UP News: चांदनी की चाहत

UP News: चांदनी वास्तव में  इतनी खूबसूरत थी कि गोरखपुर का विश्वकर्मा चौहान उस पर मर मिटा था. जबकि वह एक बेटी का बाप था. पत्नी ममता उस पर जान छिड़कती थी, लेकिन प्रेमिका चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा एक दिन ऐसा जघन्य अपराध कर बैठा कि न वह घर का रहा और न घाट का.

विश्वकर्मा ने प्रेमिका चांदनी से मिल कर पत्नी ममता के साथ हुए विवाद के बारे में सारी बातें बताईं और उसे रास्ते से हटाने के बारे में सुझाव भी मांगा तो उस ने बड़ी खूबसूरती के साथ अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, ”जो भी करना है, आप को करना है. मुझे तो आप के पहलू में सिर रख कर सोना है बस.’’

उधर बेटी की परवरिश के लिए ममता पति विश्वकर्मा से अपने हक के लिए दबाव बनाए हुए थी. पत्नी के दबाव से वह परेशान हो गया था. इसी बीच उस ने अपने हिस्से की गांव वाली जमीन पापा से अपने नाम रजिस्ट्री करा कर वह 35 लाख रुपए में बेच दी. जब ममता को जानकारी हुई कि पति ने गांव वाली अपने हिस्से की जमीन 35 लाख रुपए में बेच दी है तो वह उन रुपयों में से आधा हिस्सा मांगने लगी. पति ने फिर वही रटारटाया जवाब दिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए, उसे एक फूटी कौड़ी नहीं देगा. इस के बाद पति और पत्नी के बीच विवाद और गहराता चला गया.

ममता और विश्वकर्मा के बीच विवाद इस कदर बढ़ता चला गया कि विश्वकर्मा को ममता के नाम से ही नफरत हो गई थी और उस के खून से अपने हाथ रंगने के लिए तैयार हो गया था. उस दिन के बाद से वह पत्नी की हर गतिविधि पर नजर रखने लगा. वह उस की रेकी करने लगा था. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी. ममता अपनी बेटी को साथ ले कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में किराए के कमरे में रहती थी. यहीं रह कर वह प्राइवेट जौब कर अपनी और बेटी की परवरिश करती थी. विश्वकर्मा ने पता लगा लिया था कि वह बेटी के साथ कहां रहती है.

बात 4 सितंबर, 2025 की है. शाम साढ़े 7 बजे ममता बेटी को साथ ले कर घरेलू सामान की खरीदारी और फोटो खिंचवाने के लिए बाजार गई थी. पत्नी को घर से बाहर निकलते देख पहले से घात लगाए बैठा विश्वकर्मा अलर्ट हो गया और उस के पीछे लग गया. जहांजहां वह जाती, विश्वकर्मा उस के पीछे था. इस बात से अंजान ममता अपनी धुन में खोई बेटी के साथ बाजार की ओर बढ़ती रही. उसे इस बात का कतई अंदेशा नहीं था कि पति उस का पीछा कर रहा है.

ममता बेटी को ले कर गीता वाटिका के आसपास की दुकानों से सामान खरीद कर जेल रोड के सामने स्थित राधिका स्टूडियो में दाखिल हुई तो स्टूडियो से थोड़ी पहले विश्वकर्मा अपनी बाइक खड़ी कर के उस के वहां से आने का इंतजार करने लगा. करीब 20 मिनट बाद ममता बेटी के साथ फोटो खिंचवा कर स्टूडियो से बाहर निकली तो उसे देखते ही विश्वकर्मा का जबड़ा गुस्से से भिंच गया.

ममता स्टूडियो से जैसे ही थोड़ी आगे बढ़ी, तभी विश्वकर्मा उस के सामने आ खड़ा हुआ. पति को सामने देख कर ममता सहम गई और वहीं खड़ी हो गई. बेटी भी पापा को देख कर सकते में आ गई. अभी वह कुछ कह या समझ पाती, तब तक उस ने हेलमेट में छिपा कर रखा तमंचा निकाला और एक गोली पत्नी ममता के सीने में और दूसरी गोली बाएं कंधे पर चला दी.

गोली लगते ही ममता लहराते हुए जमीन पर गिर पड़ी और तड़पने लगी. यह देख कर बेटी अपनी जान बचा कर वहीं आसपास छिप गई. विश्वकर्मा घुटने जमीन पर टिका कर नीचे बैठ कर तड़प रही पत्नी को गौर से देखने लगा और होंठों में बुदबुदाया, ”कहा था मैं ने कि मुझ से पंगा मत ले, मत ले, लेकिन तू नहीं मानी. तूने मेरी बात मान ली होती और आराम से तलाक दे दिया होता तो तू ऐसे सड़क पर नहीं पड़ी होती, जिंदा रहती. अपनी बेटी के साथ जीती, लेकिन अपनी अकड़ के आगे तूने झुकना नहीं सीखा तो मैं कहां तुझे बख्शने वाला था. हरामजादी कहीं की…’’

इधर गोली चलने की आवाज सुनते ही व्यापारी अपनी दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिराने लगे. कुछ ही देर में वहां सन्नाटा पसर गया. इसी बीच भीड़ में से किसी ने घटना की सूचना गोरखपुर के शाहपुर थाने के इंसपेक्टर नीरज राय को दे दी. घटना की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर राय फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने देखा तमंचा हाथ में लिए हत्यारा विश्वकर्मा चौहान वहीं बैठा है. फिर क्या था, पुलिस ने उसे तमंचे सहित गिरफ्तार कर लिया.

आननफानन में घायल ममता को जीप में लाद कर जेल रोड स्थित विनायक नर्सिंगहोम ले जाया गया, जहां डौक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया.

मम्मी की मौत की सूचना मिलते ही मासूम बेटी लडख़ड़ा कर फर्श पर जा गिरी. वह यह समझ नहीं पा रही थी कि उस के साथ ये क्या हो रहा है. ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे इतनी बड़ी सजा दी है. सिर से मम्मी का साया छिन गया तो वह अब किस के सहारे जीएगी? वीरान सी जिंदगी अकेले कैसे जीएगी? पुलिस ने ममता के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए गुलरिहा स्थित बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस ने ममता के मोबाइल फोन से उस के बड़े भाई संदीप चौहान, जो लुधियाना में परिवार सहित रहता था, को सूचना देते हुए मौके पर आने के लिए कहा.

बहन की हत्या की सूचना मिलते ही वह  उसी रात प्राइवेट वाहन से लुधियाना से गोरखपुर के लिए रवाना हो गया था. अगले दिन यानी 5 सितंबर, 2025 को संदीप चौहान परिवार सहित गोरखपुर पहुंचा और शाहपुर थाने आया तो वहां मामा संदीप को देखते ही उस की भांजी उस से लिपट कर फफकफफक कर रोने लगी. भांजी को रोता देख कर संदीप भावुक हो उठा. सुरक्षा के लिहाज से पुलिस ने बीती रात से ही मृतका की बेटी को अपनी सुरक्षा में ले रखा था, ताकि उसे कोई नुकसान न पहुंचा सके. क्योंकि इस घटना की वही एकमात्र चश्मदीद गवाह थी.

पोस्टमार्टम के बाद में पुलिस ने ममता चौहान की लाश उस के भाई संदीप को सौंप दी थी. जहां उन्होंने राजघाट श्मशान में अंतिम संस्कार कराया और उसे साथ ले कर अपने गांव खजनी के पुरैना कटया चला गया. आरोपी विश्वकर्मा चौहान से की गई पूछताछ में कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

36 वर्षीया ममता चौहान 3 भाइयों संदीप चौहान, सनी चौहान और सुभाष चौहान के बाद जन्मी थी. घर में वह सब से छोटी थी और सब की लाडली भी थी. सब से बड़े भाई संदीप से उस की काफी निभती थी. ममता पिता के समान बड़े भाई को सम्मान देती थी.

मन जैसा नहीं था पति

ममता नाम के अनुरूप ही थी. उस की वाणी से रस टपकता था. लोग उस की प्रशंसा किए बिना रहते नहीं थे, लेकिन जिद्ïदी तो इतनी थी कि एक बार किसी काम के लिए अपनी जिद पर अड़ जाती तो उसे पूरा किए बिना पीछे हटती नहीं थी. घर ही नहीं आसपास के सभी लोग उस के इस व्यवहार से वाकिफ थे. धीरेधीरे बचपन की गलियों को पीछे छोड़ उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखा तो फेमिली वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. फेमिली वालों ने उस की शादी के लिए नातेरिश्तेदारों से अच्छे लड़के की तलाश करने के लिए कह रखा था.

ममता चौहान

जल्द ही फेमिली वालों की मनोकामना पूरी भी हो गई और ममता के लिए जैसा वर चाहते थे, उन्हें हरसेवकपुरम के रहने वाले विश्वकर्मा चौहान के रूप में मिल गया था. फिर जल्द ही उन की शादी हो गई. कसरती और गठीले बदन वाला विश्वकर्मा चौहान देखने में मेहनतकश तो लगता था, लेकिन वह वैसा था नहीं. ममता ने सपनों के जिस राजकुमार की कल्पना की थी, वह वैसा निकला नहीं. पति का चरित्र रसिक और आपराधिक था, क्योंकि अपने हार्डकोर क्रिमिनल भतीजे की संगत में रह कर वह भी छोटेमोटे अपराध करने लगा था.

जब तक ममता पति की पूरी सच्चाई जानती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि तब तक वह एक बेटी की मां बन चुकी थी. धीरेधीरे बेटी बड़ी हो रही थी. पिता की आपराधिक छाया बेटी पर न पड़ेे, इसलिए वह पति को आपराधिक छवि से दूर होने के लिए समझाती रही. एक दिन ममता ने पति को समझाते हुए कहा, ”ऐ जी, तुम यह काम छोड़ क्यों नहीं देते? देखो, अब तुम्हारा परिवार है. एक बेटी भी हो चुकी है. धीरेधीरे बड़ी होगी और जब मुझ से पापा के काम के बारे में पूछेगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगी. क्या कहूंगी उसे कि तेरे पापा अच्छा काम नहीं करते, वह बुरे इंसान हैं तो उस के बालमन को कितना गहरा आघात पहुंचेगा. इस बारे में कभी सोचा है?’’

”यार, तुम कितना बकबक करती हो. सोने भी नहीं देती, जा चुपचाप सो जा. रात काफी गहरी हो चुकी है. इस बारे में हम सबेरे बात करते हैं. मुझे जोर की नींद आ रही है.’’ पत्नी के सवालों को सुन कर विश्वकर्मा बात इधरउधर टालमटोल कर सोने का बहाना बनाने लगा था.

”एक नहीं सुनूंगी मैं आज तुम्हारी. क्यों न पूरी रात यंू ही आंखों में कट जाए, लेकिन अपने सवालों के जबाव सुने बगैर न खुद सोऊंगी और न ही सोने दूंगी. बताइए, ये गंदा काम छोड़ कर क्यों नहीं कोई दूसरा काम करते हैं, जिस में 2 पैसों की आमदनी हो और सम्मान से जीए भी.’’

”मेरे को गुस्सा मत दिला ममता. सोने दे. कहा न, इस बारे में कल सबेरे बात करते हैं. फिर सुनती क्यों नहीं?’’ उस ने पत्नी को डांटा.

”मेरे सवालों का जबाव दे दो, चुप हो जाऊंगी. तुम्हारा कल का सवेरा कभी आता ही नहीं. सवेरा हुआ नहीं कि तैयार हो कर बाहर निकल जाओगे और फिर रात में ही घर वापस लौटोगे. तो बताओ, मैं कब तुम से बात करूं?’’

”जिसे तुम गंदा काम कहती हो, वह मेरा प्रोफेशन है, अपने प्रोफेशन से अलग रह कर जिंदा नहीं रह सकता मैं. मेरे से पहले मुझे कोई टपका दिया तो करती रह जाना शृंगार. बेवा की जिंदगी ही नसीब होगी, इसलिए तुम भी सो जाओ और मुझे भी सोने दो. बेटी सो रही है, जग जाएगी. मेरे को भी पता है कि बेटी बड़ी होगी और मेरे पेशे के बारे में जानेगी तो उसे दुख होगा. तब की तब देखी जाएगी. तब के लिए रात क्यों खराब करती हो?’’ कहते हुए विश्वकर्मा खर्राटे भरने लगा और ममता उसे देखती रह गई.

सुबह होते ही फ्रैश हो कर विश्वकर्मा नाश्ता कर के बाहर निकल गया. रात का ममता का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था. नाश्ता बना कर पति को दे तो दिया था, लेकिन गुस्से से उस का नथुना अभी भी फूल और पिचक रहा था.

सौतन लाने की थी तैयारी

विश्वकर्मा के दिन का आधा समय सोशल मीडिया (फेसबुक) देखने में बीत जाता था. यही नहीं, फेसबुक पर लड़कियों से घंटों चैटिंग करता रहता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. चैटिंग करता था सो अलग की बात थी, कई लड़कियों से उस के अफेयर चल रहे थे, जिन में चांदनी नाम की एक युवती को तो पत्नी की सौतन बनाने की तैयारी में जुटा हुआ था. पति की करतूतों से ममता के सपने आहत हो चुके थे. जो सपने आंखों में सजाए पीहर से ससुराल आई थी, सासससुर और जेठ सब के सब मम्मीपापा और भाई जैसे ही मिले, लेकिन जिस के साथ जीवन बिताना था, वही छलिया निकला. अब बेटी ही उस के जीने का एकमात्र सहारा बची थी.

पत्नी के हत्या के आरोपों में सलाखों के पीछे विश्वकर्मा चौहान

जब से पति कि चरित्र की कलई उस के सामने खुली थी, तब से उस का मन पति के प्रति घृणा से भर गया था. नफरत हो गई थी उस की सूरत से. धीरेधीरे दोनों के बीच मनभेद ने अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया था. ममता और विश्वकर्मा एक छत के नीचे रहते तो जरूर थे, लेकिन उन में अजनबियों जैसा व्यवहार था. उन के बीच में बातचीत कम होती थी, वाट्सऐप से बातें होती थीं. किसी चीज की जरूरत होती थी तो ममता उसे वाट्सऐप पर मैसेज भेज देती थी. विश्वकर्मा उसे पकड़ कर उस की जरूरतें पूरी कर देता था.

पत्नी करने लगी थी नफरत

पत्नी की नफरत भरी हरकतों से विश्वकर्मा का भी मन उस के प्रति नफरतों से भरता जा रहा था. इस का नतीजा यह हुआ कि पत्नी से दूरियां बना गर्लफ्रेंड चांदनी को घर की जीनत बनाने के ख्वाब देखने लगा. कल तक जो पति छिपछिप कर अपनी महिला दोस्तों से फेसबुक पर चैटिंग करता था, वह अब पत्नी के सामने उन से रोमांटिक बातें करता था. यह देख कर ममता जलभुन जाती थी. धीरेधीरे बेटी 10 साल की हो गई थी. मम्मी और पापा के बीच की दूरियों को समझ रही थी. उन के खटास रिश्तों को अपने प्यार की मिठास से सुंदर बनाने की अथाह कोशिश करती रही, लेकिन उस का यह प्रयास नाकाम साबित हुआ था.

दिन पर दिन पतिपत्नी के रिश्तों में खाई और गहराती जा रही थी. यह देख और सोच कर बेटी का हृदय आत्मग्लानि से भरा जा रहा था कि मेरा क्या कुसूर था, जो मम्मी और पापा के झगड़े के बीच वह पिस रही है. ममता के कंधे पर बेटी की जिम्मेदारी का बोझ आ गया था. पति इधरउधर से जो भी कमाता था, अपनी अय्याशी पर उड़ा देता था. बेटी से भी उस ने एक तरह से मुंह मोड़ लिया था. जबकि बेटी सयानी होती जा रही थी. उस का भविष्य दोनों की लड़ाईझगड़े के बीच पिसता जा रहा था. पति ने जब अपना हाथ खींच लिया तो ममता बेटी के जीवन संवारने के लिए प्राइवेट नौकरी करने लगी.

ममता के घर से बाहर नौकरी करने पर विश्वकर्मा को आपत्ति थी. पति के इस रवैए से नाखुश ममता बेटी को साथ ले कर मायके खजनी चली गई. वहां कुछ दिनों तक रही और बड़े भाई संदीप से अपना दुखड़ा रोती रही. भाई भी बहनोई के चरित्र से परेशान हो चुका था. वह भी नहीं समझ पा रहा था कि दोनों के रिश्ते को कैसे सही करूं. दोनों को समझासमझा कर थक चुका था, लेकिन इस का नतीजा सिफर ही निकला.

पत्नी ममता के मायके में रहने से विश्वकर्मा चौहान स्वच्छंद जीवन जी रहा था. उस के जीवन में कई लड़कियों ने अपना बसेरा डाल रखा था. समयसमय पर वह सभी के साथ फ्लर्ट करता था. उन लड़कियों में एक लड़की सब से अलग मिजाज की थी, जिस का नाम था चांदनी. बिलकुल चांदनी के माफिक उजली गोरीचिट्टी, मानो खुद चांदनी धरा पर अपनी छटा बिखेर रही हो. उस से टूट कर प्यार करता था विश्वकर्मा. वह भी उसे दिल की गहराइयों तक प्यार करती थी. उस के प्यार में अंधी थी वह.

विश्वकर्मा के जीवन में चांदनी के आने के बाद उस के जीने का तौरतरीका ही बदल गया था. पत्नी ममता तो उसे फूटी आंख नहीं भा रही थी. वह चाहता था कि पत्नी से जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आजादी मिल जाए तो चांदनी के साथ शादी कर के आगे का जीवन मजे से जीए. लेकिन ममता एक पढ़ीलिखी, मेहनतकश और मजबूत इरादों वाली महिला थी. इतनी आसानी से वह पति को आजादी देने वाली नहीं थी. कसम खा ली थी कि शरीर के चाहे टुकड़ेटुकड़े हो जाएं, पति को आजादी नहीं दूंगी.

पति के चालचलन से खीझ कर ही वह बेटी को साथ ले कर मायके चली गई थी. पत्नी के मायके जाने से विश्वकर्मा चौहान की जिंदगी में जैसे बहार आ गई थी. पत्नी के इस फैसले से वह बेहद खुश था, जैसे उस की मुराद पूरी हो गई थी. विश्वकर्मा चौहान का मकान पूरी तरह से खाली था. मम्मीपापा गांव में रहते थे. एक भाई था, वह भी अपने परिवार के साथ अलग रहता था. पत्नी के मायके जाने के बाद उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

पत्नी के जाने के बाद अपनी प्रेमिका चांदनी को वह अपने घर ले आया था. एक मेहमान की तरह उस ने उस की खूब आवभगत की. बढ़चढ़ कर उस की खातिरदारी की. अपनी शानदार आवभगत से चांदनी बहुत खुश हुई. अपनी भावनाओं को वह रोक नहीं पा रही थी. आखिरकार उस ने कह ही दिया, ”बहुत खुश हूं मैं आप की मेहमाननवाजी से. मेरा दिल भर गया. नहीं जानती थी कि आप मुझे से इतना प्यार करते हो. मेरे लिए आप के दिल में इतना सम्मान है, चाहत है, बेपनाह इश्क है.’’

”सो तो है,’’ विश्वकर्मा अपना अपना दायां हाथ बाएं सीने से सटा कर अदब से झुक कर बोला था, ”मैं चीज ही ऐसा हूं जनाबेआली. मेरी अनोखी खातिरदारी से अच्छेअच्छे लोग पिघल जाते हैं. फिर आप फिसली तो क्या फिसली.’’

”अच्छा!’’ चांदनी चहक कर बोली, ”जनाब को खुद के आदरसत्कार पर बड़ा नाज है, लगता है.’’

”जी, मोहतरमा. कोई शक.’’

”नहीं,’’ कह कर दोनों ने एकदूसरे को प्यारभरी नजरों से देखते हुए ठहाके लगाए.

हालांकि इस से पहले भी विश्वकर्मा चांदनी को अपने घर पर कई बार ले कर आ चुका था, मगर दोनों को जितना आनंद आज के दिन आया था, उतना आनंद इस से पहले कभी नहीं आया था.

खैर, ठहाका लगातेलगाते वह चांदनी के बगल में बैठ गया तो वह भी गंभीर हो

बिखरे आंचल को सहेजने लगी और सहज हो गई.

जेल रोड स्थिर राधिका स्टूडियो जहां बेटी के साथ फोटो खिचवाने पहुंची थी ममता चौहान

पलभर के लिए कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था. दोनों के दिलों की धड़कनें तेज हो गई थीं. प्रेम अग्नि में उन के तनबदन तपने लगे थे. एक अजीब सी ठंडीठंडी सुरहुरी चांदनी के बदन में उठ रही थी. उस का रोमरोम खिल उठा था. विश्वकर्मा धीरेधीरे बेकाबू हो रहा था. चांदनी भी उस की तपिश में पिघलती जा रही थी. इश्क की आग में दोनों बराबर जल रहे थे. विश्वकर्मा के छूते ही वह छुइमुई की तरह सिकुड़ती जा रही थी. उस के पूरे बदन में झुरझुरी पैदा हो गई थी. सांसें धौंकनी की तरह तेजतेज चलने लगी थी. वह बेकाबू होती जा रही थी, फिर भी खुद पर नियंत्रण रखे हुई थी. वह आहिस्ता से बोली, ”बस, मुझे और बेकाबू मत कीजिए, वरना जूठी हो जाऊंगी.’’

प्यार में हुआ अंधा

”रोको मत, मुझे. हो जाने दो बेकाबू मुझे. आज पूरी तरह समा जाना चाहता हूं मैं.’’ विश्वकर्मा मद्धिम स्वर में बोला.

”नही…नहीं.’’ चांदनी कसमसा उठी, ”अभी नहीं. आप जब पूरी तरीके से मुझे पूरा अधिकार देंगे, तभी मैं सौंपूंगी खुद को आप के हवाले.’’

”कैसी बातें करती हो मेरी जान. तुम तो मेरी हो और मैं तुम्हारा हूं. क्या मुझ पर और मेरे प्यार पर तुम्हें भरोसा नहीं है.’’

”पूरा भरोसा है, यकीन भी है, लेकिन…’’

”लेकिन क्या?’’

”अब और सहन किया नहीं जा रहा है, मुझ से. समा जाने दो मुझे तुम में.’’

”नहीं…नहीं…अभी नहीं. शादी से पहले नहीं.’’

”जिद मत करो, चांदनी. तुम्हारी दूरी तनिक भी बरदाश्त नहीं हो रही है. 2 जिस्म एक जान हो जाने दो हमें. अपने प्यार की एक नर्ह कहानी अपने जिस्म पर लिख लेने दो हमें.’’ वासना की आग में जलता हुआ विश्वकर्मा बोले जा रहा था. जबकि प्रेमिका चांदनी लगातार उस से दूरियां बनाए हुए थी.

”देखिए, इस वक्त आप पूरी तरह बहक रहे हैं. ऐसे में कोई ऊंचनीच हो जाएगी तो समाज हम पर थूकेगा. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी मैं. सो प्लीज, मेरी बात मान जाइए और दूर हो जाइए.’’

प्रेमिका की बात सुन कर विश्वकर्मा के सिर से रोमांस का भूत उतर गया और वह बुरी तरह झल्ला उठा. वह बोला, ”अच्छेखासे मूड का तुम ने कचरा बना दिया.’’

”मैं ने क्या किया, जो आप इतना बिदक रहे हो.’’ चांदनी के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान थिरक रही थी, ”मैं ने थोड़ा सा सामाजिक आइना ही तो दिखाया आप को. यही कहा न कि अभी नहीं. जो करना है शादी के बाद करना है तो भला इस में क्या गलत कहा. इतने ही उतावले हो रहे हो मेरे जिस्म को पाने के लिए तो क्यों नहीं अपनी बीवी को तलाक दे रहे हो.’’ चांदनी के स्वर में अजीब सी तल्खी थी, जैसे सीधे छुरी उस के सीने में उतार दिया हो.

”क्या बेवकूफों की तरह बकवास करती हो तुम?’’

”आ…ह…हा… अब मेरी बात बेवकूफों की तरह लगने लगी.’’

”हां, तो…’’

”तो क्या? कुछ भी गलत तो नहीं कहा मैं ने. अपनी बीवी को तलाक दे दीजिए, मुझ से शादी कीजिए और मेरी जवानी के मजे लीजिए.’’

”तलाक…तलाक…तलाक… क्यों मेरे दिमाग का दही बना रही है. दे दूंगा, उसे तलाक भी दे दूंगा, पर आज का दिन तो मत खराब कर मेरी जान. मजे तो लूट लेने दे, क्यों तड़पा रही हो, क्यों सता रही हो अपने दीवाने को. बेचारा मुफ्त में मर जाएगा तेरी इस नानुकुर में.’’

”अपने राजा को ऐसे थोड़े ही न मरने दूंगी मैं,’’ शरारत भरे अंदाज में चांदनी बोली, ”अभी तो मेरे राजा को जन्नत की सैर करानी बाकी है.’’

”देख चांदनी, तू मेरे को ऐसे मत सता, मेरा मूड खराब हुआ तो…’’

ममता चौहान की मां

”तो…तो…क्या करोगे जानू.’’ चांदनी ने प्रेमी को जलाने के लिए उसे छेड़ा, ”जान से मार देंगे?’’

”अरे नहीं, यही तो नहीं कर सकता मैं. ऐसा करने से पहले मैं मर जाऊंगा. तू तो मेरी जान है. मेरे रगों में बहने वाला खून है. भला तुम्हें क्यों मारूंगा. अब तो कुछ न कुछ जल्द सोचना ही पड़ेगा.’’

”किस बारे में?’’

”तुम्हारे बारे में.’’

”मतलब?’’

”मतलब, तुम से दूर रह कर तो जी नहीं सकता और तू करीब आने नहीं देगी तो मुझे पत्नी के तलाक के बारे में सोचना ही पड़ेगा. जितनी जल्द उसे तलाक दूंगा, तभी तो तुम्हें अपने घर की जीनत बना सकंूगा.’’

”अब की है मुद्ïदे की बात. बीवी को तलाक दे दीजिए, ये जीनत उसी दिन आप की हो जाएगी.’’

”ठीक है, मैं ममता को तलाक देने के लिए किसी अच्छे वकील से मिल कर आगे की प्रोसेस करता हूं.’’

”ठीक है, चलती हूं मैं, बहुत देर हो चुकी है मेरे को आए, बाय…बाय…’’ कह कर चांदनी अपने घर के लिए रवाना हो गई तो विश्वकर्मा भी उसे बाय बाय बोल कर बाहर तक छोड़ कर आया और थोड़ा नाश्ता कर के फिर सो गया.

चांदनी से बात कर के विश्वकर्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था तो चांदनी भी कुछ कम खुश नहीं थी. प्रेमी के साथ बिताए पल को सोचसोच कर उस का रोमरोम खिल उठा था और यही सोच रही थी कि काश! उस खूबसूरत पल को कैद कर लेती तो कितना अच्छा होता. कब मेरा प्यार, दुल्हनिया बना कर मुझे अपने घर ले जाएगा, वह पल कब आएगा.

तलाक को उकसाया

उस दिन के बाद से चांदनी दिन भर में विश्वकर्मा को 2-3 बार फोन कर के पत्नी को तलाक देने के लिए उकसा दिया करती थी. प्रेमिका का फोन आते ही वह विचलित हो जाता था. और उसे भरोसा दिलाता था कि जल्द से जल्द ममता को तलाक दे देगा और उसे अपनी दुल्हन बना कर ले आएगा. इस बारे में वकील से बात कर ली है. थोड़ा वक्त उसे और दे दे. विश्वकर्मा चांदनी को आश्वासन दे चुका था कि पत्नी ममता को जल्द ही तलाक दे देगा, लेकिन वह जानता था उसे तलाक दे पाना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वह खुद ही इतनी आसानी से उसे आजाद नहीं कर रही थी.

विश्वकर्मा का एक भतीजा बदमाश था. लूट, हत्या, छिनैती, हत्या के प्रयास जैसे तमाम संगीन जुर्मों में वांछित चल रहा था. वह पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया था. भतीजे की धमक से विश्वकर्मा बेहद प्रभावित था. वह भी उसी ढर्रे पर चल निकला था. काफी सारे दुश्मन उस ने अपने आस्तीन में पाल लिए थे. अपनी सुरक्षा के मकसद से वह अपने पास एक अवैध तमंचा रखता था. चांदनी के प्यार में विश्वकर्मा इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे पत्नी ममता और बेटी की सूरत दिखाई नहीं दे रही थी, उसे तो बस कपड़े की तरह औरतें बदलने की आदत बन चुकी थी.

वारदात की सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पहुंची पुलिस

फ्लर्ट तो वह कई लड़कियों के साथ करता था, लेकिन चांदनी उसे इस कदर भा गई थी कि उसे पत्नी बनाने के लिए ठान लिया था, इसीलिए वह पत्नी को तलाक दे देना चाहता था. उस ने तलाक की अरजी न्यायालय में दाखिल भी कर दी थी. इस के बाद वह ममता से कोर्ट में गवाही देने के लिए दबाव बनाने लगा था, ताकि दोनों अपनी जिंदगी अपने तरीके से खुल कर जी सकें. पति विश्वकर्मा से ममता ने साफ शब्दों में कह दिया था कि न वह उसे तलाक देगी और न ही मनमानी करने देगी. भले ही जान ही क्यों न चली जाए.

आखिर एक बेटी है, जो सयानी हो रही है, उसे पढ़ाना है, उस का जीवन संवारना है. यदि पति गांव में स्थित अपने हिस्से वाला पूरा खेत मेरे नाम कर दे तो सोचूंगी.

पति कर बैठा क्राइम

विश्वकर्मा जानता था कि ममता उसे आसानी से तलाक नहीं देने वाली है. यानी  घी सीधी अंगुली से निकलने वाला नहीं है. फिर तो अंगुली टेढ़ी करनी ही पड़ेगी. उस ने तय कर लिया कि यदि ममता मेरी आजादी की राह में रोड़ा बन रही है तो इसे मौत के घाट उतारना ही पड़ेगा. ममता ने भी अदालत में खर्चे का दावा ठोक दिया था. पति की अय्याशी का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया पर रोमांटिक रील बनाबना कर पोस्ट करने लगी थी. ममता का यह रुख देख कर वह और बौखला गया था, लेकिन खिसियानी बिल्ली की तरह सिर्फ खंभा नोच कर रह गया था. इधर ममता मायके से वापस लौट कर शाहपुर थानाक्षेत्र के गीता वाटिका मोहल्ले में एक किराए का कमरा ले कर बेटी के साथ रह रही थी. वहीं रह कर वह नौकरी पर जाती थी.

इधर विश्वकर्मा यह पता लगा रहा था कि ममता ने अपना नया ठिकाना कहां बनाया है. आखिरकार उस ने पता लगा ही लिया था कि वह गीता वाटिका कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहती है. पते की बात तो यह थी कि जिस दिन से ममता ने बेटी को अपने साथ ले कर पति का घर छोड़ा था, उस के लिए दूसरी औरत को ले आने का रास्ता खुल गया था. दूसरी औरत यानी प्रेमिका चांदनी को घर ला कर उस के साथ रंगरेलियां मनाता था. वह अपने आशिक विश्वकर्मा पर पत्नी ममता से तलाक लेने के लिए बराबर दबाव बना रही थी.

विश्वकर्मा ममता के उस फैसले से और खार खाए हुए था, जिस में उस ने भरणपोषण के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. और वह उसे अपने हिस्से में से एक फूटी कौड़ी देने के लिए तैयार नहीं था. और फिर 4 सितंबर, 2025 की रात जेल रोड के सामने उस की गोली मार कर हत्या कर दी. कथा लिखे जाने तक आरोपी विश्वकर्मा चौहान जेल की सलाखों के पीछे था. पत्नी की हत्या का उसे जरा भी मलाल नहीं था. इस बात की उसे खुशी थी कि अब उसे पैसे नहीं देने पड़ेंगे, लेकिन उस ने तनिक भी नहीं सोचा कि मासूम बेटी का क्या होगा? वह किस के सहारे जीएगी? उस का सहारा कौन बनेगा?

हैवानियत की पराकाष्ठा पर उतर आए विश्वकर्मा ने तनिक भी सोचा होता कि वह जो कर रहा है, गलत कर रहा है तो शायद उस की खुशहाल गृहस्थी बची रहती और बेटी अपने पेरेंट्स के प्यार से महरूम नहीं होती. UP News

(कथा में चांदनी परिवर्तित नाम है)

 

 

UP News: मोहब्बत में क्राइम हरगिज नहीं

UP News: 35 साल की सुनीता भले ही 5 बच्चों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस के गठीले बदन की कसावट पर गांव के अनेक युवा आहें भरते थे. गांव का 22 वर्षीय आशीष कुमार उर्फ अंशु तो उसे अपना दिल दे चुका था. अमरबेल की तरह दोनों की मोहब्बत बढ़ती गई. मोहब्बत के इसी समंदर में डूब कर एक दिन दोनों ऐसा खतरनाक क्राइम कर बैठे कि…

आशीष उर्फ अंशु और उस की प्रेमिका सुनीता ने वीरपाल की हत्या करने की ठान ली, क्योंकि वह उन दोनों की मोहब्बत में रोड़ा बन रहा था. वीरपाल सुनीता का पति था. वे दोनों यही सोच रहे थे कि उस की हत्या कब और कैसे की जाए? तय किया कि आधी रात के बाद वीरपाल की गोली मार कर हत्या घर में ही कर दी जाए. फिर शोर मचा दिया जाएगा कि बदमाश आए थे. घर का सामान भी बिखेर दिया जाएगा और लूट की घटना बनाने के लिए जेवर और नकदी लूट कर ले जाने का नाटक किया जाएगा.

तभी अंशु बोला, ”तमंचा और कारतूस का इंतजाम कहां से होगा?’’

सुनीता ने कहा, ”यह इंतजाम तुम्हें ही करना पड़ेगा. इस के लिए रुपयों की जरूरत भी पड़ेगी.’’

”रुपए का तो मैं इंतजाम कर लूंगा, लेकिन तमंचा और कारतूस मिलना इतना आसान नहीं है. चलो, मान लिया जाए कि ये चीजें मिल भी गईं तो वीरपाल को गोली कौन मारेगा?’’ अंशु बोला.

”तुम ठीक कह रहे हो. यदि उस समय बच्चे उठ गए, उन्होंने देख लिया तो हम दोनों पकड़े जाएंगे. फिर बिना सजा के नहीं बचेंगे. इस तरह हमारी प्रेम कहानी तो अधूरी रह जाएगी.’’ सुनीता ने आशंका जताई.

इस के बाद उन्होंने दूसरी योजना तैयार की. गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए सल्फास की गोलियों का प्रयोग होता है. अकसर यह सुनने में आता है कि लोग आत्महत्या के लिए इन गोलियों का सेवन करते हैं. उन्होंने सोचा कि क्यों न ये गोलियां किसी तरह वीरपाल को खिला दी जाएं.

यह तरीका दोनों को अच्छा लगा. फिर एक दिन सल्फास की गोलियों का पैकेट अंशु ने सुनीता को ला कर दे दिया. दोनों ने तय किया कि जब भी शराब के नशे में वीरपाल आएगा, खाने में मिला कर सल्फास की गोलियां उसे दे दी जाएंगी. इस से पहले कि योजना को अंजाम दिया जाता, सल्फास की गोलियों का पैकेट बच्चों के हाथ लग गया. बच्चे समझे कि पैकेट पापा लाए हैं. वीरपाल के सामने ले जा कर बच्चे पूछने लगे, ”पापा, ये गोलियां काहे की हैं?’’

वीरपाल गोलियों का पैकेट देख कर सन्न रह गया. वीरपाल ने पैकेट उलटपलट कर देखा तो उसे पता चला कि यह तो गेहूं को सुरक्षित रखने वाली सल्फास की गोलियां हैं.

गुस्से से आगबबूला होते हुए वीरपाल ने सुनीता से पूछा, ”सल्फास का पैकेट कौन लाया है?’’

सुनीता ने झूठ बोलते हुए कहा, ”गेहूं में घुन लगने लगे थे. इसलिए मैं ने ही यह पैकेट मंगाया है.’’

वीरपाल की हत्या करने का यह प्लान भी फेल हो गया. बात आईगई हो गई. कुछ समय बाद धान की फसल तैयार होने लगी. उस की रखवाली के लिए वीरपाल अकसर खेत पर जाया करता था. ग्रामीण क्षेत्र में कई तरह के जंगली जानवर फसलों को क्षति पहुंचाते हैं. उन से फसल को बचाने के लिए रात को भी अनेक किसान खेतों पर डेरा डाले रहते हैं.

वीरपाल भी धान की फसल की रखवाली के लिए खेत पर जाता था. नींद आने पर वह वहीं सो जाया करता था. शातिर दिमाग अंशु ने सुनीता से कहा, ”अब मौका आ गया है, वीरपाल को ठिकाने लगाया जा सकता है. जिस वक्त वीरपाल रात को खेत पर सोया हो, तभी उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया जाएगा.’’ सुनीता को योजना सही लगी और वह राजी हो गई. उत्तर प्रदेश के जनपद संभल में थाना हयात नगर क्षेत्र में एक गांव स्थित है सहजना. इस गांव में दलवीर सिंह का परिवार निवास करता है. दलवीर सिंह के 5 बेटे और 5 बेटियां थीं. चौथे नंबर की बेटी सुनीता थी.

सुनीता का विवाह साल 2008 में जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्र के गांव अलेहदादपुर देवा नगला निवासी वीरपाल था. वीरपाल खेतीकिसानी के साथसाथ मजदूरी भी करता था. कभीकभी हरिद्वार में स्थित फैक्ट्री में मजदूरी करने भी चला जाता था. वीरपाल का एक बड़ा भाई है कुंवरपाल. वीरपाल की मां ज्ञानवती है, जो एक गृहिणी हैं. वीरपाल और सुनीता का वैवाहिक जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. इस दौरान उन के 5 बच्चे हुए, जिन में 4 बेटियां और एक बेटा था.

5 बच्चों की मां होने के बावजूद सुनीता के हंसीमजाक में एक बेकाबू आग छिपी थी. उस के चेहरे पर जवानी की नैचुरल चमक थी. गालों की मुलायम लकीरों में मासूमियत और आत्मविश्वास दोनों एक साथ झलकते थे. उस की आंखें बड़ी साफ और गहरी थीं, मानो किसी के बोलने से पहले ही उस का मन पढ़ लेती हों. उस का शरीर किसी कठोर मेहनत से तराशा हुआ नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से सधे हुए अनुपातों वाला था. कंधे हलके चौड़े, कमर में नजाकत और चाल में लयबद्ध कोमलता, जिसे देख कर कोई भी तुरंत समझ जाए कि यह महिला तन से ही नहीं, मन से भी मजबूत है.

वह मध्यम कद की थी. उस का रंग गेहुंआ और चेहरा गोल था. उस की आंखें बड़ी और ध्यान खींचने वाली थीं, जिन में आत्मविश्वास का भाव दिखता था. बाल पूरी तरह से सिर को ढकने वाले दुपट्टे के नीचे छिपे रहते थे, जो पारंपरिकता और शालीनता दर्शाते थे. उस की नाक में एक छोटा नथ उस की पहचान को और उभारता था. होंठ थोड़े मोटे जरूर थे, लेकिन उन पर हलकी मुसकान दिखाई देती, जो उस में छिपी ममता और दृढ़ इच्छाशक्ति की झलक देती थी. उस की आंखों की चमक देखने वालों को भटकाने वाली पहेली सी लगती थी.

गांव की गलियों में जब भी सुनीता का नाम लिया जाता, लोग धीरे से मुसकरा देते. कोई जलन से, कोई तजुर्बे से. 5 बच्चों की मां होते हुए भी उस में कुछ ऐसा था, जो जवान दिलों को बेचैन कर देता था. उस की चाल, उस की बातों की मिठास और उस की आंखों में छिपी कामुक शरारत की वजह से 35 वर्षीय सुनीता गांव की अन्य महिलाओं से अलग पहचानी जाती थी. सब जानते थे कि वह साधारण महिला नहीं.

गांव में कुंवरपाल का परिवार भी निवास करता था. कुंवरपाल अलेहदादपुर गांव का दामाद था. करीब 2 दशक पहले इसी गांव में घरजमाई बन कर आया था. फिर गांव में ही बस गया था. उस के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. एक बेटे और एक बेटी की शादी हो चुकी है. कुंवरपाल का बेटा आशीष कुमार उर्फ अंशु करीब 22 साल का एक कुंवारा नौजवान था. अंशु अपनी जवानी के चरम पर पहुंच चुका था. 22 साल की उम्र उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक ले कर आई थी. वह चमक जो मेहनत, आत्मविश्वास और युवापन के मिलन से पैदा होती है.

उस के नैननक्श साधारण होते हुए भी बेहद आकर्षक थे. माथे पर गिरती हलकी बिखरी लटें और आंखों में मौजूद सहज चमक उसे अलग पहचान देती थी. उस का शरीर एकदम सधा हुआ था. न बहुत भारी, न बहुत पतला. छाती में कसावट और बांहों में हलकी उभरी नसें, उस के मेहनत भरे जीवन की गवाही देती थीं. चलते समय उस का आत्मविश्वास साफ दिखता था. कदमों में सधी हुई लय और शख्सियत में एक ऐसी गरिमा जो बिना बोले ही लोगों को उस की तरफ देखने पर मजबूर कर देती थी. अंशु की मुसकान उस के पूरे चेहरे को रोशन कर देती थी. उस की जवानी में एक तरह की साफगोई थी, वही मासूम पर दृढ़ ऊर्जा जो केवल 21-22 की उम्र में ही दिखाई देती है.

कुंवरपाल के साले का नाम भूप सिंह था. वह इस समय गांव के मौजूदा प्रधान है. असरदार व्यक्ति है. गांव में उस का काफी मानसम्मान भी है. अंशु का दिल किसी रिश्ते की बंदिश नहीं मानता था.

अंशु अपनी नानी के घर रहता था. उस की पैदाइश भी यहीं पर हुई थी, जहां उस की जवानी बेलगाम घोड़े सी दौड़ रही थी. उस के अय्याशी के किस्से भी कम न थे. मामला पकड़े जाने पर पंचायतें भी हुईं. उस के मामा को मामला लेदे कर निपटाना पड़ा. कई बार उस के मामा को काफी रकम मुआवजे के रूप में गांव की गरीब लड़कियों को देनी पड़ी. अकसर लड़की वाले बदनामी के डर से प्रधान के रुतबे और प्रभाव के कारण कानूनी काररवाई के लिए आगे नहीं बढ़े. इस का फायदा अंशु उठाता रहा और कई घटनाएं गांव में अंजाम दे दीं.

जब सुनीता और अंशु की राहें टकराईं, तो जैसे दो चिंगारियां एक ही पल में भड़क उठीं. फिर रिश्ता रिश्ता नहीं, एक अंधी ललक बन गया, जहां उम्र, रिश्तेदारी और समाज सब पीछे छूट गया. कहानी यहीं से मोड़ लेती है. प्यार और पागलपन के इस खेल में वह सुनीता अपने पति से तंग आ चुकी थी, और अंशु उस की चाहत में अंधा हो गया था. शाम का वक्त था. खेतों से किसानों की वापसी हो रही थी, ढलती धूप में चलती बकरियों की आवाजें, ऐसा लग रहा था कि उन्हें भी घर वापस ले जाया जा रहा है.

बीच में एक महिला जो अपने आंगन में पानी भर रही थी. उस के बच्चे पास ही खेल रहे थे, गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा था, लेकिन इस शांति के पीछे एक तूफान पनप रहा था. अंशु गांव का मनचला, दुबलापतला मगर तेज नजर वाला जवान था. सब जानते थे कि अंशु की नजरें मासूम नहीं हैं और सुनीता भी यह बात समझती थी, मगर न जाने क्यों, उसे अब फर्क नहीं पड़ता था.

अंशु ने पहली बार बिना झिझक के उस से कहा, ”नानी, इतना पानी रोज क्यों भरती हो? कोई समंदर बनाना है क्या?’’

सुनीता मुसकराई, ”तेरे काम का समंदर नहीं है, डूब जाएगा तू इस में.’’

अंशु हंसा, ”डूबने का तो मन है ही, बस कोई मौका डूबने का मिल जाए.’’

उन के बीच का यह मजाक गांव के माहौल से ज्यादा गर्म था. दोनों जानते थे कि वो किस ओर बढ़ रहे हैं, मगर किसी को रोकने की हिम्मत न थी. धीरेधीरे ये मुलाकातें बढ़ीं. कभी खेत के किनारे, कभी सूनी पगडंडी पर तो कभी मकानों के पीछे के बाग में, जहां हवस और हंसी एक साथ घुलमिल जाती.

सुनीता अब अपने पति वीरपाल से ऊब चुकी थी. बच्चों और घर के झगड़ों ने उन के रिश्ते की जान निकाल दी थी. एक रात वीरपाल ने उसे रोकते हुए कहा, ”तू अब पहले जैसी नहीं रही, सुनीता.’’

तो उस ने ठंडे लहजे में जवाब दिया, ”हां, और तू भी मर्द जैसा नहीं रहा.’’

वीरपाल ने गुस्से में थप्पड़ मारा, मगर उस थप्पड़ की गूंज ने सुनीता के भीतर का सब कुछ तोड़ दिया. उसी रात वो चुपके से घर के पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकली. अंशु उस का इंतजार कर रहा था.

”अंशु, मुझ से अब और नहीं सहा जाता,’’ सुनीता ने उस से कहा.

अंशु ने उस की आंखों में झांकते हुए फुसफुसाया, ”तो फिर खत्म कर देते हैं उसे, हमेशा के लिए.’’

सुनीता चौंकती हुई बोली, ”क्या मतलब?’’

”मतलब साफ है. तुम्हारे रास्ते में बस वो वीरपाल ही तो दीवार है. गिरा देंगे, उस दीवार को.’’

सुनीता चुप रही, मगर उस के दिल में डर और चाहत दोनों एक साथ पनपने लगे. बड़ी हिम्मत करने के बाद सुनीता सीधेसीधे प्रेमी को चुनौती देती हुई बोली, ”अगर तुम को मेरे साथ रहना है तो कुछ तो करना ही होगा, मगर उस के बाद क्या तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?’’

”सुनीता, मैं ने तुम से प्यार किया है. पत्नी मान भी लिया है. अब तुम बताओ उस के बाद तुम्हारी क्या भूमिका होगी?’’

”मैं जिंदगी भर तुम्हारा साथ दूंगी, तुम्हारा खयाल रखूंगी.’’

”अगर तुम मुझे पाना चाहते हो तो अब अपने नाना का काम तमाम कर ही दो.’’

अंशु का मामा प्रधान भूप सिंह जाति से जाटव है. एक ही बिरादरी के होने के नाते से प्रधान भूप सिंह, वीरपाल को गांव के रिश्ते में चाचा कहता था. इसी रिश्ते से अंशु वीरपाल को नाना और सुनीता को नानी कह कर संबोधित करता था. दोनों के संबंध जगजाहिर हो चुके थे. फिर भी गांव के लोगों को यकीन नहीं होता था कि दोनों की उम्र में इतना अंतर होने के बाद इन के बीच अवैध संबंध होंगे. वीरपाल 12 अक्तूबर, 2025 की रात को अपने धान के खेत पर सोने के लिए गए थे. अगले दिन जब गांव के लोग खेतों पर सुबहसुबह अपने काम के लिए निकले, तब उन्होंने देखा कि वीरपाल खेत में अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था.

वीरपाल अकसर सुबहसुबह 5 बजे उठ कर घर आ जाता था. फ्रैश हो कर फिर से काम के लिए खेत पर आ जाता था, लेकिन उस दिन वह इतनी देर तक खेत में क्यों सो रहा है, लोग समझ नहीं पाए. पास जा कर लोगों ने देखा तो वह एकदम बेसुध सा लेटा हुआ था. उन्हें वीरपाल के शरीर पर कोई हरकत नहीं दिखी.  इस दौरान हड़कंप मच गया तो यह बात गांव तक पहुंची. काफी संख्या में ग्रामीण लोग उस के खेत पर पहुंच गए. गांव के एक डौक्टर को भी बुला लिया. उस ने नब्ज टटोलते ही वीरपाल को मृत घोषित कर दिया.

वीरपाल की पत्नी सुनीता भी खूब रोते हुए दहाड़े मारते हुए खेत पर पहुंच गई. पूरा चेहरा ढके हुए खूब रोए जा रही. उस को रोता देख कर लोगों का दिल पसीज गया कि अब इस बेचारी के बच्चों का क्या होगा? यह बात 13 अक्तूबर, 2025 की है. वहां मौजूद लोगों ने पुलिस को खबर देने की बात कही तो सुनीता कहने लगी कि मैं अपने पति की मिट्टी को खराब नहीं होने दूंगी. पुलिस हमारे पति का शरीर ले कर जाएगी. पोस्टमार्टम को भेजेगी. वहां चीरफाड़ होगी. पूरे शरीर को बरबाद कर देगी.

मैं अपने पति के साथ यह नहीं होने दूंगी. लेकिन कोई व्यक्ति पहले ही कोतवाली बिलारी में फोन कर के यह सूचना पुलिस को दे चुका था. सूचना पाते ही कोतवाल उदय प्रताप मलिक मय फोर्स के घटना स्तर पर पहुंच गए. शुरुआती जांच में मामला हत्या का प्रतीत हुआ, क्योंकि मृतक के गले पर दबाने के निशान थे. थोड़ीबहुत हलकीफुलकी छीनाझपटी जैसे निशान भी थे. इस से प्रतीत हो रहा था कि मृतक ने हत्यारों से थोड़ा बहुत संघर्ष भी किया है. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. घटनास्थल के आसपास का बड़ी बारीकी से मुआयना किया गया. आवश्यक सबूत इकट्ठे किए गए. मौके की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया.

कोतवाल उदय प्रताप मलिक ने मामले की जानकारी सीओ अशोक कुमार और एसपी (ग्रामीण) कुंवर आकाश सिंह को दे दी. अधिकारियों ने जांच के लिए पुलिस की दो टीमें गठित कर दीं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. गांव के लोगों ने पोस्टमार्टम से लाश आने के बाद वीरपाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस अपनी जांच कर ही रही थी. उसी दिन सुनने में आया कि वीरपाल की पत्नी सुनीता ग्रामीणों से लाश का पोस्टमार्टम कराने को मना कर रही थी. उस का कहना था कि ज्यादा शराब पी लेने से इस की स्वाभाविक मौत हुई होगी.

यह बात सुन कर पुलिस को वीरपाल की हत्या करने का शक उस की पत्नी सुनीता पर हो गया. सुनीता ने अपने पति की हत्या क्यों कराई? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पुलिस ने जब छानबीन की तब पता चला कि गांव का ही एक युवक अंशु है, जिस से सुनीता का प्रेम प्रसंग चल रहा है. इतनी जानकारी मिलने पर अंशु भी पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन से जब पूछताछ की गई तो उन्होंने पहले तो बातें गोलमोल करने की कोशिश की, लेकिन जब सख्ती की गई तब दोनों ने ही सच उगल दिया.

दोनों की उम्र में 13 से 14 साल का अंतर था. लोगों को जब इस बात का पता चला कि वास्तव में इन दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था तो कोई इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन जब सच सामने आया तो सब हैरान रह गए. इस दौरान सुनीता ने अपने आप को बचाने के लिए खूब प्लानिंग की थी. पहली प्लानिंग तो उस ने पुलिस को बुलाने से मना किया. लेकिन जब उसे लगा कि पुलिस आ गई है तो पोस्टमार्टम न हो पाए, इस के लिए उस ने पूरी कोशिश की.

पुलिस ने लाश को जब पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. तब सुनीता ने भागने का भी प्लान बना रखा था. जब उस के रिश्तेदार आए. दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक व झगड़ा चल रहा था तो एक रिश्तेदार सुनीता को अपनी बाइक पर बिठा कर वहां से निकलने वाला था, लेकिन जैसे ही सुनीता बाइक पर बैठी, गांव के लोगों ने देख लिया और उसे दौड़ कर पकड़ लिया. उस के बाद ग्रामीणों ने कहा कि जब तक पुलिस नहीं आएगी, तब तक कोई नहीं जाएगा. पुलिस को आने दो. उस के बाद जिस को जहां जाना हो, वो चला जाए.

पुलिस ने सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु से पूछताछ की तो वीरपाल की हत्या के पीछे की ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस ने सभी को चौंका कर रख दिया. सुनीता गांव के रिश्ते में अंशु की नानी लगती थी. दोनों के खेत आसपास ही थे, इसलिए उन के बीच बातचीत होना आम बात थी. उसी दौरान दोनों के बीच प्यार हो गया. और जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. सुनीता अंशु के प्यार की कायल हो गई थी. उस के सामने अपना पति वीरपाल फीका लगने लगा था. इसलिए जब भी उन का शारीरिक संबंध बनाने का मन होता था, तो सुनीता वीरपाल को शराब पिला कर धान की रखवाली करने के लिए रात को खेत पर भेज देती थी.

फिर अंशु को फोन कर के रात को अपने घर पर बुला लेती थी. फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते थे. इस तरह सुनीता अविवाहित अंशु के प्यार में डूब चुकी थी, लेकिन यह खेल ज्यादा दिनों तक छिप न सका. एक दिन इसी बीच रात में एक बार वीरपाल धान के खेत से घर वापस आया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. यह देख कर वीरपाल का खून खौल गया. अंशु तो फटाफट वहां से भाग गया, लेकिन सुनीता कहां जाती. तब वीरपाल ने उस दिन सुनीता की खूब पिटाई की. सुनीता ने उसी दिन सोच लिया था कि वीरपाल हमारे प्यार के बीच में रोड़ा बन रहा है. इसे तो निपटवाना ही पड़ेगा.

सुनीता ने उस समय तो पति से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली थी. वीरपाल ने यह बात किसी को बदनामी की वजह से नहीं बताई. 2-4 दिन बाद सुनीता और अंशु का चोरीछिपे मिलनाजुलना जारी रहा. एक दिन सुनीता ने अशु को बताया कि वीरपाल हम दोनों के प्यार में रोड़ा बन रहा है. इसे ठिकाने लगाना है. इतना ही नहीं, उस ने धमकी भी दी कि अगर तूने इसे ठिकाने नहीं लगाया तो मैं जहर खा कर अपनी जान दे दूंगी, लेकिन तेरे बिना नहीं जी सकती.

यह सुन कर अंशु के जवान खून में उबाल आ गया. उसे लगा कि उस की प्रेमिका उस के लिए जान देने के लिए तैयार है. उस की जुदाई बरदाश्त नहीं कर पा रही. लिहाजा अंशु ने कहा, ”तुम ऐसा मत करो. हम वीरपाल को ठिकाने लगा देंगे.’’

12 अक्तूबर को सुबह करीब 8 बजे सुनीता अपने खेत पर धान झाड़ रही थी. वहां पर उस की फेमिली के कुछ लोग भी मौजूद थे. उस समय अंशु भी अपने खेत पर था. सुनीता ने अंशु को अपने पास बुलाया. उस के साथ वह बात कर रही थी, तभी वीरपाल वहां पर आ गया. उस ने दोनों को बात करते देखा तो वीरपाल दोनों पर आगबबूला हो गया गालीगलौज करने लगा. अंशु उसी समय वहां से अपने घर चला गया. उस के कुछ देर बात वीरपाल भी चला गया तो सुनीता ने अंशु को फिर से बुला लिया.

फिर दोनों ने मिल कर वीरपाल की हत्या करने की योजना बनाई. वारदात की अन्य योजना पर सहमति नहीं बनी तो सुनीता ने अंशु को बताया कि वीरपाल रात में धान की रखवाली करने के लिए खेत पर जा कर सोता है. वहीं पर उस की हत्या करना आसान रहेगा. अंशु उस की इस बात पर राजी हो गया. 13 अक्तूबर को रात में करीब साढ़े 12 बजे वीरपाल खेत पर सोने गया. तभी सुनीता ने यह जानकारी प्रेमी अंशु को दे दी.

इस के बाद जब अंशु रात में वीरपाल के खेत पर पहुंचा तो उस समय वीरपाल शराब के नशे में चारपाई पर सो रहा था. अंशु ने उस का गला दबाना शुरू कर दिया. तभी वीरपाल का एक हाथ अचानक अंशु के मुंह पर लगा तो वह घबरा गया. अंशु को लगा कि अब यदि वह जिंदा बच गया तो मामला बहुत गड़बड़ हो जाएगा. वीरपाल ने उठने की कोशिश की, लेकिन नशा अधिक होने के कारण वह उठ नहीं सका. अंशु ने फिर से वीरपाल को अपने काबू में किया और गला दबाने लगा. उस के गले को वह तब तक दबाए रखा, जब तक कि वीरपाल की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट नहीं गई.

जब वीरपाल निढाल हो गया, उस का छटपटाना बंद हो गया, उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई, तब कहीं अंशु को तसल्ली हुई. फिर भी अंशु ने उस की नाक पर हाथ रख कर एक बार चैककिया कि वह मर चुका है कि नहीं.

जब उसे विश्वास हो गया कि अब इस का काम तमाम हो गया है तो अंशु वहां से सीधे अपनी प्रेमिका सुनीता के घर पहुंचा. उस ने प्रेमिका को खुशखबरी देते हुए कहा कि तुम्हारे पति का मैं ने काम तमाम कर दिया है. अब वो तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा. इस मर्डर की खुशी में दोनों ने रात भर मौजमस्ती की. इस के बाद उन्होंने पुलिस से बचने का प्लान बनाया. फिर रात में ही अंशू अपने घर चला गया. दूसरे दिन अंशु भीड़ के साथ घटना स्थल पर पहुंचा और परिवार के लोगों के साथ रहा. पोस्टमार्टम से ले कर अंतिम संस्कार तक हर कार्यक्रम में वह वीरपाल के फेमिली वालों के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर कोई शक न हो, लेकिन इस के बावजूद वह पुलिस के शक के दायरे में आ गया.

मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या कर देना आया. जिस के बाद मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल की तहरीर के आधार पर धारा 103 (1)/61(2) (क) बीएनएस के तहत आशीष कुमार उर्फ अंशु और सुनीता को नामजद किया गया. 24 घंटे के भीतर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी. पूछताछ के बाद सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु को जेल भेज दिया गया. बच्चों की परवरिश मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक अंशु और उस की प्रेमिका दोनों ही जेल में थे. UP News

 

 

UP News: फेमिली को लग जाए – जब प्यार की भनक

UP News: 20 वर्षीय रूबी चाहती थी कि उस की शादी प्रेमी रविशंकर के साथ ही हो, लेकिन फेमिली वालों को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया. फिर रूबी ने अपनी शादी को रुकवाने के लिए ऐसी खूनी साजिश रची कि…

रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को फोन किया और बोली, ”हाथ पर हाथ रखे बैठे रहोगे या कुछ करोगे भी? मेरे घर वालों ने मेरी शादी 18 नवंबर, 2025 की होनी तय कर दी है. यदि कोई उपाय नहीं किया तो हम ने जो सपने देखे हैं, सारे धरे के धरे रह जाएंगे.’’

पे्रमिका के मुंह से अचानक शादी की बात सुन कर रविशंकर के हाथों के तोते उड़ गए. फिर भी उस ने रूबी को समझाया, ”तुम चिंता मत करो, मैं कोई न कोई उपाय खोजता हूं.’’

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के थाना जवां क्षेत्र का एक गांव है चंदौखा. यहीं के रहने वाले हैं मुंशीलाल. उन के घर में 20 वर्षीय बेटी रूबी की शादी की तैयारियां जोरशोर से चल रहीं थीं. रूबी फेमिली वालों द्वारा तय की हुई शादी नहीं करना चाहती थी. क्योंकि वह तो वह 24 वर्षीय बाइक मैकेनिक रविशंकर से प्यार करती थी और उसी के साथ शादी कर अपना घर बसाना चाहती थी, लेकिन फेमिली वालों ने अचानक जब उस का रिश्ता अलीगढ़ के गोंडा मोड़ निवासी एक युवक से तय कर दिया तो रूबी परेशान हो गई.

”यदि हम लोगों ने कोई उपाय नहीं किया और यों ही बैठे रहे तो हम लोगों की शादी नहीं हो सकेगी. फिर जीवन भर पछताना पड़ेगा. तुम्हें पता है कि दादी ने मेरी शादी तय करा दी है.’’ रूबी ने अपनी शादी रुकवाने के लिए प्रेमी रविशंकर को एक उपाय सुझाया. उस ने कहा, ”यदि दादी चंद्रवती की हत्या शादी से पहले कर दी जाए तो मेरी शादी टल जाएगी. फिर हम दोनों भाग कर शादी कर लेंगे.’’

रविशंकर को भी प्रेमिका की यह योजना पसंद आई. इस खतरनाक सोच ने हत्या की नींव रख दी. अब सवाल यह था कि योजना को कैसे अंजाम दिया जाए और हथियारों का इंतजाम कैसे और कहां से किया जाए? उस के लिए रुपयों की भी जरूरत थी, घर में शादी की तैयारी चल ही रही थीं, जिस के लिए रुपयों का भी इंतजाम किया गया था. तभी रूबी ने उन्हीं रुपयों में से 10 हजार रुपए चुरा लिए. रूबी ने प्रेमी रविशंकर को फोन कर एकांत में बुलाया और उसे 10 हजार रुपए तमंचा व कारतूस लाने को दे दिए. रुपए सौंपते समय उस ने कहा, ”अब काम में ढिलाई मत करना वरना देर हो जाएगी.’’

प्रेमिका द्वारा दिए गए रुपयों से प्रेमी ने अपने गांव कस्तली के दोस्त रोहित की मदद से आईटीआई रोड के आयुष से एक तमंचा व कारतूस खरीदे. हत्या वाले दिन की मुखबिरी खुद रूबी ने की. हत्या को ले कर पहले से योजना तय हो गई थी. रूबी ने कह दिया था कि जिस समय दादी चंद्रवती घेर से पशुओं को ले कर घर वापस आएंगी, उसी समय वह उसे सूचना दे देगी. तभी उन की हत्या कर देना. 11 नवंबर, 2025 की शाम हर दिन की तरह ही शुरू हुई थी. गांव चंदौखा निवासी वीरी सिंह की 65 वर्षीय पत्नी चंद्रवती अपने घेर से पशुओं को घर ले आई. वह सुबह के समय पशुओं को घेर में ले जाती थीं और शाम को वापस घर ले आती थीं. पशुओं को घेर से लाने के काम में चंद्रवती की पोती रूबी हर रोज उन की मदद के लिए आ जाती थी, लेकिन उस दिन वह प्लानिंग के तहत कुछ जल्दी घर से निकल गई थी.

हत्या का समय फिक्स था. चंद्रवती की हत्या का स्थान भी निश्चित था. वह रोज जिस रास्ते से पशुओं को ले कर लौटती थीं, वहीं उन की हत्या होनी थी. उस दिन भी चंद्रवती पशुओं को घेर से ले कर वापस घर की ओर आ रही थीं. योजना के अनुसार रूबी उस दिन पहले से तय समय से थोड़ा पहले अपने घर से निकली.

प्रेमिका का इशारा पाते ही रविशंकर एक पेड़ और झाडिय़ों के पीछे छिप गया. रूबी जानबूझ कर जल्दी निकल कर दूर हो गई, ताकि हत्या के समय वह खुद आसपास न हो. इस षडयंत्र से अनजान चंद्रवती कुछ ही मिनट बाद जैसे ही वहां पहुंची, रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को वाट्सऐप के जरिए सूचना दी, ‘दादी आ गई हैं, अब निकलो.’

शिकार की बाट जोह रहे रविशंकर ने नजदीक से चंद्रवती के सिर में गोली मार दी. गोली सीधे सिर में लगी और गोली लगते ही चंद्रवती जमीन पर गिर पड़ीं. हत्या करने के बाद रविशंकर अंंधेरे में तमंचा झाडिय़ों में फेंक कर गायब हो गया. यह शाम लगभग साढ़े 8 बजे की बात है. वारदात के बाद थोड़ी सी देर में ही घटनास्थल पर तमाम ग्रामीण इकट्ठे हो गए. सूचना मिलते ही चंद्रवती की फेमिली वाले भी वहां आ गए. वह तुरंत ही उन्हें उपचार के लिए क्वार्सी ट्रामा सेंटर ले गए, लेकिन डौक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डौक्टरों ने बताया कि सिर में गोली लगने से इन की मौत हुई है.

सूचना मिलने के एक घंटे बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण भी किया. किसी से रंजिश नहीं होने पर फेमिली वालों ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ थाना जवां में हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गया कि चंद्रवती की हत्या  सिर में गोली लगने से हुई. चंद्रवती की मौत से घर में कोहराम मच गया. शादी वाले घर में जहां कुछ दिनों बाद शहनाइयां गूंजनी थीं, वहां मातम पसर जाने पर रूबी अंदर  ही अंदर खुश हो रही थी. उस के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे.

कहने को दिखावे के लिए वह भी आंसू बहा रही थी. उस ने सोचा कि दादी की मौत के बाद अब क्रियाकर्मों के चलते उस की शादी टल जाएगी और वह इस बीच अपने प्रेमी के साथ घर से भाग कर शादी रचा लेगी.

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चूंकि परिवार में चंद्रवती की हत्या हो गई थी, इसलिए बिना शोरशराबे के सामान्य तरीके से चंद्रवती की मौत के एक सप्ताह बाद यानी 18 नवबंर, 2025 को रूबी की शादी नियत तारीख पर परिवारजनों द्वारा कर दी गई. जबकि रूबी को इस की जरा भी उम्मीद नहीं थी. लेकिन पकड़े जाने के डर से घर में मातम के चलते वह अपनी शादी टालने के लिए भी घर में किसी से कह नहीं सकती थी. रूबी की शादी अपने प्रेमी से न होने पर वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गई. इस बीच उस की अपने प्रेमी रविशंकर से मोबाइल फोन पर कई बार बात भी हुई, लेकिन शादी होने के बाद वह विदा हो कर अपनी ससुराल चली गई. रूबी और प्रेमी रविशंकर के दिल के अरमां आंसुओं में बह कर रह गए.

घर में शादी निपट जाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत मृतका के फेमिली वालों से ही की. शुरुआती जांच में मृतका व उस के फेमिली वालों से किसी की कोई दुश्मनी नहीं मिली. पुलिस को जांच में पहले सप्ताह कोई ठोस सुराग नहीं मिला. पुलिस को लगा कि शायद किसी बाहरी शरारती व्यक्ति ने यह अपराध किया है, लेकिन सच बहुत ज्यादा जटिल और खतरनाक था, लिहाजा पुलिस ने जांच तेज की. मोबाइल सर्विलांस में एक नंबर लगातार हत्या के आसपास ऐक्टिव मिल रहा था. जांच के दौरान पता चला कि यह नंंबर रविशंकर का है. पुलिस ने जांच की तो लोकेशन मैच हुई.

कौल डिटेल्स से पता चला कि हत्या से ठीक पहले रूबी और रविशंकर के बीच कई मर्तबा बात हुई थी. हत्या वाले दिन शाम को दोनों की लोकेशन एक ही दिशा में पाई गई. तब पुलिस का शक गहराया कि जरूर चंद्रवती की हत्या में इन दोनों का कोई हाथ है. तब पुलिस ने बिना देर किए रविशंकर को हिरासत में लिया. पूछताछ में वह टूट गया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इतना ही नहीं, उस ने हत्या की पूरी साजिश पुलिस को बताई.

इस के बाद रविवार पहली दिसंबर को पुलिस ने रूबी को उस की ससुराल से बुलाया. वह मेंहदी लगे हाथों,चूड़ा पहने ही पहुंची. जब पुलिस ने थाने ले जा कर उससे पूछताछ की तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि हां, मैं ने ही दादी की हत्या कराई थी, ताकि मेरी शादी रुक जाए और मैं अपने प्रेमी से शादी कर सकूं. पूछताछ के बाद उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया. इस घटना में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब दादी चंद्रवती की हत्या के बाद फेमिली वाले सदमे में थे. किसी को अंदेशा भी नहीं था कि इस घटना के पीछे रूबी और उस के प्रेमी रविशंकर का हाथ है.

घर वालों ने सोचा था कि मौत हो गई है, लेकिन रिश्ता अचानक तोडऩा ठीक नहीं होगा और उन्होंने रूबी की शादी 18 नबंवर को नियत तारीख पर कर दी. शादी इतनी जल्दी होने से रूबी भी बेबस थी. वह रविशंकर से संपर्क करने की कोशिश करती रही, लेकिन स्थिति उस के हाथ से निकल चुकी थी. इस दिल दहला देने वाली वारदात का परदाफाश पुलिस जांच, मोबाइल सर्विलांस, वाट्सऐप चैट्स, मुखबिरी, हत्या की मिनट दर मिनट प्लानिंग और दोनों आरोपियों रूबी और रविशंकर से हुई पूछताछ के बाद हुआ.

बाइक मैकेनिक रविशंकर गांव कस्तली का रहने वाला था. वह चंदौखा मोड़ पर पिछले 6 साल से बाइक मरम्मत की दुकान चलाता था. उस की दुकान के पीछे मुंशीलाल का परिवार रहता था. मुंशीलाल की बेटी रूबी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी. रूबी चुपकेचुपके रविशंकर को देखा करती थी. लेकिन उस की यह चोरी ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. एक दिन रविशंकर और रूबी की नजरें टकरा गईं. दोनों अपलक एकदूसरे को निहारते रहे. अब तो उन का रोज का सिलसिला बन गया. यहीं दोनों की मुलाकातें शुरू हुई औैर फिर धीरेधीरे रिश्ता प्रेम में बदल गया.

क हते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते हैं. रूबी और रविशंकर के साथ भी यही हुआ. रूबी के पापा मुंशीलाल की चाची चंद्रवती, जो रूबी की दादी लगती थी को दोनों के अफेयर का पता चल गया. प्रेम प्रसंग का पता चलने के बाद दादी चंद्रवती ने रूबी से कुछ नहीं कहा, लेकिन वह पोती रूबी पर लगातार निगरानी रखने लगीं, जिस से अब दोनों के मिलनेजुलने में भी बाधा पडऩे लगी. इस बीच दादी ने परिवार पर दबाव डाल कर रूबी का रिश्ता गोंडा मोड़ अलीगढ़ के एक युवक से तय करा दिया. रूबी के लिए यह रिश्ता मंजूर करना आसान नहीं था. वह किसी भी कीमत पर प्रेमी रविशंकर से अलग नहीं होना चाहती थी.

गांव चंदौखा में इस हत्याकांड से दहशत का माहौल है. लोगों का कहना है कि ऐसी घटना हमारे गांव में आज तक कभी नहीं हुई. घर की बेटी इतनी क्रूर हो सकती है, किसी ने कल्पना तक नहीं की. दादी चंद्रवती का हमेशा पोती से स्नेह भरा रिश्ता था. दादी ने जब रूबी को अपने प्रेमी के साथ गलत राह की तरफ जाते देखा तो घर की इज्जत पर कोई दाग न आए, यही सोच कर उस ने आननफानन में फेमिली वालों से कह कर रूबी का रिश्ता तय करा दिया था. दादी अपनी पोती की शादी की तैयारियों में जुटी थीं, मगर रूबी को यह नागवार गुजरी और दादी के खून से प्रेमी रविशंकर के साथ अपने हाथ भी रंग लिए.

घटना के 20 दिन बाद जब पुलिस ने केस का खुलासा किया तो यह सिर्फ एक हत्या का केस नहीं रहा, बल्कि इंसानी रिश्तों के टूटते मूल्य, विकृत प्रेम और घर के भीतर चल रहे गहरे षडयंत्र की भयावह दास्तां बन कर सामने आया. जो सच सामने आया, उस ने परिवार, गांव और पुलिस सभी को हैरान कर दिया. हत्या किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, बल्कि उसी घर की पोती रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर के साथ मिल कर एक साजिश के तहत कराई थी, जिस की एक ही वजह थी, किसी तरह अपनी शादी टलवाना, ताकि वह प्रेमी के साथ भाग कर शादी कर सके.

सीओ (तृतीय) सर्वम सिंह ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश एक प्रैसवार्ता में करते हुए रूबी और रविशंकर की प्रेम कहानी उजागर कर दी. शादी को रोकने के लिए हत्या जैसा जघन्य अपराध, यह समाज के लिए चेतावनी है. यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है. यह एक सामाजिक चेतावनी है. प्रेम में अंधापन, परिवार से डर, जल्दबाजी, गलत सलाह और अपराध की आसान राह, ये सब मिल कर एक पूरी पीढ़ी को गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं.

रूबी, जो प्रेम में पड़ी एक सामान्य लड़की लग रही थी, वह अचानक एक ऐसी राह पर चली गई, जिस में अब उस की जिंदगी जेल की अंधेरी कोठरी में बीतेगी. इस तरह की घटनाएं परिवार, गांव और समाज सभी के लिए एक झटका हैं. UP News

 

 

UP Crime: मेरठ कांड – किडनेप के बाद का कहर

UP Crime: खेत पर जाते समय दिनदहाड़े कुछ युवकों ने सुनीता के सामने उस की बेटी मनीषा को किडनैप करने की कोशिश की तो सुनीता के विरोध करने पर युवकों ने सुनीता की हत्या कर दी और मनीषा को किडनैप कर ले गए. इस कांड के बाद गांव में तनाव व्याप्त हो गया और प्रदेश सरकार की भी नींद उड़ गई. कौन थे किडनैपर और क्यों किया गया मनीषा का किडनैप?

कहते हैं कि बालक उम्र का प्यार न तो जातपात व ऊंचनीच देखता है और न अमीरीगरीबी. इस आयुवर्ग के प्यार में एक ऐसा आकर्षण होता है, जिस के पाश में फंसे किशोर न तो समाज की बंदिशों को मानते हैं, न ही समाज की वर्जनाओं को. जाहिर है ऐसे प्यार का अंजाम भी खतरनाक होता है. पारस सोम और मनीषा का प्यार भी शायद समाज में ऊंचनीच के भेदभाव के बीच पनपा एक ऐसा ही प्यार था, जिस ने दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव को जातीय भेदभाव की आग में झुलसने पर मजबूर कर दिया.

सुनीता की आंखों के सामने ही उस की बेटी को कुछ युवकों द्वारा ले जाने की कोशिश हुई तो उस ने विरोध किया फलस्वरूप उस पर जानलेवा हमला हुआ, जिस में उसकी जान चली गई

हालात ऐसे बने कि कपसाड़ गांव बवाल की आग में जलतेजलते बचा. गांव की गली से ले कर चट्टीचौराहे तक पुलिस छावनी बन गए. इस गांव में न कोई आ सकता था, न जा सकता था. किसी को अगर आनाजाना भी होता तो उसे पुलिस को पहले संतुष्ट करना पड़ता कि वह किसी गलत इरादे से गांव में नहीं जा रहा है. कपसाड़ गांव मेरठ महानगर की सीमा से सटा होने के कारण संपन्न और घनी आबादी वाला है. राजपूत और जाटव बिरादरी बहुल इस गांव में कुछ वैश्य, ब्राह्मण और अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं. राजूपत जाति के लोग संपन्न और बड़े खेतिहर किसान हैं.

जबकि जाटव जाति के लोग या तो छोटे किसान हैं या राजूपतों के खेतों में मजदूरी कर गुजरबसर करते हैं अथवा शहर जा कर फैक्ट्री और दुकानों में नौकरी करते हैं.  इसी गांव में रहता है सतेंद्र कुमार जाटव का परिवार. उस के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 5 बच्चे थे. परिवार में सब से बड़ा बेटा है नरसी, उस से छोटे 2 बेटे मनदीप और शुभम हैं. जबकि 2 बेटियों में मनीषा बड़ी है.

परिवार में नरसी सब से बड़ा है, जबकि मनीषा दूसरे नंबर की है. पढ़ाई के नाम पर वैसे तो सभी बच्चे पढ़ेलिखे हैं, लेकिन मनीषा समेत सभी ने इंटरमीडिएट से ज्यादा की पढ़ाई नहीं की है. मनीषा ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. गुजरबसर के लिए सतेंद्र व उन का परिवार या तो गांव के तरुण राजपूत के खेतों में मजदूरी का काम करते या शहर सरधना कस्बे व मेरठ शहर में नौकरी कर गुजरबसर करते थे.

इन दिनों गन्ने की पैदावार तैयार थी, इसलिए सतेंद्र की पत्नी सुनीता व बेटी मनीषा तरुण राजपूत के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए सुबह ही खेतों में काम करने चली जाती थीं. मनीषा की सहारनपुर में शादी तय हो चुकी थी. फरवरी महीने में उस की शादी थी, इसलिए सतेंद्र का पूरा परिवार इस समय उस की शादी को ले कर पैसे जुटाने व दूसरी तैयारियां करने में व्यस्त था.

अचानक 8 जनवरी, 2026 की सुबह सतेंद्र जाटव के परिवार पर कयामत बन कर टूट पड़ी. सुबह करीब 8 बजे सुनीता बेटी मनीषा के साथ तरुण के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए जा रही थी. जब ये दोनों रजवाहे के नए पुल के पास पहुंचीं, तभी गांव के एक राजूपत योगेश सोम का बेटा पारस सोम व उस का हमजाति दोस्त सुनील तथा उन के कुछ अज्ञात साथियों ने सुनीता व मनीषा का रास्ता रोक लिया.

पारस व उस के साथी मनीषा को पकड़ कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे. जब सुनीता ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने सुनीता के साथ गालीगलौज शुरू कर दी. उन्हें जातिसूचक शब्द कहते हुए हाथापाई शुरू कर दी. लेकिन सुनीता बेटी को उन के चंगुल से बचाने के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर चुकी थी. इसी दौरान पारस व उस के साथियों ने सुनीता के सिर पर फरसे का प्रहार किया, जिस से वह जमीन पर गिर कर वहीं बेहोश हो गई.

पारस व उस के साथियों का उद्देश्य शायद मनीषा को वहां से ले कर जाने का था, इसीलिए सुनीता के खून से लथपथ होने के बाद जमीन पर गिरते ही वे सभी मनीषा को वहां से ले कर नौ दो ग्यारह हो गए. चूंकि उस वक्त बहुत सारे लोग उस रजवाहे पर खेतों में काम करने के लिए आजा रहे थे. सुनीता की बिरादरी की 2 लड़कियां भी उस वक्त वहीं से गुजर रही थीं, जिन्होंने इस मंजर को अपनी आंखों से देखा था. उन्होंने तुरंत शोर मचा कर लोगों की भीड़ इकट्ठी कर ली और सब को वह माजरा बता दिया, जो कुछ देर पहले घटित हुआ था.

लोगों की भीड़ में से किसी ने गांव में जा कर सतेंद्र व उस के परिवार को इस घटना की खबर कर दी तो सतेंद्र का परिवार और बिरादरी के दूसरे लोग भी वहां पहुंच गए, जहां सुनीता खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. सुनीता को उपचार देना पहली प्राथमिकता थी, इसलिए फेमिली वालों ने सब से पहले सुनीता को बेहोशी की हालत में एसडीएस ग्लोबल हौस्पिटल, मोदीपुरम, मेरठ में भरती कराया, जहां डौक्टरों ने उस का इलाज तो शुरू कर दिया, लेकिन इस बात से भी आगाह कर दिया कि सुनीता के सिर में काफी गंभीर चोट है तथा खून भी काफी बह चुका था, इसलिए उस के बचने की उम्मीद कम ही है.

बहरहाल, डौक्टर अपना प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन के परिवार ने अपना दूसरा काम यह किया कि मनीषा को तलाशने के लिए पुलिस की शरण ली. सतेंद्र के बेटे नरसी ने कुछ रिश्तेदारों के साथ जा कर सरधना थाने में इस बात की शिकायत दर्ज करा दी. उस ने पुलिस को बताया कि 2 किशोरियां इस बात की गवाह हैं कि पारस सोम अपने दोस्त सुनील व अन्य अज्ञात लोगों के साथ सुनीता पर फरसे से हमला कर के मनीषा का अपहरण कर के ले गया है.

सरधना थाने के एसएचओ इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने नरसी जाटव की शिकायत पर तत्काल एक टीम ग्लोबल अस्पताल व कपसाड़ गांव भेज दी, ताकि शिकायत की सच्चाई का पता लगाया जा सके. गांव में इस बात की पुष्टि हो गई कि यह घटना सच है, जबकि अस्पताल के डौक्टरों ने भी सुनीता के मरणासन्न हालत में होने की बात बता दी.

गांव में हुआ तनाव

लिहाजा अपने सीओ आशुतोष कुमार व एसएसपी विपिन ताड़ा को सारे हालात बता कर इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने मुकदमा दर्ज कर लिया. गलत तरीके से रोकने के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), शांति भंग करने के इरादे से जानबूझ कर अपमान करने व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया, क्योंकि तब तक सुनीता जिंदा थी.

चूंकि जिस लड़की मनीषा का अपहरण हुआ था और उस की घायल मां दोनों जाटव बिरादरी के थे और जिन लोगों पर आरोप था, वे सभी राजपूत बिरादरी के थे, इसलिए मामला बड़ा जातीय रूप न ले ले, इसीलिए आशंका को समझते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में अतिरिक्त पुलिस बन तैनात करवा दिया. साथ ही पुलिस की एक टीम कपसाड़ गांव में ही रहने वाले योगेश व उस के परिजनों को पूछताछ के लिए सरधना थाने ले आई. पुलिस को पारस सोम व उस के दूसरे साथी अपने घर पर नहीं मिले.

लेकिन इसी बीच 8 जनवरी की देर शाम तक अस्पताल में गंभीर रूप से इलाज करा रही सुनीता ने दम तोड़ दिया. बस, सुनीता की मौत के बाद ही हालात एकदम गंभीर हो गए. कपसाड़ गांव में जाटव बिरादरी के लोगों का एक होना शुरू हो गया. इस हत्या का आरोप व मनीषा के किडनैप का आरोप चूंकि एक राजपूत युवक और उस के हमबिरादरी साथियों पर लगा था, इसलिए मामला पूरी तरह जातीय हो गया. बढ़ते तनाव को देखते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

मनीषा का भाई नरसी

सुनीता की मौत के बाद रात को ही उस का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अगली सुबह शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया. चूंकि सुनीता की मौत होने के बाद मामला अब हत्या में तब्दील हो चुका था और फेमिली वालों के आरोप के बाद इस में एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गई थीं. लिहाजा एसएसपी के आदेश पर इस की जांच सरधना के सीओ आशुतोष कुमार को सौंप दी गई.

सुनीता की मौत से गुस्साए फेमिली वालों और गांव वालों ने शव के गांव में आते ही उस एंबुलेंस में तोडफ़ोड़ कर दी, जिस में शव को लाया गया था. शव को ले कर फेमिली वाले धरने पर बैठ गए. डीएम के साथ मौके पर पहुंचे एसएसपी विपिन ताड़ा ने परिजनों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन परिजन और ग्रामीण मनीषा की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर अड़े रहे. उन का साफ कहना था कि जब तक अपहृत मनीषा बरामद नहीं होती और आरोपी पकड़े नहीं जाते, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

मनीषा के किडनेप और उस की मम्मी की मौत के गम में डूबी घर की महिलाएं

शुरुआत में पीडि़त परिवार मृतका सुनीता का अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं था, लेकिन सरधना से भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम की मध्यस्थता के बाद सरकार की ओर से 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा के बाद परिवार मान गया और 9 जनवरी की रात को सुनीता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हालांकि फेमिली वालों की तरफ से 50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता व परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की मांग की गई थी, लेकिन बाकी मांगें कुछ समय में पूरी करने के वादे पर फिलहाल 10 लाख का चैक मिलने से मामला थोड़ा शांत हो गया था.

होटल में मिले दोनों

उस रात को अंतिम संस्कार होने के बाद पुलिस के ऊपर आरोपी की गिरफ्तारी और मनीषा की बरामदगी का दबाव आ गया. पुलिस पारस के फेमिली वालों के साथ सख्ती से पूछताछ करने के अलावा अपने इंटैलीजेंस सिस्टम से यह पता लगाने में जुट गई कि पारस मनीषा को ले कर कहां छिपा है? जहां से भी जानकारी मिल रही थी, पुलिस की टीमें वहां दबिशें डाल रही थीं, लेकिन पुलिस को सफलता मिली अगले दिन यानी 10 जनवरी की शाम को. रुड़की के एक होटल में आरोपी पारस सोम व पीडि़ता मनीषा के ठहरने की सूचना मिली थी.

इंसपेक्टर प्रताप सिंह व स्पैशल स्टाफ की एक टीम तत्काल रुड़की के उस होटल में पहुंची और पुलिस ने वहां मनीषा को आरोपी पारस सोम के साथ बरामद कर लिया. दोनों को ले कर पुलिस टीम पहले रात को मेरठ पहुंची. मनीषा के बरामद होने के बाद एसएसपी व महिला पुलिस ने उस से काफी लंबी पूछताछ की, जिस के बाद उसे आशा ज्योति केंद्र भेज दिया गया.

मनीषा के किडनेप का आरोपी पारस सोम

अगले दिन पहले प्यारे लाल अस्पताल में मनीषा का मैडिकल चैकअप कराया गया. उस के बाद पुलिस ने एसीजेएम नम्रता सिंह की अदालत में मनीषा के दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के इकबालिया बयान दर्ज कराए. बाद में अदालत के आदेश पर मनीषा को पुलिस की अभिरक्षा में उस के फेमिली वालों के साथ भेज दिया गया. दूसरी तरफ पारस से खुद एसएसपी विपिन ताड़ा ने कई घंटे तक गहन पूछताछ की, जिस के बाद पारस सोम को स्पैशल सीजेएम न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पुलिस को दिए बयान में पारस सोम ने बताया कि गांव से मनीषा को ले कर निकलने के बाद वह उसे ले कर अपनी रिश्तेदारी खतौली गया था. शाम को सुनीता की मौत की खबर मिलने पर दोनों दिल्ली चले गए, वहां एक होटल में रात गुजारी. उस के बाद वहां से अपने दोस्त के पास गुरुग्राम चले गए. मीडिया के जरिए गांव के माहौल पर पारस सोम नजर रखे हुए था.

गांव का माहौल बिगडऩे पर मनीषा को गुरुग्राम से साथ ले कर ट्रेन से सहारनपुर पहुंच गया. सहारनपुर के टपरी गांव में पारस की बहन रहती है. उन के घर पर शुक्रवार की रात बिताई. शनिवार को रुड़की के लिए ट्रेन में सवार हो गया. पारस सोम ने अपने परिवार के बारे में गांव के ही झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र, जो उस का दोस्त भी था, उस से लगातार गांव की जानकारी ले रहा था. राजेंद्र ने उसे बताया कि मनीषा की मम्मी की मौत के बाद मामला काफी तूल पकड़ चुका है और पुलिस उसे चारों तरफ तलाश कर रही है तो वह समझ नहीं पाया कि क्या करे. चूंकि मनीषा और पारस के मोबाइल को पुलिस लगातार ट्रैक कर रही थी, जिस से उस की रियल टाइम लोकेशन का पता चल गया.

उस वक्त वह रुड़की रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरा था और मनीषा उस के साथ ही थी. पुलिस की टीम वहीं पहुंच गई और 10 जनवरी, 2026 की शाम को पारस को हिरासत में ले कर मनीषा को पुलिस ने अपने संरक्षण में ले लिया और मेरठ ले आई.

हालांकि प्रेम संबंध के इस तरह के मामलों में यूं तो मामला लड़की के बरामद होने और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन यहां यह सब होने के बाद पूरा मामला कानूनी दांवपेंच में फंस गया. हालांकि मनीषा के फेमिली वाले तो पहले से ही उस की उम्र 17 साल बता रहे थे, लेकिन पारस के जेल जाने के बाद पारस के अधिवक्ता बलराम राणा व संजीव उर्फ संजू राणा ने अदालत में हाईस्कूल की मार्कशीट पेश कर उस के नाबालिग होने का दावा कर दिया. जबकि उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस मनीषा को उस का परिवार नाबालिग यानी 17 साल की बता रहा है, उस की उम्र 21 साल है.

उम्र बनी सिरदर्द

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती पारस और मनीषा की सही उम्र का पता लगाना था. मामला कानूनी दांवपेंच में फंसने के बाद पुलिस के सामने चुनौती आ गई कि पीडि़ता व आरोपी दोनों की सही उम्र का पता करें ताकि सच्चाई सामने आ सके. पारस और मनीषा दोनों ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में पढ़ाई की थी. लिहाजा पुलिस ने कालेज की प्रधानाचार्य मंजू देवी से संपर्क किया और दोनों की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की मार्कशीट हासिल कर ली.

जिस के बाद पता चला कि मनीषा ने 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. उस का जन्म का साल 2005 था यानी वह 21वें साल में चल रही थी. पारस के अधिवक्ता ने मनीषा को बालिग और पारस को नाबालिग साबित करने के लिए सबूत पेश किए, लेकिन यह कैसे तय हो कि कौन बालिग है और कौन नाबालिग. उम्र के इन दावों की जटिलता को देखते हुए पुलिस अधिकारी कानून विशेषज्ञों से विधिक राय ले रहे हैं. एसएसपी डा. विपिन ताड़ा ने एक मैडिकल बोर्ड से दोनों के बोन टेस्ट कराने पर भी विचार कर रही है.

वैसे इस तरह के मामले बाल किशोर बोर्ड के अधीन आयु निर्धारण केंद्रों में मामले भेजे जाते हैं. आयु का निर्धारण करने के लिए मैडिकल बोर्ड का गठन भी किया जा सकता है. हालांकि मनीषा की हाईस्कूल की मार्कशीट के मुताबिक वह बालिग है, लेकिन कई बार गफलत में गांव के स्कूल में जन्मतिथि गलत भी लिखवा दी जाती है. इसी तरह पीडि़त की उम्र भी नाबालिग या बालिग हो सकती है, इसीलिए पुलिस अब कानूनी दांवपेंच में फंसे उम्र के दांवपेंच को बाल किशोर बोर्ड की मदद से सुलझाने का काम करेगी.

सुनीता की हत्या व मनीषा के किडनैप केस की जांच करने वाले सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार को शक है कि पारस ने पकड़े जाने से पहले अपने झोलाछाप दोस्त को फोन कर गांव के माहौल की जानकारी ली थी. इसी जानकारी के आधार पर पुलिस ने पारस को सर्विलांस पर ले कर गिरफ्तार भी किया था. जांच अधिकारी अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि गांव का झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र इस पूरी साजिश का हिस्सा तो नहीं था.

अपने बयान में मनीषा ने स्पष्ट कहा है कि पारस ने अपने साथियों के साथ उस का किडनैप किया और फरसे का वार कर उस की मम्मी सुनीता की हत्या की. मनीषा ने अपने बयान में यह भी कहा कि पारस के पास एक तमंचा था, जिसे दिखा कर उसे डराया गया, जिस से वह उस का विरोध नहीं कर सकी और वह मनमानी करता रहा. हालांकि उस के बयानों का विरोधाभास इसी बात से साबित होता है कि पुलिस ने उन्हें रुड़की के जिस होटल से पकड़ा, वहां मनीषा आरोपी पारस के साथ आराम से रह रही थी. साथ ही जांच में यह बात भी सामने आई कि उस ने कहीं भी आरोपी के साथ जाते हुए उस का विरोध नहीं किया.

अब चूंकि पीडि़त परिवार अनुसूचित जाति से है. इस कारण वारदात ने इलाके में तनाव फैला दिया था. चूंकि सभी राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों की हमदर्दी बटोरना चाह रहे थे, इसलिए विपक्षी दलों ने मामले को पूरी तरह गरमा दिया. हर सियासी दल का नेता खुद को पीडि़त परिवार का हमदर्द साबित करना चाहता था, इसलिए सब की दौड़ कपसाड़ गांव की तरफ शुरू हो गई.

पुलिस को पहले से ही इस बात की आशंका थी कि इस मामले में सियासत होगी. लिहाजा आसपास के कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी व रैपिड ऐक्शन फोर्स की टीमें गांव में तैनात कर दी गईं. कोई भी बाहरी व्यक्ति गांव में घुस न सके, इसलिए गांव के बाहर टोल प्लाजा के पास मेनरोड पर बैरिकेड लगा कर रास्तों को बंद कर दिया. जिस राजनीतिक दल के नेता ने कपसाड़ गांव में जाने की कोशिश की, उसे या तो वहीं से वापस लौटा दिया गया अथवा हिरासत में ले लिया गया. एक तरह से मामला पूरी तरह राजपूत बनाम अनुसूचित जाति का हो गया था.

मनीषा और पारस की इस उलझी हुई प्रेम कहानी में एक पक्ष गांव के लोगों का भी है. एक तरफ जहां पीडि़त परिवार जो आरोप लगा रहा है, उसे गांव के लोग गलत बता रहे हैं. गांव के लोगों का कहना है कि लड़की का लड़के के साथ पिछले ढाई 3 साल से अफेयर था. लड़की ने ही लड़के को फोन कर के बुलाया था. लड़की ने ही अपनी मम्मी के ऊपर हमला करवाने में लड़के का साथ दिया और उस के साथ भाग गई.

गांव वालों का कहना है कि करीब 3 साल पहले जब मनीषा के सब से बड़े भाई नरसी की शादी हुई थी, तब पारस व मनीषा पहली बार एकदूसरे से मिले थे. वहीं से दोनों में एकदूसरे के प्रति प्यार व आकर्षण हुआ. चूंकि दोनों एक ही कालेज में पढते भी थे, इसलिए गांव से बाहर दोनों की एकदूसरे से मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों ही इस बात से अंजान थे कि उन का वास्ता ऐसी जातियों से था, जहां उन के प्रेम संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाएगा.

छिप सकी आशिकी

किशोर उम्र के प्यार में ऐसा जुनून और मस्तीभरी होती है, जो किसी से छिपती नहीं है. पारस व मनीषा का प्यार भी किसी से छिपा नहीं रह सका. दोनों के इश्क की कहानियां गांव के लोगों के बीच जब किस्से बन कर तैरने लगी तो जल्द ही दोनों के फेमिली वालों को भी इस की भनक लग गई. ऐसे मामलों में जो होता है, वैसा ही पारस और मनीषा के साथ भी हुआ. दोनों के ऊपर पहले परिवार की बंदिशें लगीं, लेकिन आशिकी का जुनून दोनों को जब मिलने से नहीं रोक सका तो एक दिन ऐसा भी आया कि मनीषा के परिवार वालों ने पारस के परिवार पर मनीषा को बरगलाने का आरोप लगाते हुए झगड़ा किया.

बात बढ़ती, इस से पहले ही राजपूत व जाटव बिरादरी के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव किया और इस के बाद गांव में दोनों पक्षों की एक पंचायत बुलाई गई. ये अप्रैल, 2024 की बात है. इस पंचायत में फैसला लिया गया कि मनीषा और पारस उस दिन के बाद एकदूसरे से नहीं मिलेंगे. गांव के कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि मनीषा के पिता ने अनुसूचित जाति का होने के कारण पारस के परिवार के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने का मन बनाया था, इसलिए पारस के फेमिली वालों ने खुद इस समझौते के तहत मनीषा के पापा को एक बड़ी रकम दी थी और कहा था कि वे जल्द से जल्द अपनी बिरादरी में एक लड़का ढूंढ कर उस की शादी करा दें, ताकि यह समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाए.

गांव वालों का कहना है कि इसी के बाद मनीषा के फेमिली वालों ने भागदौड़ शुरू की और उस के लिए सहारनपुर में अपनी बिरादरी का एक अच्छा लड़का देख कर उस की शादी तय कर दी. यह शादी 10 फरवरी, 2026 को होनी थी. गांव वालों का यह भी कहना है कि मनीषा पारस को भुला नहीं पा रही थी, इसीलिए गुपचुप तरीके से उस का पारस से मिलनाजुलना जारी रहा और उस ने अपनी शादी से कुछ दिन पहले पारस के साथ मिल कर खुद को भगाने की यह साजिश रची.

हालांकि मनीषा के फेमिली वाले कहते हैं कि पारस मनीषा पर अपने साथ भागने का दबाव बना रहा था, लेकिन मनीषा ने जब साफ मना कर दिया तो 8 जनवरी की सुबह उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा कि दोनों का प्यार कितना सच्चा या झूठा था. प्यार की इस नासमझी में न सिर्फ पारस की जिंदगी अंधेरे में पड़ गई, वहीं मनीषा के दामन पर भी बदनामी का दाग लग गया और उस की मम्मी की जान गई सो अलग.

इस घटना के बाद सियासी रंग ले कर बवाल को टालने के लिए फिलहाल यूपी सरकार ने परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे कर और व स्थानीय पूर्व विधायक और बीजेपी नेता संगीत सोम ने 2 लाख नकद आर्थिक मदद दे कर पीडि़त परिवार की मदद से मामले को ठंडा करने की कोशिशें तो की हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी ने 5 लाख व सपा के सरधना विधायक अतुल प्रधान ने एक लाख के चैक से परिवार को आर्थिक मदद दे कर इस घटना को सियासी रंग में रंगने का काम कर दिया है.

मुख्य आरोपी पारस सोम को कोर्ट में पेश करने ले जाती पुलिस

अब इस प्रकरण में जांच अधिकारी सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार ने सुनीता की हत्या और बेटी मनीषा के किडनैप के मामले में पुलिस की जांच तेज कर दी है. आरोपी पारस सोम को अदालत के आदेश से रिमांड पर ले कर सुनीता की हत्या में प्रयुक्त फरसा (आलाएकत्ल) बरामद कर लिया गया है, जो केस के लिए अहम सबूत है. साथ ही पुलिस ने इस मामले में 2 नाबालिग चश्मदीद लड़कियों के बयान कोर्ट के दर्ज कराए, जिस से पारस सोम के खिलाफ केस और मजबूत होगा.

जांच अधिकारी आशुतोष कुमार ने मनीषा के परिजनों में उस के पापा सतेंद्र कुमार और भाइयों नरसी, मनदीप व शुभम से भी पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए.

(कथा पुलिस की जांच, पीडि़त व आरोपी पक्ष के बयान और ग्रामीणों द्वारा बताए गए तथ्यों पर आधारित है. कथा में मनीषा परिवर्तित नाम है)

 

UP News: फर्स्ट लेडी ड्राइवर मर्डर – प्यार में छलावा

UP News: झांसी की 40 वर्षीय अनीता चौधरी ने जब औटोरिक्शा चलाना शुरू किया तो लोगों ने उस की हिम्मत की दाद देते हुए बहुत सम्मान दिया. जिले की इस पहली लेडी औटो ड्राइवर को सिर्फ सामाजिक संगठनों बल्कि पुलिस के सीनियर अधिकारियों ने भी सम्मानित किया, लेकिन एक दिन उस की हत्या हो जाने पर पुलिस अधिकारी भी भौचक्के रह गए. कौन था अनीता चौधरी का हत्यारा और क्यों की गई उस की हत्या? पढ़ें, लव क्राइम की यह खास स्टोरी.

अनीता चौधरी की उपेक्षा से मुकेश झा बहुत परेशान रहने लगा था. वह समझ नहीं पा रही था कि जिस अनीता ने शादीशुदा होते हुए भी उस के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी, उस ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया. मुकेश ने अनीता को लाख मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह उस की बात सुनने को राजी ही नहीं थी. क्योंकि अनीता का झुकाव अरुण नाम के युवक की तरफ हो गया था. 4 जनवरी, 2026 का दिन मुकेश झा के लिए खास दिन था. खास इसलिए कि इसी दिन मुकेश ने अनीता के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी. शादी की सालगिरह की खुशी में मुकेश बीते दिनों की कड़वाहट भुला कर अनीता से मिलने गया.

उस ने अनीता को शादी की सालगिरह की याद दिला कर साथ रहने को मनाने की कोशिश की, लेकिन अनीता राजी नहीं हुई. उस ने घूमनेफिरने को साथ चलने को कहा तो इस के लिए भी अनीता ने मना कर दिया. इतना ही नहीं, अनीता ने मुकेश को खरीखोटी सुना कर अपमानित भी किया.

अपमान और बेवफाई का घूंट पी कर मुकेश वापस घर आ गया. उसे अनीता की बेवफाई पसंद नहीं आई. वह सोचने लगा कि जिस के लिए उस ने तन मन धन सब न्योछावर कर दिया, अपनी पत्नी व बच्चों से छल किया, जिस को उस ने प्रेमिका की जगह पत्नी का दरजा दिया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. ऐसी बेवफा को वह कभी माफ नहीं करेगा. उसे उस की बेवफाई की सजा जरूर देगा. वह उस की न हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

इस के बाद मुकेश झा ने शादी की सालगिरह की रात ही अनीता व उस के प्रेमी अरुण की हत्या का प्लान बनाया. मुकेश अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ तमंचा रखता था. अपने प्लान के मुताबिक उस ने तमंचा लोड किया, फिर रात 9 बजे अपनी कार से अनीता की खोज में घर से निकल गया. अनीता झांसी जिले की पहली औटोरिक्शा महिला ड्राइवर थी. वह अकसर रात में ही औटो चलाती थी. एक दिन मुकेश ने मौका पा कर उस के औटोरिक्शा में ट्रैकर लगा दिया था. अपने फोन से ट्रैकर को कनेक्ट कर वह अनीता पर नजर रखता था.

अनीता 4 जनवरी, 2026 की रात लगभग साढ़े 9 बजे औटो ले कर घर से निकली और रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां उस का प्रेमी अरुण मौजूद था. अनीता ने अरुण को औटो में बैठा लिया फिर दोनों बातचीत में लीन हो गए. इधर मुकेश झा तमंचा लोड कर अपनी कार से अनीता का पीछा करने निकला. ट्रैकर के सहारे वह पीछा करते हुए अनीता तक जा पहुंचा. औटो में अरुण भी था. उस समय रात का डेढ़ बज रहा था.

सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास मुकेश ने चलती कार से अनीता पर फायर कर दिया. गोली उस की कनपटी पर लगी. अनीता लहूलुहान हो कर सड़क पर जा गिरी. औटो कुछ दूरी पर जा कर पलट गया. औटो पलटने से मुकेश अनीता के दूसरे प्रेमी अरुण को नहीं मार सका. अरुण छिप कर वहां से भाग गया. मुकेश भी कार ले कर फरार हो गया. 4-5 जनवरी, 2026 की दरम्यानी रात डेढ़ बजे किसी युवक ने झांसी के थाना नवाबाद पुलिस को सूचना दी कि स्टेशन रोड पर सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास सड़क पर एक्सीडेंट हुआ है, औटो पलटा पड़ा है और एक महिला सड़क पर खून से लथपथ पड़ी है. वह जिंदा है या नहीं, यह बताना मुश्किल है.

पहली थी लेडी ड्राइवर

एक्सीडेंट की सूचना पर एसएचओ रवि श्रीवास्तव कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सर्दी की रात थी, इसलिए वहां सन्नाटा पसरा था. एक महिला सड़क पर मरणासन्न पड़ी थी और चंद कदमों की दूरी पर एक औटो पलटा पड़ा था. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब घायल पड़ी महिला को गौर से देखा तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उसे वह जानते थे. वह कोई और नहीं, बल्कि झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर अनीता चौधरी थी. वह झांसी की चर्चित महिला थी. उसे पूरा शहर जानता था.

इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने एक्सीडेंट की सूचना पुलिस अधिकारियों व अनीता के फेमिली वालों को दी और अनीता को इलाज के लिए मैडिकल कालेज अस्पताल भेजा. वहां डौक्टरों ने परीक्षण के बाद उसे मृत घोषित कर दिया. सुबह एसएसपी बी.बी.जी.टी. एस. मूर्ति, एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम घटनास्थल पर पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. पहली नजर में अधिकारियों को लगा कि अनीता चौधरी की मौत एक्सीडेंट में हुई है.

सूचना पा कर मृतका की बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका चौधरी व देवर दिलदार सिंह पहले घटनास्थल फिर मोर्चरी पहुंचे. वहां अनीता का शव देख कर सभी परिजन बिलख पड़े. मृतका का बेटा विक्की उस समय पुणे में था. उसे भी सूचना दे दी गई. पुलिस मान रही थी कि अनीता चौधरी की मौत दुर्घटना है, लेकिन अनीता के फेमिली वाले पुलिस की बात से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि अनीता की हत्या की गई है. दुर्घटना में मौत दर्शाने के लिए औटो को पलटा गया है. अनीता के शरीर से ज्वैलरी भी गायब थीं. वह मंगलसूत्र, झुमके, पायल आदि पहने थी. उस का मोबाइल फोन भी गायब था.

इधर सुबह होते ही फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर अनीता चौधरी की मौत की खबर झांसी शहर में जंगल की आग की तरह फैली. जिस ने भी सुना, वही दंग रह गया. अधिकारियों से जानकारी जुटाने मीडियाकर्मी भी उमड़ पड़े. अनीता के फेमिली वालों से भी उन्होंने बातचीत की. उन्होंने मीडियाकर्मियों से साफ कहा कि अनीता की हत्या हुई है. फेमिली वाले पुलिस अधिकारियों से भी मिले और हत्या की आशंका जताई.

अनीता चौधरी की हत्या हुई या फिर एक्सीडेंट में मौत हुई, इस के लिए पुलिस ने शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु मैडिकल कालेज भेजा. 2 डाक्टरों के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच अनीता चौधरी के शव का पोस्टमार्टम किया और रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट की एक प्रति एसपी कार्यालय भी भिजवा दी. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब अनीता चौधरी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंक पड़े. क्योंकि उस की मौत एक्सीडेंट में नहीं हुई थी, बल्कि उस की गोली मार कर हत्या की गई थी. उस की कनपटी (कान के नीचे) पर गोली मारी गई थी. गोली उस के गले में फंस गई थी. रवि श्रीवास्तव ने यह जानकारी आला अधिकारियों को दी तो वे भी सकते में आ गए.

अनीता की मौत के मामले में पुलिस से भारी चूक हुई थी, अत: पुलिस अधिकारियों ने मृतका अनीता चौधरी के फेमिली वालों को बुलवाया और उस की हत्या के संबंध में उन से पूछताछ की.

प्रेमी पर हुआ शक

मृतका की छोटी बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका तथा देवर दिलदार ने बताया कि अनीता की हत्या मुकेश झा ने की है, जो प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में रहता है. दोनों के बीच पैसों के लेनदेन का झगड़ा था. मुकेश अनीता के चरित्र पर भी शक करता था. अनीता की हत्या में उस का बेटा शिवम झा व उस का बहनोई मनोज झा भी शामिल हो सकता है. पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों के आदेश पर इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने मृतका अनीता के पति द्वारका चौधरी की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत मुकेश झा, उस के बेटे शिवम झा तथा बहनोई मनोज झा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. तुरंत काररवाई करते हुए पुलिस ने शिवम झा व मनोज झा को हिरासत में ले लिया, लेकिन मुकेश झा घर से फरार हो गया.

मुकेश झा की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने 3 टीमों का गठन एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत की अगुवाई में किया. ये टीमें मुहिम में जुट गईं. उस की तलाश में कई संभावित ठिकानों पर दबिश दी गई, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. तब एसएसपी ने उस की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.

कार में मिला तमंचा

6 जनवरी, 2026 की देर रात एसएचओ रवि श्रीवास्तव को खबर मिली कि बरुआ सागर थाना क्षेत्र के बेतवा नदी के नोटघाट पुल पर एक लावारिस कार खड़ी है. खबर पाते ही वह अपनी टीम के साथ पहुंचे और कार की तलाशी ली. कार के अंदर से एक तमंचा तथा एक मोबाइल फोन बरामद हुआ. मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. जांचपड़ताल से पता चला कि लावारिस खड़ी इग्निस कार हत्यारोपी मुकेश झा की है. एसएचओ ने मुकेश झा की कार बरामद होने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. साथ ही आशंका जताई कि गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी मुकेश ने नदी में छलांग लगा दी है.

इस पर एसपी (सिटी) प्रीति सिंह व सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम नोटघाट पुल पहुंचे और नदी में जाल डलवा कर गोताखोरों की मदद से मुकेश की खोज कराई. लेकिन घंटों की मशक्कत के बाद भी मुकेश का कुछ भी पता न चला. तब पुलिस अधिकारियों को शक हुआ कि शायद मुकेश पुलिस को गुमराह कर भाग गया होगा. अब पुलिस ने मुकेश की तलाश और तेज कर दी. जंगलों में भी उस की तलाश शुरू कर दी. इस के अलावा पुलिस अधिकारियों ने अपने खास खबरियों को भी लगा दिया. लेकिन इस के बावजूद मुकेश हाथ नहीं आया.

9 जनवरी, 2026 की रात 10 बजे एसएचओ रवि श्रीवास्तव अपनी टीम के साथ भगवंतपुरा के पास चैकिंग कर रहे थे, तभी उन्हें खास मुखबिर से जानकारी मिली कि मुकेश झा को भगवंतपुरा से करगुआं वाले कच्चे रास्ते पर देखा गया है. इस पर नवाबाद थाने के एसएचओ रवि प्रकाश श्रीवास्तव ने पुलिस टीम के साथ घेराबंदी की. पुलिस को देख कर मुकेश कच्चे रास्ते पर भागा. रोकने पर उस ने पुलिस टीम पर फायर किया. पुलिस की जवाबी फायरिंग में उस के दाएं पैर में गोली लगी. गोली लगते ही वह लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. पुलिस ने उसे तब गिरफ्तार कर लिया. घायल मुकेश को इलाज हेतु अस्पताल में भरती कराया गया.

एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (सिटी) प्रीति सिंह ने मुकेश झा से अनीता चौधरी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया, ”मैं अनीता से बेहद प्यार करता था. हम दोनों पिछले 7 सालों से रिलेशनशिप में थे. मंदिर में शादी भी कर चुके थे, लेकिन अनीता अब दूसरे युवक को चाहने लगी थी. इसलिए उस ने 3 महीने पहले ब्रेकअप कर लिया था.’’

उस ने आगे बताया, ”प्यार में धोखा मिला तो मुझे बरदाश्त नहीं हुआ. मैं ने मैरिज एनिवर्सरी की रात 4 जनवरी को कनपटी पर गोली मार कर उस की हत्या कर दी थी. फिर अपनी कार नोटघाट पुल पर खड़ी कर भाग गया था, ताकि पुलिस को लगे कि मैं ने बेतवा नदी में कूद कर जान दे दी है. मैं अनीता के प्रेमी अरुण को भी मारना चाहता था, लेकिन औटो पलटने से वह बच गया.’’

पुलिस अधिकारियों की पूछताछ के बाद उन के आदेश पर एसएचओ रवि प्रकाश ने मुकेश झा को अनीता चौधरी की हत्या के आरोप में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. लेकिन हिरासत में लिए गए मुकेश के बेटे शिवम झा तथा बहनाई मनोज झा को साक्ष्य के अभाव में गिरफ्तार नहीं किया गया. दोनों ने खुद को अनीता की हत्या में निर्दोष बताया. अनीता चौधरी कौन थी? वह झांसी की प्रथम महिला औटो चालक कैसे बनी? मुकेश झा के संपर्क में कैसे आई? लिवइन रिलेशन में रहने के बावजूद उस का मुकेश से ब्रेकअप क्यों हुआ? मुकेश ने उस की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए अनीता का अतीत झांकना होगा.

मैनेजर से हुआ प्यार

उत्तर प्रदेश का झांसी शहर वीरांगना लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है. इसी शहर के नवाबाद थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है तालपुरा. इसी तालपुरा मोहल्ले की अंबेडकर नगर कालोनी में द्वारका चौधरी सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनीता के अलावा एक बेटा विक्की तथा 2 बेटियां थीं. द्वारका झांसी बस स्टौप के पास चाय का ठेला लगाता था. इसी की आमदनी से परिवार का भरणपोषण करता था.

अनीता पढ़ीलिखी खूबसूरत युवती थी, जबकि उस का पति द्वारका चौधरी साधारण रंगरूप का कम पढ़ालिखा इंसान था. अनीता की छोटी बहन विनीता भी द्वारका के छोटे भाई दिलदार के साथ ब्याही थी. वह भी झांसी में ही रहता था. अनीता 3 बच्चों की मां थी. वह चाहती थी कि उस के बच्चे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हों, लेकिन पति द्वारका की कमाई इतनी नहीं थी कि वह बच्चों का पालनपोषण ठीक से कर सके, उन की पढ़ाई का बोझ उठा सके. उस के लिए तो परिवार की दोजून की रोटी जुटाना ही मुश्किल था. अनीता सदैव चिंता में डूबी रहती थी.

अनीता को जब बच्चों की देखभाल की चिंता ज्यादा सताने लगी तो उस ने घर की दहलीज लांघ कर नौकरी करने का मन बनाया. इस बाबत उस ने पति से बात की तो उस ने साफ मना कर दिया. द्वारका ने कहा, ”वह चौहान वंश का है. वह गरीब जरूर है, लेकिन उस के वंश की महिलाएं घर की देहरी नहीं लांघतीं.’’

लेकिन अनीता ने पति की बात अनसुनी कर दी और नौकरी के लिए प्रयास करने लगी. अनीता के मोहल्ले की कुछ महिलाएं ओरछा स्थित एक ग्लास फैक्ट्री में काम करती थीं. अनीता ने उन महिलाओं से बात की, फिर उन के सहयोग से अनीता को भी वहां नौकरी मिल गई. अनीता कांच फैक्ट्री में काम करने लगी तो उस की माली हालत सुधरने लगी. बच्चों का पालनपोषण व पढ़ाई ठीक से होने लगी.

वह जिस ग्लास फैक्ट्री में काम करती थी, उसी में मुकेश झा भी काम करता था. वह मैनेजर था. फैक्ट्री के कर्मचारियों पर निगाह रखना तथा उन का वेतन आदि वितरण करना उस का काम था. फैक्ट्री के अन्य काम भी वही देखता था. कर्मचारी को काम पर रखना या फिर निकालना उसी के हाथ में था. फैक्ट्री पर उस की मजबूत पकड़ थी. मुकेश झा प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी अंजना के अलावा बेटा शुभम व एक बेटी थी. मुकेश फैक्ट्री में मैनेजर तो था ही, इस के अलावा वह एक होटल का संचालन भी करता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उस के पास एक कार तथा बाइक भी थी. वह ठाठबाट से रहता था. रंगीनमिजाज भी था.

एक रोज मुकेश झा की नजर फैक्ट्री में काम कर रही अनीता पर पड़ी. खूबसूरत अनीता को देख कर उस की धड़कनें बढ़ गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा, फिर चला गया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अनीता को रिझाने के लिए वह उस से नजदीकियां बढ़ाने लगा. अनीता की पारखी नजरें भांप गईं कि मैनेजर बाबू की नजरें उस पर गड़ी हैं, इसलिए वह उस से नजरें चुराने लगी, लेकिन मुकेश झा कहां मानने वाला था. एक रोज मौका पा कर उस ने अनीता को रोक लिया और बोला, ”अनीता, तुम बहुत खूबसूरत हो. तुम्हारी खूबसूरती पर मैं फिदा हूं. तुम से दोस्ती करना चाहता हूं.’’

अनीता झिझकते व शरमाते हुए बोली, ”मुकेश बाबू, आप यह क्या कह रहे हैं. मैं 3 बच्चों की मां हूं. भला मुझ से दोस्ती कर के आप को क्या हासिल होगा?’’

”अनीता तुम 3 बच्चों की मां जरूर हो, लेकिन खूबसूरती में किसी नवयौवना से कम नहीं हो. मेरे लिए तो तुम अप्सरा जैसी हो.’’

अपनी खूबसूरती की तारीफ सुन कर अनीता मन ही मन खुश हुई, लेकिन दिखावे के तौर पर बोली, ”आप मेरी झूठी तारीफ कर रहे हो. भला मैं इतनी खूबसूरत कहां हूं.’’

इस के बाद मुकेश अनीता के पीछे पड़ गया. वह उसे हर तरह से रिझाने की कोशिश करने लगा. उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. धीरेधीरे अनीता भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. यही आकर्षण कब प्यार में तब्दील हो गया, अनीता नहीं जान पाई. अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच की दूरियां भी कम होने लगीं. अब दोनों साथसाथ घूमनेफिरने लगे. होटल रेस्त्रां में गुलछर्रे उड़ाने लगे. अनीता को अब मुकेश का साथ अच्छा लगने लगा था. मुकेश भी ज्यादा समय अनीता के साथ बिताने लगा. उसे अनीता हूर की परी लगने लगी थी.

मुकेश झा आर्थिक रूप से संपन्न था. शहर में उस का मकान तथा आवागमन के लिए घर में कार व बाइक थी. अनीता की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. उस का पति द्वारका चौधरी ठेले पर चाय बेचता था. वह बीमार भी रहता था. अनीता जितनी खूबसूरत थी, उस का पति साधारण शक्लसूरत का था. अत: अनीता को जब मुकेश का साथ मिला तो वह उस की तरफ खिंचती चली गई. मुकेश के सामने उसे अब अपना पति फीका लगने लगा था. यही हाल मुकेश का भी था. अनीता के मुकाबले अपनी पत्नी फीकी लगने लगी थी.

मंदिर में लव मैरिज

अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो दोनों एक रोज मंदिर में पहुंचे और मुकेश ने उस की मांग में सिंदूर भर कर उसे पत्नी का दरजा दे दिया. इस के बाद दोनों अलग मकान ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगे. मुकेश अनीता की हर सुखसुविधा का ध्यान रखता था. अनीता गहने, कपड़े, पैसों जिस किसी की भी डिमांड करती थी, मुकेश झा उसे पूरा करता था. अनीता की मांग में सिंदूर भले ही पति द्वारका का सजा था, लेकिन वह पतिधर्म प्रेमी मुकेश के साथ निभाती थी. हंसीखुशी से उन का समय बीत रहा था.

अनीता ने मुकेश को दिल मेें बसाया तो उसे अपना बीमार पति द्वारका फीका लगने लगा. वह उस की उपेक्षा करने लगी. उस ने उस की परवाह करना छोड़ दी. अनीता और मुकेश अब साथसाथ रहना चाहते थे. अत: 4 जनवरी, 2019 को मुकेश ने मंदिर में जा कर अनीता की मांग में सिंदूर भर कर उस के साथ लव मैरिज कर ली.

इस के बाद अनीता और मुकेश ने अपनेअपने घरों से दूरियां बना लीं और अलग मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. दोनों के फेमिली वालों को विवाह रचाने की जानकारी हुई तो उन्होंने विरोध जताया, लेकिन विरोध का उन पर असर नहीं हुआ. 19 फरवरी, 2020 को अनीता और मुकेश के बीच फैक्ट्री में किसी बात को ले कर बहस हो गई. गुस्से में मुकेश ने अनीता से कह दिया कि कल से फैक्ट्री मत आना. मुकेश की यह बात अनीता के दिल में कांटे की तरह चुभ गई, अत: उस ने फैक्ट्री जाना बंद कर दिया.

हालांकि मुकेश ने अनीता को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात दिल को चुभ गई थी, इसलिए अनीता फैक्ट्री नहीं गई. मार्च 2020 के पहले हफ्ते में अनीता नौकरी की तलाश में मुंबई चली गई. वहां गए उसे 10 दिन ही बीते थे कि कोरोना की वजह से लौकडाउन की चर्चा होने लगी. वहां उसे नौकरी भी नहीं मिली थी, इसलिए वह घर लौट आई. मुंबई से लौटने के बाद अनीता के घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई.

अनीता कर्मठ, लगनशील और खुद्ïदार महिला थी. काफी सोचविचार कर उस ने फाइनैंस पर औटो ले कर चलाने का प्लान बनाया, लेकिन उस के सामने पहला प्रश्न यह था कि पैसा कौन देगा? इस के लिए उस ने कई बैंकों से संपर्क साधा, लेकिन कोई बैंक बिना गारंटी उसे लोन देने को तैयार न था. काफी प्रयास के बाद एक निजी बैंक ने लोन देने की हामी भरी. जब बैंक अधिकारी जांचपड़ताल करने घर आए तो अनीता के पति द्वारका ने अपना आधार और बैंक पासबुक की कौपी देने से इंकार कर दिया. क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अनीता महिला हो कर औटो चलाए.

वैसे भी झांसी में कोई महिला औटो चालक नहीं थी, लेकिन विरोध के बावजूद अनीता ने हिम्मत नहीं हारी. इस बुरे वक्त में अनीता ने मुकेश झा से मदद मांगी. मुकेश की मदद से उस ने बैंक के कागज पूरे किए और लोन ले लिया. 18 फरवरी, 2021 को अनीता ने फाइनैंस करा कर नई औटो खरीदी और झांसी की सड़कों पर उसे चलाने लगी. इस तरह अनीता चौधरी झांसी की फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर बन गई. उस के जज्बे की हर तरफ तारीफ होने लगी. वह अखबारों की सुर्खियों में भी छा गई. कई सामाजिक संगठनों ने उस के जज्बे को सलाम करते हुए उसे सम्मानित भी किया.

पुलिस विभाग में भी वह चर्चा का विषय बन गई. उस ने अपने औटो के आगेपीछे पोस्टर चस्पा किए थे, जिन पर लिखा था— जनपद झांसी पुलिस, झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर. पुरुष और महिला एक समान, जनजन का हो यही आह्वान. पुलिस अफसरों के फोन नंबर भी लिखे थे. अनीता का हौसला बढ़ाने के लिए तत्कालीन डीआईजी (झांसी रेंज) जोगेंद्र सिंह ने भी उस के औटो पर सफर किया था और 13 दिसंबर, 2021 को उस के कार्य की सराहना करते हुए उसे प्रशस्ति पत्र दिया था.

इस तरह समय बीतता रहा और अनीता औटो चला कर पैसे कमाती रही. साथ ही सुर्खियों में भी छाई रही. अनीता और मुकेश साथ रहते थे. मुकेश अनीता को प्यार करता था, इसलिए वह उस की हर डिमांड पूरी करता था. उस ने अनीता को गहनों से लाद दिया था. अनीता अकसर औटो ले कर झांसी रेलवे स्टेशन के पास खड़ी होती थी. यहां जुलाई 2025 में उस की दोस्ती अरुण नाम के युवक से हुई. अरुण स्टेशन के पास ही एक ट्रेवल एजेंसी में काम करता था. अनीता और अरुण एकदूसरे को पसंद करने लगे. दोनों घंटों मोबाइल पर रसभरी बातें करते और हंसीठिठोली करते.

प्यार में आया ट्विस्ट

अनीता की अरुण से नजदीकियां बढ़ीं तो वह मुकेश की उपेक्षा करने लगी. उस का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. लेकिन इधर कुछ समय से अनीता के व्यवहार में रूखापन आ गया था. वह उस की उपेक्षा भी करने लगी थी. उस की जुबान में कड़वाहट भी आ गई थी. वह पहले जैसा न तो बरताव करती थी और न ही हंसतीबोलती थी. वह साथ घूमने को चलने के लिए कहता तो साफ मना कर देती. कोई उपहार लाता तो उसे लेने से इंकार कर देती. मुकेश की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अनीता के स्वभाव मेें यह परिवर्तन कैसे और क्यों आया.

अनीता के स्वभाव को ले कर मुकेश की उलझन बढ़ी तो उस ने अनीता की जासूसी की. तब उसे पता चला कि अनीता अब किसी अरुण नाम के युवक से प्यार करने लगी है. इसी कारण वह उस की उपेक्षा करती है.

एक रोज मुकेश ने अनीता के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ”अनीता, यह अरुण कौन है? इस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

अरुण का नाम सुनते ही अनीता घबरा गई. वह जान गई कि मुकेश को उस के और अरुण की दोस्ती का पता चल गया है. फिर भी वह संभलते हुए बोली, ”अरुण एक अच्छा इंसान है. हम दोनों के बीच दोस्ती है. कभीकभी उस से बतिया लेती हूं.’’

”तुम दोनों के बीच सिर्फ दोस्ती है या फिर नाजायज रिश्ता भी है?’’ मुकेश ने कटाक्ष किया.

मुकेश के इस कटाक्ष से अनीता भड़क गई और बोली, ”तुम मुझ पर लांछन लगा कर अपनी हदें पार कर रहे हो. मैं यह सब कतई बरदाश्त नहीं करूंगी.’’

उस रोज अरुण को ले कर अनीता और मुकेश के बीच खूब कहासुनी हुई. इस के बाद तो आए दिन विवाद होने लगा. उन दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस के सामने जा पहुंचा. अरुण को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा होने लगा. अक्तूबर, 2025 में एक रोज मुकेश ने अनीता के साथ रेलवे स्टेशन के बाहर अभद्रता व मारपीट की तो औटो चालकों का गुस्सा फूट पड़ा. चालकों ने मुकेश की पिटाई कर दी. अनीता ने भी थाना नवाबाद में मुकेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद मुकेश को थाने लाया गया. थाने में पंचायत शुरू हुई. दोनों के फेमिली वाले भी थाने पहुंचे.

थाने में मुकेश पुलिस व अपने फेमिली वालों के सामने बोला कि वह अनीता के साथ ही रहेगा, लेकिन जब अनीता से पूछा गया तो उस ने कहा कि वह मुकेश के साथ नहीं रहना चाहती. यह सुनते ही मुकेश बौखला गया और कहने लगा कि अब या तो तुम रहोगी या हम. धमकी देने पर पुलिस ने उसे काफी फटकार लगाई. इस घटना के बाद अनीता ने मुकेश से ब्रेकअप कर लिया और उसे छोड़ कर पति के साथ रहने लगी. अनीता अब दिन में घर संभालती और रात को औटो चलाती. रात में अकसर अरुण भी उस के साथ रहता. सुरक्षा की दृष्टि से वह अरुण को साथ रखती थी.

मुकेश किसी भी कीमत पर अनीता को खोना नहीं चाहता था, अत: अनीता चौधरी की जिंदगी में जब अरुण आया तो वह बौखला गया. वह दोनों पर नजर रखने लगा. मुकेश ने गुपचुप तरीके से अनीता के औटो में ट्रैकर लगा दिया. मोबाइल के जरिए वह निगाह रखता था. ट्रैकर औन होने पर उस से होने वाली बात सुनता था. अनीता व अरुण में क्या बातचीत होती, उसे सब पता चल जाता था. मुकेश अब जान गया था कि अनीता और अरुण के बीच गहरे प्रेम संबंध हैं.

4 जनवरी, 2026 की शाम मुकेश अनीता के पास गया. उस ने उसे शादी की सालगिरह की याद दिलाई और घर वापस चलने को कहा, लेकिन अनीता ने साफ मना करते हुए मुकेश की बेइज्जती की. तब उस ने उसी रात अनीता की गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन उस का दूसरा प्रेमी अरुण बच गया. आरोपी मुकेश झा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 10 जनवरी, 2026 को उसे झांसी की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. UP News

 

 

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद

 

 

UP News: एक कर्मचारी 6 अस्पतालों में नौकरी

UP News: फर्रुखाबाद में स्वास्थ्य विभाग में एक ऐसा फरजीवाड़ा सामने आया है, जिस ने सब को चौंका दिया है. अर्पित सिंह नाम का एक्सरे टेक्निशियन अलगअलग 6 जिलों के सरकारी अस्पतालों में एक साथ नौकरी कर रहा था. सभी जगह से वह सैलरी भी ले रहा था. चौंकाने वाली बात यह कि सभी जगह उस का नाम, जन्मतिथि और पिता का नाम भी समान था. आखिर कैसे चल रहा था यह फरजीवाड़ा?

इन दिनों उत्तर प्रदेश चर्चाओं में है. ‘मनोहर कहानियां’ के अक्तूबर, 2025 अंक में प्रकाशित गोंडा जिले की अनामिका शुक्ला शिक्षक घोटाले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले से एक्सरे टेक्निशियन फरजी घोटाले का जिन्न बोतल से बाहर आ गया. एक ही नाम से 6 जिलों में कार्यरत फरजी कर्मियों ने सरकार को करीब 5 करोड़ रुपए की सैलरी का चूना लगाया है.

मामला तब सुर्खियों में आया, जब प्रदेश सरकार के मानव संवदा पोर्टल पर अर्पित सिंह नाम के व्यक्ति का 6 एक्सरे टेक्निशियन कर्मियों के रूप में दर्शाया जा रहा था. डा. रतन पाल सिंह सुमन (स्वास्थ्य महानिदेशक) के माथे पर उस वक्त पसीना चुहचुहा उठा था, जब यह प्रकरण उन के सामने आया. तत्काल उन्होंने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) से यह रिपोर्ट मांगी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है, यदि है तो उस की डिटेल्स तुरंत यहां दें.

मामला बहुत गंभीर और घोटालों से जुड़ा हुआ था. इस प्रकरण की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हुई तो उन्होंने तुरंत ऐक्शन लिया और स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन को आरोपियों के खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज कराने का आदेश दिया. महानिदेशक सिंह ने यह आदेश रचना खरे (सहायक निदेशक, पैरा मेडिकल, लखनऊ) को दिया. इस पर उन्होंने तत्काल ऐक्शन लिया.

पुलिस को दी तहरीर में लिखा कि उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) ने वर्ष 2016 में 403 एक्सरे टेक्निशियनों को सफल घोषित करते हुए सूची चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय को उपलब्ध कराई थी. इस में क्रमांक संख्या 80 पर अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह का नाम दर्ज था. इस अर्पित सिंह के ही नाम पर 6 अलगअलग जिलों— बलरामपुर, फर्रुखाबाद, रामपुर, बांदा और शामली में भी फरजी प्रमाण पत्रों से अन्य लोगों ने नियुक्ति हासिल कर ली थी.

इसी तहरीर के आधार पर राजधानी लखनऊ (पश्चिमी) के थाना वजीरगंज में अर्पित सिंह सहित 5 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मुकदमा अपराध संख्या- 235/2025 के धाराएं- 419, 420, 467, 468, 471 बीएनएस के तहत मुकदमा दर्ज कराया.

यह मुकदमा 8 अक्तूबर, 2025 की शाम 7 बज कर 10 मिनट पर दर्ज हुआ था. जैसे ही मुकदमा दर्ज हुआ, सभी आरोपी भूमिगत हो गए. पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई. यह मामला सामने कैसे आया? आइए पढ़ते हैं—

मुकदमा दर्ज होने से करीब सवा महीने पहले यानी 5 सितंबर, 2025 को एक दैनिक अखबार ने ‘एक अर्पित के नाम पर 6 अर्पित कर रहे नौकरी’ शीर्षक से सनसनीखेज खबर अपने सभी संस्करणों में छापी थी. जैसे ही फर्रुखाबाद जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) अवनीश कुमार की नजर खबर पर पड़ी तो मानो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह चौंक पड़े.

शुरू हुई घोटाले की जांच

उसी दिन आननफानन में सीएमओ अवनीश कुमार ने 10 बजे सुबह अपने दफ्तर में एक आवश्यक मीटिंग बुलाई, जिस में डा. सर्वेश कुमार यादव, डा. आर. सी. माथुर और डा. दीपक कटियार उपस्थित थे. घंटों तक अखबार में छपी खबर पर चली चर्चा के बाद सीएमओ ने पत्रांक संख्या-मु0चि0अ0/जांच/2025-26/3760 से जांच हेतु एक पत्र जारी किया और उक्त तीनों डौक्टरों को जांच समिति का सदस्य नामित करते हुए मामले की जांच कर 3 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आदेश दिया. पत्र की यह कौपी जिला अधिकारी, फर्रुखाबाद को भी भेज दी गई.

फर्रुखाबाद के शमसाबाद में अर्पित सिंह नाम का एक कर्मचारी एक्सरे टेक्निशियन के पद पर तैनात था. अखबार में खबर छपने के बाद वह भूमिगत हो गया. जांच समिति की टीम जब शमसाबाद अस्पताल पहुंची तो पता चला अर्पित सिंह 5 दिनों से ड्ïयूटी पर नहीं आ रहा है. उस के बाद से अब तक उस का पता नहीं है.

मामले में तब और एक नया मोड़ आया, जब एक दैनिक अखबार में छपी यही खबर हाथरस जिले के एक युवक ने पढ़ी थी. उस का भी नाम अर्पित सिंह पुत्र अनिल कुमार सिंह था. वह मूलरूप से मोहल्ला प्रतापनगर शाहगंज, आगरा रहने वाला था. वर्तमान समय में वह अपने पेरेंट्स के साथ हाथरस में रहता था. यहीं रह कर वह नौकरी करता था. वह हाथरस जिले में मुरसान में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में एक्सरे टेक्निशियन पद पर था.

खबर पढ़ते ही वह बुरी तरह सन्न रह गया. अखबार में अर्पित सिंह को ले कर जोजो हवाला दिया गया था, वो सूचना हाथरस वाले अर्पित सिंह से काफी मेल खा रही थी. खबर ने उसे बुरी तरह से सकते में डाल दिया था. उस ने सूझबूझ का परिचय देते हुए तत्काल यह बात अपने अधिकारियों को बताई. यह सुन कर वे भी सन्न रह गए थे. ये कैसे हो सकता है कि असली अर्पित सिंह तो यहां हाथरस में मौजूद है तो फिर वह कैसे फर्रुखाबाद में नौकरी कर सकता है? जरूर इस में कोई बड़ा लोचा है.

इधर हाथरस के अर्पित सिंह प्रकरण ने तूल पकड़ लिया था. इस के नाम से अन्य 6 जिलों मे नौकरी करने वाले युवकों के मामले में जांच शुरू हो गई थी. हाथरस के सीएमओ डा. मंजीत सिंह और मुरसान सीएचसी के प्रभारी डा. चंद्रवीर को लखनऊ निदेशालय हाजिर होने का फरमान जारी किया गया.

इस मामले में डा. मंजीत सिंह को आदेश हुआ कि मुरसान में तैनात अर्पित सिंह के नियुक्ति संबंधित दस्तावेजों के साथसाथ आधार कार्ड, पैन कार्ड साथ लाना है. साथ ही निदेशालय की ओर से फोटो की फोरैंसिक जांच कराने के लिए अर्पित सिंह के वर्तमान फोटो और नियुक्ति के दौरान का फोटो भी मांगा गया था. ताकि मिलान कर के असलीनकली की पहचान की जा सके. निदेशालय से आदेश मिलते ही दोनों अधिकारी एक सप्ताह के भीतर सभी दस्तावेजों के साथ लखनऊ निदेशालय रवाना हो गए और इस दौरान असली अर्पित सिंह भी उन के साथ मौजूद था, जिस का नियुक्ति के समय सीरियल नंबर 80 और रजिस्ट्रैशन नंबर 50900041299 था.

इस दौरान फर्रुखाबाद के शमसाबाद में तैनात अर्पित सिंह को भी लखनऊ निदेशालय तलब किया गया था, लेकिन सक्षम अधिकारी के सामने पेश होने से पहले ही वह फरार हो गया था. इस वाकये ने यह साबित कर दिया था कि मामले में जरूर बड़ा झोलझाल है, तभी सक्षम अधिकारी का सामना किए बिना ही वह मौके से फरार हो गया था.

खैर, हाथरस वाले अर्पित सिंह से घंटों पूछताछ चली. उस के दस्तावेजों का परीक्षण हुआ. सब कुछ ठीकठाक रहा. और तो और अधिकारियों के सवालों का उस ने दिलेरी के साथ बेझिझक जवाब दिया था. बात यहीं खत्म नहीं हुई थी. इस फरजीवाड़े की जांच आगे बढ़ी तो मामला परतदरपरत खुलता गया, जिस की नींव महानिदेशालय दफ्तर से जुड़ी हुई सामने आई. करप्शन की कोख से पैदा हुए अफसर यहीं बैठे हुए थे, जिन की शह पर ही घोटाले को ऊर्जा मिली थी. आइए पढ़ते हैं, इस फरजीवाड़े का काला सच—

मामला 2008 और 2016 की उन भर्तियों से जुड़ा है, जिन में एक्सरे टेक्निशियनों के पद पर नियुक्तियों में भारी गड़बड़ी की शिकायतें उठी थीं. स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से यह रिपोर्ट मांगी थी कि उन के यहां कहीं अर्पित सिंह नाम का कोई कर्मचारी तो तैनात नहीं है. यदि है तो उस की जानकारी निदेशालय को दें. जांच में यह सामने आया कि उस समय 79 स्वीकृत पदों पर 140 लोगों को नियुक्त किया गया था. यानी 61 लोगों को बगैर पद के नियुक्त कर के सीधे सरकार को करोड़ों का चूना लगाया गया. यह जानकारी जब सामने आई तो निदेशालय के वरिष्ठ अधिकारियों के माथे पर पसीना छलक उठा. एकदूसरे पर दोषारोपण करने लगे थे.

यह मामला गंभीर नहीं, अति गंभीर था, लिहाजा स्वास्थ्य महानिदेशक डा. रतन पाल सिंह सुमन ने तत्काल ऐक्शन लिया और उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि 2008-09 के बीच जिन भी अभ्यर्थियों ने जौइनिंग की थी, उन का पूरा विवरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि गुणवत्ता के आधार पर असली और नकली की पहचान की जा सके. फर्रुखाबाद समेत पूरे प्रदेश में भरती घोटालों की परतें उधेड़ रही यह जांच यह साफ कर रही थी कि वर्षों से सिस्टम में किस तरह से गहराई तक भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली थीं, लेकिन जनता का सवाल अब सीधा था कि आखिर अर्पित सिंह कहां है और कब तक कानून से बाहर रहेगा?

स्वास्थ्य विभाग में फरजी नियुक्ति के मामले कई बार सामने आ चुके थे. लेकिन अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे थे और मामले में टालमटोल करते जा रहे थे, ताकि जुर्म की कोख से जन्मी भ्रष्टाचार की खेती यूं ही लहलहाती रहे और उस से पैदा होने वाली नोटों से सदा उन की जेबें गरम होती रहें, लेकिन कब तक वे भ्रष्टाचार की मद्धिम आंच पर जुर्म की ताजी रोटियां सेंकते, एक न एक दिन तो यह गंदगी उजागर होनी ही थी.

अब एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह की फरजी नियुक्ति होने की चर्चाएं तेज हैं. जांच का दायरा बढ़ा तो कुछ और मामले सामने आए. मई 2016 में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से 403 एक्सरे टेक्निशियन चयनित हुए थे. इन चयनित अभ्यर्थियों में एक ही अर्पित सिंह के नाम की नियुक्ति हुई थी. बाद में सरकार के मानव संपदा पोर्टल पर अर्पित सिंह के नाम से 6 एक्सरे टेक्निशियन के नाम दिखने लगे थे. और तो और सभी के पिता का नाम अनिल सिंह, जन्म तिथि 12 जून 1989 ही अंकित था. इन में 4 अर्पित सिंह का पता सी-22 प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा अंकित था, जबकि 2 का पता अलग था.

इन में एक एक्सरे टेक्निशियन अर्पित की तैनाती सीएचसी शमसाबाद में दिखाई जा रही थी, जोकि फर्रुखाबाद जिले में आता है.

हालांकि 2016 में जनपद में 6 एक्सरे टेक्निशियन तैनात हुए थे. इन में कपिल वर्मा, प्रदीप यादव, भगवती शरण कुशवाहा, विजय शंकर तिवारी, रमेश कुमार व अर्पित सिंह शामिल थे.

जांच में सामने आया कि अन्य एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती के करीब 15 दिन बाद अर्पित सिंह की जिले में तैनाती हुई थी.

सब से पहले उसे सीएचसी शमसाबाद में ही तैनात किया गया था. इस के बाद उसे सीएचसी मोहम्मदाबाद, रामपुर जिले में भेजा गया. फिर वहां से उस का ट्रांसफर सीएचसी शमसाबाद किया गया. वर्षांे तक वहीं नौकरी करता रहा. मामला उजागर होने से एक सप्ताह पहले अर्पित सिंह का दोबारा ट्रांसफर सीएचसी मोहम्मदाबाद कर दिया गया था.

शक में आई पुलिस जांच

यह खेल बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से फलताफूलता रहा. और सरकार को लाखों का चूना हर माह लगाता रहा. उस के वेतन के कुछ हिस्से अधिकारियों की जेबों में भी जाते रहे, ताकि भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त अफसरशाही के घिनौने चेहरे सामने न आ सके और यह मामला दबा रहे. तथाकथित अर्पित सिंह जनपद एटा का निवासी था. अब सवाल यह उठता है कि एक ही नाम से 6 अर्पित सिंह की जनपद शामली, रामपुर, बांदा, बलरामपुर, बदायूं व फर्रुखाबाद में तैनाती हुई थी. इस में असली नियुक्ति किस की हुई और 5 फरजी नियुक्ति में कौनकौन शामिल थे? यह बड़ा सवाल है.

स्वास्थ्य विभाग लगातार सभी को वेतन दे रहा था, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया, जबकि नियुक्ति के बाद विभाग अभ्यर्थी का पुलिस सत्यापन कराता है. सत्यापन में भी फरजीवाड़ा खुल कर सामने नहीं आया. इस का मतलब साफ था कि पुलिस वेरीफिकेशन में जांच करने वाला पुलिस अधिकारी भी इस खेल में शामिल था, तभी तो उस ने भी अपने कर्तव्य का सही से पालन नहीं किया अन्यथा उसी दौरान फरजीवाड़े का यह खेल वहीं खुल जाता और सरकार को करोड़ों का चूना लगाए जाने से बचाया जा सकता था.

जैसेजैसे जांच का दायरा आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे नए खुलासे होते गए. जांचपड़ताल में विवेचक के हाथ 2 नियुक्ति पत्र लगे. जिस में एक नियुक्ति पत्र 25 अगस्त, 2008 को जारी हुआ था. इस में क्रम संख्या 3, रोल नंबर-एक्सआर 5035 लिखा था. अभ्यर्थी का नाम फुरकान खान, पता- सिसेंडी, लखनऊ, नियुक्ति स्थान सीएमओ सीतापुर के अधीन लिखा था. जो 79 अभ्यर्थी के परीक्षा परिणाम में इन का विवरण मौजूद है.

बात अब दूसरे नियुक्ति पत्र की करते हैं. जब इसी तरह दूसरे नियुक्ति पत्र की 79 की सूची से मिलान किया गया तो विवरण नहीं मिला. इस जौइनिंग लेटर पर नियुक्ति तिथि 20 सितंबर, 2008 अंकित थी, क्रम संख्या- 67. अनुक्रमांक-एक्सआर 5365 लिखा था. इस पर नाम पुष्पेंद्र सिंह, पता- कंचनपुर, जिला मैनपुरी, नियुक्ति मुख्य चिकित्साधिकारी बलिया के अधीन लिखा था. लेकिन परीक्षा परिणाम वाली सूची में क्रम संख्या 67 पर नाम हरिमोहन, पता आगरा का दर्ज है.

नहीं माना शासनादेश

उत्तर प्रदेश में एक्सरे टेक्निशियन और लैब टेक्निशियन की भरती में हर स्तर पर विभागीय अधिकारियों ने मनमानी की. हालत यह है कि एक्सरे टेक्निशियन भरती 2016 में नियमावली बदलाव के संबंध में राज्यपाल का आदेश जारी होने से पहले ही नियुक्ति आदेश जारी कर दिया गया था. प्रदेश में 2013 में एक्सरे टेक्निशियन भरती के लिए 287 पदों पर आवेदन मांगे गए थे. इस भरती में कई तरह के गंभीर आरोप लगे. जांच में आरोप सही पाए गए और शासन की ओर से 21 जून, 2014 को भरती प्रक्रिया निरस्त कर दी गई.

फिर 2015 में अधीनस्थ चयन आयोग का गठन हुआ. पहले की तरह इस में थोड़ी तबदीली की गई थी. अब 287 पदों की जगह 403 पदों के लिए आवेदन मांगे गए. पहले हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और डिप्लोमा इन एक्सरे टेक्निशियन के परीक्षा परिणाम के गुणांक के आधार पर 50 अंक और साक्षात्कार के आधार पर 50 अंकों को समाहित करते हुए मेरिट सूची तैयार किए जाने का नियम था. लेकिन आगे चल कर इस में बड़ा बदलाव किया गया.

तय यह किया गया कि 100 अंक के बजाय मेरिट धारियों को सिर्फ 20 अंक का साक्षात्कार लिया जाएगा. नियमों में बदलाव के लिए राज्यपाल को प्रस्ताव भेजा गया. इसी बीच मई, 2016 में 20 अंकों के आधार पर साक्षात्कार करा लिया गया. और 17 मई, 2016 को परिणाम भी जारी कर दिया गया. इतना ही नहीं, 25 मई को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए.

जबकि 10 जून, 2016 को तत्कालीन शासन के विशेष सचिव अशोक कुमार श्रीवास्तव ने आदेश जारी किया गया कि समूह ‘ग’ के पदों के लिए सीधी भरती नियमावली 2015 के नियम 8(1) के तहत साक्षात्कार के अधिकतम अंक 20 निर्धारित करने के लिए राज्यपाल ने मंजूरी दे दी है. यह मंजूरी तत्काल प्रभाव से लागू की जाती है.

पते की बात तो यह थी कि जब तक यह आदेश जारी होता, उस से पहले ज्यादातर लोगों ने कार्यभार ग्रहण कर लिया था. इसी (2016) की भरती में एक चयनित अर्पित सिंह के नाम से 6 लोगों ने अलगअलग जिलों में कार्यभार ग्रहण किया था, जिस में वजीरगंज थाने में 6 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, जिन के खिलाफ जांच चल रही है. पुलिस जांच के दौरान एक बड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया था. जांच में पता चला कि फरजी भरती से जुड़े रैकेट में शामिल लोगों ने अभ्यर्थियों के पते गलत दिए थे. इस के पीछे उन की सोचीसमझी और पुख्ता रणनीति थी.

तर्क यह था कि लाभार्थियों के फरजी पता देने से पकड़े जाने के बाद विभाग जब उन के पते पर नोटिस भेजेगा तो ये नोटिस स्वीकृत नहीं होगा. ऐसे में फरजी अभ्यर्थी यह कहते हुए खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाएंगे कि उन्हें कोई नोटिस मिला ही नहीं और बाद में कोर्ट चले जाएंगे.

भ्रष्ट लालफीताशाहियों के करतूतों की पोल ऐसे खुल कर सामने आई थी. वे अपने लचर रवैए से जुर्म की मोटी दीवार पर सरकार से विश्वासघात का परदा डाल कर उसे ढक देते हैं ताकि वे फरजी अभ्यर्थियों के साथ ढुलमुल रवैया अपनाए रहें और उन के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत भी न मिले. ऐसे में तथाकथित अभ्यर्थियों को राहत मिल जाती है. 2008 के प्रकरण में चल रही जांच में अब तक की गई जांच में यह बात सामने आई थी कि अभ्यर्थी जहां का पता लिखते थे, वहीं का फरजी प्रूफ भी तैयार कर लेते थे. इस जांच में कुछ फरजी अभ्यर्थियों की कारस्तानी सामने आई थी.

कन्नौज के सीएचसी तालग्राम में कार्यरत मनोज का पता फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का लिखा था, लेकिन जांच में पता चला कि वह फिरोजाबाद के शिकोहाबाद का नहीं, बल्कि कन्नौज के जलालाबाद के अटारा का रहने वाला था. दूसरा मामला बदायूं से जुड़ा सामने आया. बदायूं के सीएचसी उसवा में कार्यरत सुधीर का पता धुमरी सिद्धपुर रोड एटा लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज क्षेत्र के लड़सिया उर्फ लुतफुल्लापुर का रहने वाला था.

चंदौली के सीएचसी चकिया में कार्यरत विनोद का पता एटा जिले के जलालापुर रामनगर लिखा था, जबकि वह एटा जिले के अलीगंज के जैथरा का निवासी था. इसी तरह कई अन्य के निवास प्रमाण पत्रों में भी हेराफेरी की गई थी.

9 साल से लेते रहे सैलरी

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार एक्सरे टेक्निशियन की तैनाती 4,200 रुपए वेतनमान पर होती है. इस तरह शुरुआत में उन्हें लगभग 50 से 55 हजार रुपए महीना वेतन मिलता है. फरजी तरीके से नियुक्त हुए इन में से प्रत्येक व्यक्ति ने 2016 से 2025 तक 9 साल में करीब 58 लाख रुपए से अधिक वेतन स्वास्थ्य विभाग से लिया है. इस तरह फरजी नाम से नौकरी करने वाले सभी 6 कर्मचारियों ने करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए से अधिक की आर्थिक धोखाधड़ी विभाग के साथ की है. वहीं, वेतन की बात करें तो एक अर्पित सिंह हर महीने 69,595 रुपए ले रहा था. एक साल में सिर्फ एक जिले से ही 8,35,140 रुपए की सैलरी ली गई. 9 सालों में केवल एक जिले से 75,16,260 रुपए का भुगतान किया जा चुका था.

ऐसे में 6 जिलों के अर्पित सिंह के वेतन को जोड़ें तो लगभग साढ़े 4 करोड़ रुपए सिर्फ 6 व्यक्तियों ने विभाग से हासिल कर लिए. ऐसे में विभाग के बेइमान अफसरों की जेबों में भी बेइमानी का एक मोटी रकम गई होगी, इस में कोई शक नहीं है. तभी तो भ्रष्टाचार की जड़े गहराई तक जमी हैं. फर्रुखाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. अवनींद्र कुमार ने पूरे मामले पर 3 उप मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की टीम बनाई

थी. जिस में यह हुआ था कि जांच के बाद आरोपित अभ्यर्थियों के खिलाफ काररवाई होगी.  इस बीच सरकार की नीतियां, विभागीय सख्ती और निगरानी तंत्र सब पर यह सवाल खड़ा किया जा रहा है कि आखिर कैसे इतने लंबे समय तक एक शख्स सरकार से वेतन लेता रहा और विभाग को कानोंकान भनक तक नहीं लगी. इस पर सीएमओ डा. अवनींद्र कुमार ने तर्क दिया कि काररवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जल्द वे चेहरे सामने आ जाएंगे, जिन के सान्निध्य में इस फरजीवाड़े का खेल खेला गया था. मगर बड़ा सवाल यह है कि यह काररवाई सिर्फ नियमकानून के दस्तावेजों तक सीमित रहेगी या फिर व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचेगी?

हाथरस मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह ने बताया कि उस के नाम पर नियुक्ति में फरजीवाड़ा 2017 में आया था, उस समय अलीगढ़ के अकराबाद सीएचसी में भी उस के नाम से एक टेक्निशियन तैनात था. जांच शुरू होते ही वह भाग गया था. तत्कालीन सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने उस समय भी उन का सत्यापन कराया था. जांच में हाथरस वाले अर्पित सिंह की तैनाती सही पाई गई थी.

सीएमओ डा. रामवीर सिंह ने कहा कि यह फरजीवाड़ा लखनऊ से हुआ था, क्योंकि नियुक्ति पत्र निदेशालय से जारी होना दर्शाया गया था. उस की (असली अर्पित सिंह) वर्ष 2016 में हाथरस जिले में नियुक्ति हुई थी. उस समय अन्य जिलों में कोई नियुक्ति नहीं हुई थी.

उन्होंने अपने माध्यम से जानकारी जुटाई तो पता चला कि फरजी अर्पित सिंह की हाथरस में पोस्टिंग दिखा कर बिना जौइन कराए अन्य जिलों में तबादले दिखाए गए थे, जबकि असली अर्पित सिंह का तो कभी कोई तबादला हुआ ही नहीं है. उन्होंने दावा किया कि असली अर्पित सिंह ने करीब एक साल जिला अस्पताल में भी सेवा दी है. अन्य जिलों में उस के नाम से फरजी कर्मचारियों ने नौकरी की है, जब यहां टीमें पहुंचीं तो ये सभी लोग भाग खड़े हुए.

असली अर्पित सिंह की जब विभाग में जौइनिंग हुई थी तो उस के सभी दस्तावेजों की जांच के साथ पुलिस विभाग की तरफ से भी उस का सत्यापन हुआ था, जिस में सब कुछ सत्य पाया गया था. उपलब्ध दस्तावेजों में मुरसान सीएचसी पर तैनात टेक्निशियन अर्पित सिंह की नियुक्ति सीएमओ कार्यालय में वर्ष 2016 में दर्ज है. मुरसान सीएचसी पर तैनात अर्पित सिंह की भी जांच शासन स्तर पर चल रही है. इस संबंध में सभी दस्तावेज शासन को भेज दिए गए हैं. जबकि बाकी 5 जगहों पर अर्पित के नाम से नौकरी करने वाले भागे हुए हैं. मुरसान में तैनात अर्पित वास्तविक कर्मचारी है.

ऐसे खेला गया खेल

उत्तर प्रदेश में नौकरियों में फरजीवाड़े मामले में एक और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. फरजीवाड़ा करने वाले आरोपी पहली पोस्टिंग जुगाड़ से वहीं करा लेते हैं, जहां सुविधा होती है. इस के बाद पहला ट्रांसफर मिलते ही इन्हें पकडऩा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि दूसरी जगह जाने पर दस्तावेज नहीं सिर्फ ट्रांसफर लेटर चैक होता है. फरजी दस्तावेजों से नौकरी हासिल करने का ये सारा खेल विभागीय मिलीभगत से चलता है.

इस का खुलासा इस बात से होता है कि कई जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारी रह चुके स्वास्थ्य विभाग के एक निदेशक बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में तबादला करा कर आए लोगों की गोपनीय तरीके से जांच कराई तो कई अजीबोगरीब केस मिले थे, जो फरजी दस्तावेज पर नौकरी करते मिले.

ऐसे लोग पहली बार उसी जिले में कार्यभार ग्रहण करते हैं, जहां से उन का रैकेट से जुड़ा क्लर्क अथवा चिकित्साधिकारी कार्यरत होता है. क्योंकि वे आसानी से सर्विस बुक सहित अन्य पत्रावली तैयार करा लेते हैं. उस के बाद तो उन की चांदी ही चांदी होती है. तैनाती के बाद 6 महीने से साल भर के अंदर वे अपना तबादला करा कर दूसरे जिले में चले जाते हैं, जहां उन की नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज आमतौर पर देखे नहीं जाते हैं.

चिकित्साधिकारी के तर्क को देखा जाए तो साल 2008 में हुई एक्सरे टेक्निशियन भरती उन की इस बात की पुष्टि करती है कि फरजी अर्पित सिंह सहित अन्य के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा. मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज आंकड़े के मुताबिक 2008 में 79 की जगह 140 लोगों ने नौकरी हासिल की थी. इस में 61 अतिरिक्त थे. इन के सर्विस रिकौर्ड को देखा जाए तो ज्यादातर ने 2 साल के अंदर तबादले ले लिए थे.

जिस ने पहले बलिया में कार्यभार ग्रहण किया था, वह बांदा में कार्यरत है और जिस ने आगरा में कार्यभार ग्रहण किया था. वह अब वाराणसी या चंदौली में सेवाएं दे रहा है. पते की बात यह है कि इन सभी के नियुक्ति पत्र हाथ से लिख कर जारी किए गए थे.

कानपुर से जुड़े तार

चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज फैक्ट शीट (पी2) के रिकौर्ड के मुताबिक 2008 में फरजीवाड़ा के जरिए नौकरी हासिल करने वाले रैकेट के तार किसी न किसी रूप में कानपुर मंडल से जुड़े हैं, जिस में फर्रुखाबाद में हुए फरजीवाड़े से ज्यादा नजदीकी दिख रही थी. गौरतलब है कि 2016 में भी इसी रैकेट के सक्रिय रहने की आशंका जताई जा रही थी, क्योंकि फर्रुखाबाद में जिस एक्सरे टेक्निशियन अर्पित सिंह को नौकरी दी गई थी, उस का गृह जनपद आगरा था, लेकिन जांच के दौरान वह एटा का निकला.

2008 की भरती में मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज तथ्यों के आधार पर 61 एक्सरे टेक्निशियन का गृह जनपद देखा जाए तो फर्रुखाबाद के सब से ज्यादा करीब 19 कर्मचारियों के मूल निवास दिखाए गए थे. इसी तरह एटा के 16, मैनपुरी के 6, कन्नौज के 4, वाराणसी के 3, कासगंज और मेरठ के 2-2, प्रयागराज, औरैया, झांसी, अंबेडकर नगर, शामली, मुरादाबाद, बाराबंकी, बिजनौर, बलिया के एकएक निवासी बताए गए थे.

इन सभी कथित अर्पित सिंह ने 5 जिलों में प्रताप नगर, शाहगंज, आगरा का पता दर्ज कराया था, जबकि अमरोहा में कुरावली मैनपुरी का पता दिया था. शामली जिले को छोड़ कर अन्य जिलों में कथित अर्पित ने अलगअलग आधार कार्ड नंबर भी उपलब्ध कराए हैं. इस में 2 फरजी अर्पित की पहचान लखीमपुर खीरी और गोंडा में हुई है. बदायूं में तैनाती लेने वाला फरजी अर्पित पहले ही बरखास्त किया जा चुका है. आजमगढ़ के पंवई और ललितपुर वाले अर्पित फरार चल रहे हैं.

यूपीएसएसएससी की सूची में 127 क्रमांक संख्या पर दर्ज अंकित के मामले में भी जांच शुरू कर दी है. अंकित पुत्र राम सिंह की 2016 में हरदोई की मल्लावां सीएचसी पर नियुक्ति हुई थी. वह भी फरार चल रहा है. इसी तरह क्रमांक संख्या 166 पर दर्ज अंकुर पुत्र नीतू मित्ता के नाम पर फरजीवाड़ा किया गया. अंकुर एक जून, 2016 को मैनपुरी सीएमओ के अधीन नियुक्त हुआ था. वहीं दूसरे फरजी अंकुर ने 12 जून 2016 को मुजफ्फरपुर की शाहपुर सीएचसी में फरजी तरीके से नियुक्ति ली थी.

वहीं दूसरी ओर, एक ऐसा नाम जो असल में मौजूद ही नहीं है और सिस्टम की खामियों का फायदा उठा कर करोड़ों रुपए डकार गया. आखिर इस सब के पीछे जिम्मेदार कौन है?  वे अधिकारी जिन्होंने दस्तावेजों पर सिर्फ एक ठप्पा लगाने को ही अपना काम अपनी जिम्मेदारी समझा? या वे दूषित मानसिकता से ओतप्रोत थे, जिस के चलते ऐसे लोग हमेशा बच निकलते हैं?

फरजीवाड़े का यह खेल तो लंबे अरसे से खेला जा रहा था और खेला भी जा रहा है. इस से सरकार को करोड़ों रुपए का चूना भी लगाया जा रहा है. अब देखना यह है कि क्या जांच अधिकारी अपनी निष्पक्ष जांच से उन के चेहरे से नकाब उतार सकेंगे अथवा वह भी नोटों की चमक के सामने औरों की तरह अपना ईमान गिरवी रख देंगे. यदि समय रहते भरती प्रक्रिया के दौरान सभी जिम्मेदार और सक्षम अधिकारियों ने ईमानदारी से अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो फरजीवाड़े का बीज अंकुरित होने से पहले इस का वजूद मिट गया होता और यूं ही नहीं विशाल बरगद का रूप लेता.

खैर, सभी फरजी कर्मचारियों के खिलाफ फरजीवाड़े का मुकदमा दर्ज कर के जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. जांच शुरू हुए 2 महीने का समय बीत चुका है, लेकिन उन 6 में से किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी कथा संकलन तक नहीं हो सकी थी, क्योंकि उन का कहीं अतापता नहीं चल सका था. UP News

(कथा दस्तावेजों और सोशल मीडिया में छपी रिपोर्ट के आधार पर)

 

Love Crime: प्रेमिका का सिर कलम

Love Crime: पति जौनी को छोडऩे के बाद 30 वर्षीय उमा को 25 वर्षीय बिलाल से मोहब्बत हो गई थी. उस के बाद वह लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फिर एक दिन जंगल में उमा की सिरविहीन और निर्वस्त्र लाश मिली. उमा की जब किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो आखिर किस ने और क्यों किया उस का मर्डर? पढ़ें, लव क्राइम की यह हैरतंगेज कहानी.

उमा को खत्म करने की बिलाल की योजना किसी कागज पर नहीं थी, वह उस के दिमाग में बनी एक अंधेरी भूलभुलैया थी. उस ने सोचा कि पहले उमा को भरोसे में लिया जाए, फिर उसे सुनसान जगह ले जा कर उसे खत्म किया जाए. फिर उस की लाश के टुकड़े कर अलगअलग फेंक दिया जाए. इस से उस की शिनाख्त भी नहीं हो पाएगी और यह राज भी राज ही बन कर रह जाएगा. प्रेमिका को ठिकाने लगाने का बिलाल ने यही प्लान बना लिया.

14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की शादी होने जा रही थी. बारात उतराखंड के रुड़की जानी थी. लेकिन इस निकाह में बिलाल की हिंदू प्रेमिका बाधा बन सकती थी और ऐसे में उस ने प्रेमिका उमा को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार कर लिया था.

बिलाल ने अपनी शादी से ठीक 8 दिन पहले यानी 6 दिसंबर को उस ने उमा से कहा, ”चलो, कहीं घुमा कर लाता हूं.’’

उस के खौफनाक इरादों से अनजान उमा राजी हो गई. शाम का वक्त था, अंधेरा हो चला था. उमा रोमांच महसूस कर रही थी, जबकि उस के मन में कुछ और ही चल रहा था. 6 दिसंबर, 2025 को शाम करीब 6 बजे स्विफ्ट कार ले कर वह उमा के कमरे पर गया था. बोला, ”सरप्राइज है, चलो तुम्हें बाहर घुमा कर लाता हूं.’’

हथिनीकुंड बैराज में यूपी और हरियाणा को जोडऩे वाला पुल है. वह उसी रास्ते से कार लाया. पहले हिमाचल की तरफ कार घुमाई, फिर उस ने पहले हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की तरफ कार मोड़ ली. उमा लगातार उस से बातें किए जा रही थी. वह उसे प्यारभरे अंदाज में उस की बातों का जवाब दे रहा था. दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

रात के करीब 8 बज गए थे. रात का स्याह अंधेरा छा गया था. कलेसर नैशनल पार्क से गुजर रहे थे. नैशनल हाइवे से गाडिय़ां आजा रही थीं. उस दिन शनिवार था. वीकेंड पर अकसर पर्यटक इस इलाके में ज्यादा घूमने जाते हैं. उस ने कहा कि कोई होटल देखते हैं, वहां शाम बिताएंगे. पांवटा में रूम तलाशने की कोशिश की, लेकिन पर्यटक काफी थे. कहीं कोई कमरा किराए पर नहीं मिला. उसे डर लगा कि कहीं पकड़ा न जाए. अचानक प्लान बदल दिया.

इस के बाद उस ने हरियाणा की सीमा की तरफ कार मोड़ ली. बोला कि चलो, जंगल की तरफ चलते हैं, उधर भी अच्छे होटल हैं. उमा तो उस पर आंखें मूंद कर भरोसा करती थी, इसलिए राजी हो गई. कलेसर जंगल के एरिया से निकलते ही आबादी शुरू हो जाती है. यहां प्रतापनगर के गांव बहादुरपुर की सीमा से पहले ही उस ने कार रोक ली. उमा ने पूछा कि कार क्यों रोक दी?

उस ने कहा कि आबादी आने वाली है. सीट बेल्ट लगाना जरूरी है. यह बहाना बना कर वह पिछली सीट पर चला गया. उस वक्त उमा अगली सीट पर बैठी अपनी धुन में मस्त थी. तभी अचानक (25 वर्षीय) बिलाल ने 30 वर्षीय प्रेमिका उमा के गले में सीट बेल्ट डाल दी और गला घोंटने लगा. उमा के पास बचने या चिल्लाने का ज्यादा मौका नहीं था. उमा का शरीर बेजान हो गया. उसे मरा मान बिलाल तुरंत अगली सीट पर आया. उस ने कार आगे बढ़ा दी. करीब आधा किलोमीटर दूर गया तो सामने गांव बहादुरपुर की लाइटें नजर आने लगीं.

बिलाल को अब शव ठिकाने लगाने की जल्दी थी. उस के मन में पकड़े जाने का भी डर था, इसलिए उस ने गरदन से सिर काटने की सोची. साथ में वह मीट काटने वाला छुरा ले कर आया था. लाश को सड़क किनारे खेतों में बनी पौपुलर की नर्सरी में ले गया. वहां सिर धड़ से अलग किया और लाश के कपड़े उतार लिए, ताकि उस की पहचान न हो. कटे सिर और उतारे गए कपड़ों को पौलीथिन के थैले में डाल कर अगली सीट पर रख लिया. सिर कटी लाश उस ने वहीं छोड़ दी थी.

उस वक्त रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे होंगे. अब उसे ऐसी जगह की तलाश थी, जहां सिर व कपड़े फेंक सके ताकि शिनाख्त की संभावना न बचे. बिलाल ने सिर फेंकने के लिए इसी जगह को चुना. यहां सिर फेंकने के बाद बिलाल ने कार घुमाई और हथिनीकुंड बैराज के पुल से होते हुए अपने घर चला गया.

बिलाल ने मर्डर के बाद घर पहुंच कर सब से पहले अपना मोबाइल फारमेट कर दिया, जिस से कि उस के मोबाइल में उमा की फोटो और कौन्टैक्ट नंबर सब डिलीट हो गए. आधी रात के बाद बिलाल सो गया और सुबह फेमिली वालों से कहा कि अब निकाह की तैयारियों में रहूंगा. अब कहीं नहीं जाऊंगा.’’ योजना पर अमल कर के उस ने उमा की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर दी. यह मामला हरियाणा के यमुनानगर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से जुड़ा एक सनसनीखेज हत्याकांड है, जिस में प्रेम प्रसंग, लिवइन रिलेशनशिप और शादी के दबाव के चलते बेरहमी से हत्या की गई है.

सहारनपुर के हलालपुर गांव में एक परिवार रहता है. उस परिवार की उमा 18 साल की हो चुकी थी. उस की जवानी अब फूल की तरह पूरी तरह खिल चुकी थी. उमा के घर से सिर्फ 2-4 घर छोड़ कर  एक 19 साल का युवक जौनी रहता था. पेशे से मजदूर था और रंगाईपुताई का काम किया करता था. जौनी मामूली सा विकलांग था. उस की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि कोई उस की कमजोरी पर ध्यान ही नहीं देता. जौनी मेहनती और हंसमुख था.

उमा के घर में रंगाईपुताई का काम चल रहा था. उमा के पापा ने जौनी को बुलाया था, क्योंकि वह पड़ोस में ही रहता था. पहली बार जब जौनी उमा के घर आया तो वह सीढ़ी पर चढ़ कर दीवारों को रंग रहा था. विकलांग होने के बावजूद वह बड़े सलीके से काम कर रहा था, जैसे कोई कलाकार अपनी पेंटिंग बना रहा हो. उमा उस वक्त घर में थी. बचपन से ही वो जौनी को ‘जानी वाकर’ कह कर चिढ़ाती थी और जौनी मुसकरा कर उस की कलाई पकड़ लेता. दोनों साथ खेलते हुए बड़े हुए.

परंपरा, मानवता और पड़ोसी होने के नाते वह चाय ले कर किचन से बाहर आई और जौनी को देखा. उस के माथे पर पसीने की बूंदें, हाथों में ब्रश और चेहरे पर एक हलकी मुसकान.

”ओए जौनी, ले चाय पी ले,’’ उमा ने शरमाते हुए कहा.

जौनी ने मुड़ कर देखा और उस की आंखें उमा की मासूमियत पर ठहर गईं.

”धन्यवाद, उमा. लेकिन मैं तो मजदूर हूं.’’ उस ने हंसते हुए कहा.

”मजदूर को भी हमारी परंपरा के अनुसार दिन में 2 बार चाय पिलाते हैं.’’

उमा की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि वह छोटीछोटी बातों से प्रभावित हो जाती थी. जौनी की सादगी और मेहनत ने उसे छू लिया. उस दिन से दोनों की बातचीत शुरू हुई. बचपन की पुरानी यादें, यही सब बातों के विषय होते. धीरेधीरे ये मुलाकातें रोमांटिक रंग लेने लगीं. इस के बाद उन की मुलाकातें भी होने लगीं. जौनी उमा को अपनी जिंदगी की कहानियां सुनाता, कैसे वह विकलांग होने के बावजूद कभी हारा नहीं, कैसे वह सपने देखता है एक बेहतर जिंदगी के. उमा उस की ताकत से प्रभावित होती और उसे चूमती, पहले गाल पर, फिर होंठों पर.

उन के चुंबन में एक जुनून था, जैसे दोनों की आत्माएं मिल रही हों. जौनी की मजबूत बांहें उमा को घेर लेतीं और उमा की नरम अंगुलियां उस के बालों में घूमतीं. वे घंटों बातें करते, हंसते और कभीकभी चुपके से एकदूसरे को छूते, एक स्पर्श जो बिजली सी दौड़ाता.

जौनी ने उमा का हाथ पकड़ा और बोला, ”उमा, तुम मेरी जिंदगी हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’

उमा ने उस के सीने पर सिर रखा और कहा, ”जौनी, तुम्हारी कमजोरी मेरी ताकत है. हम साथ हैं, हमेशा.’’

उन का रोमांस अब गहरा हो गया था. उमा और जौनी के बीच का प्यार एक खामोश नदी की तरह बहता था. गहरा, शांत और हर किसी की नजरों से छिपा हुआ.

शादी के दिन हुई फरार

रातें उन की थीं. जब मोहल्ला सो जाता, उमा अपनी छत पर आती. जौनी दीवार फांद कर उस के पास पहुंच जाता. ऐसे ही 5 साल गुजर गए. 5 साल की अनगिनत रातें, अनकही बातें, चुराए गए चुंबन और वो सांसें जो सिर्फ एकदूसरे के लिए रुकी थीं. उमा के फेमिली वाले उमा की शादी के लिए बहुत चिंतित थे. आखिरकार एक लड़का उमा के लिए फेमिली वालों ने पसंद कर के शादी तय कर दी. यह बात सन 2010 की है. सभी धार्मिक औपचारिकताओं के बाद बारात आने की तारीख तय हो गई. अभी तक उमा की तरफ से किसी तरह का कोई विरोध फेमिली वालों के सामने नहीं आया.

सूरज की पहली किरणों ने अभीअभी गांव की सड़कों को छुआ था, जब उमा के घर में हलचल मच गई. आज वह दिन था, जिस का इंतजार पूरे परिवार को था. उमा की शादी. लेकिन कमरे में सन्नाटा था. जब मां ने दरवाजा खटखटाया और भीतर झांका तो पल भर में सब कुछ समझ में आ गया. अलमारी खुली थी, कुछ कपड़े गायब थे, उमा भी गायब थी. दुलहन का लहंगा बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. मेज पर रखा वह छोटा सा कागज, ‘मम्मी, हम मजबूर थे. माफ करना.’

जौनी और उमा, 2 प्रेमी दिल, रात की आड़ में घर से निकल चुके थे. उन के पैरों की धूल अब दूर किसी अनजान रास्ते पर उड़ रही थी, जहां प्यार की उड़ान ने परिवार की इज्जत को पीछे छोड़ दिया था. पापा की आंखें फैल गईं, भाई दौड़ कर बाहर निकले. ”कहां गई वो? जौनी भी गायब है!’’ चाचा की आवाज कांप रही थी.

पूरे गांव में तलाश शुरू हो गई. कुएं के पास, मंदिर में, बस स्टैंड पर. सभी रिश्तेदार मिल कर तलाश कर रहे थे. पड़ोसी जुट गए, फोन घूमने लगे. उन के मुंह से एक ही बात निकली, ‘भाग गए दोनों…’

ये शब्द हवा में जहर की तरह फैल गए, उमा के पापा का चेहरा पीला पड़ गया, मम्मी रोरो कर बेहाल हो रही थी.

‘उमा और जौनी की प्यार की आग में सब जल गया. अब इज्जत का क्या होगा?’ सोच कर पापा ने सिर थाम लिया.

तभी मामामामी आगे आए. उन की आवाज कांपी, पर नीयत मजबूत थी. दोनों ने उमा की मम्मी और पापा को समझाया. कहा, ”हम हैं आप के साथ. चिंता की कोई बात नहीं है. मेरी बेटी है. अगर आप कहें तो आज हम उमा की जगह अपनी बेटी को विदा कर देंगे. पूरे समाज में आप की इज्जत का सवाल है. यह त्याग हम कर सकते हैं.’’

दोनों में से किसी ने आंखें उठा कर नहीं देखा. अब हर तरफ फुसफुसाहटें थीं. उमा की मम्मी आंसू पोंछते हुए बोली, ”भाभी, क्या करूं? मेरी बेटी ने तो हमें डुबो दिया. बारात लौट गई तो गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

आंसू बिना आवाज के गिरते रहे. मां ने एक पल को भाई की ओर देखा और फिर धीरे से सिर हिला दिया. समय बीतता गया, सूरज चढ़ता गया. बारात की धुन दूर से सुनाई देने लगी. ढोल की थाप, शहनाई की मधुर स्वरलहरियां. दूल्हा, घोड़ी पर सजाधजा, मुसकराता हुआ आ रहा था अनजान इस तूफान से. घर के दरवाजे पर बारात रुकी. बारात आई. ढोलनगाड़ों की आवाज ने उस खालीपन को ढक लिया, जो आंगन में पसरा था. स्वागत हुआ, आवभगत निभाई गई. सभी के चेहरे पर नकली मुसकानें थीं, पर आंखों में प्रश्न.

परंपराएं चलीं, फेरों का समय आया. मामा की बेटी लाल जोड़े में आई. कांपती नहीं, बल्कि विश्वास से भरी थी. फेमिली वालों के चेहरे पर मुसकान चिपकी हुई थी, लेकिन आंखें बता रही थीं कि दिल टूटा हुआ है.

पापा ने आगे बढ़ कर दूल्हे का स्वागत किया, ”आओ जी, स्वागत है!’’

बाहर बारात नाच रही थी, अंदर फैसला हो चुका था. मामामामी की बेटी को बुलाया गया. वह हैरान थी, लेकिन परिवार की इज्जत के लिए तैयार हो गई.

”अगर इस से सब की लाज बचती है तो मैं कर लूंगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

मेकअप किया गया. उमा का ही लहंगा पहनाया गया. अब  मंडप सजा, पंडितजी मंत्र पढऩे लगे. दूल्हे को बताया गया कि ‘परिवार की रस्म है, दुलहन का नाम बदल गया.’ वह मुसकराया. शायद अनजान, शायद समझदार. फेरों के समय उमा की मम्मी की आंखों से आंसू बह रहे थे, खुशी के नहीं, दर्द के. पापा ने दुलहन का हाथ दूल्हे को सौंपा, मन में उमा की याद थी, ‘बेटी, तू जहां भी है, खुश रह,’ उन्होंने मन ही मन कहा.

इस तरह अपनी इज्जत की आरती को बचा कर इस घर से उमा की जगह उस की ममेरी बहन को विदा कर दिया गया. शादी संपन्न हुई. बारात विदा हुई. लेकिन घर में सन्नाटा था. रात को जब सब सो गए तब उमा की मम्मी ने पति से कहा, ”क्या हम ने सही किया?’’

उन्होंने सिर हिलाया, ”हां, इज्जत बचाई. लेकिन दिल टूटा है. जौनी और उमा, काश वे समझते.’’

इस अप्रत्याशित मोड़ ने एक नई कहानी शुरू की, दर्द की, बलिदान की और उम्मीद की.

निर्वस्त्र मिली लाश

हरियाणा के यमुनानगर के प्रताप नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गांव पड़ता है बहादुरपुर. 7 दिसंबर, 2025 की सुबह के करीब  9 बजे के आसपास इसी बहादुरपुर गांव के एक व्यक्ति ने प्रताप नगर थाने में फोन कर कहा, ”साहब, मेरे गांव के बाहर पौपुलर की एक नर्सरी है. एक महिला की डैडबौडी पड़ी है, जिस का न तो वहां पर सिर मौजूद है और न ही उस के शरीर पर कोई कपड़ा मौजूद है.’’

एसएचओ नरसिंह गुर्जर को जैसे ही सूचना मिली, वह फौरन अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पर पहले से ही काफी तादाद में लोग मौजूद थे. पुलिस भीड़ को हटा कर डैडबौडी के पास पहुंची. डैडबौडी को देखने के बाद खुद पुलिस भी एकदम से चौंक गई. पुलिस ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से मुआयना किया, लेकिन महिला का सिर बरामद नहीं हुआ.

पर सवाल यह था कि आखिरकार वह मरने वाली महिला कौन थी? घटनास्थल पर काफी सारे लोग मौजूद थे. उन सभी से पूछताछ की, पर कोई भी व्यक्ति उस डैडबौडी की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल पर कोई ऐसा डौक्यूमेंट्स और न ही कोई ऐसा पहचानपत्र मिला, जिस से उस मरने वाली महिला के बारे में कुछ पता चल सके. उस के शरीर पर भी कहीं कोई टैटू, नाम या अन्य कोई चिह्नï या गुदा नहीं था.

पुलिस ने डैडबौडी को अपने कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसएचओ नरसिंह गुर्जर ने तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. यमुनानगर के एसपी कुलदीप गोयल घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया. पुलिस ने अज्ञात अपराधियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद केस की जांचपड़ताल शुरू कर दी. 72 घंटे का समय बीत जाने के बावजूद मृतका की शिनाख्त नहीं हुई तो इस सिरविहीन धड़ का अंतिम संस्कार सेवा समिति के माध्यम से करा दिया गया.

एसपी कुलदीप गोयल ने केस का खुलासा करने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया. साथ ही सर्विलांस टीम, फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड सभी अपनीअपनी तरह से प्रयास करने में जुट गए, ताकि इस हत्याकांड का खुलासा हो सके. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर था और इस का पता चल पाना मुश्किल हो रहा था. एसपी कुलदीप गोयल ने एसआईटी के हैड डीएसपी रजत गुलिया को नियुक्त किया था. रजत गुलिया के नेतृत्व में पुलिस ने प्रयास करने शुरू कर दिए. 500 से ज्यादा  सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए. पुलिस द्वारा उन्हें बारबार देखा जा रहा था.

इस केस की जांचपड़ताल करते हुए 3 दिन का समय गुजर गया, लेकिन पुलिस के हाथ कोई सबूत नहीं मिला. 3 दिनों के बाद पुलिस फिर से उस घटनास्थल पर गई. जब आसपास के लोगों से पूछताछ की तो बहादुरपुर गांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने पुलिस से कहा कि साहब मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन ठीक एक दिन पहले 6 दिसंबर, 2025 को रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे इस रोड पर मैं ने एक कार को देखा था. मुझे उस कार का नंबर तो याद नहीं है, लेकिन उस कार के नंबर प्लेट पर यूपी का नंबर लिखा हुआ था.

निकाह से पहले अरेस्ट

पुलिस ने इसी को आधार बना कर जब इस केस की जांचपड़ताल करते हुए आगे जा कर जब रोड पर लगे हुए सीसीटीवी की फुटेज को चैक किया तो आखिरकार एक सीसीटीवी में वह कार जाते हुए दिखाई दी. उस का नंबर भी साफसाफ दिखाई दे गया. पुलिस गाड़ी के उस नंबर के माध्यम से उस के मालिक तक पहुंच गई. कार के मालिक से पता चला कि उस गाड़ी के ड्राइवर का नाम बिलाल है, जो मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नकुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत टिडोली गांव का रहने वाला है.

13 दिसंबर, 2025 को शाम के करीब 7 बजे के आसपास हरियाणा की पुलिस अपनी टीम के साथ बिलाल के घर पहुंच गई. उस दिन बिलाल की छोटी बहन की बारात आई हुई थी. कुछ बाराती चले गए थे. कुछ बाराती वहां मौजूद थे. उस वक्त बिलाल की बहन की विदाई का कार्यक्रम चल रहा था. बड़ी संख्या में पुलिस बल देख कर घर में अफरातफरी मच गई. पुलिस ने बिलाल के अब्बा फुरकान से संपर्क किया. उन से पूछा कि आज तुम्हारे यहां क्या फंक्शन है? उन्होंने बता दिया कि आज उन की बेटी की विदाई हो रही है.

पुलिस के कहने पर फुरकान ने अपने बेटे बिलाल को पुलिस के सामने पेश कर दिया.  पुलिस वालों ने जब उस से सवाल करने शुरू किए तो बिलाल सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था. सर्दी में भी उसे पसीना आने लगा. फुरकान समझ गया कि कुछ न कुछ उस के बेटे ने गड़बड़ की है. तभी बिलाल ने वहां से भागने की कोशिश की. उसे पता नहीं था कि चारों तरफ से वह पुलिस से घिरा हुआ है.

पुलिस ने बिलाल को गिरफ्तार कर लिया. तभी काफी संख्या में मौजूद रिश्तेदार पुलिस का विरोध करने लगे. सभी रिश्तेदार जानना चाहते थे कि बिलाल को पुलिस क्यों गिरफ्तार करने आई है. तब पुलिस ने उन्हें बता दिया कि इस ने एक महिला की हत्या की है. पुलिस उसे गिरफ्तार कर लौट आई. थाने में जब उस महिला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने उमा नाम की महिला की हत्या कर उस की सिरविहीन लाश हरियाणा के यमुना नगर क्षेत्र में डाल दी थी और उस का सिर हरियाणा हिमाचल प्रदेश के बौर्डर पर कलेसर जंगल में एक खाई में डाल दिया था.

पुलिस ने रविवार 14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की निशानदेही पर हरियाणा हिमाचल के बौर्डर पर कलेसर जंगल में स्थित लालढांग की खाई से उमा का सिर बरामद किया गया. हालांकि वहां छुरा बरामद नहीं हुआ. पुलिस ने अदालत में पेश कर के बिलाल को 4 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड अवधि पर उस ने पुलिस को उमा की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह हैरान करने वाली निकली—

हमदर्दी ने प्यार जगाया

बिलाल 4 भाईबहन हैं. वह पहले ट्रक और डंपर चलाता था. इन दिनों कार की ड्राइविंग कर रहा था. पेशेवर तरीके से कार की बुकिंग कर के यात्रियों को उन की बताई हुई मंजिल तक पहुंचाता था. रोज की तरह उस दिन भी वह एक फैक्ट्री में किसी सवारी को छोडऩे आया था. फैक्ट्री के गेट के बाहर एक महिला बेंच पर बैठी हुई थी. करीब 30 साल की, उस का चेहरा पीला था. आंखों में थकान और बेचैनी साफ झलक रही थी.

बिलाल का ध्यान उस पर चला गया. वह आदतन संवेदनशील था. उस ने पास जा कर उस से धीरे से पूछा, ”आप ठीक तो हैं? कुछ परेशान लग रही हैं.’’

महिला ने कमजोर सी मुसकान के साथ कहा, ”बुखार आ रहा है, सिर घूम रहा है. इसी फैक्ट्री में काम करती हूं. छुट्टी ले कर घर जा रही थी. चला नहीं गया, इसलिए अकेली बैठी हूं. अगर हो सके तो मुझे गंगोत्री कालोनी में घर तक छोड़ दीजिए.’’

घर पहुंचने पर बिलाल ने मैडिकल स्टोर से ला कर बुखार की दवा भी खिला दी. 2 घंटे में बुखार उतर गया तो बिलाल अपने घर चला गया. अगले कुछ दिनों में बिलाल हालचाल पूछने आने लगा. कभी दवा लाता, कभी फल. बातचीत का सिलसिला बढ़ा तो अहसासों की गरमाहट भी. दोनों ने अपनेअपने संघर्ष, अकेलापन और सपने साझा किए. उमा को बिलाल की सादगी और ईमानदारी भा गई और बिलाल को उमा की समझदारी और आत्मसम्मान.

एक दिन उमा ने बिलाल को अपनी जिंदगी की दुखभरी कहानी सुनाई. 13 साल पहले की बात है. मैं ने अपने पड़ोस के एक युवक जौनी के साथ भाग कर शादी की थी. मेरे एक बेटा भी है, जो अपने पापा के साथ रहता है. घर से बाहर 10 साल हम ने इधरउधर बिताए. उस के बाद हम लौट कर सहारनपुर आ गए. मेरे फेमिली वालों ने मुझ से संबंध खत्म कर दिए थे.

सहारनपुर आने पर मैं अपने पति के साथ  रमजानपुर में रहती थी. मैं काफी गुरबत में समय बिता रही थी. मोहल्ले के ही एक युवक से मेरा संपर्क हुआ. उस ने मुझे सहारनपुर में एक फैक्ट्री में नौकरी दिला दी. एक मोहल्ले के ही होने के कारण कभीकभी मैं उस के साथ चली जाती और कभीकभी वापसी में भी हम साथसाथ ही आ जाते. इस से पति मेरे ऊपर शक करने लगा. मैं ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पति जौनी के दिमाग से शक दूर नहीं हुआ.

इस बात को ले कर हम दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. दिलों में खटास पैदा हो गई. मैं ने गंगोत्री में किराए पर मकान लिया और पति से अलग इस किराए के मकान में अकेली रहने लगी. बात तलाक तक पहुंच गई. इस तरह हम दोनों के बीच संबंध विच्छेद हो गया. कुछ दिनों बाद युवक ने फैक्ट्री से काम छोड़ दिया. मेरा संपर्क उस से टूट गया. पति ने मेरी कभी कोई खबर नहीं ली. इस तरह मैं अकेली पड़ गई.

मैं एक दिन अपने पति के कमरे पर अपने बेटे से मिलने के इरादे से गई. पता चला कि वह मकान खाली कर के अपने गांव वापस चला गया है. उमा की आंखों में आंसू आ गए. दोनों एकदूसरे के करीब आए. उन के दिलों में एक नई गरमाहट जाग रही थी. धीरेधीरे मामला प्यार में बदल गया.

सहारनपुर की गलियों में एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी 2 अकेले दिलों के मिलन की. बिलाल और उमा अब साथ थे. वे लिवइन में रहने लगे. बिलाल अपने घर कोई न कोई बहाना बना कर उमा के साथ रातें बिताया करता था. घर का सारा खर्च बिलाल ही उठाता था.

परिजनों ने तोड़ा संबंध

बिलाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस से सवाल किया कि यह महिला कौन है और इस की हत्या क्यों की? बिलाल ने पुलिस को अपनी मोहब्बत की शुरुआत की सारी कहानी बता दी. सिर को भी पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. शेष धड़ का तो पहले ही पोस्टमार्टम हो चुका था. सिरविहीन धड़ लावारिस घोषित हो जाने के कारण सेवा समिति ने बगैर सिर के अज्ञात मान कर पश्चिम यमुना नहर के पास श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया था.

क्योंकि अब उमा की शिनाख्त हो गई थी. उस के परिवार का पता लग गया था, इसलिए पुलिस पोस्टमार्टम के बाद सिर को ले कर उमा के गांव हलालपुर पहुंची तो उस का भाई टिंकू मिला. टिंकू ने बताया कि साहब करीब 15 साल पहले उमा की शादी हो रही थी. हम लोगों को पता ही नहीं चला, जिस दिन उस की बारात आने वाली थी, उसी दिन मौका पाते ही वो जौनी के साथ घर से भाग गई थी. उसी रात हम ने फैसला ले लिया था कि हम अब उमा को कभी याद नहीं करेंगे. उमा से हमारा कोई वास्ता नहीं है. उमा से हमारा कोई रिश्तानाता नहीं है.

पुलिस वाले जब उस का सिर ले कर पहुंचे तो इंसानियत के नाते टिंकू ने पुलिस वालों और रिश्तेदारों के कहने पर सिर का अंतिम संस्कार कर दिया. गांव के लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि आखिरकार यह सब कैसे हो गया. फिर पुलिस उस के पति जौनी के पास गई. जौनी बोला कि मुझे पता चला है कि वह किसी बिलाल नाम के युवक के साथ रह रही थी. उस ने ही उस का कत्ल कर दिया है. जौनी ने कहा कि मुझे उस के मर्डर का दुख तो है, लेकिन मेरा उस से कोई वास्ता या सरोकार नहीं रहा. कानूनन मेरा उमा से तलाक हो चुका था.

बिलाल इस समय जेल में है. पुलिस का दावा है कि उस ने सारे सबूत एकत्र कर लिए हैं. आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. Love Crime

 

 

Crime News: Gen-Z इंजीनियर ने किए पेरेंट्स के टुकड़े

Crime News: बुजुर्ग मांबाप के सिर को लोहे के बट्टे से फोड़ा, आरी से दोनों की लाशों के टुकड़े किए, फिर उन्हें नदी में बहा दिया. सवाल यह है कि हैवानियत की सारी हदें पार करने वाले इकलौते इंजीनियर बेटे ने ऐसा क्यों किया? उस से भी बड़ा सवाल तो यह है कि आज के टूटतेबिखरते परिवार और बंटतेकटते समाज पर यह दोहरा हत्याकांड कितना भारी पड़ेगा, जिस ने मानवता के माथे पर कलंक लगा दिया है?

उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला इंजीनियर बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था. दशहरे से ठीक पहले वह अपने घर चला आया था, जबकि उस की पत्नीबच्चे कोलकाता में ही रह गए थे. बच्चों को साथ नहीं लाने पर उस के मम्मीपापा ने शिकायत भी की थी और उसे तीखे ताने भी मारे थे, ”गैर जातिधर्म वाली औरत क्या समझेगी घरपरिवार क्या होता है?’’

इस पर अंबेश तिलमिला गया था. चुप रहने के बजाय उस ने भी मम्मीपापा के तानों का जवाब ताने से ही दिया, ”आप लोग मेरी बीवी को बहू मानते ही नहीं हो तो वह कैसे यहां आएगी…’’

इस बात को ले कर अंबेश की अपने ही मम्मीपापा के साथ काफी समय तक नोकझोंक होती रही.   दिसंबर की 8 तारीख को सर्द भरी रात थी. जौनपुर के ग्रामीण इलाके में कोहरा घना होने लगा था. चारों तरफ शांति थी. हालांकि उसे भंग करने करने के लिए बीचबीच में कुत्तों के भौंकने या फिर पास के हाइवे से वाहनों के हार्न की आवाजें सुनाई दे जाती थी. अंबेश अपने कमरे में लेटा था. उसे नींद नहीं आ रही थी. रजाई में था. घर में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था, जो उस के कहने पर कुछ दिन पहले रोक दिया गया था. असल में उस ने एक तरह से घर में होने वाले निर्माण के काम को जबरन रुकवा दिया था.

अचानक वह बैड से उठा. हवाई चप्पलें पहनीं और बेसमेंट में चला गया. अंधेरे में टटोलते हुए बिजली का स्विच औन किया. एक नजर उस ने कमजोर रोशनी वाले बल्ब की ओर तो दूसरी नजर बेसमेंट के चारों तरफ घुमाई. सीमेंट की खुली बोरी का मुंह बंद कर दिया. इधरउधर बिखरी लोहे की छड़ें, तख्ते, लकडिय़ां, कुदाल, आरी, तसले, बाल्टी, कड़ाही आदि को सहेजने लगा. यह सब करते हुए उस की नजर लोहे के एक बट्टे पर पड़ी. जाने उसे क्या सूझी कि भारी बट्टे को वहां से उठा लाया और अपने कमरे में बैड के नीचे रख दिया.

बेसमेंट में खटपट की आवाज सुन कर अंबेश की मम्मी बबीता देवी की नींद खुल गई थी. वह सीधे बेटे के कमरे में चली आईं.

”क्या बात है अंबेश, नींद नहीं आ रही?’’

”नींद कैसे आएगी मम्मी, एक तरफ तुम्हारी बहू जिद कर रही है और दूसरी तरफ तुम और बाबूजी एक ही बात पर अड़े हो.’’

”तो हम क्या करें… हमें तो इसी परिवार और समाज में रहना है. तुम्हारे बाबूजी की गांव में इज्जत है. हमारे खानदान में आज तक किसी ने दूसरी बिरादरी में शादी नहीं की…तो फिर हम कैसे तुम्हारी पत्नी को बहू मान लें. उस से भी बड़ी बात ये कि वह दूसरे धर्म की है.’’

”दूसरे धर्म की है तो क्या हुआ मम्मी, अब जमाना बदल गया है. जातिधर्म के चलते क्या मैं अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ दूं?’’

”…तो हम उसे स्वीकार कर लें? हम से भी यह कभी नहीं होगा,’’ नाराज होती हुई अंबेश की मम्मी बोलीं.

”जो आप से हो सकता है, वह तो कर दो.’’ अंबेश ने भी नाराजगी के साथ तेज आवाज में कहा.

”क्या करूं मैं?’’ मम्मी बोली.

”मुझे पैसे दे दो, उस से मैं कोलकाता में अपने घर की मरम्मत करवाऊंगा.’’ अंबेश बोला.

”कहां से पैसे दूं…और किसलिए दूं, जब मैं उसे बहू ही नहीं मानती.’’ मां बोली.

”गांव की जमीन बेच दो, वो तो आज नहीं कल मेरी ही है.’’ अंबेश बोला.

”जमीन बेच दें और उस के बाद हम भीख मांगें!’’ मां बोली.

”मुझे पैसा निकालना अच्छे से आता है,’’ अंबेश गुस्से में आंखें लाल करता हुआ बोला.

”लगता है उस हरामजादी के चलते पागल हो गया है तू,’’ मां भी गुस्से में बोली और कमरे से बाहर जाने के लिए मुड़ी.

मांबाप की कर दी हत्या

पत्नी को मम्मी द्वारा दी गई गाली सुन कर अंबेश का चेहरा तमतमा गया. वह बैड के नीचे झुका और लोहे के बट्टे से मम्मी पर पीछे से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से मम्मी बबीता की चीख निकल गई और वह वहीं गिर पड़ीं. उन के सिर से खून बहने लगा था. अंबेश ने उन्हें उठाने के बजाय बट्टे से उन पर और 3-4 वार कर दिए. इस दौरान हुए शोरगुल को सुन कर दूसरे कमरे से उस के पापा श्याम बहादुर भी आ गए. उन्होंने वहां का दृश्य देखा तो सन्न रह गए. मानो उन्हें काठ मार गया हो. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.

अगले पल हाथ में पकड़े मोबाइल से वह कहीं कौल करने लगे. अंबेश अपने पापा को कौल करता देख घबरा गया. उन के हाथ से उस ने मोबाइल झपट लिया, जिस से श्याम बहादुर लडख़ड़ा गए और वापस अपने कमरे की ओर लौटने लगे. किंतु पलक झपकते ही अंबेश ने उन के गले में एक रस्सी फंसा कर खींच लिया और उन्हें वहीं गिरा दिया. उस वक्त उस के दिमाग में हिंसा की सनक सवार थी. वह आक्रामक बना हुआ था. उस ने तुरंत लोहे के खून सने बट्टे को उठाया और दनादन अपने पापा के सिर पर कई वार कर दिए.

श्याम बहादुर भी अपनी पत्नी की तरह कुछ पल में ही लहूलुहान जमीन पर धराशाई पड़े थे. उन्हें कुछ पल तक अंबेश निहारता रहा. उस के बाद बाथरूम में गया और खून से सने अपने हाथपैर धोए. अगले रोज अंबेश की बहन वंदना ने हर रोज की तरह अपनी मम्मी बबीता को कौल किया, लेकिन उन का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. उस के बाद वंदना ने अपने पापा के नंबर पर कौल की. वह भी नौट रिचेबल मिला. उसे चिंता तो हुई, लेकिन उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और अपने दैनिक घरेलू काम में लग गई.

बेटी ने शुरू की तलाश

दोपहर बाद उस ने फिर से मम्मी और पापा को कौल की. उस वक्त भी दोनों में से किसी से बात नहीं हो पाई. उस की चिंता बढ़ गई थी. उस ने न चाहते हुए भी भाई अंबेश को कौल कर दी. उसे अपने भाई की मम्मीपापा से आए दिन होने वाले झगड़े के बारे में मालूम था. इस कारण वह उस से कम ही बात करती थी. भाई का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. रेलवे से रिटायर होने के बाद श्याम बहादुर (65 वर्ष) अपनी पत्नी बबीता (63 वर्ष) के साथ अहमदपुर गांव के 3 मंजिला मकान में रहते थे. श्याम बहादुर की 3 बेटियां और एक बेटा था. बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था.

 

उस ने बीटैक की पढ़ाई की थी और पिछले 3 महीने से वह अकेला ही घर चला आया था. घर में मम्मीपापा और बेटा ही थे. उस की पत्नी मुसलिम समाज की है, जो कोलकाता की रहने वाली है. उसे ले कर अंबेश की अपनी मम्मी से हमेशा नोकझोंक हो जाती थी. मम्मी उसे किसी भी सूरत में बहू स्वीकारने को राजी नहीं थी. उस का नाम आते ही वह भद्दीभद्दी गालियां बकने लगती थीं. बेटे पर बहू को छोडऩे का दबाव बनाए हुए थीं. जबकि अंबेश उस के लिए मम्मीपापा से पैसे मांगता रहता था.

उस रात इसी बात को ले कर मम्मी के साथ ज्यादा बहस हो गई थी. इसे से पहले वह दिन में जमीन और पैसे के लिए पापा से भी उलझ पड़ा था. इस कारण अंबेश गुस्से से भरा हुआ था, जिस का अंजाम यह हुआ कि उस ने पैसे और जमीन के विवाद में अपने मम्मीपापा की नृशंस हत्या कर दी थी. उस के बाद वह फरार हो गया था. वंदना द्वारा मम्मीपापा को फोन मिलाते हुए पूरा दिन निकल गया था. वह जौनपुर में रहती थी. अगले रोज मायके जाने की सोच कर किसी तरह से रात गुजारी. गांव जाने से पहले उस की बात भाई अंबेश से हो गई.

उस से मालूम हुआ कि मम्मीपापा गुस्से में कहीं चले गए हैं. वह उन्हें तलाशने के लिए बनारस चला आया है. इस से वंदना को थोड़ी राहत मिली, लेकिन मम्मीपापा के कहीं गुम हो जाने की अलग चिंता सताने लगी. वह बेचैन हो गई. भाई से न तो मम्मीपापा की सही जानकारी मिल पा रही थी और न ही उन से फोन पर बात हो रही थी. भाई का फोन भी कभी स्विच्ड औफ मिलता तो कभी नौट रिचेबल आता. मम्मीपापा से तो बात किए हुए 4 दिन बीत गए थे. आखिरकार उस ने 13 दिसंबर, 2025 को जाफराबाद थाने जा कर मम्मीपापा और भाई की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी.

इस शिकायत पर जाफराबाद थाने की पुलिस पहले श्यामलाल के घर के पते पर गई. वहां कोई नहीं मिला. घर का मेन गेट बाहर से लौक था. पड़ोसियों से मालूम हुआ कि यह गेट तो 9 दिसंबर से ही बंद है.

पकड़ में आया अंबेश

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंधौरा थाना क्षेत्र की कटौना गांव निवासी वंदना द्वारा थाने में दर्ज करवाई गई शिकायत में अनहोनी की आशंका जाहिर की गई थी. जाफराबाद थाने की पुलिस ने पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए 3 टीमें गठित कीं, जिस के बाद जांच शुरू हुई. अंबेश समेत  श्याम बहादुर और बबीता के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया और उन के पिछले कौल की डिटेल्स निकलवाई गई. जल्द ही पुलिस को सफलता मिल गई और पुलिस ने 15 दिसंबर, 2025 को अंबेश को तलाश कर लिया. वह अपने घर के पास ही मिल गया.

लापता मम्मीपापा के बारे में पूछने पर उस ने सीधे तौर पर कुछ बताने से इनकार कर दिया. उस की बातों से पुलिस समझ गई कि वह अपने मम्मीपापा के बारे में बताने से बच रहा है. पुलिस को उस की बातें संदिग्ध लगीं. फिर उस से सख्ती से पूछताछ की गई. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया, जिस का किसी को अंदेशा नहीं था. जब उस ने कहा कि उस के मम्मीपापा अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन की उस ने हत्या कर दी है, तब पुलिस समेत फेमिली वाले भी सन्न रह गए. बहन वंदना की स्थिति विक्षिप्तावस्था की हो गई. वह अपने पेरेंट्स की बड़ी बेटी थी और अंबेश दूसरे नंबर का.

पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने मम्मीपापा की हत्या की बात स्वीकार की. हत्या का कारण बताया कि 8 दिसंबर, 2025 की रात करीब 8 बजे पैसों के लिए उस का पेरेंट्स से झगड़ा हुआ था. वह आपा खो बैठा और उन पर बट्टे से हमला कर दिया. उन के शवों को ठिकाने लगाने के बारे में उस ने आगे जो बताया, उस से उस की हैवानियत का पता चला. उस ने अपने पेरेंट्स की न केवल नृशंस हत्या कर डाली थी, बल्कि उन के शवों को ठिकाने लगाने के लिए उन को कई टुकड़ों में काट डाला था.

दोनों शवों के कटे टुकड़ों को बेसमेंट में रखे सीमेंट के बोरे में भर दिया था. यह सब करने में उसे कोई रुकावट नहीं आई, क्योंकि उस वक्त घर में वह अकेला था. फिर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए बोरे को कार में रखा. यह वही कार थी, जो उस के पेरेंट्स ने उसे खरीद कर दी थी. कार अपने घर से 8 किलोमीटर दूर गोमती नदी के बेलाव घाट ले कर गया था. वहां उस ने लाश के सभी बोरे नदी में फेंक दिए थे. किसी को शक न हो, इसलिए वह घर वापस आ गया था.

इस के बाद खुद को बचाने के लिए अगले दिन 9 दिसंबर को पेरेंट्स को खोजने का नाटक करने लगा. उस ने उन के लापता होने की खबर अपने परिचितों, रिश्तेदारों को भी दी. खोजबीन में जुटा अंबेश 12 दिसंबर को खुद लापता हो गया. इधरउधर घूमतेघूमते वह वाराणसी चला गया, जहां उस ने गंगा स्नान किया और कुछ समय घाट पर गुजारने के बाद घर चला आया. इस बीच खोजबीन में जुटी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस के सवालों में वह इस कदर उलझ गया कि पेरेंट्स की हत्या की पूरी कहानी बता दी.

मृतक श्याम बहादुर रेलवे में लोको पायलट थे. वह मूलरूप से थाना गद्दी के खरसेनपुर गांव के रहने वाले थे, लेकिन वह अपनी ससुराल में आ कर बस गए थे. वह रामनारायण के 3 दामादों में से एक थे. अंबेश के बयान के बाद पुलिस शवों की गोमती नदी में तलाश करवाने में जुट गई थी. इस के लिए 15 गोताखोर लगाए गए. इस खुलासे के बाद पुलिस ने हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली. मुख्य और एकमात्र आरोपी अंबेश कुमार की निशानदेही पर शवों की बरामदगी का प्रयास किया गया. उस ने अपने बारे में बताया कि उस ने 5 साल पहले कोलकाता की एक महिला से कोविड काल के दौरान प्रेम विवाह किया था, जो वहीं पर ब्यूटीपार्लर चलाती थी.

इकलौते बेटे के इस तरह लव मैरिज करने से उस के मम्मीपापा दुखी रहते थे. यह भी बताया जाता है कि पेरेंट्स का अपनी तीनों बेटियों के प्रति झुकाव अधिक रहता था. इसी वजह से अंंबेश का उन से कई बार विवाद हो चुका था. गांव के लोग दबी जुबान से यह भी कहते पाए गए कि अंबेश अपनी पत्नी के साथ ही पिता के रुपए ले कर शिफ्ट होना चाहता था.

वह 4 भाईबहनों में दूसरे नंबर पर था. सभी बहनों की शादी हो चुकी है. ननिहाल में अंबेश कुमार की अच्छी जिंदगी गुजरती थी. उस ने पिता के पैसों से एक कार भी खरीदी थी.  कार से चलने का शौकीन था. पुलिस के मुताबिक इसी कार में रख कर उस ने अपने पेरेंट्स के शव को ठिकाने लगाया था. अंबेश के अनुसार वह पत्नी द्वारा पैसे की मांग और मम्मीपापा द्वारा दूसरे धर्म की पत्नी को स्वीकार न किए जाने से मानसिक तनाव में था. पैसे के लिए ही बीते 3 माह से घर आया हुआ था. पैसों को ले कर घर पर बात की. पेरेंट्स ने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया. इसी बात से 8 दिसंबर की रात वह उग्र हो गया. उग्र हो कर उस ने लोहे के बट्टे से दोनों के सिर पर हमला कर डाला.

घर में कंस्ट्रक्शन के काम के लिए बेसमेंट में आरी और अन्य औजार रखे हुए थे. आरी से दोनों शवों को 3-3 टुकड़ों में काट दिया. फिर उन टुकड़ों को 6 सीमेंट की बोरियों में भरा. इस के बाद उस ने अपने पेरेंट्स के ही कपड़ों से ही फर्श को साफ किया.

कथा लिखे जाने तक अंबेश कुमार न्यायिक हिरासत में था और बरामद शव के टुकड़ों से उस की डीएनए जांच की तैयारी की जा रही थी. Crime News

 

 

Love Crime: छलिया आशिक को कैसे पहचानें

Love Crime: 4 बच्चों की मां बनने के बावजूद 52 वर्षीय रानी सोमवंशी की हसरतें जवान थीं. वह बनसंवर कर रहती और इंस्टाग्राम पर अपने फोटो शेयर करती. यहीं पर 25 वर्षीय अरुण सिंह राजपूत उसे दिल दे बैठा. बाद में दोनों होटलों में भी मिलने लगे. शादीशुदा होते हुए भी रानी अरुण से शादी करने का ख्वाब संजोने लगी, लेकिन अरुण ऐसा छलिया आशिक निकला कि…

रानी सोमवंशी की धमकी से अरुण डर गया. उस की रातों की नींद व दिन का चैन छिन गया. आखिर उस ने रानी को खत्म करने का निश्चय कर लिया. उस ने रानी को विश्वास में ले कर उस की हत्या का तानाबाना बुन लिया. 8 अगस्त, 2025 को रानी सोमवंशी ने फोन पर अरुण से बात की और उसे धमकाया कि जल्द शादी करो या फिर पैसे वापस करो. इस पर अरुण ने उस से कहा कि वह उस से प्यार करता है और शादी को तैयार है. तुम 10 अगस्त को मैनपुरी आ जाओ और भांवत चौराहे पर मिलो. उस के बाद हम शादी करने का प्लान बनाएंगे.

रानी 9 अगस्त को अपनी ससुराल के गांव जिठौली से फर्रुखाबाद जिले के गांव खेड़ा में रहने वाली अपनी बहन के यहां आई थी. प्रेमी अरुण से बात होने के बाद वह 10 अगस्त को ही ससुराल जाने की बात कह कर वह मैनपुरी चली आई. प्रेमी की इस बात पर रानी खुश हो गई और 10 अगस्त, 2025 की दोपहर साढ़े 12 बजे वह मैनपुरी के भांवत चौराहे पहुंच गई. वहां अरुण पहले से ही रानी का इंतजार कर रहा था. रानी को देख कर वह मुसकरा उठा. रानी ने भी मुसकान बिखेरी. इस के बाद दोनों ने साथ बैठ कर एक रेस्टोरेंट में चायनाश्ता किया. फिर दोनों खरपरी बंबा के पास पहुंचे और सुनसान स्थान देख कर पेड़ के नीचे बैठ कर बतियाने लगे.

बातचीत के दौरान रानी ने शादी की जिद की और दिनतारीख बताने को कहा. यह सुनते ही अरुण को गुस्सा आ गया. उस ने रानी की चुन्नी को उसी के गले में लपेटा और गला कसने लगा. चुन्नी को वह तब तक कसता रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. रानी सोमवंशी की हत्या के बाद अरुण ने रानी के शव को झाडिय़ों में छिपा दिया. रानी के मोबाइल फोन का सिम निकाल क र तोड़ दिया और बंबा में फेंक दिया. मोबाइल कूच कर झाडिय़ों में छिपा दिया. चुनरी को पत्तों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद वह फरार हो गया.

इधर रानी जब देर शाम तक घर नहीं पहुंची तो उस के पति राजपाल को चिंता हुई. उस ने रानी को कौल लगाई, लेकिन उस का फोन बंद था. वह रात भर चहलकदमी करता रहा. सुबह उस ने कुछ लोगों को रानी के लापता होने की जानकारी दी. उस के बाद वह कई दिनों तक पत्नी की खोज में भटकता रहा. जब कुछ पता नहीं चला, तब उस ने जिठौली थाने में पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. 11 अगस्त, 2025 की सुबह मैनपुरी कोतवाली के गांव खरपरी के कुछ किसान अपने खेतों की ओर गए तो उन्होंने बंबा के पास झाडिय़ों के बीच एक महिला की लाश देखी. लाश देख कर उन के होश उड़ गए. खबर गांव तक पहुंची तो वहां भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ग्रामीण ने इस लाश की सूचना थाना मैनपुरी कोतवाली को दे दी.

सूचना मिलते ही एसएसआई राजेंद्र सिंह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ खरपरी बंबा के पास पहुंच गए, जहां झाडिय़ों के बीच महिला की लाश पड़ी थी. उस समय वहां लोगों की भीड़ थी. चूंकि मामला एक महिला की हत्या का था, अत: एसएसआई राजेंद्र सिंह ने सूचना पुलिस अधिकारियों को दी. कुछ देर बाद ही एसपी (सिटी) अरुण कुमार तथा डीएसपी संतोष कुमार सिंह घटनास्थल आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक व डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण शुरू किया. मृतक महिला की उम्र 50-52 वर्ष थी. वह लाल रंग का कुरता व पीले रंग की सलवार पहने थी. गले में पर्स लटका था. हाथ के पास रुमाल पड़ा था और हाथ में लाल रंग का धागा बंधा था.

मृतका के शरीर पर चोट आदि के निशान नहीं थे. देखने से ऐसा लग रहा था कि महिला की हत्या गला घोंट कर की गई थी. शरीर पर कोई आभूषण भी नहीं था. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता महिला के शव को सूंघ कर झाडिय़ों के इर्दगिर्द घूमता रहा, फिर भौकता हुआ बंबा की पटरी पर आया. वह नगला गहियर जाने वाले मार्ग पर कुछ दूर तक गया, उस के बाद वापस आ गया. फोरैंसिक टीम ने भी जांच की, कुछ फोटो खींचे और सबूत जुटाए. अब तक महिला के शव को सैकड़ों लोग देख चुके थे, लेकिन कोई भी शव को पहचान नहीं पाया था. इस से स्पष्ट था कि महिला पासपड़ोस के गांव की नहीं थी. दूरदराज से बुला कर उस की यहां हत्या की गई थी. हत्या किसी खास परिचित ने ही की थी.

जब शव की पहचान नहीं हो पाई, तब पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल मैनपुरी भिजवा दिया. लेकिन 72 घंटे बीत जाने के बाद भी जब शव की पहचान नहीं हुई, तब नियम के मुताबिक पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने अज्ञात में महिला के शव का दाह संस्कार कर दिया. एसपी अरुण कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर को बड़ी ही गंभीरता से लिया. उन्होंने महिला की शिनाख्त व हत्याकांड के खुलासे के लिए 2 टीमें गठित कीं. साथ ही हत्यारों की धरपकड़ के लिए एक पुलिस टीम डीएसपी संतोष कुमार सिंह की देखरेख में गठित की और दूसरी स्वाट प्रभारी जितेंद्र चंदेल के नेतृत्व में बनाई गई.

पुलिस टीमों ने महिला की खोज मैनपुरी के अलावा पड़ोसी जिला फर्रुखाबाद व इटावा में शुरू की. इन जिलों के थानों में महिला की हुलिया सहित फोटो चस्पा कराई गईं. गुमशुदा अधेड़ महिलाओं की सूचना भेजने को कहा गया. डीएसपी संतोष कुमार सिंह ने सुरागसी के लिए अपनी विशेष टीम तथा मुखबिरों को भी लगा दिया. धीरेधीरे 10 दिन बीत गए, लेकिन पुलिस की टीमें महिला के शव की पहचान न कर पाई. मुखबिरों ने भी पसीना बहाया, लेकिन वह भी नाकाम रहे. अखबारों में ब्लाइंड मर्डर की खबरें सुर्खियों में छप रही थीं, साथ ही पुलिस की नाकामी पर भी सवाल उठाए जा रहे थे. खबरों से पुलिस अधिकारी चिंतित थे.

23 अगस्त, 2025 को मैनपुरी कोतवाली के एसएसआई राजेंद्र सिंह को फर्रुखाबाद जिले के थाना राजेपुर से सूचना मिली कि उन के यहां रानी सोमवंशी नाम की महिला की गुमशुदगी दर्ज है. गुमशुदगी उस के पति राजपाल सिंह ने दर्ज कराई थी, जो जिठौली गांव का रहने वाला है. रानी 4 बच्चों की मां है. उस की उम्र 52 वर्ष है. इस सूचना पर पुलिस टीम गांव जिठौली पहुंची और राजपाल सिंह सोमवंशी को महिला की पहचान हेतु मैनपुरी कोतवाली ले आई. एसएसआई ने महिला के शव की फोटो राजपाल सिंह को दिखाई तो वह फफक पड़ा और बोला, ”साहबजी, यह फोटो उस की पत्नी रानी की है. वह 10 अगस्त की सुबह 9 बजे दवा लाने के लिए घर से निकली थी, उस के बाद घर वापस नहीं आई. तब से वह उस की खोज में जुटा था.’’

”क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी पत्नी की हत्या किस ने की है?’’ एसएसआई राजेंद्र सिंह ने पूछा.

”नहीं साहब, मुझे पता नहीं कि रानी की हत्या किस ने और क्यों की है?’’ राजपाल ने जवाब दिया.

”गांव में तुम्हारी किसी से दुश्मनी या लेनदेन का झगड़ा तो नहीं था?’’

”साहब, मैं उम्रदराज सीधासादा किसान हूं. हमारा न तो किसी से झगड़ा है और न ही लेनदेन.’’

”कोई खास या बाहरी व्यक्ति घर में आता था, जिस से रानी का लगाव रहा हो.’’

”ऐसा कोई व्यक्ति घर में नहीं आता था, जिस से रानी का लगाव हो.’’

”रानी के पास मोबाइल फोन था?’’ राजेंद्र सिंह ने पूछा.

”हां साहब, था, लेकिन उस का फोन बंद है. मैं ने कई बार बात करने की कोशिश की थी.’’

राजपाल सोमवंशी से पूछताछ के बाद एसएसआई ने उस से मृतका रानी का मोबाइल फोन नंबर लिया और फिर उस नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि रानी एक खास नंबर पर अकसर बातें करती थी. आखिरी कौल उसी नंबर से उस के मोबाइल पर आई थी. रानी सोमवंशी के मोबाइल पर जो आखिरी कौल आई थी, पुलिस ने उस नंबर को ट्रेस किया तो पता चला कि वह नंबर जनपद मैनपुरी के थाना एलाऊ के किशोरपुर गांव निवासी अरुण सिंह राजपूत के नाम दर्ज है.

यह पता चलते ही पुलिस टीम ने किशोरपुर गांव निवासी अरुण के घर छापा मारा, लेकिन वह घर पर नहीं था. अरुण के पापा मुन्ना राजपूत ने बताया कि अरुण गुरुग्राम (हरियाणा) में रहता है. वह टैंकर चलाता है. इस के बाद पुलिस टीम सर्विलांस की मदद से गुरुग्राम पहुंची और पहली सितंबर 2025 की रात अरुण को गिरफ्तार कर लिया. अरुण को थाना मैनपुरी कोतवाली लाया गया. थाने में अरुण राजपूत से रानी सोमवंशी की हत्या के बारे में पूछा गया तो वह पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करने लगा, लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया.

यही नहीं, पुलिस ने अरुण की निशानदेही पर मृतका रानी का टूटा हुआ मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया, जिस का सिम तोड़ कर अरुण ने बंबा में फेंक दिया था और टूटा हुआ मोबाइल झाडिय़ों में डाल दिया था. पुलिस ने वह चुनरी भी बरामद कर ली, जिस से अरुण ने रानी का गला घोंटा था. चुनरी उस ने पेड़ के पत्तों में छिपा कर ईंट से दबा दी थी. एसएसआई राजेंद्र सिंह ने ब्लाइंड मर्डर का खुलासा करने तथा कातिल को गिरफ्तार करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसपी (सिटी) अरुण कुमार व डीएसपी संतोष कुमार सिंह ने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता कर रानी मर्डर केस का खुलासा कर दिया.

चूंकि अरुण कुमार राजपूत ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और हत्या में प्रयुक्त चुनरी भी बरामद करा दी थी, अत: बीएनएस की धारा 103(1), 228(4) के तहत अरुण राजपूत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में प्यार में छल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद जिला कई मायनों में अपनी पहचान बनाए हुए है. यहां पर बीड़ी और तंबाकू का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है. आलू का उत्पादन भी भारी मात्रा में होता है. यहां की नमकीन पूरे उत्तर प्रदेश में मशहूर है. इसी फर्रुखाबाद जिले के राजेपुर थाना अंतर्गत एक गांव है जिठौली. राजपाल सिंह सोमवंशी इसी गांव का निवासी था. उस की पत्नी का नाम रानी सोमवंशी था. उस के 4 बच्चों में 2 बेटे व 2 बेटियां थीं. राजपाल सिंह किसान था. उस के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में आलू, मूंगफली, मक्का और गेहंू की अच्छी उपज होती थी.

राजपाल व रानी अपने बच्चों से बेहद प्यार करते थे. बेटेबेटी में वह भेद भी नहीं करते थे. दोनों उन की हर जिद पूरी करते थे. पढ़ाईलिखाई का भी खूब खयाल रखते थे. उन के दोनों बेटे पढ़लिख कर टीचर बनना चाहते थे, जबकि बेटियां डाक्टर बनना चाहती थीं. राजपाल सीधासादा और कम पढ़ालिखा था. उस के रहनसहन और बोलचाल की भाषा भी साधारण थी. इस के विपरीत उस की पत्नी रानी पढ़ीलिखी थी. वह तेजतर्रार थी. सजसंवर कर रहती थी. जैसा उस का नाम था, वैसे ही वह रानी बन कर घर में रहती थी. राजपाल जो कमाता था, वह सब रानी के हाथ पर रख देता था. घर में उस की हैसियत कोल्हू के बैल की तरह थी. घर चलाने की जिम्मेदारी रानी की थी. बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, खेत में बीजखाद का खर्चा, मजदूरों का खर्चा, सब रानी की जिम्मेदारी थी. राजपाल को तो बीड़ीतंबाकू का ही पैसा मिलता था.

राजपाल का पत्नी रानी पर कोई कंट्रोल नहीं था. वह उस की किसी बात का विरोध नहीं कर पाता था. रानी स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह सामान खरीदने बाजारहाट भी जाती थी. घमंडी भी थी. इसी कारण अड़ोसपड़ोस के घरों से उस की दूरी बनी रहती थी. पड़ोस की महिलाएं उस से कम ही बातें करती थीं. समय बीतता रहा. समय के साथसाथ राजपाल उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गया, जहां सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं. वह सारा दिन फसल की रखवाली में व्यतीत करता और रात को खाना खा कर चारपाई पर पसर जाता. दूसरी तरफ रानी सोमवंशी जो 4 बच्चों की मां थी, वह अब भी अपने को जवान समझती थी और खूब सजसंवर कर रहती थी. उसे घर में सब सुख था, लेकिन पति सुख से वंचित रहती थी.

उस के मन में प्रबल इच्छा होती कि कोई उस की जिंदगी में आए और उस के अरमानों की अलख जगाए. कभीकभी तो वह सोचती कि वह दूसरा विवाह कर ले. पर किस से? यह सोच कर दुखी हो जाती. रानी खाली समय मोबाइल फोन पर व्यतीत करती थी. उसे इंस्टाग्राम चलाने का शौक था. इंस्टाग्राम पर वह अपने एडिट किए हुए फोटो लगाती थी, ताकि वह कम उम्र की और खूबसूरत दिखे. वह चाहती थी कि कोई युवक उस की फोटो देख कर उसे पसंद करे और फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजे. रानी को यकीन था कि एक न एक दिन उस की तमन्ना जरूर पूरी होगी. वह इंतजार में दिन गुजारती रही.

एक रोज अरुण राजपूत ने इंस्टाग्राम पर रानी सोमवंशी की फोटो देखी तो वह उसे पसंद आ गई. उसे लगा कि यही उस के सपनों की रानी है. अत: उस ने फालो कर उसे फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेज दी. रानी ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों की इंस्टाग्राम के जरिए दोस्ती हो गई और उन के बीच चैटिंग होने लगी. अरुण राजपूत उत्तर प्रदेश के ही मैनपुरी जिले के थाना एलाऊ के गांव किशोरपुर का रहने वाला था. उस के पिता मुन्ना राजपूत किसान थे. 3 भाईबहनों में अरुण सब से छोटा था. उस का मन न पढ़ाई में लगा और न किसानी में. अत: उस ने ड्राइवरी सीख ली और ड्राइवर बन गया. कुछ समय बाद वह गांव छोड़ कर गुडग़ांव (हरियाणा) चला गया और वहां टैंकर चलाने लगा.

अरुण राजपूत और रानी सोमवंशी की दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. दोनों एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे. इंस्टाग्राम पर दोनों हर रोज चैटिंग करते थे. रानी अपनी उम्र छिपाने के लिए फिल्टर ऐप का प्रयोग कर अरुण से बात करती थी. लगभग एक साल तक दोनों के बीच चैटिंग चलती रही. फिर चैटिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर शेयर कर लिए. अब इंस्टाग्राम पर चैटिंग के साथसाथ मोबाइल फोन पर भी उन की रसभरी बातें होने लगीं. रानी देर रात अरुण को कौल करती थी.

समय बीतते दोनों का प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच एकदूसरे से रूबरू होने की तमन्ना जागी. एक रोज अरुण ने फोन पर बातचीत के दौरान रानी से कहा कि वह उस से मिलना चाहता है और आमनेसामने बैठ कर बात करना चाहता है. इस पर रानी ने जवाब दिया कि वह स्वयं भी उत्सुुक है. जब चाहो, तब आ जाओ. अरुण रानी से मिलने को उतावला था, अत: तीसरे रोज ही वह मैनपुरी से फर्रुखाबाद आ गया. उस के बाद उस ने रानी से फोन पर बात की और बताया कि वह फर्रुखाबाद आ गया है और यात्री होटल में ठहरा है. तुम कल मिलने आ जाना. मैं तुम्हारा बेसब्री से इंतजार करूंगा. जवाब में रानी ने कहा कि वह कल सुबह 10 बजे तक होटल पहुंच जाएगी. नाश्ता व लंच साथसाथ करेंगे.

वादे के तहत रानी सुबह 9 बजे ही फर्रुखाबाद स्थित यात्री होटल पहुंच गई. होटल रूम में जब पहली बार अरुण ने रानी को देखा तो वह ठगा सा रह गया. इंस्टाग्राम पर जिस रानी की फोटो को उस ने देखा था, सामने बैठी रानी वैसी नहीं थी. वह उस की उम्र से दोगुनी दिख रही थी. हालांकि रानी ने मेकअप कर उम्र छिपाने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन चेहरे की झुर्रियां उस की उम्र की चुगली कर रही थीं.

अरुण समझ गया कि रानी ने प्यार में उस के साथ छल किया है. इंस्टाग्राम पर एडिट फोटो लगा कर उस ने उसे छला है. उस के मन में रानी के प्रति नफरत भर गई, लेकिन उस ने अपनी नफरत को दबाए रखा और रानी से प्यार भरी बातें करता रहा. उस ने रानी को आभास नहीं होने दिया कि उस के मन में नफरत का कितना बड़ा तूफान उठ रहा है. अरुण जहां रानी को देख कर मायूस हुआ, वहीं रानी 25 वर्षीय युवक अरुण को देख कर गदगद हो उठी थी. वह सोचने लगी कि अरुण जैसे गबरू जवान से शादी कर वह अपने सारे अरमान पूरे कर लेगी. उस के नीरस जीवन में एक बार फिर बहार आ जाएगी.

उस रोज रानी ने अरुण से खूब बातें कीं, फिर उस के साथ शारीरिक भूख मिटाई. चंद घंटे होटल में रुकने के बाद रानी वापस घर आ गई. उस दिन वह बेहद खुश थी. रात में भी वह अरुण के बारे में सोचती रही और उस के साथ बिताए खुशी के पलों को याद करती रही. इधर अरुण घर आया तो उसे लगा कि जैसे उस का सब कुछ लुट गया है. रानी जैसी अधेड़ उम्र की महिला से वह शादी कभी नहीं कर सकता. रानी ने प्यार में उस के साथ छल किया था. अत: उस ने भी उस के साथ छल करने का निश्चय किया. प्यार के बदले वह उस से पैसा वसूल करेगा. इंकार किया तो दूरियां बना लेगा.

इस के बाद अरुण जब दोबारा होटल में रानी से मिला तो उस ने रानी से दिखावे के रूप में खूब प्यारभरी बातें कीं. शारीरिक संबंध भी बनाए, फिर जरूरत बता कर रानी से पैसे मांगे. शादी के लालच में रानी ने उसे पैसे दे दिए. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. जब भी अरुण आता, होटल रूम मेें रानी से संबंध बनाता और फिर पैसा मांगता. इस तरह रानी से वह लगभग 2 लाख रुपए ले चुका था. इधर कुछ दिनों से रानी अरुण पर शादी करने का दबाव बनाने लगी थी, लेकिन अरुण कोई न कोई बहाना बना कर टाल देता था.

रानी को उस पर शक हुआ तो उस ने अरुण को धमकाना शुरू कर दिया कि वह या तो उस से शादी करे या फिर पैसे वापस करे, अन्यथा वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा कर उसे परिवार सहित जेल भिजवा देगी. रानी सोमवंशी की धमकी से अरुण राजपूत डर गया और बोला, ”रानी, यह तुम क्या कह रही हो? तुम जैसा कहोगी, वैसा ही मैं करूंगा. थोड़ा समय दो. मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

”तब ठीक है, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. वैसे भी मैं तुम से मजाक कर रही थी.’’ रानी बोली.

अरुण ने घबरा कर रानी से कह तो दिया कि वह उस से शादी रचा लेगा, लेकिन वह ऐसा कर नहीं सकता था, क्योंकि रानी अधेड़ उम्र की थी. भला वह उस से शादी कैसे कर लेता. उस के पेरेंट्स भी रानी को बहू के रूप में स्वीकार नहीं करते. इज्जत उछलती सो अलग से.

इस तरह रानी की शादी की जिद, रुपया वापस करने की मांग तथा जेल भिजवाने की धमकी से अरुण बेचैन हो उठा. आखिर इस समस्या से निपटने के लिए अरुण ने रानी की हत्या की योजना बनाई. उस ने इस की भनक किसी के कानों में नहीं पडऩे दी. आरोपी अरुण सिंह राजपूत से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 3 सितंबर, 2025 को मैनपुरी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Love Crime