Family Dispute: तीसरे शौहर की तीसरी बीवी

Family Dispute: शफीक की तीसरी बीवी नगमा उस के निकम्मेपन से तो परेशान थी ही, उस ने उस की मां के 5 लाख रुपए भी हड़प लिए थे. ऐसे पति से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या वह उचित था?

24 वर्षीया नगमा खान अपने मातापिता की एकलौती संतान थी. नगमा के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही पिता का साया उस के सिर से उठ गया था. मां ने छोटामोटा काम कर के उस की परवरिश की. बिना बाप की बेटी नगमा पर मोहल्ले के तमाम लड़कों की नजरें टिकी रहती थीं. बेटी के साथ कहीं कुछ ऐसावैसा न हो जाए, यह सोच कर मां ने जल्दी ही उस का निकाह आसिफ खान से करा दिया. आसिफ खान अशफाक खान का बेटा था. परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटे और बेटियां थीं. सभी बेटों और बेटियों का उन्होंने निकाह कर दिया था. परिवार में सुमति थी, लेकिन परिवार बड़ा होने की वजह से सभी अपनेअपने बालबच्चों के साथ अलगअलग घरों में रहते थे.

अशफाक खान के बेटों में पहला तौकीर खान, दूसरा तौफीक खान, तीसरा शफीक खान और चौथा बेटा आसिफ खान था. उन के चारों बेटों में शफीक खान अन्य भाइयों से अलग था. वह कोई कामधंधा करने के बजाय अपने आवारा दोस्तों के साथ दिनभर इधरउधर आवारागर्दी किया करता था. रंगीनमिजाज होने की वजह से शफीक ने 3-3 शादियां की थीं. उस के व्यवहार से तंग आ कर उस की पहले की दोनों बीवियां उसे छोड़ कर अपनेअपने मायके में रह रही थीं. 6 महीने से वह अपनी तीसरी बीवी नगमा के साथ किराए के मकान में रह रहा था. नगमा शफीक के छोटे भाई आसिफ की बीवी थी. लेकिन उस से उस का तलाक हो चुका था. तब शफीक ने उस से तीसरी शादी कर ली थी.

नगमा और आसिफ खान का जब निकाह हुआ था, तब कुछ दिनों तक तो दोनों ठीकठाक, हंसीखुशी से रहे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे नगमा की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं. अकसर वह पति से किसी न किसी महंगे समान या खानेपीने की चीजों की फरमाइश करने लगी. जबकि आसिफ को यह सब पसंद नहीं था. नगमा की इन्हीं हरकतों से तंग आ कर आखिर एक दिन उस ने नगमा को तलाक दे दिया. आसिफ से आजादी मिलने के बाद कुछ दिनों तक नगमा इधरउधर भटकती रही. इस के बाद उस ने अपने ही मोहल्ले के रहने वाले अपनी उम्र से 5 साल छोटे सरवर उर्फ मोनू से निकाह कर लिया. कुछ दिनों तक तो नगमा सरवर के साथ हंसीखुशी से रही. सरवर ने भी नगमा के हर सुखदुख का ध्यान रखा था. उसी बीच वह एक बेटे की मां बनी.

कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों के बाद नगमा का आकर्षण सरवर के प्रति कम होता गया. दोनों के बीच छोटीछोटी बातों और घरेलू खर्च को ले कर कहासुनी होने लगी थी. इस क्लेश से परेशान हो कर नगमा सरवर का घर छोड़ कर अपनी मां के साथ आ कर रहने लगी. नगमा मां के साथ रह रही थी, तभी उस की मुलाकात पहले शौहर आसिफ के बड़े भाई शफीक से हुई. रंगीनमिजाज शफीक ने अपनी लच्छेदार और मीठीमीठी बातों से नगमा का मन मोह लिया. इस के बाद उस ने यह कह कर नगमा को अपने साथ रख लिया कि वह जल्दी ही उस से निकाह कर लेगा.

इस मामले में नगमा की मां ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर शफीक के प्रेम का भूत इस तरह सवार था कि उस ने मां की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. बिना निकाह किए ही वह शफीक के साथ रहने लगी थी. इस बात का शफीक की दोनों बीवियों ने ही नहीं, घरवालों ने भी विरोध किया, लेकिन शफीक ने सभी के विरोध को नजरअंदाज कर दिया. कुछ दिनों तक शफीक ने नगमा को खूब अच्छी तरह रखा. बाद में एकएक पैसे के लिए मोहताज रहने लगी. अब उसे सरवर को छोड़ कर शफीक के साथ आने का पछतावा होने लगा.

दूसरी एक बात उसे इस से भी ज्यादा परेशान कर रही थी. दरअसल शफीक ने नगमा की मां से 5 लाख रुपए यह कह कर ले लिए थे कि वह उसे एसआरए में चल रही योजना के अंतर्गत घर दिला देगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. उस ने वे पैसे भी मौजमस्ती में उड़ा दिए. नगमा जब भी अपनी मां के पैसे लौटाने को कहती, वह उस के साथ मारपीट करने लगता. इस स्थिति में वह जब कभी सरवर से मिलती, उस से सारी परेशानियां बता कर मन का बोझ हलका कर लेती. इसी के साथ उसे छोड़ देने का अफसोस भी जाहिर करती. क्योंकि अब उसे लगता था कि सरवर जैसा भी था, शफीक से तो ठीक ही था.

30 जनवरी की रात साढ़े 10 बजे शफीक घूम कर लौटा तो बैडरूम में नगमा को सरवर के साथ हंसहंस कर बातें करते देखा. इस बात से उस का खून खौल उठा. वह सरवर को गालियां देते हुए उस से मारपीट करने लगा. नगमा को शफीक की यह हरकत अच्छी नहीं लगी. वह दोनों को अलग करने लगी तो शफीक ने उसे भी गाली दे कर गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया. तमाचा इतना जोरदार था कि नगमा के मुंह से खून निकल आया. नगमा को यह बात बरदाश्त नहीं हुई और वह भी आपा खो बैठी. क्योंकि वह पहले से ही शफीक की हरकतों से परेशान थी. उसी का नतीजा था कि उस ने तुरंत एक क्रूर फैसला ले लिया. वह दौड़ कर बाथरूम में गई और वहां रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा लाई.

शफीक सरवर से उलझा था इसलिए उस ने नगमा की ओर ध्यान नहीं दिया. इसी का फायदा उठा कर नगमा ने पीछे से उस के सिर पर मुंगरी से जोरदार वार कर दिया. वार इतना जोरदार था कि शफीक संभल नहीं सका और लड़खड़ा कर फर्श पर गिर पड़ा. इस के बाद सरवर को मौका मिल गया और वह शफीक पर पिल पड़ा. सरवर ने शफीक को इतना मारा कि वह बेहोश हो गया. नगमा और सरवर ने शफीक के साथ जो किया था, होश आने पर वह उन के साथ कुछ भी कर सकता था. इस से बचने के लिए दोनों ने उस के गले में रस्सी लपेट कर कस दी, जिस से शफीक की मौत हो गई.

शफीक को दोनों ने गुस्से में मार तो दिया, लेकिन गुस्सा शांत हुआ तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. अब उन्हें जेल जाने का डर सताने लगा. अब उन्हें शफीक की लाश को ठिकाने लगाने की चिंता सताने लगी. काफी सोचविचार कर सरवर शेख ने अपने दोस्त सोहेल मिर्जा को फोन कर के वहां बुलाया और लाश को ठिकाने लगाने में मदद मांगी. सोहेल ने मदद के लिए हामी भर दी तो सरवर और नगमा ने शफीक की लाश को एक चादर में लपेट दिया. इस के बाद सरवर उस लाश को उसी की मोटरसाइकिल से, जो वह अपने भाई की मांग कर लाया था, से रफीकनगर डंपिंग यार्ड में ले आए. लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए उन्होंने उस पर पहले मिट्टी का तेल, उस के बाद पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

31 जनवरी की सुबह 8 बजे महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर थाना शिवाजीनगर के सीनियर इंसपेक्टर बाला साहेब जाधव को पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि रफीकनगर के डंपिंग यार्ड में एक लाश जल रही है, जिस के आसपास आग फैली है. सूचना मिलते ही वह तुरंत हरकत में आ गए. तुरंत सारी औपचारिकताएं निभा कर वह सहायक इंसपेक्टर संजय दलवी, विकास भुजबल, नितिन भाट, सबइंसपेक्टर आनंद वागड़े, कांस्टेबल सुनील कलपीकट्टे, जनार्दन इंदुलकर, नारायन धड़म, संभाजी पोटे और सुनील निवालकर को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

प्राप्त सूचना के अनुसार लाश आग में जल रही थी, इसलिए चलने से पहले उन्होंने मामले की जानकारी फायरब्रिगेड को भी दे दी थी. फायरब्रिगेड की गाडि़यों ने घटनास्थल पर पहुंच कर आग को काबू में कर लिया था. पुलिस टीम के पहुंचने तक लाश इस तरह जल चुकी थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था. इंसपेक्टर बाला साहब जाधव सहायकों के साथ लाश का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर परिमंडल-7 के एडिशनल सीपी संग्राम सिंह निशायदार, एसीपी प्रकाश निलवाड़ आदि पुलिस फोटोग्राफर और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ वहां पहुंच गए.

प्रेस फोटोग्राफर और क्राइम टीम का काम खत्म हो गया तो इन पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद उन्होंने बाला साहेब जाधव से विचारविमर्श कर के उन्हें कुछ निर्देश दिए. अधिकारियों के जाने के बाद बाला साहेब जाधव सबूत जुटाने में जुट गए. लेकिन लाश की स्थिति ऐसी थी कि वह कुछ कर नहीं सके. मदद के लिए उन्होंने शहर के ही सायन अस्पताल के डा. ढेरे को बुला कर उन्हीं की मदद से लाश को पोस्टमार्टम के लिए मुंबई उपनगर घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भिजवाया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला मृतक पुरुष था और उसे गला घोंट कर मारा गया था. सबूत नष्ट करने के लिए लाश पर पेट्रोल और मिट्टी का तेल डाल कर जलाया गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर बाला साहेब जाधव ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा कर मामले की जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर संजय दलवी और विकास भुजबल को सौंप दी थी. इस मामले में सब से बड़ी समस्या थी लाश की शिनाख्त. बिना शिनाख्त के जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती थी. इस के लिए संजय दलवी ने शहर के सभी पुलिस थानों में संदेश भेज कर यह जानने की कोशिश की कि कहीं किसी की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. जब किसी थाने से कोई सूचना नहीं मिली तो मामला पेचीदा हो गया. दिन बीत रहे थे और अधजली लाश के बारे में कुछ पता नहीं चल रहा था.

जब कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो संजय दलवी और विकास भुजबल ने अपने सभी साथियों को मृतक के बारे में पता करने के लिए लगा दिया. उन की यह कोशिश रंग लाई. घटनास्थल के आसपास पूछताछ में उन्हें एक व्यक्ति ने बताया कि रात के 3-4 बजे के बीच वह डंपिंग यार्ड में शौच के लिए बैठा था तो वहां सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस से 2 लोग आए थे. पीछे बैठे आदमी के कंधे पर एक बड़ी गठरी थी. उसे वे डंपिंग यार्ड में ले आए और उसे एक जगह रख कर उस पर मिट्टी का तेल या पेट्रोल डाल कर आग लगा दी.

यह सब वह इसलिए चुपचाप बैठा देखता रहा, क्योंकि उस समय उस के पास काफी पैसे और महंगा मोबाइल फोन था. उसे डर लग रहा था कि पता नहीं वे किस तरह के आदमी हैं. उन के जाने के बाद वह भी चुपचाप वहां से चला गया था. थाना शिवाजीनगर पुलिस तो इस मामले की जांच में रातदिन एक किए ही थी, दूसरी ओर क्राइमब्रांच यूनिट-6 की टीम भी इस मामले से रहस्यों का परदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. मगर कामयाबी शिवाजीनगर पुलिस के हाथ लगी.

संजय दलवी की टीम सफेद रंग की उस मोटरसाइकिल की खोज में लग गई, जिस से लाश को डंपिंग यार्ड तक लाया गया था. संयोग देखो, जिस मोटरसाइकिल के बारे में पुलिस पता कर रही थी, उस मोटरसाइकिल को थाना चेंबूर पुलिस बरामद कर चुकी थी. चेंबूर के किसी दुकानदार ने फोन कर के सूचना दी थी कि सफेद रंग की एक मोटरसाइकिल कुछ दिनों से उस की दुकान के सामने लावारिस खड़ी है. दुकानदार की सूचना पर थाना चेंबूर पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले कर उस के नंबर के आधार पर जब उस के मालिक को बुलाया तो वह अपनी मोटरसाकिल को थाने में देख कर चौंका. उस का नाम तौफीक खान था. उस ने पुलिस को बताया कि उस की इस मोटरसाइकिल को उस का छोटा भाई शफीक एक सप्ताह पहले मांग कर ले गया था.

चूंकि मोटरसाइकिल लावारिस खड़ी मिली थी, यह जान कर तौफीक का पूरा परिवार घबरा गया. किसी अनहोनी की चिंता में सभी बुरी तरह डर गए. पता नहीं शफीक कहां और किस स्थिति में है. उस के बारे में पता करने के लिए जब उस की पत्नी नगमा को फोन किया गया तो उस ने बताया कि वह 4-5 दिनों से घर नहीं आए हैं. घरवाले चिंता में पड़ गए कि वह घर नहीं आया तो गया कहां? उस की जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले थाना नेहरूनगर जा पहुंचे. जब सारी बात वहां के थानाप्रभारी को बताई गई तो उन्होंने शफीक की गुमशुदगी दर्ज कर के बताया कि थाना शिवाजीनगर पुलिस ने बुरी तरह से जली एक लाश बरामद की है, जो अस्पताल की मोर्चरी में है. वे चाहें तो वहां जा कर उसे देख सकते हैं.

4 फरवरी, 2015 की शाम शफीक के पिता अशफाक खान अपने बेटों के साथ थाना शिवाजीनगर पहुंचे और विकास भुजबल तथा संजय दलवी से मिल कर शफीक के गायब होने के बारे में बता कर लाश देखने की इच्छा जाहिर की. संजय दलवी असफाक और उन के बेटों को राजावाड़ी अस्पताल ले गए और उन्हें वह लाश दिखाई, जो डंपिंग यार्ड से मिली थी. चूंकि लाश इस तरह जली थी कि उसे वे पहचान नहीं पाए. लेकिन सफेद रंग की मोटरसाइकिल का जो मामला था, उस से साफ हो गया कि वह लाश शफीक की ही थी. इस के बाद संजय दलवी ने शफीक के बारे में पता किया तो पता चला कि उस की 3 बीवियां थीं. वह मनमौजी और रंगीनमिजाज आदमी था. उस की पहली पत्नी का नाम शबाना था, जिस की 2 बेटियां थीं और वह उन के साथ जिला ठाणे के उपनगर मुंब्रा में रहती थी.

दूसरी पत्नी का नाम आसमा था और वह कुर्ला की पाइप लाइन में अपनी एक बेटी के साथ रहती थी. तीसरी पत्नी का नाम नगमा था, जो उस के साथ निसर्ग कौआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के मकान नंबर 6 के रूम नंबर 701 में रहती थी. शफीक के बारे में मिली इस जानकारी से जांच अधिकारियों को लगा कि शफीक की हत्या के पीछे उस की पत्नियों का हाथ हो सकता है. ईर्ष्यावश उन्हीं में से किसी ने उसे मरवा दिया है. उस की तीनों बीवियों से पूछताछ की गई तो इन में से आसमा और शबाना तो साफ निकल गईं, लेकिन नगमा फंस गई. वह पुलिस के किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. मजबूर हो कर उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और फिर शफीक की हत्या की पूरी कहानी सुना दी.

नगमा के बयान के आधार पर संजय दलवी और विकास भुजबल की टीम ने 5 फरवरी, 2015 को शिवाजीनगर स्थित दुर्गा सेवा संघ के औफिस में छापा मार कर सरवर को गिरफ्तार कर लिया. मगर उस का साथी सोहेल मिर्जा उन के हाथ नहीं लगा. क्योंकि उसे एक दिन पहले क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल की टीम ने पकड़ लिया था. पूछताछ के बाद उन्होंने सोहेल को शिवाजीनगर पुलिस के हवाले कर दिया था. पूछताछ में उन्होंने बताया था कि लाश को आग के हवाले कर के वे मोटरसाइकिल से चेंबूर स्थित मकवाना कंपाउंड पहुंचे और वहां एक दुकान के सामने मोटरसाइकिल खड़ी कर के अपनेअपने घर चले गए.

उन्हें लगा कि उन्होंने जिस तरह सारे काम निपटाए हैं, वे कतई नहीं पकड़े जाएंगे. लेकिन उन्होंने वह मोटरसाइकिल जिस दुकान के सामने खड़ी की थी, उस दुकान के मालिक ने थाना चेंबूर पुलिस को फोन कर के लावारिस खड़ी उस मोटरसाइकिल की सूचना दे दी थी, जिस से इस बात की सूचना शफीक के घर तक पहुंच गई थी. उस के बाद उस की खोज शुरू हुई तो उस की हत्या की जानकारी शफीक के घरवालों को हो गई और पुलिस नगमा तक पहुंच गई, जिस के बाद शफीक की हत्या का मामला खुल गया. पूछताछ के बाद नगमा, सरवर और शोहेल मिर्जा को पुलिस ने कुर्ला की अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family Crime: चरित्रहीन मां का गैरतमंद बेटा

Family Crime: भुलऊराम ने जो  हरकत की थी, कोई  भी गैरतमंद बेटा   बरदाश्त नहीं कर सकता था तो समयलाल कैसे बरदाश्त करता. आखिर मां की चरित्रहीनता ने उसे कातिल बना दिया. लंबी बीमारी के बाद ढेलाराम की जब मौत हुई तो पत्नी सुरजाबाई के लिए वह संपत्ति के नाम पर 6 बच्चे और एक छोटा सा मकान छोड़ गया था. गनीमत यह थी कि उस समय तक उस का बड़ा बेटा समयलाल 25 साल का हो चुका था. लड़का कमाने लायक हो गया था, इसलिए पति की मौत से सुरजाबाई को दिक्कतों का ज्यादा सामना नहीं करना पड़ा.

सुरजाबाई जवान थी, इसलिए खुद तो मजदूरी करती ही थी, समयलाल ने भी बलौदा बाजार मंडी के सामने साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली थी. मांबेटे की कमाई से किसी तरह खींचखांच कर गुजरबसर होने लगा था. इस की वजह यह थी कि कमाई के साथसाथ बच्चे बड़े हो रहे थे, जिस से खर्च बढ़ता जा रहा था. सुरजाबाई गांव के ही राजमिस्त्री भुलऊराम के साथ मजदूरी करने बलौदा बाजार जाती थी. उस के साथ आनेजाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. वह अपनी साइकिल से उसे साथ ले जाता और ले आता था.

सुरजाबाई अभी अधेड़ थी, इसलिए उसे मर्द की जरूरत महसूस होती थी. दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन रातें तनहाई में बेचैन करती थीं. तब जिस्मानी भूख उसे व्याकुल करती तो वह मन ही मन किसी ऐसे मर्द की कल्पना करती थी, जो उस की जिस्मानी भूख को शांत करता. उस की इस कल्पना में सब से पहले जिस का चेहरा आंखों के सामने आया, वह था भुलऊराम का, जिस के साथ वह पूरा दिन रहती थी. लोकलाज के भय से किसी तरह वह अपनी इस भूख को 2 सालों तक दबाए रही. लेकिन किसी भी चीज को आखिर कब तक दबाया जा सकता है. सुरजाबाई भी अपनी इस भूख को नहीं दबा सकी.

भुलऊराम ही सुरजाबाई के सब से करीब था. वह सुबह उस की साइकिल पर बैठ कर घर से निकलती थी तो सूर्यास्त के बाद ही घर लौटती थी. भुलऊराम था भी उस के जोड़ का. एक तो दोनों का हमउम्र होना, दूसरे पूरे दिन साथ रहने का नतीजा यह निकला कि वे एकदूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे.

एक दिन काम करते हुए भुलऊराम ने कहा, ‘‘सुरजा, काम तो तुम मेरे साथ करती हो, जबकि मैं देखता हूं तुम्हारा मन कहीं और रहता है.’’

‘‘भुलऊ, तुम ठीक कह रहे हो. दिन तो तुम्हारे साथ गुजर जाता है, लेकिन रात गुजारे नहीं गुजरती. ऐसे में मन तो भटकेगा ही.’’ भुलऊराम को घूरते हुए सुरजाबाई ने कहा.

भुलऊराम ने जानबूझ कर यह बात कही थी. सुरजाबाई ने जवाब भी उसी तरह दिया था. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सुरजाबाई बोली, ‘‘भुलऊ, तुम्हारी पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली जाती है तो तुम्हें कैसा लगता है?’’

भुलऊराम ने सहज भाव से कहा, ‘‘मैं तो 10 दिनों में ही बेचैन हो जाता हूं. नहीं रहा जाता तो ससुराल जा कर ले आता हूं.’’

‘‘तुम 10 दिनों में ही बेचैन हो जाते हो, यहां तो मेरे पति को मरे 2 साल हो गए हैं. मेरी क्या हालत होती होगी, कभी सोचा है?’’ सुरजाबाई ने बेचैन नजरों से ताकते हुए कहा.

भुलऊराम इतना भोला नहीं था, जो सुरजाबाई के मन की बात न समझता. लेकिन वहां और भी तमाम लोग थे, इसलिए दोनों मन मसोस कर रह गए. दोनों ने उस दिन समय से पहले ही काम निपटा दिया और घर की ओर चल पड़े. सावन का महीना था, आसमान में घने काले बादल छाए थे. दोनों आधे रास्ते पहुंचे थे कि हवा के साथ बरसात शुरू हो गई. भुलऊराम ने एक पेड़ के नीचे साइकिल रोक दी. बरसात की वजह से रास्ता सूना हो गया था. दोनों भीग गए  थे, इसलिए उन के शरीर के उभार झलकने लगे थे. उस मौसम में रहा नहीं गया तो भुलऊराम ने सुरजा का हाथ थाम लिया. सुरजा ने उस की आंखों में झांका तो उस ने कहा, ‘‘सुरजा, तुम्हारा बदन तो तप रहा है. तुम्हें बुखार है क्या?’’

सुरजा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भुलऊ, यह बुखार की तपन नहीं, यह तपन दिल में जो आग जल रही है, उस की है. आज तुम ने इस आग को और भड़का दिया है. अब तुम्हीं इस आग को बुझा सकते हो. आज रात को मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. दरवाजा खुला रहेगा और मैं दहलीज में ही लेटूंगी.’’

भुलऊराम ने चाहतभरी नजरों से सुरजा को ताका और फिर साइकिल पर सवार हुआ तो पीछे कैरियर पर सुरजा बैठ गई. गांव आते ही सुरजा अपने घर चली गई तो भुलऊ अपने घर चला गया. कपड़े बदल कर उस ने खाना खाया और सब के सोने का इंतजार करने लगा. गांवों में तो वैसे भी लोग जल्दी सो जाते हैं. भुलऊराम के गांव वाले भी सो गए तो वह सुरजाबाई के घर की ओर चल पड़ा. बरसात होने की वजह से मौसम ठंडा था. बरसाती मेढक टर्रटर्र कर रहे थे तो झींगुरों की तीखी आवाज सन्नाटे को तोड़ रही थी. 5 मिनट बाद वह सुरजाबाई के घर के सामने खड़ा था. उस ने हलके हाथ से दरवाजा ठेला तो वह खुल गया. उस ने धीरे से आवाज दी, ‘‘सुरजा… ओ सुरजा.’’

सुरजा जाग रही थी. इसलिए उस के आवाज देते ही वह उस के सामने आ कर खड़ी हो गई. उस का हाथ थाम कर धीरे से फुसफुसाई, ‘‘बड़ी देर कर दी.’’

‘‘घर वाले जाग रहे थे. जब सब सो गए, तभी निकला. इसी चक्कर में देर हो गई.’’ भुलऊराम ने कहा.

सुरजा भुलऊराम का हाथ पकड़ कर कमरे में ले आई. उसे चारपाई पर बैठा कर खुद भी सट कर बैठ गई. तन की आंखों से भले ही वे एकदूसरे को नहीं देख रहे थे, लेकिन मन की आंखों से वे एकदूसरे का तनमन सब देख रहे थे.

सुरजाबाई ने भुलऊराम का हाथ थाम कर कहा, ‘‘तुम एकदम चुप हो. कुछ सोच रहे हो क्या?’’

भुलऊराम विचारों के भंवर से निकल कर बोला, ‘‘कल की सुरजा में और आज की सुरजा में कितना अंतर है.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रहे हो, मैं समझी नहीं?’’ सुरजा ने पूछा.

‘‘सुरजा थोड़ा ही सही, लेकिन तुम ने खुद को बदला है, यह अच्छी बात है. इंसान के मन को जो अच्छा लगे, वही करना चाहिए.’’

इस के बाद सुरजाबाई का मिजाज बदलने लगा. उसने भुलऊराम के कंधे पर हाथ रखा तो उस के सोए हुए अरमान जाग उठे. उस की पत्नी 15 दिनों से मायके गई हुई थी, इसलिए वह औरत की नजदीकी पाने के लिए बेचैन था. सुरजाबाई तो सालों से प्यासी थी. भुलऊराम पर टूट पड़ी. इस तरह भुलऊराम और सुरजाबाई के बीच नए संबंध बन गए. इस के बाद घरबाहर जहां भी मौका मिलता, दोनों संबंध बना लेते. वैसे भी दोनों दिन भर साथ ही रहते थे. आतेजाते भी साथ थे, इसलिए उन्हें न मिलने में दिक्कत थी, न संबंध बनाने में. इस के अलावा दोनों अपनी मर्जी के ही नहीं, घर के भी मालिक थे, इसलिए उन्हें कोई रोकटोक भी नहीं सकता था.

लेकिन जब दोनों का मिलनाजुलना खुलेआम होने लगा तो उन के संबंधों की चर्चा गांव में होने लगी. इस के बाद सुरजाबाई को बिरादरी वालों ने बाहर कर दिया. दूसरी ओर भुलऊराम की पत्नी भी इस संबंध का विरोध करने लगी. बिरादरी से बाहर किए जाने के बाद सुरजाबाई का बड़ा बेटा समयलाल भी मां के इस संबंध का विरोध करने लगा. इस की एक वजह यह भी थी कि गांव में सब समयलाल का मजाक उड़ाते थे. इसलिए पहले उस ने मां को समझाया. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने सख्ती की. लेकिन अब तक वह भुलऊराम के साथ संबंधों की आदी हो चुकी थी, इसलिए बेटे के रोकने पर उस ने कहा,

‘‘किस के लिए मैं दिनरात मेहनत करती हूं, तुम्हीं लोगों के लिए न? इतनी मेहनत कर के अगर मुझे किसी के साथ 2 पल की खुशी मिलती है तो तुम लोगों को परेशानी क्यों हो रही है?’’

‘‘तुम जिस तरह मुझे बहका रही हो, मैं सब जानता हूं. इस दुनिया में ऐसी तमाम औरतें हैं, जिन के पति मर चुके हैं, क्या वे सभी तुम्हारी तरह नाक कटाती घूम रही हैं. अपना नहीं तो कम से कम बच्चों का खयाल करो. तुम मां के नाम पर कलंक हो.’’ समयलाल गुस्से में बोला.

‘‘आज तू मुझे सिखा रहा है. कभी सोचा है मैं ने किन परिस्थितियों से गुजर कर तुम लोगों को पाला है. तुम्हारा बाप क्या छोड़ कर गया था? सिर्फ बच्चे पैदा कर के मर गया था. आज जो बकरबकर बोल रहा है, मुझे कुलटा कह रहा है, इस लायक मैं ने ही अपना खून जला कर बनाया है.’’ सुरजा गुस्से में बोली, ‘‘गनीमत है कि मैं तुम लोगों के साथ हूं. अगर छोड़ कर चली गई होती, तो…?’’

‘‘छोड़ कर चली गई होती, तभी अच्छा रहता. लोग आज हमारी हंसी तो न उड़ाते.’’

‘‘मुझे तुम से कोई सीख नहीं लेनी. मैं जैसी हूं, वैसी ही रहने दे. तुझ से नहीं देखासुना जाता तो तू घर छोड़ कर चला जा. और सुन, आज के बाद इस मामले में मुझ से कोई बात भी मत करना.’’ सुरजा ने साफ कह दिया कि कुछ भी हो, वह उन लोगों को छोड़ सकती है, पर भुलऊराम को नहीं छोड़ सकती.

इसी तरह दिन महीने बीतते रहे. न तो भुलऊराम ने अनीति का रास्ता छोड़ा और न ही सुरजाबाई ने. धीरेधीरे 3 साल बीत गए. इस बीच समयलाल ने मां को न जाने कितनी बार समझाया, लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आई. समयलाल खून का घूंट पी कर समय से तालमेल बिठाने की कोशिश करता रहा, लेकिन लाख प्रयास के बावजूद वह इस बदनामी को झेल नहीं सका, क्योंकि पानी अब सिर से ऊपर गुजरने लगा था. उस दिन यानी 3 अप्रैल को तो हद हो गई. अभी तक जो चोरीछिपे होता था, उस दिन सब के सामने ही भुलऊराम सुरजा से मिलने आ धमका. हुआ यह कि शाम को बलौदा बाजार से लौटते समय सुरजाबाई और भुलऊराम ने रास्ते में गोश्त और शराब खरीद लिया था.

घर आ कर सुरजा गोश्त बना रही थी कि कपड़े बदल कर भुलऊराम आ गया. इस के बाद दोनों शराब पीने लगे. खाना खातेखाते दोनों ने इतनी पी ली कि भुलऊराम को जहां सुरजाबाई के अलावा कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था, सुरजा का भी कुछ वैसा ही हाल था. दोनों की हरकतों से तंग आ कर समयलाल ने भुलऊराम के पास जा कर कहा, ‘‘रात काफी हो गई है, अब तुम अपने घर जाओ. तुम्हारे घर वाले तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘मैं घर जाऊं या यहां सोऊं, तुम मुझ से कहने वाले कौन होते हो?’’ भुलऊराम ने कहा.

समयलाल को गुस्सा आ गया. वह अंदर से चारपाई का पाया उठा लाया और उसी से भुलऊराम पर हमला कर दिया. उस ने पूरी ताकत से पाया भुलऊराम के सिर पर मारा तो उस की खोपड़ी पहली ही बार में फट गई. फिर तो उस ने उसे तभी छोड़ा, जब वह मर गया. उसे मार कर वह घर से गायब हो गया. सुबह गांव वाले दिशामैदान के लिए गांव से बाहर निकले तो बाठी में उन्हें एक लाश दिखाई दी. पल भर में इस की चर्चा पूरे गांव में फैल गई. लाश औंधे मुंह पड़ी थी, उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था, इस के बावजूद गांव वालों को उसे पहचानने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. लाश भुलऊराम की थी. भुलऊराम के भाई पुनीतराम ने बलौदा बाजार के थाना सिटी जा कर भाई की हत्या की सूचना दी.

हत्या का मामला था, इसलिए थानाप्रभारी डी.के. मरकाम ने घटनास्थल पर जाने से पहले घटना की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. जिस से उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते आईएसपी अभिषेक सांडिल्य, एसडीएपी सी.पी. राजभानु भी घटनास्थल पहुंच गए थे. लाश की स्थिति से ही पता चल रहा था कि हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. लाश वहां घसीट कर लाई गई थी. पुलिस जब लाश घसीट कर लाने के निशान की ओर बढ़ी तो वह निशान सुरजाबाई के घर जा कर खत्म हो गया था.

मृतक भुलऊराम की साइकिल वहां से 2 सौ मीटर की दूरी पर खड़ी मिली. पूछताछ में पता चला कि वह उसी के यहां गया था और सुरजाबाई से उस के संबंध थे तो पुलिस के लिए आशंका की कोई बात नहीं रही. पुलिस ने सुरजाबाई और उस के बड़े बेटे समयलाल को हिरासत में ले लिया. इस तरह पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने से पहले ही अभियुक्तों को पकड़ लिया था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मांबेटे को ले कर थाने आ गई.

थाने आ कर पहले मृतक के भाई पुनीतराम की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज किया, उस के बाद समयलाल से पूछताछ शुरू की. सख्ती के डर से उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर के भुलऊराम की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. भुलऊराम के उस की मां से संबंध हैं, यह वह जानता ही था. सब कुछ जान कर भी वह चुप था. लेकिन उस दिन तो भुलऊराम ने हद ही कर दी. उस के यहां शराब पी कर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस के सामने ही वह उस की मां से अश्लील हरकतें करने लगा. उस ने मना किया तो उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर कहा, ‘‘मैं यहीं तेरे सामने ही तेरी मां से संबंध बनाऊंगा, देखता हूं तू क्या करता है.’’

भुलऊराम ने जो कहा था, और जो करने जा रहा था, समयलाल की जगह कोई भी गैरतमंद बेटा होता, बरदाश्त नहीं कर सकता था. उस से भी नहीं बरदाश्त हुआ. उस ने इधरउधर देखा, चारपाई का एक पाया पड़ा दिखाई दिया. उस ने उसे उठाया और भुलऊराम पर पिल पड़ा. इस के बाद तो वहां खून ही खून नजर आने लगा. भुलऊराम खून में डूबता गया. भुलऊराम की हत्या कर के समयलाल अपने दोस्त के यहां चला गया. सुबह जब वह घर पहुंचा तो लाश वहां नहीं थी. लाश बाठी तक कैसे पहुंची, उसे मालूम नहीं.

इस के बाद पुलिस ने सुरजाबाई से पूछताछ की तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं दरवाजे के पास खड़ी सब देख रही थी. मैं पतिता ही सही, पर इस की मां हूं. साहब मेरी वजह से आज यह हत्यारा हो गया है. इसे बचाने के लिए मैं लाश को घसीट कर बाठी में डाल आई और सुबह होने से पहले गोबर से लिपाई कर के खून साफ कर दिया.’’

इस के बाद समयलाल की निशानदेही पर पुलिस ने चारपाई का पाया, खून से सने उस के कपड़े बरामद कर लिए. सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने समयलाल और उस की मां सुरजाबाई को कोर्ट में पेश किया, जहां से उस की मां को रायपुर की महिला जेल तो समयलाल को बलौदा बाजार जेल भेज दिया गया. Family Crime

Illicit Affair: मामी की मोहब्बत में

Illicit Affair: राहुल और संतोष को जब नर्मदा ने नशे में अपने और सुनीता के संबंधों के बारे में बताया तो दोनों का खून खौल उठा. इस के बाद तो उन्होंने न संबंधों का खयाल रखा और न दोस्ती का. न र्मदा प्रसाद ने 36 वर्षीया मुंहबोली मामी सुनीता के साथ पहली बार शारीरिक संबंध बनाए तो खुद को जांबाज मर्द समझने लगा. बेरोजगारी की वजह से नर्मदा पहले न किसी से प्यार कर पाया था और न किसी से शारीरिक संबंध बनाए थे. इस तरह का खेल उस ने अपने दोस्तों के मोबाइल पर जरूर देखा था. तब उसे लगा था कि यह खेल सचमुच में खेला जाए तो जरूर बड़ा मजा आएगा.

सुनीता के साथ उसी की पहल पर जब पहली बार जिंदगी के इस हसीन सुख से रूबरू हुआ तो सुख के इस समुद्र में डूबतातैरता हुआ वह समझ नहीं पाया कि इस में उस की खुद की कोई खूबी नहीं, बल्कि सुनीता मामी की हिदायतें और सीखें ज्यादा थीं. सुनीता को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह एकदो नहीं, बल्कि 3 बच्चों की मां है.

36 की उम्र में भी उस का अंगअंग सांचे में ढला लगता था. यह कुदरत की ही मेहरबानी थी. क्योंकि वह फिटनैस के लिए रईस औरतों की तरह न किसी फिटनैस सेंटर या जिम में जाती थी, न ही सुंदर दिखने के लिए किसी ब्यूटीपौर्लर में. हां, घर के कामकाज जरूर उसे अपने हाथों से करने पड़ते थे, क्योंकि पति की इतनी आमदनी नहीं थी कि वह कामवाली रख लेती. लेकिन पति की कमाई इतनी कम भी नहीं थी कि फांके मारना पड़ता या किसी के सामने हाथ फैलाना पड़ता. भोपाल से सटे औद्योगिक इलाके मंडीदीप में फैक्ट्रियों की भरमार है, जहां आसपास या मध्य प्रदेश के ही नहीं, देश भर के लोग काम की तलाश में आते हैं. नौकरी मिल जाने पर ज्यादातर लोग यहीं बस गए हैं. देश की जिन नामी कंपनियों ने यहां फैक्ट्रियां लगा रखी हैं, उन में एक बड़ा नाम दवा बनाने वाली कंपनी ल्यूपिन का भी है, जिस में हजारों मजदूर काम करते हैं.

उन्हीं हजारों लोगों में एक 37 वर्षीय कुंवर सिंह तोमर भी है, जो फैक्ट्री में नौकरी करते हुए जानता था कि अगर बच्चों और साथ रह रहे भाई राहुल को कुछ बनाना है तो उन्हें बेहतर पढ़ाई मुहैया कराना जरूरी है. लिहाजा वह लगन और मेहनत से नौकरी तो करता ही था, साथ ही शाम को ड्यूटी खत्म होने के बाद पानीपूरी का ठेला भी लगाता था. इस से उसे 3-4 सौ रुपए रोज की ऊपर की आमदनी हो जाती थी. सालों पहले जब कुंवर सिंह हरदा जिले के नीमगांव से मंडीदीप आया था तो अन्य लोगों की तरह खाली हाथ था. लेकिन धीरेधीरे घरगृहस्थी की जरूरत की सारी जरूरी चीजें जमा हो गई थीं. पास में कुछ पैसे भी हो जाएं, इस के लिए वह शाम को पानीपूरी का ठेला लगाने लगा था.

इस काम में उसे न शरम आती थी, न ही हिचक महसूस होती थी. मिलनसार होने की वजह उस का यह धंधा बढि़या चल निकला था. मंडीदीप में हर कोई उसे जानने भी लगा था. फैक्ट्री में अपनी ड्यूटी करने के बाद वह देर रात तक पानीपूरी बेच कर इतना थक जाता था कि घर आते ही खाना खा कर बिस्तर पर लुढ़क कर खर्राटे भरने लगता. यह बात कई बार सुनीता को बेहद नागवार गुजरती, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाती थी. क्योंकि कुंवर सिंह बच्चों और घरगृहस्थी की बेहतरी के लिए ही अपना खूनपसीना एक कर रहा था. पति की इस मजबूरी की वजह से सुनीता बिस्तर पर करवटें बदलते हुए आहें भरती रहती. ऐसे में 12 साल पहले हुई शादी के बाद के दिनों को याद कर के सोने की कोशिश में वासना की आग बुझने के बजाय और भड़क उठती.

किसी तरह उसे नींद आती तो सुबह जल्दी उठ कर घर के कामकाज और बच्चों की तीमारदारी में लग जाना होता. मन ही मन घुट रही सुनीता की समझ में आने लगा था कि अब कुछ नहीं हो सकता. कुंवर सिंह उस के जज्बातों को समझ नहीं सकता. उसे रोज इसी तरह मछली की तरह तड़पना होगा. सुनीता के मन में बारबार यही खयाल आता कि पति को वह कैसे समझाए कि 3 बच्चों की मां बन जाने से औरत की शारीरिक सुख की लालसा कम नहीं हो जाती, बल्कि और बढ़ जाती है. लेकिन यह बात वह कहतेकहते रह जाती. ज्यादा बच्चे न हों, पति के कहने पर उस ने नसबंदी करा ली थी. इस पूरी कशमकश में अच्छी बात यह थी कि अभी तक उस के मन में पराए मर्द का खयाल नहीं आया था. शायद आता भी न, अगर नर्मदा प्रसाद का इस तरह उस के घर आनाजाना न होता.

यह नए साल यानी 2015 की शुरुआत की बात थी, जब एक दिन कुंवर सिंह ने सुनीता से कहा कि होशंगाबाद से भांजा नर्मदा प्रसाद काम की तलाश में उन के घर आने वाला है. नर्मदा को कभी सुनीता ने देखा नहीं था, लेकिन अपने पति की मुंहबोली बहन को वह अच्छी तरह जानती थी, जो कभीकभार उस के यहां राखी बांधने आती थी. और अगर नहीं आ पाती थी तो डाक से भेज देती थी. नर्मदा की मां और उस के पति ने एक ही गुरु से दीक्षा ली थी, इस नाते वह भाईबहन हो गए थे. वे इस रिश्ते का पूरी तरह सम्मान करते थे और हैसियत के मुताबिक निभाते भी थे.

नर्मदा प्रसाद जब मंडीदीप आया तो कुंवर सिंह ने उस की हर तरह से मदद की. पहले तो सिफारिश कर के उसे एक ग्लास फैक्ट्री में नौकरी दिलवाई. इस के बाद मंडीदीप मोहल्ला वार्ड नंबर 2 में अपने घर के सामने ही किराए पर कमरा दिलवा कर रहने की व्यवस्था कर दी. कुंवर सिंह उसे एकदम सगे भांजे की तरह मानता था. यह बात सचमुच मिसाल थी, क्योंकि वजहें कुछ भी हों, आजकल लोग सगे रिश्तों को भी इस तरह नहीं निभा पाते. इधर मुद्दत से काम की तलाश में भटक रहे बेटे को नौकरी मिली तो होशंगाबाद में रह रही उस की मां को भी तसल्ली हुई कि अब बेटे की जिंदगी पटरी पर आ जाएगी.

रायसेन में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहे नर्मदा प्रसाद के पिता लक्ष्मीनारायण ने भी बेटे की नौकरी लगने पर बेफिक्री की सांस ली और मन ही मन सोचने लगे कि साल, 2 साल नर्मदा नौकरी कर ले तो अच्छी सी लड़की देख कर उस की शादी कर के गृहस्थी बसाने की जिम्मेदारी पूरी कर देंगे. होशंगाबाद से हो कर बहती नर्मदा नदी की वजह से उसी का प्रसाद मान कर लक्ष्मीनारायण ने बेटे का नाम नर्मदा प्रसाद रखा था. तब उन्हें शायद इस बात का अहसास नहीं था कि मंडीदीप जा कर उस की जिंदगी की नदी एकदम उलटी बह कर अनर्थ कर डालेगी.

नर्मदा जब मंडीदीप में रहने लगा तो स्वाभाविक रूप से मामा के घर उस का जानाआना होता रहा. शुरुआत में तो सुनीता ने उसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि पहले से ही उस के काफी रिश्तेदार और जानपहचान वाले मंडीदीप में रहते थे. ऐसे में पति ने इस मुंहबोले भांजे को ला कर उस का सिरदर्द और बढ़ा दिया था. लेकिन उस के लगातार आनेजाने से जल्दी ही वह खुद को फिर से जवान समझने लगी थी. वजह थी नर्मदा की उस के हसीन जिस्म को भेदती नजरें. हट्टाकट्टा और खूबसूरत नर्मदा जब अपनी इस मुंहबोली मामी को देखता तो लाख कोशिश के बाद भी वह मन में उठ रहे वासना के तूफान को चेहरे पर आने से रोक नहीं पाता.

भांजे के मन की बात का अहसास होते ही सुनीता का दिल उछलने लगा था कि नर्मदा चोरीछिपे उस के जिस्म को नापतातौलता रहता है. अकसर उस की निगाहें उस के उभारों पर आ कर ठहर जातीं. यह जानने के बाद उस ने नर्मदा को बातों और हरकतों से शह देना शुरू कर दिया. अब वह सीने को पल्लू से ढंकने के बजाय अकसर गिरा देती और उसी तरह गिरा रहने देती, जिस से नर्मदा उस से नजरें बचा कर अपनी मुराद पूरी कर सके. इस के बाद दोनों में बातें तो खूब होने ही लगीं, मजाक भी होने लगा. धीरेधीरे उन के मजाक में दोअर्थी शब्द भी आने लगे. सुनीता की शारीरिक सुख की कामना अंगड़ाईयां लेने लगीं. सामने बैठा मर्द क्या सोच रहा है, यह एक औरत ही बेहतर समझ सकती है. अब यह उस की मर्जी पर निर्भर करता है कि वह उसे पहली सीढ़ी पर ही रोक दे या फिर छत तक जाने दे.

सुनीता ने तो अपनी तरफ से पूरा दरवाजा ही खोल दिया था, लेकिन यह नर्मदा के मन की हिचकिचाहट और डर था कि आंखों के सामने मिठाई रखे होने के बाद भी वह उसे उठा कर खाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. लेकिन आंखों से देखने से पेट तो भर नहीं सकता था. यही हालत सुनीता की भी थी और नर्मदा की भी. इस का मतलब आग दोनों तरफ बराबर लगी थी, बस भड़कने का इंतजार था कि पहल कौन करे. नर्मदा अपने दिल की बात इशारों से कहता तो सुनीता खुश होने के साथसाथ झल्ला भी उठती थी कि कैसा बेवकूफ लड़का है, सारी छूट दे रखी है, इस के बावजूद यह सिर्फ आग सुलगा कर चला जाता है. आखिरकार एक दिन सुनीता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने पूछ लिया, ‘‘यूं चोरीछिपे देखते ही रहोगे कि मुंह से कहोगे भी कि तुम चाहते क्या हो?’’

नर्मदा इतना नादान और बेवकूफ भी नहीं था कि इतने पर भी चुप रहता. सुनीता की इस पहल पर उस ने वही किया, जो कोई भी युवक करता. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई और नहीं था, इसलिए उस ने सुनीता को बांहों में उठाया और बिस्तर पर ला पटका. इस के बाद वह उस पर छा गया. अब कहनेसुनने को कुछ नहीं रह गया था. वासना एक तेज तूफान आया और एक नौसिखिया तथा एक तजुर्बेकार तैराक अपनेअपने तरीके से उस में गोते लगाने लगे. सुनीता को मुद्दत बाद मर्द का सुख मिला था, इसलिए वह उस पर निहाल हो उठी. दूसरी ओर नर्मदा भी अपने कमरे में आ कर निढाल सा बिस्तर पर पड़ कर कुछ देर पहले भोगे सुख को याद कर के रोमांचित होने लगा.

उस ने शारीरिक सुख के बारे में जो सुना और पढ़ा था, उस का असली सुख तो उस से कहीं ज्यादा था. इस के बाद यह लगभग रोज की बात हो गई. नर्मदा फैक्ट्री से आता तो सीधे सुनीता के पहलू में जा समाता. मौके की कमी नहीं थी, उस समय बच्चे खेलने गए होते थे और राहुल अपने दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाने में मशगूल रहता था. उन दोनों के इस नाजायज रिश्ते के बारे में कोई शक भी नहीं करता था. इस की वजह कुंवर सिंह का व्यवहार और इन दोनों की सतर्कता थी. उम्र में अपने से कुछ छोटे राहुल को भी नर्मदा ने इस तरह पटा लिया था कि वह भी इस बारे में सोच नहीं सकता था.

धीरेधीरे सुनीता और नर्मदा के शारीरिक संबंध प्यार में बदल गए और दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. यही नहीं, उन का यह प्यार इस हद तक परवान चढ़ा कि दोनों अपना बच्चा पैदा करने के बारे में सोचने लगे. इस के लिए सुनीता नसबंदी का औपरेशन खुलवाने को भी तैयार हो गई. चूंकि मंडीदीप में रहते दोनों शादी नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने भाग कर शादी करने का फैसला कर लिया. सुनीता भूल गई कि वह 3 बच्चों की मां और गरीब ही सही, पर एक इज्जतदार आदमी की पत्नी है, जिस का समाज और रिश्तेदारी में अपना अलग रसूख है.

नर्मदा भी मामा का एहसान भूल गया कि इस शख्स ने भागदौड़ कर किस तरह नौकरी दिलाई और मंडीदीप में जमने में मदद की. शायद उतनी सहायता तो सगा मामा भी नहीं करता और उस ने एवज में क्या किया, इस मुंहबोले मामा की पीठ में छुरा घोंप दिया. नर्मदा और सुनीता सारी दुनियादारी और जिम्मेदारियां भूल कर नई दुनिया बसाने की तैयारी में जुट गए थे. मई के पहले सप्ताह में चिलचिलाती गरमी में नर्मदा, राहुल और सुनीता की बहन के लड़के संतोष को शराब की पार्टी देने होशंगाबाद ले गया. मंडीदीप और होशंगाबाद के बीच औबेदुल्लागंज में रुक कर तीनों ने छक कर शराब पी. नर्मदा आदतन शराबी था, लेकिन उस दिन ज्यादा पी लेने की वजह से उस का दिमाग काबू से बाहर होने लगा. राहुल और संतोष को काफी दिनों बाद मनमाफिक पीने की मिली थी, वह भी मुफ्त में, इसलिए वे दोनों भी धुत होते जा रहे थे.

शराब का नशा क्यों नुकसानदेह कहा जाता है, यह जल्दी ही सामने आ गया. नशे की झोंक में डींगे हांकते हुए नर्मदा ने राहुल और संतोष को हमदर्द समझते हुए उन के सामने सुनीता के साथ के अपने संबंध उजागर कर दिए. उस ने दिल की बात जिस तरह कही, वह सुन कर राहुल का खून खौल उठा. लेकिन उस समय उस ने खामोश रहना ही बेहतर समझा, क्योंकि नशे की हालत में वह कुछ नहीं कर सकता था. दूसरे नर्मदा कितना सच और कितना झूठ बोल रहा था, इस का भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था. नर्मदा के मुंह से यह सुन कर कि जल्दी ही भाग कर दोनों शादी करने वाले हैं, उसे लगा कि दाल में जरूर कुछ काला ही नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है.

अपनी भाभी को मां की तरह चाहने और इज्जत देने वाले राहुल का नशा उड़ चुका था. वह बदले की आग में जल रहा था. तीनों पार्टी खत्म कर के मंडीदीप वापस आ गए और सो गए. अगले दिन राहुल ने जिस अंदाज में सुनीता और नर्मदा को बातें करते देखा, उस से उसे ताड़ते देर नहीं लगी कि बीती रात नशे में ही सही, नर्मदा ने जो कहा था, वह गलत नहीं था. अब राहुल की दिमागी स्थिति गड़बड़ाने लगी. कल तक जो नर्मदा उसे पक्का दोस्त लगता था, वह दुश्मन नंबर एक लगने लगा. उसी के साथ मां समान लगने वाली भाभी कुलटा लग रही थी, जो देवता समान पति की धोखा देने में तनिक भी नहीं हिचकिचा रही थी.

क्या किया जाए, यह सवाल राहुल को मथे डाल रहा था. भाई से कहता तो तय था कि वह उस की बात पर यकीन नहीं करते और बेवजह बात का बतंगड़ बनाते. मुमकिन है, भाभी भी उस पर ही उलटासीधा इलजाम लगा देती. हैरानपरेशान राहुल ने संतोष से बात की, जो खुद पिछली रात से तनाव में था कि उस की मौसी ऐसी है. दोनों ने मिल कर तय किया कि अब नर्मदा की हत्या के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है. इस के लिए दोनों ने तुरंत योजना भी बना डाली. शाम के वक्त नर्मदा उन्हें मिला तो दोनों ने ऐसी ऐक्टिंग की, मानों बीती रात क्या हुआ था, उसे वे भूल चुके थे या फिर उस से उन्हें कोई सरोकार नहीं था. इतराते हुए उन्होंने नर्मदा से फिर शराब पिलाने को कहा तो नर्मदा खुशीखुशी तैयार हो गया.

तय हुआ कि आज कलियासोत बांध पर चल कर पी जाए. तीनों बांध पर पहुंचे और पीनी शुरू कर दी. फर्क इतना था कि आज राहुल और संतोष दिखावे के लिए घूंटघूंट पी रहे थे, जबकि नर्मदा को ज्यादा से ज्यादा पिलाने की कोशिश कर रहे थे. नशा चढ़ा तो नर्मदा ने फिर अपने और सुनीता के संबंधों के बारे में बताना शुरू कर दिया. ये बातें राहुल और संतोष के कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रही थीं. सुनतेसुनते जब यकीन हो गया कि नर्मदा को इतना नशा चढ़ गया है कि वह कुछ नहीं कर सकता तो दोनों ने एकदूसरे को इशारा किया.

इस के बाद वे उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार करने लगे. नर्मदा के शरीर को चाकुओं से गोद कर उस के चेहरे पर एक भारी पत्थर पटका. जब उन्हें तसल्ली हो गई कि यह मर चुका है तो उन्होंने लाश को वहीं कचरे के ढेर में छिपा दिया और मंडीदीप वापस आ गए. दूसरे दिन 8 मई को थाना मिसरोद के थानाप्रभारी के.एस. मुकाती को किसी अज्ञात आदमी ने फोन द्वारा सूचना दी कि कलियासोत नदी के पुल के नीचे एक नौजवान की सिर कुचली लाश पड़ी है तो वह फौरन पुलिस टीम ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे. लाश देख कर ही पुलिस समझ गई कि मामला हत्या का है. मृतक की पहचान के लिए जब उस की तलाशी ली गई तो जेब से मिली परची पर लिखे फोन नंबर से उस की पहचान नर्मदा प्रसाद के रूप में हो गई.

शुरुआती जांच में पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ. राहुल और संतोष से भी पूछताछ हुई, लेकिन उन्होंने इस तरह इत्मीनान से जवाब दिए कि पुलिस का शक उन पर नहीं गया. उन्होंने कहा था कि नर्मदा की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, इसलिए उसे कोई क्यों मारेगा. नर्मदा की मौत शायद रहस्य बन कर रह जाती, अगर उस की मां के बयान न लिए जाते. उस ने अपने बयान में सीधे तो नहीं, लेकिन इशारों में बता दिया था कि नर्मदा के अपनी मुंहबोली मामी सुनीता से नाजायज ताल्लुकात थे. इस के बाद पुलिस के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं रह गया. अपने बयान में राहुल और संतोष यह बात छिपा गए थे कि पिछली रात वे नर्मदा के साथ कलियासोत नदी पर गए थे. पुलिस ने दोनों के हलक में अंगुली डाली तो सारी कहानी बाहर आ गई.

दोनों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. लेकिन सुनीता पर कोई आरोप नहीं लगा, जो इस कत्ल की वजह थी. हैरत की और सोचने की बात यह है कि जो औरत फसाद की जड़ थी, वह कानूनी शिकंजे से बाहर है. उस के पाप की सजा अब उस का जवान देवर और भांजा भुगतेंगे. Illicit Affair

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suicide Case: ‘कमला पसंद’ मालिक की बहू के सुसाइड का राज

Suicide Case: ‘घरेलू कलह मध्यमवर्गीय परिवारों में ही होती है,’ लोगों की इस धारणा को ‘कमला पसंद’ औद्योगिक घराने में घटी घटना ने नकार दिया है. लोगों को आश्चर्य इस बात पर है कि अरबपति परिवार की बहू दीप्ति चौरसिया ने साधनसंपन्न होने के बावजूद आत्महत्या क्यों की?

देश भर में बहुचर्चित पान मसाला ‘कमला पसंद’ और ‘राजश्री’ के मालिक की बहू दीप्ति चौरसिया का सुसाइड कई सवालों से घिरा हुआ है. बेशुमार दौलत और सुखसमृद्धि के बावजूद प्यार की भूख क्या होती है? इस दर्द का उस के सुसाइड नोट से अंदाजा लगाया जा सकता है. उस की मौत के बाद पति और सास भी कठघरे में आ चुके हैं. पति की 2 शादियों का मामला भी है. बड़ा सवाल उस के 2 बच्चों के भविष्य को ले कर भी है?

दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के पौश इलाके वसंत विहार थाने में 25 नवंबर, 2025 की दोपहर तब सनसनी फैल गई, जब पुलिस कंट्रोल रूम के जरिए एक विवाहिता की मौत की सूचना मिली. सूचना देने वाला उस का पति था. उस ने अपना नाम हरप्रीत चौरसिया बताया. अपने परिचय में उस ने जब कहा कि वह पान मसाला कंपनी ‘कमला पसंद’ के मालिक कमल किशोर चौरसिया का बेटा है, तब थाने के आला अधिकारी अलर्ट हो गए. मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर साउथवेस्ट में वसंत विहार थाने से पुलिस टीम कुछ मिनटों में ही उन के आवास पर पहुंच गई.

पुलिस ने बड़े बंगले की दूसरी मंजिल पर एक बैडरूम से दीप्ति चौरसिया (38 वर्ष) की लाश बरामद की. उस के बारे में वहां मौजूद पति हरप्रीत चौरसिया ने बताया कि दोपहर करीब साढ़े 12 बजे जब वह घर आए थे, तभी उन की मम्मी का फोन आया कि दीप्ति उस की कौल का जवाब नहीं दे रही है. इस का कारण मालूम करने के लिए वह पत्नी के कमरे में गए तो उन्होंने दीप्ति को सीलिंग से लटके हुए पाया. उस ने चुन्नी से गले में फंदा बना लिया था. वे उसी घर में साथ रहते थे. हालांकि वसंत विहार में उन के और भी कई बंगले हैं.

वह उसे तुरंत सफदरजंग अस्पताल ले गए, लेकिन वहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पुलिस तहकीकात में जुट गई. घटनास्थल का मुआयना किया. वहां से उन्हें एक हस्तलिखित सुसाइड नोट मिला, जिस में किसी पर आरोप नहीं लगाया गया था, लेकिन अपनी जिंदगी में छाई उदासी और वीरानी का जिक्र किया था. नोट में अनबन का जिक्र था.

संबंधों में थी अनबन

पुलिस को दीप्ति की एक डायरी से मिले सुसाइड नोट में दीप्ति ने अपने पति के साथ विवाद का जिक्र किया था. उस ने डायरी में लिखा, ‘अगर किसी रिश्ते में प्यार और भरोसा नहीं तो फिर उस रिश्ते में रहने की और जीने की वजह क्या है. अब और नहीं सहन होता. बेटे को मां का आशीर्वाद.’ पुलिस ने इसे घरेलू विवाद से जोड़ते हुए बीएनएस की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत केस दर्ज कर लिया.

फेमिली के वकील राजेंद्र सिंह ने भी मीडिया के सामने बयान दिया कि ये दोनों परिवारों के लिए गहरा सदमा है. जो मीडिया में फैलाया जा रहा, वो झूठ है. सुसाइड नोट में कोई आरोप नहीं, न किसी का नाम. कारण पता नहीं, लेकिन हम पुलिस के साथ हैं. फोरैंसिक रिपोर्ट और बयानों से पता चल पाएगा कि ये महज सुसाइड था या कुछ और. दीप्ति की मौत ने न सिर्फ एक अमीर परिवार को झकझोर दिया, बल्कि घरेलू हिंसा के खिलाफ बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. क्या इस में सौतन का रोल था? यह तो समय बताएगा.

इस की सूचना जब दीप्ति के फेमिली वालों को मिली, तब वे भागेभागे सफदरजंग अस्पताल पहुंचे. पुलिस ने उन से भी पूछताछ की. इस सिलसिले में दीप्ति के भाई ऋषभ चौरसिया आगबूबला थे. उन्होंने अपनी बहन की मौत का जिम्मेदार सीधेसीधे उस के पति हरप्रीत चौरसिया को बताया. देखते ही देखते अस्पताल में मीडिया का जमावड़ा हो गया. दीप्ति के भाई ऋषभ ने हौस्पिटल में मीडिया वालों को बताया कि उस की बहन और उस के पति के बीच सब ठीक नहीं था. उसे ‘फिजिकल टौर्चर’ किया गया था. 2-3 दिन पहले ही बहन से फोन पर बात हुई थी.

अफेयर्स की हुई शिकायत

ऋषभ ने मीडिया के सामने बताया कि पिछले साल वह अपनी बहन को तब घर ले आया था, जब उस ने घरेलू हिंसा और अपने पति के किसी दूसरे के साथ अफेयर्स की शिकायत की थी. किंतु कुछ दिनों में ही ससुराल  वाले उसे यह कह कर वापस ले गए कि वे उसे अपनी बेटी की तरह रखेंगे. लेकिन हाल ही में उस ने फिर से पति के अफेयर्स की शिकायत की. इस बारे में ही उस से 2-3 दिन पहले बात हुई थी. बहन ने अपने बेटे के एडमिशन के बारे में बात की थी. दीप्ति की मम्मी शारदा (63 वर्ष) ने बताया कि उन का मन बेटी की मौत से बहुत दुखी है. उन्होंने उस का अंतिम संस्कार किया है. क्या कोई उन की बेटी को वापस ला सकता है?

दीप्ति चौरसिया देश के एक बड़े पान मसाला कंपनी ‘कमला पसंद’ के मालिक कमल किशोर चौरसिया की बहू थी. उन की शादी 2010 में हरप्रीत चौरसिया से हुई थी और उन का एक 14 वर्षीय बेटा है. उन के भाई ऋषभ का आरोप है कि हरप्रीत चौरसिया ने कथित तौर पर एक और शादी कर रखी है. बताया जा रहा है कि उन की दूसरी पत्नी दक्षिण भारतीय फिल्मों की एक अभिनेत्री है. वसंत विहार पुलिस आरोप के आधार पर भी हरप्रीत चौरसिया के संबंधों की जांच कर रही है.

ऋषभ का दावा है कि उस के जीजा (हरप्रीत) के कई युवतियों से अवैध संबंध थे. शादी के बाद से ही दोनों के अच्छे संबंध नहीं थे. वर्ष 2011 में भांजे की डिलीवरी के बाद उन्हें पता चला कि जीजा और सास दीप्ति  के साथ मारपीट करते हैं. इसे देखते हुए वह अपनी बहन को कोलकाता में अपने घर ले आए थे, लेकिन उस की सास उसे वापस ले गई थीं. ऋषभ का यह भी आरोप है कि बहन को दोबारा ले जाने के बाद भी उस के साथ उन्होंने मारपीट जारी रखी. इस प्रताडऩा की जानकारी दीप्ति फोन पर देती रहती थी. इसी आरोप के साथ ऋषभ अपनी बहन की मौत की जांच चाहते हैं.

वकील ने आरोप बताए बेबुनियाद

कमला पसंद कंपनी मालिक के फेमिली एडवोकेट राजेंद्र सिंह ऋषभ के सभी आरोपों को गलत बताते हैं. उन का कहना है कि मीडिया में जो भी बताया जा रहा है, वह पूरी तरह से झूठ है. सुसाइड नोट में कोई आरोप नहीं है. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया है.

‘कमला पसंद’ और ‘राजश्री’ पान मसाला समूह का कारोबार देश भर में फैला हुआ है. इस कंपनी की जड़ें कानपुर में हैं. जबकि इस का व्यापार दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे महानगरों तक फैला हुआ है. कमला पसंद समूह के संस्थापक कमला कांत चौरसिया और कमल किशोर चौरसिया हैं. इस समूह का संबंध मूलरूप से कानपुर के फीलखाना मोहल्ले से है. करीब 40-45 साल पहले 1973 में कमलाकांत चौरसिया ने कानपुर की काहू कोठी में एक गुमटी से खुला पान मसाला बेचना शुरू किया था, जो आज अरबों रुपए के टर्नओवर वाले विशाल कारोबार में बदल गया है. ‘कमला पसंद’ समूह इस पान मसाला को बनाने वाली मूल कंपनी है, जबकि कमला कांत कंपनी एलएलपी के पास इस का ट्रेडमार्क है.

इस त्रासदी का केंद्र बिंदु यही कमल किशोर चौरसिया का पान मसाला साम्राज्य है. कमला कांत चौरसिया (कमल के पिता) और कमल किशोर ने गुटखा बेचने से शुरुआत की, जो 1980 के दशक में पान मसाला में बदल गई. आज कमला पसंद (केपी ग्रुप) और कमला कांत एंड कंपनी एलएलपी के बैनर तले बना चर्चित ब्रांड है. Suicide Case

 

 

Illicit Relationship: मामी से मोहब्बत

Illicit Relationship: लखनऊ के रेल कर्मचारी की हत्या का कारण उस का शराबी होना, गुस्सैल बने रहना या चालचलन था या फिर मामीभांजे के बीच नाजायज रिश्ते की नादानी. इन सब के अलावा एक सच्चाई यह भी थी कि मंजू अपने पति की बुरी आदतों से इतनी परेशान रहती थी कि…

मई, 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू की रिश्तेदारी में शादी थी. उस के सासससुर 24 मई, 2025 की रात को उसी शादी के लिए गए थे. पति ड्यूटी पर था. मंजू घर पर अकेली थी. शाम का वक्त था. इसी बीच एक कौल आ गई. स्क्रीन पर प्रेमी का नाम पढ़ कर उस के होंठों पर मुसकान बिखर गई. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली. कौल उस के प्रेमी आकाश वर्मा की थी, जो रिश्ते में उस का भांजा लगता था.

”हैलो! मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रही हूं. तुम उस का काम तमाम कर दो, बहुत दिन हो गए,’’ मंजू शिकायती लहजे में उस से बोली.

”मैं ने फोन किया न! …मुझे तुम से अधिक बेचैनी है…मैं चाहता हूं कि जितना जल्द हो, काम निपटा लिया जाए. मुझे तुम्हारे पति सिद्धि प्रसाद का काम तमाम हर हालत में करना है.’’ आकाश बोला.

”अब यह बताओ कि तुम कितनी देर में आ रहे हो?’’ मंजू का सीधा सवाल था.

”पहले यह बताओ कि घर का क्या हाल है?’’ उस ने सवाल का जवाब सवाल से ही किया.

”अकेली हूं. सभी लोग रिश्तेदार की शादी में गए हैं. तुम्हारा मामा ड्यूटी पर है… आधी रात को आएगा.’’ मंजू बोली.

”चलो ठीक है, मैं आ जाऊंगा, तुम दरवाजा खुला रखना,’’ कह कर आकाश ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रात गहराई. आकाश अपने दोस्त के साथ पूरी तैयारी के साथ प्रेमिका मंजू के घर आ गया. चुपके से घर में घुसने का इंतजाम मंजू पहले से ही कर चुकी थी. मंजू अपने कमरे में पति सिद्धि प्रसाद लोधी के साथ लेटी हुई थी, जबकि वह गहरी नींद में था. मंजू के घर में आने पर आकाश ने उस के इशारे पर अपने दोस्त के साथ कमरे में रखी प्लास्टिक की रस्सी से एक फंदा बना लिया. मंजू की मदद से फंदा गहरी नींद में सो रहे सिद्धि के गले में डाल दिया. दोनों ने मिल कर उस फंदे को कस दिया. थोड़ी देर सिद्धि प्रसाद छटपटाया, फिर शांत हो गया.

कुछ देर के बाद जब सिद्धि प्रसाद मरणासन्न हालत में पहुंच गया. वह जिंदा न बच जाए, इसलिए आकाश ने अपने दोस्त संजय के साथ उस के सिर पर हथौड़े से हमला कर दिया. उस वार से सिद्धि रक्तरंजित हो गया. लोहे के पाइप से भी उस के सिर पर कई हमले करने के बाद जब उस की मौत हो गई, तब आकाश ने अपने दोस्त की मदद से रात के अंधेरे में घर के पीछे एक तालाब के निकट सूखे गड्ïढे में उस की लाश फेंक दी. वह गड्ïढा झाडिय़ों की ओट में था. सिद्धि प्रसाद का मोबाइल, खून सने कपड़े भी वहीं झाडिय़ों में फेंक दिए.

25 मई, 2025 की सुबह लखनऊ-कानपुर रोड पर थाना बंथरा के एसएचओ राजेश कुमार सिंह को उसी थाने की पुलिस चौकी हरौनी के इंचार्ज एसआई अर्जुन राजपूत ने कौल कर बताया कि बीती रात सिद्धि प्रसाद लोधी नामक एक रेलकर्मी की हत्या हो गई है. उस की लाश उस के घर के ठीक पीछे तालाब के पास गड्ढे में पड़ी है. सिद्धि प्रसाद लोधी का घर दरियापुर मझरा गढ़ी चुनौटी में है. उस की लाश मिलने की सूचना पर चौकी इंचार्ज अरविंद कुमार एसआई श्यामजी मिश्रा, कांस्टेबल देवेंद्र कुमार के अलावा एसएचओ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. साथ ही इस की सूचना कृष्णा नगर के एसीपी विकास पांडेय को भी दे दी गई.

घटनास्थल पर उन के साथ एडिशनल डीसीपी अमित कुमावत भी घटनास्थल पर पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने सघन जांच के आदेश दिए. घटनास्थल पर मृतक की पत्नी मंजू देवी भी मौजूद थी. उसी ने अपने पति की हत्या की सूचना पुलिस को दी थी. मंजू रोरो कर पुलिस अधिकारियों को घटना के बारे में बताया, ”साहब, सुबह 6 बजे के करीब जब मैं सो कर उठी, तब पाया कि पति कमरे में नहीं हैं. इन्हें ढूंढते हुए मकान के बाहर निकल गई. घर के पीछे लगभग 50 मीटर दूर तालाब के पास झाडिय़ों में मुझे पति के कपड़े दिखाई दिए. पैंट और शर्ट वही थे, जो उन्होंने रात में पहने थे. पास ही पति औंधे मुंह पड़े थे.

”पास जा कर देखा तो देखते ही मेरे होश उड़ गए. मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई हो. पति के सिर पर गहरी चोट थी. काफी खून बह चुका था. वह एकदम से बेजान से थे. पति को इस हालत में देख कर ऐसा लगा, जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई.’’

घटनास्थल पर नहीं मिली खून की एक भी बूंद

पुलिस ने मंजू से प्रारंभिक पूछताछ के बाद शव की जांचपड़ताल की. एसएचओ के साथ आई पुलिस टीम ने उस की चप्पल, मोबाइल, शर्ट और पैंट पास से ही बरामद कर ली. जांच में घटनास्थल पर खून की एक बूंद भी नहीं थी, जबकि मृतक के सिर से काफी खून बह चुका था. इस से पुलिस ने सहज अनुमान लगा लिया कि इस की हत्या किसी दूसरी जगह पर करने के बाद हत्यारों ने लाश यहां ला कर फेंकी है. उन्होंने अनुमान लगाया कि हत्या करने वाले 2-3 लोग हो सकते हैं. शव की हालत देख कर पुलिस ने रात 2 और 3 बजे हत्या होने का अनुमान लगाया.

शव को ध्यान से देखने पर उस के सिर से खून बहने और गले में किसी चीज से कसाव के निशान का पता चला. एसीपी विकास पांडेय के सामने बंथरा थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की औपचारिकताएं पूरी कीं. आगे की प्रक्रिया के लिए मृतक की पत्नी मंजू देवी को थाने बुलाया गया. उस की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ सिद्धि प्रसाद लोधी की हत्या का मुकदमा धारा-103 बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया गया. मंजू देवी से जांच टीम की कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी ने पूछताछ की. साथ ही उस के घर जा कर भी तहकीकात की गई.

हरौनी के चौकीप्रभारी अर्जुन राजपूत, एसआई श्याम मिश्रा, अरविंद कुमार, संदीप सिंह और कांस्टेबल देवेंद्र के साथ देर रात तक ग्रामीणों से पूछताछ करते रहे. इस पूछताछ में हत्याकांड के संबंध में चौंकाने वाली बात सामने आई. पुलिस को विशेष सूत्रों से पता चला कि मंजू ने ही योजना बना कर अपने प्रेमी की मदद से पति की हत्या करवाई है. उस का प्रेमी आकाश वर्मा उर्फ लकी 25 साल का नवयुवक है और रिश्ते में उस के पति का भांजा है. वह जनपद लखनऊ के नरपतखेड़ा गांव का निवासी है. यह भी पता चला कि इस हत्याकांड में उस का दोस्त भी शामिल था.

आकाश वर्मा के संदिग्ध आरोपी होने की जानकारी मिलने पर पुलिस उसे घटना के एक हफ्ते बाद ही गिरफ्त में ले लिया. उसे बंथारा थाने लाया गया. खासकर उस के बारे में मंजू देवी को भनक तक नहीं लगने दी गई. पुलिस ने उस से सिद्धि प्रसाद की हत्या के बारे में कड़ाई से पूछताछ की. काफी समय तक आकाश वर्मा पुलिस को गुमराह करता रहा. सच उगलवाने के लिए आखिरकार पुलिस टीम ने उस पर थोड़ी सख्ती की. पुलिस के दबाव और पूछताछ के तरीके के आगे उस ने हार मान ली और सिद्धि प्रसाद की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस ने यह भी बताया कि यह हत्या सिद्धि प्रसाद की पत्नी  मंजू देवी की शह पर की थी.

आकाश से पूछताछ पूरी होने के अगले दिन सुबहसुबह पुलिस मंजू देवी को थाने ले आई. जैसे ही उस की नजर थाने के हवालात में बंद आकाश वर्मा पर गई तो वह चौंक गई. उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. महिला कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी उसे पकड़ कर एक कोने में ले गईं. जोरदार लहजे में उस से सवाल किया, ”सचसच बता, तूने ही अपने पति की हत्या की है न?’’

दूसरी सिपाही उस की आंखों के आगे बेंत घुमाने लगी. मंजू सिपाहियों के तेवर देख कर सहम गई. उस की जुबान खुल ही नहीं रही थी. वह एकदम से निस्तब्ध थी. तभी डंडे घुमाती सिपाही कड़कती हुई बोली, ”मंजू, तू सचसच सब कुछ बताती है या मुझे कोई दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा..?’’

मंजू फिर भी कुछ नहीं बोली. दूसरी महिला सिपाही ने उस के ऊपर बेंत उठाया ही था कि मंजू बोल पड़ी, ”मुझे मारिए मत, मैं सारा सच बता दूंगी.’’

उस के बाद मंजू ने जो कहानी बताई, वह और भी चौंकाने वाली थी. उस की कहानी में पति की हत्या ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मर्यादा को लांघने की भी बात थी. उस का प्रेमी रिश्ते में पति का भांजा था. इस नाते उस के साथ मांबेटा समान मामीभांजे का रिश्ता था. आकाश और मंजू देवी के बीच लव अफेयर के साथ हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

सिद्धि प्रसाद कैसे बना शराब का लती

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के कानपुर रोड पर थाना बंथरा के अंतर्गत पुलिस चौकी हरौनी है. थाने से लगभग 12 किलोमीटर दूर बीहड़ जंगल का यह सुनसान इलाका भी है. यहीं दरियापुर गढ़ी चुनौटी नाम का गांव बसा हुआ है. सिद्धि प्रसाद लोधी अपनी फेमिली के साथ यहीं रहता था. सिद्धि प्रसाद की उम्र लगभग 40 वर्ष की हो चुकी थी. उस का विवाह मंजू देवी के साथ करीब 8 साल पहले हुआ था. मंजू खूबसूरत थी. सिद्धि प्रसाद मंजूू देवी को पा कर बहुत खुश था. वह उस की सुंदरता और यौवन का दीवाना बना हुआ था.

वह रेलवे विभाग में सम्पार (गेट कीपर) के पद पर नौकरी करता था. उसे अच्छी सैलरी मिलती थी. उस की संगत कुछ गलत लोगों के साथ थी, जिस से वह मांसाहारी होने के साथसाथ शराबी भी बन गया था. ड्यूटी पूरी करने के बाद वह जब थकामांदा लौट कर घर वापस आता था, तब अपनी थकान मिटाने के बहाने शराब पीता था. साथ में खूब मटन और चिकन उड़ाता था. उस के बाद बिस्तर पर जाते ही अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए मंजू को बांहों में दबोच लेता था. इस का वह जरा भी खयाल नहीं करता था कि पत्नी की इच्छा है भी या नहीं! कई बार वह उस की इच्छा के खिलाफ जिस्मानी भूख मिटाता था. ऐसा वह मंजू के साथ आए दिन करता था. उस की इस आदत से मंजू परेशान हो गई थी.

उस के 2 बच्चों में से एक की असामयिक मौत होने से एकमात्र बेटी ही बची थी. दूसरे बच्चे की चाहत में वह मंजू को अपनी हवस का शिकार बनाता था. जबकि मंजू पति के वहशी व्यवहार से तंग आ गई थी. उस से घृणा करने लगी थी. सिद्धि प्रसाद  की फिजूलखर्ची बढ़ती जा रही थी. मंजू देवी इस का विरोध करती थी. विरोध करने पर सिद्धि उसे प्रताडि़त करता था. मंजू कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह अपने पति की बढ़ती शराब की लत को कैसे रोके.

मंजू और आकाश ऐसे आए करीब

जनवरी, 2025 का महीना था. सिद्धि प्रसाद खाना खा कर ड्यूटी पर चला गया था. उस के जाने के बाद मंजू अपने कमरे में लेटी थी. अपनी मुसीबतों के बारे में सोच रही थी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. वह करवट लिए लेटी हुई थी. सिर पर हाथ रखे तकिए में मुंह छिपाए काफी समय तक सिसकती रही.  दिन के 11 बजने को आए थे. चारपाई पर लेटेलेटे उस की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. जब आंखें खुलीं, तब उस ने अपने बगल में बैठे आकाश को पाया.

वह हड़बडाती हुई उठी और कपड़े संभालने लगी. उस ने महसूस किया कि आकाश की नजर उस की मांसल शरीर पर टिकी है. थोड़ी देर के लिए वह शरमा गई. फिर भी बोली, ”अरे आकाश, तू कब आया? …आ न! बैठ यहीं, तू कोई गैर थोड़े है.’’

”मैं अभीअभी आया मामी, तुम उदास दिख रही हो? क्या बात है फिर मामा से बहस हुई क्या?’’ आकाश ने हमदर्दी जताई.

”अच्छा, तुम्हें याद भी कर रही थी.’’

”सौरी मामी, मैं तुम्हें कुछ और नजरों से देख रहा था.’’

”अरे कुछ नहीं, तुम जैसा गबरू जवान मेरी जवानी को नहीं देखेगा तो और कौन..?’’ मंजू बोली.

”अच्छा! …तो आप ने मुझे माफ कर दिया.’’ झेंपता हुआ आकाश बोला.

उस के बाद दोनों के बीच हंसीमजाक और इधरउधर की बातें होती रहीं. बातोंबातों में मंजू ने अपनी पीड़ा भांजे आकाश वर्मा के सामने उड़ेल कर रख दीं. इस से उस ने महसूस किया कि गम थोड़ा हलका हो गया. फिर उस के कंधे पर अपना सिर टिका कर सिसकती हुई बोली, ”आकाश, तुम ही कोई तरीका निकालो!’’

”हां मामी, मैं कुछ करता हूं आप के लिए. थोड़ा वक्त दो… अभी चलता हूं. जब भी कोई जरूरत हो तो फोन कर देना.’’ आकाश बोला और वहां से चला गया.

आकाश वर्मा सिद्धि प्रसाद का रिश्ते में भांजा लगता था. वह मूलरूप से लखनऊ के ही थाना पारा के अंतर्गत नरपत खेड़ा गांव का रहने वाला था. अकसर खाली समय में अपने मामा सिद्धि प्रसाद के यहां मिलने आताजाता रहता था. मौका मिलने पर मंजू से आंखें छिपा कर अपने मामा सिद्धि प्रसाद के साथ शराब पीने का मौका भी निकाल लेता था. शराब के नशे में दोनों काफी देर तक गपशप किया करते थे. आकाश सरोजनी नगर के नादरगंज की एक नमकीन बनाने वाली कंपनी में काम करता था और समय मिलने पर सिद्धि प्रसाद के घर चला आता था.

हसरतों में बह गया रिश्ता

25 वर्षीय आकाश वर्मा मंजू देवी को बहुत प्यार करता था, किंतु उस ने अपने मन की बात का इजहार करने के लिए मंजू के सामने कभी पेशकश नहीं की थी. आकाश मंजू के सामने जब भी आता तो बैठ कर उसे हसरत भरी नजरों से देखा करता था. वह मंजूू से अपने दिल की बात उजागर करने का कोई अवसर भी नहीं ढूंढ पाया. मंजू को अपने दिल में बसाने के बाद उस की रातों की नींद उड़ चुकी थी. चाहत छिपती नहीं है, जब 2 प्रेमी सामने हों तो आंखों में समाई प्यार की भाषा को समझते देर भी नहीं लगती.

आकाश के अकसर घर आने के बाद मंजू भी उसे चाहत की नजरों से देखा करती थी, किंतु वह विवाहिता थी. उस के सामने समाज की कुछ मर्यादाएं भी थीं. आकाश को मन ही मन में चाहने के बाद मंजू भी अपने मन की भावना व्यक्त नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे मंजू के मन में आकाश के प्रति सम्मान व प्यार का दीप जल उठा था. दोनों उचित अवसर की तलाश में थे. जनवरी माह में उस दिन आकाश के समक्ष उस ने अपनी दुखती रग को व दर्द को बयान किया तो आकाश के मन में दया व प्यार का सागर उमड़ पड़ा, लेकिन समझदारी व अवसर की तलाश में उस दिन मंजू नेे अपनी आंखों की मूक भाषा से सब कुछ समझा दिया कि वह भी इस नरक से उसे छुटकारा दिला दे.

मार्च 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू ने फोन पर आकाश के पूछने पर बताया कि उस दिन सिद्धि प्रसाद रात की ड्यूटी पर घर से गया हुआ है, इसलिए वह घर पर आ जाए, कुछ जरूरी बात करनी है.   आकाश ड्यूटी की छुटटी के बाद मंजू के घर देर रात पहुंच गया. उस ने धीरेधीरे आहट पा कर जानने की कोशिश की कि घर की बगल की दूसरी कोठरी में मंजू के सासससुर अपने कमरे में लिहाफ ओड़े सो रहे हैं. मंजू ने आकाश को घर आया देख कर राहत की सांस ली और चुपके से अपनी कोठरी में आकाश को एकांत में बुला लिया. कमरे में पहुंचने के बाद आकाश ने जाते ही मंजूू को अपनी बाहों में भर लिया. जी भर गालों को चूमने व प्यार करने के बाद वह खाना खाने बैठ गया.

उस दिन आकाश मंजू को पाने को आतुर हो गया था. पति द्वारा प्रताडि़त करने की बात कहते हुए मंजू ने उसे अपनी पीठ पर चोट के निशान दिखाए. पीठ पर पिटाई के निशान देख कर आकाश ने हमदर्दी जताई. इसी हमदर्दी में दोनों प्रेम और सहानुभूति की भावना में बह गए थे. वे कब एकदूसरे की बाहों में आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. फिर दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. थोड़ी देर में जब आकाश जाने लगा, तब मंजू उस का हाथ पकड़ कर बोली, ”आकाश, जल्द कुछ उपाय करो… अब छिपछिप कर रहना सहन नहीं होता…और उस का जुल्म भी बढ़ता जा रहा है.’’

”जल्द ही कुछ करूंगा. चिंता मत करो.’’

आकाश जब भी आता था, तब मंजू घर में अकेले होती थी. उसे नहीं पता था कि उस की गतिविधियों पर पासपड़ोस की नजर बनी हुई है. कई बार वह रात के अंधेरे में भी आने लगा था. उस का मंजू के साथ बेमेल ही सही, लेकिन नाजायज रिश्ता बन चुका था. आकाश उस से उम्र में करीब 10 साल छोटा था. मंजू के मन का दर्द आकाश के लिए भी असहनीय हो गया था. सिद्धि प्रसाद की हत्या के 2 दिन पहले जब आकाश आया था, तब घर में बिखरे हुए सामान को देख कर समझ लिया था कि सिद्धि ने उस पर किस तरह का जुल्म ढाया होगा. घर में चारपाई के नीचे शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं.

अभी आकाश घर के चारों ओर नजरें दौड़ा ही रहा था कि उस ने मंजू की सिसकती आवाज सुनी, ”जी तो करता है कि मैं कहीं जा कर डूब मरूं और अपनी जान दे दूं.’’

आकाश तेजी से मंजू की ओर मुड़ा और उस के पास जा कर कान में कुछ फुसफुसाया. मंजू उस की बात सुन कर चौंकती हुई बोली, ”ऐसा हो सकता है तो जल्दी करो, मैं तुम्हारा साथ दूंगी. जितना भी खर्च आएगा, उस का भी इंतजाम करूंगी.’’

”मैं तुम्हें 24 मई को फोन करूंगा.’’ आकाश बोल कर वहां से जाने लगा. आकाश को जाता देख मंजू बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे देखने लगी. घर से निकलने से पहले आकाश ने एक बार फिर आश्वासन देते हुए कहा, ”मामी, आप को सब्र से काम लेना होगा. मुझे पूरी प्लानिंग बनाने का मौका दो. काम बहुत जोखिम भरा है.’’

प्रेमी के साथ मिल कर बनाया हत्या का प्लान

23 मई, 2025 की रात को आकाश और मंजू जब फोन पर बातें कर रहे थे, तभी  अचानक रात की ड्यूटी समाप्त कर सिद्धि प्रसाद घर लौट आया था. अचानक पति को घर आया देख कर मंजू सहम गई थी. तुरंत फोन कट कर दिया था. किंतु सिद्धि प्रसाद समझ गया था कि मंजू जरूर अपने प्रेमी से बात कर रही है. इस बारे में पड़ोसियों द्वारा उस के कान पहले से ही भरे जा चुके थे. उस ने तुरंत मंजू की जम कर पिटाई कर डाली. वह कहती रही कि उस की बात सहेली से हो रही थी, लेकिन सिद्धि ने पीटना नहीं छोड़ा.

राज खुलने के डर से मंजू एकाएक वह घबरा गई. परेशान सी हो उठी. किसी तरह उस ने दर्द से कराहते हुए रात बिताई. अगले रोज पति के ड्यूटी पर जाने के बाद आकाश को बीती रात की पूरी बात बता दी. अगले रोज 24 मई को उस का पति सो गया, तब आकाश का फोन आया. उस के बाद उस ने पहले तय प्लान के मुताबिक सिद्धि प्रसाद की प्लास्टिक की रस्सी के फंदे से पहले गला घोंट दिया, फिर उस के सिर पर भारी चीज से हमला कर मार डाला. इस काम में आकाश ने अपने दोस्त संजय निषाद की भी मदद ली थी.

अगले दिन ही मंजू द्वारा की गई पुलिस में शिकायत के बाद सिद्धि प्रसाद की लाश बरामद कर ली गई. इस की हफ्ते भर चली जांच में हत्या का न केवल खुलासा हो गया, बल्कि इस में शामिल आरोपियों में मंजू देवी, आकाश वर्मा और उस के दोस्त संजय निषाद की गिरफ्तारी भी हो गई. उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा के रहने वाले संजय निषाद को 40 हजार रुपए देने का वादा किया था, उसे मात्र 5 हजार रुपए एडवांस में दिए थे. मंजू देवी ने पुलिस के सामने अपने पति की क्रूरता का जिक्र करते हुए पति की प्रताडऩा से परेशान रहने की बात कही.

 

उस ने पति पर अय्याशी करने का आरोप लगाया. उस ने यह भी बताया कि सिद्धि प्रसाद के गांव की एक विधवा महिला से कई सालों से  अवैध संबंध बने हुए थे. पुलिस ने आकाश से संजय निषाद का फोन नंबर ले कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. तकनीकी जांच से  वह 10 जुलाई, 2025 को उत्तर पूर्व दिल्ली के सोनिया विहार से पकड़ा गया. संजय वारदात के बाद लखनऊ से फरार हो कर दिल्ली चला गया था. वहां वह एक दुकान पर नौकरी करने लगा था. फोन की लोकेशन के आधार पर वह भी पुलिस की पकड़ में आ गया.

पुलिस ने आरोपी मंजू देवी, उस के प्रेमी आकाश वर्मा और संजय निषाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Illicit Relationship

 

Extramarital Affair: दोस्त की पत्नी पर प्यार का पासा

Extramarital Affair: घर में आर्थिक तंगी क्या हुई, एक बच्चे की मां नेहा रौनियार ने पति नागेश्वर रौनियार को दरकिनार कर उस के दोस्त जितेंद्र का हाथ थाम लिया. वह प्रेमी जितेंद्र के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इन्हीं संबंधों ने एक दिन ऐसे अपराध को जन्म दिया कि…

नेहा पति को रास्ते से हटाने के लिए प्रेमी जितेंद्र पर दबाव डाल रही थी कि उसे जल्द से जल्द रास्ते से हटा दे, ताकि वे दोनों जल्द से जल्द एक हो जाएं. उसे अब उस की दूरी और जुदाई बरदाश्त नहीं होती.

”बताओ मुझे कि रास्ते से उसे कैसे हटाओगे?’’ नेहा ने प्रेमी से सवाल किया.

”तुम्हीं बताओ, रास्ते से हटाने के लिए मैं क्या करूं?’’ जितेंद्र ने उसी भाषा में उत्तर दिया.

”मार दो. मैं ने उस के नाम के सिंदूर को अपनी मांग से बहुत पहले ही धो डाला है. रही बात पछतावे की तो उस की मैयत पर घडिय़ाली आंसू बहा लूंगी. लोग तो यही कहेंगे कि बेचारी भरी जवानी में विधवा हो गई.’’

”कहती तो तुम ठीक ही हो, तलाक तुम्हें तो वो दे नहीं रहा है तो उसे रास्ते से हटाना ही अच्छा होगा. मगर कैसे? सोचना पड़ेगा. उस की मौत भी हो जाए और हम पर कोई आंच भी न आए.’’

”मैं भी यही सोचती हूं कि उसे ऐसी मौत दें, जिस से उस की मौत एक हादसा लगे. मगर कैसे होगा ये? मैं कुछ समझ नहीं पा रही.’’

”वो ऐसे बनाया जा सकता है कि वह एक नंबर का दारूबाज है. इसी का हम दोनों फायदा उठा सकते हैं. दारू पिला कर उस की हत्या कर देंगे और बाइक उसी के ऊपर गिरा देंगे. ऐसा लगेगा जैसे बाइक से गिर कर उस की मौत हुई हो?’’

”वाह! कमाल का आइडिया आया है तुम्हारे दिमाग में.’’ नेहा भी खुशी से झूम उठी.

नागेश्वर को अपने कमरे में बुलाने के लिए दोनों ने आपस में गुफ्तगू की. जितेंद्र जानता था कि उस के बुलाने पर नागेश्वर नहीं आएगा, लेकिन अगर नेहा बुलाए तो संभव है कि वह यहां (कमरे) आ जाए. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी.

पत्नी के जाल में ऐसे फंसा नागेश्वर

नागेश्वर पत्नी नेहा और बेटे से बेहद प्यार करता था. उस के रोमरोम में पत्नी नेहा रचीबसी थी. बेटा तो उस के दिल की धड़कन था. उस के बिना एक पल भी जीना उस के लिए गवारा न था. नेहा जब से बेटे को ले कर प्रेमी जितेंद्र के पास रहने चली गई थी, तब से ले कर अब तक हजारों बार उस ने फोन कर के उसे वापस घर लौट आने को कहा था. घर छोड़ कर प्रेमी के साथ चले जाने पर गांवसमाज में नागेश्वर और उस के फेमिली वालों की चारों ओर थूथू हो रही थी. नातेरिेश्तेदार उस पर हंस रहे थे, उस की खिल्ली उड़ा रहे थे, लेकिन उस के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी.

वह प्रेमी जितेंद्र को छोड़ कर उस के पास लौट कर आने के लिए तैयार नहीं थी. नागेश्वर के दबाव से जितेंद्र और नेहा दोनों डर गए थे कि कहीं वह उन्हें एकदूसरे से अलग न कर दे. इस से पहले कि नागेश्वर कोई ठोस कदम उठाए और वह अपने मकसद में कामयाब हो पाए, वे दोनों जल्द से जल्द नागेश्वर को खत्म कर देना चाहते थे.

”जितेंद्र, एक बात का डर मुझे खाए जा रहा है.’’ नेहा ने कहा.

”किस बात का डर?’’

”यही कि लाश को ठिकाने कहां लगाएंगे?’’ नेहा बोली.

”मैं ने पहले से सोच लिया है कि लाश का क्या करना है. अब सुनो मेरी प्लानिंग क्या है. उसे दारू पिलाने के बाद गला दबा कर मार डालेंगे. फिर उसी की बाइक पर बैठा कर यहां से कहीं दूर सुनसान जगह ले जाएंगे, जहां कोई आताजाता न हो और लाश नीचे गिरा कर उस पर बाइक पलट देंगे, ताकि लगे कि दारू पी कर बाइक चला रहा था, एक्सीडेंट हुआ और उस में इस की मौत हो गई. फिर हम दोनों सुरक्षित बच जाएंगे और हमारे रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए साफ भी हो जाएगा. बोलो, कैसा लगा हमारा प्लान?’’

”क्या शैतानी दिमाग पाया है यार.’’

आया तो था संबंधों को सुलझाने लेकिन…

जितेंद्र और नेहा ने मिल कर नागेश्वर की हत्या की जो योजना बनाई थी, उसी के अनुसार सब कुछ चल रहा था. 12 सितंबर, 2025 की दोपहर में नेहा ने पति नागेश्वर को फोन कर महाराजगंज सिटी अपने किराए के कमरे पर समझौता करने के बहाने से बुलाया. नागेश्वर पत्नी नेहा को बहुत प्यार करता था. पहले तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे मनाने के लिए नेहा ने फोन किया था. उस का फोन रिसीव कर के वह इतना खुश था कि उस के मुंह से बोल तक नहीं फूट रहे थे कि वह उस से क्या कहे. यही नहीं, पत्नी की बातों पर विश्वास कर के बात अपने तक ही सीमित रखी. फेमिली वालों को कुछ भी नहीं बताया था. उसे क्या पता था कि जिस नेहा से वह समुद्र की गहराइयों से भी ज्यादा प्यार करता था, उसी पत्नी नेहा ने उस के लिए मौत का जाल बिछाया है.

नागेश्वर ने उस दिन शाम 4 बजे अपने पापा केशवराज रौनियार से झूठ बोलते हुए कहा कि बाजार जा रहा हूं, थोड़ी देर में लौटता हूं और कह कर अपनी बाइक पर सवार हो कर निकला था. पत्नी से मिलन को ले कर वह इतना उतावला हुआ जा रहा था कि करीब 40 किलोमीटर की दूरी जान की परवाह किए बिना उस ने 40 मिनट में तय कर ली थी. इधर नेहा ने प्रेमी जितेंद्र को कुछ देर के लिए अपने कमरे में बैड के नीचे छिपा कर उस पर चादर इस तरह बिछा कर ढक दिया कि नीचे क्या है? कोई भी सामान किसी को आसानी से दिखाई न दे.

पत्नी नेहा के दिए एड्रेस पर नागेश्वर पहुंचा तो देखा नेहा दरवाजे पर खड़ी उसी के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करती खड़ी मिली. उसे देखते ही नागेश्वर ने अपनी सुधबुध खो दी थी. बाइक पर सवार ही उसे अपलक निहारता रहा. थोड़ी देर बाद जब वह होश में आया तो वह झेंप गया और बाइक से नीचे उतर कर उस के साथ कमरे में चला गया. कमरे में पहुंचते ही बैड पर बेटे को बैठा देख उस का प्यार जाग गया और झट उठा कर उसे अपने सीने से चिपका लिया. 6 महीने हो गए थे नेहा को पति नागेश्वर का घर छोड़े हुए. पत्नी और बेटे की याद में दिनरात वह तड़प रहा था.

नेहा पति की आवभगत में लगी हुई थी, ताकि उसे उस पर कहीं से शक न हो. और वह तो यह सोचसोच कर मन ही मन खुश हो रही थी. क्योंकि उस के रास्ते का बड़ा कांटा हमेशा के लिए साफ होने जा रहा है. इधर नागेश्वर सारे गिलेशिकवे भूल चुका था. वह नेहा को एक बार फिर समझाने की कोशिश में जुटा रहा कि जो हुआ, उसे अब से भुला दो. मम्मीपापा के साथ नहीं रहना चाहती हो, न सही. दोनों शहर में कहीं किराए का कमरा ले कर अलग रहेंगे, लेकिन एक बार मेरे लिए घर वापस लौट चलो. उस की बात सुन कर नेहा ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, बल्कि इतना ही कहा कि आज अभी रुक तो रहे ही हो, सुबह होने दो, तब हम इस टौपिक पर बात करेंगे.

नागेश्वर पत्नी की बात मान गया. कब 3 घंटे बीत गए, नागेश्वर को पता ही नहीं चला. रात के समय नागेश्वर बाजार से आधा किलोग्राम चिकन खरीद कर ले आया. नेहा ने उसे पकाया. इधर पहले से नींद की गोली मिठाई में मिला कर बेटे को खिला दी. मिठाई खाने के थोड़ी देर बाद बेटे को गहरी नींद आ गई. वह जगा रहता तो शायद नेहा अपने बुरे मकसद में कामयाब नहीं हो पाती. नेहा ने चिकन के साथ अंगरेजी शराब की एक बोतल पति के सामने रख दी. मंहगी शराब देख नागेश्वर की आंखों में अजीब सी चमक जाग उठी थी. नेहा अपने हाथों से पैग बना कर पति को देती गई. देखते ही देखते नागेश्वर ने पूरी शराब की बोतल खाली कर दी. थोड़ी देर बाद वह नशे के आगोश में समा गया और शरीर बेकाबू होने लगा तो नेहा ने बैड के नीचे से प्रेमी जितेंद्र को बाहर निकलने का इशारा किया.

नागेश्वर बेसुध हो कर बिस्तर पर अचेतावस्था में गिर पड़ा था. फिर क्या था? उस ने छाती पर डाल रखा अपना दुपट्टा उतारा और पति के पैरों के पास जा कर खड़ी हो गई. फिर उसी दुपट्टे से उस के दोनों पैर बांध दिए, ताकि वह कोई हरकत न कर सके. जितेंद्र ने खा जाने वाली नजरों से उसे घूर कर देखा और कूद कर उस के सीने पर जा बैठा तो नेहा ने कस कर मजबूती के साथ उस के दोनों पैर पकड़ लिए तो जितेंद्र ने पूरी ताकत के साथ नागेश्वर का गला तब तक दबाए रखा, जब तक उस की मौत न हो गई. दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी और लाश वहीं बिस्तर पर छोड़ दी थी. उस समय रात काफी हो चुकी थी.

उस समय रात का करीब एक बज रहा होगा. पहले से तय की गई योजना के अनुसार, रात डेढ़ बजे के करीब जितेंद्र ने कमरे से बाहर गली में निकल कर इधरउधर झांक कर देखा. उस समय चारों ओर गली में दूरदूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था. फिर तेजी से वह भीतर कमरे की ओर लौट आया. नेहा से उस ने कहा कि रास्ता साफ है, लाश को ठिकाने लगा देते हैं. इस के बाद दबेपांव जितेंद्र ने नागेश्वर की बाइक बाहर निकाली. धीरे से उस पर नागेश्वर के शव को बैठाया. खुद बाइक को संभाला और नेहा से लाश को कस कर पकड़ कर बैठने को कहा. नेहा ने वैसा ही किया, जैसा उसे जितेंद्र ने करने को कहा.

केशवराज की टूट गई सहारे की लाठी

महाराजगंज शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने जितेंद्र ने बाइक रोक दी और लाश को सड़क की बाईं पटरी पर लिटा कर उस पर बाइक गिरा दी, ताकि यह एक्सीडेंट लगे. उस के बाद दोनों पैदल वापस लौटे तो कुछ दूरी पर एक टैक्सी खड़ी मिली. टैक्सी में सवार हो कर दोनों वापस कमरे पर लौट आए. दोनों खुश थे, क्योंकि उन के रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल चुका था. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी संबंध बनाए और सो गए.

इधर 12/13 सितंबर, 2025 की रात 3 बजे निचलौल थाने के इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा को किसी ने फोन कर के सूचना दी कि सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर एक्सीडेंट हुआ है, जिस में 25-26 साल के युवक की मौके पर ही मौत हो गई है. सूचना मिलते ही गश्त पर निकले एसएचओ अखिलेश कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे, जहां दुर्घटना होने की बात कही गई थी. मौके पर पहुंची पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उसे एक्सीडेंट जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, क्योंकि मृतक युवक के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. मामला पूरी तरह संदिग्ध लग रहा था. जामातलाशी लेने पर युवक की पैंट की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. फिर उसी रात लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया और बाइक को भी कब्जे में ले लिया.

बाइक के नंबर से मृतक की पहचान नागेश्वर रौनियार निवासी राजाबारी, थाना ठूठीबारी, जिला महराजगंज के रूप में हुई थी. पुलिस ने मृतक की जेब से जो मोबाइल फोन बरामद किया था, उस पर कई मिस्ड कौल पड़े थे. उसी में एक मिस्ड कौल पापा के नाम से भी थी. एसएचओ अखिलेश कुमार वर्मा ने उस नंबर पर कौल बैक की. मोबाइल की घंटी बजते ही केशवराज रौनियार की नींद उचट गई. बेटे के इंतजार में वह रात भर सो नहीं पाए थे. जैसे ही फोन बजा तो बिस्तर पर उठ कर बैठ गए और दीवार घड़ी की ओर देखा. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे.

उन्होंने कौल रिसीव की तो दूसरी ओर से आवाज आई, ”हैलो! आप कौन साहब बोल रहें हैं?’’

”मैं केशवराज रौनियार, राजाबारी से बोल रहा हूं आप कौन?’’ केशवराज रौनियार ने सवाल किया.

”इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा, निचलौल थाने से बोल रहा हूं.’’

”इंसपेक्टर…’’ पुलिस का नाम सुनते ही  केशवराज बुरी तरह चौंक पड़े, ”सुबहसुबह पुलिस का फोन. क्या बात है साहब, मुझ से कोई गुस्ताखी तो नहीं हुई है.’’

”नहीं…नहीं… दरअसल, बीती रात सिंदुरिया-निचलौल हाइवे स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने सड़क किनारे एक युवक की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. जामातलाशी लेने पर उस की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था, उसी फोन से यह नंबर मिला था तो मैं ने कौल किया था. निचलौल थाने आ कर उस की पहचान कर लीजिए. मृतक का नाम नागेश्वर रौनियार पता चला है.’’

”क्याऽऽ नागेश्वर रौनियार.’’ इतना सुनते ही उन के मुंह से चीख निकल गई और फोन हाथ से छूट कर नीचे फर्श पर जा गिरा था.

पति की चीख सुनते ही ममता भी झट से बिस्तर पर उठ कर बैठ गईं और पति से पूछने लगी, ”ऐ जी क्या हुआ? सुबहसुबह किस का फोन था? क्या बात कर रहे थे उस से? सब ठीक तो है न. क्यों कुछ बोल नहीं रहे?’’ पत्नी ममता पति को जोरजोर से हिलाने लगीं.

लेकिन केशवराज को जैसे काठ मार गया हो. वह एकदम मौन से हो गए थे. थोड़ी देर बाद जब वह खुद से नारमल हुए तो दहाड़ मार कर रोने लगे, ”हम लो लुट गए नागेश्वर की मम्मी. अब हम कैसे जिएंगे. हमारे बुढ़ापे का सहारा छिन गया. हमारा बेटा नागेश्वर नहीं रहा. थाने से बड़े साहब का फोन आया था. उन्होंने निचलौल थाने लाश की शिनाख्त के लिए बुलाया है. हमारी तो कमर ही टूट गई. कैसे देखेंगे बचवा की लाश को. कैसी विपदा में आ गए हम?’’ कह कर केशवराज पत्नी से लिपट कर रोने लगे.

काम न आए घडिय़ाली आंसू

उधर पत्नी ममता बेटे की मौत की खबर सुनते ही दहाड़ मार कर रोने लगीं. सुबहसुबह केशवराज के घर में कोहराम सुन कर पड़ोसी भी हैरान रह गए थे कि आखिर क्या हो गया जो सब के सब रो रहे हैं. पड़ोसी जब वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि नागेश्वर की एक्सीडेंट में मौत हो गई है. गांव के कुछ संभ्रात लोगों को साथ ले कर केशवराज सुबह निचलौल थाने पहुंचे. फोटो देख कर उन्होंने मृतक की अपने बेटे के रूप में शिनाख्त कर ली थी. इस बात से पुलिस को थोड़ी राहत मिली. उसी दिन यानी 13 सितंबर की शाम को पोस्टमार्टम रिपोर्ट इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा की टेबल पर थी. रिपोर्ट पढ़ कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह एक्सीडेंट नहीं, दम घुटने से हुई दर्ज थी. यानी नागेश्वर की गला दबा कर हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे केस को उझला कर रख दिया था.

इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने फोन कर के केशवराज को दोबारा निचलौल थाने बुलाया और बताया कि तुम्हारे बेटे की मौत एक्सीडेंट से नहीं बल्कि गला घोंटने से हुई है. यह सुन कर केशवराज रौनियार एकदम से सन्न रह गए थे. इंसपेक्टर वर्मा ने उन से किसी पर शक होने की बात पूछी तो उन्होंने बिना सोचेसमझे अपनी बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार का नाम लिया और कहा कि इन्हीं दोनों ने मिल कर बेटे की हत्या की होगी. पीडि़त केशवराज रौनियार ने बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार के खिलाफ लिखित तहरीर दी.

तहरीर के आधार इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की हत्या और साक्ष्य मिटाने की धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया और आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इंसपेक्टर अखिलेश कुमार ने घटना से एसपी सोमेंद्र मीणा को भी अवगत करा दिया. एसपी सोमेंद्र मीणा के दिशानिर्देश पर जांच की काररवाई आगे बढ़ाई. पुलिस ने नेहा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में घटना वाले दिन पत्नी नेहा और नागेश्वर के बीच कई बार लंबीलंबी बातें हुई थीं. वैज्ञानिक साक्ष्य को ठोस आधार मान पुलिस आगे बढ़ती गई तो मामला लव अफेयर का नजर आया. यह भी शीशे की तरह साफ हो गया था कि घटना वाले दिन नागेश्वर नेहा से मिलने महराजगंज सिटी गया था.

15 सितंबर की भोर में इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा अपनी टीम के साथ नेहा के कमरे पर पहुंचे और मौके से उसे और उस के प्रेमी जितेंद्र को हिरासत में ले कर थाना निचलौल लौट आए. थाने में दोनों से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. एसपी सोमेंद्र मीणा ने उसी दिन शाम 3 बजे पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में प्रैसवार्ता बुलाई और नागेश्वर रौनियार हत्या से परदा उठा दिया.

चट्टान जैसे इरादों वाली नेहा के चेहरे पर पति की मौत का जरा भी अफसोस नहीं था. गिरफ्तारी के समय वह मुसकरा रही थी. पुलिस ने दोनों आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में हत्या के पीछे की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

दिल लगा बैठी नेहा

 

26 वर्षीय नागेश्वर रौनियार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के राजाबारी गांव का रहने वाला था. उस के पापा केशवराज रौनियार थे. 2 बेटों और एक बेटी में नागेश्वर सब से बड़ा था. था तो वह इकहरे बदन वाला, लेकिन उस में गजब का जोश और फुरती थी. केशवराज रौनियार प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. वह इतना कमा लेते थे कि अपने 5 सदस्यों वाले परिवार का पालनपोषण बड़े मजे से कर लेते थे. नागेश्वर बड़ा था और काफी समझदार भी. वह बचपन की गलियों को पीछे छोड़ कर जैसेजैसे जवानी की दहलीज पर पांव रखता गया, उस में अपने पैरों पर खड़े होने और पिता का हाथ बंटाने की ललक जोर मारने लगी थी.

वैसे भी नागेश्वर जिस जगह रहता था, वहां से नेपाल करीब 10-15 किलोमीटर दूर था. नेपाल की खूबसूरत वादियां राजाबारी (ठूठीबारी) से साफ दिखती थीं तो उन्हें देखने के लिए वह हमेशा लालायित रहता था. उसी के गांव में जितेंद्र भी रहता था. उस से उस की काफी निभती थी. दोनों अच्छे दोस्त भी थे और हमराज और हमउम्र भी. जितेंद्र की ठूठीबारी कस्बे में बाइक के स्पेयर पाट्र्स की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी. आमदनी भी अच्छी होती थी. नागेश्वर उस की दुकान पर नौकरी करता था. पाट्र्स को बेचने के लिए वह अकसर नेपाल के खूबसूरत जिला नवलपरासी आताजाता रहता था. जातेआते वक्त इसी जिले के गोपालपुर की रहने वाली बेहद खूबसूरत युवती नेहा पर उस की नजर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा था.

नागेश्वर पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठा था. इस के बाद उस का नवलपरासी आनाजाना और बढ़ गया था. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया और फेमिली वालों की रजामंदी से प्रेम विवाह कर लिया था. यह करीब 6 साल पहले की बात है, तब उस की उम्र 20 साल के आसपास रही होगी. नागेश्वर अपने प्यार को पा कर बेहद खुश था. फेमिली वाले भी चांद सी बहू पा कर फूले नहीं समा रहे थे. शादी के 3 साल बाद नेहा ने एक बेटे को जन्म दिया. पोते के पैदा होने पर केशवराज में जीने की लालसा और बढ़ गई थी. बेटे के जन्म के बाद नागेश्वर के बाद उस के खर्चे बढ़ गए थे. वह जो कमाता था, उस से उस के खर्चे पूरे नहीं होते थे. धीरेधीरे उस का झुकाव नशीले पदार्थों की ओर बढ़ता गया और नशा बेचने का काम शुरू कर दिया.

जितेंद्र जब भी नागेश्वर से मिलने उस के घर जाता तो नेहा को जितेंद्र से बात करना अच्छा लगता था. इसी दरमियान नागेश्वर के साथ एक घटना घटी. वह नशीले पदार्थ के साथ पकड़ा गया. पुलिस ने गिरफ्तार कर उसे जेल भेज दिया. नागेश्वर के जेल जाते ही जितेंद्र की तकदीर खुल गई. वह नेहा के साथ हमदर्दी दिखाता था. उस ने अपने दिल में नेहा के लिए जगह तो पहले ही बना ली थी, बस साक्षात उस के सामने होना शेष रह गया था. जितेंद्र के दिल में उसे पाने की हसरतें उमडऩे लगीं. जितेंद्र के सामने नेहा के करीब आने का एक ही रास्ता दिख रहा था, वह था उस का जमानत कराना.

जितेंद्र ने कुछ महीनों बाद नागेश्वर की जमानत करा कर नेहा के दिल पर कब्जा जमा लिया. धीरेधीरे वह भी जितेंद्र की ओर आकर्षित होती गई और दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे. जमानत पर छूट कर जेल से आने के बाद नागेश्वर के व्यवहार में काफी बदलाव आ चुका था. नागेश्वर को पत्नी नेहा की हरकतों के बारे में पता चल गया था कि उस का जितेंद्र के साथ कुछ चक्कर चल रहा है. इस बात को ले कर दोनों के बीच तकरार होती गई और दांपत्य जीवन में दरारें बढ़ती गईं. नागेश्वर ने पत्नी को बहुत समझाने की कोशिश की कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता है. भले ही आज वह आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, कल उस के पास भी पैसे आ जाएंगे.

वह बुरी आदतों और बुरी लत से तौबा कर लेगा, अपनी बसीबसाई गृहस्थी में अपने हाथों आग न लगाओ. पर नेहा ने उस की एक नहीं सुनी और बेटे को साथ ले कर प्रेमी जितेंद्र के साथ रहने के लिए महाराजगंज सिटी में एक किराए का कमरा ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी.

नागेश्वर नेहा पर घर वापस लौट आने का दबाव बनाने लगा था. नेहा उस के पास लौटने के लिए तैयार नहीं थी. नेहा रौनियार और जितेंद्र ताउम्र साथ रहना चाहते थे, लेकिन उन के लिए यह आसान नहीं था. नेहा का पति नागेश्वर अभी जिंदा था. उस के जीते जी उन के यह ख्वाब कभी पूरे नहीं हो सकते थे. पत्नी ने पति पर तलाक देने का दबाव डाला था. वह उस के साथ अब रहना नहीं चाहती थी. बाकी की जिंदगी वह अपने प्रेमी जितेंद्र के साथ उस की बांहों में बिताना चाहती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच कई बार झगड़े भी हुए थे और उस ने पत्नी नेहा को तलाक देने से साफतौर पर मना कर दिया था. इसी खुन्नस में नेहा और उस के प्रेमी जितेंद्र के साथ मिल कर पति नागेश्वर रौनियार की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

पुलिस को दिए बयान में नेहा ने बताया था कि पति पैसों के अभाव में गैरमर्दों के पहलू में भेज कर उस से धंधा कराना चाहता था. यह बात उसे गवारा नहीं थी. उस के जमीर को गहराइयों तक झकझोर दिया था, इसलिए उस का झुकाव जितेंद्र की ओर तेजी से बढ़ा था. और उस ने फैसला कर लिया कि वह जितेंद्र के साथ अपना बाकी का जीवन गुजारेगी. कथा लिखे जाने तक नागेश्वर रौनियार हत्याकांड के दोनों आरोपी नेहा रौनियार और उस का प्रेमी जितेंद्र जेल की सलाखों के पीछे कैद थे. पति की हत्या की नेहा के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी और न ही पश्चाताप का कोई भाव था.

जेल से छूटने के बाद नेहा ने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई है. उस का बेटा अपने दादा केशवराज रौनियार के साथ रह रहा था. Extramarital Affair

 

UP News: मांगा सिंदूर मिली मौत

UP News: रचना की मांग में सिंदूर भले ही पति शिवराज के नाम का होता था, लेकिन वह प्रेमी संजय पटेल को ही पति मानती थी. वह प्रेमी के लिए तनमन से पूरी तरह समर्पित थी. पति शिवराज की मौत के बाद रचना ने संजय पर शादी का दबाव डाला तो ऐसी घटना घटी, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

संजय के लिए रचना से विवाह रचाना नामुमकिन था. वह गांव का पूर्वप्रधान था. गांव में उस की प्रतिष्ठा थी. रचना से विवाह कर वह अपनी मानमर्यादा को मिट्टी में नहीं मिलाना चाहता था, अत: उस ने रचना से पीछा छुड़ाने की सोची. मन में यह विचार आते ही संजय को रिश्ते के भतीजे संदीप पटेल व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार की सुध आई. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे. एक शाम संजय ने भतीजे संदीप और उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार से मुलाकात कर रचना से छुटकारा दिलाने में मदद की गुहार की.

रुपयों के लालच में वे दोनों राजी हो गए. इस के बाद संजय ने संदीप व प्रदीप की मदद से रचना की हत्या करने व उस की लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. संजय ने रचना की मौत का सौदा एक लाख रुपए में किया और प्रदीप को 15 हजार रुपए पेशगी दे दी. शेष रकम काम होने के बाद देने का वादा किया. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के किशोरपुरा गांव निवासी विनोद पटेल पशुओं का चारा काटने अपने महेबा रोड स्थित खेत पर पहुंचा. वहां खेत किनारे बने कुएं से तेज बदबू आ रही थी. उस ने कुएं में झांक कर देखा तो कुएं के पानी में 2 बोरियां तैर रही थीं.

विनोद ने अपने खेत के कुएं में पड़ी 2 बोरियों से तेज बदबू आने की सूचना थाना टोड़ी फतेहपुर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ अतुल कुमार राजपूत पुलिस बल के साथ किशोरपुरा गांव के बाहर स्थित विनोद के कुएं पर जा पहुंचे. उस समय वहां ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. एसएचओ अतुल कुमार राजपूत ने पुलिसकर्मियों व ग्रामीणों की मदद से दोनों बोरियों को कुएं से बाहर निकलवाया. बोरियां खोली गईं तो सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. प्लास्टिक की एक बोरी में महिला की लाश का गरदन से ले कर कमर तक का हिस्सा था, जबकि दूसरी बोरी में कमर से ले कर जांघ तक का हिस्सा था.

इस के बाद कुएं को खाली कराया गया तो उस में एक बोरी और मिली, जिस में कटा हुआ एक हाथ था. कलाई में लाल रंग का धागा बंधा हुआ था. महिला का सिर और पैर अब भी नहीं मिले थे. बिना सिर के लाश की शिनाख्त होनी मुश्किल थी. बोरियों में शव के टुकड़ों के साथ ईंटपत्थर भी भरे गए थे, ताकि बोरियां पानी में उतरा न सकें. इंसपेक्टर अतुल कुमार ने टुकड़ों में विभाजित महिला की लाश मिलने की सूचना पुलिस के आला अधिकारियों को दी तो कुछ देर बाद ही एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार तथा सीओ (सिटी) अनिल कुमार राय घटनास्थल आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मृतका के अन्य अंगों की खोज में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन सफलता नहीं मिली तो बरामद अंगों को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल झांसी भेज दिया. 72 घंटे बाद भी शव की शिनाख्त न होने पर उन का पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने अज्ञात में दाह संस्कार कर दिया गया. एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने महिला के इस ब्लाइंड मर्डर को बड़ी गंभीरता से लिया और उस की शिनाख्त व हत्याकांड के खुलासे के लिए एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार व सीओ अनिल कुमार की देखरेख में 18 टीमें गठित कीं.

टीम में टोड़ी फतेहपुर थाने के एसएचओ अतुल राजपूत, स्वाट प्रभारी जितेंद्र तक्खर, सर्विलांस टीम से दुर्गेश कुमार, रजनीश तथा तेजतर्रार दरोगा रजत सिंह, शैलेंद्र, हर्षित आदि को शामिल किया गया. टीम में शामिल पुलिसकर्मियों ने आंगनबाड़ी गु्रप, ग्राम पंचायत गु्रप, आशा वर्कर तथा राशन कोटेदारों का भी सहयोग लिया. 500 से अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाले. इतनी मशक्कत के बाद भी शव की पहचान नहीं हो पाई. अब तक यह मामला डीआईजी (झांसी रेंज) केशव चौधरी के संज्ञान में भी आ गया था. अत: उन्होंने इस ब्लाइंड मर्डर केस को जल्द से जल्द खोलने व हत्यारों को पकडऩे का आदेश एसपी व एसएसपी को दिया. इस आदेश के बाद पुलिस और भी सक्रिय हो गई.

इधर एसपी (ग्रामीण) की टीम भी जांच में जुटी थी. शव के टुकड़े जिन बोरियों में पाए गए थे, वे खाद की बोरियां थीं. उन पर कृभको लिखा था, लेकिन कोड नंबर साफ नजर नहीं आ रहा था. टीम यह जानना चाहती थी कि बोरी किस सहकारी समिति से खरीदी गईं और यह किस गांव के किसान ने खरीदी थीं. जांच के लिए टीम ने खाद की कई सहकारी समितियों से संपर्क किया, लेकिन कोड नंबर स्पष्ट न होने से कोई खास जानकारी हासिल न हो सकी. टीम ने बोरी से बरामद ईंट की मिट्टी का भी परीक्षण कराया तो जांच में टोड़ी फतेहपुर की मिट्टी पाई गई. जांच से यह बात स्पष्ट हो गई कि महिला टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के ही किसी गांव की हो सकती है.

इसी बीच मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के थाना चंदेरा के मैलवारा गांव निवासी दीपक यादव को किसी महिला के कटे अंग मिलने की खबर लगी. उस की बहन रचना भी 8 दिनों से गायब थी. 19 अगस्त, 2025 की सुबह 10 बजे दीपक यादव गांव के सरपंच मोनू यादव के साथ थाना टोड़ी फतेहपुर पहुंचा. उस ने इंसपेक्टर अतुल राजपूत को बताया कि उस की बहन रचना यादव इसी थाना क्षेत्र के महेबा गांव निवासी शिवराज यादव को ब्याही थी. शिवराज की मौत हो चुकी है.

इन दिनों रचना महेबा गांव के ही पूर्वप्रधान संजय पटेल के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. 8 अगस्त को उस ने रचना से बात करने की कोशिश की थी. वह किसी अस्पताल में भरती थी. बात करने के दौरान पूर्वप्रधान संजय पटेल ने रचना के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया और मुझे धमकाया कि फोन मत किया करो. 2 रोज बाद फोन किया तो संजय बोला कि मैं ने तेरी बहन को मार डाला है. यह सुन कर उसे लगा कि वह गुस्से व नशे में बात कर रहा है. लेकिन अब लग रहा है कि संजय पटेल ने उसे सचमुच मार डाला है. आप सच्चाई का पता लगाइए. दीपक यादव की बात सुन कर एसएचओ अतुल राजपूत ने रचना का फोन नंबर सर्विलांस पर लगाया. इस से पता चला कि रचना और पूर्वप्रधान संजय के बीच बातचीत होती रहती थी.

इस के बाद पुलिस टीम महेबा गांव पहुंची. वहां ग्रामीणों से पता चला कि रचना और पूर्व ग्राम प्रधान संजय के बीच अफेयर है. अब रचना लापता है. पुलिस टीम ने 20 अगस्त की रात नाटकीय ढंग से संजय पटेल व उस के भतीजे संदीप को टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के लखेरी बांध के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने पर उन्होंने रचना की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. संजय की निशानदेही पर पुलिस टीम ने हत्या में प्रयुक्त कार व मृतका रचना का मोबाइल फोन भी संजय के घर से बरामद कर लिया. संजय पटेल व संदीप को थाने लाया गया. थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस ने अपने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप के साथ मिल कर रचना की हत्या की थी. फिर उस ने शव के 7 टुकड़े कर 4 बोरियों में भरे थे. 3 बोरियां कुएं में फेंक दी थी तथा चौथी बोरी लखेरी नदी में डाल दी थी.

संजय व संदीप की निशानदेही पर पुलिस ने लखेरी नदी में नाव से सर्च औपरेशन चलाया और रचना का सिर, पैर व एक हाथ भी बरामद कर लिया. ये अंग भी बोरी में भरे गए थे. बरामद अंगों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए झांसी के जिला अस्पताल भेज दिया. अभी तक पुलिस टीम ने 2 आरोपियों को तो गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन तीसरा आरोपी प्रदीप अहिरवार फरार था. 21 अगस्त, 2025 की रात 10 बजे पुलिस टीम ने एक मुठभेड़ के बाद प्रदीप अहिरवार को भी गिरफ्तार कर लिया. मुठभेड़ के दौरान उस के पैर में गोली लगी थी. कातिलों के पकड़े जाने के बाद डीआईजी केशव कुमार चौधरी, एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने झांसी पुलिस सभागार में एक संयुक्त प्रैस कौन्फ्रैंस कर रचना यादव हत्याकांड का खुलासा किया.

कातिलों को पकडऩे वाली पुलिस टीम पर आला कमान अधिकारियों ने इनामों की खूब बौछार की. डीआईजी केशव चौधरी ने टीम को 50 हजार रुपए नकद इनाम देने की घोषणा की. एसएसपी ने 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को दिया. वहीं एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने भी 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को पुरस्कार के रूप में दिए. चूकि कातिलों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: एसएचओ अतुल राजपूत ने मृतका रचना के भाई दीपक यादव की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) तथा 201(3)(5) के तहत संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

रचना कौन थी? वह संजय पटेल के संपर्क में कैसे आई? संजय ने उस की हत्या क्यों और कैसे कराई? यह सब जानने के लिए रचना के अतीत की ओर झांकना होगा. मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के चंदेरा थाना अंतर्गत एक गांव है मैलवारा. इसी गांव में फूलसिंह यादव सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी लौंगश्री के अलावा एक बेटा दीपक तथा बेटी रचना थी. फूलसिंह प्राइवेट नौकरी करता था. फूलसिंह की बेटी रचना खूबसूरत थी. 16 बसंत पार करने के बाद जब उस ने जवानी की डगर पर पैर रखा तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया. जो भी उसे देखता, मंत्रमुग्ध हो जाता. रचना खूबसूरत तो थी, लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं था. जैसेतैसे कर के उस ने दसवीं की परीक्षा पास की फिर घर के काम में मम्मी का हाथ बंटाने लगी.

फूल सिंह ने रचना की शादी टीकमगढ़ शहर के मोहल्ला सलियाना में रहने वाले जयकरन यादव से कर दी. वह तहसील में काम करता था. उस के 2 अन्य भाई थे, जो पन्ना शहर में नौकरी करते थे. शादी के बाद ससुराल में रचना के हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच वह 2 बेटियों की मां बन गई. बेटियों के जन्म के बाद जब खर्च बढ़ा तो घर में आर्थिक परेशानी रहने लगी. घर खर्च को ले कर रचना व जयकरन के बीच झगड़ा होने लगा. धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच इतना मनमुटाव बढ़ गया कि रचना अपनी दोनों मासूम बेटियों को पति के हवाले कर मायके में आ कर रहने लगी.

मायके में कुछ समय तो उस का ठीक से बीता, उस के बाद घरपरिवार के लोगों के ताने मिलने लगे. भाई दीपक को भी रचना का ससुराल छोड़ कर मायके में रहना नागवार लगता था. गांव में उस की बदनामी होने लगी थी. घरपरिवार के तानों से परेशान रचना ने जैसेतैसे 2 साल मायके में बिताए. उस के बाद एक रिश्तेदार के माध्यम से रचना ने शिवराज यादव से विवाह कर लिया. शिवराज यादव झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के गांव महेबा का रहने वाला था. वह किसान था. उस के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी. वह अपने बड़े भाई रघुराज के साथ रहता था.

शादी रचाने के बाद रचना अपने दूसरे पति शिवराज के साथ महेबा गांव में रहने लगी. रचना स्वच्छंद स्वभाव की थी. उसे घूंघट में रहना पसंद न था, अत: वह न जेठ से परदा करती थी और न ही बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से. उस की अपनी जेठानी से भी नहीं पटती थी. घरेलू कामकाज को ले कर दोनों में अकसर तूतूमैंमैं होती रहती थी. रचना को संयुक्त परिवार में रहना पसंद न था, अत: वह पति पर अलग रहने का दबाव बनाने लगी. घर और जमीन के बंटवारे को ले कर रचना और शिवराज के बीच मनमुटाव शुरू हो गया. दोनों के बीच झगड़ा व मारपीट होने लगी. बंटवारे को ले कर रचना की कहासुनी जेठजेठानी से भी होने लगी.

अत: उस ने जेठ रघुराज पर इलजाम लगाना शुरू कर दिया कि वह उस पर बुरी नजर रखता है. 25 मई, 2023 की शाम रेप हत्या के इलजाम को ले कर रचना का जेठजेठानी व पति से झगड़ा हुआ. तीनों ने मिल कर रचना की जम कर पिटाई की. इस पिटाई ने आग में घी डालने जैसा काम किया. सुबह होते ही रचना थाना टोड़ी फतेहपुर में जेठ व पति के खिलाफ रेप व हत्या की कोशिश करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने रचना के जेठ रघुराज व पति शिवराज को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस घटना के बाद रचना का ससुराल में रहना संभव न था, अत: वह एक बार फिर मायके आ गई. उस ने अपने भाई दीपक के सामने आंसू बहाए तो उस ने बहन को घर में शरण दे दी.

रचना के रेप व हत्या के प्रयास का मामला झांसी के गरौठा कोर्ट में शुरू हो चुका था. केस की पैरवी हेतु रचना को कोर्ट आना पड़ता था. गरौठा कोर्ट आतेजाते ही एक रोज रचना की मुलाकात संजय पटेल से हुई. दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे. जिस महेबा गांव में रचना की ससुराल थी, संजय पटेल भी उसी गांव का रहने वाला था. वह गांव का प्रधान भी रह चुका था. रचना और संजय की दोस्ती हो गई. दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. संजय अब रचना के केस की पैरवी करने लगा और उस की आर्थिक मदद भी करने लगा.

संजय नहीं चाहता था कि उस की प्रेमिका रचना उस से दूर मायके में रहे, अत: उस ने झांसी के गुरदासपुर में एक मकान किराए पर लिया और रचना को इस मकान में शिफ्ट कर दिया. संजय ने मकान में सारी सुविधाएं भी मुहैया करा दीं. इस के बाद रचना और संजय इस किराए के मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. रचना जो भी डिमांड करती, संजय उस डिमांड को पूरी करता. उस ने गहनोंकपड़ों से रचना को लाद दिया था. लाखों रुपए नकद भी दे चुका था. संजय पटेल शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. बड़ा बेटा 20 वर्ष की उम्र पार कर चुका था, लेकिन रचना से नाजायज रिश्ता जोडऩे के बाद उसे अपनी पत्नी ममता फीकी लगने लगी थी.

ममता को जब पता चला कि पति संजय व गांव के शिवराज की पत्नी रचना के बीच नाजायज रिश्ता है तो उसे अपना व बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस ने दोनों के नाजायज संबंधों का जम कर विरोध किया. घर में कलह मचाई, लेकिन वह सफल नहीं हो पाई. संजय और रचना के संबंध आम हो गए थे. शिवराज यादव को जब पत्नी रचना के नाजायज संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने माथा पीट लिया. वह पहले भी उस के परिवार को बदनाम कर चुकी थी, लेकिन अब तो उस ने हद ही कर दी थी. पत्नी के कृत्य से वह इतना टूट गया कि बीमार पड़ गया. जून, 2025 की 10 तारीख को उस की बीमारी के चलते मौत हो गई.

पति की मौत के बाद रचना विधवा हो गई, लेकिन रचना को विधवा कहलाना तथा विधवा का जीवन बिताना मंजूर नहीं था. एक शाम संजय पटेल अपनी प्रेमिका रचना से मिलने आया तो वह उदास बैठी थी. संजय ने उदासी का कारण पूछा तो वह बोली, ”संजय, तुम्हें तो पता ही है कि मैं विधवा हो गई हूं. लोग मुझे विधवा की नजर से देखें, यह मुझे पसंद नहीं है.’’

”तो तुम चाहती क्या हो?’’ संजय ने रचना से पूछा.

रचना बोली, ”संजय, तुम मेरी मांग में सिंदूर भर कर मुझे अपनी पत्नी बना लो. शेष जीवन मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूं.’’

रचना की बात सुन कर संजय को लगा कि जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. वह असमंजस की स्थिति में बोला, ”रचना, मैं कपड़ा, गहना, रुपयापैसा जैसी तुम्हारी हर डिमांड को पूरा कर रहा हूं. फिर यह सिंदूर जैसी अटपटी डिमांड क्यों?’’

रचना तुनक कर बोली, ”तुम्हें मेरी डिमांड अटपटी लग रही है. औरत का सब से कीमती गहना उस का सिंदूर होता है. वही मैं तुम से मांग रही हूं. सिंदूर के आगे बाकी सारी सुविधाएं फीकी हैं.’’

”रचना, मैं शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप हूं. तुम्हारी मांग में सिंदूर भर कर मैं अपनी पत्नी से विश्वासघात नहीं कर सकता.’’ संजय ने समझाया.

”जब मेरे साथ रात बिताते हो, मेरे शरीर को रौंदते हो, तब तुम पत्नी के साथ विश्वासघात नहीं करते. सिंदूर की मांग की तो मुझे विश्वासघात का पाठ पढ़ा रहे हो. मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूंगी. तुम्हें मेरी मांग में सिंदूर भर कर पत्नी का दरजा देना ही होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन सिंदूर की बात को ले कर रचना और संजय में तकरार होने लगी. संजय जब भी रचना से मिलने जाता, वह मांग में सिंदूर भरने और पत्नी का दरजा देने का दबाव बनाती. रचना अब उसे ब्लैकमेल करने पर उतर आई थी. रचना ने शादी की जिद पकड़ी तो संजय घबरा उठा. उस ने रचना को बहुत समझाया, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस ने रचना को खत्म करने का निश्चय किया. इस के लिए उस ने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार को चुना. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे.

संदीप झांसी के बिजौली कस्बे में रहता था और एक फैक्ट्री में काम करता था. साल 2022 में उस ने एक महिला की हत्या की थी. हत्या के मामले में वह जेल गया था, जेल में ही संदीप की दोस्ती प्रदीप से हुई थी. प्रदीप अहिरवार मूलरूप से झांसी के थाना गरौंठा के गांव पसौरा का रहने वाला था, लेकिन मऊरानीपुर में किराए पर रहता था. वह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहता था. संजय पटेल ने संदीप व प्रदीप अहिरवार से संपर्क कर रचना की मौत का सौदा किया. फिर हत्या करने व लाश को ठिकाने लगाने तथा किसी भी सूरत में पकड़े न जाने का प्लान बनाया.

संजय व उस के साथी रचना की हत्या करते, उस के पहले ही रचना 6 अगस्त, 2025 को बीमार पड़ गई. संजय ने उसे झांसी के प्राइवेट अस्पताल रामराजा में भरती कराया. रचना को ब्लीडिंग हो रही थी. 2 दिन में रचना ठीक हो गई. 8 अगस्त को संजय उसे डिस्चार्ज करा कर घर लाने पहुंचा तो वह बोली, ”यहीं से कोर्ट चलो. शादी करने के बाद ही घर में जाएंगे.’’ संजय ने उसे समझाया, लेकिन वह मान नहीं रही थी. संजय ने तब रचना को ठिकाने लगाने की ठान ली. उस ने संदीप से बात की और उसे अस्पताल बुला लिया. संदीप ने तब दोस्त प्रदीप से बात की और उसे तैयार रहने को कहा. उस ने तेजधार वाली कुल्हाड़ी का इंतजाम करने की भी बात प्रदीप से कही.

सब कुछ तय होने के बाद संजय ने रचना को 9 अगस्त, 2025 की शाम 5 बजे अस्पताल से डिस्चार्ज कराया. हालांकि वह डिस्चार्ज होने से मना कर रही थी, लेकिन जब संजय ने दूसरे रोज 10 अगस्त को शादी करने का वचन दिया तो वह मान गई. संजय की कार अस्पताल के बाहर ही खड़ी थी. वह कार की पीछे की सीट पर बैठ गई. उस के बगल में संजय भी बैठ गया. संदीप कार ले कर हाइवे पर आया तो संजय बोला, ”रचना, तुम इतने दिन अस्पताल में रही, तुम्हारा मन खराब हो गया होगा. थोड़ा घूम कर आते हैं.’’

लगभग एक घंटा सफर के बाद संजय मऊरानीपुर हाइवे पहुंचा. यहां प्रदीप अहिरवार उस का पहले से इंतजार कर रहा था. उस ने प्लास्टिक बोरी में लिपटी कुल्हाड़ी कार की डिक्की में रखी. फिर आगे की सीट पर संदीप के बगल में आ कर बैठ गया. इस के बाद यह लोग घूमते रहे. एक जगह रुक कर संजय ने शराब खरीदी और तीनों ने मिल कर कार के अंदर ही शराब पी. घूमते हुए सभी लहचूरा बांध पर कार ले कर पहुंचे. अब तक अंधेरा हो गया था. वहां सन्नाटा छाया था. प्रदीप कार में बैठी रचना से बोला, ”भाभी, तुम कितनी भी जिद कर लो, लेकिन संजय भैया तुम से शादी नहीं करेंगे.’’

इतना सुनते ही रचना भड़क गई और प्रदीप से बोली, ”तुम कौन होते हो यह सब कहने वाले?’’

रचना ने संजय से पूछा तो उस ने भी कह दिया कि प्रदीप ठीक बोल रहा है. वह उस से शादी नहीं कर सकता. तब रचना गुस्से से बोली, ”मैं क्या सिर्फ मजे लेने के लिए हूं. शहर वापस चलो. तुम सब को देख लूंगी. सब के दिमाग ठिकाने लग जाएंगे.’’

रचना की धमकी सुनते ही संदीप व प्रदीप ने उसे दबोच लिया और संजय ने कार में ही गला घोंट कर रचना को मार डाला. शव में पत्थर बांध कर लहचूरा डैम में फेंकने गए तो वहां पुलिस की गाड़ी खड़ी थी. कार में लाश थी, इसलिए तीनों वहां से भाग निकले. फिर वह लाश फेंकने खजूरी नदी पहुंचे, लेकिन वहां गार्ड था, इसलिए शव को नहीं फेंक सके. आधी रात को संजय साथियों के साथ किशोरपुरा गांव पहुंचा. गांव के बाहर सड़क किनारे उस ने कार रोकी. यहां खेत के पास कुआं था. तीनों ने मिल कर रचना के शव को कार से निकाला और कुएं में फेंकने को ले आए. लेकिन यहां से संजय का गांव महेबा मात्र 5 किलोमीटर दूर था, जिस से शव की पहचान हो सकती थी. अत: उन्होंने समूचा शव कुएं में नहीं फेंका.

शातिर अपराधी प्रदीप कार से कुल्हाड़ी ले आया, फिर रचना के शव के 7 टुकड़े किए. शव के अंगों को 4 बोरियों में भरा गया. बोरियां पानी में न उतराएं, इस के लिए बोरियों में ईंटपत्थर भी भर दिए. फिर बोरियों का मुंह बांध कर 3 बोरियां कुएं में फेंक दीं और चौथी बोरी जिस में सिर व पैर थे, कार में रख कर वहां से 7 किलोमीटर दूर रेवन गांव के पास लखेरी नदी के पुल पर आए. इस के बाद पुल के नीचे नदी में बोरी फेंक दी. शव को ठिकाने लगाने के बाद संजय ने कार से प्रदीप को मऊरानीपुर तथा संदीप को विजौली पहुंचाया, फिर खुद कार ले कर अपने गांव महेबा आ गया.

संजय को विश्वास था कि उस का अपराध उजागर नहीं होगा, लेकिन यह उस की भूल थी. भीषण बरसात के कारण कुएं का जलस्तर बढ़ा तो बोरियां उतराने लगीं. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर किशोरपुरा गांव का विनोद पटेल चारा काटने खेत पर गया तो कुएं में बोरियां उतराती दिखीं और उन से दुर्गंध भी आ रही थी. उस ने सूचना पुलिस को दी. पूछताछ करने के बाद 23 अगस्त, 2025 को पुलिस ने आरोपी संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार को झांसी कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. UP New

 

UP News: लव के गेम की खिलाड़ी बनी पिंकी

UP News: कहते हैं कि घर की देहरी लांघने के बाद भी यदि किसी महिला के पैर नहीं रुकते हैं तो उस घर की बरबादी निश्चित है. मुरादाबाद की पिंकी ने भी यही किया. अपने ब्याहता को छोड़ कर वह किशनवीर के साथ रहने लगी. इस के बावजूद चाचाभतीजे से उस के अवैध संबंध हो गए. इस के बाद जो हुआ, वह…

पति की रोजरोज की कलह से पिंकी परेशान हो चुकी थी, इसलिए उस ने अपने दोनों प्रेमियों से बात कर किशन को रास्ते से हटाने के लिए खतरनाक योजना बना डाली. किशन को कई दिनों से नशे के लिए शराब की व्यवस्था नहीं हो पाई थी. जेब में कोई पैसा भी नहीं था. योजना के अनुसार पिंकी ने अपने पति किशन से कहा कि इस समय नितिन स्योंडारा में है, उस से बात हो गई है. तुम उस के पास चले जाओ, वह 4 हजार तुम्हें देगा, ले कर आ जाओ.

ग्राम स्योंडारा मिट्ठनपुर मौजा गांव से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर है. किशन स्योंडारा पहुंच गया. वहां पर चमन शर्मा, नितिन शर्मा, अवनेश और रविकांत मौजूद थे. बराबर में ही शराब की दुकान थी. नितिन ने जा कर 2 बोतल शराब खरीदी और एकांत में पांचों जा कर बैठ गए. किशन ने नितिन से कहा कि पिंकी ने पैसों के लिए भेजा है.

”हमें पता है, पहले एक पेग ले ले, फिर चले जाना.’’

योजना के अनुसार, उन्होंने किशन को जम कर शराब पिलाई. किशन नशे में इतना चूर हो गया कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकता था. तीनों ने किशन को उठा कर एक बाइक पर बैठाया. नितिन उसे पकड़ कर पीछे बैठ गया. बाकी दोनों लोग बाइक के पीछेपीछे चल दिए. अंधेरा हो चुका था. करीब 15 किलोमीटर दूर गांव ढकिया नरू पहुंचने पर उन्हें धान के खेत में पानी भरा दिखाई दिया. यह एक सुनसान जगह थी. उस समय उधर से किसी का आनाजाना भी नहीं हो रहा था. तीनों ने फिर उसे बाइक से उतारा. उसे खेत में ले जा कर औंधे मुंह गिरा दिया और वे उस के ऊपर खड़े हो गए. वह छटपटाता रहा, हाथपांव मारता रहा, लेकिन जब तक सांसें रुक नहीं गईं, वे उस के ऊपर खड़े रहे.

किशन की मौत होते ही सब घबरा कर वहां से भाग गए. पिंकी शुरू से पूरी लोकेशन मोबाइल से ले रही थी. नितिन लगातार अपने मोबाइल से पिंकी को अपडेट दे रहा था. उस की सांस रुक जाने पर नितिन ने बता दिया कि रास्ते का कांटा हट गया है. जिला मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्रांतर्गत ग्राम ढकिया नरू को जाने वाले रोड किनारे प्रेम सिंह का खेत स्थित है. खेत में धान लगे थे. 31 जुलाई, 2025 को उन के धान के खेत में शव पड़े होने की सूचना से गांव में हड़कंप मच गया. वह व्यक्ति कोई अनजान था.

अज्ञात व्यक्ति का शव पड़े होने की सूचना ग्रामप्रधान मनोहर सिंह द्वारा पुलिस को दी गई. ग्रामप्रधान की सूचना पर मौके पर पहुंचे कोतवाल मोहित कुमार मलिक और फोरैंसिक टीम ने बारीकी से शव और मौके की जांच की. वहां मोजूद कोई भी व्यक्ति शव की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेज दिया. दूसरे दिन अखबारों में किसी व्यक्ति की लाश मिलने की खबरें छपीं. खबर पढ़ कर महेंद्र नाम का व्यक्ति कोतवाली बिलारी पहुंचा, क्योंकि उस का भाई किशनवीर एक दिन पहले शाम साढ़े 4 बजे से गायब था.

महेंद्र सिंह जिला संभल के थाना कुढफ़तेहगढ़ के गांव मिठनपुर मौजा निवासी पर्वत सिंह का बेटा था. पुलिस उसे मोर्चरी ले गई. पुलिस ने उसे मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो लाश देख कर महेंद्र के होश उड़ गए. उस की चीख निकल गई. उसे चक्कर आने लगा. साथ के लोगों ने उसे संभाला. क्योंकि वह लाश किसी और की नहीं बल्कि उस के 40 वर्षीय भाई किशनवीर की थी. पुलिस उसे दुर्घटना मान रही थी, क्योंकि पुलिस को पता चला कि किशनवीर शराबी था. इसलिए पुलिस ने सोचा कि यह नशे में धुत हो कर खेत की तरफ चला आया होगा और मुंह के बल गिरा होगा.

मुंह और नाक में पानी मिट्टी भर जाने से सांस न आने पर मौत हो गई होगी. किंतु यहां पर एक सवाल यह उठ रहा था कि किशनवीर अपने घर से करीब 15 किलोमीटर दूर एकांत जगह किसी खेत में कैसे आया, क्यों आया? उधर पति के लापता होने के दूसरे दिन पिंकी गांव के लोगों से कहती रही कि उस के पति रात से अभी तक नहीं आए हैं. तीसरे दिन बड़े भाई महेंद्र सिंह ने अखबारों में खबर छपने के बाद बिलारी कोतवाली पुलिस से संपर्क किया और पोस्टमार्टम हाउस में जा कर अपने भाई की लाश की पहचान की. डैडबौडी को ले कर वे लोग अपने गांव आ गए.

12 अगस्त, 2025 को कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज हुई. महेंद्र सिंह ने बताया कि ये लोग किशन की मृत्यु के बाद होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में लगे हुए थे. इसलिए 12 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराई. गांव में खूब चर्चा थी कि चाचाभतीजे चमन शर्मा और नितिन शर्मा ने ही किशनवीर की हत्या की है. पुलिस ने पिंकी से जानकारी की तो उस ने कहा कि उस के पति तो शराबी थे. कहीं चले गए होंगे. नशे में होने के कारण उस खेत में गिर गए होंगे, जिस से उन की मौत हो गई होगी. पुलिस को पिंकी से पूछताछ के समय ज्यादा सख्ती की जरूरत नहीं पड़ी. धमकाने पर ही उस ने सारा सच उगल दिया.

कोतवाल मोहित कुमार मलिक के निर्देशन में गठित पुलिस टीम ने अभियुक्त चमन शर्मा नितिन शर्मा निवासी गांव मनकुला, रविकांत निवासी मोहल्ला प्रेम विहार, बिलारी, पिंकी निवासी गांव मिठनपुर मौजा थाना कुढफ़तेहगढ़ जनपद संभल को गिरफ्तार किया गया. आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद किशनवीर की हत्या की चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद की तहसील बिलारी से करीब 13 किलोमीटर दूर एक गांव है मिठनपुर मौजा. इस गांव का थाना कुढ़ फतेहगढ़ लगता है. गांव मिट्ठनपुर मौजा के रहने वाले पर्वत सिंह के 3 बेटे और एक बेटी थी. सब से बड़ा सतपाल सिंह, दूसरे नंबर का महेंद्र सिंह तीसरे नंबर पर किशनवीर उर्फ ऋषिपाल. इस गांव में अधिकांश लोग यादव जाति के ही हैं. सब से बड़े भाई सतपाल की किशनवीर के मर्डर से 27 दिन पहले ही मृत्यु हुई थी. वह बीमार थे. दूसरे नंबर के महेंद्र सिंह ने अभी तक शादी नहीं की है.

महेंद्र सिंह और किशनवीर का मकान संयुक्त रूप से बना हुआ है. सतपाल बराबर में अलग से रहते थे. मातापिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. यह परिवार किसान वर्ग में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इतनी कृषि भूमि इन के पास नहीं है कि खेती कर के गुजरबसर कर सकें. तीनों भाइयों के पास मिला कर 8-9 बीघा खेती की जमीन थी, इसलिए मेहनतमजदूरी कर के यह परिवार अपनी गुजरबसर कर रहा था. बड़े भाई सतपाल का विवाह हो गया था. गनीमत तो यह रही कि पर्वत सिंह ने अपने सामने ही अपनी बेटी का विवाह कर दिया था.

पिंकी नाम की एक युवती जो किसी कारणवश शादी के कुछ महीने बाद ससुराल से भाग गई. किशनवीर के बहनोई रघुवीर के वह संपर्क में आ गई. वह ट्रक चलाते हैं. युवती ससुराल जाने को तैयार नहीं थी. रघुवीर का अपना परिवार था, जो ठीकठाक चल रहा था. किसी अज्ञात महिला को अपने साथ रख कर वह अपनी फेमिली में कोई लफड़ा करना नहीं चाहते थे. पिंकी की शादी अभी कुछ ही महीने पहले बड़े धूमधाम से हुई थी, पर ससुराल की चौखट उस के लिए वैसी नहीं निकली, जैसी उस ने सपनों में देखी थी. रोज की तकरार, छोटेछोटे आरोप और दबाव ने उस का मन तोड दिया था.

एक दिन आंसुओं से भीगी आंखों के साथ पिंकी ने तय कर लिया कि वह अब और सहन नहीं करेगी. बिना किसी को बताए वह रात में घर से निकल पड़ी.

किशन की जिंदगी में इस तरह आई पिंकी

सड़क पर भटकतेभटकते उस की मुलाकात ट्रक ड्राइवर रघुवीर से हुई. रघुवीर ने उस की परेशानी देखी और उसे अपने साथ ले गया. पिंकी का कहना था कि वह ससुराल नहीं जाएगी और मायके भी नहीं जाएगी. दोनों जगह ही उसे जान का खतरा है. पिंकी की मजबूरी और हालत को देखते हुए रघुवीर ने सोचा कि इस की शादी अपने किसी साले से करा दी जाए. रघुवीर ने अपने साले महेंद्र और किशन से बात की. दोनों साले अभी कुंवारे थे.

महेंद्र ने किशनवीर के साथ ही पिंकी की शादी कराने का सुझाव दिया. रघुवीर ने किशन से बात की तो वह तैयार हो गया. बड़े भाई और बहनोई के कहने पर किशन पिंकी को साथ रखने को तैयार हो गया. फिर सामाजिक रीतिरिवाज से पिंकी और किशनवीर के साथ सात फेरे करा दिए. किशनवीर के साथ रह कर पिंकी को पहली बार अपनापन और सुकून महसूस हुआ. धीरेधीरे दोनों में विश्वास और लगाव पैदा होता गया.

जब पिंकी के ससुराल वालों को पिंकी के घर से भाग जाने का पता चला तो उन्होंने कोई काररवाई नहीं की. उन के लिए पिंकी का घर से चले जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि वे लोग उस से पीछा छुड़ाना ही चाहते थे. अपने बचाव में पिंकी के ससुराल वालों ने दूसरे दिन सुबह को ही फोन कर के बता दिया कि तुम्हारी बेटी पिंकी यहां से रात किसी टाइम चली गई है. मायके वाले बेटी के गायब होने से परेशान थे. खोजबीन करने पर किसी तरह उन्हें पता चल गया कि पिंकी इस समय जिला संभल के एक गांव मिठनपुर मौजा में है. उन्होंने थाने के चक्कर काटे, पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई और हर जगह गुहार लगाई.

इन सब उथलपुथल के बीच पिंकी ने अपने दिल की सुनने का फैसला किया. उस ने सब के सामने घोषणा कर दी कि अब किशनवीर ही उस का पति है. लोगों ने तरहतरह की बातें कीं. किसी ने इसे पिंकी की गलती बताया, किसी ने उस की हिम्मत की तारीफ की, लेकिन पिंकी के लिए सच यही था कि उस ने अपने जीवन का नया रास्ता चुन लिया था. अब वह बीते कल की कैदी नहीं थी. वह पिंकी नहीं, बल्कि अपनी नई कहानी की नायिका थी. पिंकी के दूसरी बिरादरी में शादी करने पर उस के मायके वालों की बहुत बदनामी हो रही थी. लोग ताने दे रहे थे.

समय पंख लगा कर उड़ रहा था. किशनवीर और पिंकी अपनी जिंदगी को और विशाल बनाने के लिए कोशिश करते रहे. एक दिन किशन अपनी पत्नी पिंकी को ले कर अलीगढ़ चला गया. वहां उस ने एक कारखाने में नौकरी कर ली. दिन भर मेहनत कर के आता, पत्नी उस के स्वागत में तैयार गेट पर ही मिलती. कभी देर हो जाती है तो पिंकी शिकायत करती, ”टाइम से घर आया करो, अकेले मुझे डर लगता है.’’

तब किशन पत्नी पिंकी को बाहों में भर लेता, ”मैं हूं तो तुझे डरने की क्या बात है.’’

गोद न भरने पर अधूरी थी पिंकी की जिंदगी

सब कुछ खुशहाल गुजर रहा था. लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद भी इन को संतान सुख नहीं मिला. जब दोनों ने  वैवाहिक जिंदगी की शुरुआत की थी, तब एक दिन किशन ने अपनी पत्नी पिंकी से कहा था कि जल्द ही हमारा घर बच्चों की हंसी से गूंजेगा. लेकिन समय बीतता गया, पर हंसी उन के आंगन में नहीं आई. किशन हर शाम जब काम से लौटता तो आसपास के बच्चों को खेलते देख उस की आंखें भर आतीं. भीतर ही भीतर सोचता कि अगर मेरा भी एक बेटा होता तो थके होने पर मेरी गोद में बैठ जाता. अगर एक बेटी होती तो घर में आते ही मेरे गले में हाथ डाल कर उछल कर मेरी बाहों में समा जाती. उस की हंसी मेरे सारे दर्द भुला देती.

पिंकी की पीड़ा और गहरी थी. गांव की औरतें जब मेले या त्यौहार पर अपने बच्चों का हाथ थामे जातीं तो उस के खाली हाथ और भारी हो जाते. रिश्तेदार और पड़ोसी ताने कसते, ‘संतान नहीं तो जीवन का क्या सुख?’

इन तानों से वह चुप हो जाती, लेकिन रात को आंसू उस के तकिए भिगोते. किशन उस का हाथ पकड़ कर कहता, ”मुझे तेरी हंसी ही सब से बड़ा सहारा है. दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तू मेरे साथ है तो मैं सब से अमीर हूं.’’

फिर भी दोनों के भीतर कहीं एक अधूरी चाह थी. उन का प्यार मजबूत था, लेकिन समाज की बातें और भीतर की कसक बारबार दिल चीर देतीं. कभीकभी दोनों बैठ कर सोचते कि क्या हमारा प्यार ही हमारी संतान नहीं? क्या हमारी मेहनत से बनी ये रोटी ही हमारी विरासत नहीं? किशन की अपनी मर्दानगी पर सवाल उठने लगे, पर वह इन्हें मेहनत में डुबो देता. वह खुद को तसल्ली देता. उसे अपनी मर्दानगी में कोई कमी कभी नजर नहीं आई. पिंकी ने इस तरह की शिकायत कभी नहीं की. वह मंदिर जाती, मन्नतें मांगती, व्रत रखती.

किशन भी उस का साथ देता, पर उस का विश्वास धीरेधीरे टूट रहा था. किशन ने कहा, ”क्या हमारा प्यार अधूरा है? क्या हमारी जिंदगी में बस यही कमी रह जाएगी?’’

उस की आवाज में दर्द था, जो पिंकी के सीने में भी उतर गया. पिंकी ने उस का हाथ थामा और बोली, ”हमारा प्यार अधूरा नहीं है, बच्चा नहीं हुआ तो क्या? हम एकदूसरे के लिए तो हैं.’’

लेकिन सच तो यह था कि दोनों के दिल में एक टीस थी. पिंकी को लगता, शायद वह मां बनने के लायक नहीं. किशन को लगता, शायद वह एक पिता बनने का फर्ज नहीं निभा पाया. फिर भी, दोनों एकदूसरे का सहारा बने रहे. दिन भर की मेहनत के बाद, जब वे रात को एकदूसरे के पास बैठते तो सारी दुनिया की थकान और दुख जैसे पलभर के लिए गायब हो जाते. यहां यादव जाति के लोग बहुत पिछड़े हुए हैं. बच्चा पैदा होने के लिए दोनों में से किसी ने कभी किसी डौक्टर की सलाह पाने के लिए अज्ञानतावश जरूरत नहीं समझी.

करीब 3 साल पहले दोनों अलीगढ़ को छोड़ कर अपने घर गांव वापस आ गए. किशनवीर ने एक ईरिक्शा लोन पर ले लिया, जिस से गुजर ठीकठाक हो रही थी. इसी बीच उस की मुलाकात करीब 4-5 किलोमीटर दूर मनकुला गांव निवासी चमन शर्मा से हुई. चमन शर्मा क्षेत्र में पंडिताई करता था. मुरादाबाद जिले के ग्रामीण इलाकों में पंडित (ब्राह्मण) समाज का एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान होता है. गांवों में उन की भूमिका सिर्फ धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी होती है. ब्राह्मïण गांव में धार्मिक परामर्शदाता माने जाते हैं.

पहले ब्राह्मïणों को कृषि पर निर्भर लोगों से दक्षिणा के रूप में धान, गेहूं, अनाज, सब्जी, कपड़ा आदि मिलती थी. अब धीरेधीरे लोग नकद दक्षिणा देने लगे हैं. आधुनिकता के बावजूद गांवों में ब्राह्मïणों का सम्मान और धार्मिक आयोजन में उन की भूमिका लगभग उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले थी. परिस्थितियों के चलते 50 वर्षीय चमन शर्मा का आनाजाना किशन के घर हो गया. चमन 3 भाई हैं. चमन का विवाह हो चुका है. एक बच्चा भी है.

पिंकी थी यजमान उसे बना लिया प्रेमिका

चमन दुनियादारी में बड़ा चालाक था. किशनवीर के घर जाते समय वह उस के घर के जरूरत के सामान भी ले जाने लगा. फिर पिंकी उस का बहुत आदरसत्कार करती और उसे खाना खिलाती थी. एक दिन चमन पनीर और उस से संबंधित मसाले व अन्य सामान भी ले कर आया, लेकिन उस दिन थैले में एक शराब की बोतल भी थी. चमन ने बोतल निकाल कर थैला पिंकी को थमाते हुए कहा, ”लो भाभी, आज पनीर बनाओ. लेकिन पहले 2 गिलास और लोटे में पीने का पानी दे दो.’’

चमन ने गिलास में पैग तैयार किया. किशन ने मना किया, ”मैं नशा नहीं करूंगा, मैं शराब नहीं पीता हूं. कभी तीजत्यौहार की बात अलग है.’’

दोस्ती का वास्ता दे कर चमन ने किशन को शराब पीने के लिए राजी कर लिया. चमन ने अपने दोस्त किशन से कहा, ”जाम उठा ले और मुंह से लगा ले, मुंह से लगा कर पी.’

दोस्त के इस शायरी अंदाज पर किशन मुसकराया. पीतेपीते दोनों मस्त हो गए. इतनी देर में खाना तैयार हो चुका था. दोनों ने खाना खाया. अगले दिन फिर मुलाकात हुई तो किशन ने चमन का रात की पार्टी के लिए एहसान व्यक्त किया. चमन ने मुसकराते हुए कहा, ”अरे, दोस्ती किस दिन काम आएगी? और फिर, मैं तेरे दुखदर्द का हल भी लाया हूं.’’

किशन चौंका, ”कौन सा हल?’’

चमन धीरेधीरे अपनी चाल चलने लगा. उस ने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ”भाभी को बच्चा न होने की चिंता है न? मेरे पास ऐसा नुस्खा है जिस से निस्संतान दंपति भी मातापिता बन जाते हैं. अगर भरोसा हो तो मैं मदद कर सकता हूं.’’

यह सुनते ही पिंकी की आंखों में चमक आ गई. 9 साल से उस का यही सपना अधूरा था, लेकिन किशन को कुछ अटपटा लगा. वह बोला, ”क्या वाकई ऐसा संभव है?’’

चमन ने रहस्यमई अंदाज में कहा, ”हां, मगर यह बात नुस्खे तक नहीं है. साथ में धार्मिक अनुष्ठान व खास उपाय करना पड़ता है. वह सब मैं करूंगा और अपने खर्चे पर करूंगा, लेकिन यह राज बाहर न जाए.’’

धीरेधीरे चमन ने पिंकी के मन में झूठे सपनों की डोर बुननी शुरू कर दी. कभी दवाइयों के नाम पर, कभी ताबीजटोने के बहाने, वह उसे समझाने लगा कि बच्चा तभी आएगा, जब वह उस के बताए ‘खास उपायों’ पर भरोसा करेगी. किशन सीधासादा था. उस के दोस्त ने कुछ पुडिय़ा ला कर दीं. कहा संभोग से एक घंटा पहले खा लेना. अवश्य संतान की प्राप्ति होगी. पिंकी मासूम थी, मां बनने की चाहत में उस ने चमन की हर बात पर विश्वास कर लिया. वह सोचती, ‘सच में अब मेरी गोद भर जाएगी.’

इस तरह चमन और पिंकी के बीच देवरभाभी का रिश्ता गहरा होता चला गया. चमन मजाक के साथसाथ मौका लगता तो थोड़ी छेड़छाड़ और चुम्माचाटी भी कर लेता था. इसी लालच और विश्वास के बीच चमन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया. किशन को लगा उस का दोस्त मददगार है, जबकि असलियत में वह उस की कमजोरी का फायदा उठा रहा था. जिस दिन चमन शर्मा को दक्षिणा अधिक मिल जाती, वह कुछ न कुछ अच्छे भोजन के लिए सामान ले कर किशन के घर आ जाता.

एक दिन चमन खाने के व्यंजन के साथ में हमेशा की तरह बोतल भी लाया था. उस दिन चमन ने अपने दोस्त को कुछ अधिक शराब पिलाई. मौका लगते ही नशे की गोलियों की पुडिय़ा लाया था, एक पैग में मिला दी. कुछ ही देर बाद किशन चारपाई पर बेसुध हो कर लुढ़क गया.

फिर चमन ने अपनी भाभी पिंकी को बुला कर बाहों में समेट लिया. वह बोली, ”अरे क्या कर रहे हो, वो देख लेंगे.’’

चमन मुसकराता हुआ बोला, ”उस का पूरा इलाज आज कर दिया है. वैसे इसे अब सुबह तक भी होश नहीं आएगा.’’

पिंकी शरमाते हुए बोली, ”ऐसा क्या कर दिया?’’

चमन ने पूरी बात बताई और कहा कि आज हम खुल कर रोमांस करेंगे. इस के बाद कमरे का माहौल अचानक बदल गया.

पिंकी भी चमन की आंखों में अजीब सी मोहब्बत देख रही थी. इतने दिनों से वह समझ रही थी कि चमन सिर्फ पति का दोस्त ही नहीं, बल्कि उस के दिल में कुछ और जगह बना चुका है.

चमन ने कहा,”पिंकी, तुम जानती हो कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. आज हालात ने हमें मौका दिया है. अगर तुम चाहो तो यह रात हमारी हो सकती है.’’

पिंकी कुछ पल चुप रही, फिर उस की आंखों में हलकी मुसकान तैर गई.

”देवरजी, शायद किस्मत ने ही यह मौका दिया है. मैं भी अब रुकना नहीं चाहती.’’

इस के बाद दोनों के बीच की दूरी मिट गई. सारी बंदिशें टूट गईं और वो रात उन के लिए इश्क की एक नई दास्तां बन गई.

2 जिस्म जैसे एक जान हो गए. रात का आखिरी पहर था. चमन की अचानक आंखें खुलीं तो सुबह होने वाली थी. पिंकी भी उठ चुकी थी. पिंकी का चेहरा चमक रहा था और चमन की आंखों में संतोष था. दोनों जानते थे कि यह रिश्ता अब सिर्फ एक रात का नहीं, बल्कि उन के जीवन की नई शुरुआत है. पिंकी ने कमरे से बाहर निकल कर देखा, उस के जेठ का कमरा भी बंद था. फिर वह मेनगेट पर आई, बाहर जा कर इधरउधर देखा. कोई नहीं था. पूरा सन्नाटा छाया हुआ था. उस ने चमन को इशारा किया और वह दबेपांव घर से निकल कर अपने घर चला गया.

फिर यह सिलसिला चलता रहा. पिंकी गर्भवती हो गई और उसे एक बेटा पैदा हुआ. किशन बहुत खुश था. समझ रहा था कि उस के दोस्त ने जो दवा दी थी, उस की वजह से संतान हुई है. किशन ने कर्ज ले कर जो ईरिक्शा लिया था, उसे भी बेच दिया. क्योंकि उसे शराब की लत लग चुकी थी. कारोबार कुछ नहीं था. चमन कभीकभी उस के घर आता तो अब वह इतनी मदद नहीं कर पा रहा था, जितनी पहले कर दिया करता था. बड़ी तंगी से दिन गुजर रहे थे. बेटा पैदा होने से खर्चे और भी बढ़ गए थे.

इसी दौरान इस लव स्टोरी में एक और किरदार प्रवेश कर गया. उस का नाम था नितिन. 20 साल का नितिन पिंकी के प्रेमी चमन का सगा भतीजा था. किशन और नितिन के बीच ईरिक्शा चलाते समय दोस्ती हो गई थी. वह किशन के आर्थिक हालात से भलीभांति परिचित था. नितिन अपने पिता की अकेली संतान था. बहुत बड़ा परिवार नहीं है. अपनी सामान्य आर्थिक स्थिति होने के बावजूद नितिन समयसमय पर किशन को कुछ रुपए उधार दे दिया करता था. कई दिनों से किशन से उस की मुलाकात नहीं हुई. एक दिन वह अपने उधार की रकम का तकाजा करने किशन के घर गया.

शाम का समय था. सूर्यास्त हो रहा था. किशन और चमन आंगन में बैठे हुए शराब का दौर चला रहे थे. दोनों ने एक साथ नितिन को आवाज लगाई, ”आओ नितिन, आओ.’’

वह अंदर आया. दोनों ने उसे भी अपनी महफिल में शामिल कर लिया. जाम का दौर खत्म हो जाने पर पिंकी से खाना लाने को कहा. पिंकी 3 थालियों में खाना ले कर आई. पिंकी ने आदतन नितिन से नमस्ते की. नितिन ने सर उठा कर देखा तो देखता ही रह गया. नशे का सुरूर उसे चढ़ ही रहा था. नितिन ने देखा, उस की आंखों में चमक थी, चेहरे पर ऐसा तेज जैसे कोई दीपक जल उठा हो. बच्चा पैदा होने के बाद तो जैसे उस के हुस्न में नया निखार आ गया था. उस के गालों पर हलकी लाली, आंखों की गहराई में शांति और होंठों पर हमेशा रहने वाली

हलकी मुसकान, सब कुछ उसे और भी आकर्षक बना रहे थे. खाना खाते समय भी नितिन की नजरें पिंकी का ही पीछा करती रहीं. नितिन ने अपने कर्ज की कोई बात किशन से नहीं की. जाते समय किशन से कहा कि अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो मुझे जरूर बताना. मैं तुम्हारा दोस्त हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तैयार रहूंगा. इस समय भी उस की नजरें टकटकी लगाए पिंकी को ही देख रही थीं. पहली ही मुलाकात में वह पिंकी को दिल दे बैठा. इस के बाद मुलाकातें बढती रहीं. पिंकी भी नितिन को चाहने लगी. नितिन ने भी अपने चाचा की तरह का तरीका अपनाया.

एक दिन वह भी थैला भर कर खानेपीने का अच्छा सामान किशन के घर ले गया. दारू की बोतल और साथ में नशीली गोलियों की पिसी हुई पुडिय़ा भी थी. उस ने भी दारू पीते समय किशन के पैग में नशा की गोलियों का पाउडर मिला दिया. इस के बाद किशन के बेहोशी जैसी हालत में पहुंच जाने पर पिंकी और नितिन ने रात भर एकदूसरे पर जम कर प्यार लुटाया. जवानी से भरपूर नितिन के साथ पिंकी ने भी खूब मौजमस्ती की. इस तरह चाचाभतीजा दोनों ही पिंकी के आशिक हो गए. कभी चाचा तो कभी भतीजा पिंकी की मस्त जवानी का आनंद लेने आ जाते.

पिंकी का नितिन की तरफ ज्यादा झुकाव हो गया था. फिर भी पिंकी उस के चाचा चमन को नाराज करना नहीं चाहती थी. गाहेबगाहे वह चमन को भी खुश कर दिया करती थी. दोनों पिंकी का पूरा खयाल रखते. साथ में किशन की भी समयसमय पर दारू की व्यवस्था कर दिया करते थे. अपनी पत्नी और उस के आशिकों के बीच होने वाली रंगीन रात का किशन को पूरा अहसास था. दिन में नशा उतर जाने पर इधरउधर गांव के लोगों के बीच जाता, तब लोग उस के घर की हालत बयान करते तो वह बहुत शर्मिंदा होता.

मामला पूरे गांव में चर्चा का विषय बना हुआ था. क्योंकि दोनों किशन के दोस्त थे, इसलिए कोई सीधे आरोप नहीं लगा रहा था. वह चाचाभतीजे दोनों से टकराने की स्थिति में नहीं था. उन दोनों से टकराने का मतलब उसे साफ दिख रहा था मौत. इसलिए वह पत्नी पर ही अपना गुस्सा उतार देता था. पिंकी की मुसकान में मासूमियत का मुखौटा था, लेकिन उस की आत्मा में विश्वासघात की आग धधक रही थी. वह प्यार नहीं, बल्कि वासना का खेल खेल रही थी. इसी खेल के चलते उस ने अपने पति किशनवीर उर्फ ऋषिपाल की अपने प्रेमियों के द्वारा हत्या करा दी.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. पिंकी के साथ उस का 2 साल का बेटा भी जेल चला गया. एक आरोपी अवनीश कुमार निवासी गांव रमपुरा थाना सोनकपुर जिला मुरादाबाद को पुलिस ने 14 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया. उसे भी अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. केस की जांच कोतवाल मोहित कुमार मलिक कर रहे थे. UP News

 

 

Mumbai Crime : इंफ्लुएंसर बीवी के किए 17 टुकड़े

Mumbai Crime : 25 वर्षीय मोहम्मद ताहा अंसारी ने रील बनाने वाली 22 साल की परवीन उर्फ मुसकान से मोहब्बत की थी. फेमिली वालों के विरोध के बावजूद निकाह कर दोनों ने अपनी अलग दुनिया बसा ली थी. 2 साल बाद फिर अचानक उन की मोहब्बत को शक के कीड़े ने काट लिया. उस के बाद जो कुछ हुआ, उसे सुन कर किसी का भी दिल दहल जाएगा. ताहा के दिमाग की नसों को कुतरने वाला शक का कीड़ा तो नहीं मरा, लेकिन मुसकान जरूर 17 टुकड़ों में काट दी गई. पढ़ें, इस दर्दनाक कहानी में कैसे हुआ यह सब?

भिवंडी (ठाणे) के ईदगाह इलाके में रहने वाला मोहम्मद ताहा अंसारी 29 अगस्त, 2025 की शाम को जब कमरे पर आया, तब वहां ताला लगा पाया. उसे बहुत कोफ्त हुई. कारण उस वक्त वह बेहद थका हुआ था. कई दिनों बाद ट्रक चला कर कमरे पर लौटा था. खाड़ी से महज 20 मीटर की दूरी पर उस का कमरा था. समुद्र की उठतीगिरती लहरों के बढ़ते शोर से वह और भी परेशान हो रहा था. जबकि उसे कमरे के एकांत की जरूरत थी. वह कुछ खापी कर सोना चाहता था.

कमरे पर ताला लगा देख कर वह भुनभुनाया, ”दिन में ही उसे फोन किया था और शाम तक आने के बारे में बता दिया था…फिर भी न जाने कहां चली गई?’’

इसी के साथ उस ने पत्नी परवीन उर्फ मुसकान को फोन मिलाया, लेकिन उस का फोन नौट रीचेबल था. मोहम्मद ताहा परेशान हो गया. मुसकान को कई बार फोन मिलाया. कौल नहीं लगी. कुछ मिनटों में ही उस का फोन भी बैटरी खत्म होने के कारण बंद हो गया. वह दरवाजे के छोटे से चबूतरे पर बैठ गया. करीब आधे घंटे बाद मुसकान गोद में एक साल के बच्चे को लिए हुए आई. दूसरे हाथ में मोबाइल फोन और स्टैंड थामे हुए थी. उसे देख कर समझने में देर नहीं लगी कि मुसकान वीडियो बनाने के लिए गई हुई थी. वह बिफरता हुआ बोला, ”तुम्हें मैं ने दिन में कौल कर दिया था, फिर भी तुम लापरवाह की तरह आ रही हो.’’

”रील बनाने चली गई थी. सवारी नहीं मिल रही थी, इसलिए देरी हो गई.’’ मुसकान ने सफाई दी और ताला खोल कर कमरे में ऐसे चली गई, जैसे उसे शौहर की कोई परवाह ही नहीं हो.

जबकि ताहा बड़बड़ाता हुआ कमरे में दाखिल हुआ…

”तुम्हारे रील बनाने से मैं परेशान हो गया हूं. मेरा जरा भी खयाल नहीं रहता है.’’

”मेरा यही तो शौक है…तुम्हारी तरह मैं दारूबाज नहीं हूं.’’ मुसकान तीखे लहजे में बोली.

उस अंदाज में ताहा भी बोला, ”अरे तुम तो उस से भी अधिक गिरी हुई हो. रील बनाने के बहाने इधरउधर मुंह मारती फिरती हो. न जाने तुम्हारे कितने यार बन चुके हैं?’’

यह बात मुसकान को बहुत बुरी लगी. वह उस पर बिफरती हुई बोली, ”मेरे कैरेक्टर पर शक करते हो, तुम कौन से पाकसाफ हो. बच्चे की कसम खा कर बोलो कि तुम कभी मेरे अलावा किसी दूसरी औरत के साथ नहीं सोए हो!’’

”मेरे कैरेक्टर पर अंगुली उठाने वाली तुम कौन होती हो? मैं शराब पीता हूं, लेकिन यह बात मैं सच कहता हूं कि तुम्हारे अलावा मेरी जिंदगी में कोई गैर औरत नहीं है. मैं तो फेसबुक पर मर्दों के साथ बर्थडे मनाते तुम्हारी फोटो देख चुका हूं.’’ ताहा गुस्से में बोल पड़ा था.

दोनों के बीच बातों का घमासान होने लगा. ताहा की नजर जैसे ही पास बैठे बेटे पर गई. उसे देखते ही बातोंबातों में बोल पड़ा, ”पता नहीं बेटा भी मेरा है या किसी और का?’’

मुसकान आगबबूला हो गई. गुस्से में उस ने पति पर हाथ उठा दिया. अगले पल वहीं रखे मोबाइल स्टैंड से पति पर हमला बोल दिया. ताहा बचता हुआ एक कोने में चला गया. वहीं उस की नजर मांस काटने वाले बड़े चाकू पर पड़ी. उस के दिमाग में क्या खुराफात हुई कि उस ने बगैर कुछ सोचेविचारे चाकू उठा लिया. एक झटके में उस ने पत्नी को दबोच लिया और उस की गरदन रेत डाली. चंद मिनटों में मुसकान खून से सराबोर हो गई. वह जमीन पर गिर पड़ी थी. उस की गरदन कट गई थी.

ताहा जब ठंडा हुआ, तब उस ने अपने दोनों हाथों से माथा पकड़ लिया, ”यह मैं ने क्या कर दिया!’’

वह वहीं बैठ गया. कभी अपने खून सने हाथ को तो कभी खून लगे चाकू को देखने लगा. उस के सामने पत्नी मुसकान की लाश पड़ी थी. वह दुखी हो रहा था. उस के बारे में सोचने लगा था. अचानक 2 साल पहले का वह वाकया उस के दिमाग में घूम गया, जब मुसकान से वह पहली बार मिला था.

रील बनाते समय हो गया था प्यार

दोपहर का वक्त था. मुंबईठाणे हाइवे पर किनारे ट्रक खड़ा कर के एक पेड़ की छांव में मोहम्मद ताहा कड़ाही में कुछ पका रहा था. पास में उस का हेल्पर आटा गूंथ रहा था,  तभी उस की नजर एक लड़की पर गई. ग्रामीण वेशभूषा के साथ मेकअप में थी. उस के एक हाथ में मोबाइल था. दूसरे हाथ में मोबाइल लगाने का एक स्टैंड पकड़े थी. वह उस की तरफ ही चली आ रही थी. अपनी ओर उसे आता देख मोहम्मद ताहा चौंक गया था. उस की चालढाल जानीपहचानी सी लग रही थी. उस के बारे में सोच ही रहा था कि वह उस के करीब आ चुकी थी. वह कुछ बोल पाता, इस से पहले ही लड़की हिंदी में बोल पड़ी, ”आप ट्रक ड्राइवर हो? क्या पका रहे हो? कहां से आ रहे हो?’’

”मैं आप को पहचानता हूं?’’ बीच में ही ताहा का हेल्पर बोल पड़ा.

”कैसे पहचानता है तू? अभी जुम्माजुम्मा 4 दिन का ही है और…बेकार की बातें करता है?’’ ताहा झिड़कते हुए बोला.

”हांहां, मैं ने इन को आज ही मोबाइल में देखा है…इसी ड्रेस में!’’ हेल्पर फिर बोला.

”अरे हां! याद आया तूने मुझे भी तो दिखाया था इंस्टाग्राम में…एक चलती ट्रक पर रस्सा पकड़ कर चढ़ रही थी…’’ ताहा बोला.

”हांहां, तुम लोगों ने सही तरीके से मुझे पहचान लिया…मैं वही ट्रक पर चढऩे वाली लड़की हूं… कैसा लगा था वीडियो?’’

”मैं तो देख कर हैरान हो गया था…मैं ने बोला था कि यह तो कोई फिल्मी सीन की तरह है.’’ ताहा बोला.

”तो लाइक क्यों नहीं किया? चलो, कोई बात नहीं, अब सब्सक्राइब कर दो…यह लो मेरे वीडियो का ब्लौग. अपने मोबाइल में इसे खोल कर इस लाल वाले बटन को टच कर दो!’’ लड़की बोली.

”यहां भी वीडियो बनाने आई हो?’’ हेल्पर बोला.

”तुम लोग मेरी मदद करोगे?’’

”चलती ट्रक पर चढऩे वाला कैसे बनाया था?’’ हेल्पर को उस के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई.

”उस में एक बाइक वाले से मदद ली थी. उसी ने वीडियो बना दी थी.’’

”बहुत रिस्की था. डर नहीं लगा?’’ ताहा बोला.’’

”रिस्क कहां नहीं है? इंसान बैठाबैठा, चलताफिरता लुढ़क जाता है…या सड़क के किनारे कोई तेज गाड़ी से टक्कर मार कर फरार हो जाता है…’’ लड़की बोली.

”वह तो है, फिर भी जानबूझ कर रिस्क लेना…’’ ताहा बोला.

”अरे कुछ नहीं होता…जिंदगी में मजे होने चाहिए. मुझे रील बनाने में मजा आता है.’’ लड़की बोली.

”यहां क्या बनाओगी? यहां तो कुछ भी वैसा रिस्क जैसा नहीं है?’’

”यहां मुझे एक ट्रक ड्राइवर की पत्नी के रोल का वीडियो बनाना है.’’

”ऐंऽऽ ऐसा क्या?’’ हेल्पर चौंकता हुआ बोला, ”बिना शादी किए भाईजान शौहर बन जाएंगे.’’

”अरे, उसे शौहर का नाटक करना है.’’ लड़की बोली.

”तुम ने नाम तो बताया नहीं.’’

”मुसकान. रील भी इसी नाम से है.’’

”बड़ा अच्छा नाम है. मेरा नाम मोहम्मद ताहा है…अजब इत्तेफाक है कि मैं भी मुसलिम और तुम भी! साथ तो देना ही पड़ेगा.’’

”…तो फिर रील बनाना शुरू करें.’’ लड़की बोली.

थोड़ी देर में ताहा और मुसकान ने सड़क के किनारे रोटी बेलने, बरतन साफ करने, भोजन परोसने और साथसाथ खाने का वीडियो शूट किया. इस में हेल्पर ने मदद की. वीडियो बनाया. मुसकान जाने से पहले अपना पर्सनल मोबाइल नंबर ताहा को देती गई.

लव मैरिज के बाद मतभेदों ने लिया जन्म

उस के बाद 25 साल के ताहा और 22 साल की मुसकान की पहली मुलाकात दोस्ती में बदल गई. ताहा को जब भी ट्रक की ड्राइविंग से फुरसत मिलती, वह मुसकान को कौल कर देता. उस से घंटों बातें करता. उस की वीडियो की तारीफ करने लगता. एक दिन उस ने मुसकान के मन को टटोलते हुए उस से विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया. मुसकान ने भी उस के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया. किंतु एक समस्या मुसकान के सामने परिवार के लोगों को राजी करने की थी.

किसी तरह मुसकान ने अपने फेमिली वालों को ताहा से प्रेम विवाह करने के लिए मना लिया. उस के बाद मोहम्मद ताहा अंसारी और मुसकान भिवंडी की एक बस्ती में अलग एक कमरा ले कर रहने लगे. सालडेढ़ साल तक तो उन के संबंध मधुर बने रहे, किंतु जैसे ही उन की जिंदगी में बच्चा आया, उन की मधुरता में कमी आने लगी. बातबात पर ताहा मुसकान पर अपनी मरजी थोपने लगा. यहां तक कि उसे परदे में रहने और रील बनाना बंद करने का फरमान जारी कर दिया. इस पर मुसकान तिलमिला गई. उस ने दोटूक कह दिया, ”मैं रील बनाना किसी भी सूरत में बंद नहीं करूंगी.’’

पाबंदी और नसीहत को मानने से इनकार करने पर ताहा बौखला गया. उस के आत्मसम्मान को ठेस लगी कि बीवी को उस की भावना की कद्र नहीं है. इसे ले कर दोनों के बीच हमेशा तकरार होने लगी. ताहा जब काम के सिलसिले में बाहर रहता, तब मुसकान भी रील के लिए वीडियो बनाने निकल पड़ती थी. साथ में बच्चे को भी संभालती थी.

वे झगड़ते हुए एकदूसरे के चरित्र पर भी कीचड़ उछालने लगे थे. मुसकान के अंदाज और मर्दों के बीच जल्द घुलमिल जाने और उस के साथ हंसहंस कर बातें करने की आदत से ताहा के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. कई बार शक उस के मनमिजाज पर हावी हो जाता था. वह सोच में पड़ जाता था कि बच्चा किसी और का तो नहीं! किंतु सच तो यही था कि मुसकान और ताहा एक साल के बच्चे के मातापिता थे.

शक के कीड़े ने कुतर दी गृहस्थी

ताहा के दिमाग की नसों को कुतरता शक का कीड़ा एक दिन काल बन गया. उस का 28 अगस्त को मुसकान के साथ खूब झगड़ा हुआ था और गुस्से में काम पर चला गया था. मुसकान भी उस रोज काफी गुस्से में थी और घर से कहीं और भाग जाने की धमकी दे दी थी. किंतु अगले रोज ताहा ने दिन में मुसकान से फोन पर आत्मीयता के साथ बात की. उस ने पति से माफी मांगते हुए शाम तक लौट आने को कहा था. उस के कमरे पर नहीं होने से फिर से मानसिक तनाव में आ गया था. इसी तनाव में मुसकान के कमरे पर आते ही उस से बीते दिनों की तरह झगड़ पड़ा था, फिर उस की हत्या कर दी.

 

ताहा ने बीवी मुसकान की लाश को ठिकाने लगाने के लिए हत्या से भी अधिक अमानवीय तरीका अपनाया. ताहा ने सब से पहले उस का सिर धड़ से अलग कर दिया और फिर शव के 17 टुकड़े कर डाले. तब तक रात घिर आई थी और खाड़ी में समुद्री लहरें और तेजी से उठनेगिरने लगी थीं. समुद्र का पानी तट के काफी करीब आने लगा था. ताहा ने इस का फायदा उठाया और शव के टुकड़ों को पास के बूचडख़ाने से ले कर समंदर तक इधरउधर फेंक दिया. उस का अंदाजा था कि समुद्र की लहरों के साथ शव के टुकड़े उस में समा जाएंगे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पुलिस को ईदगाह रोड के पास स्थित बूचडख़ाने के इलाके से एक महिला का कटा हुआ सिर बरामद हुआ, जो कीचड़ से सना हुआ था. उस की पहचान और हत्या के बारे में जांच शुरू की गई. मामला भिवंडी के भोईवाड़ा पुलिस थाने में दर्ज किया गया. वहां के सीनियर इंसपेक्टर अशोक रतनपारखी हत्या का कारण पता लगाने के साथसाथ स्थान और सिर काटे जाने वाले हथियार की तलाशी में जुट गए थे. जांच में तेजी लाने के लिए डीसीपी और एसीपी की देखरेख में 2 स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीमें बनाई गई थीं.

भोईवाड़ा पुलिस के सामने महिला की पहचान और फिर हत्या के आरोपियों को पकडऩे की बड़ी चुनौती थी. अशोक रतनपारखी के मार्गदर्शन में पुलिस इंसपेक्टर प्रमोद कुंभार और उन की टीम ने ईदगाह बस्ती में जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि वहां से एक महिला लापता है. इसी के आधार पर पुलिस ने जांच की दिशा तय की और जांच शुरू की. यह स्पष्ट हो गया कि शव परवीन उर्फ मुसकान नाम की महिला का था.  तहकीकात के क्रम में पुलिस को उस के पति मोहम्मद ताहा अंसारी के बारे में मालूम हुआ. पुलिस उस के कमरे पर गई. वहां से वह फरार था. पुलिस ने उसे ढूंढ कर पहली सितंबर की शाम को हिरासत में लिया और गहन जांच शुरू की.

पूछताछ में वह बयान बदलता रहा. पुलिस द्वारा सख्ती किए जाने के बाद ताहा ने अपनी पत्नी मुसकान की हत्या करना कुबूल कर लिया. पुलिस उसे घटनास्थल पर ले गई और नाव की मदद से खाड़ी में तलाशी की ताकि पता लगाया जा सके कि उस की पत्नी का शव कहां है.  ताहा ने जुर्म कुबूल करते हुए बताया कि उस ने पहले अपनी पत्नी का सिर धड़ से अलग कर दिया था. इस के बाद उस ने शव के 17 टुकड़े कर दिए और जब समुद्री लहरें तेज थीं, तब उन्हें खाड़ी में फेंक दिया, ताकि सबूत मिटाए जा सकें.

इस बयान के आधार पर 2 सितंबर, 2025 को स्थानीय पुलिस, फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को घटनास्थल पर ले जाया गया और शव की तलाश शुरू की गई, लेकिन शव के नहीं मिलने पर खाड़ी के पास के पुलिस स्टेशन को पत्र लिख कर इस की सूचना दे दी गई. आरोपी ताहा को भिवंडी कोर्ट में पेश कर दिया और उसे 11 सितंबर तक पुलिस रिमांड में भेज दिया गया. इस बीच आरोपी ने हत्या में इस्तेमाल हथियार के बारे में बताया कि उसे वह खाड़ी में फेंक चुका है. पुलिस उस की तलाश में जुट गई थी.

इस के अलावा डीसीपी शशिकांत बोराटे के अनुसार ड्रोन कैमरों और नावों की मदद से शव की तलाश का काम शुरू करने की योजना बनाई गई थी. लिखे जाने तक आरोपी मोहम्मद ताहा अंसारी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. Mumbai Crime

 

 

UP Crime News : मीत न मिला मन का

UP Crime News : प्रीति की ख्वाहिश थी कि उस की शादी किसी सरकारी नौकरी वाले युवक के साथ हो, लेकिन वह किसान ओमपाल से ब्याह दी गई. वह 2 बेटियों की मां जरूर बन गई, लेकिन पति उस की भावनाओं को नजरअंदाज करता रहा. ऐसे में वह गांव के देवर अभय सिंह के संपर्क में आई. अपने प्यार को रिश्ते में बदलने के लिए इन दोनों ने ऐसा कदम उठाया कि…

रात के कोई 2 बजे का वक्त रहा होगा, कमरे में पतिपत्नी और एक 12 वर्षीय बच्ची ममता सो रही थी. अचानक बच्ची की आंखें खुलीं. उस बच्ची की नजर अपनी चाची पर पड़ी. चाची ने किसी गैरमर्द को इशारा किया. फिर दोनों उस के सो रहे चाचा ओमपाल की ओर बढ़ गए. चाची ने अपना तकिया उठाया और वह वहां पर सो रहे अपने पति की तरफ बढ़ चली.

चाची को देखते ही बच्ची सहम गई. फिर उस ने सोने की ऐक्टिंग करते हुए जो देखा, उसे देखते ही उस की रूह कांप उठी. वह डर के मारे थरथर कांपने लगी. चाची ने उस तकिए से उस के चाचा ओमपाल का मुंह दबा दिया. उस के साथ ही उस अन्य पुरुष ने चुनरी से उस के चाचा का गला दबा दिया. थोड़ी देर छटपटाने और इधरउधर पैर मारने के बाद उस के चाचा पूरी तरह से शांत हो गए. यह कोई फिल्मी स्टोरी नहीं, बल्कि एक हकीकत है. फिर उस के बाद जो हुआ, इस कहानी में पढि़ए.

8 सितबंर, 2025 को रात के कोई 2 बजे का वक्त था. बुलंदशहर के गांव परतापुर की रहने वाली प्रीति ने अचानक अपनी जेठानी सीता का दरवाजा खटखटाना शुरू किया.

”दीदी, जल्दी चलिए, देखिए मेरे पति को अचानक क्या हो गया? वह बिलकुल भी बोल नहीं रहे.’’

इतना सुनते ही सीता देवी अपनी देवरानी के पीछेपीछे उस के कमरे में पहुंची. ओमपाल एक खटिया पर पड़ा हुआ था. सीता ने अपने देवर ओमपाल के पास जाते ही उस के चेहरे को हिलाया.

”ओमपाल…ओमपाल, क्या हो गया तुम्हें.’’

उस के बाद सीता ने उस के सीने पर भी हाथ लगा कर देखा, लेकिन ओमपाल कुछ नहीं बोला. ओमपाल की हालत देखते ही सीता देवी ने अपने पति रवि करन को बुलाया. रवि करन ने भी छोटे भाई की नब्ज टटोली, लेकिन वह शांत थी. भाई की हालत देख रवि करन भी बुरी आशंका से भयभीत हो गया था. ओमपाल को ऐसी हालत में देखते ही रवि करन ने तुरंत ही अपने परिचित एक डौक्टर को फोन मिलाया. कोई आधा घंटे के बाद डौक्टर ओमपाल को देखने के लिए उस के घर पर पहुंचा. डौक्टर ने ओमपाल की नब्ज चैक की. नब्ज चैक करते ही डौक्टर ने जबाव दे दिया, ”ओमपाल की मौत हो चुकी है.’’

इतना सुनते ही ओमपाल के घर में कोहराम मच गया. सब बुरी तरह से रोनेधोने लगे. घर में सब को रोते देख ममता और नेहा नाम की 2 बच्चियां भी रोने लगी थीं.

डौक्टर ने ओमपाल की पत्नी से पूछा, ”आप के पति को हुआ क्या था?’’

तब प्रीति ने रोते हुए बताया, ”उन्होंने मुझे सोते से जगाया. फिर बोले प्रीति मेरे सीने में बहुत ही भयंकर दर्द हो रहा है. उस के बाद मैं ने उन के सीने को काफी देर तक मसला भी, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ. तब मैं ने सोचा कि मैं सीता भाभी को बुला कर लाती हूं. जैसे ही मैं उन को साथ ले कर अपने कमरे में पहुंची तो उन की सांस थम चुकी थी.’’

इतना सुनते ही डौक्टर ने बताया कि उन्हें शायद हार्ट अटैक आ गया था, जिस के कारण आननफानन में उस की मौत हो गई. ओमपाल की मौत से उस के परिवार में मातम छा गया. ओमपाल की 2 छोटी बेटियां थीं. एक 4 वर्ष की दूसरी ढाई वर्ष की. घर में रोनेचिल्लाने को देख कर उन का भी रोरो क र बुरा हाल था, जिन को उन की ताई सीता ने संभाल रखा था. अगले दिन सुबह ही ओमपाल के दाह संस्कार की तैयारी होने लगी. सभी रिश्तेदारों को खबर दी गई थी. ओमपाल का हार्ट अटैक से निधन हो गया. पूरे गांव में इसी बात की चर्चा थी. फिर कुछ ही समय बाद नैचुरल डेथ समझ कर उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था. सभी मेहमान अपनेअपने घर को जा चुके थे.

लेकिन उस घटना के बाद से 12 वर्षीय ममता कुछ बीमार सी रहने लगी थी. उस की मम्मी सीता ने कई बार उस से उस की परेशानी के बारे में पूछा, लेकिन वह पूरी तरह से अपना मुंह बंद किए हुए थी. न तो वह कुछ खापी रही थी और न ही किसी से कोई बात ही कर रही थी. ओमपाल की हत्या के बाद सीता देवी वहीं पर काम में लगी हुई थी, लेकिन ममता एक बार भी अपनी चाची प्रीति के घर नहीं गई थी. तभी सीता देवी ने महसूस किया कि ममता जबजब प्रीति के सामने जाती है, वह बुरी तरह से घबरा जाती है. इस बात में जरूर कोई राज है.

ममता की बिगड़ती हालत को देखते हुए पहले तो उस के फेमिली वालों ने सोचा कि उसे अपने चाचा के खत्म होने का गहरा सदमा लग गया है. क्योंकि ओमपाल उसे बहुत प्यार करता था. उसे भी उस से बहुत लगाव था. इसी कारण वह अकसर ओमपाल के घर पर ही पड़ी रहती थी. फिर वहीं पर खाना खापी कर सो भी जाती थी.

ममता की हालत को देखते हुए उस के पापा ने उसे डौक्टर के पास ले जा कर भी दिखाया. उसे न तो कोई बुखार वगैरह था और न ही कोई बीमारी. उस के बाद ममता की मम्मी ने उसे एकांत में ले जा कर उस से पूछताछ की तो उस ने अपनी मम्मी को जो जानकारी दी, वह हैरान कर देने वाली थी. ममता ने ओमपाल की मौत की हकीकत खोलते हुए बताया, ”चाचा की हार्ट अटैक से मौत नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या गांव के ही अभय सिंह ने चाची प्रीति के साथ मिल कर की थी.’’

इस जानकारी ने ओमपाल फेमिली में हड़कंप मचा दिया. ममता ने बताया कि रात में अचानक उस की आंखें खुलीं तो चाची प्रीति और अभय सिंह चाचा ओमपाल को बुरी तरह से मार रहे थे. यह देख कर वह बुरी तरह से डर गई. फिर वह सोने का नाटक करते हुए यूं ही बिस्तर पर पड़ी रही.

ममता ने आगे बताया, ”जिस वक्त मैं चाची के घर पर पहुंची तो चाचा और चाची खाना खा कर सोने जा रहे थे. तब मैं ने चाची से कहा, ‘चाची, मैं भी तुम्हारे पास ही सोऊंगी.’ फिर मैं चाची के साथ ही सो गई. रात में मेरी आंखें खुलीं तो चाची मेरे पास नहीं थी. उस के बाद मैं ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा.’’

ओमपाल की मौत की हकीकत सामने आते ही उस के बड़े भाई रवि करन को प्रीति पर गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उन्होंने किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू किया. फिर यह बात उन्होंने उस से छिपाते हुए पुलिस को इस बात की सूचना दे दी. उस वक्त तक प्रीति अपने पति की मौत का गम मनाने की ऐक्टिंग करने में लगी हुई थी. उस का ओमपाल की मौत के वक्त से ही रोरो कर बुरा हाल था.

ओमपाल की मौत की हकीकत की जानकारी मिलते ही थाना बीबीनगर पुलिस उस के घर पर जा पहुंची. पुलिस ने प्रीति से सख्ती से पूछताछ की तो प्रीति ने पुलिस की मार से बचने के लिए सहज ही अपना अपराध कुबूल कर लिया था. प्रीति के जुर्म कुबूलते ही पुलिस ने अभय सिंह को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से भी कड़ी पूछताछ की तो उस ने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस घटना की जानकारी मिलते ही एसएचओ राहुल चौधरी ने मृतक ओमपाल के फेमिली वालों के साथसाथ गांव वालों से भी विस्तृत जानकारी ली. ओमपाल की मौत की सच्चाई सामने आते ही गांव में तरहतरह की चर्चा होने लगी थी. लोग विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि ओमपाल की हत्या उस की पत्नी के इशारे पर ही की गई थी. ओमपाल की हत्या का राज खुलते ही पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त की गई चुन्नी और तकिया भी बरामद कर लिया था. इस मामले की जानकारी मिलते ही एसपी (सिटी) शंकर प्रसाद ने घटनास्थल पर जा कर जानकारी जुटाई.

यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव परतापुर की है. इसी गांव में रहता था मोहर सिंह का परिवार. मोहर सिंह एक किसान थे. उन के 3 बेटों देवीशरण, रवि करन में ओमपाल सब से छोटा था. तीनों की शादी हो जाने के बाद तीनों भाई गांव में अलगअलग घर बना कर रह रहे थे. रवि करन और ओमपाल के घर आसपास में ही थे. जबकि उस का बड़ा भाई देवीशरण गांव के बाहरी छोर पर रह रहा था.

ओमपाल की शादी अब से लगभग 7 साल पहले प्रीति के साथ हुई थी. शादी के कुछ समय बाद तक तो ओमपाल और प्रीति के संबंध मधुर रहे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद ओमपाल प्रीति की नजरों से उतरने लगा. प्रीति देखनेभालने में खूबसूरत थी, लेकिन ओमपाल गांव का सीधासादा युवक. समय के साथसाथ प्रीति 2 बच्चों की मां भी बन गई थी, लेकिन 2 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी उस की खूबसूरती में चार चांद लगे हुए थे.

ओमपाल हर वक्त खेती के काम में ही लगा रहता था. शाम को खेतीबाड़ी का कामकाज निपटा कर आता, फिर वह जल्दी ही खाना खा कर सो जाता था. यह बात प्रीति को बिलकुल भी पसंद नहीं थी. वह एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. शादी से पहले उस ने भी एक सुंदर सरकारी जौब वाले पति के सपने देखे थे, लेकिन शादी के बाद उस के सारे अरमानों पर पानी फिर गया था. फिर भी उस ने काफी समय तक ओमपाल के साथ निभाने की कोशिश की.

ओमपाल हर शाम को अपने सारे दिन की थकान मिटाने के लिए शराब का आदी भी हो गया था. उस के बाद वह अपनी ही धुन में रहने लगा था. बीवी की उसे कोई परवाह नहीं थी. ओमपाल की हरकतों को देख कर प्रीति ने अपनी किस्मत को कोसना शुरू कर दिया था. प्रीति जब कभी भी अपने खेतों पर जाती तो उस की मुलाकात खेतों पर ही अभय सिंह से होने लगी थी. उस वक्त तक अभय सिंह कुंवारा था. हालांकि दोनों के बीच चाचीभतीजे का रिश्ता था. लेकिन अभय जब कभी भी प्रीति से मिलता तो उस की सुंदरता की तारीफ करना नहीं भूलता था.

खेतों पर काम करते देख कर प्रीति ने उसे अपने पास बुलाया, फिर वह उस से मजाक भरी बातें करने लगी. चाची की बातें सुनते ही अभय ने बात आगे बढ़ाते हुए प्रश्न किया. ”चाची, चाचा के क्या हालचाल हैं?’’

”अभय, तुम्हारे चाचा की चाल तो जैसे बिलकुल ही शांत पड़ गई. सारे दिन मजदूरों की तरह खेतों में लगे रहते हैं. उस के बाद शाम को खाना खा कर सो जाते हैं. उन्हें तुम्हारी चाची से तो जैसे कोई मतलब ही नहीं. मेरी किस्मत फूटी थी, जो मुझे ऐसा पति मिला. न काम

का न काज का, दुश्मन अनाज का.’’

”अरे चाची, कैसी बात करती हो. चाचा सारे दिन इतना काम करते हैं और आप कह रही हो कि वह कुछ नहीं करते.’’ अभय ने चाची की बात को आगे बढ़ाया.

”लेकिन लाला, एक मर्द को अपनी औरत की भावनाओं को भी पढऩा चाहिए. एक औरत को रोटी के अलावा और कुछ भी चाहिए.’’

”चाची, तुम भी कैसी बात करती हो. एक इंसान को पेट भर रोटी मिल जाए तो उस से बड़ी और क्या बात हो सकती है. चाची, हम तो रोटी खा कर पेट पर हाथ फेरते हैं. हमें तो फिर किसी चीज की इच्छा नहीं होती.’’

”लगता है अभय, तुम भी अपने चाचा की तरह ही हो. किसी औरत के दिल की भाषा पढऩे में तुम भी फेल हो.’’

”अरे चाची, आप क्या बात करती हो. मेरी शादी हो जाने दो. अपनी पत्नी को रानी बना कर रखूंगा. मैं अपने चाचा की तरह अपनी पत्नी को खेतों की मिट्टी चटाने के लिए शादी नहीं करूंगा.’’ अभय ने चाची के सामने अपनी शेखी बघारी.

प्रीति हंसते हुए बोली, ”अभय, मुझे तो तुम्हारे जैसा ही पति चाहिए था, लेकिन मेरी किस्मत में मिट्टी का पुतला मिला. पता नहीं कब तक उसे झेलना पड़ेगा.’’

”अभय, तुम बताओ, तुम्हें कैसी पत्नी चाहिए?’’

”चाची, अब मैं अपने मुंह से तुम्हारी क्या तारीफ करूं. जब भी तुम्हें देखता हूं, मेरे दिल में कुछकुछ होने लगता है. मुझे तो तुम्हारी जैसी ही सुंदरसलोनी पत्नी चाहिए.’’

अभय की बात सुनते ही प्रीति ने उस का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया, ”अभय देख, मेरा दिल भी तेरे लिए कितना उछलकूद कर रहा है. यह काफी समय से तेरे लिए पागल हो कर तेरा पीछा कर रहा है.’’

चाची के सीने पर हाथ जाते ही अभय के दिल की धड़कनें भी दोगुनी हो चुकी थीं. फिर उसी दिन प्रीति ने अभय को कसम खिलाई कि हम दोनों पतिपत्नी तो नहीं बन सकते, लेकिन दोस्ती तो कर ही सकते हैं. उस दिन अभय और प्रीति के बीच दोस्ती हो गई. फिर क्या था, दोनों के बीच रिश्ता ही ऐसा था कि जिस के कारण दोनों का मिलनाजुलना बेरोकटोक चलने लगा. उसी दौरान दोनों के बीच अवैध संबंध भी बन गए. ओमपाल अपने कामकाज में इतना व्यस्त रहता था कि प्रीति हर रोज के घरेलू जरूरतों के लिए अभय को ही इस्तेमाल करने लगी थी. इसी सब के चलते दोनों के बीच मधुर संबंध स्थापित हो गए थे.

अभय भी ज्यादातर अपनी चाची के घर पर ही पड़ा रहता था. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि ओमपाल ने प्रीति और अभय को प्यार की तपिश में तपते देख लिया था. ओमपाल मजबूर था. अभय उस के रिश्ते के बड़े भाई का बेटा था, जिसे ले कर वह गांव में अपनी पत्नी को बदनाम नहीं करना चाहता था. इसी कारण ओमपाल ने अभय से विरोध करने के बजाए प्रीति पर ही पाबंदी लगानी शुरू कर दी, लेकिन प्रीति भी पाबंदी की बेडिय़ों में जकड़ कर जीना नहीं चाहती थी. वह अभय के प्यार में इतनी पागल हो चुकी थी कि वह उसे किसी भी कीमत पर छोडऩे को तैयार नहीं थी.

उस के बाद दोनों ने मोबाइल का रास्ता पकड़ा और फिर दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर प्यार भरी बातें करने लगे, लेकिन यह बात भी ओमपाल से ज्यादा दिन तक छिप न सकी. उस के बाद ओमपाल ने अभय के साथसाथ प्रीति को भी प्यार से समझाया, लेकिन दोनों ही मानने को तैयार न थे.

नतीजतन दोनों परिवार के बीच में गहरा विवाद पैदा हो गया. पतिपत्नी दोनों के बीच मनमुटाव के साथ ड़ाईझगड़ा भी होने लगा था. उस के बाद ओमपाल ने प्रीति के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी थी. पाबंदी लगते ही प्रीति पिंजरे में कैद चिडिय़ा की तरह अभय से मिलने की चाहत में फडफ़ड़ाने लगी. उसी दौरान एक दिन मौका पाते ही प्रीति ने अभय को अपने खेतों पर मिलने के लिए बुलाया.

प्रीति अभय को देखते ही रोने लगी, ”अभय, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती. अगर तुम मुझे तनिक भी प्यार करते हो तो मुझे किसी भी तरह से इस कैद से मुक्त कराओ. फिर मुझे कहीं भी ले चलो. मगर मैं इस जाहिल इंसान के साथ नहीं रहना चाहती. पहले तो वह मेरे साथ गालीगलौज ही करता था, अब तो हर रोज मेरे साथ मारपीट भी करने लगा है. मुझे तुम्हारे साथ ही सच्चा प्यार मिलता है. मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती.’’

प्रीति की आंखों में आंसू देख कर अभय ने उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उस ने कहा, ”चाची तुम परेशान मत हो. मैं कोई उपाय करता हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं ओमपाल को इस दुनिया से ही विदा किए देता हूं.’’

तभी प्रीति ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ”अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है तो उस के लिए ऐसा उठाना ही होगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

उसी दिन दोनों ने ओमपाल को अपने बीच से निकाल फेंकने की योजना बना डाली थी. ओमपाल प्रीति की बेवफाई से तंग आ कर नशे का आदी बन चुका था. उस के घर में हमेशा ही शराब एडवांस में रखी रहती थी. यह जानकारी अभय को पहले ही थी. इसी बात का लाभ उठाते हुए अभय ने प्रीति को नशे के कुछ पाउच ला कर दे दिए थे. मौका पाते ही प्रीति वह पाउच खोल कर पति की शराब में मिला देती थी, जिसे पीने के बाद ओमपाल गहरी नींद में सो जाता था. उस के बाद प्रीति अभय को अपने घर बुला लेती और फिर दोनों मौजमस्ती के समंदर में गोते लगाने लगते थे.

लेकिन इस के बावजूद भी दोनों को डर लगा रहता था कि कोई उन के फेमिली वाला आ कर उन्हें रंगेहाथों पकड़ न ले. इस सब झंझट से छुटकारा पाने के लिए दोनों ने मिल कर ओमपाल को मौत की नींद सुलाने का प्लान बना डाला.

उसी प्लान के तहत 8 सितंबर, 2025 को जब ओमपाल खापी कर सो गया तो प्रीति ने प्रेमी अभय सिंह को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस दिन जेठानी की 12 वर्षीय बेटी ममता भी उस के बच्चों के साथ वहीं पर सोई हुई थी. अभय के आने से पहले प्रीति ने सभी बच्चों को चैक किया, सभी गहरी नींद में सोए पड़े थे. फिर दोनों ने ओमपाल की गला घोंट कर हत्या कर दी.

लेकिन अभय के घर में घुसते ही ममता की आंखें खुल गईं. उस ने उस रात अपनी आंखों से हत्या का जो लाइव मंजर देखा, उसे देख कर बुरी तरह से डर गई थी. उस दिन ममता वहां पर मौजूद न होती तो ओमपाल की मौत का खुलासा न हो पाता. इस मामले में मृतक ओमपाल के भाई रवि करन की तरफ से प्रीति व अभय सिंह को आरोपी मान कर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसे पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत दर्ज किया था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने के बाद दोनों को जेल भेज दिया था. UP Crime News

(कथा में ममता और नेहा परिवर्तित नाम है)