Uttarakhand Crime : कर्ज में छिपा कत्ल का राज

Uttarakhand Crime : कर्ज लेनदेन के जाल में रुबीना ऐसी फंसी कि उस का जीना मुहाल हो गया था. किंतु उस से निकलने के लिए उस ने जो तरीका अपनाया, वह कानून के फंदे में फंसने वाला था. उस पर आसमान से गिरे और खजूर पर अटके वाली कहावत पूरी तरह से चरितार्थ हो गई. आखिर उस ने किया क्या था? पढ़ें, इस मर्डर स्टोरी में.

उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में रुड़की के मच्छी मोहल्ले में रहने वाली करीब 40 साल की रुबीना छोटे से घर में अपने शौहर शमशेर और 3 बच्चों के साथ रहती थी. बेटियां स्कूल जाती थीं. पति पत्थर टाइल्स का काम करता था और वह खुद पिछले 6 सालों से जरूरतमंद महिलाओं को लोन दिलवाने के लिए बिचौलिए का काम करती थी.

लेकिन पिछले कई महीने से वह परेशान चल रही थी. उस के घर का गुजारा किसी तरह से बस चल पा रहा था.

”तुम कब से कह रही हो नई ड्रेस दिलवा दूंगी, क्यों नहीं दिलातीं?’’ एक दिन रुबीना की 10 साल की बेटी ठुनकती हुई बोली.

”दिलवा दूंगी…तुम्हें भी दिला दूंगी.’’ रुबीना ने समझाने की कोशिश की.

”नहींनहीं अम्मी, मुझे आज ही चाहिए. तुम दीवाली पर बोली थी, वह भी निकल गई…’’ कहतेकहते बेटी रोने को हो आई.

”अरे चुप हो जा मेरी बच्ची, थोड़े पैसे आ जाने दे.’’

”उतने सारे पैसे थे तो तुम्हारे पास, मैं ने देखा था रात को तुम गिन रही थी…’’

”अरे वो पैसे मेरे नहीं थे, वो तो ब्याज के थे.’’ रुबीना बोली.

”उसी में से दिला देतीं, और पैसे आने पर उस से ब्याज दे देतीं.’’ बेटी का मासूमियत भरा सुझाव था.

”उस में एक पैसा खर्च नहीं कर सकती मेरी बच्ची…समझा कर! ब्याज नहीं चुकाऊंगी, तब कर्ज का बोझ कैसे उतरेगा. लोन वाले किस्त मांगने घर पर आ धमकेंगे.’’ रुबीना बोली.

”कर्ज लिया क्यों?’’ बेटी बोली.

”अब तुम्हें कैसे सब कुछ समझाऊं? यही तो हमारा कामधंधा है…बाप की कमाई से कहां गुजारा होता है.’’ रुबीना बोली.

”अरे इधर आ, तुझे मैं समझाती हूं.’’ रुबीना की बड़ी बेटी अपनी बहन का हाथ खींचती हुई कमरे से बाहर चली गई.

”अरे, क्या हुआ, फिर छुटकी ने किसी फरमाइश की जिद कर दी?’’ शौहर शमशेर कमरे में घुसते ही बोला.

”उस कमीनी के चलते आज यह दिन देखने पड़ रहे हैं…न वह मरती और न मुझे उस का लोन चुकाना पड़ता…’’ रुबीना बिफरती हुई बोली.

”किंतु रुबीना, तुम ने भी कुछ कम लोगों से लोन नहीं ले रखे हैं. ऊपर से दूसरों की गारंटर भी बनी हो.’’ शमशेर बोला.

”ऐसा नहीं करूं तो भला जो भी कमीशन के पैसे आ रहे हैं वह भी नहीं आएंगे और तुम्हारे काम की कमाई का तो मुझे कुछ पता ही नहीं चलता है.’’ रुबीना ने कहा.

”तुम्हारे लोन लेनेदिलवाने के चक्कर में मैं भी फंसता जा रहा हूं. क्या जरूरत थी सगीरन को लोन दिलवाने की, जब वह बीमारी के दौर से गुजर रही थी.’’ शौहर बोला.

”मैं उस की देह के भीतर घुस कर देखने गई थी कि कैसी बीमारी है उसे. अब भला किसी की बीमारी में नहीं मदद होगी, तब कब होगी?’’

लोन कैसे बना जी का जंजाल

रुबीना कई स्थानीय लोगों के अलावा 4 बैंकों की कर्जदार थी. उन की किस्तें और ब्याज के पैसे चुकाने के चलते बच्चे अच्छा खानेपहनने को तरस रहे थे. परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पा रहा था. शौहर की कमाई से जो कुछ आता, उस में से आधे से अधिक कर्ज चुकाने में ही चले थे. दरअसल, वह खुद लोन लेने और दिलवाने का धंधा करती थी. उस ने बीते 2 साल से महिलाओं का एक ग्रुप बना रखा था, जिन्हें जरूरत के अनुसार अपनी जिम्मेदारी पर लोन दिलवाती थी. इस के बदले में रुबीना को हर एक महिला से 500 रुपए कमीशन मिल जाता था.

उस ने 2 साल पहले ही अपनी आईडी से सगीरन नामक महिला को एक लाख रुपए का लोन रेखा नाम की महिला से दिलवाया था. रेखा उस के घर के पास में ही सिविल लाइंस कोतवाली क्षेत्र के सत्ती मोहल्ले में मसजिद के पीछे पति घनश्याम के साथ रहती थी. घनश्याम रुड़की की पुरानी सब्जी मंडी में सब्जी की दुकान चलाता है. घर में घनश्याम और उस की पत्नी रेखा (50 वर्ष) के अलावा और कोई नहीं रहता था. उन के 3 बच्चे अंबाला, हरियाणा ही रहते थे.

रेखा भी घर से लोन का धंधा कई सालों से कर रही थी. रुबीना की उस से जानपहचान बीते 5 सालों से थी. रेखा के पास लोन देने के लिए अच्छीखासी रकम थी. उस की समस्या थी कि वह बीमारी के चलते अधिक चलफिर नहीं सकती थी, इस वजह से वह घर पर ही रहती थी. कर्ज लेने वाले उस के घर आते थे और लोन की किस्त आदि चुका कर चले जाते थे. इन में ज्यादातर महिलाएं ही थीं. रुबीना भी उन्हीं में से एक थी, जो लोन के लिए ग्राहक लाती थी. बदले में उसे रेखा कमीशन देती थी.

रुबीना कर्ज से परेशान रहते हुए हमेशा इस चिंता में रहती थी कि कैसे उस के पास मोटी रकम आए कि कर्ज का कुछ बोझ हलका हो पाए. जब भी वह रेखा के पास जाती, तब उसे अकेली देखती थी. उस की नजर बरबस उस के पहनावे और गहनों पर चली जाती थी. उस ने महंगा मंगलसूत्र पहन रखा था. कान में भारी कुंडल थे. पति घनश्याम दिन में अपनी सब्जी की दुकान पर चला जाता था. रुबीना समझती थी कि उस के पास काफी पैसा है. वह रेखा की भी कर्जदार थी. उसे सगीरन के साथसाथ अपने भी पैसे रेखा को चुकाने थे. इस वजह से वह उस से और अधिक कर्ज नहीं ले सकती थी.

रुबीना कई दिनों से यह महसूस करने लगी थी कि रेखा के गहने उस की आंखों को चुभने लगे हैं. मन ही मन वह उस की कीमत का भी हिसाब लगाने लगी थी. एक दिन नहीं रहा गया तब उस ने पूछ लिया, ”दीदी, आप का मंगलसूत्र कितने भर सोने का है?’’

”क्यों तुम्हें बनवाना है, जो पूछ रही है?’’ रेखा ने कमेंट के मूड में बोल दिया.

”नहीं दीदी, यूं ही पूछ रही थी…और वो कान का कुंडल दीदी!’’ रुबीना फिर बोली.

”बड़ी मुश्किल से धनश्याम से लड़झगड़ कर इसे बनवाया है. अरे चलचल, अपने काम पर ध्यान दे. अपनी और दूसरों के लोन की किस्तें समय पर चुकाने का इंतजाम कर…’’ रेखा बोली.

रुबीना को उस रोज रेखा की बात थोड़ी कड़वी लगी. रेखा ने एक तरह से उसे लोन चुकाने को ले कर धमकी दे डाली थी. रुबीना भी क्या करती, उस ने अपनी आईडी उस के पास जमा करवा रखी थी.

सोमवार के दिन 25 नवंबर, 2024 को पौने 11 बज चुके थे. घर का कामकाज निपटा कर रुबीना रेखा के घर जाने के लिए निकली थी. उस रोज भी उस के पास ब्याज चुकाने तक के पूरे पैसे नहीं थे, किस्त की तो बात ही दूर थी. ऊपर से बेटी की फरमाइश थी. उस के दिमाग में खलबली हो रही थी. सब कुछ एकसाथ कौंध रहा था. चल कहीं और रही थी, ध्यान कहीं और ही था. 2 बार ऊबडख़ाबड़ सड़क पर गिरतेगिरते बची और एक बार तो स्कूटी से टकरातेटकराते! हाथ में बैग मजबूती से थामे थी. उसी में उस का साधारण मोबाइल फोन भी था. उस वक्त उस के दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था…! कुछ अच्छा, तो कुछ बुरा! कुल मिला कर उस का इरादा कुछ नेक नहीं लग रहा था.

लालच की नाव ने कैसे पहुंचाया जेल

कर्ज से मुक्ति की कुछ योजना उस ने बना रखी थी और और कुछ के बारे में सोचती हुई रेखा के घर की तरफ कदम बढ़ाती जा रही थी. उसे यह भी ध्यान में था कि रेखा का पति अभी सब्जी की दुकान से नहीं आया होगा. वह दोपहर को ही घर पर रहता था. वह 11 बजे रेखा के घर पहुंच गई थी. जैसे ही वह रेखा के कमरे में गई, शिकायती लहजे में बोली, ”देख, आज बहाना मत बनाना…सगीरन का पैसा भी देना…और अपना बेशक सिर्फ ब्याज चुका दो…आज तुम्हारे मोहल्ले की ही सबीना आने वाली है…उसे 2 लाख चाहिए…तुम्हारा नाम ले कर कल आई थी…’’

रुबीना चुपचाप सुनती रही. कोई जवाब नहीं दिया.

”क्यों कुछ बोल क्यों नहीं रही…उस के लोन का कमीशन तुम्हारे ब्याज में कम कर दूंगी.’’

”लेकिन दीदी…मेरे पास तो अपने ही ब्याज के पूरे पैसे नहीं हैं…वो 2 दिन बाद कर दूंगी…’’

”देख, फिर तूने कर दी न…छिछोरीछिनारों वाली बात!…हराम…’’

रेखा के मुंह से गालियां निकलनी शुरू ही हुईं कि रुबीना गुस्से में आ गई, ”दीदी, मैं तुम्हारी कर्जदार हूं… लिहाज करती हूं, इस का मतलब यह नहीं कि मुझे गालियां दो. दोबारा ऐसी गलती मत करना वरना बहुत बुरा हो जाएगा…’’

”क्या बुरा हो जाएगा…क्या कर लेगी तू…मैं अपना पैसा मांगती हूं…गालियां बुरी लगती हैं तो मेरा पैसा चुकाओ, वरना भुगतने के लिए तैयार हो जाओ…’’ रेखा चीखती हुई बोली.

”मैं भी देखती हूं कौन किसे दबाता है?’’ यह कहती हुई रुबीना ने वहीं कोने में रखा लोहे का पाइप रिंच उठा लिया. रेखा सहम गई, फिर भी तनी हुई आवाज में बोली, ”तो तू मुझे मारेगी, एक फोन मिलाऊंगी कि तुम्हारी बोलती बंद हो जाएगी…’’

रेखा अपना फोन निकालने के लिए तकिए को हटाने लगी, तभी रुबीना ने रेखा के सिर पर पाइप रिंच से जोरदार वार कर दिया. जिस से रेखा एक ओर चीखती हुए लुढ़क गई. चोट सिर पर लगी थी. वह अर्धबेहोशी की हालत में आ गई थी. उस की उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी. रुबीना ने तुरंत रेखा के गले में लिपटी चुन्नी को कस दिया. इस के बाद फटाफट रुबीना ने रेखा के घर की अलमारी में रखे सोनेचांदी के जेवर, 10 हजार रुपए की नगदी और रेखा का मोबाइल फोन अपने एक छोटे बैग में ठूंस कर रखा फिर चुपचाप अपने घर आ गई.

उधर घनश्याम अपनी सब्जी की दुकान पर व्यस्त था. जब वह सब्जी बेच कर दुकान से निकला तो उसे कुछ भूख लगने लगी. उस ने सोचा कि पहले घर पर जा कर खाना खाया जाए. तेज कदमों से घनश्याम घर पहुंचा. घर में सन्नाटा पसरा हुआ था. उस ने रेखा को आवाज लगाई. पीछे वाले कमरे से रेखा की दबी हुई आवाज आई, ”मैं यहां हूं.’’ घनश्याम दौड़ कर वहां पहुंचा. वहां देखा तो रेखा कराह रही थी. उस के सिर से खून रिस रहा था. गले में चुन्नी लिपटी हुई थी. घनश्याम ने उस की हालत देख कर तुरंत पड़ोसियों को बुलाया. उसे ईरिक्शा में बैठा कर सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी में ले गया. जैसे ही डाक्टरों ने रेखा का इलाज शुरू किया, उस ने दम तोड़ दिया. रेखा को पहले से ही शुगर की बीमारी थी. मरने से पहले वह घटना के बारे में कुछ भी नहीं बता पाई.

डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार में पाया कि रेखा के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया गया था. उस के गले में भी किसी रस्सी आदि के कसने के निशान थे. उस की मौत डाक्टरों को सामान्य नहीं, बल्कि हत्या लगी, इसलिए तुरंत पुलिस को सूचना दे दी गई. मामला रुड़की कोतवाली सिविल लाइंस का था. वहां से ऐश्वर्य पाल सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए. सूचना मिलने पर कोतवाल नरेंद्र सिंह बिष्ट भी अस्पताल पहुंच गए. इस मामले की तत्काल काररवाई करते हुए नरेंद्र बिष्ट ने घनश्याम से पूछताछ की. उसे जितनी जानकारी थी, वह कोतवाल को दे दी. महिला की संदिग्ध हत्या की गई थी. वह भी दिन में ही. कोतवाल ने सीओ नरेंद्र पंत और एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह को भी घटना से अवगत करा दिया.

दूसरी तरफ डाक्टरों ने रेखा के शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में भिजवा दिया. मामले की छानबीन के लिए नरेंद्र बिष्ट अपने साथ एसएसआई धर्मेंद्र राठी, एसआई मंसूर अली, हैडकांस्टेबल मनमोहन भंडारी और नूर आलम को ले कर घनश्याम के घर पर गए. रेखा की संदिग्ध मौत की सूचना पा कर उन के बच्चे अंबाला से रुड़की के लिए निकल पड़े. कोतवाल नरेंद्र सिंह बिष्ट ने रेखा के मकान का बारीकी से निरीक्षण किया. रेखा के पति घनश्याम ने पुलिस को बताया कि जब वह घर आया तो उसे लगा कि शायद रेखा बैड से नीचे गिर कर घायल हो गई होगी. मगर जब अस्पताल से लौट कर देखा तो घर के काफी जेवर गायब थी.

घर में अकसर ब्याज पर कर्ज लेने और ब्याज की रकम लौटाने के लिए महिलाएं आती रहती थीं. इन में वे महिलाएं भी थीं, जो कर्ज दिलवाने का काम करती थीं. उन में घनश्याम ने अंजुम, गजाला  और रुबीना का नाम बताया, जिन का अकसर आनाजाना होता था. घर पर आनेजाने वाली महिलाओं के अलावा पुलिस ने रेखा की दिनचर्या की जानकारी जुटाई. इस के बाद पुलिस टीम ने पड़ोसियों से भी पूछताछ की. साथ ही मोहल्ले में आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक करने की योजना बनाई गई.

पुलिस टीम ने वहां लगे लगभग 50 सीसीटीवी कैमरे चैक किए. इन कैमरों की लगभग 200 फुटेजों में घटना वाले रोज 15-16 लोगों का रेखा के घर में आनाजाना दिखा. पुलिस ने सब से पहले उन लोगों की शिनाख्त की और उन के बारे में जानकारी जुटा कर उन से पूछताछ की. उन्हीं फुटेज में एक महिला घटना वाले दिन रेखा के घर से एक छोटा बैग ले कर जाती दिखाई दी थी, जो बाकी महिलाओं से थोड़ी अलग दिखी थी. वह महिला उस दिन 2 बार रेखा के घर जाती हुई दिखाई दी थी. फोरैंसिक टीम द्वारा घटनास्थल की जांच पूरी करने के बाद जब पुलिस ने रेखा की हत्या का मुकदमा उस के बेटे दीपक कुमार की तरफ से धारा 103, 309 (6) बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया.

सीसीटीवी फुटेज में नजर आए लोगों से पूतछाछ के सिलसिले में कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को बैग ले कर 2 बार रेखा के घर जाने वाली मुसलिम पहनावे वाली महिला संदिग्ध लगी. वह रुबीना थी, जो मृतका रेखा के घर से एक छोटा बैग ले कर वापस जाते हुए दिखाई दी थी. इसलिए पुलिस ने रुबीना से दोबारा पूछताछ के लिए महिला थानेदार अंशु चौधरी के माध्यम से थाने बुलवाया. वह 28 नवंबर, 2024 की शाम थी, जब रुबीना कोतवाली में आ गई थी. थानेदार अंशु चौधरी, कोतवाल नरेंद्र बिष्ट तथा सीओ नरेंद्र पंत ने रेखा की मौत के बारे में उस से पूछताछ करनी शुरू की.

श्री बिष्ट ने जब रुबीना को सीसीटीवी कैमरों की फुटेज दिखाई तो उस के चेहरे पर घबराहट दिखाई दी. उन्होंने घटना से संबंधित कुछ सवाल पूछे तो वह पुलिस के प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे सकी और जल्द ही टूट गई थी. जेल जाने के डर से रुबीना ने पुलिस के सामने रेखा की हत्या करना स्वीकार कर लिया. अपनी मजबूरियों की खातिर रेखा की हत्या करने की सिलसिलेवार जानकारी  रख दी.

रेखा से अपने पुराने संबंधों और उस की हत्या के बारे में रुबीना ने जो खुलासा किया, वह बहुत ही शर्मनाक था, क्योंकि अपनी समस्या का समाधान निकालने का उस ने जो तरीका अपनाया था, वह सोचीसमझी साजिश थी. हालांकि इस के पीछे की वजह उस ने सगीरन के कर्ज चुकाने की अपनी मजबूरी भी बताई. उस ने बताया कि उस ने अपना कर्ज उतारने के लिए रेखा की हत्या कर के उसे लूटने की योजना बनाई थी.

कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने रुबीना की निशानदेही पर उस के घर से रेखा की हत्या करने में इस्तेमाल किया गया पाइप रिंच, रेखा का मोबाइल फोन तथा गहने मंगलसूत्र, सोने की अंगूठियां, कानों के झुमके, कानों के टौप्स, नाक की लौंग, गले की चेन, पाजेब, बिछवे, बच्चों के कड़े व नकद 10 हजार रुपए बरामद कर लिए.

रुबीना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

Jharkhand Crime : कर्ज से बचने के लिए महिला को मिट्टी के तेल से जलाया

Jharkhand Crime : उधार की रकम कभीकभी अपराध को भी जन्म देती है. अंजलि के साथ यही हुआ. मोटे ब्याज के चक्कर में उस ने फिरदौस, रमन और आरती को काफी रकम उधार दे दी थी. एक दिन यही रकम अंजलि की जान की ऐसी दुश्मन बनी कि…

झारखंड के रांची जिले के कस्बा अरगोड़ा की 33 वर्षीय अंजलि उर्फ विनीता तिर्की पति मुंसिफ खान के साथ किराए के मकान में रहती थी. दोनों ने कई साल पहले प्रेम विवाह किया था. हालांकि अंजलि पहले से शादीशुदा थी. पहला पति रमन सिमडेगा शहर के सलगापुर गांव में अपने दोनों बच्चों के साथ रहता था. रमन मानसिक रूप से अस्वस्थ था. स्वच्छंदता और आधुनिकता का अंजलि पर ऐसा रंग चढ़ा कि पति और बच्चों को छोड़ कर वह अरगोड़ा के मोहल्ला महावीर नगर में प्रेमी से पति बने मुंसिफ खान के साथ आ कर बस गई थी. ऐसे में जब बच्चों की ममता अंजलि को तड़पाती थी तब वह बच्चों से मिलने चली जाया करती थी.

एकदो दिन उन के पास बिता कर फिर महावीर नगर मुंसिफ खान के पास चली आती थी. वर्षों से अंजलि और मुंसिफ खान दोनों साथ मिल कर सूद पर रुपए बांटने का धंधा करते थे. सूद के कारोबार में उन के लाखों रुपए बाजार में फंस चुके थे. इस के बावजूद भी उन्हें इस धंधे में बड़ा मुनाफा हो रहा था. सूद के साथसाथ उन्होंने जुए का भी धंधा शुरू कर दिया था. जुए के धंधे ने उन के बिजनैस में चारचांद लगा दिए. दिन दूनी, रात चौगुनी आमदनी उन्हें हो रही थी. अंजलि एक बेहद खूबसूरत और चंचल किस्म की महिला थी. महिला हो कर भी उस ने एक ऐसे धंधे में अपने पांव पसार दिए थे जहां ग्राहक घड़ी दर घड़ी औरतों को भूखे भेडि़ए की नजरों से घूरते हैं.

ऐसे में अंजलि ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ जैसा व्यवहार रखती थी. पते की बात तो यह थी कि सूद और जुए का धंधा तो गंदा जरूर था पर अंजलि चरित्र के मामले में बेहद पाकसाफ और सतर्क रहती थी. बुरी नजरों से देखने वालों के साथ वह सख्ती से पेश आती थी. बहरहाल, अंजलि और मुंसिफ खान के धंधे में साथ देने वालों में कई नाम शुमार थे. जिन में फिरदौस रसीद और आरती के नाम मुख्य थे. फिरदौस रसीद और आरती दोनों ही लोअर बाजार इलाके के कलालटोली चर्च रोड मोहल्ले में अगलबगल रहते थे. धंधे की वजह से फिरदौस और आरती का अंजलि के यहां आनाजाना लगा रहता था. जिस की वजह से दोनों पर अंजलि अंधा विश्वास करती थी. कभीकभी वह अपना धंधा फिरदौस और आरती के भरोसे छोड़ जाती थी. ईमानदारी के साथ वे दोनों धंधा करते और सही हिसाब उन्हें सौंप देते थे.

बात 25 दिसंबर, 2019 की है. अंजलि शाम करीब साढ़े 6 बजे घर से किसी काम से अपनी आल्टो 800 कार ले कर निकली. कई घंटे बीत जाने के बाद भी न तो उस का फोन आया और न ही वह घर लौटी. जबकि घर से निकलते वक्त वह पति मुंसिफ खान से कह गई थी कि जल्द ही लौट कर आ जाएगी. उस के जाने के बाद मुंसिफ भी थोड़ी देर के लिए बाजार टहलने निकल गया था. करीब 2 घंटे बाद जब वह बाजार से घर लौटा तो अंजलि तब तक घर नहीं लौटी थी. ये देख कर वह परेशान हो गया. मुंसिफ खान ने अंजलि के मोबाइल फोन पर काल की तो उस का फोन बंद आ रहा था. यह देख कर वह और भी हैरान हो गया कि उस का फोन बंद क्यों आ रहा है? क्योंकि वह कभी भी फोन बंद नहीं रखती थी.

रात भर ढूंढता रहा मुंसिफ खान बारबार फोन स्विच्ड औफ आने से मुंसिफ खान बहुत परेशान हो गया था. पहली बार ऐसा हुआ था जब अंजलि का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. मुंसिफ ने अपने जानपहचान वालों को फोन कर के अंजलि के बारे में पता किया, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस के बाद मुंसिफ को यह बात खटकने लगी कि कहीं उस के साथ कोई ऊंचनीच की बात तो नहीं हो गई. अंजलि की तलाश में मुंसिफ खान ने पूरी रात यहांवहां ढूंढ़ते हुए बिता दी, लेकिन उस का पता नहीं चला. अगली सुबह मुंसिफ थकामांदा घर पहुंचा तो दरवाजा देख कर आश्चर्य के मारे उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस के कमरे का ताला टूटा हुआ था. कमरे के भीतर रखी अलमारी के दोनों पाट खुले हुए थे और अलमारी का सारा सामान फर्श पर बिखरा हुआ था.

अलमारी की हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी को अलमारी में किसी खास चीज की तलाश थी और उस व्यक्ति को पता था कि वह खास चीज इसी अलमारी में है, इसीलिए उस ने अलमारी के अलावा घर में रखी किसी भी वस्तु को हाथ नहीं लगाया था. मुंसिफ अंजलि को ले कर पहले से ही परेशान था, ऊपर से एक और मुसीबत ने दस्तक दे कर परेशानी और बढ़ा दी थी. मुंसिफ ने जब अलमारी चैक की तो उस में रखी ज्वैलरी और रुपए गायब थे. ये सोच कर वह परेशान था कि यह किस की हरकत हो सकती है?

मुंसिफ को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? किस के पास जाए? इसी उलझन में डूबे हुए कब दिन के 11 बज गए उसे पता ही नहीं चला. उसी समय उस ने अपना व्हाट्सएप यह सोच कर औन किया कि अंजलि के बारे में कहीं कोई सूचना तो नहीं आई है. एकएक कर के ग्रुप में आए मैसेज को सरसरी निगाहों से वह देखता चला गया. एक मैसेज पर जा कर उस की नजर ठहर गई. मैसेज में एक महिला की बुरी तरह जली लाश की फोटो पोस्ट की गई थी. लाश झुलसी हुई थी इसलिए पहचान में नहीं आ रही थी. वह लाश खूंटी थाना क्षेत्र में कालामाटी के तिरिल टोली गांव के एक खेत से मिली थी. उस मैसेज में लाश का जो हुलिया दिया गया था, वह उस की पत्नी अंजलि की कदकाठी से काफी मेल खाता हुआ नजर आ रहा था.

मैसेज पढ़ कर मुंसिफ खान दंग रह गया था. उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था. अंजलि को ले कर उस के मन में बुरेबुरे खयाल आने लगे थे. मैसेज पढ़ कर मुंसिफ जल्द ही बाइक से खूंटी की तरफ रवाना हो गया. रांची से खूंटी करीब 50-60 किलोमीटर दूर था. तेज गति से बाइक चला का मुंसिफ खान करीब एक घंटे में वह खूंटी थाना पहुंच गया था. उस ने थानाप्रभारी जयदीप टोप्पो से मुलाकात की. थानाप्रभारी ने अपने मोबाइल द्वारा उस लाश के खींचे गए फोटो मुंसिफ को दिखाए. फोटो देख कर मुंसिफ की सारी आशंका दूर हो गई क्योंकि लाश उस की पत्नी अंजलि उर्फ विनीता तिर्की की ही थी. हत्यारों ने बेरहमी से उसे जला दिया था. थानाप्रभारी को इस बात की आशंका थी कि कहीं अंजलि के साथ रेप कर के उस की हत्या तो नहीं कर दी.

थानाप्रभारी ने मुंसिफ से बात की तो उन्हें मुंसिफ की बातों और बौडी लैंग्वेज से उसी पर शक हो रहा था. उन्हें लग रहा था कि कहीं इसी ने तो अपनी पत्नी की हत्या कर के लाश यहां फेंक दी हो और पुलिस से बचने का नाटक कर रहा हो. इसी आशंका के मद्देनजर थानाप्रभारी टोप्पो ने मुंसिफ खान को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. उस से की गई लंबी पूछताछ के बाद पुलिस को उस से कुछ भी हासिल नहीं हुआ. पूछताछ में उस ने बताया कि अंजलि उस की पत्नी थी. दोनों 10 सालों से दीया और बाती की तरह घुलमिल कर रहते थे. दोनों ने प्रेम विवाह किया था. उन का जीवन खुशहाली में बीत रहा था, तो वो भला पत्नी की हत्या क्यों करेगा.

उस की यह बात सुन कर थानाप्रभारी भी सोच में पड़ गए कि वह जो कह रहा है, सच हो सकता है. इसलिए उन्होंने कुछ हिदायत दे कर उसे छोड़ दिया. अगले दिन यानी 27 दिसंबर, 2019 को अंजलि उर्फ विनीता तिर्की की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस के पास आ चुकी थी. रिपोर्ट पढ़ कर इस बात की पुष्टि हो चुकी थी कि मृतका के साथ दुष्कर्म नहीं किया गया था. रिपोर्ट में यह जरूरी उल्लेख किया गया था कि मृतका की हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के बाद बदमाशों ने लाश पर मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा थी. एसपी ने संभाली कमान अंजलि उर्फ विनीता तिर्की हत्याकांड की मानिटरिंग एसपी आशुतोष शेखर कर रहे थे. उन्होंने घटना के खुलासे के लिए एसडीपीओ आशीष कुमार के नेतृत्व में एक स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम (एसआईटी टीम) का गठन किया. उस टीम में इंसपेक्टर राधेश्याम तिवारी, दिग्विजय सिंह,

राजेश प्रसाद रजक, खूंटी थानाप्रभारी जयदीप टोप्पो, एसआई मीरा सिंह, नरसिंह मुंडा, पुष्पराज कुमार, रजनीकांत, रंजीत कुमार यादव, बिरजू प्रसाद, दीपक कुमार सिंह, पंकज कुमार और विवेक प्रशांत शामिल थे. चूंकि मृतका अंजलि दूसरे जिला यानी रांची की रहने वाली थी. इसलिए पुलिस ने सच की तह तक पहुंचने के लिए रांची से ही घटना की जांच शुरू की. इंसपेक्टर राधेश्याम तिवारी ने रांची पहुंच कर अंजलि के पति मुंसिफ खान से फिर से पूछताछ की और उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो पता चला कि अंजलि के मोबाइल फोन पर आखिरी बार काल 25 दिसंबर, 2019 को शाम साढ़े 6 बजे की गई थी. जिस नंबर से काल की गई थी, छानबीन में वह नंबर इसी जिले के लोअर बाजार थाने के कलालटोली चर्च मोहल्ले की रहने वाली आरती का निकला.

28 दिसंबर को लोअर बाजार थाना पुलिस की मदद से एसआईटी टीम और खूंटी पुलिस ने आरती को उस के घर से पूछताछ के लिए उठा लिया. पुलिस उसे लोअर बाजार थाने ले आई. पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो आरती उस के सामने पूरी तरह से टूट गई और अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने पुलिस के सामने सच्चाई उगल दी. उस पता चला कि उस ने अपने साथियों फिरदौस रसीद और रमन कुमार के साथ मिल कर अंजलि की हत्या की थी. लाश की शिनाख्त आसानी से न होने पाए, इसलिए तीनों ने मिल कर उसे जला दिया था.

हत्थे चढ़े आरोपी फिर क्या था? आरती के बयान के बाद पुलिस ने फिरदौस रसीद को कलालटोली चर्च मोहल्ले में स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया और दोनों को रांची से खूंटी ले आई. दोनों का तीसरा साथी रमन फरार था. पूछताछ में आरती और फिरदौस ने अंजलि की हत्या की वजह बता दी. उस के बाद दोनों की निशानदेही पर पुलिस ने अंजलि की हत्या के बाद लूटी गई उस की अल्टो कार, उस के घर से लूटे गए जेवरात और मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया. गिरफ्तार दोनों आरोपियों के द्वारा बताई गई कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

बिंदास अंजलि उर्फ विनीता तिर्की सूद कारोबार से बेहद फलफूल गई थी. जिंदगी और बिजनैस दोनों का साथ देने वाला प्रेमी पति मुंसिफ खान साये के समान 24 घंटे उस से चिपका रहता था. वह पत्नी के एक हुक्म पर आसमान से तारे तोड़ लाने के लिए तैयार रहता था. सूद के कारोबार से उस ने बहुत पैसे कमाए. जब पैसे आने लगे तो उस ने अपने कारोबार का विस्तार किया और मोहल्ले के एक गुप्त स्थान पर बड़ा कमरा ले कर जुए का अड्डा बना लिया और वहीं जुआ खिलाती थी. जब अंजलि का कारोबार बढ़ा तो उसे बिजनैस संभालने के लिए आदमियों की जरूरत महसूस हुई. उस ने ऐसे आदमियों की तलाश शुरू की जो उसी की तरह ईमानदार और विश्वासपात्र हो.

बिजनैस में बेईमानी करने वाला न हो.अंजली के पड़ोस में फिरदौस रसीद, रमन और आरती रहते थे. तीनों से अंजलि की खूब पटती थी. वे उस से अकसर सूद पर पैसे लेते थे और समय पर ब्याज चुकता भी कर देते थे. तीनों की ईमानदारी और व्यवहार से अंजलि बेहद खुश थी. उस के कहने पर वे कभीकभी जुए का अड्डा संभालने में उस की मदद कर दिया करते थे. फिरदौस रसीद, रमन और आरती तीनों कलालटोली चर्च मोहल्ले में अगलबगल रहते थे. तीनों एकदूसरे के पड़ोसी थे. तीनों का अपना भरापूरा परिवार था. बस कुछ नहीं था तो वह थी अच्छी सी नौकरी. इस वजह से उन के पास पर्याप्त और खाली समय रहता था. खाली समय में वे करते तो क्या करते?

आरती को छोड़ कर दोनों बालबच्चेदार थे. परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी. शार्टकट तरीके से वे कम समय में ज्यादा पैसे कमाना चाहते थे. पैसे कमाने के लिए जुआ खेलने अंजलि के अड्डे पर चले जाते थे. जुए की लत ने बनाया कंगाल फिरदौस रसीद को जुए की लत ने कंगाल बना दिया था. फिरदौस के साथसाथ आरती और रमन भी जुएबाज बन गए थे. फिरदौस तो जुए में बीवी के गहने तक हार गया था. गहने वापस पाने के लिए फिरदौस यारदोस्तों से कुछ कर्ज ले कर फिर से अपनी किस्मत आजमाने अंजलि के अड्डे पर चला गया. लेकिन उस की किस्मत ने उसे फिर से दगा दे दी. कर्ज ले कर जिन पैसों से अपनी किस्मत बदलने फरदौस आया था, वो तो हार ही गया, धीरेधीरे वह अंजलि का लाखों रुपए का कर्जदार भी हो गया. ये बात दिसंबर, 2019 के पहले हफ्ते की थी.

अंजलि अपने पैसों के लिए फिरदौस रसीद से हर घड़ी तगादा करती थी. फिरदौस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उस का कर्ज चुकता कर सके. अंजलि के तगादे से वह बच कर भागाभागा यहांवहां फिरता था. धीरेधीरे एक पखवाड़ा बीत गया. न तो वह कर्ज का एक रुपया चुका सका और न ही वह अंजलि के सामने ही आया. उस के बारबार टोकने से फिरदौस खुद की नजरों में अपमानित महसूस करता था. उस की समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे. कैसे उस से छुटकारा पाए. इसी परेशानी के दौर में उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म लिया. उस ने सोचा कि क्यों न अंजलि को ही रास्ते से हटा दें. न वह रहेगी और न ही उसे कर्ज चुकाना पड़ेगा. यानी न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. यह विचार मन में आते ही वह खुशी से झूम उठा.

फिरदौस रसीद ने योजना तो बना ली थी लेकिन योजना को अंजाम देना उस के अकेले के बस की बात नहीं थी. उस ने अपनी योजना में आरती और रमन को भी शामिल कर लिया. आरती और रमन साथ देने के लिए तैयार हो गए थे. दरअसल, वे दोनों भी अंजलि से नफरत करते थे. वे भी उस से जुए में एक बड़ी रकम हार चुके थे. जिस से कर्जमंद हो गए थे. रकम वापसी के लिए अंजलि उन पर तगादे का चाबुक चलाए हुई थी. आरती और रमन के पास एक फूटी कौड़ी नहीं थी. तो वे इतनी बड़ी रकम कहां से चुकाते. अंजलि के बारबार तगादा करने से वे परेशान हो चुके थे, इसलिए उन्होंने फिरदौस का साथ देना मंजूर कर लिया.

तीनों दुश्मनों ने बनाई योजना अब एकदो नहीं बल्कि अंजलि के 3 दुश्मन सामने आ चुके थे. तीनों ही मिल कर अंजलि से बदला लेने के लिए तैयार थे. तीनों ने मिल कर योजना बना ली थी कि किस तरह अंजलि को रास्ते से हटाना है. 25 दिसंबर यानी क्रिसमस का त्यौहार था. उन के लिए यह मौका सब से अच्छा था क्योंकि क्रिसमस के त्यौहार की वजह से सभी लोग अपनेअपने घरों में दुबके रहेंगे. वैसे भी अंजलि को कोई पूछने वाला तो था नहीं, इसलिए सुनहरे मौके को तीनों किसी कीमत पर हाथ से गंवाना नहीं चाहते थे. यही मौका उन्हें ठीक लगा. इसी योजना के मुताबिक, फिरदौस ने अंजलि को फोन कर के शाम साढ़े 6 बजे एक पार्टी दी और रिंग रोड बुलाया. उस ने यह भी कहा कि तुम्हारे पैसे तैयार हैं, उन्हें भी लेती जाना.

पैसों का नाम सुनते ही अंजलि की आंखों में चमक जाग उठी थी. उसे क्या पता था कि पैसे तो एक बहाना है, दरअसल उन्होंने उस के इर्दगिर्द मौत का जाल बिछा दिया था. उस जाल में वह फंस चुकी थी. वह दिन उस का आखिरी दिन था. बहरहाल, अंजलि ने फिरदौस से बता दिया कि वो रिंग रोड पर ही उस का इंतजार करे, कुछ ही देर में वह वहां पहुंच रही है. अंजलि की ओर से हां का जवाब मिलते ही फिरदौस, आरती और रमन की आंखों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. तकरीबन शाम 7 बजे अंजलि रिंग रोड पहुंच गई. जहां पर फिरदौस, आरती और रमन उसी के इंतजार में पलक बिछाए बैठे थे. फिरदौस के साथ आरती और रमन को देख कर अंजलि थोड़ी चौंकी थी.

अंजलि के रिंग रोड पहुंचते ही तीनों उस की कार में सवार हो गए. फिरदौस आगे की सीट पर बैठ गया था और आरती व रमन पीछे वाली सीट पर सवार थे. अंजलि ड्राइविंग सीट पर बैठी कार चला रही थी. उस ने कार जैसे ही आगे बढ़ाई, अचानक पीछे से अंजलि ने अपनी गरदन पर दबाव महसूस किया और वह चौंक गई.  उस के हाथ से स्टीयरिंग छूटतेछूटते बचा और कार हवा में लहराती हुई सड़क के दाईं ओर जा कर रुक गई. अभी वह कुछ समझ पाती तब तक फिरदौस और आरती भी उस पर भूखे भेडि़ए के समान टूट पड़े. रमन पहले ही फिरदौस के इशारे पर टूट पड़ा था.

चलती कार में घोटा गला तीनों दरिंदों के चंगुल से आजाद होने के लिए अंजलि फड़फड़ा रही थी लेकिन उन की मजबूत पकड़ से वह आजाद नहीं हो पाई और वह मौत की आगोश में सदा के लिए समा गई. अंजलि की मौत हो चुकी थी. उस की मौत के बाद तीनों बुरी तरह डर गए कि अब इस की लाश का क्या होगा? जल्द ही फिरदौस ने इस का रास्ता भी निकाल लिया. पहले तीनों ने मिल कर उस की लाश पीछे वाली सीट पर बीच में ऐसे बैठाई जैसे वह आराम से बैठीबैठी सो रही हो. उस के अगलबगल में रमन और आरती बैठ गए. फिरदौस ड्राइविंग सीट पर बैठ गया. वहां से तीनों खूंटी पहुंचे. खूंटी के कालामाटी के तिरिल टोली गांव के बाहर सूनसान खेत में अंजली का शव ले कर गए. उस के ऊपर मिट्टी का तेल उड़ेल कर आग लगा दी और कार ले कर वापस रांची पहुंचे.

इधर मुंसिफ खान अंजलि की तलाश में यहांवहां भटक रहा था. उधर तीनों अंजलि के घर पहुंचे और उस के घर की अलमारी तोड़ कर उस में से उस के सारे गहने लूट लिए और वहां से रफूचक्कर हो गए. तीनों ने जिस चालाकी से अंजलि की हत्या कर के उस की पहचान मिटाने की कोशिश की थी उन की चाल सफल नहीं हुई. आखिरकार पुलिस उन तक पहुंच ही गई और उन्हें उन के असल ठिकाने तक पहुंचा दिया. तीनों आरोपियों से पुलिस ने अंजलि के घर से लूटे गहने और कार बरामद कर ली थी.  कथा लिखने तक पुलिस अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime : शादी के लिए गर्लफ्रेंड नहीं मानी, तो मार डाला

Love Crime : ससुरालियों से खटपट हो जाने के बाद आराधना अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके आ गई. फिर एकाउंटेंट की नौकरी करने के दौरान उसे प्रवीण कुमार से प्यार हो गया. इस से पहले कि प्रवीण उस से शादी कर पाता, आराधना का झुकाव शोएब की तरफ हो गया. आराधना की यह गुस्ताखी प्रवीण को इतनी नागवार लगी कि…

उस दिन दिसंबर 2019 की 16 तारीख थी, रात के 9 बज रहे थे. रामप्रकाश गौतम बेहद परेशान थे. वह घर के अंदर चहलकदमी कर रहे थे. कभी उन की निगाह कमरे की दीवार घड़ी पर टिक जाती तो कभी दरवाजे की ओर. दरअसल वह अपनी बेटी के लिए परेशान हो रहे थे. उन की 35 वर्षीय बेटी आराधना गौतम किदवई नगर स्थित जैन ट्रेडिंग कंपनी में एकाउंटेंट थी. वह हर हाल में 8 बजे तक घर आ जाती थी, किंतु उस दिन तो रात के 9 बज गए, उस का कुछ अतापता नहीं था. वह उस के मोबाइल फोन पर कई बार काल कर चुके थे. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन वह रिसीव नहीं कर रही थी.

ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, त्योंत्यों रामप्रकाश गौतम की चिंता बढ़ती जा रही थी. आखिर जब उन के सब्र का बांध टूट गया तो रात 10 बजे उन्होंने अपने साले रामकुमार तथा भाई रमन गौतम को घर बुला लिया. उन्होंने उन्हें आराधना के घर वापस न आने के बारे में बताया तो वह भी चिंतित हो उठे. आपस में विचारविमर्श कर के रामप्रकाश ने पुलिस कंट्रोलरूम को सूचना दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद पुलिस तातियागंज, कानपुर स्थित उन के घर पहुंच गई. रामप्रकाश ने पुलिस को बेटी के संबंध में जानकारी दी तो पुलिसकर्मियों ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मामला किदवई नगर थाना क्षेत्र का है. अत: किदवई नगर थाने जा कर रिपोर्ट दर्ज कराएं.

इस पर रात 11 बजे रामप्रकाश गौतम अपने भाई रमन तथा साले रामकुमार के साथ थाना किदवईनगर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश पाठक उस समय थाने पर ही मौजूद थे. उन्होंने थानाप्रभारी को अपनी बेटी के अभी तक घर न लौटने की जानकारी दी. चूंकि मामला एक महिला एकाउंटेंट के लापता होने का था, अत: थानाप्रभारी राजेश पाठक ने आराधना गौतम की गुमशुदगी दर्ज कर ली और उस की खोज में जुट गए. उन्होंने रामप्रकाश से आराधना का फोन नंबर लिया फिर उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. डिटेल्स में उस के फोन की अंतिम लोकेशन कल्याणपुर थाना क्षेत्र के शताब्दी नगर की मिली. राजेश पाठक आराधना के घर वालों के साथ रात में ही कल्याणपुर पहुंचे और आराधना के संबंध में वहां के थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय को जानकारी दी.

मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी राजेश पाठक तथा थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय फोर्स के साथ शताब्दी नगर पहुंचे और उन्होंने वहां स्थित मोबाइल टावर के 500 मीटर की परिधि में आराधना की खोजबीन शुरू की. लेकिन उस का पता नहीं चला. दरअसल, उस समय आराधना के मोबाइल फोन का इंटरनेट बंद था, जिस से पुलिस को उस के फोन की वास्तविक लोकेशन नहीं मिल पा रही थी. इंसपेक्टर राजेश पाठक ने कई बार आराधना का नंबर अपने मोबाइल फोन से मिलाया तो उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन रिसीव नहीं हो रहा था. पुलिस ने उस के परिजनों के संग सुबह 4 बजे तक आराधना की तलाश की लेकिन सफलता नहीं मिली. तब पुलिस लौट गई.

सुबह 5 बजे रामप्रकाश गौतम भाई रमन के साथ घर पहुंचे तो उन की पत्नी रमा गौतम परिवार की अन्य महिलाओं के साथ दरवाजे पर ही बैठी थीं. उन्होंने पूरी रात आराधना के इंतजार में ही गुजार दी थी. रामप्रकाश को देखते ही रमा गौतम ने पूछा, ‘‘मेरी बेटी का कुछ पता चला?’’

जवाब में नहीं सुनते ही वह फफक पड़ीं. रामप्रकाश ने उन्हें धैर्य बंधाया कि बेटी का पता जल्द ही लग जाएगा. इधर सुबह 10 बजे के लगभग कुछ लोग शताब्दी नगर स्थित जवाहरपुरम पार्क पहुंचे तो उन्होंने पार्क के अंदर झाडि़यों के बीच एक महिला का शव पड़ा देखा. उन्हीं लोगों में से किसी ने इस की सूचना उसी समय थाना कल्याणपुर को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय जवाहरपुरम पार्क पहुंच गए. उन्होंने एक महिला का शव पाए जाने की खबर पहले अधिकारियों को दी फिर थाना किदवई नगर पुलिस को भी सूचित कर दिया. क्योंकि उन के थाना क्षेत्र से आराधना गौतम नाम की युवती भी लापता थी.

सूचना पाते ही एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, सीओ (कल्याणपुर) अजय कुमार तथा किदवई नगर थानाप्रभारी राजेश पाठक आराधना के पिता रामप्रकाश गौतम को साथ ले कर घटनास्थल पर आ गए. रामप्रकाश गौतम ने झाडि़यों में पड़े शव को देखा तो वह शव देखते ही फफक पडे़ और बोले, ‘‘सर, यह शव हमारी बेटी आराधना का है. पता नहीं इसे किस ने बेरहमी से मार डाला.’’ इस के बाद तो रामप्रकाश के घर में कोहराम मच गया. पुलिस अधिकारियों ने रामप्रकाश गौतम को धैर्य बंधाया फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका के गले पर खरोंच का निशान था, जिस से स्पष्ट था कि उस की हत्या रस्सी या तार से गला कस कर की गई थी.

शव से कुछ दूरी पर मृतका के कान की एक बाली पड़ी थी तथा दूसरी उस के कान में ही थी. कुछ चूडि़यां भी टूटी हुई थीं तथा उस का पर्स भी पार्क में पड़ा था. निरीक्षण में पार्क की घास से साफ दिखाई दे रहा था कि शव घसीट कर झाडि़यों तक ले जाया गया है. मौकामुआयना करने से यही लग रहा था कि आराधना ने मृत्यु से पहले हत्यारे से संघर्ष किया होगा. पुलिस अधिकारियों ने यह भी अनुमान लगाया कि हत्यारा मृतका का अति करीबी रहा होगा, जिस के साथ वह यहां तक आई. उस करीबी का इरादा सिर्फ आराधना की हत्या का ही रहा. क्योंकि उस ने उस के आभूषणों पर हाथ नहीं लगाया था. पुलिस ने मौके से सबूत अपने कब्जे में ले लिए. इस के बाद जरूरी काररवाई कर शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दिया.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने महिला एकाउंटेंट आराधना गौतम की हत्या के मामले को बेहद गंभीरता से लिया और खुलासे की जिम्मेदारी किदवई नगर थानाप्रभारी राजेश पाठक को सौंपी. उन्होंने स्वयं भी किदवई नगर थाने में डेरा डाल दिया. श्री पाठक ने आराधना की गुमशुदगी भादंवि की धारा 302 में तरमीम कर दी. फिर वह जांच में जुट गए. उन्होंने सब से पहले जैन ट्रेडर्स के कर्मचारियों को जांच के दायरे में लिया, जहां आराधना गौतम काम करती थी. श्री पाठक ने मालिक से ले कर कर्मचारियों तक से पूछताछ की, जिस से पता चला कि आराधना गौतम पिछले 3 साल से यहां काम कर रही थी. वह समय से काम पर आती थी और समय से घर जाती थी. कंपनी के किसी कर्मचारी से उस की कहासुनी तक नहीं हुई थी.

जैन टे्रडर्स के यहां जांचपड़ताल के दौरान 2 बातें चौंकाने वाली सामने आईं. एक तो यह कि 16 दिसंबर को आराधना गौतम किसी का फोन आने के बाद शाम सवा 6 बजे औफिस से निकली थी. दूसरा यह कि पिछले कुछ दिनों से आराधना का झुकाव फर्म के कर्मचारी शोएब की ओर बढ़ गया था. इस बाबत थानाप्रभारी ने शोएब से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार किया कि दोनों के बीच दोस्ती तो थी, लेकिन हत्या से उस का कोई वास्ता नहीं है. फर्म में पूछताछ के बाद थानाप्रभारी राजेश पाठक ने मृतका के पिता रामप्रकाश गौतम को थाना किदवई नगर बुलाया और उन का बयान दर्ज किया. रामप्रकाश ने बताया कि उन्होंने आराधना का विवाह दौलतपुर (कानपुर देहात) गांव निवासी धर्मेंद्र गौतम के साथ किया था.

धर्मेंद्र केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) का जवान था. वह आराधना को दहेज के लिए मारतापीटता था, जिस से आराधना अपने 2 बच्चों के साथ मायके में आ कर रहने लगी थी. उस ने पति पर दहेज उत्पीड़न तथा भरणपोषण का मामला दर्ज करवाया था. धर्मेंद्र गौतम इस समय छत्तीसगढ़ में तैनात है. उस ने पत्नी के रहते दूसरी शादी भी रचा ली. आराधना उस के वैवाहिक जीवन में बाधा न बने तथा मुकदमे से छुटकारा मिल जाए, इसलिए धर्मेंद्र ने ही अपने मामा प्रकाश व जयशंकर के साथ मिल कर आराधना की हत्या की है. रामप्रकाश के बयान के आधार पर थानाप्रभारी राजेश पाठक ने जांच आगे बढ़ाई और आराधना के पति धर्मेंद्र गौतम से संपर्क साधने का प्रयास किया लेकिन न तो धर्मेंद्र से संपर्क हो सका और न उस के मामा प्रकाश व जयशंकर से, क्योंकि दोनों फरार थे.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने मृतका के पर्स की जामातलाशी कराई. उस के पर्स में 2 मोबाइल फोन, कुछ नकदी, चाबी तथा साजशृंगार का सामान मिला. उन में से एक मोबाइल चालू हालत में था. पुलिस ने उस की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स में एक संदिग्ध नंबर मिला. उस नंबर की जांच की गई तो पता चला कि वह नंबर राजेंद्र का है. थानाप्रभारी राजेश पाठक ने राजेंद्र को उस के घर से दबोचा और उसे पूछताछ के लिए थाना किदवई नगर ले आए. थाने आतेआते राजेंद्र कांपने लगा था. उस ने सहज ही बता दिया कि उस के मोबाइल फोन से उस के दोस्त प्रवीण ने किसी महिला को फोन किया था. प्रवीण तातियागंज (चौबेपुर) थाना क्षेत्र के मालौगांव में रहता है और बस ड्राइवर है. वह उस के बारे में और कुछ ज्यादा नहीं जानता.

थानाप्रभारी राजेश पाठक ने प्रवीण को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर मालौगांव छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. पुलिस ने तब उस के कई खास रिश्तेदारों के घर दबिश दी, पर प्रवीण हाथ नहीं आया. तब पुलिस ने उस की टोह में एक खास मुखबिर लगा दिया. 18 दिसंबर, 2019 को इस खास मुखबिर ने थानाप्रभारी राजेश पाठक को जानकारी दी कि प्रवीण कुमार इस समय गौशाला (जुही) टैंपों स्टैंड पर मौजूद है. चूंकि मुखबिर की सूचना अतिमहत्त्वपूर्ण थी, इसलिए थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ गौशाला टैंपो स्टैंड पहुंच गए. पुलिस जीप रुकते ही वहां खड़ा एक युवक मोटरसाइकिल स्टार्ट कर भागने लगा. तभी पुलिस ने उसे दबोच लिया. उस ने अपना नाम प्रवीण कुमार बताया. पुलिस उसे थाने ले आई.

पुलिस ने जब प्रवीण से आराधना गौतम की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया और हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने मोटरसाइकिल के बैग से वह रस्सी भी बरामद करा दी, जिस से उस ने आराधना का गला घोंटा था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मोटरसाइकिल तथा रस्सी अपने कब्जे में ले ली. पुलिस पूछताछ में प्रवीण ने बताया कि वह आराधना से प्रेम करता था और उस से शादी करना चाहता था. आराधना भी राजी हो गई थी, लेकिन जब उस का एक्सीडेंट हो गया तो वह उस से कतराने लगी. इतना ही नहीं, उस ने फोन पर बात करनी भी बंद कर दी, तब उसे आराधना पर शक हुआ. उस ने गुप्तरूप से जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह किसी और से प्यार करने लगी है. यही बात उसे चुभ गई.

इस के बाद उस ने निश्चय कर लिया कि यदि आराधना उस की नहीं होगी तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. फाइनल बात करने को उस ने घटना वाली शाम दोस्त राजेंद्र के फोन से बात कर आराधना को बुलाया. फिर मोटरसाइकिल पर बिठा कर उसे जवाहरपुरम पार्क ले गया. वहां शादी को ले कर दोनों के बीच झगड़ा हुआ. वह शादी को राजी नहीं हुई तो उस ने गला घोंट कर आराधना को मार दिया. एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने भी प्रवीण कुमार से पूछताछ की, फिर आननफानन में थाना किदवई नगर में ही प्रैसवार्ता आयोजित कर प्रवीण को मीडिया के समक्ष पेश कर घटना का खुलासा किया.

चूंकि प्रवीण कुमार ने आराधना गौतम की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और हत्या में प्रयुक्त रस्सी भी बरामद करा दी थी, अत: थानाप्रभारी राजेश पाठक ने प्रवीण कुमार को आराधना की हत्या के जुर्म में भादंवि की धारा 302 के तहत विधिसम्मत बंदी बना लिया. प्रवीण के बयानों के आधार पर प्रेमिका की बेवफाई की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा मंधना पड़ता है. इसी से सटा हुआ तातियागंज है. तातियागंज पहले गांव था, लेकिन जैसेजैसे मंधना का विकास होता गया, यह गांव कस्बा के समीप आता गया. इस तातियागंज में लिपस्टिक तथा अन्य सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कई फैक्ट्रियां हैं, जहां ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं.

तातियागंज में ही रामप्रकाश गौतम अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा गौतम के अलावा 3 बच्चे थे, जिस में बेटी आराधना सब से छोटी थी. रामप्रकाश गौतम ट्रांसपोर्टर हैं. उन की आर्थिक स्थिति भी मजबूत है. रामप्रकाश गौतम की बेटी आराधना बीकौम करने के बाद नौकरी के लिए प्रयासरत थी. वहीं उस के पिता रामप्रकाश गौतम उस के योग्य वर खोज रहे थे. रामप्रकाश की तमन्ना थी कि वह अपनी लाडली तथा खूबसूरत बेटी की शादी किसी संपन्न परिवार में ही करेंगे, ताकि उसे किसी प्रकार की कमी महसूस न हो. ऐसा संपन्न घरवर खोजने में रामप्रकाश को 3 साल लग गए. तब कहीं जा कर वह बेटी के योग्य लड़के की खोज कर पाए. लड़के का नाम था धर्मेंद्र गौतम उर्फ लालजी.

धर्मेंद्र के पिता दयाराम गौतम कानपुर देहात जिले के मैथा ब्लौक के गांव दौलतपुर के रहने वाले थे. उन के 4 बच्चों में धर्मेंद्र सब से छोटा था. धर्मेंद्र उर्फ लालजी पढ़ालिखा युवक था. वह सीआरपीएफ का जवान था. दयाराम गौतम के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी उपज होती थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. रामप्रकाश गौतम को घरवर पसंद आया तो वह आराधना की शादी धर्मेंद्र से करने को राजी हो गए. इस के बाद 6 अप्रैल, 2003 को आराधना की शादी धर्मेंद्र गौतम उर्फ लालजी के साथ धूमधाम से कर दी.

आराधना के मुकाबले धर्मेंद्र उम्र में बड़ा था. ऊपर से वह सांवला भी था. धर्मेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इतनी सुंदर बीवी मिलेगी. उस से शादी कर के वह बहुत खुश था. आराधना ने अपनी समझदारी और काम से पति ही नहीं बल्कि सासससुर का मन भी जीत लिया था. हंसीखुशी से उस की गृहस्थी को 7 साल बीत गए. इन 7 सालों में आराधना एक बेटा अभय तथा एक बेटी सुप्रिया की मां बन चुकी थी. बच्चों के जन्म से परिवार की खुशियां दूनी हो गई थीं. धर्मेंद्र गौतम की ड्यूटी एक राज्य से दूसरे राज्य में लगती रहती थी. उसे जब छुट्टी मिलती थी, तभी घर आ पाता था. लेकिन छुट्टियां खत्म होने के बाद जब वह अपनी ड्यूटी पर चला जाता तो आराधना को अपनी जिंदगी नीरस लगने लगती थी. उस का दिन तो बच्चों के कोलाहल में कट जाता था लेकिन रात बैरन बन जाती थी.

इन्हीं दिनों पति, सास व ससुर का व्यवहार भी आराधना के प्रति बदल गया, जिस से वह और भी परेशान रहने लगी. सासससुर उसे बातबेबात प्रताडि़त करते थे. मकान के निर्माण हेतु उस पर मायके से पैसा लाने का दबाव बनाते. उसे दहेज कम लाने के ताने भी दिए जाने लगे. मायके से रुपए न लाने पर आराधना को प्रताडि़त किया जाने लगा. आखिर जब आराधना आजिज आ गई तो उस ने पति का घर त्याग दिया और अपने दोनों बच्चों को साथ ले कर पिता के घर रहने लगी. आराधना को विश्वास था कि पति धर्मेंद्र बच्चों की खातिर उसे मनाने आएगा और अपने साथ ले जाएगा. लेकिन धर्मेंद्र ने ऐसा नहीं किया. वह आराधना को मनाने नहीं आया.

पति के इस रूखे व्यवहार से आराधना को गहरी ठेस पहुंची. उस ने पति व सासससुर को सबक सिखाने के लिए उन के खिलाफ कानपुर कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत दहेज उत्पीडन तथा भरणपोषण का मुकदमा कायम करा दिया. मुकदमा दर्ज कराने की जानकारी धर्मेंद्र को हुई तो आराधना के प्रति उस की नफरत और बढ़ गई. उस ने आराधना से समझौता करने के बजाए मुकदमा लड़ने का निश्चय किया. आराधना ने 3 साल तक इंतजार किया कि शायद धर्मेंद्र समझौते का प्रस्ताव लाएगा और उसे तथा बच्चों को साथ ले जाएगा. लेकिन धर्मेंद्र नहीं आया. तब आराधना ने बच्चों को पढ़ाने तथा उन के भविष्य को बनाने के लिए नौकरी करने का निश्चय किया. हालांकि आराधना तथा उस के बच्चों को पिता रामप्रकाश के घर पर हर प्रकार की सुविधा थी, फिर भी वह पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी. वह कोई नौकरी करना चाहती थी.

आराधना पढ़ीलिखी युवती थी. उस ने बीकौम कर रखी थी. एकाउंट की ट्रेनिंग भी उस ने की थी, अत: उसे नौकरी हासिल करने में ज्यादा समय नहीं गंवाना पड़ा. सन 2016 में उसे किदवई नगर स्थित जैन ट्रेडिंग नामक फर्म में एकाउंटेंट की नौकरी मिल गई. आराधना ने अपने कुशल व्यवहार व अच्छे काम से कुछ महीने में ही मालिक व कर्मचारियों का दिल जीत लिया और सब की चहेती बन गई. आराधना के हाथ पर सैलरी का पैसा आने लगा तो वह अपनी तथा बच्चों की जरूरतें उचित तरीके से पूरी करने लगी. अब उसे पिता का मुंह नहीं ताकना पड़ता था. आराधना पहले दिन भर घर में बैठे बोर हुआ करती थी, लेकिन नौकरी लग जाने के बाद उस के दिन हंसीखुशी से बीतने लगे थे. रामप्रकाश को भी सकून मिला था कि आराधना अब खुश रहने लगी है.

आराधना तातियागंज से औफिस बस व टैंपो से आतीजाती थी. वह मंधना से झकरकटी बस द्वारा फिर झकरकटी से किदवईनगर औफिस टैंपो द्वारा पहुंचती थी. वह सुबह 10 बजे औफिस पहुंचती थी और शाम सवा 6 बजे औफिस छोड़ देती थी. वह हर हाल में रात 8 बजे तक अपने घर पहुंच जाती थी. हां, यह बात दीगर थी कि जब औफिस में किसी दिन काम ज्यादा होता तो उसे घर पहुंचने में देर हो जाती थी. ऐसी हालत में वह फोन द्वारा पिता को बता देती थी. आराधना जिस बस से औफिस आतीजाती थी, उस बस का ड्राइवर प्रवीण कुमार था. वह चौबेपुर थाने के मालौगांव का रहने वाला था. प्रवीण एक ट्रैवल कंपनी की बस चलाता था. उस का रूट मंधना से जाजमऊ तक था. प्रवीण की बस से आतेजाते आराधना और प्रवीण में दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यह दोस्ती प्यार में बदल गई.

रविवार को आराधना की छुट्टी रहती थी. प्रवीण भी रविवार को छुट्टी करता था, अत: उस दिन दोनों कभी मोतीझील तो कभी साईंमंदिर में मिलते थे. यहां दोनों घंटों बतियाते थे और खूब हंसीठिठोली करते थे. आराधना अपने दोनों बच्चों को भी साथ लाती थी. प्रवीण उन्हें खूब खिलातापिलाता था. दोनों बच्चे प्रवीण से खूब घुलमिल गए थे. आराधना के प्यार में आकंठ डूबा प्रवीण सारी कमाई आराधना व उस के बच्चों पर खर्च करने लगा था. आराधना भले ही 2 बच्चों की मां थी, लेकिन उस के सौंदर्य और जिस्मानी कसाव में जरा भी कमी नहीं आई थी. स्वभाव से आराधना मजाकिया तथा खुले विचारों की थी. प्रवीण से हंसीमजाक तथा नयनों के तीर भी चला देती थी. इस से प्रवीण उसे पाने के सपने देखने लगा था. प्रवीण आराधना से 8-10 साल छोटा था.

एक दिन प्रवीण ने प्यार का इजहार कर दिया, ‘‘आराधना, मैं तुम से बेइंतहा प्यार करता हूं. तुम्हारा साथ जीवन भर चाहता हूं. बोलो, मेरा साथ दोगी?’’

आराधना प्रवीण की बात सुन कर गहरी सोच में पड़ गई. फिर कुछ देर बाद बोली, ‘‘प्रवीण, मैं शादीशुदा और 2 बच्चों की मां हूं. पति से मेरा तलाक भी नहीं हुआ है. ऐसी हालत में मैं तुम से कैसे शादी कर सकती हूं. रही बात प्यारमोहब्बत की तो वह मैं तुम से करती हूं और करती रहूंगी.’’

आराधना के जवाब से प्रवीण कुछ मायूस जरूर हुआ, लेकिन उसे लगा कि जब आराधना उस से प्यार करती है तो आज नहीं तो कल शादी भी उसी से करेगी. इसलिए वह उस का दीवाना बना रहा. उस ने अपनी और आराधना की मोहब्बत की जानकारी अपने परिवार वालों को भी दे दी. इस पर उस के मातापिता ने उसे समझाया और एक शादीशुदा महिला से रिश्ता तोड़ने को कहा. लेकिन प्रवीण ने घर वालों की बात नहीं मानी. आराधना और प्रवीण रिश्ते में बंध पाते, उस से पहले ही प्रवीण का एक्सीडेंट हो गया. उस की नौकरी छूट गई और उस की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई. प्रवीण को यकीन था कि आराधना एक्सीडेंट की जानकारी पा कर उस से मिलने आएगी और उस की हरसंभव मदद करेगी.

लेकिन महीनों बीत गए, आराधना न तो उस से मिलने आई और न ही उस की कोई आर्थिक मदद की. और तो और उस ने मोबाइल पर प्रवीण से बतियाना भी बंद कर दिया. आराधना में आए इस अकस्मात बदलाव से प्रवीण बेचैन हो उठा. उस ने गुप्तरूप से आराधना के संबंध में जानकारी जुटाई तो उस के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उसे पता चला कि आराधना औफिस के ही एक कर्मचारी शोएब की मोहब्बत में बंधी है. वह उस के साथ ही सैरसपाटा करती है. उस ने इस का विरोध आराधना से किया तो उस ने दोटूक जवाब दे दिया कि वह उस की जिंदगी में दखल देने वाला होता कौन है. वह कुछ बन कर दिखाए, तब उस से बात करे.

आराधना के जवाब से प्रवीण का दिल घायल हो गया. आराधना के प्रति वह नफरत से भर उठा. फिर भी वह आराधना को दिल से निकाल नहीं सका. आराधना ने अब उस से फोन पर बात करनी भी बंद कर दी थी. वह काल पर काल करता, तब कहीं जा कर उस की काल रिसीव करती और जवाब दे कर अपना फोन बंद कर लेती. प्रवीण तब खिसिया कर रह जाता था. 10 दिसंबर, 2019 को प्रवीण आराधना के औफिस के पास पहुंचा. कुछ देर बाद आराधना औफिस से बाहर निकली और सहकर्मी शोएब की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. प्रवीण ने उस का पीछा किया. वह उस के साथ घंटाघर गई. शौपिंग की, फिर उसी के साथ घर गई. इस बीच प्रवीण ने आराधना को फोन कर पूछा कि वह कहां है तो उस ने कहा कि वह अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी में शामिल होने आई है.

उस के इस झूठ से प्रवीण बौखला गया. उस ने आराधना की हत्या का फैसला कर लिया. 16 दिसंबर, 2019 की शाम 6 बजे प्रवीण ने अपने दोस्त राजेंद्र के मोबाइल से आराधना से बात की और मिलने का अनुरोध किया. आराधना ने पहले तो साफ मना कर दिया लेकिन प्रवीण के विशेष अनुरोध पर वह मान गई. इस के बाद प्रवीण मोटरसाइकिल से आराधना के औफिस पहुंच गया. शाम सवा 6 बजे आराधना औफिस से बाहर निकली. प्रवीण ने उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा लिया. रास्ते में शोएब को ले कर दोनों के बीच झगड़ा हुआ.

लड़तेझगड़ते प्रवीण आराधना को शताब्दी नगर स्थित जवाहरपुरम पार्क ले आया. अब तक रात के 8 बज चुके थे. भीषण सर्दी पड़ने के कारण पार्क में सन्नाटा था. पार्क में प्रवीण ने उस से सीधे पूछा, ‘‘आराधना, तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

इतना सुनते ही प्रवीण भड़क उठा.

दोनों में झगड़ा शुरू हो गया. इसी झगड़े में आराधना की चूडि़यां टूट गईं और कान की एक बाली पार्क में गिर गया. झगड़े के दौरान ही प्रवीण ने आराधना का पर्स पार्क में फेंक दिया और उसे दबोच लिया. फिर उस के गले में रस्सी का फंदा कसते हुए बोला, ‘‘आराधना, तू मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’

उस के बाद उस ने फंदा तभी गले से निकाला, जब उस के प्राणपखेरू उड़ गए. हत्या करने के बाद प्रवीण ने आराधना के शव को घसीट कर झाडि़यों में छिपाया और फिर मोटरसाइकिल से फरार हो गया. हत्यारोपी प्रवीण कुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे 19 दिसंबर, 2019 को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट महेंद्र कुमार गर्ग की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. आराधना के दोनों बच्चे नाना रामप्रकाश गौतम के संरक्षण में पल रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Andhra Pradesh Crime : सगाई की खबर से भड़का प्रेमी, रची खौफनाक साजिश

आंध्र प्रदेश से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां एक प्रेमी अपनी प्रेमिका की सगाई की खबर सुन कर बौखला गया और गुस्से में आ कर दिल दहला देने वाली साजिश रच डाली. आइए, जानते हैं इस घटना की पूरी स्टोरी :

सिरफिरा प्रेमी

घटना आंध्र प्रदेश के अन्नमय्या जिले की है, जिस में एक सिरफिरे प्रेमी ने 22 साल की अपनी प्रेमिका पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया.

घटना के दिन प्रेमिका के मातापिता मवेशियों की देखभाल करने के लिए घर से बाहर थे. मौका देख कर सिरफिरा प्रेमी घर में घुस आया और प्रेमिका पर ताबड़तोड़ चाकू से हमला कर दिया. इतना ही नहीं उस ने बाथरूम साफ करने वाले एसिड से प्रेमिका को झुलसा भी दिया.

एसपी बी. कृष्णा राव ने बताया है कि 24 वर्षीय गणेश के साथ पीड़िता का प्रेमसंबंध चल रहा था. हालांकि कुछ समय बाद युवती की सगाई किसी और से हो गई, जिस के बाद प्रेमिका ने गणेश से कह दिया कि अब मैं इस रिश्ते को आगे नहीं रखना चाहती.

बात करने के बहाने बुला कर किया हमला

प्रेमिका ने प्रेमी को आखिरी बार बात करने के लिए अपने घर बुलाया, लेकिन बातचीत के दौरान दोनों में कहासुनी हो गई. इस के बाद गणेश गुस्से में आ गया और प्रेमिका पर चाकू से हमला कर दिया. हमला करने के बाद वह बाथरूम से एसिड ले आया और प्रेमिका के ऊपर डाल दिया, जिस से वह बुरी तरह झुलस गई.

आरोपी फरार, तलाश में जुटी पुलिस

प्रेमिका पर हमला करने के बाद आरोपी गणेश मौके से फरार हो गया. उसे अरेस्ट करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम का गठन कर दिया गया है. टीम उस के छिपने के स्थान पर छापेमारी कर रही है.
वहीं घायल युवती को स्थानीय अस्पताल में प्राथमिक उपचार देने के बाद उसे बैंगलुरु रेफर कर दिया गया है. डाक्टरों का कहना है कि युवती के शरीर पर गहरे चाकू के गहरे घाव हैं और एसिड से झुलसने के कारण उस की हालत गंभीर बनी हुई है.

मुख्यमंत्री ने दिए शख्स पर काररवाई के आदेश

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस हमले की कठोर निंदा करते हुए आरोपी के खिलाफ सख्त काररवाई करने का निर्देश दिया है और यह आश्वासन दिया है कि राज्य सरकार पीड़िता और उस के परिवार के साथ खड़ी है. मगर, सवाल यह है कि सिर्फ इतना भर कह देने से पीड़िता का परिवार संतुष्ट हो जाएगा?

Mumbai Crime : बेटी के शव के 3 टुकड़े किए फिर काले बैग में भर कर फेंका

Mumbai Crime : महिला के धड़ का हिस्सा आटोरिक्शा वालों के लिए भी रहस्य था और पुलिस वालों के लिए भी. लेकिन सीसीटीवी फुटेज से पुलिस ने अपनी ही बेटी के हत्यारे अरविंद तिवारी को भी खोज निकाला और हत्या का रहस्य भी ढूंढ लिया…

उस दिन दिसंबर 2019 की 8 तारीख थी. समय था सुबह के साढ़े 5 बजे. मुंबई के कल्याण स्टेशन पर  अच्छीखासी भीड़ थी. स्टेशन के बाहर दरजनों आटोरिक्शा खड़े थे. सलीम भी सवारी के इंतजार में अपना आटोरिक्शा लिए खड़ा था. तभी एक व्यक्ति बड़ा सा काला बैग लिए उस के आटो के पास आया और बैग को आटोरिक्शा में रखते हुए बोला, ‘‘भिवंडी के गोवानाका पर छोड़ दो, थोड़ी जल्दी है.’’

ऐसी कम ही सवारी होती हैं, जो बिना पूछे रिक्शा में बैठ जाएं. क्योंकि इस से पहले यह जानना भी जरूरी होता है कि आटोचालक वहां जाएगा भी या नहीं, जहां सवारी को जाना है. थोड़ा अजीब लगा तो सलीम ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा. तभी उसे अजीब सी बदबू आई जो उस के काले बैग से आ रही थी. उस के बैठने से पहले ड्राइवर ने पूछा, ‘‘इस बैग में क्या है, कहीं लाश तो नहीं?’’

अनूप की बात सुनते ही वह आदमी काले बैग को रिक्शा में छोड़ कर स्टेशन के अंदर की ओर भाग गया. अनूप ने काला बैग रिक्शा से निकाल कर बाहर रखा और यह बात अपने साथी आटो रिक्शा चालकों को बताई. जरा सी देर में सारे आटो चालक एकत्र हो गए. भीड़ बढ़ी तो आतेजाते लोग भी रुकने लगे. सब का एक ही कहना था कि काले बैग में लाश हो सकती है. सभी ने राय दी कि बैग के बारे में पुलिस को बताना चाहिए. कल्याण रेलवे स्टेशन के बाहर ही महात्मा फुले चौक पुलिस थाना है. कई आटो रिक्शा ड्राइवर थाने में गए और यह बात पुलिस को बता दी. उस वक्त मंगेश डोइफोड और सिपाही सोंगाल ड्यूटी पर थे. रिक्शा वाले उन्हें स्टेशन के बाहर उस जगह ले गए जहां काला बैग रखा था.

बदबू से उन्हें भी लगा कि बैग में जरूर किसी की लाश है. दोनों पुलिस वालों ने इस की सूचना थाने के सीनियर इंसपेक्टर प्रकाश लोंढे और इंसपेक्टर (क्राइम) संभाजी जाधव को दी. सूचना मिलते ही दोनों पुलिस अफसर आटोरिक्शा स्टैंड पर पहुंच गए. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों में से 2 को गवाह बना कर काले बैग को खुलवाया. जैसी कि पहले ही उम्मीद थी, काले बैग में एक गठरी में बंधा महिला का कमर से नीचे का हिस्सा नजर आया. करीब 25-26 साल की मृतका पीले रंग की लेगिंग पहने थी, रंग गोरा था. बिना सिर और धड़ के मृतका को पहचानना संभव नहीं था. हत्यारा कौन था, यह तो दूर की बात थी, यह पता लगाना भी आसान नहीं था कि मृतका के धड़ को वहां तक लाने वाला कौन था.

इंसपेक्टर प्रकाश लोंढे ने इस घटना के बारे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों डीसीपी विवेक पानसरे और एसीपी अनिल पवार को बताया. सूचना मिलते ही दोनों अधिकारी कल्याण स्टेशन पहुंच गए. वहां आटो स्टैंड के पास काफी भीड़ जमा थी. पुलिस ने आटो रिक्शा वाले से काला बैग ले कर आने वाले व्यक्ति का पूरा हुलिया पूछा.  उस ने बताया कि काला बैग लाने वाला कल्याण स्टेशन के अंदर भाग गया था. आटोरिक्शा चालक ने यह भी बताया कि वह लाल रंग की शर्ट पहने हुए था. महिला की लाश का हिस्सा मिलने की सूचना क्राइम ब्रांच की यूनिट नंबर 1 और 3 को भी दे दी गई थी.

खबर मिलते ही दोनों ब्रांचों के वरिष्ठ पुलिस इंसपेक्टर नितिन ठाकरे और संजू जैन भी अपनीअपनी टीम के साथ कल्याण स्टेशन पहुंच गए. बताते चलें कि मुंबई में किसी भी अपराध की जांच थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच साथसाथ करती हैं. सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग पुलिस और क्राइम ब्रांच ने साथ जांच शुरू करने से पहले महिला के शरीर के हिस्से को पोस्टमार्टम के लिए रुक्मिणीबाई अस्पताल भेज दिया, प्राथमिक कररवाई के बाद सब से पहले कल्याण स्टेशन के बाहर वाले सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी गई. फुटेज में लाल रंग की शर्ट वाला व्यक्ति कंधे पर काला थैला लटकाए स्टेशन के बाहर आता दिखाई दिया. कुछ देर बाद वह भाग कर स्टेशन के अंदर भी जाता दिखाई दिया. पुलिस ने सीसीटीवी की वह फुटेज आटोरिक्शा वाले को दिखाई तो उस ने उसे पहचान लिया.

इस हत्या के संदर्भ में पुलिस ने थाना महात्मा फुले चौक में भादवि की धारा 302, 201 के तहत  केस दर्ज कर लिया. इस केस का जांच अधिकारी क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर संभाजी को नियुक्त किया गया. अब पुलिस को यह पता लगाना था कि थैले और लाल शर्ट वाला व्यक्ति ट्रेन में चढ़ा किस स्टेशन से था. काफी खोजबीन के बाद पता चला कि वह व्यक्ति कल्याण स्टेशन से 15 किलोमीटर दूर टिटवाला स्टेशन से चढ़ा था. वहां के सीसीटीवी में वह काला थैला लिए स्टेशन के अंदर आता दिखाई दिया. इस का मतलब वह किसी आटो से वहां तक आया होगा. आटोरिक्शा चालक उसे पहचान सकते थे. उन से यह भी पता चल सकता था कि उस ने आटोरिक्शा में काला बैग कहां से रखा था. टिटवाला इलाके में उस व्यक्ति का पता लगाने की जिम्मेदारी सब इंसपेक्टर संजय बाबर को सौंपी गई.

संजय बाबर और उन की पुलिस टीम ने टिटवाला रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े रहने वाले आटोरिक्शा चालकों को फोटो दिखा कर काले बैग वाले के बारे में पूछताछ की. मेहनत तो करनी पड़ी, लेकिन कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया. एक व्यक्ति ने बताया कि वह टिटवाला के मांडा रोड़ पर रहता है. मांडा रोड़ पर पूछताछ की गई तो पता चला वह इंदिरा नगर की किसी चाल में रहता है. पुलिस टीम ने इंदिरा नगर में पूछताछ की तो पता चला उस का नाम अरविंद तिवारी है और वह साईनाथ नगर की चाल में रहता है. पुलिस टीम साईनाथ नगर की चाल पहुंची, वहां अरविंद की चाल तो मिल गई लेकिन वह घर पर नहीं था. अलबत्ता उस की चाल में बदबू जरूर आ रही थी. इस से पुलिस टीम समझ गई कि वहां कुछ बहुत बुरा हुआ था. टीम लीडर संजय बाबर ने यह बात अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता दी.

पुलिस ने आसपास रहने वालों से अरविंद तिवारी के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि वह मुंबई मलाड की पवन हंस लौजिस्टिक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता है. यह भी पता चला कि अरविंद तिवारी वहां अपनी बेटी प्रिंसी के साथ रहता है. यह जानकारी क्राइम ब्रांच को दी गई तो पुलिस ने उसे ट्रांसपोर्ट कंपनी से गिरफ्तार कर लिया. बाद में क्राइम ब्रांच ने उसे थाना महात्मा फुले चौक की पुलिस को सौंप दिया. पुलिस ने अरविंद तिवारी से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कबूलते हुए बताया कि उस ने अपनी बेटी प्रिंसी का मर्डर किया था. हत्या का कारण उस ने बताया कि प्रिंसी अंतरजातीय विवाह करना चाहती थी, जो उसे मंजूर नहीं था.

अरविंद तिवारी ने आगे बताया कि उस ने बेटी का धड़ और सिर गठरी में बांध कर कल्याण के दुर्गाडी किले की खाड़ी में फेंक दिए थे. पुलिस ने दमकल विभाग, मछुआरों और उस क्षेत्र में आने जाने वालों की मदद से 2 दिन की मेहनत के बाद शरीर के दोनों हिस्से बरमद कर लिए. इधर आटो चालकों मोहम्मद खालिद और सलीम बाबू ने अरविंद तिवारी को पहचान लिया, काले बैग में शरीर का नीचे का हिस्सा भर कर वही कल्याण स्टेशन पर उतरा था और आटो से कहीं जाना चाहता था. अरविंद तिवारी उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर का रहने वाला था. उस की 4 बेटियां थीं, जो गांव में मां के साथ रहती थीं. सालों पहले अरविंद कामकाज की तलाश में मुंबई चला आया था.

मुंबई से सटे थाणे की तहसील टिटवाला के इंदिरा नगर स्थित साईनाथ नगर में उस ने किराए पर एक चाल ले ली और वहीं रहने लगा. जल्दी ही उसे मलाड की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी मिल गई. इस तरह अरविंद तिवारी थाणे में रह कर अपने परिवार का भरणपोषण करने लगा. 6-6 महीने के अंतराल पर वह घर चला जाता था. मां के साथ रह कर उस की तीन बेटियां पढ़ रही थीं. उस की बड़ी बेटी प्रिंसी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. दकियानूसी सोच ने बनाया हत्यारा प्रिंसी ने अपने पिता अरविंद से कहा कि वह थाणे में उस के पास रह कर नौकरी करना चाहती है. अरविंद को यह बात अच्छी लगी, क्योंकि प्रिंसी के नौकरी करने से घर में 2 कमाने वाले हो जाते. इसी के मद्देनजर वह प्रिंसी को थाणे ले आया. अरविंद काम पर चला जाता तो प्रिंसी अपने लिए नौकरी ढूढ़ती. जल्दी ही उसे कालसेंटर में नौकरी मिल गई.

प्रिंसी को थाणे आए एक साल से ज्यादा हो गया था. बापबेटी चैन से रह रहे थे. तभी अरविंद ने महसूस किया कि प्रिंसी में बदलाव आने लगा है. वह काम से आती भी देर से थी. दुनिया देख चुका अरविंद समझ गया कि जरूर कोई चक्कर है. उस ने जब इस बारे में पता लगाया तो पता चला प्रिंसी का एक युवक से चक्कर चल रहा है. वह युवक भी उसी कालसेंटर में काम करता था. अरविंद को यह जानकारी भी मिली कि प्रिंसी उस युवक के हाथों में हाथ डाल कर बेखौफ घूमती है. अरविंद ने इस बारे में प्रिंसी से प्यार से पूछा, लेकिन वह बहाना बना कर टाल गई. बेटी की बातें सुन कर अरविंद चुप रह गया. उस की समस्या यह थी कि वह जल्दी काम पर जाता था और देर शाम लौटता था.

बाप से बातचीत के बाद भी प्रिंसी की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया. अरविंद ने उसे कई बार फोन पर देर तक बातें करते भी देखा. अब अरविंद को लगने लगा कि प्रिंसी उस से झूठ बोलती है. वह किसी दिन परिवार की इज्जत को पलीता लगा कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाएगी. दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव कस्बों के तमाम लोग मुंबई और उस से जुड़े थाणे व अन्य जगहों पर रहते हैं. ये लोग मुंबई में पैसा कमा कर घर भेजते हैं. पैसा कमाने के लिए मुंबई में रहने वाले ऐसे लोग न तो मुंबई को अपना बना सके और न ही गांव के रहे. इस के बावजूद ऐसे लोगों में घर परिवार और इज्जत की हनक गांव वाली ही रहती है. ये लोग बच्चों की शादियां और दूसरे समारोह गांवबिरादरी में ही करते हैं. अरविंद तिवारी भी ऐसा ही था.

जब प्रिंसी में कोई बदलाव नहीं आया तो अरविंद तिवारी ने उसे समझाया, ऊंचनीच की बातें बताईं. परिवार की इज्जत का रोना रोया. यह दांव न चलता देख अरविंद तिवारी ने एक नई चाल चली. उस ने प्रिंसी से कहा कि गांव में उस के लिए लड़का देख लिया गया है. सगाई और शादी के लिए उसे गांव जाना होगा. सच्चाई खोद निकाली पुलिस ने इस पर प्रिंसी की हकीकत सामने आ गई. उस ने पिता से दोटूक कह दिया, ‘‘मैं कालसेंटर में काम करने वाले एक लड़के से प्यार करती हूं और उस से शादी करूंगी’’

अरविंद ने बेटी को समझाने की लाख कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस की जगह वह विद्रोह पर उतर आई. प्रिंसी के तेवर देख अरविंद उस के बारे में गहराई से सोचने लगा. उसे यह बात खाए जा रही थी कि जब गांव के लोग प्रिंसी के बारे में पूछेंगे तो क्या जवाब देगा. प्रिंसी की जिद को ले कर उस के मन में गुस्सा भरा था. ऐसी ही मनोस्थिति में उस ने प्रिंसी को मौत के घाट उतारने का फैसला कर लिया. अपनी सोच को परिणाम तक पहुंचाने के लिए अरविंद तिवारी कल्याण से तेजधार वाला एक चाकू खरीद लाया, जिसे उस ने घर में छुपा कर रख दिया था. 5 दिसंबर, 2019 की शाम को प्रिंसी ने खाना बनाया, बापबेटी ने साथ बैठ कर खाना खाया.

इस के बाद प्रिंसी सोने के लिए अपने कमरे में चली गई. करीब आधी रात को जब प्रिंसी गहरी नींद में सोई थी, अरविंद चाकू ले कर उस के कमरे में पहुंचा और उस का गला रेत दिया. प्रिंसी मर गई तो अरविंद ने उस के शरीर के 3 हिस्से किए ताकि उन्हें अलगअलग जगहों पर फेंक सके. इन तीनों हिस्सों को उस ने पहले ही खरीद कर लाए पौलीथिन के काले रंग के बड़े से थैलों में अलगअलग भर दिया. इन में से सिर और धड़  वाले थैले वह रिक्शा में रख कर दुर्गाडी पुल पर ले गया. वहां से रिक्शा वापस लौटा कर उस ने दोनों थैले घाटी में फेंक दिए. अब प्रिंसी का धड़ से नीचे का हिस्सा बाकी बचा था. दुर्भाग्य से वह उसे 3 दिन तक नहीं फेंक सका और उस में से दुर्गंध आने लगी.

ऐसे में पासपड़ोस वालों को शक हो सकता था. इसलिए 8 दिसंबर को वह शेष बचा तीसरा थैला ले कर घर से निकला और टिटवाला से कल्याण की ट्रेन पकड़ ली. लेकिन दुर्भाग्य से वह जिस आटो में बैठने जा रहा था, उस के चालक ने बदबू महसूस कर के पूछ लिया, ‘‘थैले में लाश तो नहीं है?’’

अरविंद के मन में चोर था, इसलिए वह भाग निकला. फिर भी पुलिस उस तक पहुंच ही गई. अरविंद से विस्तृत पूछताछ के बाद उस की निशानदेही पर प्रिंसी का धड़ और सिर बरामद हो गया और वह चाकू भी, जिस से उस ने प्रिंसी का कत्ल किया था. सारी पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

 

 

Family Crime : मौसी बनी बच्चों की कातिल

Family Crime : राधा ने बहन के पति संजय से आशिकी ही नहीं की बल्कि उस से शादी भी कर ली. लेकिन उस की इस विषैली आशिकी ने उसी की जिंदगी में जहर घोल दिया. उस के साथ जो हुआ वह…

राधा हसीन सपने देखने वाली युवती थी. 2 भाइयों की एकलौती बहन. उसे मांबाप और भाइयों के प्यार की कभी कमी नहीं रही. लेकिन राधा की जिंदगी ही नहीं, बल्कि मौत भी एक कहानी बन कर रह गई, एक दुखद कहानी. राधा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की आशिकी इतनी दुखद साबित होगी कि ससुराल और मायके दोनों जगह नफरत के ऐसे बीज बो जाएगी, जिस के पौधों को काटना तो दूर वह उस की गंध से ही तड़प उठेगी. इस कहानी की भूमिका बनी जिला कासगंज, उत्तर प्रदेश के गांव सैलई से. विजय पाल सिंह अपने 3 बेटों मुकेश, सुखदेव और संजय के साथ इसी गांव में खुशहाल जीवन बिता रहा था. विजय पाल के पास खेती की जमीन थी. साथ ही गांव के अलावा कासगंज में पक्का मकान भी था.

मुकेश और सुखदेव की शादियां हो गई थीं. मुकेश गांव में ही परचून की दुकान चलाता था, जबकि सुखदेव कोचिंग सेंटर में बतौर अध्यापक नौकरी करता था. विजय का तीसरे नंबर का छोटा बेटा संजय ट्रक ड्राइवर था. विजय पाल का पड़ोसी केसरी लाल अपने 2 बेटों प्रेम सिंह, भरत सिंह और जवान बेटी तुलसी के साथ सैलई में ही रहता था. पड़ोसी होने के नाते विजय पाल और केसरी लाल के पारिवारिक संबंध थे. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि केसरी लाल की जवान बेटी तुलसी पड़ोस में रहने वाले संजय को इतना चाहने लगेगी कि अपनी अलग दुनिया बसाने के लिए परिवार तक से बगावत कर बैठेगी.

जब केसरी लाल को पता चला कि बेटी बेलगाम होने लगी है तो उस ने तुलसी पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया. लेकिन तुलसी को तो ट्रक ड्राइवर भा गया था, इसलिए वह बागी हो गई. संजय और तुलसी के मिलनेजुलने की चर्चा ने जब गांव में तूल पकड़ा तो केसरी लाल ने विजय पाल से संजय की इस गुस्ताखी के बारे में बताया. विजय पाल ने केसरी लाल से कहा कि वह निश्चिंत रहे, संजय ऐसा कोई काम नहीं करेगा कि उस की बदनामी हो. लेकिन इस से पहले कि विजय पाल कुछ करता, संजय तुलसी को ले कर गांव से भाग गया. घर वालों को ऐसी उम्मीद नहीं थी, पर संजय और तुलसी ने कोर्ट में शादी कर के अपनी अलग दुनिया बसा ली. केसरी लाल को बागी बेटी की यह हरकत पसंद नहीं आई. उस ने तय कर लिया कि परिवार पर बदनामी का दाग लगाने वाली बेटी से कोई संबंध नहीं रखेगा. कई साल तक तुलसी का अपने मायके से कोई संबंध नहीं रहा.

कालांतर में तुलसी ने शिवम को जन्म दिया तो मांबाप का दिल भी पिघलने लगा. तुलसी संजय के साथ खुश थी, इसलिए मांबाप उसे पूरी तरह गलत नहीं कह सकते थे.  इसी के चलते उन्होंने बेटीदामाद को माफ कर के घर बुला लिया. सब कुछ ठीक हो गया था, तुलसी खुश थी. 4 साल बाद वह 2 बच्चों की मां भी बन गई थी. उस ने सासससुर और परिवार वालों के दिलों में अपने लिए जगह बना ली. सैलई में तुलसी के चाचा अयोध्या प्रसाद भी रहते थे, जिन्हें लोग अयुद्धी भी कहते थे. अयुद्धी के 2 बेटे थे दीप और विपिन. साथ ही एक बेटी भी थी राधा. राधा और तुलसी दोनों की उम्र में थोड़ा सा अंतर था. हमउम्र होने की वजह से दोनों एकदूसरे के काफी करीब थीं.

जब तुलसी संजय के साथ भाग गई थी तो राधा खुद को अकेला महसूस करने लगी थी. तुलसी संजय के साथ कासगंज में रहती थी. राधा को उन दोनों के गांव आने का इंतजार रहता था. बहन और जीजा जब भी गांव आते थे, राधा ताऊ के घर पहुंच जाती थी. जीजासाली के हंसीमजाक को बुरा नहीं माना जाता, इसलिए संजय और राधा के बीच हंसीमजाक चलता रहता था. मजाक से हुई शुरुआत धीरेधीरे रंग लाने लगी. संजय स्वभाव से चंचल तो था ही, धीरेधीरे तुलसी से आशिकी का बुखार भी हलका पड़ने लगा था. एक दिन मौका पा कर संजय ने राधा का हाथ पकड़ लिया.

राधा ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘जीजा, तुम ने इसी तरह तुलसी दीदी का हाथ पकड़ा था न?’’

‘‘हां, ठीक ऐसे ही.’’ संजय बोला.

‘‘तो क्या इस हाथ को हमेशा पकड़े रहोगे?’’ राधा ने पूछा.

संजय ने हड़बड़ा कर राधा का हाथ छोड़ दिया. राधा ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘बड़े डरपोक हो जीजा. अगर लुकछिप कर तुम कुछ पाना चाहते हो तो मिलने वाला नहीं है. हां, बात अगर गंभीर हो तो सोचा जा सकता है. ’’

राधा संजय के दिलोदिमाग में बस चुकी थी. जबकि तुलसी को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि उस की चचेरी बहन ने किस तरह संबंधों में सेंध लगा दी है. राधा उस के जीवन में अचानक घुस आएगी, ऐसा तुलसी ने सोचा तक नहीं था. संजय पर विश्वास कर उस ने अपने मांबाप से बगावत की थी, लेकिन उसे लग रहा था कि संजय के दिल में कुछ है, जो वह समझ नहीं पा रही. दूसरी तरफ राधा सोच रही थी कि क्या सचमुच संजय उस के प्रति गंभीर है या फिर सिर्फ मस्ती कर रहा है. संजय का स्पर्श उस की रगों में बिजली के करंट की तरह दौड़ रहा था. उस ने सोचा कि यह सब गलत है. अब वह अकेले मेें संजय के करीब नहीं जाएगी. उस ने खुद को संभालने की भरपूर कोशिश की लेकिन संजय हर घड़ी, हर पल उस के दिलोदिमाग में मंडराता रहता था.

अगले कुछ दिन तक संजय गांव नहीं आया तो एक दिन राधा ने संजय को फोन कर के पूछा, ‘‘क्या बात है जीजा, दीदी गांव क्यों नहीं आती?’’

‘‘ओह राधा तुम हो, जीजी से बात कर लो, मुझ से क्या पूछती हो? अगर ज्यादा दिल कर रहा है तो हमारे घर आ जाओ. कल ही लंबे टूर से वापस आया हूं.’’

राधा का दिल धड़कने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी बहन के पति की ओर खिंची चली जा रही है. हालांकि वह जानती थी कि यह गलत है. अगर उस ने संजय से संबंध बनाए तो पता नहीं संबंधों में कितनी मजबूती होगी. संजय मजबूत भी हुआ तो समाज और परिवार के लोग कितनी लानतमलामत करेंगे. ये संबंध कितने सही होंगे, वह नहीं जानती थी. पर आशिकी हिलोरें ले रही थी. लग रहा था जैसे कोई तूफान आने वाला हो. फिर एक दिन राधा अपनी बहन के घर कासगंज आ गई. शाम को जब संजय ने राधा को अपने घर देखा तो हैरानी से पूछा, ‘‘राधा, तुम यहां?’’

‘‘हां, और अब शाम हो रही है. मैं जाऊंगी भी नहीं.’’ राधा ने संजय को गहरी नजर से देखते हुए कहा.

‘‘अरे वाह, तुम्हें देखते ही इस ने रंग बदल लिया. मैं इसे रुकने को कह रही थी तो मान ही नहीं रही थी.’’ तुलसी ने कहा. वह राधा और संजय के मनोभावों से बिलकुल बेखबर थी.

संजय ने चाचा के घर फोन कर के कह दिया कि उन लोगों ने राधा को रोक लिया है, सुबह वह खुद छोड़ आएगा. उस दिन राधा वहीं रुक गई, लेकिन तुलसी के दांपत्य के लिए वह रात कयामत की रात थी. इंटर पास राधा से तुलसी को ऐसी नासमझी की उम्मीद नहीं थी. लेकिन राधा के दिलोदिमाग पर तो जीजा छाया हुआ था. रात का खाना खाने के बाद तुलसी ने राधा का बिस्तर अलग कमरे में लगा दिया और निश्चिंत हो कर सो गई. लेकिन राधा और संजय की आंखों में नींद नहीं थी. देर रात संजय राधा के कमरे में पहुंचा तो राधा जाग रही थी. जानते हुए भी संजय ने पूछा, ‘‘तुम सोई नहीं?’’

‘‘मुझे नींद नहीं आ रही. मुझे यह बताओ जीजा, तुम ने मुझे क्यों रोका है?’’

‘‘क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘सोच लो जीजा, साली से प्यार करना महंगा भी पड़ सकता है.’’ राधा ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, बस यह जान लो कि मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं और तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’ कह कर संजय ने राधा को गले लगा लिया. इस के बाद दोनों के बीच की सारी दूरियां मिट गईं. जो संबंध संजय के लिए शायद मजाक थे, उन्हें ले कर राधा गंभीर थी. इसीलिए दोनों के बीच 2 साल तक लुकाछिपी चलती रही. फिर एक दिन राधा ने पूछा, ‘‘अब क्या इरादा है? लगता है, मां को शक हो गया है. जल्दी ही मेरे लिए रिश्ता तलाशा जाएगा. मुझे यह बताओ कि तुम दीदी को तलाक दोगे या नहीं?’’

‘‘यह क्या कह रही हो तुम? मैं तुलसी को कैसे तलाक दे सकता हूं? बड़ी मुश्किल से तुलसी को घर वालों ने स्वीकार किया है.’’ संजय बोला.

‘‘तो क्या तुम साली को मौजमस्ती के लिए इस्तेमाल कर रहे हो, यह सब महंगा भी पड़ सकता है जीजा, मुझे बताओ कि अब क्या करना है?’’

‘‘राधा, मैं तुम से प्यार करता हूं. हम दोनों कासगंज छोड़ कर कहीं और रहेंगे और कोर्ट में शादी कर लेंगे. मजबूर हो कर तुलसी तुम्हें स्वीकार कर ही लेगी.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो कहा था कि तुम तुलसी को छोड़ दोगे?’’

‘‘पागल मत बनो, वह मेरे 2 बेटों की मां है. लेकिन मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि तुम्हें वे सारे अधिकार मिलेंगे, जो पत्नी को मिलते हैं.’’ संजय ने राधा को समझाने की कोशिश की. आखिर राधा जीजा की बात मान गई और एक दिन संजय के साथ भाग गई. दोनों ने बदायूं कोर्ट में शादी कर ली. अगले दिन राधा के घर में तूफान आ गया. उस की मां को तो पहले से ही शक था. पिता अयुद्धी इतने गुस्से में था कि उस ने उसी वक्त फैसला सुना दिया, ‘‘समझ लो, राधा हम सब के लिए मर गई. आज के बाद इस घर में कोई भी उस का नाम नहीं लेगा.’’

उधर संजय परेशान था कि अब राधा को ले कर कहां जाए. उस ने तुलसी को फोन कर के बता दिया कि उस ने राधा से कोर्टमैरिज कर ली है. अब तुम बताओ, मैं राधा को घर लाऊं या नहीं. तुलसी हैरान रह गई. पति की बेवफाई से क्षुब्ध तुलसी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस ने सासससुर को सारी बात बता दी. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. इसी बीच इश्क का मारा घर का छोटा बेटा अपनी नई बीवी को ले कर घर आ गया. तुलसी क्या करती, उसे तो न मायके वालों का सहयोग मिलता और न ससुराल वालों का. अगर वह अपने पति के खिलाफ जाती तो 2-2 बच्चों की मां क्या करती. आखिर तुलसी ने हथियार डाल दिए और सौतन बहन को कबूल कर लिया.

राधा ससुराल आ तो गई, पर उसे ससुराल में वह सम्मान नहीं मिला जो एक बहू को मिलना चाहिए था. साल भर के बाद भी राधा को कोई संतान नहीं हुई तो उस के दिल में एक भय सा बैठ गया कि अगर उसे कोई बच्चा नहीं हुआ तो वह क्या करेगी. इसी के मद्देनजर वह तुलसी और उस के बच्चों के दिल में जगह बनाने की भरसक कोशिश कर रही थी. इसी बीच संजय ने कुछ सोच कर एटा के अवंतीबाई नगर में रिटायर्ड फौजी नेकपाल के मकान में 2 कमरे किराए पर ले लिए और परिवार के साथ वहीं रहने लगा. तुलसी जबतब कासगंज आतीजाती रहती थी.

संजय ने दोनों बच्चों नितिन और शिवम को स्कूल में दाखिल कर दिया गया था. राधा से बच्चे काफी हिलमिल गए थे. तुलसी ने सौतन को अपनी किस्मत समझ लिया था, लेकिन अभी जीवन में बहुत कुछ होना बाकी था. कोई नहीं जानता था कि कब कौन सा तूफान आ जाए. सतही तौर पर सब ठीक था, पर अंदर ही अंदर लावा उबल रहा था. राधा को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा था. उस के लिए मायके का दरवाजा बंद हो चुका था. ससुराल वालों से भी अपनेपन की कोई उम्मीद नहीं थी. उसे यह अपराधबोध भी परेशान कर रहा था कि उस ने अपनी ही बहन के दांपत्य में सेंध लगा दी है.

परिवार की बड़ी बहू तो तुलसी ही थी. राधा को जबतब तुलसी के ताने भी सहने पड़ते थे. जिंदगी में सुखचैन नहीं था. आगे देखती तो भी अंधेरा ही नजर आता था. एक संजय का प्यार ही था, जिस के सहारे वह सौतन की भूमिका निभा रही थी. 23 मई, 2016 को संजय को उस के किसी दुश्मन ने गोली मार दी. जख्मी हालत में उसे अलीगढ़ मैडिकल ले जाया गया. उस की हालत गंभीर थी. राधा डर गई कि अगर संजय मर गया तो वह कहां जाएगी. संजय की देखरेख कभी तुलसी करती तो कभी राधा. तभी तुलसी ने राधा से कहा, ‘‘संजय की हालत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई है, तुम जा कर बच्चों को देखो, मैं यहां संभालती हूं.’’

जुलाई महीने में संजय की हालत कुछ सुधरी तो घर वाले उसे कासगंज वाले घर में ले आए. तुलसी अपने पति के साथ थी, जबकि राधा बच्चों के साथ पति से दूर थी. अस्पताल में संजय ने एक बार राधा से कहा, ‘‘मेरी हालत ठीक नहीं है. अगर तुम किसी और से शादी करना चाहो तो कर लो.’’

सुन कर राधा सन्न रह गई, ‘‘यह क्या कह रहे हो संजय, मैं सिर्फ तुम्हारी हूं. तुम्हारे लिए कितना कुछ सह रही हूं. मेरे जैसी औरत से कौन शादी करेगा और कौन मुझे मानसम्मान देगा.’’

उस दिन के बाद से राधा डिप्रेशन में रहने लगी. पति और बच्चा दोनों ही उस की ख्वाहिश थीं. अगर पूरी नहीं होती तो वह कुछ भी नहीं थी. नितिन और शिवम इस बात से अनभिज्ञ थे कि मौसी क्यों परेशान है और उस की परेशानी कौन सा तूफान लाने वाली थी. 19 अगस्त, 2016 को बच्चे स्कूल से आए तो राधा ने उन्हें खाना दिया. फिर दोनों पढ़ने बैठ गए. राधा ने रात के खाने की तैयारी शुरू कर दी. रात का खाना खा कर सब टीवी देखने बैठ गए. किसी को पता ही नहीं चला कि मौत ने कब दस्तक दे दी थी. कुछ देर बाद  राधा ने कहा, ‘‘तुम लोग सो जाओ,सुबह उठ कर स्कूल भी जाना है.’’

कुछ देर बाद बच्चे सो गए. राधा ने संजय को फोन किया, लेकिन घंटी बजती रही. फोन नहीं उठा. यह सोच कर राधा का गुस्सा बढ़ने लगा कि क्या मैं सिर्फ सौतन के बच्चों की नौकरानी हूं. मेरे बच्चे नहीं होंगे तो क्या मुझे घर की बहू का सम्मान नहीं मिलेगा. संजय ने तो परिवार में सम्मान दिलाने का वादा किया था, पर वह मर गया तो?

ऐसे ही विचार उसे आहत कर रहे थे, गुस्सा दिला रहे थे. उस ने देखा शिवम निश्चिंत हो कर सो रहा था. यंत्रचालित से उस के हाथ शिवम की गरदन तक पहुंच गए और जरा सी देर में 4 वर्ष का के शिवम का सिर एक ओर लुढ़क गया. बच्चे की मौत से राधा घबरा गई. उस ने सोचा सुबह होते ही शिवम की मौत की खबर नितिन के जरिए सब को मिल जाएगी. इस के बाद तो पुलिस, थाना, कचहरी और जेल. संजय भी उसे माफ नहीं करेगा, ऐसे में क्या करे? उसे लगा, शिवम के भाई नितिन को भी मार देने में ही भलाई है. उस ने नितिन के गले पर भी दबाव बनाना शुरू कर दिया. नितिन कुछ देर छटपटाया, फिर बेहोश हो गया. राधा ने जल्दी से एक बैग में कपड़े, कुछ गहने, पैसे और सर्टिफिकेट भरे और कमरे में ताला लगा कर बस अड्डे पहुंच गई, जहां मथुरा वाली बस खड़ी थी. वह बस में बैठ गई. मथुरा पहुंच कर वह स्टेशन पर गई, वहां जो भी ट्रेन खड़ी मिली, वह उसी में सवार हो गई.

इधर सुबह जब नितिन को होश आया तो उस ने खिड़की में से शोर मचाया. जरा सी देर में लोग इकट्ठा हो गए. उन्होंने देखा कमरे के दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. ताला तोड़ कर जब लोग अंदर पहुंचे तो शिवम मरा पड़ा था. नितिन ने बताया, ‘‘इसे राधा मौसी ने मारा है और मुझे भी जान से मारने की कोशिश की, लेकिन मैं बेहोश हो गया था.’’

लोगों ने कोतवाली में फोन किया, कुछ ही देर में थानाप्रभारी सुधीर कुमार पुलिस टीम के साथ वहां आ गए. पुलिस जांच में जुट गई. शिवम को अस्पताल भेजा गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. नितिन ठीक था, उस का मैडिकल परीक्षण नहीं किया गया. बच्चे के पोस्टमार्टम में मौत का कारण दम घुटना बताया गया. इस मामले की सूचना कासगंज में विजय पाल को दे दी गई थी. विजय पाल ने 28 जुलाई, 2016 को थाना एटा में राधा के खिलाफ भादंवि की धारा 307, 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. राधा के इस कृत्य से सभी हैरान थे. राधा कहां गई, किसी को कुछ पता नहीं था. पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया. पुलिस को राधा की लोकेशन मथुरा में मिली थी लेकिन आगे की कोई जानकारी नहीं थी.

23 अगस्त, 2016 को लुधियाना के एक गुरुद्वारे के ग्रंथी ने फोन कर के एटा पुलिस को बताया कि लुधियाना में एक लावारिस महिला मिली है जो खुद को कासगंज की बता रही है. यह खबर मिलते ही पुलिस राधा की गिरफ्तारी के लिए रवाना हो गई. लुधियाना पहुंच कर एटा पुलिस ने राधा को हिरासत में ले लिया और एटा लौट आई. एटा में उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में राधा से पूछताछ की गई. उस ने बताया कि वह सौतन के तानों से परेशान थी, जिस के चलते उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा था. अकेले हो जाने के तनाव में उस से यह गलती हो गई. राधा ने यह बात पुलिस के सामने दिए गए बयान में तो कही. लेकिन बाद में अदालत में अपना गुनाह स्वीकार नहीं किया.

केस संख्या 572/2016 के अंतर्गत दायर इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट द्वारा 5 दिसंबर, 2016 को भादंवि की धारा 307, 302 का चार्ज लगा कर केस सत्र न्यायालय के सुपुर्द कर दिया गया. घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, राधा ने अपने बचाव में कहा कि उस के खिलाफ रंजिशन मुकदमा चलाया जा रहा है, वह निर्दोष है. उस ने किसी को नहीं मारा. तुलसी ने गवाही में कहा कि उस का राधा के साथ कोई विवाद नहीं है. उसे नहीं मालूम कि शिवम को किस ने मारा. घटना के गवाह मुकेश ने कहा कि उसे जानकारी नहीं है कि राधा ने किस वजह से शिवम की हत्या कर दी और नितिन को भी मार डालने की कोशिश की. मुकेश विजय पाल का मंझला बेटा था.

संजय ने अपनी गवाही में दूसरी पत्नी राधा को बचाने का भरसक प्रयास करते हुए कहा कि उस ने अपनी पहली पत्नी तुलसी की सहमति से राधा से शादी की थी. राधा बच्चों से प्यार करती थी. जब दुश्मनी के चलते किसी ने उसे गोली मार दी तो वह अस्पताल में था. तुलसी भी उस के साथ अलीगढ़ के अस्पताल में थी. घटना वाले दिन राधा घर पर नहीं थी, जिस से सब को लगा कि राधा ही शिवम की हत्या कर के कहीं भाग गई होगी. इसी आधार पर मेरे पिता ने उस के खिलाफ कोतवाली एटा में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, पर सच्चाई यह है कि घटना वाले दिन रात में 2 बदमाश घर में घुस आए, जिन्होंने शिवम को मार डाला और नितिन को भी मरा समझ राधा को अपने साथ ले गए. बाद में उन्होंने राधा को कुछ न बताने की धमकी दे कर छोड़ दिया था.

राधा कोतवाली एटा पहुंची और पुलिस  को घटना के बारे में बताना चाहा, लेकिन पुलिस ने उस की बात नहीं सुनी. राधा के अनुसार बदमाशों से डर कर शिवम रोने लगा और उन्होंने शिवम की हत्या कर दी और जेवर लूट लिए. लेकिन अदालत ने कहा कि राधा ने अदालत को यह बात कभी नहीं बताई. पुलिस के अनुसार राधा ने कभी भी अपने साथ लूट और बदमाशों द्वारा शिवम की हत्या की कभी कोई रिपोर्ट नहीं लिखाई, न ही अपने 164 के बयानों में इस बात का जिक्र किया. 8 वर्षीय नितिन ने अपनी गवाही में कहा, ‘‘मां ने बताया कि मुझे अपनी गवाही में कहना है कि राधा ने मेरा गला दबाया था. लेकिन उस ने राधा द्वारा शिवम की हत्या किए जाने के बारे में कुछ नहीं बताया, जबकि वह राधा के साथ ही सो रहा था.’’

सत्र न्यायाधीश रेणु अग्रवाल ने 21 जनवरी, 2019 के अपने फैसले में लिखा कि नितिन की हत्या की कोशिश के कोई साक्ष्य नहीं मिले और न ही नितिन का कोई चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया. अत: आईपीसी की धारा 307 से उसे बरी किया जाता है. परिस्थितिजन्य साक्ष्य राधा द्वारा शिवम की हत्या करना बताते हैं. अत: अभियुक्ता राधा जो जेल में है, को आईपीसी की धारा 302 का दोषी माना जाता है. अभियुक्त राधा को भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत दोषी पाते हुए आजीवन कारावास और 20 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया जाता है. अर्थदंड अदा न करने की स्थिति में अभियुक्ता को 2 माह की साधारण कारावास की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

अर्थदंड की वसूली होने पर 10 हजार रुपए मृतक शिवम की मां तुलसी देवी को देय होंगे. अभियुक्ता की सजा का वारंट बना कर जिला कारागार एटा में अविलंब भेजा जाए. दोषी को फैसले की प्रति नि:शुल्क दी जाए. आजीवन कारावास यानी बाकी का जीवन जेल में गुजरेगा, फैसला सुनते ही राधा का चेहरा पीला पड़ गया. संजय की मोहब्बत और उस के साथ जीने, उस के बच्चों की मां बनने की उम्मीद राधा के लिए सिर्फ एक मृगतृष्णा बन गई थी. जीनेमरने की स्थिति में राधा ने इधरउधर देखा, वहां आसपास कोई नहीं था. संजय उस से कहता था कि वह बेदाग छूट कर बाहर आएगी और वह उसे दुनिया की सारी खुशियां देगा.

बेजान सी राधा ने जेल में अपनी बैरक में पहुंचने के बाद इधरउधर देखा. चलचित्र की तरह सारी घटनाएं उस की आंखों के सामने गुजर गईं. कुछ ही देर में अचानक महिला बैरक में हंगामा मच गया. किसी ने जेलर को बताया कि राधा उल्टियां कर रही है, उस की तबीयत बिगड़ गई है. जेल के अधिकारी महिला बैरक में पहुंच गए. उन के हाथपैर फूल गए. राधा की हालत बता रही थी कि उस ने जहर खाया है, पर उसे जहर किस ने दिया, कहां से आया, यह बड़ा सवाल था. राधा को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. राधा का मामला काफी संदिग्ध था. उस का विसरा सुरक्षित कर लिया गया और जांच के लिए अनुसंधान शाखा में भेज दिया गया.

राधा के ससुराल और मायके में उस की मौत की खबर दी गई, लेकिन दोनों परिवारों ने शव लेने से इनकार कर दिया. राधा की विषैली आशिकी ने उस के जीवन में ही विष घोल दिया. राधा के शव का सरकारी खर्च पर अंतिम संस्कार कर दिया गया.

 

Family Dispute : रोजरोज की कलह से तंग आकर पत्नी को मारी गोली

Family Dispute : साहिल और नैंसी ने 2 साल लिवइन में रहने के बाद लव मैरिज की थी, लेकिन दोनों के बीच निभाव नहीं हो सका. स्थिति यहां तक पहुंची कि साहिल…

पिछले 2-3 दिनों से 20 वर्षीय नैंसी मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत परेशान थी. इस की वजह यह थी कि उस का 21 वर्षीय पति साहिल चोपड़ा उसे प्रताडि़त कर रहा था. इस दौरान उस ने नैंसी की कई बार पिटाई भी कर दी थी. नैंसी ने यह बात अपने घर वालों तक को नहीं बताई. इस की वजह यह थी कि उस ने घर वालों के विरोध के बावजूद साहिल से लव मैरिज की थी. साहिल और उस की शादी को अभी 8 महीने ही हुए थे. पति के प्यार की जगह वह उस के जुल्मोसितम सह रही थी. नैंसी ने भले ही यह बात अपने मातापिता को नहीं बताई थी, लेकिन अपनी सहेली प्रांजलि और सरानिया को 10 नवंबर, 2019 को वाट्सऐप पर मैसेज भेज दी थी.

इस मैसेज में उस ने पति द्वारा ज्यादा प्रताडि़त करने की जानकारी दी थी. इतना ही नहीं, उस ने सहेलियों को यह भी कह दिया था कि यदि 2 दिनों तक उस का फोन न मिले तो समझ लेना, साहिल ने उस की हत्या कर दी है. दिल्ली की ही रहने वाली प्रांजलि और सरानिया नैंसी की पक्की सहेलियां थीं. दोनों समझ नहीं पा रही थीं कि नैंसी को बहुत प्यार करने वाला साहिल नैंसी पर हाथ क्यों उठाने लगा. इस की वजह क्या है, यह तो नैंसी से मुलाकात के बाद ही पता चल सकती थी. बहरहाल, वे रोजाना नैंसी से बातें करने लगीं. लेकिन 2 दिन बाद ही नैंसी का फोन स्विच्ड औफ हो गया. प्रांजलि और सरानिया परेशान हो गईं कि नैंसी का फोन क्यों बंद है.

नैंसी पति साहिल चोपड़ा के साथ पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी स्थित बी-1 ब्लौक में रह रही थी. सरानिया और प्रांजलि ने नैंसी की ससुराल देखी थी, इसलिए 13 नवंबर, 2019 को दोनों नैंसी से मिलने उस की ससुराल पहुंच गईं. ससुराल में जब नैंसी दिखाई नहीं दी तो उन्होंने उस के बारे में उस की सास रोसी से पूछा. रोसी ने बताया कि नैंसी और साहिल घूमने के लिए हरिद्वार गए हैं. दूसरे कमरे में साहिल के दादा बैठे हुए थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि पतिपत्नी फ्रांस घूमने गए हैं. दादा की बात सुन कर दोनों चौंकीं क्योंकि नैंसी के पास पासपोर्ट नहीं था. फिर वह विदेश कैसे जा सकती है. प्रांजलि और सरानिया जब नैंसी के ससुर अश्विनी चोपड़ा से बात की तो उन्होंने दोनों के जयपुर घूमने जाने की बात बताई.

घर के 3 लोगों द्वारा अलगअलग तरह की बातें दोनों सहेलियों को हजम नहीं हुईं. इस के बाद वे अपने घर चली गईं. उन्होंने इधरउधर फोन कर के नैंसी के बारे में पता लगाने की कोशिश की, पर कोई जानकारी नहीं मिली. नैंसी की ये दोनों फ्रैंड्स अपनी दुनिया में व्यस्त हो गईं. 28 नवंबर को प्रांजलि व सरानिया ने फिर से नैंसी का नंबर मिलाया तो वह बंद मिला. तब उन्होंने उसी दिन यह जानकारी नैंसी के पिता संजय शर्मा को दे दी. बेटी के लापता होने की जानकारी पा कर संजय शर्मा के होश उड़ गए. वह पश्चिमी दिल्ली के ही हरिनगर में रहते थे. बेटी नैंसी के बारे में पता करने के लिए वह उसी दिन उस की ससुराल जनकपुरी पहुंच गए. वहां साहिल की मां ने उन्हें बताया कि साहिल और नैंसी घर से 20 लाख से ज्यादा के जेवर ले कर कहीं भाग गए हैं.

संजय शर्मा को उन की बात पर विश्वास नहीं हुआ. काफी पूछताछ करने के बाद भी जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो अगले दिन 23 नवंबर को वह थाना जनकपुरी पहुंचे. संजय शर्मा ने थानाप्रभारी जयप्रकाश से मुलाकात कर बेटी नैंसी के शादी करने से ले कर उस के गायब होने तक की बात विस्तार से बता दी. साथ ही उन्होंने नैंसी के पति साहिल, ससुर अश्विनी चोपड़ा और साहिल की बुआ के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

रिपोर्ट दर्ज करने के कई दिन बाद भी पुलिस ने नैंसी का पता लगाने की कोशिश नहीं की. तब संजय शर्मा ने डीसीपी और एसीपी से संपर्क किया. जब मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आया तो थानाप्रभारी को काररवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा. थानाप्रभारी जयप्रकाश साहिल के घर पहुंचे तो वह घर पर नहीं मिला. उस के मातापिता यही कहते रहे कि साहिल नैंसी को ले कर कहीं घूमने गया है. लेकिन तब से दोनों के फोन बंद आ रहे हैं. घर वालों को कुछ चेतावनी दे कर थानाप्रभारी लौट आए. थाने लौटने के बाद उन्होंने नैंसी और साहिल के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. साहिल चोपड़ा की काल डिटेल्स से पुलिस को पता चला कि 11 नवंबर की रात और 12 नवंबर को वह शुभम और बादल नाम के लड़कों के संपर्क में था.

इन दोनों के साथ उस की लोकेशन हरियाणा के पानीपत की थी. जांच में पता चला कि शुभम उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर का और बादल करनाल के घरोंडा गांव का रहने वाला है. ये तीनों पानीपत क्यों गए थे, यह जानकारी तीनों में से किसी से पूछताछ करने पर ही मिल सकती है. साहिल तो घर से लापता था, इसलिए पुलिस टीम सब से पहले करनाल के गांव घरोंडा स्थित बादल के घर पहुंची. वह घर पर मिल गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस की निशानदेही पर पुलिस ने शुभम को भी उस के घर से हिरासत में ले लिया. पूछताछ में पता चला कि शुभम साहिल के औफिस में काम करता था और बादल शुभम का ममेरा भाई था.

दिल्ली ला कर जब दोनों से नैंसी के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि नैंसी अब दुनिया में नहीं है. साहिल ने उस की हत्या कर लाश पानीपत में फेंक दी थी. थानाप्रभारी ने यह जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी. चूंकि नैंसी के पिता संजय शर्मा ने साहिल और उस के घर वालों के खिलाफ अपहरण और दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था, इसलिए पुलिस ने साहिल के घर वालों को थाने बुलवा लिया. किसी तरह साहिल चोपड़ा को जब यह खबर मिली कि उस के घर वालों को पुलिस ने थाने में बैठा रखा है तो वह खुद भी थाने पहुंच गया. साहिल को यह पता नहीं था कि पुलिस उस की साजिश का न सिर्फ परदाफाश कर चुकी है बल्कि शुभम और बादल पकड़े भी जा चुके हैं.

पुलिस ने साहिल से नैंसी के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस ने 11 नवंबर, 2019 को नैंसी को पश्चिम विहार फ्लाईओवर के पास छोड़ दिया था. थानाप्रभारी जयप्रकाश समझ गए साहिल बेहद चालाक है, आसानी से अपना जुर्म नहीं कबूलेगा. लिहाजा उन्होंने हिरासत में लिए गए शुभम और बादल को साहिल के सामने  बुला लिया. उन दोनों को देखते ही साहिल हक्काबक्का रह गया. उस के चेहरे का रंग उड़ गया.  अब उस के सामने सच बोलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था, लिहाजा उस ने स्वीकार कर लिया कि वह अपनी पत्नी नैंसी की हत्या कर चुका है. अपने कर्मचारी शुभम और उस के दोस्त बादल के साथ नैंसी की हत्या करने के बाद उन लोगों ने उस की लाश पानीपत में ठिकाने लगा दी थी.

इस के बाद एडिशनल डीसीपी समीर शर्मा की मौजूदगी में साहिल चोपड़ा, शुभम और बादल से पूछताछ की गई तो नैंसी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह झकझोर देने वाली थी—

पश्चिमी दिल्ली के हरिनगर के रहने वाले संजय शर्मा इलैक्ट्रिक मोटर वाइंडिंग का काम करते थे. उन की बड़ी बेटी नैंसी शर्मा (17 वर्ष) करीब 3 साल पहले विकासपुरी में कंप्यूटर सेंटर में जाती थी. वह कंप्यूटर कोर्स कर रही थी. वहीं पर उस की मुलाकात साहिल चोपड़ा (18 वर्ष) से हुई. साहिल चोपड़ा का पास में ही सेकेंडहैंड कारों की सेल परचेज का औफिस था. साहिल से पहले यह व्यवसाय उस के पिता अश्विनी चोपड़ा संभालते थे. साहिल चोपड़ा का कार सेल परचेज का व्यवसाय अच्छा चल रहा था, इसलिए वह खूब बनठन कर रहता था. नैंसी शर्मा और साहिल की मुलाकात धीरेधीरे दोस्ती में बदल गई. दोनों ही जवानी के द्वार पर खड़े थे, इसलिए आकर्षण में बंध कर एकदूसरे को चाहने लगे.

इस के बाद नैंसी साहिल के साथ कार में बैठ कर सैरसपाटे करने लगी. उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. इतना ही नहीं, उन्होंने जीवन भर साथ रहने का वादा भी कर लिया था. नैंसी उस समय नाबालिग थी, इस के बावजूद वह साहिल के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. करीब 3 साल तक सुभाषनगर में लिवइन रिलेशन में रहने के बाद दोनों ने 27 मार्च, 2019 को गुरुद्वारे में शादी कर ली.  नैंसी ने शादी अपने घर वालों की मरजी के बिना की थी, इसलिए वह उस से खुश नहीं थे. घर वालों को शादी की सूचना भी उस समय मिली, जब नैंसी ने अपनी ससुराल पहुंच कर वाट्सऐप पर शादी के फोटो भेजे.

दरअसल, नैंसी तब छोटी ही थी, जब उस की मां उसे और पिता को छोड़ कर कहीं चली गई थी. वह अपने साथ छोटे बेटे को ले गई थी. नैंसी की परवरिश उस की दादी और चाची ने की थी. संजय शर्मा बिजनैस के सिलसिले में राजस्थान जाते रहते थे. बाद में उन्होंने दूसरी शादी कर ली. बेटी बालिग थी. उस ने साहिल चोपड़ा से शादी अपनी मरजी से की थी, इसलिए वह कर भी क्या सकते थे. जवान बेटी के इस तरह चले जाने पर उन्हें बदनामी के साथ दुख भी अधिक हुआ. नैंसी जनकपुरी के बी-ब्लौक स्थित अपनी ससुराल में पति के साथ खुश थी. साहिल उस का हर तरह से खयाल रखता था. बहरहाल, उन की जिंदगी हंसीखुशी बीत रही थी. लेकिन उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. नैंसी और साहिल के बीच कुछ महीनों बाद ही मतभेद शुरू हो गए.

इस की वजह यह थी कि नैंसी अकसर फोन पर व्यस्त रहती थी. देर रात तक वह किसी से फोन पर बातें करती थी. साहिल का कहना था कि दिन में वह किसी से भी बात करे, उसे कोई ऐतराज नहीं है लेकिन उस के औफिस से लौटने के बाद उस के पास भी बैठ जाया करे. साहिल जब नैंसी से पूछता कि वह किस से बात करती है तो वह कह देती कि दोस्तों से बात करती है. पत्नी की यह बात साहिल को गले इसलिए नहीं उतरती थी, क्योंकि शादी से पहले नैंसी ने उसे बताया था कि उस का कोई भी दोस्त नहीं है. जब शादी से पहले उस का कोई दोस्त नहीं था तो शादी होते ही अब कौन ऐसे नए दोस्त बन गए जो घंटों तक उस से बतियाने लगे. यही बात साहिल के दिल में वहम पैदा कर रही थी. नैंसी की बातों और व्यवहार से साहिल को शक था कि उस की पत्नी का जरूर किसी से कोई चक्कर चल रहा है, जिसे वह उस से छिपा रही है.

पति या पत्नी दोनों के मन में संदेह पैदा हो जाए तो वह कम होने के बजाए बढ़ता जाता है और फिर कभी भी विस्फोट के रूप में सामने आता है. जिस नैंसी को साहिल दिलोजान से प्यार करता था, वही उस के साथ कलह करने लगी थी. कभीकभी तो दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ जाता था कि साहिल उस की पिटाई भी कर देता था. साहिल का उग्र रूप देख कर नैंसी को महसूस होने लगा था कि साहिल को अपना जीवनसाथी चुनना उस की बड़ी भूल थी. उसे इतनी जल्दी फैसला नहीं लेना चाहिए था. चूंकि उस ने अपनी पसंद से की शादी थी, इसलिए इस की शिकायत वह अपने पिता से भी नहीं कर सकती थी. हां, अपनी सहेलियों से बात कर के वह अपना दर्द बांट लिया करती थी.

साहिल पत्नी की रोजरोज की कलह से तंग आ चुका था. आखिर उस ने फैसला कर लिया कि रोजरोज की किचकिच से अच्छा है कि नैंसी का खेल ही खत्म कर दे. इस बारे में साहिल ने अपने औफिस में काम करने वाले शुभम (24) से बात की. शुभम साहिल का साथ देने को तैयार हो गया. साहिल को शुभम ने बताया कि उस का एक ममेरा भाई है बादल, जो करनाल के पास स्थित घरोंडा गांव में रहता है. उसे भी साथ ले लिया जाए तो काम आसान हो जाएगा. साहिल ने शुभम से कह दिया कि इस बारे में वह बादल से बात कर ले. शुभम ने बादल से बात की तो उस ने हामी भर ली. योजना को कैसे अंजाम देना है, इस बारे में साहिल ने बादल और शुभम के साथ प्लानिंग की. बादल ने सलाह दी कि नैंसी को किसी बहाने पानीपत ले जाया जाए और किसी सुनसान इलाके में ले जा कर उस का काम तमाम कर दिया जाए.

योजना को कहां अंजाम देना है, इस की रेकी के लिए तीनों लोग 10 नवंबर, 2019 को पानीपत गए. काफी देर घूमने के बाद उन्हें रिफाइनरी के पास की सुनसान जगह ठीक  लगी. रेकी करने के बाद तीनों दिल्ली लौट आए. इसी बीच नैंसी और साहिल के बीच की कलह चरम पर पहुंच गई, तभी नैंसी ने अपनी सहेलियों प्रांजलि और सरानिया को फोन कर के बता दिया था कि आजकल साहिल उस के साथ मारपीट करने लगा है. उस ने उस के घर से बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी है, उस के साथ कुछ भी हो सकता है. नैंसी को शायद पति का व्यवहार देख कर अपनी मौत की आहट मिल गई थी, तभी तो उस ने सहेलियों से कह दिया था कि अगर 2 दिनों तक उस का फोन न मिले तो समझ लेना कि साहिल ने उस की हत्या कर दी है.

चूंकि साहिल को अपनी योजना को अंजाम देना था, इसलिए उस ने 11 नवंबर को सुबह से ही नैंसी के साथ प्यार भरा व्यवहार शुरू कर दिया. पति का बदला रुख देख कर नैंसी भी खुश हो गई. दोनों ने खुशी के साथ लंच किया. लंच करने के दौरान ही साहिल ने नैंसी से कहा, ‘‘नैंसी, आज मुझे पानीपत में किसी से उधार की रकम लानी है. रकम ज्यादा है, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम भी पिस्टल ले कर मेरे साथ चलो.’’

नैंसी के पास एक पिस्टल थी, जो उसे उस के किसी दोस्त ने 2 साल पहले गिफ्ट में दी थी. नैंसी ने उस पिस्टल के साथ कई फोटो भी खिंचवा रखे थे. पति के कहने पर नैंसी उस के साथ पानीपत जाने को तैयार हो गई. शाम करीब साढ़े 6 बजे साहिल पत्नी को ले कर घर से अपनी कार में निकला. शुभम और बादल को भी उस ने घर पर बुला रखा था. शुभम कार चला रहा था और बादल शुभम के बराबर वाली सीट पर बैठा था. जबकि साहिल और नैंसी कार की पिछली सीट पर थे. कार में ही साहिल ने पत्नी से पिस्टल ले कर उस में 2 गोलियां डाल ली थीं. नैंसी को यह पता नहीं था कि उस का पति उस के सामने ही मौत का सामान तैयार कर रहा है. उन्हें पानीपत पहुंचतेपहुंचते रात हो गई.

शुभम कार को रिफाइनरी के पास ददलाना गांव की एक सुनसान जगह पर ले गया. वहीं पर साहिल ने बाथरूम जाने के बहाने कार रुकवा ली. इस से पहले कि नैंसी कुछ समझ पाती, आगे की सीट पर बैठे शुभम और बादल ने उसे दबोच लिया. तभी साहिल ने नैंसी के सिर से सटा कर गोली चला दी, लेकिन गोली नहीं चली और हड़बड़ाहट में साहिल के हाथ से पिस्टल छूट कर नीचे गिर गई. नैंसी अब पूरा माजरा समझ गई थी कि पति उसे यहां मारने के लिए लाया है. वह साहिल के सामने अपनी जान बचाने की गुहार लगाने लगी, लेकिन पत्नी के गिड़गिड़ाने का उस पर असर नहीं हुआ.

साहिल ने फुरती से कार में गिरी पिस्टल और गोली उठाई. गोली उस ने दोबारा लोड की और नैंसी के सिर से सटा कर गोली चला दी. इस बार गोली उस के सिर के आरपार हो गई. तभी उस ने दूसरी गोली भी मार दी. गोली लगते ही नैंसी के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह सीट पर ही लुढ़क गई. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. फिर तीनों ने उस की लाश उठा कर झाडि़यों में फेंक दी. साहिल ने उस का मोबाइल अपने पास रख लिया. लाश ठिकाने लगा कर तीनों दिल्ली लौट आए. साहिल अपने घर जाने के बजाए दोनों साथियों के साथ जनकपुरी सी-1 ब्लौक और डाबड़ी के बीच स्थित एक लौज में रुका.

अपनी कार उस ने पास में ही स्थित सीतापुरी इलाके में ऐसी जगह खड़ी की, जहां स्थानीय लोग अपनी कारें खड़ी करते थे. यह इलाका चानन देवी अस्पताल के नजदीक है. नैंसी का मोबाइल साहिल ने सुभाषनगर मैट्रो स्टेशन के पास फेंक दिया था. अगले दिन शुभम और बादल अपनेअपने घर चले गए. साहिल भी इधरउधर छिपता रहा. तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस उन्हें ले कर पानीपत में उसी जगह पहुंची, जहां उन्होंने नैंसी की लाश ठिकाने लगाई थी. उन की निशानदेही पर पुलिस ने ददलाना गांव की झाडि़यों से नैंसी की सड़ीगली लाश बरामद कर ली. जरूरी काररवाई कर पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए नैंसी की लाश पानीपत के सरकारी अस्पताल में भेज दी.

इस के बाद पुलिस के तीनों आरोपियों को कोर्ट में पेश कर उन का 2 दिन का रिमांड लिया. रिमांड अवधि में आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने चानन देवी अस्पताल के नजदीक खड़ी साहिल की कार बरामद की. कार की मैट के नीचे छिपाई गई वह पिस्टल भी पुलिस ने बरामद कर ली, जिस से नैंसी की हत्या की गई थी. पुलिस नैंसी का मोबाइल बरामद नहीं कर सकी.

आरोपी साहिल चोपड़ा, शुभम और बादल से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

 

Hyderabad Crime : प्रेमी के साथ मिलकर मां का चुन्नी से घोंटा गला

Hyderabad Crime : बेटियां मांबाप का मानसम्मान होती हैं, लेकिन वही बेटियां अगर गलत राह पर उतर जाएं तो न केवल परिवार की इज्जत के लिए खतरा बन जाती हैं, बल्कि कई बार तो…

श्री निवास रेड्डी अपनी पत्नी और एकलौती बेटी कीर्ति रेड्डी के साथ हैदराबाद (Hyderabad Crime) के ब्लौक हयातनगर स्थित मुनागानुरु गांव में रहते थे. वह एक ट्रक चालक थे. एक बार जब वह अपना ट्रक ले कर कामधंधे के लिए बाहर निकलते थे, तो हफ्तों तक घर नहीं लौट पाते थे. उन की ख्वाहिश थी कि वह अपनी बेटी को उच्चशिक्षा दिलाएं ताकि पढ़लिख कर वह किसी अच्छी सरकारी नौकरी में चली जाए. इसलिए वह अपने काम पर ज्यादा ध्यान देते थे. बेटी कीर्ति रेड्डी से वह बेटे की तरह व्यवहार करते थे. उन्होंने बेटी को पूरी आजादी दे रखी थी. लेकिन उस की यही आजादी एक दिन उन के परिवार को बिखेर देगी, ऐसा उन्होंने कभी नहीं सोचा था.

19 अक्तूबर, 2019 की दोपहर के करीब 2 बजे कीर्ति रेड्डी अपने एक मित्र कोथा शशिकुमार के साथ थाना हयातनगर पहुंची. उस ने थाने में अपनी मां पल्लेरला रंजीता की गुमशुदगी दर्ज करवाई. शिकायत में कीर्ति रेड्डी ने अपनी मां की गुमशुदगी का जिम्मेदार अपने पिता श्रीनिवास रेड्डी को ठहराया. कीर्ति ने ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को बताया कि मां के प्रति उस के पिता का व्यवहार ठीक नहीं था. वह शराब पी कर जब घर लौटते थे तो मां के साथ लड़ाईझगड़ा और मारपीट करते थे. पिता के इसी व्यवहार से मां परेशान रहती थीं, जिस की वजह से 2 दिन पहले वह घर छोड़ कर चली गई. उस ने मां को काफी खोजा, लेकिन कहीं पता नहीं लग सका.

पुलिस ने कीर्ति की शिकायत पर गुमशुदगी दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. इस घटना के 4-5 दिन बाद जब श्रीनिवास रेड्डी अपना ट्रक ले कर घर लौटे तो घर के दरवाजे पर ताला लटका मिला. ताला बंद देख वह समझ गए कि घर पर कोई नहीं है. पहले तो उन्होंने सोचा कि पत्नी और बेटी कहीं आसपास गई होंगी. वह वहीं पर उन के लौटने का इंतजार करने लगे. लेकिन जब वे काफी देर बाद भी नहीं लौटीं तो उन्हें चिंता हुई. उन्होंने आसपड़ोस के लोगों से अपने परिवार के बारे में पूछा तो पता चला कि उन के घर पर कई दिनों से ताला लटक रहा है. यह जान कर उन्हें झटका लगा. ऐसा कभी नहीं हुआ था कि उन की पत्नी और बेटी उन्हें बिना बताए कहीं गई हों. क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि वह कभी भी घर आ सकते थे. अगर वे कहीं जाती भी थीं तो उन्हें फोन कर जानकारी अवश्य देती थीं.

इस बीच उन की बेटी और पत्नी में से किसी का भी फोन उन के पास नहीं आया था. जब उन्होंने पत्नी का फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ था. कई बार कोशिश करने के बाद जब बेटी कीर्ति रेड्डी से उन का संपर्क हुआ तो उस ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर उन के होश उड़ गए. कीर्ति ने बताया कि मां कई दिन पहले पता नहीं कहां चली गईं और वह कुछ काम से विशाखापट्टनम आई हुई है. 2 दिन बाद वह घर आएगी. कीर्ति ने यह भी बताया कि उस ने मां को तमाम संभावित जगहों पर तलाश किया, जब वह नहीं मिली तो थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी. बेटी की यह बात सुन कर श्रीनिवास रेड्डी के होश उड़ गए. वह समझ नहीं पा रहे थे कि पत्नी बिना बताए कहां और क्यों चली गई.

लिहाजा वह भी पत्नी को इधरउधर खोजने लगे. श्रीनिवास रेड्डी की समझ में यह भी नहीं आ रहा था कि जब मां लापता थी तो बेटी को उस की तलाश करनी चाहिए थी. आखिर ऐसा कौन सा जरूरी काम आ गया, जो वह विशाखापट्टनम चली गई. उस के विशाखापट्टनम जाने की बात उन के गले नहीं उतर रही थी. बहरहाल, 2 दिनों बाद कीर्ति रेड्डी जब घर वापस आई तो वह अपनी मां की गुमशुदगी को ले कर पिता से ही उलझ पड़ी. उस का कहना था कि उन के व्यवहार की वजह से मां घर छोड़ गई है. बेटी के इस आरोप से भी श्रीनिवास रेड्डी स्तब्ध रह गए. वह पत्नी की तलाश के लिए थाने के चक्कर लगाते रहे. पत्नी को गायब हुए 8 दिन बीत चुके थे, लेकिन उस का पता नहीं लग पा रहा था. इस से श्रीनिवास रेड्डी की चिंता बढ़ती जा रही थी. वह थाने के चक्कर लगालगा कर परेशान हो चुके थे. थाना पुलिस से आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिल पा रहा था.

हार कर श्रीनिवास रेड्डी ने पुलिस कमिश्नर महेश भागवत से मुलाकात की. पुलिस कमिश्नर ने इस मामले को गंभीरता से लिया. उन के निर्देश पर एसीपी शंकर व हयाननगर क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सतीश इस केस की जांच में जुट गए.  इंसपेक्टर सतीश ने श्रीनिवास रेड्डी के पड़ोसियों और जानपहचान वालों से पूछताछ करते हुए जब उन के परिवार को खंगाला तो कीर्ति रेड्डी शक के दायरे में आ गई. वह बारबार अपने बयान बदल रही थी. इसी दौरान जांच में यह बात भी पता चली कि वह अपनी मां के गायब होने के बाद विशाखापट्टनम गई ही नहीं थी. वह अपने प्रेमी और मंगेतर चिमूला बाल रेड्डी के घर में थी. यह बात श्रीनिवास रेड्डी को तब पता चली, जब चिमूला बाल रेड्डी के पिता कृष्णा रेड्डी श्रीनिवास रेड्डी को सहानुभूति देने उन के पास आए.

रहीसही कमी पल्लेरला रंजीता के मोबाइल फोन की लोकेशन ने पूरी कर दी. 23 अक्तूबर, 2019 तक कीर्ति रेड्डी और उस की मां रंजीता रेड्डी के फोन नंबरों की काल डिटेल्स खंगाली गई तो 19 अक्तूबर को दोनों के फोन की लोकेशन साथसाथ पाई गई. फिर 4 दिन बाद मां पल्लेरला रंजीता का मोबाइल फोन बंद हो गया था. अब सवाल यह था कि रंजीता के गायब होने के 4 दिनों बाद उन का मोबाइल कैसे चालू हुआ और वह किस ने चालू किया. इस शक के आधार पर क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सतीश ने कीर्ति रेड्डी को पूछताछ के लिए अपने औफिस बुलाया. कीर्ति जब वहां पहुंची तो उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थीं. फिर भी वह पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही. खुद को वह मां की गुमशुदगी से अनभिज्ञ और निर्दोष

बताती रही. लेकिन इंसपेक्टर सतीश ने जब उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो वह प्रश्नों के जाल में उलझ गई और उसे सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने अपनी मां की गुमशुदगी के ऊपर पड़ा रहस्यमयी परदा उठा दिया. कीर्ति रेड्डी के बयान और पुलिस जांच के अनुसार मल्लेरला रंजीता की गुमशुदगी की जो कहानी सामने आई, उस की पृष्ठभूमि कुछ इस प्रकार से थी. 19 वर्षीय कीर्ति शोख और चंचल स्वभाव की थी. वह आधुनिक विचारों वाली फैशनपरस्त युवती थी. वह माइक्रोबायलौजी से बीएससी कर रही थी. कालेज में पढ़ाई के दौरान कई लड़के उसे चाहते थे. लेकिन वह जिस की तरफ आकर्षित थी, वह था उस का बचपन का साथी चिमूला बाल रेड्डी.

बाल रेड्डी उसी इलाके का रहने वाला था, जहां कीर्ति रहती थी. बाल रेड्डी के पिता कृष्णा रेड्डी सरकारी नौकरी में थे. उन का भरापूरा परिवार था. बाल रेड्डी बी.टेक. कर चुका था. बाल रेड्डी के पिता कृष्णा और कीर्ति के पिता श्रीनिवास दोनों दूर के रिश्तेदार भी थे. एक ही इलाके में रहने के कारण एकदूसरे के घरों में अकसर आनाजाना होता रहता था. कीर्ति से सीनियर होने के कारण बाल रेड्डी कभीकभी कीर्ति की पढ़ाई में उस की मदद कर दिया करता था. यही कारण था कि जब भी वह कीर्ति के घर आता था, कीर्ति उस के साथ हिलमिल जाती थी. इसी में कब बचपना गया और जवानी ने अपना रंगरूप बदला, यह दोनों को मालूम नहीं पड़ा. उन का दोस्ती जैसा रिश्ता खत्म हो गया, उस की जगह प्यार ने ले ली.

बाल रेड्डी खातेपीते परिवार का लड़का था. उस के पास मोटरसाइकिल थी, जिस पर वह अकसर कीर्ति रेड्डी को कालेज छोड़ देता था. यही कारण था कि कीर्ति उस के प्यार में कुछ इस तरह डूब गई कि वह अपनी सीमा और मर्यादा को भी भूल गई. किशोरावस्था में ही वह गर्भवती हो गई थी. यह भूल दोनों ने एक शादी समारोह के दौरान की थी. वे अपने एक रिश्तेदार की शादी में गए थे. उन्होंने जब शादी के पंडाल में दूल्हादुलहन को देखा तो उन के मन में एक हूक सी उठी. वे भी अपने आप को दूल्हा और दुलहन समझने लगे और सुहागरात की कल्पना कर दोनों एकांत में चले गए. उस रात एक तरफ दूल्हादुलहन जहां शादी के फेरों की रस्में पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कीर्ति और बाल रेड्डी एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रहे थे. वे जिंदगी के खुमार और उन्माद में डूबे हुए थे.

इस उन्माद का नतीजा जब सामने आया तो उन के होश उड़ गए, जो उन के परिवार और समाज के लिए ठीक नहीं था. कीर्ति को गर्भ ठहर गया था. जब यह बात कीर्ति ने बाल रेड्डी को बताई तो वह भी घबराया. उन के सामने अब एक ही रास्ता था कि किसी भी तरह गर्भपात कराया जाए. बाल रेड्डी का एक दोस्त था काथा शशिकुमार. बाल रेड्डी ने कीर्ति का गर्भपात कराने के संबंध में उस से बात की. शशिकुमार ने अपनी पहचान वाले डाक्टर से कीर्ति का गर्भपात करा दिया. गर्भपात हो जाने के बाद कीर्ति रेड्डी ने अपनी इस मुसीबत से तो छुट्टी पा ली लेकिन अब वह एक दूसरी मुसीबत में फंस गई. काथा शशिकुमार उसी कालोनी में रहता था, जिस में कीर्ति रहती थी. कीर्ति के घर और शशिकुमार के घर के बीच की दूरी यही कोई 100 फुट थी. शशिकुमार एक खातेपीते परिवार का था. उस के पिता हैदराबाद के एक पौलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में नौकरी करते थे.

बाल रेड्डी और शशिकुमार दोनों बचपन के मित्र थे. दोनों ने एक ही कालेज से ग्रैजुएशन की थी. बाल रेड्डी ने बी.टेक तो शशिकुमार ने एमबीए किया था. अच्छे दोस्त होने के नाते बाल रेड्डी ने कीर्ति के मामले में शशिकुमार की मदद ली थी. पड़ोसी होने के कारण शशिकुमार भी उतना ही कीर्ति के परिवार के करीब था, जितना बाल रेड्डी था. उस के दिल के एक कोने में भी कीर्ति की तसवीर थी. वह भी कीर्ति के करीब आना चाहता था. लेकिन कीर्ति ने उसे अपने पास आने का मौका नहीं दिया था, जिस की कसक उस के दिल में बनी हुई थी. गर्भपात कराने के दौरान उसे कीर्ति के पास आने का मौका मिल गया था. कीर्ति भी उस के अहसानों के नीचे दब गई थी. शशिकुमार ने कीर्ति से कहा कि वह उस के लिए भी अपने दिल के दरवाजे खोल दे अन्यथा वह गर्भपात वाली बात जगजाहिर कर देगा.

कीर्ति ने बदनामी के डर से शशिकुमार को भी अपने दिल में जगह दे दी. अब वह शशिकुमार के साथ भी मौजमस्ती करने लगी. समय अपनी गति से चल रहा था. कीर्ति अब कई परवानों की शमां बन चुकी थी. इन के बीच 3 साल का समय कैसे निकल गया, उन्हें इस का पता ही नहीं चला. कीर्ति रेड्डी अब उन्नीसवां बसंत पार कर चुकी थी. कीर्ति को ले कर उस की मां पल्लेरला रंजीता और पिता श्रीनिवास रेड्डी को उस की शादी की चिंता थी, वे उस के लिए एक वर की तलाश में जुटे थे. इस से पहले कि उन्हें कोई वर मिलता, उन्हें चिमूला बाल रेड्डी और कीर्ति के प्यार की बात पता चल गई. तब कीर्ति रेड्डी के पिता श्रीनिवास ने बाल रेड्डी के घर वालों से मिल कर उन की शादी तय कर दी.

शादी तय होने के बाद जब कीर्ति की मां को यह बात मालूम पड़ी कि कीर्ति के नाजायज संबंध बाल रेड्डी के अलावा कालेज और इलाके के कई और युवकों से भी हैं तो उन्हें बड़ा दुख हुआ. कीर्ति का सब से गहरा रिश्ता उन के पड़ोस में रहने वाले शशिकुमार से था. शशिकुमार अकसर उन के घर आताजाता था. वह घंटों कीर्ति के साथ रहता था. उसे महंगे गिफ्ट दिया करता था. यह जान कर कीर्ति की मां के पैरों तले से जमीन खिसक गई, उन्होंने इस के लिए कीर्ति को आड़े हाथों लिया और काफी खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं, उन्होंने इस के लिए कीर्ति की पिटाई भी कर दी थी. यह बात कीर्ति और उस के प्रेमी शशिकुमार दोनों को चुभ गई. शशिकुमार की सहानुभूति पा कर कीर्ति ने अपनी आजादी और मां के बंधनों से मुक्त होने के लिए शशिकुमार के साथ मिल कर एक खतरनाक योजना बना ली.

इतना ही नहीं, पिता के बाहर जाने के बाद कीर्ति और शशिकुमार ने इस योजना को साकार भी कर दिया. घटना की रात जब शशिकुमार कीर्ति रेड्डी के घर आया तो उसे देख कीर्ति की मां पल्लेरला रंजीता ने काफी डांटाफटकारा और अपने घर से धक्का मार कर बाहर निकाल दिया. उन्होंने शशिकुमार को चेतावनी भी दी कि अगर उस ने उन के घर आने और कीर्ति से मिलने की कोशिश की तो उस से बुरा कोई नहीं होगा.  घर का माहौल गरम देख कर उस समय तो वह वहां से चला गया था, लेकिन जातेजाते शशिकुमार कीर्ति को इशारोंइशारों में समझा गया. आधी रात के बाद वह लौटा तो कीर्ति की मां पल्लेरला रंजीता अपने कमरे में जा कर सोने की कोशिश कर रही थी.

आहट सुन कर रंजीता ने करवट बदली तो शशिकुमार को देख चौंक गईं. इस के पहले कि वह अपने बिस्तर से उठ पातीं, उन की बेटी कीर्ति अपने हाथों में मिर्च का पाउडर ले आई और मां की आंखों में झोंक कर उन की छाती पर सवार हो गई. इस के बाद उस ने अपनी चुन्नी मां के गले में डाल दी. तभी शशिकुमार भी वहां आ गया. दोनों ने मिल कर उन का गला घोंट दिया. मां की हत्या करते समय कीर्ति मुसकराती रही. पल्लेरला रंजीता की हत्या के बाद दोनों ने चैन की सांस ली, क्योंकि अब उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उन्होंने लाश चादर में लपेट कर घर के एक कोने में छिपा दी. दोनों ने पहले जम कर तनमन की प्यास बुझाई और फिर पुलिस थाने में जा कर शिकायत दर्ज करवा दी.

3 दिनों तक लाश घर में ही रही. जब उस से सड़ने की गंध फैलने लगी, तब उन्हें शव को ठिकाने लगाने की चिंता सताने लगी. सब से पहले उन्होंने आत्महत्या का रूप देने के लिए लाश के गले में रस्सी बांध कर उसे पंखे से लटकाने की कोशिश की, लेकिन तब तक लाश काफी डैमेज हो चुकी थी. इसलिए वह ऐसा नहीं कर सके. इस के बाद उन्होंने उसे बाहर ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. 22 अक्तूबर, 2019 को शशिकुमार ने रात 12 बजे के करीब अपनी कार में पल्लेरला रंजीता की लाश रखी और कीर्ति के साथ उसे रमन्नापेट के नजदीक टुम्मालागूडेम के रेलवे ट्रैक पर ले गया. वहां दोनों ने कार से उतार कर लाश ट्रैक पर डाल दी ताकि ट्रेन हादसा लगे. जिस चादर में लाश लपेटी गई थी, वह चादर और रस्सी रास्ते में फेंक दी मां का मोबाइल फोन कीर्ति ने स्विच्ड औफ कर के अपने पास रख लिया था.

हत्या जैसे जघन्य अपराध के सारे सबूत मिटाने के बाद कीर्ति ने 23 अक्तूबर, 2019 को अपनी मां रंजीता रेड्डी के मोबाइल से अपनी होने वाली ससुराल में बाला के पिता कृष्णा से बात कर कहा, ‘‘समधीजी, मैं अपनी बीमारी का इलाज कराने के लिए नालकोंडा अस्पताल जा रही हूं, तब तक हमारी बेटी कीर्ति आप के यहां रहे तो आप को कोई परेशानी तो नहीं होगी.’’

कृष्णा रेड्डी ने समझा कि फोन नंबर उन की समधिन पल्लेरला रंजीता का है, इसलिए उन्होंने कह दिया कि बिटिया को आप बिना किसी चिंता के यहां भेज दो. इस के बाद 24-25 अक्तूबर को कीर्ति बाला रेड्डी के यहां रही. वहां जाने से पहले उस ने अपने पड़ोसियों व नातेरिश्तेदारों में यह अफवाह फैला दी थी कि उसे विशाखापट्टनम में कुछ काम के लिए जाना पड़ रहा है. कीर्ति और उस के दोस्त शशिकुमार ने पल्लेरला रंजीता की हत्या का जो फूलप्रूफ प्लान तैयार किया था, वह पुलिस जांचपड़ताल में खुल कर सामने आ गया. उधर रमन्नापेट रेलवे स्टेशन के नजदीक शशिकुमार ने पल्लेरला रंजीता की जो लाश फेंकी थी, वह जीआरपी ने बरामद की थी. लेकिन शिनाख्त न होने के कारण लाश का पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस ने अंतिम संस्कार कर दिया था.

कीर्ति रेड्डी से विस्तृत पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर सतीश ने 28 अक्तूबर, 2019 की सुबह कोथा शशिकुमार को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने नाबालिग उम्र में कीर्ति को गर्भवती करने वाले चिमूला बाल रेड्डी को रेप करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 376 (2), 312 और 383एन के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया था. साथ ही पोक्सो एक्ट के अंतर्गत भी मामला दर्ज किया गया. तीनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

 

Love Crime : ब्लैकमेल से परेशान प्रेमी ने शादीशुदा प्रेमिका का किया कत्ल

Love Crime : कंचन शादीशुदा थी. उस के मायके वालों और ससुराल पक्ष, खासकर पति ने उसे हौस्टल में रह कर एएनएम का कोर्स करने की इजाजत दी तो उसे उन लोगों का मान रखना चाहिए था. लेकिन कंचन ने जब पूर्वप्रेमी आनंद किशोर के साथ रंगरलियां मनानी शुरू कीं तो…

सैफई थानाप्रभारी चंद्रदेव यादव अपने कक्ष में बैठे थे, तभी 30-32 साल का एक युवक उन के पास आया. वह घबराया हुआ था. उस के माथे पर भय और चिंता की लकीरें थीं. थानाप्रभारी के पूछने पर उस ने बताया, ‘‘सर, मेरा नाम अनुपम है. मैं मूलरूप से मैनपुरी जिले के किशनी थानांतर्गत गांव खड़ेपुर का रहने वाला हूं. मेरी पत्नी कंचन सैफई के चिकित्सा विश्वविद्यालय के पैरा मैडिकल कालेज में हौस्टल में रह कर नर्सिंग की

पढ़ाई कर रही थी. 2 दिनों से वह लापता है. उस का कहीं भी पता नहीं चल

रहा है.’’

‘‘तुम ने पता करने की कोशिश की कि वह अचानक कहां लापता हो गई?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं गुरुग्राम (हरियाणा) में प्राइवेट नौकरी करता हूं. कंचन से मेरी हर रोज बात होती थी. 24 सितंबर, 2019 को भी दोपहर करीब पौने 2 बजे मेरी उस से बात हुई थी. लेकिन उस के बाद बात नहीं हुई. मैं शाम से ले कर देर रात तक उस से बात करने की कोशिश करता रहा, पर उस का फोन बंद था.

‘‘आशंका हुई तो मैं सैफई आ कर हौस्टल गया तो पता चला कि कंचन 24 सितंबर को 2 बजे हौस्टल से यह कह कर निकली थी कि वह अस्पताल जा रही है. उस के बाद वह हौस्टल नहीं लौटी. इस के बाद मैं ने कंचन की हर संभावित जगह पर खोज की लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. सर, आप मेरी रिपोर्ट दर्ज कर मेरी पत्नी को खोजने में मदद करें.’’ अनुपम ने कहा. सैफई मैडिकल कालेज के हौस्टल से नर्सिंग छात्रा का अचानक गायब हो जाना वास्तव में एक गंभीर मामला था. थानाप्रभारी चंद्रदेव ने आननफानन में कंचन की गुमशुदगी दर्ज कर सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. यह 26 सितंबर, 2019 की बात है.

इस के बाद थानाप्रभारी ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनुपम, तुम्हारी पत्नी का चरित्र कैसा था? कहीं उस का किसी से कोई चक्कर तो नहीं चल रहा था?’’

‘‘नहीं सर, उस का चरित्र ठीकठाक था. वैसे भी वह अपना कैरियर दांव पर लगा कर किसी के साथ नहीं जा सकती.’’ अनुपम बोला, ‘‘सर, मुझे लगता है कि गलत इरादे से किसी ने उस का अपरहण कर लिया है.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ यादव ने अनुपम से पूछा.

‘‘नहीं सर, मेरा किसी से झगड़ा नहीं है. इसलिए किसी पर शक भी नहीं है.’’ अनुपम ने बताया.

अनुपम से पूछताछ के बाद चंद्रदेव यादव सैफई मैडिकल कालेज पहुंचे. वहां जा कर उन्होंने हौस्टल की वार्डन भारती से पूछताछ की. भारती ने बताया कि कंचन का व्यवहार बहुत अच्छा था. वह अपनी साथी छात्राओं के साथ मिलजुल कर रहती थी. 24 सितंबर को दोपहर 2 बजे वह हौस्टल से अस्पताल गई थी, लेकिन अस्पताल नहीं पहुंची. हौस्टल और अस्पताल के बीच उस के साथ कुछ हुआ है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है. अस्पताल प्रशासन भी अपने स्तर से कंचन की खोज में जुटा है. पर उस का पता नहीं चल पा रहा है.

थानाप्रभारी चंद्रदेव यादव ने मैडिकल कालेज में जांचपड़ताल की तो पता चला कालेज में कंचन ने वर्ष 2017-18 सत्र में एएनएम प्रशिक्षण हेतु नर्सिंग छात्रा के रूप में प्रवेश लिया था. वह इस साल अंतिम वर्ष की छात्रा थी. वह व्यवहारकुशल थी. यादव ने कंचन के साथ प्रशिक्षण प्राप्त कर रही कई छात्राओं से पूछताछ की तो उन्होंने उसे बेहद शालीन और मृदुभाषी बताया. साथी छात्राओं ने इस बात को भी नकारा कि उस का किसी से विशेष मेलजोल था.

थानाप्रभारी ने हौस्टल वार्डन भारती के सहयोग से कंचन के हौस्टल रूम की तलाशी ली, लेकिन रूम में कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली. न ही कोई ऐसा प्रेमपत्र मिला, जिस से पता चलता कि उस का किसी से प्रेम संबंध था. हौस्टल व कालेज के बाहर कई दुकानदारों से भी यादव ने पूछताछ की लेकिन उन्हें कंचन के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कंचन कहां चली गई. थानाप्रभारी चंद्रदेव यादव ने कंचन की ससुराल खड़ेपुर जा कर उस के ससुराल वालों से पूछताछ की, लेकिन उन्होंने पुलिस का सहयोग नहीं किया. उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि कंचन ससुराल में बहुत कम रही है. वह या तो मायके में रही या फिर हौस्टल में. इसलिए उस के बारे में कुछ भी नहीं बता सकते.

कंचन का मायका इटावा जिले के थाना जसवंत नगर के गांव जगसौरा में था. यादव जगसौरा पहुंचे और कंचन के पिता शिवपूजन तथा मां उमादेवी से पूछताछ की. कंचन के मातापिता के लापता होने से दुखी तो थे, लेकिन उस के संबंध में जानकारी देने में संकोच कर रहे थे. जब वहां से भी कंचन के बारे में कोई काम की बात पता नहीं चली तो वह थाने लौट आए. अनुपम, पत्नी के लापता होने से बेहद परेशान था. जसवंत नगर, सैफई, इटावा जहां से भी अखबार के माध्यम से उसे अज्ञात महिला की लाश मिलने की खबर मिलती, वह वहां पहुंच जाता. धीरेधीरे 10 दिन बीत गए. लेकिन पुलिस कंचन का पता लगाने में नाकाम रही. अनुपम हर दूसरेतीसरे दिन थाना सैफई पहुंच जाता और पत्नी के संबंध में थानाप्रभारी से सवालजवाब करता. चंद्रदेव उसे सांत्वना दे कर भेज देते थे.

जब अनुपम के सब्र का बांध टूट गया तो वह एसपी (ग्रामीण) ओमवीर सिंह के औफिस पहुंचा. उस ने उन्हें अपनी पत्नी के गायब होने की बात बता दी. नर्सिंग छात्रा कंचन के लापता होने की जानकारी ओमवीर सिंह को पहले से ही थी. वह इस मामले की मौनिटरिंग भी कर रहे थे, ओमवीर सिंह ने अनुपम को आश्वासन दिया कि पुलिस जल्द ही उस की लापता पत्नी की खोज करेगी. आश्वासन पा कर अनुपम वापस लौट आया. एसपी (ग्रामीण) ओमवीर सिंह ने लापता कंचन को खोजने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया. इस टीम में उन्होंने सैफई थानाप्रभारी चंद्रदेव यादव, एसआई राजवीर सिंह, वासुदेव सिंह, विपिन कुमार, महिला एसआई अंजलि तिवारी, सर्विलांस प्रभारी सत्येंद्र सिंह, कांस्टेबल अभिनव यादव तथा सर्वेश कुमार को शामिल किया. टीम की कमान खुद एसपी (ग्रामीण) ओमवीर सिंह ने संभाली.

विशेष टीम ने सब से पहले कंचन के पति अनुपम तथा उस के मातापिता से पूछताछ की. इस के बाद टीम ने कंचन के मातापिता तथा पड़ोस के लोगों से जानकारी हासिल की. टीम को आशंका थी कि कंचन का अपहरण दुष्कर्म करने के लिए किया जा सकता है. अत: टीम ने क्षेत्र के इस प्रवृत्ति के कुछ अपराधियों को पकड़ कर उन से पूछताछ की, लेकिन कंचन के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. सर्विलांस प्रभारी सत्येंद्र सिंह ने कंचन का मोबाइल फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया, ताकि कोई जानकारी मिल सके पर मोबाइल फोन बंद होने से कोई जानकारी नहीं मिल सकी. इधर थानाप्रभारी, एसआई अंजलि तिवारी व टीम के अन्य सदस्यों के साथ मैडिकल कालेज पहुंचे और कंचन के हौस्टल रूम की एक बार फिर छानबीन की. गहन छानबीन के दौरान उन्हें वहां मोबाइल फोन के 2 खाली डिब्बे मिले. दोनों डिब्बे उन्होंने सुरक्षित रख लिए.

टीम ने सैफई मैडिकल यूनिवर्सिटी के कुलसचिव सुरेशचंद्र शर्मा से भी बात की. साथ ही अन्य कई लोगों से भी कंचन के संबंध में जानकारी जुटाई. कुलसचिव कहा कि वह स्वयं भी कंचन के लापता होने से चिंतित हैं, क्योंकि यह उन की प्रतिष्ठा का सवाल है. महिला एसआई अंजलि तिवारी ने कंचन के हौस्टल रूम से बरामद दोनों डिब्बों पर अंकित आईएमईआई नंबरों की जांच की तो पता चला कि इन आईएमईआई नंबरों के दोनों फोनों में 2 सिम नंबर काम कर रहे थे. एक फोन का सिम कंचन के नाम से खरीदा गया था, जबकि दूसरा आनंद किशोर पुत्र हाकिम सिंह, निवासी नगला महाजीत सिविल लाइंस इटावा के नाम से खरीदा गया था.

पुलिस टीम 12 अक्तूबर, 2019 की रात को आनंद किशोर के घर पहुंच गई. वह घर पर ही मिल गया तो पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. थाना सैफई ला कर आनंद किशोर से पूछताछ शुरू की गई. तब आनंद किशोर ने बताया, ‘‘सर, मैं किसी कंचन नाम की लड़की को नहीं जानता.’’

‘‘तुम सरासर झूठ बोल रहे हो. तुम कंचन को अच्छी तरह जानते हो. तुम्हारे द्वारा दिया गया मोबाइल फोन का डिब्बा उस के हौस्टल रूम से बरामद हुआ है. अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि सारी सच्चाई बता दो वरना…’’

थानाप्रभारी चंद्रदेव का कड़ा रुख देख कर आनंद किशोर डर गया. वह बोला, ‘‘सर, यह सच है कि मैं ने ही बात करने के लिए उसे मोबाइल फोन खरीद कर दिया था.’’

‘‘तो बताओ कंचन कहां है? उसे तुम ने कहां छिपा कर रखा है?’’ यादव ने पूछा.

‘‘सर, कंचन अब इस दुनिया में नहीं है. मैं ने उस की हत्या कर दी है.’’ आनंद ने बताया.

‘‘क्याऽऽ कंचन को मार डाला?’’ वह चौंके.

‘‘हां सर, मैं ने कचंन की हत्या कर दी है. मैं जुर्म कबूल करता हूं.’’

‘‘उस की लाश कहां है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, लाश मैं ने भितौरा नहर में फेंक दी थी. फिर उस के दोनों मोबाइल तोड़ कर जगसौरा बंबा के पास फेंक दिए थे. खून से सने अपने कपड़े, शर्ट, पैंट तथा तौलिया भी वहीं जला दिए थे, चाकू भी वहीं फेंक दिया था.’’

इस के बाद पुलिस टीम ने आनंद किशोर की निशानदेही पर जगसौरा बंबा के पास से 2 टूटे मोबाइल तथा आलाकत्ल चाकू बरामद कर लिया. इस के बाद पुलिस टीम आनंद किशोर को साथ ले कर जसवंत नगर क्षेत्र की भितौरा नहर पहुंची. वहां आनंद किशोर ने नहर किनारे जलाए गए अधजले कपड़े बरामद करा दिए. हत्या में इस्तेमाल आनंद किशोर की ओमनी कार भी पुलिस ने उस के घर से बरामद कर ली. आनंद किशोर की निशानदेही पर पुलिस ने अब तक मोबाइल फोन, चाकू, अधजले कपडे़ तथा हत्या में प्रयुक्त कार तो बरामद कर ली थी, लेकिन कंचन की लाश बरामद नहीं हो पाई थी.

अत: लाश बरामद करने के लिए पुलिस आनंद को एक बार फिर भितौरा नहर ले गई, जहां उस ने लाश फेंकने की बात कही थी, वहां तलाश कराई. लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी कंचन की लाश बरामद नहीं हो सकी. चूंकि आनंद किशोर ने कंचन की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और हत्या में इस्तेमाल कार तथा चाकू भी बरामद करा दिया था, इसलिए थानाप्रभारी चंद्रदेव यादव ने गुमशुदगी के इस मामले को हत्या में तरमीम कर दिया और भादंवि की धारा 302, 201 के तहत आनंद किशोर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

थानाप्रभारी ने कंचन की हत्या का परदाफाश करने तथा उस के कातिल को पकड़ने की जानकारी एसपी (ग्रामीण) ओमवीर सिंह को दे दी. उन्होंने पुलिस लाइंस सभागार में प्रैसवार्ता की और हत्यारोपी को मीडिया के सामने पेश कर नर्सिंग छात्रा कंचन की हत्या का खुलासा कर दिया. उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के थाना जसवंतनगर क्षेत्र में एक गांव है जगसौरा. इसी गांव में शिवपूजन अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी उमा देवी के अलावा 2 बेटियां कंचन, सुमन तथा एक बेटा राहुल था. शिवपूजन खेतीकिसानी करते थे. उन की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. शिवपूजन के तीनों बच्चों में कंचन सब से बड़ी थी. वह खूबसूरत तो थी ही, पढ़नेलिखने में भी तेज थी. उस ने गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कालेज जसवंतनगर से इंटरमीडिएट साइंस विषय से प्रथम श्रेणी में पास किया था.

कंचन पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, जबकि उस की मां उमा देवी उस की पढ़ाई बंद कर के कामकाज में लगाना चाहती थी. उमा देवी का मानना था कि ज्यादा पढ़ीलिखी लड़की के लिए घरवर तलाशने में परेशानी होती है. लेकिन बेटी की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. कंचन ने इटावा के महिला महाविद्यालय में बीएससी में दाखिला ले लिया. बीएससी की पढ़ाई के दौरान ही एक रोज कंचन की निगाह अखबार में छपे विज्ञापन पर पड़ी. विज्ञापन द्रोपदी देवी इंटर कालेज नगला महाजीत सिविल लाइंस, इटावा से संबंधित था. कालेज को जूनियर सेक्शन में विज्ञान शिक्षिका की आवश्यकता थी.

विज्ञापन पढ़ने के बाद कंचन ने शिक्षिका पद के लिए आवेदन करने का निश्चय किया. उस ने सोचा कि पढ़ाने से एक तो उस का ज्ञानवर्द्धन होगा, दूसरे उस के खर्चे लायक पैसे भी मिल जाएंगे. कंचन ने अपने मातापिता से इस नौकरी के लिए अनुमति मांगी तो उन्होंने उसे अनुमति दे दी. कंचन ने द्रोपदी देवी इंटर कालेज में शिक्षिका पद हेतु आवेदन किया तो प्रबंधक हाकिम सिंह ने उस का चयन कर लिया. हाकिम सिंह इटावा शहर के सिविल लाइंस थानांतर्गत नगला महाजीत में रहते थे. यह उन का ही कालेज था. कंचन इस कालेज में कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों को विज्ञान पढ़ाने लगी. कंचन पढ़नेपढ़ाने में लगनशील थी, इसलिए कुछ महीने बाद वह बच्चों की प्रिय टीचर बन गई.

इसी स्कूल में एक रोज आनंद किशोर की निगाह खूबसूरत कंचन पर पड़ी. आनंद किशोर कालेज प्रबंधक हाकिम सिंह का बेटा था. हाकिम सिंह कालेज के प्रबंधक जरूर थे, लेकिन कालेज की देखरेख आनंद किशोर ही करता था. कंचन हुस्न और शबाब की बेमिसाल मूरत थी. उसे देख कर आनंद किशोर उस पर मोहित हो गया. वह उसे दिलोजान से चाहने लगा. कंचन यह जानती थी कि आनंद किशोर कालेज मालिक का बेटा है, इसलिए उस ने भी उस की तरफ कदम बढ़ाने में अपनी भलाई समझी. उसे लगा कि आनंद ही उस के सपनों का राजकुमार है. जब चाहतें दोनों की पैदा हुईं तो प्यार का बीज अंकुरित हो गया.

कंचन आनंद के साथ घूमनेफिरने लगी. इस दौरान उन के बीच अवैध संबंध भी बन गए. आनंद के प्यार में कंचन ऐसी दीवानी हुई कि घर भी देरसवेर पहुंचने लगी. मां उसे टोकती तो कोई न कोई बहाना बना देती. उमा देवी उस की बात पर सहज ही विश्वास कर लेती थी. लेकिन विश्वास की भी कोई सीमा होती है. कंचन जब आए दिन देरी से घर पहुंचने लगी तो उमा देवी का माथा ठनका. उस ने पति शिवपूजन को कंचन पर नजर रखने को कहा. शिवपूजन ने कंचन की निगरानी की तो जल्द ही सच्चाई सामने आ गई. उन्हें पता चला कि कंचन कालेज प्रबंधक के बेटे आनंद किशोर के प्रेम जाल में फंस गई है और उसी के साथ गुलछर्रे उड़ाती है.

शिवपूजन ने इस सच्चाई से पत्नी को अवगत कराया तो उमा देवी ने माथा पीट लिया. पतिपत्नी ने इस मुद्दे पर विचारविमर्श किया और बदनामी से बचने के लिए कंचन का विवाह जल्दी करने का निश्चय किया. तब तक कंचन बीएससी पास कर चुकी थी, इसलिए मां ने एक दिन उस से कहा, ‘‘कंचन, अब तेरा बीएससी पूरा हो चुका है. अब स्कूल में पढ़ाना छोड़ दे. प्राइवेट नौकरी से तेरा भला होने वाला नहीं है.’’

कंचन ने कुछ कहना चाहा तो मां ने बात साफ कर दी, ‘‘क्या यह सच नहीं है कि तेरे और आनंद के बीच गलत रिश्ता है. तुम दोनों के प्यार के चर्चे पूरे स्कूल में हो रहे हैं, इसलिए अब तू उस स्कूल में पढ़ाने नहीं जाएगी.’’

उमा देवी ने जो कहा था, वह सच था. स्कूल प्रबंधक हाकिम सिंह भी उसे सावधान कर चुके थे. पर अपने बेटे आनंद के कारण वह उसे स्कूल से निकाल नहीं पा रहे थे. चूंकि सच्चाई सामने आ गई थी. इसलिए कंचन ने भी स्कूल छोड़ने का मन बना लिया. उस ने इस बात से आनंद किशोर को भी अवगत करा दिया. चूंकि बेटी के बहकते कदमों से शिवपूजन परेशान थे, इसलिए उन्होंने कंचन के लिए घरवर की तलाश शुरू कर दी. कुछ महीने की भागदौड़ के बाद उन्हें एक लड़का पसंद आ गया. लड़के का नाम था अनुपम कुमार.

अनुपम कुमार के पिता रामशरण मैनपुरी जिले के किशनी थानांतर्गत गांव खड़ेपुर के रहने वाले थे. 3 भाईबहनों में अनुपम कुमार सब से बड़ा था. रामशरण के पास 5 बीघा जमीन थी. उसी की उपज से परिवार का भरणपोषण होता था. अनुपम गुरुग्राम (हरियाणा) में प्राइवेट नौकरी करता था. दोनों तरफ से बातचीत हो जाने के बाद 7 फरवरी, 2014 को धूमधाम से कंचन का विवाह अनुपम के साथ हो गया. शादी के एक महीने बाद जब अनुपम नौकरी पर चला गया तो कंचन मायके आ गई. कंचन कुछ दिन बाद आनंद से मिली तो उस ने शादी करने को ले कर शिकवाशिकायत की. कंचन ने उसे धीरज बंधाया कि जिस तरह वह उसे शादी के पहले प्यार करती थी, वैसा ही करती रहेगी.

कंचन जब भी मायके आती, आनंद के साथ खूब मौजमस्ती करती. आनंद किशोर के माध्यम से कंचन अपना भविष्य भी बनाना चाहती थी, वह मैडिकल लाइन में जाने के लिए प्रयासरत थी. दरअसल, वह एएनएम बनना चाहती थी. इधर पिता के दबाव में आनंद किशोर ने भी ऊषा नाम की खूबसूरत युवती से शादी कर ली. लेकिन खूबसूरत पत्नी पा कर भी आनंद किशोर कंचन को नहीं भुला पाया. वह उस से संपर्क बनाए रहा. आनंद किशोर के पास ओमनी कार थी. इसी कार से वह कंचन को कभी आगरा तो कभी बटेश्वर घुमाने ले जाता था. आनंद की पत्नी ऊषा को उस के और कंचन के नाजायज रिश्तों की जानकारी नहीं थी. वह तो पति को दूध का धुला समझती थी.

सन 2017-18 में कंचन का चयन बीएससी नर्सिंग के 2 वर्षीय एएनएम प्रशिक्षण के लिए हो गया. सैफई मैडिकल कालेज में कंचन एएनएम की ट्रैनिंग करने लगी. वह वहीं के हौस्टल में रहने भी लगी. कंचन का जब कहीं बाहर घूमने का मन करता तो वह प्रेमी आनंद को फोन कर बुला लेती थी. आनंद अपनी कार ले कर कंचन के मैडिकल कालेज पहुंच जाता, फिर दोनों दिन भर मस्ती करते. आनंद कंचन की भरपूर आर्थिक भी मदद करता था और उस की सभी डिमांड भी पूरी करता था. आनंद ने कंचन को एक महंगा मोबाइल भी खरीद कर दिया था. इसी मोबाइल से वह आनंद से बात करती थी.

कंचन आनंद किशोर से प्यार जरूर करती थी, लेकिन उस का अपने पति अनुपम कुमार से भी खूब लगाव था. वह हर रोज पति से बतियाती थी. अनुपम भी उस से मिलने उस के कालेज आताजाता रहता था. इस तरह कंचन ने एएनएम प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर द्वितीय वर्ष में प्रवेश ले लिया. कंचन और उस के प्रेमी आनंद किशोर के रिश्तों में दरार तब पड़ी, जब आनंद ने शहरी क्षेत्र में 5-6 लाख की जमीन अपनी पत्नी ऊषा के नाम खरीदी. यह जमीन खरीदने की जानकारी जब कंचन को हुई तो उस ने विरोध जताया, ‘‘आनंद, ऊषा तुम्हारी घरवाली है तो मैं भी तो बाहरवाली हूं. मुझे भी 3 लाख रुपए चाहिए.’’

धीरेधीरे कंचन आनंद को ब्लैकमेल करने पर उतर आई. अब जब भी दोनों मिलते, कंचन रुपयों की डिमांड करती. असमर्थता जताने पर कंचन दोनों के रिश्तों को सार्वजनिक करने तथा ऊषा को सब कुछ बताने की धमकी देती. कंचन की ब्लैकमेलिंग और धमकी से आनंद घबरा गया. आखिर उस ने इस समस्या से निजात पाने के लिए कंचन की हत्या करने की योजना बना ली. 24 सितंबर, 2019 की दोपहर आनंद किशोर ने कंचन को घूमने के लिए राजी किया. फिर पौने 2 बजे वह अपनी कार ले कर सैफई मैडिकल कालेज पहुंच गया. कंचन हौस्टल से यह कह कर निकली कि वह हौस्पिटल जा रही है. लेकिन वह आनंद किशोर की कार में बैठ कर घूमने निकल गई. आनंद उसे बटेश्वर ले कर गया और कई घंटे सैरसपाटा कराता रहा.

वापस लौटते समय कंचन ने उस से पैसों की डिमांड की. इस बात को ले कर दोनों में कहासुनी भी हुई. तब तक शाम के 7 बज चुके थे और अंधेरा छाने लगा था. आनंद किशोर ने अपनी कार जसवंतनगर क्षेत्र के भितौरा नहर पर रोकी और फिर सीट पर बैठी कंचन को दबोच कर उसे चाकू से गोद डाला. हत्या करने के बाद उस ने कंचन के शव को नहर में फेंक दिया. फिर वहीं नहर की पटरी किनारे खून से सने कपडे़ जला दिए. वहां से चल कर आनंद ने जगसौरा बंबा पर कार रोकी. वहां उस ने कंचन के दोनों मोबाइल फोन तोड़ कर झाड़ी में फेंक दिए. साथ ही खून सना चाकू भी झाड़ी में फेंक दिया. इस के बाद वह वापस घर आ गया. किसी को कानोंकान खबर नहीं लगी कि उस ने हत्या जैसी वारदात को अंजाम दिया है.

24 सितंबर को करीब पौने 2 बजे अनुपम कुमार की कंचन से बात हुई थी. उस के बाद जब बात नहीं हुई तो वह सैफई आ गया और कंचन की गुमशुदगी दर्ज कराई. सैफई पुलिस 18 दिनों तक लापता कंचन का पता लगाने में जुटी रही. उस के बाद हत्या का खुलासा हुआ. लेकिन कंचन की लाश फिर भी बरामद नहीं हुई. 14 अक्तूबर, 2019 को थाना सैफई पुलिस ने हत्यारोपी आनंद किशोर को इटावा कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट ए.के. सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. सैफई पुलिस कंचन की लाश बरामद करने के प्रयास में जुटी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Rajasthan Crime : ठेकदारों को पैसा नहीं दिया तो कर लिया अपहरण

Rajasthan Crime : नैचुरल पावर एशिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को बाड़मेर के गांव उत्तरलाई में सोलर प्लांट लगाना था. इस के लिए नैचुरल पावर कंपनी ने बंगलुरु की सबलेट कंपनी को ठेका दिया, जो काम अधूरा छोड़ कर भाग गई. प्लांट की स्थिति जानने के लिए जब हैदराबाद से कंपनी के एमडी के. श्रीकांत रेड्डी अपने दोस्त सुरेश रेड्डी के साथ बाड़मेर आए तो…    

हैदराबाद निवासी के. श्रीकांत रेड्डी नैचुरल पावर एशिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर थे. हैदराबाद की यह कंपनी भारत के विभिन्न राज्यों में सरकारी कामों का ठेका ले कर काम करती है. इस कंपनी को राजस्थान के जिला बाड़मेर के अंतर्गत आने वाले उत्तरलाई गांव के पास सोलर प्लांट के निर्माण कार्य का ठेका मिला था. बड़ी कंपनियां प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए छोटीछोटी कंपनियों को अलगअलग काम का ठेका दे देती हैं. नैचुरल पावर एशिया प्रा. लि. कंपनी ने भी इस सोलर प्लांट प्रोजेक्ट का टेंडर सबलेट कर दिया था

बंगलुरू की इस सबलेट कंपनी ने बाड़मेर और स्थानीय ठेकेदारों को प्लांट का कार्य दे दिया. ठेकेदार काम करने में जुट गएतेज गति से काम चल रहा था कि इसी बीच नैचुरल पावर एवं सबलेट कंपनी के बीच पैसों को ले कर विवाद हो गया. ऐसे में सबलेट कंपनी रातोंरात काम अधूरा छोड़ कर स्थानीय ठेकेदारों का लाखों रुपयों का भुगतान किए बिना भाग खड़ी हुई. स्थानीय ठेकेदारों को जब पता चला कि सबलेट कंपनी उन का पैसा दिए बगैर भाग गई है तो उन के होश उड़ गए क्योंकि सबलेट कंपनी ने इन ठेकेदारों से करोड़ों का काम करवाया था, मगर रुपए आधे भी नहीं दिए थे. स्थानीय ठेकेदार नाराज हो गए. उन्होंने एमइएस के अधिकारियों से मिल कर अपनी पीड़ा बताई. एमइएस को इस सब से कोई मतलब नहीं था.

मगर जब काम बीच में ही रुक गया तो एमईएस ने मूल कंपनी नैचुरल पावर एशिया प्रा. लि. से कहा कि वह रुके हुए प्रोजेक्ट को पूरा करे. तब कंपनी ने अपने एमडी के. श्रीकांत रेड्डी को हैदराबाद से उत्तरलाई (बाड़मेर) काम देखने पूरा करने के लिए भेजा. के. श्रीकांत रेड्डी अपने मित्र सुरेश रेड्डी के साथ उत्तरलाई (बाड़मेर) पहुंच गए. यह बात 21 अक्तूबर, 2019 की है. वे दोनों राजस्थान के उत्तरलाई में पहुंच चुके थे. जब ठेकेदारों को यह जानकारी मिली तो उन्होंने अपना पैसा वसूलने के लिए दोनों का अपहरण कर के फिरौती के रूप में एक करोड़ रुपए वसूलने की योजना बनाई.

ठेकेदारों ने अपने 3 साथियों को लाखों रुपए का लालच दे कर इस काम के लिए तैयार कर लिया. यह 3 व्यक्ति थे. शैतान चौधरी, विक्रम उर्फ भीखाराम और मोहनराम. ये तीनों एक योजना के अनुसार 22 अक्तूबर को के. श्रीकांत रेड्डी और सुरेश रेड्डी से उन की मदद करने के लिए मिलेश्रीकांत रेड्डी एवं सुरेश रेड्डी मददगारों के झांसे में गए. तीनों उन के साथ घूमने लगे और उसी शाम उन्होंने के. श्रीकांत और सुरेश रेड्डी का अपहरण कर लिया. अपहर्त्ताओं ने सुनसान रेत के धोरों में दोनों के साथ मारपीट की, साथ ही एक करोड़ रुपए की फिरौती भी मांगी

अपहर्त्ताओं ने उन्हें धमकाया कि अगर रुपए नहीं दिए तो उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. अनजान जगह पर रेड्डी दोस्त बुरे फंस गए थे. ऐसे में क्या करें, यह बात उन की समझ में नहीं रही थी. दोनों दोस्त तेलुगु भाषा में एकदूसरे को तसल्ली दे रहे थेचूंकि अपहर्त्ता केवल हिंदी और राजस्थान की लोकल भाषा ही जानते थे, इसलिए रेड्डी बंधुओं की भाषा नहीं समझ पा रहे थे. यह बात रेड्डी बंधुओं के लिए ठीक थी. इसलिए वे अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूटने की योजना बनाने लगेअपहर्त्ता मारपीट कर के दिन भर उन्हें इधरउधर रेत के धोरों में घुमाते रहे. इस के बाद एक अपहर्त्ता ने के. श्रीकांत रेड्डी से कहा, ‘‘एमडी साहब अगर आप एमडी हो तो अपने घर वालों के लिए हो, हमारे लिए तो सोने का अंडा देने वाली मुरगी हो.

इसलिए अपने घर पर फोन कर के एक करोड़ रुपए हमारे बैंक खाते में डलवा दो, वरना आप की जान खतरे में पड़ सकती है.’’ कह कर उस ने फोन के श्रीकांत रेड्डी को दे दिया. श्रीकांत रेड्डी बहुत होशियार और समझदार व्यक्ति थे. वह फर्श से अर्श तक पहुंचे थे. उन्होंने गरीबी देखी थी. गरीबी से उठ कर वह इस मुकाम तक पहुंचे थेश्रीकांत करोड़पति व्यक्ति थे. वह चाहते तो करोड़ रुपए अपहर्त्ताओं को फिरौती दे कर खुद को और अपने दोस्त सुरेश रेड्डी को मुक्त करा सकते थे, मगर वह डरपोक नहीं थे. वह किसी भी कीमत पर फिरौती दे कर अपने दोस्त और खुद की जान बचाना चाहते थे

अपहत्ताओं ने अपने मोबाइल से के. श्रीकांत रेड्डी के पिता से उन की बात कराई. श्रीकांत रेड्डी ने तेलुगु भाषा में अपने पिताजी से बात कर कहा, ‘‘डैडी, मेरा और सुरेश का उत्तरलाई (बाड़मेर) के 3 लोगों ने अपहरण कर लिया है और एक करोड़ रुपए की फिरौती मांग रहे हैं. आप इन के खाते में किसी भी कीमत पर रुपए मत डालना

‘‘जिस बैंक में मेरा खाता है, वहां के बैंक मैनेजर से मेरी बात कराना. आप चिंता मत करना, ये लोग हमारा बाल भी बांका नहीं करेंगे. हमें मारने की सिर्फ धमकियां दे सकते हैं ताकि रुपए ऐंठ सकें. आप बैंक जा कर मैनेजर से मेरी बात कराना. बाकी मैं देख लूंगा.’’

इस स्थिति में भी उन्होंने धैर्य और साहस से काम लिया. उन्होंने नैचुरल पावर कंपनी के अन्य अधिकारियों को भी यह बात बता दी. इस के बाद वह कंपनी के अधिकारियों के साथ हैदराबाद की उस बैंक में पहुंचे, जहां श्रीकांत रेड्डी का खाता थाश्रीकांत रेड्डी ने बैंक मैनेजर को मोबाइल पर सारी बात बता कर कहा, ‘‘मैनेजर साहब, मैं अपने दोस्त के साथ बाड़मेर में कंपनी का काम देखने आया था, लेकिन मददगार बन कर आए 3 लोगों ने हमारा अपहरण कर लिया और एक करोड़ की फिरौती मांग रहे हैं. आप से मेरा निवेदन है कि आप 25 लाख रुपए का आरटीजीएस करवा दो

‘‘लेकिन ध्यान रखना कि यह धनराशि जारी करते ही तुरंत रद्द हो जाए. ताकि अपहर्त्ताओं को धनराशि खाते में आने का मैसेज उन के फोन पर मिल जाए लेकिन बदमाशों को रुपए नहीं मिले.’’ उन्होंने यह बात तेलुगु और अंग्रेजी में बात की थी, जिसे अपहर्त्ता नहीं समझ सके. बैंक मैनेजर ने ऐसा ही किया. बदमाशों से एमडी के पिता और कंपनी के अधिकारी लगातार बात करते रहे और झांसा देते रहे कि जैसे ही 75 लाख रुपए का जुगाड़ होता है, उन के खाते में डाल दिए जाएंगे. चूंकि एक अपहर्त्ता के फोन पर खाते में 25 लाख रुपए जमा होने का मैसेज गया था इसलिए वह मान कर चल रहे थे कि उन्हें 25 लाख रुपए तो मिल चुके हैं और बाकी के 75 लाख भी जल्द ही मिल जाएंगे

अपहर्त्ताओं ने के. श्रीकांत रेड्डी से स्टांप पेपर पर भी लिखवा लिया था कि वह ये पैसा ठेके के लिए दे रहे हैं. अपहर्त्ता अपनी योजना से चल रहे थे, वहीं एमडी, उन के पिता और कंपनी मैनेजर अपनी योजना से चल रहे थे. उधर नैचुरल पावर कंपनी के अधिकारी ने 24 अक्तूबर, 2019 को हैदराबाद से बाड़मेर पुलिस कंट्रोल रूम को कंपनी के एमडी के. श्रीकांत रेड्डी और उन के दोस्त सुरेश रेड्डी के अपहरण और अपहत्ताओं द्वारा एक करोड़ रुपए फिरौती मांगे जाने की जानकारी दे दी. कंपनी अधिकारी ने वह मोबाइल नंबर भी पुलिस को दे दिया, जिस से अपहर्त्ता उन से बात कर रहे थे

बाड़मेर पुलिस कंट्रोल रूम ने यह जानकारी बाड़मेर के एसपी शरद चौधरी को दी. एसपी शरद चौधरी ने उसी समय बाड़मेर एएसपी खींव सिंह भाटी, डीएसपी विजय सिंह, बाड़मेर थाना प्रभारी राम प्रताप सिंह, थानाप्रभारी (सदर) मूलाराम चौधरी, साइबर सेल प्रभारी पन्नाराम प्रजापति, हैड कांस्टेबल महीपाल सिंह, दीपसिंह चौहान आदि की टीम को अपने कार्यालय बुलायाएसपी शरद चौधरी ने पुलिस टीम को नैचुरल पावर कंपनी के एमडी और उन के दोस्त का एक करोड़ रुपए के लिए अपहरण होने की जानकारी दी उन्होंने अतिशीघ्र उन दोनों को सकुशल छुड़ाने की काररवाई करने के निर्देश दिए. उन्होंने टीम के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी एएसपी खींव सिंह भाटी को.

इस टीम ने तत्काल अपना काम शुरू कर दिया. साइबर सेल और पुलिस ने कंपनी के मैनेजर द्वारा दिए गए मोबाइल नंबरों की काल ट्रेस की तो पता चला कि उन नंबरों से जब काल की गई थी, तब उन की लोकेशन सियाणी गांव के पास थीबस, फिर क्या था. बाड़मेर पुलिस की कई टीमों ने अलगअलग दिशा से सियाणी गांव की उस जगह को घेर लिया जहां से अपहत्ताओं ने काल की थी. पुलिस सावधानीपूर्वक आरोपियों को दबोचना चाहती थी, ताकि एमडी और उन के साथी सुरेश को सकुशल छुड़ाया जा सके

पुलिस के पास यह जानकारी नहीं थी कि अपहर्त्ताओं के पास कोई हथियार वगैरह है या नहीं? पुलिस टीमें सियाणी पहुंची तो अपहर्ता सियाणी से उत्तरलाई होते हुए बाड़मेर पहुंच गए. आगेआगे अपहर्त्ता एमडी रेड्डी और उन के दोस्त सुरेश रेड्डी को गाड़ी में ले कर चल रहे थे. उन के पीछेपीछे पुलिस की टीमें थींएसपी शरद चौधरी के निर्देश पर बाड़मेर शहर और आसपास की थाना पुलिस ने रात से ही नाकाबंदी कर रखी थी. अपहर्त्ता बाड़मेर शहर पहुंचे और उन्होंने बाड़मेर शहर में जगहजगह पुलिस की नाकेबंदी देखी तो उन्हें शक हो गया. वे डर गए. वे लोग के. श्रीकांत रेड्डी और सुरेश रेड्डी को ले कर सीधे बाड़मेर रेलवे स्टेशन पहुंचे. बदमाशों ने दोनों अपहर्त्ताओं को बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर वाहन से उतारा. तभी पुलिस ने घेर कर 3 अपहर्त्ताओं शैतान चौधरी, भीखाराम उर्फ विक्रम एवं मोहनराम को गिरफ्तार कर लिया.

शैतान चौधरी और भीखाराम उर्फ विक्रम चौधरी दोनों सगे भाई थे. पुलिस तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर थाने ले आई. अपहरण किए गए हैदराबाद निवासी नैचुरल पावर एशिया प्रा. लि. कंपनी के एमडी के. श्रीकांत रेड्डी और उन के दोस्त सुरेश रेड्डी को भी थाने लाया गयापुलिस ने आरोपी अपहरण कार्ताओं के खिलाफ अपहरण, मारपीट एवं फिरौती का मुकदमा कायम कर पूछताछ कीश्रीकांत रेड्डी ने बताया कि उत्तरलाई के पास सोलर प्लांट निर्माण का ठेका उन की नैचुरल पावर एशिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हैदराबाद को मिला था

उन की कंपनी ने यह काम सबलेट कंपनी बंगलुरु को दे दिया. सबलेट कंपनी ने स्थानीय ठेकेदारों को पावर प्लांट का कार्य ठेके पर दिया. कार्य पूरा होने से पूर्व सबलेट कंपनी और नैचुरल पावर एशिया कंपनी में पैसों के लेनदेन पर विवाद हो गया. सबलेट कंपनी ने जितने में ठेका नैचुरल कंपनी से लिया था, उतना पेमेंट नैचुरल कंपनी ने सबलेट कंपनी को कर दिया. मगर काम ज्यादा था और पैसे कम थे. इस कारण सबलेट कंपनी ने और रुपए मांगेनैचुरल पावर कंपनी ने कहा कि जितने रुपए का ठेका सबलेट को दिया था, उस का पेमेंट हो चुका है. अब और रुपए नैचुरल कंपनी नहीं देगी

तब सबलेट कंपनी सोलर प्लांट का कार्य अधूरा छोड़ कर भाग गई. सबलेट कंपनी ने स्थानीय ठेकेदारों को जो ठेके दिए थे, उस का पेमेंट भी सबलेट ने आधा दिया और आधा डकार गई. तब एमइएस ने मूल कंपनी नैचुरल पावर एशिया प्रा. लि. के एमडी को बुलाया. मददगार बन कर शैतान चौधरी, भीखाराम उर्फ विक्रम चौधरी और मोहनराम उन से मिलेउन के लिए यह इलाका नया था. इसलिए उन्हें लगा कि वे अच्छे लोग होंगे, जो मददगार के रूप में उन्हें साइट वगैरह दिखाएंगे. मगर ये तीनों ठेकेदारों के आदमी थे, जो दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के थे

इन्होंने ही उन का अपहरण कर एक करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. एमडी रेड्डी ने इस अचानक आई आफत से निपटने के लिए अपनी तेलुगु और अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कर के सिर्फ स्वयं को बल्कि अपने दोस्त को भी बचा लिया. पुलिस अधिकारियों ने थाने में तीनों अपहर्त्ताओं से पूछताछ की. पूछताछ में आरोपियों ने अपने अन्य साथियों के नाम बताए, जो इस मामले में शामिल थे और जिन के कहने पर ही इन तीनों ने एमडी और उन के दोस्त का अपहरण कर एक करोड़ की फिरौती मांगी थी. तीनों अपहर्त्ताओं से पूछताछ के बाद पुलिस ने 25 अक्तूबर, 2019 को अर्जुनराम निवासी बलदेव नगर, बाड़मेर, कैलाश एवं कानाराम निवासी जायड़ु को भी गिरफ्तार कर लिया. इस अपहरण में कुल 6 आरोपी गिरफ्तार किए गए थे. आरोपियों को थाना पुलिस ने 26 अक्तूबर 2019 को बाड़मेर कोर्ट में पेश कर के उन्हें रिमांड पर ले लिया.

पूछताछ में आरोपियों ने स्वीकार किया कि उन लोगों का ठेकेदारी का काम है. कुछ ठेकेदार थे और कुछ ठेकेदारों के मुनीम कमीशन पर काम ले कर करवाने वाले. अर्जुनराम, कैलाश एवं कानाराम छोटे ठेकेदार थे, जो ठेकेदार से लाखों रुपए का काम ले कर मजदूर और कारीगरों से काम कराते थेसबलेट कंपनी ने जिन बड़े ठेकेदारों को ठेके दिए थे. बड़े ठेकेदारों से इन्होंने भी लाखों रुपए का काम लिया था. मगर सबलेट कंपनी बीच में काम छोड़ कर बिना पैसे का भुगतान किए भाग गई तो इन का पैसा भी अटक गया. मजदूर और कारीगर इन ठेकेदारों से रुपए मांगने लगे, क्योंकि उन्होंने मजदूरी की थी. जब ठेकेदारों ने पैसा नहीं दिया तो ये लोग परेशान हो गए

ऐसे में इन लोगों ने जब नैचुरल पावर कंपनी के एमडी के आने की बात सुनी तो इन्होंने उस का अपहरण कर के फिरौती के एक करोड़ रुपए वसूलने की योजना बना लीइन लोगों ने सोचा था कि एक करोड़ रुपए वसूल लेंगे तो मजदूरों एवं कारीगरों का पैसा दे कर लाखों रुपए बच जाएंगेसभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.