Love Crime : प्रेमी जोड़े का गला घोंटा, चेहरे पर तेजाब डाला फिर लाशों को लटका दिया

Love Crime : बंटी और सुखदेवी चचेरेतहेरे भाईबहन जरूर थे लेकिन वे एकदूसरे से दिली मोहब्बत करते थे. दोनों के घर वालों ने शादी करने से मना कर दिया तो अपनी शादी से एक दिन पहले दोनों घर से भाग गए. इस के बाद जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

बंटी की अजीब सी स्थिति थी. उस का दिमाग तो चेतनाशून्य हो चला था. साथ ही उस के दिमाग में एक तूफान सा मचा हुआ था. यही तूफान उसे चैन नहीं लेने दे रहा था. बेचैनी का आलम यह था कि वह कभी बैठ जाता तो कभी उठ कर चहलकदमी करने लगता. अचानक उस का चेहरा कठोर होता चला गया, जैसे वह किसीफैसले पर पहुंच गया था, उस फैसले के बिना जैसे और कुछ हो नहीं सकता था. बंटी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संभल जिले के थाना धनारी के गांव गढ़ा में रहता था. उस के पिता का नाम बिन्नामी और माता का नाम शीला था. बिन्नामी खेतीकिसानी का काम करते थे.

22 वर्षीय बंटी इंटर पास था. उस के बड़े भाई 25 वर्षीय संदीप का विवाह हो चुका था. बंटी से छोटे 2 भाई तेजपाल (14 वर्ष) और भोलेशंकर (9 वर्ष) के अलावा छोटी बहनें कश्मीरा, सोमवती और राजवती थीं, जोकि क्रमश: 17 वर्ष, 7 वर्ष और 5 वर्ष की थीं. उस के पड़ोस में उस के ताऊ तुलसीदास रहते थे. परिवार में उन की पत्नी रमा देवी और उन के 6 बेटै रामपाल, विनीत उर्फ लाला, किशोरी, गोपाल उर्फ रामगोपाल, धर्मेंद्र और कुलदीप उर्फ सूखा थे. इस के अलावा इकलौती बेटी थी 21 वर्षीय सुखदेवी, जोकि सब भाइयों से छोटी थी. रिश्ते में बंटी और सुखदेवी तहेरे भाईबहन थे. बचपन से दोनों साथ खेलेघूमे. हर समय एकदूसरे का साथ दोनों को खूब भाता था. समय के साथ ही बचपन का यह खेल कब जवानी के प्यार की तरफ बढ़ने लगा, उन को एहसास भी नहीं हुआ.

जवान होती सुखदेवी के सौंदर्य को देखदेख कर बंटी आश्चर्यचकित हो गया था. सुखदेवी पर छाए यौवन ने उसे एक आकर्षक युवती बना दिया था. उस के नयननक्श में अब गजब का आकर्षण पैदा हो गया था.  हिरनी जैसे नयन, गुलाब की पंखुडि़यों जैसे होंठ, जिन का रसपान करना हर नौजवान की हसरत होती है. उस के गालों पर आई लाली ने उसे इतना आकर्षक बना दिया था कि बंटी खुद पर काबू न रख सका और उसे देख कर उसे पाने को लालायित हो उठा. सुखदेवी के यौवन में वह इस कदर खो गया कि उस के बदन को ऊपर से नीचे तक निहारता रह गया. उस के छरहरे बदन में यौवन की ताजगी, कसक और मादकता की साफसाफ झलक दिखती थी.

बंटी अपनी तहेरी बहन के मादक सौंदर्य को बस देखता रह गया और उस की चाहत में डूबता चला गया. वह इस बात को भी भूल गया कि वह उस की तहेरी ही सही, लेकिन बहन तो है. बंटी जब सुखदेवी के घर गया तो उसे एकटक देखने लगा. उधर सुखदेवी इस बात से बेखबर अपने काम में व्यस्त थी. जब उस की मां रमा ने उसे आवाज दी, ‘‘ऐ सुखिया, देख बंटी आया है.’’ तो उस का ध्यान बंटी की तरफ गया. चाहने लगा था सुखदेवी को सुखदेवी को भी बंटी पसंद था, मगर उस रूप में नहीं जिस रूप में उसे बंटी देख रहा था और उसे पाने की चाह में तड़पने लगा था.

रमा देवी ने फिर आवाज लगाई. सुखदेवी ने तुरंत एक गिलास पानी और थोड़ा मीठा ला कर बंटी के सामने रख दिया. पानी का गिलास हाथ में पकड़ाते हुए बोली, ‘‘क्या हाल हैं जनाब के?’’

जब बंटी ने उस से पानी का गिलास लिया तो उस का स्पर्श पा कर वह पहले से अधिक व्याकुल हो उठा. उस के साथ सुंदर सपनों में खो गया. इधर सुखदेवी ने उस के गालों को खींच कर कहा, ‘‘कहां खो गए जनाब?’’

इस के बाद वह चाय बनाने चली गई. बंटी का सारा ध्यान तो सुखदेवी की तरफ ही था, जो किचन में उस के लिए चाय बना रही थी. वह तो इस कदर व्याकुल था कि दिल हुआ किचन में जा कर खड़ा हो जाए. उधर जब सुखदेवी चाय ले कर आई तो बंटी की बेचैनी थोड़ी कम हुई. सुखदेवी ने जब बंटी को चाय दी तो उस ने पुन: उसे छूना चाहा, मगर नाकाम रहा. तभी उस की ताई को कुछ काम याद आ गया और वह उठ कर बाहर चली गईं. इधर बंटी की धड़कनें रेल के इंजन की तरह दौड़ने लगीं. वह घबराने लगा. मगर एक खुशी भी थी कि उस तनहाई में वह सुखदेवी को देख सकता है. फिर सुखदेवी अपने काम में लग गई, मगर बंटी के कहने पर वह उस के करीब ही चारपाई पर बैठ गई. उस के शरीर के स्पर्श ने उसे गुमशुदा कर दिया.

उस का दिल तो चाह रहा था कि वह उसे अपनी बांहों में भर ले और प्यार करे, मगर न जाने कैसी झिझक उसे रोक देती और वह अपने जज्बातों पर काबू किए उस की बातें सुनता जा रहा था. वह बारबार हंसती तो बंटी के मन में फूल खिल उठते थे. थोड़ी ही देर में बंटी को न जाने क्या हुआ, वह उठा और जाने लगा. तभी सुखदेवी ने उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

मगर बंटी ने बिना कुछ कहे अपना हाथ छुड़ाया और वहां से चला गया. सुखदेवी उस से बारबार पूछती रही. मगर वह रुका नहीं और बिना पीछे देखे चला गया. प्यार के इजहार का नहीं मिला मौका बंटी को उस दिन के बाद कुछ अच्छा न लगता, वह तो बस सुखदेवी के खयालों में ही खोया रहता था, मगर चाह कर भी वह उस से मन की जता नहीं पाता था. उस के मन में पैदा हुई दुविधा ने उसे अत्यंत उलझा रखा था. तहेरी बहन से प्रेम की इच्छा ने उस के दिलोदिमाग को हिला रखा था. मगर सुखदेवी के यौवन का रंग बंटी पर खूब चढ़ चुका था. उस के यौवन की किसी एक बात को भी वह भुला नहीं पा रहा था.

एक दिन बंटी घर पर अकेला था और सुखदेवी के खयालों में खोया हुआ था. वह चारपाई पर लेटा था, तभी सुखदेवी उस के घर पहुंची और बिना कुछ कहे सीधे अंदर चली गई. बंटी उसे देख कर आश्चर्यचकित रह गया. कुछ देर तक वह उसे देखता ही रहा था. तभी सुखदेवी ने सन्नाटा भंग करते हुए कहा, ‘‘क्या हाल है? क्या मुझे बैठने तक को नहीं कहोगे?’’

‘‘कैसी बात कर रही हो, आओ तुम्हारा ही घर है.’’ बंटी ने कहा तो सुखदेवी वहीं पड़ी चारपाई पर बैठ गई.

सुखदेवी ने बैठते ही बंटी को देखा और कहने लगी, ‘‘क्या बात है आजकल तुम घर नहीं आते? मुझ से कोई गलती हो गई है कि उस दिन तुम बिना कुछ कहे घर से चले आए.’’

बंटी मूक बैठा बस सुखदेवी को निहारे जा रहा था. सुखदेवी ने जब उसे चुप देखा तो बंटी के करीब पहुंच कर वह बैठ गई और उस के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोली, ‘‘बोलो न क्या हुआ? तुम इतने चुपचुप क्यों हो, क्या कोई बात है जो तुम्हें बुरी लग गई है. मुझे बताओ न, तुम तो हमेशा हंसते थे, मुझ से ढेर सारी बातें करते थे. मगर अब क्या हुआ है तुम्हें, तुम इतने खामोश क्यों हो?’’

मगर उधर बंटी तो एक अलग ही दुविधा में फंसा हुआ था. सुखदेवी की बातों को सुन कर अचानक ही बंटी उस की ओर घूमा और उसे बड़े गौर से देखने लगा. तभी सुखदेवी ने उस से पूछा कि वह क्या देख रहा है, मगर बंटी जड़वत हुआ उसे घूरता ही जा रहा था. सुखदेवी भी उस की निगाह के एहसास को महसूस कर रही थी, शायद इसलिए वह भी खामोश नजरें झुकाए वहीं बैठी रही थी. बंटी उस से प्रेम का इजहार करना चाहता था, मगर इस दुविधा में उलझा हुआ था कि वह मेरी तहेरी बहन है. मगर अंत में प्रेम की विजय हुई. उस ने सुखदेवी के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया. बंटी के इस व्यवहार से सुखदेवी थोड़ा घबरा गई. मगर अपनी धड़कनों पर काबू पा कर उस ने अपनी दोनों मुट्ठियों को बहुत जोर से भींचा और अपनी आंखें बंद कर लीं.

तभी बंटी ने उस से आंखें खोलने को कहा, मगर सुखदेवी हिम्मत न कर सकी. फिर दोबारा कहने पर सुखदेवी ने अपनी पलकें उठाईं और फिर तुरंत झुका लीं. तभी बंटी ने उस की आंखों को चूम लिया. सुखदेवी घबरा गई’ उस ने वहां से उठना चाहा. मगर बंटी ने उसे उठने नहीं दिया. वह शर्म के मारे कांपने लगी. उस के होंठों की कंपकंपाहट से बंटी अच्छी तरह वाकिफ था. मगर वह तो उस दिन अपने प्यार का इजहार कर देना चाहता था. तभी उस ने सुखदेवी की कलाई पकड़ कर कहा, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, मैं सचमुच तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

बंटी की इन बातों को सुन कर सुखदेवी आश्चर्यचकित हो गई और उस ने बंटी को समझाना चाहा, मगर बंटी तो अपनी जिद पर ही अड़ा रहा. सुखदेवी ने कहा, ‘‘बंटी, मैं तुम्हारी बहन हूं. हमारा प्यार कोई कैसे स्वीकार करेगा.’’

मगर बंटी ने इन सब बातों को खारिज करते हुए सुखदेवी को अपनी बांहों में समेट लिया और बड़े प्यार से उस के होंठों पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. सुखदेवी के लिए यह किसी पुरुष का पहला स्पर्श था, जिस ने उसे मदहोश होने पर मजबूर कर दिया और बंटी की बांहों में कसमसाने लगी. सुखदेवी चाह कर भी अपने आप को उस से अलग नहीं कर पा रही थी. लगातार कुछ क्षणों तक चले इस प्रेमालाप से सुखदेवी मदमस्त हो गई, तभी अचानक बंटी उस से अलग हो गया. प्यार को लग गई हवा सुखदेवी तड़प उठी. बंटी के स्पर्श से छाया खुमार जल्दी ही उतरने लगा. वह बिना कुछ कहे घर के दरवाजे की तरफ बढ़ी तो पीछे से बंटी ने उसे कई आवाजें लगाईं, मगर सुखदेवी नजरें झुकाए चुपचाप बाहर चली गई.

बंटी घबरा सा गया. उस के दिल में हजारों सवाल सिर उठाने लगे और इसी दुविधा में फंसा रहा कि सुखदेवी उस का प्यार ठुकरा न दे या कहीं ताऊताई को उस की इस हरकत के बारे में न बता दे. इसी सोच में बंटी परेशान रहा और पूरी रात सो न सका, बस बिस्तर पर करवटें बदलता रहा. उधर सुखदेवी का हाल भी बंटी से जुदा न था. वह भी पूरे रास्ते बंटी द्वारा कहे हर लफ्ज के बारे में सोचती गई. घर पहुंच कर बिना कुछ खाएपीए वह अपने बिस्तर पर लेट गई. मगर उस की आंखों में नींद भी कहां थी. वह भी इसी सोच में डूबी रही. बंटी का प्यार दस्तक दे चुका था. वह भी बिस्तर पर पड़ीपड़ी करवटें बदलती जा रही थी. सुखदेवी भी अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाई और वह भी बंटी से प्यार कर बैठी. अपने इस फैसले को दिल में लिए सुखदेवी बहुत बेकरारी से सुबह का इंतजार करने में लगी रही.

पूरी रात आंखोंआंखों में कटने के बाद सुखदेवी सुबह जल्दीजल्दी घर का सारा काम कर के अपनी मां को बता कर बंटी के घर चली गई. सुखदेवी के कदम खुदबखुद आगे बढ़ते जा रहे थे. वह बस कभी बंटी के प्रेम स्नेह के बारे में सोचती तो कभी समाज व लोकलाज के बारे में, रास्ते में जाते वक्त कई बार वापस होने को सोचा, मगर हिम्मत न जुटा सकी. क्योंकि बंटी के उस जुनून को भी भुला नहीं पा रही थी. लेकिन कहीं न कहीं उस के दिल में भी बंटी के लिए प्रेम की भावना उछाल मार रही थी. इन्हीं सोचविचार में वह बंटी के घर के दरवाजे पर पहुंच गई लेकिन अंदर जाने की हिम्मत न जुटा सकी. तभी बंटी की नजर उस पर पड़ गई और फिर उसे अंदर जाना ही पड़ा.

उधर बंटी का चेहरा एकदम पीला पड़ा हुआ था. बस एक रात में ही ऐसा लग रहा था कि वह कई दिनों से बिना कुछ खाएपीए हो. उस की आंखें लाल थीं, जिस से साफ पता चल रहा था कि वह न तो रात भर सोया है और न ही कुछ खायापीया है. उस की आंखों को देख कर सुखदेवी समझ चुकी थी कि वह बहुत रोया है. सुखदेवी को इस का आभास हो चुका था कि बंटी उस से अटूट प्रेम करता है. उस ने आते ही बंटी से पूछ लिया कि वह रोया क्यों था? बस फिर क्या था, इतना सुनते ही बंटी की आंखें फिर छलक आईं. उस की आंखों से छलके आसुंओं ने सुखदेवी को इस दुविधा में उतार दिया कि अब उसे न समाज की सोच, न अपने परिजनों का भय रह गया, वह उस से लिपट गई और उस के चेहरे को चूमने लगी.

उस के बाद उस ने अपने हाथों से बंटी को खाना खिलाया. फिर दोनों तन्हाई में एक कमरे मे बैठ गए. तन्हाई के आलम में बंटी से रहा न गया और उस ने सुखदेवी को अपनी बांहों में भर लिया, सुखदेवी ने विरोध नहीं किया. दोनों ने लांघ दी सीमाएं सुखदेवी ने इस से पहले कभी ऐसे एहसास का अनुभव नहीं किया था. बंटी का हर स्पर्श सुखदेवी की मादकता को और भड़का रहा था. उस दिन बंटी ने सुखदेवी को पूरी तरह पा लिया. सुखदेवी को भी यह अनुभव आनन्दमई लग रहा था. उसे वह सुख प्राप्त हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था. उस दिन के बाद सुखदेवी के मन में भी बंटी के लिए प्यार और बढ़ गया. अब उस के लिए बंटी सब कुछ था.

एक बार जब उस पर जिस्मानी ताल्लुकात कायम हुआ तो बस यह सिलसिला चलता ही रहा. दोनों घंटोंघंटों बातें करते. एकदूसरे के बगैर दोनों के लिए रहना अब मुश्किल होता जा रहा था. लेकिन एक दिन उन के प्यार का भेद उन के परिजनों के सामने खुल गया तो कोहराम सा मच गया. उन को समझाया गया कि उन के बीच खून का संबंध होने के कारण उन की शादी नहीं हो सकती लेकिन वे प्रेम दीवाने कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे. आखिर रिश्ते में दोनों भाईबहन थे, ऐसे में समाज उन की शादी पर अंगुलियां उठाता और उन का जीना मुहाल हो जाता. परिजनों के विरोध से दोनों परेशान रहने लगे. इसी बीच बंटी के परिजनों ने उस की शादी बदायूं जनपद के गांव तिमरुवा निवासी एक युवती से तय कर दी.

शादी की तारीख तय हुई 26 जून, 2020. इस से सुखदेवी तो परेशान हुई ही बंटी भी बेचैन हो उठा. बेचैनी में काफी देर तक वह सोचता रहा, फिर उस ने फैसला कर लिया कि वह अब अपने प्यार को ले कर कहीं और चला जाएगा, जहां प्यार के दुश्मन उन को रोक न सकें. अपने फैसले से उस ने सुखदेवी को भी अवगत करा दिया. सुखदेवी भी उस के साथ घर छोड़ कर दूर जाने को तैयार हो गई. शादी की तारीख से एक दिन पहले 25 जून, 2020 को बंटी सुखदेवी को घर से ले कर भाग गया. उन के भाग जाने की भनक दोनों के घर वालों को लग गई. उन्होंने तलाशा लेकिन कोई पता नहीं चला. प्रेमी युगल के मिले शव पहली जुलाई को गढ़ा गांव के जंगल में देवराज उर्फ दानवीर के यूकेलिप्टस के बाग में बंटी और सुखदेवी की लाशें शीशम के एक पतले  से पेड़ पर लटकी मिलीं.

गांव के कुछ लड़के उधर आए तो उन्होंने यह देखी थीं. दोनों के घर वालों को उन लड़कों ने जानकारी दे दी. सूचना पा कर बंटी के घर वाले और गांव के लोग तो पहुंच गए, लेकिन सुखदेवी के घर वाले वहां नहीं पहुंचे. संबंधित थाना धनारी को घटना की सूचना दे दी गई. सूचना पा कर इंसपेक्टर सतेंद्र भड़ाना कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थानाप्रभारी की सूचना पर एएसपी आलोक जायसवाल और सीओ (गुन्नौर) डा. के.के. सरोज भी वहां पहुंच गए. सुखदेवी और बंटी की लाशें एक ही पेड़ से लटकी हुई थीं. सुखदेवी के गले में हरे रंग के दुपट्टे का फंदा था तो बंटी के गले में प्लास्टिक की रस्सी का. दोनों के चेहरे किसी तेजाब जैसे पदार्थ से झुलसे हुए थे. प्रथमदृष्टया मामला आत्महत्या का था, लेकिन दोनों के चेहरे झुलसे होने से हत्या का शक भी जताया जा रहा था.

फिलहाल मौके पर मौजूद मृतक बंटी के पिता बिन्नामी से पुलिस अधिकारियों ने आवश्यक पूछताछ की. फिर इंसपेक्टर सतेंद्र भड़ाना को दिशानिर्देश दे कर दोनों अधिकारी चले गए. इस के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर भड़ाना ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का सही कारण नहीं आ पाया. 7 जुलाई, 2020 को सुखदेवी के भाई 25 वर्षीय कुलदीप उर्फ सूखा का गढ़ा के जंगल में नीम के पेड़ से लटका शव मिला. जहां सुखदेवी और बंटी के शव मिले थे, उस से कुछ दूरी पर ही कुलदीप का शव मिला. थानाप्रभारी सतेंद्र भड़ाना  पुलिस टीम के साथ वहां पहुंचे. सीओ के.के. सरोज भी फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए.

कुलदीप का शव प्लास्टिक की रस्सी से लटका हुआ था और उस का चेहरा भी तेजाब से झुलसा हुआ प्रतीत हो रहा था. लाश का निरीक्षण करने पर पता चला कि तीनों की मौत का तरीका एक जैसा ही था. मुआयना करने के बाद पुलिस को इस मामले में भी हत्या की साजिश नजर आ रही थी. पहले बंटी व सुखदेवी की मौत और अब सुखदेवी के भाई कुलदीप की मौत सिर्फ आत्महत्या नहीं हो सकती थी. हां, आत्महत्या का रूप दे कर हत्यारों ने गुमराह करने का प्रयास जरूर किया था. कुलदीप के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि कुलदीप 25 जून से ही लापता था. लेकिन सुखदेवी और बंटी की मौत के बाद घर वाले पुलिस के पास जाने से डर रहे थे, इसलिए पुलिस तक सूचना नहीं पहुंची.

गढ़ा गांव में 3 हत्याओं के बाद एसपी यमुना प्रसाद एक्शन में आए. उन्होंने शीघ्र ही केस का खुलासा करने के निर्देश इंसपेक्टर सतेंद्र भड़ाना को दिए. मृतक बंटी के पिता बिन्नामी की तहरीर पर इंसपेक्टर भड़ाना ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302/201/34 के तहत मुकदमा थाने में दर्ज करा दिया. इस के बाद थानाप्रभारी ने सुखदेवी के घर वालों से पूछताछ की तो सुखदेवी का भाई विनीत उर्फ लाला और किशोरी घर से गायब मिले. पुलिस ने दोनों की तलाश की तो गढ़ा के जंगल से दोनों को हिरासत में ले लिया. उन से पूछताछ की गई तो इन 3 हत्याओं का परदाफाश हो गया. उन से पूछताछ में कई और लोगों के शामिल होने का पता चला.

इस के बाद पुलिस ने गढ़ा गांव के ही जगपाल यादव उर्फ मुल्लाजी और श्योराज को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में सभी ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और घटना के बारे में विस्तार से बता दिया. पता चला कि सुखदेवी और बंटी के घर से लापता हो जाने के बाद उन के घर वाले काफी परेशान हो गए थे. जबकि बंटी सुखदेवी के साथ अपने गन्ने के खेत में छिप गया था. गांव के जगपाल यादव उर्फ मुल्लाजी ने 26 जून को उन्हें देख लिया. उस ने दोनों के खेत में छिपे होने की बात जा कर सुखदेवी के भाई विनीत उर्फ लाला को बता दी. विनीत ने यह बात अपने भाई किशोरी और गांव के श्योराज को बताई. समाज में बदनामी के डर से विनीत ने जगपाल से अपनी बहन सुखदेवी और बंटी को मारने की बात कही और बदले में ढाई लाख रुपया देने को कहा. जगपाल पेशे से अपराधी था, इसलिए वह हत्या करने को तैयार हो गया.

विनीत ने उसे ढाई लाख रुपए ला कर दे दिए. इस के बाद योजना बना कर रात 11 बजे चारों बंटी के खेत में पहुंचे. वे शराब और तेजाब की बोतल साथ ले गए थे. वहां पहुंच कर चारों ने बंटी और सुखदेवी को दबोच लिया. श्योराज ने बंटी को जबरदस्ती शराब पिलाई. फिर श्योराज पास में ही जगपाल के ट्यूबवेल पर पड़े छप्पर में लगी प्लास्टिक की रस्सी निकाल लाया. इस के बाद सुखदेवी के गले को उसी के हरे रंग के दुपट्टे से और बंटी के गले को प्लास्टिक की रस्सी से घोंट कर मार डाला. इसी बीच विनीत का छोटा भाई 25 वर्षीय कुलदीप उर्फ सूखा वहां आ गया. उस ने दोनों हत्याएं करते उन लोगों को देख लिया. विनीत ने उसे समझाबुझा कर वहां से वापस घर भेज दिया. इस के बाद वे लोग दोनों की लाशों को कुछ दूरी पर देवराज यादव उर्फ दानवीर के यूकेलिप्टस के बाग में ले गए.

वहां शीशम के पेड़ से दोनों की लाशों को दुपट्टे व रस्सी की मदद से लटका दिया. इस के बाद उन की पहचान मिटाने के लिए दोनों के चेहरों पर तेजाब डाल दिया. फिर वापस अपने घरों को लौट गए. कुलदीप को दौरे पड़ते थे, उन दौरों की वजह से उस का दिमाग भी सही नहीं था, उस पर भरोसा करना ठीक नहीं था. वह घटना का लगातार विरोध भी कर रहा था. इस पर चारों लोगों ने योजना बनाई कि कुलदीप को भी मार दिया जाए, नहीं तो वह उन लोगों का भेद खोल देगा. 2 जुलाई, 2020 को विनीत और उस के तीनों साथी कुलदीप को बहाने से रात को जंगल में ले गए. वहां गांव के नेकपाल यादव के खेत में कुलदीप का गला पीले रंग के दुपट्टे से घोंट कर उस की हत्या कर दी और उस की लाश को नीम के पेड़ से दुपट्टे से बांध कर लटका दिया.

और उस के चेहरे पर भी तेजाब डाल दिया. फिर निश्चिंत हो कर घरों को लौट गए. कुलदीप की हत्या उन के लिए बड़ी गलती साबित हुई. थानाप्रभारी सतेंद्र भड़ाना ने अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या के एवज में दिए गए ढाई लाख रुपए, शराब के खाली पव्वे और तेजाब की खाली बोतल बरामद कर ली. फिर आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद चारों अभियुक्तों विनीत उर्फ लाला, किशोरी, जगपाल और श्यौराज को न्यायालय में पेश किया गया, वहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Rajasthan Crime News : गहनों के लालच में दोस्तों ने वकील की कर दी गला घोंटकर हत्या

Rajasthan Crime News : वकील नारायण सिंह राठौड़ को सोने के आभूषण पहनने का शौक था, लेकिन उन लोगों की तरह नहीं जो सोने की चेन, कड़ा या ब्रैसलेट पहनते हैं. वह सवाडेढ़ किलो सोने के आभूषण पहनते थे. इतना ही नहीं, वकील साहब पैसे ले कर इच्छुक लोगों के साथ फोटो भी खिंचाते थे. लेकिन उन का दिखावे का यही शौक…

इसी साल मई की बात है. तारीख थी 28. जगह राजस्थान के पाली जिले का सोजत सिटी. सोजत सिटी की मेहंदी पूरे देश में प्रसिद्ध है. इसी सोजत सिटी थाना क्षेत्र में चंडावल के पास एक गांव है छितरिया. इस गांव की सरहद में मुख्य सड़क मार्ग से सटी हुई एक बावड़ी है. गरमी का मौसम होने के कारण आसपास के गांवों के लोग सुबह इस बावड़ी की तरफ टहलने चले जाते हैं. उस दिन टहलने आए लोगों ने बावड़ी के पानी में एक इंसान की लाश तैरती देखी. लोगों ने लाश को पहचानने की कोशिश की, लेकिन आसपास के गांवों का कोई भी व्यक्ति उस की शिनाख्त नहीं कर सका. लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने पर सोजत सिटी थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने गांव वालों की मदद से बावड़ी से लाश निकलवाई. मृतक के सिर और गले में चोटों के गंभीर घाव थे. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश के बारे में पूछा. कुछ पता नहीं चलने पर आसपास के गांवों के लोगों को बुला कर लाश की शिनाख्त कराने का प्रयास किया गया, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इस पर सोजत सिटी थानाप्रभारी रामेश्वरलाल भाटी ने उच्चाधिकारियों को इस घटना की सूचना दे दी. इस से पहले 27 मई की रात को करीब 9-साढ़े 9 बजे पाली जिले में ही जैतारण थाना इलाके के चांवडिया कलां, अगेवा के पास मेगा हाइवे पर एक जलती हुई कार मिली थी. इस जलती हुई कार का वीडियो रात को ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था.

पुलिस को सूचना मिली, तो मौके पर पहुंची. वहां पुलिस ने आसपास पता करने का प्रयास किया, लेकिन न तो यह पता चला कि कार किस की है और न ही इस बात की जानकारी मिली कि कार में किस ने आग लगाई थी. पुलिस को कार के आसपास कोई आदमी भी नहीं मिला. रात ज्यादा हो गई थी. इसलिए एक कांस्टेबल को मौके पर छोड़ कर जैतारण थाना पुलिस थाने लौट गई थी. जलती हुई कार मिलने के दूसरे दिन सुबह ही बावड़ी में लाश मिलने की सूचना पर सोजत सिटी डीएसपी डां. हेमंत जाखड़ और एसपी राहुल कोटोकी मौके पर पहुंचे. उन्होंने भी मौकामुआयना किया, लोगों से पूछताछ की. लाश के कपड़ों की तलाशी ली गई, लेकिन ऐसी कोई चीज नहीं मिली जिस से उस शख्स की पहचान हो पाती. अंतत: पुलिस ने लाश को सोजत अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारियों को संदेह हुआ कि जलती हुई मिली कार और बावड़ी में मिली लाश का आपस में कोई संबंध हो सकता है. हालांकि इन दोनों जगहों के बीच करीब 15 किलोमीटर का फासला था. फिर भी संदेह की अपनी वजह थी. पाली जिले के पुलिस अफसर दोनों मामलों की कडि़यां जोड़ने के प्रयास में जुटे थे, इसी बीच सूचना मिली कि जोधपुर जिले के बिलाड़ा में रहने वाले वकील नारायण सिंह राठौड़ 27 मई की दोपहर से लापता हैं. इस सूचना से पुलिस को संदेह हुआ कि लाश कहीं वकील साहब की ही तो नहीं है. पाली जिले की पुलिस ने जोधपुर जिले की पुलिस को इत्तला कर वकील नारायणसिंह के परिवार वालों को सोजत सिटी बुलवाया.

दोपहर में वकील साहब के परिवार वाले सोजत सिटी पहुंच गए. पुलिस ने उन्हें सुबह चंडावल के पास छितरिया गांव की सरहद में बावड़ी में मिली लाश दिखाई. लाश देखते ही परिवार वालों ने रोनापीटना शुरू कर दिया. लाश वकील साहब की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने वकील साहब के परिवार वालों को जैतारण ले जा कर वह कार दिखाई, जो एक दिन पहले रात को चांवडि़या कलां की अगेवा सरहद में मेगा हाइवे पर जलती हुई हालत में मिली थी. कार वकील साहब की ही निकली. पाली पुलिस ने जोधपुर के बिलाड़ा से आए वकील साहब के बेटे सतपाल सिंह राठौड़ से वकील साहब के लापता होने के बारे में सारा किस्सा पूछा.

सतपाल सिंह राठौड़ ने रोतेबिलखते बताया कि उन के 68 वर्षीय पिता नारायण सिंह बिलाड़ा के जानेमाने वकील रहे हैं. वकील साहब सोने का हार और अन्य भारीभरकम आभूषण पहनने के शौकीन थे. वे करीब सवा, डेढ़ किलो सोने के आभूषण पहनते थे. इसलिए उन्हें बिलाड़ा और आसपास ही नहीं जोधपुर तक के लोग ‘गोल्डन मैन’ के नाम से जानते थे.  सोने के आभूषण पहन कर वे लोगों के साथ फोटो सेशन भी कराते थे. वे फोटो सेशन का 2-4 हजार रुपया भी लेते थे.

कहां गए, वकील साहब बेटे सतपाल सिंह ने पुलिस को बताया कि उन के पिता नारायण सिंह 27 मई को दोपहर करीब एक बजे किसी पार्टी में जाने की बात कह कर घर से गए थे. वे दोपहर ढाई बजे वापस घर लौट आए थे. इस के कुछ ही देर बाद उन के पास किसी का फोन आया था. फोन आने के बाद वकील नारायण सिंह ने घर पर करीब एक किलो वजनी सोने का हार, साफे पर लगने वाली सोने की कलंगी सहित सोने के अन्य आभूषण पहने. इस के बाद दोपहर करीब 3-पौने 3 बजे वह परिवार वालों को यह कह कर घर से निकले कि किसी ने फोटो खिंचवाने के लिए बुलाया है. फोटो खिंचवा कर वापस लौट आऊंगा. वे घर से अपनी नैनो कार में गए थे.

दोपहर करीब 3 बजे घर से निकले वकील साहब जब रात तक वापस घर नहीं पहुंचे, तो परिवार वालों को चिंता हुई. चिंता होना स्वाभाविक था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि वकील साहब बिना बताए घर से बाहर रहे हों. अगर उन्हें बाहर रहना भी पड़ता था, तो परिवार वालों को इस की सूचना जरूर देते थे. उस दिन न तो वकील साहब ने कोई सूचना दी और न ही यह बता कर गए कि कहां जा रहे हैं. परिवार वालों ने उन के मोबाइल पर बात करने का प्रयास किया, लेकिन काफी प्रयासों के बाद भी बात नहीं हो सकी. वकील साहब की चिंता में परिवार वालों ने पूरी रात सोतेजागते गुजारी. चिंता इस बात की थी कि वकील साहब ने सवा-डेढ़ किलो सोने के आभूषण पहने हुए थे.

रात तो जैसेतैसे निकल गई. दूसरे दिन 28 मई को सुबह भी घर वालों को वकील साहब की कोई खैरखबर नहीं मिली. न ही उन से मोबाइल पर बात हुई. थकहार कर परिवार वालों ने सुबह ही बिलाड़ा पुलिस थाने में वकील साहब की गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस बीच, पाली जिले से पुलिस की सूचना मिलने के बाद वकील साहब के परिवार वाले सोजत आ गए थे. लाश और कार की पहचान होने के बाद वकील साहब के बेटे सतपाल सिंह राठौड़ ने उसी दिन सोजत सिटी थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. उन्होंने रिपोर्ट में कहा कि उन के पिता नारायण सिंह की हत्या लूट के मकसद से की गई थी. वे करीब सवा किलो सोने के आभूषण पहने हुए थे.

पुलिस ने सतपाल सिंह से उन के पिता की हत्या में किसी पर शक के बारे में पूछा. चूंकि सतपाल सिंह को यह पता ही नहीं था कि उन के पिता किस के बुलावे पर फोटो खिंचवाने गए थे, इसलिए उन्होंने किसी पर सीधा शक नहीं जताया, लेकिन यह जरूर बताया कि उन के पिता ने एक व्यक्ति के खिलाफ जोधपुर के बिलाड़ा थाने में जमीन को ले कर धोखाधड़ी के 2 मामले दर्ज कराए थे. सोजत पुलिस ने सतपाल सिंह से वकील साहब के बारे में और जरूरी बातें पूछीं. इस के बाद अस्पताल में शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उन को सौंप दिया. दोनों जगह मौके के हालात और सतपाल सिंह की ओर से सोजत थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट के आधार पर यह बात साफ हो गई कि वकील साहब की हत्या उन के कीमती आभूषण लूटने के लिए की गई है.

परिचित ने ही फंसाया जाल में लूटपाट के लिए वकील की हत्या का मामला गंभीर था. इसलिए पाली के एसपी राहुल कोटोकी ने एडिशनल एसपी तेजपाल, सोजत सिटी डीएसपी डा. हेमंत जाखड़ और जैतारण डीएसपी सुरेश कुमार के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में सोजत सिटी थानाप्रभारी रामेश्वर लाल भाटी, जैतारण थानाप्रभारी सुरेश चौधरी, सायबर तथा स्पैशल टीम के साथसाथ 25 पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. पाली पुलिस को वकील साहब का मोबाइल न तो लाश के साथ मिला और न ही जली हुई कार में. उन के मोबाइल से हत्या का खुलासा हो सकता था. पुलिस ने सब से पहले वकील नारायण सिंह के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स के आधार पर पता लगाया गया कि 27 मई को वकील साहब की किनकिन लोगों से बात हुई थी.

पुलिस ने उन लोगों से पूछताछ की. इस के अलावा जोधपुर के बिलाड़ा में वकील साहब के परिचितों से भी कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटाई गईं. लोगों से की गई पूछताछ और तकनीकी सहायता से पुलिस ने दूसरे ही दिन यानी 29 मई को 3 लोगों उमेश सोनी, प्रभु पटेल और अर्जुन देवासी को गिरफ्तार कर लिया. इन में उमेश सोनी बिलाड़ा का ही रहने वाला था, जबकि प्रभु पटेल बिलाड़ा के पास हांगरों की ढीमड़ी का और अर्जुन देवासी बिलाड़ा के पास हर्ष गांव का रहने वाला था. ये तीनों दोस्त थे. इन तीनों से पुलिस की पूछताछ के बाद गोल्डनमैन वकील की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इन के लालच के साथ विश्वासघात की भी कहानी थी.

बिलाड़ा का रहने वाला उमेश सोनी वकील नारायण सिंह का अच्छा परिचित था. अदालतों में उमेश के कुछ मुकदमे चल रहे थे, नारायण सिंह ही उस के मुकदमों की पैरवी करते थे. उमेश को वकील साहब के सोने के आभूषण पहनने के शौक से ले कर घरपरिवार की तमाम बातों की जानकारी थी. उसे यह भी पता था कि वकील साहब 4-5 हजार रुपए ले कर सोने के आभूषण पहन कर फोटो खिंचवाते हैं. ऐसे फोटो सेशन करवाने के लिए एकदो बार वह भी वकील साहब के साथ गया था. वकील साहब को सवा-डेढ़ किलो सोने के आभूषण पहने देख कर उस के मन में लालच आ गया था. सोने के उन आभूषणों की कीमत करीब 60 लाख रुपए थी. वकील साहब को सोने के आभूषण पहने देख कर उमेश भी सपने में खुद आभूषण पहने हुए देखने लगा.

अपने सपनों को पूरा करने के लिए उमेश ने अपने दोस्त प्रभु पटेल को वकील साहब के सोने के आभूषण के शौक के बारे में बताया. बिलाड़ा के पास के ही रहने वाले प्रभु पटेल को पहले से ही वकील साहब के इस शौक का पता था. टैक्सी चलाने वाला प्रभु भी वकील साहब के सोने के आभूषणों के सपने में खोया रहता था. अर्जुन इन दोनों का दोस्त था और इन के साथ ही रहता था. तीनों दोस्तों ने मिल कर वकील साहब के सोने के आभूषण हथियाने की योजना बनाई. लेकिन आभूषण हथियाना आसान काम नहीं था. कई दिन विचार करने के बाद तीनों दोस्तों ने वकील साहब को फोटो खिंचवाने के बहाने बुलाने और उन की हत्या कर सोने के आभूषण हथियाने का फैसला किया.

योजना के अनुसार, 27 मई को दोपहर में उमेश सोनी ने नारायण सिंह को फोन किया. उस ने वकील साहब से कहा कि एक आदमी उन के साथ सोना पहन कर सेल्फी लेना चाहता है. इस के बदले में वह ढाई हजार रुपए देगा. पहले से अच्छी तरह परिचित उमेश की बात पर भरोसा कर वकील नारायण सिंह ने घर से निकलवा कर 940 ग्राम सोने का बड़ा हार, 250 ग्राम वजनी सोने का दूसरा हार और 140 ग्राम वजनी सोने का पट्टा पहना. सोने के ये आभूषण पहन कर वे दोपहर करीब पौने 3 बजे घर से अपनी नैनो कार में निकले. उमेश ने फोन पर कहा था कि वह उन के घर से कुछ दूर रास्ते में मिल जाएगा. फिर साथ चलेंगे. वकील साहब के घर से निकलने के बाद कुछ ही दूरी पर उमेश सोनी मिल गया.

उस के साथ प्रभु पटेल के अलावा एक युवक और था. प्रभु पटेल को भी वकील साहब पहले से जानते थे. उमेश ने तीसरे युवक का परिचय कराते हुए वकील साहब को बताया कि यह अर्जुन देवासी है. अर्जुन का एक जानकार आदमी आप के साथ सेल्फी लेना चाहता है. परिचय कराने के बाद उमेश, प्रभु और अर्जुन वकील साहब की ही कार में बैठ गए. उमेश ने बिलाड़ा से अटबड़ा सड़क मार्ग पर रास्ते में बीयर की बोतलें खरीद ली. वकील साहब सहित चारों ने कार में बैठ कर बीयर पी. इस के बाद उमेश ने नशा होने की बात कह कर वकील साहब को कार की ड्राइविंग सीट से उठाया और खुद कार चलाने लगा. उस ने वकील साहब को आगे की सीट पर अपने पास बैठा लिया. पीछे की सीट पर प्रभु पटेल और अर्जुन देवासी बैठे थे.

बिलाड़ा से करीब 10 किलोमीटर दूर अटबड़ा के पास सड़क पर सुनसान जगह देख कर कार में पीछे बैठे प्रभु और अर्जुन ने गमछे से वकील साहब का गला दबा दिया. आगे ड्राइविंग सीट पर बैठे उमेश ने उन के दोनों हाथ पकड़ लिए. गमछे से दबा होने के कारण वकील साहब के मुंह से आवाज भी नहीं निकल सकी. कुछ देर छटपटाने के बाद उन के प्राण निकल गए. यह दोपहर करीब साढ़े 3-4 बजे के बीच की बात थी. जब तीनों को विश्वास हो गया कि वकील साहब जीवित नहीं हैं, तब उन्होंने उन के गले में पहना हार और साफे पर लगी कलंगी सहित सोने का पट्टा उतार कर अपने पास रख लिए.

अभी दिन का समय था, इसलिए लाश को ठिकाने लगाना भी मुश्किल था. इसलिए तीनों दोस्त वकील साहब की कार में उन की लाश को ले कर सड़क के किनारे पेड़ों की ओट में छिप कर खड़े रहे. शाम को जब अंधेरा होने लगा, तब कार में पड़ी वकील साहब की लाश की निगरानी के लिए अर्जुन को छोड़ कर उमेश और प्रभु किसी वाहन से बिलाड़ा आ गए. वजह यह थी कि नैनो कार में पैट्रोल कम था. बिलाड़ा से उमेश ने अपनी इंडिका कार ली. साथ ही एक जरीकेन में 5 लीटर पैट्रोल भी रख लिया. लौट कर उमेश और प्रभु वापस वहां पहुंच गए, जहां अर्जुन को छोड़ा था. तब तक शाम के करीब साढ़े 7 बज गए थे. इन लोगों ने जरीकेन से वकील साहब की कार में पैट्रोल भरा.

लाश ठिकाने लगा कर कार भी फूंकी अब उन के पास वकील साहब की कार के अलावा उमेश की कार भी थी. एक कार उमेश ने चलाई और दूसरी प्रभु ने. तीनों लोग 2 कारों से छितरिया गांव के पास बावड़ी पर पहुंचे. वहां उन्होंने वकील साहब की लाश कार से निकाल कर बावड़ी में फेंक दी. इस के बाद वे वकील साहब की कार साथ ले कर चांवडि़या-अगेवा सरहद में मेगा हाइवे पर पहुंचे. हाइवे पर सुनसान जगह देख कर उन्होंने वकील साहब की कार एक साइड रोकी और जरीकेन से पैट्रोल छिड़क कर उस में आग लगा दी. पैट्रोल की तेज लपटों से अर्जुन देवासी का मुंह और एक हाथ भी जल गया. यह बात रात करीब साढ़े 8-9 बजे की है. वकील साहब की लाश ठिकाने लगाने और उन की कार जलाने के बाद उमेश, प्रभु और अर्जुन अपने घरों के लिए चल दिए.

रास्ते में तीनों ने तय किया कि फिलहाल प्रभु इन आभूषणों को अपने घर पर रख लेगा. एकदो दिन बाद बंटवारा कर लेंगे. सारी बातें तय कर के उमेश और प्रभु ने अर्जुन को उस के गांव के बाहर छोड़ दिया. उमेश को बिलाड़ा में छोड़ कर प्रभु पटेल ने सोने के आभूषण अपने फार्म पर बने कमरे के रोशनदान में छिपा कर रख दिए. प्रभु पटेल ने दूसरे दिन सुबह उमेश सोनी की मदद से वकील साहब से लूटे 140 ग्राम वजनी सोने के पट्टे में से एक टुकड़ा तोड़ कर गला दिया. सोने का यह 46 ग्राम का टुकड़ा उस ने 29 मई को जोधपुर में एक ज्वैलर को सवा लाख रुपए में बेच दिया. पाली के सोजत सिटी थाने में वकील साहब की हत्या की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की, तो काल डिटेल्स के आधार पर सब से पहले उमेश सोनी को पकड़ कर पूछताछ की.

सख्ती से पूछताछ में उमेश ने सारा राज उगल दिया. बाद में उसी दिन प्रभु पटेल और अर्जुन देवासी को भी पकड़ लिया गया. पुलिस ने बाद में इन से पूछताछ के आधार पर वकील साहब से लूटे गए सारे आभूषण और उमेश सोनी की इंडिका कार बरामद कर ली. इस के अलावा प्रभु पटेल से सोना खरीदने वाले जोधपुर के बनाड़ इलाके के लक्ष्मण नगर निवासी ज्वैलर धर्मेश सोनी को भी गिरफ्तार किया गया. आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उन के कोरोना जांच सैंपल दिलवाए. दूसरे दिन 30 मई को जांच रिपोर्ट मिली. इस में एक आरोपी उमेश सोनी पौजिटिव निकला. उस के पौजिटिव निकलने से जोधपुर के बिलाड़ा और पाली की जैतारण व सोजत सिटी थाना पुलिस सहित अधिकारियों में हड़कंप मच गया.

इस का कारण यह था कि आरोपियों को पकड़ने में तीनों ही थानों की पुलिस ने आपस में समन्वय बनाए रखा था. अधिकारियों ने भी इन से पूछताछ की थी. डाक्टरों की सलाह पर जैतारण और सोजत सिटी के डीएसपी सहित दोनों थानों के प्रभारी और करीब 20 पुलिसकर्मियों को होम क्वारेंटाइन कर दिया गया. सतर्कता के तौर पर बिलाड़ा में 49 लोगों के सैंपल लिए गए. मृतक वकील नारायण सिंह के परिवार सहित हत्या के तीनों आरोपियों के परिवारजनों को भी होम आइसोलेट कर दिया गया. बहरहाल, वकील के कातिल पकड़े गए. उन की निशानदेही पर आभूषणों की बरामदगी भी हो गई. खास बात यह रही कि वकील के बेटे ने पुलिस में दर्ज कराई रिपोर्ट में एक किलो 330 ग्राम सोने के आभूषण लूटे जाने की बात कही थी, लेकिन बरामद हुए आभूषणों का वजन करीब डेढ़ किलो निकला.

इस का कारण यह था कि वकील के बेटे को भी पिता के पहने आभूषणों का सही वजन पता नहीं था. आमतौर पर जेवर, नकदी की लूट में सारे माल की बरामदगी पुलिस के लिए टेड़ी खीर होती है, क्योंकि मुलजिम सब से पहले लूटी हुई कीमती चीजों को खुदबुर्द करते हैं. इस मामले में आरोपी 24 घंटे में ही पकड़े गए. इसलिए उन को आभूषण ठिकाने लगाने का समय नहीं मिल सका. इसी कारण सारी ज्वैलरी बरामद हो गई. सोने का जो टुकड़ा ज्वैलर को बेचा था, वह भी बरामद हो गया. सोने के आभूषणों के लालच में उमेश, प्रभु और अर्जुन ने वकील की हत्या का जो जघन्य अपराध किया, उस की सजा उन्हें कानून देगा. गोल्डनमैन की हत्या दिखावा करने वालों के लिए एक सबक है.

Crime News : दोस्त का अपहरण करके मांगी 30 लाख की फिरौती

Crime News : पुलिस ने अगर संजीत के पिता चमन सिंह की बात पर जरा सा भी यकीन किया होता तो न तो संजीत की जान जाती और न 30 लाख रुपए. इस के बजाय पुलिस यही कहती और मानती रही कि संजीत अपनी किसी गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. इस का नतीजा…

कानपुर दक्षिण में काफी बड़े क्षेत्र में फैला एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है बर्रा. बड़े क्षेत्र को देखते हुए इसे कई भागों में बांटा गया है. चमन सिंह यादव अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के बर्रा 5 की एलआईजी कालोनी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कुसुमा देवी के अलावा एक बेटा था संजीत और एक बेटी रुचि यादव. चमन सिंह एक फैक्ट्री में काम करते थे. वह धनवान तो नहीं थे, पर घर में किसी चीज की कमी भी नहीं थी. चमन सिंह मृदुभाषी थे सो अड़ोसीपड़ोसी सभी से मिलजुल कर रहते थे. चमन सिंह खुद तो ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई थी. बेटी रुचि डीबीएस कालेज गोविंद नगर से बीएससी कर के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी थी, जबकि बेटे संजीत ने बीएससी नर्सिंग कर रखा था.

वह नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथोलौजी विभाग में बतौर लैब टेक्नीशियन कार्यरत था. उस का काम था मरीजों के खून का नमूना जांच हेतु एकत्र करना. फिर उसे जांच के लिए पैथोलौजी लैब ले जाना और जांच रिपोर्ट लाना. चमन सिंह की बेटी रुचि जौब की तलाश में थी, चमन सिंह बेटी का ब्याह कर देना चाहते थे. इस में उन की पत्नी कुसुमा की भी सहमति थी. इसी कवायद में चमन सिंह को रुचि के लिए राहुल यादव पसंद आ गया. राहुल बर्रा विश्व बैंक कालोनी में रहता था. उस के पिता राजेंद्र यादव पीएसी में तैनात थे. राहुल पसंद आया तो उन्होंने बेटी का रिश्ता तय कर दिया. रिश्ता तय हुआ तो चमन सिंह बेटी की शादी की तैयारी में जुट गए. उन्होंने बेटी के लिए जेवरात बनवा लिए तथा कैश का भी इंतजाम कर लिया.

संजीत का सपना था कि वह अपनी बहन को कार से ससुराल भेजेगा. कार खरीदने के लिए उस ने बैंक से 2 लाख का कर्ज भी ले लिया था. रुचि की शादी की तैयारियां चल ही रही थीं कि इसी बीच चमन सिंह को पता चला कि राहुल रुचि के लिए ठीक लड़का नहीं है. चमन सिंह ने अपने स्तर से पता लगाया तो बात सच निकली. इस के बाद उन्होंने पत्नी व बच्चों के साथ इस गंभीर समस्या पर विचारविमर्श किया और रुचि के भविष्य को देखते हुए रिश्ता तोड़ दिया. रिश्ता टूटने से राहुल और उस के घर वाले बौखला गए. राहुल, रुचि के पिता व भाई को मनाने में जुट गया, परंतु बात नहीं बनी. हर रोज की तरह 22 जून, 2020 को भी संजीत अस्पताल गया, लेकिन जब वह रात 10 बजे तक वापस घर नहीं आया, तब चमन सिंह व उस की पत्नी कुसुमा को चिंता हुई.

दरअसल संजीत रात 9 बजे तक हर हाल में घर आ जाता था. कभी उसे अस्पताल में रुकना होता था या कहीं और जाना होता तो वह अपनी मां या बहन को फोन कर के बता देता था. 10 बज गए थे. न वह आया था, न ही फोन पर बताया था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी बंद था. ज्योंज्यों समय बीतता रहा था, चमन सिंह, उन की पत्नी कुसुमा और बेटी रुचि की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. रुचि ने संजीत के अस्पताल फोन किया तो पता चला वह 7 बजे ही अस्पताल से चला गया था. पैथोलाजी लैब वह गया ही नहीं था. रुचि ने भाई के दोस्तों जिन्हें वह जानती थी, सब को फोन किया, कोई जानकारी नहीं मिली. मांबेटी और पिता रात भर फोन पर फोन करते रहे, लेकिन कहीं से भी संजीत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

सुबह का उजाला फैला तो पूरी कालोनी में संजीत के लापता होने की खबर फैल गई. पड़ोसी सांत्वना देने घर पहुंचने लगे. चमन सिंह ने कुछ खास पड़ोसियों से विचारविमर्श किया फिर बेटी रुचि को साथ ले कर जनता नगर पुलिस चौकी पहुंच गए. उस समय चौकी इंचार्ज राजेश कुमार चौकी पर मौजूद थे. चमन सिंह ने उन्हें एकलौते बेटे संजीत के लापता होने की जानकारी दी. साथ ही अपहरण की आशंका भी जताई. राजेश कुमार ने चमन सिंह से तहरीर ले ली, फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी किसी से दुश्मनी या जमीन वगैरह की रंजिश तो नहीं है. संजीत का लेनदेन में किसी से झगड़ाफसाद तो नहीं हुआ था.’’

‘‘सर, हम सीधेसादे लोग हैं. हमारी या बेटे संजीत की न तो किसी से रंजिश है, न ही लेनदेन का झगड़ा है.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ चौकीप्रभारी राजेश कुमार ने पूछा.

‘‘हां सर, मुझे राहुल यादव पर शक है.’’ चमन सिंह ने बताया.

‘‘वजह बताओ?’’ राजेश कुमार ने अचकचा कर पूछा.

‘‘सर, राहुल यादव, विश्व बैंक कालोनी बर्रा में रहता है. उस के पिता पीएसी में तथा चाचा मैनपुरी में दरोगा है. राहुल के साथ मैं ने अपनी बेटी रुचि का विवाह तय किया था. लेकिन कुछ कारणों से हम ने रिश्ता तोड़ दिया था. रिश्ता टूटने से राहुल बौखला गया. मुझे शक है कि इसी बौखलाहट में उस ने संजीत का अपहरण किया है.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ. मैं इस मामले को देखता हूं.’’ कह कर राजेश कुमार ने चमन सिंह को टरका दिया. उन्होंने न तो गुमशुदगी दर्ज की और न ही किसी से कोई पूछताछ की.

24 जून की सुबह 10 बजे चमन सिंह आशंका जताते हुए राहुल के खिलाफ नामजद तहरीर ले कर चौकी पहुंचे. तहरीर पढ़ते ही चौकीप्रभारी राजेश कुमार भड़क उठे, ‘‘तुम्हारा बेटा गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. किसी पर गलत आरोप लगाओगे तो भुगतना पड़ेगा. गलत होने पर मैं तुम्हारे खिलाफ मानहानि का मुकदमा लिख दूंगा, समझे.’’

चमन सिंह समझ गए कि यहां कोई काररवाई संभव नहीं है. अत: वह थाना बर्रा जा कर थानाप्रभारी रणजीत राय से मिले. उन्होंने उन्हें जनता नगर चौकी में दी गई तहरीर के आधार पर गुमशुदगी दर्ज न करने की बात बताई. इस पर वह नाराज होते हुए बोले, ‘‘हथेली पर सरसों मत उगाओ. तुम्हारा बेटा मिल जाएगा.’’

थाने से निराशा हाथ लगी तो चमन सिंह डीएसपी (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता और एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता से मिले और अपनी परेशानी बताई. लेकिन जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों ने भी उस के आंसुओं को नजरअंदाज कर दिया. दरअसल, पुलिस यह मान रही थी कि संजीत मौजमस्ती करने कहीं चला गया है. अगर उस का अपहरण हुआ होता तो अब तक फिरौती के लिए फोन आ गया होता. पुलिस की खुमारी तब टूटी जब 29 जून को फिरौती के लिए अपहर्त्ताओं का फोन आया. उन्होंने संजीत को सहीसलामत लौटाने के लिए 30 लाख रुपए मांगे थे. चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बताई. पुलिस ने उन्हें रुपयों का इंतजाम करने को कहा.

एक साधारण परिवार के लिए 30 लाख रुपए का इंतजाम करना आसान नहीं था. लेकिन सवाल एकलौते बेटे का था. चमन सिंह ने बेटी रुचि की शादी के लिए जो रकम सहेज कर रखी थी, वह और बेटी की शादी के लिए बनवाए गए जेवर बेच कर पैसा एकत्र किया. पर 30 लाख की रकम पूरी नहीं हो पाई. इस पर उन्होंने गांव की जमीन और मकान बेच दिया. पैसा एकत्र हो गया तो चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बता दी. इस बीच अपहर्त्ताओं  के फोन पर फोन आ रहे थे. उन का कहना था कि चाहे जैसे भी हो, 30 लाख रुपए जमा कर लो, बेटा अमित मिल जाएगा. रुचि हर रोज सारी बात पुलिस को बता रही थी. इस बीच संजीत के अपहरण को 3 हफ्ते बीत गए थे. इसे पुलिस की कमजोरी ही कहा जाएगा कि वह अपहर्त्ताओं का नंबर तक ट्रेस नहीं कर पाई थी.

रकम का इंतजाम हो जाने पर यह बात पुलिस को बता दी गई. इस पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने अपहर्त्ताओं को रंगेहाथों पकड़ने के लिए योजना तैयार की. इस के लिए क्राइम ब्रांच की टीम और सर्विलांस टीम को भी साथ लिया गया. चमन सिंह के परिवार को तो अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार था ही, पुलिस भी इंतजार कर रही थी. लेकिन अपहर्त्ताओं का फोन आया 12 जुलाई को. चमन सिंह ने उन्हें बता दिया कि रकम तैयार कर ली गई है. इस पर उन्होंने कहा कि 30 लाख की रकम बैग में भर कर तैयार रखो. जल्दी ही बता दिया जाएगा कि रकम कहां और कैसे देनी है. रुचि ने यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी.

उन्होंने पूरी टीम को सादे कपड़ों में तैयार रहने के लिए अलर्ट कर दिया.  लेकिन उस दिन अपहर्त्ताओं का फोन नहीं आया. उन का फोन आया 13 जुलाई की दोपहर में. अपहर्त्ताओं ने चमन सिंह से कहा कि शाम 5 बजे रकम का बैग ले कर वह गुजैनी हाइवे के फ्लाईओवर पर पहुंच जाएं. फ्लाईओवर से बैग नीचे फेंकना है. वे लोग पुल के नीचे रहेंगे. रकम मिलते ही संजीत को छोड़ दिया जाएगा. यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी गई. उन्होंने पुलिस टीम को तैयार रहने का आदेश दे दिया. ठीक 6 बजे पुलिस की 2 गाडि़यां फ्लाईओवर पर पहुंच गईं. एक गाड़ी में पुलिस जवानों के साथ अपर्णा गुप्ता थीं और दूसरी में सहयोगियों के साथ थानाप्रभारी रणजीत राय थे.

तभी रकम का बैग ले कर चमन सिंह मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. मोटरसाइकिल खड़ी कर के उस ने नीचे झांका. तभी अपहर्त्ताओं का फोन आ गया कि चंद कदम आगे जा कर बैग नीचे फेंक दो. चमन सिंह ने बैग नीचे फेंक दिया तो अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया. उन्होंने कहा कि थोड़ा आगे जा कर हनुमान मंदिर है, वहीं पहुंचो. संजीत मिल जाएगा. इस बीच पुलिस की निगाहें चमन सिंह पर ही जमी थीं. जैसे ही उस ने बैग फेंका, पुलिस अपहर्त्ताओं को पकड़ने के लिए दौड़ी, लेकिन नीचे जाने का रास्ता लंबा था. पुलिस के वहां पहुंचने तक अपहर्त्ता बैग ले कर भाग गए थे. उधर चमन सिंह आंखों में आस समेटे मंदिर पर पहुंचा. लेकिन संजीत वहां नहीं मिला. पुलिस औपरेशन पूरी तरह फेल रहा.

चमन सिंह का परिवार अवाक रह गया. जैसेतैसे जुटाई 30 लाख की रकम तो गई ही, बेटा भी नहीं मिला. इस पर रुचि पिता के साथ जा कर आईजी मोहित अग्रवाल से मिली. रुचि ने पूरी बात आईजी को बताई. साथ ही संदेह भी व्यक्त किया कि पुलिस अपहर्त्ताओं से मिली हुई थी. संभव है पैसों का बैग भी पुलिस के ही पास हो. चमन सिंह और रुचि की शिकायत पर आईजी मोहित अग्रवाल उसी समय थाना बर्रा पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी रणजीत राय से पूछताछ की. उन की बातों से संतुष्ट न होने पर उन्होंने रणजीत राय को सस्पेंड कर के हरमीत सिंह को थानाप्रभारी नियुक्त कर दिया.

इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने क्राइम ब्रांच व सर्विलांस टीम की मदद से जांच प्रारंभ की. उन्होंने पहले अपहृत संजीत के परिवार वालों से पूछताछ की, फिर संजीत के मोबाइल नंबर को खंगाला, जिस से पता चला अपहरण वाले दिन यानी 22 जून को संजीत के मोबाइल फोन पर एक नंबर से 5 काल आई थीं. 2 बार काल करने वाले ने बात की थी और 3 बार संजीत ने उसी नंबर पर बात की थी. रात पौने 8  बजे संजीत की उस नंबर पर आखिरी बार बात हुई थी. पौने 9 बजे संजीत का मोबाइल और संदिग्ध नंबर के मोबाइल का स्विच्ड औफ हो गया था. फिरौती के लिए अलग नंबर प्रयोग किया गया था. उस नंबर से 22 बार काल की गई थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस टीम ने सिम बेचने वाले दुकानदार का पता लगाया तो पता चला उस की सिम कार्ड की दुकान चकरपुर में हैं. पुलिस ने उसे उठा कर कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने 6 सिम कार्ड बेचने की बात कही. सर्विलांस टीम ने सभी मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवानी शुरू की. साथ ही उन नंबरों को लिसनिंग पर भी लगा दिया. इस के बाद पुलिस ने धनवंतरि अस्पताल की पैथालौजी के 2 कर्मचारियों को हिरासत में लिया. उन में से एक की संदिग्ध नंबर पर बात हुई थी. उस कर्मचारी से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला, वह संदिग्ध नंबर कुलदीप गोस्वामी का था, जो कुछ माह पहले धनवंतरि अस्पताल में काम करता था. लौकडाउन में विवाद होने पर उस ने नौकरी छोड़ दी थी. कुलदीप गोस्वामी पुलिस की रडार पर आया तो उस की तलाश शुरू की गई.

23 जुलाई, 2020 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी हरमीत सिंह को सूचना मिली कि कुलदीप गोस्वामी अपने साथियों के साथ अंबेडकर नगर के पटेल चौक पर मौजूद है. इस सूचना पर हरमीत सिंह क्राइम ब्रांच की टीम के साथ पटेल चौक पहुंच गए. पुलिस को देख कर एक युवती और 4 युवक भागने लगे. लेकिन क्राइम ब्रांच की टीम ने घेराबंदी कर युवती सहित 4 युवकों को गिरफ्तार कर लिया और सुरक्षा की दृष्टि से थाना बर्रा न ले जा कर सीओ औफिस गोविंद नगर ले आए. उन से पूछताछ की गई तो युवकों ने अपना नाम कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह और रामजी शुक्ला बताया. युवती ने अपना नाम प्रीति शर्मा बताया. पकड़े गए सभी युवक थे. उन की उम्र 25 से 30 वर्ष के बीच थी.

पकड़े गए युवकों से जब संजीत यादव के अपहरण के संबंध में पूछा गया तो सब ने मौन धारण कर लिया और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. इस पर उन्हें तराशा गया, आखिर उन्होंने जुबान खोली और बताया कि संजीत अब इस दुनिया में नही है. इन लोगों ने आगे बताया कि अपहरण के 4 दिन बाद उस की हत्या कर दी थी. फिर उस के शव को बोरी में भर कर पांडव नदी में फेंक दिया था. यह सुनते ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह के होश उड़ गए. उन्होंने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही आईजी मोहित अग्रवाल, एसएसपी दिनेश कुमार पी, तथा एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने अपहर्ताओं से पूछताछ की, फिर शव बरामदगी के लिए फ्लड कंपनी बटालियन की 6 बोट तथा 35 गोताखोरों को बुला कर उन्हें पांडव नदी में उतारा गया.

गोताखोरों ने 30 किलोमीटर तक शव को तलाशा, लेकिन शव बरामद नहीं हो सका. इधर अपहर्ताओं की निशानदेही पर पुलिस ने सड़क किनारे झाड़ी में छिपाई गई संजीत की मोटरसाइकिल, अपहरण व हत्या में प्रयुक्त कार, कार में रखा बैग तथा 4 मोबाइल फोन बरामद किए. पुलिस अब तक फिरौती के 30 लाख रुपए बरामद नहीं कर पाई थी. इस बाबत अपहर्ताओं से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि पुलिस के डर से वे नोटों से भरा बैग नहीं ले जा पाए थे. अब सवाल था, जब नोटों से भरा बैग अपहर्ताओं ने नहीं उठाया, तो बैग क्या पुलिस ने गायब कर दिया.

पुलिस अधिकारियों को डर था कि हत्या की खबर फैलते ही बर्रा क्षेत्र में सनसनी फैल जाएगी. लोग सड़क पर उपद्रव मचाएंगे. नेता आग में घी डालने का काम करेंगे, अत: पुलिस अधिकारियों ने पहले क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की, फिर रात 11 बजे चमन सिंह के घर जा कर अपहर्ताओं के पकड़े जाने तथा संजीत की हत्या कर शव को पांडव नदी में बहाने की जानकारी दी. संजीत की हत्या की खबर सुन कर घर में कोहराम मच गया. चमन सिंह, कुसुमा और रुचि चीखनेचिल्लाने लगी. उन की चीखपुकार सुन कर रात के सन्नाटे में मोहल्ले के लोग घरों से निकल आए.

देखते ही देखते सैकड़ों की भीड़ चमन सिंह के घर आ पहुंची. हत्या की जानकारी मिलने पर लोगों का गुस्सा भड़क उठा. मांबेटी की चीखों से महिलाएं द्रवित हो उठीं. रुचि पुलिस अधिकारियों के पैर पकड़ कर बोली, ‘‘आप लोग, जिंदा तो मेरे भाई को ला नहीं पाए, कम से कम मुर्दा ही ला दो. ताकि आखिरी बार उसे राखी बांध सकूं.’’ उस की इस बात पर पुलिस अधिकारी द्रवित हो गए. उन्होंने रुचि को धैर्य बंधाया. 24 जुलाई, 2020 की सुबह 11 बजे आईजी मोहित अग्रवाल तथा एसएसपी दिनेश कुमार पी ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैस वार्ता बुलाई और अपहर्ताओं को प्रिंट तथा इलेक्ट्रौनिक मीडिया के सामने पेश कर संजीत के अपहरण और हत्या का खुलासा कर दिया.

मीडिया के तीखे सवालों के आगे पुलिस अधिकारी बेबस नजर आए. चूंकि अपहर्ताओं ने अपहरण और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थाना बर्रा पुलिस ने पहले से दर्ज अपहरण के मामले में राहुल यादव का नाम हटा दिया और उसी क्राइम नंबर पर भादंवि की धारा 364/302/201/120बी के तहत कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हेें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस जांच तथा अभियुक्तों के बयानों से पैसे के लिए दोस्ती का कत्ल करने की घटना प्रकाश में आई.

कानपुर शहर के बर्रा भाग 5 में रहने वाला संजीत यादव नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथालौजी विभाग में काम करता था. उसी के साथ कुलदीप गोस्वामी तथा ज्ञानेंद्र सिंह काम करते थे. कुलदीप का दोस्त नीलू सिंह था, जबकि ज्ञानेंद्र का दोस्त रामजी शुक्ला था. सभी में खूब पटती थी और सप्ताह में एक बार बीयर पार्टी होती थी. दोस्तों के बीच संजीत धनवान होने का बखान करता था. उस ने दोस्तों को बताया था कि उस के 2 ट्रक चलते हैं, 2 कार हैं, गांव में जमीनमकान है. नौकरी तो वह समय काटने के लिए करता है. जल्द ही अपनी पैथालौजी खोल लेगा.

संजीत का दोस्त ज्ञानेंद्र सिंह दबौली में रहता था. उस के पिता श्रीकृष्ण यादव धनाढ्य थे. उस ने पिता से अस्पताल खोलने के लिए पूंजी लगाने का अनुरोध किया था. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया था. बीएससी नर्सिंग पास ज्ञानेंद्र सिंह महत्त्वाकांक्षी था. वह अमीर बनना चाहता था. पर 10-12 हजार की नौकरी से अमीर नहीं बना जा सकता था. यद्यपि वह ठाटबाट से रहता था. कार से आताजाता था. जनवरी 2020 में कुलदीप और ज्ञानेंद्र सिंह ने धनवंतरि अस्पताल से नौकरी छोड़ दी. ज्ञानेंद्र सिंह संविदा पर हैलट अस्पताल में काम करने लगा जबकि कुलदीप स्वरूपनगर में डा. एस.के. कटियार के यहां नौकरी करने लगा. कुलदीप सरायमीता पनकी में रहता था. उस के पिता प्रेम गोस्वामी किराए की गाड़ी चलाते थे. उस की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी.

कुलदीप की दोस्ती सचेंडी के गज्जापुरवा निवासी नीलू सिंह से थी. वह फरजी काम करता था. उस की मां की मौत हो चुकी थी और पिता चंद्रप्रकाश सरिया मिल में काम करते थे. 3 भाइयों में वह दूसरे नंबर का था. नीलू की एक महिला मित्र थी प्रीति शर्मा. वह हनुमान पार्क कौशलपुरी की रहने वाली थी. उस ने अपने पति को छोड़ दिया था और पनकी में अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी थी. नीलू सिंह का उस के घर आनाजाना था. वह अपनी अवैध कमाई उसी पर खर्च करता था. उस ने कुलदीप से भी उस की दोस्ती करा दी थी. ज्ञानेंद्र सिंह का दोस्त रामजी शुक्ला अंबेडकर नगर (गुजैनी) में रहता था. वह तेजतर्रार और अपराधी प्रवृत्ति का था. उस के पिता योगेश शुक्ला फैक्ट्रीकर्मी थे. छोटा भाई श्यामजी है.

दोनों भाइयों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था, जिस से क्षेत्र में उन का दबदबा था. ज्ञानेंद्र सिंह ने उस से दबंगई की वजह से ही दोस्ती की थी. ज्ञानेन्द्र सिंह को 2 टीवी सीरियल सावधान इंडिया और क्राइम पैट्रोल बेहद पसंद थे. इन सीरियलों को देख कर उस ने अपहरण कर फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने कुलदीप, रामजी शुक्ला, नीलू सिंह व उस की प्रेमिका प्रीति शर्मा को शामिल किया. प्रीति को 3 लाख रुपए देने का लालच दिया गया. एक रोज सब ने सिर से सिर जोड़ कर माथापच्ची की तो संजीत यादव के अपहरण और फिरौती की बात तय हुई. क्योंकि उस के बताए अनुसार संजीत धनवान था.

योजना के तहत नीलू सिंह ने महिला मित्र प्रीति शर्मा के साथ जा कर 15 जून को रतनलाल नगर में ब्रोकर रवींद्र तिवारी की मार्फत 15 हजार रुपया मासिक किराए पर सुनील श्रीवास्तव का मकान ले लिया. मकान किराए पर लेते समय प्रीति को उस ने अपनी पत्नी बताया था. इस मकान में प्रीति अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी. नीलू ने ही फरजी आईडी पर 6 सिम और 4 चाइनीज मोबाइल खरीदे और ज्ञानेंद्र को दे दिए. ज्ञानेंद्र ने चारों मोबाइल आपस में बांट लिए. ये मोबाइल अपहरण में इस्तेमाल करने के लिए थे. इधर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को बेहोश करने के लिए नशे के इंजेक्शन, मुंह पर लगाने के लिए टेप तथा नींद की गोलियां हैलट अस्पताल के सामने मैडिकल स्टोर से खरीदीं.

मैडिकल स्टोर के कर्मचारी ज्ञानेंद्र को जानते थे इसलिए उन्होंने डाक्टर का पर्चा नहीं मांगा. ज्ञानेंद्र ने इस सामान को बैग में सुरक्षित कर कार में रख लिया. 22 जून की शाम 7बज कर 47 मिनट पर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को फोन कर के बताया कि आज उस का जन्मदिन है, पार्टी करने चलते हैं. पार्टी के नाम पर संजीत तैयार हो गया. इस के बाद दोनों का फोन पर संपर्क बना रहा. ज्ञानेंद्र अपनी फोर्ड फीगो कार ले कर शिवाजी पुलिया नौबस्ता के पास खड़ा हो गया. उस समय कार में ज्ञानेंद्र के अलावा कुलदीप, नीलू तथा रामजी शुक्ला मौजूद थे. कुछ देर बाद संजीत आया तो इन लोगों ने उसे कार में बिठा लिया.

कार में ही उन लोगों ने संजीत को शराब पिलाई. उसी में नशीली गोलियां मिला दी गई थीं. बेहोश होेने पर ये लोग उसे रतनलाल नगर स्थित किराए वाले मकान पर ले आए. यहां प्रीति पहले से मौजूद थी. उसी ने दरवाजा खोला. कमरे में ला कर इन लोगों ने संजीत के हाथपैर बांधे, मुंह पर टेप लगाया और नशीला इंजेक्शन लगा दिया. इस के बाद बारीबारी से सब उस की निगरानी करने लगे. 26 जून की रात 10 बजे खाना खाते वक्त संजीत ने भागने का प्रयास किया और गेट तक पहुंच गया. लेकिन नीलू सिंह ने उसे दबोच लिया. इस के बाद ज्ञानेंद्र, कुलदीप व रामजी शुक्ला आ गए. सभी ने मिल कर संजीत का गला घोंट दिया. फिर शव को बोरी में भर कर, कार की डिक्की में रखा और सवेरा होने के पहले ही पांडव नदी में फेंक आए. फिर नीलू को छोड़ कर सब अपनेअपने घर चले गए.

संजीत की हत्या के बाद अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन किया और 30 लाख रुपए की मांग की. 13 जुलाई को उन्होंने फिरौती की रकम ले भी ली. अपहर्त्ताओं ने पुलिस से बचने का भरसक प्रयास किया, लेकिन बच नहीं पाए और पकड़े गए. इधर संजीत की हत्या की खबर प्रिंट मीडिया में छपी और टीवी चैनलों में दिखाई जाने लगी तो राजनीतिक भूचाल आ गया. सपा, बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता प्रदेश की कानूनव्यवस्था पर सवाल खड़े करने लगे तो सीएम योगी तिलमिला उठे. मुख्यमंत्री ने आईजी मोहित अग्रवाल से संजीत प्रकरण की जानकारी जुटाई, साथ ही पुलिस की भूमिका की भी जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने लापरवाह पुलिस अधिकारियों व पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने का फरमान जारी कर दिया.

एसएसपी दिनेश कुमार पी का भी तबादला झांसी कर दिया गया. शासन के आदेश पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, डीएसपी मनोज कुमार गुप्ता, पूर्व बर्रा थानाप्रभारी रणजीत राय, चौकी प्रभारी राजेश कुमार, दरोगा योगेंद्र सिंह, सिपाही अवधेश, भारती, दिशू, विनोद कुमार, सौरभ, मनीष और शिव प्रताप को सस्पेंड कर दिया गया. लेकिन मृतक संजीत की बहन रुचि ने मीडिया से रूबरू हो कर कहा कि सस्पेंड पुलिसकर्मियों की लापरवाही से उस के भाई की हत्या हो गई. इसलिए ये पुलिसकर्मी उतने ही दोषी हैं, जितने अपहर्त्ता. उस की शासन से मांग कि केवल निलंबन से काम नहीं चलेगा. उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जाए.

25 जुलाई, 2020 को थाना बर्रा पुलिस ने अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह, कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक पुलिस न तो शव बरामद कर सकी थी और न ही नोटों भरा बैग. बैग बरामदगी तथा जांच हेतु पुलिस हेडक्वार्टर से एडीजी वी.पी. जोगदंड को भेजा गया. उन्होंने जांच शुरू कर दी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

Social Crime : पाखंडी पुजारी ने प्रेमिका के पति और बच्चे का किया कत्ल

Social Crime : आस्थावान लोग पुजारी और साधुओं पर आंख मूंद कर विश्वास करते हैं. लेकिन दुख तब होता है जब कुछ पाखंडी अपने यजमान की थाली में छेद करने लगते हैं. पुजारी पंडित रविशंकर शुक्ला यशवंत साहू की पत्नी माहेश्वरी के पीछे हाथ धो कर पड़ा था. इसी चक्कर में वह इतना बड़ा अपराध कर बैठा कि…

छत्तीसगढ़ के जिला बलौदा बाजार भाटापारा के पलारी थाने के अंतर्गत एक गांव है छेरकाडीह. यशवंत साहू इसी गांव में अपनी पत्नी, छोटे भाई जितेंद्र साहू व मातापिता के साथ संयुक्त परिवार में रहता था. यह परिवार धार्मिक आस्थावान था. घर में अकसर पूजापाठ, कथा का आयोजन होता रहता था. यह पूजापाठ के ये कार्यक्रम पंडित रविशंकर शुक्ला संपन्न कराता था. पंडित रविशंकर पास के ही गांव जारा में रहता था. आसपास के कई गांवों के लोग उसी के यजमान थे. रविशंकर शुक्ला ने होश संभालने के साथ ही पुरोहित का काम करना शुरू कर दिया था.

एक बार की बात है. सुबह के 10 बजे यशवंत साहू के यहां सत्यनारायण की कथा का आयोजन था. उस दिन 32 वर्षीय रविशंकर शुक्ला यशवंत साहू के घर पहुंचा. यशवंत साहू ने उस का स्वागत किया. रविशंकर शुक्ला ने घर में इधरउधर नजरें दौड़ाने के बाद पूछा, ‘‘यजमान, देवी माहेश्वरी कहां हैं, दिखाई नहीं दे रहीं.’’

‘‘रसोई में है महराज, अभी आ जाएगी. आप बैठिए, मैं पूजा की कुछ सामग्री लाना भूल गया हूं, बाजार से ले कर आता हूं, तब तक आप चाय आदि ग्रहण करें.’’ यशवंत साहू ने कहा. यशवंत साहू मोटरसाइकिल ले कर बाजार के लिए रवाना हुआ तो पंडित रविशंकर उठ खड़ा हुआ और रसोई की ओर दबे पांव आगे बढ़ा. रसोई में माहेश्वरी साहू पूजा के लिए प्रसाद बना रही थी. तभी पंडित रविशंकर ने किचन में पहुंच कर पीछे से माहेश्वरी के गले में बांहें डाल दीं.

‘‘अरे! कौन.’’ माहेश्वरी ने घबरा कर देखा तो पीछे पंडितजी थे. वह बोली, ‘‘अरे महाराज आप?’’

‘‘हां, साहूजी को मैं ने बाजार भेजा है. घबराने की जरूरत नहीं है.’’ कह कर पंडित रविशंकर रहस्यमय भाव से  मुसकराया .

‘‘अरे, घर में  पूजा है ,बच्चे हैं और तुम…’’

‘‘अरेअरे, क्या कहती हो… चलो.’’ पंडित अपने रंग में आने लगा.

‘‘नहीं… नहीं तुम आज पूजा कराने आए हो… तुम्हें थोड़ी भी समझ नहीं है क्या.’’ माहेश्वरी ने मीठी झिड़की दी.

‘‘मुझे तुम्हारे अलावा कुछ दिखाई नहीं देता… सच कहूं तो तुम ही मेरी भगवान हो.’’ वह बेशरमी से बोला.

‘‘छि…छि… यह क्या कह रहे हो. थोड़ी तो शर्म करो, मैं तुम्हें कितना अच्छा समझती थी.’’

‘‘क्यों, मुझे क्या हो गया है… मैं तो तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहता हूं जैसा कि ठीक 2 साल पहले… जब तुम्हारीहमारी पहली मुलाकात हुई थी.’’

‘‘अच्छा, सब याद है,’’ अचरज से माहेश्वरी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘हां तारीख, दिन, समय… सब कुछ… वह दिन मैं भला कैसे भूल सकता हूं. क्या तुम भूल गई हो?’’ रविशंकर शुक्ला ने पूछा .

‘‘अच्छा, अभी तुम बैठक मैं पहुंचो… मैं 2 मिनट में आती हूं…’’ कह कर माहेश्वरी ने रविशंकर को जाने को कहा तो रविशंकर इठला कर बोला, ‘‘मैं चाय पीऊंगा तुम्हारे हाथों की. इस के बाद ही यहां से टलूंगा.’’

‘‘हां, मैं बनाती हूं महाराज,’’ कह कर माहेश्वरी मुसकराई और बोली, ‘‘अब तुम मुझ से दूर रहा करो. बच्चे बड़े हैं, अच्छा नहीं लगता. कहीं किसी ने देख लिया तो मुझे जहर खा कर मरना पड़ेगा.’’

रविशंकर और माहेश्वरी अभी बातें कर ही रहे थे कि यशवंत साहू पूजा की सामग्री ले कर आ गया. पंडितजी को बैठक में न पा कर वह स्वाभाविक रूप से रसोई की ओर बढ़ा तो पंडित रविशंकर की आवाज सुन वह ठिठक कर रुक गया. यशवंत साहू ने रविशंकर और माहेश्वरी की बातें सुनी तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह गुस्से के मारे चिल्ला कर बोला, ‘‘पंडित, यह क्या हो रहा है?’’

‘‘अरे, यजमान… भाभीजी चाय बना रही थीं, तो हम ने सोचा कि यहीं बैठ कर पी लें.’’ मीठी वाणी में रविशंकर शुक्ला ने बात बनानी चाही.

‘‘मगर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां तक घुसने की… और सुनो, मैं ने सब सुन लिया है. मुझे  तुम  पर बहुत  दिनों से  शक था, आज तू पकड़ा गया. तू पंडित नहीं, राक्षस है. चला जा, मेरे घर से.’’ यशवंत साहू ने आंखें दिखाईं तो पंडित घबराया मगर हिम्मत कर के बोला, ‘‘यजमान, तुम कहना क्या चाहते हो? तुम्हें जरूर कोई गलतफहमी हुई है. तुम ने मुझे  सत्यनारायण की कथा के लिए बुलाया है.’’

‘‘देखो, मैं तुम से साफसाफ कह रहा हूं… मेरे घर से अभी चले जाओ.’’

‘‘मगर मैं तो पूजा करने आया था… तुम नाराज क्यों हो रहे हो भाई?’’ रविशंकर ने बात बनाने की पूरी कोशिश की मगर यशवंत साहू की आंखों के सामने से मानो परदा उठ चुका था. यशवंत साहू ने जलती हुई आंखों से देखते हुए कहा, ‘‘भाग जाओ, यहां से. अब तुम्हारी पोल खुल गई है.’’

मामले की गंभीरता को देखते हुए रविशंकर वहां से चले जाने में ही भलाई समझी. इस घटना के बाद यशवंत और माहेश्वरी के वैवाहिक जीवन पर मानो ग्रहण लग गया. माहेश्वरी ने यशवंत के पैरों पर गिर कर सब कुछ स्वीकार कर लिया और फिर कभी दोबारा गलती नहीं करने की कसम खाई. परिवार की इज्जत बचाए रखने और बच्चों के भविष्य को देखते हुए यशवंत साहू ने उसे एक तरह से खून का घूंट पी कर माफ कर दिया. पुजारी ने दी धमकी मगर पंडित रविशंकर शुक्ला जब कभी गांव छेरकाडीह आता और कहीं अचानक से उसे माहेश्वरी दिख जाती तो वह उस से बात करने की कोशिश करता. लेकिन माहेश्वरी उसे देख मुंह फेर लेती तो रविशंकर मनुहार करता.

जब कई बार के प्रयासों से भी महेश्वरी नहीं पिघली तो अंतत: एक दिन गुस्से में आ कर उस ने कहा, ‘‘माहेश्वरी, मैं तुम्हें आसपास के सभी गांव में बदनाम कर दूंगा… तुम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी.’’

माहेश्वरी यह सुन कर घबराई फिर बोली, ‘‘तुम क्या चाहते हो, क्या यह चाहते हो कि मेरा पति और परिवार वाले मुझे अहिल्या की तरह त्याग दें. नहीं… मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. तुम चले जाओ…’’

मगर पंडित रविशंकर शुक्ला धमकी दे कर चला गया. जब यह बात यशवंत को मालूम हुई तो वह चिंता में पड़ गया. एक दिन वह अपने मित्र और गांव जारा के सरपंच नारायण दास से मिला. सरपंच को सारी बात बताते हुए यशवंत ने उस से मदद मांगी तो सरपंच ने कहा, ‘‘साहूजी, मामला घरेलू है, मगर मैं इस में तुम्हारी पूरी मदद करूंगा.’’

एक दिन सरपंच ने चुनिंदा लोगों की सभा बुलाई. वहां पुजारी रविशंकर शुक्ला को बुला कर सरपंच ने सब के सामने साफसाफ कहा, ‘‘पंडितजी, अगर तुम ने दोबारा माहेश्वरी भाभी को देखने, धमकाने की कोशिश की तो मामला पुलिस तक पहुंच जाएगा और तुम्हारी पुरोहिती सभी  गांवों  में बंद करा दी जाएगी.’’

मामला हाथ से निकलता देख कर पुजारी रविशंकर शुक्ला ने उस दिन हाथ जोड़ कर माफी मांगी और वहां से चला गया. यशवंत साहू और माहेश्वरी को लगा कि मामले का पटाक्षेप हो गया है, मगर ऐसा हुआ नहीं था. यशवंत साहू का परिवार मूलत: किसान था. छेरकाडीह में रह रहे उस के संयुक्त परिवार में पिता दानसाय साहू, मां लक्ष्मी, भाई  जितेंद्र साहू जो शिक्षक थे, उन की पत्नी मीना, बेटा शशिमणि व बेटी तनिशा थे. यह गांव का धनाढ्य परिवार था. यही कारण था कि हाल ही में घर के पास पिछवाड़े में आलीशान घर बनवाया था, जिस में छोटा भाई  जितेंद्र साहू अपने परिवार व पिता और मां के साथ रहता था. जबकि यशवंत साहू पत्नी व बेटे देवेंद्र के साथ पुराने मकान में ही रह रहा था. बेटी पूनम ज्यादातर दादादादी और चाचा की लड़की तनिशा के साथ रहना पसंद करती थी, वह रहती भी वहीं थी.

जब यशवंत साहू ने पंडित रविशंकर को भलाबुरा कह कर घर से निकाला था तो उस समय यशवंत का बेटा देवेंद्र साहू भी मौजूद था. बाद में जब एक बार पंडित रविशंकर गांव छेरकाडीह आया तो उस की देवेंद्र साहू से मुठभेड़ हो गई थी. इस पर पंडित रविशंकर ने धान काटने के हंसिए से देवेंद्र को मार फेंकने की धमकी दी थी. मगर यशवंत साहू ने इसे  गंभीरता से लेते हुए बेटे देवेंद्र को समझाया कि पंडित रविशंकर से मुंह न लगा करे. चाह कर भी रविशंकर शुक्ला माहेश्वरी को भुला नहीं पा रहा था. गांव में सभा हो जाने के बाद कुछ समय वह शरीफ बना रहा, फिर उस के भीतर का प्रेमी जागृत हो उठा. उस ने सोचा, जरूर माहेश्वरी पति के दबाव में उसे नकार रही है. वह उस से अभी भी प्यार करती है. उस ने सोचा कि क्यों न माहेश्वरी से बात करे… मिले… अंतिम बार.

यही सोच कर रविशंकर शुक्ला ने माहेश्वरी को मोबाइल पर काल की लेकिन माहेश्वरी ने उस की काल रिसीव नहीं की. कई बार काल करने पर भी काल रिसीव नहीं हो रही थी, ऐसे में पंडित के मन में कई शंकाएं जन्म ले रही थीं. वह सोच में डूबा था कि उस का मोबाइल घनघना उठा. उस ने देखा काल माहेश्वरी की तरफ से आ रही थी, वह खुश हो कर काल रिसीव करते हुए वह बोला, ‘‘माहेश्वरी, मैं जानता था कि तुम मुझे नहीं छोड़ सकतीं… मुझे विश्वास था कि तुम्हारा फोन आएगा. सुनो, तुम मेरे पास आ जाओ.’’

तभी माहेश्वरी गुस्से में बोली, ‘‘देखो पंडितजी, पंचायत में तुम्हें हिदायत दे दी थी, अब तुम मर्यादा में रहो.’’

‘‘मैं…मैं जानता हूं, तुम दबाव, पति के प्रभाव में हो, सचसच कहो.’’ पंडित ने पूछा .

‘‘नहीं, मैं किसी दबाव में नहीं हूं. मैं ने विवाह किया है, मेरे 2 बच्चे हैं. और तुम भी शादीशुदा हो. इसलिए आगे से फोन किया तो ठीक नहीं होगा.’’ कह कर माहेश्वरी ने गुस्से से फोन बंद कर दिया. रविशंकर शुक्ला के माथे में बल पड़ गए. वह सोचने लगा कि यह तो अलग ही सुर निकाल रही है, मैं इस को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि इस की सात पुश्तें भी याद रखेंगी. पुजारी ने रची खूनी साजिश रविशंकर शुक्ला माहेश्वरी को सबक सिखाने की योजना बनाने में जुट गया. उस ने अपनी ससुराल के एक दोस्त दुर्गेश वर्मा से बात की. फिर गांव के तालाब किनारे ले जा कर उसे अपनपा दर्द बताया और सहयोग मांगा.

जब वह साथ देने और मरनेमारने पर उतारू हो गया तो रविशंकर शुक्ला बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘मैं माहेश्वरी को सबक सिखाना चाहता हूं. उस के बेटे देवेंद्र व पति का काम तमाम करते ही वह मजबूर  हो कर मेरे आगोश मे आ जाएगी.’’

दुर्गेश ने पंडित रविशंकर की दोस्ती के कारण शनिवार 11-12 अप्रैल 2020 की रात यशवंत साहू के घर में घुस कर यशवंत साहू की हत्या की योजना बनाई. दोनों रविशंकर शुक्ला की बाइक सीजी22 एसी 7453 पर गांव गातापारा से छेरकाडीह के लिए रवाना हुए. इसी दौरान दुर्गेश वर्मा को अपने  घर के पास एक मित्र नेमीचंद धु्रव दिखाई दिया. उस ने उसे भी बाइक पर बैठा लिया और कहा, ‘‘चल, तुझे भी एक मिशन पर ले चलते  हैं.’’

रात लगभग 11 बजे छेरकाडीह पहुंच कर इन लोगों ने एक जगह बाइक खड़ी कर के नेमीचंद को वहीं खड़ा छोड़ दिया और एक टंगिया, एक फरसी ले कर दोनों  यशवंत साहू के घर की ओर बढ़े. पंडित रविशंकर जानता था कि पिछवाड़े से यशवंत के घर में आसानी से दाखिल हुआ जा सकता है. वह दुर्गेश के साथ भीतर गया. एक कमरे में यशवंत साहू अपने बेटे देवेंद्र के साथ सोया था. रविशंकर ने नींद में सोए देवेंद्र पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया. फरसे  की चोट लगते ही देवेंद्र उठ खड़ा हुआ तो दोनों ने मिल कर उसे वहीं ढेर कर दिया. इस बीच यशवंत की नींद टूट गई. वह डर से कांप रहा था. दोनों ने हमला कर के उस भी मार डाला.

दूसरे कमरे में माहेश्वरी अकेली सो रही थी. चीखपुकार सुन वह जब घटनास्थल पर पहुंची तो पति यशवंत व बेटे देवेंद्र की लाश देख कर चीख पड़ी. इस पर पंडित रविशंकर शुक्ला ने पोल खुल जाने के डर से वहां रखे  सब्बल से उस के सिर पर वार कर उसे भी मार डाला. उसी समय  घर के पिछवाड़े में नए घर में बैठी यशवंत की बेटी पूनम ने मां के चीखने की आवाज सुनी और घबरा कर चार कदम आगे बढ़ी. मगर यह सोच कर खामोश बैठ गई कि मां का पिताजी के साथ झगड़ा हो रहा होगा. उधर चारों तरफ खून फैला हुआ था, जिसे देख कर दुर्गेश और रविशंकर शुक्ला घबराए और वहां से भाग खड़े हुए. बाहर थोड़ी दूरी पर नेमीचंद धु्रव उन का इंतजार कर रहा था. तीनों बाइक से गातापार की तरफ चले गए.

सुबह 6 बजे यशवंत के पिता दानसाय साहू उठे और टहलते हुए जब यशवंत के घर की ओर बढ़े तो परछी में बहू माहेश्वरी को खून से लथपथ पडे़ देख घबरा कर उलटे पांव वापस लौटे और पत्नी लक्ष्मी को वहां की यह बात बताई. सुनते ही पास बैठी पूनम दौड़ कर घटनास्थल पर पहुंची. वह मां को मृत देख रोने लगी. जब उस ने कमरे में लाइट जलाई तो वहां पिता और भाई की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं. यह देख कर वह फूटफूट कर रोने लगी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे और क्या हो गया. पूनम के रोने की आवाज सुन चाचा जितेंद्र व सारा परिवार वहां आ गया. ग्राम पंचायत छेरकाडीह के सरपंच रामलखन भी घटनास्थल पर पहुंचे और थाना पलारी फोन कर के घटना की जानकारी दी.

12 अप्रैल, 2020 को लगभग 8 बजे पलारी थानाप्रभारी प्रमोद कुमार सिंह डौग स्क्वायड टीम व स्टाफ के साथ छेरकाडीह पहुंचे और घटनास्थल का मुआयना किया. चारों तरफ खून फैला हुआ था. उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि किसी ने दुश्मनी के कारण यह नृशंस हत्याकांड किया है. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर तीनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. इसी दरम्यान थानाप्रभारी को यह खबर मिली कि हाल ही में यशवंत साहू ने सरपंच से कह कर सभा बुलाई थी, जिस में सरपंच ने पुजारी रविशंकर को हिदायत दी थी कि वह माहेश्वरी के पीछे न पड़े. पुलिस के हत्थे चढ़े आरोपी थानाप्रभारी प्रमोद कुमार सिंह को पूरा मामला शीशे की तरह साफ नजर आ रहा था. शक की सुई पुजारी रविशंकर की ओर घूम चुकी थी. उन्होंने एसपी प्रशांत ठाकुर बलोदाबाजार, भाटापारा  को संपूर्ण जानकारी दे कर मार्गदर्शन मांगा.

तब एसपी ने इस केस को खोलने के लिए थाना गिधौरी के थानाप्रभारी ओमप्रकाश त्रिपाठी और थाना सुहेला के थानाप्रभारी रोशन सिंह को भी उन के साथ लगा दिया. पुलिस टीम ने रविशंकर शुक्ला को शाम को ही धर दबोचा. उसे पलारी थाना ला कर पूछताछ शुरू की गई, लेकिन वह शातिराना ढंग से स्वयं को पंडित बता कर  बचना चाह रहा था मगर जब पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ की तो वह टूट गया और तिहरे हत्याकांड को अंजाम देने की कहानी बता दी. उस ने बताया कि उस के इस काम में दुर्गेश व नेमीचंद भी साथ थे. पुजारी रविशंकर शुक्ला ने बताया कि वह 5 वर्षों से गांवगांव घूम कर यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराता था, 2 साल पहले यशवंत साहू ने उसे पहली बार सत्यनारायण की कथा के लिए बुलाया था, जहां उस का परिचय उस की पत्नी माहेश्वरी से हुआ और बहुत जल्द दोनों के अंतरंग संबंध बन गए.

मगर बाद में माहेश्वरी उस से दूर छिटकने की कोशिश करने लगी और वह एक बार रंगेहाथों पकड़ा भी गया था. पंचायत में बात जाने के बाद वह माहेश्वरी से बातचीत कर उसे भगा ले जाने को तैयार था मगर जब माहेश्वरी ने साफ इंकार कर दिया तो उस ने दुर्गेश को विश्वास में ले कर यशवंत साहू को सबक सिखाने की सोची. फिर माहेश्वरी सहित उस के बेटे देवेंद्र साहू को मार डाला. आरोपी रविशंकर शुक्ला ने जांच अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह को अपने इकबालिया  बयान में  बताया कि वह माहेश्वरी से दिलोजान से प्रेम करता था, इसलिए प्रेम में अंधे हो कर उस के हाथों यह हत्याकांड हो गया. पुलिस ने आरोपी पंडित रविशंकर शुक्ला और दुर्गेश वर्मा से हत्या में इस्तेमाल हथियार  टंगिया, फरसा व खून से सने कपड़े जब्त कर लिए.

प्राथमिक विवेचना के बाद पुलिस ने पलारी थाने में धारा 302 भादंवि के तहत केस दर्ज किया और मुख्य आरोपी पंडित रविशंकर शुक्ला, सहआरोपी दुर्गेश और नेमीचंद को गिरफ्तार कर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी कृष्णकुमार सूर्यवंशी की अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों से बातचीत पर आधारित

Love Story : भागकर शादी करने पर लड़की के घरवालों ने दामाद की कर दी हत्या

Love Story : घर वालों की मरजी के खिलाफ पढ़ीलिखी ज्योति ने रोहित से अंतरजातीय विवाह किया था. रोहित सरकारी नौकरी करता था, इसलिए ज्योति उस के साथ हंसीखुशी से रह रही थी. इस के 2 साल बाद इन के जीवन में ऐसा वाकया हुआ, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले का एक गांव है बृजपुरा. इसी गांव के निवासी महेश सिंह यादव पेशे से किसान थे. उन का बड़ा बेटा रोहित पशु पालन विभाग में नौकरी करता था. 9 जुलाई, 2020 की बात है. रोहित की पत्नी ज्योति की तबियत अचानक खराब हो गई थी. बुखार के साथ उस के पेट में दर्द भी हो रहा था. इस से रोहित बहुत परेशान हो रहा था. ज्योति की तबियत खराब होने से रोहित परेशान हो उठा. शाम का वक्त हो गया था. जब घरेलू उपायों से भी कोई लाभ नहीं हुआ. घर वालों ने रोहित से ज्योति को कीरतपुर के किसी डाक्टर को दिखाने को कहा. क्योंकि बृजपुरा में कोई अच्छा डाक्टर नहीं था.

घर वालों की बात मान कर रोहित ने ज्योति से कहा, ‘‘चलो डाक्टर को दिखा आते हैं. कहीं रात में ज्यादा तबियत खराब हो गई तो किसे दिखाएंगे.’’

पति की बात मान कर ज्योति डाक्टर के पास चलने के लिए तैयार हो गई. गांव ब्रजपुरा से कीरतपुर लगभग 5 किलोमीटर दूर था. इसलिए रोहित अपनी मोटरसाइकिल से ज्योति को कीरतपुर में स्थित एक डाक्टर के क्लीनिक पर ले गया. ज्योति का चैकअप करने के बाद डाक्टर ने दवा दे दी और 2 दिन बाद फिर से आने को कहा. डाक्टर से दवा लेने के बाद रोहित पत्नी को ले कर अपने घर की तरफ चल दिया. लौटते समय रात हो गई थी. जब उस की मोटरसाइकिल सिंहपुर नहर पुल स्थित हुर्रइया पुलिया के पास पहुंची. उस समय रात के सवा 8 बज रहे थे. सड़क पर सन्नाटा था. ज्योति रोहित को पकड़े बाइक पर बैठी थी. उस ने कहा, ‘‘अंधेरे में मुझे डर लग रहा है. तुम गाड़ी कुछ तेज चलाओ जिस से हम घर जल्दी पहुंच जाएं.’’

रोहित कुछ कह पाता, तभी वहां घात लगाए हमलावरों ने उन दोनों पर हमला कर दिया. दोनों को जिस बात का डर था वही हो गई. ऐसा लग रहा था बदमाश जैसे उन दोनों का ही इंतजार कर रहे थे. अचानक हुए हमले से दोनों घबरा गए. रोहित ने मोटरसाइकिल तेज कर वहां से भागने का प्रयास किया. लेकिन बदमाशों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी थी. तभी एक गोली रोहित के पेट में लगी और बाइक सहित दोनों सड़क पर जा गिरे. कई गोली लगने से ज्योति गंभीर रूप से घायल हो गई थी. हमलावर 2 मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर आए थे. रात के सन्नाटे में गोलियों की आवाज सुन कर आसपास के ग्रामीण घटनास्थल पर पहुंच गए. ग्रामीणों के वहां पहुंचने से पहले ही बदमाश घटनास्थल से फरार हो चुके थे. कुछ ग्रामीणों ने घायल दंपति को पहचान लिया और उन्होंने बृजपुरा उन के घर फोन कर घटना की जानकारी दे दी.

घटना की जानकारी होते ही रोहित के घर में कोहराम मच गया. छोटा भाई मोहित, पिता महेश व अन्य घर वाले गांव वालों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. ज्योति और रोहित सड़क किनारे बिजली के खंभे के पास लहूलुहान पड़े हुए थे. इसी बीच किसी ने थाना मैनपुरी पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी. सड़क पर बाइक सवार दंपति को गोली मारने की सूचना पर थाने में हड़कंप मच गया. घटनास्थल थाने से लगभग 7-8 किलोमीटर दूर था. कुछ ही देर में इंसपेक्टर भानुप्रताप सिंह पुलिस टीम व एंबुलेंस के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने गंभीर रूप से घायल दंपति को एंबुलेंस से जिला अस्पताल में उपचार के लिए भिजवाया.

दंपति पर जानलेवा हमले की वारदात से ग्रामीणों में रोष फैल गया था. गांव वालों के रोष को भांप कर थानाप्रभारी ने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दे कर स्थिति से अवगत कराया. खबर मिलते ही एएसपी मधुबन सिंह, सीओ अभय नारायण राय भी घटनास्थल पर पहुंच गए. अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. घटनास्थल से पुलिस को जहां 2 खोखे मिले, वहीं घटनास्थल से लगभग 150 मीटर की दूरी पर भी एक खोखा मिला. पुलिस ने घटनास्थल से जरूरी सबूत जुटा कर मौके की जरूरी काररवाई निपटाई. वहीं सीओ ने गुस्साए ग्रामीणों को भरोसा दिया कि पुलिस हमलावरों को जल्द गिरफ्तार कर लेगी. उन के आश्वासन के बाद ही ग्रामीण शांत हुए.

पुलिस बदमाशों की तलाश में जुट गई. लेकिन रात का समय होने के कारण बदमाशों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. बदमाशों ने दंपति को घायल करने के बाद उन की बाइक, नकदी व आभूषण की लूट नहीं की थी. इस से पुलिस को भी आशंका हुई कि बदमाशों ने हमला लूटपाट के लिए नहीं किया, इस के पीछे जरूर कोई रंजिश रही होगी. घटनास्थल से अधिकारी सीधे जिला चिकित्सालय पहुंचे. उन्होंने घायलों के बारे में चिकित्सकों से जानकारी ली. चिकित्सकों ने बताया कि रोहित के पेट में एक गोली तथा ज्योति के शरीर में 6 गोलियां लगी थीं. घायल रोहित ने अधिकारियों को हमलावरों के नाम भी बता दिए.

अस्पताल में मौजूद रोहित के छोटे भाई मोहित ने रंजिश के चलते अंगौथा निवासी बृजेश मिश्रा उस के बेटे गुलशन व हिमांशु मिश्रा, बृजेश के छोटे भाई अशोक मिश्रा व उस के 2 बेटों राघवेंद्र उर्फ टेंटा व रघुराई पर वारदात को अंजाम देने का आरोप लगाया था. घायल दंपति का जिला अस्पताल मैनपुरी में उपचार शुरू किया गया. उपचार के दौरान दोनों की गंभीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें मैडिकल कालेज सैफई रैफर कर दिया. पुलिस व घर वाले जब एंबुलेंस से घायल दंपति को सैफई ले जा रहे थे तो रास्ते में ज्योति की मौत हो गई. जबकि रोहित का सैफई पहुंचते ही इलाज शुरू हो गया था. गोली उस के पेट में लगी थी जो पार हो गई थी.

औपरेशन के बाद चिकित्सकों ने रोहित को आईसीयू में भरती कर दिया था. रोहित की सुरक्षा के लिए थानाप्रभारी ने 2 सिपाही भी तैनात कर दिए गए थे. रोहित के भाई मोहित ने रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि ज्योति मिश्रा ने उस के भाई रोहित यादव के साथ करीब 2 साल पहले अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था, जिस से ज्योति के घर वाले उस के भाई रोहित व भाभी ज्योति से बहुत नफरत करते थे, उन्होंने कई बार धमकियां भी दी थीं. इसी के चलते इन लोगों ने घटना को अंजाम दिया. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उन के गांव में दबिश दी. लेकिन कोई भी आरोपी घर नहीं मिला. पुलिस ने बृजेश मिश्रा के परिवार के कुछ लोगों के साथ ही कई संदिग्धों को हिरासत में ले लिया था. उन्हें कोतवाली ला कर पूछताछ की गई.

2 गांव के बीच प्रेम विवाह को ले कर हुई इस खूनी घटना के बाद खुफिया विभाग भी सतर्क हो गया था. लगातार दोनों गांव की स्थिति पर पुलिस नजर बनाए हुए थी. जहां रोहित के घर पर मातम पसरा हुआ था, वहीं अंगौथा में आरोपी के घरों पर कोई नहीं था. दोनों गांवों में इस घटना के बाद से सन्नाटा पसरा हुआ था. इस सनसनीखेज हत्याकांड के एक हफ्ते बाद भी पुलिस के हाथ खाली थे. पुलिस अब तक नामजद आरोपियों में से एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. हत्यारों द्वारा ज्योति पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर मार देने की खबर इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया में प्रमुखता से छाने लगी, जिस से पुलिस पर दबाव बढ़ता जा रहा था, लेकिन पुलिस अपने काम में जुटी रही. पुलिस की जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

पुलिस के अलावा सर्विलांस टीम, स्वाट टीम को भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम में लगाया गया. पुलिस की मेहनत रंग लाई और हत्याकांड के 3 नामजद आरोपियों को पुलिस ने दबिश के बाद उन के गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया. 16 जुलाई, 2020 को पुलिस ने 10 दिन पहले हुए ज्योति हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. एसपी अजय कुमार पांडेय ने प्रैसवार्ता आयोजित कर इस हत्याकांड का खुलासा किया. पता चला कि इस हत्याकांड को सम्मान की खातिर सगे भाई और 2 चचेरे भाइयों ने अंजाम दिया था. घटना में नामजद 5 आरोपियों में से पुलिस ने ज्योति के सगे भाई गुलशन मिश्रा तथा 2 चचेरे भाइयों राघवेंद्र मिश्रा व रघुराई मिश्रा को गिरफ्तार कर उन के कब्जे से 2 तमंचे व 5 कारतूस बरामद किए थे. तीनों हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी—

थाना मैनपुरी के बृजपुरा और अंगौथा गांव अगलबगल थे. बृजपुरा निवासी महेश सिंह के 2 बेटे व एक बेटी थी. बड़ा बेटा 25 वर्षीय रोहित यादव पशु पालन विभाग में नौकरी करता था. जबकि छोटा बेटा मोहित अभी बीएससी फर्स्ट ईयर में पड़ रहा था. छोटी बहन प्रियंका चौथी क्लास में पढ़ती थी. वहीं अंगौथा निवासी बृजेश मिश्रा खेतीकिसानी करता था. गांव में उस की आटा चक्की भी थी. उस के 4 बेटे बेटियों में गुलशन व हिमांशु के अलावा ज्योति तीसरे नंबर की थी. ज्योति की एक छोटी बहन और थी. गुलशन पिता के साथ आटा चक्की के काम में हाथ बंटाता था जबकि दूसरे नंबर का बेटा हिमांशु पुणे में नौकरी करता था.

रोहित यादव पशुपालन विभाग में अंगौथा मौजा (मझरा) में स्थित पशु चिकित्सालय व कृत्रिम गर्भाधान केंद्र में कार्य करता था. इसी सिलसिले में उस का आसपास के गांवों में आनाजाना लगा रहता था. वह पड़ोसी गांव अंगौथा भी पशुओं के इलाज के सिलसिले में जाता था. एक दिन जिस घर के पशुओं के इलाज के संबंध में रोहित आया था, उसी घर में पड़ोस में रहने वाली ज्योति आई हुई थी. रोहित की नजर उस पर पड़ी. ज्योति सुंदर लड़की थी. वह उस का अनगढ़ सौंदर्य देख ठगा सा रह गया. उस ने उसी क्षण उसे दिल में बसा लिया. ज्योति को भी अहसास हो गया कि रोहित उसे चाहत की नजरों से देख रहा है. रोहित कसी हुई कदकाठी का जवान युवक था. उसे देख कर 22 वर्षीय ज्योति का दिल भी तेजी से धड़कने लगा था.

रोहित जब भी ज्योति के गांव जाता उस की मुलाकात ज्योति से हो जाती. दोनों ही एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे. जब दो युवा मिलते हैं तो जिंदगी में नया रंग घुलने लगता है. दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार करना चाहते थे. एक दिन ज्योति को मौका मिल ही गया. भाई और पिता आटा चक्की पर थे, मां घर के कामों में व्यस्त थी. ज्योति ने जैसे ही रोहित को देखा वह उस के पास से निकली और चुपचाप से एक पर्ची उस के पास गिरा दी. रोहित ने वह पर्ची झट से उठा कर अपने पास रख ली. काम निपटाने के बाद रास्ते में उस पर्ची को खोला तो उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. बिना देर किए रोहित ने वह नंबर डायल किया.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘मैं ज्योति मिश्रा बोल रही हूं, आप कौन?’’

इस पर उस ने जवाब दिया, ‘‘मैं रोहित यादव बोल रहा हूं. आप के गांव के मवेशियों के इलाज के लिए आताजाता रहता हूं.’’

‘‘जनाब, आप इलाज जानवरों का करते हैं और घायल इंसानों को कर देते हैं,’’ कह कर ज्योति खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘आप चिंता न करें, अब मुझे आप का फोन नंबर मिल गया है. अब आप बिलकुल ठीक हो जाओगी.’’ रोहित ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया. एकदूसरे के मोबाइल नंबर मिलने के बाद दोनों के बीच धीरेधीरे बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. यह काफी दिनों तक चलता रहा. जब भी रोहित ज्योति के गांव में आता दोनों चोरीछिपे मिल कर एकदूसरे की दिल की बात जान लेते.

दोनों की जातियां भले ही अलगअलग थीं. लेकिन प्यार के दीवानों को इस की परवाह नहीं थी. दोनों का मानना था कि समाज और जाति सब अपनी जगह हैं, लेकिन हमारा प्यार इन सब से ऊपर है. यह सोच कर दोनों ने एकदूसरे का हमसफर बनने का निर्णय ले लिया था. इश्क की खुशबू कभी छिपती नहीं है. ज्योति के घर वालों को जब दोनों के बीच चल रहे प्रेमप्रसंग का पता चला तो उन्होंने ज्योति को कड़ी चेतावनी दी और रोहित से न मिलने की हिदायत दे दी. लेकिन रोहित की प्रेम दीवानी ज्योति पर इस चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ था. उस ने घर वालों से बगावत कर दी और एक दिन मौका मिलते ही ज्योति रोहित के साथ घर से भाग गई.

इस बात की जानकारी होने पर ज्योति के घर वालों ने दोनों को बहुत तलाशा. उन के न मिलने पर उन्होंने रोहित के खिलाफ कोतवाली मैनपुरी में ज्योति को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. 17 सितंबर, 2018 को दोनों ने घर वालों की मरजी के बिना प्रयागराज में कोर्ट मैरिज कर ली. कोर्ट मैरिज के बाद रोहित और ज्योति कुछ दिन दिल्ली जा कर रहे. दोनों बाद में गांव बृजपुरा आ गए थे. ज्योति के घर वालों ने यह जानकारी  पुलिस को दे दी. तब पुलिस ने ज्योति और रोहित को हिरासत में ले लिया. पुलिस ज्योति को जब न्यायालय में बयान दर्ज कराने के लिए ले जा रही थी, तब ज्योति के घर वालों ने उस से कहा कि वह उन के साथ चलने की बात कोर्ट में कहे.

इस बात के लिए ज्योति ने हामी तो भर दी थी, लेकिन जब कोर्ट में ज्योति के बयान दर्ज हुए तो उस ने पति रोहित के साथ ही जाने के बयान दिए थे. लिहाजा ज्योति को उस के पति रोहित के साथ भेज दिया गया. बेटी के इस फैसले के बाद वृद्ध पिता ब्रजेश मिश्रा व मां चुपचाप घर चले गए थे. उस समय उन्होंने खुदको बहुत अपमानित महसूस किया था. अंतरजातीय प्रेम विवाह ज्योति के घर वालों को मंजूर नहीं था. खासकर ज्योति के भाई गुलशन व चचेरे भाइयों राघवेंद्र व रघुराई को. इस वजह से वह ज्योति और रोहित से रंजिश मानने लगे थे. वे लोग दोनों की हत्या करना चाहते थे, लेकिन घर के बड़ेबुजुर्गों ने उन्हें समझाया कि हत्या करने से गई हुई इज्जत वापस तो आ नहीं जाएगी. यदि तुम लोग हत्या करोगे तो पुलिस का शक तुम्हीं लोगों पर जाएगा और पकड़े जाओगे.

उस समय तो वे लोग खून का घूंट पी कर रह गए थे. लगभग 2 साल बीतने के बाद घर वाले भी यह मान बैठे थे कि अब ये लड़के कोई घटना नहीं करेंगे. ज्योति के गैर जाति में शादी कर लेने की वजह से गांव में भी लोग आए दिन घर वालों पर छींटाकशी करते रहते थे. इस के साथ ही अविवाहित चचेरे भाई राघवेंद्र की शादी के लिए रिश्ते तो आते थे, लेकिन जब उन्हें सारी बातों की जानकारी होती, तो वे शादी से इंकार कर देते थे. चचेरी बहन के यादव जाति में शादी कर लेने से राघवेंद्र की शादी भी नहीं हो पा रही थी. इस से राघवेंद्र परेशान रहने लगा था. एक बार राघवेंद्र अकेला ज्योति की ससुराल जा पहुंचा और उस ने ज्योति से घर चलने के लिए दवाब डाला. लेकिन ज्योति ने साफ मना कर दिया. इस पर राघवेंद्र मुंह लटका कर घर लौट आया था.

यह बात गुलशन व रघुराई को नागवार लगी थी. इस घटना के बाद एक बार उन्होंने 50 हजार में भाड़े के एक शूटर से ज्योति व रोहित की हत्या कराने की योजना भी तैयार की गई थी, लेकिन वे सफल नहीं हुए थे. समय बीतने के साथ ही तीनों आरोपियों के मन में ज्योति के प्रति नफरत बढ़ती गई. इन्हें डर था कि कहीं ज्योति मां बन गई तो इस रिश्ते की डोर और भी मजबूत हो जाएगी. फिर दोनों परिवार कभी एक भी हो सकते हैं. सब तरफ से हताश होने के बाद गुलशन और उस के चचेरे भाइयों ने दोनों की हत्या करने की प्लानिंग की. वे पिछले एक महीने से इस की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने तय कर लिया था कि ज्योति और रोहित जिस दिन एक साथ मिलेंगे, वह उन की हत्या कर देंगे. इसी वजह से वे घर वालों को अंधेरे में रख कर हत्या की योजना बना रहे थे.

उन्होंने असलहों का इंतजाम भी कर लिया था. फिर तीनों ने उन की रेकी करने का काम शुरू कर दिया. 7 जुलाई, 2020 को उन को मौका मिल भी गया. उस दिन राघवेंद्र ने मोटरसाइकिल से शाम के समय रोहित और ज्योति को जाते देख लिया था. उस ने गुलशन और रघुराई को बताया कि आज दोनों को निपटा देने का अच्छा मौका है. उसी समय उन लोगों ने योजना को अंजाम देने की ठान ली थी. तीनों ने तमंचों व कारतूसों का इंतजाम पहले ही कर लिया था. वे सिंहपुर नहर पुल के बंबे के पास मोटरसाइकिलों से जा कर उन का इंतजार करने लगे. रात सवा 8 बजे जैसे ही उन्हें रोहित की मोटरसाइकिल आती दिखी, उन लोगों ने दोनों पर घात लगा कर हमला कर दिया. उन्होंने दोनों पर ताबड़तोड़ फायरिंग  कर दी.

घटना के दौरान गुलशन मार्ग से आनेजाने वाले लोगों पर नजर भी रख रहा था, जबकि ज्योति को 6 गोलियां राघवेंद्र व रघुराई ने मारीं थीं, जिस से उस के बचने की कोई गुंजाइश न रहे. वहीं योजना थी कि रोहित के घुटने में गोली मार कर उसे जिंदगी भर के लिए अपाहिज कर दिया जाए. ताकि वह सारी जिंदगी अपने किए पर पछताता रहे. इसीलिए उन्होंने रोहित के एक गोली मारी. लेकिन हड़बड़ी में गोली रोहित के घुटने के बजाय पेट में जा लगी. अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के बाद आरोपी घटनास्थल से फरार हो गए थे.

रिपोर्ट 5 लोगों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी. इन में 3 नामजदों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था. जबकि पिता बृजेश मिश्रा के खिलाफ जांच में कोई सबूत नहीं मिला था. इसी तरह पांचवें आरोपी की लोकेशन घटना के समय पुलिस को पुणे में मिली थी. इस संबंध में कहानी लिखे जाने तक विवेचना जारी थी. हत्या के लिए 2 तमंचे व 10 कारतूस का इंतजाम आरोपियों ने किया था. कारतूस व तमंचा कहां से जुटाए गए थे, पुलिस इस की भी जांच कर रही थी, ताकि दोषियों के विरुद्ध काररवाई की जा सके. इस हत्याकांड के खुलासे में एएसपी मधुबन सिंह, सीओ अभय नारायण राय, इंसपेक्टर भानुप्रताप सिंह, सर्विलांस सेल प्रभारी जोगिंदर सिंह, स्वाट टीम प्रभारी रामनरेश यादव का विशेष सहयोग रहा. एसपी अजय कुमार पांडेय ने पुलिस टीम को इस हत्याकांड का खुलासा करने पर 20 हजार का इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों को 18 जुलाई, 2020 को ही न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. मामले की जांच इंसपेक्टर भानुप्रताप सिंह कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story : बेइज्जती का बदला लेने के लिए दोस्त का किया कत्ल

Crime Story : प्रदीप 8 महीने तक फेसबुक पर ज्योति के संपर्क में रहा. दोनों में पहले दोस्ती हुई, फिर प्यार और फिर मिलन की तैयारी. उस के इस फेसबुकिया प्रेम ने उस के दोस्त…

फिरोजाबाद जिले का एक थाना है नगला खंगर. इसी के थाना क्षेत्र में एक गांव है धौनई. यहीं के रहने वाले अजयपाल का बेटा है प्रदीप यादव. वह झारखंड की एक कंपनी में नौकरी करता था. अजयपाल रक्षाबंधन से 9-10 दिन पहले अपने गांव धौनई आ गया था ताकि त्यौहार अच्छे से मनाया जा सके. उस के आने से पूरा परिवार खुश था. वजह यह कि नौकरी की वजह से अजय को झारखंड में रहना पड़ता था. वहां से वह कईकई महीने में आ पाता था. करीब 8 महीने पहले अजयपाल की फेसबुक के माध्यम से एक युवती ज्योति शर्मा से दोस्ती हो गई थी. बाद में दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर भी दे दिए थे. इस के बाद मोबाइल पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया था.

बातों बातों में प्रदीप को पता चला कि ज्योति फिरोजाबाद जिले के गांव नगला मानसिंह की रहने वाली है. ज्योति ने बताया था कि वह बीए में पढ़ रही है. फेसबुक से शुरू हुई दोनों की दोस्ती धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. अब ज्योति और प्रदीप मोबाइल पर प्यार भरी बातें भी करने लगे. अगर किसी लड़केलड़की के बीच लगातार बातचीत होती रहे तो कई बार प्यार हो जाता है. यही अजयपाल और ज्योति के बीच भी हुआ. दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे. दोनों ने एकदूसरे पर अपने प्रेम को भी उजागर कर दिया. प्रदीप ने ज्योति को बताया कि वह भी फिरोजाबाद जिले के थाना नगला खंगर के गांव धौनई का रहने वाला है. यह जानने के बाद दोनों एकदूसरे से मिलने के लिए उतावले हो गए.

लेकिन प्रदीप को कंपनी से छुट्टी नहीं मिल पा रही थी. अपने गांव जाने से वह इसलिए भी कतरा रहा था कि घर वाले पूछेंगे कि तुम अचानक क्यों आ गए? इसलिए प्रदीप ने ज्योति को बताया, वह रक्षाबंधन पर घर आएगा तो उस से जरूर मुलाकात करेगा. प्रदीप अपनी प्रेयसी से मिलने को आतुर था. इसलिए उस ने रक्षाबंधन से पहले ही घर जाने का निर्णय कर लिया. उस ने घर जाने के लिए छुट्टी ले ली. फिर वह रक्षाबंधन से 10 दिन पहले ही गांव आ गया. रक्षाबंधन 3 अगस्त को था. इस बीच उस की ज्योति से फोन पर बातचीत होती रही. प्रदीप का गांव में एक ही दोस्त था सत्येंद्र. वह गांव में ही खेतीकिसानी करता था. उस के पिता रामनिवास की मृत्यु हो चुकी थी. सत्येंद्र फौज में भरती होने की तैयारी कर रहा था.

2 अगस्त की शाम 7 बजे थे. सत्येंद्र खेत से काम कर के वापस घर लौटा था. हाथमुंह धो कर उस ने मां से खाना परोसने के लिए कहा. मां थाली परोस कर लाई ही थी कि सत्येंद्र का दोस्त प्रदीप आ पहुंचा. प्रदीप ने इशारे से सत्येंद्र को अपने पास बुलाया. प्रदीप ने उस के कान के पास मुंह ले जा कर धीमी आवाज में कुछ कहा. इस पर सत्येंद्र बोला, ‘‘खाना खा कर चलते हैं.’’

लेकिन प्रदीप ने कहा, ‘‘अभी लौट कर आते हैं, तभी खा लेना.’’

इस पर सत्येंद्र ने परोसी थाली छोड़ कर मां से कहा कि वह जरूरी काम से प्रदीप के साथ तिलियानी गांव जा रहा है. थोड़ी देर में लौट आएगा और वह जाने लगा तो मां ने कहा, ‘‘बेटा खाना तो खा ले, अभी तो कह रहा था तेज भूख लग रही है.’’

‘‘चिंता मत करो मां, वापस आ कर खा लूंगा.’’ कह कर 23 वर्षीय सत्येंद्र अपने 24 वर्षीय दोस्त प्रदीप की मोटरसाइकिल पर बैठ कर उस के साथ चला गया. दोस्ती में सत्येंद्र बना शिकार रात सवा 8 बजे सत्येंद्र के घर वालों को सूचना मिली कि सत्येंद्र तिलियानी रोड पर नगला मानसिंह के पास लहूलुहान पड़ा है. यह सुन कर घर वालों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. घर वाले आननफानन में घटनास्थल पर पहुंचे और घायल सत्येंद्र को उपचार के लिए जिला अस्पताल ले आए. उस के माथे पर गोली लगी थी. उस की गंभीर हालत देख डाक्टरों ने उसे आगरा रेफर कर दिया. घर वाले सत्येंद्र को उपचार के लिए जब आगरा ले जा रहे थे, तो रास्ते में उस की मौत हो गई. पोस्टमार्टम के लिए उस के शव को जिला अस्पताल वापस लाया गया. सत्येंद्र के शरीर में गोली न मिलने के कारण उस के शव का एक्सरे किया गया.

पता चला कि गोली माथे में लगने के बाद पार हो गई थी. सुबह जब सत्येंद्र की मौत की खबर गांव पहुंची तो सनसनी फैल गई. सभी उसे सीधासादा बता कर उस की हत्या पर शोक जताने लगे. उधर पुलिस की पूछताछ में सत्येंद्र के भाई धर्मवीर ने बताया कि कल शाम 7 बजे जब सत्येंद्र खाना खाने बैठा था, तभी गांव का उस का दोस्त प्रदीप आया और भाई को जबरन साथ ले गया. धर्मवीर ने आरोप लगाया कि उसी ने भाई की गोली मार कर हत्या कर दी है. धर्मवीर की तहरीर पर पुलिस ने प्रदीप के विरुद्ध भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में लेने के साथसाथ उस के मोबाइल को भी कब्जे में ले लिया और उस से पूछताछ शुरू कर दी.

पूछताछ के दौरान प्रदीप ने पुलिस को बताया कि वह सत्येंद्र के साथ तिलियानी गांव की ओर जा रहा था. इसी दौरान रास्ते में अचानक गोली चली और मोटरसाइकिल चला रहे सत्येंद्र के माथे में आ लगी, उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. सत्येंद्र को गोली लगने पर वह डर गया और अपनी जान बचाने के लिए वहां से भाग गया. हत्या का यह मामला आईजी (आगरा रेंज) ए. सतीश गणेश तक पहुंचा. उन्होंने कहा, ‘कहानी जितनी सीधी दिख रही है उतनी है नहीं. कोई पागल ही होगा जो अपने साथ किसी को उस के घर से ले कर आए और उस की हत्या कर दे. इस मामले में गहराई से जांच कराई जाए.’

पुलिस को प्रदीप की बात गले नहीं उतर रही थी. पुलिस को लगा कि वह सच्चाई छिपा रहा है. सवाल यह था कि रात में दोनों तिलियानी गांव किस से मिलने जा रहे थे और क्या काम था, पुलिस प्रदीप से जानना चाहती थी कि हत्या से पहले क्याक्या हुआ था, अब प्रदीप के पास सच बताने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. पुलिस ने इस बारे में प्रदीप से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने पुलिस को बहुत बाद में बताया कि उस की एक गर्लफ्रैंड है ज्योति शर्मा. उस ने ही उसे मिलने के लिए नगला मानसिंह मोड़ पर बुलाया था, दोनों उसी के पास जा रहे थे कि रास्ते में यह घटना घट गई. उस ने पुलिस से कहा कि वह चाहें तो ज्योति से पूछ ले.

प्रदीप के बयानों की सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने ज्योति की तलाश शुरू की. लेकिन ज्योति होती तो मिलती. प्रदीप से उस का मोबाइल नंबर लेने के बाद सर्विलांस पर लगा दिया गया. साइबर सेल ने यह गुत्थी सुलझा दी. दरअसल प्रदीप को फंसाने के लिए ज्योति शर्मा के नाम से एक हाईटेक जाल फैलाया गया था, जांच में पुलिस को पता चला कि जो नंबर ज्योति शर्मा का बताया जा रहा था वह नंबर गांव इशहाकपुर निवासी राघवेंद्र उर्फ काके का है. पुलिस ने प्रदीप से कहा, तुम जिस नंबर को ज्योति शर्मा का बता रहे हो, वह तो राघवेंद्र का है. यह सुनते ही प्रदीप का माथा ठनका. उस ने पुलिस को बताया कि इशहाकपुर का राघवेंद्र तो उस से रंजिश रखता है. लगता है वह मेरी बात ज्योति शर्मा नाम की किसी लड़की से कराता था. वह लड़की कौन है, यह बात तो राघवेंद्र ही बता सकता है.

एसएसपी सचिंद्र पटेल इस सनसनीखेज हत्याकांड की पलपल की जानकारी ले रहे थे. उन्होंने इस केस के आरोपियों की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी एसपी (देहात) राजेश कुमार को सौंपी. साथ ही उन्होंने उन की मदद के लिए एएसपी डा. इरज रजा और थाना सिरसागंज के प्रभारी गिरीश चंद्र गौतम को ले कर एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस पुलिस टीम में थानाप्रभारी के साथ ही एसओजी प्रभारी कुलदीप सिंह, एसआई रनवीर सिंह, अंकित मलिक, प्रवीन कुमार, कांस्टेबल विजय कुमार, परमानंद, राघव दुबे, हिमांशु, महिला कांस्टेबल हेमलता शामिल थे. इस टीम के सहयोग के लिए एसओजी प्रभारी कुलदीप सिंह को भी सहयोग करने का आदेश दिया गया. पुलिस शुरू से ही इस मामले की गहनता से जांच कर रही थी.

सौफ्टवेयर का कमाल जांच कार्य में एसएसपी सचिंद्र पटेल के निर्देश के बाद और तेजी आ गई. 7 अगस्त को पुलिस को मुखबिर से जानकारी मिली कि नगला मानसिंह में हुई हत्या के आरोपी गड़सान रोड पर व्यास आश्रम के गेट के पास खड़े हैं. इस सूचना पर थानाप्रभारी गिरीशचंद्र गौतम पुलिस टीम के साथ बताए गए स्थान पर पहुंच गए और घेराबंदी कर राघवेंद्र यादव उर्फ काके और उस के दोस्त अनिल यादव को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस दोनों हत्यारोपियों को थाने ले आई. पुलिस ने उन के कब्जे से हत्या में इस्तेमाल 315 बोर का तमंचा, एक खोखा, एक कारतूस, 3 मोबाइल और हत्या में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. दोनों आरोपियों ने सत्येंद्र की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस लाइन सभागार में आयोजित प्रैस कौन्फ्रैंस में एसपी (ग्रामीण) राजेश कुमार ने हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी.

राघवेंद्र प्रदीप से रंजिश के चलते उस की हत्या करना चाहता था. उस ने फूलप्रूफ षडयंत्र भी रचा. हत्यारोपियों ने हाईटेक जाल बिछाया और प्रदीप को अपने जाल में फंसा कर उसे अपनी मनपसंद जगह पर भी बुला लिया लेकिन निशाना चूक गया. हत्या प्रदीप की करनी थी, लेकिन हो गई उस के दोस्त सत्येंद्र की. हत्यारोपियों ने इस सनसनीखेज हत्याकांड के पीछे की जो कहानी बताई, वह चाैंकाने वाली थी—

सन 2014 की बात है. प्रदीप के गांव धौनई की रहने वाली एक लड़की से थाना नगला खंगर क्षेत्र के गांव इशहाकपुर निवासी राघवेंद्र का प्रेमप्रसंग चल रहा था. एक दिन प्रदीप राघवेंद्र को उसी लड़की के चक्कर में धोखे से बुला कर अपने गांव ले गया था. उस ने अपने परिवार के युवक हिमाचल से राघवेंद्र की पिटाई करवाने के साथसाथ उसे बेइज्जत भी कराया. तभी से वह प्रदीप से रंजिश मानने लगा था.वह प्रदीप से अपनी बेइज्जती का बदला लेना चाहता था. लेकिन इस घटना के बाद प्रदीप नौकरी के लिए झारखंड चला गया था. राघवेंद्र के सीने में प्रतिशोध की आग धधक रही थी. करीब 8 माह पहले उसे प्रदीप की फेसबुक से पता चला कि वह झारखंड की एक कंपनी में काम करता है. इस के बाद उस ने ज्योति शर्मा बन कर उस से दोस्ती कर ली और उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया.

प्रदीप का मोबाइल नंबर लेने के बाद राघवेंद्र ने अपने मोबाइल में वौइस चेंजर ऐप डाउनलोड किया. इसी ऐप के माध्यम से वह नगला मानसिंह की ज्योति शर्मा बन कर प्रदीप से बातें करने लगा. रक्षाबंधन पर प्रदीप को गांव आना था, राघवेंद्र को इस की जानकारी थी. उस ने कई दिन पहले से प्रदीप की हत्या की साजिश का तानाबाना बुनना शुरू कर दिया था. उस ने ज्योति शर्मा बन कर आवाज बदलने वाले सौफ्टवेयर से आवाज बदल कर प्रदीप को फोन किया. दोनों के बीच फोन पर प्यार भरी बातें होने लगीं. मिलने के वादे हुए. फोन पर प्रदीप जिसे ज्योति समझ कर हंसीमजाक करता था, उस से अपने दिल की बात कहता था वह राघवेंद्र था. वह भी ज्योति बन कर प्रदीप से पूरे मजे लेता था.

रक्षाबंधन पर प्रदीप के घर आने की जानकारी राघवेंद्र को थी. प्रदीप से बदला लेने का अच्छा मौका देख उस ने ज्योति की आवाज में पहली अगस्त को प्रदीप को नगला मानसिंह मोड़ पर मिलने के लिए शाम को बुलाया. उस से वादा किया कि आज मिलने पर उस की सारी हसरतें पूरी कर देगी. पहले दिन मोटरसाइकिल पर 2 लोग होने के कारण राघवेंद्र घटना को अंजाम नहीं दे सका था. 2 अगस्त को उस ने दोबारा ज्योति बन कर प्रदीप को फोन किया और मिलने के लिए बुलाया. प्रदीप ने ज्योति से कहा कि वह कुछ ही देर में उस से मिलने आ रहा है. इस के बाद प्रदीप अपने दोस्त सत्येंद्र के घर गया और उसे साथ ले कर तिलियानी रोड स्थित नगला मानसिंह मोड़ की ओर चल दिया.

नगला मानसिंह के पास रास्ते में राघवेंद्र अपने गांव के ही दोस्त अनिल यादव के साथ मोटरसाइकिल से पहले ही पहुंच गया था. प्रदीप को मोटरसाइकिल पर आते देख कर राघवेंद्र ने गोली चला दी. गोली प्रदीप को न लग कर उस के दोस्त सत्येंद्र के माथे में लगी, जिस से बाद में उस की मौत हो गई थी. पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. इस सनसनीखेज घटना का खुलासा करने वाली टीम को एसएसपी सचिंद्र पटेल ने 15 हजार रुपए का पुरस्कार दिया. यह सच है कि युवक हों या युवतियां प्यार में अंधे हो जाते हैं. न तो खुद गहराई से सोचते हैं और न दूसरे को सोचने देते हैं. इसी वजह से कभीकभी ऐसा कुछ हो जाता है, जो सावधानी बरतने पर नहीं होता. उस के अंधे प्यार ने उस के दोस्त की बलि ले ली.

आईजी के शक के चलते प्रदीप हत्या का आरोपी बनने से बच गया. उस की जगह उस का दोस्त सत्येंद्र बिना वजह मारा गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : साली के प्यार में पत्नी और बेटे को सल्फास की गोलियां खिलाकर मार डाला

Love Crime : सही मायनों में साली का दरजा सगी छोटी बहन जैसा होता है, इस के बावजूद कई लोग साली को आधी घर वाली कहते हैं, कहते ही नहीं समझने भी लगते हैं.कई सालियां भी पीछे नहीं रहतीं. अनिल और पूजा के साथ भी ऐसा ही कुछ था. तभी तो अनिल ने पूजा…

अनिल के घर से आती रोनेचीखने की आवाजें सुन कर पड़ोसियों को हैरानी हुई कि ऐसी क्या बात हो गई, जो अनिल इतनी जोर से रो रहा है. वह रोते हुए चीख रहा था, ‘‘अनिता तुम्हें क्या हो गया, तुम उठ क्यों नहीं रही हो?’’

अनिल सुबकते हुए कह रहा था, ‘‘देखो, हमारा बेटा मयंक भी नहीं उठ रहा है?’’

चीखपुकार और रोने की आवाजें सुन कर आसपड़ोस के कुछ लोग अनिल के घर पहुंच गए. लोगों ने देखा, एक कमरे में अनिता और उन का बेटा मयंक पड़े थे. दोनों ना तो होश में थे और ना ही हिलडुल रहे थे. अनिल ने पड़ोसियों को आया देख कर कहा, ‘‘पता नहीं मेरी बीवी और बेटे को क्या हो गया है? कुछ बोल ही नहीं रहे हैं. लगता है, इन्होंने कुछ खा लिया है. उल्टियां भी हुई थीं.’’

पड़ोसियों ने भी अनिता और मयंक के हाथपैर हिला कर उन की स्थिति जानने की कोशिश की, लेकिन दोनों में जीवन के कोई लक्षण नजर नहीं आए. पड़ोस की भाभीजी बोली, ‘‘कल रात तक तो अनिता मुझ से खूब हंसहंस कर बात कर रही थी. रात ही रात में ऐसा क्या हो गया, जो मरणासन्न सी पड़ी है.’’

अनिता और मयंक के कुछ खाने की बात सुन कर पड़ोसियों की सुगबुगाहट शुरू हो गई. तभी अनिल रोतेरोते बोला, ‘‘भाई साहब, आजकल कोरोना की महामारी चल रही है, कहीं मेरी बीवी और बेटा कोरोना के शिकार तो नहीं हो गए.’’

कोरोना की बात सुन कर पड़ोसियों ने कहा, ‘‘अनिल, इन दोनों को अस्पताल ले जाओ. एक बार डाक्टर को दिखाओ. क्या पता किसी और वजह से बेहोशी आ गई हो?’’

अनिल ने रोतेबिलखते हुए अपने साले और एकदो दूसरे रिश्तेदारों को फोन किया. फिर पत्नी अनिता और बेटे मयंक को कांवटिया अस्पताल ले गया. अस्पताल की इमरजेंसी में डाक्टरों ने जांचपड़ताल के बाद मांबेटे को मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने अनिल की बताई बातों और दोनों शवों के लक्षण देख कर यह अंदाजा लगा लिया कि दोनों की मौत जहरीला पदार्थ खाने से हुई है. मांबेटे की संदिग्ध मौत के कारण अस्पताल प्रशासन की ओर से इस संबंध में पुलिस को सूचना दे दी गई. यह बात इसी साल 25 जून की है. अनिल शर्मा जयपुर में सूर्यनगर, नाड़ी का फाटक, लाइफलाइन डेंटल अस्पताल के पास स्थित मकान नंबर 12 में पत्नी अनिता और बेटे मयंक के साथ रहता था. अनिल जयपुर कलेक्ट्रेट में क्लर्क है.

अस्पताल की सूचना पर करधनी थाना पुलिस कांवटिया अस्पताल पहुंची और अनिता व मयंक के शव को कब्जे में ले कर पंचनामे की कार्यवाही की. इस के बाद दोनों शवों का पोस्टमार्टम कराया गया. करधनी थाना पुलिस ने मामला धारा 174 सीआरपीसी में दर्ज कर इस की जांच एएसआई प्रमोद कुमार को सौंप दी. पुलिस ने मौकामुआयना किया. अनिता के पति अनिल और पड़ोसियों से पूछताछ की. पूछताछ में सामने आया कि पड़ोसियों ने अनिता के देवर सुनील को घटना से एक दिन पहले शाम को अनिल के घर पर आतेजाते देखा था. यह भी पता चला कि अनिल की साली पूजा भी वहां आतीजाती रहती थी.

संदेह हुआ तो जांच हुई शुरू  शुरुआती जांच में पुलिस अधिकारियों को मांबेटे की मौत का यह मामला संदिग्ध नजर आया. इस पर डीसीपी (जयपुर पश्चिम) प्रदीप मोहन शर्मा ने जांच के लिए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त बजरंग सिंह के निर्देशन में एक टीम बनाई. इस टीम को झोटवाड़ा के एसीपी हरिशंकर शर्मा के सुपरविजन और करधनी थानाप्रभारी रामकिशन बिश्नोई के नेतृत्व में काम करना था. इस टीम में एएसआई प्रमोद कुमार, हैडकांस्टेबल मनोज कुमार, कांस्टेबल नरेंद्र सिंह, अजेंद्र सिंह, बाबूलाल, रामसिंह, अमन, रविंद्र और महिला कांस्टेबल निशा को शामिल किया गया.

पुलिस ने जांच में तेजी लाते हुए अनिल, उस के छोटे भाई सुनील और साली पूजा के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा अनिल की गतिविधियों का भी पता लगाया. अनिल की ससुराल वालों की जानकारी भी हासिल की गई. अनिल की साली पूजा के बारे में भी जरूरी सूचनाएं जुटाई गईं. पुलिस ने एकदो बार अनिल और पूजा से पूछताछ भी की. पुलिस की जांचपड़ताल तेज होती देख अनिल को लगा कि पुलिस गहराई में जा रही है. वह राजस्थान की राजधानी जयपुर की कलेक्ट्रेट में बाबू था. इसलिए उस का वास्ता सभी तरह के लोगों से पड़ता था. वैसे भी वह सरकारी कामकाज की सारी प्रक्रिया जानता था.

अनिल ने घटना के करीब एक हफ्ते बाद राजस्थान के पुलिस महानिदेशक कार्यालय में इस मामले की जांच के लिए एक परिवाद लगा दिया. दूसरी तरफ, कलेक्ट्रेट के अधिकारियों से पुलिस के एक उच्चाधिकारी को जांच के नाम पर अनिल को परेशान नहीं करने की सिफारिश कराई. इन दोनों बातों से उस पर पुलिस का शक गहरा गया. कारण यह कि पुलिस ने अभी तक उस से कोई खास पूछताछ नहीं की थी, फिर भी उस ने कलेक्ट्रेट के अधिकारियों से सिफारिश लगवाई थी. पुलिस को अनिल, सुनील और पूजा के मोबाइल की काल डिटेल्स मिली, तो उन में कई चौंकाने वाले पहलू सामने आए. तीनों के बयानों में काफी विरोधाभास था.

पुलिस ने व्यापक जांचपड़ताल के बाद अनिल से सख्ती से पूछताछ की, तो उस की 38 साल की पत्नी अनिता और 14 साल के बेटे मयंक की मौत का राज खुल गया. अनिल ने रचा बड़ा षडयंत्र अनिल से पूछताछ के आधार पर उस के छोटे भाई सुनील और साली पूजा से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ के बाद पुलिस ने 30 जुलाई को अनिता और मयंक की हत्याओं के आरोप में अनिल, सुनील और पूजा को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में मांबेटे की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अनिल का अपनी साली पूजा से प्रेम प्रसंग का परिणाम थी. जीजा अनिल के इश्क में पूजा इतनी निष्ठुर हो गई थी कि उस ने अपना घर बसाने के लिए बहन का घर उजाड़ने के साथ बहन और भांजे को भी मरवा दिया.

अनिल अपनी शादीशुदा साली के हुस्न का इतना दीवाना हो गया था कि उस ने पूजा से अवैध संबंधों का विरोध करने वाली पत्नी और बेटे को ही मौत की नींद सुला दिया. उस ने अपने भाई सुनील और साली पूजा के साथ मिल कर बीवीबच्चे की जान ले ली. करीब 15 साल पहले अनिल शर्मा की शादी राजस्थान के सीकर जिले के लोसल कस्बे में रहने वाले अंजनी कुमार की बेटी अनिता से हुई थी. बड़ी बेटी अनिता की शादी के बाद अंजनी कुमार के परिवार में पत्नी मंजू, छोटी बेटी पूजा और बेटा अनुराग रह गए थे. शादी के बाद अनिता खुश थी. पति अनिल सरकारी नौकरी में था. घर का खर्च आराम से चल जाता था. परिवार में ज्यादा जिम्मेदारियां भी नहीं थी. घर में केवल अनिल का छोटा भाई सुनील था. हंसीखुशी से दिन गुजर रहे थे. शादी के कुछ समय बाद ही अनिता ने एक दिन अनिल को खुशखबरी दी.

अनिता के मुंह से जल्दी ही पिता बनने की बात सुन कर अनिल के जीवन में खुशियों के रंग भर गए.  आखिर वह दिन भी आ गया, अनिता ने बेटे को जन्म दिया. बेटा पा कर अनिल भी खुश था और अनिता भी. इन दोनों से ज्यादा खुश मंजू और अंजनी कुमार थे. वे दोनों नानानानी बन गए थे. नवासे ने उन के बुढ़ापे में भी खुशियों का चमन खिला दिया था. अनिल और अनिता ने बेटे का नाम मयंक रखा. मयंक समय के साथ बड़ा हो कर स्कूल जाने लगा. पहले अनिल की पोस्टिंग सीकर में थी. इसी दौरान 14 जुलाई, 2014 को अनिल के ससुर अंजनी कुमार की संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई. सीकर जिले की लोसल थाना पुलिस ने जांचपड़ताल के बाद आत्महत्या का मामला मानते हुए अंजनी कुमार की मौत की फाइल बंद कर दी.

पत्नी और बेटे की हत्या में अनिल की जयपुर में हुई गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में यह रहस्य भी उजागर हुआ है कि अंजनी कुमार की हत्या की गई थी. अंजनी कुमार की हत्या के बारे में बाद में बात करेंगे. पहले अंजनी कुमार की मौत के बाद की कहानी जान लें. अनिल की ससुराल में ससुर अंजनी कुमार ही परिवार के मुखिया थे. उन की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. परिवार में दिवंगत अंजनी कुमार की पत्नी, एक जवान बेटी पूजा और छोटा बेटा अनुराग रह गए थे. घर में जवान बेटी हो और कोई बड़ा पुरुष ना हो, तो लोगों की गंदी नजरें पीछा करती ही हैं. ऐसे समय में अनिल ने आगे बढ़ कर सहारा देने के लिए अपनी सास, साली और साले को सीकर में अपने साथ ही रख लिया. दोनों परिवार एकसाथ रहने लगे. इस दौरान अनिल और पूजा के बीच प्यार के बीज अंकुरित हो गए. घर में उन्हें ज्यादा मौका नहीं मिल पाता था, इसलिए मौका मिलने पर अनिल और पूजा घर से बाहर एकदूसरे की बांहों में समाने लगे.

इस बीच, अनिल ने अपने ससुर का प्लौट 30 लाख रुपए में बेच दिया और ससुराल वालों को बता दिया कि इस रकम से आप के लिए जयपुर में प्लौट ले लिया है. सास और सालासाली ने अनिल की बात पर भरोसा कर लिया. जबकि हकीकत यह थी कि अनिल ने ससुराल वालों के नाम से जयपुर में कोई प्लौट नहीं लिया था. साल 2016 में अनिल का तबादला सीकर से जयपुर कलेक्ट्रेट में हो गया. तबादला होने पर अनिल को गुलछर्रे उड़ाने का बड़ा मौका हाथ लग गया. इस के लिए उस ने एक चाल चली. वह अपनी सास को विश्वास में ले कर साली पूजा तथा साले अनुराग को पढ़ाने के बहाने जयपुर ले आया, जबकि पत्नी अनिता व बेटे मयंक को सास की देखभाल के लिए सीकर में ही छोड़ दिया.

बीवी की जगह साली को लाया साथ जयपुर आने के बाद अनिल को आजादी मिल गई. मन की मुराद पूरी करने के लिए वह साली पूजा को भी साथ ले आया था. जयपुर में उन्हें देखनेपूछने या टोकने वाला कोई नहीं था. इसलिए अनिल और पूजा को प्रेमबेल ज्यादा मजबूत होती गई. जीजा के प्यार में डूबी पूजा अपनी बहन की ही सौतन बन कर अनिल से शादी करने के ख्वाब देखने लगी. अनिल को भी पता नहीं पूजा में ऐसा क्या दिखा कि वह भी उस से शादी रचाने को बेताब था. बस समस्या यह थी कि दोनों के बीच समाज और परिवार आड़े आ रहे थे. इस बीच, अनिल ने जयपुर में मकान खरीद लिया और परिवार को जल्दी ही जयपुर ले आया. जयपुर आने पर अनिता को अनिल और पूजा की करतूतों का पता चल गया. अनिता ने इस का विरोध किया. फलस्वरूप घर में कलह होने लगी.

अनिल ने परिस्थितियां भांप कर सास, साली और साले को अपने मकान के पास ही दूसरा मकान दिलवा दिया. अनिता ने अपनी मां से पूजा की शादी जल्द से जल्द करने पर जोर दिया. अनिल ने साल 2018 में पूजा की शादी करवा दी. भले ही पूजा की शादी हो गई थी, लेकिन वह तो जीजा अनिल को ही सपनों का राजकुमार मानती थी. यही कारण रहा कि पूजा शादी के बाद ससुराल बहुत कम जाती थी. जब भी वह ससुराल जाती, पति को नौकरी नहीं लगने का ताना मार कर उस से दूर ही रहती. शादी के बाद भी पूजा और अनिल के बीच दूरियां कम नहीं हुई थी, बल्कि प्रेम की यह बेल एकदूसरे से गुंथ कर बढ़ती ही जा रही थी. इस बात पर अनिता और अनिल के बीच आए दिन झगड़ा होता था. इसी बीच, पूजा जयपुर में एक प्राइवेट नौकरी करने लगी.

अनिल और पूजा की राह में सब से बड़ा रोड़ा अनिता और मयंक थे. रोजाना के झगड़े से परेशान हो कर अनिल ने ऐसा षडयंत्र रचा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. अनिल ने इस षडयंत्र का मोहरा बनाया अपने छोटे सगे भाई सुनील को. उस ने सुनील शर्मा की शादी कराने और जयपुर में मकान दिलाने का लालच दिया. सुनील की उम्र 30 साल से ज्यादा हो गई थी, लेकिन अभी तक उस की शादी नहीं हुई थी. वह बेरोजगार था. अनिल ने अपने भाई सुनील से कहा कि वह उस की शादी अपनी साली पूजा से करा देगा. पूजा भी तैयार है. लेकिन उस की भाभी अनिता और मयंक रोड़ा बने हुए हैं. अगर उन दोनों को ठिकाने लगा दिया जाए तो कोई परेशानी नहीं होगी.

पूजा तो अनिल की ग्रिप में पहले से ही थी, भाई भी मिल गया तो अनिल ने दोनों के साथ मिल कर अनिता और मयंक को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. इस के तहत अनिल ने मई के पहले सप्ताह में नींद की हाईडोज वाली गोलियां खरीदीं और अपने गांव धानोता जा कर सुनील को दे आया. साथ ही उसे पूरी योजना भी समझा दी. कोरोना संक्रमण काल में लौकडाउन लगने के कारण मौका नहीं मिलने की वजह से सुनील जयपुर नहीं आ सका. अनिल ने 24 जून को अपने भाई सुनील को गांव से जयपुर अपने घर बुलाया. अनिल अपनी ड्यूटी पर चला गया. शाम को ड्यूटी पूरी कर के अनिल ने अपनी मोटरसाइकिल पर पूजा को साथ लिया. दोनों जयपुर स्थित अजमेर रोड पर एक होटल में पहुंचे और किराए पर एक कमरा ले लिया.

कुछ देर रुकने के बाद योजना के तहत दोनों ने कमरे में अपनेअपने बैग और मोबाइल छोड़ दिए. वे होटल से यह कह कर निकल गए कि कुछ देर में आएंगे. सुनील उसी दिन शाम को जयपुर स्थित अपने भाई के घर पहुंच गया. होटल से निकल कर अनिल पूजा के साथ अपनी सास मंजू के घर जयपुर के चरणनदी मुरलीपुरा गया. वहां दोनों ने खाना खाया. कुछ देर बाद सास के घर से पूजा को मोटरसाइकिल पर बैठा कर अनिल अपने घर सूर्य नगर के लिए चल दिया. घर से कुछ पहले ही अनिल ने अपनी बाइक एक खाली प्लाट में खड़ी कर दी. उस समय रात के करीब 11 बज रहे थे. अनिल व पूजा पैदल ही घर की ओर चल दिए. रास्ते में उन्हें सुनील मिला. सुनील ने बताया कि उस ने 13 गोलियां दूध में मिला कर भाभी अनिता और भतीजे मयंक को पिला दी हैं.

अंतिम घटनाक्रम पूजा के साथ अनिल अपने घर में गया. सुनील बाहर खड़ा रहा. अनिल व पूजा ने देखा तो अनिता और मयंक बेहोश थे लेकिन उन की सांसें चल रही थीं. खेल बिगड़ता देख कर अनिल ने पहले से खरीदी हुई सल्फास की गोलियां नींबू की शिकंजी में मिला कर बेहोशी की हालत में ही अनिता और मयंक को मुंह खोल कर पिला दीं. एकदो गोलियां उन के मुंह में भी डालीं. इस के बाद अनिल और पूजा मकान का गेट बंद कर वापस अजमेर रोड वाले होटल में चले गए. सुनील अपने गांव धानोता चला गया. अगले दिन 25 जून को अनिल सुबह अकेला अपने घर पहुंचा और अनिता व मयंक की उल्टियों के बर्तन धो कर रोनाचीखना शुरू कर दिया. उस की चीखपुकार सुन कर पड़ोसी एकत्र हो गए. बाद की कहानी आप पढ़ चुके हैं. अनिता और मयंक की हत्या का राज खुलने पर करधनी थाना पुलिस ने भादंसं की धारा 302, 201 व 120बी के तहत नामजद केस दर्ज कर लिया.

अब अनिल के ससुर अंजनी कुमार की मौत का मामला भी समझ लीजिए. सीकर के लोसल निवासी अंजनी कुमार की संदिग्ध मौत जुलाई 2014 में घर में बने पानी की हौदी में डूबने से हुई थी. उस समय लोसल थाना पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला मानते हुए फाइल बंद कर दी थी. अब पत्नी और बेटे की हत्या में गिरफ्तार अनिल ने करधनी थाना पुलिस को पूछताछ में बताया कि अंजनी कुमार की हत्या की गई थी. उन की हत्या में रिश्तेदार और अन्य लोग शामिल थे. अंजनी कुमार की हत्या किस मकसद से किनकिन लोगों ने की थी, इस का खुलासा अनिल ने किया है. करधनी थाना पुलिस ने इस मामले में लोसल थाना पुलिस को सूचना भेज दी है. लोसल पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. हो सकता है अंजनी कुमार की हत्या का कोई नया राज खुले.

बहरहाल, जीजासाली के अंधे प्रेम ने 3 परिवारों को बरबाद कर दिया. अनिल के साथ उस का भाई भी जेल की सलाखों के पीछे चला गया. पूजा ना तो अपने पति की हुई और ना ही जीजा की हो सकी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime : बेटी के अफेयर के चक्कर में मारा गया पिता

Love Crime : नाबालिग बेटी खुशबू के पैर बहक जाने की जानकारी मिलने पर मां रानी देवी को बेटी को समझा कर सही रास्ते पर लाना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने के बजाय उस ने बेटी के सहारे अपना प्रेमी ही ढूंढ लिया. इस के बाद जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

‘‘भा भी, भैया कहां हैं? दिन ढल गया, दिखाई नहीं दे रहे. किसी काम से गए हैं क्या?’’ राकेश सिंह ने अपनी भाभी रानी से पूछा.

‘‘दोपहर में किसी का फोन आया था, फोन पर बात करते हुए थोड़ी देर में आने को कह कर घर से निकले. लेकिन सांझ हो गई है, अभी तक नहीं लौटे. मुझे चिंता हो रही है.’’ परेशान रानी ने देवर राकेश से कहा.‘‘मैं भैया को ढूंढने जा रहा हूं. अगर कुछ पता नहीं चला तो मैं पहासू थाने चला जाऊंगा और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दूंगा.’’

‘‘आप के जो समझ में आए, करो. किसी भी तरह उन का का पता लगाओ.’’ रानी बोली.

‘‘जी छोटा मत करो भाभी.’’ राकेश ने भाभी को समझाया. राकेश भाई को ढूंढने निकल गया. उस समय शाम के करीब साढ़े 6 बज रहे थे. तारीख थी 9 जुलाई 2020. जितना संभव था, राकेश ने बड़े भाई बलवीर सिंह को ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. बलवीर सिंह न तो किसी दोस्त के यहां गया था और न ही किसी परिचित के यहां. राकेश भी परेशान था कि बाइक ले कर वह कहां गया होगा. बलवीर का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. फोन बंद होने से राकेश के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. जब बलवीर का कहीं पता नहीं चला तो राकेश पहासू थाने पहुंच गया.

थाने के दीवान अशोक कुमार को अपनी परेशानी बता कर उस ने भाई की गुमशुदगी की तहरीर उन्हें दे दी. अशोक कुमार ने राकेश को विश्वास दिलाया कि बड़े साहब के आते ही आवश्यक काररवाई हो जाएगी. रात काफी हो गई है, अभी अपने घर जाओ. दीवान के आश्वासन पर राकेश घर लौट आया. उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. घर वालों की बढ़ी चिंता रानी और राकेश ने किसी तरह रात काटी. बलवीर की पत्नी रानी दरवाजे पर इस आस से टकटकी लगाए रही कि वह अब घर लौटेंगे तो दरवाजा कौन खोलेगा.  बलवीर सिंह को घर से गए 24 घंटे हो गए. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. समझ नहीं आ रहा था कि वह गया तो कहां गया? इस बात को ले कर घर वालों को चिंता सताने लगी. डर था कि उस के साथ कहीं कोई अप्रिय घटना तो नहीं घट गई, क्योंकि उस का फोन अब भी बंद आ रहा था.

उस के फोन का बंद आना, घर वालों की चिंता बढ़ा रहा था. पहासू थाने के थानाप्रभारी आर.के. यादव ने राकेश की तहरीर पर बलवीर की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर आवश्यक काररवाई शुरू कर दी थी. गुमशुदगी के तीसरे दिन यानी 11 जुलाई को पुलिस को दिन के करीब 11 बजे सूचना मिली कि थाने से करीब 6 किलोमीटर दूर गंगावली नहर के किनारे झाड़ी में एक अधेड़ उम्र के आदमी की लाश पड़ी है. लाश बुरी तरह झुलसी हुई है और उस के पास एक लावारिस बाइक खड़ी है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की जानकारी राकेश को भी दे दी थी और उसे लाश की शिनाख्त के लिए मौके पर पहुंचने को कह दिया.

जानकारी मिलते ही राकेश घटनास्थल पहुंच गया. लाश की कदकाठी और कपड़ों से उस ने लाश की पहचान अपने भाई बलवीर सिंह के रूप में कर ली. पुलिस ने लाश झाड़ी के अंदर से बाहर निकलवाई. उस का चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. हत्यारों ने बलवीर की हत्या करने के बाद पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे पर कोई ज्वलनशील पदार्थ उड़ेल कर आग लगा दी थी. शव के पास जो मोटरसाइकिल बरामद हुई, वह भी बलवीर की ही थी. पुलिस ने लाश और बाइक दोनों को अपने कब्जे में ले लिया. घटनास्थल का निरीक्षण करने पर मौके से कोई अन्य चीज बरामद नहीं हुई थी.

घटनास्थल की काररवाई कर पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. थाने लौट कर पुलिस ने राकेश सिंह की तहरीर पर धारा 302 भादंसं के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और आगे की काररवाई शुरू कर दी. बलवीर सिंह की हत्या की सूचना मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. मृतक की पत्नी रानी, बेटी खुशबू और राकेश का रोरो कर बुरा हाल था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बलवीर की हत्या किस ने और क्यों की? जबकि उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. वह सीधासादा किसान था, अपने काम से काम रखने वाला.

बलवीर सिंह की हत्या ब्लांइड मर्डर थी. पुलिस के लिए चुनौती. पुलिस को बलवीर का मोबाइल नंबर मिल गया था. नंबर ही एक ऐसा आधार था जिस से पुलिस कातिलों तक पहुंच सकती थी. यह भी पता चल सकता था कि उस के फोन पर आखिरी बार किस ने काल की थी.  2 दिनों बाद पुलिस को बलवीर के मोबाइल की कालडिटेल्स मिल गई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस के नंबर पर आखिरी काल दोपहर एक बजे के करीब आई थी. फिर एक घंटे बाद उस का फोन स्विच्ड औफ हो गया था. इस से एक बात साफ हो गई कि बलवीर के साथ जो कुछ हुआ, वह इसी एक घंटे के बीच में हुआ था. हत्यारों ने इसी एक घंटे के भीतर अपना काम कर के लाश ठिकाने लगा दी होगी.

पुलिस को मिली अहम जानकारी पुलिस को जांचपड़ताल से पता चला कि बलवीर के फोन पर आखिरी बार जिस नंबर से काल आई थी, वह नंबर हेमंत का था. हेमंत पहासू थाने के जाटोला का रहने वाला था. मृतक भी पहासू का रहने वाला था और फोन करने वाला भी. इस का मतलब बलवीर और हेमंत के बीच जरूर कोई संबंध था. बलवीर और हेमंत के बीच की बिखरी कडि़यों को जोड़ते हुए पुलिस को मुखबिर के जरिए ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि पुलिस भौचक रह गई. मृतक की बेटी खुशबू और गांव के हेमंत के बीच कई सालों से अफेयर था. इतना ही नहीं, बलवीर की पत्नी रानी के भी गांव के ही एक युवक से मधुर संबंध थे. मांबेटी का अफेयर गांव के 2 अलगअलग युवकों से चल रहा था.

बलवीर सिंह को मांबेटी के अनैतिक संबंधों की जानकारी हो गई थी. वह दोनों के संबंधों का विरोध करता था. इसे ले कर पतिपत्नी के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था. पुलिस के लिए यह जानकारी काफी थी. उस की हत्या प्रेम में बाधा बनने के कारण हुई थी. लेकिन पुलिस के पास इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं था, जिस से वह मांबेटी को गिरफ्तार कर सके. मांबेटी तक पहुंचने के लिए पुलिस को दोनों के मोबाइल नंबरों की जरूरत थी. पुलिस चाहती थी कि मांबेटी को इस की भनक तक न लगे. बहरहाल, किसी तरह पुलिस ने मांबेटी के फोन नंबर हासिल कर लिए. नंबर मिल जाने के बाद दोनों नंबर सर्विलांस पर लगा दिए गए. साथ ही दोनों नंबरों की काल डिटेल्स भी निकलवा ली गई. इस से पता चला कि खुशबू की काल डिटेल्स में हेमंत का वही नंबर था जो नंबर मृतक बलवीर सिंह की काल डिटेल्स में मिला था.

हेमंत और खुशबू के बीच घटना वाले दिन और उस से पहले कई बार बातचीत हुई थी. घटना के बाद भी खुशबू और हेमंत फोन पर बातचीत कर रहे थे. दोनों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पुलिस उन के नंबरों को सर्विलांस पर लगा कर उन की बातचीत सुन रही है.  घटना के कई दिनों बाद हेमंत ने खुशबू को फोन कर के कहा, ‘‘अब तो हमारे रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल चुका है. अब हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता.’’

इस पर खुशबू ने जवाब दिया, ‘‘ज्यादा इतराओ मत. पुलिस को हमारे राज के बारे में पता चल गया तो जिंदगी भर जेल में बैठे चक्की पीसेंगे. फिर सलाखों के पीछे बैठे इश्क की माला जपते रहना. थोड़ा सब्र रखो, ऐसा कोई काम मत करना जिस से हम पकड़े जाएं.’’

पुलिस को सुराग तो मिल गया था लेकिन उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि बलवीर की हत्या मांबेटी ने मिल कर अपने आशिकों से कराई थी. मृतक की पत्नी रानी की अपने आशिक से बातचीत का रिकौर्ड पुलिस के पास मौजूद था. इन्हीं पुख्ता सबूतों के आधार पर पुलिस 22 जुलाई, 2020 को रानी और उस की बेटी खुशबू को गिरफ्तार कर पहासू थाने ले आई. दोनों से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पता चला कि बलवीर की हत्या प्रेम संबंधों में बाधक बनने की वजह से हुई थी. माशूकाओं ने पकड़वाया आशिकों को रानी और खुशबू से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसी दिन शाम को उन के आशिकों हेमंत, गोली और उस के दोस्त आकाश को बसअड्डा, पहासू से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर के पहासू थाने ले आई. उन तीनों ने खुशबू और उस की मां रानी को पुलिस हिरासत में देखा तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने भी बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. 14 दिनों से राज बने बलवीर सिंह हत्याकांड से आखिर परदा उठ ही गया. पुलिस ने अज्ञात की जगह मृतक पत्नी रानी, बेटी खुशबू, उन के आशिकों हेमंत और गोली व उस के दोस्त आकाश को नामजद कर दिया. एसपी गोपालकृष्ण चौधरी ने उसी दिन पुलिस लाइंस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर के बलवीर हत्याकांड के पांचों आरोपियों को पत्रकारों के सामने पेश कर घटना का खुलासा कर दिया. पुलिसिया पूछताछ में बलवीर सिंह हत्याकांड की कहानी ऐसे सामने आई—

45 वर्षीय बलवीर सिंह उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना पहासू के गांव जाटोला में रहता था. उस का छोटा सा परिवार था, जिस में पत्नी रानी और बेटी खुशबू तथा एक बेटा था. बलवीर का एक छोटा भाई था राकेश सिंह. बलवीर और राकेश दोनों भाइयों के बीच अटूट प्रेम था. दोनों भाई एकदूसरे के दुखसुख में हमेशा खड़े रहते थे.  बलवीर सिंह को इलाके का सब से बड़ा किसान कहा जाता था. उस के पास खेती की कई एकड़ जमीन थी, जिस पर वह वैज्ञानिक विधि से खेती करवाता था. इस से उसे अच्छा मुनाफा होता था. इसी आमदनी से वह दोनों बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहा था. बच्चों की पढ़ाई के साथ वह कोई समझौता नहीं करता था. धीरेधीरे बलवीर के दोनों बच्चे बड़े हो रहे थे. बेटी खुशबू बड़ी थी और बेटा छोटा.

कब बचपन को पीछे छोड़ कर खुशबू ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया था. वह 17 साल की हो चुकी थी. खुशबू कब तक कोरे दिल को आशिकों की नजरों से बचाती फिरती, आखिरकार वह हेमंत को अपना दिल दे बैठी. हेमंत उसी गांव का रहने वाला था. आतेजाते हेमंत की नजर खुशबू पर पड़ी तो वह उस के दिल में समा गई. खुशबू को भी हेमंत पसंद था. 22 साल का हेमंत गबरू जवान था. वह अभी पढ़ाई कर रहा था. पढ़ाई के दौरान नौकरी की तैयारी में भी जुटा था. जल्दी ही दोनों ने एकदूसरे से प्रेम का इजहार कर दिया. हेमंत से मोहब्बत की लगन लगने के बाद खुशबू के चेहरे पर कुछ अलग ही तरह का निखार आ गया था. उस के चेहरे पर हर घड़ी मुसकान थिरकने लगी. यह देख कर उस की मां रानी को शक हुआ कि खुशबू के चेहरे पर बिन बरसात हरियाली क्यों छाई रहती है. कहीं कोई इश्कविश्क का चक्कर तो नहीं है.

खुशबू की मां रानी औरत थी. एक औरत दूसरी औरत के मन की बात को जल्दी भांप लेती है. यहां तो खुशबू उस की बेटी थी, वह बेटी के दिल की बात जान सकती थी. वैसे भी मांबेटी के बीच सहेलियों जैसा रिश्ता था. मां ने पूछी दिल की बात एक दिन दोपहर का समय था. घर में मां और बेटी के अलावा कोई नहीं था. बेटा और पिता बलवीर सिंह के साथ खेती के काम से बाहर गया हुआ था. मांबेटी दोनों एक साथ पलंग पर लेटी हुई थीं. उन के बीच में घर की बातों को ले कर बातचीत हो रही थी. इसी दरमियान रानी ने बेटी के मन की बात जानने के लिए पूछा,‘‘क्या बात है खुशबू, आजकल तुम्हारे चेहरे पर कुछ ज्यादा ही चमक रहती है. कहीं प्यारव्यार का चक्कर तो नहीं है?’’

‘‘मम्मी, कैसी बातें कर रही हो?’’ खुशबू एकदम से हड़बड़ा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. वह बोली, ‘‘कोई अपनी बेटी से ऐसे बात करता है क्या?’’

‘‘देखो बेटी, मैं मां हूं तुम्हारी. तुम मेरे सामने मत उड़ो.’’ कह कर रानी ने जता दिया कि वह अनुभवी है. उस से कोई बात छिपी नहीं रह सकती.

‘‘कहां मां, मैं कहां उड़ रही हूं. जैसा तुम सोच रही हो, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ खुशबू ने मां से झूठ बोलने की कोशिश की, लेकिन रानी ने उस का झूठ पकड़ लिया.

‘‘मुझे सब पता है. तुम मुझ से झूठ बोल कर बच नहीं सकती.’’

‘‘क….क्या पता है?’’ खुशबू हड़बड़ा गई.

‘‘यही कि तुम जिस से प्यार करती हो वो कौन है?’’

‘‘क…कौन है? बताओ..बताओ कौन है?’’

‘‘उस का नाम हेमंत है न.’’ मां की जुबान से प्रेमी का नाम सुनते ही खुशबू के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. बेटी के चेहरे का रंग बदलते देख रानी खिलखिला कर हंस पड़ी. मां की रहस्यमई हंसी देख कर खुशबू और भी परेशान हो गई.

‘‘देखा, उड़ा दिए न तुम्हारे होश.’’ रानी बेटी के चेहरे को ध्यान से देखती हुई बोली, ‘‘वैसे हेमंत के साथ घूमने वाला दूसरा गबरू जवान कौन है, जो अकसर उस के साथ घूमताफिरता है?’’

‘‘वो…वो तो उस का दोस्त गोली है. पर बात क्या है मां? तुम क्यों पूछ रही हो?’’

‘‘बड़ा बांका छोरा है. जब तेरे पापा घर पर न रहें तो उसे हेमंत के साथ घर बुलवाना.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘उसे बुलवाओ तो सही, पता चल जाएगा. लेकिन याद रहे कि ये बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए. किसी तीसरे तक बात पहुंची तो तुम्हारी खैर नहीं.’’ कहती हुई रानी बिस्तर से नीचे उतरी और सीधे किचन में चली गई. खुशबू मां की बातों से अवाक थी क्योंकि वह उस की प्रेम कहानी जान गई थी. मां की बात नहीं मानी तो पापा से कह सकती है. इसलिए उस ने मां की बात मानने में ही भलाई समझी. रानी को बेटी के बहकते कदमों को रोकना चाहिए था. लेकिन ऐसा न कर के वह पति के होते हुए पराए पुरुष के आगोश में समाने को बेकरार होने लगी. बेटी के जरिए मिला मां को यार खुशबू ने हेमंत से कह कर उस के दोस्त गोली को अपने घर बुलाया. उस गबरू जवान को देख कर रानी खुश हो गई. बेशरमी की सारी हदें पार कर के रानी बेटी के सामने ही गोली से हंसहंस कर बातें करने लगी.

रानी गोली से पहली बार मिली थी. पहली ही मुलाकात में उस ने गोली के मन को टटोल लिया. बेटी के सामने जो नहीं कहना चाहिए था, रानी वहां तक कह गई थी. खुशबू की मां की जुबान से ऐसी बातें सुन कर गोली भी अवाक रह गया. वह समझ नहीं पा रहा था इन के सवालों का क्या और कैसे जवाब दे. कुछ देर बाद हेमंत गोली को ले कर वापस चला गया. जाते समय रानी ने दोनों को आते रहने के लिए कह दिया. 23 साल का बांका जवान गोली रानी के मन की बात समझ गया था. उस दिन के बाद से हेमंत और गोली रानी के घर ऐसे समय पर जाते थे जब उस का पति बलवीर सिंह और बेटा घर पर नहीं होते थे. धीरेधीरे गोली और रानी के बीच प्रेम प्रसंग बढ़ा और दोनों का रिश्ता जिस्मानी संबंधों तक पहुंच गया. उधर उस की बेटी खुशबू भी खुलेआम अपने प्रेमी की बांहों में रंगरलियां मनाने लगी.

अनैतिक काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिप पाता. धीरेधीरे मांबेटी के प्रेम के चर्चे गांव में फैलने लगे. यह बात जब बलवीर सिंह तक पहुंची तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. उसे सुनी बातों पर यकीन नहीं हुआ. क्योंकि वह पत्नी व बेटी पर बहुत विश्वास करता था. इस खबर ने उस के मन में वहम पैदा कर दिया था. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि जब तक वह अपनी आंखों से देख नहीं लेगा, किसी का विश्वास नहीं करेगा. वह पत्नी और बेटी दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहता था. दोनों को रंगेहाथों पकड़ने के लिए बलवीर ने एक युक्ति निकाली. घटना से करीब 3 माह पहले की बात है. वह सुबह के समय जानबूझ कर बेटे को साथ ले कर खेतों पर चला गया. यह बात उस ने घर में बता दी थी. उस ने पत्नी से कहा था कि लौटने में शाम हो सकती है. पति की बात सुन कर मांबेटी दोनों मन ही मन खुश हुईं.

मां के कहने पर दोपहर के समय खुशबू ने अपने और मां के प्रेमी दोनों को घर बुला लिया और दोनों अलगअलग कमरों में रंगरलियां मनाने लगीं. बलवीर शाम को आने की बात कह कर गया था लेकिन वह दोपहर में ही घर लौट आया. दरवाजा बेटी खुशबू ने ही खोला था. सामने पापा को देख कर उस के होश उड़ गए. तब तक बलवीर की नजर कमरे में पड़ चुकी थी. रंगेहाथों पकड़ा मांबेटी को  घर में गांव के 2 युवक हेमंत और गोली कुरसी पर आराम से बैठे थे. बलवीर को देख कर दोनों वहां से दबेपांव भाग गए. बलवीर का खून खौल उठा. बलवीर ने न आव देखा न ताव, पत्नी और बेटी दोनों को लातथप्पड़ों से जम कर पीटा और धमकाया भी आज के बाद तुम दोनों ने घिनौनी हरकतें कीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.

उस दिन के बाद से घर में जो विवाद शुरू हुआ, उस ने थमने का नाम नहीं लिया. इस प्रेम प्रसंग को ले कर आए दिन घर में पत्नीबेटी और पिता के बीच महाभारत होने लगी थी. इस विवाद से घर की शांति खत्म हो गई थी. कोई सुकून से रोटी नहीं खा पा रहा था. रोजरोज के विवाद और टोकाटाकी से मांबेटी बलवीर से तंग आ गई थीं. बेटी ने मां को समझाया कि क्यों न इस विवाद की जड़ को ही हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाए. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. मां ने बेटी को मंजूरी दे दी. फिर क्या था. खुशबू ने हेमंत को फोन कर के अपने पापा बलवीर सिंह को रास्ते से हटाने का फरमान जारी कर दिया. खुशबू के प्यार में अंधे हेमंत ने हां कर दी. हेमंत ने गोली से मिल कर बलवीर की हत्या की योजना बनाई. इन्होंने एक अवैध पिस्टल भी खरीद ली. इस के बाद हेमंत ने खुशबू को बता दिया कि पूरी योजना बन गई है, शिकार का शिकार कब करना है बताओ. खुशबू की ओर से जवाब आया, ‘‘ठीक है, जल्द बताती हूं.’’

बात 7 जुलाई, 2020 की है. बलवीर सिंह अपनी बाइक से मोबाइल खरीदने बाजार गया. दोपहर एक बजे के करीब नया मोबाइल खरीद कर वह घर लौटा. बलवीर के घर लौटते ही खुशबू ने हेमंत को फोन कर दिया कि शिकार घर आ गया है. फिर तय योजना के अनुसार, हेमंत ने अपने फोन के ऊपर रुमाल रख कर बलवीर को फोन किया ताकि बलवीर उस की आवाज न पहचान सके. उस ने बलवीर को बाजार में जरूरी काम से मिलने के लिए बुलाया. नंबर अंजान था फिर भी बलवीर बाइक ले कर उस अंजान व्यक्ति से मिलने बाजार चला गया. हो गई योजना पूरी  बाजार में हेमंत, गोली और उस का दोस्त आकाश मिल गए. बलवीर को देखते ही दोनों नाटक करते हुए माफी मांगने लगे और उसे अपनी बातों में उलझा कर बाजार से काफी दूर सुनसान इलाके में ले आए.

गोली और उस का दोस्त आकाश बलवीर को अपनी बातों में उलझाए रहे. तभी हेमंत ने अपने साथ लाए लकड़ी के एक मोटे डंडे से उस के सिर पर पीछे से जोरदार वार किया. सिर पर वार होते ही बलवीर जमीन पर गिर गया. उस के बाद हेमंत ने बलवीर को पिस्टल से 2 गोलियां सिर और सीने में मार दीं. बलवीर की मौत हो गई. फिर तीनों ने बलवीर की लाश गंगावली नहर के किनारे झाड़ी में डाल दी. उसे कोई आसानी से न पहचान सके, इस के लिए आधा लीटर की प्लास्टिक की बोतल में लाया तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया, जिस से उस का चेहरा झुलस गया. उस की बाइक भी उसी झाड़ी में छिपा दी और तीनों अपनेअपने घरों को लौट आए.

हेमंत ने काम पूरा हो जाने के बाद फोन कर के खुशबू को जानकारी दे दी कि हमारे प्यार के रास्ते का सब से बड़ा कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल गया है, अब हमें मिलने से कोई नहीं रोक सकता है. लेकिन मृतक के छोटे भाई राकेश की हिम्मत ने हत्यारों के मंसूबे पर पानी फेर दिया. जेल की सलाखों के पीछे पहुंचने के बाद रानी और खुशबू को अपने किए पर पश्चाताप हो रहा था कि खुद अपने ही हाथों सुखमय गृहस्थी में आग लगा दी, लेकिन अब पछताने से क्या होगा, जो होना था सो हो चुका था.

—कथा में खुशबू परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Murder Stories : साला ने पहले जीजा को मौत के घाट उतारा फिर बहन को भी मार डाला

Murder Stories : बिजनैसमैन सुखबीर ने फरीदाबाद में 500 वर्गगज में एक आलीशान कोठी बनाई थी. जिस में वह अपनी पत्नी मोनिका के साथ रहते थे. शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी उन के आंगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी. इसी दौरान ऐसा क्या हुआ कि किसी ने उन की कोठी में घुस कर दोनों की हत्या कर दी और…

रात के लगभग सवा 9 बजे का वक्त था. लेकिन कई बार कालबेल बजाने के बाद भी जब मोनिका ने दरवाजा नहीं खोला तो मनीष को कोफ्त होने लगी. उसे गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि एक तो उस की बहन मोनिका घर पर दूध लेने के लिए नहीं पहुंची थी, दूसरे जब वह खुद दूध देने के लिए आया तो कालबेल की आवाज सुन कर 10 मिनट बाद भी मोनिका और सुखबीर ने दरवाजा नहीं खोला था. आश्चर्य की बात यह थी कि घर का मुख्यद्वार भी अंदर से लौक नहीं था. जीजा सुखबीर ने करीब 15 दिन पहले ही 40 लाख रुपए में औडी क्यू-3 कार खरीदी थी, वह पोर्च में खड़ी थी. सब से बड़ी हैरानी इस बात पर थी कि घर के अंदर और बाहर पूरी तरह अंधेरा था और एक भी लाइट नहीं जल रही थी.

ये सब बातें ऐसी थी कि कोफ्त होने के साथसाथ मनीष का मन आशंका से भी भर उठा था. बहन की इस लापरवाही पर उसे गुस्सा आ रहा था. मनीष ने दरवाजे को जोरजोर से पीटना शुरू कर दिया. 1-2 बार दरवाजे को जोर लगा कर थपथपाया तो अचानक दरवाजा खुल गया और वह अंदर दाखिल हो गया. अंदर घुप्प अंधेरा था. मनीष ने मोबाइल की टौर्च जला कर स्विच बोर्ड तलाश किया और ड्राइंगरूम की लाइट जला दी, जिस से कमरा रोशन हो गया. लेकिन इतना सब होने के बावजूद घर के भीतर कोई हलचल नहीं हुई तो मनीष का दिल किसी अनहोनी के डर से कांपने लगा. क्योंकि ड्राइंगरूम से ले कर कई जगह घर का सामान अस्तव्यस्त पड़ा था. वह दौड़ता हुआ उस कमरे तक पहुंचा, जहां उस की बहन मोनिका का बैडरूम था.

उस ने दरवाजे से लगे बिजली के स्विच बोर्ड से कमरे की बत्ती जलाई तो बैडरूम के अंदर का दृश्य देख कर उस के हलक से हृदयविदारक चीख निकल गई. कमरे के भीतर उस की बहन मोनिका और जीजा सुखबीर के खून से लथपथ शव पड़े थे. दोनों के हाथपांव और मुंह सर्जिकल टेप से बंधे थे. घर की अलमारियां खुली थीं और सारा सामान अस्तव्यस्त था. घर से लाए दूध का डिब्बा मनीष के हाथ से छूट गया और और वह जमीन पर दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गया. कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो वह घर से बाहर दौड़ा और खून…खून चिल्लाता हुआ लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा. कालोनी में रहने वाले लोग दरवाजा खोल कर घर से बाहर आए और मनीष से चिल्लाने का कारण पूछा.

मनीष ने वह सब बयान कर दिया जो उस ने अंदर देखा था. कुछ ही देर में वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. इसी दौरान मनीष ने गांव में रहने वाले अपने परिजनों को भी फोन कर दिया. थोड़ी देर बाद मनीष का पूरा परिवार, गांव में रहने वाले दूसरे रिश्तेदार व अड़ोसपड़ोस में रहने वाले लोगों की भीड़ सुखबीर के घर के बाहर जमा हो गई. मनीष ने सुखबीर के परिवार वालों को भी फोन कर के इस बात की जानकारी दे दी थी. गांव वालों के कहने पर मनीष ने पुलिस कंट्रोल रूम को भी वारदात की सूचना दे दी. 11 अगस्त को जन्माष्टमी के दिन ये वारदात दिल्ली से सटे ग्रेटर फरीदाबाद के गांव जसाना में हुई थी. जिस गांव में वारदात हुई थी, वह फरीदाबाद के तिगांव थाना क्षेत्र में आता है. सूचना मिलने के आधे घंटे बाद तिगांव थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई.

सुखबीर के बड़े भाई ओमबीर और पिता रिछपाल भी अपने परिवार के साथ मौके पर आ गए थे. पुलिस ने सभी घरवालों से एकएक कर के पूछताछ शुरू कर दी. वारदात की जानकारी सब से पहले मनीष को ही मिली थी, लिहाजा पुलिस ने सब से पहले उस से ही पूरी का घटना का ब्यौरा हासिल किया. मनीष ने पुलिस को बताया कि उस की बहन मोनिका (25) की शादी साल 2013 में मूलरूप से फरीदाबाद के ही फतेहपुर चंदीला गांव के रहने वाले सुखबीर (27) के साथ हुई थी. सुखबीर को अपनी फैक्ट्री तक आने के लिए गांव से लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी. उस का इलाका काफी भीड़भाड़ वाला भी था, इसलिए उस ने 2 साल पहले ससुराल वालों की मदद से जसाना गांव के बाहर एक नवनिर्मित बस्ती में 500 गज का प्लौट ले कर उस पर दोमंजिला आलीशान मकान बनवा लिया और मोनिका के साथ यहीं आ कर रहने लगा.

घर में सभी आधुनिक सुखसुविधाएं मौजूद थीं. छत पर एक्सरसाइज के लिए ओपन जिम भी बनवाया था. गांव का दामाद होने के कारण गांव के सभी लोग सुखबीर को पाहूना या रिश्तेदार कह कर संबोधित करते थे. सुखबीर मिलनसार और हंसमुख स्वभाव का था इसलिए सभी उस की बहुत इज्जत करते थे. उस की बेदर्दी से हुई हत्या से सभी दुखी थे. करीब 15 दिन पहले ही सुखबीर ने औडी क्यू-3 कार खरीदी थी. इस कार की कीमत 35 से 40 लाख रुपए है. कार लेने के बाद सुखबीर ने अपने घर पर इस की पार्टी भी दी थी, जिस में उस की ससुराल वालों के अलावा घर के लोग भी शामिल हुए थे. सुखबीर ने अपने पिता व भाई की मेहनत व लगन के बूते काफी कम समय में अच्छी तरक्की की थी. गांव बड़खल में उन की लिक्विड फिलिंग मशीनें बनाने की फैक्ट्री है, जिसे वे सब खुद संभालते थे.

सुखबीर सीए भी कर चुका था. इसलिए फैक्ट्री के एकाउंट का काम भी वह खुद ही संभालता था. जबकि उस की पत्नी मोनिका गृहिणी थी. सुखबीर के भाई ओमबीर और पिता रिछपाल सप्ताह में कम से कम एक बार सुखबीर और मोनिका का हालचाल लेने गांव जसाना जरूर जाते थे. फोन पर भी उन की दोनों से रोजाना बातचीत होती थी. कुल मिला कर सुखबीर के घर में काफी प्रेम था. पतिपत्नी भी एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. बस कमी थी तो यह कि शादी को 7 साल होने के बावजूद सुखबीर व मोनिका के घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी.

11 अगस्त को सुबह से ही सुखबीर के पेट में दर्द था इसलिए मोनिका के कहने पर वह उस दिन फैक्ट्री नहीं गया और घर पर आराम करता रहा. दिन भर आराम करने के बावजूद जब पेट की तकलीफ कम नहीं हुई तो मोनिका सुखबीर को सुबह 11 बजे दवा दिलाने के लिए अपने साथ डाक्टर के पास ले गई. वहां से दोनों एक घंटे बाद घर लौट आए थे. चूंकि जसाना गांव मोनिका का मायका था और घर में दूध का काम होता था लिहाजा उस का दूध मायके से ही आता था. मोनिका रोज शाम को घर की डेरी पर ही दूध लेने जाती थी. लेकिन 11 अगस्त को सुखबीर की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण वह दूध लेने के लिए नहीं जा सकी. पिता रामबीर से उस ने फोन कर के कह दिया था कि शाम को कोई घर की तरफ आए तो खुद ही दूध भिजवा दें.

रात को 9 बजे जब उन का छोटा बेटा मनीष गांव के घेर में सोने के लिए जाने लगा तो उन्होंने उस से कहा कि जाते वक्त दूध का डिब्बा मोनिका के घर पकड़ा देना. दूध का वही डिब्बा देने के लिए मनीष मोनिका के घर आया था. लेकिन वहां बहन और जीजा की लाशें देख कर उस के होश उड़ गए. जब वह घर पहुंचा तो देखा सभी लाइटें बंद थी और अंदर दोनों की लाशें पड़ी थीं. रात के 12 बजे तक फरीदाबाद के पुलिस कमिश्नर ओ.पी. सिंह और क्राइम ब्रांच के अधिकारी भी मौके पर आ गए. डौग स्क्वायड के साथ फोरैंसिक टीम भी जांचपड़ताल में जुट गई. घर के हर कोने से बदमाशों की पहचान के लिए फिंगरप्रिंट तथा सबूत एकत्र किए जाने लगे. घर वालों से अब तक की पूछताछ में जो जानकारी हासिल हुई थी, उस से लग रहा था कि बदमाशों ने इस वारदात को लूटपाट के लिए अंजाम दिया था.

सुखबीर व उस की पत्नी इतने बड़े मकान में अकेले रहते थे. उन के घर तथा महंगी गाड़ी को देख कर किसी को भी उन की हैसियत का अंदाजा लग सकता था. इसलिए पहली नजर में लग रहा था कि लूटपाट करने वाले बदमाशों ने ही वारदात को अंजाम दिया होगा. वैसे भी घर में जिस तरह से सारी अलमारियां खुली हुई थीं, घर के कीमती जेवरात लापता थे, उस से भी यही लगता था. जहां तक सुखबीर की किसी से रंजिश की बात थी तो परिवार वालों ने साफ कर दिया था कि सुखबीर की किसी से भी आज तक कोई रंजिश नहीं रही. बस एक बात ऐसी थी, जिस ने पुलिस को उलझा कर रख दिया था. वह यह कि अगर बदमाशों ने घर में घुसने के बाद सुखबीर तथा मोनिका को काबू में कर के उन के हाथपांव और मुंह सर्जिकल टेप से बांध दिए थे तो वे लूटपाट करने के बाद आराम से भाग सकते थे.

बदमाश और लुटेरे आमतौर पर किसी की हत्या तभी करते हैं, जब उन का विरोध होता है. लेकिन यहां तो सुखबीर तथा मोनिका के बंधे होने के कारण विरोध की संभावना ही नहीं थी. इस का मतलब साफ था कि बदमाशों को पता था कि अगर वे उन्हें जिंदा छोड़ कर गए तो पकड़े जा सकते हैं. ऐसा भी तभी होता है जब बदमाश पीडि़त का कोई जानकार होता है. एक दूसरी बात यह भी थी कि बदमाश वारदात को अंजाम देने के बाद घर में लगे सीसीटीवी कैमरे का डीवीआर उखाड़ कर ले गए थे. ऐसा तभी होता है जब बदमाश पहचान वाला हो और सीसीटीवी की फुटेज से आसानी से पहचाने जाने के डर से आशंकित हो.

मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों को इस बात का पूरा यकीन हो गया कि हो न हो इस वारदात के पीछे सुखबीर या मोनिका के किसी जानकार का ही हाथ है. सुखबीर व मोनिका की हत्या सिर में गोली मार कर की गई थी. कई घंटे की जांचपड़ताल तथा परिवार वालों से की गई पूछताछ के बाद तिगांव थाना पुलिस ने सुखबीर व मोनिका के शवों को पोस्टमार्टम के लिए बी.के. अस्पताल भिजवा दिया और अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंसं की धारा 302, 395 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस कमिश्नर ओ.पी. सिंह ने उसी रात इस केस को सुलझाने का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंप दिया और एक विशेष टीम का गठन भी कर दिया. विशेष टीम में सीआईए सेक्टर-30 के इंचार्ज विमल कुमार, सेक्टर-85 सीआईए प्रभारी सुमेर सिंह, डीएलएफ प्रभारी सुरेंद्र व एनआईटी क्राइम ब्रांच प्रभारी को शामिल किया गया.

डीसीपी (क्राइम) मकसूद अहमद ने खुद इस केस की मौनिटरिंग का काम संभाला और एसीपी (क्राइम) अनिल कुमार तथा एसीपी (तिगांव) को विशेष टीमों की अगुवाई करने का जिम्मा सौंपा गया. एसीपी धारणा यादव को भी विशेष टीम की अगुवाई करने का जिम्मा दिया गया था. मामला चूंकि सीधे पुलिस कमिश्नर की दिलचस्पी का केंद्र बन गया था, इसलिए अगली सुबह से विशेष टीम ने अलगअलग बिंदुओं को आधार बना कर जांचपड़ताल करने का काम तेजी से शुरू कर दिया. बदमाश घर से कितनी नकदी व जेवरात लूट कर ले गए गए थे, यह तो पुलिस को कोई नहीं बता सका लेकिन ये साफ था कि घर में लूटपाट जरूर हुई थी. इतना ही नहीं, बदमाश सुखबीर व मोनिका के मोबाइल भी लूट ले गए थे, क्योंकि पुलिस को काफी तलाश करने पर भी मोबाइल घर में नहीं मिले थे. दोनों मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहे थे. घर से सुखबीर का लैपटाप भी गायब था.

इधर, बदमाशों ने घर के सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए और डीवीआर उखाड़ कर ले गए थे. लेकिन पुलिस को यकीन था कि आसपास के किसी मकान में सीसीटीवी जरूर लगा होगा, जिस से बदमाशों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है. पुलिस ने जब सीसीटीवी की जानकारी हासिल कर उन्हें खंगालने का काम शुरू किया तो सुखबीर के मकान से 2 मकान छोड़ कर एक दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी की फुटेज में पुलिस को वह फुटेज मिल गई, जिस में बदमाश आतेजाते दिख रहे थे. इस फुटेज से पता चला कि 11 अगस्त, 2020 की दोपहर 1 बज कर 37 मिनट पर 4 युवक 2 बाइकों से मकान के पास गली में आए. उन्होंने बाइकों को मकान से कुछ दूर खड़ा किया. वे घर के भीतर करीब 42 मिनट तक रहे, जिस के बाद वे 2 बज कर 18 मिनट पर वापस जाते दिखे.

2 युवक पहले घर से निकले, जिन्होंने बाइक स्टार्ट की और मकान के पास आ कर खड़े हो गए. कुछ ही देर बाद 2 युवक मकान में से भागते हुए आए और बाइकों पर बैठ गए. जिस के बाद वे फरार हो गए. वारदात की फुटेज और बदमाशों के सीसीटीवी कैमरे में कैद हो जाना पुलिस के लिए संजीवनी की तरह काम आया. पुलिस ने इन सीसीटीवी फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया. हालांकि इन फुटेज में किसी भी मोटरसाइकिल का नंबर तो साफ नहीं दिख रहा था. लेकिन चेहरे रूमाल से ढके होने के बावजूद उन्हें पहचानने में कोई परेशानी नहीं थी. मोनिका व सुखबीर दोनों के घर वालों को बुला कर पुलिस ने वह फुटेज दिखाई तो मनीष ने देखते ही साफ कर दिया कि उन चारों बदमाशों में से एक बदमाश का हुलिया उस के बड़े भाई ब्रह्मजीत की पत्नी उषा (परिवर्तित नाम) के भाई विष्णु से काफी मिलताजुलता है.

जब पुलिस ने उषा व ब्रह्मजीत को वह फुटेज दिखाई तो वे घबरा गए. उन्होंने बताया कि हुलिया विष्णु से मिलताजुलता जरूर है, लेकिन वह अपने ही जीजा की बहन के घर पर ऐसी वारदात क्यों करेगा. विष्णु के वारदात में शामिल होने की पुष्टि करने के लिए पुलिस ने मोनिका के घर वालों से विष्णु का फोन नंबर तथा घर का पता सब हासिल कर लिया. पुलिस ने विष्णु को दबोचने की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन इस से पहले पुलिस ने विष्णु के फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. क्योंकि पुलिस यह विश्वास कर लेना चाहती थी कि जिस बदमाश के विष्णु होने की शंका जताई जा रही है वो असल में विष्णु है भी या नहीं.

काल डिटेल्स सामने आई तो पता चला कि सीसीटीवी फुटेज में जिस वक्त 4 बदमाश सुखबीर के घर में वारदात करने के लिए घुसे थे, उस वक्त विष्णु के मोबाइल की लोकेशन सुखबीर के घर पर ही थी. इस से साफ हो गया कि इस वारदात में विष्णु शामिल था. पुलिस के लिए इस वारदात का खुलासा करने के लिए यह एक बड़ी लीड थी. पुलिस की एक टीम ने दिल्ली का रुख किया. विष्णु दिल्ली के भजनपुरा में रहता था. पुलिस की टीम ने उसे रात के वक्त सोते हुए उस के घर से ही दबोच लिया. विष्णु को फरीदाबाद के तिगांव थाने में ला कर जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कुबूल कर लिया कि सुखबीर व मोनिका की हत्या उस ने मेरठ के किला परीक्षितगढ़ के रहने वाले अपने 3 साथियों के साथ मिल कर की थी. इस वारदात को उस ने अपने जीजा यानी बहन उषा के पति ब्रह्मजीत के कहने पर अंजाम दिया.

एक भाई आखिर अपनी बहन और उस के पति की हत्या क्यों करवाएगा? पुलिस को यह बात थोड़ी अटपटी लगी. लेकिन जब विष्णु से गहराई से पूछताछ हुई और उस ने कारण बताया तो पुलिस भी चौंकी. पुलिस को यकीन हो गया कि ब्रह्मजीत ही इस हत्याकांड का असली मास्टरमाइंड है. लिहाजा पुलिस ने उसी रात ब्रह्मजीत को भी हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू की और जल्द ही विष्णु के तीनों साथी सोनू, यतिन उर्फ छोटू और कुलदीप कुमार उर्फ कैलाश सिंह को भी मेरठ से गिरफ्तार कर लिया.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद सुखबीर व मोनिका हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. सुखबीर चूंकि पिछले 2 साल से अपनी ससुराल जसाना में ही मकान बना कर रहने लगा था. इसलिए अपनी ससुराल वालों के घर में उस का बेधड़क आनाजाना था. पुराने और गांवदेहात के लोग आज भी घर के दामाद को बड़ा मान देते हैं. सुखबीर की पत्नी मोनिका के 2 भाई हैं मनीष और ब्रह्मजीत. दोनों ही शादीशुदा हैं और दोनों लंबेचौड़े घर में अलगअलग हिस्सों में रहते हैं. सुखबीर अपने दोनों सालों के घर में बेधड़क आताजाता था. ब्रह्मजीत की पत्नी उषा देखने में परिवार की दूसरी महिलाओं से कुछ ज्यादा सुंदर थी. लिहाजा सुखबीर उस के घर कुछ ज्यादा और बेधड़क आताजाता था. उषा भी खुले स्वभाव की थी.

चूंकि सुखबीर उस की ननद का पति था, इसलिए वह उस का बेहद सम्मान करती थी. लेकिन जब कभी सुखबीर उस के साथ हंसीमजाक करता तो वह भी उस से हंसीमजाक कर लेती थी. हुआ यूं कि करीब 2 महीने पहले सुखबीर जब ब्रह्मजीत के घर पहुंचा तो वह घर में नहीं था और उस की पत्नी नहाने के लिए बाथरूम में थी. सुखबीर सोफे पर बैठ कर उस के बाहर आने का इंतजार कर रहा था कि उस की नजर सामने पड़े उषा के मोबाइल फोन पर पड़ी. उत्सुकतावश उस ने उषा का फोन उठा लिया और उसे चैक करने लगा. उस ने उत्सुकता में ही फोन उठा कर परिवार की फोटो तथा वीडियो देखना शुरू कर दिया. अचानक कुछ ऐसी वीडियो और फोटो देख कर उस के होश उड़ गए, जिस में उषा ने अपने निजी पलों की ऐसी तसवीरें तथा वीडियो बनाए हुए थे, जिस में वह पूरी तरह या तो निर्वस्त्र थी या उस के शरीर पर बहुत कम कपडे़ थे.

सुखबीर की पत्नी मोनिका भी हालांकि बेहद खूबसूरत थी लेकिन ब्रह्मजीत की पत्नी उषा जिसे वह भाभी कहता था, अपने कदकाठी और छरहरे बदन के कारण हमेशा उस के आकर्षण का केंद्र रही. उस दिन सुखबीर ने जब उषा की ऐसी फोटो तथा वीडियो क्लिप देखीं तो उस की आंखों में उषा के प्रति कामना के डोरे तैरने लगे. मन में उषा को अपना बनाने की तमन्ना का ज्वार फूटने लगा. हालांकि किसी की इजाजत के बिना चोरीछिपे उस का मोबाइल देखना एक तरह गलत काम है. लेकिन उस दिन पूरे परिवार की इज्जत का तारा बना सुखबीर यह पाप कर बैठा. उस ने उषा के बाथरूम से आने के पहले ही उस के मोबाइल में पड़ी उस की निजी पलों की फोटो और वीडियो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर लीं और ट्रांसफर हिस्ट्री को डिलीट कर दिया ताकि किसी को पता न लगे.

उस वक्त सुखबीर को नहीं पता था कि उस ने किस मकसद से उषा के फोटो और वीडियो अपने फोन में ट्रांसफर किए हैं. लेकिन कुछ दिन बाद जब उस ने एकांत में उन तसवीरों और क्लिप को देखना शुरू किया तो उस के मन में उषा को पाने की लालसा जाग उठी. आखिर एक दिन सुखबीर जब ब्रह्मजीत के घर गया और उस ने उषा को अकेला पाया तो उस ने अपने दिल की बात उषा से कह दी. दरअसल, उस दिन सुखबीर ने उषा से ऐसी द्विअर्थी बातचीत शुरू की जिस से उषा भी अचकचा गई. सुखबीर ने उषा से उस के छरहरे बदन, उस के सांचे में ढले जिस्म की तारीफें इस तरह करनी शुरू कर दीं कि उषा ने पूछ ही लिया, ‘‘जीजाजी, आज आप ये कैसी बहकीबहकी सी बातें कर रहे हैं?’’

सुखबीर ने मौका देख कर खुल कर बताने की जगह अपना मोबाइल खोल कर उषा को उस की तसवीरें और वीडियो दिखानी शुरू कर दीं और बोला, ‘‘उषा भाभी, आप की ऐसी तसवीरें देख कर तो विश्वामित्र की तपस्या भी भंग हो सकती है हम तो वैसे भी आप के हुस्न के पहले से कद्रदान हैं. भाभी, कभी हम पर भी अपने इस हुस्न की बरसात कर दो.’’

दरअसल सुखबीर को लगा था कि अपने फोन से उषा को उसी की आपत्तिजनक तस्वीरें दिखाने से उषा की उस के प्रति हिचक दूर हो जाएगी और वह शरमातेसकुचाते हुए उस के अंकपाश में आ जाएगी. लेकिन हुआ इस का उलटा. उस दिन उषा की सुखबीर से खूब बहस हुई. उस ने सुखबीर की खूब लानतमलामत की और उसे चेतावनी दी कि अगर उस ने अपने मोबाइल से चोरी से ट्रांसफर की गई उस की फोटो और वीडियो डिलीट नहीं कीं तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा. सुखबीर को उषा के ऐसे रिएक्शन की उम्मीद नहीं थी. लेकिन उसे उम्मीद थी कि अगर वह थोड़ा सा और प्रयास करेगा तो उषा उस की बाहों में जरूर आ जाएगी. उस ने उषा की फोटो तथा वीडियो तो डिलीट नहीं कीं, लेकिन इस के बाद उषा से ऐसे वक्त पर फोन कर के बातचीत जरूर शुरू कर दी, जब वह घर में अकेली होती थी.

वह सब बातें वाट्सऐप काल के जरिए करता था. उस ने उषा पर दबाव डालना शुरू कर दिया कि अगर उस ने उस का दिल नहीं बहलाया तो हो सकता है वह उस की ये फोटो और वीडियो कुछ ऐसे लोगों तक पहुंचा दे, जिस से उस का जीना मुश्किल हो जाए और दुनिया भर में उस की बदनामी हो जाए. इस बात को ले कर उषा अकसर तनाव में रहने लगी. इसी दौरान ब्रह्मजीत को भी उषा के बदले हुए व्यवहार तथा उस के तनाव में रहने का अहसास हुआ. जब उस ने पत्नी उषा से इस की वजह पूछी तो उषा अपने दिल में भरे गुबार को रोक न सकी. उस ने पति को ननदोई सुखबीर की सारी बात बता दी कि वह किस तरह उसे ब्लैकमेल कर रहा है.

किसी भी पति के लिए पत्नी की इज्जत सब से बड़ी चीज होती है. लेकिन मुश्किल यह थी कि इस हरकत को करने वाला भी कोई गैर नहीं, बल्कि एकलौती बहन का पति था. उस ने उषा को समझाया कि फिलहाल वह चुप रहे, वह जल्द ही कोई रास्ता निकालेगा. इसी तरह कई दिन बीत गए. दूसरी तरफ सुखबीर फोन कर के उषा को हर दिन ब्लैकमेल कर के अपना दबाव बढ़ाता जा रहा था. इसी बीच 3 अगस्त को रक्षाबंधन आ गया. चूंकि उषा का तनाव के कारण मन ठीक नहीं था, इसलिए उस ने अपने भाई विष्णु से कह दिया कि वह इस बार घर नहीं आ सकेगी. वह राखी बंधवाने खुद ही आ जाए.

उषा का भाई विष्णु जब रक्षाबंधन पर उस के पास आया तो बहन के चेहरे पर फैली उदासी तथा तनाव उस से छिप नहीं सका. उस ने अपनी कसम दे कर उषा से पूछ ही लिया कि ऐसी कौन सी बात है जिस की वजह से वह परेशान है. न चाहते हुए भी उषा को भाई से सुखबीर की तरफ से उसे ब्लैकमेल किए जाने की सारी बात बतानी पड़ी. किसी भाई के लिए रक्षाबंधन के दिन उस की बहन की अस्मत पर आंच आने की बात पता चलना कितनी बड़ी पीड़ा होती है, यह कोई उस दिन विष्णु के दिल से पूछ सकता था. सुखबीर की इस घिनौनी हरकत को जान कर उस का खून खौल उठा लेकिन उस की बहन उषा ने उसे अपनी कसम दे कर शांत कर दिया.

उस दिन विष्णु को सुखबीर से ज्यादा गुस्सा अपने जीजा ब्रह्मजीत पर आया. उस ने अपने जीजा को खूब लानत दी और धिक्कारा कि पत्नी के इतने बड़े अपमान के बाद भी किस तरह उस का खून ठंडा पड़ा है.

‘‘ऐसा नही है विष्णु कि मेरा खून ठंडा पड़ा है. मेरा मन तो चाहता है कि उस कमीने को अभी जा कर खत्म कर दूं लेकिन फिर सोचता हूं कि अगर मैं ने जोश में ये काम कर दिया तो मुझे पुलिस पकड़ लेगी.

‘‘फिर उषा का क्या होगा. क्योंकि सब जानते हैं कि वह मेरा जीजा है…कितनी भी सफाई से काम करूं लेकिन भेद तो देरसबेर खुल ही जाएगा.’’

बात विष्णु की भी समझ में आ गई. उस ने जीजा से कहा, ‘‘तुम कहो तो मैं ऐसे लोगों का इंतजाम कर दूं कि वे इस हरामजादे का काम तमाम कर दें.’’

‘‘कोई है तुम्हारी नजर में तो देखो.क्योंकि उषा की इस बेइज्जती के बाद से मेरी रातों की नींद उड़ी हुई है.’’ ब्रह्मजीत ने कहा.

लेकिन साथ ही उस ने यह भी कहा कि उस के पास इस काम को करने वाले लोगों को देने के लिए पैसा नहीं है. लेकिन उन्हें सुखबीर के घर में इतना माल तो मिल ही जाएगा कि उन्हें काम करने का मलाल नहीं होगा. क्योंकि उस के पास पैसे की कोई कमी नहीं है. उस दिन ब्रह्मजीत और विष्णु ने सुखबीर की हत्या का पूरा मन बना लिया और विष्णु दिल्ली आने के बाद इस काम के लिए भाडे़ के हत्यारे जुटाने में लग गया. सब से पहले उस ने हत्या के लिए 2 तंमचे व कारतूस खरीदे तथा उन्हें ला कर अपने जीजा को दे गया. इस के बाद उस ने अपने 3 पुराने जानकारों मेरठ के परीक्षितगढ़ निवासी सोनू, यतिन उर्फ छोटू व कुलदीप कुमार उर्फ कैलाश सिंह से इस बारे में बात की.

दरअसल, विष्णु अवैध शराब की तस्करी के धंधे से जुडा था. मेरठ के उस के तीनों दोस्त भी इसी धंधे में थे और कभीकभी उस से माल खरीदते थे. विष्णु ने उन से बताया कि उस की बहन को उस का ननदोई कुछ गलत फोटो और वीडियो दिखा कर ब्लैकमेल कर रहा है. वह चाहता है कि वे तीनों बहन के ननदोई की हत्या करने में उस की मदद करें. उन्हें घर से इतना माल मिल जाएगा कि इस काम के लिए उन्हें पछताना नहीं पडे़गा. माल मिलने और बहन की खातिर दोस्त की मदद करने के नाम पर सोनू, छोटू व कुलदीप इस काम को करने के लिए तैयार हो गए. बस इस के बाद विष्णु ने जीजा ब्रह्मजीत के साथ मिल कर सुखबीर की हत्या का पूरा तानाबाना बुन लिया.

वारदात को अंजाम देने से पहले एक दिन शाम के वक्त तीनों ने विष्णु के साथ आ कर सुखबीर के घर का निरीक्षण भी कर लिया. उस के बाद उन्होंने परतापुर इलाके से 2 मोटरसाइकिल चुराईं. जन्माष्टमी के दिन वारदात करने के लिए चुना और उस दिन चोरी की दोनों मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर विष्णु अपने तीनों दोस्तों के साथ जसाना गांव पहुंच गया. गांव के बाहर ब्रह्मजीत से उन की मुलाकात हुई. उस ने चारों को पहले से खरीदे गए तमंचे और एक पिस्टल दिया. इस के बाद ब्रह्मजीत अपने घर चला गया और बाकी चारों लोग अपना काम करने के लिए सुखबीर के घर पहुंच गए.

संयोग यह था कि सुखबीर जहां रहता था, वह गली सुनसान रहती थी. इसलिए उन्हें वहां आते किसी ने नहीं देखा. उन्होंने घर में घुसते ही सुखबीर तथा मोनिका को बंधक बना लिया. बड़ी सर्जिकल टेप से दोनों के हाथपांव बांध दिए. फिर घर में लूटपाट की. घर में जो भी गहना व नकदी मिली उसे एक बैग में भर लिया और बाद में सुखबीर तथा मोनिका को गोली मार दी. हालांकि ब्रह्मजीत ने कहा था कि उन्हें मुंह पर कपड़ा बांध कर केवल सुखबीर की हत्या करनी है. लेकिन मोनिका ने वारदात के दौरान विष्णु का चेहरा देख लिया और पहचान लिया था. इसलिए उन्होंने पकड़े जाने के डर से मोनिका की भी हत्या कर दी थी.

चूंकि सुखवीर जिस जगह पर मकान बना कर रहता था, वहां पर आसपास और पीछे के एरिया में सभी प्लौट खाली थे. जबकि सामने पड़ोस में रहने वाले मकान मालिक घटना के समय घर पर नहीं थे. यह परिवार किसी काम से बाहर गया हुआ था. किसी ने भी गोली चलने की आवाज नहीं सुनी. लेकिन उन के घर के बाहर बनी एक दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में बदमाशों के आने की सारी रिकार्डिंग हो गई. वारदात को अंजाम देने के बाद उन्होंने घर में रखा एक लैपटौप, सुखबीर व मोनिका के मोबाइल फोन तथा सीसीटीवी का डीवीआर भी उखाड़ कर बैग में भर लिया और सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए.

क्योंकि ब्रह्मजीत ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि सुखबीर के घर में सीसीटीवी लगा है. इस से उन्हें लगा कि अब उन्हें कोई नहीं पकड़ पाएगा. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि पड़ोस के मकान में लगा सीसीटीवी उन के अपराध की चुगली कर देगा. 13 अगस्त को जरूरी पूछताछ के बाद पुलिस ने पांचों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 3 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. हिरासत में पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयोग किए गए 2 देसी तमंचे, 1 पिस्तौल, एक जिंदा कारतूस और एक चोरी की मोटरसाइकिल मेरठ शहर के पास मेन रोड पर झाड़ी से बरामद कर ली.

दूसरी मोटरसाइकिल पास ही दूसरी झाड़ी में मिली जो उन्होंने मेरठ के थाना परतापुर एरिया से चोरी की थी. आरोपी विष्णु के घर से सैमसंग फोन, सोने की एक चेन और 1200 रुपए नकद बरामद किए गए.  आरोपी कुलदीप से एक हजार रुपए नकद, सोने के एक जोड़ी झुमके, चांदी की एक चेन उस की बहन की ससुराल से बरामद की. आरोपी सोनू से एक लूटा हुआ लैपटौप एक मोबाइल फोन सिम कार्ड के साथ 2 हजार रुपए नकद बरामद किए गए. आरोपी जतिन से सोने के एक जोड़ी झुमके, डकैती के 2 हजार रुपए और वारदात में पहने हुए कपड़े बरामद किए गए. इस के साथ ही उस का खुद का एक मोबाइल और सिम भी बरामद किया गया.

पूछताछ में विष्णु ने बताया कि हत्या के बाद सुखबीर का मोबाइल वह अनलौक नहीं कर पा रहा था. सुखवीर के मोबाइल और लैपटौप में उस की बहन की अश्लील तसवीरें थीं. इसी वजह से हत्या के बाद विष्णु उसे साथ ले गया था. पुलिस ने दोनों मोबाइल और लैपटौप उस के पास से ही बरामद किए. सुखबीर की हत्या उस के ही घर में करने की प्लानिंग ब्रह्मजीत ने इसीलिए रची थी कि भाड़े पर लाए गए शूटरों को पैसे न देने पड़ें. उन्होंने लूटा हुआ माल सुपारी के तौर पर शूटरों को ही रखने का लालच दिया था. लेकिन बदमाशों को दुर्भाग्य से वहां से ज्यादा नकदी और गहने नहीं मिले. ब्रह्मजीत ने ही उस दिन विष्णु को सुखबीर के घर पर होने की जानकारी दी थी.

पुलिस ने 16 अगस्त, 2020 को मुकदमे में शस्त्र अधिनियम तथा साजिश की धारा जोड़ कर पांचों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें नीमका जेल भेज दिया गया है. दूसरी तरफ मृतक सुखबीर के बड़े भाई सतबीर चंदीला ने मीडिया के सामने खुलासा किया है कि उन के भाई पर साले की पत्नी से ब्लैकमेलिंग का झूठा आरोप लगा कर जानबूझ कर बदनाम किया है. उन्होंने बताया कि सुखबीर ने खुद अपनी पत्नी और ससुराल वालों से भाभी की शिकायत की थी कि वह उसे अश्लील तसवीरें भेजती है. इस बात को ले कर रक्षाबंधन से पहले सुखबीर के ससुराल में तीखी नोंकझोंक भी हुई थी.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों के बयानों पर आधारित

 

Crime Stories : पत्रकारिता की आड़ में चल रहा था देह व्यापार का धंधा

Crime Stories : मुगलों के समय से चला आ रहा देह व्यापार थमा कभी नहीं. हां, वक्त और जरूरत के हिसाब से इस के रंगरूप और ठिकाने जरूर बदलते रहे. अब यह व्यापार ऐसा बन गया है, जिस की जड़ें हर शहर तक फैली हैं. कानपुर में…

एस एसपी अनंत देव तिवारी को पिछले कुछ दिनों से जानकारी मिल रही थी कि  कानपुर शहर में कुछ फरजीपत्रकार सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे हैं. इस देह व्यापार से मोटी कमाई होती है. यह भी पता चला कि पत्रकारिता की आड़ में ये लोग स्थानीय थाना और चौकी पुलिस पर भी रौब गांठते हैं. दिन में ये लोग पुलिस के साथ उठतेबैठते हैं और रात में देह व्यापार का धंधा चलाते हैं. पौश इलाकों में महंगा मकान या फ्लैट किराए पर ले कर ये लोग कालगर्लों को बुलाते हैं और उन की बुकिंग करते हैं. चूंकि उन का उठना बैठना पुलिस वालों के साथ होता है, इसलिए पासपड़ोस के लोग उन के गलत धंधों की जानकारी पुलिस को देने में कतराते हैं.

पत्रकारों को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है. लेकिन कुछ कथित पत्रकार गलत कामधंधे कर गौरवपूर्ण पत्रकारिता को बदनाम करने पर तुले हुए थे. ऐसे कथित पत्रकारों के खिलाफ एसएसपी अनंत देव ने कड़ी कारवाई करने का निश्चय किया. इस के लिए उन्होंने पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाई. इस बैठक में एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल, एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार, सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव और सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान ने भाग लिया. एसएसपी अनंत देव ने पुलिस अधिकारियों को जानकारी दी कि कानपुर शहर में देह व्यापार का धंधा फैल रहा है. इस धंधे का संचालन कुछ फरजी पत्रकार कर रहे हैं.

आप लोग इस बात को गंभीरता से ले कर मुखबिरों के जरिए पता लगाएं कि देह व्यापार का धंधा शहर के किन क्षेत्रों में हो रहा है. फरजी पत्रकार निर्बाध रूप से किस के संरक्षण में धंधा कर रहे हैं. एसएसपी साहब ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर स्थानीय थाना या चौकी पुलिस की संलिप्तता पाई जाए तो उन के खिलाफ भी काररवाई करें. फरजी पत्रकारों की गिरफ्तारी में कोई सफेदपोश नेता बाधा डाले तो उसे गिरफ्तार कर लें. जितना जल्दी हो सके सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ करें और फरजी पत्रकारों को गिरफ्तार कर लें. एसएसपी के आदेश पर एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल ने थाना नवाबगंज, कोहना, कर्नलगंज तथा स्वरूपनगर के थाना प्रभारियों से सख्त लहजे में कहा कि वे अपनेअपने थाना क्षेत्रों में खबरियों के जरिए पता लगाएं कि देह व्यापार का धंधा कहां चल रहा है.

उस का संचालक कौन है और कब से इस धंधे में लिप्त है. आदेश के मुताबिक सभी ने अपनेअपने क्षेत्र में मुखबिरों का जाल फैला दिया. इसी तरह एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने भी थाना गोविंद नगर, नौबस्ता तथा बर्रा के थाना प्रभारियों के साथ मीटिंग की और क्षेत्र में चल रहे देह व्यापार के धंधे के संबंध में मुखबिरों के जरिए जानकारी जुटाने का आदेश दिया. आदेश पाते ही थाना प्रभारियों ने मुखबिरों को सतर्क किया और खुद भी पता लगाने में जुट गए. 28 मई, 2020 की शाम 5 बजे कोहना थानाप्रभारी प्रभुकांत क्षेत्रीय गश्त पर निकलने वाले थे, तभी उन के खास मुखबिर ने उन के कक्ष में प्रवेश किया. उस के चेहरे पर मुसकान थी, जिस से उन्हें समझते देर नहीं लगी कि वह कोई खास खबर लाया है. फिर भी उन्होंने पूछा, ‘‘कोई खास बात?’’

‘‘हां हुजूर, खास बात ही है. तभी तो आप के सामने हाजिर हुआ हूं.’’

‘‘तो फिर बताओ, क्या बात है?’’

‘‘हुजूर, आर्य नगर मोहल्ले के मकान नंबर 8/58 में देह व्यापार का धंधा फलफूल रहा है. रैकेट चलाने वाला कथित पत्रकार है मोहम्मद यूनुस. उस ने यह मकान किराए पर ले रखा है. विगत एक साल से वह इसी जगह धंधा चला रहा है.’’

मुखबिर की बात सुन कर थानाप्रभारी प्रभुकांत चौंके. उन्हें यह जान कर आश्चर्य हुआ कि उन के थाना क्षेत्र में एक साल से देहव्यापार का धंधा चल रहा और उन्हें कानोंकान खबर नहीं लगी. प्रभुकांत एसपी (पूर्वी) कार्यालय पहुंचे और मुखबिर की जानकारी से राजकुमार अग्रवाल को अवगत कराया. अग्रवाल ने सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ करने के लिए एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव, सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान, प्रभारी निरीक्षक (नवाबगंज) रमाकांत पचौरी, प्रभारी निरीक्षक (स्वरूप नगर) अश्वनी पांडेय तथा प्रभारी निरीक्षक (कोहना) प्रभुकांत को शामिल किया गया.

29 मई, 2020 की रात 8 बजे गठित पुलिस टीम आर्यनगर स्थित मकान नंबर 8/58 पर पहुंची. सीओ श्वेता सिंह यादव ने दरवाजा खटखटाया तो एक अधेड़ व्यक्ति ने दरवाजा खोला. सामने पुलिस को देख वह घबरा गया. फिर अपने को संभालते हुए बोला, ‘‘सर, आप लोग… आने की वजह?’’

‘‘मुझे खबर मिली है कि इस मकान में देह व्यापार होता है. आप कौन?’’ श्वेता सिंह यादव ने पूछा.

‘‘मैडम, मेरा नाम मोहम्मद यूनुस है. मैं पत्रकार हूं. इस मकान में किराए पर रहता हूं. आप लोग गलतफहमी के शिकार हुए हैं.’’

इंसपेक्टर प्रभुकांत ने मोहम्मद यूनुस को हिरासत में ले लिया. फिर बोले, ‘‘गलतसही का पता जल्द ही चल जाएगा.’’

पुलिस टीम ने मकान के अंदर प्रवेश किया. घर के अंदर का नजारा बड़ा ही शर्मसार कर देने वाला था. 2 अलगअलग कमरों में युवक और युवतियां जिस्म की प्यास बुझा रहे थे. पुलिस को देख कर उन्होंने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें अर्धनग्न अवस्था में ही दबोच लिया. सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता यादव ने दोनों युवतियों को तथा सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान ने दोनों युवकों को हिरासत में ले लिया. थानाप्रभारी रमाकांत पचौरी ने कमरों की तलाशी ली तो वहां से कई आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं. इन में कंडोम, कामोत्तेजना बढ़ाने वाले कैप्सूल तथा स्प्रे आदि थे. घर के बाहर एक अय्याश की कार भी खड़ी थी.

स्वरूपनगर थाना प्रभारी अश्वनी पांडेय ने उस कार को कब्जे में ले लिया. कथित पत्रकार मोहम्मद यूनुस से सीओ अजीत सिंह ने 36,100 रुपए भी बरामद किए. यह रुपया ग्राहकों से वसूला गया था. पुलिस ने इन रुपयों को कब्जे में ले लिया. रुपयों के अलावा पकड़े गए युवकयुवतियों के पास से 6 मोबाइल फोन भी बरामद हुए. मोबाइल फोन को पुलिस टीम ने अपने कब्जे मे ले लिया. सैक्स रैकेट संचालक कथित पत्रकार मोहम्मद यूनुस के पास से पुलिस टीम को एक प्रैस कार्ड बरामद हुआ. यह प्रैस कार्ड ‘दैनिक सहारा टुडे’ हिंदी समाचार पत्र का था. इस प्रैस कार्ड के संबंध में पुलिस टीम ने सहारा टुडे कार्यालय से जानकारी की तो पता चला कि कार्ड फरजी है. कानपुर में मोहम्मद यूनुस नाम का उन का कोई संवाददाता नहीं है.

यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी थी कि मोहम्मद यूनुस फरजी पत्रकार है. पत्रकारिता की आड़ में वह देह व्यापार का धंधा कर रहा था. संचालक सहित पकड़े गए दोनों युवक व युवतियों, बरामद सामान तथा कार सहित सभी को थाना कोहना लाया गया. बरामद सामान और बरामद आपत्तिजनक वस्तुओं को पुलिस ने लिखापढ़ी कर सील कर दिया. कार थाना परिसर में खड़ी कर दी गई. अड्डे से बरामद 36,100 रुपए की भी लिखापढ़ी की गई. थानाप्रभारी प्रभुकांत ने फरजी पत्रकार के सैक्स रैकेट के पकड़े जाने की जानकारी एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को दी तो वह थाना कोहना आ गए और पूछताछ की. पकड़े गए युवकों में से एक ने अपना नाम मोहम्मद यूनुस निवासी कर्नलगंज (कानपुर शहर) बताया. दूसरे युवक ने अपना नाम विशाल तथा तीसरे ने गौरव बताया. ये दोनों औरैया के रहने वाले थे.

पकड़ी गई युवतियों में से एक ने अपना नाम रेहाना निवासी कर्नलगंज तथा दूसरी ने अपना नाम रिंकी निवासी बजरिया (कानपुर शहर) बताया. इन में मोहम्मद यूनुस संचालक था. चूंकि पुलिस टीम द्वारा सभी रंगेहाथ पकड़े गए थे, अत: सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव ने स्वयं वादी बन कर देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की धारा 3, 4, 5, 6 के तहत मोहम्मद यूनुस, गौरव, विशाल, रेहाना तथा रिंकी के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी. सभी को विधिसम्मत बंदी बना लिया गया. चूंकि देह व्यापार संचालक मोहम्मद यूनुस के पास से फरजी प्रैस कार्ड बरामद हुआ था. अत: पुलिस ने उस के विरुद्ध 420 आईपीसी के तहत एक अन्य मुकदमा दर्ज किया.

इधर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता को मुखबिर के जरिए पता चला कि बर्रा थाना क्षेत्र के मेहरबान सिंह पुरवा में अतुल के मकान में ‘न्यूज पोर्टल’ की आड़ में सैक्स का धंधा चल रहा है. इस जानकारी पर उन्होंने बर्रा पुलिस तथा सीओ (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता के सहयोग से उक्त मकान पर छापा मारा और 4 युवक तथा 2 युवतियों को गिरफ्तार किया. पकड़े गए चारों युवक खुद को पत्रकार बता रहे थे, जबकि युवतियां आगरा से बुलाई गई थीं. मकान के अंदर से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद हुई. युवकयुवतियों के पास से 8 मोबाइल फोन मिले थे. जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. सभी को थाना बर्रा लाया गया. बरामद सामान तथा मोबाइल फोन को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया गया.

पूछताछ में पकड़े गए युवकों में से एक ने अपना नाम मंगल प्रसाद पासवान निवासी नई बस्ती नौबस्ता कानपुर, दूसरे ने अपना नाम विमलेश तिवारी निवासी बर्रा-8 कानपुर, तीसरे ने अपना नाम मुन्ना सिंह निवासी दादा नगर कानपुर और चौथे ने अपना नाम नीरेंद्र सिंह निवासी हंसपुरम, नौबस्ता कानपुर बताया. पकड़ी गई 2 कालगर्ल रीना कश्यप व पिंकी जाटव थी. दोनों आगरा की रहने वाली थीं. ये 3 दिन पहले ही बुकिंग पर आई थीं. पकड़े गये युवकों के पास से 2 प्रैस आईडी कार्ड बरामद हुए. एक ‘भारत एक्सप्रैस न्यूज चैनल’ का था, जिस में मुन्ना सिंह चौहान को हैड स्टेट दर्शाया गया था. दूसरा प्रैस कार्ड भी इसी चैनल का था, जिस में विमलेश तिवारी को मंडल प्रभारी दर्शाया गया था. पुलिस ने जब इन प्रैस कार्डों की जानकारी जुटाई तो पता चला कि वे फरजी थे. मतलब पकड़े गए सभी फरजी पत्रकार थे और न्यूज पोर्टल की आड़ में वह सब सैक्स रैकेट चला रहे थे.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने जब पकड़े गए युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे फरजी पत्रकार हैं और न्यूज पोर्टल की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा करते थे. संचालक मंगल प्रसाद पासवान ने बताया कि उस ने अतुल कुमार का मकान न्यूज चैनल का औफिस बनाने के नाम पर 15000 रुपए मासिक किराए पर लिया था. उस के सहयोगी मुन्ना सिंह, विमलेश तिवारी तथा नीरेंद्र सिंह ग्राहक खोजते थे. इस के एवज में उन्हें कमीशन दिया जाता था. मंगल प्रसाद ने बताया कि फेसबुक पर फेक आईडी बना कर वह लोगों को जोड़ता था. फिर नंबरों का आदानप्रदान कर के डील करता था. यह डील ढाई हजार से 10 हजार रुपए तक में होती थी. इस में कालगर्ल के आनेजाने का खर्च भी जोड़ा जाता था.

डिमांड पर युवतियोें को बाहर से भी बुलाते थे. पूरी रात 10 हजार में बुक करते थे. पिछले 8 महीने से वे इस मकान में देह व्यापार करा रहे थे. पकड़ी गई रीना कश्यप व पिंकी जाटव को डिमांड पर आगरा से बुलाया गया था. चूंकि सभी आरोपियों ने जुर्म कबूल कर लिया था, अत: सीओ मनोज कुमार गुप्ता ने स्वयं वादी बन कर बर्रा थाने में धारा 3, 4, 5, 6, 7, 8 (देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की धारा) के तहत मंगल प्रसाद पासवान, मुन्ना सिंह चौहान, विमलेश तिवारी, नीरेंद्र सिंह, पिंकी जाटव तथा रीना कश्यप के विरुद्व रिपोर्ट दर्ज करा दी. फिर उन्हें विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. चूंकि युवकों के पास से फरजी प्रैस कार्ड बरामद हुए थे, अत: उन के विरुद्व धारा 420 आईपीसी के तहत एक अन्य मुकदमा दर्ज किया गया.

पकड़ी गई युवतियों ने इस धंधे में आने की अपनी अलगअलग मजबूरी बताई. रीना कश्यप ने बताया कि वह मूलरूप से फिरोजाबाद की रहने वाली है. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. उस के पिता दयाराम कश्यप कांच फैक्ट्री में काम करते थे, जहां मामूली वेतन मिलता था. बड़ी मुश्किल से परिवार का भरणपोषण होता था. जब वह सयानी हुई तो उस के पिता को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. लेकिन गरीबी की वजह से उस का ब्याह न हो सका. कुछ समय बाद एक खास रिश्तेदार के माध्यम से उस का विवाह किनारी बाजार (आगरा) निवासी राजेश कश्यप के साथ हो गया. राजेश एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह आगरा की बाह तहसील का रहने वाला था. कुछ समय वह गांव में रही, उस के बाद पति के साथ आगरा शहर मे रहने लगी.

उस का पति राजेश उसे बेहद प्यार करता था और उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करता था. शादी के कई साल तक उस की कोख सूनी रही. उस के बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया. जिस का नाम सूरज था. सूरज हम दोनों की आंखों का तारा था. राजेश उस का बर्थडे बड़े धूमधाम से मनाता था. बर्थडे पर वह अपने यारदोस्तों को भी बुलाता था. सब कुछ हंसीखुशी से चल रहा था. पर कुदरत को यह खुशी अच्छी नहीं लगी. सूरज एक रोज बीमार हुआ तो राजेश उसे चैकअप कराने डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने चैकअप के बाद सूरज को दिल की बीमारी बताई. इलाज थोड़ा महंगा था, पर राजेश ने हिम्मत नहीं हारी. धीरेधीरे इलाज में जमापूंजी खर्च हो गई और 50 हजार का कर्ज भी हो गया. इस कर्ज को चुकाने के लिए राजेश परेशान रहने लगा.

पति को परेशान देख मैं ने भी नौकरी करने का निश्चय किया. मैं ने कई जगह कोशिश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली. सौंदर्य प्रसाधन की एक दुकान पर नौकरी मिली भी, लेकिन मालिक की नीयत खराब थी. एक रोज एकांत में उस ने छेड़खानी की तो मैं ने नौकरी छोड़ दी. एक माह का वेतन लेने भी नहीं गई. उन्हीं दिनों उस की मुलाकात एक खूबसूरत महिला से हुई. वह सब्जी मंडी के पास रहती थी. मैं ने उसे अपनी व्यथा बताई तो वह खिलखिला कर हंसी फिर बोली, ‘‘कभी मैं भी तुम्हारी तरह परेशान थी. लेकिन अब मैं ऐसी जौब कर रही हूं जिस में काम कम और दाम अधिक है. अब मैं खुश हूं. मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नही है.’’

‘‘आप ऐसा कौन सा जौब करती हैं, जिस में कम समय में अधिक दाम मिलता है?‘‘रीना कश्यप ने पूछा.

‘‘मैं तन बेचने का जौब करती हूं. घंटे भर में हजार 2 हजार कमा लेती हूं.’’

‘‘यानी देह व्यापार का धंधा.‘‘रीना ने विस्मय से पूछा.

‘‘हां, देह व्यापार. तुम भी खूबसूरत हो, जवान हो. चाहो तो मेरे साथ यह धंधा कर के अपनी सारी परेशानियां दूर कर सकती हो.’’

उस रोज मैं रात भर परेशान रही और उस महिला की बातों पर विचार करती रही. आखिर मैं ने भी परेशानी दूर करने के लिए देह व्यापार का धंधा करने का निश्चय कर लिया. उस के बाद मैं ने उस महिला से संपर्क किया. फिर उस के साथ जिस्म बेचने लगी. शुरुआत में मुझे झिझक हुई, फिर अभ्यस्त हो गई. आगरा की कई कालगर्ल सरगनाओं से मेरे संबंध बन गए. वे डिमांड पर मुझे आगरा के अलावा दूसरे शहरों में भी भेजने लगी. 3 दिन पहले मैं पिंकी के साथ कानपुर आई थी, यहां पुलिस छापे में पकड़ी गई.  पिंकी जाटव ने पूछताछ में बताया कि वह आगरा में जमुना किनारे स्थित कच्ची बस्ती की रहने वाली है. उस के पिता राजाराम जाटव जूता बनाने का काम करते हैं.

5 भाईबहनों में वह सब से छोटी है. जब वह 14 साल की थी, तभी मां की मौत हो गई थी. उसे सैरसपाटा करने तथा अच्छा खानेपहनने का शौक था. बाप की कमाई से घर का खर्च ही चल पाता था. उस के अपने शौक थे, जो पूरे नहीं हो पाते थे. पैसा मांगने पर पिताजी डांटतेफटकारते थे और आवारा कहते थे. पर उस पर जवानी का रंग चढ़ने लगा था. मन करता था कि कोई बांहों में ले कर प्यार का इजहार करे. उस के खर्चे उठाए और उसे घुमाने ले जाए. वह खूबसूरत तो थी ही, उस ने नैनों के बाण चलाने शुरू किए तो कई युवक घायल हो गए. वह उन के साथ मौजमस्ती करने लगी, शौक व खर्चे पूरे होने लगे. इन्हीं प्रेमियों में एक था राजन.

राजन गीता कालोनी में रहता था और उस पर जान छिड़कता था. वह भी उसे मन ही मन चाहती थी. एक रोज राजन उसे होटल में ले गया. वहां उस ने उस के शरीर को भोगा और 5 सौ रुपए दिए. इस के बाद उसे अपने दोस्तों को भी परोसने लगा. मैं समझ गई कि राजन का प्यार दिखावा है. वह केवल उस के शरीर से प्यार करता हैं. उसे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि राजन उस की देह की दलाली भी करने लगा है. दोस्त उसे जो पैसा देते हैं, उस का आधा वह खुद रख लेता है. यह देख उस ने निश्चय किया कि जब शरीर ही बेचना है, तो राजन का साथ क्यों पकड़े. इस के बाद वह खुल कर देह व्यापार करने लगी. उस ने आगरा के कुख्यात कालगर्ल सरगनाओं से तार जोड़ लिए और आगरा के अलावा अन्य बड़े शहरों में जाने लगी. कम उम्र की थी, सो डिमांड अधिक होती थी.

कानपुर में वह 5 दिन के लिए 30 हजार रुपए में आई थी. लेकिन तीसरे रोज ही पुलिस छापे में पकड़ी गई. फरजी पत्रकार मोहम्मद यूनुस के आर्य नगर के अड्डे से पकड़ी गई रेहाना घरेलू महिला थी. वह कर्नलगंज में अपने शौहर के साथ रहती थी. उस का शौहर शराबी और  औरतखोर था, जो कमाता था सब खर्च कर देता था. रेहाना कुछ कहती तो उसे बेरहमी से पीटता था. आजिज आ कर उस ने शौहर का साथ छोड़ दिया और अलग रहने लगी. कुछ समय बाद वह मोहम्मद यूनुस के संपर्क में आ गई. उस ने रेहाना पर डोरे डालने शुरू किए तो वह उस के जाल में फंस गई. बाद में मोहम्मद यूनुस ने उसे देह धंधे में उतार दिया. घटना वाली रात जब पुलिस का छापा पड़ा, तब वह ग्राहक के साथ हमबिस्तर थी ग्राहक के साथ वह भी पकड़ी गई.

रिंकी बजरिया की रहने वाली थी. जब वह 5 साल की थी, तभी उस की मां की मौत हो गई थी. मां की मौत के बाद पिता लक्ष्मण ने दूसरी शादी कर ली थी. सौतेली मां ने आते ही उस पर कहर बरपाना शुरू कर दिया. वह दिन भर उस से घर का काम करवाती, फिर भी शाम को बाप के घर आते ही वह उस पर कामचोर का आरोप लगा देती. बाप भी उसे मारतापीटता और खरीखोटी सुनाता. आजिज आ कर वह मौसी के घर सीसामऊ चली गई. लेकिन दुर्भाग्य ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा. एक रोज अधेड़ मौसा ने उसे जबरदस्ती हवस का शिकार बना डाला और जुबान बंद रखने की धमकी दी. परेशान हो कर उस ने मौसा का घर छोड़ दिया और अपने घर आ गई.

अब वह नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. एक दिन नौकरी की तलाश में घर से निकली तो नगर निगम के गेट पर एक समाजसेवी महिला से मुलाकात हो गई. वह उसे अपने घर ले गई. उस ने उस की खूब आवभगत की. बाद में पता चला कि महिला समाजसेवी नहीं, बल्कि सैक्स वर्कर है. उस ने उस क ी परेशानियों का फायदा उठा कर उसे भी देह के धंधे में धकेल दिया. तब से वह उसी के घर में रहती है. उस ने उसे पूरा संरक्षण दे रखा है. उसी के मार्फत वह घटना वाली रात मोहम्मद यूनुस के अड्डे पर पहुंची थी. वह ग्राहक के साथ कमरे में हमबिस्तर थी, तभी पुलिस का छापा पड़ा और वह पकड़ी गई.

पुलिस द्वारा पकड़ा गया अय्याश विशाल औरैया का रहने वाला था. वह टायर व्यवसाई था. अपनी कार से वह कानपुर शहर आया था. उसे गड़रियन पुरवा में टायर खरीदने थे. सौदा ठीक से नहीं पटा तो उस का मूड खराब हो गया. मूड ठीक करने के लिए विशाल ने सैक्स रैकेट संचालक मोहम्मद यूनुस को फोन किया. विशाल उस का पुराना ग्राहक था और पहले भी 2 बार अड्डे पर जा चुका था. सौदा पटते ही विशाल अपने दोस्त गौरव के साथ अड्डे पर पहुंच गया. गौरव विशाल का दोस्त था और वह औरैया से उस के साथ ही आया था. गौरव और विशाल अलगअलग कमरों में कालगर्ल्स के साथ मौजमस्ती कर रहे थे तभी पुलिस का छापा पड़ा और वे दोनों भी पकड़े गए.

सैक्स रैकेट संचालक मोहम्मद यूनुस बड़ा शातिर दिमाग था. उस की अपने घरवालों से नहीं पटती थी. शुरू में उस ने कई छोटेमोटे धंधे किए, पर कमाई नहीं हुई. मोहम्मद यूनुस महत्त्वाकांक्षी था. वह कम समय में लखपति बनना चाहता था. इस के लिए उस ने सैक्स का धंधा चुना. पर इस में पुलिस का भय था. इस भय को कम करने के लिए उस ने पत्रकारिता का लबादा ओढ़ा. उस का एक मित्र अखलाक था. उस ने उसी की मार्फत एक दैनिक समाचार पत्र का प्रैस कार्ड बनवा लिया. फरजी प्रैस कार्ड के माध्यम से मोहम्मद यूनुस पुलिस के संपर्क में रहने लगा. शहर में जहां भी सैक्स रैकेट पकड़ा जाता, वह वहां पहुंच जाता और पूछताछ के बहाने कालगर्ल और सरगना से मिलता. इस तरह संपर्क बढ़ा कर वह खुद सैक्स रैकेट चलाने लगा.

उस ने एक साल पहले आर्यनगर में यह मकान 10 हजार रुपए प्रति महीने के किराए पर लिया और पत्रकारिता की आड़ में देह व्यापार करने लगा. उस का भांडा तब फूटा जब पासपड़ोस वालों ने उस की शिकायत गुप्तरूप से एसएसपी से कर दी. एसएसपी ने जांच का आदेश दिया तो वह फंस गया और पकड़ा गया. थाना कोहना तथा थाना बर्रा पुलिस ने सभी आरोपियों को कानपुर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित