Crime News : जिस बेटी को गोद लिया, उसी ने कर दी माता पिता की हत्या

Crime News : लंदन में भूमिगत ट्रेन के ड्राइवर घनश्यामभाई और सुनंदा बेऔलाद थे. वे लोग कोलकाता के एक अनाथाश्रम से 15 साल की एक बच्ची को गोद ले कर लंदन चले गए. लेकिन उस बेटी को ऐसे पंख लगे कि…

लंदन के वेंबली में ज्यादातर गुजराती रहते हैं. नैरोबी से आ कर बसे घनश्याम सुंदरलाल अमीन भी अपनी पत्नी सुनंदा के साथ वेंबली में ही रहते थे. वह लंदन में भूमिगत ट्रेन के ड्राइवर थे. नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद पत्नी के साथ आराम से रह रहे थे. सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें सोशल स्कीम के तहत अच्छा पैसा मिल रहा था. इस के अलावा उन की खुद की बचत भी थी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी, कमी बस यह थी कि वह निस्संतान थे. किसी दोस्त ने घनश्यामभाई को सलाह दी कि वह कोई बच्चा गोद ले लें. ब्रिटेन में बच्चा गोद लेना बहुत मुश्किल है, भारतीय परिवार के लिए तो और भी मुश्किल. इसलिए घनश्यामभाई ने अपने किसी भारतीय मित्र की सलाह पर कोलकाता की एक स्वयंसेवी संस्था से संपर्क किया. उस संस्था ने एक अनाथाश्रम से उन का संपर्क करा दिया.

अनाथाश्रम ने घनश्यामभाई से कोलकाता आने को कहा. घनश्यामभाई पत्नी के साथ कोलकाता आ गए. कोलकाता के उस अनाथाश्रम में उन्हें सुचित्रा नाम की एक लड़की पसंद आ गई. वह 15 साल की थी. जन्म से बंगाली और मात्र बंगला तथा हिंदी बोलती थी. देखने में एकदम भोली, सुंदर और मुग्धा थी. पतिपत्नी ने सुचित्रा को पसंद कर लिया. सुचित्रा भी उन के साथ लंदन जाने को तैयार हो गई. घनश्यामभाई ने सुचित्रा को गोद लेने की तमाम कानूनी प्रक्रिया पूरी कर लीं. सुचित्रा को वीजा दिलाने में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा. तरहतरह के प्रमाणपत्र देने पड़े. आखिर 6 महीने बाद सुचित्रा को वीजा मिल गया.

सुचित्रा लंदन पहुंच गई. उस के लिए वहां सब कुछ नयानया था. नया देश, नई दुनिया, नई भाषा, नए लोग. सब कुछ नया. वहां उस का एक स्कूल में दाखिल करा दिया गया. उस ने जल्दी ही अंगरेजी सीख ली. वह गोरी थी और छोटी भी, इसलिए जल्दी से गोरे बच्चों के साथ घुलमिल गई. स्कूल में तमाम गुजराती, पंजाबी और बांग्लादेश से आए परिवारों के बच्चे पढ़ते थे. सुचित्रा अब बड़ी होने लगी. वह अकेली लंदन में अंडरग्राउंड ट्रेन में सफर कर सकती थी. बिलकुल अकेली पिकाडाली तक जा सकती थी. वह पढ़ने में भी अच्छी थी. सुचित्रा को गोद लेने वाले घनश्यामभाई और उन की पत्नी सुनंदा अपनी इस बेटी से खुश थे.

छुट्टी के दिनों में वे कभी उसे मैडम तुषाद म्युजियम दिखाने ले जाते तो कभी उसे हाइड पार्क घुमाने ले जाते. मित्रों के घर पार्टी में भी सुचित्रा को हमेशा साथ रखते. सुचित्रा सुनंदा को ‘मम्मी’ कहती तो वह खुश हो जातीं. उन्हें ऐसा लगता कि सुचित्रा उन की कोख जनी बेटी है. वह स्कूल तो जा ही रही थी. अब कभीकभार अपनी सहेली के घर रुक जाती. फिर वह हर शनिवार को सहेली के घर रुकने लगी. अभी वह 17 साल की ही थी. एक दिन सुनंदा को पता चला कि सुचित्रा घर से तो अपनी सहेली के घर जा कर रुकने की बात कह कर गई थी, पर वह सहेली के घर गई नहीं थी. उन्होंने सुचित्रा से सख्ती से पूछताछ की तो वह खीझ कर बोली, ‘‘दिस इज नन औफ योर बिजनैस.’’

सुचित्रा की इस बात से घनश्यामभाई और सुनंदा को गहरा आघात लगा. कुछ दिनों बाद एक दूसरी घटना घटी. सुचित्रा अकसर स्कूल नहीं जाती थी. घनश्यामभाई और सुनंदा ने जब उस से पूछा तो उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. पतिपत्नी ने सुचित्रा की सहेलियों से पूछताछ की तो पता चला कि वह सुखबीर नाम के एक पंजाबी लड़के के साथ घूमती है. चालू स्कूल में भी वह स्कूल छोड़ कर उस के साथ बाहर घूमने चली जाती है. घनश्यामभाई ने शाम को सुचित्रा से पूछा, ‘‘मुझे पता चला है कि तुम सुखबीर नाम के किसी लड़के के साथ घूमती हो, क्या यह सच है?’’

‘‘आई एम ए फ्री गर्ल,’’ सुचित्रा ने कहा, ‘‘मैं कहां जाती हूं और बाहर जा कर क्या करती हूं, यह आप को बिलकुल नहीं पूछना चाहिए.’’

सुनंदा ने कहा, ‘‘पर बेटा, तुम हमारी बेटी हो. हमें चिंता होती है. तुम अभी 17 साल की ही तो हो.’’

‘‘यू आर नौट माई बायोलौजिकल मदर. आई ऐम योर एडाप्टेड गर्ल. आप ने अपने स्वार्थ के लिए मुझे गोद लिया है. मैं आप की कोख से पैदा नहीं हुई हूं. मेरे ऊपर आप के मर्यादित अधिकार हैं, समझीं?’’

‘‘मतलब?’’ सुनंदा ने पूछा.

‘‘आई एम नौट ए पार्ट आफ योर बौडी. मैं तुम्हारे शरीर का कोई भी हिस्सा नहीं हूं. मेरे शरीर पर मेरा ही अधिकार है?’’

सुचित्रा की बात सुन कर घनश्यामभाई को गुस्सा आ गया. उन्होंने सुचित्रा को एक तमाचा मार दिया. सुचित्रा चिल्लाई, ‘‘दिस इज फर्स्ट एंड लास्ट. अगर दूसरी बार तुम ने ऐसा किया तो मैं पुलिस बुला लूंगी.’’

घनश्यामभाई ने कहा, ‘‘मैं खुद ही पुलिस को बताऊंगा कि मेरे द्वारा गोद ली गई बेटी पढ़ने की उम्र में गलत काम करती है. तुम्हें सोशल काउंसलिंग में भेज दूंगा. उस के बाद भी नहीं सुधरी तो तुम्हें फिर इंडिया जाना होगा.’’

इंडिया वापस भेजने की बात सुन कर सुचित्रा सोच में पड़ गई. वह एकदम चुप हो गई और अपने बैडरूम में चली गई. अगले दिन उठ कर उस ने मम्मीपापा से ‘सौरी’ कहा. घनश्यामभाई और सुनंदा शांत हो गए. सुनंदा ने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी पढ़नेलिखने की उम्र है. तुम अच्छी तरह पढ़लिख कर अपना कैरियर बना लो. अभी तुम टीनएज हो. जिस लड़के के साथ मन हो, नहीं घूम सकतीं.’’

सुचित्रा ने सिर झुका कर कहा, ‘‘मम्मी, अब इस तरह की गलती दोबारा नहीं करूंगी.’’

इस के बाद वह नियमित रूप से स्कूल जाने लगी. सुचित्रा स्कूल नहीं आती, यह शिकायतें आनी बंद हो गईं. घनश्यामभाई ने अपनी तरह से पता किया तो मालूम हुआ कि सुचित्रा नियमित स्कूल जाती है. धीरेधीरे इस बात को काफी समय बीत गया. एक दिन घनश्यामभाई और सुनंदा के पड़ोसियों ने पुलिस से शिकायत की कि हमारे बगल वाले घर से बहुत तेज दुर्गंध आ रही है. तुरंत पुलिस आ गई. घर का दरवाजा बंद था. लेकिन अंदर से स्टौपर नहीं लगा था. पुलिस ने धक्का मारा तो दरवाजा खुल गया. पुलिस ने अंदर जा कर देखा तो बैडरूम में घनश्यामभाई और उन की पत्नी की लाशें पड़ी थीं.

पूछताछ में पड़ोसियों ने बताया कि इन के साथ इन की गोद ली गई बेटी भी रहती थी. उस समय वह घर में नहीं थी. दोनों लाशों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उन की गोद ली गई बेटी गायब थी. पता चला कई दिनों से वह स्कूल भी नहीं गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो बताया गया कि पतिपत्नी के मरने से पहले खाने में नींद की दवा दी गई थी. उस के बाद घनश्यामभाई की हत्या चाकू से और सुनंदा की हत्या मुंह पर तकिया रख कर की गई थी. पुलिस का पहला शक मारे गए पतिपत्नी की दत्तक बेटी सुचित्रा पर गया. उन्होंने घनश्यामभाई और सुचित्रा के मोबाइल का काल रिकौर्ड चैक किया. 2 ही दिनों में पुलिस सुचित्रा के बौयफ्रैंड सुखबीर के घर पहुंच गई.

सुखबीर अकेला ही अपनी विधवा मां के साथ रहता था. सुचित्रा भी उसी के घर मिल गई. पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो सुचित्रा और सुखबीर ने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने प्रेम का विरोध करने की वजह से घनश्यामभाई और सुनंदा की हत्या की थी. सुचित्रा ने बताया, ‘‘उस रात मैं ने ही अपने पालक मातापिता के खाने में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिस से वे जाग न सकें. दोनों गहरी नींद सो गए तो सुखबीर को बुला लिया. उस के बाद अपनी पालक माता सुनंदा के मुंह पर तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाए रखा तो उन की सांसों की डोर टूट गई.

‘‘सुनंदा के छटपटाने की आवाज सुन कर मेरे पालक पिता घनश्यामभाई जाग गए. सुखबीर अपने साथ चाकू लाया था. उसी चाकू से उस ने घनश्यामभाई पर ताबड़तोड़ वार कर के उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया. उस के बाद हम दोनों भाग गए.’’

दोनों के बयान सुन कर पुलिस स्तब्ध रह गई. सुचित्रा अभी नाबालिग थी. पुलिस ने उस की मैडिकल जांच कराई तो पता चला कि वह गर्भवती है. सुचित्रा ने जो किया, उसे सुन कर तो अब यही लगता है कि इस तरह बच्चे को गोद लेने में भी सौ बार सोचना चाहिए.

 

Family Story : तीन बेटियों का गला दबाया और फिर मां ने खुद भी अपनी जान ले ली

Family Story : बेटे के चक्कर में सास विमला, पति कुलदीप और उन के घर वाले भूल गए थे कि 4 प्राणियों की जिंदगी को नरक बनाने से बेटा नहीं मिल जाएगा. साधना का गुनाह यह था कि उस ने 3 बेटियां जनी थीं. आखिर साधना कब तक सहती. उस ने…

उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया. इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’

बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी. उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई.

पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी. उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. वह कमरे के पास पहुंचे तो दोनों के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को. पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में एक लोहे का कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था. थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.

उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा. मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

इधर फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है. जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को उठने नहीं देंगे. बेटे की बात का सिपाही लाल ने भी समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका साधना के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी अपने जिगर के टुकड़ो को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी. थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की.

कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से. साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने भी कसने लगी थी.

घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता. गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे.

सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी. बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ थाना सहायल में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने कसने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी. अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा.

उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी. 1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

दूसरे सिरे को फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे और आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई. घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप 11 बजे घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी.

सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family Dispute : आखिर पत्नी ने नींद में सोए पति को क्यों गला दबा कर मार डाला

Family Dispute : निकाह के 18 दिन में ही मुसकान यह समझ बैठी थी कि शौहर शाहनवाज के साथ उस के सपने कभी पूरे नहीं होंगे. इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए उस ने ऐसी खौफनाक साजिश रची कि…

अहसान मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला शामली के कैराना का रहने वाला था. वह कामधंधे के सिलसिले में काफी साल पहले हरिद्वार के कस्बा झबरेड़ा के मोहल्ला नूरबस्ती आ कर रहने लगा था. 6 नवंबर, 2020 को सुबह के करीब 6 बज रहे थे. अहसान अपने बीवीबच्चों के साथ गहरी नींद सोया था. तभी अचानक घर के बाहर मोहल्ले वालों के शोरशराबे की आवाजों से उस की आंखें खुल गईं. इन्हीं आवाजों में उसे अपने साले शाहनवाज की बीवी मुसकान के रोनेचिल्लाने की आवाज सुनाई दी. अहसान को मुसकान के रोने की आवाज कुछ अजीब लगी, क्योंकि शाहनवाज व मुसकान उस के बगल वाले कमरे में ही रहते थे तथा 18 दिन पहले ही उन का निकाह हुआ था.

वह जल्दी में कमरे से बाहर निकला तो उस ने मोहल्ले वालों के ‘लाश… लाश’ चिल्लाने की मिलीजुली आवाज सुनी. अहसान तुरंत मौके पर पहुंचा. उस ने देखा कि उस के घर के पास बिजलीघर के बराबर वाले खाली प्लौट में एक लाश पड़ी थी. लाश पौलिथीन से ढकी हुई थी. वहां आसपास खडे़ दरजनों लोग लाश के बारे में तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे. तभी भीड़ से निकल कर मुसकान अहसान के पास आई और बोली कि कुछ अज्ञात हत्यारों ने शाहनवाज को मार डाला है.

‘‘शाहनवाज तो रात को घर में ही था?’’ अहसान ने कहा.

‘‘नहीं जीजाजी, वह रात को खाना खा कर 10 बजे चले गए थे.’’ मुसकान बोली.

‘‘वह बाहर किसलिए गया था?’’ अहसान ने पूछा.

‘‘कह कर गए थे कि किसी से मिल कर थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे, मगर पूरी रात वापस नहीं आए और मैं सुबह तक जाग कर उन का इंतजार करती रही.’’ मुसकान ने बताया.

‘‘तुम ने यह बात रात को ही मुझे क्यों नहीं बताई, मैं उसे कहीं ढूंढता.’’ अहसान बोला

‘‘मैं ने यह बात इसलिए नहीं बताई थी कि आप दिन भर के थके हुए थे और सो रहे थे. मुझे उम्मीद थी कि थोड़ी देर में वापस लौट आएंगे.’’ मुसकान बोली.

इसी दौरान भीड़ में से किसी ने शाहनवाज की लाश मिलने की सूचना झबरेड़ा के थानाप्रभारी रविंद्र कुमार को दे दी. हत्या की सूचना पा कर थानाप्रभारी रविंद्र कुमार अपने साथ एसआई चिंतामणि सकलानी, महेंद्र पुंडीर व हैडकांस्टेबल राजेंद्र को ले कर घटनास्थल की ओर निकल पड़े. घटनास्थल थाने से मात्र 4 किलोमीटर दूर था, अत: वे 15 मिनट में मौके पर पहुंच गए. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शाहनवाज के बारे में पूछताछ की. उन्होंने मृतक के बहनोई अहसान से भी पूछताछ की.

अहसान ने बताया कि शाहनवाज सहारनपुर के थाना कोतवाली देहात के अंतर्गत मोहल्ला शेखपुरा का रहने वाला था. वह एक ईंट भट्ठे पर नौकरी करता था. पिछली रात 10 बजे खाना खाने के बाद घर से बीवी को यह कह कर निकला था कि वह थोड़ी देर में वापस लौट आएगा. लेकिन रात भर नहीं आया और सुबह यहां उस की लाश मिली. अभी रविंद्र कुमार इस हत्या का बाबत अहसान से पूछताछ कर ही रहे थे कि सूचना पा कर सीओ (मंगलौर) अभय प्रताप सिंह व एसपी (देहात) एस.के. सिंह भी मौके पर आ गए.

दोनों अधिकारियों ने भी शाहनवाज की लाश का निरीक्षण किया. सीओ अभय प्रताप सिंह को मृतक शाहनवाज के गले पर कुछ ऐसे निशान दिखाई दिए, जिस से लग रहा था कि हत्यारों ने शायद शाहनवाज का कुछ देर तक गला दबाया था. इन अधिकारियों ने अहसान से पूछा कि शाहनवाज से किसी की दुश्मनी या लेनदेन संबंधी कोई विवाद तो नहीं था? अहसान ने साफ मना करते हुए बताया कि साहब ऐसा कुछ भी नहीं था. शाहनवाज काफी मिलनसार व मेहनत करने वाला युवक था. बस उस में एक कमी थी कि वह कभीकभार शराब जरूर पी लेता था.

मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने उस की लाश पोस्टमार्टम के लिए जे.एन. सिन्हा स्मारक संयुक्त चिकित्सालय रुड़की भेज दी. इस के बाद अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद एसपी (देहात) एस.के. सिंह ने शाम को शाहनवाज हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए थाना झबरेडा में एक मीटिंग बुलाई, जिस में सीओ (मंगलौर) अभय प्रताप सिंह व थानाप्रभारी रविंद्र कुमार शामिल हुए. इस बैठक में शाहनवाज के हत्यारों के बारे में मंथन किया गया. सीओ अभय प्रताप सिंह ने थाना झबरेडा के 2 सिपाहियों नूर हसन व नरेश को सादे कपड़ों में शाहनवाज के घर जा कर उस के व उस की बीवी मुसकान के बारे में सुरागरसी करने के निर्देश दिए.

थानाप्रभारी रविंद्र कुमार ने भी शाहनवाज व मुसकान के मोबाइल फोन नंबरों की पिछले एक महीने की काल डिटेल्स निकलवा ली थी. अगले दिन 7 नवंबर, 2020 की सुबह को पुलिस को मुसकान के बारे में काफी जानकारियां प्राप्त हो गईं. पुलिस को पता चला कि मुसकान के पिता शहीद का कई साल पहले इंतकाल हो गया था. मुसकान उन की 9 बेटियों में 8वें नंबर की थी. अहसान की बीवी सायरा शहीद की दूर की रिश्तेदार थी, इसलिए सायरा ने अपने भाई शाहनवाज के लिए शहीद से मुसकान का हाथ मांग लिया था.

गत 18 अक्तूबर, 2020 को कांधला में एक सादे समारोह में शाहनवाज व मुसकान का निकाह हो गया था. निकाह के बाद मुसकान का पारिवारिक जीवन ज्यादा सुखद नहीं रहा. इस का कारण यह था कि शाहनवाज शराबी किस्म का युवक था. शाहनवाज शराब पीने के बाद अकसर मुसकान से मारपीट पर उतारू हो जाता था. इस के अलावा पुलिस को यह भी जानकारी मिली कि मुसकान अकसर खाड़ी देश में नौकरी करने वाले एक युवक से बात करती थी. ये जानकारियां मिलने के बाद पुलिस को मुसकान पर शक हो गया. सीओ अभय प्रताप सिंह व थाना प्रभारी रविंद्र कुमार को लगा कि शाहनवाज की हत्या का राज मुसकान ही खोल सकती है. उसे शाहनवाज के हत्यारों के बारे में जरूर कोई न कोई जानकारी रही होगी.

मुसकान ने पुलिस को अभी तक यही बताया था कि शाहनवाज घटना वाले दिन रात को 10 बजे खाना खाने के बाद घर से निकल गया था. जाते वक्त वह थोड़ी देर में लौटने की बात कह कर गया था. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. सीओ अभय प्रताप सिंह ने मुसकान के बारे में मिली जानकारी से एसएसपी सेंथिल अबुदई कृष्णाराज एस. को अवगत कराया. एसएसपी ने एसपी (देहात) एस.के. सिंह व सीओ अभय प्रताप सिंह को निर्देश दिए कि मुसकान को थाने बुला कर उस से गहन पूछताछ करें.

इस के बाद थानाप्रभारी रविंद्र सिंह ने महिला कांस्टेबल पूजा को मुसकान के घर भेज कर पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. एसपी (देहात) एस.के. सिंह व सीओ अभय प्रताप की मौजूदगी में मुसकान से शाहनवाज की हत्या की बाबत पूछताछ शुरू की गई. पूछताछ के दौरान मुसकान आधे घंटे तक पुलिस को बरगलाती रही. जब एसपी एस.के. सिंह ने मुसकान से सख्त लहजे में कहा कि जब रात से तुम्हारा शौहर लापता था, तो तुम ने पास में ही रहने वाले उस के बहनोई और बहन सायरा को क्यों नहीं बताया? हो सकता है वे लोग रात को ही शाहनवाज को ढूंढ लाते और उस की जान बच जाती.

एस.के. सिंह के इस सवाल पर मुसकान खामोश हो गई. इस के बाद सीओ अभय प्रताप सिंह ने सख्त लहजे में मुसकान से कहा कि तेरी चुप्पी बता रही है कि शाहनवाज की हत्या का सच कुछ और है जिसे तू अच्छी तरह से जानती है, मगर पुलिस से छिपा रही है. या तो तू शाहनवाज की हत्या का सच सीधी तरह बता दे, नहीं तो हमें दूसरे तरीके भी आते हैं. अभय प्रताप सिंह के इस कथन का मुसकान पर गहरा असर हुआ और वह रोने लगी. मुसकान ने पुलिस के सामने अपने शौहर शाहनवाज की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि जब उस का निकाह हुआ था तो वह बड़ी खुश थी और उस ने अपने भविष्य के सतरंगी सपने संजोए थे.

लेकिन जब वह ससुराल झबरेडा आई, तो उस के सपने बिखर गए. यहां आ कर उस ने पाया कि उस का शौहर शाहनवाज एक नंबर का शराबी है. इस के अलावा वह उस के साथ अकसर मारपीट भी करता था. घटना वाले दिन यानी 5 नवंबर, 2020 को शाहनवाज नशे में धुत हो कर घर आया था. उस के नशे में होने के कारण वह क्रोध से भर गई. शाहनवाज ने घर में आते ही उस के साथ पहले मारपीट की. इस के बाद वह सो गया. मुसकान ने बताया कि उस वक्त रात के साढ़े 10 बजे थे. उस के ननदोई का परिवार बराबर वाले कमरे में गहरी नींद में सो रहा था. वह अपने शौहर शाहनवाज से पहले से ही परेशान थी.

उस वक्त वह गुस्से से भर गई और गुस्से में आ कर उस ने नशे में बेसुध सो रहे शाहनवाज का गला घोंट दिया. कुछ देर में जब उस की मौत हो गई तो उस ने उस की लाश घसीट कर घर से थोड़ी दूर एक खाली प्लौट में डाल दी. लाश को उस ने एक ठेली पर रखी प्लास्टिक की पौलीथिन से ढक दिया था, जिस से कोई उसे देख न सके. इस के बाद घर आ कर वह सो गई थी. थानाप्रभारी रविंद्र कुमार ने मुसकान के बयान दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद एसपी (देहात) एस.के. सिंह ने कोतवाली रुड़की में एक प्रैसवार्ता कर के मीडिया के सामने शाहनवाज हत्याकांड का परदाफाश किया.

निकाह के महज 18 दिनों में ही शौहर की हत्या करने वाली बीवी का यह समाचार कई दिनों तक अखबारों व टीवी चैनलों की सुर्खियां बना रहा. 2 दिनों बाद पुलिस को शाहनवाज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शाहनवाज की मौत का कारण उस का गला घोंटा जाना बताया गया. पुलिस ने मुसकान को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Bihar Crime News : थानेदार ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर को पीट-पीटकर मार डाला

Bihar Crime News : जहां थानेदार रंजीत कुमार जैसे खूंखार पुलिस वाले हों, वहां की पुलिस की बदनामी स्वाभाविक ही है. आश्चर्य की बात यह है कि जहां की पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपने एक थानेदार को पकड़ने में अक्षम हैं, सारे साधनों के बाद, वहां की जनता का क्या हाल होगा. क्या वाकई रंजीत को पकड़ने की…

बिहार में एक बड़ा जिला है भागलपुर. इसी जिले के बिहपुर इलाके में एक गांव है मड़वा. इस गांव के रहने वाले आशुतोष पाठक सौफ्टवेयर इंजीनियर थे. इंजीनियरिंग करने के बाद वह बेंगलुरु जा कर नौकरी करने लगे. इसी साल लौकडाउन में वह बेंगलुरु से नौकरी छोड़ आए. बाद में उन्होंने अपने ही जिला मुख्यालय भागलपुर में नौकरी कर ली, लेकिन गांव से उन का मोह नहीं छूटा था. इसलिए जब भी मौका मिलता, परिवार के साथ गांव चले जाते. इसी 24 अक्तूबर की बात है. उस दिन दुर्गाष्टमी थी. वह दुर्गा पूजा के लिए परिवार के साथ भागलपुर से गांव आ गए थे.

दोपहर करीब साढ़े 3 बजे वह अपनी पत्नी स्नेहा और 2 साल की बेटी मारवी के साथ भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर में पूजा कर बाइक से गांव जा रहे थे. एनएच 31 पर महंथ चौक के पास आशुतोष की साइड में चलने की बात पर एक आदमी से झड़प हो गई. पढ़ेलिखे आशुतोष बाइक रोक कर उस आदमी को समझा रहे थे, लेकिन वह आदमी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था. झड़प होते देख आसपास के लोग एकत्र हो गए. उन लोगों ने भी उस आदमी को समझाया. समझाईबुझाई चल रही थी कि बिहपुर के थानेदार रंजीत कुमार पुलिस की जीप से उधर से निकले. उन्होंने भीड़ देख कर गाड़ी रोक ली. रंजीत ने आशुतोष और उन से झगड़ा कर रहे आदमी से झगड़ने का कारण पूछा.

रंजीत कुकर बन कूदा बीच में थानेदार रंजीत कुमार पूरी बात सुन कर आशुतोष की गलती बता कर उसे धमकाने लगे. थानेदार ने आशुतोष से बाइक के कागजात मांगे. उन्होंने कागजात दिखा दिए. इसी दौरान किसी बात पर आशुतोष से थानेदार की बहस हो गई. उन्हें बहस करते देख कर थानेदार रंजीत कुमार आगबबूला हो गए. उन्होंने पत्नी और बेटी के सामने ही सरेआम आशुतोष की पिटाई शुरू कर दी. आशुतोष कहते रहे कि थानेदार साहब, आप यह गलत कर रहे हो. मैं पढ़ालिखा इंसान हूं. सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं. आशुतोष की बात पर थानेदार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने अपने जीप चालक और साथ में मौजूद पुलिस वालों से कहा कि इसे जीप में डालो और थाने ले चलो.

थानेदार साहब का हुकम था. पुलिस वालों ने आशुतोष को जबरन जीप में डाला और थाने की ओर चल दिए. आशुतोष की पत्नी स्नेहा पाठक थानेदार और पुलिस वालों के आगे हाथ जोड़ कर अपने पति को छोड़ने की गुहार लगाती रही. आशुतोष की 2 साल की बेटी रोतीबिलखती रही, लेकिन पुलिस वालों का कलेजा नहीं पसीजा. वहां मौजूद लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई कि थानेदार का विरोध करें. बिहपुर थाने ले जा कर थानेदार ने आशुतोष के कपड़े उतरवा दिए. उन को डंडों से बेरहमी से पीटा गया. इतने पर भी थानेदार रंजीत का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो पुलिस वालों से जूतों से उन की जम कर पिटाई कराई. फिर शौचालय में बंद कर खूब पिटाई की गई.

आशुतोष खून से लथपथ हो गए. उन की नाक और शरीर से कई जगह खून बहने लगा. इस बीच स्नेहा ने फोन कर मड़वा गांव में अपने घर वालों को सारी बात बता दी. गांव से आशुतोष के घरवाले बिहपुर थाने आ गए. थानेदार ने उन से भी बदसलूकी की और उन्हें आशुतोष से नहीं मिलने दिया. घर वाले थानेदार के सामने गुहार लगाते रहे, लेकिन उस ने किसी की नहीं सुनी. पुलिस वालों की पिटाई से शाम करीब 7 बजे आशुतोष मरणासन्न हो गए, तब उन्हें घर वालों को सौंप दिया गया. सौंपने से पहले एक कागज पर यह भी लिखवा लिया गया कि हम आशुतोष को सहीसलामत थाने से ले जा रहे हैं.

आशुतोष की हालत खराब थी. पुलिस वालों ने उन्हें बुरी तरह पीटा था. डंडों, जूतों और बेल्ट के साथ थप्पड़घूंसों से भी पिटाई की गई थी. जगहजगह चोटें लगने से उन के शरीर से खून रिस रहा था. जिंदगी की जंग हार गए आशुतोष घर वाले उन्हें बिहपुर के ही निजी अस्पताल में ले गए. डाक्टरों ने प्राथमिक इलाज के बाद गंभीर हालत देख कर उन्हें भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू मैडिकल कालेज एंड अस्पताल में रैफर कर दिया. अस्पताल में दूसरे दिन इलाज के दौरान उन की मौत हो गई. वे करीब 33 साल के थे. आशुतोष की मौत का पता चलने पर बिहपुर थानेदार और उस के साथी पुलिस वाले थाने से फरार हो गए.

उस दिन दशहरा था. बिहार में विधानसभा के चुनाव भी हो रहे थे. सौफ्टवेयर इंजीनियर आशुतोष पाठक की मौत से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. दोपहर करीब 12 बजे लोगों ने आशुतोष की लाश महंथ चौक पर रख कर एनएच 31 जाम कर दिया और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. पता चलने पर पुलिस और प्रशासन के अफसर मौके पर पहुंचे और उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने डीएम को मौके पर बुलाने, मृतक के आश्रितों को नौकरी, मुआवजा, दोषी पुलिस वालों को गिरफ्तार करने की मांग की. इस दौरान लोगों ने नवगछिया डीएसपी और एसडीपीओ से धक्कामुक्की भी की. कई घंटों की समझाइश और आश्वासन के बाद शाम 5 बजे लोग शांत हुए और शव का पोस्टमार्टम कराने की सहमति दी.

बाद में 3 डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से शव का पोस्टमार्टम कराया गया. इस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. पोस्टमार्टम कराने के बाद शव उन के घरवालों को सौंप दिया गया. मृतक आशुतोष के चाचा प्रफुल्ल पाठक ने झंडापुर ओपी थाने में बिहपुर थानाप्रभारी रंजीत कुमार, पुलिस जीप के निजी चालक, बिहपुर थाने में मौजूद पुलिस वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा सामने आ गया था. विधानसभा चुनाव का माहौल था. पूरे इलाके के लोगों में आक्रोश था. इसलिए मुख्यमंत्री ने डीजीपी को घटना की जांच कराने के निर्देश दिए. जिला प्रशासन ने भी मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए.

बिहार के राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कर ली. घटना की गंभीरता को देखते हुए नवगछिया की एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने आरोपी थानाप्रभारी रंजीत कुमार को निलंबित कर दिया. सिर्फ जांच ही जांच एसपी ने मामले की जांच के लिए एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया. एफएसएल टीम ने बिहपुर थाने से घटना के साक्ष्य जुटाए. इस के लिए पिटाई में इस्तेमाल डंडे, हथियारों के बट, शौचालय के दरवाजे का रौड, फर्श, पुलिस थाने की जीप आदि से सैंपल एकत्र किए गए. इंजीनियर आशुतोष की मौत को ले कर सोशल मीडिया पर जस्टिस फौर आशुतोष कैंपेन शुरू हो गया. इस में सांसद, विधायक से ले कर बिहार और झारखंड तक के लोग जुड़ गए.

आशुतोष के ननिहाल गोड्डा से ले कर उन के गांव मड़वा तक के लोग सोशल मीडिया के जरिए बिहपुर के थानेदार और उस की टीम के पुलिस वालों को फांसी देने की मांग करने लगे. लोगों का कहना था कि थानेदार रंजीत कुमार पहले भी बेवजह लोगों की पिटाई करते थे. एसपी से लोगों ने शिकायतें भी की थीं, लेकिन कभी काररवाई नहीं हुई. इस से थानेदार के अत्याचार बढ़ते गए. बिहपुर पुलिस थाने में पहले से ही सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. इन कैमरों में पूरी घटना कैद हो गई थी. इसलिए इन की फुटेज जब्त कर अधिकारियों ने उन की जांच शुरू कर दी.

प्रारंभिक जांच में इंजीनियर आशुतोष की मौत पुलिस की पिटाई से होने की बात ही सामने आई. जांच में एसआईटी को बिहपुर थाने में एक प्रार्थनापत्र और थाने की डायरी में एक एंट्री मिली. प्रार्थनापत्र आशुतोष के रिश्तेदार संजय पाठक की ओर से बिहपुर थानाध्यक्ष के नाम था. इस में लिखा था कि वह आशुतोष को थाने से सहीसलामत ले जा रहे हैं. पुलिस स्टेशन की डायरी में इस प्रार्थनापत्र की एंट्री की गई थी. पुलिस की बर्बर पिटाई से इंजीनियर की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा था. विभिन्न संगठनों के लोग जिला प्रशासन को आंदोलन की चेतावनी देने लगे. लोगों के गुस्से को देखते हुए डीआईजी सुजीत कुमार ने इस मामले की मौनिटरिंग की कमान संभाल ली.

उन्होंने नवगछिया एसपी को थानेदार सहित अन्य आरोपी पुलिस वालों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी करने को कहा. अधिकारियों के झूठे आश्वासन डीआईजी ने इस मामले में नवगछिया जिला पुलिस की मदद के लिए भागलपुर साइबर सेल के प्रभारी और एक तकनीकी विशेषज्ञ को डेपुटेशन पर अगले आदेश तक बिहपुर लगा दिया. 28 अक्तूबर को मड़वा और भ्रमरपुर गांव के लोगों ने आशुतोष की आत्मा की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला. लोगों ने मामले की न्यायिक जांच कराने, दोषी पुलिस वालों की गिरफ्तारी और उन्हें बर्खास्त करने के अलावा मृतक के परिवार को सरकारी नौकरी देने की मांग की.

आरोपी थानेदार और उस के साथी पुलिस वालों की तलाश में एसआईटी ने कई जगह छापे मारे. साइबर सेल के पुलिस अधिकारियों ने आरोपी पुलिस वालों की मोबाइल लोकेशन की टोह ली, लेकिन सुराग नहीं मिला. लोगों के आक्रोश को देखते हुए नवगछिया एसपी ने भागलपुर के डीएम को पत्र लिख कर मामले की न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया. भागलपुर डीएम प्रवीण कुमार ने इस के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिख कर आग्रह किया. एसपी ने इंजीनियर आशुतोष की पिटाई में थानेदार का साथ देने वाले 2 होमगार्ड जवानों की सेवाएं समाप्त करने के लिए भागलपुर डीएम को पत्र लिखा. इस के आधार पर डीएम ने दोनों आरोपी होमगार्ड जवानों की सेवा समाप्त कर दी.

प्रारंभिक जांच में सामने आया था कि आशुतोष की बर्बरता से पिटाई करने में थानेदार के अलावा पुलिस जीप का निजी चालक जहांगीर, एक एएसआई शिवबालक प्रसाद और 2 होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार चौधरी आदि शामिल थे. एसआईटी भी कुछ नहीं कर पाई इस मामले में लगातार हो रहे लोगों के प्रदर्शनों को देखते हुए एसआईटी के अधिकारी आरोपी पुलिस वालों की तलाश में रोजाना छापे मार रहे थे, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चल रहा था. इस से लोग यह कहने लगे कि पुलिस अपने साथियों का बचाव कर रही है.

लोगों के दबाव में भागदौड़ के बाद पुलिस ने आशुतोष की मौत के मामले में 30 अक्तूबर को बिहपुर थाने के एएसआई शिवबालक प्रसाद और बर्खास्त किए गए दोनों होमगार्ड जवान राजू पासवान व मनोज कुमार को गिरफ्तार कर लिया. आरोपी एएसआई पटना जिले के पुनपुन थाना इलाके के पोथही गांव का रहने वाला था. इसी दिन मड़वा गांव के लोगों ने नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम से मुलाकात कर आरोपी थानेदार की गिरफ्तारी नहीं होने पर गुस्सा जताया और ज्ञापन दिया. इस में आरोपी पुलिस वालों पर सख्त काररवाई और पीडि़त परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजे के अलावा आश्रित को सरकारी नौकरी दिलाने की मांग की. लोगों के आक्रोश को देखते हुए बिहपुर पुलिस थाने पर अर्धसैनिक बल तैनात कर दिया गया.

31 अक्तूबर को पुलिस को इंजीनियर आशुतोष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. इस में उन्हें अंदरूनी चोटें लगने की बात कही गई थी. इस रिपोर्ट से यह बात तय हो गई कि पुलिस ने आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद डीआईजी सुजीत कुमार ने बिहपुर थाने पहुंच कर एकएक बिंदु पर मातहत अफसरों से चर्चा की. इसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार एएसआई और बर्खास्त होमगार्ड जवानों को पूछताछ और बयान लेने के बाद अदालत में पेश किया. अदालत ने तीनों को 31 अक्तूबर को जेल भेज दिया.

चूंकि इस दौरान बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. इसलिए पुलिस की पिटाई से इंजीनियर आशुतोष की मौत के मामले को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया. आयोग ने एक नवंबर को भागलपुर की प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए. उन्हें अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह में चुनाव आयोग को सौंपने को कहा गया. सिर्फ आश्वासन चुनाव आयोग के निर्देश पर प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी ने 2 नवंबर को ही बिहपुर पहुंच कर मामले की जांच शुरू कर दी. उन्होंने एसपी स्वप्नाजी मेश्राम और एसडीपीओ दिलीप कुमार की मौजूदगी में थाने में पुलिसकर्मियों से आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की.

उन्होंने कहा कि आरोपी थानाध्यक्ष को जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उस की बर्खास्तगी का प्रस्ताव सरकार को भेजा जाएगा. एसपी ने उन्हें बताया कि फरार आरोपी थानेदार की संपत्ति की कुर्की के लिए अदालत में प्रार्थनापत्र लगाया गया है. वंदना किन्नी ने उसी दिन भागलपुर डीएम के साथ मड़वा गांव जा कर मृतक इंजीनियर आशुतोष के घर वालों को सांत्वना दी और उन से घटना के बारे में जानकारी ली. 3 नवंबर को अदालत के आदेश पर बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार के मुंगेर स्थित मकान की कुर्की कर ली गई. एसआईटी ने एसडीपीओ दिलीप कुमार के नेतृत्व में थानेदार के मकान से सारा सामान जब्त कर लिया.

इस के अलावा एक और आरोपी जहांगीर को भी एसआईटी ने गिरफ्तार कर लिया. जहांगीर बिहपुर पुलिस थाने की जीप का निजी चालक था. आरोप है कि थानेदार के कहने पर उस ने भी आशुतोष की बेरहमी से पिटाई की थी. आश्वासनों का अंबार उसी दिन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने आशुतोष के घर वालों से मुलाकात कर शोक संवेदना जताई. उन्होंने कहा कि दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा. यह घटना हृदयविदारक है. इस मामले में उन्होंने पीडि़त परिवार को 50 लाख रुपए मुआवजा दिलाने और आशुतोष की पत्नी को सरकारी नौकरी दिलाने की बात भी कही.

प्रमंडलीय आयुक्त वंदना किन्नी मामले की जांच के लिए 6 नवंबर को दोबारा बिहपुर पहुंची. उन्होंने एनएच 31 पर महंथ चौक पर दुकानदारों और प्रत्यक्षदर्शियों से 24 अक्तूबर को आशुतोष के साथ हुई घटना के बारे में पूछताछ की. इस के बाद वह बिहपुर थाना इलाके के ही कोरचक्का गांव पहुंची. इसी गांव के देवेंद्र सिंह से साइड में चलने की बात पर आशुतोष की उस दिन झड़प हुई थी. इसी झड़प के दौरान बिहपुर थानेदार रंजीत वहां पहुंच गया और आशुतोष को धमकाने के बाद पीटते हुए थाने ले गया था. आयुक्त को देवेंद्र गांव में नहीं मिला. वह नेपाल गया हुआ था. बाद में आयुक्त वंदना किन्नी ने नवगछिया में एसपी से इस मामले की जांचपड़ताल के बारे में पूछा.

भागलपुर के जिलाधिकारी प्रवीण कुमार की अनुशंसा पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार पांडेय ने 9 नवंबर को आशुतोष की मौत के मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए. इस मामले की जांच नवगछिया सिविल कोर्ट के एसीजेएम-3 प्रमोद कुमार पांडेय को सौंपी गई. उन्हें एक महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपने को कहा गया. नवगछिया एसपी स्वप्नाजी मेश्राम ने बिहपुर के निलंबित थानेदार रंजीत कुमार की बर्खास्तगी की अनुशंसा डीआईजी से की. एसपी की अनुशंसा पर थानेदार की बर्खास्तगी की काररवाई विभागीय स्तर पर शुरू हो गई.

इंजीनियर आशुतोष के पिता अजय पाठक गोड्डा कालेज में प्रोफेसर थे. आशुतोष के दादा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य और स्वतंत्रता सेनानी थे. उन के मातापिता का निधन हो चुका था. गोड्डा में आशुतोष का ननिहाल है. उन्होंने गोड्डा से ही पढ़ाई की थी. वह अच्छे क्रिकेटर भी थे. सौफ्टवेयर इंजीनियर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई शहरों में नौकरी की. कई साल तक वह बेंगलुरु में नौकरी करते रहे. लौकडाउन होने पर वे बेंगलुरु छोड़ कर अपने गांव आ गए और भागलपुर में नौकरी करने लगे थे. अभी तक आंसू बहा रही है स्नेहा आशुतोष की शादी करीब 3 साल पहले स्नेहा से हुई थी. उन के 2 साल की एक बेटी है. उस के ससुर कटिहार पुलिस में दरोगा हैं.

कथा लिखे जाने तक आरोपी थानेदार रंजीत कुमार की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वह पुलिस की पकड़ से बच कर अपने दांवपेच लगाने में जुटा था. माना यह जा रहा था वह पुलिस से कितनी भी आंख मिचौली करे, एक न एक दिन उसे अपने किए की सजा जरूर मिलेगी. नेताओं और अफसरों के वादे के बावजूद मृतक आशुतोष के घर वालों को न तो कोई आर्थिक मदद मिली थी और न ही आश्रित को नौकरी. आशुतोष की मौत से स्नेहा की मांग का सिंदूर उजड़ गया. 2 साल की मासूम बेटी मारवी के सिर से पिता का साया छिन गया. पति की मौत के गम से स्नेहा अभी उबर नहीं पा रही है. वह रात को सोते हुए उठ बैठती है और उस दिन की घटना को याद कर आंसू बहाती है.

बहरहाल, इस घटना से बिहार पुलिस का अमानवीय चेहरा उजागर हुआ है. पुलिस पहले ही बदनाम रही है, इस घटना ने आम लोगों में पुलिस का भरोसा कम किया है. देश में जहां रोजाना नए कानून बन रहे हैं. शिकायतों के लिए सरकार और अफसर हैं. इंसाफ देने के लिए अदालतें है. संविधान ने लोगों को कई तरह की आजादी और अधिकार दिए हैं. फिर भी इस तरह की हो रही घटनाएं देशवासियों का सिर शर्म से झुकाने को मजबूर कर देती हैं.

 

family Crime : बेवफा पत्नी ने बिजली के तार से घोंटा पति का गला

family Crime : दंपति के बीच आपसी विवाद होना एक आम बात होती है. लेकिन समझदार लोग पहल कर के खुद ही विवादों को निपटा लेते हैं. अवतार सिंह और अंजना यादव भी अगर अपना अहंकार छोड़ कर घरेलू विवाद निपटाने की कोशिश करते तो शायद…

यह झांसी डिवीजन के तहत आता है. महाराजा सोमेश सिंह ने अपनी पत्नी ललिता देवी की यादगार में इस का नाम ललितपुर रखा था. साल 1974 में यह जिले के रूप में अस्तित्व में आया. जिले की सीमाएं झांसी व दतिया से जुड़ी हैं. झांसी जहां ऐतिहासिक क्रांति के लिए मशहूर है तो दतिया दूधदही व खोया व्यापार के लिए. जबकि ललितपुर उधार व्यापार के लिए चर्चित है. इन 3 जिलों को मिला कर एक कहावत बहुत मशहूर है ‘झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार. ललितपुर न छोडि़ए, जब तक मिले उधार.’

ललितपुर जिला ऐतिहासिक तथा धर्मस्थलों के लिए भी मशहूर है. यहां कई प्रसिद्ध मंदिर हैं. भारत के 3 बांधों में प्रमुख गोविंद सागर बांध इसी ललितपुर में स्थित है. इस बांध को लव पौइंट के नाम से भी जाना जाता है. इसी ललितपुर शहर में एक गांव है जिजयावन. यादव बाहुल्य इस गांव में शेर सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी कमला के अलावा एक बेटी रामरती और बेटा अवतार सिंह था. शेर सिंह की आजीविका खेती थी. उसी की आय से उस ने बेटी का ब्याह कर उसे ससुराल भेजा था. शेर सिंह यादव खुद तो जीवन भर खेत जोतता रहा, लेकिन वह अपने बेटे अवतार सिंह को पढ़ालिखा कर अच्छी नौकरी दिलवाना चाहता था. लेकिन उस की यह तमन्ना अधूरी ही रह गई.

क्योंकि अवतार सिंह का मन पढ़ाई में नहीं लगा. हाईस्कूल में फेल होने के बाद उस ने पढ़ाई बंद कर दी और खेती के काम में पिता का हाथ बंटाने लगा. अवतार सिंह का मन खेतीकिसानी में लग गया तो शेर सिंह ने उस का विवाह भसौरा गांव निवासी राजकुमार यादव की बेटी अंजना उर्फ सुखदेवी के साथ कर दिया. अंजना थी तो सांवली, लेकिन उस का बदन भरा हुआ और नाकनक्श सुंदर थे. अवतार सिंह उस की अदाओं पर फिदा था, इसी कारण वह धीरधीरे जोरू का गुलाम बन गया. दोनों की शादी को 5 साल बीत गए. इस बीच अंजना 2 बेटियों की मां बन गई.

अंजना की सास कमला की दिली तमन्ना थी कि उस का एक पोता हो. लेकिन जब अंजना ने एक के बाद एक 2 बेटियों को जन्म दिया तो कमला गम में डूब गई. इसी गम से वह बीमार रहने लगी और फिर एक दिन उस की मृत्यु हो गई. पत्नी छोड़ कर चली गई तो शेर सिंह को भी संसार से मोह नहीं रह गया. उस ने साधु वेश धारण कर लिया और तीर्थस्थानों के भ्रमण करने लगा. वह महीने दो महीने में घर आता, हफ्तादस दिन रहता, उस के बाद फिर भ्रमण पर निकल जाता. ससुर के घर छोड़ने से जहां अंजना खुश थी, वहीं अवतार सिंह को इस बात का गहरा सदमा लगा था. अवतार सिंह का मानना था कि मां की मौत की जिम्मेदार उस की पत्नी अंजना ही है.

पिता भी उसी के कारण घर छोड़ कर गए हैं. कभीकभी वह अंजना को इस बात का ताना भी देता था. इसे ले कर दोनों में झगड़ा होता, फिर अंजना रूठ कर मायके चली जाती. अवतार सिंह के मनाने पर ही वह घर वापस आती थी. पतिपत्नी के बीच तनाव बढ़ा, तो उन के अंतरंग संबंधों पर भी असर पड़ने लगा. जब मन में दूरियां पैदा हो जाएं तो तन अपने आप दूर हो जाते हैं. अब महीनों तक दोनों देह मिलन से भी दूर रहते. अंजना चाहती थी कि प्रणय की पहल अवतार सिंह करे, जबकि अवतार सिंह चाहता था कि अंजना खुद उस के पास आए. इसी जिद पर दोनों अड़े रहते. तनाव पैदा होने से, घर में एक बुराई और घुस आई. अवतार सिंह को शराब पीने की आदत पड़ गई. वह शराब पी कर आने लगा. इस से मनमुटाव और बढ़ गया.

अवतार सिंह की जानपहचान कल्याण उर्फ काले कुशवाहा से थी. कल्याण पड़ोस के गांव मिर्चवारा का रहने वाला था और काश्तकार था. अवतार और कल्याण के खेत मिले हुए थे सो दोनों की खेतों पर अकसर मुलाकात हो जाती थी. कल्याण की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उस के पास बुलेरो कार भी थी, जिसे मोहन कुशवाहा चलाता था. बोलेरो कार बुकिंग पर चलती थी, जिस से कल्याण को अतिरिक्त आय होती थी. मोहन कुशवाहा ड्राइवर ही नहीं बल्कि उस का दाहिना हाथ था. कल्याण उर्फ काले कुशवाहा शराब व शबाब का शौकीन था. अवतार सिंह को भी शराब पीने की लत थी, सो उस ने कल्याण से दोस्ती कर ली. अब दोनों की महफिल साथसाथ जमने लगी. चूंकि अवतार सिंह को पैसा खर्च नहीं करना पड़ता था सो वह उस के बुलावे पर तुरंत उस के पास पहुंच जाता था.

एक रोज कल्याण शराब की बोतल ले कर अवतार सिंह के घर आ पहुंचा. उस रोज पहली बार कल्याण की नजर अवतार की पत्नी अंजना पर पड़ी. पहली ही नजर में अंजना उस के दिल में रचबस गई. अंजना भी हृष्टपुष्ट कल्याण को देख कर प्रभावित हुई. दरअसल अंजना अपने पति अवतार सिंह से संतुष्ट नहीं थी. उस का जिस्मानी रिश्ता खत्म सा हो गया था. अत: उस ने मन ही मन कल्याण को अपने प्यार के जाल में फंसाने का निश्चय कर लिया. कल्याण कुशवाहा का अंजना के घर आनाजाना शुरू हुआ, तो दोनों के बीच नजदीकियां भी बढ़ने लगीं. 2 बेटियों की मां बन जाने के बाद भी अंजना का यौवन अभी ढला नहीं था. अंजना की आंखों में जब उसे मूक निमंत्रण दिखने लगा, तो कामना की प्यास भी बढ़ गई.

अंजना की नजदीकियां पाने के लिए कल्याण ने अवतार सिंह को ज्यादा भाव देना शुरू कर दिया. वह उसे मुफ्त में शराब तो पिलाता ही था, अब उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. कल्याण का घर आना बढ़ा तो अंजना समझ गई कि कल्याण पर उस के हुस्न का जादू चल गया है. वह अपने हावभाव से उस की प्यास और भड़काने लगी. बेताबी दोनों ओर बढ़ती गई. अब उन्हें मौके का इंतजार था. एक रोज कल्याण ने अंजना को पाने का मन बनाया और दोपहर को अवतार सिंह के घर पहुंच गया. अंजना उस समय घर में अकेली थी. बच्चे स्कूल गए थे और अवतार सिंह खेतों पर. मौका अच्छा था. कल्याण को देख अंजना के होंठों पर शरारती मुसकान बिखरी और उस ने पूछा, ‘‘तुम तो शाम को अंगूर की बेटी को होंठों पर लगाने यहां आते थे, आज दिन में रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘अंजना, अंगूर की बेटी से होंठों की प्यास कहां बुझती है, उल्टा और भड़क जाती है. सोचा कि आज शराब से भी ज्यादा नशीली, उस से ज्यादा मादक अपनी अंजना का नशा कर लूं.’’ कहते हुए कल्याण ने उस के कंधे पर हाथ रख दिए.

‘‘तुम ने न मुझे हाथ लगाया, न होंठ लगाए. फिर कैसे कह सकते हो कि मैं शराब से ज्यादा मादक और नशीली हूं.’’ अंजना ने अपनी अंगुलियों से कल्याण की छाती सहलानी शुरू कर दी. यह मिलन का साफ आमंत्रण था.

कल्याण का हौसला बढ़ा. उस ने अंजना को अपनी बांहों में भर लिया. इस के बाद दोनों ने हसरतें पूरी कीं. उस रोज के बाद कल्याण तथा अंजना के बीच अकसर यह खेल खेला जाने लगा. दोनों को न मर्यादा की परवाह थी, न रिश्तेनातों की. अंजना अब खूब बन संवर कर रहने लगी. अकसर दोपहर को कल्याण का अवतार सिंह के घर आना, लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बनना ही था. धीरेधीरे पासपड़ोस वाले समझ गए कि दोनों के बीच कौन सी खिचड़ी पक रही है. चर्चा फैली तो बात अवतार सिंह के कानों तक पहुंची. उस ने पत्नी से जवाबतलब किया तो अंजना बोली, ‘‘कल्याण तो तुम्हारे साथ पीनेखाने के लिए आता है. इसी बात की जलन लोगों को होती है. तुम्हें अगर उस के आने से परेशानी है, तो तुम ही उसे मना कर देना. मैं बेकार में क्यों बुरी बनूं.’’

पत्नी की बातों से अवतार सिंह को लगा कि गांव वाले बिना वजह बातें कर रहे हैं. अंजना गलत नहीं है. वह शांत हो कर चारपाई पर जा लेटा. अवतार सिंह ने अंजना की बात पर यकीन तो कर लिया, लेकिन मन का शक दूर नहीं हुआ. इधर अंजना ने सारी बात कल्याण को बताई. इस के बाद दोनों मिलन में बेहद सतर्कता बरतने लगे. अब जब अंजना फोन पर उसे सूचना देती, तभी कल्याण घर आता. उस रोज अवतार सिंह ललितपुर जाने की बात कह कर घर से निकला, लेकिन किसी वजह से 2 घंटे बाद ही घर वापस आ गया. वह घर के अंदर कमरे के पास पहुंचा तभी उसे कमरे के अंदर से खुसरफुसर की आवाज सुनाई दी.

आवाज सुन कर वह समझ गया कि कमरे में अंजना के साथ कोई मर्द भी है. उस की आंखों में खून उतर आया. उस ने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी. भड़ाक से दरवाजा खुला, सामने बिस्तर पर कल्याण और अंजना आपत्तिजनक हालत में थे. अवतार सिंह पूरी ताकत से दहाड़ा, ‘‘हरामजादे तेरी यह हिम्मत कि तू मेरे ही घर में घुस कर मेरी इज्जत लूटे. मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा.’’

गुस्से से आग बबूला अवतार सिंह आंगन के कोने में रखा डंडा लेने लपका. तब तक कल्याण और अंजना संभल चुके थे. कल्याण तो भाग गया, लेकिन अंजना कहां जाती. अवतार सिंह ने उस की जम कर पिटाई की, और गालियां बकता रहा. फिर वह सीधा देशी शराब के ठेके पर चला गया. वहां से वह धुत हो कर लौटा, फिर पत्नी की खबर लेनी शुरू कर दी. उस रोज पूरा गांव जान गया कि अंजना का कल्याण से गलत रिश्ता है. अंजना तो कल्याण की दीवानी बन चुकी थी. अत: पिटाई के बावजूद भी उस ने कल्याण का साथ नहीं छोड़ा. अब वह घर के बजाए खेतखलिहान व बागबगीचे में प्रेमी से मिलने लगी.

इस की जानकारी जब अवतार सिंह को हुई तो उस ने फिर अंजना को पीटा और चेतावनी दी कि आज के बाद जिस दिन वह उसे रंगे हाथ पकड़ लेगा, उस दिन बहुत बुरा होगा. पति की इस चेतावनी से अंजना बुरी तरह डर गई थी. 11 अगस्त, 2020 को अचानक अवतार सिंह लापता हो गया. कई दिन बीत जाने के बाद जब गांव वालों को अवतार सिंह नहीं दिखा तो लोगों ने अंजना से उस के बारे में पूछा. उस ने लोगों को बताया कि उस के पति मथुरा वृंदावन गए हैं. हफ्तादस दिन में वापस आ जाएंगे. अंजना का जवाब पा कर लोग संतुष्ट हो गए. लगभग एक हफ्ते बाद अंजना का ससुर शेर सिंह तीर्थ स्थानों का भ्रमण कर घर लौटा तो अंजना ने उसे भी बता दिया कि अवतार सिंह मथुरा गया है.

इधर 15 अगस्त, 2020 को वानपुर थानाप्रभारी राजकुमार यादव को सूचना मिली कि खिरिया छतारा गांव के पास नहर की पटरी के किनारे झाडि़यों में एक आदमी की लाश पड़ी है. जिस से दुर्गंध आ रही है. सूचना से राजकुमार यादव ने अपने अधिकारियों को अवगत कराया फिर चौकी इंचार्ज कृष्ण कुमार, एसआई दया शंकर, सिपाही रजनीश चौहान और देवेंद्र कुमार को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय वहां गांव वालों की भीड़ जुटी थी. थानाप्रभारी ने झाडि़यों से शव बाहर निकलवाया, जो एक चादर में लिपटा था. चादर से शव निकाला तो वह 34-35 साल के युवक का था.

शव की हालत देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि उस की हत्या 4-5 दिन पहले की गई होगी. बरसात के कारण शव फूल भी गया था. देखने से प्रतीत हो रहा था कि युवक की हत्या गला घोंट कर की गई थी. थानाप्रभारी राजकुमार यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी एस.एस. बेग, एएसपी बृजेश कुमार सिंह तथा डीएसपी केशव नाथ घटनास्थल आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो पता चला कि युवक की हत्या कहीं और की गई थी और शव को नहर किनारे झाडि़यों में फेंका गया था.

पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में सैकड़ों लोग शव को देख चुके थे. पर कोई भी उसे पहचान नहीं पा रहा था. इस से अधिकारियों ने अंदाजा लगाया कि मृतक आसपास के गांव का नहीं बल्कि कहीं दूरदराज का है. तब अधिकारियों ने शव का फोटो खिंचवा कर पोस्टमार्टम के लिए ललितपुर के जिला अस्पताल भिजवा दिया. एसपी एम.एम. बेग ने इस ब्लाइंड मर्डर का परदाफाश करने की जिम्मेदारी थानाप्रभारी राजकुमार यादव को सौंपी. सहयोग के लिए एसओजी व सर्विलांश टीम को भी लगाया. पूरी टीम की कमान एएसपी बृजेश कुमार सिंह को सौंपी गई. थानाप्रभारी राजकुमार यादव ने इस केस को खोलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. मुखबिरों को गांवगांव भेजा.

पासपड़ोस के कई थानों से गुमशुदा लोगों की जानकारी जुटाई पर उस अज्ञात शव की किसी ने शिनाख्त नहीं की. तब यादव को शक हुआ कि मृतक किसी दूरदराज गांव का हो सकता है. इस पर थानाप्रभारी ने दूरदराज के गांवों में अज्ञात युवक की लाश बरामद करने की मुरादी कराई. जिजयावन गांव का शेर सिंह यादव उस समय खेत पर जा रहा था. अपने गांव में डुग्गी पिटती देख वह रुक गया. ऐलान सुना तो वह अंदर से कांप सा गया. क्योंकि उस का बेटा अवतार सिंह भी 11 अगस्त से घर से लापता था. खेत पर जाना भूल कर शेर सिंह ने पड़ोसी रामसिंह को साथ लिया और थाना वानपुर पहुंच कर थानाप्रभारी राजकुमार यादव से मिला.

थानाप्रभारी ने जब शेर सिंह को लाश के फोटो, कपड़े, चादर आदि दिखाई तो उन दोनों ने उस की शिनाख्त अवतार सिंह के तौर पर कर दी. पड़ोसी रामसिंह ने थानाप्रभारी राजकुमार यादव को यह भी जानकारी दी कि अवतार सिंह के घर मिर्चवारा गांव के कल्याण उर्फ काले का आनाजाना था. काले तथा अवतार सिंह की बीवी अंजना के बीच नाजायज रिश्ता था. अवतार सिंह इस का विरोध करता था. संभव है, इसी विरोध के कारण उस की हत्या की गई हो. अवतार सिंह की हत्या का सुराग मिला तो पुलिस टीम अंजना से पूछताछ करने उस के घर पहुंच गई. अंजना ने पूछताछ में बताया कि उस के पति मथुरा गए हैं. वहां से कहीं और चले गए होंगे.

2-4 दिन बाद आ जाएंगे. लेकिन जब पुलिस ने बताया कि उस के पति की हत्या हो गई है और उस के ससुर शेर सिंह ने फोटो चादर से उस की शिनाख्त भी कर ली है. तब अंजना ने जवाब दिया कि उस के ससुर वृद्ध हैं. बाबा बन गए हैं. उन की अक्ल कमजोर हो गई, इसलिए उन्होंने हत्या की बात मान ली और उन की गलत शिनाख्त कर दी. पर सच्चाई यह है कि पति तीर्थ करने गए हैं. आज नहीं तो कल आ ही जाएंगे. बिना सबूत के पुलिस टीम ने अंजना को गिरफ्तार करना उचित नहीं समझा. पुलिस ने पूछताछ के बहाने उस का मोबाइल फोन जरूर ले लिया तथा उस की निगरानी के लिए पुलिस का पहरा बिठा दिया.

पुलिस ने अंजना का मोबाइल फोन खंगाला तो पता चला कि अंजना एक नंबर पर ज्यादा बातें करती है. पुलिस ने उस नंबर का पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर अंजना के प्रेमी कल्याण उर्फ काले का है और वह हर रोज उस से बात करती है. फिर क्या था, पुलिस टीम ने 3 सितंबर, 2020 की सुबह अंजना को उस के घर से हिरासत में ले लिया और थाना वानपुर ले आई. फिर अंजना की ही मदद से पुलिस टीम ने कल्याण उर्फ काले को भी भसौरा तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस समय वह अपनी बोलेरो यूपी94एफ 4284 पर सवार था और ड्राइवर मोहन कुशवाहा का इंतजार कर रहा था. उसे मय बोलेरो थाना वानपुर लाया गया.

थाने पर जब उस ने अंजना को देखा तो समझ गया कि अवतार सिंह की हत्या का राज खुल गया है. जब पुलिस ने कल्याण से अवतार सिंह की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया और अपनी बोलेरो से तार का वह टुकड़ा भी बरामद करा दिया जिस से उस ने अवतार सिंह का गला घोंटा था. कल्याण के टूटते ही अंजना भी टूट गई और पति की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. कल्याण उर्फ काले कुशवाहा ने पुलिस को बताया कि अवतार सिंह की पत्नी अंजना से उस के नाजायज संबंध हो गए थे. इस रिश्ते की जानकारी अवतार को हुई तो वह विरोध करने लगा और अंजना को पीटने लगा.

अंजना की पिटाई उस से बरदाश्त नहीं हो रही थी. इसलिए उस ने अंजना और अपने ड्राइवर मोहन कुशवाहा के साथ मिल कर अवतार की हत्या की योजना बनाई और सही समय का इंतजार करने लगा. 11 अगस्त, 2020 की रात 8 बजे अंजना ने फोन कर के कल्याण को जानकारी दी कि अवतार सिंह फसल की रखवाली के लिए खेत पर गया है. वह रात को ट्यूबवैल वाली कोठरी में सोएगा. यह पता चलते ही वह अपनी बोलेरो यूपी94एफ 4284 से ड्राइवर मोहन कुशवाहा के साथ जिजयावन गांव के बाहर पहुंचा. वहां योजना के तहत अंजना उस का पहले से ही इंतजार कर रही थी. उस के बाद वह तीनों खेत पर पहुंचे. जहां अवतार सिंह कोठरी में जाग रहा था.

वहां पहुंचते ही तीनों ने अवतार सिंह को दबोच लिया, फिर बिजली के तार से अवतार सिंह का गला घोंट दिया. हत्या के बाद तीनों ने शव चादर में लपेटा और बोलेरो गाड़ी में रख कर वहां से 20 किलोमीटर दूर खिरिया छतारा गांव के बाहर नहर की पटरी वाली झाडि़यों के बीच फेंक दिया. शव ठिकाने लगाने के बाद सभी लोग अपनेअपने घर चले गए. चूंकि कल्याण उर्फ काले ने ड्राइवर मोहन कुशवाहा को भी हत्या में शामिल होना बताया था, अत: पुलिस ने तुरंत काररवाई करते हुए 4 सितंबर की दोपहर 12 बजे मोहन कुशवाहा को भी ललितपुर बस स्टैंड के पास से गिरफ्तार कर लिया. थाना वानपुर की हवालात में जब उस ने कल्याण को देखा तो सब कुछ समझ गया. पूछताछ में उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस ने हत्यारोपित कल्याण उर्फ काले, मोहन कुशवाहा तथा अंजना यादव के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें 5 सितंबर 2020 को ललितपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से तीनों को जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News : फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर करोड़ों कमाने वाले नाइजीरियन गैंग का पर्दाफाश

Crime News : नाइजीरिया के कई गिरोह दिल्ली में रह कर लोगों से पहले फेसबुक के माध्यम से दोस्ती करते हैं और फिर मोटा गिफ्ट भेजने के नाम पर ठगी करते हैं. ऐसे गिरोह में लड़कियां भी होती हैं. यह सारा लालच का खेल है. जो लालच में फंसा, समझो उस के 5-10 लाख रुपए गए. आश्चर्य की बात यह कि इस के शिकार पढ़ेलिखे लोग होते हैं. डाक्टर साधना भी…

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पीजीआई अस्पताल के पास फ्लैट में रहने वाली डाक्टर साधना कुमार अस्पताल में काम करने के साथसाथ प्राइवेट अस्पताल में भी मरीजों को देखने का काम करती थीं. उन के मन में था कि अगर यूएसए यानी अमेरिका में उन की जौब लग जाए तो वहां जाने से जिंदगी संवर सकती है. तमाम महिलाओं की तरह डाक्टर साधना फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बहुत एक्टिव रहती थीं. कई बार रात को जब समय मिलता तो फेसबुक और मैसेंजर पर फ्रैंडलिस्ट में शामिल लोगों से बातचीत भी करती थीं. अगस्त माह की बात होगी. एक दिन उन्होंने देखा कि उन के फेसबुक पर अमेरिका में रहने वाले डेविड एलेक्स नाम के अमेरिकी युवक की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई हुई थी.

डाक्टर साधना के मन में अमेरिका में रहने और किसी अमेरिकी से करीबी संबंध बनाने की इच्छा बलवती हुई. डेविड एलेक्स की प्रोफाइल देखने से लग रहा था कि वह युवा है. एलेक्स अमेरिका की कई मैडिकल संस्थाओं से भी जुड़ा था. ऐसे में डाक्टर साधना को लगा कि उस के साथ परिचय और फेसबुक पर जानपहचान करने में कोई बुराई नहीं है. साधना ने डेविड एलेक्स की फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार करते ही 5 मिनट में उधर से फेसबुक मैसेंजर पर ‘हेलो’ का मैसेज आया. साधना ने भी ‘हेलो’ कहा. इस के बाद दोनों के बीच फेसबुक मैसेंजर पर चैटिंग का सिलसिला शुरू हो गया. धीरेधीरे उन की आपस में तमाम तरह की बातें होने लगीं.

हो गई दोस्ती साधना व्यस्तता के चलते आमतौर पर रात में ही अपना फेसबुक खोल पाती थी. वह जब भी अपना फेसबुक खोलती तो मैसेजर पर कोई ना कोई मैसेज पड़ा होता था. साधना और डेविड एलेक्स के बीच बातचीत शुरू हुए एक महीने से अधिक का समय बीत गया था. अक्तूबर महीने में दशहरे और नवरात्रि का त्यौहार आया. इस दौरान साधना ने दोनों फेस्टिवल की तैयारियों के अपने फोटो फेसबुक पर पोस्ट किए. डेविड एलेक्स ने बधाई दी और इस के बाद मैसेंजर पर दोनों त्यौहारों के बारें में बातें भी कीं. अंत में डेविड एलेक्स ने साधना को लिखा, ‘दोस्त, मैं तुम्हें कुछ उपहार भेजना चाहता हूं.’

साधना ने लिखा, ‘इस की जरूरत नहीं है. बिना उपहार के भी दोस्ती चलती है. जब हम मिलेंगे तब उपहार लेंगे. आप को जब इंडिया आना हो तो लखनऊ भी आना, आप से मिल कर अच्छा लगेगा.’ डेविड एलेक्स ने साधना की बात नहीं मानी और उन्हें उपहार देने के लिए मना लिया और उन का पोस्टल एड्रैस और फोन नंबर भी ले लिया. अब दोनों के बीच फेसबुक के साथसाथ वाट्सऐप पर भी बातचीत होने लगी. बातचीत में डेविड एलेक्स बहुत सज्जन सीधा लग रहा था. साधना उस पर अब पूरी तरह से भरोसा करने लगी थीं. डेविड एलेक्स ने कहा था कि वह यूएस में उन्हें जौब दिलाने में मदद करेगा.

15 अक्तूबर की बात है. साधना को फोन आया, जिस में कहा गया कि दिल्ली एयरपोर्ट पर आप का एक कोरियर आया है, जो यूएसए के डेविड एलेक्स ने भेजा है. उन्होंने अमेरिका का टैक्स भुगतान कर दिया है पर भारत में लगने वाले टैक्स का भुगतान आप को करना है. इस एवज में आप 82 हजार रुपए बैंक खाते में जमा करा दें. साधना ने मैसेज कर के एलेक्स को पूछा तो उस ने कहा, ‘दोस्त, इंडियन मनी आप दे दो. मै आप के खाते में पैसा भेज दूंगा.’ डेविड एलेक्स ने जिस शालीनता के साथ जवाब दिया, साधना मना नहीं कर पाईं. उन्होंने 82 हजार रुपए बैंक खाते में जमा करा दिए.

डाक्टर साधना फंस गईं जाल में एक दिन बाद ही दिल्ली एयरपोर्ट कस्टम विभाग के नाम से दूसरा फोन आया. साधना ने ‘ट्रूकालर’ पर चैक किया तो दिल्ली एयरपोर्ट दिखा रहा था. यह फोन करने वाली महिला ने बताया, ‘मैम, पार्सल में 56 हजार पाउंड कैश है. यह सीधा आपराधिक मामला है. मनी लौंड्रिंग का केस बनता है. आप ने इस के लिए 82 हजार रुपए बैंक में जमा भी कराए हैं. इस से साफ है कि मामला गंभीर है. अब इस की जांच ईडी को दी जाएगी.’

यह सुन कर साधना घबरा गईं. इस के बाद बातचीत में दोबारा काल करने के लिए कहा गया. साधना ने फिर डेविड एलेक्स को मैसेज भेजा और उसे सारी बात बताई. उस ने कहा कोई बात नहीं तुम्हारे यहां के लोग रिश्वत चाहते हैं. तुम कुछ पैसे रिश्वत में दे कर पार्सल छुड़ा लो, वरना वे लोग दिक्कत कर सकते हैं. पैसा तो तुम को मिल ही रहा है.’

साधना को बात तो अच्छी नहीं लगी. पर अनमने मन से उन्होंने बताए गए खाते में 4 लाख 30 हजार रुपए और जमा करा दिए. इस तरह साधना के पास से करीब 5 लाख रुपए चले गए. अब यह चिंता की बात बन गई थी. साधना ने यह बात अपनी एक मित्र से बताई. उस ने कहा, ‘साधना तुम किसी फ्रौड में उलझ गई हो.’ इस के बाद भी साधना को डेविड एलेक्स पर यकीन बना हुआ था. 17 अक्तूबर को दिल्ली का आयकर विभाग दिखा रहे फोन नंबर से काल आई. उस में साधना को आयकर का डर दिखाते हुए 5 लाख और जमा कराने को कहा गया. साधना ने डेविड एलेक्स को जब गुस्से में मैसेज किया तो उस ने उन के किसी मैसेज का जबाव नहीं दिया.

परेशान साधना ने फेसबुक पर जा कर मैसेज किया तो डेविड एलेक्स ने साधना को फेसबुक और वाट्सऐप से ब्लौक कर दिया. पूरी जानकारी साधना ने अपनी दोस्त को बताई तो उस ने कहा, ‘साधना, यह पूरी तरह फ्रौड था. उस ने तुम से ठगी कर ली है.’ ठगी गई साधना साधना को कुछ बोलते नहीं बन रहा था. दोस्तों ने सभी नंबर पर काल करनी शुरू की तो सभी नंबर बंद हो चुके थे. बैंक से पता करने पर बैंक खाते का कोई पता नहीं चला. 19 अक्तूबर को साधना ने पीजीआई थाने में डेविड एलेक्स के खिलाफ धारा 420 और आईटीएक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया. मामला दिल्ली और साइबर क्राइम से जुड़ा था तो लखनऊ के पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने जांच के लिए यह मामला स्पैशल टास्क फोर्स को सौंप दिया.

प्रभारी पुलिस अधीक्षक एसटीएफ विशाल विक्रम सिंह ने अपनी टीम के लोगों को मामले की छानबीन का काम सौंप दिया. एसटीएफ ने जब जांच शुरू की तो पता चला कि डेल्टा एगबोर नाइजीरिया के रहने वाले थियाम बालदे और अशातु नाम की युवती ने डेविड एलेक्स के नाम पर फेसबुक प्रोफाइल बना कर इस पूरे खेल को अंजाम दिया था. थियाम ने यूएसए के युवक डेविड एलेक्स की प्रोफाइल फोटो लगा कर फरजी फेसबुक आईडी बनाई थी. इस के बाद थियाम ने पीजीआई क्षेत्र में रहने वाली महिला डाक्टर साधना प्रसाद को फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी. इस के बाद थियाम और साधना के बीच चैटिंग शुरू हो गई. थियाम ने बातों में उलझा कर डाक्टर साधना को महंगा गिफ्ट भेजने का झांसा दिया.

यह कोई नई बात नहीं थी,ठगी के ऐसे मामले होते रहते हैं और खूब होते हैं. खास बात यह कि ठगी के ऐसे मामलों में पढ़ेलिखे लोग ही फंसते हैं. बात यह कि इस तरह की ठगी ज्यादातर इंडिया में बैठे नाइजीरियन करते हैं. डाक्टर साधना भी ऐसे ही लोगों के चक्कर में फंस गई थीं. आखिर पकड़े गए ठग ठगी का एहसास होने पर डाक्टर साधना ने पुलिस से शिकायत की. जांच के बाद एसटीएफ ने ठगी का खुलासा किया. थियाम बालदे व अशातु दिल्ली के निलोठी निहालपुर में रहते थे. यहीं रह कर ये दोनों इस तरह की ठगी करते थे.

जांच में पता चला कि थियाम वर्ष 2018 में भारत आया था. फरवरी, 2020 में उस का वीजा समाप्त हो गया था. इस के बाद उस के पास पैसे भी कम होने लगे तो उस ने अपनी प्रेमिका अशातु के साथ मिल कर यूएसए के लोगों के फोटो लगा कर 6 लोगों की फरजी फेसबुक प्रोफाइल बनाई थी. इस गिरोह में कई भारतीय भी शामिल थे, जिन के खातों में रुपए मंगाए जाते थे. थियाम महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाता था और उस की प्रेमिका अशातु युवकों को झांसे में लेती थी. एसटीएफ की टीम ने सर्विलांस की मदद से दोनों आरोपियों थियाम बालदे व अशातु को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों के पास से 2 लैपटौप, 2 पासपोर्ट, 8 मोबाइल फोन और 17 सौ रुपए नकद आदि सामान बरामद किया. एसटीएफ की जांच में पता चला कि इन लोगों ने केवल डाक्टर साधना को ही अपने जाल में नहीं फंसाया, बल्कि लखनऊ के साथसाथ दिल्ली, चेन्नई और मुंबई जैसे बड़े शहरों के तमाम लोगों को ठगा था. इन्होंने करीब 10 करोड़ रुपए से अधिक की ठगी की थी. इन लोगों ने कुछ स्थानीय खाताधारकों को अपने जाल में फंसा रखा था, जिन के खाते में पैसा जमा कराया जाता था. इस के बदले में उन्हें अच्छाभला पैसा मिलता था. थियाम बालदे ने बताया कि ‘पहले हम लोग दिल्ली में इस तरह की छोटीछोटी ठगी करते थे. धीरेधीरे दिल्ली के बाहर के शहरों के लोगों को निशाने पर लिया. मेरी प्रेमिका अशातु इस में साथ देती थी.

अशातु युवकों को अपने जाल में फंसाती थी. हम लोग अमेरिका और सऊदी अरब के लोगों के नाम पर फेसबुक बनाते थे. क्योंकि वहां के लोग पैसे वाले भी होते है और शौकीनमिजाज भी. लोगों से ठगी करने के लिए उपहार देने के अलावा किसी को शादी कर विदेश ले जाने और किसी को विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर फंसाया जाता था. उपहार भेजने वाले लोगों को फरजी नंबरों से कस्टम, इनकम टैक्स और एयरपोर्ट के अधिकारी बन कर ठगी की जाती थी. ऐसे लोग फंसने के बाद जेल जाने के डर से पैसा दे देते थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. डाक्टर साधना कुमार का नाम बदल दिया गया है.

 

Crime News : बहू ने नशीली खिचड़ी खिला कर सबको बेहोश किया, सामान लेकर प्रेमी संग हुई फरार

Crime News : शादीशुदा और 4 बच्चों की मां रीनू ने पहली गलती कपिल से अवैध संबंध बना कर की, दूसरी गलती उस ने इस संबंध को स्थाई बनाने के लिए अपनी छोटी बहन की शादी कपिल से करा कर की. उस की तीसरी गलती कपिल को रिश्तेदार बना कर घर में रखने की थी. और चौथी गलती पति शिवकुमार को मौत के घाट उतरवाने की. इतनी गलतियां करने के बाद…

इसलिए तकनीकी टीम के प्रभारी एसआई रामकुमार रघुवंशी और आरक्षक मोइन खान ने चाय व समोसे वाला बन कर उन की रैकी करनी शुरू कर दी, जिस से जल्द ही जानकारी हासिल कर सम्राट उर्फ वीरामान धामी को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में वीरामान पहले तो कुछ भी बताने की राजी नहीं था. लेकिन जब उस ने मुंह खोला तो चौंकाने वाला सच सामने आया. वास्तव में वीरामान खुद वारदात करने के लिए पचोर जाने वाली टीम में शामिल था. अन्य 2 पुरुषों और महिला के बारे में पूछताछ की तो सम्राट ने बताया कि अनुष्का अपने प्रेमी तेज के साथ नई दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहती है.

पुलिस ने बदरपुर इलाके में छापेमारी कर के दोनों को वहां से गिरफ्तार कर उन के पास से चोरी का माल बरामद कर लिया. यहां तेज रोक्यो और अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल के साथ उन का तीसरा साथी भरतलाल थापा भी पुलिस गिरफ्त में आ गए. मौके पर की गई पूछताछ के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस की मदद से मामले के मुख्य आरोपी वीरामान उर्फ सम्राट मूल निवासी धनगढ़ी, नेपाल, अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल निवासी जनकपुर, तेज रोक्यो मूल निवासी जिला अछम, नेपाल, भरतलाल थापा को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी.

इस के अलावा आरोपियों को पचोर तक कार बुक करने वाला पवन थापा निवासी उत्तम नगर नई दिल्ली, बेहोशी की दवा उपलब्ध कराने वाला कमल सिंह ठाकुर निवासी जिला बजरा नेपाल, चोरी के जेवरात खरीदने वाला मोहम्मद हुसैन निवासी जैन कालोनी उत्तम नगर, जेवरात को गलाने में सहायता करने वाला विक्रांत निवासी उत्तम नगर भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. अनुष्का को कंपनी में काम पर लगवाने वाली सरिता शर्मा निवासी किशनपुरा, नोएडा तथा अनुष्का को नौकरानी के काम पर लगाने वाला बिलाल अहमद उर्फ सोनू निवासी जामिया नगर, नई दिल्ली को गिरफ्तार कर के बरामद माल सहित पचोर लौट आई. जहां एसपी श्री शर्मा ने पत्रकार वार्ता में महज 7 दिनों के अंदर जिले में हुई चोरी की सब से बड़ी घटना का राज उजागर कर दिया.

अनुष्का ने बताया कि राम गोयल का पूरा परिवार उस पर विश्वास करता था. इसलिए परिवार के अन्य लोगों की तरह अनुष्का भी घर में हर जगह आतीजाती थी. एक दिन उस के सामने घर की तिजोरी खोली गई तो उस में रखी ज्वैलरी और नकदी देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं और उस के मन में लालच आ गया. यह बात जब उस ने दिल्ली में बैठे अपने प्रेमी तेज रोक्यो को बताई तो उसी ने उसे तिजोरी पर हाथ साफ करने की सलाह दी. योजना को अंजाम देने के लिए उस का प्रेमी तेज रोक्यो ही दिल्ली से बेहोशी की दवा ले कर पचोर आया था. वह दवा उस ने रात में खिचड़ी में मिला कर पूरे परिवार को खिला दी.

जिस से खिचड़ी खाते ही पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. तब अनुष्का अलमारी में भरा सारा माल ले कर पे्रमी के संग चंपत हो गई. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक करोड़ 53 लाख रुपए का चोरी का सामान और नकदी बरामद कर ली. पुलिस ने सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच टीआई डी.पी. लोहिया कर रहे थे.

UP Crime News : 5 लाख की सुपारी देकर कराई पति की हत्या

UP Crime News : मौडर्न और महत्त्वाकांक्षी विनीता ने प्रवक्ता पति के होते 2-2 प्रेमी बना लिए थे. जब वह चेन मार्केटिंग कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ने के बाद तो वह अवधेश को 2 कौड़ी का समझने लगी थी. आखिर उस ने अपने मन की करने के लिए…

42 वर्षीय अवधेश सिंह जादौन फिरोजाबाद जिले के भीतरी गांव के निवासी थे. वह बरेली जिले के सहोड़ा में स्थित कुंवर ढाकनलाल इंटर कालेज में हिंदी लेक्चरर के पद पर तैनात थे. नौकरी के चलते ढाई वर्ष पहले उन्होंने बरेली के कर्मचारीनगर की निर्मल रेजीडेंसी में अपना निजी मकान ले लिया था, जिस में वह अपनी पत्नी विनीता और 6 वर्षीय बेटे अंश के साथ रहते थे. 12 अक्तूबर, 2020 को अवधेश से फोन पर गांव में रह रही उन की मां अन्नपूर्णा देवी ने बात की थी. अवधेश उस समय काफी परेशान थे. मां ने उन्हें दिलासा दी कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा.

इस के बाद उन्होंने अवधेश से बात करनी चाही, लेकिन बात न हो सकी. उन का मोबाइल बराबर स्विच्ड औफ आ रहा था. अन्नपूर्णा को चिंता हुई तो वह 16 अक्तूबर को बरेली पहुंच गईं. जब वह बेटे के मकान पर पहुंची, तो वहां मेनगेट पर ताला लगा मिला. पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि 12 अक्तूबर, 2020 को कुछ लोग कार से अवधेश के मकान में आए थे. तब से उन्हें नहीं देखा. अन्नपूर्णा का दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा. वह वहां से स्थानीय थाना इज्जतनगर पहुंच गईं और थाने के इंसपेक्टर के.के. वर्मा को पूरी बात बताई. यह भी बताया कि अवधेश को अपने ससुरालीजनों से खतरा था. यह बात अवधेश ने 12 अक्तूबर को फोन पर बात करते समय मां को बताई थी.

उस की पत्नी विनीता भी अपने बच्चे के साथ गायब थी. इस पर अन्नपूर्णा से लिखित तहरीर ले कर इंसपेक्टर वर्मा ने थाने में अवधेश सिंह जादौन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. फिरोजाबाद के फरिहा में 4/5 दिसंबर, 2019 की रात एक ज्वैलर्स की दुकान में हुई चोरी के मामले में पुलिस के एसओजी प्रभारी कुलदीप सिंह ने नारखी थाना क्षेत्र के धौकल गांव निवासी हिस्ट्रीशीटर शेर सिंह उर्फ चीकू को पकड़ा. 25 अक्तूबर, 2020 की शाम शेर सिंह को उठा कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बरेली के हिंदी प्रवक्ता अवधेश सिंह की हत्या करना स्वीकार किया. अवधेश की पत्नी विनीता ने अवधेश की हत्या के लिए उसे 5 लाख की सुपारी दी थी.

इस में विनीता के पिता थाना नारखी के खेरिया खुर्द गांव निवासी रिटायर्ड फौजी अनिल जादौन, भाई प्रदीप जादौन, बहन ज्योति, विनीता का आगरा निवासी प्रेमी अंकित और शेर सिंह के 2 साथी भोला और एटा निवासी पप्पू जाटव शामिल थे. हत्या में कुल 8 लोग इस शामिल थे. शेर सिंह ने बताया कि बरेली में हत्या करने के बाद लाश को सभी लोग फिरोजाबाद ले कर आए और यहां नारखी में रामदास नाम के व्यक्ति के खेत में गड्ढा खोद कर दफना दिया था. अवधेश मिला पर जीवित नहीं इस खुलासे के बाद फिरोजाबाद पुलिस ने बरेली की इज्जतनगर पुलिस को सूचना दी.

अवधेश की मां अन्नपूर्णा को बुला कर 26 अक्तूबर, 2020 को फिरोजाबाद पुलिस ने तहसीलदार की उपस्थिति में उस खेत में बताई गई जगह पर खुदाई करवाई तो वहां से अवधेश की लाश मिल गई. चेहरा बुरी तरह जला हुआ था. शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अवधेश की लाश मिलने के बाद उसी दिन इज्जतनगर थाने में विनीता, ज्योति, अनिल जादौन, प्रदीप जादौन, अंकित, शेर सिंह उर्फ चीकू, भोला सिंह और पप्पू जाटव के विरुद्ध भादंवि की धारा 147/302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के बाद हत्याभियुक्तों की तलाश में ताबड़तोड़ दबिश दी गई, लेकिन सभी अपने घरों से लापता थे.

उन सब के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए गए. सभी के मोबाइल बंद थे. बीच में किसी से बात करने के लिए कुछ देर के लिए खुलते तो फिर बंद हो जाते. उन की लोकेशन जिस शहर की पता चलती, वहां पुलिस टीम भेज दी जाती. लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही हत्यारे वहां से निकल जाते थे. 31 अक्तूबर, 2020 को एक हत्यारोपी पप्पू जाटव उर्फ अखंड प्रताप को इंसपेक्टर के.के. वर्मा ने गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी बयान में वहीं कहा, जो शेर सिंह ने कहा था. इस बीच 5 नवंबर को इज्जतनगर पुलिस ने सभी आरोपियों के गैरजमानती वारंट हासिल कर लिए.

अगले ही दिन इस से डर कर अवधेश की पत्नी विनीता ने अपने वकील के माध्यम से थाने में आत्मसमर्पण कर दिया. पूछताछ में वह अपने मृतक पति अवधेश को ही गलत साबित करने पर तुल गई. जबकि उस की सारी हकीकत सब के सामने आ गई. जब उस से क्रौस क्वेशचनिंग की गई. कई सवालों पर वह चुप्पी साध गई. अनिल जादौन परिवार के साथ फिरोजाबाद के गांव खेरिया खुर्द में रहते थे. वह सेना से रिटायर थे. परिवार में पत्नी रेखा और 3 बेटियां विनीता, नीतू और ज्योति व एक बेटा प्रदीप था. अनिल के पास पर्याप्त कृषियोग्य भूमि थी. तीनों बेटियां काफी खूबसूरत थीं और सभी ने स्नातक तक पढ़ाई पूरी कर ली थी.

2010 में नीतू का अफेयर गांव के ही पूर्व प्रधान के बेटे के साथ हो गया. जिस पर काफी बवाल हुआ. इस पर अनिल ने जल्द से जल्द अपनी बेटियों का विवाह करने का फैसला कर लिया. नारखी थाना क्षेत्र के ही गांव भीतरी में बाबू सिंह का परिवार रहता था. परिवार में पत्नी अन्नपूर्णा और 2 बेटे रमेश और अवधेश थे. रमेश का विवाह हो चुका था और वह परिवार के साथ जयपुर में रह कर नौकरी कर रहा था. अविवाहित अवधेश हिंदी प्रवक्ता के पद पर नौकरी कर रहा था. नौकरी के चक्कर में उस की उम्र अधिक हो गई थी. अवधेश विनीता से 12 साल बड़ा था. फिर भी अनिल विनीता की शादी उस से करने को तैयार हो गए.

अनिल ने विनीता से बात की तो वह मना करने लगी कि 12 साल बड़े लड़के से शादी नहीं करेगी. अनिल ने जब समझाया कि वह सरकारी नौकरी में है, उस के पास पैसों की कमी नहीं है तो वह शादी के लिए तैयार हो गई. 2011 में अवधेश का विनीता से विवाह हो गया. उसी दिन ज्योति का भी विवाह हुआ. विनीता मायके से ससुराल आ गई. विनीता पढ़ीलिखी आजाद खयालों वाली युवती थी. जबकि अवधेश सीधेसादे सरल स्वभाव का था. दोनों एक बंधन में तो बंध गए थे लेकिन उन के विचार, उन की सोच बिलकुल एकदूसरे से अलग थी.

पति सीधा था पत्नी मौडर्न विनीता को ठाठबाट से रहना पसंद था. जबकि अवधेश को साधारण तरीके से जीवन जीना अच्छा लगता था. दोनों की सोच और खयाल एक नहीं थे तो उन में आए दिन मनमुटाव और विवाद होने लगा. विनीता की अपनी सास अन्नपूर्णा से भी नहीं बनती थी. अवधेश अपनी मां की बात मानता था. विनीता इस बात को ले कर भी चिढ़ती थी. दोनों के बीच विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहे थे. 6 साल पहले विनीता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने अंश रखा. ढाई वर्ष पहले बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र के कर्मचारी नगर की निर्मल रेजीडेंसी में अवधेश ने अपना निजी मकान ले लिया. पहले वह मकान विनीता के नाम लेना चाहता था. लेकिन उस की बातें और हरकतों से उस का मन बदल गया.

वह विनीता व बेटे के साथ अपने नए मकान में आ कर रहने लगा. बढ़ते आपसी विवादों में विनीता अवधेश से नफरत करने लगी थी. उस ने शादी से पहले सोचा था कि अवधेश उस के कहे में चलेगा, उस की अंगुलियों के इशारे पर नाचेगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. पैसों के लिए उसे अवधेश का मुंह देखना पड़ता था. अवधेश अपनी सैलरी से विनीता को उस के खर्च के लिए 3 हजार रुपए महीने देता था. उस में विनीता का गुजारा नहीं होता था. अपने खर्चे को देखते हुए विनीता ने घर में ही ‘रिलैक्स जोन’ नाम से एक ब्यूटीपार्लर खोल लिया. विनीता अपनी छोटी बहन ज्योति की ससुराल जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात सिपाही अंकित यादव से हो गई. अंकित यादव बिजनौर का रहने वाला था.

उस समय उस की पोस्टिंग मैनपुरी में थी. अंकित अविवाहित था और काफी स्मार्ट था. विनीता से उस की बात हुई तो वह उस के रूपजाल में उलझ कर रह गया. फिर दोनों मोबाइल पर बातें करने लगे. एक दिन अंकित विनीता से मिलने बरेली आया. दोनों एक होटल में मिले. उस दिन से दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए. विनीता से मिलने वह अकसर बरेली आने लगा. विनीता का भाई प्रदीप एक मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करता था. उस ने विनीता से कहा कि वह मल्टीलेवल मार्केटिंग से जुड़ी कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ जाए. इस में कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का मौका मिलता है.

चेन मार्केटिंग कंपनियां कंपनी से जुड़ने वाले लोगों को बड़ेबडे़ सपने दिखाती हैं. विनीता ने भी कंपनी से जुड़ने का फैसला कर लिया. वह कई मीटिंग में गई और मीटिंग में जाने के बाद उस पर चेन मार्केटिंग के जरिए जल्द से जल्द पैसा कमा कर रईस बनने का नशा सवार हो गया. इस के लिए उस ने इसी साल की शुरुआत में कंपनी जौइन कर ली. इस के लिए विनीता ने किसी बड़ी महिला अधिकारी की तरह अपनी वेशभूषा बनाई. शानदार सूटबूट में चश्मा लगा कर जब वह इंग्लिश में बड़े विश्वास के साथ अपनी बात किसी भी व्यक्ति के सामने रखती तो वह उस का मुरीद हो जाता और उस के कहने पर कंपनी जौइन कर लेता.

भाई प्रदीप की लाल टीयूवी कार विनीता अपने पास रखने लगी. वह इसी कार से लोगों से मिलने जाती थी. लग्जरी कार से सूटेडबूटेड महिला को उतरता देख कर लोगों पर इस का काफी गहरा प्रभाव पड़ता. घर की चारदीवारी से विनीता बाहर निकली तो उस ने अपने लिए पैसों का इंतजाम करना शुरू कर दिया. अब लोग विनीता से मिलने घर पर भी आने लगे. विनीता की चल पड़ी दुकान अवधेश तो दिन में कालेज में होता था और शाम को ही लौटता था. उसे पड़ोसियों से पता चलता तो अवधेश और विनीता में विवाद होता. विनीता पहले जब अवधेश से नहीं डरीदबी तो अब तो वह खुद का काम कर रही थी. ऐसे में अवधेश को ही शांत होना पड़ता था.

दोनों  के बीच की दूरियां गहरी खाई में तब्दील होती जा रही थीं. दूसरी ओर विनीता की बहन ज्योति का अपनी ससुरालवालों से मनमुटाव हो गया था. वह काफी समय से मायके में रह रही थी. विनीता ने उसे अपने पास रहने के लिए बुला लिया. इस से भी अवधेश खफा था. लौकडाउन के दौरान फेसबुक पर विनीता की दोस्ती अमित सिसोदिया उर्फ अंकित से हुई. अमित आगरा का रहने वाला था और वेस्टीज कंपनी से ही जुड़ा था, जिस से विनीता जुड़ी थी. अमित विवाहित था और एक बेटे का पिता भी था. दोनों की फेसबुक पर बातें हुईं तो पता चला कि अमित विनीता के भाई प्रदीप का दोस्त है.

इस के बाद दोनों खुल कर बातें करने लगे और मिलने भी लगे. दोनों अलगअलग शहरों में होने वाले कंपनी के सेमिनार में भी साथ जाने लगे. अमित और विनीता की सोच और विचार काफी मिलते थे. एक साथ रहने के दौरान विनीता को यह बात महसूस हो गई थी. दोनों ही जिंदगी में खूब पैसा कमाना चाहते थे. दोनों साथ बैठते तो कल्पनाओं की ऊंची उड़ान भरते. एक दिन अमित ने विनीता का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘विनीता, हम दोनों बिलकुल एक जैसे है. एक जैसा सोचते हैं, एक जैसा काम करते है और एक ही उद्देश्य है, एकदूसरे का साथ भी हमें भाता है. क्यों न हम हमेशा के लिए एक हो जाएं.’’

विनीता पहले हलके से मुसकराई, फिर गंभीर मुद्रा में बोली, ‘‘हां अमित, मैं भी ऐसा ही सोच रही थी. यह भी सोच रही थी कि तुम मेरी जिंदगी में पहले क्यों नहीं आए, आ जाते तो मुझे कष्टों से न गुजरना पड़ता.’’ कुछ पलों के लिए रुकी, फिर बोली, ‘‘खैर अब भी हम एक हो सकते हैं ठान लें तो.’’

विनीता की स्वीकृति मिलते ही अमित खुश हो गया, ‘‘तुम ने कह दिया तो अब हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता.’’ कह कर अमित ने विनीता को बांहों में भर लिया. विनीता भी उस से लिपट गई. अमित को पा कर जैसे विनीता ने राहत की सांस ली. उसे ऐसे ही युवक की तलाश थी जो उस के जैसा हो, उसे समझता हो और उस के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए. दूसरी ओर वह अंकित यादव से भी संबंध बनाए हुए थी. विनीता दिनरात एक कर के अपने मार्केटिंग के बिजनैस में सफल होना चाहती थी. इसलिए वह इस में लगी रही. कुछ महीनों में ही उस ने अपने अंडर में एक हजार लोगों की टीम खड़ी कर दी. कंपनी ने उसे कंपनी का ‘सिलवर डायरेक्टर’ घोषित कर दिया.

विनीता खुशी से फूली नहीं समाई. कंपनी ने उसे एक स्कूटी भी इनाम में दी. विनीता अपनी कंपनी के कार्यक्रमों और उस के रिकौर्डेड संदेशों को अपने फेसबुक अकाउंट पर डालती रहती थी. कंपनी से जुड़ने के लिए लोगों से अपील भी करती थी कि उस के पास बिजनैस करने का एक अनोखा आइडिया है, जिस में महीने में 5 से 50 हजार तक कमा सकते हैं. जो कमाना चाहते हैं, उस से मिलें. विनीता की जिंदगी में सब कुछ अब अच्छा ही अच्छा हो रहा था. बस खटकता था तो अवधेश. उस के साथ होने वाली कलह. अब विनीता अवधेश से छुटकारा पाने की सोचने लगी थी. उस की जिंदगी में अमित आ चुका था, वह उस के साथ जिंदगी बिताने का सपना देखने लगी थी. अमित भी उस से कई बार कह चुका था कि वह कहे तो अवधेश को ठिकाने लगा दिया जाए. वह ही मना कर देती थी.

अवधेश के मरने से उसे हमेशा के लिए छुटकारा तो मिलता ही साथ ही अवधेश का मकान और सरकारी नौकरी भी मिल जाती. यही सोच कर उस ने आगे की योजना बनानी शुरू कर दी. इस में उस ने अपने पिता व भाई से साफ कह दिया कि वह अवधेश के साथ नहीं रहना चाहती. उसे मारने से उसे मकान और उस की सरकारी नौकरी भी मिलेगी. विनीता के पिता अनिल ने एक बार कहा भी कि वह अपना बसा हुआ घर न उजाड़े, लेकिन विनीता नहीं मानी. विनीता की जिद और लालच के लिए वे सभी उस का साथ देने को तैयार हो गए. विनीता का एक मुंहबोला चाचा था शेर सिंह उर्फ चीकू. वह उस के पिता अनिल का खास दोस्त था. शेर सिंह नारखी थाने का हिस्ट्रीशीटर था, उस पर वर्तमान में 16 मुकदमे दर्ज थे.

विनीता ने शेर सिंह से कहा कि उसे उस के पति अवधेश की हत्या करनी है. शेर सिंह ने उस से 5 लाख रुपए का इंतजाम करने को कहा तो विनीता ने हामी भर दी. अवधेश ने कार खरीदने के लिए घर में रुपए ला कर रखे थे. सोचा था कि नवरात्र में बुकिंग करा देगा और धनतेरस पर गाड़ी खरीद लेगा. उन पैसों पर विनीता की नजर पड़ गई. उन रुपयों में से 70 हजार रुपए निकाल कर विनीता ने शेर सिंह को दे दिए, बाकी पैसा बाद में देने को कहा. इस के बाद शेर सिंह ने अपने गांव के ही भोला सिंह और एटा के पप्पू जाटव को हत्या में साथ देने के लिए तैयार कर लिया. शेर सिंह ने विनीता, विनीता के पिता अनिल, भाई प्रदीप और प्रेमी अमित सिसोदिया के साथ मिल कर अवधेश की हत्या की योजना बनाई. विनीता ने बाद में ज्योति को इस बारे में बता कर उसे भी अपने साथ शामिल कर लिया.

12 अक्तूबर, 2020 की रात अवधेश रोज की तरह टहलने के लिए निकले. उस के जाने के बाद विनीता ने हत्या के उद्देश्य से पहुंचे शेर सिंह, भोला, पप्पू जाटव, अनिल, प्रदीप और अमित को घर के अंदर बुला लिया. सभी घर में छिप कर बैठ गए. कर दी हत्या कुछ देर बाद जब अवधेश लौटे तो घर में घुसते ही सब ने मिल कर उसे दबोच लिया. विनीता अपने बेटे अंश को ले कर ऊपरी मंजिल पर चली गई. नीचे सभी ने अवधेश को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया. अवधेश के मरने के बाद विनीता नीचे उतर कर आई. अवधेश की लाश को बड़ी नफरत से देख कर गाली देते हुए उस में कस के पैर की ठोकर मार दी.

देर रात अमित ने लाश को सभी के सहयोग से अपनी आल्टो कार में डाल लिया. इस के बाद प्रदीप की टीयूवी कार जो विनीता के पास रहती थी, सब उस में सवार हो गए. प्रदीप कार चला रहा था. उस के पीछे थोड़ी दूरी पर अंकित चल रहा था. लगभग साढ़े 3 घंटे का सफर तय कर के अवधेश की लाश को ले कर वे फिरोजाबाद में नारखी पहुंचे. लेकिन तब तक उजाला हो चुका था. इसलिए लाश को कहीं दफना नहीं सकते थे. इन लोगों ने पूरा दिन ऐसे ही निकाला. इस बीच लाश को जलाने के लिए बाजार से तेजाब खरीद कर लाया गया.

अंधेरा होने पर नारखी में रामदास के खेत में गड्ढा खोद कर अवधेश की लाश को उस में डाल दिया गया. फिर लाश पर तेजाब डाल दिया गया, जिस से लाश का चेहरा व कई हिस्से जल गए. लाश को दफनाने के बाद सभी वहां से लौट आए. विनीता बराबर वीडियो काल के जरिए उन लोगों के संपर्क में थी. 14 अक्तूबर, 2020 को वह भी बेटे अंश को ले कर घर से भाग गई. शेर सिंह पकड़ा गया तो घटना का खुलासा हुआ. उस ने विनीता के प्रेमी अंकित का नाम लिया. घटना की खबर अखबारों की सुर्खियां बनीं तो विनीता के प्रेमी सिपाही अंकित यादव ने देखा. अंकित ने अपना नाम समझा. उसे लगा कि पुलिस को विनीता की काल डिटेल्स से उस के बारे में पता लग गया है. अब वह भी इस हत्याकांड की जांच में फंस जाएगा.

दूसरी ओर अंकित नाम आने पर विनीता के शातिर दिमाग ने खेल खेला. अपने प्रेमी अमित सिसोदिया को बचाने के लिए वह अंकित को ही फंसाने में लग गई. 26 अक्तूबर, 2020 को वह अंकित यादव से मिलने संभल गई. 2 महीने से अंकित संभल की हयातनगर चौकी पर तैनात था. वहां वह उस से मिली. कुछ सिपाहियों ने उसे उस के साथ देखा भी. विनीता उस से मिल कर चली गई. अंकित भयंकर तनाव में आ गया. 27 अक्तूबर, 2020 को उस ने अपने साथी सिपाही की राइफल ले कर उस से खुद को गोली मार ली. अंकित के आत्महत्या कर लेने की बात विनीता को पता चल गई थी. इसलिए जब उस ने आत्मसमर्पण किया तो वह सारा दोष अंकित यादव पर डालती रही.

वह अपने प्रेमी अमित सिसोदिया उर्फ अंकित को बचाना चाहती थी. समर्पण से पहले विनीता ने अपना मोबाइल भी तोड़ दिया था, ताकि पुलिस उस मोबाइल से कोई सुराग हासिल न कर सके. गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद से सभी आरोपियों में इस बात का खौफ है कि पुलिस उन की संपत्तियों को तोड़फोड़ सकती है, कुर्क कर सकती है. इसलिए बारीबारी से सभी आत्मसमर्पण करने की तैयारी में लग गए. फिलहाल कथा लिखे जाने तक पुलिस शेष आरोपियों की तलाश में जुटी हुई थी. शेर सिंह की रिमांड 20 नवंबर को मिलनी थी.द्य

—कथा पुलिस सूत्रों व मीडिया में छपी रिपोर्टों के आधा

Love Crime : प्रेमिका ने शादी का दबाव डाला तो प्रेमी ने दुपट्टे से घोंट दिया गला

Love Crime : आलोक की प्रेमिका राधा भले ही दूसरी जाति की थी, लेकिन उस ने उसे भरोसा दिया था कि वह जीवन भर उस का साथ निभाएगा. लेकिन अपने घर वालों के दबाव में उस ने राधा से दूरी बना ली. इस के बाद आलोक ने प्रेमिका के साथ ऐसा छल किया कि…

कानपुर (देहात) जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर रसूलाबाद- बिल्हौर मार्ग पर एक कस्बा है ककवन. इसी कस्बे से सटा एक गांव है नदीहा धामू. यहीं पर रामदयाल गौतम अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी कुसुमा के अलावा 2 बेटे सर्वेश, उमेश तथा 2 बेटियां राधा व सुधा थीं. रामदयाल गांव का संपन्न किसान था. उस का बेटा सर्वेश गांव में डेयरी चलाता था. संपन्न होने के कारण जातिबिरादरी में रामदयाल की हनक थी. रामदयाल की छोटी बेटी सुधा 10वीं कक्षा में पढ़ रही थी, जबकि बड़ी बेटी ने 12वीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी.

रामदयाल उसे पढ़ालिखा कर मास्टर बनाना चाहता था, लेकिन राधा के पढ़ाई छोड़ देने से उस का यह सपना पूरा नहीं हो सका. पढ़ाई छोड़ कर वह मां के साथ घरेलू काम में मदद करने लगी थी. गांव के हिसाब से राधा कुछ ज्यादा ही सुंदर थी. जवानी में कदम रखा तो उस की सुंदरता में और निखार आ गया. उस का गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें और कंधों तक लहराते बाल, हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेते थे. अपनी इस खूबसूरती पर राधा को भी नाज था. यही वजह थी कि जब कोई लड़का उसे चाहत भरी नजरों से देखता तो वह इस तरह घूरती मानो खा जाएगी. उस की इन खा जाने वाली नजरों से ही लड़के डर जाते थे.

लेकिन आलोक राजपूत राधा की इन नजरों से जरा भी नहीं डरा था. वह राधा के घर से कुछ ही दूरी पर रहता था. आलोक के पिता राजकुमार राजपूत प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे. लेकिन रिटायर हो चुके थे. उन की एक बेटी तथा एक बेटा आलोक था. बेटी का वह विवाह कर चुके थे. पिता के रिटायर हो जाने के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी आलोक पर आ गई थी. बीए करने के बाद वह नौकरी की तलाश में था. लेकिन जब नौकरी नहीं मिली तो उस ने अपनी खेती संभाल ली थी. इस के अलावा उस ने घर में किराने की दुकान भी खोल ली थी. इस से उसे अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी.

राधा के भाई सर्वेश की आलोक से खूब पटती थी. आसपड़ोस में रहने की वजह से दोनों का एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. आलोक जब भी सर्वेश के घर आता था, राधा उसे घर के कार्यों में लगी नजर आती थी. वैसे तो वह उसे बचपन से देखता आया था, लेकिन पहले वाली राधा में और अब की राधा में काफी फर्क आ गया था. पहले जहां वह बच्ची लगती थी, अब वही जवान होने पर ऐसी हो गई थी कि उस पर से नजर हटाने का मन ही नहीं होता था.

एक दिन आलोक राधा के घर पहुंचा तो सामने वही पड़ गई. उस ने पूछा, ‘‘सर्वेश कहां है?’’

‘‘मम्मी और भैया तो कस्बे में गए हैं. कोई काम था क्या?’’ राधा बोली.

‘‘नहीं, कोेई खास काम नहीं था. बस ऐसे ही आ गया था. सर्वेश आए तो बता देना कि मैं आया था.’’

‘‘बैठो, भैया आते ही होंगे.’’ राधा ने कहा तो आलोक वहीं पड़ी चारपाई पर बैठ गया.

आलोक बैठा तो राधा रसोई की ओर बढ़ी. उसे रसोई की ओर जाते देख आलोक ने कहा, ‘‘राधा, चाय बनाने की जरूरत नहीं है. मैं चाय पी कर आया हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं, मैं ने अपने लिए चाय भी चढ़ा रखी है. उसी में थोड़ा दूध और डाल देती हूं.’’ कह कर राधा रसोेई में चली गई.

थोड़ी देर बाद वह 2 गिलासों में चाय ले आई. एक गिलास उस ने आलोक को थमा दिया, तो दूसरा खुद ले कर बैठ गई. चाय पीते हुए आलोक ने कहा, ‘‘राधा, बुरा न मानो तो मैं एक बात कहूं.’’

‘‘कहो.’’ उत्सुक नजरों से देखते हुए राधा बोली.

‘‘अगर तुम जैसी खूबसूरत और ढंग से घर का काम करने वाली पत्नी मुझे मिल जाए तो मेरी किस्मत ही खुल जाए.’’ आलोक ने कहा.

आलोक की इस बात का जवाब देने के बजाय राधा उठी और रसोई में चली गई. उसे इस तरह जाते देख आलोक को लगा, वह उस से नाराज हो गई है, इसलिए उस ने कहा, ‘‘राधा लगता है मेरी बात तुम्हें बुरी लग गई. मेरी बात का कोई गलत अर्थ मत लगाना. मैं ने तो यूं ही कह दिया था.’’

इतना कह आलोक वहां से चला गया. लेकिन इस के बाद वह जब भी सर्वेश के घर जाता, मौका मिलने पर राधा से 2-4 बातें जरूर करता. उन की इस बातचीत पर घरवालों को कोई ऐतराज भी न था. क्योंकि मोहल्ले के नाते रिश्ते में दोनों भाईबहन लगते थे. गांवों में तो वैसे भी रिश्तों को काफी अहमियत दी जाती है. लेकिन आलोक और राधा रिश्तों की मर्यादा निभा नहीं पाए. मेलमुलाकात और बातचीत से आलोक के दिलोदिमाग पर राधा की खूबसूरती और बातव्यवहार का ऐसा असर हुआ कि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने के सपने देखने लगा. लेकिन अपने मन की बात वह राधा से कह नहीं पाता था.

वह सोचता था कि कहीं राधा बुरा मान गई और उस ने यह बात घर वालों से बता दी तो वह मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा. लेकिन यह उस का भ्रम था. राधा के मन में भी वही सब था, जो उस के मन में था. जब दोनों ओर ही चाहत के दीए जल रहे हों तो मौका मिलने पर उस का इजहार भी हो जाता है. ऐसा ही राधा और आलोक के साथ भी हुआ. फिर एक दिन उन्होंने अपने मन की बात जाहिर भी कर दी. दोनों के बीच प्यार का इजहार हो गया तो उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. आए दिन होने वाली मुलाकातों ने दोनों को जल्द ही करीब ला दिया. वे भूल गए कि उन का रिश्ता नाजुक है. आलोक राधा के प्यार के गाने गाने लगा. इस तरह दोनों मोहब्बत की नाव में सवार हो कर काफी आगे निकल गए.

राधा और आलोक के बीच नजदीकियां बढ़ीं तो मनों में शारीरिक सुख पाने की कामना भी पैदा होने लगी. इस के बाद मौका मिला तो दोनों सारी मर्यादाएं तोड़ कर एकदूसरे की बांहों में समा गए. इस के बाद तो उन्हें जब भी मौका मिलता, अपनी हसरतें पूरी कर लेते. इस का नतीजा यह निकला कि कुछ दिनों बाद ही दोनों गांव वालों की नजरों में आ गए. उन के प्यार के चर्चे पूरे गांव में होने लगे. उड़तेउड़ते यह खबर राधा के पिता रामदयाल के कानों में पड़ी तो सुन कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे एकाएक विश्वास नहीं हुआ कि आलोक उस की इज्जत पर हाथ डाल सकता है. वह तो उसे अपने बेटों की तरह मानता था.

यह सब जान कर उस ने राधा पर तो पाबंदी लगा ही दी, साथ ही आलोक से भी कह दिया कि वह उस के घर न आया करे. बात इज्जत की थी, इसलिए राधा के भाई सर्वेश को दोस्त की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. उस ने आलोक को समझाया ही नहीं, धमकी भी दी कि अगर उस ने अब उस की बहन पर नजर डाली तो वह भूल जाएगा कि वह उस का दोस्त है. इज्जत के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है. इस के बाद उस ने राधा की पिटाई भी की और उसे समझाया कि उस की वजह से गांव में सिर उठा कर चलना दूभर हो गया है. वह ठीक से रहे अन्यथा अनर्थ हो जाएगा.

रामदयाल जानता था कि बात बढ़ाने पर उसी की बदनामी होगी, इसलिए बात बढ़ाने के बजाय वह पत्नी व बेटों से सलाह कर के राधा के लिए लड़के की तलाश करने लगा. इस बात की जानकारी राधा को हुई तो वह बेचैन हो उठी. एक शाम वह मौका निकाल कर आलोक से मिली और रोते हुए बोली, ‘‘घर वाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं. जबकि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘इस में रोने की क्या बात है? हमारा प्यार सच्चा है, इसलिए दुनिया की कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’ राधा को रोते देख आलोक भावुक हो उठा. वह राधा के आंसू पोंछ उस का चेहरा हथेलियों में ले कर उसे विश्वास दिलाते हुए बोला, ‘‘तुम मुझ पर भरोसा करो, मैं तुम्हारे साथ हूं. मेरे रोमरोम में तुम्हारा प्यार रचा बसा है. तुम्हें क्या लगता है कि तुम से अलग हो कर मैं जी पाऊंगा, बिलकुल नहीं.’’

उस की आंखों में आंखें डाल कर राधा बोली, ‘‘मुझे पता है कि हमारा प्यार सच्चा है, तुम दगा नहीं दोगे. फिर भी न जाने क्यों मेरा दिल घबरा रहा है. अच्छा, अब मैं चलती हूं. कोई खोजते हुए कहीं आ न जाए.’’

‘‘ठीक है, मैं कोई योजना बना कर तुम्हें बताता हूं.’’ कह कर आलोक अपने घर की तरफ चल पड़ा तो मुसकराती हुई राधा भी अपने घर चली गई.

रामदयाल राधा के लिए लड़का ढूंढढूंढ कर थक गया, लेकिन कहीं उपयुक्त लड़का नहीं मिला. इस से राधा के घर वाले परेशान थे, वहीं राधा और आलोक खुश थे. इस बीच घर वाले थोड़ा लापरवाह हो गए तो वे फिर से चोरीछिपे मिलने लगे थे. एक दिन सर्वेश ने खेतों पर राधा और आलोक को हंसीमजाक करते देख लिया तो उस ने राधा की ही नहीं, आलोक की भी पिटाई की. इसी के साथ धमकी भी दी कि अगर फिर कभी उस ने दोनों को इस तरह देख लिया तो अंजाम अच्छा न होगा.

सर्वेश ने आलोक की शिकायत उस के घर वालों से की तो घर वालों ने उसे भरोसा दिया कि वे आलोक को समझाएंगे. इस के बाद सर्वेश घर आ गया. इधर शाम को आलोक घर पहुंचा तो पिता राजकुमार ने टोका, ‘‘सर्वेश उलाहना देने आया था. तुम्हारी शिकायत कर रहा था कि तुम उस की बहन के पीछे पड़े हो. सच्चाई क्या है?’’

‘‘पिताजी, मैं और राधा एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग फिर गया है क्या? जो उस लड़की से शादी करना चाहते हो. क्या तुम्हें मालूम नहीं कि राधा दूसरी जाति की है और हम राजपूत हैं. यदि तुम ने उस से ब्याह रचाया तो समाज में हम मुंह दिखाने लायक नहीं बचेंगे. बिरादरी के लोग हमारा हुक्कापानी बंद कर देंगे. इसलिए कान खोल कर सुन लो, उस लड़की से तुम्हारा रिश्ता हरगिज नहीं हो सकता. भूल जाओ उसे.’’ राजकुमार ने कहा. पिता की फटकार और स्पष्ट चेतावनी से आलोक परेशान हो उठा. उस का एक दोस्त छोटू उर्फ नीलू था. उस ने इस बारे में छोटू से बात की तो उस ने उस के पिता की बात को जायज ठहराया और राधा से संबंध तोड़ लेने का सुझाव दिया.

आलोक ने अपनी मां का दिल टटोला तो उस ने भी साफ कह दिया कि जिस दिन राधा की डोली उस के घर आएगी, उसी दिन उस की अर्थी उठेगी. मां की इस धमकी से आलोक कांप उठा. उस पर सवार राधा के प्यार का भूत उतरने लगा. मातापिता और दोस्त की नसीहत उसे भली लगने लगी. अत: उस ने निश्चय किया कि वह राधा से दूरी बनाएगा और प्यारमोहब्बत की बात नहीं करेगा. अब उस ने राधा से ब्याह रचाने की बात दिमाग से निकाल दी. इस के बाद जब कभी आलोक का सामना राधा से होता, तो वह उस से बेमन से मिलता. बेरुखी से बात करता. न होंठों पर मुसकराहट, न चेहरे पर दमक होती. राधा नजदीकियां बढ़ाने की पहल करती, तो वह मना कर देता.

फोन पर भी उस ने बात करना एक तरह से बंद ही कर दिया था. राधा दस बार फोन करती तो वह मुश्किल से एक बार रिसीव करता, उस पर भी ज्यादा बात न करता और फोन कट कर देता. आलोक के इस रूखे व्यवहार से राधा परेशान हो उठी. उसे शक होने लगा कि आलोक किसी दूसरी लड़की के चक्कर में तो नहीं पड़ गया. अत: वह आलोक पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. वह जब भी मिलती या फोन पर बात करती तो शादी की ही बात करती. इधर कुछ समय से राधा आलोक को धमकाने भी लगी थी कि यदि उस ने शादी नहीं की तो वह पुलिस में उस की शिकायत कर देगी, तब उसे जेल भी हो सकती है.

24 अगस्त, 2020 की शाम 4 बजे राधा घर से गायब हो गई. वह देर शाम तक घर वापस नहीं लौटी तो रामदयाल को चिंता हुई. उस ने अपने बेटे सर्वेश व उमेश को साथ लिया और रात भर उस की खोज करता रहा. लेकिन राधा का कुछ भी पता न चला. रामदयाल को शक हुआ कि कहीं आलोक उसे भगा तो नहीं ले गया. वह आलोक के घर पहुंचा, तो आलोक घर पर ही मिला. 26 अगस्त की सुबह गांव का ही किसान विमल अपने खेत पर पानी लगाने पहुंचा तो उस ने अपने खेत की मेड़ के पास पीपल के पेड़ के नीचे राधा का शव देखा. उस ने खबर राधा के घर वालों को दी. उस के बाद तो रामदयाल के घर में रोनापीटना शुरू हो गया.

घर के सभी लोग घटनास्थल पहुंच गए. लाश मिलते ही आलोक का परिवार घर से गुपचुप तरीके से फरार हो गया. रामदयाल गौतम ने थाना ककवन पुलिस को सूचना दी तो थानाप्रभारी अमित कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन की सूचना पर एसपी केशव कुमार चौधरी तथा एएसपी अनूप कुमार आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के गले में दुपट्टा था. इस से अंदाजा लगाया गया कि राधा की हत्या दुपट्टे से गला घोंट कर की गई होगी. उस की उम्र 19 वर्ष के आसपास थी.

घटनास्थल पर मृतका का पिता रामदयाल तथा भाई सर्वेश मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों से पूछताछ की तो सर्वेश ने उन्हें बताया कि उस की बहन की हत्या गांव के आलोक व उस के दोस्त छोटू ने की है. पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने राधा के शव को पोेस्टमार्टम हेतु माती स्थित अस्पताल भिजवा दिया तथा थानाप्रभारी अमित मिश्रा को आदेश दिया कि वह मुकदमा दर्ज कर आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार करें. आदेश पाते ही अमित कुमार मिश्रा ने मृतका के भाई सर्वेश की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201 के तहत आलोक व छोटू के खिलाफ रिपोेर्ट दर्ज कर ली और उन्हें गिरफ्तार करने में जुट गए. इस के लिए उन्होंने मुखबिरों को भी लगा दिया.

29 अगस्त, 2020 की रात 10 बजे अमित कुमार मिश्रा ने मुखबिर की सूचना पर आलोक व छोटू को ककवन मोड़ से गिरफ्तार कर लिया. उन्हें थाना ककवन लाया गया. थाने पर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने राधा की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ में आलोक ने बताया कि राधा उस पर शादी का दबाव बना रही थी, जबकि वह राधा से शादी नहीं करना चाहता था. उस ने जब पुलिस में शिकायत दर्ज करने की धमकी दी, तो उस ने राधा को ही मिटाने की योजना बनाई. इस में उस ने अपने दोस्त छोटू को शामिल कर लिया. योजना के तहत उस ने 24 अगस्त की शाम 4 बजे राधा को खेतों पर बुलाया फिर उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

30 सितंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त आलोक राजपूतछोटू को कानपुर देहात की माती कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan Crime News : शादी से पहले बैंक मैनेजर ने बैंक में कराई 1 करोड़ 13 लाख की डकैती

Rajasthan Crime News : बैंक मैनेजर सुशील कुमार की 10 नवंबर को शादी होनी थी. कार उस ने खरीद  ली थी. लोन ले कर आलीशान मकान भी बनवा लिया था. वह शानोशौकत से शादी करना चाहता था. इस के लिए उस ने अपने ममेरे भाई नितेश, उस के 2 दोस्तों सतपाल व सुखविंद्र के साथ मिल कर साजिश रची और अपने ही बैंक में 1 करोड़ 13 लाख की डकैती करा दी, लेकिन…

‘हैं डसअप’. मुख्य गेट का शटर डाल कर अंदर घुसे तीनों युवकों ने बैंक भवन के अंदर मेज पर रखी रखी फाइलों में उलझे बैंक प्रबंधक सुशील कुमार व केशिय परमपाल सिंह को हथियारों की नोक पर लेते हुए कर्कश आवाज में कहा था. आगंतुकों के चेहरे के हावभाव व आंखों से उगलती आग दर्शा रही थी कि विरोध करने पर वे किसी भी हद तक जा सकते थे. अचानक आई आफत को देख दोनों बैंककर्मियों की घिग्घी बंध गई. हाथों में हथियार व 2 युवकों के कंधे पर लटकते पिट्ठू बैग देख उन को आभास हो गया था कि वे लोग बैंक लूटने आए हैं. दो पगड़ीधारी युवकों के हाथों में पिस्टल व तीसरे के हाथ में लंबे फल वाला का चाकू था.

दोनों बैंककर्मियों ने कोई प्रतिरोध न कर के आत्मसमर्पण कर दिया. तीनों लुटेरे केशियर व बैंक मैंनेजर को धकिया कर बैंक के स्ट्रांग रूम में ले गए. वहां तीनों ने तिजोरी में रखी 2 हजार, 5 सौ व एक सौ रुपयों की गड्डियां दोनों बैगों में ठूंसठूंस कर भर ली. दोनों बैंक अफसरों के मोबाइल पहले ही छीन लिए गए थे. मैनेजर व कैशियर को स्ट्रांगरूम में बंद कर ताला लगा दिया गया. एक लुटेरे ने मैनेजर की मेज पर रखी कार की चाबी उठा ली थी. स्ट्रांग रूप की चाबी लुटेरों ने स्ट्रांग रूम के सामने ही फेंक दी. नकदी भरे बैग उठाए तीनों युवक फुर्ती से बाहर निकल गए. जाते समय मुख्य गेट का शटर बंद कर तीनों लुटेरे बैंक मैनेजर की बाहर खड़ी गाड़ी आई10 नंबर आरजे 13 सीसी 1283 में भाग निकले.

आधा घंटा बाद स्ट्रौगरूम में बंद मैनेजर व कैशियर कुछ सहज हुए. दोनों ने मिल कर स्ट्रौंगरूम में लगी प्लास्टिक की एक पाइप को उखाड़ा और जैसेतैसे स्ट्रांगरूम से बाहर निकले. लूट की इस बड़ी बारदात को महज 7 मिनट में अंजाम दे दिया गया था. बैंक गार्ड आधा घंटा पहले ही छुट्टी कर घर चला गया था. लूट की यह सनसनीखेज घटना 17 सितंबर, 2020 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की प्रमुख मंडी संगरिया की धान मंडी स्थित एक्सिस बैंक शाख में रात तकरीबन 8 बजे हुई थी. बैंक प्रबंधन की सूचना मिलते ही संगरिया थाना के टीआई इंद्र कुमार ने मौकामुआयना कर अविलंब उच्च अधिकारियों को सूचना प्रेषित कर दी.

बैंक मैनेजर ने हथियारों की नोक पर एक करोड़ 13 लाख रुपए लूट ले जाने के आरोप में 3 अज्ञात लोगों के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज कर दिया. पुलिस ने मुकदमा आईपीसी 292 व 34 के तहत दर्ज कर लिया. संयोग से सवा करोड़ की लूट की यह वारदात संभवत: मंडी सांगरिया की पहली घटना थी. सूचना मिलते ही बीकानेर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक प्रफुल्ल कुमार जिला पुलिस अधीक्षक राशि डोगरा सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने घटना स्थल पर पहुंच कर स्थिति का जायजा लिया. पुलिस अधिकारियों को बताया गया कि कई दिनों से बैंक में लगे सीसीटीवी कैमरा सिस्टम गड़बड़ था. पुलिस जांच में यह तथ्य भले ही परेशानी साबित हो सकता था पर एसपी राशि डोगरा ने कैमरों के गड़बड़झाले को जांच में एक अहम क्लू माना. आईजी प्रफुल्ल कुमार ने इस लूट प्रकरण को जल्दी से ट्रेस आउट करने का आदेश दे दिया.

एसपी राशि डोगरा ने एकएक बिंदु को देखा, परखा जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर दूर घटित बैंक लूट की इस घटना को युवा आईपीएस राशि डोगरा ने एक चैलेंज के रूप में लिया. एसपी डोगरा ने एएसपी जस्साराम बोस और स्वयं के सुपरविजन में जिला क्षेत्र के सीओ दिनेश एजोश, सीओ प्रशांत कौशिक, सीओ नारायण सिंह, सर्किल इंस्पेक्टर इंद्रकुमार, एसआई फूल सिंह और राजाराम व सुरेश के नेतृत्व में दर्जनभर हैड कांस्टेबलों को लगाया. इस के तहत 8 टीमों का गठन कर जांच में लगा दिया गया. साइबर व सीसीटीवी कैमरा एक्सपर्ट भी लगाए गए.

अपराधी कितना भी शातिर हो, अनजाने में कोई न कोई भूल कर घटनास्थल पर कोई न कोई क्लू जरूर छोड़ जाता है. इसी तथ्य को स्वीकारकर राशि डोगरा ने अपने अनुभव इस वारदात को खोलने में लगा दिए. शुरुआती जांच व बैंक के नजदीक स्थित दुकानों पर लगे कैमरों से यह साबित हो गया था कि जाते समय लुटेरे मैनेजर की कार में भागे थे. लेकिन आते समय बैंक तक पैदल ही आए थे. पुलिस की आठो टीम पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश सहित हनुमानगढ़ व श्री गंगानगर जिला क्षेत्र में उतर गई थीं. 15 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली थे. एक दुकान के बाहर लगे कैमरों में तीनों लुटेरों की कदकाठी नजर आ रही थी पर पगड़ी के पल्लु व कैप लगी होने के कारण तीनों में से एक का भी चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था.

सीसीटीवी कैमरा एक्सपर्ट ने जांच कर खुलासा कर दिया था कि बैंक के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरों में हाल ही में छेड़छाड़ की गई थी. जांचपड़ताल में मिल रहे मामूली क्लू बैंक प्रबंधन के खिलाफ जा रहे थे. पर पुख्ता साक्ष्य के अभाव में पुलिस प्रमुख राशि डोगरा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थीं. बड़ी रकम का मामला था. अन्य प्रदेशों व स्थलों पर गई टीमों के भी हाथ खाली थे. बैंक मैनेजर सुशील व कैशियर परमपाल सिंह से अलगअलग व संयुक्त रूप से कई दौर में पूछताछ की गई पर नतीजा शून्य रहा. दूसरे दिन मैनेजर सुशील की कार संगरिया से 30 किलोमीटर दूर हरियाणा के डबवाली शहर में लावारिस हालात में मिल गई.

पूछताछ में पता चला कि 2 दिन पहले कार की जगह एक मोटर साइकिल कई घंटे खड़ी रही थी. राशि डोगरा की नजर में बैंक मैनेजर सुशील कुमार चढ़ चुका था. उन्होंने सुशील की जन्म कुंडली खंगालना शुरू कर दी. उन्हें बताया गया कि सुशील को कुछ अरसा पहले ही बैंक परीक्षा पास करने पर मैनेजर की नौकरी मिली थी. इसी 10 नवंबर को सुशील की शादी होनी थी. उन का रिहायशी आलीशान बंगला बिना कर्ज लिए बनना मुश्किल था. सुशील की ननिहाल पंजाब के जनखुआ (राजपुरा) में है. एसपी डोगरा ने संगरिया के तेजतर्रार सर्किल इंस्पेक्टर इंद्रकुमार को टीम के साथ जनसुआ भेज दिया. हाईकमान के आदेशानुसार 4 सदस्यीय टीम ने यूनिफार्म की जगह ग्रामीणों के वेश धर लिए.

खुद इंद्रकुमार ने शरीर पर सफेद कुरता और व लुंगी पहना. पैरों में चमड़े की जूती व सिर पर चैकदार साफा. सीआई ने टीम के साथ सुशील के ननिहाल में रैकी शुरू कर दी थी. वहीं 3 अन्य पुलिसकर्मी शराब ठेकों व बाजार की रैकी में लग गए थे. इस पुलिस टीम का टारगेट था एक्सिस बैंक संगरिया के नजदीक सीसीटीवी कैमरों में दर्ज हुए लुटेरों की चालढाल व कदकाठी वाले युवकों की तलाशना. टीम ने 2 लोगों की कदकाठी व चाल को पहचान लिया. एक तो सुशील के नाना के घर आजा रहा था. दूसरे को शराब ठेके पर शराब की महंगी बोतल खरीदते समय पहचाना गया. सीओ इंद्रकुमार ने डेली रिपोर्ट के रूप में इस प्रोगेस को एसपी राशि डोगरा से साझा किया. एसपी के आदेश पर इंद्रकुमार की टीम संगरिया लौट आई.

टीम की मेहनत रंग लाई इंद्रकुमार की टीम ने दोनों संदिग्धों के चोरीछिपे विडियो मोबाइल कैमरे में कैद कर लिए थे. कैमरों व वीडियो में कैद फोटोज लुटेरों से मिल रहे थे. शक की गुंजाइश नहीं थी. बैंक मैनेजर वारदात के बाद से लगातार ड्यूटी पर आ रहा था. 21 अक्तूबर को पुलिस ने अपराधियों को एक साथ उठाने का निर्णय लिया. सब से पहले जांच अधिकारी इंद्रकुमार ने मैनेजर सुशील को पूछताछ के बहाने पुलिस थाने बुलाया. एक मुस्तैद सिपाही जो डंडा लिए था की तरफ इशारा करते हुए सीओ ने कहा, ‘मैनेजर साहब, आप  बिना लागलपेटे सारा कुछ सचसच उगल दो. वरना इन डंडे वालों को संभालना मुश्किल हो जाएगा.’’

‘‘सर, मैं सब कुछ सचसच बता दूंगा,’’ सुशील ने कहा.

बिना लागलपेट सुशील कुमार ने बयां किया, ‘‘बैंक परीक्षा पास करने के बाद मुझे बैंक में नौकरी मिल गई थी. मैं ने कर्जा उठा कर भव्य मकान बनवा लिया. अब 10 नवंबर को मेरी शादी होनी थी. शानोशौकत की चाह भावी दांपत्य जीवन को मनमोहक बना देती है. इसी इच्छा के चलते बैंक की तिजौरी में रखी नोटों की गड्डियों ने मेरा इमान डोला दिया. मैं ने अपने ममेरे भाई नितेश को बुला कर उस से गुफ्तगू की. मेरी रजामंदी के चलते नितेश ने अपने 2 दोस्तों सतपाल व सुखविंद्र को शामिल कर लिया. कुछ दिन पहले नितेश अपने दोस्तों के साथ बैंक आया था. तीनों ने गहनता से बैंक भवन व आसपास का जायाजा लिया था.

वारदात के दिन तीनों दोस्त मोटरसाइकिल से डबवाली पहुंचे. डबवाली के बाजार से एक काली व एक रंगीन पगड़ी खरीदी गई. पिट्ठू बैग भी यहीं से खरीदे गए थे. दो जनों ने पगड़ी इसलिए बांधी कि पुलिस भ्रमित हो जाए. मोटरसाइकिल डबवाली में रोड़ पर खड़ी कर तीनों बस से 6 बजे शाम संगरिया पहुंच गए थे. निर्धारित प्रोग्राम के मुताबिक गार्ड को छुट्टी दे दी गई थी. बैंक में लगे कैमरे कई दिन पहले ही डिस्टर्ब कर दिए थे. दोनों बैंककर्मियों को स्टं्रागरूम में बंद कर चाबी वहीं डाल दी गई थी ताकि स्ट्रांगरूम का दरवाजा तोड़ने की नौबत न आ जाए. मैनेजर की कार प्लानिंग के अनुसार ली गई थी. तीनों सहयोगियों की पहचान भी सुशील ने जाहिर कर दी थी.

सुशील के बताए अनुसार तीनों लोग उसी दिन नकदी के साथ कुल्लू-मनाली पहुंच गए. तीनों ने वहां महंगे होटलों व शराबखोरी में दोतीन दिनों में 3 लाख रुपए उड़ा दिए. पुलिस सांगरिया में साजिशकर्ता सुशील निवासी भूना जिला फतेहाबाद से पूछताछ कर रही थी. वहीं 2 टीमें जनसुआ तहसील राजपुरा में अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी में जुटी थीं. जनसुआ से पुलिस ने सुशील के ममेरे भाई नितेश जो 8वीं तक पढ़ा और अविवाहित है, अंबाला का सुखविंद्र एमए तक शिक्षित व 2 बेटों का पिता है. सतपाल 5वीं तक पढ़ा था, वह जनसुआ में हैयर ड्रैसिंग का काम करता था, गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चारों से अलगअलग व आमनेसामने बिठा कर पूछताछ शुरू की.

पर चारों रिकवरी के बिंदु पर पुलिस को गच्चा देते रहे. जांच अधिकारी इंद्रकुमार ने चारों आरोपियों को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर ले लिया. दोबारा पूछताछ में चारों ने अपने घरों में छिपा कर रखी एक करोड़ 5 लाख रुपयों की बरामदगी करवा दी थी. अदालत में दोबारा पेश करने पर अदालत ने तीनों को जेल भिजवा दिया. मुख्य साजिशकर्ता सुशील को पुलिस ने रिकवरी के लिए दोबारा 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया था. इस अवधि में सुशील ने अपने घर से 5 लाख रुपए और बरामद करवाए. पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, कार व अन्य साक्ष्य जुटा लिए. आईजी बीकानेर ने एसपी साहित अन्य अधकारियों की दिल खोल कर हौसलाअफजाई की. एसपी राशि डोगरा ने सीआई इंद्रकुमार की विशेष सराहना की.

चारों आरोपियों ने रूपयों की खनकदमक के आगे पहली बार अपराध किया था ताकि उन का व उन के परिवार का भविष्य संवर जाए. पर हकीकत में चारों ने न केवल खुद को बल्कि परिवार को भी अंधेरे की गहराइयों में धकेल दिया है.