UP Crime News: विदेशी कौलगर्ल की हत्या का राज

UP Crime News: तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली मुहब्बत नाजमुदिनोवा करीब 15 साल पहले इंडिया घूमने आई थी, लेकिन दलालों के चंगुल में फंस कर वह जिस्मफरोशी का धंधा करने लगी. उस की हत्या की गुत्थी सुलझाते समय पुलिस को ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि…

21 फरवरी, 2026 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की मवाना कोतवाली पुलिस को एक किसान ने फोन कर के जो सूचना दी, उस से पुलिस वाले हैरान हो गए. मवाना खुर्द के भगवती फार्महाउस के पास सरसों के खेत में एक महिला का शव पड़ा हुआ मिला था. यह फार्महाउस पौड़ी हाइवे पर पड़ता है. मवाना खुर्द चौकी के प्रभारी एसआई राजेश कुमार यादव को थाने से इस कौल की सूचना पर मौके पर तत्काल पहुंचने का आदेश मिला तो वह चौकी के स्टाफ को ले कर तत्काल वहां पहुंच गए, जहां महिला का शव पड़ा था.

महिला का चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. ऐसा लगता था किसी ने उस के चेहरे पर कोई ज्वलनशील पदार्थ डाला था. इतना ही नहीं, शरीर के 1-2 जगह और भी ज्वलनशील पदार्थ डाला गया था. यह तो समझ में आता था कि उस के चेहरे पर तेजाब शायद इसलिए डाला गया था ताकि मृतका की पहचान खत्म हो जाए, लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों को क्यों जलाया गया था. यह जानने के लिए जब एसआई राजेश ने शरीर के उन हिस्सों का निरीक्षण किया तो पता चला कि उन सभी जगहों पर बड़ेबड़े टैटू बने हुए थे. लेकिन ज्वलनशील पदार्थ डाले जाने के बाद भी वे हिस्से पूरी तरह झुलस नहीं पाए थे.

एआई राजेश यादव जांचपड़ताल के काम में लगे ही थे कि तभी मवाना थाने की एसएचओ पूनम जादौन और सीओ पंकज लवानिया भी वहां पहुंच गए. एसएचओ और सीओ ने लाश के साथ घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. सवाल था कि मरने वाली कौन थी? यह पता लगाने के लिए जब कुछ महिलाकर्मियों की मदद से मृतका के शरीर पर पहने कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस की जेब से एक ऐसी चीज मिली, जिस से मृतका की पहचान की गुत्थी भी सुलझ गई.

कपड़ों से एक आधार कार्ड मिला, जिस पर नाम अर्चिता अरोड़ा और पता दिल्ली का दर्ज था. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि आधार कार्ड पर फोटो एक विदेशी युवती का लगा था. जबकि नाम एकदम देशी था. इसीलिए सीओ पंकज लवानिया को सहज विश्वास नहीं हुआ कि मृतका और उस की पहचान के बीच जो रिश्ता है वो एकदम सही है. इस दौरान एसपी (देहात) अभिजीत कुमार भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल की जांच व निरीक्षण का काम पूरा होने के बाद मवाना पुलिस ने कथित अर्चिता अरोड़ा के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

चूंकि मृतका अर्चिता अरोड़ा के शव का निरीक्षण सब से पहले एसआई राजेश यादव ने किया था, इसलिए सीओ पंकज लवानिया के निर्देश पर एक लिखित तहरीर थाने में दी और इसी के आधार पर मवाना थाने में बीएनएस की धारा 103(1), 238 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसपी (देहात) अभिजीत कुमार के निर्देश पर जांच का काम खुद एसएचओ पूनम जादौन ने अपने हाथ में ले लिया. एसपी (देहात) ने 2 पुलिस टीमों को गठन कर दिया. एक टीम को घटनास्थल की जांच और आसपास के सीसीटीवी फुटेज को खंगालने का काम सौंपा गया.

दूसरी टीम को मृतका के बारे में पुख्ता जानकारी एकत्र करने का काम सौंपा गया. सभी पुलिस टीमों की मौनिटरिंग और सर्विलांस का काम सीओ पंकज लवानिया को सौंपा गया.

पुलिस की एक टीम ने घटनास्थल की बारीकी से जांच शुरू कर दी. साथ ही उस जगह के आसपास की जगहों के सीसीटीवी फुटेज तलाशने का काम भी शुरू कर दिया, जहां अर्चिता अरोड़ा के शव को फेंका गया था. काम थोड़ा मशक्कत वाला और पेचीदा जरूर था, लेकिन जब पुलिस की टीम ने अपना काम शुरू किया तो अगले 24 घंटे में करीब 500 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज तलाश लिए, जिन से पुलिस को उन कातिलों तक पहुंचने का सुराग मिल गया, जिन्होंने अर्चिता का शव वहां ला कर फेंका था.

हाइवे पर बने भगवती फार्महाउस के सीसीटीवी कैमरे में पुलिस टीम को एक क्रेटा कार दिखी, जिस में कुछ लोग दिखे. सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे लोगों की संख्या करीब 3 से 4 थी, जो कंबल में लिपटे एक मानव शरीर को ले कर उस स्थान की तरफ गए, जहां अर्चिता का शव मिला था. पुलिस ने तकनीकी सहायता से आखिरकार ये पता लगा लिया कि उस क्रेटा कार का नंबर क्या है और वह किस के नाम पर रजिस्टर्ड है.

मुहब्बत उर्फ अर्चिता अरोड़ाः सालों पहले तुर्कमेनिस्तान से भारत घूमने आई थी, लेकिन यहां आ कर दलालों के जाल में फंस गई.

यह क्रेटा कार मेरठ के सिविल लाइन इलाके में प्रभात नगर कालोनी के रहने वाले संदीप उर्फ सिट्टू उर्फ राहुल के नाम पर रजिस्टर्ड थी. पुलिस की एक टीम ने उसी दिन संदीप को हिरासत में ले लिया और उस से कड़ी पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस तो पुलिस होती है, वह जब अपने तरीके से पूछताछ करती है तो इंसान क्या पत्थर भी बोलने लगते हैं. संदीप उर्फ राहुल ज्यादा देर तक चुप नहीं रह सका. संदीप ने पुलिस को बताया कि वह परतापुर के दिल्ली रोड स्थित अविका होटल में काम करता है. इस के बाद संदीप ने टेप रिकौर्ड की तरह बोलते हुए पुलिस को सब कुछ बता दिया कि उस ने क्यों और कैसे तथा किस के साथ मिल कर अर्चिता की हत्या की है.

संदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने अविका होटल के मालिक चंचल कुमार उर्फ बंटी निवासी न्यू देवपुरी थाना रेलवे रोड, मेरठ के अलावा वहां काम करने वाले एक अन्य  कर्मचारी गुरमुख उर्फ अरविंद उर्फ मोनू निवासी जौहड़ी बिनौली बागपत तथा विवेक उर्फ काका निवासी खजूरी वाली गली मलियाना, टीपीनगर मेरठ को ताबड़तोड़ छापेमारी कर हिरासत में ले लिया. संदीप समेत उन चारों से कड़ी पूछताछ हुई तो उन्होंने अर्चिता की हत्या का पूरा राज खोल कर रख दिया.

संदीप और उस के साथियों ने यह भी बताया कि पुलिस ने जिस महिला का शव बरामद किया है, उस का नाम अर्चिता अरोड़ा है, जो बैंक रोड अंबाला कैंट की रहने वाली है. हाल में वह दिल्ली के लोधी रोड स्थित कोटला मुबारकपुर में रहती थी. संदीप ने बताया कि अर्चिता जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी थी. वह अकसर मेरठ में आती थी, जहां वह अपने चाहने वालों का दिल बहला कर उन की जेब खाली कराती थी. इस काम के लिए अर्चिता अविका होटल में रूम बुक करती थी.

20 फरवरी, 2026 को भी उस ने रूम बुक किया था. रात के समय अर्चिता से होटल मालिक चंचल कुमार उर्फ बंटी का रूम के किराए को ले कर विवाद हो गया. विवाद इतना बढ़ गया कि अर्चिता ने चंचल पर दुष्कर्म का आरोप लगाने की धमकी दे डाली. उस के बाद चंचल को इतना गुस्सा आया कि उस ने होटल के अपने 3 कर्मचारियों के साथ मिल कर अर्चिता के साथ मारपीट शुरू कर दी. उस ने अर्चिता की इतनी पिटाई कर दी कि कि वह बेहोश हो गई.

चंचल कुमार उर्फ बंटी के सिर पर गुस्सा इस कदर सवार था कि उस वक्त उसे इस बात का होश ही नहीं था कि वह क्या कर रहा है. उस ने बेहोश अर्चिता के शरीर पर कंबल डाल दिया और उस के बाद गुस्से में ही उस की गरदन दबाते हुए चीखने लगा, ”साली वेश्या, तू मुझे झूठे केस में फंसाएगी. मुझे जेल भिजवाएगी. मेरे जरिए तूने लाखों रुपया कमाया और आज तू मुझे जेल भिजवाने की धमकी दे रही है. देखता हूं कि आज तुझे कौन बचाता है.’’

बाएं – मृतका के कपड़ों से बरामद अर्चिता अरोड़ा नाम का आधार कार्ड तथा नीचे उस का तुर्कमेनिस्तान का पासपोर्ट

चंचल कुमार को पता ही नहीं चला कि गुस्से की आग में उस ने कब कंबल के अंदर लिपटी अर्चिता की गला दबा कर हत्या कर दी है. अर्चिता के शरीर में जब काफी देर तक कोई हरकत नहीं हुई तो चंचल कुमार का गुस्सा भी थोड़ी ही देर में शांत हो गया. कुछ देर बाद जब चंचल का गुस्सा शांत हुआ तो उस ने सोचा एक बार अर्चिता से बात कर ली जाए. उस ने जब अर्चिता को हिला कर उस से बात करने की कोशिश की तो पता चला कि वह निर्जीव पड़ी है.

उस ने होटल के तीनों कर्मचारियों संदीप, गुरुमुख और विवेक को बुला कर अर्चिता को होश में लाने के लिए कहा. तीनों ने जब उस की नब्ज टटोली तो पता चला उस की नब्ज बंद हो चुकी थी. कई तरह से जांचपड़ताल करने के बाद वे समझ गए कि अर्चिता की मौत हो चुकी है. जैसे ही चंचल उर्फ बंटी को यह पता चला कि अर्चिता मर चुकी है तो उन सभी के होश उड़ गए. काफी देर तक वे समझ ही नहीं पाए कि अब वे क्या करें.

लेकिन करीब एक घंटा बीत जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि अगर उन्हें इस मामले में बचना है और पुलिस की पकड़ से दूर रहना है तो उन्हें अर्चिता के शव को अपने होटल से कहीं दूर ले जा कर ठिकाने लगाना होगा. बहुत सोचनेविचारने और सलाहमशविरा करने के बाद उन्होंने तय किया कि वे रात में ही गाड़ी में डाल कर अर्चिता के शव को कहीं और फेंक आऐंगे. उन्होंने सब से पहले तेजाब डाल कर अर्चिता के चेहरे को जला दिया ताकि उस की पहचान न हो सके. इतना ही नहीं, उस के शरीर के जिन हिस्सों में टैटू बने थे, वहां भी तेजाब डाल दिया गया.

चंडीगढ़ की एलिना से संपर्क करने पर उस ने मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना से वीडियो कौल पर पुलिस की बात कराई.

चंचल जानता था कि अर्चिता मेरठ की रहने वाली नहीं है, वह केवल अमीरजादों के जिस्म की भूख मिटा कर पैसा कमाने के लिए मेरठ आती थी. उसे शहर में ज्यादा लोग नहीं जानते हैं. अगर वे उस के चेहरे की पहचान मिटा कर उस के शव को अपने होटल से कहीं दूर डाल देंगे तो फिर उन के पकड़े जाने की संभावना नहीं है.

तेजाब से पहचान मिटा कर चंचल ने अपने तीनों साथियों के साथ मिल कर अर्चिता के शव को कंबल में लपेट कर संदीप उर्फ सिट्टू की क्रेटा कार में डाला. चंचल कुमार और उस के साथी अर्चिता की लाश को क्रेटा कार में डाल कर कारीब 45 किलोमीटर तक इधर से उधर भटकते रहे. इसी तरह वे मेरठ से होते हुए मवाना रोड निकल गए. कहीं चैकिंग नहीं हुई. वे मवाना खुर्द पुलिस चौकी के पास पौड़ी हाइवे पर स्थित भगवती फार्महाउस तक जा पहुंचे. फार्महाउस के पास पहुंच कर उन्हें लगा कि यहां लाश को ठिकाने लगाना उचित रहेगा.

वहां गाड़ी खड़ी कर के उस के बाद सभी चारों आरोपियों ने फार्महाउस की बाउंड्री के भीतर सरसों के खेत में कंबल समेत अर्चिता का शव डाल दिया. इस के बाद चारों आरोपी मौके से वापस अपने घरों को लौट आए. लेकिन घर लौटने के बाद भी चारों आरोपी मवाना पुलिस की गतिविधियों पर नजर बनाए रहे. पूछताछ का काम पूरा होने पर पुलिस ने सभी आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयोग की गई क्रेटा कार, होटल का कंबल और तेजाब की खाली बोतल भी बरामद कर सीज कर दी गई.

पुलिस ने पूछताछ और साक्ष्यों को जुटाने के बाद चारों आरोपियों चंचल कुमार, संदीप, गुरुमुख और विवेक को सक्षम न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथित अर्चिता अरोड़ा की शिनाख्त से ले कर हत्या के कारण व उस के कातिलों को गिरफ्तार करने की गुत्थी मवाना पुलिस ने सुलझा ली थी. लेकिन मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे के साथ एसपी (देहात) अभिजीत कुमार और सीओ पंकज लवानिया ने जब जांच अधिकारी पूनम जादौन के साथ हत्याकांड के एकएक बिंदु पर गहनता से चर्चा शुरू की तो सभी उच्चाधिकारियों को लगा कि कुछ ऐसा जरूर है, जो जांच में छूट रहा है.

पुलिस हिरासत में आरोपी चंचल कुमार, संदीप, गुरुमुख और विवेक

विचारविमर्श के बाद तय हुआ कि अर्चिता के बारे में और अधिक जानकारी एकत्र करनी होगी, क्योंकि पुलिस ने अर्चिता का जो आधार कार्ड बरामद किया था, उस में भले ही उस का नाम अर्चिता अरोड़ा था, लेकिन उस में जो फोटो थी वह एक विदेशी महिला की लग रही थी, इसलिए उस के भारतीय होने पर संदेह था. पुलिस की टीमों को अब अर्चिता की सही पहचान स्थापित करने के काम पर लगाया गया. महिला की सही पहचान और उस के परिवार वालों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए टीमें गठित कर दी गईं.

पुलिस को मृतका का जो आधार कार्ड बरामद हुआ था, उस में उस का नाम अर्चिता अरोड़ा पुत्री सरबजीत अरोड़ा निवासी 1811, दूसरा फ्लोर, साउथ एक्सटेंशन, कोटला मुबारकपुर, लोधी रोड मध्य दिल्ली का पता दर्ज था. इस में जन्मतिथि 27 अप्रैल, 1984 दर्ज मिली. पुलिस की टीम जब वहां पहुंची तो जानकारी मिली कि वह इस पते पर नहीं रहती. थकहार कर पुलिस खाली हाथ लौट आई. जब अर्चिता के आधार वाले पते से कोई सुराग नहीं मिला तो जांच अधिकारी पूनम जादौन ने उस के मोबाइन नंबर का सहारा लिया.

दरअसल, अर्चिता के आरोपियों से पूछताछ के दौरान पुलिस ने अर्चिता का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. पुलिस ने अर्चिता के मोबाइल की 3 महीने की कौल डिटेल्स निकाली. उस में अर्चिता के मोबाइल काल डिटेल में आखिरी नंबर किसी एलिना का था, जिस का नाम उस की कौंटेक्ट लिस्ट में दर्ज था. एलिना से फोन पर बातचीत कर पुलिस ने उसे भगवती फार्महाउस में मिले एक महिला के शव और उस के पास से बरामद अर्चिता अरोड़ा के आधार कार्ड की बाबत जानकारी दी.

कौल डिटेल्स से यह भी पता चला कि अर्चिता की हत्या में पकड़े गए आरोपी चंचल कुमार से एक साल से संबंध थे. वह अकसर मेरठ आतीजाती रहती थी. हर बार उस के नाम पर एक रात या दिन के लिए अविका होटल का रूम बुक होता था. कौल डिटेल्स में चूंकि अर्चिता की आखिरी बार 20 फरवरी, 2026 को एलिना से बात हुई थी. पुलिस ने एलिना से अनुरोध किया कि वह अर्चिता के शव की पहचान करें.

चारों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद प्रैस कौन्फ्रेंस करते पुलिस अधिकारी

एलिना चूंकि चंडीगढ़ में रहती थी, इसलिए 25 फरवरी को मवाना थाने के एक एसआई सुमित कुमार ने एलिना से संपर्क किया. उन्होंने अर्चिता के शव के हर ऐंगल की फोटोग्राफ एलिना को दिखाई तो एलिना ने खुलासा हुआ कि मृतका अर्चिता अरोड़ा नहीं, बल्कि तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली मुहब्बत है. एलिना के इस खुलासे के बाद अचानक पूरे केस की थ्योरी ही बदल गई. एलिना ने बताया कि मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना तुर्कमेनिस्तान में रहती है. एलिना ने एसआई सुमित कुमार से ली गई फोटो मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना को भेजी.

मम्मी ने भी ईयरिंग, ब्लैकटौप और शरीर पर बने टैटू के आधार पर उस की पहचान अपनी बेटी मुहब्बत के रूप में की. उन्होंने एसआई सुमित कुमार से वीडियो कौल पर बातचीत में बताया कि मुहब्बत करीब 15 साल पहले तुर्कमेनिस्तान से भारत आई थी और कथित रूप से दलालों के चंगुल में फंस गई थी. दलालों ने उस का पासपोर्ट अपने कब्जे में ले लिया और उन्होंने उसे नौकरी की जगह उसे जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया.

एसएसपी अविनाश पांडेय

मुहब्बत ने अपनी पहचान के लिए दलालों के जरिए अर्चिता अरोड़ा के नाम पर आधार कार्ड बनवा लिया, लेकिन उस पर फोटो मुहब्बत का ही लगा था. मां नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना ने यह भी खुलासा किया कि मुहब्बत भारत में जिस्मफरोशी का काम कर रही थी. पासपोर्ट पर भी उस का नाम मुहब्बत नाजमुदिनोवा था, जोकि तुर्कमेनिस्तान की नागरिक थी. मुहब्बत लगभग 15 साल से भारत में रह रही थी. एसआई सुमित कुमार से बातचीत के बाद मुहब्बत की मम्मी ने भारत में रहने वाली अपनी दोस्त उज्बेकिस्तान की रहने वाली कलिचेवा अजीजा फैजुलेवना से बातचीत की. वह भी चंडीगढ़ में रहती थी.

सीओ पंकज उस ने जब भार लवानिया

अजीजा ने वीडियो कौल पर मुहब्बत की मम्मी से बातचीत की. अजीजा एलिना को साथ ले कर 25 फरवरी को मवाना थाने पहुंची. उस ने जांच अधिकारी पूनम जादौन, सीओ पंकज लवानिया और उस के बाद एसपी (देहात) अभिजीत कुमार से मुलाकात और बातचीत की.  दूसरी तरफ मुहब्बत की मम्मी गुलनारा ने तुर्कमेनिस्तान एंबेसी को एक पत्र भेज कर बताया कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि खुद भारत आ सकूं. उस ने अजीजा के जरिए तुर्कमेनिस्तान एंबेसी को यह लेटर भेजा, ताकि उस की गैरमौजूदगी में अजीजा ही पुलिस से संपर्क कर सके.

एसएचओ पुनम जादौन

गुलनारा ने दावा किया कि मृतका भारतीय नहीं, बल्कि उस की बेटी मुहब्बत है. एलिना और अजीजा के पुलिस से संपर्क करने तथा तुर्कमेनिस्तान एंबेसी के हस्तक्षेप के बाद मवाना पुलिस पूरी तरह ऐक्टिव हो गई. सीओ पंकज लवानिया को विश्वास हो गया कि अब कथित अर्चिता अरोड़ा की सही पहचान हो जाएगी. इस दौरान एंबेसी की मदद से पुलिस को मुहब्बत के पासपोर्ट की कौपी भी मिल गई. इसलिए पुलिस ने विदेश मंत्रालय को पासपोर्ट और केस की डिटेल भेज दी है और अर्चिता उर्फ मुहब्बत का डीएनए टेस्ट कराने के लिए उस की मम्मी को एक अनुरोध पत्र भी भेज दिया.

पूछताछ में पता चला कि मृतका अर्चिता अरोड़ा का जन्मस्थान भले ही तुर्कमेनिस्तान था, लेकिन उस के पापा सरबजीत अरोड़ा भारत के ही निवासी हैं. जबकि मम्मी तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली थी. इसीलिए उस ने जब भारत आने पर अपना आधार कार्ड बनवाया तो उस में अपनी पहचान अर्चिता अरोड़ा के रूप में दी. पुलिस ने अर्चिता उर्फ मुहब्बत की हत्या और उस की पहचान की गुत्थी एक तरह से सुलझा ली थी.

लेकिन इस मामले की तह में एक बड़े ह्यूमन ट्रैफिकिंग रैकेट के जुड़े होने की बू आ रही थी. क्योंकि अर्चिता उर्फ मुहब्बत ही नहीं, देश में ऐसी बहुत सारी विदेशी महिलाएं हैं, जिन के पास भारत में फरजी पहचान पत्र हैं. फरजी आधार कार्ड तो हैं, लेकिन नागरिकता का प्रमाण नहीं है. UP Crime News

 

 

 

UP Crime: भाई क्यों बनता है – प्यार का दुश्मन

UP Crime: 20 वर्षीय अनुराधा की खता इतनी थी कि वह फोन पर अपने किसी दोस्त से बात करती थी. केवल इसी बात पर उस के बड़े भाई मनीष ने अपनी मम्मी के साथ मिल कर बहन की हत्या कर दी. यहां सोचने वाली बात यह है कि भाई चाहे किसी भी लड़की से मटरगश्ती करे, लेकिन जब उस की बहन किसी दोस्त से बात भी करे तो भाई उस का दुश्मन क्यों बन जाता है?

बात 16 नवंबर, 2025 की है. उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के परसाजागीर गनेशपुर निवासी मनीष ने छोटी बहन अनुराधा को फोन पर किसी अनजान युवक से बात करते देख लिया था. जिस से वह गुस्से से तमतमा गया. वह बहन पर आगबबूला हो गया. उस ने अनुराधा से कहा, ”तू फोन पर किस से बात कर रही है. यह बात करना बंद कर दे. मैं इस बारे में पहले भी तुझ से कई बार मना कर चुका हूं.’’

अनुराधा – फोन पर बात करना जान पर भारी पड़ा

तभी मनीष की मम्मी निर्मला देवी ने उलाहना दिया, ”मैं ने भी कई बार इस से बात करने से मना किया है, लेकिन यह किसी की बात सुनती ही नहीं है, बल्कि मुझ से झगड़ती है. जो मन में आए, वह करती है. यह तो पूरी तरह अपनी मरजी की मालिक हो गई है.’’

मम्मी की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. इस से मनीष का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. गुस्सा करने के साथ ही वह अपना आपा खो बैठा और उस ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. अत्यधिक पिटाई से अनुराधा बेहोश हो गई. इस में मम्मी ने भी मनीष का साथ दिया. तब मनीष अपनी कार की डिक्की में बेहोश अनुराधा को डाल कर रात के अंधेरे में चल दिया. रास्ते में सुनसान इलाके में उस ने अनुराधा की रस्सी से गला घोंट कर हत्या कर दी. शव को ठिकाने लगाने के लिए ममेरे भाई मुसकान को ननिहाल से अपने साथ ले लिया था.

शव को ठिकाने लगाने के लिए दोनों अयोध्या की ओर कार ले कर निकल गए, लेकिन पुलिया का निर्माण होने के कारण लौट आए. दुबौलिया-विश्वेश्वरगंज होते हुए मनीष गोंडा पहुंचा. वहां नवाबगंज में कार में पेट्रोल भरवाया. बनगांव के पास पीडी बंधा पर सुनसान जगह देख कर मनीष और मुसकान ने अनुराधा की लाश को कार की डिक्की से बाहर निकाला और उस की मौत सुनिश्चित करने के लिए मनीष ने उसे कार से कुचल कर दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की.

अपनी सगी बहन को बेदर्दी से मारने के बाद शव को वहीं फेंक कर वे लोग मनकापुर-बभनान-गौरा मार्ग होते हए बस्ती की ओर फरार हो गए. बाद में मनीष ने ममेरे भाई मुसकान को उस के गांव छोड़ दिया और खुद अपने घर वापस आ गया. 17 नवबंर, 2025 को गोंडा पुलिस को थाना तरबगंज के अंतर्गत बनगांव के पास सिकरेटरीपुरवा और कंचनपुर के बीच पीडी बंधा पर सड़क किनारे एक अज्ञात युवती का शव मिला. इस की जानकारी बनगांव के ग्राम प्रधान मंजीत सिंह ने पुलिस को दी थी.

सूचना मिलने पर तरबगंज के एसएचओ कमलाकांत त्रिपाठी पुलिस बल सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का गहराई से निरीक्षण किया. जिस युवती की लाश मिली थी, उस के हाथ में रस्सी बंधी थी. फील्ड यूनिट, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया गया. मौके से टीमों द्वारा साक्ष्य जुुटाए गए. ग्रामप्रधान की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

हत्या के बाद अनुराधा की लाश को इसी कार से ठिकाने लगाया गया था

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के शरीर व गले पर चोटों के कई निशान मिले तथा मृत्यु का कारण हेमोरेजिक शाक व एंटीमार्टम इंजरी पाया गया. इस पर पुलिस ने थाना तरबगंज में हत्या का मामला दर्ज कर लिया. युवती की शिनाख्त न होने और उस के बारे में कोई सुराग न मिलने पर मामले को ब्लाइंड मर्डर घोषित कर जांच तेज कर दी गई. पुलिस टीमों ने लगातार तकनीकी इनपुट खंगालने और सीसीटीवी फुटेज चैक किए.

आरोपी मनीष – बहन की हत्या का मनीष को जरा भी अफसोस नहीं हुआ

इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए गोंडा के एसपी विनीत जायसवाल ने तरबगंज क्षेत्र के एएसपी राधेश्याम राय के निर्देशन तथा सीओ (तरबगंज) उमेश्वर प्रभात सिंह की अध्यक्षता में एसओजी, सर्विलांस सहित 5 पुलिस टीमों का गठन कर दिया. पुलिस इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए 13 दिन तक जुुटी रही. उस की शिनाख्त कराने के साथ ही उस के हत्यारे की तलाश में जमीनआसमान एक कर दिया, इस के साथ ही अपने मुखबिरों को लगा दिया.

पुलिस टीमों ने लगातार टेक्निकल व मैनुअल इनपुट खंगाले और घटनास्थल के आसपास लगे कई सीसीटीवी चैक किए. पुलिस द्वारा तरबगंज और अयोध्या के सोहवल तक लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. एक फुटेज में एक सफेद रंग की कार जरूर दिखाई दी, लेकिन नंबर स्पष्ट न होने से कार के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी.

इस बीच पुलिस को पता चला कि जनपद बस्ती परसाजागीर गणेशपुर की एक 20-22 साल की युवती अनुराधा 13 दिन पहले लापता हो गई थी. पुलिस जांंच में पता चला कि इस संबंध में उस के फेमिली वालों ने थाने में कोई सूचना या रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है. इस पर पुलिस गांव परसाजागीर गणेशपुर जा पहुंची. पुलिस को गांव वालों से जानकारी हुई कि मनीष की बहन अनुराधा कई दिनों से घर से गायब है. वह गांव में किसी को दिखाई नहीं दे रही है.

वहां मनीष कुमार के घर पर ताला लगा था. पुलिस ने गांव वालों से परिवारीजनों के बारे में पूछताछ की. गांव वालों ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन के घर पर ताला लगा हुआ है. गांव के लोगों ने बताया कि 16 नवंबर के बाद से अनुराधा को नहीं देखा. ग्रामीणों ने जब अनुराधा की मम्मी निर्मला देवी से अनुराधा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि अनुराधा अपने मामा के घर गई हुई है. इस पर ग्रामीण संतुष्ट हो गए थे.

30 नवंबर को गोंडा पुलिस ने जब मृतका के फोटो निर्मला देवी के पड़ोसियों को दिखाए तो उन्होंने कपड़ोंं के आधार पर उस की शिनाख्त अनुराधा के रूप में की. अनुराधा की हत्या से गांव वाले सन्न रह गए. उन का कहना था कि फेमिली वाले संपन्न व प्रतिष्ठित हैं. इस के बाद पुलिस के अलावा गांव वालों को भी यही शक हो गया कि अनुराधा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उस के फेमिली वालों ने ही की है, इसलिए वे फरार हो गए. उन के फोन नंबरों के आधार पर पुलिस उन्हें तलाशने लगी.

पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. पुलिस ने मनीष कुमार और उस की मम्मी निर्मला को बस्ती के वाल्टरगंज थाना मोड़ के पास से 30 नवंबर, 2025 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपी से गांव से 100 किलोमीटर से अधिक दूर आने का कारण पूछा तो मनीष कोई जवाब नहीं दे सका. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बलेनो कार भी पुलिस ने बरामद कर ली.

मृतका की मम्मी और भाई की गिरफ्तारी के बाद प्रैस कौन्फ्रैंस करते अधिकारी

मांबेटे से अनुराधा के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस संबंध में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना वाल्टरगंज के परसाजागीर गनेशपुर की रहने वाली 20 वर्षीय अनुराधा ग्रैजुएशन कर रही थी. उस की बड़ी बहन की शादी हो चुकी है. अनुराधा के 2 भाई मनीष कुमार और आशीष कुमार हैं. बड़ा भाई आशीष कुमार पुणे में पत्थर का काम करता है, जबकि मनीष घर पर ही रहता है. 16 नवबंर, 2025 को मनीष अपने दोस्तों के साथ गोरखपुर गया था. घर लौटने पर उस ने बहन अनुराधा को किसी अनजान लड़के से मोबाइल पर बात करते देख लिया. उस ने गुस्से से कहा, ”कितनी बार तुझे मना किया कि बात करना बंद कर दे. लेकिन समझाने के बाद भी तू मानती नहीं है.’’

निर्मला देवी: बेटी की हत्या में बेटे मनीष का साथ दिया

मनीष को शक था कि अनुराधा का चालचलन ठीक नहीं है. प्रतिष्ठित परिवार होने के कारण गांव में उन के परिवार की इज्जत थी. मनीष को यह बरदाश्त नहीं हुआ. मनीष ने उस लड़के के बारे में पूछा, जिस से वह फोन पर बातें कर रही थी. इसी बात पर मनीष की अनुराधा से बहस होने लगी. इस के बाद मनीष से उस की मम्मी निर्मला देवी ने भी अनुराधा की शिकायत की. इस से बहन के प्रति मनीष का गुस्सा और बढ़ गया. उस समय तो मनीष ने किसी तरह अपने गुस्से पर काबू कर लिया.

देर रात भी मनीष का गुस्सा शांत नहीं हुआ. मन ही मन उस के अंदर उथलपुथल मचती रही. सोचने लगा कि यदि अनुराधा ने कोई गलत कदम उठा लिया तो फेमिली वाले मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि उन के परिवार की गांव में बड़ी प्रतिष्ठा थी. मनीष ने अनुराधा से जब उस का मोबाइल मांगा तो उस ने मोबाइल फोन देने से साफ इंकार कर दिया. इसी बात को ले कर रात में मनीष का अनुराधा से फिर झगड़ा हुआ. तभी मनीष ने अनुराधा के हाथ से मोबाइल छीन कर तोड़ दिया.

इस पर अनुराधा भाई मनीष पर बिफर पड़ी. दोनों में एक बार फिर तकरार होने लगी. बात बढ़ गई और मनीष ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. ज्यादा पिटाई के चलते अनुराधा बेहोश हो गई. तब बिना आगापीछा सोचे मनीष ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. उस ने अनुराधा को जान से मारने का प्लान बनाया ताकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. फिर मनीष ने अपनी मम्मी निर्मला देवी से रस्सी मंगा कर मम्मी के साथ मिल कर बहन के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. इस के बाद अनुराधा को बोरे में भर कर अपनी कार की डिक्की में डाल दिया. मम्मी को साथ ले कर मनीष अपने मामा के घर की ओर चल पड़ा. मनीष के मामा का गांव थाना दुबौलिया क्षेत्र में था.

मामा के गांव पहुंचने से पहले एक सुनसान जगह पर कार रोक कर मनीष ने रस्सी से अनुराधा का गला घोंट दिया. फिर मम्मी को मामा के घर छोड़ कर ममेरे भाई मुसकान को कार में साथ ले कर अकबरपुर टांडा की तरफ निकल पड़ा और तरबगंज के पीडी बांध मार्ग पर अनुराधा के शव को डिक्की से निकाल कर सड़क पर फेंका, फिर कार से कुचल दिया. मनकापुर-बभनान-गौरा होते हुए घर लौट गया.

बहन की हत्या का उसे कोई अफसोस नहीं था. पुलिस ने अनुराधा की हत्यारी मां निर्मला देवी व सगे भाई मनीष को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. तीसरे आरोपी मनीष के ममेरे भाई मुसकान की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर दबिश डाली गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस हिरासत में आरोपी

इस ब्लाइंड मर्डर केस का परदाफाश कर आरोपी मनीष व उस की मां को गिरफ्तार करने वाली टीम में इंसपेक्टर (तरबगंज) कमलाकांत त्रिपाठी, एसओजी प्रभारी गौरव सिंह, एडिशनल इंसपेक्टर थाना तरबगंज राजकुमार यादव, एसआई उपेंद्र यादव, एसओजी के रणवीर, अरुण यादव, राकेश सिंह, राशिद अली, अमित पाठक, इमरान अली, कांस्टेबल अंकित राय प्रमोद वर्मा व शशिबाला शामिल थे. एसपी (गोंडा) विनीत जायसवाल ने इस ब्लाइंड मर्डर का परदाफाश करने गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम तथा एसओजी टीम को 25 हजार रुपए का पुरस्कार भी दिया है.

अपनी बहन का गला घोंटते समय भाई को जरा भी मलाल नहीं हुआ. वह जल्लाद बन गया. मनीष और उस की मम्मी ने यह भी पता करने की कोशिश नहीं की कि अनुराधा किस युवक से बात करती है और वह युवक कौन है? अपनी कोख से जन्म देने वाली निर्मला ने भी उस की हत्या में अहम भूमिका निभाई, यदि वह चाहती तो अनुराधा की जान बच सकती थी. प्रश्न उठता है कि कब तक लोग कानून को अपने हाथ में लेते रहेंगे? कब तक निर्दोष लोग इस प्रकार अपनी जान से हाथ धोते रहेंगे? गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मोबाइल कल्चर इस के लिए जिम्मेदार है, जिस ने एक हंसतेखेलते परिवार को उजाड़ दिया. UP Crime

 

UP Crime: कबाड़ी से कैसे बना हिस्ट्रीशीटर

UP Crime: शामली का समयदीन उर्फ सामा ऐसा खूंखार अपराधी था कि स्थानीय पुलिस को नाकों चने चबाए रखता था. पुलिस ने जब उस पर इनाम घोषित कर दिया तो वह तेलंगाना जा कर अपराध करने लगा, लेकिन एक बड़ी वारदात करने जब वह शामली आया तो पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गया. आखिर एक फेरी वाले से इनामी हिस्ट्रीशीटर कैसे बना समयदीन? पढ़ें, उस के अपराध के किस्से.

शामली के थाना भवन के एसएचओ विजेंद्र सिंह रावत 8 दिसंबर, 2025 की रात 10 बजे के बाद थाने में अपने रोजमर्रा के जरूरी काम निपटा कर पुलिस टीम के साथ रात की गश्त के लिए जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी उन का मोबाइल बजने लगा. विजेंद्र रावत ने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली तो उन के विश्वस्त मुखबिर दुर्जन सिंह (काल्पनिक नाम) का नंबर फ्लैश हो रहा था.

”हां भई दुर्जन सिंहजी, बहुत दिनों बाद याद आई? 2-3 महीनों से तो आप न जाने कहां गायब ही हो गए थे. बताओ, क्या खास खबर है?’’ विजेंद्र रावत ने पूछा.

”साहब, बहुत ही खास खबर है. कई महीनों से मैं इस गैंग के पीछे ही लगा हुआ था. इस खबर का इनाम ठीकठाक जरूर मिलेगा न!’’ दुर्जन ने कहा.

”दुर्जन सिंह, तुम अब इनाम की फिक्र बिलकुल मत करो. खबर सटीक होगी तो इनाम भी उतना अच्छा ही मिलेगा. तुम खबर जल्दी बताओ,’’ विजेंद्र रावत ने कहा.

उस के बाद मुखबिर दुर्जन सिंह ने बताया कि क्षेत्र के ही भैंसाली इसलामापुर गांव में काफी समय से बंद पड़े ईंट के एक भट्ठे पर नामीगिरामी हिस्ट्रीशीटर डकैतों का एक गैंग जमा है. यह गिरोह पास ही के किसी गांव में बड़ी डकैती डालने वाला है. सूचना बहुत खास और महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए एसएचओ विजेंद्र रावत ने इस घटना की सूचना तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को दे दी.

सूचना मिलते ही शामली के एसपी नरेंद्र प्रताप सिंह के निर्देश पर थाना भवन और बाबरी थानों की एक संयुक्त पुलिस टीम गठित की गई. फिर एसपी साहब के निर्देश पर थाना भवन के एसएचओ विजेंद्र सिंह रावत और बाबरी थाने के एसएचओ राहुल सिसौदिया अपनीअपनी पुलिस टीमों को ले कर मौके पर पहुंच गए. पुलिस की संयुक्त टीम ने त्वरित काररवाई करते हुए बदमाशों के गिरोह को चारों ओर से घेर लिया और माइक से ऐलान कर उन्हें सरेंडर करने को कहा.

इस बात को सुनते ही ईंट भट्ठे के अंदर छिपे हुए बदमाशों ने अचानक ही चारों तरफ से पुलिस के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस टीम भी तुरंत अपनी पोजीशन ले कर जवाबी फायरिंग करने लगी. दोनों ओर से फायरिंग होने लगी. गोलियों की ताबड़तोड़ आवाज से पूरा इलाका दहल गया था. इस बीच एक गोली सीधे पुलिस कांस्टेबल अनुज यादव को लग गई, जिस से वह बुरी तरह से घायल हो गए. बदमाशों के पास अत्याधुनिक हथियार होने के कारण पुलिस टीम को काफी मशक्कत उठानी पड़ रही थी.

इस बीच बाबरी थाने के एसएचओ अपनी पोजीशन ले कर ईंट के भट्ठे के और पास जाने लगे. तभी एक गोली उन की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी लगी. तभी पुलिस की ताबड़तोड़ गोलियां ईंट भट्ठे के अंदर से बाहर भागने की फिराक में एक बदमाश को लग गई, जिस के कारण वह जमीन पर गिर कर बुरी तरह से तड़पने लगा. उस के 5 साथी वहां से भागने में सफल हो गए थे. उस के बाद उस घायल बदमाश को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां पर उपचार के दौरान उस की मौत हो गई.

मौत से पहले जब पुलिस ने उस से पूछताछ की तो बड़ी चौंकाने वाली बातें सामने आईं. उस बदमाश ने अपना नाम समयदीन उर्फ सामा बताया. समयदीन के पास मिले आधार कार्ड से उस का पता कर्नाटक का था. बाद में पता चला कि कर्नाटक में भी उस के खिलाफ कई मामले दर्ज थे. उत्तर प्रदेश पुलिस ने जब उस की कुंडली खंगाली तो जानकारी मिली कि जिला शामली, उत्तर प्रदेश में ही उस के खिलाफ 23 आपराधिक मामले दर्ज थे. उस पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित था. इस के अलावा उस के खिलाफ कई राज्यों में भी केस दर्ज थे. 50 हजार का इनामी समयदीन उर्फ सामा मुकीम काला और नफीस गैंग का सक्रिय सदस्य रहा था.

समयदीन उर्फ सामा के खिलाफ कुल 32 संगीन मामले दर्ज थे और वह शामली जिले के थाना कांधला का हिस्ट्रीशीटर था. उस की उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ 18 अक्तूबर, 2025 को भी मुठभेड़ हुई थी, लेकिन इस मुठभेड़ में वह बच कर भाग निकला था. वहां से फरार होने के बाद वह पंजाब में छिप कर रहने लगा था.

बहनोई हुआ गिरफ्तार

पुलिस मुठभेड़ में घायल समयदीन को पुलिस अस्पताल ले जा रही थी, उसी दौरान पुलिस पूछताछ में समयदीन ने पुलिस को हाल ही में तेलंगाना में की गई लूट के बारे में भी जानकारी दी थी. उस समय समयदीन को लगने लगा था कि अब शायद वह बच नहीं पाएगा, इसलिए उस ने अपने सारे गुनाह पुलिस को बता दिए थे. समयदीन के मृत्यु पूर्व के दिए गए बयान को सुनने बाद कांधला पुलिस ने सर्विलांस टीम की मदद से तेलंगाना पुलिस के साथ विस्तृत बातचीत कर समयदीन उर्फ सामा के मारे जाने के बारे में बताया.

पुलिस हिरासत में समयदीन का बहनोई उसमान

तेलंगाना पुलिस ने कांधला पुलिस को बताया कि पिछले एक साल में तेलंगाना में लूट और डकैती की 3 बड़ी घटनाएं हुई थीं. उस के बाद तेलंगाना पुलिस को शामली (उत्तर प्रदेश) बुलवाया गया. तेलंगाना पुलिस ने जानकारी दी कि इनामी बदमाश समयदीन उर्फ सामा एक सप्ताह पहले अपने एक साथी बदमाश समसू के साथ तेलंगाना गया था.

लूट में मिले जेवर और नकदी उसमान अपने पास ही रखता था समयदीन

समयदीन का साथी समसू उत्तर प्रदेश सहारनपुर के थाना गंगोह का रहने वाला है और वह भी एक हिस्ट्रीशीटर है और अभी भी फरार चल रहा है. तेलंगाना के कुरनूल के थाना कलवाकुर्ती में समयदीन उर्फ सामा और समसू ने एक मंदिर में लूट की घटना को अंजाम दिया था. उस लूट के बाद समसू तो भूमिगत हो गया, लेकिन समयदीन उर्फ सामा तेलंगाना से वापस शामली आ गया. समयदीन ने ज्वैलरी और लूटी गई पूरी की पूरी रकम अपने बहनोई उस्मान को यह कहते हुए दे दी कि वह ये गहने और पैसे बाद में उस से वापस ले लेगा. लेकिन इसी बीच समयदीन उर्फ सामा का पुलिस से एनकाउंटर हो गया.

इस के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस तेलंगाना पुलिस के साथ मिल कर समयदीन उर्फ सामा के नेटवर्क को खंगालने में जुट गई थी. जब सर्विलांस टीम ने समयदीन के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकाली तो उस में उस के बहनोई उस्मान का मोबाइल नंबर मिला. समयदीन ने सब से ज्यादा कौल उस्मान के नंबर पर की थीं. पुलिस ने काल डिटेल्स के माध्यम से उस्मान को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने जब आरोपी उस्मान से विस्तृत बातचीत की तो उस्मान ने बताया कि बीती 8 दिसंबर, 2025 को समयदीन ने फोन कर के उसे करनाल, हरियाणा के बौर्डर पर किसी जरूरी काम के बहाने बुलाया था.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता सभांलने के साथ ही अपराधियों के प्रति कड़ा रूख अपनाया हुआ है

जब वह नियत स्थान पर पहुंचा तो समयदीन काफी हड़बड़ी में लग रहा था. समयदीन ने उसे लूटे गए गहने और नकदी ले कर घर जाने को कहा था. समयदीन ने तब उस्मान से कहा था कि ये गहने और नकद रकम वह उस से बाद में ले कर जाएगा, अभी वह किसी खास काम से कहीं पर जा रहा है. समयदीन अकसर लूटी गई चीजें और रकम अपने बहनोई उस्मान को दे दिया करता था और बाद में कुछ हिस्सा उस्मान को दे कर अपनी वस्तुएं और नकदी उस से वापस ले लिया करता था.

उस के बाद उस्मान ने गहने और नकद रकम अपने घर में छिपा कर रख दिए थे. समयदीन ने उस्मान से यह भी कहा था कि उसे अभी एक और घटना करनी है, बाद में काम पूरा होने के बाद वह ये जेवर और रुपए उन से वापस ले लेगा. पुलिस ने गिरफ्तार उस्मान निवासी नई बस्ती, मुस्तफाबाद से उस की निशानदेही पर 3 लाख 2 हजार 400 रुपए नकद और 265 ग्राम सोने के आभूषण बरामद किए.

एनकाउंटर से समय बदमाशों की गोली से घायल कांस्टेबल अनुज अस्पताल में

उस्मान को गिरफ्तार करने में एसएचओ सतीश कुमार, सीआई बी. नागार्जुन (थाना कलवाकुर्ती), इंसपेक्टर पी. शंकर, एसआई नरेंद्र कुमार वर्मा, हेडकांस्टेबल वेंकटरामुल, कांस्टेबल कपिल कुमार, कांस्टेबल सुमित कुमार, चिरंजीवी, मोहम्मद नजीरुद्ïदीन शामिल थे.

कौन था गैंगस्टर नफीस

समयदीन उर्फ सामा का विश्वस्त साथी और आका का नाम मोहम्मद नफीस था. मोहम्मद नफीस कांधला गांव के मोहल्ला रवैल का मूल निवासी था. मोहम्मद नफीस ही समयदीन को अपराध की दुनिया में ले कर आया था. मोहम्मद नफीस के अब्बा मोहम्मद मूदा हैं, जो अपने परिवार के साथ अभी भी कांधला गांव में रहते हैं. नफीस के ऊपर हत्या, लूट और डकैती के कुल 34 मुकदमे दर्ज थे. नफीस के ऊपर उत्तर प्रदेश की पुलिस की ओर से एक लाख रुपए का इनाम रखा गया था. उस ने 2 शादियां की थीं. उस की पहली पत्नी रुखसाना की 6 साल पहले एक लंबी बीमारी से मौत हो गई थी.

गैंगस्टर नफीस : इसी गैंगस्टर के गैंग का सदस्य था समयदीन उर्फ सामा

रुखसाना की मौत के बाद नफीस ने कोलकाता की रहने वाली शमा से दूसरी शादी की थी. वह अपनी दूसरी पत्नी शमा के साथ कोलकाता में ही रहने लगा था, लेकिन आपराधिक वारदातें और अपने गिरोह को संचालित करने के लिए वह शामली आताजाता रहता था. उत्तर प्रदेश पुलिस काफी समय से मोहम्मद नफीस को दबोचने में लगी हुई थी. इस के लिए पुलिस ने अपने मुखबिर भी लगा रखे थे. पुलिस को मुखबिरों से सूचना मिली थी कि नफीस अपनी साली की शादी में शामली आने वाला है, क्योंकि उस की साली की शादी 22 अक्तूबर, 2025 को थी. पुलिस ने अब चारों तरफ अपना जाल बिछा दिया था.

16 अक्तूबर, 2025 को उत्तर प्रदेश पुलिस को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि नफीस शामली पहुंच चुका है तो पुलिस ने घेराबंदी शुरू कर दी थी. नफीस के आने की सूचना मिलते ही शामली पुलिस ने जगहजगह अपनी चेकिंग लगा दी थी. तभी पुलिस को एक पुख्ता जानकारी मिली कि नफीस शनिवार सुबह करीब 4 बजे बुढ़ाना कांधला रोड पर निकलने वाला है.

शामली पुलिस ने बुढ़ाना कांधला रोड पर पहले से ही चैकिंग लगा कर घेराबंदी शुरू कर दी. तभी 4 बजे सुबह एक लाख का इनामी हिस्ट्रीशीटर मोहम्मद नफीस बुढ़ाना की तरफ बाइक से आता हुआ दिखाई दिया. बाइक खुद नफीस चला रहा था, जबकि उस के साथ बाइक के पीछे एक युवक बैठा हुआ था. पुलिस ने जब उसे रुकने का इशारा किया तो वह बाइक तेजी से चलाने लगा. पुलिस को उस के ऊपर शक हुआ तो पुलिस बाइक का पीछा करने लगी. पुलिस ने काफी बाइक का पीछा किया तो भाभीसा गांव के बाहर कीचड़ में उन की बाइक फिसल गई और दोनों बाइक से नीचे गिर गए. तभी नफीस का साथी वहां से निकल कर भाग निकला, जबकि दूसरी ओर नफीस ने .32 बोर पिस्टल से पुलिस के ऊपर फायरिंग शुरू कर दी.

जवाबी फायरिंग में एक गोली सीधे नफीस को लगी, परंतु उस ने फिर भी फायरिंग जारी रखी और उस की ओर से चली एक गोली कोयला थाने के एसएचओ सतीश कुमार की बुलेटप्रूफ जैकेट में फंस गई. उस के बाद तो पुलिस और अधिक सतर्क हो गई थी. उसी बीच पुलिस की ओर से चली एक गोली हिस्ट्रीशीटर नफीस के सीने में ही धंस गई, जिस के कारण उस एक लाख के इनामी बदमाश की मौके पर ही मौत हो गई.

पुलिस को मौके से एक .32 बोर पिस्टल, एक तमंचा .315 बोर, 7 कारतूस (2 खोखे और 5 जिंदा) और एक बाइक बरामद हुई. पुलिस के अनुसार हिस्ट्रीशीटर नफीस के खिलाफ लूट, हत्या और नकली नोटों की तस्करी के 34 मुकदमे दर्ज थे. नफीस जाली करेंसी का एक बहुत बड़ा तसकर भी था और उस ने जाली करेंसी का अपना एक बड़ा नेटवर्क भी खड़ा कर रखा था.

वहीं हिस्ट्रीशीटर नफीस के एनकाउंटर के बाद उस के मोहल्ला खेल, कांधला में इस के चाहने वालों और रिश्तेदारों की एक बहुत भीड़ एकत्रित हो गई थी. वहां पर जब मीडिया के लोग पहुंचे तो मृतक नफीस का छोटा भाई नदीम अपने घर में तख्त पर लेटा हुआ था. मीडिया से बातचीत करते हुए उस ने बताया कि 22 अक्तूबर, 2025 को नफीस की साली का निकाह होने वाला था, जिस के लिए वह कुछ दिन पहले शामली पहुंच गया था.

नदीम ने आगे बताया कि काफी समय से उस का बड़ा भाई नफीस अपनी दूसरी बीवी शमा के साथ कोलकाता में रह कर फेरी लगाने का काम करता था. उस ने काफी समय से सभी बुरे कामों से तौबा कर ली थी. नदीम ने पुलिस पर इलजाम लगाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस कई सालों से मेरे भाई के पीछे पड़ी थी और पुलिस ने पुराने मामलों में वांछित दिखा कर एनकाउंटर में मेरे भाई को मार डाला.

कौन था समयदीन

42 वर्षीय समयदीन उर्फ सामा मोहल्ला रायजादगान थाना कांधला, शामली (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला था. उस के अब्बू का नाम मेहरदीन और अम्मी का नाम सबीना है. समयदीन के 4 भाई फारुख, साबिर, हफीजी, इदरीश के अलावा 5 बहनें हैं. कुल 9 भाईबहनों में समयदीन दूसरे नंबर पर था. समयदीन का परिवार पहले कांधला नगर के मोहल्ला रायजादगान में जोगियों वाली मसजिद के पास रहता था. समयदीन बचपन में अपने पिता व भाइयों के साथ गलीगली फेरी लगा कर सामान बेचने का काम करता था.

पहलेपहले तो समयदीन अपने परिवार वालों के साथ फेरी लगाता था, लेकिन थोड़े दिनों के बाद उस ने अकेले में फेरी लगाने का काम शुरू दिया. इस के पीछे उस की एक गहरी चाल यह थी कि वह फेरी लगाते समय घरों का सूक्ष्मता के साथ जायजा ले लेता था और फिर रात को सेंध लगा कर उन घरों में चोरी भी कर लिया करता था. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही समयदीन ने लूट और चोरी की वारदातें शुरू कर दी थीं. वह बचपन से ही अपराधी प्रवृत्ति का था. लोगों को धमकाना, उन से लूट करना और मारपीट करना उस ने अब अपना पेशा ही बना लिया था.

बेटा अपराध की ओर कदम बढ़ाने लगा तो उस के पेरेंट्स ने सोचा कि यदि इस की शादी कर दी जाए तो कंधे पर जिम्मेदारी आने के बाद शायद सुधर जाए, इसीलिए उन्होंने उस का जल्दी निकाह भी कर दिया था, लेकिन समयदीन शादी के बाद भी नहीं सुधर सका. समयदीन के फेमिली वालों ने उसे अपनी ओर से काफी नसीहतें दीं और अपराध की दुनिया से उसे बचाने की भरसक कोशिश भी की, लेकिन उस का परिचय अब धीरेधीरे बड़े अपराधियों से भी होने लगा था, जिन के साथ वह अब बड़ी वारदातों को भी अंजाम देने लगा था.

उस का अब अपराध की दुनिया से वापस लौटने का इरादा भी नहीं था. घर पर लगातार जब समयदीन की शिकायतें आने लगीं और पुलिस घर पर दबिश देने आने लगी तो उस के अब्बू मेहरदीन ने समयदीन और उस की पत्नी नजमा (परिवर्तित नाम) को अपने परिवार से कानूनी रूप से बेदखल कर दिया. घर से बेदखल किए जाने के बाद समयदीन ने नई बस्ती मुस्तफाबाद, कांधला देहात में अपना नया आशियाना बना लिया और अपनी पत्नी नजमा और अपने बच्चों के साथ वहीं पर रहने लगा.

धमकी का हुआ असर

समयदीन की आपराधिक वारदातों में सब से बड़ी और चर्चित घटना आज से एक दशक पहले हुई थी, जब उस का नाम अपराध की दुनिया में सुर्खियों में आया था. उस समय उस ने कांधला नगर में एक जानेमाने ज्वैलर्स के घर पर एक बड़ी डकैती को अंजाम दिया था. कांधला नगर मोहल्ला राजयादगान में मदन वर्मा नगर के एक प्रतिष्ठित और धनी ज्वैलर्स थे. उन के घर पर रात 11 बजे शादी का कार्ड देने के बहाने समयदीन ने मदन वर्मा के घर का गेट खुलवाया. ज्वैलर्स के परिवार वालों ने सहज में ही गेट खोल दिया.

उस के बाद समयदीन ने कार्ड की जगह पर तमंचा निकाल लिया और गोली मारने की धमकी दे कर मदन वर्मा को उस के परिवार सहित रस्सियों से बांध दिया. वह अपनी पूरी प्लानिंग के साथ आया था, अपने थैले में वह रस्सियां और तमंचा पहले से ही ले कर आया था. उस के बाद मदन वर्मा और उस के फेमिली वालों को धमकी देते हुए उस ने गुर्राते हुए कहा, ”देखो, ध्यान से मेरा चेहरा देख लो, मेरा नाम सामा है. मेरे नाम से ही आमजन के दिल में दहशत हो जाती है, क्योंकि जो मेरा हुक्म नहीं मानता, उसे मैं सीधे गोली मार कर दुनिया से हमेशाहमेशा के लिए विदा कर देता हूं.’’

उस के बाद उस ने परिवार वालों को तमंचा दिखा कर पैसे और ज्वैलरी रखने की जगह के बारे में पूछा. इस पर कुछ परिजनों ने हल्ला करने की कोशिश की तो उस ने विरोध करने वालों की जम कर पिटाई कर डाली और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि लूट तो मैं कर के ही जाऊंगा, यदि जान की सलामती चाहते हो तो मुझे सहयोग करो. इस के बाद ज्वैलर्स के फेमिली वाले बुरी तरह से डर गए और भय के कारण थरथर कांपने लगे. उस के बाद उन्होंने वह जगह समयदीन को बता दी, जहां पर कैश और गहने रखे हुए थे.

एसएचओ सतीश कुमार

समयदीन बहुत शातिर था, वह अपने थैले में पहले से ही टेप रखे हुए था. उस ने ज्वैलर्स और उस के फेमिली वालों के मुंह पर अच्छी तरह से टेप लगा दिया, ताकि वे चिल्ला न सकें. फिर उस ने बड़े आराम और इत्मीनान से ज्वैलर्स के घर से ही एक बड़ा बैग लिया, उस में गहने और कैश रखा और बड़े आराम से वहां से चला गया. दूसरे दिन सुबह जब घर में नौकरनौकरानी आए तो इस बड़ी लूट के बारे में पता लगा.

इस लूट में समयदीन ने करोड़ों रुपए की लूट की थी. बाद में जब पुलिस ने बदमाश के हुलिए के अनुसार गहनता के साथ छानबीन करनी शुरू की तो तब समयदीन का नाम उजागर हुआ था. इस के बाद लगभग 2 वर्षों तक समयदीन उर्फ सामा जेल में रहा. जेल से छूटने के बाद उस ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा, उस के संबंध अब धीरेधीरे अपराध जगत के बड़ेबड़े हस्ट्रीशीटरों से होने लगे थे. समयदीन उर्फ सामा पहने मुकीम गैंग का सदस्य था और इस से पहले वह बागपत के राहुल खट्टू गैंग से भी काफी लंबे समय तक जुड़ा रहा, जहां उस ने एक से बढ़ कर एक आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया.

क्राइम में हुई ग्रोथ

समयदीन के अपराधों का ग्राफ तब एकदम से बढऩे लगा, जब वह गैंगस्टर नफीस के संपर्क में आया. नफीस के साथ में रह कर उस का दिल अपराधों के प्रति अब बहुत क्रूर हो गया था. लूट या डकैती के दौरान जब बंधक उस की बात नहीं मानते थे तो वह उन्हें गोली मारने में नहीं हिचकता था. 18 अक्तूबर, 2025 को शामली में जब एक लाख रुपए के इनामी मोहम्मद नफीस का पुलिस ने एनकाउंटर किया तो उस के बाद पूरे गिरोह की कमान समयदीन उर्फ सामा के हाथों में आ गई थी.

गिरोह की कमान हाथ में आते ही अब वह 20 से 30 साल तक के युवाओं को अपने गिरोह में शामिल कर लूट, फिरौती और डकैती की घटनाओं को अंजाम देने लगा था. समयदीन ने गिरोह के सदस्यों को अपराध के लिए अलगअलग क्षेत्रों में बांट दिया था. समयदीन उर्फ सामा के गिरोह का काम बहुत अच्छी तरह से हो रहा था. वह अपने गिरोह को बखूबी संचालित भी कर रहा था. लेकिन कहते हैं कि यदि किसी इंसान की कोई कमजोरी हो तो वह फिर इस दुनिया में अधिक दिनों तक जिंदा भी नहीं रह सकता है. समयदीन की भी एक बहुत बड़ी कमजोरी थी कि वह अय्याश हो गया था.

एसपी (कैराना) हैंमत कुमार

पुलिस को जब समयदीन उर्फ सामा की इस कमजोरी का पता चला तो पुलिस ने समयदीन और उस की ज्ञात प्रेमिकाओं के मोबाइल ट्रेसिंग के जरिए उसे पकडऩे की योजना बनाई. लगातार छापेमारी के बाद समयदीन ने अब अपना नया ठिकाना जनता कालोनी, उरुकेरे जनपद तुमकुर, कर्नाटक में बना लिया, जहां पर रह कर भी वह उस इलाके में अपराध की घटनाओं को संचालित कर रहा था. 8 दिसंबर, 2025 को मुखबिर से पुलिस को सूचना मिली कि एक कुख्यात बदमाश अपने साथियों के साथ थाना भवन क्षेत्र में किसी बड़ी घटना को अंजाम देने पहुंचा है. मुखबिर से यह सूचना थाना भवन के एसएचओ को भी मिल गई थी.

फिर पुलिस टीम ने भैंसाली इसलामपुर के जंगलों में बंद पड़े ईंट के भट्ठे के चारों ओर घेराबंदी कर मुठभेड़ के बाद इस हिस्ट्रीशीटर को मार गिराया. समयदीन उर्फ सामा के अब्बू मेहरदीन का कई साल पहले इंतकाल हो चुका है. उस के परिवार में अब उस की अम्मी सबीना, भाई फारुख, साबिर, हफीजी, इदरीश तथा 5 बहनें हैं.

भारतीय कानून में एनकाउंटर क्या है?

भारतीय कानून या भारतीय संविधान के अंतर्गत एनकाउंटर शब्द का कहीं जिक्र नहीं है. पुलिस की भाषा में इस का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब सुरक्षा बल और पुलिस की अपराधियों और चरमपंथी के बीच की भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है. भारतीय संविधान में कहीं पर भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का कोई भी प्रावधान नहीं है, लेकिन कुछ नियम और कानून जरूर हैं जो पुलिस या सुरक्षा बलों को यह ताकत देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकते हैं और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.

आमतौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस या सुरक्षा बल आत्मरक्षा के दौरान काररवाई का ही जिक्र करते हैं. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 के अनुसार अगर कोई अपराधी खुद को गिरफ्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन परिस्थितियों में पुलिस उस अपराधी के ऊपर जवाबी हमला कर सकती है. एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल स्पष्ट शब्दों कहा कि इस के लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.

23 सितंबर, 2014 को इस संबंध में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया था. इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन विशेष नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है. UP Crime

 

 

UP Crime: चाइल्ड पोर्न केस – दंपति को सजा ए मौत

UP Crime: इंजीनियर राम भवन ने अपनी पत्नी दुर्गावती के साथ मिल कर 33 मासूम बच्चों से ऐसी दरिंदगी की कि पोक्सो कोर्ट ने दोनों को मरते दम तक फांसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई. आखिर यह उच्चशिक्षित दंपति मासूमों को अपने जाल में किस तरह फांसता था और उन के साथ किसकिस तरह से शोषण किया जाता था, जिस से यह मामला इंटरनैशल  लेवल तक चर्चित हुआ और उन्हें मिली सजा ए मौत?

उत्तर प्रदेश में बांदा जिले का विशेष पोक्सो कोर्ट 18 फरवरी, 2026 को खचाखच भरा हुआ था. बहुत ही खास केस की सुनवाई होनी थी, जो करीबकरीब अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी. केस की जांच सीबीआई के जिम्मे थी. मामला दरजनों मासूम बच्चों के साथ यौनाचार का था, जिन की उम्र 3 साल से 15 साल तक की थी. यह अनोखा मामला भले ही 6 साल से पोक्सो कोर्ट में आया था, लेकिन उत्तर प्रदेश में बच्चों के साथ यौनाचार और उन की अश्लील तसवीरें, वीडियो आदि इंटरनेट मीडिया के जरिए पूरी दुनिया में फैलाने और बेचने की चर्चा साल 2010 से ही बनी हुई थी.

पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा कुछ मिनटों में ही आने वाले थे. हौल की 2 कतारों में लगी बेंचों पर सीबीआई के वकील, यूपी पुलिस, आरोपी, गवाह और बचाव पक्ष के वकील आ चुके थे. यानी कि कोर्ट में साक्ष्यों, सीबीआई के अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष अपनीअपनी बातें रखने के लिए पूरी तैयारी में थे. उन की तत्परता और उत्सुकता देखते बन रही थी. इस बारे में मीडियाकर्मी भी जानने को उत्सुक थे, लेकिन उन्हें वहां से दूर रखा गया था. हौल में तमाम तरह के मोबाइल फोन और दूसरे डिजिटल डिवाइसेस प्रतिबंधित थे.

दरअसल, इस मामले के आरोपी पतिपत्नी थे. मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग का पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन था, जबकि उस का साथ देने वाली उस की पत्नी दुर्गावती पर भी गंभीर आरोप लगे थे. उन दोनों को भारी सुरक्षा के साथ जेल से कुछ समय पहले ही कोर्ट में लाया जा चुका था. कोर्ट के हौल में गहमागहमी का माहौल था. लोग अपने बगल बैठे साथी से फुसफुसा कर बातें कर रहे थे. उन के चेहरे पर यह जानने की उत्सुकता बनी हुई थी कि बच्चों के साथ यौनाचार के मामले में क्या फैसला सुनाया जाता है. वहां कुछ पीडि़तों के परिजन भी चेहरा ढंक कर गुमसुम बैठे थे.

जैसे ही न्यायाधीश महोदय प्रदीप कुमार मिश्रा हौल में आए, वहां अचानक सन्नाटा छा गया. उपस्थित सभी लोग खड़े हो गए. श्री मिश्रा अपनी सीट पर बैठ गए. उन के सामने कई फाइलें पहले से ही रख दी गई थीं. उन में से उन्होंने एक फाइल खोलने के बाद पहले पन्ने को पढऩा शुरू किया. उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था— ‘सैक्सुअली असाल्टिंग केस औफ 33 मेल चिल्ड्रेन’. केस सीबीआई बनाम राम भवन और दुर्गावती का था.

इस मामले की सुनवाई 12 फरवरी, 2021 को ही शुरू हो चुकी थी. कई दौर की सुनवाई के दरम्यान जैसेजैसे इस मामले में आरोपी के खिलाफ गवाहों की फेहरिस्त बढ़ती चली गई थी, वैसेवैसे मामला और भी पेचीदा हो चुका था. आरोपियों के खिलाफ प्याज के छिलके की तरह तथ्यों और तर्कों की परतें उतरने लगी थीं. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलीलों के साथसाथ मामले की फाइल मोटी हो गई थी. पुलिस की उलझी हुई जांच में कई खामियां थीं. तथ्य थे, मगर उस के सबूत नहीं थे. नतीजे पर पहुंचने में उलझनें कम होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

न्यायाधीश ने अचानक अपने सामने रखे लकड़ी के हथौड़े से 3 बार ठकठक की आवाज की. पूरा हौल एकदम से एक बार फिर शांत हो गया. श्री मिश्रा पोक्सो कोर्ट के सरकारी वकील की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, ”हां, तो कमल सिंहजी! आगे की सुनवाई के लिए आप तैयार हैं?’’

”जी जनाब! पहले मैं इस केस के बारे में थोड़ा ब्यौरा देना चाहता हूं.’’ एडवोकेट कमल सिंह ने अनुमति मांगी.

”इजाजत है…संक्षेप में बताइएगा.’’ श्री मिश्रा बोले.

”जी हुजूर! चाइल्ड पोर्न के इस मामले का खुलासा सीबीआई ने किया है. उसे इंटरपोल से केस के बारे में जानकारी मिली थी. 3 मोबाइल नंबरों से बने आईडी के जरिए बच्चों के यौन शोषण के वीडियो औनलाइन अपलोड किए गए थे और यह मटीरियल लगभग 40-45 देशों में बेचा गया था.

”इस बारे में सीबीआई द्वारा बरामद पेन ड्राइव में 36 बच्चों के यौन शोषण के 679 फोटो और वीडियो थे. वे सारे आरोपी राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के घर से मिले थे. इस की जांच पहले ही की जा चुकी है. 4 साल तक चले ट्रायल के दौरान 74 गवाहों से पूछताछ की जा चुकी है.

”इस केस की मूल जड़ में राम भवन और उस की पत्नी है, जिन्होंने मासूम बच्चों को तरहतरह का लालच दिया. अपने घर पर बुलाया और उन के साथ यौनाचार किया.

”यही नहीं हुजूर, दोनों ने उन के साथ यौनाचार के वीडियो और तसवीरें भी बनाईं. उन का कामर्शियल यूज किया और इंटरनेट मीडिया के जरिए विदेशों में बेच दिया.’’

”औब्जेक्शन जज साहब!… पुरानी कहानी दोहरा कर बेवजह कोर्ट का समय बरबाद किया जा रहा है.’’ बचाव पक्ष के वकील बीच में बोल पड़े.

”उन्हें अपनी बात पूरी तरह से रखने दीजिए… आप को भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा…सिंह साहब, आगे बताइए.’’ न्यायाधीश महोदय हथौड़े से तख्ती को पीटते हुए बोले.

जेई राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती – कोर्ट ने सुनाई मरते दम तक फांसी की सजा

”राम भवन मूलरूप से बांदा जिले के नरैनी शहर के रहने वाले चुन्ना प्रसाद कुशवाहा का पुत्र है. उस ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर जिस तरह के घिनौने अपराध किए हैं, उस की जितनी सख्त हो सके सजा दी जानी चाहिए.

”वह पड़ोस, रिश्तेदारों और आसपास के मासूम बच्चों को निशाना बनाते थे. बच्चों को पैसे, गिफ्ट्स और वीडियो गेम का लालच दे कर घर बुलाया जाता था. इस तरह पीडि़त बच्चों की कुल संख्या 33 थी. उन में नाबालिग लड़के थे.

”उन के साथ गंभीर यौन शोषण किया गया था. कई बच्चों को गंभीर चोटें आई थीं, कुछ को अस्पताल में भरती होना पड़ा था और कई मानसिक आघात के चलते शारीरिक समस्याओं की चपेट में आ चुके थे.

”राम भवन, दुर्गावती 10 साल तक बांदा और चित्रकूट घूमते रहते थे. वीडियो बनाने से पहले लड़कों को लुभाने के लिए तोहफों का इस्तेमाल किया था. हुजूर! एक दशक तक राम भवन ने अपना चाइल्ड पोर्न औपरेशन आराम से चलाया था.

”चित्रकूट में एक किराए का कमरा, राज्य के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की पोस्टिंग, एक आम जिंदगी जिस से कोई बाहरी संकेत नहीं मिलता था कि वह अपने आसपास के बच्चों के साथ क्या कर रहा है. सभी पीडि़त 18 साल से कम उम्र के लड़के थे, उन में 3 साल के भी थे.

”राम भवन और उस की पत्नी ने दरजनों पीडि़तों को शामिल करते हुए हैरान करने वाले 2 लाख वीडियो बनाए थे. वह बच्चों पर काम करने के अलगअलग तरीके अपनाता था, जिस में औनलाइन वीडियो गेम तक पहुंच और उन्हें लुभाने के लिए पैसे या गिफ्ट देना शामिल था. उन पर दया दिखा कर और लालच दे कर फंसाया जाता था, फिर उन के साथ गलत व्यवहार किया जाता था. उन्हें फिल्माया जाता था. वे उन्हें मोबाइल फोन, चौकलेट और घडिय़ां देने का भी वादा करते थे.’’

कोर्ट में स्पैशल पब्लिक प्रासिक्यूटर सौरभ सिंह ने भी इस केस में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि फोटो और वीडियो के जरिए राम भवन कई सालों तक बच्चों को धमकाता रहा. इस का पता लगाने में सीबीआई को ग्लोबल पुलिस ग्रुप इंटरपोल से मदद मिली. वहीं से डार्क वेब पर पोर्न की बिक्री से जुड़े 3 मोबाइल नंबर मिले.

सीबीआई की गवाही

दोनों ने पीडि़तों के 2 लाख से ज्यादा आपत्तिजनक वीडियो और तसवीरें इंटरनेट के जरिए लगभग 47 देशों में सर्कुलेट कीं. जांच के दौरान मिली एक पेन ड्राइव में 34 साफ वीडियो और 679 तसवीरें थीं. कपल ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म, वेबसाइट और डार्क वेब पर मटीरियल अपलोड करने, शेयर करने और बेचने के लिए कई मोबाइल नंबरों और ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था. इलेक्ट्रौनिक डिवाइस की फोरैंसिक जांच से एक साफ डिजिटल ट्रेल मिला.

सरकारी वकीलों के बाद न्यायाधीश श्री मिश्रा ने उन के कहने के आधार पर सीबीआई अधिकारी को भी कठघरे में आ कर अपनी बात कहने के लिए बुलाया.

”जनाब, आप ने अपनी जांच में क्याक्या पाया, उस बारे में जज साहब को बताएं.’’ सरकारी वकील बोले.

”जी साहब, जरूर. मैं सब कुछ इस मामले की जांच के आधार पर ही बताऊंगा. जांच के दौरान मैं ने पाया कि आरोपियों ने 33 लड़कों के साथ कई तरह के गलत काम किए थे, जिन में से कुछ की उम्र 3 साल के आसपास थी. इस बारे में 74 गवाहों में से कम से कम 25 ने गवाही दी. पीडि़तों से दरिंदगी का अंदाजा इस बात से लग जाता कि कुछ अभी भी हौस्पिटल में भरती हैं. कुछ पीडि़तों की आंखें टेढ़ी हो गई हैं. पीडि़त अभी भी दरिंदों की वजह से हुए साइकोलौजिकल ट्रामा से जूझ रहे हैं.

”राम भवन ने गलत तरीके से वीडियो रिकौर्ड किए. यह उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन का कामर्शियल इस्तेमाल के लिए किया गया था. जांच में पाया गया कि राम भवन ने जो कुछ भी फिल्माया, उसे बेचने के लिए एक सिस्टमैटिक डिजिटल औपरेशन बनाया था. वे इस बात से बेखबर थे कि इन्वैस्टिगेटर्स इंटरनेट पर सर्कुलेट हो रहे बच्चों के यौन शोषण के मटीरियल पर नजर रख रहे थे. जब उन्हें कपल से जुड़ा कंटेंट मिला, तब वे इंटरपोल की निगाह में आ गए.’’

इस मामले की जांच अक्तूबर, 2020 में सीबीआई को सौंप दी गई. यह वह दौर था, जब पूरा देश कोविड 19 की चपेट में था. लौकडाउन का माहौल था. चौतरफा तरहतरह की सख्ती का आलम था.

हालांकि यह मामला साल 2010 से ही चल रहा था, जिस बारे में कई तरह के घिनौने खेल की बातें मीडिया में आती रहती थीं. मुख्य आरोपी रामभवन चित्रकूट में सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात था. वह बाहर से सामान्य दिखता था और किराए के घर में रहता था. उस के घर के अंदर एक भयानक खेल चल रहा था, इस बात से आसपास के लोग अनभिज्ञ थे, जबकि इस में जेई की पत्नी दुर्गावती भी पूरी तरह शामिल थी. बताते हैं कि 2010 से 2020 तक लगभग 10 सालों तक यह सिलसिला चल रहा था.

देश के कई हिस्सों में चाइल्ड पोर्न को ले कर सीबीआई कई सालों से सक्रिय थी. इसी सिलसिले में सीबीआई द्वारा सितंबर 2020 में अनपरा निवासी इंजीनियर नीरज यादव गिरफ्तार किया गया. दरअसल, अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल ने सीबीआई को सूचना दी थी कि बच्चों के यौन शोषण और अश्लील सामग्री से जुड़ा डिजिटल डेटा मिला है, जो डार्क वेब पर साझा किया जा रहा है और वहां से उसे बेचा जा रहा है. इस के बाद ही सीबीआई ने 30-31 अक्तूबर, 2020 को एफआईआर दर्ज की थी.

उस के बाद आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई. नीरज दिल्ली में रह कर औनलाइन संदिग्ध लिंक साझा करता था. इसी दौरान एक औनलाइन लिंक के आधार पर विशेष औनलाइन चाइल्ड सैक्सुअल एब्यूज एंड एक्सप्लाइटेशन (ह्रष्टस््रश्व) यूनिट की जांच में राम भवन का नाम सामने आया. सीबीआई ने लगभग डेढ़ महीने तक जाल बिछा कर 17 नवंबर, 2020 को कर्वी की एसडीएम कालोनी स्थित किराए के मकान से राम भवन और उस की पत्नी दुगार्वती को गिरफ्तार किया.

इस के लिए सीबीआई ने विदेशी एजेंसियों के साथ जानकारी शेयर की, जिन्होंने मटीरियल के खरीदारों और पाने वालों की भी पहचान की थी, जिस से यह केस और पक्का हो गया. इस की शिकायत मिलने पर 31 अक्तूबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन के खिलाफ केस दर्ज किया. उस के द्वारा बच्चों के अश्लील वीडियो/फोटो बना कर डार्क वेब के जरिए अंतरराष्ट्रीय पेडोफाइल नेटवर्क तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया. इस के बाद 17 नवंबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को गिरफ्तार कर लिया था.

दाखिल हुई चार्जशीट

गिरफ्तारी के 88 दिन बाद 12 फरवरी, 2021 को बांदा कोर्ट में 700 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी. चार्जशीट में मैडिकल रिपोर्ट और बच्चों के बयानों को आधार बनाया गया. इस दौरान सीबीआई की टीम ने 4 से 42 साल तक की उम्र के लोगों के बयान दर्ज किए. सभी का मैडिकल परीक्षण कराने के साथ डिजिटल सबूत को कनेक्ट किया गया था.

इस के बाद बच्चों से जुड़ा मामला होने के चलते सीबीआई ने पोक्सो कोर्ट में ट्रायल की शुरुआत जून, 2023 से करवाई. इस सिलसिले में सीबीआई ने 74 गवाह पेश किए. सरकारी वकील ने मांग करते हुए कहा कि डीएम को एक पत्र लिखा जाए, जिस में पीडि़त बच्चों को 10-10 लाख रुपए की राशि देने का काम किया जाए. बांदा के पोक्सो कोर्ट में 18 फरवरी, 2026 की सुनवाई करीबकरीब पूरी हो गई. दोनों आरोपियों राम भवन और दुर्गावती को दोषी ठहराया गया. उन के खिलाफ फैसला 20 फरवरी, 2026 को सुनाया गया, जो भारतीय कानून के इतिहास में काफी बड़ा था.

बांदा के स्पैशल पोक्सो कोर्ट में पेशी के लिए दंपति को ले जाती पुलिस

न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने कहा, ”सीबीआई की विशेष जांच के बाद सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को 33 बच्चों के यौन शोषण और उन के वीडियो बना कर डार्क वेब पर बेचने का दोषी पाया गया है. यह मामला ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ श्रेणी में रखा गया है.’’

उन्होंने कहा कि उन का अपराध इतना भयावह और योजनाबद्ध था कि सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची. दोनों दोषियों को मरते दम तक फंदे पर लटकाए रखने का आदेश दिया जाता है. उन्हें ‘मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए!’

फांसी की सजा के साथसाथ कोर्ट ने राम भवन पर 6.45 लाख रुपए और दुर्गावती पर 5.40 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया.  साथ ही न्यायालय ने पीडि़त बच्चों के पुनर्वास के लिए महत्त्वपूर्ण आदेश दिए.

कानून और पीनल कोड

दंपति को इंडियन पीनल कोड और पोक्सो  ऐक्ट के तहत गंभीर पेनेट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट, पोर्नोग्राफिक मकसद के लिए बच्चों का इस्तेमाल, बच्चों से जुड़े पोर्नोग्राफिक मटीरियल का स्टोरेज, उकसाना और क्रिमिनल कांसपिरेसी जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था. इस के 163 पेज के फैसले में, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज प्रदीप कुमार मिश्रा की कोर्ट ने ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ सिद्धांत लागू किया.

कोर्ट ने कहा कि कई जिलों में इस तरह के उत्पीडऩ का बड़ा पैमाना, दोषियों की बहुत ज्यादा नैतिक गिरावट के साथ मिल कर, इसे इतना असाधारण और घिनौना अपराध बनाता है कि इस में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, जिस से न्याय के मकसद को पूरा करने के लिए आखिरी न्यायिक रोकथाम की जरूरत है. इस फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को 33 पीडि़तों में से हर एक को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया. साथ ही दंपति के घर से जब्त किया गया कैश 8 लाख रुपया भी पीडि़तों में बराबर बांटने के लिए कहा गया.

आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषी हाई कोर्ट में अपील कर सकते हैं. वहां से राहत नहीं मिलने की स्थिति में वे सुप्रीम कोर्ट और उस के बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर सकते हैं. इस बारे में जानकार वकील का कहना है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए दंपति को उच्च अदालतों से राहत की संभावना कम है. भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड के मामलों की स्वचालित पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है, जिस के बाद ही सजा अंतिम रूप लेती है.

केस से जुड़े वकीलों ने दंपति को सजा ए मौत सुनाए जानें पर अपनी खुशी व्यक्त की

यह भी बताया जाता है कि जेई राम भवन अपनी अवैध कमाई को जमीन खरीद में निवेश करने की योजना बना चुका था, किंतु वह इस में सफल नहीं हो पाया. सीबीआई जांच में पता चला कि उस ने वर्ष 2018 में 21 बीघा जमीन खरीदने की कोशिश की थी. राम भवन ने शोभा सिंह का पुरवा स्थित एसडीएम कालोनी के पास यह जमीन खरीदने की योजना बनाई थी. इस सौदे के लिए उस ने 2 अन्य इंजीनियरों को भी अपने साथ शामिल कर लिया था. जमीन की शुरुआती मांग 18 करोड़ रुपए थी, जिस पर राम भवन ने लगभग 8 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी.

एक साल तक चली जमीन की सौदेबाजी के दौरान वर्ष 2019 में भूस्वामी ने 14 करोड़ रुपए की कीमत तय की थी, किंतु जेई राम भवन 10 करोड़ रुपए से अधिक देने को तैयार नहीं हुआ, जिस के कारण यह सौदा नहीं हो सका. इसी बीच रामभवन की अवैध गतिविधि से धन कमाने का पता चला, जिसे जमीन में निवेश कर वैध बनाना चाहता था. सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी के बाद जमीन के सौदे से जुड़े लोगों से गहन पूछताछ की थी. जांच एजेंसी ने उस की संभावित अवैध आय के स्रोतों की भी पड़ताल की.

स्थानीय लोगों के अनुसार, तीनों साझेदार इस जमीन पर अपने लिए अलगअलग आवास भी बनवाना चाहते थे. सौदेबाजी के दौरान कीमत को ले कर भूस्वामी और जेई के बीच मतभेद बना रहा. अंतत: 10 करोड़ रुपए से अधिक न देने की जिद के कारण सौदा रद्द हो गया. सिंचाई विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया कि पुराने अफसरों ने कई बार राम भवन के काम में लापरवाही की शिकायत की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई, क्योंकि राम भवन की सत्ता के गलियारों के साथ ही विभाग में तगड़ी पैठ थी. कभीकभी तो वह सप्ताहसप्ताह भर दफ्तर से गायब रहता था.

उस की पैठ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के 16 दिन बाद 18 नवंबर, 2020 को उसे निलंबित किया गया. उस का निलंबन उस समय के जिलाधिकारी शेषमणि त्रिपाठी व सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता वी.के. निरंजन के आदेश पर हुआ था. यह मामला डिजिटल प्लेटफार्म के दुरुपयोग और डार्क वेब के जरिए संचालित अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है. जांच एजेंसियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े ऐसे मामलों में तकनीकी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय बेहद महत्त्वपूर्ण है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाल यौन शोषण और औनलाइन आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कड़ा संदेश है. अदालत ने न केवल दोषियों को कठोर सजा दी, बल्कि पीडि़त बच्चों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति पर भी विशेष ध्यान दिया.

दिल्ली का इंजीनियर भी बेचता था पोर्न वीडियो

जेई समेत उस की पत्नी को यौनाचार और पोर्न वीडियो बेचने के जुर्म में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद सीबीआई इस तरह के मामले की तहकीकात काफी सक्रियता से करने लगी है. इस सिलसिले में दिल्ली के इंजीनियर मोहम्मद आकिब भी निशाने पर आ चुका है. आकिब पर भी बच्चों के यौन शोषण के वीडियो विदेशों में बेचने का आरोप है. इस संबंध में सीबीआई ने गूगल के अधिकारियों समेत 8 लोगों के बयान दर्ज करने की तैयारी की है. जल्द ही आकिब भी सीबीआई के शिकंजे में कसा जा सकता है.

दरअसल, मासूम लड़कों के साथ यौन शोषण और वीडियो बना कर बेचने के मामले में जेई राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के साथ तीसरा आरोपी आकिब ही है. वह दंपति से वीडियो मंगवाता था और फिर उन्हें विदेशों को भेज कर मोटी कमाई करता था. इस से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा राम भवन को भी देता था. सीबीआई के लोक अभियोजक दारा सिंह मीणा के अनुसार सालों से चल रहे इस अपराध में आकिब भी पोर्न बाजार का एक शातिर खिलाड़ी है.

उस का दोष गूगल के अधिकारियों समेत एयरटेल कंपनी व एम्स के डाक्टरों से चिकित्सीय परीक्षण की रिपोर्ट समेज कुल 8 लोगों से पूछताछ के बाद ही तय हो पाएगा. मोहम्मद आकिब दिल्ली का रहने वाला पेशे से इंजीनियर है. उस के खिलाफ की गई जांच में पाया गया है कि वह जेई और उस की पत्नी से ईमेल के जरिए अश्लील सामग्री मंगवाता था. उस के बाद विभिन्न देशों में इसे भेज कर मोटी कमाई करता था. UP Crime

 

UP News: चांदनी की चाहत

UP News: चांदनी वास्तव में  इतनी खूबसूरत थी कि गोरखपुर का विश्वकर्मा चौहान उस पर मर मिटा था. जबकि वह एक बेटी का बाप था. पत्नी ममता उस पर जान छिड़कती थी, लेकिन प्रेमिका चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा एक दिन ऐसा जघन्य अपराध कर बैठा कि न वह घर का रहा और न घाट का.

विश्वकर्मा ने प्रेमिका चांदनी से मिल कर पत्नी ममता के साथ हुए विवाद के बारे में सारी बातें बताईं और उसे रास्ते से हटाने के बारे में सुझाव भी मांगा तो उस ने बड़ी खूबसूरती के साथ अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, ”जो भी करना है, आप को करना है. मुझे तो आप के पहलू में सिर रख कर सोना है बस.’’

उधर बेटी की परवरिश के लिए ममता पति विश्वकर्मा से अपने हक के लिए दबाव बनाए हुए थी. पत्नी के दबाव से वह परेशान हो गया था. इसी बीच उस ने अपने हिस्से की गांव वाली जमीन पापा से अपने नाम रजिस्ट्री करा कर वह 35 लाख रुपए में बेच दी. जब ममता को जानकारी हुई कि पति ने गांव वाली अपने हिस्से की जमीन 35 लाख रुपए में बेच दी है तो वह उन रुपयों में से आधा हिस्सा मांगने लगी. पति ने फिर वही रटारटाया जवाब दिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए, उसे एक फूटी कौड़ी नहीं देगा. इस के बाद पति और पत्नी के बीच विवाद और गहराता चला गया.

ममता और विश्वकर्मा के बीच विवाद इस कदर बढ़ता चला गया कि विश्वकर्मा को ममता के नाम से ही नफरत हो गई थी और उस के खून से अपने हाथ रंगने के लिए तैयार हो गया था. उस दिन के बाद से वह पत्नी की हर गतिविधि पर नजर रखने लगा. वह उस की रेकी करने लगा था. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी. ममता अपनी बेटी को साथ ले कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में किराए के कमरे में रहती थी. यहीं रह कर वह प्राइवेट जौब कर अपनी और बेटी की परवरिश करती थी. विश्वकर्मा ने पता लगा लिया था कि वह बेटी के साथ कहां रहती है.

बात 4 सितंबर, 2025 की है. शाम साढ़े 7 बजे ममता बेटी को साथ ले कर घरेलू सामान की खरीदारी और फोटो खिंचवाने के लिए बाजार गई थी. पत्नी को घर से बाहर निकलते देख पहले से घात लगाए बैठा विश्वकर्मा अलर्ट हो गया और उस के पीछे लग गया. जहांजहां वह जाती, विश्वकर्मा उस के पीछे था. इस बात से अंजान ममता अपनी धुन में खोई बेटी के साथ बाजार की ओर बढ़ती रही. उसे इस बात का कतई अंदेशा नहीं था कि पति उस का पीछा कर रहा है.

ममता बेटी को ले कर गीता वाटिका के आसपास की दुकानों से सामान खरीद कर जेल रोड के सामने स्थित राधिका स्टूडियो में दाखिल हुई तो स्टूडियो से थोड़ी पहले विश्वकर्मा अपनी बाइक खड़ी कर के उस के वहां से आने का इंतजार करने लगा. करीब 20 मिनट बाद ममता बेटी के साथ फोटो खिंचवा कर स्टूडियो से बाहर निकली तो उसे देखते ही विश्वकर्मा का जबड़ा गुस्से से भिंच गया.

ममता स्टूडियो से जैसे ही थोड़ी आगे बढ़ी, तभी विश्वकर्मा उस के सामने आ खड़ा हुआ. पति को सामने देख कर ममता सहम गई और वहीं खड़ी हो गई. बेटी भी पापा को देख कर सकते में आ गई. अभी वह कुछ कह या समझ पाती, तब तक उस ने हेलमेट में छिपा कर रखा तमंचा निकाला और एक गोली पत्नी ममता के सीने में और दूसरी गोली बाएं कंधे पर चला दी.

गोली लगते ही ममता लहराते हुए जमीन पर गिर पड़ी और तड़पने लगी. यह देख कर बेटी अपनी जान बचा कर वहीं आसपास छिप गई. विश्वकर्मा घुटने जमीन पर टिका कर नीचे बैठ कर तड़प रही पत्नी को गौर से देखने लगा और होंठों में बुदबुदाया, ”कहा था मैं ने कि मुझ से पंगा मत ले, मत ले, लेकिन तू नहीं मानी. तूने मेरी बात मान ली होती और आराम से तलाक दे दिया होता तो तू ऐसे सड़क पर नहीं पड़ी होती, जिंदा रहती. अपनी बेटी के साथ जीती, लेकिन अपनी अकड़ के आगे तूने झुकना नहीं सीखा तो मैं कहां तुझे बख्शने वाला था. हरामजादी कहीं की…’’

इधर गोली चलने की आवाज सुनते ही व्यापारी अपनी दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिराने लगे. कुछ ही देर में वहां सन्नाटा पसर गया. इसी बीच भीड़ में से किसी ने घटना की सूचना गोरखपुर के शाहपुर थाने के इंसपेक्टर नीरज राय को दे दी. घटना की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर राय फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने देखा तमंचा हाथ में लिए हत्यारा विश्वकर्मा चौहान वहीं बैठा है. फिर क्या था, पुलिस ने उसे तमंचे सहित गिरफ्तार कर लिया.

आननफानन में घायल ममता को जीप में लाद कर जेल रोड स्थित विनायक नर्सिंगहोम ले जाया गया, जहां डौक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया.

मम्मी की मौत की सूचना मिलते ही मासूम बेटी लडख़ड़ा कर फर्श पर जा गिरी. वह यह समझ नहीं पा रही थी कि उस के साथ ये क्या हो रहा है. ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे इतनी बड़ी सजा दी है. सिर से मम्मी का साया छिन गया तो वह अब किस के सहारे जीएगी? वीरान सी जिंदगी अकेले कैसे जीएगी? पुलिस ने ममता के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए गुलरिहा स्थित बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस ने ममता के मोबाइल फोन से उस के बड़े भाई संदीप चौहान, जो लुधियाना में परिवार सहित रहता था, को सूचना देते हुए मौके पर आने के लिए कहा.

बहन की हत्या की सूचना मिलते ही वह  उसी रात प्राइवेट वाहन से लुधियाना से गोरखपुर के लिए रवाना हो गया था. अगले दिन यानी 5 सितंबर, 2025 को संदीप चौहान परिवार सहित गोरखपुर पहुंचा और शाहपुर थाने आया तो वहां मामा संदीप को देखते ही उस की भांजी उस से लिपट कर फफकफफक कर रोने लगी. भांजी को रोता देख कर संदीप भावुक हो उठा. सुरक्षा के लिहाज से पुलिस ने बीती रात से ही मृतका की बेटी को अपनी सुरक्षा में ले रखा था, ताकि उसे कोई नुकसान न पहुंचा सके. क्योंकि इस घटना की वही एकमात्र चश्मदीद गवाह थी.

पोस्टमार्टम के बाद में पुलिस ने ममता चौहान की लाश उस के भाई संदीप को सौंप दी थी. जहां उन्होंने राजघाट श्मशान में अंतिम संस्कार कराया और उसे साथ ले कर अपने गांव खजनी के पुरैना कटया चला गया. आरोपी विश्वकर्मा चौहान से की गई पूछताछ में कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

36 वर्षीया ममता चौहान 3 भाइयों संदीप चौहान, सनी चौहान और सुभाष चौहान के बाद जन्मी थी. घर में वह सब से छोटी थी और सब की लाडली भी थी. सब से बड़े भाई संदीप से उस की काफी निभती थी. ममता पिता के समान बड़े भाई को सम्मान देती थी.

मन जैसा नहीं था पति

ममता नाम के अनुरूप ही थी. उस की वाणी से रस टपकता था. लोग उस की प्रशंसा किए बिना रहते नहीं थे, लेकिन जिद्ïदी तो इतनी थी कि एक बार किसी काम के लिए अपनी जिद पर अड़ जाती तो उसे पूरा किए बिना पीछे हटती नहीं थी. घर ही नहीं आसपास के सभी लोग उस के इस व्यवहार से वाकिफ थे. धीरेधीरे बचपन की गलियों को पीछे छोड़ उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखा तो फेमिली वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. फेमिली वालों ने उस की शादी के लिए नातेरिश्तेदारों से अच्छे लड़के की तलाश करने के लिए कह रखा था.

ममता चौहान

जल्द ही फेमिली वालों की मनोकामना पूरी भी हो गई और ममता के लिए जैसा वर चाहते थे, उन्हें हरसेवकपुरम के रहने वाले विश्वकर्मा चौहान के रूप में मिल गया था. फिर जल्द ही उन की शादी हो गई. कसरती और गठीले बदन वाला विश्वकर्मा चौहान देखने में मेहनतकश तो लगता था, लेकिन वह वैसा था नहीं. ममता ने सपनों के जिस राजकुमार की कल्पना की थी, वह वैसा निकला नहीं. पति का चरित्र रसिक और आपराधिक था, क्योंकि अपने हार्डकोर क्रिमिनल भतीजे की संगत में रह कर वह भी छोटेमोटे अपराध करने लगा था.

जब तक ममता पति की पूरी सच्चाई जानती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि तब तक वह एक बेटी की मां बन चुकी थी. धीरेधीरे बेटी बड़ी हो रही थी. पिता की आपराधिक छाया बेटी पर न पड़ेे, इसलिए वह पति को आपराधिक छवि से दूर होने के लिए समझाती रही. एक दिन ममता ने पति को समझाते हुए कहा, ”ऐ जी, तुम यह काम छोड़ क्यों नहीं देते? देखो, अब तुम्हारा परिवार है. एक बेटी भी हो चुकी है. धीरेधीरे बड़ी होगी और जब मुझ से पापा के काम के बारे में पूछेगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगी. क्या कहूंगी उसे कि तेरे पापा अच्छा काम नहीं करते, वह बुरे इंसान हैं तो उस के बालमन को कितना गहरा आघात पहुंचेगा. इस बारे में कभी सोचा है?’’

”यार, तुम कितना बकबक करती हो. सोने भी नहीं देती, जा चुपचाप सो जा. रात काफी गहरी हो चुकी है. इस बारे में हम सबेरे बात करते हैं. मुझे जोर की नींद आ रही है.’’ पत्नी के सवालों को सुन कर विश्वकर्मा बात इधरउधर टालमटोल कर सोने का बहाना बनाने लगा था.

”एक नहीं सुनूंगी मैं आज तुम्हारी. क्यों न पूरी रात यंू ही आंखों में कट जाए, लेकिन अपने सवालों के जबाव सुने बगैर न खुद सोऊंगी और न ही सोने दूंगी. बताइए, ये गंदा काम छोड़ कर क्यों नहीं कोई दूसरा काम करते हैं, जिस में 2 पैसों की आमदनी हो और सम्मान से जीए भी.’’

”मेरे को गुस्सा मत दिला ममता. सोने दे. कहा न, इस बारे में कल सबेरे बात करते हैं. फिर सुनती क्यों नहीं?’’ उस ने पत्नी को डांटा.

”मेरे सवालों का जबाव दे दो, चुप हो जाऊंगी. तुम्हारा कल का सवेरा कभी आता ही नहीं. सवेरा हुआ नहीं कि तैयार हो कर बाहर निकल जाओगे और फिर रात में ही घर वापस लौटोगे. तो बताओ, मैं कब तुम से बात करूं?’’

”जिसे तुम गंदा काम कहती हो, वह मेरा प्रोफेशन है, अपने प्रोफेशन से अलग रह कर जिंदा नहीं रह सकता मैं. मेरे से पहले मुझे कोई टपका दिया तो करती रह जाना शृंगार. बेवा की जिंदगी ही नसीब होगी, इसलिए तुम भी सो जाओ और मुझे भी सोने दो. बेटी सो रही है, जग जाएगी. मेरे को भी पता है कि बेटी बड़ी होगी और मेरे पेशे के बारे में जानेगी तो उसे दुख होगा. तब की तब देखी जाएगी. तब के लिए रात क्यों खराब करती हो?’’ कहते हुए विश्वकर्मा खर्राटे भरने लगा और ममता उसे देखती रह गई.

सुबह होते ही फ्रैश हो कर विश्वकर्मा नाश्ता कर के बाहर निकल गया. रात का ममता का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था. नाश्ता बना कर पति को दे तो दिया था, लेकिन गुस्से से उस का नथुना अभी भी फूल और पिचक रहा था.

सौतन लाने की थी तैयारी

विश्वकर्मा के दिन का आधा समय सोशल मीडिया (फेसबुक) देखने में बीत जाता था. यही नहीं, फेसबुक पर लड़कियों से घंटों चैटिंग करता रहता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. चैटिंग करता था सो अलग की बात थी, कई लड़कियों से उस के अफेयर चल रहे थे, जिन में चांदनी नाम की एक युवती को तो पत्नी की सौतन बनाने की तैयारी में जुटा हुआ था. पति की करतूतों से ममता के सपने आहत हो चुके थे. जो सपने आंखों में सजाए पीहर से ससुराल आई थी, सासससुर और जेठ सब के सब मम्मीपापा और भाई जैसे ही मिले, लेकिन जिस के साथ जीवन बिताना था, वही छलिया निकला. अब बेटी ही उस के जीने का एकमात्र सहारा बची थी.

पत्नी के हत्या के आरोपों में सलाखों के पीछे विश्वकर्मा चौहान

जब से पति कि चरित्र की कलई उस के सामने खुली थी, तब से उस का मन पति के प्रति घृणा से भर गया था. नफरत हो गई थी उस की सूरत से. धीरेधीरे दोनों के बीच मनभेद ने अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया था. ममता और विश्वकर्मा एक छत के नीचे रहते तो जरूर थे, लेकिन उन में अजनबियों जैसा व्यवहार था. उन के बीच में बातचीत कम होती थी, वाट्सऐप से बातें होती थीं. किसी चीज की जरूरत होती थी तो ममता उसे वाट्सऐप पर मैसेज भेज देती थी. विश्वकर्मा उसे पकड़ कर उस की जरूरतें पूरी कर देता था.

पत्नी करने लगी थी नफरत

पत्नी की नफरत भरी हरकतों से विश्वकर्मा का भी मन उस के प्रति नफरतों से भरता जा रहा था. इस का नतीजा यह हुआ कि पत्नी से दूरियां बना गर्लफ्रेंड चांदनी को घर की जीनत बनाने के ख्वाब देखने लगा. कल तक जो पति छिपछिप कर अपनी महिला दोस्तों से फेसबुक पर चैटिंग करता था, वह अब पत्नी के सामने उन से रोमांटिक बातें करता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. धीरेधीरे बेटी 10 साल की हो गई थी. मम्मी और पापा के बीच की दूरियों को समझ रही थी. उन के खटास रिश्तों को अपने प्यार की मिठास से सुंदर बनाने की अथाह कोशिश करती रही, लेकिन उस का यह प्रयास नाकाम साबित हुआ था.

दिन पर दिन पतिपत्नी के रिश्तों में खाई और गहराती जा रही थी. यह देख और सोच कर बेटी का हृदय आत्मग्लानि से भरा जा रहा था कि मेरा क्या कुसूर था, जो मम्मी और पापा के झगड़े के बीच वह पिस रही है. ममता के कंधे पर बेटी की जिम्मेदारी का बोझ आ गया था. पति इधरउधर से जो भी कमाता था, अपनी अय्याशी पर उड़ा देता था. बेटी से भी उस ने एक तरह से मुंह मोड़ लिया था. जबकि बेटी सयानी होती जा रही थी. उस का भविष्य दोनों की लड़ाईझगड़े के बीच पिसता जा रहा था. पति ने जब अपना हाथ खींच लिया तो ममता बेटी के जीवन संवारने के लिए प्राइवेट नौकरी करने लगी.

ममता के घर से बाहर नौकरी करने पर विश्वकर्मा को आपत्ति थी. पति के इस रवैए से नाखुश ममता बेटी को साथ ले कर मायके खजनी चली गई. वहां कुछ दिनों तक रही और बड़े भाई संदीप से अपना दुखड़ा रोती रही. भाई भी बहनोई के चरित्र से परेशान हो चुका था. वह भी नहीं समझ पा रहा था कि दोनों के रिश्ते को कैसे सही करूं. दोनों को समझासमझा कर थक चुका था, लेकिन इस का नतीजा सिफर ही निकला.

पत्नी ममता के मायके में रहने से विश्वकर्मा चौहान स्वच्छंद जीवन जी रहा था. उस के जीवन में कई लड़कियों ने अपना बसेरा डाल रखा था. समयसमय पर वह सभी के साथ फ्लर्ट करता था. उन लड़कियों में एक लड़की सब से अलग मिजाज की थी, जिस का नाम था चांदनी. बिलकुल चांदनी के माफिक उजली गोरीचिट्टी, मानो खुद चांदनी धरा पर अपनी छटा बिखेर रही हो. उस से टूट कर प्यार करता था विश्वकर्मा. वह भी उसे दिल की गहराइयों तक प्यार करती थी. उस के प्यार में अंधी थी वह.

विश्वकर्मा के जीवन में चांदनी के आने के बाद उस के जीने का तौरतरीका ही बदल गया था. पत्नी ममता तो उसे फूटी आंख नहीं भा रही थी. वह चाहता था कि पत्नी से जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आजादी मिल जाए तो चांदनी के साथ शादी कर के आगे का जीवन मजे से जीए. लेकिन ममता एक पढ़ीलिखी, मेहनतकश और मजबूत इरादों वाली महिला थी. इतनी आसानी से वह पति को आजादी देने वाली नहीं थी. कसम खा ली थी कि शरीर के चाहे टुकड़ेटुकड़े हो जाएं, पति को आजादी नहीं दूंगी.

पति के चालचलन से खीझ कर ही वह बेटी को साथ ले कर मायके चली गई थी. पत्नी के मायके जाने से विश्वकर्मा चौहान की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. पत्नी के इस फैसले से वह बेहद खुश था, जैसे उस की मुराद पूरी हो गई थी. विश्वकर्मा चौहान का मकान पूरी तरह से खाली था. मम्मीपापा गांव में रहते थे. एक भाई था, वह भी अपने परिवार के साथ अलग रहता था. पत्नी के मायके जाने के बाद उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

पत्नी के जाने के बाद अपनी प्रेमिका चांदनी को वह अपने घर ले आया था. एक मेहमान की तरह उस ने उस की खूब आवभगत की. बढ़चढ़ कर उस की खातिरदारी की. अपनी शानदार आवभगत से चांदनी बहुत खुश हुई. अपनी भावनाओं को वह रोक नहीं पा रही थी. आखिरकार उस ने कह ही दिया, ”बहुत खुश हूं मैं आप की मेहमाननवाजी से. मेरा दिल भर गया. नहीं जानती थी कि आप मुझे से इतना प्यार करते हो. मेरे लिए आप के दिल में इतना सम्मान है, चाहत है, बेपनाह इश्क है.’’

”सो तो है,’’ विश्वकर्मा अपना अपना दायां हाथ बाएं सीने से सटा कर अदब से झुक कर बोला था, ”मैं चीज ही ऐसा हूं जनाबेआली. मेरी अनोखी खातिरदारी से अच्छेअच्छे लोग पिघल जाते हैं. फिर आप फिसली तो क्या फिसली.’’

”अच्छा!’’ चांदनी चहक कर बोली, ”जनाब को खुद के आदरसत्कार पर बड़ा नाज है, लगता है.’’

”जी, मोहतरमा. कोई शक.’’

”नहीं,’’ कह कर दोनों ने एकदूसरे को प्यारभरी नजरों से देखते हुए ठहाके लगाए.

हालांकि इस से पहले भी विश्वकर्मा चांदनी को अपने घर पर कई बार ले कर आ चुका था, मगर दोनों को जितना आनंद आज के दिन आया था, उतना आनंद इस से पहले कभी नहीं आया था.

खैर, ठहाका लगातेलगाते वह चांदनी के बगल में बैठ गया तो वह भी गंभीर हो

बिखरे आंचल को सहेजने लगी और सहज हो गई.

जेल रोड स्थिर राधिका स्टूडियो जहां बेटी के साथ फोटो खिचवाने पहुंची थी ममता चौहान

पलभर के लिए कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था. दोनों के दिलों की धड़कनें तेज हो गई थीं. प्रेम अग्नि में उन के तनबदन तपने लगे थे. एक अजीब सी ठंडीठंडी सुरहुरी चांदनी के बदन में उठ रही थी. उस का रोमरोम खिल उठा था. विश्वकर्मा धीरेधीरे बेकाबू हो रहा था. चांदनी भी उस की तपिश में पिघलती जा रही थी. इश्क की आग में दोनों बराबर जल रहे थे. विश्वकर्मा के छूते ही वह छुइमुई की तरह सिकुड़ती जा रही थी. उस के पूरे बदन में झुरझुरी पैदा हो गई थी. सांसें धौंकनी की तरह तेजतेज चलने लगी थी. वह बेकाबू होती जा रही थी, फिर भी खुद पर नियंत्रण रखे हुई थी. वह आहिस्ता से बोली, ”बस, मुझे और बेकाबू मत कीजिए, वरना जूठी हो जाऊंगी.’’

प्यार में हुआ अंधा

”रोको मत, मुझे. हो जाने दो बेकाबू मुझे. आज पूरी तरह समा जाना चाहता हूं मैं.’’ विश्वकर्मा मद्धिम स्वर में बोला.

”नही…नहीं.’’ चांदनी कसमसा उठी, ”अभी नहीं. आप जब पूरी तरीके से मुझे पूरा अधिकार देंगे, तभी मैं सौंपूंगी खुद को आप के हवाले.’’

”कैसी बातें करती हो मेरी जान. तुम तो मेरी हो और मैं तुम्हारा हूं. क्या मुझ पर और मेरे प्यार पर तुम्हें भरोसा नहीं है.’’

”पूरा भरोसा है, यकीन भी है, लेकिन…’’

”लेकिन क्या?’’

”अब और सहन किया नहीं जा रहा है, मुझ से. समा जाने दो मुझे तुम में.’’

”नहीं…नहीं…अभी नहीं. शादी से पहले नहीं.’’

”जिद मत करो, चांदनी. तुम्हारी दूरी तनिक भी बरदाश्त नहीं हो रही है. 2 जिस्म एक जान हो जाने दो हमें. अपने प्यार की एक नर्ह कहानी अपने जिस्म पर लिख लेने दो हमें.’’ वासना की आग में जलता हुआ विश्वकर्मा बोले जा रहा था. जबकि प्रेमिका चांदनी लगातार उस से दूरियां बनाए हुए थी.

”देखिए, इस वक्त आप पूरी तरह बहक रहे हैं. ऐसे में कोई ऊंचनीच हो जाएगी तो समाज हम पर थूकेगा. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी मैं. सो प्लीज, मेरी बात मान जाइए और दूर हो जाइए.’’

प्रेमिका की बात सुन कर विश्वकर्मा के सिर से रोमांस का भूत उतर गया और वह बुरी तरह झल्ला उठा. वह बोला, ”अच्छेखासे मूड का तुम ने कचरा बना दिया.’’

”मैं ने क्या किया, जो आप इतना बिदक रहे हो.’’ चांदनी के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान थिरक रही थी, ”मैं ने थोड़ा सा सामाजिक आइना ही तो दिखाया आप को. यही कहा न कि अभी नहीं. जो करना है शादी के बाद करना है तो भला इस में क्या गलत कहा. इतने ही उतावले हो रहे हो मेरे जिस्म को पाने के लिए तो क्यों नहीं अपनी बीवी को तलाक दे रहे हो.’’ चांदनी के स्वर में अजीब सी तल्खी थी, जैसे सीधे छुरी उस के सीने में उतार दिया हो.

”क्या बेवकूफों की तरह बकवास करती हो तुम?’’

”आ…ह…हा… अब मेरी बात बेवकूफों की तरह लगने लगी.’’

”हां, तो…’’

”तो क्या? कुछ भी गलत तो नहीं कहा मैं ने. अपनी बीवी को तलाक दे दीजिए, मुझ से शादी कीजिए और मेरी जवानी के मजे लीजिए.’’

”तलाक…तलाक…तलाक… क्यों मेरे दिमाग का दही बना रही है. दे दूंगा, उसे तलाक भी दे दूंगा, पर आज का दिन तो मत खराब कर मेरी जान. मजे तो लूट लेने दे, क्यों तड़पा रही हो, क्यों सता रही हो अपने दीवाने को. बेचारा मुफ्त में मर जाएगा तेरी इस नानुकुर में.’’

”अपने राजा को ऐसे थोड़े ही न मरने दूंगी मैं,’’ शरारत भरे अंदाज में चांदनी बोली, ”अभी तो मेरे राजा को जन्नत की सैर करानी बाकी है.’’

”देख चांदनी, तू मेरे को ऐसे मत सता, मेरा मूड खराब हुआ तो…’’

ममता चौहान की मां

”तो…तो…क्या करोगे जानू.’’ चांदनी ने प्रेमी को जलाने के लिए उसे छेड़ा, ”जान से मार देंगे?’’

”अरे नहीं, यही तो नहीं कर सकता मैं. ऐसा करने से पहले मैं मर जाऊंगा. तू तो मेरी जान है. मेरे रगों में बहने वाला खून है. भला तुम्हें क्यों मारूंगा. अब तो कुछ न कुछ जल्द सोचना ही पड़ेगा.’’

”किस बारे में?’’

”तुम्हारे बारे में.’’

”मतलब?’’

”मतलब, तुम से दूर रह कर तो जी नहीं सकता और तू करीब आने नहीं देगी तो मुझे पत्नी के तलाक के बारे में सोचना ही पड़ेगा. जितनी जल्द उसे तलाक दूंगा, तभी तो तुम्हें अपने घर की जीनत बना सकंूगा.’’

”अब की है मुद्ïदे की बात. बीवी को तलाक दे दीजिए, ये जीनत उसी दिन आप की हो जाएगी.’’

”ठीक है, मैं ममता को तलाक देने के लिए किसी अच्छे वकील से मिल कर आगे की प्रोसेस करता हूं.’’

”ठीक है, चलती हूं मैं, बहुत देर हो चुकी है मेरे को आए, बाय…बाय…’’ कह कर चांदनी अपने घर के लिए रवाना हो गई तो विश्वकर्मा भी उसे बाय बाय बोल कर बाहर तक छोड़ कर आया और थोड़ा नाश्ता कर के फिर सो गया.

चांदनी से बात कर के विश्वकर्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था तो चांदनी भी कुछ कम खुश नहीं थी. प्रेमी के साथ बिताए पल को सोचसोच कर उस का रोमरोम खिल उठा था और यही सोच रही थी कि काश! उस खूबसूरत पल को कैद कर लेती तो कितना अच्छा होता. कब मेरा प्यार, दुल्हनिया बना कर मुझे अपने घर ले जाएगा, वह पल कब आएगा.

तलाक को उकसाया

उस दिन के बाद से चांदनी दिन भर में विश्वकर्मा को 2-3 बार फोन कर के पत्नी को तलाक देने के लिए उकसा दिया करती थी. प्रेमिका का फोन आते ही वह विचलित हो जाता था. और उसे भरोसा दिलाता था कि जल्द से जल्द ममता को तलाक दे देगा और उसे अपनी दुल्हन बना कर ले आएगा. इस बारे में वकील से बात कर ली है. थोड़ा वक्त उसे और दे दे. विश्वकर्मा चांदनी को आश्वासन दे चुका था कि पत्नी ममता को जल्द ही तलाक दे देगा, लेकिन वह जानता था उसे तलाक दे पाना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वह खुद ही इतनी आसानी से उसे आजाद नहीं कर रही थी.

विश्वकर्मा का एक भतीजा बदमाश था. लूट, हत्या, छिनैती, हत्या के प्रयास जैसे तमाम संगीन जुर्मों में वांछित चल रहा था. वह पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया था. भतीजे की धमक से विश्वकर्मा बेहद प्रभावित था. वह भी उसी ढर्रे पर चल निकला था. काफी सारे दुश्मन उस ने अपने आस्तीन में पाल लिए थे. अपनी सुरक्षा के मकसद से वह अपने पास एक अवैध तमंचा रखता था. चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे पत्नी ममता और बेटी की सूरत दिखाई नहीं दे रही थी, उसे तो बस कपड़े की तरह औरतें बदलने की आदत बन चुकी थी.

वारदात की सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पहुंची पुलिस

फ्लर्ट तो वह कई लड़कियों के साथ करता था, लेकिन चांदनी उसे इस कदर भा गई थी कि उसे पत्नी बनाने के लिए ठान लिया था, इसीलिए वह पत्नी को तलाक दे देना चाहता था. उस ने तलाक की अरजी न्यायालय में दाखिल भी कर दी थी. इस के बाद वह ममता से कोर्ट में गवाही देने के लिए दबाव बनाने लगा था, ताकि दोनों अपनी जिंदगी अपने तरीके से खुल कर जी सकें. पति विश्वकर्मा से ममता ने साफ शब्दों में कह दिया था कि न वह उसे तलाक देगी और न ही मनमानी करने देगी. भले ही जान ही क्यों न चली जाए.

आखिर एक बेटी है, जो सयानी हो रही है, उसे पढ़ाना है, उस का जीवन संवारना है. यदि पति गांव में स्थित अपने हिस्से वाला पूरा खेत मेरे नाम कर दे तो सोचूंगी.

पति कर बैठा क्राइम

विश्वकर्मा जानता था कि ममता उसे आसानी से तलाक नहीं देने वाली है. यानी  घी सीधी अंगुली से निकलने वाला नहीं है. फिर तो अंगुली टेढ़ी करनी ही पड़ेगी. उस ने तय कर लिया कि यदि ममता मेरी आजादी की राह में रोड़ा बन रही है तो इसे मौत के घाट उतारना ही पड़ेगा. ममता ने भी अदालत में खर्चे का दावा ठोक दिया था. पति की अय्याशी का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया पर रोमांटिक रील बनाबना कर पोस्ट करने लगी थी. ममता का यह रुख देख कर वह और बौखला गया था, लेकिन खिसियानी बिल्ली की तरह सिर्फ खंभा नोच कर रह गया था. इधर ममता मायके से वापस लौट कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में एक किराए का कमरा ले कर बेटी के साथ रह रही थी. वहीं रह कर वह नौकरी पर जाती थी.

इधर विश्वकर्मा यह पता लगा रहा था कि ममता ने अपना नया ठिकाना कहां बनाया है. आखिरकार उस ने पता लगा ही लिया था कि वह गीता वाटिका कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहती है. पते की बात तो यह थी कि जिस दिन से ममता ने बेटी को अपने साथ ले कर पति का घर छोड़ा था, उस के लिए दूसरी औरत को ले आने का रास्ता खुल गया था. दूसरी औरत यानी प्रेमिका चांदनी को घर ला कर उस के साथ रंगरेलियां मनाता था. वह अपने आशिक विश्वकर्मा पर पत्नी ममता से तलाक लेने के लिए बराबर दबाव बना रही थी.

विश्वकर्मा ममता के उस फैसले से और खार खाए हुए था, जिस में उस ने भरणपोषण के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. और वह उसे अपने हिस्से में से एक फूटी कौड़ी देने के लिए तैयार नहीं था. और फिर 4 सितंबर, 2025 की रात जेल रोड के सामने उस की गोली मार कर हत्या कर दी. कथा लिखे जाने तक आरोपी विश्वकर्मा चौहान जेल की सलाखों के पीछे था. पत्नी की हत्या का उसे जरा भी मलाल नहीं था. इस बात की उसे खुशी थी कि अब उसे पैसे नहीं देने पड़ेंगे, लेकिन उस ने तनिक भी नहीं सोचा कि मासूम बेटी का क्या होगा? वह किस के सहारे जीएगी? उस का सहारा कौन बनेगा?

हैवानियत की पराकाष्ठा पर उतर आए विश्वकर्मा ने तनिक भी सोचा होता कि वह जो कर रहा है, गलत कर रहा है तो शायद उस की खुशहाल गृहस्थी बची रहती और बेटी अपने पेरेंट्स के प्यार से महरूम नहीं होती. UP News

(कथा में चांदनी परिवर्तित नाम है)

 

 

UP News: मोहब्बत में क्राइम हरगिज नहीं

UP News: 35 साल की सुनीता भले ही 5 बच्चों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस के गठीले बदन की कसावट पर गांव के अनेक युवा आहें भरते थे. गांव का 22 वर्षीय आशीष कुमार उर्फ अंशु तो उसे अपना दिल दे चुका था. अमरबेल की तरह दोनों की मोहब्बत बढ़ती गई. मोहब्बत के इसी समंदर में डूब कर एक दिन दोनों ऐसा खतरनाक क्राइम कर बैठे कि…

आशीष उर्फ अंशु और उस की प्रेमिका सुनीता ने वीरपाल की हत्या करने की ठान ली, क्योंकि वह उन दोनों की मोहब्बत में रोड़ा बन रहा था. वीरपाल सुनीता का पति था. वे दोनों यही सोच रहे थे कि उस की हत्या कब और कैसे की जाए? तय किया कि आधी रात के बाद वीरपाल की गोली मार कर हत्या घर में ही कर दी जाए. फिर शोर मचा दिया जाएगा कि बदमाश आए थे. घर का सामान भी बिखेर दिया जाएगा और लूट की घटना बनाने के लिए जेवर और नकदी लूट कर ले जाने का नाटक किया जाएगा.

तभी अंशु बोला, ”तमंचा और कारतूस का इंतजाम कहां से होगा?’’

सुनीता ने कहा, ”यह इंतजाम तुम्हें ही करना पड़ेगा. इस के लिए रुपयों की जरूरत भी पड़ेगी.’’

”रुपए का तो मैं इंतजाम कर लूंगा, लेकिन तमंचा और कारतूस मिलना इतना आसान नहीं है. चलो, मान लिया जाए कि ये चीजें मिल भी गईं तो वीरपाल को गोली कौन मारेगा?’’ अंशु बोला.

”तुम ठीक कह रहे हो. यदि उस समय बच्चे उठ गए, उन्होंने देख लिया तो हम दोनों पकड़े जाएंगे. फिर बिना सजा के नहीं बचेंगे. इस तरह हमारी प्रेम कहानी तो अधूरी रह जाएगी.’’ सुनीता ने आशंका जताई.

इस के बाद उन्होंने दूसरी योजना तैयार की. गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए सल्फास की गोलियों का प्रयोग होता है. अकसर यह सुनने में आता है कि लोग आत्महत्या के लिए इन गोलियों का सेवन करते हैं. उन्होंने सोचा कि क्यों न ये गोलियां किसी तरह वीरपाल को खिला दी जाएं.

यह तरीका दोनों को अच्छा लगा. फिर एक दिन सल्फास की गोलियों का पैकेट अंशु ने सुनीता को ला कर दे दिया. दोनों ने तय किया कि जब भी शराब के नशे में वीरपाल आएगा, खाने में मिला कर सल्फास की गोलियां उसे दे दी जाएंगी. इस से पहले कि योजना को अंजाम दिया जाता, सल्फास की गोलियों का पैकेट बच्चों के हाथ लग गया. बच्चे समझे कि पैकेट पापा लाए हैं. वीरपाल के सामने ले जा कर बच्चे पूछने लगे, ”पापा, ये गोलियां काहे की हैं?’’

वीरपाल गोलियों का पैकेट देख कर सन्न रह गया. वीरपाल ने पैकेट उलटपलट कर देखा तो उसे पता चला कि यह तो गेहूं को सुरक्षित रखने वाली सल्फास की गोलियां हैं.

गुस्से से आगबबूला होते हुए वीरपाल ने सुनीता से पूछा, ”सल्फास का पैकेट कौन लाया है?’’

सुनीता ने झूठ बोलते हुए कहा, ”गेहूं में घुन लगने लगे थे. इसलिए मैं ने ही यह पैकेट मंगाया है.’’

वीरपाल की हत्या करने का यह प्लान भी फेल हो गया. बात आईगई हो गई. कुछ समय बाद धान की फसल तैयार होने लगी. उस की रखवाली के लिए वीरपाल अकसर खेत पर जाया करता था. ग्रामीण क्षेत्र में कई तरह के जंगली जानवर फसलों को क्षति पहुंचाते हैं. उन से फसल को बचाने के लिए रात को भी अनेक किसान खेतों पर डेरा डाले रहते हैं.

वीरपाल भी धान की फसल की रखवाली के लिए खेत पर जाता था. नींद आने पर वह वहीं सो जाया करता था. शातिर दिमाग अंशु ने सुनीता से कहा, ”अब मौका आ गया है, वीरपाल को ठिकाने लगाया जा सकता है. जिस वक्त वीरपाल रात को खेत पर सोया हो, तभी उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया जाएगा.’’ सुनीता को योजना सही लगी और वह राजी हो गई. उत्तर प्रदेश के जनपद संभल में थाना हयात नगर क्षेत्र में एक गांव स्थित है सहजना. इस गांव में दलवीर सिंह का परिवार निवास करता है. दलवीर सिंह के 5 बेटे और 5 बेटियां थीं. चौथे नंबर की बेटी सुनीता थी.

सुनीता का विवाह साल 2008 में जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्र के गांव अलेहदादपुर देवा नगला निवासी वीरपाल था. वीरपाल खेतीकिसानी के साथसाथ मजदूरी भी करता था. कभीकभी हरिद्वार में स्थित फैक्ट्री में मजदूरी करने भी चला जाता था. वीरपाल का एक बड़ा भाई है कुंवरपाल. वीरपाल की मां ज्ञानवती है, जो एक गृहिणी हैं. वीरपाल और सुनीता का वैवाहिक जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. इस दौरान उन के 5 बच्चे हुए, जिन में 4 बेटियां और एक बेटा था.

5 बच्चों की मां होने के बावजूद सुनीता के हंसीमजाक में एक बेकाबू आग छिपी थी. उस के चेहरे पर जवानी की नैचुरल चमक थी. गालों की मुलायम लकीरों में मासूमियत और आत्मविश्वास दोनों एक साथ झलकते थे. उस की आंखें बड़ी साफ और गहरी थीं, मानो किसी के बोलने से पहले ही उस का मन पढ़ लेती हों. उस का शरीर किसी कठोर मेहनत से तराशा हुआ नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से सधे हुए अनुपातों वाला था. कंधे हलके चौड़े, कमर में नजाकत और चाल में लयबद्ध कोमलता, जिसे देख कर कोई भी तुरंत समझ जाए कि यह महिला तन से ही नहीं, मन से भी मजबूत है.

वह मध्यम कद की थी. उस का रंग गेहुंआ और चेहरा गोल था. उस की आंखें बड़ी और ध्यान खींचने वाली थीं, जिन में आत्मविश्वास का भाव दिखता था. बाल पूरी तरह से सिर को ढकने वाले दुपट्टे के नीचे छिपे रहते थे, जो पारंपरिकता और शालीनता दर्शाते थे. उस की नाक में एक छोटा नथ उस की पहचान को और उभारता था. होंठ थोड़े मोटे जरूर थे, लेकिन उन पर हलकी मुसकान दिखाई देती, जो उस में छिपी ममता और दृढ़ इच्छाशक्ति की झलक देती थी. उस की आंखों की चमक देखने वालों को भटकाने वाली पहेली सी लगती थी.

गांव की गलियों में जब भी सुनीता का नाम लिया जाता, लोग धीरे से मुसकरा देते. कोई जलन से, कोई तजुर्बे से. 5 बच्चों की मां होते हुए भी उस में कुछ ऐसा था, जो जवान दिलों को बेचैन कर देता था. उस की चाल, उस की बातों की मिठास और उस की आंखों में छिपी कामुक शरारत की वजह से 35 वर्षीय सुनीता गांव की अन्य महिलाओं से अलग पहचानी जाती थी. सब जानते थे कि वह साधारण महिला नहीं.

गांव में कुंवरपाल का परिवार भी निवास करता था. कुंवरपाल अलेहदादपुर गांव का दामाद था. करीब 2 दशक पहले इसी गांव में घरजमाई बन कर आया था. फिर गांव में ही बस गया था. उस के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. एक बेटे और एक बेटी की शादी हो चुकी है. कुंवरपाल का बेटा आशीष कुमार उर्फ अंशु करीब 22 साल का एक कुंवारा नौजवान था. अंशु अपनी जवानी के चरम पर पहुंच चुका था. 22 साल की उम्र उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक ले कर आई थी. वह चमक जो मेहनत, आत्मविश्वास और युवापन के मिलन से पैदा होती है.

उस के नैननक्श साधारण होते हुए भी बेहद आकर्षक थे. माथे पर गिरती हलकी बिखरी लटें और आंखों में मौजूद सहज चमक उसे अलग पहचान देती थी. उस का शरीर एकदम सधा हुआ था. न बहुत भारी, न बहुत पतला. छाती में कसावट और बांहों में हलकी उभरी नसें, उस के मेहनत भरे जीवन की गवाही देती थीं. चलते समय उस का आत्मविश्वास साफ दिखता था. कदमों में सधी हुई लय और शख्सियत में एक ऐसी गरिमा जो बिना बोले ही लोगों को उस की तरफ देखने पर मजबूर कर देती थी. अंशु की मुसकान उस के पूरे चेहरे को रोशन कर देती थी. उस की जवानी में एक तरह की साफगोई थी, वही मासूम पर दृढ़ ऊर्जा जो केवल 21-22 की उम्र में ही दिखाई देती है.

कुंवरपाल के साले का नाम भूप सिंह था. वह इस समय गांव के मौजूदा प्रधान है. असरदार व्यक्ति है. गांव में उस का काफी मानसम्मान भी है. अंशु का दिल किसी रिश्ते की बंदिश नहीं मानता था.

अंशु अपनी नानी के घर रहता था. उस की पैदाइश भी यहीं पर हुई थी, जहां उस की जवानी बेलगाम घोड़े सी दौड़ रही थी. उस के अय्याशी के किस्से भी कम न थे. मामला पकड़े जाने पर पंचायतें भी हुईं. उस के मामा को मामला लेदे कर निपटाना पड़ा. कई बार उस के मामा को काफी रकम मुआवजे के रूप में गांव की गरीब लड़कियों को देनी पड़ी. अकसर लड़की वाले बदनामी के डर से प्रधान के रुतबे और प्रभाव के कारण कानूनी काररवाई के लिए आगे नहीं बढ़े. इस का फायदा अंशु उठाता रहा और कई घटनाएं गांव में अंजाम दे दीं.

जब सुनीता और अंशु की राहें टकराईं, तो जैसे दो चिंगारियां एक ही पल में भड़क उठीं. फिर रिश्ता रिश्ता नहीं, एक अंधी ललक बन गया, जहां उम्र, रिश्तेदारी और समाज सब पीछे छूट गया. कहानी यहीं से मोड़ लेती है. प्यार और पागलपन के इस खेल में वह सुनीता अपने पति से तंग आ चुकी थी, और अंशु उस की चाहत में अंधा हो गया था. शाम का वक्त था. खेतों से किसानों की वापसी हो रही थी, ढलती धूप में चलती बकरियों की आवाजें, ऐसा लग रहा था कि उन्हें भी घर वापस ले जाया जा रहा है.

बीच में एक महिला जो अपने आंगन में पानी भर रही थी. उस के बच्चे पास ही खेल रहे थे, गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा था, लेकिन इस शांति के पीछे एक तूफान पनप रहा था. अंशु गांव का मनचला, दुबलापतला मगर तेज नजर वाला जवान था. सब जानते थे कि अंशु की नजरें मासूम नहीं हैं और सुनीता भी यह बात समझती थी, मगर न जाने क्यों, उसे अब फर्क नहीं पड़ता था.

अंशु ने पहली बार बिना झिझक के उस से कहा, ”नानी, इतना पानी रोज क्यों भरती हो? कोई समंदर बनाना है क्या?’’

सुनीता मुसकराई, ”तेरे काम का समंदर नहीं है, डूब जाएगा तू इस में.’’

अंशु हंसा, ”डूबने का तो मन है ही, बस कोई मौका डूबने का मिल जाए.’’

उन के बीच का यह मजाक गांव के माहौल से ज्यादा गर्म था. दोनों जानते थे कि वो किस ओर बढ़ रहे हैं, मगर किसी को रोकने की हिम्मत न थी. धीरेधीरे ये मुलाकातें बढ़ीं. कभी खेत के किनारे, कभी सूनी पगडंडी पर तो कभी मकानों के पीछे के बाग में, जहां हवस और हंसी एक साथ घुलमिल जाती.

सुनीता अब अपने पति वीरपाल से ऊब चुकी थी. बच्चों और घर के झगड़ों ने उन के रिश्ते की जान निकाल दी थी. एक रात वीरपाल ने उसे रोकते हुए कहा, ”तू अब पहले जैसी नहीं रही, सुनीता.’’

तो उस ने ठंडे लहजे में जवाब दिया, ”हां, और तू भी मर्द जैसा नहीं रहा.’’

वीरपाल ने गुस्से में थप्पड़ मारा, मगर उस थप्पड़ की गूंज ने सुनीता के भीतर का सब कुछ तोड़ दिया. उसी रात वो चुपके से घर के पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकली. अंशु उस का इंतजार कर रहा था.

”अंशु, मुझ से अब और नहीं सहा जाता,’’ सुनीता ने उस से कहा.

अंशु ने उस की आंखों में झांकते हुए फुसफुसाया, ”तो फिर खत्म कर देते हैं उसे, हमेशा के लिए.’’

सुनीता चौंकती हुई बोली, ”क्या मतलब?’’

”मतलब साफ है. तुम्हारे रास्ते में बस वो वीरपाल ही तो दीवार है. गिरा देंगे, उस दीवार को.’’

सुनीता चुप रही, मगर उस के दिल में डर और चाहत दोनों एक साथ पनपने लगे. बड़ी हिम्मत करने के बाद सुनीता सीधेसीधे प्रेमी को चुनौती देती हुई बोली, ”अगर तुम को मेरे साथ रहना है तो कुछ तो करना ही होगा, मगर उस के बाद क्या तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?’’

”सुनीता, मैं ने तुम से प्यार किया है. पत्नी मान भी लिया है. अब तुम बताओ उस के बाद तुम्हारी क्या भूमिका होगी?’’

”मैं जिंदगी भर तुम्हारा साथ दूंगी, तुम्हारा खयाल रखूंगी.’’

”अगर तुम मुझे पाना चाहते हो तो अब अपने नाना का काम तमाम कर ही दो.’’

अंशु का मामा प्रधान भूप सिंह जाति से जाटव है. एक ही बिरादरी के होने के नाते से प्रधान भूप सिंह, वीरपाल को गांव के रिश्ते में चाचा कहता था. इसी रिश्ते से अंशु वीरपाल को नाना और सुनीता को नानी कह कर संबोधित करता था. दोनों के संबंध जगजाहिर हो चुके थे. फिर भी गांव के लोगों को यकीन नहीं होता था कि दोनों की उम्र में इतना अंतर होने के बाद इन के बीच अवैध संबंध होंगे. वीरपाल 12 अक्तूबर, 2025 की रात को अपने धान के खेत पर सोने के लिए गए थे. अगले दिन जब गांव के लोग खेतों पर सुबहसुबह अपने काम के लिए निकले, तब उन्होंने देखा कि वीरपाल खेत में अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था.

वीरपाल अकसर सुबहसुबह 5 बजे उठ कर घर आ जाता था. फ्रैश हो कर फिर से काम के लिए खेत पर आ जाता था, लेकिन उस दिन वह इतनी देर तक खेत में क्यों सो रहा है, लोग समझ नहीं पाए. पास जा कर लोगों ने देखा तो वह एकदम बेसुध सा लेटा हुआ था. उन्हें वीरपाल के शरीर पर कोई हरकत नहीं दिखी.  इस दौरान हड़कंप मच गया तो यह बात गांव तक पहुंची. काफी संख्या में ग्रामीण लोग उस के खेत पर पहुंच गए. गांव के एक डौक्टर को भी बुला लिया. उस ने नब्ज टटोलते ही वीरपाल को मृत घोषित कर दिया.

वीरपाल की पत्नी सुनीता भी खूब रोते हुए दहाड़े मारते हुए खेत पर पहुंच गई. पूरा चेहरा ढके हुए खूब रोए जा रही. उस को रोता देख कर लोगों का दिल पसीज गया कि अब इस बेचारी के बच्चों का क्या होगा? यह बात 13 अक्तूबर, 2025 की है. वहां मौजूद लोगों ने पुलिस को खबर देने की बात कही तो सुनीता कहने लगी कि मैं अपने पति की मिट्टी को खराब नहीं होने दूंगी. पुलिस हमारे पति का शरीर ले कर जाएगी. पोस्टमार्टम को भेजेगी. वहां चीरफाड़ होगी. पूरे शरीर को बरबाद कर देगी.

मैं अपने पति के साथ यह नहीं होने दूंगी. लेकिन कोई व्यक्ति पहले ही कोतवाली बिलारी में फोन कर के यह सूचना पुलिस को दे चुका था. सूचना पाते ही कोतवाल उदय प्रताप मलिक मय फोर्स के घटना स्तर पर पहुंच गए. शुरुआती जांच में मामला हत्या का प्रतीत हुआ, क्योंकि मृतक के गले पर दबाने के निशान थे. थोड़ीबहुत हलकीफुलकी छीनाझपटी जैसे निशान भी थे. इस से प्रतीत हो रहा था कि मृतक ने हत्यारों से थोड़ा बहुत संघर्ष भी किया है. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. घटनास्थल के आसपास का बड़ी बारीकी से मुआयना किया गया. आवश्यक सबूत इकट्ठे किए गए. मौके की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया.

कोतवाल उदय प्रताप मलिक ने मामले की जानकारी सीओ अशोक कुमार और एसपी (ग्रामीण) कुंवर आकाश सिंह को दे दी. अधिकारियों ने जांच के लिए पुलिस की दो टीमें गठित कर दीं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. गांव के लोगों ने पोस्टमार्टम से लाश आने के बाद वीरपाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस अपनी जांच कर ही रही थी. उसी दिन सुनने में आया कि वीरपाल की पत्नी सुनीता ग्रामीणों से लाश का पोस्टमार्टम कराने को मना कर रही थी. उस का कहना था कि ज्यादा शराब पी लेने से इस की स्वाभाविक मौत हुई होगी.

यह बात सुन कर पुलिस को वीरपाल की हत्या करने का शक उस की पत्नी सुनीता पर हो गया. सुनीता ने अपने पति की हत्या क्यों कराई? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पुलिस ने जब छानबीन की तब पता चला कि गांव का ही एक युवक अंशु है, जिस से सुनीता का प्रेम प्रसंग चल रहा है. इतनी जानकारी मिलने पर अंशु भी पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन से जब पूछताछ की गई तो उन्होंने पहले तो बातें गोलमोल करने की कोशिश की, लेकिन जब सख्ती की गई तब दोनों ने ही सच उगल दिया.

दोनों की उम्र में 13 से 14 साल का अंतर था. लोगों को जब इस बात का पता चला कि वास्तव में इन दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था तो कोई इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन जब सच सामने आया तो सब हैरान रह गए. इस दौरान सुनीता ने अपने आप को बचाने के लिए खूब प्लानिंग की थी. पहली प्लानिंग तो उस ने पुलिस को बुलाने से मना किया. लेकिन जब उसे लगा कि पुलिस आ गई है तो पोस्टमार्टम न हो पाए, इस के लिए उस ने पूरी कोशिश की.

पुलिस ने लाश को जब पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. तब सुनीता ने भागने का भी प्लान बना रखा था. जब उस के रिश्तेदार आए. दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक व झगड़ा चल रहा था तो एक रिश्तेदार सुनीता को अपनी बाइक पर बिठा कर वहां से निकलने वाला था, लेकिन जैसे ही सुनीता बाइक पर बैठी, गांव के लोगों ने देख लिया और उसे दौड़ कर पकड़ लिया. उस के बाद ग्रामीणों ने कहा कि जब तक पुलिस नहीं आएगी, तब तक कोई नहीं जाएगा. पुलिस को आने दो. उस के बाद जिस को जहां जाना हो, वो चला जाए.

पुलिस ने सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु से पूछताछ की तो वीरपाल की हत्या के पीछे की ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस ने सभी को चौंका कर रख दिया. सुनीता गांव के रिश्ते में अंशु की नानी लगती थी. दोनों के खेत आसपास ही थे, इसलिए उन के बीच बातचीत होना आम बात थी. उसी दौरान दोनों के बीच प्यार हो गया. और जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. सुनीता अंशु के प्यार की कायल हो गई थी. उस के सामने अपना पति वीरपाल फीका लगने लगा था. इसलिए जब भी उन का शारीरिक संबंध बनाने का मन होता था, तो सुनीता वीरपाल को शराब पिला कर धान की रखवाली करने के लिए रात को खेत पर भेज देती थी.

फिर अंशु को फोन कर के रात को अपने घर पर बुला लेती थी. फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते थे. इस तरह सुनीता अविवाहित अंशु के प्यार में डूब चुकी थी, लेकिन यह खेल ज्यादा दिनों तक छिप न सका. एक दिन इसी बीच रात में एक बार वीरपाल धान के खेत से घर वापस आया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. यह देख कर वीरपाल का खून खौल गया. अंशु तो फटाफट वहां से भाग गया, लेकिन सुनीता कहां जाती. तब वीरपाल ने उस दिन सुनीता की खूब पिटाई की. सुनीता ने उसी दिन सोच लिया था कि वीरपाल हमारे प्यार के बीच में रोड़ा बन रहा है. इसे तो निपटवाना ही पड़ेगा.

सुनीता ने उस समय तो पति से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली थी. वीरपाल ने यह बात किसी को बदनामी की वजह से नहीं बताई. 2-4 दिन बाद सुनीता और अंशु का चोरीछिपे मिलनाजुलना जारी रहा. एक दिन सुनीता ने अशु को बताया कि वीरपाल हम दोनों के प्यार में रोड़ा बन रहा है. इसे ठिकाने लगाना है. इतना ही नहीं, उस ने धमकी भी दी कि अगर तूने इसे ठिकाने नहीं लगाया तो मैं जहर खा कर अपनी जान दे दूंगी, लेकिन तेरे बिना नहीं जी सकती.

यह सुन कर अंशु के जवान खून में उबाल आ गया. उसे लगा कि उस की प्रेमिका उस के लिए जान देने के लिए तैयार है. उस की जुदाई बरदाश्त नहीं कर पा रही. लिहाजा अंशु ने कहा, ”तुम ऐसा मत करो. हम वीरपाल को ठिकाने लगा देंगे.’’

12 अक्तूबर को सुबह करीब 8 बजे सुनीता अपने खेत पर धान झाड़ रही थी. वहां पर उस की फेमिली के कुछ लोग भी मौजूद थे. उस समय अंशु भी अपने खेत पर था. सुनीता ने अंशु को अपने पास बुलाया. उस के साथ वह बात कर रही थी, तभी वीरपाल वहां पर आ गया. उस ने दोनों को बात करते देखा तो वीरपाल दोनों पर आगबबूला हो गया गालीगलौज करने लगा. अंशु उसी समय वहां से अपने घर चला गया. उस के कुछ देर बात वीरपाल भी चला गया तो सुनीता ने अंशु को फिर से बुला लिया.

फिर दोनों ने मिल कर वीरपाल की हत्या करने की योजना बनाई. वारदात की अन्य योजना पर सहमति नहीं बनी तो सुनीता ने अंशु को बताया कि वीरपाल रात में धान की रखवाली करने के लिए खेत पर जा कर सोता है. वहीं पर उस की हत्या करना आसान रहेगा. अंशु उस की इस बात पर राजी हो गया. 13 अक्तूबर को रात में करीब साढ़े 12 बजे वीरपाल खेत पर सोने गया. तभी सुनीता ने यह जानकारी प्रेमी अंशु को दे दी.

इस के बाद जब अंशु रात में वीरपाल के खेत पर पहुंचा तो उस समय वीरपाल शराब के नशे में चारपाई पर सो रहा था. अंशु ने उस का गला दबाना शुरू कर दिया. तभी वीरपाल का एक हाथ अचानक अंशु के मुंह पर लगा तो वह घबरा गया. अंशु को लगा कि अब यदि वह जिंदा बच गया तो मामला बहुत गड़बड़ हो जाएगा. वीरपाल ने उठने की कोशिश की, लेकिन नशा अधिक होने के कारण वह उठ नहीं सका. अंशु ने फिर से वीरपाल को अपने काबू में किया और गला दबाने लगा. उस के गले को वह तब तक दबाए रखा, जब तक कि वीरपाल की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट नहीं गई.

जब वीरपाल निढाल हो गया, उस का छटपटाना बंद हो गया, उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई, तब कहीं अंशु को तसल्ली हुई. फिर भी अंशु ने उस की नाक पर हाथ रख कर एक बार चैककिया कि वह मर चुका है कि नहीं.

जब उसे विश्वास हो गया कि अब इस का काम तमाम हो गया है तो अंशु वहां से सीधे अपनी प्रेमिका सुनीता के घर पहुंचा. उस ने प्रेमिका को खुशखबरी देते हुए कहा कि तुम्हारे पति का मैं ने काम तमाम कर दिया है. अब वो तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा. इस मर्डर की खुशी में दोनों ने रात भर मौजमस्ती की. इस के बाद उन्होंने पुलिस से बचने का प्लान बनाया. फिर रात में ही अंशू अपने घर चला गया. दूसरे दिन अंशु भीड़ के साथ घटना स्थल पर पहुंचा और परिवार के लोगों के साथ रहा. पोस्टमार्टम से ले कर अंतिम संस्कार तक हर कार्यक्रम में वह वीरपाल के फेमिली वालों के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर कोई शक न हो, लेकिन इस के बावजूद वह पुलिस के शक के दायरे में आ गया.

मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या कर देना आया. जिस के बाद मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल की तहरीर के आधार पर धारा 103 (1)/61(2) (क) बीएनएस के तहत आशीष कुमार उर्फ अंशु और सुनीता को नामजद किया गया. 24 घंटे के भीतर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी. पूछताछ के बाद सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु को जेल भेज दिया गया. बच्चों की परवरिश मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक अंशु और उस की प्रेमिका दोनों ही जेल में थे. UP News

 

 

UP News: फेमिली को लग जाए – जब प्यार की भनक

UP News: 20 वर्षीय रूबी चाहती थी कि उस की शादी प्रेमी रविशंकर के साथ ही हो, लेकिन फेमिली वालों को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया. फिर रूबी ने अपनी शादी को रुकवाने के लिए ऐसी खूनी साजिश रची कि…

रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को फोन किया और बोली, ”हाथ पर हाथ रखे बैठे रहोगे या कुछ करोगे भी? मेरे घर वालों ने मेरी शादी 18 नवंबर, 2025 की होनी तय कर दी है. यदि कोई उपाय नहीं किया तो हम ने जो सपने देखे हैं, सारे धरे के धरे रह जाएंगे.’’

पे्रमिका के मुंह से अचानक शादी की बात सुन कर रविशंकर के हाथों के तोते उड़ गए. फिर भी उस ने रूबी को समझाया, ”तुम चिंता मत करो, मैं कोई न कोई उपाय खोजता हूं.’’

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के थाना जवां क्षेत्र का एक गांव है चंदौखा. यहीं के रहने वाले हैं मुंशीलाल. उन के घर में 20 वर्षीय बेटी रूबी की शादी की तैयारियां जोरशोर से चल रहीं थीं. रूबी फेमिली वालों द्वारा तय की हुई शादी नहीं करना चाहती थी. क्योंकि वह तो वह 24 वर्षीय बाइक मैकेनिक रविशंकर से प्यार करती थी और उसी के साथ शादी कर अपना घर बसाना चाहती थी, लेकिन फेमिली वालों ने अचानक जब उस का रिश्ता अलीगढ़ के गोंडा मोड़ निवासी एक युवक से तय कर दिया तो रूबी परेशान हो गई.

”यदि हम लोगों ने कोई उपाय नहीं किया और यों ही बैठे रहे तो हम लोगों की शादी नहीं हो सकेगी. फिर जीवन भर पछताना पड़ेगा. तुम्हें पता है कि दादी ने मेरी शादी तय करा दी है.’’ रूबी ने अपनी शादी रुकवाने के लिए प्रेमी रविशंकर को एक उपाय सुझाया. उस ने कहा, ”यदि दादी चंद्रवती की हत्या शादी से पहले कर दी जाए तो मेरी शादी टल जाएगी. फिर हम दोनों भाग कर शादी कर लेंगे.’’

रविशंकर को भी प्रेमिका की यह योजना पसंद आई. इस खतरनाक सोच ने हत्या की नींव रख दी. अब सवाल यह था कि योजना को कैसे अंजाम दिया जाए और हथियारों का इंतजाम कैसे और कहां से किया जाए? उस के लिए रुपयों की भी जरूरत थी, घर में शादी की तैयारी चल ही रही थीं, जिस के लिए रुपयों का भी इंतजाम किया गया था. तभी रूबी ने उन्हीं रुपयों में से 10 हजार रुपए चुरा लिए. रूबी ने प्रेमी रविशंकर को फोन कर एकांत में बुलाया और उसे 10 हजार रुपए तमंचा व कारतूस लाने को दे दिए. रुपए सौंपते समय उस ने कहा, ”अब काम में ढिलाई मत करना वरना देर हो जाएगी.’’

प्रेमिका द्वारा दिए गए रुपयों से प्रेमी ने अपने गांव कस्तली के दोस्त रोहित की मदद से आईटीआई रोड के आयुष से एक तमंचा व कारतूस खरीदे. हत्या वाले दिन की मुखबिरी खुद रूबी ने की. हत्या को ले कर पहले से योजना तय हो गई थी. रूबी ने कह दिया था कि जिस समय दादी चंद्रवती घेर से पशुओं को ले कर घर वापस आएंगी, उसी समय वह उसे सूचना दे देगी. तभी उन की हत्या कर देना. 11 नवंबर, 2025 की शाम हर दिन की तरह ही शुरू हुई थी. गांव चंदौखा निवासी वीरी सिंह की 65 वर्षीय पत्नी चंद्रवती अपने घेर से पशुओं को घर ले आई. वह सुबह के समय पशुओं को घेर में ले जाती थीं और शाम को वापस घर ले आती थीं. पशुओं को घेर से लाने के काम में चंद्रवती की पोती रूबी हर रोज उन की मदद के लिए आ जाती थी, लेकिन उस दिन वह प्लानिंग के तहत कुछ जल्दी घर से निकल गई थी.

हत्या का समय फिक्स था. चंद्रवती की हत्या का स्थान भी निश्चित था. वह रोज जिस रास्ते से पशुओं को ले कर लौटती थीं, वहीं उन की हत्या होनी थी. उस दिन भी चंद्रवती पशुओं को घेर से ले कर वापस घर की ओर आ रही थीं. योजना के अनुसार रूबी उस दिन पहले से तय समय से थोड़ा पहले अपने घर से निकली.

प्रेमिका का इशारा पाते ही रविशंकर एक पेड़ और झाडिय़ों के पीछे छिप गया. रूबी जानबूझ कर जल्दी निकल कर दूर हो गई, ताकि हत्या के समय वह खुद आसपास न हो. इस षडयंत्र से अनजान चंद्रवती कुछ ही मिनट बाद जैसे ही वहां पहुंची, रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को वाट्सऐप के जरिए सूचना दी, ‘दादी आ गई हैं, अब निकलो.’

शिकार की बाट जोह रहे रविशंकर ने नजदीक से चंद्रवती के सिर में गोली मार दी. गोली सीधे सिर में लगी और गोली लगते ही चंद्रवती जमीन पर गिर पड़ीं. हत्या करने के बाद रविशंकर अंंधेरे में तमंचा झाडिय़ों में फेंक कर गायब हो गया. यह शाम लगभग साढ़े 8 बजे की बात है. वारदात के बाद थोड़ी सी देर में ही घटनास्थल पर तमाम ग्रामीण इकट्ठे हो गए. सूचना मिलते ही चंद्रवती की फेमिली वाले भी वहां आ गए. वह तुरंत ही उन्हें उपचार के लिए क्वार्सी ट्रामा सेंटर ले गए, लेकिन डौक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डौक्टरों ने बताया कि सिर में गोली लगने से इन की मौत हुई है.

सूचना मिलने के एक घंटे बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण भी किया. किसी से रंजिश नहीं होने पर फेमिली वालों ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ थाना जवां में हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गया कि चंद्रवती की हत्या  सिर में गोली लगने से हुई. चंद्रवती की मौत से घर में कोहराम मच गया. शादी वाले घर में जहां कुछ दिनों बाद शहनाइयां गूंजनी थीं, वहां मातम पसर जाने पर रूबी अंदर  ही अंदर खुश हो रही थी. उस के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे.

कहने को दिखावे के लिए वह भी आंसू बहा रही थी. उस ने सोचा कि दादी की मौत के बाद अब क्रियाकर्मों के चलते उस की शादी टल जाएगी और वह इस बीच अपने प्रेमी के साथ घर से भाग कर शादी रचा लेगी.

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चूंकि परिवार में चंद्रवती की हत्या हो गई थी, इसलिए बिना शोरशराबे के सामान्य तरीके से चंद्रवती की मौत के एक सप्ताह बाद यानी 18 नवबंर, 2025 को रूबी की शादी नियत तारीख पर परिवारजनों द्वारा कर दी गई. जबकि रूबी को इस की जरा भी उम्मीद नहीं थी. लेकिन पकड़े जाने के डर से घर में मातम के चलते वह अपनी शादी टालने के लिए भी घर में किसी से कह नहीं सकती थी. रूबी की शादी अपने प्रेमी से न होने पर वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गई. इस बीच उस की अपने प्रेमी रविशंकर से मोबाइल फोन पर कई बार बात भी हुई, लेकिन शादी होने के बाद वह विदा हो कर अपनी ससुराल चली गई. रूबी और प्रेमी रविशंकर के दिल के अरमां आंसुओं में बह कर रह गए.

घर में शादी निपट जाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत मृतका के फेमिली वालों से ही की. शुरुआती जांच में मृतका व उस के फेमिली वालों से किसी की कोई दुश्मनी नहीं मिली. पुलिस को जांच में पहले सप्ताह कोई ठोस सुराग नहीं मिला. पुलिस को लगा कि शायद किसी बाहरी शरारती व्यक्ति ने यह अपराध किया है, लेकिन सच बहुत ज्यादा जटिल और खतरनाक था, लिहाजा पुलिस ने जांच तेज की. मोबाइल सर्विलांस में एक नंबर लगातार हत्या के आसपास ऐक्टिव मिल रहा था. जांच के दौरान पता चला कि यह नंंबर रविशंकर का है. पुलिस ने जांच की तो लोकेशन मैच हुई.

कौल डिटेल्स से पता चला कि हत्या से ठीक पहले रूबी और रविशंकर के बीच कई मर्तबा बात हुई थी. हत्या वाले दिन शाम को दोनों की लोकेशन एक ही दिशा में पाई गई. तब पुलिस का शक गहराया कि जरूर चंद्रवती की हत्या में इन दोनों का कोई हाथ है. तब पुलिस ने बिना देर किए रविशंकर को हिरासत में लिया. पूछताछ में वह टूट गया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इतना ही नहीं, उस ने हत्या की पूरी साजिश पुलिस को बताई.

इस के बाद रविवार पहली दिसंबर को पुलिस ने रूबी को उस की ससुराल से बुलाया. वह मेंहदी लगे हाथों,चूड़ा पहने ही पहुंची. जब पुलिस ने थाने ले जा कर उससे पूछताछ की तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि हां, मैं ने ही दादी की हत्या कराई थी, ताकि मेरी शादी रुक जाए और मैं अपने प्रेमी से शादी कर सकूं. पूछताछ के बाद उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया. इस घटना में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब दादी चंद्रवती की हत्या के बाद फेमिली वाले सदमे में थे. किसी को अंदेशा भी नहीं था कि इस घटना के पीछे रूबी और उस के प्रेमी रविशंकर का हाथ है.

घर वालों ने सोचा था कि मौत हो गई है, लेकिन रिश्ता अचानक तोडऩा ठीक नहीं होगा और उन्होंने रूबी की शादी 18 नबंवर को नियत तारीख पर कर दी. शादी इतनी जल्दी होने से रूबी भी बेबस थी. वह रविशंकर से संपर्क करने की कोशिश करती रही, लेकिन स्थिति उस के हाथ से निकल चुकी थी. इस दिल दहला देने वाली वारदात का परदाफाश पुलिस जांच, मोबाइल सर्विलांस, वाट्सऐप चैट्स, मुखबिरी, हत्या की मिनट दर मिनट प्लानिंग और दोनों आरोपियों रूबी और रविशंकर से हुई पूछताछ के बाद हुआ.

बाइक मैकेनिक रविशंकर गांव कस्तली का रहने वाला था. वह चंदौखा मोड़ पर पिछले 6 साल से बाइक मरम्मत की दुकान चलाता था. उस की दुकान के पीछे मुंशीलाल का परिवार रहता था. मुंशीलाल की बेटी रूबी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी. रूबी चुपकेचुपके रविशंकर को देखा करती थी. लेकिन उस की यह चोरी ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. एक दिन रविशंकर और रूबी की नजरें टकरा गईं. दोनों अपलक एकदूसरे को निहारते रहे. अब तो उन का रोज का सिलसिला बन गया. यहीं दोनों की मुलाकातें शुरू हुई औैर फिर धीरेधीरे रिश्ता प्रेम में बदल गया.

क हते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते हैं. रूबी और रविशंकर के साथ भी यही हुआ. रूबी के पापा मुंशीलाल की चाची चंद्रवती, जो रूबी की दादी लगती थी को दोनों के अफेयर का पता चल गया. प्रेम प्रसंग का पता चलने के बाद दादी चंद्रवती ने रूबी से कुछ नहीं कहा, लेकिन वह पोती रूबी पर लगातार निगरानी रखने लगीं, जिस से अब दोनों के मिलनेजुलने में भी बाधा पडऩे लगी. इस बीच दादी ने परिवार पर दबाव डाल कर रूबी का रिश्ता गोंडा मोड़ अलीगढ़ के एक युवक से तय करा दिया. रूबी के लिए यह रिश्ता मंजूर करना आसान नहीं था. वह किसी भी कीमत पर प्रेमी रविशंकर से अलग नहीं होना चाहती थी.

गांव चंदौखा में इस हत्याकांड से दहशत का माहौल है. लोगों का कहना है कि ऐसी घटना हमारे गांव में आज तक कभी नहीं हुई. घर की बेटी इतनी क्रूर हो सकती है, किसी ने कल्पना तक नहीं की. दादी चंद्रवती का हमेशा पोती से स्नेह भरा रिश्ता था. दादी ने जब रूबी को अपने प्रेमी के साथ गलत राह की तरफ जाते देखा तो घर की इज्जत पर कोई दाग न आए, यही सोच कर उस ने आननफानन में फेमिली वालों से कह कर रूबी का रिश्ता तय करा दिया था. दादी अपनी पोती की शादी की तैयारियों में जुटी थीं, मगर रूबी को यह नागवार गुजरी और दादी के खून से प्रेमी रविशंकर के साथ अपने हाथ भी रंग लिए.

घटना के 20 दिन बाद जब पुलिस ने केस का खुलासा किया तो यह सिर्फ एक हत्या का केस नहीं रहा, बल्कि इंसानी रिश्तों के टूटते मूल्य, विकृत प्रेम और घर के भीतर चल रहे गहरे षडयंत्र की भयावह दास्तां बन कर सामने आया. जो सच सामने आया, उस ने परिवार, गांव और पुलिस सभी को हैरान कर दिया. हत्या किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, बल्कि उसी घर की पोती रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर के साथ मिल कर एक साजिश के तहत कराई थी, जिस की एक ही वजह थी, किसी तरह अपनी शादी टलवाना, ताकि वह प्रेमी के साथ भाग कर शादी कर सके.

सीओ (तृतीय) सर्वम सिंह ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश एक प्रैसवार्ता में करते हुए रूबी और रविशंकर की प्रेम कहानी उजागर कर दी. शादी को रोकने के लिए हत्या जैसा जघन्य अपराध, यह समाज के लिए चेतावनी है. यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है. यह एक सामाजिक चेतावनी है. प्रेम में अंधापन, परिवार से डर, जल्दबाजी, गलत सलाह और अपराध की आसान राह, ये सब मिल कर एक पूरी पीढ़ी को गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं.

रूबी, जो प्रेम में पड़ी एक सामान्य लड़की लग रही थी, वह अचानक एक ऐसी राह पर चली गई, जिस में अब उस की जिंदगी जेल की अंधेरी कोठरी में बीतेगी. इस तरह की घटनाएं परिवार, गांव और समाज सभी के लिए एक झटका हैं. UP News

 

 

UP Crime: मेरठ कांड – किडनेप के बाद का कहर

UP Crime: खेत पर जाते समय दिनदहाड़े कुछ युवकों ने सुनीता के सामने उस की बेटी मनीषा को किडनैप करने की कोशिश की तो सुनीता के विरोध करने पर युवकों ने सुनीता की हत्या कर दी और मनीषा को किडनैप कर ले गए. इस कांड के बाद गांव में तनाव व्याप्त हो गया और प्रदेश सरकार की भी नींद उड़ गई. कौन थे किडनैपर और क्यों किया गया मनीषा का किडनैप?

कहते हैं कि बालक उम्र का प्यार न तो जातपात व ऊंचनीच देखता है और न अमीरीगरीबी. इस आयुवर्ग के प्यार में एक ऐसा आकर्षण होता है, जिस के पाश में फंसे किशोर न तो समाज की बंदिशों को मानते हैं, न ही समाज की वर्जनाओं को. जाहिर है ऐसे प्यार का अंजाम भी खतरनाक होता है. पारस सोम और मनीषा का प्यार भी शायद समाज में ऊंचनीच के भेदभाव के बीच पनपा एक ऐसा ही प्यार था, जिस ने दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव को जातीय भेदभाव की आग में झुलसने पर मजबूर कर दिया.

सुनीता की आंखों के सामने ही उस की बेटी को कुछ युवकों द्वारा ले जाने की कोशिश हुई तो उस ने विरोध किया फलस्वरूप उस पर जानलेवा हमला हुआ, जिस में उसकी जान चली गई

हालात ऐसे बने कि कपसाड़ गांव बवाल की आग में जलतेजलते बचा. गांव की गली से ले कर चट्टीचौराहे तक पुलिस छावनी बन गए. इस गांव में न कोई आ सकता था, न जा सकता था. किसी को अगर आनाजाना भी होता तो उसे पुलिस को पहले संतुष्ट करना पड़ता कि वह किसी गलत इरादे से गांव में नहीं जा रहा है. कपसाड़ गांव मेरठ महानगर की सीमा से सटा होने के कारण संपन्न और घनी आबादी वाला है. राजपूत और जाटव बिरादरी बहुल इस गांव में कुछ वैश्य, ब्राह्मण और अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं. राजूपत जाति के लोग संपन्न और बड़े खेतिहर किसान हैं.

जबकि जाटव जाति के लोग या तो छोटे किसान हैं या राजूपतों के खेतों में मजदूरी कर गुजरबसर करते हैं अथवा शहर जा कर फैक्ट्री और दुकानों में नौकरी करते हैं.  इसी गांव में रहता है सतेंद्र कुमार जाटव का परिवार. उस के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 5 बच्चे थे. परिवार में सब से बड़ा बेटा है नरसी, उस से छोटे 2 बेटे मनदीप और शुभम हैं. जबकि 2 बेटियों में मनीषा बड़ी है.

परिवार में नरसी सब से बड़ा है, जबकि मनीषा दूसरे नंबर की है. पढ़ाई के नाम पर वैसे तो सभी बच्चे पढ़ेलिखे हैं, लेकिन मनीषा समेत सभी ने इंटरमीडिएट से ज्यादा की पढ़ाई नहीं की है. मनीषा ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. गुजरबसर के लिए सतेंद्र व उन का परिवार या तो गांव के तरुण राजपूत के खेतों में मजदूरी का काम करते या शहर सरधना कस्बे व मेरठ शहर में नौकरी कर गुजरबसर करते थे.

इन दिनों गन्ने की पैदावार तैयार थी, इसलिए सतेंद्र की पत्नी सुनीता व बेटी मनीषा तरुण राजपूत के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए सुबह ही खेतों में काम करने चली जाती थीं. मनीषा की सहारनपुर में शादी तय हो चुकी थी. फरवरी महीने में उस की शादी थी, इसलिए सतेंद्र का पूरा परिवार इस समय उस की शादी को ले कर पैसे जुटाने व दूसरी तैयारियां करने में व्यस्त था.

अचानक 8 जनवरी, 2026 की सुबह सतेंद्र जाटव के परिवार पर कयामत बन कर टूट पड़ी. सुबह करीब 8 बजे सुनीता बेटी मनीषा के साथ तरुण के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए जा रही थी. जब ये दोनों रजवाहे के नए पुल के पास पहुंचीं, तभी गांव के एक राजूपत योगेश सोम का बेटा पारस सोम व उस का हमजाति दोस्त सुनील तथा उन के कुछ अज्ञात साथियों ने सुनीता व मनीषा का रास्ता रोक लिया.

पारस व उस के साथी मनीषा को पकड़ कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे. जब सुनीता ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने सुनीता के साथ गालीगलौज शुरू कर दी. उन्हें जातिसूचक शब्द कहते हुए हाथापाई शुरू कर दी. लेकिन सुनीता बेटी को उन के चंगुल से बचाने के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर चुकी थी. इसी दौरान पारस व उस के साथियों ने सुनीता के सिर पर फरसे का प्रहार किया, जिस से वह जमीन पर गिर कर वहीं बेहोश हो गई.

पारस व उस के साथियों का उद्देश्य शायद मनीषा को वहां से ले कर जाने का था, इसीलिए सुनीता के खून से लथपथ होने के बाद जमीन पर गिरते ही वे सभी मनीषा को वहां से ले कर नौ दो ग्यारह हो गए. चूंकि उस वक्त बहुत सारे लोग उस रजवाहे पर खेतों में काम करने के लिए आजा रहे थे. सुनीता की बिरादरी की 2 लड़कियां भी उस वक्त वहीं से गुजर रही थीं, जिन्होंने इस मंजर को अपनी आंखों से देखा था. उन्होंने तुरंत शोर मचा कर लोगों की भीड़ इकट्ठी कर ली और सब को वह माजरा बता दिया, जो कुछ देर पहले घटित हुआ था.

लोगों की भीड़ में से किसी ने गांव में जा कर सतेंद्र व उस के परिवार को इस घटना की खबर कर दी तो सतेंद्र का परिवार और बिरादरी के दूसरे लोग भी वहां पहुंच गए, जहां सुनीता खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. सुनीता को उपचार देना पहली प्राथमिकता थी, इसलिए फेमिली वालों ने सब से पहले सुनीता को बेहोशी की हालत में एसडीएस ग्लोबल हौस्पिटल, मोदीपुरम, मेरठ में भरती कराया, जहां डौक्टरों ने उस का इलाज तो शुरू कर दिया, लेकिन इस बात से भी आगाह कर दिया कि सुनीता के सिर में काफी गंभीर चोट है तथा खून भी काफी बह चुका था, इसलिए उस के बचने की उम्मीद कम ही है.

बहरहाल, डौक्टर अपना प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन के परिवार ने अपना दूसरा काम यह किया कि मनीषा को तलाशने के लिए पुलिस की शरण ली. सतेंद्र के बेटे नरसी ने कुछ रिश्तेदारों के साथ जा कर सरधना थाने में इस बात की शिकायत दर्ज करा दी. उस ने पुलिस को बताया कि 2 किशोरियां इस बात की गवाह हैं कि पारस सोम अपने दोस्त सुनील व अन्य अज्ञात लोगों के साथ सुनीता पर फरसे से हमला कर के मनीषा का अपहरण कर के ले गया है.

सरधना थाने के एसएचओ इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने नरसी जाटव की शिकायत पर तत्काल एक टीम ग्लोबल अस्पताल व कपसाड़ गांव भेज दी, ताकि शिकायत की सच्चाई का पता लगाया जा सके. गांव में इस बात की पुष्टि हो गई कि यह घटना सच है, जबकि अस्पताल के डौक्टरों ने भी सुनीता के मरणासन्न हालत में होने की बात बता दी.

गांव में हुआ तनाव

लिहाजा अपने सीओ आशुतोष कुमार व एसएसपी विपिन ताड़ा को सारे हालात बता कर इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने मुकदमा दर्ज कर लिया. गलत तरीके से रोकने के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), शांति भंग करने के इरादे से जानबूझ कर अपमान करने व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया, क्योंकि तब तक सुनीता जिंदा थी.

चूंकि जिस लड़की मनीषा का अपहरण हुआ था और उस की घायल मां दोनों जाटव बिरादरी के थे और जिन लोगों पर आरोप था, वे सभी राजपूत बिरादरी के थे, इसलिए मामला बड़ा जातीय रूप न ले ले, इसीलिए आशंका को समझते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में अतिरिक्त पुलिस बन तैनात करवा दिया. साथ ही पुलिस की एक टीम कपसाड़ गांव में ही रहने वाले योगेश व उस के परिजनों को पूछताछ के लिए सरधना थाने ले आई. पुलिस को पारस सोम व उस के दूसरे साथी अपने घर पर नहीं मिले.

लेकिन इसी बीच 8 जनवरी की देर शाम तक अस्पताल में गंभीर रूप से इलाज करा रही सुनीता ने दम तोड़ दिया. बस, सुनीता की मौत के बाद ही हालात एकदम गंभीर हो गए. कपसाड़ गांव में जाटव बिरादरी के लोगों का एक होना शुरू हो गया. इस हत्या का आरोप व मनीषा के किडनैप का आरोप चूंकि एक राजपूत युवक और उस के हमबिरादरी साथियों पर लगा था, इसलिए मामला पूरी तरह जातीय हो गया. बढ़ते तनाव को देखते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

मनीषा का भाई नरसी

सुनीता की मौत के बाद रात को ही उस का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अगली सुबह शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया. चूंकि सुनीता की मौत होने के बाद मामला अब हत्या में तब्दील हो चुका था और फेमिली वालों के आरोप के बाद इस में एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गई थीं. लिहाजा एसएसपी के आदेश पर इस की जांच सरधना के सीओ आशुतोष कुमार को सौंप दी गई.

सुनीता की मौत से गुस्साए फेमिली वालों और गांव वालों ने शव के गांव में आते ही उस एंबुलेंस में तोडफ़ोड़ कर दी, जिस में शव को लाया गया था. शव को ले कर फेमिली वाले धरने पर बैठ गए. डीएम के साथ मौके पर पहुंचे एसएसपी विपिन ताड़ा ने परिजनों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन परिजन और ग्रामीण मनीषा की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर अड़े रहे. उन का साफ कहना था कि जब तक अपहृत मनीषा बरामद नहीं होती और आरोपी पकड़े नहीं जाते, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

मनीषा के किडनेप और उस की मम्मी की मौत के गम में डूबी घर की महिलाएं

शुरुआत में पीडि़त परिवार मृतका सुनीता का अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं था, लेकिन सरधना से भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम की मध्यस्थता के बाद सरकार की ओर से 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा के बाद परिवार मान गया और 9 जनवरी की रात को सुनीता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हालांकि फेमिली वालों की तरफ से 50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता व परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की मांग की गई थी, लेकिन बाकी मांगें कुछ समय में पूरी करने के वादे पर फिलहाल 10 लाख का चैक मिलने से मामला थोड़ा शांत हो गया था.

होटल में मिले दोनों

उस रात को अंतिम संस्कार होने के बाद पुलिस के ऊपर आरोपी की गिरफ्तारी और मनीषा की बरामदगी का दबाव आ गया. पुलिस पारस के फेमिली वालों के साथ सख्ती से पूछताछ करने के अलावा अपने इंटैलीजेंस सिस्टम से यह पता लगाने में जुट गई कि पारस मनीषा को ले कर कहां छिपा है? जहां से भी जानकारी मिल रही थी, पुलिस की टीमें वहां दबिशें डाल रही थीं, लेकिन पुलिस को सफलता मिली अगले दिन यानी 10 जनवरी की शाम को. रुड़की के एक होटल में आरोपी पारस सोम व पीडि़ता मनीषा के ठहरने की सूचना मिली थी.

इंसपेक्टर प्रताप सिंह व स्पैशल स्टाफ की एक टीम तत्काल रुड़की के उस होटल में पहुंची और पुलिस ने वहां मनीषा को आरोपी पारस सोम के साथ बरामद कर लिया. दोनों को ले कर पुलिस टीम पहले रात को मेरठ पहुंची. मनीषा के बरामद होने के बाद एसएसपी व महिला पुलिस ने उस से काफी लंबी पूछताछ की, जिस के बाद उसे आशा ज्योति केंद्र भेज दिया गया.

मनीषा के किडनेप का आरोपी पारस सोम

अगले दिन पहले प्यारे लाल अस्पताल में मनीषा का मैडिकल चैकअप कराया गया. उस के बाद पुलिस ने एसीजेएम नम्रता सिंह की अदालत में मनीषा के दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के इकबालिया बयान दर्ज कराए. बाद में अदालत के आदेश पर मनीषा को पुलिस की अभिरक्षा में उस के फेमिली वालों के साथ भेज दिया गया. दूसरी तरफ पारस से खुद एसएसपी विपिन ताड़ा ने कई घंटे तक गहन पूछताछ की, जिस के बाद पारस सोम को स्पैशल सीजेएम न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पुलिस को दिए बयान में पारस सोम ने बताया कि गांव से मनीषा को ले कर निकलने के बाद वह उसे ले कर अपनी रिश्तेदारी खतौली गया था. शाम को सुनीता की मौत की खबर मिलने पर दोनों दिल्ली चले गए, वहां एक होटल में रात गुजारी. उस के बाद वहां से अपने दोस्त के पास गुरुग्राम चले गए. मीडिया के जरिए गांव के माहौल पर पारस सोम नजर रखे हुए था.

गांव का माहौल बिगडऩे पर मनीषा को गुरुग्राम से साथ ले कर ट्रेन से सहारनपुर पहुंच गया. सहारनपुर के टपरी गांव में पारस की बहन रहती है. उन के घर पर शुक्रवार की रात बिताई. शनिवार को रुड़की के लिए ट्रेन में सवार हो गया. पारस सोम ने अपने परिवार के बारे में गांव के ही झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र, जो उस का दोस्त भी था, उस से लगातार गांव की जानकारी ले रहा था. राजेंद्र ने उसे बताया कि मनीषा की मम्मी की मौत के बाद मामला काफी तूल पकड़ चुका है और पुलिस उसे चारों तरफ तलाश कर रही है तो वह समझ नहीं पाया कि क्या करे. चूंकि मनीषा और पारस के मोबाइल को पुलिस लगातार ट्रैक कर रही थी, जिस से उस की रियल टाइम लोकेशन का पता चल गया.

उस वक्त वह रुड़की रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरा था और मनीषा उस के साथ ही थी. पुलिस की टीम वहीं पहुंच गई और 10 जनवरी, 2026 की शाम को पारस को हिरासत में ले कर मनीषा को पुलिस ने अपने संरक्षण में ले लिया और मेरठ ले आई.

हालांकि प्रेम संबंध के इस तरह के मामलों में यूं तो मामला लड़की के बरामद होने और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन यहां यह सब होने के बाद पूरा मामला कानूनी दांवपेंच में फंस गया. हालांकि मनीषा के फेमिली वाले तो पहले से ही उस की उम्र 17 साल बता रहे थे, लेकिन पारस के जेल जाने के बाद पारस के अधिवक्ता बलराम राणा व संजीव उर्फ संजू राणा ने अदालत में हाईस्कूल की मार्कशीट पेश कर उस के नाबालिग होने का दावा कर दिया. जबकि उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस मनीषा को उस का परिवार नाबालिग यानी 17 साल की बता रहा है, उस की उम्र 21 साल है.

उम्र बनी सिरदर्द

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती पारस और मनीषा की सही उम्र का पता लगाना था. मामला कानूनी दांवपेंच में फंसने के बाद पुलिस के सामने चुनौती आ गई कि पीडि़ता व आरोपी दोनों की सही उम्र का पता करें ताकि सच्चाई सामने आ सके. पारस और मनीषा दोनों ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में पढ़ाई की थी. लिहाजा पुलिस ने कालेज की प्रधानाचार्य मंजू देवी से संपर्क किया और दोनों की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की मार्कशीट हासिल कर ली.

जिस के बाद पता चला कि मनीषा ने 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. उस का जन्म का साल 2005 था यानी वह 21वें साल में चल रही थी. पारस के अधिवक्ता ने मनीषा को बालिग और पारस को नाबालिग साबित करने के लिए सबूत पेश किए, लेकिन यह कैसे तय हो कि कौन बालिग है और कौन नाबालिग. उम्र के इन दावों की जटिलता को देखते हुए पुलिस अधिकारी कानून विशेषज्ञों से विधिक राय ले रहे हैं. एसएसपी डा. विपिन ताड़ा ने एक मैडिकल बोर्ड से दोनों के बोन टेस्ट कराने पर भी विचार कर रही है.

वैसे इस तरह के मामले बाल किशोर बोर्ड के अधीन आयु निर्धारण केंद्रों में मामले भेजे जाते हैं. आयु का निर्धारण करने के लिए मैडिकल बोर्ड का गठन भी किया जा सकता है. हालांकि मनीषा की हाईस्कूल की मार्कशीट के मुताबिक वह बालिग है, लेकिन कई बार गफलत में गांव के स्कूल में जन्मतिथि गलत भी लिखवा दी जाती है. इसी तरह पीडि़त की उम्र भी नाबालिग या बालिग हो सकती है, इसीलिए पुलिस अब कानूनी दांवपेंच में फंसे उम्र के दांवपेंच को बाल किशोर बोर्ड की मदद से सुलझाने का काम करेगी.

सुनीता की हत्या व मनीषा के किडनैप केस की जांच करने वाले सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार को शक है कि पारस ने पकड़े जाने से पहले अपने झोलाछाप दोस्त को फोन कर गांव के माहौल की जानकारी ली थी. इसी जानकारी के आधार पर पुलिस ने पारस को सर्विलांस पर ले कर गिरफ्तार भी किया था. जांच अधिकारी अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि गांव का झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र इस पूरी साजिश का हिस्सा तो नहीं था.

अपने बयान में मनीषा ने स्पष्ट कहा है कि पारस ने अपने साथियों के साथ उस का किडनैप किया और फरसे का वार कर उस की मम्मी सुनीता की हत्या की. मनीषा ने अपने बयान में यह भी कहा कि पारस के पास एक तमंचा था, जिसे दिखा कर उसे डराया गया, जिस से वह उस का विरोध नहीं कर सकी और वह मनमानी करता रहा. हालांकि उस के बयानों का विरोधाभास इसी बात से साबित होता है कि पुलिस ने उन्हें रुड़की के जिस होटल से पकड़ा, वहां मनीषा आरोपी पारस के साथ आराम से रह रही थी. साथ ही जांच में यह बात भी सामने आई कि उस ने कहीं भी आरोपी के साथ जाते हुए उस का विरोध नहीं किया.

अब चूंकि पीडि़त परिवार अनुसूचित जाति से है. इस कारण वारदात ने इलाके में तनाव फैला दिया था. चूंकि सभी राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों की हमदर्दी बटोरना चाह रहे थे, इसलिए विपक्षी दलों ने मामले को पूरी तरह गरमा दिया. हर सियासी दल का नेता खुद को पीडि़त परिवार का हमदर्द साबित करना चाहता था, इसलिए सब की दौड़ कपसाड़ गांव की तरफ शुरू हो गई.

पुलिस को पहले से ही इस बात की आशंका थी कि इस मामले में सियासत होगी. लिहाजा आसपास के कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी व रैपिड ऐक्शन फोर्स की टीमें गांव में तैनात कर दी गईं. कोई भी बाहरी व्यक्ति गांव में घुस न सके, इसलिए गांव के बाहर टोल प्लाजा के पास मेनरोड पर बैरिकेड लगा कर रास्तों को बंद कर दिया. जिस राजनीतिक दल के नेता ने कपसाड़ गांव में जाने की कोशिश की, उसे या तो वहीं से वापस लौटा दिया गया अथवा हिरासत में ले लिया गया. एक तरह से मामला पूरी तरह राजपूत बनाम अनुसूचित जाति का हो गया था.

मनीषा और पारस की इस उलझी हुई प्रेम कहानी में एक पक्ष गांव के लोगों का भी है. एक तरफ जहां पीडि़त परिवार जो आरोप लगा रहा है, उसे गांव के लोग गलत बता रहे हैं. गांव के लोगों का कहना है कि लड़की का लड़के के साथ पिछले ढाई 3 साल से अफेयर था. लड़की ने ही लड़के को फोन कर के बुलाया था. लड़की ने ही अपनी मम्मी के ऊपर हमला करवाने में लड़के का साथ दिया और उस के साथ भाग गई.

गांव वालों का कहना है कि करीब 3 साल पहले जब मनीषा के सब से बड़े भाई नरसी की शादी हुई थी, तब पारस व मनीषा पहली बार एकदूसरे से मिले थे. वहीं से दोनों में एकदूसरे के प्रति प्यार व आकर्षण हुआ. चूंकि दोनों एक ही कालेज में पढते भी थे, इसलिए गांव से बाहर दोनों की एकदूसरे से मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों ही इस बात से अंजान थे कि उन का वास्ता ऐसी जातियों से था, जहां उन के प्रेम संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाएगा.

छिप सकी आशिकी

किशोर उम्र के प्यार में ऐसा जुनून और मस्तीभरी होती है, जो किसी से छिपती नहीं है. पारस व मनीषा का प्यार भी किसी से छिपा नहीं रह सका. दोनों के इश्क की कहानियां गांव के लोगों के बीच जब किस्से बन कर तैरने लगी तो जल्द ही दोनों के फेमिली वालों को भी इस की भनक लग गई. ऐसे मामलों में जो होता है, वैसा ही पारस और मनीषा के साथ भी हुआ. दोनों के ऊपर पहले परिवार की बंदिशें लगीं, लेकिन आशिकी का जुनून दोनों को जब मिलने से नहीं रोक सका तो एक दिन ऐसा भी आया कि मनीषा के परिवार वालों ने पारस के परिवार पर मनीषा को बरगलाने का आरोप लगाते हुए झगड़ा किया.

बात बढ़ती, इस से पहले ही राजपूत व जाटव बिरादरी के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव किया और इस के बाद गांव में दोनों पक्षों की एक पंचायत बुलाई गई. ये अप्रैल, 2024 की बात है. इस पंचायत में फैसला लिया गया कि मनीषा और पारस उस दिन के बाद एकदूसरे से नहीं मिलेंगे. गांव के कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि मनीषा के पिता ने अनुसूचित जाति का होने के कारण पारस के परिवार के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने का मन बनाया था, इसलिए पारस के फेमिली वालों ने खुद इस समझौते के तहत मनीषा के पापा को एक बड़ी रकम दी थी और कहा था कि वे जल्द से जल्द अपनी बिरादरी में एक लड़का ढूंढ कर उस की शादी करा दें, ताकि यह समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाए.

गांव वालों का कहना है कि इसी के बाद मनीषा के फेमिली वालों ने भागदौड़ शुरू की और उस के लिए सहारनपुर में अपनी बिरादरी का एक अच्छा लड़का देख कर उस की शादी तय कर दी. यह शादी 10 फरवरी, 2026 को होनी थी. गांव वालों का यह भी कहना है कि मनीषा पारस को भुला नहीं पा रही थी, इसीलिए गुपचुप तरीके से उस का पारस से मिलनाजुलना जारी रहा और उस ने अपनी शादी से कुछ दिन पहले पारस के साथ मिल कर खुद को भगाने की यह साजिश रची.

हालांकि मनीषा के फेमिली वाले कहते हैं कि पारस मनीषा पर अपने साथ भागने का दबाव बना रहा था, लेकिन मनीषा ने जब साफ मना कर दिया तो 8 जनवरी की सुबह उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा कि दोनों का प्यार कितना सच्चा या झूठा था. प्यार की इस नासमझी में न सिर्फ पारस की जिंदगी अंधेरे में पड़ गई, वहीं मनीषा के दामन पर भी बदनामी का दाग लग गया और उस की मम्मी की जान गई सो अलग.

इस घटना के बाद सियासी रंग ले कर बवाल को टालने के लिए फिलहाल यूपी सरकार ने परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे कर और व स्थानीय पूर्व विधायक और बीजेपी नेता संगीत सोम ने 2 लाख नकद आर्थिक मदद दे कर पीडि़त परिवार की मदद से मामले को ठंडा करने की कोशिशें तो की हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी ने 5 लाख व सपा के सरधना विधायक अतुल प्रधान ने एक लाख के चैक से परिवार को आर्थिक मदद दे कर इस घटना को सियासी रंग में रंगने का काम कर दिया है.

मुख्य आरोपी पारस सोम को कोर्ट में पेश करने ले जाती पुलिस

अब इस प्रकरण में जांच अधिकारी सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार ने सुनीता की हत्या और बेटी मनीषा के किडनैप के मामले में पुलिस की जांच तेज कर दी है. आरोपी पारस सोम को अदालत के आदेश से रिमांड पर ले कर सुनीता की हत्या में प्रयुक्त फरसा (आलाएकत्ल) बरामद कर लिया गया है, जो केस के लिए अहम सबूत है. साथ ही पुलिस ने इस मामले में 2 नाबालिग चश्मदीद लड़कियों के बयान कोर्ट के दर्ज कराए, जिस से पारस सोम के खिलाफ केस और मजबूत होगा.

जांच अधिकारी आशुतोष कुमार ने मनीषा के परिजनों में उस के पापा सतेंद्र कुमार और भाइयों नरसी, मनदीप व शुभम से भी पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए.

(कथा पुलिस की जांच, पीडि़त व आरोपी पक्ष के बयान और ग्रामीणों द्वारा बताए गए तथ्यों पर आधारित है. कथा में मनीषा परिवर्तित नाम है)

 

UP News: फर्स्ट लेडी ड्राइवर मर्डर – प्यार में छलावा

UP News: झांसी की 40 वर्षीय अनीता चौधरी ने जब औटोरिक्शा चलाना शुरू किया तो लोगों ने उस की हिम्मत की दाद देते हुए बहुत सम्मान दिया. जिले की इस पहली लेडी औटो ड्राइवर को सिर्फ सामाजिक संगठनों बल्कि पुलिस के सीनियर अधिकारियों ने भी सम्मानित किया, लेकिन एक दिन उस की हत्या हो जाने पर पुलिस अधिकारी भी भौचक्के रह गए. कौन था अनीता चौधरी का हत्यारा और क्यों की गई उस की हत्या? पढ़ें, लव क्राइम की यह खास स्टोरी.

अनीता चौधरी की उपेक्षा से मुकेश झा बहुत परेशान रहने लगा था. वह समझ नहीं पा रही था कि जिस अनीता ने शादीशुदा होते हुए भी उस के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी, उस ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया. मुकेश ने अनीता को लाख मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह उस की बात सुनने को राजी ही नहीं थी. क्योंकि अनीता का झुकाव अरुण नाम के युवक की तरफ हो गया था. 4 जनवरी, 2026 का दिन मुकेश झा के लिए खास दिन था. खास इसलिए कि इसी दिन मुकेश ने अनीता के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी. शादी की सालगिरह की खुशी में मुकेश बीते दिनों की कड़वाहट भुला कर अनीता से मिलने गया.

उस ने अनीता को शादी की सालगिरह की याद दिला कर साथ रहने को मनाने की कोशिश की, लेकिन अनीता राजी नहीं हुई. उस ने घूमनेफिरने को साथ चलने को कहा तो इस के लिए भी अनीता ने मना कर दिया. इतना ही नहीं, अनीता ने मुकेश को खरीखोटी सुना कर अपमानित भी किया.

अपमान और बेवफाई का घूंट पी कर मुकेश वापस घर आ गया. उसे अनीता की बेवफाई पसंद नहीं आई. वह सोचने लगा कि जिस के लिए उस ने तन मन धन सब न्योछावर कर दिया, अपनी पत्नी व बच्चों से छल किया, जिस को उस ने प्रेमिका की जगह पत्नी का दरजा दिया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. ऐसी बेवफा को वह कभी माफ नहीं करेगा. उसे उस की बेवफाई की सजा जरूर देगा. वह उस की न हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

इस के बाद मुकेश झा ने शादी की सालगिरह की रात ही अनीता व उस के प्रेमी अरुण की हत्या का प्लान बनाया. मुकेश अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ तमंचा रखता था. अपने प्लान के मुताबिक उस ने तमंचा लोड किया, फिर रात 9 बजे अपनी कार से अनीता की खोज में घर से निकल गया. अनीता झांसी जिले की पहली औटोरिक्शा महिला ड्राइवर थी. वह अकसर रात में ही औटो चलाती थी. एक दिन मुकेश ने मौका पा कर उस के औटोरिक्शा में ट्रैकर लगा दिया था. अपने फोन से ट्रैकर को कनेक्ट कर वह अनीता पर नजर रखता था.

अनीता 4 जनवरी, 2026 की रात लगभग साढ़े 9 बजे औटो ले कर घर से निकली और रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां उस का प्रेमी अरुण मौजूद था. अनीता ने अरुण को औटो में बैठा लिया फिर दोनों बातचीत में लीन हो गए. इधर मुकेश झा तमंचा लोड कर अपनी कार से अनीता का पीछा करने निकला. ट्रैकर के सहारे वह पीछा करते हुए अनीता तक जा पहुंचा. औटो में अरुण भी था. उस समय रात का डेढ़ बज रहा था.

सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास मुकेश ने चलती कार से अनीता पर फायर कर दिया. गोली उस की कनपटी पर लगी. अनीता लहूलुहान हो कर सड़क पर जा गिरी. औटो कुछ दूरी पर जा कर पलट गया. औटो पलटने से मुकेश अनीता के दूसरे प्रेमी अरुण को नहीं मार सका. अरुण छिप कर वहां से भाग गया. मुकेश भी कार ले कर फरार हो गया. 4-5 जनवरी, 2026 की दरम्यानी रात डेढ़ बजे किसी युवक ने झांसी के थाना नवाबाद पुलिस को सूचना दी कि स्टेशन रोड पर सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास सड़क पर एक्सीडेंट हुआ है, औटो पलटा पड़ा है और एक महिला सड़क पर खून से लथपथ पड़ी है. वह जिंदा है या नहीं, यह बताना मुश्किल है.

पहली थी लेडी ड्राइवर

एक्सीडेंट की सूचना पर एसएचओ रवि श्रीवास्तव कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सर्दी की रात थी, इसलिए वहां सन्नाटा पसरा था. एक महिला सड़क पर मरणासन्न पड़ी थी और चंद कदमों की दूरी पर एक औटो पलटा पड़ा था. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब घायल पड़ी महिला को गौर से देखा तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उसे वह जानते थे. वह कोई और नहीं, बल्कि झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर अनीता चौधरी थी. वह झांसी की चर्चित महिला थी. उसे पूरा शहर जानता था.

इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने एक्सीडेंट की सूचना पुलिस अधिकारियों व अनीता के फेमिली वालों को दी और अनीता को इलाज के लिए मैडिकल कालेज अस्पताल भेजा. वहां डौक्टरों ने परीक्षण के बाद उसे मृत घोषित कर दिया. सुबह एसएसपी बी.बी.जी.टी. एस. मूर्ति, एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम घटनास्थल पर पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. पहली नजर में अधिकारियों को लगा कि अनीता चौधरी की मौत एक्सीडेंट में हुई है.

सूचना पा कर मृतका की बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका चौधरी व देवर दिलदार सिंह पहले घटनास्थल फिर मोर्चरी पहुंचे. वहां अनीता का शव देख कर सभी परिजन बिलख पड़े. मृतका का बेटा विक्की उस समय पुणे में था. उसे भी सूचना दे दी गई. पुलिस मान रही थी कि अनीता चौधरी की मौत दुर्घटना है, लेकिन अनीता के फेमिली वाले पुलिस की बात से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि अनीता की हत्या की गई है. दुर्घटना में मौत दर्शाने के लिए औटो को पलटा गया है. अनीता के शरीर से ज्वैलरी भी गायब थीं. वह मंगलसूत्र, झुमके, पायल आदि पहने थी. उस का मोबाइल फोन भी गायब था.

इधर सुबह होते ही फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर अनीता चौधरी की मौत की खबर झांसी शहर में जंगल की आग की तरह फैली. जिस ने भी सुना, वही दंग रह गया. अधिकारियों से जानकारी जुटाने मीडियाकर्मी भी उमड़ पड़े. अनीता के फेमिली वालों से भी उन्होंने बातचीत की. उन्होंने मीडियाकर्मियों से साफ कहा कि अनीता की हत्या हुई है. फेमिली वाले पुलिस अधिकारियों से भी मिले और हत्या की आशंका जताई.

अनीता चौधरी की हत्या हुई या फिर एक्सीडेंट में मौत हुई, इस के लिए पुलिस ने शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु मैडिकल कालेज भेजा. 2 डाक्टरों के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच अनीता चौधरी के शव का पोस्टमार्टम किया और रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट की एक प्रति एसपी कार्यालय भी भिजवा दी. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब अनीता चौधरी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंक पड़े. क्योंकि उस की मौत एक्सीडेंट में नहीं हुई थी, बल्कि उस की गोली मार कर हत्या की गई थी. उस की कनपटी (कान के नीचे) पर गोली मारी गई थी. गोली उस के गले में फंस गई थी. रवि श्रीवास्तव ने यह जानकारी आला अधिकारियों को दी तो वे भी सकते में आ गए.

अनीता की मौत के मामले में पुलिस से भारी चूक हुई थी, अत: पुलिस अधिकारियों ने मृतका अनीता चौधरी के फेमिली वालों को बुलवाया और उस की हत्या के संबंध में उन से पूछताछ की.

प्रेमी पर हुआ शक

मृतका की छोटी बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका तथा देवर दिलदार ने बताया कि अनीता की हत्या मुकेश झा ने की है, जो प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में रहता है. दोनों के बीच पैसों के लेनदेन का झगड़ा था. मुकेश अनीता के चरित्र पर भी शक करता था. अनीता की हत्या में उस का बेटा शिवम झा व उस का बहनोई मनोज झा भी शामिल हो सकता है. पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों के आदेश पर इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने मृतका अनीता के पति द्वारका चौधरी की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत मुकेश झा, उस के बेटे शिवम झा तथा बहनोई मनोज झा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. तुरंत काररवाई करते हुए पुलिस ने शिवम झा व मनोज झा को हिरासत में ले लिया, लेकिन मुकेश झा घर से फरार हो गया.

मुकेश झा की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने 3 टीमों का गठन एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत की अगुवाई में किया. ये टीमें मुहिम में जुट गईं. उस की तलाश में कई संभावित ठिकानों पर दबिश दी गई, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. तब एसएसपी ने उस की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.

कार में मिला तमंचा

6 जनवरी, 2026 की देर रात एसएचओ रवि श्रीवास्तव को खबर मिली कि बरुआ सागर थाना क्षेत्र के बेतवा नदी के नोटघाट पुल पर एक लावारिस कार खड़ी है. खबर पाते ही वह अपनी टीम के साथ पहुंचे और कार की तलाशी ली. कार के अंदर से एक तमंचा तथा एक मोबाइल फोन बरामद हुआ. मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. जांचपड़ताल से पता चला कि लावारिस खड़ी इग्निस कार हत्यारोपी मुकेश झा की है. एसएचओ ने मुकेश झा की कार बरामद होने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. साथ ही आशंका जताई कि गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी मुकेश ने नदी में छलांग लगा दी है.

इस पर एसपी (सिटी) प्रीति सिंह व सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम नोटघाट पुल पहुंचे और नदी में जाल डलवा कर गोताखोरों की मदद से मुकेश की खोज कराई. लेकिन घंटों की मशक्कत के बाद भी मुकेश का कुछ भी पता न चला. तब पुलिस अधिकारियों को शक हुआ कि शायद मुकेश पुलिस को गुमराह कर भाग गया होगा. अब पुलिस ने मुकेश की तलाश और तेज कर दी. जंगलों में भी उस की तलाश शुरू कर दी. इस के अलावा पुलिस अधिकारियों ने अपने खास खबरियों को भी लगा दिया. लेकिन इस के बावजूद मुकेश हाथ नहीं आया.

9 जनवरी, 2026 की रात 10 बजे एसएचओ रवि श्रीवास्तव अपनी टीम के साथ भगवंतपुरा के पास चैकिंग कर रहे थे, तभी उन्हें खास मुखबिर से जानकारी मिली कि मुकेश झा को भगवंतपुरा से करगुआं वाले कच्चे रास्ते पर देखा गया है. इस पर नवाबाद थाने के एसएचओ रवि प्रकाश श्रीवास्तव ने पुलिस टीम के साथ घेराबंदी की. पुलिस को देख कर मुकेश कच्चे रास्ते पर भागा. रोकने पर उस ने पुलिस टीम पर फायर किया. पुलिस की जवाबी फायरिंग में उस के दाएं पैर में गोली लगी. गोली लगते ही वह लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. पुलिस ने उसे तब गिरफ्तार कर लिया. घायल मुकेश को इलाज हेतु अस्पताल में भरती कराया गया.

एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (सिटी) प्रीति सिंह ने मुकेश झा से अनीता चौधरी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया, ”मैं अनीता से बेहद प्यार करता था. हम दोनों पिछले 7 सालों से रिलेशनशिप में थे. मंदिर में शादी भी कर चुके थे, लेकिन अनीता अब दूसरे युवक को चाहने लगी थी. इसलिए उस ने 3 महीने पहले ब्रेकअप कर लिया था.’’

उस ने आगे बताया, ”प्यार में धोखा मिला तो मुझे बरदाश्त नहीं हुआ. मैं ने मैरिज एनिवर्सरी की रात 4 जनवरी को कनपटी पर गोली मार कर उस की हत्या कर दी थी. फिर अपनी कार नोटघाट पुल पर खड़ी कर भाग गया था, ताकि पुलिस को लगे कि मैं ने बेतवा नदी में कूद कर जान दे दी है. मैं अनीता के प्रेमी अरुण को भी मारना चाहता था, लेकिन औटो पलटने से वह बच गया.’’

पुलिस अधिकारियों की पूछताछ के बाद उन के आदेश पर एसएचओ रवि प्रकाश ने मुकेश झा को अनीता चौधरी की हत्या के आरोप में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. लेकिन हिरासत में लिए गए मुकेश के बेटे शिवम झा तथा बहनाई मनोज झा को साक्ष्य के अभाव में गिरफ्तार नहीं किया गया. दोनों ने खुद को अनीता की हत्या में निर्दोष बताया. अनीता चौधरी कौन थी? वह झांसी की प्रथम महिला औटो चालक कैसे बनी? मुकेश झा के संपर्क में कैसे आई? लिवइन रिलेशन में रहने के बावजूद उस का मुकेश से ब्रेकअप क्यों हुआ? मुकेश ने उस की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए अनीता का अतीत झांकना होगा.

मैनेजर से हुआ प्यार

उत्तर प्रदेश का झांसी शहर वीरांगना लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है. इसी शहर के नवाबाद थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है तालपुरा. इसी तालपुरा मोहल्ले की अंबेडकर नगर कालोनी में द्वारका चौधरी सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनीता के अलावा एक बेटा विक्की तथा 2 बेटियां थीं. द्वारका झांसी बस स्टौप के पास चाय का ठेला लगाता था. इसी की आमदनी से परिवार का भरणपोषण करता था.

अनीता पढ़ीलिखी खूबसूरत युवती थी, जबकि उस का पति द्वारका चौधरी साधारण रंगरूप का कम पढ़ालिखा इंसान था. अनीता की छोटी बहन विनीता भी द्वारका के छोटे भाई दिलदार के साथ ब्याही थी. वह भी झांसी में ही रहता था. अनीता 3 बच्चों की मां थी. वह चाहती थी कि उस के बच्चे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हों, लेकिन पति द्वारका की कमाई इतनी नहीं थी कि वह बच्चों का पालनपोषण ठीक से कर सके, उन की पढ़ाई का बोझ उठा सके. उस के लिए तो परिवार की दोजून की रोटी जुटाना ही मुश्किल था. अनीता सदैव चिंता में डूबी रहती थी.

अनीता को जब बच्चों की देखभाल की चिंता ज्यादा सताने लगी तो उस ने घर की दहलीज लांघ कर नौकरी करने का मन बनाया. इस बाबत उस ने पति से बात की तो उस ने साफ मना कर दिया. द्वारका ने कहा, ”वह चौहान वंश का है. वह गरीब जरूर है, लेकिन उस के वंश की महिलाएं घर की देहरी नहीं लांघतीं.’’

लेकिन अनीता ने पति की बात अनसुनी कर दी और नौकरी के लिए प्रयास करने लगी. अनीता के मोहल्ले की कुछ महिलाएं ओरछा स्थित एक ग्लास फैक्ट्री में काम करती थीं. अनीता ने उन महिलाओं से बात की, फिर उन के सहयोग से अनीता को भी वहां नौकरी मिल गई. अनीता कांच फैक्ट्री में काम करने लगी तो उस की माली हालत सुधरने लगी. बच्चों का पालनपोषण व पढ़ाई ठीक से होने लगी.

वह जिस ग्लास फैक्ट्री में काम करती थी, उसी में मुकेश झा भी काम करता था. वह मैनेजर था. फैक्ट्री के कर्मचारियों पर निगाह रखना तथा उन का वेतन आदि वितरण करना उस का काम था. फैक्ट्री के अन्य काम भी वही देखता था. कर्मचारी को काम पर रखना या फिर निकालना उसी के हाथ में था. फैक्ट्री पर उस की मजबूत पकड़ थी. मुकेश झा प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी अंजना के अलावा बेटा शुभम व एक बेटी थी. मुकेश फैक्ट्री में मैनेजर तो था ही, इस के अलावा वह एक होटल का संचालन भी करता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उस के पास एक कार तथा बाइक भी थी. वह ठाठबाट से रहता था. रंगीनमिजाज भी था.

एक रोज मुकेश झा की नजर फैक्ट्री में काम कर रही अनीता पर पड़ी. खूबसूरत अनीता को देख कर उस की धड़कनें बढ़ गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा, फिर चला गया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अनीता को रिझाने के लिए वह उस से नजदीकियां बढ़ाने लगा. अनीता की पारखी नजरें भांप गईं कि मैनेजर बाबू की नजरें उस पर गड़ी हैं, इसलिए वह उस से नजरें चुराने लगी, लेकिन मुकेश झा कहां मानने वाला था. एक रोज मौका पा कर उस ने अनीता को रोक लिया और बोला, ”अनीता, तुम बहुत खूबसूरत हो. तुम्हारी खूबसूरती पर मैं फिदा हूं. तुम से दोस्ती करना चाहता हूं.’’

अनीता झिझकते व शरमाते हुए बोली, ”मुकेश बाबू, आप यह क्या कह रहे हैं. मैं 3 बच्चों की मां हूं. भला मुझ से दोस्ती कर के आप को क्या हासिल होगा?’’

”अनीता तुम 3 बच्चों की मां जरूर हो, लेकिन खूबसूरती में किसी नवयौवना से कम नहीं हो. मेरे लिए तो तुम अप्सरा जैसी हो.’’

अपनी खूबसूरती की तारीफ सुन कर अनीता मन ही मन खुश हुई, लेकिन दिखावे के तौर पर बोली, ”आप मेरी झूठी तारीफ कर रहे हो. भला मैं इतनी खूबसूरत कहां हूं.’’

इस के बाद मुकेश अनीता के पीछे पड़ गया. वह उसे हर तरह से रिझाने की कोशिश करने लगा. उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. धीरेधीरे अनीता भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. यही आकर्षण कब प्यार में तब्दील हो गया, अनीता नहीं जान पाई. अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच की दूरियां भी कम होने लगीं. अब दोनों साथसाथ घूमनेफिरने लगे. होटल रेस्त्रां में गुलछर्रे उड़ाने लगे. अनीता को अब मुकेश का साथ अच्छा लगने लगा था. मुकेश भी ज्यादा समय अनीता के साथ बिताने लगा. उसे अनीता हूर की परी लगने लगी थी.

मुकेश झा आर्थिक रूप से संपन्न था. शहर में उस का मकान तथा आवागमन के लिए घर में कार व बाइक थी. अनीता की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. उस का पति द्वारका चौधरी ठेले पर चाय बेचता था. वह बीमार भी रहता था. अनीता जितनी खूबसूरत थी, उस का पति साधारण शक्लसूरत का था. अत: अनीता को जब मुकेश का साथ मिला तो वह उस की तरफ खिंचती चली गई. मुकेश के सामने उसे अब अपना पति फीका लगने लगा था. यही हाल मुकेश का भी था. अनीता के मुकाबले अपनी पत्नी फीकी लगने लगी थी.

मंदिर में लव मैरिज

अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो दोनों एक रोज मंदिर में पहुंचे और मुकेश ने उस की मांग में सिंदूर भर कर उसे पत्नी का दरजा दे दिया. इस के बाद दोनों अलग मकान ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगे. मुकेश अनीता की हर सुखसुविधा का ध्यान रखता था. अनीता गहने, कपड़े, पैसों जिस किसी की भी डिमांड करती थी, मुकेश झा उसे पूरा करता था. अनीता की मांग में सिंदूर भले ही पति द्वारका का सजा था, लेकिन वह पतिधर्म प्रेमी मुकेश के साथ निभाती थी. हंसीखुशी से उन का समय बीत रहा था.

अनीता ने मुकेश को दिल मेें बसाया तो उसे अपना बीमार पति द्वारका फीका लगने लगा. वह उस की उपेक्षा करने लगी. उस ने उस की परवाह करना छोड़ दी. अनीता और मुकेश अब साथसाथ रहना चाहते थे. अत: 4 जनवरी, 2019 को मुकेश ने मंदिर में जा कर अनीता की मांग में सिंदूर भर कर उस के साथ लव मैरिज कर ली.

इस के बाद अनीता और मुकेश ने अपनेअपने घरों से दूरियां बना लीं और अलग मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. दोनों के फेमिली वालों को विवाह रचाने की जानकारी हुई तो उन्होंने विरोध जताया, लेकिन विरोध का उन पर असर नहीं हुआ. 19 फरवरी, 2020 को अनीता और मुकेश के बीच फैक्ट्री में किसी बात को ले कर बहस हो गई. गुस्से में मुकेश ने अनीता से कह दिया कि कल से फैक्ट्री मत आना. मुकेश की यह बात अनीता के दिल में कांटे की तरह चुभ गई, अत: उस ने फैक्ट्री जाना बंद कर दिया.

हालांकि मुकेश ने अनीता को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात दिल को चुभ गई थी, इसलिए अनीता फैक्ट्री नहीं गई. मार्च 2020 के पहले हफ्ते में अनीता नौकरी की तलाश में मुंबई चली गई. वहां गए उसे 10 दिन ही बीते थे कि कोरोना की वजह से लौकडाउन की चर्चा होने लगी. वहां उसे नौकरी भी नहीं मिली थी, इसलिए वह घर लौट आई. मुंबई से लौटने के बाद अनीता के घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई.

अनीता कर्मठ, लगनशील और खुद्ïदार महिला थी. काफी सोचविचार कर उस ने फाइनैंस पर औटो ले कर चलाने का प्लान बनाया, लेकिन उस के सामने पहला प्रश्न यह था कि पैसा कौन देगा? इस के लिए उस ने कई बैंकों से संपर्क साधा, लेकिन कोई बैंक बिना गारंटी उसे लोन देने को तैयार न था. काफी प्रयास के बाद एक निजी बैंक ने लोन देने की हामी भरी. जब बैंक अधिकारी जांचपड़ताल करने घर आए तो अनीता के पति द्वारका ने अपना आधार और बैंक पासबुक की कौपी देने से इंकार कर दिया. क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अनीता महिला हो कर औटो चलाए.

वैसे भी झांसी में कोई महिला औटो चालक नहीं थी, लेकिन विरोध के बावजूद अनीता ने हिम्मत नहीं हारी. इस बुरे वक्त में अनीता ने मुकेश झा से मदद मांगी. मुकेश की मदद से उस ने बैंक के कागज पूरे किए और लोन ले लिया. 18 फरवरी, 2021 को अनीता ने फाइनैंस करा कर नई औटो खरीदी और झांसी की सड़कों पर उसे चलाने लगी. इस तरह अनीता चौधरी झांसी की फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर बन गई. उस के जज्बे की हर तरफ तारीफ होने लगी. वह अखबारों की सुर्खियों में भी छा गई. कई सामाजिक संगठनों ने उस के जज्बे को सलाम करते हुए उसे सम्मानित भी किया.

पुलिस विभाग में भी वह चर्चा का विषय बन गई. उस ने अपने औटो के आगेपीछे पोस्टर चस्पा किए थे, जिन पर लिखा था— जनपद झांसी पुलिस, झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर. पुरुष और महिला एक समान, जनजन का हो यही आह्वान. पुलिस अफसरों के फोन नंबर भी लिखे थे. अनीता का हौसला बढ़ाने के लिए तत्कालीन डीआईजी (झांसी रेंज) जोगेंद्र सिंह ने भी उस के औटो पर सफर किया था और 13 दिसंबर, 2021 को उस के कार्य की सराहना करते हुए उसे प्रशस्ति पत्र दिया था.

इस तरह समय बीतता रहा और अनीता औटो चला कर पैसे कमाती रही. साथ ही सुर्खियों में भी छाई रही. अनीता और मुकेश साथ रहते थे. मुकेश अनीता को प्यार करता था, इसलिए वह उस की हर डिमांड पूरी करता था. उस ने अनीता को गहनों से लाद दिया था. अनीता अकसर औटो ले कर झांसी रेलवे स्टेशन के पास खड़ी होती थी. यहां जुलाई 2025 में उस की दोस्ती अरुण नाम के युवक से हुई. अरुण स्टेशन के पास ही एक ट्रेवल एजेंसी में काम करता था. अनीता और अरुण एकदूसरे को पसंद करने लगे. दोनों घंटों मोबाइल पर रसभरी बातें करते और हंसीठिठोली करते.

प्यार में आया ट्विस्ट

अनीता की अरुण से नजदीकियां बढ़ीं तो वह मुकेश की उपेक्षा करने लगी. उस का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. लेकिन इधर कुछ समय से अनीता के व्यवहार में रूखापन आ गया था. वह उस की उपेक्षा भी करने लगी थी. उस की जुबान में कड़वाहट भी आ गई थी. वह पहले जैसा न तो बरताव करती थी और न ही हंसतीबोलती थी. वह साथ घूमने को चलने के लिए कहता तो साफ मना कर देती. कोई उपहार लाता तो उसे लेने से इंकार कर देती. मुकेश की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अनीता के स्वभाव मेें यह परिवर्तन कैसे और क्यों आया.

अनीता के स्वभाव को ले कर मुकेश की उलझन बढ़ी तो उस ने अनीता की जासूसी की. तब उसे पता चला कि अनीता अब किसी अरुण नाम के युवक से प्यार करने लगी है. इसी कारण वह उस की उपेक्षा करती है.

एक रोज मुकेश ने अनीता के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ”अनीता, यह अरुण कौन है? इस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

अरुण का नाम सुनते ही अनीता घबरा गई. वह जान गई कि मुकेश को उस के और अरुण की दोस्ती का पता चल गया है. फिर भी वह संभलते हुए बोली, ”अरुण एक अच्छा इंसान है. हम दोनों के बीच दोस्ती है. कभीकभी उस से बतिया लेती हूं.’’

”तुम दोनों के बीच सिर्फ दोस्ती है या फिर नाजायज रिश्ता भी है?’’ मुकेश ने कटाक्ष किया.

मुकेश के इस कटाक्ष से अनीता भड़क गई और बोली, ”तुम मुझ पर लांछन लगा कर अपनी हदें पार कर रहे हो. मैं यह सब कतई बरदाश्त नहीं करूंगी.’’

उस रोज अरुण को ले कर अनीता और मुकेश के बीच खूब कहासुनी हुई. इस के बाद तो आए दिन विवाद होने लगा. उन दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस के सामने जा पहुंचा. अरुण को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा होने लगा. अक्तूबर, 2025 में एक रोज मुकेश ने अनीता के साथ रेलवे स्टेशन के बाहर अभद्रता व मारपीट की तो औटो चालकों का गुस्सा फूट पड़ा. चालकों ने मुकेश की पिटाई कर दी. अनीता ने भी थाना नवाबाद में मुकेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद मुकेश को थाने लाया गया. थाने में पंचायत शुरू हुई. दोनों के फेमिली वाले भी थाने पहुंचे.

थाने में मुकेश पुलिस व अपने फेमिली वालों के सामने बोला कि वह अनीता के साथ ही रहेगा, लेकिन जब अनीता से पूछा गया तो उस ने कहा कि वह मुकेश के साथ नहीं रहना चाहती. यह सुनते ही मुकेश बौखला गया और कहने लगा कि अब या तो तुम रहोगी या हम. धमकी देने पर पुलिस ने उसे काफी फटकार लगाई. इस घटना के बाद अनीता ने मुकेश से ब्रेकअप कर लिया और उसे छोड़ कर पति के साथ रहने लगी. अनीता अब दिन में घर संभालती और रात को औटो चलाती. रात में अकसर अरुण भी उस के साथ रहता. सुरक्षा की दृष्टि से वह अरुण को साथ रखती थी.

मुकेश किसी भी कीमत पर अनीता को खोना नहीं चाहता था, अत: अनीता चौधरी की जिंदगी में जब अरुण आया तो वह बौखला गया. वह दोनों पर नजर रखने लगा. मुकेश ने गुपचुप तरीके से अनीता के औटो में ट्रैकर लगा दिया. मोबाइल के जरिए वह निगाह रखता था. ट्रैकर औन होने पर उस से होने वाली बात सुनता था. अनीता व अरुण में क्या बातचीत होती, उसे सब पता चल जाता था. मुकेश अब जान गया था कि अनीता और अरुण के बीच गहरे प्रेम संबंध हैं.

4 जनवरी, 2026 की शाम मुकेश अनीता के पास गया. उस ने उसे शादी की सालगिरह की याद दिलाई और घर वापस चलने को कहा, लेकिन अनीता ने साफ मना करते हुए मुकेश की बेइज्जती की. तब उस ने उसी रात अनीता की गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन उस का दूसरा प्रेमी अरुण बच गया. आरोपी मुकेश झा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 10 जनवरी, 2026 को उसे झांसी की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. UP News

 

 

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद