रोहित शेखर का पितृ दोष – भाग 2

बदल गई जिंदगी

कल के गंगू तेली उज्ज्वला और रोहित एक झटके में राजा भोज बन गए थे. सब कुछ सैटल हो गया तो एन.डी. तिवारी अपनी नई पत्नी और नाजायज से जायज बन चुके बेटे के साथ दिल्ली स्थित डिफेंस कालोनी में आ कर रहने लगे. इस आलीशान हवेली की आलीशान जिंदगी रोहित को मिली तो वह बौरा उठा. शौकिया शराब पीने वाला रोहित अब आदतन पियक्कड़ बन चुका था.

वह अकसर अपने नजदीकी लोगों से कहता था कि वह शायद दुनिया का पहला शख्स है जिस ने अपने नाजायज होने की लड़ाई लड़ी, साथ ही वह प्रकाश मेहरा निर्देशित मशहूर फिल्म ‘लावारिस’ फिल्म का वह डौयलोग भी दोहराता था जो नायक अमिताभ बच्चन ने अपने नाजायज पिता बने अमजद खान से कहा था कि कोई भी बेटा नाजायज नहीं होता बल्कि बाप नाजायज होता है.

बहरहाल, जिंदगी ढर्रे पर आ गई तो अनुभवी एन.डी. तिवारी ने रोहित को राजनीति में उतारने की सोची क्योंकि तमाम बदनामियों और दुश्वारियों के बाद भी वे राजनीति से पूरी तरह खारिज नहीं हुए थे. यह वह दौर था जब उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बेहद कमजोर पड़ने लगी थी. यह भी सच है कि इन राज्यों में अगर कांग्रेस को कोई वापस खड़ा कर सकता था, तो वह एन.डी. तिवारी ही थे.

लेकिन राहुल और सोनिया गांधी ने एन.डी. तिवारी पर दांव खेलने का जोखिम नहीं उठाया. रोहित के मुकदमे से हुई बदनामी तो इस की एक वजह थी ही, साथ ही वे 88 साल के हो रहे थे. लिहाजा पहले जैसी भागदौड़ नहीं कर सकते थे. एन.डी. तिवारी ने रोहित को कांग्रेस में जमाने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं. इस के बाद वह भाजपा की शरण में गए, लेकिन यहां के शटर भी उन के लिए गिर चुके थे.

जब उन्हें समझ आ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता तो वे एक शांत जिंदगी जीने की कोशिश में लग गए. रोहित और उज्ज्वला ने अपना फर्ज बखूबी निभाया और बीमार एन.डी. तिवारी की सेवा की.

जब दिल्ली के मैक्स अस्पताल में कैंसर जैसी घातक बीमारी से वह जूझ रहे थे, तब उन्हें उन्हीं लोगों ने सहारा दिया और संभाला, जिन्हें वह कभी दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक चुके थे. 18 अक्तूबर, 1925 को नैनीताल में जन्मे एन.डी. तिवारी की मौत भी 18 अक्तूबर, 2018 को ही हुई.

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अपूर्वा की एंट्री

मृत्यु से पहले वे बहू का मुंह देख चुके थे. रोहित ने अपनी पसंद की लड़की अपूर्वा शुक्ला से शादी कर ली थी. अपूर्वा मूलत: इंदौर की रहने वाली है और पेशे से रोहित की तरह वकील है. इन दोनों की मुलाकात अकसर सुप्रीम कोर्ट में होती रहती थी. अपूर्वा की पढ़ाई इंदौर में ही हुई थी, उस के पिता पी.के. शुक्ला इंदौर के नामी वकील हैं. इंदौर में प्रैक्टिस के साथसाथ अपूर्वा सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे लड़ने दिल्ली भी जाने लगी थी.

अपूर्वा एक मध्यमवर्गीय परिवार की महत्त्वाकांक्षी और बेइंतहा खूबसूरत लड़की है, जिस की प्रैक्टिस कोई खास नहीं चलती थी. रोहित जैसा भी था, उस की नजर और आकलन में बेशुमार दौलत का मालिक था. इसलिए उस ने शादी के लिए हां कर दी.

इधर रोहित की दिक्कत यह थी कि एक मशहूर शख्सियत का बेटा होने के बाद भी बराबरी के घराने की लड़की उस से शादी करने को शायद ही तैयार होती क्योंकि आखिरकार वह एक समय में नाजायज औलाद था.

उम्र का 40वां पड़ाव छू रहे रोहित को भी अपूर्वा भा गई थी. दोनों एक साल डेटिंग करने के बाद 11 मई, 2018 को शादी के बंधन में बंध गए. दिल्ली के नामी होटल अशोका में हुई इस शादी में देश की कई जानीमानी राजनैतिक हस्तियां शामिल हुई थीं.

अपूर्वा एन.डी. तिवारी की बहू और रोहित शेखर की पत्नी बन कर डिफेंस कालोनी के उन के आलीशान घर में आ कर रहने लगी थी. स्वास्थ्य कारणों से एन.डी. तिवारी बेटे की शादी में शामिल नहीं हो पाए थे.

इस शादी में सब कुछ ठीकठाक नहीं रहा था. एक ज्योतिषी की सलाह पर अपूर्वा की मां मंजुला शुक्ला ने एक खास तरह की पूजा संपन्न कराई थी, जिस से बेटी का दांपत्य जीवन सुखी रहे. वरमाला के वक्त स्टेज पर भी काफी कुछ असहज दिखाई दिया था, जिस का खुलासा रोहित की हत्या के बाद हुआ.

वह 13 अप्रैल, 2018 का दिन था, जब रोहित अपना वोट डालने के लिए उत्तराखंड के कोटद्वार के लिए अपने परिवारजनों के साथ कारों के काफिले के साथ रवाना हुआ था. रोहित की शादी के बाद उज्ज्वला दूसरे बंगले में रहने आ गई थीं जो तिलक लेन में स्थित है. उन के साथ रोहित का मुंहबोला भाई राजीव जो उज्ज्वला के पहले पति का बेटा है और उस की पत्नी कुमकुम रहते थे. रोहित का सौतेला भाई सिद्धार्थ रोहित के साथ रहता था.

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मां के दूसरे घर में चले जाने के बाद रोहित और भी बेलगाम हो चला था. उस के पास बेशुमार पैसा खर्च करने के लिए था, जिस का वारिस वह लंबी कानूनी लड़ाई और बदनामी के बाद बना था. लिहाजा उस ने पैसे की कीमत नहीं समझी. एन.डी. तिवारी की उसे राजनीति में लाने की कोशिशें नाकाम रही थीं यानी उसे अपने जैविक पिता के हिस्से की दौलत तो मिल गई थी, लेकिन शोहरत नहीं मिल पाई थी.

डिफेंस कालोनी के इस बंगले के अंदर क्या कुछ हो रहा है, इस का अंदाजा बाहर किसी को नहीं था. बड़े लोगों के घरों में किस तरह का तनाव पसरा रहता है, इस का अंदाजा आमतौर पर कोई नहीं लगा पाता. क्योंकि लोगों की नजर में पैसा है तो सब कुछ है, होता है. जबकि हकीकत में संभ्रांत और अभिजात्य कहे जाने वाले इन लोगों के घरों में भी खूब घटिया आरोप प्रत्यारोप, कलह और व्यभिचार होता है.

रोहित कोटद्वार में वोट डाल कर 15 अप्रैल की ही रात घर वापस आ गया था. वह शराब के नशे में था, लेकिन पूरी तरह धुत नहीं था. डिनर उस ने परिवारजनों के साथ लिया, इस के बाद उज्ज्वला तिलक लेन अपने घर चली गईं. उन के जाने के बाद अपूर्वा और रोहित में किसी बात पर कलह किचकिच हुई, जिस से दोनों का मूड औफ हो गया.

पतिपत्नी में हुई थी झड़प

कलह के बाद रोहित ऊपरी मंजिल के अपने कमरे में सोने चला गया और अपूर्वा रोज की तरह नीचे की मंजिल के कमरे में सोई. बंगले की बत्तियां बुझीं तो घरेलू नौकर गोलू और ड्राइवर अभिषेक भी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गए. भाई भाभी की आज की कलह के अंजाम से अंजान सिद्धार्थ भी अपने कमरे में जा कर पसर गया, जिस ने एक गंभीर बीमारी का मरीज होने के चलते शादी नहीं की थी.

दूसरे दिन सुबह सभी उठ कर अपने अपने काम में लग गए, सिवाए रोहित के जो अकसर देर से उठता था.चूंकि कुछ महीने पहले ही उस की बाईपास सर्जरी हुई थी, इसलिए कोई उस की नींद में खलल भी नहीं डालता था.  वैसे भी वह बीती रात कोटद्वार से लौटा था, इसलिए सभी को उस के देर तक सोने की उम्मीद थी. किसी ने उस के कमरे में झांकने तक की जरूरत नहीं समझी.

दोपहर ढलने लगी थी. शाम कोई 4 बजे गोलू किसी काम से रोहित के कमरे में गया तो वहां का नजारा देख घबराया हुआ उलटे पांव नीचे आ गया. उस ने अपूर्वा को बताया कि साहब बिस्तर पर बेसुध पड़े हैं और उन की नाक से खून बह रहा है. यह सुनते ही वह घबरा गई और उस ने तुरंत उज्ज्वला को फोन कर रोहित की हालत से अवगत कराया.

इत्तफाक से उज्ज्वला अपने इलाज के सिलसिले में उस वक्त साकेत के मैक्स अस्पताल आई थीं, इसलिए उन्होंने तुरंत अस्पताल की एम्बुलैंस डिफेंस कालोनी स्थित अपने घर भेज दी. एम्बुलैंस से अपूर्वा रोहित को ले कर मैक्स अस्पताल आ गई, लेकिन वहां मौजूद डाक्टरों ने चंद मिनटों की जांच के बाद रोहित को मृत घोषित कर दिया.

इस मामले में चूंकि मैडिको लीगल केस बनता था, इसलिए अस्पताल प्रबंधन ने इस की खबर पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. यह मामला चूंकि थाना डिफेंस कालोनी क्षेत्र का बनता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने थाना डिफेंस कालोनी को सूचना दे दी.

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                                               जांचकर्ता पुलिस टीम

पुलिस आई और जांच व पूछताछ में जुट गई. चूंकि मामला एन.डी. तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध मौत का था, इसलिए पुलिस ने संभल कर काम लिया. अपने बयान में उज्ज्वला ने रोहित की बाईपास सर्जरी होने की बात बताई और यह भी बताया कि उस के पिता की मौत भी ब्रेन हेमरेज से हुई थी तो एक क्षण को पुलिस वालों को लगा कि यह स्वाभाविक मौत भी तो हो सकती है. अपूर्वा ने भी रात का घटनाक्रम दोहरा दिया.

चूंकि मौत संदिग्ध थी, इसलिए पुलिस कोई लापरवाही न करते हुए रोहित के घर तक गई. मौत का यह शक उस वक्त यकीन में बदलने लगा, जब अपूर्वा ने कानून की दुहाई देते पुलिस को घर में जाने से रोकने की कोशिश की.

रोहित की लाश पोस्टमार्टम के लिए सौंप चुके पुलिस वालों ने जब रोहित के बैडरूम की तलाशी ली तो बिस्तर के आसपास तरह तरह की दवाइयां बिखरी पड़ी थीं. रोहित के सभी परिवारजन मौत को स्वाभाविक बता रहे थे, इसलिए पुलिस ने कमरे को सील कर दिया. अब पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था.

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थानागाजी की निर्भया : सहानुभूति या राजनीति?

लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी. राजस्थान में 2 चरणों में मतदान होना था. पहले चरण में13 सीटों के लिए 29 अप्रैल को वोट डाले जाने थे, जबकि दूसरे चरण में 12 सीटों के लिए 6 मई को मतदान होना था. पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार जोरों पर था. एक तरफ सूरज आग उगल रहा था और दूसरी तरफ सियासत की गरमी थी.

अलवर जिले में एक तहसील है थानागाजी. अलवरजयपुर स्टेट हाइवे पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का बाघ अभयारण्य थानागाजी तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है.

बीती 26 अप्रैल की बात है, दोपहर के करीब 3 बजे थे. आसमान में कुछ बादल घिर आने से सूरज के तेवर कम हो गए थे. थानागाजी इलाके में एक नवदंपति मोटरसाइकिल पर तालवृक्ष की तरफ जा रहे थे. पति मोटरसाइकिल चला रहा था और पत्नी निर्भया उस के पीछे बैठी थी. निर्भया 19 साल की थी और उस का पति 20 साल का. दोनों की कुछ ही दिन पहले शादी हुई थी.

थानागाजी अलवर बाइपास पर दुहार चौगान वाले रास्ते से कुछ दूर अचानक 2 मोटरसाइकिलों पर सवार 5 युवक तेजी से उन के पास आए. इन युवकों ने नवदंपति की बाइक के आगे अपनी मोटरसाइकिलें लगा कर उन्हें रोक लिया. पतिपत्नी समझ ही नहीं पाए कि क्या बात हो गई, उन्हें क्यों रोका गया.

वे कुछ सवाल करते, इस से पहले ही पांचों युवक उन्हें धमकाते और अश्लील शब्द कहते हुए वहां से सड़क के एक तरफ कुछ दूर बने रेत के बड़ेबडे़ टीलों की तरफ ले गए. रेत के ये टीले इतने ऊंचेऊंचे थे कि उन के पीछे क्या हो रहा है, सड़क से गुजरते लोगों को पता नहीं लग सकता था. टीलों के पीछे से सड़क तक आवाज भी नहीं पहुंच सकती थी.

पतिपत्नी को रेत के टीलों के पीछे ले जा कर पांचों युवकों ने उन से मारपीट की. पति को अधमरा कर एक तरफ बैठा दिया गया. फिर पांचों युवकों ने 19 साल की उस निर्भया से दरिंदगी की. पति ने पत्नी को बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह दरिंदों का मुकाबला नहीं कर सका.

पांचों दरिंदे निर्भया को नोचते रहे. वह हाथ जोड़ कर छोड़ने की भीख मांगती रही, लेकिन दरिंदे अपने साथियों की मर्दानगी पर हंसते और अट्टहास लगाते रहे. निर्भया चीखती रही, लेकिन उस की आवाज उस जंगली इलाके के रेतीले टीबों में ही गूंज कर रह गई.

दरिंदों ने निर्भया के कपड़े फाड़ कर दूर फेंक दिए. इस दौरान वे हैवान अपने मोबाइल से दरिंदगी का वीडियो भी बनाते रहे. इस दौरान युवक आपस में छोटेलाल, जीतू और अशोक के नाम ले रहे थे. जब दरिंदों का मन भर गया तो उन्होंने निर्भया के पति का मोबाइल नंबर लिया. फिर उसे जान से मारने और वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर पांचों मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर भाग गए.

उन के जाने के काफी देर बाद तक लुटेपिटे पतिपत्नी एकदूसरे को ढांढस बंधाते हुए अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते रहे. कुछ देर बाद जब उन के होशहवास ठीक हुए तो वे फटे कपड़े लपेट कर मोटरसाइकिल से अपने गांव गए.

गांव पहुंच कर उन्होंने घर वालों को इस घटना के बारे में बताया. निर्भया और उस का पति अनुसूचित जाति से होने के साथ गरीब भी थे. दरिंदगी का वीडियो वायरल करने, पति को मारने की धमकी दिए जाने के कारण निर्भया ने उस समय पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई. घटना के दूसरे दिन निर्भया अपने मायके चली गई और उस का पति जयपुर चला गया, जहां वह पढ़ रहा था.

तीसरे दिन 28 अप्रैल की सुबह निर्भया के पति के मोबाइल पर छोटेलाल का फोन आया. वह मिलने के लिए कह रहा था. निर्भया के पति ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘बेटा, मिलना तो तुझे पड़ेगा वरना वीडियो वायरल कर देंगे.’’

निर्भया के पति ने कहा कि तुम से मेरा भाई मिल लेगा. उस ने छोटेलाल को चचेरे भाई का मोबाइल नंबर दे दिया. इस के बाद पति ने यह बात अपने चचेरे भाई को बता दी. उस ने यह सच्चाई निर्भया के पति के सगे भाई को बता दी. छोटेलाल उसे कभी कराणा बुलाता तो कभी थानागाजी आने की बात कहता.

दोपहर में छोटेलाल का फिर फोन आया और उस ने 10 हजार रुपए की डिमांड की. निर्भया के पति ने कहा कि मैं पढ़ता हूं, 10 हजार कहां से दूंगा. इस पर उस ने कहा, ‘‘देने तो पड़ेंगे चाहे एक हजार रुपए कम दे देना.’’

वीडियो वायरल के डर से निर्भया के पति ने उसे कुछ हजार रुपए भिजवा भी दिए. पति के भाई ने यह बात पिता को बताई तो उन्होंने अपने बेटे को जयपुर से बुलवा लिया.

रुपए ऐंठने के बाद भी दरिंदों ने निर्भया के पति को काल कर के फिर पैसे मांगे तो निर्भया का परिवार अपने परिचितों के माध्यम से थानागाजी के विधायक कांती मीणा के पास पहुंचा. उन्होंने विधायक को सारी बात बताई. विधायक ने उन की रिपोर्ट दर्ज करवाने और आरोपियों के खिलाफ काररवाई कराने का आश्वासन दिया, लेकिन चुनाव के बाद.

30 अप्रैल को निर्भया और उस का पति अलवर जा कर एसपी राजीव पचार से मिले. निर्भया ने रोतेरोते एसपी को पति के सामने हुए सामूहिक दुष्कर्म की आपबीती बताई. एसपी ने थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को वाट्सऐप पर पीडि़ता की रिपोर्ट भेज कर मुकदमा दर्ज करने को कहा.

पुलिस को गैंगरेप भी मामूली सी घटना लगा

पुलिस ने इस शर्मनाक वारदात को भी साधारण तरीके से लिया. थानागाजी थानाप्रभारी ने 2 मई को दोपहर 2.31 बजे इस मामले में धारा 147, 149, 323, 341, 354बी, 376डी, 506 आईपीसी और एससी/एसटी ऐक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. रिपोर्ट में छोटेलाल गुर्जर निवासी कराणा बानसूर और जीतू व अशोक के नाम थे, जबकि 2 आरोपी अज्ञात थे.

भले ही पुलिस ने घटना के 7वें दिन मुकदमा दर्ज कर लिया, लेकिन मीडिया से इसे छिपा लिया. पुलिस ने मामले की जांच में भी लापरवाही बरती. उस दिन पीडि़ता का मैडिकल भी नहीं कराया गया. न ही अभियुक्तों को पकड़ने की कोई काररवाई की गई.

पुलिस को यह बात भी बता दी गई थी कि दरिंदे बारबार फोन कर के वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन पुलिस ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही इस के दूरगामी परिणामों के बारे में सोचा.

रिपोर्ट दर्ज होने के दूसरे दिन 3 मई को पुलिस ने अलवर में पीडि़ता का मैडिकल कराया. पुलिस ने उसी दिन पीडि़ता, उस के पति, पिता और ससुर के बयान दर्ज किए. उसी दिन पुलिस ने पीडि़ता को साथ ले जा कर मौका नक्शा बनाया.

लापरवाही इतनी रही कि एक आरोपी का नामपता और मोबाइल नंबर होने के बावजूद पुलिस ने उसे पकड़ना तो दूर, उसे थाने बुलाने की जहमत तक नहीं उठाई. इस से उन दरिंदों के हौसले बढ़ गए. इस बीच फोन पर बारबार धमकाने के बावजूद जब दोबारा पैसे नहीं मिले तो दरिंदों ने 4 मई को सोशल मीडिया पर वे वीडियो वायरल कर दिए, जो उन्होंने निर्भया से दरिंदगी करते हुए बनाए थे.

6 मई तक ये वीडियो असंख्य मोबाइलों तक पहुंच चुके थे. 6 मई को ही राजस्थान में अलवर सहित 12 लोकसभा सीटों के लिए मतदान था. मतदान के बाद पुलिस ने इस घटना को मीडिया में उजागर किया. तब तक सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो बम बन चुका था, जो किसी भी गैरतमंद आदमी को हिला देने के लिए काफी था.

7 मई को राजस्थान के मीडिया में थानागाजी गैंगरेप की सुर्खियों ने लोकसभा चुनाव की गरमी को भी ठंडा कर दिया. मीडिया ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए सवाल उठाए कि चुनाव के कारण इस घटना का खुलासा नहीं कर पुलिस क्या किसी को सियासी फायदा देना चाहती थी? या फिर समझौता कर इस मामले को रफादफा करना चाहती थी? पुलिस कहीं आरोपियों के पक्ष में तो नहीं थी? अगर ऐसा नहीं था तो वीडियो वायरल होने के बाद ही पुलिस ने यह घटना उजागर क्यों की?

वीडियो वायरल होने से यह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. इस के बाद सरकार और पुलिस अफसरों की नींद खुली. सरकार ने आननफानन में अलवर के एसपी आईपीएस अधिकारी राजीव पचार को हटा कर पदस्थापन की प्रतीक्षा में रख दिया. थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को निलंबित कर दिया गया. इसी थाने के एएसआई रूपनारायण, कांस्टेबल रामरतन, महेश कुमार और राजेंद्र को लाइन हाजिर कर दिया गया.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि पुलिस की ओर से अगर किसी भी स्तर पर लापरवाही हुई है तो सख्त काररवाई होगी. महिला सुरक्षा के प्रति सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना को बेहद शर्मनाक बताया.

डीजीपी कपिल गर्ग ने जयपुर में प्रैस कौन्फ्रैंस कर कहा कि थानागाजी थाने के सभी पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच की जाएगी. रिपोर्ट दर्ज होने के 5 दिन तक निष्क्रिय बैठी पुलिस ने आननफानन में अभियुक्तों को पकड़ने के लिए 14 टीमों का गठन कर दिया. अलवर से ले कर दिल्ली, गुड़गांव और बीकानेर तक पुलिस टीमें भेजी गईं.

पुलिस ने भागदौड़ कर एक 22 वर्षीय अभियुक्त इंदराज गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. वह जयपुर जिले के प्रागपुरा का रहने वाला था. इस के अलावा वीडियो वायरल करने के आरोप में काली खोहरा निवासी मुकेश गुर्जर को सरिस्का के जंगल से पकड़ा गया.

गैंगरेप में भी राजनीति

सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आने पर एक ओर जहां लोगों में गुस्सा था, वहीं राजनीति भी शुरू हो गई थी. थानागाजी कस्बे में सर्वसमाज की विशाल पंचायत हुई. इस में राज्यसभा सांसद डा. किरोड़ीलाल मीणा और थानागाजी विधायक कांती मीणा भी शामिल हुए.

पंचायत में फैसला लिया गया कि 24 घंटे में सभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर कस्बे के बाजार बंद कर आंदोलन किया जाएगा. डा. किरोड़ीलाल मीणा ने 8 मई को हजारों कार्यकर्ताओं के साथ जयपुर में मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव करने की भी चेतावनी दी. राजनीति में ऐसा ही होता है.

जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह ने तुरतफुरत पीडि़ता को 4 लाख 12 हजार 500 रुपए की आर्थिक सहायता राशि मंजूर कर दी. दरअसल एससी/एसटी की महिला से दुष्कर्म का मुकदमा होने पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से प्रथम किस्त के रूप में इतनी राशि देने का प्रावधान है.

8 मई को इस घटना के विरोध में अलवर से ले कर जयपुर तक धरनाप्रदर्शन होते रहे. थानागाजी में हजारों लोगों ने अलवरजयपुर सड़क मार्ग जाम कर दिया और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी पीडि़ता से मिलने के लिए थानागाजी से 7 किलोमीटर दूर उस के गांव पहुंच गए.

लोगों ने कहा कि पुलिस प्रशासन के साथ नेता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. हम ने घटना की जानकारी देने के लिए कई नेताओं को फोन किए लेकिन किसी ने मदद नहीं की.

पीडि़त परिवार ने राजस्थान सरकार के श्रम राज्यमंत्री और अलवर ग्रामीण के विधायक टीकाराम जूली को 30 अप्रैल को फोन किया तो उन्होंने कहा कि अभी चुनाव में व्यस्त हैं. बाद में जूली ने माना कि फोन आया था, लेकिन यह नहीं पता था कि मामला इतना गंभीर है.

जयपुर में राज्यसभा सांसद डा. किराड़ीलाल मीणा एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री आवास के पास सिविललाइन फाटक पर प्रदर्शन किया. इस दौरान प्रदर्शनकारी और पुलिस आपस में गुत्थमगुत्था हो गए. आधे घंटे तक हंगामा होता रहा.

बाद में प्रदर्शनकारियों ने राजभवन जा कर राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया. राजस्थान यूनिवर्सिटी में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के पुतले के साथ प्रदर्शन किया. अलवर में विभिन्न संगठनों के अलावा महिलाओं ने भी जुलूस निकाले और अधिकारियों को ज्ञापन दिए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में प्रसंज्ञान ले कर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया. साथ ही मुख्य सचिव और महानिदेशक से 6 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी.

इस मामले में उस समय नया मोड़ आ गया, जब पीडि़ता के पति ने राज्य के पूर्वमंत्री और थानागाजी के पूर्व विधायक हेमसिंह भड़ाना पर समझौते का दबाव बनाने का आरोप लगाया. हालांकि भड़ाना ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता कर सिरे से नकार दिया.

पुलिस ने 8 मई की रात तक 3 अन्य आरोपियों अशोक गुर्जर, महेश गुर्जर और हंसराज गुर्जर को भी गिरफ्तार कर लिया. मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगा था.

9 मई को भी अलवर और जयपुर सहित पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन होता रहा. इस के बावजूद सरकार की लापरवाही रही कि वायरल वीडियो ब्लौक करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश तक नहीं दिए. यह वीडियो गूगल, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया पर 9 मई तक पीडि़तों की इज्जत तारतार करता रहा. भाजपा ने अलवर में धरना दे कर मामले की जांच सीबीआई से कराने, पीडि़ता को 50 लाख रुपए मुआवजा देने, एसपी व थानाप्रभारी पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की.

महिला आयोग भी आया आगे

राष्ट्रीय महिला आयोग के दल ने थानागाजी पहुंच कर पीडि़ता से मुलाकात की. आयोग की सदस्य डा. राहुल बेन देसाई और नेहा महाजन ने इस दौरान मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विजिलेंस गोविंद गुप्ता और आईजी एस. सेंगाथिर को सोशल मीडिया पर वीडियो फोटो अपलोड करने वालों पर तुरंत एक्शन लेने के निर्देश दिए. देश भर से विभिन्न जनसंगठनों के पदाधिकारी भी थानागाजी पहुंचे और पीडि़त परिवार से मिले.

पुलिस ने घटना के 13 दिन बाद मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. उसे सीकर जिले के अजीतगढ़ से पकड़ा गया, जहां वह एक ट्रक में छिपा हुआ था. छोटेलाल इस ट्रक में सवार हो कर गुजरात भागने की फिराक में था. छोटे शराब की दुकान पर सेल्समैन का काम करता था. बानसूर के रतनपुरा गांव निवासी छोटेलाल के खिलाफ 2 आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं.

दूसरी ओर, पुलिस ने अलवर की अदालत में पीडि़ता के धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराए. वहीं, राज्य सरकार ने मामले की प्रशासनिक जांच के लिए जयपुर के संभागीय आयुक्त को नियुक्त किया. इस के अलावा चुनाव आचार संहिता लगी होने के कारण निर्वाचन आयोग से अनुमति मिलने के बाद आईपीएस औफिसर देशमुख पारिस अनिल को अलवर का एसपी नियुक्त किया गया.

पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाने पर 10 मई को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष एल. मुरुगन इस घटना की जांच करने थानागाजी पहुंचे. वे पीडि़ता और उस के परिवार से भी मिले. इस दौरान राजस्थान के मुख्य सचिव डी.बी. गुप्ता और पुलिस महानिदेशक कपिल गर्ग मौजूद रहे.

आयोग के उपाध्यक्ष ने पीडि़ता से मुलाकात के बाद कहा कि 30 अप्रैल को एसपी को परिवाद देने के बाद भी पुलिस ने 2 मई को मुकदमा दर्ज किया और 7 मई को ऐक्शन में आई, यह साफतौर पर सरकार की लापरवाही है. हम राज्य सरकार की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं.

फिलहाल प्रशासन को पीडि़ता के परिवार की नौकरी की मांग और सरकारी सहायता देने के लिए कहा गया है. इस के अलावा केस दर्ज करने में लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और और पीडि़त परिवार की स्थाई सुरक्षा की व्यवस्था करने को भी कहा गया है.

मुरुगन ने कहा कि आयोग के निर्देश पर यूट्यूब से घटना के वीडियो हटवाए गए हैं. पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए हर जरूरी कदम उठा रहे हैं.

जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उच्चस्तरीय बैठक कर ऐसे मामलों में कड़े कदम उठाने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि अगर कोई थानेदार थाने में एफआईआर दर्ज नहीं करेगा तो एसपी को दर्ज करनी होगी. ऐसे थानेदार के खिलाफ सख्त काररवाई होगी. महिला अत्याचार की घटनाओं की मौनिटरिंग के लिए हर जिले में महिला सुरक्षा डीएसपी का नया पद सृजित किया जाएगा.

यह सिर्फ महिलाओं के अपहरण, दुष्कर्म, गैंगरेप आदि मामलों की जांच करेगा. यह डीएसपी महिला थानों की मौनिटरिंग के साथ सामाजिक न्याय व महिला बाल विकास विभाग से समन्वय स्थापित करेगा और महिलाओं व बच्चों पर होने वाले अत्याचार के मामलों में काररवाई करेगा. गहलोत ने कहा कि थानागाजी के मामले को केस औफिसर स्कीम में ले कर आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी.

11 मई को थानागाजी गैंगरेप मामले में देश की सियासत गरमा गई. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजस्थान सरकार को सीधे निशाने पर लिया.

पीडि़त से हमदर्दी सिर्फ नाम की

मायावती ने लखनऊ में आयोजित चुनावी रैली में इसे अतिघृणित घटना बताते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस सरकार के चलते उस दलित महिला को इंसाफ मिलेगा.

पुलिस ने इस मामले में अलवर जेल में न्यायिक अभिरक्षा भुगत रहे 3 आरोपियों हंसराज गुर्जर, महेश गुर्जर व इंदरराज गुर्जर की शिनाख्त परेड कराई. इस के बाद इन्हें 13 मई तक रिमांड पर लिया गया. 3 आरोपी पहले ही 13 मई तक रिमांड पर थे. बाद में अदालत से सभी 6 आरोपियों की रिमांड अवधि 16 मई तक बढ़वा ली गई.

14 मई को इस मामले में जयपुर कूच करने निकले सांसद डा. किरोड़ीलाल और उन के समर्थकों ने दौसा में जयपुरदिल्ली रेलवे ट्रैक जाम करने का प्रयास किया. पुलिस ने खदेड़ा तो किरोड़ी समर्थकों ने पथराव किया. पथराव के कारण कई ट्रेनें बीच रास्ते में रोक दी गईं. काफी देर तक लाठीभाटा जंग होती रही.

इस जंग में 5 पुलिसकर्मियों सहित 8 लोग घायल हो गए. एसपी व एडीएम सहित कई अधिकारियों को भी चोटें आईं. बाद में पुलिस ने किरोड़ी के साथ पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़, विधायक हनुमान बेनीवाल व गोपीचंद को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

दूसरी ओर, पीडि़ता के पिता ने कहा कि उन का परिवार इस घटना के बाद लोगों के आनेजाने और इस से हुई बदनामी से परेशान है. उन्होंने सरकार से मांग की कि पीडि़त दंपति को सरकारी नौकरी दे कर किसी ऐसी जगह भेज दिया जाए, जहां उन्हें कोई न पहचान सके. 7 दिन में इतने नेता और लोग घर पहुंचे कि पूरे देश और समाज को पता चल गया कि वीडियो में दिखे पतिपत्नी का मकान यह है.

15 मई को भी अलवर व जयपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में आंदोलन होते रहे. थानागाजी में सर्वसमाज ने आक्रोश रैली निकाली. इस दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का थानागाजी आने का कार्यक्रम था लेकिन मौसम खराब होने से उन का हेलीकौप्टर दिल्ली से उड़ान नहीं भर सका.

16 मई को राहुल गांधी थानागाजी क्षेत्र में पीडि़ता से मिलने उस के घर पहुंचे. राहुल ने पीडि़ता, उस के पति और उस के परिवार के लोगों से करीब 15 मिनट तक अकेले में बात कर घटना की जानकारी ली. घटना के बारे में बताते हुए पीडि़ता व उस का पति रो पड़े तो राहुल भी भावुक हो गए.

राजनीति के लिए नेताओं के घडि़याली आंसू

राहुल ने पीडि़ता के पति को गले लगाया अैर कहा कि यह राजनीति नहीं है, आप को न्याय जरूर मिलेगा. परिवार ने पीडि़ता व उस के पति के पुनर्वास, सरकारी नौकरी व आरोपियों को कठोर सजा दिलाने की मांग रखी.

इस दौरान मौजूद मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि पीडि़ता के लिए सरकारी नौकरी का इंतजाम किया जाएगा. अलवर जिले में अपराध के आंकड़ों को देखते हुए 2 एसपी लगाए जाएंगे. इस केस में 7 दिनों में चालान पेश कर दिया जाएगा.

पुलिस ने सभी आरोपियों को रिमांड अवधि पूरी होने पर अलवर की अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस ने अदालत में अर्जी पेश कर पीडि़ता के पति को मोबाइल पर धमकी दे कर 10 हजार रुपए मांगने के आरोपी छोटेलाल की आवाज के नमूने लेने की अनुमति मांगी.

17 मई को इस मामले की प्रशासनिक जांच कर रहे जयपुर के संभागीय आयुक्त के.सी. वर्मा ने अलवर में जनसुनवाई कर घटना से संबंधित तथ्य जुटाए. दूसरी ओर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने राजस्थान में बढ़ रहे यौन अपराधों के मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक और सरकार से जवाब तलब किया है.

यह विडंबना ही है कि चुनाव के दौरान थानागाजी का यह मामला पूरे देश में चर्चा में आ गया. इस से राजनीति में भी उबाल आया. सभी प्रमुख दलों के नेता बयानबाजी करते रहे. कुछ लोग राजनीतिक रोटियां भी सेकते रहे. जबकि जरूरत थी पीडि़ता का दर्द कम करने की. इस के लिए जरूरी था कि राजनीति बंद होती.

पीडि़ता का पुनर्वास होना जरूरी है. सरकारी नौकरी से उसे कुछ सहारा मिलेगा तो शायद वह अपने कामकाज में व्यस्त हो कर दिल दहलाने वाली इस घटना को भुलाने की कोशिश कर सके. साथ ही ऐसे दरिंदों को कठोर सजा मिलनी चाहिए, ताकि ऐसी मानसिकता के लोगों को सबक मिल सके.

थानागाजी गैंगरेप मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के 16 दिन बाद 18 मई को अलवर की अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. 500 पेज की चार्जशीट में 6 आरोपी हैं. इनमें 5 मुलजिमों के खिलाफ गैंगरेप, अपहरण, रास्ता रोकने, मारपीट, निर्वस्त्र करने, जातिसूचक शब्द बोलने, मानसम्मान को ठेस पहुंचाने, डकैती व धमकी देने सहित प्रताडि़त करने और एक अभियुक्त पर वीडियो वायरल करने का आरोप है.

पुलिस ने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए केस औफिसर नियुक्त किया है. अदालत में दिनप्रतिदिन सुनवाई के लिए अरजी दी गई है, ताकि आरोपियों को जल्द सजा मिल सके. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ जिन धाराओं में चालान पेश किया है, उन में आरोप साबित होने पर इन दरिंदों को मरते दम तक उम्रकैद की सजा हो सकती है.

मामले का वीडियो फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करने पर पुलिस ने यूट्यूब पर बने एक चैनल टौप न्यूज 24 के खिलाफ अलवर शहर कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया है. यह मुकदमा कोतवाली थानाप्रभारी कन्हैयालाल ने खुद दर्ज कराया है.

दूसरी ओर, सरकार ने पीडि़ता को सरकारी नौकरी देने की तैयारी शुरू कर दी है. सरकार ने उसे राजस्थान पुलिस या जेल पुलिस में से कोई एक कांस्टेबल पद चुनने का विकल्प दिया है. इस में पीडि़ता ने राजस्थान के जयपुर सिटी में पोस्टिंग मांगी.

—पीडि़ता का निर्भया नाम काल्पनिक है

एसआई भरती घोटाला : वरदी उतरी, मिली जेल – भाग 1

राजस्थान में भाजपा की सरकार बन गई थी. नए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 15 दिसंबर, 2023 को पिछले सीएम अशोक गहलोत की जगह ले ली थी. उन के सामने प्रदेश के विकास के अतिरिक्त कई चुनौतियां थीं. उन में कई सालों से सब से गंभीर मुद्दा बना पेपर लीक का भी था.

उन्हें सब से पहले इन से जुड़ी मौजूदा समस्याओं को सुलझाना था. चरम पर बेरोजगारों का सरकार विरोधी धरना और आक्रोश प्रदर्शन, नकली कैंडिडेट का परीक्षाओं में शामिल होने की घटनाओं से पिछली सरकारों की किरकिरी हो चुकी थी.

इसी साल जनवरी में 19 तारीख को 16वीं राजस्थान विधानसभा के पहले सत्र की जैसे ही शुरुआत हुई, सदन में हंगामा होने लगा. परीक्षा में पेपर लीक को ले कर कांग्रेस के विधायक और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा अपनी सीटे से उठे और तीखे अंदाज में बोलने लगे, ”अध्यक्ष महोदय! मैं इस पहले सत्र में प्रदेश की गंभीर समस्या से अवगत करवाना चाहता हूं, जो बहुत बड़ी है. वह कई सालों से नासूर बनी हुई है. प्रदेश में बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है. नौकरी के नाम पर लूट मची हुई है.

”पेपर लीक करवाया जा रहा है… परीक्षाओं में नकली कैंडिडेट उतारे जा रहे हैं. उन का गिरोह बन चुका है. अयोग्य मोटी रकम दे कर नौकरी हासिल कर ले रहे हैं… योग्य पिछड़ रहे हैं…’’

इस बीच सदन में बैठे कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के विधायक ”शेम शेम…’’ करते हुए जोरजोर से बेंच पीटने लगे. हंगामा करने लगे. उन्हें टोकते हुए विधानसभा अध्यक्ष बीच मे ही बोले, ”शांत हो जाइए, सभी शांत हो जाइए! आप जो कुछ कहना चाहते हैं, साफसाफ सदन को बताइए.’’

”अध्यक्ष महोदय, मैं आप से सीधे और साफ लफ्जों में गुजारिश करता हूं कि भाजपा शासन के दौरान 2008 से 2013 के बीच पेपर लीक मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी जाए.’’ इसी के साथ गाविंद सिंह अपनी बात पूरी कर बैठ गए.

उन के बैठते ही सदन में एक बार फिर हंगामा होने लगा. अगले वक्ता के रूप में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के विधायक हनुमान बेनीवाल का नाम पुकारा गया. बेनीवाल ने भी एक सवाल के जरिए पेपर लीक के मुद्दे को ही उठाया. इस का जवाब गृहमंत्री की ओर से स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह ने दिया.

उन्होंने कहा, ”अध्यक्ष महोदय, नई सरकार आने के बाद 2 बड़ी परीक्षाएं हुई हैं, और उन में किसी में भी कोई गड़बड़ी सामने नहीं आई है. जबकि 2021 में 5, 2022 में 10 और 2023 में 5 पेपर लीक हुए थे…तो फिर इन मामलों में भी सीबीआई जांच का आदेश दिया जाए.’’

इसी के साथ स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह ने कहा कि इन सभी मामलों में जांच का काम एसआईटी को दिया जा चुका है. उन के पूरा होने के बाद आगे की काररवाई की जाएगी.

उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा, ”चूंकि जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा की जा रही है, इसलिए अगर एजेंसियां उचित समझती हैं तो आगे की कोई भी जांच सीबीआई को सौंपी जा सकती है.’’

मंत्री महोदय ने यह भी बताया कि 2014 के बाद से दर्ज 33 पेपर लीक मामलों में से 32 में आरोप पत्र अदालतों में दायर किए जा चुके हैं और उन में 615 लोग गिरफ्तार भी किए गए हैं. इन आरोपियों में 49 सरकारी अधिकारी शामिल हैं, जिन में ज्यादातर शिक्षक हैं और उन में से 11 को सेवा से बरखास्त कर दिया गया है. हालांकि राजस्थान उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद एक मामले में काररवाई रोक दी गई है.

इतना कहना था कि विपक्षी विधायकों ने राज्य सरकार द्वारा राजीव गांधी युवा मित्र इंटर्नशिप कार्यक्रम को बंद करने के मुद्दे पर वाकआउट कर दिया. इस पर कांग्रेस विधायक रोहित बोहरा ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार द्वारा लगाए गए लगभग 5,000 युवा मित्रों को बंद कर दिया गया था और कार्यक्रम को निलंबित कर दिया गया था, जिसे बिना देरी किए फिर से शुरू किया जाना चाहिए.

उन्होंने बताया कि युवा मित्रों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और सेवाओं के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए लगाया गया था और उन्हें वजीफा दिया गया था.

एक तरफ विधानसभा में पेपर लीक वादविवाद का बड़ा मुद्दा गरमाया हुआ था, दूसरी तरफ इस की वजह से लाखों युवा आक्रोश में उबल रहे थे. वे प्रदेश के कोनेकोने से चल कर राजधानी जयपुर में जुटने लगे थे. सरकार विरोधी तेवर के साथ अपनी मांगों को ले कर विरोध प्रदर्शन करन लगे थे. कोई हताशनिराश था तो कोई गुस्से में था.

जयपुर में शहीद स्मारक पर नौकरी की नियुक्ति के लिए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुका था. वहां आए एक प्रदर्शनकारी राजेंद्र (बदला नाम) को 2021 में पेपर लीक घोटाले के कारण दोबारा परीक्षा देनी पड़ी थी. उस ने परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन एक ‘तकनीकी दिक्कत’ के कारण नौकरी नहीं मिल पाई थी.

नौकरी पाना राजेंद्र का एक सपना है, जो उस के जीवन से करीबकरीब खत्म हो चुका है और वह इसे हासिल करने के करीब भी नहीं है. वैसे 33 साल की उम्र में भी वह सरकारी शिक्षक बनने का इंतजार कर रहा है.

राजस्थान के मेगा पेपर लीक रैकेट में समाधान की प्रतीक्षा में है. उस की तरह ही मोहम्मद आबिद है. वह राजमिस्त्री का काम करता है. घरों में पेंटिंग आदि का छिटपुट काम करता है. अखबार विक्रेता का भी काम कर लेता है. उस ने भी टीचर बहाली की परीक्षा दी थी.

इन के जैसे कई लोग हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरियों में भरती के इंतजार में अपनी बहुमूल्य युवावस्था को खो दिया है. ऐसा परीक्षाओं में पेपर लीक, संगठित धोखाधड़ी, पुनर्परीक्षा, परीक्षा रद्द के कारण हुआ है.

चाहे वह शिक्षक पदों के लिए हो या स्वास्थ्य अधिकारी, पुलिस कांस्टेबल, इंसपेक्टर या वन रक्षक के रूप में नौकरियों के लिए हो. कोई भी नहीं बचा है, जिस की परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं न हुई हों.

राजेंद्र और आबिद जैसे करीब 500 अन्य युवा जयपुर में पुलिस आयुक्त कार्यालय के सामने एक विरोध शहीद स्मारक पर डेरा डाल चुके थे. उन का जीवन अधर में अटका हुआ है. उन की मांग हमेशा के लिए भरती की है. फिलहाल वे और कुछ नहीं कर पा रहे हैं.

आबिद बताते हैं कि ‘मैं शिक्षण पेशे की ओर इसलिए आकर्षित हुआ हूं, क्योंकि एक शिक्षक को समाज में सम्मान मिलता है. मैं चुने जाने के बिलकुल करीब था, लेकिन मेरी तकलीफ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है.’

इस साल फरवरी माह में धरने पर बैठे अधिकांश प्रदर्शनकारी 2021 राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (आरईईटी) पेपर लीक के घाव से भरे हुए थे. वे एकदूसरे के जख्मों को साझा कर रहे थे. उस वर्ष लगभग 31,000 पदों के लिए 16 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने इस परीक्षा में हिस्सा लिया था. इन के नतीजे जनवरी 2022 में घोषित किए गए थे, लेकिन धोखाधड़ी, कदाचार के आरोपों और आगामी राजनीतिक विवाद के चलते राज्य सरकार ने पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी थी.

जब दोबारा परीक्षा कराई गई तो आबिद एक बार फिर परीक्षा में पास हो गया, लेकिन राजस्थान सरकार के अधिकारियों ने कथित तौर पर तकनीकी कारणों से भरती को रोक दिया था.

रोहित शेखर का पितृ दोष – भाग 1

अपने वक्त के जमीनी, धाकड़ और लोकप्रिय कांग्रेसी नेता एन.डी. तिवारी का अपना अलग कद था और अलग  साख थी. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे इस कद्दावर नेता की कांग्रेसी आलाकमान कभी अनदेखी नहीं कर सका. वे केंद्रीय मंत्री भी रहे और राजनैतिक कैरियर के उत्तरार्द्ध में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी बनाए गए थे.

ब्राह्मण समुदाय में खासी पैठ रखने वाले एन.डी. तिवारी की गिनती रंगीनमिजाज और विलासी नेताओं में भी होती थी. इस की एक उजागर मिसाल था उन का जैविक बेटा रोहित शेखर, जिस की हत्या  28 अप्रैल को अपने ही घर में हो गई थी. हत्या करने वाली भी उस की अपनी पत्नी अपूर्वा शुक्ला थी.

इस हाइप्रोफाइल हत्याकांड में कोई खास पेंचोखम नहीं हैं, लेकिन रोहित की कहानी फिल्मों से भी परे अकल्पनीय है. खासे गुलाबी रंगत वाले इस युवा के नैननक्श पहाड़ी इलाकों में रहने वाले युवाओं सरीखे ही थे. क्योंकि उस की पैदाइश और परवरिश भी वहीं की थी.

साल 2007 तक रोहित को नहीं मालूम था कि वह कोई ऐरागेरा नहीं बल्कि एन.डी. तिवारी जैसी सियासी शख्सियत का खून है. रोहित शेखर को जब अपनी मां से पता चला कि वह नारायण दत्त तिवारी का बेटा है तो उस ने विकट का दुस्साहस दिखाते हुए उन पर अपने बेटे होने का दावा कर डाला.

रोहित की मां उज्ज्वला शर्मा कभी एन.डी. तिवारी की प्रेमिका हुआ करती थीं. जिन्होंने तनमन से खुद को उन्हें सौंप दिया था. इस प्यार या अभिसार, कुछ भी कह लें, की देन था रोहित शेखर जिसे कोर्ट के आदेश के बाद ही एन.डी. तिवारी ने बेटा माना.

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उज्ज्वला गर्भवती हुईं तो एन.डी. तिवारी यह सोच कर घबरा उठे थे कि कहीं वह होने वाली संतान को ले कर होहल्ला न मचाने लगे. क्योंकि वे पहले से शादीशुदा थे और पत्नी सुशीला से उन्हें कोई संतान नहीं हुई थी, जिन की मृत्यु 1991 में हुई थी.

कभी पेशे से दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत की शिक्षिका रहीं उज्ज्वला खुद भी कांग्रेसी कार्यकर्ता और छोटीमोटी पदाधिकारी थीं, इसलिए एन.डी. तिवारी के रसूख से वाकिफ थीं. लंबे समय तक उन्हें देह सुख देती रही उज्ज्वला एक हद तक ही एन.डी. तिवारी पर दबाव बना पाई थीं कि वे उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लें और होने वाली संतान को भी अपना नाम दें.

उज्ज्वला के पिता प्रोफेसर शेरसिंह भी कांग्रेस के जानेमाने नेता थे और पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे थे. दरअसल, उज्ज्वला अपने पति बी.पी. शर्मा को छोड़ अपने पिता के घर आ कर रहने लगी थीं. उन की गोद में पहले पति से पैदा हुआ 2 साल का बेटा सिद्धार्थ भी था.

एन.डी. तिवारी से उज्ज्वला की पहली मुलाकात 1968 में हुई थी, जब वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उज्ज्वला की खूबसूरती पर मर मिटे एन.डी. तिवारी लगातार उस से प्रणय निवेदन करते रहे और अंतत: पहली बार 1977 में दोनों के पहली बार शारीरिक संबंध बने.

एन.डी. तिवारी जानते थे कि अगर वे उज्ज्वला के दबाव में आ गए तो इतनी बदनामी होगी कि वे फिर कहीं के नहीं रहेंगे, लिहाजा उन्होंने अपनी इस प्रेमिका को भाव नहीं दिया. यह वक्त था जब एन.डी. तिवारी का कैरियर और शोहरत दोनों शवाब पर थे.

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उन के एक इशारे पर किसी का भी काफी कुछ बन और बिगड़ जाता था. उज्ज्वला को समझ आ गया था कि बेवजह के होहल्ले से कुछ हासिल नहीं होने वाला, उलटे यह जरूर हो सकता है कि वह इस दुनिया में कहीं दिखे ही नहीं.

बेमन से उन्होंने एन.डी. तिवारी का रास्ता छोड़ दिया. इस वक्त चूंकि वह गर्भवती थीं, इसलिए रोहित को पिता के रूप में मां के पहले पति का ही का नाम मिला जो वास्तव में उस के पिता थे ही नहीं. इस से एन.डी. तिवारी ने भी चैन और सुकून की सांस ली कि चलो बला सस्ते में टली.

एक ऐतिहासिक मुकदमा

उज्ज्वला समझदार और चालाक थीं. इस बात को ले कर वह हमेशा एक कुढ़न में रहीं कि एन.डी. तिवारी उन के यौवन से तो खूब खेले, लेकिन जब बात शादी की आई तो साफसाफ मुकर गए. वक्त और हालात देख कर वह अपनी गृहस्थी में रम गईं. लेकिन एन.डी. तिवारी की बेवफाई और बेरुखी को वह कभी भूली नहीं.

वक्त का पहिया घूमता रहा और रोहित बड़ा होता गया. उधर एन.डी. तिवारी भी कामयाबी की सीढि़यां चढ़ते रहे. वह भूल गए थे कि उज्ज्वला नाम की बला टली नहीं है बल्कि वक्ती तौर पर खामोश हो गई है, जो एक दिन ऐसा तूफान उन की जिंदगी में लाएगी कि वे वाकई कहीं के नहीं रहेंगे.

ऐसा हुआ भी. किशोर होते रोहित को जब उज्ज्वला ने यह सच बताया कि एन.डी. तिवारी उस के पिता हैं तो रोहित के दिमाग की नसें हिल उठीं. एन.डी. तिवारी से उस के नाना प्रोफेसर शेर सिंह के पारिवारिक संबंध थे, इस नाते वह अकसर उस के घर आयाजाया करते थे. लेकिन उन के साथ सुरक्षाकर्मियों की फौज रहती थी.

ऐसा भी नहीं है कि एन.डी. तिवारी उज्ज्वला को एकदम भूल गए थे. वे दरअसल उन से मिलने ही आते थे और रोहित को खिलाते भी थे और उसे अपने जमाने की हिट फिल्म ‘नूरी’ के गाने भी सुनाते थे.

यह जान कर कि वह एन.डी. तिवारी का बेटा है, रोहित मां की तरह अपने नाजायज पिता के रसूख और झांसे में नहीं आया. इस की एक वजह यह भी थी कि अब तक एन.डी. तिवारी की राजनीति का ग्राफ उतर चला था और वे 88 साल के भी हो चले थे. रोहित ने हिम्मत दिखाते हुए एन.डी. तिवारी पर अपने पिता होने का मुकदमा दायर कर दिया.

अदालती काररवाई के दौरान भी वह डिगा नहीं. एन.डी. तिवारी ने उस पर दबाव बनाने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन मात खा गए. बात डीएनए जांच तक आ पहुंची, जिस से यह साबित हो सके कि वाकई एन.डी. तिवारी रोहित शेखर के पिता हैं या नहीं जैसा कि वह दावा कर रहा है.

भारतीय मुकदमों के इतिहास का यह सब से दिलचस्प, अनूठा और ऐतिहासिक मुकदमा था. क्योंकि पहली बार किसी बेटे ने एक ऐसे शख्स को अदालत की चौखट पर एडि़यां रगड़ने के लिए मजबूर कर दिया था जिस की तूती बोलती थी. हर किसी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार था.

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आखिरकार 7 साल की लंबी लड़ाई के बाद सब से बड़ी अदालत ने फैसला रोहित के हक में सुनाते उसे एन.डी. तिवारी का जैविक पुत्र करार दिया. रोहित की जिंदगी का यह दुर्लभ क्षण था. वह ऐसी लड़ाई जीत गया था, जो उस के नाम और वजूद से भी ताल्लुक रखती थी.

मीडिया और अदालती प्रक्रिया में बारबार उस के लिए नाजायज शब्द का इस्तेमाल हुआ था, जिस पर जीत के बाद सफेद शर्ट में चमकते हुए उस ने कहा था कि नाजायज बेटा नहीं बल्कि बाप होता है. भारत के परंपरागत और पितृ सत्तात्मक समाज पर भी उस ने दार्शनिकों सरीखी बातें कही थीं. जीत के बाद उस ने यह भी कहा था कि मां को भी इंसाफ मिला.

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मुकदमे के दौरान वह इतने तनाव में रहा था कि एक बार तो उसे हार्ट अटैक भी आ गया था, जिस से वह जिंदगी भर आंशिक रूप से लंगड़ा कर चलता रहा. यह रोहित की इच्छाशक्ति और साहस ही था कि उस ने एन.डी. तिवारी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था और उन के चेहरे पर से शराफत और चरित्रवान नेता होने का नकाब उतार दिया था.

एन.डी. तिवारी अब तक अंदर से भी टूट चुके थे. एक पुराना पाप हकीकत बन कर उन के सामने खड़ा था. अब उन के सामने रोहित को अपना लेने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता न था. यहां भी वे नेतागिरी दिखाने से बाज नहीं आए और रोहित को गले लगा लिया.

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महत्त्वपूर्ण राजनैतिक पदों पर रहते एन.डी. तिवारी ने करोड़ोंअरबों की जो जायदाद बनाई थी, रोहित उस का अघोषित वारिस बन बैठा. उस के दबाव के चलते ही एन.डी. तिवारी ने विधिवत वैदिक रीतिरिवाजों से 14 मई, 2014 को उज्ज्वला से शादी भी कर ली. इन दोनों की ही यह दूसरी शादी थी.

50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 3

पुलिस ने 4 मई, 2019 को धोबी की मदद से शिवदत्त को देहरादून के अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस से बरामद कर लिया. शिवदत्त अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से इस गेस्टहाउस में ठहरा हुआ था. देहरादून से वह लगातार जयपुर की अपनी एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस दौरान शिवदत्त ने देहरादून में एक कोचिंग सेंटर में इंग्लिश स्पीकिंग क्लास भी जौइन कर ली थी.

42 दिन तक कथित रूप से लापता रहे शिवदत्त को पुलिस देहरादून से भीलवाड़ा ले आई. उस से की गई पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी.

नाटक और हकीकत में फर्क होता है

शिवदत्त ने प्रौपर्टी व्यवसाय में कई जगह पैर पसार रखे थे. उस ने भीलवाड़ा में विनायक रेजीडेंसी, सांगानेर रोड पर मल्टीस्टोरी प्रोजैक्ट, अजमेर रोड पर श्रीमाधव रेजीडेंसी, कृष्णा विहार बाईपास, कोटा रोड पर रूपाहेली गांव के पास वृंदावन ग्रीन फार्महाउस आदि बनाए. इन के लिए उस ने बाजार से मोटी ब्याज दर पर करीब 50 करोड़ रुपए उधार लिए थे, लेकिन कुछ प्रोजैक्ट समय पर पूरे नहीं हुए.

बाद में प्रौपर्टी व्यवसाय में मंदी आ गई. इस से उसे अपनी प्रौपर्टीज के सही भाव नहीं मिल पा रहे थे. जिन लोगों ने शिवदत्त को रकम उधार दी थी, वह उन पर लगातार तकाजा कर रहे थे. ब्याज का बोझ बढ़ता जा रहा था. इस से शिवदत्त परेशान रहने लगा. वह इस समस्या से निकलने का समाधान खोजता रहता था.

इस बीच जनवरी में शिवदत्त अपने घर पर सीढि़यों से फिसल गया. उस की रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी. कुछ दिन वह अस्पताल में भरती रहा. फिर चोट के बहाने करीब 2 महीने तक घर पर ही रहा. इस दौरान उस ने अपना कारोबार पत्नी शर्मीला और स्टाफ के भरोसे छोड़ दिया था. पैसा मांगने वालों को घरवाले और स्टाफ शिवदत्त के बीमार होने की बात कह कर टरकाते रहे.

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घर पर आराम करने के दौरान एक दिन शिवदत्त ने सारी समस्याओं से निपटने के लिए खुद के अपहरण की योजना बनाई. उस का विचार था कि अपहरण की बात से कर्जदार उस के परिवार को परेशान नहीं करेंगे. उन पर पुलिस की पूछताछ का दबाव भी नहीं रहेगा. यहां से जाने के बाद वह भीलवाड़ा से बाहर जा कर कहीं रह लेगा और मामला शांत हो जाने पर किसी दिन अचानक भीलवाड़ा पहुंच कर अपने अपहरण की कोई कहानी बना देगा.

अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए उस ने होली का दिन चुना. इस से पहले ही शिवदत्त ने अपनी कार में करीब 8-10 जोड़ी कपड़े और जरूरी सामान रख लिया था. करीब एक लाख रुपए नकद भी उस के पास थे. शिवदत्त ने अपनी योजना की जानकारी पत्नी और किसी भी परिचित को नहीं लगने दी. उसे पता था कि अगर परिवार में किसी को यह बात बता दी तो पुलिस उस का पता लगा लेगी. इसलिए उस ने इस बारे में पत्नी तक को कुछ बताना ठीक नहीं समझा.

योजना के अनुसार, शिवदत्त होली की शाम पत्नी से अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने जाने की बात कह कर कार ले कर घर से निकल गया. वह अपने दोस्त से मिला और रात करीब 8 बजे वहां से निकल गया. शिवदत्त ने राजेश त्रिपाठी के घर से आ कर अपनी कार सुखाडि़या सर्किल के पास लावारिस छोड़ दी. कार से कपड़े और जरूरी सामान निकाल लिया. कपड़े व सामान ले कर वह भीलवाड़ा से प्राइवेट बस में सवार हो कर दिल्ली के लिए चल दिया.

भीलवाड़ा से रवाना होते ही शिवदत्त ने अपने मोबाइल से पत्नी के मोबाइल पर खुद के अपहरण का मैसेज भेज दिया था. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया. भीलवाड़ा से दिल्ली पहुंच कर वह ऋषिकेश चला गया.

ऋषिकेश में शिवदत्त ने अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से नया सिमकार्ड खरीदा. फिर एक नया फोन खरीद कर वह सिम मोबाइल में डाल दिया. कुछ दिन ऋषिकेश में रुकने के बाद शिवदत्त देहरादून चला गया. देहरादून में 29 मार्च को उस ने राकेश शर्मा की आईडी से अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस में कमरा ले लिया.

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खेल एक अनाड़ी खिलाड़ी का

देहरादून में उस ने दिखावे के लिए इंग्लिश स्पीकिंग क्लास जौइन कर ली. वह अपने कपड़े धुलवाने और प्रैस कराने के लिए धोबी को देता था. एक दिन गलती से शिवदत्त का पुराना मोबाइल उस के कपड़ों की जेब में धोबी के पास चला गया. इसी से उस का भांडा फूटा.

शुरुआती जांच में सामने आया कि देहरादून में रहने के दौरान शिवदत्त मुख्यरूप से जयपुर की एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस महिला से शिवदत्त की रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं. जबकि वह अपनी पत्नी या अन्य किसी परिजन के संपर्क में नहीं था.

भीलवाड़ा के सुभाष नगर थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने शिवदत्त को 6 मई को जोधपुर ले जा कर हाईकोर्ट में पेश किया और उस के अपहरण की झूठी कहानी से कोर्ट को अवगत कराया. इस पर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संदीप मेहता और विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने शिवदत्त के प्रति नाराजगी जताई. जजों ने याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत और पुलिस को गुमराह करने पर याचिकाकर्ता शर्मीला पर 5 हजार रुपए का जुरमाना लगाते हुए यह राशि पुलिस कल्याण कोष में जमा कराने के आदेश दिए.

बाद में सुभाष नगर थाना पुलिस ने शिवदत्त के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. उस के खिलाफ अपने ही अपहरण की झूठी कहानी गढ़ कर पुलिस को गुमराह करने, अवैध रूप से देनदारों पर दबाव बनाने और षडयंत्र रचने का मामला दर्ज किया गया. इस मामले की जांच सदर पुलिस उपाधीक्षक राजेश आर्य कर रहे थे.

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पुलिस ने इस मामले में 7 मई, 2019 को बिल्डर शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर 6 दिन के रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि में भी शिवदत्त से विस्तार से पूछताछ की गई, फिर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

बहरहाल, बिल्डर शिवदत्त मोहमाया के लालच में अपने ही बिछाए जाल में फंस गया. अपहरण की झूठी कहानी से उस के परिजन भी 42 दिन तक परेशान रहे. पुलिस भी परेशान होती रही. भले ही वह जमानत पर छूट कर घर आ जाएगा, लेकिन सौ करोड़ के कारोबारी ने बाजार में अपनी साख तो खराब कर ही ली. इस का जिम्मेदार वह खुद और उस का लोभ है.

50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 2

पुलिस जुट गई जांच में

इस बीच 24 मार्च का दिन भी निकल गया. लेकिन अपहर्त्ताओं की ओर से कोई सूचना नहीं आई. जबकि उन्होंने 2 दिन में एक करोड़ रुपए का इंतजाम करने को कहा था. घर वाले इस बात को ले कर चिंतित थे कि कहीं अपहर्त्ताओं को उन के पुलिस में जाने की बात पता न लग गई हो. क्योंकि इस से चिढ़ कर वे शिवदत्त के साथ कोई गलत हरकत कर सकते थे.

शर्मीला पति को ले कर बहुत चिंतित थी. अपहर्त्ताओं की ओर से 3 दिन बाद भी शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क नहीं किया गया. ऐसे में पुलिस को भी उस की सलामती की चिंता थी.

पुलिस ने शिवदत्त की तलाश तेज करते हुए 4 टीमें जांचपड़ताल में लगा दी. इन टीमों ने शिवदत्त के रिश्तेदारों से ले कर मिलनेजुलने वालों और संदिग्ध लोगों से पूछताछ की, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. शिवदत्त की कार जिस जगह लावारिस हालत में मिली थी, उस के आसपास सीसीटीवी फुटेज खंगालने की कोशिश भी की गई, लेकिन पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल सका.

इस पर पुलिस ने 25 मार्च को शिवदत्त के फोटो वाले पोस्टर छपवा कर भीलवाड़ा जिले के अलावा पूरे राजस्थान सहित गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के पुलिस थानों को सार्वजनिक स्थानों पर चस्पा करने के लिए भेजे.

पुलिस को भी नहीं मिला शिवदत्त

जांच में पता चला कि शिवदत्त ने कुछ समय पहले महाराष्ट्र में भी अपना कारोबार शुरू किया था. इसलिए किसी सुराग की तलाश में पुलिस टीम मुंबई और नासिक भेजी गई. लेकिन वहां हाथपैर मारने के बाद पुलिस खाली हाथ लौट आई.

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उधर लोग इस मामले में पुलिस की लापरवाही मान रहे थे. पुलिस के प्रति लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. 26 अप्रैल, 2019 को ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधि मंडल ने भीलवाड़ा के कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन दे कर शिवदत्त को सुरक्षित बरामद कर अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार करने की मांग की. ऐसा न होने पर उन्होंने आंदोलन की चेतावनी दे दी.

दिन पर दिन बीतते जा रहे थे, लेकिन न तो अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क किया था और न ही पुलिस को कोई सुराग मिला था. इस से शिवदत्त के परिजन भी परेशान थे. उन के मन में आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के साथ कुछ गलत न कर दिया हो. क्योंकि इतने दिन बाद भी न तो अपहर्त्ता संपर्क कर रहे थे और न ही खुद शिवदत्त.

पुलिस की चिंता भी कम नहीं थी. वह भी लगातार भागदौड़ कर रही थी. पुलिस ने शिवदत्त के फेसबुक, ट्विटर, ईमेल एकाउंट खंगालने के बाद संदेह के दायरे में आए 50 से अधिक लोगों से पूछताछ की.

पुलिस की टीमें महाराष्ट्र और गुजरात भी हो कर आई थीं. शिवदत्त और उस के परिवार वालों के मोबाइल की कालडिटेल्स की भी जांच की गई. भीलवाड़ा शहर में बापूनगर, पीऐंडटी चौराहा से पांसल चौराहा और अन्य इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई, लेकिन इन सब का कोई नतीजा नहीं निकला.

बिल्डर शिवदत्त के अपहरण का मामला पुलिस के लिए एक मिस्ट्री बनता जा रहा था. पुलिस अधिकारी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर अपहर्त्ता शिवदत्त को कहां ले जा कर छिप गए. ऐसा कोई व्यक्ति भी पुलिस को नहीं मिल रहा था जिस ने राजेश त्रिपाठी के घर से निकलने के बाद शिवदत्त को देखा हो. त्रिपाठी ही ऐसा शख्स था, जिस से शिवदत्त आखिरी बार मिला था. पुलिस त्रिपाठी से पहले ही पूछताछ कर चुकी थी. उस से कोई जानकारी नहीं मिली थी तो उसे घर भेज दिया गया था.

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जांचपड़ताल में सामने आया कि शिवदत्त का करीब 100 करोड़ रुपए का कारोबार था. साथ ही उस पर 20-30 करोड़ की देनदारियां भी थीं. महाराष्ट्र के नासिक और गुजरात के अहमदाबाद में भी उस ने कुछ समय पहले नया काम शुरू किया था.

शिवदत्त ने सन 2009 में प्रौपर्टी का कारोबार शुरू किया था. शुरुआत में उस ने इस काम में अच्छा पैसा कमाया. कमाई हुई तो उस ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. एक साथ कई काम शुरू करने से उसे नुकसान भी हुआ. इस से उस की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने लगी तो उस ने लोन लेने के साथ कई लोगों से करोड़ों रुपए उधार लिए. भीलवाड़ा जिले का रहने वाला एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भी शिवदत्त की प्रौपर्टीज में पैसा लगाता था.

शिवदत्त भीलवाड़ा में ब्राह्मण समाज और अन्य समाजों के धार्मिक कार्यक्रमों में मोटा चंदा देता था. इस से उस ने विभिन्न समाजों के धनी और जानेमाने लोगों का भरोसा भी जीत रखा था. ऐसे कई लोगों ने शिवदत्त की प्रौपर्टीज में निवेश कर रखा था.

शिवदत्त के ऊपर उधारी बढ़ती गई तो लेनदार भी परेशान करने लगे. शिवदत्त प्रौपर्टी बेच कर उन लोगों का पैसा चुकाना चाहता था, लेकिन बाजार में मंदी के कारण प्रौपर्टी का सही भाव नहीं मिल रहा था. इस से वह परेशान रहने लगा था. लोगों के तकाजे से परेशान हो कर उसने फोन अटेंड करना भी कम कर दिया था.

हालांकि शर्मीला ने पुलिस थाने में पति के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस को एक भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिस के उस के अपहरण की पुष्टि होती. एक सवाल यह भी था कि शिवदत्त अगर उधारी का पैसा नहीं चुका रहा था तो अपहर्त्ता उन के किसी परिजन को उठा कर ले जाते, क्योंकि लेनदारों को यह बात अच्छी तरह पता थी कि पैसों की व्यवस्था शिवदत्त के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता.

घूमने लगा पुलिस का दिमाग

आधुनिक टैक्नोलौजी के इस जमाने में पुलिस तीनचौथाई आपराधिक मामले मोबाइल लोकेशन, काल डिटेल्स व सीसीटीवी फुटेज से सुलझा लेती है, लेकिन शिवदत्त के मामले में पुलिस के ये तीनों हथियार फेल हो गए थे. उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. सीसीटीवी फुटेज साफ नहीं थे. काल डिटेल्स से भी कोई खास बातें पता नहीं चलीं.

प्रौपर्टी का काम करने से पहले शिवदत्त के पास बोरिंग मशीन थी. वह हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर सहित कई राज्यों में ट्यूबवैल के बोरिंग का काम करता था. इन स्थितियों में तमाम बातों पर गौर करने के बाद पुलिस शिवदत्त के अपहरण के साथ अन्य सभी पहलुओं पर भी जांच करने लगी.

इसी बीच शिवदत्त की पत्नी शर्मीला ने राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी. इस में शर्मीला ने अपने पति को ढूंढ निकालने की गुहार लगाई. इस पर हाईकोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि शिवदत्त को तलाश कर जल्द से जल्द अदालत में पेश किया जाए.

अब पुलिस के सामने शिवदत्त मामले में दोहरी चुनौती पैदा हो गई. पुलिस ने शिवदत्त की तलाश ज्यादा तेजी से शुरू कर दी. मई के पहले सप्ताह में शिवदत्त का मोबाइल स्विच औन किया गया. इस से उस की लोकेशन का पता चल गया. पता चला कि वह मोबाइल देहरादून में है. भीलवाड़ा से तुरंत एक पुलिस टीम देहरादून भेजी गई. देहरादून में पुलिस ने मोबाइल की लोकेशन ढूंढी तो वह मोबाइल एक धोबी के पास मिला.

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धोबी ने बताया कि पास के ही एक गेस्टहाउस में रहने वाले एक साहब के कपड़ों में एक दिन गलती से उन का मोबाइल आ गया. उस मोबाइल को धोबी के बेटे ने औन कर के अपने पास रख लिया था. मोबाइल औन होने से उस की लोकेशन पुलिस को पता चल गई.

दुराचारी पिता का हश्र

दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को 30 अप्रैल, 2014 को सूचना मिली कि केशोपुर डिपो (Keshopur Depot) के नजदीक गहरे नाले के किनारे बेडशीट में लिपटी हुई कोई चीज पड़ी है और उस बेडशीट पर खून के धब्बे भी लगे हैं. यह इलाका पश्चिमी दिल्ली के ख्याला (Khyala Police Station) थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा ख्याला (Khyala) थाने को बता दी. सूचना में बताई गई जगह पर जब तक थाना पुलिस वहां पहुंची, तब तक वहां तमाम लोग इकट्ठे हो गए थे.

खून सनी बेडशीट देख कर पुलिस को भी शक हो रहा था. वहीं पर खून से सना तकिया भी पड़ा था. पुलिस ने जब वह बेडशीट खुलवाई तो उस में एक अधेड़ आदमी की लाश निकली.

50-55 साल के उस आदमी की गरदन और पैरों पर केबल का तार लपेटा हुआ था. उस का सीना चीरा हुआ था और उस के सिर, और शरीर के अन्य भाग पर कई जगह घाव थे. भीड़ में से कोई भी शख्स उस लाश की शिनाख्त नहीं कर सका तो पंचनामा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए दीनदयाल अस्पताल भिजवा दी.

ख्याला थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या कर लाश छिपाने का मामला दर्ज कर लिया गया. इस केस को सुलझाने के लिए पश्चिमी जिले के डीसीपी रणवीर सिंह ने एसीपी इलिश सिंघल की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई.

टीम ने सब से पहले अज्ञात लाश मिलने की सूचना दिल्ली के सभी थानों को वायरलैस द्वारा दे दी और लाश की शिनाख्त के लिए जिले में सार्वजनिक स्थानों पर लाश के फोटो लगे पैंफ्लेट चिपकवाए.

पहली मई को पुलिस को खबर मिली कि थाना राजौरी गार्डन में एक आदमी आया है. वह पैंफ्लेट में छपे फोटो को देख कर कह रहा है कि वह उस का रिश्तेदार है. चूंकि हत्या का मामला थाना ख्याला में दर्ज था, इसलिए ख्याला पुलिस थाना राजौरी गार्डन पहुंच गई.

ख्याला पुलिस ने जब उस आदमी से पूछताछ की तो उस ने मरने वाले उस अधेड़ का नाम दलजीत सिंह (Daljeet Singh)  बताया और कहा कि वह उस का रिश्तेदार है व राजौरी गार्डन की शहीद भगत सिंह कालोनी में डीडीए फ्लैट्स में रहता है.

पुलिस जब डीडीए कालोनी में दलजीत सिंह के फ्लैट पर पहुंची तो वहां उस की बेटी परमजीत कौर मिली. पुलिस ने परमजीत से उस के पिता दलजीत के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह एक ट्रैवल एजेंसी में ड्राइवर हैं और 30 अप्रैल की सुबह कार ले कर घर से निकले हैं. अभी तक वह घर नहीं लौटे हैं.

पुलिस ने बताया कि उन की तो हत्या हो चुकी है. इतना सुनते ही परमजीत रोने लगी. तसल्ली दे कर पुलिस ने उसे चुप कराया. अस्पताल ले जा कर जब उसे लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने पिता के रूप में की.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस का अगला काम हत्यारों तक पहुंचना था. वह जिस ट्रैवल एजेंसी में नौकरी करता था, पुलिस ने उस एजेंसी के मालिक ललित कुमार से बात की. ललित ने बताया कि 30 अप्रैल को दलजीत सिंह ड्यूटी पर आया ही नहीं था.

इस बीच पुलिस ने दलजीत की फैमिली बैकग्राउंड के बारे में पता लगा लिया था. जिस में जानकारी मिली कि परमजीत कौर की कई युवकों से दोस्ती थी. यह दोस्ती उस के पिता को पसंद नहीं थी. इस से पुलिस को परमजीत पर ही शक होने लगा. पिता ड्यूटी पर गए थे, जबकि वह ड्यूटी पर पहुंचे ही नहीं थे. इसलिए पुलिस ने परमजीत से एक बार फिर पूछताछ की.

इस बार सख्ती से की गई पूछताछ में परमजीत ने पुलिस के सामने सच्चाई उगल दी. उस ने पुलिस को बताया कि वह बाप नहीं, दुराचारी था जो अपनी ही बेटी पर गलत नजर रखता था. हालात ऐसे बन गए, जिस की वजह से उसे मारना पड़ा. फिर उस ने अपने ही पिता के कत्ल की जो कहानी बताई, वह पारिवारिक रिश्ते को तारतार करने वाली निकली.

दलजीत सिंह पश्चिमी दिल्ली स्थित राजौरी गार्डन की शहीद भगत सिंह कालोनी में परिवार के साथ रहता था. परिवार में पत्नी के अलावा उस की 3 बेटियां थीं. 2 बेटियों की वह शादी कर चुका था. शादी के लिए अब 23 साल की परमजीत कौर ही बची थी. करीब 3 साल पहले दलजीत की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद घर में केवल 2 लोग ही रह गए थे.

परमजीत ने पुलिस को बताया कि मां के मरने के बाद उस का पिता उस के साथ गलत हरकतें करने लगा. विरोध करने पर वह उसे धमका देता. जिस से वह डर गई. इस के बाद तो उस की हिम्मत बढ़ गई और वह उस का शारीरिक शोषण करने लगा.

पिछले 3 सालों से परमजीत कौर पिता के शारीरिक शोषण का शिकार होती रही. पड़ोस में ही रहने वाले पिं्रस संधु और अशोक शर्मा नाम के युवकों से परमजीत की दोस्ती थी. एक दिन उस ने अपने दिल का दर्द दोस्तों के सामने बयां कर दिया और इस जिल्लतभरी जिंदगी से छुटकारा दिलाने का अनुरोध किया.

एक बाप अपनी सगी बेटी के साथ इस तरह की हरकतें कर सकता है, यह उन्होंने पहली बार सुना था. परमजीत से इस बारे में सलाह मशविरा करने के बाद उन्होंने ऐसे दुराचारी बाप को सबक सिखाने की योजना बना ली.

29 अप्रैल, 2014 को दलजीत सिंह घर लौटा और खाना खा कर सो गया. तभी परमजीत ने अपने दोस्त प्रिंस संधु और अशोक शर्मा को बुला लिया. फिर तीनों ने गहरी नींद में सोए दलजीत पर विकेट से हमला किया. जब उस ने चीखने की कोशिश की तो परमजीत ने उस का मुंह दबोच लिया. उस के सिर से काफी खून निकल चुका था, इसलिए थोड़ी देर में ही उस की मौत हो गई.

कहीं वह जिंदा न रह जाए, इसलिए उन लोगों ने शीशे के तेज धार वाले टुकड़े से उस का सीना चीर कर पेसमेकर निकाल लिया. फिर उस के पैर और उस की गरदन केबल के तार से बांध दी. लाश एक बेडशीट में लपेट दी.  डैडबाडी ठिकाने लगाने के लिए वह उसे इनोवा कार में डाल कर केशोपुर डिपो के पास ले गए. एक तकिए पर भी खून लग गया था, उन्होंने वह तकिया भी कार में रख लिया.

केशोपुर डिपो के पास एक गहरा नाला है. उन्होंने सोचा कि लाश गहरे पानी में फेंक देंगे तो वह बह कर कहीं दूर चली जाएगी. यही सोच कर उन्होंने कार से लाश निकाल कर फेंकी तो वह नाले के पानी में गिरने के बजाय किनारे पर ही गिर गई. फिर उन्होंने खून से सना तकिया भी जल्दी से वहीं फेंक दिया.

लाश ठिकाने लगा कर उन्होंने कार उत्तम नगर के मोहन गार्डन इलाके में एक जगह खड़ी कर दी और अपनेअपने घर चले गए.

परमजीत से पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रिंस संधु और अशोक शर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित परमजीत कौर परिवर्तित नाम है

3 करोड़ के सपने ने पहुंचाया जेल

एक तो कड़ाके की सर्दी, दूसरे रात के यही कोई 2 बज रहे थे, तीसरे पहाड़ी इलाका, ऐसे में सड़कों पर धुंध होने की वजह से काफी शांति थी. कभी कभार इक्कादुक्का वाहन सामने से आता जरूर दिखाई दे जाता था. हालात ऐसे थे कि पीछे से आने वाला कोई वाहन आगे जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था. वैसे में उत्तराखंड के हरिद्वार की सड़कों पर एक पुलिस जीप भागी चली जा रही थी.

वह पुलिस जीप जिस समय हरिद्वार के चित्रा लौज के गेट पर पहुंची थी, रात के 3 बज रहे थे. कड़ाके की उस ठंड में हर कोई रजाई में दुबका सो रहा था. लेकिन जीप से आए पुलिस वाले किसी भी चीज की परवाह किए बगैर फुर्ती से जीप से उतरे और सीधे जा कर मैनेजर से मिले.

अपना परिचय दे कर उन्होंने मैनेजर को एक फोटो दिखाया तो वह उन्हें साथ ले कर दूसरी मंजिल की ओर चल पड़ा. दूसरी मंजिल पर पहुंच कर उस ने कमरा नंबर 206 का दरवाजा खटखटाया तो थोड़ी देर बाद आंखें मलते हुए एक युवक ने दरवाजा खोला.

युवक काफी स्वस्थ और सुंदर था. वह वही युवक था, जिस का फोटो पुलिस वाले ने लौज के मैनेजर को दिखाया था. उसे देख कर पुलिस वालों के चेहरे खिल उठे, क्योंकि उन की मंजिल मिल चुकी थी. जबकि उस युवक के चेहरे से साफ लग रहा था कि उतनी रात को दरवाजा खटखटा कर उस की नींद में खलल डालना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगा था.

इस हरकत से क्षुब्ध युवक ने बेरुखी से सामने खड़े मैनेजर से पूछा, ‘‘क्या बात हो गई मैनेजर साहब, जो इतनी रात को दरवाजा खटखटा रहे हैं?’’

मैनेजर ने साथ आए लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘ये लोग आप से मिलने आए हैं.’’

युवक उन लोगों से कुछ पूछता, उस के पीछे से आवाज आई, ‘‘कौन है भाई, इतनी रात को दरवाजा खटखटा रहा है?’’

दरवाजा खोलने वाला युवक अपने साथी के सवाल का जवाब दिए बगैर मैनेजर के साथ आए लोगों को पहचानता नहीं था, इसलिए उन्हें पहचानने की कोशिश करने लगा.

तभी मैनेजर के साथ आए लोगों में से सब से आगे खड़े व्यक्ति ने कहा, ‘‘इतनी रात को किसी का दरवाजा खटखटा कर परेशान करना ठीक नहीं है. लेकिन हम मजबूर थे मि. प्रमोद कुमार भाटी. तुम ने काम ही ऐसा किया है कि इतनी रात को तुम्हें परेशान करना पड़ा.’’

अजनबी के मुंह से अपना नाम सुन कर युवक एकदम से घबरा गया, जो उस के चेहरे पर साफ झलक आया था. लेकिन उस ने जल्दी ही खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘क्या कहा आप ने, प्रमोद कुमार भाटी, यह कौन हैं? यहां तो इस नाम का कोई आदमी नहीं है. आप लोग कौन हैं, मैं तो आप लोगों को पहचानता नहीं?’’

‘‘चिंता मत करो, अभी पहचान जाओगे.’’ कह कर उस आदमी ने युवक का कौलर पकड़ कर बाहर खींचा तो उस के साथ आए अन्य लोगों ने उसे दबोच लिया. इस के बाद कमरे के अंदर बैड पर रजाई में दुबके उस के साथी को भी पकड़ लिया गया.

इस के बाद उस कमरे की तलाशी ली गई. कमरे में जो भी जरूरत की चीज मिली, पुलिस ने जब्त कर लिया. सारे सुबूत और दोनों युवकों को साथ ले कर पुलिस स्थानीय थाने आ गई, जहां औपचारिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उन के तीसरे साथी को उस के घर से पकड़ लिया था.

पकड़े गए तीनों युवकों के नाम प्रमोद कुमार भाटी, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल तथा भावी कुमार मोदी थे. उन पर मुंबई में एक बड़ी चोरी करने का आरोप था. मुबई की थाना कुर्ला पुलिस ने हरिद्वार पुलिस की मदद से 2 लोगों को चित्रा लौज से उस समय गिरफ्तार किया था, जब वे लौज के कमरे में सो रहे थे, जबकि उन के तीसरे साथी को गुजरात से उस के घर से पकड़ा गया था.

30 जनवरी, 2014 की रात साढ़े 11 बजे मुंबई के उपनगर थाना कुर्ला में 73 वर्षीय रतनचंद जैन ने अपनी फर्म में करोड़ों की चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने वाले रतनचंद जैन अपने परिवार के साथ मुंबई के लालबाग के उदय गार्डन में रहते थे. उन का गहने बनाने का कारोबार था. उन का यह कारोबार आर.आर. संघवी एंड कंपनी के नाम की फर्म के माध्यम से होता था. उन की यह कंपनी कुर्ला न्यू मिल रोड पर थी, जो सोनेचांदी से ले कर हीरेजवाहरात के गहने बना कर बेचती थी.

रतनचंद जैन की यह फर्म लगभग 60 साल पुरानी थी, जिसे वह अपने तीन नौकरों की मदद से चलाते थे. फर्म सुबह ठीक 9 बजे खुलती थी अैर रात के ठीक 9 बजे बंद होती थी. फर्म में काम करने वाले तीनों नौकर फर्म में ही रहते थे. फर्म गुरुवार को बंद रहती थी, इसलिए उस दिन नौकरों को कहीं भी आनेजाने की छूट होती थी.

चोरी गुरुवार को ही हुई थी, जिस दिन फर्म बंद रहती थी. रात साढ़े 10 बजे रतनचंद जैन खापी कर सोने की तैयारी कर रहे थे कि फर्म में काम करने वाले नौकर कैलाश कुमार भाटी ने फोन कर के आशंका व्यक्त की थी कि लगता है फर्म में चोरी हो गई है. चोरी की बात सुन कर रतनचंद घबरा गए, क्योंकि करोडों का मामला था. घर वालों को बिना कुछ बताए ही उन्होंने कपड़े पहने और टैक्सी पकड़ कर फर्म पर जा पहुंचे.

फर्म पर पहुंच कर रतनचंद जैन को पता चला कि उन का एक नौकर प्रमोद कुमार भाटी गायब है. उस का फोन भी बंद है. रतनचंद जैन अपने तीनों नौकरों पर आंख मूंद कर विश्वास करते थे. तीनों नौकरों में 2 तो पुराने थे, लेकिन प्रमोद कुमार भाटी को उन्होंने अभी 6 महीने पहले ही रखा था.

लेकिन वह भी कोई बाहरी नहीं था. वह उन के पुराने और विश्वासपात्र नौकर कैलाश कुमार भाटी का चचेरा भाई था. इसलिए वह उस पर भी उसी तरह विश्वास करने लगे थे, जैसा कैलाश पर करते थे.

प्रमोद के गायब होने से उस के प्रति मन में तरहतरह की आशंकाएं उठने लगीं. वैसे तो वह काम में मेहनती और बातचीत में शरीफ था. लेकिन आदमी की कब नीयत खराब हो जाए, कौन जानता है. वह ताला तोड़वा कर अंदर पहुंचे तो फर्म की तिजोरी की स्थिति देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

तिजोरी में रखे सारे जेवरात और पैसे गायब थे. उन्होंने फर्म में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो प्रमोद कुमार भाटी का असली चेहरा सामने आ गया.

कैमरे की फुटेज में प्रमोद कुमार भाटी अपने एक साथी के साथ तिजोरी से गहने निकालते हुए साफ दिखाई दे रहा था. इस के बाद उन्होंने इस मामले में देर करना उचित नहीं समझा और दोनों नौकरों के साथ थाना कुर्ला जा पहुंचे.

रतनचंद जैन ने फर्म में हुई चोरी की रिपोर्ट थाना कुर्ला में लिखाई तो करोड़ों की इस चोरी पर थाने हड़कंप सा मच गया. थाने में ड्यूटी पर तैनात सबइंसपेक्टर प्रदीप पगारे ने तुरंत इस चोरी की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और कंट्रोल रूम को दी. इस के बाद कुछ सिपाहियों को साथ ले कर वह रतनचंद जैन की फर्म पर जा पहुंचे.

तिजोरी का निरीक्षण करने पर पता चला कि वह एकदम ठीकठाक थी. इस का मतलब उसे उसी की चाबी से खोला गया था. सबइंस्पेक्टर प्रदीप पगारे अभी निरीक्षण कर रहे थे कि डीसीपी धनंजय कुलकर्णी, एसीपी प्रकाश लाड़गे, सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे, इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले, असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत, सबइंसपेक्टर तुकाराम कोयडे भी वहां पहुंच गए.

डीसीपी धनंजय कुलकर्णी और एसीपी प्रकाश लाड़गे ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए.

अधिकारियों के जाने के बाद सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे ने रतनचंद जैन और उन के दोनों नौकरों से काफी लंबी पूछताछ की. इसी पूछताछ में चोरी गए गहनों की सूची बनाई गई. पता चला, चोरी गए स्वर्ण आभूषणों का वजन साढ़े 10 किलोग्राम था, जिन की बाजार में कीमत 2 करोड़ 84 लाख रुपए के आसपास थी. इस के अलावा तिजोरी में नकद 5 लाख की रकम भी रखी थी.

रतनचंद जैन और उन के दोनों नौकरों से पूछताछ कर के पुलिस थाने आ गई. अब पुलिस को चोरों तक पहुंचना था. चोरों के बारे में उन्हें पता चल ही गया था. मुख्य चोर प्रमोद कुमार भाटी के बारे में उन्हें सारी जानकारी उस के चचेरे भाई कैलाश कुमार भाटी से मिल गई थी.

सीसीटीवी फुटेज से साफ हो गया था कि चोरी प्रमोद कुमार भाटी ने ही अपने 2 साथियों के साथ मिल कर की थी, इसलिए किसी दूसरी दिशा में जांच का कोई सवाल ही नहीं उठता था. चोरों को जल्दी पकड़ना भी था, क्योंकि अगर उन्होंने चोरी का माल ठिकाने लगा दिया तो परेशानी खड़ी हो सकती थी.

इस बात को ध्यान में रख कर सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले को सौंप दी. इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले ने मामले की जांच की रूपरेखा तैयार की और पुलिस की 3 टीमें बना कर अलगअलग लोगों को उन की कमान सौंप दी. इन में से एक टीम का नेतृत्व असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत को सौंपा गया था.

असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने अपने सहयोगियों हेडकांस्टेबल निवृत्ती येधे यशवंत पवार, इब्राहीम सैयद, संदीप माने के साथ फर्म के पुराने नौकर कैलाश कुमार भाटी से प्रमोद के बारे में पूरी जानकारी ले कर उसे पकड़ने के प्रयास शुरू कर दिए.

इस तरह की घटना को अंजाम दे कर कोई भी अपराधी जल्दी अपने घर नहीं जाता, यही सोच कर असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत प्रमोद के घर जाने के बजाय उस की तलाश मुंबई में ही रहने वाले उस के नातेरिश्तेदारों के यहां करने लगे. मुंबई में जब उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो उन्होंने उस के गांव का रुख किया.

प्रमोद की तलाश के साथ उस के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा कर का लोकेशन भी पता किया जा रहा था. उस के मोबाइल की पहली लोकेशन बोरीवली नेशनल पार्क की मिली थी. इस से अंदाजा लगाया गया कि प्रमोद साथियों के साथ मुंबई से बाहर निकल गया है, क्योंकि शहर से बाहर जाने वाली बसें वहीं से जाती थीं.

इस के बाद प्रमोद कुमार भाटी के मोबाइल फोन की लोकेशन गुजरात के उस के गांव की मिली थी. उसी लोकेशन के आधार पर असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत उस के गांव पहुंचे. लेकिन पुलिस टीम के वहां पहुंचने तक उस ने दोस्त के साथ गांव छोड़ दिया था. दादादादी ने पुलिस को बताया कि वह दिल्ली जाने की बात कह कर घर से निकला था.

पुलिस टीम दिल्ली पहुंची. लेकिन दिल्ली में भी प्रमोद उन्हें नहीं मिला, क्योंकि पुलिस टीम के दिल्ली पहुंचने तक वह उत्तराखंड के हरिद्वार पहुंच गया था. पुलिस को यह जानकारी उस के मोबाइल फोन के लोकेशन से मिल रही थी. मोबाइल फोन के लोकेशन के आधार पर ही पुलिस टीम हरिद्वार जा पहुंची थी.

पुलिस टीम हरिद्वार तो पहुंच गई थी, लेकिन वहां प्रमोद और उस के साथी को ढूंढ़ना आसान नहीं था. लेकिन चोरों को तो पकड़ना ही था. असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने स्थानीय पुलिस की मदद से वहां के होटलों और लौजों में फोटो दिखा कर उन की तलाश शुरू कर दी.

आखिर उन की मेहनत रंग लाई और उन्होंने चित्रा लौज से प्रमोद और उस के साथी कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में प्रमोद ने बताया कि चोरी का सारा माल उस के तीसरे साथी भावी कुमार मोदी के पास रखा है.

असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने हरिद्वार से ही यह जानकारी सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे और इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले को दी तो इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले ने तत्काल सबइंस्पेक्टर प्रदीप पगारे की टीम को चोरी का माल बरामद करने के लिए भावी कुमार मोदी के गांव के लिए रवाना कर दिया था.

सबइंसपेक्टर प्रदीप पगारे अपनी टीम के साथ भावी कुमार मोदी के घर पहुंचे तो संयोग से वह घर पर ही मिल गया. उन्होंने उसे गिरफ्तार कर के चोरी का सारा माल बरामद कर लिया.

तीनों को मुंबई लाया गया और अगले दिन महानगर दंडाधिकारी के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में प्रमोद कुमार भाटी और उस के साथियों ने आर.आर. संघवी एंड कंपनी में चोरी की जो कहानी सुनाई, वह चोरी कर के जल्दी से जल्दी करोड़पति बनने की निकली.

प्रमोद कुमार भाटी गुजरात के जिला मानसरोवर के गांव पालनपुर का रहने वाला था. उस के पिता प्रकाश कुमार के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उसी में मेहनत कर के वह किसी तरह गुजारा कर रहे थे. परिवार बड़ा था, इसलिए घर में हमेशा आर्थिक तंगी रहती थी.

प्रमोद कुमार भाटी भाईबहनों में सब से बड़ा था. समझदार हुआ तो कोई कामधंधा कर के वह परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने के बारे में सोचने लगा. इसी चक्कर में वह मुंबई में रहने वाले अपने चचेरे भाई कैलाश कुमार भाटी के पास आ गया.

कैलाश कुमार 15 सालों से मुंबई में रतनचंद जैन की गहने बनाने वाली आर.आर. संघवी एंड कंपनी में काम कर रहा था. वह मेहनती और ईमानदार था, इसलिए रतनचंद जैन उसे बेटे की तरह मानते थे. यही वजह थी कि करोड़ों का माल वह उस के भरोसे छोड़ देते थे.

फर्म की तिजोरी की एक चाबी वह अपने पास रखते थे, जबकि दूसरी चाबी उन की फर्म के ठीक सामने स्थित के.के. ज्वैलर्स के मालिक के पास रहती थी.

यह फर्म रतनचंद जैन के रिश्तेदार की थी. यह चाबी उन के पास इसलिए रहती थी कि अगर कभी किसी ग्राहक को अचानक जरूरत पड़ जाए तो फर्म के नौकर इस चाबी से तिजोरी खोल कर उस ग्राहक को माल दे सकें.

रतनचंद कैलाश पर ही नहीं, अपने सभी नौकरों पर उसी तरह भरोसा करते थे. यही वजह थी कि उन के रहने और सोने की व्यवस्था उन्होंने अपनी कंपनी में ही कर रखी थी.

कैलाश कुमार को अपने चाचा के घर की आर्थिक स्थिति पता थी, इसलिए प्रमोद जब गांव से काम की तलाश उस के पास आया तो उस ने अपने मालिक रतनचंद जैन से कह कर उसे अपनी ही कंपनी में नौकरी दिला दी.

प्रमोद कुमार भाटी भी उसी तरह मेहनत और ईमानदारी से काम करने लगा, जिस तरह कैलाश और अन्य नौकर कर रहे थे. अपनी मेहनत और ईमानदारी से जल्दी ही उस ने फर्म के मालिक रतनचंद जैन के मन में अपने लिए खास जगह बना ली. इस तरह अन्य नौकरों की तरह वह भी उन का विश्वासपात्र बन गया.

रतनचंद जैन को प्रमोद पर भरोसा हो गया तो वह उसे भी फर्म की तिजोरी की चाबी देने लगे. इस के बाद जरूरत पड़ने पर अन्य नौकरों की तरह वह भी के.के. ज्वैलर्स के यहां से चाबी लाने लगा.

प्रमोद कुमार भाटी को नौकरी पर लगे 2-3 महीने ही हुए थे कि किसी काम से उसे गांव जाना पड़ा. छुट्टी ले कर वह गांव गया तो वहां वह अपने दोस्तों कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल और भावी कुमार मोदी से मिला.

कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल और भावी कुमार मोदी के परिवारों की भी आर्थिक स्थिति वैसी ही थी, जैसी प्रमोद कुमार के परिवार की थी. वे ज्यादा पढ़लिख भी नहीं पाए थे. कामधंधा न होने की वजह से गांव में आवारों की तररह घूमते रहते थे.

मुंबई से आए प्रमोद को देख कर उस के दोनों दोस्त हैरान रह गए. बातचीत में जब उन्हें पता चला कि प्रमोद गहने बनाने वाली कंपनी में काम करता है और वहां रोजाना लाखों का कारोबार होता है तो उन के मुंह में पानी आ गया. उन्हें लगा कि अगर फर्म का सारा माल उन के हाथ लग जाए तो वे तुरंत करोड़पति बन जाएंगे. सही बात है, खाली दिमाग शैतान का घर होता है, वह हमेशा उलटा ही सोचता है.

कमलेश और भावी ने जब यह बात प्रमोद से कही तो उस ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. लेकिन उन दोनों ने हार नहीं मानी और लगातार उसे चोरी के लिए राजी करने में लगे रहे. आखिर वे प्रमोद को पटरी पर लाने में कामयाब हो ही गए. उसे भी लगा कि अगर कंपनी का सारा माल उसे मिल जाता है तो उस के परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी. उस के बाद उसे कहीं काम करने की जरूरत नहीं रहेगी.

प्रमोद को कंपनी की सारी गतिविधियों और कामकाज का पता ही था, यह भी पता था कि कंपनी में हमेशा 3-4 करोड़ का माल यानी सोने के गहने, नकदी रखी रहती है.

दोस्तों के साथ करोड़ों की चोरी करने की योजना बना कर प्रमोद छुट्टी खतम होने के बाद मुंबई आ गया और पहले की ही तरह कंपनी के काम करने लगा. लेकिन अब उसे योजना को अंजाम देने के लिए हमेशा मौके की तलाश रहने लगी थी.

चोरी करने के एक दिन पहले यानी 29 जनवरी, 2014 को प्रमोद ने फोन कर के अपने दोनों दोस्तों, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल और भावी कुमार मोदी को मुंबई बुला लिया. 30 जनवरी, 2014 को कंपनी बंद थी. उस दिन अगलबगल की भी सारी दुकानें बंद रहती थीं, इसलिए रास्ता पूरी तरह साफ था.

शाम 7 बजे कैलाश और अन्य नौकर घूमने और खाना खाने बाहर चले गए तो प्रमोद अपने काम में लग गया. उस ने तुरंत फोन कर के कुर्ला स्टेशन के आसपास घूम रहे अपने दोस्तों को बुला लिया और खुद तिजोरी की चाबी लेने के.के. ज्वैलर्स के यहां चला गया.

के.के. ज्वैलर्स से चाबी लेते समय उस ने कहा था कि एक बड़ा ग्राहक आया है, जिसे और्डर का समान देना है. ऐसा हमेशा होता आया था, इसलिए तिजोरी की चाबी मिलने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

चाबी ला कर प्रमोद ने भावी कुमार मोदी को फर्म के बाहर निगरानी पर खड़ा कर दिया और खुद कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल के साथ अंदर आ गया. इस के बाद तिजोरी खोल कर उस में रखे सारे गहने और 5 लाख रुपए नकद ले कर तिजोरी को बंद कर के चाबी के.के. ज्वैलर्स को दे दी. सारा काम निपटा कर फर्म में बाहर से ताला बंद किया और दोस्तों के साथ चला गया.

तीनों ने कुर्ला स्टेशन के पास से टैक्सी पकड़ी और बोरीवली आ गए, जहां से बस पकड़ कर अपने गांव चले गए. गांव में प्रमोद ने चेरी का सारा माल भावी कुमार मोदी के यहां रखा और गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद कमलेश उर्फ कल्पेश के साथ गांव छोड़ दिया.

गांव से दोनों दिल्ली आए, जहां वसंत विहार के एक लौज में ठहरे. अगले दिन दोनों हरिद्वार चले गए. हरिद्वार में एक रात वे बालाजी लौज में ठहरे. इस के अगले दिन वे चित्रा लौज में ठहरे, जहां से पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. इस के बाद पुलिस ने सारा माल भी बरामद कर लिया. इस तरह उन के करोड़पति बनने और ऐशोआराम से जीने का सपना टूट गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रमोद कुमार भाटी, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल और भावी कुमार मोदी के खिलाफ चोरी का मामला दर्ज कर के पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बीवी का डबल इश्क पति ने उठाया रिस्क

50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 1

21 मार्च, 2019 की बात है. उस दिन होली थी. होलिका दहन के अगले दिन रंग गुलाल से खेले जाने वाले त्यौहार का आमतौर पर दोपहर तक ही धूमधड़ाका रहता है. दोपहर में रंगेपुते लोग नहाधो कर अपने चेहरों से रंग उतारते हैं. फिर अपने कामों में लग जाते हैं. कई जगह शाम के समय लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलने भी जाते हैं.

भीलवाड़ा के पाटील नगर का रहने वाला शिवदत्त शर्मा भी होली की शाम अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने के लिए अपनी वेरना कार से बापूनगर के लिए निकला था. शिवदत्त ने जाते समय पत्नी शर्मीला से कहा था कि वह रात तक घर आ जाएगा. थोड़ी देर हो जाए तो चिंता मत करना.

शिवदत्त जब देर रात तक नहीं लौटा तो शर्मीला को चिंता हुई. रात करीब 10 बजे शर्मीला ने पति के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद शर्मीला घरेलू कामों में लग गई. उस के सारे काम निबट गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया था. शर्मीला ने दोबारा पति के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन इस बार भी उस का फोन स्विच्ड औफ ही मिला. उसे लगा कि शायद पति के मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई होगी, इसलिए स्विच्ड औफ आ रहा है.

शर्मीला बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. धीरेधीरे रात के 12 बज गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया. इस से शर्मीला को चिंता होने लगी. वह पति के दोस्त राजेश त्रिपाठी को फोन करने के लिए नंबर ढूंढने लगी, लेकिन त्रिपाठीजी का नंबर भी नहीं मिला.

शर्मीला की चिंता स्वाभाविक थी. वैसे भी शिवदत्त कह गया था कि थोड़ीबहुत देर हो जाए तो चिंता मत करना, लेकिन घर आने की भी एक समय सीमा होती है. शर्मीला बिस्तर पर लेटेलेटे पति के बारे में सोचने लगी कि क्या बात है, न तो उन का फोन आया और न ही वह खुद आए.

पति के खयालों में खोई शर्मीला की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. त्यौहार के कामकाज की वजह से वह थकी हुई थी, इसलिए जल्दी ही गहरी नींद आ गई.

वाट्सऐप मैसेज से मिली पति के अपहरण की सूचना

22 मार्च की सुबह शर्मीला की नींद खुली तो उस ने घड़ी देखी. सुबह के 5 बजे थे. पति अभी तक नहीं लौटा था. शर्मीला ने पति को फिर से फोन करने के लिए अपना मोबाइल उठाया तो देखा कि पति के नंबर से एक वाट्सऐप मैसेज आया था.

शर्मीला ने मैसेज पढ़ा. उस में लिखा था, ‘तुम्हारा घर वाला हमारे पास है. इस पर हमारे एक करोड़ रुपए उधार हैं. यह हमारे रुपए नहीं दे रहा. इसलिए हम ने इसे उठा लिया है. हम तुम्हें 2 दिन का समय देते हैं. एक करोड़ रुपए तैयार रखना. बाकी बातें हम 2 दिन बाद तुम्हें बता देंगे. हमारी नजर तुम लोगों पर है. ध्यान रखना, अगर पुलिस या किसी को बताया तो इसे वापस कभी नहीं देख पाओगी.’

मोबाइल पर आया मैसेज पढ़ कर शर्मीला घबरा गई. वह क्या करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. पति की जिंदगी का सवाल था, घबराहट से भरी शर्मीला ने अपने परिवार वालों को जगा कर मोबाइल पर आए मैसेज के बारे में बताया.

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मैसेज पढ़ कर लग रहा था कि शिवदत्त का अपहरण कर लिया गया है. बदमाशों ने शिवदत्त के मोबाइल से ही मैसेज भेजा था ताकि पुष्टि हो जाए कि शिवदत्त बदमाशों के कब्जे में है. यह मैसेज 21 मार्च की रात 9 बज कर 2 मिनट पर आया था, लेकिन उस समय शर्मीला इसे देख नहीं सकी थी.

शिवदत्त के अपहरण की बात पता चलने पर पूरे परिवार में रोनापीटना शुरू हो गया. जल्दी ही बात पूरी कालोनी में फैल गई. चिंता की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त पर अपने एक करोड़ रुपए बकाया बताए थे और वह रकम उन्होंने 2 दिन में तैयार रखने को कहा था.

शर्मीला 2 दिन में एक करोड़ का इंतजाम कहां से करती? शिवदत्त होते तो एक करोड़ इकट्ठा करना मुश्किल नहीं था लेकिन शर्मीला घरेलू महिला थी, उन्हें न तो पति के पैसों के हिसाब किताब की जानकारी थी और न ही उन के व्यवसाय के बारे में ज्यादा पता था. शर्मीला को बस इतना पता था कि उस के पति बिल्डर हैं.

शर्मीला और उस के परिवार की चिंता को देखते हुए कुछ लोगों ने उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी. शर्मीला परिवार वालों के साथ 22 मार्च को भीलवाड़ा के सुभाषनगर थाने पहुंच गई और पुलिस को सारी जानकारी देने के बाद अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने शर्मीला और उन के परिवार के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि कपड़ा नगरी के नाम से देश भर में मशहूर भीलवाड़ा के पथिक नगर की श्रीनाथ रेजीडेंसी में रहने वाले 42 साल के शिवदत्त शर्मा की हाइपर टेक्नो कंसट्रक्शन कंपनी है. शिवदत्त का भीलवाड़ा और आसपास के इलाके में प्रौपर्टी का बड़ा काम था. उन के बिजनैस में कई साझीदार हैं और इन लोगों की करोड़ों अरबों की प्रौपर्टी हैं.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने इस की जानकारी एडिशनल एसपी दिलीप सैनी को दे दी. इस के बाद पुलिस ने शिवदत्त की तलाश शुरू कर दी. साथ ही शिवदत्त की पत्नी से यह भी कह दिया कि अगर अपहर्त्ताओं का कोई भी मैसेज आए तो तुरंत पुलिस को बता दें.

चूंकि शिवदत्त अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी के घर जाने की बात कह कर घर से निकले थे, इसलिए पुलिस ने राजेश त्रिपाठी से पूछताछ की. राजेश ने बताया कि शिवदत्त होली के दिन शाम को उन के पास आए तो थे लेकिन वह रात करीब 8 बजे वापस चले गए थे.

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जांचपड़ताल के दौरान 23 मार्च को पुलिस को शिवदत्त की वेरना कार भीलवाड़ा में ही सुखाडि़या सर्किल से रिंग रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार जब्त कर ली. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से शिवदत्त के अपहरण से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. कार भी सहीसलामत थी. उस में कोई तोड़फोड़ नहीं की गई थी और न ही उस में संघर्ष के कोई निशान थे.

पुलिस ने शिवदत्त के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन मोबाइल के स्विच्ड औफ होने की वजह से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जांच की अगली कड़ी के रूप में पुलिस ने शिवदत्त, उस की पत्नी और कंपनी के स्टाफ के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा शिवदत्त के लेनदेन, बैंक खातों, साझेदारों के लेनदेन से संबंधित जानकारियां जुटाईं. यह भी पता लगाया गया कि किसी प्रौपर्टी को ले कर कोई विवाद तो नहीं था.