Family Love Crime : पति के अफेयर में क्यों पिसे पत्नी

Family Love Crime. बरेली का रहने वाला भारत यादव सेना में नौकरी करता था. वह 2 बच्चों का बाप जरूर बन गया था, लेकिन पत्नी गीता यादव को बासी दाल समझता था. इसी बीच बदायूं की रहने वाली 24 वर्षीय सुरभि यादव से उसे फेसबुक द्वारा प्यार हो गया. दोनों होटल में अपनी हसरतें पूरी करते रहे. यह जानकारी गीता को हुई तो घर में महाभारत शुरू हो गई. फिर एक दिन पति के अफेयर में गीता ऐसी पिसी कि

”गीता…गीता…गीता. अरे इस नाम को सुन कर अब नफरत होने लगी है मुझे अपने आप से.’’ सुरभि ने भारत को अपने से हटाते हुए लगभग धकेलते हुए गुस्से में कहा.

”अरे मेरी जान, नाराज क्यों हो रही हो?’’ भारत ने सुरभि का गुस्सा भांपते हुए बात को संभालने की कोशिश की, ”मैं तुम से पहले ही कह चुका हूं बेबी कि तुम्हें जल्द ही गीता नाम की इस नागिन से छुटकारा दिला दूंगा.’’

”जुबान बंद रखो अपनी और लंबीलंबी हांकना बंद करो… पिछले 3 महीने से तुम्हारी ये जुमलेबाजी सुन रही हूं कि जल्द ही मुझे मेरी सौतन से छुटकारा दिला दोगे. लेकिन हर बार आते हो और अपने जिस्म की गरमी उतार कर चले जाते हो और फिर भूल जाते हो कि हम ने क्या तय किया था.’’ सुरभि उस दिन जिस तरह भड़क रही थी उस से भारत को लगा कि आज शायद वह किसी फैसले के मूड में है.

‘सुनो..सुनो जान, थोड़ा सब्र करो… मैं ने सब कुछ प्लान कर लिया है. इस बार मैं तुम्हें यही बताने आया हूं कि अब गीता का अंत नजदीक आ गया है. उस दिन 18 अप्रैल 2026 की मध्यरात्रि थी, जब भारत सिंह यादव अपनी प्रेयसी के अंकपाश में सिमटा अपनी ही पत्नी की हत्या की योजना बना रहा था.

उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के थाना सुभाषनगर में दोपहर करीब एक बजे फोन से सूचना मिली कि सुभाष नगर में वैष्णो धाम कालोनी में रहने वाले एक फौजी की पत्नी की किसी ने हत्या कर दी है. फोन समीप के एक अस्पताल से मरने वाली महिला के भतीजे ने किया था.

सूचना मिलते ही सुभाषनगर थाने के एसएचओ सतीश कुमार नैन, एसआई राजेंद्र सिंह, कांस्टेबल लख्मीचंद, महिला कांस्टेबल राखी को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन से पहले ही इलाके की पीसीआर गाड़ी से गश्ती पुलिस दल वहां पहुंच गया था. जिस घर में वारदात हुई थी, वहां भीड़ का मेला जैसा लग गया था.

Family Love Crime

पूछताछ करने पर पता चला कि जिस महिला की हत्या हुई, उस का नाम गीता यादव (32) था. पुलिस को सूचना उस के भतीजे सचिन ने दी थी, जो अपनी बहन शीतल के साथ वहां मौजूद था.

इंसपेक्टर सतीश नैन ने पूछताछ की. शुरुआत उसी से की तो पता चला गीता यादव के पति का नाम भारत यादव है और वह सेना में नौकरी करता है. वर्तमान में उस की पोस्टिंग पंजाब के फिरोजपुर में है. गीता के साथ उस के 2 बेटे 14 वर्षीय दृश्य और 12 वर्षीय हर्ष के अलावा उन के भतीजे सचिन के छोटे भाई का 6 साल का बेटा यशवर्धन रहता है.

दरअसल, सचिन और शीतल बरेली में रह कर पढ़ रहे हैं, इसलिए अपनी बुआ की कालोनी में ही किराए का एक कमरा ले कर साथ रहते हैं, जबकि भाई के बेटे यशोवर्घन को बुआ ने पालने के लिए अपने पास ही रख लिया था. मंगलवार को तीनों बच्चे स्कूल गए थे. सुबह करीब 11 बजकर 16 मिनट पर गीता ने अपनी भतीजी शीतल को फोन किया था कि कुछ काम है, इसलिए कुछ देर में घर पर आ जाए.

कुछ देर बाद जब शीतल बुआ के घर पहुंची तो दरवाजा अंदर से बंद था. अंदर से उसे लौक किया गया था. काफी आवाज देने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला, अंदर से कूलर चलने की आवाज आ रही थी. इस पर शीतल को लगा कि हो सकता है बुआ सो गई हों. इसी बीच यशोवर्धन के स्कूल से फोन आ गया तो शीतल उसे लेने चली गई.

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दोपहर करीब एक बजे जब स्कूल से लौट कर आई तो लोहे के मुख्य  दरवाजे का लौक तो खुला था, लेकिन अंदर से दरवाजे की कुंडी नीचे से लगी हुई थी. संदिग्ध परिस्थिति महसूस होने पर शीतल ने अपने भाई सचिन को फोन किया. सचिन ने आने के बाद दरवाजा नीचे से खोला तो अंदर गीता जमीन पर बेजान लाश की तरह पड़ी थी.

सचिन और शीतल ने अपनी बुआ को हिलाडुला कर देखा, लेकिन शरीर में किसी तरह की कोई हरकत होती न देख वे उसे उठा कर पास के निजी अस्पताल दया हौस्पिटल ले गए, जहां डौक्टरों ने जब उपचार शुरू किया तो पता चला कि उस की मौत तो वहां लाने से पहले ही हो चुकी है. डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

इस के बाद सचिन ने मामले की सूचना पुलिस को दी. इंसपेक्टर सुभाष नैन ने पूरे घर का बारीकी से निरीक्षण किया. एसपी (सिटी) मनीष पारेख और एसएसपी अनुराग आर्य भी घटना की जानकारी मिलने के बाद घटनास्थल का निरीक्षण करने के लिए पहुंच गए. घर के एक कमरे में फर्श पर चूडिय़ां भी टूटी पड़ी थीं, जिस से लगा कि शायद मरने से पहले गीता यादव का कातिल के साथ संघर्ष हुआ था.

ये वही जगह थी, जहां सचिन को गीता फर्श पर बेहोशी की हालत में मिली थी. एसएसपी अनुराग आर्य को शुरुआती जांच में ही शक हो गया कि हो न हो किसी ने बड़ी सफाई से गीता का कत्ल किया है. चूंकि घर से कोई कीमती वस्तु गायब नहीं पाई गई और घर का सामान भी यथास्थिति में मिला. इस से साफ था कि कातिल का मकसद गीता की हत्या करना ही होगा.

घटनास्थल की फोरैंसिक जांच के बाद इंसपेक्टर सतीश नैन और अन्य अधिकारी दया अस्पताल पहुंचे और गीता यादव के शव का निरीक्षण किया तथा डौक्टरों से बातचीत की. शव के निरीक्षण से ही साफ हो गया कि गीता की हत्या गला दबा कर की गई है. क्योंकि गले के चारों तरफ किसी चीज से गला दबाने के लाल निशान साफतौर पर दिखाई दे रहे थे.

पुलिस ने गीता के शव को पंचनामा भर कर वहीं से उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद इंसपेक्टर सतीश नैन अधिकारियों से आवश्यक दिशानिर्देश ले कर वापस घटनास्थल वैष्णो धाम कालोनी पहुंच गए. तब तक उन के मातहत परिवार के दूसरे लोगों से पूछताछ कर काम की कई जानकारियां हासिल कर चुके थे.

दरअसल, एसआई राजेंद्र सिंह ने इंसपेक्टर सतीश नैन के जाने के बाद सचिन और सतीश से पूछा कि क्या उन्हें किसी पर अपनी बुआ की हत्या का शक है तो उन्होंने साफ बताया कि उन की बुआ बेहद मिलनसार और सरल स्वभाव की थीं, इसलिए उन की किसी से ऐसी जानलेवा दुश्मनी होगी, इस की कल्पना करना ही कठिन है.

लेकिन जब गीता घर में अकेली थी तो बाहर से घर के भीतर वही इंसान दाखिल हुआ होगा, जो गीता का इतना अच्छा परिचित होगा कि उस के लिए गीता ने सहज ढंग से दरवाजा खोल दिया. अचानक एसआई राजेंद्र सिंह को खयाल आया कि ये काफी संपन्न लोगों की कालोनी है. अगर कोई भी इंसान घर में आया गया होगा तो वह कालोनी के किसी सीसीटीवी कैमरे में जरूर कैद हुआ होगा.

यही सोच कर उन्होंने मोहल्ले में लगे सीसीटीवी के बारे में जानकारी एकत्र की तो कालोनी में एक के बाद एक कई सीसीटीवी लगे होने की जानकारी मिली. लेकिन पता चला कि कम से एक एक सीसीटीवी ऐसा था, जिस से गीता यादव के घर की एंट्री और एग्जिट पूरी तरह कवर होते थे. संयोग से सीसीटीवी काम कर रहा था.

लिहाजा एसआई राजेंद्र सिंह ने सीसीटीवी कैमरे की फुटेज अपने कब्जे में ले ली और उन की टीम ने उस दिन सुबह से सीसीटीवी की फुटेज देखने का काम शुरू कर दिया.

जिस सफलता को हासिल करने के लिए पुलिस टीम सीसीटीवी फुटेज देखने की मशक्कत कर रही थी, आखिरकार उस में सफलता मिल गई. सुबह करीब 10 बजे छाता ओढ़े और मुंह को गमछे से ढंके एक व्यक्ति ने गीता यादव के घर का दरवाजा खटखटाया. खुद गीता यादव ने दरवाजा खोला.

गीता यादव आगंतुक से एकदम सहज ढंग से बात कर रही थी, मानो वह उसे जानती हो. उस के बाद आगंतुक घर के भीतर चला गया और दरवाजा बंद हो गया. करीब एक घंटे बाद घर का मेन गेट खुला और उस से वही आदमी छाता ओढ़े तथा मुंह पर गमछा लपेटे बाहर निकलता दिखा.

दबे पांव घर के मुख्यद्वार से निकल कर छाता लगाए वह गमछाधारी नकाबपोश इधरउधर देखता हुआ तेजी से गली के बाहर की तरफ चला गया. सीसीटीवी की ये फुटेज साफ इशारा कर रही थी कि वह आगंतुक जो भी था, उसी ने गीता यादव की हत्या को अंजाम दिया होगा. क्योंकि संदेहास्पद तरीके से उस का घर में आना और फिर खिड़की के रास्ते से बाहर आ कर चोरीछिपे चले जाना साफ इशारा कर रहा था कि उस की नीयत साफ नहीं थी.

घर में प्रवेश से ले कर बाहर निकलते वक्त तक आगंतुक के हाथ में छाते के अलावा कोई सामान नहीं था, जिस से साफ पता चलता था कि वह घर से कोई सामान नहीं ले गया है. आते व जाते समय उस के कंधे पर एक बैग था, जैसे उस में कुछ थोड़ा सामान रखा हो.

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लेकिन सब से बड़ा सवाल राजेंद्र सिंह के मन में ये कुलबुला रहा था कि वह संदिग्ध कातिल आखिर कौन था, जिस के दरवाजा खटखटाने पर गीता यादव ने न सिर्फ दरवाजा खोल दिया, बल्कि उसे अंदर भी आने दिया. यह बात तो साफ थी कि वह इंसान गीता यादव का कोई परिचित रहा होगा.

इसीलिए एसआई राजेंद्र सिंह ने उस सीसीटीवी फुटेज की कौपी अपने कब्जे में ले ली और उसे गीता यादव के घर में ला कर गीता के भतीजे सचिन कुमार, उस की बहन शीतल व 2 बच्चों राहुल व प्रीति को दिखाया, क्योंकि ये तो परिवार के लोग ही बता सकते हैं कि वो परिचित इंसान कौन रहा होगा.

सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद तो सभी के होश उड़ गए. दोनों बच्चों ने सीसीटीवी फुटेज में चेहरा साफ दिखाई न देने के बावजूद देखते ही बता दिया कि ये उन के पापा की वीडियो है. सचिन और शीतल ने भी साफ कर दिया कि घर में आने वाला संदिग्ध आगंतुक कोई और नहीं बल्कि उन के फूफा भारत सिंह यादव हैं.

सीसीटीवी की फुटेज से हत्याकांड की तसवीर पूरी तरह साफ हो गई थी. कातिल का पता चल चुका था, बस कत्ल की वजह साफ होना बाकी थी. इंसपेक्टर सतीश नैन को जब एसआई राजेंद्र सिंह से जांच की. इस प्रगति के बारे में पता चला तो उन की बांछें खिल गईं. क्योंकि केस का खुलासा लगभग हो चुका था.

इंसपेक्टर नैन ने जांच की इस प्रगति रिपोर्ट से एसपी (सिटी) मनीष पारेख और एसएसपी अनुराग आर्य को भी अवगत करा दिया. उन्होंने कुछ खास दिशानिर्देश दिए, ताकि कातिल को जल्द पकड़ा जा सके और उस के खिलाफ ठोस साक्ष्य एकत्र किए जा सकें.

आगे की काररवाई से पहले पुलिस ने वादी सचिन कुमार निवासी प्रगति नगर की तहरीर पर सुभाष नगर कोतवाली में बीएनएस की धारा 103 (1) 61 (2) में मुकदमा पंजीकृत कर लिया. एसपी (सिटी) के आदेश पर जांच का दायित्व इंसपेक्टर सतीश कुमार नैन ने अपने ही पास रखा.  इस दौरान गीता यादव के बहुत सारे रिश्तेदार भी हत्या की सूचना मिलने के बाद उन के घर पहुंच गए. देर शाम तक पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया.

परिवार वालों से पता चला कि वर्तमान में भारत सिंह की पोस्टिंग पंजाब के फिरोजपुर में है. लिहाजा पुलिस ने परिवार के लोगों से भारत यादव के कार्यालय समेत उन के निजी फोन नंबर हासिल कर लिए.

इंसपेक्टर नैन ने जब भारत के नंबर पर फोन किया तो वह बंद पाया गया. लिहाजा उन्होंने भारत की बटालियन के कमांड औफिस में फोन कर के उस की पत्नी की हत्या की सूचना दी और उस से बात कराने के लिए कहा.

लेकिन सेना के कमांड औफिस से बताया गया कि भारत यादव तो 17 अप्रैल को ही पत्नी की बीमारी की बात बता कर एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने घर गया था. यह बात जानने के बाद तो भारत पर शक न करने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची.

अगले दिन परिवार के लोगों ने मृतका गीता यादव का अंतिम संस्कार कर दिया. इस दौरान परिवार के लोगों से कुरेद कर की गई पूछताछ में पुलिस को कुछ अहम जानकारी मिली थी, जिस के आधार पर पुलिस ने अगले दिन सब से पहले भारत यादव के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाई.

भारत यादव का मोबाइल फोन तो बंद आ रहा था. लेकिन कौल डिटेल्स को खंगालने के बाद पता चला कि  एक ऐसा नंबर था, जिस पर भारत दिन में कई बार लंबीलंबी बातें किया करता था. इतना ही नहीं, जिस दिन गीता यादव की हत्या हुई उस दिन भी करीब साढ़े 12 बजे उस ने उस नंबर पर लंबी बात की थी. उस से पहले भी वह उस नंबर पर लगातार बातचीत करता रहा था.

पुलिस ने उस नंबर की डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि यह नंबर सुरभि यादव (24 वर्ष) का था जो परवेज नगर, थाना बिसौली, जनपद बदायंू पंजीकृत था. जंाच में यह भी पता चला कि जिस समय 11 से 12 बजे के बीच गीता यादव की हत्या हुई, भारत यादव के मोबाइल की लोकेशन उस के घर के आसपास ही थी. अब पुलिस को सुरभि यादव का पता लगाना था, जिस से भारत यादव संदिग्ध रूप से बात कर रहा था. वैसे ये वही सुरभि यादव थी, जिस के बारे में परिवार के लोगों ने पुलिस को अहम जानकारी दी थी.

उच्चाधिकारियों से निर्देश ले कर पुलिस की एक टीम तत्काल बदायूं पहुंची. संयोग से सुरभि यादव अपने कमरे पर ही मिल गई. पुलिस उसे हिरासत में ले कर बरेली आ गई और महिला पुलिस उस से पूछताछ करने लगी.

पहले तो सुरभि यादव पुलिस को इधरउधर की कहानियां सुना कर बरगलाती रही और कहती रही कि उस का गीता यादव की हत्या से कोई वास्ता नहीं है. लेकिन जब पुलिस ने उस से पूछा कि गीता यादव की हत्या के बाद भारत ने उसे किसलिए फोन किया था तो वह कोई सही कारण नहीं बता सकी. आखिरकार पुलिस की थका देने वाली पूछताछ में उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी के उकसावे पर भारत यादव ने अपनी पत्नी की हत्या को अंजाम दिया था.

पुलिस ने गहनता से पूछताछ के बाद गीता यादव की हत्या के आरोप में सहआरोपी बना कर सुरभि यादव को सक्षम अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. अगले दिन पुलिस को खबर मिली कि गीता के फौजी पति भारत सिंह यादव ने स्थानीय न्यायालय में समर्पण कर दिया है तो पुलिस ने उस के कस्टडी रिमांड के लिए अदालत से अनुरोध किया. अदालत ने उसे 2 दिन की पुलिस अभिरक्षा में सौंप दिया.

जो भारत यादव अदालत में बोल रहा था कि पुलिस उसे उस की पत्नी की हत्या के झूठे आरोप में फंसा रही है. वही भारत यादव पुलिस कस्टडी में आने के बाद थोड़ी सख्ती बरतने पर ही तोते की तरह बोलने लगा. उस ने पुलिस को बताया कि गीता यादव की हत्या उस ने क्यों, कैसे और किस के साथ मिल कर अंजाम दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद भारत यादव की निशानदेही पर उस गमछे व छतरी को बरामद कर लिया, जिस से गला दबा कर उस ने गीता यादव की हत्या को अंजाम दिया था. आवश्यक पूछताछ व साक्ष्य एकत्र करने के बाद पुलिस ने भारत यादव को अदालत में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

भारत यादव व सुरभि से पूछताछ में गीता हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह एक एक फौजी इंसान के चारित्रिक पतन की चौंकाने वाली कहानी है, जिस ने अपनी हवस की खातिर अपने हंसतेखेलते आशियाने में खुद ही आग लगा ली.

मूलरूप से इटावा के रहने वाले भारत सिंह यादव की शादी कम उम्र में ही हो गई थी. कम उम्र में ही इंटर की पढ़ाई के बाद उस की सेना में नौकरी लग गई. चूंकि उस के व उस की पत्नी गीता के ज्यादातर परिजन बरेली जिले में रहते थे, इसलिए कुछ सालों बाद भारत ने भी बरेली की वैष्णोधाम कालोनी में मकान बना लिया. कम उम्र में शादी होने के कारण जल्द ही दोनों एक बेटे व बेटी के मातापिता बन गए.

जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक 5 साल पहले उस की जिंदगी में आई सुरभि यादव ने उथलपुथल मचा दी. जो लोग घर से बाहर नौकरी या किसी दूसरे बहाने परिवार से दूर रहते हैं, वे अकसर सोशल मीडिया पर अपना मनोरंजन या दोस्त तलाशते हैं. जब से देश में डाटा सस्ता हुआ है तब से तो यह ट्रेंड कुछ ज्यादा ही प्रचलित हुआ है. भारत यादव पत्नी व बच्चों से दूर रहता था, लिहाजा वह भी दूसरे लोगों की तरह सेाशल मीडिया में व्यस्त रह कर अपना समय व्यतीत करता और फेसबुक आदि में रील या दूसरे माध्यमों से अपना मनोरंजन करता.

चूंकि फौजी लोग अपने परिवार से दूर रहते हैं और पत्नी के सान्निध्य को तरस जाते हैं, इसलिए फेसबुक पर महिला मित्रों से दोस्ती और बातचीत करना उन के बीच सब से सहज माध्यम है. भारत यादव की शादी चूंकि कम उम्र में हो गई थी और वह भी उस की अपनी नहीं बल्कि परिवार की मरजी से, इसलिए उसे कभी पता नहीं चला कि रोमांस क्या होता है.

वह भी चाहता था कि अपनी पसंद की किसी लड़की से प्रेम भरी बातें करे. उस से चोरीछिपे मिले और प्रेम की ऐसी गाथा लिखे, जो इश्क व जवानी की दहलीज पर कदम रखते समय नहीं कर पाया. उस की अमर प्रेम की कहानी बन जाए.

यह महज संयोग ही था कि 5 साल पहले उस की मुलाकात फेसबुक के जरिए यूपी के बदायूं जिले के परवेज नगर की रहने वाली सुरभि यादव से हुई थी. सहज ढंग से उस ने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी और सुरभि ने उसे स्वीकार कर फ्रेंड्स की लिस्ट में जोड़ भी लिया.

संयोग से सुरभि ने अन्य लड़कियों की तरह फेसबुक के बायो में कोई झूठी जानकारी नहीं दी थी. शुरुआत में बातचीत सिर्फ चैट के जरिए हुई, फिर यह दोस्ती धीरेधीरे जब प्रगाढ़ होने लगी तो सजातीय होने के कारण मैसेंजर के जरिए उन की बात भी होने लगी. दोनों का एकदूसरे पर भरोसा बढ़ा तो फोन नंबरों का आदानप्रदान हो गया. अब बातचीत टेलीफोन पर भी होने लगी. कुछ ही समय में दोनों ने एकदूसरे के बारे में सब कुछ जान लिया.

न सुरभि ने अपने बारे में कुछ छिपाया न ही भारत ने. भारत ने बता दिया कि कम उम्र में ही परिवार वालों ने उस की शादी करा दी थी और वह 2 बच्चों का बाप है. लेकिन सुरभि कहीं उस से दोस्ती न तोड़ ले, इसलिए यह भी कह दिया कि उसे अपनी पत्नी से कोई लगाव नहीं है. वह तो सुरभि जैसी पत्नी चाहता था.

इधर सुरभि ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह बदायूं के एक गांव में रहने वाले गरीब परिवार की लड़की है. 4 भाईबहनों में वह सब से बड़ी है. परिवार गांव में मेहनतमजदूरी कर के गुजरबसर करता है. वह किसी तरह इंटरमीडिएट पास करने के बाद नौकरी करने के लिए शहर आ गई और यहां किराए का कमरा ले कर रहने लगी. उस के ऊपर खुद का परिवार बसाने से ले कर अपने मातापिता व भाईबहनों को किसी मुकाम तक पहुंचाने और उन्हें पालने की जिम्मेदारी है.

भारत व सुरभि दोनों को ही एकदूसरे की यह ईमानदारी बेहद पसंद आई कि उन्होंने अपने बारे में कुछ नहीं छिपाया. कहते हैं रिश्तों में जब भरोसा बढ़ता है तो साथ में बढ़ता है सर्मपण.  कुछ ही महीनों में दोनों का एकदूसरे पर भरोसा इतना अटूट हो गया कि अब एकदूसरे से दूर रहना उन के लिए मुश्किल हो गया.

एक साल बाद भारत और सुरभि यादव पहली बार बदायंू के होटल में मिले. पहली बार दोनों एकदूसरे से मिले तो तनमन से पूरी तरह एक हो गए. दोनों के रिश्ते की अहम बात यह थी कि दोनों ही एक जाति के थे.

समय के साथ यह रिश्ता इतना गहरा हो गया कि भारत सिंह अपने परिवार से दूरी बनाने लगा. वह चोरीछिपे सुरभि से मिलने भी जाता था और छुट्टियों के दौरान उस के साथ समय बिताने लगा. उस ने सुरभि से वादा किया कि वह उस के साथ शादी कर के उसे अपनी बना लेगा. लेकिन तुम्हारी बीवी… वो मानेगी?  सुरभि ने अपनी शंका दूर करने के लिए पूछा. भारत ने जो जवाब दिया, उस ने सुरभि के दिल को बेहद सुकून दिया.

भारत ने कहा कि उस की बीवी गीता से कभी उसे प्यार नहीं था. वह तो बस पत्नी बन गई, इसलिए रिश्ता बनाना पड़ा. इसीलिए बच्चे भी हो गए. असली परिवार तो वह सुरभि के साथ बनाना चाहता है. वह अपनी प्रेमिका को हर महीने करीब 15 हजार रुपए भी देता था, ताकि अपने परिवार के प्रति उस की जिम्मेदारियों का कुछ बोझ कम हो सके. इस दौरान भारत अपने परिवार से लगातार दूर होता जा रहा था.

लेकिन हर झूठ की कलई एक न एक दिन खुलती ही है. एक बार जब भारत कुछ दिन की छुट्टियां ले कर अपने घर की बजाय सुरभि के पास समय बिताने पहुंचा तो अचानक उस के छोटे बेटे की तबीयत ज्यादा खराब हो गई.

पत्नी गीता ने पति भारत को फोन लगाया. लेकिन भारत ने अपना फोन सुरभि के पास आने के बाद बंद कर दिया था. जब भारत का फोन नहीं लगा तो गीता ने उस के कमांड औफिस में फोन कर भारत यादव से बात कराने के लिए कहा. लेकिन तब यह जान कर गीता हैरान रह गई कि भारत तो परिवार से मिलने का कारण बता कर एक हफ्ते की छुट्टी पर बरेली ही आया हुआ है.

कमाल की बात यह थी कि 3 दिन पहले अपने औफिस से परिवार से मिलने के लिए चला भारत यादव अपने ही घर नहीं पहुंचा था. करीब 5 दिन बीत जाने के बाद भारत एक दिन के लिए अपने परिवार से मिलने के लिए घर आया तो उसे पता चला कि पत्नी गीता ने उस की रेजीमेंट के कमांड में औफिस में फोन किया था.

पोल खुलने के डर से भारत ने बहाना बना दिया कि वह पंजाब में कुछ पैसा लगा कर एक दोस्त के साथ कोई काम शुरू करना चाहता है. उसी काम के लिए उस ने औफिस से झूठ बोल कर छुट्टी ली थी.

भारत ने झूठ तो बोल दिया, लेकिन गीता को उस की बातें हजम नहीं हुई. इस के बाद उस ने भारत की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. कुछ ही महीनों में भारत की हरकतों से गीता को लगने लगा कि वह किसी पराई औरत के चंगुल में है, इसीलिए वह लगातार अपने परिवार से दूरी बना रहा है.

इसी बीच जब भारत एक बार बरेली अपने परिवार के पास आया हुआ था तो गलती से भारत के फोन पर आई सुरभि की कौल गीता ने अटैंड कर ली तो सुरभि से भारत के इश्क का भांडा फूट गया.

भारत के एक महिला से अवैध संबंध की जानकारी अब पूरे परिवार के सामने जगजाहिर हो चुकी थी. कोई भी पत्नी अपने पति को किसी दूसरी औरत के साथ नहीं देख सकती. जाहिर है गीता को जब यह पता चला कि उस का पति किसी गैर औरत के पहलू को गर्म करता है तो घर में विवाद होना ही था. आए दिन ये विवाद बढ़ते ही गए. पतिपत्नी के बीच तनाव बढ़ता गया और स्थिति इतनी बिगड़ गई कि रिश्तों की डोर पूरी तरह टूटने लगी.

अब जबकि भारत और सुरभि के रिश्ते का सच परिवार पर जाहिर हो चुका था तो सुरभि ने भी भारत पर अपनी पत्नी को छोड़ कर उस के साथ रहने का दबाव बनाना शुरू कर दिया.

एक दिन भारत ने गीता से यह बात कह भी दी कि वह उसे तलाक दे दे. लेकिन गीता पुराने विचारों की घरेलू महिला थी जो ये विचार रखती है कि और की डोली मायके से उठेगी तो अर्थी पति के घर से. पति को त्यागना या उस के जीवित रहते उस से अलग होना तो कल्पना से परे है. इस बात पर भी गीता और भारत के बीच खूब विवाद हुआ.

बात जब यहां तक पहुंच चुकी थी तो सुरभि यादव ने भारत सिंह पर अपनी पत्नी को रास्ते से हटाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. कुछ दिन तक तो भारत सिंह टालता रहा, लेकिन अब 2 नावों पर सवारी करना उसे भी आसान नहीं था. कम उम्र में ही शादी के कारण जवान पत्नी गीता भारत सिंह को अधेड़ उम्र की गंवार औरत लगने लगी थी, जबकि सुरभि एक पढ़ीलिखी युवा और हसीन लड़की थी.

सुरभि का हुस्न दिल जीतने के मामले में गीता की उम्र पर भारी पड़ा और भारत सिंह ने मन ही मन ठान लिया कि वह गीता को अपनी खुशियों के रास्ते से हटा देगा. इसी के चलते 18 अप्रैल, 2026 को भारत परिवार से मिलने का बहाना कर के अपनी रेजीमेंट से एक हफ्ते की छुट्टी ले कर बरेली आया. लेकिन वह बरेली नहीं गया, बल्कि सीधे सुरभि के पास पहुंचा. इसी दौरान दोनों ने मिल कर हत्या की साजिश रची.

भारत ने बताया कि वह किस तरह गीता की हत्या करेगा. भारत जानता था कि उस के दोनों बच्चे व सचिन का बेटा हमेशा की तरह सुबह स्कूल चले जाते हैं.

योजना के अनुसार भारत सिंह 21 अप्रैल की सुबह करीब 4 बजे घर से एक छाता तथा मुंह ढंकने वाले अंगौछे के साथ बदायंू में सुरभि के कमरे से निकला और सुबह करीब 9 बजे बरेली पहुंच गया. वहां से वह सुभाष नगर स्थित वैष्णोधाम कालोनी अपने घर पहुंचा. कोई पहचान न ले, इसलिए उस ने सिर को छाते से ढंक लिया और चेहरे को अंगौछे से लपेट लिया.

करीब 10 बजे उस ने घर का दरवाजा खटखटाया. संयोग से उस वक्त पूर्वानुमान के मुताबिक गीता अकेली थी. सामने पति को खड़ा देख उस ने अचानक वहां होने की बात पूछी और उस के बाद दरवाजा खोल कर उस के अंदर आने के बाद दरवाजा बंद कर लिया. तब तक उसे पति के इरादों का पता नहीं था.

लेकिन अंदर आते ही जब भारत ने उस से कहना शुरू किया कि वह उस का पीछा क्यों नहीं छोड़ रही है तो गीता को अहसास हुआ कि शायद भारत उस दिन गलत इरादे से घर में आया है. गीता को भले ही अहसास हो गया था, लेकिन वह थी तो कमजोर औरत ही. एक फौजी पुरुष के सामने वह टिक नहीं सकी. भारत ने उसी समय अंगौछे से गला घोंट कर गीता की हत्या कर दी.

इस हाथापाई में उस के हाथ की कुछ चूडिय़ां टूट कर फर्श पर फैल गईं. गीता की हत्या के बाद उस की मौत का इत्मीनान कर भारत सिंह खिड़की के रास्ते बाहर निकला और बाहर के मुख्यद्वार की कुंडी अंदर से गिरा कर बाहर निकल गया.

उस ने कुछ दूर जाने के बाद सुरभि को फोन कर के बता दिया कि उस ने गीता नाम के रास्ते के कांटे को अपनी जिंदगी से निकाल दिया है. बस भारत से चूक यह हो गई कि घर में आने और जाने की उस की फुटेज पड़ोसी के सीसीटीवी कैमरे में रिकौर्ड हो गई.

बाद में पहले भतीजी शीतल और फिर भतीजा सचिन घर पहुंचे तो उन्होंने गीता को घर में मृत पाया.  वह उन्हें अस्पताल ले कर दौड़ा, लेकिन डौक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.

पुलिस ने जब गीता के घर के पास लगे सीसीटीवी कैमरे चैक किए तो उस में 11:20 बजे के आसपास एक व्यक्ति घर में घुसता हुआ दिखाई दे रहा है. उस ने पूरे मुंह को सफेद रंग के अंगौछे से ढंका हुआ है, चेहरा छिपाने के लिए काले रंग का छाता भी लगाया है.

करीब एक घंटे बाद साढ़े 12 के आसपास वही व्यक्ति घर से निकलता हुआ दिखाई दिया. उस ने आते समय बैग आगे टांगा हुआ था, जाते समय बैग पीछे टांगा था. इसी बीच में जब शीतल घर पहुंची थी तो दरवाजा अंदर से बंद था.

इस से साफ हो गया कि उस वक्त भारत सिंह घर के भीतर ही था. गीता के भतीजे सचिन के आने से पहले भारत गीता को ठिकाने लगा कर बाहर जा चुका था. पुलिस को भारत सिंह के हत्यारोपी होने का शक उसी समय हो गया था, जब परिवार के लोगों ने सीसीटीवी फुटेज में उस के होने की पुष्टि की थी.

शक यकीन में तब बदल गया, जब जांच में सामने आया कि भारत सिंह कई दिनों से बरेली में ही छिप कर रह रहा था. जबकि परिवार से झूठ बोल रहा था कि वह पंजाब के फिरोजपुर में ड्यूटी पर तैनात है.

इस के अलावा गीता के रिश्तेदार के मुताबिक भारत सिंह ने फोन पर बताया था कि वह जम्मू में है. वहां से निकल रहा है. हालांकि जब उस की यूनिट के अधिकारी घर पहुंचे तो उन्होंने बताया कि भारत सिंह 17 मार्च, 2026 से ही छुट्टी पर था. उस ने शादी का कार्ड दिखा कर छुट्टी ली थी.

सब से हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि वारदात से एक दिन पहले ही उस ने अपने बेटे को फोन कर के कहा था कि कल तुम दोनों भाई स्कूल जरूर जाना. यानी साफतौर पर उस ने पहले से ही पूरी साजिश रच रखी थी, ताकि घर में उन की पत्नी अकेली रह जाए.

जब बच्चे स्कूल गए, उसी दौरान भारत सिंह घर पहुंचा. पहचान छिपाने के लिए छाता और कपड़े से चेहरा ढका और मौका पा कर पत्नी गीता की गला घोंट कर हत्या कर दी.Family Love Crime

Builders Scam : कहानियां सुना कर की जाने वाली लूट गायत्री बिल्डर की ठगी

Builders Scam : पिछले 2-3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में तमाम बिल्डर कुकुरमुत्तों की तरह सामने आए. इन में से अनेक ने लग्जरी फ्लैट देने के नाम पर लोगों को खूब ठगा. गायत्री रियल एस्टेट का मालिक हरिओम दीक्षित भी उन्हीं में से एक है. अलगअलग हाउसिंग परियोजनाओं के नाम पर इस शातिर ठग ने लोगों के करोड़ों रुपए इतनी आसानी से डकार लिए कि

गेट वे औफ उत्तर प्रदेश कहे जाने वाले नोएडा के सेक्टर-78 में रहने वाले विनोद कुमार गुप्ता पेशे से बड़े बिजनेसमैन हैं. एक जमाना था जब पुरानी दिल्ली में उन के खानदानी घर में पूरा परिवार एक ही छत के नीचे एक साथ रहता था. लेकिन वक्त के साथ जरूरतें और माहौल सब बदलते हैं. समय के साथ परिवार का भी विस्तार हो गया था, लिहाजा विनोद गुप्ता ने पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से निकल कर आधुनिक और भव्य इलाके में अपना नया घरौंदा बनाने का विचार कर लिया

उन्होंने अच्छीखासी रकम में पुरानी दिल्ली का मकान बेच दिया और नोएडा के सेक्टर 78 में एक कोठी बना लीइसी आशियाने में विस्तार पा चुका परिवार विकसित होता रहा और बच्चे धीरेधीरे जवान होने लगे. नए जमाने की जरूरतों को समझते हुए विनोद कुमार ने सोचा कि क्यों वक्त रहते सभी बच्चों और परिवार के सदस्यों को उन के लिए पसंद का आशियाना खरीद दिया जाए

लेकिन तमाम उम्र परिवार के साथ बिताने वाले विनोद यह नहीं चाहते थे कि अलग आशियाना बसाने की चाह में परिवार बिखर जाए. इसलिए वह ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रही उन प्रौपर्टीज की खोज करने लगे, जिन में सुविधाओं के साथ आसान पहुंच भी होआखिर साल 2010 में उन की तलाश पूरी हुई. गायत्री हौस्पिटैलिटी एंड रियलकन नाम की बिल्डर कंपनी ग्रेटर नोएडा के सेक्टरएक में गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना बना रही थी. करीब 500 फ्लैट वाले इस प्रोजेक्ट में आलीशान फ्लैट के साथ वे तमाम सुविधाएं भी बताई जा रही थीं, जिन का वह सपना देखते थे.

आशियाने की खोज पूरी हुई तो परिवार के लोगों के साथ प्रोजेक्ट को देखनेदिखाने का दौर शुरू हुआ. प्रोजेक्ट अपने शुरुआती दौर में ही था, इसलिए थोड़ा किफायती कीमत पर भी मिल रहा थाबिल्डर कंपनी के मालिक के अलावा सेल्स और मार्केटिंग टीम के लोगों से बातचीत का दौर शुरू हुआप्रोजेक्ट की वैधानिकता जांचने के लिए उन्होंने उन के परिजनों ने जमीन के कागजों से ले कर अथौरिटी से प्रोजेक्ट की मंजूरी और नक्शे लेआउट प्लान तक सब देख डाले. कहीं कोई शंका नजर नहीं आई.

दरअसल, विनोद गुप्ता ने सुन रखा था कि नोएडा में बिल्डर मिट्टी को सोना बता कर और बंजर जमीन पर आलीशान बंगला बनाने का ख्वाब दिखा कर लोगों से उन की खूनपसीने की गाढ़ी कमाई लूट लेते हैंविनोद गुप्ता ऐसे किसी लफड़े में नहीं पडऩा चाहते थे, इसीलिए उन्होंने कदम आगे बढ़ाने से पहले कागजों की सारी पड़ताल सारी जांचपरख कर ली थी

इस के बाद उन्होंने पहले परिवार के 7 सदस्यों के नाम पर 3 बैडरूम वाले 7 फ्लैट बुक करवा दिए और गायत्री बिल्डर को डिमांड की गई एडवांस रकम अलगअलग तरीके से दे दी. इस की उन्होंने बाकायदा लिखापढ़ी भी कर लीबिल्डर की तरफ से वायदा किया गया था कि 2016 के अंत तक वह सभी फ्लैट का कब्जा उन्हें दे देगा. 1-2 साल का वक्त गुजरा तो अचानक उस इलाके में प्रौपटी के रेट तेजी से बढऩे शुरू हो गए

इसी बीच गायत्री बिल्डर की मार्केटिंग टीम की तरफ से उन्हें औफर मिला कि अगर वे उन के प्रोजेक्ट में और निवेश करना चाहते हैं तो उन्हें पुराने रेट पर ही फ्लैट बुक करने का बेनिफिट मिल सकता है

14 फ्लैट किए बुक

विनोद गुप्ता को लगा कि यह सुनहरा मौका है, इस से उन्हें बड़ा फायदा होगा. वैसे भी उन का व्यवसाय ठीक ही चल रहा था, पैसे की कोई कमी थी नहीं, लिहाजा उन्होंने परिवार के 7 और सदस्यों के नाम से 2 3 कमरे के 7 और फ्लैट बुक कर के उन की रकम भी एडवांस जमा करा दी

इस तरह उन्होंने 2010 से 2015 के बीच सेक्टर एक के जीएच-11 भूखंड पर विकसित की जा रही गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना सोसायटी में विभिन्न आकार के कुल 14 फ्लैट बुक कराए. वे अब तक बिल्डर को करीब 3.35 करोड़ रुपए एडवांस दे चुके थेबिल्डर ने तय समय में फ्लैट पर कब्जा देने और विक्रय पत्र अनुबंध करने का आश्वासन दिया था. वक्त तेजी से गुजरता गया और 2016 का वह समय भी गया, जब उन्हें उन के सभी 14 फ्लैट का कब्जा मिलना था

उस से कुछ दिन पहले की बात है, जब विनोद कुमार ने सोचा कि फ्लैट बन कर तैयार हो गए होंगे. कब्जा लेने से पहले देख आते हैं कि काम कैसा हुआ है, लेकिन जब वे बिल्डर की साइट पर पहुंचे तो जिस जगह उन का ब्लौक बनना था, वहां तो खाली जमीन पड़ी थी. वहां फ्लैट तो क्या एक ईंट नहीं लगी थी.

विनोद कुमार यह देख कर भड़क गए. उन्होंने गायत्री बिल्डर के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने जवाब दिया कि जिस जगह उन का ब्लौक तैयार होना था, उस जगह पर कोर्ट में किसानों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग को ले कर केस कर दिया था, जिस कारण कोर्ट ने जमीन के उस हिस्से पर निर्माण करने पर रोक लगा दी है

गायत्री बिल्डर के अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि अब अदालती विवाद लगभग खत्म हो गया है और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू हो जाएगाबिल्डर की तरफ से जो कहा गया था, उस के मुताबिक एक से डेढ़ साल के भीतर उन्हें निर्माण करवा कर फ्लैटों को कब्जा दे दिया जाएगा

मरता क्या करता, गुप्ता परिवार ने सब्र कर लिया कि चलो एकडेढ़ साल बाद ही सही उन के फ्लैट उन्हें मिल जाएंगे, लेकिन जो कहा गया था, वैसा हुआ नहीं.  क्योंकि एक तरफ उन से कहा गया था कि उन्हें डेढ़ साल के भीतर फ्लैट सुपुर्द कर दिए जाएंगे, दूसरी तरफ वे जब भी 1-2 महीने में गायत्री बिल्डर की ओरा परियोजना की साइट पर जाते तो उन के ब्लौक की खाली जमीन पर उन्हें वैसे ही हालात मिलते, जैसे पहले थे

आखिर यह हो क्या रहा है? एक दिन गुस्से में कर जब बिल्डर ग्रुप के पदाधिकारियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि किसानों ने समझौता करने से इंकार कर दिया है और वे फिर से कोर्ट में चले गए हैं, लिहाजा जब तक मामला नहीं सुलटता, तब तक उस हिस्से में काम शुरू नहीं किया जा सकता.  लेकिन इस बार उन्होंने जो आश्वासन दिया, उस से विनोद गुप्ता की उम्मीदें थोड़ा बढ़ गई थीं. उन्होंने विनोद गुप्ता से कहा कि अगर तय समय में कोर्ट से जमीन का विवाद नहीं सुलझा तो जो ब्लौक बन कर तैयार हो रहा है, उन्हें उस ब्लौक में फ्लैट आवंटित कर दिए जाएंगे

जिस ब्लौक में फ्लैट देने का वायदा किया था, विनोद गुप्ता ने उस के मौडल फ्लैट देख भी लिए, सब कुछ वैसा ही था, जैसा उन को मिलने वाले फ्लैट में था. कुछ महीनों का इंतजार भी खत्म हो गया. इस दौरान बताए गए दूसरे ब्लौक के फ्लैट बन कर तैयार हो गए.  उन्होंने गायत्री बिल्डर के औफिस जा कर उस ब्लौक में फ्लैट देने की बात पूछी तो उन से कहा गया कि वे सारे फ्लैट तो सेल आउट हो गए हैं. अब उन्हें बताया गया कि उन्हें तब तक इंतजार करना होगा, जब तक उन के ब्लौक की जमीन का विवाद खत्म नहीं हो जाता.

विनोद गुप्ता और उन के परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. आखिर यह क्या बात हुई कि 3.35 करोड़ रुपए की बड़ी रकम एडवांस लेने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं दिया जा रहा है, जबकि सालों गुजर चुके हैं.  उन्होंने बिल्डर ग्रुप पर ब्याज सहित पैसा वापस करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. शुरू में तो उन से कहा गया कि जल्द ही उन का बुकिंग अमाउंट का पैसा रिटर्न कर दिया जाएगा. लेकिन टालमटोल करते हुए नित नए बहाने बनाते हुए इस बात को भी कई महीने गुजर गए

आखिर एक दिन विनोद गुप्ता अपने परिजनों कुछ जानकारों के साथ गायत्री बिल्डर के औफिस जा धमके और अपना पैसा लौटाने या फ्लैट देने की जिद पर अड़ गए. लेकिन उस दिन उन्हें पता चला कि बिल्डर की नीयत में ही खोट हैउस दिन साफ कह दिया गया कि बुकिंग अमाउंट वापस करना कंपनी की पौलिसी में नहीं है, अगर किसी वजह से फ्लैट नहीं दिया जाता तो कंपनी किसी दूसरे प्रोजेक्ट में पैसा एडजस्ट कर सकती है

ठगी का हुआ अहसास

अब तक विनोद गुप्ता को यह बात बखूबी समझ चुकी थी कि वे और उन का परिवार गायत्री बिल्डर के हाथों ठगे गए हैं. उन्हें अपना करोड़ों रुपया डूबता नजर आने लगा. इसलिए अब उन्होंने बिल्डर को सबक सिखाने का मन बना लियाविनोद गुप्ता ने अपने कुछ परिचित वकीलों के साथ मिल कर जब बिसरख थाने में गायत्री बिल्डर की वादाखिलाफी और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की तो उन्हें पता लगा कि ऐसे दगाबाज बिल्डर के खिलाफ कानूनी काररवाई करने में पुलिस भी कितनी लाचार है

सरकार ने ऐसे बिल्डरों पर लगाम लगाने के लिए रेरा नाम की संस्था बनाई हुई है. विनोद गुप्ता ने वहां भी बिल्डर कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. यहां से वहां इस विभाग से उस विभाग तक धक्के खाते हुए विनोद गुप्ता को कई साल बीत गए, लेकिन कहीं से भी नतीजा अच्छा नहीं निकला

उन की खूनपसीने की कमाई लगभग पानी में डूबती नजर रही थी. विनोद गुप्ता अमनपसंद और कानून में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे, लिहाजा उन्होंने तय कर लिया कि अब वे कानून से मदद लेने के लिए अदालत जाएंगे और पुलिस को विवश करेंगे कि वह बिल्डर के खिलाफ काररवाई करेउन्होंने गौतमबुद्ध नगर की जिला अदालत में 156/3 में एक याचिका दाखिल कर दी ताकि पुलिस को उन की एफआईआर दर्ज करने का अदालती आदेश दिया जा सके. लेकिन यह काम भी उतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने समझा था

कानून की पेचीदगियों के छेद भरतेभरते आखिरकार गौतमबुद्ध नगर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रैट ने फरवरी, 2026 में कमिश्नरेट पुलिस को आदेश दिया कि विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर के खिलाफ बीएनएस की धारा 318, 406, 467, 468, 471, 120बी और 352 के तहत एफआईआर दर्ज कराई जाए, ताकि बिल्डर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ काररवाई कर के विनोद गुप्ता को फ्लैट अथवा उन की रकम वापस दिलाई जा सके20 फरवरी, 2026 को न्यायालय के आदेश पर बिसरख थाने के एसएचओ कृष्ण गोपाल शर्मा ने विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर डेवलपर के मालिक हरिओम दीक्षित के खिलाफ जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर लिया और जांच भी शुरू कर दी गई

विनोद गुप्ता के परिवार ने साल 2010 से 2015 तक कुल 3.35 करोड़ रुपए बिल्डर फर्म के निदेशक हरिओम दीक्षित को दे कर तय समय सीमा में तो फ्लैट पाया उन की रकम मिली. कुछ पाया तो काफी मेहनतमशक्कत और सालों के इंतजार के बाद एक मुकदमा जिस के लिए भी उन्हें अदालत में लंबी लड़ाई लडऩी पड़ीविनोद गुप्ता को इस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पता चला कि बिल्डर ने उन्हें फ्लैट पर कब्जा इसलिए नहीं दिया और वह लगातार टालमटोल करता रहा, क्योंकि जिन ब्लौक में उन के फ्लैट बुक किए गए थे, वह वास्तविक निर्माण योजना में शामिल ही नहीं थे.

उन्हें फरजी नक्शा दिखा कर बुकिंग कर ली गई थी. उन्होंने कंपनी के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) में भी शिकायत की थी, जो आज तक लंबित है. एनसीएलटी में भी उन की शिकायत पर जवाब देते वक्त गायत्री बिल्डर कंपनी की तरफ से गलत जानकारी दी गई

11 जनवरी, 2019 को एनसीएलटी में दाखिल कंपनी की सूची में 14 में से सिर्फ 7 फ्लैट ही दिखाए गए हैं. इन में भी 3 का उल्लेख नहीं था और 4 अन्य नामों से दिखाए गए हैं, जबकि 10 जुलाई, 2022 की सूची में सिर्फ एक फ्लैट दिखाया गया था4 कोअनएलाटेड एडवांसदिखाया है. 8 अन्य आवंटियों के नाम से दर्शाए गए और एक फ्लैट का जिक्र ही नहीं था

और भी फंसे जाल में

एनसीएलटी में कंपनी की तरफ से दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक परियोजना के आई और के ब्लौक को स्क्रैप कर उन की जमीन पर कामर्शियल निर्माण करा दिया गया, जबकि 4 फ्लैट इन्हीं ब्लौकों में बुक थे. विनोद कुमार गुप्ता समेत अन्य पीडि़तों को तो वैकल्पिक फ्लैट दिए और ही रकम वापस की गई.

दरअसल, विनोद कुमार गुप्ता अकेले ऐसे निवेशक नहीं हैं, जिन्हें आशियाने का सपना दिखा कर गायत्री बिल्डर के मालिक हरिओम दीक्षित ने करोड़ों रुपए हड़प लिए और तो समय पर फ्लैट दिया ही उन के पैसे लौटाए. ऊपर से पैसे लौटाने का दबाव बनाने पर धमकी तक दी गई.  पिछले 2 से 3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में एक कहावत तेजी से प्रचलित हुई है कि शहरों में सिर्फ 2 चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं, जमीनों के और कमीनों के

इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि तेजी से बढ़ती आबादी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों की सीमाओं में तेजी से विस्तार हुआ. लोगों के सपनों के घर आशियाने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के विभिन्न प्राधिकरणों और निजी बिल्डरों ने नई आवासीय योजनाएं शुरू कींइन आवासीय योजनाओं को पूरा करने के लिए जमीनों की जरूरत थी. लिहाजा बिल्डरों प्राधिकरणों ने किसानों ग्रामीणों से खेती की जमीन को खरीद कर उन का लैंड यूज चेंज करा लिया

शुरुआत में किसानों से आवासीय योजनाओं के लिए खरीदी गई जमीनें अपेक्षाकृत सस्ती थीं, लेकिन जब वक्त के साथ देशभर में किसानों को यह आभास हुआ कि उन से सस्ते दामों पर जमीन खरीद कर प्राधिकरण और बिल्डर बनाए गए फ्लैटों को बेहद महंगे दामों पर बेचते हैं तो उन्होंने भी अपनी जमीनों के दाम बढ़ाने शुरू कर दिएहालात यह हो गए कि महानगर के आसपास जमीनें सोने के भाव बिकने लगीं और जमीनों के बढ़े दाम आसमान छूने लगे. ये तो हुई बढ़े हुए जमीनों के दाम की मूल कहानी. अब बताते हैं कमीनों के दाम कैसे बढ़े

शुरुआत में जब सरकार के प्राधिकरण लोगों को पर्याप्त रूप से आवासीय सुविधाएं देने में नाकाम रहे तो सरकार ने निजी बिल्डरों डेवलपरों को आवासीय परियोजनाएं बनाने की मंजूरी दी. बस यहीं से कमीनों के दाम बढऩे का सिलसिला शुरू हुआ.  महानगरों में रहने वाले ऐसे लोग जिन के पास अपना थोड़ाबहुत पुश्तैनी पैसा था, उन्होंने बैंकों से मोटे कर्ज ले कर किसानों से औनेपौने दाम में जमीनें खरीदनी शुरू कर दी और वहां सरकार से आवासीय परियोजना बनाने की मंजूरी ले कर गगनचुंबी इमारतें बनानी शुरू कर दीं

कुछ बिल्डर कंपनियां, जिन्होंने पैसे का ईमानदारी से उपयोग किया, वे फलीफूलीं और नामचीन कंपनी बन गईं. लेकिन इन में से अधिकांश लोग ऐसे निकले, जिन्होंने इस की टोपी उस के सिर और उस की टोपी इस के सिर पर रखने काम काम कियामसलन, उन्होंने अपनी आवासीय अथवा कामर्शियल परियोजनाओं में एक मौडल फ्लैट, दुकान या औफिस बना कर लोगों को आशियाने और सपनों का घर देने का वायदा करना शुरू कर दिया.

ऐसे जुगाड़ू बिल्डर निवेशकों से 2 से 3 सालों में कब्जा देने का सब्जबाग दिखा कर बुकिंग अमाउंट के रूप में मोटी रकम जमा कराने लगेकुछ बिल्डरों ने तो टोपियां घुमाने का ऐसा धंधा किया कि एक परियोजना से बुकिंग के रूप में मिली करोड़ों की धनराशि को प्रोजेक्ट शुरू करने के बजाय दूसरे प्रोजेक्ट के लिए किसानों से जमीन खरीदने में लगा दिया. जबकि पहले प्रोजेक्ट का काम ही शुरू नहीं हुआ.

ऐसे जुगाड़ू बिल्डर हर छोटेबड़े शहर खासकर दिल्ली एनसीआर में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए. ऐसे बिल्डरों को तो लोगों के खूनपसीने की कमाई के नुकसान का डर था, उन के सपनों के घर के टूटने की परवाह. उन्हें चाह थी तो रातोंरात शार्टकट से अमीर बनने कीबिल्डरों ने दिल्ली एनसीआर में आशियाने का सपना दिखा कर लोगों से पैसा ऐंठने के लिए ऐसेऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि रियल एस्टेट व्यवसाय में लगे लोगों को लोग कमीना मानने लगे

इन के कारनामों से निवेशक और घर खरीदने की चाह रखने वाले इतने आजिज गए कि सरकार कोरेरानाम की एक संस्था बनानी पड़ी, ताकि बिल्डर समय पर निवेशकों को उन की संपत्ति का कब्जा देने के लिए बाध्य होंइतना ही नहीं, बैंकों सरकारी संस्थाओं से कर्ज ले कर परियोजना बनाने वाले रियल एस्टेट समूह पर देनदारी सुनिश्चित करने के लिए एनसीएलटी जैसा प्राधिकरण भी बना दिया गया

लेकिन हैरत की बात यह है कि रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े लोगों ने धांधली इस कदर मचा दी है कि इन संस्थाओं के होते हुए भी हर रोज लोग लाखोंकरोड़ों खर्च करने के बावजूद अपने सपनों का आशियाना पाने का सपना सिर्फ आंखों में ही संजो कर रह गए हैंक्योंकि रेरा जैसी संस्थाओं तथा एनसीएलटी जैसे प्राधिकरण में बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों के इतने अंबार लगे हैं कि लोगों को सालों तक अपनी सुनवाई का इंतजार करना पड़ रहा है. फैसला आने में तो हो सकता है दशकों बीत जाएं.       

बहरहाल, गायत्री बिल्डर का मालिक हरिओम दीक्षित कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुए उन्हीं बिल्डरों में से एक है, जिस ने शार्टकट से पैसा कमाने के लिए तो लोगों को झूठे सब्जबाग दिखाने में कोई भय है ही लोगों का घर का सपना टूटने का कोई डर

आगरा में बनी साख

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलपुरा के मिढ़ाकुर का मूल निवासी हरिओम दीक्षित वर्तमान में नोएडा के सेक्टर 121 की वीआईपी सोसायटी में रह रहा है. साल 2006 में हरिओम दीक्षित ने गायत्री बिल्डर डेवलपर नाम से रियल एस्टेट कंपनी बना कर आगरा में अपने बिजनैस की शुरुआत की थी

शुरू में उस ने आगरा में रियल एस्टेट के कई प्रोजेक्ट बनाए और लोगों को उन के घर फ्लैट के कब्जे समय से दे कर अपनी साख बनाईकुछ ही सालों में आगरा में उस की साख इतनी बढ़ गई कि उस के किसी भी प्रोजेक्ट से पहले सारे फ्लैटों की एडवांस बुकिंग होने लगी और प्रोजेक्ट के लिए मोटा पैसा इकट्ठा होने लगा.

कहते हैं लालच इंसान की सब से बड़ी कमजोरी होता है. हरिओम दीक्षित के साथ भी वही हुआ. रातोंरात दुनिया का सब से अमीर आदमी बनने की चाह में उस ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिएएनसीआर उन दिनों रियल एस्टेट का सब से तेजी से उभरता केंद्र था. लिहाजा हरिओम दीक्षित ने भी आगरा जैसे छोटे शहर से निकल कर दिल्ली एनसीआर के शहरों नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए

उस ने पहले अपनी पत्नी कल्याणी चतुर्वेदी के नाम से कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग नाम से एक नई कंपनी शुरू की. वैसे उस का आगे बढऩे का सिलसिला यहीं पर नहीं रुका. आगरा में कमाई गई अपनी साख को वह पूरी तरह भुनाना चाहता थाउस ने कुछ कारोबारी दोस्तों के साथ मिल कर और भी कई कंपनियां बनाईं और उन सभी में या तो वह खुद या उस की पत्नी कल्याणी पार्टनर बन गए. काम का फैलाव हुआ तो हरिओम दीक्षित ने बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं से अपने प्रोजेक्टों के लिए लोन भी लेना शुरू कर दिया.

फिर शुरू हुई हरिओम दीक्षित की ऊंची उड़ान और इस के लिए लोगों के सपने रौंद कर उन से पैसा ऐंठने का अंतहीन सिलसिला. हरिओम दीक्षित ने आगरा से ले कर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में दरजनों कंपनियां बना कर नएनए प्रोजेक्ट बनाने शुरू कर दिएहर प्रोजेक्ट आलीशान होने के दावों के साथ उस में भौतिक सुखसुविधाओं का ऐसा गुणगान किया जाता कि लोग आंखें बंद कर के उस के प्रोजेक्ट में फ्लैटों की बुकिंग के लिए लाखोंकरोड़ों रुपए एडवांस में दे देते

2012 के बाद हरिओम दीक्षित की अलगअलग रियल एस्टेट फर्मों ने प्रोजेक्ट तो दरजनों शुरू किए, लेकिन शायद ही कोई ऐसा प्रोजेक्ट रहा होगा, जो समय से पूरा हुआ या निवेशकों को समय से डिलिवरी दी गई हो. ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो पूरे ही नहीं हुए या निवेशकों को पुलिस और अदालतों की शरण लेनी पड़ी.

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर एक में गायत्री ओरा प्रोजेक्ट जहां विनोद गुप्ता के 14 परिजनों ने 14 फ्लैट बुक कराने के लिए 3 करोड़ 35 लाख रुपए एडवांस दिए थे, उसी प्रोजेक्ट में योगेश, कपिल और उन के 3 दोस्त भी निवेशक हैं, जिन्हें विनोद गुप्ता की ही तरह 2024 में अदालत का सहारा ले कर थाना बिसरख में एफआईआर दर्ज कराने के लिए मजबूर होना पड़ा था

उन चारों से भी लाखों रुपया फ्लैट बुक कराने के नाम पर ले लिया गया, लेकिन तो समय से फ्लैट मिले, ही काफी समय गुजरने के बाद कोई धनराशि लौटाई गई.  गायत्री ओरा प्रोजेक्ट में निवेश करने वालों को तो कानोंकान इस बात की खबर नहीं लगी कि करीब एक माह पहले यानी 24 जनवरी, 2026 को आगरा प्रशासन ने गायत्री डेवलपर के निदेशक हरिओम दीक्षित की ग्रेटर नोएडा वेस्ट सेक्टर-1 के इस प्रोजेक्ट की 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्तियां कुर्क कर ली थीं.

आगरा प्रशासन के आदेश पर जिन प्रोजेक्ट की संपत्तियां कुर्क की गईं, उन में नोएडा के गायत्री ओरा, एपेक्स ओरा और गायत्री हौस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट शामिल हैं. घर खरीदारों की बकाया राशि चुकाने के लिए इन संपत्तियों को नीलाम किया जाना है

वैसे तो हरिओम दीक्षित उस की रियल एस्टेट कंपनियों की पोल 2012 के बाद ही खुलनी शुरू हो गई थी. जब उस के खिलाफ निवेशकों ने एक के बाद एक शिकायतें पुलिस, अदालतों और रेरा में दर्ज करानी शुरू कर दी थीं. कोई प्रोजेक्ट ऐसा नहीं बचा था, जहां फ्लैट बुक कराने वाले निवेशकों ने समय से फ्लैट देने पर बिल्डर ग्रुप के खिलाफ प्रदर्शन किया हो

पुलिस ने किया अरेस्ट

लेकिन हरिओम दीक्षित को सब से बड़ा झटका लगा 3 अक्तूबर, 2020 को जब आगरा की ताजनगरी पुलिस ने बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को जेल भेज दिया थादरअसल, बुकिंग कराने के बाद भी लोगों को फ्लैट देने और करोड़ों रुपए की ठगी मामले में दोनों को गिरफ्तार किया गया था

उस समय हरिओम दीक्षित को गायत्री बिल्डर एवं डेवलपर्स के मालिक और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग की डायरेक्टर की हैसियत से गिरफ्तार किया गयाक्योंकि मेरठ रेंज के आईजी . सतीश गणेश ने आगरा जिले की समीक्षा के दौरान पाया था कि विगत 2 साल में आगरा के अलगअलग बिल्डरों के खिलाफ 40 से ज्यादा मुकदमे दर्ज होने पर भी पुलिस ने उन के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की

आईजी ने जिम्मेदार अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए सख्त काररवाई करने का आदेश दिया था. जिस के बाद आगरा पुलिस ने लोगों से ठगी कर के फरार हुए बिल्डरों की एक सूची बनाई और उन के खिलाफ काररवाई शुरू की

उन्हीं में एक बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी भी शामिल थे, जिन के खिलाफ कई मामले पुलिस अदालतों में दर्ज थे, लेकिन स्थानीय पुलिस ने बिल्डर से मिले सुविधा शुल्क के कारण कभी उस के खिलाफ गैरजमानती वारंट नहीं लेने की जहमत ही नहीं उठाई.  जबकि हरिओम दीक्षित के खिलाफ हरिपर्वत, सिकंदरा, न्यू आगरा, ताजगंज और रकाबगंज थानों में करीब एक दरजन शिकायतें दर्ज थीं, जिस में उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित भी नामजद थी.

बिल्डर हरिओम दीक्षित पर ज्यादातर मामलों में एक ही आरोप था कि लोगों के बुकिंग कराने के बाद भी उन्हें अभी तक फ्लैट नहीं दिए. कब फ्लैट मिलेंगे, यह भी नहीं बताया जा रहा है.  बिल्डर के औफिस में तो फोन उठाया जाता था, जिन मामलों में उस ने  चैक दिए थे, वे बाउंस हो गए, लेकिन पुलिस ने कभी भी उसे गिरफ्तार करने की जहमत नहीं उठाई.

आगरा थाने की हरिपर्वत पुलिस ने बाद में झांसी के जल निगम में तैनात वीरेंद्र पाल सिंह की शिकायत पर हरिओम दीक्षित उस की पत्नी के अलावा उस के भाई देवेंद्र दीक्षित को भी जेल भेजा था. इस मामले में उस की सास और साली समेत 12 लोग नामजद हैं. वीरेंद्र पाल से भी एडवांस बुकिंग के नाम पर 24 लाख रुपए की ठगी की गई थी

हालांकि 2020 में आगरा की हरिपर्वत थाना पुलिस द्वारा हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी से पहले आगरा के ही रकाबगंज और ताजगंज थाने में दर्ज मुकदमों में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन जब आईजी सतीश गणेश की नजरें पुलिस की करतूत पर टेढ़ी हुईं तो इस की जांच भी शुरू की गई कि इन मुकदमों को किस आधार पर खत्म किया गया.

बिल्डर हरिओम दीक्षित के खिलाफ आगरा के अलावा नोएडा और गुरुग्राम में विभिन्न थानों में 2 दरजन से अधिक मुकदमे दर्ज हैं. हैरानी की बात है कि अधिकांश में पुलिस ने एक बिल्डर के खिलाफ किसी भी मुकदमे में गैरजमानती वारंट नहीं लिए. इसे ले कर पुलिस और बिल्डरों के गठजोड़ पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं.

2020 में हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी के बाद मामला गरमा गया तो उस वक्त आगरा पुलिस ने एक सूची बनाई, जिस में हरिओम दीक्षित की किस कंपनी के कौन से प्रोजेक्ट हैं, उन में अधिकांश पर विवाद है.  जांच में पता चला कि हरिओम दीक्षित की गायत्री डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने वर्ष 2010 में 2 कंपनी एडोर्न इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और मैसर्स राधारानी प्राइवेट लिमिटेड के नाम से भी कंपनी है, जिस ने 10 हजार वर्गमीटर जमीन खरीदी.

इस के बाद सिकंदरा क्षेत्र में अन्ना आइकोन रोड पर मनहर गार्डन सोसायटी के नाम से 200 फ्लैट तैयार किए. इस में केनरा बैंक एमजी रोड से भी लोन लिया. बाद में बैंक ने तकरीबन 59 फ्लैट्स लोन के बदले अपने कब्जे में लिए

बैंक खाते हुए कुर्क

मैसर्स कल्याणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के माध्यम से शमसाबाद रोड पर वर्ष 2007 में गायत्री उपवन के नाम से 6 बीघा जमीन खरीद कर प्लौट बेचे गए.  गायत्री हौस्पिटैलिटी के माध्यम से नोएडा में गायत्री एडोरा के नाम से 36,000 वर्गफीट जमीन ले कर 1680 फ्लैट का निर्माण किया जा रहा हैकृष्णा मयूरी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम से वर्ष 2012 में रंगोली कालोनी में नीलामी के दौरान 8,000 वर्ग मीटर जमीन ली थी. इस पर आज तक कोई निर्माण कार्य नहीं किया गया.

हरिओम दीक्षित के स्वामित्त्व वाली मनहर इंफ्रा होम प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा वर्ष 2015 में फतेहाबाद रोड पर गायत्री रिट्रीट के नाम से प्रोजेक्ट्स में 72 फ्लैट तैयार कर के बेचे जा चुके हैं. नोएडा के सेक्टर 121 थाने में हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित के खिलाफ 4 मुकदमे दर्ज हैं. इन में अपने प्रोजेक्ट में फ्लैट और प्लौट की बुकिंग कर के रुपए लेने और कब्जा नहीं देने के आरोप थे.

जांच में यह भी पता चला कि आगरा में फ्लैट देने के नाम पर धोखाधड़ी के चलते न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) गायत्री डेवलपमेंट बिल्डर्स के मालिक हरिओम दीक्षित के 11 खाते कुर्क कर दिए हैं. उस के 3 खातों से राजस्व टीम ने 18 लाख रुपए की वसूली की है. बाकी 8 खातों में राजस्व टीम को एक भी पैसा नहीं मिला

गायत्री बिल्डर से भू संपदा विनियामक (रेरा) ने अप्रैल, 2021 में 69.16 लाख वसूली के आदेश डीएम को दिए दिए थे. बकाएदारी नहीं चुकाने और वसूली में लापरवाही बरतने पर 2 पीडि़त हाइकोर्ट की शरण में गए थे. जिस के बाद न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) ने बिल्डर के 11 खाते कुर्क किए थे. बिसरख थाने की पुलिस को विनोद कुमार गुप्ता के मामले की जांच में पता चला है कि गायत्री बिल्डर को सेक्टर एक में 17.5 एकड़ जमीन अलौट हुई थी, जिस में गायत्री ओरा के तहत 1,500 फ्लैट बनाने थे

इन में से कुछ टावरों को निर्माण तो हुआ, जिस की आड़ में बिल्डर ने करीब एक हजार फ्लैट बिना बने ही एडवांस रकम ले कर बेच डाले और अब इन के निवेशक या तो थानों के अथवा अदालतों के धक्के खा रहे हैं

सुनीत अवस्थी ने भी 2011 में गायत्री ओरा में 1,195 वर्गफीट का एक फ्लैट बुक किया था, जिस के लिए अब तक 16 लाख रुपए का पेमेंट कर चुके हैं.  इस के बाद भी  डेवलपर के साथ कई बार मीटिंग और वादों के बावजूद, जमीन के उस टुकड़े पर कंस्ट्रक्शन का कोई काम शुरू नहीं किया गया

उन्होंने भी पिछले साल गायत्री बिल्डर के खिलाफ 2 जुलाई को केस दर्ज किया था. गायत्री बिल्डर ने अपने ओरा प्रोजेक्ट में बुकिंग के बदले 30 से 90 फीसदी तक पेमेंट ले लिया है, जो सभी 2011 और 2015 में बुक की गई थीं, लेकिन आज तक बिल्डर ने जमीन की खुदाई तक नहीं की है

हैरानी की बात यह है कि विनोद गुप्ता की तरह बिल्डर सभी इनवेस्टर्स को शिकायत करने पर यही कहानी सुनाता है कि किसानों ने अभी तक जमीन का कब्जा नहीं सौंपा है. लेकिन हकीकत यह है कि गायत्री डेवलपर ने वह प्लौट किसी और को बेच दिया था.

UP Crime: पिस्टल गर्ल अंशिका के 150 शिकार

UP Crime: पिस्टल गर्ल के नाम से फेमस 27 वर्षीय अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा ने अपनी एक गैंग बना रखी थी. इस लेडी डौन के नाम से पुलिस वाले तक खौफ खाते थे. डीएसपी, एसएचओ और मालूम कितने पुलिसकर्मियों को वह हनीट्रैप के जाल में फांस कर उन से मोटी रकम वसूल चुकी थी. एक शरीफ और सीधेसादे परिवार में जन्मी अंशिका सिंह आखिर अपराध के दलदल में कैसे पहुंची? पढ़ें, सोशल मीडिया क्राइम की यह खास स्टोरी.

शराब से भरा कांच का गिलास हाथ में थामे अंशिका सिंह बोली, ”यार बंटी, 50 हजार रुपए और कहां से लाऊं, समझ में नहीं आ रहा है. वरना कल की पार्टी किरकिरी हो जाएगी.’’

इस से पहले अंशिका 2 पैग ले चुकी थी. शराब उस पर अपना असर दिखा चुकी थी. दिमाग और जुबान दोनों उस का साथ नहीं दे रहे थे. तभी वह लडख़ड़ाती जुबान में आगे बोली, ”तेरे पास हो तो तू दे दे, बाद में तेरे को वापस कर दूंगी, पक्का. आई प्रौमिस.’’ कह कर गिलास थामे वह बंटी की तरफ देखती रही.

”यार, तू कैसी बातें करती है. तेरे हुस्न के पिटारे में कई नगीने कैद हैं, फिर भी तू परेशान है. किसी के भी द्वार पर दस्तक दे दे, फट से तेरी झोली भर जाएगी.’’ बंटी भी हाथ में शराब से भरा कांच का गिलास पकड़े हवा में झूम रहा था.

”तू कह तो सच रहा है भाई, मेरे हुस्न के पिटारे में बहुतेरे नगीने कैद हैं, किसी एक को भी आवाज दे दूं तो वो नंगे पांव दौड़ेभागे चले आएं मेरे पास. 50 हजार की बात कौन करे, इस जवानी पर लाखलाख रुपए लुटा दें. ‘‘

”तो किस बात की देर है, निकाल पिटारे से किसी नगीने को और अपने हुस्न के हंटर से लगा 2 कोड़े. ससुरा फडफ़ड़ाता हुआ तेरी जूती पे नाक रगड़ता दिखेगा.’’

”तू ही बता दे मेरे बेवड़े आशिक, किस पर चलाऊं अपने हुस्न का हंटर.’’

”वो तेरा नया आशिक विशाल मित्ता है न, उसी को लगा दे दांव पर. साला मालदार तो है ही, उस के लिए 25-50 हजार क्या चीज है. तू जो कहेगी, ला कर तेरे कदमों में डाल देगा अभी के अभी. वैसे मानना पड़ेगा तेरे को अंशिका, तू लोमड़ी से भी ज्यादा शातिर है.’’

”वो कैसे बंटी?’’

”देख अंशिका, तू मेरे से सयानपट्टी मत कर, मैं तेरी नसनस से वाकिफ हूं, तूने कैसे विशाल को कब्जे में लेने की तरकीब निकाली है. अपनी इज्जत बचाने के लिए पूरी जिंदगी तेरे इशारों पर नाचेगा वो, तू जो कहेगी वो करेगा.’’

”तू मानता है न मेरे को, मेरे शातिर दिमाग को. एक ही झटके में कैसे उसे चित कर डाला. ऐसे ही नहीं बीड़ू उस की बीवी से दोस्ती की है. उस ने मेरे को जब से पत्नी के साथ देखा है, तब से उस के माथे पर इस ठंड के मौसम में भी पसीना चुहचुहा उठा है. बेचारा विशाल मेरे को फोन कर के पत्नी को कुछ भी न बताने के लिए गिड़गिड़ा रहा था.’’

”तो ठोक दे साले पे 50 हजार की मोहर, रकम हंसता हुआ तेरी झोली में डाल जाएगा.’’

”आइडिया बुरा नहीं हैं, बीड़ू. लगाती हूं 50 हजार की मोहर उस की जेब पर. सांप के माफिक फन उठाए रेंगता हुआ मेरे कदमों में आ गिरेगा बेचारा आशिक.’’

”तो हुआ डन.’’

”यस, माई डियर, डन डना डन डन.’’

”तो हो जाए चीयर्स.’’

”चीयर्स.’’ कह कर अंशिका हाथ में थामे शराब के गिलास से बंटी के गिलास से टकरा कर चीयर्स किया और एक ही झटके में हलक के नीचे उतार दी. और पल भर बाद लडख़ड़ाते कदमों से बिस्तर की ओर बढ़ी और धड़ाम से बैड पर गिरी. कुछ ही देर में वह खर्राटा भरने लगी.

इस से पूर्व उस ने बंटी को जाते हुए दरवाजे को आपस में भिड़का कर अपने घर जाने को कह दिया था. उस ने अंशिका की बातों को सिरआंखों पर रखते हुए वैसा ही किया था, जैसा करने को उस ने कहा था. यह बात 20 जनवरी, 2026 की रात करीब साढ़े 9 बजे की थी.

हो गया खूनी बर्थडे

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर मुख्यालय से डेढ़ किलोमीटर दूर दक्षिण में वीआईपी थाना कैंट स्थित है. इसी थानाक्षेत्र के अंतर्गत दीवानी कचहरी, मंत्री आवास, जजों के अपार्टमेंट्स सहित तमाम पौश कालोनियां आती थीं. पुलिस सुरक्षा की जिम्मेदारी थाना कैंट पुलिस पर ही है. कैंट थाने से करीब 5 किलोमीटर पूरब में सिंघडिय़ा कालोनी बसी है. इसी कालोनी में एक किराए का कमरा ले कर अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा भी रह रही थी, जो मूलरूप से गोरखपुर के हरपुर बुदहत थाने के झुडिय़ा बाबू की रहने वाली थी. वह यहां अकेली रहती थी. हालांकि उस के पापा राजकुमार सिंह (परिवर्तित नाम), जो पेशे से एक किसान थे, कोरोना काल में गुजर गए थे.

राजकुमार के परिवार में पतिपत्नी सहित कुल 7 सदस्य थे, जिन में 4 बेटियां और एक बेटा था. उन की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी पत्नी पर आ गई थी. जैसेतैसे उन्होंने अपनी गृहस्थी की बागडोर थामी. राजकुमार ने अपने जीते जी 2 बेटियों की शादी कर दी थी, जबकि बेटा मुंबई निकल चुका था और वहीं रह कर एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करने लगा था. उस की भी शादी हो चुकी थी. वह हमेशा के लिए अपना घर छोड़ कर मुंबई में बस गया था.

गोली लगने से घायल अस्पताल में भर्ती विशाल का ड्राइवर अभिताभ निशाद तथा गोली मारकर भागते वक्ता भीड़ के चगुंल में फंसी अशिंका 

फेमिली से तोड़े संबंध

तीसरे नंबर की बेटी अंशिका सिंह परिवार से अलग रह रही थी और फेमिली वालों ने भी उस से अपने रिश्ते तोड़ लिए थे. स्वच्छंद खयालातों वाली अंशिका अपनी मरजी की मालिक थी. करीब 4 साल हो चुके थे न तो वह अपने घर लौट कर गई थी और न ही घर वालों ने उस की खोज खबर ही ली थी.

खैर, बला की खूबसूरत 27 साल की अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा अपने परिवार से अलग रहती थी. 20 जनवरी, 2026 को उस का बर्थडे आने वाला था. इस बार अपना बर्थडे बड़ी धूमधाम से मनाने की योजना दोस्तों के साथ बना चुकी थी. बर्थडे पार्टी में खर्च कुछ ज्यादा ही आ रहा था. कुछ पैसे उस ने इधरउधर से अरेंज कर लिए थे. बावजूद इस के 50 हजार रुपए की और जरूरत थी. वरना पार्टी उस तरीके से नहीं बनती जैसी उस ने योजना बनाई थी. समझ में नहीं आ रहा था कि 50 हजार रुपए का कहां से इंतजाम करे.

21 जनवरी, 2026 यानी अगले दिन अंशिका का बर्थडे था. सुंदर और गुलाबी चेहरा सुबह से ही खिला हुआ था. सुबह से ही उस के चाहने वालों के फोन आ रहे थे और उसे शुभकामनाएं दे रहे थे. इसीलिए वो कुछ ज्यादा ही खुश थी. शाम 6 बजे के करीब अंशिका ने फोन कर के अपने दोस्तों आकाश वर्मा उर्फ बंटी, शिवम सिंह, विकास और अर्जुन वर्मा को अपने घर पर बुलाया, फिर कार बाहर निकाल कर बंटी को ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद आगे की सीट पर बैठ गई तो पीछे वाले सीट पर विकास और अर्जुन वर्मा बैठ गए.

थोड़ी देर बाद अंशिका दोस्तों के साथ कैंट थानाक्षेत्र स्थित मौडल शौप सिंघडिय़ा पहुंची. कार से चारों बाहर निकले और मौडल शौप के भीतर गए और एक कार्नर की टेबल के सामने चारों बैठ गए. फिर वहीं से बैठी अंशिका ने विशाल मित्ता को फोन किया, ”हैलो! अरे विशालजी, कहां हो आप?’’

गोली चलाकर भागते समय पिस्टल सहित पकड़ी गई अंशिका सिंह को पुलिस हिरासत में 

”कुछ काम से बाहर निकला हूं. बताओ, किसलिए फोन किया?’’ कौल रिसीव करते ही विशाल के चेहरे पर परेशानियों की लकीरें उभर आई थीं, ”कोई बात तो नहीं है?’’

”आप जैसे लोग मेरे शुभचिंतक हों तो मेरे को काहे की चिंता करनी. वैसे आप को बता दूं कि आज मेरा बर्थडे है, मेरे को 50 हजार चाहिए, मेरे अकांउट में तुरंत ट्रांसफर कर दो.’’

”50 हजार…’’ सुन कर विशाल ऐसे उछला था, जैसे उस ने कोई अजूबा देख लिया हो, ”क्यों खालीपीली मजाक करती हो? अभी मजाक के मूड में नहीं हूं. ‘‘

”तुम मेरे खसम तो हो नहीं, जो मैं तुम से मजाक करूंगी. फिलहाल मैं भी मजाक के मूड में नहीं हूं और न ही मजाक कर रही हूं. 10 मिनट में पैसे ट्रांसफर कर दो. मैं वेट कर रही हूं.’’ अंशिका की आवाज में धमकी की बू आ रही थी.

पुलिस हिरासत में अंशिका का सहयोगी बंटी वर्मा

”देख अंशिका, इतने पैसे तो मेरे पास नहीं है. थोड़ा वक्त दो, कहीं से मैं जुगत कर के पैसों का इंतजाम करता हूं फिर पैसे देता हूं.’’ अंशिका के सामने उस ने अपनी लाचारी जाहिर कर दी.

”50 हजार बोले तो 50 हजार. तू कहीं से ला कर दे.’’ अंशिका के तेवर बदल गए थे, ”कर्ज ले, भीख मांग या कुछ और कर, मैं नहीं जानती, मेरे को पैसे चाहिए तो चाहिए.’’

”पैसे नहीं दिए तो?’’

”तो तू जानता है न, तेरी बीवी मेरी अच्छी सहेली बन गई है, मेरे साथ बहुत मजे करती है, तेरी पोल उस के सामने खोल दूंगी तो सोच तेरा क्या होगा?’’ अंशिका ने धमकी दी.

”फिर भी न दूं तो… ‘‘

”तो रेप केस में जेल जाने के लिए तैयार हो जाना. तूने मेरा रेप किया है या नहीं, पुलिस यह नहीं पूछेगी, सीधा तुझे जेल भेज देगी. फिर उस के बाद तेरी जो घरसमाज में बदनामी होगी और लोग जब तुझ पर थूथू करेंगे, तब ज्ञान का ढक्कन खुल जाएगा कि किस से पंगा लिया है.’’ अंशिका ने फिर से ढीठ बन कर धमकी दी.

”ठीक है, मैं पैसे इंतजाम कर के आ रहा हूं. तू है कहां?’’

”सिंघडिय़ा मौडल शौप. जल्दी आ, वेट कर रही हूं मैं तेरा.’’

”ठीक, पहुंचता हूं मैं.’’ फिर विशाल फोन डिसकनेक्ट कर दिया और अपने कार ड्राइवर अमिताभ निषाद और दोस्त शैलेष को साथ ले कर मौडल शौप सिंघडिय़ा रवाना हो गया.

उस समय वो दोस्त के साथ कडजहां किसी काम से गया हुआ था. वहीं उस ने रमन से उधार पैसे मांगे. उस समय उस के पास 20 हजार रुपए थे, उस ने पूरे के पूरे दे दिए. वही रुपए ले कर विशाल दोस्त के साथ सिंघडिय़ा पहुंचा था.

अंशिका मौडल शौप के बाहर अपने दोस्तों के साथ चहलकदमी करती हुई अंदर बाहर कर रही थी. जैसे ही उस की नजर विशाल पर पडी, वह उछल गई. यही नहीं, वह लपक कर उस के नजदीक जा पहुंची और हाथ बढ़ाती हुई पैसों की मांग करने लगी, ”लाओ, पैसे दो मेरे को.’’

विशाल ने पैंट के दाहिनी जेब में हाथ डाल कर रुपए निकाले और अंशिका की ओर बढ़ा दिए.

”कितने हैं?’’ अंशिका कड़क आवाज में बोली.

”20 हजार. यही था मेरे पास. अब और नहीं दे सकता. ‘‘

”मेरा मूड खराब मत करो, विशाल. मैं बिलकुल भी मजाक के मूड में नहीं हूं. 50 हजार चाहिए मेरे को. बाकी के 30 हजार फटाफट निकालो.’’

”अब कोई पैसे नहीं हैं मेरे पास. जो था, वह मैं ने दे दिया. रही बात मजाक की तो मैं भी मजाक के मूड में नहीं हूं. बहुत पैसे तुम्हें दे दिया मैं ने, अब बस. एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा. जो करना हो कर लेना.’’ विशाल भी अपनी जगह अड़ गया.

सोशल मीडिया पर ऐसे ही मोहक अदाओं को देख मोहन अंशिका पर लट्टू हुआ था.

”मेरे गुस्से को और न भड़का, वरना…’’

”वरना क्या. गोली मार दोगी मुझे?’’

विशाल का इतना ही कहना था कि अंशिका का गुस्सा लावा बन कर फूट पड़ा. उस ने आव देखा न ताव, कमर में खोंस रखी पिस्टल निकाली और विशाल के सीने पर सटा दी.

यह देख कर विशाल की घिग्घी बंध गई. उस की समझ में नहीं आया कि क्या करे. इतने में अंशिका ने पिस्टल का ट्रिगर दबा दिया.

इस से पहले कि गोली उसे लगती, बड़ी फुरती के साथ उस ने ड्राइवर अमिताभ निषाद को अपनी ओर खींच लिया. पिस्टल से निकली गोली उस के पेट में जा लगी और वो हवा में लहराते हुए वहीं सड़क पर जा गिरा और तड़पने लगा. इतने में अंशिका और उस के दोस्त मौके का फायदा उठाते हुए कार का दरवाजा खोलने लगे.

लेकिन दरवाजा खुला नहीं. तब तक गोली की आवाज सुन कर आसपास खड़ी पब्लिक ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और अंशिका को धर दबोचा. इस बीच मौके का फायदा उठा कर उस के दोस्त फरार हो गए. तभी किसी ने कैंट थाने को फोन कर घटना की सूचना दी.

थार लूट में भी अरेस्ट

घटना की सूचना मिलते ही थाना कैंट के इंसपेक्टर संजय कुमार सिंह मय दलबल मौके पर पहुंच गए और अंशिका को अपनी कस्टडी में ले कर थाने लौट आए. उधर गोली लगने से घायल अमिताभ निषाद को आननफानन में कार से नर्सिंगहोम ले जाया गया, जहां उस की हालत गंभीर देख कर उसे एम्स मैडिकल इंजीनियरिंग कालेज रेफर कर दिया गया. वहां डौक्टरों ने तत्काल इलाज शुरू कर दिया, जिस से उस की स्थिति स्थिर बनी रही.

पुलिस अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा को हिरासत में ले कर थाने पहुंची और उस से कड़ाई से पूछताछ की तो यह जान कर पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई कि यह तो पुलिस के लिए वांछित अभियुक्त है और करीब 5 महीने पहले दिल्ली से चुराई थार कार में इसकी और इस के 4 साथियों की भी तलाश की जा रही थी. इस का नाम अंशिका सिंह है और यह संगठित गिरोह चलाती हैं.

यह चोरी के मामले के साथ कइयों को हनीट्रैप का शिकार भी बना चुकी थी. इस मामले में भी इस की तलाश चल रही थी. कार चोरी वाले मामले में पुलिस से बचने के लिए इस ने अग्रिम जमानत ले ली थी. जिस कारण पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई थी. जमानत लेने के बाद वह भूमिगत हो गई थी और अब जा कर पुलिस के हाथ लगी थी. इंसपेक्टर संजय कुमार सिंह ने मामले की सूचना सीओ (कैंट) योगेंद्र सिंह, एसपी (सिटी) अभिनव त्यागी और एसएसपी राजकरन नैयर को दी. सूचना पा कर पुलिस अधिकारी पूछताछ के लिए कैंट थाने पहुंचे.

पूछताछ में अंशिका ने बताया कि वह एक डीएसपी, एक थानेदार सहित करीब 150 लोगों को हनीट्रैप का शिकार बना चुकी है. फिर उस ने पूरी कहानी विस्तार से बताई तो उस की दर्द भरी कहानी सुनकर पुलिस अधिकारियों ने दांतों तले अंगुली दबा ली. आइए पढ़ते हैं, एक साधारण परिवार में संस्कारों के बीच पलीबढ़ी अंशिका हनीट्रैपर और गैंगस्टर कैसे बनी? साल 2019-20 का वह समय शायद ही कोई भूला होगा, जब देश में कोरोना नामक महामारी सुरसा के समान मुंह बाए कइयों के घरपरिवार को लील गई थी. रोटी के अभाव में कितने परिवार टूट कर बिखर गए थे.

उसी दौर में अंशिका का परिवार भी शिकार बना था तब कोरोना के महामारी का निवाला अंशिका के पिता राजकुमार सिंह बने. अंशिका के घर वालों पर अचानक दुखों का ऐसा पहाड़ टूट पड़ा था, जहां उन्हें एक वक्त की रोटी के लिए दुश्वारियों की काली चादर ओढऩे के लिए मजबूर होना पड़ा था, क्योंकि राजकुमार ही परिवार का भरणपोषण करने वाले व्यक्ति थे. उन्हीं के कंधों पर 7 सदस्यों का दारोमदार टिका था.

उन्होंने 4 बेटियों में से 2 बेटियों की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से थोड़ी मुक्ति पा ली थी. इकलौते बेटे राजन की भी शादी कर चुके थे. सिर्फ 2 बेटियां अंशिका और वंशिका (परिवर्तित नाम) ही शादी करने के लिए शेष रह गई थीं. उन की भी शादी कर के जल्द से जल्द गंगा नहा लेना चाहते थे, लेकिन इस से पहले ही उन की मृत्यु हो गई. घर की जिम्मेदारियों का बोझ अंशिका की मम्मी के कंधों पर आ चुका था. अचानक आई जिम्मेदारियों के बोझ से वह थोड़ी विचलित जरूर हो गई, लेकिन टूटी नहीं थी. बस दिनरात हाड़तोड़ मेहनत कर के गृहस्थी चलाने में जुटी हुई थी.

सूत्रों के अनुसार, बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की अंशिका अपने भाई और बहनों से बिलकुल अलग थी. कम उम्र में ही शानोशौकत से जीना, रईसी ठाठबाट का रुतबा दिखाना उस की प्रवृत्ति में शुमार हो चुका था. शाही अंदाज में जीने के लिए उसे ढेर सारे पैसे चाहिए थे. उन पैसों के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए रजामंद हो चुकी थी, जबकि उसे घरपरिवार की माली हालत के  बारे में बखूबी पता था.

ऐसे बहके कदम

यहीं से उस के पांव बहकने शुरू हुए. वह दिनदिन भर घर से गायब रहती थी. लड़के और लड़कियों के साथ घूमा करती थी. मम्मी उसे समझाती थी, लेकिन उन के समझाने का उस पर कोई खास असर नहीं पड़ता था. अपनी ही मस्ती में वह जीती थी और छोटेछोटे रील बनाकर सोशल मीडिया यूट्यूब पर डालती थी और अपने रूपसौंदर्य को कैश करती थी. अपने चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए पब्लिक से रिक्वेस्ट भी करती थी. रील से उसे पैसे मिलने लगे थे. उन पैसों को वो यारदोस्तों के ऊपर उड़ा देती थी. अब तो उस ने शराब से भी यारी कर ली थी और उसे अपने जीवन का अहम हिस्सा बना लिया था.

अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा ने देखा कि रील पोस्ट करने से कोई खास कमाई नहीं हो रही है, जिस की उसे जरूरत थी तो उस ने अपने ट्रेंड को चेंज करने का मूड बना लिया. इस में कोई दोराय नहीं है कि वह गजब की सुंदर थी. बलखा कर जब चलती थी, दीवाने आहें भरते थे. मनचलों की इसी दीवानगी को उस ने कैश कराने का नायाब तरीका ढंूढ निकाला. और उसी हथियार से दीवानों को घायल करने की योजना भी बना डाली.

इसी दरमियान, उस के जीवन में एक नया मोड़ आ गया था. लड़के और लड़कियों के साथ दिन भर गायब रहने वाली अंशिका मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गई थी. मसलन आज किसी और लड़केलड़कियों के साथ घूमते देखा जाता था तो कल नए के साथ घूमती नजर आती थी. कपड़ों की तरह लड़कों को बदलती थी. खुद से ही खुद के पैरों को बदनामी के दलदल में धंसाए जा रही थी. अंशिका की बदनामी की आंच से पूरा घर जल रहा था. नित नएनए किस्से लोगों के जुबान से सुने जाने लगे थे और वे चटखारे ले ले कर मजे लेने लगे थे. लोगों के भद्देभद्दे कमेंट सुनसुन कर घर वालों के कान पक गए थे. मोहल्ले में उन का रहना और जीना दुश्वार हो गया था.

और तो और लोग फेमिली वालों को अच्छी नजरों से नहीं देख रहे थे. बेटी को सुधारने की मां ने पूरी कोशिश की थी, लेकिन उन के शासन का उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी थी. वह अपने अल्हड़पन टोली में ही मस्त रही और जीती रही. बेटी अंशिका की बदनामी की आंच अब घर वाले किसी और सदस्य पर पडऩे देना नहीं चाहते थे, लिहाजा वे उस सेे दूरियां बनाने में ही अपनी भलाई समझ रहे थे, सो उन्होंने उस से सारे रिश्ते तोड़ उसे उस के हाल पर छोड़ दिया. तब वे खलीलाबाद से आ कर गोरखपुर में बस गए थे.

भाई तो पहले ही परिवार से रिश्ते तोड़ कर परिवार सहित मुंबई में बस गया था. जब से घर वालों से रिश्ता तोड़ा था, उस के बाद से पलट कर कभी घर की ओर नहीं देखा था और न ही मम्मी की सुध ही ली थी. फेमिली वालों ने अंशिका से रिश्ते तोड़ लिए थे, इस का उसे तनिक भी मलाल नहीं था, अब तो वह खुद को आजाद पंक्षी समझने लगी थी और पूरे आसमान में स्वच्छंद विचरण करना चाहती थी, जहां उसे उस की आजादी पर न तो कोई रोकने वाला हो और न ही टोकने वाला हो.

अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को उस ने और हवा दे दी. जिस पैसे की भूख के नाते उस ने घरपरिवार से रिश्ते तोडऩे में समय नहीं लगाया, उन पैसों को हासिल करने की ओर कदम बढ़ा दिया था. अंशिका रील बनाने में थोड़ा कम फोकस करती थी. ऐसे मालदार लड़कों की तलाश में जुटी हुई थी, जो आसानी से उस की गिरफ्त में फंस जाए और पैसे दे दें. यह बात साल 2021 की है. अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा गोरखपुर के कैंट थानाक्षेत्र के सिंघडिय़ा इलाके में किराए का एक कमरा ले कर रहने लगी. उस ने अपना पहला शिकार देवरिया के पवन को बनाया था.

अंशिका ने फेसबुक पर अपना एक खूबसूरत फोटो डाला और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी. पवन ने उस की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. उस के बाद अंशिका ने मैसेंजर पर एक मैसेज डाला. उसे भी पवन ने पढ़ लिया और उसे अपना मोबाइल नंबर सेंड कर दिया. फिर दोनों के बीच वाट्सऐप के जरिए बातचीत होती रही. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोटो भी भेज दिए.

इसी दरमियान अंशिका ने पवन के फोटो अपने मोबाइल में सेव कर लिए और फिर एक ऐप के जरिए दोनों के आपत्तिजनक न्यूड फोटो तैयार कर के वह न्यूड फोटो उसे भेज दीं. आपत्तिजनक हालत में फोटो देखकर पवन के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह बुरी तरह परेशान हो गया. समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? अपने मन की तकलीफ किसे शेयर करे? अभी वो इसी ऊहापोह में डूबा हुआ था कि अंशिका ने उसे न्यूड फोटो वायरल करने की धमकी दे कर इज्जत बचाने के लिए मोटी रकम की मांग कर बैठी.

पवन ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ पैसों का बंदोबस्त कर उसे दिए. पैसे हाथ लगते ही अंशिका के चेहरे पर कुटिल मुसकान थिरक उठी. इस के बाद उस ने इसी को अपने जीवन जीने का मजबूत हथियार बना लिया. अंशिका पवन से फिर से मोटी रकम की डिमांड कर बैठी तो उस ने पैसे देने से साफतौर पर मना कर दिया. फिर क्या था? अंशिका ने पवन के खिलाफ कोतवाली थाने में दुष्कर्म करने का एक फरजी मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने पवन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. उस का यह हथकंडा काम कर गया तो उस ने इसे ब्लैकमेल करने का मजबूत हथियार बना लिया.

ऐसे फांसती गई शिकार

दूसरा शिकार अंशिका ने खलीलाबाद के उस मकान मालिक को बनाया, जिस के मकान में वह किराए पर रहती थी. पवन की तरह ही मकान मालिक को छेड़छाड और दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर 2 लाख रुपए की डिमांड की, लेकिन वहां उस की दाल न गली. क्योंकि अंशिका की धमकियों के बाद मकान मालिक ने घर के कई हिस्सों में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए थे, ताकि उस की हरकतें कैमरे में कैद हो सकें और सचझूठ का सही से पता चल सके.

अंशिका छेडख़ानी और दुष्कर्म का झूठा मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर कइयों को अपनी हनीट्रैप का शिकार बना कर पैसे ऐठ चुकी थी. अब ऐसी आसामी को अपने रूपजाल में फांस कर शिकार बनाना चाहती थी, जो लाइफटाइम सोने का अंडा देता रहे. जल्द ही उस की तलाश पूरी भी हो गई. इस बार उस ने अयोध्या जिले के एक डीएसपी (सीओ) को अपना शिकार बनाया. उस से लाखों रुपए ठगे. जब उस ने पैसे देने बंद कर दिए तो वह तिलमिला उठी.

वो इतनी आसानी से डीएसपी को हाथ से जाने देने वाली नहीं थी. उसे तो सोने की खान समझती थी, लेकिन डीएसपी भी समझ चुका था कि वो हनीट्रैप का शिकार बन चुका है. यहां मुफ्त में बदनामी ही मिलनी है, लिहाजा खुद को संभाल ले. जब डीएसपी को खुद के ठगे जाने का अहसास हुआ तो उस ने अपने हाथ खींच लिए. इस से नाराज अंशिका ने डीएसपी के खिलाफ छेडख़ानी और दुष्कर्म का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया.

मामला सुर्खियों में आते ही डीएसपी की काफी बदनामी हुई और उसे पद से निलंबित कर दिया गया. इस के बाद अंशिका ने गोरखपुर के गीडा थाने के एसएचओ सहित करीब दरजनभर पुलिसकर्मियों को अपने हनीट्रैप का शिकार बनाया और उन्हें फरजी मुकदमे में फंसाने की धमकी दे कर लाखों रुपए वसूले. पते की बात तो यह है कि मामला सुर्खियों में आने के बाद गीडा इंसपेक्टर को भी थानेदारी गंवानी पड़ी थी.

अंशिका दिन पर दिन अपने जुर्म की खेती को बढ़ाती जा रही थी. उस के गैंग में आकाश वर्मा उर्फ बंटी वर्मा उस का खास सिपहसलार था तो बंटी के हाथों को देवरिया के भदेली गांव का निवासी शिवम सिंह मजबूत कर रहा था. बंटी ने ही अंशिका को पिस्टल मुहैया कराई थी. पिस्टल पा लेने के बाद उस के पैर जमीन पर नहीं थे. वह हवा में उडऩे लगी थी. अपराध की खेती के पैदावार से अंशिका का बैंक बैलेंस काफी मजबूत हो गया था. यारदोस्तों पर पानी की तरह पैसे बहाती तो थी ही, नशे को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया था.

कच्ची दारू की बड़ी शौकीन बन गई थी. शराब की बोतल लिए रील बनाती और उसे पोस्ट करती थी. लग्जरी जीवन जीने की आदी बन गई थी. वह चमचमाती गाड़ी में घूमती थी. अपराध के नशे में चूर अंशिका शायद भूल गई थी कि जुर्म की उम्र बहुत छोटी होती है. जिस रास्ते पर वह निकल चुकी है, वह रास्ता सीधा जेल की ओर जाता है. अपराधी भले ही कुछ पल के लिए कानून की आंख में धूल झोक कर अपनी बादशाहत बघार ले, लेकिन वो कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सकता है.

बात, सितंबर, 2025 की है. अंशिका अपने 5 साथियों आकाश वर्मा, अर्जुन, शिवम सिंह, देवेंद्र कुमार रावत उर्फ सोनू रावत और प्रिय प्रवास दुबे उर्फ विक्की के साथ दिल्ली घूमने गई थी. राजधानी घूमने के लिए उस ने किराए पर थार कार दिन भर के लिए बुक कराई थी. कार नई थी. अंशिका का कार पर मन डोल गया और कार ले कर फरार हो गई. कार गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले चंदन नारायण की थी. कार चोरी करने और उस पर फरजी नंबर प्लेट लगाने के मामले में चंदन नारायण ने एक लिखित तहरीर खोराबार थाने में अंशिका और साथियों के खिलाफ दी. मुकदमा पंजीकृत होने के बाद पुलिस तेजी से जांच में जुट गई थी.

अगले दिन 13 अक्तूबर को खोराबार के वनसप्ती चौराहे के पास बड़हलगंज निवासी प्रिय प्रवास दुबे उर्फ विक्की और आकाश वर्मा उर्फ बंटी को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह काले रंग की थार कार ले कर देवरिया की ओर जा रहा था. कार की जामा तलाशी लेने पर उस में से 4 फरजी नंबर प्लेट मिली थीं, जिन में 2 हरियाणा, एक बिहार और एक गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) की थी. बंटी और विक्की से पूछताछ करने पर पता चला कि सितंबर में दिल्ली घूमने गए थे. दिल्ली से गाड़ी किराए पर ली और उसे ले कर भाग गए थे.

पकड़े जाने के डर से फरजी नंबर प्लेट लगा कर घूम रहे थे. पुलिस अधिकारियों के पूछताछ में बंटी और विक्की ने अंशिका के आदेश पर चोरी करने की बात कुबूली थी.

अंशिका हुई अंडरग्राउंड

2 साथियों आकाश वर्मा उर्फ बंटी और विक्की के गिरफ्तार होने और अपना नाम सामने आने के बाद अंशिका सिंह अंडरग्राउंड हो गई थी. अंडरग्राउंड रहते उस ने अग्रिम जमानत ले ली थी. जिस से पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी और इसी का लाभ उठा कर लोगों को हनीट्रैप का शिकार बनाती रही. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, करीब 150 लोगों को उस ने अपना शिकार बनाया था और भिन्नभिन्न ऐक्शन में रील बना कर 700 रील फेसबुक पर पोस्ट की थीं. उस के करीब साढ़े 7 हजार फालोवर बन गए थे.

सोशल मीडिया पर मोहक अदाओं में अंशिका की रील देख कर विशाल मित्ता उस का दीवाना हुआ था. फिर दोनों फेसबुक के जरिए एकदूसरे से चैटिंग करना शुरू किए थे. दोनों ने एकदूसरे को अपना मोबाइल नंबर आदानप्रदान किए. फिर मोबाइल पर देर तक बातचीत होती थी. विशाल को अंशिका से प्यार हो गया था. जबकि वह शादीशुदा था. लेकिन उसे पता नहीं था कि जिस खूबसूरत बला के मोह में वह दीवाना हुआ है, वह एक हनीट्रैपर थी, जो अपनी अदाओं का जादू बिखेर कर ठगती थी.

उस के बाद अंशिका वीडियो काल के जरिए विशाल से बात करने लगी और उस की फोटो मोबाइल में कैद कर लीं. फिर उस का न्यूड वीडियो बना कर उसे ब्लैकमेल करने लगी थी. ब्लैकमेलिंग की बोतल में विशाल को उतारने के बाद पहली बार अंशिका अपने साथी आकाश वर्मा उर्फ बंटी के साथ उस से पैसे वसूलने द्विवेदी चाइल्ड केयर हौस्पिटल, दिव्यनगर पहुंच गई थी. वहां उस ने विशाल को जब उस का न्यूड वीडियो दिखाया तो देख कर उसे पसीना छूट गया था. फिर क्या था? अंशिका ने उसी वीडियो के जरिए ब्लैकमेल करते हुए उस से 12 हजार रुपए की मांग की.

मरता क्या न करता, विशाल ने उसे पैसे दे कर अपनी इज्जत बचाई थी. लोमड़ी से भी ज्यादा शातिर अंशिका शिकार को इतनी आसानी से जाने देने वाली कहां थी, उसे पता था कि वह शादीशुदा है, इसलिए उस ने विशाल के घर तक अपनी पहुंच बना ली थी और उस की पत्नी से अच्छी दोस्ती कर ली थी, ताकि विशाल उस के चंगुल में फंसा रहे. ऐसा नहीं था कि विशाल को उस की हरकतों के बारे में जानकारी नहीं थी, जब उस ने पत्नी को अंशिका के साथ घूमते हुए देखा था, तभी उस के पैरों तले जमीन खिसक गई थी. उस ने पत्नी से अंशिका से दूर रहने के लिए कह दिया था.

फूटा गुनाहों का घड़ा

कहते हैं कि जब गुनाहों का घड़ा भर जाता हे तो फूटना लाजिमी होता है, शायद अंशिका का गुनाहों का घड़ा भर चुका था. उस की लग्जरी जीवन जीने की आदत जो बन गई थी. 21 जनवरी, 2026 को अंशिका का बर्थडे था. इस बार वह अपने बर्थडे को यादगार बनाना चाहती थी. पार्टी के लिए उस ने कुछ पैसों का इंतजाम कर लिया था, अभी भी उसे 50 हजार रुपए कम पड़ रहे थे, तभी उस ने बंटी से बात करके विशाल से वसूलने का प्लान बनाया.

जैसेतैसे कर के विशाल ने 20 हजार रुपए का इंतजाम किया और वह रुपए अंशिका को देने उस के बताए स्थान मौडल शौप सिंघडिय़ा पहुंचा भी था, लेकिन रुपए कम होने के नाते अंशिका ने लेने से इंकार कर दिए और पास रखे पिस्टल से विशाल पर फायर झोंक दिया, जो बीचबचाव में गोली विशाल के ड्राइवर अमिताभ निषाद के पेट में जा गई. विशाल मित्ता की तहरीर पर इंसपेक्टर संजय कुमार सिंह ने अंशिका सहित उस के साथियों आकाश वर्मा उर्फ बंटी, अर्जुन वर्मा और शिवम सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. मौके से अंशिका ही पकड़ी गई थी, जबकि बंटी, अर्जुन और शिवम फरार हो गए थे. 2 मार्च, 2026 को अर्जुन वर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

14 मार्च, 2026 को खोराबार थाने के एसएचओ सुधांशु सिंह की तहरीर पर अंशिका सहित आकाश वर्मा उर्फ बंटी, अर्जुन, शिवम सिंह, देवेंद्र कुमार रावत उर्फ सोनू रावत और प्रिय प्रवास दुबे उर्फ विक्की के खिलाफ थार कार चोरी के अपराध में उत्तर प्रदेश गिरोहबंद समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया. गैंगस्टर ऐक्ट के तहत काररवाई की सूचना मिलते ही अंशिका की सारी अकड़ ढीली पड़ गई थी. वह जेल में फूटफूट कर रो रही थी.

यही नहीं 24 मार्च को आकाश वर्मा उर्फ बंटी और 25 मार्च को शिवम सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. गिरफ्तार सभी आरोपियों के खिलाफ गंभीर और संगीन मामले में लगभग दरजन भर मुकदमे दर्ज हैं. पुलिस सभी की हिस्ट्रीशीट खोलने की तैयारी कर चुकी है.    अपराध के सतरंगी रथ पर सवार तब अंशिका को तनिक भी इल्म नहीं हुआ कि जिस रथ पर सवार हो कर मुट्ठी भर सिपहसलारों के दम पर दंभ भर रही है, एक दिन उस का अंत जेल की सलाखों के पीछे जा कर होगा.

जिला ही नहीं प्रदेश स्तर पर कुख्यात हुई अंशिका की कलाई में जब पुलिस ने हथकड़ी पहनाई तो जहान भर का दर्द उस की आंखों के रास्ते आंसू बन कर छलक उठा और अपने किए पर पछतावा होने लगा.

पुलिस ने 17 अप्रैल, 2026 को इस गैंग के एक और सदस्य देवेंद्र कुमार रावत उर्फ सोनू को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया. अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा के साथी एक एक कर के सलाखों के पीछे पहुंच गए. पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस ने किनकिन पुलिस वालों को अपने हनीट्रैप के जाल में फंसा कर कितने पैसे ऐंठे हैं?

अपराध की काली कमाई से अंशिका ने जो भी संपत्ति अर्जित की, उस पर बुलडोजर चलाने की तैयारी पुलिस कर रही थी. कथा लिखे जाने तक जांच जारी थी. UP Crime

—कथा में कई पात्रों के नाम परिवर्तित किए गए हैं.

 

 

UP Crime: शादीशुदा से प्यार जरा सोचसमझ के

UP Crime: 4 बच्चों के पिता राजू गुप्ता ने पूजा से दूसरी शादी कर तो ली थी, लेकिन उस के नाजनखरे उठाना भारी पड़ रहा था. हद तो तब हो गई, जब वह उस की दिवंगत पत्नी के बच्चों से मिलने पर ही पाबंदी लगाने लगी और बारबार मोटी रकम की मांग करने लगी. फिर जो कुछ हुआ, उस में पूरा परिवार उलझ गया…

शाम होने को आई थी. राजू गुप्ता काफी निराश बैठा था. इस की वजह यह थी कि उस की दूसरी पत्नी पूजा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. वह उसे अब ठिकाने लगाने का फैसला ले चुका था, लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस काम को कैसे पूरा करे. राजू गुप्ता को उदास देख कर उस का सहयोगी अनीस पूछ बैठा, ”क्या बात है भाईजान, आज काफी उदास दिख रहे हो? दुकानदारी में घाटा हुआ है क्या?’’

राजू गुप्ता की लखनऊ की दुबग्गा सब्जीमंडी में दुकान थी.

”नहीं मेरे भाई, घाटावाटा कुछ नहीं… क्या बताऊं? बात ही कुछ ऐसी है, जो न कहते बनती है और न निगलते.’’

”मैं भी तो जानूं कि वह कौन सी बात है, जिसे ले कर परेशान दिख रहे हो…और मुझे नहीं बता सकते?’’

”बात ही ऐसी है कि मैं किसी से भी नहीं बताना चाहता. बस! समझो कि पानी सिर से ऊपर बहने की नौबत आ गई है.’’

”ऐं! यह क्या कह रहे हो मेरे भाई? इतना सब कुछ हो गया और मुझ से ही छिपा रहे हो? वह कौन सी बात है, जो तुम्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही है?’’ अनीस ने पूछा.

”अरे, वही पूजा की डिमांड!’’ राजू निराश मन से बोला और सिर नीचे की ओर झुका लिया.

”उस के साथ फिर कोई बहस हुई क्या? अब क्या डिमांड है उस की?’’

”अरे क्या बताऊं तुम्हें, अभीअभी 10 लाख का प्लौट बेचा था, जो पूजा के नाम था…’’ राजू आगे कुछ बोल पाता कि अनीस उस का मुंह देखने लगा. थोड़ी देर चुप रहने के बाद पूछा, ”हां, तो क्या हुआ उस का? पैसे तो पूरे मिल गए न!’’

”अरे हां, पैसे तो मिल गए, किंतु उस पर पूजा नजर जमाए है. यह समझो कि वह पूरा पैसा हड़पना चाहती है.’’ राजू निराश मन से बोला.

”अब इस में मैं क्या कर सकता हंू, मैं ने तुम्हें पहले ही मना किया था, लेकिन तुम नहीं माने!’’ अनीस बोला.

”फिर भी तुम कुछ तो बताओ, मैं अब क्या करूं?’’ राजू ने हताशा के लहजे में पूछा.

वह मुसकराते हुए बोली, ”मैं पूजा के बारे में तुम्हारी बातें सुनतेसुनते थक चुका हंू. जब तुम ने उस से दूसरी शादी की है तो तुम ही उसे झेलो. तुम्हारा भी तो औरत के बगैर गुजारा नहीं हो रहा था. तुम जानते थे कि पूजा विवाहित है, फिर भी उस में तुम्हें न जाने क्या दिखा, जो तुम भी अपनी रातों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उस की खूबसूरती पर फिदा हो गए. तुम ने उस के चालचलन की तनिक भी खोजबीन नहीं की.’’ अनीस राजू का जिगरी दोस्त था.

”तुम्हारे पास कोई उपाय है तो बताओ, लेकिन जले पर नमक मत छिड़को.’’ राजू रूखेपन के साथ बोला.

”अरे, चिंता क्यों करते हो? सब ठीक हो जाएगा. कुछ खानेपीने को मंगवाते हो तो मंगवाओ, वरना मैं चलता हूं.’’ अनीस बोला.

”हांहां क्यों नहीं, अभी मंगवाता हंू. बैठो, आज कुछ जरूरी बात करनी है.’’ दुकान के नीचे सामने खड़े राजेश को पैसे देते हुए राजू बोला, ”ब्लैक हार्सपावर व्हिस्की की बोतल ले आओ… और सुनो प्याज की गरम पकौडिय़ां भी सामने की दुकान से ले आना.’’

राजेश कुछ देर में ही व्हिस्की की बोतल ले आया. राजू और अनीस दुकान के पीछे बने बैडरूम में चले. उन्होंने उस शाम छक कर शराब पी. मूड बनाने के बाद अनीस ने पूछा, ”अब बताओ, तुम्हारे दिल की क्या समस्या है? कैसा समाधान चाहते हो?’’

राजू ने राजेश को बुला कर बोतल की बची हुई व्हिस्की उसे दे कर बाहर आढ़त की दुकान पर बैठने को कहा. हिदायत भी दी कि जब तक वह वापस नहीं आए, किसी को अंदर नहीं आने दे.

राजेश जब चला गया, तब राजू लंबी सांस लेता हुआ अनीस से बोला, ”मेरी एक योजना है…तुम जरा ध्यान से सुनना और मुझे मदद करने के बारे में बताना.’’

”ठीक है भाई, जैसा कहोगे, वैसा मैं करूंगा, जितना हो सकेगा साथ दूंगा.’’ अनीस बोला.

”तो ठीक है, मेरी बात को ध्यान से सुनना, लेकिन इस से पहले मुझे वचन दो कि किसी को भी इस बारे में कभी नहीं बताओगे.’’ राजू बोला और वचन लेने के लिए अपनी हथेली अनीस की ओर बढ़ा दी. उस के बाद धीमी आवाज में अनीस से फुसफुसा कर बातें करने लगा.

जैसे ही राजू ने अपनी बात पूरी की, वैसे ही अनीस की आंखों में अजीब तरह की चमक दिखी. वह बोला, ”तू तो बहुत ही शातिर दिमाग रखता है यार, मैं ने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं था.’’

”तुम को मेरा साथ देना होगा.’’

”पक्का साथ दूंगा, लेकिन दूसरे सहयोगियों से भी तो बात कर लो.’’ अनीस बोला.

”पैसे के आगे वे भी साथ देंगे.’’

दरअसल, राजू ने एक योजना बनाई थी, जिस में अनीस के अलावा शकील, राजेश और सर्वेश नाम के युवकों को भी शामिल कर लिया था. सब की निगरानी की जिम्मेदारी अनीस को सौंप दी गई थी.

योजना के मुताबिक, राजू गुप्ता को सोनिया को ले कर किराए के मकान में रह रही उस की मम्मी पूजा के पास ले कर जाना था. सोनिया कोई और नहीं, बल्कि राजू की बेटी थी और पूजा उस की दूसरी पत्नी थी. सोनिया रामप्रकाश के हौस्टल में काम करती थी और वहीं रहती थी और पूजा अलग से किराए पर रहती थी. राजू 31 अक्तूबर, 2025 को दिन में 10 बजे सोनिया को ले कर नावल्टी सिनेमा के पास गया था. वहीं पूजा से मुलाकात के बाद सोनिया अपने हौस्टल लौट गई थी, जबकि राजू और पूजा अपनेअपने घरों की ओर जाने के लिए साथसाथ लौट आए.

कहने को दोनों पतिपत्नी थे, लेकिन उन के बीच अनबन सालों से बनी हुई थी. इस कारण पूजा अलग किराए के मकान में रहती थी. बात 3 नवंबर, 2025 की है. लखनऊ के थाना माल क्षेत्र के गांव बशहरी निवासी किसान राजपाल सुबहसुबह खेत में जुताई करने के लिए ट्रैक्टर ले कर गया था. वहां पर उसे झाडिय़ों के पास से तेज दुर्गंध आती हुई महसूस हुई. आशंका से घिरा राजपाल दुर्गंध आने वाली जगह पर गया. झाडिय़ों में एक महिला का नग्नावस्था में रक्तरजित शव देख कर चौंक पड़ा. वह तुरंत ट्रैक्टर ले कर सीधे थाना मौल गया.

उस ने इंसपेक्टर नवाब अहमद को लाश और उस से निकलने वाली दुर्गंध के बारे में बताया. उस ने महिला का हुलिया भी बताया, जो गोरी, मांसल देह वाली थी. उस की मांग में सिंदूर, पैरों में पाजेब और बिछुवा थे. इंसपेक्टर ने राजपाल की बात गौर से सुनने के बाद सामने बैठे एसएसआई मोहम्मद रोशन के साथ घटनास्थल पर चलने की तैयारी करने के लिए कहा. उन्होंने कांस्टेबल अर्जुन सिंह और संजय पाल को भी साथ ले लिया. बशहरी गांव के क्षेत्र से संबंधित पुलिस चौकी सैदापुर के बीट प्रभारी अभय कुमार बाजपेयी को भी वहां पहुंचने की सूचना दे दी गई. उन्हें भी घटनास्थल पर शीघ्र ही पहुंचने को कहा.

इंसपेक्टर राजपाल ने इस की सूचना मलीहाबाद के एसीपी सुजीत कुमार दुबे, एडिशनल डीसीपी और डीसीपी गोपालकृष्ण चौधरी को भी भेज दी गई. घटनास्थाल पर सर्विलांस की पूरी टीम पहुंच गई थी. टीम ने पहले घटनास्थल के चारों तरफ लोगों की भीड़ को हटा कर नाकेबंदी करा दी. टीम में महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थीं. शव को एक कपड़े से ढंक दिया गया. इस से पहले महिला कांस्टेबल सपना ने शव की गहनता के साथ छानबीन की. उस ने एसएचओ को बताया कि मृतका की हत्या धारदार हथियार से की गई है. उस के साथ दुष्कर्म के निशान नहीं पाए गए हैं. शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

लाश की पहचान के लिए ग्रामीणों से पूछताछ की गई. जल्द ही पता चला कि वह महिला दुबग्गा सब्जीमंडी में अकसर देखी गई थी. वह वहां सब्जी का काम करती थी. कुछ लोगों ने बताया कि वह सब्जी मंडी में आढ़ती राजू गुप्ता के संपर्क में थी. पुलिस राजू गुप्ता के पास गई और उसे शव की फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछा. उस वक्त पूजा की बेटी सोनिया भी साथ थी. उस ने शव को देखते ही पहचान लिया. सैंडिल, बिछुआ और चेहरे को देखते ही वह बोली कि यह उस की मम्मी पूजा है.

सोनिया ने पुलिस को बताया कि राजू गुप्ता उस का सौतेला पिता है. उस ने मम्मी की मौत का जिम्मेदार राजू गुप्ता को ठहराया और उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को कहा. इस संबंध में उस ने लिखित तहरीर दी. उस ने लिखा कि वह अपनी मम्मी से अलग रह कर गल्र्स हौस्टल में रहती है. वहां का काम करती है. कभीकभी उस की मम्मी उस से मिलने आया करती थी. वह सीता विहार कालोनी के एक किराए के मकान में रहती थी.

सोनिया ने बताया कि उस की मम्मी पूजा सीतापुर जनपद के असुवामऊ गांव की मूल निवासी थी. उन की पहली शादी सुरेश के साथ हुई थी. उस के असली पिता सुरेश ही हैं, लेकिन मम्मी की पापा से अनबन होने के बाद वह लखनऊ आ कर दुबग्गा सब्जी मंडी में आढ़त पर काम करने लगी थी. वहीं उस का संपर्क राजू गुप्ता से हुआ था. राजू गुप्ता की भी सब्जी की आढ़त थी. उन के संपर्क में आने के बाद वह दुबग्गा के ही निकट बालाजी के मंदिर में एक किराए के मकान पर आ कर रहने लगी थी. सोनिया ने बताया कि मम्मी ने राजू गुप्ता के साथ दूसरी शादी कर ली थी.

सोनिया की तहरीर, दिए गए बयानों और साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने राजू गुप्ता के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया. पूछताछ के लिए 5 नवंबर, 2025 को उसे थाने बुलाया गया. पूछताछ में वह पूजा की हत्या के बारे में ठोस जानकारी नहीं दे पाया. किंतु उस ने पूजा के साथ जब बिगड़े संबंधों के बारे में बताया, तब पुलिस सख्ती के साथ उस से पूछताछ करने लगी. जल्द ही वह टूट गया और उस ने पूजा की हत्या के बारे में पूरी बात बता दी. राजू गुप्ता ने यह भी बताया कि उस के अलावा मोहम्मद शकील (54), सर्वेश ( 40), राजेश कुमार (27) और अनीस (65) भी पूजा की हत्या में शामिल थे.

मृतका के पास से मिले मोबाइल की काल डिटेल्स से भी उस की राजू से बातचीत का विवरण मिल गया था. इन साक्ष्यों के आधार पर सभी आरोपियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उस के बाद पूजा, उस का पहला पति और राजू के साथ के उलझे हुए संबंधों की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

पूजा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के गांव सदना की मूल निवासी थी. उस के पापा पुतान ने सामाजिक रीतिरिवाज के अनुसार 15 साल पहले सीतापुर जनपद के गांव असुवामऊ निवासी सुरेश के साथ उस का विवाह कर दिया था. सुरेश के साथ विवाह होने के बाद पूजा को पता चला कि वह शराब पीने का बुरी तरह आदी था. जो कुछ भी कमाता था, वह परिवार के पालनपोषण में खर्च न कर आवारागर्दी और दारू के शौक में बरबाद कर दिया करता था.

शादी के 2 साल तक पूजा ने अपने दांपत्य जीवन का जैसेतैसे निभाया. गांव में ही खेती बंटाई पर किसानी की फसल से मेहनतमजदूरी कर अपना जीवनयापन करती रही. पति के साथ आए दिन कलह के कारण उस ने गांव में ही अलग रह कर अपना जीवनयापन शुरू कर दिया. उन्हीं दिनों पूजा ने बेटी को जन्म दिया. उस का नाम रखा सोनिया. एक साल बाद सुरेश टीबी से ग्रसित हो गया. इलाज कराने में उसे दिक्कतों का सामना करना पड़ा. पति के इलाज में कोई कमी नहीं आने दी. वह स्वस्थ हो गया. कुछ दिन तक तो ठीक रहा, उस के बाद वह फिर पहले जैसा ही करने लगा. पति की प्रताडऩा से तंग आ कर वह दिनरात दुखी रहने लगी.

सुरेश रोजाना पूजा से दारू के लिए पैसे मांगने लगा. पैसे नहीं देने पर मारनेपीटने लगा. धीरेधीरे उस का मन सुरेश के प्रति खिन्न होता चला गया. पूजा का सुरेश ने जीना हराम कर रखा था. पूजा मानसिक प्रताडऩा से बुरी तरह त्रस्त हो गई थी. तंग आ कर उस ने सीतापुर के कमलापुर नामक कस्बे में एक फार्महाउस पर जा कर नौकरी करने का मन बना लिया था. वह अपनी ससुराल से अपने मायके सदना आ कर रहने लगी. वहीं से वह डेयरी फार्म पर काम के लिए जाने लगी. उस ने दिनरात मेहनत कर अपने काम में स्वयं को व्यस्त कर लिया था. एक दिन सुरेश ने उसे ढूंढ निकाला.

सर्दी की रात थी. पूजा उन दिनों अपने मायके सदना में थी. सुरेश पूजा से मिलने सदना पहुंच गया. उसे आया देख कर पूजा आगबबूला हो उठी. किसी तरह सुरेश ने उसे शांत किया. पूजा ने रात को त्रियाचरित्र का खेल खेला. जब सुरेश उस के साथ एक रात बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा था, तभी पूजा ने उस के गले में कपड़ा कस कर हत्या कर दी. उस की मौत हो जाने के बाद वह सोनिया को साथ ले कर दिन निकलने से पहले कमलापुर वापस चली आई.

सुबह सदना थाने की पुलिस ने उसे तलाश कर पति की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया. सीतापुर जिले के थाना सदना में उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. उस के बाद उसे जेल भेज दिया गया. लंबे समय तक पूजा जेल में रही. जेल से छूटने पर वह फिर से कमलापुर स्थित डेयरी मालिक के यहां रहने के लिए गई, लेकिन पूजा पर हत्या का आरोप लगने के बाद डेयरी मालिक के मातापिता ने उसे आश्रय देने से मना कर दिया.

आश्रय के लिए उस की काफी मिन्नतों के बाद डेयरी के मालिक ने लखनऊ स्थित दुबग्गा की सब्जी मंडी में काम दिलवा दिया. उस के पास ही वह बालाजी के मंदिर में एक कमरा किराए पर ले कर अपनी बेटी सोनिया के साथ रहने लगी. तब तक बेटी भी किशोरावस्था में पहुंच चुकी थी. सब्जी मंडी में धीरेधीरे काम करते उसे 2 साल बीत गए. इसी दौरान वह विशाल नामक आढ़ती के माध्यम से वहां के पुराने आढ़ती राजू गुप्ता के संपर्क में आ गई. पूजा के मंदिर में रहने के कारण आनेजाने वाले लोगों को सहानुभूति हो गई.

एक व्यक्ति ने बेटी सोनिया को कपूरथला स्थित राम प्रकाश के गल्र्स हौस्टल में उसे नौकरी पर लगवा दिया. सोनिया दिन भर हौस्टल में काम किया करती. उसे वहां रहने की जगह मिलने के कारण वह स्थाई रूप से हौस्टल में ही रहने लगी. छुट्टी के दिनों में वह अपनी मम्मी पूजा से बालाजी मंदिर परिसर में स्थित मकान पर मिल लेती थी. फिर वापस लौट जाती थी. एक दिन उस ने अपनी मम्मी पूजा से मजाकमजाक में कह दिया, ”मम्मी, तुम्हारी अभी उम्र ही क्या है? मेरी 2 बहनें और भी हैं, उन का भी भरणपोषण और शादी होनी है. तुम दूसरी शादी कर लो.’’

यह बात पूजा के दिमाग में घर कर गई. एक दिन शाम को पूजा राजू गुप्ता के घर पहुंची तो पाया कि वह अकेला बैठा शराब के पैग बना रहा था. पूजा को अकेली आया देख कर उस ने फुरती से उठ कर कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. राजू के द्वारा दरवाजा बंद करने के कारण पूजा तुरंत ही भांप गई कि राजू के मन में क्या है. उस दिन पूजा ने भी नाजुक स्थिति को भांपते हुए राजू के आग्रह पर दारू का पैग गले के नीचे उतार लिया. उस रात पूजा और राजू एक साथ बिस्तर पर सो गए. दोनों ने अपनी जिस्मानी भूख शांत की.

पूजा सुबह राजू के यहां नहाधो कर खाना पकाया, वहीं साथ खाया और हर दिन की तरह आढ़त पर काम करने चली गई. उस के बाद पूजा राजू के बुलाने पर उस के घर आनेजाने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने विशाल के कहने पर राजू के साथ लखनऊ के आर्यसमाज मंदिर में विवाह कर लिया. पूजा के पहले पति से 3 बच्चे थे, जिन में बेटी सोनिया 15 साल की थी. पूजा अपने बच्चों के साथ सीता विहार में अलग रहने लगी थी. यह बात सोनिया को ठीक नहीं लगी. उस ने राजू गुप्ता के यहां ही बच्चों के साथ रहने के लिए दबाव डाला. किंतु राजू इस पर राजी नहीं हुआ. उस ने पूजा के पहले पति के बच्चों को अपने घर पर नहीं रख कर अलग कमरे पर रहने की सलाह दी.

विवश हो कर पूजा के दोनों बच्चे सोनिया के पास रहने लगे और खुद बालाजी का मंदिर (मंगल) पर किराए के मकान में एक कमरा ले कर राजू के पास रहने लगी. धीरेधीरे दोनों के दांपत्य जीवन के 3 साल बीत गए. राजू ने इसी दौरान 3 प्लौट पूजा के नाम खरीदे. बीते वर्ष राजू ने एक प्लौट पूजा की सहमति से 10 लाख रुपए में बेच दिया. यही उन के बीच विवाद का कारण बन गया. पूजा ने बेचे गए प्लौट की आधी रकम 5 लाख रुपए की मांग की. इस पर राजू आगबबूला हो उठा.

पूजा अपनी मौत से 3 माह पहले रोजाना राजू से आधी रकम की मांग कर रही थी. जबकि राजू उसे फूटी कौड़ी तक नहीं देना चाहता था, जिस के चलते हर दिन घर में कलह का वातावरण बन गया था. राजू मानसिक रूप से परेशान रहने लगा था. पूजा के द्वारा रकम मांगने पर पूजा के प्रति उस का रवैया ही बदल गया. राजू का कहना था कि वह उस रकम से उधारी की रकम चुकता करने के बाद बची रकम देने के बारे में सोचेगा.

बारबार पूजा द्वारा पैसे मांगने पर राजू ने एक दिन खतरनाक फैसला ले लिया. 30 अक्तूबर, 2025 को अपनी आढ़त पर अपने सब से करीबी दोस्त अनीस को बुला कर पूजा की हरकतों के बारे में बता कर उसे रास्ते से हटाने के लिए अपनी योजना बताई. साथ देने के लिए उस ने अनीस को एक लाख रुपए की सुपारी दे कर अन्य व्यक्तियों शकील, राजेश और सर्वेश को शामिल करने को कहा. राजू ने अनीस को 31 अक्तूबर की रात सीतापुर रोड से चंद्रिका देवी के मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर योजना को अंजाम देने के लिए सभी तरह का इंतजाम कर लिया.

शाम के वक्त जब राजू अपने घर पर आया तब पूजा भी वहीं थी. वह खाना बनाने में व्यस्त थी. राजू को देखते ही पूछ बैठी, ”आज काफी देर कर दी?’’

उस ने राजू को नशे में धुत्त देखा. नशे में ही राजू बोला, ”कल 31 अक्तूबर को वह सोनिया के यहां सीता विहार कालोनी मिलने जाएगा. सोनिया से मिलने के बाद चंद्रिका देवी मंदिर को बशहरी मड़वाना माल के रास्ते से दर्शन करने जाएगा. मंदिर से वापस आने के बाद वह दोनों बच्चों को सीता विहार के मकान से अपने यहां ले कर वापस आ जाएगा. कल तुम्हें आढ़त मंडी नहीं जाना है.’’

राजू की बात सुन कर पूजा मुसकरा दी. उस रात राजू ने दारू के नशे मेंं शारीरिक संबंध बनाए. सुबह 31 अक्तूबर, 2025 को राजू ने जैसा कहा था वैसा ही किया. ठीक 10 बजे पूजा राजू के साथ सोनिया के यहां मिलने सीता विहार कालोनी गई. वहां कुछ देर बैठने के बाद पूजा को साथ ले कर चंद्रिका देवी के सिद्धपीठ मंदिर दर्शन के लिए निकल गया. रवाना होने से पहले पूजा ने राजू से छिप कर सोनिया को बता दिया कि राजू की नीयत ठीक नहीं है. कई बार वह उस का गला दबा कर उसे जान से मारने का प्रयास कर चुका है. उस का जीवन खतरे में है.

राजू अपनी बनाई योजना के अनुसार, पूजा के साथ जब बशहरी मड़वाना गांव के रास्ते घनी बागायत के निकट पहुंचा, तब वहां अनीस का मैसेज आ गया. उस के बाद राजू लघुशंका करने के बहाने सड़क के किनारे घनी झाडिय़ों के पीछे चला गया. वहीं दूसरी तरफ पहले से छिपे शकील, अनीस, राजेश और सर्वेश ने मिल कर पूजा की गला दबा कर हत्या कर दी. उस के कपड़े को बुरी तरह फाड़ कर अलग कर दिए. वे उस हत्या का कारण दुष्कर्म की घटना से जोडऩा चाहते थे. किंतु डौक्टर की रिपोर्ट में पूजा के साथ कोई भी दुष्कर्म करने की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन उस के 5 माह के गर्भ का पता चला.

राजू गुप्ता पूजा द्वारा दी जाने वाली मानसिक प्रताडऩा से तंग आ चुका था. वह अपनी कमाई की पूंजी से पूजा के पहले पति से पैदा हुए बच्चों को कुछ भी नहीं देना चाहता था. राजू अपनी पहली पत्नी से पैदा हुए 4 बच्चों को पैसा देना चाहता था, जो अलग मकान में रह रहे थे. पुलिस इस हत्याकांड में शामिल सभी आरोपियों राजू गुप्ता, मोहम्मद शकील, सर्वेश, राजेश और अनीस को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी. UP Crime

—कथा में सोनिया परिवर्तित नाम है

 

 

Gorakhpur Crime: डबल मर्डर से प्रेमिका कर्जमुक्त

Gorakhpur Crime: रजत अपनी प्रेमिका कंचन को हर तरह से खुश रखना चाहता था. जब उसे पता चला कि कंचन के पापा पर कर्ज होने के कारण घर में सब परेशान रहते हैं तो रजत भी बहुत दुखी हुआ. यह कर्ज उतारने के लिए उस ने 2 मर्डर तक कर दिए. इस से उस ने न सिर्फ प्रेमिका के पापा का कर्ज उतार दिया, बल्कि प्रेमिका को आईफोन भी गिफ्ट दिया. इतना करने के बाद क्या उसे उस की प्रेमिका मिली?

रजत जब अपने इरादों में बारबार फेल होता रहा तो उस ने एक खतरनाक प्लान बनाया. प्लान यह था कि अपने मकसद को पूरा करने के लिए अगर किसी के खून से अपना हाथ भी रंगना पड़े तो वह पीछे नहीं हटेगा, खून कर देगा, लेकिन प्रेमिका कंचन को और दुखी नहीं देख सकता. दिलोदिमाग में पक्का इरादा बैठा लेने के बाद रजत ने परफैक्ट मर्डर प्लान किया. उस ने प्लान बनाया कि पहले बुआ विमला को छक कर शराब पिलाएगा. जब वह पूरे नशे में आ जाएगी तो उस की कलाई से सोने का ब्रेसलेट निकाल लेगा.

शांति देवी ने रजत पर विश्वास क्या किया कि जान से हाथ धो बैठीं

उस के बाद विमला बुआ के घर में रखे सोने के जेवरात और नकदी पर हाथ फेरेगा. ऐसा करते वक्त अगर बुआ ने विरोध किया तो उस की हत्या कर देगा. इस पूरे खतरनाक खेल में रजत एकमात्र किरदार था, जो काली स्याही से पटकथा लिख रहा था. रजत के दिमाग में एक बात खटक रही थी कि हत्या के बाद पुलिस उस तक पहुंच सकती है. वह इस से बचने के लिए अपने खिलाफ कोई साक्ष्य या सबूत छोडऩा नहीं चाहता था, इसलिए वह फूंकफूंक कर कदम रख रहा था.

घटना से एक सप्ताह पहले यानी 17 नवंबर, 2025 की रात करीब 9 बजे रजत विमला बुआ से मिलने उस के घर पहुंचा. विमला और उस की मां शांति देवी अपनीअपनी नौकरी से वापस घर लौट चुकी थीं और खाना बना कर वह थोड़ा आराम फरमा रही थीं, तभी रजत उन से मिलने पहुंचा. साथ में एक महंगी शराब की बोतल भी ले आया था. यह तय कर के वह घर से चला था कि विमला बुआ की कलाई से सोने का ब्रेसलेट उड़ा कर ही रहेगा. इसलिए उसे छक कर शराब पिलाऊंगा.

घर में दाखिल होने के बाद रजत ने अपने संस्कार का परिचय देते हुए विमला और शांति के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और उन के बगल में खाली पड़ी कुरसी पर जा बैठा. उस समय कमरे में विमला ही बैठी थी और दिन भर की थकी हुई उस की मां शांति देवी आराम करने दूसरे कमरे में जा चुकी थी. विमला और रजत में गप्पें शुरू हुईं. फिर थोड़ी देर बाद किचन में जा कर रजत 2 गिलास ले आया और दोनों में बराबरबराबर पैग बनाया. जाम भरा एक गिलास विमला की ओर बढ़ाया और जाम से भरा दूसरा गिलास खुद थामा. दोनों चियर्स कर के एक ही बार में हलक के नीचे उतार दिए.

फिर बड़ी चालाकी से उस ने बची हुई शराब उस के गिलास में उड़ेल दी. विमला ने वह भी अपने हलक के नीचे उतार ली थी. अब उस की नजर बुआ के चेहरे पर जा टिकी थी कि जैसे ही शराब अपना कमाल दिखाएगी, वैसे ही उस की कलाई से ब्रेसलेट उतार कर घर के और सामानों पर अपना हाथ साफ कर रफूचक्कर हो जाएगा. रजत की योजना धरी का धरी रह गई. घंटों बीत गए थे, शराब का विमला पर जरा भी असर नहीं हुआ और न ही वह मदहोश हुई. यह देख कर उस का माथा भन्ना उठा. जिस घड़ी का काफी देर से वह इंतजार कर रहा था, वो समय ही उसे धोखा दे रहा था.

रात के 12 बज गए. रजत ने जब देखा कि उस का प्लान फेल हो चुका है तो वह बुआ विमला को गुड नाइट कह कर अपने घर को लौट आया. मुंहबोले भतीजे रजत के जाने के बाद विमला भीतर से दरवाजे पर सिटकनी चढ़ा कर खुद भी मां के कमरे में उन के बगल में सो गई. अपनी योजना में असफल हुआ रजत खुद से बुरी तरह चिढ़ गया था. उसे एक अच्छा मौका उस के हाथ से निकल गया, लेकिन उस ने हार नहीं मानी. अपने मंसूबे को कामयाब बनाने के लिए उस ने फिर से प्लान बनाना शुरू किया.

इस बार उस ने अपनी पटकथा में योजना सफल बनाने के बुआ विमला और दादी शांति देवी को मौत के घाट उतारने की योजना बना ली थी. अगले दिन वह बाजार से करीब डेढ़ सौ रुपए की एक हथौड़ी खरीद कर ले आया और जिस कमरे में सोता था, उसी कमरे में बिस्तर के नीचे छिपा दी. इसी हथौड़ी से मांबेटी दोनों का मर्डर करने का उस ने पूरा प्लान तैयार कर लिया था. उस के शातिर दिमाग को तो देखिए, हथौड़ी खरीदते समय रजत अपने दोनों हाथों में ग्लव्स पहने हुए था, ताकि हत्थे पर कहीं भी उस के फिंगरप्रिंट रह न जाएं और इसी के जरिए वह पुलिस के हत्थे चढ़ जाए. रजत एकएक कदम फूंकफूंक कर रख रहा था.

बात 23 नवंबर, 2025 की रात 10 बजे की थी. रम की बोतल ले कर रजत विमला के घर पहुंचा. शांति देवी बाहर के कमरे में लेटी हुई थी और उन्होंने उसे हमेशा की तरह बेटे की तरह बुलाया तो उस ने उन के नजदीक पहुंच कर दादी के पैर छू कर आशीर्वाद लिया. अंदर कमरे में विमला थी. रजत दादी के पास से हो कर उस से मिलने वहां पहुंचा तो उसे देख कर विमला खुश होते हुए बोली, ”खाना बनाने को मन नहीं हो रहा है, रजत.’’

विमला देवी – प्रेमिका का कर्ज उतारने के लिए भतीजा ही कातिल बन गया

अलसाई विमला आगे बोली, ”मन हो रहा है, 2 रोटी सेंक कर कोई दे देता तो उस का बड़ा उपकार होता. काम करतेकरते आज बहुत थक गई हूं.’’

”ऐसा क्यों कह रही हो बुआ?’’ रजत बोला, ”मम्मी को फोन कर के कह दो आप दोनों के लिए खाना पका देंगी.’’

”ये तुम ने अच्छा याद दिलाया भतीजे. अभी भाभी को फोन कर के कह देती हूं हमारे लिए 4 परांठे सेंक कर किसी

से भिजवा दें या फिर मैं खुद ही जा कर लेती आऊंगी.’’

”ये हुई न अच्छी वाली बात बुआ. जब तक आप खाना ले कर आओगी, तब तक मैं आप के थकान मिटाने का एक नायाब बंदोबस्त करता हूं.’’ कहते हुए रजत ने रम की बोतल सामने मेज पर रखी तो उसे देख कर उस की आंखों में एक अजीब सी चमक जाग उठी थी. इसी बीच विमला ने रजत की मम्मी को फोन कर के परांठे बनाने के लिए कह दिया. इधर रजत किचन से 2 गिलास ले कर आया और उस में एकएक पैग बनाया. जल्दी से विमला ने पैग हलक से नीचे उतारा और खुद खाना लेने रजत के घर के लिए निकल गई. तब तक रजत कमरे से निकल कर दादी के पास आ कर बैठ गया था.

थोड़ी देर बाद रजत के घर से खाना ले कर लौटी विमला पर उस ने पैनी नजर डाली तो उसे देख कर वह परेशान हो गया था. पैग का उस पर कोई खास असर ही नहीं दिख रहा था, बल्कि वह पहले जैसी ही नजर आ रही थी. यह देख कर उस की योजना पर पानी फिरता नजर आ रहा था. इस बार वह हर हाल में अपनी योजना को अंजाम तक पहुंचाना चाहता था.

खाना ले कर विमला अंदर कमरे की ओर बढ़ी तो रजत भी उसी के पीछेपीछे हो लिया था. उस ने खाना किचन में रख दिया और वापस कमरे में लौट आई थी. इधर रात काफी हो चली थी तो शांति देवी सो गई थी. इस के बाद एक बार फिर रजत ने एकएक पैग बनाया और एक पैग विमला की ओर बढ़ाया तो दूसरा पैग खुद पिया. वह सोच रहा था उस के नशे में होते ही अपना काम कर के लौट जाए, लेकिन इस बार भी पिछली वाली कहानी दुहराने को तैयार थी. लेकिन इस बार वह ऐसा होने देना नहीं चाहता था. इसलिए धीरेधीरे रजत के सब्र का पैमाना छलकना शुरू हो गया था और उस के भीतर का शैतान फुंकार मारने लगा था. इस बार के पैग ने भी कोई अपना असर नहीं दिखाया तो गुस्से से उस का चेहरा तमतमा उठा.

सुशीला लखनऊ में रहती थी, मां बहन की हत्या की सूचना मिलते ही गोरखपुर पहुंत गई. 

रजत और विमला दोनों पास बैठ कर ही शराब पी रहे थे. योजना फेल होती देख गुस्से से तमतमाया रजत कुरसी से उठा और 2 कदम आगे किचन की ओर बढ़ा. किचन से एक पौलीथिन ली और पहले से पैंट में पीछे खोंस रखी हथौड़ी निकाली. हत्थे पर पौलीथिन चढ़ाई और बिल्ली के माफिक दबेपांव विमला की ओर पलटा और धीरेधीरे आगे बढ़ा और पीछे से उस के सिर पर जोरदार वार किया. वार इतना जोरदार था कि उस के मुंह से दर्दनाक चीख निकली. चीख सुन कर शांति देवी की नींद उचट गई. और उठ कर बिस्तर पर बैठ कर इधरउधर देखने लगी और ‘कौन है…कौन है…’ आवाज देने लगी.

इधर सिर पर खून सवार रजत विमला पर तब तक ताबड़तोड़ वार पर वार करता रहा, जब तक वह मर न गई. विमला को मौत के घाट उतारते ही पकड़े जाने के डर से वह बुरी तरह डर गया, क्योंकि उसे घर में आते हुए शांति देवी ने देखा था. उस से बात भी की थी. कल को वह गवाही दे सकती थी. फिर उस ने विमला के चीखने की आवाज भी सुन ली थी.

ये सारे तथ्य उस के खिलाफ गवाही देने के लिए काफी थे. यह सोच कर रजत के हाथपांव बुरी तरह कांप रहे थे. इस से पहले शांति देवी उस के लिए खतरा बनती, रजत शांति देवी के कमरे की ओर दबेपांव बढ़ा और उसे भी उसी हथौड़ी से सिर पर वार कर के मौत के घाट उतार दिया. फिर रजत ने दोनों मांबेटी को हिलाडुला कर चैक किया कि कहीं वे जीवित तो नहीं हैं, लेकिन दोनों मर चुकी थीं. इस के बाद हथौड़ी शांति देवी के बिस्तर के पास फर्श पर छोड़ दिया और आराम से वाशरूम गया. वहां उस ने हाथ पर लगे खून को धोया. फिर वह कमरे में पहुंचा, जहां विमला की लाश पड़ी थी.

उस की कलाई से सोने का ब्रेसलेट और सोने की अंगूठी उतार अपनी पैंट की जेब में रखी. फिर वहां से अलमारी की ओर बढ़ा. अलमारी के लौकर में शांति देवी के आंख के औपरेशन के लिए रखे साढ़े 4 लाख रुपए, सोने के कई आभूषण और जाते समय विमला की स्कूटी ले कर अपने घर पहुंचा. घर जा कर वह आराम से ऐसे सो गया था, जैसे उस ने कुछ किया ही नहीं था. उस के चेहरे पर जरा सी भी शिकन नहीं थी. खैर, यह सब करतेधरते रात के करीब 2 बज गए थे. आखिरकार, रजत अपनी योजना में सफल हो ही गया था.

अगली सुबह यानी 24 नवंबर, 2025 को विमला जब अपनी नौकरी पर दोपहर 12 बजे तक नहीं पहुंची, तब पड़ोसी और रामा फरनीचर के मालिक रामानंद विश्वकर्मा ने उसे फोन किया. तब उस का मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहा था. इस के बाद लगातार कई बार उसे फोन किया. हर बार उस का फोन स्विच्ड औफ ही बता रहा था. यह देख कर उसे बड़ा अजीब लगा. विमला अपना फोन कभी बंद नहीं रखती थी, फिर क्यों फोन बंद आ रहा है?

रामा फरनीचर से 10 फर्लांग आगे विमला का घर स्थित था. रामानंद विश्वकर्मा टहलते हुए उस के घर जा पहुंचे और दरवाजे पर लगी कौलबेल का स्विच कई बार दबाया, लेकिन भीतर से कोई हलचल होती दिखाई नहीं दी तो उन्हें कुछ शक हुआ कि मामला कुछ गड़बड़ है. रामानंद की आवाज सुन कर पड़ोस के लोग भी मौके पर जमा हो गए थे. फिर किसी ने इस की सूचना शाहपुर थाने को दे दी.

सूचना पा कर शाहपुर थाने के एसएचओ नीरज कुमार राय फोर्स के साथ गीता वाटिका कालोनी स्थित घोसीपुरवा मोहल्ला पहुंच गए. फिर वे सीढिय़ों से होते हुए मकान के फस्र्ट फ्लोर पर पहुंचे, जहां शांति देवी और विमला रहती थीं. पुलिस जैसे ही ऊपर कमरे में पहुंची, बिस्तर पर खून से लथपथ शांति देवी की लाश देख चौंक गई. वहां से हो कर जैसे ही पुलिस दूसरे कमरे में दाखिल हुई, खून से सनी एक और लाश देख कर हैरान रह गई.

घटना की जांच करती पुलिस

80 वर्षीय शांति देवी और 50 वर्षीय विमला यानी मांबेटी की नृशंस हत्या की खबर पलभर में जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई थी. दोहरे हत्याकांड की सूचना पा कर मौके पर मोहल्लेवासियों का जमावड़ा लग गया. इंसपेक्टर नीरज ने घटना की सूचना गोरखपुर के एसएसपी राजकरन नैय्यर, एसपी (सिटी) अभिनव त्यागी, सीओ (कैंट) योगेंद्र सिंह, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को दी. दोहरे हत्याकांड की सूचना मिलते ही मौके पर आला अफसर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम भी पहुंच कर जांच में जुट गई थी. पुलिस ने मेज के ऊपर स्टील के 2 गिलास देखे. गिलास उठाए तो उन से शराब की स्मैल आ रही थी.

यह देख पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा कोई जानपहचान वाला रहा होगा. उस ने यहां बैठ कर मृतका के साथ शराब पी होगी. उस के बाद घटना को अंजाम दे कर फरार हो गया होगा. पुलिस ने दोनों गिलास अपने कब्जे में ले लिए.  पुलिस दोनों लाशों की गहनता से जांचपड़ताल करने में जुटी हुई थी. शांति देवी की लाश के पास खून से सनी हथौड़ी पड़ी थी. पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर वह अपने कब्जे में ले ली.

फिर खोजी कुत्ते को लाशों को सुंघा कर छोड़ दिया. खोजी कुत्ता घटनास्थल को सूंघते हुए मौके से 200 मीटर दूर पेट्रोल पंप तक पहुंचा, उस के बाद वहीं रुक गया. यह क्रिया उस ने 3 बार दुहराई थी. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा यहां तक पैदल आया होगा. उस के बाद वह किसी वाहन में बैठ कर फरार हो गया होगा. जरूरी काररवाई पूरी कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज, गुलरिहा भिजवा दिया. पुलिस आगे की काररवाई में जुटी हुई थी. किसी का शक रजत की ओर न जाए, इसलिए वह भी मौके पर जा पहुंचा था और सभी के सामने फूटफूट कर घडिय़ाली आंसू बहाने लगा था.

जांचपड़ताल में पता चला कि मांबेटी के अलावा कोई नहीं है. मृतका शांति देवी की सौतन की एक बेटी सुशीला है, जो अपने परिवार के साथ लखनऊ रहती है. वह कभीकभार ही यहां आती है. पड़ोसियों से पुलिस को पता चला कि पास ही में इन का एक मुंहबोला भतीजा रहता है, जिस का नाम रजत है. उस से सुशीला का मोबाइल नंबर मिल सकता है. रजत और उस के घर वाले भी मौके पर आ चुके थे. वे मांबेटी की हत्या से काफी दुखी थे. बल्कि उन्होंने सुशीला को फोन कर के घटना की सूचना भी दे दी थी.

मां और बहन की हत्या की सूचना मिलते ही सुशीला उसी समय लखनऊ से गोरखपुर को रवाना हो गई. 24 नवंबर की देर रात वह गोरखपुर पहुंची और मुंहबोले भतीजे रजत के घर पर ही ठहरी. अगले दिन 25 नवंबर को वह पुलिस के साथ घर पहुंची. घर की अलमारी से सोने के जेवरात और लौकर में रखे नकदी साढ़े 4 लाख गायब थे. सुशीला ने इस की जानकारी पुलिस को दी तो पुलिस के कान खड़े हो गए. यानी घटना को लूटपाट की नीयत से अंजाम दिया गया था.

पते की बात तो यह थी भूतल पर 3 किराएदार रह रहे थे. इतनी बड़ी घटना घट गई थी, लेकिन उन्हें कानोंकान भनक नहीं लगी थी, ऐसा कैसे हो सकता था. यह सोच कर पुलिस परेशान थी. लेकिन सुशीला की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारे के खिलाफ धारा 103(1) बीएनएस के तहत मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी थी. पुलिस के माथे पर उस वक्त चिंता की लकीरें खिंच उठी थीं, जब उसे कातिल के शातिरानेपन का इल्म हुआ था. कातिल जो भी था, इतना शातिर था कि उस ने अपने खिलाफ कोई सबूत नहीं छोड़ा था. मसलन, उस ने न तो गिलास के ऊपर कोई फिंगरप्रिंट छोड़ा था और न ही हथौड़े के हत्थे पर ही.

इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी ने पुलिस को बुरी तरह उलझा कर रख दिया था. पुलिस दोहरे हत्याकांड की जांच लूटपाट को टारगेट कर के आगे बढ़ा रही थी. जांचपड़ताल से यह भी पता चला कि घटना से एक दिन पहले गली में वाहन रखने को ले कर पड़ोसी और शांति देवी के बीच विवाद हुआ था. और तो और संपत्ति को ले कर भी परिवार में विवाद चल रहा था. जांच में पुलिस ने यह ऐंगिल भी हासिल कर लिया.

पुलिस किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी. पुलिस जांच की एकएक पहलू रजत के आंखों के सामने से हो कर गुजर रही था, क्योंकि सुशीला की परछाईं बन कर रजत हर वक्त उस के साथ मौजूद रहता था. इसलिए पुलिस की हर गतिविधियों की उसे जानकारी हो जाती थी. धीरेधीरे सप्ताह बीत गया था, लेकिन पुलिस अभी तक हत्या की ठोस वजह तक पहुंच नहीं पाई थी कि इन की हत्या क्यों की गई थी?

रजत अपने परफेक्ट मर्डर प्लान पर बहुत खुश था. पुलिस अब तक कातिल को पकडऩा तो दूर की बात उस की परछाईं तक को छू नहीं पाई थी. हत्या के कारणों तक भी पहुंच नहीं पाई थी. यह देख कर वह मन ही मन खुश हो रहा था. इस के बाद रजत ने चोरी के नकदी में से डेढ़ लाख रुपए का कंचन के लिए ऐप्पल कंपनी का मोबाइल खरीद कर गिफ्ट दिया. उस के पापा के सिर पर लदे कर्ज के एवज में भी डेढ़ लाख रुपए उस के पापा को दिया. ताकि वे कर्ज से मुक्ति पा सके.

कंचन महंगे मोबाइल और पापा के सिर से उतरे कर्ज से प्रेमी रजत के एहसानों के तले दब गई थी. लेकिन उसे ये नहीं पता था कि जो मोबाइल और नकदी उस के हाथों में है, वो किसी के खून से रंगे हुए हैं. हालांकि कंचन ने रजत से पूछा भी था कि तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आए? तो उस ने झूठ बोतले हुए कहा, ”तुम तो जानती हो, मैं प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी देखता हूं. एक डीलिंग पास हुई थी, उसी में साढ़े 4 लाख रुपए कमीशन मिले वो रुपए हैं ये.’’ रजत ने कंचन को समझाया तो वह उस की बातों को आंख मूंद कर विश्वास कर लिया.

आरोपी रजत कुमार – प्रेमिका के पापा का कर्ज उतारने के लिए बन गया हत्यारा

उन्हीं पैसों में से रजत ने 50 हजार रुपए अपने पापा रामाधार को यह कहते दिए कि उस ने एक प्रौपर्टी की डीलिंग की थी. उस में एक लाख मिला था, जिस में से 50 हजार आप को दे रहा हूं. पता नहीं क्यों रामाधार को बेटे की इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था. पहले दिनों की अपेक्षा इधर उस के हावभाव कुछ बदलेबदले से लग रहे थे और वह कई दिनों से परेशान रह रहा था, लेकिन किसी से कुछ कह नहीं रहा था.

शांति देवी और उन की बेटी विमला की हत्या से वे काफी परेशान थे. क्योंकि दोनों की हत्या के बाद घर से नकदी और सोने के जेवरात की चोरी हुई थी. चोर अथवा कातिल अभी पकड़ा नहीं गया था. रामाधार को बेटे पर शक हो रहा था कि रजत जरूर हम से कुछ छिपा रहा है, उसे कत्ल के बारे में पूरी जानकारी हो सकती है. मानवता का परिचय देते हुए रामाधार शाहपुर थाने पहुंच गए. इंसपेक्टर नीरज कुमार राय से मिल कर रामाधार ने आशंका जताई कि उन्हें अपने बेटे रजत पर शक है, शाहपुर दोहरे हत्याकांड के बारे में बहुत कुछ जानता है, कड़ाई से पूछताछ की जाए तो घटना का खुलासा हो सकता है.

इधर पुलिस ने घटना वाली रात की काल डिटेल्स का गहनतापूर्वक अध्ययन किया तो शक की सूई रजत पर जा कर रुक रही थी. रजत के मोबाइल की लोकेशन घटना वाली रात मौके पर दिख रही थी. वैज्ञानिक साक्ष्यों और पिता रामाधार के शक के आधार पर पुलिस ने करीब 13 दिनों बाद यानी 5 दिसंबर, 2025 को रजत को उस के घर से हिरासत में ले लिया. थाने में उस से कड़ाई से पूछताछ की. रजत पहले नानुकुर करता रहा, खुद को बेगुनाह बताता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस के सामने वैज्ञानिक साक्ष्यों की फेहरिस्त रखी तो कानून के सामने उस ने घुटने टेक  दिए और अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

यह दोहरा हत्याकांड करीब 13 दिनों से रहस्य बना हुआ था. जिस पर से परदा उठ चुका था. जिस ने भी मुंहबोले भतीजे रजत की करतूत सुनी, सहसा उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस पराए रिश्ते पर अपने खून से भी ज्यादा बढ़ कर अंधा विश्वास किया था, उसी ने इतना बड़ा कांड कर डाला. उस के कारनामे से उस के फेमिली वाले भी हतप्रभ थे. और तो और जब प्रेमिका कंचन को प्रेमी रजत की हरकतों के बारे में पता चला तो उस का दिल नफरत से भर उठा था. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि रजत इतना बड़ा जुर्म कर सकता है.

वारदात वाली जगह से सबूत इकठ्ठा करती फोरैंसिक टीम

रजत के जुर्म कुबूल करने के बाद पुलिस ने लूट के 16.94 ग्राम सोने की चैन, करीब 20 ग्राम गला हुआ सोना, सोने की एक अंगूठी, एक मोबाइल फोन और 50 हजार रुपए नकद उस के कमरे से बरामद किए. अज्ञात में दर्ज मुकदमे को रजत के नाम दर्ज कर लिया गया और हत्या की धारा 103(1) के साथसाथ धारा 305, 315, 317(2) बीएनएस भी बढ़ा दी गईं. उसी दिन दोपहर में पुलिस लाइन स्थित व्हाइट हाउस में एसएसपी राजकरन नैयर और एसपी (सिटी) अभिनव त्यागी ने संयुक्त प्रैसवार्ता कर शाहपुर गीतावाटिका स्थित मांबेटी दोहरा हत्याकांड का खुलासा कर दिया. फिर आरोपी रजत को अदालत के सामने पेश किया, जहां से उसे बिछिया के मंडलीय कारागार भेेज दिया.

इस दोहरे हत्याकांड के पीछे की रजत ने जो कहानी बताई, इस प्रकार थी—

22 वर्षीय रजत मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के थाना शाहपुर स्थित घोषीपुरवा का रहने वाला था. उस के परिवार में पेरेंट्स के अलावा 2 बहनें थीं. पापा रामाधार रेलवे में नौकरी करते थे और रिटायर हो चुके थे. उन का छोटा परिवार था और शिक्षित भी था. उन्होंने बेटा और बेटियों की जिंदगी संवारने के लिए पढ़ायालिखाया. जिन संस्कारों की बेडिय़ों में रामाधार अपने बच्चों को बांधना चाहते थे, बेटियां तो बंध गईं, लेकिन बेटा रजत उन की सोच और संस्कारों की पकड़ से हमेशा 2 कदम आगे ही रहता रहा.

दुनिया की चकाचौंध से उस का मनमस्तिष्क सराबोर हो उठा था. अमीरियत की शहंशाही पर सवार हो कर चांदी की थाली में सोने के चम्मच से खाने का ख्वाब देख रहा था, जो मुंगेरी लाल के हसीन सपनों से कम नहीं था. वह पैसा, पैसा और पैसा का पुजारी बन गया था. अमीरजादे और आवारा किस्म के लड़कों की संगत में पढ़ कर रजत का पांव गलत संगत की दलदल में फंसता गया और वह बिगड़ता गया. बेटे के हाथ से निकल जाने से पेरेंट्स दुखी थे. सुधारने के अनेकानेक कोशिशों के बावजूद वे उसे सुधारने में विफल रहे. उन्होंने देखा कि बेटा उन के हाथ से रेत की तरह फिसल रहा है तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

रजत का तर्क था कि वह बड़ा हो चुका है, उस में सोचनेसमझने की क्षमता और चीजों कों परखने की ज्ञान आ चुका है, इसलिए वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है. पढऩा भी चाहता है और पढ़ाई के साथ साथ पैसे भी कमाना चाहता है. घटना के समय रजत पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में बीए में पढ़ रहा था. पढ़ाई के दौरान ही कंचन से प्रेम हुआ था. दोनों एकदूसरे से प्रेम करते थे. दोनों ने साथ जीने और मरने की कसमें खाई थी.

कंचन एक तरह से रजत की धमनियों में बहने वाला खून थी. उस के बिना जीने की उस ने कल्पना छोड़ दी थी. उसे कभी दुखी देख नहीं सकता था. जमाने की सारी खुशियों से उस का दामन भर देना चाहता था, लेकिन कंचन कुछ चिंतित सी रहती थी. यह देख कर वह बुरी तरह परेशान हो गया था. ”तुम जानती हो कंचन, मैं तुम्हें तकलीफ में देख नहीं सकता.’’ रजत ने कंचन को समझाने की कोशिश की, ”बताओ, आखिर बात क्या हैं? क्यूं आजकल बुझीबुझी सी रहती हो तुम? कहीं तुम्हारी शान में मेरे से तो कोई गुस्ताखी तो नहीं हो गई है? आखिर बात क्या है बताओगी तो ही सोल्यूशन निकालूंगा न.’’

”नहीं, रजत. ऐसी कोई बात नहीं हैं. तुम से कोई गलती नहीं हुई है.’’ कंचन ने बुझे मन से जवाब दिया.

रजत ने कहा, ”तो फिर कौन सी परेशानी तुम्हें सताए जा रही है, जो इतनी गुमसुम सी रहती हो? तुम्हें परेशान और गुमसुम देख कर मेरा दिल परेशान हुए जा रहा है.’’

”नाहक परेशान हो रहे हो रजत. कहा न, कोई बात नहीं है.’’

”तो तुम ऐसे नहीं बताओगी.’’ कंचन के बेहद करीब पहुंच कर आगे बोला था रजत, ”तुम मुझ से प्यार करती हो कि नहीं?’’

”हां, बहुत प्यार करती हूं.’’

”मुझ पर भरोसा रखती हो?’’

”खुद से भी ज्यादा.’’

”मुझ से प्यार भी करती हो, भरोसा भी रखती हो तो अपने दिल की बात मुझ से शेयर क्यों नहीं करती कि तुम्हें कौन सी परेशानी खाए जा रही है, जो तुम मुझे बताना नहीं चाहती.’’

”मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से कोई और भी परेशान हो.’’ कहतेकहते कंचन की आंखें डबडबा गईं.

”तुम रो क्यों रहीं हो?’’ कंचन की आंखों में आंसू देखकर रजत तड़प उठा, ”आखिर बात क्या है, तुम बता क्यों नहीं हो मेरे को?’’

”मुझे पता है मेरी तकलीफ, मेरी परेशानी जानकर तुम बुरी तरह परेशान हो जाओगे, इसलिए मैं कुछ बताने के पक्ष में नहीं  थी.’’

”तुम कब से तेरामेरा करने लगी.’’ तड़प उठा था रजत, ”यह कह कर तुम ने मुझे पलभर में पराया कर दिया.’’

”मेरे कहने का वो मतलब नहीं था, जो तुम समझ रहे हो.’’

”छोड़ कंचन. तुम इतनी सयानी हो गई हो कि अपनी तकलीफों, अपनी परेशानियों को खुद अकेले सौल्व कर सकती हो, तुम्हारी नजरों में अब मेरी कोई अहमियत नहीं रही.’’

”ओह, रजत. मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी, इसीलिए तुम्हें अपनी परेशानी बताना नहीं चाहती थी. मैं जानती हूं कि तुम मेरे लिए कुछ भी कर सकते हो, किसी भी हद तक जा सकते हो.’’

”जब तुम जानती हो, मैं तुम्हें किसी परेशानी या किसी तकलीफ में देख नहीं सकता, तुम्हारे लिए किसी भी हद को पार कर सकता हूं तो तुम बता क्यों नहीं देती कि तुम्हारी परेशानी क्या है?’’

कंचन बोली, ”बताती हूं, बाबा. बताती हूं. घर की परेशानियों में पापा इतना परेशान रहते हैं कि पूरा परिवार उन की परेशानियों से दुखी है. ऊपर से कर्ज है कि सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा है. पापा की समझ में नहीं आ रहा है कि कर्ज चुकता कैसे करें.’’

”तो ये बात है, इसलिए दुखी हो.’’ रजत सिर हिलाते हुए आगे कहा, ”बाई दि वे कितना कर्ज होगा अंकल पर.’’

”यही कोई डेढ़ लाख.’’

”डेढ़ लाख!’’ सुन कर रजत चौंक पड़ा, ”इतने पैसे तो मेरे पास नहीं है, होता तो मैं अभी दे देता. फिर इतनी बड़ी रकम घर वालों से मांग भी नहीं सकता. थोड़ा वक्त दो, कहीं न कहीं से मैं इंतजाम करने की पूरी कोशिश करता हूं.’’

”डेढ़ लाख के रकम कुछ कम नहीं होती है रजत. कैसे इंतजाम करोंगे?’’

”कैसे इंतजाम करूंगा? यह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’ कुछ पल सोचते हुए आगे कहा, ”कहीं न कहीं से मैं बंदोबस्त कर लूंगा, तुम चिंता मत करो. बस, तुम मुसकराती रहा करो. जब तुम मुसकराती हो तो बंद कलियां खिल उठती हैं, आवारा भौंरे गुनगुना उठते हैं.’’

”मस्का न मारो.’’

”मस्का मैं कहां मार रहा हूं.’’

”तो फिर इतनी रकम कहां से लाओगे.’’

”कहा न, तुम इस की चिंता छोड़ दो. मैं कहीं न कहीं से इंतजाम कर लूंगा.’’

”बताओ तो सही, आखिर कहां से ले आओगे पैसे?’’

”समय आने पर बता दूंगा कि मैं ने पैसे कहां से इंतजाम किए थे, अब इस टौपिक पर कोई डिसकस नहीं करोगी, समझी. सुनो…’’

”क्या?’’

”मेरी फीस तो मुझे अदा करती जाओ.’’ रजत मुसकराते हुए बोला था. उस समय कमरे में दोनों के बीच गहरे सन्नाटे का पहरा था. उस की बात सुन कर कंचन का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था. प्रेमी रजत उस से क्या चाहता था वह समझ चुकी थी, तभी तो शरम से खुद में सिमटी जा रही थी.

”कहां से दूं तुम्हारी फीस?’’ कहते हुए कंचन का चेहरा शरम से लाल गया था.

”अपनी आंखें बंद करो, मैं खुद ही तुम से फीस वसूल लूंगा.’’ यह कहते हुए रजत कंचन के और करीब आ गया तो कंचन आंखें बंद कर अपनी जगह स्थिर हो गई.

अपने करीब रजत को महसूस कर उस के संपूर्ण जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी. फिर क्या था प्रेमी युगल आलिंगनबद्ध हो प्रेमरस में डूब गए. उस के बाद रजत अपने घर लौट गया और कंचन का रोमरोम खिल उठा था.

रास्ते भर रजत यही सोचता रहा कि कंचन की नजरों में खुद को ऊंचा दिखाने के लिए पैसों के इंतजाम करने की हामी भर तो दी, लेकिन इतनी बड़ी रकम कहां से लाऊंगा? कौन देगा मुझे इतने पैसे? क्या करूं अब मैं? कहां से ले आऊं इतनी बड़ी रकम?

घर वालों से पैसे मांग नहीं सकता वरना वो पूछेंगे कि इतने पैसों की जरूरत तुम्हें क्यों आन पड़ी या इतने पैसों का क्या करोगे? फिर उन्हें मैं क्या जबाव दूंगा. ऐसे में तो मेरी पोलपट्टी खुल जाएगी और उन्हें हमारे रिश्तों के बारे में पता चल जाएगा. नहींनहीं ऐसा नहीं करना है. इस के लिए कुछ और ही सोचना होगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

रजत रास्ते भर सोचता हुआ घर की ओर बढ़ रहा था. अचानक उस की आंखों के सामने विमला बुआ के हाथों में पड़ा सोने का ब्रेसलेट चमक उठा. उस की चमक से रजत का चेहरा खुशियों से खिल उठा. जिस रास्ते की उसे तलाश थी, आखिरकार वह रास्ता मिल ही गया था. उस ने अपना इरादा मजबूत किया और विमला बुआ का सोने का ब्रेसलेट चुराने का फैसला किया. ये फैसला कर के ही वो खुशी से झूम उठा था. ये बात घटना से करीब 3-4 महीने पहले की थी.

विमला, जिसे वो बुआ कह कर बुलाता था, दरअसल वह उस की सगी बुआ नहीं थी. मोहल्ले में रहने के नाते उस घर से उस का काफी लगाव हो गया था. इसी रिश्ते से उसे बुआ कह कर बुलाता था. विमला अपनी 80 साल की वृद्ध मां शांति देवी के साथ रहती थी. दोनों मांबेटी के अलावा उन का अपना कोई और सहारा नहीं था. रजत ही गाहेबगाहे उन के दुखसुख में खड़ा रहता था. दोनों मांबेटी उस पर अंधा विश्वास करती थीं. उन के घर के कोनेकोने से परिचित था रजत.

रजत जानता कि विमला बुआ और शांति दादी के घर में कहां क्या सामान रखा है. उसे यह भी पता था कि इन दिनों बुआ ने अपने घर की अलमारी में साढ़े 4 लाख रुपए कैश रखा है. सोने के काफी सारे जेवरात भी उन के पास हैं. यह सारे सामान उस के हाथ लग जाएं तो वह प्रेमिका कंचन की नजरों में हीरो बन जाएगा और उस के पापा के सिर पर लदा कर्ज भी उतार देगा. तब कंचन जीवन भर उस की कर्जदार ही बनी रहेगी. कभी सिर उठा कर उस से बात करने की हिम्मत जुटा नहीं पाएगी, अगर ऐसा हो जाए तो?

मुंगेरी लाल के हसीन सपनों की तरह रजत खुली आंखों से सपने देखता रहा. और वो ये सोचता रहा कि सपने को कैसे हकीकत में बदले? वो अपने जीते जी पैसे और गहने देने से रही और उसे हासिल करना उस का लक्ष्य बन गया है, चाहे जैसे भी संभव हो? उस दिन के बाद से रजत की नजर विमला के सोने के ब्रेसलेट, पैसों और जेवरात पर गड़ गई थी. उसे पाने की हसरत उस के दिलोदिमाग पर हलचल मचाने लगी थी. रजत जानता था विमला बुआ शराब की शौकीन है, शराब पीती है. क्यों न उसे शराब पिला कर जब वो नशे में पूरी तरह डूब जाए तो उस का ब्रेसलेट चुरा लूं.

यह आइडिया दिमाग में आने के बाद से रजत का विमला के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. जब भी वह आता था देर में ही आता था. तब तक विमला काम से वापस घर लौट आती थी. मोहल्ले में ही एक फरनीचर की दुकान पर वह नौकरी करती थी और शाहपुर थानाक्षेत्र के इंजीनियरिंग गेट के सामने उस की मां शांति देवी चाय की दुकान चलाती थी. देर रात तक वह घर लौटती थी, इसलिए रजत उन से मिलने रात में घर जाता था.

इस बीच उस ने विमला के ब्रेसलेट चुराने की कई बार कोशिश की, लेकिन अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ. इस से वह परेशान रहने लगा था, लेकिन उस के दिमाग से ब्रेसलेट, पैसे और जेवरात के खयाल दूर नहीं हुए और उसे पाने के लिए बारबार एक नई कोशिश करता रहा. प्रेमिका के पिता के सिर के कर्ज उतारने के लिए उस ने दशकों पहले बने खून जैसे रिश्ते को धोखे के चाकू से पलभर में वार करके दागदार बना दिया था. 75 वर्षीया शांति देवी की जिंदगी की कहानी भी बड़ी अजीबोगरीब थी. पति रामनरेश जायसवाल की वो दूसरी पत्नी थी. पहली पत्नी से एक बेटी थी, जिस का नाम सुशीला था. उस से कोई बेटा नहीं था तो रामनरेश ने दूसरी शादी शांति से की.

दूसरी पत्नी से 3 बेटियां हुईं, जिस में 2 बेटियों ने लव मैरिज कर के अपना घर बसा लिया. इस के बाद फिर पलट कर कभी घर नहीं लौटीं. तीसरी बेटी विमला थी. विमला का रहनसहन बचपन से ही लड़कों जैसा था. दशकों पहले रामनरेश की स्वाभाविक मौत हो गई तो शांति देवी अकेली हो गई. बड़ी बेटी सुशीला की शादी हो चुकी थी. वो अपने परिवार के साथ लखनऊ में रहती थी. कभीकभार ही मम्मी से मिलने गोरखपुर आती थी.

डर्बल मर्डर का खुलासा करते पुलिस अधिकारी

विमला मम्मी को अकेला छोडऩा नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने आजीवन शादी न करने का फैसला किया और अपने वचन पर अडिग रही. मांबेटी दोनों साथसाथ रहती थीं. शाहपुर में 2 मंजिला मकान था. नीचे वाले हिस्से को उन्होंने किराए पर दे दिया था. समय काटने को दोनों ने अपनेअपने पसंद के काम तलाश लिए थे. दोनों की जिंदगी मजे से कट रही थी. लेकिन शायद नियति को तो कुछ और ही मंजूर था.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने रजत के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. खून से सने प्रेमी के हाथ कंचन के लिए तकलीफदेह बन कर रह गए थे. उस ने रजत से कभी नहीं चाहा था कि वह पापा के सिर से कर्ज उतारने के लिए अपनों के खून से हाथ रंगे. कंचन उस दिन को कोसती थी, जिस दिन उस की पहली मुलाकात रजत से हुई थी. रजत के इस घिनौने फैसले से वह बुरी तरह मर्माहत है. कथा लिखे जाने तक रजत जेल की सलाखों के पीछे कैद था. उस के हाल पर फेमिली वालों ने उसे वैसा ही छोड़ दिया था. Gorakhpur Crime

(कथा में कंचन परिवर्तित नाम है.)

 

UP Crime News: मुसलिम प्रेमिका बहन खल्लास

UP Crime News: पति द्वारा साथ छोड़ देने के बाद नीलिमा ने अपने जुड़वां बच्चों हार्दिक और दीपशिखा की अच्छी परवरिश करते हुए उच्चशिक्षा भी दिलवाई. दोनों बच्चे गुरुग्राम की अच्छी कंपनियों में जौब कर रहे थे. फिर एक दिन ऐसा क्या हुआ कि अपनी बहन दीपशिखा को पलकों पर बिठा कर रखने वाले 25 वर्षीय हार्दिक ने बहन दीपशिखा की चाकू से गोद कर न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि मम्मी नीलिमा को भी लहूलुहान कर दिया. उच्चशिक्षित हार्दिक ने ऐसा क्यों किया?

मुरादाबाद के दिल्ली रोड स्थित बुद्धि विहार में नीलिमा किराए के मकान में रहती थी. करीब 2 साल से वह इस मकान में अपने जुड़वां बच्चों 25 वर्षीय दीपशिखा व हार्दिक के साथ रह रही थी. दीपशिखा वर्तमान में गुरुग्राम में स्थित आईटी कंपनी विप्रो में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी. जबकि उस का भाई हार्दिक बीटेक कर के गूगल में सर्विस करता था. गुरुग्राम में भी एक साल पहले हार्दिक ने गूगल की नौकरी छोड़ दी थी. वह अब यूट्यूबर बन गया था. जुड़वां भाईबहन दीपशिखा व हार्दिक गुरुग्राम के सेक्टर-23 के एक फ्लैट में रह रहे थे.

3 मार्च, 2026 को दीपशिखा व हार्दिक कार द्वारा गुरुग्राम से अपनी मम्मी नीलिमा के पास बुद्धि विहार में होली मनाने आए थे. नीलिमा दिल्ली रोड स्थित एक निजी बीमा कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी.

तीनों ने 4 मार्च, 2026 को खूब रंगगुलाल से होली खेली. सभी लोग खुश थे, खुशनुमा माहौल था. पढ़ेलिखे अच्छी प्रोफाइल वाले मुरादाबाद के इस परिवार में 6 मार्च, 2026 को ऐसी वारदात हुई, जिस से शहर में सनसनी फैल गई. हार्दिक पुणे (महाराष्ट्र) की एक मुसलिम युवती से प्यार करता था. वह उस युवती से शादी करना चाहता था. मम्मी नीलिमा और बहन दीपशिखा इस शादी का विरोध कर रही थीं, जिस कारण हार्दिक नाराज था.

करीब 7 महीने पहले मुसलिम प्रेमिका से हार्दिक का ब्रेकअप हो गया था, जिस के कारण वह डिप्रेशन में रहने लगा था. होली पर उसी प्रेमिका को ले कर नीलिमा, दीपशिखा व हार्दिक में आपस में कहासुनी हुई थी. हार्दिक का कहना था कि तुम लोगों की वजह से ही मेरा मेरी दोस्त से ब्रेकअप हुआ है. बात आईगई हो गई थी.

इसी बीच हार्दिक के दिमाग में ऐसा फितूर चढ़ा कि उस ने 6 मार्च, 2026 की दोपहर करीब 12 बजे अपनी बहन दीपशिखा की चाकू से हत्या कर दी. फिर उस की लाश कंबल में लपेट कर पलंग पर डाल दी. उस समय हार्दिक की मम्मी अपने औफिस में थी. दीपशिखा की हत्या कर हार्दिक तुरंत ही कार ले कर मम्मी के औफिस पहुंच गया था. वहां पहुंच कर वह अपनी मम्मी से बोला, ”मम्मी, हम भाईबहन गुरुग्राम जा रहे हैं. आप घर चलो, हमें विदा करो. वैसे भी हम दोनों आप को सरप्राइज देंगे.’’

बेटे के चेहरे पर मुसकान देख कर नीलिमा ने समझा कि दोनों ने कोई प्लान बनाया होगा. बेटे के साथ कार में बैठ कर नीलिमा औफिस से घर आ गई. घर में दाखिल होते ही दीपशिखा का खून में लथपथ शरीर कंबल में लिपटा बैड पर पड़ा दिखाई दिया. यह सब देख कर नीलिमा की चीख निकल गई.

वह चीखते हुए बोली, ”यह हाल किस ने किया है?’’

चीख इतनी तेज थी कि आसपास रहने वालों को सुनाई दी.

बस इसी दौरान हार्दिक ने अपनी मम्मी का मुंह एक हाथ से दबा दिया व जेब से चाकू निकाल कर अपनी मम्मी नीलिमा पर भी वार करने लगा था.

लहूलुहान मांबेटी

अचानक हुए हमले से नीलिमा ने हार्दिक का चाकू वाला हाथ पकड़ लिया था, जिस कारण उन के हाथ की कई अंगुलियां कट गई थीं. हार्दिक ने इस के बाद अपनी मम्मी नीलिमा की गरदन पर भी वार किया. चाकू का एक वार कंधे पर किया. चीखपुकार सुन कर आसपड़ोस के लोग नीलिमा के घर के अंदर आने लगे तो गंभीर रूप से घायल नीलिमा फिर चिल्लाई कि पकड़ो इसे, इस ने मेरी बेटी दीपशिखा की हत्या की है और मुझे भी मारना चाह रहा था. जब हार्दिक ने देखा कि पड़ोसी आ गए हैं तो वह चाकू लहराता हुआ अपनी कार में बैठ कर वहां से भाग गया था.

 

बहन दीपशिखा की जिस कमरे में हत्या हुई, वहां की जांच करतो फॉरेंसिक टीम

लोगों ने तुरंत ही थाना मझोला पुलिस को फोन द्वारा इस वारदात की सूचना दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ रविंद्र कुमार मय फोर्स के घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस ने तुरंत दीपशिखा और उस की मम्मी नीलिमा को जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डौक्टरों ने दीपशिखा को देखते ही मृत घोषित कर दिया था. नीलिमा के घाव गंभीर थे, उसे एडमिट कर के हाथ व गरदन व गंधे पर चाकू के वार थे. उपचार शुरू कर दिया था. दीपशिखा का शव मोर्चरी में रखवा दिया था.

घटना की सूचना मिलते ही मुरादाबाद के एसएसपी सतपाल अंतिल, एसपी (सिटी) कुमार रणविजय सिंह व सीओ कुलदीप गुप्ता जिला अस्पताल पहुंचे और घायल नीलिमा से बात की. उधर पुलिस ने दीपशिखा का शव पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया था. जिला अस्पताल के 2 डौक्टरों डा. मनोज यादव और डा. दुर्गेश्वर की टीम ने 25 वर्षीय दीपशिखा के शव का पोस्टमार्टम किया.

पोस्टमार्टम की विडियोग्राफी व फोटोग्राफी भी करवाई गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दीपशिखा के शरीर पर 80 घाव मिले थे. उस की गरदन रेत कर हत्या की गई थी. सिर से ले कर पैर तक घाव ही घाव थे. एसएसपी सतपाल अंतिल ने इस जघन्य अपराध के अभियुक्त हार्दिक की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों को लगाया. पुलिस टीम में थाना मझोला के एसएचओ रविंद्र कुमार, एसआई तेजपाल, शिवम, हैडकांस्टेबल रविंद्र, प्रमोद शर्मा, बेअंत सिंह, दिनेश कुमार आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने 7 मार्च, 2026 को हार्दिक को मुरादाबाद के जीरो पौइंट से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह बाहर भागने की फिराक में था. पूछताछ में हार्दिक ने पुलिस को बताया कि बहन की हत्या के बाद वह जेल चला जाता. ऐसे में मम्मी अकेली रह जातीं, इसलिए उस ने मम्मी को भी मारने की कोशिश की.

हार्दिक एसपी (सिटी) कुमार रणविजय सिंह को भी गुमराह कर रहा था. तब उन्होंने उसे डांटते हुए कहा कि तुम ने अपनी बहन की हत्या की, उस के बाद अपनी मम्मी को भी मौत के घाट उतारने की कोशिश की. अब तुम पूरी जिंदगी जेल की रोटियां खाओगे. कुमार रणविजय सिंह ने उस से यह भी पूछा कि तुम्हारी मुसलिम प्रेमिका से जब तुम्हारा ब्रेकअप हो गया था, तब तुम ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? तुम दोनों भाग कर भी विवाह कर सकते थे. हत्या करने की और कोई वजह तो नहीं है.

इतना सुनते ही आरोपी हार्दिक ने नीचे निगाह कर ली थी. इस के बाद उस ने बहन की हत्या करने की सारी कहानी पुलिस को बता दी. नीलिमा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की रहने वाली थी. इन की शादी पीलीभीत निवासी इंद्रजीत सिंह के साथ हुई थी. करीब 21 वर्ष पहले इंद्रजीत सिंह नीलिमा को छोड़ कर अलग हो गए थे. इंद्रजीत सिंह से 25 साल पहले नीलिमा को जुड़वां बेटीबेटा पैदा हुए थे.

नीलिमा पढ़ी लिखी थी. नीलिमा को अकेला छोड़ कर इंद्रजीत सिंह कहीं चले गए, जोकि आज उन का कोई अतापता नहीं है. नीलिमा ने बदायूं में प्राइवेट नौकरी कर अपने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी. बेटी को बीबीए करवाया, बेटे हार्दिक को बीटेक करवाया था.

दोनों गुरुग्राम में जौब करते थे. दीपशिखा विप्रो कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी. बेटा हार्दिक गूगल में सर्विस करता था. एक साल पहले गूगल की सर्विस छोड़ कर वह यूट्यूबर बन गया था. इंस्टाग्राम पर उस के 13 हजार से ज्यादा फालोअर हैं. 2 साल से वह मुरादाबाद में रह रहा था. दोनों बच्चों को नीलिमा ने अनगिनत मुश्किलों से लड़ते हुए पाला था. दोनों बहनभाई में बहुत प्यार था.

बहन दीपशिखा गुरुग्राम में अपने भाई हार्दिक का खूब खयाल रखती थी. नौकरी छूटने के बाद हार्दिक के सामने पैसों की कमी आ गई थी. वह अकसर अपनी मम्मी नीलिमा से पैसे मांगता रहता था.

प्रेमिका की खातिर खून

पुणे (महाराष्ट्र) की रहने वाली मुसलिम प्रेमिका के चक्कर में हार्दिक की नौकरी छूट गई थी, जो पैसा उसे गूगल की नौकरी से मिलता था, अधिकतर पैसा वह अपनी प्रेमिका पर खर्च करता था. घटना से 7 महीने पहले प्रेमिका से ब्रेकअप होने के बाद हार्दिक डिप्रेशन में रहता था. दीपशिखा उसे समझाती थी कि प्रेमिका दूसरे धर्म की है, उस से तुम्हारी कभी नहीं बनेगी. तो हार्दिक बहन पर हमलावर हो जाता था.

 

हार्दिक की घायल मम्मी नीलिमा को अस्पताल से इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई

वैसे हार्दिक का व्यवहार शांत था, लेकिन जब उस की प्रेमिका का जिक्र आता तो वह आक्रोशित हो जाता था. उस के व्यवहार में बदलाव आने का परिवार को महसूस तो हो रहा था, लेकिन यह पता नहीं था कि वह हत्या का प्लान बना चुका था. घटना से कुछ दिन पहले उस ने एक वीडियो पोस्ट किया, जिस में वह कह रहा है कि इंसान को गुलामी नहीं आजाद जिंदगी जीनी चाहिए. उस के अलावा उस ने अपनी बहन दीपशिखा के साथ कई वीडियो बनाए. उन्हें पोस्ट किया, जिस में वह बोलता है कि 20 साल बाद फेमिली वालों को अपने बच्चों को आजादी देनी चाहिए.

यह परिवार 1990 में बदायूं से मुरादाबाद आ कर बस गया था. अधिकतर जगह किराए पर रहा था. दीपशिखा की हत्या जिस मकान में हुई थी, वह मकान भी किराए पर था. डिप्रेशन में चल रहे हार्दिक ने अपने प्यार के लिए बहन और मम्मी को मारने का प्लान तैयार किया था. घटना से कुछ दिन पहले भी उस ने बदायूं के अपने परिचित व दोस्तों से तमंचा प्राप्त करने की कोशिश भी की थी, लेकिन सभी ने हाथ खड़े कर लिए थे.

पहले हार्दिक बहन और मम्मी की हत्या गोली मार कर करना चाहता था. जब तमंचे का इंतजाम नहीं हुआ तो उस ने चाकू से हत्या करने का प्लान बना डाला था. घटना से एक दिन पहले हार्दिक ने अपनी मम्मी को दिल्ली के 3 वकीलों के फोन नंबर दिए थे. नंबर देते समय वह बोला कि इन की जरूरत आगे पड़ेगी. नीलिमा ने समझा कि हार्दिक शायद अपनी प्रेमिका से शादी करने जा रहा है, इसलिए वकीलों के फोन नंबर दे रहा है. नीलिमा ने हार्दिक से आगे सवाल नहीं किया था, क्योंकि उस समय वह मानसिक रूप से परेशान दिखाई दे रहा था.

नीलिमा के परिवार की एक दुकान शहर बदायूं की मेन बाजार में थी. वह दुकान नीलिमा के परिजनों ने एक करोड़ रुपए में बेची थी. उस में नीलिमा भी हिस्सेदार थी. यह दुकान पिछले वर्ष सितंबर 2025 में बिकी थी. नीलिमा के हिस्से में करीब 25 से 30 लाख रुपए आए थे. वह पैसे नीलिमा के पास थे. बेटा हार्दिक अकसर अपनी मम्मी से उक्त पैसों की मांग करता था.

डिप्रेशन में चल रहे हार्दिक ने अपने प्यार के लिए बहन और मम्मी को मारने का प्लान तैयार किया था. घटना से कुछ दिन पहले भी उस ने बदायूं के अपने परिचित व दोस्तों से तमंचा प्राप्त करने की कोशिश की थी, लेकिन सभी ने हाथ खड़े कर लिए थे.

नीलिमा कहती थी कि तुम लोग बड़े हो गए हो, तुम नौकरी भी करते हो. तूने नौकरी क्यों छोड़ी? अब भी समय है, अपनी नौकरी जौइन कर ले या अन्य किसी कंपनी में जौब ढूंढो. इन पैसों से मुझे मकान खरीदना है. हम लोग कब तक किराए पर रहेंगे. तुम्हारी शादियां भी करनी हैं. यह पैसा मैं ने फिक्स करवा दिया है.

हत्या का दूसरा पहलू

हार्दिक उक्त पैसा अकसर मांगता था. नीलिमा ने पैसा देने से साफ मना कर दिया. पैसा देने के मामले में बहन दीपशिखा अपनी मम्मी का साथ देती थी. जिस कारण हार्दिक दीपशिखा से चिढ़ जाता था. 9 मार्च, 2026 को नीलिमा की अस्पताल से छुटटी मिल गई थी. उस से पहले 7 मार्च, 2026 को दीपशिखा के पोस्टमार्टम के बाद उस के शव को परिवार के लोगों के सुपुर्द कर दिया था. दीपशिखा के मामा ने मुखाग्नि दी. नीलिमा ने जिस बेटी को 25 साल तक पालपोस कर बड़ा किया, उस की मौत के बाद उस के अंतिम दर्शन भी न कर सकी. आरोपी हार्दिक से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 7 मार्च, 2026 को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. UP Crime News

 

UP Crime News: विदेशी कौलगर्ल की हत्या का राज

UP Crime News: तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली मुहब्बत नाजमुदिनोवा करीब 15 साल पहले इंडिया घूमने आई थी, लेकिन दलालों के चंगुल में फंस कर वह जिस्मफरोशी का धंधा करने लगी. उस की हत्या की गुत्थी सुलझाते समय पुलिस को ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि…

21 फरवरी, 2026 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की मवाना कोतवाली पुलिस को एक किसान ने फोन कर के जो सूचना दी, उस से पुलिस वाले हैरान हो गए. मवाना खुर्द के भगवती फार्महाउस के पास सरसों के खेत में एक महिला का शव पड़ा हुआ मिला था. यह फार्महाउस पौड़ी हाइवे पर पड़ता है. मवाना खुर्द चौकी के प्रभारी एसआई राजेश कुमार यादव को थाने से इस कौल की सूचना पर मौके पर तत्काल पहुंचने का आदेश मिला तो वह चौकी के स्टाफ को ले कर तत्काल वहां पहुंच गए, जहां महिला का शव पड़ा था.

महिला का चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. ऐसा लगता था किसी ने उस के चेहरे पर कोई ज्वलनशील पदार्थ डाला था. इतना ही नहीं, शरीर के 1-2 जगह और भी ज्वलनशील पदार्थ डाला गया था. यह तो समझ में आता था कि उस के चेहरे पर तेजाब शायद इसलिए डाला गया था ताकि मृतका की पहचान खत्म हो जाए, लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों को क्यों जलाया गया था. यह जानने के लिए जब एसआई राजेश ने शरीर के उन हिस्सों का निरीक्षण किया तो पता चला कि उन सभी जगहों पर बड़ेबड़े टैटू बने हुए थे. लेकिन ज्वलनशील पदार्थ डाले जाने के बाद भी वे हिस्से पूरी तरह झुलस नहीं पाए थे.

एआई राजेश यादव जांचपड़ताल के काम में लगे ही थे कि तभी मवाना थाने की एसएचओ पूनम जादौन और सीओ पंकज लवानिया भी वहां पहुंच गए. एसएचओ और सीओ ने लाश के साथ घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. सवाल था कि मरने वाली कौन थी? यह पता लगाने के लिए जब कुछ महिलाकर्मियों की मदद से मृतका के शरीर पर पहने कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस की जेब से एक ऐसी चीज मिली, जिस से मृतका की पहचान की गुत्थी भी सुलझ गई.

कपड़ों से एक आधार कार्ड मिला, जिस पर नाम अर्चिता अरोड़ा और पता दिल्ली का दर्ज था. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि आधार कार्ड पर फोटो एक विदेशी युवती का लगा था. जबकि नाम एकदम देशी था. इसीलिए सीओ पंकज लवानिया को सहज विश्वास नहीं हुआ कि मृतका और उस की पहचान के बीच जो रिश्ता है वो एकदम सही है. इस दौरान एसपी (देहात) अभिजीत कुमार भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल की जांच व निरीक्षण का काम पूरा होने के बाद मवाना पुलिस ने कथित अर्चिता अरोड़ा के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

चूंकि मृतका अर्चिता अरोड़ा के शव का निरीक्षण सब से पहले एसआई राजेश यादव ने किया था, इसलिए सीओ पंकज लवानिया के निर्देश पर एक लिखित तहरीर थाने में दी और इसी के आधार पर मवाना थाने में बीएनएस की धारा 103(1), 238 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसपी (देहात) अभिजीत कुमार के निर्देश पर जांच का काम खुद एसएचओ पूनम जादौन ने अपने हाथ में ले लिया. एसपी (देहात) ने 2 पुलिस टीमों को गठन कर दिया. एक टीम को घटनास्थल की जांच और आसपास के सीसीटीवी फुटेज को खंगालने का काम सौंपा गया.

दूसरी टीम को मृतका के बारे में पुख्ता जानकारी एकत्र करने का काम सौंपा गया. सभी पुलिस टीमों की मौनिटरिंग और सर्विलांस का काम सीओ पंकज लवानिया को सौंपा गया.

पुलिस की एक टीम ने घटनास्थल की बारीकी से जांच शुरू कर दी. साथ ही उस जगह के आसपास की जगहों के सीसीटीवी फुटेज तलाशने का काम भी शुरू कर दिया, जहां अर्चिता अरोड़ा के शव को फेंका गया था. काम थोड़ा मशक्कत वाला और पेचीदा जरूर था, लेकिन जब पुलिस की टीम ने अपना काम शुरू किया तो अगले 24 घंटे में करीब 500 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज तलाश लिए, जिन से पुलिस को उन कातिलों तक पहुंचने का सुराग मिल गया, जिन्होंने अर्चिता का शव वहां ला कर फेंका था.

हाइवे पर बने भगवती फार्महाउस के सीसीटीवी कैमरे में पुलिस टीम को एक क्रेटा कार दिखी, जिस में कुछ लोग दिखे. सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे लोगों की संख्या करीब 3 से 4 थी, जो कंबल में लिपटे एक मानव शरीर को ले कर उस स्थान की तरफ गए, जहां अर्चिता का शव मिला था. पुलिस ने तकनीकी सहायता से आखिरकार ये पता लगा लिया कि उस क्रेटा कार का नंबर क्या है और वह किस के नाम पर रजिस्टर्ड है.

मुहब्बत उर्फ अर्चिता अरोड़ाः सालों पहले तुर्कमेनिस्तान से भारत घूमने आई थी, लेकिन यहां आ कर दलालों के जाल में फंस गई.

यह क्रेटा कार मेरठ के सिविल लाइन इलाके में प्रभात नगर कालोनी के रहने वाले संदीप उर्फ सिट्टू उर्फ राहुल के नाम पर रजिस्टर्ड थी. पुलिस की एक टीम ने उसी दिन संदीप को हिरासत में ले लिया और उस से कड़ी पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस तो पुलिस होती है, वह जब अपने तरीके से पूछताछ करती है तो इंसान क्या पत्थर भी बोलने लगते हैं. संदीप उर्फ राहुल ज्यादा देर तक चुप नहीं रह सका. संदीप ने पुलिस को बताया कि वह परतापुर के दिल्ली रोड स्थित अविका होटल में काम करता है. इस के बाद संदीप ने टेप रिकौर्ड की तरह बोलते हुए पुलिस को सब कुछ बता दिया कि उस ने क्यों और कैसे तथा किस के साथ मिल कर अर्चिता की हत्या की है.

संदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने अविका होटल के मालिक चंचल कुमार उर्फ बंटी निवासी न्यू देवपुरी थाना रेलवे रोड, मेरठ के अलावा वहां काम करने वाले एक अन्य  कर्मचारी गुरमुख उर्फ अरविंद उर्फ मोनू निवासी जौहड़ी बिनौली बागपत तथा विवेक उर्फ काका निवासी खजूरी वाली गली मलियाना, टीपीनगर मेरठ को ताबड़तोड़ छापेमारी कर हिरासत में ले लिया. संदीप समेत उन चारों से कड़ी पूछताछ हुई तो उन्होंने अर्चिता की हत्या का पूरा राज खोल कर रख दिया.

संदीप और उस के साथियों ने यह भी बताया कि पुलिस ने जिस महिला का शव बरामद किया है, उस का नाम अर्चिता अरोड़ा है, जो बैंक रोड अंबाला कैंट की रहने वाली है. हाल में वह दिल्ली के लोधी रोड स्थित कोटला मुबारकपुर में रहती थी. संदीप ने बताया कि अर्चिता जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी थी. वह अकसर मेरठ में आती थी, जहां वह अपने चाहने वालों का दिल बहला कर उन की जेब खाली कराती थी. इस काम के लिए अर्चिता अविका होटल में रूम बुक करती थी.

20 फरवरी, 2026 को भी उस ने रूम बुक किया था. रात के समय अर्चिता से होटल मालिक चंचल कुमार उर्फ बंटी का रूम के किराए को ले कर विवाद हो गया. विवाद इतना बढ़ गया कि अर्चिता ने चंचल पर दुष्कर्म का आरोप लगाने की धमकी दे डाली. उस के बाद चंचल को इतना गुस्सा आया कि उस ने होटल के अपने 3 कर्मचारियों के साथ मिल कर अर्चिता के साथ मारपीट शुरू कर दी. उस ने अर्चिता की इतनी पिटाई कर दी कि कि वह बेहोश हो गई.

चंचल कुमार उर्फ बंटी के सिर पर गुस्सा इस कदर सवार था कि उस वक्त उसे इस बात का होश ही नहीं था कि वह क्या कर रहा है. उस ने बेहोश अर्चिता के शरीर पर कंबल डाल दिया और उस के बाद गुस्से में ही उस की गरदन दबाते हुए चीखने लगा, ”साली वेश्या, तू मुझे झूठे केस में फंसाएगी. मुझे जेल भिजवाएगी. मेरे जरिए तूने लाखों रुपया कमाया और आज तू मुझे जेल भिजवाने की धमकी दे रही है. देखता हूं कि आज तुझे कौन बचाता है.’’

बाएं – मृतका के कपड़ों से बरामद अर्चिता अरोड़ा नाम का आधार कार्ड तथा नीचे उस का तुर्कमेनिस्तान का पासपोर्ट

चंचल कुमार को पता ही नहीं चला कि गुस्से की आग में उस ने कब कंबल के अंदर लिपटी अर्चिता की गला दबा कर हत्या कर दी है. अर्चिता के शरीर में जब काफी देर तक कोई हरकत नहीं हुई तो चंचल कुमार का गुस्सा भी थोड़ी ही देर में शांत हो गया. कुछ देर बाद जब चंचल का गुस्सा शांत हुआ तो उस ने सोचा एक बार अर्चिता से बात कर ली जाए. उस ने जब अर्चिता को हिला कर उस से बात करने की कोशिश की तो पता चला कि वह निर्जीव पड़ी है.

उस ने होटल के तीनों कर्मचारियों संदीप, गुरुमुख और विवेक को बुला कर अर्चिता को होश में लाने के लिए कहा. तीनों ने जब उस की नब्ज टटोली तो पता चला उस की नब्ज बंद हो चुकी थी. कई तरह से जांचपड़ताल करने के बाद वे समझ गए कि अर्चिता की मौत हो चुकी है. जैसे ही चंचल उर्फ बंटी को यह पता चला कि अर्चिता मर चुकी है तो उन सभी के होश उड़ गए. काफी देर तक वे समझ ही नहीं पाए कि अब वे क्या करें.

लेकिन करीब एक घंटा बीत जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि अगर उन्हें इस मामले में बचना है और पुलिस की पकड़ से दूर रहना है तो उन्हें अर्चिता के शव को अपने होटल से कहीं दूर ले जा कर ठिकाने लगाना होगा. बहुत सोचनेविचारने और सलाहमशविरा करने के बाद उन्होंने तय किया कि वे रात में ही गाड़ी में डाल कर अर्चिता के शव को कहीं और फेंक आऐंगे. उन्होंने सब से पहले तेजाब डाल कर अर्चिता के चेहरे को जला दिया ताकि उस की पहचान न हो सके. इतना ही नहीं, उस के शरीर के जिन हिस्सों में टैटू बने थे, वहां भी तेजाब डाल दिया गया.

चंडीगढ़ की एलिना से संपर्क करने पर उस ने मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना से वीडियो कौल पर पुलिस की बात कराई.

चंचल जानता था कि अर्चिता मेरठ की रहने वाली नहीं है, वह केवल अमीरजादों के जिस्म की भूख मिटा कर पैसा कमाने के लिए मेरठ आती थी. उसे शहर में ज्यादा लोग नहीं जानते हैं. अगर वे उस के चेहरे की पहचान मिटा कर उस के शव को अपने होटल से कहीं दूर डाल देंगे तो फिर उन के पकड़े जाने की संभावना नहीं है.

तेजाब से पहचान मिटा कर चंचल ने अपने तीनों साथियों के साथ मिल कर अर्चिता के शव को कंबल में लपेट कर संदीप उर्फ सिट्टू की क्रेटा कार में डाला. चंचल कुमार और उस के साथी अर्चिता की लाश को क्रेटा कार में डाल कर कारीब 45 किलोमीटर तक इधर से उधर भटकते रहे. इसी तरह वे मेरठ से होते हुए मवाना रोड निकल गए. कहीं चैकिंग नहीं हुई. वे मवाना खुर्द पुलिस चौकी के पास पौड़ी हाइवे पर स्थित भगवती फार्महाउस तक जा पहुंचे. फार्महाउस के पास पहुंच कर उन्हें लगा कि यहां लाश को ठिकाने लगाना उचित रहेगा.

वहां गाड़ी खड़ी कर के उस के बाद सभी चारों आरोपियों ने फार्महाउस की बाउंड्री के भीतर सरसों के खेत में कंबल समेत अर्चिता का शव डाल दिया. इस के बाद चारों आरोपी मौके से वापस अपने घरों को लौट आए. लेकिन घर लौटने के बाद भी चारों आरोपी मवाना पुलिस की गतिविधियों पर नजर बनाए रहे. पूछताछ का काम पूरा होने पर पुलिस ने सभी आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयोग की गई क्रेटा कार, होटल का कंबल और तेजाब की खाली बोतल भी बरामद कर सीज कर दी गई.

पुलिस ने पूछताछ और साक्ष्यों को जुटाने के बाद चारों आरोपियों चंचल कुमार, संदीप, गुरुमुख और विवेक को सक्षम न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथित अर्चिता अरोड़ा की शिनाख्त से ले कर हत्या के कारण व उस के कातिलों को गिरफ्तार करने की गुत्थी मवाना पुलिस ने सुलझा ली थी. लेकिन मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे के साथ एसपी (देहात) अभिजीत कुमार और सीओ पंकज लवानिया ने जब जांच अधिकारी पूनम जादौन के साथ हत्याकांड के एकएक बिंदु पर गहनता से चर्चा शुरू की तो सभी उच्चाधिकारियों को लगा कि कुछ ऐसा जरूर है, जो जांच में छूट रहा है.

पुलिस हिरासत में आरोपी चंचल कुमार, संदीप, गुरुमुख और विवेक

विचारविमर्श के बाद तय हुआ कि अर्चिता के बारे में और अधिक जानकारी एकत्र करनी होगी, क्योंकि पुलिस ने अर्चिता का जो आधार कार्ड बरामद किया था, उस में भले ही उस का नाम अर्चिता अरोड़ा था, लेकिन उस में जो फोटो थी वह एक विदेशी महिला की लग रही थी, इसलिए उस के भारतीय होने पर संदेह था. पुलिस की टीमों को अब अर्चिता की सही पहचान स्थापित करने के काम पर लगाया गया. महिला की सही पहचान और उस के परिवार वालों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए टीमें गठित कर दी गईं.

पुलिस को मृतका का जो आधार कार्ड बरामद हुआ था, उस में उस का नाम अर्चिता अरोड़ा पुत्री सरबजीत अरोड़ा निवासी 1811, दूसरा फ्लोर, साउथ एक्सटेंशन, कोटला मुबारकपुर, लोधी रोड मध्य दिल्ली का पता दर्ज था. इस में जन्मतिथि 27 अप्रैल, 1984 दर्ज मिली. पुलिस की टीम जब वहां पहुंची तो जानकारी मिली कि वह इस पते पर नहीं रहती. थकहार कर पुलिस खाली हाथ लौट आई. जब अर्चिता के आधार वाले पते से कोई सुराग नहीं मिला तो जांच अधिकारी पूनम जादौन ने उस के मोबाइन नंबर का सहारा लिया.

दरअसल, अर्चिता के आरोपियों से पूछताछ के दौरान पुलिस ने अर्चिता का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. पुलिस ने अर्चिता के मोबाइल की 3 महीने की कौल डिटेल्स निकाली. उस में अर्चिता के मोबाइल काल डिटेल में आखिरी नंबर किसी एलिना का था, जिस का नाम उस की कौंटेक्ट लिस्ट में दर्ज था. एलिना से फोन पर बातचीत कर पुलिस ने उसे भगवती फार्महाउस में मिले एक महिला के शव और उस के पास से बरामद अर्चिता अरोड़ा के आधार कार्ड की बाबत जानकारी दी.

कौल डिटेल्स से यह भी पता चला कि अर्चिता की हत्या में पकड़े गए आरोपी चंचल कुमार से एक साल से संबंध थे. वह अकसर मेरठ आतीजाती रहती थी. हर बार उस के नाम पर एक रात या दिन के लिए अविका होटल का रूम बुक होता था. कौल डिटेल्स में चूंकि अर्चिता की आखिरी बार 20 फरवरी, 2026 को एलिना से बात हुई थी. पुलिस ने एलिना से अनुरोध किया कि वह अर्चिता के शव की पहचान करें.

चारों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद प्रैस कौन्फ्रेंस करते पुलिस अधिकारी

एलिना चूंकि चंडीगढ़ में रहती थी, इसलिए 25 फरवरी को मवाना थाने के एक एसआई सुमित कुमार ने एलिना से संपर्क किया. उन्होंने अर्चिता के शव के हर ऐंगल की फोटोग्राफ एलिना को दिखाई तो एलिना ने खुलासा हुआ कि मृतका अर्चिता अरोड़ा नहीं, बल्कि तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली मुहब्बत है. एलिना के इस खुलासे के बाद अचानक पूरे केस की थ्योरी ही बदल गई. एलिना ने बताया कि मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना तुर्कमेनिस्तान में रहती है. एलिना ने एसआई सुमित कुमार से ली गई फोटो मुहब्बत की मम्मी नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना को भेजी.

मम्मी ने भी ईयरिंग, ब्लैकटौप और शरीर पर बने टैटू के आधार पर उस की पहचान अपनी बेटी मुहब्बत के रूप में की. उन्होंने एसआई सुमित कुमार से वीडियो कौल पर बातचीत में बताया कि मुहब्बत करीब 15 साल पहले तुर्कमेनिस्तान से भारत आई थी और कथित रूप से दलालों के चंगुल में फंस गई थी. दलालों ने उस का पासपोर्ट अपने कब्जे में ले लिया और उन्होंने उसे नौकरी की जगह उसे जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया.

एसएसपी अविनाश पांडेय

मुहब्बत ने अपनी पहचान के लिए दलालों के जरिए अर्चिता अरोड़ा के नाम पर आधार कार्ड बनवा लिया, लेकिन उस पर फोटो मुहब्बत का ही लगा था. मां नाजमुदिनोवा गुलनारा सुनातोवना ने यह भी खुलासा किया कि मुहब्बत भारत में जिस्मफरोशी का काम कर रही थी. पासपोर्ट पर भी उस का नाम मुहब्बत नाजमुदिनोवा था, जोकि तुर्कमेनिस्तान की नागरिक थी. मुहब्बत लगभग 15 साल से भारत में रह रही थी. एसआई सुमित कुमार से बातचीत के बाद मुहब्बत की मम्मी ने भारत में रहने वाली अपनी दोस्त उज्बेकिस्तान की रहने वाली कलिचेवा अजीजा फैजुलेवना से बातचीत की. वह भी चंडीगढ़ में रहती थी.

सीओ पंकज उस ने जब भार लवानिया

अजीजा ने वीडियो कौल पर मुहब्बत की मम्मी से बातचीत की. अजीजा एलिना को साथ ले कर 25 फरवरी को मवाना थाने पहुंची. उस ने जांच अधिकारी पूनम जादौन, सीओ पंकज लवानिया और उस के बाद एसपी (देहात) अभिजीत कुमार से मुलाकात और बातचीत की.  दूसरी तरफ मुहब्बत की मम्मी गुलनारा ने तुर्कमेनिस्तान एंबेसी को एक पत्र भेज कर बताया कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि खुद भारत आ सकूं. उस ने अजीजा के जरिए तुर्कमेनिस्तान एंबेसी को यह लेटर भेजा, ताकि उस की गैरमौजूदगी में अजीजा ही पुलिस से संपर्क कर सके.

एसएचओ पुनम जादौन

गुलनारा ने दावा किया कि मृतका भारतीय नहीं, बल्कि उस की बेटी मुहब्बत है. एलिना और अजीजा के पुलिस से संपर्क करने तथा तुर्कमेनिस्तान एंबेसी के हस्तक्षेप के बाद मवाना पुलिस पूरी तरह ऐक्टिव हो गई. सीओ पंकज लवानिया को विश्वास हो गया कि अब कथित अर्चिता अरोड़ा की सही पहचान हो जाएगी. इस दौरान एंबेसी की मदद से पुलिस को मुहब्बत के पासपोर्ट की कौपी भी मिल गई. इसलिए पुलिस ने विदेश मंत्रालय को पासपोर्ट और केस की डिटेल भेज दी है और अर्चिता उर्फ मुहब्बत का डीएनए टेस्ट कराने के लिए उस की मम्मी को एक अनुरोध पत्र भी भेज दिया.

पूछताछ में पता चला कि मृतका अर्चिता अरोड़ा का जन्मस्थान भले ही तुर्कमेनिस्तान था, लेकिन उस के पापा सरबजीत अरोड़ा भारत के ही निवासी हैं. जबकि मम्मी तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली थी. इसीलिए उस ने जब भारत आने पर अपना आधार कार्ड बनवाया तो उस में अपनी पहचान अर्चिता अरोड़ा के रूप में दी. पुलिस ने अर्चिता उर्फ मुहब्बत की हत्या और उस की पहचान की गुत्थी एक तरह से सुलझा ली थी.

लेकिन इस मामले की तह में एक बड़े ह्यूमन ट्रैफिकिंग रैकेट के जुड़े होने की बू आ रही थी. क्योंकि अर्चिता उर्फ मुहब्बत ही नहीं, देश में ऐसी बहुत सारी विदेशी महिलाएं हैं, जिन के पास भारत में फरजी पहचान पत्र हैं. फरजी आधार कार्ड तो हैं, लेकिन नागरिकता का प्रमाण नहीं है. UP Crime News

 

 

 

UP Crime: भाई क्यों बनता है – प्यार का दुश्मन

UP Crime: 20 वर्षीय अनुराधा की खता इतनी थी कि वह फोन पर अपने किसी दोस्त से बात करती थी. केवल इसी बात पर उस के बड़े भाई मनीष ने अपनी मम्मी के साथ मिल कर बहन की हत्या कर दी. यहां सोचने वाली बात यह है कि भाई चाहे किसी भी लड़की से मटरगश्ती करे, लेकिन जब उस की बहन किसी दोस्त से बात भी करे तो भाई उस का दुश्मन क्यों बन जाता है?

बात 16 नवंबर, 2025 की है. उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के परसाजागीर गनेशपुर निवासी मनीष ने छोटी बहन अनुराधा को फोन पर किसी अनजान युवक से बात करते देख लिया था. जिस से वह गुस्से से तमतमा गया. वह बहन पर आगबबूला हो गया. उस ने अनुराधा से कहा, ”तू फोन पर किस से बात कर रही है. यह बात करना बंद कर दे. मैं इस बारे में पहले भी तुझ से कई बार मना कर चुका हूं.’’

अनुराधा – फोन पर बात करना जान पर भारी पड़ा

तभी मनीष की मम्मी निर्मला देवी ने उलाहना दिया, ”मैं ने भी कई बार इस से बात करने से मना किया है, लेकिन यह किसी की बात सुनती ही नहीं है, बल्कि मुझ से झगड़ती है. जो मन में आए, वह करती है. यह तो पूरी तरह अपनी मरजी की मालिक हो गई है.’’

मम्मी की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. इस से मनीष का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. गुस्सा करने के साथ ही वह अपना आपा खो बैठा और उस ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. अत्यधिक पिटाई से अनुराधा बेहोश हो गई. इस में मम्मी ने भी मनीष का साथ दिया. तब मनीष अपनी कार की डिक्की में बेहोश अनुराधा को डाल कर रात के अंधेरे में चल दिया. रास्ते में सुनसान इलाके में उस ने अनुराधा की रस्सी से गला घोंट कर हत्या कर दी. शव को ठिकाने लगाने के लिए ममेरे भाई मुसकान को ननिहाल से अपने साथ ले लिया था.

शव को ठिकाने लगाने के लिए दोनों अयोध्या की ओर कार ले कर निकल गए, लेकिन पुलिया का निर्माण होने के कारण लौट आए. दुबौलिया-विश्वेश्वरगंज होते हुए मनीष गोंडा पहुंचा. वहां नवाबगंज में कार में पेट्रोल भरवाया. बनगांव के पास पीडी बंधा पर सुनसान जगह देख कर मनीष और मुसकान ने अनुराधा की लाश को कार की डिक्की से बाहर निकाला और उस की मौत सुनिश्चित करने के लिए मनीष ने उसे कार से कुचल कर दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की.

अपनी सगी बहन को बेदर्दी से मारने के बाद शव को वहीं फेंक कर वे लोग मनकापुर-बभनान-गौरा मार्ग होते हए बस्ती की ओर फरार हो गए. बाद में मनीष ने ममेरे भाई मुसकान को उस के गांव छोड़ दिया और खुद अपने घर वापस आ गया. 17 नवबंर, 2025 को गोंडा पुलिस को थाना तरबगंज के अंतर्गत बनगांव के पास सिकरेटरीपुरवा और कंचनपुर के बीच पीडी बंधा पर सड़क किनारे एक अज्ञात युवती का शव मिला. इस की जानकारी बनगांव के ग्राम प्रधान मंजीत सिंह ने पुलिस को दी थी.

सूचना मिलने पर तरबगंज के एसएचओ कमलाकांत त्रिपाठी पुलिस बल सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल का गहराई से निरीक्षण किया. जिस युवती की लाश मिली थी, उस के हाथ में रस्सी बंधी थी. फील्ड यूनिट, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया गया. मौके से टीमों द्वारा साक्ष्य जुुटाए गए. ग्रामप्रधान की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

हत्या के बाद अनुराधा की लाश को इसी कार से ठिकाने लगाया गया था

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के शरीर व गले पर चोटों के कई निशान मिले तथा मृत्यु का कारण हेमोरेजिक शाक व एंटीमार्टम इंजरी पाया गया. इस पर पुलिस ने थाना तरबगंज में हत्या का मामला दर्ज कर लिया. युवती की शिनाख्त न होने और उस के बारे में कोई सुराग न मिलने पर मामले को ब्लाइंड मर्डर घोषित कर जांच तेज कर दी गई. पुलिस टीमों ने लगातार तकनीकी इनपुट खंगालने और सीसीटीवी फुटेज चैक किए.

आरोपी मनीष – बहन की हत्या का मनीष को जरा भी अफसोस नहीं हुआ

इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए गोंडा के एसपी विनीत जायसवाल ने तरबगंज क्षेत्र के एएसपी राधेश्याम राय के निर्देशन तथा सीओ (तरबगंज) उमेश्वर प्रभात सिंह की अध्यक्षता में एसओजी, सर्विलांस सहित 5 पुलिस टीमों का गठन कर दिया. पुलिस इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए 13 दिन तक जुुटी रही. उस की शिनाख्त कराने के साथ ही उस के हत्यारे की तलाश में जमीनआसमान एक कर दिया, इस के साथ ही अपने मुखबिरों को लगा दिया.

पुलिस टीमों ने लगातार टेक्निकल व मैनुअल इनपुट खंगाले और घटनास्थल के आसपास लगे कई सीसीटीवी चैक किए. पुलिस द्वारा तरबगंज और अयोध्या के सोहवल तक लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली. एक फुटेज में एक सफेद रंग की कार जरूर दिखाई दी, लेकिन नंबर स्पष्ट न होने से कार के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी.

इस बीच पुलिस को पता चला कि जनपद बस्ती परसाजागीर गणेशपुर की एक 20-22 साल की युवती अनुराधा 13 दिन पहले लापता हो गई थी. पुलिस जांंच में पता चला कि इस संबंध में उस के फेमिली वालों ने थाने में कोई सूचना या रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है. इस पर पुलिस गांव परसाजागीर गणेशपुर जा पहुंची. पुलिस को गांव वालों से जानकारी हुई कि मनीष की बहन अनुराधा कई दिनों से घर से गायब है. वह गांव में किसी को दिखाई नहीं दे रही है.

वहां मनीष कुमार के घर पर ताला लगा था. पुलिस ने गांव वालों से परिवारीजनों के बारे में पूछताछ की. गांव वालों ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन के घर पर ताला लगा हुआ है. गांव के लोगों ने बताया कि 16 नवंबर के बाद से अनुराधा को नहीं देखा. ग्रामीणों ने जब अनुराधा की मम्मी निर्मला देवी से अनुराधा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि अनुराधा अपने मामा के घर गई हुई है. इस पर ग्रामीण संतुष्ट हो गए थे.

30 नवंबर को गोंडा पुलिस ने जब मृतका के फोटो निर्मला देवी के पड़ोसियों को दिखाए तो उन्होंने कपड़ोंं के आधार पर उस की शिनाख्त अनुराधा के रूप में की. अनुराधा की हत्या से गांव वाले सन्न रह गए. उन का कहना था कि फेमिली वाले संपन्न व प्रतिष्ठित हैं. इस के बाद पुलिस के अलावा गांव वालों को भी यही शक हो गया कि अनुराधा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उस के फेमिली वालों ने ही की है, इसलिए वे फरार हो गए. उन के फोन नंबरों के आधार पर पुलिस उन्हें तलाशने लगी.

पुलिस की यह कोशिश रंग लाई. पुलिस ने मनीष कुमार और उस की मम्मी निर्मला को बस्ती के वाल्टरगंज थाना मोड़ के पास से 30 नवंबर, 2025 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने आरोपी से गांव से 100 किलोमीटर से अधिक दूर आने का कारण पूछा तो मनीष कोई जवाब नहीं दे सका. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बलेनो कार भी पुलिस ने बरामद कर ली.

मृतका की मम्मी और भाई की गिरफ्तारी के बाद प्रैस कौन्फ्रैंस करते अधिकारी

मांबेटे से अनुराधा के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस संबंध में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के थाना वाल्टरगंज के परसाजागीर गनेशपुर की रहने वाली 20 वर्षीय अनुराधा ग्रैजुएशन कर रही थी. उस की बड़ी बहन की शादी हो चुकी है. अनुराधा के 2 भाई मनीष कुमार और आशीष कुमार हैं. बड़ा भाई आशीष कुमार पुणे में पत्थर का काम करता है, जबकि मनीष घर पर ही रहता है. 16 नवबंर, 2025 को मनीष अपने दोस्तों के साथ गोरखपुर गया था. घर लौटने पर उस ने बहन अनुराधा को किसी अनजान लड़के से मोबाइल पर बात करते देख लिया. उस ने गुस्से से कहा, ”कितनी बार तुझे मना किया कि बात करना बंद कर दे. लेकिन समझाने के बाद भी तू मानती नहीं है.’’

निर्मला देवी: बेटी की हत्या में बेटे मनीष का साथ दिया

मनीष को शक था कि अनुराधा का चालचलन ठीक नहीं है. प्रतिष्ठित परिवार होने के कारण गांव में उन के परिवार की इज्जत थी. मनीष को यह बरदाश्त नहीं हुआ. मनीष ने उस लड़के के बारे में पूछा, जिस से वह फोन पर बातें कर रही थी. इसी बात पर मनीष की अनुराधा से बहस होने लगी. इस के बाद मनीष से उस की मम्मी निर्मला देवी ने भी अनुराधा की शिकायत की. इस से बहन के प्रति मनीष का गुस्सा और बढ़ गया. उस समय तो मनीष ने किसी तरह अपने गुस्से पर काबू कर लिया.

देर रात भी मनीष का गुस्सा शांत नहीं हुआ. मन ही मन उस के अंदर उथलपुथल मचती रही. सोचने लगा कि यदि अनुराधा ने कोई गलत कदम उठा लिया तो फेमिली वाले मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि उन के परिवार की गांव में बड़ी प्रतिष्ठा थी. मनीष ने अनुराधा से जब उस का मोबाइल मांगा तो उस ने मोबाइल फोन देने से साफ इंकार कर दिया. इसी बात को ले कर रात में मनीष का अनुराधा से फिर झगड़ा हुआ. तभी मनीष ने अनुराधा के हाथ से मोबाइल छीन कर तोड़ दिया.

इस पर अनुराधा भाई मनीष पर बिफर पड़ी. दोनों में एक बार फिर तकरार होने लगी. बात बढ़ गई और मनीष ने अनुराधा की बुरी तरह पिटाई कर दी. ज्यादा पिटाई के चलते अनुराधा बेहोश हो गई. तब बिना आगापीछा सोचे मनीष ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. उस ने अनुराधा को जान से मारने का प्लान बनाया ताकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. फिर मनीष ने अपनी मम्मी निर्मला देवी से रस्सी मंगा कर मम्मी के साथ मिल कर बहन के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. इस के बाद अनुराधा को बोरे में भर कर अपनी कार की डिक्की में डाल दिया. मम्मी को साथ ले कर मनीष अपने मामा के घर की ओर चल पड़ा. मनीष के मामा का गांव थाना दुबौलिया क्षेत्र में था.

मामा के गांव पहुंचने से पहले एक सुनसान जगह पर कार रोक कर मनीष ने रस्सी से अनुराधा का गला घोंट दिया. फिर मम्मी को मामा के घर छोड़ कर ममेरे भाई मुसकान को कार में साथ ले कर अकबरपुर टांडा की तरफ निकल पड़ा और तरबगंज के पीडी बांध मार्ग पर अनुराधा के शव को डिक्की से निकाल कर सड़क पर फेंका, फिर कार से कुचल दिया. मनकापुर-बभनान-गौरा होते हुए घर लौट गया.

बहन की हत्या का उसे कोई अफसोस नहीं था. पुलिस ने अनुराधा की हत्यारी मां निर्मला देवी व सगे भाई मनीष को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. तीसरे आरोपी मनीष के ममेरे भाई मुसकान की गिरफ्तारी के लिए कई जगहों पर दबिश डाली गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस हिरासत में आरोपी

इस ब्लाइंड मर्डर केस का परदाफाश कर आरोपी मनीष व उस की मां को गिरफ्तार करने वाली टीम में इंसपेक्टर (तरबगंज) कमलाकांत त्रिपाठी, एसओजी प्रभारी गौरव सिंह, एडिशनल इंसपेक्टर थाना तरबगंज राजकुमार यादव, एसआई उपेंद्र यादव, एसओजी के रणवीर, अरुण यादव, राकेश सिंह, राशिद अली, अमित पाठक, इमरान अली, कांस्टेबल अंकित राय प्रमोद वर्मा व शशिबाला शामिल थे. एसपी (गोंडा) विनीत जायसवाल ने इस ब्लाइंड मर्डर का परदाफाश करने गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम तथा एसओजी टीम को 25 हजार रुपए का पुरस्कार भी दिया है.

अपनी बहन का गला घोंटते समय भाई को जरा भी मलाल नहीं हुआ. वह जल्लाद बन गया. मनीष और उस की मम्मी ने यह भी पता करने की कोशिश नहीं की कि अनुराधा किस युवक से बात करती है और वह युवक कौन है? अपनी कोख से जन्म देने वाली निर्मला ने भी उस की हत्या में अहम भूमिका निभाई, यदि वह चाहती तो अनुराधा की जान बच सकती थी. प्रश्न उठता है कि कब तक लोग कानून को अपने हाथ में लेते रहेंगे? कब तक निर्दोष लोग इस प्रकार अपनी जान से हाथ धोते रहेंगे? गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मोबाइल कल्चर इस के लिए जिम्मेदार है, जिस ने एक हंसतेखेलते परिवार को उजाड़ दिया. UP Crime

 

UP Crime: कबाड़ी से कैसे बना हिस्ट्रीशीटर

UP Crime: शामली का समयदीन उर्फ सामा ऐसा खूंखार अपराधी था कि स्थानीय पुलिस को नाकों चने चबाए रखता था. पुलिस ने जब उस पर इनाम घोषित कर दिया तो वह तेलंगाना जा कर अपराध करने लगा, लेकिन एक बड़ी वारदात करने जब वह शामली आया तो पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गया. आखिर एक फेरी वाले से इनामी हिस्ट्रीशीटर कैसे बना समयदीन? पढ़ें, उस के अपराध के किस्से.

शामली के थाना भवन के एसएचओ विजेंद्र सिंह रावत 8 दिसंबर, 2025 की रात 10 बजे के बाद थाने में अपने रोजमर्रा के जरूरी काम निपटा कर पुलिस टीम के साथ रात की गश्त के लिए जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी उन का मोबाइल बजने लगा. विजेंद्र रावत ने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली तो उन के विश्वस्त मुखबिर दुर्जन सिंह (काल्पनिक नाम) का नंबर फ्लैश हो रहा था.

”हां भई दुर्जन सिंहजी, बहुत दिनों बाद याद आई? 2-3 महीनों से तो आप न जाने कहां गायब ही हो गए थे. बताओ, क्या खास खबर है?’’ विजेंद्र रावत ने पूछा.

”साहब, बहुत ही खास खबर है. कई महीनों से मैं इस गैंग के पीछे ही लगा हुआ था. इस खबर का इनाम ठीकठाक जरूर मिलेगा न!’’ दुर्जन ने कहा.

”दुर्जन सिंह, तुम अब इनाम की फिक्र बिलकुल मत करो. खबर सटीक होगी तो इनाम भी उतना अच्छा ही मिलेगा. तुम खबर जल्दी बताओ,’’ विजेंद्र रावत ने कहा.

उस के बाद मुखबिर दुर्जन सिंह ने बताया कि क्षेत्र के ही भैंसाली इसलामापुर गांव में काफी समय से बंद पड़े ईंट के एक भट्ठे पर नामीगिरामी हिस्ट्रीशीटर डकैतों का एक गैंग जमा है. यह गिरोह पास ही के किसी गांव में बड़ी डकैती डालने वाला है. सूचना बहुत खास और महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए एसएचओ विजेंद्र रावत ने इस घटना की सूचना तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को दे दी.

सूचना मिलते ही शामली के एसपी नरेंद्र प्रताप सिंह के निर्देश पर थाना भवन और बाबरी थानों की एक संयुक्त पुलिस टीम गठित की गई. फिर एसपी साहब के निर्देश पर थाना भवन के एसएचओ विजेंद्र सिंह रावत और बाबरी थाने के एसएचओ राहुल सिसौदिया अपनीअपनी पुलिस टीमों को ले कर मौके पर पहुंच गए. पुलिस की संयुक्त टीम ने त्वरित काररवाई करते हुए बदमाशों के गिरोह को चारों ओर से घेर लिया और माइक से ऐलान कर उन्हें सरेंडर करने को कहा.

इस बात को सुनते ही ईंट भट्ठे के अंदर छिपे हुए बदमाशों ने अचानक ही चारों तरफ से पुलिस के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस टीम भी तुरंत अपनी पोजीशन ले कर जवाबी फायरिंग करने लगी. दोनों ओर से फायरिंग होने लगी. गोलियों की ताबड़तोड़ आवाज से पूरा इलाका दहल गया था. इस बीच एक गोली सीधे पुलिस कांस्टेबल अनुज यादव को लग गई, जिस से वह बुरी तरह से घायल हो गए. बदमाशों के पास अत्याधुनिक हथियार होने के कारण पुलिस टीम को काफी मशक्कत उठानी पड़ रही थी.

इस बीच बाबरी थाने के एसएचओ अपनी पोजीशन ले कर ईंट के भट्ठे के और पास जाने लगे. तभी एक गोली उन की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी लगी. तभी पुलिस की ताबड़तोड़ गोलियां ईंट भट्ठे के अंदर से बाहर भागने की फिराक में एक बदमाश को लग गई, जिस के कारण वह जमीन पर गिर कर बुरी तरह से तड़पने लगा. उस के 5 साथी वहां से भागने में सफल हो गए थे. उस के बाद उस घायल बदमाश को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां पर उपचार के दौरान उस की मौत हो गई.

मौत से पहले जब पुलिस ने उस से पूछताछ की तो बड़ी चौंकाने वाली बातें सामने आईं. उस बदमाश ने अपना नाम समयदीन उर्फ सामा बताया. समयदीन के पास मिले आधार कार्ड से उस का पता कर्नाटक का था. बाद में पता चला कि कर्नाटक में भी उस के खिलाफ कई मामले दर्ज थे. उत्तर प्रदेश पुलिस ने जब उस की कुंडली खंगाली तो जानकारी मिली कि जिला शामली, उत्तर प्रदेश में ही उस के खिलाफ 23 आपराधिक मामले दर्ज थे. उस पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित था. इस के अलावा उस के खिलाफ कई राज्यों में भी केस दर्ज थे. 50 हजार का इनामी समयदीन उर्फ सामा मुकीम काला और नफीस गैंग का सक्रिय सदस्य रहा था.

समयदीन उर्फ सामा के खिलाफ कुल 32 संगीन मामले दर्ज थे और वह शामली जिले के थाना कांधला का हिस्ट्रीशीटर था. उस की उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ 18 अक्तूबर, 2025 को भी मुठभेड़ हुई थी, लेकिन इस मुठभेड़ में वह बच कर भाग निकला था. वहां से फरार होने के बाद वह पंजाब में छिप कर रहने लगा था.

बहनोई हुआ गिरफ्तार

पुलिस मुठभेड़ में घायल समयदीन को पुलिस अस्पताल ले जा रही थी, उसी दौरान पुलिस पूछताछ में समयदीन ने पुलिस को हाल ही में तेलंगाना में की गई लूट के बारे में भी जानकारी दी थी. उस समय समयदीन को लगने लगा था कि अब शायद वह बच नहीं पाएगा, इसलिए उस ने अपने सारे गुनाह पुलिस को बता दिए थे. समयदीन के मृत्यु पूर्व के दिए गए बयान को सुनने बाद कांधला पुलिस ने सर्विलांस टीम की मदद से तेलंगाना पुलिस के साथ विस्तृत बातचीत कर समयदीन उर्फ सामा के मारे जाने के बारे में बताया.

पुलिस हिरासत में समयदीन का बहनोई उसमान

तेलंगाना पुलिस ने कांधला पुलिस को बताया कि पिछले एक साल में तेलंगाना में लूट और डकैती की 3 बड़ी घटनाएं हुई थीं. उस के बाद तेलंगाना पुलिस को शामली (उत्तर प्रदेश) बुलवाया गया. तेलंगाना पुलिस ने जानकारी दी कि इनामी बदमाश समयदीन उर्फ सामा एक सप्ताह पहले अपने एक साथी बदमाश समसू के साथ तेलंगाना गया था.

लूट में मिले जेवर और नकदी उसमान अपने पास ही रखता था समयदीन

समयदीन का साथी समसू उत्तर प्रदेश सहारनपुर के थाना गंगोह का रहने वाला है और वह भी एक हिस्ट्रीशीटर है और अभी भी फरार चल रहा है. तेलंगाना के कुरनूल के थाना कलवाकुर्ती में समयदीन उर्फ सामा और समसू ने एक मंदिर में लूट की घटना को अंजाम दिया था. उस लूट के बाद समसू तो भूमिगत हो गया, लेकिन समयदीन उर्फ सामा तेलंगाना से वापस शामली आ गया. समयदीन ने ज्वैलरी और लूटी गई पूरी की पूरी रकम अपने बहनोई उस्मान को यह कहते हुए दे दी कि वह ये गहने और पैसे बाद में उस से वापस ले लेगा. लेकिन इसी बीच समयदीन उर्फ सामा का पुलिस से एनकाउंटर हो गया.

इस के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस तेलंगाना पुलिस के साथ मिल कर समयदीन उर्फ सामा के नेटवर्क को खंगालने में जुट गई थी. जब सर्विलांस टीम ने समयदीन के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकाली तो उस में उस के बहनोई उस्मान का मोबाइल नंबर मिला. समयदीन ने सब से ज्यादा कौल उस्मान के नंबर पर की थीं. पुलिस ने काल डिटेल्स के माध्यम से उस्मान को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने जब आरोपी उस्मान से विस्तृत बातचीत की तो उस्मान ने बताया कि बीती 8 दिसंबर, 2025 को समयदीन ने फोन कर के उसे करनाल, हरियाणा के बौर्डर पर किसी जरूरी काम के बहाने बुलाया था.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता सभांलने के साथ ही अपराधियों के प्रति कड़ा रूख अपनाया हुआ है

जब वह नियत स्थान पर पहुंचा तो समयदीन काफी हड़बड़ी में लग रहा था. समयदीन ने उसे लूटे गए गहने और नकदी ले कर घर जाने को कहा था. समयदीन ने तब उस्मान से कहा था कि ये गहने और नकद रकम वह उस से बाद में ले कर जाएगा, अभी वह किसी खास काम से कहीं पर जा रहा है. समयदीन अकसर लूटी गई चीजें और रकम अपने बहनोई उस्मान को दे दिया करता था और बाद में कुछ हिस्सा उस्मान को दे कर अपनी वस्तुएं और नकदी उस से वापस ले लिया करता था.

उस के बाद उस्मान ने गहने और नकद रकम अपने घर में छिपा कर रख दिए थे. समयदीन ने उस्मान से यह भी कहा था कि उसे अभी एक और घटना करनी है, बाद में काम पूरा होने के बाद वह ये जेवर और रुपए उन से वापस ले लेगा. पुलिस ने गिरफ्तार उस्मान निवासी नई बस्ती, मुस्तफाबाद से उस की निशानदेही पर 3 लाख 2 हजार 400 रुपए नकद और 265 ग्राम सोने के आभूषण बरामद किए.

एनकाउंटर से समय बदमाशों की गोली से घायल कांस्टेबल अनुज अस्पताल में

उस्मान को गिरफ्तार करने में एसएचओ सतीश कुमार, सीआई बी. नागार्जुन (थाना कलवाकुर्ती), इंसपेक्टर पी. शंकर, एसआई नरेंद्र कुमार वर्मा, हेडकांस्टेबल वेंकटरामुल, कांस्टेबल कपिल कुमार, कांस्टेबल सुमित कुमार, चिरंजीवी, मोहम्मद नजीरुद्ïदीन शामिल थे.

कौन था गैंगस्टर नफीस

समयदीन उर्फ सामा का विश्वस्त साथी और आका का नाम मोहम्मद नफीस था. मोहम्मद नफीस कांधला गांव के मोहल्ला रवैल का मूल निवासी था. मोहम्मद नफीस ही समयदीन को अपराध की दुनिया में ले कर आया था. मोहम्मद नफीस के अब्बा मोहम्मद मूदा हैं, जो अपने परिवार के साथ अभी भी कांधला गांव में रहते हैं. नफीस के ऊपर हत्या, लूट और डकैती के कुल 34 मुकदमे दर्ज थे. नफीस के ऊपर उत्तर प्रदेश की पुलिस की ओर से एक लाख रुपए का इनाम रखा गया था. उस ने 2 शादियां की थीं. उस की पहली पत्नी रुखसाना की 6 साल पहले एक लंबी बीमारी से मौत हो गई थी.

गैंगस्टर नफीस : इसी गैंगस्टर के गैंग का सदस्य था समयदीन उर्फ सामा

रुखसाना की मौत के बाद नफीस ने कोलकाता की रहने वाली शमा से दूसरी शादी की थी. वह अपनी दूसरी पत्नी शमा के साथ कोलकाता में ही रहने लगा था, लेकिन आपराधिक वारदातें और अपने गिरोह को संचालित करने के लिए वह शामली आताजाता रहता था. उत्तर प्रदेश पुलिस काफी समय से मोहम्मद नफीस को दबोचने में लगी हुई थी. इस के लिए पुलिस ने अपने मुखबिर भी लगा रखे थे. पुलिस को मुखबिरों से सूचना मिली थी कि नफीस अपनी साली की शादी में शामली आने वाला है, क्योंकि उस की साली की शादी 22 अक्तूबर, 2025 को थी. पुलिस ने अब चारों तरफ अपना जाल बिछा दिया था.

16 अक्तूबर, 2025 को उत्तर प्रदेश पुलिस को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि नफीस शामली पहुंच चुका है तो पुलिस ने घेराबंदी शुरू कर दी थी. नफीस के आने की सूचना मिलते ही शामली पुलिस ने जगहजगह अपनी चेकिंग लगा दी थी. तभी पुलिस को एक पुख्ता जानकारी मिली कि नफीस शनिवार सुबह करीब 4 बजे बुढ़ाना कांधला रोड पर निकलने वाला है.

शामली पुलिस ने बुढ़ाना कांधला रोड पर पहले से ही चैकिंग लगा कर घेराबंदी शुरू कर दी. तभी 4 बजे सुबह एक लाख का इनामी हिस्ट्रीशीटर मोहम्मद नफीस बुढ़ाना की तरफ बाइक से आता हुआ दिखाई दिया. बाइक खुद नफीस चला रहा था, जबकि उस के साथ बाइक के पीछे एक युवक बैठा हुआ था. पुलिस ने जब उसे रुकने का इशारा किया तो वह बाइक तेजी से चलाने लगा. पुलिस को उस के ऊपर शक हुआ तो पुलिस बाइक का पीछा करने लगी. पुलिस ने काफी बाइक का पीछा किया तो भाभीसा गांव के बाहर कीचड़ में उन की बाइक फिसल गई और दोनों बाइक से नीचे गिर गए. तभी नफीस का साथी वहां से निकल कर भाग निकला, जबकि दूसरी ओर नफीस ने .32 बोर पिस्टल से पुलिस के ऊपर फायरिंग शुरू कर दी.

जवाबी फायरिंग में एक गोली सीधे नफीस को लगी, परंतु उस ने फिर भी फायरिंग जारी रखी और उस की ओर से चली एक गोली कोयला थाने के एसएचओ सतीश कुमार की बुलेटप्रूफ जैकेट में फंस गई. उस के बाद तो पुलिस और अधिक सतर्क हो गई थी. उसी बीच पुलिस की ओर से चली एक गोली हिस्ट्रीशीटर नफीस के सीने में ही धंस गई, जिस के कारण उस एक लाख के इनामी बदमाश की मौके पर ही मौत हो गई.

पुलिस को मौके से एक .32 बोर पिस्टल, एक तमंचा .315 बोर, 7 कारतूस (2 खोखे और 5 जिंदा) और एक बाइक बरामद हुई. पुलिस के अनुसार हिस्ट्रीशीटर नफीस के खिलाफ लूट, हत्या और नकली नोटों की तस्करी के 34 मुकदमे दर्ज थे. नफीस जाली करेंसी का एक बहुत बड़ा तसकर भी था और उस ने जाली करेंसी का अपना एक बड़ा नेटवर्क भी खड़ा कर रखा था.

वहीं हिस्ट्रीशीटर नफीस के एनकाउंटर के बाद उस के मोहल्ला खेल, कांधला में इस के चाहने वालों और रिश्तेदारों की एक बहुत भीड़ एकत्रित हो गई थी. वहां पर जब मीडिया के लोग पहुंचे तो मृतक नफीस का छोटा भाई नदीम अपने घर में तख्त पर लेटा हुआ था. मीडिया से बातचीत करते हुए उस ने बताया कि 22 अक्तूबर, 2025 को नफीस की साली का निकाह होने वाला था, जिस के लिए वह कुछ दिन पहले शामली पहुंच गया था.

नदीम ने आगे बताया कि काफी समय से उस का बड़ा भाई नफीस अपनी दूसरी बीवी शमा के साथ कोलकाता में रह कर फेरी लगाने का काम करता था. उस ने काफी समय से सभी बुरे कामों से तौबा कर ली थी. नदीम ने पुलिस पर इलजाम लगाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस कई सालों से मेरे भाई के पीछे पड़ी थी और पुलिस ने पुराने मामलों में वांछित दिखा कर एनकाउंटर में मेरे भाई को मार डाला.

कौन था समयदीन

42 वर्षीय समयदीन उर्फ सामा मोहल्ला रायजादगान थाना कांधला, शामली (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला था. उस के अब्बू का नाम मेहरदीन और अम्मी का नाम सबीना है. समयदीन के 4 भाई फारुख, साबिर, हफीजी, इदरीश के अलावा 5 बहनें हैं. कुल 9 भाईबहनों में समयदीन दूसरे नंबर पर था. समयदीन का परिवार पहले कांधला नगर के मोहल्ला रायजादगान में जोगियों वाली मसजिद के पास रहता था. समयदीन बचपन में अपने पिता व भाइयों के साथ गलीगली फेरी लगा कर सामान बेचने का काम करता था.

पहलेपहले तो समयदीन अपने परिवार वालों के साथ फेरी लगाता था, लेकिन थोड़े दिनों के बाद उस ने अकेले में फेरी लगाने का काम शुरू दिया. इस के पीछे उस की एक गहरी चाल यह थी कि वह फेरी लगाते समय घरों का सूक्ष्मता के साथ जायजा ले लेता था और फिर रात को सेंध लगा कर उन घरों में चोरी भी कर लिया करता था. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही समयदीन ने लूट और चोरी की वारदातें शुरू कर दी थीं. वह बचपन से ही अपराधी प्रवृत्ति का था. लोगों को धमकाना, उन से लूट करना और मारपीट करना उस ने अब अपना पेशा ही बना लिया था.

बेटा अपराध की ओर कदम बढ़ाने लगा तो उस के पेरेंट्स ने सोचा कि यदि इस की शादी कर दी जाए तो कंधे पर जिम्मेदारी आने के बाद शायद सुधर जाए, इसीलिए उन्होंने उस का जल्दी निकाह भी कर दिया था, लेकिन समयदीन शादी के बाद भी नहीं सुधर सका. समयदीन के फेमिली वालों ने उसे अपनी ओर से काफी नसीहतें दीं और अपराध की दुनिया से उसे बचाने की भरसक कोशिश भी की, लेकिन उस का परिचय अब धीरेधीरे बड़े अपराधियों से भी होने लगा था, जिन के साथ वह अब बड़ी वारदातों को भी अंजाम देने लगा था.

उस का अब अपराध की दुनिया से वापस लौटने का इरादा भी नहीं था. घर पर लगातार जब समयदीन की शिकायतें आने लगीं और पुलिस घर पर दबिश देने आने लगी तो उस के अब्बू मेहरदीन ने समयदीन और उस की पत्नी नजमा (परिवर्तित नाम) को अपने परिवार से कानूनी रूप से बेदखल कर दिया. घर से बेदखल किए जाने के बाद समयदीन ने नई बस्ती मुस्तफाबाद, कांधला देहात में अपना नया आशियाना बना लिया और अपनी पत्नी नजमा और अपने बच्चों के साथ वहीं पर रहने लगा.

धमकी का हुआ असर

समयदीन की आपराधिक वारदातों में सब से बड़ी और चर्चित घटना आज से एक दशक पहले हुई थी, जब उस का नाम अपराध की दुनिया में सुर्खियों में आया था. उस समय उस ने कांधला नगर में एक जानेमाने ज्वैलर्स के घर पर एक बड़ी डकैती को अंजाम दिया था. कांधला नगर मोहल्ला राजयादगान में मदन वर्मा नगर के एक प्रतिष्ठित और धनी ज्वैलर्स थे. उन के घर पर रात 11 बजे शादी का कार्ड देने के बहाने समयदीन ने मदन वर्मा के घर का गेट खुलवाया. ज्वैलर्स के परिवार वालों ने सहज में ही गेट खोल दिया.

उस के बाद समयदीन ने कार्ड की जगह पर तमंचा निकाल लिया और गोली मारने की धमकी दे कर मदन वर्मा को उस के परिवार सहित रस्सियों से बांध दिया. वह अपनी पूरी प्लानिंग के साथ आया था, अपने थैले में वह रस्सियां और तमंचा पहले से ही ले कर आया था. उस के बाद मदन वर्मा और उस के फेमिली वालों को धमकी देते हुए उस ने गुर्राते हुए कहा, ”देखो, ध्यान से मेरा चेहरा देख लो, मेरा नाम सामा है. मेरे नाम से ही आमजन के दिल में दहशत हो जाती है, क्योंकि जो मेरा हुक्म नहीं मानता, उसे मैं सीधे गोली मार कर दुनिया से हमेशाहमेशा के लिए विदा कर देता हूं.’’

उस के बाद उस ने परिवार वालों को तमंचा दिखा कर पैसे और ज्वैलरी रखने की जगह के बारे में पूछा. इस पर कुछ परिजनों ने हल्ला करने की कोशिश की तो उस ने विरोध करने वालों की जम कर पिटाई कर डाली और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि लूट तो मैं कर के ही जाऊंगा, यदि जान की सलामती चाहते हो तो मुझे सहयोग करो. इस के बाद ज्वैलर्स के फेमिली वाले बुरी तरह से डर गए और भय के कारण थरथर कांपने लगे. उस के बाद उन्होंने वह जगह समयदीन को बता दी, जहां पर कैश और गहने रखे हुए थे.

एसएचओ सतीश कुमार

समयदीन बहुत शातिर था, वह अपने थैले में पहले से ही टेप रखे हुए था. उस ने ज्वैलर्स और उस के फेमिली वालों के मुंह पर अच्छी तरह से टेप लगा दिया, ताकि वे चिल्ला न सकें. फिर उस ने बड़े आराम और इत्मीनान से ज्वैलर्स के घर से ही एक बड़ा बैग लिया, उस में गहने और कैश रखा और बड़े आराम से वहां से चला गया. दूसरे दिन सुबह जब घर में नौकरनौकरानी आए तो इस बड़ी लूट के बारे में पता लगा.

इस लूट में समयदीन ने करोड़ों रुपए की लूट की थी. बाद में जब पुलिस ने बदमाश के हुलिए के अनुसार गहनता के साथ छानबीन करनी शुरू की तो तब समयदीन का नाम उजागर हुआ था. इस के बाद लगभग 2 वर्षों तक समयदीन उर्फ सामा जेल में रहा. जेल से छूटने के बाद उस ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा, उस के संबंध अब धीरेधीरे अपराध जगत के बड़ेबड़े हस्ट्रीशीटरों से होने लगे थे. समयदीन उर्फ सामा पहने मुकीम गैंग का सदस्य था और इस से पहले वह बागपत के राहुल खट्टू गैंग से भी काफी लंबे समय तक जुड़ा रहा, जहां उस ने एक से बढ़ कर एक आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया.

क्राइम में हुई ग्रोथ

समयदीन के अपराधों का ग्राफ तब एकदम से बढऩे लगा, जब वह गैंगस्टर नफीस के संपर्क में आया. नफीस के साथ में रह कर उस का दिल अपराधों के प्रति अब बहुत क्रूर हो गया था. लूट या डकैती के दौरान जब बंधक उस की बात नहीं मानते थे तो वह उन्हें गोली मारने में नहीं हिचकता था. 18 अक्तूबर, 2025 को शामली में जब एक लाख रुपए के इनामी मोहम्मद नफीस का पुलिस ने एनकाउंटर किया तो उस के बाद पूरे गिरोह की कमान समयदीन उर्फ सामा के हाथों में आ गई थी.

गिरोह की कमान हाथ में आते ही अब वह 20 से 30 साल तक के युवाओं को अपने गिरोह में शामिल कर लूट, फिरौती और डकैती की घटनाओं को अंजाम देने लगा था. समयदीन ने गिरोह के सदस्यों को अपराध के लिए अलगअलग क्षेत्रों में बांट दिया था. समयदीन उर्फ सामा के गिरोह का काम बहुत अच्छी तरह से हो रहा था. वह अपने गिरोह को बखूबी संचालित भी कर रहा था. लेकिन कहते हैं कि यदि किसी इंसान की कोई कमजोरी हो तो वह फिर इस दुनिया में अधिक दिनों तक जिंदा भी नहीं रह सकता है. समयदीन की भी एक बहुत बड़ी कमजोरी थी कि वह अय्याश हो गया था.

एसपी (कैराना) हैंमत कुमार

पुलिस को जब समयदीन उर्फ सामा की इस कमजोरी का पता चला तो पुलिस ने समयदीन और उस की ज्ञात प्रेमिकाओं के मोबाइल ट्रेसिंग के जरिए उसे पकडऩे की योजना बनाई. लगातार छापेमारी के बाद समयदीन ने अब अपना नया ठिकाना जनता कालोनी, उरुकेरे जनपद तुमकुर, कर्नाटक में बना लिया, जहां पर रह कर भी वह उस इलाके में अपराध की घटनाओं को संचालित कर रहा था. 8 दिसंबर, 2025 को मुखबिर से पुलिस को सूचना मिली कि एक कुख्यात बदमाश अपने साथियों के साथ थाना भवन क्षेत्र में किसी बड़ी घटना को अंजाम देने पहुंचा है. मुखबिर से यह सूचना थाना भवन के एसएचओ को भी मिल गई थी.

फिर पुलिस टीम ने भैंसाली इसलामपुर के जंगलों में बंद पड़े ईंट के भट्ठे के चारों ओर घेराबंदी कर मुठभेड़ के बाद इस हिस्ट्रीशीटर को मार गिराया. समयदीन उर्फ सामा के अब्बू मेहरदीन का कई साल पहले इंतकाल हो चुका है. उस के परिवार में अब उस की अम्मी सबीना, भाई फारुख, साबिर, हफीजी, इदरीश तथा 5 बहनें हैं.

भारतीय कानून में एनकाउंटर क्या है?

भारतीय कानून या भारतीय संविधान के अंतर्गत एनकाउंटर शब्द का कहीं जिक्र नहीं है. पुलिस की भाषा में इस का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब सुरक्षा बल और पुलिस की अपराधियों और चरमपंथी के बीच की भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है. भारतीय संविधान में कहीं पर भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का कोई भी प्रावधान नहीं है, लेकिन कुछ नियम और कानून जरूर हैं जो पुलिस या सुरक्षा बलों को यह ताकत देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकते हैं और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है.

आमतौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस या सुरक्षा बल आत्मरक्षा के दौरान काररवाई का ही जिक्र करते हैं. आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 के अनुसार अगर कोई अपराधी खुद को गिरफ्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन परिस्थितियों में पुलिस उस अपराधी के ऊपर जवाबी हमला कर सकती है. एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल स्पष्ट शब्दों कहा कि इस के लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे.

23 सितंबर, 2014 को इस संबंध में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया था. इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन विशेष नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है. UP Crime

 

 

UP Crime: चाइल्ड पोर्न केस – दंपति को सजा ए मौत

UP Crime: इंजीनियर राम भवन ने अपनी पत्नी दुर्गावती के साथ मिल कर 33 मासूम बच्चों से ऐसी दरिंदगी की कि पोक्सो कोर्ट ने दोनों को मरते दम तक फांसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई. आखिर यह उच्चशिक्षित दंपति मासूमों को अपने जाल में किस तरह फांसता था और उन के साथ किसकिस तरह से शोषण किया जाता था, जिस से यह मामला इंटरनैशल  लेवल तक चर्चित हुआ और उन्हें मिली सजा ए मौत?

उत्तर प्रदेश में बांदा जिले का विशेष पोक्सो कोर्ट 18 फरवरी, 2026 को खचाखच भरा हुआ था. बहुत ही खास केस की सुनवाई होनी थी, जो करीबकरीब अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी. केस की जांच सीबीआई के जिम्मे थी. मामला दरजनों मासूम बच्चों के साथ यौनाचार का था, जिन की उम्र 3 साल से 15 साल तक की थी. यह अनोखा मामला भले ही 6 साल से पोक्सो कोर्ट में आया था, लेकिन उत्तर प्रदेश में बच्चों के साथ यौनाचार और उन की अश्लील तसवीरें, वीडियो आदि इंटरनेट मीडिया के जरिए पूरी दुनिया में फैलाने और बेचने की चर्चा साल 2010 से ही बनी हुई थी.

पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा कुछ मिनटों में ही आने वाले थे. हौल की 2 कतारों में लगी बेंचों पर सीबीआई के वकील, यूपी पुलिस, आरोपी, गवाह और बचाव पक्ष के वकील आ चुके थे. यानी कि कोर्ट में साक्ष्यों, सीबीआई के अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष अपनीअपनी बातें रखने के लिए पूरी तैयारी में थे. उन की तत्परता और उत्सुकता देखते बन रही थी. इस बारे में मीडियाकर्मी भी जानने को उत्सुक थे, लेकिन उन्हें वहां से दूर रखा गया था. हौल में तमाम तरह के मोबाइल फोन और दूसरे डिजिटल डिवाइसेस प्रतिबंधित थे.

दरअसल, इस मामले के आरोपी पतिपत्नी थे. मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग का पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन था, जबकि उस का साथ देने वाली उस की पत्नी दुर्गावती पर भी गंभीर आरोप लगे थे. उन दोनों को भारी सुरक्षा के साथ जेल से कुछ समय पहले ही कोर्ट में लाया जा चुका था. कोर्ट के हौल में गहमागहमी का माहौल था. लोग अपने बगल बैठे साथी से फुसफुसा कर बातें कर रहे थे. उन के चेहरे पर यह जानने की उत्सुकता बनी हुई थी कि बच्चों के साथ यौनाचार के मामले में क्या फैसला सुनाया जाता है. वहां कुछ पीडि़तों के परिजन भी चेहरा ढंक कर गुमसुम बैठे थे.

जैसे ही न्यायाधीश महोदय प्रदीप कुमार मिश्रा हौल में आए, वहां अचानक सन्नाटा छा गया. उपस्थित सभी लोग खड़े हो गए. श्री मिश्रा अपनी सीट पर बैठ गए. उन के सामने कई फाइलें पहले से ही रख दी गई थीं. उन में से उन्होंने एक फाइल खोलने के बाद पहले पन्ने को पढऩा शुरू किया. उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था— ‘सैक्सुअली असाल्टिंग केस औफ 33 मेल चिल्ड्रेन’. केस सीबीआई बनाम राम भवन और दुर्गावती का था.

इस मामले की सुनवाई 12 फरवरी, 2021 को ही शुरू हो चुकी थी. कई दौर की सुनवाई के दरम्यान जैसेजैसे इस मामले में आरोपी के खिलाफ गवाहों की फेहरिस्त बढ़ती चली गई थी, वैसेवैसे मामला और भी पेचीदा हो चुका था. आरोपियों के खिलाफ प्याज के छिलके की तरह तथ्यों और तर्कों की परतें उतरने लगी थीं. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलीलों के साथसाथ मामले की फाइल मोटी हो गई थी. पुलिस की उलझी हुई जांच में कई खामियां थीं. तथ्य थे, मगर उस के सबूत नहीं थे. नतीजे पर पहुंचने में उलझनें कम होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

न्यायाधीश ने अचानक अपने सामने रखे लकड़ी के हथौड़े से 3 बार ठकठक की आवाज की. पूरा हौल एकदम से एक बार फिर शांत हो गया. श्री मिश्रा पोक्सो कोर्ट के सरकारी वकील की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, ”हां, तो कमल सिंहजी! आगे की सुनवाई के लिए आप तैयार हैं?’’

”जी जनाब! पहले मैं इस केस के बारे में थोड़ा ब्यौरा देना चाहता हूं.’’ एडवोकेट कमल सिंह ने अनुमति मांगी.

”इजाजत है…संक्षेप में बताइएगा.’’ श्री मिश्रा बोले.

”जी हुजूर! चाइल्ड पोर्न के इस मामले का खुलासा सीबीआई ने किया है. उसे इंटरपोल से केस के बारे में जानकारी मिली थी. 3 मोबाइल नंबरों से बने आईडी के जरिए बच्चों के यौन शोषण के वीडियो औनलाइन अपलोड किए गए थे और यह मटीरियल लगभग 40-45 देशों में बेचा गया था.

”इस बारे में सीबीआई द्वारा बरामद पेन ड्राइव में 36 बच्चों के यौन शोषण के 679 फोटो और वीडियो थे. वे सारे आरोपी राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के घर से मिले थे. इस की जांच पहले ही की जा चुकी है. 4 साल तक चले ट्रायल के दौरान 74 गवाहों से पूछताछ की जा चुकी है.

”इस केस की मूल जड़ में राम भवन और उस की पत्नी है, जिन्होंने मासूम बच्चों को तरहतरह का लालच दिया. अपने घर पर बुलाया और उन के साथ यौनाचार किया.

”यही नहीं हुजूर, दोनों ने उन के साथ यौनाचार के वीडियो और तसवीरें भी बनाईं. उन का कामर्शियल यूज किया और इंटरनेट मीडिया के जरिए विदेशों में बेच दिया.’’

”औब्जेक्शन जज साहब!… पुरानी कहानी दोहरा कर बेवजह कोर्ट का समय बरबाद किया जा रहा है.’’ बचाव पक्ष के वकील बीच में बोल पड़े.

”उन्हें अपनी बात पूरी तरह से रखने दीजिए… आप को भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा…सिंह साहब, आगे बताइए.’’ न्यायाधीश महोदय हथौड़े से तख्ती को पीटते हुए बोले.

जेई राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती – कोर्ट ने सुनाई मरते दम तक फांसी की सजा

”राम भवन मूलरूप से बांदा जिले के नरैनी शहर के रहने वाले चुन्ना प्रसाद कुशवाहा का पुत्र है. उस ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर जिस तरह के घिनौने अपराध किए हैं, उस की जितनी सख्त हो सके सजा दी जानी चाहिए.

”वह पड़ोस, रिश्तेदारों और आसपास के मासूम बच्चों को निशाना बनाते थे. बच्चों को पैसे, गिफ्ट्स और वीडियो गेम का लालच दे कर घर बुलाया जाता था. इस तरह पीडि़त बच्चों की कुल संख्या 33 थी. उन में नाबालिग लड़के थे.

”उन के साथ गंभीर यौन शोषण किया गया था. कई बच्चों को गंभीर चोटें आई थीं, कुछ को अस्पताल में भरती होना पड़ा था और कई मानसिक आघात के चलते शारीरिक समस्याओं की चपेट में आ चुके थे.

”राम भवन, दुर्गावती 10 साल तक बांदा और चित्रकूट घूमते रहते थे. वीडियो बनाने से पहले लड़कों को लुभाने के लिए तोहफों का इस्तेमाल किया था. हुजूर! एक दशक तक राम भवन ने अपना चाइल्ड पोर्न औपरेशन आराम से चलाया था.

”चित्रकूट में एक किराए का कमरा, राज्य के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की पोस्टिंग, एक आम जिंदगी जिस से कोई बाहरी संकेत नहीं मिलता था कि वह अपने आसपास के बच्चों के साथ क्या कर रहा है. सभी पीडि़त 18 साल से कम उम्र के लड़के थे, उन में 3 साल के भी थे.

”राम भवन और उस की पत्नी ने दरजनों पीडि़तों को शामिल करते हुए हैरान करने वाले 2 लाख वीडियो बनाए थे. वह बच्चों पर काम करने के अलगअलग तरीके अपनाता था, जिस में औनलाइन वीडियो गेम तक पहुंच और उन्हें लुभाने के लिए पैसे या गिफ्ट देना शामिल था. उन पर दया दिखा कर और लालच दे कर फंसाया जाता था, फिर उन के साथ गलत व्यवहार किया जाता था. उन्हें फिल्माया जाता था. वे उन्हें मोबाइल फोन, चौकलेट और घडिय़ां देने का भी वादा करते थे.’’

कोर्ट में स्पैशल पब्लिक प्रासिक्यूटर सौरभ सिंह ने भी इस केस में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि फोटो और वीडियो के जरिए राम भवन कई सालों तक बच्चों को धमकाता रहा. इस का पता लगाने में सीबीआई को ग्लोबल पुलिस ग्रुप इंटरपोल से मदद मिली. वहीं से डार्क वेब पर पोर्न की बिक्री से जुड़े 3 मोबाइल नंबर मिले.

सीबीआई की गवाही

दोनों ने पीडि़तों के 2 लाख से ज्यादा आपत्तिजनक वीडियो और तसवीरें इंटरनेट के जरिए लगभग 47 देशों में सर्कुलेट कीं. जांच के दौरान मिली एक पेन ड्राइव में 34 साफ वीडियो और 679 तसवीरें थीं. कपल ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म, वेबसाइट और डार्क वेब पर मटीरियल अपलोड करने, शेयर करने और बेचने के लिए कई मोबाइल नंबरों और ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था. इलेक्ट्रौनिक डिवाइस की फोरैंसिक जांच से एक साफ डिजिटल ट्रेल मिला.

सरकारी वकीलों के बाद न्यायाधीश श्री मिश्रा ने उन के कहने के आधार पर सीबीआई अधिकारी को भी कठघरे में आ कर अपनी बात कहने के लिए बुलाया.

”जनाब, आप ने अपनी जांच में क्याक्या पाया, उस बारे में जज साहब को बताएं.’’ सरकारी वकील बोले.

”जी साहब, जरूर. मैं सब कुछ इस मामले की जांच के आधार पर ही बताऊंगा. जांच के दौरान मैं ने पाया कि आरोपियों ने 33 लड़कों के साथ कई तरह के गलत काम किए थे, जिन में से कुछ की उम्र 3 साल के आसपास थी. इस बारे में 74 गवाहों में से कम से कम 25 ने गवाही दी. पीडि़तों से दरिंदगी का अंदाजा इस बात से लग जाता कि कुछ अभी भी हौस्पिटल में भरती हैं. कुछ पीडि़तों की आंखें टेढ़ी हो गई हैं. पीडि़त अभी भी दरिंदों की वजह से हुए साइकोलौजिकल ट्रामा से जूझ रहे हैं.

”राम भवन ने गलत तरीके से वीडियो रिकौर्ड किए. यह उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन का कामर्शियल इस्तेमाल के लिए किया गया था. जांच में पाया गया कि राम भवन ने जो कुछ भी फिल्माया, उसे बेचने के लिए एक सिस्टमैटिक डिजिटल औपरेशन बनाया था. वे इस बात से बेखबर थे कि इन्वैस्टिगेटर्स इंटरनेट पर सर्कुलेट हो रहे बच्चों के यौन शोषण के मटीरियल पर नजर रख रहे थे. जब उन्हें कपल से जुड़ा कंटेंट मिला, तब वे इंटरपोल की निगाह में आ गए.’’

इस मामले की जांच अक्तूबर, 2020 में सीबीआई को सौंप दी गई. यह वह दौर था, जब पूरा देश कोविड 19 की चपेट में था. लौकडाउन का माहौल था. चौतरफा तरहतरह की सख्ती का आलम था.

हालांकि यह मामला साल 2010 से ही चल रहा था, जिस बारे में कई तरह के घिनौने खेल की बातें मीडिया में आती रहती थीं. मुख्य आरोपी रामभवन चित्रकूट में सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात था. वह बाहर से सामान्य दिखता था और किराए के घर में रहता था. उस के घर के अंदर एक भयानक खेल चल रहा था, इस बात से आसपास के लोग अनभिज्ञ थे, जबकि इस में जेई की पत्नी दुर्गावती भी पूरी तरह शामिल थी. बताते हैं कि 2010 से 2020 तक लगभग 10 सालों तक यह सिलसिला चल रहा था.

देश के कई हिस्सों में चाइल्ड पोर्न को ले कर सीबीआई कई सालों से सक्रिय थी. इसी सिलसिले में सीबीआई द्वारा सितंबर 2020 में अनपरा निवासी इंजीनियर नीरज यादव गिरफ्तार किया गया. दरअसल, अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल ने सीबीआई को सूचना दी थी कि बच्चों के यौन शोषण और अश्लील सामग्री से जुड़ा डिजिटल डेटा मिला है, जो डार्क वेब पर साझा किया जा रहा है और वहां से उसे बेचा जा रहा है. इस के बाद ही सीबीआई ने 30-31 अक्तूबर, 2020 को एफआईआर दर्ज की थी.

उस के बाद आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई. नीरज दिल्ली में रह कर औनलाइन संदिग्ध लिंक साझा करता था. इसी दौरान एक औनलाइन लिंक के आधार पर विशेष औनलाइन चाइल्ड सैक्सुअल एब्यूज एंड एक्सप्लाइटेशन (ह्रष्टस््रश्व) यूनिट की जांच में राम भवन का नाम सामने आया. सीबीआई ने लगभग डेढ़ महीने तक जाल बिछा कर 17 नवंबर, 2020 को कर्वी की एसडीएम कालोनी स्थित किराए के मकान से राम भवन और उस की पत्नी दुगार्वती को गिरफ्तार किया.

इस के लिए सीबीआई ने विदेशी एजेंसियों के साथ जानकारी शेयर की, जिन्होंने मटीरियल के खरीदारों और पाने वालों की भी पहचान की थी, जिस से यह केस और पक्का हो गया. इस की शिकायत मिलने पर 31 अक्तूबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन के खिलाफ केस दर्ज किया. उस के द्वारा बच्चों के अश्लील वीडियो/फोटो बना कर डार्क वेब के जरिए अंतरराष्ट्रीय पेडोफाइल नेटवर्क तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया. इस के बाद 17 नवंबर, 2020 को सीबीआई ने राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को गिरफ्तार कर लिया था.

दाखिल हुई चार्जशीट

गिरफ्तारी के 88 दिन बाद 12 फरवरी, 2021 को बांदा कोर्ट में 700 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी. चार्जशीट में मैडिकल रिपोर्ट और बच्चों के बयानों को आधार बनाया गया. इस दौरान सीबीआई की टीम ने 4 से 42 साल तक की उम्र के लोगों के बयान दर्ज किए. सभी का मैडिकल परीक्षण कराने के साथ डिजिटल सबूत को कनेक्ट किया गया था.

इस के बाद बच्चों से जुड़ा मामला होने के चलते सीबीआई ने पोक्सो कोर्ट में ट्रायल की शुरुआत जून, 2023 से करवाई. इस सिलसिले में सीबीआई ने 74 गवाह पेश किए. सरकारी वकील ने मांग करते हुए कहा कि डीएम को एक पत्र लिखा जाए, जिस में पीडि़त बच्चों को 10-10 लाख रुपए की राशि देने का काम किया जाए. बांदा के पोक्सो कोर्ट में 18 फरवरी, 2026 की सुनवाई करीबकरीब पूरी हो गई. दोनों आरोपियों राम भवन और दुर्गावती को दोषी ठहराया गया. उन के खिलाफ फैसला 20 फरवरी, 2026 को सुनाया गया, जो भारतीय कानून के इतिहास में काफी बड़ा था.

बांदा के स्पैशल पोक्सो कोर्ट में पेशी के लिए दंपति को ले जाती पुलिस

न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने कहा, ”सीबीआई की विशेष जांच के बाद सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती को 33 बच्चों के यौन शोषण और उन के वीडियो बना कर डार्क वेब पर बेचने का दोषी पाया गया है. यह मामला ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ श्रेणी में रखा गया है.’’

उन्होंने कहा कि उन का अपराध इतना भयावह और योजनाबद्ध था कि सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची. दोनों दोषियों को मरते दम तक फंदे पर लटकाए रखने का आदेश दिया जाता है. उन्हें ‘मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए!’

फांसी की सजा के साथसाथ कोर्ट ने राम भवन पर 6.45 लाख रुपए और दुर्गावती पर 5.40 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया.  साथ ही न्यायालय ने पीडि़त बच्चों के पुनर्वास के लिए महत्त्वपूर्ण आदेश दिए.

कानून और पीनल कोड

दंपति को इंडियन पीनल कोड और पोक्सो  ऐक्ट के तहत गंभीर पेनेट्रेटिव सैक्सुअल असाल्ट, पोर्नोग्राफिक मकसद के लिए बच्चों का इस्तेमाल, बच्चों से जुड़े पोर्नोग्राफिक मटीरियल का स्टोरेज, उकसाना और क्रिमिनल कांसपिरेसी जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था. इस के 163 पेज के फैसले में, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज प्रदीप कुमार मिश्रा की कोर्ट ने ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ सिद्धांत लागू किया.

कोर्ट ने कहा कि कई जिलों में इस तरह के उत्पीडऩ का बड़ा पैमाना, दोषियों की बहुत ज्यादा नैतिक गिरावट के साथ मिल कर, इसे इतना असाधारण और घिनौना अपराध बनाता है कि इस में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, जिस से न्याय के मकसद को पूरा करने के लिए आखिरी न्यायिक रोकथाम की जरूरत है. इस फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को 33 पीडि़तों में से हर एक को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया. साथ ही दंपति के घर से जब्त किया गया कैश 8 लाख रुपया भी पीडि़तों में बराबर बांटने के लिए कहा गया.

आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषी हाई कोर्ट में अपील कर सकते हैं. वहां से राहत नहीं मिलने की स्थिति में वे सुप्रीम कोर्ट और उस के बाद राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर कर सकते हैं. इस बारे में जानकार वकील का कहना है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए दंपति को उच्च अदालतों से राहत की संभावना कम है. भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड के मामलों की स्वचालित पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है, जिस के बाद ही सजा अंतिम रूप लेती है.

केस से जुड़े वकीलों ने दंपति को सजा ए मौत सुनाए जानें पर अपनी खुशी व्यक्त की

यह भी बताया जाता है कि जेई राम भवन अपनी अवैध कमाई को जमीन खरीद में निवेश करने की योजना बना चुका था, किंतु वह इस में सफल नहीं हो पाया. सीबीआई जांच में पता चला कि उस ने वर्ष 2018 में 21 बीघा जमीन खरीदने की कोशिश की थी. राम भवन ने शोभा सिंह का पुरवा स्थित एसडीएम कालोनी के पास यह जमीन खरीदने की योजना बनाई थी. इस सौदे के लिए उस ने 2 अन्य इंजीनियरों को भी अपने साथ शामिल कर लिया था. जमीन की शुरुआती मांग 18 करोड़ रुपए थी, जिस पर राम भवन ने लगभग 8 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी.

एक साल तक चली जमीन की सौदेबाजी के दौरान वर्ष 2019 में भूस्वामी ने 14 करोड़ रुपए की कीमत तय की थी, किंतु जेई राम भवन 10 करोड़ रुपए से अधिक देने को तैयार नहीं हुआ, जिस के कारण यह सौदा नहीं हो सका. इसी बीच रामभवन की अवैध गतिविधि से धन कमाने का पता चला, जिसे जमीन में निवेश कर वैध बनाना चाहता था. सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी के बाद जमीन के सौदे से जुड़े लोगों से गहन पूछताछ की थी. जांच एजेंसी ने उस की संभावित अवैध आय के स्रोतों की भी पड़ताल की.

स्थानीय लोगों के अनुसार, तीनों साझेदार इस जमीन पर अपने लिए अलगअलग आवास भी बनवाना चाहते थे. सौदेबाजी के दौरान कीमत को ले कर भूस्वामी और जेई के बीच मतभेद बना रहा. अंतत: 10 करोड़ रुपए से अधिक न देने की जिद के कारण सौदा रद्द हो गया. सिंचाई विभाग में कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया कि पुराने अफसरों ने कई बार राम भवन के काम में लापरवाही की शिकायत की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई, क्योंकि राम भवन की सत्ता के गलियारों के साथ ही विभाग में तगड़ी पैठ थी. कभीकभी तो वह सप्ताहसप्ताह भर दफ्तर से गायब रहता था.

उस की पैठ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के 16 दिन बाद 18 नवंबर, 2020 को उसे निलंबित किया गया. उस का निलंबन उस समय के जिलाधिकारी शेषमणि त्रिपाठी व सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता वी.के. निरंजन के आदेश पर हुआ था. यह मामला डिजिटल प्लेटफार्म के दुरुपयोग और डार्क वेब के जरिए संचालित अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है. जांच एजेंसियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े ऐसे मामलों में तकनीकी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय बेहद महत्त्वपूर्ण है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाल यौन शोषण और औनलाइन आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ कड़ा संदेश है. अदालत ने न केवल दोषियों को कठोर सजा दी, बल्कि पीडि़त बच्चों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति पर भी विशेष ध्यान दिया.

दिल्ली का इंजीनियर भी बेचता था पोर्न वीडियो

जेई समेत उस की पत्नी को यौनाचार और पोर्न वीडियो बेचने के जुर्म में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद सीबीआई इस तरह के मामले की तहकीकात काफी सक्रियता से करने लगी है. इस सिलसिले में दिल्ली के इंजीनियर मोहम्मद आकिब भी निशाने पर आ चुका है. आकिब पर भी बच्चों के यौन शोषण के वीडियो विदेशों में बेचने का आरोप है. इस संबंध में सीबीआई ने गूगल के अधिकारियों समेत 8 लोगों के बयान दर्ज करने की तैयारी की है. जल्द ही आकिब भी सीबीआई के शिकंजे में कसा जा सकता है.

दरअसल, मासूम लड़कों के साथ यौन शोषण और वीडियो बना कर बेचने के मामले में जेई राम भवन और उस की पत्नी दुर्गावती के साथ तीसरा आरोपी आकिब ही है. वह दंपति से वीडियो मंगवाता था और फिर उन्हें विदेशों को भेज कर मोटी कमाई करता था. इस से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा राम भवन को भी देता था. सीबीआई के लोक अभियोजक दारा सिंह मीणा के अनुसार सालों से चल रहे इस अपराध में आकिब भी पोर्न बाजार का एक शातिर खिलाड़ी है.

उस का दोष गूगल के अधिकारियों समेत एयरटेल कंपनी व एम्स के डाक्टरों से चिकित्सीय परीक्षण की रिपोर्ट समेज कुल 8 लोगों से पूछताछ के बाद ही तय हो पाएगा. मोहम्मद आकिब दिल्ली का रहने वाला पेशे से इंजीनियर है. उस के खिलाफ की गई जांच में पाया गया है कि वह जेई और उस की पत्नी से ईमेल के जरिए अश्लील सामग्री मंगवाता था. उस के बाद विभिन्न देशों में इसे भेज कर मोटी कमाई करता था. UP Crime