Love Crime : गर्लफ्रेंड ने लोहे की रौड से किया बॉयफ्रेंड का कत्ल

Love Crime : कहा जाता है कि कई रोगों में कड़वी दवाई ज्यादा असरकारक होती है. रूमाना और अफजल को भी अपनी शादीशुदा जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए कड़वा घूंट पीना पड़ा, मुझे भी. पढ़ें कैसे…

उस दिन जो क्लायंट मुझ से मिला, वह कुछ अजब किस्म का था. उस ने अपना नाम अफजल बताया. वह फ्रूट का धंधा करता था. उस की परेशानी यह थी कि वह अपनी बीवी रूमाना को तलाक दे चुका था और उस की एकलौती बेटी को उस की बीवी रूमाना साथ ले गई थी. वह अपनी बेटी को वापस लेना चाहता था. मांबेटी अपने घर में रह रहे थे. अफजल को घर से निकलना पड़ा, क्योंकि घर रूमाना के नाम पर था. यह मकान महमूदाबाद बाजार के सिरे पर था. मकान के बाहरी हिस्से में एक दुकान थी, मकान का रास्ता बाजू वाली गली से था. 3 कमरों के इस घर में अफजल की छोटी सी फैमिली आराम से रह रही थी कि फरीद की नजर लग गई.

फरीद हसन 45 साल का हैंडसम आदमी था, लेकिन बेहद चालाक. वह इन लोगों का किराएदार था. बाहरी हिस्से वाली दुकान में उस ने एस्टेट एजेंसी खोल रखी थी. मकान रूमाना के नाम था इसलिए उस ने फरीद को अपनी मरजी से दुकान दी थी, जबकि अफजल इस के खिलाफ था. रूमाना सरकारी नौकरी में थी, ऊपर की आमदनी भी अच्छी थी. यह घर उसी ने बनाया था. थोड़ा पैसा अफजल का भी लगा था. वैसे उस की ज्यादा आमदनी नहीं थी. वह मंडी से माल उठाता और घरों में पहुंचा देता. ज्यादातर ग्राहक फिल्म इंडस्ट्री के थे और अफजल को जुनून की हद तक फिल्मों में काम करने का शौक था. कोई छोटा एक्टर भी उसे फिल्मों में काम दिलाने की उम्मीद दिखाता, तो उसे वह फ्री में फल सब्जी पहुंचा कर फिल्म में काम मिलने की उम्मीद में उस की खिदमत करता रहता.

अभी तक उसे कोई चांस नहीं मिला था, क्योंकि अफजल के पास न हुनर था न कोई सोर्स और न किसी डायरेक्टर से पहचान. अफजल के इस शौक से उस की बीवी रूमाना नाराज रहती थी क्योंकि फायदा कुछ नहीं था, उलटा नुकसान होता था. इस बात पर दोनों में तकरार भी होती. वह समझाता, ‘‘देखना रूमाना, मैं जल्द टीवी के ड्रामों में नजर आऊंगा. फिर मेरे पास कार बंगला सब कुछ होगा.’’

इस लड़ाई में कभी बेटी फरजाना मां का साथ देती थी. 16-17 साल की फरजाना मैट्रिक की स्टूडेंट थी. कभी झुंझला कर कह देती, ‘‘आप दोनों कभी नहीं सुधरेंगे. इसी तरह लड़तेलड़ते जिंदगी गुजर जाएगी.’’

बेटी को बहलाने के लिए अफजल ने वादा किया, ‘‘अब ये सब छोड़ कर मैं काम में दिल लगाऊंगा.’’

कुछ दिन तो सुकून से गुजरे. फिर एक नया किस्सा शुरू हो गया. दुकान का किराएदार फरीद अकसर रूमाना से मिलने आने लगा. पहले तो वह महीने में 2-4 बार आता था, अब उस की आमद बढ़ गई थी. अफजल को उस का आनाजाना पसंद नहीं था. उस की आवाजाही बढ़ी तो अफजल ने ऐतराज किया, जिस से मेलमुलाकात रुक गई थी, फिर वह अफजल की गैरमौजूदगी में भी आने लगा. अब रूमाना ने बाहर मिलना भी शुरू कर दिया. यह बात भी अफजल को पता चल गई. अभी तकरार चल ही रही थी कि अचानक एक दिन अफजल बेटाइम घर पहुंच गया, उस ने दोनों को घर में ही रंगेहाथों पकड़ लिया.

अफजल गुस्से से पागल हो गया. फरीद भाग निकला. पतिपत्नी की जोरदार लड़ाई हुई. अफजल बोला, ‘‘बेगैरती और बेशर्मी की हद हो गई, एक जवान लड़की के होते हुए पराए मर्द से ताल्लुक रखती हो. ये मैं बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

रूमाना भी चीख कर बोली, ‘‘बेगैरत तुम हो, तुम अपनी बीवी पर इलजाम लगा रहे हो मेरी उस की दोस्ती है, हम अपना दुखसुख बांट लेते हैं.’’

तकरार गालीगलौज पर पहुंच गई और तलाक पर खत्म हुई. घर रूमाना के नाम पर था. अफजल को बोरियाबिस्तर बांध कर घर छोड़ना पड़ा. बेटी फरजाना मां के पास रह गई. अब अफजल कोर्ट में केस करने के लिए मेरे पास आया था कि मैं मुकदमा लड़ कर उस की बेटी उस के हवाले कर दूं. मैं ने उसे कहा, ‘‘देखो अफजल, तुम ने रूमाना को तलाक दे दी है. अगर तुम तलाक न देते तो वह खुला (औरत तलाक मांग लेती है) ले लेती. तुम्हारे साथ हरगिज न रहती. अब तुम चाहते हो कि कोर्ट के जरिए फरजाना को रूमाना की कस्टडी से निकाल कर तुम्हारे हवाले कर दूं.’’

‘‘हां वकील साहब, मैं हर कीमत पर अपनी बेटी को अपने पास लाना चाहता हूं. उस बेशर्म औरत की संगत में वह बिगड़ जाएगी. आप सारी बातें छोड़ें और मुकदमा लड़ कर मुझे मेरी बेटी दिला दें, मैं उस से बहुत प्यार करता हूं. मैं महीने में एक बार मिलने पर तसल्ली नहीं कर सकता. आप केस लड़ें.’’

‘‘केस लड़ने के लिए 3 बातों पर गौर करना जरूरी है, तभी मैं आप का केस ले सकता हूं.’’

‘‘कौन सी 3 बातें…जल्द बताइए.’’

‘‘पहली बात तो यह कि क्या आप के पास अपना घर है?’’

‘‘नहीं, मेरे पास अपनी रिहाइश नहीं है. मेरे दोस्त बशीर का एक होटल है, उस की ऊपरी मंजिल पर स्टाफ की रिहाइश के लिए कुछ कमरे बने हैं, उन्हीं में से एक में मैं रहता हूं.’’

‘‘अगर आप के पास घर नहीं है तो यह पौइंट आप के मुखालिफ जाता है. कोर्ट लड़की को होटल में स्टाफ के लिए बने कमरों में रखने की इजाजत नहीं देगी, जबकि मां के पास खुद का घर है. दूसरा मुद्दा यह है कि क्या आप इतना कमा लेते हैं कि बेटी व उस के महंगे स्कूल का खर्च उठा सकें?’’

‘‘मैं कमा तो लेता हूं पर आमदनी रेग्युलर नहीं है. उस का स्कूल काफी महंगा है.’’

‘‘तीसरा सवाल जो सब से जरूरी है, आप की बेटी मैट्रिक में पढ़ रही है, समझदार है. क्या वह आप के पास रहने को राजी है या मां के पास रहना चाहती है?’’

‘‘ये तो जाहिर सी बात है कि वह अपनी मां के साथ रहना पसंद करती है.’’

‘‘देखिए अफजल साहब, कोर्ट औलाद की कस्टडी के लिए इन्हीं 3 बातों पर गौर करती है. इन 3 खास मुद्दों पर आप का जवाब नेगेटिव है, कोर्ट कभी भी आप को लड़की की कस्टडी नहीं देगी और आप को साफ बात बता दूं, मैं भी आप का केस नहीं लड़ सकता. मैं बेवजह आप से पैसे झटकना नहीं चाहता. हकीकत में आप का केस बहुत कमजोर है. जीतने का कोई चांस नहीं है.’’

उस दिन अफजल मेरे पास से बेहद मायूस हो कर गया. अब दोबारा आने की उम्मीद नहीं थी, पर कुछ दिनों बाद होटल के मालिक बशीर भाई मेरे सामने आ खड़े हुए. पहले मैं उन का एक केस लड़ चुका था और वह मुकदमा जीत गए थे. उन्होंने ही अफजल को मेरे पास भेजा था. आज वह फिर मेरे सामने खड़े थे. बोले, ‘‘बेग साहब, अफजल बड़ी मुसीबत में फंस गया है. वह जेल में बंद है. पुलिस ने उसे फरीद के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया है.’’

‘‘फरीद वही न, एस्टेट एजेंट, जिस की वजह से अफजल ने अपनी बीवी को तलाक दी थी.’’

‘‘जी हां, वही अफजल और वही एस्टेट एजेंट फरीद. उसी के कत्ल के इलजाम में पुलिस ने कल सुबह उसे अदालत में पेश किया और 7 दिन का रिमांड हासिल कर लिया.’’

‘‘कब हुआ ये कत्ल?’’

‘‘कत्ल 15 मई को हुआ था. उसी दिन दोपहर को मेरे होटल से उसे गिरफ्तार कर लिया गया. वह सीधा, कुछ बेवकूफ जरूर है पर वह कत्ल नहीं कर सकता. बहुत डरपोक आदमी है. मैं उसे सालों से जानता हूं, उस के खिलाफ साजिश की गई है. मेरा शक तो रूमाना पर जाता है.’’

‘‘ठीक है, मैं आज थाने जा कर अफजल से मिलता हूं. आप को पक्का यकीन है न कि वह बेकुसूर है? आप केस के बारे में और मालूमात करें. उस ने मेरी फीस अदा कर दी.’’

उसी दिन शाम को मैं उस थाने पहुंच गया, जहां अफजल बंद था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर रौनक आ गई. वह दुखी हो कर बोला, ‘‘देखिए सर, मुझे बेवजह इस केस में फंसा दिया गया है.’’

‘‘इसीलिए तो मैं ने तुम्हारा केस हाथ में लिया है. चलो, मुझे सब कुछ सचसच बता दो.’’

वह बोला, ‘‘आप पूरी कोशिश कर के मुझे मौत से बचा लीजिए, भले ही मुझे थोड़ी सजा हो जाए. मैं फरजाना की शादी अपने हाथों से करना चाहता हूं.’’

मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ. मैं ने उसे तसल्ली दी, ‘‘तुम जल्द रिहा हो जाओगे, पर सच बोलना.’’

उस ने जो किस्सा सुनाया, उस का खुलासा यह है कि वह मेरा पहला मुलजिम था, जो थोड़ी सजा पर राजी था. जेहन में खयाल भी आया कि कहीं ये मुजरिम तो नहीं है जो कुछ उस ने कहा, मैं आप को बताता रहूंगा. रिमांड पूरी होने पर पुलिस ने अदालत में चालान पेश कर दिया. इस मौके पर मैं ने जमानत की कोशिश की पर मंजूर नहीं हुई. उसे जेल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक कत्ल 15 मई को दिन के 11 बजे हुआ था. एक लोहे की रौड फरीद के सिर पर मारी गई थी, जिस से खोपड़ी चटक गई थी. मौत की जगह रूमाना का ड्राइंगरूम था. दूसरी पेशी 15 दिन बाद थी. मेरे पास तैयारी के लिए काफी टाइम था. बशीर जानकारी जुटाने में लगा था. वह अफजल का पक्का दोस्त था.

जब अदालत शुरू हुई तो जज ने अफजल को उस का जुर्म बताया. उस ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. इस्तगासा की तरफ से 6 गवाहों को पेश किया गया था, जिस में अफजल की एक्स वाइफ रूमाना भी थी. अफजल का बयान नोट कराया गया जो काफी सटीक था. अदालत की इजाजत से इस्तगासा के वकील ने पूछताछ शुरू की. उस ने पूछा, ‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करते हो कि तुम मकतूल से नफरत करते थे और उसी नफरत में तुम ने फरीद का खून कर दिया?’’

‘‘मैं ने फरीद का कत्ल नहीं किया.’’ उस ने दोटूक कहा.

‘‘आलाए कत्ल पर तुम्हारे फिंगरप्रिंट्स मिले हैं.’’

‘‘मुझे नहीं मालूम रौड पर मेरे फिंगरप्रिंट्स कैसे आए?’’

‘‘क्या फरीद तुम्हारा किराएदार रहा था?’’

‘‘नहीं, वह मेरा नहीं मेरी एक्स वाइफ का किराएदार था.’’

‘‘क्या तुम ने फरीद की वजह से रूमाना को तलाक नहीं दी थी, तुम उस पर झूठा शक करते थे?’’

‘‘मैं ने कोई झूठा शक नहीं किया, जो हकीकत थी वह बरदाश्त से बाहर थी. मुझे तलाक देनी पड़ी.’’

वकील इस्तगासा कोई खास बात मालूम नहीं कर सका. बारी आने पर मैं ने बौक्स में खड़े हो कर पूछा, ‘‘इस्तगासा के 3 गवाहों ने दावा किया है कि तुम्हें कत्ल के दिन मौकाएवारदात पर देखा गया. तुम 15 मई को वहां क्या कर रहे थे?’’

वह मुझे हवालात में बता चुका था. बात मेरे पक्ष में थी, इसलिए मैं ने पूछा तो अफजल ने जवाब दिया, ‘‘मैं अपनी बेटी फरजाना से मिलने गया था.’’

‘‘तुम्हारी मुलाकात पार्क या बाहर होती थी, उस दिन तुम घर क्यों गए थे?’’

‘‘यह चेंज रूमाना के कहने पर हुआ था. हर महीने की 15 तारीख को मैं अपनी बेटी से पार्क में मिलता था. रूमाना उसे ले कर आती थी. पर इस बार 14 मई की शाम उस ने मुझे कहलवाया कि फरजाना की तबीयत ठीक नहीं है. वह पार्क नहीं आएगी. इस बार साढ़े 11 बजे उस से मिलने घर आ जाओ. फरजाना घर पर अकेली होगी, मुझे शौपिंग के लिए बाहर जाना है. वापसी लगभग एक बजे होगी. इस बीच मैं अपनी बेटी से मिल सकता हूं. मेरी कोई गलती नहीं, उस के कहने पर मैं घर गया था.’’

‘‘अच्छा, सोच कर बताओ, तुम कितने बजे रूमाना के घर पहुंचे थे?’’

‘‘मैं ठीक 12 बजे उस के घर पहुंचा था.’’

मैं ने जज से कहा, ‘‘जनाबेआली, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार कत्ल 10 से 11 बजे के बीच हुआ. मुलजिम वहां 12 बजे पहुंचा था. यह पौइंट नोट किया जाए.’’

जज ने सिर हिला कर सहमति जताई. वकील इस्तगासा बोला, ‘‘टाइम गलत भी बताया जा सकता है, जान बचाने की खातिर. मिसेज रूमाना ने भी इस बात से इनकार किया है कि उस ने अफजल को ऐसा कोई मैसेज दे कर 12 बजे घर बुलाया था. ये बनाई हुई कहानी है.’’

‘‘यह बात मिसेज रूमाना से गवाही के समय पूछी जा सकती है.’’

‘‘जनाबेआली सब से बड़ा सबूत यह है कि आलाए कत्ल पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान पाए गए. जब वह 12 बजे पहुंचा था तो आलाए कत्ल पर उस की अंगुलियों के निशान क्यों पाए गए?’’

‘‘आप परेशान न हों, इस का जवाब भी मिल जाएगा. हां, अफजल जब तुम रूमाना के घर पहुंचे तो तुम ने वहां क्या देखा?’’

‘‘मुझ से कहा गया था कि फरजाना घर पर अकेली होगी.’’

‘‘तो क्या फरजाना से तुम्हारी मुलाकात हुई?’’

‘‘दरवाजे के दोनों पट भिड़े हुए थे. मैं अंदर पहुंचा तो फरजाना नहीं, वहां फरीद की लाश पड़ी थी. वह सोफे पर उलटा पड़ा था और उस की खोपड़ी चटकी हुई थी. खून से कपड़े व सोफा गीला हो गया था. मैं वहां से उलटे पांव निकल गया, पर दोपहर को मुझे पुलिस ने होटल के कमरे से गिरफ्तार कर लिया. बशीर भाई ने लाख दलीलें दीं पर कुछ नहीं हुआ.’’

‘‘क्या तुम ने मौकाएवारदात पर लोहे की रौड को पकड़ा था?’’

‘‘वकील साहब, मैं ने किसी चीज को हाथ नहीं लगाया. इतना भी बेवकूफ नहीं हूं मैं.’’

‘‘पर आलाए कत्ल पर तुम्हारी अंगुलियों के निशान हैं.’’

‘‘यह बात मेरी समझ से बाहर है, ये कैसे हुआ?’’

‘‘उस आदमी का नाम क्या है जो 14 मई को रूमाना का संदेश ले कर तुम्हारे पास आया था?’’

‘‘वकील साहब, मैं उस बंदे के नाम से वाकिफ नहीं हूं. उस दिन मैं ने उसे पहली बार देखा था.’’

फिर उस दिन अदालत का वक्त खत्म हो गया. जिस तरह अफजल ने अदालत में जवाब दिए, उस से वह जरा भी नर्वस नहीं लग रहा था. ऐेसे केस लड़ने का एक अलग ही मजा है. अगली 2 पेशियों में इस्तगासा के 5 गवाह पेश हुए, उन में से एक खुरशीद था, अख्तर कालोनी में रहता था. उस ने हलफ ले कर अपना बयान दिया. वकील ने उस से अफजल के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब अफजल और रूमाना का तलाक नहीं हुआ था, मैं भी उन का किराएदार था. अफजल अकसर दुकान पर आता था पर तलाक के बाद उसे घर छोड़ना पड़ा.’’

‘‘उस के बाद तुम्हारी उस से कभी मुलाकात हुई थी?’’

‘‘एकदो बार राह चलते सलामदुआ हुई. 15 मई को वाकए के दिन वह मेरी दुकान के सामने वाली गली में गया था, जिस के अंदर रूमाना का घर है.’’

‘‘अफजल तुम से रूमाना के बारे में क्या कहता था?’’

‘‘वह रूमाना के बारे में कुछ नहीं कहता था, इधरउधर की बातें होती थीं. उस की बातों से पता लगता था कि वह फरीद को पसंद नहीं करता. वह बहुत चालाक व फितना आदमी था, जो हुआ अच्छा हुआ. अफजल उस से परेशान था.’’

‘‘अफजल उस से किस वजह से नफरत करता था कि उस की बातें सुन कर तुम भी फरीद को नापसंद करने लगे.’’

‘‘जनाब, उस ने एक हंसताखेलता घर तोड़ डाला. दोनों के बीच फरीद ने ही आग लगाई थी.’’

‘‘क्या आप को लगता है कि तलाक का जिम्मेदार फरीद था? क्या अफजल का रूमाना पर शक सही था?’’

‘‘ये मुझे नहीं मालूम पर अफजल ने जो कुछ कहा, उस से यही लगता है कि वह फरीद से नफरत करता था.’’

वकील ने कहा, ‘‘जनाबेआली, 15 मई को उसे अपनी नफरत निकालने का मौका मिल गया. उस ने फरीद को ठिकाने लगा दिया.’’

उस की जिरह खत्म होने पर मैं खड़ा हुआ, ‘‘खुरशीद साहब, आप किस चीज का बिजनैस करते हैं? आप की टाइमिंग क्या है?’’

‘‘मैं कपड़े का कारोबार करता हूं. साढ़े 12 बजे तक अपनी दुकान खोलता हूं. 15 मई को मैं ने 12 बजे दुकान खोली थी.’’

‘‘आप ने 15 मई को मुलजिम को रूमाना के घर वाली गली में जाते देखा था?’’

‘‘जनाब उस वक्त 12 बजे थे. अफजल मेरी दुकान के सामने से निकल कर उस के घर वाली गली में गया था.’’

मैं जज से मुखातिब हुआ, ‘‘सर, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में मौत का टाइम 10 से 11 बजे है, मुलजिम 12 बजे उस तरफ जाते देखा गया, इसलिए कातिल कोई और है.’’

वकील इस्तगासा जल्दी से बोला, ‘‘हो सकता है उस दिन खुरशीद भाई ने दुकान जल्दी खोल ली हो.’’

‘‘होने को तो बहुत कुछ हो सकता है. खुरशीद भाई झूठ क्यों बोलेंगे? और फिर उन्होंने मुलजिम को गली की तरफ जाते देखा है, घर में घुसते हुए नहीं देखा.’’

इस के बाद पड़ोसन जकिया आपा की गवाही हुई. जकिया आपा को हर आएगए पर निगाह रखने का शौक था. जकिया आपा से पूछताछ में वकीले इस्तगासा नहीं मिसेज रूमाना का तलाक का मामला भी उठा. उस की गवाही से यह साबित हुआ कि अफजल 15 मई को 12 बजे के आसपास मिसेज रूमाना के घर गया था. मेरी बारी आने पर मैं ने कहा, ‘‘जकिया, आप की क्या हर आनेजाने वाले पर नजर रहती है?’’

‘‘मेरा घर रूमाना के घर के सामने है. गली का रास्ता साफ दिखता है. मैं ने अफजल को जाते देखा था. तलाक के पहले फरीद को भी आतेजाते देखती थी. उसे मैं ने समझाया भी था कि पराए मर्द से मेलजोल रखना गलत है पर उस पर असर नहीं हुआ. मैं ने तो तलाक के बाद भी रूमाना को समझाने का फैसला किया था, पर एक ऐसी बात सुनने में आई कि मैं पीछे हट गई.’’

‘‘आप ने ऐसी क्या बात सुन ली कि रूमाना को सही राह पर लाने का इरादा ही छोड़ दिया?’’

जकिया आपा मायूसी से बोली, ‘‘मैं ने सुना कि रूमाना ने फरीद से निकाह कर लिया है, अब समझाने को कुछ नहीं बचा था.’’

‘‘दैट्स आल योर औनर,’’ कह कर मैं ने जिरह खत्म कर दी. अगली पेशी पर मेरे सामने मिसेज रूमाना खड़ी थी. मैं ने इस पेशी के लिए अच्छाखासा होमवर्क किया था. यह खास गवाह थी. उसे पछाड़ने के लिए मैं ने 2-3 लोग तैयार कर रखे थे. रूमाना 35-40 साल की होगी. काफी खूबसूरत, कपड़े भी मौडर्न और कीमती पहने थी. मैं ने एक खास अंदाज में अपनी जिरह शुरू की, ‘‘मिसेज रूमाना, मैं आप की नाखुश जिंदगी के बारे में कुछ नहीं पूछूंगा, वह सब को मालूम है पर इतना जरूर कहूंगा कि अफजल बदकिस्मत है कि उस ने आप जैसा नायाब हीरा खो दिया.’’

मेरी बात सुन कर वह गुरूर से मुसकराई, फिर कहा, ‘‘मैं यह सोच कर परेशान थी कि माज़ी व अफजल की बातें कर के मुझे बोर किया जाएगा.’’

‘‘जहां जरूरी है वहां तो कहना पड़ेगा. आप ये बताइए कि मेरे क्लायंट अफजल का दावा है कि आप ने उसे 15 मई को 12 बजे फरजाना से मिलने अपने घर बुलाया था. आप का इस बारे में क्या कहना है?’’

‘‘फरजाना 8 बजे स्कूल जाती है और 2 बजे वापस आती है. क्या मैं पागल हूं जो खाली घर में उसे बेटी से मिलने बुलाऊंगी. मैं ने उसे नहीं बुलाया था.’’

‘‘यानी आप ने 14 मई को उसे कोई मैसेज नहीं भेजा था?’’

‘‘जी हां, मैं ने उसे कोई मैसेज नहीं भेजा था. उसे अदाकारी का बहुत शौक है, ये सारी ड्रामेबाजी है.’’

मैं ने आलाए कत्ल उठा लिया और उस से पूछा, ‘‘क्या आप इसे पहचानती हैं?’’

लोहे की रौड को देखते हुए वह ऐतेमाद से बोली, ‘‘ये वही रौड है, जिस से आप के क्लायंट ने फरीद का खून किया था. इस के एक सिरे पर खून व बाल चिपके हुए हैं. दूसरे सिरे पर अफजल के फिंगरप्रिंट्स हैं. स्टोरी इज वेरी क्लियर.. आप अपने क्लायंट को बहुत मासूम समझते हैं. एम आई राइट?’’

‘‘राइट. पर अगर मेरी नजर में क्लायंट खूनी होता तो मैं ये केस ही नहीं लेता. खैर, ये बताइए आप ने ये खतरनाक रौड अपने घर में क्यों रख रखा था?’’

‘‘इस रौड से मेरा कोई ताल्लुक नहीं है. हो सकता है आप का क्लायंट ही इसे छिपा कर साथ लाया हो.’’

‘‘क्या वह मकतूल को भी अपने साथ लाया था?’’

‘‘हो सकता है लाया हो, बहलानेफुसलाने में वह एक्सपर्ट है. संभव है, ड्रामेबाजी कर के ले आया हो.’’

‘‘पर मुझे तो पता लगा है कि फरीद आप से मिलने आप के घर आता था.’’

‘‘सौ फीसदी सच. वह मुझ से मिलने आता था.’’

‘‘मैं ने सुना है आप ने उस से निकाह कर लिया था,’’ मैं ने उस के सिर पर बम गिराते हुए पूछा.

वह टस से मस न हुई. ऐतमाद से बोली, ‘‘ये गंदे जहनों की गंदी सोच है. दरअसल मैं घर बदलना चाहती थी. फरीद की एस्टेट एजेंसी थी. मैं उस से सलाह कर के डिफेंस में एक फ्लैट लेना चाह रही थी, इसलिए वह मेरे पास आता रहता था. यह बात इसलिए बता रही हूं कि गंदे जहनों की गंदगी भी साफ हो जाए.’’ वह ताने के अंदाज में बोली.

‘‘यह भी तो हकीकत है कि वह हमेशा आप की बेटी की गैरमौजूदगी में आता था. जब आप अकेली होती थीं.’’

‘‘ये सच है. उसे मैं फरजाना की गैरमौजूदगी में बुलाती थी, क्योंकि उसे फरीद का घर आना कतई पसंद न था और वह अपने घर से बहुत मोहब्बत करती थी.

‘‘इसे बेचने के लिए राजी नहीं थी. इसलिए फरीद को मैं उस की गैरमौजूदगी में ही बुलाती थी. मैं ने सोचा था कि उस की जानकारी में लाए बिना डिफेंस में घर फाइनल कर लूं, बाद में उसे मना लूंगी. अब तो आप को व अदालत दोनों को तसल्ली हो गई होगी.’’

वह अल्लाह की बंदी मेरे हर बाउंसर को बड़ी खूबसूरती से हुक कर के बाउंडरी के बाहर फेंक रही थी. पर मैं भी हथियार फेंकने को राजी न था, मैं ने पूछा, ‘‘क्या 15 मई को सुबह भी मकतूल को आप से मिलने आना था?’’

‘‘नहीं, ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं था. अगर उसे आना होता तो मैं घर पर होती.’’

‘‘वाकए के दिन आप कितने बजे घर से निकली थीं?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 9 बजे घर से रवाना हुई थी और करीब साढ़े 12 बजे वापसी हुई थी. उस दिन मुझे टेलर के पास जाना था और किचन के लिए ग्रोसरी लेनी थी.’’ उस ने तीखे लहजे में कहा.

‘‘अगर मैं गलत नहीं हूं तो आप के टेलर का नाम तारिक है. उस की दुकान मेन रोड पर है जबकि आप ग्रोसरी बड़े बाजार के अलीबख्श से खरीदती हैं.’’

‘‘हां, आप सही फरमा रहे हैं.’’ वह अचरज से बोली. पहली बार उस के चेहरे पर उलझन नजर आई. पर लहजे का ऐतमाद वैसा ही था.

‘‘मिसेज रूमाना, वारदात के दिन पहले आप टेलर के पास गई थीं फिर ग्रोसरी लेने गई थीं?’’

‘‘मैं पहले टेलर के पास गई थी,’’ वह सोच कर बोली.

‘‘मैडम, पहले आप सामान लेने गई थीं, आप भूल रही हैं.’’ मैं ने सिक्सर मारते हुए कहा.

वह चौंक कर बोली, ‘‘आप यह बात इतने विश्वास से कैसे कह सकते हैं?’’

‘‘मेनरोड की कोई भी दुकान 12-साढे़ 12 बजे से पहले नहीं खुलती, जबकि बड़ा बाजार में 9 बजे से रौनक लग जाती है.’’

‘‘वकील साहब, आप काफी स्मार्ट और इंटेलिजेंट हैं. मैं आप की इस बात को मानती हूं कि मैं पहले बड़ा बाजार अलीबख्श की दुकान पर गई थी, उस के बाद टेलर के पास गई थी.’’

‘‘मैडम, आखिरी सवाल. क्या 15 मई को आप अलीबख्श से ग्रोसरी ले कर अपने टेलर से अपना काम करवाने में कामयाब हो गई थीं?’’

‘‘हां, हंडरेड परसेंट.’’ वह ढिठाई से बोली.

‘‘एकदम बकवास. एकदम गलत. तुम झूठ बोल रही हो. अदालत की आंख में धूल झोंक रही हो.’’ मैं ने तेज लहजे में कहा.

‘‘योर ओनर,’’ इस्तगासा के वकील ने आवाज उठाई, ‘‘वकील साहब मेरे क्लायंट से बदतमीजी कर रहे हैं. ये ज्यादती है.’’

जज ने मुझ से कहा, ‘‘ये क्या है बेग साहब?’’

मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘जनाबे आली, ये तो कुछ भी नहीं है. असल माल तो बाहर इंतजार कर रहा है. मैं अदालत की इजाजत से 2 गवाह किराना मर्चेंट अलीबख्श और टेलर तारिक को गवाही के लिए बुलाना चाहता हूं.

‘‘टेलर तारिक आप को बताएंगे कि 15 मई के दिन उन की शौप सारा दिन बंद रही थी, क्योंकि किसी की मौत की वजह से वह अपने गांव गए थे और दूसरे दिन आए. साथ ही अलीबख्श सबूत के साथ अदालत को हकीकत बताएंगे कि मैडम रूमाना ने 14 मई को उन की दुकान से ग्रोसरी खरीदी थी. बिल बुक में रसीद मौजूद है.’’

मेरे दोनों गवाहों ने सबूत के साथ गवाही दे कर यह साबित कर दिया कि रूमाना सरासर झूठ बोल रही थी. इस के बाद अदालत में जो कुछ हुआ, आप अंदाजा नहीं लगा सकते. इस गवाही से रूमाना को बुरी तरह बौखला जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ. वह आराम से विटनेस बौक्स में खड़ी रही. जज ने कड़े लहजे में रूमाना से कहा, ‘‘मिसेज रूमाना आप ने अदालत से झूठ क्यों बोला?’’

रूमाना के बजाए अफजल ने हथकड़ी वाला हाथ ऊपर कर के कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं कुछ कहना चाहता हूं.’’

जज ने इजाजत दे दी. मेरा क्लायंट बोला और ऐसा बोला कि उस ने मेरी मेहनत की धज्जियां बिखेर दीं. मैं उस कलाकार की अदाकारी देखता रह गया. वह बड़े भावुक अंदाज में बोल रहा था, ‘‘जनाबेआली, मेरा जमीर मुझ पर थूक रहा था, अब मैं खामोश नहीं रह सकता. मैं लगातार अदालत से, वकील साहब से और अपने दोस्त बशीर भाई से झूठ बोलता रहा. हकीकत यह है कि मैं काफी दिनों से मकतूल का पीछा कर रहा था.

‘‘वारदात के दिन मैं उसे बहलाफुसला कर अपनी एक्स वाइफ के घर ले कर गया. उस दिन रूमाना घर पर मौजूद नहीं थी. मकतूल मेरी चाल में आ गया. ड्राइंग रूम में मैं ने उसे मौत के घाट उतारा लेकिन मेरे जाने के पहले रूमाना आ गई.

‘‘फिर हम ने मिल कर एक स्कीम बनाई, जिस में फरीद के कत्ल का इलजाम मुझ पर आए. रूमाना पर किसी का शक न जाए, फिर सब कुछ वैसा ही होता चला गया जैसा हम ने चाहा था. पर मेरे होशियार वकील ने मुझे शक के दायरे से निकाल कर रूमाना के लिए फांसी का फंदा तैयार कर दिया. हालांकि मैं ने अपने वकील साहब से कहा था कि भले ही अगर बाइजज्जत बरी न करा सकें तो कोई बात नहीं, मुझे थोड़ी सजा दिलवा दें, पर जहीन वकील ने हकीकत खोल दी. जैसा मैं ने सोचा था उस का उलटा हो गया.

‘‘मजबूरन अपने जमीर की आवाज पर मुझे अपनी जुबान खोलनी पड़ी. मैं खुदा को हाजिरनाजिर जान कर इस बात का इकरार करता हूं कि मैं मुजरिम हूं, खून मैं ने किया है. उम्मीद है मेरे इकबाली बयान के एवज में अदालत मुझ पर रहम खा कर कम से कम सजा देगी. फरीद ने मेरा घर उजाड़ दिया था, मुझे दरबदर कर दिया था.’’

जज ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, ‘‘बेग साहब, अब आप क्या कहते हैं?’’

मेरे क्लायंट ने मुझे कुछ कहने लायक नहीं छोड़ा था. मैं तल्खी से बोला, ‘‘सबूतों के व गवाहों के बयान की रोशनी में मैं ने अपनी पेशेवराना जिम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाई. आगे जो इस का नसीब. मेरे क्लायंट के इकबाले बयान के बाद और जुर्म मान लेने के बाद जाहिर है इस केस से मेरा कोई ताल्लुक नहीं रहा. मैं इसे एक कड़वा घूंट समझ कर हलक से उतार लूंगा.’’

जज हां में गरदन हिला कर रह गया. लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती. अफजल ने अपने फन की जो अदाकारी दिखाई थी, उसे मैं भूल न सका. लगभग 6 साल बाद अफजल और रूमाना मेरे पास आए और एक कार्ड मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अगले थर्सडे को हमारी बेटी फरजाना की शादी है. आप जरूर तशरीफ लाएं, हमें बहुत खुशी होगी.’’

‘‘क्या मैं ये समझूं कि आप दोनों फिर से एक बंधन में बंधन गए हैं? अफजल से शादी कर के एक नई जिंदगी शुरू कर दी है? शायद मैं गलत कह गया…’’

‘‘आप बिलकुल ठीक समझे, वकील साहब.’’

‘‘फिर तो मैडम रूमाना फरीद की बेवा कहने के बजाए फरीद की कातिल कहना ज्यादा ठीक है. है न?’’

वह सिर झुका कर बोली, ‘‘बेग साहब, इस के अलावा मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था. मैं ने फरीद की खातिर अफजल की जिंदगी खराब की. अपनी बेटी का दिल दुखाया और फरीद से शादी कर ली. पर वह कमीना बेहद घटिया इंसान था. उस की नीयत मेरी मासूम बच्ची पर खराब हो गई, उस की इज्जत लूटने की फिराक में रहने लगा था. उस का यही इलाज था.’’

पता नहीं रूमाना और क्या कहती रही, पर मैं सोच रहा था, ‘रूमाना ने मेरे मुकाबले कहीं बड़ा कड़वा घूंट हलक से उतारा था.’

 

 

 

Love Crime : गर्लफ्रेड ने ली बॉयफ़्रेंड की जान

Love Crime :  एसचओ ने ग्रामीणों की मदद से शव को तालाब से बाहर निकलवाया. शव पूरी तरह नग्न अवस्था में था. शव का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि मृतक की उम्र लगभग 30 साल थी और उस के शरीर पर धारदार हथियार से गोदे जाने के कई निशान थे.

उसी दौरान एक युवक ने लाश की शिनाख्त पिडरुआ निवासी तुलसीराम प्रजापति के रूप में की. उस की हत्या किस ने और क्यों की, यह बात कोई भी व्यक्ति नहीं समझ पा रहा था. 26 वर्षीय सविता और 28 वर्षीय तुलसीराम पहली मुलाकात में ही एकदूसरे को दिल दे बैठे थे, सविता को पाने की अभिलाषा तुलसीराम के दिल में हिलोरें मारने लगी थी, इसलिए वह किसी न किसी बहाने से सविता से मिलने उस के खेत पर बनी टपरिया में अकसर आने लगा था.

तुलसीराम प्रजापति के टपरिया में आने पर सविता गर्मजोशी से उस की खातिरदारी करती, चायपानी के दौरान तुलसीराम जानबूझ कर बड़ी होशियारी के साथ सविता के गठीले जिस्म का स्पर्श कर लेता तो वह नानुकुर करने के बजाय मुसकरा देती. इस से तुलसीराम की हिम्मत बढ़ती चली गई और वह सविता के खूबसूरत जिस्म को जल्द से जल्द पाने की जुगत में लग गया. एक दिन दोपहर के समय तुलसीराम सविता की टपरिया में आया तो इत्तफाक से सविता उस वक्त अकेली चक्की से दलिया बनाने में मशगूल थी. उस का पति पुन्नूलाल कहीं गया हुआ था. इसी दौरान तुलसीराम को देखा तो उस ने साड़ी के पल्लू से अपने आंचल को करीने से ढंका.

तुलसीराम ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ”सविता, तुम यह आंचल क्यों ढंक रही हो? ऊपर वाले ने तुम्हारी देह देखने के लिए बनाई है. मेरा बस चले तो तुम को कभी आंचल साड़ी के पल्लू से ढंकने ही न दूं.’’

”तुम्हें तो हमेशा शरारत सूझती रहती है, किसी दिन तुम्हें मेरे टपरिया में किसी ने देख लिया तो मेरी बदनामी हो जाएगी.’’

”ठीक है, आगे से जब भी तेरे से मिलने तेरी टपरिया में आऊंगा तो इस बात का खासतौर पर ध्यान रखूंगा.’’

सविता मुसकराते हुए बोली, ”अच्छा एक बात बताओ, कहीं तुम चिकनीचुपड़ी बातें कर के मुझ पर डोरे डालने की कोशिश तो नहीं कर रहे?’’

”लगता है, तुम ने मेरे दिल की बात जान ली. मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं, अब तो जानेमन मेरी हालत ऐसी हो गई है कि जब तक दिन में एक बार तुम्हें देख नहीं लेता, तब तक चैन नहीं मिलता है. बेचैनी महसूस होती रहती है, इसलिए किसी न किसी बहाने से यहां चला आता हूं. तुम्हारी चाहत कहीं मुझे पागल न कर दे…’’

तुलसीराम प्रजापति की बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि सविता बोली, ”पागल तो तुम हो चुके हो, तुम ने कभी मेरी आंखों में झांक कर देखा है कि उन में तुम्हारे लिए कितनी चाहत है. मुझे तो ऐसा लगता है कि दिल की भाषा को आंखों से पढऩे में भी तुम अनाड़ी हो.’’

”सच कहा तुम ने, लेकिन आज यह अनाड़ी तुम से बहुत कुछ सीखना चाहता है. क्या तुम मुझे सिखाना चाहोगी?’’ इतना कह कर तुलसीराम ने सविता के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया.

सविता ने भी अपनी आंखें बंद कर के अपना सिर तुलसीराम के सीने से टिका दिया. दोनों के जिस्म एकदूसरे से चिपके तो सर्दी के मौसम में भी उन के शरीर दहकने लगे. जब उन के जिस्म मिले तो हाथों ने भी हरकतें करनी शुरू कर दीं और कुछ ही देर में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

सविता के पति पुन्नूलाल के शरीर में वह बात नहीं थी, जो उसे तुलसीराम से मिली. इसलिए उस के कदम तुलसीराम की तरफ बढ़ते चले गए. इस तरह उन का अनैतिकता का खेल चलता रहा.

सविता के क्यों बहके कदम

मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक गांव है पिडरुआ. इसी गांव में 26 वर्षीय सविता आदिवासी अपने पति पुन्नूलाल के साथ रहती थी. पुन्नूलाल किसी विश्वकर्मा नाम के व्यक्ति की 10 बीघा जमीन बंटाई पर ले कर खेत पर ही टपरिया बना कर अपनी पत्नी सविता के साथ रहता था. उसी खेत पर खेती कर के वह अपने परिवार की गुजरबसर करता था. उस की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी.

उस के पड़ोस में ही तुलसीराम प्रजापति का भी खेत था, इस वजह से कभीकभार वह सविता के पति से खेतीबाड़ी के गुर सीखने आ जाया करता था. करीब डेढ़ साल पहले तुलसीराम ने ओडिशा की एक युवती से शादी की थी, लेकिन वह उस के साथ कुछ समय तक साथ रहने के बाद अचानक उसे छोड़ कर चली गई थी.

सविता को देख कर तुलसीराम की नीयत डोल गई. उस की चाहतभरी नजरें सविता के गदराए जिस्म पर टिक गईं.  उसी क्षण सविता भी उस की नजरों को भांप गई थी. तुलसीराम हट्टाकट्टा नौजवान था. सविता पहली नजर में ही उस की आंखों के रास्ते दिल में उतर गई. सविता के पति से बातचीत करते वक्त उस की नजरें अकसर सविता के जिस्म पर टिक जाती थीं.

सविता को भी तुलसीराम अच्छा लगा. उस की प्यासी नजरों की चुभन उस की देह को सुकून पहुंचाती थी. उधर अपनी लच्छेदार बातों से तुलसीराम ने सविता के पति से दोस्ती कर ली. तुलसीराम को जब भी मौका मिलता, वह सविता के सौंदर्य की तारीफ करने में लग जाता. सविता को भी तुलसीराम के मुंह से अपनी तारीफ सुनना अच्छा लगता था. वह पति की मौजूदगी में जब कभी भी उसे चायपानी देने आती, मौका देख कर वह उस के हाथों को छू लेता. इस का सविता ने जब विरोध नहीं किया तो तुलसीराम की हिम्मत बढ़ती चली गई.

धीरेधीरे उस की सविता से होने वाली बातों का दायरा भी बढऩे लगा. सविता का भी तुलसीराम की तरफ झुकाव होने लगा था. तुलसीराम को पता था कि सविता अपने पति से संतुष्ट नहीं है. कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. आखिर एक दिन तुलसीराम को सविता के सामने अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया और उस के बाद दोनों के बीच वह रिश्ता बन गया, जो दुनिया की नजरों में अनैतिक कहलाता है. दोनों ने इस रास्ते पर कदम बढ़ा तो दिए, लेकिन सविता ने इस बात पर गौर नहीं किया कि वह अपने पति के साथ कितना बड़ा विश्वासघात कर रही है.

जिस्म से जिस्म का रिश्ता कायम हो जाने के बाद सविता और तुलसीराम उसे बारबार बिना किसी हिचकिचाहट के दोहराने लगे. सविता का पति जब भी गांव से बाहर जाने के लिए निकलता, तभी सविता तुलसीराम को काल कर अपने पास बुला लेती थी. अनैतिक संबंधों को कोई लाख छिपाने की कोशिश करे, एक न एक दिन उस की असलियत सब के सामने आ ही जाती है. एक दिन ऐसा ही हुआ. सविता का पति पुन्नूलाल शहर जाने के लिए घर से जैसे ही निकला, वैसे ही सविता ने अपने प्रेमी तुलसीराम को फोन कर दिया.

अवैध संबंधों का सच आया सामने

सविता जानती थी कि शहर से घर का सामान लेने के लिए गया पति शाम तक ही लौटेगा, इस दौरान वह गबरू जवान प्रेमी के साथ मौजमस्ती कर लेगी. सविता की काल आते ही तुलसीराम बाइक से सविता के टपरेनुमा घर पर पहुंच गया. उस ने आते ही सविता के गले में अपनी बाहों का हार डाल दिया, तभी सविता इठलाते हुए बोली, ”अरे, यह क्या कर रहे हो, थोड़ी तसल्ली तो रखो.’’

”कुआं जब सामने हो तो प्यासे व्यक्ति को कतई धैर्य नहीं होता है,’’ इतना कहते हुए तुलसीराम ने सविता का गाल चूम लिया.

”तुम्हारी इन नशीली बातों ने ही तो मुझे दीवाना बना रखा है. न दिन को चैन मिलता है और न रात को. सच कहूं जब मैं अपने पति के साथ होती हूं तो सिर्फ तुम्हारा ही चेहरा मेरे सामने होता है,’’ सविता ने भी इतना कह कर तुलसी के गालों को चूम लिया.

तुलसीराम से भी रहा नहीं गया. वह सविता को बाहों में उठा कर चारपाई पर ले गया. इस से पहले कि वे दोनों कुछ कर पाते, दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. इस आवाज को सुनते ही दोनों के दिमाग से वासना का बुखार उतर गया. सविता ने जल्दी से अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को ठीक किया और दरवाजा खोलने भागी. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया, ”तुम तो घर से शहर से सौदा लाने के लिए निकले थे, फिर इतनी जल्दी कैसे लौट आए?’’ सविता हकलाते हुए बोली.

”क्यों? क्या मुझे अब अपने घर आने के लिए भी तुम से परमिशन लेनी पड़ेगी? तुम दरवाजे पर ही खड़ी रहोगी या मुझे भीतर भी आने दोगी,’’ कहते हुए पुन्नूलाल ने सविता को एक तरफ किया और जैसे ही वह भीतर घुसा तो सामने तुलसीराम को देख कर उस का माथा ठनका.

”अरे, आप कब आए?’’ तुलसीराम ने पूछा तो पुन्नूलाल ने कहा, ”बस, अभीअभी आया हूं.’’

सविता के हावभाव पुन्नूलाल को कुछ अजीब से लगे, उस ने सविता की तरफ देखा, वह बुरी तरह से घबरा रही थी. उस के बाल बिखरे हुए थे. माथे की बिंदिया उस के हाथ पर चिपकी हुई थी.

यह सब देख कर पुन्नूलाल को शक होना लाजिमी था. डर के मारे तुलसीराम भी उस से ठीक से नजरें नहीं मिला पा रहा था. ठंड के मौसम में भी उस के माथे पर पसीना छलक रहा था. पुन्नूलाल तुलसीराम से कुछ कहता, उस से पहले ही वह अपनी बाइक पर सवार हो कर वहां से भाग गया.

उस के जाते ही पुन्नूलाल ने सविता से पूछा, ”तुलसीराम तुम्हारे पास क्यों आया था और तुम दोनों दरवाजा बंद कर क्या गुल खिला रहे थे?’’

”वह तो तुम से मिलने आया था और कुंडी इसलिए लगाई थी कि आज पड़ोसी की बिल्ली बहुत परेशान कर रही थी.’’ असहज होते हुए सविता बोली.

”लेकिन मेरे अचानक आ जाने से तुम दोनों की घबराहट क्यों बढ़ गई थी?’’

”अब मैं क्या जानूं, यह तो तुम्हें ही पता होगा.’’ सविता ने कहा तो पुन्नूलाल तिलमिला कर रह गया. उस के मन में पत्नी को ले कर संदेह पैदा हो गया था.

पुन्नूलाल ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पति पर निगाह रखनी शुरू कर दी और हिदायत दे दी कि तुलसीराम से वह आइंदा से मेलमिलाप न करे. पति की सख्ती के बावजूद सविता मौका मिलते ही तुलसीराम से मिलती रहती थी.

सविता और उस के प्रेमी को चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था. उधर तुलसीराम चाहता था कि सविता जीवन भर उस के साथ रहे, लेकिन सविता के लिए यह संभव नहीं था.

सविता क्यों बनी प्रेमी की कातिल

वैसे भी जब से पुन्नूलाल और गांव वालों को सविता और तुलसीराम प्रजापति के अवैध संबंधों का पता लगा था, तब से सविता घर टूटने के डर से तुलसीराम से छुटकारा पाना चाह रही थी, लेकिन समझाने के बावजूद तुलसीराम उस का पीछा नहीं छोड़ रहा था. तब अंत में सविता ने अपने छोटे भाई हल्के आदिवासी के साथ मिल कर अपने प्रेमी तुलसीराम को मौत के घाट उतारने की योजना बना डाली.

अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए 8 जनवरी, 2024 को सविता अपने मायके साईंखेडा चली गई, जिस से किसी को उस पर शक न हो. वहां से वह 11 जनवरी की दोपहर अपनी ससुराल पिडरुआ वापस लौट आई. उसी दिन शाम के वक्त उस ने तुलसीराम को फोन करके मिलने के लिए मोतियाहार के जंगल में बुला लिया.

अपनी प्रेमिका के बुलावे पर उस की योजना से अनजान तुलसीराम खुशी खुशी मोतियाहार के जंगल में पहुंचा. तभी मौका मिलते ही सविता ने अपने मायके से साथ लाए चाकू का पूरी ताकत के साथ तुलसीराम के गले पर वार कर दिया. अपनी जान बचाने के लिए खून से लथपथ तुलसीराम ने वहां से बच कर भाग निकलने की कोशिश की तो सविता ने चाकू उस के पेट में घोंप दिया. पेट में चाकू घोंपे जाने से उस की आंतें तक बाहर निकल आईं. कुछ देर छटपटाने के बाद ही उस के शरीर में हलचल बंद हो गई.

इस के बाद सविता के भाई हल्के आदिवासी ने तुलसीराम की पहचान मिटाने के लिए उस के सिर को पत्थर से बुरी तरह से कुचल दिया. फिर सविता ने अपने प्रेमी की नाक के पास अपनी हथेली ले जा कर चैक किया कि कहीं वह जिंदा तो नहीं है. दोनों को पूरी तरह तसल्ली हो गई कि तुलसीराम मर चुका है, तब उन्होंने तुलसीराम के सारे कपड़े उतार कर उस के कपड़े, जूते एक थैले में रख कर तालाब में फेंक दिए. लाश को ठिकाने लगाने के लिए सविता और उस का भाई हल्के तुलसी की लाश को कंधे पर रख कर हरा वाले तालाब के करीब ले गए. वहां बोरी में पत्थर भर कर रस्सी को उस की कमर में बांध कर शव को तालाब में फेंक दिया.

नग्नावस्था में मिली थी तुलसी की लाश

12 जनवरी, 2024 की सुबह उजाला फैला तो पिडरुआ गांव के लोगों ने तालाब में युवक की लाश तैरती देखी. थोड़ी देर में वहां लोगों की भीड़ जुट गई. भीड़ में से किसी ने तालाब में लाश पड़ी होने की सूचना बहरोल थाने के एसएचओ सेवनराज पिल्लई को दी.

सूचना मिलते ही एसएचओ कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. लाश तालाब से बाहर निकलवाने के बाद उन्होंने उस की जांच की. उस की शिनाख्त पिडरुआ निवासी तुलसीराम प्रजापति के रूप में की. वहीं पर पुलिस को यह भी पता चला कि तुलसीराम के पिछले डेढ़ साल से गांव की शादीशुदा महिला सविता आदिवासी से अवैध संबंध थे. इसी बात को ले कर पतिपत्नी में तकरार होती रहती थी.

लेकिन तुलसीराम की हत्या इस तरह गोद कर क्यों की गई, यह बात पुलिस और लोगों को अचंभे में डाल रही थी. मामला गंभीर था. एसएचओ ने घटना की सूचना एसडीओपी (बंडा) शिखा सोनी को भी दे दी थी. वह भी मौके पर आ गईं. इस के बाद उन्होंने भी लाश का निरीक्षण कर एसएचओ को सारी काररवाई कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के निर्देश दिए. एसएचओ पिल्लई ने सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. फिर थाने लौट कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

एसडीओपी शिखा सोनी ने इस केस को सुलझाने के लिए एक पुलिस टीम गठित की. टीम में बहरोल थाने के एसएचओ सेवनराज पिल्लई, बरायथा थाने के एसएचओ मकसूद खान, एएसआई नाथूराम दोहरे, हैडकांस्टेबल जयपाल सिंह, तूफान सिंह, वीरेंद्र कुर्मी, कांस्टेबल देवेंद्र रैकवार, नीरज पटेल, अमित शुक्ला, सौरभ रैकवार, महिला कांस्टेबल प्राची त्रिपाठी आदि को शामिल किया गया.

चूंकि पुलिस को सविता आदिवासी और मृतक की लव स्टोरी की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी, इसलिए पुलिस टीम ने गांव के अन्य लोगों से जानकारी जुटाने के बाद सविता आदिवासी को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया.

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सविता से तुलसीराम की हत्या के बारे में जब सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने पुलिस को गुमराह करने की भरसक कोशिश की, लेकिन एसएचओ सेवनराज पिल्लई के आगे उस की एक न चली और उसे सच बताना ही पड़ा. सविता के खुलासे के बाद पुलिस ने सविता के भाई हल्के आदिवासी को भी साईंखेड़ा गांव से गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया सविता और उस के भाई हल्के आदिवसी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

सविता और उस के भाई हल्के ने सोचा था कि तुलसीराम को मौत के घाट उतार देने से बदनामी से छुटकारा और बसा बसाया घर टूटने से बच जाएगा, लेकिन पुलिस ने उन के मंसूबों पर पानी फेर कर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. तुलसीराम की हत्या कर के सविता और उस का भाई हल्के आदिवासी जेल चले गए. सविता ने अपनी आपराधिक योजना में भाई को भी शामिल कर के अपने साथ भाई का भी घर बरबाद कर दिया. Love Crime

Stories in Hindi : वो काली मनहूस रात

Stories in Hindi : युवा उद्योगपति रोहित अग्रवाल हर अमावस की रात को फाइवस्टार होटल से एक लड़की ले कर अपने बंगले पर लौटता था. फिर उस लड़की को निर्वस्त्र कर हाथपैर बांध कर घुटने के बल बैठा देता था. इस के बाद चाकू की नोक से उस की पीठ पर लिख देता था ‘बेवफा’. आखिर वह ऐसा क्यों करता था?

एक पेशेंट के चेहरे की ड्राफ्टिंग तैयार कर के मैं वार्ड में आया तो वार्डबौय विनोद ने मुझे एक लिफाफा ला कर दिया. यह डाक से मेरे नाम आया एक पत्र था. पत्र लंदन से भेजा गया था. मुझे बेहद हैरानी हुई, लंदन में मेरा कोई पहचान वाला नहीं रहता था. पत्र किस ने भेजा है? सोचते हुए मैं ने भेजने वाले का नाम पढ़ा तो खुशी के कारण मेरे मुंह से चीख निकल गई. वार्ड में मौजूद पेशेंट और स्टाफ के लोग मेरी चीख सुन कर मुझे आश्चर्य से देखने लगे तो मैं झेंप गया. मैं तुरंत वहां से अपने रेस्टरूम में आ गया. यह पत्र लंदन से रोहित ने भेजा था. रोहित अग्रवाल! मेरा दोस्त रोहित, जिसे मैं एक साल से पागलों की तरह तलाश कर रहा था.

रोहित मुंबई से अचानक ही गायब हो गया था. मैं ने उसे हर संभावित जगह पर ढूंढा था, उस के लिए मुंबई के हर छोटेबड़े अखबारों में उस की गुमशुदगी का इश्तहार छपवाए थे, लेकिन उस का कोई अतापता नहीं चला था. चलता भी कैसे, वह तो भारत से सैकड़ों मील दूर लंदन में बैठा हुआ था. आज उसे मेरी याद आई थी. मैं ने आराम कुरसी पर बैठने के बाद पत्र लिफाफे से बाहर निकाला और पढऩे लगा—

‘प्रिय दोस्त अभय! लंदन के होटल शार्क में एक हिंदुस्तानी व्यक्ति के पास मुंबई से निकलने वाले न्यूजपेपर ‘लोकमत’ में अपनी गुमशुदगी का इश्तहार देख कर दिल को बहुत सुकून मिला कि तुम आज भी मुझे अपना मानते हो. मेरी तलाश में भटक रहे हो और तुम ने मेरी दोस्ती को भुलाया नहीं है.

‘दोस्त, मैं भी तुम्हें नहीं भूला हूं. किसी मजबूरीवश मुझे अचानक मुंबई छोडऩी पड़ी थी. अब में लंदन में हूं. यहां मैं ने ‘अग्रवाल फेब्रिक इंडिया’ नाम से एक कंपनी खोल ली है. तुम्हें हर रोज याद करता हूं. तुम पत्र पाते ही तुरंत लंदन चले आओ, फिर बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे. आने से पहले मेरे मोबाइल पर सूचना देना, मेरा मोबाइल नंबर यह है 993333333 तुम्हारा दोस्त रोहित अग्रवाल.’

रोहित का पत्र पढ़ कर मैं उस की यादों में खो गया. रोहित मुंबई के मशहूर उद्योगपति धीरेन अग्रवाल का इकलौता बेटा था. धीरेन अग्रवाल की मुंबई में कपड़ा मिल थी, जिस में सैकड़ों मजदूर काम करते थे. धीरज अग्रवाल की पत्नी की असमय ही कैंसर से मृत्यु हो गई थी, उस वक्त रोहित 11 साल का था. धीरेन अग्रवाल ने मां और बाप की जिम्मेदारी निभाते हुए रोहित की परवरिश की थी. उन के पास धनदौलत की कोई कमी नहीं थी. उन के बाद सब कुछ रोहित का ही था, फिर भी उन्होंने रोहित को पढ़ानेलिखाने में कोई कंजूसी नहीं की.

रोहित की पहचान मुझ से सेंट पीटर्स स्कूल में हुई थी. यहां मैं दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था. रोहित भी इसी स्कूल में मेरी क्लास का छात्र था. यहां ऊंचे घराने के बच्चे पढ़ते थे. चूंकि मेरे पापा का एक रोड एक्सीडेंट में निधन हो गया था, मैं अपने चाचाचाची के पास रह कर जीवनयापन कर रहा था. मेरे चाचाजी इसी स्कूल में चपरासी थे, उन्होंने स्कूल प्रशासन के हाथपैर जोड़ कर मेरा एडमिशन इस स्कूल में करवा दिया था. रोहित अमीर बाप का बेटा था, लेकिन उस में इस बात का जरा सा भी घमंड नहीं था. उस ने मुझे अपना दोस्त बनाया तो अपनी खानेपीने की चीजें मुझ से शेयर करने लगा. मेरी छोटीमोटी जरूरतों का वह पूरा खयाल रखने लगा था. हम ने हाईस्कूल इसी स्कूल से पास किया. बाद में रोहित ने अपना एडमिशन सोमैय्या आर्ट ऐंड कमर्शियल कालेज में करवा लिया था.

मेरी रुचि साइंस में थी, लेकिन इस की पढ़ाई के लिए मेरे चाचा के पास पैसे नहीं थे. रोहित ने मेरी इच्छा को देखते हुए मेरा एडमिशन सेंट जेवियर्स कालेज में अपने खर्चे से करवा दिया. उस दिन मैं रोहित के गले लग कर खूब रोया. रोहित मेरी पीठ सहलाता रहा, जब मैं ढेरों आंसू बहा लेने के बाद उस के कंधे से हटा तो रोहित ने मुसकरा कर कहा था, ”तुम बड़े डाक्टर बन कर मुंबई में अपना हौस्पिटल खोलो, मेरी यही इच्छा है अभय.’’

मैं ने सिर हिला कर उसे आश्वासन दिया कि तुम्हारी इच्छा का मैं खयाल रखूंगा मेरे दोस्त. यहां से हम दोस्त अलग हुए थे. रोहित अपने कालेज जाता, मैं अपने. यहां की पढ़ाई पूरी कर के मैं प्लास्टिक सर्जरी का कोर्स करने के लिए अमरीका चला गया. इस का भी पूरा खर्च रोहित ने ही उठाया था. अब हम दोनों के बीच बातचीत का जरिया फोन ही था. मैं रोहित का सपना साकार करने के लिए जी जान से मेहनत कर रहा था, अभी मेरे कोर्स का एक साल और बचा था कि रोहित के डैडी वीरेन अग्रवाल का हार्ट अटैक से देहांत हो गया. रोहित को अपना कालेज छोड़ कर डैडी का कारोबार संभालना पड़ा. वह मेरी मदद करने में तब भी पीछे नहीं हटा.

मैं अमरीका में था, रोहित मुंबई में. हमारे बीच फोन से बातें होती थीं. रोहित रोज शाम को मुझ से फोन पर बातें करता था. अचानक रोहित के फोन आने बंद हो गए. मैं ने बहुत कोशिश की थी कि किसी तरह रोहित से संपर्क हो जाए, लेकिन रोहित का नंबर नाट रिचेबल आता रहा. मैं रोहित के बगैर छटपटाता रहा. मजबूर था, मैं पढ़ाई छोड़ कर मुंबई नहीं लौट सकता था. एक साल बाद मैं प्लास्टिक सर्जन बन कर भारत लौटा. मुंबई एयरपोर्ट से मैं सीधा टैक्सी ले कर धीरेन अग्रवाल के बंगले पर गया तो मुझे जबरदस्त धक्का लगा. रोहित वह बंगला और अपना मिल मैनेजर को सौंप कर कहीं चला गया था. वह कहां गया, यह बात मैनेजर भी नहीं जानता था.

मैं समझ नहीं पाया कि अचानक रोहित को यह क्या सूझी कि वह अपने डैडी की जमीनजायदाद मैनेजर के हवाले कर के मुंबई से क्यों चला गया. ऐसी क्या समस्या आ गई उस के जीवन में. मैं ने उसे हर मुमकिन जगह तलाश किया. इस दौरान मैं ने स्मार्ट ब्यूटीकेयर हौस्पिटल में हैड प्लास्टिक सर्जन की जौब जौइन कर ली थी. रोहित को तलाश करने के लिए मैं ने अखबारों में इश्तहार भी छपवाए, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. आज अचानक ही रोहित का मेरे नाम से पत्र आया तो मैं ने चैन की सांस ली. वह लंदन में था और मैं उस से मिलने लंदन जाने को उतावला हो उठा था. मैं ने हौस्पिटल से 15 दिन की छुट्टी ली और दूसरे दिन ही लंदन के लिए हवाई जहाज में बैठ गया.

लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर मैं सुबह उतरा तो पीली चटक धूप खिली हुई थी. मैं ने रोहित के मोबाइल पर लंदन आने की पहले ही सूचना दे दी थी. वह एयरपोर्ट पर मुझे लेने आया था. मुझे देख कर उस ने गैलरी से हाथ हिलाया तो मैं दौड़ कर उस के गले से जा लगा. उस वक्त उस में पहले जैसा ही जोश और उत्साह मैं ने महसूस किया. एकदूसरे के गले लग कर हम यूं मिले, जैसे बरसों से बिछुड़े हुए अब जुदा नहीं होंगे. हमारी आंखों में आंसू थे.

”तुम ने अचानक से मुंबई छोड़ दी रोहित और यहां इतनी दूर आ कर बसेरा कर लिया, जान सकता हूं तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

”लंबी कहानी है अभय, वक्त आएगा तो बता दूंगा. आओ घर चलें.’’ एक हलकी सी मुसकराहट चेहरे पर ला कर रोहित बोला और मुझे ले कर कार पार्किंग में आ गया.

पार्किंग में उस की शानदार कार खड़ी थी. मुझे अपने पास सीट पर बिठा कर उस ने खुद ड्राइविंग सीट संभाल ली. हमारा सफर शुरू हुआ. भव्य ऊंची इमारतों को पीछे छोड़ती हुई कार उस ओर बढ़ी, जिधर वीरान जंगल और पहाड़ों की लंबी शृंखला फैली हुई थी. शहर से दूर पहाड़ों के बीच में एक अकेला बंगला खड़ा था. कार उसी बंगले के पोर्च में आ कर रुकी. एक बूढ़ा नौकर दौड़ कर कार के पास आ गया.

”यह डेविड अंकल हैं. मेरे साथ यहीं रहते हैं. हम इस बंगले में सिर्फ 2 ही लोग हैं अभय. अब तुम आ गए हो तो हम 3 हो गए.’’ रोहित ने हंसते हुए कहा और कार से नीचे उतर गया.

”मैं यहां हमेशा थोड़ी रहूंगा दोस्त, तुम्हारे लिए 15 दिन की छुट्टी ले कर आया हूं.’’ मैं ने कहा और अपना सूटकेस उठाने लगा.

”रहने दो, यह सूटकेस डेविड अंकल तुम्हारे कमरे में पहुंचा देंगे.’’

मैं रोहित के साथ अंदर ड्राइंगरूम में आया तो वह बोला, ”अभय, तुम फ्रेश हो जाओ. हम साथ में बैठ कर नाश्ता करेंगे.’’

फे्रश होने के बाद मैं ने रोहित के साथ बैठ कर नाश्ता किया. नाश्ते के दौरान रोहित ने बताया, ”मैं ने अचानक मुंबई छोड़ी थी अभय, उस वक्त तुम अमरीका में थे, मैं तुम से संपर्क नहीं कर पाया, यहां आने के बाद मैं काम में उलझ गया. एक दिन जब शार्क होटल में एक हिंदुस्तानी के पास ‘लोकमत’ न्यूजपेपर में अपनी गुमशुदगी का तुम्हारी ओर से छपवाया गया इश्तहार पढ़ा तो मुझे तुम्हारी याद हो आई.

”मुझे मालूम था तुम कोर्स पूरा कर के मुंबई लौट आए होगे और किसी बड़े हौस्पिटल में प्लास्टिक सर्जन का पद जौइन कर लिया होगा तो मैं ने मुंबई के हर बड़े हौस्पिटल में तुम्हारे बारे में मालूम किया. मुझे स्मार्ट ब्यूटी केयर हौस्पिटल में तुम्हारे बड़ा सर्जन होने की जानकारी मिली तो मैं ने तुम्हारे नाम पत्र लिखा. इस प्रकार आज फिर मैं अपने अजीज दोस्त से मिल पाया हूं. अच्छा अभय, तुम अपना हौस्पिटल कब खोलने वाले हो?’’ रोहित ने पूछा.

”बहुत जल्द रोहित, मैं उस के लिए पैसा इकट्ठा कर रहा हूं.’’ मैं ने मुसकरा कर बताया, ”और हां, मैं अपने हौस्पिटल का नाम ‘पार्थ ब्यूटी होम’ रखने वाला हूं.’’

”पार्थ क्यों?’’

”तुम्हारी बदौलत ही मैं इस मुकाम पर पहुंचा हूं दोस्त, तुम मेरे लिए सब कुछ हो और मैं तुम्हारा पार्थ यानी सेवक हूं.’’

मैं ने नाश्ता खत्म किया और डेविड अंकल के साथ एक रूम में चला आया. मेरा सामान डेविड ने इसी कमरे में ला कर रख दिया था. इस में बैडरूम कम स्टडीरूम जैसी सुविधा थी. मैं नर्म बिस्तर पर लेटा तो जल्दी ही मुझे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया.

मेरी नींद खुली तो शाम ढलने को आ गई थी. मैं खूब सोया था. मुझे जगा देख कर डेविड मेरे लिए कड़क चाय और बिसकुट ले कर आए. मैं ने उन से रोहित के विषय में पूछा तो वह गंभीर स्वर में बोले, ”आज अमावस है न बेटा, रोहित हर अमावस को शहर जाता है.’’

”क्यों?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

”जाता होगा क्लबों और बार में, जब रात को लौटता है तो उस के साथ एक जवान और सुंदर लड़की होती है.’’

रोहित के विषय में यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी. मैं उसे अच्छे से जानता था, उसे न बार, क्लबों में जाने का शौक था, न कभी उस ने किसी लड़की के साथ दोस्ती की थी. वह लड़कियों से दस कदम दूर रहता था. फिर यहां लंदन में आ कर उस ने यह शौक कैसे पाल लिए. मेरी समझ में नहीं आ रहा था.

”मैं अपने मालिक के लिए झूठ क्यों बोलूंगा. फिर रोहित तो मेरे बेटे जैसा है, मैं उसे बदनाम क्यों करूंगा. मैं ने 3 अमावस की रातों को रोहित को नशे में लडख़ड़ाते देखा है. उस के साथ लड़की भी यहां आते देखी है. लेकिन…’’

”लेकिन क्या अंकल?’’

”जो लड़की रोहित के साथ यहां आईं, वह मैं ने वापस जाते नहीं देखीं. तलाश करने पर वह लड़की मुझे बंगले में नहीं मिली.’’

मैं चाय पी कर टहलने के इरादे से बंगले के लौन में आ गया. रोहित का एक नया रूप मेरे सामने उजागर हुआ था. मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि मेरा दोस्त एक ऐसा नकाब पहने हुए है, जिस के पीछे एक बुरा इंसान छिपा हुआ है. मैं इस की असलियत खुद जानने को उत्सुक हो गया. लौन में रंगबिरंगे फूल लगे हुए थे. उन्हें निहारते हुए मैं लौन को पार कर के बंगले के पीछे निकल आया. पीछे एक बड़ा सा तालाब था. वह शांत दिखाई दे रहा था, लेकिन मैं जैसे ही उस तालाब के किनारे गया, उस में से बड़ीबड़ी मछलियां उछलती हुई किनारे पर आ गईं. शाम पूरी तरह ढल गई थी. मैं बंगले में लौट आया और अपने कमरे में आ कर लेट गया. रोहित अभी तक शहर से वापस नहीं लौटा था.

8 बजे डेविड अंकल ने मुझे आ कर बताया कि रोहित ने फोन कर के कहा है कि मैं खाना खा लूं, वह देर से लौटेगा. मैं ने डेविड अंकल से खाना अपने कमरे में ही मंगवा लिया. खाना खा लेने के बाद मैं फिर से बिस्तर पर लेटा तो मेरी आंख लग गई. अचानक मेरी नींद किसी आहट से टूटी. मैं ने देखा रात के 12 बज रहे थे. आहट मेरे दरवाजे पर हुई थी. मैं उठ कर दबेपांव दरवाजे पर आया और दरवाजे से कान लगा दिए. बाहर बरामदे में कोई खड़ा था. मैं ने कीहोल से आंख लगा कर देखा तो मुझे रोहित नजर आया. शायद मेरे दरवाजे पर मेरी स्थिति भांपने आया था.

कुछ क्षण बाद वह मेरे दरवाजे से हट कर बरामदे में जाता नजर आया तो मैं ने धीरे से दरवाजा खोल दिया. रोहित बंगले के पीछे के भाग की तरफ जा रहा था. कुछ सोच कर मैं दबे कदम रोहित के पीछे लग गया. रोहित गैलरी पार कर के बंगले के अंतिम छोर पर आ कर रुक गया, यहां से आगे रास्ता नहीं था, समतल दीवार थी. रोहित ने दीवार पर लगी एक खूंटी को पकड़ कर घुमाया तो दीवार में एक दरवाजा खुल गया. मैं हैरान रह गया. इस दीवार में बड़ी सफाई से चोर दरवाजा भी बनाया जा सकता है, यह आश्चर्य की बात थी. रोहित उस दरवाजे से अंदर चला गया तो दरवाजा बंद हो गया. मैं लपक कर वहां आया और मैं ने वही खूंटी घुमा कर दरवाजा खोल लिया और अंदर घुस गया. सामने शीशे का हाल था. उस हाल में नजर पड़ते ही मैं बुरी तरह चौंक गया.

हाल में एक खूबसूरत लड़की घुटने के बल बैठी हुई थी. उस लड़की के हाथपांव पीछे की तरफ रस्सियों से बांध दिए गए थे. उस के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. वह बेहद डरी हुई दिखाई दे रही थी. रोहित उस के सामने खड़ा था. चूंकि रोहित की पीठ मेरी तरफ थी, वह मुझे नहीं देख पाया था. रोहित के हाथ में चाकू था. वह क्या करने वाला था, मैं नहीं समझ पाया. मैं दम साधे देख रहा था. रोहित उस भय से सहमी लड़की से कुछ कह रहा था. क्या, यह मैं नहीं सुन सकता था. शायद शीशे का वह हाल साउंडप्रूफ था. मैं उस के बाहर था, इसलिए मुझे कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी.

इस लड़की से कुछ कहने के बाद रोहित उस की तरफ बढ़ा तो मैं ने महसूस किया कि लड़की उस से दया की भीख मांग रही है, किंतु रोहित पूरा वहशी बना हुआ था. उस ने आगे बढ़ कर लड़की के बाल मुट्ठी में पकड़े और लड़की की पीठ पर चाकू से खुरचखुरच कर कुछ लिखने लगा. लड़की को मैं ने तड़पते और गला फाड़ कर चीखता महसूस किया तो मेरी आंखों में आंसू छलक आए. मेरा दोस्त, जिसे मैं क्या समझता था, आज मुझे किसी राक्षस से कम नहीं लग रहा था. लड़की असहनीय पीड़ा से चीखती हुई फर्श पर औंधी गिरी तो मैं ने पढ़ा, रोहित ने उस की पीठ पर चाकू से ‘बेवफा’ शब्द खुरचा था.

‘उफ!’ मैं ने आंखें बंद कर लीं. रोहित ने अब उस लड़की को सीधा कर के उस के सीने में चाकू उतार दिया था. लड़की बुरी तरह तड़प रही थी, उस के शरीर से खून निकल कर फर्श को लाल करने लगा था. रोहित ने उसे उसी हालत में उठाया और शीशे की दीवार के पास ले आया. वहां कोई लीवर था, उसे दबाने से शीशे में बड़ी सी खिड़की खुल गई. रोहित ने तड़पती हुई लड़की को उस खिड़की से बाहर उछाल दिया. अब मेरी समझ में आ गया था कि वह लड़की वापस क्यों नहीं जाती. रोहित उस का बेरहमी से कत्ल कर उस की लाश तालाब में फेंक देता है, मछलियां लड़की को चट कर हैं. मेरा मन रोहित के प्रति उस वक्त घृणा से भर गया. मैं चुपचाप वहां से बाहर निकला और भारी कदमों से अपने कमरे में आ गया. मुझे रात भर नींद नहीं आई. मैं बिस्तर पर पड़ा रोहित के विषय में सोचता रहा.

सुबह मैं फ्रेश हुआ तो डेविड अंकल ने आ कर कहा, ”मालिक तुम्हारा ब्रेकफास्ट के लिए इंतजार कर रहे हैं बेटा अभय.’’

”हां. चलता हूं अंकल.’’ मैं ने पैरों में स्लीपर पहनते हुए कहा.

मैं डेविड अंकल के साथ ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ा तो रोहित ने मुसकरा कर मेरा स्वागत किया, ”माफ करना अभय, कल मुझे अचानक एक जरूरी काम से शहर जाना पड़ गया था. मैं तुम्हें पहाड़ पर नहीं ले जा सका. आज…’’

मैं ने बात काट दी, ”आज नहीं रोहित, फिर किसी रोज चलेंगे.’’

”जैसा तुम्हें ठीक लगे, हम बाद में चल लेंगे.’’ रोहित ने कहा और मेरे लिए टोस्ट पर मक्खन लगाने लगा.

”रोहित, मैं ने कल तुम से पूछा था कि तुम ने अचानक से मुंबई क्यों छोड़ दी? तुम ने कहा कि लंबी कहानी है, बाद में बताऊंगा. आज तुम्हें बताना होगा कि ऐसी क्या बात हुई कि तुम मुंबई छोड़ कर लंदन में आ बसे?’’

”तुम जानने की जिद कर रहे हो तो सुनो,’’ रोहित ने गहरी सांस ले कर बताना शुरू किया, ”तुम डाक्टरी कोर्स करने अमरीका चले गए तो मेरे साथ बहुत कुछ घटा. दिल का दौरा पडऩे से अचानक डैडी चल बसे. मुझे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर डैडी का कारोबार संभालना पड़ा. मैं अब रोज कंपनी के औफिस में जाने लगा था.

”एक दिन मेरे औफिस में एक लड़की आई. वह जवान और खूबसूरत थी. बहुत गरीब घर से थी. उस के बाप का साया सिर पर नहीं था, मां थी, लेकिन बीमार रहती थी. घर में

कोई कमाने वाला नहीं था. 12 क्लास पढ़ी हुई थी, उसे काम चाहिए था. मुझे उस पर न जाने क्यों तरस आ गया. मैं ने उसे स्टेनो के पद पर रख लिया.

”मैं धीरेधीरे उस की तरफ आकर्षित होने लगा. वक्तबेवक्त मैं उस की खुले मन से मदद करने लगा. वह मेरे दिल की आवाज को पहचान गई. उस ने मेरी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए एक बात कही थी, ‘रोहित बाबू, मैं बेशक गरीब घर की हूं, लेकिन एक इज्जतदार बाप की बेटी हूं. मुझ से प्यार के नाम पर ऐसा छल मत करना कि मुझे शर्मिंदा हो कर किसी कुएंतालाब में जगह ढूंढनी पड़े.’

”मैं ने उसे विश्वास दिलाया कि मैं मर जाऊंगा, लेकिन तुम्हारे साथ कभी छल नहीं करूंगा.’’ एक क्षण को रोहित रुका, फिर कहने लगा, ”अभय, मैं ने उसे दिल से चाहा, वह यह मेरा पहला और आखिरी प्यार थी. उस के कहने पर मैं ने उस के साथ सात फेरे लेने का मन बना लिया था. इस के लिए मैं ने 15 मई का दिन तय किया.

”उस दिन अमावस थी. मुझे कुछ लोगों ने कहा कि अमावस की रात को दुलहन के साथ फेरे लेना शुभ नहीं होते, लेकिन मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता था. मैं ने लोगों से कहा कि मेरी होने वाली दुलहन पूनम का चांद है, उस की रोशनी से अमावस का अंधेरा भी जगमगा उठेगा.

”कार्ड छपे. शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं और फिर वह अमावस की रात भी आ गई, जिस दिन मुझे मेरी प्रियतमा के साथ अग्नि के सात फेरे लेने थे.

”मुंबई के वरसोवा वाले बंगले को दुलहन की तरह सजाया गया था. मुंबई शहर के जानेमाने उद्योगपति, मेरे मित्र और अन्य प्रतिष्ठित

व्यक्ति हमारी एंगेजमेंट और शादी में शामिल होने के लिए बंगले में आने शुरू हो गए थे. एंगेजमेट और शादी का समय रात 11 बजे रखा गया था.

”मैं दूल्हा बन कर मित्र मंडली में बैठा हंसीठिठोली कर रहा था. मेरी दुलहन, जिसे मैं पूनम के नाम से पुकार रहा हूं, वह भी एक कमरे में दुलहन के लिबास में सजसंवर रही होगी, मैं यही सोचे बैठा था, लेकिन मुहूर्त पर जब वह स्टेज पर नहीं आई तो मैं उसे बुलाने उस कमरे में गया, जहां वह मेकअप करवा रही थी. वह कमरा खाली था. मैं हैरानपरेशान पूनम को बंगले में तलाश करने लगा.

”मुझे टूटे हुए गजरे के फूल नीचे बेसमेंट में जाने वाली सीढिय़ों पर दिखाई दिए तो मैं बेसमेंट में उतर राया. उफ!’’ रोहित के मुंह से सर्द आह निकली. वह थके से स्वर में बोला, ”अभय, मेरी पूनम कपड़ा उद्योगपति पीयूष गिडवानी की बांहों में मुझे मिली तो मेरे सारे अरमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. मैं पूनम की बेवफाई पर रो पड़ा. क्या नहीं था मेरे पास कि उस बेवफा ने मुझे पीयूष की नजरों में बौना बना दिया. उस ने मुझे धोखा दिया था अभय. मेरे दिल पर उस ने गहरी चोट की थी.’’ रोहित कहतेकहते बच्चों की तरह रोने लगा.

मुझे रोहित के ऊपर तरस हो आया, मैं ने रोहित का कंधा थपथपा कर उसे ढांढस बंधाने के बाद कहा, ”मुझे उस का सही नाम बताओ रोहित, मैं उस से मिलूंगा और…’’

”अब कोई जरूरत नहीं है अभय. मैं ने उस बेवफा को भुला दिया है. मेरे लिए वह उसी दिन मर गई थी, जब उस ने मुझ से शादी वाले दिन बेवफाई की थी. मैं ने उसे और मुंबई शहर को भुला देने के लिए वहां से दूरी बना ली. फिर मैं लंदन आ गया. अब मैं उसे याद नहीं करता.’’

मुझे रोहित के दिलोदिमाग से लड़की जात के प्रति पैदा हुई नफरत को समाप्त करना था. सब से पहले मुझे उस नागिन का पता लगाना था, जिस ने रोहित को डसा था और इस अंजाम तक पहुंचाया था. उस का पता मुझे रोहित के कमरे से चल सकता था. मैं रोहित के बैडरूम में घुस गया और उस की अलमारियों की तलाशी लेने लगा. मैं ने वहां रखे सामान को उलटपलट डाला. मेज की ड्राअर, सेफ आदि देख लेने के बाद मैं ने रोहित के पलंग का बिस्तर पलटा तो मुझे गद्दे के नीचे एक लड़की की तसवीर नजर आ गई. मैं ने जैसे ही वह तसवीर उठा कर देखी, मुझे जबरदस्त झटका लगा. यह तसवीर शालू की थी.

शालू, जो रजनी बन चुकी थी. वह अब मेरी प्रेमिका थी, मैं उसे बहुत प्यार करता था. मेरी आंखों के आगे शालू से हुई पहली मुलाकात का एकएक दृश्य उजागर होने लगा.

मैं ने अमरीका से लौट कर मुंबई में स्मार्ट ब्यूटीकेयर हौस्पिटल में प्लास्टिक सर्जन का पद जौइन कर लिया था और मुझे रहने के लिए हौस्पिटल की तरफ से एक फ्लैट मिल गया था. एक दिन मेरे फ्लैट पर एक लड़की साफसफाई का काम मांगने आई. मैं ने देखा उस ने अपना चेहरा दुपट्टे से छिपा रखा था. वह 2 दिन से भूखी थी, उस की आंखों में याचना थी, वह बहुत मायूस और मजबूर लगी मुझे. मैं ने उस पर तरस खा कर उसे काम पर रख लिया. 2-3 दिन में ही मैं ने पहचान लिया कि वह मेहनती है. मैं ने उस से 3 दिन बाद उस के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह दुनिया में अकेली है. वह 2 वक्त की रोटी के लिए दरदर भटक रही थी, उस के सिर पर छत भी नहीं थी. आप के यहां मुझे काम मिला है तो अब मैं पेट भर कर खा लेती हूं और फ्लैट के बाहर सो जाती हूं.

”आज से तुम बाहर नहीं सोओगी, स्टोर रूम खाली है, उस में अपना बिस्तर लगा लो. और हां, तुम यह अपना चेहरा क्यों छिपा कर रखती हो?’’

उस ने गहरी सांस भर कर उदास स्वर में कहा, ”मेरी भी हसरतें जवान हुई थीं साहब, मैं ने भी एक स्मार्ट युवक से दिल लगा लिया था. वह अमीर घर से था, उस ने मुझे अपने दिल की रानी बना कर महलों में रखने की कसमें खाई थीं, लेकिन न जाने क्यों उस ने मुझे ‘बेवफा’ घोषित कर दिया और मेरे चेहरे पर तेजाब डाल कर इस शहर से ही गायब हो गया. अब मैं अपना झुलसा हुआ यह कुरूप चेहरा किसी को नहीं दिखा सकती, इसलिए ढक कर रखती हूं.’’

”ओह!’’ मैं ने तड़प कर कहा, ”मुझे अपना चेहरा दिखाओ, मैं प्लास्टिक सर्जन हूं, तुम्हारे चेहरे की कुरूपता खत्म कर सकता हूं.’’

उस ने अपना चेहरा मुझे दिखाया. उस के बाएं चेहरे को तेजाब ने बुरी तरह झुलसा दिया था. जख्म सूख चुका था, लेकिन जला हुआ वह हिस्सा इस लड़की को बहुत बदसूरत बना रहा था.

मैं ने उसे आश्वासन दिया कि मैं इस जले हुए चेहरे को नई सुंदरता दूंगा.

वादे के मुताबिक मैं ने शालू के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी की और उस के कहने पर उस को एक नया चेहरा और नया नाम दे दिया रजनी. रजनी मेरे अहसान तले दब गई थी, लेकिन मैं ने इस का कोई गलत फायदा नहीं उठाया. मैं उसे दिल की गहराई से प्यार करने लगा. वह भी मुझे चाहने लगी. हमारे प्यार में निर्मलता थी, पवित्रता थी. उस अमावस की मनहूस रात की सच्चाई क्या थी, मुझे अब यह मालूम करना था. इस के लिए मुझे मुंबई लौटना जरूरी था.

मैं ने अचानक अपना सामान पैक किया. रोहित औफिस से नहीं लौटा था. मैं ने डेविड अंकल से झूठ बोला कि मुंबई से काल आई है, मेरा एक पेशेंट बहुत सीरियस है, मुझे तुरंत बुलाया गया है. रोहित से मैं फोन पर बात कर लूंगा. मैं चुपचाप एयरपोर्ट आया और मुंबई जाने वाली फ्लाइट ले कर मुंबई के लिए रवाना हो गया.

मुंबई में आ कर मैं ने एक होटल में कमरा लिया. शालू से पहले मैं पीयूष गिडवानी को टटोलना चाहता था. शालू मेरे साथ एक साल से रह रही थी, मुझे उस के प्यार में कोई मदारी और फरेब जैसी बात देखने को नहीं मिली थी. एक कपड़ा उद्योगपति मेरा मित्र था. उस से मुझे पीयूष गिडवानी का पता मिल गया. मुझे मालूम हुआ कि रईस उद्योगपति पीयूष अब लोखंडवाला की झुग्गी बस्ती में रहता है. हैरानी की बात थी, मैं उसे ढूंढता हुआ लोखंडवाला की झुग्गी बस्ती में उस के पास पहुंच गया.

पिता हरीश गिडवानी की गिनती उद्योग जगत में रईसों में होती थी, उस का बेटा पीयूष एक छोटी सी झुग्गी में रह रहा था. उस ने मुझे हैरत भरी नजरों से देखा और बोला, ”यदि मैं भूला नहीं हूं तो आप रोहित अग्रवाल के दोस्त अभय वर्मा हैं.’’

”ठीक पहचान रहे हो पीयूष.’’ उस के पास स्टूल पर बैठते हुए मैं विषभरे स्वर में बोला, ”फिर तो तुम यह भी समझ गए होगे कि मैं तुम्हें तलाश करता हुआ इस झुग्गी तक क्यों आया हूं.’’

”आप बताइए, मैं भला बगैर बताए कैसे समझ सकता हूं?’’

”पीयूष, तुम ने रोहित और शालू की एंगेजमेट और मैरिज पार्टी में शालू के साथ जो हरकत की थी, क्या उस में शालू की रजामंदी थी?’’

”नहीं.’’ गहरी सांस भर कर पीयूष बोला, ”शालू बेचारी तो बिलकुल बेकुसूर थी. वह सिर्फ मेरी हरकत थी, उसी की सजा मैं आज भुगत रहा हूं. मैं ने पिता की मौत के बाद उन की सारी संपत्ति जुए और शराब की भेंट चढ़ा दी और मैं इस झुग्गी में आ गया. आज मैं किडनी रोगी हूं, जिंदगी की अंतिम घडिय़ां गिन रहा हूं. यह शालू के दिल से निकली बददुआ का असर हो सकता है. मैं ने ओछी हरकत कर के रोहित और शालू को जुदा कर दिया था. वह बेदाग और बेगुनाह थी. मैं आप को उस की बेगुनाही का सबूत देता हूं.’’

पीयूष उठा और कोने में रखे टूटे से संदूक में से एक कैसेट निकाल कर उस ने वह कैसेट मुझे दे दी.

”इस वीडियो कैसेट में मेरी वह तमाम हरकतें कैद हैं, जो उस अमावस की रात को पार्टी में मैं ने शालू के साथ की थीं.’’ पीयूष ने रुक कर लंबी सांस ली, ”मैं और रोहित एक ही बिजनैस कपड़ा उद्योग से जुड़े हुए थे, रोहित अकसर मुझ से आगे रहता था, इसलिए मैं उसे अपना प्रतिद्वंदी मानने लगा था. मैं ने उस से दोस्ती जरूर कर रखी थी, लेकिन मन ही मन में उस से जलता था.

”जब मुझे रोहित का एंगेजमेंट और मैरिज का कार्ड मिला तो मैं ने मन ही मन रोहित से बदला लेने का प्लान बना लिया. मैं ने पार्टी में पहुंच कर शालू को तलाश किया. वह तैयार हो कर कमरे से निकल रही थी. मैं ने उसे कोल्ड ड्रिंक औफर की. उस में मैं ने बेहोशी का पाउडर मिला दिया था. शालू ने वह ड्रिंक पी ली.

”वह बेहोश हो कर गिरने को हुई तो मैं उसे कमर से थाम कर बेसमेंट में ले आया. मैं ने एक वीडियोग्राफर को इस काम के लिए बुक कर रखा था कि वह मेरी और शालू की गंदी वीडियो बनाएगा. उस ने यह काम किया, लेकिन उस बेवकूफ ने वह दृश्य भी कैमरे में कैद कर लिए, जब मैं शालू के लिए कोल्ड ड्रिंक में बेहोशी का पाउडर डाल रहा था.

”मैं ने बेहोश शालू को बेसमेंट में लाने के बाद उस के साथ ऐसे पोज बनाया, जैसे शालू मुझे चिपक कर प्यार कर रही हो. मैं कोई हरकत करता कि शालू को तलाश करता हुआ रोहित बेसमेंट में आ गया. मैं वहां से भाग निकला. यदि कैसेट मेरे हिसाब से बनती तो मैं जिंदगी भर रोहित को ब्लैकमेल करता, लेकिन मेरा खेल बिगड़ गया था.’’ पीयूष खामोश हो कर हांफने लगा था. मैं ने अब वहां रुकना बेकार समझा. मैं वीडियो कैसेट ले कर उस की झुग्गी से बाहर निकल आया.

होटल छोड़ कर मैं अपने फ्लैट पर पहुंचा तो शालू उर्फ रजनी ने उठ कर मुझे अभिवादन किया. मैं ने उस के सामने बैठ कर बहुत गंभीर स्वर में कहा, ”रजनी, मैं 10 दिन बाद फिर लंदन जाऊंगा, इस बार तुम भी मेरे साथ चलोगी.’’

उस ने मुझे हैरानी से देखा और तरहतरह के सवाल करने लगी. मैं ने उस की किसी बात का उत्तर नहीं दिया. मैं उठ कर हौस्पिटल चला गया. दसवें दिन मैं ने रजनी को साथ लिया और रात को लंदन को लिए फ्लाइट पकड़ ली. दूसरे दिन जब मैं उसे ले कर एयरपोर्ट पर उतरा तो रजनी ने मेरी कलाई कस कर पकड़ ली और गंभीर स्वर में बोली, ”यदि आप मुझे रोहित के पास ले कर जा रहे हैं तो सुन लीजिए. मेरे मन में अब रोहित के लिए कोई जगह नहीं है, मैं अब आप से प्यार करती हूं. यदि आप मुझे सहारा नहीं दे सकते तो हाथ छुड़ा लीजिए. मैं यहां की भीड़ में खो जाऊंगी.’’

”ऐसा मत कहो रजनी, मुझ से पहले

तुम रोहित का प्यार थी, उसे आज तुम्हारी जरूरत है.’’

”रोहित कभी मेरा प्यार था डाक्टर बाबू, उस ने मुझ पर शक कर के अपने प्यार का अधिकार खो दिया है.’’

”रजनी, मेरी बात को समझो. रोहित उस रात धोखे का शिकार हुआ था, वह तुम्हें सच्चा प्यार करता था. तुम्हें पीयूष की बांहों में देख कर वह होश खो बैठा था, उस ने इसीलिए तुम्हारे चेहरे पर तेजाब फेंका था और मुंबई छोड़ कर यहां वीराने में आ बसा. अमावस की रात को वह शहर से एक लड़की बहलाफुसला कर लाता है और अपने बंगले में बड़ी बेरहमी से उस का कत्ल कर देता है. वह मानसिक रोगी बन चुका है रजनी. मैं उसे इस मानसिक विकृति से बाहर निकालना चाहता हूं, तुम मेरी मदद करोगी तो रोहित की जान बच जाएगी, वरना किसी दिन वह खुद अपनी जान ले लेगा.’’

शालू उर्फ रजनी ने गहरी सांस ली, ”अपने से जुदा करने के अलावा आप मुझ से जो कहेंगे, मैं करूंगी डाक्टर बाबू. कहिए, मुझे क्या करना है?’’

मैं ने रजनी को अपनी योजना समझा दी. मैं जो कुछ करने जा रहा था, वह बहुत जोखिम भरा था, लेकिन रोहित को मानसिक रोग से बाहर लाने के लिए इस के अलावा कोई दूसरी राह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी.

सुबह जब रोहित अपने औफिस के लिए चला गया, मैं उस के बंगले पर पहुंच गया. मुझे अचानक सामने देख कर डेविड अंकल हैरान रह गए, ”अरे तुम डाक्टर बेटा, तुम अचानक गए और आज अचानक से आ गए, सब ठीक तो है न?’’

मैं ने डेविड अंकल का प्यार से हाथ पकड़ कर कहा, ”आप मुझे बेटा मानते हैं न?’’

”हां,’’ डेविड अंकल ने आत्मीयता से कहा, ”जैसे रोहित मेरा बेटा है, वैसे तुम भी मेरे बेटे ही हो.’’

मैं ने डेविड अंकल को कुरसी पर बिठाया और वह सब कुछ सस्पेंस उन्हें बता दिया, जो मैं ने पिछली अमावस वाली रात को उस साउंडप्रूफ हाल में देखा था. मेरे कहने पर डेविड अंकल रोहित की इस मानसिक विकृति से उसे बाहर लाने के लिए मेरा साथ देने को तैयार हो गए थे.

उन की मदद से मैं ने साउंडप्रूफ हाल के कोने में एक एलईडी स्क्रीन लगा कर उस में एक पैन ड्राइव सैट कर दिया. मुंबई में ही मैं ने पीयूष से मिली विडियो कैसेट को पैनड्राइव में ट्रांसफर कर ली थी. यह काम कर के मैं शहर के लिए निकल गया. मैं ने शालू उर्फ रजनी को शहर के उस शार्क होटल में ठहरा दिया, जहां रोहित अपना शिकार तलाश करने हर अमावस की रात जाता था. कल अमावस की रात थी. मैं होटल पहुंच कर शालू से मिला और पूरी रात और दूसरे दिन शाम तक शालू के साथ कमरे में रहा. मैं उसे समझाता रहा कि उसे रोहित का सामना कैसे करना है और उसे कैसे अपनी मीठी बातों में फंसा कर उस के फ्लैट तक पहुंचना है.

शाम को शार्क होटल के बार ऐंड डांसिंग फ्लोर पर अमीर लोगों का आना शुरू हुआ. मैं ने शालू उर्फ रजनी को तैयार कर के नीचे भेज दिया. मैं खुद बड़ा सा हैट सिर पर रख कर अपने को छिपाता हुआ नीचे बार रूम में एक टेबल पर आ कर बैठ गया. शालू क्रिश्चियन परिवेश में थी. शार्ट टौप, जींस और सिर पर सफेद दुपट्टा. दुपट्टे से उस ने अपना आधा चेहरा ढक लिया था. वह इस ड्रेस में बड़ी आकर्षक लग रही थी. वह एक टेबल पर बैठ गई. 7 बजे जब बार की महफिल जवां हुई, रोहित ने बार में कदम रखा. उस ने पूरे हाल में नजरें दौड़ाईं. फिर अकेली बैठी शालू की तरफ बढ़ गया. शालू संभल कर बैठ गई.

”हैलो हसीना!’’ वह शालू के पास झुक कर मुसकराया, ”आप अकेली हैं, क्या मैं आप का पार्टनर बन सकता हूं?’’

”मैं आप जैसे हैंडसम साथी की तलाश में थी. बैठिए.’’ शालू अदा से मुसकरा कर उस की तरफ हाथ बढ़ाया.

रोहित ने जैसे ही उस का हाथ थामा तो वह एक क्षण को चौंका और शालू को देखने लगा.

”क्या हुआ?’’ शालू ने चौंक कर पूछा.

”मुझे ऐसा लगा जैसे यह हाथ मैं ने पहले भी थामा है.’’ रोहित डूबती आवाज में बोला. फिर सिर झटक कर उस ने शालू की कमर में हाथ डाल दिया, ”चलो.’’

वह शालू को ले कर बार से निकला तो मैं उस के पीछे झपटा. रोहित मुझे शालू के साथ अपनी कार में नजर आया. मैं ने एक टैक्सी रुकवाई और टैक्सी वाले को समझा दिया कि वह सावधानी से रेड रंग की उस कार का पीछा करे. आगे पीछे रोहित की कार और टैक्सी उस वीराने में स्थित फ्लैट तक पहुंच गई. मैं ने दूर ही टैक्सी रुकवा कर किराया दिया और पैदल ही फ्लैट तक पहुंच गया. आधी रात से पहले ही मैं डेविड अंकल को ले कर साउंडप्रूफ हाल में आ गया. रोहित ने शालू को उसी तरह रस्सियों से बांध कर घुटने के बल बिठा दिया था, जैसा वह दूसरी लड़कियों के साथ करता था.

मुझे ताज्जुब हुआ कि उस ने शालू को निर्वस्त्र नहीं किया था. शालू बुरी तरह डरी हुई थी. मैं ने पास पहुंच कर उस का गाल थपथपाया, ”हिम्मत रखो रजनी, तुम्हें मैं कुछ नहीं होने दूंगा. मैं और डेविड अंकल उधर एलईडी स्क्रीन के पीछे छिप रहे हैं.’’

शालू ने फीकी मुसकान के साथ सिर हिलाया. मैं डेविड अंकल को ले कर एलईडी स्क्रीन के पीछे छिप कर बैठ गया.

ठीक 12 बजे रोहित ने हाल में कदम रखा. मैं और डेविड अंकल सावधान हो गए. रोहित लडख़ड़ाती चाल से शालू की तरफ बढ़ा और उस के सामने आ कर रुक गया. वह शालू को घूरते हुए बोला, ”ऐ हसीन बला, तुम पहली लड़की हो, जिसे निर्वस्त्र करने में मेरे हाथों ने इंकार किया है. पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारी इन शरबती आंखों को मैं ने पहले भी कहीं देखा है, तुम्हारी दिल को मोह लेने वाली मधुर आवाज मेरे कानों ने पहले भी सुनी है. कौन हो तुम?’’

”मैं शालू हूं मिस्टर रोहित अग्रवाल.’’ शालू बड़ी लापरवाह अंदाज में बोली, ”वही शालू जिसे तुम बेइंतहा प्यार करते थे.’’

”नहींऽऽ’’ रोहित गला फाड़ कर गुस्से से चीख पड़ा, ”तुम शालू नहीं हो, उस बेवफा का तो मैं ने तेजाब से चेहरा बिगाड़ दिया था. यह चेहरा शालू का नहीं है.’’

”यह शालू का ही चेहरा है मिस्टर रोहित. डा. अभय ने तेजाब से जले इस चेहरे को नया लुक दिया है अब मैं शालू नहीं, रजनी बन गई हूं.’’ शालू शुष्क स्वर में बोली.

”ओह!’’ रोहित एकाएक हिंसक हो गया, ”अब मैं समझ गया, तुम शालू ही हो… तुम बेवफा हो. उस दिन मैं ने तुम्हारा चेहरा जलाया था. तुझे आज मैं तेरी बेवफाई की इतनी भयानक सजा दूंगा कि देखने वालों की रुह भी कांप जाएगी.’’ रोहित ने जेब से चमचमाता हुआ चाकू निकाला.

उस की आंखों में नफरत के शोले दहकने लगे. चेहरा क्रोध के कारण भयानक हो गया.

जैसे ही उस ने चाकू वाला हाथ ऊपर उठाया, मेरे इशारे पर डेविड अंकल ने हाल की बत्ती बुझा दी.

मैं ने तुरंत एलईडी स्क्रीन औन कर दी. स्क्रीन पर रोहित और शालू की एंगेजमेंट ऐंड मैरिज फंक्शन के दृश्य उभरने लगे. पार्टी इंजौय कर रहे मेहमानों से होता हुआ कैमरा उस दरवाजे पर आ कर रुका, जहां से शालू दुलहन के लिबास में सजीधजी बाहर निकल रही थी. फिर कैमरे में पीयूष गिडवानी नजर आया. वह एक कोल्ड ड्रिंक का गिलास टेबल पर रख कर उस में एक पुडिय़ा का पाउडर डाल रहा था. कोल्ड ड्रिंक चम्मच से हिला कर वह गिलास ले कर शालू के पास आता नजर आया, फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ”हाय! शालूजी, आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं, लीजिए मेरे हाथ से यह कोल्ड ड्रिंक पीएं, मुझे अच्छा लगेगा.’’

शालू ने मुसकरा कर कोल्ड ड्रिंक लिया और पीने लगी. कुछ ही देर बाद वह लडख़ड़ाती नजर आई. पीयूष गिडवानी ने उसे कमर से थाम लिया और बेसमेंट की तरफ बढ़ गया. बेसमेंट में ला कर उस ने उसे सोफे पर लिटा दिया और उस की साड़ी उतारने लगा. अद्र्धमूर्छित शालू उस का विरोध करती नजर आ रही थी. साड़ी उतारने के बाद उस ने शालू को जैसे ही बांहों में भरा, वहां रोहित आता दिखा. पीयूष उसे देख कर घबराया हुआ उठा और सीढिय़ों की तरफ भागा. इस के बाद स्क्रीन से वीडियो गायब हो गई.

”देख लिया रोहित शालू की बेगुनाही का सबूत.’’ मैं ने ऊंची आवाज में कहा और डेविड अंकल से बोला, ”लाइट्स जला दीजिए अंकल.’’

डेविड अंकल ने लाइट्स औन की तो हाल का दृश्य देख कर हमारे मुंह से चीखें निकल गईं. रोहित ने अपने दोनों कलाइयों की नसें काट ली थीं. वह बुत बना स्क्रीन को देख रहा था. उस की कलाइयों से निकले खून ने फर्श को रंग दिया था.

मैं घबरा कर रोहित की तरफ झपटा. डेविड ने शायद अंधेरे में ही शालू को बंधनमुक्त कर दिया था. वह भी रोहित की तरफ दौड़ी. डेविड अपनी जगह जड़ बना खड़ा रह गया था, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था.

”यह तुम ने क्या किया रोहित?’’ रोहित को बाहों में ले कर मैं चीख पड़ा.

”अंकल एंबुलेंस बुलाओ.’’

”नहीं दोस्त.’’ रोहित हाथ उठा कर शुष्क स्वर में बोला, ”मैं ने अपने प्यार पर शक कर के उस का अपमान किया है. मुझे सजा मिलनी चाहिए. वैसे भी मैं शालू को बेवफा मान कर इतने गुनाह कर चुका हूं कि कानून मुझे मौत की ही सजा देगा.

मैं कानून और शालू का गुनहगार हूं. मेरे मरने से भी इन गुनाहों का प्रायश्चित नहीं हो सकता, मुझे माफ कर देना शालू.’’ रोहित की आवाज अब डूबने लगी थी. मैं डाक्टर था, किंतु उस वक्त बेबस था. रोहित को कटी हुई कलाइयों से तेजी से खून बह कर रोहित को मौत की तरफ धकेल रहा था. मैं रोने लगा.

”नहीं अभय, मेरे दोस्त, मुझे रो कर विदा मत कर. तू तो मेरा सब से अच्छा दोस्त है, मेरे मरने के बाद तू शालू से शादी कर लेना, मेरी प्रौपर्टी का तू नौमिनी है. इस में शालू को भी भागीदार बनाना. इस फ्लैट में डेविड अंकल रहेंगे. शालू, प्लीज मेरे दोस्त अभय का खयाल रखना…’’ अंतिम शब्द बहुत मुश्किल से कह पाया था रोहित. उस की गरदन एक तरफ लुढ़क गई. मैं और शालू फूटफूट कर रोने लगे. डेविड अंकल फर्श पर बैठ कर सुबकने लगे. सुबह तक हम तीनों रोहित की लाश के पास बैठ कर रोते रहे. हम ने सुबह बड़ी सावधानी से रोहित का अंतिम संस्कार कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि रोहित मरने के बाद किसी कानूनी लफड़े में फंस कर इस बात के लिए बदनाम हो कि उस ने कई लड़कियों को मौत के घाट उतारा है.

दूसरे दिन डेविड अंकल से हम ने विदा ली. हम अपने साथ रोहित की अस्थियां ले कर मुंबई आए. यहां से हम ने हरिद्वार आ कर रोहित की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर दिया. मैं ने एक महीने बाद शालू उर्फ रजनी के साथ शादी कर ली और रोहित की लंदन वाली संपत्ति बेच कर मुंबई में ‘पार्थ ब्यूटी केयर’ नाम से हौस्पिटल खोल लिया. डेविड अंकल उस वीराने में बने फ्लैट में रह कर रोहित की यादों के सहारे जी रहे थे. Stories in Hindi

 

 

Online Crime Story : लव ट्राएंगल में ली गैंती से जान, मारते समय खून के छींटे दीवार पर फैल गए

Online Crime Story : छत्तीसगढ़ में एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के पति को गैंती से मार डाला. जब लोगों ने इस सनसनीखेज वारदात के बारे में सुना तो हैरान रह गए. प्रेमी को प्रेमिका के हसबैंड से किस तरह का खतरा महसूस हुआ कि वह उसे मार डाला, आइए जानते हैं पूरी घटना को विस्तार से

यह घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले की है. जहां 25 जुलाई, 2025 को एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका ईश्वरी केवट के पति अमरनाथ का गैंती से मार कर कत्ल कर दिया. मृतक अमरनाथ कोटमीसानोर का रहने वाला था. ईश्वरी केवट का पिछले कई सालों से युवराज नामक शख्स के साथ प्रेम संबंध चल रहा था. युवराज और कोई नही हैं ईश्वरी का ही रिश्तेदार था और बिहार के मुंगेर जिले के महुआकापा गांव में रहता था.
युवराज एक मिस्त्री का काम करता था. ईश्वरी युवराज के प्रेम प्रसंग में ऐसे पागल थी कि 22 जुलाई, 2025 को अपने प्रेमी के घर भी चली गई, लेकिन 5 दिन बाद वापस पति के पास लौट आई और उसी के साथ रहने लगी.

मीडिया रिर्पोट के मुताबिक, 25 जुलाई को शुक्रवार के दिन अमरनाथ केवट और ईश्वरी घर ही मौजूद थे. तभी युवराज स्कूटी से अमरनाथ के घर पहुंचा और आते ही उस ने घर में रखी गैंती उठाकर अमरनाथ पर हमला कर दिया. युवराज ने अमरनाथ के सीने और चेहरे पर कई वार किए, जिस के खून के छींटे दीवार पर फैल गए. अमरनाथ चिल्लाता रहा और खून से लथपथ हो कर जमीन पर जा गिरा. वारदात के वक्त ईश्वरी घर ही मौजूद थी, लेकिन उस ने अपने पति को नही बचाया. इसके बाद घटना को अंजाम देकर युवराज फरार हो गया.

अस्पताल में तोड़ा दम

जब अमरनाथ की मां को पता चला कि उस का बेटा घायल अवस्था में घर में पड़ा हुआ है तो उन्होंने तुरंत आसपड़ोस के लोगों को बुलाया. उन की मदद से अमरनाथ को नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान अस्पताल में ही उस ने दम तोड़ दिया.
वारदात की सूचना मिलते ही अकलतरा पुलिस मौके पर पहुंची और घटना की छानबीन करने लगी. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

अलकतरा के सीएसपी कविता ठाकुर ने बताया कि अमरनाथ की हत्या के बाद आरोपी युवराज बिलासपुर के लिए भाग गया था, लेकिन पुलिस ने जांच के बाद उसे 27 जुलाई, 2025 रविवार को अरेस्ट कर लिया. पुलिस ने युवराज से पूछताछ के बाद उस की प्रेमिका ईश्वरी को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस दोनों आरोपियों से पूछताछ कर पूरे मामले की गहनता से जांच कर रही है.

Short Story in Hindi love : प्रेमिका के लिए पत्नी-बेटी को नदी में फेंककर मार डाला

Short Story in Hindi love : पति की मौत के बाद शैली ने 14 साल छोटे राजकुमार उर्फ राज वर्मा से शादी कर ली. लेकिन कुछ दिनों में ही राज का मन शैली से ऊब गया तो फेसबुक के माध्यम से वह भारती के संपर्क में आ गया. इस के बाद शैली के बिगड़ैल राजकुमार ने जो किया वह…

आज के समय में सोशल मीडिया का बुखार लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. अपनी फोटो, अपनी दिनचर्या, अपनी खुशी अपना गम, सब कुछ इस आभासी दुनिया में शेयर करते हैं. यहां तक कि सच्चे दोस्त और हमसफर की तलाश भी इसी आभासी दुनिया की भीड़ में हो रही है. शैली भी फेसबुक पर अपने लिए हमसफर की तलाश कर रही थी. इसी तलाश में उस की दोस्ती राजकुमार उर्फ राज वर्मा से हुई, जिस ने फेसबुक पर अपनी आईडी राज वर्मा नाम से बना रखी थी. दोस्ती हुई तो उन के बीच बातें होने लगीं. बातों ही बातों में पता चला कि राजकुमार शैली से करीब 14 साल छोटा है. फिर भी उन के बीच दोस्ती बरकरार रही, जो धीरेधीरे प्यार का रूप ले रही थी.

शैली को भी पति की मौत के बाद एक सहारे की जरूरत थी. राजकुमार काफी स्मार्ट था और व्यवहार व बातें करने में भी काफी अच्छा था. समय के साथ दोनों काफी नजदीक आने लगे, एकदूसरे से रूबरू मिलने की इच्छा हुई तो बात कर के मिलने को तैयार हो गए. शैली हरियाणा के करनाल शहर की थी, राजकुमार भी करनाल का था. लेकिन वह गुड़गांव में प्राइवेट जौब कर रहा था. कहां मिलना है, कितने बजे मिलना है, यह सब उन दोनों ने तय कर लिया था. फिर निश्चित तिथि पर शाम 6 बजे करनाल के एक पार्क में शैली पहुंच गई. शैली वहां जिस राज वर्मा नाम के युवक से मिलने आई थी, उसे पहले उस ने कभी नहीं देखा था. फेसबुक पर दोनों ने एकदूसरे के फोटो देखे थे, वीडियो कालिंग भी उन में होती थी.

इसी के आधार पर दोनों को यकीन था कि सैकड़ों की भीड़ में वे अपने दिलबर को पहचान लेंगे. शैली पार्क में होने वाली भीड़ से थोड़ा अलग खड़ी हो गई. वहां खड़े हो कर वह राज वर्मा की तलाश में चारों ओर नजरें दौड़ाने लगी. तभी एक युवक अचानक उस के सामने आ खड़ा हुआ, ‘‘हैलो शैली!’’

शैली ने चौंक कर उसे देखा. मन में बसी हुई राज वर्मा की तसवीर से उस के चेहरे का मिलान किया तो सुखद आश्चर्य से चीख पड़ी, ‘‘राज, तुम.’’

‘‘हां मैं,’’ राज वर्मा मुसकराया,‘‘शैली, मैं कहता था न कि मैं सैकड़ों में भी तुम्हें पहचान लूंगा. देखो पहचान लिया न.’’

‘‘हां, मैं भी तो तुम्हें पहचान गई,’’ राज से मिलने का उत्साह और उल्लास शैली के चेहरे से छलक रहा था, ‘‘तुम तो समय से पहले आ गए.’’

‘‘तुम भी तो आधे घंटा पहले आई हो.’’

‘‘दिल जिसे चाहता हो, पहली बार उस से रूबरू मिलने का जोश ही अलग होता है.’’ शैली बोली.

‘‘शैली, सही कहा तुम ने,’’ राज की मुसकान खिली, ‘‘समय पास करना मुश्किल हो रहा था. एकएक लम्हा सदियों की तरह बीत रहा था. इसीलिए मैं 40 मिनट पहले ही पार्क में आ गया.’’

‘‘इसी को कहते हैं दोनों तरफ बराबर आग लगी होना,’’ शैली हंसती हुई बोली, ‘‘हम कब तक यहां खड़े हो कर बात करेंगे. चलो, कहीं सुकून से बैठ कर बातें करें.’’

‘‘मैं जानता था कि जब हम पहली बार मिलेंगे तो बातें खत्म होने का नाम नहीं लेंगी. किसी तरह का डिस्टरबेंस भी हमें मंजूर नहीं होगा.’’ राज चहक कर बोला, ‘‘इसीलिए मैं ने ऐसी जगह का बंदोबस्त कर लिया है, जहां बेफिक्र हो कर बातें करें.’’

‘‘राज, यह काम तुम ने बहुत सही किया,’’ शैली ने खुशी जाहिर की.

राजकुमार के कदम बढ़े तो शैली भी उस के साथ कदम मिलाने लगी. एक के बाद एक परेशानियों ने घेरा शैली को हरियाणा के करनाल जिले के गांव असम की रहने वाली थी शैली. शैली सुशिक्षित व संस्कारी युवती थी. शैली के पिता का नाम खैरातीलाल बल्ला और मां का नाम उषा रानी था. शैली के पिता खैरातीलाल का बैटरियां बेचने का कामधंधा था. उन का यह काम बहुत अच्छा चलता था. जिस वजह से वह आर्थिक रूप से काफी सुदृढ़ थे. शैली की एक बहन मोनिका और एक भाई करन था. करन जब 13 साल का था, तभी पेट का संक्रमण होने के कारण उस की मृत्यु हो गई थी. वर्ष 1997 में शैली का विवाह दिल्ली निवासी अनिल वर्मा से कर दिया.

कालांतर में शैली ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने तान्या रखा. समय का पहिया घूमता रहा. एक समय वह आया जब अनिल को अपने बिजनैस में काफी घाटा हुआ तो वह परेशान हो गया. वह तनाव में रहने लगा. शैली भी पति को परेशान देख कर दुखी रहने लगी. शैली ने अपने पिता को बात बताई तो उन्होंने दोनों को अपने पास आ कर रहने को कहा. शैली ने अपने पति अनिल से बात की तो मजबूर अनिल को अपनी ससुराल में रहने के लिए हां कहना पड़ा. शैली पति अनिल और बेटी तान्या के साथ अपने पिता के घर शिफ्ट हो गई. खैरातीलाल ने दामाद अनिल को अपने बैटरी के बिजनैस में जोड़ लिया. वैसे भी उन का एक ही बेटा था, जोकि अब इस दुनिया में नहीं था.

दामाद भी एक तरह से बेटा ही होता है, यही सोच कर खैरातीलाल ने यह कदम उठाया था. एक बार फिर से शैली की जिंदगी में सब अच्छा चलने लगा. साल दर साल गुजरने लगे. फिर अचानक समय ने अपना रुख बदला. 2014 में शैली की मां का देहांत हो गया. मां की मौत से वह उबर पाती कि 2016 में पति अनिल की भी बीमारी के कारण मौत हो गई. शैली की राज से बनीं नजदीकियां पति के बिना जिंदगी गुजारना बहुत कठिन होता है. शैली के आगे अभी पूरी जिंदगी पड़ी थी और उस के सिर पर बेटी तान्या की भी जिम्मेदारी थी. ऐसे में शैली ने दूसरी शादी करने का फैसला कर लिया. उस ने तमाम माध्यमों से अपने नए हमसफर की तलाश करनी शुरू कर दी.

शैली ने फेसबुक पर अपना एकाउंट बना रखा था. फेसबुक पर वह रोज नए लोगों से मिलती, उन की फ्रैंड रिक्वेस्ट को स्वीकार करती. इन में से ही एक युवक था राजकुमार वर्मा उर्फ राज. राज करनाल के गांव निगदू का निवासी था. उस के परिवार में मातापिता और एक भाई व 3 बहनें थीं. राज की उम्र शैली से करीब 14 साल कम थी. फेसबुक पर शैली के मित्रों की सूची में उस ने भी जगह बना ली. राज शैली के मित्रों की सूची में जुड़ने वाला सिर्फ एक नाम बन कर नहीं जुड़ने आया था, वह तो शैली के दिल तक अपनी पहुंच बना कर उसे अपना बनाने आया था. उस ने शैली को मैसेज पर मैसेज करने शुरू कर दिए.

पहले तो वह जानपहचान बढ़ाने के उद्देश्य से शैली को मैसेज कर रहा था. शैली जब उस से मैसेंजर पर बातें करने लगी तो वह एक  सच्चा दोस्त बन कर उस से दोस्ती की बातें करने लगा. शैली को भी उस की बातों में मजा आता था. राज स्मार्ट था और बातों का धनी था. शैली भी उस से प्रभावित हो कर उस से खुलने लगी. शैली ने राज को अपने बारे में सब बता दिया था. उस के बावजूद राज उसे पटाने में लगा था. राज युवा था और अविवाहित था. उसे कोई भी खूबसूरत युवती मिल जाती और शादी करने को तैयार हो जाती. लेकिन राज को शैली में न जाने क्या दिखा, जो वह अपने से 14 साल बड़ी विधवा औरत, जिस के एक जवान बेटी भी थी, उस के प्यार में पड़ने को आतुर था.

यह प्यार था या एक जाल, जिस में वह शैली को फांसने की तैयारी कर रहा था. यह तो वक्त के गर्त में छिपा था. लेकिन इतना सब शैली ने नहीं सोचा. वह तो राज जैसे युवा को अपनी तरफ आकर्षित देख कर फूली नहीं समा रही थी. शादी तक पहुंचा प्यार दोस्ती की अगली सीढ़ी प्यार होता है. दोनों प्यार की सीढ़ी पर चढ़ने को आतुर थे. उन के बीच वीडियो काल पर बातें होने लगीं. ऐसी ही एक वीडियो काल के दौरान राज ने शैली से कहा, ‘‘हम दोनों को फेसबुक पर जुड़े काफी समय हो गया. लेकिन मैं इधर काफी दिनों से महसूस करने लगा हूं कि हमारा रिश्ता दोस्ती के रिश्ते से भी आगे बढ़ गया है.

‘‘जिस रिश्ते की दहलीज पर हम ने कदम रखा है वह रिश्ता है प्यार का रिश्ता. मुझे तुम से प्यार हो गया है शैली. यह कब हुआ कैसे हुआ, इस बात का मुझे भी पता न चला. जब इस को मैं ने महसूस किया तो दिल की खुशी का ठिकाना न रहा. मुझे लगता है कि तुम भी मुझ से प्यार करती हो. एम आई राइट शैली?’’

शैली यह सुन कर मन ही मन खुश हो रही थी, उस ने अपनी यह खुशी राज पर जाहिर नहीं होने दी और बोली, ‘‘राज, हम दोस्त ही रहें तो अच्छा है, प्यार के चक्कर से दूर रहें, वही ठीक है.’’

शैली के गोलमोल जवाब से राज जान गया कि शैली के दिल में भी वही है, जो वह चाहता है. वह भी उसे प्यार करती है लेकिन कहने से कतरा रही है. हो सकता है इस के पीछे बड़ा कारण हो. लेकिन उस ने भी ठान लिया कि वह शैली को मना कर ही रहेगा.

‘‘शैली, ऐसा क्यों कह रही हो. जब प्यार करती हो तो उसे स्वीकार भी करो. दिल में छिपा कर मत रखो.’’ राज ने बेचैन हो कर शैली से कहा.

‘‘राज हम दोनों में उम्र का बहुत बड़ा फासला है. तुम से कुछ साल छोटी मेरी एक बेटी है. ऐसे में हम प्यार के रिश्ते में नहीं पड़ सकते, दोस्ती का रिश्ता ही ठीक है. वैसे भी हमारे समाज में यह स्वीकार्य नहीं है.’’

‘‘तुम मुझ से बड़ी हो फिर भी नासमझी वाली बातें कर रही हो. प्यार कभी उम्र नहीं देखता, कभी जातपात, ऊंचनीच नहीं देखता और न किसी की परवाह करता है. जिस से होता है तो बस हो जाता है. हमारी जिंदगी है तो जिंदगी के फैसले हम ही लेंगे, खासतौर पर उन फैसलों को जिन पर हमारी जिंदगी की खुशियां टिकी हैं.

‘‘वैसे भी समाज में कई उदाहरण हैं जिस में महिला पुरुष से बड़ी थी, लेकिन उन्होंने किसी की परवाह नहीं की और एक बंधन में बंध कर खुशहाल जिंदगी गुजार रहे हैं. जब वे एक साथ अच्छी जिंदगी गुजार सकते हैं तो हम क्यों नहीं.’’ राज ने समझाया.

कुछ सोच कर शैली बोली, ‘‘बात तो तुम्हारी सही है, हमें अपनी जिंदगी के फैसले लेने का खुद हक है. किसी को परेशानी हो तो उस से हमें क्या करना. मैं भी तुम्हें बहुत दिनों से चाह रही थी. लेकिन दुविधा में पड़ी थी. तुम ने आज मुझे निश्चिंत कर दिया कि तुम मेरे जीवनसाथी बनने के लिए ही बने हो. लव यू राज.’’

‘‘लव यू टू शैली.’’ राज ने भी शैली के प्यार का जवाब प्यार से दिया. इस के बाद उन के बीच काफी देर तक बातें होती रहीं. राज शैली को मनाने में सफल हो गया.

उन में प्यार हो गया वह भी बिना एकदूसरे से मिले. अब दोनों ने एकदूसरे से मिलने का फैसला किया.

निश्चित तिथि पर पार्क में दोनों मिले. एकदूसरे को सामने देख कर दोनों खुश हुए. पार्क में बात करने में दिक्कत हुई तो वे सुरक्षित और शांत ठिकाने पर बातें करने चले गए. इस के बाद उन के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता ही गया. बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला लिया तो अपने घर वालों को बताया. शैली ने अपनी छोटी बहन मोनिका को इस बारे में बताया तो मोनिका ने अपनी बड़ी बहन से कहा कि उन्होंने राज के बारे में सब पता कर लिया है कि नहीं. इस पर शैली ने उसे आश्वस्त किया कि उस ने राज के बारे में सब पता कर लिया है. जबकि शैली को उतना ही पता था, जितना राज ने उसे बताया था.

ससुराल में होने लगी अनबन वर्ष 2017 में शैली ने राज से विवाह कर लिया. विवाह के बाद बेटी तान्या के साथ ससुराल गांव निगदू आ गई. कुछ समय तक सब ठीकठाक चलता रहा. उस के बाद शैली की राज के घर वालों से तकरार होने लगी. उस की वजह यह थी कि वे सब शैली और उस की बेटी तान्या को परेशान करते थे. राज या तो चुप रहता या अपने घर वालों का ही पक्ष लेता. जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो शैली ने अलग रहने का इरादा कर लिया. शैली ने करनाल शहर के न्यू प्रेमनगर मोहल्ले में मकान किराए पर ले लिया. शैली ने जहां मकान किराए पर लिया था, वहीं 2 गली छोड़ कर उस की छोटी बहन मोनिका किराए पर रहती थी.

मोनिका का पति अमनदीप वासी अमेरिका में जौब करता था और वहां की उसे स्थाई नागरिकता मिली हुई थी. मोनिका कुछ समय के अंतराल पर पति से मिलने अमेरिका जाती रहती थी. मोनिका के 14 साल की एक बेटी और 9 साल का एक बेटा था, जोकि उस के साथ ही रहते थे. शैली शहर में आ कर रही तो उस ने अपना और अपनी बेटी का खर्चा उठाने के लिए करनाल की मुगल मार्केट में सोलर एनर्जी से जुड़ी एक कंपनी के औफिस में नौकरी कर ली थी. कुछ दिन में राज भी उस के पास वहां आ कर रहने लगा. राज काम करना चाहता था. उस के पास पैसे नहीं थे. वह शैली से पैसों का इंतजाम करने को कहता था. राज को पता था कि शैली के पास काफी पैसा है और दिल्ली में पहले पति का फ्लैट भी उस के नाम है.

राज ने जब काफी जिद की तो शैली ने पिछले साल 10 लाख रुपयों का इंतजाम कर के उसे पैसा कमाने के लिए पुर्तगाल भेजा. भारती के प्यार ने बदल दी सोच पुर्तगाल में राज किसी कंपनी में लग गया. इसी दौरान फेसबुक पर राज की मुलाकात 21 वर्षीय भारती से हुई. भारती करनाल के कौल गांव की रहने वाली थी. उस के पिता एक ज्वैलर थे. भारती से फेसबुक पर दोस्ती हुई तो उन में बातचीत होने लगी. दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे. भारती और राज एकदूसरे के बारे में जानने को उत्सुक थे. राज ने भारती को बताया कि वह शादीशुदा है लेकिन वह अपनी पत्नी से तलाक लेने वाला है.

पत्नी उम्र में बड़ी है और उस की एक बेटी है जिस की उम्र 21 साल है, जितनी उस की (भारती) उम्र है. शैली ने साजिश के तहत उस पर दबाव बना कर उस से शादी की थी. अब वह उस से पीछा छुड़ाना चाहता है. वैसे भी ऐसे बेमेल रिश्ते का खत्म हो जाना अच्छा है. राज की बात सुन कर भारती खुश हुई. उस ने राज से बिना सोचेसमझे अपने प्यार का इजहार कर दिया. राज उस की हिम्मत की दाद देने लगा. राज भी यही चाहता था. उसे लगा था कि भारती को लाइन पर लाने में काफी समय लगेगा, लेकिन यहां तो वह खुद ही बिना देर किए उस की गोद में आ गिरी. राज ने भी उस से अपने प्यार का इजहार किया. फिर दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा.

12 मार्च, 2021 को राज पुर्तगाल से वापस करनाल आ गया. वह भारती से मिला. दोनों मिल कर बहुत खुश हुए. इस के बाद उन की बराबर मुलाकातें होने लगीं. पुर्तगाल से वापस आते ही राज ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए. वह शैली से दिल्ली वाला फ्लैट बेचने का दबाव बनाने लगा. फ्लैट बेच कर मिलने वाले पैसों से वह अमेरिका जाना चाहता था. शैली को हटाने की बनाई योजना शैली ने साफ मना कर दिया. भारती से शादी करने के लिए वह शैली से तलाक देने की बात करने लगा. तलाक की वजह उस ने शैली को बताई कि उस के कोई बच्चा नहीं हो रहा, इसलिए वह तलाक लेना चाहता है.

जबकि शैली ने शादी से पहले ही उस से कह दिया था कि वह बच्चा नहीं चाहती. फिर भी अब राज उस से बच्चा न होने का उलाहना दे कर तलाक चाहता था. राज को शैली से तलाक पाने का यही सही तरीका लगा था. लेकिन शैली तलाक देने को तैयार नहीं हुई. राज ने भारती को बताया तो भारती ने उस से कहा कि कैसे भी कर के उसे रास्ते से हटाओ, उस की हत्या करनी पड़े तो वह भी करो. शैली ने राज के लिए सारे रास्ते बंद कर रखे थे. इसलिए उस ने भी निश्चय कर लिया कि शैली से हर हाल में छुटकारा पाना है. इस के लिए राज और भारती ने योजना बनाई. योजना ऐसी कि जिस से मामला हत्या का नहीं, हादसे का लगे.

19 मई, 2021 को राज शैली और तान्या को बठिंडा में रहने वाले दादा से मिलवाने के लिए बाइक पर बैठा कर करनाल से चला. किरमिच के पास भाखड़ा नदी में जानबूझ कर उस ने अपनी बाइक गिरा दी. बाइक के साथ ही तीनों नदी में गिर गए. शैली और तान्या को तैरना नहीं आता था. राज यह जानता था, इसीलिए यह योजना बनाई थी. नदी में गिरने पर राज ने लात मार कर शैली व तान्या को नदी के बीच में कर दिया, जिस से वे डूब कर मर जाएं. जब डूबने से दोनों की मौत हो गई, तब वह तैर कर नदी से बाहर निकला. फिर जेब में पन्नी में लिपटा मोबाइल निकाला और भारती को काल कर के दोनों का काम हो जाने की बात बताई.

योजना में हुए सफल बात करने के बाद फोन को नदी में फेंक दिया. वह चिल्ला कर लोगों को हादसा बताने का ड्रामा करने लगा. वहां लोगों से पत्नी और सौतेली बेटी के नदी में गिरने की बात कहने लगा, दोनों को तैरना नहीं आता, ये भी बात बताई. पास में ही ईंट भट्ठे पर मजदूर काम करते थे. वे दोनों को बचाने के लिए नदी में कूद गए. काफी तलाशने पर शैली मृत अवस्था में मिली, जिसे वे मजदूर नहर से बाहर निकाल लाए. तान्या का कुछ पता नहीं चला. राज ने अपने परिवार वालों को घटनास्थल पर बुलवा लिया. घटनास्थल कुरुक्षेत्र जिले के केयूके थाना क्षेत्र में आता था. पुलिस को घटना की सूचना दे दी गई. सूचना पा कर केयूके थाने के एसएचओ राकेश राणा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

राज वर्मा ने उन्हें घटना के बारे में बताया. थानाप्रभारी राणा ने गोताखोरों को नदी में उतार कर तान्या की खोजबीन की, लेकिन तान्या का कुछ पता नहीं चला. इस पर उन्होंने शैली की लाश का निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. राज ने मोनिका को शाम 4 बज कर 20 मिनट पर फोन कर के हादसा होने की जानकारी दी थी. जबकि घटना अपराह्न 3 बजे की थी. राज ने जो बताया, उस से मोनिका समझ गई कि राज ने दोनों को मारने का प्लान बनाया था, जिसे हादसा होना बता रहा है. मोनिका ने केयूके थाने जा कर एक तहरीर दी, जिस में उस ने राज की हरकतों का ब्यौरा देते हुए अपनी बहन और उस की बेटी की हत्या का आरोप उस पर लगाया था. उस साजिश में राज के मातापिता, भाई और 3 बहनों पर आरोप लगाया था.

थानाप्रभारी राकेश राणा को पहले ही राज वर्मा की बातों पर शक था. मोनिका की तहरीर के बाद वह शक और भी पुख्ता हो गया. उन्होंने मोनिका को वादी बना कर राज वर्मा और उस के 6 पारिवारिक सदस्यों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद थानाप्रभारी राणा ने राज वर्मा को गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की तो वह गुमराह करता रहा. 21 मई, 2021 को उसे कोर्ट में पेश कर के एक दिन की रिमांड पर लिया गया. राज वर्मा के फोन नंबर की काल डिटेल्स की जांच करने के बाद 22 मई को भारती को भी उस के गांव कौल से गिरफ्तार कर लिया गया. 22 मई को नया ऐंगल सामने आने के बाद कोर्ट से राज वर्मा की एक दिन की रिमांड और ली गई.

राज और भारती का आमनासामना करा कर पूछताछ की गई तो सारा भेद खुल कर सामने आ गया. पुलिस ने गोताखोरों की मदद से नदी से राज की बाइक बरामद कर ली. 23 मई, 2021 को जांबा गांव के पास नदी से तान्या की लाश भी बरामद हो गई. 23 मई को राजकुमार वर्मा और भारती को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. Short Story in Hindi love

—कथा पुलिस सूत्रों और मोनिका से पूछताछ पर आधार

Hindi Suspense Stories : ओलंपिक सुशिल कुमार का खूनी दंगल

Hindi Suspense Stories : छत्रसाल स्टेडियम से अपने कुश्ती के करियर की शुरुआत करने वाले सुशील पहलवान ने अपनी मेहनत के बूते विश्व भर में अपनी पहचान बनाई. देश ने भी उन्हें अपार मानसम्मान दिया. लेकिन जिस स्टेडियम ने उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाया, उसी स्टेडियम में सुशील पहलवान ने अपनी ताकत और गुरूर का ऐसा नंगा नाच किया कि…

कहते हैं कि शोहरत ऐसा नशा है जो सिर चढ़ कर बोलता है. क्योंकि शोहरत से ताकत और पैसा दोनों मिलता है. जिस इंसान के पास पैसा और ताकत दोनों हों तो स्वाभाविक है कि ताकत का नशा उस के सिर चढ़ कर बोलने लगता है. आमतौर पर कुश्ती लड़ने वाले ऐसे पहलवान जो शोहरत की बुलंदियों को छू लेते हैं, उन के सिर पर ताकत का ऐसा ही नशा सवार हो जाता है. सुशील पहलवान ऐसा नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है. दुनिया का यह नामचीन पहलवान भी ताकत के इसी नशे का शिकार हो गया. वैसे तो पूरी दुनिया सुशील पहलवान के बारे में जानती है लेकिन कहानी शुरू करने से पहले थोड़ा सुशील पहलवान के बारे में जान लेना जरूरी है.

दिल्ली के नजफगढ़ इलाके के बपरोला गांव में 26 मई, 1983 को दीवान सिंह और कमला देवी के सब से बड़े बेटे के रूप में सुशील कुमार का जन्म हुआ. साधारण परिवार में जन्मे सुशील 3 भाइयों के परिवार में सब से बड़े हैं. सुशील के पिता दिल्ली परिवहन निगम में एक बस ड्राइवर के रूप में कार्यरत थे और अपने विभाग में कुश्ती खेलते थे. इसीलिए बचपन से सुशील को भी कुश्ती के खेल का शौक ऐसा लगा कि किशोर उम्र तक आतेआते न सिर्फ कुश्ती लड़ने लगे, बल्कि ओलंपिक में पदक जीतना जिंदगी का लक्ष्य बन गया. सुशील जब 14 साल के थे तो उत्तर पश्चिम दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में स्थित ‘अखाड़ा’ या कुश्ती अकादमी में एक पहलवान के रूप में उन्होंने दाखिला ले लिया.

जहां प्रसिद्ध पहलवान महाबली सतपाल उन के प्रशिक्षक थे. सुशील ने बपरोला के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद जब दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन ले कर स्नातक की पढ़ाई शुरू की तो वे पूरी तरह दिल्ली के हो कर रह गए. पद्मश्री उपाधि प्राप्त जानेमाने पहलवान महाबली सतपाल की संगत में सुशील को पहलवानी के नए गुर सीखने को मिले और सुशील जल्द ही एक कुशल पहलवान बनने की तरफ तेजी से बढ़ने लगे.  सुशील पहलवानी के क्षेत्र में नाम कमाने के लिए दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में प्रतिदिन सुबह 5 बजे से कुश्ती के दांवपेच सीखते और जम कर पसीना बहाते. कई राजकीय व राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहलवानी का लोहा मनवाने के बाद सुशील कुमार ने जूनियर स्तर में प्रतिस्पर्धा शुरू की और सन 1998 में उन्होंने अपना पहला टूर्नामेंट जीता जब वे विश्व कैडेट खेलों में स्वर्ण पदक विजेता के रूप में उभरे.

पहली बार सन 2006 में दोहा एशियाई खेलों में सिलवर पदक जीता तो सब ने उन की प्रतिभा को लोहा मानना शुरू कर दिया. इस के बाद सुशील की सफलता की कहानी शुरू हुई तो उन्होंने देश का नाम कई बार रोशन किया. कनाडा में आयोजित राष्ट्रमंडल कुश्ती प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया तो उन की शोहरत का डंका बजने लगा. सन 2008 के बीजिंग ओलंपिक में उन्होंने कांस्य पदक जीता. सन 2010 में मास्को में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुमार ने इतिहास रचा, जब वे कुश्ती में विश्व खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने. उसी वर्ष उन्होंने दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में स्वर्ण पदक जीता.

2012 में उन्होंने एक बार फिर इतिहास रचा, जब उन्होंने लंदन ओलंपिक में 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में रजत पदक जीता और व्यक्तिगत ओलंपिक पदक वापस जीतने वाले पहले भारतीय बने. 2014 में सुशील कुमार ने स्कौटलैंड के ग्लासगो में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में स्वर्ण पदक जीता. सुशील कुमार को सरकार ने रेलवे में खेल कोटे से नौकरी दी, जहां वे इन दिनों कार्यरत भी हैं. 2015 में उन्होंने टीवी शो एमटीवी रोडीज में सह जज के रूप में भी काम किया. सरकार ने भी किया सम्मानित सुशील के गले में बढ़ती चांदी, कांस्य और सोने के मैडलों की संख्या के साथ हरियाणा व दिल्ली सरकार के साथ केंद्र सरकार की तरफ से उन के ऊपर लाखोंकरोड़ों रुपए के पुरस्कारों की बरसात भी होने लगी.

सरकार ने देश का नाम रोशन करने के लिए सुशील कुमार को सन 2005 में अर्जुन पुरस्कार से, सन 2008 में भारत में सर्वोच्च खेल सम्मान, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया और सन 2011 में उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. 18 फरवरी, 2011 को जानेमाने पहलवान गुरु सतपाल की बेटी सावी सोलंकी से सुशील ने शादी की थी, जिन से साल 2014 में इस दंपति को जुड़वा बेटे पैदा हुए. ये थी सुशील पहलवान के शोहरत की कहानी जिस के कारण उन पर करोड़ों रुपए की बरसात हुई और उन्होंने लाखोंकरोड़ों की संपत्ति अर्जित की तथा देश और दुनिया के नामचीन लोगों से उन के संबध बने.

लेकिन 4 मई, 2021 की आधी रात को सुबह दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में जो कुछ हुआ, उस ने एक क्षण में शोहरत की बुलंदियां छूने वाले पहलवान सुशील कुमार के नाम को अर्श से फर्श पर ला दिया. दरअसल, पुलिस को 4 मई, 2021 को आधी रात करीब डेढ़ बजे छत्रसाल स्टेडियम में गोलियां चलने की सूचना मिली. पुलिस कंट्रोल रूम से मिली इस सूचना पर उत्तर पश्चिम जिले के इस स्टेडियम के अधीन पड़ने वाले मौडल टाउन थाने में रात की ड्यूटी पर तैनात इमरजेंसी अफसर एएसआई जितेंद्र सिंह अपने साथ पुलिस स्टाफ ले कर छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे तो वहां पार्किंग में मारुति अल्टो, स्कौर्पियो, होंडा सिटी, फौरच्युचनर तथा ब्रेजा कारें तो खड़ी मिलीं, लेकिन ऐसा कोई आदमी नहीं मिला, जो घटना के चश्मदीद के तौर पर जानकारी दे पाता.

लेकिन इतना जरूर पता चला कि उन के आने से पहले पीसीआर की गाड़ी 3 ऐसे जख्मी व खून से लथपथ लोगों, जिन्हें शायद बुरी तरह पीटा गया था, को लेकर बाबू जगजीवनराम अस्पताल गई है. सुशील पहलवान का नाम आया सामने हालात जानने के बाद एएसआई जितेंद्र सिंह ने कुछ स्टाफ को सुरक्षा और निगरानी के लिए वहीं छोड़ा और खुद बाकी स्टाफ के साथ बाबू जगजीवन राम अस्पताल पहुंच गए. वहां पहुंचने पर पता चला कि जिन 3 लोगों को घायलावस्था में वहां लाया गया था, उन को इलाज के लिए निजी अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया गया है क्योंकि उन्हें गंभीर चोटें थीं.

घायलों के परिजन भी मौके पर आ चुके थे लिहाजा वे उन्हें दूसरे अस्पताल ले गए. घायल तो नहीं मिले अलबत्ता उन की पहचान सोनू (37) पुत्र सतवीर निवासी एमसीडी कालोनी दिल्ली, सागर (23) पुत्र अशोक निवासी एम 2 /1 मौडल टाउन (तृतीय), दिल्ली  और अमित कुमार (27) पुत्र महेंद्र निवासी अदरेती चावला, रोहतक (हरियाणा) के रूप में हुई. पुलिस ने तीनों घायलों के परिजनों के फोन नंबर व दस्तावेज हासिल कर लिए और आगे की काररवाई के लिए एएसआई जितेंद्र फिर से छत्रसाल स्टेडियम पहुंच गए. उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुलवा लिया ताकि घटनास्थलल पर हुए झगड़े और मारपीट के साक्ष्य एकत्र किए जा सकें. एएसआई जितेंद्र सिंह ने पार्किंग में खड़ी पांचों गाडि़यों की एकएक कर तलाशी लेने का काम शुरू कर दिया.

जिस के बाद स्कौर्पियो कार की पिछली सीट पर एक दोनाली बंदूक व 3 जिंदा कारतूस मिले, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. इस के अलावा पुलिस को लकड़ी के कुछ डंडे भी मिले, जिन पर खून के धब्बे लगे थे. तब तक पुलिस को कुछ लोगों से पूछताछ के बाद इस बात की भनक लग चुकी थी कि सोनू, सागर व अमित नाम के जिन युवकों को चोट लगने के कारण अस्पताल पहुंचाया गया था, उन की छत्रसाल स्टेडियम के ओएसडी (खेल) और जानेमाने पहलवान सुशील कुमार ने अपने साथियों के साथ मिल कर पिटाई की थी. चूंकि यह वारदात दिल्ली में चल रहे लौकडाउन के दौरान उस का उल्लंघन कर के हुई थी, इसलिए सूचना मिलते ही मौडल टाउन थाने के थानाप्रभारी दिनेश कुमार इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) प्रभांशु कुमार, इंसपेक्टर (एटीओ ) अमित कुमार तथा एसीपी (मौडल टाउन) विपुल बिहारी महिपाल भी घटनास्थल पर आ चुके थे.

घायल सागर पहलवान ने तोड़ा दम घटनास्थल पर जांच और लोगों से पूछताछ करने की औपचारिकता में भोर का उजाला हो चला था, जिस के बाद पुलिस ने पीसीआर को मिली काल व घटनास्थल पर की गई जांच के आधार पर मौडल टाउन थाने में भादंसं की धारा 308 (गैरइरादतन हत्या का प्रयास), 365 (अपहरण), 323 (मारपीट), 325 (गंभीर चोट पहुंचाना), 341 (रास्ता रोकना), 506 (जान से मारने की धमकी देना),188 (सरकारी आदेश का उल्लंघन), 269 (महामारी में जीवन को संकट में डालना), 120बी (आपराधिक साजिश), 34 (समान आशय) और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 /54 /59 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया, जिस की जांच का जिम्मा इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) प्रभांशु कुमार के सुपुर्द कर दिया गया.

अभी तक पुलिस की समझ में पूरा मामला आया भी नहीं था और जांच ठीक से शुरू भी नहीं हुई थी और यह भी पता नहीं चला था कि इस मामले में विवाद क्या था और असली गुनहगार कौन थे. तब तक पुलिस को सूचना मिली कि इस मामले में घायल एक युवक सागर धनखड़ (23) ने अस्पताल में दम तोड़ दिया है. मारपीट का यह मामला अचानक हत्या के मामले में तब्दील होते ही दिल्ली पुलिस के अधिकारी सक्रिय हो गए. मुकदमे में हत्या की धारा 302 भी जोड़ दी गई. उभरता हुआ पहलवान था सागर चूंकि सुशील कुमार देश के नामी पहलवान और ओलंपिक पदक विजेता होने के साथ पद्मश्री अवार्ड से भी सम्मानित हैं.

इस वारदात में उन का नाम सामने आते ही यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि छत्रसाल स्टेडियम में कुछ पहलवानों के बीच गैंगवार हुआ है. उत्तर पश्चिम जिला पुलिस की डीसीपी उषा रंगनानी व अतिरिक्त उपायुक्तडा. गुर इकबाल सिंह सिद्धू भी जयपुर गोल्डन अस्पताल पहुंचे, जहां सागर भरती था. हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला सागर धनखड़ देश का एक उभरता हुआ कुश्ती खिलाडी था. कुश्ती के गुर सीखने के लिए उस ने 14 साल की उम्र में ही दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में अभ्यास करना शुरू कर दिया था. 23 साल का सागर जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीत चुका था. अस्पताल में मौजूद सागर के चाचा नरेंद्र ने बताया कि 5 बार ताइवान, चीन थाईलैंड जैसे देशों में जा कर सागर ने पदक भी जीते हैं.

उस का सपना ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतने का था. 4 दिन पहले ही वह घर से लौट कर आया था. लेकिन उस ने ऐसी कोई बात नहीं की थी, जिस से पता चल पता चले कि कोई झगड़ा है. परिवार वालों को उस ने बताया था कि वह कुछ दोस्तों के साथ मौडल टाउन (तृतीय) में किराए के फ्लैट में रह रहा था. सागर के पिता दिल्ली पुलिस में ही हैडकांस्टेबल के तौर पर काम कर रहे हैं. जबकि भाई पिछले 3 साल से आस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहा है. इस हादसे में घायल दूसरे पहलवान सोनू ने सुबह सागर के पिता को फोन कर वारदात की जानकारी दी थी. सागर के परिवार वालों के बयान लेने और उस का शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद पुलिस ने प्राइवेट अस्पताल में दाखिल सोनू व अमित के भी बयान लिए.

दोनों ने इस वारदात के लिए पहलवान सुशील को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने पुलिस को वह वजह भी बता दी जिस कारण सुशील व उस के साथी पहलवानों ने उन्हें मारापीटा और सागर की इस हमले में जान चल गई. पुलिस की दरजनों पुलिस टीमें जुटीं इस वारदात में ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार के शामिल होने के कारण मामला काफी हाईप्रोफाइल हो गया था. इसलिए डीसीपी उषा रंगनानी को विशेष टीमें गठित कर आरोपियों की धरपकड़ करने के निर्देश दे कर पुलिस कमिश्नर एस.एन. श्रीवास्तव ने क्राइम ब्रांच की टीमों को सुशील की गिरफ्तारी का जिम्मा सौंप दिया.

पूरे घटनाक्रम की कडि़यां जोड़ कर पुलिस ने वारदात में शामिल आरोपी पहलवानों और बदमाशों की सूची बनानी शुरू कर दी और सभी के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स खंगाली जाने लगी तो पता कि दोपहर तक सुशील दिल्ली में ही मौजूद था. लेकिन दोपहर बाद उस के मोबाइल की लोकेशन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही थी. लोकेशन के आधार पर स्पैशल सेल व क्राइम ब्रांच की टीमें मेरठ, मुजफ्फरनगर व हरिद्वार में छापेमारी करने के लिए भेज दी गईं. वारदात में शामिल ज्यादातर पहलवानों के मोबाइल फोन पुलिस को स्विच्ड औफ मिल रहे थे. उत्तर पश्चिम जिले के स्पैशल स्टाफ के साथ मौडल टाउन थाने की पुलिस ने सुशील के आवास पर छापा मारा और उस की पत्नी के अलावा ससुर सतपाल पहलवान तथा साले लव सहरावत समेत 20 से अधिक लोगों से पूछताछ की, लेकिन सुशील का कहीं पता नहीं चला.

इसीलिए पुलिस ने सुशील के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिया, ताकि वह देश छोड़ कर भाग नहीं सके. मौडल टाउन थाना पुलिस ने सुशील समेत उस के खास सहयोगी जिन का नाम इस वारदात में सामने आया था अजय, मोहित, डौली, भूपेंद्र सहित 7 आरोपितों के खिलाफ रोहिणी कोर्ट से गैरजमानती वारंट भी हासिल कर लिए. कई पहलवान हुए गिरफ्तार पुलिस ने इस मामले में सब से पहले हरियाणा के आसोदा गांव निवासी प्रिंस दलाल को गिरफ्तार किया. उस के पास से एक दोनाली बंदूक और कारतूस भी बरामद हुए हैं. वारदात के तीसरे दिन मौडल टाउन थाना पुलिस ने 3 और आरोपित पहलवानों को गिरफ्तार किया.

पकडे़ गए आरोपियों में एक भूरा पहलवान है, उसे सोनीपत से गिरफ्तार किया गया है. पूछताछ में पता चला है कि भूरा पहलवान को मुख्य आरोपित ओलंपियन सुशील पहलवान ने वारदात के बाद फोन कर के बुलाया था और हरिद्वार में बाबा रामदेव के पतंजलि आश्रम तक छोड़ने के लिए उस से कहा था. भूरा सुशील को वहां छोड़ कर वापस हरियाणा चला गया, जहां से पुलिस ने उसे दबोच लिया था. उस के अलावा 2 अन्य आरोपियों भूपेंद्र पहलवान और अजय पहलवान को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. अजय के पिता सुरेश बक्करवाला मौडल टाउन इलाके से कांग्रेस के निगम पार्षद हैं. सुरेश पहलवान (बक्करवाला) दिल्ली पुलिस का बरखास्त सिपाही है. सुरेश बक्करवाला को 1993 में 49 लाख रुपए लूटने के मामले में करोलबाग पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

इस मामले में सुरेश के अलावा दिल्ली पुलिस के ही बरखास्त सिपाही जगवीर उर्फ जग्गा को भी गिरफ्तार किया गया था. एक अन्य मामले में सुरेश सजायाफ्ता अपराधी है. सुरेश के पास से 1993 में चोरी का माल बरामद हुआ था. जबकि गिरफ्तार चौथे आरोपी भूपेंद्र के खिलाफ फरीदाबाद के थानों में उगाही और आर्म्स एक्ट के मामले दर्ज हैं. पुलिस ने इस मामले में पहले ही दिन 5 वाहन जब्त कर लिए थे. इस के बाद 4 अन्य वाहन बरामद करने के बाद अब तक 9 वाहन जब्त किए जा चुके हैं. पुलिस ने वारदात के बाद छत्रसाल स्टेडियम व उस के आसपास से सीसीटीवी की फुटेज बरामद की है, जिस में सुशील अपने साथियों के साथ सागर को पीटते नजर आ रहे हैं. उस के 3 साथियों सोनू, भगत सिंह और अमित की भी स्टेडियम की पार्किंग में पिटाई की जा रही थी. इन सभी ने अपने बयानों में पहलवान सुशील कुमार को ही मुख्य आरोपी बताया था.

सुशील आदि के पकड़े जाने के बाद ही  पता चलेगा कि असल में किस बात या मामले को ले कर पहलवानों के बीच यह खूनी गैंगवार हुई. लेकिन अभी तक पीडि़तों के बयान, पकड़े गए आरोपियों के बयान तथा पुलिस की जांच में सामने आया है कि छत्रसाल स्टेडियम में 4 मई की रात को पहलवानों के बीच जो खूनी दंगल हुआ था, उस की जड़ में एक विवादित प्रौपर्टी है, जिस पर कब्जा करने के लिए ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार ने इस खूनी खेल को अंजाम दिया था. हालांकि यह बात तो पूरी तरह तभी साफ हो पाएगी कि इस दंगल के कितने पहलवान और अपराधी शामिल थे, लेकिन यह बात साफ है कि इस वारदात के बाद दिल्ली में अखाड़ों के पहलवानों का पेशेवर अपराधियों के साथ गठजोड़ और पैसा कमाने के लिए अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने का खेल पूरी तरह सामने आ गया है.

करोड़ों की संपत्ति बनी विवाद की जड़ जांच में पता चला कि मौडल टाउन थर्ड में (एम 2/1) नंबर पर करोड़ों रुपए की एक संपत्ति है. इस संपत्ति का मालिक कौन है, यह तो पुलिस को भी अभी तक नहीं पता. लेकिन बताते हैं कि सुशील ने हरियाणा के कुख्यात बदमाश काला जठेड़ी की मदद से इस फ्लैट में रहने वाले लोगों को भगा कर इस पर कब्जा कर लिया था. इस के बाद इस फ्लैट के कागज तैयार कर के महंगे दामों पर बेचने तक काला जठेड़ी के एक साथी पहलवान सोनू महाल और पहलवान सागर आदि को उन के 1-2 साथियों के साथ वहां रहने के लिए छोड़ दिया.

बताते हैं कि सुशील ने अब इस मकान के लिए खरीदार तैयार कर लिए थे और वह सोनू तथा सागर से इस संपत्ति को खाली कराना चाहता था. लेकिन सोनू महाल ने काला जठेड़ी के इशारे पर संपत्ति खाली करने से इंकार कर दिया. इस बात को ले कर सुशील का उन से कुछ दिन पहले भी झगड़ा हुआ था. काला जठेड़ी ने उस समय समझौता करा दिया और सुशील से कह दिया कि संपत्ति बेच कर हिस्सा आपस में बांट लेंगे. इस फ्लैट में आने से पहले सागर धनखड़ स्टेडियम में ही रहता था. इधर सोनू महाल के साथ रहने के कारण सागर धनखड़ भी सुशील के कहने से बाहर हो गया था और सोनू की भाषा बोलता था. सुशील ने जब सोनू व सागर से फ्लैट खाली करने को कहा तो सागर ने सुशील से कह दिया कि फ्लैट कौन सा तुम्हारा खरीदा हुआ है.

जैसे तुम ने कब्जा किया वैसे ही अब हम ने कर लिया. और सागर व सोनू ने फ्लैट खाली करने से इंकार कर दिया. इस बात को जब काफी वक्त गुजर गया और समझाने पर भी सागर ने फ्लैट खाली नहीं किया तो सुशील ने 4 मई, 2021 की रात को अपने गुट के साथी पहलवानों व साथियों के साथ उस फ्लैट पर धावा बोल दिया, जहां सागर ने कब्जा कर रखा था. 4 मई की रात को सुशील अपने चेले पहलवानों और गुंडों के साथ उस संपत्ति पर गया. वहां से सोनू, सागर और अमित आदि को हथियार के बल पर उठा कर गाडि़यों में डाल कर स्टेडियम में ले गए. वहां पर इन सब को फावड़े के हत्थे से पीटा गया. इस दौरान गोलियां भी चलाई गईं.

बदमाश स्टेडियम में लेते थे शरण बताया जाता है कि काला जठेड़ी का काफी समय से स्टेडियम में आनाजाना रहता था. जांच में पता चला कि सुशील के साथ हरियाणा के कुख्यात काला जठेड़ी गिरोह के कई बदमाशों का उठनाबैठना था. स्टेडियम से जुड़े सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि फरारी के दौरान पुलिस से बचने के लिए ये बदमाश स्टेडियम में शरण लेते रहते हैं. बदले में पहलवान उन्हें रंगदारी, टेंडर और जमीन जायदाद के कब्जों को छुड़ाने के लिए इस्तेमाल करता था. दिलचस्प बात यह थी कि जिस रात ये वारदात हुई, दिल्ली में लौकडाउन लगा हुआ था. उस के बावजूद 5 गाडि़यों में सवार हथियारबंद पहलवान पहले मौडल टाउन गए, वहां से अपने शिकार को हथियारों की नोंक पर गाडि़यों में बैठाया और फिर छत्रसाल स्टेडियम पहुंच गए.

पुलिस ने स्टेडियम के अंदर और बाहर की सड़कों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो उसे पूरी घटना का पता चला और यह भी साफ हो गया कि सुशील कुमार घटनास्थल पर ही मौजूद था और खुद पीडि़तों की पिटाई कर रहा था. सुशील पहलवान के मोबाइल फोन के रिकौर्ड से यह भी पता चला है कि उस के किसकिस बदमाश या संदिग्ध लोगों से संबंध हैं और वारदात वाली रात उस के साथ कौनकौन लोग थे. वैसे इस स्टेडियम से बदमाशों का पुराना नाता है. 2 दशक पहले की बात है कि एक बार ढिचाऊं गांव के कुख्यात बदमाश कृष्ण पहलवान को जबरन वसूली के मामले में पुलिस तलाश कर रही थी. उस दौरान कृष्ण स्टेडियम में आयोजित समारोह में सतपाल पहलवान के साथ पुरस्कार बांट रहा था. यह किस्सा मीडिया की सुर्खी बना था.

दरअसल सतपाल पहलवान उन दिनों दिल्ली सरकार में खेल निदेशक के पद पर तैनात थे. लेकिन नामी पहलवान होने के कारण उन के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की गई. उन्हीं सतपाल पहलवान का दामाद सुशील पहलवान हालांकि मूलरूप से रेलवे का अधिकारी है, लेकिन रेलवे से पहले वह उत्तरी दिल्ली नगर निगम में प्रतिनियुक्ति पर गया और उस के बाद वह दिल्ली सरकार में प्रतिनियक्ति पर चला गया और 5 साल पहले छत्रसाल स्टेडियम के ओएसडी (खेल) पद पर विराजमान हो गया. यानी प्रतिनियुक्ति से प्रतिनियुक्ति पर जाना साबित करता है कि सुशील कुमार का रसूख कितना बड़ा था. तभी से वह छत्रसाल स्टेडियम में ओएसडी के पद पर है. इस से यह भी साबित होती है कि रसूखदार पहलवानों के सामने कानून कितना बौना हो जाता है.

प्रतिनियुक्ति पर तैनाती 3 साल से अधिक नहीं की जा सकती, लेकिन इस मामले में इस नियम को भी नजरअंदाज कर दिया गया. दिल्ली पुलिस को अपने मुखबिर तंत्र से अकसर ऐसी सूचना मिलती रही कि छत्रसाल स्टेडियम अपराधियों की शरणगाह बना हुआ है. यूपी पुलिस ने तो कुछ समय पहले नोएडा के बदमाश सुंदर भाटी के छत्रसाल स्टेडियम में आनेजाने और सुशील पहलवान से उस के संबंधों की पड़ताल भी की थी. इस स्टेडियम में अपराधियों का कितना हस्तक्षेप है, इस बात का पता इस से चलता है कि एक बार स्टेडियम की महिला डिप्टी डायरेक्टर के बारे में इस स्टेडियम में उन के औफिस की दीवार पर अश्लील टिप्पणी लिखी गई थी, लेकिन शिकायत के बावजूद पुलिस किसी दोषी को नहीं पकड़ सकी.

बताते हैं कि स्टेडियम में चलने वाली गैरकानूनी गतिविधियां और अपराधियों की आवाजाही किसी की नजर में न आए, इसलिए स्टेडियम के अंदर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगवाए गए हैं. अगर स्टेडियम में सभी जगह कैमरे लगे होते तो इस से पहले होने वाली कई वारदातों का भी खुलासा हो जाता. कई नामी पहलवानों ने छोड़ दिया था स्टेडियम पुलिस को अब यह भी पता चल रहा है कि सुशील पहलवान और उस के चेलों के दुर्व्यवहार और गुंडागर्दी का इतना आतंक छत्रसाल स्टेडियम में था कि अपराधी गुट तथा सीधीसादी जिंदगी बसर करने वाले कोच तथा पहलवान यहां ज्यादा दिन टिक नहीं पाते थे.

द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित कोच रामफल और कई पहलवान तो इसी दुर्व्यवहार से तंग आ कर ओलंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त की अकेडमी में चले गए हैं. जबकि एक अन्य कोच वीरेंद्र ने नरेला में अपनी अकेडमी खोल ली. पहलवान बजरंग पूनिया भी इसी कारण छत्रसाल स्टेडियम छोड़ कर योगेश्वर के पास चला गया था. योगेश्वर दत्त ने भी इसी वजह से इस अखाड़े को छोड़ा था. पुलिस की जांच में अब यह भी खुलासा हो रहा है कि स्टेडियम में पहलवानों की संदिग्ध गतिविधियां सालों से जारी रहने के पीछे दिल्ली सरकार के मंत्रियों से ले कर खेल मंत्रालय के अधिकारियों की मिलीभगत है. पुलिस को सुशील के मोबाइल की काल डिटेल्स मिल चुकी हैं. सूत्रों का कहना है कि सुशील ने वारदात के बाद हरियाणा के बदमाश काला जठेड़ी से भी संपर्क किया. सुशील ने काला से कहा कि उस से गलती हो गई.

वह तो सोनू आदि को इसलिए उठा कर लाया था कि थप्पड़ व चांटे मार कर व  धमका कर उस से संपत्ति खाली करा लेगा. बताया जा रहा है कि इस संपत्ति के कब्जाने में काला जठेड़ी का भी हाथ है. सुशील के कारण अब इस संपत्ति का विवाद सार्वजनिक होने व नुकसान के कारण वह सुशील से काफी नाराज बताया जाता है. इधर पुलिस ने जांच के दौरान सागर की मौत के बाद घायल सोनू व अमित के जो बयान दर्ज किए हैं, उस में उन्होेंने सुशील के खिलाफ बयान दिया है. सोनू काला जठेड़ी का खास साथी है. वह हत्या के कई मामलों में आरोपी रह चुका है. इसी कारण आशंका है कि सुशील पहलवान और काला जठेड़ी के बीच आने वाले दिनों में गैंगवार हो सकती है.

इधर सुशील के खिलाफ काला जठेड़ी के अलावा सुंदर भाटी, नीरज बवानिया समेत अनेक कुख्यात बदमाशों से संबध रखने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं. देश के एक नामचीन खिलाड़ी होने के कारण पुलिस हमेशा उस पर हाथ डालने से कतराती रही. लेकिन सुशील पहलवानों तथा अपराधियों के नेटवर्क के साथ मिल कर टोल टैक्स, अवैध कब्जा और विवादित संपत्ति का धंधा चला रहा है, इस का सार्वजनिक खुलासा पहली बार हुआ है. फिलहाल, पुलिस पहलवान सुशील कुमार की गिरफ्तारी के लिए देशव्यापी स्तर पर छापेमारी कर रही है. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी पर एक लाख रुपए का ईनाम रख दिया है और उस के खिलाफ अरेस्ट वारंट भी हासिल कर लिया है.

इस ओलंपिक पदक विजेता पहलवान को एक ही गलत दांव ने चित कर दिया है. उस की गिरफ्तारी के बाद सागर धनखड़ हत्याकांड में कई नए खुलासे होने की संभावना है. बहरहाल, जिस छत्रसाल स्टेडियम के अखाड़े ने सुशील का नाम बुलंदियों पर पहुंचाने में योगदान दिया था, उसी स्टेडियम में घटी घटना ने उसे अर्श से फर्श पर पटक दिया है. पुलिस की कई टीमें सुशील की तलाश के लिए संभावित स्थानों पर दबिशें डालती रहीं. सुशील भी पुलिस से आंखमिचौली खेलता रहा. आखिर दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल ने 23 मई, 2021 की सुबह पहलवान सुशील कुमार को गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद छत्रसाल स्टेडियम के फिजिकल एजुकेशन टीचर अजय कुमार को भी दिल्ली के मुंडका क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया. अजय पर 50 हजार का ईनाम था. कथा लिखने तक पुलिस दोनों आरोपियों से पूछताछ कर रही थी. Hindi Suspense Stories

—कथा मीडिया रिपोर्ट, पीडि़तों के बयान और पुलिस की जांच पर आधारित

 

Short Kahani in Hindi : पिता की मौत के बाद अखबार बेचने वाली अरीना खान उर्फ पारो को राष्ट्रपति ने किया सम्मानित

Short Kahani in Hindi : पिता की मौत के बाद अरीना खान उर्फ पारो ने 9 साल की उम्र से ही अखबार बांटने शुरू कर दिए. यह काम करते हुए उन्होंने जिस तरह की समाजसेवा की, उस की बदौलत उन्हें राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया..

अगर इंसान चाह ले तो उस के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. चाहे वह महिला हो या पुरुष. आज महिलाएं वे सारे काम बखूबी कर रही हैं, जिन पर कभी केवल पुरुष अपना अधिकार समझता था. जमीन से ले कर आसमान तक महिलाएं पुरुषों को मात दे रही हैं. ऐसा ही काम जयपुर की अरीना खान उर्फ पारो ने भी किया है. उन्होंने जो काम किया है, उस की बदौलत आज वह भारत की पहली महिला हौकर मानी जा रही है. जिस समय पूरा शहर मस्ती भरी नींद में सो रहा होता था, उसी समय सर्दी हो या गरमी या फिर बरसात, 9 साल की अरीना खान उर्फ पारो सुबह के 4 बजे उठ जाती और फिर अपने नन्हेनन्हे पैरों से साइकिल के बड़ेबड़े पैडल मारते हुए राजस्थान के शहर जयपुर के गुलाब बाग सेंटर पर पहुंच जाती थी.

गुलाब बाग के सेंटर से अखबार ले कर वह बांटने के लिए निकल जाती. पिछले 20 सालों से उस का यह सिलसिला जारी है. 9 साल की उम्र में पारो ने भले ही यह काम मजबूरी में शुरू किया था, पर आज इसी काम की वजह से वह देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में जानी जाती है. एक तरह से यह काम आज उस की पहचान बन गया है. अपने इसी काम की बदौलत आज वह देश की पहली महिला हाकर बन गई है. पारो जिन  लोगों तक अखबार पहुंचाती है, उन में जयपुर का राज परिवार भी शामिल है. अरीना खान की 7 बहनें और 2 भाई हैं. मातापिता को ले कर कुल 11 लोगों का परिवार था. इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी उस के पिता सलीम खान उठाते थे.

इस के लिए वह सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे. जयपुर के गुलाब बाग स्थित सेंटर पर जा कर अखबार उठाते और जयपुर के बड़ी चौपड़, चौड़ा रास्ता, सिटी पैलेस, चांद पुल, दिलीप चौक, जौहरी बाजार और तिरपौलिया बाजार में घूमघूम कर अखबार बांटते थे. इस के बाद दूसरा काम करते थे. 12 से 14 घंटे काम कर के किसी तरह वह परिवार के लिए दो जून की रोटी और तन के कपड़ों की व्यवस्था कर रहे थे. अरीना उस समय 9 साल की थी, जब उस के पिता की तबीयत खराब हुई. दरअसल उन्हें बुखार आ रहा था. बुखार आता तो वह मैडिकल स्टोर से दवा ले कर खा लेते और अपने काम के लिए निकल जाते. उन के पास इतना पैसा नहीं था कि वह अपना इलाज किसी अच्छे डाक्टर से कराते.

इस का नतीजा यह निकला कि बीमारी उन पर हावी होती गई. वह साधारण बुखार टाइफाइड बन गया. एक तो बीमारी, दूसरे मेहनत ज्यादा और तीसरे खानेपीने की ठीक से व्यवस्था न होने की वजह से उन का शरीर कमजोर होता गया. एक दिन ऐसा भी आया जब सलीम खान को चलनेफिरने में परेशानी होने लगी. अगर सलीम काम पर न जाते तो परिवार के भूखों मरने की नौबत आ जाती. उन्हें अपनी नहीं, अपने छोटेछोटे बच्चों की चिंता थी. वह अपनी दवा कराए या बच्चों का पेट भरे. जब वह चलनेफिरने से भी मजबूर हो गए तो 9 साल की अरीना अपने अब्बू के साथ अखबार बंटवाने में उन की मदद के लिए जाने लगी. वह पिता की साइकिल में पीछे से धक्का लगाती और अखबार बंटवाने में उन की मदद करती.

किसी तरह घर की गाड़ी चल रही थी कि अचानक एक दिन अरीना के परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा. बीमारी की वजह से उस के पिता सलीम खान की मौत हो गई. अब कमाने वाला कोई नहीं था. ऐसी कोई जमापूंजी भी नहीं थी कि उसी से काम चलता. ऐसे में सहानुभूति जताने वाले तो बहुत होते हैं, लेकिन मदद करने वाले कम ही होते हैं. फिर किसी की मदद से कितने दिन घर चलता. पिता के मरते ही मात्र 9 साल की नन्ही अरीना समझदार हो गई. उस ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली. इस की वजह यह थी कि उसे अपने पिता के अखबार बांटने वाले काम की थोड़ीबहुत जानकारी थी. इस के अलावा वह और कुछ न तो करने के लायक थी और न ही कुछ कर सकती थी.

पारो को पता था कि कहां से अखबार उठाना है और किसकिस घर में देना है. फिर क्या था अरीना उर्फ पारो भाई के साथ गुलाब बाग जा कर पेपर उठाती और घरघर जा कर पहुंचाती. इस के लिए उसे सुबह 4 बजे उठना पड़ता था. घरघर अखबार पहुंचा कर उसे घर लौटने में 9, साढ़े 9 बज जाते थे. अरीना जयपुर के गुलाब बाग से अखबार उठा कर चौपड़, चौड़ा रास्ता, सिटी पैलेस, चांद पुल, दिलीप चौक, जौहरी बाजार, तिरपौलिया बाजार इलाके में घरघर जा कर अखबार पहुंचाती थी. इस तरह उसे लगभग 7 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता था. वह करीब सौ घरों में अखबार पहुंचाती थी.

शुरूशुरू में अरीना को इस काम में काफी परेशानी हुई. क्योंकि वह 9 साल की बच्ची ही तो थी. उतनी दूर चल कर वह थक तो जाती ही थी, साथ ही उसे यह भी याद नहीं रहता था कि उसे किसकिस घर में अखबार डालना है. यही नहीं, वह रास्ता भी भूल जाती थी. इस के अलावा उसे इस बात पर भी बुरा लगता था, जब छोटी बच्ची होने की वजह से कोई उसे दया की दृष्टि से देखता था. बुरे दिनों में मदद करने वाले कम ही लोग होते हैं. फिर भी अरीना के पिता को जानने वाले कुछ लोगों ने उस की मदद जरूर की. इसलिए अरीना सुबह जब अखबार लेने गुलाब बाग जाती तो उसे लाइन नहीं लगानी पड़ती थी. उसे सब से पहले अखबार मिल जाता था. इस के बावजूद उसे परेशान तो होना ही पड़ता था.

क्योंकि अखबार बांटने के बाद उसे स्कूल भी जाना होता था. स्कूल जाने में उसे अकसर देर हो जाती थी. क्योंकि वह अखबार बांट कर 9, साढ़े 9 बजे तो घर ही लौटती थी. उस के स्कूल पहुंचतेपहुंचते एकदो पीरियड निकल जाते थे. उस का पढ़ाई का नुकसान तो होता ही, लगभग रोज ही प्रिंसिपल और क्लास टीचर की डांट भी सुननी पड़ती थी. उस समय अरीना 5वीं में पढ़ती थी. जब इसी तरह सालों तक चलता रहा तो नाराज हो कर प्रिंसिपल ने उस का नाम काट दिया. इस के बाद अरीना एक साल तक अपने लिए स्कूल ढूंढती रही, जहां वह अपना काम निपटाने के बाद पढ़ने जा सके. वह इस तरह का स्कूल ढूंढ रही थी कि अगर वह देर से भी स्कूल पहुंचे तो उसे क्लास में बैठने दिया जाए.

आखिर रहमानी मौडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल ने उस की शर्त पर अपने यहां एडमिशन दे दिया. इस तरह एक बार फिर उस की पढ़ाई शुरू हो गई. अखबार बांटने के बाद वह एक बजे तक अपनी पढ़ाई करती. स्कूल में अरीना की जो क्लास छूट जाती, उस की पढ़ाई अरीना को खुद ही करनी पड़ती. जिस समय अरीना 9वीं क्लास में थी तो एक बार फिर उस की और उस की छोटी बहन की पढ़ाई में रुकावट आ गई. इस की वजह थी उस की आर्थिक स्थिति. अखबार बांटने से उस की इतनी कमाई नहीं हो रही थी कि उस का अपना घर खर्च आराम से चल पाता. जब घर का खर्च ही पूरा नहीं होता था तो पढ़ाई का खर्च कहां से निकालती. खर्च पूरे करने के लिए उस ने एक नर्सिंगहोम में पार्टटाइम नौकरी कर ली.

अब वह सुबह उठ कर अखबार बांटती, फिर स्कूल जाती, उस के बाद नर्सिंगहोम में नौकरी करती. नर्सिंगहोम में वह शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक काम करती थी. रात को घर आ कर उसे फिर अपनी पढ़ाई करनी पड़ती. इस तरह उसे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी. अरीना जब बड़ी हो रही थी, सुबह उसे अकेली पा कर लड़के उस से छेड़छाड़ करने लगे थे. पर अरीना इस से जरा भी नहीं घबराई. अगर कोई लड़का ज्यादा पीछे पड़ता या परेशान करता तो अरीना उसे धमका देती. अगर इस पर भी वह नहीं मानता तो अरीना उस की पिटाई कर देती. अब वह किसी से नहीं डरती थी. परिस्थितियां सचमुच इंसान को निडर बना देती हैं.

अरीना अखबार बांटने के साथसाथ पार्टटाइम नौकरी करते हुए पढ़ भी रही थी. कड़ी मेहनत करते हुए उस ने 12वीं पास कर ली. इतने पर भी वह नहीं रुकी. उस ने महारानी कालेज से ग्रैजुएशन किया, साथ ही वह कंप्यूटर भी सीखती रही. कंप्यूटर सीखने के बाद उसे एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई. लेकिन उस ने अखबार बांटना नहीं बंद किया. सुबह उठ कर वह अखबार बांटती है, उस के बाद लौट कर नहाधो कर तैयार हो कर नौकरी पर जाती है. इतना ही नहीं, बाकी बचे समय में वह गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं करती, बल्कि पढ़ाती भी थी. इस के अलावा कई संगठनों के साथ मिल कर गरीब बच्चों के लिए काम भी करना शुरू कर दिया.

अरीना के समाज सेवा के इन कामों को देखते हुए उसे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं. यही वजह है कि देश की पहली महिला हाकर होने के साथसाथ समाज सेवा करने वाली अरीना को राष्ट्रपति ने भी सम्मानित किया है. अरीना को जब पता चला कि उस की मेहनत को राष्ट्रपति सम्मानित करने वाले हैं तो उसे बड़ी खुशी हुई. जिसे बयां करने के लिए उस के पास शब्द नहीं थे. उस के पैर मानो जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. पैर जमीन पर पड़ते भी कैसे, छोटी सी उम्र से अब तक उस के द्वारा किया गया संघर्ष सम्मानित जो किया जा रहा था.

अरीना की जो कल तक आलोचना करते थे, आज उसे सम्मान की नजरों से देखते हैं. शायद यह उस के संघर्ष का फल है. लोग आज अपने बच्चों को उस की मिसाल देते हैं. आज अरीना एक तरह से सेलिब्रिटी बन चुकी है. वह जहां भी जाती है, लोग उसे पहचान लेते हैं और उस के साथ सेल्फी लेते हैं. अरीना ने जो काम कभी मजबूरी में शुरू किया था, आज वही काम उस की पहचान बन चुका है. शायद इसीलिए उस ने अपना अखबार बांटने का काम आज भी बंद नहीं किया है. अरीना की स्थिति को देखते हुए साफ लगता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. लड़कियां भी अगर चाह लें तो कोई भी काम कर सकती हैं.

 

Crime Stories : लड़कियों को किडनैप कर जबरन कराया जाता था जिस्मफरोशी धंधा करवाया

Crime Stories : औनलाइन सैक्स रैकेट चलाने वाले गिरोह से 12 साल की मानसी को बरामद करने पर पुलिस को ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि…

22  जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने बताया कि मानसी तो काफी देर पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है. जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करतेकरते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला. करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी.

क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी. जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे. उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली.

12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे. जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.    आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Stories

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

 

MP News : शक के चलते पत्नी ने डॉक्टर पति को करंट लगाकर मार डाला

MP News : नीरज पाठक एक जानेमाने डाक्टर थे. उन की पत्नी डा. ममता पाठक कैमेस्ट्री की प्रोफेसर थी. उच्चशिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार होने के बावजूद ममता पाठक पति पर शक करती थी. शक का यह कीड़ा इतना बलवती हो गया कि एक दिन इस ने…

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर जिले की एक पौश कालोनी है, लोकनाथपुरम. इसी कालोनी में 65 साल के डा. नीरज पाठक का एक क्लीनिक है. डा. पाठक इस जिले के जाने माने मैडिसिन स्पैशलिस्ट हैं. डा. पाठक छतरपुर के जिला अस्पताल में डाक्टर थे, परंतु रिटायरमेंट के 2 साल पहले ही सरकारी नौकरी से वीआरएस ले लिया था. तभी से वह अपने निजी क्लीनिक पर मरीजों का उपचार करते थे. डा. पाठक की 62 साल की पत्नी ममता पाठक छतरपुर के शासकीय महाराजा कालेज में कैमेस्ट्री की प्रोफेसर थीं. मगर अपने पति से उन की कैमेस्ट्री कभी ठीक नहीं रही. डा. दंपति के 2 बेटे हैं, जिन में से बड़ा बेटा नीतेश पाठक मानसिक रूप से अस्वस्थ रहता है.

वह रूस से एमबीबीएस की पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया था, जबकि छोटा बेटा मानस आईटी से इंजीनियरिंग की डिगरी लेने के बाद अमेरिका में नौकरी करता है. डा. नीरज और ममता की शादी जब 11 मई 1994 को हुई थी, तो परिवार के लोग दोनों की योग्यता और पद पर नाज करते थे. शादी के कुछ समय बाद तक तो सब कुछ ठीकठाक चलता रहा, पर 2 बेटों के जन्म के बाद उन के दांपत्य जीवन में दरार आ गई. डा. पाठक जिले के नामीगिरामी चिकित्सक थे, तो ममता पाठक भी शहर के सब से प्रतिष्ठित सरकारी कालेज में प्रोफेसर थीं. अपनी योग्यता के इसी अहं के कारण दोनों के बीच दीवार खड़ी हो गई.

कहते हैं कि केवल उच्च शिक्षा और पैसा हासिल कर लेने से ही सब कुछ नहीं मिल जाता, जीवन में खुशियां लाने के लिए खुला मन और अच्छी सोच का होना जरूरी है. डा. नीरज पाठक और ममता पाठक की जिंदगी में शक की लाइलाज बीमारी ने जहर घोलने का काम किया. घुलता गया शक का जहर पढ़ीलिखी प्रोफेसर ममता पाठक को हमेशा यही शक बना रहता था कि उन के पति के किसी महिला से अवैध संबंध हैं. इस की वजह से वह अपने पति की हर गतिविधि पर नजर रखती और छोटीछोटी बातों को ले कर शंका करती. डा. पाठक पत्नी के इस व्यवहार से दुखी रहते थे. दोनों के बीच चरित्र संदेह को ले कर अकसर लड़ाईझगडे़ और मारपीट होती रहती थी.

छोटीछोटी बातों से शुरु हुई कलह घर की चारदीवारी से बाहर निकलने लगी. दोनों एकदूसरे के बुरे व्यवहार की शिकायत कई बार पुलिस के आला अधिकारियों से कर चुके थे. पुलिस भी पतिपत्नी के आपसी विवाद में ज्यादा कुछ न कर उन्हें हर बार समझाइश दे कर मामले को रफादफा करती रही. आखिरकार, ममता का शक्की मिजाज उन के दांपत्य जीवन में बिखराव का कारण बन गया. यानी करीब 11 साल पहले ममता अपने बेटों को ले कर अपने पति से अलग रहने लगी. बाद में छोटा बेटा मानस नौकरी के लिए अमेरिका चला गया. अलग रहते हुए भी ममता अपने पति से घर चलाने का खर्च वसूल करती रही. इधर डा. पाठक एक घरेलू नौकर के भरोसे अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहे थे.

पतिपत्नी के रिश्ते की दरार जब बढ़ जाती है तो रिश्ते बोझिल हो जाते हैं. यही वजह थी कि दोनों एक दूसरे के खिलाफ थाने में कई बार रिपोर्ट दर्ज करा चुके थे. हाईप्रोफाइल इस दंपति की आपसी कलह ने उन की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी प्रभावित कर दिया था. छतरपुर जिले में डा. पाठक का अपना रसूख था, मगर पत्नी की हरकतों की वजह से डा. पाठक मानसिक रूप से प्रताडि़त हो रहे थे. ऐसे में पुलिस और रिश्तेदारों की पहल पर पतिपत्नी में समझौता हुआ और सितंबर 2020 में ममता अपने बेटे नीतेश को ले कर पति के घर वापस आ गई. कमरे में पड़ी थी डा. पाठक की लाश पहली मई 2021 को सुबह का समय था. ममता पाठक ने 100 डायल पर सूचना दी कि उन के पति कमरे में मृत पड़े हुए हैं.

ममता की सूचना पर छतरपुर के सिविल लाइंस थाने के टीआई जगतपाल सिंह पुलिस टीम के साथ डा. पाठक के बंगले पर पहुंच गए. प्रोफेसर ममता पाठक बदहवास हालत में मिली. टीआई प्रोफेसर ममता पाठक से परिचित थे तो उन्होंने बैडरूम में पड़े हुए डा. पाठक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘मैडम डा. साहब को क्या हो गया?’’

प्रोफेसर ममता पाठक ने टीआई को बताया, ‘‘डा. पाठक पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे और आज उन की डेथ हो गई’’ टीआई जगतपाल सिंह को याद आया कि अभी 2 दिन पहले 29 अप्रैल को ही डा. पाठक ने व्हाट्एप के माध्यम से उन्हें एक शिकायत भेजी थी कि उन की पत्नी और बेटा उन्हें प्रताडि़त कर रहे हैं. खैर, उन की मौत कैसे हुई, यह बात तो उन्हें जांच के बाद ही पता चलनी थी. चूंकि मामला शहर के हाई प्रोफाइल डा. पाठक से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. उन्होंने फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम भी डा. पाठक के बंगले पर बुला ली.

चूंकि कोरोना महामारी का खौफ पूरे शहर में था, इस वजह से पीपीई किट में पहुंची पुलिस ने जिस बैड रूम में डा. नीरज पाठक का शव पड़ा उस रूम के अलावा पूरे बंगले की जांच की. पोस्टमार्टम में हुआ नया खुलासा पुलिस ने कागजी काररवाई पूरी कर मामला संदिग्ध होने की वजह से शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. एसपी सचिन शर्मा के निर्देश पर 3 डाक्टरों की टीम ने डा. पाठक के शव का पोस्टमार्टम किया. अगले दिन पुलिस के पास जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस अधिकारी आश्चर्यचकित रह गए. रिपोर्ट में बताया गया कि डा. पाठक की मौत बिजली का करंट लगने से हुई थी. मौत 24 घंटे से पहले होने का अंदेशा भी जताया गया.

डा. पाठक के अंतिम संस्कार के कुछ दिन तक पुलिस ममता और उस के बेटे नीतेश के बयान नहीं ले सकी, लेकिन पुलिस की शंका की सुई पत्नी ममता पाठक की ओर ही घूम रही थी. इधर ममता पाठक पुलिस को यही बता रही थी कि डा. पाठक पिछले 3 दिनों से बीमार थे, इस कारण उन की मौत हो गई. मौके पर पहुंचे डा. पाठक के रिश्तेदारों ने पुलिस को बताया कि ममता पाठक द्वारा डा. नीरज पाठक को कमरे में बंद कर प्रताडि़त कर उन्हें खाना भी नहीं दिया गया था. डा. पाठक की हत्या के बाद से ही पुलिस इस मामले की तफ्तीश में जुट गई थी. छतरपुर जिले के एसपी सचिन शर्मा ने पुलिस की एक टीम गठित की जिस में टीआई जगतपाल सिंह, एसआई माधवी अग्निहोत्री, गुरुदत्त सेषा, प्रधान आरक्षक हरचरन राजपूत, आरक्षक दिनेश मिश्रा और धर्मेंद्र चतुर्वेदी को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने जांचपड़ताल शुरू की तो पूरे घटनाक्रम की कडि़यां जुड़ती रहीं और इस बात का पुख्ता सबूत मिल गया कि डा. पाठक को उन की पत्नी ने ही मौत के घाट उतारा है. 7 मई 2021 को पुलिस ने ममता पाठक को हिरासत में ले कर पूछताछ की तब ममता पहले तो पुलिस को अलगअलग बयान दे कर गुमराह करती रही, लेकिन एसआई माधवी अग्निहोत्री ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो मामले का सच सामने आ गया. पूछताछ में पत्नी ममता ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, वह रिश्तों को शर्मसार करने वाली निकली. शक की वजह से शुरू हुआ रिश्तों के बिखराव का अंतहीन सिलसिला आखिर पति की मौत का कारण बन गया.

11 साल के वनवास के बाद ममता अपने पति के पास वापस जरूर आ गई थी, लेकिन पतिपत्नी के संबंधों में कड़वाहट खत्म नहीं हुई थी. सनकी मिजाज की ममता के दिमाग में बैठा शक का कीड़ा हमेशा कुलबुलाता रहता था. इसी वजह से ममता की रातों की नींद गायब हो गई थी. जब ममता डा. पाठक को नींद न आने की बात कहती तो डा. पाठक ममता को रात में एक इंजेक्शन लगा देते थे. जिस से ममता को नींद आ जाती थी. खाने में मिला दीं नींद की गोलियां इंजेक्शन के बाद ममता को होश नहीं रहता. जब सुबह उस की नींद खुलती तो उसे यही शक बना रहता कि डा. पाठक उसे बेहोशी का इंजेक्शन दे कर किसी महिला के साथ रंगरलियां मनाते हैं. इस बात को ले कर दोनों में अकसर विवाद होता.

अप्रैल की 29 तारीख को भी इसी बात को ले कर जब विवाद बढ़ गया तो ममता ने डा. पाठक को कमरे में बंद कर दिया. डा. पाठक ने एक वीडियो वायरल कर इस बात की जानकारी अपने एक वकील और रिश्तेदारों को देते हुए शिकायत टीआई जगतपाल को भी व्हाट्सएप द्वारा कर दी. रिश्तेदारों और पुलिस की समझाइश से मामला शांत तो हो गया, लेकिन ममता के मन में अपने पति के प्रति नफरत इस हद तक बढ़ गई कि ममता ने अपने पति को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाने का निश्चय कर लिया. 29 अप्रैल, 2021 को ममता ने डा. पाठक के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं और उन के कमरे में भोजन की थाली ले कर पहुंच गई.

डा. पाठक के साथ तमीज से पेश आते हुए उस ने उन से खाना खाने का आग्रह किया. विवाद की वजह से सुबह से भूखेप्यासे रहे डा. पाठक ने खाना खाया. खाना खाने के बाद ही वह गहरी नींद में चले गए. ममता ने सोचा कि नींद की ज्यादा गोलियां खाने से डा. पाठक की मृत्यु हो गई है. इस के बाद डर के मारे उस का बुरा हाल था. ममता यही सोचसोच कर डर रही थी कि कहीं खाने में नींद की गोलियां मिलाने की बात सामने आई तो उस का जेल जाना तय है. इस के बाद उस के मस्तिष्क में एक विचार आया. तब वह नीचे से बिजली का एक्सटेंशन बोर्ड और वायर ले कर उस कमरे में पहुंची जहां पति अचेत अवस्था में पड़े थे, उस बोर्ड से ममता ने पति को काफी देर तक बिजली का करंट लगाया, जिस से डा. नीरज की मौत हो गई.

पति की मौत होने के बाद दूसरे दिन 30 अप्रैल को वह एक प्राइवेट कार में अपने बेटे को ले कर झांसी चली गई. इसी दौरान उस ने एक वीडियो देखा था, जिस में बताया था कि खाने में जहर या नशीली दवा देने के बाद यदि 2 दिन तक शव को रखा रहने दिया जाए तो पोस्टमार्टम में नशीली दवा जहर ट्रैस नहीं होता है. ममता अपने बेटे के साथ शाम को छतरपुर वापस आ कर चुपचाप सो गई. डा. पाठक की डेडबौडी को घर में पड़े जब 2 दिन हो गए तो ममता को पूरी तरह यकीन हो गया कि अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नशीली दवा की पुष्टि नहीं होगी. इस के बाद पहली मई को उस ने पुलिस को सूचना दी. इसी वजह से पोस्टमार्टम में नशीली दवा देने की बात नहीं आई.

ममता पाठक के बयान के आधार पर पुलिस ने उस के खिलाफ पति की हत्या का मामला दर्ज किया और उस की निशानदेही पर प्रयुक्त बची हुई नींद की गोलियां ममता पाठक के किचन से बरामद कर लीं. बिजली का करंट लगाने में उपयोग किया गया एक्सटेंशन बोर्ड और वायर भी ममता के बेडरूम के दराज से बरामद हुआ. बेटे नीतेश के मानसिक रूप से फिट न होने के कारण उस की संलिप्तता इस घटनाक्रम में साबित नहीं हो सकी. 8 मई, 2021 को ममता को हिरासत में ले कर न्यायालय में पेश किया जहां से उसे छतरपुर जेल भेज दिया गया. शक्की मिजाज बीवी की सनक मिजाजी की वजह से एक उच्च शिक्षित परिवार किस तरह जीवन भर मुश्किलों का सामना करता रहा और अपने पति की कातिल बनी बीवी ममता को उम्र के आखिरी पड़ाव पर जेल की सलाखों के बीच रहने को मजबूर होना पड़ा. MP News

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित