ये कैसा बदला : सुनीता ने क्यों की एक मासूम की हत्या?

चीचली गांव कहने भर को ही भोपाल का हिस्सा है, नहीं तो बैरागढ़ और कोलार इलाके से लगे इस गांव में अब गिनेचुने घर ही बचे हैं. बढ़ते शहरीकरण के चलते चीचली में भी जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं. इसलिए अधिकतर ऊंची जाति वाले लोग यहां की अपनी जमीनें बिल्डर्स को बेच कर कोलार या भोपाल के दूसरे इलाकों में शिफ्ट हो गए हैं.

इन गिनेचुने घरों में से एक घर है विपिन मीणा का. पेशे से इलैक्ट्रिशियन विपिन की कमाई भले ही ज्यादा न थी, लेकिन घर को घर बनाने में जिस संतोष की जरूरत होती है वह जरूर उस के यहां था. विपिन के घर में बूढ़े पिता नारायण मीणा के अलावा मां और पत्नी तृप्ति थी. लेकिन घर में रौनक साढ़े 3 साल के मासूम वरुण से रहती थी. नारायण मीणा वन विभाग से नाकेदार के पद से रिटायर हुए थे और अपनी छोटीमोटी खेती का काम देखते हैं.

इस खुशहाल घर को 14 जुलाई, 2019 को जो नजर लगी, उस से न केवल विपिन के घर में बल्कि पूरे गांव में मातम सा पसर गया. उस दिन शाम को विपिन जब रोजाना की तरह अपने काम से लौटा तो घर पर उस का बेटा वरुण नहीं मिला. उस समय यह कोई खास चिंता वाली बात नहीं थी क्योंकि वरुण घर के बाहर गांव के बच्चों के साथ खेला करता था. कभीकभी बच्चों के खेल तभी खत्म होते थे, जब अंधेरा छाने लगता था.

थोड़ी देर इंतजार के बाद भी वरुण नहीं लौटा तो विपिन ने तृप्ति से उस के बारे में पूछा. जवाब वही मिला जो अकसर ऐसे मौकों पर मिलता है कि खेल रहा होगा यहीं कहीं बाहर, आ जाएगा.

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वरुण 

विपिन वरुण को ढूंढने अभी निकला ही था कि घर के बाहर उस के पिता मिल गए. उन से पूछने पर पता चला कि कुछ देर पहले वरुण चौकलेट खाने की जिद कर रहा था तो उन्होंने उसे 10 रुपए दिए थे.

चूंकि शाम गहराती जा रही थी और विपिन घर के बाहर ही गया था, इसलिए उस ने सोचा कि दुकान नजदीक ही है तो क्यों न वरुण को वहीं जा कर देख लिया जाए. लेकिन वह उस वक्त चौंका जब वरुण के बारे में पूछने पर जवाब मिला कि वह तो आज उस की दुकान पर आया ही नहीं.

घबराए विपिन ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो उसे कोई बच्चा खेलता नजर नहीं आया, जिस से वह बेटे के बारे में पूछता. एक बार घर जा कर और देख लिया जाए, शायद वरुण आ गया हो. यह सोच कर वह घर की तरफ चल पड़ा.

घर आने पर भी विपिन को निराशा ही हाथ लगी क्योंकि वरुण अभी भी घर नहीं आया था. लिहाजा अब पूरा घर परेशान हो उठा. उसे ढूंढने के लिए विपिन ने गांव का चक्कर लगाया तो जल्द ही उस के लापता होने की बात भी फैल गई और गांव वाले भी उसे ढूंढने में लग गए.

रात 10 बजे तक सभी वरुण को हर उस मुमकिन जगह पर ढूंढ चुके थे, जहां उस के होने की संभावना थी. जब वह कहीं नहीं मिला और न ही कोई उस के बारे में कुछ बता पाया तो विपिन सहित पूरा घर किसी अनहोनी की आशंका से घबरा उठा.

वरुण की गुमशुदगी को ले कर तरह तरह की हो रही बातों के बीच गांव वालों ने एक क्रेटा कार का जिक्र किया, जो शाम के समय गांव में देखी गई थी. लेकिन उस का नंबर किसी ने नोट नहीं किया था.

हालांकि चीचली गांव में बड़ीबड़ी कारों का आना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि अकसर प्रौपर्टी ब्रोकर्स ग्राहकों को जमीन दिखाने यहां लाते हैं. लेकिन उस दिन वरुण गायब हुआ था, इसलिए क्रेटा कार लोगों के मन में शक पैदा कर रही थी.

थकहार कर कुछ गांव वालों के साथ विपिन ने कोलार थाने जा कर टीआई अनिल बाजपेयी को बेटे के गुम होने की जानकारी दे दी. उन्होंने वरुण की गुमशुदगी दर्ज कर तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को इस घटना से अवगत भी करा दिया.

टीआई पुलिस टीम के साथ कुछ ही देर में चीचली गांव पहुंच गए. गांव वालों से पूछताछ करने पर पुलिस का पहला और आखिरी शक उसी क्रेटा कार पर जा रहा था, जिस के बारे में गांव वालों ने बताया था.

पूछताछ में यह बात उजागर हो गई थी कि मीणा परिवार की किसी से कोई रंजिश नहीं थी जो कोई बदला लेने के लिए बच्चे को अगवा करता और इतना पैसा भी उन के पास नहीं था कि फिरौती की मंशा से कोई वरुण को उठाता.

तो फिर वरुण कहां गया. उसे जमीन निगल गई या फिर आसमान खा गया, यह सवाल हर किसी की जुबान पर था. क्रेटा कार पर पुलिस का शक इसलिए भी गहरा गया था क्योंकि कोलार के बाद केरवा चैकिंग पौइंट पर कार में बैठे युवकों ने खुद को पुलिस वाला बता कर बैरियर खुलवा लिया था और दूसरा बैरियर तोड़ कर वे कार को जंगलों की तरफ ले गए थे.

चीचली और कोलार इलाके में मीणा समुदाय के लोगों की भरमार है, इसलिए लोग रात भर वरुण को ढूंढते रहे. 15 जुलाई की सुबह तक वरुण कहीं नहीं मिला और लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई तो लोगों का गुस्सा भड़कने लगा.

यह जानकारी डीआईजी इरशाद वली को मिली तो वह खुद चीचली पहुंच गए. उन्होंने वरुण को ढूंढने के लिए एक टीम गठित कर दी, जिस की कमान एसपी संपत उपाध्याय को सौंपी गई. दूसरी तरफ एसडीपीओ अनिल त्रिपाठी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम जंगलों में जा कर वरुण को खोजने लगी.

पुलिस टीम ने 15 जुलाई को जंगलों का चप्पाचप्पा छान मारा लेकिन वरुण कहीं नहीं मिला और न ही उस के बारे में कोई सुराग हाथ लगा. इधर गांव भर में भी पुलिस उसे ढूंढ चुकी थी. एक बार नहीं कई बार पुलिस वालों ने गांव की तलाशी ली लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी तो गांव वालों का गुस्सा फिर से उफनने लगा.

बारबार की पूछताछ में बस एक ही बात सामने आ रही थी कि वरुण अपने दादा नारायण से 10 रुपए ले कर चौकलेट खरीदने निकला था, इस के बाद उसे किसी ने नहीं देखा. इस से यह संभावना प्रबल होती जा रही थी कि हो न हो, बच्चे को घर से निकलते ही अगवा कर लिया गया हो.

विपिन का मकान मुख्य सड़क से चंद कदमों की दूरी पर पहाड़ी पर है, इसलिए यह अनुमान भी लगाया गया कि इसी 50 मीटर के दायरे से वरुण को उठाया गया है.

लेकिन वह कौन हो सकता है, यह पहेली पुलिस से सुलझाए नहीं सुलझ रही थी. क्योंकि पूरे गांव व जंगलों की खाक छानी जा चुकी थी इस पर भी हैरत की बात यह थी कि बच्चे को अगवा किए जाने का मकसद किसी की समझ नहीं आ रहा था.

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अगर पैसों के लिए उस का अपहरण किया गया होता तो अब तक अपहर्त्ता फोन पर अपनी मांग रख चुके होते और वरुण अगर किसी हादसे का शिकार हुआ होता तो भी उस का पता चल जाना चाहिए था. चीचली गांव की हालत यह हो चुकी थी कि अब वहां गांव वाले कम पुलिस वाले ज्यादा नजर आ रहे थे. इस पर भी लोग पुलिसिया काररवाई से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए माहौल बिगड़ता देख गांव में डीजीपी वी.के. सिंह और आईजी योगेश देशमुख भी आ पहुंचे.

2 बड़े शीर्ष अधिकारियों को अचानक आया देख वहां मौजूद पुलिस वालों के होश उड़ गए. चंद मिनटों की मंत्रणा के बाद तय किया गया कि एक बार फिर से गांव का कोना कोना देख लिया जाए.

इत्तफाक से इसी दौरान टीआई अनिल बाजपेयी की टीम की नजर विपिन के घर से चंद कदमों की दूरी पर बंद पड़े एक मकान पर पड़ी. उन का इशारा पा कर 2 पुलिसकर्मी उस सूने मकान की दीवार लांघ कर अंदर दाखिल हो गए. दाखिल तो हो गए लेकिन अंदर का नजारा देख कर भौचक रह गए क्योंकि वहां किसी बच्चे की अधजली लाश पड़ी थी.

बच्चे का अधजला शव मिलने की खबर गांव में आग की तरह फैली तो सारा गांव इकट्ठा हो गया. दरवाजा खोलने के बाद पुलिस और गांव वालों ने बच्चे की लाश देखी तो उस का चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. लेकिन विपिन ने उस लाश की शिनाख्त अपने साढ़े 3 साल के बेटे वरुण के रूप में कर दी.

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                           रोती बिलखती वरुण मीणा की मां तृप्ति 

सभी लोग इस बात से हैरान थे कि पिछले 2 दिनों से जिस वरुण की तलाश में लोग आकाश पाताल एक कर रहे थे, उस की लाश घर के नजदीक ही पड़ोस में पड़ी है, यह बात किसी ने खासतौर से पुलिस वालों ने भी नहीं सोची थी.

वरुण के मांबाप और दादादादी होश खो बैठे, जिन्हें संभालना मुश्किल काम था. घर वाले ही क्या, गांव वालों में भी खासा दुख और गुस्सा था. अब यह बात कहने सुनने और समझने की नहीं रही थी कि मासूम वरुण का हत्यारा कोई गांव वाला ही है, लेकिन वह कौन है और उस ने उस बच्चे को जला कर क्यों मारा, यह बात भी पहेली बनती जा रही थी.

गुस्साए गांव वालों को संभालती पुलिसिया काररवाई अब जोरों पर आ गई थी. देखते ही देखते खोजी कुत्ते और फोरैंसिक टीम चीचली पहुंच गई.

डीआईजी इरशाद वली ने बारीकी से वरुण के शव का मुआयना किया तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि जिस किसी ने भी उसे जलाया है, उस ने धुआं उठने के डर से तुरंत लाश पर पानी भी डाला है. वरुण के शव पर गेहूं के दाने भी चिपके हुए थे, इसलिए यह अंदाजा भी लगाया गया कि उसे गेहूं में दबा कर रखा गया होगा. यानी हत्या कहीं और की गई है और लाश यहां सूने मकान में ला कर ठिकाने लगा दी गई है.

इस मकान के बारे में गांव वाले कुछ खास नहीं बता पाए सिवाए इस के कि कुछ दिनों पहले ही इसे भोपाल के किसी शख्स ने खरीदा है. पूछताछ करने पर विपिन ने बताया कि उस की किसी से भी कोई दुश्मनी नहीं है.

इस के बाद पुलिस ने लाश से चिपके गेहूं के आधार पर ही जांच शुरू कर दी. अच्छी बात यह थी कि खाली पड़े उस मकान से जराजरा से अंतराल पर गेहूं के दानों की लकीर दूर तक गई थी.

डीआईजी के इशारे पर पुलिस वाले गेहूं के दानों के पीछे चले तो गेहूं की लाइन विपिन के घर के ठीक सामने रहने वाली सुनीता के घर जा कर खत्म हुई. यह वही सुनीता थी जो कुछ देर पहले तक वरुण के न मिलने की चिंता में आधी हुई जा रही थी और उस का बेटा भी गांव वालों के साथ वरुण को ढूंढने में जीजान से लगा हुआ था.

पुलिस ने सुनीता से पूछताछ की तो उस का चेहरा फक्क पड़ गया. वह वही सुनीता थी, जो एक दिन पहले तक एक न्यूज चैनल पर गुस्से से चिल्लाती दिखाई दे रही थी. वह चीखचीख कर कह रही थी कि हत्यारों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

इस बीच पूछताछ में उजागर हुआ था कि सुनीता सोलंकी का चालचलन ठीक नहीं है और उस के घर तरह तरह के अनजान लोग आते रहते हैं. पर यह सब बातें उसे हत्यारी ठहराने के लिए नाकाफी थीं, इसलिए पुलिस ने सख्ती दिखाई तो सच गले में फंसे सिक्के की तरह बाहर आ गया.

वरुण जब चौकलेट लेने घर से निकला तो सुनीता को देख कर उस के घर पहुंच गया. मासूमियत और हैवानियत में क्या फर्क होता है, यह उस वक्त समझ आया जब भूखे वरुण ने सुनीता से रोटी मांगी. बदले की आग में जल रही सुनीता ने उसे सब्जी के साथ रोटी खाने को दे दी, लेकिन सब्जी में उस ने चींटी मारने वाली जहरीली दवा मिला दी.

वरुण दवा के असर के चलते बेहोश हो गया तो सुनीता ने उसे मरा समझ कर उस के हाथपैर बांधे और पानी के खाली पड़े बड़े कंटेनर में डाल दिया. इधर जैसे ही वरुण की खोजबीन शुरू हुई तो वह भी भीड़ में शामिल हो गई. इतना ही नहीं, उस ने दुख में डूबे अपने पड़ोसी विपिन मीणा के घर जा कर उन्हें चाय बना कर दी और हिम्मत भी बंधाती रही.

जबकि सच सिर्फ वही जानती थी कि वरुण अब इस दुनिया में नहीं है. उस की तो वह बदले की आग के चलते हत्या कर चुकी है. हादसे की शाम सुनीता का बेटा घर आया तो उसे बिस्तर के नीचे से कुछ आवाज सुनाई दी. इस पर सुनीता ने उसे यह कहते हुए टरका दिया कि चूहा होगा, तू जा कर वरुण को ढूंढ.

बाहर गया बेटा रात 8 बजे के लगभग फिर वापस आया तो नजारा देख कर सन्न रह गया, क्योंकि सुनीता वरुण की लाश को पानी के कंटेनर से निकाल कर गेहूं के कंटेनर में रख रही थी. इस पर बेटे ने ऐतराज जताया तो उस ने उसे झिड़क कर खामोश कर दिया. सुनीता ने मासूम की लाश को पहले गेहूं से ढका फिर उस पर ढेर से कपड़े डाल दिए थे.

16 जुलाई, 2019 की सुबह तड़के 5 बजे सुनीता ने घर के बाहर झांका तो वहां उम्मीद के मुताबिक सूना पड़ा था. वरुण की तलाश करने वाले सो गए थे. उस ने पूरी ऐहतियात से लाश हाथों में उठाई और बगल के सूने मकान में ले जा कर फेंक दी.

लाश को फेंक कर वह दोबारा घर आई और माचिस के साथसाथ कुछ कंडे (उपले) भी ले गई और लाश को जला दिया. धुआं ज्यादा न उठे, इस के लिए उस ने लाश पर पानी डाल दिया. जब उसे इत्मीनान हो गया कि अब वरुण की लाश पहचान में नहीं आएगी तो वह घर वापस आ गई.

हत्या सुनीता ने की है, यह जान कर गांव वाले बिफर उठे और उसे मारने पर आमादा हो आए तो उन्हें काबू करने के लिए पुलिस वालों को बल प्रयोग करना पड़ा. इधर दुख में डूबे विपिन के घर वाले हैरान थे कि सुनीता ने वरुण की हत्या कर उन से कौन से जन्म का बदला लिया है.

दरअसल बीती 16 जून को सुनीता 2 दिन के लिए गांव से बाहर गई थी. तभी उस के घर से कोई आधा किलो चांदी के गहने और 30 हजार रुपए नकदी की चोरी हो गई थी. सुनीता जब वापस लौटी तो विपिन के घर में पार्टी हो रही थी.

इस पर उस ने अंदाजा लगाया कि हो न हो विपिन ने ही चोरी की है और उस के पैसों से यह जश्न मनाया जा रहा है. यह सोच कर वह तिलमिला उठी और मन ही मन  विपिन को सबक सिखाने का फैसला ले लिया.

सुनीता सोलंकी दरअसल भोपाल के नजदीक बैरसिया के गांव मंगलगढ़ की रहने वाली थी. उस की शादी दुले सिंह से हुई थी, जिस से उस के 3 बच्चे हुए. इस के बाद भी पति से उस की पटरी नहीं बैठी क्योंकि उस का चालचलन ठीक नहीं था.

इस पर दोनों में विवाद बढ़ने लगा तो दुले सिंह ने उसे छोड़ दिया. इस के बाद मंगलगढ़ गांव के 2-3 युवकों के साथ रंगरलियां मनाते उस के फोटो वायरल हुए थे, जिस के चलते गांव वालों ने उसे भगा दिया था. वे नहीं चाहते थे कि उस के चक्कर में आ कर गांव के दूसरे मर्द बिगड़ें.

इस के बाद तो सुनीता की हालत कटी पतंग जैसी हो गई. उस ने कई मर्दों से संबंध बनाए और कुछ से तो बाकायदा शादी भी की लेकिन ज्यादा दिनों तक वह किसी एक की हो कर नहीं रह पाई. आखिर में वह चीचली में ठीक विपिन के घर के सामने आ कर बस गई.

चीचली में भी रातबिरात उस के घर मर्दों का आनाजाना आम बात थी. इन में उस की बेटी का देवर मुकेश सोलंकी तो अकसर उस के यहां देखा जाता था. इस से उस की इमेज चीचली में भी बिगड़ गई थी. लेकिन सुनीता जैसी औरतें समाज और दुनिया की परवाह ही कहां करती हैं. गांव में हर कोई जानता था कि सुनीता के पास पैसे कहां से आते हैं, लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता था.

चोरी के कुछ दिन पहले विपिन का भाई उस के यहां घुस आया था और उस ने सुनीता को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया था. इस पर भी विपिन के घर वालों से उस की कहासुनी हुई थी. यह बात तो आईगई हो गई थी, लेकिन वह चोरी के शक की आग में जल रही थी इसलिए उस ने बदला मासूम वरुण की हत्या कर के लिया.

गांव वालों के मुताबिक यह पूरा सच नहीं है बल्कि तंत्रमंत्र और बलि का चक्कर है. गांव वाले इसे चंद्रग्रहण से जोड़ कर देख रहे हैं. गांव वालों के मुताबिक वरुण की लाश के पास से मिठाई भी मिली थी. घटनास्थल के पास से अगरबत्ती और कटे नींबू मिलने की बात भी कही गई. इस के अलावा वरुण की लाश को लाल रंग के कपड़े से ही क्यों लपेटा गया, इस की भी चर्चा चीचली में है.

गांव वालों की इस दलील में दम है कि अगर वाकई सुनीता के यहां चोरी हुई थी तो उस ने इस का जिक्र किसी से क्यों नहीं किया था और न ही पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

वरुण के नाना अनूप मीणा तो खुल कर बोले कि उन के नाती की हत्या की असली वजह तंत्रमंत्र का चक्कर है. उन्होंने घटनास्थल पर मिले नींबू के अलावा घर के बाहर पेड़ पर लटकी काली मटकी का भी जिक्र किया.

वरुण की हत्या चोरी का बदला थी या तंत्रमंत्र इस की वजह थी, इस पर पुलिस बोलने से बच रही है. लेकिन उस की लापरवाही और नकारापन लोगों के निशाने पर रहा. चीचली के लोगों ने साफसाफ कहा कि लाश एकदम बगल वाले घर में थी और पुलिस वाले यहांवहां वरुण को ढूंढ रहे थे.

गांव वालों का यह भी कहना है कि अगर डीजीपी और आईजी गांव में नहीं आते तो ये लोग उस सूने मकान में भी नहीं झांकते और वरुण की लाश पता नहीं कब मिलती. उम्मीद के मुताबिक इस हत्याकांड पर राजनीति भी खूब गरमाई. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हादसे पर अफसोस जाहिर किया तो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बिगड़ती कानूनव्यवस्था को ले कर सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे.

हैरानी तो इस बात की भी है कि गुमशुदगी का बवाल मचने के बाद भी सुनीता ने वरुण की लाश बड़े इत्मीनान से जला दी और किसी को खबर भी नहीं लगी. सुनीता को अपने किए का कोई पछतावा नहीं है. इस से लगता है कि बात कुछ और भी हो सकती है.

पुलिस ने सुनीता से पूछताछ करने के बाद उस के नाबालिग बेटे को भी हिरासत में ले लिया. उस का कसूर यह था कि हत्या की जानकारी होने के बाद भी उस ने पुलिस को नहीं बताया था. पुलिस ने सुनीता को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया जबकि उस के नाबालिग बेटे को बालसुधार गृह भेजा गया.

कोचांग गैंगरेप केस : वो 6 घंटे हैवानियत के

15 मई, 2019 की दोपहर को झारखंड के जनपद खूंटी के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (प्रथम) राजेश कुमार की अदालत के बाहर भारी भीड़ थी. अदालत परिसर में खाकी वरदी ही वरदी नजर आ रही थीं. परिसर के अंदर और बाहर सशस्त्र पुलिस किसी भी स्थिति से निबटने के लिए तैयार थी. हालात देख कर लग रहा था कि अदालत किसी बड़े केस का फैसला सुनाने वाली है.

सचमुच उस दिन एक बड़े और संगीन जुर्म का फैसला सुनाया जाने वाला था. दरअसल, खूंटी जिले के अड़की थाना क्षेत्र में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी.

इस घटना में दरिंदों ने सोची समझी साजिश के तहत 3 युवकों और 5 युवतियों का अपहरण कर के पहले उन के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और फिर उन के गुप्तांगों को सिगरेट से दाग दिया. इस कांड से न केवल झारखंड की बुनियाद हिल गई थी. बल्कि इस दरिंदगी की गूंज दिल्ली तक सुनाई दी थी. इसी केस में 6 आरोपियों को सजा सुनाई जानी थी.

दोपहर के करीब 2 बजे न्यायाधीश राजेश कुमार ने अदालत में आ कर न्याय का आसन संभाला. अदालत में सरकारी अधिवक्ता सुशील जायसवाल और बचाव पक्ष के दोनों अधिवक्ता के.बी. सांगा और सुभाशीष सोरेन सावधान मुद्रा में खड़े थे.

न्यायाधीश के सामने दाईं ओर बने कटघरे में 7 आरोपियों स्कौटमैन मेमोरियल मिडिल स्कूल के प्रधानाचार्य फादर अल्फोंस आइंद, छुटभैया नेता जौन जोनास तिडु, बलराम समद, जुनास मुंडा,बांदी समद उर्फ टकला, आशीष लुंगा एवं अजूब सांडी पूर्ती खड़े थे.

दोनों पक्षों के वकीलों ने घटना से संबंधित बहस 8 मई, 2019 को पूरी कर ली थी. बहस के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों के.बी. सांगा और सुभाशीष सोरेन अपने मुवक्किलों को बचाने में असफल रहे थे. सरकारी वकील सुशील जायसवाल ने अदालत के सामने कई ठोस सबूत और केस से संबंधित 19 अहम गवाहों को पेश कर के बचाव पक्ष को धूल चटा दी थी.

8 मई को दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद न्यायाधीश राजेश कुमार ने फैसला सुनाने के लिए 15 मई, 2019 की तारीख मुकर्रर की थी. न्यायाधीश ने सातों आरोपियों के विरुद्ध फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘तमाम गवाहों और सबूतों के आधार पर अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि इस गैंगरेप में जौन जोनास तिडु, बलराम समद, जूनास मुंडा, बांदी समद उर्फ टकला, आशीष लुंगा, और अजूब सांडी पूर्ती दोषी पाए गए हैं. एक अभियुक्त को नाबालिग पाया गया है. उस के खिलाफ अनुसंधान जारी है.’’

अपने फैसले को जारी रखते हुए न्यायाधीश ने आगे कहा, ‘‘फादर अल्फोंस आइंद, जो पहले से जमानत पर थे, उन की जमानत रद्द की जाती है, क्योंकि वह इस केस में मुख्य षडयंत्रकारी साबित हुए हैं. साथ ही 4 अभियुक्तों जौन जोनास तिडु, बलराम समद, आशीष लुंगा और बांदी समद उर्फ टकला का जुर्म साबित हुआ है.

फादर अल्फोंस आइंद था साजिशकर्ता

जौन जोनास तिडु, बांदी समद उर्फ टकला, आशीष लुंगा और बलराम समद जो पत्थरगढ़ी के समर्थक थे, की इस मामले में संलिप्तता पाई गई है.

‘‘इस मामले में 19 लोगों की अहम गवाही दर्ज हुई. स्थितियों के अनुरूप यह मामला रेयरेस्ट औफ रेयर की श्रेणी में आता है. इसलिए अदालत सभी आरोपियों को दोषी करार देते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाती है. सभी अभियुक्तों को हिरासत में ले कर जेल भेज दिया जाए.’’

न्यायाधीश राजेश कुमार फैसला सुनाने के बाद न्याय के आसन से उठ कर अपने कक्ष में चले गए. अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने सभी दोषियों को हिरासत में ले कर जेल भेज दिया.

दिल दहला देने वाली इस लोमहर्षक घटना की बुनियाद फैसला सुनाए जाने के 11 महीने पहले 19 जून, 2018 को पड़ी थी. इसलिए घटनाक्रम जानने के लिए हमें 11 महीने पहले जाना होगा.

झारखंड की राजधानी रांची से 80-90 किलोमीटर दूर ऊंची पहाडि़यों और जंगलों के बीच है जिला खूंटी. इस जिले के कुछ हिस्सों में आदिवासियों के बसेरे हैं. ये आदिवासी अशिक्षा, गरीबी, अज्ञानता के शिकार हैं और आज भी गुलामों जैसी जिंदगी जीते हैं.

खूंटी के एक सामाजिक संगठन आशा किरण की संस्थापिका सिस्टर जेम्मा ओएसयू ने आदिवासियों को अज्ञानता से आजादी दिलाने और मानव तस्करी जैसे घृणित कार्यों के खिलाफ जागरूकता अभियान चला रखा था. अपने नाम आशा किरण के अनुरूप यह संगठन अच्छा काम कर रहा था.

आशा किरण के युवक और युवतियां जगहजगह नुक्कड़ नाटक कर के जागरूकता का संदेश देते थे. संगठन के जोशीले कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे नुक्कड़ नाटकों से समाज पर गहरा असर हो रहा था. परिणामस्वरूप आदिवासी समाज में काफी बदलाव आने लगा था.

जो मांबाप अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते थे, वे पुरानी दकियानूसी परंपराओं को दरकिनार कर बच्चों को स्कूल भेजने लगे थे. स्कूली बच्चे घने जंगलों के बीच से हो कर कोसों दूर विद्यालय में पढ़ने जाते थे.

बात 19 जून, 2018 की है. जिले के अड़की थानाक्षेत्र के कोचांग स्थित स्टौकमैन मेमोरियल मिडिल स्कूल में सामाजिक संगठन आशा किरण की ओर से सरकारी योजनाओं के प्रचारप्रसार और मानव तस्करी के खिलाफ नुक्कड़ नाटक का आयोजन होना था.

यह आयोजन स्कूल के फादर अल्फोंस आइंद, स्कूल के 2 शिक्षकों मोटाई मुंडू, रौबर्ट हस्सा पूर्ती और 2 महिला शिक्षकों रंजीता किंडो और अनीता नाग की देखरेख में शुरू हुआ. नाटक में आशा किरण की ओर से 3 युवक रोशन, विकास, राजन और 5 युवतियां सीमा, रीना, गीता, बिपाशा और वंदना शामिल थे.

ये कलाकार अपनी कला के माध्यम से सरकारी योजनाओं के बारे में बता रहे थे. इस कार्यक्रम को शुरू हुए करीब एक घंटा बीत चुका था. नाटक के दौरान एक शख्स स्कूल की सिस्टर रंजीता किंडो से मिला. उस ने कहा कि वह कोचांग के बुरुडीहा गांव का मुखिया है. उसे उन का कार्यक्रम पसंद है और वह चाहता है कि बुरुडीह में भी ऐसा कार्यक्रम कराया जाए.

सिस्टर रंजीता किंडो ने पहले तो मना कर दिया, फिर कुछ सोच कर कहा कि इस की इजाजत फादर अल्फोंस आइंद से लेनी पड़ेगी. अगर वह कलाकारों को ले जाने की परमिशन दे देते हैं तो ये लोग वहां जा सकते हैं.

उस शख्स ने सिस्टर रंजीता से कहा कि वह उसे फादर अल्फोंस आइंद से मिला दे. रंजीता उसे ले कर फादर के दफ्तर पहुंची, जो स्कूल के पीछे था. उस शख्स के साथ 3 और भी युवक थे. जिन की उम्र 25 से 35 साल के बीच रही होगी. ये चारों युवक मोटरसाइकिल से आए थे.

नुक्कड़ नाटक बना मुसीबत

रंजीता किंडो वहां से मंच की ओर लौट आई. नाटक खत्म हो चुका था और कलाकार वापस लौटने की तैयारी करने लगे थे. तभी फादर अल्फोंस ने सिस्टर अनीता नाग को भेज कर आठों कलाकारों को अपने औफिस में बुला लिया.

फादर अल्फोंस ने एक व्यक्ति की ओर इशारा कर के कलाकारों से कहा कि ये कोचांग के मुखिया हैं और बुरुडीह गांव में नुक्कड़ नाटक कराना चाहते हैं. 2 घंटे की बात है. आप सब वहां जा कर नाटक कर दें. नाटक खत्म होते ही मुखियाजी अपने आदमियों के साथ आप सभी को सम्मान के साथ यहां पहुंचा देंगे.

फादर अल्फोंस आइंद की बात सुन कर सभी कलाकारों ने उन युवकों के साथ जाने से मना कर दिया. उन युवकों ने सिस्टर रंजीता किंडो और सिस्टर अनीता नाग को भी साथ चलने के लिए कहा था. लेकिन फादर ने यह कह कर दोनों सिस्टर्स को उन के साथ भेजने से मना कर दिया कि वे नन हैं, इसलिए वहां नहीं जा सकतीं.

कलाकारों के मना करने पर मोटर साइकिलों पर आए चारों व्यक्ति जोरजबरदस्ती पर उतर आए. उन्होंने बंदूक की नोंक पर आठों कलाकारों को आशा किरण के वाहन में बैठा लिया और बुरुडीह की ओर चलने को कहा. वाहन के पीछेपीछे चारों युवक 3 मोटरसाइकिलों पर चल रहे थे.

आशा किरण के आठों कलाकार रोशन, विकास, राजन और 5 युवतियां सीमा, रीना, गीता, बिपाशा और वंदना को बुरुडीह गए करीब 6 घंटे बीत गए थे, शाम ढलने वाली थी. लेकिन वे स्कूल लौट कर नहीं आए थे.

फादर अल्फोंस को उन की चिंता हो रही थी. थोड़ी देर बाद यानी शाम साढ़े 6 बजे आशा किरण के वाहन ने स्कूल में प्रवेश किया तो उसे देख कर फादर की जान में जान आई. क्योंकि सारे कलाकार उन्हीं की जिम्मेदारी पर बुरुडीह गए थे.

वाहन स्कूल परिसर के बीच खड़ा कर के चालक तेजी से मुख्यद्वार से बाहर की ओर भाग गया. यह देख कर फादर आइंद को कुछ शक हुआ. उन्होंने वाहन के पास जा कर उस के भीतर झांका. वाहन में आठों कलाकार मरणासन्न स्थिति में पड़े थे. उनके कपडे़ फटे हुए थे. शरीर पर जगहजगह चोट के निशान थे.

फादर अल्फोंस ने खेला खेल

लड़कों और लड़कियों की हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन के साथ कुछ बहुत बुरा हुआ था. वे इस स्थिति में नहीं थे कि कुछ बोल पाते. फादर के बहुत कुरेदने पर लड़कों ने जो आपबीती बताई, उसे सुन कर फादर के रोंगटे खड़े हो गए.

फादर अल्फोंस आइंद की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें. इलाके में फादर का बहुत दबदबा था. राजनीति के गलियारों में ऊंची पहुंच थी. इसी का फायदा उठाते हुए फादर आइंद ने आठों कलाकारों को धमकाया कि जो होना था, सो हो गया. यह बात तुम सब के अलावा किसी को पता नहीं चलनी चाहिए. अन्यथा इस का बहुत बुरा परिणाम होगा.

फादर ने कहा तुम्हारे मुंह खोलने पर तुम्हारे मांबाप की हत्या भी हो सकती है. फादर के धमकाने से आठों कलाकार बुरी तरह डर गए. वे लोग इतना डर गए कि अपने साथ हुई घटना के बारे में अपने मांबाप तक को नहीं बताया.

आठों कलाकारों के साथ घटना घटे 24 घंटे बीत गए थे. खूंटी की रहने वाली सीमा को भीतर ही भीतर बुरी तरह घुटन महसूस हो रही थी. उन लोगों द्वारा दी गई यातना उस से बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने अपने मांबाप से आपबीती सुना दी और फफक फफक कर रोने लगी.

बेटी के साथ हुई घटना को मांबाप ने सुना तो सन्न रह गए. बात कोई छोटीमोटी नहीं थी. बेटी की मानमर्यादा को तारतार कर के उस के गुप्तांगों को सिगरेट से जलाया गया था. उन दरिंदों ने यातना की सारी सीमाएं लांघ दी थीं. सीमा और उस के बाकी साथियों के साथ क्या क्या हुआ था, उस ने मांबाप को पूरी बात विस्तार से बता दी.

दरअसल, बीते 19 जून को खुद को बुरुडीह का मुखिया बता कर जो युवक गांव में नुक्कड़ नाटक कराने की बात कह कर आठों कलाकारों को अपने साथ ले गया था, वह उन्हें गांव न ले जा कर एक घने जंगल में ले गया था. वाहन चला रहे आशा किरण संगठन के चालक संजय शर्मा को मारपीट कर बीच रास्ते में उतार दिया गया था.

गाड़ी के पीछे चल रहे मोटरसाइकिल सवारों में से एक नीचे उतरा और संजय की जगह ड्राइविंग सीट पर सवार हो कर वाहन चलाने लगा. वे लोग जिस जंगल के बीच वाहन को ले गए, वहां पहले से ही कई लोग मौजूद थे. उन के पास खतरनाक हथियार थे.

मुखिया ने सभी युवक और युवतियों को वाहन से निकलने का आदेश दिया. फरमान जारी होते ही सभी एकएक कर के वाहन से नीचे उतर आए और एक कतार में खडे़ हो गए. उन के कतार में खड़े होते ही हथियारबंद युवकों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया.

उन लोगों के हाथों में हथियार देख कर आठों कलाकार कांपने लगे. मुखिया आगे बढ़ा और पांचों युवतियों में से सीमा के नजदीक पहुंचा. पहले तो उस ने सीमा को खा जाने वाली नजरों से घूरा, फिर एकाएक उस के बालों को अपनी मुट्ठी में भर कर खींचा. सीमा दर्द के मारे बिलबिला उठी. वह चिल्लाया, ‘‘हरामजादी कुतिया, और चिल्ला.’’

मुखिया की आंखों से क्रोध के अंगारे बरसने लगे, ‘‘तुम्हारा चीखना चिल्लाना सुन कर मेरे दिल को सुकून मिला.’’

‘‘पर आप हो कौन?’’ सीमा ने साहस जुटा कर सवाल किया, ‘‘और इस तरह हमारे साथ जंगली जानवरों जैसा व्यवहार क्यों कर रहे हो? आखिर हम ने किया क्या है?’’

‘‘बहुत नाटक करती है हरामजादी और मुझ से पूछती है कि तेरा दोष क्या है?’’ मुखिया दांत भींचते हुए बोला.

‘‘लेकिन हमारे नाटक से आप का क्या संबंध है?’’

‘‘है. तुम्हारे नाटक करने से हमारा बहुत गहरा संबंध है. तुम जो नाटक कर के समाज के लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हो, वही तुम्हारा सब से बड़ा दोष है. तुम्हें और तुम्हारे साथियों को इस दोष की ऐसी सजा दी जाएगी, जो जीवन भर नासूर बन कर तुम्हारे जमीर को चुभेगी.’’

‘‘प्लीज हमें छोड़ दीजिए, हमें हमारे घर जाने दीजिए.’’ सीमा दोनों हाथ जोड़ कर उस के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘अगर हमारे नाटक करने से आप को परेशानी है तो आज के बाद हम नाटक नहीं करेंगे. प्लीज, हमें छोड़ दीजिए.’’

‘‘हम तुम्हें और तुम्हारे बाकी साथियों को छोड़ भी देंगे, घर भी जाने देंगे लेकिन सजा देने के बाद, समझी?’’ इतना कह कर मुखिया ने उस के बाल छोड़ दिए. फौरी तौर पर सीमा को थोड़ी राहत मिली.

दरिंदगी की इंतहा

सीमा को यातना देते देख बाकी साथियों की सांस गले में अटक गई थी. उन के मुंह से एक बोल तक नहीं फूटा. इस के बाद मुखिया ने अपने साथियों को इशारा किया.

उस का इशारा पाते ही 5 युवक, जिस में मुखिया भी शामिल था, पांचों लड़कियों को खींच कर वहां से थोड़ी दूर जंगल के भीतर ले गए और एकएक कर के उन के साथ अपना मुंह काला किया. उन के साथ एक युवक और भी था, जो अपने और लड़कियों के मोबाइल से दुष्कर्म के समय की वीडियो बना रहा था.

इन दरिंदों का जब इतने पर भी दिल नहीं भरा तो उन्होंने उन के गुप्तांगों को सिगरेट से दाग दिया. सिगरेट की जलन से वे बुरी तरह बिलबिला उठीं. वे दरिंदों के सामने हाथ जोड़ कर भीख मांग रही थीं कि वीडियो न बनाएं लेकिन उन हैवानों पर उन की याचनाओं का कोई असर नहीं हुआ.

दरिंदे सिगरेट से गुप्तांग के जलाए जाने का भी नजदीक से वीडियो बना रहे थे. हैवानों ने उन के साथ कई बार अपना मुंह काला किया. इतना ही नहीं, उन्होंने लड़कों को भी नहीं छोड़ा. लड़कों के साथ भी अप्राकृतिक दुष्कर्म किया गया. इतना ही उन्हें अपना पेशाब  पिलाया और इस कृत्य की भी वीडियो बनाई.

उन नरपिशाचों ने 6 घंटों तक आठों युवकयुवतियों के साथ यातनाओं का घिनौना खेल खेला. जब शाम ढलने लगी तो सभी युवकयुवतियों को उन्हीं के वाहन में डाल कर स्कूल पहुंचा दिया गया. स्कूल पहुंच कर उन्होंने फादर अल्फोंस आइंद से आपबीती सुनाई. लेकिन फादर आइंद ने मदद करने की बजाए उन्हें डराधमका कर चुप करा दिया.

बहरहाल, सीमा की दिलेरी से दिल दहला देने वाली घटना सामने आई तो उस के मांबाप ने आशा किरण की संस्थापिका जेम्मा ओएसयू को पूरी बात बताई, जिन की जिम्मेदारी पर बच्चियां नुक्कड़ नाटक करने गई थीं. बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संगठन की थी, लेकिन उन की सुरक्षा नहीं की गई थी.

सिस्टर जेम्मा ने दिल दहला देने वाली घटना सुनी तो भौचक रह गईं. उन्हें ताज्जुब तो इस बात पर हो रहा था कि 24 घंटे बीत जाने के बाद भी मामला पुलिस तक नहीं पहुंचा, बल्कि उसे दबा दिया गया था. लेकिन वे खुद चुप बैठने वालों में से नहीं थीं.

21 जून, 2018 की दोपहर को सिस्टर जेम्मा अड़की थाने पहुंचीं और पुलिस को घटना की लिखित तहरीर दी. तहरीर पढ़ कर एसओ विपिन सिंह के होश उड़ गए. इतनी बड़ी और शर्मनाक घटना की पुलिस को सूचना तक नहीं मिली थी.

सिस्टर जेम्मा की तहरीर पर आननफानन में अड़की पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसओ विपिन सिंह जानते थे, जेम्मा कोई ऐसीवैसी महिला नहीं हैं, उन की पहुंच ऊपर तक है. सो उन्होंने त्वरित काररवाई की.

अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंवि की धारा 341, 342, 323, 363, 365, 328, 506, 201, 120बी के तहत केस दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होते ही इस घटना की जानकारी पूरे जिले में फैल गई. यह बात जब शहर के एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा तक पहुंची तो आननफानन में वे अड़की थाना पहुंचे और मामले की पूरी जानकारी ली.

घटना छोटीमोटी नहीं थी. साथ ही मानवाधिकार से भी जुड़ी हुई थी. एसपी अश्विनी ने अपनी गरदन बचाते हुए यह सूचना आईजी नवीन कुमार और डीआईजी अमोल वी. होमकर को दे दी. हकीकत सुन कर पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. उसी दिन शाम होतेहोते यह मामला पुलिस महानिदेशक डी.के. पांडेय, एडीजी आर.के. मल्लिक से होते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास तक जा पहुंचा.

22 जून को मुख्यमंत्री रघुबर दास ने प्रदेश के पुलिस प्रमुख डी.के. पांडेय को अपने औफिस बुला कर उन के साथ आपात बैठक की. बैठक में उन्होंने मामले की गहन जांच के आदेश दिए और साजिश का परदाफाश करने को कहा. यही नहीं, उन्होंने दोषियों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के भी आदेश दिए.

मुख्यमंत्री के आदेश के बाद डीजीपी डी.के. पांडेय ने आईजी नवीन कुमार को निर्देश दिया कि अविलंब सभी पीडि़तों की सुरक्षा बढ़ा दी जाए और उन से आरोपियों के बारे में पूछताछ की जाए. उन से जानकारी जुटा कर आरोपियों के स्कैच बनवाए जाएं.

आईजी नवीन कुमार का फरमान जारी होते ही एसपी अश्विनी कुमार ने आठों पीडि़तों को पूछताछ के लिए सुरक्षा घेरे में ले लिया. उन के रहने की व्यवस्था थाना अड़की में की गई. सुरक्षा की दृष्टि से उन से किसी की भी बात कराने पर पाबंदी लगा दी गई थी, ऐसा इसलिए किया गया था कि इस मामले की जानकारी बाहर न जा सके.

थाने में हुई पीडि़तों से पूछताछ के आधार पर 3 आरोपियों के स्कैच बनवा कर शहर में जगहजगह चस्पा करा दिए गए. उन पर ईनाम भी घोषित किया गया. उस के बाद सभी पीडि़तों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया. मैडिकल रिपोर्ट में उन सभी के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई.

खैर, 5 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस को कोई खास सफलता नहीं मिली. लेकिन छठे दिन अचानक ही पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिल गई. शहर में लगाए गए पोस्टरों में से स्कैच वाले 2 युवकों की पहचान हो गई. दोनों आरोपियों के नाम अजूब सांडी पूर्ती और आशीष लुंगा थे. वे खूंटी जिले के पश्चिम सिंहभूम गांव के रहने वाले थे.

पुलिस को किस का डर था

पुलिस ने दोनों आरोपियों को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के लिए अड़की थाने ले आई.

थाने ला कर पुलिस ने जब अजूब सांडी और आशीष लुंगा से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए. उन्होंने अपने साथियों के नाम भी बता दिए.

घटना में इन के अलावा पत्थलगढ़ी समुदाय का मुखिया जौन जोनास तिडु, बलराम समद, बांदी समद उर्फ टकला और जुनास मुंडा के अलावा पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट औफ इंडिया (उग्रवादी संगठन) के लोग शामिल थे.

अजूब सांडी और आशीष लुंगा की निशानदेही पर उसी रात चारों साथियों को पश्चिम सिंहभूम से गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन उन्होंने अपने जुर्म कबूलने से इनकार कर दिया.

इस पर पुलिस ने इन चारों और पहले गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों की अलग कमरे में बैठे पीडि़तों के सामने परेड कराई तो पीडि़तों ने आरोपियों को पहचान लिया. ये वही दरिंदे थे, जिन्होंने 19 जून को उन्हें 6 घंटे तक मौत से बदतर यातनाएं दी थीं.

पीडि़तों द्वारा शिनाख्त किए जाने के बाद पुलिस ने चारों आरोपियों जौन जोनास तिडु, बलराम समद, बांदी समद उर्फ टकला और जुनास मुंडा से अलगअलग कड़ाई से पूछताछ की तो चारों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. ये लोग ही लड़के लड़कियों को स्कूल से जबरन अगवा कर के ले गए थे

इन लोगों ने उन के साथ बदले की भावना से बलात्कार किया था ताकि भविष्य में फिर कोई उन के और उन के उसूलों के खिलाफ न जा सके. यानि गुलामों सी जिंदगी जी रहे आदिवासियों को उन के अधिकारों का पाठ पढ़ाने की कोशिश न करे.

सामूहिक दुष्कर्म के सभी आरोपियों की गिरफ्तारी की सूचना मिलने पर एडीजी आर.के. मल्लिक, आईजी नवीन कुमार, डीआईजी अमोल वी. होमकर को मिली, तो वे भी थाने आ गए.

एडीजी आर.के. मल्लिक शहर में रह कर घटना की पलपल की मौनिटरिंग कर रहे थे और पूरी जानकारी पुलिस प्रमुख डी.के. पांडेय और मुख्यमंत्री रघुबर दास को दे रहे थे. पुलिसिया जांचपड़ताल में पूरी घटना के पीछे स्कौटमैन मेमोरियल मिडिल स्कूल के फादर अल्फोंस आइंद द्वारा रची गई साजिश का परदाफाश हुआ.

आरोपियों से की गई पूछताछ, पीडि़तों के मजिस्ट्रैट के समक्ष दिए गए बयानों और मौके से जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने घटना के मुख्य साजिशकर्ता फादर अल्फोंस आइंद को 27 जून को स्कूल परिसर से गिरफ्तार कर लिया.

फादर अल्फोंस आइंद के गिरफ्तार होते ही क्रिश्चियन मिशनरी में खलबली मच गई. ईसाई समुदाय के लोग पुलिस का विरोध करने लगे तो विवश हो कर अगले दिन एडीजी आर.के. मल्लिक को प्रैस कौन्फ्रैंस करनी पड़ी.

एडीजी आर.के. मल्लिक ने प्रैसवार्ता के दौरान पत्रकारों को बताया कि खूंटी में घटी घटना में पत्थलगढ़ी के नेता जौन जोनास तिडु और अन्य अपराधी शामिल थे.

उन्होंने दावा किया कि अपराधी 5 युवतियों और उन के 3 पुरुष साथियों को उन्हीं की गाड़ी में जबरदस्ती बैठा कर 7-8 किलोमीटर दूर छोटाली के जंगल में ले गए थे. वहां पहले से ही पीएलएफआई समूह के नक्सली मौजूद थे. इन लोगों ने नुक्कड़ नाटक करने वाले समूह को सबक सिखाने के लिए उन के साथ सुनियोजित तरीके से बलात्कार किया.

मल्लिक ने आगे बताया कि पुलिस ने पश्चिम सिंहभूम के रहने वाले अजूब सांडी पूर्ती और आशीष लुंगा को गिरफ्तार कर मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. गिरफ्तार दोनों अपराधियों ने अपना अपराध कबूल लिया और पीडि़त युवतियों के समक्ष उन की परेड करा कर उन की पहचान भी करा ली गई.

जांच के दौरान पाया गया कि खूंटी में हुई सामूहिक बलात्कार की इस घटना में कम से कम 7 लोगों ने 5 युवतियों का अपहरण कर उन के साथ बलात्कार किया था. साथ ही उन के 3 पुरुष सहकर्मियों के साथ अप्राकृतिक दुष्कर्म भी किया था. आरोपियों ने इस पूरे कृत्य की वीडियो बना कर उसे सोशल मीडिया पर भी डाल दिया था.

प्रैस कौन्फ्रैंस के बाद पुलिस ने फादर अल्फोंस आइंद को अदालत के सामने पेश किया, जहां से अदालत ने उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

बहरहाल, आशा किरण संगठन समाज को जागरूक करने के लिए समय समय पर सरकारी योजनाओं के बारे में बताने के लिए नुक्कड़ नाटक कराती रहती थी. आशा किरण द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले ये नाटक पत्थलगड़ी के कोचांग इलाके के छुटभैये नेता जौन जोनास तिडु को पसंद नहीं आ रहे थे. उसे लगता था कि उन के द्वारा किए जाने वाले नुक्कड़ नाटक पत्थलगढ़ी समाज के खिलाफ हैं.

उन नाटकों में काम करने वाले लड़के और लड़कियां उन्हीं के समुदाय के थे. जोनास ने लड़कियों से मना किया था कि तुम सब ऐसे नाटकों में भाग मत लिया करो, जिस से हमारे समाज को नुकसान पहुंचे. लेकिन लड़कियों ने जोनास की बात मानने से साफ इनकार कर दिया था.

पूरे कृत्य का मास्टरमाइंड था जोनास तिडु

जोनास तिडु ने लड़कियों से बदला लेने की ठान ली और मौके की तलाश में रहने लगा. छुटभैया नेता जोनास तिडु का जो चेहरा सब के सामने था, उस के पीछे एक और चेहरा छिपा था. उस का संबंध झारखंड के प्रतिबंधित कट्टर उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट औफ इंडिया से था. उग्रवादी संगठन के साथ मिल कर वह समाज विरोधी गतिविधियों में संलिप्त था.

खैर, जिस मौके की तलाश में जोनास तिडु जुटा था, आखिरकार वह मौका उसे मिल ही गया. जोनास तिडु को पता चला था कि फादर अल्फोंस आइंद के स्कूल में 19 जून को आशा किरण की लड़कियां नुक्कड़ नाटक करने वाली हैं.

उस से 2 दिन पहले जोनास तिडु अपने ग्रुप के साथियों बलराम समद, अजूब सांडी पूर्ती, बांदी समद उर्फ टकला, जुनास मुंडा और आशीष लुंगा के साथ स्कूल जा कर फादर आइंद से मिला. फादर आइंद जानता था कि जोनास अपराधी प्रवृत्ति का इंसान है, अगर उस की बात नहीं मानी तो वह कुछ भी कर सकता है.

योजना के अनुसार, जौन जोनास तिडु ने अपने साथ उग्रवादी संगठन पीएलएफआई के कई साथियों को भी मिला लिया था. लड़कियों के साथ क्या करना है, इस की भी रूपरेखा तैयार कर ली गई.

19 जून को आशा किरण के लड़के और लड़कियां जब फादर आइंद के स्कूल में नाटक करने पहुंचे तो फादर ने इस की सूचना जौन जोनास को दे दी. सूचना मिलते ही दिन के करीब 12 बजे जौन जोनास तिडु अपने 3 साथियों बलराम समद, अजूब सांडी पूर्ति और आशीष लुंगा के साथ 3 मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर स्कूल पहुंच गया. उस समय नाटक समाप्त होने वाला था.

जौन जोनास नाटक मंच के पास मौजूद सिस्टर रंजीता किंडो से मिला और अपने इलाके बुरुडीह में नाटक कराने की इच्छा जाहिर की. रंजीता ने उसे फादर से मिला दिया. सिस्टर रंजीता और सिस्टर अनीता नाग को देख कर उस का दिल दोनों ननों पर आ गया था.

जब वह फादर के पास पहुंचा, तो फादर समझ गए कि कोई बड़ा अनर्थ होने वाला है. जोनास ने जब नाटक मंडली को अपने इलाके में ले जाने की बात कही तो वह फौरन तैयार हो गए.

नाटक मंडली के 3 लड़के और 5 लड़कियों के अलावा जब उस ने दोनों ननों सिस्टर रंजीता किंडो और अनीता नाग को भेजने के लिए कहा तो फादर ने यह कह कर मना कर दिया कि वे नन हैं और हमारे विद्यालय की हैं.

जोनास फादर की बात मान गया. इस पर नाटक मंडली के सभी कलाकारों ने विरोध किया तो जोनास और उस के साथी आठों को जबरन अपहरण कर के उन्हीं के वाहन में बिठा कर ले गए. ये लोग स्कूल से 7-8 किलोमीटर दूर जंगल में पहुंचे, जहां पहले से पीएलएफआई के नक्सलियों के साथ उन के अन्य साथी मौजूद थे. आगे क्या हुआ, ऊपर कहानी में बताया जा चुका है.

खूंटी में हुए गैंगरेप की घटना के करीब ढाई महीने बाद मानवाधिकारों के हनन के मामले की जांच के लिए 17-18 अगस्त, 2018 को डब्ल्यूएसएस और सीडीआरओ की 10 सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम फैक्ट फाइंडिंग के लिए स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ खूंटी गई.

टीम ने अपनी जांच के बाद बताया कि पुलिस को गैंगरेप की घटना की जानकारी तो मिली, लेकिन एफआईआर से यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें घटना की जानकारी कहां से मिली.

फैक्ट फाइंडिंग टीम को पुलिस अधिकारियों से पूछताछ करने पर पता चला कि महिला थाने को भी घटना की जानकारी एसपी औफिस से मिली थी. एसपी से इस के बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. 20 जून की रात से ही पुलिस ने पीडि़तों से संपर्क साधने की कोशिश की पर वे पीडि़तों तक 21 जून को पहुंच पाई.

जांच टीम ने आगे बताया कि गैंगरेप की 5 पीडि़ताओं को पुलिस द्वारा उन की सुरक्षा करने के नाम पर गैरकानूनी रूप से 3 हफ्ते तक हिरासत में रखा गया. पुलिस की हिरासत में 3 हफ्ते तक उन्हें किसी से मिलने तक नहीं दिया जा रहा था. केवल एनसीडब्ल्यू की टीम उन से मिल पाई थी.

एक पीडि़ता के परिजनों ने बताया कि उन्हें भी पीडि़ता से घटना के 2-3 दिन बाद थाने में पुलिस वालों की मौजूदगी में केवल 5-10 मिनट के लिए मिलने दिया गया था. प्रशासन की इस काररवाई को एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा ने दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए सही बताया.

मुख्यमंत्री रघुबर दास के आदेश पर दिल दहला देने वाले खूंटी गैंगरेप कांड की रोजाना सुनवाई शुरू हुई. घटना में लिप्त सातों आरोपी जेल में बंद थे. घटना के करीब 6 महीने बाद पटना हाईकोर्ट से फादर अल्फोंस आइंद को जमानत मिल गई थी. लेकिन अदालत ने उसे शहर छोड़ कर कहीं भी जाने पर पाबंदी लगा कर उस का पासपोर्ट जब्त कर लिया था.

7 मई, 2019 को खूंटी के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (प्रथम) राजेश कुमार की अदालत ने 4 आरोपियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया. कोर्ट ने फादर अल्फोंस को षडयंत्रकारी मानते हुए उस की जमानत रद्द कर दी. उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में इसी कोर्ट ने 15 मई, 2019 को सभी आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

—कथा में रोशन, विकास, राजन, सीमा, रीना, गीता, बिपाशा और वंदना परिवर्तित नाम हैं. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

संतान प्राप्ति के लिए नरबलि, दोषियों को उम्रकैद

उस दिन कानपुर देहात की माती अदालत में आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. सर्दी होने के बावजूद लोग 10 बजे से पहले ही कचहरी पहुंच गए थे. अपर जिला जज-13 पोक्सो वाकर शमीम रिजवी की अदालत के बाहर सब से ज्यादा भीड़ मौजूद थी. भीड़ में आम लोगों के अलावा वकील भी शामिल थे.

अदालत में भीड़ जुटने का कारण यह था कि उस दिन कानपुर देहात के बहुचर्चित मासूम मानसी अपहरण हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. इसलिए मानसी के मातापिता के अलावा उन के कई परिचित भी अदालत में आए हुए थे.

भीड़ में इस बात को ले कर खुसरफुसर हो रही थी कि अदालत क्या फैसला सुनाएगी. कोई कह रहा था कि आरोपियों को फांसी होगी तो कोई उम्रकैद होने का अनुमान लगा रहा था. दरअसल, इस मामले से कानपुर देहात की जनता का भावनात्मक जुड़ाव रहा था. इसलिए कानपुर देहात की जनता की नजरें फैसले पर टिकी हुई थीं.

अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी नियत समय पर कोर्टरूम आ कर अपनी कुरसी पर बैठ गए. उन के कुरसी पर बैठते ही अदालत में सन्नाटा छा गया. आरोपी परशुराम, सुनैना, अंकुल व वीरन अदालत के कटघरे में मौजूद थे. जज ने बारीबारी से उन पर नजर डाली. मृतका मानसी के घर वाले, शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय तथा विपक्ष के वकील ताराचंद्र व रवि तिवारी भी अदालत में मौजूद थे.

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अदालत में शांति बनाए रखने का आदेश देने के बाद अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने दंड के रूप में दी जाने वाली सजा पर दोनों पक्षों को ध्यान से सुना. अभियुक्तों के वकीलों का तर्क था कि इस से पहले अभियुक्तों ने कोई भी अपराध नहीं किया है. उन के खिलाफ अपराध भी पहली बार सिद्ध हुआ है, जो जघन्य से जघन्यतम नहीं है. इसलिए उन के करिअर, उम्र व भविष्य को देखते हुए उन्हें दिए जाने वाले दंड में नरमी बरती जानी चाहिए.

जबकि अभियोजन पक्ष की तरफ से जिला शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने उन की बात का विरोध करते हुए कहा कि 6 वर्षीय बच्ची की हत्या कर उस का कलेजा निकाल कर खाना बेहद क्रूरतम अपराध है.

उस की हत्या के पीछे तंत्रमंत्र बड़ा कारण था. इसलिए पैरों पर महावर लगाई गई थी. यह रेयरेस्ट औफ रेयर मामला है. इसलिए आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, इन्हें कम से कम फांसी की सजा दी जानी चाहिए.

वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज साहब ने शाम 4 बजे दोषियों को सजा सुनाने की बात कही. इस के बाद वह अपने चैंबर में चले गए. यह बात 16 दिसंबर, 2023 की है.

मासूम मानसी कौन थी? उस का अपहरण व हत्या क्यों की गई? यह सब जानने के लिए हमें करीब 3 साल पीछे जाना होगा.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है-घाटमपुर. इस कस्बे से कुछ दूरी पर स्थित है-भदरस गांव. कमल कुरील इसी दलित बाहुल्य गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी जयश्री के अलावा 2 बेटियां थीं, जिन में मानसी बड़ी थी. कमल कुरील किसान था. खेतीबाड़ी से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था. मानसी 6 वर्ष की थी, जबकि छोटी बेटी 4 वर्ष की.

किस ने दी बच्ची की बलि

14 नवंबर, 2020 को दीपावली का त्योहार था. शाम को नए कपड़े पहनकर मानसी व दया घर के बाहर अपनी सहेली के साथ खेल रही थीं. कुछ देर बाद दया तो घर वापस आ गई, लेकिन मानसी घर वापस नहीं आई. कमल व उस की पत्नी जयश्री तब मानसी की खोज में जुट गए.

अड़ोसपड़ोस के लोगों को मासूम मानसी के गायब होने की जानकारी हुई तो वे भी उस के मातापिता के साथ उस की खोज में जुट गए. उन्होंने गांव की हर गली, कोना छान मारा. खेतखलिहान, बागबगीचा भी खंगाला, तालाब, कुआं भी देखा, लेकिन मानसी का कुछ भी पता न चला.

सुबह 5 बजे कुछ लोग गांव के बाहर स्थित भद्रकाली मंदिर की तरफ गए तो उन्होंने मासूम मानसी की लाश भद्रकाली मंदिर के पास पड़ी देखी. हालात देख कर लग रहा था कि वहां उस की बलि दी गई थी. कमल व उस की पत्नी जयश्री को खबर लगी तो दोनों नंगे पांव ही भागे.

इसी बीच गाँव के किसी व्यक्ति ने दीपावली की रात गांव के कमल कुरील की 6 वर्षीय बेटी मानसी की बलि देने की सूचना थाना घाटमपुर के इंसपेक्टर राजीव सिंह को दे दी.

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खबर पाते ही एसएचओ पुलिस टीम के साथ भदरस गांव पहुंच गए. भद्रकाली मंदिर गांव के बाहर था. वहां भारी भीड़ जुटी थी. दरअसल, मासूम बच्ची की बलि चढ़ाए जाने की बात भदरस ही नहीं, बल्कि अड़ोस पड़ोस के गांवों तक फैल गई थी. अत: सैकड़ों लोगों की भीड़ वहां जमा थी.

भीड़ देख कर राजीव सिंह के हाथपांव फूल गए. क्योंकि वहां मौजूद लोगों में गुस्सा भी था. लोगों ने साफ कह दिया था कि जब तक एसएसपी घटनास्थल पर नहीं आएंगे, तब तक वह बच्ची के शव को नहीं उठने देंगे. इंसपेक्टर राजीव सिंह ने यह जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी, फिर जांच में जुट गए.

मानसी की नग्न लाश भद्रकाली मदिर के पास नीम के पेड़ के नीचे गन्नू तिवारी के खेत में पड़ी थी. शव के पास मृत बच्ची का पिता कमल कुरील बदहवास खड़ा था और उस की पत्नी जयश्री कुरील दहाड़ मार कर रो रही थी. घर की महिलाएं उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं.

मासूम का पेट किसी नुकीले व धारदार औजार से चीरा गया था और पेट के अंदर के अंग दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें तथा किडनी गायब थीं. बच्ची के गुप्तांग पर चोट के निशान थे. माथे पर तिलक लगा था और पैरों पर महावर लगी थी. देखने से ऐसा लग रहा था कि नरपिशाचों ने बलि देने से पहले मासूम के साथ दुराचार भी किया था. शव के पास ही मृतका की चप्पलें, जींस तथा अन्य कपड़े पड़े थे. नमकीन का एक खाली पैकेट भी वहां पड़ा मिला.

इंसपेक्टर सिंह ने वहां पड़ी चीजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. उसी दौरान एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव तथा सीओ (घाटमपुर) रवि कुमार सिंह भी वहां आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा कई थानों की फोर्स बुलवा ली. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित भीड़ को आश्वासन दिया कि जिन्होंने भी दिल को झकझोर देने वाली इस घटना को अंजाम दिया है, वे जल्द ही पकड़े जाएंगे और उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाई जाएगी.

अधिकारियों के इस आश्वासन पर लोग नरम पड़ गए, उस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बालिका का शव देख कर पुलिस अधिकारी भी सिहर उठे.

एसएसपी के बुलावे पर डौग स्क्वायड भी घटनास्थल पर पहुंची. डौग स्क्वायड प्रभारी अवधेश सिंह ने जांच शुरू की. उन्होंने नीम के पेड़ के नीचे पड़ी बालिका के खून के अंश व उस की चप्पलें खोजी कुतिया यामिनी को सुंघाई. उसे सूंघने के बाद यामिनी खेत की पगडंडी से होते हुए गांव की ओर दौड़ पड़ी.

कई जगह रुकने के बाद वह सीधे मृतक बच्ची के घर पहुंची. यहां से बगल के घर से होते हुए गली के सामने बने एक घर पर पहुंची. 4 घरों में जाने के बाद गली के कोने में स्थित एक मंदिर पर जा कर वह रुक गई.

टीम ने पड़ताल की, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. इस के बाद यामिनी गांव का चक्कर लगा कर घटनास्थल पर वापस आ गई. यामिनी हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी.

मुख्यमंत्री योगी के आदेश पर एक पैर पर दौड़ी पुलिस

निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका मानसी के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय कानपुर भिजवा दिया. मोर्चरी के बाहर भी भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था.

उधर नरबलि की खबर न्यूज चैनलों तथा इंटरनेट मीडिया पर वायरल होते ही कानपुर से ले कर लखनऊ तक सनसनी फैल गई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद इस दुस्साहसिक वारदात को संज्ञान में लिया. मुख्यमंत्री ने मंडलायुक्त, डीएम व एसएसपी से वार्ता की और तुरंत आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई करने का आदेश दिया.

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उन्होंने दुखी परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और 5 लाख रुपए आर्थिक मदद देने की घोषणा की. उन्होंने कहा, ”सरकार इस प्रकरण की फास्टट्रैक कोर्ट में सुनवाई करा कर अपराधियों को जल्द सजा दिलाएगी.’’

मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई तो प्रशासन एक पैर पर दौडऩे लगा. आननफानन में 3 डाक्टरों का पैनल गठित किया गया और शव का पोस्टमार्टम कराया गया. मासूम के शव का परीक्षण करते समय पोस्टमार्टम करने वाली टीम के हाथ भी कांप उठे थे.

मासूम के पेट के अंदर कोई अंग था ही नहीं. दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें, किडनी, स्प्लीन और इन अंगों को आपस में जोड़े रखने वाली मेंब्रेंन तक गायब थी. मासूम के निजी अंगों में चोट के निशान थे, जिस से दुष्कर्म की पुष्टि हुई थी.

बच्ची के पेट में कुछ था या नहीं, आंतें गायब होने से इस की पुष्टि नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम के बाद मानसी का शव उस के पिता कमल कुरील को सौंप दिया गया.

इधर रात 10 बजे एसडीएम (नर्वल) रिजवाना शाहिद के साथ तत्कालीन विधायक (घाटमपुर क्षेत्र) उपेंद्र पासवान भदरस गांव पहुंचे और मृतका मानसी के पिता कमल कुरील को 5 लाख रुपए का चैक सौंपा. उन्हें 2 बीघा कृषि भूमि का पट्टा दिलाने का भी भरोसा दिया गया.

चैक लेते समय कमल व उन की पत्नी जयश्री की आंखों में आंसू थे. उन्होंने नरपिशाचों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले को वर्कआउट करने में देरी पर नाराजगी जताई थी, इसलिए एसएसपी प्रीतिंदर सिंह व एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव ने थाना घाटमपुर में डेरा डाल दिया और डीएसपी रवि कुमार सिंह के निर्देशन में खुलासे के लिए पुलिस टीम गठित कर दी.

इस टीम ने भदरस गांव पहुंच कर अनेक लोगों से गहन पूछताछ की. गांव के एक झोलाछाप डाक्टर ने गांव के गोंगा के मझले बेटे अंकुल कुरील पर शक जताया. पड़ोसी परिवार की एक बच्ची ने भी बताया कि शाम को उस ने मानसी को अंकुल के साथ जाते हुए देखा था.

अंकुल कुरील पुलिस की रडार पर आया तो पुलिस टीम ने उसे घर से उठा लिया. उस समय वह ज्यादा नशे में था. उसे थाना घाटमपुर लाया गया. उस से कई घंटे तक पूछताछ की, लेकिन अंकुल नहीं टूटा.

आधी रात के बाद जब नशा कम हुआ, तब उस से सख्ती के साथ दूसरे राउंड की पूछताछ की गई. इस बार वह पुलिस की सख्ती से टूट गया और मासूम मानसी की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

अंकुल ने जो बताया, उस से पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए और मामला ही पलट गया. अंकुल ने बताया कि उस के चाचा परशुराम व चाची सुनयना ने 1,500 रुपए में मासूम बच्ची का कलेजा लाने की सुपारी दी थी.

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                           आरोपी अंकुल कुरील और बीरन

उस के बाद उस ने अपने दोस्त वीरन के साथ मिल कर कमल की बेटी मानसी को पटाखा देने के बहाने फुसलाया. उसे वे गांव से एक किलोमीटर दूर भद्रकाली मंदिर के पास ले गए. वहां दोनों ने पहले उस बच्ची के साथ दुराचार किया फिर अंगौछे से उस का गला घोंट दिया.

उस के बाद चाकू से उस का पेट चीर कर अंगों को निकाल लिया गया. उस ने कलेजा पौलीथिन में रख कर चाची सुनयना को ले जा कर दे दिया. सुनयना और परशुराम ने कलेजे के 2 टुकड़े किए और कच्चा ही खा गए, ऐसा उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए किया था. इस के बाद वादे के मुताबिक चाची ने 500 रुपए मुझे तथा हजार रुपए वीरन को दिए. फिर हम लोग घर चले गए.

16 नवंबर, 2020 की सुबह 7 बजे पुलिस टीम ने पहले वीरन, फिर परशुराम तथा उस की पत्नी सुनयना को गिरफ्तार कर लिया. सुनयना के घर से पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त अंगौछा तथा 2 चाकू बरामद कर लिए. चाकू को सुनयना ने भूसे के ढेर में छिपा दिया था.

उन तीनों को थाने लाया गया. यहां तीनों की मुलाकात हवालात में बंद अंकुल से हुई तो वे समझ गए कि अब झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. अत: उन तीनों ने भी पूछताछ में सहज ही मानसी की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

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पुलिस ने जब परशुराम कुरील से कलेजा खाने की वजह पूछी तो उस के चेहरे पर पश्चाताप की जरा भी झलक नहीं थी. उस ने कहा कि सभी जानते हैं कि किसी बच्ची का कलेजा खाने से निस्संतानों के भी बच्चे हो जाते हैं. वह भी निस्संतान था. उस ने बच्चा पाने की चाहत में कलेजा खाया था.

चूंकि सभी ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था. इसलिए इंसपेक्टर राजीव सिंह ने मृतका के पिता कमल कुरील की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. अंकुल व वीरन के खिलाफ दुराचार तथा पोक्सो ऐक्ट के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया.

पुलिस पूछताछ में आरोपियों ने दिल कंपा देने वाली घटना का खुलासा किया.

बच्चा पैदा होने की लालसा में दी थी बलि

परशुराम कुरील भदरस गांव में ही कमल कुरील के घर के पास ही रहता था. परशुराम की शादी सुनयना के साथ लगभग 15 साल पहले हुई थी. परशुराम के पास कृषि भूमि नाममात्र की थी. वह साबुन का व्यवसाय करता था. वह गांव कस्बे में फेरी लगा कर साबुन बेचता था. इसी व्यवसाय से वह अपने घर का खर्च चलाता था.

भदरस और उस के आसपास के गांवों में अंधविश्वास की बेल खूब फलतीफूलती है, जिस का फायदा ढोंगी तांत्रिक उठाते हैं. भदरस गांव भी तांत्रिकों के मकडज़ाल में फंसा है. यहां घरघर कोई न कोई तांत्रिक पैठ बनाए हुए है.

बीमारी में तांत्रिक अस्पताल नहीं मुरगे की बलि, पैसा कमाने को मेहनत नहीं, बकरे की बलि, दुश्मन को ठिकाने लगाने के लिए शराब और बकरे की बलि, संतान के लिए नरबलि की सलाह देते हैं. इन तांत्रिकों पर पुलिस भी काररवाई करने से बचती है. कोई जघन्य कांड होने पर ही पुलिस जागती है.

परशुराम और उस की पत्नी सुनयना भी तांत्रिकों के मकडज़ाल में फंसे हुए थे. महीने में एक या 2 बार उन के घर तंत्रमंत्र व पूजापाठ करने कोई न कोई तांत्रिक आता रहता था.

दरअसल, सुनयना की शादी को 15 वर्ष से अधिक का समय बीत गया था. लेकिन उस की गोद सूनी थी. पहले तो उस ने इलाज पर खूब पैसा खर्च किया, लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो वह अंधविश्वास में उलझ गई और तांत्रिकों और मौलवियों के यहां माथा टेकने लगी.

तांत्रिक उसे मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते. धीरेधीरे 5 साल और बीत गए, लेकिन सुनयना की गोद सूनी की सूनी ही रही.

सामाजिक तिरस्कार से टूट गई थी सुनयना

सुनयना की जातिबिरादरी के लोग उसे बांझ समझने लगे थे और उस का सामाजिक बहिष्कार करने लगे थे. समाज का कोई भी व्यक्ति परशुराम को सामाजिक कार्य में नहीं बुलाता था. कोई भी औरत अपने बच्चे को उस की गोद में नहीं देती थी, क्योंकि उसे जादूटोना करने का शक रहता था.

परिवार के लोग उसे अपने बच्चे के मुंडन, जन्मदिन आदि में भी नहीं बुलाते थे, जिस से उसे पीड़ा होती थी. सामाजिक तिरस्कार से सुनयना टूट जरूर गई थी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी थी.

10 सालों से उस का तांत्रिकों के पास आनाजाना बना हुआ था. एक रोज वह विधनू कस्बे के एक तांत्रिक के पास गई और उसे अपनी पीड़ा बताई. तांत्रिक ने उसे आश्वासन दिया कि वह अब भी मां बन सकती है, यदि वह एक उपाय कर सके.

” कौन सा उपाय?’’ सुनयना ने उत्सुकता से पूछा.

”यही कि तुम्हें दीपावली की रात 10 साल से कम उम्र की एक बालिका की पूजापाठ कर बलि देनी होगी. फिर उस का कलेजा निकाल कर पतिपत्नी दोनों को आधाआधा खाना होगा. बलि देने तथा कलेजारूपी प्रसाद चखने से मां काली प्रसन्न होंगी और तुम्हें संतान प्राप्ति होगी.’’

”ठीक है बाबा, मैं उपाय करने का प्रयत्न करूंगी. अपने पति से भी रायमशविरा करूंगी.’’ सुनयना ने तांत्रिक से कहा.

उन्हीं दिनों परशुराम के हाथ ‘कलकत्ता का काला जादू’ नामक तंत्रमंत्र की एक किताब हाथ लगी. इस किताब में भी संतान प्राप्ति के लिए उपाय लिखा था और मासूम बालिका का कलेजा कच्चा खाने का जिक्र किया गया था.

परशुराम ने यह बात पत्नी सुनयना को बताई तो वह बोली, ”विधनू के तांत्रिक ने भी उसे ऐसा ही उपाय करने को कहा था.’’

अब परशुराम और सुनयना के मन में यह अंधविश्वास घर कर गया कि मासूम बच्ची का कच्चा कलेजा खाने से उन को संतान हो सकती है. इस पर उन्होंने गंभीरता से सोचना शुरू किया तो उन्हें लगा अंकुल उन की मदद कर सकता है. अंकुल परशुराम के बड़े भाई गोंगा कुरील का बेटा था. 3 भाइयों में वह मंझला था. वह नशेबाज और निर्दयी था, गंजेड़ी भी. अपने भाईबहनों के साथ मारपीट और हंगामा भी करता रहता था.

अपने स्वार्थ के लिए परशुराम ने भतीजे अंकुल को मोहरा बनाया. अब वह उसे घर बुलाने लगा और मुफ्त में शराब पिलाने लगा. गांजा फूंकने को पैसे भी देता. अंकुल जब हां में हां मिलाने लगा, तब एक रोज सुनयना ने उस से कहा, ”अंकुल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे पास बच्चा नहीं है. लेकिन तुम चाहो तो मैं मां बन सकती हूं.’’

”वह कैसे चाची?’’

”इस के लिए तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. आने वाली दीपावली की रात तुम्हें किसी बच्ची का कलेजा ला कर देना होगा. देखो ‘न’ मत करना. यदि तुम मेरा काम कर दोगेे तो हमारे घर में भी खुशी आ सकती है.’’

”ठीक है चाची, मैं तुम्हारे लिए यह काम कर दूंगा.’’

अंकुल राजी हो गया तो उन लोगों ने मासूम बच्ची पर मंथन किया. मंथन करते करते उन के सामने मानसी का चेहरा आ गया. मानसी कमल कुरील की बेटी थी. उस की उम्र 7 साल थी. कमल परशुराम के घर के पास रहता था.

वीरन कुरील अंकुल का दोस्त था. पारिवारिक रिश्ते में वह उस का भाई था. वीरन भी नशेड़ी था, सो उस की अंकुल से खूब पटती थी. अंकुल ने वीरन को सारी बात बताई और उसे भी अपने साथ मिला लिया था. अब अंकुल के साथ वीरन भी परशुराम के घर जाने लगा और नशेबाजी करने लगा.

14 नवंबर, 2020 को दीपावली थी. अंकुल और वीरन शाम 5 बजे परशुराम के घर पहुंच गए. परशुराम ने दोनों को खूब शराब पिलाई. सुनयना ने दोनों को कलेजा लाने की एवज में 1500 रुपए देने का भरोसा दिया.

इस के बाद उस ने अंकुल व वीरन को गोश्त काटने वाले 2 चाकू दिए. इन चाकुओं को पत्थर पर घिस कर दोनों ने धार बनाई. सुनयना ने महावर की एक शीशी अंकुल को दी और कुछ आवश्यक निर्देेश दिए.

शाम 6 बजे अंकुल और वीरन परशुराम के घर से निकले, तब तक अंधेरा घिर चुका था. वे दोनों जब कमल के घर के सामने आए तो उन की निगाह मासूम मानसी पर पड़ी. वह नए कपड़े पहने पेड़ के नीचे एक बच्ची के साथ खेल रही थी. अंकुल ने मानसी को बुलाया और पटाखों का लालच दिया.

मानसी पर मौत का साया मंडरा रहा था. वह मान गई और अंकुल के साथ चल दी. दोनों मानसी को ले कर गांव के बाहर आए और फिर भद्रकाली मंदिर की ओर चल पड़े. मानसी को आशंका हुई तो उस ने पूछा, ”भैया, कहां ले जा रहे हो?’’

यह सुनते ही अंकुल ने उस का मुंह दबा दिया और वीरन ने चाकू चुभो कर उसे डराया, जिस से उस की घिग्घी बंध गई. फिर वे दोनों मानसी को भद्रकाली मंदिर के पास ले गए और नीम के पेड़ के नीचे पटक दिया.

उन दोनों ने मानसी के शरीर से कपड़े अलग किए तो उन के अंदर का शैतान जाग उठा. उन्होंने बारीबारी से उस के साथ दुराचार किया. इस बीच मासूम चीखी तो उन्होंने अंगौछे से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

इस के बाद सुनयना के निर्देशानुसार अंकुल ने मानसी के पैरों में लाल रंग लगाया तथा माथे पर टीका किया. फिर चाकू से उस का पेट चीर डाला. अंदर से अंग काट कर निकाल लिए और कलेजा पौलीथिन में रख कर वहां से निकल लिए. रास्ते में पानी भरे एक गड्ढे में बाकी अंग फेंक दिए और कलेजा ला कर परशुराम को दे दिया.

शराब से धो कर दोनों ने खाया कलेजा

परशुराम ने कलेजे को शराब से धोया फिर चाकू से उस के 2 टुकड़े किए. उस ने एक टुकड़ा स्वयं खा लिया तथा दूसरा टुकड़ा पत्नी सुनयना को खिला दिया. सुनयना ने खुश हो कर 500 रुपए अंकुल को और 1,000 रुपए वीरन को दिए. उस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चले गए.

इधर दीया जलाते समय कमल को मानसी नहीं दिखी तो उस ने खोज शुरू की. कमल व उस की पत्नी जयश्री रात भर बेटी की खोज करते रहे. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला. सुबह गांव के कुछ लोगों ने उसे बेटी की हत्या की जानकारी दी. तब वह वहां पहुंचा. इसी बीच किसी ने घटना की जानकारी थाना घाटमपुर पुलिस को दे दी थी.

17 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन चारों को जिला जेल भेज दिया गया.

जेल जाने के बाद आरोपियों ने अपने वकीलों के माध्यम से जमानत पाने का प्रयास किया, लेकिन उन के खिलाफ ठोस सबूत मिल जाने से उन को जमानत नहीं मिली. इस चर्चित कांड में मुकदमे के विवेचना अधिकारी इंसपेक्टर राजीव सिंह ने विवेचना कर के सबूतों सहित सभी साक्ष्य जुटा कर आरोपियों के खिलाफ गैंगरेप, हत्या, शव गायब करने तथा पोक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं में 37 दिन में अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया.

अदालत में करीब 3 साल तक इस बहुचर्चित मामले की काररवाई चलती रही, जिस में 10 गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए. इन गवाहों में अदालत ने गांव के झोलाछाप डाक्टर रवि तथा मृतका के साथ खेल रही पड़ोस की लड़की का बयान अहम माना. इन दोनों ने ही आरोपी अंकुल का नाम पुलिस को बताया था.

पोस्टमार्टम करने वाले 2 डाक्टरों की गवाही को भी अदालत ने अहम माना. शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने भी केस की जम कर पैरवी की. न्यायालय में पेश हुए साक्ष्यों के आधार पर ही अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने आरोपियों को दोषी ठहराया.

सजा सुनाने के लिए अपर जिला जज साहब शाम 4 बजे कोर्ट में पहुंच गए. उस समय आरोपियों के अलावा मामले से जुड़े सभी वकील व मानसी के मातापिता तथा अन्य लोग भी कोर्टरूम में मौजूद थे.

अपर जिला जज वाकर शमीम रिजवी ने बिना कोई भूमिका बनाए सीधे फैसला सुनाते हुए कहा, ”अभियुक्त अंकुल व वीरन ने अमानवीय तथा हृदयविदारक जघन्य अपराध किया था. अपराध प्रवृत्ति को देखते हुए दोनों समाज के लिए खतरा हैं. ऐसे हालात में उन के साथ नरमी का रुख अपनाए जाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता.

”6 साल की मासूम बच्ची का अपहरण कर गैंगरेप करना फिर हत्या कर कलेजा निकालना जघन्य अपराध माना जाना न्यायोचित प्रतीत होता है. इसलिए अभियुक्त अंकुल व वीरन को उम्रकैद की सजा दी जाती है. सजा के साथ दोनों को 45-45 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है. अर्थदंड न देने पर 6 माह की सजा और भुगतनी होगी.’’

कुछ क्षण रुकने के बाद जज साहब ने कहा, ”आरोपी दंपति परशुराम व सुनयना ने नियोजित तरीके से षडयंत्रपूर्वक अपराध किया था. उन दोनों ने संतान पाने के लिए 7 साल की बच्ची का कलेजा सहयोगियों के मार्फत मंगवाया और फिर खाया. उन का यह अपराध अतिगंभीर व हृदयविदारक है.

उन के खिलाफ नरमी का रुख अपनाया जाना न्यायोचित नहीं होगा. अत: उन्हें उम्रकैद की सजा दी जाती है. सजा के साथ दोनों को 20-20 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया जाता है. अर्थदंड न देने पर 6 माह की सजा और भुगतनी होगी.’’

अदालत का फैसला आते ही कमल व उस की पत्नी जयश्री की आंखें छलक पड़ीं. शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय के साथ मौजूद कमल ने रुंधे गले से कहा कि हमें सजा से संतोष तो है, लेकिन दोषियों को फांसी होती तो हमारे कलेजे को और ठंडक मिल जाती.

शासकीय अधिवक्ता प्रदीप पांडेय ने कहा कि उन्होंने कोर्ट से केस के रेयरेस्ट औफ द रेयर होने की बात कह कर फांसी की सजा की मांग की थी, लेकिन कोर्ट का फैसला उम्रकैद आया. हम अध्ययन करेंगे और यदि कुछ बिंदु निकलते हैं तो फांसी के लिए हाईकोर्ट में अपील भी करेंगे.

सजा सुनाए जाने के बाद चारों दोषियों परशुराम, सुनयना, अंकुल व वीरन को कानपुर देहात की माती जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक चारों दोषी माती जेल में बंद थे.

—कथा अदालत के फैसले पर आधारित. कथा में मानसी, कमल और जयश्री परिवर्तित नाम हैं.

22 साल से लापता बेटा जब संन्यासी बन कर लौटा

किसी चमत्कार के इंतजार में सालों से दिन गुजार रहे रतिपाल और घर वालों को 22 साल बाद साधु वेश में अपना खोया बेटा पिंकू मिला तो सब की आंखें छलक उठीं थीं. बेटा मिलने की खुशी में रतिपाल ने दिल्ली से अपनी पत्नी माया देवी को भी बुला लिया. खोए बेटे पिंकू को साधु वेश में देखते ही मां भावुक हो गई. उस के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

दरअसल, संन्यासी की पारंपरिक पोशाक में आए एक युवक ने सारंगी बजा कर भिक्षा देने की गुहार लगा कर जैसे ही एक रुदन गीत गाना शुरू किया तो उसे सुन कर बड़ी संख्या में गांववाले एकत्र हो गए. जोगी ने अपने आप को गांव के ही रहने वाले रतिपाल सिंह का गायब हुआ बेटा बताया. रुदन गीत सुन कर गांव की महिलाओं और पुरुषों के साथ ही रतिपाल के घर वालों की आंखों से आंसू झरने लगे.

दरअसल, 22 साल से लापता अरुण उर्फ पिंकू के लौटने की खुशी में पूरा गांव रो पड़ा. घर वालों के आंसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. यह दृश्य उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के थाना जायज के गांव खरौली का था. तारीख थी 28 जनवरी, 2024.

Jogi or Sathi ke Ane Par Ekatra Ganv Wale

बताते चलें कि साधु के वेश में अपने एक साथी के साथ आया वह युवक गांव के ही रतिपाल सिंह का बेटा अरुण उर्फ पिंकू था, जो 22 साल से अधिक समय तक लापता रहने के बाद अब संन्यासी के वेश में उन के सामने था. जब पिंकू लापता हुआ, उस समय वह 11 साल का था. अब पिंकू जोगी बन कर अपने गांव में मां से भिक्षा लेने पहुंचा था. इतने लंबे समय बाद अपने खोए बेटे को संन्यासी के रूप में सामने देख पिता व अन्य परिजन भावुक हो गए.

मां माया देवी, पिता रतिपाल के अलावा पिंकू की बुआओं उर्मिला व नीलम ने भी साधु वेश में आए पिंकू से गृहस्थ जीवन में लौटने की मिन्नतें कीं. लेकिन युवक की जुबान पर एक ही रट थी, ‘आप से भिक्षा लिए बिना मेरी दीक्षा पूरी नहीं होगी. गुरु का आदेश है कि मां के हाथ से भिक्षा पाने के बाद ही योग सफल होगा.’ उस ने कहा, ‘मां, यदि आप भिक्षा नहीं दोगी तो मैं दरवाजे की मिट्टी को ही भिक्षा के रूप में स्वीकार कर चला जाऊंगा.’

अब बेटा नहीं संन्यासी हूं मैं

साधु ने कहा, ”माई, मैं अब आप का बेटा पिंकू नहीं, बल्कि संन्यासी हूं. मैं भिक्षा ले कर वापस झारखंड स्थित पारसनाथ मठ में दीक्षा पूरी करने के लिए चला जाऊंगा.’’

साधु की बातें सुन कर रतिपाल और उन की पत्नी का कलेजा बैठ गया. उन्होंने उसे मनाने के साथ ही कहीं भी जाने से मना किया.

साधु खरौली गांव में 22 जनवरी, 2024 से ही आनेजाने लगा था. वह साथी के साथ आधे गांव में चक्कर लगा कर सारंगी व ढपली पर भजन गाता था. इस के बाद शाम होते ही वापस चला जाता.

रतिपाल मूलरूप से गांव खरौली के रहने वाले हैं. गांव में उन का छोटा भाई जसकरन सिंह, भतीजे व अन्य लोग रहते हैं. गांव में उन की खेती की जमीन भी है. 11वीं पास करने के बाद उन की शादी हो गई थी. साल 1986 में वह दिल्ली आ गए. यहां उन के एक बेटा हुआ, जिस का नाम उन्होंने अरुण रखा. घर में सभी प्यार से उसे पिंकू के नाम से पुकारते थे.

Arun Pankoo Birthday Par Kek Khata Huaa

                                      पिंकू के बचपन की तस्वीर

जब पिंकू 5-6 साल का था, उस की मां भानुमति बीमार हो गई. 3 साल तक उन का दिल्ली में इलाज चलता रहा, लेकिन उन की मृत्यु हो गई. रतिपाल ने बच्चे की परवरिश व अपनी आगे की जिंदगी के लिए वर्ष 1998 में माया देवी से दूसरी शादी कर ली. सब कुछ ठीक चल रहा था.

डांटने से गुस्से में घर से चला गया था पिंकू

कंचे खेलने पर मां की डांट से गुस्से में आ कर साल 2002 में 11 साल की उम्र में पिंकू अपने घर से कहीं चला गया. उस समय वह दिल्ली के शहादतपुर स्थित स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ता था. घर वालों ने पिंकू को काफी तलाश किया, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिलने पर पिता रतिपाल ने दिल्ली के थाना खजूरी खास में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई.

समय गुजरता गया लेकिन लापता बेटा नहीं मिला. रतिपाल हफ्ते दस दिन में थाने जा कर पुलिस से अपने खोए बेटे के बारे में जानकारी लेते, लेकिन उन्हें हर बार एक ही जबाव मिलता कि तलाशने पर भी आप का बच्चा नहीं मिल रहा है.

रतिपाल ने अपने स्तर से भी बच्चे को तलाश किया, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला. अपने इकलौते बेटे के इस तरह घर से चले जाने पर मातापिता ने कलेजे पर पत्थर रख कर सब्र कर लिया.

27 जनवरी, 2024 को खरौली में रह रहे भतीजे दीपक ने दिल्ली रतिपाल के पास फोन किया, ”चाचा, साधु भेष में एक युवक 22 जनवरी से गांव में आया हुआ है, जो अपने को आप का खोया हुआ बेटा अरुण उर्फ पिंकू बता रहा है. जब उस से पिंकू की कोई पहचान बताने को कहा तो उस ने कहा कि पिता जब खुद देख कर बताएंगे, तभी पहचान सभी गांव वालों को दिखाऊंगा. चाचा, आप गांव आ कर देख लो. साधु कल आने की बात कह कर रायबरेली से लगभग 30 किलोमीटर दूर बछगांव स्टेशन जाने की बात कह कर चला गया है.’’

बेटे से मिलने की चाहत और मन में ढेरों सवाल लिए रतिपाल अपनी बहन नीलम के साथ दिल्ली से गांव खरौली 28 जनवरी को ही पहुंच गए. दूसरे दिन वह साधु अपने एक साथी के साथ सुबह 11 बजे गांव आया. आधे गांव का चक्कर लगाता और सारंगी पर भजन गाते हुए साधु रतिपाल के घर पर पहुंचा.

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पिंकू निकला नफीस

साधु ने देखते ही पापा व बुआओं को पहचान लिया. साधु ने उन्हें बताया कि वह वास्तव में उन का बेटा पिंकू है. वह संन्यासी हो गया है, भिक्षा मांगने आया हुआ है. रतिपाल ने उस के पेट पर बचपन की चोट के निशान को देखने के बाद अपने खोए बेटे अरुण उर्फ पिंकू के रूप में उस की पहचान की.

बेटे की खातिर रतिपाल सब कुछ न्यौछावर करने को हो गया तैयार

बचपन में खोए बेटे को 22 साल बाद दरवाजे पर देख पिता व परिजनों की उम्मीद लौट आई थी. आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी. स्नेह ऐसा जागा कि भींच कर उसे सीने से लगा लिया. बेटे को घर लाने के लिए पिता सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार था.

खोए बेटे के मिलने पर रतिपाल ने घर पर साधु व उस के साथी के साथ भोजन भी किया. अब साधु रतिपाल को पापा तथा रतिपाल उसे पिंकू कह कर पुकारने लगे थे. रतिपाल ने खोए बेटे के मिलने की खुशखबरी अपनी रिश्तेदारी में भी दे दी थी. इस पर कई रिश्तेदार गांव आ गए थे.

एक सप्ताह तक वह जोगी अपने साथी के साथ रोजाना गांव आता और शाम होते ही वापस चला जाता. इस दौरान उस की रतिपाल और परिजनों से बातें भी होतीं. भोजन भी पापा के साथ करता. अपने पापामम्मी व अन्य घर वालों के प्यार को देख कर पिंकू का झुकाव भी उन की ओर होने लगा.

वहीं रतिपाल की बूढ़ी आंखों ने अपने खोए बेटे को 22 साल बाद देखा तो प्यार फफक पड़ा. खोए बेटे को किसी भी तरह वापस पाने के लिए परिवार तड़प उठा. सभी के प्रयास विफल होने पर रतिपाल ने जोगी से किसी भी तरह घर लौटने की गुजारिश की.

इस पर उस ने कहा, ”पापा, आप मेरे गुरु महाराज से बात कर मुझे आश्रम से छुड़ा लो.’’

”पापा, आश्रम से गुरुजी ने मुझे दीक्षा के दौरान लंगोटी, कमंडल व अंगवस्त्र दिए हैं. मठ की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. मठ का सामान वापस करना होगा.’’

तब रतिपाल ने कहा, ”बेटा, तुम गुरुजी से बात कर प्रक्रिया के बारे में बताना. मैं तुम्हें घर लाने के लिए प्रक्रिया पूरी कर दूंगा.’’

अनाज व नकदी दे कर किया विदा

दिल पर पत्थर रख कर घर वालों व गांव वालों ने भिक्षा के रूप में उसे 13 क्ंिवटल अनाज और रतिपाल ने जोगी बने बेटे पिंकू को संपर्क में बने रहने के लिए एक नया मोबाइल फोन व नकदी दे कर पहली फरवरी को विदा किया. रतिपाल की बाराबंकी में रहने वाली बहन निर्मला ने पिंकू द्वारा बताए खाते में 11 हजार रुपए की रकम ट्रांसफर कर दी.

पिंकू ने कहा कि वह यहां से सभी सामान ले कर अयोध्या जाएगा, जहांं साधुओं को भंडारा कराएगा. सामान पहुंचाने के लिए रतिपाल ने एक वाहन का इंतजाम कर दिया. पहली फरवरी, 2024 को जोगी अपने साथी के साथ सामान ले कर चला गया. रतिराम, पत्नी माया देवी परिजनों के साथ ही गांव वालों ने भारी मन से जोगी को विदा किया.

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घर से भिक्षा ले कर जाने के बाद संन्यासी बेटे पिंकू का मन पसीज गया. दूसरे दिन उस ने फोन कर पिता से घर लौटने की इच्छा जताई. बेटे के गृहस्थ जीवन में लौटने की बात सुन कर रतिराम की खुशी का पारावार नहीं रहा. उस ने बताया कि गुरु महाराज का कहना है कि गृहस्थ आश्रम में लौटने के लिए दीक्षा के रूप में 10.80 लाख रुपए चुकाने पड़ेंगे.

रतिपाल ने इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थता जताई. इतना ही नहीं, पिंकू ने पिता की मठ के गुरु महाराज से फोन पर बात भी कराई. लेकिन इतनी बड़ी रकम देने की उन की हैसियत नहीं थी. तब 4.80 लाख देने की बात कही गई.

गुरुओं की दीक्षा चुकाने की शर्त पर पिता ने आखिरकार बेटे को पाने के लिए 3 लाख 60 हजार रुपए में हां कर दी.

मठ का खाता न बताने पर हुआ शक

बेटे को वापस पाने के लिए मजबूर पिता ने 14 बिस्वा जमीन का सौदा गांव के ही अनिल कुमार वर्मा से 11 लाख 20 हजार रुपए में तय कर लिया. 3-4 दिन रतिपाल को पैसों का इंतजाम करने में लग गए.

इस के बाद साधु पिंकू की ओर से बताए गए आईसीआईसीआई बैंक खाते में पैसा ट्रांसफर करने भाई जसकरन व भतीजे धर्मेश के साथ पहुंचे. रतिपाल ने बताया, बैंक मैनेजर ने उन से कहा कि एक दिन में 25 हजार से ज्यादा रुपए ट्रांसफर नहीं हो सकते. पिंकू ने यूपीआई से भुगतान करने को कहा.

रतिपाल ने पिंकू से कहा कि अपने मठ के ट्रस्ट का बैंक खाते का नंबर दे दो, उस पर भुगतान कर देंगे. इस के बाद वहां आ कर तुम्हें अपने साथ घर ले आएंगे तो साधु ने मना कर दिया. यहीं से रतिपाल को कुछ शक होने लगा. तब प्रशासन से उन्होंने मदद मांगी.

रतिपाल सिंह समझ गए कि बेटे पिंकू के रूप में आया जोगी कोई ठग है. उस ने उन की भावनाओं का सौदा किया है. रतिपाल ने 10 फरवरी, 2024 को थाना जायस में 2 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 419 के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कराई.

एसएचओ देवेंद्र सिंह ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद इस केस की जांच बहादुरपुर चौकी प्रभारी राजकुमार सिंह को सौंपी. आरोपी का मोबाइल बंद आने पर उसे सर्विलांस पर लगा दिया गया.

इस के बाद रतिपाल को जब शंका हुई तो उन्होंने अपने स्तर से जांचपड़ताल करनी शुरू कर दी. उन के हाथ उसी साधु बने युवक के कई फोटो और वीडियो लग गए हैं. रतिपाल ने बताया कि उन्होंने झारखंड के एसपी से फोन पर बात की. पूरा प्रकरण बताया. एसपी को जोगी का मोबाइल नंबर भी दिया.

उन्होंने अपने स्तर से जांच कराई फिर फोन कर बताया कि यह नंबर झारखंड में नहीं, बल्कि गोंडा में चल रहा है. इस के साथ ही झारखंड में पारसनाथ नाम का कोई मठ है ही नहीं. उन्होंने कहा कि उसे पकड़ा जाए और यदि वह गलत है तो सजा मिले.

जोगी की सच्चाई पता करने के लिए रतिपाल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. जिस गुरु का नाम बताया, वह भी गलत निकला. दीक्षा में मिले 13 क्विंटल अनाज व अन्य सामान को पिकअप में ले कर साधु अयोध्या जाने की कह कर गया था. पिकअप चालक  के साथ रतिपाल अयोध्या पहुंचे तो वहां कोई नहीं मिला. पिकअप चालक ने बताया कि अरुण अयोध्या न जा कर उसे गोंडा ले गया था, वहीं सारा सामान उतरवाया था.

गोंडा की जिस आईसीआईसीआई बैंक के खाते का नंबर साधु ने रतिपाल को दिया था वह खाता आशीष कुमार गुप्ता, आशीष जनरल स्टोर मुंबई का निकला. बाराबंकी में रहने वाली रतिपाल की बहन निर्मला ने उसी खाते में 11 हजार रुपए की धनराशि ट्रांसफर की थी.

रतिपाल ने बताया कि उन्होंने पुलिस को बैंक स्टेटमेंट सौंप दिया है. उन्होंने बताया कि उन्हें मीडिया के माध्यम से पता चला है कि साधु के भेष में आया युवक जो अपने को उन का खोया बेटा पिंकू बताता था, उस युवक का नाम नफीस है.

ठगी के लिए साधु का वेश धारण किया

सीओ (तिलोई) अजय सिंह ने बताया कि मामला ठगी से जुड़ा हुआ है. पूरे मामले पर मुकदमा पंजीकृत कर मामले की छानबीन की जा रही है. जल्द से जल्द इस पूरे मामले में कड़ी से कड़ी काररवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि 10 फरवरी को जायस थाना क्षेत्र के खरौली गांव निवासी रतिपाल सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

गोंडा के एसपी विनीत जायसवाल ने बताया, ”टिकरिया गांव में रहने वाले कई लोगों द्वारा जोगी बन कर जालसाजी करने की शिकायत मिली है. 2 आरोपियों द्वारा अमेठी जिले में भी साधु वेश बना किसी को झांसा देने का मामला प्रकाश में आया है. पुलिस को तलाश के निर्देश दिए गए हैं.’’

रिपोर्ट दर्ज होने और उच्चाधिकारियों के निर्देश के बाद जायस थाने की पुलिस सक्रिय हो गई. रतिपाल ने बताया कि 16 फरवरी, 2024 को एक प्राइवेट वाहन से जायस पुलिस के साथ गोंडा कोतवाली देहात की सालपुर पुलिस चौकी पहुंचे. वहां के चौकी इंचार्ज पवन कुमार सिंह से मिले, उन्होंने जांच में पूरा सहयोग करने की बात कही. इस चौकी से कुछ दूरी पर ही टिकरिया गांव है.

उन्होंने कहा कि गोंडा की सालपुर चौकी पर उन्हें 5 घंटे तक बैठाया गया. कहा कि आप यहीं बैठो, पुलिस दबिश देने जा रही है. नफीस के घर पहुंची पुलिस टीम सब से पहले नफीस के परिवार से मिली. उस समय घर पर बुजुर्ग महिलाएं ही थीं. उन्होंने बताया कि 25 वर्षीय नफीस करीब एक महीने से घर से बाहर है.

पुलिस को आया देख कर आरोपी गन्ने के खेत में भाग गया था. पुलिस ने उसे पकडऩे का प्रयास किया, लेकिन वह हाथ नहीं आया. पुलिस ने बताया, पिंकू बन कर घर पहुंचा ठग टिकरिया निवासी सिजाम का बेटा नफीस है, जो ठगी के मामले में पहले भी जेल जा चुका है.

जबकि उस का भाई राशिद 29 जुलाई, 2021 को जोगी बन कर मिर्जापुर के गांव सहसपुरा परसोधा निवासी बुधिराम विश्वकर्मा के यहां उन का 14 साल पहले लापता हुआ बेटा रवि उर्फ अन्नू बन कर पहुंचा था. मां से भिक्षा मांगी ताकि उस का जोग सफल हो जाए. परिजनों ने बेटा मान कर उसे घर में रख लिया. कुछ दिन बाद वह लाखों रुपए ले कर फरार हो गया था. बाद में पकड़ा गया और जेल गया.

पुलिस की दस्तक के चलते नफीस, उस के दोनों भाई दिलावर और राशिद समेत अधिकांश तथाकथित साधु अंडरग्राउंड हो गए. उस का एक रिश्तेदार असलम भी ऐसे मामले में वांछित चल रहा है. नफीस का मोबाइल बंद है.

पड़ताल में सामने आया कि नफीस के ससुर का भाई असलम उर्फ लंबू घोड़ा भी वाराणसी में जेल जा चुुका है. तब पुलिस ने शिकायत के आधार पर एक परिवार को इसी तरह जोगी का झांसा दे कर ठगने के बाद उसे दबोच लिया था.

पेट के टांकों को देख कर की पहचान

रतिपाल ने बताया कि 22 साल पहले उस का 11 वर्षीय बेटा अरुण उर्फ पिंकू घर से कहीं चला गया था. एक बार वह सीढ़ी से गिर गया था, जिस से उस के पेट में अंदरूनी चोट आई थी. इस बात का 6 माह तक पता नहीं चला. पिंकू की आंत सड़ गई थी, जिस के चलते उस का औपरेशन दिल्ली के कृष्णा नगर स्थित होली चाइल्ड अस्पताल में हुआ था. उस के 14 टांके आए थे.

साधु के भेष में आए व्यक्ति ने उन्हें टांकों के निशान दिखाए थे. लेकिन वे असली थे या बनाए हुए थे, ये नहीं पता. रतिपाल सिंह पहले अपनी बहन नीलम के साथ खरौली गांव पहुंचे थे. खबर दिए जाने पर बहन उर्मिला भी आ गई थी. उन्होंने अपनी पत्नी माया देवी को घर पर ही बच्चों की देखभाल के लिए छोड़ दिया था. खोए पिंकू की पहचान हो जाने के बाद उन्होंने पत्नी को भी गांव बुला लिया था.

रतिपाल की दूसरी शादी के बाद 4 बच्चे हुए. 2 बेटी व 2 बेटे हैं. बड़ी बेटी 24 वर्ष की है. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है. एक बेटा 12वीं तथा सब से छोटा 9वीं में पढ़़ रहा है. वे घर पर ही बर्थडे में बच्चों के लगाए जाने वाली कैप बनाने का कार्य पत्नी के सहयोग से कर गुजरबसर करते हैं.

पूरा परिवार जिस युवक को अपना खोया बेटा पिंकू मान कर प्यार लुटा रहा था. असल में वह जालसाज गोंडा जिले के टिकरिया गांव  का नफीस निकला. टिकरिया के 20-25 लोगों का गैंग कई राज्यों में सक्रिय है. वह खोए बच्चों के बारे में जानकारी करने के बाद परिजनों की भावनाओं से खिलवाड़ कर ठगी करने का काम करते हैं.

साइबर सेल प्रभारी बृजेश सिंह का कहना है कि किसी गांव में बच्चों के खोने या लापता होने पर परिजन खुद उस का प्रचार प्रसार करते हैं. इस प्रचार से उन्हें आस होती है कि शायद कोई व्यक्ति उन की खोई संतान को वापस मिला देगा. पैंफ्लेट व अखबारों से भी पहचान के लिए चोट के निशानों का उल्लेख किया जाता है. ठगों का यह गैंग स्थानीय स्तर पर जानकारी एकत्र कर इसी का फायदा उठा कर ठगी करता है.

मातापिता की भावनाओं से खेल कर संपत्ति व धन हड़पने का नफीस का षडयंत्र विफल हो गया. 22 साल पहले लापता बेटा पिंकू बन कर गांव जायसी पहुंचा साधु वेशधारी पुलिस जांच में गोंडा के गांव टिकरिया निवासी नफीस और उस का साथी पट्टर  निकला. गांव वालों ने वायरल वीडियो में भी दोनों की तस्दीक की. पुलिस की सक्रियता से ठगी की मंशा का खुलासा हुआ तो ठग और उस का साथी दोनों फरार हो गए.

गोंडा में पड़ताल करने पर पता चला कि टिकरिया गांव के कुछ परिवार इस तरह की ठगी करते हैं. उन का एक गैंग ठगी का काम करता है. ठगी जेल तक जा चुकी है. उन्हीं में से एक नफीस का भी परिवार है.

नफीस मुकेश (मुसलिम) का दामाद है. उस की पत्नी का नाम पूनम है. उस का एक बेटा अयान है. ठग साधु कहता था कि उस ने झारखंड के पारसनाथ मठ में दीक्षा ली है. मठ के गुरु का आदेश था कि अयोध्या में दर्शन के बाद गांव जा कर अपनी मां से भिक्षा मांगना, तभी दीक्षा पूरी होगी. सच यह है कि झारखंड में पारसनाथ नाम का कोई मठ है ही नहीं. बेटा बन कर अब तक नफीस कई लोगों को चूना लगा चुका है.

रतिपाल का कहना है कि दोनों ठगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी पुलिस हाथ पर हाथ रखे बैठी है. दोनों ठग अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं. जिस बैंक खाते में 11 हजार रुपए बहन निर्मला ने जमा कराए थे, उस खाते वाले को पकड़ा जाए, जिस से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और इन ठगों का गैंग पकडऩे में मदद मिलेगी.

पुलिस फरार चल रहे दोनों साधु वेशधारी ठगों की सरगरमी से तलाश में जुटी है. पुलिस का कहना है कि समय रहते इन ठगों का भेद खुल जाने से रतिपाल व उन का परिवार बहुत बड़ी ठगी व मुसीबत से बच गए.

पिता रतिपाल को पुत्र वियोग और मिलन के बाद उसे दोबारा पाने की चाह है, लेकिन किसी षडयंत्र की आशंका भी है. उन का कहना है कि खोया हुआ बेटा इस समय 33 वर्ष का होता.

—कथा पुलिस व परिजनों से की गई बातचीत पर आधारित

कुत्ते वाली मैडम के काले कारनामे

कानपुर के साकेत नगर के डब्ल्यू ब्लौक के रहने वाले लोग कुत्ते वाली मैडम से  बहुत परेशान थे. सीमा तिवारी नाम की वह महिला संदीप अग्रवाल के मकान में किराए पर रहती थी. उस ने विदेशी नस्ल का कुत्ता पाल रखा था. वह कुत्ता था तो छोटा सा, लेकिन अकसर भौंकता रहता था. जिस से मोहल्ले वाले डिस्टर्ब होते थे.

इस के अलावा सीमा तिवारी के घर शाम ढलते ही लड़के और लड़कियों की आवाजाही शुरू हो जाती थी. कालोनी के लागों को शक था कि सीमा के घर जरूर कोई गैरकानूनी काम होता है. कुछ लोगों को लगता था कि सीमा चकला घर चलाती है. इस मामले में पुलिस ने काररवाई कराने के लिए कुछ लोग एसपी (साउथ) रवीना त्यागी से मिले.

रवीना त्यागी ने आगंतुकों की बात गौर से सुनी और आश्वासन दिया कि यदि जांच में यह सूचना सही पाई गई तो सीमा तिवारी व अन्य दोषियों के खिलाफ जरूरी काररवाई की जाएगी.

उन के जाने के बाद रवीना त्यागी ने तत्काल किदवई नगर के थानाप्रभारी कुंज बिहारी मिश्रा को अपने कार्यालय बुलवा लिया. उन्होंने मिश्रा से कहा कि तुम्हारे थाना क्षेत्र के डब्ल्यू ब्लौक, साकेत नगर में कालगर्ल का धंधा होने की जानकारी मिली है. जांच कर इस मामले में जरूरी काररवाई करो.

कप्तान साहिबा को मिलने के बाद थानाप्रभारी सीधे साकेत नगर पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने चौकी इंचार्ज डी.के. सिंह से इस बारे में बात की और इस शिकायत की गोपनीय जांच करने को कहा.

चूंकि मामला कप्तान साहिबा ने सौंपा था इसलिए थानाप्रभारी और चौकी प्रभारी ने अपने मुखबिरों को लगा दिया. इस के 2 दिन बाद ही एक खास मुखबिर ने आ कर बताया कि डब्ल्यू ब्लौक साकेत नगर में टेलीफोन एक्सचेंज के पास वाले मकान में जिस्मफरोशी का धंधा होता है. इस रैकेट की संचालिका सीमा तिवारी है, जो कुत्ते वाली मैडम के नाम से जानी जाती है. सीमा का पति भी इस धंधे में दलाली करता है.

थानाप्रभारी ने इस जानकारी से एसपी (साउथ) रवीना त्यागी को अवगत करा दिया. चूंकि दबिश के दौरान सीओ स्तर के पुलिस अधिकारी की मौजूदगी जरूरी होती है, इसलिए एसपी ने सीओ मनोज कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित की. इस टीम में थानाप्रभारी कुंज बिहारी मिश्रा, चौकी इंचार्ज डी.के. सिंह के साथसाथ कुछ हैडकांस्टेबल और सिपाहियों को शामिल किया गया.

11 अप्रैल, 2019 की रात 8 बजे पुलिस टीम ने सीमा तिवारी के अड्डे पर छापा मारा. मकान के अंदर एक कमरे का दृश्य देख कर पुलिस चौंकी. कमरे में 2 अर्धनग्न महिलाएं बिस्तर पर चित पड़ी थीं. उन के साथ 2 युवक कामक्रीड़ा में लीन थे.

पुलिस पर निगाह पड़ते ही दोनों युवकों ने दरवाजे से भागने का प्रयास किया पर दरवाजे पर खडे़ पुलिसकर्मियों ने उन्हें दबोच लिया. दूसरे कमरे में एक युवती सजी संवरी बैठी थी. शायद उसे ग्राहक के आने का इंतजार था.

महिला सिपाही ने उसे भी हिरासत में ले लिया. कमरे में तलाशी के दौरान सैक्सवर्धक दवाएं तथा कई आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई. पुलिस ने ऐसी सभी चीजें अपने कब्जे में ले लीं. छापे में सरगना के अलावा 3 युवतियां, 2 ग्राहक तथा एक दलाल पकड़ा गया. इन सभी को गिरफ्तार कर पुलिस थाने ले आई.

जिस मकान में सैक्स रैकेट चल रहा था, वह संदीप अग्रवाल का था. संदेह के आधार पर पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया. संदीप अग्रवाल के पकड़े जाने से हड़कंप मच गया. कई रसूखदार लोगों ने थानाप्रभारी कुंज बिहारी मिश्रा को फोन किया और संदीप अग्रवाल को निर्दोष बताते हुए उसे छोड़ने के लिए दबाव डाला.

लेकिन मिश्राजी ने जांच में दोषी न पाए जाने के बाद ही रिहा करने की बात कही. पूछताछ में संदीप अग्रवाल ने भी स्वयं को निर्दोष बताया और कहा कि वह व्यापारी है. हर साल हजारों रुपया टैक्स देता है. उस ने तो मकान किराए पर दिया था. उसे सैक्स रैकेट की जानकारी नहीं थी. हर पहलू से जांच के बाद जब संदीप अग्रवाल बेकसूर लगा तो पुलिस ने 2 दिन बाद उसे क्लीन चिट दे दी.

सीओ मनोज कुमार ने जिस्मफरोशी के आरोप में पकड़े गए युवक, युवतियों से पूछताछ की तो युवतियों ने अपने नाम सीमा तिवारी, खुशी, विविता तथा मंतसा बताए. इन में सीमा तिवारी सैक्स रैकेट की संचालिका थी. युवकों ने अपने नाम महेश, शैलेंद्र तथा चंद्रेश तिवारी बताए. इन में चंद्रेश तिवारी सीमा का पति था और वह दलाल भी था.

चूंकि सभी आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए सीओ मनोज कुमार ने वादी बन कर अनैतिक देह व्यापार अधिनियम 1956 की धारा 3, 4, 5, 6, 7, 8 और 9 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. पूछताछ में देह व्यापार में लिप्त युवतियों ने इस धंधे में आने की अपनीअपनी अलगअलग मजबूरी बताई.

सैक्स रैकेट की संचालिका सीमा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के कुमऊपुर गांव की रहने वाली थी. उस के पिता बाबूराम तिवारी किसान थे. उन के 3 बच्चों में सीमा सब से छोटी थी.

बाबूराम के पास मात्र 2 बीघा खेती की जमीन थी. कृषि उपज से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. वह एक बेटे तथा एक बेटी की शादी कर चुके थे. सीमा भी शादी योग्य थी, इसलिए वह उस की शादी के लिए प्रयासरत थे.

सीमा तिवारी साधारण परिवार में पलीबढ़ी जरूर थी लेकिन वह थी खूबसूरत. सीमा ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस के रूप में निखार आ गया. कालेज में कई लड़कों से उस की दोस्ती हो गई थी. उन के साथ वह घूमती और मौजमस्ती करती थी. घर वाले देर से घर आने को टोकाटाकी करते तो सीमा कोई न कोई बहाना बना देती थी.

जवान बेटी कहीं बहक न जाए इसलिए उन्होंने उस के लिए लड़का देखने के प्रयास तेज कर दिए. थोड़ी दौड़धूप करने के बाद घाटपुरम का चंद्रेश तिवारी उन्हें पसंद आ गया. उन्होंने सीमा का विवाह चंद्रेश तिवारी के साथ कर दिया.

सीमा ससुराल में कुछ समय तक ठीक रही, फिर धीरेधीरे वह खुलने लगी. दरअसल सीमा ने जैसे सजीले युवक से शादी का रंगीन सपना देखा था, चंद्रेश वैसा नहीं था. चंद्रेश एक पैट्रोल पंप पर काम करता था. उस की आमदनी भी सीमित थी. सीमा न तो पति से संतुष्ट थी और न ही उस की आमदनी से. उस की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं. इसे ले कर घर में आए दिन कलह होने लगी.

चंद्रेश चाहता था कि सीमा मर्यादा में रहे और देहरी न लांघे. लेकिन सीमा को बंधन मंजूर नहीं था. वह चंचल हिरणी की तरह विचरण करना चाहती थी. उसे घर का चूल्हाचौका, सासससुर और पति का कठोर बंधन पसंद नहीं था. बस इन्हीं सब बातों को ले कर चंद्रेश व सीमा के बीच झगड़ा बढ़ने लगा. आजिज आ कर सीमा पति का साथ छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी.

सीमा को मनाने चंद्रेश कई बार ससुराल आया लेकिन सीमा उसे हर बार दुत्कार कर भगा देती थी. यद्यपि सीमा के मातापिता चाहते थे कि वह  उन की छाती पर मूंग न दले और पति के साथ चली जाए. मांबाप ने सीमा को बहुत समझाया लेकिन जिद्दी सीमा ने उन की बात नहीं मानी. सीमा मायके में पड़ीपड़ी जब बोर होने लगी तो उस ने कानपुर शहर में नौकरी करने की सोची.

कानपुर शहर के जवाहर नगर मोहल्ले में सीमा की मौसी रहती थी. एक रोज वह सीमा से मिलने गई. सीमा पढ़ीलिखी भी थी और खूबसूरत भी. उसे विश्वास था कि जल्द ही कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी और उस का जीवनयापन मजे से होने लगेगा. सीमा ने नौकरी के बाबत मौसी से राय मांगी तो मौसी ने भी उसे नौकरी की इजाजत दे दी.

सीमा नौकरी की तलाश में जुट गई. वह जहां भी नौकरी के लिए जाती वहां उसे नौकरी तो नहीं मिलती, लेकिन उस के शरीर को पाने की चाहत जरूर दिखती. सीमा को लगा कि उस का नौकरी का सपना पूरा नहीं होगा.

लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. आखिर उस का सपना पूरा हुआ. उसे कपड़े की एक फर्म में नौकरी मिल गई. सीमा का काम था सजसंवर कर काउंटर पर बैठना और बिक्री का लेनदेन करना. सीमा अब नोटों की चकाचौंध में रहने लगी थी.

मौसी को जब पता चला कि सीमा और उस के पति चंद्रेश के बीच विवाद है तो विवाद को सुलझाने के लिए मौसी ने पहले सीमा से बात की. फिर उस के पति चंद्रेश को अपने घर बुलवाया. इस के बाद दोनों को आमनेसामने बैठा कर विवाद को सुलझा दिया. फलस्वरूप दोनों साथसाथ रहने को राजी हो गए.

विवाद सुलझाने के बाद सीमा तिवारी पति चंद्रेश के साथ बर्रा 2 में रहने लगी. दोनों की जिंदगी एक बार फिर ठीक से व्यतीत होने लगी. इधर सीमा को फर्म में नौकरी करते  3 महीने ही बीते थे कि उस पर फर्म के मालिक की नीयत खराब हो गई. वह उसे ललचाई नजरों से देखने लगा और एकांत में बुला कर छेड़छाड़ भी करने लगा.

सीमा ने उस की हरकतों का विरोध करना बंद कर दिया तो फर्म मालिक का हौसला बढ़ गया. आखिर एक रोज उस ने सीमा को अपनी हवस का शिकार बना लिया. सीमा रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उस हवस के दरिंदे को जरा भी दया नहीं आई.

सीमा का मुंह बंद करने के लिए उस ने 2 हजार रुपए उस के हाथ में थमा दिए. इस के बाद तो यह सिलसिला सा बन गया. जब भी उसे मौका मिलता सीमा से भूख मिटा लेता. आखिर सीमा ने सोचा कि जब जिस्म ही बेचना है तो नौकरी करने की क्या जरूरत है.

इन्हीं दिनों सीमा की मुलाकात अंजलि से हुई. अंजलि बर्रा 2 में रहती थी और सैक्स रैकेट चलाती थी. वह खूबसूरत मजबूर लड़कियों को अपने जाल में फंसाती थी और उन्हें जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देती थी. सीमा ने अपनी व्यथा अंजलि को बताई तो उस ने सीमा को जिस्मफरोशी का धंधा अपनाने की सलाह दी.

सीमा ने अंजलि की बात मान ली और उस के धंधे से जुड़ गई. सीमा खूबसूरत और जवान थी. ऐसी लड़कियों या औरतों को ग्राहकों की कोई कमी नहीं रहती थी. शुरूशुरू में सीमा को इस धंधे से झिझक हुई. लेकिन कुछ समय बाद वह खुल गई.

सीमा जब जिस्मफरोशी करने लगी और खूब पैसा कमाने लगी तो उसके पति चंद्रश्े को उस पर शक हुआ. क्योंकि वह देर रात घर आती तो कभी पूरी रात नहीं आती थी. चंद्रेश पूछता तो अंजलि सहेली के घर रुकने का बहाना बना देती. लेकिन एक रोज जब चंद्रेश ने सख्ती से पूछा तो उस ने सब सचसच बता दिया. उस ने चंद्रेश से भी अनुरोध किया कि वह भी उस के धंधे में सहयोग करे.

सीमा की बात सुन कर चंद्रेश हक्काबक्का रह गया. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि सीमा इतना गिर सकती है. उसे लगा कि अब सीमा को समझाना व्यर्थ है. क्योंकि उसे नोटों और परपुरुष की लत लग चुकी है. चंद्रेश की पैट्रोल पंप वाली नौकरी छूट गई थी. वह बेरोजगार हो गया था.

पत्नी की कमाई से उसे खाना और पीने को शराब मिल रही थी. सो सीमा के अनैतिक काम का विरोध करने के बजाए वह उस के धंधे का सहयोगी बन गया. अब चंद्रेश भी ग्राहक ढूंढ कर लाने लगा. कह सकते हैं कि वह बीवी का दलाल बन गया.

सीमा तिवारी ने सैक्स रैकेट संचालिका अंजलि के साथ जुड़ कर जिस्मफरोशी के सारे गुर सीख लिए थे. अब वह खुद ही रैकेट चलाने लगी. उस ने अपने जाल में कई और लड़कियां फंसा लीं और जिस्म का सौदा करने लगी.

इस ध्ांधे में उसे अच्छी आमदनी होने लगी तो उस ने अपना कद और दायरा भी बढ़ा लिया. अब वह मकान किराए पर लेती और खूबसूरत व जमान युवतियों को सब्ज बाग दिखा कर अपने जाल में फांसती फिर उन्हें देह व्यापार में उतार देती. वह ज्यादातर साधारण परिवार की उन युवतियों को फंसाती जो अभावों में जिंदगी गुजार रही होती थीं.

सीमा तिवारी खूबसूरत के साथसाथ मृदुभाषी भी थी. अपनी भाषाशैली से वह सामने वाले को जल्दी ही प्रभावित कर लेती थी. यही कारण था कि ग्राहक एक बार उस के अड्डे पर आता तो वह बारबार आने लगता था.

सीमा वाट्सऐप के जरिए युवतियों की फोटो अपने ग्राहकों को भेजती. फिर पसंद आने पर उन के जिस्म की कीमत तय करती. उस के यहां 500 से 5 हजार रुपए तक की कीमत तय होती. वह टूर बुकिंग भी करती थी, लेकिन उस की कीमत ज्यादा होती थी. उस का पुराना ग्राहक ही नए ग्राहक लाता था.

अलग सैक्स रैकेट चलाने के बावजूद सीमा, अंजलि के संपर्क में रहती थी. वह सीमा के अड्डे पर लड़कियां व ग्राहक भेजती रहती थी. इस के बदले में वह उस से कमीशन लेती थी. सीमा का पति चंद्रेश भी दलाल बन गया था, वह भी ग्राहक लाता था.

सीमा अब बेहद चालाक हो चुकी थी. वह एक क्षेत्र में कुछ माह ही अपना धंधा चलाती थी. जैसे ही क्षेत्र के लोगों को उस के धंधे की सुगबुगाहट होने लगती, वह जगह बदल देती थी. अंजलि अकसर ऐसा मकान या फ्लैट किराए पर लेती थी, जिस में कोई दूसरा किराएदार न रहता हो.

पहले वह बर्रा क्षेत्र में धंधा करती थी. फिर उस ने क्षेत्र बदल दिया और पनकी क्षेत्र में देहव्यापार चलाने लगी. वहां उस का टकराव एक स्थानीय गुंडे से हो गया था. दरअसल वह गुंडा सीमा से टैक्स वसूलना चाहता था. इस के अलावा वह अय्याशी भी करना चाहता था. सीमा इस गुंडे से परेशान थी और अड्डा बदलना चाहती थी.

मार्च 2019 में सीमा ने किदवई नगर थाना क्षेत्र के डब्लू ब्लौक साकेत नगर में 15 हजार रुपए महीना किराए पर एक मकान ले लिया. यह मकान व्यापारी संदीप अग्रवाल का था, जो किदवई नगर स्थित अपने दूसरे मकान में रहते थे. इस मकान में रह कर सीमा अपने पति चंद्रेश की मदद से सैक्स रैकेट चलाने लगी. उस के अड्डे पर नए पुराने ग्राहक तथा युवतियों आने जाने लगीं. बर्रा की अंजलि भी उस के अड्डे पर युवतियां और ग्राहक भेजने लगी.

सीमा के पास एक विदेशी नस्ल का कुत्ता था. छोटे कद का वह कुत्ता बहुत तेज था. इस कुत्ते को उस ने प्रशिक्षित कर रखा था. वह पूरे मकान में रेकी करता था.

जैसे ही कोई मकान के गेट पर आता, वह तेज आवाज में भौंकने लगता था. कुत्ते की आवाज सुन कर सीमा सतर्क हो जाती और छिप कर देखती थी कि गेट पर कौन आया है. कुछ ही समय में सीमा तिवारी उस ब्लौक में कुत्ते वाली मैडम के नाम से मशहूर हो गई.

सीमा के घर युवक युवतियों का देर रात आनाजाना शुरू हुआ तो पासपड़ोस के लोगों का माथा ठनका. वह आपस में चर्चा करने लगे कि कुत्ते वाली मैडम के यहां युवक युवतियां क्यों आते हैं. उन्होंने निगरानी रखनी शुरू कर दी तो उन्हें शक हो गया कि मैडम सैक्स रैकेट चलाती है. इन्हीं संभ्रांत लोगों ने एसपी (साउथ) रवीना त्यागी के कार्यालय में शिकायत की थी.

देहव्यापार अड्डे से पकड़ी गई 22-23 साल की खुशी बर्रा 4 की कच्ची बस्ती में रहती थी. गरीब परिवार में पली खुशी बेहद खूबसूरत थी. उस की सहेलियां महंगे कपड़े पहनती थीं और ठाठबाट से रहती थीं. उन के पास एक नहीं 2-2 मोबाइल होते थे. वह मोबाइल पर बात करतीं और खूब हंसतीबतियातीं. खुशी जब उन्हें देखती तो सोचती काश ऐसे ठाटबाट उस के नसीब में भी होते.

एक रोज बर्रा सब्जी मंडी से लौटते समय खुशी की मुलाकात अंजलि से हुई. दोनों की बातचीत हुई तो अंजलि समझ गई कि खुशी महत्त्वाकांक्षी है. यदि उसे रंगीन सपने दिखाए जाएं तो वह उस के जाल में आसानी से फंस सकती है.

इस के बाद अंजलि उसे अपने घर बुलाने लगी और उस की आर्थिक मदद भी करने लगी. धीरेधीरे अंजलि ने खुशी को अपने जाल में फंसा लिया और उसे देह व्यापार के धंधे में उतार दिया. छापे वाली रात अंजलि ने ही सौदा कर खुशी को सीमा के घर भेजा था. जहां वह पकड़ी गई. उस समय वह कमरे में ग्राहक के इंतजार में बैठी थी.

पुलिस छापे के दौरान पकड़ी गई विविता भी बर्रा 4 में रहती थी. उस का शौहर साजिद अली शराबी था. वह विविता को मारतापीटता था. विविता पति से परेशान थी और कहीं नौकरी कर अपना गुजरबसर करना चाहती थी. एक रोज सीटीआई टैंपो स्टैंड पर विविता की बातचीत अंजलि से हुई तो उस ने उसे नौकरी दिलाने का भरोसा दिलाया.

एक सप्ताह बाद अंजलि उसे नौकरी दिलाने के बहाने लखनऊ ले गई. वहां उसने एक जानेमाने सफेदपोश नेता के साथ विविता का सौदा कर दिया. विविता को जिस्म के बदले नोट मिले तो वह इसी धंधे में रम गई. पुलिस छापे वाली रात अंजलि ने ही विविता के जिस्म का सौदा तय कर ग्राहक महेश के साथ सीमा के मकान पर भेजा था, जहां दोनों रंगे हाथों पकड़े गए थे.

देह व्यापार के अड्डे से पकड़ी गई मंतसा जवाहर नगर निवासी अली अहमद की पत्नी थी. उस के शौहर ने उसे तलाक दे कर दूसरा निकाह कर लिया था. मंतसा ने कुछ रुपए जोड़ कर सब्जी बेचने का काम शुरू कर दिया, लेकिन उसे यह काम रास नहीं आया. उस ने एक रिश्तेदार से कर्ज लिया तो वह रिश्तेदार उस के पीछे पड़ गया. कर्ज के बदले उस ने मंतसा को अपनी हवस का शिकार बनाया.

वह रिश्तेदार बड़ा चलाक निकला. उस ने खुद तो हवस पूरी कर ली, अब वह उस का सौदा दोस्तों से भी करने लगा. मंतसा जवान और खूबसूरत थी. उसे ग्राहकों की कमी नहीं थी, पर उस के पास जगह नहीं थी. इसी बीच उसे पता चला कि साकेत नगर में रहने वाली सीमा तिवारी सैक्स रैकेट चलाती है.

मंतसा ने सीमा से मुलाकात की और अपनी मजबूरी बताई. मजबूरी का फायदा उठा कर सीमा तिवारी ने मंतसा को अपने रैकेट में शामिल कर लिया. छापे वाली रात सीमा ने मंतसा के जिस्म का सौदा व्यापारी शैलेंद्र के साथ किया था. पुलिस रेड में वे दोनों रंगेहाथों पकड़े गए थे.

पुलिस छापे में पकड़ा गया महेश व्यापारी है. उस का प्लास्टिक का व्यवसाय है. वह अपनी कमाई का आधे से ज्यादा भाग अय्याशी और शराब में खर्च कर देता था. शादीशुदा होते हुए भी वह दूसरी औरतों की बाहों में सुख खोजता था. उस की अय्याशी से उस की पत्नी बेहद परेशान थी. उस ने पति को बहुत समझाया, लेकिन पति सुधरने के बजाय उलटे उस की पिटाई कर देता था.

एक रोज महेश को पता चला कि बर्रा-2 में रहने वाली अंजलि लड़कियां भी उपलब्ध कराती है और जगह भी. यह पता चलते ही महेश ने अंजलि से मुलाकात की और अच्छी लड़की के बदले मुंहमांगी रकम देने को कहा. अंजलि ने उसे जगह और युवती उपलब्ध करा दी.

इस के बाद वह अंजलि का ग्राहक बन गया. छापे वाली रात अंजलि ने ही महेश से रकम तय करने के लिए विविता को उस के साथ सीमा तिवारी के अड्डे पर भेजा था. जहां महेश, विविता के साथ रंगेहाथ पकड़ा गया था.

देह व्यापार के अड्डे से पकड़ा गया शैलेंद्र भी बर्रा में ही रहता था और महेश का दोस्त था. दोनों का व्यापार भी एक था. दोनों साथसाथ शराब पीते थे और अय्याशी करते थे. छापे वाली रात महेश ही शैलेंद्र को सीमा के अड्डे पर ले गया था. सीमा ने मंतसा को दिखा कर उस का सौदा शैलेंद्र से किया था. चंद्रेश तिवारी को पुलिस ने निगरानी करते पकड़ा था.

सीमा की सहयोगी अंजलि को पकड़ने के लिए पुलिस ने बर्रा स्थित उस के किराए वाले मकान पर छापा मारा लेकिन वह पकड़ी नहीं जा सकी. पुलिस का कहना है कि जब वह पकड़ी जाएगी, तब उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई की जाएगी.

12 अप्रैल, 2019 को थाना किदवई नगर पुलिस ने देह व्यापार में पकड़ी गई सीमा तिवारी, विविता, मंतसा, खुशी तथा ग्राहक महेश, शैलेंद्र व दलाल चंद्रेश तिवारी को गिरफ्तार कर कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मां बेटे ने खेला पशु व्यापारी की मौत का खेल

रामचंद्र छाबड़ा का गाय भैंस खरीद फरोख्त का कारोबार था. 70 वर्षीय रामचंद्र यह कारोबार पिछले 40 वर्षों से कर रहे थे. उम्र बढ़ने के साथ जब शरीर कमजोर होने लगा तो उन्होंने अपने भतीजे कुलदीप छाबड़ा को अपने कारोबार का साझीदार बना लिया.

दोनों मिल कर यह धंधा करने लगे. रामचंद्र छाबड़ा  जालंधर शहर के न्यू शीतल नगर में रहते थे जबकि उन का भतीजा कुलदीप वहां से कुछ दूर स्थित डीएवी कालेज के सामने स्थित फ्रैंड्स कालोनी में रहता था.

तायाभतीजे दोनों गांवगांव घूम कर अच्छी नस्ल के सस्ते पशु खरीदते थे और फिर उन्हें अपनी डेयरी में कुछ दिन रखने के बाद महंगे दामों पर बेच देते थे. इस काम में उन्हें अच्छाखासा मुनाफा हो जाता था. उन्होंने लिदडा गांव में दूध की एक डेयरी भी बना रखी थी. खरीदा हुआ पशु जब तक बिक नहीं जाता था, उसे डेयरी में अन्य पशुओं के साथ रखा जाता था. रामचंद्र की डेयरी का दूध पूरे शहर में सप्लाई होता था.

पशुओं की खरीदफरोख्त का काम अधिकतर रामचंद्र ही संभालते थे जबकि डेयरी व अन्य लेनदेन के मामले कुलदीप देखा करता था. इन सब कामों के अलावा रामचंद्र ने अपना लाखों रुपया जरूरतमंद लोगों को मामूली ब्याज पर भी दे रखा था, जिस की वसूली के लिए वे गांव गांव जाया करते थे.

4 अक्तूबर, 2018 की सुबह करीब 11 बजे रामचंद्र अपने भतीजे कुलदीप को यह बता कर घर से निकले कि वह पैसों की वसूली के लिए जा रहे हैं और दोपहर तक लौट आएंगे. वह अपनी स्कूटी नंबर पीबी 08 डीएच-3465 पर गए थे. लेकिन वह देर रात तक घर नहीं लौटे. उन का फोन नंबर मिलाया तो वह भी बंद था.

उन की स्कूटी का भी कोई पता नहीं चला. ऐसे में कुलदीप और परिवार के अन्य लोगों का चिंतित होना लाजमी था. कुलदीप और परिवार के लोग उन्हें रात में ही ढूंढने के लिए निकल पड़े. पूरी रात और अगला दिन तलाश करने पर भी रामचंद्र का कहीं कोई पता नहीं चला.

रामचंद्र को कहां ढूंढा जाए, परिजनों के सामने यह बड़ी समस्या थी. रामचंद्र को किस गांव के किस आदमी से पैसे लेने थे, यह बात कुलदीप को भी पता नहीं थी. काफी तलाश करने के बाद भी जब रामचंद्र के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन के पोते संजय छाबड़ा ने देर रात थाना डिविजन-1 में रामचंद्र की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी.

रामचंद्र मिलनसार और समाजसेवी इंसान थे. उन की पुलिस प्रशासन और शहर में काफी इज्जत थी, सो पुलिस बड़ी तत्परता से उन की तलाश में जुट गई. पुलिस के साथसाथ रामचंद्र के भाईभतीजे और पोते भी अपने स्तर पर उन की तलाश में जुटे थे. उधार की डायरी से कुछ लोगों के नाम देख कर उन के गांव जा कर भी पता किया गया, पर कोई सुराग नहीं मिला.

उधार की डायरी में एक नाम रणजीत कौर का भी था, जो पतारा के गांव जोहला की रहने वाली थी. रामचंद्र को रणजीत कौर से करीब 75 हजार रुपए लेने थे, जिन्हें देने में वह आनाकानी कर रही थी.

कुलदीप ने रणजीत कौर के गांव जा कर उस से भी रामचंद्र के बारे में पता किया, पर रणजीत कौर ने साफ कह दिया कि रामचंद्र उस के यहां नहीं आए थे.

कुलदीप को उस की बातें संदेहास्पद लगीं. बहरहाल उस रात कुलदीप और संजय अपने घर वापिस लौट आए. लेकिन अगली सुबह वे दोबारा जोहला गांव गए तो गांव में गुरुद्वारा साहेब के पास एक किराने की दुकान के पास उन्हें रामचंद्र की स्कूटी लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पास में ही रणजीत कौर का मकान था.

अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया था कि रणजीत कौर ने उन से झूठ बोला था.  रामचंद्र अवश्य ही रणजीत कौर के पास आए थे. उस ने झूठ क्यों बोला इस का पता करने के लिए कुलदीप और संजय उस के घर पहुंचे और रामचंद्र के बारे में पूछा. पर इस बार रणजीत कौर उन के साथ बदतमीजी से पेश आई. रणजीत कौर ने उन से यह भी कहा कि रामचंद्र का उस के पास कोई पैसा नहीं है. उस ने सारे पैसे चुका दिए हैं.

कुलदीप ने जब जोहला गांव के कुछ लोगों से रामचंद्र के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि रामचंद्र को कल दोपहर में रणजीत कौर के घर देखा गया था. उस के बाद उन की स्कूटी गुरुद्वारे के पास खड़ी मिली थी. अब यह बात पक्के तौर पर साबित हो गई थी कि रामचंद्र रणजीत कौर के घर ही अपने पैसे लेने आए थे और वहीं से वह गायब हो गए थे.

जबकि रणजीत कौर इस मामले में कुछ भी बताने को तैयार नहीं थी. अत: कुलदीप ने और देर करना उचित नहीं समझा और जालंधर देहात के थाना पतारा में जा कर एसओ सतपाल सिंह सिद्धू को पूरी बात बताई. साथ ही शंका भी व्यक्त की कि हो न हो रणजीत कौर ने ही रुपयों की खातिर उस के ताया रामचंद्र को कहीं गायब करा दिया हो.

कुलदीप की शिकायत के बाद सतपाल सिंह ने एसआई मेजर सिंह, सुखराज सिंह, हवलदार मनोहर लाल, कांस्टेबल जसपाल सिंह, जोबन, प्रीत सिंह और दीपक कुमार की एक टीम बना कर रामचंद्र की तलाश में भेज दी. वह स्वयं रणजीत कौर से पूछताछ करने के लिए उस के गांव पहुंचे.

हर बार की तरह इस बार भी रणजीत कौर ने यही जवाब दिया कि रामचंद्र उस के घर नहीं आए थे. इस पर एसआई सतपाल सिंह ने रामचंद्र के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर चेक करवाई तो उन की लास्ट लोकेशन जोहला गांव में रणजीत कौर के घर के आसपास की मिली.

पुलिस के सामने यह एक बड़ी समस्या थी कि रणजीत कौर रामचंद्र के वहां आने की बात से साफ इनकार कर रही थी. पुलिस ने रंजीत कौर के घर के पास वाली किराने की दुकान और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर चैक की.

फुटेज में रामचंद्र रणजीत कौर के साथ उस के घर के अंदर जाते हुए साफसाफ दिखाई दे रहे थे. वह घर के अंदर तो गए थे पर बाहर लौट कर नहीं आए थे. अब रणजीत कौर के मुकरने का सवाल ही नहीं था, पर फिर भी वह अपनी इस बात पर डटी रही कि रामचंद्र उस के घर नहीं आए थे.

आखिर मजबूरन पुलिस रणजीत कौर को हिरासत में ले कर थाने लौट आई. थाने पहुंच कर लेडी हवलदार सुरजीत कौर ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो रणजीत कौर टूट गई. उस ने बताया कि रामचंद्र की हत्या उस ने अपने एक साथी मनजिंदर सिंह के साथ मिल कर की थी.

रामचंद्र की हत्या करने के बाद उस की लाश को जला दिया गया था. ताकि कोई सबूत बाकी ना बचे. रणजीत कौर ने हत्या में साथ देने वाले जिस दूसरे आरोपी का नाम बताया था, वह पंजाब पुलिस का सस्पैंड कांस्टेबल मनजिंदर सिंह था.

मनजिंदर सिंह साल 2012 में बतौर कांस्टेबल पंजाब पुलिस में भरती हुआ था और उस की पोस्टिंग देहात क्षेत्र के थाने में थी. लेकिन कुछ महीने पहले किसी आपराधिक मामले में उस पर केस दर्ज हो जाने की वजह से उसे नौकरी से सस्पैंड कर दिया गया था. तब से वह सस्पैंड ही चल रहा था.

मनजिंदर तरनतारन का रहने वाला था और रणजीत कौर के संपर्क में था. कुछ समय पहले वह उसी के घर के पास किराए पर रह चुका था. अब तक की जांच में यह बात सामने आई थी कि रामचंद्र ने रणजीत कौर को पशु बेचे थे, जिस के 75 हजार रुपए रणजीत कौर पर उधार थे.

काफी दिन बाद भी जब रुपए नहीं मिले तो वह 4 अक्तूबर को रणजीत कौर के घर पहुंचे. उस ने रुपए देने में आनाकानी शुरू कर दी. बाद में रणजीत कौर ने रामचंद्र को अपने घर के अंदर बुला लिया. इस के बाद उस ने अपने पड़ोस में रहने वाले मनजिंदर को बुलाया और दोनों ने मिल कर रामचंद्र की गला दबा कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद उन के शव को घर की तीसरी मंजिल पर ले जाया गया. वहां शव को एक चारपाई पर रख कर ऊपर से कुछ कपड़े डाले और जला दिया और राख अपने खेतों में बिखेर दी थी. अधजले शव को वहीं छत पर पड़ी हुई ईंटों के पीछे छिपा दिया गया.

रणजीत कौर के अनुसार मनजिंदर सिंह की यह योजना थी कि बाद में मौका देख कर वह शव को वहां से निकाल कर कहीं ले जा कर खुर्दबुर्द कर देंगे. रणजीत कौर की निशानदेही पर पुलिस ने अधजला शव भी बरामद करा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और उस का डीएनए टेस्ट के लिए सैंपल सुरक्षित रखवा लिए. इस के अलावा पुलिस ने सबूत के तौर पर अधजले कपड़े, अधजली लकडि़यां भी बरामद कर लीं.

रामचंद्र की जेब में उन के कारोबार से संबंधित एक पाकेट डायरी हमेशा रहती थी. वह डायरी पुलिस बरामद नहीं कर पाई थी. रामचंद्र के भतीजे कुलदीप छाबड़ा ने बताया कि उन के ताया ने कभी अपने पास रुपए रखने के लिए पर्स नहीं रखा था. वह अपने कागज और पैसे तक लिफाफे में रखते थे.

रणजीत कौर की निशानदेही पर उसी दिन गांव से मनजिंदर सिंह को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया.

लेकिन मनजिंदर ने खुद को बेकसूर बताया. पुलिस ने रणजीत कौर और मनजिंदर सिंह को रामचंद की हत्या करने और लाश छिपाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने जांच की तो रणजीत कौर के घर के पास लगे सीसीटीवी में मनजिंदर की फोटो नहीं दिखी. पुलिस इस बात से हैरान थी कि दूसरा आरोपी मनजिंदर सिंह कैमरे में कैद होने से कैसे बच गया.

इस पर रणजीत कौर ने बताया कि मनजिंदर सिंह को यह बात पता थी कि घर के सामने सीसीटीवी कैमरा लगा है. इसलिए वह कैमरे से बचने के लिए घर के पीछे की दीवार फांद कर उस के घर में दाखिल हुआ था.

इस मामले में नया मोड़ उस समय आया जब मनजिंदर से अकेले में हत्या के बारे में पूछताछ की गई. उस ने बताया कि घटना वाले दिन वह उस गांव से कोसों दूर कहीं और था. पुलिस ने मनजिंदर के बयान को क्रौस चैक किया तो पता चला कि वह सच कह रहा था.

उस के फोन की लोकेशन भी घटनास्थल से मीलों दूर थी. इसीलिए वह सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी नहीं आया था. इतना ही नहीं पुलिस ने रणजीत कौर द्वारा बताई गई उस दीवार को भी देखा, रणजीत कौर के अनुसार जिसे फांद कर मनजिंदर रणजीत कौर के घर आया था. छानबीन में उस की यह बात भी गलत साबित हुई.

पुलिस का मार्गदर्शन करते हुए मनजिंदर सिंह ने बताया कि हो सकता है रामचंद्र की हत्या रणजीत कौर और उस के बेटे हरजाप सिंह उर्फ जापा ने की हो. जापा नशे का आदि था. इस नई जानकारी के साथ पुलिस ने जब रणजीत कौर से दोबारा पूछताछ की तो इस बार वह सब सच बोल गई. उस ने रामचंद्र की हत्या में अपने बेटे का नाम उजागर कर दिया.

पुलिस ने रामचंद्र छाबड़ा हत्याकांड की पुन: जांच की तो पाया कि सस्पेंड सिपाही मनजिंदर सिंह का इस हत्याकांड से कोई लेनादेना नहीं था. इसलिए उसे इस केस से निकाल दिया गया. पता चला कि रणजीत कौर इस मामले में मनजिंदर को फंसा कर अपने बेटे हरजाप को बचाना चाहती थी.

पुलिस जांच में यह भी स्पष्ट हो गया है कि रणजीत कौर का 20 वर्षीय बेटा हरजाप सिंह नशे का आदि था. रणजीत कौर के रामचंद्र के साथ नाजायज संबंध थे, इसीलिए वह उसे रुपया उधार दे दिया करता था.

जांच में पता चला कि घटना वाले दिन 4 अक्तूबर, 2018 को रामचंद्र और रणजीत कौर घर में अकेले थे. ऊपर से अचानक रणजीत कौर का बेटा हरजाप घर आ गया और उस ने अपनी मां को रामचंद्र के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया.

गुस्से में आ कर उस ने लोहे की रौड रामचंद्र के सिर पर दे मारी. रौड के एक ही वार से रामचंद्र खून से लथपथ हो कर जमीन पर गिर पड़े. अपने बेटे को इस मामले में फंसते देख कर रणजीत कौर ने रामचंद्र की गला दबा कर हत्या कर दी.

उस के बाद मांबेटे ने मिल कर रामचंद्र की लाश को तीसरी मंजिल पर ले जा कर चारपाई पर रख दिया. फिर पुराने कपड़ों और लकड़ी के पीढ़े आदि को तोड़ कर चारपाई पर डाला और आग लगा दी. उस की अधजली लाश को मांबेटे ने वहीं छत पर पड़ी ईंटों के बीच छिपा दिया था.

रामचंद्र की लाश का जो हिस्सा पूरी तरह से जल गया था उस की राख और हड्डियां मांबेटे ने एक पौलीथिन थैली में डाल कर खेतों में फेंक दी थी.

नई जांच और रणजीत कौर के इस बयान के आधार पर पुलिस ने 7 अक्तूबर को हरजाप को गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर के उसे 2 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया. मांबेटे की निशानदेही पर पुलिस ने लोहे की रौड भी बरामद कर ली. मृतक की डायरी जिसे वह अपनी जेब में रखता था और उन का फोन पुलिस को नहीं मिल सके. आरोपियों ने बताया कि फोन और डायरी भी उन्होंने जला दी थी.

लंबी पूछताछ और पुलिस काररवाई पूरी करने के बाद जब रिमांड अवधि समाप्त हो गई तो मांबेटे को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत के आदेश पर पुलिस ने उन्हें जिला जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हुई थी. पुलिस ने जांच के बाद केस से सस्पैंड कांस्टेबल मनजिंदर सिंह का नाम हटा दिया था. पुलिस ने जिस अधजली लाश को डीएनए टेस्ट के लिए भेजा था, उस की जांच से यह बात स्पष्ट हो गई कि वह शव रामचंद्र का ही था.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डाक्टर कामदेव : भोपाल का नर्स यौन शोषण केस

बात 26 अक्तूबर, 2018 की है. भोपाल (Bhopal) के शाहपुरा (Shahpura) के टीआई जितेंद्र वर्मा अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी 29- 30 साल की एक महिला उन के पास आई. उस महिला ने अपना नाम अल्पना बताया. उस ने बताया कि वह मूलरूप से केरल की रहने वाली है और पिछले 4 महीनों से शाहपुरा के लाहोटी हौस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर ( Lahoti Hospital And Research Center) में नर्स के रूप में काम कर रही है. इतना कह कर वह चुप हो गई और इधरउधर देखने लगी.

टीआई वर्मा समझ गए कि अल्पना को परेशानी क्या है, इसलिए उन्होंने महिला आरक्षक सुनीता को बुलाया. उन्होंने सुनीता से कह दिया कि वह अल्पना की पूरी समस्या सुने. सुनीता अल्पना को अपने साथ दूसरे कमरे में ले गईं.

इस के बाद अल्पना ने आरक्षक सुनीता को बताया कि डा. कपिल लाहोटी (Dr. Kapil Lahoti) उस का यौन शोषण कर रहे थे. उस के इस कृत्य से वह गर्भवती हो गई तो डा. कपिल और उस की पत्नी डा. सीमा लाहोटी ने साजिश कर के उस का गर्भपात करवा दिया.

अल्पना ने बताया कि संबंध बनाने से ले कर गर्भ गिराने तक डा. कपिल ने उसे बड़े बड़े सपने दिखाए थे. यहां तक कि गर्भ गिराने के लिए उन्होंने दिखावे के लिए क्षेत्र के आर्यसमाज मंदिर में उस के साथ शादी भी रचा ली थी. उस की बातों में आ कर जैसे ही उस ने गर्भपात कराया तो डा. कपिल और उस की पत्नी सीमा के तेवर बदल गए.

डा. सीमा लाहोटी, जो कल तक उसे अपनी छोटी बहन कहती थी, अब उसे डायन, वेश्या आदि कहने लगी है. इतना ही नहीं, उन्होंने उसे जल्द से जल्द भोपाल छोड़ने की धमकी भी दी है.

आरक्षक सुनीता ने अल्पना की पूरी बात सुनने के बाद सारी जानकारी टीआई जितेंद्र वर्मा को दे दी, जिस पर उन्होंने अल्पना का मैडिकल करवाने के बाद एसपी (पश्चिम) राहुल कुमार लोढ़ा और सीएसपी दिशेष अग्रवाल को भी मामले की जानकारी दे दी. इस के बाद लाहोटी अस्पताल के संचालक डा. कपिल और उस की पत्नी डा. सीमा लाहोटी के खिलाफ बलात्कार सहित अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच एसआई जयपाल सिंह बिल्लोरे को सौंप दी.

डा. कपिल का कृत्य आया सामने

दौलत का नशा भी किसी दूसरे नशे से कम नहीं होता, इसलिए चेहरों पर बेफिक्री लिए थाने आए डा. कपिल और डा. सीमा पहले तो खुद को मेहमान के तौर पर पेश करते रहे. लेकिन खुद को निर्दोष बताने वाले दंपति से जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो परत दर परत दोनों के कारनामे सामने आते गए. दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पुलिस ने भी पतिपत्नी को उसी दिन शाम को गिरफ्तार कर लिया. दूसरे दिन सुबह डा. कपिल और उस की पत्नी की गिरफ्तारी की खबर लोगों में फैली तो लाहोटी क्लीनिक में काम कर चुकी कई पूर्व नर्सों ने राहत की सांस ली. क्योंकि अल्पना से पहले वह कई नर्सों के साथ संबंध बना चुका था. इस काम में उस की पत्नी डा. सीमा भी पति की मदद करती थी.

गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने डा. लाहोटी के अस्पताल में छापेमारी कर उस के केबिन से कई आपत्तिजनक चीजें बरामद कीं. डाक्टर दंपति से पूछताछ के बाद नर्स अल्पना का यौनशोषण, फरजी शादी करने आदि की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

अल्पना मूलरूप से केरल की रहने वाली थी. इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद वह करीब 5 साल पहले भोपाल आई थी. चूंकि केरल की अनेक युवतियां भोपाल स्थित तमाम नर्सिंग होम्स व अस्पतालों में नौकरी कर रही हैं, इसलिए भोपाल में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

दक्षिण भारतीय होने के कारण उस का रंग जरूर सांवला था, लेकिन उस के काले घने बाल और मोटी मोटी झील सी आंखों के अलावा उस का शरीर संतुलित और आकर्षक था. इस के अलावा वह दयावान भी थी. भोपाल में नर्स का कोर्स पूरा करने के बाद करीब 5 महीने पहले अपनी नौकरी के सिलसिले में वह लाहोटी अस्पताल के संचालक डा. कपिल लाहोटी के पास पहुंची थी.

डा. कपिल ने अल्पना को जब पहली बार देखा तो उस की आकर्षक नैननक्श और कदकाठी को देखता ही रह गया. जिस तरह वह उसे नजरें गड़ाए देख रहा था तो उस की तीर जैसी नजरें अल्पना को अपने सीने में उतरती सी महसूस हुईं. डा. कपिल का इशारा पा कर उस ने सीट पर बैठने से पहले अपना दुपट्टा संभाला और नजरें झुका कर बैठ गई.

‘‘केरल से हो?’’ डा. कपिल लाहोटी ने उस से पहला प्रश्न किया.

‘‘यस.’’ अल्पना बोली.

‘‘बताओ, मैं ने कैसे जाना?’’ डा. कपिल ने बात को लंबी खींचने के मकसद से पूछा.

‘‘आई डोंट नो सर, मैं कैसे कह सकती हूं.’’ वह बोली.

‘‘अरे भाई, तुम्हारे घने काले बाल, बड़ीबड़ी आंखें और ये भरा हुआ बदन देख कर कोई भी कह सकता है कि तुम केरल में पैदा हुई होगी.’’ ऐसा कहते हुए डा. कपिल की नजरें लगातार अल्पना के चेहरे पर ही टिकी हुई थीं. इस से अल्पना अपने अंदर एक अजीब सी शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. यह बात डा. लाहोटी भांप कर बोले, ‘‘काफी शरमीली हो. लेकिन तुम जानती हो कि हमारे इस प्रोफेशन में शर्म वाला काम नहीं होता.’’

‘‘यस सर, जानती हूं.’’

‘‘गुड. कल से काम पर आ जाओ. शुरू में तुम्हारी ड्यूटी मौर्निंग में होगी. पर बाद में हम दोनों अपने हिसाब से तुम्हारी शिफ्ट फिक्स कर लेंगे.’’ कहते हुए डा. लाहोटी ने उसे नौकरी मिलने की बधाई देने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो अल्पना ने भी औपचारिकतावश उस से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया, जिसे लाहोटी काफी देर तक थामे रहा.

फंस गई मछली जाल में

दूसरे दिन से अल्पना लाहोटी अस्पताल में मन लगा कर अपना काम करने लगी. इस दौरान उसे पता चला कि डा. कपिल लाहोटी मूलरूप से पास के शहर विदिशा का निवासी है. उस ने मुंबई से एमबीबीएस की पढ़ाई की थी, उस की पत्नी डा. सीमा भी महाराष्ट्र की रहने वाली है. लोगों से अल्पना को यह भी पता चला कि डा. सीमा कपिल की क्लासमेट थी और दोनों ने लवमैरिज की थी.

इन सब बातों से अल्पना को कोई मतलब नहीं था. वह अपने काम से काम रखती थी. डा. सीमा का व्यवहार उस के प्रति सामान्य था लेकिन कपिल उस पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिखाई देता था. हर काम में उस की तारीफ करता था और जल्द ही अस्पताल में उसे बड़ी जिम्मेदारी देने की बात कहता था. लेकिन अल्पना को डा. कपिल के सामने जाने में डर लगता था क्योंकि वह जब भी उस के सामने खड़ी होती, कपिल उस के सीने पर अपनी नजरें जमाए रहता था.

यह सब देख कर अल्पना दूसरे अस्पताल में नौकरी खोजने की सोचने लगी थी, लेकिन कपिल ने उसे इतना मौका नहीं दिया. अल्पना को नौकरी करते हुए एक महीना ही हुआ था.  इस दौरान एक रोज त्यौहार होने के कारण अस्पताल में मरीजों की भीड़ काफी कम थी. इस के अलावा अस्पताल का ज्यादातर स्टाफ भी छुट्टी पर था.

उस रोज अस्पताल आने के बाद डा. कपिल ने उसे अपने केबिन में बुलाया और काम के बहाने परदे के पीछे वहां ले गया, जहां वह मरीजों की जांच करता था. वहां पर डा. कपिल ने उसे दबोच लिया और पागलों की तरह उसे प्यार करने लगा. अल्पना ने बचने की काफी कोशिश की लेकिन उस ने अल्पना को मरीज की जांच करने वाली टेबल पर गिरा कर उस के साथ बलात्कार कर दिया.

अल्पना के अनुसार इस घटना के बाद उस ने उसे धमकी दी कि तुम भोपाल में अकेली रहती हो. इस बात की जानकारी किसी को दी तो तुम्हें अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है. साथ ही उस ने यह भी कहा कि राजनीति में उस के ऊपर तक संबंध हैं, पुलिस भी उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकती.

इस घटना के कुछ समय बाद ही सीमा अस्पताल आई और उस रोज उस ने जिस तरह से अल्पना की तरफ मुसकरा कर देखा, उस से वह समझ गई कि सीमा को पहले ही इस बात की जानकारी थी कि आज उस के साथ क्या होने वाला है.

इस घटना से अल्पना बुरी तरह डर गई थी. वह नौकरी छोड़ना चाहती थी, लेकिन कपिल उसे धमकी देने लगा कि वह अपने अस्पताल के अलावा भोपाल में कहीं और काम नहीं करने देगा. इस दौरान वह उस का लगातार बलात्कार करता रहा. उसे जब भी मौका मिलता, वह उसे अपने केबिन में बुला लेता, जिस के चलते 2 महीने बाद वह गर्भवती हो गई.

डा. कपिल ने चली नई चाल

अल्पना ने यह बात कपिल को बताई तो वह कुछ देर तक चुप रहा फिर बोला, ‘‘गुड, मैं खुद यही चाहता था. क्योंकि सीमा को मैं तलाक दे चुका हूं, वह केवल दिखावे के लिए मेरे साथ रहती है. अब तुम मेरी पत्नी और इस अस्पताल की मालकिन बनोगी.’’

अल्पना को उस की बातों पर भरोसा नहीं था. लेकिन उस वक्त भरोसा करना पड़ा, जब 13 सितंबर, 2018 को डा. कपिल ने आर्यसमाज मंदिर में उस के साथ शादी कर ली. अल्पना को भरोसा था कि शादी के बाद कपिल उसे अपने घर ले जाएगा. लेकिन उस ने कुछ दिन तक अलग रहने की बात कह कर उसे दानिश कुंज स्थित उस के कमरे पर ही छोड़ दिया और रात में आ कर सुहागरात मनाने की बात कही.

अल्पना ने पुलिस को बताया कि कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक चलता रहा. लेकिन इस के बाद सीमा का उस के प्रति बदला व्यवहार देख कर वह समझ गई कि उस से शादी करना सीमा और कपिल की चाल थी. यह बात उस समय साफ हो गई जब कुछ दिन बाद ही कपिल उस का गर्भ गिराने के लिए कहने लगा. लेकिन जब उस ने मना किया तो 1-2 बार सीमा ने उस से इशारे में कपिल की बात मान लेने को कहा. इस से वह समझ गई कि उस के साथ शादी भी एक धोखा थी, जिस में सीमा बराबर की शरीक रही.

पत्नी भी बनी पाप की भागीदार

इस दौरान अल्पना को इस बात की जानकारी भी लग चुकी थी कि उस से पहले भी कपिल अपने अस्पताल में काम करने वाली कुछ महिला कर्मचारियों का शोषण इसी तरह कर चुका था. इसलिए अल्पना कपिल के चंगुल से निकलने के लिए छटपटाने लगी.

यह बात कपिल और सीमा समझ गए, जिस के चलते 9 अक्तूबर को कपिल और सीमा लाहोटी उस के कमरे पर आए और डराधमका कर उसे गर्भपात की दवा खिला दी, जिस से उस का गर्भपात हो गया. कुछ देर बाद अल्पना की हालत बिगड़ी तो वे लोग पहले उस का इलाज अपने अस्पताल में करते रहे. जब उस की हालत में सुधार नहीं हुआ तो वे उसे अपने जानने वाले किसी दूसरे अस्पताल में ले गए.

वहां भरती रह कर उस का इलाज चला. स्वस्थ हो कर जब अल्पना वापस अपने कमरे पर आई तो कपिल और सीमा दोनों उस पर दबाव डालने लगे कि वह हमेशा के लिए भोपाल छोड़ कर चली जाए. दोनों ने ऐसा न करने पर उसे अगवा कर हत्या करवाने के बाद जंगल में शव फेंक देने की धमकी भी दी.

जांच अधिकारी एसआई जयपाल सिंह बिल्लोरे के अनुसार, इस मामले में डा. कपिल के अपराध में उस की पत्नी डा. सीमा बराबर की शरीक थी.

दोनों को उम्मीद थी कि उन की धमकी से डर कर अल्पना भोपाल छोड़ कर हमेशा के लिए कहीं और चली जाएगी. लेकिन अल्पना ने अपने साथ हुए शोषण के खिलाफ कानून का दरवाजा खटखटाया, जिस के चलते आरोपियों के खिलाफ काररवाई की गई. पुलिस ने डा. कपिल और उस की पत्नी डा. सीमा से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अल्पना परिवर्तित नाम है

नफरत की आग : महिला वकील की बेटी की निर्मम हत्या

बात 18 फरवरी, 2019 की है. शाम करीब 5 बजे रमाशंकर गुप्ता एडवोकेट पदमा गुप्ता  के केशव नगर स्थित घर पहुंचे तो उन के मकान का मेनगेट बंद था. गेट के बाहर 2 युवक खड़े थे. दोनों आपस में बतिया रहे थे. रमाशंकर ने उन युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम क्रमश: मोहित और शुभम बताए.

उन्होंने बताया कि वे दोनों औनलाइन शौपिंग कुरियर डिलिवरी बौय हैं. स्नेह गुप्ता ने औनलाइन कोई सामान बुक कराया था, वह उस सामान को देने आए हैं. लेकिन आवाज देने पर वह न तो गेट खोल रही हैं और न ही फोन रिसीव कर रही हैं.

रमाशंकर गुप्ता स्नेह के मौसा थे. वह उसी से मिलने आए थे. कुरियर बौय मोहित की बात सुन कर रमाशंकर का माथा ठनका. उन्होंने भी स्नेह का मोबाइल नंबर मिलाया. लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ. इस के बाद रमाशंकर ने स्नेह की मां एडवोकेट पदमा गुप्ता को फोन किया. वह उस समय कचहरी में थीं. पदमा गुप्ता ने उन्हें बताया कि स्नेह घर पर ही है. शायद वह सो गई होगी, जिस की वजह से काल रिसीव नहीं कर रही होगी.

रमाशंकर गुप्ता ने किसी तरह गेट खोला और अंदर गए. उन्होंने स्नेह को कई आवाजें दीं लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मेनगेट से लगा बरामदा था. बरामदे में पदमा का पालतू पामेरियन कुत्ता टहल रहा था. 2 कमरों के दरवाजे भी खुले थे.

रमाशंकर स्नेह को खोजते हुए पीछे वाले कमरे में पहुंचे तो उन के मुंह से चीख निकल गई. स्नेह खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थी. उस की सांसें चल रही थीं या थम गईं, कहना मुश्किल था. स्नेह की यह हालत देख कर कुरियर बौय मोहित व शुभम भी घर के अंदर पहुंच गए. कमरे में एक लड़की की लाश देख कर वह भी आश्चर्यचकित रह गए.

रमाशंकर ने पुलिस को खबर देने के लिए कई बार 100 नंबर पर काल की, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया तो वह डिलिवरी बौय की मोटर साइकिल पर बैठ कर उस्मान पुलिस चौकी पहुंचे और उन्होंने वारदात की सूचना दी. चौकी से सूचना थाना नौबस्ता को दे दी गई. उस के बाद थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह पुलिस टीम के साथ डब्ल्यू ब्लौक केशव नगर स्थित एडवोकेट पदमा गुप्ता के घर पहुंच गए. उस समय वहां भीड़ जुटी थी.

थानाप्रभारी उस कमरे में पहुंचे, जहां 24 वर्षीय स्नेह खून से लथपथ पड़ी थी. कमरे का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. स्नेह के पैर दुपट्टे से बंधे थे और दोनों हाथों की कलाइयां किसी तेजधार वाले हथियार से काटी गई थीं. सिर पर किसी भारी वस्तु से प्रहार किया गया था, जिस से सिर फट गया था. गरदन को रेता गया था और चेहरे पर भी कट का निशान था.

थानाप्रभारी समरबहादुर सिंह ने स्नेह के दुपट्टे से बंधे पैर खुलवाए फिर जीवित होने की आस में एंबुलैंस मंगवा कर तत्काल चकेरी स्थित कांशीराम ट्रामा सेंटर भिजवाया. लेकिन वहां डाक्टरों ने स्नेह को देखते ही मृत घोषित कर दिया था. थानाप्रभारी ने पदमा गुप्ता की बेटी की घर में घुस कर हत्या करने की जानकारी पुलिस के बड़े अधिकारियों को दी तो हड़कंप मच गया.

इधर पदमा गुप्ता कचहरी से सीधे अपने साथियों के साथ कांशीराम ट्रामा सेंटर पहुंचीं और बेटी का शव देख कर गश खा कर गिर पड़ीं. महिला पुलिसकर्मी व उन के सहयोगी वकीलों ने उन्हें संभाला. होश आने पर वह दहाड़ें मार कर रोने लगीं.

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                                         रोती बिलखती एडवोकेट पदमा गुप्ता

चूंकि मामला एक वकील की जवान बेटी की हत्या का था. अत: सूचना पाते ही एसएसपी अनंतदेव तिवारी, एसपी (साउथ) रवीना त्यागी, एसपी (पश्चिम) संजीव सुमन तथा सीओ (गोविंद नगर) आर.के. चतुर्वेदी घटनास्थल पर पहुंच गए. एसएसपी अनंत देव ने मौके पर डौग स्क्वायड तथा फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

सूचना पा कर आईजी आलोक सिंह अस्पताल पहुंचे और उन्होंने पदमा गुप्ता को धैर्य बंधाया. उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि हत्यारा कितना भी पहुंच वाला क्यों न हो, बच नहीं पाएगा. इस के बाद आईजी घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में खून ही खून फैला था. कमरे में अंदर रखी अलमारी खुली थी और सामान पलंग पर बिखरा पड़ा था. पालतू कुत्ता बरामदे से ले कर गेट तक चहलकदमी कर रहा था. वह डरासहमा नजर आ रहा था.

पुलिस अधिकारियों ने अलमारी खुली होने व सामान बिखरे पड़े होने से अनुमान लगाया कि हत्या शायद लूट के इरादे से की गई होगी. शव के पास मृतका का मोबाइल फोन पड़ा था, जिसे पुलिस ने अपने पास सुरक्षित रख लिया.

फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल से सबूत इकट्ठे किए. टीम ने अलमारी व पलंग और कई जगह से फिंगरप्रिंट लिए. घटनास्थल के पास ही खून सनी एक ईंट पड़ी थी. इस ईंट से भी टीम ने फिंगरप्रिंट लिए और जांच हेतु ईंट को भी सुरक्षित कर लिया. टीम को वाशिंग मशीन पर रखा पानी से धुला एक चाकू मिला. इस धुले चाकू की जब टीम ने जांच की तो पुष्टि हुई कि उस पर लगा खून धोया जा चुका है. टीम ने चाकू को भी अपने पास सुरक्षित कर लिया.

खोजी कुतिया ‘जूली’ घटनास्थल को सूंघ कर भौंकते हुए पड़ोसी संदेश चतुर्वेदी के घर जा घुसी. उस के घर के अंदर चक्कर काटने के बाद जूली वापस आ गई. पुलिस ने संदेश चतुर्वेदी से बात की लेकिन उन से हत्या के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली.

एसएसपी अनंतदेव तिवारी तथा एसपी (साउथ) रवीना त्यागी मृतका की मां पदमा गुप्ता से पूछताछ करना चाहते थे. अत: वह कांशीराम ट्रामा सेंटर पहुंच गए. वह बेटी के शव के पास बदहवास बैठी थीं. उन के आंसू थम नहीं रहे थे. उस समय उन की स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन से कुछ पूछताछ की जा सके. जरूरी काररवाई के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारियों को इस बात का अंदेशा था कि कहीं वकील उग्र न हो जाएं, अत: उन्होंने पोस्टमार्टम हाउस पर पुलिस फोर्स तैनात कर दी.

भारी पुलिस सुरक्षा के बीच दूसरे दिन 3 डाक्टरों के पैनल ने स्नेह का पोस्टमार्टम किया. पैनल में डिप्टी सीएमओ राकेशपति तिवारी, कांशीराम ट्रामा सेंटर के डा. अभिषेक शुक्ला और विधनू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डा. श्रवण कुमार शामिल रहे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर के पीछे भारी वस्तु के प्रहार करने, चाकू से गले पर वार करने के 3 निशान और चेहरे पर एक निशान मिला. इस के अलावा रिपोर्ट में यह भी बताया कि उस के दोनों हाथों की कलाइयां चाकू से काटी गई थीं. बताया कि स्नेह की मौत खून ज्यादा मात्रा में निकलने की वजह से हुई थी. वहीं दुष्कर्म की आशंका के चलते स्लाइडें भी बना ली गईं.

महिला एडवोकेट की बेटी की हत्या का समाचार दैनिक समाचार पत्रों की सुर्खियां बना तो कानपुर कचहरी खुलते ही वकीलों में रोष छा गया. एडवोकेट पंकज कुमार सिंह, ताराचंद रुद्राक्ष, रतन अग्रवाल, टीनू शुक्ला, डी.एन. पाल, संजीव कनौजिया, शरद कुमार शुक्ला आदि अधिवक्ता भवन पर एकत्र हुए.

इस के बाद इन वकीलों ने हत्या के विरोध में न्यायिक काम ठप करा दिया. इस के बाद वकीलों ने एसएसपी कार्यालय के बाहर सड़क पर वाहन खड़े कर रास्ता बंद कर दिया, जिस से लंबा जाम लग गया.

एसएसपी अनंत देव ने सीओ (कोतवाली) राजेश पांडेय को प्रतिनिधि के रूप में वकीलों के पास भेजा. श्री पांडेय ने उग्र वकीलों को आश्वासन दिया कि स्नेह के हत्यारे जल्द ही पकड़ लिए जाएंगे. इस आश्वासन पर वकील शांत हुए.

कानपुर बार एसोसिएशन ने इस बात का भी फैसला लिया कि स्नेह के हत्यारोपियों की कोई भी वकील पैरवी नहीं करेगा. अब तक पदमा गुप्ता सामान्य स्थिति में आ चुकी थीं. अत: एसपी (साउथ) रवीना त्यागी उन से पूछताछ करने उन के आवास पर पहुंचीं.

पूछताछ में पदमा गुप्ता ने बताया कि 18 फरवरी की सुबह सब कुछ सामान्य था. बेटी स्नेह ने खाना बनाया और उसे टिफिन लगा कर दिया. इस के बाद वह कोर्ट चली गईं. शाम सवा 5 बजे बहनोई रमाशंकर द्वारा ही उन्हें बेटी की हत्या के बारे में सूचना मिली.

‘‘आप की बेटी की हत्या किस ने की? आप को किसी पर शक है?’’ रवीना त्यागी ने पूछा.

‘‘हां, मुझे 2-3 लोगों पर शक है.’’ पदमा गुप्ता ने बताया.

‘‘किस पर?’’ एसपी ने पूछा.

‘‘पड़ोसी संदेश चतुर्वेदी और उस के बेटे सूरज तथा मोहल्ले के शोहदे अन्नू अवस्थी पर.’’

‘‘वह कैसे?’’ रवीना त्यागी ने पूछा.

पदमा गुप्ता ने बताया, ‘‘संदेश चतुर्वेदी और उस का बेटा पिछले 3 महीने से उन के साथ विवाद कर रहे हैं. दोनों बापबेटे हर समय झगड़ा व मारपीट के लिए उतारू रहते हैं. इन लोगों ने सन 2012 में उन पर जानलेवा हमला भी करवाया था और मोहल्ले का शोहदा अन्नू अवस्थी उन की बेटी से छेड़छाड़ करता था. लोकलाज के कारण उस की शिकायत नहीं की. इन्हीं कारणों से इन लोगों पर शक है.’’

‘‘घर में क्या लूटपाट भी हुई?’’ एसपी रवीना त्यागी ने पूछा.

‘‘हां, अलमारी से कुछ गहने व मामूली नकदी गायब है.’’ पदमा गुप्ता ने बताया.

पदमा गुप्ता से पूछताछ के बाद एसपी रवीना त्यागी ने स्नेह की हत्या के खुलासे के लिए एक विशेष टीम गठित की. इस टीम में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम व सिविल पुलिस के तेजतर्रार दरजन भर पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

पदमा गुप्ता ने पड़ोसी संदेश चतुर्वेदी, उस के बेटे सूरज तथा एक अन्य युवक अन्नू अवस्थी को उठा लिया. पुलिस टीम को यह भी संदेह था कि किसी बेहद नजदीकी ने ही स्नेह की हत्या की है.

अत: पुलिस ने मृतका स्नेह के मौसा रमाशंकर को भी उठा लिया. क्योंकि रमाशंकर ही सब से करीबी रिश्तेदार थे और उन का स्नेह के घर आनाजाना था. दूसरे वह अचानक घटना वाले दिन स्नेह के घर पहुंचे भी थे.

पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर संदेश चतुर्वेदी ने पदमा गुप्ता से विवाद की बात तो स्वीकार की लेकिन हत्या करने या कराने से साफ इनकार कर दिया. पूछताछ और बौडी लैंग्वेज से पुलिस को भी लगा कि संदेश व उस के बेटे सूरज का स्नेह की हत्या में हाथ नहीं है. अत: इस हिदायत के साथ उन्हें छोड़ दिया कि जरूरत पड़ने पर उन्हें फिर से थाने आना पड़ सकता है.

शोहदे अन्नू अवस्थी से भी टीम ने सख्ती से पूछताछ की. अन्नू ने स्वीकार किया कि वह स्नेह से एकतरफा प्यार करता था. उस ने उस के साथ एकदो बार छेड़खानी भी की थी, पर हत्या जैसा जघन्य अपराध उस ने नहीं किया है.

पुलिस ने उस के मोबाइल को चैक किया तो घटनास्थल वाले दिन उस की लोकेशन स्नेह के घर के आसपास की मिली. इस शक के आधार पर पुलिस टीम ने पुन: उस से सख्त रुख अपना कर पूछताछ की लेकिन उस से कोई खास जानकारी नहीं मिली. पुलिस किसी निर्दोष को जेल नहीं भेजना चाहती, अत: अन्नू अवस्थी को भी हिदायत के साथ छोड़ दिया.

रमाशंकर गुप्ता, मृतका स्नेह का मौसा थे और वह बेहद करीबी रिश्तेदार भी थे. पुलिस ने जब उन से पूछा कि घटना वाले दिन वह अचानक स्नेह के घर क्यों और कैसे पहुंचे.

इस पर रमाशंकर ने बताया कि स्नेह ने उन से मोबाइल पर बतियाते हुए कहा था कि 20 फरवरी को उस के इंस्टीट्यूट में कोई कार्यक्रम है. उसे भी कार्यक्रम में हिस्सा लेना है, अत: कुछ पैसे चाहिए. मैं ने उसे पैसे देने का वादा कर लिया था.

18 फरवरी को वह रतनलाल नगर आए थे. यहीं उन्हें याद आया कि स्नेह ने उन से पैसे मांगे थे. इसलिए वह रतनलाल नगर से सीधा डब्ल्यू ब्लौक केशवनगर स्थित स्नेह के घर पहुंचे. वहां 2 युवक कुरियर लिए खड़े थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि वह काफी देर से गेट खटखटा रहे हैं. न तो दरवाजा खुल रहा है और न ही स्नेह फोन रिसीव कर रही है. इस के बाद जब वह घर में गए तो वहां स्नेह की लाश देखी.

रमाशंकर पुलिस की निगाह में संदिग्ध थे. इसलिए उन की सच्चाई जानने के लिए पुलिस टीम ने पदमा गुप्ता से उन के बारे में जानकारी ली. पदमा गुप्ता ने रमाशंकर को क्लीन चिट देते हुए कहा कि वह उस की बहन का सुहाग है. समयसमय पर वह उन की मदद करते रहते हैं. स्नेह को वह बेटी जैसा प्यार करते थे. स्नेह भी उन से खूब हिलीमिली थी. वह उन से अकसर फोन पर बतियाती रहती थी.

पदमा गुप्ता ने रमाशंकर को क्लीन चिट दी तो पुलिस ने भी रमाशंकर को छोड़ दिया. इस के बाद पुलिस टीम ने कुरियर बौय मोहित और शुभम को उठाया. पुलिस को शक था कि कहीं वारदात को अंजाम दे कर दोनों बाहर तो नहीं आ गए और तभी रमाशंकर के आ जाने पर उन्होंने कहानी बनाई हो.

पुलिस ने मोहित से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह किदवईनगर में रहता है, जबकि उस का साथी शुभम यशोदा नगर में रहता है. स्नेह ने औनलाइन कोई सामान मंगाया था. उसी का पैकेट ले कर वह दोनों उस के घर गए थे. पैकेट पर स्नेह का मोबाइल नंबर लिखा था. उस नंबर को उस ने कई बार मिलाया. लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की.

वे दोनों जाने ही वाले थे कि रमाशंकर आ गए. उन्होंने सारी बात उन्हें बताई. पुलिस को कुरियर बौय की बातों पर विश्वास हो गया तो दोनों कुरियर बौय की डिटेल्स ले कर उन्हें भी थाने से भेज दिया.

स्नेह के मोबाइल से पुलिस टीम को 10 संदिग्ध फोन नंबर मिले. जांच करने पर पता चला कि यह नंबर स्नेह के घर काम कर चुके राजमिस्त्री, मजदूर, टिन शेड डालने वाले लोगों के थे. पुलिस ने इन नंबरों पर बात की और एकएक को थाने बुला कर सख्ती से पूछताछ की.

इन में से एक नंबर ऐसा था, जो बंद था. इस नंबर को पुलिस ने सर्विलांस पर लगाया तो पता चला कि यह नंबर घटना वाली शाम से बंद है. लेकिन उस रोज उस नंबर से दूसरे एक नंबर पर बात हुई थी. इस नंबर को पुलिस ने ट्रैस किया तो पता चला कि यह नंबर दबौली निवासी अमित का है. पुलिस टीम अमित की तलाश में जुट गई.

आखिर टीम ने नाटकीय ढंग से अमित को धर दबोचा. थाना नौबस्ता ला कर जब अमित से सख्ती से पूछताछ की तो अमित टूट गया. उस ने बताया कि बंद मोबाइल नंबर जुबेर आलम का है, जो मेहरबान सिंह पुरवा में रहता है. रतनलाल नगर में उस की वैल्डिंग करने, जेनरेटर व कूलर मरम्मत की दुकान है. जावेद ने उसे बताया कि उस ने स्नेह की हत्या कबाड़ी सुरेश वाल्मिकी की मदद से की थी.

अमित के बयान से पुलिस टीम की टेंशन दूर हो गई. अमित के सहयोग से पुलिस ने महादेव नगर निवासी सुरेश वाल्मिकी को पकड़ लिया. पुलिस ने उस के पास से सोने के 4 कंगन भी बरामद कर लिए, जो उस ने पदमा गुप्ता के यहां से चुराए थे.

इस के बाद पुलिस टीम ने जुबेर आलम के मेहरबान सिंह पुरवा स्थित किराए के मकान पर छापा मारा लेकिन वह वहां नहीं मिला. वहां पता चला कि जुबेर आलम मकान खाली कर मुरादाबाद में अपने किसी रिश्तेदार के घर चला गया है. अब जुबेर आलम को पकड़ने के लिए पुलिस टीम ने गहरा जाल बिछाया. साथ ही मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया.

7 मार्च, 2019 को प्रात: 8 बजे एक खास मुखबिर से पुलिस टीम को पता चला कि जुबेर आलम अपनी दुकान का सामान निकालने व उसे बेचने आया है. वह इस समय चिंटिल इंग्लिश मीडियम स्कूल के पास मौजूद है. मुखबिर की सूचना पर पुलिस वहां पहुंच गई और घेराबंदी कर उसे दबोच लिया.

थाने में जब उस का सामना सुरेश वाल्मिकी से हुआ तो वह सब समझ गया. फिर उस ने बिना किसी हीलाहवाली के पदमा गुप्ता की बेटी स्नेह की हत्या का जुर्म कबूल लिया. जुबेर आलम ने चुराए गए जेवरों में से झुमका और एक अंगूठी दबौली के एक ज्वैलर्स के यहां बेची थी. पुलिस ने ज्वैलर्स के यहां से अंगूठी व झुमके बरामद कर लिए. साथ ही जुबेर के पास से 900 रुपए भी बरामद कर लिए.

चूंकि सुरेश और जुबेर आलम ने स्नेह की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और उन से जेवर, नकदी भी बरामद हो गई थी, इसलिए पुलिस ने स्नेह की हत्या के जुर्म में जुबेर आलम व सुरेश वाल्मिकी को गिरफ्तार कर लिया.

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            पुलिस हिरासत में अभियुक्त जुबेर आलम व सुरेश वाल्मिकी

यह जानकारी एसएसपी अनंतदेव तथा एसपी (साउथ) रवीना त्यागी को हुई तो दोनों अधिकारी थाने पहुंच गए और उन्होंने टीम की सराहना करते हुए 25 हजार रुपए ईनाम देने की घोषणा की. फिर एसएसपी अनंतदेव ने प्रैस वार्ता कर इस चर्चित हत्याकांड का खुलासा पत्रकारों के समक्ष किया. पत्रकार वार्ता के दौरान अभियुक्तों ने स्नेह की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के नौबस्ता थानांतर्गत एक मोहल्ला केशवनगर पड़ता है. इसी मोहल्ले के डब्ल्यू ब्लौक में एडवोकेट पदमा गुप्ता अपनी बेटी स्नेह के साथ रहती थीं. यह उन का निजी मकान था. पदमा गुप्ता के पति राजकुमार गुप्ता अलग रहते हैं. दांपत्य जीवन में मनमुटाव के चलते उन्होंने पदमा को तलाक दे दिया था.

पदमा गुप्ता कानपुर कोर्ट में वकालत करती हैं. स्नेह की उम्र जब एक साल से भी कम थी, तभी उन के पति ने उन का साथ छोड़ दिया था.

पिता के प्यार से वंचित स्नेह की पदमा गुप्ता ने बड़े ही लाड़प्यार से परवरिश की थी. स्नेह बेहद खूबसूरत थी. पढ़ाई में भी तेज थी. उस ने हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. इस के बाद उस ने पौलिटेक्निक में प्रवेश पा लिया था. वह महिला पौलिटेक्निक से फार्मेसी की पढ़ाई कर रही थी.

पदमा गुप्ता अपने पड़ोसी संदेश चतुर्वेदी से दुखी रहती थीं. वह और उस का बेटा सूरज हमेशा झगड़े पर उतारू रहते थे. पदमा गुप्ता मोहल्ले के अन्नू अवस्थी से भी परेशान थीं. पौलिटेक्निक आतेजाते वह स्नेह को परेशान करता था.

हालांकि स्नेह कड़े मिजाज की थी और वह अन्नू को पास नहीं फटकने देती थी. लेकिन अन्नू एकतरफा प्यार में पागल था, जिस से वह उस से छेड़छाड करने से बाज नहीं आता था. पदमा गुप्ता अन्नू को सबक तो सिखाना चाहती थीं, किंतु लोकलाज के कारण चुप बैठ जाती थीं.

पदमा गुप्ता की बहन जरौली निवासी रमाशंकर गुप्ता को ब्याही थी. रमाशंकर पीओपी कारोबारी थे. उन का पदमा गुप्ता के घर आनाजाना था. घर बाहर का कोई काम हो वह रमाशंकर के बिना नहीं कराती थी.

अक्तूबर 2018 में पदमा गुप्ता ने अपने मकान का निर्माण कराया था. इस में राजमिस्त्री, मजदूर, कारपेंटर आदि की व्यवस्था रमाशंकर ने ही कराई थी. प्लास्टिक की शेड डालने का ठेका रमाशंकर ने जुबेर आलम को दिया था. जुबेर आलम मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शहर हापुड़ का रहने वाला था. कानपुर में वह परिवार सहित रहता था.

रतनलाल नगर में उस की वेल्डिंग करने, जेनरेटर व कूलर मरम्मत की दुकान थी. वह शेड डालने का भी काम करता था. पदमा गुप्ता के घर शेड डालने का ठेका उस ने 14 हजार रुपए में लिया था. काम खत्म होने पर जुबेर आलम को पदमा गुप्ता ने 12 हजार रुपए दे कर उस के 2 हजार रुपए रोक लिए थे.

पदमा गुप्ता के घर के सामने शशि शुक्ला का मकान था. काम के दौरान पदमा गुप्ता ने जुबेर आलम को उन के यहां लोहे की जाली लगाने का ठेका दिलवा दिया था. साथ ही तय रकम भी दिलवा दी थी. लेकिन जुबेर आलम ने आधा काम किया. शशि शुक्ला पदमा को उलाहना देती थी. स्नेह के पास सभी कामगारों के फोन नंबर थे. वह जब भी जुबेर आलम को शशि शुक्ला के यहां जाली लगाने का काम पूरा करने को कहती तो वह बहाना बना देता था.

जुबेर आलम का एक दोस्त सुरेश वाल्मिकी था. सुरेश कबाड़ का काम करता था. सुरेश जुबेर की दुकान से भी कबाड़ खरीदता था. सो दोनों में दोस्ती हो गई. दोनों की अकसर शराब की महफिल जमती थी.

दोनों पर लाखों का कर्ज था. सुरेश को कबाड़ के काम में घाटा हो गया था जबकि जुबेर आलम का बेटा बीमारी से जूझ रहा था, जिस से उस पर कर्ज हो गया था. दोनों कर्ज चुकाने की जुगत में परेशान रहते थे.

इधर एकडेढ़ माह से जुबेर आलम अपने 2 हजार रुपए मांगने स्नेह के घर आने लगा था. स्नेह उसे यह कह कर पैसा देने से मना कर देती थी कि पहले शशि आंटी के घर का काम पूरा करो. बारबार पैसा मांगने पर जब स्नेह ने पैसे नहीं दिए तो वह नफरत से भर उठा.

वह सोचने लगा कि वकील की लड़की जानबूझ कर उस की बेइज्जती कर रही है और उसे उस की मेहनत का पैसा नहीं दे रही. उस ने इस बाबत दोस्त सुरेश से सलाहमशविरा किया फिर निश्चय किया कि इस बार अगर उस ने पैसे देने से इनकार किया तो वह अपनी बेइज्जती का बदला ले कर ही रहेगा. इस के बाद उस ने 2 दिन स्नेह के घर की रेकी कर सुनिश्चित कर लिया कि सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे के बीच स्नेह घर में अकेली रहती है.

18 फरवरी, 2019 की दोपहर जुबेर आलम स्कूटर से अपने दोस्त सुरेश के साथ स्नेह के घर पहुंचा. जुबेर आलम ने गेट खटखटाया तो स्नेह ने गेट खोला. स्नेह उस समय घर पर अकेली थी. उस की मां पदमा गुप्ता कोर्ट गई हुई थीं.

जुबेर आलम का साथी सुरेश गेट के बाहर स्कूटर लिए खड़ा रहा और जुबेर आलम बरामदे में पहुंच गया. जुबेर को देख कर स्नेह का कुत्ता भौंका तो स्नेह ने इशारा कर के कुत्ते को शांत करा दिया. फिर स्नेह ने जुबेर से पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’

‘‘बेबी, मुझे रुपयों की सख्त जरूरत है, इसलिए हिसाब का बाकी 2 हजार रुपए लेने आया हूं.’’

‘‘देखो जुबेर, तुम्हें बाकी पैसा तभी मिलेगा जब तुम शशि शुक्ला आंटी का काम पूरा कर दोगे. वैसे भी मां घर पर नहीं हैं. शाम को जब वह आ जाएं, तब हिसाब लेने आ जाना.’’ स्नेह कड़ी आवाज में बोली.

जुबेर गिड़गिड़ा कर बोला, ‘‘बेबी, मेरा बेटा बीमार है. उसे दिखाने डाक्टर के पास जाना है. पूरा पैसा न सही 500 रुपए ही दे दो.’’

‘‘मुझे तुम्हारे बेटे की बीमारी से क्या लेनादेना. इस समय मैं तुम्हें फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगी. समझे.’’ वह बोली.

स्नेह की बात सुन कर जुबेर तिलमिला उठा. उस की आंखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी. जुबेर अभी यह सोच ही रहा था कि वह इस बदमिजाज लड़की को सबक कैसे सिखाए, तभी स्नेह बोल पड़ी, ‘‘जुबेर, मुझे पलंग के पास एक अलमारी बनवानी है. उस की नाप ले लो.’’

इस के बाद वह जुबेर को अंदर के कमरे में ले गई. जुबेर ने स्नेह को इंचटेप पकड़ाया और वह पलंग पर चढ़ कर नाप लेने लगी. इसी समय नफरत से भरे जुबेर आलम की नजर जीने में रखी ईंट पर पड़ गई. उस ने लपक कर ईंट उठाई और भरपूर वार स्नेह के पीछे सिर में किया. स्नेह का सिर फट गया और वह पलंग के नीचे आ गिरी.

इसी समय खून से लथपथ पड़ी स्नेह के पैर उस ने उसी के दुपट्टे से बांध दिए. फिर रसोई में जा कर चाकू उठा लाया. इस के बाद उस ने चाकू से उस के गले को रेत दिया तथा दोनों हाथों की कलाइयों की नसें काट दीं. उस ने उस के चेहरे पर भी चाकू से वार कर दिया.

स्नेह को मौत के घाट उतारने के बाद जुबेर ने अलमारी का सामान पलंग पर बिखेर दिया और अलमारी से सोने के 4 कंगन, एक जोड़ी झुमके, एक अंगूठी और 900 रुपए निकाल लिए. यह सब ले कर वह घर के बाहर आ गया.

बाहर उस का दोस्त सुरेश स्कूटर स्टार्ट किए खड़ा था. इस के बाद स्कूटर से दोनों भाग गए. लेकिन शास्त्री चौक पर उस का स्कूटर खराब हो गया. तब उस ने मोबाइल फोन पर अपने एसी मैकेनिक दोस्त दबौली निवासी अमित को सारी घटना बताई और मोटरसाइकिल ले कर आने को कहा. लेकिन अमित घबरा गया. उस ने दोबारा फोन न करने की चेतावनी दे कर अपना फोन बंद कर दिया.

इस के बाद सुरेश ने स्कूटर ठीक कराया और जुबेर को उस के घर छोड़ा. जुबेर ने 4 कंगन तो सुरेश को दे दिए तथा झुमके और अंगूठी उस ने उसी शाम दबौली के ज्वैलर के यहां 24 हजार रुपए में बेच दिए और रात में ही मिनी ट्रक पर सामान लाद कर पत्नी बच्चों सहित मुरादाबाद में रिश्तेदार के यहां रवाना हो गया. इधर घटना की जानकारी तब हुई जब कुरियर देने मोहित व शुभम आए.

8 मार्च, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त जुबेर आलम व सुरेश वाल्मिकी को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया.

कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. अमित को पुलिस ने सरकारी गवाह बना लिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंजाम-ए-साजिश : एक निर्दोष लड़की की हत्या

 रेलवे लाइनों के किनारे पड़ी बोरी को लोग आश्चर्य से देख रहे थे. बोरी को देख कर सभी अंदाजा लगा रहे थे कि बोरी में शायद किसी की लाश होगी. मामला संदिग्ध था, इसलिए वहां मौजूद किसी शख्स ने फोन से यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को दे दी.

कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोलरूम की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने जब बोरी खोली तो उस में एक युवती की लाश निकली. लड़की की लाश देख कर लोग तरहतरह की चर्चाएं करने लगे.

जिस जगह लाश वाली बोरी पड़ी मिली, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना सरिता विहार क्षेत्र में आता है. लिहाजा पुलिस कंट्रोलरूम से यह जानकारी सरिता विहार थाने को दे दी गई. सूचना मिलते ही एसएचओ अजब सिंह, इंसपेक्टर सुमन कुमार के साथ मौके पर पहुंच गए.

एसएचओ अजब सिंह ने लाश बोरी से बाहर निकलवाने से पहले क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया और आला अधिकारियों को भी इस की जानकारी दे दी. कुछ ही देर में डीसीपी चिन्मय बिस्वाल और एसीपी ढाल सिंह भी वहां पहुंच गए. फोरैंसिक टीम का काम निपट जाने के बाद डीसीपी और एसीपी ने भी लाश का मुआयना किया.

मृतका की उम्र करीब 24-25 साल थी. वहां मौजूद लोगों में से कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका तो यही लगा कि लड़की इस क्षेत्र की नहीं है. पुलिस ने जब उस के कपड़ों की तलाशी ली तो उस के ट्राउजर की जेब से एक नोट मिला.

उस नोट पर लिखा था, ‘मेरे साथ अश्लील हरकत हुई और न्यूड वीडियो भी बनाया गया. यह काम आरुष और उस के 2 दोस्तों ने किया है.’

नोट पर एक मोबाइल नंबर भी लिखा था. पुलिस ने नोट जाब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस के सामने पहली समस्या लाश की शिनाख्त की थी. उधर बरामद किए गए नोट पर जो फोन नंबर लिखा था, पुलिस ने उस नंबर पर काल की तो वह उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले आरुष का निकला. नोट पर भी आरुष का नाम लिखा हुआ था.

सरिता विहार एसएचओ अजब सिंह ने आरुष को थाने बुलवा लिया. उन्होंने मृतका का फोटो दिखाते हुए उस से संबंधों के बारे में पूछा तो आरुष ने युवती को पहचानने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि वह उसे जानता तक नहीं है. किसी ने उसे फंसाने के लिए यह साजिश रची है.

आरुष के हावभाव से भी पुलिस को लग रहा था कि वह बेकसूर है. फिर भी अगली जांच तक उन्होंने उसे थाने में बिठाए रखा. उधर डीसीपी ने जिले के समस्त बीट औफिसरों को युवती की लाश के फोटो देते हुए शिनाख्त कराने की कोशिश करने के निर्देश दे दिए. डीसीपी चिन्मय बिस्वाल की यह कोशिश रंग लाई.

पता चला कि मरने वाली युवती दक्षिणपूर्वी जिले के अंबेडकर नगर थानाक्षेत्र के दक्षिणपुरी की रहने वाली सुरभि (परिवर्तित नाम) थी. उस के पिता सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं. पुलिस ने सुरभि के घर वालों से बात की. उन्होंने बताया कि नौकरी के लिए किसी का फोन आया था. उस के बाद वह इंटरव्यू के सिलसिले में घर से गई थी.

पुलिस ने सुरभि के घर वालों से उस की हैंडराइटिंग के सैंपल लिए और उस हैंडराइटिंग का मिलान नोट पर लिखी राइटिंग से किया तो दोनों समान पाई गईं. यानी दोनों राइटिंग सुरभि की ही पाई गईं.

पुलिस ने आरुष को थाने में बैठा रखा था. सुरभि के घर वालों से आरुष का सामना कराते हुए उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने आरुष को पहचानने से इनकार कर दिया.

नौकरी के लिए फोन किस ने किया था, यह जानने के लिए एसएचओ अजब सिंह ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस से सुरभि के फोन पर कई बार काल की गई थीं और उस से बात भी हुई थी. जांच में वह फोन नंबर संगम विहार के रहने वाले दिनेश नाम के शख्स का निकला. पुलिस काल डिटेल्स के सहारे दिनेश तक पहुंच गई.

थाने में दिनेश से सुरभि की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कबूल कर लिया कि अपने दोस्तों के साथ मिल कर उस ने पहले सुरभि के साथ सामूहिक बलात्कार किया. इस के बाद उन लोगों ने उस की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

उस ने बताया कि वह सुरभि को नहीं जानता था. फिर भी उस ने उस की हत्या एक ऐसी साजिश के तहत की थी, जिस का खामियाजा जेल में बंद एक बदमाश को उठाना पड़े. उस ने सुरभि की हत्या की जो कहानी बताई, वह किसी फिल्मी कहानी की तरह थी—

दिल्ली के भलस्वा क्षेत्र में हुए एक मर्डर के आरोप में धनंजय को जेल जाना पड़ा. जेल में बंटी नाम के एक कैदी से धनंजय का झगड़ा हो गया था. बंटी उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र का रहने वाला था.

बंटी भी एक नामी बदमाश था. दूसरे कैदियों ने दोनों का बीचबचाव करा दिया. दोनों ही बदमाश जिद्दी स्वभाव के थे, लिहाजा किसी न किसी बात को ले कर वे आपस में झगड़ते रहते थे. इस तरह उन के बीच पक्की दुश्मनी हो गई.

उसी दौरान दिनेश झपटमारी के मामले में जेल गया. वहां उस की दोस्ती धीरेंद्र नाम के एक बदमाश से हुई. जेल में ही धीरेंद्र की दुश्मनी बुराड़ी के रहने वाले बंटी से हो गई. धीरेंद्र ने जेल में ही तय कर लिया कि वह बंटी को सबक सिखा कर रहेगा.

करीब 2 महीने पहले दिनेश और धीरेंद्र जमानत पर जेल से बाहर आ गए. जेल से छूटने के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक कमरे में साथसाथ संगम विहार इलाके में रहने लगे.

उन्होंने बंटी के परिवार आदि के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी. उन्हें पता चला कि बंटी के पास 200 वर्गगज का एक प्लौट है. उस प्लौट की देखभाल बंटी का भाई आरुष करता है. कोशिश कर के उन्होंने आरुष का फोन नंबर भी हासिल कर लिया.

इस के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक गहरी साजिश का तानाबाना बुनने लगे. उन्होंने सोचा कि बंटी के भाई आरुष को किसी गंभीर केस में फंसा कर जेल भिजवा दिया जाए. उस के जेल जाने के बाद उस के 200 वर्गगज के प्लौट पर कब्जा कर लेंगे. यह फूलप्रूफ प्लान बनाने के बाद वह उसे अंजाम देने की रूपरेखा बनाने लगे.

दिनेश और धीरेंद्र ने इस योजना में अपने दोस्त सौरभ भारद्वाज को भी शामिल कर लिया. पहले से तय योजना के अनुसार दिनेश ने अपनी गर्लफ्रैंड के माध्यम से उस की सहेली सुरभि को नौकरी के बहाने बुलवाया. सुरभि अंबेडकर नगर में रहती थी.

गर्लफ्रैंड ने सुरभि को नौकरी के लिए दिनेश के ही मोबाइल से फोन किया. सुरभि को नौकरी की जरूरत थी, इसलिए सहेली के कहने पर वह 25 फरवरी, 2019 को संगम विहार स्थित एक मकान पर पहुंच गई.

उसी मकान में दिनेश और धीरेंद्र रहते थे. नौकरी मिलने की उम्मीद में सुरभि खुश थी, लेकिन उसे क्या पता था कि उस की सहेली ने विश्वासघात करते हुए उसे बलि का बकरा बनाने के लिए बुलाया है.

सुरभि उस फ्लैट पर पहुंची तो वहां दिनेश, धीरेंद्र और सौरभ भारद्वाज मिले. उन्होंने सुरभि को बंधक बना लिया. इस के बाद उन तीनों युवकों ने सुरभि के साथ गैंपरेप किया. नौकरी की लालसा में आई सुरभि उन के आगे गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उन दरिंदों को उस पर जरा भी दया नहीं आई.

चूंकि इन बदमाशों का मकसद जेल में बंद बंटी को सबक सिखाना और उस के भाई आरुष को फंसाना था, इसलिए उन्होंने सुरभि के मोबाइल से आरुष के मोबाइल नंबर पर कई बार फोन किया. लेकिन किन्हीं कारणों से आरुष ने उस की काल रिसीव नहीं की थी.

इस के बाद तीनों बदमाशों ने हथियार के बल पर सुरभि से एक नोट पर ऐसा मैसेज लिखवाया जिस से आरुष झूठे केस में फंस जाए. उस नोट पर इन लोगों ने आरुष का फोन नंबर भी लिखवा दिया था.

फिर वह नोट सुरभि के ट्राउजर की जेब में रख दिया. सुरभि उन के अगले इरादों से अनभिज्ञ थी. वह बारबार खुद को छोड़ देने की बात कहते हुए गिड़गिड़ा रही थी. लेकिन उन लोगों ने कुछ और ही इरादा कर रखा था.

तीनों बदमाशों ने सुरभि की गला घोंट कर हत्या कर दी. बेकसूर सुरभि सहेली की बातों पर विश्वास कर के मारी जा चुकी थी. इस के बाद वे उस की लाश ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगे. उन्होंने उस की लाश एक बोरी में भर दी.

इस के बाद इन लोगों ने अपने परिचित रहीमुद्दीन उर्फ रहीम और चंद्रकेश उर्फ बंटी को बुलाया. दोनों को 4 हजार रुपए का लालच दे कर इन लोगों ने वह बोरी कहीं रेलवे लाइनों के किनारे फेंकने को कहा.

पैसों के लालच में दोनों उस लाश को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हो गए तो दिनेश ने 7800 रुपए में एक टैक्सी हायर की. रात के अंधेरे में उन्होंने वह लाश उस टैक्सी में रखी और रहीमुद्दीन और चंद्रकेश उसे सरिता विहार थाना क्षेत्र में रेलवे लाइनों के किनारे डाल कर अपने घर लौट गए.

लाश ठिकाने लगाने के बाद साजिशकर्ता इस बात पर खुश थे कि फूलप्रूफ प्लानिंग की वजह से पुलिस उन तक नहीं पहुंच सकेगी, लेकिन दिनेश द्वारा सुरभि को की गई काल ने सभी को पुलिस के चंगुल में पहुंचा दिया. मामले का खुलासा हो जाने के बाद एसएचओ अजब सिंह ने हिरासत में लिए गए आरुष को छोड़ दिया.

दिनेश से की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के अन्य साथियों सौरभ भारद्वाज, चंद्रकेश उर्फ बंटी और रहीमुद्दीन उर्फ रहीम को भी गिरफ्तार कर लिया. पांचवां बदमाश धीरेंद्र पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका, वह फरार हो गया था. गिरफ्तार किए गए बदमाशों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

पुलिस को इस मामले में दिनेश की प्रेमिका को भी हिरासत में ले कर पूछताछ करनी चाहिए थी, क्योंकि सुरभि की हत्या की असली जिम्मेदार तो वही थी. उसी ने ही सुरभि को नौकरी के बहाने दिनेश के किराए के कमरे पर बुलाया था.

बहरहाल, दूसरे को फांसने के लिए जाल बिछाने वाला दिनेश खुद अपने बिछाए जाल में फंस गया. पहले वह झपटमारी के आरोप में जेल गया था, जबकि इस बार वह सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में जेल गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड