Social Crime: अधेड़ पति संग कैसे चले गृहस्थी

Social Crime: यह कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है, बल्कि हर उस औरत की है, जो पति से डरती है. लेकिन समाज से और ज्यादा अपमान सहती रहती है. वह इसलिए क्योंकि उसे अपना घर बचाना होता है. वह सब कुछ सहते हुए भी चुप रहती है, क्योंकि उसे अपने बच्चों का भविष्य देखना होता है. और अंत में वही चुप्पी उस की कब्र की मिट्टी बन जाती है. पढ़ें, दिल को झकझोर देने वाली यह कहानी. 

लक्ष्मी जब उस घर में ब्याह कर आई थी, तब उस घर की लक्ष्मी बन कर आई थी. साल 2017 में जब वाराणसी के मार्कंडेय महादेव मंदिर में उस का विवाह 38 साल के प्रदीप मिश्रा के साथ हुआ था, तब वह मात्र 18 साल की थी. उस का पति प्रदीप उस से 20 साल बड़ा था. अपनी उम्र से 20 साल बड़े आदमी से विवाह करने का मतलब था कि उस के फेमिली वालों ने मजबूरी में उस का विवाह प्रदीप के साथ किया था. क्योंकि 20 साल का अंतर कम नहीं होता.

लक्ष्मी के पेरेंट्स की मजबूरी यह थी कि वे इतने गरीब थे कि बेटी का विवाह नहीं कर सकते थे. इसीलिए उन्होंने लक्ष्मी का विवाह मंदिर में किया था.

प्रदीप मिश्रा उम्र में ही लक्ष्मी से बड़ा नहीं था, बल्कि अपराधी भी था. वह 10 साल की सजा भी काट चुका था. थाना चौबेपुर में उस के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. इसीलिए इतनी उम्र तक वह कुंवारा ही रहा था.

कुछ भी रहा हो, लक्ष्मी प्रदीप से मंदिर में ब्याह कर के उस के घर की लक्ष्मी बन कर आ गई थी. इस तरह के आदमी से विवाह कर के लक्ष्मी जिस घर में आई थी, वहां संशय, डर और अपमान ने पहले से ही डेरा डाल रखा था. ऐसे घर में लक्ष्मी कहां से लक्ष्मी रहती. इस तरह लक्ष्मी नाम की यह महिला ‘लक्ष्मी’ नहीं, विडंबना बन कर रह गई थी.

प्रदीप मिश्रा: पत्नी द्वारा अपमानित करने पर उसे ठिकाने लगाने की ठान ली

वाराणसी के सोनबरसा गांव की उस गली में, जहां सुबह गंगा की आरती की ध्वनि गूंजती थी और शाम को दीपों की रोशनी उतरती थी, वहां प्रदीप से विवाह के बाद लक्ष्मी की जिंदगी बिना किसी शोर के धीरेधीरे बुझने लगी थी.

प्रदीप के साथ रहते हुए दिन गुजरने लगे. उसे अपने सुख की नहीं, पति के सुख की ज्यादा चिंता रहती. धीरेधीरे उसकी उम्र 26 साल हो गई तो पति की उम्र 46 साल. लक्ष्मी जवान हुई तो पति अधेड़ यानी बूढ़ा हो गया था. अब तक वह 2 बच्चों, एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी.

मृतका लक्ष्मी: गरीब पेरेंट्स ने उस का विवाह 20 साल बड़े प्रदीप से कर दिया था

सपने देखने और और उन्हें संवारने की उम्र थी लक्ष्मी की, हाथों में बच्चों की गरमाहट और मन में शायद एक ऐसी जिंदगी की चाह थी, जिस में उसे हर पल सफाई न देनी पड़े, लेकिन उस के सामने था उस का पति 46 साल का प्रदीप मिश्रा, जो औटो चलाता था. वह एक कातिल भी था, जिस की वह सजा भी काट चुका था.

20 साल की उम्र का फासला कोई छोटी बात नहीं होती. इस तरह देखा जाए तो लक्ष्मी ने प्रदीप से विवाह नहीं किया था, बल्कि अपनी जिंदगी से, खुशियों से, सपनों से समझौता किया था. जैसा आज तक होता आया है कि लड़की के हिस्से में आता है समझना, झुकना, निभाना, वैसा ही लक्ष्मी के हिस्से में भी आया था. इस का उलटा पुरुष के हिस्से में आता है अधिकार, शक और असुरक्षा.

शादी के शुरुआती दिनों में शायद सब कुछ ठीकठाक रहा होगा. तभी तो लक्ष्मी प्रदीप के 2 बच्चों की मां बन गई थी. तब प्रदीप भी जवान रहा होगा. इसलिए लक्ष्मी को हर तरह से खुश रखता रहा होगा. इसी का परिणाम था उन के 2 बच्चे. बच्चे रिश्तों को जोड़ते हैं, परिवार को टूटने से बचाते हैं, लेकिन कभीकभी वे फंस गए होते हैं.

धीरेधीरे लक्ष्मी में बदलाव आने लगा था. इस की वजह यह थी कि अब वह जवान हुई तो उस का पति यानी प्रदीप मिश्रा बूढ़ा हो गया था. वह उस की हसरतें जगा तो देता था, पर उन्हें शांत करना उस के वश का नहीं रह गया था. जवान लक्ष्मी की चाल में वह काफी पीछे रह जाता था. औटो चलाने वाला प्रदीप पत्नी और बच्चों की खुशी के लिए पैसे कमाने के चक्कर में देर रात को आता था और खाना खा कर सो जाता था. कभीकभार लक्ष्मी उस से प्यार करने की बात करती तो वह उस की भावनाओं को नहीं समझता था. ऐसे में लक्ष्मी जलभुन जाती और बूढ़ा कह कर उसे धिक्कारती.

अपमान और शरम से प्रदीप करवट बदल कर सो जाता था. धीरेधीरे यह क्रम बढ़ता ही गया. पति का प्यार न पाने और देह की आग शांत न होने से लक्ष्मी का स्वभाव बदलने लगा था. वह चिड़चिड़ी हो गई थी, जिस से अपना ज्यादातर समय वह मोबाइल पर बिताने लगी थी. उसी बीच उस की मोबाइल द्वारा ही किसी से मुलाकात हो गई थी, जो उसे अपने पति और बच्चों से ज्यादा अच्छा लगने लगा था.

फिर तो जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर बात करती रहती. कभी मुसकराती तो खिलखिला कर हंसती. कभी अचानक चुप हो जाती. फिर यही चुप्पी प्रदीप को चुभने लगती. लक्ष्मी में आए इस बदलाव से उसे लगता था कि लक्ष्मी उस से दूर जा रही है. वह उसे बूढ़ा समझती है, जिस की वजह से वह किसी और की हो चुकी है. प्रदीप को अभी इस बात का शक था, क्योंकि उस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं था. शक दीमक की तरह रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है, लेकिन यह शक नहीं था. लक्ष्मी सचमुच किसी और की हो गई थी.

क्योंकि एक बार नहीं, 3 बार घर, पति और बच्चों को छोड़ कर भाग चुकी थी. वह जब भी घर छोड़ कर जाती थी, कभी एक सप्ताह तो कभी 10 दिन बाद लौट आती थी. पहली बात तो प्रदीप उस से कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं कर पाता था और अगर पूछ भी लेता तो उसे बूढ़ा कह कर अपमानित करती थी. वह अपना घर बचाने के लिए चुप रह जाता था. यही वजह थी कि दिनोंदिन लक्ष्मी मनबढ़ होती गई और वह वह करने लगी, जो उस का मन होता था. इस से प्रदीप परेशान रहने लगा था.

लक्ष्मी ने कभी खुल कर कुछ कहा या नहीं, यह अब कोई नहीं जानता. लेकिन प्रदीप ने लोगों को जो बताया, उस के हिसाब से लक्ष्मी ही हमेशा दोषी रही. प्रदीप का कहना था कि वह उसे ‘बुड्ïढा’ कह कर अपमानित करती थी. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती थी. लक्ष्मी 3 बार घर छोड़ कर जा चुकी थी. पर उसने ही नही, किसी ने भी उस से यह नहीं पूछा कि वह कहां और क्यों गई थी?

इस की वजह यह थी कि प्रदीप को अपने बच्चों की चिंता थी. पत्नी नहीं रहेगी तो वह छोटेछोटे बच्चों को कैसे संभालेगा. बच्चों को पालने के लिए पैसों की जरूरत थी और पैसे कमाने के लिए उस का घर से बाहर जाना जरूरी था. अगर लक्ष्मी घर में नहीं रहेगी तो वह बच्चों को अकेला छोड़ कर घर से बाहर कैसे जा पाता? यही सोच कर प्रदीप लक्ष्मी की यह गलती भी स्वीकार करता रहा और उस के ताने भी सुनता रहा. लक्ष्मी जब भी घर छोड़ कर जाती थी, सप्ताह या 10 दिनों बाद खुद ही वापस आ जाती थी. वह भाग कर कहां जाती थी, किस के पास जाती थी, यह प्रदीप को ही नहीं, किसी को भी नहीं पता था. उस के मायके वालों को भी नहीं.

क्या घर छोड़ कर जाना अपराध है? क्या अपनी खुशी के लिए इतना करना अपराध है? कभीकभी यह घुटन भरे वातावरण से निकल कर सांस लेने की कोशिश भी तो हो सकती है? एक औरत की मानसिक थकान दूर करने की इच्छा भी तो हो सकती है. लक्ष्मी के दिन अब बोझिल होने लगे थे. प्रदीप के घर में उस के साथ रहने में उसे घुटन सी होने लगी थी. वह मां थी, लेकिन उस से पहले एक औरत भी थी. किसी भी औरत के लिए घर एक सुरक्षित जगह मानी जाती है. उस की सारी दुनिया वही घर होता है, जहां उसे सुरक्षा के साथसाथ सारे सुख मिलते हैं. पर लक्ष्मी के लिए अब उस का ही घर सुरक्षित जगह नहीं रहा था.

जिस सुख के लिए वह उस घर में आई थी, अब वही सुख उसे वहां नहीं मिल रहा था. अब उस के हर सवाल में इलजाम थे, हर चुप्पी में शक था और हर हंसी में अपराध था. जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर व्यस्त रहने लगी थी. शायद इसलिए नहीं कि दूसरी ओर कोई और था, बल्कि इसलिए कि कोई तो हो, जिस से वह बिना डरे, बिना संकोच बात कर सके. मन की घुटन को दूर कर सके. मन को हलका कर सके.

लेकिन पुरुष समाज में औरत का अकेलापन भी उसे ही दोषी ठहराता है. अपराधी बनाता है या अपराध को जन्म देता है. अकेलेपन पर पति की उपेक्षा से परेशान लक्ष्मी एक बार फिर घर छोड़ कर भागी तो 18 दिसंबर, 2025 की सुबह लौटी थी. उस दिन गुरुवार था. लक्ष्मी घर तो वापस आ गई थी, लेकिन उस का मूड ठीक नहीं था. घर आने के बाद जब प्रदीप ने उसे टोका तो वह उस से लडऩे लगी थी. इस बार उस ने प्रदीप से स्पष्ट कह दिया था कि अब वह उस के साथ नहीं रहेगी. वह बूढ़ा हो चुका है. वह बूढ़े के साथ रहने के बजाय अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी.

इस के पहले भी वह 2 बार भागी थी. तब प्रदीप और लक्ष्मी का एक बार थाने में तो दूसरी बार पंचायत में समझौता हुआ था. प्रदीप उसे तलाक देने को भी राजी था, लेकिन तब लक्ष्मी ने कहा था कि अब वह नहीं भागेगी. इस के बावजूद यह तीसरी बार भाग गई थी. अकेलेपन और पति की टोकाटाकी से परेशान लक्ष्मी बारबार प्रदीप से झगड़ा कर रही थी. हल्की ठंड थी, लेकिन अकेलेपन से बेचैन लक्ष्मी का मूड गरम था.

पतिपत्नी के इस झगड़े से बच्चे परेशान हो रहे थे. इसलिए सभी का मूड ठीक करने के लिए प्रदीप ने 19 दिसंबर, 2025 की शाम को लक्ष्मी से अपनी बहन के यहां चलने को कहा. उस की बहन जौनपुर के चंदवक के अहिरौली गांव में रहती थी. लक्ष्मी प्रदीप की बहन यानी अपनी ननद के यहां जाने के लिए राजी हो गई. महिलाएं अकसर मान जाती हैं. लक्ष्मी भी मान गई थी, शायद वह आखिरी कोशिश करना चाहती थी.

सभी को अपने औटो से ले कर प्रदीप बहन के यहां पहुंचा. रात करीब 10 बजे सभी ने साथ बैठ कर खाना खाया. खाने के बाद एक बार फिर प्रदीप ने उस लड़के का जिक्र किया, जिस से लक्ष्मी बातें करती थी. प्रदीप का कहना था कि लक्ष्मी उसे छोड़ कर उस लड़के से शादी करना चाहती है. प्रदीप ने उस लड़के की बात की तो लक्ष्मी उसे भलाबुरा कहने लगी. जबकि प्रदीप का कहना था कि वह उसे समझा रहा था. लड़के का जिक्र करने से लक्ष्मी को गुस्सा आ गया था और वह उस से जोरजोर लडऩे लगी थी.

रिश्तेदारों के सामने ही प्रदीप को अपमानित करने लगी थी. वहां भी उस ने वही बात कही कि अब वह उस जैसे बूढ़े के साथ नहीं रहेगी. वह अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी. यह बात प्रदीप को बुरी लगी और उस ने मन ही मन उस की हत्या करने का निर्णय ले लिया. प्रदीप के अनुसार, रोजरोज के इन झगड़ों से अपमानित होने से वह परेशान हो चुका था. रिश्तेदारों के सामने लक्ष्मी ने प्रदीप को अपमानित किया तो उस ने तय कर लिया कि अब उसे लक्ष्मी को ठिकाने लगाना ही होगा. तभी वह शांति से रह पाएगा.

थोड़ा शांत होने के बाद लक्ष्मी ने चाय पिलाने के लिए कहा. बहन ने चाय बनाने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने कहा, ”नहीं, मैं घर में नहीं, बाहर चल कर चाय पीना चाहती हूं.’’

बच्चों को बहन के घर में ही छोड़ कर प्रदीप लक्ष्मी को औटो से ले कर चल पड़ा. चलते समय बच्चों ने नहीं सोचा था कि वह मम्मी को अंतिम बार देख रहे हैं. यही कोई 11 बजे का टाइम था. लक्ष्मी ने एक बार फिर चाय पीने की बात की. उस की यह एक मामूली इच्छा थी. साधारण सी बात थी. बस, उस की इसी इच्छा ने अपराध को जन्म दे दिया था. लक्ष्मी औटो की पिछली सीट पर बैठी थी. वह सोच रही थी कि शायद सब ठीक हो जाएगा. उसे क्या पता था कि जिस आदमी के साथ उस ने इतने साल गुजारे थे, आज वही आदमी उस की सांसों का हिसाब करने वाला है.

सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था. प्रदीप कथौर गांव के पास (चोलापुर) की ओर मुड़ गया. थोड़ा आगे बढऩे पर सड़क को सुनसान देख कर प्रदीप को लगा कि यही सही जगह और मौका है. उस के दिमाग में लक्ष्मी की हत्या की योजना बनने लगी. फिर उस ने औटो रोक दिया. उस के औटो रोकने पर लक्ष्मी ने पूछा, ”यहां सुनसान में औटो क्यों रोक दिया?’’

प्रदीप ने बहाना बनाते हुए कहा, ”कुछ गड़बड़ी हो गई है. रुको देखता हूं, क्या खराबी आई है?’’

औटो से बाहर आ कर प्रदीप ने गले में लिपटा मफलर निकाला और उस का फंदा बना कर तैयार हो गया. इस के बाद लक्ष्मी से कहा कि उस की मदद के लिए वह भी जरा बाहर आ जाए. लक्ष्मी जैसे ही औटो से उतर कर बाहर आई, प्रदीप ने फुरती से मफलर का फंदा उस के गले में डाल कर कस दिया. 2 मिनट तक तड़प कर लक्ष्मी हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गई. लक्ष्मी की हत्या करने के बाद उस सर्द रात में प्रदीप 10 मिनट तक चुपचाप बैठा सोचता रहा कि अब क्या किया जाए. काफी सोचने के बाद उस के मन में आया कि अगर वह लाश को इसी तरह छोड़ कर चला गया तो वह पकड़ा जा सकता है, क्योंकि उस का घर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. कोई न कोई लाश को पहचान लेगा.

लाश की पहचान न हो सके, इस के लिए वह लाश को सड़क से घसीट कर पास के एक बाग में ले गया और उस की पहचान मिटाने के लिए औटो में रखी एक सीमेंट की ईंट से उस के चेहरे पर कई वार किए, जिस से उस का चेहरा इस तरह बिगड़ गया कि अब उसे कोई पहचान नहीं सकता था. वहीं करीब ही बाजरे के लट्ठे का ढेर था. चेहरा बिगाडऩे के बाद प्रदीप ने लाश को उसी में छिपा दिया. उस के बाद वह न घर गया और न बहन के यहां. वह फरार हो गया था. बच्चों को उस ने बहन के घर ही रहने दिया था.

21 दिसंबर, 2025 को कथौर गांव का रहने वाला मूकबधिर सोनू यादव बाग में लगे बाजरे के लट्ठे के ढेर को उठाने पहुंचा तो उसे उस ढेर में एक महिला की लाश दिखाई दी. वह भाग कर गांव पहुंचा और इशारे से लोगों को बुला कर लट्ठे के ढेर के पास ले आया. इस के बाद लोगों ने ग्राम प्रधान दयाराम यादव को बाजरे के ढेर में लाश होने की सूचना दी तो दयाराम ने यह जानकारी वाराणसी के थाना चोलापुर पुलिस को दे दी.

लाश मिलने की सूचना मिलते ही एसएचओ दीपक कुमार पुलिस बल, फोरैंसिक टीम एवं डौग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थाने से निकलने से पहले उन्होंने यह सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. लाश बाहर निकाली गई. चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था. इसलिए उस की पहचान मुश्किल लग रही थी. प्रदीप ने यही सोचा था कि चेहरा बिगाड़ देने से कोई पहचान नहीं पाएगा, लेकिन वह यह भूल गया था कि औरतें सिर्फ चेहरे से ही नहीं पहचानी जातीं, उन की पहचान एक निशान से भी हो जाती है. उस के हाथों पर पहचान लिखी थी.

लाश के दोनों हाथों पर टैटू थे. एक हाथ पर अंगरेजी में ‘पीएल’ लिखा था तो दूसरे हाथ में दिल का निशान तो बना ही था, साथ ही कुछ लिखा भी था. ये प्रेम के निशान थे. पुलिस के लिए यही सब से बड़ा सुराग साबित हुआ. पूछताछ में मरने वाली का नाम आया लक्ष्मी. ‘एल’ से लक्ष्मी था तो ‘पी’ से प्रदीप. यानी उस ने हाथ पर लक्ष्मी और प्रदीप लिखवा रखा था. इस का मतलब था कि वह प्रदीप से बहुत प्यार करती थी. तभी तो अपने नाम के साथ उस का नाम लिखवाया था, लेकिन समय के साथ वह प्यार खत्म हो गया था और बात हत्या तक पहुंच गई थी.

प्रैस क्रौन्फ्रैंस करते एसीपी विदुष सक्सैना और एडीसीपी वरूणा नीतू कात्यायन

उसी टैटू से लाश की शिनाख्त हो गई तो पुलिस हत्यारे का पता लगाने के साथ सबूत जुटाने में लग गई. पुलिस को अब लक्ष्मी के पति प्रदीप मिश्रा की तलाश थी. लेकिन वह घर में नहीं था. पुलिस को उस का मोबाइल नंबर मिल गया था, जिसे पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था. इस के अलावा पुलिस सीसीटीवी कैमरों की भी मदद ले रही थी. परिणामस्वरूप पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सीसीटीवी कैमरों और सर्विलांस की मदद से प्रदीप मिश्रा उर्फ गुड्ïडू को औटो के साथ 22 दिसंबर को महमूदपुर मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया.

उसे थाना चोलापुर ला कर एडिशनल डीसीपी वरुणा नीतू कत्यायन और एसीपी सारनाथ विदुष सक्सेना की उपस्थिति में पूछताछ की गई तो प्रदीप थोड़ेबहुत बहाने बनाने के बाद टूट गया और पत्नी लक्ष्मी की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. शुरुआत में उस ने भी बाकी अपराधियों की तरह अंजान बनने की कोशिश की थी, लेकिन सच भारी होता है. ज्यादा देर छिपता नहीं है. वह जल्दी ही मुंह से निकल ही आता है. जब उस ने कहा कि उस ने ही लक्ष्मी को मारा है तो पुलिस ने राहत की सांस ली, क्योंकि मामले का खुलासा हो गया था और आरोपी पकड़ा गया था.

और फिर जैसे किसी को अपना गुनाह हल्का करना होता है तो वह गुनाह की वजहें गिनाने लगता है, उसी तरह प्रदीप भी लक्ष्मी की हत्या की वजहें गिनाने लगा कि वह उसे ताने मारती थी, उस से दूर हो गई थी, उस का किसी और से अफेयर था. लेकिन प्रदीप ने यह नहीं कहा कि उस ने उसे समझने या समझाने की कोशिश की.

प्रदीप का कहना था कि उस ने उस की हर बात सुनी, उसे हर तरह की आजादी दी, शायद उसी का नतीजा था कि वह आजाद हो गई थी. अपना धर्म और संस्कार भूल गई थी. उस ने यह नहीं कहा कि किसी जवान महिला को सिर्फ रोटीकपड़ा ही नहीं चाहिए, उसे प्यार और स्नेह भी चाहिए, जो उसे परिवार के लिए बांधे रखता है.

उसके 2 बच्चे हैं, जो अभी कुछ नहीं जानते. सब से ज्यादा चुप्पी अब उन्हीं के हिस्से में है. वे अपनी बुआ के पास हैं. उन्हें बताया गया है कि मम्मी कहीं गई है. पापा काम से बाहर गए हैं. किसी ने उन्हें नहीं बताया कि उन की मम्मी अब कभी कहानी नहीं सुनाएगी, उन्हें अब कभी नहीं मिलेगी और उन के पिता जेल में हैं. पूछताछ के बाद प्रदीप को जेल भेज दिया गया है. पुलिस ने उसे हत्यारा साबित करने के लिए सबूत भी जुटा लिए हैं, जिस में सीसीटीवी फुटेज के अलावा घटनास्थल पर उस की उपस्थिति के भी सबूत थे. Social Crime

 

 

Family Crime: प्यार में छली गई कांस्टेबल

Family Crime: पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी की एक्सीडेंट में मृत्यु के बाद ओडिशा के कांस्टेबल दीपक राउत (39 वर्ष) ने बीमा कंपनी से डेढ़ करोड़ रुपए का क्लेम लिया. इस के बाद उस ने कांस्टेबल शुभमित्रा साहू (25 वर्ष) को प्रेम जाल में फांस कर उस से कोर्टमैरिज कर ली. फिर एक दिन उस ने शुभमित्रा को भी ठिकाने लगा दिया. पुलिस ने जब जांच कर गड़े मुर्दे खोदे तो ऐसी सच्चाई जगजाहिर हुई कि…

महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू अपने दोस्त कांस्टेबल दीपक राउत के साथ गुपचुप तरीके से की गई कोर्ट मैरिज को जल्द से जल्द सार्वजनिक करना चाहती थी, जबकि 39 वर्षीय दीपक राउत अब शुभमित्रा साहू (25 वर्ष) को अपनी जिंदगी से हमेशाहमेशा के लिए निकालने का प्लान बना चुका था.

अपने इसी प्लान को आखिरी मंजिल तक पहुंचाने के लिए उस ने 6 सितंबर, 2025 की तारीख को चुना. शुभमित्रा साहू की ड्यूटी डीसीपी ट्रैफिक कार्यालय में थी. शाम 7 बजे उस की ड्यूटी खत्म हुई तो दीपक राउत ने फोन कर के उसे एक अनजान जगह मिलने के लिए बुलाया. जब शुभमित्रा 7 बज कर 10 मिनट पर उस की बताई गई जगह पर पहुंची तो दीपक राउत अपनी होंडा सिटी कार से उस का इंतजार कर रहा था.

दीपक उसे कार में बिठा कर भीड़भाड़ से दूर एक सुनसान जगह पर ले गया और फिर जंगल के सुनसान इलाके में उस ने कार रोक दी. इस दौरान शुभमित्रा ने दीपक से अपने उधार के 20 लाख रुपयों की मांग की, क्योंकि वह अपनी शादी को सार्वजनिक कर एक ग्रांड पार्टी देना चाहती थी. जबकि दीपक शुभमित्रा को एक पाई तक देने के मूड में नहीं था. वह तो केवल कोर्ट मैरिज की आड़ में उस के शरीर और भावनाओं से खेल रहा था.

पैसे मांगने पर दोनों के बीच विवाद हो गया. कांस्टेबल दीपक ने उसे गालियां देनी शुरू कर दीं तो शुभमित्रा भी जवाब में उसे गालियां देने लगी. इस पर दीपक ने उस के साथ मारपीट करनी शुरू कर दी. इस दौरान शुभमित्रा ने दीपक को जोर से एक लात मार दी. गुस्से में आ कर दीपक ने शुभमित्रा का गला पकड़ लिया और तब तक दबाता रहा, जब तक वह बेसुध हो कर नीचे नहीं गिर गई. कुछ ही पलों में शुभमित्रा की मौत हो गई.

शुभमित्रा की हत्या करने के बाद दीपक ने उस का शव अपनी कार की डिक्की में रखा. पूरे एक दिन तक वह शुभमित्रा का शव अपनी कार की डिक्की में रख कर सामान्य तरीके से ही घूमता रहा. यहां तक कि वह अपनी ड्यूटी करने थाने भी गया. इस के बाद उस ने अपने चचेरे भाई को पैसे देने का लालच दे कर उसे और उस के ड्राइवर को जेसीबी ले कर शव को 170 किलोमीटर दूर क्योंझर जिले के घाटगांव क्षेत्र के पास जंगल में भेज दिया. वहां उन्होंने सुनसान जगह पर जेसीबी से गहरा गड्ढा खोद कर शुभमित्रा साहू को दफना दिया.

25 वर्षीय शुभमित्रा साहू उस समय कोरडा टाउन, पिचकुली, सूर्यनगर, भुवनेश्वर में किराए के मकान में रहती थी. उस के औफिस से उस के कमरे का रास्ता बमुश्किल आधे घंटे का था. शुभमित्रा की मम्मी सुकीर्ति साहू उस के साथ में रहती थीं. जब शाम को 8 बजे तक भी शुभमित्रा साहू अपने घर नहीं पहुंची तो उस की मम्मी एकदम से घबरा गईं. उन्होंने तुरंत अपने पति और बेटी को इस बारे में सूचना दी और अपने पड़ोस की एक महिला के साथ शुभमित्रा का पता लगाने उस के औफिस में चली गईं.

औफिस से पता चला कि शुभमित्रा साहू तो रोजाना की तरह आज शाम को 7 बजे अपनी ड्यूटी खत्म कर के अपने घर की ओर निकल गई थी. अब तक पुलिस महकमे में भी इस खबर को सुन कर हड़बड़ी मच गई थी. शुभमित्रा साहू की मम्मी सुकीर्ति साहू ने तुरंत कैपिटल थाने में अपनी बेटी शुभमित्रा साहू के लापता होने की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस अब तुरंत हरकत में आ गई थी. दूसरे दिन लापता शुभमित्रा साहू की मम्मी सुकीर्ति साहू और पापा धुरयदान साहू ने पुलिस कमिश्नर (भुवनेश्वर) सुरेश देव दत्ता सिंह से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर बेटी को तलाशने में त्वरित जांच की मांग की. पुलिस कमिश्नर ने संबंधित अधिकारियों को लापता ट्रैफिक कांस्टेबल शुभमित्रा साहू की खोज के लिए आवश्यक दिशानिर्देश जारी कर दिए.

पुलिस टीमें लगातार शुभमित्रा साहू की तलाश में जुटी हुई थीं. इस के लिए पुलिस ने अपनी कई टीमें बना रखी थीं, लेकिन हफ्ता गुजरने के बाद भी पुलिस के पास कोई भी सुराग हाथ नहीं आ पाया था. पुलिस टीम को शुभमित्रा के किराए के घर पर उस का खुद का मोबाइल भी सुरक्षित हालत में बरामद हुआ था.

अब पुलिस टीम को यह बात साफ नहीं हो पा रही थी कि लापता महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू अपना मोबाइल अपने ही घर में जल्दबाजी में भूल गई थी या जानबूझ कर छोड़ गई थी. एक महिला कांस्टेबल रहस्यमय तरीके से ड्यूटी के स्थान से ले कर अपने किराए के मकान के बीच भला कैसे गायब हो सकती थी. यह प्रश्न अब ओडिशा पुलिस के लिए खुद एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था.

अपनी इसी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए आखिरकार डीसीपी भुवनेश्वर ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘एक्स’ पर शुभमित्रा की फोटो और उस की पूरी डिटेल्स को शेयर करते हुए एक पोस्ट में लिखना पड़ा था कि क्या आप ने हमारी महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू, जिस की उम्र 25 वर्ष और लंबाई लगभग 5 फुट है, जिस ने ड्यूटी से अपने घर को निकलते समय बैंगनी रंग का टौप और सफेद सलवार पहनी हुई थी, उसे कहीं पर देखा है?

यदि किसी ने इन महिला कांस्टेबल को कहीं पर भी आतेजाते या टहलते हुए कहीं पर देखा है तो कृपया हमें हमारे मोबाइल नंबर 7008264419 और 8280338022 पर सूचित करें. सूचना देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जाएगी. इस के अतिरिक्त भुवनेश्वर पुलिस ने लापता शुभमित्रा की सूचना देने वाले व्यक्ति को 25 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा भी कर दी थी.

भुवनेश्वर पुलिस पूरे जोरशोर से शुभमित्रा की तलाश कर रही थी. इस के लिए पुलिस सीसीटीवी कैमरे और शुभमित्रा के घर से बरामद उस के मोबाइल फोन को भी अनलौक करने में जुटी जुटी हुई थी, लेकिन पुलिस को अभी तक कोई भी सूत्र हाथ नहीं लग पाया था. शुभमित्रा अपने औफिस से शाम को 7 बजे के बाद अपने घर आने के रास्ते में अचानक कहां लापता हो गई थी, यह प्रश्न बारबार पुलिस को परेशान कर रहा था.

जांच के दौरान पुलिस के सामने यह बात साफ हो चुकी थी कि शुभमित्रा के गायब होने में उस के किसी खास परिचित, प्रेमी आदि का हाथ हो सकता है, इसलिए अब पुलिस इस केस की जांच ‘लव एंगल’ से भी करने लगी. आखिरकार, भुवनेश्वर पुलिस के कैपिटल पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारियों को अपनी विस्तृत जांच करने के दौरान यह पता चला कि भुवनेश्वर में शुभमित्रा साहू के साथ आखिरी बार पुलिस कमिश्नरेट में तैनात पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत को देखा गया था.

पुलिस टीम ने तत्काल दीपक राउत को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी. इसी दौरान पुलिस को यह भी पता चला कि पिछले साल दीपक और शुभमित्रा ने गुपचुप कोर्ट मैरिज कर ली थी, जिस के बारे में दोनों के फेमिली वालों को पता तक नहीं था. अब पुलिस का शक दीपक पर पूरी तरह से बढ़ गया था. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर संदिग्ध दीपक राउत शुभमित्रा के गायब होने के बाद दुखी होने का दिखावा करता रहा. यहां तक कि वह शुरू में परिवार और पुलिस के साथ उसे ढूंढने में मदद करने का झूठा दिखावा करता रहा.

पुलिस पूछताछ में दीपक राउत ने सामान्य स्थिति का दिखावा करते हुए यह बात स्वीकार की कि उस के और शुभमित्रा के बीच में प्रेम प्रसंग था और उस ने शुभमित्रा के साथ 23 जुलाई, 2024 को कोर्ट मैरिज भी छिप कर कर ली थी. दीपक राउत ने पुलिस पूछताछ में आगे बताया कि वह 6 सितंबर, 2025 को जब शुभमित्रा एकाएक लापता हो गई थी तो वह अपने एक रिश्तेदार से मिलने क्योंझर गया था और उस ने अपनी प्रेयसी और पत्नी शुभमित्रा साहू की सकुशल व सुरक्षित वापसी के लिए वहां के तारिणी मंदिर में प्रार्थना भी की थी.

इस बात की पुष्टि करते हुए उस ने पुलिस टीम को अपने मोबाइल में खींची गई तसवीरें और पूजापाठ करते हुए ली गई सेल्फी भी दिखाई. इस के साथ ही उस ने सोशल मीडिया पर किया गया अपना पोस्ट भी दिखाया, जिस में उस ने शुभमित्रा के लापता होने की जानकारी पोस्ट की थी और लोगों से अपील भी की थी कि उस के बारे में किसी भी किस्म की जानकारी होने पर तुरंत पुलिस को दिए गए मोबाइल फोन पर सूचना दें.

शुभमित्रा साहू की जांच में एक अहम मोड़ तब आया, जब पुलिस ने लापता शुभमित्रा का फोन अनलौक करने के बाद उस के वाट्सऐप चैट्स को एक्सेस किया. इस में इस बात का पता चला कि शुभमित्रा ने 10 लाख रुपए कोर्ट मैरिज से पहले दीपक राउत को उधार दिए थे. उस के बाद शुभमित्रा दीपक से अपने 10 लाख रुपए लौटाने के साथसाथ 10 लाख रुपए अतिरिक्त देने की डिमांड कर रही थी, ताकि वह धूमधाम के साथ अपनी शादी की पार्टी अपने फेमिली वालों व परिचितों के बीच कर सके.

लेकिन दीपक इस विवाह को सार्वजनिक किए जाने के खिलाफ था. वह शुभमित्रा से बारबार यही कहता था कि वह अभी तक अपनी पहली पत्नी अपर्णा की मृत्यु से ठीक तरह से उबर नहीं पाया है. इस के अलावा दीपक बारबार इस बात का उलाहना भी शुभमित्रा को देता रहता था कि उस ने शुभमित्रा का एक करोड़ रुपए का बीमा करा रखा है, जिस की किश्त देना उसे भारी पड़ता जा रहा है, इसलिए दीपक उस के 10 लाख रुपए लौटाने के एकदम खिलाफ हो गया था.

इन सभी बातों से शुभमित्रा काफी तनाव में आ गई थी, जिस के कारण उस के वाट्सऐप मैसेज में पुरी, मथुरा और वाराणसी जाने की इच्छा जताई थी. शुरू में दीपक राउत ने पुलिस को यह कह कर गुमराह करने की कोशिश की थी कि शुभमित्रा की अपने मम्मीपापा के साथ अनबन रहती थी, जिस के कारण वह अपना घर छोड़ कर चली गई होगी. उस के बाद पुलिस टीम ने पुरी, वाराणसी और मथुरा में जा कर भी शुभमित्रा की तलाश की, लेकिन पुलिस टीम को शुभमित्रा का कोई सुराग नहीं मिल पाया था.

फिर पुलिस ने आरोपी दीपक राउत का पौलीग्राफ टेस्ट कराया. पौलीग्राफ टेस्ट के दौरान दीपक राउत के जवाब भ्रामक पाए गए. उस के बाद पुलिस ने जब उस के साथ सख्ती की तो फिर उस ने शुभमित्रा साहू की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. शुभमित्रा साहू और दीपक राउत की पहली मुलाकात किसी फिल्मी सीन की तरह घटित हुई थी. उस दिन शुभमित्रा को औफिस में ज्यादा काम हो गया था, जिस की वजह से वह शाम को 7 बजे अपने घर लौटने के बजाय रात लगभग 9 बजे अपने औफिस से स्कूटी से घर के लिए निकली थी.

जैसे ही शुभमित्रा एक अंधेरी सी सड़क से गुजरी तो उसे एक लड़की की चीख सुनाई पड़ी. चीख सुनते ही शुभमित्रा ने अपनी स्कूटी तत्काल उस तरफ मोड़ दी, जिधर से चीखने की आवाज आई थी. तभी उस की नजर एक अंधेरे कोने पर पड़ी तो उस ने देखा कि एक युवती को 4 युवकों ने चारों ओर से घेर रखा था और वे सब उस युवती को पकड़ कर उस के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे. शुभमित्रा खुद एक पुलिस वाली थी, इसलिए उस ने अपनी स्कूटी साइड में खड़ी की और तुरंत उस युवती को बचाने चली गई. पहले तो उन चारों युवकों ने शुभमित्रा को धमकाया, लेकिन जब शुभमित्रा ने उन में से 2 युवकों के चेहरों पर थप्पड़ जड़े तो उन के होश ठिकाने आ गए.

अब चारों युवक उस युवती को छोड़ कर शुभमित्रा से मारपीट करने लगे. पहले तो कुछ देर तक शुभमित्रा चारों से मुकाबला करती रही, लेकिन एक युवती अकेली उन चारों का मुकाबला भला कैसे कर सकती थी. इसलिए धीरेधीरे वे चारों युवक उस पर अब भारी पड़ते जा रहे थे. तभी उन में से एक युवक बोल पड़ा, ”इस के कारण हमारा शिकार देखो भाग गया. इतने दिन से हम उस के पीछे पड़े थे, उस की एकएक गतिविधि को देख रहे थे, आज हमें मौका मिला तो यह समाज सुधारक न जाने कहां से बीच में टपक पड़ी. चलो, कोई बात नहीं, अब इसी से मजे ले लेते हैं.’’

यह सुन कर सुमित्रा की रूह भी एकबारगी कांप सी उठी थी. वह अब सोचने लगी थी कि उस ने तो एक असहाय युवती को बचाने की कोशिश की थी, लेकिन अब तो यहां पर दांव उलटा ही पड़ गया. वह अपनी ओर से उन चारों दरिंदों से फिर भी भिड़ रही थी और बीचबीच में वह मदद के लिए चीखपुकार भी रही थी. तभी उस सड़क से अपनी बाइक पर दीपक गुजर रहा था, उस ने जब अपने सामने एक युवती को अकेले 4 युवकों से मुकाबला करते देखा तो वह दंग रह गया. दीपक ने तुरंत अपनी बाइक रोकी और युवकों को ललकारने लगा. युवकों ने जब देखा कि अब मुकाबले में एक और आदमी शामिल हो गया है तो उन में से 2 युवकों ने चाकू निकाल लिए थे.

लेकिन जब दीपक कयामत बन कर उन सड़कछाप शोहदों पर एकाएक कर टूट पड़ा तो वे चारों शोहदे उस के ताइक्वांडो और जूडो कराटे का सामना चाह कर भी नहीं कर सके. दोनों चाकू वाले गुंडे तो दीपक के हाथों में पड़ गए, जिन की उस ने दिल से कुटाई की, लेकिन 2 शोहदे वहां से भागने में कामयाब हो गए. वहां पर ऐसा भी नहीं था कि अन्य लोग नहीं थे. दूर से तमाशा देखने वाले और उस घटना का वीडियो बनाने वाले भी उस भीड़ में शामिल थे, लेकिन उन लोगों ने न तो उस युवती की मदद की और न ही दीपक की सहायता करने के लिए आगे आए.

शुभमित्रा इस युवक के समय पर किए गए इस साहसिक कार्य को देख कर एकदम कायल हो गई थी. वह उस अनजान युवक को धन्यवाद देने के लिए जब उस के पास गई तो वह युवक किसी को फोन कर रहा था. उस के फोन कटते ही वहां पर पुलिस भी आ गई थी, जो उन दोनों शोहदों को पुलिस की गाड़ी में बिठा कर वहां से चली गई थी.

शुभमित्रा यह समझ चुकी थी कि यह युवक अवश्य कोई पुलिस वाला हो सकता है. जब उस ने अपनी नजरें उठा कर युवक की ओर देखा और दोनों की आंखें मिलीं तो पहला खयाल शुभमित्रा के दिल में यही आया था कि काश! ऐसा निडर पति मुझे भी मिल जाता तो पूरी जिंदगी कितनी आसानी से और बेफिक्री से गुजर जाती.

अपने मन की भावनाओं को किसी तरह शुभमित्रा ने काबू किया और उस अनजान व्यक्ति का धन्यवाद करते हुए बोली, ”सर, आज रात यदि आप यहां पर समय से नहीं आते तो ये चारों शोहदे मेरी जान अवश्य ले लेते. पता नहीं मेरी क्या हालत कर डालते. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह पाती मैं. आप का मैं किन शब्दों में धन्यवाद करूं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है सर! क्या मैं जान सकती हूं कि आप किस विभाग में काम करते हैं?’’

”जी, इस में धन्यवाद वाली भला क्या बात है. एक पुलिसकर्मी होने के नाते तो यह मेरा फर्ज बनता भी है. वैसे मुझे यह लग रहा है कि मैं ने आप को कहीं देखा जरूर है. क्या मैं आप का परिचय जान सकता हूं.’’ उस युवक ने कहा.

”जी सर, मेरा नाम शुभमित्रा साहू है, मैं ट्रैफिक पुलिस में कांस्टेबल हूं और डीसीपी (ट्रैफिक) में आजकल कंप्यूटर का काम देखती हूं. आप ने मुझे अवश्य देखा होगा, आप कहां पर हैं सर!’’ शुभमित्रा ने पूछा.

”शुभमित्राजी, मैं कमिश्नर औफिस में लेखा विभाग में पोस्टेड हूं. देखिए, आप भी हमारे डिपार्टमेंट से ही हैं, इसलिए यदि आप मुझे सर कह कर न पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा. मेरा नाम दीपक राउत है, आप मुझे यदि दीपक नाम से संबोधित करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा,’’ दीपक ने मुसकराते हुए कहा.

”वैसे आप काफी बहादुर हैं. आप ने उन चारों को ऐसी मार लगाई, जिस से मेरा तो दिल खुश हो गया दीपकजी.’’ शुभमित्रा ने मुसकराते हुए कहा.

दीपक भी पहली नजर में शुभमित्रा का दीवाना सा हो गया था. उस का मन कर रहा था कि वह इस शुभमित्रा जैसी हसीन युवती को जी भर कर देखता रहे और उस के साथ ढेर सारी बातें करता रहे.

तभी शुभमित्रा ने कहा, ”दीपकजी, देखिए अब यहां पर भीड़ काफी अधिक हो चुकी है. लोग तो केवल तमाशबीन बन कर वीडियो बनाते फिरते हैं. किसी ने हम दोनों का ही वीडियो बना लिया तो हम दोनों के लिए यह ठीक नहीं हो सकता. ये तमाशबीन लोग अपने आप कुछ करते नहीं हैं, लेकिन बात का बतंगड़ बनाने में हमेशा आगे रहते हैं.’’

”आप वाकई बहुत समझदार हैं, लेकिन मैं तो आप की बहादुरी और खूबसूरती का पहली नजर में ही कायल हो गया हूं. आप से दोबारा कब मुलाकात होगी? क्या आप का मोबाइल नंबर ले सकता हूं?’’ दीपक ने सीधेसीधे कह दिया था.

”दीपकजी, आप से मिल कर मुझे आज सचमुच बहुत खुशी हो रही है, आप मेरा मोबाइल नंबर नोट कर लीजिए. आप कौल कीजिए, मैं भी आप का मोबाइल नंबर सेव कर लूंगी.’’ शुभमित्रा ने मुसकराते हुए कहा.

दीपक ने तुरंत ही उस मोबाइल नंबर पर फोन किया तो दूसरी तरफ से शुभमित्रा के मोबाइल पर घंटी बजने लगी थी. शुभमित्रा ने भी दीपक का नंबर सेव कर लिया. 25 वर्षीय शुभमित्रा साहू उड़ीसा के जगतपुर जिले के पारादीप की रहने वाली थी. उस के पापा का नाम धुरयदान साहू और मम्मी का नाम सुकीर्ति साहू था. शुभमित्रा अपने परिवार में सब से बड़ी थी. उस के 2 छोटे भाई और एक बहन थी. बचपन से ही शुभमित्रा का सपना पुलिस की नौकरी करने का था, इसलिए वह पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी स्कूल और कालेज में सब से आगे रहती थी.

उस के पापा एक किसान थे, इसलिए शुभमित्रा नौकरी कर अपने मम्मीपापा और दोनों छोटे भाइयों को एक सुखद भविष्य देना चाहती थी. सुभमित्रा की कोशिशें रंग लाईं और उस ने इधर बीए में प्रवेश प्रवेश लिया तो दूसरी तरफ उस की नियुक्ति ओडिशा पुलिस में हो गई. यह साल 2018 की बात है.

उस के बाद शुभमित्रा की पोस्टिंग जनवरी 2024 में भुवनेश्वर के कैपिटल थाने में ट्रैफिक पुलिस कांस्टेबल के रूप में हो गई. शुभमित्रा की उम्र भी तब 24 साल की हो गई थी, इसलिए उस के पेरेंट्स उस से शादी करने के लिए दबाव बनाते रहते थे, लेकिन शुभमित्रा का अपना यह मानना था कि अभी उस की शादी की उम्र भी नहीं है. दूसरा वह अपनी पसंद से ही शादी करना चाहती थी. शुभमित्रा साहू के दिल में दीपक राउत ने एक बौलीवुड हीरो की तरह एंट्री कर के ऐसी छाप छोड़ दी थी, जिसे वह भूल नहीं पा रही थी. एक ही दिन और एक ही पल में वह अपना दिल दीपक को न्यौछावर कर चुकी थी.

इस घटना को 2 दिन हो चुके थे, लेकिन शुभमित्रा सोच रही थी कि 2 दिन हो चुके हैं, दीपक ने अभी तक भी उसे फोन नहीं किया.

उस समय रात के लगभग 10 बजे थे. शुभमित्रा खाना खा कर अपने कमरे में बैठी एक किताब पढ़ रही थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने स्क्रीन देखी तो पता चला कि वह कौल दीपक की ही है. शुभमित्रा के चेहरे पर मुसकान तैर गई. दोनों के बीच थोड़ी देर बातचीत हुई. उस के बाद दीपक ने उसे सीधासीधा कह दिया कि वह उस से दोस्ती कर उसे सदा के लिए अपनाना चाहता है.

शुभमित्रा भी यही चाहती थी. लिहाजा उस ने भी दीपक के प्रस्ताव पर अपनी सहमति जता दी. इस के बाद तो दोनों के बीच मुलाकातें भी होने लगी थीं. दीपक ने शुभमित्रा को यह भी बता दिया था कि 2018 में उस की शादी अपर्णा से हुई थी, लेकिन एक सड़क दुर्घटना में उस की जुलाई 2024 में मौत हो गई थी. दीपक की इस ईमानदारी पर शुभमित्रा बहुत प्रभावित हुई.

शुभमित्रा अब जल्द से जल्द धूमधाम से दीपक से शादी करना चाहती थी, लेकिन दूसरी तरफ दीपक ने उस से कहा कि अभी हम लोग कोर्ट मैरिज कर लेते हैं, क्योंकि अभी वह अपनी पहली पत्नी के दुख से पूरी तरह से उबर नहीं पाया है. कुछ समय बाद जब सब नारमल हो जाएगा तो धूमधाम से सब के सामने सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर लेंगे.

उस के बाद शुभमित्रा और दीपक राउत ने अपने फेमिली वालों, परिचितों से छिप कर 23 जुलाई, 2024 को कोर्ट मैरिज कर ली. कोर्ट मैरिज के बाद शुभमित्रा अपने पेरेंट्स के पास ही रह रही थी और दीपक भी अकेले अपने घर में रह रहा था. कभीकभार वह घूमने का प्लान बना कर दूसरे शहर में साथ रह लेते थे. एक कहावत भी है कि आज की मतलब की दुनिया में कौन किसी का होता है, आज तो धोखा वही देता है, जिस पर भरोसा होता है.

उन के आपसी संबंध अब भले ही चाहे दुनिया से दूर थे, पर अब बद से बदतर होते जा रहे थे. दीपक राउत के मन में लालच की बेल पूरी तरह फैल चुकी थी, इसलिए उस ने एक फुलप्रूफ प्लान बना कर शुभमित्रा साहू की हत्या कर उस का शव ठिकाने लगा दिया. पुलिस ने दीपक से पूछताछ के बाद उस की निशानदेही पर 17 सितंबर, 2025 बुधवार को मजिस्ट्रैट की निगरानी में जेसीबी की मदद से उस जगह की खुदाई कराई, जहां पर शुभमित्रा साहू का शव सीमेंट के एक बैरल में बंद और लगभग 10 फीट नीचे जमीन में दबा हुआ था. जरूरी काररवाई कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस के बाद पुलिस ने आरोपी दीपक राउत की होंडा सिटी कार नंबर ओडी02आर 8494 को भी जब्त कर लिया. दीपक राउत के कुबूलनामे और साक्ष्यों के आधार पर भुवनेश्वर के कैपिटल थाने में उस के खिलाफ बीएनएस की धारा 103(1) और 238 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. साथ ही पुलिस ने शव को छिपाने के लिए आरोपी दीपक रावत के चचेरे भाई विनोद बिहारी भुइयां (38 वर्ष) और जेसीबी चालक शंभूनाथ महंत (23 वर्ष) को भी गिरफ्तार कर लिया.

महिला पुलिस कांस्टेबल शुभमित्रा मर्डर केस जब ओडिशा के लोगों के सामने जगजाहिर हुआ तो आरोपी दीपक राउत की मुश्किलें अब और भी बढ़ गई हैं. दीपक की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी के पेरेंट्स ने भी अब पुलिस के समक्ष अपर्णा की हत्या किए जाने की शिकायत दर्ज कराई है. मृतका अपर्णा प्रियदर्शिनी की छोटी बहन रोजलिन ने मीडिया को बताया है कि शुरुआत में हमें यह लगा था कि हमारी बहन की मौत महज एक दुर्घटना थी. अब दीपक राउत की दूसरी पत्नी शुभमित्रा साहू की हत्या के बाद हमें यह पूरा यकीन है कि दीपक ने मेरी बहन की भी हत्या की होगी और हत्या को दुर्घटना का रूप दे दिया. अपर्णा की मौत की दोबारा जांच की मांग को ले कर ढेंकनाल पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है.

रोजलिन ने यह आरोप भी लगाया है कि अपने पति दीपक के साथ अपर्णा का वैवाहिक जीवन शुरू से ही समस्याओं, परेशानियों और अथाह दुखों से भरा था. शादी के कुछ महीनों बाद ही दीपक ने अपर्णा को परेशान और प्रताडि़त करना शुरू कर दिया था. इस संबंध में अपर्णा ने पुलिस कमिश्नरेट में औनलाइन शिकायत भी दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस ने दीपक के खिलाफ कोई भी काररवाई नहीं की.

रोजलिन ने यह राज भी खोला कि दीपक ने उस की बहन का एक करोड़ रुपए का बीमा कराया था, जोकि बहन की मृत्यु के बाद उसे मिल भी चुका है. अब हमें उस के ऊपर यह शक है कि दीपक ने इंश्योरेंस क्लेम पाने के लिए अपर्णा की हत्या की थी. शुभमित्रा साहू के हत्यारे कांस्टेबल दीपक राउत की पहली शादी अपर्णा प्रियदर्शिनी के साथ 25 अप्रैल, 2018 को हुई थी. दीपक राउत की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी एक राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) थी और ढेंकनाल जिले में तैनात थी.

19 मार्च, 2022 को दीपक राउत ने खुंटुनी थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उस की पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी (31 वर्ष) की 2 दिन पहले ट्रक नंबर ओडी02 एस 3486 की चपेट में आने से मौत हो गई थी. कथित दुर्घटना एनएच-55 पर राधा किशोरपुर चौक के पास हुई थी. घटना के बारे में दीपक राउत ने तब पुलिस को बयान दिया था कि घटना के दिन अपर्णा उस (दीपक) के साथ अपनी गाड़ी से अपने गृहनगर लौट रही थी, तब एक जगह गाड़ी को रुकवा कर अपर्णा ने दीपक से कहा कि उसे टायलट जाना है.

जब वह सड़क पार टायलेट में जाने के लिए सड़क पार कर रही थी तो कथित तौर पर रात को 9 से साढ़े 9 बजे के बीच एक ट्रक ने अपर्णा को टक्कर मार दी, जिस से उस के सिर में गंभीर चोटें आ गई थीं. उस के बाद दीपक उसे ले कर अस्पताल गया, जहां पर इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. उस समय खुंटुनी पुलिस ने इस केस की जांच की थी. जांच के दौरान पुलिस ने उक्त पंजीकरण वाले ट्रक का पता लगा लिया और चालक को हिरासत में ले लिया था. लेकिन पुलिस जांच में यह पाया गया कि दुर्घटना वाले दिन वह ट्रक उस इलाके में नहीं था.

उस के बाद दीपक राउत ने दावा किया कि शायद अंधेरा होने के कारण उस ने ट्रक का गलत नंबर नोट कर लिया होगा. वह शायद कोई दूसरे नंबर का वाहन हो सकता है. रिपोर्ट लिखाने वाला एक पुलिसकर्मी था, इसलिए उस की बातों पर यकीन कर के जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि उस दुर्घटना के लिए एक अज्ञात वाहन ही जिम्मेदार था. उस के बाद कोई अन्य सुराग न मिल पाने के कारण जांच अधिकारी द्वारा अदालत में एक अंतिम सत्य रिपोर्ट (एफटीआर) प्रस्तुत की गई, जिस में यह संकेत दिया गया कि यह घटना वास्तविक थी, लेकिन उस विशेष ट्रक को दोषी ठहराने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे.

अदालत द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या फिर शिकायतकर्ता पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत झूठ बोल रहे थे और क्या पुलिस को उस समय अपर्णा प्रियदर्शिनी की मौत में किसी गड़बड़ी का संदेह था. जांच अधिकारी ने तब अदालत में बताया था कि इन सभी सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही मिल पाएंगे. इस मामले में मृतका अपर्णा की बहन रोजलिन ने मीडिया और पुलिस को दिए अपने शिकायती पत्र में यह भी आरोप लगाया है कि अपर्णा के पति दीपक राउत ने उन्हें फोन पर बताया था कि खुंटुनी के राधा दामोदरपुर के पास अपर्णा का एक्सीडेंट हुआ था.

पहले तो दीपक राउत ने मृतका अपर्णा के परिजनों को यह बताया था कि अभी हम दोनों दुर्घटनास्थल पर ही हैं. उस के बाद में उन के द्वारा यह बताया गया था कि दीपक अपर्णा को एससीबी मैडिकल कालेज और अस्पताल ले कर गया है. बाद में हमें दीपक राउत का एक और कौल आया, जिस में बताया गया कि अपर्णा को वह कटक के एक निजी अस्पताल ले कर गया है. इस मामले में कटक (ग्रामीण) के एसपी विनीत अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि हम ने अपर्णा प्रियदर्शिनी की हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और इस की जांच के लिए एक डीएसपी स्तर के अधिकारी को नियुक्त कर दिया है.

भुवनेश्वर पुलिस द्वारा 19 सितंबर, 2025 को बताया गया कि 25 वर्षीय महिला ट्रैफिक कांस्टेबल शुभमित्रा साहू की हत्या को रैड फ्लैग घोषित कर दिया गया है. अब यह जांच क्राइम ब्रांच (सीबी) के डीजीपी की निगरानी में होगी. भुवनेश्वर के कमिश्नरेट पुलिस के समन्वित सहयोग के साथ, एजेंसी कैपिटल थाना पुलिस और खुंटुनी पुलिस द्वारा पहले एकत्र किए गए सभी साक्ष्यों और आंकड़ों की जांच करेगी. इस के साथ ही सीएडब्लू (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) और सीडब्लू (साइबर विंग) दोनों ही इकाइयां इस मामले की बारीकी से जांच और छानबीन करेंगी.

ओडिशा पुलिस ने वर्ष 2014 में जांच की रेड फ्लैग श्रेणी शुरू की थी, जिस के तहत मामलों की जांच सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर की जाती है. इस रेड फ्लैग जांच में महिला कांस्टेबल शुभमित्रा की हत्या के साथसाथ 17 मार्च, 2022 को ओडिशा के कटक के आधागढ़ के पास एक सड़क दुर्घटना में आरोपी कांस्टेबल दीपक राउत की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी की मृत्यु के बीच संभावित संबंध का भी पता लगाया जाएगा, जिस के लिए दीपक राउत की जीवन बीमा पौलिसी से डेढ़ करोड़ रुपए का भुगतान मिला था.

18 सितंबर, 2025 को भुवनेश्वर के डीसीपी जगमोहन मीणा ने आरोपी हत्यारे पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत को उस की नौकरी से निलंबित कर दिया. उस के एक रिश्तेदार और एक अन्य सहयोगी को भी शुभमित्रा साहू के शव को ठिकाने लगाने में आरोपी दीपक राउत की मदद करने में गिरफ्तार कर लिया गया है. इसी बीच मृतका शुभमित्रा के पोस्टमार्टम के नमूने भुवनेश्वर स्थित राज्य फोरैंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिए गए हैं, क्योंकि क्योंझर जिला मुख्यालय अस्पताल में सड़ीगली लाशों की विस्तृत और सटीक रिपोर्ट देने के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.

मृतका कांस्टेबल शुभमित्रा साहू का पोस्टमार्टम उस के भाइयों का मौजूदगी में करा लिया गया है. पुलिस इस मामले की तफ्तीश गंभीरता से कर रही थी. Family Crime

 

Love Crime: प्रेम प्रसंग में टुकड़े – टुकड़े किया पति

Love Crime: चंदौसी शहर के जूता कारोबारी राहुल ने रूबी से लव मैरिज करने के बाद उसे हर तरह की सुखसुविधाएं दीं. लेकिन 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रूबी पति की आंखों में धूल झोंक कर 2-2 प्रेमियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी. प्यार में अंधी हो चुकी रूबी के इरादे एक दिन इतने खौफनाक हो गए कि….

रूबी की जिंदगी एक त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में फंस गई थी. वह प्रेमी अभिषेक व दूसरे प्रेमी गौरव और पति राहुल के बीच फंसी हुई थी. रूबी के लिए यह त्रिकोण नहीं, बल्कि 3 दिशाओं में बिखरा हुआ मन था. पति राहुल स्थिरता और परिवार में समन्वय  बनाए रखने के भ्रम के साथ परिवार को खुशहाल बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ था. इसी तरह उस की शादी के 15 साल बीत चुके थे. दूसरी तरफ अभिषेक, जो उस के पति और समाज में रूबी को बहन बता कर दिन में भैया रात में सैंया की कहावत को चरितार्थ कर रहा था. अपनी धनदौलत के सहारे रूबी की मस्त जवानी का इस्तेमाल कर रहा था. अभिषेक के साथ रूबी 15 साल पहले जैसे यौन आनंद लिए जाने में मस्त थी. अभिषेक बहुत समझदार था.

तीसरा आशिक गौरव ने कुछ महीने पहले इस कहानी में एंट्री की थी. वह जवानी के जुनून में इस तरह अंधा हो गया था, जैसे कि सांप केंचुली आने पर हो जाता है. रूबी से उस का संपर्क हुआ. इसी दौरान अभिषेक से भी मुलाकात हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. अभिषेक की तरह गौरव भी रूबी को बहन कहने लगा था और उस के बच्चे भी अभिषेक की तरह गौरव को भी मामा कहते थे. यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला संभल की सब से उन्नतशील तहसील चंदौसी का है. संभल के जिला बनने से पहले चंदौसी को ही जिला बनाने की मांग उठती रही थी. जिला होने के सभी मानक भी चंदौसी पूरे करती थी, लेकिन राजनीतिक खेल की वजह से संभल को जिला घोषित कर दिया गया था, लेकिन मुख्यालय काफी दूर बहजोई में बनाया गया.

चंदौसी की घनी आबादी के चुन्नी मोहल्ला में राहुल नाम का जूते का व्यापारी रहता था. वैसे यह इलाका जूतों के निर्माण के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसी चुन्नी मोहल्ले में 40 वर्षीय राहुल कुमार अपनी पत्नी रूबी (39 साल) 12 साल की बेटी और 10 साल के बेटे के साथ रह रहा था. राहुल एक मेहनती जूता व्यापारी था, सुबह से शाम तक कारीगरों से जूते बनवाता था. जूतों को राहुल थोक दुकानदारों को सप्लाई करता था. भागतेदौड़ते हुए भी वह जब भी घर लौटता, रूबी और दोनों बच्चों का चेहरा देख कर सारे दिन की थकान भूल जाता था. उस के चेहरे पर हमेशा संतोष की मुसकान रहती. रूबी, उस की पत्नी, घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. कभीकभी वह राहुल के बिजनैस में भी मदद कर दिया करती थी.

प्रेमिका के साथ मिलकर उसके पति की जान लेने वाला आरोपी

रूबी की आंखों में एक खालीपन था, एक ऐसी तन्हाई जो शादी के बंधन में भी उसे घेर लेती थी. राहुल का प्यार सच्चा था, लेकिन उस का जीवन बिजनैस की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि रूबी की भावनाओं को छूने का समय ही नहीं मिलता.

रूबी से हुआ प्यार

राहुल मूलरूप से संभल जिले के ही रजपुरा थाना क्षेत्र के गंवा कस्बे के रहने वाले जसवंत का इकलौता बेटा था. जसवंत के 4 बच्चे हुए, जिस में एक बेटा राहुल और 3 बेटियां हैं. राहुल के चाचा, ताऊ और बाकी रिश्तेदार वहीं रहते हैं. गवां कस्बे में रहने वाले राहुल के चाचा नेकराम बताते हैं कि राहुल जब केवल 15 साल का था, तभी उस के मम्मीपापा का बीमारी के चलते कुछ ही अंतराल में निधन हो गया.

घर संभालने के लिए राहुल ने राजमिस्त्री का काम शुरू कर दिया. पहले राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था. फिर धीरेधीरे काम सीख कर राजमस्त्री बन गया. बाद में इस ने टाइल्स लगाने का भी काम सीखा. राहुल ने मेहनत कर के परिवार को आगे बढ़ाया. बहनों की शादी की. काम के चलते इसे अलगअलग जगहों पर जाना पड़ता था. उसी बीच इस की मुलाकात चुन्नी मोहल्ले की रहने वाली रूबी से हुई.

चंदौसी के चुन्नी मोहल्ले में उस सुबह धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी थी. गली के कोने पर बन रहे नए मकान में राजमिस्त्री राहुल अपने औजार संभालते हुए काम पर लग चुका था. सिर पर गमछा बंधा था. हाथों में सीमेंट की महक आ रही थी. आंखों में अपने भविष्य के छोटेछोटे सपने थे. राहुल रोज की तरह ईमानदारी से काम कर रहा था. एक दिन मकान के आंगन से अचानक चूडिय़ों की हलकी सी खनक सुनाई दी. राहुल ने नजर उठाई. सामने खड़ी थी मकान मालिक की बेटी. सादे सूट में, खुले बालों और शांत आंखों वाली रूबी किसी सुबह की तरह ताजा लग रही थी. वह पानी का गिलास ले कर आई थी और संकोच से बोली, ”मिस्त्री साहब, पानी पी लीजिए.’’

राहुल ने पहली बार उसे देखा. जवान रूबी की सुंदरता ऐसी थी, जैसे किसी हलकी सुबह की पहली किरण जो धीरेधीरे पूरे आकाश को रंग दे देती हो. उस का चमकदार लाल कुरता, भरे गांव की पृष्ठभूमि में खिला कोई ताजा फूल सा सुंदर लग रहा था. गले के पास की खूबसूरत कढ़ाई उस के व्यक्तित्त्व की कोमलता को और उभार दे रही थी.

उस के कंधों तक बिखरे हलके घुंघराले बाल हवा के हर झोंके के साथ नाच उठते, जैसे बचपन की शरारतें अब भी उस के साथ खेल रही हों. उस की चाल में न तो शहर की बनावट थी, न ही किसी संकोच की दीवार. बस, आत्मविश्वास और सहजता की हलकी सी मुसकान थी, जो अनजाने में देखने वालों के मन में जगह बना लेती.

देखने में वह किसी फिल्मी दृश्य की हीरोइन लग रही थी. जवान रूबी के सपने उस की आंखों से झलक रहे थे, जैसे हर कदम के साथ वह भविष्य की नई कहानी बुन रही हो. रूबी ने फिर कहा, ”लो मिस्त्री साहब, पानी पी लो.’’

उस पल सब कुछ ठहर सा गया. उस ने मुसकरा कर पानी लिया. बस उसी एक पल में दोनों के दिल में जैसे कोई हलकी सी 2 दिलों को जोडऩे वाली प्रेम रेखा खिंच गई. दिन बीतते गए. राहुल ईंटों की दीवारें खड़ी करता और रूबी  कभीकभी उसे काम करते देखती. कभी चाय ले कर आ जाती, कभी घर के किसी काम का बहाना बन जाता. बातों का सिलसिला छोटा होता, पर आंखों में कहानियां लंबी होने लगीं.

धीरेधीरे रोज की मुलाकात छोटी बातों में बदलने लगी. पानी देना, चाय लाना या बस मुसकराना. राहुल को महसूस हुआ कि उस के भीतर का दिल रूबी पर आ गया है. राहुल को अपनी हैसियत का पूरा एहसास था. वह एक राजमिस्त्री था, रोज की मजदूरी पर जीने वाला. वहीं रूबी एक अच्छे घर की पढ़ीलिखी लड़की थी. फिर भी दिल ने बारबार दिमाग को चुप करा दिया. रूबी को राहुल की सादगी, उस का सम्मानपूर्ण व्यवहार और मेहनत भरी ईमानदारी अच्छी लगने लगी. उसे लगा कि यह आदमी दीवारें ही नहीं, भरोसा भी मजबूती से खड़ा करता है.

एक शाम जब काम खत्म हो चुका था और आसमान हलका गुलाबी हो चला था, रूबी ने हिम्मत कर के कहा, ”राहुल, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

राहुल कुछ पल चुप रहा. फिर बोला, ”रूबी, मैं बहुत साधारण हूं, पर दिल सच्चा है.’’

बस वही सच था, जिस ने दोनों को और करीब ला दिया.

यह प्यार चुपचाप पनपा. बिना शोर, बिना दिखावे के ईंट, सीमेंट और धूल के बीच 2 दिलों ने एकदूसरे के लिए जगह बना ली. मकान बन कर तैयार हो गया, लेकिन राहुल और रूबी के दिलों में जो निर्माण हुआ था, वह कहीं ज्यादा मजबूत था. चुन्नी मोहल्ले की उस गली में आज भी लोग उस मकान को देखते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उस की नींव में कहीं न कहीं रूबी की प्रेम कहानी भी गड़ी हुई है. दोनों का इश्क परवान चढ़ा. 2025 के हिसाब से देखें तो 15 साल पहले यानी कि 2010 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया.

इस चुन्नी मोहल्ले में रूबी का जहां मायका है, इसी गली में थोड़ा आगे कुछ घर छोड़ कर रूबी के राहुल ने भी यहां एक प्लौट खरीद कर मकान बना लिया. राहुल के घर और रूबी के मायके के बीच की गली मात्र 4 फीट चौड़ी है. गांव छोड़ कर कुछ सालों बाद ये लोग इस संकरी गली में बने मकान में रहने लगे.

दिल में बसा गौरव

एक दिन बारिश की झमाझम में रूबी बाजार से सब्जियां ले कर लौट रही थी. उस की साड़ी हलकी सी भीग चुकी थी और वह जल्दीजल्दी घर की ओर बढ़ रही थी, तभी मोहल्ले का युवक गौरव उसे देख कर रुक गया. उस ने अपनी छतरी रूबी की ओर बढ़ाई और मुसकराते हुए कहा, ”भाभीजी, भीग जाएंगी. लीजिए, मेरी छतरी ले लीजिए. मैं तो घर के पास ही हूं.’’

रूबी ने हिचकिचाते हुए छतरी ली, लेकिन उस की आंखों में गौरव की उस छोटी सी मदद ने एक अनजानी चिंगारी जला दी. अगले दिन रूबी ने छतरी लौटाने के बहाने गौरव के घर पर जाना तय किया. छतरी ले कर जा ही रही थी कि रास्ते में उसे गौरव मिल गया. वह बोला, ”अरे भाभीजी, आप ने क्यों कष्ट किया. छतरी लेने मैं ही घर आ जाता. इस बहाने से एक कप चाय भी मिल जाती.’’

रूबी ने कहा, ”अब तो यह अपनी छतरी संभालो. चाय के लिए फिर किसी दिन आ जाना, मेरा दरवाजा आप के लिए हमेशा खुला मिलेगा.’’

यह बस 2-3 मिनट की औपचारिक बातचीत थी, मगर रूबी को चलतेचलते लगा जैसे किसी ने लंबे सूखे दिन के बाद जरा सा पानी छिड़क दिया हो. एक दिन गौरव उस के घर पहुंच गया. रूबी घर में बिलकुल अकेली थी, उसी समय अचानक अभिषेक भी वहां आ गया. दोनों उस समय चाय पी रहे थे. रूबी ने गौरव से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा मुंह बोला भाई अभिषेक है. फिर गौरव की तरफ इशारा करते हुए रूबी ने कहा कि यह गौरव है. ये मोहल्ले में ही रहता है. मुझे बहन मानता है.

दोनों की यह पहली मुलाकात थी. उस के बाद अकसर रूबी के घर या बाहर भी कभीकभी कहींकहीं दोनों मिल जाया करते थे. औपचारिक बातचीत के साथसाथ उन दोनों में दोस्ती भी हो गई. रूबी की कोशिश रहती कि एक बार में उस के घर एक ही व्यक्ति से मुलाकात हो. दोनों एकदूसरे पर भरोसा भी करते थे. दिलचस्प बात यह कि इन दोनों के मन में कहीं न कहीं शक भी पनप रहा था कि भाई है या मेरी तरह आशिक. कुछ ही मुलाकातों में गौरव और रूबी एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

राहुल को गौरव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक दिन राहुल बाजार से घर पर आया. उस समय रूबी के साथ गौरव बैठा चाय पी रहा था. स्थिति बहुत आपत्तिजनक  तो नहीं थी, लेकिन शक पनप जाने के लायक काफी थी.

यह नजारा देख कर राहुल का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. इस से पहले कि वह कोई सवाल करता, गौरव ही बोल पड़ा, ”दीदी, चाय में तो मजा आ गया.’’

यह सुन कर राहुल सामान्य हो गया. 2-4 बातें गौरव से भी हुईं. फिर गौरव रुबी दीदी राहुल जीजा को नमस्ते कर के चला गया. चाय की इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात में रूबी ने गौरव से कहा कि उस दिन तुम्हारा स्टेप शानदार रहा, जिस से राहुल का गुस्सा शांत हो गया. नहीं तो यह हमारे बीच का प्यार परवान नहीं चढ़ पाता.

धीरेधीरे गौरव उस की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा, वह पूछता, ”भैया की दुकानदारी कैसी चल रही है? सीजन में तो जूते की अच्छी मांग होगी?’’

रूबी को यह अच्छा लगता कि कोई तो है जो उस के पति के बिजनैस के बारे में इतनी तल्लीनता से पूछ रहा है. बस धीरेधीरे दोनों की बातें, दोनों की आदतें और दोनों की बेचैनियां एकदूसरे में घुलने लगीं. राहुल मेहनती था, पर बिजनैस की चिंता, कर्ज की किस्तें और बढ़ता हुआ खर्च उस के स्वभाव को चिड़चिड़ा बना रहे थे. घर पर उस की बातचीत ज्यादातर पैसों, बिलों और थके हुए तानों के बीच उलझ जातीं. रूबी के दिल में कहीं यह बात बैठ गई कि उस की मुसकराहट अब पति के लिए जरूरी नहीं रही.

रूबी और गौरव दोनों को समझ में आ गया कि जो रिश्ता उन के बीच बन चुका है, वह नाम के बंधन से परे, दिल की गहराई में जड़ें जमा चुका है. एक दिन मौका पाते ही 2 जिस्म एक जान हो गए. फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा.

दोनों पकड़े गए रंगेहाथ

जब कभी राहुल बिजनैस के काम से बाजार चला जाता, गौरव घर आ जाता. बच्चे स्कूल में होते. दोनों मौजमस्ती करते. अभिषेक से भी ज्यादा आनंद वह गौरव के साथ महसूस कर रही थी. शाम का वक्त था. राहुल ने अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दबाजी में कहा, ‘मैं बाजार जा रहा हूं, कल शाम तक लौटूंगा’, इतना कह कर वह निकल गया. बच्चे सो चुके थे. घर में अब सिर्फ रूबी थी. उस ने तुरंत फोन कर के गौरव से घर आने को कहा.

मौके का फायदा उठाने के लिए गौरव रूबी के घर पहुंच गया.

”कितनी देर लगाई आज?’’ रूबी ने हलके से ठहाका लगाते हुए कहा.

पति की हत्यारोपी रूबी को पुलिस में ले जाते हुए 

”बाजार गया था, वहां ट्रैफिक में फंस गया था,’’ गौरव ने आतेआते अपनी शर्ट का एक बटन खोल दिया और उस के पास पहुंच कर उस की कमर में हाथ डाल दिया.

”अब सजा सुनाओ, कितना इंतजार करवाया?’’ रूबी ने भी उस के गले में बांहें डाल दीं.

”सजा तो बहुत कुछ बाकी है. पहले तो यह सजा पूरी करो.’’ गौरव ने उसे दीवार से सटा दिया.

रूबी की सांसें तेज हो गईं. उस ने गौरव के होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया. एक ऐसी भूख के साथ, जो सालों से दबी हुई थी. 15 साल पहले राहुल के साथ भी ऐसे ही पल आते थे, पर वो जल्दी खत्म हो जाते. अब कमरे में सिर्फ सांसों की आवाज थी. दोनों एकदूसरे में खोए हुए थे. ऐसे जैसे दुनिया में सिर्फ यही 2 लोग बचे हों. जल्दबाजी में वे दरवाजा बंद करना भी भूल गए थे. तभी अचानक राहुल आ गया.

राहुल हुआ लापता

दरअसल, राहुल को पूरा शक हो गया था कि उस की पत्नी गौरव के साथ रंगरलियां मनाती है, इसलिए वह जाने का बहाना कर के घर में ही अपने गोदाम में छिप गया था. यही घटना राहुल की हत्या का सबब बन गई. रूबी ने अपने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर अपने पति राहुल की हत्या की ऐसी योजना बनाई कि एक महीने तक पता ही नहीं चल सका कि राहुल कहां चला गया. उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

शायद कभी पता चलता भी नहीं, लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक हो, कोई न कोई ऐसा क्लू पुलिस के हाथ लग ही जाता है. फिर जमीन की तह से भी पुलिस अपराधी को खोज लेती है. राहुल ने राजमिस्त्री के काम से हट कर जूतों के कारोबार में कदम रखा था. घर से ही यह काम शुरू किया. वह अलगअलग जगहों पर जूते सप्लाई करता था. उस ने देहरादून में भी एक किराए की जगह ले रखी है. वहां भी बिजनैस को बढ़ा रहा था. देहरादून एक पर्यटक स्थल है.

कभीकभी वहां सैलानी बहुत बड़ी संख्या में आ जाते हैं, जिस के कारण होटल में ठहरने को जगह भी नहीं मिल पाती थी. इसलिए राहुल ने किराए पर एक कमरा ले लिया था. बिजनैस के सिलसिले में उस का हमेशा घर से बाहर आनाजाना लगा रहता. अभी कुछ दिन पहले राहुल की बुआ की बेटी की शादी थी. राहुल को शादी की तैयारी के लिए जाना था. इस के अलावा उसे कुछ खरीदारी भी करनी थी. 18 नवंबर, 2025 को उस ने अपनी पत्नी रूबी से कहा, ”मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं, कल तक लौट आऊंगा.’’

18 नवंबर का पूरा दिन बीत गया. 19 नवंबर आया, पर राहुल घर नहीं लौटा. पत्नी और बच्चे इंतजार कर रहे थे. हालांकि वो काम की वजह से कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. यह नौरमल बात थी, इसलिए बच्चों को उतनी चिंता नहीं थी. 20 नवंबर आया. बेटा और बेटी भी मम्मी से पापा के बारे में पूछ रहे थे. बेटी के अनुसार पापाजी का मोबाइल फोन कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था. कभी औन रहता तो कभी स्विच्ड औफ हो जाता.

शायद बैटरी खराब हो गई होगी. बच्चों के जिद करने पर रूबी ने जब पति को कौल किया तो उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कुछकुछ देर बाद और ट्राई किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ ही मिला. बेटी ने बताया कि पापा अपने फूफा के घर भी जाने वाले थे. हो सकता है कि काम पूरा करने के बाद वहीं चले गए हों. शादी के सामान की खरीदारी करवानी थी.

अब फूफा को कौल किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल तो यहां पर आया ही नहीं. बारीबारी से पत्नी कभी बच्चे बाकी रिश्तेदारियों में कौल करते रहे, लेकिन राहुल का कहीं कुछ पता नहीं चला. इसी तरह एक दिन और बीत जाता है. अब रूबी ने फैसला किया कि राहुल जहां भी काम के सिलसिले में जाते थे, वहां जा कर पता करेगी. इस के बाद रूबी बच्चों के खुद पति की खोज में निकल गई. 22 नवंबर, 2025 को यह देहरादून के उस किराए वाले मकान में भी पहुंच गई, जहां राहुल का अकसर आनाजाना होता था.

रूबी ने मकान मालिक से बात की. अभी तक 4 दिन बीत चुके थे. मकान मालिक ने कहा कि राहुल तो यहां पर कई दिनों से नहीं आए. समझ नहीं आ रहा था कि राहुल कहां चला गया. अंत में थकहार कर रूबी ने 24 नवंबर, 2025 को कोतवाली चंदौसी में पति के लापता होने की सूचना दर्ज कराई. पुलिस ने उस की हर एक डिटेल ली. राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस की जानकारी आसपास के दूसरे थानों में भी भिजवा दी.

ऐसे ही इस का भाई जुगनू है. उस के खिलाफ चंदौसी कोतवाली में कई मामले दर्ज हैं. जो चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के मामले बताए गए हैं. वह वर्तमान में मुरादाबाद जेल में बंद है. भाई के कारनामों में बहन रूबी का भी दखल रहता था. बताते हैं कि जब पुलिस जुगनू को पकडऩे के लिए जाती तो रूबी पुलिस से उलझ जाती थी. आसपास के लोग भी रूबी से दूरी बना कर रखते, इस डर से कि कब किस पर झूठा केस कर दे. रूबी कोई आम सुंदरी नहीं थी.

रूबी एक हेकड़ और दबंग महिला थी. बताते हैं कि साल 2016 में राहुल का अपने गांव में जमीन को ले कर विवाद हो गया था. उस समय रूबी अपने पति के साथ गांव के ही मकान में रहती थी. तब रूबी ने मोर्चा संभाला और विरोधियों को धूल चटाई थी. रूबी ने गांव के 3 लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए रजपुरा थाने में केस दर्ज करवाया था. इस में एक पिता, बेटा और भतीजे को नामजद कराया गया था. वह झगड़ा तो शांत हुआ. गांव के लोगों ने फैसला करा दिया था. नामजद लोगों को इस के लिए भरी पंचायत में माफी मांगनी पड़ी थी. ऊपर से रूबी ने उन तीनों से केस वापस लेने के लिए भारीभरकम रकम भी वसूल की थी.

घटना से करीब डेढ़ महीने पहले चंदौसी के सैनिक चौराहे के पास एक जमीन खाली कराने के लिए रूबी अपने प्रेमी अभिषेक के लिए मैदानेजंग में उतर आई थी. रूबी की हिम्मत, हौसला और तेवर देख कर विरोधी घबरा गए और उन्हें जमीन छोड़ कर भागना पड़ा था. रूबी के कारण ही प्रेमी अभिषेक को मोटी रकम का फायदा हुआ था.

बदले में रूबी को खुश करने के लिए अभिषेक ने भी अच्छीखासी रकम रूबी को दी थी. ऐसे ही विवाद का एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस में रूबी ने अभिषेक और गौरव के साथ मिल कर हंगामा किया था. उस समय उस का पति राहुल भी साथ था. इस की एक तसवीर भी वायरल हो रही है, जिस में रूबी को अपने दोनों प्रेमी और  पति के साथ कहीं पर हंगामा करते हुए देखा जा सकता है.

इसी तरह के कई अन्य विवादों में रूबी चंदौसी, रजपुरा, बनियाठेर थानों में लगभग 6-7 केस दर्ज करवा चुकी है. कुछ महीने पहले अभिषेक, रूबी और गौरव नैनीताल घूमने गए थे. वहां एक होटल में इन्होंने रात्रि विश्राम किया था. दोनों का टारगेट यह था कि इन में से कोई एक भी किसी काम से बाहर चला जाए तो दूसरा रूबी के साथ अपने प्रेम का टारगेट पूरा कर ले. शक तो दोनों को एकदूसरे पर हो ही गया था. यह सब आजमाने के लिए अभिषेक होटल से कोई बहाना कर के बाहर गया.

गौरव समझा 1-2 घंटे में तो घूम कर वापस आएगा, लेकिन अभिषेक कुछ ही मिनट बाद जैसे ही होटल के कमरे में घुसा, उस ने रूबी और गौरव को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उस समय उस ने गौरव से तो कुछ नहीं कहा, ऐसा बन गया जैसे उस ने कुछ देखा ही न हो. उस दिन के बाद से वह धीरेधीरे उन दोनों से किनारा करने लगा.

लाश के मिले टुकड़े

रूबी अब गौरव पर पूरी तरह से फिदा थी. इसलिए अभिषेक रूबी की प्रेम कहानी से बाहर हो गया और उस का संपर्क रूबी और गौरव दोनों से ही टूट गया. धीरेधीरे समय बीत रहा था. लेकिन राहुल का कुछ अतापता नहीं था. सभी लोग काफी चिंतित थे. अब दिन हफ्तों में बदलने लगे. 3 हफ्ते गुजर गए. सब की उम्मीद भी अब दम तोड़ चुकी थी. 27 दिन बाद यानी 15 दिसंबर, 2025 को राहुल के घर से करीब 800 मीटर दूर पतरौआ रोड है. यहीं पर एक ईदगाह स्थित है. इसी के पास रोड के साइड से एक नाला गुजरता है.

यह इलाका काफी सुनसान रहता है. आसपास खेतखलिहान है. कोई सीसीटीवी कैमरा भी दूरदूर तक नहीं है. सुबह के करीब 9 बजे के आसपास कुछ लोग इसी रास्ते से गुजर रहे थे. उन्होंने देखा कि नाले के पास काफी सारे कुत्ते इकट्ठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं. एकदूसरे पर भौंक रहे हैं और किसी चीज को ले कर छीनाझपटी भी कर रहे हैं. उन के पास एक बड़ा सा पौलीथिन बैग पड़ा था, जिस में कुछ भारीभरकम चीज रखी हो.

उस में से काफी तेज गंध भी आ रही थी. मामला संदिग्ध लगा तो एक व्यक्ति ने पुलिस कंट्रोल रूम का 112 नंबर डायल कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना चंदौसी कोतवाली में दे दी गई. सूचना मिलते ही कोतवाल अनुज तोमर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह 15 दिसंबर, 2025 की बात है. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां 2 टूरिस्ट बैग नाले में पड़े थे. एक को कुत्तों ने फाड़ दिया था, जिस में से मानव बौडी के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. जब खोला गया तो उस में से किसी आदमी का धड़ वाला भाग निकला. इस का हाथ, पैर, सिर सब कुछ गायब था.

पुलिस को दूसरे बैग के अंदर कुछ और भी सामान और एक पौलीथिन मिली. सामानों में ब्लैक और ग्रीन कलर की एक टीशर्ट थी. इस पर खून के धब्बे भी थे. एक अंडरवियर भी मिला और पौलीथिन में बायां हाथ अच्छे से सील पैक था, जिस वजह से नाले में पड़े रहने के बावजूद भी उस में पानी प्रवेश नहीं कर सका. शायद इस की बदबू बाहर न आ जाए, इस वजह से पैक किया हो. दिखने में लाश के ये अंग कई हफ्ते पुराने लग रहे थे. फोरैंसिक टीम को सूचित कर दिया गया.

फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य इकट्ठा करने शुरू कर दिए. इतनी देर में आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी जुटने लगे. पुलिस ने यहीं आसपास और भी छानबीन की. शायद और भी शरीर का हिस्सा भी मिल जाए. काफी तलाश के बाद भी सिर और शरीर के बाकी अंग कहीं नहीं मिले. घटनास्थल के फोटोग्राफ लिए गए और वीडियो भी बनाई गई. पुलिस द्वारा बरामद शरीर और बरामद कपड़ों को दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की गई.

कटर से काटी लाश

फोरैंसिक जांच के दौरान पुलिस को बहुत सारी चीजें पता चलीं. ऐसा लगा जैसे आराम से घटना अंजाम दी गई है. पूरी सफाई के साथ शरीर के टुकड़े किए गए. शरीर को काटने में तेजधार हथियार नहीं, बल्कि किसी मशीन का इस्तेमाल किया गया. 16 और 17 दिसंबर, 2025 तक यानी 2 दिन लगातार पुलिस की टीमें बौडी के विभिन्न अंगों को तलाश करती रहीं. पुलिस की कोशिश थी कि किसी तरह से सिर बरामद हो जाए तो मृतक की पहचान हो सके.

कोतवाल अनुज कुमार तोमर लगातार केस की जांच कर रहे थे. घटनास्थल पर बैग में जो हाथ मिला था, पुलिस द्वारा उस का ध्यान से निरीक्षण किया तो उस पर एक टैटू नजर आया. हाथ के बीच में ‘राहुल’ नाम लिखा हुआ था. अब राहुल कौन हो सकता है? राहुल या तो इस का ही नाम होगा या फिर इस के किसी करीबी का. उधर पुलिस की टीमें थाने में ऐसी पुरानी फाइल्स खंगाल रही थीं, जिन की गुमशुदगी लिखाई गई हो. चंदौसी थाने में ही एक केस फाइल मिला जूता कारोबारी राहुल कुमार का. 18 नवंबर, 2025 से गायब था. उस की गुमशुदगी उस की पत्नी रूबी द्वारा लिखाई गई थी.

पुलिस ने रूबी को बुला कर बरामद कपड़े व लाश के टुकड़े दिखाए. रूबी ने सब कुछ देख कर अपने पति के अवशेष होना स्वीकार नहीं किया. साफ इनकार कर दिया. थकहार कर पुलिस ने 18 दिसंबर, 2025 को लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस का सब से पहला काम था मृतक की पहचान पता करना. पुलिस के पास तो कोई ऐसी निशानी भी नहीं थी. अब पुलिस को शक हो चला था कि यह लाश राहुल की ही हो सकती है. क्योंकि एक तरफ तो राहुल गुमशुदा था और दूसरी तरफ लाश की बांह पर भी ‘राहुल’ के नाम का टैटू बना हुआ था.

जनपद संभल के थाना चंदौसी क्षेत्र में 24 नवंबर, 2025 को रूबी नाम की एक महिला ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद रूबी ने कभी पुलिस से कोई कौंटेक्ट नहीं किया, न ही उच्च अधिकारियों से शिकायत की कि पुलिस उस के पति को ढूंढने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए पुलिस का शक अब यकीन में बदलता जा रहा था, लेकिन कोई सबूत हाथ में आने से पहले वह रूबी पर हाथ डालना नहीं चाहती थी.

पुलिस ने लापता राहुल के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. पता चला कि राहुल का मोबाइल फोन घर पर ही 18 नवंबर, 2025 से ही स्विच औफ दिख रहा था. 19 दिसंबर, 2025 को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. पुलिस को राहुल की पत्नी रूबी पर शक हो रहा था. 20 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने रूबी से फिर पूछताछ की. उस के बात करने का तरीका अजीब था. जैसे कि वह जानबूझ कर दुखी होने का नाटक कर रही हो. जांच के दौरान पुलिस ने रूबी से उस का मोबाइल फोन मांगा, लेकिन वह मोबाइल  देने से इंकार कर रही थी.

पुलिस को मना करने की वजह भी नहीं बता रही थी. डांटडपट कर पुलिस ने मोबाइल लिया और इस की जांच की. सारे फोटोज, कौल डिटेल्स, चैटिंग सब कुछ चैक किया गया. इसी में ही रूबी के पति राहुल के साथ अलगअलग समय में लिए गए अनेक फोटो मिले. उसी दौरान पुलिस को 2 फोटो ऐसे मिले, जिन्होंने इस केस की परतें प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी. एक फोटो में राहुल वही टीशर्ट पहने दिखा, जो नाले के पास बैग में मिली थी.

जब पुलिस ने बरामद टीशर्ट रूबी को दिखाई थी तो उस ने उसे पहचानने से क्यों इंकार किया? मान लें कि वह कोई दूसरा टीशर्ट हो, किसी और का हो, फिर भी यह बोल सकती थी कि राहुल के पास ऐसा ही टीशर्ट है. पर उस ने बिलकुल ही पहचानने से मना कर दिया था.

पत्नी निकली कातिल

पुलिस ने थोड़ा ध्यान से देखा तो फोटो में राहुल के हाथ पर उस के नाम का टैटू गुदा था. इस से पुलिस को विश्वास कि नाले से बरामद लाश के टुकड़े राहुल के ही थे. इस से साफ हो गया कि रूबी अपने पति राहुल की गुमशुदगी और मौत को ले कर झूठ बोल रही है. अब पुलिस ने रूबी से अपने अंदाज में पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में रूबी सच बोलने के लिए मजबूर हो गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने पति राहुल की हत्या कराई थी. उस ने इस हत्याकांड की एक हृदयविदारक स्टोरी सुनाई.

18 नवंबर की रात को जब राहुल घर पर नहीं था. रूबी ने गौरव को अपने घर बुला लिया. रूबी को पता नहीं था कि वह कहीं गया नहीं है, घर में ही छिपा है. राहुल को मौके का इंतजार था. प्यार के नाम पर वासना का खेल शुरू होते ही राहुल अंदर आया. दरवाजा खुला था. क्योंकि दोनों इतने खोए हुए थे कि चिटकनी लगाना भी भूल गए थे. राहुल को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया.

एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई

उस की आंखें पहले रूबी पर टिकीं, जो अब तक चादर से जिस्म ढकने की कोशिश में सीने से लगाए बैठी थी. बाल बिखरे, होंठ कांपते हुए. फिर गौरव पर, जो बिस्तर के किनारे खड़ा था, हाथ में चादर का कोना पकड़े, लेकिन शरीर अभी भी नंगा था. राहुल का चेहरा पहले सफेद पड़ गया, फिर लाल. उस की आंखों में कुछ ऐसा था नफरत, सदमा, धोखा और शायद एक पल के लिए दया भी. वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था.

सन्नाटा तोड़ते हुए आवाज आई, ”राहुल…’’ यह कांपती आवाज रूबी की थी, ”तुम… तुम इतनी जल्दी?’’

राहुल ने जवाब नहीं दिया. उस ने बस एक बार फिर दोनों को देखा, जैसे कोई तसवीर देख रहा हो, जो कभी भूलना नहीं चाहता. फिर बिना एक शब्द बोले, वह मुड़ा. उस के कदम भारी थे. दरवाजे तक पहुंच कर वह रुका. पीठ फेर कर बोला, कपड़े पहन ले. वह आक्रोश से बुरी तरह तमतमा रहा था. फिर उस ने रूबी को बुरी तरह पीटा और सरेबाजार उस का जुलूस निकालने की धमकी दी.

कोतवाल अनुज तोमर

बस इसी से पगलाई रूबी ने गौरव को इशारा किया. गौरव ने लोहे की रौड उठा कर राहुल के सिर में मार दिया. वह वहीं गिर गया. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. रूबी भी पति पर हमला करने की पोजीशन ले चुकी थी. उस ने हथौड़ा ले कर उस के सिर पर मारमार कर सिर कुचल दिया. इस तरह दोनों ने मिल कर राहुल का  कत्ल कर दिया और अगले दिन बाजार से इलैक्ट्रिक कटर मशीन ला कर घर में ही अपने पति की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर डाले.

पुलिस ने रूबी और गौरव की निशानदेही पर कत्ल और सबूत मिटाने में इस्तेमाल किए गए कटर मशीन, हथौड़ा, मोबाइल फोन और लोहे की रौड जैसी चीजों को भी अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने धड़ का हिस्सा और एक बांह तो बरामद कर ली थी, लेकिन राहुल का सिर और उस के बाकी के हाथपांव बरामद नहीं हुए. रूबी और गौरव ने उस की लाश के अन्य हिस्सों को एक कार में ले कर बहजोई बबराला होते हुए राजघाट पहुंचे. वहां से गुजर रही गंगा नदी में राहुल के शरीर के बाकी टुकड़ों को फेंक दिया, जो अब बह कर दूर जा चुके हैं. शायद नष्ट भी हो चुके हों.

इस पूरे हत्याकांड की भनक उन्होंने बच्चों तक को नहीं लगने दी. राहुल की बेटी पापा के मर्डर में मम्मी और गौरव के अलावा अभिषेक को भी आरोपी मान रही है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि अभिषेक के रूबी से संबंध विच्छेद हो चुके थे. वह इस कहानी से अलग था. इस का इस घटना में कोई रोल नहीं है. चंदौसी शहर के लिए इतनी निर्मम हत्या का यह पहला मामला बताया जा रहा है.

गौरव ने जिस दुकान से बैग खरीदे थे, उस दुकानदार का नाम विनोद अरोड़ा है. उसे भी यह जान कर बहुत दुख हुआ कि उस के बैग का इस्तेमाल एक निर्मम हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर के फेंकने के लिए किया गया. गौरव को कटर देने वाला व्यक्ति जितेंद्र उर्फ जीतू तो उस समय बिलखबिलख कर रोने लगा, जब पत्रकारों ने उस से कहा कि तुम ने कटर गौरव को क्यों दिया था. उसे इस बात का बहुत दुख हुआ कि लोहे का सरिया काटने वाला कटर मानव शरीर को काटने में इस्तेमाल किया गया.

एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने 22 दिसंबर, 2025 को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में घटनाक्रम का खुलासा किया. पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव व रूबी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Love Crime

 

 

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद

 

 

Gujrat News: फारेस्ट औफिसर ने किया परिवार दफन

Gujrat News: भावनगर के फारेस्ट औफिसर शैलेष खांभला का परिवार ऊपर से देखने में भले ही खुशहाल लगता था, लेकिन घर में ऐसी खामोश आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था. इसी बीच शैलेष ने एक ऐसी खूनी साजिश तैयार कर ली, जिस से उस ने न सिर्फ पत्नी बल्कि दोनों बच्चों की हत्या कर उन्हें दफन कर दिया. एक फारेस्ट अधिकारी ने आखिर ऐसा क्यों किया?

गुजरात के जिला भावनगर की फारेस्ट कालोनी की वह सुबह हर दिन से कुछ अलग सी थी. सूरज से निकलने वाली किरणें घरों की छतों पर इस तरह फैल रही थीं, मानो धीरेधीरे कोई राज खोल रही हों. जबकि इस कालोनी का वह घर, जिस में शैलेष खांभला अपनी पत्नी नयनाबेन, बेटे भव्य और बेटी पृथा के साथ रहता था. उस सुबह जैसे किसी अदृश्य परदे में लिपटा हुआ था. दूर से देखने में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर ऐसा कुछ था, जिसे हवा भी छूने से डर रही थी. शैलेष खांभला वन विभाग में एसीएफ यानी असिस्टेंट कंजर्वेटर औफ फारेस्ट था. साल भर पहले ही उस का इस पद पर प्रमोशन हुआ था. उस के बाद ही ट्रांसफर हो कर भावनगर आया था.

जयपुरिया शर्ट पहन कर औफिस जाने वाला, नियमों में विश्वास रखने वाला, दिखने में शांत, लोगों से कम बोलने वाला व्यक्ति था शैलेष. लोग कहते थे कि साहब बहुत सीधे हैं, गुस्सा बिलकुल नहीं करते. परिवार से बहुत प्यार करते हैं. और उस की पत्नी नयना एक ऐसी महिला थी, जो अपनी छोटी सी दुनिया को संभालने में ही दिनरात खोई रहती थी. बेटी पृथा 13 साल की थी तो बेटा भव्य 9 साल का. दोनों पढऩे में तो अच्छे थे ही, सभ्य और खुशमिजाज भी थे.

एक अफसर का परिवार होने के बावजूद यह परिवार बिलकुल साधारण दिखाई देता था. नौकरी की वजह से पति बाहर रहता था तो नयना बच्चों को ले कर सूरत के कापोद्रा में सासससुर के साथ रहती थी. बाहर से देखने में सब कुछ सामान्य लगता था. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो घर की दीवारों के अंदर ही चुपचाप सांसें लेती हैं. उन का किसी को पता तक नहीं चलता कि अंदर ही अंदर क्या हो रहा है, क्या मर रहा है और क्या जन्म ले रहा है?

शैलेष साल भर पहले ही प्रमोशन ले कर भावनगर आया था. यहां रहते हुए उस की दुनिया बदल गई थी, लेकिन यह बदलाव उस के घर में नहीं आया था, उस के औफिस में आया था. वन विभाग में ही नौकरी करने वाली एक युवती शैलजा (बदला हुआ नाम), जिस की उम्र शैलेष से भले कम थी, लेकिन उस का रूप अधिक था. आकर्षण ऐसा था कि देखने वाले की नजर उस पर ठहर जाए. वह विभाग की अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाती थी. मुसकरा कर बातें करती तो जैसे फूल झड़ते हों. बिलकुल अलग दुनिया से आई हुई लगती थी शैलजा.

प्यार की हुई शुरुआत

मिलने की शुरुआत काम की बातचीत से हुई. शैलजा को काम के सिलसिले में बारबार शैलेष के पास आना पड़ता था. बारबार पास यानी नजदीक आने से शैलेष उस की ओर आकर्षित होने लगा, क्योंकि शैलजा जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं अधिक खूबसूरत उस का बातचीत करने का ढंग था. शैलजा अच्छी लगने लगी तो शैलेष उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगे. शुरुआत हुई वाट्सऐप मैसेज से. आजकल सरकारी आदेश, सूचनाएं, नोटिस आदि वाट्सऐप से ही भेजे जाने लगे हैं. इसलिए औफिस के हर कर्मचारी का नंबर हर किसी के पास होता ही है. इसलिए शैलजा का नंबर भी शैलेष के पास था. शैलेष शैलजा को सरकारी संदेशों के साथसाथ गुडमार्निंग का संदेश भी भेजने लगा था.

गुडमार्निंग का संदेश भेजतेभेजते शैलेष उसे प्यार के द्विअर्थी संदेश भेजने लगा. शैलजा उस के इन संदेशों को अवाइड करने या विरोध करने के बजाय जवाब देने लगी तो शैलेष समझ गया कि शैलजा को वह पसंद हैं. उस के संदेशों से स्पष्ट हो रहा था कि उस ने शैलेष के प्यार के प्रपोजल को स्वीकार कर लिया था. शैलजा को पता था कि शैलेष शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप भी है, फिर भी वह शैलेष के प्यार के झांसे में आ गई थी.

जब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया तो उन की फोन पर बातें होने लगी थीं, जो घंटोंघंटों चलती थीं. फिर तो दोनों के दिलों ने एकदूसरे को इस तरह जकड़ लिया, जैसे जंगल की बेल किसी पेड़ को धीरेधीरे जकड़ लेती है. कहते हैं कि प्यार कभी अचानक नहीं होता. वह धीरेधीरे बढ़ता है, जैसे दीमक किसी लकड़ी में बढ़ता है. शैलेष के मन में भी शैलजा के प्यार का दीमक लग चुका था.

किस ने चुराईं खुशियां

किसी और की मुसकान ने उस के घर की खुशियां चुरा ली थीं. अब घर लौटने में उस का मन शांत नहीं रहता था. वह फोन को सीने से लगा कर सोने लगा था. पत्नी कभी कोई सवाल करती थी तो जवाब देने के बजाय चुप रह जाता था. अपने ही बच्चों से अब उसे कोई मतलब नहीं रह गया था. एक पिता अपने ही बच्चों से दूर होता गया था. एक हंसतेखेलते, सुखीसंपन्न परिवार में एक पुरुष की लंपटता की वजह से काफी कुछ बदल चुका था.

शैलजा शैलेष के जीवन में भावना बन कर नहीं आई थी, बल्कि जुनून बन कर आई थी. एक आग की तरह कि जिसे बुझाना भी चाहो तो वह और भड़क उठे. शैलेष का दिमाग पूरी तरह बदल चुका था. वह सोचने लगा था कि अगर शैलजा के प्यार को पाना है तो उस के लिए कुछ बड़ा करना होगा. कुछ ऐसा करना होगा कि उस के बाद उसे कोई रोकटोक न सके. दुनिया उसे एक अधिकारी, एक भरेपूरे परिवार वाला और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखती थी. हर किसी को लगता था कि शैलेष बहुत सुखी है.

उस की सुंदरसुघड़ पत्नी और 2 प्यारेप्यारे बच्चे हैं. अच्छीखासी कमाई है. संपन्न परिवार से भी है. लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद उस के अंदर अब एक और आदमी पैदा हो चुका था, जो प्यार नहीं, कब्जा चाहता था. किसी और की देह पर कब्जा. और कब्जा अकसर हिंसा से ही मिलता है. 26 अक्तूबर, 2025 को नयना बच्चों को ले कर सूरत से भावनगर पति के पास आ गई थी. उसे पति के स्वभाव और बातचीत से उस की हरकतों पर संदेह हो गया था, जिस की वजह से वह उस से लडऩेझगडऩे लगी थी. साथ रहने की जिद करने लगी थी.

एक पति पत्नी के साथ जैसा व्यवहार करता है, शैलेष नयना के साथ बिलकुल नहीं कर रहा था. इसलिए यह झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था. शैलेष के बदले व्यवहार से नयना को यकीन हो गया था कि शैलेष पूरी तरह बदल गया है. इसलिए नयना अब उस के साथ ही रहना चाहती थी, जबकि शैलेष उसे खुद से दूर ही रखना चाहता था. नयना ने पति की हरकतों को भांप कर तय कर लिया था कि अब वह उस के साथ ही रहेगी. जबकि शैलेष किसी भी हालत में साथ रखने को तैयार नहीं था. इसलिए नयना की जिद से वह परेशान हो उठा था. जब नयना किसी भी हालत में नहीं मानी तो शैलेष उस से छुटकारा पाने के उपाय ही नहीं सोचने लगा था, बल्कि योजना बनाने लगा था.

उसी योजना के तहत 2 नवंबर को शैलेष ने रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से कहा कि कूड़ा फेंकने और पानी भरने के लिए उसे घर के पीछे वाले खेत में एक बड़ा गड्ïढा खुदवाना है. खेत में गड्ïढा खुदवाना सामान्य बात थी. लेकिन वह गड्ïढा सामान्य नहीं था. वह गड्ïढा भविष्य का श्मशान था.

उसी दिन रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया ने शैलेष के सरकारी क्वार्टर से 20 फीट की दूरी पर जेसीबी से मिट्टी हटवा कर गहरा गड्ïढा खुदवा दिया. गड्ïढा छोटामोटा नहीं खुदवाया था, शैलेष ने पूरे साढ़े 6 फुट गहरा गड्ïढा खुदवाया था. गिरीश ने सोचा था कि शैलेष ने किसी खास काम यानी कूड़ा डालने और पानी भरने के लिए गड्ïढा खुदवाया होगा. तब किसे पता था कि वह गड्ïढा 3 जिंदगियों का अंतिम ठिकाना बनने वाला है.

4 नवंबर, 2025 से शैलेष का व्यवहार एकदम से बदल गया था. घर में कुछ बेचैनी सी फैल गई थी. उस का बदला व्यवहार देख कर पत्नी ने पूछा भी था कि सब ठीक तो है न? जवाब में उस ने कहा था, ”हां, सब ठीक ही है. कुछ तो नहीं है.’’ लेकिन उस के इस ‘कुछ तो नहीं है’ में एक ऐसा तूफान छिपा था, जिस में सब उड़ जाना था. जो बच्चे रोज उस के साथ खेलते थे, वे उस से दूर हो गए थे. वे अपने मन से नहीं दूर हुए थे, बल्कि शैलेष ने खुद उन्हें दूर कर दिया था. पिता के बातव्यववहार से उन्हें भी हवा से कुछ गड़बड़ होने का अहसास हो रहा था.

4 नवंबर की सुबह साढ़े 8 बजे के करीब रेंज फारेस्ट औफिसर ने शैलेष को फोन किया कि सर खेत में जो गड्ïढा खोदा था, उस में एक मोर गिर कर मर गया है. इसलिए गड्ïढा पटवाना जरूरी है. शैलेष भाग कर आया. उस ने कहा कि यहां तो कोई मोर नहीं है. आरएफओ हैरान रह गया था, क्योंकि उस ने अपनी आंखों से गड्ढे क में मरा हुआ मोर देखा था. वह खड़ा यही सोच रहा था कि शैलेष झूठ क्यों बोल रहा है? आखिर यह आदमी गड्ïढा भरवाने से मना क्यों कर रहा है?

जो भी राज था, वह शैलेष के मन में ही था. गड्ढे क का वह क्या करेगा, यह किसी को पता नहीं था. इसलिए लोगों को शक होने लगा था. उस रात भावनगर में हवा कुछ अलग ही चल रही थी. वह ऐसी हवा थी, जो शांत तो थी, पर डरावनी भी थी. घर में बच्चों की आवाजें धीमी पड़ गई थीं. नयना को कुछ बेचैनी सी हो रही थी. शैलेष का चेहरा ऐसा हो गया था, जैसे कोई आदमी अपनी परछाई से भी डर रहा हो.

औफिसर ने किए 3 मर्डर

4 नवंबर, 2025 की रात से ही शैलेष और नयना में साथ रहने को ले कर झगड़ा शुरू हो गया था, जो पूरी रात चलता रहा. बच्चे खापी कर सो गए थे, लेकिन न शैलेष की आंखों में नींद थी और न नयना की आंखों में, क्योंकि कमरे की चौखट पर खड़ा शैलेष अपने ही परिवार की मौत लिखने वाला था. उस ने सोचा कि सब से पहले पत्नी को ठिकाने लगाया जाए. क्योंकि पत्नी ही उस के प्यार की, उस के नए जीवन की सब से बड़ी बाधा थी. सब से बड़ा सवाल थी. सब से बड़ा सच थी. वही सवाल कर सकती थी कि वह यह क्या करने जा रहा है.

शैलेष और नयना की लड़ाई सुबह और बढ़ गई थी. नयना अपना अधिकार मांग रही थी. उसे क्या पता था कि थोड़ी देर में उसे अधिकार नहीं, मौत मिलने वाली है. यह काम कोई और नहीं, वही आदमी करेगा, जिस ने अग्नि के 7 फेरे लेते हुए उस की जानमाल और इज्जत की सुरक्षा करने की कसम खाई थी. वही अब उस की जान लेने वाला है, एक ऐसी औरत के लिए जो अभी उस की कोई नहीं थी. अभी सब कुछ वादों में था.

लड़तेझगड़ते अचानक शैलेष को गुस्सा आ गया. उस ने बैड पर पड़ा दूसरा तकिया उठाया और नयना के मुंह पर पूरी ताकत से इतनी मजबूती से दबाया कि उस की आवाज तक बाहर नहीं आ सकी. नयना ने जान बचाने के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन शैलेष की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उस ने हाथपैर पटक कर, थोड़ी देर छटपटा कर दम तोड़ दिया. जिस आदमी ने कभी बच्चों तक से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी, उस आदमी ने अपनी ही पत्नी की सांसें रोक दीं. जिस से पूरे जीवन साथ निभाने का वादा किया था, बीच में उस की जान ले कर उस का साथ छोड़ दिया.

कमरा फिर खामोश हो गया. एक ऐसी खामोशी, जिस में कोई रो तो सकता था, लेकिन कोई सुन नहीं सकता था. शायद मम्मी के कमरे से आने वाली छटपटाहट की आवाज सुन कर दोनों बच्चे, 13 साल की पृथा और 9 साल का भव्य जाग गए थे. कमरे से आने वाली धीमी आवाजों ने उन्हें डरा दिया था. बेटी थोड़ी बड़ी थी. उस ने पूछा, ”पापा, मम्मी को क्या हुआ?’’

शैलेष ने मुसकराने की कोशिश तो की, लेकिन उस की आंखों में पागलपन उतर चुका था. उस ने बेटी को समझाने या सांत्वना देने के बजाय दबोच लिया और उस के मुंह पर भी तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाना शुरू कर दिया. 13 साल की मासूम बच्ची कितना संघर्ष करती, एक वयस्क पुरुष के सामने कितनी देर टिक सकती थी? आखिर वही हुआ, जो शैलेष चाहता था. कुछ पलों में पृथा की भी सांसें रुक गईं. उस के बाद 9 साल के बेटे को भी उसी तरह खत्म कर दिया.

जिन हाथों ने पकड़ कर उसे चलना सिखाया था, उन्हीं हाथों ने बेटी और बेटे का जीवन लील लिया था. उन का मुंह दबाते समय पिता के हाथ भी नहीं कांपे थे. जब पत्नी और बच्चों की सांसें थम गईं तो शैलेष के अंदर का शैतान शांत हो गया. वही नहीं, घर भी शांत हो गया था. यह शांति मौत की थी. शैलेष खड़ा तीनों लाशों को ताक रहा था. उस की आंखों में उस समय एक ऐसा खालीपन था, जो अब कभी भरने वाला नहीं था. लगता था कि भीतर का सब कुछ मर चुका हो. लेकिन मन में कोई पछतावा नहीं था. अब उसे तीनों लाशों को ठिकाने लगाना था. इस की योजना उस ने पहले से बना रखी थी.

लाशों को ठिकाने लगाने के लिए शैलेष ने पहले से घर के पीछे 20 फीट की दूरी पर गड्ïढा खुदवा रखा था. अब उसे उन लाशों को उस गड्ढे क में डाल कर ऊपर से मिट्ठी डालनी थी. शैलेष ने तीनों लाशें उस गड्ढे क तक पहुंचाई, जिसे उस ने लाशों के हिसाब से ही खुदवाया था. लाशों में पत्थर बांध कर गड्ढे क में डाल दिया. इस के बाद घड़ी की ओर देखा तो साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने लाशों के ऊपर गद्ïदा डाल कर ऊपर से एक दरवाजा डाल दिया, जिस से गद्ïदा इधरउधर न खिसके. अब ऊपर से मिट्टी डालनी थी.

शैतान बन चुके शैलेष ने खुद ही अपने उस परिवार के ऊपर मिट्टी डाल कर दफना दिया, जिस के लिए अब तक जिया था. इस के बाद उस ने अमित को फोन कर के 2 डंपर बजरी मंगवाई कि गड्ढे क को भरवाना है. रेंज फारेस्ट अफसर ने कहा कि गड्ढे क से निकली मिट्टी तो है, उसी को जेसीबी से भरवा देते हैं. पर शैलेष ने बजरी मंगवा कर गड्ढे क में डलवा दी. इस तरह उस गड्ढे क में अपराध का एक इतिहास दफन हो गया था. ऊपर से सूखी घास और पुरानी बोरियां डाल कर गड्ढे को खेत का एक हिस्सा बना दिया था.

5 नवंबर, 2025 को हत्या हुई थी. इतना कुछ करने के बाद शैलेष घर से निकल गया. 7 नवंबर, 2025 की शाम को वह भावनगर के थाना भरतनगर पहुंचा और पत्नी, बेटे और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने अपना काम शुरू कर दिया. नयना, पृथा और भव्य के फोटो, आधार कार्ड आदि सारी जानकारी भावनगर जिले के तमाम थानों को भेज कर तलाश शुरू कर दी. 12 नवंबर, 2025 तक शैलेष नौकरी पर जाता रहा. उस के बाद छुट्टी ले कर सूरत चला गया. वह इस तरह रह रहा था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.

दूसरी ओर 8 नवंबर को पुलिस ने नयना के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई थी. उसी दिन शैलेष ने थाना भरतनगर जा कर पुलिस को बताया था कि सिक्योरिटी गार्ड ने बताया है कि उस ने नयना और दोनों बच्चों को एक औटोरिक्शा से जाते देखा था. इस के बाद पुलिस ने सिक्योरिटी गार्ड से पूछताछ की तो उस ने उन तीनों को देखने से साफ मना कर दिया. तब पुलिस ने फारेस्ट कालोनी तथा उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने के साथ नयना के मोबाइल की वह स्क्रीनशौट मंगाई, जिस में उस ने वह मैसेज छोड़ा था कि वह घर छोड़ कर बच्चों के साथ जा रही है.

सीसीटीवी फुटेज में ऐसा कोई औटो नजर नहीं आया, जिस में नयना और बच्चे जा रहे हों. तीनों पैदल भी जाते नहीं दिखाई दिए थे.

फोन से मिला सुराग

जांच में पता चला कि शैलेश ने खुद ही पत्नी के मोबाइल से एक मैसेज किया था, जिस में उस ने लिखा था कि वह किसी दूसरे के साथ रहने जा रही है. लेकिन फोन फ्लाइट मोड पर था, इसलिए वह मैसेज सेंड नहीं हो सका था. पुलिस को इस से थोड़ा शक हुआ और उसे आगे बढऩे की रोशनी मिल गई. तब पुलिस ने नयना के पुराने मैसेज से उस की भाषा का मिलान किया तो उस की भाषा अलग लगी. पुलिस को यहीं शक हुआ कि जो इंसान घर छोड़ कर भाग रहा हो, वह संदेश छोड़ कर क्यों जाएगा.

शैलेष शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि इस बीच शैलेष की रेंज फारेस्ट अफसर गिरीशभाई बनिया से अधिक बात हुई थी. 11 नवंबर को पुलिस ने शैलेष के घर की तलाशी ली, जिस में घर से एक छोटा कपड़ा कुरसी के नीचे से मिला था, जो किसी बच्चे का लगता था. उस का एक बटन टूटा हुआ था. कोने में पड़े 2 स्कूल बैग और घर बता रहा था कि बच्चे कई दिनों से गायब थे. 15 नवंबर को रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से मिलने पुलिस पहुंच गई.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ मे गिरीश बनिया ने बताया कि 2 नवंबर को शैलेष ने उस से कहा था कि उसे घर के पीछे खेत में पानी जमा करने और कूड़ा डालने के लिए एक गड्ïढा खुदवाना है. उस ने शैलेष के कहने पर गड्ïढा खुदवा दिया था. 6 नवंबर को फिर आदेश आया कि अब इस गड्ढे क में मिट्टी भरवा दो. बनिया की इस बात से पुलिस को लगा कि यह महज संयोग नहीं हो सकता. यह किसी योजना के तहत था.

शैलेष के कहने पर गड्ïढा भरवाने के लिए गए वनरक्षक विशाल पनोत ने बताया कि जब वह गड्ïढा भरवाने के लिए डंपर से मिट्टी गिरवाने लगा तो गड्ïढा देखने की गरज से उस ओर गया. तब शैलेष ने घबराई आवाज में कहा था कि इधर मत आओ, उस का पैर किसी सांप पर पड़ गया था. वह उसे काट सकता है. घर का रहा न घाट का एक जंगल के अधिकारी की इस तरह की बचकानी हरकत पुलिस को हजम नहीं हुई. डंपर के साथ आए विशाल से बात की गई तो उस ने बताया कि जब उस ने गड्ढे क में पड़े गद्ïदे के बारे में पूछा तो शैलेष ने बताया था कि गड्ढे क में एक नीलगाय गिर गई थी, उसे बाहर निकालने के लिए गद्ïदा डालना पड़ा था. जबकि गड्ढे क में डाली गई मिट्टी एक अलग ही कहानी कह रही थी.

नई, ताजी, जल्दबाजी में भरी गई मिट्टी साफ कह रही थी कि इस के नीचे कोई रहस्य छिपा है. मिट्टी डाल कर भले जमीन समतल कर दी गई थी, लेकिन जल्दबाजी में किया गया यह कारनामा पुलिस की आंखों में धूल नहीं झोंक सका. हर क्लू एक ही बात की ओर इशारा कर रहा था कि गड्ïढा हत्या से जुड़ा है और हत्या के रहस्य को इसी गड्ढे में जल्द से जल्द मिटाने की कोशिश की गई थी. सिक्योरिटी गार्ड, सीसीटीवी फुटेज, रेंज फारेस्ट अफसर, वनरक्षक और डंपर के साथ आए सहायक की बातों से पुलिस का शक अब यकीन में बदलने लगा था. तब पुलिस टीम फिर फारेस्ट कालोनी पहुंची. इस बार उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थीं.

गड्ढे में जहां मिट्टी और बजरी डाली गई थी, जेसीबी से मिट्टी हटाई जाने लगी. सभी टकटकी लगाए गड्ढे क को ताक रहे थे. जब मिट्टी के नीचे कपड़े का एक टुकड़ा दिखाई दिया तो वहां खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. कुछ ही देर में तीनों लाशें दिखाई दे गईं. ये लाशें नयनाबेन, पृथा और भव्य की थीं, जिन्हें तकिए से दम घोंट कर मारा गया था. इस घटना की खबर आग की तरह फैल गई. पूरे भावनगर में मातम था. पुलिस ने लाशें निकलवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी थीं.

लाशें मिलने के बाद स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं शैलेष ने ही की हैं. पर लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि एक पढ़ेलिखे, सभ्य, सरकारी मुलाजिम ने यह जघन्य अपराध क्यों किया? वह इतना क्रूर कैसे हो गया? अब पुलिस शैलेष को गिरफ्तार करना चाहती थी. पर वह घर में ताला बंद कर के गायब था. चूंकि मामला एक अधिकारी से जुड़ा था, इसलिए एसपी नितेश पांडे ने तुरंत थाना भरतनगर के इंसपेक्टर को भावनगर तथा सूरत में छापा मार कर शैलेष खांभला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चंद घंटों में शैलेष खांभला को सूरत से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस समय उस के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था. बस, एक अजीब सा खालीपन था, जैसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि उस ने क्या खोया और क्या पाया है. शैलेष की गिरफ्तारी की सूचना पा कर एसपी नितेश पांडे, रेंज आईजी गौतम परमार भी आ गए थे. सभी की मौजूदगी में शैलेष से पूछताछ की गई तो उस ने अपना हर अपराध स्वीकार कर लिया था.

इस पूछताछ में उस ने यही बताया कि पत्नी नयनाबेन साथ रहने की जिद कर रही थी, इसलिए आवेश में आ कर उस ने उस की हत्या कर दी थी. बच्चों की हत्या उस ने क्यों की, इस सवाल का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. पुलिस ने शैलजा से भी पूछताछ की. उस का कहना था कि शैलेष के मन में क्या था, उसे पता नहीं. रही बात प्यार करने की तो वह अलग बात है. पर उस ने शैलेष से न कभी साथ रहने की बात की है और न ही उस से कभी अपने परिवार की हत्या करने की बात की थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शैलजा को जाने दिया, क्योंकि पुलिस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था कि वह भी इस हत्या में शामिल थी. पुलिस ने शैलेष को 7 दिनों तक रिमांड पर भी रखा. इस बीच उस के खिलाफ जितने सबूत मिल सकते थे, जुटाए. यह भी पता किया कि इन हत्याओं में कोई और तो उस के साथ नहीं था. पता चला कि यह जघन्य अपराध उस ने अकेले ही किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे कोर्ट में दोबारा पेश कर के जेल भेज दिया गया था. शैलेष के इस कारनामे से उस की पूरी बिरादरी ही नहीं, घर वाले भी इस कदर नाराज हैं कि सभी यही चाहते हैं कि उसे सख्त से सख्त सजा मिले. Gujrat News

 

 

Haryana Crime News: एमए बीएड टौपर बनी सीरियल किलर

Haryana Crime News: पानीपत में 4 बच्चों की हत्या के आरोप में पकड़ी गई पूनम के निशाने पर वे बच्चे होते थे, जो उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर दिखते थे. एमए बीएड पास किलर मौम द्वारा की गईं 3 हत्याओं का किसी को शक नहीं हुआ, लेकिन चौथे बच्चे की हत्या के बाद वह इस तरह शक के दायरे में आई कि…

पानीपत के एक गांव में शादी का माहौल था, दिसंबर 2025 महीने की पहली तारीख थी. सभी शादी के जश्न में डूबे हुए थे. यह शादी पूनम के मायके में थी, इसलिए वह भी इस शादी में आई हुई थी. फेमिली में लोगों के बीच वह काफी चर्चा में थी. कारण, वह अपनी सुंदरता, चपलता और चंचलता से सब का बरबस ध्यान खींच रही थी. वैसे भी फेमिली के लोगों से वह कई सालों बाद मिली थी.

घर में चहलपहल का माहौल था. विवाह की रस्में निभाई जा रही थीं. रात होने को आई थी. घर के लोगों को रात के भोजन के लिए बुलाया जाने लगा था. इसी बीच उस की भाभी राखी ने पूछा, ”पूनम, तुम ने विधि को देखा है क्या?’’ विधि 6 साल की बच्ची थी.

”नहीं तो भाभी! क्यों, क्या हुआ?’’ पूनम अनजान बनती हुई बोली.

”कुछ नहीं, काफी देर से दिखाई नहीं पड़ रही है. सुबह का खाना खाया है, भूखी होगी!’’ राखी चिंता से बोली.

”आ जाएगी. इधर ही कहीं खेल रही होगी बच्चों के साथ.’’ पूनम बोली.

”अरे नहीं पूनम, बहुत टाइम हो गया है. इतनी देर तक मेरे बगैर नहीं रहती है, उसे ढूंढना होगा!’’ चिंता जताती हुई राखी भाभी बोली.

”जी भाभी, मैं तलाशती हूं उसे.’’

थोड़ी देर में ही यह बात पूरे घर में फैल गई कि विधि नहीं मिल रही है. पहले घर के सभी बच्चों से पूछताछ की गई, सभी ने एक ही बात कही कि उन्होंने उसे बहुत देर से नहीं देखा है.

विधि के लापता हुए कई घंटे हो गए. परिवार के सभी सदस्य उसे तलाशने में जुट गए. घर के कमरे का कोनाकोना छान मारा गया. यहां तक कि पासपड़ोस के घरों में भी उस की तलाश की गई. कई लोगों से उस के बारे में पूछताछ की गई, किंतु उस का कोई पता नहीं चल पाया था.

हर किसी के लिए शादी के काम के दिन एक नई समस्या खड़ी हो गई थी. क्या बच्चे और और क्या बड़ेबुजुर्ग, विधि की एक झलक पाने के प्रयास में थे. सभी के सामने एक ही सवाल था, ‘आखिर कहां गई होगी विधि?’

कई घंटे बीत चुके थे. विधि की मम्मी राखी का बुरा हाल हो रहा था. परेशान थी. घर के सभी कमरों में कई बार झांक चुकी थी. छत पर कई बार सीढिय़ां चढ़ चुकी थी. थक कर बरामदे में चावल की एक बोरी पर बैठ गई. उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं. सुस्ताने के लिए आंखें मूंद ली थीं. कुछ पल में उस ने एक आवाज सुनी, ”मिल गई विधि… मिल गई.’’

”कहां? कहां है मेरी विधि?’’ राखी चौंकती हुई बोली.

”स्टोररूम में मिली…’’ किसी ने कहा.

”स्टोररूम में क्या करने चली गई थी.’’ विधि की मम्मी तेजी से उठी और स्टोररूम की ओर भागी. उसे विधि के मिलने की जानकारी जरूर मिल गई थी, लेकिन बुरी खबर भी सुनने को मिली.

विधि सोनीपत में रहती थी और अपने परिवार के साथ एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने पानीपत के नौल्था गांव आई थी. उस के साथ उस के दादा पाल सिंह, दादी ओमवती, पिता संदीप, मम्मी और 10 महीने का छोटा भाई भी था. दादी ओमवती और विधि की मम्मी राखी घर और आसपास की गलियों में काफी तलाश कर चुके थे. रात करीब 2 बजे जब ओमवती पहली मंजिल पर गईं, तब उन्होंने स्टोररूम का दरवाजा बाहर से बंद देखा. जब उन्होंने दरवाजा खोला तो देखा कि विधि पानी से भरे टब में मुंह के बल पड़ी थी. उसे कोई होश नहीं था.

यह देखते ही उन की चीख निकल गई. फेमिली वाले तुरंत उसे इसराना मैडिकल कालेज ले गए, जहां डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. विधि नाम की जो बच्ची शादी के लिए काफी उत्साह के साथ तैयार हुई थी, पूरे दिन काफी उमंग से भरी हुई थी, वह अचानक गायब हो गई थी. उस की तलाश में सभी घंटों तक परेशान रहे. खोजबीन शुरू हुई और तब वह आधी रात को स्टोररूम में प्लास्टिक के टब में बेहोशी की हालत में मिली.

यह मामला सोनीपत के नौल्था गांव की है. सोनीपत पुलिस को इस की सूचना मिली. गहन जांचपड़ताल होने लगी. 2 दिनों तक तहकीकात होती रही. घरपरिवार के सभी सदस्यों से विधि के लापता होने से ले कर उस की मौत के बारे में पूछताछ की जाने लगी. पुलिस ने शादी में आए सभी लोगों से पूछताछ की. पुलिस अधिकारियों को जल्द ही पूनम के बयानों में अंतर दिखा और उन का शक गहरा गया. लगातार पूछताछ के दौरान वह टूट गई और उस ने न केवल विधि की हत्या करना, बल्कि इसी तरीके से पहले भी 3 हत्याएं करना कुबूल कर लिया. उसे 3 दिसंबर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.

उस ने पुलिस को हत्या का जो कारण बताया, वह बेहद हैरान करने वाली थी. यह भी बताया कि वह विधि से पहले और 3 बच्चों की हत्या कर चुकी है. विधि समेत वह 4 बच्चों की हत्या की आरोपी थी. इस डरावने मामले का कारण तो और भी चौंकाने वाला था. उस ने बताया कि उस ने जिन बच्चों की हत्याएं की थीं, वे बच्चे उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर थे. इस कारण उस ने उन्हें मार डाला. चौंकाने वाली बात यह है कि मरने वालों में एक उस का अपना बेटा भी था.

उस ने पुलिस को बताया कि परिवार में कोई भी उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर दिखा नहीं कि वह उन बच्चों को नुकसान पहुंचाने के मनोविज्ञान से ग्रसित हो जाती थी. जब भी उस के सामने सुंदर बच्चा आता था, तब वह जलन से भर जाती थी. इस कारण ही सजीसंवरी विधि पूनम की आंख की किरकिरी बन गई थी और उस ने पहली दिसंबर की रात को अपनी 6 साल की भतीजी विधि को बाथटब में डुबो कर तब मार डाला था, जब पूरा परिवार  शादी के फंक्शन में मशगूल था.

उस ने विधि को बाथटब में पानी भरने का लालच दिया था. उसे स्टोररूम में ले जाने के लिए कहा था. वहां जाते ही उस ने बच्ची को डुबो दिया था. बाहर से दरवाजा बंद कर शादी के जश्न में ऐसे वापस आ गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो. पुलिस ने पूनम से पूछताछ में पाया कि वह एक साइको किलर है. उस ने पिछले जुर्म के बारे में भी बताया. पूनम ने सब से पहले 2023 में अपनी ननद की बेटी इशिका को टैंक में डुबो कर मार डाला था. बेटे को मारने का कारण उस के मन में छिपा भय था. उसे आशंका हो गई थी कि उस ने जो अपराध किया है, वह उस का बेटा शुभम जान गया है. वह इस बारे में सब को बता न दे. इसलिए अपने बेटे को भी मार दिया.

उस के बाद अगस्त, 2025 में पूनम अपने चचेरे भाई की 6 साल की बेटी जिया को भी इसी तरह मार डाला था. इन सभी मौतों को परिवार ने दुखद हादसा मान कर टाल दिया था. इस तरह से पूनम शुभम, इशिका, जिया और विधि की कातिल बन गई. उस की कहानी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है. उस ने प्यार, सनक और दरिदंगी का जो काम किया, उसे सुन कर किसी का भी कलेजा कांप जाए. बात जनवरी, 2023 की है. पूनम की ननद पिंकी 11 जनवरी को अपनी 7 साल की बेटी इशिता के साथ मायके आई थी. सोनीपत के गोहाना के भावड़ गांव में अचानक 12 जनवरी, 2023 को हड़कंप मच गया था.

घर के बाहर बने पानी के 5 फीट गहरे स्टोरेज टैंक में पूनम के 3 साल के बेटे शुभम और उस की ननद पिंकी की 7 वर्षीय बेटी इशिता का शव मिलता है. तब परिवार के लोगों ने इसे हादसा मान लिया था. किसी ने जरा भी हत्या किए जाने की आशंका नहीं जताई. कोई पूनम के इरादे नहीं भांप नहीं पाया. जबकि हैरान करने वाली बात यह थी कि साइको पूनम ने इशिता के साथ अपने बेटे को भी टैंक में डुबो कर मार दिया था. 2 हत्याओं को अंजाम देने के बाद पूनम ने फिर अपनी सनक मिटाने के लिए करीब डेढ़ साल का वक्त लिया. इस अंतराल की वजह पूनम ने फिर से गर्भवती होना बताया. उस ने एक और बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अपने पहले बेटे शुभम के नाम पर ही रख लिया.

पूनम द्वारा दोहराई गई वारदात 18 अगस्त, 2025 की है. वह रात को अपने चचेरे भाई दीपक के घर रुकी थी. रात में उस ने 10 साल की जिया को अपने पास सोने के लिए मना लिया. बच्ची को प्यार और दुलार का झांसा दिया और रात के अंधेरे में उस ने जिया को घर के पीछे बने पानी के हौद में डुबो दिया. इस घटना के बाद अगले रोज जिया की मम्मी ने बताया कि 19 अगस्त की सुबह उस ने उठ कर परिवार के लोगों के साथ बच्ची की काफी तलाश की. उसे स्कूल जाने के लिए तैयार करना था, लेकिन बच्ची घर के पीछे बनी पानी की छोटी सी टंकी में मिली.

इस दौरान फेमिली वालों को लगा कि पुलिस को शिकायत दी जाए. तब पूनम ने भी कानूनी काररवाई के नाम पर सभी को डरा दिया. वह सब से ज्यादा रोती नजर आई. जिया की मम्मी ने बताया कि पानी की टंकी इतनी गहरी भी नहीं थी कि बच्ची उस में डूब जाती, लेकिन परिवार के लोग यह मान कर चुप हो गए कि शायद सोते समय उस के साथ हादसा हो गया हो और उस की मौत हो गई. हालांकि तब जिया के ताऊ सुरेंद्र ने पूनम पर ही शक किया था, लेकिन पूनम काफी रोने लगी. कहने लगी कि मैं इशिता की मौत की जिम्मेदार हूं तो अपनी जान दे दूंगी. परिवार के लोग उस की भावनात्मक धमकी से घबरा गए और लोकलाज के चलते इस मामले को शांत कर दिया और पुलिस में इस की शिकायत तक नहीं की गई.

इस तरह पूनम 2 साल के अंतराल में 3 हत्याएं कर चुकी थी, लेकिन इस की भनक  किसी को नहीं लगी. उस पर शक जरूर हो गया था, लेकिन इस की पुलिस में शिकायत किसी ने नहीं की. पूनम ने यह कुबूल किया कि वह अपने खौफनाक इरादों के साथ ही पानीपत में इसराना के नौल्था गांव गई थी. पूनम की रिश्तेदारी में जेठ लगने वाले सतीश अपने परिवार के साथ शादी में आए थे. उस ने मौका पा कर पहली दिसंबर को 6 साल की बच्ची विधि की हत्या कर दी थी. इन चारों हत्याओं में पूनम का तरीका एक जैसा था. पूनम ने विधि को भी पानी में डुबो कर मारा था और हत्या के लिए शादी वाला दिन चुना.

जब पुलिस ने इस की गहन छानबीन की, तब एक और बात का पता चला. वह अहम बात यह थी कि तीनों हत्याएं पूनम ने एकादशी के दिन की थी. एक दिसंबर को भी एकादशी थी. ऐसे में अब तंत्रमंत्र के एंगल से भी जांच की जाने लगी. मृतक बच्ची जिया के ताऊ सुरेंद्र ने बताया कि पूनम उस की चचेरी बहन थी. उन्होंने बारबार सभी पहलुओं पर विचार किया तो एक बात सामने निकल कर आई कि तीनों वारदात के दिन एकादशी थी और तीनों की हत्या करने का तरीका एक ही था तो कहीं न कहीं यह तांत्रिक क्रिया से जुड़ा होने की शंका जताई गई.

पूनम का व्यवहार भी अजीब रहता था और वह गोहाना में अपने घर के आसपास के लोगों से कहती थी कि उस में पड़ोस के युवक की आत्मा आ गई है. इसे ले कर ही पूनम के चचेरे भाई सुरेंद्र ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि उस की बहन को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए. क्योंकि उम्रकैद होने के बाद वह जेल से बाहर आएगी और फिर से बच्चों की हत्या कर सकती है. परिवारजनों का कहना है कि पूनम को तांत्रिक के पास भी ले गए थे. पूनम की मम्मी सुनीता ने यह अंदेशा जताया कि उस की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी. हालांकि, पति ने इंकार किया है.

वैसे यह भी कुछ कम अजीब बात नहीं है कि पूनम ने जिस विधि को मौत के घाट उतारा, उस की मम्मी राखी पूनम के बेटे शुभम की देखभाल कर चुकी थी. राखी पूनम के 2 साल के बेटे शुभम को सीने से लगा कर दूध पिलाती थी. तब सोनीपत के वेस्ट रामनगर की रहने वाली विधि की मम्मी राखी पूनम के 10 माह के बच्चे को अपने साथ ले गई थी. कारण, पूनम अपने बच्चे की भी परवाह नहीं करती थी और वह ज्यादातर मायके में ही रहती थी. पानीपत के इसराना की रहने वाली पूनम की शादी सोनीपत के गोहाना में नवीन से 2019 में हुई थी. 2021 में पूनम ने पहले बेटे को जन्म दिया था. ऐसा भी नहीं है कि पूनम कोई अनपढ़ थी. वह उच्चशिक्षित थी. उस ने एमए पौलिटिकल साइंस से किया था और फिर बीएड में वह टौपर थी. पूनम का पति नवीन गाडिय़ों को धोने का वाशिंग सेंटर चलाता था.

पूनम ने गांव के देवीलाल कन्या कालेज से बीए तक की पढ़ाई की थी. उस के बाद राजकीय कालेज से राजनीति शास्त्र से एमए किया था और वह टीचर बनना चाहती थी. उस के 2 छोटे भाई हैं और वह सब से बड़ी थी. 3 बच्चों की हत्या करने के बाद तक पूनम कानून के फंदे से बच गई थी, लेकिन चौथी बच्ची की हत्या के दौरान पूनम कुछ गलतियां कर बैठी. पूनम ने जिस बाथटब में विधि को डुबो कर मारा था, वह उस की ऊंचाई से कम था. ऐसे में पुलिस को शक हुआ कि बच्ची की हत्या की गई है. इस दौरान जब पूनम ने बच्ची की हत्या की और फिर पहली मंजिल से नीचे आई तो उस के कपड़े भीगे हुए थे.

यानी उसे बच्ची को मारने के लिए संघर्ष करना पड़ा. लोगों ने पूनम को भीगी हुई हालत में देखा था. पुलिस को मामले की शिकायत दी गई और फिर जब पूछताछ हुई तो सारा मामला खुल गया. पानीपत के एसपी भूपेंद्र सिंह के अनुसार पूनम ने पूछताछ में बताया कि वह अपने मायके सिवाह में आई थी और गांव नौल्था में पति नवीन के मामा सतपाल के बेटे अमन और बेटी की शादी थी. वह 30 नवंबर को शादी में गई थी. फिर पहली दिसंबर को दोपहर बाद अमन की बारात निकली तो घर से सभी मेहमान बाहर थे. इसी दौरान उसे विधि घर पर सीढिय़ों से चढ़ते हुए दिखी.

बाद में वह उस के पीछेपीछे छत पर गई और विधि से बातचीत करने लगी, फिर इसी दौरान स्टोररूम के बाहर पानी से भरे प्लास्टिक टब को अंदर ले गई और इस में विधि की गरदन डुबो कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद बाहर से दरवाजे की कुंडी लगा कर नीचे आ गई थी. कथा लिखे जाने तक पूनम पर अब अपने बेटे शुभम और भतीजी इशिका की हत्या के मामले में सोनीपत के गोहाना के बरोदा पुलिस थाने में भी हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. Haryana Crime News

 

Extramarital Affair: दोस्त की पत्नी पर प्यार का पासा

Extramarital Affair: घर में आर्थिक तंगी क्या हुई, एक बच्चे की मां नेहा रौनियार ने पति नागेश्वर रौनियार को दरकिनार कर उस के दोस्त जितेंद्र का हाथ थाम लिया. वह प्रेमी जितेंद्र के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इन्हीं संबंधों ने एक दिन ऐसे अपराध को जन्म दिया कि…

नेहा पति को रास्ते से हटाने के लिए प्रेमी जितेंद्र पर दबाव डाल रही थी कि उसे जल्द से जल्द रास्ते से हटा दे, ताकि वे दोनों जल्द से जल्द एक हो जाएं. उसे अब उस की दूरी और जुदाई बरदाश्त नहीं होती.

”बताओ मुझे कि रास्ते से उसे कैसे हटाओगे?’’ नेहा ने प्रेमी से सवाल किया.

”तुम्हीं बताओ, रास्ते से हटाने के लिए मैं क्या करूं?’’ जितेंद्र ने उसी भाषा में उत्तर दिया.

”मार दो. मैं ने उस के नाम के सिंदूर को अपनी मांग से बहुत पहले ही धो डाला है. रही बात पछतावे की तो उस की मैयत पर घडिय़ाली आंसू बहा लूंगी. लोग तो यही कहेंगे कि बेचारी भरी जवानी में विधवा हो गई.’’

”कहती तो तुम ठीक ही हो, तलाक तुम्हें तो वो दे नहीं रहा है तो उसे रास्ते से हटाना ही अच्छा होगा. मगर कैसे? सोचना पड़ेगा. उस की मौत भी हो जाए और हम पर कोई आंच भी न आए.’’

”मैं भी यही सोचती हूं कि उसे ऐसी मौत दें, जिस से उस की मौत एक हादसा लगे. मगर कैसे होगा ये? मैं कुछ समझ नहीं पा रही.’’

”वो ऐसे बनाया जा सकता है कि वह एक नंबर का दारूबाज है. इसी का हम दोनों फायदा उठा सकते हैं. दारू पिला कर उस की हत्या कर देंगे और बाइक उसी के ऊपर गिरा देंगे. ऐसा लगेगा जैसे बाइक से गिर कर उस की मौत हुई हो?’’

”वाह! कमाल का आइडिया आया है तुम्हारे दिमाग में.’’ नेहा भी खुशी से झूम उठी.

नागेश्वर को अपने कमरे में बुलाने के लिए दोनों ने आपस में गुफ्तगू की. जितेंद्र जानता था कि उस के बुलाने पर नागेश्वर नहीं आएगा, लेकिन अगर नेहा बुलाए तो संभव है कि वह यहां (कमरे) आ जाए. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी.

पत्नी के जाल में ऐसे फंसा नागेश्वर

नागेश्वर पत्नी नेहा और बेटे से बेहद प्यार करता था. उस के रोमरोम में पत्नी नेहा रचीबसी थी. बेटा तो उस के दिल की धड़कन था. उस के बिना एक पल भी जीना उस के लिए गवारा न था. नेहा जब से बेटे को ले कर प्रेमी जितेंद्र के पास रहने चली गई थी, तब से ले कर अब तक हजारों बार उस ने फोन कर के उसे वापस घर लौट आने को कहा था. घर छोड़ कर प्रेमी के साथ चले जाने पर गांवसमाज में नागेश्वर और उस के फेमिली वालों की चारों ओर थूथू हो रही थी. नातेरिेश्तेदार उस पर हंस रहे थे, उस की खिल्ली उड़ा रहे थे, लेकिन उस के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी.

वह प्रेमी जितेंद्र को छोड़ कर उस के पास लौट कर आने के लिए तैयार नहीं थी. नागेश्वर के दबाव से जितेंद्र और नेहा दोनों डर गए थे कि कहीं वह उन्हें एकदूसरे से अलग न कर दे. इस से पहले कि नागेश्वर कोई ठोस कदम उठाए और वह अपने मकसद में कामयाब हो पाए, वे दोनों जल्द से जल्द नागेश्वर को खत्म कर देना चाहते थे.

”जितेंद्र, एक बात का डर मुझे खाए जा रहा है.’’ नेहा ने कहा.

”किस बात का डर?’’

”यही कि लाश को ठिकाने कहां लगाएंगे?’’ नेहा बोली.

”मैं ने पहले से सोच लिया है कि लाश का क्या करना है. अब सुनो मेरी प्लानिंग क्या है. उसे दारू पिलाने के बाद गला दबा कर मार डालेंगे. फिर उसी की बाइक पर बैठा कर यहां से कहीं दूर सुनसान जगह ले जाएंगे, जहां कोई आताजाता न हो और लाश नीचे गिरा कर उस पर बाइक पलट देंगे, ताकि लगे कि दारू पी कर बाइक चला रहा था, एक्सीडेंट हुआ और उस में इस की मौत हो गई. फिर हम दोनों सुरक्षित बच जाएंगे और हमारे रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए साफ भी हो जाएगा. बोलो, कैसा लगा हमारा प्लान?’’

”क्या शैतानी दिमाग पाया है यार.’’

आया तो था संबंधों को सुलझाने लेकिन…

जितेंद्र और नेहा ने मिल कर नागेश्वर की हत्या की जो योजना बनाई थी, उसी के अनुसार सब कुछ चल रहा था. 12 सितंबर, 2025 की दोपहर में नेहा ने पति नागेश्वर को फोन कर महाराजगंज सिटी अपने किराए के कमरे पर समझौता करने के बहाने से बुलाया. नागेश्वर पत्नी नेहा को बहुत प्यार करता था. पहले तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे मनाने के लिए नेहा ने फोन किया था. उस का फोन रिसीव कर के वह इतना खुश था कि उस के मुंह से बोल तक नहीं फूट रहे थे कि वह उस से क्या कहे. यही नहीं, पत्नी की बातों पर विश्वास कर के बात अपने तक ही सीमित रखी. फेमिली वालों को कुछ भी नहीं बताया था. उसे क्या पता था कि जिस नेहा से वह समुद्र की गहराइयों से भी ज्यादा प्यार करता था, उसी पत्नी नेहा ने उस के लिए मौत का जाल बिछाया है.

नागेश्वर ने उस दिन शाम 4 बजे अपने पापा केशवराज रौनियार से झूठ बोलते हुए कहा कि बाजार जा रहा हूं, थोड़ी देर में लौटता हूं और कह कर अपनी बाइक पर सवार हो कर निकला था. पत्नी से मिलन को ले कर वह इतना उतावला हुआ जा रहा था कि करीब 40 किलोमीटर की दूरी जान की परवाह किए बिना उस ने 40 मिनट में तय कर ली थी. इधर नेहा ने प्रेमी जितेंद्र को कुछ देर के लिए अपने कमरे में बैड के नीचे छिपा कर उस पर चादर इस तरह बिछा कर ढक दिया कि नीचे क्या है? कोई भी सामान किसी को आसानी से दिखाई न दे.

पत्नी नेहा के दिए एड्रेस पर नागेश्वर पहुंचा तो देखा नेहा दरवाजे पर खड़ी उसी के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करती खड़ी मिली. उसे देखते ही नागेश्वर ने अपनी सुधबुध खो दी थी. बाइक पर सवार ही उसे अपलक निहारता रहा. थोड़ी देर बाद जब वह होश में आया तो वह झेंप गया और बाइक से नीचे उतर कर उस के साथ कमरे में चला गया. कमरे में पहुंचते ही बैड पर बेटे को बैठा देख उस का प्यार जाग गया और झट उठा कर उसे अपने सीने से चिपका लिया. 6 महीने हो गए थे नेहा को पति नागेश्वर का घर छोड़े हुए. पत्नी और बेटे की याद में दिनरात वह तड़प रहा था.

नेहा पति की आवभगत में लगी हुई थी, ताकि उसे उस पर कहीं से शक न हो. और वह तो यह सोचसोच कर मन ही मन खुश हो रही थी. क्योंकि उस के रास्ते का बड़ा कांटा हमेशा के लिए साफ होने जा रहा है. इधर नागेश्वर सारे गिलेशिकवे भूल चुका था. वह नेहा को एक बार फिर समझाने की कोशिश में जुटा रहा कि जो हुआ, उसे अब से भुला दो. मम्मीपापा के साथ नहीं रहना चाहती हो, न सही. दोनों शहर में कहीं किराए का कमरा ले कर अलग रहेंगे, लेकिन एक बार मेरे लिए घर वापस लौट चलो. उस की बात सुन कर नेहा ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, बल्कि इतना ही कहा कि आज अभी रुक तो रहे ही हो, सुबह होने दो, तब हम इस टौपिक पर बात करेंगे.

नागेश्वर पत्नी की बात मान गया. कब 3 घंटे बीत गए, नागेश्वर को पता ही नहीं चला. रात के समय नागेश्वर बाजार से आधा किलोग्राम चिकन खरीद कर ले आया. नेहा ने उसे पकाया. इधर पहले से नींद की गोली मिठाई में मिला कर बेटे को खिला दी. मिठाई खाने के थोड़ी देर बाद बेटे को गहरी नींद आ गई. वह जगा रहता तो शायद नेहा अपने बुरे मकसद में कामयाब नहीं हो पाती. नेहा ने चिकन के साथ अंगरेजी शराब की एक बोतल पति के सामने रख दी. मंहगी शराब देख नागेश्वर की आंखों में अजीब सी चमक जाग उठी थी. नेहा अपने हाथों से पैग बना कर पति को देती गई. देखते ही देखते नागेश्वर ने पूरी शराब की बोतल खाली कर दी. थोड़ी देर बाद वह नशे के आगोश में समा गया और शरीर बेकाबू होने लगा तो नेहा ने बैड के नीचे से प्रेमी जितेंद्र को बाहर निकलने का इशारा किया.

नागेश्वर बेसुध हो कर बिस्तर पर अचेतावस्था में गिर पड़ा था. फिर क्या था? उस ने छाती पर डाल रखा अपना दुपट्टा उतारा और पति के पैरों के पास जा कर खड़ी हो गई. फिर उसी दुपट्टे से उस के दोनों पैर बांध दिए, ताकि वह कोई हरकत न कर सके. जितेंद्र ने खा जाने वाली नजरों से उसे घूर कर देखा और कूद कर उस के सीने पर जा बैठा तो नेहा ने कस कर मजबूती के साथ उस के दोनों पैर पकड़ लिए तो जितेंद्र ने पूरी ताकत के साथ नागेश्वर का गला तब तक दबाए रखा, जब तक उस की मौत न हो गई. दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी और लाश वहीं बिस्तर पर छोड़ दी थी. उस समय रात काफी हो चुकी थी.

उस समय रात का करीब एक बज रहा होगा. पहले से तय की गई योजना के अनुसार, रात डेढ़ बजे के करीब जितेंद्र ने कमरे से बाहर गली में निकल कर इधरउधर झांक कर देखा. उस समय चारों ओर गली में दूरदूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था. फिर तेजी से वह भीतर कमरे की ओर लौट आया. नेहा से उस ने कहा कि रास्ता साफ है, लाश को ठिकाने लगा देते हैं. इस के बाद दबेपांव जितेंद्र ने नागेश्वर की बाइक बाहर निकाली. धीरे से उस पर नागेश्वर के शव को बैठाया. खुद बाइक को संभाला और नेहा से लाश को कस कर पकड़ कर बैठने को कहा. नेहा ने वैसा ही किया, जैसा उसे जितेंद्र ने करने को कहा.

केशवराज की टूट गई सहारे की लाठी

महाराजगंज शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने जितेंद्र ने बाइक रोक दी और लाश को सड़क की बाईं पटरी पर लिटा कर उस पर बाइक गिरा दी, ताकि यह एक्सीडेंट लगे. उस के बाद दोनों पैदल वापस लौटे तो कुछ दूरी पर एक टैक्सी खड़ी मिली. टैक्सी में सवार हो कर दोनों वापस कमरे पर लौट आए. दोनों खुश थे, क्योंकि उन के रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल चुका था. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी संबंध बनाए और सो गए.

इधर 12/13 सितंबर, 2025 की रात 3 बजे निचलौल थाने के इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा को किसी ने फोन कर के सूचना दी कि सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर एक्सीडेंट हुआ है, जिस में 25-26 साल के युवक की मौके पर ही मौत हो गई है. सूचना मिलते ही गश्त पर निकले एसएचओ अखिलेश कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे, जहां दुर्घटना होने की बात कही गई थी. मौके पर पहुंची पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उसे एक्सीडेंट जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, क्योंकि मृतक युवक के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. मामला पूरी तरह संदिग्ध लग रहा था. जामातलाशी लेने पर युवक की पैंट की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. फिर उसी रात लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया और बाइक को भी कब्जे में ले लिया.

बाइक के नंबर से मृतक की पहचान नागेश्वर रौनियार निवासी राजाबारी, थाना ठूठीबारी, जिला महराजगंज के रूप में हुई थी. पुलिस ने मृतक की जेब से जो मोबाइल फोन बरामद किया था, उस पर कई मिस्ड कौल पड़े थे. उसी में एक मिस्ड कौल पापा के नाम से भी थी. एसएचओ अखिलेश कुमार वर्मा ने उस नंबर पर कौल बैक की. मोबाइल की घंटी बजते ही केशवराज रौनियार की नींद उचट गई. बेटे के इंतजार में वह रात भर सो नहीं पाए थे. जैसे ही फोन बजा तो बिस्तर पर उठ कर बैठ गए और दीवार घड़ी की ओर देखा. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे.

उन्होंने कौल रिसीव की तो दूसरी ओर से आवाज आई, ”हैलो! आप कौन साहब बोल रहें हैं?’’

”मैं केशवराज रौनियार, राजाबारी से बोल रहा हूं आप कौन?’’ केशवराज रौनियार ने सवाल किया.

”इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा, निचलौल थाने से बोल रहा हूं.’’

”इंसपेक्टर…’’ पुलिस का नाम सुनते ही  केशवराज बुरी तरह चौंक पड़े, ”सुबहसुबह पुलिस का फोन. क्या बात है साहब, मुझ से कोई गुस्ताखी तो नहीं हुई है.’’

”नहीं…नहीं… दरअसल, बीती रात सिंदुरिया-निचलौल हाइवे स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने सड़क किनारे एक युवक की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. जामातलाशी लेने पर उस की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था, उसी फोन से यह नंबर मिला था तो मैं ने कौल किया था. निचलौल थाने आ कर उस की पहचान कर लीजिए. मृतक का नाम नागेश्वर रौनियार पता चला है.’’

”क्याऽऽ नागेश्वर रौनियार.’’ इतना सुनते ही उन के मुंह से चीख निकल गई और फोन हाथ से छूट कर नीचे फर्श पर जा गिरा था.

पति की चीख सुनते ही ममता भी झट से बिस्तर पर उठ कर बैठ गईं और पति से पूछने लगी, ”ऐ जी क्या हुआ? सुबहसुबह किस का फोन था? क्या बात कर रहे थे उस से? सब ठीक तो है न. क्यों कुछ बोल नहीं रहे?’’ पत्नी ममता पति को जोरजोर से हिलाने लगीं.

लेकिन केशवराज को जैसे काठ मार गया हो. वह एकदम मौन से हो गए थे. थोड़ी देर बाद जब वह खुद से नारमल हुए तो दहाड़ मार कर रोने लगे, ”हम लो लुट गए नागेश्वर की मम्मी. अब हम कैसे जिएंगे. हमारे बुढ़ापे का सहारा छिन गया. हमारा बेटा नागेश्वर नहीं रहा. थाने से बड़े साहब का फोन आया था. उन्होंने निचलौल थाने लाश की शिनाख्त के लिए बुलाया है. हमारी तो कमर ही टूट गई. कैसे देखेंगे बचवा की लाश को. कैसी विपदा में आ गए हम?’’ कह कर केशवराज पत्नी से लिपट कर रोने लगे.

काम न आए घडिय़ाली आंसू

उधर पत्नी ममता बेटे की मौत की खबर सुनते ही दहाड़ मार कर रोने लगीं. सुबहसुबह केशवराज के घर में कोहराम सुन कर पड़ोसी भी हैरान रह गए थे कि आखिर क्या हो गया जो सब के सब रो रहे हैं. पड़ोसी जब वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि नागेश्वर की एक्सीडेंट में मौत हो गई है. गांव के कुछ संभ्रात लोगों को साथ ले कर केशवराज सुबह निचलौल थाने पहुंचे. फोटो देख कर उन्होंने मृतक की अपने बेटे के रूप में शिनाख्त कर ली थी. इस बात से पुलिस को थोड़ी राहत मिली. उसी दिन यानी 13 सितंबर की शाम को पोस्टमार्टम रिपोर्ट इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा की टेबल पर थी. रिपोर्ट पढ़ कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह एक्सीडेंट नहीं, दम घुटने से हुई दर्ज थी. यानी नागेश्वर की गला दबा कर हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे केस को उझला कर रख दिया था.

इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने फोन कर के केशवराज को दोबारा निचलौल थाने बुलाया और बताया कि तुम्हारे बेटे की मौत एक्सीडेंट से नहीं बल्कि गला घोंटने से हुई है. यह सुन कर केशवराज रौनियार एकदम से सन्न रह गए थे. इंसपेक्टर वर्मा ने उन से किसी पर शक होने की बात पूछी तो उन्होंने बिना सोचेसमझे अपनी बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार का नाम लिया और कहा कि इन्हीं दोनों ने मिल कर बेटे की हत्या की होगी. पीडि़त केशवराज रौनियार ने बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार के खिलाफ लिखित तहरीर दी.

तहरीर के आधार इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की हत्या और साक्ष्य मिटाने की धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया और आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इंसपेक्टर अखिलेश कुमार ने घटना से एसपी सोमेंद्र मीणा को भी अवगत करा दिया. एसपी सोमेंद्र मीणा के दिशानिर्देश पर जांच की काररवाई आगे बढ़ाई. पुलिस ने नेहा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में घटना वाले दिन पत्नी नेहा और नागेश्वर के बीच कई बार लंबीलंबी बातें हुई थीं. वैज्ञानिक साक्ष्य को ठोस आधार मान पुलिस आगे बढ़ती गई तो मामला लव अफेयर का नजर आया. यह भी शीशे की तरह साफ हो गया था कि घटना वाले दिन नागेश्वर नेहा से मिलने महराजगंज सिटी गया था.

15 सितंबर की भोर में इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा अपनी टीम के साथ नेहा के कमरे पर पहुंचे और मौके से उसे और उस के प्रेमी जितेंद्र को हिरासत में ले कर थाना निचलौल लौट आए. थाने में दोनों से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. एसपी सोमेंद्र मीणा ने उसी दिन शाम 3 बजे पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में प्रैसवार्ता बुलाई और नागेश्वर रौनियार हत्या से परदा उठा दिया.

चट्टान जैसे इरादों वाली नेहा के चेहरे पर पति की मौत का जरा भी अफसोस नहीं था. गिरफ्तारी के समय वह मुसकरा रही थी. पुलिस ने दोनों आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में हत्या के पीछे की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

दिल लगा बैठी नेहा

 

26 वर्षीय नागेश्वर रौनियार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के राजाबारी गांव का रहने वाला था. उस के पापा केशवराज रौनियार थे. 2 बेटों और एक बेटी में नागेश्वर सब से बड़ा था. था तो वह इकहरे बदन वाला, लेकिन उस में गजब का जोश और फुरती थी. केशवराज रौनियार प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. वह इतना कमा लेते थे कि अपने 5 सदस्यों वाले परिवार का पालनपोषण बड़े मजे से कर लेते थे. नागेश्वर बड़ा था और काफी समझदार भी. वह बचपन की गलियों को पीछे छोड़ कर जैसेजैसे जवानी की दहलीज पर पांव रखता गया, उस में अपने पैरों पर खड़े होने और पिता का हाथ बंटाने की ललक जोर मारने लगी थी.

वैसे भी नागेश्वर जिस जगह रहता था, वहां से नेपाल करीब 10-15 किलोमीटर दूर था. नेपाल की खूबसूरत वादियां राजाबारी (ठूठीबारी) से साफ दिखती थीं तो उन्हें देखने के लिए वह हमेशा लालायित रहता था. उसी के गांव में जितेंद्र भी रहता था. उस से उस की काफी निभती थी. दोनों अच्छे दोस्त भी थे और हमराज और हमउम्र भी. जितेंद्र की ठूठीबारी कस्बे में बाइक के स्पेयर पाट्र्स की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी. आमदनी भी अच्छी होती थी. नागेश्वर उस की दुकान पर नौकरी करता था. पाट्र्स को बेचने के लिए वह अकसर नेपाल के खूबसूरत जिला नवलपरासी आताजाता रहता था. जातेआते वक्त इसी जिले के गोपालपुर की रहने वाली बेहद खूबसूरत युवती नेहा पर उस की नजर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा था.

नागेश्वर पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठा था. इस के बाद उस का नवलपरासी आनाजाना और बढ़ गया था. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया और फेमिली वालों की रजामंदी से प्रेम विवाह कर लिया था. यह करीब 6 साल पहले की बात है, तब उस की उम्र 20 साल के आसपास रही होगी. नागेश्वर अपने प्यार को पा कर बेहद खुश था. फेमिली वाले भी चांद सी बहू पा कर फूले नहीं समा रहे थे. शादी के 3 साल बाद नेहा ने एक बेटे को जन्म दिया. पोते के पैदा होने पर केशवराज में जीने की लालसा और बढ़ गई थी. बेटे के जन्म के बाद नागेश्वर के बाद उस के खर्चे बढ़ गए थे. वह जो कमाता था, उस से उस के खर्चे पूरे नहीं होते थे. धीरेधीरे उस का झुकाव नशीले पदार्थों की ओर बढ़ता गया और नशा बेचने का काम शुरू कर दिया.

जितेंद्र जब भी नागेश्वर से मिलने उस के घर जाता तो नेहा को जितेंद्र से बात करना अच्छा लगता था. इसी दरमियान नागेश्वर के साथ एक घटना घटी. वह नशीले पदार्थ के साथ पकड़ा गया. पुलिस ने गिरफ्तार कर उसे जेल भेज दिया. नागेश्वर के जेल जाते ही जितेंद्र की तकदीर खुल गई. वह नेहा के साथ हमदर्दी दिखाता था. उस ने अपने दिल में नेहा के लिए जगह तो पहले ही बना ली थी, बस साक्षात उस के सामने होना शेष रह गया था. जितेंद्र के दिल में उसे पाने की हसरतें उमडऩे लगीं. जितेंद्र के सामने नेहा के करीब आने का एक ही रास्ता दिख रहा था, वह था उस का जमानत कराना.

जितेंद्र ने कुछ महीनों बाद नागेश्वर की जमानत करा कर नेहा के दिल पर कब्जा जमा लिया. धीरेधीरे वह भी जितेंद्र की ओर आकर्षित होती गई और दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे. जमानत पर छूट कर जेल से आने के बाद नागेश्वर के व्यवहार में काफी बदलाव आ चुका था. नागेश्वर को पत्नी नेहा की हरकतों के बारे में पता चल गया था कि उस का जितेंद्र के साथ कुछ चक्कर चल रहा है. इस बात को ले कर दोनों के बीच तकरार होती गई और दांपत्य जीवन में दरारें बढ़ती गईं. नागेश्वर ने पत्नी को बहुत समझाने की कोशिश की कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता है. भले ही आज वह आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, कल उस के पास भी पैसे आ जाएंगे.

वह बुरी आदतों और बुरी लत से तौबा कर लेगा, अपनी बसीबसाई गृहस्थी में अपने हाथों आग न लगाओ. पर नेहा ने उस की एक नहीं सुनी और बेटे को साथ ले कर प्रेमी जितेंद्र के साथ रहने के लिए महाराजगंज सिटी में एक किराए का कमरा ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी.

नागेश्वर नेहा पर घर वापस लौट आने का दबाव बनाने लगा था. नेहा उस के पास लौटने के लिए तैयार नहीं थी. नेहा रौनियार और जितेंद्र ताउम्र साथ रहना चाहते थे, लेकिन उन के लिए यह आसान नहीं था. नेहा का पति नागेश्वर अभी जिंदा था. उस के जीते जी उन के यह ख्वाब कभी पूरे नहीं हो सकते थे. पत्नी ने पति पर तलाक देने का दबाव डाला था. वह उस के साथ अब रहना नहीं चाहती थी. बाकी की जिंदगी वह अपने प्रेमी जितेंद्र के साथ उस की बांहों में बिताना चाहती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच कई बार झगड़े भी हुए थे और उस ने पत्नी नेहा को तलाक देने से साफतौर पर मना कर दिया था. इसी खुन्नस में नेहा और उस के प्रेमी जितेंद्र के साथ मिल कर पति नागेश्वर रौनियार की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

पुलिस को दिए बयान में नेहा ने बताया था कि पति पैसों के अभाव में गैरमर्दों के पहलू में भेज कर उस से धंधा कराना चाहता था. यह बात उसे गवारा नहीं थी. उस के जमीर को गहराइयों तक झकझोर दिया था, इसलिए उस का झुकाव जितेंद्र की ओर तेजी से बढ़ा था. और उस ने फैसला कर लिया कि वह जितेंद्र के साथ अपना बाकी का जीवन गुजारेगी. कथा लिखे जाने तक नागेश्वर रौनियार हत्याकांड के दोनों आरोपी नेहा रौनियार और उस का प्रेमी जितेंद्र जेल की सलाखों के पीछे कैद थे. पति की हत्या की नेहा के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी और न ही पश्चाताप का कोई भाव था.

जेल से छूटने के बाद नेहा ने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई है. उस का बेटा अपने दादा केशवराज रौनियार के साथ रह रहा था. Extramarital Affair

 

Hindi Stories: बस एक बेटा चाहिए

Hindi Stories: मेहनतमजदूरी कर के जीविका चलाने वाली शंकरी की 3 बेटियां थीं, चौथा बच्चा पेट में था. आखिर उस की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रही थी. जिस तरह उस बूढ़े बरगद के पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, उसी तरह उस के नीचे बायस्कोप लिए खड़ी उस औरत, जिस का नाम शंकरी था, की उम्र का भी अंदाजा लगाना आसान नहीं था. वह चला तो बायस्कोप रही थी, लेकिन उस का ध्यान लोहे के 4 पाइप खड़े कर के साड़ी से बने झूले में सो रही अपनी 2 साल की बेटी पर था.

अगर झूले में लेटी बेटी रोने लगती तो वह बायस्कोप जल्दीजल्दी घुमाने लगती. बायस्कोप देखने वाले बच्चे शोर मचाते तो वह कहती, ‘‘लगता है, बायस्कोप खराब हो गया है, इसीलिए यह तेजी से घूमने लगा है.’’

बायस्कोप का शो खत्म कर के शंकरी बेटी को गोद में ले कर चुप कराने लगती. लेकिन बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस से झगड़ने लगते. झगड़ते भी क्यों न, उन्होंने जिस आनंद के लिए पैसे दिए थे, वह उन्हें मिला नहीं था. औरत बच्चे के रोने का हवाला देती, फिर भी वे बच्चे न मानते. उन्हें तो अपने मनोरंजन से मतलब था, उस के बच्चे के रोने से उन्हें क्या लेनादेना था. शंकरी उन्हें समझाती, दोबारा दिखाने का आश्वासन भी देती, क्योंकि उसे भी तो इस बात की चिंता थी कि अगर उस के ये ग्राहक बच्चे नाराज हो गए तो उस की आमदनी बंद हो जाएगी. लेकिन उस की परेशानी यह थी कि वह बेटी को संभाले या ग्राहक. बेटी को भी रोता हुआ नहीं छोड़ा जा सकता था.

शंकरी के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी. बच्चों की जिद पर मजबूरन उसे बच्ची को रोता छोड़ कर बायस्कोप के पास जाना पड़ता, क्योंकि बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस का ज्यादा देर तक इंतजार नहीं कर सकते थे. शंकरी की अपनी बच्ची रोती रहती और वह दूसरों के बच्चों का मनोरंजन कराती रहती. बच्ची रोरो कर थक जाती लेकिन वह उसे गोद में न ले पाती. वह उसे तभी गोद में उठा पाती, जब उस के ग्राहकों की भीड़ खत्म हो जाती. ग्राहकों के जाते ही वह दौड़ कर बच्ची को गोद में उठाती, प्यार करती और झट से साड़ी के पल्लू के नीचे छिपा कर दूध पिलाने लगती. तब उस के चेहरे पर जो सुकून होता, वह देखने लायक होता.

शंकरी ने बच्ची को प्यार करने के लिए अपना घूंघट थोड़ा खिसकाया तो थोड़ी दूर पर बेटी को मेला दिखाने आई संविधा की नजर उस के चेहरे पर पड़ी. उस का गोरा रंग धूप की तपिश से मलिन पड़ गया था. अभी भी गरम सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनछन कर उस के चेहरे पर पड़ रही थीं. भूरे बालों को उस ने करीने से गूंथ कर मजबूती से बांध रखा था. आंखों में काजल की पतली लकीर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, गोल चेहरा, जिस में 2 बड़ीबड़ी आंखें, जो दूध पीते बच्चे को बड़ी ममता से निहार रही थीं. कभीकभी उस की आंखें बेचैनी से उस ओर भी घूम जातीं, जो उस का बायस्कोप देखने के लिए उस के इंतजार में खड़े थे.

जैसे ही बेटी ने दूध पीना बंद किया, शंकरी के चेहरे पर आनंद झलक उठा. बच्ची अभी भी उस की गोद में लेटी थी और अधखुली आंखों से उसे ताकते हुए अपनी नन्ही हथेलियों से उस के माथे और गालों को सहला रही थी. औरत ने गौर से बच्ची को देखा, उस के चेहरे पर आनंद की जगह दुख की बदली छा गई. उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें टपक पड़ीं, जो बच्चे के चेहरे पर गिरीं. उस ने जल्दी से साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछा. बच्ची अब तक नींद के आगोश में चली गई थी.

शंकरी ने तमाशा देखने वालों को देखा. वे सभी उसे ही ताक रहे थे. उस ने बहुत हलके से बच्ची को झूले में लिटाया. बरगद के नीचे मक्खियों और कीड़ों की भरमार थी, इसलिए बच्ची को उन से बचाने के लिए एक बारीक कपड़ा उस के चेहरे पर डाल दिया, जिस से बच्ची आराम से सोती रहे. जैसे ही वह बच्ची के पास से हटी, बच्ची फिर रोने लगी. उस के रोने से वह बेचैन हो उठी. उस ने बायस्कोप के पास से ही रोती बच्ची को देखा, लेकिन मजबूरी की वजह से वह उसे उठा नहीं सकी. बायस्कोप देखने वाले बच्चों से पैसे ले कर उन्हें बैठा दिया. बच्ची रोती रही, 1-2 बार तो ऐसा लगा जैसे उस की सांस रुक गई है, लेकिन वह रोतीरोती सो गई.

थोड़ी देर बाद एक छोटी लड़की, जो 4 साल के आसपास रही होगी, सो रही बच्ची के पास से गुजरती हुई शंकरी के पास आ कर उस की साड़ी का पल्लू मुंह में डाल कर लौलीपाप की तरह चूसने लगी. वह शायद शंकरी की झूले में लेटी बेटी से बड़ी थी. उस की लार से शंकरी की साड़ी का पल्लू गीला हो गया. शंकरी की यह दूसरी बेटी घुटने तक लाल रंग का फ्रौक पहने थी. उस के पैर धूल से अटे हुए थे, आंखें पीली, मैलेकुचैले बाल, जो बूढ़े टट्टू की पूंछ की तरह बंधे हुए थे. उन में से कुछ खुले बाल उस के मटमैले चेहरे पर बिखरे हुए थे. लड़की ने शंकरी से उस के कान में फुसफुसा कर कुछ कहा. उस ने ऐसा न जाने क्या कहा कि शंकरी ने खीझ कर उसे कोहनी से झटक दिया. लड़की रोते हुए जमीन पर लेट गई, जिस से उस का पूरा शरीर धूल से अट गया.

तमाशा देखने वाले बच्चे इन सभी चीजों से बेपरवाह और बेखबर अपनी आंखें बायस्कोप के छोटे से गोल शीशे पर जमाए बक्से के अंदर का नजारा देख रहे थे, जो शायद उन्हें कुछ इस तरह मजा दे रहा था, जैसे वे सिनेमाहाल में कोई फिल्म देख रहे हों. यह उन के जोश और दीवानगी से पता चल रहा था. झूले में लेटी बच्ची एक बार फिर रोने लगी. शंकरी ने बगल में जमीन पर लोट रही बेटी को 5 रुपए का सिक्का दिखाया तो वह तुरंत  उठ कर खड़ी हो गई और शरीर पर चिपकी धूल को झाड़ते हुए मां के हाथ से सिक्का झपट लिया. उस के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. हाथ में सिक्का आते ही वह उत्साह और खुशी से उछलतीकूदती रोती हुई छोटी बहन के पास आई और उसे झूले से उठा कर अपनी छोटी सी कमर के सहारे गोद में ले कर थोड़ी दूरी पर स्थित एक छोटी सी दुकान की ओर चल पड़ी.

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवारसमीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी. लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी. संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था. संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी. लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी. 4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी. अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी. धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितनेकितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है. उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी. संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी? इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारेमारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’ ‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची का मुंह साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने क काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए. Hindi Stories

अनुवाद: एम.एस. जरगाम

Stories in Hindi Love: बहार आई भी तो उदासउदास

लेखक – रुखसाना, Stories in Hindi Love: कागज का पुर्जा मेरे हाथों में फड़फड़ा रहा था. मेरी रगों में भयानक बेचैनी दौड़ने लगी थी. दिल में दहकती हुई आग भर गई थी. बड़े घरों में बसने वाले लोग कितने बेबस और मजबूर होते हैं, यह अब मेरी समझ में अच्छी तरह आ रहा था. आ पी ने खीर की प्लेट अपनी तरफ सरका कर चोर नजरों से बारीबारी सबकी तरफ देखा. मैं अनजान बन गई, लेकिन जिम्मी भाई ने मम्मी से बात करतेकरते तेज नजरों से आपी को घूर कर तल्ख लहजे में कहा, ‘‘ज्यादा खाने ने तुम्हें तबाह कर दिया है आपी जान! पता नहीं तुम वाकई नासमझ हो या जानबूझ कर ऐसा करती हो. अगर तुम्हें अपने पर तरस नहीं आता तो कम से कम हम पर तो तरस खाओ.’’

लेकिन

‘‘तुम ने तो जहां मुआपी ने जिम्मी भाई की तरफ नजर उठा कर भी न देखा. वह उसी तरह अपने दिलबहलाव यानी खाने में यों मगन रहीं, जैसे जिम्मी भाई ने किसी और से कहा हो.

मम्मी ने उन्हें टोका, ‘‘फरजाना, यह जमशेद तुम से कुछ कह रहा है. क्या तुम उस की बात सुन नहीं रही हो?’’झे खाते देखा, टोकना शुरू कर दिया,’’ कह कर खाली प्याली मेज पर पटक कर आपी उठ खड़ी हुईं और धपधप करती खाने के कमरे से बाहर चली गईं. उन के बाहर जाते ही जिम्मी भाई अपना सिर दोनों हाथों में थाम कर बोले, ‘‘इस का क्या होगा मम्मी? मैं तो इसे समझासमझा कर हार गया हूं. अगर यह खुद अपनी जिंदगी संवारना नहीं चाहती तो हम सब क्या कर सकते हैं इस के लिए?’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो जिम्मी.’’ मम्मी ठंडी आह भर कर बोलीं, ‘‘मेरी तो समझ में नहीं आता कि इसे कैसे समझाऊं? किसी नसीहत, किसी डांट का इस पर असर ही नहीं होता. खानदान में तो कोई इस के लिए तैयार नहीं और बाहर से जो रिश्ता आता है, इस का डीलडौल देख कर भाग जाता है. ऊपर से इस की आदतें…’’

मैं बेजार हो कर मेज से उठ गई. रोज खाने पर ऐसी ही बहस छिड़ जाती. मम्मी को आपी की बहुत फिक्र थी. बात भी ठीक थी. उन की उम्र शादी की उम्र को पार कर गई थी. ऊपर से उन के बेपनाह खाने की आदत ने उन का मोटापा हद से ज्यादा बढ़ा दिया था. उन पर मानो गोश्त चढ़ता जा रहा था. थोड़ा-सा चलतीं तो उन की सांस फूलने लगती. उन्हें और किसी चीज में दिलचस्पी नहीं थी. न घर के कामकाज में, न सिलाईकढ़ाई में. वह कहीं आनाजाना भी पसंद नहीं करती थीं. सैरसपाटे का भी उन्हें कोई शौक नहीं था. बस उन के 2 ही शौक थे, खाना और सोना. जाहिर है, मोटी उन्हें होना ही था. कोई भी मेहमान हमारी हवेली में आता, कहीं से भी आता, वह जरा भी किसी को लिफ्ट न देतीं. किसी से कोई मतलब न रखतीं.

आपी का रंग साफ था. नैननक्श भी बुरे नहीं थे. मम्मी का खयाल था कि अगर उन का वजन कम हो जाए तो वह भद्दी नहीं लगेंगी और अल्लाह का कोई बंदा उस के जाल में फंस जाएगा. लेकिन मम्मी और जिम्मी भाई के लाख समझाने का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था. यों लगता था, जैसे उन्हें अपनी शादी से भी कोई दिलचस्पी नहीं थी. अगर बड़ी हवेली और कीमती दहेज की कशिश में एकाध रिश्ता आ भी जाता तो रिश्ता लाने वाले आपी को देख कर और उन से मिल कर दोबारा हवेली का रुख न करते. मम्मी को आपी की फिक्र थी, क्योंकि वह मां थीं, लेकिन जिम्मी भाई की फिक्र में उन की अपनी गरज शामिल थी. मैं यह बताना भूल गई कि हमारी हवेली खुदगर्ज लोगों का डेरा थी.

यहां हर इंसान सिर्फ अपने लिए सोचता था. जिम्मी भाई की मोहब्बत बड़े जोरदार तरीके से अपनी फुफेरी बहन नाइला से चल रही थी और वह चाहते थे कि जल्दी से जल्दी नाइला को दुलहन बना कर हवेली में ले आएं. लेकिन हमारे खानदान में रिवाज था कि छोटों की शादी उस वक्त तक नहीं हो सकती थी, जब तक कि बड़ी बहन या बड़े भाई की शादी न हो जाए. अगर ऐसा किया जाता तो खानदान वाले एक तरह से उस घराने का बायकाट कर देते थे. इसलिए उस रिवाज को तोड़ने में सब डरते थे. हमारी मम्मी गैरखानदान से थीं. मेरे वालिद इलाके के बहुत बड़े रईस थे. मम्मी से शादी उन्होंने अपनी मरजी से की थी. आपी मम्मी और डैडी की पहली औलाद थीं. दूसरे नंबर पर जमशेद भाई थे.

सब से छोटी मैं थी. मैं एक साल की थी, जब डैडी का दिल के दौरे से इंतकाल हो गया था. उन के बाद मम्मी ने इतनी बड़ी हवेली में हम तीनों बच्चों और ढेर सारे नौकरों के बीच अपना वक्त गुजारा. वह काफी पढ़ीलिखी थीं. हवेली को उन्होंने अपनी पसंद के मुताबिक ढाला था. वह पुराने रिवाज पसंद नहीं करती थीं. इसलिए आपी की शादी से मायूस हो कर उन्होंने जमशेद भाई के लिए फुफ्फू जानी से नाइला का रिश्ता मांगा. लेकिन फुफ्फू पुराने खयालात की औरत थीं. उन्होंने साफ कह दिया था कि जब तक फरजाना की डोली नहीं उठेगी, जमशेद की शादी नाइला या किसी और से नहीं हो सकती.

फुफ्फू जानी का हमारे यहां बहुत दखल था. वह डैडी की एकलौती बहन थीं और हर काम, हर बात में उन से सलाह ली जाती थी. फिर भी आखिरी कोशिश के तौर पर मम्मी ने उन से कहा कि अगर सारी उम्र फरजाना बिनब्याही बैठी रही तो क्या होगा? इस के जवाब में फुफ्फू ने कहा था, ‘‘अव्वल तो ऐसा होगा नहीं. और अगर ऐसा हुआ भी तो जमशेद और नाइला को भी सारी उम्र क्वांरे रहना होगा.’’

हर तरह से हार कर मम्मी ने आपी की शादी के लिए अपनी कोशिशें फिर से तेज कर दीं. इस से पहले जिम्मी भाई को आपी से कोई सरोकार नहीं था. शायद वह समझते थे कि मम्मी इस मसले को संभाल लेंगी और फूफ्फू को राजी कर लेंगी. लेकिन अब तो आपी के लिए दूल्हा तलाश करना उन का ‘मिशन’ बन गया था. मैं ने एमए पास कर लिया था और हौस्टल छोड़ कर हवेली में आ गई थी. लेकिन हवेली आ कर मैं सख्त बोर हो रही थी. सारासारा दिन किसी बदरूह की तरह सारी हवेली में घूमती रहती या किताबें पढ़पढ़ कर अपना वक्त बिताया करती. आपी और मेरे बीच उम्र का फर्क था. बहनों वाली बेतकल्लुफी भी नहीं थी, हमारी आदतों और खयालों में भी कोई तालमेल नहीं था.

आपी को हर वक्त खाते रहने का शौक था, जबकि मैं दोपहर को फलों का लंच करती और अकसर रात का खाना गोल कर जाती. इसलिए मेरा बदन स्मार्ट था. नैननक्श तीखे थे. बाल लंबे और घने थे. यूनिवर्सिटी में तालीम हासिल कर के मैं खासी सोशल हो गई थी. हर मामले में अच्छा बोल लेती थी और सुनने वाला मेरी आवाज के जादू में खो जाता था. इसलिए जब से मैं घर आई, मेरे लिए तमाम रिश्ते आ रहे थे. लेकिन मम्मी को मेरी तरफ से कोई फिक्र नहीं थी. जिम्मी भाई की जरूरत आपी की शादी से ही पूरी हो सकती थी, मेरी शादी से नहीं. इसलिए मेरे लिए आया हुआ अच्छे से अच्छा रिश्ता भी बेजारी से रद्द कर दिया जाता. मुझे खुद भी अभी शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए हर रिश्ते पर मेरी राय भी मम्मी या जिम्मी भाई से अलग न होती.

मैं भी चूंकि खुदगर्जी के इसी माहौल में पलीबढ़ी थी, सो मुझे न तो आपी के मोटापे से सरोकार था, न उन की शादी से. आपी की एक खामी तालीम की कमी भी थी. मम्मी के लाख चाहने के बावजूद वह मैट्रिक से आगे न पढ़ी सकी थीं. मैट्रिक भी उन्होंने 2 साल में किया था. सर्दियों के दिन थे. मौसम बहुत खुशगवार हो रहा था. शाम का समय था. मैं, मम्मी और आपी, तीनों लौन में बैठे शाम की चाय पी रहे थे. आपी गुलाबजामुनों के साथ इंसाफ कर रही थीं. मैं और मम्मी चाय की प्यालियां हाथों में थामे बातों में मशगूल थीं कि अचानक जिम्मी भाई गेट के अंदर दाखिल हुए और बड़ी खुशदिली से करीब आए. उन्हें यों खुश देख कर मम्मी बोलीं, ‘‘कहां से आ रहे हो?’’

‘‘फुफ्फू की तरफ से आ रहा हूं. नाइला ने बुलाया था.’’

हमारे खानदान में मां से ऐसी बातचीत नहीं की जाती थी, लेकिन मम्मी ने हमारी परवरिश अलग तरीके से की थी. उन्होंने हमें अपने खानदान के उसूलों, रस्मों और रिवाजों से दूर रखा था. वह औलाद और मांबाप के बीच फासलों के हक में नहीं थी. औलाद पर बंदिशें लगाना उन्हें पसंद नहीं था. इसलिए हम अपने दिल की बात मम्मी से खुल कर कह सकते थे. इस वक्त भी मम्मी को जिम्मी भाई की बात बुरी नहीं लगी. हंस कर वह बोलीं, ‘‘चलो, तुम्हारी मुलाकात तो हो गई. लेकिन मेरा खयाल है, तुम वह काम फिर भूल गए होगे?’’

‘‘कौन सा काम?’’ जिम्मी भाई मम्मी को देखने लगे. अचानक उन्हें याद आया तो वह शर्मिंदा हो गए, ‘‘ओह मम्मी, मैं तो बिलकुल ही भूल गया. वह चुड़ैल नाइला जब भी बुलाती है, मैं सब कुछ भूल जाता हूं.’’

‘‘जिम्मी डियर, एक जवान और सेहतमंद जेहन को इतना भुलक्कड़ नहीं होना चाहिए. तुम जानते हो, यह कितना अहम काम है? बहरहाल कल तुम जरूर जा कर नए असिस्टैंट कमिश्नर से मिल लो और उसे खाने की दावत दे दो.’’

‘‘कल जरूर याद रखूंगा मम्मी.’’ फिर उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘रुखसाना, एक कप चाय बना दो मेरे लिए और खाने को भी कुछ दो. मैं ने अभी तक लंच नहीं किया.’’

मैं ने मेज पर गुलाबजामुनों की तलाश में नजरें दौड़ाईं, लेकिन आपी जिम्मी के टोकने के डर से गुलाबजामुनों समेत नौ दो ग्यारह हो गई थीं. मम्मी ने नौकर को बिस्कुट लाने के लिए कहा और मैं चाय बनाने लगी.

डैडी की जिंदगी में हमारी हवेली का यह रिवाज था कि जो भी सरकारी अफसर किसी सरकारी या निजी दौरे पर इलाके में आता, हमारी हवेली में उस की दावत जरूर होती. डैडी की मौत के बाद मम्मी ने इस रिवाज को जिंदा रखा और हर बार जो भी असफर आता, हमारी हवेली का मेहमान जरूर बनता. इस बार कोई नया असिस्टैंट कमिश्नर दौरे पर आया था और रेस्ट हाउस में ठहरा था. उसे आए हुए दूसरा दिन था. मम्मी रोजाना जिम्मी भाई को याद दिलातीं कि वह उस से मिल कर खाने पर बुला लें. लेकिन जिम्मी भाई भूल जाते.

उस दिन शाम को मैं गुलाबों के कुंज में बैठी ‘रिमूवर’ से अपने नाखूनों का रंग साफ कर रही थी. मम्मी ने बालों में हेयर कलर लगा लिया था और उन्हें खुश्क करने लौन में आ कर मेरे पास बैठ गईं. आपी अपने कमरे में थीं. मैं ने देखा, जिम्मी भाई सीधा रास्ता अपनाने के बजाए मोतियों की बाड़ फलांगते हुए हमारे करीब आ गए. उन का रंग जोश से तमतमा रहा था और वह कुछ कहनेसुनने के लिए बेचैन हो रहे थे. मैं एक निगाह उन पर डाल कर फिर से अपने काम में लग गई. मम्मी ने पूछ लिया, ‘‘क्या बात है, बहुत पुरजोश नजर आ रहे हो?’’

‘‘हां मम्मी, बड़ी अजीब खबर लाया हूं. आप सुनेंगी तो सख्त हैरान होंगी.’’

‘‘अच्छा, ऐसी कौन सी खबर है, जिस ने तुम्हें इतना हैरानपरेशान कर दिया है?’’ मम्मी हंस पड़ीं. मैं ने तीखे अंदाज से जिम्मी भाई की तरफ देखा. उन की खबरें सदा ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ वाली कहावत साबित होती थीं, सो मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी उन की खबर सुनने में. वह मुझे नहीं, मम्मी को बता रहे थे.

‘‘आप अंदाजा भी नहीं लगा सकतीं मम्मी कि मैं किस से मिल कर आ रहा हूं.’’

‘‘तुम शायद उस नए असिस्टैंट कमिश्नर से मिलने गए थे?’’

‘‘हां, लेकिन आप को यह जान कर हैरत का शदीद धक्का लगेगा कि वह असिस्टैंट कमिश्नर कौन है?’’

‘‘क्या सनसनी फैला रहे हो जिम्मी? सीधी बात करो न, क्या वह हमारा कोई जानने वाला है?’’ मम्मी ने पूछा.

‘‘आप उसे जानने वाला नहीं कह सकती मम्मी, वह इस हवेली में पल कर बड़ा हुआ है. खैर, बड़ा तो हम नहीं कह सकते, लेकिन अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उस ने इसी हवेली में गुजारा है.’’

मम्मी के साथसाथ मैं भी चौंक उठी. मम्मी हैरत से पूछ रही थीं, ‘‘कौन है वह? तुम बताते क्यों नहीं हो जिम्मी? पहेलियां क्यों बुझा रहे हो?’’

‘‘वह जैदा है मम्मी, हमारी आया का बेटा. अब वह जावेद खां बन गया है.’’

‘‘क्या?’’ मम्मी को सचमुच हैरत का झटका लगा. वह जिम्मी भाई को देखते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हें यकीनन कोई बड़ी गलतफहमी हुई है. कहां एक बेसहारा लड़का जैदा और कहां असिस्टैंट कमिश्नर.’’

‘‘लेकिन मम्मी, उस ने मुझे खुद बताया है. जब मैं उस से मिला और मैं ने अपना परिचय दिया तो वह बेअख्तियार अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और मुझे गले लगाते हुए बोला, ‘अरे जिम्मी भाई, तुम ने मुझे पहचाना नहीं? मैं जैदा हूं तुम्हारी आया का बेटा. तुम ने यहां आने की तकलीफ क्यों की? मैं तो खुद हवेली आने वाला था.’ फिर उस ने बारीबारी सब के बारे में पूछा. अपने हालात बताते हुए उसे जरा भी शरम नहीं आ रही थी. वहां और भी लोग बैठे थे, लेकिन उन सब के सामने अपनी गरीबी की दास्तान सुना रहा था. वैसे मम्मी, मैं तो उस की हिम्मत की दाद देता हूं. यह मुकाम उस ने अपनी मेहनत, हिम्मत और कोशिश से हासिल किया है. और मम्मी, वह मरियल सा लड़का ऐसा गबरू जवान निकल आया है कि आप देखेंगी तो हैरान रह जाएंगी. अगर वह खुद न बताता तो मैं कयामत तक उसे पहचान नहीं सकता. ऊपर से अपने ओहदे का जरा भी गरूर नहीं.’’

मैं और मम्मी सकते की हालत में जिम्मी भाई की बातें सुन रही थीं. मेरे दिल में बड़े जोर की धड़कन हो रही थी. मैं मुंह फाड़े जिम्मी भाई की तरफ देखे जा रही थी. मम्मी भी सन्न थीं. फिर कुछ दबेदबे लहजे में उन्होंने जिम्मी भाई से पूछा, ‘‘तुम ने खाने की दावत दे दी उसे?’’

‘‘हां, कल रात की दावत दी है. वह तो दावत कबूल ही नहीं कर रहा था. कह रहा था कि खुद आऊंगा और सब से मिलूंगा. लेकिन मैं ने उस से मनवा कर ही छोड़ा.’’

जिम्मी भाई काफी देर तक उस की बातें करते रहे. मम्मी बारबार कह रही थीं कि उन्हें यकीन नहीं आ रहा  कि जैदा इस मुकाम तक पहुंच गया है. मम्मी और जिम्मी भाई वहां से उठ गए लेकिन मैं वहीं बैठी रही. फिजा में ठंडक उतर आई थी. मैं अपने जिस्म के गिर्द चादर लपेटे लगातार उस के बारे में सोच रही थी, जिस का नाम एक अरसे के बाद सुना था. मेरे दिल में उस की यादों के साथ उदासी उतरने लगी. मैं ने कुर्सी की पुश्त के टेक लगा कर आंखें बंद कर लीं. मेरी नजरों के सामने बहुत पहले का जमाना आ गया.

तब हम बहुत छोटे थे. हमारी आया बहुत बूढ़ी हो गई थी. इसलिए आए दिन बीमार रहती थी. जब वह काम के काबिल नहीं रही तो उस ने अपनी बेवा बेटी को बुलवा लिया, जिस के साथ एक बेटा भी था. वह अपने जेठ के साथ रहती थी और जेठानी के जुल्मों से तंग आ गई थी. मम्मी को उस के बेटे पर खासा ऐतराज था. लेकिन आया बहुत मेहनती और ईमानदार औरत थी, इसलिए मम्मी को चुप रहना पड़ा. जैदा का असली नाम जावेद था. आया कभीकभी दुलार से उसे जावेद खां कह कर बुलाती थी. जैदा मेरा हमउम्र था. हम दोनों जब भी एक साथ खेलते, मम्मी को गुस्सा आ जाता. वह डांट कर उसे भगा देतीं और मुझे अपने कमरे में ले आतीं. जैदे को पढ़ाई का बहुत शौक था.

जब मैं पढ़ती तो न जाने कहां से वह निकल आता और हसरतभरी नजरों से मुझे देखता रहता. अक्सर जब मेरी कोर्स की किताबें फट जातीं तो मैं मम्मी से छिपा कर उसे दे देती. वह बहुत खुश होता. फटे हुए पेजों को गोंद से चिपका देता और अकसर मेरे पास बैठ कर उन किताबों को पढ़ने की कोशिश करता रहता. हवेली में मेरे साथ खेलने वाला कोई नहीं था. बच्चों को आम तौर पर अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलने का शौक होता है. आपी और जिम्मी भाई, दोनों मुझ से बड़े थे. मैं जब कीमती खिलौनों से खेलखेल कर उकता जाती तो मम्मी से छिप कर जैदे की तरफ चली जाती और जब तक मम्मी अनजान रहतीं, हम दोनों खेलते रहते.

मम्मी ने सब नौकरों को ताकीद की थी कि मुझे जैदे के साथ न खेलने दिया जाए, सो हर तरफ से मेरी निगरानी की जाती थी, यहां तक कि जैदे की मां और नानी भी मेरी मिन्नत करतीं कि मैं जैदे के साथ न खेलूं. वह कहतीं, ‘‘छोटी बीबी, हवेली में चली जाएं. बेगम साहिबा आप को इधर देखेंगी तो नाराज होंगी. उन का सारा गुस्सा हम पर उतरेगा.’’

लेकिन मुझे मम्मी की परवाह न होती. वक्ती तौर पर उन की डांट से मैं सहम जाती, मगर बाद में हम दोनों सब कुछ भुला कर दोबारा खेलने में लग जाते. मम्मी ने कई बार जैदे के गाल पर थप्पड़ मारे थे. उसे बुराभला कहा था और हवेली में तो उस का घुसना ही मना कर दिया गया था. नौकरों को सख्ती से ताकीद थी कि जैदे को हवेली में आने न दिया जाए. लेकिन इन सारी पाबंदियों ने हमारे इकट्ठे खेलने के शौक को और ज्यादा भड़का दिया था. वह हवेली न आता तो मैं उस के कमरे में चली जाती. मम्मी अक्सर मुझे समझातीं, ‘‘रुखसाना बेटी, छोटे लोगों को ज्यादा मुंह नहीं लगाते. इस तरह तुम्हारी आदतें बिगड़ जाएंगी. तुम जैदे के साथ मत खेला करो. वह छोटा है. हमारा उन का कोई जोड़ नहीं.’’

मम्मी न जाने क्याक्या कहती रहतीं, लेकिन उस छोटी सी उम्र में मम्मी की ‘बड़ीबड़ी’ बातें मेरी समझ में न आतीं और मैं उकता कर वहां से उठ जाती. पढ़ाई के जैदे के बेपनाह शौक को देख कर उस की मां ने उसे प्राइमरी स्कूल में दाखिल करवा दिया था. हम रोजाना अपनी जीप में शहर जाया करती थीं, जहां चोटी के एक स्कूल में हम पढ़ती थीं. जैदे के स्कूल में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी, लेकिन उसे अंग्रेजी पढ़ने और सीखने का शौक था. इसलिए अपने स्कूल की छुट्टी के बाद वह मेरी पुरानी किताबें पढ़ा करता था. जो उस की समझ में न आता, वह मुझ से पूछ लिया करता. बचपन में टीचर बनने में बहुत मजा आता था. इसी तरह साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए हम छठी जमात तक आ गए थे.

उन्हीं दिनों जैदे पर 2 इतने बड़े दुख आ पड़े कि उस का नन्हा वजूद उन दुखों तले दब कर रह गया. हमारे इलाके में हैजे की जबरदस्त बीमारी फैली थी. तब इलाज की सहूलियतें न के बराबर थीं. लोग मर रहे थे. जैदे की मां और नानी भी उस की लपेट में आ गईं. जैदे की नानी बेचारी तो पहले ही झटके में मर गईं. जैदे की मां अलबत्ता कुछ दिन जिंदा रही. मम्मी ने उस की दवादारू का इंतजाम भी किया. लेकिन उस का वक्त पूरा हो चुका था. इसलिए वह जैदे को रोताबिखलता छोड़ कर चल बसी. जैदा बिलकुल अकेला और बेसहारा रह गया. वह सारासारा दिन रोता रहता. मेरे सिवा हवेली में उस का कोई हमदर्द नहीं था. मैं खुद भी नासमझ थी. लेकिन हर मुमकिन तरीके से उस का दुख बांटा करती.

मम्मी को तो शुरू से जैदा नापसंद रहा था. इसलिए उन्होंने एक नौकर को जैदे के ताया का पता करने भेजा, ताकि वह आ कर बकौल मम्मी के, इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा दिला दे. लेकिन जैदे का ताया उसे लेने नहीं आया, बल्कि उस ने हवेली के नौकर को अपनी गरीबी की लंबीचौड़ी दास्तान सुनाई, जिस का निचोड़ यही था कि वह अपने बच्चों को ही नहीं पाल सकता तो जैदे को कहां से खिलाएगा? नौकर जब नाकाम लौटा तो मम्मी ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया कि वह जैदे का क्या करेंगी? लेकिन खुदा बड़ा कारसाज है. हमारी हवेली का चौकीदार एक बूढ़ा था. मम्मी ने उसे अलग कमरा दे रखा था. वह बिलकुल अकेला रहता था. उस ने मम्मी से कह कर अपना सामान समेटा और जैदे के पास रहने लगा. इस तरह दोनों को एकदूसरे का सहारा मिल गया.

हालांकि जैदा कमउम्र था, फिर भी बेहद सुलझा हुआ था. छोटी सी उम्र में तल्ख तजुर्बों ने उस की दिमागी उम्र बढ़ा दी थी. उस ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा. खाली समय में वह किराने की एक दुकान पर काम करता. अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए वह रात गए तक बैठा लिफाफे बनाता रहता. छोटी सी उम्र में वह बेहद संजीदा हो गया था. मैं उसे अब भी अपना साथी और दोस्त समझती थी. मम्मी से छिप कर मैं उस के कमरे में चली जाया करती. लेकिन अब हम खेलने से ज्यादा पढ़ा करते थे. मैं जो भी सबक स्कूल में पढ़ती, वह जैदे को जरूर पढ़ाया करती. जैदा मेरे लाख कहने पर भी हवेली में न आता, बल्कि मुझे भी अपने कमरे में आने से मना करता.

उस दिन मेरे सिर में मामूली सा दर्द था. मैं ताजा सबक जैदे को पढ़ाना चाहती थी, लेकिन कमरे में जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. सुस्ती सी महसूस हो रही थी. मम्मी किसी जलसे में शरीक होने चली गईं तो मैं ने नौकर को भेज कर जैदे को बुलवा लिया. वह पढ़ने के शौक में आ तो गया, लेकिन बेहद सहमा हुआ था. बारबार कह रहा था, ‘‘रुखसाना, बेगम साहिबा ने देख लिया तो बहुत मारेंगी.’’

‘‘अरे कुछ नहीं होता. मम्मी तो हवेली में मौजूद ही नहीं हैं. वह किसी जलसे में हिस्सा लेने शहर गई हैं. रात गए लौटेंगी.’’

मैं और जैदा गुलाबों के कुंज में बैठ गए. मैं उसे पढ़ाने लगी. वह बहुत मन लगा कर पढ़ रहा था कि न जाने कहां से आपी आ गईं. आपी ने तेज नजरों से हमें घूरा और कुछ कहेसुने बगैर अंदर चली गईं. जैदा बेहद घबरा गया और सहमी आवाज में बोला, ‘‘अब मैं जाता हूं रुखसाना. आपी ने देख लिया है. अब वह बेगम साहिबा से शिकायत करेंगी.’’

‘‘अरे बैठो, मम्मी हवेली में मौजूद ही नहीं, तो किस से शिकायत करेंगी? तुम आराम से पढ़ो.’’

जैदा सहमा सा बैठा पढ़ता रहा. लेकिन उस का शक सही था. मम्मी शहर से आ गई थीं और आपी ने जा कर उन से हमारी शिकायत कर दी थी. कुछ देर बाद मम्मी हमारे सामने खड़ी थीं. गुस्से की शिदद्त से वह हांफ रही थीं. उन्होंने आव देखा न ताव, जैदे को पकड़ कर बेतहाशा मारने लगीं. साथसाथ वह बोल भी रही थीं, ‘‘कमबख्त, जलील, कमीने, सौ बार तुझे मना किया कि हवेली में मत आया कर, पर तू मानता ही नहीं.’’

मैं गुमसुम खड़ी उसे मार खाते देखती रही. मम्मी जब उसे मारमार कर थक गईं तो नौकर को बुला कर हुक्म दिया, ‘‘शैदे, क्वार्टर से इस का सामान निकाल कर फेंक दो. देखती हूं, अब यह यहां कैसे रहता है.’’ फिर वह जैदे से कहने लगीं, ‘‘निकल जा, अभी और इसी वक्त निकल जा. अगर आइंदा तू हवेली के आसपास भी देखा गया तो तेरी लाश किसी गंदे नाले में फेंकवा दूंगी.’’

जैदा रोता हुआ वहां से चला गया. आपी और जिम्मी भाई यह तमाशा देखदेख कर खुश हो रहे थे, जबकि मैं मम्मी का दामन पकड़े रो रही थी, ‘‘जैदे को माफ कर दो मम्मी, इसे क्वार्टर से न निकालो. मम्मी, यह कहां जाएगा? यह तो एकदम अकेला है.’’

मम्मी ने मेरे हाथ झटक कर मुझे नौकरानी के सुपुर्द कर दिया, जो मुझे मेरे कमरे में ले गई. वह जैदे से मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस दिन के बाद उस का कोई पता न चल सका. बाद में मैं एक अरसे तक उसे याद करकर के रोती रही. मम्मी ने मुझे और जिम्मी भाई को हौस्टल में दाखिल करवा दिया, क्योंकि अब हमारी क्लासें बड़ी हो गई थीं और घर में पढ़ाई का हर्ज होता था. मैं अक्सर जैदे के बारे में सोचती रहती थी कि वह हवेली से जाने के बाद कहां गया होगा? उस का तो कोई अपना न था, किस ने उसे पनाह दी होगी?

लेकिन आज… आज एक लंबे अरसे के बाद मैं ने उस का नाम सुना भी तो किस अंदाज में? एक इज्जतदार शख्स की शक्ल में, जिस के पास एक बड़ा ओहदा था, इज्जत थी और जिसे मेरा भाई इस बड़ी और आनबान वाली हवेली के मालिक की हैसियत से दावत दे आया था. यह सब क्या था? सब हैरान थे कि यह कैसे हो गया? एक ही छलांग में जैदा जावेद खां कैसे बन गया? जमीन से आसमान तक का यह सफर कैसे तय किया उस ने? लेकिन मुझे कोई हैरानी नहीं थी. उसे तालीम हासिल करने की लगन थी. दीवानगी की हद तक पढ़ने का शौक था और जब शौक जुनून बन जाए तो राह की सारी रुकावटें दूर हो जाती हैं. इसलिए अगर वह कुछ न बनता तो मुझे हैरत होती, लेकिन अब जब वह अपनी मंजिल तक पहुंच गया था, मुझे दूसरों की तरह कोई हैरत नहीं, बल्कि एक इत्मीनान था.

अगले दिन वह हमारे बीच बैठा था. यह वही हवेली थी, जिस में उस का कदम रखना मना था, जहां से उसे मारपीट कर बेइज्जत कर के निकाला गया था. लेकिन आज हालात बदल गए थे. आज मम्मी उस की आवभगत में बिछी जा रही थीं. खाने की मेज पर एकएक चीज उस के सामने रख कर आग्रह से उसे खिला रही थीं, ‘‘खाओ जावेद मियां, तुम तो बराए नाम खा रहे हो. यह शामी कबाब तो तुम ने चखे भी नहीं.’’

‘‘बस बेगम साहिबा, बहुत खा चुका हूं. अब और गुंजाइश नहीं बेगम साहिबा.’’

मैं और जिम्मी भाई बेसाख्ता हंस पड़े. मम्मी बनावटी नाराजगी से कहने लगीं, ‘‘आंटी कहो बेटा.’’

‘‘मैं अपनी औकात नहीं भूला हूं बेगम साहिबा.’’ वह संजीदगी से बोला, ‘‘मैं बहुत छोटा आदमी हूं और इस हवेली के मुझ पर बेशुमार एहसान हैं. खासतौर पर रुखसाना साहिबा का तो मैं बेहद शुक्रगुजार हूं. इन्होंने मेरे मन में पढ़ाई का शौक दोगुना कर दिया था.’’

उस ने गहरी नजरों से मेरी तरफ देखा तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई. मैं गड़बड़ा गई. बेअख्तियार हो कर मैं ने अपनी नजरें झुका लीं. उसे अब नजर भर कर देखना भी मुमकिन नहीं रहा था. वह बड़ा खूबसूरत जवान निकल आया था. वह बारबार मुझे मुखातिब करता और पिछली बातें याद दिलाता, लेकिन मैं जो हर बात पर जम कर बोला करती थी, बहस कर के उसे हरा दिया करती थी, अब उस के सामने बोलना भूल गई थी. अल्फाज जैसे खो गए थे मुझ से. मैं तो उस की शख्सियत के जादू में डूब कर रह गई थी. वह एक अदा से सिगरेट पी रहा था. चेहरे पर कमतरी के निशान बिलकुल नहीं थे. वह कीमती सूट पहने था. मैं गुमसुम बैठी हां में जवाब देती रही.

आपी खाने में मगन थीं. मेहमानों की मौजूदगी में उन्हें खाने पर टोका नहीं जा सकता था और वह ऐसे मौके का खूब फायदा उठाती थीं. रात गए जब वह वापस जाने लगा तो मम्मी ने बड़ी मोहब्बत से उसे आते रहने को कहा. पूरी रात मैं सो न सकी. जावेद मेरे खयालों में आता रहा. उस की रौबदार शख्सियत बारबार मेरी नजरों के सामने आ जाती. उस की धीमी मुसकराहट मेरे दिल में नई उमंग जगाने लगी. फिर सब से ज्यादा उस का बड़प्पन कि एक बार भी उस ने मम्मी को उन का वह सुलूक याद नहीं दिलाया, जो उन्होंने उस के साथ किया था. हां, अपनी जद्दोजहद और कोशिशों की कहानी उस ने जरूर सुनाई कि किस तरह वह अपनी मंजिल तक पहुंचा. लेकिन उस ने एक बार भी मम्मी से यह नहीं कहा कि मुझ यतीम और बेसहारे के सिर पर अगर आप लोग हाथ रख देते तो आप की दौलत में क्या कमी आ जाती? मम्मी शर्मिंदा सी लग रही थीं.

सुबह नाश्ते पर फिर जावेद का जिक्र छिड़ गया. मम्मी हैरानी से कह रही थीं, ‘‘मुझे कभी उस की काबिलियत का अंदाजा नहीं हो सका था. एक छोटा इंसान इतनी मेहनत भी कर सकता है, यकीन नहीं आता.’’

जिम्मी भाई टोस्ट पर जैम लगाते हुए बोले, ‘‘लेकिन आंखों देखे पर तो यकीन करना ही पड़ता है मम्मी. वैसे आप कल बारबार जावेद को हवेली आने के लिए कह रही थीं. क्या आप भूल गईं कि एक दिन वह इसी हवेली से दुत्कार कर निकाला गया था और उस का छोटामोटा सामान आप ने नौकरों के हाथों बाहर फेंकवा दिया था.’’

‘‘आप भूल गए हैं जिम्मी भाई,’’ मैं तल्खी से बोली, ‘‘जब मम्मी ने ऐसा किया था, तब जावेद ‘जैदा’ था, बिन मांबाप का गरीब बच्चा. लेकिन आज वह एक बहुत बड़े ओहदे पर लगा हुआ है, इज्जतदार बंदा है. मम्मी दरअसल जावेद की नहीं, उस के ओहदे की इज्जत कर रही हैं.’’

मम्मी ने तेज नजरों से मुझे घूरा और बोलीं, ‘‘रुखसाना, बड़ों से ऐसी बात नहीं की जाती. क्या तुम ने बाहर रह कर यही सब कुछ सीखा है? जाओ, अपने कमरे में चली जाओ.’’

मैं मुंह बना कर उठ खड़ी हुई. जिम्मी भाई भी उठने लगे तो मम्मी ने उन से कहा, ‘‘तुम बैठो जिम्मी, तुम से कुछ बात करना है मुझे.’’

मैं कमरे से निकल तो आई, लेकिन मेरे कदम रुक गए. मम्मी यकीनन जावेद के बारे में ही जिम्मी भाई से बात करना चाहती थीं. मैं सांस रोक कर दरवाजे की आड़ में खड़ी हो गई. मम्मी धीमी आवाज में जिम्मी भाई से कह रही थी, ‘‘जिम्मी, जब से मैं ने जावेद को देखा है, एक अनोखा खयाल मेरे दिमाग में आ रहा है.’’

‘‘कैसा खयाल मम्मी?’’ जिम्मी भाई की आवाज में हैरत थी.

‘‘सोचती हूं,’’ मम्मी जरा सा रुक कर बोलीं, ‘‘अगर फरजाना का रिश्ता जावेद से तय हो जाए तो कैसा रहेगा?’’

‘‘लेकिन…’’ जिम्मी भाई हकलाते हुए बोले, ‘‘जावेद तो उम्र में मुझ से भी छोटा है और आपी उम्र में मुझ से बड़ी हैं. यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘होने को क्या नहीं हो सकता जिम्मी?’’ मम्मी खुदगर्जी से बोलीं, ‘‘बस जरा चालाकी की जरूरत है. वैसे भी यह तो जावेद के लिए इज्जत की बात है कि हम उसे हवेली का दामाद बना रहे हैं, वरना तालीम और ओहदे को उस की शख्सियत से अलग कर दो तो उस की क्या हैसियत रह जाती है? हवेली की एक नौकरानी का बेटा और बस.’’

‘‘अगर ऐसा हो जाए मम्मी तो हमारी बहुत बड़ी मुश्किल हल हो जाएगी और आपी की जिंदगी सही मायनों में संवर जाएगी. खानदान के जिन लड़कों ने आपी को ठुकराया है, वे मुंह देखते रह जाएंगे. उन में से कोई भी इतने बड़े ओहदे पर नहीं है.’’ जिम्मी भाई जोश से बोल रहे थे और मम्मी शेखी से कह रही थीं, ‘‘यह भी तो कहो न जिम्मी कि तुम्हारे लिए रास्ता साफ हो जाएगा और तुम नाइला को दुलहन बना कर जल्दी ला सकोगे.’’

‘‘अच्छा मम्मी,’’ वह हंस कर बोले, ‘‘आप तो मजाक कर रही हैं.’’

वे दोनों इसी मुद्दे पर बातें करते रहे. लेकिन मेरे सीने में बडे़ जोर का दर्द उठने लगा था. मेरे अंदर जोरदार धमाके होने लगे थे. हाथपांव ठंडे पड़ने लगे. मेरी आंखों में अंधेरा लहरें लेने लगा. मेरा दिल चाहा कि मैं धड़ाम से दरवाजा खोल कर अंदर घुस जाऊं और चिल्लाचिल्ला कर उन से कह दूं, ‘‘ऐ बड़ी हवेली के अंदर बसने वाले छोटे लोगों, जरा अपने गरेबान में झांक कर देखो कि तुम क्या कर रहे हो? क्या जावेद की किस्मत में कूड़ा ही लिखा है? जावेद ने जिस मेहनत और जिस लगन से अपनी जिंदगी बनाई है, तुम लोग आपी को उस की जिंदगी में दाखिल कर के उस की जिंदगी तबाह कर दोगे. यही इंसाफ है तुम्हारा?’’

लेकिन मैं कुछ भी न कर सकी, कुछ भी न कह सकी. बस बेजान कदमों से अपने कमरे में आ गई. यह बात इतनी छोटी नहीं थी कि मैं इस पर चुप रहती. मैं ने जोरशोर से इस पर ऐतराज किया और आपी के सामने कह दिया, ‘‘मम्मी, आप ज्यादती कर रही हैं. आपी और जावेद का कोई जोड़ नहीं है, किसी भी लिहाज से. उम्र में भी आपी जावेद से बहुत बड़ी हैं. खुदा के लिए यह जुल्म न कीजिए, ऐसी शादियां ज्यादा दिन पनप नहीं सकतीं. अंजाम अच्छा नहीं होता ऐसी शादियों का.’’

‘‘तुम बीच में मत बोलो.’’ मम्मी का रंग गुस्से के मारे सुर्ख हो गया.

जिम्मी भाई ने नाराजगी से मुझे घूरा, ‘‘तुम से किस ने राय मांगी है रुखसाना?’’

मैं ने आपी की तरफ देखा. शायद वही ऐतराज कर दे इस बेजोड़ रिश्ते पर, लेकिन उन्हें तो खाने के सिवा किसी बात से कोई सरोकार ही नहीं था. वे सब क्या कर रहे थे? किस के लिए कर रहे थे? उन्हें परवाह ही नहीं थी कोई. थकहार कर मैं चुप हो गई. जावेद 2-3 बार हवेली में आया. सब साथ ही बैठे रहते. वह अक्सर कहता, ‘‘तुम बहुत चुपचुप सी हो गई हो रुखसाना. बचपन में तो तुम ऐसी नहीं थीं. बहुत ही शरारती और बातूनी हुआ करती थीं. तुम्हें याद है जब तुम ने…’’ वह बचपन का कोई किस्सा सुनाने लगा. मैं खोईखोई बैठी रहती….खालीखाली नजरों से उसे देखती रहती. जिम्मी भाई और मम्मी बेमकसद हंसने लगते. मम्मी उस की खूब आवभगत करतीं. आपी को हर रोज बेहतरीन सूट पहनातीं. जावेद जब मेरे बारे में बात करता तो मम्मी घुमाफिरा कर आपी की बात शुरू कर देतीं.

वह जावेद के दौरे का आखिरी दिन था. कल उसे वापस जाना था. उस दिन वह सब से मिलने के लिए हवेली आया तो उस ने सब को दावत दी कि शहर आ कर कुछ दिन उस को मेजबानी का मौका दें. मुझ से वह बारबार कह रहा था, ‘‘रुखसाना, मैं ने अपने लौन में मोतिया के बेशुमार पौधे लगाए हैं. तुम्हें बचपन में मोतिया की खुशबू कितनी पसंद थीं, तुम मेरे घर आना. तुम्हें बेहद भला लगेगा.’’

मेरे बजाय मम्मी ने जवाब दिया, ‘‘हां…हां… जावेद मियां, जरूर आएंगे.’’

वह चला गया. उस के जाने के बाद मुझे यों लगा, जैसे चिरागों में रोशनी न रही हो. मेरे अंदर अंधेरा फैलने लगा. जिम्मी भाई और मम्मी क्या बातें कर रहे थे, मुझे सुनाई नहीं दे रहा था. मैं अपने वजूद को संभालती हुई अपने कमरे में आ गई और बेदम हो कर बिस्तर पर ढह गई. यों सुबह मेरी आंखें देर से खुलीं. रात भर मैं परेशान रही थी. मुझे चाहिए था कि मैं जावेद को खबरदार कर देती कि कहीं वह मम्मी के बिछाए जाल में न फंस जाए. मैं खुद को मुजरिम समझ रही थी, लेकिन कुसूर मेरा भी नहीं था. मम्मी और जिम्मी भाई ने एक मिनट के लिए भी मुझे अकेले नहीं छोड़ा जावेद के पास. शायद वे समझ गए थे कि मैं मौका पा कर जावेद को सारी बात बता दूंगी.

मेरा दिल हौल रहा था. मैं ने जल्दीजल्दी मुंह पर पानी के छपाके मारे और ड्राइंगरूम की तरफ चल दी. लेकिन मुझे ठिठक कर रुकना पड़ गया. वहां तो नजारा ही और था. मम्मी गुस्से के मारे लालपीली हो रही थीं. हमेशा नरम आवाज में बात करने वाली मम्मी बुरी तरह चीख रही थीं, ‘‘कमीना, बदजात, गंदी नाली का कीड़ा, दो टके का आदमी, आज हमारी बराबरी करना चाहता है?’’

उधर जिम्मी भाई मुट्ठियां भींचभींच कर तैश में कह रहे थे, ‘‘मैं उस खबीस के टुकड़ेटुकडे़ कर दूंगा. उस की यह हिम्मत कैसे हुई? जलील इंसान अपनी हैसियत भूल गया. लेकिन मैं उसे अपनी हैसियत याद दिलाऊंगा. समझता क्या है खुद को?’’

‘‘क्या हुआ मम्मी?’’ मैं घबराकर बोली. आपी जो टोस्ट पर मक्खन की तह लगा रही थीं, मुझे देख कर अजीब बेढंगेपन से हंसने लगीं. मैं घबरा कर बारीबारी सब की तरफ देखने लगी, ‘‘आप सब मुझे बताते क्यों नहीं कि आखिर क्या बात हुई है?’’

अजीब ठंडे अंदाज में मम्मी ने एक मुड़ातुड़ा कागज मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो, उस खबीस की हिम्मत खुद देख लो.’’ मम्मी कमरे से बाहर चली गईं. उन के पीछेपीछे जिम्मी भाई भी चले गए. आपी अपना नाश्ता खत्म कर चुकी थीं. सो उन के रुकने की भी कोई वजह नहीं थी. वह मुझे देखती और मुसकराती हुई कमरे से बाहर निकल गईं. अजीब बेवकूफी भरी मुसकराहट थी उन के होंठों पर. या खुदा, मैं पागल हो गई हूं या ये सब पागल हो गए हैं? मैं ने झुंझला कर वह मुड़ातुड़ा कागज खोला और मेरी नजरें तेजी से उन सतरों पर दौड़ने लगीं. वह जावेद का खत था मम्मी के नाम. लिखा था : बेगम साहिबा,

आदाब! आप का पैगाम मिला. इज्जतअफजाई का शुक्रिया. मैं यकीनन इस रुतबे और मकाम के काबिल नहीं हूं और आप का जितना भी शुक्रिया अदा करूं, कम होगा. लेकिन गुस्ताखी माफ बेगम साहिबा! आपी को मैं ने हमेशा से अपनी बड़ी बहन का दर्जा दिया है. इस नजर से मैं ने उन्हें कभी नहीं देखा. उन की शख्सियत मेरे लिए काबिलेइज्जत रही है और सारी उम्र काबिलेइज्जत रहेगी.

दरअसल, खुद मैं भी आप से हाथ जोड़ कर दरख्वास्त करना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ रही थी. ऐसा लगता था, जैसे छोटे मुंह बड़ी बात कह दी जाए. आप की नाराजगी और कहर का डर था. अपनी कमतरी का अहसास था. इसलिए मैं अपने दिल की सारी ख्वाहिशें दिल में ही छिपा कर यहां से विदा होना चाहता था. लेकिन आज जब आप का पैगाम मिला तो मेरे अंदर भी हिम्मत पैदा हो गई और मैं ने सोचा कि अगर आप मुझे दामाद की हैसियत देना ही चाहती हैं तो रुखसाना का हाथ मेरे हाथ में दे दीजिए. मैं सारी जिंदगी आप का एहसान नहीं भूलूंगा बेगम साहिबा! यह आज की ख्वाहिश नहीं, मुद्दतों पहले की ख्वाहिश है, तब की, जब आप की डांट और मार के बावजूद हम इकट्ठे खेलने और इकट्ठे पढ़ने से बाज नहीं आते थे. तब मैं कुछ भी नहीं था और आज जो कुछ बना हूं, इसी ख्वाहिश की बदौलत बना हूं. मैं जल्दी ही आ कर आप का जवाब लूंगा.

—खैरअंदेश जावेद खां

कागज का पुर्जा मेरे हाथों में फड़फड़ा रहा था. मेरी रगों में भयानक बेचैनी दौड़ने लगी थी. दिल में दहकती हुई आग भर गई थी. बड़े घरों में बसने वाले लोग कितने बेबस और मजबूर होते हैं, यह अब मेरी समझ में अच्छी तरह आ रहा था.

मैं भागीभागी अपने कमरे में आई. मुलायम बिस्तर जहरीले कांटों की सेज लग रहा था. रोती रही… सैलाब आ गया था मेरी आंखों में. …फिर उठी और सोचने लगी.

आखिरकार मेरे दिल ने और मेरे दिमाग ने भी वह फैसला ले लिया, जो कभी मेरे तसव्वुर में भी न आया था. एक दिन सहेली के घर जाने के बहाने निकली तो फिर हवेली लौटी ही नहीं. आज मेरी जिंदगी के गुलशन में बेहद प्यारी खुशबू वाले दो फूल खिले हैं. बताने को कहिए बता दूं कि आपी के लिए एक गरीब दूल्हा खरीद लिया गया और फिर जिम्मी भाई की भी नाइला से शादी हो गई. लेकिन इतना सब होने में इतनी आंधियां चलीं, इतना गुबार उठा कि खुदा न करे, किसी खानदान में वैसा हो. इसीलिए तो कभीकभी शिद्दत से महसूस होता है कि बहार आई भी तो …

 

MP News: रिश्तों की बलिवेदी

MP News: मुकेश रिश्तेनातों को भूल कर अपनी ही सगी बहन पूजा को एकतरफा प्यार करने लगा था. पूजा को उस की हकीकत पता चली तो उसे दुत्कार कर वह उस से कन्नी काटने लगी. उसे क्या पता था कि भाई कसाई भी बन सकता है. एएसआई के.के. दुबे अपनी पत्नी माया व कुछ रिश्तेदारों के साथ शाम लगभग 5 बजे अपने क्वार्टर पहुंचे. उन का क्वार्टर थाना रांझी के प्रांगण में था. दरवाजा खुलवाने के लिए उन्होंने अपनी बेटी पूजा को आवाज दी. लेकिन घर के अंदर से न तो कोई जवाब मिला और न कोई हलचल ही हुई. वह पूजा को अकेली ही छोड़ कर गए थे, इसलिए सोचा कि वह सो रही होगी. उसे जगाने के लिए उन्होंने जोरजोर से दरवाजा पीटा, साथ ही उस का नाम ले कर आवाजें दीं.

क्वार्टर में जाने के लिए एक दरवाजा पीछे से भी था. जब आवाजें देने के बाद भी पूजा ने दरवाजा नहीं खेला तो के.के. दुबे क्वार्टर के पीछे गए. पिछला दरवाजा खुला देख कर उन्हें मामला कुछ गड़बड़ लगा. वह दबे पांव खुले दरवाजे के अंदर घुस कर कमरे में पहुंचे तो फर्श पर पूजा को लहूलुहान अवस्था में देख कर अवाक रह गए. आंखों से आंसू टपकने लगे. जब तक वह कमरे से बाहर निकले, तब तक पत्नी और रिश्तेदार भी पीछे वाले दरवाजे की तरफ आ गए थे. पति की आंखों में आंसू देख कर माया समझ गई कि कुछ न कुछ गड़बड़ है. उन्होंने पति से पूजा के बारे में पूछा तो उन की कुछ भी बताने की हिम्मत नहीं हुई और वह जोरजोर से रोने लगे. यह देख कर माया भी घबरा गई. वह तुरंत कमरे में गई. उस के पीछेपीछे रिश्तेदार भी पहुंच गए.

उन के क्वार्टर से थाने का दफ्तर करीब 100 मीटर दूर था, इसलिए रोने की आवाजें दफ्तर तक पहुंच गईं. रोनेधोने की आवाज सुन कर थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य के.के. दुबे के क्वार्टर पर पहुंच गए. उन्होंने जब सुना कि दुबे की बेटी की हत्या कर दी गई है तो उन के भी होश उड़ गए. कमरे का मुआयना करने के बाद उन्होंने अपने अधिकारियों को भी घटना से अवगत करा दिया. एएसआई की बेटी की हत्या थाना प्रांगण स्थित उन के क्वार्टर में हुई थी, इसलिए यह खबर हैरान कर देने वाली थी. सूचना पा कर डीएम एस.एन. रूपला, एसपी हरिनारायणचारी मिश्रा, एएसपी अमरेंद्र सिंह, एसपी (सिटी) जे.पी. मिश्रा, एसपी सिटी (ओमती) आजम खान भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने फोरेंसिक और डाग स्क्वायड टीम को भी मौके पर बुला लिया.

पूजा की लाश के पास ही एक टेप कटर और एक ईअर फोन पड़ा था. टेप कटर पर खून के धब्बे लगे थे. फोरेंसिक एक्सपर्ट ने टेप कटर और अन्य सामानों से फिंगर प्रिंट इकट्ठे किए. खोजी कुत्ता लाश सूंघ कर दरवाजे के पास जा कर रुक गया. उस से भी पुलिस को कोई खास सहायता नहीं मिली. बाद में पुलिस ने मौके से सुबूत जब्त कर लिए. पुलिस अधिकारियों ने लाश का मुआयना किया तो उस की गरदन पर 3 घाव थे और उस की दोनों कलाइयों की नसें कटी हुई थी. छानबीन के बाद पुलिस ने मृतका पूजा की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल जबलपुर भेज दी.

श्वांस नली और दोनों कलाइयों की नसें कटी होने की वजह से कुछ पुलिस वाले इसे आत्महत्या का मामला मान रहे थे. जब कोई पढ़ालिखा व्यक्ति आत्महत्या करता है तो वह सुसाइड नोट लिख कर ऐसी जगह रख देता है, जिस पर सभी की नजर पड़े. पुलिस ने पूरा कमरा छान मारा, लेकिन कहीं भी सुसाइड नोट नहीं मिला. थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य को यह मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का लग रहा था. इस की वजह यह थी कि कोई भी व्यक्ति धारदार हथियार से अपना गला नहीं काट सकता. पूजा के गले पर तो कटने के 3 निशान थे. इस के अलावा उस की कलाइयों की नसें भी काटी थीं.

उन्हें लग रहा था कि हत्यारे ने इस मामले को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की है. घर का कोई सामान भी चोरी नहीं हुआ था. इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे का मकसद केवल पूजा की हत्या करना था. हत्यारा कौन हो सकता है, इस का पता लगाने के लिए उन्होंने मृतका के पिता एएसआई के.के. दुबे से बात की. के.के. दुबे ने बताया कि उन की 5 बेटियां हैं, जिस में से 4 बेटियों की वह शादी कर चुके हैं. शादी के लिए सब से छोटी बेटी पूजा दुबे ही रह गई थी. वह एमए की पढ़ाई कर रही थी. थाने के सरकारी क्वार्टर में वह पत्नी माया दुबे और छोटी बेटी पूजा के साथ रहते थे. चूंकि पूजा भी शादी योग्य हो चुकी थी.

उस की पढ़ाई भी पूरी होने वाली थी इसलिए उन्होंने उस की शादी पनानगर के एक अच्छे परिवार के लड़के से तय कर दी थी. फरवरी, 2015 में उस की शादी होनी थी. लेकिन इस से पहले ही यह घटना घट गई. बतातेबताते दुबेजी की आंखें भर आईं. थानाप्रभारी ने उन्हें ढांढस बंधाया तो के.के. दुबे ने आगे बताया कि 29 जनवरी, 2015 को उन की सुसराल बूढ़ानगर में तेरहवीं का कार्यक्रम था. उस में भोपाल के रहने वाले उन के साढ़ू मुनेंद्र उपाध्याय को भी शामिल होना था. इसलिए 28 जनवरी को वह अपने बच्चों के साथ हमारे क्वार्टर पर आ गए थे. यहीं से हम सब 29 जनवरी को साढ़े 11 बजे बूढ़ानगर के लिए निकल गए. पूजा से हम ने चलने को कहा तो उस ने पढ़ाई की वजह से जाने से मना कर दिया. क्वार्टर थाने के प्रांगण में था, इसलिए उस के घर रुकने पर वह निश्चिंत थे.

दुबे के अनुसार तेरहवीं का कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन्होंने रांझी के लिए वापसी की. शाम करीब 5 बजे वह अपने क्वार्टर पर आए. यहां आ कर दरवाजा खुलवाने के लिए उन्होंने पूजा को कई आवाजें दीं और दरवाजा खटखटाया. लेकिन घर के अंदर से न तो पूजा की कोई आवाज आई और न ही कोई हलचल सुनाई दी. तब वह पीछे के दरवाजे पर पहुंचे. पीछे वाला दरवाजा खुला पड़ा था. उन्होंने कमरे में जा कर देखा तो बैड के करीब फर्श पर पूजा की लहूलुहान लाश पड़ी थी.

के.के. दुबे ने बताया कि पूजा आत्महत्या नहीं कर सकती, क्योंकि वह बहुत हिम्मत वाली लड़की थी. पढ़नेलिखने में भी वह तेज थी. शादी तय हो जाने के बाद से वह काफी खुश थी. जब थानाप्रभारी ने उन से किसी पर शक वगैरह होने की बात पूछी तो उन्होंने अपने साढू मुनेंद्र के बेटे मुकेश उपाध्याय पर हल्का शक जाहिर किया. उन्होंने बताया कि शहपुरा और जबलपुर के थानों में तैनाती के दौरान मुकेश ने उन के यहां कुछ ज्यादा आनाजाना कर दिया था. उस दौरान उस ने पूजा के साथ कुछ ऐसी हरकतें कीं, जो बहनभाई के संबंधों में नहीं होनी चाहिए थीं. पूजा ने जब यह बात उन्हें बताई थी तो वह उस के साथ उपेक्षा भरा बर्ताव कर के उस से बेरुखी से पेश आने लगे. इस के बाद मुकेश पूजा के मोबाइल पर ऐसी बातें करने लगा जो पूजा को पसंद नहीं थीं.

मुकेश के बारबार फोन करने से पूजा परेशान हो उठी. उस ने मुकेश को डांटा और उसे फोन न करने की सख्त हिदायत दी. लेकिन मुकेश ने अपनी हरकतें बंद नहीं कीं. परेशान हो कर अंत में उन्होंने उस के मातापिता से शिकायत की. इस से वह और उग्र हो गया और फोन बदलबदल कर पूजा को धमकियां देने लगा. इसी दौरान दिसंबर, 2014 में उन्होंने पूजा की शादी तय कर दी थी. बाद में जनवरी, 2015 के प्रथम सप्ताह में उन्होंने पूजा की मंगनी भी कर दी थी. जब इस बात की जानकारी मुकेश को हुई तो वह 14 जनवरी को भोपाल से जबलपुर आ गया. वह घर न आ कर सीधे पूजा के कोचिंग सेंटर के बाहर पहुंच गया. जैसे ही वह कोचिंग सेंटर से बाहर निकली तो रास्ते में उस ने पूजा को रोक लिया और उस से विवाह करने की जिद करने लगा.

पूजा ने उसे झिड़क दिया और घर आ कर अपनी मां को मुकेश की हरकतों के बार में बताया. मुकेश की पागलपन की इन हरकतों से वे लोग बेहद परेशान थे, लेकिन लोकलाज के कारण चुप थे. मौसेरे भाई की एकतरफा प्यार की कहानी सुन कर थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य ने मृतका पूजा व मुकेश के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई और मुकेश के नंबर को सर्विलांस पर लगा कर केस के खुलासे की कोशिश शुरू कर दी. मुकेश की काल डिटेल्स की समीक्षा से पता चला कि घटना के दौरान उस के फोन की लोकेशन जबलपुर और थाना रांझी के टावरों के पास थी. इस से पुलिस का शक मुकेश पर और गहरा गया.

थानाप्रभारी अनिल मौर्य ने दलबल के साथ पहली फरवरी, 2015 को कोहेफिजा, भोपाल स्थित मुकेश के घर छापा मारा. मुकेश घर पर ही मिल गया. तलाशी लेने पर उस के घर में खून लगी जैकेट मिली. वह पुलिस ने बरामद कर ली. पुलिस ने उसी समय उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए थाना रांझी ले आई. थाने में मुकेश से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह पुलिस के सामने ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. उस ने स्वीकार कर लिया कि पूजा की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

मुकेश मध्य प्रदेश के जिला भोपाल के कस्बा कोहेफिजा के रहने वाले मुनेंद्र उपाध्याय का बेटा था. मुनेंद्र उपाध्याय प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. मुकेश गलत साथियों की संगत में पड़ जाने की वजह से इंटरमीडिएट से आगे की पढ़ाई नहीं कर सका. वह दिन भर आवारागर्दी करता. मातापिता ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं सुधरा. करीब 7 साल पहले की बात है. मुकेश पहली बार परिवार वालों के साथ पूजा के घर गया था. जब उस ने पहली बार पूजा को देखा तो वह उसे भा गई. उस की सुंदरता के आकर्षण में वह ऐसा डूबा कि उस का दीवाना हो गया. मुकेश चूंकि पूजा का मौसेरा भाई था, इसलिए वह उस से घुलमिल कर बातें करती थी. पूजा के इसी अपनत्व भरे व्यवहार को मुकेश पूजा की चाहत समझ बैठा. इस तरह उस के दिल में पूजा के प्रति एकतरफा प्यार उमड़ने लगा.

इस के बाद वह अकसर कोई न कोई बहाना बना कर भोपाल से जबलपुर स्थित पूजा के घर आनेजाने लगा. बहन का बेटा होने की वजह से पूजा की मां माया उसे बड़े प्यारदुलार से रखती थी. मानसम्मान पा कर मुकेश अकसर पूजा के घर आने लगा. वह वहां कईकई दिन रुकता था. मुकेश की नजरें पूजा पर ही लगी रहती थीं, इसलिए वह जब भी वहां आता, पूजा के आसपास ही मंडराता रहता था. चूंकि मुकेश सगा रिश्तेदार था, इसलिए परिवार वाले उस पर किसी तरह का शक नहीं करते थे. धीरेधीरे वह पूजा के साथ अजीब तरह की हरकतें करने लगा. फिर भी पूजा मुकेश के अटपटे व्यवहार को उस का भोलापन मान कर नजरअंदाज करती रही. इसे मुकेश पूजा के प्यार करने की मूक सहमति समझने लगा.

समय के साथ मुकेश का प्यार विकृत हो कर भयावह होता जा रहा था. वहीं दूसरी ओर पूजा के दिल में मुकेश के प्रति भाई का प्यार पवित्र और सामान्य स्थिति में था. मुकेश एकतरफा प्यार में अंधा होता जा रहा था. इतना ही नहीं, वह गलतफहमी में पूजा को अपना जीवनसाथी बनाने के सतरंगी सपने देखने लगा. समय गुजरता गया. 6 साल कब गुजर गए, पता तक नहीं चल पाया. इधर पूजा एमए कर रही थी. शादी योग्य समझ कर उस के घर वालों ने उस का विवाह तय कर दिया. यह खबर सुन कर मुकेश की स्थिति कटे हुए वृक्ष जैसी हो गई. वह कई बार पूजा के घर बहाना बना कर आया, लेकिन समय न पा कर मुकेश पूजा से अपने दिल की बात नहीं कह पाया.

जब मुकेश को पता चला कि पूजा की मंगनी नए साल के पहले सप्ताह में होने वाली है तो वह विचलित हो उठा. उस ने मोबाइल से फोन कर के पूजा से पहली बार प्यार का इजहार करते हुए कहा, ‘‘पूजा, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. मैं तुम से विवाह करना चाहता हूं. अगर तुम ने मुझ से विवाह न किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा.’’

‘‘मुकेश, यह तुम क्या कह रहे हो. लगता है तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. तुम मेरे मौसेरे भाई हो. आइंदा ऐसी गंदी सोच वाली बात मुझ से न करना.’’ डांटते हुए पूजा बोली.

‘‘पूजा, तुम अच्छी तरह सुन लो कि मैं तुम्हें जान से ज्यादा चाहता हूं और तुम्हें अपना मान चुका हूं. मैं ने तय कर लिया है कि शादी तुम से ही करूंगा. अगर तुम ने मुझे धोखा दिया तो समझ लो परिणाम गंभीर होंगे.’’ चेतावनी देते हुए मुकेश बोला, ‘‘यह याद रखो पूजा, अगर तुम मेरी न हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं बनने दूंगा. भले ही नतीजा कुछ भी हो.’’

‘‘मुकेश भइया तुम पागल हो चुके हो. कहीं भाईबहन में शादी होती है?’’ कह कर पूजा ने फोन काट दिया.

दूसरी तरफ मुकेश पूजा की बेरुखी को देख कर गहरे तनाव में आ गया. उसे पूरी रात नींद नहीं आई. उस के मनमस्तिष्क में पूजा की ही तस्वीर घूमती रही. सुबह उठा तो उस की आंखें सूजी हुई थीं. तनाव से वह बेहद खामोश एवं गंभीर हो गया. मुकेश की खामोशी को घरपरिवार वाले समझ नहीं पा रहे थे. वह अकसर गुमशुम रहने लगा. उधर मुकेश की बहकीबहकी बातें सुन कर पूजा बहुत परेशान हो उठी. उस ने मुकेश के मोबाइल की काल को रिसीव करना बंद कर दिया, जिस से मुकेश और बेचैन हो गया. पूजा की मंगनी होने की बात सुन कर मुकेश 14 जनवरी, 2015 को भोपाल से जबलपुर आ गया और जब पूजा अपने कोचिंग सेंटर से बाहर निकली तो उस ने पूजा को रोक लिया.

उस ने पूजा के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पूजा, मैं तुम्हें जान से ज्यादा चाहता हूं. तुम किसी और से विवाह न कर के मुझ से कर लो. हम दोनों के बीच जो भी रोड़े आएंगे, हम उन से निपट लेंगे. लेकिन तुम मेरी चाहत और प्यार को धोखा मत दो.’’

‘‘मुकेश, मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ रही हूं, लेकिन हम दोनों के बीच भाईबहन का पवित्र रिश्ता है. बेहतर यही है कि तुम होश में आ जाओ. अगर तुम मुझे ज्यादा परेशान करोगे तो मैं तुम्हारी शिकायत मौसाजी से कर दूंगी.’’ पूजा उसे सख्त हिदायत देते हुए बोली. घर लौट कर पूजा ने यह बात अपनी मां माया दुबे को बताई तो उन्होंने उसी समय अपनी बहन और बहनोई को फोन कर के उन से मुकेश की शिकायत कर दी. उस ने कहा कि मुकेश को समझाओ. उस की हरकतों से पूजा की शादी में व्यवधान पडे़गा और अगर शादी के बाद किसी तरह यह बात उस के ससुराल वालों को मालूम हो गई तो उस का पारिवारिक जीवन नरक हो जाएगा.

मुकेश के घर वालों ने उसे डांटा. इस से वह आगबबूला हो गया. उस ने पूजा की हत्या करने की ठान ली. संयोग से मुकेश को पता चला कि 29 जनवरी, 2015 को उस के मातापिता मौसामौसी के साथ बूढ़ानगर स्थित ननिहाल में तेरहवीं कार्यक्रम में जाएंगे. पूजा की हत्या करने का उस के लिए यह अच्छा मौका था. 28 जरवरी, 2015 को मुकेश के मातापिता भोपाल से पूजा के घर के लिए चल दिए. मुकेश भी उन्हीं के पीछेपीछे रवाना हो गया. उसी दिन देर रात वे लोग पूजा के घर पहुंच गए. जबकि मुकेश जबलपुर स्टेशन पर पहुंच गया. अपनी योजना के मुताबिक वह पूरी रात स्टेशन पर ही रहा. 29 जनवरी की सुबह 10 बजे मुकेश रांझी पहुंच गया और थाना रांझी से कुछ दूर खड़े हो कर अपने और पूजा के मातापिता के घर से निकलने का इंतजार करने लगा.

वे लोग साढे़ 11 बजे के लगभग थाने के क्वार्टर के बाहर आ गए तो कुछ देर बाद वह पूजा के घर पहुंच गया. उन के जाने के बाद उस ने निश्चिंत हो कर दरवाजा खटखटाया. जैसे ही पूजा ने दरवाजा खोला, वह अंदर घुस गया. फुरती से अंदर घुस कर उस ने दरवाजा बंद कर लिया. फिर वह पूजा को पकड़ कर पीछे वाले कमरे में ले गया और उस से शादी करने के लिए उस पर घर से भाग चलने का दबाव बनाने लगा. पूजा मुकेश पर बिगड़ी और पिता को उस की बातें बताने की धमकी दे कर बैड पर पड़े अपना मोबाइल उठाने के लिए लपकी.

पूजा की हरकत देख कर मुकेश ने जेब से टेप कटर निकाला और पूजा की गरदन को 3 बार रेत दिया. वह लहूलुहान हो कर फर्श पर गिर गई. उस के बाद पूजा की हत्या को आत्महत्या के रूप में दर्शाने के लिए उस ने उस के दोनों हाथों की कलाई की नसों को काट दिया और कमरे में उसे तड़पता छोड़ कर चुपचाप पीछे वाले दरवाजे से निकल गया. उस की जैकेट पर खून के छींटे आ गए थे, इसलिए उस ने जैकेट उतार कर हाथ में पकड़ ली थी. फिर वह अपने घर भोपाल आ गया. मुकेश ने थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य को बताया कि पहले पूजा भी उसे खूब चाहती थी. जब भी उस से मिलताजुलता था, वह उस से बड़े प्यार से बातें करती थी.

लेकिन शादी तय हो जाने के बाद वह पूरी तरह बदल गई और उस से  नफरत करने लगी थी. उस ने पूजा को अपने साथ शादी करने के लिए बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी तो मजबूर हो कर उस ने उस की हत्या कर डाली. मुकेश से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302, 450 के तहत गिरफ्तार कर 2 फरवरी, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल जबलपुर भेज दिया. एसपी हरिनारायणचारी मिश्रा ने इस मामले का खुलासा करने वाली टीम को बधाई देते हुए उन्हें पुरस्कृत किया. MP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित