UP Crime News : चाहत बनी आफत

UP Crime News : उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर के थाना संदना का एक गांव है हरिहरपुर. रामप्रसाद का परिवार इसी गांव में रहता था. खेती किसानी करने वाले रामप्रसाद के परिवार में पत्नी सोमवती के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे. उन में संगीता सब से बड़ी थी. सांवले रंग की संगीता का कद थोड़ा लंबा था. संगीता जवान हुई तो रामप्रसाद ने उस की शादी अपने ही इलाके के गांव रसूलपुर निवासी मुन्नीलाल के बेटे परमेश्वर के साथ कर दी. यह 6 साल पहले की बात थी.

परमेश्वर के पास 7 बीघा जमीन थी, जिस पर वह खेतीबाड़ी करता था. समय के साथ संगीता 3 बच्चों रजनी, मंजू और रजनीश की मां बनी. शादी के कुछ दिनों बाद ही परमेश्वर अपने घर वालों से अलग रहने लगा, इसलिए पत्नी और बच्चों के भरणपोषण और खेतीबाड़ी की पूरी जिम्मेदारी उसी पर आ गई थी. परमेश्वर खेतों पर जी तोड़ मेहनत करता तो संगीता बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभालती. घरगृहस्थी के चक्रव्यूह में फंस कर परमेश्वर यह भी भूल गया कि उस की पत्नी अभी जवान है और उस की कुछ भी हैं.

यह मानव स्वभाव में है कि जब उस की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो उस में चिड़चिड़ापन आ जाता है. ऐसा ही कुछ संगीता के साथ भी था. वह परमेश्वर से अपने मन की चाह के बारे में भले ही खुल कर बता नहीं पाती थी, लेकिन चिड़चिड़ेपन की वजह से लड़ जरूर लेती थी. इस तरह दोनों के बीच कहासुनी होना आम बात हो गई थी.

गांव में ही बाबूराम का भी परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटियां और 4 बेटे थे. इन में छोटू को छोड़ कर बाकी सभी भाईबहनों की शादियां हो चुकी थीं.19 वर्षीय छोटू वैवाहिक समारोहों में स्टेज बनाने का काम करता था. जब काम न होता तो वह गांव में खाली घूमता रहता था. छोटू परमेश्वर को बड़े भाई की तरह मानता था, इसलिए उस का काफी सम्मान करता था.

एक दिन परमेश्वर खेत पर काम कर रहा था तो छोटू वहां पहुंच गया. उसे वहां आया देख परमेश्वर ने उसे अपने घर से खाना लाने भेज दिया. छोटू परमेश्वर के घर पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात संगीता से हुई. संगीता उसे नहीं जानती थी. उस ने अपने बारे में बता कर संगीता से खाने का टिफिन लगा कर देने को कहा तो संगीता टिफिन में खाना लगाने लगी.

छोटू जवान हो चुका था. इस मुकाम पर महिलाओं के प्रति आकर्षण स्वाभाविक होता है. वह चोर निगाहों से संगीता के यौवन का जायजा लेने लगा. छोटू कुंवारा था, इसलिए नारी तन उस के लिए कौतूहल का विषय था. संगीता के यौवन को देख कर छोटू के तन में कामवासना की आग जलने लगी. वह मन ही मन सोचने लगा कि अगर संगीता का खूबसूरत बदन उस की बांहों में आ जाए तो मजा आ जाए.

संगीता का भी यही हाल था. उसे परमेश्वर से वह सब कुछ हासिल नहीं हो रहा था, जिस की उसे चाह थी. छोटू के बारे में ही सोचतेसोचते उस ने टिफिन में खाना लगा कर उसे थमा दिया. जब छोटू खाना ले कर जाने लगा तो संगीता भी ठीक वैसा ही सोचने लगी, जैसा थोड़ी देर पहले छोटू सोच रहा था. छोटू शारीरिक रूप से हट्टाकट्टा नौजवान ही नहीं था, बल्कि कुंवारा भी था. पहली ही नजर में वह संगीता को भा गया था.

दूसरी ओर छोटू का भी वही हाल था. वह दूसरे दिन का इंतजार करने लगा. परमेश्वर ने जब दूसरे दिन भी उस से खाना लाने को कहा तो वह तुरंत परमेश्वर के घर के लिए रवाना हो गया. वह उस के घर पहुंचा तो संगीता घर के बाहर ही बैठी थी. छोटू को देखते ही संगीता खुश हो गई. वह उसे प्यार से अंदर ले गई. जवान छोटू उसे एकटक निहार रहा था.

छोटू को अपनी ओर एकटक देखते पा कर संगीता ने उस का ध्यान भंग करते हुए कहा, ‘‘ऐसे एकटक क्या देख रहे हो, कभी जवान औरत को नहीं देखा क्या?’’

छोटू तपाक से बोला, ‘‘देखा तो है, पर तुम्हारी जैसी नहीं देखी.’’

संगीता शरमाने का नाटक करती हुई अंदर चली गई और वहीं से उस ने छोटू को आवाज लगाई, ‘‘अंदर आ जाओ, आज खाना लगाने में थोड़ी देर लगेगी.’’

उस के आदेश का पालन करते हुए छोटू अंदर आ गया. दोनों बैठ कर बातें करते हुए एकदूसरे के प्रति आकर्षित होते रहे. अब यही रोज का क्रम बन गया. स्त्रीपुरुष एकदूसरे की तरफ आकर्षित होते हैं तो मतलब की बातों का सिलसिला खुदबखुद जुड़ जाता है. मौका देख एक दिन छोटू ने संगीता की दुखती रग को छेड़ दिया, ‘‘भाभी, तुम खुश नहीं लग रही हो. लगता है, भैया तुम्हारा ठीक से खयाल नहीं रखते?’’

‘‘खुश होने की वजह भी तो होनी चाहिए. तुम्हारे भैया तो सिर्फ खेतों के हो कर रह गए हैं, घर में जवान बीवी है, इस की उन्हें कोई परवाह ही नहीं है.’’

‘‘भैया से इस बारे में बात करतीं तो तुम्हारी समस्या जरूर दूर हो जाती.’’

‘‘मैं ने कई बार उन्हें इस बात का अहसास दिलाया, लेकिन वह अपनी इस जिम्मेदारी को समझने को तैयार ही नहीं हैं. उन्हें पूरे घर की जिम्मेदारी तो दिखती है, लेकिन मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती.’’ संगीता ने बड़े ही निराश भाव से कहा. मौका देख कर छोटू ने अपने मन की बात उस के सामने रख दी, ‘‘भाभी, निराश मत हों. अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें वह खुशियां दे सकता हूं, जो परमेश्वर भैया नहीं दे पा रहे हैं.’’

अपनी बात कह कर छोटू ने संगीता को चाहत भरी नजरों से देखा तो संगीता ने भी उस की आंखों में आंखें डाल दीं. उस की आंखों में जो जुनून था, वह उस की सुलगती कामनाओं को ठंडा करने के लिए काफी था. संगीता ने उस के हाथों में अपना हाथ दे दिया. छोटू उस की सहमति पा कर खुशी से झूम उठा. इस के बाद संगीता ने अपने तन की आग में सारी मर्यादाओं को जला कर राख कर दिया.

एक बार दोनों ने अपने नाजायज रिश्ते की इबारत लिखी तो वह बारबार दोहराई जाने लगी. इसी के साथ उन के रिश्ते में गहराई भी आती गई. रसूलपुर में ही प्रमोद नाम का एक युवक रहता था. उस के पिता हरनाम भी खेतीकिसानी करते थे. 23 वर्षीय प्रमोद अविवाहित था. वह भी परमेश्वर की पत्नी संगीता पर फिदा था और उसे अपने जाल में फांसने का प्रयास करता रहता था.

एक दिन मौका देख कर उस ने संगीता से अपने दिल की बात कह दी. लेकिन संगीता ने उस से संबंध बनाने से साफ इनकार कर दिया. प्रमोद इस से निराश नहीं हुआ. उस ने अपनी तरफ से कोशिश जारी रखी. इसी बीच उसे संगीता के छोटू से बने नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया. प्रमोद को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई कि संगीता उस के अलावा किसी और से संबंध रखे. उस ने परमेश्वर के सामने उन दोनों के नाजायज रिश्ते की पोल खोल दी. परमेश्वर को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मन में शक जरूर पैदा हो गया.

अगले ही दिन परमेश्वर रोज की तरह छोटू से खाना लाने को कहा. छोटू खाना लाने चला गया तो परमेश्वर भी छिपतेछिपाते उस के पीछे घर की तरफ चल दिया. छोटू घर में जा कर संगीता के साथ रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि दोपहर का समय था और किसी के आने का अंदेशा नहीं था, इसलिए दोनों बिना दरवाजा बंद किए ही एकदूसरे से गुंथ गए.

अभी कुछ पल ही बीते थे कि किसी ने भड़ाक से दरवाजा खोल दिया. अचानक दोनों ने घबरा कर दरवाजे की तरफ देखा तो सामने परमेश्वर खड़ा था. उस की आंखों से चिंगारियां फूट रही थीं. उस ने पास पड़ा डंडा उठाया तो छोटू वहां से भागा. लेकिन भागते समय परमेश्वर का डंडा उस की कमर पर पड़ गया. दर्द की एक तेज लहर उस के बदन में दौड़ गई, लेकिन वह रुका नहीं.

उस के जाने के बाद परमेश्वर ने संगीता की जम कर पिटाई की. संगीता ने परमेश्वर से किए की माफी मांग ली और आगे से कभी दोबारा ऐसा कदम न उठाने की कसम खाई. लेकिन एक बार विश्वास की दीवार में दरार आ जाए तो उसे किसी भी तरह भरा नहीं जा सकता.

ऐसे में परमेश्वर भला संगीता पर कैसे विश्वास करता? छोटू ने उस के परिवार की इज्जत से खेलने की जो हिमाकत की थी, उसे वह बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. इस आग में घी डालने का काम किया प्रमोद ने. वह परमेश्वर को छोटू से बदला लेने के लिए उकसाने लगा.

दरअसल प्रमोद यह सब सोचीसमझी साजिश के तहत कर रहा था. उस ने सोचा था कि परमेश्वर छोटू की हत्या कर देगा तो वह छोटू के परिजनों से मिल कर परमेश्वर को जेल भिजवा देगा. इस से छोटू और परमेश्वर नाम के दोनों कांटे उस के रास्ते से हट जाएंगे. फिर संगीता को पाने से उसे कोई नहीं रोक पाएगा.

आखिर प्रमोद ने परमेश्वर को छोटू को मार कर बदला लेने के लिए मना ही लिया. परमेश्वर के कहने पर इस साजिश में वह भी शामिल हो गया. परमेश्वर के कहने पर संगीता को भी इस साजिश में शामिल होना पड़ा. क्योंकि इस के अलावा उस के सामने कोई चारा नहीं था.

24 मार्च की रात परमेश्वर ने संगीता से कह कर छोटू को अपने घर बुलाया. परमेश्वर और प्रमोद घर में ही छिप कर बैठे थे. छोटू घर आया तो संगीता उस के पास बैठ कर मीठीमीठी बातें करने लगी. देर रात होने पर परमेश्वर और प्रमोद चुपचाप बाहर निकले और पीछे से छोटू के गले में अंगौछे का फंदा बना कर डाल कर पूरी ताकत से कसने लगे.

छोटू छूटने के लिए छटपटाने लगा. इस से वह जमीन पर गिर पड़ा. छोटू के जमीन पर गिरते ही संगीता ने उस के पैर कस कर पकड़ लिए तो परमेश्वर व प्रमोद ने पूरी ताकत से अंगौछे से छोटू का गला कस दिया. कुछ ही देर में उस का शरीर शांत हो गया. उस की मौत हो गई.

प्रमोद ने छोटू की जेब से उस का मोबाइल निकाल लिया. इस के बाद परमेश्वर और प्रमोद लाश को एक बोरी में भर कर पास के गांव मेदपुर में मुन्ना सिंह के खेत में ले जा कर डाल आए. बोरी को उन्होंने सरकंडे और घासफूस से ढक दिया था. दूसरे दिन छोटू दिखाई नहीं दिया तो घर वालों ने उस की तलाश शुरू की. लेकिन जब काफी कोशिशों के बाद भी उस का कुछ पता नहीं चला तो 26 मार्च, 2014 को उस के पिता बाबूराम ने थाना संदना में उस की गुमशुदगी लिखा दी.

28 मार्च को मेदपुर में गांव के कुछ लोगों ने मुन्ना सिंह के खेत में एक लाश पड़ी देखी तो यह खबर आसपास के गांवों तक फैल गई. बाबूराम को पता चला तो वह भी अपने घर वालों के साथ वहां पहुंच गया. वहां पड़ी लाश देख कर बिलखबिलख कर रोने लगे. लोगों द्वारा सांत्वना देने के बाद सभी किसी तरह शांत हुए तो लाश की सूचना थाना संदना पुलिस को दी गई.

सूचना पा कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. मृतक छोटू के गले में अगौंछा पड़ा हुआ था. गले में उस के कसे जाने के निशान भी मौजूद थे. इस से यही लगा कि उसी अंगौछे से उस की गला घोंट कर हत्या की गई थी. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय सीतापुर भिजवा दिया.

थाने लौट कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने बाबूराम की लिखित तहरीर पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. दूसरी ओर इस की भनक लगते ही पकड़े जाने के डर से परमेश्वर संगीता के साथ फरार हो गया.

30 मार्च की सुबह 8 बजे थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने एक मुखबिर की सूचना पर संदना-मिसरिख रोड पर भरौना पुलिया के पास से परमेश्वर और संगीता को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब पूछताछ की गई तो दोनों ने छोटू की हत्या की पूरी कहानी बयां कर दी.

31 मार्च को सुबह साढ़े 7 बजे पुलिस ने प्रमोद को भी गोपालपुर चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया.

दरअसल, प्रमोद छोटू की हत्या करवाने के बाद छोटू के घर वालों से जा कर मिल गया था. उसी ने ही उन्हें बताया था कि छोटू और संगीता के नाजायज संबंध थे, जिस के बारे में परमेश्वर को पता चल गया था. इसी वजह से परमेश्वर ने संगीता के साथ मिल कर छोटू की हत्या की थी. प्रमोद ही लाश मिलने की जगह भी बाबूराम को ले गया था. बाबूराम ने उसी की बातों के आधार पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई थी. इतनी चालाकी के बावजूद भी प्रमोद खुद को कानून के शिकंजे से नहीं बचा सका और पकड़ा गया. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : बदले की आग

Crime News : लखनऊ के थाना मडि़यांव के थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को सुबहसुबह किसी ने फोन कर के सूचना दी कि ककौली में बड़ी खदान के पास एक कार में आग लगी है. सूचना मिलते ही रघुवीर सिंह ककौली की तरफ रवाना हो गए. थोड़ी ही देर में वह ककौली की बड़ी खदान के पास पहुंच गए. उन्होंने एक जगह भीड़ देखी तो समझ गए कि घटना वहीं घटी है. जब तक पुलिस वहां पहुंची, कार की आग बुझ चुकी थी. पुलिस ने देखा, कार के अंदर कोई भी सामान सलामत नहीं बचा था.

यहां तक कि कार की नंबर प्लेट का नंबर भी नहीं दिखाई दे रहा था. इसी से अंदाजा लगाया गया कि आग कितनी भीषण रही होगी. जली हुई कार के अंदर कुछ हड्डियां और 2 भागों में बंटी इंसान की एक खोपड़ी पड़ी थी. उन्हें देख कर थानाप्रभारी चौंके. हड्डियों और खोपड़ी से साफ लग रहा था कि कार के अंदर कोई इंसान भी जल गया था.

थानाप्रभारी ने अपने आला अधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी थी. इस के बाद थोड़ी ही देर में क्षेत्राधिकारी (अलीगंज) अखिलेश नारायण सिंह फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. कार के अंदर जली अवस्था में एक छोटा गैस सिलेंडर और शराब की खाली बोतल भी पड़ी थी. फोरेंसिक टीम ने अपना काम निपटा लिया तो पुलिस ने अपनी जांच शुरू की.

कार की स्थिति देख कर पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि साजिशन इसे अंजाम दिया गया है. कार एक खुले मैदान में थी. आबादी वहां से कुछ दूरी पर थी. इसलिए हत्यारों ने वारदात को आसानी से अंजाम दे दिया था. यह 4 दिसंबर, 2013 की बात है.

कार में कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से जल कर खाक हो चुके व्यक्ति की शिनाख्त हो पाती. इसलिए पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर बरामद हड्डियों और खोपड़ी को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया, जहां से हड्डियों को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया.

अब तक इस घटना की खबर जंगल की आग की तरह आसपास फैल चुकी थी. ककौली के ही रहने वाले सुरजीत यादव का छोटा भाई रंजीत यादव 3 दिसंबर को कार से कटरा पलटन छावनी एरिया में किसी शादी समारोह में शामिल होने के लिए घर से निकला था. उसे उसी रात को लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. यही वजह थी कि यह खबर सुनते ही सुरजीत बड़ी खदान की तरफ चल पड़ा. वहां पहुंच कर कार देखते ही वह समझ गया कि यह कार उसी की है.

सुरजीत ने थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को अपने भाई के गायब होने की पूरी बात बता कर आशंका जताई कि कार में जल कर जो व्यक्ति मरा है, वह उस का भाई रंजीत हो सकता है. इस के बाद सुरजीत की तहरीर पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ रंजीत की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सुरजीत से बातचीत के बाद थानाप्रभारी रघुवीर सिंह ने तहकीकात शुरू की तो पता चला कि रंजीत शादी समारोह में जाने के लिए घर से निकला तो था, लेकिन समारोह में पहुंचा नहीं था. अब सोचने वाली बात यह थी कि वह शादी समारोह में नहीं पहुंचा तो गया कहां था. यह जानने के लिए उन्होंने मुखबिर लगा दिए. एक मुखबिर ने बताया कि 3 दिसंबर की शाम रंजीत को देशराज और अजय के साथ देखा गया था. देशराज हरिओमनगर में रह कर सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. रंजीत उसी की सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था.

देशराज से पूछताछ के बाद ही सच्चाई का पता चल सकता था, इसलिए पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी. 5 दिसंबर, 2013 को सुबह 5 बजे के करीब उसे रोशनाबाद चौराहे के पास से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब देशराज से पूछताछ की गई तो उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद उस ने रंजीत यादव को जिंदा जलाने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला देशराज लखनऊ के हरिओमनगर में एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. वहीं पर उस ने एक मकान किराए पर ले रखा था. वह लखनऊ में अकेला रहता था, जबकि उस की पत्नी और बच्चे सीतापुर में रहते थे. समय मिलने पर वह अपने परिवार से मिलने सीतापुर जाता रहता था. उस की एजेंसी अच्छी चल रही थी. जिस से उसे हर महीने अच्छी आमदनी होती थी. कहते हैं, जब किसी के पास उस की सोच से ज्यादा पैसा आना शुरू हो जाता है तो कुछ लोगों में नएनए शौक पनप उठते हैं. देशराज के साथ भी यही हुआ. वह शराब और शबाब का शौकीन हो गया था.

वह पास के ही ककौली गांव भी आताजाता रहता था. वहीं पर एक दिन उस की नजर रानी नाम की एक औरत पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा.

रानी की अजीब ही कहानी थी. उस का विवाह उस उम्र में हुआ था, जब वह विवाह का मतलब ही नहीं जानती थी. नाबालिग अवस्था में ही वह 2 बेटों अजय, संजय और एक बेटी सीमा की मां बन गई थी. उसी बीच किसी वजह से उस के पति की मौत हो गई. पति का साया हटने से उस के ऊपर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. जब कमाने वाला ही न रहा तो उस के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया. मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे वह दो जून की रोटी का इंतजाम करने लगी.

देशराज ने उस की भोली सूरत देखी तो उसे लगा कि वह उसे जल्द ही पटा लेगा. रानी से नजदीकी बढ़ाने के लिए वह उस से हमदर्दी दिखाने लगा. रानी देशराज के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी. बस इतना ही जानती थी कि वह पैसे वाला है. एक पड़ोसन से रानी ने देशराज के बारे में काफी कुछ जान लिया था. इस के बाद धीरेधीरे उस का झुकाव भी उस की तरफ होता गया.

एक दिन देशराज रानी के घर के सामने से जा रहा था तो वह घर की चौखट पर ही बैठी थी. उस समय दूरदूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था. मौका अच्छा देख कर देशराज बोल पड़ा, ‘‘रानी, मुझे तुम्हारे बारे में सब पता है. तुम्हारी कहानी सुन कर ऐसा लगता है कि तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ दुख ही दुख है.’’

‘‘आप के बारे में मैं ने जो कुछ सुन रखा था, आप उस से भी कहीं ज्यादा अच्छे हैं, जो दूसरों के दुख को बांटने की हिम्मत रखते हैं. वरना इस जालिम दुनिया में कोई किसी के बारे में कहां सोचता है?’’

‘‘रानी, दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. खैर, तुम चिंता मत करो. आज से मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. चाहो तो बदले में तुम मेरे घर का कुछ काम कर दिया करना.’’

‘‘ठीक है, आप ने मेरे बारे में इतना सोचा है तो मैं भी आप के बारे में सोचूंगी. मैं आप के घर के काम कर दिया करूंगी.’’

इतना कह कर देशराज ने रानी के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखा तो रानी ने अपनी गरदन टेढ़ी कर के उस के हाथ पर अपना गाल रख कर आशा भरी नजरों से उस की तरफ देखा. देशराज ने मौके का पूरा फायदा उठाया और रानी के हाथ पर 500 रुपए रखते हुए कहा, ‘‘ये रख लो, तुम्हें इस की जरूरत है. मेरी तरफ से इसे एडवांस समझ लेना.’’

रानी तो वैसे भी अभावों में जिंदगी गुजार रही थी, इसलिए उस ने देशराज द्वारा दिए गए पैसे अपने हाथ में दबा लिए. इस से देशराज की हिम्मत और बढ़ गई. वह हर रोज रानी से मिलने उस के घर पहुंचने लगा. वह जब भी उस के यहां जाता, रानी के बच्चों के लिए खानेपीने की कोई चीज जरूर ले जाता. कभीकभी वह रानी को पैसे भी देता. इस तरह वह रानी का खैरख्वाह बन गया.

रानी हालात के थपेड़ों में डोलती ऐसी नाव थी, जिस का कोई मांझी नहीं था. इसलिए देशराज के एहसान वह अपने ऊपर लादती चली गई. पैसे की वजह से उस की बेटी सीमा भी स्कूल नहीं जा रही थी. देशराज ने उस का दाखिला ही नहीं कराया, बल्कि उस की पढ़ाई का सारा खर्च उठाने का वादा किया.

स्वार्थ की दीवार पर एहसान की ईंट पर ईंट चढ़ती जा रही थी. अब रानी भी देशराज का पूरा खयाल रखने लगी थी. वह उसे खाना खाए बिना जाने नहीं देती थी. लेकिन देशराज के मन में तो रानी की देह की चाहत थी, जिसे वह हर हाल में पाना चाहता था.

एक दिन उस ने कहा, ‘‘रानी, अब तुम खुद को अकेली मत समझना. मैं हर तरह से तुम्हारा बना रहूंगा.’’

यह सुन कर रानी उस की तरफ चाहत भरी नजरों से देखने लगी. देशराज समझ गया कि वह शीशे में उतर चुकी है, इसलिए उस के करीब आ गया और उस के हाथ को दोनों हथेलियों के बीच दबा कर बोला, ‘‘सच कह रहा हूं रानी, तुम्हारी हर जरूरत पूरी करना अब मेरी जिम्मेदारी है.’’

हाथ थामने से रानी के शरीर में भी हलचल पैदा हो गई. देशराज के हाथों की हरकत बढ़ने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों बेकाबू हो गए और अपनी हसरतें पूरी कर के ही माने.

देशराज ने वर्षों बाद रानी की सोई भावनाओं को जगाया तो उस ने देह के सुख की खातिर सारी नैतिकताओं को अंगूठा दिखा दिया. अब वह देशराज की बन कर रहने का ख्वाब देखने लगी. देशराज और रानी के अवैध संबंध बने तो फिर बारबार दोहराए जाने लगे. रानी को देशराज के पैसों का लालच तो था ही, अब वह उस से खुल कर पैसों की मांग करने लगी.

देशराज चूंकि उस के जिस्म का लुत्फ उठा रहा था, इसलिए उसे पैसे देने में कोई गुरेज नहीं करता था. इस तरह एक तरफ रानी की दैहिक जरूरतें पूरी होने लगी थीं तो दूसरी तरफ देशराज उस की आर्थिक जरूरतें पूरी करने लगा था. वर्षों बाद अब रानी की जिंदगी में फिर से रंग भरने लगे थे.

ककौली गांव में ही भल्लू का परिवार रहता था. पेशे से किसान भल्लू के 2 बेटे रंजीत, सुरजीत और 2 बेटियां कमला, विमला थीं. चारों में से अभी किसी की भी शादी नहीं हुई थी.

24 वर्षीय रंजीत और 22 वर्षीय सुरजीत, दोनों ही भाई देशराज की सिक्योरिटी एजेंसी में काम करते थे. रंजीत और देशराज की उम्र में काफी लंबा फासला था. देशराज की जवानी साथ छोड़ रही थी, जबकि रंजीत की जवानी पूरे चरम पर थी. वैसे भी वह कुंवारा था. देशराज और रंजीत के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ खातेपीते थे.

एक दिन शराब के नशे में देशराज ने रंजीत को अपने और रानी के संबंधों के बारे में बता दिया. यह सुन कर रंजीत चौंका. यह उस के लिए चिराग तले अंधेरे वाली बात थी. उसी के गांव की रानी अपने शबाब का दरिया बहा रही थी और उसे खबर तक नहीं थी. वह किसी औरत के सान्निध्य के लिए तरस रहा था. रानी की हकीकत पता चलने के बाद जैसे उसे अपनी मुराद पूरी होती नजर आने लगी.

रंजीत के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. वह मन ही मन सोचने लगा कि जब देशराज रानी के साथ रातें रंगीन कर सकता है, तो वह क्यों नहीं? वह देशराज की ब्याहता तो है नहीं.  अगले दिन रंजीत देशराज से मिला तो बोला, ‘‘रानी की देह में मुझे भी हिस्सा चाहिए, नहीं तो मैं तुम दोनों के संबंधों की बात पूरे गांव में फैला दूंगा.’’

देशराज को रानी से कोई दिली लगाव तो था नहीं, वह तो उस की वासना की पूर्ति का साधन मात्र थी. उसे दोस्त के साथ बांटने में उसे कोई परेशानी नहीं थी. वैसे भी रंजीत का मुंह बंद करना जरूरी था. इसलिए उस ने रानी को रंजीत की शर्त बताते हुए समझाया, ‘‘देखो रानी, अगर हम ने उस की बात नहीं मानी तो वह हमारी पोल खोल देगा. पूरे गांव में हमारी बदनामी हो जाएगी. इसलिए तुम्हें उसे खुश करना ही पड़ेगा.’’

रानी के लिए जैसा देशराज था, वैसा ही रंजीत भी था. उस ने हां कर दी. इस बातचीत के बाद देशराज ने यह बात रंजीत को बता दी. फलस्वरूप वह उसी दिन शाम को रानी के घर पहुंच गया. एक ही गांव का होने की वजह से दोनों न केवल एकदूसरे को जानते थे, बल्कि उन में बातें भी होती थीं. रंजीत उसे भाभी कह कर बुलाता था.

सारी बातें चूंकि पहले ही तय थीं, सो दोनों के बीच अब तक बनी संकोच की दीवार गिरते देर नहीं लगी. दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने तो रानी को एक अलग ही तरह की सुखद अनूभूति हुई. रंजीत के कुंवारे बदन का जोश देशराज पर भारी पड़ने लगा. उस दिन के बाद तो वह अधिकतर रंजीत की बांहों में कैद होने लगी. रंजीत भी रानी की देह का दीवाना हो चुका था. इसलिए वह भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. रंजीत ने मारुति आल्टो कार ले रखी थी, जो उस के भाई सुरजीत के नाम पर थी. रंजीत रानी को अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले जाने लगा. वह उसे रेस्टोरेंट वगैरह में ले जा कर खिलातापिलाता और गिफ्ट भी देता.

रानी की जिंदगी में रंजीत आया तो वह देशराज को भी और उस के एहसानों को भूलने लगी. रंजीत उस के दिलोदिमाग पर ऐसा छाया कि उस ने देशराज से मिलनाजुलना तक छोड़ दिया. इस से देशराज को समझते देर नहीं लगी कि रानी रंजीत की वजह से उस से दूरी बना रही है. उसे यह बात अखरने लगी. रानी को फंसाने में सारी मेहनत उस ने की थी, जबकि रंजीत बिना किसी मेहनत के फल खा रहा था.

इसी बात को ले कर रंजीत और देशराज में मनमुटाव रहने लगा. देशराज ने रंजीत से उस की कुछ जमीन खरीदी थी, जिस का करीब 5 लाख रुपया बाकी था. रंजीत जबतब देशराज से अपने पैसे मांगता रहता था. इस बात को ले कर रंजीत कई बार उसे जलील तक कर चुका था.

एक तरफ रंजीत ने देशराज की मौजमस्ती का साधन छीन लिया था तो दूसरी ओर उसे 5 लाख रुपए भी देने थे. इसलिए सोचविचार कर उस ने रंजीत को अपने रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने अपने यहां सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे अजय पांडेय को भी लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया. अजय सीतापुर के कमलापुर थानाक्षेत्र के गांव रूदा का रहने वाला था.

3 दिसंबर की शाम को रंजीत को कटरा पलटन छावनी में एक वैवाहिक समारोह में जाना था. यह बात देशराज को पता थी. उस ने उसी दिन अपनी योजना को अंजाम देने के बारे में सोचा. उस दिन देर शाम रंजीत घर से तैयार हो कर कार से कटरा पलटन जाने के लिए निकला. रास्ते में एक जगह उसे देशराज और अजय पांडेय मिल गए. वहां से वे हाइवे पर ट्रामा सेंटर के पास गए और शराब खरीद कर बड़ी खदान के पास आ गए.

तीनों ने कार के अंदर बैठ कर शराब पी. देशराज और अजय ने खुद कम शराब पी, जबकि रंजीत को ज्यादा पिलाई. जब रंजीत नशे में धुत हो गया तो दोनों ने उसे पिछली सीट पर लिटा दिया. कार में एक छोटा गैस सिलेंडर भरा रखा था, जिसे रंजीत घर से गैस भराने के लिए लाया था. साथ ही कार में एक बोतल पेट्रोल भी रखा था. देशराज ने कार के सभी शीशे चढ़ा कर गैस सिलेंडर की नौब खोल दी, जिस से तेजी से गैस रिसने लगी.

देशराज पेट्रोल की बोतल उठा कर कार से बाहर आ गया और कार के सभी दरवाजे बंद कर दिए. इस के बाद उस ने कार के ऊपर सारा पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. चूंकि कार के अंदर गैस भरी थी, इसलिए आग की लपटें तेजी से बाहर निकलीं. देशराज का चेहरा और हाथ जल गए. गैस और पेट्रोल की वजह से कार धूधू कर के जलने लगी. नशे में धुत अंदर लेटे रंजीत ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन वह नाकामयाब रहा. अपना काम कर के देशराज और अजय वहां से भाग खडे़ हुए.

देशराज मौके से तो भाग गया, लेकिन कानून से नहीं बच सका. इंसपेक्टर रघुवीर सिंह ने रानी से भी पूछताछ की. हत्या के इस मामले में उस की कोई भूमिका नहीं थी. अलबत्ता जब गांव वालों को यह पता चला कि हत्या की वजह रानी थी तो लोगों ने उस के साथ भी मारपीट की.

पुलिस ने देशराज को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा संकलन तक पुलिस अजय पांडेय को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.v Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story : गर्लफ्रेंड के लिए बना चोर

Hindi Story : रात के दस बजने वाले थे. वाराणसी जनपद के सिगरा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली नगर निगम चौकी के प्रभारी सबइंसपेक्टर बसंत कुमार एसआई चंद्रकेश शर्मा और 2 सिपाहियों गामा यादव व बाबूलाल के साथ शिवपुरवा तिराहे के पास मौजूद थे. उसी समय एक मुखबिर ने आ कर बताया कि इलाके में पिछले कुछ महीनों से मोबाइल और लैपटाप वगैरह की जो चोरियां हुई हैं, उन का चोर चोरी का सामान बेचने के लिए खरीदार से संपर्क करने के लिए आने वाला है.

चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर बसंत कुमार के लिए सूचना काफी महत्त्वपूर्ण थी. मुखबिर से कुछ जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्होंने उस चोर को पकड़ने के लिए व्यूह रचना तैयार कर अपने साथी पुलिस वालों को सतर्क कर दिया. मुखबिर को उन्होंने छिप कर खड़ा होने को कह दिया. थोड़ी देर बाद मुखबिर ने सनबीम स्कूल की ओर से पैदल आ रहे 2 युवकों की ओर इशारा कर दिया. उन दोनों की पहचान कराने के बाद मुखबिर वहां से चला गया.

सबइंसपेक्टर बसंत कुमार और उन के साथी चौकन्ने हो गए. दोनों युवकों में से एक के पास एक काले रंग का बड़ा सा बैग था, जिसे वह पीठ की तरफ टांगे हुए था. दोनों युवक जैसे ही रेलवे कालोनी जल विहार मोड़ के पास पहुंचे. सबइंसपेक्टर बसंत कुमार ने उन दोनों को रुकने का आदेश दिया. लेकिन पुलिस को देख कर दोनों तेजी से विपरीत दिशा की ओर भागने लगे. लेकिन पहले से तैयार पुलिस टीम ने दौड़ कर उन्हें पकड़ लिया.

पुलिस के शिकंजे में फंसते ही दोनों युवक गिड़गिड़ाए, ‘‘सर, आप हम लोगों को क्यों पकड़ रहे हैं, हम ने क्या किया है?’’

‘‘कुछ नहीं किया तो भागने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘साहब, हम डर गए थे कि कहीं आप हमें किसी झूठे मुकदमे में न फंसा दें.’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है कि पुलिस वाले यूं ही राह चलते लोगों को फंसा देते हैं. खैर, अपना बैग चेक कराओ.’’ कह कर बसंत कुमार ने सिपाही गामा यादव को आदेश दिया, ‘‘इन का बैग चेक करो.’’

‘‘साहब, बैग में कपड़ेलत्तों के अलावा कुछ नहीं है.’’ एक युवक ने कहा तो बसंत कुमार ने उसे डांटा, ‘‘अगर आपत्तिजनक कुछ नहीं है तो घबरा क्यों रहे हो?’’

सबइंसपेक्टर चंद्रकेश शर्मा ने युवक की पीठ पर टंगा काले रंग का बैग जबरदस्ती ले कर खोला तो उस में लैपटाप और नए मोबाइल सेट के डिब्बे दिखे. बैग में मोबाइल सेट और लैपटाप देखते ही बसंत कुमार समझ गए कि शिकार जाल में फंस चुका है.

बसंत कुमार ने बैग वाले युवक का नाम पूछा तो उस ने अपना नाम जयमंगल निवासी शिवपुरवा बताया. उस के साथी का नाम गुडलक था. वह सिगरा थानाक्षेत्र की महमूरगंज रोड स्थित संपूर्णनगर कालोनी में रहता था. विस्तृत पूछताछ के लिए दोनों युवकों को हिरासत में ले कर चौकीप्रभारी बसंत कुमार अपनी टीम के साथ सिगरा थाने आ गए.

सिगरा थाने में जयमंगल से विस्तृत पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस के बैग में सारा सामान चोरी का है. पुलिस को उस के बैग से 3 लैपटाप, 10 मोबाइल सेट, रितेश नाम से एक वोटर आईडी के अलावा 1560 रुपए और 1 किलो 100 ग्राम चरस मिली. जबकि गुडलक की तलाशी में उस की पैंट की जेब से प्लास्टिक की थैली में रखी 240 ग्राम चरस मिली.

जयमंगल और गुडलक से पूछताछ चल ही रही थी कि तभी गश्त पर गए थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र थाने लौट आए. उन्हें जब पता चला कि पिछले दिनों इलाके में हुई चोरी की घटनाओं में शामिल 2 चोर पकड़े गए हैं तो वह भी पूछताछ में शामिल हो गए. जयमंगल से बरामद रितेश नाम से जारी वोटर आईडी को देखने पर पता चला कि उस पर फोटो जयमंगल का लगा था. इस का मतलब उस ने फरजी नाम से आईडी बनवा रखी थी.

थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र ने इस बारे में जयमंगल से जब अपने तरीके से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने रितेश नाम से फर्जी वोटर आईडी बनवाई थी, ताकि होटल वगैरह में ठहरने के लिए उस आईडी का इस्तेमाल कर के अपनी असली पहचान छिपा सके.

पूछताछ के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि वह शिवपुरवा (सिगरा क्षेत्र) स्थित अपने पैतृक घर में न रह कर पिछले तीन सालों से अपनी प्रेमिका पत्नी के साथ पड़ोसी जनपद भदोही के गोपीगंज थानाक्षेत्र स्थित खमरिया में किराए का मकान ले कर रह रहा था. जयमंगल ने गुडलक को अपना दोस्त बताया. जयमंगल पहले ही स्वीकार कर चुका था कि उस के बैग से बरामद सामान अलगअलग जगहों से चोरी किया गया था. चरस के बारे में उस का कहना था कि नशे के लिए चरस का इस्तेमाल वह खुद करता था.

पूछताछ चल ही रही थी कि तभी थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र की नजर जयमंगल के हाथों पर पड़ी. उस के हाथों पर 2-3 लड़कियों के नाम गुदे हुए थे. एक साथ 2-3 लड़कियों के नाम हाथों पर गुदे देख शिवानंद मिश्र ने इस बारे में जयमंगल से पूछा. उस ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर न सिर्फ थानाप्रभारी बल्कि वहां मौजूद सभी पुलिस वाले आश्चर्यचकित रह गए.

जयमंगल ने बताया कि उस के हाथ पर ही नहीं, बल्कि शरीर के विभिन्न हिस्सों पर उस ने पच्चीसों लड़कियों के नाम गोदवाए हुए हैं. जयमंगल की टीशर्ट को पेट के ऊपर तक उठा कर देखा गया तो उस के सीने और पीठ पर दर्जनों लड़कियों के नाम गुदे मिले. दोनों हाथ, छाती और पीठ पर जिन लड़कियों के नाम गुदे थे, वे सब जयमंगल की प्रेमिकाएं थीं. पूछताछ में पता चला कि जयमंगल को नईनई लड़कियों से देस्ती करने का शौक था. वह उन से दोस्ती ही नहीं करता था, बल्कि उन से जिस्मानी संबंध भी बनाता था.

आर्थिक रूप से कमजोर घर की लड़कियों से जानपहचान बढ़ा कर उन से दोस्ती करना उस का शगल था. इस के लिए वह उन्हें उन की पसंद और जरूरत के मुताबिक तोहफे देता था. इतना ही नहीं, जिन लड़कियों से वह दोस्ती करता था, गाहेबगाहे उन के परिवार वालों की भी आर्थिक मदद कर के परिवार वालों की नजरों में शरीफजादा बन जाता था. इसी वजह से परिवार वाले जयमंगल के साथ अपनी लड़की के घूमनेफिरने पर ज्यादा बंदिशें नहीं लगाते थे.

लड़कियों को इंप्रेस करने के लिए शुरूशुरू में जयमंगल उन का नाम अपने बदन पर गुदवा लेता था. लेकिन जब समय के साथ प्रेमिकाओं की संख्या बढ़ने लगी तो बदन में लड़कियों का नाम गुदवाना उस का शौक बन गया. पुलिस के समक्ष जयमंगल ने खुलासा किया कि अब तक वह 27 प्रेमिकाओं के नाम अपने बदन पर गुदवा चुका है.

जिन लड़कियों को किसी कारणवश वह छोड़ देता था या फिर लड़की ही उस से किनारा कर लेती थी, उस लड़की का नाम वह अपने बदन से मिटा देता था. नाम मिटाने के लिए वह उसे ब्लेड से खुरचने के साथसाथ कई बार गुदे हुए नाम को जला देता था. जयमंगल के हाथों में 3-4 जगहों पर जले के निशान भी दिखाई दिए, जिस के बारे में उस ने पुलिस को बताया कि जली हुई जगह पर उस की जिन प्रेमिकाओं के नाम गुदे थे, अब उन से उस का कोई रिश्ता नहीं रहा. इसलिए उस ने उन के नाम भी अपने बदन से मिटा दिए.

पुलिस की माने तो जयमंगल अब तक 30 से अधिक लड़कियों को अपनी प्रेमिका बना चुका था. जिन में से 2 दर्जन से अधिक प्रेमिकाओं के नाम उस ने अपने बदन पर भी गुदवाए थे. अपनी प्रेमिकाओं में से ही एक गुडि़या से उस ने 3 साल पहले एक मंदिर में शादी कर ली थी. फिलहाल वह उसी के साथ रह रहा था.

पूछताछ के दौरान चौंकाने वाली एक बात यह भी पता चली कि जयमंगल एक रईस खानदान का लड़का था. किशोरावस्था में उस के कदम बहक गए और ज्यादा से ज्यादा लड़कियों से दोस्ती करने की आदत ने उसे चोरी करने पर मजबूर कर दिया.

पुलिस की मानें तो बनारस के शिवपुरवा नगर निगम इलाके में जयमंगल का बहुत बड़ा पुश्तैनी मकान था, इस मकान के अलावा भी शहर के कई इलाकों में उस परिवार के कई मकान थे जिन्हें उन लोगों ने किराए पर उठा रखे थे. लेकिन जयमंगल की गलत हरकतों की वजह से परिवार वाले पिछले 5-6 सालों से उसे पैसा नहीं देते थे.  जयमंगल खुद भी परिवार वालों से किसी तरह की आर्थिक मदद लेने के बजाय चोरी कर के अपनी जरूरतें और शौक पूरा करने का आदी हो चुका था.

जयमंगल ने पुलिस को यह भी बताया कि वह चोरी की ज्यादातर घटनाओं को खुद ही अंजाम दिया करता था. हां, कभीकभार वह किसी जरूरतमंद दोस्त को चोरी में जरूर शामिल कर लेता था, ताकि उस की मदद हो सके. चोरी के लिए कई बार वह होटलों में भी ठहरता था. फरजी आईडी उस ने इसीलिए बनवा रखी थी.

पुलिस ने जयमंगल के पास से जो 10 मोबाइल सेट बरामद किए थे, उन में से 2 मोबाइलों की चोरी की रिपोर्ट सिगरा थाने में पहले से ही दर्ज थी. थाने में दर्ज मोबाइल चोरी की रिपोर्ट के अनुसार चोरी का माल उस के पास से बरामद हो गया था.

पुलिस ने जयमंगल के विरुद्ध भादंवि की धारा 419, 420, 468, 467, 471, 41, 411, 414 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया. इस के अलावा उस के पास से बरामद 1 किलो 100 ग्राम चरस के लिए एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/18/20 के अंतर्गत अलग से मुकदमा दर्ज किया गया. जयमंगल के साथी गुडलक के पास से भी 240 ग्राम चरस बरामद हुई थी, इसलिए उस के खिलाफ भी एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/18/20 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया.

जयमंगल और गुडलक की गिरफ्तारी 17 जुलाई, 2014 को हुई थी. अगले दिन 18 जुलाई को दोनों को बनारस के नगर पुलिस अधीक्षक सुधाकर यादव ने एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर दोनों आरोपियों को मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया.

जयमंगल ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि उस ने जो भी चोरियां की थी, वे अपनी माशूकाओं को गिफ्ट देने और उन्हें खुश करने के लिए की थीं. इस के पहले भी वह 3-4 बार जेल जा चुका था और जब भी बाहर आता था, अपने पुराने धंधे में लग जाता था. पुलिस ने दोनों को वाराणसी के जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.  Hindi Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : प्रेमिका ने प्रेमी से पहले संबंध बनाए फिर पैट्रोल से जिंदा जला दिया

Love Crime : दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस में 27 अक्तूबर, 2015 को एक ऐसी घटना घटी कि गैस्टहाऊस के मैनेजर और कर्मचारी सिहर उठे. शाम के करीब 4 बजे गैस्टहाऊस के कमरा नंबर 24 से अचानक चीखने की आवाजें आने लगीं. चीखें सुन कर मैनेजर सुमित कटियार 2 कर्मचारियों के साथ उस कमरे की ओर भागे. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि कमरे से धुआं भी निकल रहा है.

उस कमरे में सुबह ही एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया था. कमरे से चीखने की जो आवाज आ रही थी, वह उसी आदमी की थी. मैनेजर की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के साथ ऐसा क्या हो गया, जो वह इस तरह चीख रहा है. चीखों और धुआं निकलने से उस ने यही अंदाजा लगाया कि शायद वह आदमी जल रहा है. यह सोच कर सुमित कटियार घबरा गए.

कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उन्होंने दरवाजा थपथपाया, लेकिन वह नहीं खुला. वह परेशान हो उठे. जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने अन्य कर्मचारियों के साथ मिल कर कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. कमरे के अंदर का खौफनाक दृश्य देख कर सब की घिग्घी बंध गई. कमरे में पड़े बैड के नीचे एक आदमी आग में जलते हुए तड़प रहा था. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. बैड के पास खड़ी उस की पत्नी हैरत से उसे जलता देख रही थी. वह भी उसी हालत में थी.

सुमित कटियार ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस घटना की सूचना दे दी. थोड़ी ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी वहां पहुंच गई, जिस में 4 पुलिसकर्मी थे. यह क्षेत्र दक्षिणीपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से इस घटना की सूचना थाना सनलाइट कालोनी को भी दे दी गई थी.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल 2 हैडकांस्टेबलों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. निरीक्षण में उन्हें कमरे में एक अधेड़ आदमी फर्श पर झुलसा पड़ा मिला. वह बेहोशी की हालत में लगभग 90 प्रतिशत जला था. उस के कपड़े बैड के पास रखी मेज पर रखे थे. मेज के नीचे एक कोल्डङ्क्षड्रक्स की 2 लीटर की खाली बोतल रखी थी, जिस में थोड़ा पैट्रोल था. थानाप्रभारी ने एक हैडकांस्टेबल के साथ उस जले हुए आदमी को इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया.

जिस व्यक्ति के साथ यह घटना घटी थी, वह कौन था, कहां का रहने वाला था और यह घटना कैसे घटी थी, इस बारे में थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने गैस्टहाऊस के मैनेजर सुमित कटियार से पूछा तो उन्होंने बताया कि जो आदमी आग से झुलसा है, उस का नाम गजानन है. वह सुबह साढ़े 10 बजे अपनी पत्नी सुनीता के साथ आया था. उस ने आईडी के रूप में अपने वोटर कार्ड की फोटोकौपी जमा कराई थी.

तब उसे कमरा नंबर 24 दे दिया गया था. इस के बाद अभी थोड़ी देर पहले कमरे से चीखने की आवाज सुनाई दी तो वह कुछ कर्मचारियों के साथ वहां पहुंचा. तब उस ने कमरे से धुआं निकलते देखा. उस ने दरवाजा खुलवाने की कोशिश की. जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दरवाजा तोड़ दिया.

इस के आगे मैनेजर ने बताया कि जब उस ने गजानन की पत्नी सुनीता से आग लगने के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि उस की शादी को 15 साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें संतान नहीं हुई. बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखाया, तांत्रिकों के पास भी गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. संतान न होने की वजह से दोनों काफी परेशान थे. एक दिन पहले उस के पति ने उस से कहा कि कल उन्हें महाराष्ट्र के नागपुर शहर चलना है. वहां एक बहुत पहुंचे हुए फकीर हैं, जो दुआ पढ़ा हुआ पानी देते हैं. वह पानी पीने के बाद संतान सुख का लाभ मिलता है.

चूंकि जिस ट्रेन से उन्हें नागपुर जाना था, वह रात 9 बजे की थी. इतना टाइम वे सडक़ पर नहीं बिता सकते थे, इसलिए आराम करने के लिए इस गैस्टहाऊस में आ गए. शारीरिक संबंध बनाने के बाद पति पर न जाने क्या फितूर सवार हुआ कि उन्होंने साथ लाए कपड़े के बैग से 2 लीटर वाली प्लास्टिक की बोतल निकाली और उस में भरा पैट्रोल खुद पर उड़ेल लिया. वह कुछ समझ पाती पति ने माचिस की तीली जला कर खुद को आग लगा ली.

“कहां है गजानन की पत्नी सुनीता?” ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा तो मैनेजर इधरउधर देखने लगा. उस ने पूरा गैस्टहाऊस छान मारा, लेकिन सुनीता कहीं नहीं मिली.

“तुम्हारी लापरवाही की वजह से वह भाग गई,” ओमप्रकाश लेखवाल ने कहा, “तुम ने गजानन की उस पत्नी की कोई आईडी ली थी?”

“सर, पति की आईडी मिल गई तो मैं ने उस की आईडी लेना जरूरी नहीं समझा.” कह कर मैनेजर ने सिर झुका लिया.

“वह गजानन की पत्नी ही थी, मुझे नहीं लगता. वह मौजमस्ती के लिए उस के साथ यहां आई थी. मुझे पूरा यकीन है कि वह पैट्रोल गजानन नहीं वही लाई थी. अपना काम कर के वह रफूचक्कर हो गई. उस ने तुम्हें झूठी कहानी सुना कर विश्वास में ले लिया और कपड़े पहन कर चली गई. लापरवाही तुम लोग करते हो और भुगतना पुलिस को पड़ता है.” ओमप्रकाश लेखवाल ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा.

थानाप्रभारी ने गैस्टहाऊस का रजिस्टर चैक किया तो उस में गजानन का पता चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली का लिखा था. जबकि उस ने अपने वोटर आईडी कार्ड की जो छायाप्रति जमा कराई थी, उस में उस का पता गांव कामनवास, सवाई माधोपुर, राजस्थान लिखा था.

पुलिस ने गैस्टहाऊस के मैनेजर को वादी बना कर भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. गजानन का हाल जानने के लिए ओमप्रकाश लेखवाल अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि गजानन की मौत हो चुकी है. मरने से पहले उस ने डाक्टरों को बताया था कि उसे सुनीता उर्फ ङ्क्षरकू ने जलाया था.

गजानन की मौत की खबर उस के घर वालों को देना जरूरी था, इसलिए उस ने गैस्टहाऊस में दिल्ली का जो पता लिखाया था, पुलिस चांदनी चौक स्थित उस पते पर गौरीशंकर मंदिर पहुंची तो वहां से पता चला कि गजानन पहले इसी मंदिर में महंत था. लेकिन कुछ दिनों पहले उसे वहां से हटा दिया गया था. अब वह सवाई माधोपुर स्थित अपने गांव में रहता था. दिल्ली वह 10-15 दिनों में आताजाता रहता था.

इस के बाद दिल्ली पुलिस ने राजस्थान पुलिस को गजानन की हत्या की खबर भिजवा कर संबंधित थाने द्वारा उस के घर वालों को उस की हत्या की खबर भिजवा दी. खबर सुन कर गजानन के घर वाले थाना सनलाइट कालोनी पहुंच गए.

डीसीपी संजीव रंधावा ने सुनीता की तलाश के लिए पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में एसआई ललित कुमार, हैडकांस्टेबल मान ङ्क्षसह, कांस्टेबल सूबे ङ्क्षसह, महिला कांस्टेबल संगीता ङ्क्षसह को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व ओमप्रकाश लेखवाल को सौंपा गया.

गजानन चांदनी चौक के जिस गौरीशंकर मंदिर में महंत था, पुलिस टीम ने वहीं से जांच शुरू की. वहां से पुलिस को कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पता चला कि गजानन 10 साल पहले दिल्ली आया था और गौरीशंकर मंदिर का महंत बन गया था. मंदिर में पूजापाठ कराने के साथसाथ वह ज्योतिषी एवं तंत्रमंत्र का भी काम करता था. उस के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुरुषों के साथसाथ महिलाएं भी आती थीं.

इन में कुछ महिलाओं से उस की अच्छी जानपहचान हो गई थी. वह शराब भी पीने लगा था. इन में से कुछ महिलाओं से उस के अनैतिक संबंध भी बन गए थे. बाद में जब यह बात गौरीशंकर मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो कमेटी ने सन 2008 में गजानन को मंदिर से निकाल दिया था.

इस के बाद गजानन ने मंदिर के बाहर फूल एवं पूजा सामग्री बेचने की दुकान खोल ली. उस की यह दुकान बढिय़ा चलने लगी थी. उस ने दुकान पर काम करने के लिए 2 नौकर रख दिए और खुद राजस्थान स्थित अपने घर चला गया. यह 2-3 साल पहले की बात है. वह हफ्तादस दिन में दुकान पर आता और नौकरों से हिसाब कर के चला जाता था. यह जानकारी हासिल कर के पुलिस टीम थाने लौट आई.

उधर पोस्टमार्टम के बाद 20 अक्तूबर, 2015 को लाश गजानन के परिजनों को सौंप दी गई. घर वालों ने निगमबोध घाट पर ही उस की अंत्येष्टि कर दी. एसआई ललित कुमार ने घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी पर शक नहीं जताया.

पुलिस ने गैस्टहाऊस में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी. फुटेज में सुनीता उर्फ ङ्क्षरकू का चेहरा तो नजर आ रहा था, लेकिन पुलिस के लिए मुश्किल यह थी कि इतनी बड़ी दिल्ली में उसे कहां ढूंढ़ा जाए. पुलिस के पास सुनीता का कोई मोबाइल नंबर भी नहीं था, जिस से उस के द्वारा उसे ढूंढने में आसानी हो. गैस्टहाऊस में गजानन के कपड़ों से एक मोबाइल फोन मिला था. घर वालों ने बताया था कि वह मोबाइल गजानन का ही है.

ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर जानने के लिए गजानन के मोबाइल की काल लौग देखी तो एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. क्योंकि वह नंबर ‘माई लव’ के नाम से सेव था. ललित कुमार जानना चाहते थे कि यह नंबर किस का है. उन्होंने अपने सैल फोन से वह नंबर मिलाया.

कुछ देर बाद एक महिला ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा तो ललित कुमार बोले, “कार में चलने का शौक है तो इस के लोन की किस्तें भी समय से जमा करा दिया करो. 3 महीने हो गए, आप ने अभी तक किश्तें नहीं जमा कीं.”

“अरे भाई, आप कौन बोल रहे हैं? मैं ने कार के लिए कब लोन लिया?” दूसरी ओर से महिला ने कर्कश स्वर में कहा.

“आप रुखसार बोल रही हैं न?” ललित कुमार ने पूछा.

“नहीं बाबा, मैं रुखसार नहीं, सुनीता हूं. रौंग नंबर.”

“सौरी मैडम, गलत नंबर लग गया.” ललित कुमार ने कहा. इस के बाद उन्होंने फोन काट दिया. इस बातचीत के बाद उन की आंखों में चमक आ गई. क्योंकि सुनीता के फोन नंबर की पुष्टि हो गई थी.

ललित कुमार ने सुनीता का फोन नंबर सॢवलांस पर लगवाया तो उस की लोकेशन लाल किला, रेलवे कालोनी की मिली. वह टीम के साथ रेलवे कालोनी पहुंचे तो वहां के लोगों से सुनीता के बारे में पूछने पर पता चला कि सुनीता का पति रेलवे में नौकरी करता है. वह पहले इसी कालोनी में पति के साथ रहती थी, पर 4 सालों से वह परिवार के साथ नोएडा में कहीं रहने चली गई है.

पता चला कि रेलवे कालोनी का वह क्वार्टर उस ने किसी को किराए पर दे रखा था. किराएदार से वह उस दिन मिलने आई थी. उस से मिल कर वह नोएडा चली गई थी. नोएडा में सुनीता कहां रह रही है, यह बात रेलवे कालोनी में रहने वाला कोई नहीं बता सका.

अलबत्ता सुनीता ने जिस परिवार को अपना क्वार्टर किराए पर दिया था, उस ने पुलिस को बताया कि उस का कुछ जरूरी सामान एक कमरे में रहता है, जिस की चाबी सुनीता के पास रहती है. आज जब वह मिलने आई थी तो वहां से कुछ सामान अपने बैग में भर कर ले गई थी.

इतनी जानकारी मिलने के बाद ललित कुमार ने सॢवलांस द्वारा सुनीता के फोन की लोकेशन पता की तो इस बार लोकेशन नोएडा सैक्टर-29 की निकली.

28 अक्तूबर, 2015 की सुबह ललित कुमार ने टीम में शामिल महिला कांस्टेबल के साथ नोएडा के सैक्टर- 29 स्थित एक मकान पर दबिश दी तो वहां सुनीता मिल गई. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, “मेरा गजानन से रिश्ता जरूर था, मगर मैं ने उन्हें जला कर नहीं मारा. उन्होंने खुद ही पैट्रोल डाल कर आग लगाई थी.”

“तो फिर तुम वहां से भागी क्यों?” थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

“स…सर, मैं डर गई थी.” वह बोली.

“गजानन भला खुद को आग क्यों लगाएगा?” ओमप्रकाश लेखवाल ने पूछा.

“सर, बात यह है कि गजानन की पत्नी बीमार रहती है. जब मुझ से उन का रिश्ता बना तो वह मुझ पर शादी करने का दबाव बनाने लगे. मैं 2 बच्चों की मां हूं. बच्चों को छोड़ कर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?” कह कर सुनीता सिसकने लगी.

पलभर बाद वह हिचकियां लेते हुए बोली, “26 अक्तूबर की शाम गजानन ने फोन कर के कहा कि मुझ से मिलने की उस की काफी इच्छा है. अगले दिन उन्होंने सुबह 10 बजे मुझे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर बुलाया. अगले दिन तयशुदा समय पर मैं स्टेशन के बाहर पहुंची तो उन्हें मैं ने इंतजार करते पाया. उन के कंधे पर कपड़े का एक बैग था.

“गजानन मुझे यश गैस्टहाऊस ले गए. उन्होंने वहां मुझे अपनी पत्नी बताया था. कमरे में जा कर हम ने शारीरिक संबंध बनाए. उस के बाद गजानन ने साथ लाए बैग से प्लास्टिक की 2 लीटर की बोतल निकाली और उस का ढक्कन खोला. उस में पैट्रोल भरा था.

“गजानन ने मुझ से कहा कि वह आखिरी बार पूछ रहा है कि मैं उस से शादी करूंगी या नहीं? मैं ने साफ इनकार कर दिया. तब उन्होंने कहा कि जब तुम नहीं मान रही तो मैं खुदकुशी कर लूंगा, लेकिन पुलिस यही समझेगी कि उसे तुम ने जलाया है. इस के बाद गजानन ने पूरा पैट्रोल अपने शरीर पर छिडक़ कर आग लगा ली.”

फिर सुनीता जोरजोर से रोते हुए बोली, “सर, मैं ने उन्हें नहीं मारा. मुझे फंसाने के लिए उन्होंने खुदकुशी की थी.”

ओमप्रकाश लेखवाल को लगा कि सुनीता की आंखों के आंसू घडिय़ाली हैं, यह जरूर कुछ छिपा रही है. उन्होंने महिला कांस्टेबलों को इशारा किया. महिला कांस्टेबल ने सुनीता को एक अलग कमरे में ले जा कर थोड़ी सख्ती की तो उस ने सहजता से अपना जुर्म कबूल कर लिया.

सुनीता उर्फ ङ्क्षरकू मूलरूप से पटना, बिहार की रहने वाली थी. 13 साल पहले उस की शादी विजय कुमार के साथ हुई थी. विजय कुमार दिल्ली में रहता था और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर बतौर टैक्नीशियन नौकरी करता था. वह पति के साथ खुश थी. वह 2 बच्चों की मां बनी. विजय कुमार को रेलवे की ओर से जामामस्जिद के पास बनी रेलवे कालोनी में क्वार्टर मिला था. उस में वह पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ रहता था.

सुनीता आजादखयालों की थी, जबकि विजय कुमार पंरपरावादी. सुनीता को घूमने एवं सिनेमाहौल में फिल्में देखने का शौक था. अपने शौक पूरे करने के लिए वह पति से अनापशनाप खर्च लेती रहती थी. सुनीता अकसर गौरीशंकर मंदिर भी जाया करती थी. वहीं 8 साल पहले उस की मुलाकात मंदिर के महंत गजानन से हुई.

गजानन पुजारी होने के साथसाथ ज्योतिषी भी था. यही वजह थी कि उस के पास महिलाओं की भीड़ लगी रहती थी. सुनीता गजानन से मिली तो वह उस का दीवाना हो गया. इस के बाद दोनों के बीच संबंध बन गए. कुछ दिनों बाद गजानन और सुनीता के संबंधों की बात मंदिर की प्रबंधक कमेटी को पता चली तो उसे मंदिर से निकाल दिया गया. तब वह मंदिर के बाहर फूल व पूजा सामग्री बेचने लगा.

सुनीता और गजानन के संबंध पहले की ही तरह जारी रहे. गजानन ने चांदनी चौक में किराए का मकान ले रखा था. जब भी उस की इच्छा होती, वह सुनीता को अपने कमरे पर बुला लेता. वह सुनीता को शौक पूरे करने के लिए अच्छेखासे पैसे भी देता था.

सन 2014 के अगस्त महीने में गजानन ने सवाई माधोपुर में अपना एक प्लौट 25 लाख रुपए में बेचा तो सुनीता के मांगने पर उस ने उसे 10 लाख रुपए उधार दे दिए. सितंबर, 2015 के अंतिम दिनों में गजानन ने उस से अपने रुपए मांगे तो सुनीता बहाने बनाने लगी.

दरअसल, अब तक गजानन का मन सुनीता से भर चुका था. वह अपने 10 लाख रुपए ले कर उस से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना चाहता था. लेकिन सुनीता की नीयत में खोट आ गई थी. वह गजानन के 10 लाख रुपए किसी भी सूरत में लौटाना नहीं चाहती थी. वह टालमटोल करने लगी तो गजानन धमकी देने लगा कि उस ने उस के अंतरंग क्षणों की वीडियो बना रखी है. अगर उस ने उस के पैसे नहीं लौटाए तो वह वीडियो उस के पति को दिखा देगा.

सुनीता डर गई. उस ने गजानन की हत्या करने की योजना बना डाली. सुनीता ने 26 अक्तूबर, 2015 की रात गजानन को फोन किया. उस समय गजानन सवाई माधोपुर स्थित अपने घर में था. सुनीता ने कहा, “कल सुबह तुम हजरत निजामुददीन रेलवे स्टेशन के बाहर 11 बजे मिलना. मैं तुम्हारे 10 लाख रुपए लौटा दूंगी.”

पैसों के लालच में गजानन रात में ही ट्रेन द्वारा राजस्थान से चल पड़ा और 27 अक्तूबर की सुबह 9 बजे हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंच गया. वह स्टेशन के बाहर खड़ा हो कर सुनीता का इंतजार करने लगा.

10 बजे के करीब सुनीता वहां पहुंची. वह गजानन को नांगली राजपुर स्थित यश गैस्टहाऊस ले गई. वहां गजानन ने एक कमरा बुक कराया. जैसे ही वे दोनों कमरे में पहुंचे, तभी सुनीता ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मौके का फायदा उठाने के लिए गजानन ने उसे आगोश में ले लिया.

इस के बाद दोनों ने कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाए. हसरतें पूरी करने के बाद दोनों बिस्तर पर निर्वस्त्र लेटे थे, तभी गजानन ने उस से अपने 10 लाख रुपए मांगे. तब सुनीता ने कहा, “पंडितजी, 8-10 सालों से मैं तुम्हारी सेवा करती आ रही हूं. अब तो आप उन पैसों को भूल जाइए.”

“नहीं सुनीता, घर वालों को इस की जानकारी हो गई है. वे सब मुझ से झगड़ा करते हैं. इसलिए मैं पैसे मांग रहा हूं.” गजानन ने कहा.

सुनीता उठी और साथ लाए बैग से पैट्रोल से भरी बोतल निकाल कर उस के ऊपर उड़ेल दी. इस से पहले कि गजानन कुछ समझ पाता, सुनीता ने उस पर आग लगा दी. जलता हुआ गजानन चीखने लगा. उस की चीख सुन कर गैस्टहाऊस का मैनेजर वहां आ पहुंचा. इस के बाद क्या हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

सुनीता से पूछताछ कर के पुलिस ने 29 अक्तूबर, 2015 को उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Suicide Case : प्रेमी जोड़े ने मिठाइयों में जहरीला पदार्थ खाकर की आत्महत्या

Suicide Case : 11जुलाई, 2014 को सुबह साढ़े 10 बजे इंदौर के स्काई होटल के मालिक दर्शन पारिख ने अपने कर्मचारी को होटल के कमरा नंबर 202 में ठहरे व्यक्ति से 500 रुपए लाने को कहा. एक दिन पहले इस कमरे में रोहित सिंह अपनी छोटी बहन के साथ ठहरा था. कमरा बुक कराते समय उस ने कहा था कि वह कमरे में पहुंच कर फ्रैश होने के बाद पैसे दे देगा.

पैसे लेने के लिए कर्मचारी कमरा नंबर 202 पर पहुंचा तो उसे कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मिला. उस ने कालबेल का बटन दबाया. बटन दबाते ही कमरे के अंदर लगी घंटी के बजने की आवाज उस के कानों तक आई तो वह दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगा.

कुछ देर बाद तक दरवाजा नहीं खुला तो उस ने दोबारा घंटी बजाई. इस बार भी दरवाजा नहीं खुला और न ही अंदर से कोई आहट सुनाई नहीं पड़ी. फिर उस ने दरवाजा थपथपाया. इस के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो वह कर्मचारी अपने मालिक दर्शन पारिख के पास पहुंचा और उन्हें दरवाजा न खोलने की बात बता दी. उस ने यह भी बता दिया कि कई बार घंटी बजाने के बाद भी कमरे में कोई हलचल नहीं हुई.

उस की बात सुन कर दर्शन पारिख खुद रूम नंबर 202 पर पहुंच गया और उस ने भी कई बार दरवाजा थपथपाया. उसे भी कमरे से कोई हलचल सुनाई नहीं दी. उसे शंका हुई कि कहीं मामला गड़बड़ तो नहीं है. उस ने उसी समय थाना खजराना फोन कर के इस बात की सूचना दे दी.

ऐसी कंडीशन में ज्यादातर कमरे के अंदर लाश मिलने की संभावना होती है. इसलिए सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सी.बी. सिंह एसआई पी.सी. डाबर और 2 सिपाहियों को ले कर बाईपास रोड पर बने नवनिर्मित होटल स्काई पहुंच गए. उन्होंने भी रूम नंबर 202 के दरवाजे को जोरजोर से खटखटाया. जब दरवाजा नहीं खुला तो पुलिस ने दर्शन पारिख से दूसरी चाबी ले कर दरवाजा खोला. अंदर फर्श पर एक लड़का और लड़की आलिंगनबद्ध मिले.

उन की सांसों को चैक किया तो लगा कि उन की सांसें टूट चुकी हैं. दर्शन पारिख ने उन दोनों को पहचानते हुए कहा कि कल जब यह लड़का आया था तो इस ने इस लड़की को अपनी बहन बताया था और इस समय ये इस हालत में पड़े हैं. कहीं उन की सांसें बहुत धीरेधीरे न चल रही हों, यह सोच कर पुलिस ने उन्हें अस्पताल भेजा. लेकिन अस्पताल के डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

इस के बाद पुलिस ने होटल के उस कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया. मौके पर फोरेंसिक अधिकारी डा. सुधीर शर्मा को भी बुला लिया गया. कमरे में मिठाई का एक डिब्बा, केक, जलेबी आदि खुले पड़े थे.  जिस जगह लाशें पड़ी थीं, वहीं पास में एक पुडि़या में पाउडर रखा था. उसे देख कर डा. सुधीर शर्मा ने बताया कि यह हाई ब्रोस्वोनिक नाम का जहरीला पदार्थ हो सकता है. इन्होंने मिठाई वगैरह में इस पाउडर को मिला कर खाया होगा. जिस की वजह से इन की मौत हो गई.

एसआई पी.सी. डाबर ने सामान की तलाशी ली तो उस में जो कागजात मिले, उन से पता चला कि उन के नाम रोहित सिंह और मीनाक्षी हैं. वहीं 20 पेज का एक सुसाइड नोट भी मिला. उस से पता चला कि वे मौसेरे भाईबहन के अलावा प्रेमी युगल भी थे. पुलिस ने कमरे में मिले सुबूत कब्जे में ले लिए.

कागजात की जांच से पता चला कि लड़की का नाम मीनाक्षी था. वह खंडवा जिले के नेहरू चौक सुरगांव के रहने वाले महेंद्र सिंह की बेटी थी, जबकि लड़के का नाम रोहित था. वह हरदा के चरवा बावडि़या गांव के रहने वाले सोहन सिंह का बेटा था. पुलिस ने दोनों के घरवालों को खबर कर दी तो वे रोतेबिलखते हुए अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने लाशों की पहचान रोहित और मीनाक्षी के रूप में कर दी. उसी दिन पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें उन के परिजनों को सौंप दी गईं.

दोनों के घर वालों से की गई बातचीत और सुसाइड नोट के बाद पुलिस जान गई कि रोहित और मीनाक्षी के बीच प्रेमसंबंध थे. उन के प्रेमप्रसंग से ले कर सुसाइड करने तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

मध्य प्रदेश के हरदा शहर के चरवा बावडि़या गांव के रहने वाले सोहन सिंह के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और 2 बेटे थे. रोहित सिंह उन का दूसरे नंबर का बेटा था. बेटी को पढ़ानेलिखाने के बाद वह उस की शादी कर चुके थे. रोहित इंटरमीडिएट पास कर चुका था. उस की तमन्ना कृषि वैज्ञानिक बनने की थी, इसलिए पिता ने भी उस से कह दिया था कि उस की पढ़ाई में वह किसी तरह की रुकावट नहीं आने देंगे.

करीब 3 साल पहले की बात है. रोहित अपने परिजनों के साथ इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर अपनी मौसेरी बहन की शादी में गया था. उस शादी में रोहित की दूसरी मौसी की बेटी मीनाक्षी भी अपने घर वालों के साथ आई हुई थी.

मीनाक्षी बेहद खूबसूरत और हंसमुख थी. वह जीवन के 22 बसंत पार कर चुकी थी. मजबूत कदकाठी का 17 वर्षीय रोहित भी बहुत हैंडसम था. पूरी शादी में मीनाक्षी रोहित के साथ रही थी, दोनों ने शादी में काफी मस्ती भी की. मीनाक्षी की रोहित के प्रति दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. चूंकि वे मौसेरे भाईबहन थे, इसलिए दोनों के साथसाथ रहने पर किसी को कोई शक वगैरह नहीं हुआ.

शादी के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर जाने के बाद मीनाक्षी के मन में उथलपुथल होती रही. शादी में रोहित के साथ की गई मस्ती के वह पल उस के दिमाग में घूम रहे थे. समझदार होने के बाद इतने ज्यादा समय तक मोहित उस के साथ पहली बार रहा था. मौसेरा भाई होने के बावजूद मीनाक्षी का उस की तरफ झुकाव हो गया. दोनों के पास एकदूसरे के फोन नंबर थे. समय मिलने पर वे फोन पर बात करते और एसएमएस भेजते रहते.

मीनाक्षी उसे अपने प्रेमी के रूप में देखने लगी. एक दिन उस ने फोन पर ही रोहित से अपने प्यार का इजहार कर दिया. रोहित भी जवानी की हवा में उड़े जा रहा था. उस ने उस का प्रस्ताव मंजूर कर लिया. उस समय वे यह भूल गए कि आपस में मौसेरे भाईबहन हैं. फिर क्या था, दोनों के बीच फोन पर ही प्यार भरी बातें होने लगीं. बातचीत, मेलमुलाकातों के साथ करीब 3 साल तक प्यार का सिलसिला चलता रहा. इस दौरान उन के बीच की दूरियां भी मिट चुकी थीं.

कहते हैं कि प्यार को चाहे कितना भी छिपाने की कोशिश की जाए, वह छिप नहीं पाता, लेकिन मीनाक्षी और रोहित के संबंधों पर घर वालों को जल्दी से इसलिए शक नहीं हुआ था, क्योंकि वे आपस में मौसेरे भाईबहन थे.

भाईबहन का रिश्ता होते हुए भी घर वालों ने जब उन्हें सीमाओं को लांघते देखा तो उन्हें शक हो गया. फिर क्या था, उन के संबंधों को ले कर घर में चर्चा होने लगी. पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ. लेकिन उन की हरकतें ऐसी थीं कि संदेह पैदा हो रहा था. इस के बावजूद घर वाले लापरवाह बने रहे.

उधर मीनाक्षी और रोहित का इश्क परवान चढ़ता जा रहा था. अब मीनाक्षी 25 साल की हो चुकी थी और रोहित 20 साल का. वह रोहित से 5 साल बड़ी थी. इस के बावजूद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था.  दोनों ने शादी का फैसला तो कर लिया, लेकिन उन के सामने समस्या यह थी कि अपनी बात घर वालों से कहें कैसे.

सच्चे प्रेमियों को अपने प्यार के आगे सभी चीजें बौनी नजर आती हैं. वे अपना मुकाम हासिल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं. हालांकि उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि उन के घर वाले उन की बात मानेंगे, लेकिन वे यह बात कह कर घर वालों को यह बता देना चाहते थे कि वे एकदूसरे को प्यार करते हैं. मौका पा कर रोहित और मीनाक्षी ने अपनेअपने घर वालों से साफसाफ कह दिया कि वे एकदूसरे को प्यार करते हैं और अब शादी करना चाहते हैं.

यह सुन कर घर वाले सन्न रह गए कि ये आपस में सगे मौसेरे भाईबहन हैं और किस तरह की बात कर रहे हैं? ऐसा होना असंभव था. घर वालों ने उन्हें बहुत लताड़ा और समझाया भी कि सगेसंबंधियों में ऐसा नहीं होता. मोहल्ले वाले और रिश्तेदार जिंदगी भर ताने देते रहेंगे. लेकिन रोहित और मीनाक्षी ने उन की एक न सुनी. उन्होंने आपस में मिलनाजुलना नहीं छोड़ा. घर वालों को जब लगा कि ये ऐसे नहीं मानेंगे तो उन्होंने उन पर सख्ती करनी शुरू कर दी.

मीनाक्षी और रोहित बालिग थे. उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाने की योजना पहले ही बना ली थी. फिर योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए 15 जून, 2014 को वे अपने घरों से भाग कर इंदौर पहुंच गए. घर से भागने से पहले रोहित अपने दादा के पैसे चुरा कर लाया था तो वहीं मीनाक्षी भी घर से पैसे व जरूरी कपड़े आदि बैग में रख कर लाई थी. वे इंदौर आए और 3 दिनों तक एक होटल में रहे. इस के बाद उन्होंने राज मोहल्ला में एक मकान किराए पर ले लिया.

मीनाक्षी के अचानक गायब होने पर घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने सब से पहले उस का फोन मिलाया. वह बंद आ रहा था. फिर उन्होंने अपने खास लोगों को फोन कर के उस के बारे में पता किया. मामला जवान बेटी के गायब होने का था, इसलिए बदनामी को ध्यान में रखते हुए वे अपने स्तर से ही उसे ढूंढते रहे. बाद में जब उन्हें पता चला कि रोहित भी घर पर नहीं है तो उन्हें बात समझते देर नहीं लगी. फिर मीनाक्षी के पिता महेंद्र सिंह ने बेटी के लापता होने की थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

घर से भाग कर गृहस्थी चलाना कोई आसान काम नहीं होता. खास कर तब जब आमदनी का कोई स्रोत न हो. वे दोनों घर से जो पैसे लाए थे, वे धीरेधीरे खर्च हो चुके थे. अब पैसे कहां से आएं, यह उन की समझ में नहीं आ रहा था. एक दिन रोहित ने मीनाक्षी से कहा, ‘‘मैं घर जा कर किसी तरह पैसा लाता हूं. वहां से लौटने के बाद हमें गुजरबसर के लिए कुछ करना होगा.’’

मीनाक्षी को इंदौर में ही छोड़ कर रोहित अपने गांव चला गया. वह खंडवा रेलवे स्टेशन पर पहुंचा था कि तभी इत्तफाक से मीनाक्षी के भाई ने उसे देख लिया. उस ने उसे वहीं पर पकड़ लिया. वहां भीड़ जमा हो गई. भीड़ में उस के कुछ परिचित भी थे. उन्होंने रोहित से मीनाक्षी के बारे में पूछा, लेकिन रोहित ने कुछ नहीं बताया तो वह अपने परिचितों के सहयोग से उसे पकड़ कर थाने ले गया.

पुलिस ने रोहित से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उस ने बता दिया कि वह इंदौर में है. पुलिस उसे ले कर इंदौर के राज मोहल्ले में पहुंची. इस से पहले कि वह उस के कमरे पर पहुंच पाती, रोहित पुलिस को झांसा दे कर रफूचक्कर हो गया. पुलिस से छूट कर वह तुरंत अपने कमरे पर पहुंचा और वहां से मीनाक्षी को ले कर खिसक गया. कमरा छोड़ कर वे इंदौर के रेडिसन चौराहे के पास स्थित स्काई होटल पहुंचे.

उन के पास अब ज्यादा पैसे नहीं थे. होटल मालिक दर्शन पारिख से मीनाक्षी ने रोहित को अपना छोटा भाई बताया था. दर्शन पारिख ने जब कमरे का एडवांस किराया 500 रुपए जमा करने को कहा तो उस ने कह दिया कि पैसा हम सुबह दे देंगे, अभी जरा थोड़ा आराम कर लें.

कमरे में सामान रखने के बाद वे खाना खाने बाहर गए. वापस आते समय कुछ मिठाइयां आदि ले कर आए और सुबह होटल के कमरे में उन की लाशें मिलीं. अब संभावना यह जताई जा रही है कि उन्होंने मिठाइयों में वही जहरीला पदार्थ मिला कर खाया होगा, जो घटनास्थल पर मिला था.

कमरे से 20 पेज का जो सुसाइड नोट मिला है, उस में दोनों ने 5-5 पेज अपनेअपने घर वालों को लिखे हैं. रोहित ने लिखा है कि पापा मेरी आखिरी इच्छा है कि आप शराब पीना छोड़ दें. गांव में जा कर दादादादी के साथ रहें. मम्मी के लिए उस ने लिखा कि आप पापा, दादादादी, भैया का खयाल रखना. तुम मुझ से सब से ज्यादा प्यार करती हो, अब मैं यहां से जा रहा हूं.

मीनाक्षी ने भी अपने पिता को लिखा था कि पापा, मैं जो कुछ कह रही हूं, जो कुछ किया है, वह शायद किसी को अच्छा नहीं लगेगा कि मौसी के लड़के से प्यार करती हूं. आप के और रोहित के साथ रहना चाहती थी, लेकिन आप ने अनुमति नहीं दी, इसीलिए मैं ने यह कदम उठाया है. आप अपनी सेहत का ख्याल रखना और कमर दर्द की दवा बराबर लेते रहना. उस ने मां के लिए लिखा था कि आप पापा से झगड़ा मत करना.

उन्होंने सामूहिक सुसाइड नोट में लिखा था कि हमारे पत्र के साथ हमारे फोटो भी हैं. आत्महत्या का समाचार हमारे फोटो के साथ अखबारों में छापा जाए.

रोहित और मीनाक्षी की मौत के बाद उन के घर वाले सकते में हैं. सुसाइड नोट के बाद यह बात साबित हो गई थी कि वे दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे. यह बात जगजाहिर होने के बाद दोनों के घर वालों का समाज के सामने सिर झुक गया. क्योंकि रोहित और मीनाक्षी के बीच जो संबंध थे, उसे हमारा समाज मान्यता नहीं देता.

बहरहाल, रोहित के पिता सोहन सिंह का बेटे को कृषि वैज्ञानिक बनाने का सपना धराशाई तो हो ही गया, साथ ही बेटा भी हमेशा के लिए उन से जुदा हो गया. इस के अलावा महेंद्र सिंह को भी इस बात का पछतावा हो रहा है कि जैसे ही उन्होंने मीनाक्षी और रोहित के बीच चक्कर चलने की बात सुनी थी, उसी दौरान वह उस की शादी कहीं और कर देते तो शायद यह दुखद समाचार सुनने को नहीं मिलता. Suicide Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Emotional Story : फिनाइल पीकर गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड ने ली जान

Emotional Story : शिव सिंह उर्फ मक्कू कस्बा अकबरपुर में बन रहे अपने मकान पर पहुंचे तो उन्होंने वहां जो देखा, वह दिल दहला देने वाला था. मकान के अंदर एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी थी. लाशों को देख कर ही लग रहा था कि वे प्रेमीप्रेमिका थे, क्योंकि मरने के बाद भी दोनों एकदूसरे का हाथ थामे हुए थे. शिव सिंह ने तुरंत इस बात की सूचना थाना अकबरपुर पुलिस को दी. उन्होंने यह बात कुछ लोगों को बताई तो जल्दी ही यह खबर अकबरपुर कस्बे में फैल गई. इस के बाद सैकड़ों लोग उन के मकान पर पहुंच गए. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. यह 20 अप्रैल, 2017 की बात है.

थाना अकबरपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर ए.के. सिंह यह जानकारी अधिकारियों को दे कर तुरंत पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही एसपी प्रभाकर चौधरी, एएसपी मनोज सोनकर तथा सीओ आलोक कुमार जायसवाल भी फील्ड यूनिट की टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

अधिकारियों के आते ही घटनास्थल का निरीक्षण शुरू हुआ. लड़की की उम्र 18-19 साल रही होगी तो लड़का 23-24 साल का था. लाशों के पास ही फिनाइल की 2 खाली बोतलें पड़ी थीं. इस से अंदाजा लगाया गया कि फिनाइल पी कर दोनों ने आत्महत्या की है. उन बोतलों को पुलिस ने जब्त कर लिया.

इस के बाद पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाशों की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन वहां इकट्ठा लोगों में से कोई भी उन की पहचान नहीं कर सका. लाशों की पहचान नहीं हो सकी तो एसपी प्रभाकर चौधरी ने एक सिपाही से लड़के की जेब की तलाशी लेने को कहा. सिपाही ने लड़के की पैंट की जेब में हाथ डाला तो उस में 2 सिम वाला एक मोबाइल फोन, बीकौम का परिचय पत्र, जो कुंदनलाल डिग्री कालेज, रनियां का था, मिला.

लड़की की लाश के पास एक बैग पड़ा था. पुलिस ने उस की तलाशी ली तो उस में से हाईस्कूल, इंटरमीडिएट की मार्कशीट, आधार कार्ड, कालेज का परिचय पत्र, बैंक की पासबुक, मोबाइल फोन, कुछ दवाएं तथा जिला अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ का ओपीडी का पर्चा मिला.

आधार कार्ड के अनुसार, लड़की का नाम रोहिका था. उस के पिता का नाम अजय कुमार था. वह जिला कानपुर देहात के आधू कमालपुर गांव की रहने वाली थी. लाशों की शिनाख्त के बाद एसपी प्रभाकर चौधरी ने रोहिका के आधार कार्ड में लिखे पते पर 2 सिपाहियों को घटना की सूचना देने के लिए भेज दिया. इस के बाद लड़के की जेब से मिले मोबाइन फोन को उन्होंने जैसे ही औन किया, फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने फोन करने वाले से बात की और उसे तुरंत अकबरपुर कस्बा स्थित जिला अस्पताल के पीछे आने को कहा.

अभी आधा घंटा भी नहीं बीता था कि एक आदमी वहां आ पहुंचा. लड़के की लाश देख कर वह सिर पीटपीट कर रोने लगा. पूछने पर उस ने अपना नाम राजेंद्र कुमार बताया. वह जिला कानपुर देहात के आधू कमालपुर गांव का रहने वाला था. वह लाश उस के बेटे अंकित उर्फ रामबाबू की थी.

crime-story

एक दिन पहले यानी 19 अप्रैल, 2017 को सुबह 10 बजे अंकित कालेज जाने  की बात कह कर घर से निकला था. देर शाम तक वह घर नहीं लौटा तो उस की तलाश शुरू हुई. मोबाइल पर फोन किया गया तो वह बंद था. नातेरिश्तेदारों से पता किया गया, लेकिन अंकित का कुछ पता नहीं चला.

सवेरा होते ही उस की खोज फिर शुरू हुई. उसे कई बार फोन भी किया गया. उसी का नतीजा था कि उस का फोन मिल गया. राजेंद्र एसपी प्रभाकर चौधरी को बेटे अंकित के बारे में बता ही रहा था कि उस के साथ मरने वाली लड़की रोहिका के घर वाले भी आ गए. फिर तो वहां कोहराम मच गया.

रोहिका की मां सुनीता और बहन रितिका छाती पीटपीट कर रो रही थीं. रोहिका के पिता का नाम अजय था. उन के भी आंसू नहीं थम रहे थे. रोतेबिलखते घर वालों को सीओ आलोक कुमार जायसवाल ने किसी तरह शांत कराया और उन्हें हटा कर अपनी काररवाई शुरू की.

लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर पुलिस ने पूछताछ शुरू की. लाशों की स्थितियों से साफ था कि अंकित और रोहिका एकदूसरे को प्रेम करते थे. यह भी निश्चित था कि उन्होंने आत्महत्या की थी. उन्होंने आत्महत्या इसलिए की होगी, क्योंकि घर वालों ने उन की शादी नहीं की होगी. इस बारे में घर वालों से विस्तारपूर्वक पूछताछ की गई तो जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर देहात के थानाकस्बा अकबरपुर का एक गांव है आधू कमालपुर. यह कस्बे से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है. इसी गांव में अजय कुमार अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटियां रितिका और रोहिका थीं. बड़ी बेटी रितिका की शादी हो चुकी थी.

अजय सेना में नौकरी करते थे. इस समय वह असम में तैनात थे. सरकारी नौकरी होने की वजह से उन्हें अच्छा वेतन मिलता था, इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. उन की छोटी बेटी रोहिका काफी खूबसूरत थी. उस की इस खूबसूरती में चार चांद लगाता था उस का स्वभाव.

रोहिका अत्यंत सौम्य और मृदुभाषी थी. वह तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही पढ़ने में भी तेज थी. अकबरपुर इंटरकालेज से इंटरमीडिएट करने के बाद वह वहीं स्थित डिग्री कालेज से बीएससी कर रही थी. पढ़ाईलिखाई और स्वभाव की वजह से वह मांबाप की आंखों का तारा थी.

अंकित भी रोहिका के ही गांव का रहने वाला था. उस के पिता राजेंद्र कुमार के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए वह गांव का संपन्न किसान था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी थी. संतानों में अंकित सब से छोटा था. कस्बे से इंटरमीडिएट कर के वह रानियां के कुंदनलाल डिग्री कालेज से बीकौम कर रहा था.

रोहिका और अंकित एक ही जाति के थे. उन के घर वालों में भी खूब पटती थी, इसलिए अंकित रोहिका के घर बेरोकटोक आताजाता था. इसी आनेजाने में रोहिका अंकित को भा गई. फिर तो वह कालेज आतेजाते समय उस का पीछा करने लगा.

अंकित रोहिका को तब तक चाहतभरी नजरों से ताकता रहता था, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी. लेकिन रोहिका थी कि उसे भाव ही नहीं दे रही थी. धीरेधीरे अंकित के मन की बेचैनी बढ़ने लगी. हर पल उस के दिल में रोहिका ही छाई रहती थी. अब उस का मन पढ़ाई में भी नहीं लगता था.

रोहिका के करीब पहुंचने की तड़प जब अंकित के लिए बरदाश्त से बाहर हो गई तो वह उस के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगा. चूंकि घर वालों में अच्छा तालमेल था, इसलिए उस के घर आने और रोहिका से बातें करने पर किसी को ऐतराज नहीं था. उस के घर आने पर अंकित भले ही बातें दूसरों से करता रहता था, लेकिन उस की नजरें रोहिका पर ही टिकी रहती थीं.

अंकित की इस हरकत से जल्दी ही रोहिका ने उस के मन की बात भांप ली. अंकित के मन में अपने लिए चाहत देख कर रोहिका का भी मन विचलित हो उठा. अब वह भी उस के आने का इंतजार करने लगी. जब भी अंकित आता, वह उस के आसपास ही मंडराती रहती. इस तरह दोनों ही एकदूसरे की नजदीकी पाने को बेचैन रहने लगे.

अंकित की चाहतभरी नजरें रोहिका की नजरों से मिलतीं तो वह मुसकराए बिना नहीं रह पाती. इस से अंकित समझ गया कि जो बात उस के मन में है, वही रोहिका के भी मन में है. लेकिन वह दिल की बात रोहिका से कह नहीं पा रहा था.

अंकित ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह अपने दिल की बात रोहिका से कह सके. चाह को राह मिल ही जाती है. आखिर एक दिन अंकित को मौका मिल ही गया. उस दिन रोहिका को घर में अकेली पा कर अंकित ने कहा, ‘‘रोहिका, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर तुम बुरा न मानो तो अपने मन की बात तुम से कह दूं.’’

‘‘बात ही कहनी है तो कह दो. इस में बुरा मानने वाली कौन सी बात है?’’ रोहिका आंखें नचाते हुए बोली. शायद उसे पता था कि वह क्या कहने वाला है.

‘‘रोहिका, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम्हारे अलावा कुछ अच्छा ही नहीं लगता.’’ नजरें झुका कर अंकित ने कहा, ‘‘हर पल मेरी नजरों के सामने तुम्हारी सूरत नाचती रहती है.’’

अंकित की बातें सुन कर रोहिका की धड़कनें बढ़ गईं. शरमाते हुए उस ने कहा, ‘‘अंकित, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

‘‘सच…’’ कह कर अंकित ने रोहिका को अपनी बांहों में भर कर कहा, ‘‘यही सुनने का तो मैं कब से इंतजार कर रहा था.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. रोहिका कालेज या कोचिंग जाने के बहाने घर से निकलती और अंकित से मिलने पहुंच जाती. अंकित उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर कानपुर शहर चला जाता, जहां दोनों फिल्में देखते, चिडि़याघर या मोतीझील घूमते और प्यार भरी बातें करते. कभी दोनों बिठूर पहुंच जाते, जहां गंगा में नौका विहार करते.

ऐसे में ही दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए भविष्य के सपने देखने लगे थे. मन से मन मिला तो दोनों के तन मिलने में देर नहीं लगी. समय इसी तरह बीतता रहा और इसी के साथ रोहिका और अंकित का प्यार गहराता गया. उन्होंने लाख कोशिश की कि उन के प्यार की जानकारी किसी को न हो, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

एक दिन रोहिका के चचेरे भाई रवि ने नहर के किनारे दोनों को इस हालत में देख लिया कि सारा मामला समझ में आ गया. उस ने अपने परिवार की बेइज्जती महसूस की और तुरंत यह बात अपनी चाची सुनीता को बता कर चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘रोहिका और अंकित को समझा देना. अगर वे दोनों नहीं माने तो उन्हें मैं अपने ढंग से मनाऊंगा. तब बहुत महंगा पड़ेगा.’’

रोहिका की हरकत पता चलने पर सुनीता सन्न रह गई. वह घर आई तो सुनीता ने बेटी को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘रोहिका, तुम पर तो मैं बहुत भरोसा करती थी. लेकिन तुम ने तो अभी से रंग दिखाना शुरू कर दिया. अंकित के साथ तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘मेरा किसी से कोई चक्कर नहीं है.’’ रोहिका ने दबी आवाज में कहा.

‘‘तू क्या सोचती है कि तेरी बात पर मुझे विश्वास हो जाएगा. जो बात मैं कह रही हूं, उसे कान खोल कर सुन ले. आज के बाद तू अंकित से बिलकुल नहीं मिलेगी और वह इस घर में कदम नहीं रखेगा. आज के बाद तूने कोई हरकत की तो तेरा बाप और चचेरा भाई तुझे जिंदा जमीन में गाड़ देंगे.’’ सुनीता ने चेतावनी देते हुए कहा.

मां ने जो कहा था, वह सच था. इसलिए रोहिका ने कोई जवाब नहीं दिया. मां बड़बड़ाती रही और वह चुपचाप उन की बातें सुनती रही. मां की चेतावनी से वह बुरी तरह डर गई थी. इस से साफ था कि मां उस के संबंधों को जान गई थी.

अजय असम में तैनात थे. कुछ दिनों बाद जब वह छुट्टी पर घर आए तो सुनीता ने उन्हें बेटी की करतूत बता दी. अजय ने उसे जम कर डांटा. चूंकि बात इज्जत की थी, इसलिए अजय ने अंकित को तो डांटा ही, उस के पिता राजेंद्र से भी उस की शिकायत की. रोहिका पर अब कड़ी नजर रखी जाने लगी. उस का घर से निकलना भी लगभग बंद कर दिया गया था. अगर किसी जरूरी काम से कहीं जाना होता तो मां उस के साथ जाती थी. उसे अकेली कहीं नहीं जाने दिया जाता था.

कहते हैं, प्यार पर पहरा लगा दिया जाता है तो वह और बढ़ता है. शायद इसी से रोहिका और अंकित परेशान रहने लगे थे. दोनों एकदूसरे की एक झलक पाने को बेचैन रहते थे. रोहिका के प्यार में आकंठ डूबा अंकित तरहतरह के अपमान भी बरदाश्त कर रहा था.

कुछ समय बाद सुनीता को लगा कि बेटी सुधर गई है और अंकित के प्यार का भूत उस के सिर से उतर गया है तो उन्होंने उसे ढील दे दी. ढील मिलते ही रोहिका और अंकित की प्रेमकहानी एक बार फिर शुरू हो गई. हां, अब मिलने में दोनों काफी सतर्कता बरतते थे.

तमाम सतर्कता के बावजूद एक शाम रवि ने दोनों को एक साथ देख लिया. इस बार रवि आपा खो बैठा और अंकित के साथ मारपीट कर बैठा. घर आ कर उस ने नमकमिर्च लगा कर चाची से रोहिका की शिकायत की. गुस्से में सुनीता ने रोहिका को भलाबुरा तो कहा ही, पिटाई भी कर दी. यही नहीं, उन्होंने फोन कर के सारी बात पति को भी बता दी.

अजय बेटी को ले कर परेशान हो उठा. उसे डर था कि कहीं रोहिका उस की इज्जत पर दाग न लगा दे. इसलिए किसी तरह छुट्टी ले कर वह घर आ गया. उस ने पत्नी सुनीता से इस गंभीर समस्या पर विचार किया. अंत में रोहिका का विवाह जल्द से जल्द करने का निर्णय लिया गया. दौड़धूप कर उन्होंने रोहिका का विवाह औरैया में तय कर दिया और अपनी ड्यूटी पर चले गए.

रोहिका को शादी तय होने की जानकारी मिली तो वह बेचैन हो उठी. किसी तरह इस बात की जानकारी अंकित को भी हो गई. एक दिन मौका मिलने पर वह रोहिका से मिला तो पहला सवाल यही किया, ‘‘रोहिका, मैं ने जो सुना है, क्या वह सच है?’’

‘‘हां अंकित, तुम ने जो सुना है, वह सच है. मेरे घर वालों ने मेरी मरजी के खिलाफ मेरी शादी तय कर दी है. लेकिन मैं बेवफा नहीं हूं. मैं तुम्हें जितना प्यार पहले करती थी, उतना ही आज भी करती हूं. मैं ने तुम्हारे साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं, उसे निभाऊंगी.’’

रोहिका की ये बातें सुन कर अंकित के दिल को थोड़ा सुकून मिला. लेकिन उस की बेचैनी खत्म नहीं हुई. अब तो उस का खानापीना तक छूट गया. उसे न दिन में चैन मिल रहा था न रात में. रोहिका पर हर तरह से पाबंदी थी, इसलिए वह उस से मिल भी नहीं सकता था. फिर भी जब कभी मौका मिलता था, वह फोन कर के बात कर लेता था.

15 मार्च, 2017 से रोहिका की परीक्षा शुरू हुई, इसलिए उस पर लगी पाबंदी हटानी पड़ी. वह परीक्षा देने अकबरपुर डिग्री कालेज जाने लगी. परीक्षा के दौरान उस की अंकित से मुलाकातें होने लगीं. लेकिन मिलते हुए दोनों काफी सतर्क रहते थे.

18 अप्रैल, 2017 को रोहिका का आखिरी पेपर था. उस दिन परीक्षा दे कर वह अंकित से मिली. तब उस ने उसे बताया कि कल उस के पापा असम से आ रहे हैं. उसे लगता है कि आते ही वह उस की शादी की तारीख तय कर देंगे. इस के पहले वह किसी और की हो जाए, वह उसे कहीं और ले चले. अगर उस ने ऐसा नहीं किया तो वह अपनी जान दे देगी. इतना कह कर वह रोने लगी.

रोहिका के गालों पर लुढ़के आंसुओं को पोंछते हुए अंकित ने कहा, ‘‘रोहिका, तुम्हें मुझ से कोई नहीं छीन सकता. हम कल ही सब छोड़ देंगे और तुम्हें ले कर अपनी अलग दुनिया बसाएंगे.’’

इस के बाद दोनों ने घर छोड़ने की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत 19 अप्रैल, 2017 की सुबह रोहिका ने अपने बैग में शैक्षणिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, बैंक की पासबुक तथा कालेज का परिचय पत्र और मोबाइल फोन रखा और मां से कालेज में जरूरी काम होने की बात कह कर घर से निकल पड़ी.

सड़क पर अंकित उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस के आते ही दोनों टैंपो में बैठ कर अकबरपुर कस्बा आ गए. रोहिका को हलका बुखार था और जी मितला रहा था. अंकित उसे जिला अस्पताल ले गया और ओपीडी में पर्चा बनवा कर महिला डाक्टर को दिखाया. महिला डाक्टर ने कुछ दवाएं रोहिका के पर्चे पर लिख दीं.

दवा लेने के बाद रोहिका कुछ सामान्य हुई तो उस ने कहा, ‘‘अंकित, हम भाग कर कहां जाएंगे? हमारे पास तो पैसे भी नहीं है. कहीं मुसीबत में फंस गए तो बड़ी परेशानी होगी. इसलिए भागना ठीक नहीं है.’’

‘‘भागने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है हमारे पास.’’ अंकित ने मायूस हो कर कहा.

‘‘एक रास्ता है.’’ रोहिका बोली.

‘‘क्या?’’

‘‘घर वाले हमें साथ रहने नहीं देंगे और हम एकदूसरे के बिना रह नहीं सकते. हम साथ जीवित भले नहीं रह सकते, लेकिन साथ मर तो सकते हैं.’’

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो रोहिका.’’ इस के बाद दोनों ने जीवनलीला समाप्त करने की योजना बना डाली.

योजना के तहत रोहिका और अंकित अकबरपुर बाजार गए और वहां 2 बोतल फिनाइल खरीदी. इस के बाद देर शाम दोनों जिला अस्पताल के पीछे बन रहे शिव सिंह के मकान पर पहुंचे. वहां वे आधी रात तक बातें करते रहे. इस के बाद एकएक बोतल फिनाइल पी कर एकदूसरे का हाथ पकड़ कर लेट गए.

कुछ ही देर में फिनाइल ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो दोनों तड़पने लगे. कुछ देर तड़पने के बाद उन की जीवनलीला समाप्त हो गई. दूसरी ओर शाम तक जब रोहिका घर नहीं लौटी तो सुनीता को चिंता हुई. उस ने उस के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन फोन बंद मिला. अजय घर आए तो पतिपत्नी मिल कर रात भर बेटी की तलाश करते रहे, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला.

सुबह 10 बजे पुलिस द्वारा बेटी की मौत की सूचना मिली. इसी तरह अंकित के घर वाले भी उस की तलाश करते रहे. सुबह उन्हें भी फोन द्वारा उस के मौत की सूचना मिली. पोस्टमार्टम के बाद रोहिका और अंकित की लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गईं. घर वालों ने अलगअलग उन का अंतिम संस्कार कर दिया. इस तरह एक प्रेमकहानी का अंत हो गया. Emotional Story

Crime Kahani : आधी-अधूरी प्रेम कहानी – दोस्त ही निकला हत्यारा

Crime Kahani : 7 फरवरी, 2020 की बात है. उस दिन दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चाकचौबंद थी. इस की वजह यह थी कि अगले दिन यानी 8 फरवरी को दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे. पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया थाने में तैनात महिला एसआई प्रीति अहलावत भी अपनी ड्यूटी पूरी कर के घर चली गई थीं. वह दिल्ली के रोहिणी इलाके में किराए के मकान में रहती थीं. ड्यूटी पर वह मैट्रो से आतीजाती थीं. उस दिन भी वह मैट्रो से रोहिणी जाने के लिए निकल गईं.

करीब साढ़े 9 बजे वह रोहिणी (पूर्व) मैट्रो स्टेशन पर उतरीं. वहां से वह पैदल ही अपने घर की ओर चल दीं. अभी वह 50 मीटर ही चल पाई थीं कि किसी ने उन के बराबर में आ कर उन पर गोलियां चला दीं. प्रीति को सोचनेसमझने का मौका तक नहीं मिला. हमलावर ने उन पर 3 गोलियां चलाई थीं, जिन में से 2 गोलियां प्रीति को लगीं और एक गोली बराबर से गुजर रही कार के पिछले शीशे में जा लगी. एक गोली प्रीति के सिर में लगी थी, जिस से वह नीचे गिर गईं और तत्काल उन की मौत हो गई.

उधर से गुजर रहे लोगों ने जब यह देखा तो किसी ने 100 नंबर पर दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर के सूचना दे दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई. पुलिस को जब पता चला कि वह युवती दिल्ली पुलिस में सबइंसपेक्टर है तो पुलिस कंट्रोल रूम की टीम आश्चर्यचकित रह गई.

सूचना रोहिणी जिले के डीसीपी और अन्य पुलिस अधिकारियों को दे दी गई. जिस युवती को गोली मारी गई थी, उस के आईडी कार्ड से पता चला कि उस का नाम प्रीति अहलावत है. उस के सिर में गोली लगी थी. देखने में लग रहा था कि उस की मौत हो चुकी है. फिर भी पुलिसकर्मी आननफानन में नजदीकी डा. अंबेडकर अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. अगले दिन दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे. ऐसे में दिल्ली पुलिस की एक अफसर की गोली मार कर हत्या कर देना एक बड़ी बात थी. कुछ ही देर में दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अस्पताल पहुंचने लगे.

अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम ने भी घटनास्थल पहुंच कर आवश्यक सबूत जुटाए. मौके से गोली के 3 खाली खोखे बरामद हुए. पता चला कि मृत महिला पुलिस अफसर की ड्यूटी पूर्वी दिल्ली के थाना पटपड़गंज क्षेत्र में थी और वह मूलरूप से हरियाणा के रोहतक जिले की रहने वाली थीं. पुलिस के सीनियर अधिकारियों ने इस घटना को बहुत गंभीरता से लिया. फोन द्वारा हत्या की सूचना मृतका के घर वालों को दे दी गई थी. इस केस को खोलने के लिए तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को लगा दिया गया.

जिस जगह पर एसआई प्रीति को गोली मारी गई थी, पुलिस ने रात में ही उस क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई. फुटेज को गौर से देखा गया तो उस में एक युवक संदिग्ध अवस्था में दिखाई दिया.

अज्ञात हत्यारे ने मारी गोली

पता चला कि प्रीति जब रोहिणी (पूर्व) मैट्रो स्टेशन से उतर कर अपने घर जाने के लिए पैदल निकली तो उस युवक ने उन का पीछा करना शुरू कर दिया था. कुछ दूर चल कर वह युवक तेज कदमों से प्रीति के पास आया और नजदीक जा कर उस पर गोली चला दी. इस के बाद वह तेजी से पैदल चल कर कुछ दूर खड़ी कार के नजदीक पहुंचा और फरार हो गया. युवक कौन था, पुलिस इस का पता लगाने में जुट गई. प्रीति जिस थाने में तैनात थीं, जांच टीम ने वहां के पुलिसकर्मियों और प्रीति के मातापिता से बात कर कुछ क्लू तलाशने की कोशिश की.

टीम को जानकारी मिली कि प्रीति और दिल्ली पुलिस के ही एक एसआई दीपांशु राठी के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से प्रीति ने दीपांशु से दूरियां बना ली थीं. यह दूरियां क्यों बनीं, इस की जानकारी पुलिस टीम को नहीं मिल सकी. 26 वर्षीय एसआई प्रीति अहलावत की हत्या की वजह कहीं दीपांशु ही तो नहीं है, यह पता लगाना जरूरी था. पुलिस ने दीपांशु के बारे में रात में ही छानबीन की तो पता चला उस की पोस्टिंग उत्तरपूर्वी दिल्ली के थाना भजनपुरा में है.

एसआई दीपांशु के फोन को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया. उस के फोन की लोकेशन दिल्ली से सोनीपत होते हुए आगे बढ़ रही थी. पुलिस जांच टीम एसआई दीपांशु के फोन के आधार पर उन का पीछा करने लगी. क्योंकि दीपांशु से पूछताछ करने के बाद ही जांच टीम अगला कदम उठा सकती थी. रोहिणी जिले के डीसीपी एस.डी. मिश्रा अलगअलग दिशा में काम कर रही पुलिस टीमों के संपर्क में थे. उन के निर्देशन में ही टीमें काम कर रही थीं.

एसआई दीपांशु के फोन की लोकेशन मुरथल के पास जा कर स्थिर हो गई. वैसे वह रहने वाले सोनीपत के थे. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह भजनपुरा थाने से अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद शायद अपने घर चला गया होगा. फिर भी पुलिस को दीपांशु से मिल कर पूछताछ करना जरूरी था. लिहाजा 8 फरवरी को सुबह पुलिस टीम उस स्थान पर पहुंच गई, जहां दीपांशु के फोन की लोकेशन मिल रही थी. लोकेशन ट्रेस करते हुए जांच टीम मुरथल के पास सड़क किनारे खड़ी एक कार के पास पहुंची. उस कार में ध्यान से देखा तो दीपांशु ड्राइविंग सीट पर मृत पड़ा था. उस के हाथ में सरकारी रिवौल्वर थी और उस की कनपटी से खून निकल रहा था. साफ दिखाई दे रहा था कि उस ने गोली मार कर आत्महत्या की थी.

28 वर्षीय एसआई दीपांशु राठी के सुसाइड करने की जानकारी टीम ने डीसीपी एस.डी. मिश्रा को दे दी. इस के बाद तो विभाग में हड़कंप मच गया. क्योंकि एक ही दिन में 2 युवा पुलिस अफसरों की मौत हुई थी. दीपांशु के सुसाइड करने के बाद यह बात स्पष्ट हो गई थी कि दीपांशु राठी ने ही प्रीति अहलावत को गोली मारने के बाद खुद की जीवनलीला खत्म कर ली थी.

सूचना मिलने पर दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी सकते में आ गए कि ऐसा क्या हुआ जो दीपांशु ने इतना बड़ा कदम उठाया. फोन कर के यह सूचना दीपांशु के घर वालों को दे दी गई. दीपांशु का घर सोनीपत की शास्त्री कालोनी में था. यह दुखद समाचार सुन कर उस के पिता दयानंद राठी परिवार के अन्य लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

अपने जवान बेटे की इस दुखद मौत पर वह बिलखबिलख कर रोते हुए कह रहे थे कि दीपांशु तो बहुत हिम्मत वाला था. उस ने ऐसा कदम क्यों उठा लिया. दयानंद राठी और अन्य लोगों से कुछ जरूरी पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. सुबह होने पर प्रीति के पिता और घर के अन्य लोग भी दिल्ली पहुंच गए थे. प्रीति की हत्या से सभी गहरे सदमे में थे. उन्हें पता चला कि प्रीति को गोली किसी और ने नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस के ही एसआई दीपांशु राठी ने मारी थी. इस के बाद उस ने खुद को भी गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी.

करीबी फ्रैंड निकला हत्यारा

यह खबर मिलते ही मृतका के पिता बोले कि दीपांशु काफी दिनों से उन की बेटी को परेशान कर रहा था. इस की शिकायत उन्होंने उस के घर वालों से भी की थी, इस के बावजूद उस ने अपनी हरकतें बंद नहीं कीं और हमारी बेटी की जान ले ली. मृतका के घर के सभी लोगों का रोरो कर बुरा हाल था. किसी तरह पुलिस अधिकारियों ने उन्हें ढांढस बंधाया. फिर टीम ने उन से भी जरूरी पूछताछ की.

मृतकों के घर वालों और घनिष्ठ दोस्तों से पूछताछ करने के बाद जांच टीम ने यह पता लगाने की कोशिश की कि आखिर युवा एसआई दीपांशु राठी ने एसआई प्रीति की हत्या क्यों की और उन की हत्या कर के खुद सुसाइड क्यों कर लिया? इस जांच में पुलिस को पता चला कि दोनों पुलिस अफसरों के बीच प्रेम प्रसंग चला था. इन के प्रेम प्रसंग के बीच आखिर ऐसा क्या हो गया, दीपांशु को इतना खतरनाक कदम उठाना पड़ा. इस के पीछे की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान कर देने वाली थी—

दीपांशु राठी हरियाणा के सोनीपत शहर की शास्त्री कालोनी के रहने वाले दयानंद राठी का बेटा था. दयानंद राठी भी हरियाणा पुलिस में थे. करीब 4 महीने पहले वह एसआई के पद से रिटायर हुए थे. दीपांशु के अलावा उन की एक बेटी थी, जिस की शादी हो चुकी थी. सन 2018 में दीपांशु का चयन दिल्ली पुलिस में एसआई पद पर हो गया था. ट्रेनिंग के दौरान ही दीपांशु की मुलाकात एसआई की ट्रेनिंग कर रही प्रीति अहलावत से हुई थी. दोनों एक ही बैच के थे. प्रीति अहलावत मूलरूप से हरियाणा के जिला रोहतक की रहने वाली थी.

प्रीति के पिता सीमा सुरक्षा बल में थे जोकि रिटायर हो चुके थे. प्रीति की मां और बड़ी बहन टीचर हैं जबकि भाई न्यूजीलैंड में कंप्यूटर इंजीनियर है. कुल मिला कर वह एक अच्छे परिवार से थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद प्रीति ने दिल्ली के रोहिणी में किराए का फ्लैट ले कर रहना शुरू कर दिया था. ट्रेनिंग के दौरान हुई प्रीति और दीपांशु की मुलाकात धीरेधीरे दोस्ती में बदलती गई. जून 2019 तक दोनों गहरे दोस्त बन गए. दोनों ही पुलिस अफसर बन चुके थे और अपने भविष्य के बारे में अच्छी सोचसमझ रखते थे. धीरेधीरे इन युवा पुलिस अफसरों के दिलों में एकदूसरे के प्रति चाहत पैदा हो गई यानी एकदूसरे को प्यार करने लगे. दीपांशु ने तो तय कर लिया था कि वह शादी करेगा तो प्रीति से.

अपनीअपनी ड्यूटी से फारिग हो कर दोनों प्यार की बातें करने के लिए रेस्टोरेंट व अन्य जगहों पर जाने लगे. प्रीति को भी दीपांशु अपना हमसफर लगने लगा था. दोनों के दोस्त भी उन की इस गहरी दोस्ती की सच्चाई जानते थे. दोनों का कई महीनों तक प्रेम प्रसंग चलता रहा. उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. लेकिन दोनों ही इस बात के पक्ष में थे कि शादी घर वालों की सहमति के बाद सामाजिक रीतिरिवाज से ही हो. लिहाजा दोनों ने अपने मन की बात अपनेअपने घर वालों को भी बता दी.

दोनों के परिवार पढ़ेलिखे, समझदार और खातेपीते थे. उन दोनों के प्रेम को देख कर दोनों पक्षों ने शादी के लिए सहमति दे दी. घर वालों की इजाजत मिल जाने से दीपांशु और प्रीति खूब खुश थे. अपनी हदों में रह कर दोनों एकदूसरे को प्यार करते रहे. इस के बाद उन के मिलने का सिलसिला बढ़ गया. दीपांशु के बात करने का लहजा भी पहले से बदल गया था. वह अभी से प्रीति पर पति जैसा अधिकार जताने वाली बातें करने लगा था. कुछ दिनों तक प्रीति उस के इस व्यवहार को नजरअंदाज करती रही, लेकिन जब उस की यह आदत कम होने के बजाए बढ़ने लगी तो प्रीति को उस का इस तरह का व्यवहार चुभने लगा.

बदल गई प्रीति की सोच

प्रीति ने सोचा कि अभी तो शादी भी नहीं हुई है और दीपांशु इस तरह की बातें करता है. अगर साथ शादी हो गई तब तो वह उस का जीना हराम कर देगा. दीपांशु की यही बातें प्रीति को अखरने लगीं और उस ने तय कर लिया कि वह दीपांशु से शादी हरगिज नहीं करेगी. अपने इस फैसले से प्रीति ने अपने मातापिता को भी अवगत करा दिया. मांबाप ने भी फैसला बेटी पर छोड़ दिया कि उसे जो अच्छा लगे, करे. इतना ही नहीं, प्रीति के पिता ने दीपांशु से शादी न करने वाली बात दीपांशु के पिता को भी बता दी.

उधर दीपांशु को जब प्रीति के फैसले की जानकारी हुई तो उस ने प्रीति को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह उसे हमेशा के लिए भूल जाए. प्रीति ने दीपांशु का फोन नंबर अपने फोन में विकीपीडिया के नाम से सेव कर रखा था. अब उस ने उस से मिलना तो दूर फोन पर बात करनी भी बंद कर दी. यह बात दिसंबर 2019 की है. उधर दीपांशु तो प्रीति के प्यार में दीवाना बन गया था. प्रीति को भुला देना उस के लिए आसान नहीं था. प्रीति द्वारा उस का फोन तक रिसीव न करने पर वह बहुत परेशान रहने लगा. वह कोशिश करता कि किसी तरह प्रीति गुस्सा थूक कर मान जाए और संबंध पहले की तरह सामान्य हो जाएं. लेकिन प्रीति अपने फैसले पर अटल रही.

3 जनवरी, 2020 को दीपांशु ने मैसेज भेज कर प्रीति को मिलने के लिए बुलाया. लेकिन प्रीति ने उस से मिलने से न सिर्फ इनकार कर दिया बल्कि दीपांशु का फोन नंबर ही ब्लौक कर दिया. प्रीति की पोस्टिंग पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया थाने में थी’दीपांशु थाना भजनपुरा में तैनात था. दीपांशु ने एकदो बार प्रीति के थाने जा कर उस से मिलने की कोशिश की लेकिन प्रीति ने मिलने से इनकार कर दिया. दीपांशु प्रीति से मिल कर किसी भी तरह प्रीति को मनाना चाहता था, लेकिन उस की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी. इस से वह बुरी तरह टूट गया. अचानक प्रीति उस से इतनी दूरी बना लेगी, ऐसा उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

ऐसे में उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. क्योंकि प्रीति ने उस के लिए अपने दिल का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर लिया था. ऐसे में उस के मन में नकारात्मक विचार पनपने लगे. इसी बीच उस ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस का दुख न सिर्फ उस के घर वालों को बल्कि प्रीति के घर वालों को भी जिंदगी भर तक सालता रहेगा.

दीपांशु को इस बात की तो जानकारी थी कि प्रीति ड्यूटी पूरी करने के बाद रोहिणी स्थित अपने फ्लैट पर किस रास्ते से जाती है. घटना से 2 दिन पहले दीपांशु किसी केस के सिलसिले में उत्तर प्रदेश गया था. तब वह थाने से सरकारी पिस्टल ले गया था. वहां से लौटने के बाद उस ने वह पिस्टल और गोलियां जमा नहीं कराई थीं. इस की वजह यह थी कि उसे इस पिस्टल से अपनी योजना को अंजाम देना था. 7 फरवरी को अपनी ड्यूटी पूरी कर के दीपांशु अपनी कार से रोहिणी (पूर्व) मैट्रो स्टेशन पहुंचा. वहां उस ने कार एक जगह सड़क किनारे खड़ी कर दी. इस के बाद वह एक जगह खड़े हो कर प्रीति के आने का इंतजार करने लगा. उसे पता था कि प्रीति अपनी ड्यूटी के बाद 9 साढ़े 9 तक मैट्रो स्टेशन पहुंच जाती है.

साढ़े 9 बजे के करीब प्रीति मैट्रो स्टेशन से उतरने के बाद जैसे ही अपने फ्लैट की तरफ पैदल चली, तभी दीपांशु ने उस का पीछा करना शुरू कर दिया और फिर उस के नजदीक पहुंच कर प्रीति पर अपनी सरकारी पिस्टल से 3 फायर किए, जिस में एक गोली उधर से गुजर रही कार के पिछले शीशे में जा कर लगी. प्रीति के सिर में जो गोली लगी थी, उसी से उस की मौत हो गई. वारदात को अंजाम देने के बाद दीपांशु अपनी कार के पास पहुंचा और वहां से अपने घर की तरफ (सोनीपत) चल दिया. मुरथल के पास पहुंच कर उस ने उसी पिस्टल से खुद को भी गोली मार ली. पुलिस को दीपांशु की कार से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी इस बात की पुष्टि हो गई कि दीपांशु और प्रीति की मौत दीपांशु को थाने से इश्यू की गई सरकारी पिस्टल से चलाई गई गोलियां से हुई थी. चूंकि हत्यारे ने खुद भी आत्महत्या कर ली थी, इसलिए पुलिस इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी. बहरहाल, थोड़ी सी नासमझी के कारण दोनों युवा पुलिस अफसरों को न सिर्फ अपनी जान गंवानी पड़ी, बल्कि घर वालों को भी ऐसा दुख दे दिया, जिसे वे जिंदगी भर नहीं भुला पाएंगे. Crime Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : कंकाल से आखिर किस तरह सामने आया हत्या का सच

Crime News : कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने सब से पहले कंकाल का निरीक्षण किया. इस के बाद उन्होंने आसपास की झाडिय़ों पर नजर दौड़ाई. पास में एक फटा सलवारसूट पड़ा था, जिसे देख कर लग रहा था कि यह कंकाल किसी युवती का रहा होगा. इस के बाद उन्होंने आसपास पड़ी किसी अन्य वस्तु को भी खोजना शुरू किया जिस से उन्हें इस कंकाल के बारे में और जानकारी प्राप्त हो सके.

3 दिन बीत गए थे. मगर युवती के कंकाल की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. इस के बाद एसएसपी अजय सिंह ने इस कंकाल की शिनाख्त के लिए एसओजी प्रभारी विजय सिंह तथा थाना सिडकुल के एसएचओ नरेश राठौर को लगा दिया था. साथ ही पुलिस टीम कंकाल मिलने वाली जगह के आसपास चलने वाले मोबाइल फोनों की डिटेल भी जुटा रही थी.

हरिद्वार के रानीपुर क्षेत्र में स्थित शिवालिक पर्वत की निचली सतह की ओर घनी झाडिय़ां फैली हुई थीं. कई दिनों से क्षेत्र में हो रही मूसलाधार बारिश के कारण ये झाडिय़ां काफी घनी हो गई थीं. इन्हीं झाडिय़ों के पास से हो कर गांवों से एक रास्ता जिला मुख्यालय की ओर जाता है. सैकड़ों लोग अकसर सुबहशाम इसी रास्ते से हो कर अपने घर आतेजाते थे.

कई दिनों से कुछ लोग यह महसूस कर रहे थे कि झाडिय़ों के एक कोने से काफी बदबू आ रही है. पहले तो लोगों को यह लग रहा था कि यह बदबू किसी कुत्ते या बिल्ली की लाश से आ रही होगी, मगर जब यह बदबू ज्यादा हो गई थी और इसे सहन करना भी असहनीय हो गया था तो कुछ लोगों ने नाक पर रुमाल रख इसे देखने का फैसला किया था.

उधर से गुजरने वाले कई लोग उत्सुकता से जब झाडिय़ों से लगभग 100 मीटर अंदर की ओर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख कर उन सब की चीख निकल गई थी. वहां पर एक मानव कंकाल पड़ा हुआ था.

कंकाल के पास ही किसी युवती के कपड़े भी पड़े थे, जो बारिश के कारण भीगे हुए थे. तब सभी लोग सहम कर वापस सड़क पर आ गए थे और उन्होंने झाडिय़ों में कंकाल पड़ा होने की जानकारी पुलिस को देने का विचार बनाया था.

यह स्थान उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के रोशनाबाद मुख्यालय के निकट कोतवाली रानीपुर के क्षेत्र टिबड़ी में पड़ता है. घटनास्थल कोतवाली रानीपुर से मात्र 3 किलोमीटर तथा एसएसपी कार्यालय से केवल 5 किलोमीटर दूर है. इस के बाद राहगीरों ने टिबड़ी क्षेत्र में कंकाल पड़े होने की सूचना कोतवाल रानीपुर नरेंद्र बिष्ट को दे दी. अपने क्षेत्र में कंकाल मिलने की सूचना पा कर नरेंद्र बिष्ट चौंक पड़े थे.

सब से पहले उन्होंने यह सूचना एसपी (क्राइम) रेखा यादव, सीओ (ज्वालापुर) निहारिका सेमवाल व एसएसपी अजय सिंह को दी. इस के बाद नरेंद्र बिष्ट अपने साथ कोतवाली के एसएसआई नितिन चौहान तथा अन्य पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम 10 मिनट में ही मौके पर पहुंच गई थी.

जब पुलिस टीम मौके पर पहुंची थी तो उस वक्त कुछ लोग उस कंकाल के आसपास खड़े थे. जिस स्थान पर कंकाल मिला था, वह स्थान सुनसान होने के साथसाथ वन्य क्षेत्र से लगा हुआ है. हिंसक पशु गुलदार व जंगली हाथी अकसर इस क्षेत्र में घूमते हुए देखे जा सकते हैं.

आखिर किस का था वह कंकाल

कोतवाल नरेंद्र बिष्ट अभी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर ही रहे थे कि तभी वहां एसएसपी अजय सिंह, एसपी (क्राइम) रेखा यादव तथा (सीओ) ज्वालापुर निहारिका सेमवाल सहित कुछ मीडियाकर्मी भी पहुंच गए थे. इस के बाद पुलिसकर्मियों ने कंकाल के अलगअलग कोणों से फोटो लिए थे.

कंकाल की शिनाख्त करने के लिए अजय सिंह ने कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को निर्देश दिए कि वह आसपास के पुलिस स्टेशनों से यह जानकारी करे कि इस हुलिए की कोई युवती उन के क्षेत्र से कहीं लापता तो नहीं है. शिनाख्त न होने पर इस बाबत अखबारों में कंकाल के इश्तहार छपवाने को कहा था. यह बात 26 जुलाई, 2023 की है.

पुलिस ने कंकाल का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए हरमिलापी अस्पताल हरिद्वार भेज दिया था. अब सब से पहले कोतवाल नरेंद्र बिष्ट के सामने युवती की शिनाख्त न होने की समस्या थी. यदि युवती की शिनाख्त हो जाती तो पुलिस उस की काल डिटेल्स आदि के आधार पर जांच में जुट जाती. अगले दिन जब कंकाल के फोटो अखबारों में छपे तो कोई भी व्यक्ति उसे पहचानने वाला पुलिस के पास नहीं आया था.

इस के अलावा पुलिस स्टेशनों से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. एक बार तो नरेंद्र बिष्ट के दिमाग में यह भी आया कि युवती को कहीं किसी नरभक्षी गुलदार ने निवाला न बना लिया हो. मगर बाद में उन्हें ऐसा नहीं लगा था.

युवती के कंकाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली जिस से कि पुलिस कातिल तक पहुंच पाती.

वह 30 जुलाई, 2023 का दिन था. थाना सिडकुल के एसएचओ नरेश राठौर के पास करीब 55 वर्षीय राम प्रसाद निवासी कस्बा किरतपुर बिजनौर उत्तर प्रदेश अपनी बेटी प्रवीना के साथ वहां पहुंचा था. राम प्रसाद ने नरेश राठौर को बताया कि उस की 21 वर्षीया बेटी रवीना इसी महीने की 11 जुलाई से लापता है.

राम प्रसाद ने बताया कि रवीना सिडकुल की एक कंपनी में नौकरी करती थी तथा उस के बाद से ही वह लापता हो गई थी.

इस के बाद राठौर ने राम प्रसाद को कोतवाली रानीपुर भेज दिया था. राम प्रसाद व उन की बेटी रवीना कोतवाल नरेंद्र बिष्ट से मिले और उन्हें 11 जुलाई से रवीना के लापता होने की बात बता दी. जब बिष्ट ने राम प्रसाद को गत 26 जुलाई को उन के क्षेत्र में रवीना जैसी युवती का कंकाल मिलने की जानकारी दी थी तो राम प्रसाद ने कंकाल के पास मिले कपड़े देखने की इच्छा जताई.

जब कोतवाल ने कंकाल के पास मिले कपड़े ला कर दिखाने को कहा तो मुंशी कपड़े ले आया. राम प्रसाद व उन की बेटी प्रवीना उन कपड़ों को देखते ही फफक कर रो पड़े थे.

इस से पुष्टि हो गई कि टिबड़ी क्षेत्र में मिला कंकाल रवीना का ही था. खैर, किसी तरह बिष्ट ने दोनों बापबेटी को चुप कराया था और उन से रवीना के बारे में जानकारी हासिल की.

पुनीत से रवीना की कैसे हुई दोस्ती

राम प्रसाद ने बिष्ट को बताया कि पिछले 2 साल से रवीना की धामपुर बिजनौर निवासी पुनीत धीमान से खासी दोस्ती थी तथा उन की आपस में शादी करने की योजना भी थी. मगर बीच में कुछ गड़बड़ हो गई थी. कुछ समय पहले पुनीत ने किसी अन्य युवती से शादी कर ली थी. पुनीत व रवीना सिडकुल की कंपनी ऋषिवेदा में साथसाथ काम करते थे. पुनीत कंपनी में सुपरवाइजर था.

यह जानकारी मिलते ही नरेंद्र बिष्ट ने तुरंत पुनीत धीमान व रवीना के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगालने के लिए एसओजी प्रभारी विजय सिंह को कहा था. उसी दिन शाम को ही पुलिस को दोनों के नंबरों की काल डिटेल्स मिल गई थी.

दोनों की काल डिटेल्स जब पुलिस ने देखी तो उस से पुनीत खुद ही संदेह के दायरे में आ गया. इस के बाद पुलिस ने पुनीत से पूछताछ करने की योजना बनाई.

उसी दिन रात को ही पुलिस टीम ने पुनीत को पूछताछ के लिए सिडकुल से हिरासत में ले लिया था. इस के बाद पुलिस उसे पूछताछ करने के लिए कोतवाली रानीपुर ले आई. पुनीत से पूछताछ करने के लिए एसपी (क्राइम) रेखा यादव व एसएसपी अजय सिंह भी वहां पहुंच गए.

पहले तो पुलिस ने पुनीत से रवीना के उस के साथ प्रेम संबंधों व उस की हत्या की बाबत पूछताछ की थी, मगर पुनीत पुलिस को गच्चा देते हुए बोला कि मेरा तो रवीना से या उस की हत्या से कोई लेनादेना नहीं है.

पुनीत के मुंह से यह बात सुन कर वहां खड़े कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को गुस्सा आ गया और उन्होंने पुनीत को डांटते हुए कहा, ”पुनीत, या तो तुम सीधी तरह से रवीना की मौत का सच बता दो अन्यथा याद रखो, पुलिस के सामने मुर्दे भी सच बोलने लगते हैं.’’

बिष्ट के इस वाक्य का पुनीत पर जादू की तरह असर हुआ था. पुनीत ने रवीना की हत्या की बात कुबूल करते हुए पुलिस को जो जानकारी दी, वह इस प्रकार है—

क्यों नहीं हो सकी प्रेमी युगल की शादी

बात 4 साल पुरानी है. पुनीत और रवीना सिडकुल की कंपनी ऋषिवेदा में साथसाथ काम करते थे. हम दोनों में पहले दोस्ती हुई थी, जो बाद में प्यार में बदल गई थी. फिर दोनों ने भविष्य में शादी करने की भी योजना बना ली थी. यह अंतरजातीय प्यार गहरा हो गया. इस बाबत जब पुनीत ने अपने घर वालों से बात की तो दोनों की जातियां अलगअलग होने के कारण घर वालों ने शादी करने से साफ मना कर दिया था.

इस के बाद पुनीत के घर वाले किसी और सजातीय लड़की से उस की शादी कराने के प्रयास में जुट गए. उन्होंने फरवरी 2023 में उस की शादी कर दी थी. दूसरी ओर रवीना के पिता राम प्रसाद ने भी उस की सगाई कहीं और कर दी थी. इस के बाद पुनीत ने रवीना पर अपनी सगाई तोडऩे के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. रवीना ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

रवीना के मना करने से पुनीत तिलमिला गया. इस के बाद रवीना ने उस का फोन अटैंड करना भी बंद कर दिया था और अपना फोन नंबर भी बदल लिया. यह बात पुनीत को बहुत बुरी लगी. वह गुस्से में पागल हो गया था. तभी उस ने रवीना की हत्या की योजना बनाई.

योजना के अनुसार, पुनीत 11 जुलाई, 2023 को रवीना से मिला था और उसे घुमाने के लिए टिबड़ी रोड पर ले गया था. वहां सुनसान होने के कारण उस ने रवीना की गला घोंट कर हत्या कर दी और धामपुर आ कर रहने लगा था.

इस के बाद कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने पुनीत के ये बयान दर्ज कर लिए थे. फिर बिष्ट ने रवीना की गुमशुदगी को हत्या की धाराओं 302 व 201 में तरमीम कर दिया था. अगले दिन रोशनाबाद स्थित पुलिस कार्यालय में एसएसपी अजय सिंह ने प्रैसवार्ता का आयोजन कर के इस ब्लाइंड मर्डर केस का परदाफाश कर दिया.

अजय सिंह ने इस केस को सुलझाने वाली पुलिस टीम में शामिल कोतवाल नरेंद्र बिष्ट, एसओजी प्रभारी विजय सिंह, एसएचओ (सिडकुल) नरेश राठौर की पीठ थपथपाई.

इस के बाद पुलिस ने हत्या के आरोपी पुनीत धीमान को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. इस हत्याकांड की विवेचना कोतवाल नरेंद्र बिष्ट द्वारा की जा रही थी. वह शीघ्र ही इस केस की विवेचना पूरी कर के पुनीत के खिलाफ चार्जशीट अदालत में भेजने की तैयारी कर रहे थे. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Romance Kahani : पारुल और विकास की आड़ी-तिरछी प्रेम कहानी

Romance Kahani : पारुल और विकास के बीच नईनई जानपहचान हुई थी. दोनों ही ठाकुरगंज के होम्योपैथी अस्पताल में साफसफाई का काम करते थे. वैसे तो दोनों की मुलाकात कम ही होती थी, क्योंकि दोनों के काम करने का समय अलगअलग था. जब से दोनों के बीच एकदूसरे के प्रति लगाव बढ़ा था, समय निकाल कर दोनों मिलने और बातचीत करने की कोशिश करते थे. पारुल ने विकास को अपने बारे में सच बता दिया था. विकास के साथ उस का ऐसा लगाव था कि वह उस से कोई बात छिपाना नहीं चाहती थी.

एक दिन पारुल अपने बारे में बता रही थी और विकास उस की बातें सुन रहा था. पारुल बोली, ‘‘मेरी शादी को 14 साल हो गए. कम उम्र में शादी हो गई थी. मेरे 3 बच्चे भी हैं. मैं सोचती हूं कि जब हम दोस्ती कर रहे हैं तो एकदूसरे की हर बात को समझ लें.

‘‘मेरे पति तो जेल में हैं. ससुराल वालों से मेरा कोई संपर्क नहीं रह गया है. मैं अपने 3 बच्चों का पालनपोषण अपनी मां के पास रह कर करती हूं.’’

शाम का समय था. विकास और पारुल ठाकुरगंज से कुछ दूर गुलालाघाट के पास गोमती के किनारे बैठे थे. दोनों ही एकदूसरे से बहुत सारी बातें करने के मूड में थे. दोनों को कई दिनों बाद आपस में बात करने का मौका मिला था.

‘‘तुम्हारी शादी हो चुकी है तो मैं भी कुंवारा नहीं हूं. मैं बरेली से यहां नौकरी करने आया था. मेरी शादी 8-9 महीने पहले हुई है. शादी के कुछ महीने बाद से ही पत्नी के साथ मेरे संबंध ठीक नहीं रहे. मैं 5 महीने से अलग रह रहा हूं.

‘‘मेरी पत्नी की भी मेरे साथ रहने की कोई इच्छा नहीं है. ऐसे में मैं उस के साथ रहूं या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता.’’ पारुल की बातें सुन कर विकास ने कहा.

‘‘आप की शादी तो पिछले साल ही हुई है, फिर भी आप पत्नी को छोड़ मुझे पसंद करते हैं. ऐसा क्यों?’’ पारुल ने विकास से पूछा.

‘‘शादी के बाद से ही पत्नी से मेरे आत्मिक संबंध नहीं रह सके. पतिपत्नी होते हुए भी ऐसा लगता था जैसे हम एकदूसरे से अनजान हैं. जब से आप मिलीं, आप से अपनापन लगने लगा. मैं अपनी पत्नी के साथ खुश नहीं हूं. हम दोनों ही अलग हो जाना चाहते हैं.’’ विकास ने पारुल की बात का जबाव दिया.

विकास बरेली जिले के प्रेम नगर का रहने वाला था. वह नौकरी करने लखनऊ आया था. रश्मि के साथ उस की शादी 2018 के जून में हुई थी. 4-5 महीने दोनों साथ रहे, पर इस के बाद वह पत्नी से अलग रहने लगा. पारुल और विकास की मुलाकात साल 2019 के जून में हुई थी. शुरुआती कई महीनों तक दोनों में बातचीत नहीं होती थी. दोनों बस एकदूसरे को देखते रहते थे. जब बातचीत होने लगी और एकदूसरे की पंसद नापसंद पर बात हुई तो पहले पारुल ने खुद को शादीशुदा बताया. तब विकास ने हंसते हुए कहा, ‘‘शादीशुदा तो मैं भी हूं. लेकिन बच्चे नहीं हैं. हमारी शादी पिछले साल हुई थी.’’

जब पता चला कि दोनों ही शादीशुदा हैं तो वे निकट आने लगे. दोनों ही अपनेअपने जीवनसाथी के साथ खुश नहीं थे. पारुल का पति रिंकू आटोरिक्शा चलाता था. शादी के 7 साल बाद परिवार में हुई हत्या में रिंकू को जेल हो गई. उस समय तक पारुल के 3 बच्चे मुसकान, पवन और गगन हो चुके थे. पति के जेल जाने के बाद उस की सुसराल वालों ने उस से संबंध नहीं रखे. पारुल अपने बच्चों को ले कर अपनी मां सुषमा के साथ रहने लगी. वहीं पर पारुल ने अपने बच्चों का स्कूल में एडमिशन करा दिया. अब पारुल पर मां का दबाव रहता था. वह उस की एकएक गतिविधि पर पूरी नजर रखती थी.

इधर धीरेधीरे पारुल और विकास के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. सही मायनों में दोनों ही एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करने लगे थे. एकदूसरे के साथ दोनों का पूरी तरह से तालमेल बैठ गया था. कभी साथ घूमने जाते तो कभी एक साथ फिल्म देखते. जब पारुल की मां को जानकारी मिली तो उस ने पारुल को समझाया और ऐसे संबंधों से दूर रहने को कहा. पर पारुल मानने को तैयार नहीं थी. कुछ दिन बाद दोनों फिर मिलने लगे. पारुल की मां सुषमा को लग रहा था कि विकास उन की बेटी को बहका कर अपने साथ रखता है. पारुल और विकास के संबंधों को ले कर मोहल्ले के लोगों और नातेरिश्तेदारों में भी चर्चा होने लगी थी.

दूसरी ओर पारुल को विकास के साथ संबंधों की लत लग चुकी थी. वह किसी भी स्थिति में विकास से दूर नहीं रहना चाहती थी. विकास भी पूरी तरह पारुल का दीवाना हो चुका था. जब पारुल की मां और करीबी रिश्तेदारों का दबाव पड़ने लगा तो दोनों ने लखनऊ छोड़ने का फैसला कर लिया. पारुल के सामने सब से बड़ी परेशानी उस के बच्चे थे. प्यार के लिए पारुल ने उन का मोह भी छोड़ दिया. उस ने विकास से कहा, ‘‘अब हम साथ रहेंगे. हमारे बच्चे भी हमारे बीच में नहीं आएंगे. हम लोग यहां से कहीं दूर चलेंगे. बच्चे यहीं रहेंगे. जब समय ठीक होगा, तब हम वापस आ कर बच्चों को अपने साथ रख लेंगे.’’

विकास ने फैसला किया कि वह पारुल को ले कर अपने घर बरेली चला जाएगा. दिसंबर, 2019 की बात है. पारुल और विकास लखनऊ छोड़ कर बरेली चले आए. यहां दोनों साथ रहने लगे. पारुल के लखनऊ छोड़ने का सारा ठीकरा उस की मां सुषमा ने विकास के ऊपर फोड़ दिया. सुषमा ने लखनऊ की कृष्णानगर कोतवाली में जा कर एक प्रार्थनापत्र दिया और विकास पर अपनी बेटी पारुल को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का आरोप लगाया. पुलिस ने प्रार्थनापत्र रख लिया.

पुलिस ने रिपोर्ट लिखने की जगह एनसीआर दर्ज की. पुलिस का मानना था कि पारुल बालिग है, 3 बच्चों की मां है और अपना भलाबुरा समझती है. वह जहां भी गई होगी, अपनी मरजी से गई होगी. कई माह बीत जाने के बाद भी जब पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो पारुल की मां सुषमा ने कोर्ट की शरण ली. 14 अगस्त, 2020 को कोर्ट ने पुलिस को धारा 498 और 506 के तहत मुकदमा कायम करने का आदेश दिया.

पुलिस ऐसे मामलों की विवेचना 155 (2) के तहत करती है. इस में किसी तरह का कोई वारंट जारी नहीं होता. पुलिस दोनों को कोर्ट के सामने पेश करती है, जहां दोनों कोर्ट के सामने बयान देते हैं. कोर्ट अपने विवेक से फैसला देती है. 20 सितंबर, 2020 की रात लखनऊ के थाना कृष्णानगर के दरोगा भरत पाठक एक सिपाही और विकास व पारुल के 2 रिश्तेदारों को साथ ले कर बरेली गए. पुलिस रात में ही पारुल और विकास को कार से ले कर लखनऊ वापस लौटने लगी.

पुलिस द्वारा लखनऊ लाए जाने की बात पारुल और विकास को पता चल चुकी थी. उन के मन में भय था कि लखनऊ ले जा कर पुलिस दोनों को अलग कर देगी, जेल भी भेज सकती है. पारुल ने अपने पति को देखा था. हत्या के आरोप में 8 साल बाद भी वह जेल से बाहर नहीं आ सका था. विकास सीधासादा था, उसे भी पुलिस, जेल और कचहरी के चक्कर से डर लग रहा था. ऐसे में दोनों ने फैसला किया कि वे साथ रह नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं.

रात के समय जब पुलिस ने लखनऊ चलने के लिए कहा तो दोनों ने तैयार होने का समय मांगा. पारुल ने अपने पास कीटनाशक दवा की 4 गोली वाला पैकेट रख रखा था. दोनों कपड़े पहन कर वापस आए तो पुलिस ने पारुल की तलाशी नहीं ली. पुलिस की दिक्कत यह थी कि वह अपने साथ कोई महिला सिपाही ले कर नहीं आई थी, जिस से उस की तलाशी नहीं ली जा सकी. पुलिस ने पारुल विकास को अर्टिगा गाड़ी में बैठाया और बरेली से लखनऊ के लिए निकल गई. आगे की सीट पर दारोगा भरत पाठक और एक सिपाही बैठा था. पीछे वाली सीट पर विकास और पारुल को बैठाया गया था, जबकि बीच की सीट पर दोनों के रिश्तेदार बैठे थे.

गाड़ी बरेली से चली तो रात का समय था. ड्राइवर को छोड़ कर सभी लोग सो गए. अपनी योजना के मुताबिक पारुल और विकास ने कीटनाशक की 2-2 गोलियां खा लीं. कुछ ही देर में दोनों को उल्टी होने लगी. पुलिस वालों को लगा कि गाड़ी में बैठ कर अकसर कई लोगों को उल्टी होेने लगती है, शायद वैसा ही कुछ होगा. जब गाड़ी सीतापुर पहुंची तो सो रहे लोगों की नींद खुली. पीछे की सीट से उल्टी की बदबू आ रही थी. आगे की सीट पर बैठे लोगों ने पारुल और विकास को आवाज दी, पर दोनों में से कोई नहीं बोला. पास से देखने पर पता चला दोनों बेसुध हैं. दोनों की तलाशी ली गई. उन के पास कीटनाशक दवा का एक पैकेट मिला, जिस में 2 गोलियां शेष बची थीं.

इस से पता चल गया कि दोनों ने वही दवा खाई है. लखनऊ पहुंच कर पुलिस दोनों को ले कर लखनऊ मैडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर पहुंची, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. दो प्रेमियों के आत्महत्या करने का मसला पूरे लखनऊ में चर्चा का विषय बन गया. शुरुआत में विकास और पारुल के घर वालों ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाया. बाद में उन्हें भी लगा कि पुलिस, कचहरी और कानून के डर से पारुल और विकास ने आत्महत्या की है.

विकास और पारुल दोनों ही बालिग थे. अपना भलाबुरा समझते थे. परिवार वालों ने अगर आपसी सहमति से समझाबुझा कर फैसला लिया होता तो दोनों को यह कदम नहीं उठाना पड़ता. इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं. ऐसे मामलों में पुलिस की प्रताड़ना प्रेमीजनों के मन में भय पैदा कर देती है. पुलिस, समाज और कचहरी के भय से प्रेमी युगल ऐसे कदम उठा लेते हैं. ऐसे में समाज और कानून दोनों को संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए. Romance Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : प्रेमिका के कत्ल का गवाह बना सूटकेस

Love Crime : एसएचओ ने घटनास्थल पर पहुंच कर देखा तो वहां वास्तव में एक सूटकेस अधजली हालत में पड़ा था. उसी के साथ कुछ अधजली लकड़ियों से पेट्रोल की गंध भी महसूस हुई. इस से उन्होंने अंदाजा लगाया कि किसी ने बाहर से यह सूटकेस यहां ला कर उस पर लकड़ियों रख कर पेट्रोल डाल कर जलाने की कोशिश की थी.

सूटकेस में एक युवती की लाश निकली, लेकिन वहां मौजूद लोगों में से कोई भी मृतका की शिनाख्त नहीं कर पाया तो यही लगा कि मृतका आसपास के क्षेत्र की रहने वाली नहीं होगी. मृतका की उम्र यही कोई 24-25 साल थी.

गुजरात के शहर राजकोट के बाहर ग्रामीण इलाके में गांव पदधारी के पास काफी जमीन बंजर पड़ी है. इस जमीन पर घास के अलावा और कुछ नहीं होता, इसलिए उधर लोग कम ही आतेजाते थे. केवल जानवर चराने वाले दोपहर बाद अपने जानवर ले कर चराने के लिए आते थे.

9 अक्तूबर, 2023 की दोपहर के बाद जब कुछ लोग अपने जानवर उस सुनसान बंजर जमीन पर चराने के लिए ले आए तो उन्हें ही वहां वह अधजला सूटकेस दिखाई दिया था.

उन लोगों ने इस बात की सूचना गांव के सरपंच कनुभाई परमार को दी. कुछ ही देर में कनुभाई गांव के कई लोगों के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. सभी को मामला गड़बड़ लगा.

सरपंच ने तुरंत इस की सूचना क्षेत्रीय थाना पदधारी में दे दी. सरपंच की सूचना पर ही थाना पदधारी के एसएचओ जी.जे. जाला सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे थे.

घटनास्थल पर काफी लोग जमा थे. जिस स्थिति में लाश मिली थी, साफ था कि यह सुनियोजित हत्या कर लाश ठिकाने लगाने का मामला था. लाश की शिनाख्त जरूरी थी, इसलिए पुलिस ने आसपास का निरीक्षण शुरू किया कि शायद वहां कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस से लाश की शिनाख्त हो जाए.

काफी कोशिश के बाद भी वहां कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से लाश के बारे में कुछ पता चलता. सिर्फ एक गाड़ी के टायरों के निशान जरूर दिखाई दिए. वे निशान भी थोड़ा अलग थे. वे निशान किसी बड़ी गाड़ी के दिख रहे थे, क्योंकि वह निशान चौड़े टायरों के थे.

एसएचओ ने फोटोग्राफर के साथसाथ फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया था. घटनास्थल की सारी काररवाई करने के बाद पुलिस ने सूटकेस जब्त कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

थाने लौट कर एसएचओ जी.जे. जाला ने पूरे स्टाफ को बुला कर कहा, ”सब से पहले तो यह पता लगाओ कि आसपास के किसी गांव की इस उम्र की कोई युवती गायब तो नहीं है? इस के बाद यह पता करो कि जिले के किसी थाने में इस तरह की युवती की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज कराई गई? क्योंकि लाश की जो हालत थी, उस से साफ लग रहा था कि उस युवती की हत्या कम से कम 3 दिन पहले हुई थी.

पुलिस अपने सूत्रों से यह पता लगाने में जुट गई कि लाश वाली युवती कौन हो सकती है? आसपास के ही नहीं, पूरे राजकोट के सभी थानों से पता किया गया कि किसी थाने में 24-25 साल की युवती की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज कराई गई है. दुर्भाग्य से राजकोट के किसी थाने में उस तरह की युवती की कोई गुमशुदगी नहीं दर्ज थी.

कहीं किसी मुखबिर से भी सूचना नहीं मिल रही थी कि उस तरह की युवती कहां रहती थी और अब दिखाई नहीं दे रही है. जब जिले के किसी थाने से कोई जानकारी नहीं मिली तो एसएचओ ने अगलबगल के जिलों से पता किया. पर इस में भी उन्हें निराश ही होना पड़ा. अब क्या किया जाए, एसएचओ ने सहयोगियों के साथ सलाह मशविरा किया. क्योंकि बिना शिनाख्त के हत्यारे तक पहुंचा नहीं जा सकता था.

जब कोई सहयोगी उचित सलाह नहीं दे सका तो एसएचओ जी.जे. जाला ने खुद ही अपना दिमाग लगाया. उन्होंने वह सूटकेस मंगवाया, जिस में रख कर लाश जलाई गई थी. उन्होंने उस अधजले सूटकेस को उलटपलट कर देखा तो उस में उस के ब्रांड का नाम मिल गया यानी यह पता चल गया कि वह सूटकेस किस कंपनी का था.

यह पता चलते ही एसएचओ ने ड्राइवर से थाने की जीप निकलवाई और 2 सिपाहियों को साथ ले कर शहर में उस ब्रांड के सूटकेस के जितने भी शोरूम थे, सभी पर जा पहुंचे. लाश 9 अक्तूबर को मिली थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि हत्या 6 अक्तूबर को की गई थी. इसलिए पहली अक्तूबर, 2023 से ले कर 8 अक्तूबर, 2023 तक उस ब्रांड के उस साइज के जितने भी सूटकेस बिके थे, शोरूमों से उन्हें खरीदने वालों के नाम, पते और फोन नंबर प्राप्त कर लिए.

पता चला कि इस बीच उस तरह के कुल 27 सूटकेस बिके थे. दरअसल, यह ब्रांडेड सूटकेस था और इस की वारंटी होती है, इसलिए वापसी का चक्कर रहता है. यही वजह थी कि इसे खरीदने वाला ग्राहक बिल में अपना पूरा नाम, पता और फोन नंबर लिखवाता है.

यह सब करते करते एक महीने का समय निकल गया था. यानी नवंबर महीना चल रहा था. थाने आ कर एसएचओ जी.जे. जाला ने उस बीच उस ब्रांड के सूटकेस खरीदने वाले एकएक आदमी को फोन करना शुरू किया. अपना परिचय दे कर एसएचओ उस के द्वारा खरीदे गए सूटकेस के बारे में पूछते तो हर आदमी सूटकेस खरीदने की वजह बताने के साथसाथ वीडियो काल पर सूटकेस भी दिखा देता.

किसी का सूटकेस किसी रिश्तेदार के यहां होता तो वह अपने रिश्तेदार से बात करा देता. अगर किसी से फोन पर बात न हो पाती तो जी.जे. जाला शोरूम से मिले पते के आधार पर उस के घर पहुंच जाते और पूरी बात बता कर उस के द्वारा खरीदे गए सूटकेस के बारे में पता करते.

इसी तरह एसएचओ जी.जे. जाला ने 26 सूटकेसों के बारे में पता कर लिया. जब उन्होंने 27वें आदमी को फोन किया तो वह बहाने बनाने लगा. कभी वह कहता कि सूटकेस कोई ले गया है तो कभी कहता कि जो सूटकेस ले गया है, अभी दे कर नहीं गया. जब जी.जे. जाला सूटकेस ले जाने वाले का पता पूछते तो वह पता बताने को तैयार नहीं होता.

मजबूर हो कर जी.जे. जाला राजकोट के गांधीग्राम इलाके के आत्मन अपार्टमेंट में रहने वाले उस व्यक्ति मेहुल चोटलिया के यहां पहुंच गए. जब वह आत्मन अपार्टमेंट पहुंचे तो अपार्टमेंट के नीचे उन्हें एक एसयूवी दिखाई दी, जिस के टायर उतने ही चौड़े थे, जितने चौड़े टायर के निशान घटनास्थल पर मिले थे. उस एसयूवी को देखते ही उन्हें लगा कि हो न हो, इसी आदमी ने उस घटना को अंजाम दिया होगा.

उस समय मेहुल चोटलिया घर पर ही था. पुलिस ने उस के फ्लैट की घंटी बजाई तो उस ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर पुलिस देख कर वह घबरा गया. क्योंकि उस के मन में चोर था.

एसएचओ ने उस की शक्ल देख कर ही अंदाजा लगा लिया कि वह सही ठिकाने पर आ गए हैं. उन्होंने आने की वजह बताई तो वह सूटकेस दिखाने में पहले की ही तरह बहानेबाजी करता रहा.

पुलिस को उस पर शक तो था ही, इसलिए उन्होंने उस के फ्लैट की तलाशी ली तो उस के फ्लैट से ऐसी तमाम चीजें मिलीं, जिन का उपयोग महिलाएं करती हैं. लेकिन जब उस से पूछा गया कि उस के फ्लैट में तो कोई महिला है नहीं, यह सामान किस का है? तब पुलिस के इस सवाल का मेहुल कोई उचित जवाब नहीं दे सका.

तब पुलिस ने उस से तरहतरह के सवाल करने शुरू किए. मेहुल झूठ पर झूठ बोलता रहा. पुलिस उसे ले कर नीचे आई तो सामने ही उस की एसयूवी खड़ी थी. पुलिस ने जब उस एसयूवी के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि यह गाड़ी उसी की है.

पुलिस ने उस गाड़ी के टायर एक बार फिर देखे तो वे वैसे ही थे, जिस तरह के निशान उस जली हुई लाश के पास पाए गए थे. एसएचओ जी.जे. जाला को पूरा विश्वास हो गया कि पदधारी गांव के पास सूटकेस में जो लाश जलाई गई थी, वह इसी मेहुल चोटलिया ने ही जलाई थी.

मेहुल को थाने ला कर पूछताछ शुरू हुई. मेहुल मानने को तैयार ही नहीं था कि वह लाश उसी ने जलाई थी. वह लगातार झूठ बोलते हुए इस बात से इनकार करता रहा. चूंकि पुलिस को अब तक काफी सबूत मिल चुके थे, इसलिए पुलिस भी लगातार उस से पूछताछ करती रही.

आखिर झूठ बोलते बोलते जब मेहुल थक गया तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने साथ रहने वाली अपनी लिवइन पार्टनर आयशा मकवाना की हत्या कर उस की लाश वहां ले जा कर जलाई थी.

इस के बाद मेहुल ने आयशा से प्यार करने से ले कर उस की हत्या कर के लाश को सूटकेस में रख कर जलाने तक की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

मेहुल चोटलिया राजकोट का ही रहने वाला था. होटल मैनेजमेंट की पढाई करने के बाद उसे राजकोट में ही एक होटल में मैनेजर की नौकरी मिल गई थी. मेहुल थोड़ा आजाद खयाल युवक था, इसलिए नौकरी लगने के बाद उस ने राजकोट के ही गांधीग्राम इलाके के आत्मन अपार्टमेंट में एक फ्लैट खरीद लिया था और उसी में अकेला ही रहने लगा था. उसे गाड़ी का शौक था, इसलिए उस ने चौड़े टायरों वाली एसयूवी कार खरीद ली थी.

आजाद खयाल मेहुल चोटलिया को होटल से अच्छा खासा वेतन मिलता था, इसलिए वह मौज से रहता था. उस के पास अब सब कुछ था, लेकिन कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी. मेहुल को गर्लफ्रेंड की कमी बहुत खलती थी. उस ने इस के लिए प्रयास करना शुरू किया तो एक दिन उसी के होटल में उस की मुलाकात आयशा मकवाना से हो गई.

24 साल की आयशा अहमदाबाद की रहने वाली थी. राजकोट में वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी और राजकोट में अकेली ही रहती थी. आयशा भी आजादखयाल थी. वह जीवन के सारे सुख भोगना चाहती थी, पर जिम्मेदारियों का बोझ नहीं उठाना चाहती थी.

ऐसा ही हाल लगभग मेहुल का भी था. इसलिए जब दोनों की मुलाकात हुई तो दोनों के विचार आपस में मिलने की वजह से उन में दोस्ती हो गई. यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई तो दोनों ने बिन फेरे हम तेरे बनने का फैसला कर लिया.

यानी वह लिवइन रिलेशन में रहने लगे. इस तरह साथ रहने को आज की नई पीढ़ी पसंद भी करती है. इस में रहते तो दोनों पतिपत्नी की तरह हैं, पर दोनों ही एकदूसरे के प्रति न तो जिम्मेदार होते हैं और न ही एकदूसरे का कहना मानते हैं और न ही एकदूसरे के लिए कुछ करना चाहते हैं. सिर्फ मौजमजे के साथी होते हैं.

मेहुल और आयशा भी इसी तरह लिवइन में साथसाथ पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. रहते जरूर दोनों साथसाथ पतिपत्नी की तरह थे, लेकिन अपनी अपनी मरजी के मालिक थे, इसलिए दोनों में अकसर लड़ाई झगड़ा होता रहता था.

6 अक्तूबर, 2023 को भी किसी बात को ले कर मेहुल और आयशा में लड़ाई हो रही थी, तभी गुस्से में आयशा ने मेहुल को एक तमाचा मार दिया. एक लड़की हो कर आयशा ने एक मर्द मेहुल को तमाचा मार दिया था, इसलिए मेहुल से यह अपमान बरदाश्त नहीं हुआ और उस ने गुस्से में आयशा का गला इतनी जोर से दबा दिया कि उस की मौत हो गई.

गुस्से में मेहुल ने आयशा की हत्या तो कर दी, लेकिन अब पकड़े जाने का डर सताने लगा था. उसे पता था कि अगर पुलिस ने आयशा की हत्या के आरोप में उसे पकड़ लिया तो उस की बाकी की जिंदगी जेल में ही कटेगी.

यह 6 अक्तूबर की शाम घटना थी. उस ने आयशा की लाश को बैडबौक्स में छिपा दिया और इस बात पर विचार करने लगा कि वह आयशा की लाश को कैसे और कहां ठिकाने लगाए कि पुलिस उस की शिनाख्त न करा सके. क्योंकि अब तक वह इतना तो जान ही चुका था कि जब तक लाश की शिनाख्त नहीं हो सकेगी, तब तक पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी.

यही सोचते सोचते वो रात भी बीत गई और अगला पूरा दिन भी. 8 अक्तूबर को लाश से बदबू आने लगी. इस से मेहुल डर गया कि अगर बदबू ज्यादा बढ़ेगी तो पड़ोसी पुलिस को सूचना दे देंगे. तब वह पकड़ा जाएगा.

काफी सोचविचार कर वह बाजार गया और वहां एक सूटकेस के शोरूम से एक ट्रौली वाला सूटकेस खरीद लाया. उसे अंदाजा था कि आयशा की लंबाई ज्यादा नहीं है, इसलिए उस की लाश आराम से उस सूटकेस में आ जाएगी. चूंकि वह शोरूम ब्रांडेड सूटकेस का था, इसलिए बिल बनाते समय उस के नामपते के साथ फोन नंबर भी लिखा गया.

मेहुल सूटकेस ले कर घर आया और आयशा की लाश बैडबौक्स से निकाल कर उस सूटकेस में रख ली. इस के बाद उस ने लिफ्ट से सूटकेस नीचे उतारा और एसयूवी कार में रख कर पास के बाजार गया, जहां से उस ने लकडिय़ां खरीदीं. पेट्रोल पंप से एक बोतल पेट्रोल खरीदा और अपनी एसयूवी से शहर से बाहर ग्रामीण इलाके में आ गया.

कार चलाते हुए वह पदधारी गांव के पास पहुंचा तो गांव के पास उसे सुनसान इलाका दिखाई दिया. उस ने वहीं पर कार से सूटकेस निकाला और उस पर लकडिय़ां रखीं, फिर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

जब तक लकडिय़ां जलती रहीं, वह वहीं खड़ा रहा. लकडिय़ों की आग बुझने लगी तो वह कार ले कर घर वापस आ गया. उसे जरा भी नहीं लग रहा था कि पुलिस उस तक पहुंच जाएगी, इसलिए निश्चिंत हो कर अपने घर में रह रहा था. लेकिन पुलिस 2 महीने बाद उस तक पहुंच ही गई.

थाना पुलिस ने अहमदाबाद में रहने वाले आयशा के घर वालों को सूचना दी. घर वालों ने आ कर लाश की फोटो देख कर शिनाख्त कर दी. पुलिस ने उन की डीएनए जांच भी कराई है. पूछताछ के बाद पुलिस ने मेहुल चोटलिया को राजकोट की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित