Crime Story : तीसरे पति की चाहत में दूसरे पति का मर्डर

Crime Story : पति की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद 3 बच्चों की मम्मी गीता यादव ने चरन सिंह से दूसरी शादी कर ली थी. इसी दौरान गीता की लाइफ में जबर सिंह आ गया. उस के आने से घर में ऐसा जलजला आया कि…

गीता यादव फितरती औरत थी. उसे बच्चों से तो हमदर्दी थी, लेकिन पति चरन सिंह फूटी आंख भी नहीं सुहाता था. पति रूपी बाधा को दूर करने के लिए एक रोज गीता ने प्रेमी जबर सिंह को उकसाया, ”जबर, हम कब तक परदेस में पड़े रहेंगे. कब तक हम मजदूरीधतूरी करते रहेंगे. तुम्हें मेरे साथ जीवन बिताना है तो कुछ करना होगा?’’

”क्या करना होगा?’’ जबर सिंह ने पूछा.

”तुम्हें मेरे सिंदूर को मिटाना होगा, ताकि मैं तुम्हारे हाथ का सिंदूर अपनी मांग में सजा सकूं. अभी तो मैं तुम्हारी रखैल ही हूं.’’

”चाहता तो मैं भी हूं, लेकिन पकड़े गए तो..?’’

”कुछ नहीं होगा. तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी. ऐसा प्लान बनाऊंगी कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

कुछ देर चुप्पी साधने के बाद वह फिर बोली, ”चरन सिंह जीवित नहीं रहेगा तो उस के घर तथा जमीनजायदाद पर भी उसी का कब्जा हो जाएगा. हम दोनों उसी घर में बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहेंगे.’’

”ठीक है. मैं तैयार हूं.’’ जबर सिंह ने सहमति जताई.

उस के बाद गीता और जबर सिंह ने कान से कान जोड़ कर चरन सिंह की हत्या का प्लान बनाया. तय हुआ कि इस बार जब गांव जाएंगे, तब योजना के तहत चरन सिंह को ठिकाने लगा देंगे. 14 नवंबर, 2024 को इटावा कोर्ट में गीता द्वारा पति के खिलाफ दर्ज कराए गए मारपीट के मुकदमे की तारीख थी. इसलिए गीता प्रेमी जबर सिंह के साथ सोनीपत से गांव रम्पुरा लौहरई आई. कोर्ट में तारीख पर गई, फिर शाम को वापस घर आ गई. उस ने घर में खाना पकाया और बच्चों को खिलाया. पति चरन सिंह से भी हमदर्दी भरी बातें कीं. चरन सिंह को लगा कि गीता को अपनी भूल का अहसास हो गया है. अब वह घर में बच्चों के साथ ही रहेगी, लेकिन यह उस की भूल थी.

गांव के बाहर प्राइमरी स्कूल था. यहां कई कमरे ऐसे थे, जिस में दरवाजे नहीं लगे थे. ऐसे ही एक कमरे में चरन सिंह का कब्जा था. यहां वह आलू का बीज रखे था, जिसे वह 2 दिन बाद खेत में लगाने वाला था. बीज की रखवाली के लिए वह रात में स्कूल वाले कमरे में सोता था. गीता ने इस की जानकारी पहले ही कर ली थी. 15 नवंबर, 2024 की शाम गीता पति चरन सिंह के साथ स्कूल वाले कमरे में सोने के लिए गई. इस की जानकारी गीता ने मोबाइल फोन के जरिए प्रेमी जबर सिंह को दे दी. योजना के तहत गीता चरन सिंह से मीठीमीठी बातें करती रही. चरन सिंह भी उस से बतियाता रहा. फिर वह सो गया. लेकिन गीता की आंखों में नींद नहीं थी. वह तो जबर सिंह के आने का इंतजार कर रही थी.

गीता क्यों बनी पति का काल

आधी रात को जब गांव के लोग गहरी नींद में सो गए, तब जबर सिंह लोहे की रौड ले कर घर से निकला. रौड का इंतजाम जबर सिंह ने गीता का फोन आने के बाद कर लिया था. जबर सिंह स्कूल पहुंचा तो गीता ने उस के कान में कुछ फुसफुसाया. इस के बाद गीता ने चरन सिंह के पैर दबोच लिए और जबर सिंह ने उस के सिर पर रौड से कई प्रहार किए. चरन सिंह की हल्की चीख निकली, फिर शांत हो गया. हत्या करने के बाद दोनों चरन सिंह के शव को स्कूल की टूटी बाउंड्री वाल के पास ले गए, फिर शव पर घासफूस डाल कर जलाने का प्रयास किया. इस के बाद जबर सिंह फरार हो गया और गीता अपने घर आ गई.

16 नवंबर, 2024 की सुबह पढऩे वाले बच्चे स्कूल पहुंचे तो उन्होंने बाउंड्री वाल के पास अधजला शव देखा. बच्चों ने शोर मचाया तो गांव वाले आ गए. ग्राम प्रधान सुधर सिंह ने थाना बसरेहर पुलिस को सूचना दी तो एसएचओ समित चौधरी पुलिस बल के साथ घटनास्थल आ गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को घटना से अवगत कराया तो एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा डीएसपी पुहुप सिंह मौकाएवारदात पर आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

अब तक ग्रामीणों ने शव की पहचान कर ली थी. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मृतक का नाम चरन सिंह है. वह रम्पुरा गांव का ही रहने वाला था. शव के पास मृतक की पत्नी गीता छाती पीटपीट कर रो रही थी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधाया, फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक चरन सिंह की उम्र 48 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर में प्रहार कर की गई थी. पहचान मिटाने के लिए शव को जलाने का प्रयास किया गया था. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर जांच की और सबूत जुटाए. निरीक्षण के बाद पुलिस ने चरन सिंह के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद मृतक की पत्नी गीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति चरन सिंह की हत्या उस के देवर मुन्नालाल ने की है. वह उस की जमीन हड़पना चाहता था. यह पता चलते ही पुलिस ने मुन्नालाल को हिरासत में ले लिया. अधिकारियों ने जब मुन्नालाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गीता झूठ बोल रही है. वह उसे फंसाना चाहती है. रोनेधोने का नाटक कर वह पुलिस को गुमराह करना चाहती है. जबकि हकीकत यह है कि गीता ने ही अपने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर भाई की हत्या की है.

उस का भाई चरन सिंह नाजायज रिश्तों का विरोध करता था. गीता अपने पति व 3 बच्चों को छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई थी. वह सोनीपत में उस के साथ रहने लगी थी. अवैध रिश्तों की बात पता चली तो पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ समित चौधरी ने गीता को हिरासत में ले लिया. गीता की 13 वर्षीया बेटी सान्या ने भी पुलिस को बताया कि उस के पिता की हत्या मम्मी गीता ने जबर सिंह के साथ मिल कर की है.

एसएचओ समित चौधरी ने थाने पर जब गीता से चरन सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई और त्रियाचरित्र दिखाने लगी, लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गई और उस ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया. दूसरे रोज पुलिस ने नाटकीय ढंग से जबर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया और हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड भी बरामद करा दी, जिसे उस ने स्कूल के पास झाडिय़ों में छिपा दिया था.

हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की सूचना एसएचओ समित चौधरी ने पुलिस अधिकारियों को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थित सभागार में प्रैसवार्ता की और हत्या का खुलासा किया. गीता यादव और उस के प्रेमी जबर सिंह से पूछताछ के बाद चरन सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियद पर रचीबसी निकली—

गीता 3 साल में हो गई विधवा

गीता के पिता रूपसिंह यादव औरैया जनपद के दिबियापुर कस्बे के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी गोमती के अलावा एक बेटा भागीरथ तथा 2 बेटियां गीता व अनीता थी. रूपसिंह बढ़ईगीरी का काम करता था. इस काम में बेटा भागीरथ भी उस की मदद करता था. रूपसिंह की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. बड़ी मुश्किल से परिवार चल पाता था.

भाईबहनों में सब से बड़ी गीता यादव थी. वह घर में सब की लाडली थी. इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. उस का रूपरंग तो साधारण था, लेकिन नैननक्श आकर्षक थे. गीता ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, फिर भी ऊंचे ख्वाब देखा करती थी. जब वह बनठन कर अपनी जवानी के जलवे बिखेरती हुई गलियों से गुजरती तो मनचलों के दिलों पर बिजली सी गिरती थी. गीता यादव आजादखयाल की जरूर थी, लेकिन मनचलों को अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह बस यही कल्पना करती कि उस का पति भी उसी की तरह हैंडसम और आजादखयाल का होगा.

गीता यौवन के भार से लद गई तो रूपसिंह को उस की शादी की चिंता हुई. रूपसिंह ने लड़का देखना शुरू किया तो उसे संजय के बारे में पता चला. संजय के पिता रामसिंह कानपुर के घाटमपुर कस्बे के रहने वाले थे. उन के 2 बेटे अजय व संजय थे. अजय का विवाह हो चुका था. संजय कुंवारा था. वह आटो चलाता था. संजय देखने में आकर्षक व शरीर से हृष्टपुष्ट था. कमाता भी था. अत: रूपसिंह ने संजय को अपनी बेटी गीता के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद रूपसिंह ने गीता का विवाह संजय के साथ कर दिया.

शादी के बाद गीता व संजय ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. सुखमय जीवन व्यतीत करते 5 साल कब बीत गए, दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला. इन 5 सालों में गीता ने एक बेटी को जन्म दिया. गीता ने उस का नाम सान्या रखा. नन्ही परी सान्या से गीता व संजय दोनों ही बेहद प्यार करते थे. उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं रखते थे. संजय घाटमपुर-कानपुर मार्ग पर आटो चलाता था. वह सुबह 8 बजे घर से निकलता, फिर रात 8 बजे तक ही घर वापस आता था. दोपहर का खाना वह होटल पर खाता था, जबकि रात का खाना पत्नी व बेटी के साथ ही खाता था. गीता उस के खानपान का विशेष ध्यान रखती थी.

जीवन सुखमय बीत रहा था. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था, जिस ने गीता की जिंदगी में अंधेरा कर दिया. उस दिन संजय सुबह आटो ले कर घर से निकला. दोपहर बाद गीता को खबर मिली कि संजय का एक्सीडेंट हो गया. उस के आटो में किसी लोडर चालक ने टक्कर मार दी. वह सीएचसी घाटमपुर में भरती है. गीता अपने ससुर रामसिंह के साथ अस्पताल पहुंची. लेकिन तब तक डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. बेटी सान्या अभी 3 साल की ही थी कि उस के सिर से पिता का साया उठ गया. गीता ने कुछ महीने तक तो आंसू बहाए, उस के बाद बेटी के भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सासससुर ने कुछ दिनों तक तो हमदर्दी जताई, उस के बाद उन का भी रवैया बदल गया.

विधवा बहू व उस की बेटी उन्हें बोझ लगने लगी थी. वह उसे ताने भी मारने लगे थे. सास कहती, ‘बहू उस के बेटे को खा गई.’ ससुर कहता, ‘अभागिन बहू ने उस के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया.’ गीता कब तक ससुराल वालों के ताने सहती. एक रोज उस ने बेटी को साथ लिया और मायके आ गई. मम्मीपापा ने उस के दर्द को समझा और उसे घर में शरण दे दी. गीता उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, अत: उस ने काम की तलाश शुरू कर दी. काफी प्रयास के बाद उसे बाल भारती स्कूल में आया की नौकरी मिल गई. नौकरी से वह अपना तथा बेटी का भरणपोषण करने लगी.

गीता भरी जवानी में विधवा हो गई थी. पेरेंट्स को चिंता सता रही थी कि वह पूरा जीवन कैसे बिताएगी. कोई न कोई सहारा उसे जरूर चाहिए. अत: रूपसिंह उस का घर बसाने के प्रयास में जुट गए. एक रोज एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें चरन सिंह के बारे में पता चला. चरन सिंह इटावा जिले के बसरेहर थाना के गांव रम्पुरा लौहरई का रहने वाला था. बड़ा भाई मुन्नालाल अपने परिवार के साथ अलग रहता था. दोनों भाइयों के बीच घर जमीन का बंटवारा हो चुका था. चरनसिंह किसान था. मनरेगा में भी मजदूरी कर लेता था. चरन सिंह उम्रदराज जरूर था, फिर भी रूपसिंह ने उसे पसंद कर लिया था. कारण उन की बेटी गीता भी विधवा और एक बेटी की मां थी.

दूसरे पति से खुश क्यों नहीं थी गीता

गीता और चरन सिंह का कोई मेल नहीं था. गीता 30 साल की थी तो चरन सिंह 40 साल का था. गीता दिखने में आकर्षक व सुंदर थी, जबकि चरन सिंह सांवले रंग का इकहरे बदन का था. इस बेमेल विवाह में गीता का विधवा होना तथा उस के पिता की गरीबी, चरन सिंह के लिए वरदान बन गई. मजबूरी में गीता का विवाह चरन सिंह से हो गया. मन मसोस कर गीता ने भी इस बेमेल संबंध को स्वीकार कर लिया. गीता जैसी जवान और सुंदर पत्नी पा कर अधेड़ उम्र का चरन सिंह अपने भाग्य पर इतरा उठा. गीता के घर संभालते ही चरन सिंह ने उसे घर की चाबी सौंप दी. वह गीता से तो प्यार करता ही था, उस की बेटी को भी भरपूर प्यार देता था. सान्या भी चरन सिंह को पापा कह कर बुलाती थी. अब चरन सिंह जो कमाता था, वह गीता के हाथ पर रखता था. दूसरे पति के रूप में गीता को चरन सिंह का सहारा मिल गया था. अत: उस के दिन सुख से बीतने लगे थे.

समय बीतता गया. गीता के एक बेटी पहले से थी. दूसरे पति चरन सिंह से उस ने एक के बाद एक 2 बेटों अमन व करन को जन्म दिया. इस तरह गीता अब 3 बच्चों की मां बन चुकी थी. गीता यादव अपने तीनों बच्चों से बेहद प्यार करती थी तथा उन के पालनपोषण में कोई कोताही नहीं बरतती थी. चरन सिंह भी अपने बेटों जैसा ही सान्या को भी प्यार देता था और उस की हर जिद पूरी करता था. गीता 3 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस के आकर्षण में कमी नहीं आई थी. वह अब भी हर रात पति का साथ चाहती थी. जबकि 2 बेटों के जन्म के बाद चरन सिंह की कामेच्छा कम हो गई थी.

5 साल भी नहीं बीते थे कि गीता की रातें काली होनी शुरू हो गईं. अब उस की समझ में आया कि चरन सिंह के हाथों से मंगलसूत्र पहनना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. ऐसी भूल, जिसे सुधारा भी नहीं जा सकता था. चरन सिंह तो बुझता हुआ दीया था. बुझने से पहले जिस तरह दीया भड़कता है, शादी के बाद चरन सिंह उसी तरह भड़का था. इसी अंतिम जोश में 2 बच्चे हो गए और खुद चरन सिंह बुझ गया. हर रात की असफलता चरन सिंह की रोजमर्रा बन गई तो शर्मिंदगी से बचने के लिए वह गीता का सामना करने से कतराने लगा. दिन में वह खेत पर रहता. शाम को दारू पी कर आता. कभी खाना खाता, कभी बिना खाए ही सो जाता. गीता रात भर करवटें बदलती रहती.

पति की उपेक्षा से गीता यादव का मन गृहस्थी में कम ही लगता था. अब तक उस की बेटी सान्या 10 वर्ष की उम्र पार कर चुकी थी. घर का कुछ काम वह संभाल लेती थी. दोनों भाइयों का भी खयाल रखती थी. पापा को भी नाश्तापानी खेत पर दे आती थी. वहीं गीता एक तरफ उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. चंचल चितवन की गीता के चेहरे पर अकसर उदासी के बादल छाए रहने से उस के घर से 4 घर दूर रहने वाला युवक जबर सिंह समझ गया कि अवश्य उसे कोई दुख कचोट रहा है. वह गीता को जब भी देखता, उसे बांहों में लेने को मचलने लगता. गीता भी उसे देख कभीकभी मुसकरा देती. इस से जबर सिंह को यकीन हो गया कि गीता उस से कुछ चाहती है.

जबर सिंह के पापा गजोधर की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बेटे गब्बर व जबर सिंह थे. गब्बर दूध का व्यवसाय करता था. जबकि जबर सिंह खेतीकिसानी के साथ मनरेगा में मजदूरी भी करता था. मनरेगा मे काम करने के दौरान ही जबर सिंह की दोस्ती गीता के पति चरन सिंह से हुई थी. हालांकि जबर सिंह और चरन सिंह की उम्र में 10-12 साल का फासला था. लेकिन दोनों शराब के लती थे, सो उन के बीच दोस्ती हो गई थी. जबर सिंह का आनाजाना गीता के घर बना रहता था. देखनेभालने में जबर सिंह गठीले बदन वाला युवक था. गीता का हमउम्र था. बातें भी लच्छेदार करता था. गीता को उस की बातें अच्छी लगती थीं. वह जब भी जबर सिंह को देखती, सोचने लगती कि काश! उस का पति भी मजबूत कदकाठी वाला और चुहलबाज होता तो उस की भी जिंदगी मजे से बीतती.

चरन सिंह कमजोर शौहर तो था ही, शराब का लती भी था. इसलिए गीता उस से मन ही मन नफरत करने लगी. पति से निराश हुई तो उस का झुकाव जबर सिंह की तरफ होने लगा. जबर सिंह जब भी आता था, गीता व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ खानेपीने की चीज जरूर लाता था. इस से गीता यही सोचती कि जबर सिंह उस का कितना खयाल रखता है. गीता का पति चरन सिंह उस के आनेजाने पर ऐतराज न करे, इसलिए जबर सिंह उस की आर्थिक मदद करता रहता था. चरन सिंह को दारू भी पिलाता था. उस के घर में बैठ कर एकदो पैग वह भी लगा लेता था. ऐसा वह गीता की नजदीकी हासिल करने के लिए करता था. इस बीच गीता और जबर के बीच नैनमटक्का चलता रहता था. कभीकभी चरन सिंह की नजर बचा कर वह गीता को छेड़ भी देता था.

इस के बावजूद चरन सिंह जब पत्नी और जबर सिंह को हंसीमजाक व बतियाते देख लेता था तो वह पत्नी पर नाराज होता था और लांछन लगाने लगता था. लेकिन जबर सिंह बीच में आ जाता और दारू का लालच दे कर चरन सिंह का गुस्सा शांत कर देता था. एक रोज जबर सिंह शाम को गीता के घर आया. उस के एक हाथ में बोतल तथा दूसरे में मीट की थैली थी. आते ही उस ने पूछा, ”भाभी, भैया नहीं दिख रहे हैं, आज मैं उन की मनपसंद चीज लाया हूं.’’

”ऐसी क्या चीज लाए हो, जिस से तुम्हारे भैया खुश हो जाएंगे?’’ गीता ने आंखें नचाईं.

”बकरे का मीट और शराब की बोतल.’’ जबर सिंह ने थैली और शराब दिखाते हुए गीता से कहा.

”लेकिन वो तो आज घर पर हैं नहीं.’’

”कहां गए हैं?’’ जबर ने पूछा.

”किसी काम से रिश्तेदारी में गए हैं. कल दोपहर तक वापस आएंगे.’’ गीता ने बताया.

”तब तो कल ही महफिल जमेगी.’’ जबर सिंह मायूस हो गया.

”अरे भैया नहीं तो क्या हुआ, मैं तो हूं. मैं मीट पका लूंगी. तुम मायूस क्यों होते हो.’’ कहते हुए उस ने मीट की थैली जबर सिंह के हाथ से ले ली. इस के बाद गीता ने पानी, गिलास तथा नमकीन जबर सिंह के आगे रख दी. गीता मटन पकाने लगी. जबर सिंह पैग बनाबना कर मजे से पीने लगा. रसोई का काम निपटा कर गीता पास आ बैठी तो नशे के सुरूर में जबर सिंह उस के हुस्न के कसीदे पढऩे लगा. गीता को उस की बातों में रस आ रहा था. जबर सिंह शराब का गिलास उठा कर बोला, ”भाभी, भैया न जानें क्यों शराब का नशा करते हैं, आप की मदभरी आंखों में इतना नशा है कि कोई भी शराब उस का मुकाबला नहीं कर सकती.’’

”ये तुम समझते हो, वो तो नहीं समझते.’’ गीता ने ठंडी आह भरी.

”मैं तो भाभी यह भी कहता हूं…’’ नशे की झोंक में वह गीता के पास खिसक आया फिर बोला, ”भाभी, तुम्हारे रस भरे होठों में इतनी तासीर है कि इन्हें अंगुली से छू कर शराब में अंगुली डुबो दो, नशा 4 गुना बढ़ जाएगा.’’

”वो कैसे?’’ गीता ने आंखें नचाते हुए पूछा.

”वो ऐसे भाभी,’’ जबर सिंह ने अपनी तर्जनी अंगुली गीता के निचले होंठ पर फिराई, फिर अंगुली शराब के गिलास में डुबो कर एक ही सांस में पूरी शराब गटक गया. जबर सिंह के इस स्पर्श ने गीता की देह में अंगारे भर दिए. कामाग्नि की आंच से उस का बदन सुलगने सा लगा. चारपाई से उठते हुए वह बोली, ”अब बस करो, बहुत पी चुके हो. मैं खाना ले कर आती हूं.’’

5 मिनट बाद ही गीता थाली परोस कर ले आई. जबर सिंह को लगा, शायद उस की हरकत से गीता नाराज है, इसलिए वह बिना कुछ बोले चुपचाप खाना खाता रहा और सामने बैठी गीता अपलक उसे देखती रही. देह की भड़की हुई प्यास उसे बेचैन किए थी. जबर सिंह का मजबूत बदन रहरह कर उस की कामनाओं को हवा दे रहा था. वह किसी तरह खुद को संभाले हुए थी. खाना खा कर जबर सिंह जाने लगा तो गीता फंसीफंसी आवाज में बोली, ”कैसे मर्द हो तुम? मुझ अकेली औरत को यूं तन्हा छोड़ कर जा रहे हो?’’

”तुम्हें डर लग रहा है तो मैं यहीं सो जाता हूं.’’ जबर सिंह बोला.

गीता के बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे. बच्चे जाग न जाएं और उस के खेल में खलल न डाल दें, सो उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. गीता ने जबर सिंह की कलाई पकड़ी और अपने कमरे में ले गई. फिर चारपाई की ओर इशारा करते हुए बोली, ”जबर सिंह, तुम इस पर लेट जाओ.’’

”खाट तो एक ही है, फिर तुम कहां सोओगी?’’ जबर ने उत्सुकता से पूछा.

”इसी चारपाई पर तुम्हारे साथ.’’ वासना ने गीता का विवेक हर लिया था. उस ने धक्का दे कर जबर सिंह को चारपाई पर गिरा दिया और स्वयं उस पर ढेर हो गई, ”बुद्धू, इतना भी नहीं समझते कि शबाब मिले तभी शराब पीने का मजा आता है.’’

जबर सिंह नशे में था तो गीता कामातुर थी. पका हुआ फल खुद ही गोद में आ गिरा था. जबर सिंह ने कामातुर गीता को अपनी बांहों में भर लिया और चारपाई पर लुढ़क गया. उस के बाद कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. काम पिपासा मिटाने के बाद ही दोनों एकदूसरे से अलग हुए. दोनों के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि थी. गीता यादव और जबर सिंह एक बार अवैध संबंधों के दलदल में समाए तो समाते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते. गीता ने जहां पति के साथ विश्वासघात किया था तो वहीं जबर सिंह ने दोस्ती में दगा दी थी. लेकिन उन दोनों को कोई मलाल न था.

जबर सिंह के बारबार घर आनेजाने पर चरन सिंह को शक हो गया कि जरूर इस का गीता के साथ कोई चक्कर चल रहा है, जिस से यह यहां इतने चक्कर लगाता है. एक दिन चरन सिंह ने इस बाबत पत्नी गीता से पूछा तो वह झूठ बोली, ”जरूर तुम्हें कोई वहम हो गया है. जैसा तुम सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है.’’

पति ने रंगेहाथ ऐसे पकड़ा गीता को

 

दिन भर का थकाहारा चरन सिंह शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे जबर सिंह पर पड़ी. वह उस की पत्नी गीता से हंसीठिठोली कर रहा था. गीता भी उस की बातों में सराबोर थी. यह देख कर चरन सिंह का गुस्सा सातवेें आसमान पर जा पहुंचा. वह चीखते हुए बोला, ”गीता, अपने यार से ही बतियाती रहेगी या फिर चायपानी को भी पूछेगी.’’

पति का कटाक्ष सुन कर गीता भी फट पड़ी, ”कैसी बातें करते हो, थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. जबर सिंह मेरा यार नहीं, गलीटोला के नाते देवर लगता है. वैसे भी जबर सिंह तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो, कामधंधा करते हो और शराब की महफिल सजाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का घर आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो उसे बेइज्जत कर भगा दो. ताकि दोबारा उस के कदम घर की ओर न बढ़ें.’’

”तेरी लोमड़ी चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तू चाहती है कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तू उस की भली बनी रहे. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तेरे दिल में उस के लिए जो प्यार उमड़ता है, उसे मैं भलीभांति जानता हूं. तेरे कारण ही वह कुत्ते की तरह पूंछ हिलाता हुआ चला आता है. मुझ से मिलने का तो बस बहाना होता है.’’

गीता और चरन सिंह की तूतूमैंमैं की भनक जबर सिंह के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर बरामदे में आ गया और बोला, ”चरन भैया, लगता है आप खेतों पर किसी से झगड़ कर आए हो. इसलिए मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भौजाई पर उतार रहे हो. लेकिन भैया, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लाल परी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

चरन सिंह शराब का लती था. जबर सिंह ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा. वह खुशी का मुखौटा ओढ़ कर बोला, ”जबर सिंह, मैं तेरी भौजाई से झगड़ नहीं रहा था. बीजखाद का इंतजाम करने की बात कर रहा था.’’

उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”गीता, कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम और जबर सिंह महफिल सजाएंगे.’’

पति की हांक सुन कर गीता मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा पति है. कुछ देर पहले लांछन लगा रहा था. जबर सिंह को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है?’’

गीता ने कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद चरन सिंह और जबर सिंह शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त जबर सिंह की निगाहें गीता पर ही टिकी रहीं. गीता भी मंदमंद मुसकरा कर जबर सिंह का नशा बढ़ाती रही. लेकिन गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिपता, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रोज चरन सिंह खेतों पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी जबर सिंह उस के घर आ गया. आते ही उस ने गीता को बांहों में भर लिया. दोनों काम वासना में अभी डूबे हुए ही थे कि चरन सिंह की पुकार सुन कर दोनों घबरा गए.

गीता ने अपने कपड़े तुरंत दुरुस्त किए और दरवाजा खोल दिया. घर में अंदर जबर सिंह मौजूद था. बिस्तर कुछ पल पहले गुजरे तूफान की चुगली कर रहा था. चरन सिंह सब समझ गया. उस ने गीता को धुनना शुरू किया तो जबर सिंह चुपके से खिसक लिया. चरन सिंह जान गया था कि जबर सिंह उस पर इतना मेहरबान क्यों था? अब उस ने जबर सिंह के साथ शराब पीना बंद कर दी और उस के घर आने पर पाबंदी भी लगा दी. देह की लगी पाबंदियों को भला कहां मानती है.

चरन सिंह ने जब एक रोज जबर सिंह को गीता के साथ बतियाते देख लिया तो उस ने जबर सिंह के साथ गालीगलौज व मारपीट की. साथ ही जबर सिंह को चेतावनी भी दे डाली कि वह उस की पत्नी का पीछा छोड़ दे, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा. यही नहीं, उस ने जबर की शिकायत भी उस के बड़े भाई गब्बर से कर दी. गब्बर सिंह ने भाई को समझाया और गीता से दूर रहने को कहा. लेकिन जबर सिंह ने भाई की बात नहीं मानी. वह गीता के इश्क में इतना अंधा हो चुका था कि उसे अपनी पत्नी बनाने के सपने देखने लगा था. दोनों के मिलने पर पाबंदी लगी तो वे मोबाइल फोन के जरिए एकदूसरे से बात करने लगे. गीता को मोबाइल फोन जबर सिंह ने ही मुहैया करा दिया था.

एक रात चरन सिंह ने पत्नी गीता को फोन पर बतियाते छत पर पकड़ा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. उस ने गीता से फोन छीन कर दूर फेंक दिया, फिर उस ने गीता को डंडे से जम कर पीटा. इस पिटाई से गीता का सिर फट गया. उस ने सुबह जा कर बसरेहर थाने में पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस पर पुलिस ने चरन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. 2 दिन बाद उसे जमानत मिली.

इस घटना के बाद गीता ने तय कर लिया कि वह पति की मार अब और सहन नहीं करेगी. वह उस के साथ रहेगी भी नहीं. गीता का नाजायज रिश्ता जबर सिंह के साथ बन ही चुका था, इसलिए उस ने जबर सिंह को तीसरे पति के रूप में चुन लिया और बच्चों का मोह त्याग कर जबर सिंह के साथ रहने की ठान ली. उस ने अपनी मंशा से जबर सिंह को भी अवगत करा दिया.

बच्चों को छोड़ प्रेमी के साथ भाग गई गीता

जबर सिंह तो गीता को पत्नी बनाने का प्रयास पहले से ही कर रहा था, अत: गीता ने प्रस्ताव रखा तो वह उसे पत्नी का दरजा देने को राजी हो गया. इस के बाद गीता और जबर सिंह ने गांव छोडऩे का निश्चय किया. उन्होंने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी. मौका देख कर एक रात गीता अपने तीनों बच्चों को घर में छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई. जबर सिंह गीता को सोनीपत (हरियाणा) ले गया. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. जीविका चलाने के लिए दोनों मेहनतमजदूरी करने लगे. वहां गीता को किसी तरह का डर नहीं था. गीता व जबर सिंह को सोनीपत में बसाने का काम जबर सिंह के एक दूर के रिश्तेदार ने किया था, जो पहले से वहां रहता था.

इधर चरन सिंह की सुबह आंखें खुलीं तो पत्नी घर से गायब थी. तीनों बच्चे भी मां को खोजने लगे. चरन सिंह ने गांव भर में गीता की खोज की, जब वह नहीं मिली तो वह समझ गया कि गीता जबर सिंह के साथ भाग गई है. उस ने यह बात पूरे गांव को भी बता दी. कुछ लोगों ने उसे रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. लेकिन उस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. गीता कई महीने तक जबर सिंह के साथ रही, उस के बाद उसे बच्चों की याद सताने लगी. उस से नहीं रहा गया, तब वह एक रोज गांव वापस आ गई. बच्चों ने मां को सामने देखा तो उन की आंखों से आंसू बहने लगे. गीता ने बच्चों को गले लगा लिया. चरन सिंह भी बच्चों की देखभाल के लिए परेशान था सो उस ने झगड़ा करने की बजाय गीता को बच्चों के साथ रहने के लिए समझाया. उस ने मारपीट के लिए क्षमा भी मांगी.

लेकिन जबर सिंह के पौरुष की दीवानी गीता ने चरन सिंह की बात ठुकरा दी. वह सप्ताह भर बच्चों के साथ रही, उस के बाद सोनीपत लौट गई. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गीता 2-4 महीने में जबर सिंह के साथ गांव आती और हफ्ता-10 दिन बच्चों के साथ रहती, फिर दोनों वापस चले जाते. गांव प्रवास के दौरान गीता का चरन सिंह से झगड़ा भी होता. कुछ समय बाद गीता का मारपीट वाले मुकदमे की कोर्ट में तारीखें पडऩे लगीं. अत: उसे इटावा कोर्ट में तारीख पर आना पड़ता. तारीख पर आने के बाद वह बच्चों से भी मिल लेती थी. तारीख पर चरन सिंह भी जाता था.

वहां कभी दोनों की नोंकझोंक होती तो कभी साथ बैठ कर बतियाते और खातेपीते भी थे, लेकिन गीता केस में सुलह को राजी नहीं होती थी. फिर 15 नवंबर की रात को गीता यादव ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति चरन सिंह की हत्या कर दी. चूंकि गीता यादव और जबर सिंह ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल लोहे की रौड भी बरामद करा दी थी, अत: एसएचओ समित चौधरी ने मृतक की बेटी सान्या की तहरीर के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 238(ए) के तहत गीता व जबर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

19 नवंबर, 2024 को पुलिस ने गीताजबर सिंह को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा में सान्या परिवर्तित नाम है

 

 

Family Dispute : बहू ने सास को लोहे की पाइप से पीट पीट कर मार डाला

Family Dispute : निकिता और रेखाबेन का आए दिन का झगड़ा आम सास बहू के झगड़ों और कहासुनी से अलग नहीं था. लेकिन यह झगड़ा तब सीमाएं लांघ गया जब सास रेखाबेन ने गर्भवती बहू के गर्भ में ससुर का बच्चा होने का इलजाम लगाया. जाहिर है कोई भी औरत ऐसा झूठा आरोप नहीं सह सकती. निकिता भी नहीं…

परिवार में सासबहू के झगड़े सैकड़ों सालों से चले आ रहे हैं. ये विवाद कभी खत्म नहीं हुए और न ही हो सकते हैं. सासबहू की लड़ाई को टीवी की महारानी एकता कपूर ने सीरियल के रूप में घरघर तक नए रूप में पहुंचाया. संपन्न परिवारों में सास और बहू एकदूसरे को मात देने के लिए कुटिल चालों का तानाबाना बुनती रहती थीं, जिस के चलते टीवी सीरियल की कहानियां लंबी खिंचती जाती थीं. अब इन सीरियलों का दौर भले ही खत्म हो गया, लेकिन वास्तविक जीवन में सासबहू के झगड़े जारी हैं. आज भी कोई इक्कादुक्का परिवार ही ऐसे होंगे, जहां सास और बहू में आपस में प्रेमप्यार बना हुआ हो. आमतौर पर सास अपनी बहू पर मनमर्जी थोपना चाहती है और बहू आजादी चाहती है.

विवाद यहीं से शुरू होता है. यह विवाद कभीकभी इतना बढ़ जाता है कि या तो परिवार टूटने की नौबत आ जाती है या फिर अपराध की. कई बार ऐसे किस्से भी सुनने को मिलते हैं जब सास ने अपनी बहू को मार डाला. कभी इस के उलट कहानी भी सामने आती है. यह कहानी गुजरात की राजधानी अहमदाबाद शहर की है. अहमदाबाद के गोता इलाके में स्थित पौश आवासीय सोसायटी रौयल होम्स में फर्स्ट फ्लोर पर बने फ्लैट में रामनिवास अग्रवाल का परिवार रहता है. उन का शहर में पत्थर, टाइल्स का बड़ा कारोबार है. बेटा दीपक भी उनके साथ व्यापार में हाथ बंटाता है.

घरपरिवार में मौज थी. केवल 4 सदस्यों के इस परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. खुद रामनिवास अग्रवाल, उन की पत्नी रेखा बेन, बेटा दीपक और बहू निकिता उर्फ नायरा. रामनिवास की उम्र कोई 55 साल है. उन की पत्नी रेखा करीब 52 साल की थी. बेटा दीपक लगभग 30-32 साल का और बहू निकिता करीब 29 साल की. दीपक की शादी इसी साल 16 जनवरी को निकिता से हुई थी. निकिता राजस्थान के जिला अजमेर के ब्यावर निवासी सुरेशचंद्र अग्रवाल की बेटी है. रामनिवास भी मूलरूप से राजस्थान के रहने वाले हैं. उन का परिवार पहले पाली जिले में सुमेरपुर के पास जवाई बांध इलाके में रहता था. बाद में रामनिवास व्यापार के सिलसिले में अहमदाबाद चले गए. वहां उन का कारोबार अच्छा चल गया.

रामनिवास भले ही गुजरात में बस गए थे, लेकिन राजस्थान की माटी से उन का मोह नहीं छूटा था. इसलिए बेटे दीपक के लिए जब राजस्थान के ब्यावर से निकिता का रिश्ता आया, तो उन्होंने घरपरिवार देख कर हामी भर दी. वैसे भी ब्यावर के रहने वाले सुरेशचंद्र अग्रवाल साधन संपन्न थे. उन का भी अच्छा कारोबार था. पैसों की कोई कमी नहीं थी. निकिता में भी कोई कमी नहीं थी. तीखे नाकनक्श वाली निकिता ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से एमकौम तक की पढ़ाई करने के बाद सिक्किम यूनिवर्सिटी से फायनेंस में एमबीए की डिगरी भी हासिल की थी. दीपक और निकिता की शादी हो गई. शादी में सुरेशचंद्र अग्रवाल ने दिल खोल कर पैसा खर्च किया. किसी बात की कमी नहीं छोड़ी. पत्नी के रूप में सुंदर और पढ़ीलिखी निकिता को पा कर दीपक भी निहाल हो गया.

दीपक भी हैंडसम था. निकिता भी पति के रूप में दीपक को पा कर खुद पर अभिमान करती थी. दोनों का दांपत्य जीवन खुशी से चलने लगा. निकिता की भले ही शादी हो गई थी, लेकिन पीहर से उस का मोह नहीं छूटा था. वह पीहर जाती, तो महीनेबीस दिन में आती. हालांकि इस बीच मार्च में लौकडाउन हो गया था. लौकडाउन के दौरान निकिता को करीब 3-4 महीने पीहर में ही गुजारने पड़े. उस का कहना था कि ट्रेन और बसें बंद होने तथा एक से दूसरे राज्य में लोगों की आवाजाही पर रोक होने से वह अहमदाबाद नहीं जा सकी थी. पढ़ीलिखी बहू और गृहिणी सास की नोंकझोंक बहू निकिता के ज्यादा समय पीहर में रहने से सास रेखा बेन को कोई सुख नहीं मिल पा रहा था. वैसे तो घर में कामकाज के लिए बाई आती थी. फिर भी रेखा बेन चाहती थी कि कोई उस की भी देखभाल करने वाला हो.

बहू उस के कामकाज में हाथ बंटाए. इस बात को ले कर रेखा और निकिता में कई बार खटपट हो जाती थी. दहेज को ले कर भी रेखा उसे ताने मारती और उस के कामकाज में मीनमेख निकालती रहती थी. वैसे भी आमतौर पर बढ़ती उम्र के लिहाज से हर महिला चाहती है कि जैसे उस ने घर को संवारा है, वैसे ही बहू भी घरपरिवार की जिम्मेदारी संभाले, लेकिन निकिता शादी के बाद आधे से ज्यादा समय पीहर में ही रही थी. ऐसी हालत में रेखा बेन को ही घरपरिवार में खटना पड़ता था. उसी पर पति की जिम्मेदारी थी और बेटे की भी. इसी बीच, अक्तूबर के महीने में निकिता के दादा का निधन हो गया, तो वह फिर अपने मायके चली गई. इस बार भी वह मायके में कुछ ज्यादा दिन रुक गई. ससुर और पति ने कई बार फोन किए, तो वह 21 अक्तूबर को अहमदाबाद लौट आई.

ससुराल आ कर निकिता ने पति और सास को अपने गर्भवती होने की बात बताई. यह सुन कर दीपक तो खुशी से झूम उठा, लेकिन रेखा बेन के माथे पर सिलवटें पड़ गई. रेखा बेन को बहू के गर्भवती होने से कोई खुशी नहीं हुई. उसे शक था कि निकिता के पेट में बेटे दीपक का नहीं बल्कि ससुर रामनिवास का गर्भ है. रेखा बेन को अपने पति पर भी शक था. उस का शक इसलिए भी था कि ससुर और बहू खूब हंसबोल कर बातें करते थे. मोबाइल पर चैटिंग भी करते थे. हालांकि रेखा बेन ने कभी ससुर और बहू को गलत हरकत करते हुए नहीं देखा, लेकिन उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता रहता था. रेखा पहले से ही बहू से खुश नहीं थी. अब उसे उस के चरित्र पर भी शक होने लगा था.

शक ऐसा कीड़ा है, जिस का कोई इलाज नहीं है. रेखा पहले तो दहेज को ले कर और उस के कामकाज तथा पीहर में ज्यादा समय रहने पर ऐतराज उठाती थी. अब वह उस के चरित्र पर भी अंगुली उठाने लगी. इस से सासबहू के झगड़े बढ़ गए. रेखा को जब भी मौका मिलता, वह निकिता को ताने मारने से नहीं चूकती. रोजाना दिन में 2-4 बार किसी न किसी बात पर रेखा और निकिता में कहासुनी हो ही जाती थी. रेखा बहू की शिकायत अपने बेटे और पति से करती, तो वह हंस कर टाल देते थे. इस बीच, रामनिवास कोरोना से संक्रमित हो गया. उसे 24 अक्तूबर को निजी अस्पताल में भरती करा दिया गया. पति के कोरोना संक्रमित होने से रेखा बेन चिड़चिड़ी हो गई.

इस के बाद 27 अक्तूबर की रात करीब 8 बजे की बात है. घर पर केवल रेखा और निकिता ही थी. दीपक अपने टाइल्स, पत्थर के औफिस गया हुआ था. रेखा उस समय रसोई में रात के भोजन की तैयारी कर रही थी. इसी दौरान रेखा अपनी बहू को ताने मारने लगी. रेखा के हाथ में लोहे का एक पाइप था. वह उस पाइप को निकिता के पेट पर धंसा कर कहने लगी, तेरे पेट में ये जो बच्चा है, वह मेरे बेटे का नहीं बल्कि मेरे पति का है. निकिता बर्दाश्त नहीं कर पाई सास के मुंह से ऐसी बातें सुन कर निकिता को गुस्सा आ गया. उस ने रेखा के हाथ से वह पाइप छीन लिया और बिना सोचेसमझे उस के सिर में दे मारा.

50-52 साल की रेखा बेन जवान बहू का विरोध नहीं कर सकी. उस के सिर से खून बहने लगा. वह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद भी निकिता का गुस्सा शांत नहीं हुआ. उस ने पाइप से सास के सीने, पेट और चेहरे पर कई वार किए. पाइप के लगातार हमलों को रेखा सहन नहीं कर सकी. उस के शरीर से कई जगह से खून रिसने लगा और थोड़ी ही देर में उस के प्राण निकल गए. जब निकिता का गुस्सा शांत हुआ, तो वह घबरा गई. उस की सोचनेसमझने की शक्ति जवाब दे गई थी. कुछ देर बैठ कर वह सोचती रही कि अब क्या करे? कुछ देर विचार करने के बाद उस ने सास की हत्या को आत्महत्या का रूप देने की योजना बनाई.

उस ने फ्लैट में ही रेखा के शव पर चादर डाल कर उसे जलाने का प्रयास किया. उसे यह नहीं पता था कि इंसान का शव इतनी आसानी से नहीं जलता. शव नहीं जला, तो वह हताश हो कर अपना सिर पकड़ कर बैडरूम में जा बैठी. इस बीच, पड़ोसियों ने सासबहू के बीच झगड़े और मारपीट की तेज आवाजें सुनीं, तो उन्होंने रामनिवास के फ्लैट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन निकिता ने दरवाजा नहीं खोला. कई बार घंटी बजाने और कुंडी खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो पड़ोसियों ने रामनिवास को फोन किया. रामनिवास अस्पताल में थे. पड़ोसी की बात सुन कर वे चिंतित हो उठे. उन्होंने बेटे दीपक को तुरंत घर जाने को कहा. दीपक उस समय अपना औफिस बंद कर चाणक्यपुरी ब्रिज स्थित मंदिर में हनुमानजी के दर्शन करने गया हुआ था. वह रात करीब साढ़े 9 बजे फ्लैट पर पहुंचा.

उस ने घंटी बजाई, लेकिन निकिता ने गेट नहीं खोला. उस ने गेट की कुंडी भी खटखटाई, लेकिन फिर भी दरवाजा नहीं खुला, तो उस ने मां और बीवी के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन दोनों ने ही फोन नहीं उठाया. उसे लगा कि निकिता ने मां से झगड़े के बाद गेट बंद कर लिया होगा और अब वह गुस्से में गेट नहीं खोल रही है. मां की लाश देख होश उड़े थकहार कर उस ने पड़ोसियों की सीढि़यों के रास्ते अपने फ्लैट में जाने की कोशिश की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. बाद में उस ने पड़ोसियों से पाइप की बनी सीढ़ी का इंतजाम किया. इस सीढ़ी पर चढ़ कर वह रसोई के रास्ते अपने फ्लैट में पहुंचा. उस की मां का कमरा बंद था. उस ने कमरा खोला, तो मां की खून से लथपथ अधजली लाश देख कर दीपक सहम गया.

मां की लाश के पास ही खून से सना लोहे का एक पाइप पड़ा था. निकिता अपने बैडरूम में चुपचाप बैठी थी. उस ने उस से पूछा कि यह सब क्या और कैसे हुआ?  निकिता ने दीपक को बताया कि मम्मीजी ने पहले उस से झगड़ा किया. फिर वे अपने कमरे में चली गईं. पता नहीं उन्होंने खुद कैसे अपना यह हाल बना लिया? शायद उन्होंने सुसाइड कर लिया. दीपक को निकिता की बातें गले नहीं उतर रही थीं. अगर रेखा बेन सुसाइड करतीं, तो खून से लथपथ कैसे हो जातीं और फिर उन का शव कैसे जलता? दीपक ने निकिता से पूछा कि घर में कोई और आदमी आया था क्या? निकिता ने मना कर दिया.

दीपक ने रात को ही फोन नंबर 108 पर एंबुलेंस सेवा को फोन किया. एंबुलेंस के साथ आए डाक्टर और चिकित्साकर्मियों ने रेखा बेन की जांच कर उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद दीपक ने पुलिस को फोन किया. पुलिस उस के फ्लैट में पहुंच गई. पुलिस ने दीपक से पूछताछ की. दीपक ने पिता का फोन आने से ले कर सीढ़ी के रास्ते फ्लैट में चढ़ने और मां का लहूलुहान शव पड़ा होने की सारे बातें बता दीं. पुलिस ने निकिता से पूछताछ की, तो उस ने वही बातें कहीं, जो दीपक को बताई थीं. मौके के हालात देख कर पुलिस को भी निकिता की कहानी पर भरोसा नहीं हुआ. रात ज्यादा हो गई थी. फिर भी पुलिस ने रात को ही घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी.

फुटेज में इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि दीपक के फ्लैट में बाहर से कोई आदमी आया था. पुलिस ने पंचनामा बना कर शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. मामला संदिग्ध था. इस के लिए निकिता से पूछताछ जरूरी थी. पुलिस उसे थाने ले गई. दीपक की शिकायत पर सोला थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मौके से खून से सना लोहे का पाइप बरामद कर लिया था. पुलिस ने थाने में निकिता से पूछताछ की. वह कहती रही कि सास और उस का झगड़ा हुआ था. इस के बाद सास अपने कमरे में चली गई और अंदर से कमरा बंद कर लिया. बाद में कैसे और क्या हुआ, इस का उसे कुछ पता नहीं है.

निकिता ने पुलिस को बताया कि उस की सास पिछले कुछ सालों से ऐसी बीमारी से पीडि़त थी कि कोई उसे छू ले, तो वह तुरंत नहाती थीं. मैडिकल की भाषा में इस बीमारी को औब्सेसिव कंपजिव डिसऔर्डर (ओसीडी) कहा जाता है. दीपक ने भी अपनी मां के ऐसी बीमारी से ग्रस्त होने की बात मानी. पुलिस ने दीपक से उस के घरपरिवार और सासबहू के रिश्तों के बारे में पूछा. इस में पता चला कि रेखा बेन और निकिता में दहेज और घरेलू कामकाज को ले कर झगड़े होते रहते थे. इस पर पुलिस अधिकारियों ने निकिता से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की.

आखिर दूसरे दिन 28 अक्तूबर को सुबह निकिता ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस के अधिकारी भी हैरान रह गए. निकिता ने बताया कि उस की सास पुराने खयालों की थी. वह उसे कभी दहेज पर तो कभी किसी दूसरी बात पर ताने मारती थी. शादी के बाद से ही सास से उस की पटरी नहीं बैठी थी. अभी जब वह पीहर से ससुराल आई और मम्मीजी को अपने गर्भवती होने की बात बताई, तो उन की त्यौरियां चढ़ गईं. उस दिन तो उन्होंने कुछ नहीं कहा. ससुरजी के अस्पताल में भरती होने के बाद मम्मीजी मेरे गर्भ को ले कर अनापशनाप बातें कहने लगीं. उस दिन जब उन्होंने उस से गर्भ ससुर का होने की बात कही, तो गुस्से में वह अपना आपा खो बैठी और उन के हाथ से पाइप छीन कर ताबड़तोड़ हमले किए. इस से उन की मौत हो गई. निकिता ने सास की हत्या करने की बात कबूल कर ली थी.

उस ने पुलिस को बताया कि सास की हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए उस ने वहां फैले खून को चादर से साफ किया. फिर शव पर चादर डाल कर आग लगा दी ताकि शव जल जाए, लेकिन शव नहीं जला. इस के बाद उस ने अपने मोबाइल से ससुर के वाट्सएप चैट और मैसेज डिलीट किए. मोबाइल से मैसेज डिलीट करने की बात सामने आने पर पुलिस ने निकिता के साथ परिवार के चारों लोगों के मोबाइल जब्त कर लिए. इन की जांच की, तो निकिता के मोबाइल में एक मैसेज मिला. 24 अक्तूबर के इस मैसेज में ससुर रामनिवास ने लिखा था कि तुम अभी दीपक से दूर ही रहना.

स्वीकारोक्ति के बाद निकिता की स्वीकारोक्ति के बाद पुलिस ने निकिता और उस की सास के खून से सने कपड़े भी जब्त कर लिए. मोबाइल फोन के साथ इन कपड़ों को भी जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया गया. एफएसएल टीम ने भी मौके से साक्ष्य जुटाए. पुलिस ने दूसरे दिन डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से रेखा बेन के शव का पोस्टमार्टम कराया. बाद में दीपक को शव सौंप दिया गया. घर वालों ने रेखा बेन का अंतिम संस्कार कर दिया. कोरोना जांच में निकिता निगेटिव मिली. इस के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया. पुलिस ने निकिता को उस के फ्लैट पर ले जा कर वारदात का सीन रिक्रिएट किया.

इस दौरान पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि निकिता और रेखा बेन के बीच झगड़ा कैसे शुरू हुआ होगा. इस के बाद निकिता ने कैसे उस की हत्या की होगी. सीन रिक्रिएट के जरिए पुलिस ने यह बात जानने की भी कोशिश की कि क्या निकिता ने अकेले ही सास की हत्या की या इस में किसी दूसरे आदमी ने भी उस की मदद की? हालांकि पुलिस को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला. बेटी के हाथों सास की हत्या की सूचना मिलने पर राजस्थान के ब्यावर शहर से निकिता के मातापिता अहमदाबाद पहुंचे. पहले वे समधन रेखा बेन की अंतिम क्रिया में शरीक हुए. बाद में वे सोला पुलिस स्टेशन जा कर हत्या आरोपी बेटी निकिता से मिले.

उसे पुलिस हिरासत में देख कर मांबाप के आंसू बह निकले. निकिता भी रो पड़ी. सुबकते हुए उस ने अपने मातापिता से केवल इतना ही कहा, ‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’ पुलिस ने जांचपड़ताल के दौरान पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि रेखा और निकिता के बीच आमतौर पर रोजाना ही किसी ना किसी बात पर झगड़ा होता था. उस दिन भी उन्होंने दोनों के बीच झगड़े और मारपीट की तेज आवाजें सुनी थीं. इस के बाद ही रामनिवास को फोन किया था.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने निकिता को जेल भिजवा दिया था. पुलिस यह जानने का प्रयास कर रही थी कि क्या निकिता के अपने ससुर से किसी तरह के संबंध थे? हालांकि पुलिस को एक मोबाइल चैटिंग के अलावा इस बारे में दूसरा कोई प्रमाण नहीं मिला. मोबाइल चैटिंग से भी यह बात साफ नहीं होती कि निकिता के ससुर से किसी तरह के संबंध थे. बहरहाल, 2 महीने की गर्भवती निकिता अपनी सास की हत्या के आरोप में जेल पहुंच गई. ससुर रामनिवास पर बहू से संबंधों का आरोप लग गया. पति दीपक बीच मंझधार में फंस गया.

उस के सामने संकट आ खड़ा हुआ कि वह पिता पर शक करे या पत्नी पर. निकिता के पेट में किस का गर्भ है, यह तो वही जाने. शक की बुनियाद पर एक खातेपीते संपन्न परिवार के रिश्तों में ऐसी दरार आ गई, जो जिंदगी भर नहीं पाटी जा सकती.

 

Social Crime : झाड़फूंक के बहाने काले कपड़े वाला बाबा करता था महिलाओं से छेड़छाड़

Social Crime : देश में शिक्षा का प्रचारप्रसार चाहे कितना भी बढ़ गया हो लेकिन लोगों के मन से अंधविश्वास अभी भी नहीं गया है. एक मजार के बाबा अंसार हुसैन ने तो महिलाओं की समस्याएं दूर करने का ऐसा तरीका बना रखा था कि…

हर इंसान दुनिया में किसी न किसी परेशानी या समस्या से घिरा रहता है. लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं, जिस का हल न हो. कुछ समझदार लोग बड़ी से बड़ी समस्या का हल अपनी सूझबूझ से निकाल लेते हैं, लेकिन कुछ मूढ़मति भटक कर रह जाते हैं. निस्संदेह भटकने वाले लोगों का फायदा गलत किस्म के इंसान उठाते हैं. ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों और झाड़फूंक करने वाले कथित पीर बाबाओं मौलानाओं की दुकानदारियां ऐसे ही लोगों से चलती हैं. जिन के चक्कर में पड़ कर अपनी जिंदगी तो खराब करते ही हैं, आर्थिक नुकसान भी उठाते हैं.

गंभीर रोगों पर किसी प्रकार की शारीरिक समस्या अथवा निस्संतान होने पर महिलाएं अच्छे डाक्टर के बजाय इन बाबाओं के चक्कर में पड़ जाती हैं. मातृत्व की प्राप्ति के बिना नारीत्व सार्थक नहीं होता. निस्संतान महिला ससुराल में उपेक्षा की पात्र बन कर रह जाती है. दूसरे लोग भी उस पर टीकाटिप्पणी करने से बाज नहीं आते. ऐसे में कोई उसे बांझ कह दे तो महिला के दिल को गहरी चोट लगती है. ऐसी उपेक्षित महिला के लिए बांझ कोई शब्द नहीं, बल्कि गाली होती है. ऐसी गाली सुन कर उस पर क्या बीतती है, केवल वही समझ सकती है, जो इस दर्द से गुजरी हो.

ऐसी ही एक निस्संतान महिला थी सलमा (परिवर्तित नाम) जोकि लखनऊ के सआदतगंज इलाके में रहती थी. उस के निकाह को 10 साल हो चुके थे, मगर उस की गोद सूनी थी. संतानोत्पत्ति के लिए सलमा जो कर सकती थी, सब किया लेकिन उस की मुराद पूरी नहीं हुई. सलमा ने भी मान लिया था कि उस की किस्मत में संतान नहीं है. संतान न होने का गम उठा कर भी सलमा घुटघुट कर जी लेती, लेकिन अचानक उस के शौहर ने उस का जीना हराम कर दिया. वही शौहर जो कभी उस पर जान छिड़कता था. अचानक उसे दुश्मन की नजर से देखने लगा. दोष सलमा का था जो पति को उस का वारिस नहीं दे सकी थी, इसलिए वह चुप रह कर उस की गालियां भी सुन लेती और पिट भी लेती. सलमा की खामोशी ने उस के शौहर के जुल्म बढ़ा दिए थे.

सलमा ने शौहर में अचानक आए बदलाव का कारण पता किया तो उस के जैसे होश उड़ गए. पता चला कि उस का दूसरे मोहल्ले में रहने वाली एक युवती से इश्क चल रहा था. शौहर अपनी प्रेमिका को अपनी बेगम बना कर घर लाना चाहता था. सलमा अपनी छाती पर भला सौतन को कैसे बरदाश्त कर सकती थी. इसलिए उस ने इस का विरोध किया तो शौहर ने उस की पिटाई कर दी. उधर शौहर की माशूका उस से निकाह करने को राजी थी. लेकिन उस ने साफ कह दिया था कि पहले वह अपनी बेगम सलमा को घर से दफा करे, उस के बाद वह उस से निकाह करेगी.

यही कारण था कि शौहर सलमा पर जुल्मों के पहाड़ ढा रहा था. उस की मंशा थी कि सलमा हमेशा के लिए अपने मायके चली जाए और प्रेमिका से उस का निकाह करने का रास्ता साफ हो जाए. एक या कुछ दिन की बात होती तो सलमा सह लेती. यहां तो हर सुबह उसे गालियों का नाश्ता मिलता और पिटाई का डिनर करती फिर पूरी रात चुपकेचुपके रोती रहती. एक दिन तो गजब हो गया. सलमा के शौहर को बेड टी लेने की आदत थी. वह चाय की चुस्कियां लेने के बाद ही बिस्तर से उठता था. उस सुबह सलमा चाय ले कर शौहर को जगाने गई, ‘‘उठिए, चाय पी लीजिए.’’

शौहर पहले से जाग रहा था. सुबहसुबह सलमा को पीटने का मन भी बनाए हुए था. बस, उसे एक बहाना चाहिए था. सलमा ने जैसे ही उसे आवाज दी तो वह उस पर बरस पड़ा, ‘‘साली बांझ, मेरी आंखों के सामने आ कर क्यों खड़ी हो गई. तूने मेरा पूरा दिन बरबाद कर दिया.’’

उस के बाद उस ने सलमा के सीने पर लात मारी. सलमा दीवार से टकराई, उस पर गरम चाय गिर गई. एक तो चोट, दूसरे चाय से जलन की पीड़ा. सलमा बिलबिला कर रो पड़ी. मगर उस के शौहर को कहां तरस आने वाला था. सलमा को चोट पहुंचाने के लिए ही तो उस ने उस के सीने पर लात मारी थी. सलमा बिलबिला कर रोने लगी तो शौहर का पारा हाई हो गया. वह बैड से उतरा और जमीन पर गिरी सलमा को लातों से कुचलने लगा, ‘‘बांझ औरत, मैं तेरा मनहूस चेहरा नहीं देखना चाहता. जीना चाहती है तो शराफत से मायके चली जा और लौट कर यहां कभी मत आना. और नहीं गई तो मैं पीटपीट कर तेरी जान ले लूंगा.’’

रोनेसिसकने के अलावा सलमा कर भी क्या सकती थी. सलमा को अधमरा करने के बाद शौहर फ्रैश हुआ और कपडे़ बदल कर घर से चला गया. चोटें सहलाते हुए सलमा अपनी फूटी किस्मत पर आंसू बहाती रही.  दिमाग बहुत कुछ सोच रहा था. अब सलमा को अपना जीवन निरर्थक लग रहा था. सोच यही थी कि जलालत और दुखों से भरी ऐसी जिंदगी जीने से क्या लाभ. इन हालातों से कभी छुटकारा नहीं मिलने वाला. ऐसे जीवन से तो मौत भली. इस के बाद सलमा के जेहन में मौत को गले लगाने का विचार हावी होता चला गया. वह उठी और मुंह पर पानी के छींटें मार कर चेहरा दुरुस्त किया, फिर दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसन को दे दी और कहा कि उस का शौहर आए तो चाभी दे देना. इस के बाद सलमा के जिस ओर कदम उठे, वह चल पड़ी.

मन में विचार आ रहा था कि कैसे मरे. इसी बीच सड़क पर उस की एक खास परिचित महिला मिली. उस ने सलमा को परेशान देखा तो उसे रोक कर पूछा कि कहां जा रही है. सलमा ने उसे दुखी मन से बोल दिया कि वह मरने जा रही है. यह सुन कर वह महिला चौंकी. वह सलमा को लेकर एक जगह बैठ गई. उस की परेशानी पूछी तो सलमा ने रोते हुए उसे पूरी आपबीती सुना दी. महिला को उस की स्थिति पर तरस आया. उस ने उसे उस की समस्या को दूर करने का रास्ता बताने का वादा किया. शर्त यह रखी कि वह मरने का इरादा छोड़ दे तो वह बताएगी. सलमा ने वादा किया कि उस की शर्त मानने को तैयार है. उस की समस्या दूर हो जाएगी तो उसे मरने की जरूरत ही नहीं पडे़गी.

महिला ने उसे वह रास्ता बताया तो जैसे सलमा को ऐसे लगा जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया. आस जगी तो वह घर वापस लौट गई. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ठाकुरगंज थानाक्षेत्र के हुसैनाबाद में रईस मंजिल के पास सैयद अहमद शाह उर्फ पिन्नी वाले बाबा की मजार थी. मजार पर रोज काफी लोग मत्था टेकने आते थे और अपने लिए दुआएं मांगते थे. आने वालों में महिलाएं अधिक होती थीं.  मजार पर 65 वर्षीय मौलाना अंसार हुसैन उर्फ काला बाबा झाड़फूंक का काम करता था. अंसार हुसैन हमेशा काले कपड़े पहनता और काली टोपी लगाता था. इसीलिए लोग उसे काला बाबा कहने लगे थे. मजार के पास ही एक कमरा बना था. काला बाबा झाड़फूंक का काम उसी कमरे में करता था.

वह निस्संतानता, सफेद दाग और कई प्रकार के रोगों और परेशानियों को दूर करने का दावा करता था. उस का एक सहयोगी असलम था, जो कि बाबा का राजदार था और उस के हर काम में सहयोग करता था. परिचित महिला ने सलमा को इसी काला बाबा के बारे में बताया था. सलमा अपना दुख ले कर काला बाबा के पास पहुंची और अपना दुख उस के सामने जाहिर किया. काला बाबा ने उस पर ऊपरी साया होने की बात बताई जो कि उस की कोख हरी नहीं होने दे रहा. वह साया उस की कोख में अपनी जगह बनाए हुए था. इसलिए पूरे जतन करने के बाद भी वह मां नहीं बन पा रही थी. काला बाबा की बात सुन कर सलमा सहम गई. उस ने काला बाबा से उस का उपाय करने को कहा. बाबा ने उसे हर बुधवार को मजार पर पास आने को कहा. बाबा ने उस से कहा कि वह उस दिन नहा कर साफ कपड़े पहन कर आए. बाबा का मानना था कि बुधवार को ही कोई काम शुद्ध होता है.

उस दिन भी बुधवार था. काला बाबा उसे कमरे में ले गया और मोर पंखों की झाड़ू उस के सिर पर मार कर उस के ऊपरी साए को भगाने का जतन करने लगा. साथ ही कुछ बुदबुदाते हुए उस के ऊपर फूंक भी रहा था. कुछ देर तक ऐसा करने के बाद काला बाबा ने सलमा से कहा कि ऊपरी साए को दूर करने के लिए उसे अपने शरीर पर भभूत लगवानी होगी. सलमा कुछ झिझकी तो बाबा ने कहा कि जो तुम्हारी समस्या को दूर कर रहा हो, उस के सामने शरमाना और हिचकना नहीं चाहिए. सलमा वैसे ही परेशान थी और हर हाल में अपना दुख दूर करना चाहती थी. इसलिए वह काला बाबा की बात मानने को तैयार हो गई.

कमरे के आधे हिस्से को एक चादर से कवर किया गया था. वहां जमीन पर एक चादर भी बिछी थी. काला बाबा ने सलमा को वहां भेज दिया. सलमा ने अपने सारे कपडे़ उतार दिए और जमीन पर बिछी चादर पर लेट गई. काला बाबा उस के पास पहुंचा और उस के बदन पर साथ लाई भभूत को मलने लगा, साथ ही वह कुछ बुदबुदा भी रहा था. वह काफी देर तक भभूत लगाता रहा. सलमा मजबूरी में लेटी थी लेकिन बाबा का स्पर्श करना उसे भी अच्छा लग रहा था. उस दिन के बाद सलमा हर बुधवार बाबा के पास जाने लगी. बाबा के पास आने वाली महिलाओं में सलमा ही नहीं थी, उस जैसी कई महिलाएं थीं, काला बाबा जिन का इसी तरह इलाज करता था. किसी को भभूत लगाता तो किसी को लेप लगाता था.

इलाज के बहाने वह महिलाओं के शरीर से छेड़छाड़ करता, उन की अस्मत से खेलता था. कभी उस की तबियत खराब होती या चेले असलम का मन होता तो काला बाबा उसे महिलाओं से खेलने का मौका दे देता था. असलम अपने गुरु से भी चार हाथ आगे निकल गया. वह महिलाओं की इज्जत से तो खेलता ही था, साथ ही वह उन की वीडियो भी बना लेता था. वीडियो के सहारे बाद में वह उन महिलाओं को ब्लैकमेल करता था. बाबा और उस के चेले का यह गोरखधंधा कई सालों से चल रहा था. मजार पर महिलाएं जरूरत से ज्यादा आने लगीं तो आसपास के लोगों का माथा ठनका. उन्होंने काला बाबा और उस के चेले पर नजर रखनी शुरू कर दी.

वह काला बाबा से कुछ पूछते या टोकते तो बाबा और उस के घर वाले लोगों से लड़ने को तैयार हो जाते थे. परिवार वाले बाबा का ही साथ देते थे. सआदतगंज क्षेत्र की एक महिला अपने शरीर पर पड़े सफेद दागों को दूर कराने के लिए एक साल से काला बाबा के पास आ रही थी. काला बाबा उस के सफेद दाग दूर करने के बहाने उस के नग्न बदन पर लेप लगाता था. 21 अक्तूबर, 2020 की शाम को भी वह महिला काला बाबा के पास लेप लगवाने आई. बाबा की तबियत ठीक नहीं थी. इसलिए उस ने अपने चेले असलम को लेप लगाने के लिए बोल दिया. असलम उस महिला को कमरे में ले जा कर लेप लगाने लगा. उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था. काला बाबा दरवाजे के बाहर ही तैनात था.

तभी मोहल्ले वाले कमरे के अंदर किसी महिला के होने की जानकारी मिलते ही वहां पहुंच गए. वे लोग कमरे के अंदर क्या हो रहा है, काला बाबा से इस की जानकारी मांगने लगे. बाबा उन पर नाराज हो गया तो लोग उस से हाथापाई करने लगे. कुछ लोग इस सब का मोबाइल से वीडियो बना रहे थे, तभी शोर सुन कर कमरे के अंदर मौजूद असलम ने दरवाजा खोल कर बाहर देखना चाहा तो मोहल्ले के लोग कमरे के अंदर घुस गए. वहां परदे के पीछे एक नग्न महिला लेटी हुई थी. लोग वहां पहुंच गए और उस से सवालजवाब करने लगे. महिला कपड़े पहनते हुए सफाई देने लगी कि वह तो मजार पर मत्था टेकने आई थी. वह एक साल से मजार पर आ रही थी. लोगों ने वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिए.

बाबा की घिनौनी करतूत को जिस ने देखा उस ने बाबा को कोसा. मोहल्ले के लोगों ने ठाकुरगंज थाने में सूचना दे दी. सूचना पर इंसपेक्टर राजकुमार अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. मोहल्ले के लोगों ने काला बाबा की करतूतों के बारे में उन्हें बताया. पूरे मामले की बनाई गई वीडियो भी उन को दे दी. इस बीच काला बाबा का चेला असलम भाग गया था. इंसपेक्टर राजकुमार काला बाबा और उस महिला को साथ ले कर थाने आ गए. महिला ने बाबा के विरुद्ध थाने में शिकायत दर्ज कराने से मना कर दिया. तब पुलिस ने महिला को पूछताछ के बाद थाने से घर भेज दिया.

इस के बाद थाने के दरोगा ओमप्रकाश यादव की ओर से काला बाबा और उस के चेले असलम के खिलाफ अश्लील हरकत करने और धोखाधड़ी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद काला बाबा को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस असलम की तलाश में लगी हुई थी.

Rajasthan Crime : तीन बहुओं ने मिलकर सास की गला दबाकर की हत्या

Rajasthan Crime : एक जमाना था जब सास बहू पर रौब दिखाना अपना अधिकार समझती थी. इतना ही नहीं, वह उसे अपनी अंगुलियों पर नचाती थी. लेकिन आज की बहुएं पहले जैसी नहीं हैं. वह अपने जीवन में किसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं करतीं. इस बात को कमला देवी समझ पाती तो शायद उस की 3 बहुओं को हत्या के आरोप में जेल नहीं जाना पड़ता. समाज में सास और बहू के संबंधों पर कई टीवी धारावाहिक बने हैं. सास बहू का रिश्ता हर परिवार में देखने  को मिलता है. ज्यादातर सास की अपनी बहुओं से कोई न कोई शिकायत रहती ही है. बहू भले ही कितनी भी सुघड़ और समझदार हो.

भले ही वह सास को अपनी जन्मदात्री मां के बराबर दर्जा दे कर उन के इशारों पर दिनरात काम करती रहे. मगर सास नामक प्राणी को बहू से इस के बाद भी शिकायत ही रहती है. कुछ ही सास होती हैं जो बहू को बेटी समझ कर लाड़प्यार से रखती हैं वरना तो अधिकांश सास अपनी बहू के काम में कोई न कोई मीनमेख निकालती ही रहती हैं. कहने का मतलब है कि ऐसी सास कभी भी अपनी आदत से बाज नहीं आती.  लेकिन अब जमाना काफी बदल गया है. आज की बहुओं को सास द्वारा उन के काम में मीनमेख निकालना पसंद नहीं है. वह अपनी लाइफ में पति के अलावा किसी और का हस्तक्षेप पसंद नहीं करतीं. इतने पर भी सास यदि तानाशाही दिखाती रहे तो परिणाम भयानक सामने आते हैं.

राजस्थान के जोधपुर जिले के थाना मतोड़ा के अंतर्गत एक गांव आता है हरलाया रामदेव नगर. इस में दमाराम मेघवाल अपने परिवार के साथ रहते हैं. उन के परिवार में पत्नी कमलादेवी के अलावा 5 बेटे हैं. उस ने अपने पांचों बेटों की शादियां कर दी थी. सभी बेटे अपने परिवार के साथ अलगअलग मकान बनवा कर रह रहे थे. दमाराम की बीवी कमलादेवी भी कड़क स्वभाव की सास थी. वह अपनी बहुओं को दबाव में रखना चाहती थी. उस ने ऐसा ही किया. बड़े और मंझले बेटे की शादी हुई तो इन दोनों बहुओं को उस ने अपने नियंत्रण में रखा. उन से सास कुछ भी कहती तो बहुओं की हिम्मत नहीं होती थी कि वे सास को पलट कर जवाब दें. सास द्वारा काम में टोकाटाकी व हायतौबा मचाने पर भी वे चुप रहती थीं.

जब छोटे 3 बेटों पुखराज, मिश्रीलाल व मदनराम के विवाह हो गए तब दोनों बड़े बेटे अलग हो गए. पुखराज व मिश्रीलाल की बीवियां प्रेमा एवं पिंटू सगी बहनें थीं. वहीं मदनराम की पत्नी ओमा इन की चचेरी बहन थी. तीनों बहनें एक ही परिवार के सगे भाइयों में ब्याही थीं.  पुखराज, मिश्रीलाल एवं मदनराम राजमिस्त्री का काम करते थे. ज्यादातर वे अपने गांव या आसपास के गांवों में काम करते थे. वे सुबह नाश्ता कर के अपने काम पर चले जाते और दोपहर में घर आ कर खाना खा कर थोड़ा सा आराम कर के पुन: काम पर चले जाते थे. दैनिक मजदूरी 7-8 सौ रुपए थी. इस से परिवार का भरणपोषण आराम से हो रहा था. इन तीनों भाइयों के घर आसपास ही थे जबकि बड़े भाइयों के घर थोड़े दूर थे.

तीनों बहनें ब्याही एक ही परिवार में तीनों बहनें प्रेमा, पिंटू व ओमा मिलजुल कर रहती थीं. ससुराल में अगर सगी बहन या चचेरी बहन ब्याही होती है तो उन में कुछ ज्यादा ही बनती है. इन तीनों के पति काम पर चले जाते, तो तीनों बहनें घर का काम निबटा कर एक जगह पर इकट्ठा हो कर बतियाती रहती थीं. जिस से इन का टाइम पास हो जाता था. मगर इन के टाइम पास में सास अकसर खलल डाल देती थी. सास कमला देवी उन को ताने देती कि घर के काम में मन नहीं लगता. जब देखो तब बैठ कर गप्पे मारती रहती हो. जब बहुएं कहतीं कि घर का सारा काम कर लिया है, तो सास उन पर चढ़ दौड़ती. वह उन्हें 10 काम और बता देती कि यह नहीं किया, वो नहीं किया. तीनों बहनों को सास गालीगलौज देने लगती तो रुकती ही नहीं.

वह पूरा घर सिर पर उठा लेती थी. तीनों बहनें परेशान हो जातीं. मगर कमला देवी को कोई फर्क नहीं पड़ता. उस के सामने प्रेमा पड़ती तो उसे गाली एवं काम में मीनमेख व टोकाटाकी. पिंटू पड़ती तो वही मीनमेख और हायतौबा. ओमा पड़ती तो उसे भी सास की बेवजह हायहाय सुननी पड़ती थी. अगर ये बहुएं अपनी सास से कुछ कहतीं तो वह उन पर बिफर जाती और अपने बेटों के घर आने पर बहुओं की शिकायत करती कि यह तीनों बैठ कर दिन भर गप्पें मारती रहती हैं. कामधाम कुछ नहीं करतीं. अगर मैं कुछ कहती हूं तो यह मुझे आंखें दिखाती हैं और जुबान लड़ाती हैं. मुझ से इस तरह बात करती हैं जैसे मैं इन की बहू हूं.

बेटे मां की बात सुन कर अपनी बीवियों को समझाते कि मां जो कुछ कहती है. उन के भले के लिए कहती है. वह बूढ़ी हो गई हैं अब कितने दिन की मेहमान हैं. उन का सम्मान किया करो. जुबान बंद रखा करो.  बेटे अपनी बीवियों को समझा कर जाते और मां से भी कहते कि वह भी क्यों बेवजह परेशान होती हैं. अगर बहुएं काम नहीं करें तो मत करने दो. उन का बिगड़ेगा, तुम्हारे ऊपर क्या फर्क पड़ेगा. तुम रामनाम की माला जपो. मगर बेटों के समझाने का भी कमला देवी पर कोई असर नहीं पड़ता. लिहाजा उस के और तीनों बहुओं के बीच हर रोज कलह और विवाद होता था. कलह के कारण सब परेशान थे. मगर कलह करने वाले अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे थे.

कमलादेवी 62 साल की थी फिर भी वह अपनी बकरियां ले कर जंगल में चराने के लिए हर रोज जाती थी. दोपहर तक बकरियां चरा कर वह घर आ जाती थी. घर आ कर बकरियों को बाड़े में बांध कर फिर वह आराम करती थी. बेटे जब दोपहर में खाने घर आते थे तो मां घर पर आराम करते मिलती थी. लेकिन 28 अगस्त, 2020 को दयाराम के तीनों बेटे पुखराज, मदन एवं मिश्रीलाल मेघवाल दोपहर को खाना खाने घर आए तो बकरियां घर के बाहर खुले में खड़ी थीं.

यह देख कर वे चौंके कि बकरियां आज खुली कैसे हैं. क्योंकि मां पहले बकरियां बाड़े में बांधती थी. मदन व पुखराज ने मां को आवाज लगाई. मगर कोई जवाब नहीं मिला. घर में देखा मां वहां भी नहीं थी. मा कहां चली गई. यह उन्होंने अपनी बीवियों से पूछा. बीवियों ने कहा कि हमें पता नहीं. वे कहां गईं. तब मदन, पुखराज मां को देखने घर के बाहर बने कमरे में गए. कमरे में देखते ही उन की चीख निकल गई. मां गले में फंदा डाल कर छत पर पंखे से लटकी हुई मरी पड़ी थी. यह नजारा देख कर बेटों के हाथपैर कांपने लगे. वे रोने लगे. दोपहर में रोने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. गांव वाले समझ नहीं पा रहे थे कि कमला देवी ने इस उम्र में आत्महत्या क्यों की? बहुएं तो बुक्का फाड़ कर रो रही थीं.

किसी ने मृतका के पीहर (मायके) हरिओमनगर भीकमकोर में सूचना दे दी. भीकमकोर से मृतका के पीहर से भाईभतीजे शाम होतेहोते हरलाया रामदेव नगर आ गए. पीहर वालों ने जब कमला देवी को पंखे से लटके देखा तो उन्हें लगा कि कमला देवी की हत्या कर के शव फंदे पर लटकाया गया है. मृतका के बेटे और बहुएं यह मानने को तैयार नहीं थे. मृतका के पीहर वालों के संदेह करने का कारण था फंदा पंखे के हुक से न बांध कर पंखे के पाइप से बांधना. प्लास्टिक का पाइप वजन से पंखे सहित सुसाइड करने की स्थिति में झटका लगने से टूट सकता था. मगर वह टूटा नहीं था. इस पर पीहर वालों ने शक जताया. उन्होंने मृतका की बहुओं प्रेमा, पिंटू, ओमा से पूछा तो वे कहती रहीं कि सास ने आत्महत्या की है.

जबकि मृतका कमला देवी के भतीजे प्रभुराम ने बताया कि वह 25 अगस्त, 20 को जब बुआ कमला से मिलने आया था. तब बुआ ने रोते हुए उसे बताया था कि पुखराज की पत्नी प्रेमा उर्फ प्रेमी उस की हत्या कर सकती है. वह मारने की धमकियां दे रही है. तब भतीजे प्रभुराम ने बुआ को दिलासा दिया था कि वह वापस आ कर बात उस के बेटों से करेगा. इसी बीच 28 अगस्त, 2020 की शाम को प्रभुराम को करनाणियों ढाणी के रिश्तेदार उस के पास हरिओमनगर भीकमकोर आए. उन्होंने बताया कि तुम्हारी बुआ कमला देवी का शायद काम तमाम कर दिया है. प्रभुराम ने अपनी बुआ के बेटों पर आरोप लगाया कि उन्होंने उन्हें घटना की जानकारी तक नहीं दी. रिश्तेदारों से सुन कर प्रभुराम अपने भाईभतीजों के साथ हरलाया रामदेवनगर आए.

प्रभुराम ने बुआ कमला देवी की हत्या कर के शव पंखे पर लटकाने का आरोप लगाया. रात भर इस हत्याकांड पर घर में चर्चा होती रही. मृतका की बहुओं से भी पूछताछ की गई और झांसा दिया गया कि वे सच बता दें. तब प्रेमा, पिंटू और ओमा ने सभी के सामने स्वीकार कर लिया कि उन तीनों ने ही अपनी सास की गला दबा कर हत्या करने के बाद शव पंखे से लटकाया था. अब सच सामने आ चुका था. 3 बहुओं ने मिल कर सास की सांस रोक दी थी. लिहाजा 29 अगस्त, 2020 को प्रभुराम मेघवाल ने थाना मतोड़ा जा कर थानाप्रभारी नेमाराम इनाणिया को अपनी बुआ कमला देवी की हत्या की सूचना दे कर मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद थानाप्रभारी प्रभुराम को ले कर पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे.

कमला देवी का शव जिस स्थिति में था. देख कर संदेह स्वाभाविक था कि मारने के बाद शव फांसी पर लटकाया गया है. उन्होंने सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. एसपी (जोधपुर ग्रामीण) राहुल बारहठ से निर्देश प्राप्त कर थानाप्रभारी नेमाराम ने काररवाई शुरू कर मृतका का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मैडिकल बोर्ड बना कर मृतका का पोस्टमार्टम कराया गया. जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिलती तब तक पुलिस जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. पुलिस पूछताछ में मृतका के बेटे और बहुएं आदि कह रहे थे कि मां ने आत्महत्या की है. जबकि मृतका के पीहर वाले सीधे तौर पर हत्या का आरोप लगा रहे थे.

पोस्टमार्टम के बाद कमला देवी का शव उस के परिजनों को सौंप दिया. उसी रोज मृतका का दाह संस्कार कर दिया गया. पुलिस को मृतका कमला देवी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबा कर हत्या की बात सामने आई. पोस्टमार्टम में हुआ हत्या का खुलासा  मामला अब एकदम साफ हो चुका था. पुलिस का मकसद अब हत्यारे तक पहुंचना था. इस के बाद थानाप्रभारी ने मृतका कमला देवी के घर जा कर कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में प्रेमा उर्फ पेमी पत्नी पुखराज, पिंटू पत्नी मिश्रीलाल, ओमा पत्नी मदनराम मेघवाल ने सास कमला देवी का गला दबा कर हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. तब पुलिस ने पहली सितंबर, 2020 को प्रेमा, पिंटू आर ओमा को गिरफ्तार कर लिया. इन्हें थाने मतोड़ा ला कर पूछताछ की गई.

पूछताछ में उन्होंने बताया कि सास उन के हर काम में टांग अड़ाती थी, हर काम में किचकिच करने और बेवजह लड़ाईझगड़ा करने के कारण वे बहुत परेशान हो गई थीं. इस के बाद उन्होंने सास की हत्या की योजना बना ली. फिर 28 अगस्त 2020 को दोपहर में सास जब बकरियां चरा कर घर लौटी तो आते ही उस ने तीनों बहुओं से झगड़ना शुरू कर दिया. तब तीनों ने पकड़ कर सास को गिरा दिया और गला दबा कर मार डाला. इस के बाद उन्होंने उस के गले में रस्सी का फंदा डाल कर उस का शव कमरे में लगे छत के पंखें पर लटका दिया. ताकि मामला आत्महत्या का लगे. लेकिन किसी के देख लेने के डर से जल्दबाजी में शव पंखे के ऊपर लगे हुक से बांधने के बजाय प्लास्टिक पाइप से बांध दी. शव जमीन को भी छू रहा था. उन्होंने बहुत कोशिश की मगर खून करने के बाद तीनों डर के मारे कुछ कर नहीं पा रही थीं.

इस कारण जब मृतका के पीहर वालों एवं पुलिस ने शव लटके देखा तो संदेह हो गया था. मगर बगैर किसी सबूत के किसी पर आरोप लगाना भी ठीक नहीं था. ऐसे में पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज होने के बाद एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने तक गुप्त रूप से इस घटना की तहकीकात की. इस जांच में सामने आया कि बहुओं ने सास की हर रोज की किचकिच से परेशान हो कर साजिश रच कर हत्या की थी.  वृद्ध सास अगर अपनी बहुओं को बेटियां मान कर हर काम में मीनमेख नहीं निकालती और बहुओं के साथ प्यार का बर्ताव करती तो शायद बहुएं उस का काल नहीं बनतीं. तीनों बहुओं प्रेमा उर्फ पेमी, पिंटू और ओमा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें पहली सितंबर 2020 को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन तीनों बहुओं को अजमेर जेल भेजने के कोर्ट ने आदेश दिए.

अजमेर जेल भेजने से पहले इन तीनों हत्यारोपी बहुओं की कोरोना जांच करवाई गई. अगर कमला देवी अपनी आदत सुधार लेती या फिर उन की तीनों बहुएं सास की आदत है कह कर या सुन कर आवेश में न आतीं तो उन्हें आज यह दिन नहीं देखना पड़ता. सास की हत्या कर की आरोपी तीनों बहुएं सैकड़ों किलोमीटर दूर अजमेर जेल में बंद हैं. इन तीनों के पति और बच्चे अपने हाल पर हैं. समाज में घरपरिवार की इज्जत गई सो अलग. कलह के कारण पूरा परिवार बिखर चुका है. गलत राह पकड़ने से पहले एक बार सोच लें तो कभी परिवार नहीं बिखरेगा. वरना गृहकलेश में ऐसा ही होता है.

 

Family Dispute : सास ने 10 लाख की सुपारी देकर कराई दामाद की हत्या

Family Dispute : यशवीर उर्फ कपिल ने पुलिस अधिकारी ममता पवार से अंतरजातीय विवाह किया था. लेकिन एक दिन अचानक ममता की मृत्यु हो गई. इस के बाद ममता की अकूत संपत्ति को ले कर कपिल और उस की सास शिमला पवार के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि…

उत्तर प्रदेश के जनपद हापुड़ के असोड़ा गांव में बालकिशन सैनी रहते थे. वह खेतीकिसानी करते थे. परिवार में पत्नी निर्मला और 3 बेटे बिरजू, सुखबीर और यशवीर के अलावा 3 बेटियां थीं. सब से छोटा यशवीर था. यश पड़ने में काफी तेज था. उस का पढ़ाई में मन देख कर पिता बालकिशन और मां निर्मला काफी खुश होते थे कि कम से कम एक बेटा तो पढ़ कर अपनी जिंदगी संवार लेगा. आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद बालकिशन ने बेटे की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. यश ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में रह कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगा. बाद में उस ने वहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए कोचिंग देनी शुरू कर दी. दिल्ली में रहते यशवीर ने एलएलबी की और वकील बन गया.

कुछ ही दिनों में उस के कोचिंग सेंटर में काफी छात्रछात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आने लगे. यश का पढ़ाने का तरीका काफी अच्छा था, जिस से छात्रछात्राएं उस से पढ़ने में रुचि लेते थे. उस के कोचिंग सेंटर में पढ़ने आने वाली छात्राओं में ममता पवार नाम की भी एक छात्रा भी थी. वह भी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में लगी थी. ममता का परिवार बागपत जिले में रहता था. उस के पिता का नाम लक्ष्मीचंद्र पवार और मां का नाम शिमला पवार था. ममता 3 भाईबहनों में सब से बड़ी थी. पिता बड़े बिजनेसमैन थे. आगरा में उन की काफी संपत्ति थी, जिस वजह से ममता की मां शिमला आगरा में ही रहती थीं. उन का घर आगरा के थाना छत्ता अंतर्गत जाटनी के बाग के एक अपार्टमेंट में था. यह फ्लैट ममता और शिमला के संयुक्त नाम पर था.

ममता पढ़ने में काफी तेज थी. किसी भी प्रश्न के जवाब से जब तक वह संतुष्ट नहीं हो जाती, तब तक उस का पीछा नहीं छोड़ती थी. इस में यश उस की मदद करता था. यश भी उस की उत्सुकता और पढ़ाई के प्रति अच्छा रुख देख कर खुश होता था. इसलिए वह उसे किसी भी प्रश्न का जवाब समझाने के लिए अतिरिक्त समय दे देता था. इस अतिरिक्त समय में वे दोनों ही होते थे. पढ़नेपढ़ाने के दौरान दोनों काफी खुल गए थे, इसलिए बेझिझक एकदूसरे से बातें करते थे. पढ़ाई के अलावा भी उन के बीच इधरउधर की बातें होने लगीं. दोनों को एक साथ रहना और बातें करना अच्छा लगने लगा. दोनों की उम्र में कोई खास अंतर नहीं था. इसलिए दोनों एकदूसरे से दोस्तों की तरह व्यवहार करने लगे. साथ समय बिताते, घूमने जाते और साथ खातेपीते.

दिल की बात की जाहिर इस सब के चलते दोनों के दिल काफी करीब आ गए. दोस्ती से वे कब प्यार में पड़ गए, उन्हें पता ही न चला. जब दिल की धड़कनें और निगाहें उन के प्यार को जताने लगीं तब उन्हें एहसास हुआ कि वे प्यार में आकंठ डूब गए हैं. दिल की बात जुबां पर लाने के लिए दोनों की जुबान कुछ कहने से पहले ही लड़खड़ा जाती थी. एक दिन एकांत के क्षणों में ममता मेज पर कोहनियों के बल दोनों हाथ टिकाए यश के सामने बैठी थी तो कपिल ने उस की मेज पर रखे दोनों हाथों के पंजे अपने हाथों में लिए और अपने होंठों से उन्हें चूमते हुए बोला, ‘‘ममता, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. यह प्यार काफी दिनों से अपने दिल में छिपाए बैठा था, लेकिन तुम से इजहार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था.

तुम भी मुझ से प्यार करती हो कि नहीं, बस इसी ऊहापोह में हर पल गुजारता था. अब रहा नहीं गया तो तुम से अपने दिल की बात कह दी. अब तुम मेरे प्यार को ठुकराओ या स्वीकार करो, यह फैसला तुम्हारा होगा. तुम जो भी फैसला करोगी, मुझे मंजूर होगा.’’

ममता तो जैसे इसी पल के इंतजार में थी. यश ने जब उस का हाथ चूमा था, तभी समझ गई थी कि आज यश उस से अपने दिल की बात कहने वाला है. वह जान गई थी कि यश भी उस से प्यार करता है. इसलिए मुसकराते हुए बोली, ‘‘सच कहूं, मैं तो कब से इसी इंतजार में थी कि कब तुम मुझ से अपने प्यार का इजहार करोगे. आज आखिर वह शुभ घड़ी आ गई. मैं भी तुम से बहुत प्यार करती हूं.’’ कहते हुए ममता ने यश की आंखों में झांका तो यश ने उसे झट अपने सीने से लगा लिया. यश ने उसे सीने से लगा कर सुकून की सांस ली तो ममता भी अपनी आंखें बंद कर यश के सीने में कैद दिल की धड़कनें सुनने लगी. यश की हर धड़कन में उसे अपने लिए प्यार महसूस हुआ, जिस की वजह से उस के होंठों पर प्यारी सी मुसकराहट तैरने लगी.

उन का प्यार समय के साथ और प्रगाढ़ होता गया. इस दौरान यश की नौकरी लग गई. वह मेरठ की कोर्ट में पेशकार हो गया. उधर ममता भी उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंस्पेक्टर के पद पर भरती हो गई. नौकरी करते हुए भी उन की बातचीत होती रहती थी. दोनों शादी करने का फैसला कर चुके थे. लेकिन इस में जाति आड़े आ रही थी. क्योंकि यश सैनी समाज से था और ममता जाट समाज की. ममता ने अपने घर वालों से बात की तो वे यश से अंतरजातीय विवाह करने की बात पर विरोध में आ गए. ममता ने घर वालों के विरोध के बावजूद यश से विवाह करने की ठान ली. लेकिन उसे और उस के परिवार को इस विवाह से परेशानी न उठानी पड़े, इस के लिए ममता ने यश के सामने शर्त रख दी कि उसे अपना सरनेम बदल कर पवार करना पड़ेगा और विवाह के बाद यश अपने परिवार से कोई संबंध नहीं रखेगा.

यश ने उस की शर्त मान ली और उस ने अपना नाम बदल कर कपिल पवार रख लिया. उस ने सरनेम के साथ नाम भी बदल लिया. 15 साल पहले दोनों ने विवाह कर लिया. ममता की पोस्टिंग आगरा में हो गई. दोनों के अलगअलग शहर में रहने पर परेशानी होने लगी तो कपिल अपनी नौकरी छोड़ कर आगरा आ गया. आगरा के जाटनी के बाग के जिस अपार्टमेंट में ममता की मां शिमला रहती थी, ममता कपिल उर्फ यश के साथ अपनी मां के फ्लैट से ऊपर वाली मंजिल पर स्थित फ्लैट में रहने लगी. यह फ्लैट ममता के नाम पर था. आगरा आ कर कपिल वकालत करने लगा. इस के अलावा वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी करता था. समय के साथ 8 साल पहले ममता ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने कन्नू रखा. इस समय कन्नू सेंट पैट्रिक्स स्कूल में पहली कक्षा की छात्रा थी.

कपिल कुछ ही समय में वकालत के क्षेत्र में आगरा में छा गया. कई बड़े केस उस के हाथ में आ गए. उन में आगरा का बहुचर्चित जोंस मिल कंपाउंड भूमि घोटाले का मुकदमा भी था. जोंस मिल कंपाउंड की आखिरी महिला वारिस मौरिस जोन ने उसे अपना वकील बनाया था. वह कपिल को बेटे की तरह मानती थीं. दूसरी ओर कपिल का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा भी खूब फलफूल रहा था. जमीन का सौदा करवाने में कपिल को जबरदस्त महारत हासिल थी. उस ने कई ऐसे सौदे करवाए थे जो विवादित थे. ममता बन गई पुलिस इंसपेक्टर अब तक ममता इंसपेक्टर के पद पर प्रोन्नत हो चुकी थी. किसी ने कपिल से ईर्ष्या कर पुलिस विभाग के अधिकारियों से शिकायत कर दी कि कपिल की पत्नी ममता आगरा में इंसपेक्टर है.

पत्नी के पुलिस इंसपेक्टर होने के बलबूते पर कपिल ने कई विवादित जमीन की खरीदफरोख्त की है. इस पर पुलिस अधिकारियों ने ममता पवार का स्थानांतरण आगरा से प्रयागराज कर दिया. ममता को अपने विभागीय अधिकारियों का आदेश तो मानना ही था, लिहाजा उसे मजबूरन प्रयागराज जाना पड़ा. प्रयागराज में तैनाती के दौरान 24 सितंबर, 2019 को ममता की तबियत खराब हुई. उस की गंभीर हालत को देखते हुए उसे पीजीआई लखनऊ में भरती कराया गया. लेकिन 27 सितंबर, 2019 को ब्रेन हैमरेज के कारण उस की मृत्यु हो गई. ममता की मौत के बाद उस की मां शिमला कपिल से और बैर रखने लगी. अभी तक ममता के कारण वह कुछ नहीं कहती थी. लेकिन ममता की मौत के बाद शिमला का कपिल से विवाद रहने लगा. विवाद का कारण था ममता के नाम कई प्रौपर्टीज का होना.

ममता के नाम मेरठ के अंसल टाउन में एक प्लौट, आगरा के जाटनी के बाग में एक फ्लैट जिस में शिमला खुद रह रही थी, आस्था सिटी सेंटर के सामने एक प्लौट और एक बेकरी की दुकान थी. बेकरी की दुकान के किराएनामे में शिमला का नाम था. कपिल ने उस का बैनामा अपने नाम करा लिया था. प्लौट भी कपिल अपने नाम कराने की कोशिश कर रहा था. शिमला ने ममता को यह संपत्ति खरीदने के लिए अपनी जमापूंजी दी थी. अब उसे डर था कि उस का दामाद कपिल सारी संपत्ति पर कब्जा कर के उसे घर से बेदखल न कर दे. इसे ले कर उन के बीच बहुत गहरा विवाद था.

ममता की मौत के बाद कपिल के सामने उस की रखी शर्त की कोई बंदिश नहीं थी. वैसे भी कपिल अकेलापन महसूस करता था. इसलिए कपिल ने अपने परिवार से संपर्क रखना शुरू कर दिया. हालांकि फोन पर कपिल पहले भी जबतब बात कर लेता था, लेकिन ममता की वजह से न घर वालों को घर बुला पाता था और न ही उन से मिलने घर जाता था. बंदिश हटी तो कपिल के घर वाले उस के पास आनेजाने लगे. 26 अक्तूबर, 2020 की शाम कपिल अपने फ्लैट में था. 10 दिन पहले उस ने अपनी 90 वर्षीया मां निर्मला को अपने पास रहने के लिए बुला लिया था. वह शाम को अपनी मां से प्लौट पर जाने की बात कह कर घर से निकल गया. अपनी मारुति वैगनआर कार से वह आस्था सिटी सेंटर के पास वाले प्लौट पर गया था. लेकिन पूरी रात बीत गई, वह वापस नहीं लौटा.

सुबह निर्मला ने पड़ोसियों से कहा तो उन्होंने फोन मिलाने को कहा. निर्मला फोन मिलाना नहीं जानती थी, न ही उन के पास बेटे का नंबर था. पड़ोसियों ने नीचे की मंजिल पर रह रही कपिल की सास शिमला से कहा कि वह कपिल के बारे में पता करे. इस पर शिमला कपिल के फ्लैट में आई और निर्मला पर बरस पड़ी, ‘‘ड्रामा मत करो. यहां मजाक बनेगा. वह आ जाएगा, उसे कौन ले जाएगा. तुम चुप रहो बस.’’ कह कर शिमला चली गई. बाद में पड़ोसियों के दबाव में 27 अक्तूबर की शाम को ही शिमला ने स्थानीय छत्ता थाना पुलिस को कपिल के लापता होने की सूचना दी. जिस के बाद छत्ता थाने के इंसपेक्टर सुनील दत्त मय टीम के कपिल के फ्लैट पर पहुंचे.

वहां उन्होंने निर्मला से कपिल के संबंध में पूछताछ की. इस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने कपिल पवार उर्फ यश की थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी. कपिल की मिली लाश बाद में कपिल का कोई सुराग न लगने पर गुमशुदगी को भादंवि की धारा 364 में तरमीम कर दिया गया. इसी बीच इंसपेक्टर सुनील दत्त को 27 अक्तूबर की शाम को इटावा जिले के भरथना थाना क्षेत्र के मल्हौली नहर में एक लाश मिलने की सूचना मिली. उन्होंने इटावा पुलिस से संपर्क कर के लाश की फोटो मंगवाई. वह फोटो कपिल की मां और उस के दोनों भाइयों को दिखाई गई तो उन्होंने लाश की पहचान कपिल के रूप में कर दी. इस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने दोनों भाइयों को एसआई योगेश कुमार के साथ इटावा भेज दिया. दोनों भाइयों ने लाश की शिनाख्त अपने भाई यश उर्फ कपिल के रूप में की. इटावा पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद लाश दोनों भाइयों के सुपुर्द कर दी.

इंसपेक्टर दत्त ने कपिल के फोन नंबर की काल डिटेल्स की जांच की तो उस में एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. उस नंबर की जानकारी की गई तो वह नंबर कपिल के दोस्त जीतू उर्फ हर्ष यादव का निकला. जीतू के नंबर की लोकेशन ट्रेस की गई तो 26 अक्तूबर की शाम को कपिल के प्लौट, फिर उस के घर से होती हुई इटावा तक मिली. इस के बाद उन्होंने अपार्टमेंट में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की तो उस में घटना की रात जीतू कपिल की कार के साथ आया दिखा. साथ में एक जाइलो कार भी थी, जिस में 2 व्यक्ति सवार थे. जीतू ने वहां कुछ देर रुक कर कपिल की सास शिमला से बात की. उस के बाद चला गया.

इस के बाद 30 अक्तूबर, 2020 को इंसपेक्टर दत्त ने कपिल की सास शिमला को हिरासत में ले कर पूछताछ की. पूछताछ में शिमला ने कपिल की हत्या जीतू और उस के 2 साथियों राहुल और अनवर से करवाने की बात स्वीकार कर ली. जिस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने अपने मुखबिरों को राहुल और अनवर की तलाश के लिए लगा दिया. जल्द ही एक मुखबिर ने सूचना दी कि राहुल और अनवर एत्मादपुर से मथुरा की ओर जाइलो कार नंबर यूपी75एन 0021 से जा रहे हैं. जिस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने अपनी टीम के साथ जा कर वाटर वर्क्स पुल के ऊपर से दोनों को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उन से कड़ाई से पूछताछ की गई तो सारी कहानी सामने आ गई.

प्रौपर्टी के धंधे में काम करते हुए कपिल की जानपहचान जीतू उर्फ हर्ष यादव से हो गई थी, जोकि आगरा के एत्माद्दौला थाना क्षेत्र में टेढ़ी बगिया में रहता था. दोनों में दोस्ती भी हो गई. जीतू का कपिल के घर आनाजाना हुआ. धीरेधीरे दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि कपिल ने उसे अपनी पत्नी ममता की सारी संपत्तियों की जानकारी उसे दे दी. उस ने यह भी बता दिया कि कई संपत्ति पत्नी ममता और सास शिमला के संयुक्त नाम से भी हैं. जीतू कहने को कपिल का दोस्त था, लेकिन वह मन ही मन उस से जलता था. कई जमीन के सौदे करवाने में दोनों लगे होते थे लेकिन हर बार कपिल बाजी मार ले जाता था. इस से जीतू को नुकसान उठाना पड़ता था.

कपिल से जीतू मानने लगा रंजिश करीब डेढ़ साल पहले जोंस मिल कंपाउंड में यमुना किनारे जीतू का डेढ़ हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन का इकरारनामा कपिल के माध्यम से हुआ था. मगर बाद में मौरिस जौन ने जमीन का बैनामा उस के नाम न कर के दूसरे किसी कारोबारी को कर दिया. मौरिस ने यह कदम जीतू के खिलाफ छत्ता थाने में रंगदारी का मुकदमा दर्ज होने के बाद उठाया था. इस मामले में जीतू ने कपिल से जमीन उस के नाम कराने को कहा लेकिन कपिल ने उस का इस मामले में कोई साथ नहीं दिया. लिहाजा दर्ज मुकदमे में जीतू को जेल जाना पड़ा. इस से वह कपिल से रंजिश मानने लगा. जीतू वैसे भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. उस पर विभिन्न धाराओं में 5 मुकदमे दर्ज हैं.

जेल से छूटने के बाद वह कपिल को ठिकाने लगाने की सोचने लगा. लेकिन उस ने कपिल के साथ मिलनाजुलना, बातें करना पहले की तरह ही चालू रखा. जिस से कपिल को उस पर शक न हो. लौकडाउन के दौरान उस ने कपिल की हत्या करने की सोची लेकिन फिर यह सोच कर रह गया कि इस लौकडाउन में वह शहर से बाहर भाग कर कहीं नहीं जा सकेगा. लेकिन उस ने लौकडाउन खुलने के बाद किसी भी तरीके से कपिल की हत्या करने की ठान ली. इस के लिए उस ने हत्या के बाद अपने बचाव की भी तैयारी करनी शुरू कर दी. फिरोजाबाद के एक लूट के मामले में वह कई तारीखों पर कोर्ट नहीं गया तो उस के खिलाफ वारंट जारी हो गया. कपिल और शिमला के बीच विवाद किस हद तक पहुंच गया है, यह भी जीतू बखूबी जानता था.

घटना से 10 दिन पहले संपत्ति विवाद के चलते दोनों की पंचायत हुई. इस में कपिल की तरफ से जीतू और उस के दोस्त थे. शिमला ने अपने घर के लोगों को बुला लिया जोकि बागपत जिले में रहते थे. पंचायत में कोई नतीजा नहीं निकला. लेकिन जीतू ने भांप लिया कि कपिल की सास शिमला संपत्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इस के लिए उस ने शिमला से बात करने की सोच ली. जीतू ने शिमला से पहले से ही काफी मेलजोल बढ़ा रखा था. जीतू कपिल के उठाए गए कदमों की जानकारी शिमला को देता रहता था. इसलिए शिमला उस पर विश्वास करने लगी थी. सास ने दी 10 लाख की सुपारी दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसी तर्ज पर जीतू ने अकेले में शिमला से बात की और कहा, ‘‘आंटीजी जिस संपत्ति के लिए आप परेशान हो रही हैं, वह तभी आप के हाथ आएगी, जब कपिल दुनिया में नहीं रहेगा.’’

इस पर शिमला ने बिना देर किए बोल दिया, ‘‘जो भी खर्चा आएगा, वह दे देगी लेकिन कपिल को रास्ते से हटा दो.’’

‘‘खर्चा 10 लाख रुपए आएगा. 2 सुपारी किलर हायर करने पड़ेंगे.’’ जीतू ने बताया.

‘‘ठीक है, शाम को आ कर मुझ से एक लाख रुपए ले जाना. बाकी 9 लाख रुपए मैं काम होने के बाद दूंगी.’’ शिमला ने कहा.

शिमला की बात सुन कर जीतू ने सहमति दे दी, फिर वहां से चला आया. जीतू तो वैसे भी कपिल को मारना चाहता था. ऐसे में शिमला के कहने पर हत्या करने पर सुपारी की रकम मिल रही थी. शाम को फिर वापस आ कर उस ने शिमला से एक लाख रुपए ले लिए. रकम मिलने के बाद उस ने टेढ़ी बगिया में ही रहने वाले अपने दोस्त अनवर और कालिंद्री विहार के राहुल को कपिल की हत्या करने के लिए तैयार कर लिया. उस ने उन दोनों को शिमला से मिलवा भी दिया. 26 अक्तूबर, 2020 की शाम को जीतू अपनी जाइलो कार में राहुल और अनवर को बैठा कर कपिल के प्लौट पर पहुंचा. वह जानता था कि इस समय कपिल अपने प्लौट पर बैठा शराब पी रहा होगा.

उस का सोचना सही था. कपिल प्लौट पर बैठा शराब पी रहा था. जीतू भी अपने साथियों के साथ उस के पास बैठ गया. जीतू ने कपिल के खाने के लिए अनवर से अंडे की भुजिया मंगवाई, जिस में अनवर ने योजनानुसार नशीला पदार्थ मिला दिया. कपिल ने वह भुजिया खाई तो कुछ ही देर में वह नशे से बेसुध हो गया. जीतू ने राहुल और अनवर की मदद से उसे कार में पिछली सीट पर डाला. इस के बाद राहुल और अनवर जीतू की कार और जीतू कपिल की वैगनआर कार से शिमला से मिलने अपार्टमेंट पहुंचे. वहां शिमला को पूरी बात बताई और बाकी पैसे मांगे. शिमला ने बाकी पैसे पूरा काम होने के बाद ही देने की बात कही.

इस के बाद जीतू अपने साथियों के साथ वहां से निकल आया. फिर तीनों ने कार की सीट बेल्ट से गला घोंट कर कपिल की हत्या कर दी और उस की लाश जाइलो कार से निकाल कर वैगनआर में रख ली. लाश को ले कर तीनों चल दिए. जीतू ने अनवर को रामबाग में छोड़ दिया. जीतू राहुल के साथ कपिल की लाश को इटावा के भरथना थाना क्षेत्र में मल्हौली नहर के पास ले कर गया. वहां नहर में कपिल की लाश डालने के बाद जीतू राहुल के साथ वापस लौट आया. फिरोजाबाद के पास उस ने राहुल को उतार दिया और घर चला गया. राहुल, अनवर और शिमला के गिरफ्तार होने का पता लगते ही जीतू ने फिरोजाबाद की कोर्ट में लूट के उसी मामले में आत्मसमर्पण कर दिया, जिन की तारीखों की पेशी में वह पहले से नहीं जा रहा था. उस के खिलाफ वारंट तक निकल गया था.

वह जानता था कि बडे़ मामलों में पुलिस गिरफ्तारी ऐसे ही नहीं दिखाती, पैर में गोली मार कर मुठभेड़ की बात कह कर दिखाती है. वह गोली नहीं खाना चाहता था, इसलिए उस ने अपने बचाव में यह रास्ता अपनाया था. राहुल और अनवर के पास से 2 तमंचे और 4 जिंदा कारतूस बरामद हुए. इंसपेक्टर सुनील दत्त ने मुकदमे में भादंवि धारा 302/201/120बी और बढ़ा दी. फिर आवश्यक कागजी खानापूर्ति करने के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस जीतू को रिमांड पर लेने की बात कह रही थी. पुलिस कपिल की वैगनआर कार बरामद करने का भी प्रयास कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

UP Crime News : पति का गला काट रहा था प्रेमी, पत्नी मोबाइल देखकर हंसती रही

UP Crime News : 4 बच्चों की मां बनने के बाद भी कुसुम की हसरतें उफान पर थीं. ऐसे में उस के पैर बहक गए और उस का झुकाव कलंदर नाम के युवक की ओर हो गया. इस बात का गांव, समाज में विरोध हुआ तो कुसुम ने पति मुकेश को रास्ते से हटाने की ऐसी चाल चली कि…

उस रोज सुबह से ही कुसुम का मन उल्लास से भरा हुआ था. उस की एक खास वजह थी. उस सुबह नाश्ता करने के बाद मुकेश आंगन में हाथ धोने, कुल्ला करने के बाद रोज की तरह सीधे काम पर नहीं गया था. बल्कि अंगोछे से हाथमुंह पोंछते हुए वह रसोई में चला आया था. पास में पति के आते ही रोटी बेल रही कुसुम के हाथ रुक गए. सिर उठा कर उस ने पति को देखा, फिर पूछा, ‘‘कुछ चाहिए?’’

मुकेश कुसुम के पास बैठ गया. वह इतनी धीमी आवाज में बोला कि कोई तीसरा न सुन सके, ‘‘हां चाहिए, लेकिन अभी नहीं रात को.’’

इस के बाद वह सीधा खड़ा हुआ, मुसकरा कर दाहिनी आंख दबाई और चला गया. पति की यह शरारत देख कर कुसुम के मन की कलियां खिल गईं. किसी भी पत्नी के लिए समझना बहुत आसान होता है कि रात को पति उस से क्या चाहता है. कुसुम का दिल बागबाग हो गया कि देर से ही सही, पतिदेव की कामनाएं तो जागीं. पूरे दिन कुसुम प्रफुल्लित रही. दौड़दौड़ कर उत्साह से सारे काम करती रही. पड़ोसन ने उस का यह जोश देखा तो पूछा, ‘‘क्या बात है कुसुम, आज बहुत जोश में हो और तुम्हारी खुशी भी छलक रही है.’’

नहाधो कर कुसुम ने सुर्ख साड़ी पहनी, फिर शृंगार किया. उस के बाद शाम होने पर आंगन में बैठ कर अपने पति के आने का इंतजार करने लगी. कुछ देर में मुकेश आ गया. पानी गरम हो गया तो मुकेश नहा लिया. इस के बाद कुसुम ने उसे खाना परोस कर दिया. खाना खाने के बाद मुकेश ने अपनी मासूम बेटी दीक्षा को गोद में उठाया और अपने कमरे में चला गया. कुसुम ने निखरे हुए अपने रूप का बहाने से पति के सामने प्रदर्शन भी किया लेकिन मुकेश के मुख से तारीफ के दो मीठे बोल भी न निकले. खैर, कुसुम ने झटपट जूठे बरतन मांजे और कमरे में पहुंच गई. आजमगढ़ जिले का एक गांव है असाढ़ा. यहीं रहता था मुक्खू. उस के परिवार में पत्नी सुखवती देवी के अलावा 4 बेटियां और इकलौता बेटा मुकेश था.

मुक्खू ने अपनी सभी बेटियों का विवाह कर दिया था, वे सभी अपनी ससुराल में हंसीखुशी से रह रही थीं. इस के बाद इकलौते बेटे मुकेश के विवाह की बारी आई. तो 14 साल पहले करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित गोढाव गांव निवासी सुभाष की बेटी कुसुम से मुकेश का विवाह हो गया. कुसुम मायके से ससुराल आ गई. कालांतर में कुसुम ने 3 बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया. परिवार बढ़ा तो खर्च भी बढ़े. खेती के नाम पर मुकेश के पास केवल 4 विसवा जमीन थी, उस से कुछ होने वाला नहीं था. मुकेश बढ़ईगिरी का काम भी करता था. लेकिन उसे रोजरोज काम नहीं मिलता था तो वह मनरेगा में मजदूरी का काम करने लगा. काम में व्यस्तता अधिक होने के कारण अगले 2-3 साल में हाल यह हो गया कि थकान और जीवन की एकरसता ने मुकेश को उत्साहहीन कर दिया.

रासरंग में भी उस की रुचि नहीं रह गई. खाना खाने के कुछ देर बाद ही वह गहरी नींद में सो जाता. कुसुम की ख्वाहिशें मचलती रह जातीं. कामनाओं को काबू में रख पाना कठिन हो जाता. देर रात तक वह गीली लकड़ी की तरह सुलगती रहती. कुसुम असंतोष भरा जीवन जीने लगी थी. कुसुम की उमंगों को एक बार फिर तब पर लगे, जब उस दिन नाश्ता करने के बाद मुकेश रसोई में उस के पास आया था. कुसुम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने सोचा कि वह आज पिछली कसर भी पूरी कर लेगी. उमंगों के हिंडोले में झूलती कुसुम कमरे में पहुंची तो पिताबेटी को सोते हुए देखा. उस रात पति को सोया देख कर कुसुम को झुंझलाहट नहीं हुई बल्कि होंठों पर मुसकान खेलने लगी कि बेटी परेशान न करे, इसलिए उसे सुलातेसुलाते वह खुद भी सो गए. बाकी बच्चे भी दूसरे कमरे में सो चुके थे.

कुसुम ने पति के पास सो रही बेटी को उठा कर अलग सुला दिया. इस के बाद वह स्वयं मुकेश की बगल में आ कर लेट गई और उसे जगाने के लिए प्यार से छेड़ने लगी. मुकेश कच्ची नींद में था. वह कुनमुनाया, ‘‘क्या है…?’’

‘‘और क्या होना है,’’ कुसुम धीमी आवाज में बोली, ‘‘आज रतजगा है.’’

मुकेश ने आंखें खोल कर पत्नी की ओर देखा, उस के बाद फिर से आंखें बंद कर लीं. कुसुम ने हलके से उसे फिर हिलाया, ‘‘मुझे ठीक से देख कर बताओ, कैसी लग रही हूं.’’

‘‘जब से शादी हुई है, तब से देख ही तो रहा हूं.’’

‘‘पहले की छोड़ो, आज की बात करो,’’ कुसुम अपनी सांसों से पति के चेहरे को गरमाने लगी, ‘‘आज मैं ने तुम्हारे लिए विशेष रूप से शृंगार किया है. देख कर बताओ न कि मैं कैसी लग रही हूं.’’

मुकेश ने ऐसे हावभाव से आंखें खोलीं, मानो कोई आफत टूट पड़ी हो. कुसुम को देखा, फिर टालने के अंदाज में बोला, ‘‘अच्छी लग रही हो.’’

‘‘अच्छी लग रही हूं तो सो क्यों रहे हो,’’ कुसुम ने उसे उकसाया, ‘‘नींद भगाओ और तुम भी कुछ अच्छा करो. इतना अच्छा कि मुझे भी फौरन नींद आ जाए.’’

‘‘क्या करूं…’’

‘‘वही, जो सुबह नाश्ता करने के बाद रात को करने को कह गए थे.’’

‘‘यार, सुबह मन था, अब नहीं है. बहुत थका हूं, मैं सोना चाहता हूं. आज का प्रोग्राम फिर कर लेंगे. तुम भी सो जाओ और मुझे भी सोने दो.’’

‘‘रात होने का मैं ने भी पूरा इंतजार किया है, इसलिए कैसे सो जाऊं,’’ कुसुम शरारत पर उतारू हो गई. वह उसे बेतहाशा चूमने लगी. मुकेश के तेवर तीखे हो गए. उस ने झल्ला कर पत्नी को कुछ गालियां दीं और उस की ओर पीठ कर ली. पति के व्यवहार से कुसुम की हसरतों पर तो मानो बर्फ पड़ गई. उस ने भी पति की ओर पीठ कर ली. उस रात कुसुम का विश्वास मजबूत हो गया कि वास्तव में उस की किस्मत फूट गई थी. उसी रात कुसुम के विद्रोही मन ने फैसला कर लिया कि यदि उसे यौवन का सुख पाना है तो मुकेश के भरोसे नहीं रहा जा सकता. खुद ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी.

अतृप्ति एवं असंतोष के पलों में कुसुम ने जो निर्णय लिया, रात बीतने के बाद उसे भूली नहीं. सुबह होते ही उस की आंखों ने ऐसे साथी को तलाशना आरंभ कर दिया जो उस की हसरतें पूरी कर सके. नियति ने कुसुम को यह अवसर भी दे दिया. असाढ़ा गांव से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर गांव उबारसेपुर है. इसी गांव में 30 वर्षीय कलंदर रहता था. वह अविवाहित था और आटो चलाता था. कलंदर का मुकेश के घर आनाजाना था. एक दिन चबूतरे पर बैठ कर कलंदर मुकेश से बातें कर रहा था. कुसुम को न जाने क्या सूझा कि खिड़की के पास खड़े हो कर वह उन दोनों की बातें सुनने लगी. खिड़की की ओर मुकेश और कलंदर की पीठ थी. इसलिए दोनों को पता नहीं था कि कुसुम उन की बातें सुन रही है. वे दोनों रसीली बातें कर रहे थे.

कुसुम का यह सोच कर जी जल गया कि रात होते ही मुकेश रूखाफीका हो जाता है और बाहर रसीली बातें करता है, लानत है ऐसे पति पर. बातोंबातों में कलंदर मुकेश से बोला, ‘‘मुकेश, सच कहूं तो तुम मुकद्दर के सिकंदर हो. क्या पटाखा बीवी पाई है, जो देखे देखता रह जाए.’’

यह सुन कर कुसुम का दिमाग कलंदर में उलझ गया. वह सोचने लगी कि निश्चित रूप से कलंदर उस पर दिल रखता होगा, इसीलिए तो वह उसे पटाखा नजर आती है. उस दिन हंसीमजाक में कलंदर का पटाखा कहना कुसुम के मन में एक नई सोच को जन्म दे गया. कुसुम को भी कलंदर अच्छा लगता था. कलंदर कुसुम को भाभी कह कर बुलाता था. देवरभाभी का रिश्ता बनने के कारण कुसुम से हंसीमजाक भी कर लेता था. अलबत्ता उस का दिल कुसुम के लिए बेईमान हो गया. कलंदर को ले कर कुसुम की सोच बदली तो उस के हावभाव भी बदल गए. वह चुपकेचुपके कलंदर से आंखें लड़ाने लगी. कलंदर को कुसुम अपनी तरफ आकर्षित होती हुई महसूस हुई तो वह ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब कुसुम घर में अकेली हो.

एक दिन अश्लील मजाक करतेकरते एकाएक कलंदर ने कुसुम की कलाई पकड़ ली, ‘‘भाभी बहुत तरसा चुकीं, अब तो रहम करो.’’

कुसुम ने नारीसुलभ नखरा किया, ‘‘कलंदर, यह पाप है. इस पाप में न खुद गिरो और न मुझे गिराओ.’’

‘‘भाभी, मुझे आज मत रोको.’’ कहते हुए उस ने कुसुम को बांहों में समेट कर चुंबनों की झड़ी लगा दी. अपेछा के अनुरूप कुसुम ने मामूली विरोध किया, कुछ नखरे दिखाए. फिर मन का काम होते देख उस ने विरोध और नखरे छोड़ दिए. कलंदर के बाजुओं में कसमसाते हुए बोली, ‘‘जरा ठहरो, दरवाजा तो बंद कर लूं.’’

‘‘तुम्हें छोड़ दिया तो फिर हाथ नहीं आने वाली.’’

‘‘विश्वास करो मैं कहीं भागूंगी नहीं, लौट कर तुम्हारे पास आऊंगी.’’

कलंदर ने कुसुम को बांहों के बंधन से मुक्त कर दिया. कुसुम ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और कलंदर के पास लौट आई. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. एक बार सीमाएं टूटीं फिर तो उन का यह रोज का यह नियम बन गया. कुसुम के दिल और तन पर कलंदर के जोश की ऐसी छाप पड़ी कि कलंदर के आगे वह सब कुछ भूल गई. अब जो कुछ था उस के लिए कलंदर ही था. वह भी कुसुम की भावनाओं का पूरा खयाल रखता था. किसी चीज की जरूरत होती तो वह झट से ला देता. कलंदर के लिए दिल में प्यार बढ़ रहा था तो मुकेश के लिए मन में नफरत. 7 मई, 2020 की शाम को कुसुम ने मुकेश से सब्जी लाने को कहा तो मुकेश सब्जी लेने चला गया. लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी मुकेश घर नहीं लौटा तो कुसुम को चिंता हुई. उस ने गांव के प्रधान को सूचना दी. मुकेश को तलाशा गया लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

अगले दिन 8 मई को कुसुम सरायमीर थाने गई और इंसपेक्टर अनिल सिंह को अपने पति के गायब होने की सूचना दी. उस ने पति के गायब होने का आरोप गांव के कुछ लोगों पर लगाया. साथ ही पति के गायब होने की सूचना मीडिया को भी दे दी. मीडिया में मामला तूल पकड़ा तो पुलिस भी सक्रिय हो कर मुकेश को तलाशने लगी. 9 मई को लोगों ने मुकेश की लाश नरईपुर पुल के पास पड़ी देखी. कुसुम को इस की सूचना दे दी गई. प्रधान मौके पर पहुंचा तो उस ने घटना की सूचना सरायमीर थाने को दे दी. सूचना पर इंसपेक्टर अनिल सिंह दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए. लाश झाडि़यों में औंधे मुंह पड़ी थी. मृतक की गरदन पर तेज धारदार हथियार से काटने के निशान मौजूद थे. डौग स्क्वायड को मौके पर बुलाया गया. इंसपेक्टर सिंह ने कुसुम और मृतक की मां सुखवती से जरूरी पूछताछ की.

इस के बाद उन्होने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी और सुखवती की ओर से अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू करते हुए इंसपेक्टर अनिल सिंह ने कुसुम से पूछताछ की तो उस ने गांव के कुछ लोगों पर आरोप लगाया कि वे लोग उस के पति से दुश्मनी मानते थे. इस के बाद इंसपेक्टर सिंह ने गांव के लोगों व प्रधान से पूछताछ की तो केस की गुत्थी सुलझने लगी. इंसपेक्टर अनिल सिंह को पता चला कि कुसुम के उबारसेपुर गांव के कलंदर के साथ अवैध संबंध थे. यह भी पता चला कि इस मामले को ले कर गांव में पंचायत भी हुई थी. गांव के जिन लोगों ने पंचायत में कुसुम और कलंदर का विरोध किया था, कुसुम ने उन पर ही मुकेश की हत्या का आरोप लगाया था. इस का मतलब यह था कि सारा रचारचाया खेल कुसम और कलंदर का है, मुकेश की हत्या में इन दोनों का ही हाथ है.

इस के बाद इंसपेक्टर अनिल सिंह ने कुसुम और कलंदर के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में दोनों की रोज घंटों बात करने के साक्ष्य मिले. घटना की रात भी कलंदर के नंबर से कुसुम के नंबर पर काल की गई थी. जिस समय कलंदर ने काल की थी उस के नंबर की लोकेशन भी घटनास्थल की थी. पुख्ता साक्ष्य मिलते ही इंसपेक्टर अनिल सिंह ने 11 मई को कुसुम और कलंदर को गिरफ्तार कर लिया. थाने में ला कर जब उन से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए घटना में शामिल साथियों के नाम भी बता दिए. घटना में साथ देने वालों में कलंदर की बहन शकुंतला, रविंद्र उर्फ छोटू, बिरेंद्र उर्फ करिया व धीरेंद्र निवासी गांव ऊदपुर और मिथिलेश उर्फ पप्पू निवासी महराजपुर थे.

इन सभी को भी उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया. अभियुक्तों से पूछताछ के बाद मुकेश की हत्या की कहानी कुछ इस प्रकार निकली—

कुसुम से संबंध बन गए तो कलंदर का मुकेश के घर आनाजाना भी बढ़ गया. इस से उन के संबंध गांव वालों से छिपे न रह सके. गांव वालों ने इस का विरोध करना शुरू कर दिया. इतने पर भी ये दोनों नहीं माने तो गांव में इस को ले कर पंचायत बुलाई गई. पंचायत में कलंदर के गांव आने पर पाबंदी लगा दी गई. इस से कुसुम बिफर पड़ी. मुकेश ने उस की लानतमलानत की तो उस की नफरत ने विद्रोह का रूप ले लिया. कुसुम वैसे भी कलंदर की हो चुकी थी और शादी कर के उस के साथ घर बसाना चाहती थी. ऐसे में कुसुम और कलंदर ने मुकेश की हत्या करने का फैसला कर लिया.

4 फरवरी, 2020 को कुसुम के मायके में शादी थी. वहां पर कलंदर और कलंदर की बहन शकुंतला भी मौजूद थी, वहीं पर मुकेश को मारने का प्लान बना. इस के बाद शकुंतला के घर पर कुसुम और कलंदर बैठे. वहीं पर शकुंतला ने अपने देवरों रविंद्र, वीरेंद्र, धीरेंद्र और उन के साथी मिथलेश को बुला लिया. ये सभी कुछ पैसों के लालच में उन का साथ देने को तैयार हो गए थे. सभी ने साथ बैठ कर यह समझा कि प्लान को कैसे अमल में लाना है. 5 मई को मुकेश की हत्या करने के इरादे से सभी निकले लेकिन अचानक आंधीबारिश आने के कारण प्लान टल गया. फिर 7 मई की शाम को प्लान के मुताबिक कुसुम ने मुकेश को सब्जी लाने के लिए भेज दिया.

शाम साढ़े 6 बजे मुकेश पोखरा पहुंचा तो वहां कलंदर, शकुंतला और उस के साथी एक टैंपो में पहले से बैठे थे. कलंदर ने तेरही खाने के लिए चलने की बात कह कर मुकेश को टैंपो में बैठा लिया. मुकेश को सभी के साथ ले कर छित्तेपुर गया. वहां शराब खरीद कर मुकेश को पिलाई और खुद पी. सभी अंधेरा होने का इंतजार कर रहे थे. योजना के मुताबिक सभी लोग अपने मोबाइल अपने घरों में ही रख कर आए थे, केवल कलंदर ही अपना मोबाइल साथ लाया था. अपने मोबाइल से वह कुसुम को लगातार काल कर रहा था. कुसुम अपने पति को मौत के मुंह में भेजने को बहुत आतुर थी. वह कलंदर के साथ में तो नहीं थी. लेकिन उस से फोन पर पलपल की जानकारी ले रही थी. उन के बीच क्या बात हो रही है, यह भी कुसुम सुन रही थी. एक बीवी अपने ही पति के मर्डर का लाइव ब्राडकास्ट सुन रही थी.

रात साढे़ 8 बजे सभी मुकेश को टैंपो से ले कर तेजपुर में मघई नदी पर नरईपुर पुल के पास पहुंचे. मुकेश को नीचे उतारा और मुकेश की गले में गमछा डाल कर दबाने में सभी टूट पड़े. नशे की हालत में मुकेश की आंखें बंद हो गईं और वह बेसुध हो गया. सभी उसे मरा हुआ समझ कर झाडि़यों में छिपा आए. इस के बाद कलंदर ने कुसुम से बात की तो कुसुम ने कहा कि वह मुकेश का चाकू से गला काटे, जिस से वह उस के चीखने की आवाजें सुन सके. इस पर वापस पहुंच कर कलंदर ने जैसे ही मुकेश की गरदन पर चाकू रखा. मुकेश चिल्ला उठा. सभी ने उस को दबोचा तो कलंदर कसाई की तरह मुकेश का गला चाकू से रेतने लगा, इस से मुकेश की चीखें निकलने लगीं, जिसे मोबाइल पर सुन कर कुसुम ठहाके मार कर हंसती रही.

मुकेश को मौत के घाट उतारने के बाद कलंदर ने मुकेश का मोबाइल फोन उस की जेब से निकाल लिया और उसे ले कर काफी देर तक इधरउधर घूमता रहा. इस के बाद कुसुम अपने मोबाइल से बात न हो पाने का बहाना बना कर आसपड़ोस के लोगों से मोबाइल ले कर मुकेश के मोबाइल पर फोन मिलाती, दूसरी ओर से कलंदर मुकेश बन कर उस से बात करता. बात करने के बाद कुसुम उन्हें मोबाइल वापस कर देती और कह देती कि मेरे पति कह रहे हैं कि कुछ देर में वापस आ जाएंगे. कुसुम पड़ोसियों को दिखाने के लिए यह नाटक कर रही थी. देर रात योजनानुसार कुसुम प्रधान के पास गई और पति के गायब होने की सूचना दी. अगले दिन थाने जा कर उस ने पति की गुमशुदगी लिखाई लाश मिलने पर वह बराबर पंचायत में कलंदर और उस का विरोध करने वालों पर मुकेश की हत्या का आरोप लगाती रही.

वह एक तीर से 2 शिकार करना चाहती थी. मुकेश को रास्ते से हटाने के बाद उस की हत्या करने के आरोप में अपने विरोधियों को जेल भेजना चाहती थी. लेकिन उस की चाल धरी की धरी रह गई. पति की हत्या के समय चीखें सुनना उसे भारी पड़ गया. इंसपेक्टर अनिल सिंह ने अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल चाकू व टैंपो और कुसुम, कलंदर और मुकेश का मोबाइल बरामद कर लिए. मुकदमे में धारा 147/404/34 और बढ़ा दी गईं. सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सातों अभियुक्तों को सीजेएम कोर्ट में पेश किया गया, वहां से न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.द

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Uttarakhand Crime : प्रेमी संग मिलकर पत्नी ने किया पति का कत्ल, बताया जिन्न का साया था वजह

Uttarakhand Crime : लोकडाउन के दौरान कत्ल के कई ऐसे मामले आए जिन में आरोपियों ने कोरोना का बहाना बना कर हत्या के आरोप से बचने की कोशिश की. बबली ने इस से भी चार कदम आगे निकल कर बताया कि उस के पति बालेश पर रात में जिन्न आता था, जो उस की और बेटे अरुण की पिटाई करता था. उन दोनों ने मिल कर जिन्न की…

उस दिन अगस्त 2020 की 20 तारीख थी. सुबह के 8 बज रहे थे. हरिद्वार जिले के थाना भगवानपुर के थानाप्रभारी संजीव थपलियाल थाना स्थित अपने आवास में थे और औफिस आने के लिए तैयार हो रहे थे. तभी थाने के संतरी ने आ कर सूचना दी कि गांव खुब्वनपुर की लाव्वा रोड पर एक आदमी का कत्ल हो गया है. उस की लाश सब्जी के एक खेत में पड़ी है. सुबहसुबह कत्ल की सूचना पा कर थपलियाल का मन कसैला हो गया. वह तुरंत थाने आए पुलिस टीम को ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने इस कत्ल की सूचना सीओ अभय प्रताप सिंह, एसपी (देहात) एस.के. सिंह और एसएसपी सेंथिल अबुदई कृष्णाराज एस. को दे दी. इस के बाद थपलियाल अपने साथ खुब्वनपुर क्षेत्र के इंचार्ज थानेदार मनोज ममगई सहित मौके पर पहुंच गए.

थपलियाल मौके पर पहुंचे तो वहां ग्रामीणों की भीड़ जमा थी. पुलिस को देख कर भीड़ तितरबितर हो गई. थपलियाल ने शव पर नजर डाली. वह 47-48 साल का अधेड़ व्यक्ति था, जिस का गला 2 जगह से कटा हुआ था. उस के कपड़े खून से सने थे. वहां मौजूद लोगों में से एक ग्रामीण ने मृतक की शिनाख्त कर दी थी. उस ने बताया कि मृतक ग्राम खुब्वनपुर के पूर्व प्रधान ब्रह्मपाल का भाई बालेश है. पुलिस ने तुरंत ब्रह्मपाल के घर सूचना भिजवा दी. इस के बाद थपलियाल ने वहां खड़े ग्रामीणों से बालेश के बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी. जब वे जानकारी ले रहे थे, तभी वहां सीओ (मंगलौर) अभय प्रताप सिंह व एसपी (देहात) एस.के. सिंह भी पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने भी थपलियाल व ग्रामीणों से बालेश की हत्या की बाबत जानकारी ली और थपलियाल को आवश्यक निर्देश दे कर चले गए.

थपलियाल ने थानेदार मनोज ममगई को बालेश के शव का पंचनामा भरने को कहा और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की एक टीम बालेश के घर भेजी दी. प्राथमिक काररवाई कर के पुलिस ने बालेश का शव पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल रुड़की भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस खुब्वनपुर स्थित बालेश के घर पहुंची और उस की पत्नी बबली व उस के बेटे अरुण से पूछताछ की. बबली ने बताया कि बालेश बीती रात खाना खा कर बीड़ी पीने के लिए पड़ोस में गया था, इस के बाद वह वापस नहीं लौटा. वह रात भर उस का इंतजार करती रही थी. बबली ने बताया कि पिछले 2 सालों में बालेश पर 2 बार हमला हो चुका था.

पुलिस ने उस समय जब इन हमलों की जांच की थी, तो मामला पारिवारिक निकला था. पूछताछ के दौरान थपलियाल ने पाया कि बबली व अरुण के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. लगता था, वे पुलिस से कुछ छिपा रहे हैं. इस के बाद पुलिस ने बालेश की हत्या का मामला धारा 302 के तहज दर्ज कर के जांच शुरू की दी. सब से पहले थपलियाल ने बालेश के परिवार की सुरागरसी व पतारसी करने के लिए सादे कपड़ों में 2 पुलिसकर्मी खुब्वनपुर में तैनात कर दिए. अगले दिन उन दोनों ने जो जानकारी थपलियाल को दी, उसे सुन कर वह चौंके. जानकारी यह थी कि 25 साल पहले बालेश की शादी पास के ही गांव भक्तोवाली निवासी बबली से हुई थी. जिस से उसे 6 संतान हुईं. बालेश व बबली का बड़ा बेटा अरुण है. बालेश के पास मात्र 7 बीघा खेती की जमीन थी. घर का खर्च चलाने के लिए बबली नौकरी ढूढने लगी.

3 साल पहले बबली को घर से 3 किलोमीटर दूर सिकंदरपुर स्थित मां दुर्गा इंडस्ट्रीज में नौकरी मिल गई थी. दूसरी ओर बालेश अकसर नशा कर के बबली व अपने बेटे अरुण से मारपीट करता रहता था. इसी बीच बबली की दोस्ती फैक्ट्री के एक सहकर्मी लाल सिंह से हो गई थी. बबली अपने पति बालेश से खासी परेशान थी. कुछ समय बाद लाल सिंह और बबली के बीच अवैध संबंध बन गए थे. लालसिंह अकसर बालेश के घर आने जाने लगा था. जब लालसिंह का ज्यादा आनाजाना बढ़ गया, तो इस की चर्चा गांव में आम हो गई. पड़ोसियों को इस बात की जानकारी तो थी कि बालेश अपनी बीबी बबली व बेटे अरुण की अकसर रात में मारपीट करता है,

मगर जब पड़ोसियों को इस बात की जानकारी हुई कि बबली के साथ फैक्ट्री में काम करने वाले लाल सिंह के उस से अवैध संबंध है तो गांव में कानाफूसी होने लगी. कुछ समय बाद दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी बालेश को भी हो गई थी. एक दिन बालेश ने अपने घर पर आए लाल सिंह को घर आने के लिए मना कर दिया और बबली को भी फटकारा. इस के बाद लाल सिंह के घर न आने से बबली खोईखोई सी रहने लगी थी. एक दिन लाल सिंह व बबली फैक्ट्री के बाहर मिले और उन्होंने अपने रास्ते के रोड़े बालेश को हटाने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत बबली ने गांव में यह कहना शुरू कर दिया था कि उस के पति बालेश पर जिन्न का साया है और जिन्न रात को आता है.

जिन्न के सवार होने पर बालेश उसे व उस के बेटे को मारतापीटता है. इस के बाद अरुण को भी अपने बाप बालेश पर संदेह होने लगा था कि सचमुच उस के बाप पर जिन्न का ही साया है. अरुण पास ही एक दूसरी फैक्ट्री में कर्मचारी था. वह भी मां के कहने पर विश्वास करने लगा था और उसे बाप से नफरत हो गई थी. गांव खुब्वनपुर के गांव वालों को यह संदेह था कि बालेश की हत्या के तार बबली व लाल सिंह से कहीं न कहीं जुडे़ हुए हैं. इस बारे में थानाप्रभारी संजीव थपलियाल को सटीक सूचना मिली थी, अत: उन्होंने बालेश की हत्या के मामले में उस की पत्नी बबली को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. पूछताछ के दौरान बबली पुलिस को इतना ही बता पाई कि बालेश घटना वाले दिन खाना खा कर बीड़ी पीने के लिए पड़ोस में गया था और रात भर वापस नहीं लौटा था. उसे सुबह पुलिस द्वारा उस की हत्या की सूचना मिली थी.

बालेश की हत्या के बारे में बबली से कोई सूत्र न मिलने पर सीओ अभय प्रताप सिंह ने थपलियाल को लाल सिंह व बबली के मोबाइलों की काल डिटेल्स निकलवाने को कहा. जब दोनों के मोबाइलों की लोकेशन व कालडिटेल्स पुलिस को मिली, तो पुलिस को यकीन हो गया कि बालेश की हत्या में दोनों शामिल हैं. इस के बाद थपलियाल ने लाल सिंह निवासी ग्राम बढेड़ी थाना भगवानपुर को बालेश की हत्या के बारे में पूछताछ के लिए बुलवाया और उस से पूछताछ करने लगे. पहले तो लाल सिंह पुलिस को गच्चा देने का प्रयास करता रहा, मगर जब थपलियाल ने उस से बालेश की हत्या वाले दिन उस की मौजूदगी के सवाल पूछे, तो वह टूट गया. उस ने पुलिस के सामने बालेश की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली.

लाल सिंह द्वारा बालेश की हत्या की कबूल करने की सूचना पा कर बालेश का पूर्व प्रधान भाई ब्रह्मपाल, सीओ अभय प्रताप सिंह व एसपी (देहात) एस.के. सिंह भी थाना भगवानपुर पहुंच गए थे. पूछताछ के दौरान लाल सिंह ने पुलिस को बताया कि कई सालों से वह और बबली फैक्ट्री में साथसाथ काम करते थे. उन दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए थे. बबली अकसर मुझ से कहती रहती थी कि मेरा पति बालेश मुझ से तथा मेरे बच्चों से मारपीट करता है. मुझ पर शक करते हुए घर का खर्च भी नहीं देता है. इस के बाद मैं और बबली बालेश की हत्या की योजना बनाने लगे. 19 अगस्त, 2020 को मैं ने एक स्थानीय मैडिकल स्टोर से नींद की 20 गोलियों की स्ट्रिप खरीदी थी, जो बबली को दे दिया था.

उसी रात को बबली ने मुझे मोबाइल पर बताया कि उस ने बालेश को नींद की 10 गोलियां खाने में डाल कर खिला दी हैं और वह घर में बेहोश पड़ा है. फिर मैं तुरंत बाइक से बबली के घर पहुंच गया. वहां पहुंच कर मैं ने व बबली ने कमरे में बेहोश पड़े बालेश का गला घोंट कर मार डाला. बालेश की हत्या करने के बाद बबली व उस के बेटे अरुण के सहयोग से मैं ने बालेश की लाश को एक बोरे में डाल दिया. लाश वाले बोरे को ले कर वह और अरुण लाव्वा रोड पर एक सब्जी के खेत में फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. पुलिस ने लालसिंह के बयान दर्ज कर लिए थे. तभी पुलिस बबली व उस के बेटे अरुण को भी थाने ले आई. बबली व अरुण ने जब हवालात में बंद लालसिंह को देखा, तो सारा माजरा समझ गए. उन दोनों ने अपने बयानों में लालसिंह के ही बयानों का समर्थन करते हुए बालेश की हत्या का सच पुलिस को बता दिया.

बबली ने पुलिस को जानकारी दी कि वह रोजरोज की मारपीट से परेशान थी. उस के मन में बालेश के प्रति नफरत पैदा हो गई थी.

जब लाल सिंह व अरुण बालेश के शव को सब्जी के खेत में फेंक कर वापस आ गए थे, तो भी मुझे चैन नहीं था. इस के बाद मैं खुद अपने बेटे अरुण के साथ दरांती ले कर उस जगह पर गई, जहां बालेश की लाश पड़ी थी. वहां पहुंच कर मैं ने ही दरांती से बालेश का गला रेता था. अपने बेटे को बता रखा था कि बालेश पर जिन्न का साया है, जिस की वजह से वह हम लोगों से मारपीट करता है. मैं ने अपनी इस योजना में अरुण को भी शामिल कर लिया था. बबली के बयान दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी संजीव थपलियाल ने लाल सिंह, बबली व अरुण को बालेश की हत्या के आरोप में भादंवि की धाराओं 302, 201 व 34 के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन एसएसपी सेंथिल अबुदई कृष्णाराज एस. ने कोतवाली सिविललाइन रुड़की में प्रैसवार्ता के दौरान बालेश हत्याकांड का परदाफाश किया और तीनों आरोपियों कोे मीडिया के सामने पेश किया. पति पर जिन्न का सांया है इसलिए पत्नी ने कराई पति की हत्या

प्रैसवार्ता में एसएसपी द्वारा 24 घंटे में बालेश हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की तारीफ की. पुलिस ने हत्याकांड के आरोपियों लाल सिंह, बबली व अरुण का मैडिकल कराने के बाद उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. तीनों आरोपी अपने बुने जाल में फंस गए. इन तीनों की प्लानिंग थी कि बालेश को नींद की गोलियां खिला कर उस का गला दबा कर हत्या कर देंगे. बालेश की हत्या के बाद समाज के लोगों से कह देंगे कि वह बुखार से पीडि़त था, हो सकता है कोरोना वायरस से पीडि़त रहा होगा. कुछ समय बाद लोग बालेश की मौत को भूल जाएंगे. पुलिस ने बालेश की हत्या में इस्तेमाल बाइक, नींद की गोलियों का रैपर तथा बालेश के शव को ले जाने वाले बोरे को बरामद कर लिया. बालेश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस की मौत कारण गला घोंटा जाना तथा धारदार हथियार से गला कटने से ज्यादा खून बहना बताया गया था.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suicide : प्रेमी संग मिलकर पुलिस की गाड़ी में विवाहिता ने खाई कीटनाशक की चार गोलियां

Suicide : पारुल और विकास का अपने जीवनसाथियों से मोहभंग हो गया था, इसलिए दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे. उन्हें क्या पता था कि उन का प्यार इतना जहरीला है कि उस का जहर…

पारुल और विकास के बीच नईनई जानपहचान हुई थी. दोनों ही ठाकुरगंज के होम्योपैथी अस्पताल में साफसफाई का काम करते थे. वैसे तो दोनों की मुलाकात कम ही होती थी, क्योंकि दोनों के काम करने का समय अलगअलग था. जब से दोनों के बीच एकदूसरे के प्रति लगाव बढ़ा था, समय निकाल कर दोनों मिलने और बातचीत करने की कोशिश करते थे. पारुल ने विकास को अपने बारे में सच बता दिया था. विकास के साथ उस का ऐसा लगाव था कि वह उस से कोई बात छिपाना नहीं चाहती थी. एक दिन पारुल अपने बारे में बता रही थी और विकास उस की बातें सुन रहा था. पारुल बोली, ‘‘मेरी शादी को 14 साल हो गए. कम उम्र में शादी हो गई थी. मेरे 3 बच्चे भी हैं. मैं सोचती हूं कि जब हम दोस्ती कर रहे हैं तो एकदूसरे की हर बात को समझ लें.

‘‘मेरे पति तो जेल में हैं. ससुराल वालों से मेरा कोई संपर्क नहीं रह गया है. मैं अपने 3 बच्चों का पालनपोषण अपनी मां के पास रह कर करती हूं.’’

शाम का समय था. विकास और पारुल ठाकुरगंज से कुछ दूर गुलालाघाट के पास गोमती के किनारे बैठे थे. दोनों ही एकदूसरे से बहुत सारी बातें करने के मूड में थे. दोनों को कई दिनों बाद आपस में बात करने का मौका मिला था.

‘‘तुम्हारी शादी हो चुकी है तो मैं भी कुंवारा नहीं हूं. मैं बरेली से यहां नौकरी करने आया था. मेरी शादी 8-9 महीने पहले हुई है. शादी के कुछ महीने बाद से ही पत्नी के साथ मेरे संबंध ठीक नहीं रहे. मैं 5 महीने से अलग रह रहा हूं.

‘‘मेरी पत्नी की भी मेरे साथ रहने की कोई इच्छा नहीं है. ऐसे में मैं उस के साथ रहूं या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता.’’ पारुल की बातें सुन कर विकास ने कहा.

‘‘आप की शादी तो पिछले साल ही हुई है, फिर भी आप पत्नी को छोड़ मुझे पसंद करते हैं. ऐसा क्यों?’’ पारुल ने विकास से पूछा.

‘‘शादी के बाद से ही पत्नी से मेरे आत्मिक संबंध नहीं रह सके. पतिपत्नी होते हुए भी ऐसा लगता था जैसे हम एकदूसरे से अनजान हैं. जब से आप मिलीं, आप से अपनापन लगने लगा. मैं अपनी पत्नी के साथ खुश नहीं हूं. हम दोनों ही अलग हो जाना चाहते हैं.’’ विकास ने पारुल की बात का जबाव दिया. विकास बरेली जिले के प्रेम नगर का रहने वाला था. वह नौकरी करने लखनऊ आया था. रश्मि के साथ उस की शादी 2018 के जून में हुई थी. 4-5 महीने दोनों साथ रहे, पर इस के बाद वह पत्नी से अलग रहने लगा. पारुल और विकास की मुलाकात साल 2019 के जून में हुई थी. शुरुआती कई महीनों तक दोनों में बातचीत नहीं होती थी. दोनों बस एकदूसरे को देखते रहते थे.

जब बातचीत होने लगी और एकदूसरे की पंसद नापसंद पर बात हुई तो पहले पारुल ने खुद को शादीशुदा बताया. तब विकास ने हंसते हुए कहा, ‘‘शादीशुदा तो मैं भी हूं. लेकिन बच्चे नहीं हैं. हमारी शादी पिछले साल हुई थी.’’

जब पता चला कि दोनों ही शादीशुदा हैं तो वे निकट आने लगे. दोनों ही अपनेअपने जीवनसाथी के साथ खुश नहीं थे. पारुल का पति रिंकू आटोरिक्शा चलाता था. शादी के 7 साल बाद परिवार में हुई हत्या में रिंकू को जेल हो गई. उस समय तक पारुल के 3 बच्चे मुसकान, पवन और गगन हो चुके थे. पति के जेल जाने के बाद उस की सुसराल वालों ने उस से संबंध नहीं रखे. पारुल अपने बच्चों को ले कर अपनी मां सुषमा के साथ रहने लगी. वहीं पर पारुल ने अपने बच्चों का स्कूल में एडमिशन करा दिया. अब पारुल पर मां का दबाव रहता था. वह उस की एकएक गतिविधि पर पूरी नजर रखती थी. इधर धीरेधीरे पारुल और विकास के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. सही मायनों में दोनों ही एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करने लगे थे. एकदूसरे के साथ दोनों का पूरी तरह से तालमेल बैठ गया था. कभी साथ घूमने जाते तो कभी एक साथ फिल्म देखते.

जब पारुल की मां को जानकारी मिली तो उस ने पारुल को समझाया और ऐसे संबंधों से दूर रहने को कहा. पर पारुल मानने को तैयार नहीं थी.  कुछ दिन बाद दोनों फिर मिलने लगे. पारुल की मां सुषमा को लग रहा था कि विकास उन की बेटी को बहका कर अपने साथ रखता है. पारुल और विकास के संबंधों को ले कर मोहल्ले के लोगों और नातेरिश्तेदारों में भी चर्चा होने लगी थी. दूसरी ओर पारुल को विकास के साथ संबंधों की लत लग चुकी थी. वह किसी भी स्थिति में विकास से दूर नहीं रहना चाहती थी. विकास भी पूरी तरह पारुल का दीवाना हो चुका था. जब पारुल की मां और करीबी रिश्तेदारों का दबाव पड़ने लगा तो दोनों ने लखनऊ छोड़ने का फैसला कर लिया.

पारुल के सामने सब से बड़ी परेशानी उस के बच्चे थे. प्यार के लिए पारुल ने उन का मोह भी छोड़ दिया. उस ने विकास से कहा, ‘‘अब हम साथ रहेंगे. हमारे बच्चे भी हमारे बीच में नहीं आएंगे. हम लोग यहां से कहीं दूर चलेंगे. बच्चे यहीं रहेंगे. जब समय ठीक होगा, तब हम वापस आ कर बच्चों को अपने साथ रख लेंगे.’’

विकास ने फैसला किया कि वह पारुल को ले कर अपने घर बरेली चला जाएगा. दिसंबर, 2019 की बात है. पारुल और विकास लखनऊ छोड़ कर बरेली चले आए. यहां दोनों साथ रहने लगे. पारुल के लखनऊ छोड़ने का सारा ठीकरा उस की मां सुषमा ने विकास के ऊपर फोड़ दिया. सुषमा ने लखनऊ की कृष्णानगर कोतवाली में जा कर एक प्रार्थनापत्र दिया और विकास पर अपनी बेटी पारुल को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का आरोप लगाया. पुलिस ने प्रार्थनापत्र रख लिया. पुलिस ने रिपोर्ट लिखने की जगह एनसीआर दर्ज की. पुलिस का मानना था कि पारुल बालिग है, 3 बच्चों की मां है और अपना भलाबुरा समझती है. वह जहां भी गई होगी, अपनी मरजी से गई होगी.

कई माह बीत जाने के बाद भी जब पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो पारुल की मां सुषमा ने कोर्ट की शरण ली. 14 अगस्त, 2020 को कोर्ट ने पुलिस को धारा 498 और 506 के तहत मुकदमा कायम करने का आदेश दिया. पुलिस ऐसे मामलों की विवेचना 155 (2) के तहत करती है. इस में किसी तरह का कोई वारंट जारी नहीं होता. पुलिस दोनों को कोर्ट के सामने पेश करती है, जहां दोनों कोर्ट के सामने बयान देते हैं. कोर्ट अपने विवेक से फैसला देती है. 20 सितंबर, 2020 की रात लखनऊ के थाना कृष्णानगर के दरोगा भरत पाठक एक सिपाही और विकास व पारुल के 2 रिश्तेदारों को साथ ले कर बरेली गए. पुलिस रात में ही पारुल और विकास को कार से ले कर लखनऊ वापस लौटने लगी.

पुलिस द्वारा लखनऊ लाए जाने की बात पारुल और विकास को पता चल चुकी थी. उन के मन में भय था कि लखनऊ ले जा कर पुलिस दोनों को अलग कर देगी, जेल भी भेज सकती है. पारुल ने अपने पति को देखा था. हत्या के आरोप में 8 साल बाद भी वह जेल से बाहर नहीं आ सका था. विकास सीधासादा था, उसे भी पुलिस, जेल और कचहरी के चक्कर से डर लग रहा था. ऐसे में दोनों ने फैसला किया कि वे साथ रह नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं. रात के समय जब पुलिस ने लखनऊ चलने के लिए कहा तो दोनों ने तैयार होने का समय मांगा. पारुल ने अपने पास कीटनाशक दवा की 4 गोली वाला पैकेट रख रखा था. दोनों कपड़े पहन कर वापस आए तो पुलिस ने पारुल की तलाशी नहीं ली.

पुलिस की दिक्कत यह थी कि वह अपने साथ कोई महिला सिपाही ले कर नहीं आई थी, जिस से उस की तलाशी नहीं ली जा सकी. पुलिस ने पारुल विकास को अर्टिगा गाड़ी में बैठाया और बरेली से लखनऊ के लिए निकल गई. आगे की सीट पर दारोगा भरत पाठक और एक सिपाही बैठा था. पीछे वाली सीट पर विकास और पारुल को बैठाया गया था, जबकि बीच की सीट पर दोनों के रिश्तेदार बैठे थे. गाड़ी बरेली से चली तो रात का समय था. ड्राइवर को छोड़ कर सभी लोग सो गए. अपनी योजना के मुताबिक पारुल और विकास ने कीटनाशक की 2-2 गोलियां खा लीं. कुछ ही देर में दोनों को उल्टी होने लगी. पुलिस वालों को लगा कि गाड़ी में बैठ कर अकसर कई लोगों को उल्टी होेने लगती है, शायद वैसा ही कुछ होगा.

जब गाड़ी सीतापुर पहुंची तो सो रहे लोगों की नींद खुली. पीछे की सीट से उल्टी की बदबू आ रही थी. आगे की सीट पर बैठे लोगों ने पारुल और विकास को आवाज दी, पर दोनों में से कोई नहीं बोला. पास से देखने पर पता चला दोनों बेसुध हैं. दोनों की तलाशी ली गई. उन के पास कीटनाशक दवा का एक पैकेट मिला, जिस में 2 गोलियां शेष बची थीं. इस से पता चल गया कि दोनों ने वही दवा खाई है. लखनऊ पहुंच कर पुलिस दोनों को ले कर लखनऊ मैडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर पहुंची, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. दो प्रेमियों के आत्महत्या करने का मसला पूरे लखनऊ में चर्चा का विषय बन गया. शुरुआत में विकास और पारुल के घर वालों ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाया. बाद में उन्हें भी लगा कि पुलिस, कचहरी और कानून के डर से पारुल और विकास ने आत्महत्या की है.

विकास और पारुल दोनों ही बालिग थे. अपना भलाबुरा समझते थे. परिवार वालों ने अगर आपसी सहमति से समझाबुझा कर फैसला लिया होता तो दोनों को यह कदम नहीं उठाना पड़ता. इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं. ऐसे मामलों में पुलिस की प्रताड़ना प्रेमीजनों के मन में भय पैदा कर देती है. पुलिस, समाज और कचहरी के भय से प्रेमी युगल ऐसे कदम उठा लेते हैं. ऐसे में समाज और कानून दोनों को संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime : दामाद ने संपत्ति हड़पने के लिए सास, ससुर और सालियों की डंडे से पीट कर की हत्या

Family Crime : नरेंद्र गंगवार बेहद शातिर इंसान था. सब से पहले उस ने हीरालाल की बड़ी बेटी लीलावती को फांस कर उस से लवमैरिज की. फिर ससुर की संपत्ति हड़पने के लिए ससुराल के सभी लोगों की हत्या कर उन्हें घर में ही दफना दिया. 15 महीने बाद जब इस सनसनीखेज राज से परदा…

25 अगस्त, 2020 को नरेंद्र गंगवार अपने ससुर हीरालाल के पैतृक गांव पैगानगरी पहुंचा. यह गांव बरेली जिले की तहसील मीरगंज के अंतर्गत आता है. गांव पहुंचते ही वह हीरालाल के नाती दुर्गा प्रसाद से मिला. उस ने दुर्गा प्रसाद को बताया कि वह अपने ससुर की जमीन की पैदावार की बंटाई का हिस्सा लेने आया है. दरअसल, इस गांव में हीरालाल की 16 बीघा जमीन थी जो उन्होंने बंटाई पर दे रखी थी. वह खेती की पैदावार का हिस्सा लेने गांव आते रहते थे. दुर्गा प्रसाद नरेंद्र को अच्छी तरह जानते थे. हीरालाल दुर्गा प्रसाद के रिश्ते के नाना लगते थे. नरेंद्र कई बार अपने ससुर के साथ गांव आया था. दुर्गा प्रसाद ने उस से नाना की कुशलक्षेम पूछी.

इस पर नरेंद्र ने कहा, ‘‘दुर्गा प्रसादजी, बहुत ही दुखद खबर है. आप के नाना हीरालालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. 22 अप्रैल, 2020 को उन की मंझली बेटी दुर्गा और हीरालालजी ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लौकडाउन के चलते हम किसी को उन की मृत्यु की खबर तक नहीं दे पाए. कोरोना महामारी के चलते मैं ने अपनी बीवी लीलावती, किराएदार विजय व कुछ अन्य लोगों के सहयोग से नारायण नंगला किचा नदी में उन का दाहसंस्कार करा दिया था. पति के वियोग में उन की पत्नी हेमवती भी अपनी बेटी पार्वती को ले कर अचानक कहीं चली गईं. मैं ने और लीलावती ने उन्हें सब जगह ढूंढा, लेकिन उन का भी कहीं पता न चल सका.’’

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर दुर्गा प्रसाद को झटका लगा. वहां बैठे गांव के कई लोग भी हैरत में पड़ गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो इंसान अपनी औलाद के सुनहरे भविष्य का सपना ले कर गांव छोड़ शहर जा बसा था, उस का परिवार इस तरह टूट कर बिखर जाएगा. हीरालाल के मरने की खबर सुन कर गांव के लोग तरहतरह की बातें करने लगे. दुर्गा प्रसाद को बहुत दुख हुआ. लेकिन एक बात उन की समझ में नहीं आ रही थी कि जब पति और बेटी खत्म हो गए तो हेमवती को अपनी बेटी को साथ ले कर कहीं चली गई. अगर उसे वहां से जाना था तो गांव में उस के पति की 16 बीघा जमीन पड़ी थी, जिस के सहारे हीरालाल के घर का खर्च चलता था. गांव में उस का मकान भी था. वह गांव आ कर रह सकती थी.

उसी समय नरेंद्र ने दुर्गाप्रसाद को बताया कि ससुर के घर के पास ही मेरा भी मकान है. जिस पर एकमात्र बची बेटी लीलावती का मालिकाना हक कराने के लिए मुझे हीरालालजी के मृत्यु प्रमाण पत्र की जरूरत है. आप लोग उन के परिवार के लोग हो, यह काम आप ही करा सकते हो. दुर्गा प्रसाद को विश्वास नहीं हुआ नरेंद्र की बात सुनते ही दुर्गा प्रसाद का दिमाग घूम गया. उन्हें उस की बात में कुछ झोल नजर आया. दुर्गा प्रसाद ने यह बात हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन के घर जा कर उन्हें बताई. साथ ही नरेंद्र की बातों पर कुछ शक भी जाहिर किया. यह बात सुन कर कुंवर सैन ने उसे बंटाई का हिस्सा देने से भी साफ मना कर दिया तो नरेंद्र वापस अपने घर चला आया.

नरेंद्र की बातों पर शक हुआ तो 27 अगस्त, 2020 को दुर्गा प्रसाद हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन को साथ ले कर उन की मौत की सच्चाई जानने के लिए रुद्रपुर ट्रांजिट कैंप पहुंचे. हीरालाल के घर पर ताला लगा हुआ था. यह देख कर उन्होंने पड़ोसियों से उन के बारे में जानकारी लेनी चाही तो पता चला कि हीरालाल के घर पर पिछले 15 महीने से ताला लटका हुआ है. इस दौरान उन्होंने कभी भी हीरालाल और उन के परिवार वालों को यहां आतेजाते नहीं देखा. यह बात सामने आते ही दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन को हैरानी हुई, क्योंकि नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि हीरालाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उस के पड़ोसियों को इस बात की जानकारी तक नहीं थी.

नरेंद्र का झूठ सामने आते ही दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन समझ गए कि हीरालाल की संपत्ति हड़पने की मंशा से उन के दामाद नरेंद्र ने कोई चक्रव्यूह रच कर उन्हें मौत Family Crime के घाट उतार दिया. हीरालाल के परिवार के साथ किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन उसी दिन ट्रांजिट कैंप थाने पहुंच गए. यह बात उन्होंने थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी को बताई. मामला एक ही परिवार के 4 लोगों के लापता होने का था, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से लिया. दुर्गाप्रसाद और कुंवर सैन से जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्हें घर भेज दिया गया. फिर थानाप्रभारी जोशी ने इस मामले की सच्चाई जानने के लिए गुप्तरूप से जांचपड़ताल करानी शुरू की. सादे वेश में जा कर पुलिस ने नरेंद्र गंगवार को अपने कब्जे में लिया, ताकि वह फरार न हो सके.

थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी ने नरेंद्र से हीरालाल और उन के परिवार के सदस्यों के बारे में कड़ी पूछताछ की. पुलिस पूछताछ के दौरान नरेंद्र शुरू में तो इधरउधर की कहानी गढ़ता रहा. लेकिन जैसे ही पुलिस की सख्ती बढ़ी तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस के बाद उस ने अपने ससुराल वालों की हत्या अपने किराएदार विजय के सहयोग से करने की बात स्वीकार कर ली. पूछताछ के दौरान नरेंद्र गंगवार ने बताया कि 20 अप्रैल, 2019 को सुबह साढ़े 5 बजे उस ने अपने किराएदार विजय के साथ मिल कर सासससुर और 2 सालियों को डंडे से पीट कर मौत के घाट उतारा. फिर उन की लाशों को उन्हीं के मकान में गड्ढा खोद कर दफन कर दिया.

नरेंद्र द्वारा 4 लोगों की हत्या कर घर में ही दफनाने वाली बात सामने आते ही थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने इस बात की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी. थानाप्रभारी ने आननफानन में तत्परता से नरेंद्र के सहयोगी रहे उस के किराएदार विजय को भी हिरासत में ले लिया. यह जानकारी मिलते ही ट्रांजिट कैंप के साथसाथ थाना पंतनगर, थाना रुद्रपुर और थाना किच्छा से भी पुलिस टीमें हीरालाल के मकान पर पहुंच गईं. देखते ही देखते आजादनगर की मुख्य सड़क पुलिस छावनी में तब्दील हो गई. आजादनगर के आसपास यह नजारा देख लोग हैरत में पड़ गए. घटना की जानकारी मिलते ही एसएसपी दिलीप सिंह व आईजी (कुमाऊं) अजय कुमार रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंचे.

पुलिस द्वारा हीरालाल के घर का दरवाजा खोलने से पहले ही वहां तमाशबीनों का जमावड़ा लग गया. पुलिस ने नरेंद्र की निशानदेही पर मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में दिन के 3 बजे 4 मजदूरों को लगा कर खुदाई शुरू कराई. लगभग 2 घंटे के अथक प्रयास के बाद पुलिस लाशों तक पहुंची. लगभग साढ़े 4 फीट की गहराई में एक के ऊपर एक 4 लाशें पड़ी मिलीं, जो प्लास्टिक की थैलियों में पैक थीं. इस हृदयविदारक दृश्य को देख कर लोगों के होश उड़ गए. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने है वह सच है या सपना. पुलिस ने थैलियों को खोल कर लाशों की जांचपड़ताल की. लाशों को देख कर पुलिस हैरान थी कि सभी लाशें अभी तक अच्छी हालत में थीं. पुलिस को उम्मीद थी कि 15 महीनों के लंबे अंतराल के दौरान लाशें कंकाल में बदल चुकी होंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसी गड्ढे से पुलिस ने लकड़ी के डंडे के आकार की एक फंटी बरामद की. नरेंद्र ने उसी फंटी से चारों को मारने की बात स्वीकार की थी.

घटनास्थल पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए. फिर उन्हें जांच के लिए सुरक्षित रख लिया. पुलिस ने चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं और इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 4 डाक्टरों के पैनल द्वारा वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमार्टम कराया. यह कुमाऊं का पहला ऐसा सनसनीखेज  मामला था, जिस ने तहलका मचा दिया था. हीरालाल का अपना कोई बेटा नहीं था तो उन्होंने बेटियों का ही पालनपोषण अच्छे से किया था. बड़ी बेटी लीलावती ने गलत कदम उठाया तो उसे भी सहन करते हुए उन्होंने उस के पति नरेंद्र को बेटे का दरजा दे कर उसे अपने घर में शरण दी. इस के बावजूद उस ने ऐसा कदम उठाया कि ससुराल का वजूद ही खत्म कर डाला. यह कहानी जितनी सनसनीखेज थी, उस से कहीं ज्यादा हृदयविदारक भी थी.

हीरालाल का परिवार उत्तर प्रदेश के जिला बरेली, तहसील मीरगंज के गांव पैगानगरी में रहता था गांव में उन का परिवार सुखीसंपन्न माना जाता था. गांव में उन की जुतासे की करीब 60 बीघा जमीन थी. औलाद के नाम पर 3 बेटियां थीं लीलावती उर्फ लवली, पार्वती और सब से छोटी दुर्गा. उन की पत्नी हेमवती सहित घर में कुल 5 सदस्य थे. घर में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. हीरालाल की बस एक ही परेशानी थी कि उन का कोई बेटा नहीं था. जो घर धनधान्य से भरपूर हो और घर में उस का कोई वारिस न हो तो चिंतित रहना स्वभाविक ही है. हीरालाल ने बेटे की चाह के चलते इधरउधर काफी हाथपांव मारे. कई डाक्टरों और तांत्रिकों से मिले लेकिन उन की बेटे की इच्छा पूरी न हो सकी.

बाद में इस सोच को बदल कर उन्होंने अपना पूरा ध्यान बेटियों की परवरिश में लगा दिया. समय के साथ बेटियां समझदार हुईं तो हीरालाल ने सोचा कि उन्हें अपनी बेटियों को गांव के माहौल से बचा कर शहर में अच्छी शिक्षा दिलानी चाहिए. जिस से वे पढ़लिख कर कुछ बन जाएं. इसी सोच के चलते हीरालाल ने सन 2007 में अपनी खेती की जमीन में से 44 बीघा जमीन बेच दी. उस पैसे को ले कर हीरालाल अपने परिवार के साथ गांव से रुद्रपुर के ट्रांजिट कैंप थानांतर्गत राजा कालोनी में आ कर रहने लगे. उन्होेंने अपना मकान बना लिया था. रुद्रपुर आ कर हीरालाल ने अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अच्छे स्कूल में दाखिला दिला दिया था.

बेटियों की तरफ से निश्चिंत हो कर हीरालाल ने बाकी बचे पैसों से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू कर दिया. जमीन के पैसे से ही उन्होंने आसपास कई प्लौट खरीद कर डाल दिए थे. उसी दौरान हीरालाल की मुलाकात नरेंद्र गंगवार से हुई. राहु बन कर कुंडली में बैठा नरेंद्र नरेंद्र गंगवार रामपुर जिले के थाना ऐरो बिलासपुर के गांव खेड़ासराय का रहने वाला था. वह उसी मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था. नरेंद्र गंगवार सिडकुल की एक फैक्ट्री में काम करता था. उस ने हीरालाल से एक प्लौट खरीदने की इच्छा जताई. इस पर हीरालाल ने उसे अपने घर के सामने पड़ा प्लौट दिखाया तो वह नरेंद्र को पसंद आ गया. उस ने हीरालाल से वह प्लौट खरीद कर उस की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली.

प्लौट के चक्कर में नरेंद्र की हीरालाल से जानपहचान हुई तो वह उन के संपर्क में रहने लगा था. इसी बहाने वह हीरालाल के घर भी आनेजाने लगा था. घर आनेजाने के दौरान ही नरेंद्र की नजर हीरालाल की बड़ी बेटी लीलावती पर पड़ी. लीलावती देखनेभालने में सुंदर थी और उस समय पढ़ भी रही थी. उस की सुंदरता को देखते ही नरेंद्र उसे पाने के लिए लालायित हो उठा. वह जब भी हीरालाल के घर जाता तो उस की निगाहें उसी पर टिकी रहती थीं. लीलावती नरेंद्र के बारे में पहले ही सब कुछ जान चुकी थी. जब उस ने नरेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देखा तो उस के दिल में भी चाहत पैदा हो गई.

दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार उमड़ा तो वे प्रेम की राह पर बढ़ चले.  लीलावती स्कूल जाती तो नरेंद्र घंटों तक उस की राह तकता रहता. उस के स्कूल जाने का फायदा उठाते हुए वह घर से बाहर ही उस से मुलाकात करने लगा. प्रेम बेल फलीफूली तो मोहल्ले वालों की नजरों में किरकरी बन कर चुभने लगी. कुछ ही समय बाद दोनों की प्रेम कहानी हीरालाल के सामने जा पहुंची. अपनी बेटी की करतूत सुन कर हीरालाल को बहुत दुख हुआ. वह अपनी बेटियों को बेटा समझ पढ़ालिखा रहे थे, ताकि वे किसी काबिल बन जाएं. लेकिन बड़ी बेटी की करतूत सुन कर उसे गहरा सदमा पहुंचा. यह जानकारी मिलने पर उस ने लीलावती को समझाया और नरेंद्र के घर आने पर पाबंदी लगा दी. इस पर दोनों मोबाइल पर बात कर अपने दिल की पीड़ा एकदूसरे से साझा करने लगे.

इस प्रेम कहानी के चलते लीलावती ने सन 2008 में घर वालों को बिना बताए नरेंद्र से लव मैरिज कर ली. शादी के बाद लीलावती उस के साथ किराए के मकान में रहने लगी. लीलावती की इस करतूत से हीरालाल और उन की पत्नी हेमवती दोनों को जबरदस्त आघात पहुंचा. बेटी के कारण मियांबीवी मोहल्ले में सिर उठा कर चलने लायक नहीं रहे. इसी वजह से हीरालाल ने अपनी बेटी लीलावती से संबंध खत्म कर दिए. लेकिन हेमवती मां थी. मां का दिल तो वैसे भी बहुत कोमल होता है. भले ही लीलावती ने नरेंद्र के साथ शादी कर अपनी दुनिया बसा ली थी, लेकिन मां होने के नाते हेमवती उस के लिए परेशान रहने लगी थी. जब बेटी के बिना उस से नहीं रहा गया तो वह पति को बिना बताए उस से मिलने लगी.

हेमवती जब कभी घर में कुछ अच्छा बनाती, चुपके से लीलावती को पहुंचा आती. साथ ही वह उस की आर्थिक मदद भी करने लगी थी. धीरेधीरे यह बात हीरालाल को भी पता चल गई. शुरूशुरू में तो इस बात को ले कर दोनों में विवाद हो गया. लेकिन हीरालाल भी दिल के कमजोर इंसान थे. बेटी की परेशानी को देखते हुए उन का दिल भी पसीज गया. नरेंद्र बना घरजंवाई शादी के कुछ समय बाद ही हीरालाल ने नरेंद्र को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया और बेटीदामाद दोनों को घर ले आए. नरेंद्र घरजंवाई की हैसियत से ससुर हीरालाल के मकान में ही रहने लगा. उसी दौरान नरेंद्र कई बार हीरालाल के साथ उन के गांव पैगानगरी भी गया था. हीरालाल का गांव में मकान था, जो खाली पड़ा था.

साथ ही उन की बची हुई 16 बीघा जमीन भी थी, जिसे उन्होंने बंटाई पर दे रखा था. इस जमीन से उन्हें हर साल इतना रुपया मिल जाता था कि उन के परिवार की गुजरबसर ठीक चल रही थी. वह प्रौपर्टी खरीदबेच कर जो कमाते थे वह अलग था. ससुर के साथ रह कर नरेंद्र उन की एकएक बात अपने दिमाग में उतारने लगा. मम्मीपापा के घर पर रहते हुए ही लीलावती 4 बच्चों, 2 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी. हीरालाल के घर पर रहते हुए नरेंद्र नौकरी करने के साथसाथ उन के काम में भी हाथ बंटाने लगा था. हालांकि नरेंद्र के चारों बच्चों का खर्च भी हीरालाल स्वयं ही वहन कर रहे थे. इस के बावजूद नरेंद्र अपने खर्च के लिए हीरालाल से पैसे ऐंठता रहता था.

हीरालाल की अभी 2 बेटियां शादी के लिए बाकी थीं. वह समय से उन की शादी करना चाहते थे. लेकिन जब से नरेंद्र इस घर में आया था, अपनी सालियों को फूटी आंख नहीं देखना चाहता था. नरेंद्र तेजतर्रार और चालाक था. लीलावती से शादी करने के बाद उस की निगाह हीरालाल की संपत्ति पर जम गई थी. जिसे देख वह भविष्य के सुनहरे सपनों में खोया रहता था. उसी दौरान उस ने हीरालाल पर उस के हिस्से की संपत्ति उस के नाम कराने का दबाव बनाना शुरू किया. लेकिन हीरालाल का कहना था कि जब तक उन की दोनों बेटियां विदा नहीं हो जातीं, वह अपनी किसी भी संपत्ति का बंटवारा नहीं करेंगे. हीरालाल जब नरेंद्र की हरकतों से परेशान हो उठे तो उन्होंने नरेंद्र के प्लौट पर मकान बनवा दिया. बाद में नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को साथ ले कर नए मकान में चला गया.

हीरालाल ने सोचा था कि नरेंद्र अपने घर में जाने के बाद सुधर जाएगा. लेकिन घर आमनेसामने होने के कारण उस के बीवीबच्चे हीरालाल के घर पर ही पड़े रहते थे. बच्चों के सहारे आ कर वह फिर से बदतमीजी पर उतर आता था. लेकिन ससुर होने के नाते हीरालाल सब कुछ सहन करते रहे. उसी दौरान नरेंद्र ने अपने मकान में विजय नाम का एक किराएदार रख लिया. विजय गंगवार जिला बरेली के थाना देवरनियां के गांव दमखोदा का रहने वाला था. विजय गंगवार से नरेंद्र पहले से ही परिचित था. दोनों में खूब पटती थी. विजय गंगवार अभी कुंवारा था. नरेंद्र ने विजय गंगवार के सामने अपने ससुर की सारी संपत्ति की पोल खोल कर दी, जिस की वजह से उस के मन में भी लालच जाग उठा. उस ने भी नरेंद्र की तरह हीरालाल की मंझली बेटी पार्वती पर निगाहें गड़ा दीं. लेकिन पार्वती समझदार थी. विजय के लाख कोशिश करने के बाद भी वह उस के प्रेम जाल में नहीं फंसी.

जम गई नजर ससुर की संपत्ति पर मन में संपत्ति का लालच आते ही वह अपने ससुर के साथसाथ बाकी लोगों को भी मौत के घाट उतारने के लिए षडयंत्र रचने लगा. लेकिन वह अपनी किसी भी योजना में सफल नहीं हो पा रहा था. नरेंद्र को यह भी पता लग गया था कि विजय उस की साली के पीछे पड़ा है. तभी उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उस ने वह बात विजय को बताते हुए धमकाया कि जो वह कर रहा है वह ठीक नहीं है. अगर इस बात का पता उस के ससुर को चल गया तो परिणाम बहुत गलत होगा. नरेंद्र की बात सुन कर विजय घबरा गया. इस के बाद विजय नरेंद्र की हां में हां मिलाने लगा. फिर आए दिन नरेंद्र अपने घर पर विजय की दावत करने लगा. उस समय तक हीरालाल का परिवार हंसीखुशी से रह रहा था. लेकिन नरेंद्र को उन के परिवार की खुशियां कचोटती थीं.

वह मन ही मन अपने ससुराल वालों से खार खाने लगा था. उसी दौरान उस ने विजय को अपने ससुर की संपत्ति Family Crime से कुछ हिस्सा देने की बात कहते हुए अपनी षडयंत्रकारी योजना में शामिल कर लिया. फिर 17 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र ने अपने किराएदार विजय के साथ मिल कर ससुराल वालों की हत्या की योजना को अंतिम रूप दे दिया. इस योजना के बनते ही नरेंद्र ने अपने बीवीबच्चों को देवरनियां बरेली में अपने फूफा के घर भेज दिया ताकि उन्हें उस की साजिश का पता न चल सके. बीवीबच्चों को बरेली भेजने के बाद वह विजय के साथ मिल कर इस घटना को अंजाम देने के लिए मौके की तलाश में लग गया. लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था. नरेंद्र और विजय को यह भी डर था कि अगर इस योजना में वे किसी तरह से फेल हो गए तो न घर के रहेंगे न घाट के.

नरेंद्र जानता था कि उस की सास सुबह दूध लेने जाती है. उस वक्त उस का ससुर और दोनों सालियां सोई रहती हैं. घर का गेट खुला रहता है. उस वक्त तक पड़ोसी भी सोए होते हैं. घटना को अंजाम देने के लिए नरेंद्र को यह समय सही लगा. 20 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार सुबह जल्दी उठ गए थे. दोनों हेमवती के दूध लेने जाने का इंतजार करने लगे. हेमवती उस दिन सुबह के साढ़े 5 बजे अपनी बेटी पार्वती को साथ ले कर दूध लाने के लिए घर से निकली. उन के घर से निकलते ही नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर हीरालाल के घर में घुस गया. उस समय तक हीरालाल सो कर उठ गए थे. सुबहसुबह दोनों को अपने घर में आया देख हीरालाल ने नरेंद्र से आने का कारण पूछा तो उस ने कहा कि आज मैं आखिरी बार आप से पूछने आया हूं कि आप मेरे हिस्से की संपत्ति मुझे देते हो या नहीं.

पूरे परिवार की हत्या सुबहसुबह दामाद के मुंह से इस तरह की बात सुन हीरालाल का पारा चढ़ गया. दोनों के बीच विवाद बढ़ा तो पूर्व योजनानुसार नरेंद्र ने वहां रखी लकड़ी की फंटी से पीटपीट कर बड़ी ही बेरहमी से हीरालाल की हत्या कर दी. अपने पापा के चीखने की आवाज सुन कर बेटी दुर्गा उन के बचाव में आई तो दोनों ने उसे भी फंटी से पीटपीट कर मार डाला. दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद नरेंद्र और विजय हेमवती और पार्वती के आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही उन दोनों ने घर में प्रवेश किया दरवाजे के पीछे खड़े नरेंद्र और विजय ने उन्हें भी पीटपीट कर मार डाला. सासससुर और दोनों सालियों को खत्म करने के बाद नरेंद्र और विजय ने चारों को घसीट कर एक कमरे में ले जा कर डाल दिया.

कमरे में ले जाने के बाद भी नरेंद्र और विजय को उन की मौत पर विश्वास नहीं हुआ तो दोनों ने एकएक कर सब की नब्ज चैक की. जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि चारों मौत की नींद सो चुके हैं, तो दोनों ने मकान में फैले खून को धो कर साफ किया और घर के बाहर ताला लगा कर अपने घर आ गए. इस खूनी वारदात को अमलीजामा पहनाने के बाद दोनों ने उन लाशों को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. नरेंद्र जानता था कि उन की लाश को घर से बाहर ले जा कर ठिकाने लगाना उन के लिए खतरे से खाली नहीं है. इसलिए दोनों ने तय किया कि बाजार से प्लास्टिक शीट ला कर लाशों को उस में लपेटा घर में ही गड्ढा खोद कर दफन कर दिया जाए. लाशों पर प्लास्टिक शीट लिपटी होने के कारण उन के सड़ने के बाद भी बदबू बाहर नहीं निकल पाएगी.

20 अप्रैल, 2019 को ही नरेंद्र बाजार से प्लास्टिक शीट खरीद लाया. उसी रात दोनों ने ससुर हीरालाल के मकान में जा कर चारों लाशों को प्लास्टिक शीट में पैक कर दिया. अगले दिन 21 अप्रैल, 2019 की सुबह नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर के घर में गया. फिर दोनों ने अपनी योजना के मुताबिक जीने के नीचे गड्ढा खोदना शुरू किया. कुछ पड़ोसियों ने नरेंद्र से हीरालाल के घर में अचानक काम कराने के बारे में पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि वह मकान बेच कर कहीं दूसरी जगह चले गए. घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा है. वैसे भी उस मोहल्ले में नरेंद्र से कोई ज्यादा मतलब नहीं रखता था. यही कारण था कि हीरालाल के परिवार के बारे में किसी ने भी नरेंद्र से ज्यादा पूछताछ नहीं की. नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर लगभग 6 घंटे में एक गहरा गड्ढा खोदा. उस के बाद दोनों ने प्लास्टिक में पैक चारों लाशें गड्ढे में डाल दीं.

चारों लाशों को गड्ढे में दफन कर के उन्होंने वहां पर पक्का फर्श बना दिया. चारों लाशों को ठिकाने लगाने के बाद नरेंद्र ने हीरालाल के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला डाल दिया. घर के अंदर कब्रिस्तान हीरालाल के घर पर अचानक ताला देख लोगों को हैरत तो जरूर हुई. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि हीरालाल रात ही रात में अपने परिवार को ले कर अचानक कहां गायब हो गए. लेकिन नरेंद्र से किसी ने पूछने की हिम्मत नहीं की. ससुराल वालों को ठिकाने लगा कर नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को बरेली से घर ले आया. घर आते ही लीलावती की नजर पिता के मकान की ओर गई, जहां पर ताला लगा था.

लीलावती ने उन के बारे में पति से पूछा, तो उस ने बताया कि उस के पापा अपना मकान बेच कर हल्द्वानी चले गए हैं. उन्होंने वहां पर ही अपना प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया है. यह सुन कर लीलावती चुप हो गई. इस के आगे उसे नरेंद्र से ज्यादा पूछने की हिम्मत नहीं थी. उसे पता था कि उस के पिता और नरेंद्र की आपस में नहीं बनती है. नरेंद्र ने हीरालाल के पूरे परिवार को मौत की नींद सुला दिया था, इस के बाद भी उस के मन में किसी तरह का खौफ नहीं था. इस घटना को अंजाम देने के बाद नरेंद्र ने हीरालाल के मकान को किराए पर उठा दिया. लेकिन कुछ समय बाद किराएदार मकान छोड़ कर चला गया तो उस ने मकान पर फिर से ताला लगा दिया.

उस दिन के बाद उस ने कभी भी उस मकान का ताला नहीं खोला था. अगर नरेंद्र संपत्ति हड़पने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में जल्दबाजी न करता तो यह राज शायद राज ही बन कर रह जाता. इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार को भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. चारों शवों के पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने शव उन के रिश्तेदार दुर्गा प्रसाद को सौंप दिए थे. उन का दाह संस्कार बरेली के मीरगंज गांव पैगानगरी के पास भाखड़ा नदी किनारे किया गया. नरेंद्र गंगवार इतना शातिर इंसान था कि उस ने दुर्गा प्रसाद को इस केस में फंसाने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई सामने आते ही पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया.

हालांकि इस केस की रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद की ओर से ही दर्ज कराई गई थी. फिर भी इस केस के खुल जाने के बाद पुलिस दुर्गा प्रसाद और अन्य के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच में जुटी थी. पुलिस ने लीलावती से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया था. वह नरेंद्र के फूफा के साथ बहेड़ी चली गई थी. केस की जांच थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

Gujarat News : सहेली की गला दबाकर हत्या की, फिर शव को कंबल में लपेटकर लाइटर से जला दिया

Gujarat News : थाइलैंड की रहने वाली सहेलियां आईडा और वनिडा बुसोन सूरत के अलगअलग स्पा सेंटरों में नौकरी करती थीं. भारत के स्पा और मसाज सेंटरों में थाई लड़कियों की अच्छी डिमांड रहती है. जिस से दोनों सहेलियां अच्छी कमाई कर रही थीं. इसी दौरान ऐसा क्या हुआ कि आईडा ने वनिडा बुसोन के खून से अपने हाथ रंग लिए…

गुजरात का सूरत शहर साडि़यों और हीरों के काम के लिए दुनियाभर में मशहूर है. इसी शहर के मगदल्ला गांव में 6 सितंबर 2020 को सुबह करीब 7 बजे एक मकान में किराए पर रहने वाली थाईलैंड की युवती वनिडा बुर्सोन उर्फ मिम्मी के कमरे से धुआं निकलता हुआ दिखाई दिया. धुआं देख कर आसपास के लोग वहां एकत्र हो गए. कमरे के बाहर ताला लगा हुआ था. लोगों ने समझा कि कमरा बंद है, तो वनिडा कहीं गई होगी. उस के पीछे से कमरे में  किसी कारण से आग लग गई है. लोग कयास लगाने लगे कि आग कैसे लग गई? आग किसी भी कारण से लग सकती है. या तो शौर्ट सर्किट हो गया होगा या फिर वनिडा रसोई गैस खुली छोड़ गई होगी.

वहां मौजूद लोग आपस में आग लगने के कारणों पर कयास लगा रहे थे. इतनी देर में एक पड़ोसी ने मकान मालिक नगीन भाई प्रभुभाई पटेल को फोन कर के आग लगने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में मकान मालिक का दामाद हितेश भाई वहां पहुंच गया. हितेश ने लोगों से वनिडा के बारे में पूछा, लेकिन किसी को कुछ पता होता तो वह बताता. तब हितेश ने जल्द ही कमरे का ताला तोड़ दिया. कमरे के अंदर धुआं भरा हुआ था. जमीन पर पड़े गद्दे पर आग जल रही थी. उस ने आसपड़ोस से पानी मंगा कर आग पर फेंका. जलते हुए गद्दे पर एक चादर भी जलती हुई नजर आई. हितेश ने चादर खींची, तो उस के नीचे किसी इंसान के पैर नजर आए.

जलते हुए गद्दे पर किसी इंसान के पैर होने की बात सुन कर वहां मौजूद लोगों में दहशत फैल गई. दहशत इसलिए भी फैली कि कमरे के बाहर से ताला लगा हुआ था. वनिडा अगर कमरे में थी, तो बाहर ताला कैसे लगा हुआ था. डरेसहमे लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी. कुछ ही देर में उमरा थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस जिस समय उस कमरे में घुसी, उस समय भी गद्दा जल रहा था. पुलिस ने पानी डाल कर आग बुझाई. गद्दे पर देखा, तो एक युवती की लाश थी. लाश पूरी तरह जल चुकी थी. चेहरा भी जल गया था. फिर भी आसपड़ोस के लोगों ने कदकाठी और बाकी चीजों से उस की शिनाख्त कर बताया कि लाश वनिडा की है.

जली हालत में मिली लाश पुलिस ने आसपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि थाईलैंड की रहने वाली वनिडा किराए के इस कमरे में 3-4 महीने पहले ही आई थी. उस के साथ थाईलैंड की ही रहने वाली एक और सहेली रूंघटीथा म्याऊ भी रहती थी, लेकिन उस समय वह गुजरात के ही भरूच शहर गई हुई थी. पुलिस को मौके पर वनिडा के मोबाइल भी नहीं मिले, जबकि वह 2-3 कीमती मोबाइल रखती थी. घटनास्थल पर ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से वनिडा की मौत के कारणों का पता चल पाता. मोबाइल नहीं मिलने पर पुलिस ने यह माना कि शायद वह आग में जल गए होंगे, लेकिन उन के अवशेष भी नहीं मिले थे.

घर में कोई भी सामान बिखरा हुआ नहीं मिला. इसलिए लूटपाट या चोरी का संदेह भी नहीं हुआ. मौके पर खानेपीने का कुछ सामान, शराब की बोतलें, गिलास और कोल्ड ड्रिंक की बोतलें जरूर मिली. पड़ोसियों ने बताया कि वनिडा सूरत के इस्कान मौल में एक स्पा में काम करती थी. वह पिछली रात को करीब साढ़े 8 बजे आटोरिक्शा से घर आई थी. रात को उस के कमरे पर उस की सहेली मिलने आई थी. रात को संभवत: सहेली के साथ वनिडा ने पार्टी की थी, क्योंकि पहले उन की मौजमस्ती की सी आवाजें आ रही थीं. बाद में वनिडा के कमरे से झगड़ा होने की आवाज भी आई थी. कुछ लोगों ने बताया कि रात को एक कार में वनिडा के 3 बौयफ्रैंड भी आए थे. रात में एक बाइक पर भी अज्ञात युवक घूमता हुआ देखा गया था. कुछ लोगों ने वनिडा के पूर्व प्रेमी लालू पर शक जताया.

ताज्जुब की बात यह थी कि वनिडा की मौत जलने से हुई थी, लेकिन किसी ने उस की चीखपुकार नहीं सुनी. मैडिकल साइंस में माना जाता है कि होशोहवास वाला कोई भी व्यक्ति जलता है, तो चीखताचिल्लाता जरूर है. ऐसा भी कारण सामने नहीं आया कि वनिडा ने खुदकुशी करने के मकसद से खुद को आग के हवाले किया हो. मामला बड़ा संदेहास्पद था. यह साफ नहीं हो रहा था कि वनिडा की हत्या हुई है या यह कोई हादसा है. उमरा थाना प्रभारी ने उच्चाधिकारियों को सूचना दे कर एफएसएल की टीम और क्राइम ब्रांच की टीम को मौके पर बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम और क्राइम ब्रांच की टीम ने मौके से कुछ साक्ष्य एकत्र किए. फोरैंसिक टीम के विशेषज्ञों ने हत्या की आशंका जताते हुए कुछ सैंपल भी लिए.

उमरा थाना पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर एक्सीडेंटल डैथ मानते हुए मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. सूरत के गांव मगदल्ला और आसपास के इलाकों में थाईलैंड की कई युवतियां अकेली और अन्य परिवार भी रहते हैं. पुलिस ने उन से भी वनिडा के बारे में पूछताछ की, लेकिन ऐसी कोई बात पता नहीं चली जिस से कि उस की मौत का राज खुल पाता. शादीशुदा वनिडा सूरत में अकेली रहती थी. उस का पति व बेटा थाईलैंड में रहते हैं. पुलिस ने लोगों से वनिडा का थाईलैंड का पता हासिल किया ताकि दूतावास के जरिए उस के परिजनों को सूचना भेजी जा सके. बाद में पुलिस ने थाईलैंड हाई कमीशन को मामले की सूचना दे दी.

पूछताछ में कोई सुराग नहीं मिलने पर पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों के फुटेज के सहारे जांच आगे बढ़ाने का फैसला किया. आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखने के बाद पुलिस हालांकि किसी नतीजे पर तो नहीं पहुंची, लेकिन कुछ लोगों को चिन्हित कर उन से पूछताछ करने का निर्णय लिया. इस के लिए दूसरे दिन 7 सितंबर को पुलिस की स्पेशल जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया गया. डीसीपी विधि चौधरी के नेतृत्व में इस टीम में उमरा थाने के इंसपेक्टर के अलावा क्राइम ब्रांच को भी शामिल किया गया. एसआईटी के अधिकारियों ने मौकामुआयना करने वाली फोरैंसिक टीम से राय ली. फोरैंसिक विशेषज्ञों ने कहा कि शव को देखने के बाद ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह आकस्मिक मौत है. अगर घर में शार्ट सर्किट भी होता तो शव इतना नहीं जलता. शव फर्श पर पड़ा था. आग लगने के बाद आदमी छटपटाता है. इधरउधर भाग कर आग बुझाने की कोशिश करता है.

फोरैंसिक विशेषज्ञों ने कहा कि मौके के हालात से लगता है कि इस में कोई और शामिल हो सकता है, जिस ने युवती को जलाया. युवती ने खुद ऐसा नहीं किया होगा. जलाने में संभवत: ज्वलनशील पदार्थ का इस्तेमाल किया गया होगा. शव को जलने में 2 से 3 घंटे का समय भी लगा होगा. वनिडा का शव जिस गद्दे पर मिला, वह रुई का था. आग केवल गद्दे तक ही लगी थी, पूरे कमरे में नहीं फैली थी. फोरैंसिक एक्सपर्ट ने दी चौंकाने वाली रिपोर्ट कमरे के बाहर से ताला लगा होना भी संदेह पैदा कर रहा था. कोई भी व्यक्ति बाहर से ताला लगा कर केवल तभी सोता है, जब या तो उस का कोई साथी उसी के सामने बाहर गया हो और उसे वापस आना हो.

अथवा ऐसा तब होता है जब अंदर वाले को किसी से डर या खतरा हो, तब वह किसी से बाहर का ताला लगवा सकता है. लेकिन पुलिस को ऐसा भी कोई आदमी नहीं मिला, जिस से वनिडा ने कमरे का बाहर का ताला लगवाया हो. विशेषज्ञों ने माना कि जलते समय युवती होश में नहीं थी. संभवत: वह गहरे नशे में रही होगी. इसीलिए वह जलने पर न तो चीखीचिल्लाई और न किसी ने उस की कोई आवाज सुनी थी. फोरैंसिक विशेषज्ञ हत्या की आशंका जताते हुए अपने तर्क दे रहे थे, लेकिन हत्या का मामला दर्ज करने से पहले पुलिस सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए पुलिस ने दक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (डीजीवीसीएल) के बिजली अधिकारियों से भी मौका निरीक्षण कराया, ताकि पता चल सके कि शार्ट सर्किट तो नहीं हुआ था. जांच पड़ताल के बाद बिजली अधिकारियों ने साफ कर दिया कि कमरे में शार्ट सर्किट नहीं हुआ था.

शव मिलने के तीसरे दिन पुलिस ने 16 लोगों से अलगअलग पूछताछ की. इन में वनिडा की रूममेट, उसे घर और स्पा ले जाने वाले आटो चालक, सहेलियों और सीसीटीवी फुटेज में नजर आए संदिग्ध लोग शामिल थे. पुलिस ने वनिडा के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स भी निकलवाई. इस बीच, पुलिस ने वनिडा के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने विसरा और अन्य सैंपल जांच के लिए एफएसएल भिजवा दिए. पुलिस की जांचपड़ताल में पता चला कि करीब 27 साल की वनिडा एक साल पहले टूरिस्ट वीजा पर सूरत आई थी. वह 3-4 महीने से नगीन भाई पटेल के मकान में किराए के कमरे में रहती थी. उस के साथ थाईलैंड की ही निवासी रूंघटीथा म्याऊ नाम की युवती भी रहती थी.

फोरैंसिक विभाग ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट पुलिस को दी. इस में मौत का कारण तो नहीं बताया गया, लेकिन यह जरूर कहा गया कि जलाते समय युवती जीवित थी. उस की श्वास नली में कार्बन मिला है. कोई व्यक्ति जिंदा जलता है, तो उस की सांस की नली में कार्बन पाया जाता है. यह हो सकता है कि युवती को बेहोश कर या कोई मादक पदार्थ पिला कर जलाया गया हो. मामला विदेशी युवती की मौत का था. इसलिए पुलिस सभी एंगल से मामले की जांच कर रही थी. लोगों से पूछताछ में पुलिस को कुछ ऐसी बातें पता चलीं, जिस से पुलिस ने माना कि वनिडा की हत्या हुई होगी. हत्या के एंगल से जांच की गई, तो यह माना गया कि कातिल बहुत शातिर है.

उस ने वनिडा को जलाने के लिए पैट्रोल या केरोसिन के बजाय शराब, नेल पेंट, डिओड्रेंट या किसी अन्य बिना गंध वाले ज्वलनशील पदार्थ का इस्तेमाल किया होगा, क्योंकि पैट्रोल व केरोसिन की गंध दूर तक फैलती है. 11 सितंबर को उमरा थाना पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ वनिडा की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. हत्या का मामला एफएसएल की प्राथमिक रिपोर्ट व डीजीवीसीएल के बिजली अधिकारियों की रिपोर्ट और अन्य सबूतों के आधार पर दर्ज किया गया. 80 से ज्यादा लोगों से की पूछताछ लगभग 80 से ज्यादा लोगों से की गई पूछताछ और 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने के बाद पुलिस ने 2 लोगों पर शक की सुई टिका दी. इन में एक आईडा थी और दूसरा चेतन. थाईलैंड की ही रहने वाली आईडा मृतका वनिडा की अच्छी दोस्त थी.

वह भी वनिडा की ही तरह एक स्पा सैंटर में काम करती थी. वहीं, चेतन वनिडा के मकान के पास ही रहता था. चेतन ने ही वनिडा को 5 सितंबर को आखिरी काल की थी. चेतन सूरत के ही एक स्पा में मैनेजर की नौकरी करता है. पुलिस ने अपने मुखबिर लगाए और इन दोनों की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. निगरानी रखने के बाद पुलिस ने चेतन को शक के दायरे से बाहर कर आईडा पर सारा ध्यान केंद्रित कर दिया. पुलिस की ओर से जरूरी सबूत जुटाने के बाद सूरत के पुलिस कमिश्नर अजय तोमर ने 14 सितंबर, 2020 को वनिडा की हत्या का खुलासा कर दिया. पुलिस ने आईडा को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस की जांचपड़ताल और आईडा से की गई पूछताछ में वनिडा की हत्या की जो कहानी उभरकर सामने आई, वह इस प्रकार है—

थाईलैंड की रहने वाली वनिडा और आईडा अच्छी दोस्त थीं. दोनों लगभग हमउम्र थीं. दोनों की ही शादी हो चुकी थी. वनिडा का एक बेटा है. पति और बेटा थाईलैंड में रहते हैं. वनिडा पैसा कमाने के मकसद से टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थी. वह स्पा का काम जानती थी. भारत में स्पा सेंटरों में विदेशी युवतियों की सब से ज्यादा मांग रहती है. परिचित थाई युवतियों के माध्यम से वह सूरत आ गई. सूरत में उसे एक स्पा सेंटर में काम मिल गया. स्पा में वह अच्छा पैसा कमा रही थी. उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. आईडा भी थाईलैंड से टूरिस्ट वीजा पर सूरत आई थी. वह भी शादीशुदा थी लेकिन वह करीब एक साल से अपने पति से अलग रहती थी. उस का पति थाईलैंड में रहता है.

एक देश की होने और एक ही काम करने के कारण वनिडा और आईडा में अच्छी दोस्ती हो गई. आईडा भी मगदल्ला गांव में ही किराए के मकान में थी. वनिडा व आईडा के मकान के बीच 10 मिनट का पैदल का रास्ता है. दोनों सहेलियों को एकदूसरे की सारी बातें पता थीं. वे कभीकभी अपने कमरे पर पार्टी कर लेती थीं. थाईलैंड के खानपान के लिहाज और स्पा मसाज के पेशे से जुड़ी होने के कारण सिगरेट पीना, वोदका, बीयर, और शराब पीने के अलावा हुक्के के कश लगाना तथा झींगा मछली वगैरह खाना इन का शौक था. इन की पार्टी करीब 11-12 बजे शुरू हो कर भोर होने तक चलती थी. सहेली आईडा को आया लालच आईडा का टूरिस्ट वीजा 26 सितंबर को खत्म हो रहा था.

उसे वीजा की अवधि बढ़वानी थी. इस के लिए उस ने किसी एजेंट से भी बात कर ली थी. वीजा बढ़वाने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. इस के अलावा थाईलैंड के बानपाको में रहने वाले उस के भाई ने गाड़ी का एक्सीडेंट कर दिया था. उस की गाड़ी पुलिस ने जब्त कर ली. भाई की गाड़ी छुड़वाने के लिए भी आईडा को पैसे चाहिए थे. आईडा ने अपने 2-4 परिचितों से पैसे उधार मांगे, लेकिन उसे कहीं से मदद नहीं मिली. उसे पता था कि वनिडा अच्छा पैसा कमाती है. वह ठाठ से रहती और खूब खर्च करती है. थाईलैंड में अपने घर भी पैसा भेजती है. उसे पता था कि वनिडा का वीजा 20 सितंबर को खत्म हो रहा है और वह वापस थाईलैंड जाना चाहती है. इस से आईडा को अनुमान था कि वनिडा के पास अभी काफी पैसा होगा. इसलिए उस ने वनिडा को शराब पिला कर उसे लूटने की योजना बनाई.

आईडा ने वनिडा से 5 सितंबर की रात को पार्टी करने की बात तय कर ली. योजना के तहत आईडा रात करीब साढ़े 9 बजे वनिडा के घर पहुंची. दोनों ने शराब व वोदका पी. नशीले पदार्थ वाले हुक्के के भी कश लगाए. इस बीच वे मछली वगैरह भी खाती रहीं. आईडा ने जानबूझ कर वनिडा को ज्यादा शराब पिलाई. वनिडा जब बेसुध हो गई, तो आईडा वनिडा का कीमती माल तलाश करने लगी. इस बीच, उसे खयाल आया कि अगर वनिडा को होश आ गया, तो वह चिल्लाएगी. इस से वह पकड़ी जाएगी. अगर उसे अभी होश नहीं आया, तो सुबह कीमती सामान नहीं मिलने पर वह सीधा उस पर चोरी का आरोप लगाएगी. इस से बचने के लिए आईडा ने वनिडा का काम तमाम करने का फैसला किया.

उस ने कमरे में गद्दे पर बेसुध पड़ी वनिडा का कंबल से गला दबा दिया. इस के बाद उस पर टिश्यू पेपर और नायलोन का कंबल डाल कर लाइटर से आग लगा दी. ज्यादा नशे में होने से बेसुध होने के कारण वनिडा चीखपुकार भी नहीं सकी. वह जिंदा ही जल गई. वनिडा को जला कर आईडा ने उस के 3 आईफोन और सोने की चेन सहित करीब 2 लाख रुपए का कीमती सामान बटोरा और तड़के अपने कमरे पर आ गई. अपने कमरे में उस ने वनिडा की सोने की चेन चावल के डब्बे में छिपा कर रख दी. आईडा इतनी शातिर थी कि 6 सितंबर को सुबह जब कमरे में वनिडा का जला हुआ शव मिला, तो पुलिस की काररवाई के दौरान वह थाईलैंड की अन्य महिलाओं के साथ मृतका को श्रद्धांजलि देने के लिए हाथ जोड़े वहां कई घंटे तक खड़ी रही. इस दौरान उस ने किसी को भी शक नहीं होने दिया.

वनिडा की मर्डर मिस्ट्री का रहस्य उस की रूममेट रूंघटीथा म्याऊ से पूछताछ के बाद सुलझा. म्याऊ ने पुलिस को बताया कि वह वनिडा की मृत्यु के बाद भरूच से सूरत आई थी. भरूच से वह काफी सामान लाई थी. वनिडा के कमरे में आग लगने के कारण वहां सामान नहीं रख सकी, तो वह आईडा के कमरे पर सामान रखने गई. आईडा के मकान मालिक ने ज्यादा सामान कमरे में रखने से मना कर दिया. आईडा ने स्वीकारा अपराध इस पर म्याऊ ने अपना कुछ गैरजरूरी सामान अपने आटोचालक को दे दिया. इस दौरान आईडा ने भी आटो चालक को एक बैग दे कर कहा कि वह बाद में ले लेगी. आटोचालक ने आईडा का दिया बैग और म्याऊ का दिया सामान ला कर अपने घर पर रख दिया.

स्पा में काम करने वाली थाईलैंड की युवतियों ने अपने आटोचालक तय कर रखे हैं. उन्हें जब भी कहीं आनाजाना होता है, तो फोन कर के उन्हें बुला लेती हैं. म्याऊ ने पुलिस को यह भी बताया कि वनिडा के पास 3 मोबाइल फोन और सोने की चेन थी, जो गायब हैं. रुपएपैसे और अन्य कीमती सामान के बारे में म्याऊ को ज्यादा पता नहीं था. म्याऊ से पूछताछ के बाद पुलिस ने आटो चालक से पूछताछ की. उस ने म्याऊ और आईडा की ओर से दिए गए सामान के बारे में बता दिया. पुलिस ने उस के घर जा कर सामान चेक किया, तो उस बैग में वनिडा का मोबाइल मिला, जो आईडा ने उसे दिया था. पहले से ही शक के दायरे में चल रही आईडा पर पुलिस का संदेह पुख्ता हो गया. पुलिस को आईडा से पूछताछ में काफी पापड़ बेलने पड़े. उस ने हिंदी, गुजराती या अंग्रेजी भाषा समझने से इनकार कर दिया. वह केवल थाई भाषा ही बोलती रही.

उस से पूछताछ के लिए दुभाषिए की मदद लेनी पड़ी. वह बारबार वनिडा की हत्या से साफ इनकार करते हुए पुलिस से सबूत बताने की बात कहती रही. विदेशी युवती का मामला होने के कारण पुलिस उस से सख्ती भी नहीं कर पा रही थी. पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली, तो चावल के डब्बे से वनिडा की सोने की चेन बरामद हो गई. कुछ अन्य सामान भी मिल गया. पुलिस ने उसे रात साढ़े 9 बजे वनिडा के घर आने और तड़के करीब साढ़े 4 बजे मुंह ढक कर जाने के सीसीटीवी फुटेज दिखाए. इस के बाद उस ने वनिडा की हत्या करने की बात कबूल कर ली. आईडा से उस ताले की चाबी भी बरामद हो गई, जो वह वनिडा की हत्या के बाद उस के कमरे के बाहर लगा कर आई थी.

पुलिस ने आईडा को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को अन्य लोगों से पता चला कि आईडा के खिलाफ मलेशिया और जापान में जुआ का अड्डा चलाने के आपराधिक मामले दर्ज हैं. पुलिस इन मामलों का पता लगाने का प्रयास कर रही है. बहरहाल, आईडा ने छोटे से लालच में अपनी ही सहेली का खून कर दिया. पैसे कमाने आई आईडा को अब भारत में अपने किए की सजा भुगतनी होगी.