Love Crime News : ईंट से कई वार करके शादीशुदा प्रेमिका का किया कत्ल

Love Crime News : 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी सरिता का शारीरिक आकर्षण बरकरार था. तभी तो जब उस का पति अरविंद दोहरे काम करने कुछ दिनों के लिए घर से बाहर गया तो वह पति के दोस्त दलबीर सिंह की बांहों में चली गई. इस का खामियाजा सरिता को ही इस तरह भुगतना पड़ा कि…

अरविंद दोहरे अपने काम से शाम को घर लौटा तो उस की पत्नी सरिता के साथ दलबीर सिंह घर में मौजूद था. उस समय दोनों हंसीठिठोली कर रहे थे. उन दोनों को इस तरह करीब देख कर अरविंद का खून खौल उठा. अरविंद को देखते ही दलबीर सिंह तुरंत बाहर चला गया. उस के जाते ही अरविंद पत्नी पर बरस पड़ा, ‘‘तुम्हारे बारे में जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसे सुन कर अपने आप पर शरम आती है मुझे. मेरी नहीं तो कम से कम परिवार की इज्जत का तो ख्याल करो.’’

‘‘तुम्हें तो लड़ने का बस बहाना चाहिए, जब भी घर आते हो, लड़ने लगते हो. मैं ने भला ऐसा क्या गलत कर दिया, जो मेरे बारे में सुनने को मिल गया.’’ सरिता ने तुनकते हुए कहा तो अरविंद ताव में बोला, ‘‘तुम्हारे और दलबीर के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में हो रही है. लोग मुझे अजीब नजरों से देखते हैं. मेरा भाई मुकुंद भी कहता है कि अपनी बीवी को संभालो. सुन कर मेरा सिर शरम से झुक जाता है. आखिर मेरी जिंदगी को तुम क्यों नरक बना रही हो?’’

‘‘नरक तो तुम ने मेरी जिंदगी बना रखी है. पत्नी को जो सुख चाहिए, तुम ने कभी दिया है मुझे? अपनी कमाई जुआ और शराब में लुटाते हो और बदनाम मुझे कर रहे हो.’’ सरिता  तुनक कर बोली. पत्नी की बात सुन कर अरविंद का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने उस की पिटाई करनी शुरू कर दी. वह उसे पीटते हुए बोला, ‘‘साली, बदजात एक तो गलती करती है, ऊपर से मुझ से ही जुबान लड़ाती है.’’

सरिता चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन अरविंद के हाथ तभी रुके जब वह पिटतेपिटते बेहाल हो गई. पत्नी की जम कर धुनाई करने के बाद अरविंद बिस्तर पर जा लेटा. सरिता और अरविंद के बीच लड़ाईझगड़ा और मारपीट कोई नई बात नहीं थी. दोनों के बीच आए दिन ऐसा होता रहता था. उन के झगड़े की वजह था अरविंद का दोस्त दलबीर सिंह. अरविंद के घर दलबीर सिंह का आनाजाना था. अरविंद को शक था कि सरिता और दलबीर सिंह के बीच नाजायज संबंध हैं. इस बात को ले कर गांव वालों ने भी उस के कान भरे थे. बीवी की किसी भी पुरुष से दोस्ती चाहे जायज हो या नाजायज, कोई भी पति बरदाश्त नहीं कर सकता.

अरविंद भी नहीं कर पा रहा था. जब भी उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता, वह बेचैन हो जाता था. उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के फफूंद थाना क्षेत्र में एक गांव है लालपुर. अरविंद दोहरे अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 2 बच्चे थे. अरविंद के पास मामूली सी खेती की जमीन थी. वह जमीन इतनी नहीं थी कि मौजमजे से गुजर हो पाती. फिर भी वह सालों तक हालात से उबरने की जद्दोजहद करता रहा. सरिता अकसर अरविंद को कोई और काम करने की सलाह देती थी. लेकिन अरविंद पत्नी की बात को नजरअंदाज करते हुए अपनी खेतीकिसानी में ही खुश था.

पत्नी की बात न मानने के कारण ही दोनों में अकसर झगड़ा होता रहता था. अरविंद अपनी जमीन पर खेती करने के साथसाथ गांव के दूसरे लोगों की जमीन भी बंटाई पर ले लेता था. फिर भी परिवार के भरणपोषण के अलावा वह कुछ नहीं कर पाता था. अगर बाढ़ या सूखे से फसल चौपट हो जाती, तो उसे हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं मिल पाता था. इसी सब के चलते जब अरविंद पर कर्ज हो गया तो वह खेती की देखभाल के साथ फफूंद कस्बे में एक ठेकेदार के पास मजदूरी करने लगा. वहां से उस का रोजाना घर आना संभव नहीं था, इसलिए वह फफूंद कस्बे में ही किराए का कमरा ले कर रहने लगा.

अब वह हफ्ता-15 दिन में ही घर आता और पत्नी के साथ 1-2 रातें बिता कर वापस चला जाता. 30 वर्षीय सरिता उन दिनों उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जब औरत को पुरुष की नजदीकियों की ज्यादा चाहत होती है. जैसेतैसे कुछ वक्त तो गुजर गया. लेकिन फिर सरिता का जिस्म अंगड़ाइयां लेने लगा. एक रोज उस की नजर दलबीर सिंह पर पड़ी तो उस ने बहाने से उसे घर बुला लिया. दलबीर सिंह गांव के दबंग छोटे सिंह का बड़ा बेटा था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. दूध के व्यवसाय से वह खूब कमाता था. दलबीर सिंह और उस के पति अरविंद हमउम्र थे. दोनों में खूब पटती थी.

अरविंद जब गांव आता था, तो शाम को दोनों बैठ कर शराब पीते थे. सरिता को वह भाभी कहता था. घर के अंदर आते ही सरिता ने पूछा, ‘‘देवरजी, हम से नजरें चुरा कर कहां जा रहे थे?’’

‘‘भाभी, अभीअभी तो घर से आ रहा हूं. खेत की ओर जा रहा था कि आप ने बुला लिया.’’ दलबीर सिंह ने मुसकरा कर जवाब दिया. उस दिन दलबीर सिंह को सरिता ज्यादा खूबसूरत लगी. उस की निगाहें सरिता के चेहरे पर जम गईं. यही हाल सरिता का भी था. दलबीर सिंह को इस तरह देखते सरिता बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो मुझे. क्या पहली बार देखा है? बोलो, किस सोच में डूबे हो?’’

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है, मैं तो यह देख रहा था कि साधारण मेकअप में भी तुम कितनी सुंदर लग रही हो. अड़ोसपड़ोस में तुम्हारे अलावा और भी हैं, पर तुम जैसी सुंदर कोई नहीं है.’’

‘‘बस… बस रहने दो, बहुत बातें बनाने लगे हो. तुम्हारे भैया तो कभी तारीफ नहीं करते. महीना-15 दिन में आते हैं, वह भी किसी न किसी बात पर झगड़ते रहते हैं.’’

‘‘अरे भाभी, औरत की खूबसूरती सब को रास थोड़े ही आती है. अरविंद भैया तो अनाड़ी हैं. शराब में डूबे रहते हैं. इसलिए तुम्हारी कद्र नहीं करते.’’

‘‘और तुम?’’ सरिता ने आंखें नचाते हुए पूछा.

‘‘मुझे सचमुच तुम्हारी कद्र है भाभी. यकीन न हो तो परख लो. अब मैं तुम्हारी खैरखबर लेने आता रहूंगा. छोटाबड़ा जो भी काम कहोगी, करूंगा.’’ दलबीर सिंह ने सरिता की चिरौरी सी की. दलबीर सिंह की यह बात सुन कर सरिता खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘तुम आराम से चारपाई पर बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

थोड़ी देर में सरिता 2 कप चाय ले आई. दोनों पासपास बैठ कर गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के दिलोदिमाग में हलचल सी मची हुई थी. सच तो यह था कि सरिता दलबीर पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, दलबीर सिंह भी सरिता का दीवाना बन गया था. दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद दलबीर सिंह अकसर सरिता से मिलने आने लगा. सरिता को दलबीर सिंह का आना अच्छा लगता था. जल्द ही वे एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगा. सरिता चाहती थी कि पहल दलबीर सिंह करे, जबकि दलबीर चाहता था कि जिस्म की भूखी सरिता स्वयं उसे उकसाए.

आखिर जब सरिता से नहीं रहा गया तो एक रोज रात में उस ने दलबीर सिंह को अपने घर रोक लिया. फिर तो उस रात दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. हर रिश्ता टूट कर बिखर गया और एक नए रिश्ते ने जन्म लिया, जिस का नाम है अवैध संबंधों का रिश्ता. उस दिन के बाद सरिता और दलबीर सिंह अकसर एकांत में मिलने लगे. लेकिन यह सच है कि ऐसे संबंध ज्यादा दिनों तक छिपते नहीं हैं. उन का भांडा एक न एक दिन फूट ही जाता है. सरिता और दलबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक रात जब सरिता और दलबीर सिंह देह मिलन कर रहे थे तो सरिता की देवरानी आरती ने छत से दोनों को देख लिया.

उस ने यह बात अपने पति मुकुंद को बताई. फिर तो यह बात गांव में फैल गई. और उन के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में होने लगी. सरिता के पति अरविंद दोहरे को जब सरिता और दलबीर सिंह के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व दोस्त दलबीर से बात की तो दोनों मुकर गए और साफसाफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गांव के लोग उन्हें बेवजह बदनाम कर रहे हैं. लेकिन एक रोज अरविंद ने जब दोनों को हंसीठिठोली करते अचानक देख लिया तो उस ने सरिता की पिटाई की तथा दलबीर सिंह को भी फटकारा. लेकिन उन दोनों पर इस का कोई असर नहीं हुआ. दोनों पहले की तरह ही मिलते रहे.

पत्नी की इस बेवफाई से अरविंद टूट चुका था. महीना-15 दिन में जब वह घर आता था तो दलबीर को ले कर सरिता से उस की जम कर तकरार होती थी. कई बार नौबत मारपीट तक आ जाती थी. अरविंद का पूरा परिवार और गांव वाले इस बात को जान गए थे कि दोनों के बीच तनाव सरिता और दलबीर सिंह के नाजायज संबंधों को ले कर है. अरविंद की जब गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने फफूंद कस्बे में रहना जरूरी नहीं समझा और अपने गांव आ कर रहने लगा. पर सरिता तो दलबीर सिंह की दीवानी थी. उसे न तो पति की परवाह थी और न ही परिवार की इज्जत की. वह किसी न किसी बहाने दलबीर से मिल ही लेती थी.

हां, इतना जरूर था कि अब वह उस से घर के बजाय बाहर मिल लेती थी. दरअसल घर से कुछ दूरी पर अरविंद का प्लौट था. इस प्लौट में एक झोपड़ी बनी हुई थी. इसी झोपड़ी में दोनों का मिल लेते थे. जुलाई, 2020 में सरिता का छोटा बेटा नीरज उर्फ जानू बीमार पड़ गया. उस के इलाज के लिए सरिता ने अपने प्रेमी दलबीर सिंह से पैसे मांगे, लेकिन उस ने धंधे में घाटा होने का बहाना बना कर सरिता को पैसे देने से इनकार कर दिया. उचित इलाज न मिल पाने से एक महीने बाद सरिता के बेटे जानू की मौत हो गई. बेटे की मौत का सरिता को बेहद दुख हुआ.

विपत्ति के समय आर्थिक मदद न करने के कारण सरिता दलबीर सिंह से नाराज रहने लगी थी. वह न तो स्वयं उस से मिलती और न ही दलबीर को पास फटकने देती. सरिता सोचती, ‘जिस प्रेमी के लिए उस ने पति से विश्वासघात किया. परिवार की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया, उसी ने बुरे वक्त पर धोखा दे दिया. समय रहते यदि उस ने आर्थिक मदद की होती, तो आज उस का बेटा जीवित होता.’

सरिता ने प्रेमी से दूरियां बनाईं तो दलबीर सिंह परेशान हो उठा. वह उसे मनाने की कोशिश करता, लेकिन सरिता उसे दुत्कार देती. दलबीर सरिता को भोगने का आदी बन चुका था. उसे सरिता के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने सरिता को मनाने के लिए उसे प्लौट में बनी झोपड़ी में बुलाया. सरिता वहां पहुंची तो दलबीर ने उस से पूछा, ‘‘सरिता, तुम मुझ से दूरदूर क्यों भागती हो. मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं.’’

‘‘तुम मुझ से नहीं, मेरे शरीर से प्यार करते हो. तुम्हारा प्यार स्वार्थ का है. सच्चे प्रेमी सुखदुख में एकदूसरे का साथ देते हैं. लेकिन तुम ने हमारे दुख में साथ नहीं दिया. जब तुम स्वार्थी हो, तो अब मैं भी स्वार्थी बन गई हूं. अब मुझे भी तन के बदले धन चाहिए.’’

‘‘क्या तुम प्यार की जगह अपने तन का सौदा करना चाहती हो?’’ दलबीर ने पूछा.

‘‘जब प्यार की जगह स्वार्थ पनप गया हो तो समझ लो कि मैं भी तन का सौदा करना चाहती हूं. अब तुम मेरे शरीर से तभी खेल पाओगे, जब एक लाख रुपया मेरे हाथ में थमाओगे.’’

‘‘यदि रुपयों का इंतजाम न हो पाया तो..?’’ दलबीर ने पूछा.

‘‘…तो मुझे भूल जाना.’’

दलबीर को सपने में भी उम्मीद न थी कि सरिता तन के सौदे की बात करेगी. उसे उम्मीद थी कि वह उस से माफी मांग कर तथा कुछ आर्थिक मदद कर उसे मना लेगा. पर ऐसा नहीं हुआ बल्कि सरिता ने उस से बड़ी रकम की मांग कर दी. इस के बाद सरिता और दलबीर में दूरियां और बढ़ गईं. जब कभी दोनों का आमनासामना होता और दलबीर सरिता को मनाने की कोशिश करता तो वह एक ही जवाब देती, ‘‘मुझे तन के बदले धन चाहिए.’’

13 जनवरी, 2021 की सुबह 5 बजे दलबीर सिंह ने सरिता को फोन कर के अपने प्लौट में बनी झोपड़ी में बुलाया. सरिता को लगा कि शायद दलबीर ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. सो वह वहां जा पहुंच गई. सरिता के वहां पहुंचते ही दलबीर उस के शरीर से छेड़छाड़ तथा प्रणय निवेदन करने लगा. सरिता ने छेड़छाड़ का विरोध किया और कहा कि वह तभी राजी होगी, जब उस के हाथ पर एक लाख रुपया होगा. सरिता के इनकार पर दलबीर सिंह जबरदस्ती करने लगा. सरिता ने तब गुस्से में उस की नाक पर घूंसा जड़ दिया. नाक पर घूंसा पड़ते ही दलबीर तिलमिला उठा. उस ने पास पड़ी ईंट उठाई और सरिता के सिर पर दे मारी.

सरिता का सिर फट गया और खून की धार बह निकली. इस के बाद उस ने उस के सिर पर ईंट से कई प्रहार किए. कुछ देर छटपटाने के बाद सरिता ने दम तोड़ दिया. सरिता की हत्या के बाद दलबीर सिंह फरार हो गया. इधर कुछ देर बाद सरिता की देवरानी आरती किसी काम से प्लौट पर गई तो वहां उस ने झोपड़ी में सरिता की खून से सनी लाश देखी. वह वहां से चीखती हुई घर आई और जानकारी अपने पति मुकुंद तथा जेठ अरविंद को दी. दोनों भाई प्लौट पर पहुंचे और सरिता का शव देख कर अवाक रह गए. इस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और मौके पर भीड़ जुटने लगी.

इसी बीच परिवार के किसी सदस्य ने थाना फफूंद पुलिस को सरिता की हत्या की सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह पुलिस फोर्स के साथ लालपुर गांव की ओर रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. कुछ देर बाद ही एसपी अपर्णा गौतम, एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित तथा सीओ (अजीतमल) कमलेश नारायण पांडेय भी लालपुर गांव पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा मृतका सरिता के पति अरविंद दोहरे तथा अन्य लोगों से पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए तथा फिंगरप्रिंट लिए.

एसपी अपर्णा गौतम ने जब मृतका के पति अरविंद दोहरे से हत्या के संबंध में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की पत्नी सरिता के दलबीर सिंह से नाजायज संबंध थे, जिस का वह विरोध करता था. इसी नाजायज रिश्तों की वजह से सरिता की हत्या उस के प्रेमी दलबीर सिंह ने की है. दलबीर और सरिता के बीच किसी बात को ले कर मनमुटाव चल रहा था. अवैध रिश्तों में हुई हत्या का पता चलते ही एसपी अपर्णा गौतम ने थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह को आदेश दिया कि वह आरोपी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें. आदेश पाते ही राजेश कुमार सिंह ने मृतका के पति अरविंद दोहरे की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 तथा (3) (2) अ, एससी/एसटी ऐक्ट के तहत दलबीर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उस की तलाश में जुट गए.

15 जनवरी, 2021 की शाम चैकिंग के दौरान थानाप्रभारी राजेश कुमार सिंह को मुखबिर से सूचना मिली कि हत्यारोपी दलबीर सिंह आरटीओ औफिस की नई बिल्डिंग के अंदर मौजूद है. मुखबिर की सूचना पर थानाप्रभारी ने आरटीओ औफिस की नई बिल्डिंग से दलबीर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त खून सनी ईंट तथा खून सने कपड़े बरामद कर लिए. दलबीर सिंह ने बताया कि सरिता से उस का नाजायज रिश्ता था. सरिता उस से एक लाख रुपए मांग रही थी. इसी विवाद में उस ने सरिता की हत्या कर दी.

राजेश कुमार सिंह ने सरिता की हत्या का खुलासा करने तथा आरोपी दलबीर सिंह को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी अपर्णा गौतम को दी, तो उन्होंने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपी दलबीर सिंह को मीडिया के समक्ष पेश कर हत्या का खुलासा किया. 16 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त दलबीर सिंह को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News : शराब की बोतल तोड़ी, नुकीले हिस्से से पति पर वार कर किया कत्ल

UP News : यह सच्चाई है कि अवैध संबंधों को ज्यादा दिनों तक छिपाए नहीं रखा जा सकता. खुलासा होने पर ये आपराधिक वारदात को जन्म देते हैं. काश! इस बात को पेशे से अध्यापक रहे इंद्रपाल और उस की पत्नी सीमा समझ पाती तो शायद…

कन्नौज जिले का एक बड़ा कस्बा है सौरिख. इसी कस्बे के नगरिया तालपार में शिक्षक इंद्रपाल रहते थे. उन के पिता श्रीकृष्ण मुर्रा गांव के निवासी थे. वहां उन का पुश्तैनी मकान तथा खेती की जमीन है. उन के बेटे इंद्रपाल ने सौरिख कस्बे में दोमंजिला मकान बनवा लिया था. इंद्रपाल की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. वह शिक्षक संघ का अध्यक्ष भी था. वर्ष 2001 में इंद्रपाल का विवाह फर्रुखाबाद (गदराना) निवासी सरयू प्रसाद की बेटी सुधा के साथ हुआ था. सुधा साधारण रंगरूप वाली युवती थी. लगभग 2 साल तक दोनों का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से बीता, उस के बाद कड़वाहट घुलने लगी.

कड़वाहट का पहला कारण था, इंद्रपाल का शराब पी कर घर आना तथा दूसरा कारण था झगड़ा और मारपीट करना. सुधा शराब पीने को मना करती तो वह उसे ही दोषी ठहराता और उस के चरित्र पर अंगुली उठाता, सुधा तब परेशान हो कर मायके चली जाती. सुधा जब पहले मायके आती थी तो उल्लास से भरे उस के पैर एक स्थान पर नहीं टिकते थे. लेकिन अब जब भी आती थी तो वह गुमसुम और उदास रहती थी. उस की मां तारावती ने कई बार उस से पूछा भी कि बेटी, क्या ससुराल में तुम्हें किसी तरह का दुख या परेशानी है?

‘‘नहीं मां सब ठीक है. ऐसा कुछ भी गलत नहीं है कि उसे सही करने के लिए तुम्हें दखल देने की जरूरत हो.’’ कह कर सुधा हर बार टाल देती.

तारावती के सीने में मां का दिल था. वह खूब समझ रही थी कि सुधा असल बात बता नहीं रही, कुछ छिपाए हुए है. इस बारे में उस ने पति से राय ली तो सरयू प्रसाद ने कहा कि उन लोगों का कोई घरेलू और आपसी मामला होगा. उन्हें ही सुलझाने दो. हमें दखल देने की जरूरत नहीं है. हम दखल देंगे, तो बात बनने के बजाय बिगड़ने का अंदेशा है. लेकिन तारावती का मन बेटी की उदासी को स्वाभाविक मतभेद मानने को तैयार नहीं था. उसे लग रहा था कि कोई तो बात है, जो सुधा को घुन की तरह खाए जा रही है. उस ने तय कर लिया कि अब की बार सुधा आई, तो वह उस से जान कर रहेगी कि उस की उदासी का कारण क्या है?

कुछ दिनों बाद सुधा मायके आई तो उस के चेहरे पर पहले की तरह उदासी की परछाइयां कायम थीं. उचित समय पर तारावती ने सुधा को पास बिठा कर स्नेह से उस के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘बेटी मां से बड़ी शुभचिंतक और हितैषी कोई दूसरी नहीं होती. न ही मां से बेहतर कोई सहेली होती है.’’

सुधा ने सिर उठा कर मां को सूनीसूनी आंखों से देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं. तारावती ने अपनी रौ में बोलना जारी रखा, ‘‘सुधा, मैं तुम्हें दुखी और उदास नहीं देख सकती. मां न सही सहेली ही समझ कर आज तुम अपना दुख कह दो.’’

संभवत: उस दिन सुधा का अंतस कुछ अधिक भरा हुआ था. ममता की आंच से वह पिघल गई. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. कुछ देर बाद सुधा के आंसू थमे तो वह बोली, ‘‘मां मेरा दुख यह है कि कुछ महीनों से इंद्रपाल पहले जैसे नहीं रहे, वह बहुत बदल गए हैं.’’

सुधा ने रुंधे कंठ से बताया, ‘‘न वह सीधे मुंह बात करते है. न प्यार से पेश आते हैं. शराब पी कर झगड़ा भी करते हैं. मैं थाली परोसती हूं तो, वह उस पर नजर तक नहीं डालते. मेरे साथ सोते जरूर हैं, पर पीठ कर के.’’

सुधा की बात सुन कर तारावती की आंखें हैरत से फैल गईं. वह जान गई कि बेटी का जीवन अंधकारमय है. तारावती ने इस बाबत इंद्रपाल से बात की तो वह झगड़े पर उतारू हो गया. उस ने साफ कह दिया कि वह सुधा को पसंद नहीं करता. वह उस से तलाक चाहता है. दामाद की बात सुन कर तारावती सन्न रह गई. उस ने दोनों के बीच तनाव खत्म करने के लिए अनेक उपाय किए. रिश्तेदारों के बीच समझौते का प्रयास किया. लेकिन जब बात नहीं बनी तो मामला कोर्टकचहरी तक जा पहुंचा. आखिर में दोनों की रजामंदी से इंद्रपाल और सुधा का तलाक हो गया. फिर सुधा मायके में रहने लगी.

सुधा से तलाक होने के बाद इंद्रपाल दूसरी शादी के लिए प्रयास करने लगा. परिवार के लोग भी चाहते थे कि इंद्रपाल का दूसरा विवाह हो जाए, तो वह भी प्रयास करने लगे. घर वालों को कई रिश्ते पसंद भी आए, लेकिन इंद्रपाल ने रिश्ता नकार दिया. परिवार के लोग भी समझ गए कि इंद्रपाल अपनी मनपसंद युवती से ही शादी करेगा. इंद्रपाल फर्रूखाबाद शहर के आरबीआरडी इंटर कालेज में पढ़ाता था. वह प्राइवेट शिक्षक था. इसी कालेज में सीमा पाल नाम की लड़की पढ़ती थी. इंटरमीडिएट में पढ़ाई के दौरान सीमा और इंद्रपाल एकदूसरे की ओर आकर्षित हुए. कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकातें कालेज के बाहर भी होने लगीं.

सीमा पाल के पिता अवध पाल, हुसैनपुर के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा मनोज तथा बेटी सीमा थी. अवध पाल किसान थे. सीमा उन की होनहार बेटी थी. पढ़ने में भी तेज थी, सो वह उसे पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते थे. सीमा, छरहरी काया और तीखे नाकनक्श वाली लड़की थी. उस की मुसकान सामने वाले पर गहरा असर करती थी. सीमा की खूबसूरती और मुसकान इंद्रपाल के दिल पर भी असर कर गई थी. एक दिन इंद्रपाल ने उस से अपने मन की बात भी कह दी, ‘‘सीमा हंसते हुए तुम बहुत अच्छी लगती हो. इसी तरह हंसती रहा करो. यदि तुम मेरा प्यार कबूल कर लोगी तो मैं खुद को दुनिया का सब से खुशनसीब आदमी समझूंगा.’’

सीमा उम्र के जिस पायदान पर थी, उस में लड़कियों को ऐसी बातें गुदगुदा देती हैं. सीमा का भी दिलोदिमाग सुखद सनसनी से भर गया. उस ने इंद्रपाल की आंखों में देखा. उन आंखों में प्यार का सागर ठाठे मार रहा था. उस की आंखों में देखते हुए कुछ देर तक वह सोच में डूबी रही, उस के बाद बोली, ‘‘अगर मैं तुम्हारा प्यार कबूल कर लूं तो तुम्हारा अगला कदम क्या होगा?’’

‘‘शादी.’’ इंद्रपाल ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘लेकिन मेरे घर वाले राजी नहीं हुए तो..?’’ सीमा ने पूछा.

‘‘…तो हम दोनों प्रेम विवाह कर लेंगे.’’

सीमा मुसकराई और फिर नजरें झुका कर स्वीकृति में सिर हिला दिया. इंद्रपाल का दिल बल्लियां उछल पड़ा. उस ने तो एक मुट्ठी आसमान की तमन्ना की थी, लेकिन यहां तो पूरा का पूरा आसमान उस का हो गया था. कुछ दिनों बाद इंद्रपाल के कहने पर सीमा ने घर वालों को अपने प्रेम से अवगत कराया और विवाह की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने सीमा को समझाया, ‘‘बेटी, इंद्रपाल पहली पत्नी को धोखा दे चुका है. तुम्हें भी धोखा दे सकता है. बेहतर यही होगा कि उस का खयाल अपने मन से निकाल दो.’’

सीमा ने मुलाकात कर ये सारी बातें इंद्रपाल को बताईं, तो उस ने पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो? तुम्हारे जवाब पर ही सब कुछ निर्भर है.’’

‘‘मैं तुम्हें पाना चाहती हूं.’’ सीमा ने जवाब दिया. इस के बाद वर्ष 2007 में सीमा पाल ने अपने घर वालों की मरजी के बिना इंद्रपाल के साथ प्रेम विवाह कर लिया और उस की दुलहन बन कर इंद्रपाल के साथ रहने लगी. इंद्रपाल के घर वालों ने भी सीमा को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. चूंकि सीमा और इंद्रपाल ने प्रेम विवाह किया था. अत: दोनों खुश थे. वैसे भी संपन्न घर और शिक्षक पति पा कर सीमा फूली नहीं समा रही थी. सौरिख कस्बे के नगरिया तालपार स्थित 2 मंजिला मकान की ऊपरी मंजिल पर वह पति इंद्रपाल के साथ रहती थी, भूतल और प्रथम तल पर किराएदार रहते थे. हंसीखुशी से 3 साल कब बीत गए, दोनों को पता ही न चला.

इन 3 सालों में सीमा ने एक बेटी रक्षा को जन्म दिया. रक्षा के जन्म के 3 साल बाद सीमा ने एक और बेटी दीक्षा को जन्म दिया. दोनों बेटियों को सीमा और इंद्रपाल बेहद प्यार करते थे. सीमा पाल की इच्छा टीचर बनने की थी. अत: उस ने इंद्रपाल से प्रेम विवाह करने के बावजूद पढ़ाई जारी रखी. इस में इंद्रपाल ने भी उस का सहयोग किया. बीए पास करने के बाद उस ने बीएड किया. फिर जब शिक्षकों की भरती निकली तो उस ने भी आवेदन किया. सीमा पाल के भाग्य ने साथ दिया और उस का चयन प्राथमिक पाठशाला की शिक्षिका के लिए हो गया. चयन होने के बाद सीमा पाल प्राथमिक पाठशाला, चिकनपुर में सहायक अध्यापिका के तौर पर पढ़ाने लगी.

सीमा पाल को सरकारी नौकरी मिली तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. अब वह मायके भी जाने लगी थी. उस का भाई मनोज पाल भी उस के घर आनेजाने लगा था. इंद्रपाल का भी ससुराल आनाजाना शुरू हो गया था. मनोज की शादी में सीमा और इंद्रपाल ने मनोज की हरसंभव मदद भी की थी. वैसे भी मनोज को जब भी आर्थिक परेशानी होती थी, इंद्रपाल उस की मदद कर देता था. सीमा और इंद्रपाल की जिंदगी खुशियों से भरी थी. दोनों खूब कमाते थे. सीमा सरकारी टीचर थी, तो इंद्रपाल ने भाउलपुर में अपना निजी विद्यालय खोल लिया था. दोनों की खुशियों में ग्रहण तब लगा, जब एक रोज मनोज अपने जीजा इंद्रपाल की शिकायत करने बहन के घर आया.

उस ने सीमा को बताया कि जीजाजी ने उस के घर आतेजाते उस की पत्नी शिखा को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उस से नाजायज रिश्ता बना लिया है. बहन आप उन को समझाओ कि वह उस का घर बरबाद न करें. भाई की बात सुन कर सीमा के तनबदन में आग लग गई. शाम को इंद्रपाल जब विद्यालय से घर आया तो सीमा ने शिखा को ले कर सवालजवाब किया. इस पर इंद्रपाल हंस कर बोला, ‘‘शिखा हमारी सलहज है. उस से मैं हंसबोल कर अपना मन बहला लेता हूं. उस से हमारा कोई नाजायज रिश्ता नहीं है. किसी ने जरूर तुम्हारे कान भरे हैं.’’

लेकिन सीमा को पति की बात पर यकीन नहीं हुआ. उसे पता था कि उस का भाई झूठ नहीं बोल सकता. इस के बाद तो शिखा को ले कर अकसर सीमा और इंद्रपाल में झगड़ा होने लगा. कभीकभी झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ जाता कि दोनों के बीच मारपीट हो जाती. इंद्रपाल शराब तो पहले से ही पीता था, लेकिन अब वह कुछ ज्यादा ही पीने लगा और सीमा से झगड़ा करने लगा. इसी लड़ाईझगड़े के बीच सीमा ने तीसरी बेटी दिशा को जन्म दिया. सीमा और इंद्रपाल के बीच में अब गहरी दरार पड़ गई थी. वह दोनों रहते जरूर एक छत के नीचे थे, लेकिन दोनों के बिस्तर अलग हो गए थे.

सीमा अपने बच्चों के साथ अलग कमरें में रहने लगी थी. इंद्रपाल दूसरे कमरे में बिस्तर पर करवटें बदलता रहता था. कईकई दिनों तक दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी. पतिपत्नी के बीच तनाव चल ही रहा था कि इसी बीच अशोक ने सीमा के घर आनाजाना शुरू किया. अशोक, सौरिख में ही रहता था और रिश्ते में इंद्रपाल का भाई लगता था. वह कार चलाता था और खूब सजसंवर कर रहता था. अशोक को सीमा और इंद्रपाल के बीच तनाव की बात पता चली तो वह सीमा को रिझाने की कोशिश करने लगा. वह जब भी आता, सीमा से मीठीमीठी बातें करता तथा उस के रूप की प्रशंसा भी करता. सीमा पति की उपेक्षा की शिकार थी.

इस कारण धीरेधीरे सीमा, अशोक की ओर आकर्षित होने लगी. दोनों के बीच देवरभाभी का रिश्ता था, सो हंसीमजाक भी होने लगी. सीमा और अशोक के बीच चाहत बढ़ी तो अवैध रिश्ता कायम होने में भी देर नहीं लगी. अशोक का सीमा से मिलनाजुलना बढ़ा तो इंद्रपाल के कान खड़े हो गए. उस ने दोनों पर नजर रखनी शुरू की तो एक रोज दोनों को रंगे हाथ पकड़ लिया. फिर तो उस रोज इंद्रपाल ने सीमा की जम कर पिटाई की और सारा गुबार निकाला. इस के बाद तो यह रवैया ही चल पड़ा. जिस रोज इंद्रपाल को पता चल जाता कि अशोक आया था, वह सीमा की जम कर पिटाई करता. कई बार उस का अशोक से भी झगड़ा हुआ.

सीमा, अशोक की इतनी दीवानी बन गई थी कि वह पति की पिटाई के बावजूद उस का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. एक दिन तो सीमा ने हद ही कर दी. उस ने अपनी तीनों बेटियों को बहाने से अपनी सास माया के पास छोड़ा और प्रेमी अशोक के साथ भाग गई. इंद्रपाल और उस के घरवालों को जानकारी हुई तो वह सब दंग रह गए. उन्होंने थाना सौरिख में शिकायत दर्ज कराई. तब पुलिस ने कई रोज बाद सीमा को अशोक के एक रिश्तेदार के घर से बरामद किया. घरवालों के मनाने व समझाने के बाद सीमा, इंद्रपाल के साथ रहने को राजी हुई. सीमा और इंद्रपाल में समझौता तो हो गया था, लेकिन उन के दिलों में गांठ पड़ गई थी. दोनों एक दूसरे पर शक भी करते थे.

उन के बीच तूतू मैंमैं अब भी होती रहती थी. कभीकभी मारपीट भी हो जाती थी. सीमा ने अशोक से संबंध अब भी खत्म नहीं किए थे. वह उस से चोरीछिपे मिलती रहती थी. 28 नवंबर, 2020 की सुबह 4 बजे सीमा चीखनेचिल्लाने लगी कि उस के पति इंद्रपाल की किसी ने हत्या कर दी. उस की चीख सुन कर उस के मकान में रहने वाले किराएदर आ गए. इन्हीं में से किसी ने इंद्रपाल के घर वालोें को सूचना दे दी. उस के बाद तो घर में सनसनी फैल गई. इंद्रपाल के पिता श्रीकृष्ण, मां माया देवी, चाचा लंकुश तथा चचेरा भाई राजू आ गया. इंद्रपाल का शव देख कर वह सब हैरान रह गए. कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ने बेटे की हत्या की सूचना थाना सौरिख पुलिस को दी.

सूचना पाते ही थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा पुलिस दल के साथ रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने शिक्षक इंद्रपाल की हत्या की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा जिस समय इंद्रपाल के नगरिया तालपार स्थित मकान पर पहुंचे. उस समय वहां भारी भीड़ जुटी थी. श्री वर्मा पुलिसकर्मियों के साथ मकान के द्वितीय तल स्थित उस कमरे में पहुंचे जहां इंद्रपाल की लाश पड़ी थी. श्री वर्मा ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. इंद्रपाल की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के शरीर पर चोटों के कई निशान थे. शरीर को किसी नुकीली चीज से गोदा गया था. शव के पास ही शराब की टूटी बोतल पड़ी थी. संभवत: इसी टूटी बोतल से उस के शरीर को गोदा गया था.

हत्या संभवत: मुंह नाक दबा कर की गई थी. कमरे में खून फैला था. मृतक की उम्र लगभग 45 वर्ष के आसपास थी. पुलिस ने शराब की टूटी बोतल को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह तथा डीएसपी शिवकुमार थापा मौका ए वारदात आ गए. उन्होंने मौके पर फौरेंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा मृतक की पत्नी व घर वालों से पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. उस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए कन्नौज के जिला अस्पताल भेज दिया गया.

हत्या का खुलासा करने के लिए एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने डीएसपी शिवकुमार थापा के निर्देशन में पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा, स्वाट टीम प्रभारी राकेश कुमार सिंह तथा सर्विलांस प्रभारी शैलेंद्र सिंह को शामिल किया गया. गठित टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर मृतक की पत्नी सीमा पाल से पूछताछ की. सीमा ने बताया कि पति की हत्या उस के मकान में रहने वाले किराएदार प्रवीण उर्फ विक्की ने की है. उस का पति से झगड़ा हुआ था. टीम ने प्रवीण को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि इंद्रपाल ने प्लौट खरीदने के लिये डेढ़ लाख रुपए उस से उधार लिया था, जिस में 70 हजार रुपए वह लौटा चुका था.

उस का इंद्रपाल से कोई झगड़ा न था. सीमा उसे गलत फंसा रही है. जबकि सच्चाई यह है कि इंद्रपाल की हत्या का रहस्य सीमा के ही पेट में छिपा है. प्रवीण से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने मृतक के पिता श्रीकृष्ण, चाचा लंकुश, मां माया देवी तथा चचेरे भाई राजू से पूछताछ की. उन सब ने बताया कि सीमा बदचलन है. उस ने अपने प्रेमी अशोक के साथ मिल कर इंद्रपाल की हत्या की है. यदि उस से सख्ती से पूछताछ की जाए तो आज ही हत्या का भेद खुल सकता है. सीमा संदेह के घेरे में आई तो पुलिस टीम ने उसे घर से गिरफ्तार कर लिया तथा उस का मोबाइल कब्जे में ले लिया. सर्विलांस प्रभारी शैलेंद्र सिंह ने उस के मोबाइल को खंगाला तो 27 नवंबर की रात 11 बजे उस ने 2 मोबाइल नंबरों पर बात की थी.

इन नंबरों को खंगाला गया तो पता चला कि एक मोबाइल नंबर सीमा के भाई मनोज पाल का है तथा दूसरा सीमा के प्रेमी अशोक का है. पुलिस टीम ने इन फोन नंबरों के आधार पर सीमा से कड़ाई से पूछताछ की तो वह टूट गई और पति इंद्रपाल की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. सीमा ने बताया कि अशोक के साथ उस के नाजायज संबंध थे, जिस का विरोध इंद्रपाल करता था और उस के साथ मारपीट करता था. इस मारपीट से वह आजिज आ गई थी और पति से छुटकारा पाना चाहती थी. 27 नवंबर की रात 10 बजे इंद्रपाल शराब पी कर घर आया और अशोक को ले कर झगड़ा करने लगा. उस ने उसे खूब पीटा. तब उस ने फोन कर अपने भाई मनोज पाल व प्रेमी अशोक को बुलवा लिया. अशोक अपने भाई राजेश को भी साथ लाया था.

उन चारों ने मिल कर इंद्रपाल की हत्या की योजना बनाई. इंद्रपाल उस समय अपने कमरे में नशे में धुत पड़ा था. उन चारों ने मिल कर पहले इंद्रपाल की पिटाई की फिर शराब की बोतल जो कमरे में लुढ़की पड़ी थी, अशोक ने उसी बोतल को तोड़ कर उस के नुकीले भाग से उस के शरीर को गोदा. उस के बाद नाकमुंह दबा कर उस की हत्या कर दी. फिर अशोक, राजेश व मनोज फरार हो गए. उन के जाने के बाद वह रोनेधोने का ड्रामा करने लगी. सीमा से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए मुखबिरों को लगाया. दूसरे ही दिन एक मुखबिर की सूचना पर मनोज पाल को सौरिख विधूना मार्ग स्थित बिजलीघर के पास से गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. अशोक व राजेश पुलिस की गिरफ्त में न आ सके. चूंकि सीमा व मनोज पाल ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था. अत: थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा ने मृतक के पिता श्रीकृष्ण की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत सीमा, मनोज, अशोक तथा राजेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सीमा व मनोज को विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. 2 दिसंबर 2020 को पुलिस ने अभियुक्त सीमा व मनोज पाल को कन्नौज कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अशोक व राजेश फरार थे. आरोपी सीमा की बेटियां बाबा श्रीकृष्ण के संरक्षण में पल रही थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News : पत्रकार आशु यादव हत्याकांड – बेवफा प्रेमिका निकली कातिल की मास्टरमाइंड

UP News : बहकी हुई महिला के कदम अकसर किसी अपराध को जन्म देते हैं. एक पुलिसकर्मी की बेटी दीपिका शुक्ला ने पति बल्ली शुक्ला और 2 बेटियों को छोड़ कर अवनीश शर्मा से शादी कर ली. इस के बाद हिस्ट्रीशीटर और कथित पत्रकार आशू यादव से उस के अनैतिक संबंध हो गए. फिर वह अमित के संपर्क में आई. इस का नतीजा यह हुआ कि…

2 जनवरी, 2021 की सुबह धर्मेंद्र नगर, कच्ची बस्ती के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने सीटीआई नहर किनारे सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल की बाउंड्री वाल के पास एक लावारिस कार खड़ी देखी. स्थानीय लोगों में चर्चा शुरू हुई, तो लोगों की भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ने फोन कर के थाना बर्रा पुलिस को सूचना दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने कार का बारीकी से निरीक्षण किया. कार के शीशों पर काली फिल्म चढ़ी थी, जिस से अंदर का कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था.

कार के पिछले शीशे पर एक स्टिकर चिपका था, जिस पर लिखा था ‘अमर स्तंभ हिंदी दैनिक समाचार पत्र’ आशू यादव संवाददाता. स्टिकर पर ‘पुलिस’ और मोबाइल नंबर भी लिखा था. हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कार किसी पत्रकार की हो सकती है. उन्होंने स्टिकर पर लिखा मोबाइल नंबर मिलाया, लेकिन वह बंद था. कार के अंदर की स्थिति को जानने के लिए हरमीत सिंह ने कार का पिछला दरवाजा खोला, तो वह सहम गए. पिछली सीट पर एक युवक की लाश पड़ी थी. हरमीत सिंह ने लावारिस कार से शव बरामद होने की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी तो मौके पर एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल, एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा सीओ (गोविंद नगर) विकास कुमार पांडेय आ गए.

पुलिस अधिकारियोें ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से कार तथा शव का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. उस के शरीर पर चोटों के निशान थे और गले पर रगड़ का निशान था. इस से अनुमान लगाया कि युवक की हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई होगी. हत्या से पहले संभवत: उस के साथ मारपीट भी की गई थी. फोरैंसिक टीम ने कार से फिंगरप्रिंट लिए तथा अन्य साक्ष्य जुटाए. कार की तलाशी में शराब की एक खाली बोतल, 4 शिकायती पत्र, 2 माइक, आगे की सीट के नीचे प्लास्टिक बैग में 2 टेडीबियर, कोटी, फोटो लगे कई स्टिकर तथा मृतक की जेब से 300 रुपए बरामद हुए. इस सामान को पुलिस ने जाब्ते में ले लिया.

अब तक शव को सैकड़ों लोग देख चुके थे, लेकिन कोई उस की पहचान नहीं कर पाया था. जिस से पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि मृतक आसपास का नहीं है. अत: उन्होंने शव की पहचान कराने के लिए कानपुर शहर के सभी थानों को कंट्रोलरूम से अज्ञात लाश मिलने के संबंध में सूचना प्रसारित करा दी. कुछ देर बाद ही थाना रेलबाजार के थानाप्रभारी दधिबल तिवारी ने एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को सूचना दी कि उन के थाने में आशू यादव नाम के युवक की गुमशुदगी दर्ज है, जो कथित पत्रकार तथा हिस्ट्रीशीटर है. चूंकि कार में लगे पोस्टर में भी आशू यादव का नाम छपा था, अत: एसपी अग्रवाल ने दधिबल तिवारी को आदेश दिया कि वह आशू के घरवालों को साथ ले कर जल्द ही धर्मेंद्र नगर कच्ची बस्ती स्थित नहर की पटरी पर पहुंचें.

आदेश पाते ही दधिबल तिवारी ने आशू यादव के घरवालों को सूचना दी, फिर उन्हें साथ ले कर वहां पहुंच गए. घरवालों ने कार में पड़े शव को देखा तो वे फफक कर रो पड़े. कंचन, शानू, धर्मेंद्र तथा जितेंद्र ने बताया कि शव उन के भाई आशू यादव का है. कार भी उसी की है. रात से लापता था मृतक की बहन शानू व कंचन ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि 31 दिसंबर की रात डेढ़ बजे किसी का फोन आने पर आशू अपनी कार ले कर घर से निकला था, फिर रात को वापस नहीं आया. आशू अपने पास 3 मोबाइल फोन रखता था. सुबह हम लोगों ने उस के तीनों नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन तीनों नंबर बंद थे.

इस के बाद हम लोग उस की खोज में जुट गए. चिंता इसलिए भी बढ़ गई थी कि पहली जनवरी को उस का जन्मदिन था. अपना जन्मदिन वह धूमधाम से मनाता था और दोस्तों को बुलाता था. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिन भर खोजने के बाद जब उस का कुछ भी पता नहीं चला तो उन्होंने शाम को थाना रेलबाजार जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. बहन कंचन ने यह भी बताया कि आशू गले में सोने की चेन तथा दोनों हाथों में सोने की 6 अंगूठियां पहने हुआ था. हत्यारों ने उस के तीनों मोबाइल, चेन तथा अंगूठियां लूट ली हैं. चूंकि शव की शिनाख्त हो गई थी. अत: पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया.

आशू यादव की गुमशुदगी थाना रेलबाजार में दर्ज थी, अत: थानाप्रभारी दधिबल तिवारी ने मृतक की बहन कंचन की ओर से भादंवि की धारा 364/302/201/120बी के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने मृतक आशू यादव के भाई धर्मेंद्र यादव से घटना के संबंध में पूछताछ की. पूछताछ में धर्मेंद्र ने बताया कि उस का भाई आशू हिंदी दैनिक समाचार पत्र ‘अमर स्तंभ’ में काम करता था. कुछ समय पहले उस ने क्षेत्रीय पार्षद मधु के पति राजू सोनकर व उन के बेटों के कारनामोें के खिलाफ समाचार छापा था, जिस पर राजू ने झगड़ा किया था और उस के बेटे अति व सोनू सोनकर ने आशू को जान से मारने की घमकी दी थी. आशू की हत्या में इन्हीं लोगों का हाथ है.

संदेह के आधार पर पुलिस ने राजू व उस के बेटों से पूछताछ की. लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. अत: पूछताछ के बाद उन्हें थाने से घर भेज दिया गया. चूंकि मामला एक कथित पत्रकार व हिस्ट्रीशीटर की हत्या का था. अत: एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिए तीन टीमों का गठन किया. इन तीनों टीमों को एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल व एसपी (साउथ) दीपक भूकर के निर्देशन में काम करना था. इन टीमों में इंसपेक्टर (नौबस्ता) सतीश कुमार सिंह, इंसपेक्टर (बर्रा) हरमीत सिंह, इंसपेक्टर (रेलबाजार) दधिबल तिवारी, सीओ (गोविंदनगर) विकास कुमार पांडेय तथा सर्विलांस टीम को शामिल किया गया.

पुलिस की तीनों टीमों ने अलगअलग जांच शुरू की. आशू यादव 31 दिसंबर की रात डेढ़ बजे अपने घर खपरा मोहाल से निकला था और उस के मोबाइल फोन की आखिरी लोकेशन 31 दिसंबर की रात 2:37 बजे मसवानपुर की मिली थी. मिलने लगे सबूत पुलिस की एक टीम ने खपरा मोहाल से घंटाघर, जरीब चौकी, विजय नगर व मसवानपुर तक रोड पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तथा दूसरी टीम ने दूसरे रोड की फुटेज को खंगाला, जिस में आशू की कार मसवानपुर जाते समय फजलगंज व विजयनगर चौराहे पर जाते समय तो दिखी पर लौटते समय दिखाई नहीं दी.

जाहिर था कि हत्या के बाद हत्यारे आशू की कार को किसी दूसरे रूट से लाए थे और धर्मेंद्र नगर स्थित नहर पटरी पर कार को खड़ा कर दिया था. सर्विलांस टीम ने मृतक आशू के तीनों मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि 31 दिसंबर की देर रात आशू के मोबाइल फोन पर आखिरी काल एक महिला की आई थी. वह महिला सीतापुर में रहने वाली शालिनी थी. पुलिस जब उस के पते पर पहुंची तो पता चला कि उस फोन नंबर का इस्तेमाल मसवानपुर निवासी दीपिका शुक्ला कर रही थी.

टीम ने दीपिका के संबंध में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह शातिर अपराधी है. शिवली, सचेंडी व कोहना थाने में उस के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हैं. नकली शराब बनाने व बेचने के जुर्म में वह पति के साथ जेल गई थी और अब जमानत पर थी. सर्विलांस टीम ने उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो हिस्ट्रीशीटर अमित गुप्ता के बारे में जानकारी मिली. अमित गुप्ता के फोन की डिटेल्स के जरिए टीम को उस के 2 साथियों जूहीलाल कालोनी निवासी किशन वर्मा व सचिन वर्मा की जानकारी मिली. अमित के मोबाइल फोन पर 31 दिसंबर की रात 2:08 बजे एक मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था- ‘बुला लो भाई उस को, आज हो जाएगा काम.’ जांच से पता चला कि जिस नंबर से मैसेज भेजा गया था, वह किशन का था.

पुख्ता सबूत मिलने के बाद पुलिस की संयुक्त टीमों ने 3 जनवरी, 2021 की रात 11 बजे किशन वर्मा व सचिन वर्मा के जूही लाल कालोनी स्थित घर से दोनों को गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों को थाना रेलबाजार लाया गया. थाने में जब किशन व सचिन वर्मा से आशू यादव की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की गई तो वे टूट गए और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन दोनों की निशानदेही पर पुलिस टीमों ने मसवानपुर स्थित दीपिका के घर छापा मारा. लेकिन दीपिका और अमित फरार हो चुके थे. दीपिका के घर से पुलिस ने वह रस्सी बरामद कर ली, जिस से आशू का गला घोंटा गया था.

पूछताछ में आरोपी किशन वर्मा व सचिन ने बताया कि आशू की हत्या प्रेम त्रिकोण में की गई थी. आशू व अमित दोनों का दीपिका से नाजायज रिश्ता था. अमित को आशू और दीपिका की नजदीकियां पसंद नहीं थीं, इसलिए उस ने दीपिका के साथ मिल कर आशू को मौत की नींद सुला दिया. रुपयों के लालच में उन दोनों ने भी अमित का साथ दिया. हत्या मसवानपुर स्थित दीपिका के घर की गई थी. 4 जनवरी, 2021 को रेलबाजार थाना प्रभारी दधिबल तिवारी ने आशू यादव की हत्या का खुलासा करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल, एसपी (साउथ) दीपक भूकर ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की. एसएसपी ने केस का खुलासा करने वाली टीम को 25 हजार रुपया ईनाम देने की भी घोषणा की.

चूंकि आशू यादव की हत्या का मुकदमा रेलबाजार थाने में पहले से अज्ञात में दर्ज था. अत: खुलासा होने के बाद थानाप्रभारी दधिबल तिवारी ने इस मामले में 4 आरोपी दीपिका शुक्ला, अमित गुप्ता, किशन वर्मा व सचिन वर्मा को नामजद कर दिया. 2 आरोपी दीपिका व अमित फरार थे. आरोपियों से पूछताछ में प्रेम त्रिकोण में हुई हत्या का सनसनीखेज खुलासा हुआ. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के थाना रेलबाजार के अंतर्गत एक मोहल्ला है-खपरा मोहाल. इसी मोहल्ले के मकान नंबर डी-19 में छोटे सिंह यादव रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मालती के अलावा 3 बेटे धर्मेंद्र, जितेंद्र, आशू तथा 2 बेटियां शानू व कंचन थीं. छोटे सिंह की जनरल स्टोर की दुकान थी. उसी की आमदनी से परिवार का भरणपोषण होता था.

3 भाइयों में आशू यादव मंझला था. छोटे सिंह का पूरा परिवार आपराधिक प्रवृत्ति का था. आशू का भाई धर्मेंद्र व चाचा बड़े यादव रेलबाजार थाने के हिस्ट्रीशीटर थे. आशू भी अपने घरवालों की राह पर चल पड़ा. यद्यपि वह पढ़ालिखा व तेजतर्रार था. आशू ने अपराध जगत से नाता जोड़ा तो उस ने अपने चाचा व भाइयों को भी पीछे छोड़ दिया. कुछ समय बाद ही उस पर थाना रेलबाजार, छावनी, फीलखाना समेत अन्य थानों में एनडीपीएस ऐक्ट, शस्त्र अधिनियम, गुंडा अधिनियम, रंगदारी, अपहरण समेत अन्य संगीन धाराओं के 10 मुकदमे दर्ज हो गए. वह रेलबाजार थाने का हिस्ट्रीशीटर बन गया.

आशू यादव ने पुलिसकर्मी राकेश कुमार की बेटी ज्योति से लवमैरिज की थी. राकेश कुमार उन दिनों कानपुर शहर के हरवंश मोहाल थाने में तैनात थे. उन का परिवार भी साथ रहता था. इसी दौरान आशू की मुलाकात ज्योति से हुई. दोनों में प्रेम संबंध बने, फिर ज्योति ने घरवालोें की मरजी के खिलाफ आशू से प्रेम विवाह कर लिया. ज्योति के 7 वर्षीय बेटा शुभ तथा 5 वर्षीया बेटी सोनाक्षी हैं. हिस्ट्रीशीटर बन गया पत्रकार आशू यादव बड़ी ही शानोशौकत से रहता था. अवैध कमाई से उस ने कार भी खरीद ली थी. वह शातिर दिमाग था.

पुलिस से बचने के लिए उस ने हिंदी दैनिक समाचार पत्र ‘अमर स्तंभ’ में काम करना शुरू कर दिया था. उस ने अपनी कार पर भी अमर स्तंभ का स्टिकर लगा लिया था. शासनप्रशासन के अधिकारियों से वह पत्रकार के रूप में ही मिलता था. पत्रकारिता की आड़ में वह जायजनाजायज काम करने लगा था. लोगों से धन वसूली भी करता था. सन 2019 में आशू यादव किसी मामले में जेल गया तो वहां उस की मुलाकात मोती मोहाल निवासी अमित गुप्ता व कल्याणपुर निवासी अवनीश कुमार शर्मा से हुई. तीनों एक ही बैरक में थे. अमित शातिर अपराधी था. उस ने रुपए व जेवर हड़पने के लिए कल्याणपुर निवासी बुआ बिट्टो, फूफा पवन गुप्ता तथा बिट्टो की सास रानी की हत्या कर दी थी.

पकड़े जाने के बाद अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. अवनीश कुमार शर्मा नकली शराब बनाने व बेचने के जुर्म में जेल में था. चूंकि तीनों शातिर अपराधी थे, अत: उन के बीच दोस्ती हो गई. अवनीश शर्मा की ही पत्नी का नाम दीपिका शुक्ला था. वह भी पति के अवैध कारोबार में हाथ बंटाती थी. दीपिका मूलरूप से शिवली थाने के गांव भीखर की रहने वाली थी. उस के पिता अशोक चतुर्वेदी मुंबई पुलिस में हवलदार थे. रिटायर होने के बाद उन की मुजफ्फरनगर में हत्या कर दी गई थी. कुछ दिनों बाद मां की भी मौत हो गई. उस के बाद सन 2002 में दीपिका ने शिवली थाने के बैरी सवाई गांव निवासी बल्ली शुक्ला उर्फ हरीराम शुक्ला से शादी कर ली.

बल्ली शुक्ला से दीपिका ने 2 बेटियों को जन्म दिया. बल्ली शुक्ला के पड़ोस में अवनीश शर्मा रहता था. उस का बल्ली शुक्ला के घर आनाजाना था. घर आतेजाते अवनीश शर्मा ने दीपिका को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया. वर्ष 2016 में अवनीश की दीवानी दीपिका 2 बेटियों को छोड़ कर अवनीश के साथ भाग गई. अवनीश कल्याणपुर में रहता था और नकली शराब बनाता व बेचता था. दीपिका भी अवनीश के साथ नकली शराब बनाने व बेचने का काम करने लगी. उस ने कई शराब तस्करों से अपने संबंध मजबूत कर लिए और उन के मार्फत शिवली, सचेंडी, घाटमपुर तथा कानपुर में नकली शराब बेचने लगी थी.

सन 2017 में नकली व जहरीली शराब पीने से घाटमपुर व सचेंडी में 17 लोगों की मौत हो गई थी. इस मामले में वह अवनीश के साथ पहली बार जेल गई. उस के बाद सन 2019 में कोहना तथा शिवली थाने से भी नकली शराब बनाने व बेचने के जुर्म में जेल गई. कोहना थाने से उसे गैंगस्टर ऐक्ट में जेल भेजा गया था. इस मामले में उसे जून 2020 में जमानत मिली और वह बाहर आ गई. आशू यादव जब जेल से बाहर आया तो उस ने दीपिका से मुलाकात की. मुलाकातें प्यार में बदलीं, फिर दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. दीपिका उस की कार में घूमने लगी तथा उस के घर भी जाने लगी. आशू उस की आर्थिक मदद भी करने लगा.

इधर आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अमित गुप्ता को सितंबर 2020 में पैरोल मिल गई. अमित पैरोल पर बाहर आ रहा था, तो अवनीश ने उस से कहा कि वह उस की पत्नी दीपिका का खयाल रखे तथा उसे भी जेल से बाहर निकलवाने की कोशिश करे. कपड़ों की तरह बदलती रही प्रेमी अमित ने जेल से बाहर आ कर दीपिका से संपर्क किया. कुछ दिनों में ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. वह दीपिका को ले कर अपने घर मोतीमोहाल पहुंचा. अमित के घरवालों ने दीपिका को घर में रखने की इजाजत नहीं दी. इस पर वह दीपिका को ले कर मसवानपुर में अनिल शुक्ला के मकान में किराए पर रहने लगा. दिखावे के लिए उस ने बाजार में कपड़े की दुकान खोल ली.

दीपिका के साथ रहते अमित को पता चला कि दीपिका के उस के दोस्त आशू यादव से पहले से ही नाजायज संबंध हैं. यह बात अमित को नागवार लगी और उस ने आशू को मिटाने की ठान ली. उस ने दीपिका से साथ देने को कहा तो वह आनाकानी करने लगी. इस पर अमित ने दीपिका को धमकी दी कि वह साथ नहीं देगी तो वह आशू और उस के नाजायज रिश्तों की बात उस के पति अवनीश को बता देगा. इस धमकी से दीपिका डर गई और वह अमित का साथ देने को राजी हो गई. इस के बाद अमित ने दीपिका के साथ मिल कर आशू के कत्ल की योजना बनाई और अपनी योजना में दोस्त किशन वर्मा व सचिन वर्मा को भी पैसों का लालच दे कर शामिल कर लिया.

योेजना के तहत 31 दिसंबर की रात डेढ़ बजे दीपिका ने आशू के मोबाइल फोन पर काल की और जन्मदिन की बधाई दी. साथ ही घर आने तथा मौजमस्ती करने का आमंत्रण भी दिया. इस के बाद आशू सजसंवर कर अपनी कार से दीपिका के घर मसवानपुर पहुंच गया. जन्मदिन की खुशी में दीपिका ने उसे खूब शराब पिलाई. आशू जब नशे में धुत हो गया तभी अमित अपने साथियों किशन व सचिन के साथ घर आ गया. दोनों ने आशू को दबोच लिया और खूब पिटाई की. फिर अमित व दीपिका ने मिल कर रस्सी से आशू का गला घोंट दिया. इस बीच दीपिका ने आशू के 3 मोबाइल फोन कब्जे में ले कर स्विच्ड औफ कर दिए तथा आशू के गले से सोने की चेन तथा दोनों हाथों से सोने की 6 अंगूठियां उतार लीं.

इस के बाद सब ने मिल कर आशू के शव को उस की कार में रखा और कार बर्रा थाना क्षेत्र के धर्मेंद्र नगर कच्ची बस्ती ला कर नहर की पटरी पर खड़ी कर दी. उस के बाद वे सब फरार हो गए. थाना रेलबाजार पुलिस ने अभियुक्त किशन वर्मा व सचिन वर्मा से पूछताछ के बाद उन्हें 4 जनवरी, 2021 को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मुख्य आरोपी अमित गुप्ता तथा दीपिका शुक्ला फरार थीं. पुलिस सरगरमी से उन की तलाश में जुटी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News : भतीजे संग रंगे हाथों पकड़ी गई पत्नी को मारकर पंखे में लटकाया

UP News : पारिवारिक रिश्ते और मानमर्यादाएं परिवार को बांधने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन 2 बच्चों की मां सुमन ने इन रिश्तों को इस तरह तारतार किया कि…

महेंद्र सिंह को पिछले कुछ दिनों से अजय का अपने घर में आनाजाना ठीक नहीं लग रहा था. वह आता था तो उस की पत्नी सुमन उस से कुछ ज्यादा ही घुलमिल कर बातें करती थी. वैसे तो अजय उस के भाई का ही बेटा था, लेकिन महेंद्र सिंह को उस के लक्षण कुछ ठीक नहीं लग रहे थे. अजय जब महेंद्र सिंह की मानसिक परेशानी का कारण बनने लगा तो एक दिन उस ने सुमन से पूछा कि अजय क्यों बारबार घर के चक्कर लगाता है. इस पर सुमन ने तुनकते हुए कहा, ‘‘अजय तुम्हारे भाई का बेटा है. वह आता है, तो क्या मैं इसे घर से निकाल दूं?’’

महेंद्र सिंह को सुमन की बात कांटे की तरह चुभी तो लेकिन उस के पास सुमन की बात का जवाब नहीं था. वह चुप रह गया. महेंद्र सिंह कानपुर शहर के बर्रा भाग 6 में रहता था. वह मूलरूप से औरैया जिले के कस्बा सहायल का रहने वाला था. वह अपने भाइयों में सब से छोटा था. उस से बड़े उस के 2 भाई थे— मानसिंह और जयसिंह. सब से बड़े भाई मानसिंह के 2 बेटे थे अजय सिंह और ज्ञान सिंह. ज्ञान सिंह की शादी हो गई थी. अजय सिंह अविवाहित था. महेंद्र सिंह की शादी जिला कन्नौज के कस्बा तिर्वा निवासी नरेंद्र सिंह की बेटी सुमन के साथ हुई थी. नरेंद्र के 2 बच्चे थे सुमन और गौरव. लाडली और बड़ी होने की वजह से सुमन शुरू से ही जिद्दी स्वभाव की थी. वह जो ठान लेती, वही करती.

शादी हो कर सुमन जब ससुराल आई, तो उसे ससुराल रास नहीं आई. चंद महीने बाद ही वह पति के साथ कानपुर आ कर रहने लगी. सुमन का पति महेंद्र सिंह दादानगर स्थित एक फैक्ट्री में सुरक्षागार्ड की नौकरी करता था. उस की आमदनी सीमित थी. इस के बावजूद सुमन फैशनपरस्त थी. वह अपने बनावशृंगार पर खूब खर्च करती थी. लेकिन शुरूशुरू में जवानी का जुनून था, इसलिए महेंद्र सिंह ने इन सब पर ध्यान नहीं दिया था. उसे तो बस उस की अदाएं पसंद थीं. समय के साथ सुमन ने पूजा और विभा 2 बेटियों को जन्म दिया. शादी के कुछ समय बाद ही महेंद्र सिंह महसूस करने लगा था कि उस की पत्नी उस के साथ संतुष्ट नहीं है.

दरअसल, सुमन नरेंद्र सिंह की एकलौती बेटी थी और अपनी शादी के बारे में बड़ेबड़े ख्वाब देखा करती थी. लेकिन उस के पिता ने उस की शादी एक साधारण सुरक्षा गार्ड से कर दी थी, जिस से उस के सारे अरमान चूरचूर हो गए थे. और वह बच्चों और चौकेचूल्हे में उलझ कर रह गई थी. फिर भी जिंदगी की गाड़ी जैसेतैसे चलती रही. कहानी ने मान सिंह के बड़े बेटे ज्ञान सिंह की शादी के बाद एक नया मोड़ लिया. ज्ञान सिंह की शादी के मौके पर सुमन ने महसूस किया कि अजय उस का कुछ ज्यादा ही खयाल रख रहा है. वह खाने की थाली ले कर सुमन के पास आया और उस के सामने टेबल पर रखते हुए बोला, ‘‘यहां बैठ कर खाओ चाची.’’

सुमन मुसकरा कर थाली अपनी ओर खिसकाने लगी, तो अजय भी उस की ओर देख कर मुसकराते हुए चला गया. थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में दूसरी थाली थी. वह सुमन के पास ही बैठ कर खाना खाने लगा. खाना खातेखाते दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा, तो अजय बोला, ‘‘चाची तुम सुंदर भी हो और स्मार्ट भी. लेकिन चाचा ने तुम्हारी कद्र नहीं की.’’

अजय सिंह ने यह कह कर सुमन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. ज्ञान सिंह की बारात करीब के ही गांव में जानी थी. शाम को रिश्तेदार व परिवार के लोग बारात में चले गए. लेकिन अजय बारात में नहीं गया. उसी रात जब दरवाजे पर दस्तक हुई, तो सुमन ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर अजय खड़ा था. सुमन ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम… बारात में नहीं गए. यहां कैसे?’’

दरवाजा खुला था, अजय सिंह अंदर आ गया तो सुमन ने दरवाजा बंद कर दिया. सुमन की आंखें तेज थीं. उस ने अजय की आंखों की भाषा पढ़ ली.

‘‘चाची, मुझे तुम से कुछ कहना है. बहुत दिनों से सोच रहा हूं, पर मौका ही नहीं मिल पा रहा था. आज अच्छा मौका मिला, इसलिए मैं बारात में नहीं गया.’’ अजय ने कमरे में पड़े पलंग पर बैठते हुए कहा.

‘‘ऐसी क्या बात है, जिस के लिए तुम्हें मौके की तलाश थी?’’ सुमन ने पूछा, तो अजय तपाक से बोला,‘‘चाची आया हूं तो मन की बात कहूंगा जरूर. तुम्हें बुरा लगे या अच्छा. दरअसल बात यह है कि तुम मेरे मन को भा गई हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार…’’ सुमन ने अजय को गौर से देखा.

आज वह पहले वाला अजय नहीं था, जिसे वह बच्चा समझती थी. अजय जवान हो चुका था. पलभर के लिए सुमन डर गई. उस ने कभी नहीं सोचा था कि वह उस से ऐसा भी कुछ कह सकता है.

‘‘अजय, तुम यहां से जाओ, अभी इसी वक्त.’’ सुमन ने सख्ती से कहा, तो अजय ने पूछा, ‘‘चाची क्या तुम मेरी बात का बुरा मान गईं. मैं ने तो मजाक में कहा था.’’

‘‘अजय, मैं ने कहा न जाओ यहां से.’’ डांटते हुए सुमन ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, तो उस के तेवर देख अजय डर कर वहां से चला गया.

अजय तो चला गया लेकिन सुमन रात भर सोच में डूबी अपने मन को टटोलती रही. वह सचमुच महेंद्र सिंह से संतुष्ट नहीं थी. उस की जिंदगी फीकी दाल और सूखी रोटी की तरह थी. पिछले कुछ समय से महेंद्र सिंह की तबियत भी ढीली चल रही थी. ड्यूटी से आने के बाद वह खाना खाते ही सो जाता था. वह पति से क्या चाहती है, यह महेंद्र सिंह ने न तो कभी सोचा और न जानने की कोशिश की. यही वजह थी कि सुमन का मन विद्रोह कर उठा. उस ने मन को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन न चाहते हुए भी उस की सोच नएनए जवान हुए अजय के आस पास ही घूमती रही. उस का मन पूरी तरह बेइमान हो चुका था.

आखिरकार उस ने निर्णय ले लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. चाहे इस के लिए रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. कोई भी औरत जब बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही सुमन के मामले में हुआ. दूसरी ओर अजय यह सोच कर डरा हुआ था कि चाची ने चाचा को सब कुछ बता दिया तो तूफान आ जाएगा. इसी डर से वह सुमन से नहीं मिला. इधर सुमन फैसला करने के बाद तैयार बैठी अजय का इंतजार कर रही थी. उस ने मिलने की कोशिश नहीं की, तो सुमन ने उसे स्वयं ही बुला लिया.

अजय आया तो सुमन ने उसे देखते ही उलाहने वाले लहजे में कहा, ‘‘मुझे राह बता कर खुद दूसरी राह चले गए. क्या हुआ, आए क्यों नहीं?’’

‘‘मैं ने सोचा, शायद तुम्हें मेरी बात बुरी लगी. इसीलिए…’’ अजय ने कहा तो सुमन बोली, ‘‘रात में आना, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

अजय सिंह समझ गया कि उस का तीर निशाने पर भले ही देर से लगा हो, पर लग गया है. वह मन ही मन खुश हो कर लौट गया. सुमन का पति महेंद्र सिंह दूसरे दिन ही बारात से लौटने के बाद वापस कानपुर आ गया था. लेकिन पत्नी व बच्चों को गांव में ही छोड़ गया था. इसी बीच सुमन और अजय नजदीक आने का प्रयास करने लगे थे. सुमन ने अजय को मिलन का खुला आमंत्रण दिया था. अत: वह बनसंवर कर देर शाम सुमन के कमरे पर पहुंच गया. उस ने दरवाजे पर दस्तक दी तो सुमन ने दरवाजा खोल कर उसे तुरंत अंदर बुला लिया. उस के अंदर आते ही सुमन ने दरवाजा बंद कर लिया.

अजय पलंग पर बैठ गया, तो सुमन उस के करीब बैठ कर उस का हाथ सहलाने लगी. अजय के शरीर में हलचल मचने लगी. वह समझ गया कि चाची ने उस की मोहब्बत स्वीकार कर ली. इसी छेड़छाड़ के बीच कब संकोच की सारी दीवारें टूट गईं, दोनों को पता हीं नहीं चला. बिस्तर पर रिश्ते की मर्यादा भले ही टूट गई, लेकिन सुमन और अजय के बीच स्वार्थ का पक्का रिश्ता जरूर जुड़ गया. अपने इस रिश्ते से दोनों ही खुश थे. सुमन अपनी मौजमस्ती के लिए पाप की दलदल में घुस तो गई, पर उसे यह पता नहीं था कि इस का अंजाम कितना भयंकर हो सकता है. उस दिन के बाद अजय और सुमन बिस्तर पर जम कर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे.

अजय सुमन के लिए बेटे जैसा था और अजय के लिए वह मां जैसी. लेकिन वासना की आग ने उन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया था. सुमन लगभग एक माह तक गांव में रही और गबरू जवान अजय के साथ मौजमस्ती करती रही. उस के बाद वह वापस कानपुर आ गई और पति के साथ रहने लगी. अजय और सुमन के बीच अब मिलन तो नहीं हो पाता था, लेकिन मोबाइल फोन पर दोनों की बात होती रहती थी. सुमन के बिना न अजय को चैन था और न अजय के बिना सुमन को. आखिर जब अजय से न रहा गया तो वह सुमन के बर्रा भाग 6 स्थित घर पर किसी न किसी बहाने से आने लगा. उस ने सुमन के साथ फिर से संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो सब गुपचुप चलता रहा.

लेकिन फिर अजय का इस तरह सुमन के पास आनाजाना पड़ोसियों को खटकने लगा. लोगों को पक्का यकीन हो गया कि चाचीभतीजे के बीच नाजायज रिश्ता है. नाजायज रिश्तों को ले कर पड़ोसियों ने टोकाटाकी की तो महेंद्र सिंह के होश उड़ गए. उस की पत्नी उसी के सगे भतीजे के साथ मौजमस्ती कर रही थी, यह बात भला वह कैसे बरदाश्त कर सकता था. वह गुस्से में तमतमाता घर पहुंचा. सुमन उस समय घर के कामकाज निपटा रही थी. उसे देखते ही वह गुस्से में बोला, ‘‘तेरे और अजय के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुमन ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘मतलब छोड़ो. यह बताओ कि अजय यहां क्या करने आता है?’’ महेंद्र सिंह ने पूछा तो सुमन बोली, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो तुम? अजय तुम्हारा भतीजा है. बात क्या है. उखड़े हुए से क्यों लग रहे हो?’’

‘‘तू मेरी पीठ पीछे क्या करती है, मुझे सब पता है. तेरी पाप लीला पूरे मोहल्ले के सामने आ चुकी है. तूने मुझे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘अपनी पत्नी पर गलत इलजाम लगा रहे हो. तुम्हें शर्म आनी चाहिए.’’ सुमन ने रोते हुए कहा, तो महेंद्र सिंह बोला, ‘‘देखो, अब भी वक्त है. संभल जा, नहीं तो अंजाम अच्छा न होगा.’’

महेंद्र सिंह ने भतीजे अजय सिंह को भी फटकार लगाई और बिना मतलब घर न आने की हिदायत दी. महेंद्र सिंह की सख्ती से सुमन और अजय डर गए. अजय का आनाजाना भी कम हो गया. अब वह तभी आता जब उसे कोई जरूरी काम होता. वह भी चाचा महेंद्र सिंह की मौजूदगी में. महेंद्र सिंह अपने बड़े भाई मान सिंह का बहुत सम्मान करता था. इसलिए उस ने अजय की शिकायत भाई से नहीं की थी. लौकडाउन के दौरान मान सिंह ने महेंद्र सिंह से 5 हजार रुपए उधार लिए थे और फसल तैयार होने के बाद रुपया वापस करने का वादा किया था. अजय का आनाजाना कम हुआ तो महेंद्र सिंह ने राहत की सांस ली. उसे भी लगने लगा था कि अब सुमन और अजय का अवैध रिश्ता खत्म हो गया है. लिहाजा उस ने सुमन पर निगाह रखनी भी बंद कर दी थी.

20 जनवरी, 2021 की दोपहर 12 बजे महेंद्र सिंह ने पड़ोसियों को बताया कि उस की पत्नी सुमन ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस की बात सुन कर पड़ोसी सन्न रह गए. कुछ ही देर बाद उस के दरवाजे पर भीड़ बढ़ने लगी. इसी बीच महेंद्र सिंह ने पत्नी के मायके वालों तथा थाना बर्रा पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह घटनास्थल पर आ गए. उस समय महेंद्र सिंह के घर पर भीड़ जुटी थी. मृतका सुमन की लाश कमरे में पलंग पर पड़ी थी. उस के गले में फांसी का फंदा था, किंतु गले में रगड़ के निशान नहीं थे. फांसी के अन्य लक्षण भी नजर नहीं आ रहे थे.

संदेह होने पर थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने पुलिस अधिकारियों को सूचित किया तो कुछ देर बाद एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन्हें भी महिला की मौत संदिग्ध लगी. फोरैंसिक टीम को भी आत्महत्या जैसा कोई सबूत नहीं मिला. पुलिस अधिकारी मौकाएवारदात पर अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि मृतका सुमन के मायके पक्ष के दरजनों लोग आ गए. आते ही उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया और महेंद्र पर सुमन की हत्या का आरोप लगाया तथा उसे गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि पुलिस अधिकारी वैसे भी मामले को संदिग्ध मान रहे थे, अत: पुलिस ने मृतका के पति महेंद्र सिंह को हिरासत में ले लिया तथा शव पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. दूसरे रोज शाम 5 बजे मृतका सुमन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह को प्राप्त हुई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो उन की शंका सच साबित हुई. रिपोर्ट में बताया गया कि सुमन ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि गला दबा कर उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने मृतका के पति महेंद्र सिंह से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने पत्नी सुमन की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

महेंद्र सिंह ने बताया कि उस की पत्नी सुमन के भतीजे अजय सिंह से नाजायज संबंध पहले से थे. उस ने कल शाम 4 बजे सुमन और अजय को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस समय अजय तो सिर पर पैर रख कर भाग गया. लेकिन सुमन की उस ने जम कर पिटाई की. देर रात अजय को ले कर उस का फिर सुमन से झगड़ा हुआ. गुस्से में उस ने सुमन का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. पुलिस और पड़ोसियों को गुमराह करने के लिए उस ने सुमन के शव को उसी की साड़ी का फंदा बना कर कुंडे से लटका दिया. सुबह वह बड़ी बेटी पूजा को ले कर डाक्टर के पास चला गया.

उसे हल्का बुखार था. वहां से दोपहर 12 बजे वापस आया तो उस ने पत्नी द्वारा आत्महत्या कर लेने का शोर मचाया. उस के बाद पड़ोसी आ गए. चूंकि महेंद्र सिंह ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने मृतका के भाई गौरव को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत महेंद्र सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे गिरफ्तार कर लिया. 22 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त महेंद्र सिंह को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सुमन की मासूम बेटियां पूजा और विभा ननिहाल में नानानानी के पास रह रही थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bijnor News : चाची के इश्क में भतीजे ने उतारा चाचा को मौत के घाट

Bijnor News :  2 बच्चों की मां सुशीला की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. उस का पति वीर सिंह उस का हर तरह से खयाल रखता था. इस के बावजूद भी उस के पैर अपने भतीजे सोमपाल की तरफ बहक गए. इन बहके कदमों का जो अंजाम हुआ, वो…

शाम के 5 बज रहे थे. सुशीला ने घड़ी देखी तो वह खाना बनाने की तैयारी करने लगी. उस का पति वीर सिंह 6 बजे तक काम से लौट आता था. यह रोज की दिनचर्या थी. उस ने सब्जी काटी और उसे पकाने के लिए गैस चूल्हा जलाना चाहा तो माचिस ही नहीं मिली. उसे याद आया कि माचिस तो आज सुबह ही खत्म हो गई थी. वह घर के मेनगेट पर जा कर खड़ी हो गई. उस ने सोचा कि वह किसी को बुला कर  दुकान से माचिस मंगवा लेगी. तभी उसे सोमपाल दिखा. सोमपाल उस के पति का भतीजा था. इस नाते वह उस का भी भतीजा हुआ. वह भी उसी गांव में रहता था.

सुशीला ने उसे आवाज दे कर पुकारा, ‘‘सोम, जरा इधर आओ.’’

सोमपाल फौरन उस के पास आ गया, ‘‘हां चाची, बोलो मुझे क्यों पुकार रही थीं?’’

‘‘सोम, जरा जल्दी जा कर दुकान से एक माचिस खरीद कर ले आओ. तुम्हारे चाचा आते होंगे, उन के लिए खाना बनाना है.’’

‘‘चाची, माचिस तो मैं ला दूंगा, पर इस के बदले में तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा.’’

‘‘कर दूंगी,’’ सुशीला ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया, सोचा चाय पीने को मांगेगा, बना कर दे देगी. इसीलिए वह लापरवाही से बोली, ‘‘लेकिन पहले जा कर माचिस ले आओ, नहीं तो देर हो जाएगी.’’

‘‘चाची, मेरे रहते हुए तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, माचिस ले कर अभी आया.’’ कह कर सोमपाल तेजी से वहां से चला गया. 5 मिनट में ही उस ने माचिस ला कर सुशीला के हाथ पर रख दी. सुशीला का पूरा ध्यान खाना बनाने पर था, इसलिए माचिस ले कर वह किचन में चली गई. किचन में सुशीला ने चूल्हा जला कर उस पर कड़ाही रख दी. उस के बाद तेल का डिब्बा उठाने के लिए घूमी तो उस ने अपने पीछे सोमपाल को खड़े पाया. सुशीला को आश्चर्य हुआ, ‘‘अरे, तुम यहां क्या कर रहे हो, जा कर कमरे में बैठो.’’

‘‘चाची, माचिस लाने लाने से पहले मैं ने तुम से कुछ कहा था…’’ सोमपाल ने सुशीला को गौर से देखा.

सुशीला की भी नजरें सोमपाल के चेहरे पर जम गईं, ‘‘मुझ से ऐसा कौन सा काम है तुम्हें?’’

‘‘मैं वही तो बताने जा रहा हूं.’’ सोमपाल ने फिर सुशीला की आंखोें में आंखें डाल दीं, ‘‘मैं ने इस शर्त पर माचिस ला कर दी थी कि तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा. अपने वादे से मुकरो मत. मैं ने तुम्हारा काम कर दिया, अब तुम मेरा काम करो.’’

सोमपाल अकसर सुशीला से चाय की फरमाइश करता था. लिहाजा सुशीला के मन में यही बात थी कि वह चाय के लिए कहेगा. सुशीला खाना पकाने की जल्दी में थी, इसलिए वह सोमपाल के कुछ बोलने से पहले ही वह बोल पड़ी, ‘‘तुम्हारा काम मैं अच्छी तरह जानती हूं, लेकिन मुझे अभी खाना पकाना है, इसलिए तुम्हें चाय बना कर नहीं दे सकती. खाना बन जाए तो मैं खुद तुम्हें बुला कर चाय पिला दूंगी.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘चाची, चाय के अलावा दूसरा काम भी तो हो सकता है.’’

‘‘तुम देख रहे हो न,’’ डिब्बे से कड़ाही में तेल उड़ेलते हुए सुशीला बोली, ‘‘मैं बिजी हूं, जो बात करनी हो, बाद में कर लेना.’’

‘‘मेरी बात तुम सब्जी पकाते हुए भी तो सुन सकती हो!’’ सोमपाल ने कहा.

‘‘अच्छा जल्दी बोलो, क्या बात है?’’ वह बोली.

सोमपाल अर्थपूर्ण अंदाज से मुसकराते हुए बोला, ‘‘चाची तुम अकसर कहती हो न कि सोमपाल तुम बड़े हो गए हो.’’

सुशीला ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उस की तरफ देखा, ‘‘हां, कह देती हूं तो?’’

‘‘चाची, तुम्हारी बातों से मुझे भी लग रहा है कि मैं अब बच्चा नहीं रहा, वास्तव में बड़ा हो गया हूं.’’

सुशीला हंसने लगी, ‘‘यही तुम्हारा वह जरूरी काम था.’’

‘‘नहीं, यह तो उस की भूमिका थी, असली बात तो बाकी है.’’

कड़ाही में गरम होते तेल पर नजरें जमाए हुए सुशीला बोली, ‘‘हां, चलो अच्छा हुआ कि तुम ने भी मान लिया कि तुम बड़े हो गए हो.’’

‘‘इसीलिए मैं ने सोचा कि बड़ा हो गया हूं तो बड़ों वाले काम भी करने चाहिए.’’

सुशीला को उस की बातों में रस आने लगा, ‘‘अब यह तो बता दो कि बड़ों वाला कौन सा काम करने जा रहे हो?’’

सोमपाल ने नजरें झुका लीं, मानो शरमा रहा हो.

सुशीला ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘शरमाओ मत, बता दो.’’

‘‘चाची, डांटोगी तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल नहीं डांटूंगी, बोलो.’’

‘‘किसी से मेरी शिकायत भी नहीं करोगी?’’ वह झिझकते हुए बोला.

‘‘नहीं करूंगी बाबा,’’ सुशीला के होंठों पर गहरी मुसकान पसर गई, ‘‘काम बताओ, समय बरबाद मत करो.’’

‘‘अच्छा तो सुनो,’’ सोमपाल सुशीला के और नजदीक आ गया. उस के बाद अपने लहजे को रहस्यमय बना कर बोला, ‘‘मुझे प्यार हो गया है.’’

‘‘वाह क्या बात है.’’ सुशीला की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘यानी कि तुम इतने बड़े हो गए हो कि खुद को प्यार के लायक समझने लगे.’’

‘‘और नहीं तो क्या, अब मैं बच्चा थोड़े ही हूं, 22 साल का जवान हो गया हूं. इस उम्र में तो गांव के आम लड़के 2 बच्चों के बाप बन जाते हैं. मेरे भी कुछ दोस्त 2 बच्चों के बाप बन गए हैं. इस उम्र के लोग जब बाप बन जाते हैं तो मैं तो केवल प्यार करने की बात कर रहा हूं.’’ सोमपाल ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी. सुशीला दिलचस्पी से उस की आंखों में देखने लगी, ‘‘किस से दिल लगा बैठे हो, जरा मुझे भी तो बताओ.’’

‘‘बता दूंगा, फिलहाल राज को राज रहने दो.’’

‘‘अच्छा सोम, यह बताओ, जिस से तुम प्यार करते हो, वह भी तुम्हें चाहती है न?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘यह क्या बात हुई,’’ कड़ाही में कटी हुई सब्जी डालते हुए  सुशीला बोली, ‘‘दिल लगा बैठे और यह तक पता नहीं कि उस के दिल में तुम्हारे लिए प्यार है या नहीं.’’

‘‘मैं कहूंगा, तब तो उसे पता चल जाएगा और तभी वह अपने दिल की बात मुझ तक पहुंचा देगी.’’

‘‘तो कह दो न.’’

‘‘चाची, कहने की हिम्मत नहीं है,’’ सोमपाल ने बेचैनी से पहलू बदला, ‘‘इसलिए अपनी बात कहने के लिए यह प्रेम पत्र लिखा है.’’

सोमपाल ने जेब से एक पत्र निकाल कर सुशीला की ओर बढ़ाया, ‘‘लो, खुद ही पढ़ लो.’’

सुशीला ने तह किया हुआ पत्र खोल कर पढ़ा. बिना किसी को संबोधित करते हुए उस में लिखा था—

प्रिय प्राणेश्वरी,  मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिन हो या रात, तुम्हारे ही खयालों में खोया रहता हूं. मुश्किल से नींद आती है तो तुम्हारे ही सपने देखता रहता हूं. सपने में तुम आती हो तो मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता और तुम्हारे साथ अंतरंग क्षणों में खो जाता हूं. उस समय का प्यार मुझे भूले नहीं भूलता. इस पत्र के जरिए अपने दिल की हालत तो मैं ने बयान कर दी. कह दो न कि तुम भी मुझे प्यार करती हो. —तुम्हारा सोम

पत्र पढ़ कर सुशीला मुसकराई, ‘‘सोम, प्यार का इजहार करने के साथसाथ तुम ने अंतरंग क्षणों का जिक्र कर दिया.’’

‘‘चाची, जो सच है, मैं ने वही लिखा है. सच यह है कि मैं उस के साथ अंतरंग क्षणों का दीवाना हूं.’’

सुशीला का विवाह हुए केवल 12 साल हुए थे और वह 2 बच्चों की मां थी. वह जानती  थी कि अंतरंग क्षणों में इंसान कैसे पेश आता है. इस पर सुशीला उस की हिम्मत बढ़ाने के उद्देश्य से बोली, ‘‘हिचको मत, जिस के लिए पत्र लिखा है उसे दे आओ.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘मेरी बात उस के दिल पर असर तो करेगी?’’

‘‘जरूर असर करेगी.’’

‘‘वह प्यार का जबाव प्यार से देगी न, सिर पर जूते पड़ने की नौबत तो नहीं आएगी?’’

‘‘इस बारे में तुम बेहतर बता सकते हो कि प्यार मिलेगा या फटकार!’’

‘‘चाची, तुम बताओ क्या मिलेगा?’’

‘‘सोम, तुम दिमाग बहुत चाट चुके, अब तुम जाओ, मुझे खाना पकाना है. तुम्हारे चाचा आते ही होंगे, आते ही वह खाना मांगेंगे.’’

‘‘चला जाऊंगा, बस तुम एक सवाल का जबाव दे दो…’’ सोमपाल उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘मुझे प्यार ही मिलेगा न?’’

सुशीला ने पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘हां, प्यार ही मिलेगा.’’

‘‘तो प्यार दो न चाची!’’ सोमपाल फंसी हुई सी आवाज में बोला, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है और यह पत्र मैं ने तुम्हारे लिए ही लिखा था.’’

पलक झपकते ही सुशीला सन्नाटे से घिर गई. ऐसा सन्नाटा जिस में वह अपना अस्तित्व शून्य जैसा महसूस कर रही थी. जनपद बिजनौर के थाना रेहड़ के अंतर्गत ग्राम फाजलपुर निवासी वीर सिंह से सुशीला का विवाह 12 साल पहले हुआ था. कालांतर में सुशीला ने एक बेटी सोनम (7 वर्ष) और एक बेटा मनीष (5 वर्ष) को जन्म दिया. वीर सिंह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. फाजलपुर गांव में ही सोमपाल रहता था. वह भी चाचा वीर सिंह की तरह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. सोमपाल की उम्र 22 साल थी और वह अविवाहित था. उस के 2 बहन और एक भाई था. वह तीनों से छोटा था. उम्र के जिस पड़ाव पर सोमपाल था, वह सपने देखने और उन में नित नएनए रंग भरने की होती है.

सोमपाल का मन भी रंगीन कल्पना किया करता था और आंखें तन को रोमांचित करने वाले सपने देखा करती थीं. सोमपाल सुशीला से उम्र में 11 साल छोटा था. गोरे रंग की सुशीला का बदन उम्र बढ़ने के साथ ही और खिलता जा रहा था. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस के यौवन में कोई कमी नहीं आई थी. सुशीला का बिंदास बोलना और उठनाबैठना सोमपाल के दिल में घर कर गया. सुशीला कब उस के सपनों की शहजादी बन गई, स्वयं उसे भी पता नहीं चला. सोमपाल के मन में सुशीला एक बार बसी तो वह चाह कर भी उसे दिल से निकाल नहीं सका. सुशीला को वह चाची कहता था, इस के बावजूद वह उस के सपनों की रानी बनी हुई थी.

मन ही मन सोमपाल उसे चाहता ही नहीं था, बल्कि उस से शादी करने के सपने भी देखा करता था. बहुत दिनों से सोमपाल इस जुगत में था कि सुशीला को वह अपने मन की बात बता सके. लेकिन उसे कभी मौका नहीं मिलता तो कभी उस की हिम्मत उस का साथ नहीं देती थी. लिहाजा उस ने एक प्रेमपत्र लिख कर यह सोच कर अपनी जेब में रख लिया था कि मौका मिलते ही चाची को दे देगा. उस दिन मौका मिला तो सोमपाल ने प्रेमपत्र देने के बाद अपने मन की बात भी उसे बता दी, ‘‘सुशीला चाची, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

सोमपाल का प्रेम निवेदन सुन कर सुशीला सन्नाटे में आ गई. उस की तंद्रा तब टूटी, जब कड़ाही की तली में सब्जी जलने की बदबू आई. सुशीला तुरंत सब्जी चलाने लगी. सोमपाल के प्रेम निवेदन से सुशीला को गुस्सा नहीं आया, अपितु उस की सोच को नई दिशा मिल गई. दरअसल वीर सिंह के साथ वह खुश तो थी लेकिन वह उस के सपनों का राजकुमार नहीं था. विवाह से पहले सुशीला ने कल्पना की तूलिका से अपने मन में अपने जीवनसाथी की जो छवि बनाई थी, वह वीर सिंह जैसी नहीं, बल्कि सोमपाल जैसी थी. सुशीला भी उसे बहुत पसंद करती थी. पहली बार सोमपाल को उस ने देखा था तो मन में यही खयाल आया था, ‘सोमपाल इस दुनिया में पहले क्यों नहीं आया.

यदि पहले आ जाता तो सोमपाल से मेरी शादी हो जाती, कसम से मजा आ जाता. जीवन में फिर कोई तमन्ना नहीं रह जाती.’

अब सोमपाल ने अपने प्रेम का इजहार किया तो वह सोचने लगी, ‘शायद नियति ने मेरे मन की बात सुन ली है और वह इसे पूरी करना भी चाहता है. इसलिए उस ने सोमपाल का दिल मेरी चाहत से रोशन कर दिया है. देर से ही सही, लेकिन सोमपाल से इश्क लड़ा कर देखा जाए कि मोहब्बत कैसा मजा देती है.’

उस दिन सुशीला का मन किसी काम में नहीं लगा. उस का दिमाग बस सोमपाल के बारे में सोचता रहा. उस का दिया प्रेम पत्र उस ने कई बार पढ़ा और फिर मुसकरा कर चूम लिया. कोई उस के चरित्र पर अंगुली उठाए, ऐसा सुबूत वह अपने पास रखना नहीं चाहती थी, इसलिए सोमपाल का वह प्रेम पत्र चूल्हे की आग में जला दिया. वीर सिंह के घर आने के बाद उस ने उसे खाना परोसा. वीर सिंह ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में डाला, उस के बाद उस ने सुशीला को अजीब नजरों से देखा और बोला, ‘‘सुशीला, आज तुम ने खाना पकाया है या मजाक किया है. सब्जी में नमक नहीं है और जलने की गंध आ रही है. रोटी भी कहीं कच्ची है तो कहीं जली है. खाना पकाते समय ध्यान कहां था तुम्हारा.’’

सुशीला कैसे बताती कि वह सोमपाल के खयालों में खोई रही थी, इसलिए उस ने बेमन से खाना पकाया था. अपनी बात संभालने के लिए उस ने सिर भारी होने और चक्कर आने का बहाना किया और उस के सामने से थाली खींचने लगी, ‘‘तबियत ठीक न होने की वजह से खाना खराब हो गया. आधा घंटा लगेगा, अभी दूसरी रोटीसब्जी पका लाती हूं.’’

‘‘रहने दो. जैसा है, भोजन है और भोजन का अपमान नहीं करना चाहिए. रोज अच्छा खाता था, आज थोड़ा खराब खा लूंगा. बस थोड़ा नमक दे दो.’’ इस पर सुशीला ने उसे नमक दे दिया. सब्जी में नमक मिला कर वीर सिंह ने वही खाना खा लिया. रात को सभी लोग सो गए लेकिन सुशीला सोमपाल के खयालों में ही खोई रही. सोमपाल और अपने बारे में सोचतेसोचते सुशीला ने अंतत: निर्णय कर लिया कि वह सोमपाल के प्यार का जबाव प्यार से देगी. बस, उस के मन का तनाव जाता रहा और वह चैन से सो गई. दूसरी तरफ कहने को सोमपाल सो रहा था, जबकि वह जाग रहा था और इसी सोच में था कि सुशीला उस के प्यार को स्वीकार करेगी कि नहीं.

अगले दिन सुबह वीर सिंह काम पर चला गया. सोमपाल काम पर नहीं गया, अपने घर पर ही रहा. असल में वह सहमा भी था कि कहीं सुशीला चाची का जबाव उस के मन के विपरीत हुआ तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा. जब वह सुशीला के सामने पहुंचा तो सुशीला ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘कल मैं खाना पकाने की उलझन में थी, इसलिए तुम्हारी बातों पर तवज्जो नहीं दे पाई. अब बोलो, कल क्या कह रहे थे?’’

सोमपाल के भीतर के भय ने और भी लंबे पांव पसार लिए. नजरें झुका कर वह धीरे से बोला, ‘‘मुझे जो कहना था, कल ही कह दिया था.’’

‘‘क्या यह सच है कि तुम्हें मुझ से प्यार हो गया है?’’ वह बोली.

सोमपाल ने नजरें झुकाए हुए ही धीरे से सिर हिला दिया, ‘‘हां.’’

‘‘प्यार भी करते हो और डरते भी हो,’’ सुशीला ने अपनी बांहें उस के गले में डाल दी, ‘‘बुद्धू, प्यार करने वाले डरा नहीं करते.’’

सोमपाल हैरान रह गया. सुशीला प्यार का जबाव इस शिद्दत से देगी, यह उस की सोच से परे बात थी.

‘‘विश्वास नहीं हो रहा है!’’ सुशीला मुसकराई, ‘‘अच्छा, मैं तुम्हारा मुंह मीठा करा देती हूं, तब यकीन होगा कि यह सुशीला भी तुम्हें चाहती है.’’

इस के बाद वह अपना मुंह सोमपाल के मुंह के पास ले गई. इतने पास कि सांसें सांसों से टकराने लगीं. सोमपाल ने उस के होंठों से अपने होंठों का मिलाप करा कर उस के होंठों को चूम लिया.

कुछ देर चूमने के बाद सुशीला ने अपना मुंह हटा लिया और उस की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘हुआ मुंह मीठा?’’

सोमपाल ने होंठों पर अपनी जीभ फेरी, उस के बाद सुशीला की कमर को अपनी बांहों में समेट लिया, मुसकरा कर बोला, ‘‘मुंह भी मीठा हुआ और यकीन भी हो गया. जिस तरह मुंह मीठा किया है, उसी तरह पूरा बदन मीठा कर दो तो मजा आ जाए.’’

सुशीला ने बांकी चितवन से उसे देखा, ‘‘सब कुछ आज ही कर गुजरने का इरादा है क्या?’’

‘‘प्यार में जो होना है, वह फौरन हो जाना चाहिए.’’ कह कर सोमपाल ने सुशीला के होंठों को चूम लिया.

सुशीला के मन में अनार की आतिशबाजी सी होने लगी. उस का मन भी सोमपाल के जोश और जवानी को परखने का हो गया, मुसकरा कर बोली, ‘‘सोम, तुम भी क्या याद करोगे. प्यार के इजहार के बाद पहली मुलाकात में ही तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा, जोकि आम प्रेमियों को महीनों बाद मिलता है और कइयों को तो मिलता ही नहीं है.’’

सोमपाल ने बांहों का घेरा और तंग कर लिया, ‘‘थैंक यू चाची.’’

‘‘चाची, दूसरों के सामने बोलना, अकेले में मुझे मेरे नाम से पुकारा करो,’’ सुशीला इठला कर बोली, ‘‘अब कमर छोड़ो, तो मैं दरवाजा बंद कर आऊं.’’

सोमपाल ने सुशीला की कमर को बांहों की गिरफ्त से आजाद कर दिया. सुशीला ने झट से दरवाजा बंद कर दिया और सोमपाल की बांहों में समा गई. फिर उन के जिस्म मर्यादाओं की दीवार तोड़ कर एक हो गए. कुछ देर बाद दोनों अलग हुए तो दोनों ही आनंद से अभिभूत थे. सोमपाल को पहली बार नारी देह का सुख मिला था, यह सर्वथा अनूठा और आनंददायक अनुभव था. सुशीला इसलिए आनंद के महासागर में डुबकियां लगा रही थी क्योंकि उस का पति वीर सिंह उसे ऐसा कभी सुख नहीं दे पाया था. बस, उस दिन से दोनों एकदूसरे के पूरक बन गए. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह अपनी बाइक से सुआवाला बाजार गया लेकिन देर शाम तक वह वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने उस की तलाश की लेकिन कहीं पता नहीं चला.

इस पर वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल सिंह ने रेहड़ थाने में वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुबह वीर सिंह के घर वालों और गांव के लोगों ने फिर से वीर सिंह की तलाश शुरू की तो सुआवाला और मच्छमार मार्ग के बीच हरहरपुर गांव के पास वीर सिंह की लाश पड़ी मिली. लाश मिलते ही वीर सिंह के घर वाले रोनेचिल्लाने लगे. घटनास्थल अफजलगढ़ थाना क्षेत्र में आता था, इसलिए घटना की सूचना अफजलगढ़ थाने को दे दी गई. सूचना पा कर इंसपेक्टर नरेश कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक वीर सिंह के सिर पर घाव के निशान थे, जिस से अंदाजा यह लगाया गया कि किसी ठोस वस्तु से सिर पर प्रहार कर के वीर सिंह को मौत के घाट उतारा गया है.

इंसपेक्टर नरेश कुमार ने लाश का निरीक्षण करने के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया, लेकिन घटना से संबंधित कोई सुबूत हाथ नहीं लगा. उस के घर वालों से पूछताछ की तो वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल ने थानाप्रभारी को बताया कि 2 जनवरी को वीर सिंह का गांव के ही अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हुआ था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर कुमार ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. थाने आ कर इंसपेक्टर कुमार ने रामगोपाल की तरफ से अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 304 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू हुई तो नामजद आरोपियों की लोकेशन घटनास्थल पर या उस के आसपास नहीं मिली. सभी आरोपी अपनेअपने घरों में ही मौजूद थे.

वह सवालों के जवाब भी बेखटक दे रहे थे. किसी तरह का शक न होने पर इंसपेक्टर कुमार ने अपनी जांच की दिशा को मोड़ा. उन की समझ में आ गया था कि घटना में नामजदगी गलत है, घटना किसी और ने अंजाम दी है. सर्विलांस टीम का सहारा लिया गया. घटना वाली शाम घटनास्थल पर मौजूद नंबरों की जांचपड़ताल की गई, तो उस में से 3 नंबर संदिग्ध लगे. एक नंबर सोमपाल का था. सोमपाल के बारे में इंसपेक्टर कुमार ने पता किया तो वह मृतक का भतीजा निकला. सोमपाल के साथ 2 फोन नंबर और भी एक्टिव थे. उन नंबरों की लोकेशन भी काफी समय तक एक साथ रही थी. वह नंबर ऊधमसिंह नगर के जसपुर थाना क्षेत्र के रायपुर गांव के 2 युवकों के थे. उन की लोकेशन घटना वाली शाम घटनास्थल से रायपुर तक रही थी.

इस के बाद इंसपेक्टर कुमार ने 16 जनवरी की रात सोमपाल और उस के साथियों लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने वीर सिंह की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. थाने में उन से पूछताछ के बाद 17 जनवरी को उन्होंने सुशीला को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिसिया पूछताछ के बाद हत्या की जो वजह निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

सोमपाल और सुशीला के संबंध बने महीनों बीत गए. इस दौरान सुशीला और सोमपाल का प्यार बेहद बढ़ गया था. अलग होने की कल्पना से ही दोनों का कलेजा मुंह को आने लगता था. सोमपाल शादी करने की बात करता तो सुशीला उस की हां में हां मिलाने लगती थी. असल में सुशीला ने पति वीर सिंह को दिल से निकाल दिया था और मन से सोमपाल को अपना पति मान चुकी थी. वह उस के साथ ही अपना जीवन बिताने की इच्छुक थी. लेकिन घटना से करीब 2 महीने पहले उन के इस नाजायज रिश्ते का भेद खुल गया. एक दिन रात में सोते समय वीर सिंह की आंखें खुलीं तो वह लघुशंका के लिए उठा तो उस ने सुशीला को अपने बिस्तर से गायब पाया.

वह कमरे से बाहर निकला तो रसोई से उसे कुछ आवाजें आती सुनाई दीं,वह उस तरफ बढ़ गया. जैसे ही वह रसोई के अंदर पहुंचा तो अंदर का दृश्य देख कर उस की आंखें हैरत से फट गईं. सुशीला भतीजे सोमपाल के साथ आपत्तिजनक हालत में थी. उसे एकबारगी तो विश्वास नहीं हुआ, पर अगले ही पल वह चिल्लाया, ‘‘सुशीला…’’

वीर सिंह की आवाज सुन कर दोनों हड़बड़ा कर अलग हो गए और मुजरिम की भांति नजरें झुका कर खड़े हो गए. वीर सिंह ने दोनों को काफी लताड़ा और सुशीला के साथ मारपीट की. लेकिन तब तक सोमपाल वहां से खिसक लिया था. सुशीला को वीर सिंह ने हिदायत दी कि आगे से ऐसी हरकत न करे, नहीं तो अच्छा नहीं होगा. लेकिन कहते हैं कि ये ऐसी चाहत है, जिस का नशा इंसान के सिर चढ़ कर बोलता है, तमाम पाबंदियों के बावजूद इंसान बेचैन हो कर फिर उसी नशे की तरफ भागता है. ऐसा ही सोमपाल और सुशीला के साथ हुआ. वह भी इस चाहत के नशे के आदी हो गए थे.

जब पाबंदी लगी तो बरदाश्त नहीं कर सके और बेचैन हो कर फिर दोनों एकदूसरे के नशे की चाहत में डूबने लगे. लेकिन बंदिशों के कारण खुल कर न मिल पाने की कसक दोनों को सालती थी. वैसे भी दोनों एक साथ रहने का मन बना चुके थे, इसलिए वीर सिंह को अपने रास्ते से हटाने की सोचने लगे, उस को हटाए बिना दोनों एक नहीं हो सकते थे. इसलिए सोमपाल ने अपने 2 साथियों ऊधमसिंह नगर के थाना जसपुर के रायपुर गांव निवासी लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) से हत्या में साथ देने के लिए बात की. दोनों सोमपाल का साथ देने को तैयार हो गए. लवकुश तो बालिग था, उस की उम्र 22 साल थी, लेकिन सलीम नाबालिग था उस की उम्र 16 वर्ष थी.

वीर सिंह की हत्या की योजना बनी, योजना से सुशीला को भी अवगत कराया गया. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह सुआवाला बाजार जाने के लिए बाइक से निकला. उस के निकलने से पहले ही सुशीला ने फोन कर के सोमपाल को बता दिया था. सोमपाल लवकुश और सलीम के साथ सुआवाला मच्छमार मार्ग के रास्ते में जा कर खड़ा हो गया. जैसे ही वीर सिंह बाइक पर बैठ कर उधर आया, तो उस ने डंडा मार कर उसे बाइक से गिरा दिया. वीर सिंह के गिरते ही तीनों ने उसे दबोच लिया और सिर पर डंडा मारमार कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद नहर के दोनों तरफ बनी पक्की दीवारों के बीच में लाश डाल दी. डंडे को एक गन्ने के खेत में छिपा दिया तथा वीर सिंह का मोबाइल मय सिम तालाब में फेंक दिया.

इस के बाद वीर सिंह की बाइक से सोमपाल लवकुश और सलीम को रायपुर तक छोड़ने गया. वहां से वापस आ कर एक जगह बाइक छिपा दी और घर चला गया. लेकिन गुनाह कभी किसी का छिपता नहीं तो इन का कैसे छिप जाता. चारों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ गए. इंसपेक्टर कुमार ने आईपीसी की धारा 304 को धारा 302/120बी में तरमीम कर दिया. फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चारों आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News : पिता ने तकिए से दबाया बेटे का मुंह, कहा मार नहीं रहा, मुक्ति दे रहा हूं

UP News : इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

सी सामऊ थानाप्रभारी के कक्ष में एक युवकयुवती बैठे थे. युवक का नाम अलंकार था जबकि युवती का नामसारिका. रिश्ते में दोनों पतिपत्नी थे. उन की आंखों से आंसू टपक रहे थे. सारिका की आंखों में बेटा खोने के आंसू थे, जबकि अलंकार की आंखों में पश्चाताप के. अलंकार ने सुबह 8 बजे थाने आ कर अपने 7 वर्षीय मासूम बेटे रुशांक उर्फ तारुष की हत्या का जुर्म कबूला था. कक्ष में वह थानाप्रभारी के आने का इंतजार कर रहा था. सारिका की नजरें जबजब पति से मिलतीं तो वह सिहर उठती. मानो पति से पूछ रही हो, ‘‘तारुष के पापा, कोई वजह नहीं… कोई नाराजगी नहीं, तो आखिर यह क्या था? तुम तो अपने इकलौते बेटे को अथाह प्यार करते थे. उसे जरा सी चोट लग जाती तो तड़प उठते थे.

‘‘बेटे के आंसू कभी बरदाश्त नहीं हुए. उसे कोई छू भी ले तो कलेजा फट जाता था. उसे अपने हाथों से खिलानापिलाना और हमेशा अपने पास सुलाना. आखिर ऐसा क्या रहस्य है कि तुम ने बेटे का गला घोंट दिया. मौत से पहले बच्चे की तड़प तुम ने कैसे देखी होगी. रुशांक छटपटाया होगा तो प्यारदुलार करने वाले हाथ कैसे ढीले नहीं पड़े? आखिर क्यों तुम ने बेटे की हत्या कर डाली?’’

सुबह लगभग 9 बजे इंसपेक्टर महेश वीर सिंह थाने पहुंचे. वहां कक्ष में मौजूद युवकयुवती उन्हें देख कर खड़े हो गए. युवक हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सर, मेरा नाम अलंकार श्रीवास्तव है और यह मेरी पत्नी सारिका है. हम गांधीनगर मोहल्ले में रहते हैं. मैं ने अपने 7 साल के बेटे रुशांक को गला दबा कर मार डाला.’’

यह सुन कर महेश वीर सिंह विचलित हो उठे. उन्होंने अलंकार के ऊपर नजर डाली और एक कांस्टेबल को बुला कर उसे हिरासत में लेने के आदेश दिए. उसे तुरंत हिरासत में ले लिया गया. हत्या की वजह जानने के लिए उन्होंने सारिका से पूछताछ की तो वह फफक पड़ी, ‘‘सर, बीती शाम तक घर में सब कुछ सामान्य था. रात 10 बजे पति ने घर के सभी सदस्यों को दूध पीने कोे दिया. दूध पीने के बाद उसे तथा उस की बेटियों को नींद आ गई. शायद दूध में नींद की गोलियां घोली गई थीं. सुबह 5 बजे पति ने उसे जगाया और बोले, ‘‘अब सब ठीक हो गया है. अब कोई बेटे को परेशान नहीं कर पाएगा. बेटा चैन की नींद सो रहा है.’’

पति की अटपटी बातें सुन कर वह घबरा गई. वह बाहर वाले कमरे में गई तो देखा सोफे पर रुशांक का शव पड़ा है. उस के मुंह से चीख निकली तो दोनों बेटियां तूलिका व गीतिका आ गईं. घर में रोनापीटना शुरू हुआ तो पड़ोसी आ गए. फिर तो पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ जमा हो गई. इसी बीच अलंकार उसे साथ ले कर थाने आ गए और समर्पण कर दिया. सर, पति कुछ महीने से तनावग्रस्त थे. इसी तनाव में उन्होंने बेटे को मार डाला. थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने पिता द्वारा मासूम बेटे की हत्या करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. फिर सारिका के साथ उस के गांधीनगर स्थित घर पहुंच गए. उस समय घर के बाहर भीड़ जमा थी.

सभी के मन में यही प्रश्न था कि आखिर अलंकार ने अपने एकलौते बेटे की हत्या क्यों की? घर के अंदर सोफे पर मासूम बालक रुशांक का शव पड़ा था. शव के पास ही उस की बहनें रो रही थीं. नानी, मामी, मौसी सभी सिसक रही थीं. इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

थानाप्रभारी अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार तथा डीएसपी श्वेता सिंह वहां आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा घर वालों से घटना के संबंध में पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए. कई जगह से फिंगरप्रिंट भी लिए. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक रुशांक के शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद एसपी(पश्चिम) डा. अनिल कुमार थाना सीसामऊ पहुंचे. वहां उन्होंने हत्यारे पिता अलंकार से दिन भर पूछताछ की, जिस में वह चकरा कर रह गए.

कभी नरमी से तो कभी सख्ती से सवाल पूछे गए, लेकिन अलंकार पर कोई असर नहीं पड़ा. इस बीच कभी वह सामान्य दिखा तो कभी फूटफूट कर रोया. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने रुशांक को क्यों मारा?’’

‘‘सर, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो उसे वो मार देता. फिर हम बचा नहीं पाते सर.’’ अलंकार बोला.

‘‘कौन उसे मारने वाला था?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मैं नहीं बताऊंगा वरना वह मुझे भी मारने की कोशिश करेगा.’’ अलंकार घबराते हुए बोला.

‘‘आखिर कौन हैं वो? हमें बताओ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

थानाप्रभारी की बात सुन अलंकार उन की तरफ देख कर हंसने लगा. उस की हरकतें देख कर थानाप्रभारी समझ गए कि जरूर यह मानसिक रोगी है. फिर उन्होंने पूछा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि तुम ने रुशांक को कैसे मारा?’’

‘‘कैसे बताऊं? उन्हें कोई नहीं देख पाएगा. लेकिन वे मेरे परिवार को मार डालेंगे.’’ माथे पर हाथ रख कर वह बैठ गया. आंखें भर आईं, फिर बोला, ‘‘सर, हम ने उसे मारा नहीं बल्कि हम ने तो उसे बचा लिया. अब वह पूरी तरह सेफ है.’’

‘‘कैसे सेफ है? तुम ने तो उसे मार डाला.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘मैं ने उसे सेफ कर दिया. अब वह उसे नहीं मार पाएगा.’’ अलंकार बोला.

‘‘उस वक्त कौनकौन था वहां?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘हम थे, रुशांक था. सब सो गए थे. हम जाग रहे थे.’’

‘‘बच्चे का गला कसते हुए तुम्हारे हाथ नहीं कांपे?’’ थानाप्रभारी ने पूछा तो अलंकार फफकफफक कर रोने लगा.

पूछताछ में अलंकार ने जिस तरह हर सवाल का अटपटा जवाब दिया, उस से एसपी डा. अनिल कुमार को भी लगा कि अलंकार श्रीवास्तव मानसिक रोगी है या फिर किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त है. उन्होंने इसी दिशा में अपनी जांच आगे बढ़ाई और आरोपी अलंकार श्रीवास्तव की पत्नी सारिका से विस्तृत पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज कराया. उन्होंने सारिका से रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा तो वह आनाकानी करते हुए बोली, ‘‘सर, बेटा तो चला ही गया. अब पति जेल चले गए तो सब खत्म हो जाएगा. बेटे के बाद पति के बिना हम कैसे जिएंगे?’’

काफी समझाने के बाद सारिका ने तहरीर दी. उस के बाद थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने सारिका की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत अलंकार श्रीवास्तव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक ऐसे इंसान की कहानी प्रकाश में आई, जिस के जीवन में पश्चाताप के अलावा कुछ भी नहीं बचा. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर का एक घनी आबादी वाला मोहल्ला है-गांधीनगर. यह सीसामऊ थाने के अंतर्गत आता है. अलंकार श्रीवास्तव इसी मोहल्ले के मकान नंबर 106/92 में सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी सारिका के अलावा 2 बेटियां तथा एक बेटा रुशांक उर्फ तारुष था.

अलंकार श्रीवास्तव का अपना पुश्तैनी मकान था. मकान का आधा भाग उस ने किराए पर उठा रखा था और आधे भाग में वह स्वयं रहता था. अलंकार श्रीवास्तव के 2 अन्य भाई आलोक व अभिषेक श्रीवास्तव थे. आलोक मध्य प्रदेश में तथा अभिषेक मुंबई में परिवार सहित बस गए थे. मातापिता की मौत के बाद उन का कानपुर आनाजाना बहुत कम हो गया था. अलंकार के परिवार से उन का लगाव न के बराबर था. अलंकार श्रीवास्तव शेयर बाजार में ब्रोकर था. स्टाक मार्केट से वह अपनी फर्म के कई ग्राहकों को लाखों रुपए की कमाई कराता था और स्वयं भी कमाता था. उस की पत्नी सारिका पढ़ीलिखी थी. वह शिक्षिका थी. वह कन्नौज जिले के नदौरा गांव स्थित प्राथमिक पाठशाला में सरकारी टीचर थी.

उसे भी 30-35 हजार रुपया प्रतिमाह वेतन मिलता था. कुल मिला कर अलंकार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी और परिवार खुशहाल था. चूंकि सारिका स्वयं पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह अपने बच्चों को भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहती थी. उस की 16 वर्षीया बड़ी बेटी वेस्ट कौट स्कूल में कक्षा 10 में पढ़ रही थी, जबकि 10 वर्षीया छोटी बेटी इसी स्कूल में कक्षा 4 की छात्रा थी. सब से छोटा 7 वर्षीय रुशांक उर्फ तारुष अशोक नगर के किड्स प्री स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ रहा था. अलंकार श्रीवास्तव अपने इकलौते बेटे रुशांक उर्फ तारुष से बहुत प्यार करता था. वह उसे अपने हाथ से खाना खिलाता, दूध पिलाता और अपने साथ ही सुलाता था.

तारुष की शैतानी पर बेटियां उसे डांट देतीं तो अलंकार तारुष का पक्ष ले कर बेटियों को ही डांटता. एक बार स्कूल टीचर ने तारुष को किसी बात पर थप्पड़ मार दिया तो जानकारी मिलने पर अलंकार ने स्कूल जा कर हंगामा खड़ा कर दिया. आखिर में स्कूल टीचर को माफी मांगनी पड़ी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन मार्च 2020 में महामारी के चलते जब देश में लौकडाउन हुआ तो अलंकार का भी काम ठप्प हो गया और उस की नौकरी भी चली गई. नौकरी जाने से अलंकार परेशान रहने लगा. उसे अपने बेटे व बेटियों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. लौकडाउन के पहले उस ने अपनी फर्म के जिन ग्राहकों को लाखों रुपए कमवाए, जरूरत पड़ने पर उस की मदद को कोई खड़ा नहीं हुआ. इस बात को ले कर भी वह बहुत टेंशन में रहता था.

धीरेधीरे अलंकार इस कदर मानसिक बीमार हो गया कि वह आत्महत्या की बात करने लगा. वह इतना चिंतित रहने लगा कि सोते से अचानक जाग उठता और कहता, ‘‘वो मुझे मार डालेगा. मेरे बेटे को मार डालेगा.’’

वह चिड़चिड़ा हो गया. उस का ब्लडप्रैशर बढ़ गया और पड़ोसियों से भी झगड़ा करने लगा. वह कभी गुमसुम रहता तो कभी हंसतामुसकराता और कभी रोने भी लगता. कभी परिवार को सतर्क करते हुए कहता, ‘‘वो मार डालेगा.’’

पति की इन अजीबोगरीब हरकतों से सारिका की चिंता बढ़ने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि अलंकार के दिमाग में आखिर चल क्या रहा है. कई बार उस ने इलाज कराने की बात कही, लेकिन अलंकार तैयार नहीं हुआ. बोला, ‘‘मुझे कोई बीमारी नहीं है. थोड़ा ब्लडप्रैशर बढ़ा है. होम्योपैथी दवा ले रहा हूं.’’

27 नवंबर, 2020 की रात 8 बजे सारिका की बड़ी बेटी ने मटर पनीर की सब्जी बनाई फिर रोटियां सेंकी. इस के बाद सभी ने बैठ कर खाना खाया. सोने के पहले सभी एकएक गिलास दूध पीते थे. उस रात भी सारिका दूध ले कर आई तो अलंकार बोला, ‘‘कोरोना बढ़ रहा है. दूध में हल्दी व अश्वगंधा मिला कर पीना चाहिए.’’

अलंकार ने सारिका से दूध भरे गिलास ले लिए और रसोई में चला गया. वहां उस ने दूध में हल्दी के साथ नशीली गोलियां घोल दीं और सब को दूध पिला दिया. तारुष को यह कह कर दूध नहीं दिया कि उस के पेट में दर्द है. दूध पीने के कुछ देर बाद सारिका व उस की बेटियां गहरी नींद में सो गईं. अलंकार ने तारुष को अपने साथ सोफे पर लिटा लिया. वह डिप्रेशन में था. उसे नींद नहीं आ रही थी. आधी रात के बाद वह उठा और तकिए से बेटे का मुंह दबाने लगा. तारुष छटपटा कर बोला, ‘‘पापा, मुझे मत मारो. मैं तो आप का दुलारा बेटा हूं.’’

‘‘बेटा, मैं तुझे मार नहीं रहा हूं. मुक्ति दिला रहा हूं. अगर मैं ने ऐसा नहीं किया तो वह मार डालेगा.’’

‘‘ कौन पापा?’’ तारुष ने पूछा.

‘‘तुम उसे नहीं जानते. वह बहुत खतरनाक है. वह मुझे भी मारना चाहता है.’’ कहते हुए अलंकार ने तारुष का तकिए से मुंह नाक दबाया फिर गला घोंट दिया. हत्या करने के बाद उस ने तारुष के शव को कंबल से ढंक दिया और वहीं बैठा रहा. सुबह 5 बजे अलंकार अपनी पत्नी सारिका के कमरे में पहुंचा और उसे जगा कर बोला, ‘‘सारिका, अब सब ठीक हो गया. अब कोई तारुष को परेशान नहीं कर पाएगा. वह चैन की नींद सो रहा है.’’

यह सुन कर सारिका का माथा ठनका. वह बदहवास कमरे के बाहर आई तो सोफे पर तारुष का शव पड़ा देखा. वह चीख पड़ी तो चीख सुन कर तूलिका व गीतिका आ गईं. भाई का शव देख कर वे दोनों भी सुबकने लगीं. दोनों ने पास खड़े पिता पर नजर डाली. मानो पूछ रही हों, ‘पापा, यह तुम ने क्या किया. भाई को मार डाला. अब मैं राखी किस को बांधूंगी. किस के माथे पर टीका करूंगी.’

सूर्य की पौ फटते ही पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोग अलंकार के दरवाजे पर जुटने लगे. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अलंकार ने अपने एकलौते बेटे को मार डाला है. इसी बीच अलंकार पत्नी सारिका को ले कर थाना सीसामऊ पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया. 29 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अलंकार श्रीवास्तव को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. जेल प्रशासन उस पर निगरानी रखे हुए है और उस का उचित इलाज हो रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

 

Agra News Crime : टॉयलेट के बहाने जंगल में ले जाकर प्रेमी से कराया पति का कत्ल

Agra News Crime : 2 शादियां करने के बावजूद भी पूनम अपने मायके के प्रेमी संदीप को नहीं भुला सकी थी. पति शिवकुमार से छुटकारा पाने और प्रेमी के साथ जिंदगी बिताने की पूनम ने ऐसी खूनी साजिश रची कि…

16 दिसंबर, 2020 की सुबह करीब 9 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के यमुना एक्सप्रेसवे से मथुरा के राया कस्बे में उतरने वाले रास्ते के किनारे लोगों ने झाडि़यों में खून से लथपथ एक युवक का शव पड़ा देखा. कुछ ही देर में वहां राहगीर भी जुटने लगे. उसी दौरान किसी व्यक्ति ने इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. चूंकि यह क्षेत्र थाना राया के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा वायरलैस मैसेज दे कर घटना से अवगत करा दिया. रातभर की ड्यूटी के बाद सुबह इतनी जल्दी उठना पुलिस के लिए थोड़ा मुश्किल जरूर होता है. लेकिन स्थानीय राया थाने के प्रभारी निरीक्षक सूरज प्रकाश शर्मा को जैसे ही उन के मुंशी ने आ कर हत्या के बारे में बताया तो उन का आलस्य काफूर हो गया.

थानाप्रभारी एस.पी. शर्मा तत्काल तैयार हुए. एसआई मोहनलाल यादव, राजकुमार, कांस्टेबल यशपाल, आशुतोष कुमार व प्रदीप कुमार को साथ ले कर वह उस स्थान पर पहुंच गए, जहां खून से लथपथ शव पड़े होने की सूचना मिली थी. लाश को देखते ही इंसपेक्टर शर्मा समझ गए कि यह दुर्घटना का नहीं बल्कि हत्या का मामला है. क्योंकि पास में ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था, जिस पर लगा खून इस बात की गवाही दे रहा था कि उसी पत्थर से मृतक के सिर पर प्रहार कर के उस की हत्या की गई थी. इसी के कारण मृतक का सिर व चेहरा खून से सराबोर हो चुके थे. चेहरे पर बहते ताजा खून को देख कर वे समझ गए कि हत्या हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता है. मृतक के चेहरे पर घनी दाढ़ी थी जो खून से सराबोर थी.

थानाप्रभारी ने एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर तथा सीओ आरती सिंह को राया मोड़ पर मिले शव के बारे में सूचना दे दी. एसएसपी व सीओ सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक की टीम का दस्ता भी मौके पर पहुंच गया. घटनास्थल के मुआयने के बाद मृतक की कदकाठी व सूरत से अनुमान लगा कि उस की उम्र 26 साल के आसपास रही होगी. मृतक के शरीर पर जींस और जैकेट के साथ पैरों के जूतों से अनुमान लग रहा था कि वह कोई राहगीर था, जिस से या तो लूटपाट के लिए उस की हत्या की गई थी या किसी ने रंजिशन यहां ला कर मार दिया था.

मृतक के जेबों की तलाशी ली गई तो जेब से ऐसी कोई चीज बरामद नहीं हो सकी, जिस से उस की पहचान की जा सकती थी. इंसपेक्टर शर्मा शव का मुआयना कर रहे थे, तभी उन की नजर लाश से कुछ दूरी पर पड़े एक बैग पड़ी. लेकिन वह बैग पूरी तरह खाली था मगर तलाशी लेने पर उस में कागज का एक लिफाफा पड़ा मिला, जिस में एक फोटो थी. फोटो ताजमहल के सामने खिंचवाई गई थी. फोटो में मृतक के साथ एक महिला भी खड़ी थी. फोटो इस तरह खिंचवाई गई थी जिस तरह नवदंपति खिंचवाते हैं. इस फोटो से 2 बातें साफ हो रही थीं. एक तो यह कि जिस अंदाज में ये फोटो खिंचवाई गई थी आमतौर पर वैसे लोग अपनी पत्नी के साथ फोटो खिंचवाते हैं.

दूसरी ये बात भी साफ हो गई कि ये फोटो बहुत पुरानी नहीं थी, क्योंकि मृतक के शरीर पर जो कपड़े थे, फोटो में भी उस ने वही कपड़े पहने हुए थे. इस का मतलब साफ था कि मृतक ताजमहल घूम कर लौटा था. लेकिन सवाल यह था कि अगर फोटो में उस के साथ खड़ी महिला उस की पत्नी थी तो वह कहां है? अचानक इंसपेक्टर एस.पी. शर्मा के मन में सवाल कौंधा कि कहीं पत्नी ने ही तो उस का काम तमाम नहीं कर दिया. लेकिन ये तमाम सवाल तब तक कयास ही थे, जब तक मृतक की शिनाख्त नहीं हो जाती. ताजमहल देख कर राया के इस रास्ते पर उतरने से इस बात की भी संभावना थी कि मृतक आसपास के ही किसी गांव का रहने वाला हो सकता है.

इसी उम्मीद में इंसपेक्टर सूरज प्रकाश शर्मा ने उस इलाके में 5 किलोमीटर तक पड़ने वाले सभी गांवों में अपनी पुलिस टीम से कह कर ऐसे जिम्मेदार लोगों को मौके पर बुलवाया, जो अपने गांव के अधिकांश लोगों को जानते थे. कई घंटे मशक्कत की गई, लेकिन काफी लोगों को दिखाने के बाद भी मृतक की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. पुलिस अधिकारी घटनास्थल से थाने लौट आए. पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर ने जांच की जिम्मेदारी राया थाने के प्रभारी निरीक्षक सूरज प्रकाश शर्मा को ही सौंप दी. साथ ही उन्होंने सीओ आरती सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी.

टीम में थानाप्रभारी के अलावा एसआई मोहनलाल यादव, राजकुमार, कांस्टेबल यशपाल, आशुतोष कुमार, प्रदीप तथा इंसपेक्टर (सर्विलांस) जसवीर सिंह तथा उन की टीम के कांस्टेबल राघवेंद्र सिंह, समुनेश, योगेश कुमार, गोपाल सिंह को भी शामिल किया गया. एसएसपी ने इस हत्याकांड का जल्द से जल्द खुलासा कर आरोपियों को पकड़ने के निर्देश टीम को दिए. पुलिस के पास मृतक की पहचान करने व वारदात का खुलासा करने के लिए केवल एक ही लीड थी और वह थी घटनास्थल से बरामद हुआ फोटो. थानाप्रभारी एस.पी. शर्मा खुद पुलिस टीम ले कर आगरा पहुंच गए. उन्होंने आगरा पहुंच कर वहां ताजमहल के आसपास फोटो खींचने वाले फोटोग्राफरों को मृतक के पास से मिले फोटो दिखा कर जानकारी हासिल करनी चाही. लेकिन इस प्रयास में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

क्योंकि वहां सैकड़ों फोटोग्राफर थे और सभी से संपर्क होना बेहद मुश्किल था. अचानक उन्होंने उस साइट का निरीक्षण किया, जहां खड़े हो कर मृतक ने फोटो खिंचवाई थी. इस से एक बात स्पष्ट हो गई कि मृतक ने ताजमहल के भीतर जा कर फोटो खिंचवाई थी. इंसपेक्टर शर्मा ने ताजमहल प्रशासन की मदद से ताजमहल के भीतर प्रवेश करने वाले गेट की पिछले 2 दिनों की सीसीटीवी फुटेज देखी तो 15 दिसंबर को मृतक एक महिला के साथ ताजमहल में प्रवेश करते हुए दिखाई पड़ गया. इस से एक बात तो साफ हो गई कि मृतक आगरा से घूम कर ही मथुरा गया था, जहां उस की हत्या हो गई.

आगे का काम पुलिस के लिए बेहद आसान हो गया. पुलिस ने ताजमहल प्रशासन की मदद से 15 दिसंबर को ताजमहल देखने वालों के टिकट की छानबीन शुरू कर दी. दरअसल ताजमहल देखने के लिए जाने वालों को अपना नाम, पता और मोबाइल नंबर की जानकारी भरनी होती है. छानबीन करने के दौरान पुलिस टीम को आखिर एक ऐसा टिकट मिल गया, जो 2 लोगों के लिए बना था. उस में जो आईडी प्रूफ लगा था, वह हरियाणा के पलवल जिले के थाना होडल क्षेत्र के गांव सेवली में रहने वाले शिवकुमार का था. साथ में उस की पत्नी पूनम का नाम लिखा था.

पुलिस टीम ने ताजमहल प्रशासन की मदद से सीसीटीवी फुटेज और एंट्री टिकट का रिकौर्ड वहां से अपने कब्जे में ले लिया. इंसपेक्टर शर्मा अपनी टीम के साथ 16 दिसंबर की रात को ही मथुरा वापस लौट आए. इंसपेक्टर शर्मा ने एक सिपाही को पलवल के सेवली गांव भेजा. जहां से वह अगली सुबह शिवकुमार के चाचा लक्ष्मण सिंह व अन्य परिजनों को अपने साथ राया थाने लिवा लाया. सब से पहले लक्ष्मण व अन्य परिजनों को पोस्टमार्टम हाउस में प्रिजर्व कर के रखा गया शव दिखाया तो उन्होंने देखते ही उस की पहचान शिवकुमार के रूप में कर दी.

लक्ष्मण सिंह ने कपड़ों को देख कर भी साफ कर दिया कि उस ने जो कपड़े पहने थे, वह घर से पहन कर गया था. साथ ही उन्होंने मृतक शिवकुमार के शव के पास मिली फोटो को देख कर स्पष्ट कर दिया कि वह फोटो शिवकुमार तथ उस की पत्नी पूनम की है. पूछताछ करने पर लक्ष्मण ने बताया कि 14 दिसंबर को शिवकुमार अपनी पत्नी पूनम के साथ ताजमहल जाने की बात कह कर बस से गया था. दोपहर अपने मामा ओंकार सिंह से मुलाकात करने के लिए भरतपुर गेट मथुरा जाने की कह कर आया था. उन्होंने बताया कि शिवकुमार की शादी इसी साल 29 जून को अलीगढ़ जिले के गांव गोरोला निवासी पूनम से हुई थी. लक्ष्मण ने बताया कि उन के बेटे सूरज की शादी भी इसी गांव में हुई थी और उस के सुझाव पर उन के भाई भरत सिंह ने बेटे शिवकुमार का विवाह पूनम से किया था.

चूंकि शादी के बाद से कोरोना की महामारी के कारण शिवकुमार अपनी पत्नी को कहीं भी घूमने के लिए ले कर नहीं गया था, इसीलिए उस ने पहली बार पत्नी को घुमाने का प्लान बनाया था और ताजमहल घुमाने के लिए ले कर गया था. शिवकुमार की हत्या और उस की पत्नी पूनम के लापता होने की गुत्थी को लक्ष्मण सिंह भी नहीं समझ पा रहे थे. इंसपेक्टर शर्मा को लग रहा था कि हो न हो शिवकुमार की हत्या और उस की पत्नी के लापता होने में कोई राज जरूर है. शिवकुमार तथा उस की पत्नी पूनम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. शिवकुमार की काल डिटेल्स से तो पुलिस को कुछ खास मदद नहीं मिली. लेकिन पूनम की काल डिटेल्स खंगाली गई तो पता चला कि पिछले कुछ महीनों से पूनम की एक खास नंबर पर लंबीलंबी बातें दिन में कई बार होती थीं.

16 दिसंबर की सुबह जब पुलिस ने शिवकुमार का शव बरामद किया था, उस दिन तथा उस से पहले 3-4 दिन में उसी नंबर पर पूनम की कई बार लंबी बातचीत हुई थी. पुलिस ने जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि वह पूनम के ही गांव गोरोला में रहने वाले किसी संदीप के नाम है. जांच जैसेजैसे आगे बढ़ रही थी, धीरेधीरे पूरा माजरा भी पुलिस की समझ में आ रहा था. क्योंकि जब पूनम व संदीप के फोन की लोकेशन ट्रेस की गई तो 15 दिसंबर की शाम से ले कर अभी तक दोनों के फोन की लोकेशन अलीगढ़ व मथुरा के बौर्डर एरिया में एक साथ मिल रही थी. साफ था कि पूनम व संदीप एक साथ हैं. पुलिस की एक टीम पूनम की तलाश में उस के मायके पहुंची, लेकिन वहां उस का कोई पता नहीं चल सका.

पुलिस ने लोकेशन के आधार पर कई टीमें बना कर अलीगढ़ में अलगअलग छापेमारी शुरू कर दी. आखिरकार पुलिस ने पूनम व संदीप को मथुरा व अलीगढ़ बौर्डर के गांव नगला गंजू से उस के एक दोस्त के घर से गिरफ्तार कर लिया. दोनों को राया थाने में ला कर पूछताछ शुरू की गई तो पुलिस को शिवकुमार की हत्या का राज खुलवाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. पूनम पति से बेवफाई और अपनी निजी जिंदगी का एकएक राज खोलती चली गई. 24 साल की पूनम ने जब से जवानी की दहलीज पर कदम रखा था, तब से संदीप को ही अपना सब कुछ माना था. दोनों एक ही बिरादरी के थे, इसलिए पूनम ने कभी सोचा ही नहीं था कि संदीप को पति के रूप में देखने का उस का सपना कभी पूरा नहीं होगा.

पलवल के सेवली गांव के रहने वाले चंद्रपाल सिंह के 4 बच्चों में पूनम सब से बड़ी थी. उस से छोटी एक बहन व 2 भाई थे. गांव में खेतीकिसानी करने वाले पिता को जब एक साल पहले पता चला कि बड़ी बेटी पूनम गांव में ही रहने वाले महावीर के छोटे बेटे संदीप से प्यार करती है तो उन का गुस्सा फूट पडा. दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज भी एक ही गांव में रहने वाले युवकयुवतियों को आपस में भाईबहन मानने की प्रथा है. इसलिए चंद्रपाल सिंह ने पूनम से साफ कह दिया कि वे मर जाएंगे, लेकिन संदीप से उस की शादी नहीं करेंगे. पूनम ने पिता से साफ कहा कि वह संदीप से 3 सालों से प्यार करती है और उस के बिना जीने की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की है. अगर उन्होंने उस की शादी कहीं कर भी दी तो वह खुश नहीं रह पाएगी. क्योंकि वह तन मन से संदीप को ही अपना पति मान चुकी है.

चंद्रपाल सिंह ने बेटी को ऊंचनीच और समाज का वास्ता दे कर उस वक्त शांत तो कर दिया लेकिन उन्हें लगा कि अगर जल्द ही बेटी के हाथ पीले नहीं किए तो वह समाज में उसे रुसवा कर सकती है. गांव में बिरादरी के ही एक दोस्त की बेटी की शादी पलवल के सूरज से हुई थी. सूरज के परिवार और खानदान के बारे में उन्हें पता था कि निहायत शरीफ और अच्छे परिवार का लड़का है. चंद्रपाल ने दोस्त से कह कर पूनम के लिए अपने घरपरिवार में कोई लड़का देखने की बात कही तो सूरज ने उसे बताया कि उस के चाचा का लड़का शिवकुमार भी शादी के लायक है.

शिवकुमार भाइयों में सब से बड़ा था. हालांकि घर में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस पर परिवार के लोग खेती करते थे. लेकिन इस के अलावा भी शिवकुमार पलवल में एक कारखाने में नौकरी करता था. जब खेती का काम ज्यादा होता तो नौकरी छोड़ देता था. कुल मिला कर जिंदगी की गुजरबसर ठीक तरह से हो रही थी. सूरज ने जब अपने चाचा और पिता को अपनी ससुराल में रहने वाले चंद्रपाल की लड़की पूनम का जिक्र किया तो परिवार को लगा कि अच्छा ही देखाभाला परिवार है दोनों भाइयों की ससुराल एक ही गांव में होगी तो अच्छा रहेगा. एक दिन सूरज ने शिवकुमार को अपनी ससुराल में ले जा कर चोरी से उसे पूनम को दिखा भी दिया. शिवकुमार को पूनम पहली ही नजर में भा गई.

गांव की सीधीसादी और मासूम सी पूनम को देख कर शिवकुमार ने घर वालों से पूनम से शादी करने की हां भर दी. इस के बाद दोनों परिवारों में बात हुई और कोरोना के कारण दोनों परिवारों ने सादगी के साथ शादी संपन्न करा दी. शादी के बाद पूनम शिवकुमार की दुलहन बन कर उस के गांव सेवली आ गई. दोनों का वक्त धीरेधीरे प्यार के बीच गुजरने लगा. लेकिन शादी के बाद एक भी दिन पूनम अपने दिल से संदीप का प्यार व उस की यादों को निकाल नहीं सकी थी. वक्त जैसेजैसे गुजर रहा था, संदीप के लिए उस की तड़प और ज्यादा बढ़ती जा रही थी. वह जब भी मायके जाती तो चोरीछिपे संदीप से जरूर मिलती और किसी तरह शिवकुमार से छुटकारा दिला कर अपनी बनाने का दबाव उस पर डालती.

संदीप भी पूनम के बिना खुद को अधूरा समझता था. उस ने पूनम को भरोसा दिलाया कि जल्द ही वह उस के लिए कुछ करेगा. 9 दिसंबर को पूनम के भाई की शादी हुई थी. इस में शिवकुमार अपनी पत्नी के साथ गया था. 3 दिन तक वह वहीं रहा. उसी दौरान पूनम को संदीप के साथ कई बार मिलने का मौका मिला. संदीप ने उस से कहा कि शिवकुमार से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि उस की हत्या कर दी जाए. उस के बाद जब वह विधवा हो जाएगी तो परिवार वाले एक गांव का होने के बावजूद उन की शादी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे.

बात पूनम की समझ में आ गई. उस ने शिवकुमार की हत्या करने के लिए हामी भर दी. लेकिन शिवकुमार को कैसे मारा जाए कि उन पर कोई अंगुली भी न उठे. इस के लिए 2-3 मुलाकातों में ही पूनम ने संदीप से मिल कर हत्या की पूरी साजिश तैयार कर ली. शादी के बाद पूनम पति शिवकुमार के साथ वापस आ गई. पूनम व संदीप के पास मोबाइल फोन थे, जिस के माध्यम से वे शादी के बाद से एकदूसरे से बातचीत किया करते थे और वाट्सऐप कालिंग करते रहते थे. लेकिन भाई की शादी से लौटने के बाद पूनम का संदीप से फोन पर बातचीत करने का सिलसिला ज्यादा बढ़ गया. क्योंकि उन्हें अपनी उस योजना को अंजाम देना था, जिस के साथ शिवकुमार को रास्ते से हटाना था.

संदीप ने पूनम से कहा था कि अगले एकदो दिन में वह अपने पति को आगरा घूमने के लिए राजी कर ले और उसे अपने साथ आगरा ले आए. पूनम ने ऐसा ही किया. उस ने शिवकुमार से कहा कि शादी के बाद वह उसे कहीं घुमाने नहीं ले गया. कम से कम आगरा में प्यार की निशानी आगरा का ताजमहल तो दिखा दें. फरमाइश कोई ज्यादा बड़ी और नाजायज भी नहीं थी, लिहाजा शिवकुमार परिवार वालों से इजाजत ले कर 14 दिसंबर को पूनम को ताजमहल दिखाने के लिए बस से आगरा ले आया. 14 दिसंबर को पूनम और शिवकुमार आगरा ताजमहल घूमते रहे. रात को एक होटल में रुके. अगले दिन सुबह यानी 15 दिसंबर को उन्होंने ताजमहल देखा और शाम को वहीं रुके.

अगली सुबह 6 बजे आगरा से बस द्वारा घर के लिए निकल पड़े. हालांकि शिवकुमार का प्लान यह था कि पहले मथुरा जा कर कृष्ण जन्मभूमि व प्रेम मंदिर देखेंगे उस के बाद मथुरा में अपने मामा से मिलेगा और बाद में घर जाएगा. लेकिन बस में बैठते समय पूनम ने अनुरोध कर के उस का प्लान बदलवा दिया. दरअसल, पूनम ने कहा था कि राया के पास उस के रिश्ते के एक मौसा रहते हैं. उन्होंने कई बार उस से पति के साथ घर आने के लिए कहा है. थोड़ी देर के लिए उन से मिलने के बहाने वह शिवकुमार को ले कर राया के पास एक्सप्रेसवे के यमुना कट पर ही उतर गई. दरअसल, शिवकुमार पत्नी से इतना प्यार करता था और भले स्वभाव का था कि उसे पता ही नहीं था कि पूनम एक साजिश के तहत उसे राया लाई है. हकीकत यह थी कि वहां उस का कोई मौसा नहीं रहता था.

इस दौरान संदीप से लगातार उस की बात चल रही थी. उस वक्त सुबह के करीब 7 बजे थे. एक्सप्रेसवे पर बस से उतरने के बाद पूनम ने चाय पीने की इच्छा जताई तो उन्होंने एक स्टाल पर रुक कर चाय पी. इस के बाद पूनम ने साजिश के तहत शिवकुमार से टौयलेट जाने की बात कही तो वह असमंजस में पड़ गया. क्योंकि एक्सप्रेसवे पर सब जगह टायलेट तो होते नहीं हैं. लेकिन पत्नी को इमरजेंसी थी, लिहाजा सब से उचित जगह सड़क के नीचे दिख रहा जंगल ही था. लिहाजा शिवकुमार पूनम को ले कर नीचे जंगल की ओर उसे टौयलेट कराने के लिए ले गया. लेकिन उसे क्या पता था कि मौत पहले से वहां उस का इंतजार कर रही है. संदीप वहां पहले ही झाडि़यों में छिपा था.

जैसे ही शिवकुमार उस की तरफ पीठ कर के खड़ा हुआ, संदीप ने दबेपांव पीछे से जा कर शिवकुमार के सिर पर भारीभरकम पत्थर दे मारा. इस के बाद संदीप और पूनम ने शिवकुमार के सिर पर पत्थर से कई प्रहार किए. शिवकुमार वहीं निढाल हो कर गिर पड़ा. शिवकुमार के पास 2 बैग थे. एक बैग में पूनम के कपडे़ थे, दूसरे में शिवकुमार के कपड़े. शिवकुमार के बैग से पूनम ने सारा सामान निकाल कर अपने बैग में रख लिया ताकि बैग में ऐसी कोई चीज न मिले, जिस से शिवकुमार की पहचान हो सके. लेकिन गलती से शिवकुमार और पूनम का ताजमहल पर खिंचवाया गया फोटो वाला लिफाफा थैले में ही रह गया था. इसी आधार पर पुलिस ने मृतक की शिनाख्त की थी.

दरअसल, हत्या का ये पूरा प्लान संदीप ने ही तैयार किया था. शिवकुमार की हत्या करने के बाद वे दोनों वहां से टैंपो कर के मथुरा की ओर भाग आए थे. इस के बाद वे इधर से उधर भागते रहे. पूनम एक दिन बाद ससुराल जाने का मन बना रही थी. उस से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूनम की हालत ऐसी हो गई न तो सनम मिला ना ही विसाले सनम. एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर ने हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 10 हजार रुपए पुरस्कार देने की घोषणा की है. पुलिस ने पूनम व संदीप से पूछताछ करने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर सक्षम न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों तथा पीडि़त परिवार के बयान पर आधारित

 

UP News : परेशान प्रेमिका ने प्रेमी के सिर पर सिलेंडर मारकर की हत्या

UP News : सीमा की शादी हो जाने के बाद नीरज को उस से दूरी बना लेनी चाहिए थी. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया बल्कि वह उस की ससुराल तक जाने लगा. एक दिन उस ने सीमा के साथ जोरजबरदस्ती करने की कोशिश की तो सीमा भी विकराल हो गई. इस के बाद…

नीरज बनसंवर कर घर से जाने लगा, तो उस के भाई धीरज ने उसे टोका, ‘‘नीरज इतनी रात को तुम कहां जा रहे हो? क्या कोई जरूरी काम है या फिर किसी की शादी में जा रहे हो?’’

‘‘भैया, मेरे दोस्त के घर भगवती जागरण है. मैं वहीं जा रहा हूं.’’ नीरज बोला.

फिर नीरज ने कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर डाली और बोला, ‘‘भैया, अभी रात के साढ़े 9 बजे हैं. मैं 12 बजे तक लौट आऊंगा.’’ कहते हुए नीरज घर से बाहर चला गया. नीरज उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर शहर की सुरेखापुरम कालोनी में रहता था. धीरज और उस की पत्नी नीरज के इंतजार में रात 12 बजे तक जागते रहे. जब वह घर नहीं आया तो उन्हें चिंता हुई. वे दोनों घर के अंदरबाहर कुछ देर चहलकदमी करते रहे, फिर धीरज ने अपने मोबाइल फोन से नीरज को फोन किया. पर उस का फोन बंद था. धीरज ने कई बार फोन मिलाया, लेकिन हर बार फोन बंद ही मिला. रात 2 बजे तक वह नीरज के इंतजार में जागता रहा. उस के बाद उस की आंख लग गई.

अभी सुबह का उजाला ठीक से फैला भी नहीं था कि धीरज का दरवाजा किसी ने जोरजोर से पीटना शुरू किया. अलसाई आंखों से धीरज ने दरवाजा खोला तो सामने एक अनजान व्यक्ति खड़ा था. धीरज ने उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं और दरवाजा क्यों पीट रहे हैं?’’

उस अनजान व्यक्ति ने अपना परिचय तो नहीं दिया. लेकिन यह जरूर बताया कि उस का भाई नीरज डंगहर मोहल्ले में मीना किन्नर के घर के पास गंभीर हालत में पड़ा है. उस ने घर का पता बताया था और खबर देने का अनुरोध किया था, सो वह चला आया. भाई के घायल होने की जानकारी पा कर धीरज घबरा गया. उस ने अड़ोसपड़ोस के लोगों को जानकारी दी और फिर उन को साथ ले कर डंगहर मोहल्ले में मीना किन्नर के घर के पास पहुंच गया. उस समय वहां भीड़ जुटी थी. धीरज ने अपने भाई नीरज को मरणासन्न स्थिति में देखा तो वह घबरा गया. उस का सिर फटा हुआ था, जिस से वह लहूलुहान था. लग रहा था जैसे उस के सिर पर किसी ने भारी चीज से हमला किया था.

उस ने थाना कटरा पुलिस को इस की जानकारी दी फिर सहयोगियों के साथ नीरज को इलाज के लिए निजी डाक्टर के पास ले गया. लेकिन डाक्टर ने हाथ खड़े कर लिए और पुलिस केस बता कर सदर अस्पताल ले जाने की सलाह दी. यह बात 28 नवंबर, 2020 की सुबह 8 बजे की है. जीवित होने की आस में धीरज अपने भाई नीरज को सदर अस्पताल मिर्जापुर ले गया. डाक्टरों ने नीरज को देखते ही मृत घोषित कर दिया. भाई की मृत्यु की बात सुन कर धीरज फफक कर रोने लगा. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल प्रशासन ने सूचना थाना कटरा पुलिस को दी. सूचना पाते ही प्रभारी निरीक्षक रमेश यादव पुलिस बल के साथ सदर अस्पताल आ गए. उन्होंने धीरज को धैर्य बंधाया और घटना के संबंध में पूछताछ की.

धीरज ने बताया कि वह सुरेखापुरम कालोनी में रहता है. उस का भाई नीरज बीती रात साढ़े 9 बजे यह कह कर घर से निकला था कि वह दोस्त के घर जागरण में जा रहा है. लेकिन सुबह उसे उस के घायल होने की जानकारी मिली. तब उस ने उसे सदर अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

‘‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे भाई पर कातिलाना हमला किस ने किया है?’’ श्री यादव ने पूछा.

‘‘सर, मुझे कुछ भी पता नहीं है.’’ धीरज ने जवाब दिया.

पूछताछ के बाद श्री यादव ने नीरज के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. नीरज की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. उस के सिर पर किसी ठोस वस्तु से प्रहार किया गया था, जिस से उस का सिर फट गया था. संभवत: सिर में गहरी चोट लगने के कारण ही उस की मौत हो गई थी. शरीर के अन्य भागों पर भी चोट के निशान थे. निरीक्षण के बाद उन्होंने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इधर नीरज की हत्या की खबर सुरेखापुरम कालोनी पहुंची तो कालोनी में सनसनी फैल गई. धीरज के घर लोगों की भीड़ जमा हो गई. लोगों में जवान नीरज की हत्या को ले कर गुस्सा था. गुस्साई भीड़ ने मिर्जापुर नगर के बथुआ के पास मिर्जापुर-रीवा मार्ग जाम कर दिया तथा पुलिस विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए.

सड़क जाम की सूचना कटरा कोतवाल रमेश यादव को हुई तो वह पुलिस बल के साथ वहां पहुंचे. उन्होंने भीड़ को समझाने का प्रयास किया तो भीड़ और उत्तेजित हो गई. लोगों की शर्त थी कि जब तक पुलिस अधिकारी नहीं आएंगे, तब तक वह सड़क पर बैठे रहेंगे. इस पर श्री यादव ने जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. उन्होंने अधिकारियों को यह भी बताया कि भीड़ बढ़ती जा रही है तथा स्थिति बिगड़ती जा रही है. हत्या के विरोध में सड़क जाम की सूचना पा कर एसपी अजय कुमार सिंह, एडीशनल एसपी (सिटी) संजय कुमार तथा सीओ अजय राय मौके पर पहुंचे. उन्होंने मृतक के घर वालों एवं उत्तेजित लोगों को समझाया तथा आश्वासन दिया कि नीरज के कातिलों को जल्द ही पकड़ा जाएगा. पुलिस अधिकारियों के इस आश्वासन पर भीड़ ने सड़क खाली कर दी.

एसपी अजय कुमार सिंह ने नीरज की हत्या को चुनौती के रूप में लिया. अत: हत्या का खुलासा करने के लिए उन्होंने एक विशेष टीम का गठन एएसपी (सिटी) संजय कुमार व सीओ अजय राय की देख रेख में गठित कर दी. इस टीम में प्रभारी निरीक्षक रमेश चंद्र यादव, चौकी इंचार्ज अजय कुमार श्रीवास्तव, हैडकांस्टेबल भोलानाथ, दारा सिंह, अरविंद सिंह, महिला कांस्टेबल रिचा तथा पूजा मौर्या को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया. उस के बाद मृतक नीरज के भाई धीरज का बयान दर्ज किया. पुलिस टीम ने अपनी जांच किन्नर मीना के घर के आसपास से शुरू की और दरजनों लोगों से पूछताछ की.

इस का परिणाम भी सार्थक निकला. पूछताछ से पता चला कि मृतक का आनाजाना डंगहर मोहल्ला निवासी विशाल यादव के घर था. विशाल की पत्नी सीमा (परिवर्तित नाम) और मृतक नीरज के बीच दोस्ती थी. लेकिन विशाल को नीरज का घर आना पसंद नहीं था. पुलिस टीम ने अपनी जांच आगे बढ़ाई और विशाल यादव के पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि बीती रात 12 बजे के आसपास विशाल यादव के घर झगड़ा हो रहा था. मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. फिर कुछ देर बाद खामोशी छा गई थी. पर झगड़ा किस से और क्यों हो रहा था, यह बात पता नहीं है.

विशाल यादव और उस की पत्नी सीमा पुलिस टीम की रडार पर आए तो टीम ने दोनों को हिरासत में ले कर पूछताछ करने की योजना बनाई. योजना के तहत पुलिस टीम रात 10 बजे विशाल यादव के घर पहुंची और विशाल को हिरासत में ले लिया. महिला कांस्टेबल रिचा और पूजा मौर्या ने विशाल की पत्नी सीमा को अपनी कस्टडी में ले लिया. दोनों को थाना कटरा लाया गया. थाने पर जब उन से नीरज की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो विशाल व उस की पत्नी सीमा ने सहज ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. विशाल यादव ने बताया कि वह मंजू रिटेलर टायर बरौंधा में काम करता है. उस की ड्यूटी रात में लगती है. बीती रात साढ़े 11 बजे नीरज उस के घर में घुस आया था और उस की पत्नी सीमा के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा था. उस ने जब सीमा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की तो उस ने इस का विरोध किया.

इसी बात को ले कर सीमा और नीरज में विवाद होने लगा. उस की पत्नी सीमा ने अपने बचाव में घर में रखे एक छोटे सिलेंडर से नीरज के सिर पर प्रहार कर दिया. जिस से उस के सिर में गंभीर चोट आ गई. इसी बीच विशाल भी घर आ गया, सच्चाई पता चली तो उसे भी गुस्सा आ गया, उस ने भी नीरज को मारापीटा और घर से भगा दिया. शायद गंभीर चोट लगने से उस की मौत हो गई. जुर्म कबूलने के बाद विशाल यादव ने आलाकत्ल छोटा सिलेंडर तथा ईंट अपने घर से पुलिस टीम को बरामद करा दी. पुलिस टीम ने नीरज हत्याकांड का परदाफाश करने तथा आलाकत्ल सहित उस के कातिलों को पकड़ने की जानकारी एसपी अजय कुमार सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर नीरज हत्याकांड का खुलासा किया.

यही नहीं उन्होंने हत्याकांड का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को 10 हजार रुपए पुरस्कार देने की भी घोषणा की. चूंकि हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी रमेश यादव ने मृतक के भाई धीरज की तरफ से धारा 304 आईपीसी के तहत विशाल यादव व उस की पत्नी सीमा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक औरत और उस के जुर्म की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई. उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर शहर के सुरेखापुरम कालोनी में 2 भाई धीरज व नीरज श्रीवास्तव रहते थे. यह कालोनी थाना कटरा के अंतर्गत आती है. धीरज की शादी हो चुकी थी जबकि नीरज अविवाहित था.

उन के पिता रमेशचंद्र श्रीवास्तव की मौत हो चुकी थी. धीरज की बथुआ में मोबाइल फोन और एसेसरीज की दुकान थी, जबकि उस का छोटा भाई नीरज मोबाइल पार्ट्स की सप्लाई करता था. दोनों भाई खूब कमाते थे और मिलजुल कर रहते थे. एक रोज नीरज सुरेखापुरम कालोनी स्थित एक मोबाइल की दुकान पर कुछ मोबाइल पार्ट्स देने पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात एक खूबसूरत युवती से हुई. उस समय वह वहां अपना मोबाइल फोन ठीक कराने आई थी. युवती और नीरज की आंखें एकदूसरे से मिलीं तो पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे को भा गए. दोनों में बातचीत शुरू हुई तो युवती ने अपना नाम सीमा बताया. वह भी सुरेखापुरम कालोनी में ही रहती थी. बातचीत के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया. फिर दोनों में अकसर मोबाइल फोन पर बातें होने लगीं. बातों का दायरा बढ़ता गया. फिर वे प्यारमोहब्बत की बातें करने लगे.

दरअसल सीमा विवाहित थी. उस के पिता ने उस की शादी एक सजातीय युवक के साथ की थी. सीमा दुलहन बन कर ससुराल तो गई लेकिन उसे वहां का वातावरण बिलकुल रास नहीं आया. ऊंचे ख्वाब सजाने वाली स्वच्छंद युवती को ससुराल की मानमर्यादा की सीमाओं में बंध कर रहना भला कैसे भाता. सुहागरात में तो उस के सारे अरमान धूल धूसरित हो कर रह गए. उस का पति उस की इच्छापूर्ति की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया. सीमा को ससुराल बंद पिंजरे की तरह लगने लगी थी, जहां वह किसी परिंदे की तरह फड़फड़ाने लगी थी. स्वच्छंदता पर सामाजिक मानमर्यादा की बंदिशें लग चुकी थीं. मन की तरंगे घूंघट के भीतर कैद हो कर रह गई थीं. ससुराल में उस का एकएक दिन मुश्किल में बीतने लगा.

सीमा ने एक दिन निश्चय कर लिया कि एक बार यहां से निकलने के बाद वह कभी अपनी ससुराल नहीं आएगी. आखिर एक दिन उस के घर वाले उसे बुलाने आ गए तो वह अपनी ससुराल को हमेशा के लिए अलविदा कह कर अपने मायके आ गई. मायके आ कर सीमा सजसंवर कर स्वच्छंद हो कर घूमने लगी. एक रोज उस का फोन खराब हो गया तो वह उसे ठीक कराने के लिए पास के ही एक मोबाइल शौप पर गई तो वहां उस की मुलाकात एक सजीले युवक नीरज से हुई. उस के बाद दोनों अकसर मिलने लगे. बाद में सीमा नीरज के साथ घूमने भी जाने लगी. कुछ ही दिनों में दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच अंतरंग संबंध बन गए. अवैध रिश्तों का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया. जब भी दोनों को मौका मिलता, एकदूसरे की बांहों में समा जाते.

लेकिन ऐसी बातें समाज की नजरों से ज्यादा दिनों तक छिपती कहां हैं. धीरेधीरे पूरे मोहल्ले में नीरज और सीमा के नाजायज रिश्ते की चर्चा होने लगी. जवान बेटी ससुराल छोड़ कर बाप की छाती पर मूंग दले, इस से बड़ा कष्ट बाप के लिए और क्या हो सकता है. ऊपर से जब उस के नाजायज रिश्तों की बात पता चले तो उस के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात होती है. सीमा के बाप का धैर्य टूटा तो उस ने उस पर लगाम कसनी शुरू की और उस के योग्य कोई लड़का खोजना शुरू कर दिया. इस बीच प्रतिबंध लग जाने से सीमा और नीरज का मिलना कुछ कम हो गया. काफी दौड़धूप के बाद घर वालों ने सीमा का दूसरा विवाह विशाल यादव के साथ वर्ष 2019 में कर दिया. विशाल यादव के पिता कल्लू यादव की मृत्यु हो चुकी थी. विशाल मिर्जापुर शहर के कटरा थाना अंतर्गत डंगहर मोहल्ले में रहता था और मंजू रिटेलर टायर बरौंधा कचार में काम करता था.

विशाल यादव से विवाह करने के बाद सीमा हंसीखुशी से ससुराल में रहने लगी. यहां उसे कोई बंधन न था. न घर में सास थी न ससुर. पति भी सीधासादा था. वह पति से जिस भी चीज की मांग करती, वह उसे पूरा कर देता था. क्योंकि पत्नी की खुशी में ही अपनी खुशी समझता था. उस की मांग पर उस ने उसे नया मोबाइल फोन भी ला कर दे दिया था. होना यह चाहिए था कि जब सीमा ने दूसरी शादी कर ली तो नीरज को उस की ससुराल नहीं जाना चाहिए था. लेकिन नीरज नहीं माना. वह शारीरिक सुख पाने के लिए सीमा के घर जाने लगा. सीमा कभी तो उसे लिफ्ट दे देती, तो कभी उसे दुत्कार भी देती. सीमा नाराज हो जाती तो नीरज उसे उपहार दे कर या फिर आर्थिक मदद कर उस की नाराजगी दूर करता.

सीमा के पति विशाल की ड्यूटी रात में रहती थी. उस के जाने के बाद ही नीरज सीमा से मिलने आता था. फिर घंटा, 2 घंटा उस के साथ बिताने के बाद वापस चला जाता था. पड़ोसियों ने पहले तो गौर नहीं किया, लेकिन जब नीरज अकसर वहां आने लगा तो उन के कान खड़े हो गए. उन्होंने विशाल को हकीकत बताई तो उस के मन में शंका का बीज उपज आया. विशाल ने इस बाबत सीमा से जवाब तलब किया तो वह उसे बरगलाने की कोशिश करने लगी. विशाल ने सख्ती की तो सीमा ने सच्चाई बयां कर दी और यह कहते हुए माफी मांग ली कि आज के बाद वह नीरज से कोई वास्ता नहीं रखेगी.

विशाल ने घर टूटने के खौफ से सीमा को माफ कर दिया. इस के बाद सीमा ने सख्त रुख अख्तियार करना शुरू कर दिया. अब नीरज जब भी उस के घर आता, सीमा उसे दुत्कार कर भगा देती, लेकिन नीरज दुत्कारने के बावजूद सीमा से मिलने पहुंच जाता. वह सीमा को मनाने की भी कोशिश करता. 27 नवंबर, 2020 की रात साढ़े 9 बजे नीरज बनसंवर कर घर से निकला. उस ने अपने भाई धीरज से झूठ बोला कि वह दोस्त के घर जागरण में जा रहा है. घर से निकल कर वह कुछ देर इधरउधर घूमता रहा फिर रात साढ़े 11 बजे वह डंगहर स्थित सीमा के घर जा पहुंचा. सीमा ने उसे दुत्कारा और घर से निकल जाने को कहा.

लेकिन नीरज नहीं माना. उस ने सीमा को धकेल कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और सीमा से जोरजबरदस्ती करने लगा. सीमा ने विरोध किया तो वह जबरदस्ती उसे अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश करने लगा. सीमा बचाव में हाथपैर चलाने लगी. इसी बीच उस की निगाह छोटे गैस सिलेंडर पर पड़ी. उस ने लपक कर सिलेंडर उठाया और नीरज के सिर पर दे मारा. नीरज का सिर फट गया और वह जमीन पर गिर पड़ा. इसी समय किसी ने दरवाजा खटखटाया. सीमा ने दरवाजा खोला तो सामने उस का पति विशाल था. वह पति के सीने से लिपट गई और बोली, ‘‘नीरज जबरदस्ती घर में घुस आया था और उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था.’’

सीमा की बात सुन कर विशाल का गुस्सा बढ़ गया. उस ने ईंट से उसे पीटना शुरू कर दिया. नीरज तब चीखनेचिल्लाने लगा और माफी भी मांगने लगा. बुरी तरह पीटने के बाद विशाल ने नीरज को घर के बाहर धकेल दिया. नीरज घायल अवस्था में कुछ दूर तक गया फिर मीना किन्नर के घर के सामने गिर पड़ा. रात भर ठंड में वह वहीं पड़ा रहा. सुबह कुछ लोग घर से टहलने निकले तो उन्होंने नीरज को गंभीर हालत में देखा. उधर से गुजरने वाले एक व्यक्ति को अपने घर का पता देते हुए खबर देने का अनुरोध किया. जब उस व्यक्ति ने नीरज के घर खबर की तो उस का भाई धीरज आया. धीरज ने उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

विशाल यादव और सीमा से पूछताछ के बाद पुलिस ने 29 नवंबर, 2020 को दोनों अभियुक्तों को मिर्जापुर की जिला अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में सीमा नाम परिवर्तित है.

 

पत्नी ने रचाई साजिश : 5 लाख की सुपारी देकर कराया पति का खौफनाक कत्ल

Crime News : मौडर्न और महत्त्वाकांक्षी विनीता ने प्रवक्ता पति के होते 2-2 प्रेमी बना लिए थे. जब वह चेन मार्केटिंग कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ने के बाद तो वह अवधेश को 2 कौड़ी का समझने लगी थी. आखिर उस ने अपने मन की करने के लिए…

42 वर्षीय अवधेश सिंह जादौन फिरोजाबाद जिले के भीतरी गांव के निवासी थे. वह बरेली जिले के सहोड़ा में स्थित कुंवर ढाकनलाल इंटर कालेज में हिंदी लेक्चरर के पद पर तैनात थे. नौकरी के चलते ढाई वर्ष पहले उन्होंने बरेली के कर्मचारीनगर की निर्मल रेजीडेंसी में अपना निजी मकान ले लिया था, जिस में वह अपनी पत्नी विनीता और 6 वर्षीय बेटे अंश के साथ रहते थे. 12 अक्तूबर, 2020 को अवधेश से फोन पर गांव में रह रही उन की मां अन्नपूर्णा देवी ने बात की थी. अवधेश उस समय काफी परेशान थे. मां ने उन्हें दिलासा दी कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद उन्होंने अवधेश से बात करनी चाही, लेकिन बात न हो सकी. उन का मोबाइल बराबर स्विच्ड औफ आ रहा था. अन्नपूर्णा को चिंता हुई तो वह 16 अक्तूबर को बरेली पहुंच गईं. जब वह बेटे के मकान पर पहुंची, तो वहां मेनगेट पर ताला लगा मिला.

पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि 12 अक्तूबर, 2020 को कुछ लोग कार से अवधेश के मकान में आए थे. तब से उन्हें नहीं देखा. अन्नपूर्णा का दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा. वह वहां से स्थानीय थाना इज्जतनगर पहुंच गईं और थाने के इंसपेक्टर के.के. वर्मा को पूरी बात बताई. यह भी बताया कि अवधेश को अपने ससुरालीजनों से खतरा था. यह बात अवधेश ने 12 अक्तूबर को फोन पर बात करते समय मां को बताई थी. उस की पत्नी विनीता भी अपने बच्चे के साथ गायब थी. इस पर अन्नपूर्णा से लिखित तहरीर ले कर इंसपेक्टर वर्मा ने थाने में अवधेश सिंह जादौन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.  फिरोजाबाद के फरिहा में 4/5 दिसंबर, 2019 की रात एक ज्वैलर्स की दुकान में हुई चोरी के मामले में पुलिस के एसओजी प्रभारी कुलदीप सिंह ने नारखी थाना क्षेत्र के धौकल गांव निवासी हिस्ट्रीशीटर शेर सिंह उर्फ चीकू को पकड़ा.

25 अक्तूबर, 2020 की शाम शेर सिंह को उठा कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बरेली के हिंदी प्रवक्ता अवधेश सिंह की हत्या करना स्वीकार किया. अवधेश की पत्नी विनीता ने अवधेश की हत्या के लिए उसे 5 लाख की सुपारी दी थी. इस में विनीता के पिता थाना नारखी के खेरिया खुर्द गांव निवासी रिटायर्ड फौजी अनिल जादौन, भाई प्रदीप जादौन, बहन ज्योति, विनीता का आगरा निवासी प्रेमी अंकित और शेर सिंह के 2 साथी भोला और एटा निवासी पप्पू जाटव शामिल थे. हत्या में कुल 8 लोग इस शामिल थे. शेर सिंह ने बताया कि बरेली में हत्या करने के बाद लाश को सभी लोग फिरोजाबाद ले कर आए और यहां नारखी में रामदास नाम के व्यक्ति के खेत में गड्ढा खोद कर दफना दिया था.

अवधेश मिला पर जीवित नहीं इस खुलासे के बाद फिरोजाबाद पुलिस ने बरेली की इज्जतनगर पुलिस को सूचना दी. अवधेश की मां अन्नपूर्णा को बुला कर 26 अक्तूबर, 2020 को फिरोजाबाद पुलिस ने तहसीलदार की उपस्थिति में उस खेत में बताई गई जगह पर खुदाई करवाई तो वहां से अवधेश की लाश मिल गई. चेहरा बुरी तरह जला हुआ था. शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अवधेश की लाश मिलने के बाद उसी दिन इज्जतनगर थाने में विनीता, ज्योति, अनिल जादौन, प्रदीप जादौन, अंकित, शेर सिंह उर्फ चीकू, भोला सिंह और पप्पू जाटव के विरुद्ध भादंवि की धारा 147/302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के बाद हत्याभियुक्तों की तलाश में ताबड़तोड़ दबिश दी गई, लेकिन सभी अपने घरों से लापता थे.

उन सब के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए गए. सभी के मोबाइल बंद थे. बीच में किसी से बात करने के लिए कुछ देर के लिए खुलते तो फिर बंद हो जाते. उन की लोकेशन जिस शहर की पता चलती, वहां पुलिस टीम भेज दी जाती. लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही हत्यारे वहां से निकल जाते थे. 31 अक्तूबर, 2020 को एक हत्यारोपी पप्पू जाटव उर्फ अखंड प्रताप को इंसपेक्टर के.के. वर्मा ने गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी बयान में वहीं कहा, जो शेर सिंह ने कहा था. इस बीच 5 नवंबर को इज्जतनगर पुलिस ने सभी आरोपियों के गैरजमानती वारंट हासिल कर लिए. अगले ही दिन इस से डर कर अवधेश की पत्नी विनीता ने अपने वकील के माध्यम से थाने में आत्मसमर्पण कर दिया.

पूछताछ में वह अपने मृतक पति अवधेश को ही गलत साबित करने पर तुल गई. जबकि उस की सारी हकीकत सब के सामने आ गई. जब उस से क्रौस क्वेशचनिंग की गई. कई सवालों पर वह चुप्पी साध गई. अनिल जादौन परिवार के साथ फिरोजाबाद के गांव खेरिया खुर्द में रहते थे. वह सेना से रिटायर थे. परिवार में पत्नी रेखा और 3 बेटियां विनीता, नीतू और ज्योति व एक बेटा प्रदीप था. अनिल के पास पर्याप्त कृषियोग्य भूमि थी. तीनों बेटियां काफी खूबसूरत थीं और सभी ने स्नातक तक पढ़ाई पूरी कर ली थी. 2010 में नीतू का अफेयर गांव के ही पूर्व प्रधान के बेटे के साथ हो गया. जिस पर काफी बवाल हुआ. इस पर अनिल ने जल्द से जल्द अपनी बेटियों का विवाह करने का फैसला कर लिया. नारखी थाना क्षेत्र के ही गांव भीतरी में बाबू सिंह का परिवार रहता था.

परिवार में पत्नी अन्नपूर्णा और 2 बेटे रमेश और अवधेश थे. रमेश का विवाह हो चुका था और वह परिवार के साथ जयपुर में रह कर नौकरी कर रहा था. अविवाहित अवधेश हिंदी प्रवक्ता के पद पर नौकरी कर रहा था. नौकरी के चक्कर में उस की उम्र अधिक हो गई थी. अवधेश विनीता से 12 साल बड़ा था. फिर भी अनिल विनीता की शादी उस से करने को तैयार हो गए. अनिल ने विनीता से बात की तो वह मना करने लगी कि 12 साल बड़े लड़के से शादी नहीं करेगी. अनिल ने जब समझाया कि वह सरकारी नौकरी में है, उस के पास पैसों की कमी नहीं है तो वह शादी के लिए तैयार हो गई. 2011 में अवधेश का विनीता से विवाह हो गया. उसी दिन ज्योति का भी विवाह हुआ. विनीता मायके से ससुराल आ गई. विनीता पढ़ीलिखी आजाद खयालों वाली युवती थी. जबकि अवधेश सीधेसादे सरल स्वभाव का था. दोनों एक बंधन में तो बंध गए थे लेकिन उन के विचार, उन की सोच बिलकुल एकदूसरे से अलग थी.

पति सीधा था पत्नी मौडर्न विनीता को ठाठबाट से रहना पसंद था. जबकि अवधेश को साधारण तरीके से जीवन जीना अच्छा लगता था. दोनों की सोच और खयाल एक नहीं थे तो उन में आए दिन मनमुटाव और विवाद होने लगा. विनीता की अपनी सास अन्नपूर्णा से भी नहीं बनती थी. अवधेश अपनी मां की बात मानता था. विनीता इस बात को ले कर भी चिढ़ती थी. दोनों के बीच विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहे थे. 6 साल पहले विनीता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने अंश रखा. ढाई वर्ष पहले बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र के कर्मचारी नगर की निर्मल रेजीडेंसी में अवधेश ने अपना निजी मकान ले लिया. पहले वह मकान विनीता के नाम लेना चाहता था.

लेकिन उस की बातें और हरकतों से उस का मन बदल गया. वह विनीता व बेटे के साथ अपने नए मकान में आ कर रहने लगा. बढ़ते आपसी विवादों में विनीता अवधेश से नफरत करने लगी थी. उस ने शादी से पहले सोचा था कि अवधेश उस के कहे में चलेगा, उस की अंगुलियों के इशारे पर नाचेगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. पैसों के लिए उसे अवधेश का मुंह देखना पड़ता था. अवधेश अपनी सैलरी से विनीता को उस के खर्च के लिए 3 हजार रुपए महीने देता था. उस में विनीता का गुजारा नहीं होता था. अपने खर्चे को देखते हुए विनीता ने घर में ही ‘रिलैक्स जोन’ नाम से एक ब्यूटीपार्लर खोल लिया. विनीता अपनी छोटी बहन ज्योति की ससुराल जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात सिपाही अंकित यादव से हो गई.

अंकित यादव बिजनौर का रहने वाला था. उस समय उस की पोस्टिंग मैनपुरी में थी. अंकित अविवाहित था और काफी स्मार्ट था. विनीता से उस की बात हुई तो वह उस के रूपजाल में उलझ कर रह गया. फिर दोनों मोबाइल पर बातें करने लगे. एक दिन अंकित विनीता से मिलने बरेली आया. दोनों एक होटल में मिले. उस दिन से दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए. विनीता से मिलने वह अकसर बरेली आने लगा. विनीता का भाई प्रदीप एक मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करता था. उस ने विनीता से कहा कि वह मल्टीलेवल मार्केटिंग से जुड़ी कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ जाए. इस में कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का मौका मिलता है. चेन मार्केटिंग कंपनियां कंपनी से जुड़ने वाले लोगों को बड़ेबडे़ सपने दिखाती हैं.

विनीता ने भी कंपनी से जुड़ने का फैसला कर लिया. वह कई मीटिंग में गई और मीटिंग में जाने के बाद उस पर चेन मार्केटिंग के जरिए जल्द से जल्द पैसा कमा कर रईस बनने का नशा सवार हो गया. इस के लिए उस ने इसी साल की शुरुआत में कंपनी जौइन कर ली. इस के लिए विनीता ने किसी बड़ी महिला अधिकारी की तरह अपनी वेशभूषा बनाई. शानदार सूटबूट में चश्मा लगा कर जब वह इंग्लिश में बड़े विश्वास के साथ अपनी बात किसी भी व्यक्ति के सामने रखती तो वह उस का मुरीद हो जाता और उस के कहने पर कंपनी जौइन कर लेता. भाई प्रदीप की लाल टीयूवी कार विनीता अपने पास रखने लगी. वह इसी कार से लोगों से मिलने जाती थी.

लग्जरी कार से सूटेडबूटेड महिला को उतरता देख कर लोगों पर इस का काफी गहरा प्रभाव पड़ता. घर की चारदीवारी से विनीता बाहर निकली तो उस ने अपने लिए पैसों का इंतजाम करना शुरू कर दिया. अब लोग विनीता से मिलने घर पर भी आने लगे. विनीता की चल पड़ी दुकान अवधेश तो दिन में कालेज में होता था और शाम को ही लौटता था. उसे पड़ोसियों से पता चलता तो अवधेश और विनीता में विवाद होता. विनीता पहले जब अवधेश से नहीं डरीदबी तो अब तो वह खुद का काम कर रही थी. ऐसे में अवधेश को ही शांत होना पड़ता था. दोनों  के बीच की दूरियां गहरी खाई में तब्दील होती जा रही थीं. दूसरी ओर विनीता की बहन ज्योति का अपनी ससुरालवालों से मनमुटाव हो गया था. वह काफी समय से मायके में रह रही थी. विनीता ने उसे अपने पास रहने के लिए बुला लिया. इस से भी अवधेश खफा था.

लौकडाउन के दौरान फेसबुक पर विनीता की दोस्ती अमित सिसोदिया उर्फ अंकित से हुई. अमित आगरा का रहने वाला था और वेस्टीज कंपनी से ही जुड़ा था, जिस से विनीता जुड़ी थी. अमित विवाहित था और एक बेटे का पिता भी था. दोनों की फेसबुक पर बातें हुईं तो पता चला कि अमित विनीता के भाई प्रदीप का दोस्त है. इस के बाद दोनों खुल कर बातें करने लगे और मिलने भी लगे. दोनों अलगअलग शहरों में होने वाले कंपनी के सेमिनार में भी साथ जाने लगे. अमित और विनीता की सोच और विचार काफी मिलते थे. एक साथ रहने के दौरान विनीता को यह बात महसूस हो गई थी. दोनों ही जिंदगी में खूब पैसा कमाना चाहते थे. दोनों साथ बैठते तो कल्पनाओं की ऊंची उड़ान भरते. एक दिन अमित ने विनीता का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘विनीता, हम दोनों बिलकुल एक जैसे है.

एक जैसा सोचते हैं, एक जैसा काम करते है और एक ही उद्देश्य है, एकदूसरे का साथ भी हमें भाता है. क्यों न हम हमेशा के लिए एक हो जाएं.’’

विनीता पहले हलके से मुसकराई, फिर गंभीर मुद्रा में बोली, ‘‘हां अमित, मैं भी ऐसा ही सोच रही थी. यह भी सोच रही थी कि तुम मेरी जिंदगी में पहले क्यों नहीं आए, आ जाते तो मुझे कष्टों से न गुजरना पड़ता.’’ कुछ पलों के लिए रुकी, फिर बोली, ‘‘खैर अब भी हम एक हो सकते हैं ठान लें तो.’’

विनीता की स्वीकृति मिलते ही अमित खुश हो गया, ‘‘तुम ने कह दिया तो अब हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता.’’ कह कर अमित ने विनीता को बांहों में भर लिया. विनीता भी उस से लिपट गई. अमित को पा कर जैसे विनीता ने राहत की सांस ली. उसे ऐसे ही युवक की तलाश थी जो उस के जैसा हो, उसे समझता हो और उस के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए. दूसरी ओर वह अंकित यादव से भी संबंध बनाए हुए थी. विनीता दिनरात एक कर के अपने मार्केटिंग के बिजनैस में सफल होना चाहती थी. इसलिए वह इस में लगी रही. कुछ महीनों में ही उस ने अपने अंडर में एक हजार लोगों की टीम खड़ी कर दी. कंपनी ने उसे कंपनी का ‘सिलवर डायरेक्टर’ घोषित कर दिया.

विनीता खुशी से फूली नहीं समाई. कंपनी ने उसे एक स्कूटी भी इनाम में दी. विनीता अपनी कंपनी के कार्यक्रमों और उस के रिकौर्डेड संदेशों को अपने फेसबुक अकाउंट पर डालती रहती थी. कंपनी से जुड़ने के लिए लोगों से अपील भी करती थी कि उस के पास बिजनैस करने का एक अनोखा आइडिया है, जिस में महीने में 5 से 50 हजार तक कमा सकते हैं. जो कमाना चाहते हैं, उस से मिलें. विनीता की जिंदगी में सब कुछ अब अच्छा ही अच्छा हो रहा था. बस खटकता था तो अवधेश. उस के साथ होने वाली कलह. अब विनीता अवधेश से छुटकारा पाने की सोचने लगी थी. उस की जिंदगी में अमित आ चुका था, वह उस के साथ जिंदगी बिताने का सपना देखने लगी थी. अमित भी उस से कई बार कह चुका था कि वह कहे तो अवधेश को ठिकाने लगा दिया जाए. वह ही मना कर देती थी.

अवधेश के मरने से उसे हमेशा के लिए छुटकारा तो मिलता ही साथ ही अवधेश का मकान और सरकारी नौकरी भी मिल जाती. यही सोच कर उस ने आगे की योजना बनानी शुरू कर दी. इस में उस ने अपने पिता व भाई से साफ कह दिया कि वह अवधेश के साथ नहीं रहना चाहती. उसे मारने से उसे मकान और उस की सरकारी नौकरी भी मिलेगी. विनीता के पिता अनिल ने एक बार कहा भी कि वह अपना बसा हुआ घर न उजाड़े, लेकिन विनीता नहीं मानी. विनीता की जिद और लालच के लिए वे सभी उस का साथ देने को तैयार हो गए. विनीता का एक मुंहबोला चाचा था शेर सिंह उर्फ चीकू. वह उस के पिता अनिल का खास दोस्त था. शेर सिंह नारखी थाने का हिस्ट्रीशीटर था, उस पर वर्तमान में 16 मुकदमे दर्ज थे.

विनीता ने शेर सिंह से कहा कि उसे उस के पति अवधेश की हत्या करनी है. शेर सिंह ने उस से 5 लाख रुपए का इंतजाम करने को कहा तो विनीता ने हामी भर दी. अवधेश ने कार खरीदने के लिए घर में रुपए ला कर रखे थे. सोचा था कि नवरात्र में बुकिंग करा देगा और धनतेरस पर गाड़ी खरीद लेगा. उन पैसों पर विनीता की नजर पड़ गई. उन रुपयों में से 70 हजार रुपए निकाल कर विनीता ने शेर सिंह को दे दिए, बाकी पैसा बाद में देने को कहा. इस के बाद शेर सिंह ने अपने गांव के ही भोला सिंह और एटा के पप्पू जाटव को हत्या में साथ देने के लिए तैयार कर लिया. शेर सिंह ने विनीता, विनीता के पिता अनिल, भाई प्रदीप और प्रेमी अमित सिसोदिया के साथ मिल कर अवधेश की हत्या की योजना बनाई. विनीता ने बाद में ज्योति को इस बारे में बता कर उसे भी अपने साथ शामिल कर लिया.

12 अक्तूबर, 2020 की रात अवधेश रोज की तरह टहलने के लिए निकले. उस के जाने के बाद विनीता ने हत्या के उद्देश्य से पहुंचे शेर सिंह, भोला, पप्पू जाटव, अनिल, प्रदीप और अमित को घर के अंदर बुला लिया. सभी घर में छिप कर बैठ गए. कुछ देर बाद जब अवधेश लौटे तो घर में घुसते ही सब ने मिल कर उसे दबोच लिया. विनीता अपने बेटे अंश को ले कर ऊपरी मंजिल पर चली गई. नीचे सभी ने अवधेश को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया. अवधेश के मरने के बाद विनीता नीचे उतर कर आई. अवधेश की लाश को बड़ी नफरत से देख कर गाली देते हुए उस में कस के पैर की ठोकर मार दी. देर रात अमित ने लाश को सभी के सहयोग से अपनी आल्टो कार में डाल लिया. इस के बाद प्रदीप की टीयूवी कार जो विनीता के पास रहती थी, सब उस में सवार हो गए.

प्रदीप कार चला रहा था. उस के पीछे थोड़ी दूरी पर अंकित चल रहा था. लगभग साढ़े 3 घंटे का सफर तय कर के अवधेश की लाश को ले कर वे फिरोजाबाद में नारखी पहुंचे. लेकिन तब तक उजाला हो चुका था. इसलिए लाश को कहीं दफना नहीं सकते थे. इन लोगों ने पूरा दिन ऐसे ही निकाला. इस बीच लाश को जलाने के लिए बाजार से तेजाब खरीद कर लाया गया. अंधेरा होने पर नारखी में रामदास के खेत में गड्ढा खोद कर अवधेश की लाश को उस में डाल दिया गया. फिर लाश पर तेजाब डाल दिया गया, जिस से लाश का चेहरा व कई हिस्से जल गए. लाश को दफनाने के बाद सभी वहां से लौट आए. विनीता बराबर वीडियो काल के जरिए उन लोगों के संपर्क में थी. 14 अक्तूबर, 2020 को वह भी बेटे अंश को ले कर घर से भाग गई.

शेर सिंह पकड़ा गया तो घटना का खुलासा हुआ. उस ने विनीता के प्रेमी अंकित का नाम लिया. घटना की खबर अखबारों की सुर्खियां बनीं तो विनीता के प्रेमी सिपाही अंकित यादव ने देखा. अंकित ने अपना नाम समझा. उसे लगा कि पुलिस को विनीता की काल डिटेल्स से उस के बारे में पता लग गया है. अब वह भी इस हत्याकांड की जांच में फंस जाएगा. दूसरी ओर अंकित नाम आने पर विनीता के शातिर दिमाग ने खेल खेला. अपने प्रेमी अमित सिसोदिया को बचाने के लिए वह अंकित को ही फंसाने में लग गई. 26 अक्तूबर, 2020 को वह अंकित यादव से मिलने संभल गई. 2 महीने से अंकित संभल की हयातनगर चौकी पर तैनात था. वहां वह उस से मिली. कुछ सिपाहियों ने उसे उस के साथ देखा भी. विनीता उस से मिल कर चली गई. अंकित भयंकर तनाव में आ गया.

27 अक्तूबर, 2020 को उस ने अपने साथी सिपाही की राइफल ले कर उस से खुद को गोली मार ली. अंकित के आत्महत्या कर लेने की बात विनीता को पता चल गई थी. इसलिए जब उस ने आत्मसमर्पण किया तो वह सारा दोष अंकित यादव पर डालती रही. वह अपने प्रेमी अमित सिसोदिया उर्फ अंकित को बचाना चाहती थी. समर्पण से पहले विनीता ने अपना मोबाइल भी तोड़ दिया था, ताकि पुलिस उस मोबाइल से कोई सुराग हासिल न कर सके. गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद से सभी आरोपियों में इस बात का खौफ है कि पुलिस उन की संपत्तियों को तोड़फोड़ सकती है, कुर्क कर सकती है. इसलिए बारीबारी से सभी आत्मसमर्पण करने की तैयारी में लग गए.

फिलहाल कथा लिखे जाने तक पुलिस शेष आरोपियों की तलाश में जुटी हुई थी. शेर सिंह की रिमांड 20 नवंबर को मिलनी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों व मीडिया में छपी रिपोर्टों के आधा

Love Crime : साली के इश्क में ढाई लाख सुपारी देकर गर्भवती पत्नी की कराई हत्या

Love Crime : शंभू ने खेल तो बड़ी होशियारी से खेला था, लेकिन वह भूल गया कि पुलिस की आंखों में धूल झोंकना आसान नहीं होता. शंभू का सपना तो पूरा नहीं हुआ. हां, वह जेल जरूर पहुंच गया, वह भी…

9 जुलाई, 2020 को शंभू रजक पत्नी रूबी को ससुराल से विदा करा कर लाया था और अपने गांव झाईंचक लौट रहा था. दोनों बाइक पर थे. समय रहा होगा सुबह के 9 बजे का. नैशनल हाइवे की चौड़ी और शानदार सड़क होने के बावजूद शंभू की बाइक की स्पीड 35-40 किमी प्रति घंटे की थी. वजह यह कि उस की पत्नी रूबी 4 माह के गर्भ से थी. रूबी तीसरी बार गर्भवती हुई थी. पहले भी उस की 2 बेटियां थीं. शंभू लोहानीपुर भिवानी मोड़ से कुछ आगे निकल कर जगनपुरा मोड़ पर पहुंचा तो उस ने बाइक सड़क किनारे रोक दी. कुछ देर रुक कर वह बाइक ले कर चल दिया. जब वह थोड़ा आगे ब्रह्मपुर मोड़ पहुंचा, तो उस ने देखा मोड़ पर 2 युवक नीले रंग की बाइक लिए सड़क किनारे खड़े थे और आपस में बातचीत कर रहे थे.

शंभु बाइक चलाते हुए आगे बढ़ गया. तभी वे दोनों पीछे से आए और शंभु को ओवरटेक कर के उस की बाइक से अपनी बाइक लगभग सटा कर चलने लगे. शंभू बाइक से गिरतेगिरते बचा. युवकों की इस हरकत पर उसे गुस्सा आ गया. रूबी को बाइक से नीचे उतार कर वह उन युवकों से भिड़ गया. रूबी पति को मना कर रही थी कि जो हो गया, हो गया, अब बस भी करो, घर चलो, बदतमीजों के मुंह क्यों लगते हो, लेकिन शंभू ने पत्नी की एक न सुनी. उस ने आव देखा न ताव, युवकों से 2-2 हाथ करने के लिए उतावला हो गया. देखतेदेखते दोनों के बीच विवाद गहरा गया. तभी उन में से एक युवक ने अंटी में रखी देशी पिस्टल निकाली और शंभू पर गोली चला दी.

गोली चलते ही जान बचाने के लिए शंभू नीचे झुक गया. गोली उस के पीछे खड़ी पत्नी रूबी के सिर में जा धंसी और वह सड़क पर गिर कर छटपटाने लगी. तब तक दोनों युवक मौके से फरार हो गए. सड़क पर गिरी रूबी की मौत हो गई. शंभू पत्नी की लाश के पास बिलखबिलख कर रो रहा था. उसे रोता देख कर कुछ राहगीर रुक गए. उन्हें बातोंबातों में पता चला कि रोने वाले की पत्नी की 2 लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गए. धीरेधीरे तमाशबीनों की भारी भीड़ जमा हो गई थी. उसी भीड़ में से किसी ने पुलिस कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. वह इलाका गोपालपुर थाने में आता था. हत्या की सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ थानाप्रभारी आलोक कुमार घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के कुछ देर बाद एसपी सिटी (पूर्वी) जितेंद्र कुमार भी वहां गए.

पुलिस ने घटनास्थल की जांच की. मौके से पुलिस को कारतूस का एक खोखा मिला. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार ने पीडि़त शंभू रजक से बदमाशों का हुलिया पूछा. उस ने बताया कि दोनों की उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच रही होगी. वे नीले रंग की बाइक पर सवार थे. पूछताछ में शंभू ने पुलिस को यह भी बताया कि बदमाशों ने 4 किलोमीटर पहले से उस का पीछा करना शुरू किया था. पत्नी 4 माह की गर्भवती थी, इसलिए वह धीरेधीरे बाइक चला रहा था. शंभू से घटना के संबंध में अहम जानकारी ले कर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज, पटना भिजवा दिया. शंभू रजक की तहरीर पर पुलिस ने 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. उस के बाद पुलिस बदमाशों की सुरागरसी में जुट गई.

शंभू ने पुलिस को बताया था कि दोनों बाइक सवार 4 किलोमीटर से उस का पीछा कर रहे थे. पुलिस ने घटनास्थल से 4 किलोमीटर पहले तक बदमाशों की पहचान के लिए सभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले. आश्चर्य की बात यह थी कि सीसीटीवी फुटेज में कोई भी पीछा करता नजर नहीं आया. यह देख कर जांच अधिकारी हैरान थे कि शंभु ने झूठ क्यों बोला. पुलिस को लगा कि कहीं न कहीं मामला संदिग्ध है और शंभू की भूमिका भी संदिग्ध है. विवेचनाधिकारी आलोक कुमार ने इस की जानकारी एसएसपी उपेंद्र शर्मा और एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार को दी. यह सुन कर वे भी चौंके. दोनों पुलिस अधिकारियों ने आलोक कुमार से कहा कि शंभू को थाने बुला कर उस से गहन पूछताछ करो.

तब 11 जुलाई को थानाप्रभारी आलोक कुमार ने शंभू को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. फिर उस से 4 घंटे तक गहन पूछताछ की. आखिरकार शंभू ने पुलिस के सवालों के आगे अपने घुटने टेक ही दिए. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुआ कहा कि उसी ने ढाई लाख की सुपारी दे कर अपनी गर्भवती पत्नी रूबी की हत्या कराई थी. उस ने बताया कि वह पत्नी से एक वारिस यानी बेटे की आस लगाए था. वह बेटे की बजाए बेटियां पैदा किए जा रही थी, इसलिए वह साली से शादी करना चाहता था. पत्नी उस की राह में रोड़ा बन गई थी. इसलिए उस ने उसे रास्ते से हटा दिया.

शंभू की बात सुन कर सभी दंग रह गए. पूछताछ करने पर शंभू ने सिलसिलेवार पूरी कहानी पुलिस को बता दी. उस के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर दोनों हत्यारों को उसी दिन रात में जयनगर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में दोनों बदमाशों ने अपने नाम ऋषि कुमार और नवीन कुमार बताए. दोनों जक्कनपुर थाने के जयनगर (पटना) मोहल्ले के रहने वाले थे. पूछताछ में दोनों बदमाशों ने अपने जुर्म कबूल कर लिए. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त नीले रंग की बाइक, एक देशी पिस्टल और एक जिंदा कारतूस बरामद कर लिया था. करीब 60 घंटों के अंदर पुलिस ने रूबी हत्याकांड से परदा उठा दिया था. यही नहीं घटना में शामिल तीनों आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया था.

पुलिस टीम की कार्यप्रणाली से खुश हो कर एसएसपी ने पुलिस टीम को 25 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की. 12 जुलाई को दिन में एसएसपी उपेंद्र शर्मा ने पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की. पत्रकारों के सामने तीनों आरोपियों ने पूरी घटना विस्तार से बताई. पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद रूबी की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

35 वर्षीय शंभू रजक मूलरूप से पटना जिले के थाना परसा बाजार इलाके के झाईंचक का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी रूबी और 2 बेटियां थीं, जिन की उम्र 6 साल और 4 साल थी. शंभू रजक के घर में सब कुछ था. शहर के बीचोबीच उस की लौंड्री की दुकान थी. दुकान अच्छीभली चलती थी. जिस से अच्छी कमाई होती थी. बस कमी थी तो एक बेटे की. रूबी पति को समझाती थी कि आजकल बेटीबेटे में कोई फर्क नहीं है. लड़कियां किसी मामले में लड़कों से कम नहीं होतीं. पत्नी की बातें सुन शंभू के दिल को थोड़ा सुकून मिलता था. फिर भी उसे कभीकभी अपने बुढ़ापे के सहारे की जरूरत महसूस होती थी. शंभु की एक साली थी खुशबू. वह अपने जीजा शंभू के दिल की बात को शिद्दत से महसूस करती थी. कभीकभी वह उस की दुखती रग पर अपने प्यार का मरहम भी लगा देती थी.

दरअसल, खुशबू का ज्यादातर समय बहन की ससुराल में ही बीतता था. रूबी के छोटेछोटे बच्चे थे. बच्चे संभालने में उसे दिक्कत होती थी. अपना हाथ बंटाने के लिए उस ने बहन को अपने पास ही रख लिया था. खुशबू के पास रहने से उसे काफी राहत मिलती थी. खुशबू जवान और खूबसूरत थी, ऊपर से चंचल, सो अलग. उस की खूबसूरती में शंभू कब डूब गया था, उसे पता ही नहीं चला. एहसास तो तब होता था, जब साली कभी अपने घर लोहानीपुर भिखना चली जाती थी. जीजा और साली के बीच मजाक का रिश्ता होता ही है. मजाकमजाक में शंभू खुशबू से ऐसा ऐसा मजाक करता था जो उसे नहीं करना चाहिए था. जीजा की रसीली बातें सुन कर खुशबू शरम से गुलाबी हो जाती थी. फिर अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा कर दूसरे कमरे में भाग जाती और वहां खिलखिला कर हंसती थी. खुशबू की यही अदा शंभू को भा गई थी.

खुशबू जब कभी लोहानीपुर चली जाती थी तो शंभू को अपना घर खालीखाली लगता था. फिर वह उसे जल्द ही बुला लाता था. शंभू साली खुशबू के प्यार में डूब चुका था, खुशबू भी उसे बहुत चाहती थी. साली और जीजा का प्यार पत्नी की नाक के नीचे परवान चढ़ रहा था. रूबी को इस की भनक तक नहीं लगी. उसे क्या पता था उस की अपनी ही बहन उस के सिंदूर पर डाका डाल रही है. एक दिन शंभू खुशबू को शाम के वक्त पार्क घुमाने ले गया. पार्क घुमाना तो एक बहाना था. शंभू के मन में कुछ और ही चल रहा था. उसे अपने मन की बात साली से शेयर करनी थी. दोनों घास पर बैठ गए. शंभु ने अपने हाथों में उस की हथेलियां लेते हुए कहा, ‘‘खुशबू, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’ शंभु ने सीधे कह दिया.

‘‘ये कैसी बहकीबहकी बातें कर रहे हैं, जीजू. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. दुनिया तो हम पर थूकेगी कि एक बहन ने बहन के घर में डाका डाल दिया. फिर दीदी के जिंदा रहते यह कैसे संभव है?’’ खुशबू जीजा की बातें सुन कर थोड़ा सकपका गई. उन दोनों के बीच घंटों तक इसी मुद्दे पर बातें होती रहीं, लेकिन खुशबू बहन की जगह लेने के लिए फिलहाल तैयार नहीं हुई. उस ने शंभु से थोड़ा सोचने की मोहलत मांगी. जीजा और साली के बीच की यह नजदीकियां रूबी को खटकने लगी थीं. खुशबू के हावभाव से उसे उस पर शक हो गया था कि दोनों के बीच में कोई खिचड़ी पक रही है. उस दिन के बाद से रूबी बहन और पति दोनों पर अपनी पैनी नजर रखने लगी. वह खुद ही पति के करीब अब ज्यादा रहने लगी थी. यह देख कर शंभू का माथा ठनका कि कहीं पत्नी को उस पर शक तो नहीं हो गया है.

बाद में दोनों के बीच में खुशबू को ले कर विवाद भी होने लगा था. रूबी ने पति से साफसाफ कह दिया था कि खुशबू अब यहां नहीं रहेगी. वह बहुत सेवा कर चुकी, उसे मांबाप के पास लोहानीपुर भिखना वापस जाना होगा. पत्नी की जिद के आगे शंभु की एक नहीं चली. खुशबू को जाना पड़ा. इस से शंभू नाराज था. वह साली की जुदाई में तड़प रहा था. उस की नजरों के सामने साली का चेहरा घूमता रहता था. शंभू ने खुशबू को अपना बनाने की ठान ली थी. इस के बदले वह पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए तैयार था. इस खतरनाक योजना को उस ने अपने तक गोपनीय ही रखा, खुशबू को इस की भनक तक नहीं लगने दी. बात पिछले साल अक्तूबर की है. शंभू किसी काम से पटना से बाहर गया हुआ था.

लौटते समय पटना स्टेशन पर उस की मुलाकात जयप्रकाश नगर में रहने वाले सुपारी किलर 25 वर्षीय ऋषि कुमार से हुई. शंभू ऋषि के नाम और काम दोनों से वाकिफ था. उस ने ऋषि को बताया था कि उसे साली से प्रेम हो गया है. वह पत्नी रूबी का काम तमाम कराना चाहता है. ऋषि काम करने को तैयार हो गया. इस के बदले उस ने शंभू से 3 लाख रुपए की डिमांड की. सौदा ढाई लाख रुपए में तय हो गया. साली के इश्क में अंधे शंभू ने पत्नी रूबी की ढाई लाख रुपए में सुपारी दे दी थी. पेशगी के तौर पर उसे 50 हजार रुपए देने थे. उस समय उस के पास किलर को देने के लिए केवल 20 हजार रुपए थे. बाकी पैसे के लिए उस ने बैंक से 30 हजार रुपए लोन लिया. उस ने किलर ऋषि को पेशगी के तौर पर उसे 50 हजार रुपए दे दिए, बाकी के 2 लाख रुपए काम होने के बाद देना तय हुआ.

रकम पाने के बाद शूटर ऋषि अपने काम को अंजाम देने में जुट गया. कहते हैं जाको राखे साइयां, मार सके न कोय. कुछ ऐसा ही रूबी के साथ भी हुआ. रूबी की हत्या के लिए ऋषि ने कई प्रयास किए, लेकिन वह अपनी योजना को अंजाम नहीं दे सका. नया साल यानी 2020 का मार्च महीना बीत गया, रूबी सहीसलामत बची रही. इसी बीच रूबी गर्भवती हो गई. उस के पांव भारी होते ही शंभू का मन यह सोच कर पिघल गया कि हो सकता है, इस बार वह अपने कुल के लिए एक चिराग दे दे तो सब कुछ ठीक हो जाए. पत्नी के लिए शंभू का प्यार छलक पड़ा. इस प्यार में भी उस का ही स्वार्थ छिपा था. लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था उस की कोख में पल रहा बच्चा बेटा है या बेटी. इस का पता तो 3 महीने बाद ही चल सकता था.

तब तक तो उसे इंतजार ही करना था लेकिन शंभू ने यह फैसला कर लिया था अगर इस बार भी इस ने बेटी को जना तो इस का मरना तय है. 4 महीने बाद यानी जून महीने में शंभू ने किसी तरह यह पता लगा लिया कि रूबी के गर्भ में इस बार भी बेटी है. इस के बाद उस का प्यार पत्नी के लिए नफरत में बदल गया. उसी पल उस ने किलर ऋषि से कांटेक्ट किया और पत्नी को रास्ते से हटाने को कह दिया. शंभू की ओर से हरी झंडी मिलते ही ऋषि तैयार हो गया. घटना को अंजाम कैसे देना है, इस की रूपरेखा दोनों ने मिल कर तैयार की. बस उसे अंजाम देना शेष था. इस खतरनाक योजना की भनक शंभू ने साली खुशबू तक को भी नहीं लगने दी.

योजना के मुताबिक, 8 जुलाई, 2020 को शंभू अपनी बाइक से दोनों बेटियों और पत्नी को ले कर ससुराल लोहानीपुर भिखना सासससुर से मिलने आया था. उस ने रूबी से कहा कि कई महीने से तुम मायके नहीं गई हो, चलो तुम्हें मम्मीपापा से मिलवा लाते हैं. रात में वहीं रुक जाएंगे, अगली सुबह घर लौट आएंगे. रूबी मायके जाने के लिए तैयार हो गई. ससुराल पहुंचने के बाद देर रात शंभू ने ऋषि को फोन किया कि शिकार तैयार है. अगली सुबह काम हो जाना चाहिए. कब और कहां, वह सुबह फोन कर के उसे बता देगा. सुबह शंभू जब ससुराल से पत्नी और बच्चों को ले कर घर के लिए निकला तो उस ने ऋषि को फोन कर के बता दिया कि वह ससुराल से निकल रहा है, तैयार रहना. उस ने यह भी बता दिया था जगनापुर से ब्रह्मपुर होते हुए निकलेगा.

सब कुछ योजना के मुताबिक हो रहा था. जैसे ही शंभू बाइक ले कर जगनापुर से ब्रह्मपुर मोड़ पहुंचा, वहां किलर ऋषि अपने साथी नवीन कुमार के साथ पहले से खड़ा शंभू के आने का इंतजार कर रहा था. ऋषि को देख कर उस ने अपनी बाइक की गति कम कर दी. उस के बाद सड़क पर खड़े ऋषि ने जानबूझ कर अपनी बाइक उस की बाइक में भिड़ा दी. ये सब सुनियोजित योजना की कड़ी थी. बाइक में टक्कर लगते ही शंभू बाइक रोक कर उस से उलझने का नाटक करने लगा. दिखावे के तौर पर शंभू और ऋषि आपस में भिड़ गए. उधर पति को झगड़ते देख रूबी ने उसे समझाने की कोशिश की कि जो हुआ सो हुआ, झगड़े की कोई बात नहीं है, घर चलें.

शंभू ने उस की एक नहीं सुनी. शंभू ऋषि और रूबी के बीच में खड़ा था. यही वह चाहता भी था. उस ने ऋषि से इशारों में पूछा निशाना सही है क्या, पलक झपका कर उस ने हां में उत्तर दिया. फिर क्या था,ऋषि ने कमर में खोंसा पिस्टल निकाला और शंभू के सिर पर सटा दिया. शंभू जानबूझ कर नीचे की ओर झुक गया. पिस्टल से चली गोली सीधे रूबी के माथे में जा घुसी. वह नीचे जमीन पर गिर पड़ी. थोड़ी ही देर में उस ने दम तोड़ दिया. तब तक ऋषि अपने साथी नवीन के साथ मौके से फरार होने में कामयाब हो गया. शंभू ने जिस चालाकी से पत्नी की मौत का तानाबाना बुना था, पुलिस अधिकारियों ने महज 60 घंटे में उस के मंसूबे पर पानी फेर दिया.

48 घंटे के भीतर किलर ऋषि और उस के साथी नवीन को पकड़ कर जेल पहुंचा दिया. ऋषि के खिलाफ पटना के विभिन्न थानों में करीब दरजन भर हत्या, हत्या के प्रयास, लूट आदि के मुकदमे दर्ज हैं. तीनों आरोपी शंभू रजक, ऋषि कुमार और नवीन कुमार जेल के सलाखों के पीछे कैद है.

—कथा में खुशबू नाम परिवर्तित है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.