UP News: एक कर्मचारी 6 अस्पतालों में नौकरी

UP News: फर्रुखाबाद में स्वास्थ्य विभाग में एक ऐसा फरजीवाड़ा सामने आया है, जिस ने सब को चौंका दिया है. अर्पित सिंह नाम का एक्सरे टेक्निशियन अलगअलग 6 जिलों के सरकारी अस्पतालों में एक साथ नौकरी कर रहा था. सभी जगह से वह सैलरी भी ले रहा था. चौंकाने वाली बात यह कि सभी जगह उस का नाम, जन्मतिथि और पिता का नाम भी समान था. आखिर कैसे चल रहा था यह फरजीवाड़ा?

इन दिनों उत्तर प्रदेश चर्चाओं में है. ‘मनोहर कहानियां’ के अक्तूबर, 2025 अंक में प्रकाशित गोंडा जिले की अनामिका शुक्ला शिक्षक घोटाले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले से एक्सरे टेक्निशियन फरजी घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ गया. एक ही नाम से 6 जिलों में कार्यरत फरजी कर्मियों ने सरकार को करीब 5 करोड़ रुपए की सैलरी का चूना लगाया है.

मामला तब सुर्खियों में आया, जब प्रदेश सरकार के मानव संवदा पोर्टल पर अर्पित सिंह नाम के व्यक्ति का 6 एक्सरे टेक्निशियन कर्मियों के रूप में दर्शाया जा रहा था. डा. रतन पाल सिंह सुमन (स्वास्थ्य महानिदेशक) के माथे पर उस वक्त पसीना चुहचुहा उठा था, जब यह प्रकरण उन के सामने आया. तत्काल उन्होंने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) से यह रिपोर्ट मांगी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है, यदि है तो उस की डिटेल्स तुरंत यहां दें.

मामला बहुत गंभीर और घोटालों से जुड़ा हुआ था. इस प्रकरण की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हुई तो उन्होंने तुरंत ऐक्शन लिया और स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन को आरोपियों के खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज कराने का आदेश दिया. महानिदेशक सिंह ने यह आदेश रचना खरे (सहायक निदेशक, पैरा मेडिकल, लखनऊ) को दिया. इस पर उन्होंने तत्काल ऐक्शन लिया.

पुलिस को दी तहरीर में लिखा कि उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) ने वर्ष 2016 में 403 एक्सरे टेक्निशियनों को सफल घोषित करते हुए सूची चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय को उपलब्ध कराई थी. इस में क्रमांक संख्या 80 पर अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह का नाम दर्ज था. इस अर्पित सिंह के ही नाम पर 6 अलगअलग जिलों— बलरामपुर, फर्रुखाबाद, रामपुर, बांदा और शामली में भी फरजी प्रमाण पत्रों से अन्य लोगों ने नियुक्ति हासिल कर ली थी.

इसी तहरीर के आधार पर राजधानी लखनऊ (पश्चिमी) के थाना वजीरगंज में अर्पित सिंह सहित 5 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मुकदमा अपराध संख्या- 235/2025 के धाराएं- 419, 420, 467, 468, 471 बीएनएस के तहत मुकदमा दर्ज कराया.

यह मुकदमा 8 अक्तूबर, 2025 की शाम 7 बज कर 10 मिनट पर दर्ज हुआ था. जैसे ही मुकदमा दर्ज हुआ, सभी आरोपी भूमिगत हो गए. पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई. यह मामला सामने कैसे आया? आइए पढ़ते हैं—

मुकदमा दर्ज होने से करीब सवा महीने पहले यानी 5 सितंबर, 2025 को एक दैनिक अखबार ने ‘एक अर्पित के नाम पर 6 अर्पित कर रहे नौकरी’ शीर्षक से सनसनीखेज खबर अपने सभी संस्करणों में छापी थी. जैसे ही फर्रुखाबाद जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) अवनीश कुमार की नजर खबर पर पड़ी तो मानो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह चौंक पड़े.

शुरू हुई घोटाले की जांच

उसी दिन आननफानन में सीएमओ अवनीश कुमार ने 10 बजे सुबह अपने दफ्तर में एक आवश्यक मीटिंग बुलाई, जिस में डा. सर्वेश कुमार यादव, डा. आर. सी. माथुर और डा. दीपक कटियार उपस्थित थे. घंटों तक अखबार में छपी खबर पर चली चर्चा के बाद सीएमओ ने पत्रांक संख्या-मु0चि0अ0/जांच/2025-26/3760 से जांच हेतु एक पत्र जारी किया और उक्त तीनों डौक्टरों को जांच समिति का सदस्य नामित करते हुए मामले की जांच कर 3 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आदेश दिया. पत्र की यह कौपी जिला अधिकारी, फर्रुखाबाद को भी भेज दी गई.

फर्रुखाबाद के शमसाबाद में अर्पित सिंह नाम का एक कर्मचारी एक्सरे टेक्निशियन के पद पर तैनात था. अखबार में खबर छपने के बाद वह भूमिगत हो गया. जांच समिति की टीम जब शमसाबाद अस्पताल पहुंची तो पता चला अर्पित सिंह 5 दिनों से ड्ïयूटी पर नहीं आ रहा है. उस के बाद से अब तक उस का पता नहीं है.

मामले में तब और एक नया मोड़ आया, जब एक दैनिक अखबार में छपी यही खबर हाथरस जिले के एक युवक ने पढ़ी थी. उस का भी नाम अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह था. वह मूलरूप से मोहल्ला प्रतापनगर शाहगंज, आगरा रहने वाला था. वर्तमान समय में वह अपने पेरेंट्स के साथ हाथरस में रहता था. यहीं रह कर वह नौकरी करता था. वह हाथरस जिले में मुरसान में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में एक्सरे टेक्निशियन पद पर था.

खबर पढ़ते ही वह बुरी तरह सन्न रह गया. अखबार में अर्पित सिंह को ले कर जोजो हवाला दिया गया था, वो सूचना हाथरस वाले अर्पित सिंह से काफी मेल खा रही थी. खबर ने उसे बुरी तरह से सकते में डाल दिया था. उस ने सूझबूझ का परिचय देते हुए तत्काल यह बात अपने अधिकारियों को बताई. यह सुन कर वे भी सन्न रह गए थे. ये कैसे हो सकता है कि असली अर्पित सिंह तो यहां हाथरस में मौजूद है तो फिर वह कैसे फर्रुखाबाद में नौकरी कर सकता है? जरूर इस में कोई बड़ा लोचा है.

इधर हाथरस के अर्पित सिंह प्रकरण ने तूल पकड़ लिया था. इस के नाम से अन्य 6 जिलों मे नौकरी करने वाले युवकों के मामले में जांच शुरू हो गई थी. हाथरस के सीएमओ डा. मंजीत सिंह और मुरसान सीएचसी के प्रभारी डा. चंद्रवीर को लखनऊ निदेशालय हाजिर होने का फरमान जारी किया गया.

इस मामले में डा. मंजीत सिंह को आदेश हुआ कि मुरसान में तैनात अर्पित सिंह के नियुक्ति संबंधित दस्तावेजों के साथसाथ आधार कार्ड, पैन कार्ड साथ लाना है. साथ ही निदेशालय की ओर से फोटो की फोरैंसिक जांच कराने के लिए अर्पित सिंह के वर्तमान फोटो और नियुक्ति के दौरान का फोटो भी मांगा गया था. ताकि मिलान कर के असलीनकली की पहचान की जा सके. निदेशालय से आदेश मिलते ही दोनों अधिकारी एक सप्ताह के भीतर सभी दस्तावेजों के साथ लखनऊ निदेशालय रवाना हो गए और इस दौरान असली अर्पित सिंह भी उन के साथ मौजूद था, जिस का नियुक्ति के समय सीरियल नंबर 80 और रजिस्ट्रैशन नंबर 50900041299 था.

इस दौरान फर्रुखाबाद के शमसाबाद में तैनात अर्पित सिंह को भी लखनऊ निदेशालय तलब किया गया था, लेकिन सक्षम अधिकारी के सामने पेश होने से पहले ही वह फरार हो गया था. इस वाकये ने यह साबित कर दिया था कि मामले में जरूर बड़ा झोलझाल है, तभी सक्षम अधिकारी का सामना किए बिना ही वह मौके से फरार हो गया था.

खैर, हाथरस वाले अर्पित सिंह से घंटों पूछताछ चली. उस के दस्तावेजों का परीक्षण हुआ. सब कुछ ठीकठाक रहा. और तो और अधिकारियों के सवालों का उस ने दिलेरी के साथ बेझिझक जवाब दिया था. बात यहीं खत्म नहीं हुई थी. इस फरजीवाड़े की जांच आगे बढ़ी तो मामला परतदरपरत खुलता गया, जिस की नींव महानिदेशालय दफ्तर से जुड़ी हुई सामने आई. करप्शन की कोख से पैदा हुए अफसर यहीं बैठे हुए थे, जिन की शह पर ही घोटाले को ऊर्जा मिली थी. आइए पढ़ते हैं, इस फरजीवाड़े का काला सच—

मामला 2008 और 2016 की उन भर्तियों से जुड़ा है, जिन में एक्सरे टेक्निशियनों के पद पर नियुक्तियों में भारी गड़बड़ी की शिकायतें उठी थीं. स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से यह रिपोर्ट मांगी थी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है. यदि है तो उस की जानकारी निदेशालय को दें. जांच में यह सामने आया कि उस समय 79 स्वीकृत पदों पर 140 लोगों को नियुक्त किया गया था. यानी 61 लोगों को बगैर पद के नियुक्त कर के सीधे सरकार को करोड़ों का चूना लगाया गया. यह जानकारी जब सामने आई तो निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों के माथे पर पसीना छलक उठा. एकदूसरे पर दोषारोपण करने लगे थे.

यह मामला गंभीर नहीं, अति गंभीर था, लिहाजा स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने तत्काल ऐक्शन लिया और उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि 2008-09 के बीच जिन भी अभ्यर्थियों ने जौइनिंग की थी, उन का पूरा विवरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि गुणवत्ता के आधार पर असली और नकली की पहचान की जा सके. फर्रुखाबाद समेत पूरे प्रदेश में भरती घोटालों की परतें उधेड़ रही यह जांच यह साफ कर रही थी कि वर्षों से सिस्टम में किस तरह से गहराई तक भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली थीं, लेकिन जनता का सवाल अब सीधा था कि आखिर अर्पित सिंह कहां है और कब तक कानून से बाहर रहेगा?

स्वास्थ्य विभाग में फरजी नियुक्ति के मामले कई बार सामने आ चुके थे. लेकिन अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे थे और मामले में टालमटोल करते जा रहे थे, ताकि जुर्म की कोख से जन्मी भ्रष्टाचार की खेती यूं ही लहलहाती रहे और उस से पैदा होने वाली नोटों से सदा उन की जेबें गरम होती रहें, लेकिन कब तक वे भ्रष्टाचार की मद्धिम आंच पर जुर्म की ताजी रोटियां सेंकते, एक न एक दिन तो यह गंदगी उजागर होनी ही थी.

अब एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह की फरजी नियुक्ति होने की चर्चाएं तेज हैं. जांच का दायरा बढ़ा तो कुछ और मामले सामने आए. मई 2016 में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से 403 एक्सरे टेक्निशियन चयनित हुए थे. इन चयनित अभ्यर्थियों में एक ही अर्पित सिंह के नाम की नियुक्ति हुई थी. बाद में सरकार के मानव संपदा पोर्टल पर अर्पित सिंह के नाम से 6 एक्सरे टेक्निशियन के नाम दिखने लगे थे. और तो और सभी के पिता का नाम अनिल सिंह, जन्म तिथि 12 जून 1989 ही अंकित था. इन में 4 अर्पित सिंह का पता सी-22 प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा अंकित था, जबकि 2 का पता अलग था.

इन में एक एक्सरे टेक्निशियन अर्पित की तैनाती सीएचसी शमसाबाद में दिखाई जा रही थी, जोकि फर्रुखाबाद जिले में आता है.

हालांकि 2016 में जनपद में 6 एक्सरे टेक्निशियन तैनात हुए थे. इन में कपिल वर्मा, प्रदीप यादव, भगवती शरण कुशवाहा, विजय शंकर तिवारी, रमेश कुमार व अर्पित सिंह शामिल थे.

जांच में सामने आया कि अन्य एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती के करीब 15 दिन बाद अर्पित सिंह की जिले में तैनाती हुई थी.

सब से पहले उसे सीएचसी शमसाबाद में ही तैनात किया गया था. इस के बाद उसे सीएचसी मोहम्मदाबाद, रामपुर जिले में भेजा गया. फिर वहां से उस का ट्रांसफर सीएचसी शमसाबाद किया गया. वर्षांे तक वहीं नौकरी करता रहा. मामला उजागर होने से एक सप्ताह पहले अर्पित सिंह का दोबारा ट्रांसफर सीएचसी मोहम्मदाबाद कर दिया गया था.

शक में आई पुलिस जांच

यह खेल बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से फलताफूलता रहा. और सरकार को लाखों का चूना हर माह लगाता रहा. उस के वेतन के कुछ हिस्से अधिकारियों की जेबों में भी जाते रहे, ताकि भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त अफसरशाही के घिनौने चेहरे सामने न आ सके और यह मामला दबा रहे. तथाकथित अर्पित सिंह जनपद एटा का निवासी था. अब सवाल यह उठता है कि एक ही नाम से 6 अर्पित सिंह की जनपद शामली, रामपुर, बांदा, बलरामपुर, बदायूं व फर्रुखाबाद में तैनाती हुई थी. इस में असली नियुक्ति किस की हुई और 5 फरजी नियुक्ति में कौनकौन शामिल थे? यह बड़ा सवाल है.

स्वास्थ्य विभाग लगातार सभी को वेतन दे रहा था, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया, जबकि नियुक्ति के बाद विभाग अभ्यर्थी का पुलिस सत्यापन कराता है. सत्यापन में भी फरजीवाड़ा खुल कर सामने नहीं आया. इस का मतलब साफ था कि पुलिस वेरीफिकेशन में जांच करने वाला पुलिस अधिकारी भी इस खेल में शामिल था, तभी तो उस ने भी अपने कर्तव्य का सही से पालन नहीं किया अन्यथा उसी दौरान फरजीवाड़े का यह खेल वहीं खुल जाता और सरकार को करोड़ों का चूना लगाए जाने से बचाया जा सकता था.

जैसेजैसे जांच का दायरा आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे नए खुलासे होते गए. जांचपड़ताल में विवेचक के हाथ 2 नियुक्ति पत्र लगे. जिस में एक नियुक्ति पत्र 25 अगस्त, 2008 को जारी हुआ था. इस में क्रम संख्या 3, रोल नंबर-एक्सआर 5035 लिखा था. अभ्यर्थी का नाम फुरकान खान, पता- सिसेंडी, लखनऊ, नियुक्ति स्थान सीएमओ सीतापुर के अधीन लिखा था. जो 79 अभ्यर्थी के परीक्षा परिणाम में इन का विवरण मौजूद है.

बात अब दूसरे नियुक्ति पत्र की करते हैं. जब इसी तरह दूसरे नियुक्ति पत्र की 79 की सूची से मिलान किया गया तो विवरण नहीं मिला. इस जौइनिंग लेटर पर नियुक्ति तिथि 20 सितंबर, 2008 अंकित थी, क्रम संख्या- 67. अनुक्रमांक-एक्सआर 5365 लिखा था. इस पर नाम पुष्पेंद्र सिंह, पता- कंचनपुर, जिला मैनपुरी, नियुक्ति मुख्य चिकित्साधिकारी बलिया के अधीन लिखा था. लेकिन परीक्षा परिणाम वाली सूची में क्रम संख्या 67 पर नाम हरिमोहन, पता आगरा का दर्ज है.

नहीं माना शासनादेश

उत्तर प्रदेश में एक्सरे टेक्निशियन और लैब टेक्निशियन की भरती में हर स्तर पर विभागीय अधिकारियों ने मनमानी की. हालत यह है कि एक्सरे टेक्निशियन भरती 2016 में नियमावली बदलाव के संबंध में राज्यपाल का आदेश जारी होने से पहले ही नियुक्ति आदेश जारी कर दिया गया था. प्रदेश में 2013 में एक्सरे टेक्निशियन भरती के लिए 287 पदों पर आवेदन मांगे गए थे. इस भरती में कई तरह के गंभीर आरोप लगे. जांच में आरोप सही पाए गए और शासन की ओर से 21 जून, 2014 को भरती प्रक्रिया निरस्त कर दी गई.

फिर 2015 में अधीनस्थ चयन आयोग का गठन हुआ. पहले की तरह इस में थोड़ी तबदीली की गई थी. अब 287 पदों की जगह 403 पदों के लिए आवेदन मांगे गए. पहले हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और डिप्लोमा इन एक्सरे टेक्निशियन के परीक्षा परिणाम के गुणांक के आधार पर 50 अंक और साक्षात्कार के आधार पर 50 अंकों को समाहित करते हुए मेरिट सूची तैयार किए जाने का नियम था. लेकिन आगे चल कर इस में बड़ा बदलाव किया गया.

तय यह किया गया कि 100 अंक के बजाय मेरिट धारियों को सिर्फ 20 अंक का साक्षात्कार लिया जाएगा. नियमों में बदलाव के लिए राज्यपाल को प्रस्ताव भेजा गया. इसी बीच मई, 2016 में 20 अंकों के आधार पर साक्षात्कार करा लिया गया. और 17 मई, 2016 को परिणाम भी जारी कर दिया गया. इतना ही नहीं, 25 मई को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए.

जबकि 10 जून, 2016 को तत्कालीन शासन के विशेष सचिव अशोक कुमार श्रीवास्तव ने आदेश जारी किया गया कि समूह ‘ग’ के पदों के लिए सीधी भरती नियमावली 2015 के नियम 8(1) के तहत साक्षात्कार के अधिकतम अंक 20 निर्धारित करने के लिए राज्यपाल ने मंजूरी दे दी है. यह मंजूरी तत्काल प्रभाव से लागू की जाती है.

पते की बात तो यह थी कि जब तक यह आदेश जारी होता, उस से पहले ज्यादातर लोगों ने कार्यभार ग्रहण कर लिया था. इसी (2016) की भरती में एक चयनित अर्पित सिंह के नाम से 6 लोगों ने अलगअलग जिलों में कार्यभार ग्रहण किया था, जिस में वजीरगंज थाने में 6 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, जिन के खिलाफ जांच चल रही है. पुलिस जांच के दौरान एक बड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया था. जांच में पता चला कि फरजी भरती से जुड़े रैकेट में शामिल लोगों ने अभ्यर्थियों के पते गलत दिए थे. इस के पीछे उन की सोचीसमझी और पुख्ता रणनीति थी.

तर्क यह था कि लाभार्थियों के फरजी पता देने से पकड़े जाने के बाद विभाग जब उन के पते पर नोटिस भेजेगा तो ये नोटिस स्वीकृत नहीं होगा. ऐसे में फरजी अभ्यर्थी यह कहते हुए खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाएंगे कि उन्हें कोई नोटिस मिला ही नहीं और बाद में कोर्ट चले जाएंगे.

भ्रष्ट लालफीताशाहियों के करतूतों की पोल ऐसे खुल कर सामने आई थी. वे अपने लचर रवैए से जुर्म की मोटी दीवार पर सरकार से विश्वासघात का परदा डाल कर उसे ढक देते हैं ताकि वे फरजी अभ्यर्थियों के साथ ढुलमुल रवैया अपनाए रहें और उन के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत भी न मिले. ऐसे में तथाकथित अभ्यर्थियों को राहत मिल जाती है. 2008 के प्रकरण में चल रही जांच में अब तक की गई जांच में यह बात सामने आई थी कि अभ्यर्थी जहां का पता लिखते थे, वहीं का फरजी प्रूफ भी तैयार कर लेते थे. इस जांच में कुछ फरजी अभ्यर्थियों की कारस्तानी सामने आई थी.

कन्नौज के सीएचसी तालग्राम में कार्यरत मनोज का पता फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का लिखा था, लेकिन जांच में पता चला कि वह फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का नहीं, बल्कि कन्नौज के जलालाबाद के अटारा का रहने वाला था. दूसरा मामला बदायूं से जुड़ा सामने आया. बदायूं के सीएचसी उसवा में कार्यरत सुधीर का पता धुमरी सिद्धपुर रोड एटा लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज क्षेत्र के लड़सिया उर्फ लुतफुल्लापुर का रहने वाला था.

चंदौली के सीएचसी चकिया में कार्यरत विनोद का पता एटा जिले के जलालापुर रामनगर लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज के जैथरा का निवासी था. इसी तरह कई अन्य के निवास प्रमाण पत्रों में भी हेराफेरी की गई थी.

9 साल से लेते रहे सैलरी

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती 4,200 रुपए वेतनमान पर होती है. इस तरह शुरुआत में उन्हें लगभग 50 से 55 हजार रुपए महीना वेतन मिलता है. फरजी तरीके से नियुक्त हुए इन में से प्रत्येक व्यक्ति ने 2016 से 2025 तक 9 साल में करीब 58 लाख रुपए से अधिक वेतन स्वास्थ्य विभाग से लिया है. इस तरह फरजी नाम से नौकरी करने वाले सभी 6 कर्मचारियों ने करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए से अधिक की आर्थिक धोखाधड़ी विभाग के साथ की है. वहीं, वेतन की बात करें तो एक अर्पित सिंह हर महीने 69,595 रुपए ले रहा था. एक साल में सिर्फ एक जिले से ही 8,35,140 रुपए की सैलरी ली गई. 9 सालों में केवल एक जिले से 75,16,260 रुपए का भुगतान किया जा चुका था.

ऐसे में 6 जिलों के अर्पित सिंह के वेतन को जोड़ें तो लगभग साढ़े 4 करोड़ रुपए सिर्फ 6 व्यक्तियों ने विभाग से हासिल कर लिए. ऐसे में विभाग के बेइमान अफसरों की जेबों में भी बेइमानी का एक मोटी रकम गई होगी, इस में कोई शक नहीं है. तभी तो भ्रष्टाचार की जड़े गहराई तक जमी हैं. फर्रुखाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. अवनींद्र कुमार ने पूरे मामले पर 3 उप मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की टीम बनाई

थी. जिस में यह हुआ था कि जांच के बाद आरोपित अभ्यर्थियों के खिलाफ काररवाई होगी.  इस बीच सरकार की नीतियां, विभागीय सख्ती और निगरानी तंत्र सब पर यह सवाल खड़ा किया जा रहा है कि आखिर कैसे इतने लंबे समय तक एक शख्स सरकार से वेतन लेता रहा और विभाग को कानोंकान भनक तक नहीं लगी. इस पर सीएमओ डा. अवनींद्र कुमार ने तर्क दिया कि काररवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जल्द वे चेहरे सामने आ जाएंगे, जिन के सान्निध्य में इस फरजीवाड़े का खेल खेला गया था. मगर बड़ा सवाल यह है कि यह काररवाई सिर्फ नियमकानून के दस्तावेजों तक सीमित रहेगी या फिर व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचेगी?

हाथरस मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह ने बताया कि उस के नाम पर नियुक्ति में फरजीवाड़ा 2017 में आया था, उस समय अलीगढ़ के अकराबाद सीएचसी में भी उस के नाम से एक टेक्निशियन तैनात था. जांच शुरू होते ही वह भाग गया था. तत्कालीन सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने उस समय भी उन का सत्यापन कराया था. जांच में हाथरस वाले अर्पित सिंह की तैनाती सही पाई गई थी.

सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने कहा कि यह फरजीवाड़ा लखनऊ से हुआ था, क्योंकि नियुक्ति पत्र निदेशालय से जारी होना दर्शाया गया था. उस की (असली अर्पित सिंह) वर्ष 2016 में हाथरस जिले में नियुक्ति हुई थी. उस समय अन्य जिलों में कोई नियुक्ति नहीं हुई थी.

उन्होंने अपने माध्यम से जानकारी जुटाई तो पता चला कि फरजी अर्पित सिंह की हाथरस में पोस्टिंग दिखा कर बिना जौइन कराए अन्य जिलों में तबादले दिखाए गए थे, जबकि असली अर्पित सिंह का तो कभी कोई तबादला हुआ ही नहीं है. उन्होंने दावा किया कि असली अर्पित सिंह ने करीब एक साल जिला अस्पताल में भी सेवा दी है. अन्य जिलों में उस के नाम से फरजी कर्मचारियों ने नौकरी की है, जब यहां टीमें पहुंचीं तो ये सभी लोग भाग खड़े हुए.

असली अर्पित सिंह की जब विभाग में जौइनिंग हुई थी तो उस के सभी दस्तावेजों की जांच के साथ पुलिस विभाग की तरफ से भी उस का सत्यापन हुआ था, जिस में सब कुछ सत्य पाया गया था. उपलब्ध दस्तावेजों में मुरसान सीएचसी पर तैनात टेक्निशियन अर्पित सिंह की नियुक्ति सीएमओ कार्यालय में वर्ष 2016 में दर्ज है. मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह की भी जांच शासन स्तर पर चल रही है. इस संबंध में सभी दस्तावेज शासन को भेज दिए गए हैं. जबकि बाकी 5 जगहों पर अर्पित के नाम से नौकरी करने वाले भागे हुए हैं. मुरसान में तैनात अर्पित वास्तविक कर्मचारी है.

ऐसे खेला गया खेल

उत्तर प्रदेश में नौकरियों में फरजीवाड़े मामले में एक और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. फरजीवाड़ा करने वाले आरोपी पहली पोस्टिंग जुगाड़ से वहीं करा लेते हैं, जहां सुविधा होती है. इस के बाद पहला ट्रांसफर मिलते ही इन्हें पकडऩा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि दूसरी जगह जाने पर दस्तावेज नहीं सिर्फ ट्रांसफर लेटर चैक होता है. फरजी दस्तावेजों से नौकरी हासिल करने का ये सारा खेल विभागीय मिलीभगत से चलता है.

इस का खुलासा इस बात से होता है कि कई जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारी रह चुके स्वास्थ्य विभाग के एक निदेशक बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में तबादला करा कर आए लोगों की गोपनीय तरीके से जांच कराई तो कई अजीबोगरीब केस मिले थे, जो फरजी दस्तावेज पर नौकरी करते मिले.

ऐसे लोग पहली बार उसी जिले में कार्यभार ग्रहण करते हैं, जहां से उन का रैकेट से जुड़ा क्लर्क अथवा चिकित्साधिकारी कार्यरत होता है. क्योंकि वे आसानी से सर्विस बुक सहित अन्य पत्रावली तैयार करा लेते हैं. उस के बाद तो उन की चांदी ही चांदी होती है. तैनाती के बाद 6 महीने से साल भर के अंदर वे अपना तबादला करा कर दूसरे जिले में चले जाते हैं, जहां उन की नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज आमतौर पर देखे नहीं जाते हैं.

चिकित्साधिकारी के तर्क को देखा जाए तो साल 2008 में हुई एक्सरे टेक्निशियन भरती उन की इस बात की पुष्टि करती है कि फरजी अर्पित सिंह सहित अन्य के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा. मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज आंकड़े के मुताबिक 2008 में 79 की जगह 140 लोगों ने नौकरी हासिल की थी. इस में 61 अतिरिक्त थे. इन के सर्विस रिकौर्ड को देखा जाए तो ज्यादातर ने 2 साल के अंदर तबादले ले लिए थे.

जिस ने पहले बलिया में कार्यभार ग्रहण किया था, वह बांदा में कार्यरत है और जिस ने आगरा में कार्यभार ग्रहण किया था. वह अब वाराणसी या चंदौली में सेवाएं दे रहा है. पते की बात यह है कि इन सभी के नियुक्ति पत्र हाथ से लिख कर जारी किए गए थे.

कानपुर से जुड़े तार

चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज फैक्ट शीट (पी2) के रिकौर्ड के मुताबिक 2008 में फरजीवाड़ा के जरिए नौकरी हासिल करने वाले रैकेट के तार किसी न किसी रूप में कानपुर मंडल से जुड़े हैं, जिस में फर्रुखाबाद में हुए फरजीवाड़े से ज्यादा नजदीकी दिख रही थी. गौरतलब है कि 2016 में भी इसी रैकेट के सक्रिय रहने की आशंका जताई जा रही थी, क्योंकि फर्रुखाबाद में जिस एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह को नौकरी दी गई थी, उस का गृह जनपद आगरा था, लेकिन जांच के दौरान वह एटा का निकला.

2008 की भरती में मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज तथ्यों के आधार पर 61 एक्सरे टेक्निशियन का गृह जनपद देखा जाए तो फर्रुखाबाद के सब से ज्यादा करीब 19 कर्मचारियों के मूल निवास दिखाए गए थे. इसी तरह एटा के 16, मैनपुरी के 6, कन्नौज के 4, वाराणसी के 3, कासगंज और मेरठ के 2-2, प्रयागराज, औरैया, झांसी, अंबेडकर नगर, शामली, मुरादाबाद, बाराबंकी, बिजनौर, बलिया के एकएक निवासी बताए गए थे.

इन सभी कथित अर्पित सिंह ने 5 जिलों में प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा का पता दर्ज कराया था, जबकि अमरोहा में कुरावली मैनपुरी का पता दिया था. शामली जिले को छोड़ कर अन्य जिलों में कथित अर्पित ने अलगअलग आधार कार्ड नंबर भी उपलब्ध कराए हैं. इस में 2 फरजी अर्पित की पहचान लखीमपुर खीरी और गोंडा में हुई है. बदायूं में तैनाती लेने वाला फरजी अर्पित पहले ही बरखास्त किया जा चुका है. आजमगढ़ के पंवई और ललितपुर वाले अर्पित फरार चल रहे हैं.

यूपीएसएसएससी की सूची में 127 क्रमांक संख्या पर दर्ज अंकित के मामले में भी जांच शुरू कर दी है. अंकित पुत्र राम सिंह की 2016 में हरदोई की मल्लावां सीएचसी पर नियुक्ति हुई थी. वह भी फरार चल रहा है. इसी तरह क्रमांक संख्या 166 पर दर्ज अंकुर पुत्र नीतू मित्ता के नाम पर फरजीवाड़ा किया गया. अंकुर एक जून, 2016 को मैनपुरी सीएमओ के अधीन नियुक्त हुआ था. वहीं दूसरे फरजी अंकुर ने 12 जून 2016 को मुजफ्फरपुर की शाहपुर सीएचसी में फरजी तरीके से नियुक्ति ली थी.

वहीं दूसरी ओर, एक ऐसा नाम जो असल में मौजूद ही नहीं है और सिस्टम की खामियों का फायदा उठा कर करोड़ों रुपए डकार गया. आखिर इस सब के पीछे जिम्मेदार कौन है?  वे अधिकारी जिन्होंने दस्तावेजों पर सिर्फ एक ठप्पा लगाने को ही अपना काम अपनी जिम्मेदारी समझा? या वे दूषित मानसिकता से ओतप्रोत थे, जिस के चलते ऐसे लोग हमेशा बच निकलते हैं?

फरजीवाड़े का यह खेल तो लंबे अरसे से खेला जा रहा था और खेला भी जा रहा है. इस से सरकार को करोड़ों रुपए का चूना भी लगाया जा रहा है. अब देखना यह है कि क्या जांच अधिकारी अपनी निष्पक्ष जांच से उन के चेहरे से नकाब उतार सकेंगे अथवा वह भी नोटों की चमक के सामने औरों की तरह अपना ईमान गिरवी रख देंगे. यदि समय रहते भरती प्रक्रिया के दौरान सभी जिम्मेदार और सक्षम अधिकारियों ने ईमानदारी से अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो फरजीवाड़े का बीज अंकुरित होने से पहले इस का वजूद मिट गया होता और यूं ही नहीं विशाल बरगद का रूप लेता.

खैर, सभी फरजी कर्मचारियों के खिलाफ फरजीवाड़े का मुकदमा दर्ज कर के जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जांच शुरू हुए 2 महीने का समय बीत चुका है, लेकिन उन 6 में से किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी कथा संकलन तक नहीं हो सकी थी, क्योंकि उन का कहीं अतापता नहीं चल सका था. UP News

(कथा दस्तावेजों और सोशल मीडिया में छपी रिपोर्ट के आधार पर)

 

Love Crime: प्रेमिका का सिर कलम

Love Crime: पति जौनी को छोडऩे के बाद 30 वर्षीय उमा को 25 वर्षीय बिलाल से मोहब्बत हो गई थी. उस के बाद वह लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फिर एक दिन जंगल में उमा की सिरविहीन और निर्वस्त्र लाश मिली. उमा की जब किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो आखिर किस ने और क्यों किया उस का मर्डर? पढ़ें, लव क्राइम की यह हैरतंगेज कहानी.

उमा को खत्म करने की बिलाल की योजना किसी कागज पर नहीं थी, वह उस के दिमाग में बनी एक अंधेरी भूलभुलैया थी. उस ने सोचा कि पहले उमा को भरोसे में लिया जाए, फिर उसे सुनसान जगह ले जा कर उसे खत्म किया जाए. फिर उस की लाश के टुकड़े कर अलगअलग फेंक दिया जाए. इस से उस की शिनाख्त भी नहीं हो पाएगी और यह राज भी राज ही बन कर रह जाएगा. प्रेमिका को ठिकाने लगाने का बिलाल ने यही प्लान बना लिया.

14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की शादी होने जा रही थी. बारात उतराखंड के रुड़की जानी थी. लेकिन इस निकाह में बिलाल की हिंदू प्रेमिका बाधा बन सकती थी और ऐसे में उस ने प्रेमिका उमा को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार कर लिया था.

बिलाल ने अपनी शादी से ठीक 8 दिन पहले यानी 6 दिसंबर को उस ने उमा से कहा, ”चलो, कहीं घुमा कर लाता हूं.’’

उस के खौफनाक इरादों से अनजान उमा राजी हो गई. शाम का वक्त था, अंधेरा हो चला था. उमा रोमांच महसूस कर रही थी, जबकि उस के मन में कुछ और ही चल रहा था. 6 दिसंबर, 2025 को शाम करीब 6 बजे स्विफ्ट कार ले कर वह उमा के कमरे पर गया था. बोला, ”सरप्राइज है, चलो तुम्हें बाहर घुमा कर लाता हूं.’’

हथिनीकुंड बैराज में यूपी और हरियाणा को जोडऩे वाला पुल है. वह उसी रास्ते से कार लाया. पहले हिमाचल की तरफ कार घुमाई, फिर उस ने पहले हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की तरफ कार मोड़ ली. उमा लगातार उस से बातें किए जा रही थी. वह उसे प्यारभरे अंदाज में उस की बातों का जवाब दे रहा था. दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

रात के करीब 8 बज गए थे. रात का स्याह अंधेरा छा गया था. कलेसर नैशनल पार्क से गुजर रहे थे. नैशनल हाइवे से गाडिय़ां आजा रही थीं. उस दिन शनिवार था. वीकेंड पर अकसर पर्यटक इस इलाके में ज्यादा घूमने जाते हैं. उस ने कहा कि कोई होटल देखते हैं, वहां शाम बिताएंगे. पांवटा में रूम तलाशने की कोशिश की, लेकिन पर्यटक काफी थे. कहीं कोई कमरा किराए पर नहीं मिला. उसे डर लगा कि कहीं पकड़ा न जाए. अचानक प्लान बदल दिया.

इस के बाद उस ने हरियाणा की सीमा की तरफ कार मोड़ ली. बोला कि चलो, जंगल की तरफ चलते हैं, उधर भी अच्छे होटल हैं. उमा तो उस पर आंखें मूंद कर भरोसा करती थी, इसलिए राजी हो गई. कलेसर जंगल के एरिया से निकलते ही आबादी शुरू हो जाती है. यहां प्रतापनगर के गांव बहादुरपुर की सीमा से पहले ही उस ने कार रोक ली. उमा ने पूछा कि कार क्यों रोक दी?

उस ने कहा कि आबादी आने वाली है. सीट बेल्ट लगाना जरूरी है. यह बहाना बना कर वह पिछली सीट पर चला गया. उस वक्त उमा अगली सीट पर बैठी अपनी धुन में मस्त थी. तभी अचानक (25 वर्षीय) बिलाल ने 30 वर्षीय प्रेमिका उमा के गले में सीट बेल्ट डाल दी और गला घोंटने लगा. उमा के पास बचने या चिल्लाने का ज्यादा मौका नहीं था. उमा का शरीर बेजान हो गया. उसे मरा मान बिलाल तुरंत अगली सीट पर आया. उस ने कार आगे बढ़ा दी. करीब आधा किलोमीटर दूर गया तो सामने गांव बहादुरपुर की लाइटें नजर आने लगीं.

बिलाल को अब शव ठिकाने लगाने की जल्दी थी. उस के मन में पकड़े जाने का भी डर था, इसलिए उस ने गरदन से सिर काटने की सोची. साथ में वह मीट काटने वाला छुरा ले कर आया था. लाश को सड़क किनारे खेतों में बनी पौपुलर की नर्सरी में ले गया. वहां सिर धड़ से अलग किया और लाश के कपड़े उतार लिए, ताकि उस की पहचान न हो. कटे सिर और उतारे गए कपड़ों को पौलीथिन के थैले में डाल कर अगली सीट पर रख लिया. सिर कटी लाश उस ने वहीं छोड़ दी थी.

उस वक्त रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे होंगे. अब उसे ऐसी जगह की तलाश थी, जहां सिर व कपड़े फेंक सके ताकि शिनाख्त की संभावना न बचे. बिलाल ने सिर फेंकने के लिए इसी जगह को चुना. यहां सिर फेंकने के बाद बिलाल ने कार घुमाई और हथिनीकुंड बैराज के पुल से होते हुए अपने घर चला गया.

बिलाल ने मर्डर के बाद घर पहुंच कर सब से पहले अपना मोबाइल फारमेट कर दिया, जिस से कि उस के मोबाइल में उमा की फोटो और कौन्टैक्ट नंबर सब डिलीट हो गए. आधी रात के बाद बिलाल सो गया और सुबह फेमिली वालों से कहा कि अब निकाह की तैयारियों में रहूंगा. अब कहीं नहीं जाऊंगा.’’ योजना पर अमल कर के उस ने उमा की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर दी. यह मामला हरियाणा के यमुनानगर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से जुड़ा एक सनसनीखेज हत्याकांड है, जिस में प्रेम प्रसंग, लिवइन रिलेशनशिप और शादी के दबाव के चलते बेरहमी से हत्या की गई है.

सहारनपुर के हलालपुर गांव में एक परिवार रहता है. उस परिवार की उमा 18 साल की हो चुकी थी. उस की जवानी अब फूल की तरह पूरी तरह खिल चुकी थी. उमा के घर से सिर्फ 2-4 घर छोड़ कर  एक 19 साल का युवक जौनी रहता था. पेशे से मजदूर था और रंगाईपुताई का काम किया करता था. जौनी मामूली सा विकलांग था. उस की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि कोई उस की कमजोरी पर ध्यान ही नहीं देता. जौनी मेहनती और हंसमुख था.

उमा के घर में रंगाईपुताई का काम चल रहा था. उमा के पापा ने जौनी को बुलाया था, क्योंकि वह पड़ोस में ही रहता था. पहली बार जब जौनी उमा के घर आया तो वह सीढ़ी पर चढ़ कर दीवारों को रंग रहा था. विकलांग होने के बावजूद वह बड़े सलीके से काम कर रहा था, जैसे कोई कलाकार अपनी पेंटिंग बना रहा हो. उमा उस वक्त घर में थी. बचपन से ही वो जौनी को ‘जानी वाकर’ कह कर चिढ़ाती थी और जौनी मुसकरा कर उस की कलाई पकड़ लेता. दोनों साथ खेलते हुए बड़े हुए.

परंपरा, मानवता और पड़ोसी होने के नाते वह चाय ले कर किचन से बाहर आई और जौनी को देखा. उस के माथे पर पसीने की बूंदें, हाथों में ब्रश और चेहरे पर एक हलकी मुसकान.

”ओए जौनी, ले चाय पी ले,’’ उमा ने शरमाते हुए कहा.

जौनी ने मुड़ कर देखा और उस की आंखें उमा की मासूमियत पर ठहर गईं.

”धन्यवाद, उमा. लेकिन मैं तो मजदूर हूं.’’ उस ने हंसते हुए कहा.

”मजदूर को भी हमारी परंपरा के अनुसार दिन में 2 बार चाय पिलाते हैं.’’

उमा की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि वह छोटीछोटी बातों से प्रभावित हो जाती थी. जौनी की सादगी और मेहनत ने उसे छू लिया. उस दिन से दोनों की बातचीत शुरू हुई. बचपन की पुरानी यादें, यही सब बातों के विषय होते. धीरेधीरे ये मुलाकातें रोमांटिक रंग लेने लगीं. इस के बाद उन की मुलाकातें भी होने लगीं. जौनी उमा को अपनी जिंदगी की कहानियां सुनाता, कैसे वह विकलांग होने के बावजूद कभी हारा नहीं, कैसे वह सपने देखता है एक बेहतर जिंदगी के. उमा उस की ताकत से प्रभावित होती और उसे चूमती, पहले गाल पर, फिर होंठों पर.

उन के चुंबन में एक जुनून था, जैसे दोनों की आत्माएं मिल रही हों. जौनी की मजबूत बांहें उमा को घेर लेतीं और उमा की नरम अंगुलियां उस के बालों में घूमतीं. वे घंटों बातें करते, हंसते और कभीकभी चुपके से एकदूसरे को छूते, एक स्पर्श जो बिजली सी दौड़ाता.

जौनी ने उमा का हाथ पकड़ा और बोला, ”उमा, तुम मेरी जिंदगी हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’

उमा ने उस के सीने पर सिर रखा और कहा, ”जौनी, तुम्हारी कमजोरी मेरी ताकत है. हम साथ हैं, हमेशा.’’

उन का रोमांस अब गहरा हो गया था. उमा और जौनी के बीच का प्यार एक खामोश नदी की तरह बहता था. गहरा, शांत और हर किसी की नजरों से छिपा हुआ.

शादी के दिन हुई फरार

रातें उन की थीं. जब मोहल्ला सो जाता, उमा अपनी छत पर आती. जौनी दीवार फांद कर उस के पास पहुंच जाता. ऐसे ही 5 साल गुजर गए. 5 साल की अनगिनत रातें, अनकही बातें, चुराए गए चुंबन और वो सांसें जो सिर्फ एकदूसरे के लिए रुकी थीं. उमा के फेमिली वाले उमा की शादी के लिए बहुत चिंतित थे. आखिरकार एक लड़का उमा के लिए फेमिली वालों ने पसंद कर के शादी तय कर दी. यह बात सन 2010 की है. सभी धार्मिक औपचारिकताओं के बाद बारात आने की तारीख तय हो गई. अभी तक उमा की तरफ से किसी तरह का कोई विरोध फेमिली वालों के सामने नहीं आया.

सूरज की पहली किरणों ने अभीअभी गांव की सड़कों को छुआ था, जब उमा के घर में हलचल मच गई. आज वह दिन था, जिस का इंतजार पूरे परिवार को था. उमा की शादी. लेकिन कमरे में सन्नाटा था. जब मां ने दरवाजा खटखटाया और भीतर झांका तो पल भर में सब कुछ समझ में आ गया. अलमारी खुली थी, कुछ कपड़े गायब थे, उमा भी गायब थी. दुलहन का लहंगा बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. मेज पर रखा वह छोटा सा कागज, ‘मम्मी, हम मजबूर थे. माफ करना.’

जौनी और उमा, 2 प्रेमी दिल, रात की आड़ में घर से निकल चुके थे. उन के पैरों की धूल अब दूर किसी अनजान रास्ते पर उड़ रही थी, जहां प्यार की उड़ान ने परिवार की इज्जत को पीछे छोड़ दिया था. पापा की आंखें फैल गईं, भाई दौड़ कर बाहर निकले. ”कहां गई वो? जौनी भी गायब है!’’ चाचा की आवाज कांप रही थी.

पूरे गांव में तलाश शुरू हो गई. कुएं के पास, मंदिर में, बस स्टैंड पर. सभी रिश्तेदार मिल कर तलाश कर रहे थे. पड़ोसी जुट गए, फोन घूमने लगे. उन के मुंह से एक ही बात निकली, ‘भाग गए दोनों…’

ये शब्द हवा में जहर की तरह फैल गए, उमा के पापा का चेहरा पीला पड़ गया, मम्मी रोरो कर बेहाल हो रही थी.

‘उमा और जौनी की प्यार की आग में सब जल गया. अब इज्जत का क्या होगा?’ सोच कर पापा ने सिर थाम लिया.

तभी मामामामी आगे आए. उन की आवाज कांपी, पर नीयत मजबूत थी. दोनों ने उमा की मम्मी और पापा को समझाया. कहा, ”हम हैं आप के साथ. चिंता की कोई बात नहीं है. मेरी बेटी है. अगर आप कहें तो आज हम उमा की जगह अपनी बेटी को विदा कर देंगे. पूरे समाज में आप की इज्जत का सवाल है. यह त्याग हम कर सकते हैं.’’

दोनों में से किसी ने आंखें उठा कर नहीं देखा. अब हर तरफ फुसफुसाहटें थीं. उमा की मम्मी आंसू पोंछते हुए बोली, ”भाभी, क्या करूं? मेरी बेटी ने तो हमें डुबो दिया. बारात लौट गई तो गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

आंसू बिना आवाज के गिरते रहे. मां ने एक पल को भाई की ओर देखा और फिर धीरे से सिर हिला दिया. समय बीतता गया, सूरज चढ़ता गया. बारात की धुन दूर से सुनाई देने लगी. ढोल की थाप, शहनाई की मधुर स्वरलहरियां. दूल्हा, घोड़ी पर सजाधजा, मुसकराता हुआ आ रहा था अनजान इस तूफान से. घर के दरवाजे पर बारात रुकी. बारात आई. ढोलनगाड़ों की आवाज ने उस खालीपन को ढक लिया, जो आंगन में पसरा था. स्वागत हुआ, आवभगत निभाई गई. सभी के चेहरे पर नकली मुसकानें थीं, पर आंखों में प्रश्न.

परंपराएं चलीं, फेरों का समय आया. मामा की बेटी लाल जोड़े में आई. कांपती नहीं, बल्कि विश्वास से भरी थी. फेमिली वालों के चेहरे पर मुसकान चिपकी हुई थी, लेकिन आंखें बता रही थीं कि दिल टूटा हुआ है.

पापा ने आगे बढ़ कर दूल्हे का स्वागत किया, ”आओ जी, स्वागत है!’’

बाहर बारात नाच रही थी, अंदर फैसला हो चुका था. मामामामी की बेटी को बुलाया गया. वह हैरान थी, लेकिन परिवार की इज्जत के लिए तैयार हो गई.

”अगर इस से सब की लाज बचती है तो मैं कर लूंगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

मेकअप किया गया. उमा का ही लहंगा पहनाया गया. अब  मंडप सजा, पंडितजी मंत्र पढऩे लगे. दूल्हे को बताया गया कि ‘परिवार की रस्म है, दुलहन का नाम बदल गया.’ वह मुसकराया. शायद अनजान, शायद समझदार. फेरों के समय उमा की मम्मी की आंखों से आंसू बह रहे थे, खुशी के नहीं, दर्द के. पापा ने दुलहन का हाथ दूल्हे को सौंपा, मन में उमा की याद थी, ‘बेटी, तू जहां भी है, खुश रह,’ उन्होंने मन ही मन कहा.

इस तरह अपनी इज्जत की आरती को बचा कर इस घर से उमा की जगह उस की ममेरी बहन को विदा कर दिया गया. शादी संपन्न हुई. बारात विदा हुई. लेकिन घर में सन्नाटा था. रात को जब सब सो गए तब उमा की मम्मी ने पति से कहा, ”क्या हम ने सही किया?’’

उन्होंने सिर हिलाया, ”हां, इज्जत बचाई. लेकिन दिल टूटा है. जौनी और उमा, काश वे समझते.’’

इस अप्रत्याशित मोड़ ने एक नई कहानी शुरू की, दर्द की, बलिदान की और उम्मीद की.

निर्वस्त्र मिली लाश

हरियाणा के यमुनानगर के प्रताप नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गांव पड़ता है बहादुरपुर. 7 दिसंबर, 2025 की सुबह के करीब  9 बजे के आसपास इसी बहादुरपुर गांव के एक व्यक्ति ने प्रताप नगर थाने में फोन कर कहा, ”साहब, मेरे गांव के बाहर पौपुलर की एक नर्सरी है. एक महिला की डैडबौडी पड़ी है, जिस का न तो वहां पर सिर मौजूद है और न ही उस के शरीर पर कोई कपड़ा मौजूद है.’’

एसएचओ नरसिंह गुर्जर को जैसे ही सूचना मिली, वह फौरन अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पर पहले से ही काफी तादाद में लोग मौजूद थे. पुलिस भीड़ को हटा कर डैडबौडी के पास पहुंची. डैडबौडी को देखने के बाद खुद पुलिस भी एकदम से चौंक गई. पुलिस ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से मुआयना किया, लेकिन महिला का सिर बरामद नहीं हुआ.

पर सवाल यह था कि आखिरकार वह मरने वाली महिला कौन थी? घटनास्थल पर काफी सारे लोग मौजूद थे. उन सभी से पूछताछ की, पर कोई भी व्यक्ति उस डैडबौडी की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल पर कोई ऐसा डौक्यूमेंट्स और न ही कोई ऐसा पहचानपत्र मिला, जिस से उस मरने वाली महिला के बारे में कुछ पता चल सके. उस के शरीर पर भी कहीं कोई टैटू, नाम या अन्य कोई चिह्नï या गुदा नहीं था.

पुलिस ने डैडबौडी को अपने कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसएचओ नरसिंह गुर्जर ने तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. यमुनानगर के एसपी कुलदीप गोयल घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया. पुलिस ने अज्ञात अपराधियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद केस की जांचपड़ताल शुरू कर दी. 72 घंटे का समय बीत जाने के बावजूद मृतका की शिनाख्त नहीं हुई तो इस सिरविहीन धड़ का अंतिम संस्कार सेवा समिति के माध्यम से करा दिया गया.

एसपी कुलदीप गोयल ने केस का खुलासा करने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया. साथ ही सर्विलांस टीम, फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड सभी अपनीअपनी तरह से प्रयास करने में जुट गए, ताकि इस हत्याकांड का खुलासा हो सके. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर था और इस का पता चल पाना मुश्किल हो रहा था. एसपी कुलदीप गोयल ने एसआईटी के हैड डीएसपी रजत गुलिया को नियुक्त किया था. रजत गुलिया के नेतृत्व में पुलिस ने प्रयास करने शुरू कर दिए. 500 से ज्यादा  सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए. पुलिस द्वारा उन्हें बारबार देखा जा रहा था.

इस केस की जांचपड़ताल करते हुए 3 दिन का समय गुजर गया, लेकिन पुलिस के हाथ कोई सबूत नहीं मिला. 3 दिनों के बाद पुलिस फिर से उस घटनास्थल पर गई. जब आसपास के लोगों से पूछताछ की तो बहादुरपुर गांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने पुलिस से कहा कि साहब मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन ठीक एक दिन पहले 6 दिसंबर, 2025 को रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे इस रोड पर मैं ने एक कार को देखा था. मुझे उस कार का नंबर तो याद नहीं है, लेकिन उस कार के नंबर प्लेट पर यूपी का नंबर लिखा हुआ था.

निकाह से पहले अरेस्ट

पुलिस ने इसी को आधार बना कर जब इस केस की जांचपड़ताल करते हुए आगे जा कर जब रोड पर लगे हुए सीसीटीवी की फुटेज को चैक किया तो आखिरकार एक सीसीटीवी में वह कार जाते हुए दिखाई दी. उस का नंबर भी साफसाफ दिखाई दे गया. पुलिस गाड़ी के उस नंबर के माध्यम से उस के मालिक तक पहुंच गई. कार के मालिक से पता चला कि उस गाड़ी के ड्राइवर का नाम बिलाल है, जो मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नकुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत टिडोली गांव का रहने वाला है.

13 दिसंबर, 2025 को शाम के करीब 7 बजे के आसपास हरियाणा की पुलिस अपनी टीम के साथ बिलाल के घर पहुंच गई. उस दिन बिलाल की छोटी बहन की बारात आई हुई थी. कुछ बाराती चले गए थे. कुछ बाराती वहां मौजूद थे. उस वक्त बिलाल की बहन की विदाई का कार्यक्रम चल रहा था. बड़ी संख्या में पुलिस बल देख कर घर में अफरातफरी मच गई. पुलिस ने बिलाल के अब्बा फुरकान से संपर्क किया. उन से पूछा कि आज तुम्हारे यहां क्या फंक्शन है? उन्होंने बता दिया कि आज उन की बेटी की विदाई हो रही है.

पुलिस के कहने पर फुरकान ने अपने बेटे बिलाल को पुलिस के सामने पेश कर दिया.  पुलिस वालों ने जब उस से सवाल करने शुरू किए तो बिलाल सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था. सर्दी में भी उसे पसीना आने लगा. फुरकान समझ गया कि कुछ न कुछ उस के बेटे ने गड़बड़ की है. तभी बिलाल ने वहां से भागने की कोशिश की. उसे पता नहीं था कि चारों तरफ से वह पुलिस से घिरा हुआ है.

पुलिस ने बिलाल को गिरफ्तार कर लिया. तभी काफी संख्या में मौजूद रिश्तेदार पुलिस का विरोध करने लगे. सभी रिश्तेदार जानना चाहते थे कि बिलाल को पुलिस क्यों गिरफ्तार करने आई है. तब पुलिस ने उन्हें बता दिया कि इस ने एक महिला की हत्या की है. पुलिस उसे गिरफ्तार कर लौट आई. थाने में जब उस महिला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने उमा नाम की महिला की हत्या कर उस की सिरविहीन लाश हरियाणा के यमुना नगर क्षेत्र में डाल दी थी और उस का सिर हरियाणा हिमाचल प्रदेश के बौर्डर पर कलेसर जंगल में एक खाई में डाल दिया था.

पुलिस ने रविवार 14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की निशानदेही पर हरियाणा हिमाचल के बौर्डर पर कलेसर जंगल में स्थित लालढांग की खाई से उमा का सिर बरामद किया गया. हालांकि वहां छुरा बरामद नहीं हुआ. पुलिस ने अदालत में पेश कर के बिलाल को 4 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड अवधि पर उस ने पुलिस को उमा की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह हैरान करने वाली निकली—

हमदर्दी ने प्यार जगाया

बिलाल 4 भाईबहन हैं. वह पहले ट्रक और डंपर चलाता था. इन दिनों कार की ड्राइविंग कर रहा था. पेशेवर तरीके से कार की बुकिंग कर के यात्रियों को उन की बताई हुई मंजिल तक पहुंचाता था. रोज की तरह उस दिन भी वह एक फैक्ट्री में किसी सवारी को छोडऩे आया था. फैक्ट्री के गेट के बाहर एक महिला बेंच पर बैठी हुई थी. करीब 30 साल की, उस का चेहरा पीला था. आंखों में थकान और बेचैनी साफ झलक रही थी.

बिलाल का ध्यान उस पर चला गया. वह आदतन संवेदनशील था. उस ने पास जा कर उस से धीरे से पूछा, ”आप ठीक तो हैं? कुछ परेशान लग रही हैं.’’

महिला ने कमजोर सी मुसकान के साथ कहा, ”बुखार आ रहा है, सिर घूम रहा है. इसी फैक्ट्री में काम करती हूं. छुट्टी ले कर घर जा रही थी. चला नहीं गया, इसलिए अकेली बैठी हूं. अगर हो सके तो मुझे गंगोत्री कालोनी में घर तक छोड़ दीजिए.’’

घर पहुंचने पर बिलाल ने मैडिकल स्टोर से ला कर बुखार की दवा भी खिला दी. 2 घंटे में बुखार उतर गया तो बिलाल अपने घर चला गया. अगले कुछ दिनों में बिलाल हालचाल पूछने आने लगा. कभी दवा लाता, कभी फल. बातचीत का सिलसिला बढ़ा तो अहसासों की गरमाहट भी. दोनों ने अपनेअपने संघर्ष, अकेलापन और सपने साझा किए. उमा को बिलाल की सादगी और ईमानदारी भा गई और बिलाल को उमा की समझदारी और आत्मसम्मान.

एक दिन उमा ने बिलाल को अपनी जिंदगी की दुखभरी कहानी सुनाई. 13 साल पहले की बात है. मैं ने अपने पड़ोस के एक युवक जौनी के साथ भाग कर शादी की थी. मेरे एक बेटा भी है, जो अपने पापा के साथ रहता है. घर से बाहर 10 साल हम ने इधरउधर बिताए. उस के बाद हम लौट कर सहारनपुर आ गए. मेरे फेमिली वालों ने मुझ से संबंध खत्म कर दिए थे.

सहारनपुर आने पर मैं अपने पति के साथ  रमजानपुर में रहती थी. मैं काफी गुरबत में समय बिता रही थी. मोहल्ले के ही एक युवक से मेरा संपर्क हुआ. उस ने मुझे सहारनपुर में एक फैक्ट्री में नौकरी दिला दी. एक मोहल्ले के ही होने के कारण कभीकभी मैं उस के साथ चली जाती और कभीकभी वापसी में भी हम साथसाथ ही आ जाते. इस से पति मेरे ऊपर शक करने लगा. मैं ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पति जौनी के दिमाग से शक दूर नहीं हुआ.

इस बात को ले कर हम दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. दिलों में खटास पैदा हो गई. मैं ने गंगोत्री में किराए पर मकान लिया और पति से अलग इस किराए के मकान में अकेली रहने लगी. बात तलाक तक पहुंच गई. इस तरह हम दोनों के बीच संबंध विच्छेद हो गया. कुछ दिनों बाद युवक ने फैक्ट्री से काम छोड़ दिया. मेरा संपर्क उस से टूट गया. पति ने मेरी कभी कोई खबर नहीं ली. इस तरह मैं अकेली पड़ गई.

मैं एक दिन अपने पति के कमरे पर अपने बेटे से मिलने के इरादे से गई. पता चला कि वह मकान खाली कर के अपने गांव वापस चला गया है. उमा की आंखों में आंसू आ गए. दोनों एकदूसरे के करीब आए. उन के दिलों में एक नई गरमाहट जाग रही थी. धीरेधीरे मामला प्यार में बदल गया.

सहारनपुर की गलियों में एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी 2 अकेले दिलों के मिलन की. बिलाल और उमा अब साथ थे. वे लिवइन में रहने लगे. बिलाल अपने घर कोई न कोई बहाना बना कर उमा के साथ रातें बिताया करता था. घर का सारा खर्च बिलाल ही उठाता था.

परिजनों ने तोड़ा संबंध

बिलाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस से सवाल किया कि यह महिला कौन है और इस की हत्या क्यों की? बिलाल ने पुलिस को अपनी मोहब्बत की शुरुआत की सारी कहानी बता दी. सिर को भी पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. शेष धड़ का तो पहले ही पोस्टमार्टम हो चुका था. सिरविहीन धड़ लावारिस घोषित हो जाने के कारण सेवा समिति ने बगैर सिर के अज्ञात मान कर पश्चिम यमुना नहर के पास श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया था.

क्योंकि अब उमा की शिनाख्त हो गई थी. उस के परिवार का पता लग गया था, इसलिए पुलिस पोस्टमार्टम के बाद सिर को ले कर उमा के गांव हलालपुर पहुंची तो उस का भाई टिंकू मिला. टिंकू ने बताया कि साहब करीब 15 साल पहले उमा की शादी हो रही थी. हम लोगों को पता ही नहीं चला, जिस दिन उस की बारात आने वाली थी, उसी दिन मौका पाते ही वो जौनी के साथ घर से भाग गई थी. उसी रात हम ने फैसला ले लिया था कि हम अब उमा को कभी याद नहीं करेंगे. उमा से हमारा कोई वास्ता नहीं है. उमा से हमारा कोई रिश्तानाता नहीं है.

पुलिस वाले जब उस का सिर ले कर पहुंचे तो इंसानियत के नाते टिंकू ने पुलिस वालों और रिश्तेदारों के कहने पर सिर का अंतिम संस्कार कर दिया. गांव के लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि आखिरकार यह सब कैसे हो गया. फिर पुलिस उस के पति जौनी के पास गई. जौनी बोला कि मुझे पता चला है कि वह किसी बिलाल नाम के युवक के साथ रह रही थी. उस ने ही उस का कत्ल कर दिया है. जौनी ने कहा कि मुझे उस के मर्डर का दुख तो है, लेकिन मेरा उस से कोई वास्ता या सरोकार नहीं रहा. कानूनन मेरा उमा से तलाक हो चुका था.

बिलाल इस समय जेल में है. पुलिस का दावा है कि उस ने सारे सबूत एकत्र कर लिए हैं. आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. Love Crime

 

 

Crime News: Gen-Z इंजीनियर ने किए पेरेंट्स के टुकड़े

Crime News: बुजुर्ग मांबाप के सिर को लोहे के बट्टे से फोड़ा, आरी से दोनों की लाशों के टुकड़े किए, फिर उन्हें नदी में बहा दिया. सवाल यह है कि हैवानियत की सारी हदें पार करने वाले इकलौते इंजीनियर बेटे ने ऐसा क्यों किया? उस से भी बड़ा सवाल तो यह है कि आज के टूटतेबिखरते परिवार और बंटतेकटते समाज पर यह दोहरा हत्याकांड कितना भारी पड़ेगा, जिस ने मानवता के माथे पर कलंक लगा दिया है?

उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला इंजीनियर बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था. दशहरे से ठीक पहले वह अपने घर चला आया था, जबकि उस की पत्नीबच्चे कोलकाता में ही रह गए थे. बच्चों को साथ नहीं लाने पर उस के मम्मीपापा ने शिकायत भी की थी और उसे तीखे ताने भी मारे थे, ”गैर जातिधर्म वाली औरत क्या समझेगी घरपरिवार क्या होता है?’’

इस पर अंबेश तिलमिला गया था. चुप रहने के बजाय उस ने भी मम्मीपापा के तानों का जवाब ताने से ही दिया, ”आप लोग मेरी बीवी को बहू मानते ही नहीं हो तो वह कैसे यहां आएगी…’’

इस बात को ले कर अंबेश की अपने ही मम्मीपापा के साथ काफी समय तक नोकझोंक होती रही.   दिसंबर की 8 तारीख को सर्द भरी रात थी. जौनपुर के ग्रामीण इलाके में कोहरा घना होने लगा था. चारों तरफ शांति थी. हालांकि उसे भंग करने करने के लिए बीचबीच में कुत्तों के भौंकने या फिर पास के हाइवे से वाहनों के हार्न की आवाजें सुनाई दे जाती थी. अंबेश अपने कमरे में लेटा था. उसे नींद नहीं आ रही थी. रजाई में था. घर में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था, जो उस के कहने पर कुछ दिन पहले रोक दिया गया था. असल में उस ने एक तरह से घर में होने वाले निर्माण के काम को जबरन रुकवा दिया था.

अचानक वह बैड से उठा. हवाई चप्पलें पहनीं और बेसमेंट में चला गया. अंधेरे में टटोलते हुए बिजली का स्विच औन किया. एक नजर उस ने कमजोर रोशनी वाले बल्ब की ओर तो दूसरी नजर बेसमेंट के चारों तरफ घुमाई. सीमेंट की खुली बोरी का मुंह बंद कर दिया. इधरउधर बिखरी लोहे की छड़ें, तख्ते, लकडिय़ां, कुदाल, आरी, तसले, बाल्टी, कड़ाही आदि को सहेजने लगा. यह सब करते हुए उस की नजर लोहे के एक बट्टे पर पड़ी. जाने उसे क्या सूझी कि भारी बट्टे को वहां से उठा लाया और अपने कमरे में बैड के नीचे रख दिया.

बेसमेंट में खटपट की आवाज सुन कर अंबेश की मम्मी बबीता देवी की नींद खुल गई थी. वह सीधे बेटे के कमरे में चली आईं.

”क्या बात है अंबेश, नींद नहीं आ रही?’’

”नींद कैसे आएगी मम्मी, एक तरफ तुम्हारी बहू जिद कर रही है और दूसरी तरफ तुम और बाबूजी एक ही बात पर अड़े हो.’’

”तो हम क्या करें… हमें तो इसी परिवार और समाज में रहना है. तुम्हारे बाबूजी की गांव में इज्जत है. हमारे खानदान में आज तक किसी ने दूसरी बिरादरी में शादी नहीं की…तो फिर हम कैसे तुम्हारी पत्नी को बहू मान लें. उस से भी बड़ी बात ये कि वह दूसरे धर्म की है.’’

”दूसरे धर्म की है तो क्या हुआ मम्मी, अब जमाना बदल गया है. जातिधर्म के चलते क्या मैं अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ दूं?’’

”…तो हम उसे स्वीकार कर लें? हम से भी यह कभी नहीं होगा,’’ नाराज होती हुई अंबेश की मम्मी बोलीं.

”जो आप से हो सकता है, वह तो कर दो.’’ अंबेश ने भी नाराजगी के साथ तेज आवाज में कहा.

”क्या करूं मैं?’’ मम्मी बोली.

”मुझे पैसे दे दो, उस से मैं कोलकाता में अपने घर की मरम्मत करवाऊंगा.’’ अंबेश बोला.

”कहां से पैसे दूं…और किसलिए दूं, जब मैं उसे बहू ही नहीं मानती.’’ मां बोली.

”गांव की जमीन बेच दो, वो तो आज नहीं कल मेरी ही है.’’ अंबेश बोला.

”जमीन बेच दें और उस के बाद हम भीख मांगें!’’ मां बोली.

”मुझे पैसा निकालना अच्छे से आता है,’’ अंबेश गुस्से में आंखें लाल करता हुआ बोला.

”लगता है उस हरामजादी के चलते पागल हो गया है तू,’’ मां भी गुस्से में बोली और कमरे से बाहर जाने के लिए मुड़ी.

मांबाप की कर दी हत्या

पत्नी को मम्मी द्वारा दी गई गाली सुन कर अंबेश का चेहरा तमतमा गया. वह बैड के नीचे झुका और लोहे के बट्टे से मम्मी पर पीछे से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से मम्मी बबीता की चीख निकल गई और वह वहीं गिर पड़ीं. उन के सिर से खून बहने लगा था. अंबेश ने उन्हें उठाने के बजाय बट्टे से उन पर और 3-4 वार कर दिए. इस दौरान हुए शोरगुल को सुन कर दूसरे कमरे से उस के पापा श्याम बहादुर भी आ गए. उन्होंने वहां का दृश्य देखा तो सन्न रह गए. मानो उन्हें काठ मार गया हो. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.

अगले पल हाथ में पकड़े मोबाइल से वह कहीं कौल करने लगे. अंबेश अपने पापा को कौल करता देख घबरा गया. उन के हाथ से उस ने मोबाइल झपट लिया, जिस से श्याम बहादुर लडख़ड़ा गए और वापस अपने कमरे की ओर लौटने लगे. किंतु पलक झपकते ही अंबेश ने उन के गले में एक रस्सी फंसा कर खींच लिया और उन्हें वहीं गिरा दिया. उस वक्त उस के दिमाग में हिंसा की सनक सवार थी. वह आक्रामक बना हुआ था. उस ने तुरंत लोहे के खून सने बट्टे को उठाया और दनादन अपने पापा के सिर पर कई वार कर दिए.

श्याम बहादुर भी अपनी पत्नी की तरह कुछ पल में ही लहूलुहान जमीन पर धराशाई पड़े थे. उन्हें कुछ पल तक अंबेश निहारता रहा. उस के बाद बाथरूम में गया और खून से सने अपने हाथपैर धोए. अगले रोज अंबेश की बहन वंदना ने हर रोज की तरह अपनी मम्मी बबीता को कौल किया, लेकिन उन का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. उस के बाद वंदना ने अपने पापा के नंबर पर कौल की. वह भी नौट रिचेबल मिला. उसे चिंता तो हुई, लेकिन उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और अपने दैनिक घरेलू काम में लग गई.

बेटी ने शुरू की तलाश

दोपहर बाद उस ने फिर से मम्मी और पापा को कौल की. उस वक्त भी दोनों में से किसी से बात नहीं हो पाई. उस की चिंता बढ़ गई थी. उस ने न चाहते हुए भी भाई अंबेश को कौल कर दी. उसे अपने भाई की मम्मीपापा से आए दिन होने वाले झगड़े के बारे में मालूम था. इस कारण वह उस से कम ही बात करती थी. भाई का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. रेलवे से रिटायर होने के बाद श्याम बहादुर (65 वर्ष) अपनी पत्नी बबीता (63 वर्ष) के साथ अहमदपुर गांव के 3 मंजिला मकान में रहते थे. श्याम बहादुर की 3 बेटियां और एक बेटा था. बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था.

 

उस ने बीटैक की पढ़ाई की थी और पिछले 3 महीने से वह अकेला ही घर चला आया था. घर में मम्मीपापा और बेटा ही थे. उस की पत्नी मुसलिम समाज की है, जो कोलकाता की रहने वाली है. उसे ले कर अंबेश की अपनी मम्मी से हमेशा नोकझोंक हो जाती थी. मम्मी उसे किसी भी सूरत में बहू स्वीकारने को राजी नहीं थी. उस का नाम आते ही वह भद्दीभद्दी गालियां बकने लगती थीं. बेटे पर बहू को छोडऩे का दबाव बनाए हुए थीं. जबकि अंबेश उस के लिए मम्मीपापा से पैसे मांगता रहता था.

उस रात इसी बात को ले कर मम्मी के साथ ज्यादा बहस हो गई थी. इसे से पहले वह दिन में जमीन और पैसे के लिए पापा से भी उलझ पड़ा था. इस कारण अंबेश गुस्से से भरा हुआ था, जिस का अंजाम यह हुआ कि उस ने पैसे और जमीन के विवाद में अपने मम्मीपापा की नृशंस हत्या कर दी थी. उस के बाद वह फरार हो गया था. वंदना द्वारा मम्मीपापा को फोन मिलाते हुए पूरा दिन निकल गया था. वह जौनपुर में रहती थी. अगले रोज मायके जाने की सोच कर किसी तरह से रात गुजारी. गांव जाने से पहले उस की बात भाई अंबेश से हो गई.

उस से मालूम हुआ कि मम्मीपापा गुस्से में कहीं चले गए हैं. वह उन्हें तलाशने के लिए बनारस चला आया है. इस से वंदना को थोड़ी राहत मिली, लेकिन मम्मीपापा के कहीं गुम हो जाने की अलग चिंता सताने लगी. वह बेचैन हो गई. भाई से न तो मम्मीपापा की सही जानकारी मिल पा रही थी और न ही उन से फोन पर बात हो रही थी. भाई का फोन भी कभी स्विच्ड औफ मिलता तो कभी नौट रिचेबल आता. मम्मीपापा से तो बात किए हुए 4 दिन बीत गए थे. आखिरकार उस ने 13 दिसंबर, 2025 को जाफराबाद थाने जा कर मम्मीपापा और भाई की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी.

इस शिकायत पर जाफराबाद थाने की पुलिस पहले श्यामलाल के घर के पते पर गई. वहां कोई नहीं मिला. घर का मेन गेट बाहर से लौक था. पड़ोसियों से मालूम हुआ कि यह गेट तो 9 दिसंबर से ही बंद है.

पकड़ में आया अंबेश

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंधौरा थाना क्षेत्र की कटौना गांव निवासी वंदना द्वारा थाने में दर्ज करवाई गई शिकायत में अनहोनी की आशंका जाहिर की गई थी. जाफराबाद थाने की पुलिस ने पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए 3 टीमें गठित कीं, जिस के बाद जांच शुरू हुई. अंबेश समेत  श्याम बहादुर और बबीता के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया और उन के पिछले कौल की डिटेल्स निकलवाई गई. जल्द ही पुलिस को सफलता मिल गई और पुलिस ने 15 दिसंबर, 2025 को अंबेश को तलाश कर लिया. वह अपने घर के पास ही मिल गया.

लापता मम्मीपापा के बारे में पूछने पर उस ने सीधे तौर पर कुछ बताने से इनकार कर दिया. उस की बातों से पुलिस समझ गई कि वह अपने मम्मीपापा के बारे में बताने से बच रहा है. पुलिस को उस की बातें संदिग्ध लगीं. फिर उस से सख्ती से पूछताछ की गई. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया, जिस का किसी को अंदेशा नहीं था. जब उस ने कहा कि उस के मम्मीपापा अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन की उस ने हत्या कर दी है, तब पुलिस समेत फेमिली वाले भी सन्न रह गए. बहन वंदना की स्थिति विक्षिप्तावस्था की हो गई. वह अपने पेरेंट्स की बड़ी बेटी थी और अंबेश दूसरे नंबर का.

पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने मम्मीपापा की हत्या की बात स्वीकार की. हत्या का कारण बताया कि 8 दिसंबर, 2025 की रात करीब 8 बजे पैसों के लिए उस का पेरेंट्स से झगड़ा हुआ था. वह आपा खो बैठा और उन पर बट्टे से हमला कर दिया. उन के शवों को ठिकाने लगाने के बारे में उस ने आगे जो बताया, उस से उस की हैवानियत का पता चला. उस ने अपने पेरेंट्स की न केवल नृशंस हत्या कर डाली थी, बल्कि उन के शवों को ठिकाने लगाने के लिए उन को कई टुकड़ों में काट डाला था.

दोनों शवों के कटे टुकड़ों को बेसमेंट में रखे सीमेंट के बोरे में भर दिया था. यह सब करने में उसे कोई रुकावट नहीं आई, क्योंकि उस वक्त घर में वह अकेला था. फिर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए बोरे को कार में रखा. यह वही कार थी, जो उस के पेरेंट्स ने उसे खरीद कर दी थी. कार अपने घर से 8 किलोमीटर दूर गोमती नदी के बेलाव घाट ले कर गया था. वहां उस ने लाश के सभी बोरे नदी में फेंक दिए थे. किसी को शक न हो, इसलिए वह घर वापस आ गया था.

इस के बाद खुद को बचाने के लिए अगले दिन 9 दिसंबर को पेरेंट्स को खोजने का नाटक करने लगा. उस ने उन के लापता होने की खबर अपने परिचितों, रिश्तेदारों को भी दी. खोजबीन में जुटा अंबेश 12 दिसंबर को खुद लापता हो गया. इधरउधर घूमतेघूमते वह वाराणसी चला गया, जहां उस ने गंगा स्नान किया और कुछ समय घाट पर गुजारने के बाद घर चला आया. इस बीच खोजबीन में जुटी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस के सवालों में वह इस कदर उलझ गया कि पेरेंट्स की हत्या की पूरी कहानी बता दी.

मृतक श्याम बहादुर रेलवे में लोको पायलट थे. वह मूलरूप से थाना गद्दी के खरसेनपुर गांव के रहने वाले थे, लेकिन वह अपनी ससुराल में आ कर बस गए थे. वह रामनारायण के 3 दामादों में से एक थे. अंबेश के बयान के बाद पुलिस शवों की गोमती नदी में तलाश करवाने में जुट गई थी. इस के लिए 15 गोताखोर लगाए गए. इस खुलासे के बाद पुलिस ने हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली. मुख्य और एकमात्र आरोपी अंबेश कुमार की निशानदेही पर शवों की बरामदगी का प्रयास किया गया. उस ने अपने बारे में बताया कि उस ने 5 साल पहले कोलकाता की एक महिला से कोविड काल के दौरान प्रेम विवाह किया था, जो वहीं पर ब्यूटीपार्लर चलाती थी.

इकलौते बेटे के इस तरह लव मैरिज करने से उस के मम्मीपापा दुखी रहते थे. यह भी बताया जाता है कि पेरेंट्स का अपनी तीनों बेटियों के प्रति झुकाव अधिक रहता था. इसी वजह से अंंबेश का उन से कई बार विवाद हो चुका था. गांव के लोग दबी जुबान से यह भी कहते पाए गए कि अंबेश अपनी पत्नी के साथ ही पिता के रुपए ले कर शिफ्ट होना चाहता था.

वह 4 भाईबहनों में दूसरे नंबर पर था. सभी बहनों की शादी हो चुकी है. ननिहाल में अंबेश कुमार की अच्छी जिंदगी गुजरती थी. उस ने पिता के पैसों से एक कार भी खरीदी थी.  कार से चलने का शौकीन था. पुलिस के मुताबिक इसी कार में रख कर उस ने अपने पेरेंट्स के शव को ठिकाने लगाया था. अंबेश के अनुसार वह पत्नी द्वारा पैसे की मांग और मम्मीपापा द्वारा दूसरे धर्म की पत्नी को स्वीकार न किए जाने से मानसिक तनाव में था. पैसे के लिए ही बीते 3 माह से घर आया हुआ था. पैसों को ले कर घर पर बात की. पेरेंट्स ने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया. इसी बात से 8 दिसंबर की रात वह उग्र हो गया. उग्र हो कर उस ने लोहे के बट्टे से दोनों के सिर पर हमला कर डाला.

घर में कंस्ट्रक्शन के काम के लिए बेसमेंट में आरी और अन्य औजार रखे हुए थे. आरी से दोनों शवों को 3-3 टुकड़ों में काट दिया. फिर उन टुकड़ों को 6 सीमेंट की बोरियों में भरा. इस के बाद उस ने अपने पेरेंट्स के ही कपड़ों से ही फर्श को साफ किया.

कथा लिखे जाने तक अंबेश कुमार न्यायिक हिरासत में था और बरामद शव के टुकड़ों से उस की डीएनए जांच की तैयारी की जा रही थी. Crime News

 

 

Love Crime: छलिया आशिक को कैसे पहचानें

Love Crime: 4 बच्चों की मां बनने के बावजूद 52 वर्षीय रानी सोमवंशी की हसरतें जवान थीं. वह बनसंवर कर रहती और इंस्टाग्राम पर अपने फोटो शेयर करती. यहीं पर 25 वर्षीय अरुण सिंह राजपूत उसे दिल दे बैठा. बाद में दोनों होटलों में भी मिलने लगे. शादीशुदा होते हुए भी रानी अरुण से शादी करने का ख्वाब संजोने लगी, लेकिन अरुण ऐसा छलिया आशिक निकला कि…

रानी सोमवंशी की धमकी से अरुण डर गया. उस की रातों की नींद व दिन का चैन छिन गया. आखिर उस ने रानी को खत्म करने का निश्चय कर लिया. उस ने रानी को विश्वास में ले कर उस की हत्या का तानाबाना बुन लिया. 8 अगस्त, 2025 को रानी सोमवंशी ने फोन पर अरुण से बात की और उसे धमकाया कि जल्द शादी करो या फिर पैसे वापस करो. इस पर अरुण ने उस से कहा कि वह उस से प्यार करता है और शादी को तैयार है. तुम 10 अगस्त को मैनपुरी आ जाओ और भांवत चौराहे पर मिलो. उस के बाद हम शादी करने का प्लान बनाएंगे.

रानी 9 अगस्त को अपनी ससुराल के गांव जिठौली से फर्रुखाबाद जिले के गांव खेड़ा में रहने वाली अपनी बहन के यहां आई थी. प्रेमी अरुण से बात होने के बाद वह 10 अगस्त को ही ससुराल जाने की बात कह कर वह मैनपुरी चली आई. प्रेमी की इस बात पर रानी खुश हो गई और 10 अगस्त, 2025 की दोपहर साढ़े 12 बजे वह मैनपुरी के भांवत चौराहे पहुंच गई. वहां अरुण पहले से ही रानी का इंतजार कर रहा था. रानी को देख कर वह मुसकरा उठा. रानी ने भी मुसकान बिखेरी. इस के बाद दोनों ने साथ बैठ कर एक रेस्टोरेंट में चायनाश्ता किया. फिर दोनों खरपरी बंबा के पास पहुंचे और सुनसान स्थान देख कर पेड़ के नीचे बैठ कर बतियाने लगे.

बातचीत के दौरान रानी ने शादी की जिद की और दिनतारीख बताने को कहा. यह सुनते ही अरुण को गुस्सा आ गया. उस ने रानी की चुन्नी को उसी के गले में लपेटा और गला कसने लगा. चुन्नी को वह तब तक कसता रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. रानी सोमवंशी की हत्या के बाद अरुण ने रानी के शव को झाडिय़ों में छिपा दिया. रानी के मोबाइल फोन का सिम निकाल क र तोड़ दिया और बंबा में फेंक दिया. मोबाइल कूच कर झाडिय़ों में छिपा दिया. चुनरी को पत्तों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद वह फरार हो गया.

इधर रानी जब देर शाम तक घर नहीं पहुंची तो उस के पति राजपाल को चिंता हुई. उस ने रानी को कौल लगाई, लेकिन उस का फोन बंद था. वह रात भर चहलकदमी करता रहा. सुबह उस ने कुछ लोगों को रानी के लापता होने की जानकारी दी. उस के बाद वह कई दिनों तक पत्नी की खोज में भटकता रहा. जब कुछ पता नहीं चला, तब उस ने जिठौली थाने में पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. 11 अगस्त, 2025 की सुबह मैनपुरी कोतवाली के गांव खरपरी के कुछ किसान अपने खेतों की ओर गए तो उन्होंने बंबा के पास झाडिय़ों के बीच एक महिला की लाश देखी. लाश देख कर उन के होश उड़ गए. खबर गांव तक पहुंची तो वहां भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ग्रामीण ने इस लाश की सूचना थाना मैनपुरी कोतवाली को दे दी.

सूचना मिलते ही एसएसआई राजेंद्र सिंह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ खरपरी बंबा के पास पहुंच गए, जहां झाडिय़ों के बीच महिला की लाश पड़ी थी. उस समय वहां लोगों की भीड़ थी. चूंकि मामला एक महिला की हत्या का था, अत: एसएसआई राजेंद्र सिंह ने सूचना पुलिस अधिकारियों को दी. कुछ देर बाद ही एसपी (सिटी) अरुण कुमार तथा डीएसपी संतोष कुमार सिंह घटनास्थल आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक व डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण शुरू किया. मृतक महिला की उम्र 50-52 वर्ष थी. वह लाल रंग का कुरता व पीले रंग की सलवार पहने थी. गले में पर्स लटका था. हाथ के पास रुमाल पड़ा था और हाथ में लाल रंग का धागा बंधा था.

मृतका के शरीर पर चोट आदि के निशान नहीं थे. देखने से ऐसा लग रहा था कि महिला की हत्या गला घोंट कर की गई थी. शरीर पर कोई आभूषण भी नहीं था. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता महिला के शव को सूंघ कर झाडिय़ों के इर्दगिर्द घूमता रहा, फिर भौकता हुआ बंबा की पटरी पर आया. वह नगला गहियर जाने वाले मार्ग पर कुछ दूर तक गया, उस के बाद वापस आ गया. फोरैंसिक टीम ने भी जांच की, कुछ फोटो खींचे और सबूत जुटाए. अब तक महिला के शव को सैकड़ों लोग देख चुके थे, लेकिन कोई भी शव को पहचान नहीं पाया था. इस से स्पष्ट था कि महिला पासपड़ोस के गांव की नहीं थी. दूरदराज से बुला कर उस की यहां हत्या की गई थी. हत्या किसी खास परिचित ने ही की थी.

जब शव की पहचान नहीं हो पाई, तब पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल मैनपुरी भिजवा दिया. लेकिन 72 घंटे बीत जाने के बाद भी जब शव की पहचान नहीं हुई, तब नियम के मुताबिक पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने अज्ञात में महिला के शव का दाह संस्कार कर दिया. एसपी अरुण कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर को बड़ी ही गंभीरता से लिया. उन्होंने महिला की शिनाख्त व हत्याकांड के खुलासे के लिए 2 टीमें गठित कीं. साथ ही हत्यारों की धरपकड़ के लिए एक पुलिस टीम डीएसपी संतोष कुमार सिंह की देखरेख में गठित की और दूसरी स्वाट प्रभारी जितेंद्र चंदेल के नेतृत्व में बनाई गई.

पुलिस टीमों ने महिला की खोज मैनपुरी के अलावा पड़ोसी जिला फर्रुखाबाद व इटावा में शुरू की. इन जिलों के थानों में महिला की हुलिया सहित फोटो चस्पा कराई गईं. गुमशुदा अधेड़ महिलाओं की सूचना भेजने को कहा गया. डीएसपी संतोष कुमार सिंह ने सुरागसी के लिए अपनी विशेष टीम तथा मुखबिरों को भी लगा दिया. धीरेधीरे 10 दिन बीत गए, लेकिन पुलिस की टीमें महिला के शव की पहचान न कर पाई. मुखबिरों ने भी पसीना बहाया, लेकिन वह भी नाकाम रहे. अखबारों में ब्लाइंड मर्डर की खबरें सुर्खियों में छप रही थीं, साथ ही पुलिस की नाकामी पर भी सवाल उठाए जा रहे थे. खबरों से पुलिस अधिकारी चिंतित थे.

23 अगस्त, 2025 को मैनपुरी कोतवाली के एसएसआई राजेंद्र सिंह को फर्रुखाबाद जिले के थाना राजेपुर से सूचना मिली कि उन के यहां रानी सोमवंशी नाम की महिला की गुमशुदगी दर्ज है. गुमशुदगी उस के पति राजपाल सिंह ने दर्ज कराई थी, जो जिठौली गांव का रहने वाला है. रानी 4 बच्चों की मां है. उस की उम्र 52 वर्ष है. इस सूचना पर पुलिस टीम गांव जिठौली पहुंची और राजपाल सिंह सोमवंशी को महिला की पहचान हेतु मैनपुरी कोतवाली ले आई. एसएसआई ने महिला के शव की फोटो राजपाल सिंह को दिखाई तो वह फफक पड़ा और बोला, ”साहबजी, यह फोटो उस की पत्नी रानी की है. वह 10 अगस्त की सुबह 9 बजे दवा लाने के लिए घर से निकली थी, उस के बाद घर वापस नहीं आई. तब से वह उस की खोज में जुटा था.’’

”क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी पत्नी की हत्या किस ने की है?’’ एसएसआई राजेंद्र सिंह ने पूछा.

”नहीं साहब, मुझे पता नहीं कि रानी की हत्या किस ने और क्यों की है?’’ राजपाल ने जवाब दिया.

”गांव में तुम्हारी किसी से दुश्मनी या लेनदेन का झगड़ा तो नहीं था?’’

”साहब, मैं उम्रदराज सीधासादा किसान हूं. हमारा न तो किसी से झगड़ा है और न ही लेनदेन.’’

”कोई खास या बाहरी व्यक्ति घर में आता था, जिस से रानी का लगाव रहा हो.’’

”ऐसा कोई व्यक्ति घर में नहीं आता था, जिस से रानी का लगाव हो.’’

”रानी के पास मोबाइल फोन था?’’ राजेंद्र सिंह ने पूछा.

”हां साहब, था, लेकिन उस का फोन बंद है. मैं ने कई बार बात करने की कोशिश की थी.’’

राजपाल सोमवंशी से पूछताछ के बाद एसएसआई ने उस से मृतका रानी का मोबाइल फोन नंबर लिया और फिर उस नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि रानी एक खास नंबर पर अकसर बातें करती थी. आखिरी कौल उसी नंबर से उस के मोबाइल पर आई थी. रानी सोमवंशी के मोबाइल पर जो आखिरी कौल आई थी, पुलिस ने उस नंबर को ट्रेस किया तो पता चला कि वह नंबर जनपद मैनपुरी के थाना एलाऊ के किशोरपुर गांव निवासी अरुण सिंह राजपूत के नाम दर्ज है.

यह पता चलते ही पुलिस टीम ने किशोरपुर गांव निवासी अरुण के घर छापा मारा, लेकिन वह घर पर नहीं था. अरुण के पापा मुन्ना राजपूत ने बताया कि अरुण गुरुग्राम (हरियाणा) में रहता है. वह टैंकर चलाता है. इस के बाद पुलिस टीम सर्विलांस की मदद से गुरुग्राम पहुंची और पहली सितंबर 2025 की रात अरुण को गिरफ्तार कर लिया. अरुण को थाना मैनपुरी कोतवाली लाया गया. थाने में अरुण राजपूत से रानी सोमवंशी की हत्या के बारे में पूछा गया तो वह पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करने लगा, लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया.

यही नहीं, पुलिस ने अरुण की निशानदेही पर मृतका रानी का टूटा हुआ मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया, जिस का सिम तोड़ कर अरुण ने बंबा में फेंक दिया था और टूटा हुआ मोबाइल झाडिय़ों में डाल दिया था. पुलिस ने वह चुनरी भी बरामद कर ली, जिस से अरुण ने रानी का गला घोंटा था. चुनरी उस ने पेड़ के पत्तों में छिपा कर ईंट से दबा दी थी. एसएसआई राजेंद्र सिंह ने ब्लाइंड मर्डर का खुलासा करने तथा कातिल को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसपी (सिटी) अरुण कुमार व डीएसपी संतोष कुमार सिंह ने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता कर रानी मर्डर केस का खुलासा कर दिया.

चूंकि अरुण कुमार राजपूत ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और हत्या में प्रयुक्त चुनरी भी बरामद करा दी थी, अत: बीएनएस की धारा 103(1), 228(4) के तहत अरुण राजपूत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में प्यार में छल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद जिला कई मायनों में अपनी पहचान बनाए हुए है. यहां पर बीड़ी और तंबाकू का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. आलू का उत्पादन भी भारी मात्रा में होता है. यहां की नमकीन पूरे उत्तर प्रदेश में मशहूर है. इसी फर्रुखाबाद जिले के राजेपुर थाना अंतर्गत एक गांव है जिठौली. राजपाल सिंह सोमवंशी इसी गांव का निवासी था. उस की पत्नी का नाम रानी सोमवंशी था. उस के 4 बच्चों में 2 बेटे व 2 बेटियां थीं. राजपाल सिंह किसान था. उस के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में आलू, मूंगफली, मक्का और गेहंू की अच्छी उपज होती थी.

राजपाल व रानी अपने बच्चों से बेहद प्यार करते थे. बेटेबेटी में वह भेद भी नहीं करते थे. दोनों उन की हर जिद पूरी करते थे. पढ़ाईलिखाई का भी खूब खयाल रखते थे. उन के दोनों बेटे पढ़लिख कर टीचर बनना चाहते थे, जबकि बेटियां डाक्टर बनना चाहती थीं. राजपाल सीधासादा और कम पढ़ालिखा था. उस के रहनसहन और बोलचाल की भाषा भी साधारण थी. इस के विपरीत उस की पत्नी रानी पढ़ीलिखी थी. वह तेजतर्रार थी. सजसंवर कर रहती थी. जैसा उस का नाम था, वैसे ही वह रानी बन कर घर में रहती थी. राजपाल जो कमाता था, वह सब रानी के हाथ पर रख देता था. घर में उस की हैसियत कोल्हू के बैल की तरह थी. घर चलाने की जिम्मेदारी रानी की थी. बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, खेत में बीजखाद का खर्चा, मजदूरों का खर्चा, सब रानी की जिम्मेदारी थी. राजपाल को तो बीड़ीतंबाकू का ही पैसा मिलता था.

राजपाल का पत्नी रानी पर कोई कंट्रोल नहीं था. वह उस की किसी बात का विरोध नहीं कर पाता था. रानी स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह सामान खरीदने बाजारहाट भी जाती थी. घमंडी भी थी. इसी कारण अड़ोसपड़ोस के घरों से उस की दूरी बनी रहती थी. पड़ोस की महिलाएं उस से कम ही बातें करती थीं. समय बीतता रहा. समय के साथसाथ राजपाल उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गया, जहां सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं. वह सारा दिन फसल की रखवाली में व्यतीत करता और रात को खाना खा कर चारपाई पर पसर जाता. दूसरी तरफ रानी सोमवंशी जो 4 बच्चों की मां थी, वह अब भी अपने को जवान समझती थी और खूब सजसंवर कर रहती थी. उसे घर में सब सुख था, लेकिन पति सुख से वंचित रहती थी.

उस के मन में प्रबल इच्छा होती कि कोई उस की जिंदगी में आए और उस के अरमानों की अलख जगाए. कभीकभी तो वह सोचती कि वह दूसरा विवाह कर ले. पर किस से? यह सोच कर दुखी हो जाती. रानी खाली समय मोबाइल फोन पर व्यतीत करती थी. उसे इंस्टाग्राम चलाने का शौक था. इंस्टाग्राम पर वह अपने एडिट किए हुए फोटो लगाती थी, ताकि वह कम उम्र की और खूबसूरत दिखे. वह चाहती थी कि कोई युवक उस की फोटो देख कर उसे पसंद करे और फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजे. रानी को यकीन था कि एक न एक दिन उस की तमन्ना जरूर पूरी होगी. वह इंतजार में दिन गुजारती रही.

एक रोज अरुण राजपूत ने इंस्टाग्राम पर रानी सोमवंशी की फोटो देखी तो वह उसे पसंद आ गई. उसे लगा कि यही उस के सपनों की रानी है. अत: उस ने फालो कर उसे फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेज दी. रानी ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों की इंस्टाग्राम के जरिए दोस्ती हो गई और उन के बीच चैटिंग होने लगी. अरुण राजपूत उत्तर प्रदेश के ही मैनपुरी जिले के थाना एलाऊ के गांव किशोरपुर का रहने वाला था. उस के पिता मुन्ना राजपूत किसान थे. 3 भाईबहनों में अरुण सब से छोटा था. उस का मन न पढ़ाई में लगा और न किसानी में. अत: उस ने ड्राइवरी सीख ली और ड्राइवर बन गया. कुछ समय बाद वह गांव छोड़ कर गुडग़ांव (हरियाणा) चला गया और वहां टैंकर चलाने लगा.

अरुण राजपूत और रानी सोमवंशी की दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. दोनों एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे. इंस्टाग्राम पर दोनों हर रोज चैटिंग करते थे. रानी अपनी उम्र छिपाने के लिए फिल्टर ऐप का प्रयोग कर अरुण से बात करती थी. लगभग एक साल तक दोनों के बीच चैटिंग चलती रही. फिर चैटिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर शेयर कर लिए. अब इंस्टाग्राम पर चैटिंग के साथसाथ मोबाइल फोन पर भी उन की रसभरी बातें होने लगीं. रानी देर रात अरुण को कौल करती थी.

समय बीतते दोनों का प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच एकदूसरे से रूबरू होने की तमन्ना जागी. एक रोज अरुण ने फोन पर बातचीत के दौरान रानी से कहा कि वह उस से मिलना चाहता है और आमनेसामने बैठ कर बात करना चाहता है. इस पर रानी ने जवाब दिया कि वह स्वयं भी उत्सुुक है. जब चाहो, तब आ जाओ. अरुण रानी से मिलने को उतावला था, अत: तीसरे रोज ही वह मैनपुरी से फर्रुखाबाद आ गया. उस के बाद उस ने रानी से फोन पर बात की और बताया कि वह फर्रुखाबाद आ गया है और यात्री होटल में ठहरा है. तुम कल मिलने आ जाना. मैं तुम्हारा बेसब्री से इंतजार करूंगा. जवाब में रानी ने कहा कि वह कल सुबह 10 बजे तक होटल पहुंच जाएगी. नाश्ता व लंच साथसाथ करेंगे.

वादे के तहत रानी सुबह 9 बजे ही फर्रुखाबाद स्थित यात्री होटल पहुंच गई. होटल रूम में जब पहली बार अरुण ने रानी को देखा तो वह ठगा सा रह गया. इंस्टाग्राम पर जिस रानी की फोटो को उस ने देखा था, सामने बैठी रानी वैसी नहीं थी. वह उस की उम्र से दोगुनी दिख रही थी. हालांकि रानी ने मेकअप कर उम्र छिपाने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन चेहरे की झुर्रियां उस की उम्र की चुगली कर रही थीं.

अरुण समझ गया कि रानी ने प्यार में उस के साथ छल किया है. इंस्टाग्राम पर एडिट फोटो लगा कर उस ने उसे छला है. उस के मन में रानी के प्रति नफरत भर गई, लेकिन उस ने अपनी नफरत को दबाए रखा और रानी से प्यार भरी बातें करता रहा. उस ने रानी को आभास नहीं होने दिया कि उस के मन में नफरत का कितना बड़ा तूफान उठ रहा है. अरुण जहां रानी को देख कर मायूस हुआ, वहीं रानी 25 वर्षीय युवक अरुण को देख कर गदगद हो उठी थी. वह सोचने लगी कि अरुण जैसे गबरू जवान से शादी कर वह अपने सारे अरमान पूरे कर लेगी. उस के नीरस जीवन में एक बार फिर बहार आ जाएगी.

उस रोज रानी ने अरुण से खूब बातें कीं, फिर उस के साथ शारीरिक भूख मिटाई. चंद घंटे होटल में रुकने के बाद रानी वापस घर आ गई. उस दिन वह बेहद खुश थी. रात में भी वह अरुण के बारे में सोचती रही और उस के साथ बिताए खुशी के पलों को याद करती रही. इधर अरुण घर आया तो उसे लगा कि जैसे उस का सब कुछ लुट गया है. रानी जैसी अधेड़ उम्र की महिला से वह शादी कभी नहीं कर सकता. रानी ने प्यार में उस के साथ छल किया था. अत: उस ने भी उस के साथ छल करने का निश्चय किया. प्यार के बदले वह उस से पैसा वसूल करेगा. इंकार किया तो दूरियां बना लेगा.

इस के बाद अरुण जब दोबारा होटल में रानी से मिला तो उस ने रानी से दिखावे के रूप में खूब प्यारभरी बातें कीं. शारीरिक संबंध भी बनाए, फिर जरूरत बता कर रानी से पैसे मांगे. शादी के लालच में रानी ने उसे पैसे दे दिए. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. जब भी अरुण आता, होटल रूम मेें रानी से संबंध बनाता और फिर पैसा मांगता. इस तरह रानी से वह लगभग 2 लाख रुपए ले चुका था. इधर कुछ दिनों से रानी अरुण पर शादी करने का दबाव बनाने लगी थी, लेकिन अरुण कोई न कोई बहाना बना कर टाल देता था.

रानी को उस पर शक हुआ तो उस ने अरुण को धमकाना शुरू कर दिया कि वह या तो उस से शादी करे या फिर पैसे वापस करे, अन्यथा वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा कर उसे परिवार सहित जेल भिजवा देगी. रानी सोमवंशी की धमकी से अरुण राजपूत डर गया और बोला, ”रानी, यह तुम क्या कह रही हो? तुम जैसा कहोगी, वैसा ही मैं करूंगा. थोड़ा समय दो. मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

”तब ठीक है, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. वैसे भी मैं तुम से मजाक कर रही थी.’’ रानी बोली.

अरुण ने घबरा कर रानी से कह तो दिया कि वह उस से शादी रचा लेगा, लेकिन वह ऐसा कर नहीं सकता था, क्योंकि रानी अधेड़ उम्र की थी. भला वह उस से शादी कैसे कर लेता. उस के पेरेंट्स भी रानी को बहू के रूप में स्वीकार नहीं करते. इज्जत उछलती सो अलग से.

इस तरह रानी की शादी की जिद, रुपया वापस करने की मांग तथा जेल भिजवाने की धमकी से अरुण बेचैन हो उठा. आखिर इस समस्या से निपटने के लिए अरुण ने रानी की हत्या की योजना बनाई. उस ने इस की भनक किसी के कानों में नहीं पडऩे दी. आरोपी अरुण सिंह राजपूत से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 3 सितंबर, 2025 को मैनपुरी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Love Crime

 

 

Aligarh News: एक जुर्म दीवाने की खातिर

Aligarh News: पति यूसुफ के घर से निकलते ही तबस्सुम ने योजनानुसार प्रेमी दानिश को फोन कर दिया था. इस बात की जानकारी किसी को नहीं हो सकी. यूसुफ जब शाम को काम से वापस घर नहीं आया, तब फेमिली वालों को चिंता हुई. यूसुफ के साथ फिर क्या हुआ? पढि़ए, इस सनसनीखेज कहानी में…

दानिश और तबस्सुम का 4 सालों तक प्यार परवान चढ़ता रहा, लेकिन अब यूसुफ की दखलंदाजी से दोनों परेशान रहने लगे. फोन पर भी अब तबस्सुम दानिश से डरडर कर कम ही बात कर पाती थी. प्रेमी और प्रेमिका दोनों ही बिन पानी की मछली की तरह तड़पने लगे. जब दोनों को एकदूसरे की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो यूसुफ से छुटकारा पाने के लिए उस की हत्या करने का प्लान बनाया. 29 जुलाई, 2025 को यूसुफ घर से टिफिन ले कर मंडी जाने के लिए घर से निकला था, रास्ते में उसे दानिश ने रोक कर कहा, ”यूसुफ यहां पर सारे दिन काम करने पर भी मिलने वाले पैसों से तुम्हारा काम नहीं चलेगा. मेरे साथ चलो, कासगंज में मेरी जानपहचान है. वहां पर अच्छा काम दिलवा दूंगा.’’

अपने दोस्त दानिश की बातों में आ कर यूसुफ उस की स्कूटी पर बैठ गया. दानिश यूसुफ को अपनी स्कूटी पर बैठा कर कासगंज की ओर ले गया. रास्ते में टिफिन से खाना खाने के बहाने दानिश यूसुफ को विलराम क्षेत्र में स्थित बंद पड़े एक ईंट भट्ठे पर ले गया. दानिश ने अपने लिए खाना पहले ही एक होटल से ले लिया था. भट्ठे पर पहुंच कर दोनों ने वहां बैठ कर अपनाअपना खाना खाया. खाना खाने के बाद दोनों वहीं आराम करने लगे. खाना खाने के कुछ देर बाद ही यूसुफ बेहोश हो गया. तब दानिश ने उस के दोनों हाथ पीछे बांध दिए और अपने साथ लाए छुरे को स्कूटी से निकाल कर यूसुफ के पेट में वार कर उस की हत्या कर दी.

इस के बाद भी उसे तसल्ली नहीं हुई और अपने साथ लाए तेजाब से उस का चेहरा जला कर शव को वहां उगी झाडिय़ों में फेंक कर अपनी स्कूटी से भाग गया. यूसुफ की हत्या करने के बाद दानिश ने काम होने की पूरी जानकारी मोबाइल से अपनी प्रेमिका तबस्सुम को दे दी. इस के बाद दानिश अपने घर आ गया. यूसुफ की हत्या करने के बाद दानिश और तबस्सुम खुश थे. दोनों की फोन पर बातें होती रहती थीं. दोनों साथ रहने का प्लान बना रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

2 अगस्त, 2025 की शाम को कासगंज जिले की बिलराम पुलिस चौकी के गांव नगला छत्ता में बंद पड़े एक ईंट भट्ठे के पास झाड़ी में एक अज्ञात व्यक्ति का अधजला हुआ शव मिला. युवक का शव मिलने की जानकारी जंगल की आग की तरह फैल गई और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में महिलाओं व पुरुषों की भीड़ एकत्र हो गई. कुछ लोग कह रहे थे कि यह आशिकी के चक्कर में मारा गया है, जबकि कुछ का कहना था कि पैसों के लेनदेन के पीछे हत्या हुई है. जितने मुंह उतनी बातें वहां होने लगी.

लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी, पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. शव कई दिन पुराना होने के चलते उस में कीड़े पनप गए थे.  मृतक के दोनों हाथ पीछे रस्सी से बंधे हुए थे. शव को देखने से प्रतीत हो रहा था कि पेट में किसी धारदार हथियार से वार कर के मौत के घाट उतारा गया था. शव को पेट्रोल या तेजाब से जला दिया गया था, ताकि उस की शिनाख्त न हो सके. सूचना मिलने पर एसपी (देहात) अमृत जैन भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य जुटाए. शव की पहचान कराने का प्रयास किया गया, लेकिन शव की पहचान न होने पर पुलिस समझ गई कि युवक कहीं बाहर का है और उस की हत्या यहां ला कर की गई है.

पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद शव को मोर्चरी भिजवा दिया. इस के बाद आसपास  के थानों व जिलों से लापता लोगों के बारे में जानकारी की गई. पुलिस को पता चला कि थाना छर्रा के धनसारी गांव का यूसुफ पिछले कई दिनों से लापता है. इस पर पुलिस ने बिना देर किए यूसुफ के फेमिली वालों से संपर्क किया. यूसुफ के फेमिली वाले जब थाने पहुंचे तो उन्होंने कपड़ों और चप्पलों के आधार पर शव की शिनाख्त यूसुफ के रूप में की. 29 जुलाई, 2025 की शाम के 6 बज चुके थे और 27 वर्षीय यूसुफ अभी तक गल्ला मंडी से वापस नहीं लौटा था. यूसुफ गल्ला मंडी में काम करता था. दोनों बच्चे शाम होते ही बेसब्री से अपने पापा का इंतजार करने लगते थे, क्योंकि यूसुफ बच्चों के लिए खानेपीने और कभीकभी कोई खिलौना ले कर जरूर आता था.

सुबह से शाम हो गई और जब रात घिरने लगी तो बड़े बेटे असलान ने अपनी मम्मी तबस्सुम से पूछा, ”मम्मी, पापा अब तक क्यों नहीं आए हैं? वैसे तो वो शाम तक आ जाते थे.’’

”बेटा, पापा को आज ज्यादा काम मिल गया होगा, इसलिए उन्हें आने में देर हो गई है.’’ तबस्सुम ने कहा.

जब रात के 9 बज गए, तब यूसुफ के पिता भूरे खां ने बहू तबस्सुम से पूछा, ”बहू, यूसुफ सुबह जाते समय क्या कह गया था कि वह देर से घर आएगा?’’

इस पर तबस्सुम ने जबाव दिया, ”नहीं पापाजी, वह मुझ से तो कुछ कह नहीं गए थे. मैं ने फोन किया था, लेकिन उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. मुझे लगा कि कहीं काम में फंस गए होंगे. उन्होंने वापस कौल भी नहीं की.’’

यह सुन कर भूरे खां को चिंता हुई. यूसुफ सुबह गल्ला मंडी जा कर शाम को घर लौट आता था, लेकिन आज उस ने फोन कर के भी नहीं बताया कि वह देरी से आएगा. उन्होंने सोचा कि इस समय तो गल्ला मंडी भी बंद हो चुकी होगी. बेटे को तलाशें तो तलाशें कहां? फिर भी उन्होंने स्वजनों के साथ यूसुफ को ढंूढा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. अलीगढ़ के थाना छर्रा के गांव धनसारी निवासी भूरे खां व उन के फेमिली वालों ने यूसुफ के इंतजार में पूरी रात आंखों में काटी. सुबह होते ही भूरे खां ने फेमिली वालों के साथ गल्ला मंडी जा कर बेटे की तलाश की. साथ ही उस के साथ काम करने वाले अन्य लोगों से बेटे यूसुफ के बारे में जानकारी की. लोगों ने बताया कि यूसुफ कल तो मंडी आया ही नहीं था.

यह सुनते ही भूरे खां के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उन के मन में तरह तरह के विचार आने लगे कि कहीं बेटे के साथ कोई अनहोनी तो नहींं हो गई. कल से उस का कोई हालचाल नहीं मिला था. बेटे की तलाश में भूरे खां ने जहां भी संभव हो सकता था, वहां उस की तलाश की. दूसरे दिन यानी 30 जुलाई को भूरे खां ने थाना छर्रा में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद  पुलिस और यूसुफ के फेमिली वाले उस की तलाश करते रहे, लेकिन 4 दिन तलाशने के बाद भी यूसुफ का कोई पता नहीं चला.

यूसुफ की नृशंस हत्या से घर में कोहराम मच गया. यूसुफ  के बच्चों के फूल से खिले चेहरे पिता की मौत से मुरझा से गए. पुलिस ने फेमिली वालों को ढांढस बंधाते हुए उन से हत्यारों की तलाश में मदद करने को कहा. कासगंज में यूसुफ के शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव फेमिली वालों को सौंप दिया गया. 3 अगस्त को डैडबौडी शाम 5 बजे गांव पहुंची. परिजनों और ग्रामीणों ने घटना का खुलासा करने और सभी आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छर्राकासगंज मार्ग पर जाम लगाने की कोशिश की. तब पुलिस ने उन्हें समझा कर सड़क से हटा दिया, इस के बाद गांव में शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

अपने पति की हत्या से यूसुफ की पत्नी तबस्सुम का रोरो कर बुरा हाल था. वह कभी अपने को संभालती तो कभी बच्चों को.  पुलिस ने मृतक यूसुफ की पत्नी के साथ ही घर के अन्य सदस्यों से गहनता से पूछताछ की. बच्चों से भी पुलिस ने जानकारी जुटाई. तबस्सुम ने बताया कि उस ने पति के वापस न आने पर उस ने फोन किया था, लेकिन उन का फोन स्विच औफ आ रहा था. तब उस ने पति के दोस्त दानिश को फोन कर पति के बारे में पूछा था. दानिश ने पति यूसफ के बारे में कोई जानकारी न होने की बात कही थी. इस पर मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और मृतक की पत्नी तबस्सुम के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच की. इस के अच्छे परिणाम शीघ्र ही सामने आ गए.

पुलिस ने गहनता से जांच कर इस हत्या की गुुत्थी सुलझा कर इस हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. जो सच्चाई सामने आई है, वो बेहद हैरान करने वाली थी. यूसुफ की दर्दनांक हत्या के पीछे जो कहानी सामने आई, उस ने सब को चौंका दिया. यूसुफ की पत्नी तबस्सुम ने अपने गांव में रहने वाले 28 वर्षीय प्रेमी दानिश के साथ मिल कर इस हत्या की साजिश रची थी. दोनों के प्रेम प्रसंग की जानकारी होने पर जब यूसुफ ने इस का विरोध किया तो दोनों ने मिल कर अपने प्यार के रास्ते से हटाने की ठान ली.

पुलिस ने 3 अगस्त, 2025 को मृतक के पिता भूरे खां की तहरीर पर हत्या की रिपोर्ट  तबस्सुम, उस के प्रेमी दानिश व दानिश के  अज्ञात साथियों के खिलाफ दर्ज कर ली गई. कौल डिटेल्स में तबस्सुम और प्रेमी दानिश के बीच लंबेलंबे समय तक बातचीत के साक्ष्य मिले. इस के बाद तबस्सुम को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि यूसुफ को बड़ी बेरहमी से मारा गया था. बेहोश होने के बाद पहले उस के हाथ पीछे बांधे गए. फिर धारदार हथियार से पेट पर वार किए गए. हत्या के बाद पहचान मिटाने के लिए उस के शरीर पर तेजाब डाला गया.

जांच के बाद पुलिस ने 3 अगस्त को ही तबस्सुम को गिरफ्तार कर लिया. उस ने पूछताछ में सारा राज उगल दिया. प्रेम और वासना में अंधी हो कर तबस्सुम ने अपने पति से छुटकारा पाने के लिए उसे मौत के घाट उतारने की साजिश यूसुफ के दोस्त और अपने आशिक दानिश के साथ मिल कर रची और उसे अंजाम तक पहुंचाया. पुलिस ने पूछताछ के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस को 6 अगस्त, 2025 की शाम मुखबिर से सूचना मिली कि यूसूफ की हत्या का आरोपी दानिश जो कि यूसुफ का दोस्त भी है, रामपुर बंबा के निकट कहीं जाने की फिराक में है. सूचना मिलते ही पुलिस एलर्ट हो गई और बंबा के पास से दानिश को गिरफ्तार कर लिया.

दानिश को थाने ला कर उस से यूसुफ की हत्या के बारे में पूछताछ की गई. उस ने बताया कि गांव में उस का और यूसुफ का घर थोड़ी दूरी पर ही है. हम दोनों में दोस्ती थी. यूसुफ के घर आनाजाना रहता था. करीब 4 साल पहले एक दिन जब वह यूसुफ के घर गया था, उस की यूसुफ की पत्नी तबस्सुम से आंखें चार हो गईं. तबस्सुम बला की खूबसूरत थी. दानिश भी कसे शरीर का सुंदर युवक था. पहली ही मुलाकात में दोनों ने आंखों ही आखों में एकदूसरे के दिल पर मोहब्बत की दस्तक दे दी थी.

अब दानिश अकसर यूसुफ के घर आ जाता था. वह बच्चों के लिए कोई न कोई गिफ्ट या उन के पसंद की खानेपीने की चीजें ले कर आता. इस बीच दानिश ने यूसुफ की गैरमौजूदगी में तबस्सुम से उस का मोबाइल नंबर ले लिया. यूसुफ के काम पर जाने के बाद दोनों प्रेमी प्रेमिका फोन पर घंटों बातें करते थे. पति यूसुफ के मंडी जाने के बाद वह बाजार जाने के बहाने घर से निकल जाती और अपने प्रेमी दानिश से मिलती. इस बीच दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ते भी बन गए थे. जब भी तबस्सुम को मौका मिलता वह दानिश से मिल आती. तबस्सुम के खयालों में हरदम अपने प्रेमी दानिश की तसवीर रहती थी. वह चाहती थी कि उस का दीवाना हर पल उस की आंखों के सामने ही रहे.

पत्नी के बदलते व्यवहार पर यूसुफ को शक हुआ. फिर उसे दोस्त दानिश और पत्नी तबस्सुम के प्रेम प्रसंग की भनक लगी तो उस ने तबस्सुम का विरोध किया. दानिश को ले कर आए दिन उन के घर में कलह भी होने लगी. पूछताछ में पत्नी तबस्सुम ने पुलिस को बताया, वह अपने प्रेमी दानिश के साथ जाना चाहती थी. पति यूसुुफ इस का विरोध करता था. वह दानिश से बात करने और घर पर उस के सामने आने को मना करता था. पति यूसुफ मंडी के काम से इतना कमा नहीं पाता था, जिस से घर में तंगी बनी रहती थी. जबकि दानिश उस पर खूब खर्च करता था और उस की हर बात का खयाल रखता था.

योजना के अनुसार 29 जुलाई, 2025 को उस ने यूसुफ के खाने में नींद की गोलियां पीस कर मिला दी थीं. ये गोलियां दानिश ने ला कर दी थीं. इस के साथ ही पति के घर से गल्ला मंडी के लिए निकलते ही दानिश को फोन कर दिया था. बताते चलें कि भट्ठे पर जब यूसुफ ने टिफिन से खाना खाया तो नींद की गोलियों की मात्रा खाने में अधिक मिली होने से वह खाना खाने के कुछ समय बाद ही बेहोश हो गया. इस का फायदा उठाते हुए दानिश ने उस की नृशंस तरीके से हत्या कर दी. भूरे खां ने बताया कि बेटे यूसुफ की 7 साल पहले मडराक निवासी तबस्सुम से शादी हुई थी. यूसुफ के 6 साल और 4 साल के 2 बेटे हैं.

सब कुछ ठीक चल रहा था. 4 साल पहले जब से दानिश से यूसुफ की दोस्ती हुई तब से तबस्सुम फोन पर दानिश से बात किया करती थी. इस का यूसुफ विरोध किया करता था. इसी के चलते तबस्सुम ने दानिश के साथ मिल कर यूसुफ की बेहरमी से हत्या कर दी. उस ने अपने छोटे बेटों की भी चिंता नहीं की. थानाप्रभारी राजेश कुमार के अनुसार, जहां तबस्सुम और दानिश के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकाली गई, वहीं घटना में सीसीटीवी फुटेज की भी मदद ली गई.

घटना वाले दिन दानिश अपनी सफेद स्कूटी पर यूसुफ को बैठा कर अपने साथ ले जाता हुआ नजर आया. सभी सबूत एकत्रित कर घटना का परदाफाश किया गया है. आरोपी दानिश की निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त छुरा भी बरामद कर लिया गया है. सीओ (छर्रा) धनजंय सिंह के अनुसार, प्रेमिका ने ही प्रेमी के साथ मिल कर घटना का अंजाम दिया. दोनों जेल भेज दिए गए हैं. मृतक का चेहरा भी जलाया गया था. शिनाख्त कपड़ों व चप्पल से हुई. शव 4-5 दिन पुराना भी लग रहा था. अवैध संबंधों के चलते यूसुफ की हत्या की गई है.

पुलिस को इस मामले का परदाफाश करने में ज्यादा टाइम नहीं लगा. पत्नी को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने पति की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. लेकिन उस की बात पूरी तरह पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. तब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स जांची तो पड़ोस में रहने वाला दानिश पुलिस के रडार पर आया. लव अफेयर के चलते पत्नी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर अपने ही जीवनसाथी को मार डाला. अब पत्नी तबस्सुम और प्रेमी दानिश अपने किए का फल भोगेंगे. Aligarh News

 

 

UP News: चीटर कौन दरोगा या उस की बीवी

UP News: यूपी पुलिस के दरोगा आदित्य कुमार लोचन अपनी पत्नी दिव्यांशी चौधरी को लुटेरी दुलहन बता रहे हैं, जबकि दिव्यांशी ने भी पति पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं. यह हाईप्रोफाइल मामला अब कोर्ट में जा चुका है. कोर्ट के फैसले के बाद ही पता लगेगा कि दोनों में से चीटर कौन?

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के बी.बी. नगर का रहने वाला आदित्य कुमार लोचन यूपी पुलिस में दरोगा था. गांव के ही ताऊजी दिव्यांशी चौधरी नाम की युवती का रिश्ता आदित्य कुमार के लिए ले कर आए थे. जब आदित्य कुमार को पता चला कि उसे दहेज में स्कौर्पियो और लाखों के जेवर मिलने वाले हैं तो उस ने शादी के लिए हां कर दी. पर कहते हैं न कि लालच बुरी बला है और इसी बला ने दरोगाजी को घेर लिया.

फरवरी, 2024 की शाम थी. दिन में तेज धूप, शाम को मौसम सामान्य और रात में गुलाबी सर्दी. मौसम का यह मिजाज यहां अकसर देखने को मिलता है. 17 फरवरी, 2024 को भी ऐसा ही मौसम था, जब बुलंदशहर के बी.बी. नगर निवासी दरोगा आदित्य कुमार ने जीवनसाथी के रूप में दिव्यांशी का हाथ थामा था. यह 17 फरवरी,  2024 का वही दिन था, जब आदित्य ने दिव्यांशी से शादी की थी. वह मुसकराती हुई, हल्दी व मेहंदी की खुशबू और कंगनों की खनक के साथ उस के घर आई थी. आदित्य को लगा था कि उस की जिंदगी अब पटरी पर आ जाएगी.

पहली नजर में यह रिश्ता परिवारों के सपनों से सजा लगता था, लेकिन किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह रिश्ता कुछ महीनों में सुर्खियों में बदल जाएगा. कुछ ही समय में इस रिश्ते की परतें खुलने लगीं. आदित्य का कहना है कि दिव्यांशी कभी घर रुकती नहीं थी, आए दिन पैसों की मांग करती थी. महीना बीता नहीं था कि तसवीर बदलने लगी. दिव्यांशी का मूड हर दिन कुछ नया बहाना ढूंढता. वह कहती कि यह घर ठीक नहीं, तुम मुझे समझते नहीं, मुझे मायके जाना है, पैसे भेज दो वगैरहवगैरह. आदित्य पहले समझने की कोशिश करता, फिर उसे समझाने की और आखिर में वह थक चुका था.

यूं शुरू हुई दोनों में अनबन

2019 बैच के सबइंसपेक्टर आदित्य कुमार लोचन के पापा ऋषिपाल किसान थे और मम्मी राजेश देवी घरेलू महिला थीं. पापा की मौत के बाद कैंसर से मम्मी की भी मौत हो गई थी. घर में एक भाई है. वह भी दिव्यांग है. यानी एक तरीके से कहें कि सिर्फ दरोगा आदित्य ही घर थे और वही परिवार. एक रिश्ते के ताऊ आदित्य के लिए 29 साल की दिव्यांशी का रिश्ता ले कर आए थे. बताया कि दिव्यांशी की कोठी आदित्य के घर से 50 किलोमीटर दूर मेरठ के मवाना में स्थित है. दहेज में स्कौर्पियो कार, लाखों के जेवर और धूमधाम से शादी की बात ताऊ ने कही. खूबसूरत दिव्यांशी को देख कर दरोगा आदित्य कुमार लोचन और उन के फेमिली वालों ने भी हामी भर दी थी.

शादी को अभी 4 महीने ही हुए थे, पर आदित्य के मन में कुछ खटकने लगा था. दिव्यांशी अकसर कहती, ”मैं बीएड और सीटेट की तैयारी कर रही हूं, मायके में पढ़ाई में ध्यान ज्यादा लगता है. मेरे मायके का घर में बना एक स्टडीरूम मुझे पहचानता है और मैं स्टडीरूम को जानती हूं. मुझे उस में पढऩे की आदत बनी हुई है.’’

पहले आदित्य ने भरोसा किया, फिर धीरेधीरे आदतें शक पैदा करने लगीं. वह मायके में रह कर औनलाइन पैसों की मांग करती, कभी कोचिंग की फीस, कभी किताबें तो कभी फार्म भरने के नाम पर. आदित्य बिना सवाल किए रुपए भेज देता, क्योंकि वह उस की पत्नी थी और भरोसा करना उस के संस्कारों का हिस्सा था, लेकिन हर बार जब वह ससुराल आती, कुछ अजीब करती. अपने मोबाइल से सारे यूपीआई ऐप डिलीट कर देती.

‘इतना क्यों छिपाती है? आखिर क्या है, जो दिखाना नहीं चाहती?’ यह सवाल आदित्य को हर दिन परेशान करता रहा.

एक दिन आदित्य ने उस से कहा, ”दिव्यांशी, अपना मोबाइल दिखाना जरा.’’

बस इतना कहना था कि दिव्यांशी के चेहरे की रंगत उड़ गई. उस ने मोबाइल पकड़ाया. आदित्य ने उस से फोन का पासवर्ड पूछ कर स्क्रीन खोली. जैसे ही उस ने चैक किया, उन की भौंहें सिकुड़ गईं. मोबाइल में एक भी यूपीआई ऐप नहीं था, सब डिलीट. वह धीरे से बोला, ”तैयारी करती हो तो फीस किस से भरी? फार्म किस से जमा किया? किताबें कैसे खरीदीं? इस मोबाइल में यूपीआई या बैंक से संबंधित कोई ऐप डाउनलोड है ही नहीं. जबकि तुम ने जितने भी रुपए मुझ से लिए हैं, सब औनलाइन ही लिए हैं, वो भी अपने फोन नंबर के जरिए.’’

दिव्यांशी कुछ बोल न पाई, बस बारबार होंठ भींचती रही. आदित्य की सारी शंकाएं अचानक आकार लेने लगीं. उस दिन से घर का माहौल ही बदल गया. विश्वास में दरारें साफ दिखने लगीं और दिव्यांशी के झूठ की परतें एकएक कर के खुलती चली गईं.

कमिश्नर औफिस में क्यों किया हंगामा

पिछले साल 25 नवंबर को कानपुर कमिश्नरी कार्यालय में दिव्यांशी ने हाईवोल्टेज ड्रामा किया था. वह एक ठंडी सुबह थी. कमिश्नरी कार्यालय के बाहर भीड़ जमा थी. आरोप है कि वह अपने साथ कई लोगों को ले कर आई थी. भीतर से आवाजें गूंज रही थीं. किसी के रोने की, किसी के समझाने की और किसी के गुस्से से कांपती आवाज थी. यही दिन था, जब दिव्यांशी ने अपने पति आदित्य के खिलाफ आरोपों की झड़ी लगा दी थी. सब के सामने सच उजागर करने का दावा किया था. वह इस समय कमिश्नर के दफ्तर में थी और आदित्य कुमार की शिकायत कर रही थी. रोरो कर अपना दुखड़ा सुना रही थी. चेहरे पर आंसू और आंखों में आग लिए वह पुलिस अधिकारी के सामने बोली, ”इस आदमी ने मेरा सब कुछ बरबाद कर दिया.’’

उस के शब्द हवा में तीर की तरह गूंजे. दिव्यांशी का आरोप था कि पति आदित्य ने उसे महीनों तक मानसिक रूप से परेशान किया और उस की मेहनत की कमाई के 14 लाख 50 हजार रुपए हड़प लिए. लेकिन यह केवल पैसों का मामला नहीं था. दिव्यांशी ने और भी गंभीर आरोप लगाए. उस ने कहा कि आदित्य सोशल मीडिया पर लड़कियों से दोस्ती करता है, मीठी बातें कर उन का भरोसा जीतता है, फिर उन्हें अपने जाल में फंसा लेता है. बाद में उन्हीं की तसवीरें और वीडियो का इस्तेमाल कर उन्हें धमकाता और ब्लैकमेल करता है.

मामला पुलिस के एक दरोगा आदित्य से जुड़ा होने के कारण पत्रकारों की भीड़ कमिश्नरी के बाहर जमा हो गई. कमिश्नर कार्यालय से बाहर निकलते ही यूट्यूबर और चैनलों के पत्रकारों ने भी दिव्यांशी को घेर लिया. दिव्यांशी ने रोरो कर वो सारी बातें पत्रकारों को बताईं, जो शिकायत उस ने कमिश्नर साहब से लिखित में की थी. 14 लाख 50 हजार रुपए दिए जाने के मोबाइल ऐप गूगलपे व सबूत के तौर पर बैंक के लेनदेन के कागज भी पत्रकारों को दिखा रही थी. कमिश्नरी के गलियारों में यह मामला गूंजने लगा.

इस बीच दरोगा आदित्य कुमार भी अपनी सफाई देने कमिश्नर के पास पहुंच गया. यह देख कर मीडियाकर्मी वहीं रुक गए, जिस से कि उस का भी इंटरव्यू लिया जा सके. आदित्य कुमार भी पूरी तैयारी के साथ आया था. एक मोटी फाइल उस के हाथ में थी.

दरोगा ने कमिश्नर को बताई सच्चाई

आदित्य कुमार ने कमिश्नर साहब को सबूत के साथ पूरी जानकारी दी. उस ने कहा, ”मैं ने अपनी खुफिया जांच पत्नी दिव्यांशी घर के आसपास के लोगों से पूछताछ शुरू की थी. पता चला कि वह पहले से ही शादीशुदा है. पहले जिस से शादी हुई थी, दिव्यांशी ने उन लोगों पर मुकदमा दर्ज करा रखा है. इस के बाद मैं ने ई कोर्ट ऐप पर दिव्यांशी की डिटेल डाली तो एक मुकदमा दिव्यांशी वर्सेज प्रेमराज पुष्कर का सामने आ गया.

”मैं ने इस के दस्तावेज निकलवाए. पता चला कि दिव्यांशी ने मेरठ के थाना पल्लवपुर में दरोगा प्रेमराज पुष्कर और उस के भाई भूपेंद्र पुष्कर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी. फिर मैं ने मेरठ न्यायालय से इस मुकदमे के दस्तावेज निकलवाए. दिव्यांशी ने दरोगा प्रेमराज पुष्कर और उस के भाई भूपेंद्र पर एफआईआर दर्ज करवाई थी.

”कोर्ट में मजिस्ट्रैट के सामने बयान देते समय पलट गई. उस ने कहा था कि मेरा प्रेमराज पुष्कर से 3 जुलाई, 2019 को प्रेम विवाह हुआ था. मुझे इस के खिलाफ मेरठ के हस्तिनापुर थाने से भी एक रेप की एफआईआर मिली. इस में दिव्यांशी ने पंजाब नैशनल बैंक, हस्तिनापुर के मैनेजर आशीष राज और मवाना मेरठ के बैंक मैनेजर अमित गुप्ता पर भी एफआईआर दर्ज कराई थी. मुकदमे से अमित का नाम निकाल दिया गया था. नाम निकलवाने में भी मोटी रकम वसूले जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. इस मामले में भी दिव्यांशी कोर्ट में अपने ही बयान से पलट गई. यहां पर बैंक मैनेजर से लाखों रुपए वसूला गया होगा.’’

दरोगा आदित्य कुमार लोचन ने आगे कहा कि मैं ने रेप के आरोप में जेल जा चुके प्रेमराज पुष्कर से बात की तो पता चला कि वह दिव्यांशी के अभी भी संपर्क में है. दिव्यांशी को उस ने मेरी गोपनीय जांच के बारे में बता दिया. इस से दिव्यांशी समझ गई कि अब उस की दाल नहीं गलने वाली है. इस के बाद दिव्यांशी अपने लाखों के जेवरात और कीमती सामान समेट कर मायके चली गई. कुछ दिनों बाद वह मेरे घर पहुंची और मेन गेट का ताला तोड़ कर घर में घुस गई. मकान पर कब्जा कर वहीं रहने लगी. जब मैं वहां नहीं गया तो उस ने संबंधित थाने में तहरीर दी, लेकिन जांच में उस के सभी आरोप झूठे पाए गए.

 

इस के बाद एक करोड़ रुपए की मांग करने लगी, पूरी नहीं होने पर पूरे परिवार को जेल भिजवाने की धमकी दी. इस के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो आज 25 नवंबर को दिव्यांशी कानपुर पहुंची और पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार को मेरे खिलाफ तहरीर दी. मैं ने दस्तावेज पेश किए तो वह भाग गई. आदित्य ने बताया कि जब मैं ने दिव्यांशी के फोन में डिलीट हो चुके सभी यूपीआई ऐप डाउनलोड कराए तो मेरे होश उड़ गए. ट्रांजैक्शन हिस्ट्री में 10 से ज्यादा खातों में करोड़ों का ट्रांजैक्शन किया गया था. खातों के बारे में पूछने के बाद दिव्यांशी मुझ से झगड़ा कर के सब ज्वैलरी व कीमती सामान ले कर मायके चली गई.

पुलिस कमिश्नर ने एडीसीपी को सौंपी जांच

उधर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने तुरंत एडिशनल डीसीपी (महिला अपराध) को जांच सौंपी. इस के बाद पुलिस ने दिव्यांशी की जांच शुरू की. पुलिस ने जब दिव्यांशी के खाते की जांच की तो कई चौंकाने वाले सच सामने आए. उस के बैंक खातों में करोड़ों का ट्रांजैक्शन मिला. शक हुआ कि इस के गैंग में कई पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. दिव्यांशी के सनसनीखेज आरोपों के बाद मामले की जिम्मेदारी एडिशनल डीसीपी (महिला अपराध) को सौंपी गई थी.

यह एक जटिल जांच थी, क्योंकि इस में न केवल वित्तीय धोखाधड़ी शामिल थी, बल्कि ब्लैकमेलिंग और डिजिटल सबूतों का एक जाल भी था. सब से पहले, दिव्यांशी का विस्तृत बयान दर्ज किया गया. इस में 14.50 लाख रुपए के लेनदेन का ब्यौरा (बैंक रिकौर्ड, हस्तांतरित दस्तावेज) और पति आदित्य द्वारा किए गए कथित ब्लैकमेलिंग की पूरी जानकारी शामिल थी. उस ने उन सोशल मीडिया अकाउंट्स और चैट हिस्ट्री के स्क्रीनशौट्स भी उपलब्ध कराए, जिन से आदित्य कथित तौर पर अन्य युवतियों को फंसाता था.

पुलिस ने आदित्य के बैंक खातों और संपत्ति के रिकौर्ड की जांच शुरू की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि 14.50 लाख रुपए कहां गए? क्या वे किसी अन्य खाते में स्थानांतरित किए गए या किसी संपत्ति की खरीद में इस्तेमाल हुए? पुलिस ने आदित्य को पूछताछ के लिए बुलाया तो उस ने सभी आरोपों से इनकार किया. आदित्य के मोबाइल फोन, लैपटाप और अन्य डिजिटल उपकरणों को जब्त कर लिया गया. फोरैंसिक टीम ने डिलीट की गई चैट्स, वीडियो और फोटो को रिकवर करने का प्रयास किया.

पुलिस ने आदित्य के सोशल मीडिया प्रोफाइल की जांच की और उन युवतियों को तलाश किया. यह जांच का सब से नाजुक हिस्सा था, क्योंकि कई पीडि़त बदनामी के डर से सामने आने को तैयार नहीं होते हैं. असली झटका तब लगा था, जब आदित्य कुमार ने ग्वालटोली थाने में दिव्यांशी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तहरीर देने की हिम्मत जुटाई. यह बात नवंबर 2024 की है. करीब एक साल तक पुलिस काररवाई में ढील देती रही. कभी दोनों का पारिवारिक मामला आपसी समझौते से ही तय हो जाए. मामला उलझता ही जा रहा था.

17 नवंबर, 2025 की बात है. आदित्य थाने में अपने औफिस में बैठा था. पत्नी दिव्यांशी की फाइल उन के सामने रखी थी. कागज पर लिखे शब्द जैसे उस के सपनों को चीरते जा रहे थे. उस का दिमाग अभी भी उस दिन की यादों में ही उलझा था कि तभी गेट पर जोरजोर से बातें होने लगीं. ड्यूटी पर मौजूद सिपाही ने आ कर बताया, ”सर, दिव्यांशी को गिरफ्तार कर लिया गया है.’’

यह सुन कर आदित्य का दिल एक धड़कन के लिए रुक गया. पुलिस जीप के पीछे से उतारी गई दिव्यांशी का चेहरा वैसा ही शांत था, मानो उसे पता ही हो कि ये सब होने वाला है, पर असली तूफान वो नहीं था. तूफान था उस की फाइल. दिव्यांशी उस से पहले 2 बैंक मैनेजरों से शादी कर चुकी थी, एक दरोगा को भी अपने जाल में फंसा चुकी थी और उन तीनों पर बलात्कार जैसे संगीन मामलों के फरजी मुकदमे लिखा कर मोटी रकम ऐंठ चुकी थी. औफिस के बाहर मीडिया का शोर बढ़ता जा रहा था. कितने लोग फंसे इस में? कौन है इस खेल का असली मास्टरमाइंड? क्या दिव्यांशी अकेली है या किसी और के इशारों पर चल रही है? और सब से बड़ा सवाल कि क्या अगला शिकार आदित्य ही था?

दिव्यांशी को सुरक्षित करते हुए पत्रकारों को पूरी जानकारी डीसीपी (सेंट्रल) श्रवण कुमार सिंह ने दी. डीसीपी श्रवण कुमार सिंह ने प्रैसवार्ता में पत्रकारों को बताया कि आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है. यह बात सोमवार 17 नवंबर, 2025 की है. उस को मंगलवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा. इस से पहले थाने आने पर आदित्य ने दिव्यांशी की ओर देखा. वह शांत खड़ी थी, जैसे किसी बात का इंतजार कर रही हो. फिर उस ने हलकी मुसकान दी. ऐसी मुसकान, जिस में डर नहीं, बल्कि रहस्य छिपे थे.

पर सवाल अभी भी हवा में लटका था कि क्या यह उस की आखिरी शादी थी या सिर्फ आखिरी गिरफ्तारी? दरोगा के साथ हुए हैरेसमेंट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस ने 2 बार सुसाइड करने का भी प्रयास किया था. यह पुलिसकर्मी दिव्यांशी के गिरफ्तार हो जाने के बाद दरोगा आदित्य पर समझौते का दबाव बना रहे थे. कहानी कुछ ऐसी निकली कि पुलिस अफसरों तक के होश उड़ गए. यह हैरानी की बात नहीं सच है, क्योंकि यहां पकड़ी गई दिव्यांशी 8 करोड़ के गेम को अकेले खेलने वाली ऐसी खिलाड़ी निकली, जिस ने कोई 1-2 नहीं बल्कि  4-4 शादियां कीं.

थाने का माहौल उस दिन बेहद तनावपूर्ण था. पुलिस दिव्यांशी को सीधे थाने ले आई, यह जानते हुए कि मामला हाईप्रोफाइल है और हंगामे की पूरी संभावना है.

दिव्यांशी के पक्ष में वकील पहुंचे थाने में

दिव्यांशी चौधरी, जिसे कुछ दिन पहले तक लोग एक सम्माननीय घर की बहू समझ रहे थे, अब सलाखों के पीछे खड़ी थी. उस की गिरफ्तारी के कुछ ही देर बाद, थाने के बाहर अचानक भीड़ जुटने लगी. यह भीड़ थी वकीलों की, जो दिव्यांशी का पक्ष लेने के लिए वहां पहुंचे थे. वकीलों का एक समूह थाने के गेट पर पहुंचा. उन के चेहरे पर गुस्सा और आत्मविश्वास झलक रहा था. उन्होंने दिव्यांशी से मिलने की कोशिश की, लेकिन एसएचओ ने उन से कोर्ट में मिलने को कहा. यह सुन कर वकील एकएक कर लौट गए. थाने के बाहर सन्नाटा छा गया.

अंदर लौकअप में दिव्यांशी चौधरी चुपचाप दीवार से सिर टिकाए बैठी थी. उस के चेहरे पर अब वो मुसकान भी नहीं थी. शादी के नाम पर ठगी करने के आरोप में मेरठ के बड़ा मवाना से गिरफ्तार कर लाई गई दिव्यांशी चौधरी के खिलाफ ग्वालटोली पुलिस ने 18 नवंबर, 2025 दिन मंगलवार को एसीजेएम-7 अमित सिंह की कोर्ट में पेश किया. पुलिस कोर्ट में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी. पुलिस की रिमांड शीट में कई कमियां थीं, जिन का दिव्यांशी के वकील ने विरोध किया. कानपुर पुलिस ने दिव्यांशी चौधरी के खिलाफ बीएनएस की 12 धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था और आगे की पूछताछ के लिए 8 धाराओं में रिमांड की प्रशस्ति मांगी थी, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि रिमांड देने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद नहीं हैं.

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि रिमांड जैसी कठोर प्रक्रिया के लिए आवश्यक साक्ष्य और आधार पुलिस द्वारा प्रस्तुत नहीं किए गए. कोर्ट ने दिव्यांशी को अरेस्ट करने में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लंघन पाया. इस के बाद दिव्यांशी को रिहा कर दिया गया. अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ‘मात्र आरोप और अनुमानों’ के आधार पर रिमांड नहीं दी जा सकती. रिमांड खारिज करते हुए अदालत ने दिव्यांशी चौधरी को व्यक्तिगत बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश जारी किया. साथ ही निर्देश दिया गया कि आरोपी जांच में सहयोग करेगी और किसी भी प्रकार का दबाव या प्रभाव नहीं डालेगी.

पुलिस की किरकिरी होने पर फौरन डीसीपी (सेंट्रल) श्रवण कुमार सिंह ने अपने औफिस में एक मीटिंग बुलाई. इस में डीसीपी (सेंट्रल), एडीसीपी अर्चना सिंह, विवेचक शुभम सिंह और शिकायत करने वाले दरोगा आदित्य लोचन को बुलाया गया. कानपुर में दरोगा की लापरवाही की वजह से दिव्यांशी चौधरी कोर्ट से रिहा हो गई. इस वजह से आरोपी दिव्यांशी को कोर्ट ने छोड़ दिया. जांच में पता चला कि एक रिटायर सीओ दिव्यांशी की पैरवी में कानपुर पहुंचे थे. वह शुभम के साथ कई घंटे तक रहे.

जौइंट पुलिस कमिश्नर आशुतोष कुमार ने दरोगा शुभम पर विभागीय जांच के आदेश दिए हैं. साथ ही दिव्यांशी के पूरे सिंडिकेट का परदाफाश करने के लिए एक जांच कमेटी बनाई है.

आईओ शुभम से उच्चाधिकारी हुए नाराज

जौइंट सीपी आशुतोष कुमार ने विवेचक शुभम से पूछा कि जब इतने पुलिसकर्मियों का दिव्यांशी से संबंध है तो इन लोगों के बयान क्यों नहीं लिए गए? इन पुलिसकर्मियों और बैंक अफसर की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई? आखिर दिव्यांशी से इन सभी का क्या कनेक्शन है, जो लाखों का ट्रांजैक्शन है? दरोगा शुभम कोई जवाब नहीं दे सका? इस पर जौइंट सीपी ने शुभम को जम कर फटकार लगाई.

जौइंट पुलिस कमिश्नर ने पूरे मामले की जांच में अब एक इंसपेक्टर को भी शामिल किया है. उन्होंने कहा है कि अब इस पूरे सिंडिकेट का खुलासा होना चाहिए. जिन पुलिस अफसरों और बैंक अफसर समेत अन्य की कौल डिटेल्स और लाखों का ट्रांजैक्शन मिला है, एकएक व्यक्ति की जांच होगी. जांच के बाद सिंडिकेट में शामिल सभी के खिलाफ काररवाई की जाएगी. डीसीपी (सेंट्रल) श्रवण कुमार सिंह ने बताया कि अब डीजे कोर्ट में दोबारा सभी साक्ष्यों के साथ अपील करेंगे, ताकि आरोपी को दोबारा अरेस्ट कर के जेल भेजा जाए. पुलिस टीम अब नए सिरे से दोबारा जांच कर के एकएक साक्ष्य जुटा रही है. जल्द ही पूरे सिंडिकेट के खिलाफ पुलिस कड़ी काररवाई करेगी.

दिव्यांशी चौधरी ने रिहा होने के बाद इसे सच्चाई की जीत बताया. कहा, ”मुझे मीडिया में बदनाम किया कि मैं लुटेरी दुलहन हूं. मेरे हसबैंड, जो उसी थाने में पोस्टेड है और जो आईओ है, वो उन का दोस्त है, कहां से फेयर इनवेस्टिगेशन हो जाएगी.’’

दिव्यांशी ने कहा कि मैं थाने खुद गई थी. यह कहने कि आप मेरा भी पक्ष सुनिए, लेकिन उन्होंने उस चीज का फायदा उठाया और मेरे को वहीं से अरेस्ट कर लिया. कौन सी लुटेरी दुलहन शादी में स्कौर्पियो गाड़ी देती है. कौन सी लुटेरी दुलहन 25 लाख की एफडी देगी? मुझ पर सब मनगढ़ंत आरोप हैं. आप शादी से डेढ़ साल पहले से मेरे को जानते हैं.

उस ने बताया कि दरोगाजी मेरे साथ डेढ़ साल से रिलेशन में थे. आप ने मुझ से 14 लाख 50 हजार औनलाइन लिया है. औफलाइन तो जितना लिया है, उस को छोडि़ए. शादी के बाद भी वसूली का रवैय्या खत्म नहीं हुआ. आप की डिमांड खत्म नहीं होती है. आप दरोगा हैं तो इस का मतलब ये थोड़ी न है कि आप कुछ भी करेंगे. अपनी पत्नी को आप ने इस हद तक पहुंचा दिया था कि शायद सुसाइड ही एकमात्र रास्ता रह गया था. अगर मुझे सच्चे वकील वरुण सर न मिलते तो शायद मैं तो मर ही गई होती.

एडवोकेट वरुण ने कहा कि दिव्यांशी पर उस के दरोगा पति ने पैसे के लेनदेन का आरोप लगाया था, उन के ऊपर भी जांच होनी चाहिए. 58 हजार की तनख्वाह है, एक दरोगा की एवरेज महीने की. ढाई-3 करोड़ का दरोगा आदित्य के अकाउंट में ट्रांजैक्शन हुआ है. यह कैसे संभव है? इस की जांच जरूर होनी चाहिए. अदालत के दरवाजे पर सच्चाई और साजिश का दावा करने वाले दोनों पक्ष खड़े हैं, दोनों अपनी बात पर अडिग हैं. कहानी अभी खत्म नहीं हुई, बल्कि न्याय की तलाश में आगे बढ़ चुकी है. अपील की फाइल तैयार हो रही है, साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं. एक तरफ दिव्यांशी का दावा, फंसाई गई हूं. उन के वकील साहब का विश्वास है कि दिव्यांशी मासूम है, निर्दोष है. वकील को उम्मीद है कि सच्चाई की जीत होगी.

दूसरी तरफ पुलिस का दावा दुलहन लुटेरी है, सबूत मजबूत हैं, अपील मंजूर होगी, दिव्यांशी जेल जाएगी. न्याय की जीत होगी. अब यह जंग कोर्ट के फैसले पर टिकी है. क्या दिव्यांशी का जाल फिर बचेगा या सिंडिकेट ढह जाएगा?

उत्तर प्रदेश की यह कहानी अभी अधूरी है. सच्चाई का इंतजार है, कानून का इम्तिहान है. लेकिन एक बात साफ है, प्यार के नाम पर ठगी का खेल अब लंबा नहीं चलेगा. न्याय की घंटी बजनी बाकी है. इस समय न कोई विजेता, न कोई स्पष्ट दोषी है. बस 2 सच, 2 दावे और एक ऐसी लड़ाई जिस का फैसला अब कोर्ट करेगी न कि भावनाएं.

कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि वहीं से शुरू होती है, जहां कानून आखिरी शब्द बोलता है और सच अपनी अगली परत खोलता है. UP News

 

Illicit Relationship: मामी से मोहब्बत

Illicit Relationship: लखनऊ के रेल कर्मचारी की हत्या का कारण उस का शराबी होना, गुस्सैल बने रहना या चालचलन था या फिर मामीभांजे के बीच नाजायज रिश्ते की नादानी. इन सब के अलावा एक सच्चाई यह भी थी कि मंजू अपने पति की बुरी आदतों से इतनी परेशान रहती थी कि…

मई, 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू की रिश्तेदारी में शादी थी. उस के सासससुर 24 मई, 2025 की रात को उसी शादी के लिए गए थे. पति ड्यूटी पर था. मंजू घर पर अकेली थी. शाम का वक्त था. इसी बीच एक कौल आ गई. स्क्रीन पर प्रेमी का नाम पढ़ कर उस के होंठों पर मुसकान बिखर गई. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली. कौल उस के प्रेमी आकाश वर्मा की थी, जो रिश्ते में उस का भांजा लगता था.

”हैलो! मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रही हूं. तुम उस का काम तमाम कर दो, बहुत दिन हो गए,’’ मंजू शिकायती लहजे में उस से बोली.

”मैं ने फोन किया न! …मुझे तुम से अधिक बेचैनी है…मैं चाहता हूं कि जितना जल्द हो, काम निपटा लिया जाए. मुझे तुम्हारे पति सिद्धि प्रसाद का काम तमाम हर हालत में करना है.’’ आकाश बोला.

”अब यह बताओ कि तुम कितनी देर में आ रहे हो?’’ मंजू का सीधा सवाल था.

”पहले यह बताओ कि घर का क्या हाल है?’’ उस ने सवाल का जवाब सवाल से ही किया.

”अकेली हूं. सभी लोग रिश्तेदार की शादी में गए हैं. तुम्हारा मामा ड्यूटी पर है… आधी रात को आएगा.’’ मंजू बोली.

”चलो ठीक है, मैं आ जाऊंगा, तुम दरवाजा खुला रखना,’’ कह कर आकाश ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रात गहराई. आकाश अपने दोस्त के साथ पूरी तैयारी के साथ प्रेमिका मंजू के घर आ गया. चुपके से घर में घुसने का इंतजाम मंजू पहले से ही कर चुकी थी. मंजू अपने कमरे में पति सिद्धि प्रसाद लोधी के साथ लेटी हुई थी, जबकि वह गहरी नींद में था. मंजू के घर में आने पर आकाश ने उस के इशारे पर अपने दोस्त के साथ कमरे में रखी प्लास्टिक की रस्सी से एक फंदा बना लिया. मंजू की मदद से फंदा गहरी नींद में सो रहे सिद्धि के गले में डाल दिया. दोनों ने मिल कर उस फंदे को कस दिया. थोड़ी देर सिद्धि प्रसाद छटपटाया, फिर शांत हो गया.

कुछ देर के बाद जब सिद्धि प्रसाद मरणासन्न हालत में पहुंच गया. वह जिंदा न बच जाए, इसलिए आकाश ने अपने दोस्त संजय के साथ उस के सिर पर हथौड़े से हमला कर दिया. उस वार से सिद्धि रक्तरंजित हो गया. लोहे के पाइप से भी उस के सिर पर कई हमले करने के बाद जब उस की मौत हो गई, तब आकाश ने अपने दोस्त की मदद से रात के अंधेरे में घर के पीछे एक तालाब के निकट सूखे गड्ïढे में उस की लाश फेंक दी. वह गड्ïढा झाडिय़ों की ओट में था. सिद्धि प्रसाद का मोबाइल, खून सने कपड़े भी वहीं झाडिय़ों में फेंक दिए.

25 मई, 2025 की सुबह लखनऊ-कानपुर रोड पर थाना बंथरा के एसएचओ राजेश कुमार सिंह को उसी थाने की पुलिस चौकी हरौनी के इंचार्ज एसआई अर्जुन राजपूत ने कौल कर बताया कि बीती रात सिद्धि प्रसाद लोधी नामक एक रेलकर्मी की हत्या हो गई है. उस की लाश उस के घर के ठीक पीछे तालाब के पास गड्ढे में पड़ी है. सिद्धि प्रसाद लोधी का घर दरियापुर मझरा गढ़ी चुनौटी में है. उस की लाश मिलने की सूचना पर चौकी इंचार्ज अरविंद कुमार एसआई श्यामजी मिश्रा, कांस्टेबल देवेंद्र कुमार के अलावा एसएचओ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. साथ ही इस की सूचना कृष्णा नगर के एसीपी विकास पांडेय को भी दे दी गई.

घटनास्थल पर उन के साथ एडिशनल डीसीपी अमित कुमावत भी घटनास्थल पर पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने सघन जांच के आदेश दिए. घटनास्थल पर मृतक की पत्नी मंजू देवी भी मौजूद थी. उसी ने अपने पति की हत्या की सूचना पुलिस को दी थी. मंजू रोरो कर पुलिस अधिकारियों को घटना के बारे में बताया, ”साहब, सुबह 6 बजे के करीब जब मैं सो कर उठी, तब पाया कि पति कमरे में नहीं हैं. इन्हें ढूंढते हुए मकान के बाहर निकल गई. घर के पीछे लगभग 50 मीटर दूर तालाब के पास झाडिय़ों में मुझे पति के कपड़े दिखाई दिए. पैंट और शर्ट वही थे, जो उन्होंने रात में पहने थे. पास ही पति औंधे मुंह पड़े थे.

”पास जा कर देखा तो देखते ही मेरे होश उड़ गए. मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई हो. पति के सिर पर गहरी चोट थी. काफी खून बह चुका था. वह एकदम से बेजान से थे. पति को इस हालत में देख कर ऐसा लगा, जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई.’’

घटनास्थल पर नहीं मिली खून की एक भी बूंद

पुलिस ने मंजू से प्रारंभिक पूछताछ के बाद शव की जांचपड़ताल की. एसएचओ के साथ आई पुलिस टीम ने उस की चप्पल, मोबाइल, शर्ट और पैंट पास से ही बरामद कर ली. जांच में घटनास्थल पर खून की एक बूंद भी नहीं थी, जबकि मृतक के सिर से काफी खून बह चुका था. इस से पुलिस ने सहज अनुमान लगा लिया कि इस की हत्या किसी दूसरी जगह पर करने के बाद हत्यारों ने लाश यहां ला कर फेंकी है. उन्होंने अनुमान लगाया कि हत्या करने वाले 2-3 लोग हो सकते हैं. शव की हालत देख कर पुलिस ने रात 2 और 3 बजे हत्या होने का अनुमान लगाया.

शव को ध्यान से देखने पर उस के सिर से खून बहने और गले में किसी चीज से कसाव के निशान का पता चला. एसीपी विकास पांडेय के सामने बंथरा थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की औपचारिकताएं पूरी कीं. आगे की प्रक्रिया के लिए मृतक की पत्नी मंजू देवी को थाने बुलाया गया. उस की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ सिद्धि प्रसाद लोधी की हत्या का मुकदमा धारा-103 बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया गया. मंजू देवी से जांच टीम की कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी ने पूछताछ की. साथ ही उस के घर जा कर भी तहकीकात की गई.

हरौनी के चौकीप्रभारी अर्जुन राजपूत, एसआई श्याम मिश्रा, अरविंद कुमार, संदीप सिंह और कांस्टेबल देवेंद्र के साथ देर रात तक ग्रामीणों से पूछताछ करते रहे. इस पूछताछ में हत्याकांड के संबंध में चौंकाने वाली बात सामने आई. पुलिस को विशेष सूत्रों से पता चला कि मंजू ने ही योजना बना कर अपने प्रेमी की मदद से पति की हत्या करवाई है. उस का प्रेमी आकाश वर्मा उर्फ लकी 25 साल का नवयुवक है और रिश्ते में उस के पति का भांजा है. वह जनपद लखनऊ के नरपतखेड़ा गांव का निवासी है. यह भी पता चला कि इस हत्याकांड में उस का दोस्त भी शामिल था.

आकाश वर्मा के संदिग्ध आरोपी होने की जानकारी मिलने पर पुलिस उसे घटना के एक हफ्ते बाद ही गिरफ्त में ले लिया. उसे बंथारा थाने लाया गया. खासकर उस के बारे में मंजू देवी को भनक तक नहीं लगने दी गई. पुलिस ने उस से सिद्धि प्रसाद की हत्या के बारे में कड़ाई से पूछताछ की. काफी समय तक आकाश वर्मा पुलिस को गुमराह करता रहा. सच उगलवाने के लिए आखिरकार पुलिस टीम ने उस पर थोड़ी सख्ती की. पुलिस के दबाव और पूछताछ के तरीके के आगे उस ने हार मान ली और सिद्धि प्रसाद की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस ने यह भी बताया कि यह हत्या सिद्धि प्रसाद की पत्नी  मंजू देवी की शह पर की थी.

आकाश से पूछताछ पूरी होने के अगले दिन सुबहसुबह पुलिस मंजू देवी को थाने ले आई. जैसे ही उस की नजर थाने के हवालात में बंद आकाश वर्मा पर गई तो वह चौंक गई. उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. महिला कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी उसे पकड़ कर एक कोने में ले गईं. जोरदार लहजे में उस से सवाल किया, ”सचसच बता, तूने ही अपने पति की हत्या की है न?’’

दूसरी सिपाही उस की आंखों के आगे बेंत घुमाने लगी. मंजू सिपाहियों के तेवर देख कर सहम गई. उस की जुबान खुल ही नहीं रही थी. वह एकदम से निस्तब्ध थी. तभी डंडे घुमाती सिपाही कड़कती हुई बोली, ”मंजू, तू सचसच सब कुछ बताती है या मुझे कोई दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा..?’’

मंजू फिर भी कुछ नहीं बोली. दूसरी महिला सिपाही ने उस के ऊपर बेंत उठाया ही था कि मंजू बोल पड़ी, ”मुझे मारिए मत, मैं सारा सच बता दूंगी.’’

उस के बाद मंजू ने जो कहानी बताई, वह और भी चौंकाने वाली थी. उस की कहानी में पति की हत्या ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मर्यादा को लांघने की भी बात थी. उस का प्रेमी रिश्ते में पति का भांजा था. इस नाते उस के साथ मांबेटा समान मामीभांजे का रिश्ता था. आकाश और मंजू देवी के बीच लव अफेयर के साथ हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

सिद्धि प्रसाद कैसे बना शराब का लती

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के कानपुर रोड पर थाना बंथरा के अंतर्गत पुलिस चौकी हरौनी है. थाने से लगभग 12 किलोमीटर दूर बीहड़ जंगल का यह सुनसान इलाका भी है. यहीं दरियापुर गढ़ी चुनौटी नाम का गांव बसा हुआ है. सिद्धि प्रसाद लोधी अपनी फेमिली के साथ यहीं रहता था. सिद्धि प्रसाद की उम्र लगभग 40 वर्ष की हो चुकी थी. उस का विवाह मंजू देवी के साथ करीब 8 साल पहले हुआ था. मंजू खूबसूरत थी. सिद्धि प्रसाद मंजूू देवी को पा कर बहुत खुश था. वह उस की सुंदरता और यौवन का दीवाना बना हुआ था.

वह रेलवे विभाग में सम्पार (गेट कीपर) के पद पर नौकरी करता था. उसे अच्छी सैलरी मिलती थी. उस की संगत कुछ गलत लोगों के साथ थी, जिस से वह मांसाहारी होने के साथसाथ शराबी भी बन गया था. ड्यूटी पूरी करने के बाद वह जब थकामांदा लौट कर घर वापस आता था, तब अपनी थकान मिटाने के बहाने शराब पीता था. साथ में खूब मटन और चिकन उड़ाता था. उस के बाद बिस्तर पर जाते ही अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए मंजू को बांहों में दबोच लेता था. इस का वह जरा भी खयाल नहीं करता था कि पत्नी की इच्छा है भी या नहीं! कई बार वह उस की इच्छा के खिलाफ जिस्मानी भूख मिटाता था. ऐसा वह मंजू के साथ आए दिन करता था. उस की इस आदत से मंजू परेशान हो गई थी.

उस के 2 बच्चों में से एक की असामयिक मौत होने से एकमात्र बेटी ही बची थी. दूसरे बच्चे की चाहत में वह मंजू को अपनी हवस का शिकार बनाता था. जबकि मंजू पति के वहशी व्यवहार से तंग आ गई थी. उस से घृणा करने लगी थी. सिद्धि प्रसाद  की फिजूलखर्ची बढ़ती जा रही थी. मंजू देवी इस का विरोध करती थी. विरोध करने पर सिद्धि उसे प्रताडि़त करता था. मंजू कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह अपने पति की बढ़ती शराब की लत को कैसे रोके.

मंजू और आकाश ऐसे आए करीब

जनवरी, 2025 का महीना था. सिद्धि प्रसाद खाना खा कर ड्यूटी पर चला गया था. उस के जाने के बाद मंजू अपने कमरे में लेटी थी. अपनी मुसीबतों के बारे में सोच रही थी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. वह करवट लिए लेटी हुई थी. सिर पर हाथ रखे तकिए में मुंह छिपाए काफी समय तक सिसकती रही.  दिन के 11 बजने को आए थे. चारपाई पर लेटेलेटे उस की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. जब आंखें खुलीं, तब उस ने अपने बगल में बैठे आकाश को पाया.

वह हड़बडाती हुई उठी और कपड़े संभालने लगी. उस ने महसूस किया कि आकाश की नजर उस की मांसल शरीर पर टिकी है. थोड़ी देर के लिए वह शरमा गई. फिर भी बोली, ”अरे आकाश, तू कब आया? …आ न! बैठ यहीं, तू कोई गैर थोड़े है.’’

”मैं अभीअभी आया मामी, तुम उदास दिख रही हो? क्या बात है फिर मामा से बहस हुई क्या?’’ आकाश ने हमदर्दी जताई.

”अच्छा, तुम्हें याद भी कर रही थी.’’

”सौरी मामी, मैं तुम्हें कुछ और नजरों से देख रहा था.’’

”अरे कुछ नहीं, तुम जैसा गबरू जवान मेरी जवानी को नहीं देखेगा तो और कौन..?’’ मंजू बोली.

”अच्छा! …तो आप ने मुझे माफ कर दिया.’’ झेंपता हुआ आकाश बोला.

उस के बाद दोनों के बीच हंसीमजाक और इधरउधर की बातें होती रहीं. बातोंबातों में मंजू ने अपनी पीड़ा भांजे आकाश वर्मा के सामने उड़ेल कर रख दीं. इस से उस ने महसूस किया कि गम थोड़ा हलका हो गया. फिर उस के कंधे पर अपना सिर टिका कर सिसकती हुई बोली, ”आकाश, तुम ही कोई तरीका निकालो!’’

”हां मामी, मैं कुछ करता हूं आप के लिए. थोड़ा वक्त दो… अभी चलता हूं. जब भी कोई जरूरत हो तो फोन कर देना.’’ आकाश बोला और वहां से चला गया.

आकाश वर्मा सिद्धि प्रसाद का रिश्ते में भांजा लगता था. वह मूलरूप से लखनऊ के ही थाना पारा के अंतर्गत नरपत खेड़ा गांव का रहने वाला था. अकसर खाली समय में अपने मामा सिद्धि प्रसाद के यहां मिलने आताजाता रहता था. मौका मिलने पर मंजू से आंखें छिपा कर अपने मामा सिद्धि प्रसाद के साथ शराब पीने का मौका भी निकाल लेता था. शराब के नशे में दोनों काफी देर तक गपशप किया करते थे. आकाश सरोजनी नगर के नादरगंज की एक नमकीन बनाने वाली कंपनी में काम करता था और समय मिलने पर सिद्धि प्रसाद के घर चला आता था.

हसरतों में बह गया रिश्ता

25 वर्षीय आकाश वर्मा मंजू देवी को बहुत प्यार करता था, किंतु उस ने अपने मन की बात का इजहार करने के लिए मंजू के सामने कभी पेशकश नहीं की थी. आकाश मंजू के सामने जब भी आता तो बैठ कर उसे हसरत भरी नजरों से देखा करता था. वह मंजूू से अपने दिल की बात उजागर करने का कोई अवसर भी नहीं ढूंढ पाया. मंजू को अपने दिल में बसाने के बाद उस की रातों की नींद उड़ चुकी थी. चाहत छिपती नहीं है, जब 2 प्रेमी सामने हों तो आंखों में समाई प्यार की भाषा को समझते देर भी नहीं लगती.

आकाश के अकसर घर आने के बाद मंजू भी उसे चाहत की नजरों से देखा करती थी, किंतु वह विवाहिता थी. उस के सामने समाज की कुछ मर्यादाएं भी थीं. आकाश को मन ही मन में चाहने के बाद मंजू भी अपने मन की भावना व्यक्त नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे मंजू के मन में आकाश के प्रति सम्मान व प्यार का दीप जल उठा था. दोनों उचित अवसर की तलाश में थे. जनवरी माह में उस दिन आकाश के समक्ष उस ने अपनी दुखती रग को व दर्द को बयान किया तो आकाश के मन में दया व प्यार का सागर उमड़ पड़ा, लेकिन समझदारी व अवसर की तलाश में उस दिन मंजू नेे अपनी आंखों की मूक भाषा से सब कुछ समझा दिया कि वह भी इस नरक से उसे छुटकारा दिला दे.

मार्च 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू ने फोन पर आकाश के पूछने पर बताया कि उस दिन सिद्धि प्रसाद रात की ड्यूटी पर घर से गया हुआ है, इसलिए वह घर पर आ जाए, कुछ जरूरी बात करनी है.   आकाश ड्यूटी की छुटटी के बाद मंजू के घर देर रात पहुंच गया. उस ने धीरेधीरे आहट पा कर जानने की कोशिश की कि घर की बगल की दूसरी कोठरी में मंजू के सासससुर अपने कमरे में लिहाफ ओड़े सो रहे हैं. मंजू ने आकाश को घर आया देख कर राहत की सांस ली और चुपके से अपनी कोठरी में आकाश को एकांत में बुला लिया. कमरे में पहुंचने के बाद आकाश ने जाते ही मंजूू को अपनी बाहों में भर लिया. जी भर गालों को चूमने व प्यार करने के बाद वह खाना खाने बैठ गया.

उस दिन आकाश मंजू को पाने को आतुर हो गया था. पति द्वारा प्रताडि़त करने की बात कहते हुए मंजू ने उसे अपनी पीठ पर चोट के निशान दिखाए. पीठ पर पिटाई के निशान देख कर आकाश ने हमदर्दी जताई. इसी हमदर्दी में दोनों प्रेम और सहानुभूति की भावना में बह गए थे. वे कब एकदूसरे की बाहों में आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. फिर दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. थोड़ी देर में जब आकाश जाने लगा, तब मंजू उस का हाथ पकड़ कर बोली, ”आकाश, जल्द कुछ उपाय करो… अब छिपछिप कर रहना सहन नहीं होता…और उस का जुल्म भी बढ़ता जा रहा है.’’

”जल्द ही कुछ करूंगा. चिंता मत करो.’’

आकाश जब भी आता था, तब मंजू घर में अकेले होती थी. उसे नहीं पता था कि उस की गतिविधियों पर पासपड़ोस की नजर बनी हुई है. कई बार वह रात के अंधेरे में भी आने लगा था. उस का मंजू के साथ बेमेल ही सही, लेकिन नाजायज रिश्ता बन चुका था. आकाश उस से उम्र में करीब 10 साल छोटा था. मंजू के मन का दर्द आकाश के लिए भी असहनीय हो गया था. सिद्धि प्रसाद की हत्या के 2 दिन पहले जब आकाश आया था, तब घर में बिखरे हुए सामान को देख कर समझ लिया था कि सिद्धि ने उस पर किस तरह का जुल्म ढाया होगा. घर में चारपाई के नीचे शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं.

अभी आकाश घर के चारों ओर नजरें दौड़ा ही रहा था कि उस ने मंजू की सिसकती आवाज सुनी, ”जी तो करता है कि मैं कहीं जा कर डूब मरूं और अपनी जान दे दूं.’’

आकाश तेजी से मंजू की ओर मुड़ा और उस के पास जा कर कान में कुछ फुसफुसाया. मंजू उस की बात सुन कर चौंकती हुई बोली, ”ऐसा हो सकता है तो जल्दी करो, मैं तुम्हारा साथ दूंगी. जितना भी खर्च आएगा, उस का भी इंतजाम करूंगी.’’

”मैं तुम्हें 24 मई को फोन करूंगा.’’ आकाश बोल कर वहां से जाने लगा. आकाश को जाता देख मंजू बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे देखने लगी. घर से निकलने से पहले आकाश ने एक बार फिर आश्वासन देते हुए कहा, ”मामी, आप को सब्र से काम लेना होगा. मुझे पूरी प्लानिंग बनाने का मौका दो. काम बहुत जोखिम भरा है.’’

प्रेमी के साथ मिल कर बनाया हत्या का प्लान

23 मई, 2025 की रात को आकाश और मंजू जब फोन पर बातें कर रहे थे, तभी  अचानक रात की ड्यूटी समाप्त कर सिद्धि प्रसाद घर लौट आया था. अचानक पति को घर आया देख कर मंजू सहम गई थी. तुरंत फोन कट कर दिया था. किंतु सिद्धि प्रसाद समझ गया था कि मंजू जरूर अपने प्रेमी से बात कर रही है. इस बारे में पड़ोसियों द्वारा उस के कान पहले से ही भरे जा चुके थे. उस ने तुरंत मंजू की जम कर पिटाई कर डाली. वह कहती रही कि उस की बात सहेली से हो रही थी, लेकिन सिद्धि ने पीटना नहीं छोड़ा.

राज खुलने के डर से मंजू एकाएक वह घबरा गई. परेशान सी हो उठी. किसी तरह उस ने दर्द से कराहते हुए रात बिताई. अगले रोज पति के ड्यूटी पर जाने के बाद आकाश को बीती रात की पूरी बात बता दी. अगले रोज 24 मई को उस का पति सो गया, तब आकाश का फोन आया. उस के बाद उस ने पहले तय प्लान के मुताबिक सिद्धि प्रसाद की प्लास्टिक की रस्सी के फंदे से पहले गला घोंट दिया, फिर उस के सिर पर भारी चीज से हमला कर मार डाला. इस काम में आकाश ने अपने दोस्त संजय निषाद की भी मदद ली थी.

अगले दिन ही मंजू द्वारा की गई पुलिस में शिकायत के बाद सिद्धि प्रसाद की लाश बरामद कर ली गई. इस की हफ्ते भर चली जांच में हत्या का न केवल खुलासा हो गया, बल्कि इस में शामिल आरोपियों में मंजू देवी, आकाश वर्मा और उस के दोस्त संजय निषाद की गिरफ्तारी भी हो गई. उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा के रहने वाले संजय निषाद को 40 हजार रुपए देने का वादा किया था, उसे मात्र 5 हजार रुपए एडवांस में दिए थे. मंजू देवी ने पुलिस के सामने अपने पति की क्रूरता का जिक्र करते हुए पति की प्रताडऩा से परेशान रहने की बात कही.

 

उस ने पति पर अय्याशी करने का आरोप लगाया. उस ने यह भी बताया कि सिद्धि प्रसाद के गांव की एक विधवा महिला से कई सालों से  अवैध संबंध बने हुए थे. पुलिस ने आकाश से संजय निषाद का फोन नंबर ले कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. तकनीकी जांच से  वह 10 जुलाई, 2025 को उत्तर पूर्व दिल्ली के सोनिया विहार से पकड़ा गया. संजय वारदात के बाद लखनऊ से फरार हो कर दिल्ली चला गया था. वहां वह एक दुकान पर नौकरी करने लगा था. फोन की लोकेशन के आधार पर वह भी पुलिस की पकड़ में आ गया.

पुलिस ने आरोपी मंजू देवी, उस के प्रेमी आकाश वर्मा और संजय निषाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Illicit Relationship

 

Love Story in Hindi: प्यार में न बनें बौयफ्रेंड का खिलौना

Love Story in Hindi: एक निजी अस्पताल में नर्स 24 वर्षीय समरीन की दिनचर्या भले ही व्यस्त थी, लेकिन उस के दिल का कोना खाली था. अपने सपनों के राजकुमार की उसे भी तलाश थी. इंस्टाग्राम के जरिए उस की जिंदगी में 25 वर्षीय गौसे आलम ने एंट्री तो की, लेकिन उस ने समरीन को एक ऐसा खिलौना समझा कि…

समरीन ने इंस्टाग्राम पर अपनी जो फोटो पोस्ट की थी, उस में उस का चेहरा आधा दिखता, आधा छिपा हुआ था. उस का हिजाब उस की पहचान बन चुका था. लोग यही समझते थे कि वह एक शरीफ मुसलिम लड़की है, परदे में रहती है. वह जनपद मुरादाबाद के गांव रुस्तम नगर सहसपुर में स्थित अपने घर से करीब 12 किलोमीटर दूर सेफनी कस्बे के एक अस्पताल में नर्स थी. समरीन अस्पताल की लंबी शिफ्ट से थक जाती थी, लेकिन मरीजों की देखभाल में अपना सारा दर्द भूल जाती थी, परंतु रात में अकेलापन उसे घेर लेता.

वह अस्पताल में हर दिन मौत और जिंदगी की जंग देखती थी. रोजाना घर से अस्पताल जाना और वापस घर आना सफर की थकान, साथ में अस्पताल के काम की थकान यह सब समरीन की जिंदगी का हिस्सा था. फिर भी उस के दिल में प्यार की गहराई, भावनाओं का सैलाब, दर्द, तड़प सब कुछ अनुभव करने की अपार क्षमता थी. अपने सपनों के राजकुमार की उसे भी तलाश थी. समरीन को इंस्टाग्राम पर नएनए लोगों से दोस्ती करना अच्छा लगता था. वह फोटोग्राफी और किताबों की तसवीरें डालती, छोटेछोटे कैप्शन में अपने दिल की बातें लिखती.

एक दिन उसे एक युवक का मैसेज मिला. उस की प्रोफाइल खंगाली तो वहां थोड़ेबहुत सुंदर फोटो थे, गौसे आलम नाम था उस का. नाम ऐसा था जो सुनने में सुकून दे रहा था. शुरुआत में तो बस सामान्य ‘हाय’ लिखा मैसेज देखा तो नसरीन ने भी उस का उत्तर ‘हाय’ में ही दे दिया. गौसे आलम एक 25 साल का ट्रक ड्राइवर था, जो लंबी दूरी की सड़कों पर जीवन बिताता था. अकेलापन, परिवार की जिम्मेदारी और जीवन की कठोर सच्चाइयां उस की साथी थीं. गौसे आलम की जिंदगी ट्रक की स्टीयरिंग और राजमार्गों पर लंबीलंबी दूरी तक माल ढोते हुए ही गुजर रही थी. कहीं वह रात में विश्राम करता तो वह रातों में खुद को अकेला महसूस करता. परिवार के लिए पैसा कमाता, लेकिन दिल खाली था. रात में मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया घूमना उस का शौक था.

वह जनपद मुरादाबाद के ही थाना कुंदरकी के चकफाजलपुर गांव का निवासी था. उस का इंस्टाग्राम अकाउंट जैसे उस की छोटी सी दुनिया था. तसवीरें, शायरी और कभीकभी दिल की बातें. हर रात वह अपनी किसी पोस्ट के नीचे लिखता, ‘कोई तो होगी, जो मेरे दिल की बात समझेगी’. वह चाहता था कोई ऐसी लड़की, जो उस की पोस्टों में छिपे जज्बात को महसूस कर सके, उस की अकेली जिंदगी में रंग भर सके. धीरेधीरे उसे समझ आया कि तमाम लड़के आजकल इंस्टाग्राम पर किस तरह की मोहब्बत ढूंढते हैं. कभी लाइक के जरिए, कभी कमेंट से बात शुरू कर के तो कभी किसी की स्टोरी पर रिप्लाई दे कर. गौसे आलम भी वही करने लगा. हर नई तसवीर पर मुसकराहट के साथ एक दिल भेज देता, कभी किसी शायरी पर ‘वाह!’ लिख देता.

एक रात ट्रक सड़क किनारे खड़ा कर के  उस ने इंस्टाग्राम ओपन किया. उस की निगाहें हिजाब पहने हुए एक फोटो पर टिक गईं. उस का नाम था समरीन. वह काफी देर चेहरे को देखता रहा. उस की एक पोस्ट ने गौसे आलम का ध्यान खींचा. अस्पताल की बालकनी से ली गई तसवीर, जहां वह मास्क लगाए एक बच्चे को गोद में ले कर मुसकरा रही थी. यह पोस्ट उस की भावनात्मक थकान दिखाती थी. नर्स की जिम्मेदारी में छिपा दर्द उस की आंखों से छलक रहा था. फिर उस ने समरीन की प्रोफाइल देखी. उस की प्रोफाइल की तसवीर में हल्की मुसकान थी और बायो में लिखा था, ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए.’

गौसे आलम ने हिम्मत की और उस की  शायरी पर कमेंट किया, ‘लफ्ज तो बहुत लोग लिखते हैं, पर एहसास सिर्फ तुम लाती हो.’ समरीन ने भी उसे ‘शुक्रिया’ लिखा, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. धीरेधीरे चैट शुरू हुई, फिर देर रात तक चलने लगी. दोनों अपनीअपनी जिंदगी की खाली जगहों को एकदूसरे के शब्दों से भरने लगे. गौसे आलम अब हर सुबह उस की ‘गुड मार्निंग’ का इंतजार करता. समरीन उसे अपने कालेज की बातें बताती और गौसे आलम अपने लंबे सफर की दास्तान सुनाता. अपनी दिन भर की थकान के बीच उस की हंसी में सुकून ढूंढता. उस दिन के बाद से इंस्टाग्राम अब सिर्फ एक ऐप नहीं रहा, वो उन की मोहब्बत की गवाही देने वाला आईना बन गया.

गौसे आलम अब रोज नई तसवीर नहीं डालता, बस एक ही कैप्शन लिखता है ‘मिल गई वो, जिस से जिंदगी रंगीन हो गई.’ इस तरह दोनों तरफ से मैसेज का सिलसिला शुरू हो गया. समरीन हर रोज सुबहशाम 1-2 लाइनें हंसीमजाक, मजहबी और कभी गहराई की बातें पोस्ट किया करती थी. जैसे कोई साथी मिल गया हो. गौसे आलम ने एक दिन दिल  की गहराई से एक पोस्ट लिखी, ‘तुम्हारी मुसकराहट तो मेरी रातों की थकान मिटा देती है. तुम्हारे जैसे लोगों को सलाम, जो दूसरों के लिए हर वक्त लगे रहते हैं. मैं एक ट्रक ड्राइवर हूं, इसलिए मेरी सड़कें भी बहुत तनहा होती हैं.’

गौसे आलम की यह पोस्ट समरीन के दिल में उतर गई. गौसे आलम एक आम युवक था. उम्र बस 25 की, पर सपने बहुत बड़े. समरीन और गौसे आलम एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर ले ही चुके थे. इसलिए दिल खोल कर प्यारमोहब्बत की बातें होने लगीं. जिंदगी भर साथ निभाने की कसमें भी खाई जाने लगीं. गौसे आलम का कहना था कि जल्दी एक मुलाकात हो जाए तो हमारा प्यार और भी परवान चढऩे लगेगा.

समरीन ने महसूस किया कि गौसे आलम उस के लिए बेहद समझदार है और सहानुभूति दिखाने लगा है. उस की बातों पर समरीन का दिल खोयाखोया सा रहने लगा. वह सोचती कि कोई तो है, जो उस की बात ध्यान से सुनता है, उस की परेशानी पर संवेदना दिखाता है और मुश्किल में साथ देने का वादा करता है. वह कहता कि समरीन मैं तुम से शादी करूंगा. तुम मेरी जिंदगी हो. समरीन भी उस की बातों पर गहरा विश्वास करने लगी थी. वह सोचती कि गौसे आलम दिल का सच्चा है. भले ही वह एक ट्रक ड्राइवर है, लेकिन दिल का अच्छा है.

 

इन दोनों की कहानी में पहला मोड़ तब आया, जब वह अकसर ‘सिर्फ तुम्हारे लिए’ जैसी बातें करता. वह कहता कि समरीन मेरा साथ कभी मत छोडऩा, मेरा इस दुनिया में तुम्हारे अलावा कोई नहीं है. मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हूं. मुझे कभी किसी से कोई प्यार नहीं मिला. यदि तुम ने मेरा दिल तोड़ दिया तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा. इसलिए समरीन को यह अहसास होता कि उन दोनों का यह रिश्ता कुछ खास है. उस ने अपनी सब से करीबी सहेली को ये सारी बातें बताईं.

तब सहेली ने कहा, ”तेरी बातों से तो ऐसा लगता है कि वह तुझ से सच्चा प्यार करता है.’’

कुछ दिनों में उन का रिश्ता इंस्टाग्राम की स्क्रीन से निकल कर असल जिंदगी में उतरने लगा. उन का प्यार परवान चढऩे लगा.

पहली मुलाकात में जब गौसे आलम ने समरीन को देखा तो कहा, ”समरीन, तुम तो तसवीरों से ज्यादा हसीन हो और हकीकत में ज्यादा सच्ची भी.’’

समरीन भी मुसकराती हुई बोली, ”और तुम इंस्टाग्राम से ज्यादा शरमीले हो.’’

फिर दोनों हंस पड़े.

गौसे आलम को जब यकीन हो गया कि समरीन अब उस के फरेबी प्यार के जाल में फंस चुकी है तो  एक दिन वह अपने असली रूप में आ गया. उस ने ‘ओयो होटल’ में एक कमरा बुक किया. फोन कर के उस ने होटल में समरीन को भी बुला लिया.

जनपद मुरादाबाद में ‘ओयो’ जैसे और भी बहुत से केंद्र काफी चर्चित हो चुके हैं, जहां प्रेमी युगल दिन में 2-4 घंटे के लिए कमरा बुक करते हैं और मौजमस्ती कर के चले जाते हैं. होटल में पहुंच कर समरीन को जब गौसे आलम के इरादे का पता चले तो उस ने साफ इनकार किया. उस ने कहा कि शादी से पहले प्यार की अंतिम चरम सीमा पर नहीं पहुंचना चाहिए. तब गौसे आलम ने कहा, ”प्यार में सब जायज है. शादी तो होगी ही. जब हमें जिंदगी भर साथ ही रहना है तो फिर हम दोनों के बीच में किसी भी तरह की यह दूरी क्यों?’’

इस तरह हमबिस्तरी के पक्ष और विपक्ष में दोनों के बीच काफी चर्चा हुई और अंत में वह सब कुछ हो गया, जो सिर्फ सुहागरात को होना चाहिए था. समय बीतता रहा, समरीन ने महसूस किया कि गौसे आलम पहले की तरह प्यारमोहब्बत के लिए नहीं मिलता है. वह तो सिर्फ अंतिम प्यार का मौका देखता है. बस अपनी हवस मिटा लेता है. जब उसे शक हुआ तो समरीन ने उस से शादी के लिए कहा. शादी की बात सुनते ही गौसे आलम का तो नजरिया बदल गया. वैसे तो इन दोनों के प्यार के किस्से दोनों के फेमिली वालों और रिश्तेदारियों में आम हो चुके थे. समरीन ने उस के फेमिली वालों से भी कहा कि उस की शादी अब जल्द करा दी जाए. उन दोनों के प्यार को अब कई महीने बीत चुके हैं.

चारों तरफ से घिरता देख 25 वर्षीय गौसे आलम अब प्रेमिका समरीन से पीछा छुड़ाने के तरीके सोचने लगा. इस का एक कारण दोनों की जातियों का अलगअलग होना भी था. गौसे आलम की जाति के लोग इस क्षेत्र में अपने आप को उच्च जाति का समझते हैं. जबकि समरीन सलमानी यानी पिछड़ी जाति की थी.

 

‘एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज, न कोई बंदा रहा, न कोई बंदा नवाज.’ यह कहावत यहां शादीविवाह में लागू नहीं होती. खासकर तो तुर्क बिरादरी के लोगों के लड़के तो अपनी बिरादरी में ही शादी करते हैं.

सलमानी बिरादरी के लोग भी जनपद में निवास करते हैं. ये लोग अभी तक अपने पारंपरिक कार्य को अंजाम दे रहे हैं. दूसरों के सिर के बाल, दाढ़ी और मूंछें संभालना इन का पेशा है. इन्हें अभी समानता का दरजा इस क्षेत्र में नहीं मिला है. जाति को ले कर भी गौसे आलम के फेमिली वाले समरीन से शादी करने के लिए राजी नहीं थे. समरीन को ले कर गौसे आलम की चिंता अब बढ़ती जा रही थी. इसलिए उसे लगा कि अब इसे ठिकाने लगा कर ही वह पीछा छुड़ा सकता है.

गौसे आलम को समरीन के व्यवहार से ऐसा लग रहा था कि वह शादी न करने पर उसे कानूनी पेंच में फंसा कर जेल भिजवा सकती है. समरीन पढ़ीलिखी थी. एक नर्स का काम करती है. समाज में अच्छेबुरे सभी तरह के लोगों से उस की डीलिंग अस्पताल में रहती है. इसलिए वह भी बड़ी दिलेरी से शादी  करने  के लिए अड़ी हुई थी. अधिकतर ड्राइवरों के चेहरे पर हमेशा एक मुसकान, लेकिन आंखों में हवस की चमक छिपी होती है. ऐसा ही गौसे आलम था. वह खुद को प्यार का पुजारी कहता, लेकिन सच तो यह थी कि वह हवस का गुलाम था.

छोटेछोटे गांवों और शहरों में उस की कई कहानियां बिखरी पड़ी थीं. लड़कियां जो उस के मीठे व झूठे वादों में फंसतीं और फिर छोड़ दी जातीं. लेकिन समरीन की कहानी अलग थी. यह कहानी प्यार की नहीं, बेवफाई की थी, जो दिल को छलनी कर देती है. इस से पहले कि समरीन नाम की फांस गौसे आलम के लिए नासूर बन जाए, उस ने एक दिन अपने इरादे को अंजाम दे दिया. यह काम गौसे आलम ने इतनी चालाकी और प्लानिंग के साथ किया कि पुलिस के हाथ उस की गरदन तक न पहुंचें. समय बलवान होता है. अपराधी कोई न कोई सबूत छोड़ जाता है. अब तो डिजिटल युग है. कोई न कोई सबूत कहीं न कहीं से मिल ही जाता है. आखिरकार वही हुआ यह सब उस ने कैसे किया? यह घटना बहुत ही दिल दहलाने वाली है.

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है तहसील बिलारी. इसी तहसील का एक गांव रुस्तम नगर सहसपुर है. यह बिलारी से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है. बिलारी और सहसपुर के बीच की इस दूरी में भी मकान बन रहे हैं. आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि कुछ ही सालों में गांव सहसपुर भी बिलारी का एक मोहल्ला जैसा हो जाएगा. रुस्तम नगर सहसपुर तहसील क्षेत्र का सब से बड़ा गांव है. इस को नगर पंचायत बनाने की बात भी चल रही है. इस का प्रस्ताव सरकार को भेजा जा चुका है. इसी गांव के मोहल्ला साहूकारा में रियासत हुसैन का परिवार निवास करता है. नर्स समरीन इन्हीं की बेटी थी. अपने 4 भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. इस की बड़ी बहन फरहा की शादी हो चुकी है. जबकि 2 बड़े भाई सुहेल और रिजवान दिल्ली में सैलून पर काम करते हैं. उस की अम्मी शाहिदा परवीन की 10 साल पहले मौत हो चुकी है.

रियासत हुसैन शादीविवाह में कौफी मशीन चलाते हैं. सर्दियों में अधिकांश समारोह में कौफी की व्यवस्था मेहमानों के लिए की जाती है. कौफी का स्टाल लगाने वाले अलग लोग होते हैं. इन का हलवाइयों के स्टाल से कोई मतलब नहीं होता है. एक तरह की मजदूरी का काम है. रियासत हुसैन ने भी एक कौफी मशीन ले रखी है. सर्दियों में अधिकांशत: रात में ही बुकिंग मिलती है. यह अपनी कौफी मशीन ले जा कर अपनी स्टाल सजा कर शादी समारोह में बैठ जाते हैं. दूध और काफी बाकी सामान की व्यवस्था समारोह के आयोजकों द्वारा की जाती है. इन की तो सिर्फ मशीन और खुद की मेहनत होती है.

रियासत हुसैन की बेटी समरीन रामपुर जिले के सेफनी कस्बे में स्थित इनाया हेल्थकेयर क्लीनिक में नर्स का काम करती थी. उस से परिवार को बहुत सारी उम्मीदें थीं. सेफनी जिला रामपुर की तहसील शाहबाद के अंतर्गत एक नगर पंचायत है, यानी सेफनी जिला मुरादाबाद की सीमा से एकदम सटा हुआ है. 22 वर्षीय समरीन 24 अगस्त, 2025 की सुबह 10 बजे रोजाना की तरह घर से नर्सिंग होम जाने की बात कह कर निकली थी, लेकिन देर शाम तक वह वापस नहीं लौटी. रियासत हुसैन ने उस के क्लीनिक पर कौल की तो पता चला कि समरीन क्लीनिक पर आज नहीं पहुंची थी.

यह जानकारी मिलने पर फेमिली वालों के होश उड़ गए. इस के बाद परिजन उस की तलाश में जुट गए. अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों को मोबाइल फोन पर संपर्क कर के समरीन के बारे में पूछा गया, लेकिन कहीं से भी यह जवाब नहीं मिला कि समरीन को उन्होंने कहीं देखा है या उन के घर आई है. तब रियासत हुसैन ने दिल्ली में रह रहे अपने दोनों बेटों को फोन से सूचना दी कि समरीन आज सुबह से लापता है. दोनों बेटे भी रात में ही दिल्ली से घर के लिए रवाना हो गए. सुबह रियासत हुसैन और उन के बेटों ने अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों से राय ली. सब की सहमति के बाद उन्होंने 25 अगस्त, 2025 को बिलारी कोतवाली में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

समरीन के मोबाइल की पुलिस ने कौल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह बिलारी से 7 किलोमीटर दूर थाना कुंदरकी क्षेत्र के रहने वाले गौसे आलम नाम के युवक से बात करती थी. पुलिस गौसे आलम की तलाश में जुट गई. गौसे आलम ट्रक ले कर कहीं गया हुआ था. उस की लोकेशन पुलिस लगातार ट्रेस कर रही थी. पुलिस की कई टीमें इस मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए लगाई गईं. आखिरकार 30 अगस्त, 2025 दिन शनिवार को गौसे आलम पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. चूंकि घटना थाना कुंदरकी क्षेत्र की थी, इसलिए गौसे आलम से कुंदरकी पुलिस ने पूछताछ शुरू की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. यह साबित करने की कोशिश करता रहा कि उसे समरीन के बारे में कोई जानकारी नहीं है. वह ट्रक ले कर बाहर गया हुआ था, लेकिन पुलिस द्वारा थोड़ी सख्ती करने पर गौसे आलम टूट गया. उस ने समरीन की हत्या करना कुबूल कर लिया.

इस के बाद गौसे आलम की निशानदेही पर पुलिस ने 30-31 अगस्त की रात को थाना कुंदरकी क्षेत्र के चकफजालपुर गांव के गन्ने के खेत से समरीन का सड़ागला शव बरामद कर लिया. समरीन की लाश मिलने की सूचना पर उस के अब्बू, भाई और रिश्तेदार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना की सूचना जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई. बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर जमा हो गए. थाना कुंदरकी के एसएचओ प्रदीप सहरावत मय फोर्स के घटना स्थल पर मौजूद थे. सूचना पर एसपी (देहात) कुंवर आकाश सिंह भी घटनास्थल का मुआयना करने पहुंच गए. गौसे आलम को थाने भेज दिया गया. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. उस ने मौके पर जांच कर के साक्ष्य जुटाए.

मौके की जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया. थाना कुंदरकी के एसएचओ प्रदीप सहरावत की गहन पूछताछ के बाद हत्या का एक दिल दहलाने वाला खुलासा हुआ. समरीन का यह कोई पहला मौका नहीं था, जो उस ने किसी युवक पर भरोसा किया था. पहले भी एक युवक उस की जिंदगी में आया था. उस ने भी उस से कहा था, ”चेहरा क्या है, मैं तुम्हारे दिल से प्यार करता हूं.’’ जब शादी की बात आई तो वही आशिक उस के चेहरे व गले पर स्पष्ट दिखाई देने वाले जलने के निशान देख कर पीछे हट गया.

समरीन ने उस से लाख कहा कि इन दागों के नीचे भी मैं वही लड़की हूं. पर उस युवक और उस के फेमिली वालों ने उसे ‘अधूरी’ कह दिया. इसी तरह गौसे आलम ने उसे स्वीकार नहीं किया तो वह टूट गई. उस ने जिद की कि तुम शादी नहीं करोगे तो मैं खुद को खत्म कर दूंगी. इन बातों का समरीन के प्रेमी पर कोई असर नहीं हुआ. उस के फेमिली वालों ने भी समरीन की विनती को ठुकरा दिया. मामला पुलिस तक भी पहुंचा. मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला. मजबूरन समरीन और उस के परिवार को समझौता करना पड़ा.

दरअसल, कुछ साल पहले समरीन ने किसी कलह के चलते खुद को आग लगा दी थी. आग की चपेट में आ जाने से वह काफी झुलस गई थी. उस के चेहरे पर आग से जले हुए निशान अब भी स्पष्ट दिखाई देते थे. उस की गरदन पर भी जले हुए के निशान थे. शरीर के और भी हिस्सों पर निशान थे, जो कपड़ों से दब जाया करते थे. जबकि गरदन और चेहरे के निशान ढकने के लिए वह अकसर हिजाब पहना करती थी. समरीन की जले हुए की घटना की जिन्हें जानकारी नहीं थी, वो यही समझते थे कि बहुत ही मजहबी लड़की है. इसलाम और शरीयत की रोशनी में घर से हिजाब पहन कर ही निकलती है. बाहर के लोगों ने कभी उसे बिना हिजाब के नहीं देखा.

गौसे आलम ने जब पहली मर्तबा समरीन के चेहरे और गरदन के जले हुए निशान देखे थे, तब एकदम उस के चेहरे की रंगत बदल गई थी. वह उदास हो गया था. समरीन उस की हालत देख कर घबरा गई थी. वह रोने लगी थी. कहने लगी कि शायद मेरे चेहरे के निशान देख कर आप मायूस हो रहे हैं. निराश हो रहे हैं. आप मुझ से नहीं मेरे चेहरे से मोहब्बत करते हैं. गौसे आलम ने कहा कि ऐसी बात नहीं है. उस ने एकदम अपने चेहरे की रंगत बदली. चेहरे पर शगुफ्तगी लाने की कोशिश की और कहा कि मैं तुम्हें दिल से चाहता हूं. ऐसा कभी मत सोचना. मैं तुम्हारा जिंदगी भर साथ निभाऊंगा.

कस्बा बिलारी से करीब 7 किलोमीटर दूर बिलारी तहसील का ही एक कस्बा कुंदरकी है. गौसे आलम  कुंदरकी कस्बे से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित चकफाजलपुर गांव का निवासी है. यह 3 भाई और 2 बहनें हैं. गौसे आलम बीच का है. एक बहन की शादी हो चुकी है. एक बहन मानसिक रूप से विकलांग है. गौसे आलम के चेहरे पर मासूमियत और बातों में जादू होता था. गांव में उसे सब ‘आशिक आलम’ कह कर चिढ़ाते थे. असली दुनिया उस की इंस्टाग्राम थी. हर शाम हाथ में मोबाइल आता और फिर शुरू होती उस की औनलाइन मोहब्बत की दुनिया.

गौसे आलम का अंदाज ऐसा कि कोई भी लड़की उस की बातों में जल्दी बहक जाती. सिर्फ दोस्ती के नाम पर शुरू होने वाली बातें धीरेधीरे रोमांस में बदल जातीं. शेर ओ शायरी लिखता और हर चैट के अंत में दिल का इमोजी डाल देता. वह कई लड़कियों से चैट करता था. हर किसी से वही बातें ‘तुम बहुत अलग हो’, ‘काश तुम मेरे शहर में होतीं’, ‘तुम्हारी मुसकान दिल में उतर जाती है’.

उस के चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत थी, जो किसी भी इंसान के दिल में भरोसा जगा दे. बड़ीबड़ी आंखों में अजीब सी शांति थी, जैसे उस में कभी तूफान उठा ही न हो. चेहरे की वो हलकी मुसकान, मानो किसी दर्द को छिपाने का हुनर हो. कोई पहली नजर में उसे देखे तो कहेगा ‘इतना सादा, इतना खूबसूरत चेहरा कैसे किसी का खून कर सकता है?’ लेकिन वही चेहरा था, जिस ने मोहब्बत की आड़ में मौत की कहानी लिखी थी.

एक दिन गलती से उस ने सना को वही मैसेज भेज दिया जो किसी और को भेजना था. ‘कह दो न, तुम भी मुझ से प्यार करती हो, शाइस्ता?’

मैसेज पड़ कर सना चौंक गई, ”शाइस्ता..? मैं तो सना हूं!’’

गौसे आलम की पोल खुल गई. उस दिन के बाद सना ने उसे ब्लौक कर दिया, उस के बाद से गौसे आलम ने बड़ी ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी. इस तरह समरीन उस के प्यार के जाल में तो फंस गई, लेकिन बाद में गले की हड्ïडी भी बन गई. गौसे आलम ने यह एहसास समरीन को होने नहीं दिया. हमेशा की तरह उस ने समरीन को फोन कर के कहा कि बह बिलारी के महाराणा प्रताप चौक पर आ जाए. गौसे आलम बाइक ले कर वहीं खड़ा था. बिलारी का यह वही स्थान था, जहां से अकसर गौसे आलम अपनी बाइक पर बैठा कर समरीन को ले जाया करता था.

उस समय सुबह के लगभग 10 बजे थे. यही वह समय था, जब समरीन अपनी ड्यूटी करने जाया करती थी. अपने गांव रुस्तम नगर सहसपुर से समरीन बैटरी रिक्शा में बैठ कर आई थी. बैटरी रिक्शा से उतर कर समरीन गौसे आलम की बाइक पर बैठ गई और दोनों मौजमस्ती करने मुरादाबाद चले गए. गौसे आलम ने वादा किया था कि आज घर वालों से मिल कर शादी की बात करेंगे और जल्दी ही तारीख भी तय कर लेंगे. समरीन भी चाहती थी कि फेमिली वालों की मंजूरी व सामाजिक नियमकानून के अनुसार शादी होगी तो समाज में दोनों के फेमिली वालों की इज्जत बनी रहेगी.

गौसे आलम की योजना के अनुसार रास्ते में एक निश्चित स्थान पर उस का दोस्त मिल गया, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखने  वाला था, लेकिन अभी नाबालिग था. गौसे आलम ने अपने मित्र से ऐसे अनजान बन कर बात की जैसे पहले से कोई प्लानिंग न हो. समरीन ने पूछा कौन है तो उस ने बताया कि यह मेरा कजिन है. उसे भी बाइक पर बैठा लिया. अपने गांव चकफाजलपुर और रूपपुर के बीच रेलवे ट्रैक के पास बाइक रोकी. उस की आंखों में वही मोहब्बत थी, वही भरोसा, जो समरीन को इस जंगल तक लाया था.

अभी तक समरीन को गौसे आलम पर किसी तरह का कोई शक नहीं था. वो नहीं जानती थी कि उसी के साथ में उस का कातिल भी है. गौसे आलम के मन में कुछ और ही तूफान उमड़ रहा था. विश्वास की नींव पर खड़ी उन की कहानी, अब धोखे की चट्टानों से टकराने वाली थी. समरीन बाइक से नीचे उतर गई. गौसे आलम ने मुसकरा कर उस की ओर देखा. वह उसे यहां लाया था, प्रेम की मिठास का वादा कर के.

नीचे उतर कर समरीन ने पूछा, ”क्या हुआ?’’

गौसे आलम ने कहा, ”कुछ नहीं, बस हलका होना है.’’

इस से पहले कि समरीन कुछ समझ पाती गौसे आलम ने उसे वहीं गिरा लिया. उस के साथी ने दबोच लिया. फिर उन्होंने उस की हत्या कर दी. उस की चीख सुनने वाला भी वहां कोई नहीं था. दोनों ने लाश को उठा कर गन्ने के खेत में डाल दिया. प्यार के वादों से शुरू हुई कहानी, उस शाम विश्वासघात की आग में जल कर राख हो गई. गौसे आलम की दास्तान सुन कर पुलिस भी दंग रह गई. पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया. अदालत ने गौसे आलम को जेल भेज दिया और उस के नाबालिग दोस्त को बाल सुधार गृह के हवाले कर दिया.

पुलिस ने घटना में इस्तेमाल की गई बाइक भी बरामद कर ली. समरीन के मोबाइल को गौसे आलम ने तोड़ कर फेंक दिया था, जो कहानी लिखने तक पुलिस बरामद नहीं कर सकी. Love Story in Hindi

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Love Story in Hindi: औनलाइन इश्क जरा सोचसमझ के

Love Story in Hindi: पांचवीं पास मसजिद का इमाम और 3 बच्चों का बाप शहजाद बहुत चालबाज था. उस ने उच्चशिक्षित असमिया युवती नईमा यासमीन से औनलाइन दोस्ती कर उसे न सिर्फ फरेबी इश्क के जाल में फांसा, बल्कि उस से औनलाइन निकाह भी कर लिया. एक दिन नईमा ने जब अपना मुंह खोला तो उसे ऐसी सजा दी गई कि…

असम की रहने वाली नईमा यासमीन पिछले 2 दिनों से नोएडा के वन बीएचके फ्लैट में उदास बैठी थी. उस की उदासी के कई कारण थे. उस ने मोबाइल से बैंक बैलेंस चैक किया था, जो जीरो पर आ गया था. कहीं भी कोई सेविंग्स नहीं बची थी. सारे पैसे खत्म हो गए थे. उसे अपना मेट्रो कार्ड रिचार्ज करवाने के लिए पैसे की जरूरत थी. मोबाइल का रिचार्ज भी 2 दिनों में खत्म होने वाला था. इस बारे में अपनी बहन को बताए भी काफी समय बीत चुका था. उस से कुछ पैसे अकाउंट में ट्रांसफर करने की उस ने मदद मांगी थी. यह बात सितंबर महीने की 16 तारीख दोपहर की है.

उसे जल्द ही कोई दूसरी नौकरी तलाशनी थी. दिल्ली के एनसीआर गुरुग्राम की नौकरी छोड़े 2 हफ्ते हो गए थे. वह कई दूसरी कंपनियों में अपना रिज्यूम दे चुकी थी, लेकिन कहीं से बुलावे का मेल नहीं आया था. वह पिछले साल 2024 में शादी के बाद गुरुग्राम के पीजी से शिफ्ट हो कर नोएडा में अपने पति शहजाद के साथ रह रही थी. कई बातें दिमाग में उमड़घुमड़ रही थीं. तभी कौल बेल बजने पर उस का ध्यान भंग हो गया. वह बेमन से दरवाजा खोलने के लिए उठ रही थी. तब तक 2-3 बार कौल बेल बज चुकी थी.

दरवाजे की कुंडी खोल कर अपने कमरे में जाने को मुड़ी ही थी कि पीछे से प्यार भरी आवाज आई, ”क्या बात है बेगम साहिबा!  पूछे बगैर कुंडी खोल दी! दरवाजे पर कोई और होता तो..? ऐसी भूल मत किया करो.’’

यह उस के पति शहजाद की आवाज थी, जिस का नईमा ने कोई जवाब नहीं दिया था और कमरे में चली गई थी. पीछेपीछे शहजाद भी आ गया. उस ने पूछा, ”नौकरी का कहीं से बुलावा आया?’’

”अभी नहीं,’’ नईमा उदासी से बोली.

”कोई बात नहीं, चलो जब तक कहीं से कोई बुलावा नहीं आता, तब तक तुम्हें सैर करवाने ले चलता हूं.’’ शहजाद बोला.

”मैं टेंशन में हूं और तुम्हें सैर की सूझ रही है.’’

”थोड़ा घूमोगी तभी तो तुम्हारा मन हलका होगा. आज नहीं तो कल नौकरी मिल ही जाएगी, चिंता क्यों करती हो?’’ शहजाद बोला.

नईमा को पति के बदले रूप पर हैरानी हुई. कुछ देर पहले वह उस से काफी झगड़ कर निकला था. फिर अचानक उस से प्यार जताने लगा, सैर पर जाने के लिए कह रहा है. वह बोली, ”पैसे कहां हैं?’’

”इस की चिंता मत करो…’’ शहजाद के आगे कुछ बोलने से पहले ही पास रखे नईमा के मोबाइल पर मैसेज आने की टोन सुनाई दी. वह यूपीआई द्वारा पैसे आने का मैसेज था.

टोन सुन कर शहजाद फोन की तरफ देखने लगा. वह बोला, ”यह लो, पैसे भी आ गए!’’

”नहींनहीं! इस पर नजर मत डालो. बड़ी मिन्नतों के बाद दीदी ने पैसे भेजे हैं. मेट्रो कार्ड और फोन रिचार्ज करवाना है.’’ नईमा तुनकती हुई बोली और पैसा ट्रांसफर का मैसेज पढऩे लगी.

उस में शहजाद भी झांकने लगा. अंगरेजी में लिखा मैसेज आसानी से नहीं समझ पाया. बैलेंस अमाउंट देखने से पहले ही नईमा ने मोबाइल बंद कर दिया.

”ठीक है मत बताओ, मेरी जेब में पैसे हैं. यह देखो.’’ कहते हुए शहजाद ने जेब से 500 रुपए के नोटों की एक गड्डी निकाल कर दिखा दी.

”इस में पूरे 30 हजार रुपए हैं. चलो, तुम्हें मेरठ घुमा लाता हूं. वहीं कुछ शौपिंग भी करवा दूंगा. बचे पैसे तुम रख लेना.’’

”इतने पैसे कहां से आए. अभी तो तुम्हारे पास एक रुपया नहीं था…सचसच बताना किस से कर्ज लिया है?’’ नईमा बोली.

”तुम बेकार की बातों में मत उलझो. तैयार हो जाओ, हमें जल्दी निकलना है.’’ शहजाद बोला और अपना सामान पैक करने के लिए बैग निकाल लिया.

नईमा शहजाद के इस रूप को देख कर हैरान थी. बातबात पर गालियां बकने और हाथ उठाने वाले में यह बदलाव कैसे आ गया. इस पर अधिक बात न करना ही उस ने मुनासिब समझा. उस की दिली तमन्ना को पूरा करने के लिए वह भी उस के साथ चलने की तैयारी करने लगी.

कुछ घंटे बाद शहजाद और नईम मेरठ के भीड़भाड़ वाले बाजार में थे. वहीं दोनों ने कुछ शौपिंग की. नईमा ने झिझकते हुए अपनी पसंद की एक ड्रैस ली, लेकिन नईम ने उस के लिए एक बुरका भी खरीद लिया. फिर दोनों ने एक साधारण से रेस्टोरेंट में खाना खाया.

वहीं शहजाद की मुलाकात नदीम से हुई. उस का परिचय नईमा से करवाया, ”यह मेरा खास दोस्त है. मुसीबत में मेरा साथ देता है.’’

”अच्छा!’’ नईमा इस से अधिक और कुछ नहीं बोली.

शहजाद उसे रेस्टोरेंट के बाहर तक छोड़ आया.

तब तक शाम घिरने लगी थी. नईम वापस दिल्ली लौटने को बोली. इस पर शहजाद ने अगले रोज लौटने के बारे में बोल कर अपने दोस्त नदीम घर ठहरने का आग्रह किया.

नईमा थकान महसूस कर रही थी. शहजाद के आग्रह को मान लिया. दोनों नदीम के घर की ओर चल पड़े. रास्ते में एक जूस की दुकान दिखी. शहजाद बोला, ”क्यों न एकएक गिलास जूस पी लिया जाए! जूस की यह बहुत फेमस दुकान है. तुम्हारे लिए कौन सा जूस बनवाऊं?’’

”अनार का बनवा लो,’’ वह बोली.

”ठीक है, मैं तो अनानास का लूंगा!’’ शहजाद बोला और जूस की दुकान की ओर चल पड़ा. नईमा थोड़ी दूरी पर खड़ी रही. कुछ मिनटों में ही शहजाद 2 गिलास जूस ले कर नईमा के पास आ गया. दोनों ने अपनीअपनी पसंद का जूस पीया और फिर वहां से चल पड़े. अगले रोज 17 सितंबर, 2025 को मेरठ में जानी थाने की पुलिस को सिवालखास जंगली इलाके में एक महिला की रक्तरंजित लाश मिली. लाश बुरके में थी. पुलिस लावारिस लाश की पहचान के लिए तहकीकात में जुट गई. महिला का गला रेता हुआ था.

इस की स्थिति देख कर पहली नजर में पुलिस ने अनुमान लगाया कि महिला की मौत गला रेतने से हुई होगी. किंतु हो सकता है उस की मौत के और भी कुछ कारण रहे हों. हो सकता है उस का गला घोंटा गया हो या फिर उसे जहर खिलाने के बाद मृत देह का गला रेता गया हो. कारण जो भी हो, वो तो पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकेगा.  शक्ल और कदकाठी से महिला उत्तर पूर्व की लग रही थी, जिस की उम्र लगभग 35-36 साल थी.

मौत के कारण की जांच के लिए लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उस की रिपोर्ट में गला रेतने से मौत की पुष्टि हुई. किंतु उस की हफ्तों तक पहचान नहीं हो पाई. पुलिस को कोई सुराग भी हाथ नहीं लग रहा था. मेरठ की पुलिस तफ्तीश में जुटी हुई थी.

अचानक 8 अक्तूबर, 2025 को मेरठ पुलिस को एक गुमशुदा की रिपोर्ट पर ध्यान गया. दरअसल, वह रिपोर्ट मुजफ्फरनगर के चरथावल थाने में दर्ज की गई थी. करीब 35 वर्षीया नईमा यासमीन नामक महिला के बारे में बताया गया था कि वह 16 सितंबर से लापता है. गुमशुदमी दर्ज होते ही नईमा यासमीन का फोटो और पूरी डिटेल्स पुलिस के औनलाइन रिकौर्ड पर फीड हो गई. मेरठ पुलिस की नजर जब इस पर गई, तब वह चौंक गई. कारण गुमशुदा महिला की तसवीर 17 सितंबर को बरामद हुई लाश से मिलतीजुलती थी.

मेरठ पुलिस को गुमशुदा की रिपोर्ट से ही शिकायत दर्ज करवाने वाले के बारे में मालूम हो गया. वह पहले चरथावल थाने गई. वहां से रिपोर्ट दर्ज करवाने वाले का पूरा विवरण ले लिया, जो उस लापता महिला नई यासमीन का पति शहजाद है. उस के ग्राम सैद नगला मुजफ्फरनगर का रहने की पुष्टि हुई. मेरठ पुलिस तुरंत शहजाद के घर गई. पुलिस को देखते ही शहजाद घबरा गया. उस की बौडी लैंग्वेज से पुलिस समझ गई कि जरूर दाल में कुछ काला है. पुलिस ने उसे उस की लापता पत्नी की लाश मिलने की जानकारी दी.

यह सुन कर शहजाद घडिय़ाली आंसू बहाने लगा. फिर पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले गई. थाने में उस से यासमीन की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो शहजाद पुलिस के सवालों के सही जवाब देने से कतराता रहा, किंतु जब पुलिस ने सख्त रुख अख्तियार किया, तब  उस ने नईम की हत्या करना कुबूल कर लिया. उस ने यह भी बताया कि इस वारदात को अंजाम देने में उस ने अपने साथी नदीम अंसारी की मदद ली थी. दोनों ने मिल कर यासमीन की हत्या की थी. इस से पहले उस ने यासमीन को जूस में नींद की गोलियां मिला कर दी थीं. उस के बेहोश हो जाने के बाद दोनों उसे घटनास्थल तक ले गए थे.

हत्या के बाद किसी को शक नहीं हो, इसलिए उस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना चरथावल में दर्ज करवाई थी. यह उस तक पुलिस के पहुंचने का कारण बन गया. जांचपड़ताल के बाद जानी थाने की पुलिस ने शहजाद और नदीम को गिरफ्तार कर वारदात का खुलासा कर दिया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त छुरी व रस्सी भी बरामद कर ली. इस खुलासे पर एसएसपी डा. विपिन ताडा ने पुलिस टीम को 25 हजार रुपए का इनाम दे कर पुरस्कृत किया. शहजाद ने नईम की हत्या करने का जो कारण बताया, इस में उस की मक्कारी, हैवानियत, अपनी पहली बीवी और इसलाम धर्म तक के साथ बेवफाई की हैरान करने वाली दर्दनाक दास्तान थी.

हत्या की शिकार होने वाली नईमा यासमीन और शहजाद एक बेमेल जोड़ा था. उन के बीच कुछ समय के लिए वैचारिक तालमेल बन गए थे और यही उन के बीच प्रेम संबंध और निकाह का कारण भी था. नईम यासमीन जितनी सच्ची और प्रतिभावान और पढ़ीलिखी थी, शहजाद उतना ही उस के उलट था. असम के शहर गुवाहाटी की रहने वाली नईमा ग्रैजुएट थी और दिल्ली एनसीआर में स्थित मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती थी. दूसरी तरफ 5वीं तक पढ़ाई करने वाला शहजाद मेरठ की एक मसजिद में इमाम की छोटी से नौकरी करता है. वह शादीशुदा है और 3 बच्चों का बाप भी था. वह सोशल मीडिया का दीवाना था.

साल 2024 में उस की नईमा से औनलाइन जानपहचान हो गई थी. नईमा एनिमल वेलफेयर एनजीओ से भी जुड़ी थी. जानवरों से उसे बेहद लगाव था. साथ ही उस के पास 5-6 बिल्लियां भी थीं. इसी एनजीओ के जरिए साल 2024 में उस की मुलाकात शहजाद से हुई थी. सोशल मीडिया के जरिए दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और फिर धीरेधीरे दोस्ती आगे बढ़ी. शहजाद ने खुद को दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) का ग्रैजुएट और कारोबारी बता कर नईमा का दिल जीत लिया था. साथ ही उस ने कहा था कि उसे भी बिल्लियों से बहुत प्यार है. उस ने नईमा से वही बातें कीं, जो उसे पसंद थीं.

कैट लवर बन कर शहजाद ने धीरेधीरे नईमा का भरोसा जीत लिया था और फिर प्यार का सिलसिला शुरू हो गया था. सितंबर 2024 में दोनों ने औनलाइन निकाह भी कर लिया. निकाह के बाद दोनों दिल्ली में साथ रहने लगे, जिस की जानकारी नईमा की बहन को भी थी. नईमा खुश थी और अपने नए जीवन की बातें सिर्फ अपनी बहन के साथ साझा करती थी. निकाह के करीब 3 महीने बाद शहजाद ने नईमा से मुजफ्फरनगर में स्थित अपना पुश्तैनी घर दिखाने के लिए कहा. उस के कहने पर नईमा मुजफ्फरनगर पति के घर पहुंची. वहां उस के सपने टूट गए. खुद को बिजनैसमैन बताने वाला शहजाद बेहद साधारण परिवार से था और एक इमाम की नौकरी करता था. खुद मसजिद के राशन पर पलता था. उस का कोई कारोबार या व्यापार नहीं था. उस ने नईमा को झूठ बताया था.

सब से बड़ा झूठ तो उस ने अपनी शादी को ले कर कहा था. नईमा से उस ने बात छिपा ली थी कि वह पहले से विवाहित और 3 बच्चों का बाप भी है. नईमा को समझते देर नहीं लगी कि शहजाद ने उस से निकाह उस की नौकरी और सैलरी, सेविंग्स के लालच में किया था. इस सच्चाई के खुलते ही नईमा ने शहजाद का विरोध किया. बदले में शहजाद उस के साथ गालीगलौज और मारपीट  पर उतर आया. शहजाद की हकीकत जान कर नईमा यासमीन पूरी तरह टूट गई. उस ने अपना दुखड़ा बहन को सुनाया. अपनी सच्चाई का परदाफाश होते  ही शहजाद का चेहरा भी बदल गया. वह नईमा की सैलरी हड़पने लगा. उस की सारी सेविंग्स भी खत्म कर दी.

नईमा परेशान हो गई. उस ने शहजाद से पहली पत्नी और बच्चों से मिलने से मना किया. यह बात शहजाद को नागवार गुजरी. तब उस ने नईमा को ही रास्ते से हटाने का प्लान बना लिया.  जिस के लिए उस ने अपने दोस्त नदीम को 12 हजार रुपए दे कर योजना में शामिल कर लिया. योजना के मुताबिक शहजाद 16 सितंबर, 2025 को शौपिंग के बहाने नईमा को मेरठ ले कर आया और रास्ते में उसे जूस में नींद की गोलियां दे कर बेहोश कर दिया. फिर दोनों उसे जंगली इलाके के एक खेत में ले गए. जहां नदीम ने रस्सी से उस का गला दबाया और शहजाद ने छुरे से गले को रेत दिया. फिर दोनों ने लाश को एक बुरके में लपेट कर फेंक दिया. फिर वापस घर लौट आए.

हफ्तों तक वे चुप्पी साधे रहे, लेकिन भीतरभीतर डरे हुए भी थे कि कहीं वे पकड़े न जाएं. इसी भय से शहजाद ने 8 अक्तूबर, 2025 को मुजफ्फरनगर में नईमा यासमीन की गुमशुदगी भी दर्ज करवा दी थी. पुलिस ने आरोपी शहजाद और उस के साथी नदीम से पूछताछ करने के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Love Story in Hindi

 

Crime News: नोएडा में सनसनी – नाले से मिली सिर कटी महिला की निर्वस्त्र लाश

Crime News: एक ऐसी हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है, जिस ने हर किसी को चौंका कर रख दिया है. नोएडा में एक महिला की सिर कटी निर्वस्त्र लाश नाले में मिली. आखिर किस की थी यह लाश और किस ने इस महिला को इतनी बेरहमी से मार डाला. क्या है इस हत्याकांड का पूरा सच, चलिए पढ़ते हैं, इस क्राइम से जुड़ी स्टोरी को विस्तार से.

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के नोएडा के सेक्टर-82 से सामने आई है. यहां 6 नवंबर, 2025 दिन गुरुवार को एक महिला का सिर कटा हुआ शव मिला. पुलिस को सूचना मिली तो वह मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में ले लिया.पुलिस के द्वारा शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है. पुलिस जांच कर रही है कि मृतका कौन है.

पुलिस के अनुसार, यह मामला थाना सेक्टर-39 में दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने कहा है कि यह महिला का शव सेक्टर-82 नोएडा के कट के पास नाले में मिला. महिला का सिर और हाथ गायब थे. जिस से लग रहा है कि महिला की हत्या कहीं और की गई थी. सबूत मिटाने के लिए शरीर को यहां फेंका गया होगा. पुलिस सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज के आधार पर जांच कर रही है. Crime News