Love Crime: गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रोकने की साजिश – प्रेमी ने कंपनी को दी बम से उड़ाने की धमकी

Love Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जो आप को भी हैरान कर देगा. जहां एक बौयफ्रेंड ने अपनी गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रुकवाने की ऐसी साजिश रची कि सभी हैरान रह गए. उस ने ईमेल के जरिए कंपनी को एक मैसेज भेजा और कहा कि वह बम से उड़ा देगा. चलिए जानते हैं इस लव और क्राइम की स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाले क्राइम से सचेत करेगी.

यह घटना हरियाणा के गुरुग्राम के सेक्टर 43 स्थित वन होराइजन सेंटर में एक निजी कंपनी से सामने आई है. जहां प्रेमी अनिकेत ने सुबह 9 बजे कंपनी को मेल भेज कर धमकी दी. यह मेल कंपनी के औफिशियल मेल आईडी पर भेजा गया था. आसपास इलाके में बम की धमकी से हड़कंप मच गया. पुलिस को सूचना दी गई और पुलिस मौके पर पहुंची. इसके बाद पुलिस ने स्निक डौग और मेटल डिटेक्टर की मदद से कंपनी का पूरा केबिन चेक किया.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि मेल फेक था और बम की सूचना भी फेक थी. एसीपी विकास कौशिक ने बताया कि डीएलएफ थाना साइबर की पूरी टीम ने कंपनी में सभी को खाली करवा कर तलाशी ली. कई घंटों तक जांच चली, लेकिन पुलिस को कोई भी संदिग्ध वस्तु नहीं मिली.

जांच में खुलासा हुआ कि प्रेमी अनिकेत ने यह साजिश अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड से रिश्ता सुधारने के लिए रची थी. अनिकेत ने यह वारदात इसलिए की ताकि गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू स्थगित हो जाए और वह उस से फिर से संपर्क कर सके. आरोपी अनिकेत के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है. Love Crime

Crime News: कविता रैना हत्याकांड – कत्ल जो बन गया पहेली

Crime News: कविता रैना की हत्या पुलिस के लिए एक पहेली बन गई थी. इस पहेली को सुलझाने में 4 आईपीएस अधिकारी, 5 थानों की पुलिस, क्राइम ब्रांच और 200 पुलिस कर्मचारी लगे. आज तक का यह सब से महंगा और जटिल केस अब मध्य प्रदेश पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा.

कविता रैना की हत्या इंदौर पुलिस के लिए मिस्ट्री बन कर रह गई थी. एक ऐसा रहस्य, जिस का कोई भी सिरा ढूंढे नहीं मिल रहा था. सिरा मिला तो लेकिन 107 दिन बाद, वह भी तब जब 5 आईपीएस अफसरों सहित 200 पुलिस कर्मियों ने खानापीना भूल कर 20-20 घंटे काम किया. 177 लोगों से गहन पूछताछ की, डेढ़ लाख मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स की छानबीन की गई.

20 से ज्यादा बार मर्डर का ट्रायल किया गया.  1500 से ज्यादा मकानों और लगभग 200 गोदामों का चप्पाचप्पा छाना गया. 117 बुलेट मोटरसाइकिलों और 150 कारों को जांचा परखा गया. 100 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. 5 थानों की पुलिस के साथसाथ क्राइम ब्रांच को भी लगाया गया. यहां तक कि अजय देवगन, तब्बू स्टारर फिल्म ‘दृश्यम’ को कई बार इसलिए देखा गया कि कहीं हत्यारे ने फिल्म के नायक की तरह ही कोई दांव न खेला हो.

कविता रैना की हत्या की कहानी सुलझी तो लेकिन इंदौर पुलिस के लिए एक ऐसा इतिहास बन कर जो अब पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा. अपने पति संजय रैना, सास कांता रैना और 2 बच्चों बेटे ध्रुव और बेटी यशस्वी के साथ 81/2 सेक्टर-बी, मित्रबंधु नगर में रहती थीं कविता रैना. मित्रबंधु नगर इंदौर के कनाडि़या रोड पर है. कविता के पति संजय रैना एमिल फार्मास्युटिकल कंपनी में एरिया सेल्स मैनेजर थे. पहले कविता भी एक स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाने की वजह से उन्होंने 2 साल पहले पढ़ाना छोड़ दिया था. फिलहाल वह घर में रह कर महिलाओं के ब्लाउज वगैरह सिलने का काम करती थीं. ब्लाउज सिलने में उन्हें एक्सपर्ट माना जाता था.

कविता के पति संजय रैना अधिकांशत: कंपनी के कामों में व्यस्त रहते थे. इसलिए घरबार के छोटेमोटे काम भी कविता को करने  होते थे. इस के लिए उन्होंने एक्टिवा स्कूटी ले रखी थी. कविता की बेटी यशस्वी एक कान्वेंट स्कूल में पहली क्लास में पढ़ती थी. वह रोजाना स्कूल बस से आतीजाती थी. बस स्टाप बहुत ज्यादा दूर नहीं था. कविता सुबह को बेटी को स्कूटी से ले जा कर बस में बैठा आती थीं और दोपहर को खुद ही बस स्टाप से ले आती थीं.

24 अगस्त, 2015 की दोपहर को डेढ़ बजे यशस्वी की बस मित्रबंधु नगर के शर्मा स्वीट्स के सामने वाले स्टाप पर आकर रुकी तो अन्य बच्चों के साथ यशस्वी भी उतर गई. सभी बच्चों की मां या घर का कोई सदस्य उन्हें लेने आए थे, लेकिन यशस्वी की मां कविता रैना वहां नहीं आई थीं.

पिछले 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां यशस्वी को लेने स्टाप पर नहीं आई हों. मां को वहां न देख यशस्वी रुंआसी हो गई. कविता के पड़ोस में ही रहने वाली जया अपने बच्चे को लेने बस स्टाप पर आई थीं. उन्होंने यशस्वी को रुंआसी खड़ी देखा तो उसे समझाया, ‘‘हो सकता है तुम्हारी मां किसी काम में उलझ गई हों, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगी.’’

जया आंटी पड़ोस में ही रहती थीं. यशस्वी उन्हें जानती थी, इसलिए वह उन के साथ घर आ गई. यशस्वी को अकेला आया देख दादी कांता रैना ने पूछा, ‘‘तेरी मां नहीं पहुंची स्टाप पर? यहां से तो वह एक दस पर ही निकल गई थी.’’

‘‘मां वहां नहीं थीं, मैं आंटी के साथ आ गई.’’ यशस्वी ने बताया तो दादी बोली, ‘‘चल कोई बात नहीं, हो सकता है किसी काम में उलझ गई हो.’’ कांता रैना पोती की ड्रैस वगैरह चेंज कराने में लग गईं. बात वहीं समाप्त हो गई.

चूंकि कविता घर के कामों से बाहर जाती रहती थीं, इसलिए कांता रैना ने तो यह बात आसानी से मान ली कि वह किसी काम में उलझ गई होगी, लेकिन यह बात यशस्वी के गले नहीं उतर रही थी. इस की वजह यह थी कि 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां उसे लेने स्टाप पर न पहुंची हों. संजय रैना उस दिन एक मीटिंग के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे. उन्होंने नाश्ता तक नहीं किया था. दोपहर को लंच करने वह घर आए तो यशस्वी ने उन्हें बताया कि मां उसे लेने न तो बसस्टाप पर पहुंचीं और न ही अभी तक लौटी हैं. यह जान कर संजय रैना हैरान रह गए. उन्होंने कविता के मोबाइल पर फोन किया तो पता चला उन का मोबाइल घर में ही है. तब तक कविता को गए 2 घंटे हो चुके थे.

संजय को चिंता हुई तो वह खाना छोड़ कर कविता को ढूंढने निकल पड़े. उन्होंने कविता को हर जगह ढूंढा, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला. रिश्तेदारों और परिचितों को फोन भी किए पर कविता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. हर ओर से निराश हो कर उन्होंने थाना कनाडि़या में कविता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, लेकिन संजय जानते थे कि हालफिलहाल कुछ होने वाला नहीं है. इसलिए वह रिश्तेदारों और मित्रों के साथ कविता को खोजते रहे. कविता को लापता हुए 2 दिन हो गए लेकिन उन का कहीं कोई पता न चला.

इस से सब ने अनुमान लगाया कि कविता के साथ कोई अनहोनी हो गई है. 26 अगस्त को देवास के पास एक युवती की जली हुई लाश मिली तो पुलिस ने शिनाख्त के लिए संजय रैना को भी बुलाया क्योंकि उन्होंने पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. लाश पहचानने की स्थिति में नहीं थी. कपड़े वगैरह भी नहीं थे. संजय ने अनुमान से ही कह दिया कि हो सकता है वह उन की पत्नी की लाश हो. पुलिस ने इसे सत्य मान कर उन से हस्ताक्षर भी करवा लिए. यह खबर सुन कर संजय के घर में कोहराम मच गया. पूरा परिवार रोनेधोने लगा. तभी खबर आई कि थाना भंवर कुआं क्षेत्र में 3 इमली चौराहे के पास वाले गंदे नाले में 2 बोरों में एक महिला की 6 टुकड़ों में कटी लाश मिली है.

दरअसल, कचरा बीनने वाले 2 लड़कों ने नाले में 2 बोरे पड़े देखे थे, जिन में से बदबू आ रही थी. उन्होंने यह बात लोगों को बताई और लोगों ने पुलिस को. सूचना मिलते ही थाना भंवरकुआं के थानाप्रभारी राजेंद्र सोनी पुलिस टीम के साथ वहां जा पहुंचे जहां बोरे पड़े थे. दोनों बोरों को नाले से निकाल कर खुलवाया गया तो उन में एक औरत की नग्न लाश निकली. आश्चर्यजनक बात यह थी कि लाश 6 टुकड़ों में कटी हुई थी. इस के अलावा मृतका के सीने पर चाकुओं के 2 निशान भी थे. साथ ही सिर पर भी एक घाव था. पुलिस ने लाश के टुकड़ों को जोड़ा ताकि मृतका की पहचान कराई जा सके.

पुलिस ने लाश को पहचानने के लिए संजय रैना को भी बुलाया. उन्होंने लाश के टुकड़े देखे तो हाथ पर गुदे टैटू और कंधे के तिल को देख कर बताया कि लाश उन की पत्नी कविता की है. पुलिस ने फोरेंसिक एक्सपर्ट सुधीर शर्मा को भी बुला रखा था. उन्होंने लाश को सूक्ष्म यत्रों से देख कर बताया कि मृतका की हत्या 24 अगस्त को ही कर दी गई थी. जबकि उस के शरीर को काफी बाद में इलेक्ट्रिक कटर से काटा गया था. यह बात लाश के कटने के निशानों और हड्डियों के काटने की शेप से पता चली.

प्राथमिक काररवाई के बाद लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए एमवाई अस्पताल भेज दिया गया. इस के साथ ही थाना भंवरकुआं में अज्ञात लोगों के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर लिया गया. एक सीधीसादी पारिवारिक गृहणी के साथ इस तरह का पाशविक कृत्य किसी के गले नहीं उतर रहा था. मित्रबंधु नगर के निवासी इसे ले कर बहुत गुस्से में थे. उन का गुस्सा पुलिस पर भी था क्योंकि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी उस ने कोई खास काररवाई नहीं की थी.

यही वजह थी कि पोस्टमार्टम के बाद जब कविता का शव मिल गया तो मित्रबंधु नगर के लागों ने शव को बंगाली चौराहे पर रख कर चक्का जाम कर दिया. इस पर डीआईजी संतोष कुमार, एसपी (पूर्व) ओ.पी. त्रिपाठी, एसपी (पश्चिम) डी. कल्याण चक्रवर्ती, एसपी (सिटी) शशिकांत कनकने और एडीशनल एसपी (क्राइम ब्रांच) विनयपाल ने बंगाली चौराहे पर आ कर लोगों को समझाया. साथ ही आश्वासन भी दिया कि जल्दी ही हत्यारों को पकड़ लिया जाएगा.

पुलिस के अनुरोध और आश्वासन पर लोगों ने धरना खत्म कर दिया. उसी दिन कविता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पुलिस का अनुमान था कि कविता रैना के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया होगा और उस के बाद उन की हत्या कर दी गई होगी. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस की यह धारणा गलत साबित हुई. कविता के साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था. उन की मौत सिर पर लगी गंभीर चोट और सीने पर हुए चाकू के वारों से हुई थी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कविता की लाश के टुकड़े चाकू वगैरह से नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक कटर से किए गए थे. अलबत्ता सीने पर चाकू के 2 निशान जरूर पाए गए.

इस से पुलिस को संदेह हुआ कि ऐसा काम कोई करीबी ही कर सकता था. इस की वजह यह थी कि कविता की हत्या और शरीर के टुकड़े किसी एकांत जगह पर ही किए जा सकते थे और ऐसी जगह वह किसी करीबी के साथ ही जा सकतीं थीं. यह किसी प्रेम प्रसंग का मामला भी हो सकता था और पतिपत्नी के झगड़ों का प्रतिफल भी. संभावना यही थी कि इस के पीछे कविता के पति संजय रैना का हाथ हो सकता है.

पुलिस की प्राथमिक पूछताछ में यह बात सामने आई कि घटना वाले दिन कविता अपनी बेटी यशस्वी को बस स्टाप से लाने के लिए 1 बज कर 10 मिनट पर घर से निकली थीं. यशस्वी की बस स्टाप पर 1 बज कर 40 मिनट पर आई थी. जब बस स्टाप पर पहुंची थी तब कविता वहां नहीं थीं. इस का मतलब कविता के गायब होने का रहस्य 1 बज कर 10 मिनट से 1 बज कर 40 मिनट के बीच ही छिपा था. घर से बस स्टाप के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. पुलिस ने इस सवा किलोमीटर के रास्ते पर तमाम लोगों से पूछताछ की, लेकिन किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं बताया जिस से यह माना जाता कि कविता का अपहरण हुआ था.

पुलिस ने बस स्टाप के सामने वाली दुकान शर्मा स्वीट्स पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी देखी, लेकिन कविता कहीं नजर नहीं आईं. इस से अनुमान लगाया गया कि वह किसी परिचित के साथ ही गई होंगी, बाद में उसी ने उन का कत्ल कर दिया होगा. इसी के मद्देनजर पुलिस ने सब से पहले कविता के पति संजय रैना को शक के दायरे में रख कर पूछताछ करने का मन बनाया. इस की वजह यह थी कि संजय ने एक गलत लाश की पहचान अपनी पत्नी के रूप में कर दी थी.

पूछताछ से पहले संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों के बारे में पता लगाया गया. साथ ही उन की काल डिटेल्स भी निकलवाई गई. पासपड़ोस के लोगों और उन के परिचितों से भी पूछताछ की गई. पूछताछ में संजय रैना की मां कांता रैना को भी शामिल किया गया. इस पूछताछ में पता चला कि कविता रैना घरेलू महिला थीं. उन के और संजय के बीच किसी बात को ले कर कोई मतभेद नहीं था. कविता की किसी से कोई दुश्मनी या झगड़ा भी नहीं था. वह मिलनसार महिला थीं. कांता रैना ने बताया कि कविता घर पर ब्लाउज सिलने का काम करती थीं.

घटना वाले दिन उन्हें 2 ब्लाउज सिल कर शाम तक देने थे, इसलिए यशस्वी को ले कर उन्हें जल्दी लौट आना चाहिए था, लेकिन वह नहीं लौटी थीं. इस पूछताछ में यह बात भी निकल कर आई कि संजय को कोई मनोरोग था, जिस के लिए वह खुद इंजेक्शन लिया करते थे. इस बारे में संजय रैना से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ समय पहले मानसिक प्रौब्लम हुई थी. डाक्टर ने उन्हें इंजेक्शन लगाना सिखा कर घर पर ही इंजेक्शन लगाने को कहा था. उन्होंने डाक्टर के पेपर भी पुलिस को दिखाए. इस से पुलिस संतुष्ट हो गई.

संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों और उन की काल डिटेल्स में पुलिस को कुछ संदिग्ध नहीं मिला. पुलिस ने संजय के 2 सहकर्मियों पीयूष और विक्रांत परमार से भी पूछताछ की, जो कभीकभी उन के घर आया करते थे. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच बड़नगर से कविता के पिता रामनारायण जालवाल, मां तेजूबाई, दोनों भाई लखन व ठाकुर तथा दोनों बहनें सुनीता और सीमा भी आ चुके थे. पुलिस ने रामनारायण, तेजूबाई और उन के बेटों से अलग पूछताछ की. उन का कहना था कि संजय रैना से कविता को कोई शिकायत नहीं थी. दोनों के बीच खूब प्यार था. यह संभव नहीं है कि संजय ने कविता को कोई नुकसान पहुंचाया हो.

पुलिस ने बहन सीमा और उस के पति ओमप्रकाश कुमावत से भी अलग से पूछताछ की. ओमप्रकाश कुमावत का पालदा में एंब्रायडरी का काम था. ओमप्रकाश और सीमा को उन के घर पालदा भी ले जाया गया. लेकिन इस से कोई नतीजा नहीं निकला. जब कहीं से कोई बात न बनी तो डीआईजी संतोष कुमार ने एएसपी देवेंद्र पाटीदार, सीएसपी बिट्टू सहगल, सीएसपी पारुल बेलापुरकर, शशिकांत कनकने, एएसपी विनयपाल और इंसपेक्टर सोमा मलिक के नेतृत्व में पुलिस की 8 टीमें बनाईं. इन आठों  टीमों को अलगअलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

जांच के जो अहम बिंदू तय किए गए उन में मुख्य थे, उस सवा किलोमीटर रास्ते की हर नजरिए से गहन जांच करना जो कविता के घर और स्कूल बस के स्टाप के बीच था. क्योंकि कविता उसी रास्ते से लापता हुई थीं. साथ ही एक टीम को उस रास्ते में पड़ने वाली दुकानों या मकानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालनी थीं.

एक टीम को संजय रैना और कविता के करीबियों से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई तो एक को उन लोगों का पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई जो कविता के संपर्क में रहते थे. एक टीम को कविता के चरित्र या किसी प्रेमप्रसंग वगैरह का भी पता लगाने को कहा गया. एक टीम इस काम पर भी लगाई गई कि वह कविता के बस स्टाप के बीच पड़ने वाले सभी मोबाइल टावरों के संपर्क में आने वाले मोबाइल फोनों के नंबर एकत्र करे और कालडिटेल्स से उन में संदिग्ध नंबर ढूंढे.

एक टीम को उस टीचर जो 2 साल पहले कविता के साथ पढ़ाती थी और उस स्कूल के संचालक से भी पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिस के स्कूल में ये दोनों पढ़ाती थीं. दूसरी टीम को यशस्वी को बस स्टाप से लाने वाली महिला और उस महिला से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई जिस ने कविता को बस स्टाप की ओर जाते देखा था. साथ ही उस महिला से भी पूछताछ करने को कहा गया जिस के ब्लाउजों का आर्डर कविता को उसी दिन शाम तक देना था.

पुलिस टीम ने पता लगाया तो जानकारी मिली कि कविता अपनी पड़ोसी निशा यादव के साथ रेहान अली के स्कूल में पढ़ाती थीं. वहां से पहले कविता ने पढ़ाना छोड़ा था और फिर एक साल बाद निशा ने. कविता के स्कूल की नौकरी छोड़ने की वजह यह थी कि एक तो उन की बेटी यशस्वी स्कूल जाने लगी थी और उसे बस स्टाप पर छोड़ने और लेने जाना होता था. दूसरे वह बहुत अच्छे ब्लाउज सिलना जानती थी और स्कूल के वेतन से ज्यादा पैसे घर पर ही कमा सकती थीं.

पुलिस ने निशा और स्कूल संचालक दोनों से पूछताछ की. उन दोनों ने बताया कि उन के बीच किसी तरह का कोई मतभेद या विवाद नहीं था. कविता ने अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी थी. नौकरी छोड़ने के बाद रेहान अली से उन का कोई संपर्क नहीं रहा था. निशा से भी कविता का किसी तरह का कोई मतभेद नहीं था. जिस महिला सुमित्रा यादव ने कविता को बसस्टाप की ओर जाते देखा था, उस का कहना था कि घर से स्टाप तक का ज्यादातर रास्ता सुनसान रहता था, उस ने कविता को वैभवनगर कौर्नर पर पीपल के पेड़ के पास देखा था.

पीपल के पेड़ के आगे बस स्टाप तक भीड़भाड़ रहती थी इसलिए उस से आगे कविता के अपहरण की कोई संभावना नहीं थी. यह बात बताने वाली सुमित्रा यादव निशा की सास थी. पुलिस उसे वैभव नगर के कौर्नर वाले पीपल के पेड़ के पास तक भी ले गई. पुलिस ने नंदिनी नागर नाम की उस महिला से भी पूछताछ की जिस के ब्लाउज के और्डर कविता को शाम तक देने थे. उस ने बताया कि वह कविता से केवल ब्लाउज सिलवाती थी, इस से अलावा उन से उस का कोई संबंध या संपर्क नहीं था. रक्षाबंधन पास था. इसलिए उस ने कविता से शाम तक ब्लाउज देने को कहा था.

संजय रैना ने बताया था कि जिस दिन कविता गायब हुई थी उस दिन एक काली स्कार्पियो उन के घर के सामने से गुजरी थी, थोड़ी देर बाद वह तेजी से वापस लौट गई थी. साथ ही उस दिन एक बोलेरो को भी कालोनी में घूमते देखा गया था. हो सकता है, उन गाडि़यों में बैठे लोग स्थित का जायजा लेने आए हों. इस पर पुलिस ने उस इलाके के मकानों के आगे लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं और उस स्कार्पियो व बोलेरो को पहचानने की कोशिश की.

इस के अलावा उस शर्मा स्वीट्स के कैमरे की फुटेज भी दोबारा देखी गई जिस के सामने स्कूल का बस स्टाप था. उस फुटेज में कविता तो कहीं नजर आईं अलबत्ता वहां 2 बाइकों पर सवार 4 युवक और एक संदिग्ध वैन जरूर खड़ी दिखाई दी. पुलिस ने उन मोटर साइकिल सवारों, वैन और स्कार्पियो की खोजबीन शुरू की. पुलिस ने उन टावरों के अंतर्गत आने वाले 7000 मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स की भी गहनता से जांच की जो कविता के घर से यशस्वी के बस स्टाप के बीच पड़ते थे. घटना वाले दिन कविता के मोबाइल पर महज 2 फोन काल आई थीं. इन में एक उन के पति संजय की थी और दूसरी एक बुटीक से आई थी.

पूछताछ में संजय ने बताया कि उस दिन वह काम के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे, इसलिए उन्होंने फोन कर के पत्नी से कहा था कि दोपहर का खाना घर आ कर ही खाएंगे. जिस शृंगार बुटिक से फोन आया था, वह मीना नाम की महिला का था, जो वैभवनगर बस स्टाप के निकट था. पूछताछ में उस ने बताया कि कविता ने एक सूट सिलने को दिया था, उसी के लिए उसे फोन किया गया था.

कविता के घर के सामने ही एक यादव का घर था, जो शादियों में शामियाने वगैरह लगाने का काम करता था, उस के पास उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जन भर से ज्यादा लड़के काम करते थे. पुलिस ने संदेह के आधार पर उन सभी लड़कों को हिरासत में ले कर पूछताछ की और उन के मोबाइल चेक किए. लेकिन वे सब निर्दोष थे.

इस के अलावा कविता से मिलने वालों, गैस सिलेंडर सप्लाई करने वाले, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, कूड़ा उठाने वाले, दूध वाले, सब्जी वाले, फेरी वालों और इलाके के धोबी तक से पूछताछ की गई. संजय रैना का परिवार पहले भागीरथपुरा में किराए के मकान में रहता था. 4 साल पहले यह परिवार मित्रबंधु नगर में अपने मकान में शिफ्ट हो गया था. पुलिस ने भागीरथपुरा से मित्रबंधु नगर तक कविता के जानपहचान वालों को खोजखोज कर पूछताछ की.

जांच में यह बात भी सामने आई कि कविता पिछले एक साल में 177 लोगों से मिली थीं, जिन में परिचित व रिश्तेदार भी थे और ऐसे लोग भी, जिन से कविता का कोई काम पड़ा था. इन सभी 177 लोगों से पूछताछ के बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. पूछताछ में यह भी पता चला कि 28 जुलाई को कविता जब अपनी सास और बेटी के साथ एक्टिवा से पलासिया चौराहे के पास से गुजर रही थीं तो एक बुलेट मोटरसाइकिल वाले ने पीछे से आ कर उन की एक्टिवा को टक्कर मार दी थी. कविता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. उस वक्त बात वहीं समाप्त हो गई.

लेकिन कविता जब पत्रकार कालोनी के चौराहे पर पहुंचीं तो उसी बाइक वाले ने फिर से उन की एक्टिवा में टक्कर मार दी. इस बार कविता, उन की सास कांता और बेटी यशस्वी गिर गई. बाइक सवार शराब पिए हुए था. कविता को गुस्सा आया तो उन्होंने उस की चप्पल से पिटाई कर दी. लोगों ने भी इस मामले में उन का ही साथ दिया. यह बात सामने आई तो पुलिस ने सोचा कि कहीं उस मोटरसाइकिल वाले ने ही रंजिशन उन का अपहरण कर के उन की हत्या न कर दी हो. इस के बाद पुलिस ने शहर के 117 बुलेट मोटरसाइकिल चलाने वालों की जांच की. लेकिन उन में कोई भी संदिग्ध नहीं निकला.

अभी कारों और बुलेट मोटरसाइकिलों की जांच चल ही रही थी कि 30 अगस्त को कविता की एक्टिवा एमपी09एस एएस5271 पुलिस को मिल गई. यह  एक्टिवा पिछले 7 दिन से नौलखा बस स्टैंड की पार्किंग में खड़ी थी. पुलिस ने पार्किंग की देखभाल करने वाले से पूछताछ की तो उस ने बताया कि स्कूटी को 24 अगस्त को रात साढ़े 8 बजे राजू नाम का एक व्यक्ति खड़ा कर गया था. पर्ची लेते वक्त उस ने 30 रुपए दे कर तीसरे दिन आने को कहा था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया.

पार्किंग के केयरटेकर ने बताया कि उस ने राजू से स्कूटी लौक न करने को कहा था ताकि जरूरत होने पर उसे दूसरी जगह खड़ा किया जा सके. लेकिन राजू नहीं माना और स्कूटी को लौक कर के चाबी अपने साथ ले गया. पार्किंग में बाहर की ओर सीसीटीवी कैमरा लगा था. उम्मीद थी कि उस की सीसीटीवी  फुटेज में राजू का चेहरा दिखाई दे सकता है. लेकिन यहां भी पुलिस को मात खानी पड़ी. सीसीटीवी कैमरे के सामने एक लाइट लगी थी, जिस की वजह से राजू का फोटो नहीं आ पाया था. अलबत्ता पार्किंग के केयरटेकर से पूछ कर उस का स्केच जरूर बनवाया जा सकता था. पुलिस ने यही काम कर लेना बेहतर समझा.

इस काम में टेक्नीकल और साइंटिफिक टीमें भी लगी थीं. उन्होंने जब एक्टिवा की जांच की तो उस पर खून के धब्बे पाए गए. इस से अनुमान लगाया गया कि कविता की लाश के टुकड़े उसी की एक्टिवा पर रख कर नाले में फेंके गए होंगे. लेकिन पुलिस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि हत्यारे को कविता की एक्टिवा को इस तरह सुरक्षित रखने की क्या जरूरत थी? क्योंकि वह चाहता तो काम हो जाने के बाद कविता के कपड़ों और जेवरों की तरह एक्टिवा को भी गायब कर सकता था या फिर उसे कहीं दूर दूसरी जगह खड़ा कर सकता था.

इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने बसस्टैंड पर एक्टिवा यह सोच कर खड़ी की होगी कि पुलिस यह सोचे कि कविता बस में बैठ कर कहीं गई होंगी. लेकिन कविता की लाश मिलने से पुलिस की यह सोच न बन सकी. कविता की लाश के टुकड़े नग्नावस्था में मिले थे. जबकि घर से जाते समय वह पीले रंग की साड़ी ब्लाउज और कुछ गहने पहने हुए थीं.

इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने उन के कपड़े जला दिए होंगे और गहने अपने पास रख लिए होंगे. एक्टिवा को सुरक्षित जगह खड़ा करना भी हत्यारे की मानसिकता को दर्शा रहा था. यानी वह कविता के गहनों और एक्टिवा का मोह पाले हुए था. इस से पुलिस को एक बार फिर कविता के करीबियों पर शक हुआ. इस के लिए गोपनीय और खुले दोनों ही रूप से कविता के कई करीबी लोगों की जांच की गई. लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला.

इस बीच पुलिस टीमें 6 पीएसटीएन (पब्लिक स्विच्ड टेलीफोन नेटवर्क) के माध्यम से डेढ़ लाख से ज्यादा मोबाइल फोनों का डाटा खंगाल चुकी थी. केवल इतना ही नहीं बल्कि हत्यास्थल की तलाश में इमली चौराहे से ले कर नेमावर रोड तक 6 किलोमीटर के दायरे में सारे मकान और गोदाम भी छान लिए गए थे.

अधिकारी गूगल पर एक एक मकान या गोदाम को टिक करते और पुलिस टीम उस जगह की जांच करती. इस तरह पुलिस ने 1500 मकान और 200 गोदाम छाने. लेकिन कहीं से कुछ नहीं मिला. लाश के टुकड़े जिन बोरियों में मिले थे, उन का प्रिंट तो धुंधला था लेकिन यह पता चल गया था कि उन में से एक बोरी चाय की पत्ती की थी और दूसरी कैमिकल की. इस बात को ध्यान में रख कर पालदा औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और गोदामों की सर्चिंग की गई.

इन्वेस्टीगेशन के दौरान ही पुलिस की निगाह महेश बैरागी पर जम गई. महेश बैरागी  उस मीनाबाई का पति था, जिसे कविता ने 18 जुलाई 2015 को अपना सूट सिलने के लिए दिया था. महेश बैरागी अपनी पत्नी मीनाबाई और 2 बच्चों तनिष्क और तेजस के साथ मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोकनगर में रहता था. साथ में उस की साली पूजा भी रहती थी. महेश के बारे में पता चला कि पहले मूसाखेड़ी चौराहे पर उस की मोबाइल रिचार्ज की दुकान थी. बाद में उस ने मोबाइल रिचार्ज की दुकान बंद कर दी थी.

मीनाबाई ने वैभवनगर मेन रोड पर शृंगार बुटिक के नाम से लेडीज कपडे़ सिलने की दुकान खोल रखी थी. कभीकभी वहां महेश भी बैठा करता था. बाद में 20 अगस्त से उस ने वहीं पास में साडि़यों की दुकान खोल ली थी. ताज्जुब की बात यह थी कि 28 अगस्त को उस ने वह दुकान बंद कर दी थी. घटना वाले दिन कविता के फोन पर शृंगार बुटिक से ही फोन किया गया था. हालांकि पुलिस ने मीनाबाई और महेश बैरागी से पहले भी पूछताछ की थी. इतना ही नहीं महेश बैरागी हर धरनेप्रदर्शन में भी शामिल हुआ था और एक 2 बार कविता के घर शोक जताने भी गया था. कई बार वह कविता के घर वालों के साथ थाने भी आया था.

पुलिस ने जब मीना से पूछा कि घटना वाले दिन वह 12 बजे से 2 बजे के बीच कहां थी, तो वह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई. कविता को उस ने कब फोन किया था, यह भी वह ठीक से नहीं बता पाई. इस से पुलिस को महेश बैरागी पर शक हुआ. वैसे भी उस का पिछला रिकौर्ड कुछ ठीक नहीं था. संदेह हुआ तो पुलिस ने महेश बैरागी को थाने बुला कर पूछताछ की. उस से लगातार 20-22 दिन तक पूछताछ की जाती रही. लेकिन वह पुलिस के सवालों के सही जवाब देता रहा. वैसे भी उसे किडनी की बीमारी थी, जिस से वह परेशान हो जाता था. इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी.

पुलिस की टीमें कविता की हत्या के मामले में लगातार 107 दिन तक पूछताछ करती रही. पुलिस ने कोई भी ऐसा एंगल नहीं छोड़ा, जहां जरा सी भी संभावना रही हो. 177 लोगों से गहन पूछताछ की गई. करीब 100 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गईं. 1500 मकान और 200 गोदाम छाने गए, लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला.

कहते हैं, पाप सिर चढ़ कर बोलता है. अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो कोई न कोई गलती कर ही बैठता है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. कविता के मर्डर के 107 दिन बाद पुलिस को एक लीड मिली. एक किराना व्यापारी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी दुकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगवा रखा है. महेश बैरागी उस के पास आया था और 24 अगस्त की फुटेज मांग रहा था. यह पता चलते ही 9 दिसंबर, 2015 को पुलिस ने महेश बैरागी को उस के मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोक नगर से उठा लिया. थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने मान लिया कि कविता का कत्ल उस ने ही किया था.

महेश बैरागी ने बताया कि कविता रैना के घर से 400 मीटर की दूरी पर उस की पत्नी मीना का बुटिक था. कविता पर उस की निगाहें कई महीने से जमी थीं. उसे उम्मीद तब बंधी जब 18 जुलाई को कविता ने उस की पत्नी मीनाबाई के बुटिक पर अपनी नेट की साड़ी से सूट सिलवाने को दिया था. इस के बाद कविता सूट के चक्कर में बुटिक पर आने लगी थी. वह तभी आती थीं जब बेटी को लेने बस स्टाप पर आती थीं. महेश बैरागी कोशिश करता था कि जब वह आएं तो बुटिक पर मौजूद रहे. मीना को वह किसी न किसी बहाने वहां से भेज देता था. इस तरह महेश कविता को एक महीने तक टालता रहा. उस ने उन्हें डिलीवरी के लिए 18 अगस्त की डेट दी थी.

महेश बैरागी कई महीने से कविता को देख रहा था और उन पर उस का दिल आ गया था. कविता से उस की जो बातें हुई थीं, उस से उसे पता चला कि वह सूट कम और साड़ी ज्यादा पहनती थीं. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने 20 अगस्त को पत्नी के बुटिक के पास ही साड़ी की दुकान खोल ली. उसे उम्मीद थी कि कविता साड़ी देखने के लिए उस की दुकान पर जरूर आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

महेश बैरागी यह जानता था कि कविता दोपहर में अपनी बेटी को लेने बस स्टाप पर आती हैं. उसी समय वह मीनाबाई के बुटिक पर भी आती हैं. उस ने कविता को 18 अगस्त की सूट की डिलीवरी डेट थी. इसलिए बहाने से उस ने अपनी पत्नी मीनाबाई को घर भेज दिया और खुद बुटिक पर बैठ गया. उस दिन करीब एक बज कर 20 मिनट पर कविता आईं तो उस ने कह दिया, ‘‘आप का सूट अभी तैयार नहीं हुआ है, सिलने के लिए कारीगर के पास गया हुआ है. 2-4 दिन में सिल जाएगा तो हम आप को फोन कर देंगे.’’

इसी बहाने उस ने कविता का मोबाइल नंबर भी ले लिया. उस दिन कविता लौट कर बस स्टाप पर चली गईं. बाद में वह बेटी को ले कर घर चली गईं. 24 अगस्त को महेश बैरागी ने अपनी साड़ी की दुकान नहीं खोली. इस की जगह वह बुटिक पर बैठ गया. वहां 2 लोगों का कोई काम नहीं था, इसलिए मीनाबाई घर चली गई. उस के जाते ही महेश ने कविता के मोबाइल पर काल कर के कहा, ‘‘आप का सूट तैयार है, आ कर ले लीजिएगा.’’

सूट के चक्कर में ही कविता घर से 10 मिनट पहले निकलीं. उन्होंने सोचा था कि पहले सूट लेंगी और फिर बस स्टाप से बेटी को. इसलिए पहले वह मीनाबाई के बुटिक पर पहुंची. वहां महेश बैरागी बैठा था. कविता ने सूट के बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘आप का सूट तो तैयार है, लेकिन आप को मेरे साथ आईडीए कालोनी चलना पड़ेगा. सूट कारीगर के पास है.’’

सूट सिलने के लिए दिए हुए एक महीने से ज्यादा हो गया था. कैसा बना है, यह देखने की भी उत्सुकता थी. यशस्वी की बस के आने में थोड़ा समय था. इसलिए कविता ने चलने के लिए हां कर दी. कविता की स्वीकृति मिलते ही महेश ने अपनी मोटरसाइकिल उठा ली. कविता के पास स्कूटी थी ही. दरअसल, महेश ने पहले ही पूरी तैयारी कर रखी थी. आजादनगर की आईडीए कालोनी में उस के एक दोस्त टीकम देवड़ा का फ्लैट था. इस फ्लैट की एक चाबी महेश बैरागी के पास रहती थी.

आईडीए कालोनी के फ्लैट नंबर एफ-20 के पास पहुंच कर महेश बैरागी ने अपनी मोटर साइकिल खड़ी कर दी. कविता ने भी स्कूटी स्टैंड पर लगा दी. इस के बाद महेश कविता को फ्लैट नंबर एफ-20 में ले गया. फ्लैट में जरूरत का सारा सामान था. महेश ने कविता से कहा, ‘‘आप बैठिए, मैं कारीगर को बुलाता हूं.’’

कविता सोफे पर बैठ गईं तो महेश ने दरवाजे की कुंडी बंद कर दी और कविता के पास आ कर घुटनों के बल बैठते हुए बोला, ‘‘मैं आप को बहुत चाहने लगा हूं. आप की खूबसूरती ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. प्लीज एक बार मेरी इच्छा पूरी कर दो. जिंदगी भर आप की सेवा करूंगा.’’

यह सुनते ही कविता आगबबूला हो गईं. इस के बावजूद महेश बैरागी ने उन के साथ हाथापाई और छेड़छाड़ करने की कोशिश की. लेकिन जब कविता ने काबू न दिया तो महेश बैरागी ने कमरे में पड़ा लोहे का पाइप उठा कर उन के सिर पर दे मारा. वार जोरदार था. कविता के सिर से खून निकलने लगा और वह वहीं ढेर हो गईं. अब स्थिति करो या मरो की हो गई थी. अपनी जान बचाने के लिए कविता को ठिकाने लगाना जरूरी था. इस के लिए महेश बैरागी ने पहले से तैयार चाकू से उन के सीने पर 2 वार किए. फलस्वरूप कविता की इहलीला खत्म हो गई.

कविता मर चुकी थीं. बैरागी जानता था कि कविता के घर न पहुंचने पर खोजबीन भी होगी और बात पुलिस तक भी पहुंचेगी. इसलिए उस ने वहां से अपनी मोटरसाइकिल हटाना जरूरी समझा. फ्लैट का ताला बंद कर के उस ने कविता की एक्टिवा ओट में खड़ी कर दी और अपनी बाइक ले कर दुकान पर चला गया.

महेश बैरागी ने कविता का कत्ल तो कर दिया, लेकिन उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि लाश को कैसे ठिकाने लगाए. शाम तक वह इसी मुद्दे पर सोचता रहा. सोचविचार कर उस ने एक इलेक्ट्रिक कटर का इंतजाम किया. 24 की रात को टीकमदेवड़ा के फ्लैट पर पहुंच कर सब से पहले उस ने कविता के सारे कपड़े उतार कर जलाए और उन की राख टायलेट पौट में डाल कर फ्लश कर दी. जेवर उस ने अपने पास रख लिए.

इस के बाद उस ने घर से साथ लाए इलेक्ट्रिक कटर से कविता की लाश के 6 टुकड़े किए और फ्लैट में पड़ी 2 बोरियों में भर दिए. तत्पश्चात वह दोनों बोरों को बारीबारी से कविता की स्कूटी पर रख कर इमली चौराहे के पास वाले नाले में फेंक आया. फ्लैट से खून वगैरह उस ने साफ कर दिया था. 24 अगस्त की रात साढ़े 8 बजे महेश बैरागी कविता की स्कूटी ले कर नौलखा बस स्टैंड पहुंचा और अपना नाम राजू बता कर 3 दिन के लिए स्कूटी पार्किंग में खड़ी कर दी. पार्किंग के केयरटेकर के कहने के बावजूद उस ने स्कूटी की चाबी अपने पास ही रखी. ऐसा उस ने इसलिए किया ताकि बाद में पता चलने पर पुलिस यही समझे कि कविता स्कूटी वहां खड़ी कर के किसी के साथ बस में बैठ कर कहीं चली गई होंगी.

2 दिन बाद यानी 26 अगस्त को जब कविता की लाश के टुकड़े मिल गए और लोगों ने बंगाली चौराहे पर धरनाप्रदर्शन किया तो वह उस में भी शामिल हुआ. इतना ही नहीं बल्कि वह कविता के घर और उन के घर वालों के साथ थाने भी गया. जब महेश बैरागी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया तो पुलिस ने उसे 10 दिसंबर, 2015 को जिला न्यायालय के कोर्ट नंबर 14 में न्यायाधीश संजय श्रीवास्तव की अदालत पर पेश कर के 15 दिसंबर तक के पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. इस के साथ ही इस साजिश में शामिल महेश बैरागी की पत्नी मीनाबाई और दोस्त टीकम देवड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों पर साक्ष्य छिपाने का आरोप था.

महेश बैरागी की निशानदेही पर उस के घर से कविता का वह सूट, जिस की वजह से उन की जान गई थी, भी बरामद हो गया. साथ ही वह लोहे का पाइप और चाकू भी बरामद कर लिया गया, जिस से कविता की हत्या की गई थी. लाश के टुकड़े करने वाला इलेक्ट्रिक कटर भी बरामद हो गया. पुलिस ने टीकम के फ्लैट से खून के नमूने भी उठाए. साथ ही महेश का खून ले कर डीएनए जांच के लिए भी भेजा. इस के अलावा उस से 3 सिम भी बरामद हुए.

टीकम देवड़ा के बारे में पता चला कि जिस फ्लैट में कविता की हत्या की गई थी, उस में वह पिछले 2 सालों से किराए पर रह रहा था. वह सुबह को चोईथराम सब्जीमंडी में और शाम को मूसाखेड़ी सब्जीमंडी में पौलीथिन सप्लाई करने का काम करता था. दोपहर में वह घर में ही रहता था. उस के घर कोई नहीं आताजाता था. इसी से अनुमान लगाया गया कि वह इस अपराध में बराबर का भागीदार रहा होगा. जबकि मीनाबाई को हत्या से जुड़ी सूचनाएं छुपाने का अपराधी माना गया.

महेश बैरागी के बारे में पता चला कि उस की पत्नी मीना उस की सगी मौसी की बेटी थी. उस से उस ने प्रेमविवाह किया था. यह जानकारी भी मिली कि वह अय्याश तबीयत का था और क्रिमनल माइंडेड भी. उस की दूसरी मौसी की बेटी रेखा, जो बेटमा की रहने वाली थी, 2009 में उस के घर से गायब हो गई थी. रेखा अपने पति हेमंत उर्फ बबलू के साथ महेश के घर रह रही थी. उन दोनों को महेश ने ही बुला कर अपने साथ रखा था. रेखा की गुमशुदगी संयोगितागंज थाने में दर्ज हुई थी. पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार उस वक्त महेश ने पुलिस को मिठाई के डिब्बे पर लिखा एक पत्र सौंपा था. उस ने बताया था कि वह रेखा का लिखा पत्र है. इस पत्र में लिखा था कि वह अपनी मर्जी से वसीम के साथ जा रही है.

बाद में जब पुलिस ने वसीम से इस सिलसिले में बात की तो उस ने बताया कि रेखा से उस का कोई संबंध नहीं था. अलबत्ता रेखा के पति बबलू ने महेश पर संदेह जाहिर करते हुए कहा था कि रेखा ने उसे सुहागरात को ही बता दिया था कि महेश के साथ उस के पुराने संबंध हैं. जिस दिन रेखा गायब हुई थी उस दिन महेश बबलू को चायपत्ती बेचने के काम के सिलसिले में बागली (देवास) ले गया था. बहाना बना कर वह स्वयं घर लौट आया था. जबकि बबलू को उस ने रात को वहीं रुकने को कहा था. उस समय महेश बैरागी की पत्नी मीना ने भी अपने पति पर शक जाहिर किया था, लेकिन बाद में वह पलट गई थी और वसीम का नाम ले दिया था. अब पुलिस एक बार फिर रेखा के गायब होने वाली फाइल खोलने की सोच रही है. रेखा की मां माया को अब भी महेश बैरागी पर ही शक है.

महेश बैरागी पर शर्मा नाम के एक व्यक्ति का मकान हड़पने का भी आरोप है. यह आलोक नगर का वही मकान है, जिस में वह पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. यह मकान उस ने किराए पर लिया था और बाद में फर्जी दस्तावेज बनवा कर मकान पर कब्जा कर लिया था. मकान मालिक को उस ने मारपीट कर भगा दिया था. अब पुलिस उस के खिलाफ मकान पर जबरन कब्जा करने का भी केस दर्ज करेगी. सन 2012 में संयोगितागंज थाने की पुलिस ने उस के आलोकनगर वाले घर से उसे अश्लील सीडी बनाते हुए भी पकड़ा था. बाद में 2013 में वह एक महिला से अश्लील बात करने के आरोप में भी पकड़ा गया था.

बहरहाल, जितना जटिल कविता मर्डर केस था, उतना ही जटिल महेश बैरागी का करेक्टर भी है. उस की पूरी हकीकत विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगी. Crime News

 

Dehradun Crime: काल बनी एक बहू

Dehradun Crime: फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही चंचल बेहद खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. फौजी पति की दूरियों की वजह से वह संजय के प्रेम में उलझ गई. सास ने उसे संभालने की कोशिश की तो संजय चंचल के साथसाथ करोड़ों की प्रौपर्टी के चक्कर में ऐसा अंधा हुआ कि उस ने चंचल के साथ मिल ऐसी खतरनाक साजिश रची कि…

कमला जोशी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 25 किलोमिटर दूर थाना प्रेमनगर के संपन्न गांव श्यामपुर में रहती थीं. उन के परिवार में 2 बेटे बड़ा राजेंद्र और छोटा दीपक था. दोनों बेटों का वह विवाह कर चुकी थीं. राजेंद्र खेतीबाड़ी संभालता था, जबकि दीपक भारतीय सेना में नौकरी कर रहा था. दीपक की पत्नी चंचल कमला के पास ही रहती थी. वह देहरादून में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी. वह स्कूटी से आतीजाती थी.

कमला जोशी के पास करोड़ों की प्रौपर्टी थी. घर से लगी रही उन की 4 बीघा जमीन थी, देहरादून में भी उन्होंने प्लौट खरीद रखा था. उन का परिवार वैसे तो खुशहाल था, लेकिन उन्हें एक बात की हमेशा फिक्र लगी रहती थी. दरअसल राजेंद्र का विवाह उन्होंने 7-8 साल पहले कर दिया था, लेकिन अनबन के चलते एक साल बाद ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. राजेंद्र का एक बेटा था भास्कर, जिसे उस ने अपने पास ही रख लिया था. 7 वर्षीय भास्कर परिवार में सभी का लाडला था.

कमला उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी थीं. वह चाहती थीं कि किसी भी तरह बड़े बेटे की गृहस्थी दोबारा बस जाए तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाए. इस से एक तो राजेंद्र को सहारा मिल जाता और भास्कर को मां का प्यार. उन की छोटी बहू चंचल सुंदर होने के साथसाथ पढ़ीलिखी और समझदार थी. वह हर तरह से परिवार के सभी सदस्यों का खयाल रखती थी. थोड़ी परेशानी तब होती थी, जब चंचल दीपक के पास चली जाती थी.

दीपक की तैनाती उड़ीसा में थी. नवंबर के दूसरे सप्ताह में भी चंचल दीपक के पास चली गई थी. बड़े बेटे का घर बसाने के लिए कमला ने अपने कई नातेरिश्तेदारों से कह रखा, लेकिन उस की उम्र और एक बेटा होने की वजह से कोई उस से रिश्ता करने को तैयार नहीं था. इस के बावजूद कमला ने प्रयास नहीं छोड़ा. आखिरकार किसी ने उन्हें पिथौरागढ़ में एक रिश्ता बताया. कमला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं. अपने स्तर से उन्होंने जो जानकारियां जुटाईं, उस हिसाब से लड़की और उस का परिवार दोनों ही बहुत अच्छे थे.

बातचीत हो जाने के बाद कमला ने वादा कर लिया कि वह जल्द ही लड़की देखने आएंगी. दीपक अपनी मां और भाई से बात करता रहता था. 27 नवंबर, 2015 की सुबह उस ने राजेंद्र के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बात कमला से हुईं. उन्होंने उसे बताया कि वे लोग रास्ते में हैं और लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जा रहे हैं. कमला ने बताया था कि उन के साथ राजेंद्र और भास्कर भी हैं. मां के साथ हुई दीपक की यह आखिरी बातचीत थी. क्योंकि उस ने शाम के वक्त मां के मोबाइल पर फोन किया तो वह स्विच औफ मिला. इस के बाद रात से सुबह हो गई, लेकिन दीपक की मां से दोबारा बात नहीं हो सकी.

इस से उस की चिंता बढ़ गई. उस ने किसी तरह पता कर के लड़की वालों के यहां पिथौरागढ़ फोन किया तो पता चला कि वे वहां पहुंचे ही नहीं थे, जबकि वे लोग उन का इंतजार कर रहे थे. दीपक ने अपने नातेरिश्तेदारों को भी फोन किए, पर घर वालों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. उस का मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा. वे घर भी वापस नहीं पहुंचे थे. दीपक इस से परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वे लोग गए तो कहां गए.

कुछ नहीं सूझा तो उस ने छुट्टी ली और पत्नी चंचल के साथ अगले दिन घर पहुंच गया. जब वह अपने स्तर से उन की खोजबीन में नाकाम रहा तो उस ने स्थानीय थाना प्रेमनगर में अपनी मां, भाई और भतीजे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. दीपक ने एसएसपी डा. सदानंद दाते से भी मिल कर परिवार को खोजने की गुजारिश की. पुलिस ने खोजबीन शुरू की तो पता चला कि 28 नवंबर को उन की कार नंबर – यूके 07 एपी 5359 उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद के बिलासपुर इलाके में लावारिस हालत में पाई गई थी.

दीपक ने पुलिस को बताया कि राजेंद्र कार चलाना नहीं जानते थे. पिथौरागढ़ जाने के लिए वे कोई ड्राइवर कर के गए होंगे. लेकिन उन के साथ ड्राइवर कौन गया था, यह उसे पता नहीं था. एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर पुलिस ने बिलासपुर पहुंच कर कार की जांचपड़ताल की. कार में सभी सामान सुरक्षित था. बारीकी से जांच की गई तो उस में एक्सिस बैंक के एटीएम की एक परची मिली. वह उपनगर काशीपुर की थी. इस से अनुमान लगाया गया कि काशीपुर में उन्होंने एटीएम का इस्तेमाल किया होगा. सदानंद दाते ने एक पुलिस टीम काशीपुर के लिए रवाना कर दी. पुलिस  ने एटीएम के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी.

इस फुटेज से पता चला कि राजेंद्र और उस की मां कमला करीब 8 मिनट एटीमए केबिन में रहे थे. बाद में उन के पास एक लंबातगड़ा युवक भी आया था, जिस से उन्होंने कुछ बात की थी. संभावना थी कि वही ड्राइवर रहा होगा. हालांकि उस का चेहरा बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं था, लेकिन पुलिस को उम्मीद थी कि उस के जरिए अब जोशी परिवार के लापता होने का सुराग मिल जाएगा. लेकिन यह उम्मीद ज्यादा नहीं टिक सकी, पता चला कि वह वहां का सिक्योरिटी गार्ड था. इस से केवल यह पता चला कि जोशी परिवार काशीपुर तक सुरक्षित था.

जोशी परिवार रहस्यमय हालात में कहां लापता हो गया, कोई नहीं जानता था. इसी बीच ऊधमसिंहनगर में सितारगंज के सिडकुल के पास एक बच्चे का शव पड़ा मिला. शव मुख्य सड़क से करीब 30 मीटर अंदर झाडि़यों में मिला था. शव मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी सी.एस. बिष्ट मौके पर पहुंचे. बच्चे की हत्या गरदन काट कर की गई थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एएसपी टी.डी. वैला भी घटनास्थल पर पहुंचे.

मौके पर पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उस के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस की सूचना मिलने पर दीपक भी सितारगंज पहुंचा. शव देख कर वह बिलख पड़ा. वह शव उस के भतीजे भास्कर का था. सितारगंज पुलिस ने बच्चे की हत्या, अपहरण और साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. जो जोशी परिवार लापता था. उस में से एक बच्चे भास्कर की हत्या की जा चुकी थी. उन की कार भी बरामद हो चुकी थी. जबकि कमला और राजेंद्र का कुछ पता नहीं था. ऊधमसिंहनगर के एसएसपी केवल खुराना ने इस मामले की तह तक जाने और गहनता से जांच कर ने के लिए एएसपी टी.डी. वैला, एएसपी काशीपुर कमलेश उपाध्याय और सीओ खटीमा लोकजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की 3 टीमों का गठन किया.

लेकिन उन्हें घटना के तार देहरादून से जुड़े होने का अंदेशा था. सब से अहम बात यह थी कि राजेंद्र जिस ड्राइवर को अपने साथ ले कर गया होगा, वह कार ड्राइवर कौन था, यह पता लगाना जरूरी था. ड्राइवर का पता चलने पर ही अहम सुराग मिल सकते थे. पुलिस ने जोशी परिवार के आसपास रहने वालों से भी पूछताछ की, लेकिन ड्राइवर के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका. ड्राइवर को उन्होंने हायर किया था या कोई जानपहचान वाला चालक था, इस बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा था. हां, यह आशंका जरूर प्रबल हो गई थी कि जोशी परिवार किसी बड़ी साजिश का शिकार हुआ है. भास्कर का शव मिलने के बाद राजेंद्र और उस की मां के जीवित होने की उम्मीद कम ही रह गई थी.

पुलिस ने दीपक और उस की पत्नी चंचल से भी पूछताछ की, लेकिन उन्होंने किसी से भी कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. जोशी परिवार के पास करोड़ों की पारिवारिक जमीन थी. यह पूरी प्रौपर्टी कमला के नाम थी. इस नजरिए की गई जांच में सामने आया कि प्रौपर्टी को ले कर भी किसी से किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं था. ड्राइवर का पता लगाने के लिए पुलिस ने राजेंद्र के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल की, लेकिन उस में भी कोई नंबर ऐसा नहीं मिला, जो किसी ड्राइवर का रहा हो.

राजेंद्र के मोबाइल में आखिरी काल पिथौरागढ़  से आई थी. पुलिस वहां पहुंची तो वह उस लड़की के पिता का नंबर था, जिसे जोशी परिवार देखने जा रहा था. उन्होंने बताया कि राजेंद्र का फोन 27 नवंबर को सिर्फ यह बताने के लिए आया था कि वे लोग उन के यहां आ रहे हैं. इस के बाद राजेंद्र से चाहकर भी उन का कोई संपर्क नहीं हो सका था. पुलिस के सामने अब 2 तरह की आशंकाएं थीं. एक तो यह कि इस परिवार की हत्याएं लूटपाट के लिए की गई थीं और दूसरी यह कि कार ड्राइवर ने ही उन लोगों के साथ कुछ गलत किया हो. इस बात को ध्यान में रख कर दोनों जिलों देहरादून और ऊधमसिंहनगर की पुलिस ने कई संदिग्ध लोगों से पूछताछ की.

लेकिन कोई सुराग नही मिल सका. मामला उलझ कर रह गया था. वारदात का मोटिव समझ से परे था. जोशी परिवार की खुले तौर पर किसी से कोई रंजिश नहीं थी और न ही कोई दूसरा ऐसा विवाद जिस के लिए परिवार को ही लापता कर दिया जाता. नि:संदेह इस घटना को साजिश के तहत अंजाम दिया गया था. पुलिस ने राजेंद्र के पूर्व ससुराल वालों से भी पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी, परंतु कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा था.

पुलिस ने शक के आधार पर काम करती है. परिवार की समाप्ति पर कमला की करोड़ों की प्रौपर्टी का दीपक ही एकलौता वारिस था. यह भी संभव था कि उस के इशारे पर ही किसी रहस्यमय तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया हो. आज के दौर में प्रौपर्टी को ले कर हत्याएं हो जाना कोई नई बात नहीं है. अपने ही अपनों के खून के प्यासे बन जाते हैं. प्रौपर्टी के एंगल पर पुलिस ने दीपक को भी शक के दायरे में रख कर 5 दिसंबर को उस से गहन पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस किसी नतीजे पर पहुंच पाती, इस से पहले गुत्थी और ज्यादा उलझ गई. एसएसपी केवल खुराना के निर्देश पर पुलिस ने 7 दिसंबर को उस स्थान के आसपास कांबिग कर के खोजबीन शुरू की, जहां भास्कर का शव मिला था. इस खोजबीन में उत्तर दिशा की झाडि़यों से पुलिस को 2 शव और मिले. दोनों शव बुरी तरह सड़गल चुके थे. कपड़ों के आधार पर उन की शिनाख्त कमला और राजेंद्र के रूप में की गई. पुलिस ने दोनों शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड में पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि हत्याओं को किस ने और क्यों अंजाम दिया? ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, जिस के लिए 3 हत्याएं कर दी गईं. ड्राइवर का अब तक कुछ पता नहीं चल सका था.

जबकि वही मुख्य संदिग्ध भी था. वह सुपारी किलर भी हो सकता था और किसी लुटेरे गिरोह का सदस्य भी. दीपक व उस की पत्नी किसी रंजिश की बात से इनकार कर चुके थे. इस मामले की जांच में स्पैशल औपरेशन गु्रप की टीम को भी लगा दिया गया. देहरादून व ऊधमसिंहनगर पुलिस की 10 टीमें केस के खुलासे में जुट गईं. पुलिस के शक की सुई ड्राइवर पर ही टिकी थी. क्योंकि कुछ ऐसे ड्राइवर भी होते हैं, जो दिखावे के लिए तो कार चलाने का काम करते हैं, लेकिन किसी गिरोह के साथ मिल कर अपराध को अंजाम देते हैं.

देहरादून से सितारगंज के बीच कई सुनसान इलाके थे, लेकिन हत्यारों ने उसी स्थान को क्यों चुना, यह भी एक बड़ा सवाल था. ऐसा प्रतीत होता था कि हत्या पूर्व नियोजित थी और शातिराना अंदाज में तीनों को ठिकाने लगा दिया गया था. पुलिस के पास हत्या की जांच के लिए 3 बिंदु प्रमुख थे. एक ड्राइवर, दूसरा संपत्ति और तीसरा प्रेम प्रसंग. संपत्ति के मामले में पुलिस दीपक से खूब घुमाफिरा कर गहन पूछताछ कर चुकी थी. वह खुद को बेकसूर बता रहा था. उस के खिलाफ पुलिस को कोई सबूत भी नहीं मिला था. ड्राइवर के गुनाहगार और राजदार होने के शक में भी कई लोगों से पूछताछ की जा चुकी थी.

जांच कर रही पुलिस ने इस बार नजरिया बदल कर प्रेम के एंगल पर भी काम करना शुरू किया. इस के लिए कुछ रिश्तों को खंगालना शुरू किया गया. इस कड़ी में घर की छोटी बहू यानी दीपक की पत्नी चंचल पर जांच केंद्रित की गई. पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स की जांचपड़ताल शुरू की तो पुलिस चौंकी. दरअसल घटना वाले दिन उस के मोबाइल पर एक नंबर से कुछ एसएमएस किए गए थे, जिस नंबर से एसएमएस किए गए थे, वह श्यामपुर के ही संजय पंत का था.

संजय पंत जोशी परिवार के पड़ोस में ही रहता था. इस पर पुलिस ने संजय के मोबाइल की लोकेशन की जांच की तो उसे यह देख कर झटका लगा कि घटना वाले दिन उस की लोकेशन राजेंद्र के मोबाइल के साथसाथ सितारगंज तक गई थी. इस से साफ था कि घटना वाले दिन वह उन के साथ था. चंचल और संजय मोबाइल पर अकसर बातें किया करते थे. काल डिटेल्स इस की गवाही दे रही थी. इस का मतलब संजय और चंचल का जरूर कोई गहरा कनेक्शन था.

गुत्थी सुलझती नजर आई तो पुलिस बिना देरी किए देहरादून पहुंची. संजय को पकड़ लिया गया. देहरादून के एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर चंचल को भी हिरासत में ले लिया गया. उन दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस ऊधमसिंहनगर आ गई. पुलिस ने दोनों के मोबाइल ले कर चेक किए तो उन में से घटना वाली तारीख के एसएमएस नदारद थे. जाहिर था कि उन्होंने एसएमएस डिलीट कर दिए थे. पुलिस ने दोनों से गहराई से पुछताछ की तो उन्होंने जो बताया, सुन कर पुलिस के भी रोंगटे खड़े हो गए.

जोशी परिवार का कातिल संजय पंत था और इस साजिश में चंचल भी शामिल थी. दोनों के अवैध रिश्ते और संपत्ति का लालच इतने बड़े कांड की वजह बन गया था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक बहू पूरे परिवार के लिए काल बन जाएगी. करीब डेढ़ साल पहले संजय और चंचल की नजरें चार हुई थीं, धीरेधीरे दोनों का झुकाव एकदूसरे की तरफ हो गया था. चंचल का पति दूर रहता था, संजय ने इस बात का फायदा उठाया और अपनी मीठीमीठी बातों से चंचल को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हो गया.

चंचल को भी पति से दूरियां खलती थीं. भविष्य की परवाह किए बिना दोनों ने प्रेम की पींगे बढ़ानी शुरू कर दीं. संजय किसी न किसी बहाने से कमला के घर आनेजाने लगा. एक ही गांव और पड़ोसी होने से उस का इस तरह आना कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. वक्त गुजरता रहा. संजय और चंचल मुलाकातों के अलावा मोबाइल पर भी बातें किया करते थे. दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार कर चुके थे. एक दौर ऐसा भी आया, जब उन के बीज मर्यादा की दीवार गिर गई. यूं तो हर नजरिए से उन का रिश्ता अवैध था, लेकिन उन दोनों को इस में खुशियां मिल रही थीं.

चंचल काफी पढ़ीलिखी थी. उस की समझदारी पर पूरे परिवार को गर्व था. कमला ने जमाना देखा था. बहू के रंगढंग उन से छिप नहीं सके. उन्होंने एक दिन चंचल को समझाया, ‘‘संजय का हमारे घर ज्यादा आनाजाना ठीक नहीं है बहू. मैं सबकुछ जान कर भी अंजान नहीं रह सकती. तुम खुद को सुधार लो, इसी में परिवार की भलाई है.’’

चंचल जैसे इस के लिए पहले से तैयार थी. यह एक सच है कि ऐसी गलतियां कर ने वाला इंसान अपनी कारगुजारियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगता है और इसी के चलते वह काफी शातिर भी हो जाता है. वह जानती थी कि एक न एक दिन यह नौबत आ कर रहेगी. अच्छा इंसान वही होता है, जो अपनी गलती स्वीकार कर के उसे सुधार ले, लेकिन चंचल ने उल्टा दांव चला. वह हैरान हो कर बोली, ‘‘यह आप क्या कह रही हैं मांजी? आप को इतनी घटिया बातें सोचते हुए शरम नहीं आई?’’

‘‘सोचना क्या, मैं सब देख रही हूं.’’ कमला गुस्से से बोलीं.

‘‘सच देखतीं तो आप ऐसा नहीं बोलतीं. ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा आप सोच रही हैं. अपने दिमाग से इस तरह की बातों को निकाल दीजिए.’’

‘‘सच्चाई तो कड़वी लगती है बहू, लेकिन मैं ने तुम्हें समझाना अपना फर्ज समझा. मैं तुम्हारी हरकतों से अपने परिवार को बदनाम नहीं होने दूंगी.’’ बहू के शातिराना रुख से हैरान कमला ने चेतवानी भरे लहजे में कहा.

उन्होंने अगले दिन संजय को भी समझाया कि वह उन के यहां ज्यादा न आया करे. पतन की राहें बहुत रपटीली होती हैं. कुछ दिनों तो दोनों दूर रहे, लेकिन बहुत जल्द दोनों पुराने ढर्रे पर उतर आए. संजय रात के वक्त भी छिपतेछिपाते आने लगा. जो गलतियां करता है, वह कहीं न कहीं लापरवाह भी हो जाता है. एक रात कमला ने उन दोनों को पकड़ा तो उन्हें जम कर फटकारा. संजय चुपचाप वहां से खिसक गया. कमला ने चंचल को खरीखोटी सुनाई, ‘‘मैं ने सोचा था चंचल कि तू मेरी बातों से संभल जाएगी, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर चला गया है. अब मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकती. मुझे इस बारे में दीपक से बात करनी पड़ेगी.’’

चंचल रंगेहाथों पकड़ी गई थी. उस के पास कहनेसुनने को कुछ नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात उस के पति तक पहुंचे. उस ने कमला से माफी मांग कर कभी कोई गलती न करने की कसम खाई. सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. कमला ने भी वक्त के साथ बहू को माफ कर दिया. बेटे को दु:ख न पहुंचे, इसलिए वह इन बातों को दबा गईं. संजय का आनाजाना भी कम हो गया. अपने किए पर वह भी माफी मांग चुका था. कुछ दिनों की सावधानी के बाद दोनों अब देहरादून जा कर एकदूसरे से मिलने लगे. चंचल फैशन डिजाइनिंग के कोर्स के लिए जाती थी. इसी बहाने वह संजय से मिल लेती थी. मोबाइल पर भी वह बातें और एसएमएस किया करते थे. अब दोनों को ही परिवार के लोग बाधा लगने लगे थे.

अपने अवैध रिश्ते में संजय और चंचल एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा चुके थे. संजय दुष्ट और अपराध करने वाला युवक था. चंचल पूरी तरह उस के रंग में रंगी हुई थी. उन के प्रेमप्रसंग में कमला व राजेंद्र बड़ी बाधा थे, गनीमत यह थी कि ये बातें अभी दीपक को नहीं पता थी. संजय चाहता था कि अपने और चंचल के बीच की हर दीवार को गिरा कर न सिर्फ उस से विवाह कर ले, बल्कि करोड़ों की प्रौपर्टी भी उस की हो जाए. उस ने इस बारे में चंचल से बात की तो उस ने भी अपनी स्वीकृति दे दी.

इस के बाद संजय इसी बारे में सोचने लगा. उस ने रुपयों का इंतजाम कर के 30 हजार रुपए में सितारगंज के रहने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के युवक अनिल कुमार से एक माउजर खरीद लिया. संजय व चंचल चाहते थे कि हत्याएं इतनी सफाई से की जाएं कि किसी को उन के ऊपर जरा भी शक न हो. वे दोनों जानते थे कि कमला राजेंद्र के लिए लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जाने वाली हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर वह पहले ही अपने पति के पास उड़ीसा चली गई. उड़ीसा जाने के बावजूद वह संजय के संपर्क में बनी रही.

संजय ने उस से वादा किया कि अगर कमला पिथौरागढ़ गईं तो वह सभी का काम तमाम कर देगा. संजय ने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए कमला और राजेंद्र से मेलजोल और बढ़ा लिया. उसे पता चला कि 27 नवंबर को उन्हें पिथौरागढ़ जाना है. राजेंद्र को ड्राइवर की जरूरत थी. उस ने इस बारे मं सजय से कहा तो वह खुद उन के साथ जाने को तैयार हो गया. संजय कार चलाना जानता था. कमला और राजेंद्र को इस बात की खुशी हुई कि संजय उन के लिए अपना समय निकाल रहा है.

27 नवंबर को वह उन्हें कार से ले कर पिथैरागढ़ के लिए निकला. संयोगवश उसे किसी ने भी उन के साथ जाते नहीं देखा. संजय ने अपने पास माउजर और एक चाकू रख लिया. ये लोग हरिद्वार पहुंचे तो दीपक का फोन आया और उस ने मां से बात की. इस के बाद संजय ने बहाने से राजेंद्र का मोबाइल लिया और उस का सिम ढीला कर दिया, जिस से उस का नेटवर्क चला गया. राजेंद्र टैक्नोलौजी के मामले में कमजोर था, इसलिए उस ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. संजय नहीं चाहता था कि किसी का फोन आए और वह लोग उस के साथ होने के बारे में कुछ बता दें. वे काशीपुर पहुंचे तो राजेंद्र ने एटीएम से कुछ पैसे निकाले.

इस बीच संजय ने 2 बार चंचल से 4-4 मिनट बात की. इस के बाद जंगल का रास्ता सुनसान था. कमला और भास्कर कार में सो रहे थे, जबकि राजेंद्र जाग रहा था. सिडकुल के पास पहुंच कर संजय ने कार रोक दी. राजेंद्र ने उस से कार रोकने की वजह पूछी तो उस ने कहा कि उसे थकान हो रही है. कुछ देर रुक कर चलेंगे. संजय कार से नीचे उतर गया. राजेंद्र भी नीचे उतर गया. बाहर से कार के अंदर कोई आवाज न जाए, इसलिए संजय ने कार के शीशे बंद कर दिए.

संजय बात करते हुए बहाने से राजेंद्र को कुछ दूर ले गया और माउजर से उस के सिर में गोली मार दी. राजेंद्र ने तुरंत ही दम तोड़ दिया. संजय उसे खींच कर झाडि़यों में ले गया और लाश को छिपा दिया. इस बीच उस ने राजेंद्र की जेब से मोबाइल निकाल कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया. इस के बाद वह कमला जोशी के पास पहुंचा और उन्हें बताया कि राजेंद्र झाडि़यों के पीछे बैठ कर शराब पी रहा है और आने से मना कर रहा है. यह सुन कर कमला जोशी उस के साथ चल दीं. मौका पाते ही संजय ने उन्हें भी गोली मार दी.

दोनों शव ठिकाने लगा कर वह कार ले कर थोड़ा दूर आगे गया और एक जगह पर कार रोक कर भास्कर को जगा कर अपने साथ झाडि़यों की तरफ ले गया. संजय हैवान बन चुका था. उस ने चाकू निकाल कर मासूम भास्कर की पहले गरदन काटी और फिर उस के पेट पर वार किए. भास्कर ने तड़प कर दम तोड़ दिया. हत्या कर के तीनों की लाशें ठिकाने लगाने के बाद उस ने यह बात चंचल को एसएमएस कर के बता दी. कमला ने बैग में जो आभूषण लड़की को देने के लिए रखे थे, वह उस ने खुद कब्जा लिए. उस ने एक थैले में आभूषण, चाकू व माउजर रखा और आगे जा कर कलमठ में जंगल में एक स्थान पर गड्डा खोद कर उसे छिपा दिया.

इस के बाद वह रुद्रपुर होते हुए बिलासपुर पहुंचा और सड़क किनारे कार छोड़ कर बस से देहरादून चला गया. हत्या का मामला ठंडा हो जाने के बाद चंचल और संजय की योजना दीपक को भी ठिकाने लगाने की थी. लेकिन उस से पहले ही वे पुलिस के शिकंजे में आ गए. संजय की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हथियार और आभूषण बरामद करने के साथ ही पुलिस ने माउजर बेचने वाले अनिल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत भेज दिया गया.

चंचल के अविवेक ने जहां एक भरेपूरे परिवार को उजाड़ दिया, अंधे प्यार और लालच ने संजय को भी जुर्म की राह पर धकेल दिया. दोनों ने मर्यादाओं का खयाल किया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. चंचल के पति दीपक का कहना था कि उसे नहीं लगता कि उस की पत्नी का हत्या में कोई हाथ है. वह पूरे कांड का मास्टरमाइंड संजय को मानता है. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Dehradun Crime

 

Crime Story: दौलत से जीता दिल

Crime Story: रविंद्र का दिल दोस्त की पत्नी परमजीत पर आया तो वह उस पर विदेश से कमा कर लाई दौलत लुटाने लगा. परिणामस्वरूप उस ने परमजीत को तो पा लिया, लेकिन दोस्त को गंवा कर…

जगतार सिंह में भले ही लाख बुराईयां रही हों, लेकिन उस में एक सब से बड़ी अच्छाई यह थी कि उसे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, वह शाम के 7, साढ़े 7 बजे तक घर जरूर लौट आता था. जिस किसी को उस से मिलना होता या कोई काम करवाना होता, वह शाम 7 बजे के बाद उस का इंतजार उस के घर पर करता था. जगतार सिंह पंजाब बिजली बोर्ड में नौकरी करता था. लेकिन न जाने क्यों आज से 5-6 साल पहले उस ने अपनी यह नौकरी छोड़ दी और घर पर रह कर स्वतंत्र रूप से बिजली मरम्मत का काम करने लगा था. उस के इलाके के ज्यादातर किसान बिजली बोर्ड के बजाय उस पर ज्यादा भरोसा करते थे.

इसीलिए दूरदूर तक के गांवों में जब किसी की घर की बिजली या ट्यूबवेल की मोटर खराब होती, लोग बिजली बोर्ड में शिकायत करने के बजाय जगतार को ले जा कर अपना काम करवाना ज्याद बेहतर समझते थे. एक तो इस से उन का समय बच जाता था, दूसरे जगतार की भी रोजीरोटी अच्छी तरह से चल रही थी. 25 अगस्त, 2015 की शाम जब जगतार अपने निश्चित समय पर घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों को चिंता हुई. इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. क्योंकि उस का फोन बंद बता रहा था. जब रात 10 बजे तक भी वह घर नहीं लौटा तो उस के घर वाले परेशान हो उठे.

जगतार सिंह का मोबाइल बंद था, इसलिए बात नहीं हो पा रही थी. उस की पत्नी परमजीत  कौर, बड़ा भाई गुरबख्श सिंह तथा गांव के कुछ अन्य लोग उस की तलाश में निकल पड़े थे. रात करीब 11 बजे अचानक उस का फोन मिल गया. उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी से उस की बात हो गई. इस के बाद उस ने सभी को बताया कि जगतार अपने दोस्तों के साथ कहीं बैठा खापी रहा है. चिंता की कोई बात नहीं है, थोड़ी देर में वह घर आ जाएगा. जगतार अपने किन दोस्तों के साथ बैठा खापी रहा है, यह उस ने नहीं बताया था.

बहरहाल, जगतार से बात हो जाने के बाद घर वालों की चिंता कुछ कम हो गई. लेकिन फोन पर कहने के बावजूद जगतार रात को घर नहीं आया. उस के बाद से उस का फोन बंद हो गया तो सुबह तक बंद ही रहा. अगले दिन यानी 26 अगस्त, 2015 को किसी ने बताया कि गांव नरीकोकलां स्थित पंचायती अनाज मंडी स्टोर की ट्यूबवेल की हौदी में जगतार सिंह की लाश पड़ी है. पंचायती अनाज मंडी जगतार के गांव सहिके से करीब 4-5 किलोमीटर दूर थी. लाश पड़ी होने की सूचना मिलने पर गांव के सरपंच, उस की पत्नी, भाई और गांव के कुछ लोग नरीकोकलां जा पहुंचे. वहां एक ट्यूबवेल की पानी की हौदी में जगतार की लाश पड़ी थी.

उस के सिर और पैर पर मामूली चोटों के निशान थे. लाश को ट्रैक्टर की ट्रौली पर लाद कर उस के गांव सहिके लाया गया. जगतार के पास अपना स्कूटर था, जिस से वह गांवगांव जा कर लोगों का बिजली का काम करता था. काफी तलाशने पर भी उस का स्कूटर वहां नहीं मिला. यही नहीं, उस के औजार और मोबाइल फोन भी नहीं मिला. बहरहाल, गांव आ कर जब घर और गांव वालों ने कहा कि यह साफसाफ हत्या का मामला और इस की सूचना पुलिस को देनी चाहिए तो उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि वह इस बात की सूचना पुलिस को कतई नहीं देना चाहती.

क्योंकि पुलिस को सूचना दी गई तो वह लाश को कब्जे में ले कर उस का पोस्टमार्टम कराएगी. वह नहीं चाहती कि मरने के बाद उस के पति की लाश को काटपीट कर दुर्दशा की जाए. जगतार के बड़े भाई गुरबख्श सिंह और सरपंच ने परतजीत को काफी समझाया कि पोस्टमार्टम होने से पता चल जाएगा कि जगतार की मौत क्यों और कैसे हुई है? लेकिन परमजीत अपनी बात पर अड़ी रही. उस का कहना था कि जगतार की मौत बिजली का करंट लगने से हुई होगी, इसलिए पोस्टमार्टम की कोई जरूरत नहीं है.

सरपंच ही नहीं, घर तथा गांव वाले कहते रह गए, लेकिन परमजीत ने किसी की नहीं सुनी. मजबूर हो कर गांव वालों ने पुलिस को सूचित किए बगैर ही जगतार सिंह का अंतिम संस्कार करा दिया. पंजाब के जिला संगरूर का एक कस्बा है अमरगढ़. इसी कस्बे से लगभग 8 किलोमीटर दूर गांव है सहिके. गुरनाम सिंह इसी गांव के रहने वाले थे. उन की 7 संताने थीं, जिन में 3 बेटे और 4 बेटियां थीं. बड़ा बेटा गुरबख्श सिंह सेना से रिटायर्ड हो कर गांव में ही रहता था. उस से छोटा था जगतार, जो बिजली मरम्मत का काम करता था और गांव में ही रहता था. उस से छोटा था अवतार सिंह, जिस की जून, 1999 में मौत हो गई थी.

उस की मौत कैसे हुई, इस बात का पता आज तक नहीं चला. गुरनाम सिंह की भी मौत हो चुकी है. गांव में अब सिर्फ 2 भाई, फौजी गुरबख्श सिंह और जगतार सिंह ही रहते थे. दोनों के मकान भले ही अलगअलग थे, लेकिन आमनेसामने थे. सन 1994 में जगतार का विवाह परमजीत कौर से हुआ था. उस के 2 बच्चे थे, 19 साल की बेटी हरप्रीत कौर और 14 साल का बेटा. परमजीत कौर ने जिद कर के पति का अंतिम संस्कार भले ही करा दिया था, लेकिन फौजी गुरबख्श सिंह के मन में हर समय यही बात घूमा करती थी कि आखिर परमजीत ने जगतार की लाश का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराने दिया. यह एक ऐसा संदेह था, जो उसे किसी भी तरह से चैन नहीं लेने दे रहा था.

जगतार के अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी हो गईं तो परमजीत अपने मायके मलेरकोटला चली गई. इस के बाद तो वह पूरी तरह से आजाद हो गई. कभी वह संगरूर चली जाती तो कभी अमरकोट. उसे न पति की मौत का दुख था और न अब बच्चों की कोई परवाह रह गई थी. यह सब देख कर फौजी गुरबख्श सिंह को और ज्यादा दुख होता. जब नहीं रहा गया तो उन्होंने सरपंच के साथ मिल कर निजी तौर पर परमजीत कौर के बारे में छानबीन की तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. परमजीत की हरकतों से मन का संदेह बढ़ता गया तो 8 सितंबर को वह सरपंच को साथ ले कर थाना अमरगढ़ जा पहुंचे.

सारी बात उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर संजीव गोयल को बताई तो उन्होंने भी संदेह व्यक्त किया कि उन के भाई की मौत बिजली का करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है. संजीव गोयल ने गुरबख्श सिंह की पूरी बात सुन कर उन की शिकायत दर्ज करा कर उन्हें पूरा विश्वास दिलाया कि वह जल्दी ही जगतार की मौत के रहस्य से परदा उठा देंगें. इस मामले में संजीव गोयल के सामने समस्या यह थी कि मर चुके जगतार सिंह का अंतिम संस्कार हो चुका था. कोई इस तरह का सबूत भी नहीं था कि उसी के आधार पर वह इस मामले की जांच करते.

अब जो भी सबूत जुटाए जा सकते थे, वे सिर्फ पूछताछ कर के ही जुटाए जा सकते थे. इसलिए उन्हें लगा कि सब से पहले मृतक जगतार की पत्नी परमजीत कौर से ही पूछताछ करनी चाहिए. उन्होंने सहिके जा कर परमजीत कौर से जगतार सिंह की मौत के बारे में पूछा तो उस ने उन से भी कहा कि उन की मौत बिजली का करंट लगने से हुई थी. उस दिन वह पंचायती मंडी के उस ट्यूबवेल की मोटर ठीक करने गए थे. मोटर ठीक करते हुए उन्हें करंट लगा और वह हौदी में गिर गए, जिस से उन की मौत हो गई.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम ने इस बात की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? तुम्हें ऐसी क्या जल्दी थी कि बिना पोस्टमार्टम कराए ही तुम ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने सोचा कि आज नहीं तो कल उन का अंतिम संस्कार कराना ही है, इसलिए मैं ने देर करना उचित नहीं समझा और उन का अंतिम संस्कार करा दिया.’’

‘‘अच्छा जगतार की अस्थियां कहां हैं?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘उन्हें तो मैं ने श्रीकीरतपुर साहिब में प्रवाह दी हैं.’’

‘‘मतलब, तुम ने सारे सबूत मिटा दिए, कुछ भी नहीं छोड़ा. खैर, फिर भी मैं सच्चाई का पता लगा ही लूंगा.’’ संजीव गोयल ने कहा.

इस के बाद उन्होंने अन्य लोगों से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें पता चला कि जगतार के मरने के बाद से परमजीत कौर को न बच्चों की कोई चिंता है और न उस की मौत का जरा भी दुख है. उसे देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि 10-15 दिन पहले ही उस के पति की मौत हुई है. बहरहाल, उस दिन की पूछताछ में सरपंच ने ही नहीं, गांव के जिस किसी से उन्होंने पूछा, सभी ने यही आशंका व्यक्त की कि जगतार की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है और उस की हत्या में कहीं न कहीं से परमजीत का हाथ जरूर है.

इसी पूछताछ में संजीव गोयल को गांव वालों से पता चला कि परमजीत कौर के घर रविंद्र उर्फ रवि तथा जुगराज का काफी आनाजाना था. हत्या वाले दिन यानी 25 अगस्त की शाम जगतार को उन्हीं दोनों के साथ टोरिया गांव की ओर जाते देखा गया था. संजीव गोयल थोड़ा और गहराई में गए तो पता चला कि परमजीत कौर और रविंद्र के बीच जरूर कुछ चल रहा है. इस के तुरंत बाद उन के एक मुखबिर ने उन्हें बताया कि परमजीत कौर को उस ने रविंद्र के साथ मलेरकोटला की ओर जाते देखा था. उन के हाथ में बैग थे, जिस से यही लगता है कि वे गांव छोड़ कर कहीं जा रहे हैं.

यह सूचना मिलते ही संजीव गोयल ने समय गंवाना उचित नहीं समझा और तुरंत जीप से पीछा कर के रास्ते में ही रविंद्र और परमजीत कौर को गिरफ्तार कर के थाने ले आए. फौजी गुरबख्श सिंह के बयान के आधार पर रविंद्र, जुगराज और परमजीत कौर को नामजद कर के जगतार की हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर पूछताछ शुरु की गई. 10 सितंबर, 2015 को संजीव गोयल ने रविंद्र और परमजीत को सक्षम अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान रविंद्र की निशानदेही पर मृतक जगतार का स्कूटर और मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर दोनों को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें संगरूर की जिला जेल भेज दिया गया. मृतक जगतार के भाई फौजी गुरबख्श सिंह, सरपंच एवं गांव वालों तथा अभियुक्तों से की गई पूछताछ में जगतार की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह परमजीत कौर के पतन की कहानी थी. जगतार सिंह और रविंद्र बचपन के दोस्त थे. उन का खेलनाकूदना, खानापीना बचपन से अब तक साथ रहा. जवान होने पर भी दोनों ज्यादातर साथ ही रहते थे. रविंद्र सिंह उर्फ रवि पड़ोसी गांव मुंडिया के रहने वाले काका सिंह का बेटा था.

सवेरा होते ही रविंद्र जगतार के गांव सहिके आ जाता या फिर जगतार उस के गांव मुंडिया पहुंच जाता. जवान होने पर दोनों की शादियां ही नहीं हो गईं, बल्कि वे एकएक बेटी के बाप भी बन गए. जगतार बिजली मरम्मत का काम करता था, जबकि रविंद्र निठल्ला घूमते हुए आवारागर्दी किया करता था. बचपन से ही उस की काम करने की आदत नहीं थी. लगभग 8 साल पहले वह अपने एक रिश्तेदार के पास विदेश चला गया, जहां 3 साल रहा. वहां से लौटा तो उस के पास ढेर सारे रुपए थे.  वह कार से जगतार से मिलने उस के घर गया तो उस के लिए भी ढेर सारे महंगे उपहार ले गया था. रविंद्र के ठाठबाट देख कर जगतार की पत्नी परमजीत खूब प्रभावित हुई.

उस दिन के बाद जगतार का घर शराब का अड्डा बन गया. रोज महफिलें सजने लगीं. रविंद्र के साथ उस का दोस्त जुगराज भी आता था. वह गांव शेरखां वाला के रहने वाले राम सिंह का बेटा था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद परमजीत अभी जवान और खूबसूरत लगती थी. उस की मांसल देह किसी को भी दीवाना बना सकती थी. रविंद्र पहले से ही उस का दीवाना था. इसीलिए विदेश से लौटने पर परमजीत को खुश करने के लिए वह उस के लिए भी तरहतरह के महंगे उपहार खरीद कर लाने लगा.

एक दिन जब जगतार की गैरमौजूदगी में उस ने परमजीत कौर का हाथ पकड़ कर कहा कि वह उस से प्यार करने लगा है और उस के लिए पागल हो गया है तो परमजीत खुशीखुशी उस के आगोश में समा गई. इस की वजह यह थी कि वह भी तो रविंद्र और उस की कमाई की दीवानी थी. रविंद्र और परमजीत के बीच अवैधसंबंध तो बन गए, लेकिन जगतार के घर पर रहने की वजह से उन्हें मिलने का अवसर कम ही मिल पाता था. इस का उपाय रविंद्र ने यह निकाला कि जगतार की उस ने मलेरकोटला में बिजली बोर्ड में नौकरी लगवा दी.

वह सुबह नौकरी पर जाता तो रात में ही लौटता. उस के नौकरी पर जाते ही रविंद्र उस के घर पहुंच जाता. यह लगभग रोज का नियम बन गया. रविंद्र परमजीत कौर पर दोनों हाथों से रुपए लुटा रहा था. वह उस के इस तरह खर्च करने से बहुत खुश थी. शायद इसी वजह से उस ने रविंद्र के कहने पर उस के दोस्त जुगराज से भी संबंध बना लिए थे. अब परमजीत एक ही समय में अपने 2 प्रेमियों, रविंद्र और जुगराज को खुश करने लगी थी.

सब कुछ बढि़या चल रहा था कि मोहल्ले में उड़तेउड़ते यह खबर किसी दिन जगतार के कानों तक पहुंच गई. इस के बाद उस ने मलेरकोटला छोड़ दिया और घर पर ही रहने लगा. उसी बीच किसी दिन उस ने परमजीत कौर, रविंद्र और जुगराज को रंगेहाथों पकड़ लिया. उस समय परमजीत कौर और रविंद्र ने माफी मांग कर बात संभाल ली. जगतार ने भी उन्हें माफ कर दिया. लेकिन वे चोरीछिपे मिलते रहे.

परमजीत कौर को इस तरह चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उस ने रुआंसी हो कर कहा, ‘‘देखो रविंद्र, इस तरह चोरीछिपे मिलना मुझे अच्छा नहीं लगता. अगर इस बार हम पकड़े गए तो जगतार माफ नहीं करेगा. तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो तो मुझे भगा ले चलो या फिर जगतार का कोई इंतजाम कर दो.’’

रविंद्र परमजीत की देह का इतना दीवाना था कि उस से बिछुड़ने की कल्पना से ही डरता था. इसलिए उस ने परमजीत कौर के साथ मिल कर जगतार को ही रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस योजना में उस ने जुगराज को भी शामिल कर लिया. 25 अगस्त की शाम रविंद्र ने जगतार के साथ खानेपीने का कार्यक्रम बनाया. यह महफिल उन्होंने सहिके गांव से 4 किलोमीटर दूर खेतों में जमाई. शराब पीने के दौरान रविंद्र और जुगराज ने बातोंबातों में जगतार को कुछ ज्यादा ही शराब पिला दी.

जब जगतार संतुलन खोने लगा तो दोनों उसे ले कर पंचायती मंडी के पास आ गए और वहां उस की जम कर पिटाई की. उस के बाद गला घोंट कर उस की हत्या कर दी और लाश ट्यूबवेल की हौदी में फेंक कर परमजीत को फोन कर दिया कि उन्होंने जगतार की हत्या कर दी है. इस के बाद परमजीत कौर ने घटनास्थल पर जा कर खुद देखा कि जगतार सचमुच मर चुका है या वे झूठ बोल रहे हैं. जगतार की लाश देख कर उसे विश्वास हो गया तो वह गांव लौट आई. जगतार की हत्या के समय वह इतना बेचैन थी कि मात्र एक घंटे में उस ने कई बार रविंद्र को फोन कर के पूछा था कि काम हो गया या नहीं?

यह बात संजीव गोयल को तब पता चली, जब उन्होंने परमजीत कौर और रविंद्र के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. रविंद्र और परमजीत को जेल भेज कर संजीव गोयल ने इस हत्याकांड के तीसरे अभियुक्त जुगराज की तलाश शुरू की तो 16 सितंबर, 2015 को उन्होंने उसे भी संगरूर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी स्वीकार कर लिया कि जगतार की हत्या में रविंद्र के साथ वह भी शामिल था.

पूछताछ के बाद संजीव गोयल ने 17 सितंबर को जुगराज को भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे भी जेल भेज दिया गया. जगतार की मौत के बाद उस के बच्चे अकेले रह गए थे. अब वे अपने फौजी ताऊ गुरबख्श सिंह के साथ रह रहे हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Shoes Offer: एक रुपए के जूते की सेल, बेकाबू भीड़ पर किया लाठीचार्ज

Shoes Offer: एक ऐसा मामला सामने आया है जिस ने हर किसी को चौंका दिया है. जहां एक दुकान पर एक रुपए में महंगे जूते देने का औफर दिया गया. इसी औफर की वजह से इतनी ज्यादा भीड़ इकट्ठा हो गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ गया. आखिर किस तरह से एक रुपए में जूते का औफर चल रहा था. इस पूरी कहानी को जानने के लिए पढ़ते हैं आगे.

यह घटना केरल से सामने आई है, जहां एक दुकान पर जरूरत से ज्यादा भीड़ जमा हो जाने के कारण पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. जानकारी के मुताबिक दुकानदार ने एक रुपए में जूते देने का औफर रखा था, जिस के बाद काफी बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए.

इस के बाद कई जिलों से भी लोग उस की दुकान पर आने लगे. दुकान के बाहर देर रात से ही लोगों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया, जिस के बाद भीड़ लगातार बढ़ती चली गई. हालात इतने बिगड़ गए कि मौके पर भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. आखिरकार पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा.

दुकान के औफर के मुताबिक वह पहले 100 ग्राहकों को एक रुपए में एक जोड़ी जूते देने वाला था, जिस वजह से सबसे पहले पहुंचने की होड़ मच गई थी.

जानकारी के मुताबिक वायरल विज्ञापन से आकर्षित हो कर सैकड़ों ग्राहक तड़के ही उस की दुकान के पास पहुंच गए, जिस से भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. भीड़ की वजह से इलाके में ट्रैफिक भी प्रभावित होने लगा, जिस के बाद पुलिस को ऐक्शन लेना पड़ा.

पुलिस ने बताया कि भीड़ इतनी ज्यादा थी कि दुकान की क्षमता से कहीं अधिक ग्राहक पहुंच गए, जिन में बच्चे भी शामिल थे. हैरानी की बात यह रही कि वायनाड जैसे जिलों से भी लोग वहां आए थे. वायनाड से आए एक लड़के ने बताया कि वह देर रात करीब ढाई बजे दुकान पर पहुंचा, लेकिन वहां पहले से ही भारी भीड़ मौजूद थी. लोगों की भारी भीड़ के कारण इलाके में अफरातफरी फैल गई और यातायात पूरी तरह बाधित हो गया.

जब स्थिति बेकाबू हो गई, तो पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और भगदड़ रोकने के लिए हल्का लाठीचार्ज भी किया गया. इस अफरातफरी के बाद इलाके में तनाव फैलाने के आरोप में दुकान मालिक को हिरासत में ले लिया गया. 1 Rupee Shoes Offer

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने में कानून नाकाम

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने  में कानून नाकाम   देश की राजधानी दिल्ली में अपनी छोटी बहन के साथ जा रही एक लड़की पर द्वारका मोड़ के पास एक लड़के ने एसिड अटैक कर दिया. लड़की ने इस मामले में 2-3 लोगों पर शक जाहिर किया. पुलिस ने सभी 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

लड़की के पिता ने बताया, ‘‘मेरी दोनों बेटियां सुबह स्कूल के लिए निकली थीं. कुछ देर बाद मेरी छोटी बेटी भागती हुई आई और उस ने बताया कि 2 लड़के आए और दीदी पर एसिड फेंक कर चले गए.  हर साल देश में एसिड अटैक के 1,000 से ज्यादा मामले सामने आते हैं. आरोपी पकड़े जाते हैं. पुलिस अपना काम करती है. इस के बावजूद लड़की की जिंदगी खराब हो जाती है. एसिड अटैक को ले कर साल 2013 में कानून बना था.

यह भी एसिड की शिकार लड़कियों की पूरी मदद नहीं कर पा रहा है. कानून के तहत एसिड हमलों को अपराध की श्रेणी में ला कर भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए और धारा 326बी जोड़ी गई. इन धाराओं के तहत कुसूरवार पाए जाने पर कम से कम  10 साल की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है. कुछ मामलों में उम्रकैद का भी प्रावधान रखा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में एक पीडि़ता की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा था, ‘एसिड हमला हत्या से भी बुरा है.

इस से पीडि़त की जिंदगी पूरी तरह बरबाद हो जाती है.’ इस के बाद एसिड अटैक के पीडि़तों के इलाज और सुविधाओं के लिए भी नई गाइडलाइंस जारी की गई थीं. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों को एसिड हमले के शिकार को तुरंत कम से कम 3 लाख रुपए की मदद देने का प्रावधान है. पीडि़ता का मुफ्त इलाज भी सरकार की जिम्मेदारी है.  देखने में यह बेहतर लगता है, पर हकीकत में इस को संभालना बहुत मुश्किल होता है. एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगी, इस के बाद भी एसिड मिल रहा है.

साल 2018 से साल 2020 के बीच देश में महिलाओं पर एसिड हमलों के 386 मामले दर्ज किए गए थे. इन में से केवल 62 मामलों के आरोपियों को कुसूरवार पाया गया था. एसिड अटैक की शिकार अपना मुकदमा सही से नहीं लड़ पाती हैं. उन के पास अच्छा वकील करने के लिए पैसे नहीं होते हैं.

एसिड अटैक की शिकार अंशु बताती हैं, ‘‘एसिड अटैक के बाद जिंदगी बेहद मुश्किल हो जाती है. इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं. सरकार से मिलने वाली मदद लेना बेहद मुश्किल होता है. वह मदद इतनी नहीं होती कि सही तरह से इलाज हो सके.  ‘‘इस के बाद जिंदगी में किसी का साथ नहीं मिलता. एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए सरकार को पुख्ता कदम उठाने चाहिए.’’

UP Crime: मुखौटा लगा कर ली पत्नी की जान

UP Crime: एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक पति ने पत्नी के अफेयर के चलते उस की चाकू से हत्या कर डाली. पत्नी आरती अपने प्रेमी के साथ लिवइन में रह रही थी. अब सवाल उठता है कि आखिर आरती पति के होते हुए प्रेमी के साथ लिवइन में क्यों रह रही थी? आखिर क्या वजह थी इस हत्या की? पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को सावधान और होने वाले क्राइम से सतर्क करेगी.

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर से सामने आई है, जहां होली के दिन मनमोहन पांडेय ने मुखौटा लगा कर पत्नी आरती की हत्या कर डाली. वहीं आरती के प्रेमी बृजदीप के ऊपर तेजाब फेंक दिया, जिस से वह बुरी तरह झुलस गया.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरती का मनमोहन पांडेय से पिछले 2 सालों से तलाक का केस चल रहा था. इसी वजह से वह अपने पति से अलग रहती थी. इस के बाद वह करीब 6 महीने से अपने प्रेमी बृजदीप के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. मनमोहन होली वाले दिन ही पत्नी के किराए के घर पहुंच गया. उस समय उस का प्रेमी भी वहीं रुका हुआ था. मनमोहन ने दरवाजा खटखटाया. जब बृजदीप दरवाजा खोलने आया तो मनमोहन ने उस की आंखों में रंग डाल दिया.

इस की चीख सुनकर आरती बाहर आई तो मनमोहन ने उसे दबोच लिया और चाकू से उस की हत्या कर डाली. बृजदीप ने बताया कि होली के मौके पर मैं आरती के साथ रुका था. सुबह हम बैठकर बातें कर रहे थे, तभी डोर बेल बजी. दरवाजा खोला तो सामने एक आदमी चेहरे पर मुखौटा पहने खड़ा था. उस ने मेरी आंखों में रंग झोंक दिया. कुछ समझ में आता, उस से पहले ही हमलावर ने मेरे चेहरे पर तेजाब उड़ेल दिया.

मैं चीखते हुए मकान के बाहर आ गया. मेरी चीख सुनकर आरती दौड़ते हुए कमरे से बाहर आ गई. मैं ने कहा तुम भाग जाओ. तब तक हमलावर ने आरती को दबोच लिया. जब मैं ने हमलावर का मुखौटा खींचा तो पता चला कि वह उस का पति मनमोहन था.

मनमोहन ने चाकू से आरती का गला रेत दिया. आरती की चीख सुनकर मैं भागकर कमरे में आया. देखा तो आरती लहूलुहान पड़ी थी और मनमोहन उस पर चाकू से और वार करने जा रहा था. तभी मैं उस पर टूट पड़ा. मैं ने मनमोहन को लातघूंसे से बुरी तरह पीटा और ईंट से उस के सिर पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. इस घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी. UP Crime

Social Story: मजदूरों का कोई माई बाप नहीं

Social Story: किसी भी देश की तरक्की में उन मेहनत कश  मजदूरों का योगदान ही सबसे अधिक होता  है. खेती किसानी, उद्योग धंधे, फैक्ट्री, विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्य मजदूर के हाथ बिना पूरे नहीं होते. मैले कुचैले कपड़ों में दो जून की रोटी के लिए गर्मी,सर्दी और बरसात में विना रूक काम करने वाले मजदूर काम की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर मीलों दूर निकल जाते है.

आजादी के सात दशक बीत गए, लेकिन देश से हम गरीबी दूर नहीं कर पाये हैं.2014 में अच्छे दिन आने का सपना दिखाने वाली मोदी सरकार इन मजदूरों को रोटी,कपड़ा और मकान नहीं दे पाई है.सरकार पी एम आवास योजना का कितना ही ढोल पीटे, लेकिन अभी भी मजदूरों के परिवार पालीथीन तानकर अपने आशियाने बना रहे हैं. अपनी  बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मजदूर एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाने विवश हैं.

कोरोना वायरस के फैलने को रोकने के लिए 24 मार्च की रात जब प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में 21 दिन के लौक डाउन की घोषणा की तो पूरा देश अवाक रह गया. लौक डाउन की परिस्थितियों से निपटने किसी को मौका नहीं दिया गया और न ही कोई सुनियोजित तरीका अपनाया गया. जब मजदूरों को लगा कि वे शहर में विना काम धंधा 21 दिन नहीं रह सकते तो महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों के साथ पैदल ही अपने गांव की ओर निकल पड़े.

समाचार चैनलों ने जब मजदूरों के घर लौटने की खबर दिखाई तो राज्य सरकारों ने अपनी इज्जत बचाने इन्हें रोक कर भोजन पानी का इंतजाम किया. इन मजदूरों के जत्थे को सरकारी जर्जर भवनों में रोककर न तो सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा है और न ही मजदूरों की मूलभूत आवश्यकताओं का ध्यान रखा जा रहा है. नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव में जबलपुर की सीमा से सटे गांव में रूके मजदूरों के साथ महिलाओं और दुधमुंहे बच्चों को इस चिलचिलाती गर्मी में दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पा रही.

चुनाव के समय गरीब, मजदूरों से वोट की वटोरने वाले इन सफेद पोश नेताओं को  इन मजदूरों से जैसे कोई सरोकार ही नहीं है .

हरियाणा में काम करने वाले नरसिंहपुर जिले के एक गांव बरांझ के मजदूर सुन्दर कौरव ने बताया कि वह 10अप्रेल को एक मालगाड़ी के डिब्बे में बैठकर इटारसी आ गया. इटारसी से रेलवे ट्रैक के किनारे किनारे पैदल ही अपने गांव की ओर चल पड़ा.भूख प्यास से व्याकुल सुंदर को सर्दी खांसी के साथ बुखार आ गया तो सिहोरा स्टेशन के पास बोहानी गांव के मेडिकल स्टोर से दबा खरीदकर गांव की ओर जा रहा था,तभी चैक पोस्ट पर तैनात कर्मचारियों ने उसे रोककर पूछताछ की. सुन्दर की हालत देख कर कोरोना वायरस के संभावित लक्षणों के आधार पर उसे जिला अस्पताल भेज दिया है.जहां उसकी जांज कर आइसोलेशन वार्ड में भर्ती किया गया है.

हर साल फसलों की कटाई के लिए नरसिंहपुर जिले के गांवों में छिंदवाड़ा, सिवनी,मंडला, डिंडोरी जिलों से बड़ी संख्या में मजदूर आते हैं. इस वार लाक डाउन की बजह से इन मजदूरों को उतना काम नहीं मिला.और वे गांवों से घर की ओर निकल पड़े. गांव के स्थानीय लोगों ने उनसे रूकने और भोजन पानी की व्यवस्था का आश्वासन दिया तो उनका कहना था कि वे अपने 12 से 14 साल के बच्चों और बूढ़े मां-बाप को घर पर छोड़ कर फसल कटाई के लिए आये थे.लौक डाउन लंबा चला तो हमारे घर के सदस्यों का क्या होगा, इसलिए वे अपने गांव लौटने पैदल चल पड़े.

जब चीन के बुहान शहर में कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ था, तो हमारे देश की सरकार ने चीन में लाखों डॉलर कमाने वाले अमीरों के साहबजादों को विशेष विमान से भारत बुला लियाथा, लेकिन भारत में कोरोना की महामारी फैलते ही इस देश के लाचार मजदूर को उसके गांव पहुंचाने कोई जनसेवक आगे नहीं आया.

इस सरकार को मजदूरों से ज्यादा चिंता तीर्थ यात्रा पर गये यात्रियों ,धर्म के ठेकेदारों और पुजारियों की ज्यादा थी, तभी तो वाराणसी में फंसे 900 तीर्थ यात्रियों को को आंध्रप्रदेश के राज्य सभा सांसद जीबीएल नरसिम्हा राव की पहल पर लक्जरी बसों में घर वापस भेजा गया.

14 अप्रैल को देश के प्रधान सेवक सुबह दस बजे यह सोचकर अपना संबोधन दे रहे थे मुंबई की सड़कों और धर्म शालाओं में मजदूर टेलीविजन देख रहे होंगे.किसी भी तरह की सूचना संचार की तकनीक से दूर जब यह अफवाह फैली कि आज‌लौक डाउन खत्म हो रहा है तो मजदूरों का हुजूम रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ने लगा. बांद्रा स्टेशन पर घर जाने को उमड़ी भीड़ बता रही है कि लौक डाउन में फंसे मेहनत कश मजदूर  रोजी-रोटी की खातिर अपने घर लौट जाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें  तो पुलिस के डंडे और आंसू गैस का सामना करना पड़ा .

देश के क‌ई हिस्सों से यह खबर आ रही हैं कि रेलवे के कोचों को आइसोलेशन वार्ड में तब्दील किया गया है. यैसे में ये राजनेताओं को यह बात नहीं सूझती कि इनही रेलवे कोचों में इन मजदूरों को उनके घर वापस पहुंचा दिया जाए. दरअसल इन मजदूरों का कोई माई बाप नहीं है.नेता इन्हें अपनी कठपुतली समझते हैं,वे जानते हैं कि जब इनसे वोट लेना होगी तो एक बोतल शराब हजार पांच सौ के नोटों से इन्हे बरगलाया जा सकता है. Social Story

Hindi Crime Story: उधार के पैसे और हत्या

Hindi Crime Story: अपने परिजनों के राजनीतिक रसूख के चलते कोई बिगड़ैल नवाब अगर पैसे उधार लेकर आंखें दिखाने लगे, पैसे देना ना चाहे, तो उसका परिणाम जतिन राय जैसा हो सकता है.

रायपुर के खमताराई थाना इलाके में जतिन राय अभी नाबालिग ही था. उम्र थी 20 वर्ष और पार्षद अंजनी विभार का भतीजा था. चाचा भी प्रदेश में सत्ता में धमक रखते हैं.

राजधानी रायपुर के थाना खम्हारडीह इलाके में एक सूटकेस से जतिन राय नाम के युवक की लाश मिली. पुलिस इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले प्रदीप नायक, सुजीत तांडी और केवी दिवाकर को गिरफ्तार तो कर लिया मगर संपूर्ण घटनाक्रम को देखें तो जहां यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि अगर परिजन राजनीति में है, प्रभावशाली है तो बच्चे किस तरह “बिगड़े नवाब” बन सकते हैं. दूसरी तरफ पुलिस हत्या जैसे गंभीर अपराध पर भी कैसा लचीला रुख अपनाती है और अगर राजनीतिक प्रभाव ना हो मुख्यमंत्री तक पहुंच नहीं हो तो कुंभकर्णी नींद में सोती रहती है.

अपनी मौत का सामान लेकर आया जतिन!

आरोपियों ने जो घटनाक्रम पुलिस के समक्ष बयां किया है उसके अनुसार जतिन राय को कहा गया था कि अपने साथ एक बड़ा सुटकेश ट्रॉली बैग लेकर आना. क्योंकि हमें कहीं बाहर जाना है. जतिन ने अपनी मां से बैग मांगा, उन्होंने बैग देने से मना कर दिया.दूसरी तरफ आरोपी बार-बार उसे कॉल कर बुला रहे थे.

जतिन ने आखिरकार अपने पड़ोसी अभय से एक बड़ा सूटकेस लिया और प्रदीप से मिलने के लिए निकला.आरोपी प्रदीप के बताए स्थान पर पहुंचने के बाद थोड़ी देर में अपने 20 हजार रुपए लौटाने को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ. फिर प्रदीप ने अपने साथियों के साथ मिलकर जतिन की गला दबाकर हत्या कर दी. उसकी लाश को उसी सूटकेस में भर दिया जिसे लेकर वह पहुंचा था. वे आरोपी जतिन का स्कूटर लेकर चंडीनगर में सुनसान इलाके के कुएं में लाश भरे बैग को डाल कर आराम से अपने अपने घर चले गए.

राजनीतिक रसूख!

9 फरवरी 2021को जतिन के लापता होने की शिकायत खमतराई थाने में परिवार ने दर्ज करवाई गई . मगर 5 दिनों तक पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही जहां परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. थाने तक महापौर एजाज मेंबर और पर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा आ पहुंचे. मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दरबार तक पहुंचा और पुलिस को तत्परता से आरोपियों को खोजने का निर्देश मिला.और कहते हैं न, जब पुलिस अपने पर आ जाए तो आरोपी बच नहीं सकते. इस घटनाक्रम में भी यही हुआ सख्ती बरतने पर प्रदीप, उसका साथी सूरज और केवी दिवाकर पुलिस के समक्ष सच स्वीकार कर लिया.

दरअसल, करीब एक महीने पहले हत्या के आरोपी प्रदीप ने अपनी बाइक गिरवी रखी थी. इसके बदले में उसे 30 हजार रुपए मिले थे. इसमें से 20 हजार रुपए मांगने पर प्रदीप ने जतिन को दिए थे. और अब इन रुपयों को जतिन लौटा नहीं रहा था. जब भी प्रदीप पैसा मांगता तो जतिन बहाने बनाने लगता और ऐसा व्यवहार करता कि रुपए तो नहीं मिलेंगे जो करना है कर लेना. हालांकि जतिन के परिवार वालों का कहना है कि प्रदीप, जतिन से चिढ़ता था, इसलिए उसकी हत्या की और अब झूठ ही रुपयों की देनदारी की बातें कर रहा है.

“क्राइम पेट्रोल” देख बनाया प्लान

इस सनसनीखेज हत्याकांड के संदर्भ में पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि इस हत्याकांड के पीछे जहां पैसों की लेनदेन थी, रुपए नहीं मिलने से नाराज प्रदीप को “क्राइम पेट्रोल” का एक एपिसोड देखकर यह सुझा कि क्यों ना जतिन राय को कुछ इस तरह सजा दे दी जाए. पुलिस के समक्ष यह भी सच सामने आ गया है कि प्रदीप घटना से पहले जतिन को लगातार फोन कर रहा था, वो उसे बुला रहा था, जतिन जाने से इनकार कर चुका था. मगर वह बार-बार दोस्ती की दुहाई दे रहा था.

जतिन जब प्रदीप के पास भनपुरी स्थित मकान में पहुंचा तो यहां दोस्तों ने उसका स्वागत किया और मिलकर शराब पार्टी की. प्रदीप ने जानबूझकर जतिन को ज्यादा शराब पिलाई. प्रदीप ने तीव्र आवाज में म्यूजिक चला रखा था ताकि किसी को कोई आभास ना मिले. इसके बाद हत्यारों ने मौका मिलते ही उसकी गला घोंट कर हत्या कर दी और जो सूटकेस जतिन लेकर आया था उसी में उसके शव को डालकर खम्हारडीह में फेंक दिया गया.

तीन दिन बाद कचरा बीनने वाले एक बच्चे की नजर कुएं में पड़े बैग और उसमें से निकले पैरों पर पड़ी थी. और मामला पुलिस तक पहुंचा. मगर पुलिस जांच में उदासीन रही जब जतिन राय के चाचा और परिजनों ने हंगामा किया तब जाकर पुलिस के उच्च अधिकारियों के कान में जूं रेंगी और मामले की जांच में में तेजी आई और अंततः मामले का खुलासा हुआ. Hindi Crime Story

Suspense Crime Story: दौलत की खातिर दांव पर लगी दोस्ती

Suspense Crime Story: 19मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए.

शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था. शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी.

फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया.

विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था. 20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया.

पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा. रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ.

कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था.

शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था.

पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है. दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई.

योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा.

इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए. जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए.

घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को  कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित