिस्तानी गूंगी बच्ची है जो भारत में अपनी मां से बिछुड़ गई है. उस के पास कोई पहचान भी नहीं है.

सलमान खान यानी पवन कुमार चतुर्वेदी मुन्नी को कैसे उस के घर वालों तक पहुंचाते हैं, यही फिल्म की कहानी है. मानवीय  रिश्तों वाली इस कहानी को इतनी खूबसूरती से गढ़ा गया है कि ज्यादातर बातें हास्यरस की चाशनी में लपेट कर कही गई हैं ताकि दर्शक बोर न हो और बात सीधे उस के दिल तक जाए. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते राजनैतिक स्तर पर भले ही कैसे भी हों, आतंकवाद के समर्थक भले ही भारत में तबाही मचाने के मंसूबे बांधते हों, लेकिन हकीकत यह है कि आम हिंदुस्तानी या आम पाकिस्तानी के मन में किसी तरह का वैरभाव नहीं है.

वैसे भी मेहनत से रोजीरोटी का जुगाड़ करने वालों के पास बिना वजह की दुश्मनी का समय नहीं होता. न ही वे एकदूसरे का बुरा सोचते हैं. उन के बीच इंसानियत का रिश्ता हमेशा कायम रहता है. ‘बजरंगी भाईजान’ में भी इस हकीकत को समझाने का प्रयास किया गया है. इस फिल्म के टाइटल ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर भी खूब होहल्ला मचा. कई शहरों में इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने के लिए अदालतों में अर्जियां दी गईं. कई जगह सुनवाई भी हुई. यह सोचेसमझे या देखे बिना ही कि फिल्म में क्या है? बात सिर्फ इतनी सी कि बजरंगी के साथ भाईजान क्यों जोड़ा गया.

जैसे बजरंगी के सारे कौपीराइट हिंदुओं के पास हों और भाईजान मुस्लिमों की प्रौपर्टी. मसलन जैसे मुट्ठी भर कुछ लोग भाईजान जैसे मीठे शब्द, जो शब्द नहीं बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है, को भी मजहबी रंग में रंग देना चाहते हों तो कुछ बजरंगी (हनुमानजी) नाम रखने पर भी पाबंदी लगा देना चाहते हों. यह अलग बात है कि 2-4 बजरंगी हर गांव, कस्बे और शहर में मिल जाएंगे. और भाईजान तो हिंदू और मुस्लिम दोनों में चलता है. वैसे यह सब इसलिए बेकार की बातें हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्देश दे रखा है कि सेंसर द्वारा पास की गई फिल्म का प्रदर्शन रोकने की अपीलों पर ध्यान न दिया जाए.

बहरहाल, तमाम तरह की अफवाहों और विवादों के बावजूद बजरंगी भाईजान पूरी भव्यता से प्रदर्शित हुई और सफल भी रही. लेकिन इस फिल्म का एक भावनात्मक पहलू और भी है, जिसे शायद ही कोई जानता हो. दरअसल, सलमान खान अपने पिता का न केवल बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं, बल्कि उन से घबराते भी हैं. उन से पूछे बिना वह कोई भी बड़ा काम नहीं करते. सर्वविदित है कि सलमान के पिता सलीम खान विख्यात पटकथा लेखक रहे हैं, जिन्होंने ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म लिखी. ऐसे में पटकथा पर उन की गहरी पैठ होना स्वाभाविक ही है. इसी के मद्देनजर सलमान उन से अपनी फिल्म की पटकथाओं पर उन की राय जरूर लेते हैं. इतना ही नहीं, फिल्म बन जाने के बाद प्रीमियर से पहले उन्हें दिखाते भी हैं ताकि उन की राय जानी जा सके.

जब ‘बजरंगी भाईजान’ बन गई तो कबीर खान और सलमान ने घर पर यह फिल्म सलीम साहब को दिखाई. फिल्म देखने के बाद कबीर खान ने सलीम साहब से उन की राय पूछी तो वह बोले, ‘‘यह फिल्म सलमान के 25 साल के कैरियर की सब से बेहतरीन फिल्म है. लेकिन फिल्म के अंत में सलमान और करीना पर जो गाना फिल्माया गया है, वह अनावश्यक है. इस गाने से फिल्म का प्रभाव खत्म हो रहा है.’’ बहरहाल, सलीम साहब की राय मान कर कबीर खान और सलमान ने वह गाना हटा दिया. अब यह फिल्म 2 घंटे 40 मिनट की रह गई है.

‘बजरंगी भाईजान’ भले ही दिल्ली बेस्ड है, लेकिन इसे पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और कश्मीर में फिल्माया गया है. भारत-पाक का बौर्डर होने की वजह से सब से ज्यादा शूटिंग राजस्थान में हुई. फिल्म में सब से खूबसूरत लोकेशन कश्मीर की हैं. यहां गुलमर्ग में ऐसी जगह शूटिंग की गई है, जहां आज तक कोई फिल्मकार नहीं गया था. साथ ही पहलगाम और सोनमर्ग में भी कई सीन फिल्माए गए हैं. फिल्म के लिए अलगअलग जगह शूटिंग इसलिए की गई क्योंकि फिल्म में सलमान बच्ची को उस के घर पहुंचाने के लिए उसे ले कर जगहजगह घूमते हैं.

सलमान खान को दर्शक एक्शन हीरो के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन बजरंगी भाईजान की कहानी एकदम अलग तरह की है, दिल को छू जाने वाली. करीब 2 घंटे 40 मिनट की इस फिल्म में दर्शक आखिर तक बंधा रहता है तो इस की वजह सलमान का रियल कैरेक्टर जैसा अभिनय है. फिल्म के निर्देशक कबीर खान ने भी अपने निर्देशन से कहानी पर कुछ ऐसी पकड़ बनाए रखी है कि पूरी फिल्म में हर वर्ग के दर्शक कहानी के किरदारों से बखूबी बंधे रहते हैं. दरअसल, पाकिस्तान के छोटे से गांव की रहने वाली सईदा (हर्षाली मल्होत्रा) जन्म से गूंगी है. उस के पिता पाकिस्तानी आर्मी में हैं और मां घरेलू महिला. सईदा बोल तो कुछ नहीं सकती लेकिन समझती सब कुछ है.

गांव के कुछ लोग सईदा के अब्बूअम्मी को बताते हैं कि अगर वह दिल्ली जा कर निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करे तो उन की बच्ची की जुबान लौट सकती है. परेशानी यह है कि सईदा के अब्बू को पाक आर्मी में होने की वजह से भारत का वीजा नहीं मिल सकता. ऐसी स्थिति में सईदा की अम्मी बेटी को ले कर समझौता एक्सप्रेस से दिल्ली आती है. दरगाह पर सजदा करने के बाद जब वह समझौता एक्सप्रेस से वापस लौटती है तो जरा सी देर के लिए एक सुनसान जगह पर ट्रेन रुकती है. इसी दौरान सईदा मां को छोड़ कर ट्रेन से उतर जाती है. तभी टे्रन चल पड़ती है और सईदा वहीं खड़ी रह जाती है.

सईदा की मां सीमा पार जा कर अपनी बेटी को ढूंढने के लिए भारत आना चाहती है, पर दो देशों की सीमा आड़े आ जाती है जिस की वजह से वह भारत नहीं आ पाती. दूसरी ओर सईदा एक मालगाड़ी में सवार हो कर कुरुक्षेत्र जा पहुंचती है. कुरुक्षेत्र में हनुमान जयंती पर विशाल जुलूस निकल रहा है. इस जुलूस में बजरंगबली के पक्के भक्त पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी (सलमान खान) भी शामिल हैं. इसी जुलूस के दौरान सईदा की मुलाकात बजरंगी से होती है लेकिन गूंगी और अनपढ़ होने की वजह से वह अपने बारे में कुछ भी नहीं बता पाती.

बजरंगी सईदा को ले कर स्थानीय पुलिस स्टेशन में जाता है, लेकिन यह जान कर कि बच्ची गूंगी और अनपढ़ है, पुलिस बजरंगी को हिदायत दे कर वापस भेज देती है. बजरंगी अजीबोगरीब स्थिति में फंस जाता है. उसे न बच्ची का नाम पता होता है, न धर्म और न यह कि वह कहां की रहने वाली है. वह कई तरह के इशारों से उस की हकीकत जानने की कोशिश करता है, लेकिन बच्ची न कुछ समझ पाती है न बता पाती है. बजरंगी दिल्ली में अपने पिता के दोस्त त्रिपाठीजी (शरत सक्सेना) के घर रहता है. त्रिपाठीजी की बेटी रसिका (करीना कपूर) स्कूल टीचर है और बजरंगी से प्यार करती है.

बजरंगी त्रिपाठी और रसिका को बताता है कि वह बच्ची उसे कुरुक्षेत्र में मिली है और हिंदू है. रसिका भी इशारोंइशारों में बच्ची से उस की हकीकत पता लगाने की कोशिश करती है, पर नाकाम रहती है. इस के बाद बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के मिशन में जुट जाता है. अपनी सुविधा के लिए बजरंगी और रसिका बच्ची को मुन्नी कह कर बुलाने लगते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब बजरंगी और रसिका को पता चलता है कि वह बच्ची पाकिस्तानी है. बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के लिए वीजा लेने की कोशिश करता है लेकिन उसे वीजा नहीं मिलता. इस के बाद वह बच्ची को बिना पासपोर्ट वीजा के ही पाकिस्तान पहुंचाने का फैसला करता है.

बजरंगी बच्ची को ले कर बौर्डर पार भी कर जाता है पर पकड़ा जाता है. यहीं पर उस की मुलाकात पाकिस्तान के लोकल टीवी चैनल के खोजी पत्रकार चांद नवाज (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से होती है. चांद नवाज को बजरंगी में सच्चाई और इंसानियत का जज्बा नजर आता है. वह हर तरह से बजरंगी की मदद करने का फैसला करता है. अंतत: चांद नवाज की मदद से बजरंगी छिपतेछिपाते सईदा के घर तक पहुंचता है और बच्ची को उस के मांबाप को सौंप देता है. बजरंगी जब सईदा को उस के मातापिता के पास छोड़ कर जाने लगता है और वह उसे माता कह कर पुकारती है तो हर दर्शक भावुक हो जाता है. यानि अंतिम दृश्य में बच्ची बोलने लगती है.

बजरंगी की भूमिका में सलमान खान ने जबरदस्त अभिनय किया है. उन के लिए वाकई यह चैलेंजिंग कैरेक्टर था, जिसे उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया. एक्टिंग के मामले में नवाजुद्ीन सिद्दीकी भी पीछे नहीं हैं. कई जगह तो वह सलमान पर भी हावी रहे. वह चूंकि फिल्म में सलमान को भाईजान बोलते हैं, इसलिए फिल्म का नाम ‘बजरंगी भाईजान’ रखा गया. हर्षाली मल्होत्रा भले ही 6 साल की बच्ची रही हों पर एक्टिंग के मामले में उस ने कमाल किया है. देखा जाए तो यह पूरी फिल्म सलमान खान, हर्षाली मल्होत्रा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के ही कंधों पर टिकी है. भारतपाक के रिश्ते भले ही चाहे जैसे भी हों लेकिन इस फिल्म के माध्यम से इंसानियत का जो मैसेज दिया गया है, वह दिल को छू लेने वाला है. Film

 

 

 

Crime Stories: प्रेमी को न रखें सिर पर चढ़ा कर

Crime Stories: 25 वर्षीय रोशन सावे और 23 वर्षीय रितु भंडारकर के बीच पिछले 5 सालों से अफेयर चल रहा था, लेकिन रोशन की गलत आदतों और बेरोजगार बने रहने से रितु ने उस से मुंह फेर लिया. यहां तक कि वह रोशन के साथ उपेक्षा भरा बरताव कर उस से बेरुखी से पेश आने लगी थी. उस ने उस की फोन कौल भी रिसीव करनी बंद कर दी थी. रितु के इस रवैए से तिलमिलाया रोशन एक दिन इतना खूंखार हो गया कि…

11 नवंबर, 2025 को सुबह के 10 बजे का समय रहा होगा. मूलरूप से बालाघाट जिले की बैहर तहसील के छोटे से गांव आमगांव की रहने वाली 23 साल की रितु भंडारकर की उस के प्रेमी 25 वर्षीय युवक रोशन ने दिनदहाड़े बीच चौराहे पर धारदार चाकू से उस दौरान गला रेत कर हत्या कर दी, जब वह रोज की तरह फाटा चौराहे पर  बैहर जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थी. वह बैहर के एक इलेक्ट्रौनिक शोरूम में नौकरी करती थी. रोजाना की तरह मंगलवार को भी उस के चाचा धर्मेंद्र भंडारकर उसे अपनी बाइक पर बैठा कर फाटा चौराहे पर छोड़ कर घर लौट आए थे.

रितु बैहर जाने के लिए चौराहे पर बस का इंतजार कर रही थी. उसी समय पीछे से उस का प्रेमी रोशन आया और उस से बात करने लगा. फिर थोड़ी ही देर में उन दोनों में शादी के मुद्ïदे को ले कर तीखी नोकझोंक होने लगी. दोनों के बीच सरेराह तेज आवाज और तीखे शब्दों में नोकझोंक होती देख कर उधर से गुजर रहे राहगीर भी खड़े हो गए. रितु और दर्शक बने राहगीर इस से पहले कि रोशन के नापाक इरादे को समझ पाते, तब तक रोशन अपनी जेब से चाकू निकाल कर रितु की गरदन पर कई वार कर चुका था.

हालांकि चाकू से जानलेवा हमला करने से पहले उस ने रितु को धमकाते हुए कहा था, ”रितु, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं, इसलिए तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

”रोशन, यह तुम क्या कह रहे हो. लगता है कि तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. आइंदा ऐसी गंदी सोच वाली बात मुझ से मत करना.’’ रितु ने उसे डांटते हुए कहा.

”रितु, तुम अच्छी तरह से सुन लो कि मैं तुम्हें जान से ज्यादा चाहता हूं और तुम्हें अपना मान चुका हूं. मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी तुम से ही करूंगा. अगर तुम ने मुझे धोखा दिया तो समझ लो परिणाम गंभीर होंगे.’’ तल्ख लहाजे में चेतावनी देते हुए रोशन बोला, ”यह याद रखो रितु कि अगर तुम मेरी न हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं बनने दूंगा. भले ही इस का नतीजा कुछ भी हो. अब अपनी जिंदगी का निर्णय तुम्हें खुद करना होगा कि मेरे साथ शादी करना पसंद करोगी या किसी और के साथ?’’

 

रोशन ने आगे कहा, ”रितु, मेरी जिंदगी को तूने नर्क बना कर रख दिया है. अब शेष बचा ही क्या है मेरी जिंदगी में?’’

रोशन के मुंह से यह सब सुन रितु भौचक्की रह गई. उस ने बिना किसी हिचकिचाहट के रोशन की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ”रोशन, आज तुम भी कान खोल कर सुन लो कि मैं तुम से इतनी नफरत करती हूं कि तुम से शादी करना तो दूर की बात, किसी भी तरह के ताल्लुकात भी रखना नहीं चाहती. यहां तक कि तुम्हारी सूरत भी देखना नहीं चाहती, यह मेरा आखिरी डिसीजन है.’’

इतना सुनते ही रोशन के तनबदन में आग लग गई. शराब के नशे में धुत रोशन आपे से बाहर हो गया. फिर उस ने गुस्से में आ कर रितु के गले पर चाकू से ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. रितु बचाव के लिए चीखनेचिल्लाने लगी, लेकिन हैरत की बात है कि मौके पर मौजूद लोगों में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे हमलावर से बचा लेते. सब के सब बुत बने रहे. किसी ने भी उसे रोकने के लिए मुंह से आवाज तक नहीं निकाली. बल्कि कुछ लोग तो मोबाइल से सारे घटनाक्रम का वीडियो बनाते रहे, यह सिलसिला फिल्मी दृश्य की तरह काफी देर तक चलता रहा.

इस बीच रितु गंभीर रूप से घायल हो कर सड़क पर गिर पड़ी. इस के बावजूद भी हत्यारा रितु के गले पर चाकू से तब तक वार करता रहा, जब तक कि उस की सांसें थम नहीं गईं. इस के बाद रितु का हत्यारा रोशन मृतका के सिर को अपनी गोद में रख कर कुछ देर तक उस के दुपट्टे से अपने हाथों में लगे खून को पोंछता रहा. फिर चाकू से अपने शरीर पर प्रहार कर अपने आप को भी चोटिल कर लिया और बेसुध हो कर रितु के शव के पास ही लुढ़क गया.

भीड़भाड़ वाला इलाका होने से घटनास्थल पर कुछ ही समय में काफी भीड़ जमा हो गई. इस दिल दहला देने वाली हृदयविदारक घटना ने सर्द मौसम के बावजूद माहौल में गरमाहट पैदा कर दी. घटना भी ऐसी कि पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. दरअसल, घटनास्थल पर जमा भीड़ में से किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना की सूचना दे दी. इस से पहले कि पुलिस घटनास्थल पर पहुंच पाती, रितु ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया. इस सूचना के मिलते ही पुलिस कंट्रोल रूम ने वायरलैस से मैसेज प्रसारित कर बैहर थाने के एसएचओ जयंत मर्सकोले को तत्काल घटनास्थल पर पहुंचने को कहा.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिलते ही एसएचओ जयंत मर्सकोले कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. थोड़ी देर बाद मौके पर पहुंच कर उन्होंने जांचपड़ताल शुरू कर दी. जांच करने पर पता चला कि वहां खून से लथपथ पड़ी युवती की मौत हो चुकी थी, जबकि घायलावस्था पर पड़ा युवक कराह रहा था. उन्होंने युवक को तुरंत सरकारी अस्पताल पहुंचवाया. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने पुलिस के आला अधिकारियों को इस वारदात से अवगत करा दिया था.

इसी सूचना पर बालाघाट जिले के एसपी आदित्य मिश्रा, एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला और बैहर के एसडीओपी करणदीप सिंह भी मौके पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने वारदातस्थल और मृतका के रक्तरंजित शव का मुआयना किया तो उस की गरदन पर चाकू के काफी गहरे घाव थे. श्वास नली की नसें भी कटी हुई थीं. शव के पास ही वह चाकू भी पड़ा हुआ था, जिस से हत्यारे ने इस वारदात को अंजाम दिया था. जबकि हत्यारे और मृतका के पास मिले मोबाइल फोन में सेव नंबरों में से उन दोनों के परिजनों के नंबर खोज कर फेमिली वालों को पुलिस द्वारा इस घटना की सूचना दी गई.

सूचना पा कर रितु के फेमिली वाले अचंभित रह गए कि रितु की रोशन ने हत्या कर दी है. वे भागेभागे घटनास्थल पर पहुंचे. सड़क पर अपनी इकलौती बेटी को लहूलुहान हालत में मृत देख कर परिजन कुछ देर के लिए अवाक रह गए. उन सभी की आंखों से आंसू टपकने लगे. इसी बीच रितु के रिश्तेदार और पड़ोसी भी घटनास्थल पर आ गए थे. रितु के पापा शिवशंकर और चाचा धर्मेंद्र की आंखों में आंसू देख कर रिश्तेदार और पड़ोसी समझ गए कि कुछ न कुछ गड़बड़ है, उन्होंने हिम्मत कर के रितु के चाचा धर्मेंद्र से पूछा कि रितु कैसी है तो उन की कुछ भी बताने की हिम्मत नहीं हुई और जोरजोर से रोने लगे.

यह देख कर रिश्तेदार और पड़ोसियों को यह समझ में आ गया कि भंडारकर परिवार की इकलौती बेटी के साथ अनहोनी घट गई है.

घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने सारी काररवाई अपनी मौजूदगी में निपटवाई. पुलिस ने घटनास्थल से सारे  सबूत इकट्ठा करने से वहां की वीडियोग्राफी कराने के साथ ही मौके से ब्लड के सैंपल लिए ताकि डीएनए जांच भी कराई जा सके. हत्या वाली जगह से ही पुलिस टीम ने रक्तरंजित चाकू समेत 2 मोबाइल फोन और मृतका का बैग बरामद किया. पुलिस ने रितु भंडारकर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. कागजी काररवाई पूरी करने के बाद एसएचओ थाने लौट आए. यह सब करतेकरते दोपहर के 12 बज गए.

उधर जैसे ही मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटनाक्रम की खबर लोगों को लगी तो बैहर थाने के गेट पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. इस हुजूम में राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से ले कर सामाजिक संगठनों और मृतका के पेरेंट्स भी शामिल थे. उन सभी में इस जघन्य हत्या को ले कर काफी आक्रोश था. वे हत्यारे को  फांसी देने और उस के मकान को बुलडोजर से जमींदोज करने के साथ ही मृतका के परिजनों को एक करोड़ रुपए दिए जाने मांग को ले कर धरने पर बैठ गए. इस के साथ भीड़ नारेबाजी भी कर रही थी.

इस से पहले जैसे ही एसपी आदित्य मिश्रा, एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला और एसडीओपी करण सिंह घटनास्थल का मौकामुआयना कर वापस लौटने को हुए तो भीड़ ने उन्हें कानूनव्यवस्था का मुद्ïदा बना कर घेर लिया. इस से माहौल तनावपूर्ण हो गया था. इस हालत में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए एसएचओ ने थाने से और फोर्स बुला ली. पुलिस अधिकारियों ने आरोपी के खिलाफ सख्त काररवाई का वादा कर किसी तरह समझाबुझा कर प्रदर्शनकारियों को शांत किया. उधर बैहर के सिविल अस्पताल से रितु के हत्यारोपी रोशन के डिस्चार्ज होते ही पुलिस उसे थाने ले आई, जहां उस ने एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला की मौजूदगी में अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

जब उन्होंने उस से रितु की हत्या करने की वजह पूछी तो उस ने हत्या करने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोर देने वाली निकली—

रोशन ने बताया कि वह रितु को तब से जानता था, जब वह उस के साथ स्कूल में पढ़ती थी. दोनों का पिछले 5 सालों तक लव अफेयर भी चला. पहले रितु भी मुझे खूब चाहती थी. उस ने आगे बताया कि जब भी मैं उस से मिलताजुलता था, वह बड़े प्यार से बात करती थी. यहां तक कि हम घर वालों से लुकछिप कर घंटों तक  पार्क, रेस्टोरेंट में साथ बैठ कर प्यारमोहब्बत की बातें करते थे, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह अचानक पूरी तरह बदल गई थी और मुझ से नफरत करने लगी थी.

पता नहीं कि ऐसा क्या हुआ कि उस ने अब मेरी कौल तक रिसीव करनी बंद कर दी थी, जिस से मैं गहरे तनाव में आ गया था. मैं ने उस की हत्या करने से पहले रितु को अपने साथ शादी करने के लिए बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी तो मजबूर हो कर मैं ने उसे मौत की नींद सुलाने की योजना बना डाली. मुझे यह जानकारी तो पहले से ही थी कि रितु नौकरी पर जाने के लिए रोज सुबह फाटा चौराहे से बस में सवार हो कर बैहर जाती है, अत: रितु के चौराहे पर पहुंचने से पहले वहां पहुंच कर मैं उस के आने का इंतजार करने लगा.

जैसे ही वह वहां पहुंची, उस के पास पहुंच कर मैं ने आखिरी बार शादी के मुद्ïदे को ले कर उस से बात की, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. उधर रितु के पेरेंट्स का कहना है कि उन की बेटी का रोशन से प्यार का कोई चक्कर नहीं था. रोशन जबरदस्ती उस के पीछे पड़ा हुआ था. उस ने उन की इकलौती बेटी को छीन लिया. उसे फांसी की सजा होनी चाहिए. रोशन से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे विधिवत गिरफ्तार कर कड़ी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. हालांकि रोशन के चेहरे पर न कोई शिकन थी और न ही कोई पछतावा, बल्कि अपने किए पर वह बेहद खुश था. Crime Stories

 

 

Crime Stories: आखिरी फैसला – साधना बनी अपनों की कातिल

Crime Stories: उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया.

इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी.उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई. पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी.

उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. दोनों कमरे के पास पहुंचे तो मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को.पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में लोहे का एक कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था.

थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा.मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है.जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को नहीं उठने देंगे. सिपाही लाल ने भी बेटे की बात का समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी जिगर के टुकड़ों को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी.

थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की. कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से.

साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने कसने लगी थी. घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता.

गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे. सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी.

बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत थाना सहायल में कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा भी दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो वह इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने देने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी.

अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा. उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी.1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

साड़ी के टुकड़ों के दूसरे सिरे को उस ने फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने उस मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई.

घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Stories

Crime Stories: अपमान और नफरत की साजिश

Crime Stories: पहली मई, 2019 की बात है. दिन के करीब 12 बजे का समय था, जब महाराष्ट्र के अहमदनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर थाना पारनेर क्षेत्र के गांव निधोज में उस समय अफरातफरी मच गई, जब गांव के एक घर में अचानक आग के धुएं, लपटों और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आनी शुरू हुईं. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर गांव वाले एकत्र हो गए. लेकिन घर के मुख्यद्वार पर ताला लटका देख खुद को असहाय महसूस करने लगे.

दरवाजा टूटते ही घर के अंदर से 3 बच्चे, एक युवक और युवती निकल कर बाहर आए. बच्चों की हालत तो ठीक थी, लेकिन युवती और युवक की स्थिति काफी नाजुक थी. गांव वालों ने आननफानन में एंबुलेंस बुला कर उन्हें स्थानीय अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन का प्राथमिक उपचार कर के उन्हें पुणे के सेसूनडाक अस्पताल के लिए रेफर कर दिया. साथ ही इस मामले की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से मिली जानकारी पर थाना पारनेर के इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने चार्जरूम में मौजूद ड्यूटी अफसर को बुला कर तुरंत इस मामले की डायरी बनवाई और बिना विलंब के एएसआई विजय कुमार बोत्रो, सिपाही भालचंद्र दिवटे, शिवाजी कावड़े और अन्ना वोरगे के साथ अस्पताल की तरफ रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने अपने मोबाइल फोन से मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में पहुंची, वहां काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. इन में अधिकतर उस युवक और युवती के सगेसंबंधी थे. पूछताछ में पता चला कि युवती का नाम रुक्मिणी है और युवक का नाम मंगेश रणसिंग लोहार. रुक्मिणी लगभग 70 प्रतिशत और मंगेश 30 प्रतिशत जल चुका था. अधिक जल जाने के कारण रुक्मिणी बयान देने की स्थिति में नहीं थी. मंगेश रणसिंग भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था.

इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने मंगेश रणसिंग और अस्पताल के डाक्टरों से बात की. इस के बाद वह अस्पताल में पुलिस को छोड़ कर खुद घटनास्थल पर आ गए.

घटना रसोईघर के अंदर घटी थी, जहां उन्हें पैट्रोल की एक खाली बोतल मिली. रसोईघर में बिखरे खाना बनाने के सामान देख कर लग रहा था, जैसे घटना से पहले वहां पर हाथापाई हुई हो.

जांचपड़ताल के बाद उन्होंने आग से बच गए बच्चों से पूछताछ की. बच्चे सहमे हुए थे. उन से कोई खास बात पता नहीं चली. वह गांव वालों से पूछताछ कर थाने आ गए. मंगेश रणसिंग के भाई महेश रणसिंग को वह साथ ले आए थे. उसी के बयान के आधार पर रुक्मिणी के परिवार वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी.

इस मामले में रुक्मिणी का बयान महत्त्वपूर्ण था. लेकिन वह कोई बयान दर्ज करवा पाती, इस के पहले ही 5 मई, 2019 को उस की मृत्यु हो गई. मंगेश रणसिंग और उस के भाई महेश रणसिंग के बयानों के आधार पर यह मामला औनर किलिंग का निकला.

रुक्मिणी की मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया, जिसे ले कर सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग सड़क पर उतर आए और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. इस से जांच टीम पर वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव बढ़ गया. उसी दबाव में पुलिस टीम ने रुक्मिणी के चाचा घनश्याम सरोज और मामा सुरेंद्र भारतीय को गिरफ्तार कर लिया. रुक्मिणी के पिता मौका देख कर फरार हो गए थे.

पुलिस रुक्मिणी के मातापिता को गिरफ्तार कर पाती, इस से पहले ही इस केस ने एक नया मोड़ ले लिया. रुक्मिणी और मंगेश रणसिंग के साथ आग में फंसे बच्चों ने जब अपना मुंह खोला तो मामला एकदम अलग निकला. बच्चों के बयान के अनुसार पुलिस ने जब गहन जांच की तो मंगेश रणसिंग स्वयं ही उन के राडार पर आ गया.

मामला औनर किलिंग का न हो कर एक गहरी साजिश का था. इस साजिश के तहत मंगेश रणसिंग ने अपनी पत्नी की हत्या करने की योजना बनाई थी. पुलिस ने जब मंगेश से विस्तृत पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए रुक्मिणी हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह रुक्मिणी के परिवार वालों और रुक्मिणी के प्रति नफरत से भरी हुई थी.

23 वर्षीय मंगेश रणसिंग गांव निधोज का रहने वाला था. उस के पिता चंद्रकांत रणसिंग जाति से लोहार थे. वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर राजगीर का काम करते थे. घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर भी गांव में उन की काफी इज्जत थी. सीधेसादे सरल स्वभाव के चंद्रकांत रणसिंग के परिवार में पत्नी कमला के अलावा एक बेटी प्रिया और 3 बेटे महेश रणसिंग और ओंकार रणसिंग थे.

मंगेश रणसिंग परिवार में सब से छोटा था. वह अपने दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करता था. गांव के स्कूल से वह किसी तरह 8वीं पास कर पाया था. बाद में वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगा. धीरेधीरे उस में पिता के सारे गुण आ गए. राजगीर के काम में माहिर हो जाने के बाद उसे पुणे की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई.

वैसे तो मंगेश को पुणे से गांव आनाजाना बहुत कम हो पाता था, लेकिन जब भी वह अपने गांव आता था तो गांव में अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर इधरउधर घूमता और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर गप्पें मारता. इसी के चलते जब उस ने रुक्मिणी को देखा तो वह उसे देखता ही रह गया.

20 वर्षीय रुक्मिणी और मंगेश का एक ही गांव था. उस का परिवार भी उसी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था, जिस पर मंगेश अपने पिता के साथ काम करता था. इस से मंगेश रणसिंग का रुक्मिणी के करीब आना आसान हो गया था. रुक्मिणी का परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता रामा रामफल भारतीय जाति से पासी थे. सालों पहले वह रोजीरोटी की तलाश में गांव से अहमदनगर आ गए थे. बाद में वह अहमदनगर के गांव निधोज में बस गए थे. यहीं पर उन्हें एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम मिल गया था.

बाद में उन्होंने अपनी पत्नी सरोज और साले सुरेंद्र को भी वहीं बुला लिया था. परिवार में रामा रामफल भारतीय के अलावा पत्नी, 2 बेटियां रुक्मिणी व 5 वर्षीय करिश्मा थीं.

अक्खड़ स्वभाव की रुक्मिणी जितनी सुंदर थी, उतनी ही शोख और चंचल भी थी. मंगेश रणसिंग को वह अच्छी लगी तो वह उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा.

मंगेश रणसिंग पहली ही नजर में रुक्मिणी का दीवाना हो गया था. वह रुक्मिणी को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. उस की यह मुराद पूरी भी हुई.

कंस्ट्रक्शन साइट पर रुक्मिणी के परिवार वालों का काम करने की वजह से मंगेश रणसिंग की राह काफी आसान हो गई थी. वह पहले तो 1-2 बार रुक्मिणी के परिवार वालों के बहाने उस के घर गया. इस के बाद वह मौका देख कर अकेले ही रुक्मिणी के घर आनेजाने लगा.

मंगेश रुक्मिणी से मीठीमीठी बातें कर उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता. साथ ही उसे पैसे भी देता और उस के लिए बाजार से उस की जरूरत का सामान भी लाता. जब भी वह रुक्मिणी से मिलने उस के घर जाता, उस के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता. साथ ही उस के भाई और बहन के लिए भी खानेपीने की चीजें ले जाता था.

मांबाप की जानपहचान और उस का व्यवहार देख कर रुक्मिणी भी मंगेश की इज्जत करती थी. रुक्मिणी उस के लिए चायनाश्ता करा कर ही भेजती थी. मंगेश रणसिंह तो रुक्मिणी का दीवाना था ही, रुक्मिणी भी इतनी नादान नहीं थी. 20 वर्षीय रुक्मिणी सब कुछ समझती थी.

वह भी धीरेधीरे मंगेश रणसिंग की ओर खिंचने लगी थी. फिर एक समय ऐसा भी आया कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह मंगेश की बांहों में आ गिरी.

अब दोनों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एकदूसरे के लिए बेचैन रहने लगे. उन के प्यार की ज्वाला जब तेज हुई तो उस की लपट उन के घर वालों तक ही नहीं बल्कि अन्य लोगों तक भी जा पहुंची.

मामला नाजुक था, दोनों परिवारों ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों शादी करने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

आखिरकार मंगेश रणसिंग के परिवार वालों ने उस की जिद की वजह से अपनी सहमति दे दी. लेकिन रुक्मिणी के पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. फिर भी वह पत्नी के समझाने पर राजी हो गए. अलगअलग जाति के होने के कारण दोनों की शादी में उन का कोई नातेरिश्तेदार शामिल नहीं हुआ.

एक सादे समारोह में दोनों की शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में दरार आने लगी. दोनों के प्यार का बुखार उतरने लगा था. दोनों छोटीछोटी बातों को ले कर आपस में उलझ जाते थे. अंतत: नतीजा मारपीट तक पहुंच गया.

30 अप्रैल, 2019 को मंगेश रणसिंग ने किसी बात को ले कर रुक्मिणी को बुरी तरह पीट दिया था. रुक्मिणी ने इस की शिकायत मां निर्मला से कर दी, जिस की वजह से रुक्मिणी की मां ने उसे अपने घर बुला लिया. उस समय रुक्मिणी 2 महीने के पेट से थी. इस के बाद जब मंगेश रणसिंग रुक्मिणी को लाने के लिए उस के घर गया तो रुक्मिणी के परिवार वालों ने उसे आड़ेहाथों लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया.

रुक्मिणी के परिवार वालों के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग नाराज हो गया. उस ने इस अपमान के लिए रुक्मिणी के घर वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली.

बदमाश प्रवृत्ति के मंगेश रणसिंग की इस धमकी से रुक्मिणी के परिवार वाले डर गए, जिस की वजह से वे रुक्मिणी को न तो घर में अकेला छोड़ते थे और न ही बाहर आनेजाने देते थे.  रुक्मिणी का परिवार सुबह काम पर जाता तो रुक्मिणी को उस के छोटे भाइयों और छोटी बहन के साथ घर के अंदर कर बाहर से दरवाजे पर ताला डाल देते थे, जिस से मंगेश उन की गैरमौजूदगी में वहां आ कर रुक्मिणी को परेशान न कर सके.

इस सब से मंगेश को रुक्मिणी और उस के परिवार वालों से और ज्यादा नफरत हो गई. उस की यही नफरत एक क्रूर फैसले में बदल गई. उस ने रुक्मिणी की हत्या कर पूरे परिवार को फंसाने की साजिश रच डाली.

घटना के दिन जब रुक्मिणी के परिवार वाले अपनेअपने काम पर निकल गए तो अपनी योजना के अनुसार मंगेश पहले पैट्रोल पंप पर जा कर इस बहाने से एक बोतल पैट्रोल खरीद लाया कि रास्ते में उस के दोस्त की मोटरसाइकिल बंद हो गई है. यही बात उस ने रास्ते में मिले अपने दोस्त सलमान से भी कही.

फिर वह रुक्मिणी के घर पहुंच गया. उस समय रुक्मिणी रसोईघर में अपने भाई और बहन के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. घर के दरवाजे पर पहुंच कर मंगेश रणसिंग जोरजोर दरवाजा पीटते हुए रुक्मिणी का नाम ले कर चिल्लाने लगा. वह ताले की चाबी मांग रहा था.

दरवाजे पर आए मंगेश से न तो रुक्मिणी ने कोई बात की और न दरवाजे की चाबी दी. वह उस की तरफ कोई ध्यान न देते हुए खाना बनाने में लगी रही.

रुक्मिणी के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग का पारा और चढ़ गया. वह किसी तरह घर की दीवार फांद कर रुक्मिणी के पास पहुंच गया और उस से मारपीट करने लगा. बाद में उस ने अपने साथ लाई बोतल का सारा पैट्रोल  रुक्मिणी के ऊपर डाल कर उसे आग के हवाले कर दिया.

मंगेश की इस हरकत से रुक्मिणी के भाईबहन बुरी तरह डर गए थे. वे भाग कर रसोई के एक कोने में छिप गए. जब आग की लपटें भड़कीं तो रुक्मिणी दौड़ कर मंगेश से कुछ इस तरह लिपट गई कि मंगेश को उस के चंगुल से छूटना मुश्किल हो गया. इसीलिए वह भी रुक्मिणी के साथ 30 प्रतिशत जल गया.

इस के बावजूद भी मंगेश का शातिरपन कम नहीं हुआ. अस्पताल में उस ने रुक्मिणी के परिवार वालों के विरुद्ध बयान दे दिया. उस का कहना था कि उस की इस हालत के लिए उस के ससुराल वाले जिम्मेदार हैं.

उस की शादी लवमैरिज और अंतरजातीय हुई थी. यह बात रुक्मिणी के घर वालों को पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे घर बुला कर पहले उसे मारापीटा और जब रुक्मिणी उसे बचाने के लिए आई तो उन्होंने दोनों पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी.

अपमान और नफरत की आग में जलते मंगेश रणसिंग की योजना रुक्मिणी के परिवार वालों के प्रति काफी हद तक कामयाब हो गई थी. लेकिन रुक्मिणी के भाई और उस के दोस्त सलमान के बयान से मामला उलटा पड़ गया.

अब यह केस औनर किलिंग का न हो कर पति और पत्नी के कलह का था, जिस की जांच पुलिस ने गहराई से कर मंगेश रणसिंग को अपनी हिरासत में ले लिया.

उस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 307, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद रुक्मिणी के परिवार वालों को रिहा कर दिया गया. Crime Stories