Rajasthan News : शादीशुदा प्रेमिका को प्यार में फंसाया फिर हत्या कर सरसों के खेत में फेंका

Rajasthan News : कभीकभी इंसान छोटी सी समस्या से निजात पाने के लिए अपराध कर बैठता है, जिस से उस की जिंदगी बरबाद हो जाती है. प्रेमिका कमला से निजात पाने के लिए हरिराम मीणा भी ऐसा ही एक अपराध कर बैठा. इस का नतीजा यह हुआ कि…

राजस्थान के टोंक जिले की देवली तहसील के थाना घाड़ के अंतर्गत एक गांव बड़ोली आता है. इसी गांव के रहने वाले गोकुल के खेत पर सरसों की फसल की कटाई का काम मजदूरों द्वारा किया जा रहा था. यह बात 10 फरवरी, 2021 की है. सरसों काटते हुए मजदूरों की निगाह एक मानव कंकाल पर पड़ी. इस कंकाल के पास महिला की शृंगार सामग्री यानी चूडि़यां, बिछिया, नीली साड़ी वगैरह पड़ी थी. कंकाल साड़ी में लिपटा था. देखने पर लग रहा था कि कंकाल किसी महिला का है. यह बात मजदूरों ने खेत के मालिक गोकुल को बताई. गोकुल ने भी मौके पर आ कर देखा. बात सही थी.

गोकुल ने फोन कर के गांव के सरपंच धनपत माली को खेत में कंकाल मिलने की बात बताई. कुछ ही देर में सरपंच भी खेत पर पहुंच गए. फिर उन्होंने फोन कर के धाड़ थाने में इस की सूचना दी. सूचना पा कर धाड़ थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामेश्वर प्रसाद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. घटनास्थल का मुआयना किया. वहां पर नीले रंग की साड़ी में लिपटा कंकाल मिला. थानाप्रभारी रामेश्वर प्रसाद ने इस घटना की सूचना सीओ (देवली) दीपक कुमार, एएसपी राकेश कुमार और एसपी ओमप्रकाश को दे दी. सूचना मिलने पर सीओ दीपक कुमार एवं एफएसएल टीम मौके पर पहुंच गई.

एफएसएल टीम द्वारा साक्ष्य उठाए गए, साथ ही 11 फरवरी को महिला के कंकाल को पोस्टमार्टम एवं डीएनए जांच के लिए अजमेर मैडिकल कालेज भेजा गया. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी (टोंक) ने अपने निर्देशन में एक टीम का गठन किया. इस टीम को जल्द से जल्द अज्ञात महिला कंकाल के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई. इस टीम में एएसपी (मालपुरा) राकेश कुमार, सीओ दीपक कुमार, थानाप्रभारी (धाड़) रामेश्वर प्रसाद, हैडकांस्टेबल हरफूल, भैरूलाल, कांस्टेबल भागचंद, बजरंग, मेघराज, रामराज, कन्हैयालाल, महिला कांस्टेबल ज्योति और साइबर सेल के हैडकांस्टेबल सुरेशचंद शामिल थे.

पुलिस टीम ने सब से पहले महिला कंकाल से लिपटी हुई नीली साड़ी के पल्लू से बंधी मिली एक परची पर लिखे मोबाइल नंबर  की काल डिटेल्स निकाली. यह मोबाइल नंबर हरिराम मीणा पुत्र रामलाल मीणा, निवासी गांव भरनी का था. इस नंबर से सब से आखिर में महावीर मीणा से बात हुई थी. महावीर और हरिराम मीणा काल डिटेल्स में संदिग्ध लगे तो पुलिस टीम ने 13 फरवरी को हरिराम को उठा लिया और उस से पूछताछ की. थोड़ी देर तक तो वह आनाकानी करता रहा. मगर फिर जब पुलिसिया तेवर दिखाए तो वह तोते की तरह बोलने लगा. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

पता चला कि वह लाश टोंक जिले के गांव जगनतन ढिकला निवासी कमला मोग्या की थी. वह राजू मोग्या की बेटी थी. इस के बाद दूसरे आरोपी महावीर मीणा को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उस से पूछताछ की गई तो उस ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. तब पुलिस ने महिला कंकाल के पास मिले सामान को देखने के लिए राजू मोग्या, उस की पत्नी रतनीबाई और मृतका कमला मोग्या की छोटी बहन को धाड़ थाने पर बुलाया. इन्होंने महिला कंकाल के पास मिले सामान को देख कर अपनी बेटी कमला मोग्या पत्नी कालूलाल मोग्या के रूप में शिनाख्त कर ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने और आरोपियों के गिरफ्तार होने पर पुलिस ने चैन की सांस ली. कमला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मैडिकल कालेज में कंकाल की जांच हो जाने के बाद वह मृतका के पिता राजू मोग्या को सौंप दिया. उन्होंने कंकाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने मृतका के मातापिता राजू एवं रतनीबाई का डीएनए टेस्ट भी कराया ताकि सच सामने आ सके. पुलिस अधिकारियों ने कमला के खून से हाथ रंगने वाले आरोपी महावीर मीणा और हरिराम मीणा से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, वह कुछ इस प्रकार से है—

कमला मोग्या की शादी आज से करीब 10 साल पहले कालूलाल मोग्या से हुई थी. कमला के मातापिता ने गरीबी में जीवन गुजारा था. मगर अपनी बेटी कमला की हर ख्वाहिश पूरी की थी. कमला सांवले रंग की आकर्षक नैननक्श की नवयौवना थी. शादी के बाद उसे कालूलाल जैसा मेहनतकश इंसान पति के रूप में मिला था. वक्त के साथ कमला 3 बच्चों की मां बनी. ये तीनों बेटे हैं. इस समय इन की उम्र 7 साल, 5 और 3 साल है. कालूलाल मेहनतमजदूरी में दिनरात खटता था. इस कारण वह थकामांदा रात को घर लौट कर खाना खा कर बिस्तर पर पड़ता और सो जाता था. कालू की पत्नी कमला की हसरतें अभी जवान थीं. वह चाहती थी कि उस का पति उसे बांहों में ले कर आनंदलोक की सैर कराए.

मगर कालू की हाड़तोड़ मेहनत ने उसे थका दिया था. अगर इंसान के तन की ज्वाला ठंडी नहीं हो तो वह बहकने लगता है. अपने सुख के लिए उस के कदम बहकने लगते हैं. कालू तो अपनी बीवी और बच्चों के भरणपोषण के लिए रातदिन मेहनतमजदूरी कर रहा था. वहीं कमला अपने देहसुख के लिए अपने जुगाड़ में लगी थी. आज से करीब 10 महीने पहले कालू ने ढिकला निवासी दिव्यांग युवक महावीर मीणा का खेत बटाई (हिस्सेदारी) पर ले लिया. इस के बाद कालू अपनी पत्नी कमला एवं तीनों बेटों के साथ जंगलतन से ढिकला स्थित महावीर के खेत में झोपड़ी बना कर रहने लगा.

खेत में रहते हुए कुछ दिन ही हुए थे कि एक रोज महावीर खेत देखने आया. उस समय कालू खेत में काम कर रहा था. कालू की बीवी कमला झोपड़ी में बैठी खाना बना रही थी. महावीर सीधे झोपड़ी में चला गया. उस समय कमला घुटनों तक साड़ी उठा कर बैठी थी. महावीर की नजर कमला की गोरी पिंडलियों पर पड़ी. उस की कामवासना जाग उठी. महावीर ने कहा, ‘‘क्या पका रही है कालू भाई के लिए?’’

सुन कर कमला चौंकी. उस ने आगंतुक पर नजर डाली. वह उस की गोरी पिंडलियों की तरफ ताक रहा था. कमला ने झट से साड़ी नीचे की. इसी हड़बड़ाहट में उस के उभारों पर से साड़ी हट गई. उन्नत उभार देख कर तो महावीर बावला ही हो गया. कमला ने साड़ी को ठीक किया और बोली, ‘‘आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘मैं महावीर हूं. यह खेत मेरा ही है.’’ सुन कर कमला बोली, ‘‘अच्छा, तो आप महावीरजी हैं. आइए, बैठिए. मैं चाय बनाती हूं.’’

महावीर खटिया पर बैठ गया. कमला चाय बनाने लगी. तभी कालू भी आ गया. महावीर और कालू बातें करने लगे. कमला चाय बना लाई. सभी ने चाय पी. इस के बाद महावीर ने कहा कि कोई चीज चाहिए तो बोल देना. परेशान मत होना. मुझे अपना ही समझना. इस के बाद महावीर खेत में फसल देख कर गांव चला गया. महावीर की आंखों में 3 बच्चों की मां कमला का मादक बदन बस गया. वह सारी रात उसे पाने का षडयंत्र मन ही मन करता रहा. महावीर 2 दिन बाद फिर खेत जा पहुंचा. खेत तो बहाना था. उसे तो कमला को रिझाना था. इस कारण वह दुकान से बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें भी लाया था.

कमला से महावीर हंसीठिठोली करने लगा. वह उस की सुंदरता की तारीफ भी करता था. कमला द्वारा बनी चाय का बखान भी करता था. महावीर इस के बाद अकसर 2-4 दिन बाद खेत जाने लगा. वह कमला को ललचाई नजर से देखता. उस रोज कालू काम से कहीं गया हुआ था. महावीर आ गया खेत पर. कमला से पता चला कि कालू शाम तक घर लौटेगा. बस उस रोज महावीर ने बिसकुट, भुजिया दे कर बच्चों को झोपड़ी से बाहर खेलने भेज दिया. उस के बाद महावीर ने कमला से पूछा, ‘‘लगता है, मेरा आना तुम्हें अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं. मुझे तो तुम बहुत अच्छे लगते हो.’’ कमला ने कहा.

सुन कर महावीर ने आव देखा न ताव, कमला को बांहों में भर लिया. थोड़ी सी नानुकुर के बाद कमला ने अपना तन महावीर के हवाले कर दिया. महावीर और कमला वासना के दरिया में गोते लगाने लगे. कमला को महावीर ने ऐसा शारीरिक सुख दिया कि वह उस की दीवानी हो गई. कमला भूल गई कि वह शादीशुदा और 3 बेटों की मां है. उस के ये बहके कदम उसे कहीं का नहीं छोडेंगे अवैध संबंधों का परिणाम बहुत खतरनाक होता है. कमला को जो शारीरिक सुख महावीर ने कई बरसों बाद दिया था, उस सुख की खातिर वह अपने पति और बच्चों तक को ताक पर रख कर महावीर के साथ भाग जाने को तैयार हो गई थी.

कालू शरीफ था. उसे पता नहीं था कि उस की गैरमौजूदगी में उस की बीवी गैरमर्द के साथ रंगरलियां मनाती है. वह तो सोचता था कि महावीर अपनी खेती देखने आता है. जबकि महावीर तो कमला से मिलने आता था. कालू वहीं खेत पर रहता था. इस कारण कमला और महावीर का मिलन नहीं हो पाता था. ऐसे में वासना की आग में जल रहे महावीर और कमला ने योजना बनाई कि वे दोनों चुपके से भाग जाएंगे. महावीर ने कमला से कहा, ‘‘मैं ने देवली में कमरा किराए पर ले लिया है. तुम वहीं रहना. मैं भी आताजाता रहूंगा. बाद में जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, तब मैं तुम से शादी कर लूंगा और बच्चों को भी अपना लूंगा.’’

सुन कर कमला बहुत खुश हुई. करीब 7 महीने पहले एक रोज कमला बिना कुछ बताए कहीं चली गई. महावीर योजनानुसार कमला को ले कर देवली कस्बे पहुंचा और किराए के कमरे में कमला को छोड़ कर वापस गांव ढिकला आ गया ताकि उस पर कोई शक न करे. उधर पत्नी के अचानक गायब हो जाने पर कालू को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि उस की पत्नी गई तो गई कहां. कालू ने उस की बहुत खोजबीन की. रिश्तेदारी में ढूंढा. मगर कमला का कोई पता नहीं चल सका. उसे जमीन खा गई थी या आसमान निगल गया था. थकहार कर कालू ने थाना दूनी में कमला की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

पुलिस ने उस की कोई खोजबीन नहीं की. पुलिस वालों ने कहा कि कहीं गई होगी. अपने आप आ जाएगी. गरीब की भला कौन सुनता है. कालू बीवी की खोजबीन कर के थक गया. वह अपने तीनों बच्चों की परवरिश करने लगा. कालूलाल अब बच्चों की देखभाल करने लगा. उस का कामधंधा छूट गया था. कालू काम पर जाए तो बच्चों की देखरेख कौन करे. इस कारण कालू अपनी बीवी के वियोग में मासूम बच्चों को जैसेतैसे पालने लगा. उधर महावीर का जब मन होता तो वह देवली जाता और कमला के साथ रंगरलियां मनाता. वह कभी गांव तो कभी देवली में प्रेमिका कमला के साथ रातें रंगीन कर रहा था. कुछ समय बाद महावीर ने कमला को देवली से निवाई कस्बे में किराए के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

महावीर अब निवाई में कमला के साथ मौजमस्ती करने लगा. कमरे का किराया और कमला के खानेपीने का सारा खर्च महावीर मीणा उठाता था. महावीर निवाई में 2 दिन रहता. फिर गांव ढिकलाआ जाता. गांव में 2-3 दिन रहता फिर निवाई कमला के पास चला जाता. महावीर के निवाई से वापस गांव जाने के बाद कमला अकेली रह जाती थी. वह बमुश्किल समय अकेले काटती थी. ऐसे में कमला ने तय कर लिया कि वह अब महावीर के साथ ढिकला जा कर रहेगी. उसे अपने बच्चों की भी याद सता रही थी. महावीर जब जनवरी के दूसरे हफ्ते में निवाई कमला से मिलने आया तब कमला ने उस से कहा कि अब वह यहां अकेली नहीं रहेगी.

कमला ने दबाव बनाया कि वह अपने साथ उसे गांव ढिकला में रखे और बच्चों को भी अपनाए. सुन कर महावीर मीणा के हाथों के तोते उड़ गए. महावीर और कमला के अवैध संबंधों की खबर उस के गांव ढिकला में भी पता चल चुकी थी. महावीर के अकसर देवली और बाद में निवाई जा कर रहने का राज गांव में उजागर हो गया था. अब कमला उस के साथ ढिकला चलने की जिद करने लगी थी. ऐसे में अब तक महावीर गांव के लोगों से कहता रहा था कि कमला के बारे में जो बातें कही जा रही हैं, वह गलत हैं. उसे तो पता तक नहीं कि कमला है कहां.

ऐसे में जब उस के साथ कमला को लोग देखेंगे तो उस की समाज और गांव में बदनामी होगी. तब महावीर ने बदनामी के डर से कमला को ही रास्ते से हटाने का निर्णय ले लिया. महावीर ने कमला को झूठा विश्वास दिलाया कि वह एकदो दिन में उसे गांव ढिकला ले जाएगा. उस की बात सुन कर कमला खुश हो गई. महावीर ने भरनी निवासी अपने ममेरे भाई हरिराम मीणा से इस बारे में बात की और अपने पास बुलाया. इस के बाद योजनानुसार 11 जनवरी, 2021 को महावीर और हरिराम मीणा बाइक द्वारा निवाई कमला के पास पहुंचे. रात वहीं कमला के पास रुके.

अगले दिन कमरे का हिसाब वगैरह कर के कमला के साथ मोटरसाइकिल पर टोंक पहुंचे. टोंक घूमने के बाद 12 जनवरी, 2021 को चौथ का बरवाड़ा घुमाते रहे. फिर शाम हो जाने के बाद केरली कुंड आए. वहां महावीर और हरिराम ने शराब पी. इस के बाद बड़ोली के जंगल में पहुंचे और वहां एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए. वहीं पर उन्होंने मौका पा कर कमला को गला दबा कर मार डाला और उस के शव को सरसों के खेत में डाल कर ढिकला में अपने घर आधी रात को आ कर सो गए. कमला ने हरिराम के मोबाइल नंबर की परची अपनी साड़ी के पल्लू में बांध रखी थी ताकि कभी उस से बात करेगी. इसी परची ने पुलिस को हत्यारों तक पहुंचा दिया.

सरसों के खेत में कमला की लाश पड़ी रही. 12 जनवरी, 2021 की रात 11 बजे कमला की हत्या कर शव गोकुल जाट के खेत में सरसों की फसल के बीच फेंका गया था. लाश सरसों के बीच खेत में पड़ी रही. करीब एक महीने तक पड़ी यह लाश सड़गल कर कंकाल बन गई. जब 10 फरवरी, 2021 को हत्याकांड से करीब महीने भर बाद सरसों की कटाई मजदूरों द्वारा की जा रही थी, तब उन की नजर कंकाल पर पड़ी. इस के बाद खेत मालिक गोकुल जाट ने सरपंच धनपत माली को कंकाल मिलने की खबर दी. सरपंच ने धाड़ थाने के थानाप्रभारी रामेश्वर प्रसाद को सूचना दी. पुलिस ने पूछताछ पूरी होने पर दोनों आरोपियों महावीर मीणा और हरिराम मीणा को कोर्ट में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jharkhand News : 10 दिन तक सिर कटी लाश बनी रही रहस्य, आखिर किसकी थी

Jharkhand News : युवावस्था में किसी लड़की के कदम बहक जाएं तो उसे सही रास्ते पर लाना कोई आसान नहीं होता. मोहम्मद जमशेद ने बहकी हुई बेटी सुफिया को सही रास्ते पर लाने की लाख कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस का नतीजा जो निकला वह…

झारखंड की राजधानी रांची के थाना ओरमांझी स्थित साई यूनिवर्सिटी के परिसर में छात्र चहलकदमी कर रहे थे. घूमते हुए कुछ छात्र विश्वविद्यालय के पीछे स्थित जीराबेर जंगल में मस्ती करने पहुंच गए थे. जंगल में वे इधरउधर घूमते हुए जब इस के बीचोबीच पहुंचे तो वहां एक महिला की सिरकटी नग्न लाश देख कर चौंक गए. वे उसी क्षण उलटे पांव दौड़ते हुए विश्वविद्यालय के कैंपस पहुंचे. धौंकनी के समान उन की सांसें तेजतेज चल रही थीं. थोड़ी देर बाद जब वे सामान्य हुए तो उन्होंने लाश वाली बात अपने दोस्तों को बता दी.

जिस ने भी यह खबर सुनी, वह चौंके बिना नहीं रह पाया था. मुंहमुंह होते हुए यह खबर विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंच गई थी. कैंपस के पीछे लाश की सूचना मिलते ही प्रशासनिक भवन में हड़कंप मच गया. सूझबूझ का परिचय देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने घटना की जानकारी ओरमांझी थाने के थानाप्रभारी श्याम किशोर महतो को दे दी. विश्वविद्यालय कैंपस के पीछे जीराबेर जंगल में सिरकटी लाश की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी श्याम किशोर महतो चौंक गए. फिर वह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

उन के साथ एसआई जयप्रकाश दास, संजय दास और 3 सिपाही थे. मौके पर पहुंच कर महिला की सिर कटी नग्न लाश का निरीक्षण किया. हत्यारों ने युवती की बर्बरतापूर्वक हत्या की थी. गहनतापूर्वक छानबीन करने पर पता चला कि हत्यारों ने युवती के गुप्तांग पर धारदार हथियार से कई वार किए थे और सिर भी काट कर साथ लेता गया था. क्योंकि पुलिस ने जंगल की छानबीन की थी, लेकिन मृतका का सिर कहीं नहीं मिला था. थानाप्रभारी श्यामकिशोर महतो ने दिल दहला देने वाली इस घटना की सूचना एसएसपी सुरेंद्र कुमार झा, एसपी (ग्रामीण) नौशाद अली और डीएसपी चंद्रशेखर आजाद को भी दे दी थी.

सूचना पा कर पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. अधिकारियों ने भी मौके का मुआयना किया. लाश के पास से शराब की कुछ शीशियां भी पाई गई थीं. इस से यही अनुमान लगाया जा रहा था हत्यारों ने युवती के साथ दुष्कर्म करने के पश्चात अपनी पहचान छिपाने के लिए हत्या कर दी होगी और सिर काट कर अपने साथ ले गया होगा और कहीं छिपा दिया होगा. इसलिए लाश की पहचान नहीं हो पाई थी. थानाप्रभारी श्यामकिशोर महतो ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए रिम्स अस्पताल भिजवा दी और अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 324, 201, 120बी भादंसं के तहत मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. यह बात 3 जनवरी, 2021 की है.

अगले दिन रांची के सभी स्थानीय अखबारों ने इस घटना को प्रमुखता से छापा. अखबार में छपी खबर पढ़ कर एक दंपति ने ओरमांझी थाने पहुंच कर थानाप्रभारी से मुलाकात की. थानाप्रभारी ने जब दंपति को अस्पताल ले जा कर वह सिरकटी लाश दिखाई तो दंपति ने उस की शिनाख्त अपनी बेटी के रूप में कर ली. तब पुलिस ने थोड़ी राहत की सांस ली. सोचा कि मृतका की शिनाख्त हो गई है तो हत्या की वजह भी सामने आ ही जाएगी. लेकिन अगले दिन हैरान करने वाली बात सामने आई. जिस दंपति ने सिरकटी लाश को अपनी बेटी के रूप में पहचाना था, उन की बेटी जिंदा घर लौट आई थी.

पता चला कि वह अपने घर से भाग कर शहर में छिप कर अपने प्रेमी के साथ कई दिनों से रह रही थी. जब मामला बिगड़ता देखा तो वह मांबाप के सामने आ गई थी. मतलब साफ था कि मृतका उस दंपति की बेटी नहीं थी तो वह कौन थी? यह पुलिस के लिए अबूझ पहेली बन गई. उसी दिन लाश की शिनाख्त के लिए एसएसपी सुरेंद्र कुमार झा ने 25 हजार रुपए का ईनाम रख दिया. यह भी ऐलान कर दिया था पता बताने वाले की पहचान छिपा कर रखी जाएगी. 2 दिन बीत जाने के बावजूद भी न तो मृतका की शिनाख्त हो सकी थी और न ही उस के बारे में कोई सूचना ही मिली. जबकि एसएसपी ने इस केस के खुलासे के लिए 2 टीमें गठित कर दी थीं और मुखबिर भी लगा दिए थे. बावजूद इस के पुलिस के हाथ खाली थे.

तो आईजी (रांची) ने ईनाम की रकम 25 हजार रुपए से बढ़ा कर 50 हजार कर दी. फिर 2 दिनों बाद 8 जनवरी को शासन स्तर से ईनाम की यह रकम 50 हजार से बढ़ा कर सीधे 5 लाख रुपए कर दी गई. लाश की पहचान के लिए ओरमांझी पुलिस ने जिले के सभी शहरी और ग्रामीण इलाके के थानों से पता करा लिया था कि 2 जनवरी के पहले किसी थाने में किसी युवती के गुम होने की कोई रिपोर्ट तो नहीं दर्ज है? लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. किसी थाने में किसी युवती की गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं थी. पुलिस जहां से चली थी वहीं आ कर खड़ी हो गई.

कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था कि लाश की पहचान कैसे कराई जाए. 10 जनवरी, 2021 की दोपहर में चान्हों थाने के चटवल के रहने वाली राबिया परवीन और मोहम्मद जमशेद नाम के एक वृद्ध दंपति रिम्स अस्पताल पहुंचे. अखबारों के माध्यम से उन्हें पता चला था कि 2 जनवरी को जीराबेर जंगल में 18 से 22 साल के बीच एक युवती की सिर कटी लाश बरामद हुई थी. जिस दिन लाश बरामद हुई थी, उस के 2 दिन पहले से उन की ब्याहता बेटी सुफिया परवीन अपनी ससुराल चंदवे, थाना पिठौरिया से रहस्यमय तरीके से गायब थी. अपने दामाद शेख बिलाल से जमशेद ने कई बार फोन कर के बेटी के बारे में पूछा भी, लेकिन उस ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.

मोहम्मद जमशेद और उस की पत्नी राबिया परवीन ने अपने स्तर से संबंधियों और रिश्तेदारों सभी से पता लगा लिया. न तो सुफिया वहां गई थी और न ही उस का फोन काम कर रहा था. सुफिया का फोन लगातार बंद आ रहा था. जमशेद ने अखबारों में जब से सिरकटी लाश के बारे में पढ़ा था, तब से उसे देखने के लिए परेशान और बेचैन था. यही सोच कर वह पत्नी को ले कर 10 जनवरी के दोपहर में रिम्स अस्पताल पहुंचे थे. मोहम्मद जमशेद और राबिया परवीन लाश को देखते ही पहचान गए. लाश उन की बेटी सुफिया परवीन की ही थी, जो पिछले 14 दिनों से अपनी ससुराल चंदवे से गायब थी. राबिया परवीन ने लाश के दाईं पैर पर जले के निशान से उस की पहचान की थी.

दरअसल, सुफिया बचपन में आग से बुरी तरह झुलस गई थी. इलाज के बाद सुफिया के जख्म तो भर गए थे लेकिन दाग अभी भी मौजूद थे. लाश की पहचान होते ही थानेदार श्याम किशोर महतो ने दंपति को थाने बुलाया और दोनों से जानकारी हासिल की. मोहम्मद जमशेद के बयान के आधार पर पुलिस की नजरों में दोषी के रूप में उन का दामाद शेख बिलाल चढ़ गया. पुलिस ने मोहम्मद जमशेद से शेख बिलाल की तसवीर मांगी. अगले दिन मोस्टवांटेड के रूप में शेख बिलाल की तसवीर जिले के हर थाने में चस्पा करा दी और अखबारों में भी प्रकाशित करा दी. पता बताने वालों को ईनाम देने की भी घोषणा कर दी थी.

11 जनवरी को मोहम्मद जमशेद ने दामाद शेख बिलाल के बारे में पुलिस को जो जानकारी दी थी, उसी आधार पर पुलिस ने चंदवे स्थित गांव उस के मकान पर जा कर दबिश दी. घर पर शेख बिलाल की पत्नी शब्बो खातून और उस का नाबालिग बेटा मिला. दोनों से पूछताछ करने पर पुलिस को पता चला कि शेख बिलाल 2 जनवरी से ही घर से गायब है. इस पर पुलिस का शक पुख्ता हो गया कि सुफिया का कत्ल उसी ने किया है, तभी वह घर से फरार है. शब्बो खातून और उस के बेटे से पूछताछ में पुलिस को उन दोनों पर शक हो गया था कि जरूर सुफिया की हत्या की जानकारी दोनों को थी, लेकिन वे कुछ भी नहीं बता रहे थे.

इसी शक के आधार पर पुलिस सिर्फ शब्बो को हिरासत में ले कर थाने ले आई और वहां उस से गहन पूछताछ की. शब्बो पहले नानुकुर करती रही. अंतत: पुलिस के बारबार पूछने पर वह टूट गई और कबूल कर लिया कि उसे अपनी सौतन सुफिया परवीन की हत्या की जानकारी पहले से थी. उस का पति शेख बिलाल ही सुफिया परवीन का कातिल है, उसी ने उस का सिर काट कर घर से 2 किलोमीटर दूर अपने खेत में गड्ढा खोद कर दफना दिया था. शब्बो खातून के मुंह से इतना सुनते ही थानाप्रभारी श्यामकिशोर चौंक गए. फिर तो वह रट्टू तोते की तरह पूरी कहानी उगलती गई. पूरी कहानी सुनने के बाद वह अपना चेहरा हथेलियों बीच छिपा कर सुबकने लगी और पुलिस अधिकारियों से माफी मांगने लगी.

इस के बाद मजिस्ट्रैट की उपस्थिति में पुलिस शब्बो खातून को ले कर चंदवे गांव में स्थित उस खेत में गई जहां सुफिया का कटा सिर दफनाया गया था. पुलिस के पैरों तले से जमीन तब खिसक गई थी जब सिर के इर्दगिर्द बड़ी मात्रा में नमक मिला. हत्यारे शेख बिलाल का तर्क था कि पुलिस उस के गुनाहों से कभी परदा नहीं उठा पाएगी. जब तक उस के गिरेहबान पर हाथ डालेगी तब तक वारदात का नामोनिशान मिट चुका होगा. लेकिन पुलिस ने उस के मंसूबों पर पानी फेर दिया. 10 दिनों से रहस्य बनी सिर कटी लाश की शिनाख्त सुफिया परवीन के रूप में हो गई थी.

सौतन सुफिया की हत्या का राज छिपाने के जुर्म में पुलिस ने शब्बो खातून को गिरफ्तार कर लिया और उस के पति शेख बिलाल की तलाश में उस के ठिकानों पर दबिश दी. 2 दिनों की मेहनत ने अपना रंग दिखाया. आखिरकार 14 जनवरी, 2021 को शेख बिलाल अपने इलाके से उस समय गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह भागने की फिराक में रोड पर खड़ा हुआ बस का इंतजार कर रहा था. गिरफ्तार कर पुलिस उसे थाने ले आई. सुफिया हत्याकांड के मुख्य आरोपी शेख बिलाल के गिरफ्तार होते ही थानाप्रभारी श्यामकिशोर ने पुलिस अधिकारियों को सूचना दे दी थी.

एसपी (ग्रामीण) नौशाद अली थोड़ी देर में ओरमांझी थाने पहुंच गए और हत्या के संबंध में आरोपी शेख बिलाल से कड़ाई से पूछताछ शुरू की. बिना हीलाहवाली के शेख बिलाल ने अपना जुर्म कबूल कर लिया कि उसी ने प्रेमिका से दूसरी पत्नी बनी सुफिया परवीन की हालात के हाथों मजबूर हो कर हत्या की थी. फिर उस ने सुफिया से प्यार से ले कर हत्या तक की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. उस के बाद पुलिस उसे हिरासत में ले कर वहां गई, जहां सुफिया परवीन की हत्या कर के लाश फेंकी थी. फिर पुलिस उसे वहां ले कर गई, जहां सुफिया का सिर काट कर जमीन के भीतर दफनाया था.

उस के बाद उसी दिन घर ले जा कर शेख बिलाल ने हत्या में प्रयुक्त धारदार हथियार खून में सना दाउली बरामद करा दिया. पुलिस ने दाउली अपने कब्जे में ले लिया और आरोपी को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. क्रूर हत्यारा शेख बिलाल ने सुफिया परवीन की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह कुछ ऐसे सामने आई है—

21 वर्षीय सुफिया परवीन मूलरूप से राजधानी रांची के थाना चान्हों के चटवल इलाके की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम मोहम्मद जमशेद और मां का नाम राबिया परवीन था. जमशेद और राबिया की 6 बेटियों और 3 बेटों में वह पांचवें नंबर की थी. प्राइवेट नौकरी कर के जमशेद इतना कमा लेता था जिस से वह अपना और अपने परिवार का भरणपोषण कर लेता था. बच्चों में बेटियां सब से बड़ी थीं. पुराने खयालातों वाला जमशेद बेटियों को नौकरी के लिए कहीं बाहर जाने नहीं देता था. वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है. समाज में इज्जत ही बेटियों का गहना होती है, जिसे जितना ढक कर रखा जाए वह उतनी पाकीजा रहती है.

इसलिए वह अपनी छोटी सी कमाई में परिवार को खुश रखने की हरसंभव कोशिश करता था, ताकि आधुनिक भौतिक वस्तुओं की चकाचौंध में वे बहकने न पाएं. मोहम्मद जमशेद की सभी संतानों में सुफिया परवीन अलग किस्म की लड़की थी. औसत कदकाठी और गोरे रंग की सुंदर सुफिया चंचल मन और स्वच्छंद खयालातों वाली लड़की थी. सुफिया ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि उस का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था. जमशेद ने 4 बेटियों के हाथ पीले कर दिए थे. मजे से उस की गृहस्थी चल रही थी. अब अच्छा सा घरवर देख कर सुफिया के हाथ पीले करा दे तो एक और बेटी की जिम्मेदारी में रह जाएगी.

जमशेद बेटी की शादी के बारे में पत्नी से विचारविमर्श कर रहा था कि सुफिया के कोरे मन पर मोहब्बत की सुनहरी स्याही से खालिद ने अपनी मोहब्बत की दास्तान लिख दी. अब सुफिया के अस्तित्व पर खालिद का पूरा कब्जा था. दोनों ही एकदूसरे से बेपनाह प्यार करते थे. सुफिया और खालिद के दिलों में मोहब्बत की मीठी उमंग उस समय पनपी थी, जब दोनों की आंखें चार हुई थीं. बलसोकरा गांव निवासी खालिद की शादी सुफिया के घर के बगल में रहने वाली फातिमा से हुई थी. पड़ोसी होने के नाते प्यारी सहेली फातिमा से मिलने सुफिया उस के घर जाती थी. आतेजाते फातिमा के पति खालिद की नजरें सुफिया के हुस्न से टकराईं तो वह उस की जवानी की तीखी तलवार से घायल हो गया था.

उसी दिन उसे पाने की हसरत अपने मन में ठान ली. फातिमा की अजीज सहेली होने के नाते सुफिया से खालिद ने मजाकमजाक में साली का रिश्ता जोड़ लिया था. उसी रिश्ते की आड़ में वह उस से अश्लील मजाक करने लगा. खालिद का मजाक करना सुफिया को अच्छा लगता था. खालिद की चिकनीचुपड़ी और मीठी बातों से उस रोमरोम खिल उठता था. उस के मन को गहराई तक गुदगुदाता था. धीरेधीरे सुफिया खालिद की ओर खिंचती गई और उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. यह जानते हुए भी कि खालिद उस की प्यारी सहेली फातिमा का शौहर है, फिर भी सुफिया ने सहेली के पति पर बुरी नजर डाल कर उसे अपने हुस्न के मकड़जाल में कैद कर लिया था.

मोहब्बत की आग में जलते दीवानों ने एकदूसरे के साथ सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाईं और एकदूसरे के साथ अपने घरौंदे बसाने के हसीन ख्वाब देखे. खालिद के बिना जीवन अधूरा समझने वाली सुफिया घटना से 10 महीने पहले फरवरी, 2020 में घर छोड़ कर खालिद के साथ भाग गई और दिल्ली जा कर उस के साथ निकाह कर लिया. न जाने सुफिया की हंसतीखेलती गृहस्थी में किस की बुरी नजर लगी कि उस के प्यार का घरौंदा रेत के महल की तरह भरभरा कर ढह गया. खालिद और सुफिया के बीच 2 महीने तक सब कुछ इसी तरह चलता रहा. धीरेधीरे सुफिया के सिर से खालिद की मोहब्बत का जूनुन पूरी तरह उतर गया था.

उन दोनों के बीच में कड़वाहट ने अपना कब्जा जमा लिया था. नए जमाने के खयालातों में जीने वाली सुफिया को पति की बंदिशें अखरने लगीं तो उन के बीच में टकराहट ने पांव जमा लिए थे. अब खालिद के साथ रहना उसे एक पल गवारा नहीं था, लिहाजा सुफिया खालिद को छोड़ कर दिल्ली से अपने मायके चटवल (रांची) आ गई थी. सुफिया ने जो किया था, वह माफी के लायक नहीं था, लेकिन उसे बुरा सपना समझ कर उस के नेकदिल मांबाप ने बेटी को माफ कर घर में जगह दे दी थी. उन का सोचना था सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते, फिर वह तो उस का अपना खून है, लड़की है, कहां जाएगी.

बेटी के बातव्यवहार और विचारों में बदलाव देख कर मांबाप धीरेधीरे सब कुछ भूलते गए. सुफिया भी खुद को बदलने में जुट गई थी. लेकिन यह सब उस का सिर्फ दिखावा था. मोहब्बत के जिस भंवर से वह अभीअभी बाहर निकली थी, फिर उस के पांव उसी भंवर में जा फंसे थे. सुफिया दिल के हाथों एक बार फिर मजबूर हो गई थी. इस बार उस का दिल खालिद के मामू के शादीशुदा बेटे शेख बिलाल पर आ गया था. कसरती और सुडौल बदन वाले साधारण शक्लसूरत के शेख बिलाल को जब से देखा था, उस दिन से ही उस पर मर मिटी थी.

शेख बिलाल भी सुफिया को देख कर उस पर फिदा था. किसी का भी दिल उस पर आ सकता था. सुफिया को देख कर शेख बिलाल अपने होशोहवास खो बैठा था और उस से प्यार करने लगा था, हालांकि दोनों के दरमियान करीब 14-15 साल का फासला था. कहते हैं प्यार अंधा होता है, न उम्र देखता है न जातपात, बस हो जाता है. सुफिया के साथ भी ऐसा हुआ था. 40 वर्षीय शेख बिलाल मूलरूप से रांची जिले के चंदवे गांव का रहने वाला था. वह पहले से शादीशुदा था. उस की पत्नी शब्बो खातून उर्फ अफसाना थी और एक 14 साल का बेटा भी. शेख बिलाल अपराधी किस्म का था. जिले के कई थानों में उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज थे. वह कई मामलों में वांछित भी था.

खैर, धीरेधीरे सुफिया और शेख बिलाल का प्यार जवां हो रहा था. बेटी के दोबारा फिसलते कदम की जानकारी जब सुफिया के मांबाप को हुई तो उन्हें उस की करतूत पर यकीन नहीं हुआ. फिर भी मांबाप ने उसे समझाने की कोशिश की. सुफिया के सिर पर शेख बिलाल के इश्क का भूत सवार था. उस के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि शेख के अलावा उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, मांबाप की तो बात ही छोड़ दीजिए. मांबाप ने जब देखा कि बेटी को समझाने का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया. इधर शेख बिलाल ने सुफिया से अपनी शादीशुदा जिंदगी की कहानी छिपा रखी थी और यह भी छिपा रखा था कि वह एक बेटे का बाप है.

बहरहाल, सितंबर, 2020 में दोनों ने निकाह कर लिया. निकाह के बाद शेख बिलाल सुफिया को अपने घर लाया और जब उसे उस की शादीशुदा जिंदगी के बारे में पता चला तो उस ने घर में तूफान खड़ा कर दिया. उस ने पति से कह दिया कि घर में या तो वह रहेगी या उस की सौतन शब्बो. उसे दोनों में से किसी एक को चुनना होगा. असमंजस के भंवर में डूबा शेख बिलाल फैसला नहीं कर पा रहा था कि वह क्या करे. क्योंकि सुफिया का रौद्र रूप देख कर वह डर गया था. वह दोनों में से किसी को भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं था इसलिए सब कुछ हालात पर छोड़ दिया.

इधर सुफिया सौतन शब्बो को घर से निकालने की अपनी जिद पर अड़ी हुई थी. सुफिया की जिद ने शेख बिलाल की हंसतीखेलती गृहस्थी को अखाड़ा बना दिया था. शब्बो को ले कर दोनों के बीच घर में रोज झगड़े होने लगे थे. पति के सामने सुफिया ने एक शर्त रख दी. वह शर्त यह थी कि शब्बो को नहीं छोड़ सकते तो मेरे रहने का कहीं और इंतजाम कर दो या तो मुझे पैसे दे दो, जिस से मैं कहीं अलग रह लूं. शेख बिलाल सुफिया की किसी भी शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. जब सुफिया ने जिद की तो गुस्से में उस ने सुफिया को लातघूंसों से खूब मारा.

पति की पिटाई से सुफिया अंदर तक हिल गई. दोनों के बीच का प्रेम अब नफरत का रूप ले चुका था और नौबत मरनेमारने की आ गई थी. पति की पिटाई से आहत सुफिया ने पति को सबक सिखाने के लिए पिठौरिया थाने में दहेज उत्पीड़न और मारपीट का मुकदमा दर्ज करा दिया. उस की लिखित शिकायत पर पुलिस ने शेख बिलाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. शेख बिलाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की ही पत्नी उस के साथ ऐसा कर सकती है. उस के इस दुस्साहस से बिलाल नफरत से बिलबिला उठा और उस ने सुफिया को सजा देने की ठान ली. इधर सुफिया पति को जेल भिजवाने के बावजूद उसी के घर में सीना ताने डटी रही, तनिक भी डरी नहीं.

उस के डर से सौतन शब्बो खातून और नाबालिग बेटे की घिग्घी बंध गई थी. मांबेटे दोनों घर में डरडर कर रहते रहे और शब्बो पति की जमानत की तैयारी में जुट गई थी. महीना भर जेल में रहने के बाद शेख बिलाल जमानत पर छूट कर घर आया तो सुफिया को देख कर उस का खून खौल उठा. वह उसे अपने घर में एक पल के लिए बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. उस का चेहरा देखते ही उसे जेल की सलाखें याद आ रही थी. उस ने सोच लिया था कि उसे अब क्या करना है. शेख बिलाल ने पहली पत्नी शब्बो खातून के साथ मिल कर एक खतरनाक योजना बनाई. योजना सुफिया को रास्ते से हटाने की थी.

पति का साथ देने के लिए वह तैयार हो गई. पहले उसे रास्ते से हटाने के लिए गोली मार कर हत्या करने की योजना बनाई. इस के लिए उस ने एक कट्टा भी खरीद लिया था लेकिन बाद में उस ने अपनी योजना बदल दी. वह कुछ ऐसा करना चाहता था कि न तो लाश को पुलिस पहचान सके और न ही पुलिस कभी उस तक पहुंच सके, एकदम फूलप्रूफ योजना बनाना चाहता था और ऐसी ही योजना बनाई भी. योजना के अनुसार, शेख बिलाल भले ही सुफिया से नफरत करता था लेकिन जानता था कि जब तक वह सुफिया का भरोसा नहीं जीतेगा, तब तक उस की योजना सफल नहीं हो सकती है. षडयंत्र सफल बनाने के लिए उस ने एक चाल चली.

बिलाल ने सुफिया से माफी मांग कर उस का दिल जीत लिया. उस ने उसे भरोसा दिलाया कि वह जो चाहती है, वह वही करेगा. इस के लिए उसे उस का साथ देना होगा. इस पर खुश हो कर सुफिया साथ देने के लिए तैयार हो गई. वह चाहती थी कि उस की सौतन शब्बो जल्दी से जल्दी उस के रास्ते से हट जाए ताकि पति पर उस का पूरा अधिकार हो जाए. चिडि़या को फंसाने के लिए जाल पर शेख बिलाल ने जो दाना डाला था, उस का निशाना एकदम सही जगह पर बैठ गया था. उस ने पत्नी को धीरे से इशारा कर दिया कि शिकार जाल में पूरी तरह से फंस चुकी है, उसे रास्ते से हटाने की देरी है.

तय योजना के मुताबिक, 2 जनवरी, 2021 को शेख बिलाल ने विश्वास में ले कर सुफिया से यह कहा कि आज रात शब्बो का काम तमाम करना है तो सुफिया ने अपनी ओर से हरी झंडी दे दी और खुश भी थी. उस के बाद वह पूरी तैयारी के साथ रात साढ़े 10 बजे के करीब शब्बो खातून और सुफिया परवीन को मोटरसाइकिल पर बैठा कर जीराबेर जंगल की ओर ले गया. बीच में सुफिया बैठी थी, पीछे शब्बो और शेख बिलाल मोटरसाइकिल चला रहा था. जंगल में जैसे ही तीनों बाइक से नीचे उतरे और शेख बिलाल ने बाइक स्टैंड के सहारे खड़ी की, तब तक शब्बो सुफिया पर भेडि़ए की तरह झपटी तो पलट कर शेख भी उस पर झपट पड़ा और उसे जमीन पर पटक दिया.

फिर गला दबा कर सुफिया को मौत के घाट उतार दिया. उस के बाद साथ लाए धारदार हथियार से सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस से भी जब उस का मन नहीं भरा तो उस ने सुफिया के सारे कपड़े उतार लिए ताकि उस की पहचान न हो सके. फिर उसी धारदार हथियार से उस के गुप्तांग पर कई वार किए और अपने मन की भड़ास निकाली. सुफिया को मौत के उतारने के बाद शेख बिलाल शब्बो को बाइक पर बिठा कर कपड़े और कटा सिर साथ लेता गया. करीब ढाई किलोमीटर दूर जा कर अपने खेत पर रुका और खेत में 4 फीट गहरा गड्ढा खोद कर सिर दफना दिया और उस पर बड़ी मात्रा में नमक डाल दिया ताकि सिर मिट्टी में गल जाए और पुलिस के हाथों कोई सबूत न लगे.

उस के बाद सुफिया के सारे कपड़े जला दिए और आखिरी सबूत भी नष्ट कर दिया. यह सब करने के बाद घर जा कर दोनों पतिपत्नी आराम से सो गए. उस ने सोचा था कि सबूत के बिना पुलिस उस तक पहुंच नहीं सकेगी, लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. शेख बिलाल ने फूलप्रूफ योजना बनाई थी. लेकिन सुफिया के मांबाप ने बेटी की लाश पहचान कर उस की योजना पर पानी फेर दिया और उस के असल ठिकाने पहुंच गया. सुफिया की हत्या में पति के साथ शब्बो खातून भी थी, इसलिए उसे भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. सुफिया की हत्या का जेल में बंद शेख बिलाल को तनिक भी मलाल नहीं था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News : भतीजे संग रंगे हाथों पकड़ी गई पत्नी को मारकर पंखे में लटकाया

UP News : पारिवारिक रिश्ते और मानमर्यादाएं परिवार को बांधने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन 2 बच्चों की मां सुमन ने इन रिश्तों को इस तरह तारतार किया कि…

महेंद्र सिंह को पिछले कुछ दिनों से अजय का अपने घर में आनाजाना ठीक नहीं लग रहा था. वह आता था तो उस की पत्नी सुमन उस से कुछ ज्यादा ही घुलमिल कर बातें करती थी. वैसे तो अजय उस के भाई का ही बेटा था, लेकिन महेंद्र सिंह को उस के लक्षण कुछ ठीक नहीं लग रहे थे. अजय जब महेंद्र सिंह की मानसिक परेशानी का कारण बनने लगा तो एक दिन उस ने सुमन से पूछा कि अजय क्यों बारबार घर के चक्कर लगाता है. इस पर सुमन ने तुनकते हुए कहा, ‘‘अजय तुम्हारे भाई का बेटा है. वह आता है, तो क्या मैं इसे घर से निकाल दूं?’’

महेंद्र सिंह को सुमन की बात कांटे की तरह चुभी तो लेकिन उस के पास सुमन की बात का जवाब नहीं था. वह चुप रह गया. महेंद्र सिंह कानपुर शहर के बर्रा भाग 6 में रहता था. वह मूलरूप से औरैया जिले के कस्बा सहायल का रहने वाला था. वह अपने भाइयों में सब से छोटा था. उस से बड़े उस के 2 भाई थे— मानसिंह और जयसिंह. सब से बड़े भाई मानसिंह के 2 बेटे थे अजय सिंह और ज्ञान सिंह. ज्ञान सिंह की शादी हो गई थी. अजय सिंह अविवाहित था. महेंद्र सिंह की शादी जिला कन्नौज के कस्बा तिर्वा निवासी नरेंद्र सिंह की बेटी सुमन के साथ हुई थी. नरेंद्र के 2 बच्चे थे सुमन और गौरव. लाडली और बड़ी होने की वजह से सुमन शुरू से ही जिद्दी स्वभाव की थी. वह जो ठान लेती, वही करती.

शादी हो कर सुमन जब ससुराल आई, तो उसे ससुराल रास नहीं आई. चंद महीने बाद ही वह पति के साथ कानपुर आ कर रहने लगी. सुमन का पति महेंद्र सिंह दादानगर स्थित एक फैक्ट्री में सुरक्षागार्ड की नौकरी करता था. उस की आमदनी सीमित थी. इस के बावजूद सुमन फैशनपरस्त थी. वह अपने बनावशृंगार पर खूब खर्च करती थी. लेकिन शुरूशुरू में जवानी का जुनून था, इसलिए महेंद्र सिंह ने इन सब पर ध्यान नहीं दिया था. उसे तो बस उस की अदाएं पसंद थीं. समय के साथ सुमन ने पूजा और विभा 2 बेटियों को जन्म दिया. शादी के कुछ समय बाद ही महेंद्र सिंह महसूस करने लगा था कि उस की पत्नी उस के साथ संतुष्ट नहीं है.

दरअसल, सुमन नरेंद्र सिंह की एकलौती बेटी थी और अपनी शादी के बारे में बड़ेबड़े ख्वाब देखा करती थी. लेकिन उस के पिता ने उस की शादी एक साधारण सुरक्षा गार्ड से कर दी थी, जिस से उस के सारे अरमान चूरचूर हो गए थे. और वह बच्चों और चौकेचूल्हे में उलझ कर रह गई थी. फिर भी जिंदगी की गाड़ी जैसेतैसे चलती रही. कहानी ने मान सिंह के बड़े बेटे ज्ञान सिंह की शादी के बाद एक नया मोड़ लिया. ज्ञान सिंह की शादी के मौके पर सुमन ने महसूस किया कि अजय उस का कुछ ज्यादा ही खयाल रख रहा है. वह खाने की थाली ले कर सुमन के पास आया और उस के सामने टेबल पर रखते हुए बोला, ‘‘यहां बैठ कर खाओ चाची.’’

सुमन मुसकरा कर थाली अपनी ओर खिसकाने लगी, तो अजय भी उस की ओर देख कर मुसकराते हुए चला गया. थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में दूसरी थाली थी. वह सुमन के पास ही बैठ कर खाना खाने लगा. खाना खातेखाते दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा, तो अजय बोला, ‘‘चाची तुम सुंदर भी हो और स्मार्ट भी. लेकिन चाचा ने तुम्हारी कद्र नहीं की.’’

अजय सिंह ने यह कह कर सुमन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. ज्ञान सिंह की बारात करीब के ही गांव में जानी थी. शाम को रिश्तेदार व परिवार के लोग बारात में चले गए. लेकिन अजय बारात में नहीं गया. उसी रात जब दरवाजे पर दस्तक हुई, तो सुमन ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर अजय खड़ा था. सुमन ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम… बारात में नहीं गए. यहां कैसे?’’

दरवाजा खुला था, अजय सिंह अंदर आ गया तो सुमन ने दरवाजा बंद कर दिया. सुमन की आंखें तेज थीं. उस ने अजय की आंखों की भाषा पढ़ ली.

‘‘चाची, मुझे तुम से कुछ कहना है. बहुत दिनों से सोच रहा हूं, पर मौका ही नहीं मिल पा रहा था. आज अच्छा मौका मिला, इसलिए मैं बारात में नहीं गया.’’ अजय ने कमरे में पड़े पलंग पर बैठते हुए कहा.

‘‘ऐसी क्या बात है, जिस के लिए तुम्हें मौके की तलाश थी?’’ सुमन ने पूछा, तो अजय तपाक से बोला,‘‘चाची आया हूं तो मन की बात कहूंगा जरूर. तुम्हें बुरा लगे या अच्छा. दरअसल बात यह है कि तुम मेरे मन को भा गई हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार…’’ सुमन ने अजय को गौर से देखा.

आज वह पहले वाला अजय नहीं था, जिसे वह बच्चा समझती थी. अजय जवान हो चुका था. पलभर के लिए सुमन डर गई. उस ने कभी नहीं सोचा था कि वह उस से ऐसा भी कुछ कह सकता है.

‘‘अजय, तुम यहां से जाओ, अभी इसी वक्त.’’ सुमन ने सख्ती से कहा, तो अजय ने पूछा, ‘‘चाची क्या तुम मेरी बात का बुरा मान गईं. मैं ने तो मजाक में कहा था.’’

‘‘अजय, मैं ने कहा न जाओ यहां से.’’ डांटते हुए सुमन ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, तो उस के तेवर देख अजय डर कर वहां से चला गया.

अजय तो चला गया लेकिन सुमन रात भर सोच में डूबी अपने मन को टटोलती रही. वह सचमुच महेंद्र सिंह से संतुष्ट नहीं थी. उस की जिंदगी फीकी दाल और सूखी रोटी की तरह थी. पिछले कुछ समय से महेंद्र सिंह की तबियत भी ढीली चल रही थी. ड्यूटी से आने के बाद वह खाना खाते ही सो जाता था. वह पति से क्या चाहती है, यह महेंद्र सिंह ने न तो कभी सोचा और न जानने की कोशिश की. यही वजह थी कि सुमन का मन विद्रोह कर उठा. उस ने मन को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन न चाहते हुए भी उस की सोच नएनए जवान हुए अजय के आस पास ही घूमती रही. उस का मन पूरी तरह बेइमान हो चुका था.

आखिरकार उस ने निर्णय ले लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. चाहे इस के लिए रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. कोई भी औरत जब बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही सुमन के मामले में हुआ. दूसरी ओर अजय यह सोच कर डरा हुआ था कि चाची ने चाचा को सब कुछ बता दिया तो तूफान आ जाएगा. इसी डर से वह सुमन से नहीं मिला. इधर सुमन फैसला करने के बाद तैयार बैठी अजय का इंतजार कर रही थी. उस ने मिलने की कोशिश नहीं की, तो सुमन ने उसे स्वयं ही बुला लिया.

अजय आया तो सुमन ने उसे देखते ही उलाहने वाले लहजे में कहा, ‘‘मुझे राह बता कर खुद दूसरी राह चले गए. क्या हुआ, आए क्यों नहीं?’’

‘‘मैं ने सोचा, शायद तुम्हें मेरी बात बुरी लगी. इसीलिए…’’ अजय ने कहा तो सुमन बोली, ‘‘रात में आना, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

अजय सिंह समझ गया कि उस का तीर निशाने पर भले ही देर से लगा हो, पर लग गया है. वह मन ही मन खुश हो कर लौट गया. सुमन का पति महेंद्र सिंह दूसरे दिन ही बारात से लौटने के बाद वापस कानपुर आ गया था. लेकिन पत्नी व बच्चों को गांव में ही छोड़ गया था. इसी बीच सुमन और अजय नजदीक आने का प्रयास करने लगे थे. सुमन ने अजय को मिलन का खुला आमंत्रण दिया था. अत: वह बनसंवर कर देर शाम सुमन के कमरे पर पहुंच गया. उस ने दरवाजे पर दस्तक दी तो सुमन ने दरवाजा खोल कर उसे तुरंत अंदर बुला लिया. उस के अंदर आते ही सुमन ने दरवाजा बंद कर लिया.

अजय पलंग पर बैठ गया, तो सुमन उस के करीब बैठ कर उस का हाथ सहलाने लगी. अजय के शरीर में हलचल मचने लगी. वह समझ गया कि चाची ने उस की मोहब्बत स्वीकार कर ली. इसी छेड़छाड़ के बीच कब संकोच की सारी दीवारें टूट गईं, दोनों को पता हीं नहीं चला. बिस्तर पर रिश्ते की मर्यादा भले ही टूट गई, लेकिन सुमन और अजय के बीच स्वार्थ का पक्का रिश्ता जरूर जुड़ गया. अपने इस रिश्ते से दोनों ही खुश थे. सुमन अपनी मौजमस्ती के लिए पाप की दलदल में घुस तो गई, पर उसे यह पता नहीं था कि इस का अंजाम कितना भयंकर हो सकता है. उस दिन के बाद अजय और सुमन बिस्तर पर जम कर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे.

अजय सुमन के लिए बेटे जैसा था और अजय के लिए वह मां जैसी. लेकिन वासना की आग ने उन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया था. सुमन लगभग एक माह तक गांव में रही और गबरू जवान अजय के साथ मौजमस्ती करती रही. उस के बाद वह वापस कानपुर आ गई और पति के साथ रहने लगी. अजय और सुमन के बीच अब मिलन तो नहीं हो पाता था, लेकिन मोबाइल फोन पर दोनों की बात होती रहती थी. सुमन के बिना न अजय को चैन था और न अजय के बिना सुमन को. आखिर जब अजय से न रहा गया तो वह सुमन के बर्रा भाग 6 स्थित घर पर किसी न किसी बहाने से आने लगा. उस ने सुमन के साथ फिर से संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो सब गुपचुप चलता रहा.

लेकिन फिर अजय का इस तरह सुमन के पास आनाजाना पड़ोसियों को खटकने लगा. लोगों को पक्का यकीन हो गया कि चाचीभतीजे के बीच नाजायज रिश्ता है. नाजायज रिश्तों को ले कर पड़ोसियों ने टोकाटाकी की तो महेंद्र सिंह के होश उड़ गए. उस की पत्नी उसी के सगे भतीजे के साथ मौजमस्ती कर रही थी, यह बात भला वह कैसे बरदाश्त कर सकता था. वह गुस्से में तमतमाता घर पहुंचा. सुमन उस समय घर के कामकाज निपटा रही थी. उसे देखते ही वह गुस्से में बोला, ‘‘तेरे और अजय के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुमन ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘मतलब छोड़ो. यह बताओ कि अजय यहां क्या करने आता है?’’ महेंद्र सिंह ने पूछा तो सुमन बोली, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो तुम? अजय तुम्हारा भतीजा है. बात क्या है. उखड़े हुए से क्यों लग रहे हो?’’

‘‘तू मेरी पीठ पीछे क्या करती है, मुझे सब पता है. तेरी पाप लीला पूरे मोहल्ले के सामने आ चुकी है. तूने मुझे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘अपनी पत्नी पर गलत इलजाम लगा रहे हो. तुम्हें शर्म आनी चाहिए.’’ सुमन ने रोते हुए कहा, तो महेंद्र सिंह बोला, ‘‘देखो, अब भी वक्त है. संभल जा, नहीं तो अंजाम अच्छा न होगा.’’

महेंद्र सिंह ने भतीजे अजय सिंह को भी फटकार लगाई और बिना मतलब घर न आने की हिदायत दी. महेंद्र सिंह की सख्ती से सुमन और अजय डर गए. अजय का आनाजाना भी कम हो गया. अब वह तभी आता जब उसे कोई जरूरी काम होता. वह भी चाचा महेंद्र सिंह की मौजूदगी में. महेंद्र सिंह अपने बड़े भाई मान सिंह का बहुत सम्मान करता था. इसलिए उस ने अजय की शिकायत भाई से नहीं की थी. लौकडाउन के दौरान मान सिंह ने महेंद्र सिंह से 5 हजार रुपए उधार लिए थे और फसल तैयार होने के बाद रुपया वापस करने का वादा किया था. अजय का आनाजाना कम हुआ तो महेंद्र सिंह ने राहत की सांस ली. उसे भी लगने लगा था कि अब सुमन और अजय का अवैध रिश्ता खत्म हो गया है. लिहाजा उस ने सुमन पर निगाह रखनी भी बंद कर दी थी.

20 जनवरी, 2021 की दोपहर 12 बजे महेंद्र सिंह ने पड़ोसियों को बताया कि उस की पत्नी सुमन ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस की बात सुन कर पड़ोसी सन्न रह गए. कुछ ही देर बाद उस के दरवाजे पर भीड़ बढ़ने लगी. इसी बीच महेंद्र सिंह ने पत्नी के मायके वालों तथा थाना बर्रा पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह घटनास्थल पर आ गए. उस समय महेंद्र सिंह के घर पर भीड़ जुटी थी. मृतका सुमन की लाश कमरे में पलंग पर पड़ी थी. उस के गले में फांसी का फंदा था, किंतु गले में रगड़ के निशान नहीं थे. फांसी के अन्य लक्षण भी नजर नहीं आ रहे थे.

संदेह होने पर थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने पुलिस अधिकारियों को सूचित किया तो कुछ देर बाद एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन्हें भी महिला की मौत संदिग्ध लगी. फोरैंसिक टीम को भी आत्महत्या जैसा कोई सबूत नहीं मिला. पुलिस अधिकारी मौकाएवारदात पर अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि मृतका सुमन के मायके पक्ष के दरजनों लोग आ गए. आते ही उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया और महेंद्र पर सुमन की हत्या का आरोप लगाया तथा उसे गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि पुलिस अधिकारी वैसे भी मामले को संदिग्ध मान रहे थे, अत: पुलिस ने मृतका के पति महेंद्र सिंह को हिरासत में ले लिया तथा शव पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. दूसरे रोज शाम 5 बजे मृतका सुमन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह को प्राप्त हुई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो उन की शंका सच साबित हुई. रिपोर्ट में बताया गया कि सुमन ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि गला दबा कर उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने मृतका के पति महेंद्र सिंह से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने पत्नी सुमन की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

महेंद्र सिंह ने बताया कि उस की पत्नी सुमन के भतीजे अजय सिंह से नाजायज संबंध पहले से थे. उस ने कल शाम 4 बजे सुमन और अजय को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस समय अजय तो सिर पर पैर रख कर भाग गया. लेकिन सुमन की उस ने जम कर पिटाई की. देर रात अजय को ले कर उस का फिर सुमन से झगड़ा हुआ. गुस्से में उस ने सुमन का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. पुलिस और पड़ोसियों को गुमराह करने के लिए उस ने सुमन के शव को उसी की साड़ी का फंदा बना कर कुंडे से लटका दिया. सुबह वह बड़ी बेटी पूजा को ले कर डाक्टर के पास चला गया.

उसे हल्का बुखार था. वहां से दोपहर 12 बजे वापस आया तो उस ने पत्नी द्वारा आत्महत्या कर लेने का शोर मचाया. उस के बाद पड़ोसी आ गए. चूंकि महेंद्र सिंह ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने मृतका के भाई गौरव को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत महेंद्र सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे गिरफ्तार कर लिया. 22 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त महेंद्र सिंह को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सुमन की मासूम बेटियां पूजा और विभा ननिहाल में नानानानी के पास रह रही थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan News : लव जिहाद मामला, जिसने सभी को कर डाला हैरान

Rajasthan News : सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है कि यदि विपरीत धर्म के बालिग युवकयुवती स्वेच्छा से शादी करते हैं तो इसे लव जिहाद का नाम न दिया जाए. लेकिन पिछले दिनों बीकानेर में जो हुआ, वह आरोपोंप्रत्यारोपों का लव जिहाद ज्यादा नजर आता है, क्योंकि शादी करने वाली लड़की मनीषा जो कह रही है वह…

राजस्थान का बीकानेर वैसे तो भुजिया पापड़ के लिए मशहूर है. लेकिन पिछले दिनों बीकानेर का कथित लव जिहाद का मामला सुर्खियों में है. हाल ही में युवती मनीषा डूडी के पिता और दादा ने हिंदू समाज से न्याय के लिए गुहार लगाई. उन का आरोप था कि उन की बच्ची मनीषा डूडी का अपहरण किया गया और इस के बाद मुसलिम लड़के मुख्तयार खान पुत्र मुन्ने खान ने उस के साथ शादी कर ली. मामला बीकानेर जिले की कोलायत तहसील के बज्जू क्षेत्र का है. वहीं के रहने वाले मनीषा डूडी के दादा हरीराम और पिता सत्यनारायण का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिस में उन्होंने समाज के लोगों से बेटी मनीषा को छुड़वाने की अपील की थी.

साथ ही यह भी धमकी दी कि अगर उन की बेटी नहीं आएगी तो वह आत्महत्या कर लेंगे. वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने इस मामले की जांच की और उसे लव जिहाद का मामला नहीं माना. सोशल मीडिया पर वीडियो वार छिड़ गई. प्रेम विवाह करने वाली युवती मनीषा डूडी जहां अपनी मरजी से किसी के दबाव में नहीं आ कर मुख्तयार खान से शादी करने की बात कह रही थी, वहीं बीकानेर पुलिस मनीषा के प्रेम विवाह करने की बात का समर्थन कर रही थी. तथाकथित लव जिहाद के मामले ने तूल पकड़ा तो 17 जनवरी, 2021 रविवार को केसरिया हिंदू वाहिनी संगठन सहित सर्वसमाज के संगठनों ने लव जिहाद के मामले का विरोध किया. बीकानेर कलेक्ट्रेट पर हजारों लोगों ने प्रदर्शन कर मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की.

तथाकथित लव जिहाद का मामला सोशल मीडिया में आने और इसे बढ़ावा देने पर सामाजिक कार्यकर्ता अंबेडकर कालोनी निवासी अकबर अली ने दर्ज कराया. सत्यनारायण डूडी और उस के पिता हरीराम डूडी निवासी मुक्ता प्रसाद कालोनी, बीकानेर के खिलाफ 17 जनवरी, 2021 को नया शहर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. अकबर अली की शिकायत पर पुलिस ने समाज में आपसी शत्रुता बढ़ाने, 4 वर्गों में वैमनस्यता पैदा करने और अशांति का माहौल बनाने का मामला दर्ज करा लिया. अब जानते हैं कि यह मुख्तयार कौन है, जिस पर मनीषा के साथ जबरन शादी करने के आरोप लग रहे हैं.

22 वर्षीय मुख्तयार खान पुत्र मुन्ने खान, निवासी गांव बीठनोक, तहसील कोलायत, जिला बीकानेर का था. वहीं 18 वर्षीय युवती मनीषा डूडी गांव आरडी-860 बांगड़सर, जिला बीकानेर के रहने वाले सत्यनारायण डूडी की बेटी थी. मुख्तयार खान और मनीषा ने प्रेम विवाह किया था. इस अंतरधार्मिक शादी को ले कर बीकानेर में खूब बवाल मचा कट्टरपंथी इसे लव जिहाद बनाने पर तुले थे. थाने में दिए गए सर्टिफिकेट के अनुसार दोनों ने बीकानेर के एफसीआई गोदाम के पास स्थित बंगला नगर में 10 दिसंबर, 2020 को शादी की. जांच में पुलिस को पता चला कि मुख्तयार खान और मनीषा के परिवार के घनिष्ठ संबंध थे.

दोनों के पिता मुन्ने खान और सत्यनारायण बिजनैस पार्टनर थे. इस वजह से मुख्तयार का मनीषा के घर आनाजाना था. इसी दौरान दोनों करीब आए और फिर शादी का निर्णय लिया. मनीषा ने अपील की कि उस के प्रेम के नाम पर राजनीति न की जाए. उस ने कहा कि उस से पहले क्या किसी हिंदू लड़की ने मुसलिम युवक से शादी नहीं की. ऐसी बहुत शादियां हुई हैं तो हमारा विरोध क्यों?

एसपी बीकानेर प्रीति चंद्रा ने कहा, ‘यह मामला लव जिहाद का नहीं है. युवकयुवती ने अपनी शादी के कागजात भी दिखाए. इस में कहीं भी लव जिहाद नहीं है. हम मामले पर नजर रखे हुए हैं. मनीषा के पास हमारा कौन्टैक्ट नंबर है, अगर वह हम से सुरक्षा की मांग करेगी तो हम आगे की काररवाई करेंगे.’

लड़की और लड़का प्रेम विवाह बता रहे थे. पुलिस भी यही कह रही थी. जबकि लड़की के परिजन इसे लव जिहाद बता रहे थे. इस घटना ने बीकानेर में सर्दी के मौसम में भी गरमी पैदा कर दी. सोशल मीडिया पर लोग अपनाअपना राग अलाप रहे थे. जाट जाति के हरीराम डूडी का परिवार काफी समय पहले बांगड़सर से बीकानेर शहर में आ बसा था. बीकानेर में आ कर सत्यनारायण ने कामधंधे की तलाश शुरू की. उन्हीं दिनों सत्यनारायण की जानपहचान प्रौपर्टी का धंधा करने वाले मुन्ने खान से हो गई. वह गांव बीठनोक, जिला बीकानेर का रहने वाला था. मुन्ने खान जाति से मांगणहार था. वह बीकानेर में रहता था. उन दिनों सत्यनारायण का परिवार बीकानेर की मुक्ताप्रसाद कालोनी में रह रहा था.

मुन्ने खान से दोस्ती गाढ़ी हुई तो मुन्ने खान के साथ सत्यनारायण ने पार्टनरशिप में धंधा शुरू किया. वैसे मांगणहार जाति के लोगों का पेशा गायनवादन है. मांगणहार जाति के लोग अपने यजमानों के घर पर बच्चे के जन्म, शादी एवं तीजत्यौहार पर जा कर गानाबजाना करते हैं.  यजमानों द्वारा दिए गए रुपएपैसों, अनाज, कपड़े वगैरह से इन के परिवारों का पालनपोषण होता है. मगर मुन्ने खान ने अपने पुश्तैनी काम की जगह गांव बीठनोक से बीकानेर आ कर प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया और उस का काम चल निकला. प्रौपर्टी डीलिंग में अच्छी आमदनी थी. सत्यनारायण को भी उस ने अपना पार्टनर बना लिया. दोनों ने पार्टनरशिप में एक होटल भी खोला और साथ में काम करने लगे.

सत्यनारायण जहां सीधासादा था, उस के उलट मुन्ने खान दबंग प्रवृति का व्यक्ति था. सत्यनारायण को यह पता नहीं था. खैर, दोनों साथ काम करते थे और दोस्ती भी पक्की थी तो मुन्ने खान का सत्यनारायण के घर आनाजाना शुरू हो गया. थोड़े ही दिनों में मुन्ने खान ने सत्यनारायण की पत्नी को अपनी धर्मबहन बना लिया. मुन्ने का बेटा मुख्तयार खां अकसर सत्यनारायण के घर आता और ज्यादा से ज्यादा समय मनीषा के इर्दगिर्द मंडराता रहता था.  मुख्तयार ने 17 साल की उम्र से ही मनीषा पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. मनीषा उस समय नाबालिग थी. मुख्तयार ने उस का ब्रेनवाश कर के अपने रंग में रंग लिया. उम्र बढ़ने के साथ ही दोनों प्यार के रंग में रंगते चले गए.

दोनों की प्रेम कहानी का मनीषा के घर वालों को पता तक नहीं था. सत्यनारायण और उस के परिजन समझते थे कि धर्म के रिश्ते की वजह से मनीषा व मुख्तयार भाईबहन हैं. बाद में किसी वजह से मुन्ने के और सत्यनारायण के बीच थोड़ी खटास आई तो होटल की पार्टनरशिप का धंधा अलग कर लिया. सत्यनारायण ने मुन्ने खान से पार्टनरशिप तोड़ी और अपना धंधा अलग कर लिया. मुन्ने खान को गुस्सा तो बहुत आया, मगर वह कुछ कर नहीं सका. सत्यनारायण ने सुमेरराम पूनिया, जो बीकानेर में ही खाद, बीज का काम करते थे, के साथ धंधा शुरू कर दिया. सुमेर पूनिया जाति से जाट थे और दबंग प्रवृत्ति के थे. वह शादीशुदा और 4 बेटियों के पिता भी थे.

मुन्ने जानता था कि सुमेर पूनिया से वह पार नहीं पा सकता, मगर उस ने अपनी योजनानुसार एक दिन सत्यनारायण पर अज्ञात बदमाशों से हमला करवा दिया. इस हमले में सत्यनारायण के हाथपैर तोड़ दिए गए. वह अस्पताल में कई महीने इलाज कराने के बाद ठीक हुए. मुन्ने खान ने सत्यनारायण की देखभाल भी की ताकि उस पर कोई शक न करे. हुआ भी यही. मुन्ने खान पर किसी ने शक नहीं किया. सत्यनारायण के पिता हरीराम डूडी की बांगड़सर गांव में खेतीबाड़ी थी और बीकानेर में सत्यनारायण का खाद बीज का कारोबार था. पूनिया सत्यनारायण के कंधे से कंधा मिला कर चलते थे. पूनिया का उन के घर आनाजाना था.

मुन्ने सुमेर पूनिया से इस कारण रंजिश रखता था क्योंकि वह सत्यनारायण के साथ काम करते थे. इन दोनों को पता नहीं था कि मुन्ने खान उन्हें बरबाद करने का तानाबाना बुन रहा है. मनीषा डूडी अब तक मुख्तयार के प्रेमजाल में फंस चुकी थी. मनीषा 18 साल की बालिग हो चुकी थी. उसे पता था कि उस के परिजन उस की शादी मुख्तयार से कभी नहीं करेंगे. ऐसे में मुख्तयार और मनीषा ने बालिग होने पर 10 दिसंबर, 2020 को कोर्ट में विवाह कर लिया. मनीषा के परिजनों को इस की भनक तक नहीं लगी थी. नववर्ष 2021 का आगमन हो चुका था. मनीषा की मां बीमार हुईं तो उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया.

अस्पताल में सत्यनारायण, हरीराम, सुमेर पूनिया, मनीषा और सारे परिजन थे. सत्यनारायण के लिए खाना बना कर लाने के लिए दोपहर में मनीषा और सुमेर पूनिया घर गए. मनीषा ने खाना बना कर सुमेर पूनिया को टिफिन दिया. टिफिन ले कर सुमेर पूनिया अस्पताल चले आए. उन्हें आए एकाध घंटा ही हुआ था कि नयाशहर थाने की पुलिस आई और सुमेर पूनिया को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का कारण बताया कि थोड़ी देर पहले मनीषा ने दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज कराई है. यह बात 4 जनवरी, 2021 की है. यह सुन कर डूडी परिवार सकते में आ गया. मनीषा के पिता, दादा और अन्य परिजन नयाशहर थाने पहुंचे और मनीषा से बात की.

मनीषा को समझाया कि उस ने गलत रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई. तब मनीषा ने कहा कि ऐसे ही रिपोर्ट दर्ज करा दी है. चूंकि रिपोर्ट दर्ज हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने सुमेर पूनिया को नहीं छोड़ा. अगले दिन मनीषा के कोर्ट में बयान कराए गए. बयान दे कर मनीषा कोर्ट से बाहर आई तो करीब 100-150 लोगों की भीड़ ने एक राय हो कर मनीषा का एक गाड़ी में अपहरण कर लिया. हरीराम ने पोती को छुड़ाने की कोशिश की तो आरोपियों ने गाड़ी उन पर चढ़ाने की कोशिश की. इस में हरीराम के पैर में चोट लगी. होहल्ला करने पर पुलिस ने भी अपहरण कर के ले जा रही गाड़ी का पीछा किया और पुलिस सब को पकड़ कर थाने ले आई.

वहां पर मुख्तयार खान और मनीषा डूडी ने विवाह के कागज दिखा कर कहा कि वे बालिग हैं और उन्होंने 10 दिसंबर, 2020 को कोर्ट में शादी कर ली है. तब पुलिस ने मुख्तयार खान और मनीषा को जाने दिया. तब मनीषा के घर वाले माथा पीट कर रह गए. मुन्ने खान ने एक योजना के तहत सुमेर पूनिया को बलात्कार के मुकदमे में फंसा दिया था ताकि सत्यनारायण को वह सपोर्ट न कर सके. थाने में विवाह के कागजात दिखा कर बेटेबहू को घर ले आया. हरीराम डूडी और सत्यनारायण की इज्जत पर आन पड़ी थी. उन की समझ में अब सारी कहानी आ गई थी. मगर बहुत देर हो चुकी थी. बेटी ने उन्हें धोखे में रख कर मुख्तयार खान के साथ साजिश की शिकार हो कर उस की बहू बन गई थी.

इन्होंने एसपी प्रीति चंद्रा, नयाशहर थानाप्रभारी गोविंददान चारण और अन्य से मिल कर बेटी मनीषा को वापस दिलाने की गुहार की मगर मनीषा बालिग थी और उस ने मुख्तयार खान के साथ कोर्ट में शादी कर ली थी. इसलिए पुलिस ने इन की मदद नहीं की. तब बापबेटे ने सोशल मीडिया पर वीडियो में सर्वसमाज से बेटी मनीषा के लव जिहाद का शिकार बनाने और अब बेटी वापस दिलाने की गुहार लगाई. तब सर्वसमाज ने 17 जनवरी को बीकानेर में प्रदर्शन कर पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने की मांग की. इस के बाद 18 जनवरी, 2021 को नयाशहर थाने में मनीषा की मां ने अपने साथ दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म का मामला दर्ज करा दिया.

पुलिस को दी गई रिपोर्ट में उस ने बताया कि 2015 में वह अपने परिवार के साथ मुक्ताप्रसाद कालोनी में रहती थी. वहीं पर उस के पति का बिजनैस पार्टनर मुन्ने खान आता था. मुन्ने खान जब भी घर आता तो कोल्डड्रिंक ले कर आता. जुलाई 2015 में उस के पति व बच्चे घर पर नहीं थे. तब मुन्ने घर आया. उस ने कोल्डड्रिंक पिलाई, जिस से वह बेहोश हो गई. तब मुन्ने खान ने उस के साथ दुष्कर्म किया और वीडियो बना लिया. बाद में वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर बारबार दुष्कर्म किया. जब पीडि़ता ने किराए का मकान बदल लिया तब भी आरोपी उस के पास आता रहा. पीडि़ता ने आरोप लगाया कि आरोपी अपने दोस्तों को साथ ले कर आने लगा और उन्होंने भी उस के साथ दुष्कर्म किया.

मुन्ने खान का साथी गडि़याला के मोटासर निवासी शेरू खान और एक अन्य ने उस के साथ दुष्कर्म किया.  वीडियो वायरल करने और परिजनों को जान से मारने की धमकी दे कर आरोपी मुन्ने खां उस के साथ लगातार दुष्कर्म करता रहा. पीडि़ता ने आरोप लगाया कि मुन्ने खान ने बेटे मुख्तयार को उस की बेटी के पीछे लगाया और प्रेम में फंसा लिया. पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म का मामला थाना नयाशहर में दर्ज कर लिया. मामला संदिग्ध था, इसलिए इस की जांच सीओ सिटी सुभाष शर्मा को सौंप दी गई. इसी मामले को ले कर सर्वसमाज ने बीकानेर में कलेक्ट्रैट पर प्रदर्शन किया था. उसी समय मनीषा ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर और डाला. इस वीडियो में मनीषा ने जो कुछ कहा, उसे सुन कर लोग आश्चर्यचकित रह गए.

मनीषा ने एक वीडियो वायरल कर कहा कि मैं ने 4 जनवरी, 2021 को जिस सुमेर पूनिया पर दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया, उस सुमेर पूनिया के साथ मेरी मां के अवैध संबंध हैं. सुमेर पूनिया दूर के रिश्तेदार हैं और पिता के कामधंधे में पार्टनर. सुमेर पूनिया अकसर हमारे घर आते थे और मुझ से गलत हरकतें करते थे. मनीषा ने आगे कहा कि उस की और मुख्तयार की शादी का मेरे घर वालों को पता था. वे हमारी शादी से खुश थे. मगर बाद में वे किसी के कहने में आ कर लव जिहाद का राग अलापने लगे. अगर मनीषा के ये आरोप सही हैं तो सुमेर पूनिया को उस के परिजन क्यों बचा रहे हैं? क्या उन पर किसी का दबाव है? या फिर मनीषा ने झूठे आरोप लगाए.

सवाल यह भी है कि मनीषा ने सुमेरराम पूनिया के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई तो उस के परिजनों ने बेटी की बातों के बजाए उस व्यक्ति की पैरवी क्यों की, जिस पर उन की बच्ची छेड़छाड़, दुष्कर्म का आरोप लगा रही थी. वहीं मनीषा ने यह भी कहा कि अगर घर वाले बाहरी लोगों को घर के अंदर आने की छूट नहीं देते तो आज डूडी परिवार की इज्जतआबरू मिट्टी में नहीं मिलती. अब तो पुलिस जांच के बाद दूध का दूध और पानी का पानी होगा. तभी पता चलेगा कि कौन सच्चा है और कौन झूठा.

—कथा पुलिस सूत्रों, मीडिया रिपोर्ट्स और लेखक की जांच पर आधारित है

 

Bijnor News : चाची के इश्क में भतीजे ने उतारा चाचा को मौत के घाट

Bijnor News :  2 बच्चों की मां सुशीला की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. उस का पति वीर सिंह उस का हर तरह से खयाल रखता था. इस के बावजूद भी उस के पैर अपने भतीजे सोमपाल की तरफ बहक गए. इन बहके कदमों का जो अंजाम हुआ, वो…

शाम के 5 बज रहे थे. सुशीला ने घड़ी देखी तो वह खाना बनाने की तैयारी करने लगी. उस का पति वीर सिंह 6 बजे तक काम से लौट आता था. यह रोज की दिनचर्या थी. उस ने सब्जी काटी और उसे पकाने के लिए गैस चूल्हा जलाना चाहा तो माचिस ही नहीं मिली. उसे याद आया कि माचिस तो आज सुबह ही खत्म हो गई थी. वह घर के मेनगेट पर जा कर खड़ी हो गई. उस ने सोचा कि वह किसी को बुला कर  दुकान से माचिस मंगवा लेगी. तभी उसे सोमपाल दिखा. सोमपाल उस के पति का भतीजा था. इस नाते वह उस का भी भतीजा हुआ. वह भी उसी गांव में रहता था.

सुशीला ने उसे आवाज दे कर पुकारा, ‘‘सोम, जरा इधर आओ.’’

सोमपाल फौरन उस के पास आ गया, ‘‘हां चाची, बोलो मुझे क्यों पुकार रही थीं?’’

‘‘सोम, जरा जल्दी जा कर दुकान से एक माचिस खरीद कर ले आओ. तुम्हारे चाचा आते होंगे, उन के लिए खाना बनाना है.’’

‘‘चाची, माचिस तो मैं ला दूंगा, पर इस के बदले में तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा.’’

‘‘कर दूंगी,’’ सुशीला ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया, सोचा चाय पीने को मांगेगा, बना कर दे देगी. इसीलिए वह लापरवाही से बोली, ‘‘लेकिन पहले जा कर माचिस ले आओ, नहीं तो देर हो जाएगी.’’

‘‘चाची, मेरे रहते हुए तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, माचिस ले कर अभी आया.’’ कह कर सोमपाल तेजी से वहां से चला गया. 5 मिनट में ही उस ने माचिस ला कर सुशीला के हाथ पर रख दी. सुशीला का पूरा ध्यान खाना बनाने पर था, इसलिए माचिस ले कर वह किचन में चली गई. किचन में सुशीला ने चूल्हा जला कर उस पर कड़ाही रख दी. उस के बाद तेल का डिब्बा उठाने के लिए घूमी तो उस ने अपने पीछे सोमपाल को खड़े पाया. सुशीला को आश्चर्य हुआ, ‘‘अरे, तुम यहां क्या कर रहे हो, जा कर कमरे में बैठो.’’

‘‘चाची, माचिस लाने लाने से पहले मैं ने तुम से कुछ कहा था…’’ सोमपाल ने सुशीला को गौर से देखा.

सुशीला की भी नजरें सोमपाल के चेहरे पर जम गईं, ‘‘मुझ से ऐसा कौन सा काम है तुम्हें?’’

‘‘मैं वही तो बताने जा रहा हूं.’’ सोमपाल ने फिर सुशीला की आंखोें में आंखें डाल दीं, ‘‘मैं ने इस शर्त पर माचिस ला कर दी थी कि तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा. अपने वादे से मुकरो मत. मैं ने तुम्हारा काम कर दिया, अब तुम मेरा काम करो.’’

सोमपाल अकसर सुशीला से चाय की फरमाइश करता था. लिहाजा सुशीला के मन में यही बात थी कि वह चाय के लिए कहेगा. सुशीला खाना पकाने की जल्दी में थी, इसलिए वह सोमपाल के कुछ बोलने से पहले ही वह बोल पड़ी, ‘‘तुम्हारा काम मैं अच्छी तरह जानती हूं, लेकिन मुझे अभी खाना पकाना है, इसलिए तुम्हें चाय बना कर नहीं दे सकती. खाना बन जाए तो मैं खुद तुम्हें बुला कर चाय पिला दूंगी.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘चाची, चाय के अलावा दूसरा काम भी तो हो सकता है.’’

‘‘तुम देख रहे हो न,’’ डिब्बे से कड़ाही में तेल उड़ेलते हुए सुशीला बोली, ‘‘मैं बिजी हूं, जो बात करनी हो, बाद में कर लेना.’’

‘‘मेरी बात तुम सब्जी पकाते हुए भी तो सुन सकती हो!’’ सोमपाल ने कहा.

‘‘अच्छा जल्दी बोलो, क्या बात है?’’ वह बोली.

सोमपाल अर्थपूर्ण अंदाज से मुसकराते हुए बोला, ‘‘चाची तुम अकसर कहती हो न कि सोमपाल तुम बड़े हो गए हो.’’

सुशीला ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उस की तरफ देखा, ‘‘हां, कह देती हूं तो?’’

‘‘चाची, तुम्हारी बातों से मुझे भी लग रहा है कि मैं अब बच्चा नहीं रहा, वास्तव में बड़ा हो गया हूं.’’

सुशीला हंसने लगी, ‘‘यही तुम्हारा वह जरूरी काम था.’’

‘‘नहीं, यह तो उस की भूमिका थी, असली बात तो बाकी है.’’

कड़ाही में गरम होते तेल पर नजरें जमाए हुए सुशीला बोली, ‘‘हां, चलो अच्छा हुआ कि तुम ने भी मान लिया कि तुम बड़े हो गए हो.’’

‘‘इसीलिए मैं ने सोचा कि बड़ा हो गया हूं तो बड़ों वाले काम भी करने चाहिए.’’

सुशीला को उस की बातों में रस आने लगा, ‘‘अब यह तो बता दो कि बड़ों वाला कौन सा काम करने जा रहे हो?’’

सोमपाल ने नजरें झुका लीं, मानो शरमा रहा हो.

सुशीला ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘शरमाओ मत, बता दो.’’

‘‘चाची, डांटोगी तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल नहीं डांटूंगी, बोलो.’’

‘‘किसी से मेरी शिकायत भी नहीं करोगी?’’ वह झिझकते हुए बोला.

‘‘नहीं करूंगी बाबा,’’ सुशीला के होंठों पर गहरी मुसकान पसर गई, ‘‘काम बताओ, समय बरबाद मत करो.’’

‘‘अच्छा तो सुनो,’’ सोमपाल सुशीला के और नजदीक आ गया. उस के बाद अपने लहजे को रहस्यमय बना कर बोला, ‘‘मुझे प्यार हो गया है.’’

‘‘वाह क्या बात है.’’ सुशीला की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘यानी कि तुम इतने बड़े हो गए हो कि खुद को प्यार के लायक समझने लगे.’’

‘‘और नहीं तो क्या, अब मैं बच्चा थोड़े ही हूं, 22 साल का जवान हो गया हूं. इस उम्र में तो गांव के आम लड़के 2 बच्चों के बाप बन जाते हैं. मेरे भी कुछ दोस्त 2 बच्चों के बाप बन गए हैं. इस उम्र के लोग जब बाप बन जाते हैं तो मैं तो केवल प्यार करने की बात कर रहा हूं.’’ सोमपाल ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी. सुशीला दिलचस्पी से उस की आंखों में देखने लगी, ‘‘किस से दिल लगा बैठे हो, जरा मुझे भी तो बताओ.’’

‘‘बता दूंगा, फिलहाल राज को राज रहने दो.’’

‘‘अच्छा सोम, यह बताओ, जिस से तुम प्यार करते हो, वह भी तुम्हें चाहती है न?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘यह क्या बात हुई,’’ कड़ाही में कटी हुई सब्जी डालते हुए  सुशीला बोली, ‘‘दिल लगा बैठे और यह तक पता नहीं कि उस के दिल में तुम्हारे लिए प्यार है या नहीं.’’

‘‘मैं कहूंगा, तब तो उसे पता चल जाएगा और तभी वह अपने दिल की बात मुझ तक पहुंचा देगी.’’

‘‘तो कह दो न.’’

‘‘चाची, कहने की हिम्मत नहीं है,’’ सोमपाल ने बेचैनी से पहलू बदला, ‘‘इसलिए अपनी बात कहने के लिए यह प्रेम पत्र लिखा है.’’

सोमपाल ने जेब से एक पत्र निकाल कर सुशीला की ओर बढ़ाया, ‘‘लो, खुद ही पढ़ लो.’’

सुशीला ने तह किया हुआ पत्र खोल कर पढ़ा. बिना किसी को संबोधित करते हुए उस में लिखा था—

प्रिय प्राणेश्वरी,  मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिन हो या रात, तुम्हारे ही खयालों में खोया रहता हूं. मुश्किल से नींद आती है तो तुम्हारे ही सपने देखता रहता हूं. सपने में तुम आती हो तो मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता और तुम्हारे साथ अंतरंग क्षणों में खो जाता हूं. उस समय का प्यार मुझे भूले नहीं भूलता. इस पत्र के जरिए अपने दिल की हालत तो मैं ने बयान कर दी. कह दो न कि तुम भी मुझे प्यार करती हो. —तुम्हारा सोम

पत्र पढ़ कर सुशीला मुसकराई, ‘‘सोम, प्यार का इजहार करने के साथसाथ तुम ने अंतरंग क्षणों का जिक्र कर दिया.’’

‘‘चाची, जो सच है, मैं ने वही लिखा है. सच यह है कि मैं उस के साथ अंतरंग क्षणों का दीवाना हूं.’’

सुशीला का विवाह हुए केवल 12 साल हुए थे और वह 2 बच्चों की मां थी. वह जानती  थी कि अंतरंग क्षणों में इंसान कैसे पेश आता है. इस पर सुशीला उस की हिम्मत बढ़ाने के उद्देश्य से बोली, ‘‘हिचको मत, जिस के लिए पत्र लिखा है उसे दे आओ.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘मेरी बात उस के दिल पर असर तो करेगी?’’

‘‘जरूर असर करेगी.’’

‘‘वह प्यार का जबाव प्यार से देगी न, सिर पर जूते पड़ने की नौबत तो नहीं आएगी?’’

‘‘इस बारे में तुम बेहतर बता सकते हो कि प्यार मिलेगा या फटकार!’’

‘‘चाची, तुम बताओ क्या मिलेगा?’’

‘‘सोम, तुम दिमाग बहुत चाट चुके, अब तुम जाओ, मुझे खाना पकाना है. तुम्हारे चाचा आते ही होंगे, आते ही वह खाना मांगेंगे.’’

‘‘चला जाऊंगा, बस तुम एक सवाल का जबाव दे दो…’’ सोमपाल उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘मुझे प्यार ही मिलेगा न?’’

सुशीला ने पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘हां, प्यार ही मिलेगा.’’

‘‘तो प्यार दो न चाची!’’ सोमपाल फंसी हुई सी आवाज में बोला, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है और यह पत्र मैं ने तुम्हारे लिए ही लिखा था.’’

पलक झपकते ही सुशीला सन्नाटे से घिर गई. ऐसा सन्नाटा जिस में वह अपना अस्तित्व शून्य जैसा महसूस कर रही थी. जनपद बिजनौर के थाना रेहड़ के अंतर्गत ग्राम फाजलपुर निवासी वीर सिंह से सुशीला का विवाह 12 साल पहले हुआ था. कालांतर में सुशीला ने एक बेटी सोनम (7 वर्ष) और एक बेटा मनीष (5 वर्ष) को जन्म दिया. वीर सिंह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. फाजलपुर गांव में ही सोमपाल रहता था. वह भी चाचा वीर सिंह की तरह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. सोमपाल की उम्र 22 साल थी और वह अविवाहित था. उस के 2 बहन और एक भाई था. वह तीनों से छोटा था. उम्र के जिस पड़ाव पर सोमपाल था, वह सपने देखने और उन में नित नएनए रंग भरने की होती है.

सोमपाल का मन भी रंगीन कल्पना किया करता था और आंखें तन को रोमांचित करने वाले सपने देखा करती थीं. सोमपाल सुशीला से उम्र में 11 साल छोटा था. गोरे रंग की सुशीला का बदन उम्र बढ़ने के साथ ही और खिलता जा रहा था. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस के यौवन में कोई कमी नहीं आई थी. सुशीला का बिंदास बोलना और उठनाबैठना सोमपाल के दिल में घर कर गया. सुशीला कब उस के सपनों की शहजादी बन गई, स्वयं उसे भी पता नहीं चला. सोमपाल के मन में सुशीला एक बार बसी तो वह चाह कर भी उसे दिल से निकाल नहीं सका. सुशीला को वह चाची कहता था, इस के बावजूद वह उस के सपनों की रानी बनी हुई थी.

मन ही मन सोमपाल उसे चाहता ही नहीं था, बल्कि उस से शादी करने के सपने भी देखा करता था. बहुत दिनों से सोमपाल इस जुगत में था कि सुशीला को वह अपने मन की बात बता सके. लेकिन उसे कभी मौका नहीं मिलता तो कभी उस की हिम्मत उस का साथ नहीं देती थी. लिहाजा उस ने एक प्रेमपत्र लिख कर यह सोच कर अपनी जेब में रख लिया था कि मौका मिलते ही चाची को दे देगा. उस दिन मौका मिला तो सोमपाल ने प्रेमपत्र देने के बाद अपने मन की बात भी उसे बता दी, ‘‘सुशीला चाची, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

सोमपाल का प्रेम निवेदन सुन कर सुशीला सन्नाटे में आ गई. उस की तंद्रा तब टूटी, जब कड़ाही की तली में सब्जी जलने की बदबू आई. सुशीला तुरंत सब्जी चलाने लगी. सोमपाल के प्रेम निवेदन से सुशीला को गुस्सा नहीं आया, अपितु उस की सोच को नई दिशा मिल गई. दरअसल वीर सिंह के साथ वह खुश तो थी लेकिन वह उस के सपनों का राजकुमार नहीं था. विवाह से पहले सुशीला ने कल्पना की तूलिका से अपने मन में अपने जीवनसाथी की जो छवि बनाई थी, वह वीर सिंह जैसी नहीं, बल्कि सोमपाल जैसी थी. सुशीला भी उसे बहुत पसंद करती थी. पहली बार सोमपाल को उस ने देखा था तो मन में यही खयाल आया था, ‘सोमपाल इस दुनिया में पहले क्यों नहीं आया.

यदि पहले आ जाता तो सोमपाल से मेरी शादी हो जाती, कसम से मजा आ जाता. जीवन में फिर कोई तमन्ना नहीं रह जाती.’

अब सोमपाल ने अपने प्रेम का इजहार किया तो वह सोचने लगी, ‘शायद नियति ने मेरे मन की बात सुन ली है और वह इसे पूरी करना भी चाहता है. इसलिए उस ने सोमपाल का दिल मेरी चाहत से रोशन कर दिया है. देर से ही सही, लेकिन सोमपाल से इश्क लड़ा कर देखा जाए कि मोहब्बत कैसा मजा देती है.’

उस दिन सुशीला का मन किसी काम में नहीं लगा. उस का दिमाग बस सोमपाल के बारे में सोचता रहा. उस का दिया प्रेम पत्र उस ने कई बार पढ़ा और फिर मुसकरा कर चूम लिया. कोई उस के चरित्र पर अंगुली उठाए, ऐसा सुबूत वह अपने पास रखना नहीं चाहती थी, इसलिए सोमपाल का वह प्रेम पत्र चूल्हे की आग में जला दिया. वीर सिंह के घर आने के बाद उस ने उसे खाना परोसा. वीर सिंह ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में डाला, उस के बाद उस ने सुशीला को अजीब नजरों से देखा और बोला, ‘‘सुशीला, आज तुम ने खाना पकाया है या मजाक किया है. सब्जी में नमक नहीं है और जलने की गंध आ रही है. रोटी भी कहीं कच्ची है तो कहीं जली है. खाना पकाते समय ध्यान कहां था तुम्हारा.’’

सुशीला कैसे बताती कि वह सोमपाल के खयालों में खोई रही थी, इसलिए उस ने बेमन से खाना पकाया था. अपनी बात संभालने के लिए उस ने सिर भारी होने और चक्कर आने का बहाना किया और उस के सामने से थाली खींचने लगी, ‘‘तबियत ठीक न होने की वजह से खाना खराब हो गया. आधा घंटा लगेगा, अभी दूसरी रोटीसब्जी पका लाती हूं.’’

‘‘रहने दो. जैसा है, भोजन है और भोजन का अपमान नहीं करना चाहिए. रोज अच्छा खाता था, आज थोड़ा खराब खा लूंगा. बस थोड़ा नमक दे दो.’’ इस पर सुशीला ने उसे नमक दे दिया. सब्जी में नमक मिला कर वीर सिंह ने वही खाना खा लिया. रात को सभी लोग सो गए लेकिन सुशीला सोमपाल के खयालों में ही खोई रही. सोमपाल और अपने बारे में सोचतेसोचते सुशीला ने अंतत: निर्णय कर लिया कि वह सोमपाल के प्यार का जबाव प्यार से देगी. बस, उस के मन का तनाव जाता रहा और वह चैन से सो गई. दूसरी तरफ कहने को सोमपाल सो रहा था, जबकि वह जाग रहा था और इसी सोच में था कि सुशीला उस के प्यार को स्वीकार करेगी कि नहीं.

अगले दिन सुबह वीर सिंह काम पर चला गया. सोमपाल काम पर नहीं गया, अपने घर पर ही रहा. असल में वह सहमा भी था कि कहीं सुशीला चाची का जबाव उस के मन के विपरीत हुआ तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा. जब वह सुशीला के सामने पहुंचा तो सुशीला ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘कल मैं खाना पकाने की उलझन में थी, इसलिए तुम्हारी बातों पर तवज्जो नहीं दे पाई. अब बोलो, कल क्या कह रहे थे?’’

सोमपाल के भीतर के भय ने और भी लंबे पांव पसार लिए. नजरें झुका कर वह धीरे से बोला, ‘‘मुझे जो कहना था, कल ही कह दिया था.’’

‘‘क्या यह सच है कि तुम्हें मुझ से प्यार हो गया है?’’ वह बोली.

सोमपाल ने नजरें झुकाए हुए ही धीरे से सिर हिला दिया, ‘‘हां.’’

‘‘प्यार भी करते हो और डरते भी हो,’’ सुशीला ने अपनी बांहें उस के गले में डाल दी, ‘‘बुद्धू, प्यार करने वाले डरा नहीं करते.’’

सोमपाल हैरान रह गया. सुशीला प्यार का जबाव इस शिद्दत से देगी, यह उस की सोच से परे बात थी.

‘‘विश्वास नहीं हो रहा है!’’ सुशीला मुसकराई, ‘‘अच्छा, मैं तुम्हारा मुंह मीठा करा देती हूं, तब यकीन होगा कि यह सुशीला भी तुम्हें चाहती है.’’

इस के बाद वह अपना मुंह सोमपाल के मुंह के पास ले गई. इतने पास कि सांसें सांसों से टकराने लगीं. सोमपाल ने उस के होंठों से अपने होंठों का मिलाप करा कर उस के होंठों को चूम लिया.

कुछ देर चूमने के बाद सुशीला ने अपना मुंह हटा लिया और उस की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘हुआ मुंह मीठा?’’

सोमपाल ने होंठों पर अपनी जीभ फेरी, उस के बाद सुशीला की कमर को अपनी बांहों में समेट लिया, मुसकरा कर बोला, ‘‘मुंह भी मीठा हुआ और यकीन भी हो गया. जिस तरह मुंह मीठा किया है, उसी तरह पूरा बदन मीठा कर दो तो मजा आ जाए.’’

सुशीला ने बांकी चितवन से उसे देखा, ‘‘सब कुछ आज ही कर गुजरने का इरादा है क्या?’’

‘‘प्यार में जो होना है, वह फौरन हो जाना चाहिए.’’ कह कर सोमपाल ने सुशीला के होंठों को चूम लिया.

सुशीला के मन में अनार की आतिशबाजी सी होने लगी. उस का मन भी सोमपाल के जोश और जवानी को परखने का हो गया, मुसकरा कर बोली, ‘‘सोम, तुम भी क्या याद करोगे. प्यार के इजहार के बाद पहली मुलाकात में ही तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा, जोकि आम प्रेमियों को महीनों बाद मिलता है और कइयों को तो मिलता ही नहीं है.’’

सोमपाल ने बांहों का घेरा और तंग कर लिया, ‘‘थैंक यू चाची.’’

‘‘चाची, दूसरों के सामने बोलना, अकेले में मुझे मेरे नाम से पुकारा करो,’’ सुशीला इठला कर बोली, ‘‘अब कमर छोड़ो, तो मैं दरवाजा बंद कर आऊं.’’

सोमपाल ने सुशीला की कमर को बांहों की गिरफ्त से आजाद कर दिया. सुशीला ने झट से दरवाजा बंद कर दिया और सोमपाल की बांहों में समा गई. फिर उन के जिस्म मर्यादाओं की दीवार तोड़ कर एक हो गए. कुछ देर बाद दोनों अलग हुए तो दोनों ही आनंद से अभिभूत थे. सोमपाल को पहली बार नारी देह का सुख मिला था, यह सर्वथा अनूठा और आनंददायक अनुभव था. सुशीला इसलिए आनंद के महासागर में डुबकियां लगा रही थी क्योंकि उस का पति वीर सिंह उसे ऐसा कभी सुख नहीं दे पाया था. बस, उस दिन से दोनों एकदूसरे के पूरक बन गए. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह अपनी बाइक से सुआवाला बाजार गया लेकिन देर शाम तक वह वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने उस की तलाश की लेकिन कहीं पता नहीं चला.

इस पर वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल सिंह ने रेहड़ थाने में वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुबह वीर सिंह के घर वालों और गांव के लोगों ने फिर से वीर सिंह की तलाश शुरू की तो सुआवाला और मच्छमार मार्ग के बीच हरहरपुर गांव के पास वीर सिंह की लाश पड़ी मिली. लाश मिलते ही वीर सिंह के घर वाले रोनेचिल्लाने लगे. घटनास्थल अफजलगढ़ थाना क्षेत्र में आता था, इसलिए घटना की सूचना अफजलगढ़ थाने को दे दी गई. सूचना पा कर इंसपेक्टर नरेश कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक वीर सिंह के सिर पर घाव के निशान थे, जिस से अंदाजा यह लगाया गया कि किसी ठोस वस्तु से सिर पर प्रहार कर के वीर सिंह को मौत के घाट उतारा गया है.

इंसपेक्टर नरेश कुमार ने लाश का निरीक्षण करने के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया, लेकिन घटना से संबंधित कोई सुबूत हाथ नहीं लगा. उस के घर वालों से पूछताछ की तो वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल ने थानाप्रभारी को बताया कि 2 जनवरी को वीर सिंह का गांव के ही अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हुआ था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर कुमार ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. थाने आ कर इंसपेक्टर कुमार ने रामगोपाल की तरफ से अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 304 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू हुई तो नामजद आरोपियों की लोकेशन घटनास्थल पर या उस के आसपास नहीं मिली. सभी आरोपी अपनेअपने घरों में ही मौजूद थे.

वह सवालों के जवाब भी बेखटक दे रहे थे. किसी तरह का शक न होने पर इंसपेक्टर कुमार ने अपनी जांच की दिशा को मोड़ा. उन की समझ में आ गया था कि घटना में नामजदगी गलत है, घटना किसी और ने अंजाम दी है. सर्विलांस टीम का सहारा लिया गया. घटना वाली शाम घटनास्थल पर मौजूद नंबरों की जांचपड़ताल की गई, तो उस में से 3 नंबर संदिग्ध लगे. एक नंबर सोमपाल का था. सोमपाल के बारे में इंसपेक्टर कुमार ने पता किया तो वह मृतक का भतीजा निकला. सोमपाल के साथ 2 फोन नंबर और भी एक्टिव थे. उन नंबरों की लोकेशन भी काफी समय तक एक साथ रही थी. वह नंबर ऊधमसिंह नगर के जसपुर थाना क्षेत्र के रायपुर गांव के 2 युवकों के थे. उन की लोकेशन घटना वाली शाम घटनास्थल से रायपुर तक रही थी.

इस के बाद इंसपेक्टर कुमार ने 16 जनवरी की रात सोमपाल और उस के साथियों लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने वीर सिंह की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. थाने में उन से पूछताछ के बाद 17 जनवरी को उन्होंने सुशीला को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिसिया पूछताछ के बाद हत्या की जो वजह निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

सोमपाल और सुशीला के संबंध बने महीनों बीत गए. इस दौरान सुशीला और सोमपाल का प्यार बेहद बढ़ गया था. अलग होने की कल्पना से ही दोनों का कलेजा मुंह को आने लगता था. सोमपाल शादी करने की बात करता तो सुशीला उस की हां में हां मिलाने लगती थी. असल में सुशीला ने पति वीर सिंह को दिल से निकाल दिया था और मन से सोमपाल को अपना पति मान चुकी थी. वह उस के साथ ही अपना जीवन बिताने की इच्छुक थी. लेकिन घटना से करीब 2 महीने पहले उन के इस नाजायज रिश्ते का भेद खुल गया. एक दिन रात में सोते समय वीर सिंह की आंखें खुलीं तो वह लघुशंका के लिए उठा तो उस ने सुशीला को अपने बिस्तर से गायब पाया.

वह कमरे से बाहर निकला तो रसोई से उसे कुछ आवाजें आती सुनाई दीं,वह उस तरफ बढ़ गया. जैसे ही वह रसोई के अंदर पहुंचा तो अंदर का दृश्य देख कर उस की आंखें हैरत से फट गईं. सुशीला भतीजे सोमपाल के साथ आपत्तिजनक हालत में थी. उसे एकबारगी तो विश्वास नहीं हुआ, पर अगले ही पल वह चिल्लाया, ‘‘सुशीला…’’

वीर सिंह की आवाज सुन कर दोनों हड़बड़ा कर अलग हो गए और मुजरिम की भांति नजरें झुका कर खड़े हो गए. वीर सिंह ने दोनों को काफी लताड़ा और सुशीला के साथ मारपीट की. लेकिन तब तक सोमपाल वहां से खिसक लिया था. सुशीला को वीर सिंह ने हिदायत दी कि आगे से ऐसी हरकत न करे, नहीं तो अच्छा नहीं होगा. लेकिन कहते हैं कि ये ऐसी चाहत है, जिस का नशा इंसान के सिर चढ़ कर बोलता है, तमाम पाबंदियों के बावजूद इंसान बेचैन हो कर फिर उसी नशे की तरफ भागता है. ऐसा ही सोमपाल और सुशीला के साथ हुआ. वह भी इस चाहत के नशे के आदी हो गए थे.

जब पाबंदी लगी तो बरदाश्त नहीं कर सके और बेचैन हो कर फिर दोनों एकदूसरे के नशे की चाहत में डूबने लगे. लेकिन बंदिशों के कारण खुल कर न मिल पाने की कसक दोनों को सालती थी. वैसे भी दोनों एक साथ रहने का मन बना चुके थे, इसलिए वीर सिंह को अपने रास्ते से हटाने की सोचने लगे, उस को हटाए बिना दोनों एक नहीं हो सकते थे. इसलिए सोमपाल ने अपने 2 साथियों ऊधमसिंह नगर के थाना जसपुर के रायपुर गांव निवासी लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) से हत्या में साथ देने के लिए बात की. दोनों सोमपाल का साथ देने को तैयार हो गए. लवकुश तो बालिग था, उस की उम्र 22 साल थी, लेकिन सलीम नाबालिग था उस की उम्र 16 वर्ष थी.

वीर सिंह की हत्या की योजना बनी, योजना से सुशीला को भी अवगत कराया गया. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह सुआवाला बाजार जाने के लिए बाइक से निकला. उस के निकलने से पहले ही सुशीला ने फोन कर के सोमपाल को बता दिया था. सोमपाल लवकुश और सलीम के साथ सुआवाला मच्छमार मार्ग के रास्ते में जा कर खड़ा हो गया. जैसे ही वीर सिंह बाइक पर बैठ कर उधर आया, तो उस ने डंडा मार कर उसे बाइक से गिरा दिया. वीर सिंह के गिरते ही तीनों ने उसे दबोच लिया और सिर पर डंडा मारमार कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद नहर के दोनों तरफ बनी पक्की दीवारों के बीच में लाश डाल दी. डंडे को एक गन्ने के खेत में छिपा दिया तथा वीर सिंह का मोबाइल मय सिम तालाब में फेंक दिया.

इस के बाद वीर सिंह की बाइक से सोमपाल लवकुश और सलीम को रायपुर तक छोड़ने गया. वहां से वापस आ कर एक जगह बाइक छिपा दी और घर चला गया. लेकिन गुनाह कभी किसी का छिपता नहीं तो इन का कैसे छिप जाता. चारों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ गए. इंसपेक्टर कुमार ने आईपीसी की धारा 304 को धारा 302/120बी में तरमीम कर दिया. फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चारों आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News : पिता ने तकिए से दबाया बेटे का मुंह, कहा मार नहीं रहा, मुक्ति दे रहा हूं

UP News : इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

सी सामऊ थानाप्रभारी के कक्ष में एक युवकयुवती बैठे थे. युवक का नाम अलंकार था जबकि युवती का नामसारिका. रिश्ते में दोनों पतिपत्नी थे. उन की आंखों से आंसू टपक रहे थे. सारिका की आंखों में बेटा खोने के आंसू थे, जबकि अलंकार की आंखों में पश्चाताप के. अलंकार ने सुबह 8 बजे थाने आ कर अपने 7 वर्षीय मासूम बेटे रुशांक उर्फ तारुष की हत्या का जुर्म कबूला था. कक्ष में वह थानाप्रभारी के आने का इंतजार कर रहा था. सारिका की नजरें जबजब पति से मिलतीं तो वह सिहर उठती. मानो पति से पूछ रही हो, ‘‘तारुष के पापा, कोई वजह नहीं… कोई नाराजगी नहीं, तो आखिर यह क्या था? तुम तो अपने इकलौते बेटे को अथाह प्यार करते थे. उसे जरा सी चोट लग जाती तो तड़प उठते थे.

‘‘बेटे के आंसू कभी बरदाश्त नहीं हुए. उसे कोई छू भी ले तो कलेजा फट जाता था. उसे अपने हाथों से खिलानापिलाना और हमेशा अपने पास सुलाना. आखिर ऐसा क्या रहस्य है कि तुम ने बेटे का गला घोंट दिया. मौत से पहले बच्चे की तड़प तुम ने कैसे देखी होगी. रुशांक छटपटाया होगा तो प्यारदुलार करने वाले हाथ कैसे ढीले नहीं पड़े? आखिर क्यों तुम ने बेटे की हत्या कर डाली?’’

सुबह लगभग 9 बजे इंसपेक्टर महेश वीर सिंह थाने पहुंचे. वहां कक्ष में मौजूद युवकयुवती उन्हें देख कर खड़े हो गए. युवक हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सर, मेरा नाम अलंकार श्रीवास्तव है और यह मेरी पत्नी सारिका है. हम गांधीनगर मोहल्ले में रहते हैं. मैं ने अपने 7 साल के बेटे रुशांक को गला दबा कर मार डाला.’’

यह सुन कर महेश वीर सिंह विचलित हो उठे. उन्होंने अलंकार के ऊपर नजर डाली और एक कांस्टेबल को बुला कर उसे हिरासत में लेने के आदेश दिए. उसे तुरंत हिरासत में ले लिया गया. हत्या की वजह जानने के लिए उन्होंने सारिका से पूछताछ की तो वह फफक पड़ी, ‘‘सर, बीती शाम तक घर में सब कुछ सामान्य था. रात 10 बजे पति ने घर के सभी सदस्यों को दूध पीने कोे दिया. दूध पीने के बाद उसे तथा उस की बेटियों को नींद आ गई. शायद दूध में नींद की गोलियां घोली गई थीं. सुबह 5 बजे पति ने उसे जगाया और बोले, ‘‘अब सब ठीक हो गया है. अब कोई बेटे को परेशान नहीं कर पाएगा. बेटा चैन की नींद सो रहा है.’’

पति की अटपटी बातें सुन कर वह घबरा गई. वह बाहर वाले कमरे में गई तो देखा सोफे पर रुशांक का शव पड़ा है. उस के मुंह से चीख निकली तो दोनों बेटियां तूलिका व गीतिका आ गईं. घर में रोनापीटना शुरू हुआ तो पड़ोसी आ गए. फिर तो पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ जमा हो गई. इसी बीच अलंकार उसे साथ ले कर थाने आ गए और समर्पण कर दिया. सर, पति कुछ महीने से तनावग्रस्त थे. इसी तनाव में उन्होंने बेटे को मार डाला. थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने पिता द्वारा मासूम बेटे की हत्या करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. फिर सारिका के साथ उस के गांधीनगर स्थित घर पहुंच गए. उस समय घर के बाहर भीड़ जमा थी.

सभी के मन में यही प्रश्न था कि आखिर अलंकार ने अपने एकलौते बेटे की हत्या क्यों की? घर के अंदर सोफे पर मासूम बालक रुशांक का शव पड़ा था. शव के पास ही उस की बहनें रो रही थीं. नानी, मामी, मौसी सभी सिसक रही थीं. इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

थानाप्रभारी अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार तथा डीएसपी श्वेता सिंह वहां आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा घर वालों से घटना के संबंध में पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए. कई जगह से फिंगरप्रिंट भी लिए. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक रुशांक के शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद एसपी(पश्चिम) डा. अनिल कुमार थाना सीसामऊ पहुंचे. वहां उन्होंने हत्यारे पिता अलंकार से दिन भर पूछताछ की, जिस में वह चकरा कर रह गए.

कभी नरमी से तो कभी सख्ती से सवाल पूछे गए, लेकिन अलंकार पर कोई असर नहीं पड़ा. इस बीच कभी वह सामान्य दिखा तो कभी फूटफूट कर रोया. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने रुशांक को क्यों मारा?’’

‘‘सर, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो उसे वो मार देता. फिर हम बचा नहीं पाते सर.’’ अलंकार बोला.

‘‘कौन उसे मारने वाला था?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मैं नहीं बताऊंगा वरना वह मुझे भी मारने की कोशिश करेगा.’’ अलंकार घबराते हुए बोला.

‘‘आखिर कौन हैं वो? हमें बताओ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

थानाप्रभारी की बात सुन अलंकार उन की तरफ देख कर हंसने लगा. उस की हरकतें देख कर थानाप्रभारी समझ गए कि जरूर यह मानसिक रोगी है. फिर उन्होंने पूछा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि तुम ने रुशांक को कैसे मारा?’’

‘‘कैसे बताऊं? उन्हें कोई नहीं देख पाएगा. लेकिन वे मेरे परिवार को मार डालेंगे.’’ माथे पर हाथ रख कर वह बैठ गया. आंखें भर आईं, फिर बोला, ‘‘सर, हम ने उसे मारा नहीं बल्कि हम ने तो उसे बचा लिया. अब वह पूरी तरह सेफ है.’’

‘‘कैसे सेफ है? तुम ने तो उसे मार डाला.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘मैं ने उसे सेफ कर दिया. अब वह उसे नहीं मार पाएगा.’’ अलंकार बोला.

‘‘उस वक्त कौनकौन था वहां?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘हम थे, रुशांक था. सब सो गए थे. हम जाग रहे थे.’’

‘‘बच्चे का गला कसते हुए तुम्हारे हाथ नहीं कांपे?’’ थानाप्रभारी ने पूछा तो अलंकार फफकफफक कर रोने लगा.

पूछताछ में अलंकार ने जिस तरह हर सवाल का अटपटा जवाब दिया, उस से एसपी डा. अनिल कुमार को भी लगा कि अलंकार श्रीवास्तव मानसिक रोगी है या फिर किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त है. उन्होंने इसी दिशा में अपनी जांच आगे बढ़ाई और आरोपी अलंकार श्रीवास्तव की पत्नी सारिका से विस्तृत पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज कराया. उन्होंने सारिका से रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा तो वह आनाकानी करते हुए बोली, ‘‘सर, बेटा तो चला ही गया. अब पति जेल चले गए तो सब खत्म हो जाएगा. बेटे के बाद पति के बिना हम कैसे जिएंगे?’’

काफी समझाने के बाद सारिका ने तहरीर दी. उस के बाद थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने सारिका की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत अलंकार श्रीवास्तव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक ऐसे इंसान की कहानी प्रकाश में आई, जिस के जीवन में पश्चाताप के अलावा कुछ भी नहीं बचा. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर का एक घनी आबादी वाला मोहल्ला है-गांधीनगर. यह सीसामऊ थाने के अंतर्गत आता है. अलंकार श्रीवास्तव इसी मोहल्ले के मकान नंबर 106/92 में सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी सारिका के अलावा 2 बेटियां तथा एक बेटा रुशांक उर्फ तारुष था.

अलंकार श्रीवास्तव का अपना पुश्तैनी मकान था. मकान का आधा भाग उस ने किराए पर उठा रखा था और आधे भाग में वह स्वयं रहता था. अलंकार श्रीवास्तव के 2 अन्य भाई आलोक व अभिषेक श्रीवास्तव थे. आलोक मध्य प्रदेश में तथा अभिषेक मुंबई में परिवार सहित बस गए थे. मातापिता की मौत के बाद उन का कानपुर आनाजाना बहुत कम हो गया था. अलंकार के परिवार से उन का लगाव न के बराबर था. अलंकार श्रीवास्तव शेयर बाजार में ब्रोकर था. स्टाक मार्केट से वह अपनी फर्म के कई ग्राहकों को लाखों रुपए की कमाई कराता था और स्वयं भी कमाता था. उस की पत्नी सारिका पढ़ीलिखी थी. वह शिक्षिका थी. वह कन्नौज जिले के नदौरा गांव स्थित प्राथमिक पाठशाला में सरकारी टीचर थी.

उसे भी 30-35 हजार रुपया प्रतिमाह वेतन मिलता था. कुल मिला कर अलंकार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी और परिवार खुशहाल था. चूंकि सारिका स्वयं पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह अपने बच्चों को भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहती थी. उस की 16 वर्षीया बड़ी बेटी वेस्ट कौट स्कूल में कक्षा 10 में पढ़ रही थी, जबकि 10 वर्षीया छोटी बेटी इसी स्कूल में कक्षा 4 की छात्रा थी. सब से छोटा 7 वर्षीय रुशांक उर्फ तारुष अशोक नगर के किड्स प्री स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ रहा था. अलंकार श्रीवास्तव अपने इकलौते बेटे रुशांक उर्फ तारुष से बहुत प्यार करता था. वह उसे अपने हाथ से खाना खिलाता, दूध पिलाता और अपने साथ ही सुलाता था.

तारुष की शैतानी पर बेटियां उसे डांट देतीं तो अलंकार तारुष का पक्ष ले कर बेटियों को ही डांटता. एक बार स्कूल टीचर ने तारुष को किसी बात पर थप्पड़ मार दिया तो जानकारी मिलने पर अलंकार ने स्कूल जा कर हंगामा खड़ा कर दिया. आखिर में स्कूल टीचर को माफी मांगनी पड़ी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन मार्च 2020 में महामारी के चलते जब देश में लौकडाउन हुआ तो अलंकार का भी काम ठप्प हो गया और उस की नौकरी भी चली गई. नौकरी जाने से अलंकार परेशान रहने लगा. उसे अपने बेटे व बेटियों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. लौकडाउन के पहले उस ने अपनी फर्म के जिन ग्राहकों को लाखों रुपए कमवाए, जरूरत पड़ने पर उस की मदद को कोई खड़ा नहीं हुआ. इस बात को ले कर भी वह बहुत टेंशन में रहता था.

धीरेधीरे अलंकार इस कदर मानसिक बीमार हो गया कि वह आत्महत्या की बात करने लगा. वह इतना चिंतित रहने लगा कि सोते से अचानक जाग उठता और कहता, ‘‘वो मुझे मार डालेगा. मेरे बेटे को मार डालेगा.’’

वह चिड़चिड़ा हो गया. उस का ब्लडप्रैशर बढ़ गया और पड़ोसियों से भी झगड़ा करने लगा. वह कभी गुमसुम रहता तो कभी हंसतामुसकराता और कभी रोने भी लगता. कभी परिवार को सतर्क करते हुए कहता, ‘‘वो मार डालेगा.’’

पति की इन अजीबोगरीब हरकतों से सारिका की चिंता बढ़ने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि अलंकार के दिमाग में आखिर चल क्या रहा है. कई बार उस ने इलाज कराने की बात कही, लेकिन अलंकार तैयार नहीं हुआ. बोला, ‘‘मुझे कोई बीमारी नहीं है. थोड़ा ब्लडप्रैशर बढ़ा है. होम्योपैथी दवा ले रहा हूं.’’

27 नवंबर, 2020 की रात 8 बजे सारिका की बड़ी बेटी ने मटर पनीर की सब्जी बनाई फिर रोटियां सेंकी. इस के बाद सभी ने बैठ कर खाना खाया. सोने के पहले सभी एकएक गिलास दूध पीते थे. उस रात भी सारिका दूध ले कर आई तो अलंकार बोला, ‘‘कोरोना बढ़ रहा है. दूध में हल्दी व अश्वगंधा मिला कर पीना चाहिए.’’

अलंकार ने सारिका से दूध भरे गिलास ले लिए और रसोई में चला गया. वहां उस ने दूध में हल्दी के साथ नशीली गोलियां घोल दीं और सब को दूध पिला दिया. तारुष को यह कह कर दूध नहीं दिया कि उस के पेट में दर्द है. दूध पीने के कुछ देर बाद सारिका व उस की बेटियां गहरी नींद में सो गईं. अलंकार ने तारुष को अपने साथ सोफे पर लिटा लिया. वह डिप्रेशन में था. उसे नींद नहीं आ रही थी. आधी रात के बाद वह उठा और तकिए से बेटे का मुंह दबाने लगा. तारुष छटपटा कर बोला, ‘‘पापा, मुझे मत मारो. मैं तो आप का दुलारा बेटा हूं.’’

‘‘बेटा, मैं तुझे मार नहीं रहा हूं. मुक्ति दिला रहा हूं. अगर मैं ने ऐसा नहीं किया तो वह मार डालेगा.’’

‘‘ कौन पापा?’’ तारुष ने पूछा.

‘‘तुम उसे नहीं जानते. वह बहुत खतरनाक है. वह मुझे भी मारना चाहता है.’’ कहते हुए अलंकार ने तारुष का तकिए से मुंह नाक दबाया फिर गला घोंट दिया. हत्या करने के बाद उस ने तारुष के शव को कंबल से ढंक दिया और वहीं बैठा रहा. सुबह 5 बजे अलंकार अपनी पत्नी सारिका के कमरे में पहुंचा और उसे जगा कर बोला, ‘‘सारिका, अब सब ठीक हो गया. अब कोई तारुष को परेशान नहीं कर पाएगा. वह चैन की नींद सो रहा है.’’

यह सुन कर सारिका का माथा ठनका. वह बदहवास कमरे के बाहर आई तो सोफे पर तारुष का शव पड़ा देखा. वह चीख पड़ी तो चीख सुन कर तूलिका व गीतिका आ गईं. भाई का शव देख कर वे दोनों भी सुबकने लगीं. दोनों ने पास खड़े पिता पर नजर डाली. मानो पूछ रही हों, ‘पापा, यह तुम ने क्या किया. भाई को मार डाला. अब मैं राखी किस को बांधूंगी. किस के माथे पर टीका करूंगी.’

सूर्य की पौ फटते ही पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोग अलंकार के दरवाजे पर जुटने लगे. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अलंकार ने अपने एकलौते बेटे को मार डाला है. इसी बीच अलंकार पत्नी सारिका को ले कर थाना सीसामऊ पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया. 29 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अलंकार श्रीवास्तव को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. जेल प्रशासन उस पर निगरानी रखे हुए है और उस का उचित इलाज हो रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

 

Uttar Pradesh Crime : बेटी ने मां के साथ मिलकर क्यों किया प्रेमी का कत्ल, वजह चौंकाने वाली

Uttar Pradesh Crime : सेजल मिश्रा और हिमांशु एकदूसरे को इतना चाहते थे कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. इसी दौरान सेजल की मां प्रतिभा उपाध्याय ने सेजल के ऐसे कान भरे कि वह प्रेमी की जान लेने को आमादा हो गई. इस के बाद जो हुआ..

21 वर्षीय हिमांशु सिंह सुलतानपुर पीडब्लूडी कालोनी में अपनी मां प्रतिमा सिंह और बड़े भाई शिवेंद्र के साथ रहता था. 3 दिसंबर, 2020 की शाम साढ़े 6 बजे किसी का फोन आया तो वह घर से निकल गया. देर रात तक जब वह नहीं लौटा तो शिवेंद्र ने उस का फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. हर बार फोन बंद ही मिला तो वह परेशान हो गया. मां प्रतिमा सिंह भी चिंतित हो गईं कि पता नहीं वह कहां है जो उस का फोन भी नहीं लग रहा. अगले दिन भी हिमांशु की तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता न चला. मोबाइल भी लगातार बंद आ रहा था. जब कुछ पता न चला तो 5 दिसंबर को शिवेंद्र अपने मामा विवेक सिंह के साथ शहर कोतवाली पहुंचा.

कोतवाली में मौजूद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को उन्होंने हिमांशु के लापता होने की बात बताई. पूरी  बात जानने के बाद इंसपेक्टर सिंह ने हिमांशु की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से हिमांशु को खोजने लगी. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को जानकारी मिली कि बाराबंकी के लोनी कटरा थाना पुलिस ने 4 दिसंबर को अखैयापुर गांव के पास नाले से एक युवक की नग्न लाश बरामद की थी. जिस की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. इंसपेक्टर सिंह ने कटरा थाने से लाश के फोटो मंगवा कर हिमांशु के भाई व मामा को दिखाए तो उन्होंने लाश की शिनाख्त हिमांशु के रूप में कर दी.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने हिमांशु के भाई शिवेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हिमांशु की किसी से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन उस के प्रेम संबंध 18 वर्षीय सेजल मिश्रा नाम की युवती से थे. वह डा. प्रदीप मिश्रा और प्रतिभा उपाध्याय की बेटी है और शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती है. प्रतिभा का तलाक हो चुका है. इसलिए वह पति से अलग रह रही है. इस से हिमांशु की हत्या का शक सेजल के परिजनों पर गया. लिहाजा पुलिस ने प्रतिभा के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस से पता चला कि डा. प्रदीप घटना के दिन शाम 6 बजे से ले कर रात साढे़ 8 बजे तक प्रतिभा के घर पर थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उसी समय के बीच हत्या किए जाने की पुष्टि हुई थी. हिमांशु के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन की जांच की गई तो शक और पुख्ता हो गया. हिमांशु की आखिरी लोकेशन प्रतिभा के घर की थी. असरोगा टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में घटना की रात 12:05 बजे महाराष्ट्र नंबर की एक स्कोडा कार जाते हुए दिखी. पुलिस ने हिमांशु के दोस्तों से पूछताछ की तो पता चला कि हिमांशु अपने एक दोस्त के साथ घटना की शाम प्रतिभा के घर गया था. हिमांशु दोस्त को बाहर छोड़ कर अंदर चला गया था. हिमांशु काफी समय तक वापस नहीं लौटा तो दोस्त उस के मोबाइल पर मैसेज भेज कर वापस आ गया. हिमांशु 6:40 बजे प्रतिभा के घर में घुसा था. 8:22 बजे वह प्रतिभा के घर से निकलते देखा गया.

हिमांशु के परिजनों ने भी उस के हिमांशु के आने की पुष्टि कर दी. अब यह बात समझ नहीं आ रही थी कि जब हिमांशु प्रतिभा के घर से निकल आया तो गया कहां. लेकिन शक की गुंजाइश अभी थी कि फोटो में निकलते समय हिमांशु का चेहरा नहीं दिख रहा था. हिमांशु के साथ  गए दोस्त और अन्य दोस्तों को युवक का फोटो दिखाया गया तो उन्होंने फोटो में दिख रहे युवक की पहचान हिमांशु के रूप में नहीं की. वह युवक कपड़े जरूर हिमांशु के पहने था, लेकिन चालढाल उस की अलग थी. इस का मतलब यह था कि किसी और को हिमांशु के कपड़े पहना कर गुमराह करने के लिए घर से निकाला गया था. तमाम सुबूत प्रदीप मिश्रा और उन की तलाकशुदा पत्नी प्रतिभा की ओर इशारा कर रहे थे.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने 14 दिसंबर को डा. प्रदीप मिश्रा को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती में ही वह टूट गए और उन्होंने घटना के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी. हिमांशु की हत्या करने में प्रदीप के अलावा प्रतिभा, उस की बेटी सेजल और उन का नौकर सद्दाम शामिल थे. हत्या के लिए बाकायदा एक प्रौपर्टी डीलर गुफरान अख्तर के जरिए 50 हजार रुपए की सुपारी दी गई थी. गुफरान ने अपने हिस्ट्रीशीटर दोस्त वाहिद खान को हत्या के लिए तैयार किया था. वाहिद ने सब के सामने घटना को अंजाम दिया था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने शिवेंद्र सिंह की तरफ से प्रदीप मिश्रा, प्रतिभा उपाध्याय, सेजल मिश्रा, गुफरान अख्तर, वाहिद खान और सद्दाम के खिलाफ भादंवि की धारा 364/302/201/34/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

आरोपियों से पूछताछ के बाद हिमांशु की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर की शहर कोतवाली के शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती थी प्रतिभा उपाध्याय. प्रतिभा का विवाह 19 साल पहले बडि़यावीर में रहने वाले प्रदीप मिश्रा से हुआ था. प्रदीप मिश्रा होम्योपैथी के डाक्टर थे. विवाह के साल भर बाद ही प्रतिभा ने एक खूबसूरत बेटी सेजल को जन्म दिया. समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया. सन 2007 में प्रतिभा ने प्रदीप से किसी बात से खफा हो कर तलाक ले लिया और बेटी सेजल के साथ शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहने लगी. प्रतिभा ब्याज पर पैसे देने का काम करती थी. इस पर उसे अच्छी कमाई होती थी. मांबेटी का रहनसहन काफी अच्छा था. प्रतिभा हाई सोसायटी की महिलाओं की तरह ही जींस टीशर्ट पहनती थी, हाथ में महंगा मोबाइल होता था.

रहनसहन और काम के चलते प्रतिभा का हर तरह के लोगों से संपर्क रहता था. वह किसी के दबाव में नहीं आती थी. समय के साथ सेजल जवान हो गई. उस ने इंटर तक पढ़ाई कर ली थी और आगे पढ़ने की तैयारी कर रही थी. गोरे रंग की सेजल बेहद खूबसूरत थी. गलीमोहल्ले का हर युवक उस से नजदीकी बढ़ाने को बेकरार रहता था. पिता के बिना मां के साथ रहते हुए सेजल भी काफी खुले मिजाज की हो गई थी. मां के तौरतरीके और रंगढंग देख कर वह भी उसी रंग में ढल गई थी. उस के जो मन में आता, करती. वह अपने सपनों के राजकुमार के इंतजार में पलकें बिछाए बैठी थी. हिमांशु सिंह बाराबंकी के गांव जंगरा बसावनपुर का रहने वाला था.

उस का एक बड़ा भाई था शिवेंद्र. हिमांशु के पिता का नाम प्रदीप सिंह और मां का नाम प्रतिभा सिंह था. प्रदीप खेतीकिसानी का काम करते थे. लेकिन किसी वजह से उन की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही. भाई बना सहारा पति की मानसिक स्थिति ठीक न होने पर प्रतिभा सिंह अपने दोनों बेटों को साथ ले कर सुलतानपुर अपने भाई विवेक सिंह के पास आ गई. विवेक सिंह सरकारी नौकरी करते थे और गोलाघाट क्षेत्र में रहते थे. उन्होंने अपनी बहन और भांजों को सहारा दिया. उन की परवरिश में मदद की. शिवेंद्र ने मुरादाबाद स्थित एक इंस्टीट्यूट से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था. वह काफी स्मार्ट था. खूबसूरत युवतियों में उस का काफी लगाव था.

जब हिमांशु और उस का भाई शिवेंद्र अपने दम पर कुछ करने के काबिल हुए तो विवेक सिंह ने उन्हें पीडब्लूडी कालोनी में एक मकान रहने के लिए दिला दिया. उन का सारा खर्चा विवेक सिंह ही उठा रहे थे. हिमांशु की सेजल से मुलाकात मार्केट में शौपिंग करते समय हुई थी. पहली ही नजर में सेजल उसे दिल दे बैठी. उधर हिमांशु भी उसे देखते ही उस पर फिदा हो गया था. उस पहली मुलाकात में दोनों के बीच कोई संवाद शुरू नहीं हो सका. मगर सेजल मार्केट से घर लौट कर भी हिमांशु को भुला नहीं पाई. उस रात वह हिमांशु के बारे में ही सोचती रही. हिमांशु से हुई उस पहली मुलाकात के बाद सेजल खोईखोई सी रहने लगी थी. अब उसे बेसब्री से इंतजार था हिमांशु से अपनी मुलाकात होने का, ताकि वह अपना हाले दिल बयां कर सके.

पहली मुलाकात के 2 हफ्ते बाद एक दिन उसी मार्केट में उसे हिमांशु दिखाई दे गया. हिमांशु को देखते ही उस के दिल के तार झनझना उठे, चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. अब तक हिमांशु की निगाह भी उस पर पड़ चुकी थी. वह धड़कते दिल से बस सेजल को ही घूरे जा रहा था. कुछ पलों तक यह घूरने का सिलसिला चलता रहा. फिर हिमांशु सेजल के पास आया और बेहद मीठे लहजे में झिझकते हुए बोला, ‘‘माफ कीजिए, क्या मैं आप से कुछ बातें कर सकता हूं?’’

‘‘जी हां कीजिए, क्या बात करना चाहते हैं?’’

‘‘सामने रेस्टोरेंट में चल कर एकएक कप चाय पीते हैं, वहीं बातें भी हो जाएंगी.’’

‘‘अच्छा आइडिया है, चलिए.’’ सेजल ने उतावले मन से कहा.

दोनों कुछ कदमों की दूरी पर स्थित रेस्टोरेंट में दाखिल हो गए. उस दिन दोनों ने एकदूसरे के बारे में बहुत कुछ जान लिया. दोस्ती हुई तो फोन पर बात करने का सिलसिला शुरू हो गया. सेजल के मोबाइल पर हिमांशु के फोन काल्स आने लगे. दोनों कईकई घंटे बात करते, मगर फिर भी दिल नहीं भरता. अब हिमांशु प्रतिभा की गैरमौजूदगी में सेजल के घर भी आनेजाने लगा. एक दिन जब हिमांशु सेजल के घर आया तो हिमांशु ने सेजल को बांहों में भर कर उस के होंठोें को चूम लिया, ‘‘अब ये दूरियां बरदाश्त नहीं होतीं, तुम से एक पल भी अलग होने को दिल नहीं करता.’’

‘‘तो फिर मुझ से शादी क्यों नहीं कर

लेते हो?’’

‘‘वह तो मैं करूंगा ही यार, मगर शादी के बाद रोमांस का मजा किरकिरा हो जाता है. इसलिए सोचता हूं कि पहले जी भर कर सैरसपाटा और मस्ती कर ली जाए. फिर शादी की बात सोचेंगे.’’

प्रेमी हिमांशु के मनोभावों को जान कर सेजल प्रसन्नता से खिल उठी. उसे हिमांशु दुनिया का सब से अच्छा इंसान नजर आने लगा. कुछ दिनों बाद सेजल का जन्मदिन था. उस दिन सेजल ने हिमांशु के सिवाय किसी को इनवाइट नहीं किया. यहां तक कि अपनी खास सहेली हिमानी को भी नहीं बुलाया. मिल गए हिमांशु और सेजल तन्हा कमरे में दो जवां दिल, कोई रोकनेटोकने वाला भी नहीं था, ऐसे में मन भटकते कितनी देर लगती है. फिर हिमांशु ने सेजल को बांहों में भींच कर प्यार करना शुरू कर दिया. लेकिन सेजल ने किसी तरह खुद पर काबू किया और हिमांशु को भी बेकाबू होने से रोक लिया.

दोनों ही सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते थे. सोशल मीडिया ऐप ‘इंस्टाग्राम’ पर सेजल ने हिमांशु के साथ अपनी रिलेशनशिप को ले कर एक पोस्ट डाली, जिस में वह हिमांशु के साथ एक सेल्फी में  दिख रही थी. उस में उस ने हिमांशु से अपने प्यार का इजहार किया था और अपने रिलेशनशिप के 2 साल 7 महीने पूरे होने पर खुशी जताई थी. ये पोस्ट सेजल के मित्रों के अलावा और अन्य लोगों ने भी देखी. यह बात सेजल की मां प्रतिभा तक भी पहुंच गई. प्रतिभा ने सेजल से बात की और उसे गुस्से में डांटा भी. लेकिन कुछ सोचने के बाद प्रतिभा ने सेजल को समझाया,

‘‘मानती हूं कि तू उम्र के उस दौर से गुजर रही है, जहां किसी भी लड़के के प्रति आकर्षित हो सकती है. लेकिन एक सच यह भी है कि उम्र के इस दौर में दिमाग से ज्यादा दिल से काम लिया जाता है. जैसे तूने सिर्फ अपने दिल की सुनी, दिमाग की नहीं. दिमाग की सुनती तो तू उसे अपने लिए नहीं चुनती.’’

‘‘मौम, हिमांशु में क्या खराबी है. गुड लुकिंग है, हैंडसम है, मेरी उस की जोड़ी बहुत अच्छी लगती है.’’ सेजल ने खुश होते हुए अपने दिल की बात बता दी.

‘‘बेटा, केवल खूबसूरती और प्यार से जिंदगी में काम नहीं चलता. अच्छी तरह से जिंदगी गुजारने के लिए आमदनी का अच्छा जरिया होना चाहिए, जो उस के पास नहीं है. न नौकरी न कामधंधा और न ही रहने का खुद का कोई ठिकाना. ऐसे में वह तुझे क्या खुश रखेगा.’’

पहले नहीं सोचा था मां की बात सुन कर सेजल सोच में पड़ गई. वह सोचने लगी कि उस की मां कह तो सही रही हैं. प्यार के रंग और जोश में वह यह कुछ सोच ही न सकी कि आगे कैसे उस के साथ जिंदगी कटेगी. ऐसे में उस ने हिमांशु से दूर होने का फैसला कर लिया. अब वह हिमांशु से कटने लगी. जबकि हिमांशु उस से शादी करने का दबाव बना रहा था. सेजल उस से दूर होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हिमांशु उस का पीछा छोड़ने को ही तैयार न था. तब प्रतिभा एक दिन हिमांशु के घर पहुंच गई. उस ने हिमांशु की मां को न सिर्फ अपने बेटे को समझाने की हिदायत दी बल्कि काफी भलाबुरा भी कहा. इसी दिन हिमांशु के घर वालों को उस के प्रेम संबंधों का पता चला.

मां ने हिमांशु को समझाया भी कि वह सेजल से दूर रहे. लेकिन प्यार में आकंठ डूबा हिमांशु सेजल से दूर होने की सपने में भी नहीं सोच सकता था. हिमांशु के पीछा न छोड़ने पर मांबेटी उस से छुटकारा पाने का उपाय सोचने को मजबूर हो गईं. डा. प्रदीप ने प्रतिभा से तलाक के बाद दूसरी शादी कर ली थी, एक बेटा भी था. लेकिन इधर कुछ समय से वह फिर से प्रतिभा से मिलने उस के घर आने लगा था. रोजाना एकडेढ़ घंटे वह प्रतिभा के घर रुकता था. प्रदीप को भी हिमांशु के बारे में पता था, वह भी उस से काफी गुस्सा था. प्रदीप और प्रतिभा का एक प्रौपर्टी डीलर काफी करीबी था. उस का नाम गुफरान अख्तर था और शहर कोतवाली के चौक मोहल्ले में रहता था.

दोनों ने गुफरान से बात की और उस से हिमांशु को ठिकाने लगाने में मदद मांगी. गुफरान का एक साथी था वाहिद खान. वाहिद चांदा थाने के अंतर्गत कोथरा गांव में रहता था. वह चांदा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. गुफरान ने वाहिद से बात की और उसे प्रदीप और प्रतिभा से मिला कर पूरी डील फाइनल करा दी. हत्या की सुपारी की रकम 50 हजार रुपए तय हुई जो काम होने के बाद दी जानी थी. हिमांशु की हत्या करने का पूरा तानाबाना बुना गया. इस में प्रतिभा ने अपने नौकर सद्दाम को भी शामिल कर लिया. 3 दिसंबर, 2020 की शाम सेजल ने फोन कर के हिमांशु को अपने घर बुलाया कि उस के मम्मीपापा उस से बात करना चाहते हैं. हिमांशु अपने दोस्त के साथ प्रतिभा के घर पहुंचा.

करीब पौने 7 बजे वह दोस्त को बाहर खड़ा कर के अंदर चला गया. वहां प्रदीप, प्रतिभा, सेजल, नौकर सद्दाम के साथ गुफरान और वाहिद मौजूद थे. बातचीत शुरू हुई. बातचीत के दौरान ही वाहिद ने पीछे से लोहे के पाइप से हिमांशु के सिर पर प्रहार किया. प्रहार इतना तेज था कि हिमांशु के मुंह से चीख भी न निकल सकी. फिर ताबड़तोड़ सिर व शरीर पर कई प्रहार कर के वाहिद ने हिमांशु की हत्या कर दी. बाकी सभी उस की हत्या अपनी आंखों के सामने होते देखते रहे. हिमांशु को मारने के बाद उस के कपड़े उतार कर सद्दाम को पहनाए गए. हिमांशु की तरह ही वेशभूषा बना कर उस की ही तरह सद्दाम रात 8:22 बजे घर से निकला, जिस से लगे कि हिमांशु घर से निकला है.

सभी को पता था कि बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. उन में हिमांशु की घर में आते हुए फोटो कैद हुई होगी. ऐसे में उन पर ही पुलिस का शक जाएगा. इस से बचने के लिए ही यह रास्ता अपनाया गया. देर रात वाहिद ने अपनी स्कोडा कार में हिमांशु की नग्न लाश डाली. फिर गुफरान के साथ कार से बाराबंकी के लोनी कटरा थाना क्षेत्र के अखैयापुर गांव के पास एक नाले में हिमांशु की लाश फेंक दी और वापस आ गए. वाहिद को मिल गई रकम अगले दिन वाहिद को अपनी तय सुपारी की रकम भी मिल गई. लेकिन तमाम होशियारी के बाद भी उन सब का गुनाह कानून की नजर में आ ही गया. आवश्यक पूछताछ के बाद पुलिस ने डा. प्रदीप को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

19 दिसंबर को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने गुफरान अख्तर और वाहिद खान को नगर कोतवाली के पयागीपुर चौराहे से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों स्कोडा कार से कहीं भागने की फिराक में थे. उन के पास से हत्या में प्रयुक्त लोहे का पाइप और स्कोडा कार बरामद हो गई. उन दोनों ने हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. आवश्यक पूछताछ के बाद गुफरान और वाहिद को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिभा, सेजल और नौकर सद्दाम पुलिस की पकड़ से दूर थे. पुलिस सरगर्मी से उन की तलाश कर रही थी. उन तीनों पर पुलिस ने ईंनाम भी घोषित कर दिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP Crime News : कैंची से कत्ल – दूसरे प्रेमी से करवाया पहले का मर्डर

UP Crime News : सोनू जानती थी कि अमीन के पद पर कार्यरत आशीष शुक्ला शादीशुदा ही नहीं बल्कि 2 बच्चों का पिता है. इस के बावजूद लालची सोनू ने उसे अपने प्यार के जाल में फांस लिया. इसी दौरान महत्त्वाकांक्षी सोनू ने ऐसी चाल चली कि…

नवंबर 2020 माह की 28 तारीख थी. जनपद अंबेडकरनगर के मालीपुर थाना क्षेत्र में मझुई नदी के नेमपुर घाट पर किसी अज्ञात व्यक्ति की लाश पड़ी हुई थी. सुबहसवेरे घाट पर पहुंचे लोगों ने लाश देखी तो कुछ देर में वहां देखने वालों का तांता लग गया. उसी दौरान किसी ने इस की सूचना मालीपुर थाने में फोन कर के दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी विवेक वर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. लाश पौलिथिन में लिपटी हुई थी. मृतक की उम्र लगभग 43-44 साल थी. उस के गले पर किसी तेज धारदार हथियार से वार किए जाने के निशान मौजूद थे. आसपास का निरीक्षण करने पर कोई सुबूत हाथ नहीं लगा. अनुमान लगाया गया कि हत्या कहीं और कर के लाश वहां फेंकी गई है.

वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी वर्मा ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी. यह बात 28 नवंबर, 2020 की है. थाने आ कर थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने जिले के समस्त थानों में दर्ज गुमशुदगी के बारे में पता किया तो अकबरपुर थाने में 45 वर्षीय आशीष शुक्ला नाम के व्यक्ति की गुमशुदगी दर्ज होने की बात पता चली. गुमशुदगी आशीष के साथ लिवइन में रहने वाली सोनू नाम की युवती ने दर्ज कराई थी. सोनू को बुला कर लाश की शिनाख्त कराई गई तो उस ने उस की शिनाख्त आशीष के रूप में की. सोनू ने पूछताछ में बताया कि एक दिन पहले देर रात किसी का फोन आया था, जिस के बाद आशीष घर से चले गए थे. आज उन की लाश मिली.

पता चला कि आशीष लखीमपुर जिले की कोतवाली सदर अंतर्गत कनौजिया कालोनी में रहता था. आशीष अंबेडकरनगर में अमीन पद पर कार्यरत था और कोतवाली शहर के मुरादाबाद मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था. उस के साथ उस की कथित पत्नी सोनू शुक्ला रहती थी. लखीमपुर में आशीष की पत्नी राखी और बच्चे रहते थे. राखी को पति की लाश मिलने की सूचना मिली तो वह तुरंत अंबेडकरनगर पहुंच गई. मालीपुर थाने में उस ने दी तहरीर में पति की हत्या का आरोप सोनू शुक्ला और उस के 3 साथियों विवेक, विकास पर लगाया. राखी की तहरीर के आधार पर थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने सोनू और उस के साथियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

30 नवंबर को थानाप्रभारी ने सोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती करने पर वह टूट गई और आशीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि आशीष की हत्या में उस के प्रेमी आनंद तिवारी, उस के साथी मूलसजीवन पांडेय और राजीव कुमार तिवारी उर्फ राजू ने साथ दिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन आनंद और मूल सजीवन को गिरफ्तार कर लिया गया.  उन सभी से पूछताछ के बाद आशीष की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

आशीष शुक्ला लखीमपुर खीरी क्षेत्र में एलआरपी रोड पर स्थित कनौजिया कालोनी में रहते थे. 18 वर्ष पहले उन का विवाह राखी से हुआ था. राखी काफी सरल स्वभाव की थी. उस ने आते ही आशीष की जिंदगी को महका दिया था. आशीष भी सरल स्वभाव की राखी को हमसफर के रूप में पा कर काफी खुश हुआ. कालांतर में राखी ने एक बेटे आयुष (17 वर्ष) और बेटी अर्चिता (12 वर्ष) को जन्म दे दिया. आयुष के जन्म के बाद 2006 में आशीष की नौकरी अमीन के पद पर लग गई. वह अंबेडकरनगर में ही कोतवाली शहर के मुरादाबाद मोहल्ले में किराए पर कमरा ले कर रह रहा था. जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, कभीकभी तभी अचानक से जिंदगी में ऐसा खतरनाक मोड़ आ जाता है कि इंसान न संभले तो सब कुछ तहसनहस हो जाता है.

आशीष की जिंदगी में भी सब कुछ अच्छा चल रहा था कि जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया कि उस की जिंदगी दूसरे रास्ते पर चल पड़ी. वह रास्ता उस के और उस के परिवार के लिए कितना खतरनाक होने वाला था, आशीष को इस का बिलकुल आभास नहीं था. अंबेडकरनगर में काम के दौरान उस की मुलाकात सोनू नाम की युवती से हुई. 27 वर्षीय सोनू इब्राहिमपुर थाना क्षेत्र के बड़ा गांव की रहने वाली थी. उस के पिता विजय कुमार तिवारी की मृत्यु हो चुकी थी. सोनू 2 भाई व 3 बहनें थीं. सोनू काफी महत्त्वाकांक्षी थी. पिता के न रहने पर उस के विवाह होने में भी अड़चन आ रही थी. इसलिए उस ने अपने लिए खुद ही अच्छा हमसफर तलाश करने की ठान ली. इसी तलाश ने उसे आशीष शुक्ला तक पहुंचा दिया. आशीष एक तो सरकारी नौकरी करता था, साथ ही काफी स्मार्ट भी था.

सोनू ने उस की तरफ अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. सोनू ने आशीष के बारे में पूरी जानकारी जुटा ली. उसे यह भी पता था कि आशीष शादीशुदा है और 2 बच्चों का पिता है. लेकिन सोनू के लिए अच्छी बात यह थी कि उस की पत्नी और बच्चे लखीमपुर में रहते थे. आशीष को सोनू ने अपने रूपजाल में फांसना शुरू कर दिया. आशीष के साथ वह अधिक से अधिक समय बिताने लगी. उस के लिए खाना बना देती. घर में बना उस के हाथ का खाना खा कर आशीष को बड़ा अच्छा लगता था. वैसे आशीष कभी खुद खाना बना लेता था या होटल पर खा लेता था. सोनू अच्छी तरह जानती थी कि किसी भी मर्द के दिल तक पहुंचने का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. भरपेट मनपसंद खाना मिलता तो आशीष सोनू की जम कर तारीफ करता. समय के साथ दोनों काफी नजदीक आने लगे.

आशीष अपनी पत्नी राखी को धोखा नहीं देना चाहता था, लेकिन सोनू का साथ पा कर वह दिल के हाथों ऐसा मजबूर हुआ कि वह अपने आप को रोक नहीं पाया और अपनी जिंदगी को दूसरे रास्ते पर ले गया. उस रास्ते पर सोनू बांहें फैलाए उस का इंतजार कर रही थी. अब सोनू हर दूसरेतीसरे दिन आशीष के कमरे पर ही रुकने लगी. रुकती तो खाना बनाने के साथ ही बाकी काम भी वह कर देती थी. सोनू उस के साथ ऐसा व्यवहार करती जैसे उस की पत्नी हो. आशीष को यह सब काफी अच्छा लगता. एक रात जब दोनों बैठे बातें कर रहे थे तो आशीष ने उस से कह दिया, ‘‘सोनू तुम मेरा बहुत खयाल रखती हो. इतना खयाल तो सिर्फ पत्नी ही रख सकती है. तुम मेरी पत्नी न होते हुए भी पत्नी जैसा खयाल रख रही हो.’’

‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया जनाब. आप को इस बात का पता तो चला कि मैं आप का कितना खयाल रखती हूं. मैं तो अभी तक यही सोचती थी कि न जाने कब आप को पता चलेगा और कब मैं अपने दिल का हाल बयां कर पाऊंगी.’’ कह कर सोनू ने अपनी नजरें झुका लीं.

‘‘क्या मतलब…’’ आशीष ने उस के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ‘‘कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘अब इतने भी अंजान नहीं हो तुम कि इस का क्या मतलब ही न जानते हो. जो मैं तुम्हारा हर समय हरदम खयाल रखती हूं, वह भी एक पत्नी की तरह, तो क्यों रखती हूं.’’

‘‘तो तुम ही खुल कर बता दो कि तुम्हें मेरा इतना खयाल क्यों है.’’ उस ने पूछा.

‘‘मैं तुम को पसंद करती हूं तुम से प्यार करती हूं, इसीलिए मुझे तुम्हारा इतना खयाल रहता है. मुझे तुम्हारा साथ पसंद है इसीलिए हमेशा तुम्हारे पास ही बनी रहती हूं, लेकिन तुम हो कि मेरे जज्बातों की फिक्र ही नहीं है.’’ सोनू ने यह कह कर एक बार फिर अपनी नजरें झुका लीं और मायूसी का लबादा ओढ़ लिया. आशीष उस की बात पर मंदमंद मुसकराते हुए बोला, ‘‘मैं जानता था लेकिन जानबूझ कर अंजान बना था. तुम्हारे इतना सब करने पर कोई मूर्ख व्यक्ति भी समझ जाएगा कि तुम्हारे दिल में क्या है तो मैं तो पढ़ालिखा हूं. तुम्हारी जुबां से सुनना चाहता था, इसलिए अंजान बनने का नाटक कर रहा था.’’

यह सुनते ही सोनू की खुशी का पारावार न रहा, ‘‘मतलब मुझे इतने दिनों से बना रहे थे कि कुछ नहीं जानते हो. मुझे बता तो देते मैं तो वैसे भी तुम पर वारी जा रही थी.’’ कह कर सोनू आशीष के सीने से लग गई. उस की आंखों में अपनी जीत की खुशी चमक रही थी.

‘‘तुम पत्नी जैसे सब काम कर रही थीं लेकिन एक काम छोड़ कर…’’ शरारती अंदाज में तिरछी नजरों से आशीष ने सोनू को देख कर कहा. सोनू ने एक पल के लिए दिमाग पर जोर दे कर सोचा, फिर अगले ही पल आशीष की बात का मतलब समझते ही वह शरमा गई और उस के सीने में अपना मुंह छिपा लिया. उस के बाद उन के बीच शारीरिक रिश्ता भी कायम हो गया. आशीष और सोनू के बीच उम्र में 18 साल का अंतर था. सोनू 27 साल की थी तो आशीष 45 वर्ष का. सोनू आशीष के साथ उस की पत्नी बन कर रहने लगी. अपने नाम के आगे शुक्ला लगाने लगी. जिस से भी मिलती, बातें करती तो अपने आप को आशीष की पत्नी ही बताती. समय के साथ ब्याहता राखी को पता चल गया कि उस का पति आशीष सोनू नाम की किसी महिला के साथ रह रहा है.

पति आशीष से राखी ने बात की तो उस ने कह दिया कि जैसा वह सोच रही है वैसा कुछ नहीं है. काम के सिलसिले में वह उस के पास रह रही है. आशीष के साथ रहते सोनू उसे अपने वश में करने की पूरी कोशिश करती थी. मसलन किसी भी कागज/दस्तावेज में पत्नी के नाम की जगह आशीष उस का ही नाम डाले. कोई संपत्ति खरीदे तो उस के नाम से ही खरीदे. इस के लिए वह आशीष पर दबाव बनाती थी. आशीष उस की बात को नजरअंदाज कर देता था. सोनू के कहने पर ऐसा वह कर भी नहीं सकता था. लेकिन आशीष को अपनी बात न मानते देख कर सोनू नाराज हो जाती थी. अब उन दोनों में अकसर विवाद होने लगा. सोनू अपने भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगी. आशीष से उस ने जिस वजह से रिश्ता बनाया, वह वजह उसे पूरी होती नहीं दिख रही थी.

आशीष का एक दोस्त था 23 वर्षीय आनंद तिवारी. आनंद अकबरपुर थाना क्षेत्र के सिंहमई कारीरात गांव में रहता था. उस के पिता रमेश तिवारी किसान थे. 3 भाइयों में वह सब से बड़ा था और अविवाहित था. आनंद तिवारी आशीष से मिलने उस के कमरे पर आता रहता था. आनंद भी काफी स्मार्ट और जवान था. सोनू से 4 साल छोटा था. आशीष तो दोनों से उम्र में काफी बड़ा था. आनंद से कुछ छिपा नहीं था, वह जानता था कि सोनू आशीष की पत्नी नहीं है, उसे केवल अपने पास रखे हुए है. उस से अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है. ऐसे में वह भी सोनू के नजदीक आने की जुगत में लग गया.

सोनू आशीष के द्वारा बात न मानने पर तनाव में रहती थी. ऐसे में आनंद उस के पास आता, उस से बातें करता, बातों के दौरान ही हलकाफुलका मजाक भी कर देता तो सोनू का मन बहल जाता. कुछ समय के लिए वह अपना सारा तनाव भूल जाती थी. सोनू भी उस से घुलनेमिलने लगी. दोनों एकदूसरे की चाहत को अपने प्रति समझ रहे थे. चाहत दिल में पैदा हुई तो अधिक समय साथ बिताने लगे. एक दिन आनंद आया तो सोनू चाय बनाने लगी. आनंद को शरारत सूझी तो वह चुपके से सोनू के पीछे पहुंच गया और अचानक चिल्ला दिया. सोनू हड़बड़ा गई. हड़बड़ाहट में वह पीछे मुड़ी तो आनंद को खडे़ पाया, वह मुसकरा रहा था.

सोनू उस की शरारत समझ गई. वह उसे मारने दौड़ी तो वह वापस हुआ तो आगे पलंग था. वह उस से टकराने से बचने के लिए रुका तो पीछे भागी सोनू उस से टकरा गई. दोनों आपस में टकराए तो एक साथ पलंग पर गिर गए. दोनों की सांसें एकदूसरे के चेहरे से टकरा रही थी तो दिल भी आपस में मिल गए. उस समय दोनों के दिल की धड़कनें काफी तेज थीं. तन सटे होने के कारण एकदूसरे के दिल की तेज धड़कनों को दोनों ही महसूस कर रहे थे. दोनों जुबां से तो कुछ नहीं कह रहे थे लेकिन आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. आनंद सोनू को इतने नजदीक पा कर खुशी से भर उठा और बेसाख्ता बोला, ‘‘आई लव यू…आई लव यू, सोनू.’’

आनंद के इन मीठे बोलों ने सोनू के कानों को सुखद अनुभूति कराई. उस ने आंखें बंद कीं तो होंठ थिरक उठे, ‘‘आई लव यू टू आनंद.’’

इस के बाद उन के बीच शारीरिक रिश्ता कायम हो गया. सोनू को आनंद के साथ आनंद का सुखद एहसास हुआ. उस दिन के बाद उन के बीच संबंधों का सिलसिला अनवरत चलने लगा. अब सोनू आनंद के साथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगी थी. क्योंकि आशीष से अब उसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं रह गई थी. लेकिन आशीष की सरकारी नौकरी और संपत्ति का लालच उसे जरूर था. आनंद के साथ जिंदगी बिताने के लिए उसे आशीष की नौकरी और संपत्ति की जरूरत थी. वैसे भी इन चीजों को पाने के लिए सोनू ने काफी प्रयास किया था और समय भी बर्बाद किया था. वह ऐसे आसानी से सब छोड़ नहीं छोड़ सकती थी.

इसलिए उस ने आनंद से बात की तो आनंद के मन में भी लालच पैदा हो गया. सरकारी नौकरी और संपत्ति तभी हाथ लग सकती थी, जब आशीष जिंदा न रहे. इसलिए दोनों ने आशीष की हत्या करने का फैसला कर लिया. आशीष की हत्या में साथ देने के लिए आनंद तिवारी ने अपने 2 साथियों मूलसजीवन पांडेय निवासी गांव गंगापुर भुलिया जिला सुलतानपुर और राजीव कुमार तिवारी उर्फ राजू निवासी गांव भारीडीहा अंबेडकरनगर को तैयार कर लिया. मूलसजीवन और राजू दोनों ही अकबरपुर के आरडी लौज में काम करते थे और इस समय वहीं रह रहे थे.  27 नवंबर की रात 11 बजे के करीब सोनू और आशीष का विवाद हुआ. विवाद के बाद आशीष सो गया. सोनू ने आनंद को उस के साथियों के साथ बुला लिया.

आनंद अपनी बजाज पल्सर बाइक से दोनों साथियों को ले कर आशीष के कमरे पर पहुंचा. उन लोगों को आया देख कर सोनू ने धीरे से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सोते समय आशीष के गले पर तेज धारदार चाकू व कैंची से कई प्रहार किए गए. आशीष चीख भी न सका और उस की सांसों की डोर टूट गई. आशीष को मारने के बाद उन्होंने उस की लाश एक पौलिथिन में लपेट कर उस की ही हुंडई इयान इरा कार में डाल दी और उसे मालीपुर थाना क्षेत्र में मझुई नदी के नेमपुर घाट पर फेंक आए. आने के बाद कार सुलतानपुर के दोस्तपुर थाना क्षेत्र में लावारिस हालत में छोड़ दी. अगले दिन सोनू ने अकबरपुर थाने जा कर आशीष की गुमशुदगी लिखाई.

लेकिन चारों का गुनाह छिप न सका. गिरफ्तार तीनों अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, कैंची, 5 मोबाइल फोन, पल्सर बाइक और आशीष की इयान कार बरामद कर ली. कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तीनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक 23 दिसंबर को थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने चौथे अभियुक्त राजीव तिवारी उर्फ राजू को भी गिरफ्तार कर लिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP Crime News : हत्यारे ने पहचान छिपाने के लिए शव के साथ कौन सी घिनौनी करतूत की

MP Crime News : ममता तोमर एक साथ 2 प्रेमियों सुरेश उइके और सईद के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही थी. बाद में उस ने सुरेश के साथ लवमैरिज कर ली. लेकिन शादी के बाद भी उस का सईद के साथ चक्कर चलता रहा. इस का नतीजा…

30 सितंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. होशंगाबाद जिले के थाना पथरोड़ा की थानाप्रभारी सुश्री प्रज्ञा शर्मा पुराने मामलों की फाइल पलट रही थीं. तभी डंडे का सहारा ले कर लगभग 90 वर्षीय एक बुजुर्ग धीरेधीरे उन के औफिस में दाखिल हुए. थानाप्रभारी ने बुजुर्ग को कुरसी पर बैठने का इशारा किया. बुजुर्ग ने अपना नाम रामदास बताते हुए कहा कि वह डोव गांव में रहता है और उस का 40 साल का बेटा सुरेश उइके गांव नानपुरा पंडरी में पत्नी ममता और 2 बच्चों के साथ रहता है. सुरेश रेलवे में वेल्डर है. वह रोज सुबह नौकरी पर अपनी मोटरसाइकिल से भौरा स्टेशन आताजाता था. लेकिन कल रात में वह काम से वापस नहीं लौटा और उस का मोबाइल भी बंद था.

वह उसे खोजने के लिए जब भौरा जा रहा था तो जंगल के रास्ते में उसे अपने बेटे की मोटरसाइकिल पड़ी दिखाई दी. जिस के पास कुछ दूरी पर एक पेड़ के नीचे उस की लाश पड़ी है. रामदास ने बताया कि किसी ने उन के बेटे का सिर कुचल कर उस की हत्या कर दी है. थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के सामने कई ऐसे सवाल थे जिन के उत्तर रामदास दे सकता था. लेकिन पहली जरूरत मौके पर पहुंचने की थी. इसलिए उन्होंने सब से पहले एसपी होशंगाबाद संतोष सिंह गौर और एसडीपीओ महेंद्र मालवीय को घटना की जानकारी दी. फिर वह पुलिस टीम ले कर मौके पर पहुंच गई. भौरा मार्ग से कुछ हट कर जंगल के अंदर सागौन के पेड़ के नीचे सुरेश की सिर कुचली लाश पड़ी थी.

लाश के पास ही खून से सना भारी पत्थर पड़ा था, जिस से जाहिर था कि उसी पत्थर को सुरेश के सिर पर मारा गया था, जिस से उस का पूरा भेजा बाहर निकल कर चारों तरफ बिखर गया था. सड़क पर पड़ी मोटरसाइकिल के पास भी खून के निशान थे. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि संभवत: मोटरसाइकिल से घर लौट रहे सुरेश को हमलावरों ने पहले चलती बाइक पर हमला कर रोका होगा और फिर बाद में अंदर जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी होगी. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के साथ ही रामदास की रिपोर्ट पर हत्या का केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरी तरफ मामले की गंभीरता देखते हुए एसपी संतोष सिंह गौर ने एसडीपीओ महेंद्र मालवीय के निर्देशन और पथरोड़ा थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी.

टीम में एएसआई भोजरात बरबडे, हेडकांस्टेबल सुरेंद्र मालवीय, अनिल ठाकुर, कांस्टेबल हेमंत, टिल्लू, विनोद, संजय आदि को शामिल किया गया. इस टीम ने मृतक सुरेश के बारे में गहन छानबीन की, जिस में पता चला कि सुरेश ने करीब 13 साल पहले कांदई कलां की रहने वाली ममता तोमर से प्रेम विवाह किया था. जबकि ममता के बारे में जानकारी मिली कि वह अपने एक रिश्तेदार के घर ड्राइवर की नौकरी करने वाले सईद खां से प्यार करती थी. मृतक सुरेश के पिता रामदास आर्डिनैंस फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी करते थे. शादी के कुछ समय बाद सुरेश को रेलवे में वेल्डर की नौकरी मिल गई, जिस के बाद वह अपनी पत्नी ममता के साथ नानपुरा पंडरी में मकान बना कर रहने लगा था.

सुरेश की ड्यूटी भौरा और कीरतगढ़ रेल सेक्शन के बीच रहती थी, इसलिए वह रोज मोटरसाइकिल से भौरा आ कर रात लगभग 8 बजे ड्यूटी खत्म कर के घर लौट जाता था. सुरेश के साथियों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन्होंने बताया कि सुरेश सीधासच्चा आदमी था और उस की किसी से कोई रंजिश भी नहीं थी. कहानी में मोड़ तब आया, जब पुलिस ने मृतक के पिता रामदास से पूछताछ की. उन्होंने उस की हत्या का शक अपने बेटे की पत्नी ममता पर जाहिर किया. ससुर अपनी ही बहू पर खुद उसी के पति की हत्या करने का आरोप लगा रहा था. इसलिए उन के आरोप को हलके में नहीं लिया जा सकता था. थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने मृतक की पत्नी ममता को पूछताछ के लिए थाने बुलाने के बजाए खुद गांव जा कर उस के बयान दर्ज करने की सोची.

दरअसल इस के पीछे थानाप्रभारी का इरादा गांव में ममता के बारे में लोगों से और जानकारी हासिल करना था. इस के लिए जब वह ममता के घर पहुंचीं तो वहां पहुंचते ही यह देख कर चौंकी कि ममता के घर के मुख्य दरवाजे के अलावा घर में कई जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. सुरेश रेलवे मे मामूली सी नौकरी करता था. उस के पास करोड़ों की पुश्तैनी संपत्ति भी नहीं थी और न ही उस की किसी से कोई रंजिश की बात सामने आई थी. तो उस ने घर में कई सीसीटीवी कैमरे क्यों लगवाए. उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सुरेश की हत्या का संबंध उस के घर में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से जुड़ा हो.

उन का यह शक उस वक्त और भी गहरा गया, जब उन्हें पता चला कि सुरेश ने ये कैमरे 10-12 दिन पहले ही लगवाए थे. इसलिए ममता के बयान दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने टीम के कुछ सदस्यों को गांव में ममता के बारे में जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी दे दी. पता चला कि ममता के मायके में रहने वाला सईद अक्सर उस समय ममता के घर आता था, जब सुरेश घर पर नहीं होता था. पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि सुरेश के घर में कैमरे लगने के बाद से सईद को गांव में नहीं देखा गया. दूसरी जो सब से बड़ी बात सुनने में आई, वह यह कि कोई 4 महीने पहले ममता अचानक घर से लापता हो गई थी. वह करीब एक महीने बाद घर लौटी थी, जिस के कुछ दिन बाद सुरेश ने अपने घर में कैमरे लगवाए थे.

सुनने में आया था कि लापता रहने के दौरान ममता सईद खान के साथ सिवनी मालवा में रही थी. इस जानकारी के बाद ममता के साथ सईद भी शक के घेरे में आ गया, जो ममता के मायके का रहने वाला था. पुलिस टीम ने कांदई कलां में सईद की तलाश की तो वह गांव से गायब मिला. जब सईद के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली गई तो पता चला कि मृतक सुरेश की पत्नी ममता के साथ उस की लगातार लंबी बातें होती थीं. जिस दिन सुरेश की हत्या हुई उस दिन भी उस ने कई बार ममता से बात की थी.

दूसरी सब से बड़ी बात जो उस की काल डिटेल्स में निकल कर सामने आई, वह यह कि जिस समय सुरेश का कत्ल हुआ उस समय तक सईद का मोबाइल उसी लोकेशन पर था, जहां सुरेश की लाश मिली थी. इस से थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा के सामने पूरी कहानी साफ हो गई. सईद की काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि घटना के पहले कुछ दिनों तक सईद ने लगातार नया बस स्टैंड नंदूबाड़ा रोड सिवनी मालवा निवासी आशू उर्फ हसरत और अरबाज के साथ न केवल कई बार फोन पर बात की थी, बल्कि घटना के समय इन दोनों के मोबाइल भी सईद के साथ घटनास्थल पर ही मौजूद थे. इसलिए एसडीपीओ महेंद्र मालवीय के निर्देश पर पुलिस टीम ने इन तीनों की तलाश शुरू कर दी.

आरोपी फंसे शिकंजे में जिस से जल्द ही सईद को बैतूल के चिचोली थाना इलाके के मउपानी से और अरबाज आशू को सिवनी मालवा से हिरासत में ले लिया. पुलिस ने इन तीनों से सख्ती से पूछताछ की. पूछताछ में तीनों ने न केवल सुरेश की हत्या की बात स्वीकार की बल्कि इस में उस की पत्नी ममता के भी शामिल होने की बात बताई. पुलिस ने उन की निशानदेही पर घटना के समय पहने तीनों के रक्तरंजित कपड़े तथा उपयोग में लाई गई कुदाल, गला घोंटने में प्रयुक्त तार आदि भी बरामद कर सुरेश की पत्नी ममता को भी उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद प्रेमी और पति को एक साथ खुश रखने वाली ममता द्वारा सुरेश की हत्या करवा देने की कहानी इस प्रकार सामने आई—

कांदई कला में रहने वाली ममता बचपन से ही अपने चंचल स्वभाव के लिए जानी जाती थी. बताते हैं कि मिडिल में पढ़ते समय ही उस का रंगरूप कुछ ऐसा निखार आया था कि देखने वाले उसे देख रीझ जाते थे. ममता के साथ स्कूल में गांव का रहने वाला सईद भी पढ़ता था. सईद ममता का दीवाना था. वह उस से दोस्ती कर उसे पाने के सपने देखता था. फिर नादान उम्र में ही ममता सईद के साथ प्रेम और देह के पाठ पढ़ने लगी थी. स्कूली पढ़ाई के बाद ममता ने आगे की पढ़ाई बंद कर दी. वह घर पर ही रहने लगी. उसी दौरान सुरेश उइके से उस के प्रेम संबंध हो गए. यह जानकारी जब सईद को हुई तो उसे झटका लगा. ममता के पिता गांव के बडे़ किसान थे.

गांव में रहने वाले ममता के रिश्ते के एक भाई ने खेतीकिसानी के काम के लिए सईद को बतौर टै्रक्टर ड्राइवर नौकरी पर रख लिया था. इस से सईद को ममता के आसपास रहने का मौका मिलने लगा. सईद बहुत शातिर था. उस का मकसद नौकरी के बहाने ममता से नजदीकियां बढ़ाना था, क्योंकि ममता उन दिनों सुरेश उइके से प्रेम की पींगें बढ़ा रही थी. सईद ने तिकड़म से जल्द ही ममता के पूरे परिवार का दिल जीत लिया. जिस से उस का उस के घर में बेरोकटोक आनाजाना शुरू हो गया. जब ममता को पता चला कि सईद उस की दीवानगी के चलते ही ड्राइवर की नौकरी करने आया है तो उस ने सईद की दीवानगी को भी हवा देनी शुरू कर दी.

वह पहले से ही प्यार के मामले में काफी अनुभवी थी. उस ने सईद को पूरी तरह से अपना दीवाना बना लिया. ममता एक ही समय में 2 प्रेमियों सईद और सुरेश को अपनी बांहों में प्रेम का झूला झुलाने लगी. इतना ही नहीं, उस ने सईद के संग निकाह और सुरेश के संग शादी करने का वादा भी कर रखा था जबकि वह जानती थी कि ये दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते. बहरहाल, सईद के साथ उस का निकाह होना सुरेश के साथ शादी होने से ज्यादा मुश्किल था. इसलिए उस ने सईद को छोड़ कर सुरेश के साथ लवमैरिज कर ली.

संयोग से शादी के ठीक बाद सुरेश को रेलवे में नौकरी मिल गई, जिस के बाद वह नानपुर पंडरी में मकान बना कर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा. बाद में ममता 2 बेटियों की मां बनी. उस की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. सुरेश की ड्यूटी भौंरा और कीरतगढ़ के बीच थी, इसलिए वह गांव से रोज सुबह मोटरसाइकिल से आ कर शाम को वापस घर लौट आता था. दिन भर ममता घर में अकेली रहती थी. उस ने अपने इस खाली समय का उपयोग पुराने प्रेमी सईद को खुश करने के लिए करना शुरू कर दिया. वह पति के काम पर चले जाने के बाद सईद को अपने घर बुलाने लगी, जहां दोनों दिन भर वासना का खेल खेलते.

शाम को सुरेश के आने से पहले सईद अपने घर चला जाता. इस दौरान सईद ममता से किसी न किसी बहाने पैसा भी लेता रहता था. ममता ने रची गहरी साजिश ममता को सईद का आना अच्छा लगता था, इसलिए सईद के आते ही वह घर का दरवाजा बंद कर उस के साथ कमरे में कैद हो जाती थी. जल्द ही इस बात की चर्चा गांव में होने से बात सुरेश तक भी पहुंच गई. सुरेश ने एकाध बार इशारे में ममता से  इस बारे में बात की, जिस से ममता समझ गई कि अब सईद को घर बुलाने में खतरा है. इसलिए जब उस ने इस बारे में सईद से बात की तो उस ने उसे साथ भाग चलने को कहा. ममता सईद के साथ भागने को तैयार हो गई.

फिर 8 अगस्त, 2020 के दिन ममता को ले कर सईद सिवनी मालवा आ गया, जहां उस के दोस्त और रिश्तेदार अरबाज तथा आशू ने दोनों के रहने की व्यवस्था पहले से ही कर दी थी. ममता के भाग जाने से सुरेश पागल सा हो गया. उसे जरा भी भरोसा नहीं था कि उस के साथ प्रेम विवाह करने वाली ममता उसे और बच्चों को इस तरह से धोखा देगी. इस से सुरेश का दिल टूट गया. इधर एक महीने तक ममता द्वारा घर से लाए गए पैसों पर ऐश करने के बाद सईद ने उसे वापस सुरेश के पास भेज दिया. एक महीने बाद घर लौटी पत्नी को सुरेश अपनाना तो नहीं चाहता था, लेकिन बच्चों की खातिर उस ने ममता को माफ कर दिया. आगे ऐसा न हो, इसलिए सुरेश ने घर में कई सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए. वह ड्यूटी पर रहते हुए मोबाइल के माध्यम से घर पर नजर रखने लगा.

इस से सईद और ममता समझ गए कि अब उन का वासना का खेल खत्म हो गया है. इसलिए उन्होंने फोन पर चर्चा कर सुरेश का ही खेल खत्म करने की योजना बना ली, जिस में सईद ने अपने दोनों दोस्त अरबाज और आशू को भी शामिल कर लिया. फिर तीनों ने मिल कर 30 सितंबर, 2020 की रात ड्यूटी से लौट रहे सुरेश को रोक लिया और साथ लाए तार से गला घोंट दिया. फिर भारी पत्थर से उस का सिर कुचल दिया. सईद और उस की प्रेमिका ममता का सोचना था कि मामला शांत हो जाने के बाद वे दोनों फिर पहले की तरह अय्याशी कर सकेंगे. लेकिन पथरोड़ा थानाप्रभारी प्रज्ञा शर्मा ने 4 दिन में ही सभी आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

Delhi News : आपसी रंजिश के चलते 55 लाख की सुपारी देकर कराई गई किन्नर की हत्या

Delhi News : दिल्ली में किन्नरों के कई ग्रुप हैं, जो मोटी कमाई करते हैं. अंडरवर्ल्ड की तरह किन्नरों में भी आपसी रंजिश रहती है. कई हत्याएं भी हुई हैं. एकता जोशी की हत्या भी किसी ग्रुप ने ही कराई, लेकिन किस ग्रुप ने, यह पता लगाना आसान नहीं होगा. फिर भी…

पूर्वी दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव में बने डीडीए के जनता फ्लैट्स का वह कंपाउंड सब से आलीशान था. 6 फ्लैट के इस पूरे कंपाउड को 3 किन्नरों ने खरीद कर इसे आलीशान बंगले के रूप में तब्दील कर दिया था. इस बंगलेनुमा कंपाउंड में 3 किन्नरों के परिवार रहते हैं. किन्नरों के इस ग्रुप ने कुछ महीनों पहले ही इस कपांउड में आ कर रहना शुरू किया था. इन्हीं में एक परिवार था एकता जोशी (40) का. एकता मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली थी. एकता के पिता दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में जौब करते हैं, जबकि मां और भाई गांव में रहते हैं.

एकता ने भाई के बच्चों 3 बेटों व एक बेटी को अपने पास रखा हुआ था. जबकि भाईभाभी और मां गांव में रहते थे. एकता चाहती थी कि उस के भाई के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़लिख कर काबिल बने. चारों बच्चों की पढ़ाई के खर्चे एकता खुद उठाती थी. एकता बचपन से किन्नर थी, इसलिए युवावस्था में पहले वह उत्तराखंड में रही, इस के बाद दिल्ली के किन्नर समाज में आ कर रहने लगी. किन्नरों की गुरू अनीता का एकता से खास लगाव था. इसलिए जिस कंपाउंड में एकता रहती थी, अनीता का निवास भी उसी कंपाउंड में था. धर्मालु स्वभाव और घूमनेफिरने की शौकीन एकता की सुंदरता के कारण लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता था कि वह किन्नर है. एकता का एक ही सपना था कि उस के भतीजेभतीजी पढ़लिख कर काबिल बने और उन्हें जीवन की हर खुशी मिले.

एकता का अपने परिवार से बहुत ज्यादा लगाव था. इसीलिए वह हमेशा परिवार के संपर्क में रहती थी. कभी वह बच्चों को ले कर गांव चली जाती तो कभी मां, भाई और भाभी उस से मिलने के लिए चले आते थे. 5 सितंबर, 2020 की रात के लगभग 9 बजे का वक्त था. उस दिन बड़े भतीजे अमित ने बुआ एकता से नई जींस और कुछ दूसरे कपड़े खरीदने की फरमाइश की थी. कोरोना महामारी के चलते लगे लौकडाउन के बाद से एकता ने बच्चों के लिए और अपने लिए भी कोई नई ड्रैस नहीं खरीदी थी. इसलिए वह भतीजे अमित को ले कर लक्ष्मीनगर में शौपिंग करने के लिए निकल गई. अपने व सभी बच्चों के लिए उस ने कुछ ना कुछ खरीदा.

कई घंटे तक शौपिंग करने के बाद 9 बजे वह वापस घर लौट आई. अमित कपड़ों से भरे बैग ले कर घर के भीतर चला गया. एकता कार को घर के सामने पार्क करने के बाद जैसे ही बाहर निकली, अचानक तेजी से एक सफेद रंग की स्कूटी उस के पास आ कर रुकी. अज्ञात स्कूटी सवारों का हमला स्कूटी पर 2 लोग सवार थे, दोनों ने चेहरों पर मास्क और सिर पर हेलमेट पहने थे. एकता जब तक स्कूटी सवार आगंतुकों से कुछ पूछती, तब तक उन दोनों ने पैंट के अंदर खोंस रखे पिस्तौल निकाले और एक के बाद एक 4 गोलियों की आवाजों से इलाका गूंज उठा. आगंतुक स्कूटी सवारों के पिस्तौल से बेहद करीब से चलाई गई चारों गोलियां एकता के शरीर के नाजुक हिस्सों में लगी थी.

गोलियां लगते ही एकता के हलक से बचाओ…ओ….ओ की चीख निकली और खून में नहाया उस का शरीर लहरा कर जमीन पर गिर गया. गोलियों की आवाज और एकता की चीख सुन कर उस कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों के परिवार और राहगीर वहां एकत्र हो गए. इस बीच एकता पर गोलियां दागने वाले स्कूटी सवार जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी के साथ वहां से नौ दो ग्यारह हो गए. एकता के भाई के चारों बच्चे भी शोर व गोलियों की आवाज सुन कर वहां पहुंच गए. एकता को खून में लथपथ देख वे फूटफूट कर रोने लगे. तब तक किसी ने अस्पताल ले चलने की बात कही तो कंपाउंड में रहने वाले कुछ किन्नर एकता को जल्दी से गाड़ी में डाल कर समीप के जीटीबी अस्पताल ले गए.

लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने बता दिया कि उस की मौत हो चुकी है. किन्नरों के कंपाउंड में रहने वाले किसी व्यक्ति ने तब तक पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के वारदात की सूचना दे दी थी. सूचना मिलने के 10 मिनट बाद ही पीसीआर की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. वारदात की पुष्टि करने के बाद पीसीआर ने घटनास्थल से संबंधित इलाके के जीटीबी एनक्लेव थाने को फोन कर के घटना की जानकारी दे दी और तत्काल वहां पहुंचने के लिए कहा. सूचना मिलते ही जीटीबी थाने के एसएचओ अरुण कुमार अपने इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र कुमार को ले कर वारदात वाले स्थान पर पहुंच गए.

पता चला कि एकता किन्नर को कुछ लोग जीटीबी अस्पताल ले गए हैं और उस की मौत हो चुकी है. एसएचओ अरुण कुमार ने इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार को पंचनामे की काररवाई के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया और खुद घटनास्थल पर जांच व पूछताछ का काम शुरू कर दिया. सब से पहले उन्होंने अमित से पूछताछ की, जिस ने लक्ष्मीनगर बाजार से शौपिंग कर के लौटने और घर के भीतर जाने के बाद बाहर अपनी बुआ को गोली मार जाने की सारी बात बता दी. तब तक वारदात की सूचना पा कर एसीपी (सीमापुरी) मुकेश त्यागी और शाहदरा जिले के डीसीपी अमित शर्मा भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर आ गए.

पूछताछ में पता चला कि वारदात के बाद कातिल मुश्किल से 5 मिनट में वारदात को अंजाम दे कर वहां से फरार हो गए थे. इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार भी एकता के शव की जांचपड़ताल और उस के शव के पंचनामे की काररवाई कर के वापस घटनास्थल पर पहुंच गए. एकता के सीने व पेट में 4 गोली लगी थीं. गोली मारने के बाद मौके से स्कूटी पर फरार हुए कातिलों का चेहरा किसी ने नहीं देखा था. जिस कंपाउंड में एकता व अन्य किन्नरों के परिवार रहते थे, उस के गेट पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया. एसीपी मुकेश त्यागी के निर्देश पर उसी रात एसएचओ अरुण कुमार ने धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच का काम इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र के सुपुर्द कर दिया. साथ ही उन की मदद के लिए एक विशेष टीम का गठन कर दिया.

जांच का काम शुरू करते ही पुलिस ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज की जांच की, लेकिन उस से कोई विशेष मदद नहीं मिली. क्योंकि बदमाशों के चेहरे पूरी तरह हेलमेट व मास्क से ढके थे. पुलिस को वारदात में इस्तेमाल की गई स्कूटी के नंबर से मदद मिलने की उम्मीद थी. क्योंकि सीसीटीवी में उस का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. लेकिन जब नंबर की पड़ताल की गई तो पता चला कि इस नंबर पर स्कूटी रजिस्टर्ड ही नहीं है, जिस से साफ हो गया कि कातिलों ने स्कूटी पर फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया था. पुलिस को शक था कि संभव है पिछले दिनों एकता का किसी से कोई झगड़ा हुआ हो या फिर किसी ने धमकी दी हो. क्योंकि आमतौर पर किन्नर समाज में सब से ज्यादा झगड़े इलाके को ले कर होते हैं.

कई ग्रुप हैं किन्नरों के दिल्ली में किन्नरों के अलगअलग ग्रुप हैं और अकसर इलाके में काम करने को ले कर कोई ग्रुप किसी दूसरे इलाके में घुस आता है तो उस इलाके में काम करने वाले किन्नर झगड़ा कर लेते हैं. जब इस बिंदु पर जांच हुई और कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों से पूछताछ की गई तो पता चला एकता स्वभाव से बेहद मिलनसार थी. उस का किसी से कोई विवाद नहीं था. पूछताछ करने पर पता चला कि इसी कंपाउंड में रहने वाली अनीता जोशी इस इलाके की गुरु हैं, जिन्होंने एकता को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसलिए पैसे के लेनदेन का सारा हिसाब एकता ही रखती थी. किन्नर समाज में एकता का रुतबा बन चुका था. वह पूरी दिल्ली की गुरु बनने की रेस में शामिल हो गई थी.

एकता के करीबियों से पूछताछ में यह भी पता चला कि जिस रात एकता की हत्या हुई, उसी सुबह नंदनगरी 212 बस स्टैंड पर जनता फ्लैट्स के किन्नर ग्रुप का दूसरे किन्नरों के ग्रुप से विवाद हुआ था. दूसरा ग्रुप कमजोर पड़ गया था, जिस ने रात को देख लेने की धमकी दी थी. इसलिए पुलिस को आशंका हुई कि कहीं इस हत्याकांड को आपसी रंजिश के तहत अंजाम न दिया गया हो. पुलिस ने किन्नरों से पूछताछ के बाद किन्नरों के दूसरे गुट के बारे में जानकारी हासिल की और कुछ किन्नरों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन पूछताछ के बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. फिर भी न जाने क्यों एसएचओ अरुण कुमार को अंदेशा था कि किन्नर समाज के लोग ही इस हत्या में शामिल हैं, गुरु की कुरसी हासिल करने के चलते भी यह हत्या हो सकती है.

जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन से हत्याकांड के बारे में तो पता नहीं चला लेकिन यह जरूर पता चल गया कि एकता को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद दिल्ली में कई किन्नर गुरु एकता से नाराज थे. दूसरी तरफ पुलिस की टीम ने इलाके के सौ से ज्यादा लोगों से पूछताछ कर ली थी और 2 सौ से ज्यादा कैमरों की फुटेज खंगाल चुकी थी. लेकिन इस के बावजूद कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हो पाई थी. कुछ किन्नरों से पूछताछ के बाद पुलिस को ऐसे संकेत मिले कि एकता जोशी की हत्या में भाड़े के हत्यारों का इस्तेमाल हो सकता है. ऐसा इसलिए भी लग रहा था क्योंकि गोली चलाने वाले बेहद प्रोफेशनल थे.

दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में किन्नर समाज के लोगों ने एकता जोशी की हत्या पर आक्रोश जताते हुए हत्याकांड का जल्द खुलासा करने की मांग शुरू कर दी थी. एकता के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उस की हत्या के बाद शिवसेना के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयभगवान भी शोक प्रकट करने के लिए उस के घर पर पहुंचे. किन्नर महामंडलेश्वर लक्ष्मी किन्नर एकता को अपनी खास दोस्त मानती थी, इसलिए वह भी शोक प्रकट करने के लिए उन के घर पहुंची. एसएचओ अरुण कुमार ने जांचपड़ताल में साइबर सेल टीम की भी मदद ली थी. साइबर टीम के सहयोग से पुलिस ने घटनास्थल के आसपास उस रात एक्टिव मोबाइल फोन नंबरों का डंप निकाल कर छानबीन शुरू कर दी थी.

एकता जोशी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर पुलिस ने उस की भी छानबीन की. इस बिंदु पर की गई छानबीन के बाद पुलिस को पता चला कि एकता जोशी की पश्चिमी यूपी के मेरठ व गाजियाबाद में कुछ लोगों से बातचीत होती थी. जिन नंबर से उन्हें काल आती या की जाती, वे सभी मेरठ के अपराधियों के नंबर थे. इसीलिए एसीपी मुकेश त्यागी ने मेरठ में एसटीएफ टीम से संपर्क कर हत्याकांड में मदद करने के लिए कहा था. उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पैशल टास्क फोर्स के डीएसपी बृजेश सिंह ने अपने तेजतर्रार इंसपेक्टर रविंद्र कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में सबइंसपेक्टर संजय कुमार, हेडकांस्टेबल संजय सिंह, रवि वत्स, रकम सिंह, कांस्टेबल दीपक कुमार व अंकित श्यौरान को शामिल किया गया.

छानबीन पहुंची मेरठ तक पुलिस की इस टीम के पास मेरठ के अधिकांश अपराधियों की कुंडली थी. दिल्ली पुलिस से सूचना मिलने के बाद पुलिस ने अपने मुखबिर नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया. एसटीएफ की टीम ने ऐसे अपराधियों को चिह्नित करना शुरू किया, जो सुपारी ले कर हत्या करने के लिए जाने जाते थे. पुलिस ने चिह्नित किए गए सभी बदमाशों के मोबाइल नंबर हासिल कर उन की काल डिटेल्स निकाल कर उसे खंगालना शुरू कर दिया. इसी पड़ताल के दौरान एसटीएफ की टीम को आमिर गाजी नाम के एक बदमाश के मोबाइल की लोकेशन 5 सितंबर को दिल्ली में मिली.

संयोग से आमिर के मोबाइल की लोकेशन रात को साढ़े 8 से 9 बजे के करीब जीटीबी एनक्लेव के जनता फ्लैट के आसपास थी और यहीं एकता जोशी की हत्या हुई थी. एसटीएफ की टीम समझ गई कि दिल्ली पुलिस का शक सही है कि एकता जोशी की हत्या करने वाले बदमाशों का संबंध मेरठ से है. इतनी जानकारी मिलने के बाद एसटीएफ की टीम ने आमिर गाजी को ट्रैक करना शुरू कर दिया. और 9 नवंबर को सटीक सूचना मिलने के बाद एसटीएफ टीम ने शाम को करीब 7 बजे उसे इस्माइल वाली गली से गिरफ्तार कर लिया. आमिर के साथ एक अन्य युवक भी था. तलाशी लेने के बाद दोनों के कब्जे से एक आटोमैटिक पिस्टल और एक तमंचा बरामद हुआ. आमिर के साथ पकड़े गए युवक का नाम सुहैल खान था.

पुलिस को दोनों से पूछताछ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. थोड़ी सी सख्ती के बाद आमिर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त गगन पंडित के साथ मिल कर किन्नर एकता जोशी की हत्या की थी. आमिर मेरठ के कुख्यात अपराधी और गाजियाबाद की डासना जेल में बंद सलमान गाजी का छोटा भाई है. सलमान की मेरठ के दूसरे कुख्यात अपराधी शारिक से जानलेवा दुश्मनी चल रही है. एक जमीन को ले कर कई साल पहले शुरू हुई शारिक व सलमान की दुश्मनी में अब तक दोनों के गैंग के कई लोग मारे जा चुके हैं. इन दिनों सलमान व शारिक दोनों ही जेल में बंद हैं.

आमिर गाजी ने बताया कि कोतवाली क्षेत्र में सराय बहलीम निवासी गगन पंडित ने किन्नर गुरु एकता जोशी की हत्या कराई थी. चूंकि उस के भाई सलमान के गैंग की रंजिश शारिक गैंग से चल रही है. इसलिए जेल में बंद सलमान ने आमिर से कहा था कि किसी भी तरह शारिक की हत्या करा दें तो शहर में उन की पकड़ मजबूत हो जाएगी. बस इसी काम के लिए आमिर ने कुछ दिन पहले गगन पंडित से मदद मांगी थी. आमिर की गगन पंडित से 6 महीने पहले ही हाजी याकूब गली में रहने वाले असलम पहलवान के जरिए मुलाकात हुई थी. दोनों की जानपहचान जल्द ही दोस्ती में बदल गई थी.

3 महीने पहले गगन पंडित ने आमिर से कहा था कि वह पहले दिल्ली के शाहदरा में जीटीबी एनक्लेव में एक हत्या करने में उस की मदद कर दे तो उस के बाद वह शारिक गैंग का खात्मा कराने में उस की मदद करेगा. आमिर ने कह दिया कि वह उस के काम में मदद जरूर करेगा, लेकिन उस के बाद उसे शारिक गैंग को खत्म करने में उस की मदद करनी पडे़गी. इस बात पर दोनों की ही सहमति बन गई थी. 5 सितंबर, 2020 को आमिर मेरठ में था जब सुबह के वक्त उस के पास गगन पंडित का फोन आया. उस ने बताया कि वह दिल्ली में है. गगन ने उस से कहा, दोस्त जिस काम के लिए तुम्हें मेरी मदद करनी है उसे पूरा करने का वक्त आ गया है. इसी वक्त दिल्ली चले आओ.

मदद लेने से पहले दोस्त की मदद करने का वायदा किया था, लिहाजा आमिर उसी समय दिल्ली के लिए रवाना हो गया. शाम को 3 बजे के करीब वह दिल्ली पहुंच गया और नंदनगरी में उस जगह पहुंचा, जहां गगन ने उसे पहुंचने के लिए कहा था. गगन पंडित के साथ वहां कुछ और लोग भी थे. यहीं पर गगन ने उसे बताया कि जीटीबी एनक्लेव में रहने वाले एक किन्नर एकता जोशी से उस की खुन्नस चल रही है.

‘‘किन्नर से तुम्हारी किस बात की खुन्नस गगन भाई?’’ आमिर ने उत्सुकता में पूछा.

‘‘मेरी सीधी तो खुन्नस नहीं है लेकिन उसी की बिरादरी के कुछ लोग हैं, जिन से अपनी दोस्ती है और वे मदद भी करते रहते हैं. उन्हीं के रास्ते का कांटा बन गई है एकता जोशी, बस इसीलिए टपकाना है. समझो, पीछे से डिमांड मिली है.’’ गगन जोशी ने थोड़े शब्दों में पूरी बात बता दी.

‘‘ठीक है भाई, आप चाहते हो तो टपका देते हैं साली को.’’ आमिर ने जोश के साथ कहते हुए पूछा, ‘‘सामान वगैरह है या जुगाड़ करने पडें़गे?’’

‘‘चिंता मत करो पूरा सामान है.’’ कहते हुए गगन ने उसे एक इंग्लिश पिस्टल दी और खुद भी एक पिस्टल निकाल कर अपनी पैंट में खोंस ली. गगन का खेल इस के बाद वे किसी के फोन का इंतजार करने लगे. शाम को किसी का फोन आने के बाद गगन आमिर को एक स्कूटी पर बैठा कर अपने साथ जीटीबी एनक्लेव में जनता फ्लैट के पास पहुंचा और इंतजार करने लगा. पहचान छिपाने के लिए दोनों ने सिर पर हेलमेट लगा लिए थे और चेहरे पर मास्क भी पहन रखे थे. उन्हें बैकअप देने के लिए गगन के कुछ साथी भी स्कूटी ले कर उन के आसपास थे. रात करीब 9 बजे जैसे ही एकता जोशी की कार उस के कंपाउंड के बाहर आ कर रुकी तो गगन ने थोड़ी दूर पर खड़ी अपनी स्कूटी स्टार्ट की और जब तक एकता कार से बाहर निकलती, तब तक स्कूटी ले जा कर एकता के पास रोक दी.

एकता जैसे ही कार से बाहर निकली आमिर और गगन ने उस पर 2-2 गोलियां इतने नजदीक से दागीं कि उस के बचने की गुजांइश ही नहीं थी. गोलियां मारने के बाद दोनों फौरन घटनास्थल से फरार हो गए. एकता की हत्या के बाद आमिर और गगन दोनों ही मेरठ वापस आ गए. हालांकि आमिर के साथ गिरफ्तार हुए सुहैल खान उर्फ सोनू का एकता की हत्या से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन उस से पुलिस ने अवैध हथियार बरामद किया था. इसलिए एसटीएफ ने उस के खिलाफ भी आमिर के साथ शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया. मेरठ के नूरनगर का रहने वाला सुहैल ईव्ज चौराहे पर कार वाशिंग का काम करता है. सुहैल 2 साल से आमिर के संपर्क में था.

श्यामनगर निवासी इरफान ने परवेज से उस का संपर्क कराया था. परवेज मेरठ के एक बड़े गैंगस्टर हाजी इजलाल का भाई है. इजलाल ने 10 साल पहले दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी एस.के. गिहा के भतीजे पुनीत गिरि, उस के दोस्त सुनील ढाका और कुलदीप उज्ज्वल की हत्या कर उन के शव बागपत नहर में डाल दिए थे. इजलाल ने अपनी प्रेमिका के कहने पर मेरठ कालेज में पढ़ने वाले इन तीनों लड़कों की बेरहमी से हत्या की थी. इस हत्याकांड में परवेज भी जेल गया था, लेकिन 2 साल पहले उसे जमानत मिल गई थी. उसी इजलाल के भाई परवेज ने सुहैल को 2 हत्याओं के लिए 10-10 लाख रुपए की सुपारी दी थी, लेकिन उस ने अभी यह नहीं बताया था कि उसे किस की हत्या करनी है.

परवेज ने सुहैल से कहा था कि किस की हत्या करनी है और कब करनी है, इस के बारे में आमिर उसे बताएगा. आमिर को परवेज ने बता दिया था कि उसे सुहैल के साथ मिल कर किन लोगों की हत्या को अंजाम देना है. आमिर गाजी के एकता हत्याकांड के कबूलनामे के बाद एसटीएफ के डीएसपी बृजेश सिंह ने सीमापुरी एसीपी मुकेश त्यागी और जीटीबी एनक्लेव थाने के एसएचओ अरुण कुमार को आमिर की गिरफ्तारी और एकता हत्याकांड के खुलासे की सूचना दे दी और उन के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर मेरठ की अदालत में पेश कर दिया. जहां से उन्हें मेरठ जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक हत्याकांड में शामिल गगन पंडित की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. पुलिस को आशंका है कि एकता की हत्या किसी विरोधी किन्नर ग्रुप ने सुपारी दे कर कराई है. आमिरगगन से पूछताछ के बाद ही पूरे राज से परदा उठेगा. लेकिन वह लापता है.