UP News : गीता हुई भतीजे के प्यार में दीवानी

UP News : 28 वर्षीय गीता का पति प्रकाश कनौजिया मुंबई में था. वह मायके में रहते हुए 2 बच्चों की जिम्मेदारियां संभाले हुए थी. निजी जिंदगी जैसेतैसे तनहाई में गुजर रही थी. हमउम्र भतीजे विकास का जरा सा सहारा क्या मिला, उसी से दिल लगा बैठी. एक तरफ प्रेम की दीवानगी थी, अनैतिक संबंध और वासना का उफान था तो दूसरी तरफ पैसे की तंगी भी थी. फिर जो कुछ हुआ, उस में गेहूं के साथ घुन पिसने की कहावत चरितार्थ हो गई. क्या हुआ, कैसे हुआ, पढ़ें मांबेटी हत्याकांड की पूरी कहानी…

मलीहाबाद में मिर्जागंज बाजार स्थित एक चर्चित कपड़े की दुकान ‘प्रेम वस्त्रालय’ में बैठा विकास बारबार आ रहे फोन काल से परेशान हो गया था. त्यौहार का सीजन था. ग्राहकों की भीड़ थी. 2 दिन बाद ही करवाचौथ आने वाला था. वह ग्राहक को देखे या फिर फोन सुने. तंग आ कर उस ने मोबाइल ही स्विच औफ कर दिया.

दुकान पर जब ग्राहकों की भीड़ कम हुई, तब उस ने लंच करने के लिए अपने टिफिन का थैला उठाया और दुकान के पीछे छोटे से गोदाम में चला गया. लंच बौक्स खोला, साथ ही अपने मोबाइल को औन किया. मोबाइल औन होते ही स्क्रीन पर पर 22 मिस काल और 8 वाट्सऐप मैसेज चमकने लगे. ये सभी मिस्ड काल और मैसेज गीता के थे. कुछ घंटे पहले गीता ही लगातार उसे काल पर काल किए जा रही थी. काल करने के बजाए उस ने मैसेज पढऩा शुरू किया. विकास का मन कड़वा हो गया. सोचा खाना खाने के बाद या दुकान से छुट्टी होने पर गीता को काल कर लेगा. उस ने फटाफट 5-7 मिनट में लंच कर लिया.

लंच बौक्स संभालते वक्त गीता के 2 और वाट्सऐप मैसेज आ गए. मैसेज क्या थे, पूरी शिकायत थी. उस में धमकी भी शामिल थी. लिखा था, ”मैं आ रही हूं दुकान पर, देखती हूं कि तुम मुझे कैसे कपड़े नहीं दिलवाते हो?’’

मैसेज पढ़ कर वह भुनभुनाया, ”कहां से कपड़े दिलवाऊं? वैसे ही दुकान का मालिक पिछला बकाया मांग रहा है…’’

वह झुंझला उठा था. उस के मन में बेचैनी आ गई थी. सिर खुजलाता हुआ किसी तरह खुद को सहज बनाने की कोशिश की और दुकान पर जा बैठा. वहां ग्राहकों की भीड़ लग गई थी. वह जल्दीजल्दी उन्हें निपटाने के लिए अपने सहयोगी सेल्समैन का हाथ बंटाने लगा. अचानक उस की नजर सामने सड़क की ओर गई. उस ने गीता को दुकान में घुसते देखा तो सकपका गया. दुकान के एक किनारे चला गया. तब तक गीता वहां पहुंच गई. आते ही शिकायती लहजे में बोल पड़ी, ”तुम ने फोन क्यों नहीं उठाया, कितनी बार काल किया.’’

”देख रही हो दुकान पर कितने ग्राहक हैं!’’ विकास बोला.

”तुम ने फोन ही बंद कर दिया, लाओ कहां है मेरी साड़ी?’’ गीता सीधे अपनी बात पर आ गई थी.

विकास रिश्ते में गीता का भतीजा था. वह कपड़े की दुकान में सेल्समैन की नौकरी करता था. उसे उस ने 2 दिन पहले ही करवाचौथ के लिए साड़ी लाने को कहा था. विकास गीता की बातों का कोई जवाब नहीं दे पाया था.

”अब मुझे टुकुरटुकुर क्या देख रहे हो. साड़ी दो उस में फाल लगवानी है. मैचिंग ब्लाउज भी सिलवाना है. पेटीकोट भी बनवाना है.’’ गीता बोलने लगी.

”गीता, तुम अभी घर जाओ, मैं शाम को साड़ी लेता आऊंगा. पूजा का सामान भी ला दूंगा.’’ विकास बोला.

”यह तो तुम हफ्ते भर से बोल रहे हो, नहीं ले कर आए, तभी तो मुझे यहां आना पड़ा.’’ गीता बोली.

”अभी तुम जाओ, प्लीज तुम यहां से चली जाओ. दुकान पर बहुत काम है!’’ विकास बोला.

”ठीक है, जाती हूं. लेकिन साड़ी, पूजा का सामान ले कर आना और कुछ पैसे भी देना.’’ बोलती हुई गीता वहां से चली गई.

विकास ने राहत की सांस ली. कुछ पल वह मौन बना रहा. फिर काम में लग गया.

दुुकान से निकल कर गीता मायूस थी. वह सोचती हुई जा रही थी, विकास के व्यवहार में कितना बदलाव आ गया है. जो विकास एक समय में उस की हर बात को तुरंत मान लेता था, एक पैर पर खड़े हो कर उस का हर काम करने के लिए तैयार हो जाता था. लेकिन अब वह क्यों बदल गया है. उसे अपनी बदहाल और अभावग्रस्त जिंदगी को ले कर रोना आ रहा था. खुद को कोस रही थी. खुद से बातें करती घर जा रही थी, ‘आखिर वह किस अधिकार से करवाचौथ के लिए उस से साड़ी मांगने गई थी, जबकि उस का पति प्रकाश मुंबई में बैठा था. उस ने त्यौहार के मौके पर छुट्टी नहीं मिलने के कारण घर नहीं आने की खबर कर दी थी. उसी ने विकास से कपड़े आदि खरीदवाने को कहा था. इसी आस में वह विकास से उम्मीद लगा बैठी थी.’

प्रेमी के प्रति गीता के मन में क्यों हुई नफरत

दूसरी तरफ विकास दुकान में अपनी अंगुलियों पर हिसाब लगा रहा था. वह कर्ज के बोझ की चिंता में डूबा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि दुकान के मालिक से कैसे साड़ी और कुछ पैसे उधार देने की मांग करे. उस ने पहले से ही जो कर्ज ले रखा था, उसे चुकाने में कई महीने लग जाएंगे. वह और कर्ज लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. गीता ने करवाचौथ के मौके पर बेमन से आए दिन पहनने वाली साड़ी में ही चावल, बतासे और जल से चंद्रमा को अघ्र्य दे कर छोटीमोटी रस्में पूरी कर लीं. छलनी से पति की तसवीर को निहार लिया. चंद्रमा को प्रणाम किया और व्रत तोडऩे के बाद पास बैठी 6 वर्षीय बेटी दीपिका को प्रसाद खाने के लिए दे दिया.

आधी रात का वक्त होने को आया था. गीता भूखीप्यासी थी. उसे नींद नहीं आ रही थी. अचानक दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई दी. उस ने कमरे के बाहर जा कर देखा. सामने विकास उसे देख कर मुसकरा रहा था. खाली हाथ उसे देख रहा था.

”अब यहां क्या लेने आया है, वह भी आधी रात को, चलो भागो यहां से. जाओ, आज के बाद से मेरे घर में कदम मत रखना. मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है.’’ गीता विकास को देखते ही आंखे तरेर कर बोली.

”गीता, मेरी मजबूरी तो समझो…’’ विकास के आगे बोलने से पहले ही गीता भद्ïदी सी गाली के साथ बोली, ”हरामी कहीं का, जब देखो मुंह उठाए मेरे यहां चला आता है और जब मुझे जरूरत होती है, तब मुंह फेर लेता है.’’

गीता लगातार गालियां दिए जा रही थी और विकास बेशरमी से सुनता रहा. वह अजीबोगरीब स्थिति में था. जबकि गीता उसे बोलने का मौका ही नहीं दे रही थी. वह ऐसे कर रही थी, जैसे उसे चबा ही जाएगी. भूखी शेरनी की तरह गुर्राने के कारण विकास के बोल नहीं निकल पा रहे थे. बोलते हुए उस के शब्द अटक रहे थे. बोलतेबोलते गीता एक झटके से मुड़ी और कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. बाहर विकास कुछ सेकेंड तक ठिठका रहा, फिर वापस अपने घर लौट आया. उधर गीता ने सौगंध ले ली कि वह भविष्य में विकास को यहां कभी आने नहीं देगी और न ही वह उस से कभी मिलेगी.

हुआ भी ऐसा ही. हफ्तों बीत गए, गीता ने विकास से मिलना तो दूर उसे फोन तक करना मुनासिब नहीं समझा. यहां तक कि नए साल की शुभकामनाओं का मैसेज तक नहीं दिया. जबकि विकास गीता को फोन करता था, लेकिन गीता उस का फोन कट कर देती थी. विकास के घर आने पर वह बेरुखी से तुरंत दरवाजा बंद कर लेती थी. विकास जब भी दुकान पर होता, तब उस की बारबार बाहर जाने वाली नजर गीता को तलाशती रहती थी. वह उसे एक बार मिल कर बता देना चाहता था कि उस की  मजबूरियां क्या हैं? वह उसे कितना प्यार करता है. उस पर कितना खर्च करता रहा है और उस कारण वह किस कदर कर्जदार बना हुआ है.

विकास को एक दिन संयोग से गीता बाजार में खरीदारी करती दिख गई. वह अपने पापा सिद्धनाथ, बेटे दीपांशु और बेटी के साथ थी. दरअसल, उस की ससुराल ईशापुर में है. पति प्रकाश मुंबई में प्राइवेट नौकरी करता है. लखनऊ से 6 किलोमीटर की दूरी पर उस का मायका दिलावर नगर है. उस के पापा सिद्धनाथ अकसर गीता की देखरेख करने और जरूरत की चीजें दिलवाने के लिए उस की ससुराल आया करते थे. उस दिन विकास गीता को बाजार में देख कर दुकान से तुरंत उतर कर पीछे से गीता के सामने जा कर खड़ा हो गया. उस वक्त गीता अकेली एक कौस्मेटिक्स की दुकान के सामने खड़ी थी. विकास गीता का हाथ पकड़ कर एक किनारे ले गया.

”क्या इरादा है तुम्हारा? क्यों तुम मेरे हाथों मरना चाहती हो?’’ विकास ने एक सांस में ही गीता को बहुत खरीखोटी सुना दी. उस ने यहां तक कह दिया, ”या तो तुम मेरी जान ले लो या मैं तुम्हारी जान ले लूं!’’ गीता मौके की नजाकत को देख कर विकास की बात को सुनती रही. कुछ देर में विकास खुद शांत हो गया. तब गीता बच्चों को साथ ले कर चुपचाप अपने घर चली गई.

दोहरे मर्डर से सकते में आई पुलिस

बात 17 जनवरी, 2025 की है. मलीहाबाद पुलिस के बीट प्रभारी एसआई अमन श्रीवास्तव को सुबहसुबह ईशापुर गांव में एक महिला और 6 वर्षीय बच्ची की मकान के अंदर हत्या किए जाने की सूचना मिली. उन्होंने इस की सूचना एसएचओ सतीशचंद्र साहू को दे दी. साहू ने भी फौरी काररवाई करते हुए अमन श्रीवास्तव को पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जाने के आदेश दिए.

थोड़ी देर में ही एसीपी अमोल मुरकर और पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. अमन श्रीवास्तव के साथ एसआई अश्वनी कुमार और विवेक कुमार के अलावा सिपाही गौरीशंकर यादव, उत्तम राठी और हैडकांस्टेबल कामरान खान भी ईशापुर पहुंच गए थे. घर के भीतर दोहरे हत्याकांड की मौके पर की गई जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि मृतका की उम्र 28 साल थी और उस का नाम गीता और 6 साल की बच्ची उस की बेटी दीपिका है. दोनों की हत्या धारदार हथियार से की गई थी. मौके पर गीता की गरदन कटी पाई गई.

पुलिस की जांच में रात 2 से 3 बजे के बीच घटना को अंजाम दिए जाने की आशंका जताई गई. पुलिस दल ने दोनों लाशों का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने जांच में गीता की ससुराल ईशापुर और मायका दिलावर नगर के बीच 2 केंद्र चिह्निïत किए. हत्यारे का पता लगाने के लिए सर्विलांस टीम और डौग स्क्वायड ने दिन में 12 बजे ईशापुर गांव जा कर जांच की. खोजी कुत्ता घर से 20 मीटर की दूरी तक लखनऊ रेलवे लाइनों के किनारे कुछ दूर गया और ठहर कर वापस लौट आया. पुलिस ने अनुमान लगाया कि रेलवे ट्रैक के सहारे किनारेकिनारे हमलावर आए होंगे और पैदल गीता के घर तक गए होंगे.

पुलिस ने इस हत्याकांड में किसी परिचित के शामिल होने की आशंका जताई. ग्रामीणों ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि गीता के घर में ज्यादातर उस के परिवार के लोगों का ही आनाजाना था, जो ससुराल और मायके के होते थे. वैसे इस हत्याकांड की सूचना गीता के पापा सिद्धनाथ कनौजिया को भेज दी गई थी. वह लखनऊ में दिलावर नगर, रहीमाबाद थाने के रहने वाले हैं. उन की तहरीर पर मलीहाबाद थाने में धारा 103(1) बीएनएस के तहत केस दर्ज कर लिया गया.  इस की आगे की जांच के लिए डीसीपी (पश्चिम) विश्वजीत श्रीवास्तव द्वारा पुलिस की टीमों का गठन किया गया.

डीसीपी और एडीसीपी धनंजय कुमार कुशवाहा ने क्राइम टीम के सर्विलांस की टीम को इंसपेक्टर सतीशचंद्र साहू के साथ शामिल कर दिया. पुलिस कमिश्नर कार्यालय के इंसपेक्टर शिवानंद मिश्रा, एसआई आशुतोष पांडेय, शुभम पाराशर और हबीब के अलावा पवन, दिलीप व सूरज सिंह सिपाहियों को ले कर 5 टीमें बनाई गईं.

प्रकाश घर क्यों नहीं आ पाता था पत्नी से मिलन

सभी जांच टीमों की मेहनत ने 12 घंटे में रंग दिखा दिया. गीता के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स मालूम हो चुकी थी. उस के मुताबिक गीता के मोबाइल फोन पर एक साल के भीतर 1100 काल विकास के द्वारा किए गए थे. फिर क्या था, घटना के अगले दिन ही 17 जनवरी, 2025 को ईशापुर निवासी राजेश के बेटे विकास को मलीहाबाद में हाइवे के किनारे से पकड़ लिया गया.

विकास से थाने में सख्ती से पूछताछ की जाने लगी. जल्द ही उस ने स्वीकार कर लिया कि वह गीता से बहुत प्यार करता था, लेकिन कुछ दिनों से उस की बेरुखी से तंग आ गया था. उस के बाद वारदात की तह में छिपी कहानी इस तरह बताई—

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अंतर्गत 24 राजमार्ग के किनारे मलीहाबाद से 3 किलोमीटर की दूरी पर ईशापुर गांव में प्रकाश कनौजिया का परिवार रहता है. प्रकाश के पापा का नाम रामखिलावन था. उस के घर की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी. गांव में रह कर गुजरबसर होनी काफी मुश्किल थी. इस कारण रामखिलावन का भाई रामविलास सन 2010 में गांव से मुंबई चला गया था. किसी तरह वहां कामधंधा किया. बाद में उस ने वहां एक लौंड्री की दुकान खोल ली. जल्द ही लौंड्री का व्यवसाय चलने लगा. धंधा जमते ही रामविलास अपने बुजुर्ग मम्मीपापा के गुजरबसर के लिए हर महीने कुछ पैसा भेजने लगा. रामखिलावन ने रामविलास के कहने पर 2014 में प्रकाश का विवाह दिलावर नगर निवासी सिद्धनाथ कनौजिया की बेटी गीता के साथ करवा दिया.

शादी के बाद गीता अपनी ससुराल ईशापुर आ गई. प्रकाश और गीता का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से शुरू हुआ. शादी के एक साल बाद गीता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम दीपांशु रखा गया. रामविलास के मुंबई जाने के बाद घर के खर्चों की जिम्मेदारी प्रकाश पर आ गई. प्रकाश चाहता था कि वह भी कोई कामधंधा शुरू करे. लेकिन उस के सामने मजबूरी थी. वह पत्नी और मम्मीपापा को अकेला नहीं छोडऩा चाहता था. शादी के 3 साल बाद गीता ने एक बेटी को जन्म दिया. प्रकाश और गीता को अब दोनों बच्चों के भविष्य की चिंता सताने लगी. गीता प्रकाश पर मुंबई जा कर रामविलास के साथ ही कोई कामधंधा करने के लिए दबाव बनाने लगी.

इस बारे में गीता ने अपने ससुर से भी बात कर उन्हें राजी कर लिया. साल 2018 की होली के मौके पर रामविलास अपने घर आया, तब गीता ने उस से भी प्रकाश को साथ ले जाने की विनती की. वह खुशीखुशी तैयार हो गया. होली के बाद अप्रैल, 2018 के पहले सप्ताह में प्रकाश भी मुंबई के उपनगर कल्याण पहुंच गया. रामविलास ने उस के लिए एक छोटी खोली किराए पर ले ली और उस की भी लौंड्री की दुकान खुलवा दी. प्रकाश ने खूब मेहनत की और अपने मधुर व्यवहार से धंधा जमा लिया. किंतु इस बीच वह गीता और बच्चों को एकदम से भूल गया. हालांकि वह चाहता था कि कमाई से पैसा जमा करे और दीवाली के मौके पर ढेर सारा पैसा ले कर घर जाए.

हालांकि करीब 6 महीने बाद प्रकाश पैसा देने के लिए एक रात के लिए अपने गांव  आया और अगले दिन ही मुंबई लौट गया. गीता को पति का इस तरह जल्दी में जाना अच्छा नहीं लगा, लेकिन वह उसे चाह कर भी नहीं रोक पाई. धीरेधीरे एक साल बीतने को आया. प्रकाश गांव नहीं आ पाया. साल 2020 के आते ही कोरोना काल आ गया. लौकडाउन लग गया. वह चाह कर भी गांव नहीं जा पाया.

2022 के फरवरी-मार्च में होली पर प्रकाश ने एक बार फिर गांव ईशापुर आने की तैयारी की. लेकिन दोबारा लौकडाउन के चलते वह मुंबई में ही फंसा रहा. पत्नी और बच्चों से मिलने नहीं आ सका. इस का असर उस के धंधे पर भी हुआ. कमाई बहुत कम हो गई.

चाची का विकास पर कैसे आया दिल

गीता को भी घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया. प्रकाश ने उसे जो पैसे भेजे थे, वे सब खर्च हो गए थे. गीता को अपने परिवार के भरणपोषण के लिए परेशान रहने लगी. इसी बीच प्रकाश ने अपने रिश्ते के चचेरे भाई राजेश के बेटे विकास से मदद मांगी. उसे  अपनी चाची गीता और दोनों बच्चों का खयाल रखने का अनुरोध किया. इस बारे में प्रकाश ने गीता को भी फोन पर बता दिया कि वह बेझिझक विकास से किसी भी तरह की मदद ले सकती है. उस के बाद से विकास और गीता का मिलनाजुलना होने लगा था. विकास गीता से मिलने घर पर बेरोकटोक आने लगा था. उन के बीच चाचीभतीजे का रिश्ता था, इस वजह से पासपड़ोस और मायके के लोगों को उन के मिलनेजुलने पर कोई आपत्ति नहीं थी.

चाचा प्रकाश से किए वायदे को विकास अच्छी तरह निभा रहा था. विकास जब भी काम से फुरसत पाता, चाची गीता से मिलने चला आता था. दोनों घंटों साथ बैठ कर बातें करते रहते थे. विकास उसे जरूरत की चीजें भी ला कर दे दिया करता था. गरमी के दिन थे. रात के 9 बज रहे थे. धीरेधीरे रात पैर पसार रही थी. गीता के दोनों बच्चे आंगन में पड़ी चारपाई पर सो रहे थे. सन्नाटे में घर के अंदर दोनों अकेले थे. विकास जब अपने घर को चलने को हुआ तो गीता ने कहा कि आज रात को खाना यहीं खा कर यहीं सो जाओ.

विकास गीता की बात सुन कर कुछ ठिठक सा गया. जेहन में एक विचार कौंध गया. लालटेन की मध्यम रोशनी में वह गौर से गीता के गोरे चेहरे को निहारने लगा. तभी विकास का कुंवारापन जाग उठा था. वह 25 साल का नवयुवक था. काफी देर तक उस का चेहरा निहारने के बाद बोला, ”आज मुझे घर जाने दो. मैं कल शाम को अपनी मां से यहां रुकने के लिए कह कर आऊंगा.’’

विकास की बात सुन कर गीता मुसकराई और बोली, ”कल जरूर आ कर रुकना, तुम्हें मेरी कसम है.’’

गीता के आग्रह के साथ बोलने और कसम देने की बात कहने पर विकास का दिलदिमाग और भी झनझना उठा था. वह उस की चाहत को समझ गया था. जातेजाते बोला, ”यहीं आ कर रात को रुकूंगा और खाना भी यहीं खाऊंगा.’’

विकास मलीहाबाद में एक कपड़े की दुकान में नौकरी करता था और रोजाना की तरह बाजार से शाम को अपने घर वापस लौटते समय अकसर गीता से बातें करने के लिए उस के पास चला जाता था. उस का मन धीरेधीरे उस की आकर्षित होने लगा था.

एक झटके में टूट गई मर्यादा की दीवार

अगले दिन विकास पूरी तैयारी के साथ गीता के पास गया. उस ने नौनवेज खरीदा. इस के अलावा शराब की एक बोतल भी खरीद कर रख ली. ये चीजें दिन में बाइक से गीता के घर जा कर दे आया और रात में आने को बोल गया. रात के 10 बजे विकास गीता के घर पहुंचा. गीता खाना खाने का इंतजार कर रही थी. विकास ने खाना खाने के पहले शराब के 2 पैग लेने की योजना बनाई. जब तक गीता खाना गर्म करने रसोई में गई, तब तक विकास ने शराब के पैग पीने शुरू कर दिए.

जब खाना ले कर गीता आई, तब उस ने नशे की हालत में गीता को भी जबरन 2 पैग शराब पिला दी. उस रात दोनों पर शराब का नशा इस कदर हावी हो गया कि वे आपस में छेड़छाड़ और नोकझोंक करते हुए वासना की आग में तप गए. एक बार जब उन के बीच रिश्ते की पवित्रता पर धूल पड़ी, तब उस के बाद वे इस के लिए अपनी मनमरजी के मालिक बन गए. गीता को पति से यौनसुख नहीं मिल पा रहा था. विकास भी कुंवारा था. इस में गीता ने खुले विचार से विकास का साथ दिया. बदले में विकास उस की जरूरतों को पूरा करने लगा.

प्रकाश का पिछले साल जनवरी के महीने में लखनऊ आना हुआ. एक सप्ताह घर पर रहने के बाद वह मुंबई वापस चला गया. पति के मुंबई चले जाने के बाद गीता अपने मायके में आ कर रहने लगी थी. इस बार अक्तूबर, 2024 से अपने मायके नहीं आई थी. वह ससुराल में अलग से बने बाग के मकान में अपने बच्चों के साथ रहने चली गई थी. वह मकान रामविलास और प्रकाश ने मिल कर बनवाया था. इसी मकान के आगे बाग की सीमा खत्म हो जाती थी और उस से सटी रेलवे लाइन गुजरती थी. गीता और विकास अकसर वहीं मिलने लगे थे.

गीता उस से मोहब्बत करने लगी थी. दिन निकलने के पहले विकास गीता के घर से चला जाता था और झटपट दोपहर का खाना ले कर मलीहाबाद दुकान पर रवाना हो जाता था. वह रोजाना शाम को जब भी अपने गांव वापस लौटता तो वह गीता के पास जा कर के प्यारमोहब्बत की बातों में मशगूल हो जाता था. विकास जब भी बाजार से घर आता तो गीता के बच्चे उस की जेब में हाथ डाल देते थे. गीता के पास बेटी दीपिका ही रहती थी, जबकि बेटा दीपांशु अपने नाना के पास था.

विकास और गीता की मोहब्बत काफी गहरी हो चुकी थी. वे एकदूसरे के बिना नहीं रह पाते थे. विकास गीता की आशनाई में अपनी नौकरी की कमाई उस पर खर्च करने लगा था. जबकि विकास के परिवार में उस के अलावा 2 बहनें और थीं. पूरे परिवार का खर्च उस की नौकरी पर निर्भर था. फेमिली वालों से उस की हरकतें छिपी न रहीं. उन्होंने  विकास को गीता के मकडज़ाल से मुक्त करवाने की योजना बनानी शुरू की. वे उसे लखनऊ से दूर कहीं दूसरे शहर भेजने की योजना बनाने लगे. विकास गीता पर पैसे खर्च करने के चक्कर में कर्जदार बन गया था.

अपने पापा के कहने पर 2023 में वह साढ़े 3 लाख रुपया खर्च कर कुवैत चला गया. इस बीच गीता अकेली रह गई. विकास के कुवैत में नौकरी करते कुल 2 महीने ही बीते थे कि गीता अपने फोन से उसे रोजाना रात को फोन कर देती थी. फोन पर वह अपना दुखड़ा सुनाने लगती थी. उसे ईशापुर लौटने के लिए कहती थी. गीता के लगातार जिद करने पर केवल 2 महीने में ही वह कुवैत से वापस आ गया. कुवैत से लखनऊ वापस आने के कारण विकास लगभग 4 लाख रुपए का कर्जदार हो चुका था. गीता की जिद पर विकास जब अपने गांव वापस आया तो वह कपड़ों के उसी शोरूम पर जा कर फिर से नौकरी करने लगा.

अक्तूबर, 2024 में करवाचौथ से 2 दिन पहले विकास गीता से मिलने गया था. गीता ने त्यौहार पर आने वाले खर्च की फरमाइशें सुना दीं. साथ ही उस ने बताया कि उस के चाचा प्रकाश इस मौके पर भी नहीं आ रहे हैं, इसलिए पूजा का सामान और साड़ी उसे ही ला कर देनी होगी. उस के सारे कपड़े और गहने मायके में ही रखे हैं. इस पर विकास ने आश्वासन दिया, साथ ही पैसा नहीं होने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि वह अभी बहुत कर्ज में डूबा हुआ है. इसी आश्वासन को पा कर गीता करवाचौथ के दिन विकास से रुपया लेने के लिए दुकान पर गई थी.

विकास के व्यवहार से नाराज हो कर गीता ने उस सेे संबंध तोडऩे का मन बना लिया था. वह विकास को फोन करना भी बंद कर चुकी थी. गीता की इस बेरुखी से तंग आ कर विकास दिनरात परेशान रहने लगा था.

एक के चक्कर में ऐसे हुए 2 मर्डर

15 जनवरी, 2025 की रात को विकास ने अपनी प्रेमिका चाची गीता को फोन किया और उस से मिलने के लिए कहा तो गीता ने फोन पर दोटूक उत्तर देते हुए कहा, ”मैं तुम्हारी ब्याहता थोड़े हूं. मेरे यहां अब मत आना, तुम मेरा बोझ नहीं उठा सकते हो तो तुम्हें कोई हक नहीं है. मुझ से अब कोई उम्मीद मत रखो.’’ इतना कह कर गीता ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

विकास फोन पर गीता की बातें सुनने के बाद बुरी तरह तिलमिला कर रह गया. उस ने गीता को सबक सिखाने के लिए योजना बना डाली. रात के करीब एक बजे विकास गीता के घर के पास लगे बिजली के खंभे के सहारे चढ़ कर उस के मकान के अंदर घुस गया. गीता के कमरे के सामने पहुंच कर उस ने गीता से कमरा खोलने के लिए कहा. विकास की आवाज पहचान गई थी, इसलिए उस ने अंदर से ही कहा कि वह वहां से चला जाए. करीब आधा घंटा बीतने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला तो विकास किचन के अंदर जा कर बरतनों को इधरउधर फेंकने लगा. ऐसा करते हुए उसे एक बड़ा चाकू हाथ लग गया. उस ने उसे अपने पास छिपा लिया.

इसी दौरान गीता बरतनों की आवाज सुन कर बाहर आई और उसे डांटने लगी. पहले से ही तिलमिलाया हुआ विकास गुस्से में बोला,  ”आज मैं अपना और तुम्हारा दुख दूर किए देता हूं.’’

इतना कह कर विकास ने हाथ में लिए डंडे से गीता के सिर पर हमला कर दिया. वह उस पर तब तक हमला करता रहा, जब तक कि वह बुरी तरह बेहोश नहीं हो गई. गीता  के जमीन पर गिरते ही वह अपनी कमर में खोंसे चाकू से उस की गरदन रेतने लगा. इसी बीच गीता की बेटी दीपिका जाग गई. उस ने विकास को इतने गुस्से में पहली बार देखा था. वह तेजी से रोने लगी. विकास ने उसे पकड़ कर चाकू से उस की भी हत्या कर दी. आंगन में रखी बाल्टी में हाथपैर धोने के बाद वह खंभे के सहारे ही मकान से उतर कर बाहर आया और रेलवे लाइन के किनारे होता हुआ फरार हो गया.

विकास ने पुलिस को हत्या में प्रयोग की गई बाइक नंबर यूपी32 जीयू1335, चाकू और कुछ गहने, 760 रुपए नकद बरामद करवा दिए. उस ने पुलिस टीम के सामने स्वीकार किया कि वह गीता से बहुत प्यार करता था और उस के ऊपर गीता की खातिर 4 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. उस ने कर्जा उतारने के लिए ही उस ने गीता के गहने चुराने का प्लान भी बनाया था.

विकास से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

 

 

UP News : प्रेमिका की खातिर महाकुंभ ले जा कर पत्नी का मर्डर

UP News : दिल्ली के अशोक वाल्मिकी ने जब 38 वर्षीय पत्नी मीनाक्षी से महाकुंभ जाने की बात कही तो वह फूली नहीं समा रही थी, क्योंकि महाकुंभ की भव्यता का दर्शन कर उस की दिली इच्छा भी त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने की थी. लेकिन अशोक के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. उस ने प्रयागराज ले जा कर एक लौज में पत्नी की गरदन काट कर हत्या कर दी. आखिर अशोक ने ऐसा क्यों किया?

पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी में रहने वाली मीनाक्षी घरेलू समस्याओं और उलझनों को ले कर कुनमुनाई हुई थी. घर की छोटी सी रसोई में खाना पकाते समय बारबार उस के हाथ से बरतन छूट जा रहे थे. वह चिढ़ती हुई बुदबुदा रही थी, ”मैं यहीं रसोई में सड़ रही हूं… एक दिन यहीं मरखप जाऊंगी…सभी कुंभ जा रहे हैं…जब से वो हरामजादी आई है, तब से मेरा जीवन और नरक बन गया है. आज आने दो उस को साफसाफ कह दूंगी वैशाली या फिर मैं…’’

घर में अशोक के आने की आहट होते ही मीनाक्षी और भी तेज आवाज में बोलने लगी. बोलतेबोलते वह आक्रामक हुई जा रही थी. बारबार वैशाली का नाम ले रही थी. आखिर अशोक से रहा नहीं गया. बोला, ”तुम बारबार मुझ पर शक करती हो, मैं किसी वैशाली को नहीं जानता.’’

”खाओ मेरी कसम! रखो बच्चों के सिर पर हाथ और कहो कि मेरा वैशाली से कोई चक्कर नहीं है.’’

”हांहां सौगंध लूंगा, लेकिन यहां नहीं गंगा में तुम्हारे साथ खड़े हो कर.’’ अशोक बोला.

”गंगा स्नान को ले कर जाओगे तब न,’’ मीनाक्षी बोली.

”तैयारी करो, आने वाले शनिवार को चलते हैं.’’ अशोक बोला.

”कहां ले चलोगे, हरिद्वार या फिर प्रयागराज के संगम में?’’ मीनाक्षी बोली.

”जहां तुम कहो, लेकिन हां, फिर मुझ पर शक नहीं करना कि तुम्हारी कोई सौतन भी है.’’

”चलो देखती हूं.’’ कहती हुई मीनाक्षी ने एक लंबी सांस ली और रसोई के बचे काम को पूरा करने में लग गई. पति द्वारा गंगा स्नान के लिए ले जाने का आश्वासन मिलते ही वह खुश हो गई. उस की पति के प्रति नाराजगी भरी कुनमुनाहट पल भर में दूर हो गई. हो भी क्यों न, उस की सालों की तमन्ना पूरी जो होने वाली थी.

अशोक के मन को भी थोड़ी शांति मिली. उस ने एक आश्वासन से मीनाक्षी की कड़वी बातों में मिठास घोल दी थी. हालांकि उस के मन में कुछ और ही चल रहा था. इस का अंदाज उस की कुटिल मुसकान से लगाया जा सकता था. दरअसल, अशोक काफी समय से पत्नी के व्यवहार से खफा था. उस के ताने सुनसुन कर ऊब चुका था. कान पक गए थे. वह वैशाली नाम की युवती के प्रेम जाल में फंसा हुआ था. इस की जानकारी मीनाक्षी को हो गई थी. वैशाली को भी मीनाक्षी के विरोधी तेवर के बारे में मालूम था. उस की धमकियों के बारे में सुन चुकी थी और अशोक पर कोई रास्ता निकालने का दबाव डालती रहती थी. अशोक ने वैशाली को भी इस का समाधान करने का आश्वासन दे रखा था. कुल मिला कर भीतर से बेचैन अशोक एक खतरनाक प्लान को पूरा करने का मन बना चुका था.

पत्नी को ले कर अशोक के मन में क्या पक रही थी खिचड़ी

 

असल में अशोक अपने प्लान को पूरा करने के लिए ही मीनाक्षी को गंगा स्नान पर ले जाना चाहता था. तय तारीख को वह सुबहसुबह मीनाक्षी को ले कर हरिद्वार पहुंच गया. ठहरने के लिए हर की पौड़ी के पास एक होटल में गया. उस ने रिसैप्शन पर बैठे ऊंघते व्यक्ति को हाथ से काउंटर की मेज को थपथपा कर जगाया.

”क्या है?’’ अलसाई आवाज में उस ने पूछा.

”मुझे कमरा चाहिए.’’

”सिंगल या डबल?’’

”कोई भी.’’

”साथ में कोई है?’’

”वाइफ है, नीचे है.’’

”किसी एक का आधार कार्ड दो.’’

”वह तो घर पर छूट गया.’’

”वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस…कुछ भी जिस में तुम्हारा एड्रैस लिखा हो.’’

”असल में घर से निकलते वक्त मेरा छोटा पर्स घर पर ही छूट गया, उसी में सारे कार्ड थे.’’ अशोक मायूस हो कर बोला.

”तो कमरा बुक नहीं हो सकता.’’

”कोई तो उपाय निकालो. इतनी सुबहसुबह कहां जाऊंगा? फ्रैश भी होना है. मैनेजर से पूछ लो.’’ अशोक ने आग्रह किया.

”नहीं भाई, बगैर किसी आईडी के कमरा बुक नहीं होगा. पुलिस का सख्त और्डर है.’’

काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने साफसाफ मना कर दिया. अशोक होटल की तंग सीढिय़ां उतर कर सड़क किनारे खड़ी मीनाक्षी के पास आ कर बोला, ”दूसरे होटल चलते हैं. यहां कमरा साफ नहीं है.’’

”अच्छा! बाहर से तो बहुत चमक रहा है.’’

”यहां ऐसा ही है…बाहर कुछ, भीतर कुछ और…’’ अशोक ने बड़ी सफाई से कमरा बुक नहीं होने की बात छिपा ली थी.

पास के दूसरे होटल में गया. वहां भी आईडी प्रूफ की समस्या आई और कमरा बुक नहीं करवा पाया. कई छोटेछोटे लौजनुमा होटलों में घूमने के बाद बड़ी मुश्किल से एक धर्मशाला में ठहरने का इंतजाम करवा पाया. दरअसल, वह बिना आईडी या आधार कार्ड के होटल में कमरा लेना चाहता था. उस की मंशा दिल्ली से बना कर लाए गए प्लान को सफल बनाने की थी, जिस के बारे सिर्फ वही जानता था. मीनाक्षी को तो इस का आभास तक नहीं था. कुछ भी हो, अशोक ने जैसेतैसे कर मीनाक्षी की गंगा नहाने की मंशा पूरी कर दी थी. उसे वहां के सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे कर कई मंदिरों के दर्शन करवा दिए थे. मीनाक्षी अपने पति के भक्तिभाव को देख कर बहुत खुश थी. दोनों ने हरिद्वार में

मीनाक्षी बहुत खुश थी. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे सब कुछ उस के मन के मुताबिक चल रहा हो. जबकि सच्चाई तो यह थी कि सब कुछ पति अशोक की सुनियोजित प्लान के अनुरूप चल रहा था, जिस में होटल का कमरा नहीं मिलने से थोड़ी बाधा आ गई थी. अगले रोज अशोक वापस दिल्ली लौट आया. सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा था. मीनाक्षी को भरोसा हो गया था कि अशोक का वैशाली नाम की किसी युवती सें संबंध नहीं है. 2 महीने बाद महाकुंभ के बारे में चर्चा जोरशोर से होने लगी थी. जिसे देखो, वही प्रयागराज जा कर संगम में डुबकी लगाने की तैयारी कर रहा था. औरतों में इसे ले कर गजब की ललक थी. जैसे भी हो, वह महाकुंभ में जरूर जाना चाहती थी. मीनाक्षी की इसी भावना को देखते हुए अशोक के मन में एक बार फिर करीब 2 महीने पहले बनाई योजना को अंजाम देने की चाहत जागी.

उस ने मीनाक्षी को महाकुंभ मेले में जाने के लिए राजी कर लिया. उस ने फटाफट जरूरी सामान बांधा और 17 फरवरी, 2024 को अशोक संग प्रयागराज के लिए निकल पड़ी. दोनों 18 फरवरी को प्रयागराज पहुंच गए. संगम में स्नान किया. सेल्फी ली और सोशल मीडिया के अपने अकाउंट पर मुसकराहटों वाली कुछ तसवीरें अपलोड कर दीं. उस के बाद दोनों थकेहारे प्रयागराज के शहरी इलाके में होटल की तलाश में निकल पड़े, जहां उन्हें कमरा मिल सके. वहां भी अशोक ने बगैर आईडी प्रूफ दिए होटल का कमरा बुक करवाने की कोशिश की, जिस में वह असफल रहा. सभी ने बिना आईडी के कमरा देने से इनकार कर दिया.

इस दरम्यान अशोक जब होटल के रिसैप्शन पर बात करने जाता तो पत्नी को नहीं ले जाता था. कई बार वह उसे होटल के बाहर ही खड़ा रखता था. हालांकि पत्नी को उस का ऐसा करना थोड़ा अटपटा लगा, लेकिन उस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई. कमरा तलाशते हुए अशोक की मुलाकात एक लोकल व्यक्ति सुरेंद्र बिंद से हो गई. वह अस्थायी बने निजी लौज आदि के लिए ब्रोकर का काम करता था. कुंभ में आने वालों को देखते हुए प्रयागराज के कई निवासियों ने अपने खाली घर को ही अस्थायी लौज का रूप दे दिया था, जिस में कुछ घंटे के लिए लोग ठहरते थे. वहां किसी तरह की आईडी प्रूफ जैसी झंझट नहीं थी.

अशोक की उम्र और साथ में पत्नी को देख कर सुरेंद्र ने नई झूंसी, आजाद नगर इलाके में महाकुंभ मेले के निकट अपनी मौसी के बेटे संजय का कमरा दिलवा दिया. एक रात गुजारने का किराया 500 रुपए लिए. बदले में उस ने अपना कमीशन भी लिया. अशोक ने संजय को अपना मोबाइल नंबर तक नहीं दिया. उस ने कहा कि उस का मोबाइल मेले में खो गया है. अशोक और मीनाक्षी ने राहत की सांस ली. उन्होंने आराम किया. थकी मीनाक्षी जल्द सो गई, जबकि अशोक छिपा कर रखे मोबाइल पर वेब सीरीज देखने लगा.

मीनाक्षी की गला काट कर की हत्या

अगले रोज 19 फरवरी, 2025 को थाना झूंसी के एसएचओ उपेंद्र सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने मोबाइल काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ”यहां एक महिला की लाश पड़ी है. आप जल्द आ जाइए.’’ काल करने वाले ने उन्हें घटनास्थल का एड्रैस भी बता दिया. एसएचओ उपेंद्र सिंह तुरंत अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों को ले कर आजाद नगर की केवट बस्ती में पहुंच गए. वहां मकान की पहली मंजिल पर अस्थाई लौज के कमरे के पास बने बाथरूम में एक महिला की खून में लथपथ लाश पड़ी थी.

पुलिस ने घटना की जांच शुरू की तो पता चला कि दंपति बीती रात यहां आया था. लौज चलाने वाले व्यक्ति ने उस से किसी भी तरह की आईडी नहीं ली थी. रजिस्टर में दिल्ली के त्रिलोकपुरी का पता लिखवाया गया था. वह भी अधूरा जैसा ही लग रहा था. उस लौज के मैनेजर संजय ने ही इस की सूचना पुलिस को दी थी. उस ने पुलिस को बताया कि वे पतिपत्नी के रूप में यहां आ कर रुके थे. उन के बीच कोई तनाव जैसी बात नजर नहीं आई थी. रात के एक बजे तक दोनों जागे थे. कमरे के बाहर कंबाइन बने बाथरूम और लैट्रिन के पास ही लाश पड़ी थी. वे एफ 4 नंबर के कमरे में ठहरे थे. यह लैट्रिन बाथरूम को फस्र्ट फ्लोर पर रुकने वाले या अन्य लोगों के लिए भी था.

पुलिस टीम ने कई ऐंगल से लाश के फोटो लिए. कमरे की तलाशी ली. कमरे में दंपति का किसी तरह का कोई सामान नहीं मिला. बाथरूम के फर्श से खून के नमूने लिए गए. शव को सील कर दिया गया. पंचनामा भरने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. पुलिस के लिए उस की गुत्थी सुलझाना आसान नहीं था, क्योंकि महाकुंभ की भारी भीड़ थी और लाश की गरदन आधी कटी हुई थी. यानी यह मर्डर का मामला था. पुलिस के सामने एक बड़ा सवाल था कि कमरे में ठहरने वाला व्यक्ति वहां से फरार था तो क्या हत्याकांड का संबंध उस से जुड़ा था? उसे महाकुंभ की भीड़ में तलाशना भी कोई आसान नहीं था.

उसी रोज शाम के वक्त अंधेरा घिर आने पर अशोक ने दिल्ली में अपने बेटे को फोन किया. काल रिसीव होते ही वह रोने लगा. कुछ बात नहीं कर पा रहा था. पापा को फोन पर सुबकने की आवाज सुन कर पूछा, ”पापा, क्या हुआ? आप क्यों रो रहे हैं? कोई परेशानी है तो बताइए.’’

”अरे बेटा, तुम्हारी मम्मी को मैं पिछले 18 घंटे से तलाश कर रहा हूं, लेकिन वह मिल नहीं रही है. पता नहीं महाकुंभ की इस भीड़ में अचानक कहां लापता हो गई? मैं उसे सुबह से ही ढूंढ रहा हूं…’’ कहतेकहते आशोक फिर रोने लगा.

”ऐसे कैसे लापता हो गई, पापा परेशान मत हो. मम्मी जरूर मिल जाएंगी. आप पुलिस में शिकायत लिखवा दो.’’ बेटे ने समझाया.

बेटे की तसल्ली से अशोक शांत हो गया. बेटे से बोला, ”तुम भी परेशान नहीं होना. मैं यहां उस की तलाश कर के लौटूंगा.’’

”ठीक है पापा. आप वहीं रुक कर मम्मी की तलाश करो, मैं भी छोटे भाई के साथ आ जाता हूं, हम लोग मिल कर मम्मी को ढूंढ निकालेंगे.’’ बेटा बोला.

उस ने अपने छोटे भाई आदर्श को मम्मी के महाकुंभ में गुम होने की बात बताई. उन्होंने इस की जानकारी अपने मामा प्रवेश को दी और उन से जितनी जल्दी हो सके, प्रयागराज चलने की विनती की.

अशोक के दोनों बेटे अश्विनी और आदर्श अपने मामा प्रवेश के साथ अगले रोज ही प्रयागराज पहुंच गए. मीनाक्षी की तलाश शुरू करने से पहले वह प्रयागराज के थाना दारागंज गए. वहां मम्मी मीनाक्षी की फोटो दे कर मेले में गुम होने की शिकायत दर्ज की. फोटो देखते ही पुलिस चौंक गई. तीनों को असलियत बताए बिना पुलिस ने उन्हें थाना झूंसी जाने के लिए कहा. तीनों उम्मीद के साथ थाना झूंसी पहुंचे. वहां एसएचओ उपेंद्र प्रताप सिंह से मुलाकात की. बेटों ने उन्हें मम्मी की फोटो दिखाते हुए उन के मेले में गुम होने की बात बताई. उपेंद्र प्रताप सिंह महिला की तसवीर देख कर चौंक गए.

वह जिस अज्ञात लाश की शिनाख्त को मुश्किल भरा समझ रहे थे, उस की पहचान तसवीर से ही गई थी. तब एसएचओ ने उन्हें आजाद नगर के लौज से बरामद महिला की लाश के फोटो दिखाए. फोटो देखते ही बेटे रोने लगे. उन्होंने कहा कि यह तो उन की मम्मी मीनाक्षी की लाश है. तब पुलिस उन्हें मुर्दाघर ले गई और बरामद लाश उन्हें दिखाई. अपनी मां की लाश देख कर दोनों भाई बिलखबिलख कर रोने लगे. वे बड़ी उम्मीद ले कर दिल्ली से आए थे. उन्होंने इस की कल्पना तक नहीं की थी कि उस की मां इस हालत में मिलेगी. वह भी आधी गरदन कटी हुई.  उन के द्वारा महिला की शिनाख्त मीनाक्षी पति अशोक कुमार निवासी त्रिलोकपुरी, दिल्ली के रूप में हुई.

पुलिस जांच की काररवाई आगे बढ़ी. लौज के आसपास कोई सीसीटीवी नहीं था. दूर की सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरों से 2 क्लिप मिलीं. उस में मीनाक्षी नजर आ गई. उस के साथ नजर आने वाले व्यक्ति की पहचान बेटे ने पापा अशोक कुमार के रूप में कर ली. दोनों भाइयों ने 19 फरवरी, 2025 की रात में पापा से फोन पर हुई बात एसएचओ को बताई तो उन्होंने दोनों भाइयों से कहा कि वह अपने पापा को फोन कर यहां बुला लें, लेकिन मम्मी की मृत्यु के बारे में उन्हें नहीं बताएं. उसे इसी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाने के बारे में बताएं.

बात 21 फरवरी, 2025 की है. अश्विनी ने अपने पापा को फोन कर थाना झूंसी में बुलाया. कहा कि मम्मी कि गुमशुदगी की सूचना दर्ज करानी है. बेटे के कहने पर अशोक सीधे झूंसी थाने आ गया तो पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. कारण, उस पर पुलिस को पत्नी मीनाक्षी की हत्या में शामिल होने का शक हो गया था. पुलिस ने अशोक से सख्ती से पूछताछ की तो अशोक घबरा गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही पत्नी मीनाक्षी का कत्ल किया है. उस की गरदन चाकू से काट डाली थी और उस के बाद चाकू बैग में ले कर भाग गया था. वह चाकू अपने साथ पहले से ही ले कर आया था. उस ने पत्नी की हत्या तब की थी, जब वह बाथरूम गई थी. उस ने उस पर पीछे से वार कर दिया था.

उस ने सोचा था कि महाकुंभ की भीड़ में पुलिस को कभी कुछ पता नहीं चलेगा. किंतु ऐसा नहीं हो सका और उस की गिरफ्तारी हो गई. पत्नी की हत्या का कारण भी कुछ कम रोमांच से भरा नहीं था. अशोक का पड़ोस की एक महिला वैशाली से प्रेम संबंध था, जबकि वह अधेड़ उम्र का व्यक्ति 3 बेटों का बाप था. उस की प्रेम कहानी भैया से सैंया बनाने की है. एक बार अशोक अपनी बाइक से घर से निकला था. थोड़ी दूर ही चला था कि उसी मोहल्ले की रहने वाली वैशाली ने हाथ दिखा कर लिफ्ट मांगी. अशोक ने बाइक रोक दी. वह बोली, ”भैया मुझे बस स्टौप तक छोड़ देना.’’

”भैया कहना जरूरी है क्या? रिश्ता कुछ और भी हो सकता है. आप तो पड़ोसन हैं, आप का पूरा अधिकार है, आप मुझ से कुछ भी काम ले सकती हो.’’ अशोक बोलने लगा.

”बसबस, बहुत हो गई तारीफ, आगे से खयाल रखूंगी, नाम से बुलाऊंगी. देख लो, मुझ से काफी बड़े हो…बुरा मत मानना.’’ वैशाली भी मुसकरा कर उसी के अंदाज में बोलने लगी.

”अच्छाअच्छा ठीक है…बैठो जल्दी.’’ अशोक बोला.

वैशाली अशोक का कंधा पकड़ कर बाइकपर बैठने की कोशिश करने लगी.

”अरे दिल्ली वाली हो, एक तरफ पैर क्यों, दोनों पैर क्रौस कर बैठो.’’ अशोक बोला.

वैशाली आंखों से इशारा कर मुसकरा दी. दोनों की नजरें मिलीं और एकदूसरे के दिल में उतर गई. अशोक ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ”संभल कर बैठो न, तुम ने तो अपनी नजरों से मुझे घायल कर दिया. अब संभालना तुम्हारा काम है.’’

वैशाली अपने चेहरे पर शरारत भरी मुसकान बिखेरते हुए बाइक पर बैठ गई और उसी के लहजे में बोली, ”नजरों के तीर चलाने में तुम तो मंझे हुए लगते हो. बाइक संभाल कर चलाना, झटके नहीं देना. हमारेतुम्हारे बीच की दूरी इंचदो इंच भर की है. वह बनी रहनी चाहिए.’’

वैशाली का इतना कहना था कि अशोक ने अचानक जोर से ब्रेक लगाया. वैशाली ने अपना बचाव करते हुए अशोक को पीछे से पकड़ लिया. दोनों हाथों की पकड़ उस की कमर तक जा पहुंची थी.

”कर दी न शरारात!’’ वैशाली तुनकती हुई बोली, किंतु उस के उन्नत वक्षों के स्पर्श से ही अशोक के जिस्म में बिजली सी कौंध गई थी.

और धीरेधीरे वैशाली से हो गया प्यार

उस के जिस्म की गरमाहट से वैशाली को भी एक अजीब आनंद की अनुभूति हुई. स्टौप आ गया था. वैशाली उतर गई, लेकिन जिस अंदाज में हाथ हिला कर गई, उस में जल्दी मिलने का स्पष्ट संकेत था. वैशाली बहुत खूबसूरत थी, लेकिन उस का पति उस के भरपूर यौवन की तरफ कोई ध्यान नहीं देता था, जो एक फैक्ट्री में नौकरी करने वाला मेहनतकश इंसान था. दिन भर ड्यूटी के बाद कुछ घंटे का ओवर टाइम भी कर लिया करता था. इस कारण थकाहारा घर आता और खाना खा कर सो जाता था. वैशाली की तड़प बढ़ जाती थी. जब से अशोक और वैशाली मिले थे, तब से दोनों के बीच वासना लिपटे प्यार का अंकुर फूट पड़ा था. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हो गया था. यह अंकुर पौधे से कब वृक्ष बन गया, पता ही नहीं चला. देखतेदेखते दो जिस्म एक जान हो गए.

अशोक कुमार वाल्मिकी का विवाह करीब 20 साल पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर निवासी मीनाक्षी से हुआ था. उस के 3 बेटे हैं अश्विनी, आदर्श व आशीष. अशोक 40 साल का हो चुका था, जबकि मीनाक्षी 38 वर्ष की थी. अशोक दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन (एमसीडी) में नौकरी करता था. वह फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का फैन था. अधेड़ अवस्था में भी वह बिल्कुल उसी के स्टाइल में रहता है. उस के बोलने की स्टाइल भी मिथुन चक्रवर्ती की तरह ही थी. उदार स्वभाव का होने के कारण वह हर किसी से बहुत जल्दी ही घुलमिल जाता था. पत्नी मीनाक्षी भी काफी सुंदर थी. वह ग्रामीण परिवेश में पलीबढ़ी थी.

हत्या के बाद प्रेमिका ने भी मोड़ लिया मुंह

गृहस्थी को संभालते- संभालते उस के यौवन में पहले जैसी कशिश और आकर्षण में कमी आ गई थी. बड़ेबड़े बच्चों का लिहाज करते हुए वह अपने पति के साथ रोमांस के लिए कुछ पल भी नहीं निकाल पाती, जिस से दोनों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही थी. सैक्स करने की इस आवश्यकता का तकाजा कई बार उसने अपनी पत्नी मीनाक्षी से किया, लेकिन मीनाक्षी ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया और कोई न कोई बहाना बना कर टाल देती. ऐसी स्थिति में अशोक का मन विचलित होना एक स्वाभाविक बात थी. अब वैशाली से उस की मुलाकातें बढ़ती जा रही थीं. एक दिन की बात है कि मीनाक्षी अपने बेटों के साथ दिल्ली में ही किसी शादी के प्रोग्राम में गई हुई थी.

मौका देख कर अशोक ने वैशाली को अपने घर ही बुला लिया. दोनों ने भरपूर रोमांस किया. मौजमस्ती की और जम कर बातें की. भविष्य की योजनाएं बनाई. अशोक ने कहा कि तुम्हें जीवनसाथी बनाना चाहता हूं. तुम अपने पति को छोड़ कर मेरे साथ रहने की तैयारी कर लो. दिल्ली में किसी दूसरे इलाके में एक कमरा किराए पर ले कर हम दोनों वहीं एक साथ ही रहेंगे. कसमेवादे हो रहे थे कि अचानक दरवाजे को किसी ने खटखटाया. अशोक को अंदाजा नहीं था कि पत्नी प्रोग्राम से इतनी जल्दी वापस आ सकती है. अशोक ने दरवाजा खोला तो सामने पत्नी ही खड़ी थी. वह अंदर आई.

वैशाली को वहां देखते ही उस का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. उस ने वैशाली को जम कर बुराभला कहा. इतना ही नहीं, उस ने झपट कर वैशाली के बाल पकड़े और खींच कर उसे घर से बाहर निकाल दिया. अशोक को यह बात बहुत बुरी लगी. दोनों में जम कर नोकझोंक होने लगी. बात इतनी बढ़ गई कि अशोक ने मीनाक्षी की जम कर पिटाई कर दी. उस के बाद घर में कलह रहने लगी. बात इतनी बढ़ गई कि पतिपत्नी का एक साथ रहना मुश्किल सा हो गया. एक रोज मीनाक्षी ने अशोक को धमकी दी थी कि उस ने वैशाली से मिलनाजुलना बंद नहीं किया तो वह अपने भाइयों की मदद से सबक सिखाएगी. उस के बाद से ही अशोक अपमानित महसूस करने लगा था. इस की जानकारी वैशाली को भी हुई. उस ने जब इस का समाधान पूछा, तब अशोक ने उसे अपनी योजना बताई.

अशोक की योजना क्या थी, इस बारे में उस ने कुछ नहीं बताया. फिर अशोक ने प्लान के मुताबिक पत्नी मीनाक्षी की हत्या कर दी. अशोक ने पत्नी की हत्या करने की बात प्रेमिका मीनाक्षी को बताई, तब वह सहम गई और उस से हमेशा के लिए संबंध तोडऩा ही मुनासिब समझा.

पुलिस ने आरोपी अशोक वाल्मिकी से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

 

 

Crime Story : प्रेमी के साथ मिल कर पत्नी बनी कातिल

Crime Story : प्रविंद्र ने अपने चचेरे भाई अनुज को अपने यहां इसलिए रख लिया था कि परदेस में रह कर अनुज के चार पैसे बच जाएंगे. लेकिन अनुज ने आस्तीन का सांप बन कर प्रङ्क्षवद्र की ही 22 वर्षीय पत्नी सरिता को अपने प्रेम जाल में फांस लिया. प्रङ्क्षवद्र ने जब इस का विरोध किया तो…

22 वर्षीया सरिता खूबसूरत, गोरीचिट्टी व छरहरी काया की हसीना थी. उस के नैननक्श भी काफी तीखे थे. उस के चेहरे में कुछ ऐसा जादू था कि जो भी उसे एक बार देख लेता था, बस उसी में ही खो सा जाता था. 10 साल पहले जब सरिता प्रविंद्र की दुलहन बन कर आई थी तो प्रविंद्र का चचेरा भाई अनुज उसे देखता ही रह गया था.

अनुज उस वक्त एक इंस्टीट्यूट से इलैक्ट्रिकल ट्रेड में आईटीआई कर रहा था. उस समय उस की उम्र 18 साल थी. वैसे तो सरिता की शादी प्रविंद्र से हो गई थी, मगर अकसर अनुज भी हर दूसरेतीसरे दिन प्रविंद्र के घर में किसी न किसी बहाने से आताजाता रहता था. वह सरिता पर डोरे डाल रहा था. इसी तरह से जब कई महीने हो गए तो सरिता भी अनुज के मन में चल रही बात को भांप गई.

एक दिन सरिता ने अकेले में अनुज से पूछ ही लिया, ”देवरजी, आजकल तुम कहां खोए से रहते हो?’’ सरिता की इतनी बात सुन कर अनुज समझ गया था कि सरिता भी उस की ओर आाकर्षित होने लगी है. उस वक्त तो वह अपने दिल की बात सरिता से कह नहीं पाया, वह सिर्फ इतना बोला, ”कहीं नहीं भाभी.’’ मगर वह अपने दिल की बात सरिता से कहने के लिए अच्छे वक्त का इंतजार करने लगा था.

और फिर एक दिन अनुज को अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया. उस दिन प्रविंद्र का पूरा परिवार मेला देखने गया हुआ था. सरिता उस समय घर पर अकेली ही थी, तभी अनुज ने उस के घर के दरवाजे पर जा कर दस्तक दी. अनुज को देख कर सरिता बड़ी खुश हो गई. वह अनुज के लिए चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई. इसी बीच घर के ड्राईंगरूम में बैठा अनुज सरिता के खयालों में डूब चुका था, तभी अचानक सरिता चाय की ट्रे ले कर वहां आई. जैसे ही सरिता ने चाय के प्याले मेज पर रखे तो अनुज उस समय बेकाबू हो गया और उस ने सरिता का हाथ पकड़ लिया.

अनुज ने कहा, ”भाभी, मुझे अब तुम से प्यार हो गया है, अब मैं तुम्हारी जुदाई सहन नहीं कर सकता. तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगा.’’

इस के बाद अनुज को सरिता की मौन स्वीकृति मिल चुकी थी और दोनों पहली बार अलिंगनबद्ध हो गए थे. इस के बाद से अकसर अनुज व सरिता चोरीछिपे एकदूसरे से मिलने लगे थे. दोनों के अवैध संबंधों का यह सिलसिला बेरोकटोक चलने लगा था. इसी बीच 5 साल बीत चुके थे. तब तक सरिता एक बेटी एक बेटे की मां बन चुकी थी.

देवरभाभी के कैसे हुए संबंध

सरिता का प्रविंद्र व अनुज आपस में चचेरे भाई थे तथा वे मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के थाना फतेहपुर के अंतर्गत गांव कमालपुर के रहने वाले थे. उस समय प्रविंद्र गांव में बाइक मिस्त्री का काम करता था. अनुज उस वक्त इलैक्ट्रिकल ट्रेड से आईटीआई करने के बाद नौकरी की तलाश करने लगा था. इसी दौरान वर्ष 2020 में देश में कोरोना संकट आ गया था. इस कारण समूचे देश में सभी कारोबार ठप्प होने लगे थे.

काम की तलाश में प्रविंद्र व अनुज अपने गांव से 40 किलोमीटर दूर देहरादून में आ कर रहने लगे थे. प्रविंद्र ने तो वहां अपना बाइक की मरम्मत का काम शुरू कर दिया था. अनुज ने भी नौकरी के लिए उत्तराखंड के विद्युत विभाग में अप्लाई कर दिया था. इसी बीच अनुज व प्रविंद्र मोहल्ला पटेल नगर में एक साथ ही रहते थे. जब प्रविंद्र घर से चला जाता तो अनुज और सरिता घर में रंगरलियां मनाते थे. इसी प्रकार 2 साल बीत चुके थे. इसी दौरान अनुज की नौकरी उत्तराखंड पावर कारपोरेशन में अस्थाई रूप से बतौर लाइनमैन लग गई थी. नौकरी लगने के बाद अनुज ने अपनी तनख्वाह सरिता पर खर्च करनी शुरू कर दी थी तथा सरिता अब खूब बनठन कर फैशनेबल कपड़ों में रहने लगी थी. अब प्रविंद्र को कुछकुछ शक होने लगा था कि उस के घर में कुछ गड़बड़ हो रहा है.

एक दिन किसी काम से दोपहर को प्रविंद्र को घर में आना पडा. जब वह घर पहुंचा तो उस ने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था और घर के अंदर से हंसीठहाकों की आवाजें आ रही थीं. प्रविंद्र चुपचाप हो कर बाहर खडा ये आवाजें सुनता रहा. प्रविंद्र को यकीन हो गया कि घर के अंदर से आने वाली आवाजें अनुज व सरिता की ही हैं. तब प्रविंद्र ने घर का दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो कमरे में सरिता व अनुज अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को ठीक करते हुए निकले थे. अनुज तो तुरंत ही घर से निकल कर भाग खड़ा हुआ था.

सरिता तो अपनी गलती पर प्रविंद्र से माफी मांगने लगी थी. प्रविंद्र ने सरिता से कहा कि कल तक अनुज अपना सामान व कपड़े उठा कर कहीं अलग चला जाए. वह मेरे घर में रहने के लायक नहीं है. इस के बाद ऐसा ही हुआ. अनुज अब अपने चचेरे भाई प्रविंद्र से अलग कमरा ले कर रहने लगा था. सरिता व अनुज भले ही अलग रहने लगे थे, मगर उन दोनों के बीच जो अवैध संबंध थे, वे खत्म नहीं हुए थे. 2 महीने बीत जाने के बाद दोनों में एकदूसरे के प्रति वासना की आग फिर से भड़कने लगी थी. इस के बाद दोनों मोबाइल से एकदूसरे से बातें करने लगे.

पहले तो दोनों में मोबाइल द्वारा बातें करने का सिलसिला शुरू हुआ, इस के बाद अकसर सरिता व अनुज घर से बाहर चोरीछिपे मिलने लगे. कुछ समय तक दोनों इसी प्रकार मिलते रहे. वह चोरीछिपे नहीं बल्कि खुले रूप से साथ रहना चाहते थे, इसलिए दोनों ने मिल कर एक खतरनाक योजना बनाई. वह योजना प्रविंद्र को रास्ते से हटाने की थी. इस के बाद वे दोनों अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने के प्रयास में जुट गए.

पुलिस को क्यों लगा हत्या का मामला

वह 16 दिसंबर, 2024 का दिन था. उस समय सुबह के 11 बज रहे थे. देहरादून की कोतवाली पटेल नगर के एसएचओ कमल कुमार लुंठी उस समय कोतवाली में ही थे. तभी उन के औफिस में संतरी ने उन्हें जानकारी दी कि क्षेत्र के श्री महंत इंद्रेश अस्पताल से एक डैथ मेमो आया है. जब श्री लुंठी ने डैथ मेमो को देखा तो उस में डाक्टर ने लिखा था कि बीती रात पटेलनगर निवासी विवाहिता सरिता ने अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ अपने बीमार पति प्रविंद्र को उपचार हेतु इमरजैंसी में भरती कराया था. उस वक्त प्रविंद्र के गले पर चोटों के निशान थे तथा उस के कान से खून रिस रहा था. इस कारण प्रविंद्र की मौत संदिग्ध लग रही है. कृपया उचित काररवाई करने की कृपा करें.

एसएचओ कमल कुमार लुंठी को यह मामला संदिग्ध मौत का लग रहा था. इस के बाद उन्होंने तुरंत ही श्री महंत इंद्रेश अस्पताल पहुंचने का निश्चय किया. चलने से पहले श्री लुंठी ने इस संदिग्ध मौत की जानकारी अपने सीओ अभिनय चौधरी तथा एसएसपी अजय सिंह को मोबाइल द्वारा दे दी. जब श्री लुंठी अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने सब से पहले मृतक प्रविंद्र की डैडबौडी की बड़े ध्यान से जांच की. शव के गले पर चोटों के निशान थे. शव के कानों से खून भी आ रहा था. उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सामान्य मौत नहीं, बल्कि हत्या का हो सकता है. इसी दौरान संदिग्ध मौत की सूचना पा कर सीओ अभिनय चौधरी भी अस्पताल पहुंच गए थे.

इस के बाद अभिनय चौधरी ने भी प्रविंद्र के शव का निरीक्षण किया. इस के बाद कमल कुमार लुंठी ने प्रविंद्र के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए कोरोनेशन अस्पताल भिजवा दिया था. प्रविंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद श्री लुंठी ने थानेदार योगेश दत्त को पटेल नगर भेजा और उन्होंने प्रविंद्र के घर के आसपास जा कर उस के बारे में जानकारी जुटाने को कहा. इस के बाद पुलिस ने प्रविंद्र के भाई सुमित की ओर से प्रविंद्र की संदिग्ध मौत का मुकदमा बीएनएस की धारा 103 (1) के तहत दर्ज कर लिया. उसी दिन शाम को पुलिस ने प्रविंद्र के परिवार की सारी जानकारी जुटा ली. जांच में पता चला कि प्रविंद्र की पत्नी सरिता के साथ प्रविंद्र के चचेरे भाई अनुज के अवैध संबंध थे. प्रविंद्र के घर से जाने के बाद अकसर अनुज पहले उस के घर जा कर रंगरलियांमनाता था.

एक बार आपत्तिजनक हालत में पकड़े जाने के बाद अनुज ने सरिता से होटलों में मिलना शुरू कर दिया था. हो सकता है कि उन दोनों ने ही कहीं प्रविंद्र की हत्या न कर दी हो? इस के बाद लुंठी ने अनुज से पूछताछ करने का फैसला किया. अनुज व सरिता को पटेलनगर कोतवाली लाने के लिए पुलिस की 2 टीमों का गठन किया गया था. कुछ ही घंटों में पुलिस अनुज को हिरासत में ले कर कोतवाली आ गई थी. सीओ अभिनय चौधरी व कोतवाल कमल कुमार लुंठी ने प्रविंद्र की मौत के बारे में अनुज से पूछताछ की. उन्होंने पूछा कि जब प्रविंद्र ने तुम्हें सरिता से मिलने के लिए मना किया था तो फिर तुम सरिता से अलगअलग होटलों में क्यों मिलते थे? घटना वाले दिन तुम्हारी लोकेशन प्रविंद्र के घर की हमें मिल रही है. तुम हमें प्रविंद्र की मौत की सच्चाई सचसच बता दो.

अनुज ने सोचा कि जब पुलिस को सारी बातें पता ही चल गई हैं तो अब सच्चाई छिपाने से कोई फायदा नहीं है. अत: अनुज ने प्रविंद्र की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस ने हत्या की जो जानकारी पुलिस को जुबानी बताई, वह इस प्रकार थी.

अवैध संबंध के रास्ते पर इस तरह फिसलते गए देवरभाभी

उस ने बताया सरिता रिश्ते में मेरी भाभी लगती थी. जब से वह मेरे चचेरे भाई प्रविंद्र से ब्याह कर आई थी, मैं तब से ही उस पर फिदा हो गया था. बाद में मेरे सरिता के साथ अवैध संबंध बन गए थे. एक बार प्रविंद्र ने हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ भी लिया था. तब उस ने मुझे कमरे से निकाल दिया था. इस के बाद मैं प्रविंद्र के मकान के पास में ही कमरा ले कर रहने लगा था. वैसे तो हम दोनों बाद में भी चोरीछिपे मिलते ही रहते थे, मगर हम दोनों से यह जुदाई सहन नहीं हो पा रही थी. हम दोनों एकदूसरे को पाने के लिए शादी करना चाहते थे, मगर प्रविंद्र हम दोनों के रास्ते का कांटा बना हुआ था. अत: हम दोनों शीघ्र ही प्रविंद्र को रास्ते से हटाने की योजना बना रहे थे. इस के लिए हम उचित मौके की तलाश में रहने लगे थे.

15 दिसंबर, 2024 की रात को मैं पावर हाउस पर अपनी ड्यूटी पर था. इसी दौरान मेरे मोबाइल पर सरिता की वाट्सऐप काल आई कि प्रविंद्र नशे में है, तुम जल्दी घर पर आ जाओ. मैं जैसे ही प्रविंद्र के घर की ओर चला तो वहां पर मोहल्ले की स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं. पहचाने जाने के डर से मैं वापस अपने बिजलीघर आया था और उस क्षेत्र की बिजली सप्लाई बंद कर दी थी. उस समय प्रविंद्र के घर के आसपास अंधेरा छा गया था. जब मैं प्रविंद्र के घर पहुंचा था तो प्रविंद्र नशे में धुत अपने बच्चों के साथ सो रहा था. मुझे देख कर सरिता दोनों बच्चों को ऊपर के कमरे में छोड़ कर नीचे आ गई थी.

इस के बाद मैं ने व सरिता ने चुन्नी से प्रविंद्र का गला घोंट दिया था. जब प्रविंद्र ने खुद को छुड़ाने का प्रयास किया तो सरिता ने प्रविंद्र के सिर को कई बार बैड के सिरहाने पर पटका था. इस के बाद प्रविंद्र निढाल हो कर एक ओर लुढ़क गया था. मैं वापस अपनी ड्यूटी पर बिजली घर आ गया था. योजना के अनुसार, सरिता ने अपने एक रिश्तेदार को यह कह कर घर बुला लिया कि प्रविंद्र की तबीयत खराब है. उस रिश्तेदार के साथ सरिता प्रविं्रद को ले कर श्री महंत इंद्रेश अस्पताल पहुंची, जहां डाक्टरों ने प्रविंद्र को मृत घोषित कर दिया.

दूसरी पुलिस टीम सरिता को ले कर कोतवाली आई तो सरिता ने भी पुलिस के सामने अपने पति की हत्या करनी कुबूल कर ली थी. अपने बयानों में भी सरिता ने अनुज के ब्यानों का समर्थन किया था. इस के बाद पुलिस ने प्रविंद्र की हत्या में प्रयुक्त चुन्नी, अनुज की स्प्लेंडर बाइक व अनुज और सरिता के मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिए थे. इस के बाद एसएसपी अजय सिंह ने एक प्रैसवार्ता कर प्रविंद्र हत्याकांड का खुलासा किया. हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी अजय सिंह ने ढाई हजार रुपए का नकद इनाम देने की घोषणा की.

प्रविंद्र की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटा जाना तथा सिर में चोटें लगना बताया गया था. कथा लिखे जाने तक अनुज व सरिता देहरादून जेल में बंद थे. प्रविंद्र हत्याकांड की विवेचना थानेदार योगेश दत्त द्वारा की जा रही थी. योगेश दत्त आरोपियों के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर अदालत में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी कर रहे थे.

 

 

Extramarital Affair : दूसरी पत्नी की आशनाई

Extramarital Affair : आए दिन होने वाले शिकवेशिकायतों के बावजूद बबलू की जिंदगी 2 बीवियों संग राजीखुशी से गुजर रही थी. एक बार उस ने आधी रात में दूसरी बीवी को जब उस के प्रेमी की बांहों में देखा तो घर में ऐसा भूचाल आ गया कि…

रतलाम के दीनदयाल नगर के रहने वाले बबलू उर्फ संजय की दोनों बीवियों को अपनीअपनी सौतन के बारे में मालूम था. उस की पहली बीवी कुआंझागर गांव में बूढ़े सासससुर के साथ रहते हुए गृहस्थ जीवन गुजार रही थी, जबकि दूसरी पास के तेतरी गांव में रहती थी. संयोग से दोनों का नाम माया था. दूसरी बीवी पास में ही हुसैन समोसावाला के कौटेज पर चौकीदारी का काम करती थी, जहां बबलू भी चौकीदार था. दोनों की जानपहचान काम करते हुए करीब ढाई साल पहले हुई थी. बबलू उस की अल्हड़ जवानी और खूबसूरती पर फिदा हो गया था. जबकि दिलफेंक और बातूनी बबलू भी कुछ कम आशिकमिजाज नहीं था.

 

एक दिन बातोंबातों में उस ने बोल दिया, ”मेरी जिंदगी भी गजब की हसीन और माया से भरी हुई है. इधर भी माया, उधर भी माया.’’

”क्या मतलब हुआ इस का? चौकीदारी के काम में नईनई आई माया ने सवाल किया था.

”एक तुम माया हो और एक वह मोहमाया है…’’ बबलू बोला और वहां से चला गया. थोड़ी देर में ही उस के पास लौट आया… उस के दोनों हाथों में चाय का कप था.

”यह लो अब चाय के मजे लो!’’

”अरेअरे! तुम क्यों लाए, बोल देते मैं थर्मस में ले आती. वैसे एक बात कहूं, तुम हो मजेदार इंसान!’’ माया हंसती हुई बोली.

”वह तो हूं ही, यहां टाइम पास करने के लिए ऐसा बनना पड़ता है. यह लो पहले चाय पीयो…’’

इस तरह दोनों के बीच बातें होने लगीं. इधरउधर की बातें करते और चौकीदारी के उबाऊपन को दूर करते थे. जल्द ही उन के बीच अच्छी दोस्ती हो गई और एकदूसरे को दिल दे बैठे. बबलू माया की हर बात का खयाल रखने लगा था. बिंदास और बोल्ड स्वभाव की माया को उस के शादीशुदा होने के बारे में पता चल चुका था. यही बात उसे अच्छी लगी कि बबलू ने अपने बारे में कुछ भी उस से नहीं छिपाया था. उस ने प्रेम का इजहार करते हुए पहली बार में ही अपने बारे में सच्चाई बता दी थी. माया को उस में एक सच्चे इंसान की झलक दिखी और फिर भी उसे न जाने क्या सूझी, उस के साथ पतिपत्नी की तरह रहने लगी.

और फिर बबलू 2 बीवियों वाला एक जिम्मेदार पति बन गया. उस ने पहली बीवी से भी कुछ नहीं छिपाया. उसे भी सब कुछ सचसच बता दिया. बबलू की यही सच्चाई पहली बीवी को भी पसंद आई और इस का कोई विरोध नहीं किया.

2 पत्नियों के साथ खुश था बबलू

उस की दोनों बीवियों की उम्र में काफी अंतर था. दूसरी बीवी उम्र में उस से काफी छोटी, खिली हुई कली जैसी जवानी से भरी हुई थी. कहने को तो पहली पत्नी के मन में सौतन को ले कर तकलीफ नहीं थी, लेकिन किसी ब्याहता स्त्री के लिए यह सहन करना आसान नहीं होता. ऐसा ही बबलू की पहली पत्नी के साथ भी हुआ था. वह जब भी 2-3 दिनों के बाद  अपने गांव आता था, तब उस की पहली पत्नी शिकायतों का पिटारा ले कर बैठ जाती थी.

”अरे! तुम गलत टाइम पर आए हो!’’ अचानक घर आए पति बबलू से उस के सामान का थैला ले कर पहली पत्नी माया बोली.

”ऐसा क्यों भला?’’ बबलू आश्चर्य से बोला.

”अब छोड़ो, बाद में बताऊंगी!’’ माया ने कहा.

”अरे परेशान मत करो, तुम तो जानती हो कि माया के साथ रह कर भी मैं तुम्हें कितना याद करता हूं.’’ बबलू बोला.

”अब रहने भी दो. इतना ही मुझ पर मरते तो सौतन ला कर मेरी छाती पर नहीं बिठाते. महीने में 2 दिन के लिए आते हो और बातें करते हो जैसे मेरे बिना सैंयाजी के गले से खाना भी नहीं उतरता हो.’’ पहली पत्नी माया ने शिकायती अंदाज में कहा.

”तुम जलीकटी बातें करना कब छोड़ोगी?’’

”जब तुम मेरी सौतन को छोड़ दोगे.’’

”यह नहीं हो सकता.’’

”तो सुनते रहो मेरी जलीकटी. गनीमत मनाओ कि इस के बाद भी मैं तुम्हें पास आने देती हूं. कोई और होती तो अब तक भाग गई होती किसी के साथ.’’ माया तेवर के साथ बोली.

बात को बदलते हुए बबलू बोला, ”अच्छा ठीक है, अब खाना खिला दो, बहुत भूख लगी है.’’

”सच है, दूसरी भूख पूरी करने वाली माया जो है.’’

”अरे? तुम फिर शुरू हो गई.’’

”अच्छा, गुस्सा न करो, हाथमुंह धो लो… थोड़ा सुस्ता लो… तब तक खाना पक जाएगा.’’ माया बोली.

बबलू ने पत्नी की बात को आज्ञा की तरह मान लिया. हाथमुंह धो कर बाहर कमरे में अपने मातापिता के पास जा कर बैठ गया. उन का हालसमाचार पूछने लगा. उन से बातें करने लगा.

मांबाप की देखभाल उस की पहली पत्नी ही गांव में रहते हुए करती थी, जबकि दूसरी पत्नी माया उस के साथ ही तेतरी में रहती थी. माया की उम्र बबलू से करीब 20 साल कम थी. उस से शादी कर साथ रहने को ले कर पहली पत्नी काफी नाराज हो गई थी, लेकिन उसे माया की कमाई से मिलने वाले पैसे का लालच दे कर मना लिया था. उस के पास महीने में 2-3 बार कुआंझागर आने लगा था.

21 जनवरी के रोज भी वह माया को छोड़ कर पहली पत्नी के पास आया था. वह अपनी मां से बात कर रहा था. तभी पत्नी ने तेज आवाज दी, ”अम्मा!…अरी ओ अम्मा!’’

”अच्छा अभी आती हूं… तू बाबूजी के पास बैठ, मैं तेरे लिए रोटी सेंक कर आती हूं.’’ बोलती हुई मां वहां से उठ कर तुरंत चली गई. मां को इस तरह से अपनी बहू की एक आवाज पर चली जाना बबलू को कुछ अच्छा नहीं लगा. वह सोचने लगा, इस का मतलब पत्नी उस से घर का सारा कामकाज करवाती होगी.

हालांकि उस का ऐसा सोचना गलत तब निकला, जब उसे पत्नी से मालूम हुआ कि वह इन दिनों मासिक धर्म के दौर में है. उसे अपनी सोच पर कुछ समय के लिए पछतावा हुआ, साथ ही अफसोस भी कि वह ऐसे वक्त में बेकार ही आया! उसे यह भी समझने में देरी नहीं लगी कि पत्नी ने आते ही क्यों कहा था कि वह गलत वक्त पर आया है. वह अब क्या करे, क्या नहीं! इसी उधेड़बुन में  पड़ गया. इसी बीच मां ने खाना खाने के लिए आवाज लगाई. अचानक उस के दिमाग में बिजली कौंध गई. इसी अपने अधलेटे बाबूजी से बोला, ”मैं दूसरे गांव से तेतरी लौट रहा था, सोचा आप लोगों से मिलता चलूं. खाना खा कर लौट जाऊंगा.’’

बबलू रोमांटिक मूड बना कर आया था, जिस पर पानी फिर चुका था. इसलिए वापस दूसरी पत्नी के पास लौटना ही बेहतर समझा. शाम हो चुकी थी और ठंड भी बढ़ गई थी. पत्नी और अम्माबाबूजी के मना करने के बावजूद वह तेतरी के लिए घंटे भर में ही लौट गया. उस के भीतर वासना हिलोरें मार रही थी. वह शराब का भी शौकीन था और उस ने माया को भी इस का जबरदस्त चस्का लगा दिया था. शराब के नशे में माया और भी कामुक हो जाती थी. वह उसे तृप्त कर देती थी. शराब के नशे में यौनसंबंध बनाना उसे बेहद पसंद था. यही सोचते हुए उस ने शराब की अद्धा बोतल खरीद ली.

बंद कमरे का ऐसा खुला रहस्य

तेतरी पहुंचतेपहुंचते आधी रात के करीब हो गई थी. घर के पास पहुंच कर वह चौंक गया. ठीक दरवाजे के बाहर एक बाइक खड़ी थी. दरवाजे तक जाने का रास्ता भी नहीं बचा था. वह भुनभुनाया, ‘कौन कमबख्त यहां बाइक लगा गया है?’

इधरउधर नजरें दौड़ाईं, कोई नजर नहीं आया. बाइक भी अनजानी लगी. फिर किसी तरह बाइक को थोड़ी टेढ़ी कर कमरे के दरवाजे का पास पहुंच गया. दरवाजे की कुंडी के पास की दरार से अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर आ रही थी. वहां से वह झांक कर देखने लगा. भीतर का नजारा देख कर फिर चौंक गया. माया बैड पर अधनंगी बैठी थी. हाथ में शराब का गिलास लिए घूंट मार रही थी. वह कुंडी खटखटाने को ही था कि उस ने देखा माया के चेहरे पर सिगरेट का गहरा धुंआ भर गया है. वह समझ गया कि उस के साथ कोई मर्द है, जो सिगरेट पी रहा है.

तभी एक मर्द दिखा, उस ने माया के हाथ से शराब का गिलास ले लिया. फिर उस ने माया को बाहों में जकड़ लिया था. जैसे ही उस ने माया को अपनी गोद में बिठाया, उस का चेहरा दिख गया. बबलू ने उसे पहचान लिया. वह भरत भाभोर था. जेतवाड़ा का रहने वाला था और वहीं लोडिंग पिकअप पर काम करता था. माया उसी के साथ अंतरंग स्थिति में बेसुध थी. भाभोर उसे शराब पिला रहा था. चूम रहा था. दोनों कामवासना से भरे खोए हुए थे. बबलू के लिए यह नजारा एक बिजली के झटके के समान था. वह आक्रोश से भर गया था. हालांकि गुस्से में उस ने धैर्य से काम लिया. दरवाजा खटखटाने के बजाय वहां से हट कर उस ने पास के गांव में रहने वाले आपने रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन कर दिया. उन्हें तुरंत उस के पास आने के लिए बोला.

थोड़ी देर में ही कोलावाखेड़ी गांव से उस का मौसेरा भाई सुनील, जुलवानिया से दिनेश परमार और आलेनिया गांव से ईश्वर सिंगाड़ा और राहुल, राहुल मालीवाड़ पहुंच गए. कड़ाके की ठंड में घर के बाहर बैठे बबलू ने उन्हें कमरे के भीतर दूसरे मर्द के साथ अय्याशी कर रही माया के बारे में बताया. उन्हें रंगेहाथों पकडऩे के लिए उन से मदद मांगी. इसी बीच कमरे के भीतर माया ने बाहर की हलचल सुन ली. वह चौंकने के साथसाथ अज्ञात आशंका को ले कर चिंतित हो गई.  उस ने खिड़की से बाहर देखा. वहां बबलू को कुछ लोगों के साथ देख कर परेशान हो गई. कमरे से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वह बेहद डर गई कि आगे क्या होने वाला है. डर कर उस ने कमरे में अंदर से ताला लगा लिया. जबकि बबलू ने दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया था.

दूसरी पत्नी का प्यार चढ़ा परवान

बबलू के पास एक ही उपाय था कि किसी तरह से दरवाजे को तोड़ दिया जाए. सभी  दरवाजे के किनारे से खुदाई करने लगे. जबकि भीतर कमरे में माया दुबकी रही और भाभोर दरवाजा खुलने के साथ भाग निकलने की ताक में था. जल्द ही बबलू और दूसरे लोगों ने मिल कर दरवाजा बाहर से तोड़ दिया. दरवाजे का आधा भाग खुलते ही भाभोर ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसे सभी ने पकड़ लिया. उस ने जान छुड़ा कर भागना चाहा, किंतु तब तक उस पर लाठी, लोहे के सब्बल आदि से मार पडऩे लगी. भाभोर धराशाई हो गया. उस के बाद बबलू ने सभी साथियों के साथ मिल कर वहां शराब पी, जबकि माया पीटे जाने के डर से कमरे में ही दुबकी रही.

सुबह होने से पहले बबलू ने अपने दोस्त दिनेश परमार के साथ मरणासन्न भाभोर को उस की बाइक पर लाद कर कनेरी गांव में हाईस्कूल के पास फेंककर वापस तेतरी गांव लौट आया. सुबह होते ही 22 जनवरी, 2025 को मध्य प्रदेश के रतलाम के डीडी नगर थाने के टीआई रविंद्र दंडोतिया को कनेरी में किसी युवक की लाश होने की सूचना मिली. लाश की शिनाख्त होने पर उस की पहचान भरत भाभोर के रूप में हुई, जो जैतमाड़ी का निवासी था.

इस की जांच के लिए एसपी अमित कुमार ने एएसपी राजेश खाखा और सीएसपी सत्येंद्र घनोरिया के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. जांच के लिए चौतरफा पुलिस के मुखबिर लगा दिए गए. उन की सक्रियता से पता चला कि भरत भाभोर का तेतरी निवासी बबलू की पत्नी माया के साथ महीनों से प्रेम संबंध बनाए हुए था. इस की जानकारी बबलू को जरा भी नहीं थी. जबकि उस ने भी माया से प्रेम किया था और औपचारिक विवाह बंधन में बंध कर उस के साथ रह रहा था.

घटना के बाद से माया भी घर से लापता थी. जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी. सुनील पुलिस के कब्जे में आ गया. वह कोलवाखेड़ी निवासी रामलाल गणवा का बेटा था. उस ने भाभोर की हत्या की पूरी दास्तान सुना दी. उस के बाद उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया. पुलिस को माया और बबलू के प्रेम संबंधों के बारे में अच्छी तरह से मालूम हो गया था. बबलू माया को 2-3 दिनों के लिए छोड़ कर अपनी पहली पत्नी और मातापिता से मिलने के लिए पुश्तैनी गांव कुआंझागर चला जाता था. इसी बीच माया और भरत भाभोर एकदूसरे के करीब आ गए थे. माया अपने पति की गैरमौजूदगी में प्रेमी भाभोर को घर बुला लेती थी और उस के संग बेफिक्र हो कर गुलछर्रे उड़ाती थी.

वारदात के दिन भी बबलू अपनी पहली पत्नी के पास गया था. मगर संयोग से वह उसी रात लौट आया था. उस ने माया को भरत के साथ कमरे में बंद देखा था. उन्हें सबक सिखाने के लिए उस ने भरत की जम कर पिटाई की थी. इस बीच मौका देख कर माया फरार हो गई थी. डीडी नगर थाने में धारा 103(1) बीएनएस के तहत केस दर्ज कर लिया गया था. टीआई रविंद्र दंडोदिया और जांच टीम के प्रयास से वारदात के 10 दिन बाद बबलू और उस की पत्नी माया को भी गिरफ्तार कर लिया. बबलू ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. तब उसे भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक 3 आरोपी फरार थे.

 

 

Murder Stories : फौजी पति ने पत्नी के आशिक की सुपारी देकर कराई हत्या

Murder Stories : रंजिश उस विषबेल की तरह होती है, जो बड़े पेड़ों से भी लिपट जाए तो धीरेधीरे उस के वजूद को लीलने लगती है. दिल्ली पुलिस के सिपाही मनोज और फौजी रणबीर ने भी अपने वजूद में ऐसी ही विषबेल पाल रखी थी, जो दोनों…

4 मई, 2020 की बात है. मनोज की आंखें खुलीं तो उस ने पास रखे मोबाइल फोन पर नजर डाली. उस समय सुबह के साढ़े 6 बज चुके थे. वह फटाफट उठा और फ्रैश होने चला गया. दरअसल, मनोज दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल था और घर पर रहने के दौरान टहलने जरूर जाता था. उस दिन वह देर से सो कर उठा, इसलिए जल्दबाजी में मौर्निंग वाक पर जाने के लिए तैयार हो गया. मनोज परिवार सहित हरियाणा के जिला झज्जर के कस्बा बहादुरगढ़ स्थित लाइनपार की वत्स कालोनी में रहता था. मनोज की गली में ही रमेश कुमार भी रहता था. वह रिश्ते में मनोज का चाचा था, लेकिन दोनों हमउम्र थे इसलिए उन की आपस में खूब पटती थी. मनोज चाचा रमेश को साथ ले कर टहलने जाता था.

मनोज तैयार हो कर चाचा रमेश कुमार के यहां पहुंचा, फिर दोनों नजदीक ही स्थित मुंगेशपुर ड्रेन पर पहुंच कर नहर के किनारे टहलने लगे. दोनों अकसर वहीं पर मौर्निंग वाक करते थे. उन्हें वहां पहुंचे कुछ ही देर हुई थी कि उन के पास एक बाइक आ कर रुकी, बाइक पर अंगौछे से अपना चेहरा ढंके 2 युवक बैठे थे. इस से पहले कि मनोज और रमेश कुछ समझ पाते, बाइक पर पीछे बैठे युवक ने पिस्टल निकाल कर मनोज पर निशाना साधते हुए गोली चला दी. लेकिन रमेश ने फुरती दिखाते हुए मनोज को धक्का दे दिया, जिस से मनोज नीचे गिर गया. लेकिन पिस्टल से चली गोली रमेश के सिर में जा लगी. गोली लगते ही रमेश जमीन पर गिर पड़ा.

एक गोली चलाने के बाद भी बदमाश रुका नहीं, उस ने मनोज पर दूसरी गोली चलाई जो उस के पेट में जा लगी. मनोज को गोली मारने के बाद बाइक सवार फरार हो गए. उधर गोली लगते ही मनोज अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागा. मनोज ने घायलावस्था में ही अपने भाई संदीप को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी देते हुए तुरंत मौके पर पहुंचने को कहा. संदीप अपने एक दोस्त को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गया. सिर में गोली लगने से रमेश की मौत हो चुकी थी और मनोज पेट में उस जगह को हाथ से दबाए हुए था, जिस जगह गोली लगी थी.

संदीप ने दोस्त की मदद से मनोज को स्कूटी पर बैठाया और इलाज के लिए सिविल अस्पताल ले गया, लेकिन अस्पताल पहुंचने पर डाक्टरों ने मनोज को मृत घोषित कर दिया. इस गोली कांड की सूचना जब पुलिस को मिली तो थाना लाइनपार के थानाप्रभारी देवेंद्र कुमार घटनास्थल पर पहुंच गए. डीएसपी राहुल देव भी वहां आ गए. लौकडाउन के समय में एक पुलिसकर्मी और एक अन्य व्यक्ति की दिनदहाड़े हुई हत्या पर जिला पुलिस प्रशासन सकते में आ गया. इस के अलावा बहादुरगढ़ क्षेत्र में भी सनसनी फैल गई. लोगों में कोरोना को ले कर पहले से ही भय व्याप्त था, इस दोहरे हत्याकांड पर वे और ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लगे.

रमेश कुमार और कांस्टेबल मनोज की हत्या के बाद उन के घरों में कोहराम मच गया. दोनों ही शादीशुदा थे. उन के बीवीबच्चों का रोरो कर बुरा हाल था. पुलिस अधिकारी घर वालों को समझाने की कोशिश कर रहे थे. सूचना पा कर झज्जर से पुलिस कप्तान भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया, इस संबंध में मृतकों के घर वालों से पूछताछ की. मनोज के भाई संदीप कुमार ने आरोप लगाया कि इस हत्याकांड को इसी कालोनी के रहने वाले फौजी रणबीर सिंह और उस के घर वालों ने अंजाम दिया है. पुलिस कप्तान ने थानाप्रभारी देवेंद्र कुमार को आदेश दिए कि वह केस को खोलने के लिए जरूरी काररवाई करें.

कप्तान साहब ने सीआईए की 2 टीमों को भी हत्यारों का पता लगाने के लिए लगा दिया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने सिविल अस्पताल जा कर दिल्ली पुलिस के जवान मनोज कुमार की लाश का भी मुआयना किया. थानाप्रभारी देवेंद्र कुमार ने घटनास्थल का मुआयना करने के बाद रमेश कुमार की लाश भी पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस टीमें तत्परता से इस काम में जुट गईं. चूंकि मृतक सिपाही मनोज कुमार के भाई संदीप ने हत्या का आरोप कालोनी में रहने वाले बीएसएफ के जवान रणबीर सिंह और उस के घर वालों पर लगाया था, इसलिए पुलिस को सब से पहले फौजी रणबीर से पूछताछ करनी थी.

पुलिस टीम जब फौजी रणबीर के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर वाले भी पुलिस को सही बात नहीं बता सके. पुलिस को यह पहले ही पता लग चुका था कि रणबीर कुछ दिनों पहले ही छुट्टी ले कर घर आया था. इस के बाद पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी. उस के घर के बाहर पुलिस की चौकसी बढ़ा दी. इतना ही नहीं, मुखबिरों को भी लगा दिया. फौजी रणबीर की तलाश के साथसाथ पुलिस ने शक के आधार पर आपराधिक प्रवृत्ति के कई लोगों को भी पूछताछ के लिए उठा लिया.उन सभी से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ की गई. कई तरह से की गई पूछताछ के बाद भी उन बदमाशों से काम की कोई जानकारी नहीं मिल सकी तो उन्हें हिदायतें दे कर घर भेज दिया गया.

घटना के 3 दिन बाद मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने फौजी रणबीर को हिरासत में ले लिया. उस से कांस्टेबल मनोज और उस के चाचा रमेश कुमार की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई. उस ने पुलिस से कहा कि मनोज और उस के घर वाले उस से दुश्मनी रखते हैं. वह भला उन दोनों को क्यों मारेगा.

‘‘जब तुम ने उन्हें नहीं मारा तो घर से लापता क्यों हुए?’’ थानाप्रभारी ने पूछा. ‘‘नहीं सर, मैं लापता नहीं हुआ था बल्कि बहादुरगढ़ में किसी से मिलने गया था.’’ फौजी ने सफाई दी. पुलिस को लगा कि शायद अब यह आसानी से सच्चाई नहीं बताएगा, लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल मनोज कुमार और रमेश की हत्या उस ने खुद तो नहीं की, लेकिन 20 लाख रुपए की सुपारी दे कर उस ने यह काम दूसरे लोगों से कराया था. इस की वजह यह थी कि मनोज ने रणवीर जीना दुश्वार कर रखा था. कई बार समझाने के बाद भी, उस ने समाज में न तो अपनी इज्जत का ध्यान रखा और न ही रणवीर की. पूरे समाज में उस ने खूब बेइज्जती कराई थी.

फौजी ने इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

हरियाणा के जिला झज्जर के कस्बा बहादुरगढ़ के लाइनपार क्षेत्र में स्थित वत्स कालोनी का रहने वाला रणबीर सीमा सुरक्षा बल में कांस्टेबल था. उस की शादी रूबी (परिवर्तित नाम) से हुई थी. बीएसएफ में होने की वजह से वह काफीकाफी दिनों बाद ही घर आ पाता था. इसी वत्स कालोनी में मनोज कुमार भी रहता था, जो दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल था. वह भी शादीशुदा था. बताया जाता है कि मनोज और रूबी के बीच अवैध संबंध हो गए थे. किसी तरह यह जानकारी रणबीर को हुई तो उस ने न सिर्फ अपनी पत्नी रूबी को बल्कि मनोज को भी बहुत समझाया, लेकिन दोनों ने ही उस की बातों पर अमल नहीं किया.

इस के बाद रणबीर ने पत्नी के साथ सख्ती की, लेकिन वह तो एक तरह से ढीठ हो गई थी. रणबीर भले ही अपनी ड्यूटी पर रहता था, लेकिन उस का ध्यान पत्नी की ओर ही लगा रहता था. उस के शुभचिंतक फोन पर ही उस की पत्नी की करतूतें उसे बताते रहते थे. रणबीर पत्नी के बारे में सुनसुन कर परेशान हो गया था. लिहाजा उस ने कुछ दिनों पहले पत्नी को तलाक दे दिया था. फौजी रणबीर से तलाक लेने के बाद रूबी वत्स कालोनी में ही किराए का मकान ले कर रहने लगी. तलाक के बाद वह एक तरह से आजाद हो गई थी. उस ने मनोज से भी संबंध खत्म नहीं किए थे. यह जानकारी फौजी रणबीर को भी मिल चुकी थी.

रणबीर के मन में बस एक बात ही घूम रही थी कि मनोज की वजह से उस के जीवन में अशांति आई थी, तो क्यों न उस को ही ठिकाने लगा दिया जाए. इसी काम के मकसद से कुछ दिन पहले वह छुट्टी ले कर घर आया. मनोज को ठिकाने लगवाने के लिए उस ने बहादुरगढ़ की लाइनपार स्थित फ्रैंड्स कालोनी में रहने वाले पवन से बात की. पवन मूलरूप से सोनीपत के जौली गांव का रहने वाला था. 2 लाख रुपए में पवन से मनोज की हत्या की बात तय हो गई. फौजी ने उसी समय 5 हजार रुपए उसे एडवांस के तौर पर भी दे दिए.

पवन की दोस्ती पश्चिमी दिल्ली के रघुबीर नगर निवासी तेजपाल उर्फ घूणी से थी. पवन और तेजपाल वैसे तो पेंटर थे, लेकिन पैसों के लालच में मनोज की हत्या करने को राजी हो गए. बातचीत तय हो जाने के बाद पवन और तेजपाल कांस्टेबल मनोज की रेकी करने लगे. उन्होंने उस की हत्या हरियाणा में ही करनी तय की. रेकी के बाद उन्हें पता चला कि मनोज रोजाना मौर्निंग वाक के लिए मुंगेशपुर ड्रेन पर जाता है. सुबह के समय नहर के किनारे सुनसान रहते हैं, इसलिए दोनों को यही समय ठीक लगा. 4 मई, 2020 को मनोज कुमार अपने दूर के रिश्ते के चाचा रमेश कुमार के साथ सुबह 7 बजे के करीब मुंगेशपुर में नहर किनारे घूमने गया, तभी पवन और तेजपाल मोटरसाइकिल से वहां पहुंचे और उन्होंने मनोज के चक्कर में रमेश को भी मौत के घाट उतार दिया.

फौजी रणबीर से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन अन्य आरोपियों पवन और तेजपाल उर्फ धूणी को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने उन के पास से .32 एमएम की पिस्टल व 7 जीवित कारतूस और वारदात में इस्तेमाल की गई बाइक भी बरामद कर ली. तीनों आरोपियों के खिलाफ हत्या और हत्या की साजिश रचने का मुकदमा दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी देवेंद्र कुमार ने उन्हें कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. घटना में रूबी की कोई भूमिका सामने नहीं आई थी. मामले की जांच थानाप्रभारी देवेंद्र कुमार कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

Family Crime Stories : पत्नी के टुकड़े कर पानी में उबाले

Family Crime Stories : पुट्टा गुरुमूर्ति ने पत्नी वेंकट माधवी की हत्या करने के बाद लाश के टुकड़े कर उन्हें न सिर्फ उबाला, बल्कि उस की हड्डियों को मिक्सी में पीस कर ठिकाने लगा दिया. आखिर ऐसी क्या वजह रही, जो गुरुमूर्ति इतना क्रूर बन गया…

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के मीरपेट थाने के जिल्लेलागुड़ा की न्यू वेंकटेश्वर कालोनी में किराए पर कमरा ले कर रहने वाले पुट्टा गुरुमूर्ति (39) और वेंकट माधवी (35) की शादी को 13 साल बीत चुके थे. दोनों इतना लंबा समय खट्टेमीठे अनुभवों के साथ गुजारते आए थे. गुरुमूर्ति की जब 2013 में शादी हुई थी, तब वह सेना में नायब सूबेदार था और ठीकठाक कमाता था, इसलिए माधवी गुरुमूर्ति से विवाह कर के खुश थी. लेकिन गुरुमूर्ति में कमी यह थी कि वह माधवी को अपने साथ नौकरी वाले शहर में नहीं ले जाता था. जबकि माधवी को शुरुआत में सासससुर के साथ रहना कतई अच्छा नहीं लगता था. वह पति के साथ उस के नौकरी वाले शहर में रहना चाहती थी, लेकिन गुरुमूर्ति इस के लिए तैयार नहीं था.

ऐसी स्थिति में पति के दबाव के चलते माधवी अपने सासससुर के साथ आंध्र प्रदेश के प्रकाशम में रह कर घरपरिवार को संभालने में जुट गई थी. सासससुर को कैसे खुश रखा जाए, गृहस्थी की जरूरतें कैसे पूरी हों, परिवार के अन्य सदस्यों के साथसाथ सामाजिक मानमर्यादा का खयाल किस तरह से रखा जाए? इस बात का खयाल माधवी खासतौर से रखती थी. एक तरह से उस ने अपना एक संतुलित परिवार बना लिया था. वह एक बेटा और बेटी की मां बन गई, उस के दोनों ही बच्चे एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढऩे जाते थे.

5 साल पहले पति के भारतीय सेना की नौकरी से रिटायर हो जाने के बाद वह पति और दोनों बच्चों के साथ हैदराबाद के उपनगर जिल्लेलागुडा की न्यू वेंकटेश्वर कालोनी में रहने लगी थी. किराए का मकान और गृहस्थी के बढ़ते खर्च, बेटेबेटी की बेहतर पढ़ाईलिखाई को ले कर माधवी काफी परेशान रहने लगी थी. बच्चों के भविष्य को ले कर उसे काफी फिक्र रहती थी. उधर गुरुमूर्ति की माधवी के मातापिता से किसी बात को ले कर खटपट हो गई थी. गुरुमूर्ति ने अपने सासससुर से बोलचाल बंद करने के साथ ही माधवी का मायके जाना बंद कर दिया था.

दामाद से बात कर परेशान क्यों हुईं सुब्बम्मा

गृहस्थी ठीकठाक पहले की तरह चल सके, इसलिए गुरुमूर्ति ने 2020 से कंचन बाग में स्थित डीआरडीओ कार्यालय में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करनी शुरू कर दी थी. लेकिन बीते कुछ दिनों से गुरुमूर्ति को अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह होने लगा था. गुरुमूर्ति को शक था कि माधवी उस की गैरमौजूदगी में अपने रिश्तेदार को बुला कर उस के साथ रंगरलियां मनाती है. हालांकि कुछ दिनों तक तो माधवी की समझ में ही नहीं आया कि पति ऐसा सलूक उस के साथ क्यों करने लगा गया है?

उधर गुरुमूर्ति के मन में पत्नी के चालचलन को ले कर नफरत बढ़ती जा रही थी. उस ने पत्नी से इस बारे में पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का किसी के साथ कोई चक्कर वगैरह कुछ नहीं है. लेकिन गुरुमूर्ति को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उसे लगा कि माधवी झूठ बोल रही है, इसलिए उस ने पत्नी को ठिकाने लगाने का प्लान बना लिया.

फिर प्लान के अनुसार, 15 जनवरी, 2025 को अपने बच्चों और पत्नी को अपनी बहन सुजाता के घर मेलमिलाप के बहाने ले गया. दोनों बच्चों को बहन के घर पर ही छोड़ कर पत्नी के साथ उसी रात को घर पर लौट आया था. 16 जनवरी की सुबह माधवी ने अपने पति से कहा कि मैं पोंगल के लिए अपने मायके नंदयाल जाना चाहती हूं, लेकिन अपने सासससुर से खफा गुरुमूर्ति ने दोटूक शब्दों में माधवी को वहां जाने से मना कर दिया. इस बात को ले कर दोनों में तूतूमैंमैं होने लगी. उसी दिन गुरुमूर्ति ने अपनी सास उप्पला सुब्बम्मा के मोबाइल पर काल कर दिया, ”हैलो सासू मां, आप मेरी बात सुन रही हैं?’’

”हांहां बोलो, दामादजी, तुम्हारी आवाज  मुझे बिलकुल स्पष्ट सुनाई दे रही है. बोलो न, क्या बता रहे थे मेरी बेटी के बारे में? आप को क्या शिकायत है माधवी से, मुझे साफसाफ बताओ, मैं बात करूंगी माधवी से इस बारे में.’’

”पिछले कुछ महीनों से माधवी के चालचलन में काफी बदलाव आ गया है. वह बेहया हो गई है. आप वक्त निकाल कर उसे जरा समझा देना, वरना मेरे हाथों से किसी दिन अनर्थ हो जाएगा.’’ गुरुमूर्ति ने एक तरह से धमकी भरे अंदाज में कहा और फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

दरअसल, उप्पला सुब्बम्मा अपने दामाद की बातों को पूरी तरह से समझ नहीं पाई थी. फिर भी उस ने अपने दामाद के कहने पर माधवी से बात कर लेना उचित समझा, अत: बिना किसी हिचकिचाहट के उस के नंबर पर काल कर दिया, ”हैलो माधवी, तू कैसी है? तेरे दोनों बच्चे कैसे हैं?’’

”अम्मा, मैं ठीक हूं, दोनों बच्चे तो अपनी बुआ के यहां  गए हुए हैं. आप और बापू कैसे हैं? घर पर सब खैरियत तो है न?’’

”अरे माधवी, दामादजी का फोन आया था. कुछ देर पहले तुम्हारे बारे में ही ही बोल रहे थे कि तुम्हारा चालचलन ठीक नहीं है और बड़ी बेहया हो गई हो? कोई इस तरह की बात है क्या?’’ सुब्बम्मा बोली.

”अरे नहीं अम्मा, आप उन की बातों को कोई अहमियत न दो, यह मेरे और गुरुमूर्ति के बीच की बात है.’’ माधवी ने अपनी मां को फोन पर समझाया.

”तेरे बच्चों की पढ़ाईलिखाई ठीकठाक चली है न. उन दोनों से मुलाकात किए 7 साल हो गए. छुट्टी वाले दिन उन्हें ले आना.’’ उप्पला सुब्बम्मा ने कहा.

उस दिन तो बात आईगई हो गई न तो माधवी ने अपने पति के साथ आए दिन होने वाली तकरार के बारे में अपनी अम्मा को कुछ बताया और न ही सुब्बम्मा ने बेटी की निजी जिंदगी में दखल देने की कोशिश की. लेकिन यह क्या? कुछ ही देर बाद गुरुमूर्ति ने अपनी सास को फिर से फोन कर वही बात दुहराई. कहने लगा, ”अपनी बेटी को संभाल लो, वरना मेरे हाथों अनर्थ हो जाएगा.’’

उस ने बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे आरोप लगा दिया कि माधवी का एक करीबी रिश्तेदार के साथ चक्कर चल रहा है. एक तरह से गुरुमूर्ति ने उस दिन माधवी पर बदचलन होने और रिश्तेदार के साथ नाजायज संबंध होने का सीधेसीधे आरोप लगा दिया था. बेटी के बारे में दामाद से यह सब सुन कर सुब्बम्मा ने बेटी को फोन कर काफी डांट लगाई. उन्होंने गुस्से में बेटी से दोटूक कह दिया कि वह सिर्फ अपने पति और बच्चों पर ध्यान दे और अपने दोनों बच्चों का उज्जवल भविष्य बनाए, गलत रास्ते पर कतई न जाए, यदि दोबारा तुम्हारे बारे में दामादजी की शिकायत आई तो तुम्हारे लिए मायके के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे.

दूसरी तरफ सुब्बम्मा ने गुरुमूर्ति को भरोसा दिलाया कि वह कल सुबह तुम्हारे ड्यूटी पर निकलने से पहले घर पर आ कर माधवी को समझा देगी, लेकिन उस के लिए वह दिन नहीं आया. उसे अपनी बेटी को उस बारे में आमनेसामने बैठ कर बातें करने का मौका ही नहीं मिला.

सुब्बम्मा पति के साथ क्यों गई बेटी की ससुराल

शाम के 7 बजे के करीब सुब्बम्मा बेटी और उस के बच्चों के लिए बाजार से कुछ सामान लेने जाने के लिए तैयार हो रही थी. तभी अचानक गुरुमूर्ति का फोन आ गया. मोबाइल के डिसप्ले पर दामाद का नंबर देख कर सुब्बम्मा चौंक गई. कुछ क्षण के लिए वह यह सोचने लगा गई कि जब सुबह 2 बार बात हो चुकी है तो शाम के वक्त दामाद ने फोन क्यों किया है? जरूर कोई खास बात होगी. सुब्बम्मा दामाद का फोन रिसीव करते हुए बोली, ”हां दामादजी, बोलो क्या बात हो गई, जो शाम के वक्त फोन किया?’’

दूसरी तरफ से दामाद की घबराहट भरी आवाज सुन कर उप्पला सुब्बम्मा किसी अनहोनी से आशंकित हो गई. उस ने पूछा, ”क्या बात है दामादजी, तुम्हारी आवाज में मुझे घबराहट क्यों लग रही है. तुम मुझे काफी परेशान से लग रहे हो, घर में सब खैरियत तो है न?’’

”अरे सासू मां, कतई खैरियत नहीं है. तुम्हारी बेटी मुझ से लड़झगड़ कर दोपहर बाद से कहीं चली गई, उस के बारे में कुछ भी पता नहीं चल रहा है.’’

इतना सुनते ही चौंकते हुए सुब्बम्मा ने गुरुमूर्ति से माधवी को ले कर तमाम सारे सवाल कर डाले, ”अरे, आप फोन पर ही मुझ से सवाल पर सवाल कर के वक्त जाया करती रहोगी या फिर अपनी बेटी को ढूंढने का प्रयास भी करोगी.’’

”चलो दामादजी, मैं फोन रखती हूं और माधवी के बारे में रिश्तेदारों और परिचितों के यहां पता करती हूं.’’

इस के बाद सुब्बम्मा ने बेटी के बारे में जानकारी लेने के लिए रिश्तेदारों से ले कर परिचितों को फोन लगा कर मालूमात की, लेकिन उस के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका. माधवी को गायब हुए 48 घंटे से अधिक का समय गुजर चुका था. न तो उस का मोबाइल फोन लग रहा था और न ही उस के बारे में कोई जानकारी मिल पा रही थी. अत: अपने पति को साथ ले कर उप्पला सुब्बम्मा ने अपने दामाद के घर जाने का फैसला लिया.

आटोरिक्शा पकड़ कर वह पति के बाद साथ न्यू वेंकटेश्वर कालोनी पहुंच गई. आटोरिक्शा चालक को भाड़ा चुकाने के बाद उप्पला सुब्बम्मा ने गुरुमूर्ति के आसपड़ोस में रहने वाले लोगों के घरों में जा कर बेटी माधवी के बारे में पूछताछ की. पड़ोसियों ने बताया कि उन्हें तो 16 जनवरी की सुबह 7 बजे के बाद से माधवी नहीं दिखी.

पति ने लाश के टुकड़े क्यों उबाले

आखिरकार माधवी के मम्मीपापा ने निर्णय लिया कि थाने में माधवी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी जाए, इसलिए मीरपेट थाने में उप्पला सुब्बम्मा ने अपने पति के साथ जा कर बेटी माधवी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी. उसी वक्त गुरुमूर्ति की बहन और बहनोई को भी इस घटनाक्रम की जानकारी दे दी गई. बुआ से मम्मी के अचानक घर से लापता होने की जानकारी मिलते ही माधवी के बच्चे भी बुआ के घर से अपने घर पर वापस लौटने के लिए हठ करने लगे. बुआ के घर का माहौल काफी बोझिल हो गया.

गुरुमूर्ति के चाचा ने उस से घुमाफिरा कर माधवी के लापता होने के बारे में पूछा. चाचा के पूछने पर आखिरकार गुरुमूर्ति को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने बताया, ”माधवी, इस बात को ले कर काफी नाराज थी कि मेरी मां को फोन कर मेरे रिश्तेदार से संबंध होने की बात क्यों बताई. इसी बात को ले कर हम दोनों में जम कर तूतूमैंमैं हुई. इस के बाद वह अपने मायके जाने की हठ करने लगी. तभी मैं ने माधवी को जोर से थप्पड़ मार दिया. माधवी दीवार के पास खड़ी थी, गुस्से में मैं ने उस का सिर जोर से दीवार पर 4-5 बार दे मारा. मेरे द्वारा ऐसा करने से सिर में चोट लगने से माधवी बेहोश हो गई.’’

उस ने आगे बताया कि माधवी को बेहोश देख कर मैं बुरी तरह घबरा गया. मुझे लगा कि माधवी मर गई है. मैं ने उस की नब्ज टटोली, जो चल रही थी. मुझे लगा कि होश में आने के बाद माधवी अपनी मम्मी के साथ मीरपेट थाने में जा कर उस की शिकायत कर देगी तो मुझे मारपीट करने के केस में जेल जाना पड़ेगा, इसलिए मैं ने फैसला किया कि माधवी के होश में आने से पहले ही उस की गला दबा कर हत्या कर दी जाए और फिर उस की लाश को बड़ी सफाई के साथ ठिकाने लगा दिया जाए. यह 16 जनवरी, 2025 की बात है.

गुरुमूर्ति ने गुस्से में आ कर माधवी की हत्या तो कर दी, लेकिन अब वह इस सोच में पड़ गया कि लाश को किस तरह ठिकाने लगाया जाए कि वह पुलिस की पकड़ में न आ सके. वह काफी देर तक इस बारे में सोचता रहा. फिर उसे ध्यान में आया कि माधवी की लाश को ठिकाने लगाने का आइडिया क्यों न ओटीटी प्लेटफार्म पर कोई क्राइम थिलर देख कर ले लिया जाए. गुरुमूर्ति को लाश को ठिकाने लगाने और सारे सबूत मिटाने के लिए क्राइम थ्रिलर का आइडिया सब से ज्यादा पसंद आया, इसेिलए वह सुबह करीब 10 बजे माधवी की लाश को घसीट कर वाशरूम में ले गया और तेज धार वाले चाकू से उस की लाश के 4 टुकड़े कर दिए.

सब से पहले दोनों हाथ फिर पैर काटे. उस के बाद शरीर के शेष हिस्सों के छोटे छोटेटुकड़े करने के बाद सबूत मिटाने की मंशा से सभी टुकड़ों को घर में रखी पेंट की खाली बाल्टी में डाल कर पानी गर्म करने वाली रौड की मदद से पानी में उबाल कर मांस और हड्डियों को अलग किया. उस ने एक बार फिर से मांस के टुकड़ों को उबाला. रसोई गैस के बर्नर पर माधवी के शरीर की हड्डियों को भी काफी देर तक प्रेशर कुकर में पकाया. इस के बाद मांस से अलग हुई हड्डियों को मिक्सी में डाल कर पाउडर बना दिया. पके हुए मांस के टुकड़ों और पाउडर को अलगअलग पौलीथिन की थैलियों में बंद कर घर के करीब स्थित चंंदन झील में मछलियों को खाने के लिए फेंक आया.

माधवी के शव के टुकड़ों को ठिकाने लगाने के बाद गुरुमूर्ति ने घर लौट कर बाथरूम, पेंट की खाली बाल्टी, चाकू, मिक्सी, इमरसन रौड व जमीन पर फैले खून को वाशिंग पाउडर और फिनाइल डाल कर अच्छी तरह रगडऱगड़ कर साफ किया. बड़ी होशियारी से हत्या के सारे सबूत उस ने नष्ट कर दिए. गुरुमूर्ति ने अपने चाचा के द्वारा माधवी के बारे में बारबार पूछने पर उन्हें  माधवी की हत्या के बारे में सब कुछ बता दिया था. गुरुमूर्ति की बात सुन कर चाचा के पैरों तले जमीन खिसक गई. चाचा ने गुरुमूर्ति से कहा कि यह तुम क्या बक रहे हो.

गुरुमूर्ति ने कहा कि चाचा मेरी सहनशक्ति की सीमा खत्म हो गई तो मैं ने माधवी को मौत के घाट उतार दिया. भतीजे के मुंह से माधवी की हत्या करने की बात सुन कर चाचा बुरी तरह घबरा गए. उन्हें लगा कि भतीजे के साथ पुलिस उन्हें बात छिपाने के आरोप में गिरफ्तार न कर ले, इसलिए चाचा ने बिना देरी किए मीरपेट थाने पहुंच कर उस की हैवानियत के बारे में सब कुछ टीआई को बता दिया. उधर गुरुमूर्ति की सास थाने में अपनी बेटी माधवी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा चुकी थी, इसलिए टीआई ने गुरुमूर्ति को हिरासत में ले कर पूछताछ की.

गुरुमूर्ति को पता नहीं था कि उस के चाचा ने टीआई को उस के द्वारा माधवी की हत्या किए जाने और लाश ठिकाने लगाने की सूचना दे दी है, इसलिए वह तरहतरह की कहानियां बता कर पुलिस को उलझाता रहा. आखिरकार वह घुमावदार बातों में खुद उलझ गया तो उस ने सच्चाई उगल दी. फिर उस ने माधवी की हत्या करने की सारी कहानी पुलिस को बता दी. हत्या का गुनाह कुबूल करने पर पुलिस ने गुरुमूर्ति को 28 जनवरी, 2025 की सुबह विधिवत अपनी हिरासत में ले लिया.

गुरुमूर्ति के इस कबूलनामे के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) हत्या 238 (अपराध के सबूत को गायब करना) और 85 (महिला के प्रति क्रूरता के तहत मामला दर्ज कर लिया है). चौंकाने वाली बात यह थी कि गुरुमूर्ति का जुर्म की दुनिया से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन उस ने पेशेवर हत्यारे को भी मात दे दी थी. उस ने अपनी पत्नी की हत्या और सबूत मिटाने की योजना को बड़ी होशियारी से अंजाम दिया.

राचकोंडा के पुलिस आयुक्त जी. सुधीर बाबू का कहना है कि हत्या के इस मामले की गुत्थी को सुलझाने और इस मामले से जुड़े सभी सबूत जुटाने के लिए देश भर के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों  की मदद ली गई थी. इस के लिए दिल्ली और गुजरात के फोरैंसिक विशेषज्ञों को घटनास्थल और चंदन झील का मौकामुआयना कराया था और उन के द्वारा सबूत इकट्ठे करने का भरसक प्रयास किया गया. इसी का परिणाम है कि पुलिस के हाथ चंदन झील के किनारे माधवी के शव के टुकड़ों में एक मांस का टुकड़ा बतौर सबूत हाथ लग गया. सबूत हाथ लगते ही पुलिस ने माधवी के मम्मीपापा का डीएनए ले कर चंदन झील से बरामद इंसान के मांस के टुकड़े का डीएनए टेस्ट करवाया. जांच के बाद दोनों का डीएनए मैच कर गया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस गुरुमूर्ति की निशानदेही पर घर के भीतर से हत्या के सबूत मिटाने में प्रयुक्त किया गया गैस बर्नर, पेंट की खाली बाल्टी, चाकू और पानी गर्म करने वाली रौड, मिक्सी सहित खून से लथपथ कपड़ों को बरामद कर पुट्टा गुरुमूर्ति के घर को सील कर चुकी थी. उधर माधवी की हत्या के बाद से उस के माइनर बेटाबेटी को उन के नानानानी अपने साथ ले गए. सनसनीखेज तरीके से पति द्वारा की गई हत्या हैदराबाद से ले कर समूचे भारत में चर्चा का विषय बन गई है. आम और खास लोग अब यह जानने को उत्सुक हैं कि कोर्ट गुरुमूर्ति को क्या दंड देता है?

 

 

Etawah News : देवर के इश्क में सुहाग की बलि

Etawah News : 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद मधु के अवैध संबंध फुफेरे देवर रोहित के साथ हो गए. अवैध संबंधों की राह पर वह ऐसी फिसली कि संभल नहीं पाई. साथ ही उस ने प्रेमी के साथ मिल कर ऐसे क्राइम को अंजाम दिया, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.

उस रोज मधु ने मस्टर्ड कलर की साड़ी और ब्लैक कलर का ब्लाउज पहन रखा था. इन कपड़ों में उस का गोरा रंग खूब खिल रहा था. रोहित कुछ देर उसे एकटक देखता रहा, फिर मुसकराते हुए बोला, ”भाभी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

मधु के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह सवालिया नजरों से रोहित को देखने लगी. रोहित ने उस की झील सी आंखों में झांकते हुए कह दिया, ”तुम बहुत हसीन हो भाभी, हजारों में न सही, लेकिन सैकड़ों में एक जरूर हो.’’

अपनी तारीफ सुन कर मधु के गाल गुलाबी हो गए. बरबस उस के होंठों पर मुसकान तैर गई. वह मन की खुशी को छिपाते हुए बोली, ”चलो हटो, आजकल तुम बातें बनाना सीख गए हो.’’

”मैं सच कहता हूं भाभी, ”रोहित उत्साह में आ कर उस के सामने आ खड़ा हुुआ, ”कहो तो मैं सबूत भी दे सकता हूं कि आज तुम कितनी हसीन लग रही हो.’’

मधु ने गौर से रोहित को देखा फिर थोड़ी अदा से कहा, ”दो सबूत?’’

”मेरी आंखों में देखो, आईना तो झूठ बोल सकता है, पर मेरी आंखें झूठ नहीं बोलेंगी. आंखों में तुम्हारा अक्स जो कैद है, वह दुनिया की सब से हसीन औरत का है.’’ रोहित ने बड़े प्यार से मधु को देखा.

मधु के होंठों पर शरारत तैर गई. उस ने रोहित की आंखों में देखा, फिर निचला होंठ दबाते हुए बोली, ”चल झूठे, तेरी आंखों में तो मुझे कुछ और ही दिखाई दे रहा है.’’

”तुम्हारी तसवीर के सिवाय कुछ और हो ही नहीं सकता. बताओ, तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’’

”एक तमन्ना… एक प्यास,’’ मधु ने मादक स्वर में कहा.

”भाभी, जब तुम ने मेरी तमन्ना देख ही ली है तो उसे पूरी कर दो न.’’ रोहित ने हिम्मत जुटा कर मधु का हाथ पकड़ लिया.

”कर दूंगी, वक्त आने दो.’’ मधु ने रोहित के गाल पर प्यार की चपत लगाई.

”कब भाभी, आखिर कितना इंतजार कराओगी?’’

”ज्यादा नहीं, सिर्फ एक दिन का.’’ मधु नशीली नजरों से देवर को देख कर बोली, ”अब हाथ तो छोड़ दो.’’

”पहले वादा करो भाभी, तभी हाथ छोड़ूंगा.’’

”पक्का वादा.’’ मधु ने कहा तो रोहित ने उस का हाथ छोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद का एक चर्चित कस्बा है लखुना. यह कस्बा सोनेचांदी के व्यवसाय के लिए दूरदूर तक मशहूर है. ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर लोग शादीविवाह में इसी कस्बे से आभूषण बनवाते हैं.

इसी लखुना कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामबेटी के अलावा 2 बेटे अजय, अमर तथा 2 बेटियां राधा व मधु थीं. रामबाबू पढ़ालिखा तो न था, लेकिन आभूषण बनाने का उम्दा कारीगर था. वह ज्वैलरी की दुकान में काम करता था. उस के परिवार का भरणपोषण उस की सैलरी से होता था.

मधु भाईबहनों में सब से छोटी थी. वह अपने अन्य भाईबहनों से ज्यादा सुंदर थी. पढ़ाईलिखाई में भी तेज थी. हाईस्कूल पास कर के वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन मम्मीपापा उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे. वह पढ़ाई छोड़ कर मम्मी के साथ घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी. हालांकि वह मम्मीपापा के इस निर्णय से खुश नहीं थी.

मधु ने सोलहवां वसंत पार किया तो रामबाबू को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. एक कहावत है, ‘जब बेटी हुई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ इसी कहावत के चरितार्थ रामबाबू भी अपनी बेटी की शादी के लिए योग्य लड़का ढूंढने लगा. काफी दौड़धूप के बाद उस की नजर मनोज कुमार पर जा कर ठहर गई.

मनोज कुमार के पापा तहसीलदार, इटावा जिले के इकदिल कस्बा में रहते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी रागिनी तथा बेटा मनोज कुमार था. रागिनी की शादी वह आगरा के बाह कस्बा निवासी श्याम सिंह के साथ कर चुके थे. श्याम सिंह डाक्टर था.

मनोज अभी कुंवारा था. मनोज रंगरूप से तो सांवला था, लेकिन शरीर से मजबूत था. पढ़ालिखा भी था. सरकारी नौकरी की तलाश में उस ने जूते घिसे. लेकिन जब नौकरी नहीं मिली तो वह कस्बे में ही प्राइवेट नौकरी करने लगा. कुछ खेती की जमीन भी थी, उस की भी देखभाल मनोज ही करता था. रामबाबू ने मनोज को अपनी बेटी मधु के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद फरवरी, 2010 में मधु का विवाह मनोज कुमार के साथ धूमधाम से हो गया.

सुहाग के जोड़े में सजीधजी मधु पहली बार ससुराल आई तो मुंह दिखाई रस्म में सभी ने उस के रूपरंग की तारीफ की. मनोज भी मधु जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था. वह अपने भाग्य पर इतरा उठा था. सब खुश थे, लेकिन मधु खुश नहीं थी. उस ने जिस तरह के पति की कल्पना की थी, मनोज वैसा नहीं था.

मधु ने सपना संजो रखा था कि उस का पति हैंडसम, तेजतर्रार और आधुनिक विचारों वाला होगा. जबकि मनोज उस की अपेक्षाओं से बिलकुल विपरीत था. सांवले रंग का मनोज देहाती भाषा बोलता था और रहनसहन भी साधारण था.

लेकिन अब जैसा भी था, मनोज उस का पति था. मन मसोस कर मधु ने जीवन की शुरुआत की. धीरेधीरे कई साल बीत गए. इस बीच मधु 2 बेटों अमित व सुमित की मां बनी. 2 बच्चों के जन्म से घर में खुशियां तो बढ़ गईं, लेकिन आर्थिक बोझ भी बढ़ गया. मनोज अधिक कमाई की सोचने लगा. लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कौन सा काम करे, जिस से उस की आमदनी में इजाफा हो.

काफी सोचविचार के बाद उस ने घरों में ब्रेड, चाय, बिसकुट सप्लाई का काम शुरू कर दिया. इस धंधे से उस की अतिरिक्त कमाई तो होने लगी, लेकिन इस काम से वह बहुत थम जाता था.

मधु की सास की मौत हो चुकी थी. अत: घर की चाबी उसी के हाथ में थी. मनोज नौकरी व व्यवसाय में जो भी कमाई करता था, वह सब मधु के हाथ पर ही रखता था. खेती से होने वाली आमदनी का हिसाब भी मधु ही रखती थी. मधु के ससुर तहसीलदार नाममात्र के घर के मालिक थे. वह तो केवल घर खेत की रखवाली करते थे. खेतों पर उन्होंने झोपड़ी बना रखी थी. उन का ज्यादा समय खेतों पर ही बीतता था. वह केवल खाना खाने घर आते थे.

मनोज कड़ी मेहनत करता था. वह सुबह उठ कर फेरी लगाता, फिर 10 बजे नौकरी पर चला जाता तो फिर रात गए ही लौटता था. थकान के बहाने वह शराब भी पीने लगा था. धीरेधीरे वह शराब का लती हो गया. मधु शराब पीने को मना करती तो वह उस पर नाराज हो जाता था.

मधु 2 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन उस के रूपरंग में अभी भी कोई कमी नहीं आई थी. वह बनसंवर कर रहती थी. दूसरी तरफ मनोज का मन सैक्स से हट गया था. 2 बच्चे पैदा करने के बाद उस ने पत्नी की भावनाओं को समझना बंद कर दिया था. मधु हर रात पति का साथ चाहती थी, लेकिन शराब का लती मनोज उस का साथ नहीं दे पाता था. नतीजा यह निकला कि मधु पति से किनारा कर के अपने लिए जिस्म का साथी तलाशने लगी.

इन्हीं दिनों मधु की निगाह रोहित पर पड़ी. रोहित थाना एकदिल के गांव बुसा का रहने वाला था. रिश्ते में मनोज रोहित का ममेरा भाई यानी मामा का बेटा था. इस नाते मनोज की पत्नी मधु और रोहित के बीच देवरभाभी का रिश्ता था.

25 वर्षीय रोहित गबरू जवान था. वह एलआईसी व पोस्ट औफिस का एजेंट था. बचत योजनाओं में लोगों का पैसा जमा कराता था और अच्छी कमाई करता था, जिस से वह ठाटबाट से रहता था. मधु भी पोस्ट औफिस में पैसा जमा करने जाती थी, अत: उस का मधु के घर आनाजाना लगा रहता था. रोहित रसभरी लच्छेदार बातें करता था, इसलिए मधु से उस की खूब पटती थी.

उम्र में रोहित मधु से 5 साल छोटा था. दोनों का देवरभाभी का रिश्ता था, सो उन के बीच खूब हंसीमजाक होती थी. मधु भी उस की बातों में खूब रस लेती थी. उस के मन के किसी कोने में जैसे साथी की तसवीर थी, वह रोहित जैसी ही थी.

यही वजह थी कि मधु रोहित को चाहने लगी थी. रोहित तो वैसे ही उस का दीवाना था. वह मधु भाभी से प्रीत जोड़ कर अपनी तन्हाइयों से निजात पाने के सपने देखा करता था.

उस रोज जब रोहित घर आया तो वह मधु के रूपरंग की तारीफ करने लगा और अपनी रसभरी बातों से मधु को रिझाने लगा. इस से मधु का दिल उमंगों से भर गया. उधर रोहित भी भाभी के लिए बेताब था. उस ने वह रात सपने संजोतेसंजोते गुजारी. अगले दिन उस की चाहत पूरी होने वाली थी.

रोहित सुबह देर से जागा. दोपहर हुई तो तैयार हो कर बाइक से मधु के घर की ओर रवाना हो लिया. लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय कर वह मधु के घर पहुंच गया. मधु उसी का इंतजार कर रही थी. उस दिन उस ने अपने आप को कुछ खास तरह से संवारा था. रोहित ने कमरे में पहुंचते ही मधु को अपनी बांहों में समेट लिया, ”भाभी, आज तो हूर की परी लग रही हो. जी चाहता है कि…’’

”थोड़ा सब्र से काम लो देवरजी,’’ मधु ने प्यार से उसे एक चपत लगाई, ”मैं दरवाजा तो बंद कर लूं.’’

 

रोहित ने मधु को बाहुपाश से मुक्त कर दिया. मधु दरवाजे तक गई, बाहर का जायजा लिया. बाहर दोपहर का सन्नाटा था. मधु ने दरवाजा बंद किया और मुसकान बिखेरती हुई रोहित के सामने आ खड़ी हुई. ख्वाबों की तसवीर अब उस के सामने थी. रोहित बावला सा हो गया. उस ने मधु को बाहुपाश में भरा और बिस्तर पर ले गया. इस के बाद तो कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. दोनों के जिस्म तभी जुदा हुए, जब उन्हें तृप्ति मिल गई.

उस दोपहर अनीति की आग में मर्यादा स्वाहा हुई तो फिर यह खेल अकसर खेला जाने लगा. मधु को रोहित पसंद था. उसे उस की बांहों में असीम सुख मिलता था. देवर से अवैध रिश्ता बना तो मधु पति को तनमन से भूल सी गई. उस ने उस की परवाह करनी भी बंद कर दी. यही नहीं, मधु रोहित के साथ बाइक पर बैठ कर बाजार में घूमने भी जाने लगी.

छिप न सके दोनों के अवैध संबंध

जब देवरभाभी की हर दोपहर रंगीन होने लगी तो बातें बाहर भी फैलने लगीं. इसी बीच एक रोज गांव का एक युवक खेतों पर पहुंचा और झोपड़ी में बैठे मनोज के पिता तहसीलदार से बोला, ”दद्ïदा, आप तो यहां खेतों पर पड़े रहते हो. घर में क्या अनर्थ हो रहा है, तुम्हें कुछ पता भी है?’’

”मेरे घर में और अनर्थ? यह तुम कैसी बातें कर रहे हो?’’ तहसीलदार ने प्रश्न किया.

”दद्ïदा, नहीं पता है तो सुनो. बुसा गांव का रिश्तेदार रोहित अकसर तुम्हारे घर दोपहर में आता है. उस के आते ही तुम्हारी बहू मधु दरवाजा बंद कर लेती है. आप तो बुजुर्ग हैं. बंद दरवाजे के भीतर बहू क्या गुल खिलाती होगी, आप को भी समझना चाहिए.’’

युवक तो अपनी बात कह कर बीड़ी फूंकता हुआ चला गया, लेकिन तहसीलदार के मन में शंकाओं के बादल उमडऩेघुमडऩे लगे. वह सोचने लगा, ‘रोहित खास रिश्तेदार है. क्या वह वास्तव में उस की पीठ में इज्जत का छुरा घोंप रहा है. जल्द ही असलियत का पता लगाना होगा. मनोज को भी अलर्ट करना होगा.’

असलियत जानने के लिए तहसीलदार ने घर की निगरानी शुरू कर दी. चंद दिनों में ही उसे पता चल गया कि बहू मधु बदचलन है. उस का रोहित से टांका भिड़ा है. दोनों बंद कमरे में मर्यादा को तारतार करते हैं. उन्होंने इस बाबत मनोज को अलर्ट किया कि वह अपनी पत्नी मधु व घर पर आने वाले रोहित पर नजर रखे. उन के बारे में पूरे मोहल्ले में खुसरफुसर हो रही है.

मनोज ने इस बाबत मधु से बात की तो वह उसे ही आंखें दिखाते हुए बोली, ”लोगों के बहकावे में आ कर मेरे कैरेक्टर पर शक करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई. रोहित रिश्ते में मेरा देवर है. पोस्ट औफिस की किस्त लेने घर आता है. देवरभाभी के रिश्ते से हम दोनों हंसीमजाक कर लेते हैं. कमाल है, पासपड़ोस के लोग देवरभौजाई के रिश्ते को भी शक की नजर से देखते हैं.’’

आधी रात को चूडिय़ों की आवाज ने खोली पोल

मनोज के पास पत्नी की चरित्रहीनता का कोई सबूत तो था नहीं, सो वह चुप रह गया. उस ने सोचा कि जब तक सच अपनी आंखों से नहीं देखेगा, किसी की बात पर विश्वास नहीं करेगा. मनोज चुप हो गया तो मधु ने इसे अपनी जीत मान लिया. एक महीने तक वह रोहित से दूर रही. उस के बाद फिर अनीति की आग में बदन सिंकने लगे.

उस रोज भी मनोज रोजाना की तरह सुबह 10 बजे ड्यूटी गया था. उस के जाने के बाद ही रोहित उस के घर आ गया. उसी समय मनोज वापस आ गया. मधु और रोहित वासना के नशे में चूर थे. जल्दबाजी में दोनों अंदर से दरवाजा बंद करना भी भूल गए. उढ़का हुआ दरवाजा आहिस्ता से खोल कर मनोज सीधा कमरे में पहुंच गया. वहां का नजारा देख कर उस की आंखें गुस्से से लाल हो गईं.

मधु और रोहित रंगेहाथों पकड़े गए तो दोनों अपराधबोध से कांपने लगे. मनोज ने दोनों की खबर ली. मौके की नजाकत समझ कर मधु ने पति से अपनी गलती की माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने कसम खाई कि भविष्य में वह रोहित से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखेगी. रोहित ने भी मनोज के पैर पकड़ते हुए कहा, ”बड़े भैया, मुझ से बड़ी भूल हो गई, इस बार माफ कर दो. आइंदा ऐसी भूल नहीं होगी.’’

मनोज ने देवरभाभी को इसलिए माफ कर दिया था ताकि मोहल्ले में घर की इज्जत नीलाम न हो. लेकिन इस के बाद वे दोनों पर कड़ी नजर रखने लगा. जिस दिन मनोज रोहित को घर में देख लेता तो उसे फटकार लगाता. मधु जवाबसवाल करती तो वह उस की पिटाई कर देता, परंतु पति की मार का मधु पर कोई असर नहीं पड़ता था. वह रोहित के प्यार में इस कदर पागल थी कि एक दिन भी उस से अलग नहीं रहना चाहती थी. रोहित को भी मधु के बिना चैन नहीं था.

रोहित अब अकसर संडे के दिन आता था. उस दिन मनोज की भी छुट्टी रहती थी, इसलिए वह घर पर ही मिलता था. ऐसा वह इसलिए करता था ताकि आने पर मनोज को शक न हो. उस रोज मधु स्वादिष्ट खाना बनाती थी. शाम को दोनों बैठ कर शराब पीते थे, फिर खाना खाते थे. मधु बड़ी चालाकी से मनोज की सब्जी में नींद की गोलियां पीस कर मिला देती थी. नतीजन खाने के बाद मनोज चारपाई पर लेटता तो कुछ देर बाद उसे नींद आ जाती थी. मनोज जब खर्राटे भरने लगता तो रोहित मधु के कमरे में पहुंच जाता. फिर दोनों रंगरलियां मनाते.

लेकिन मधु की यह चाल ज्यादा समय तक न चली और उस का यह भांडा भी फूट गया. दरअसल, उस रोज मनोज की तबियत कुछ नरम थी. इसलिए उस ने लती होने के बावजूद रोहित के साथ बैठ कर शराब नहीं पी. वह कमरे में जा कर लेट गया. उस ने खाना भी कमरे में ही मंगवा लिया. मधु ने खाने में नशीली गोलियां तो मिलाई थीं, लेकिन उस ने खाना आधाअधूरा ही खाया और थाली चारपाई के नीचे रख दी. कुछ देर बाद मधु उस के कमरे में पहुंची तो मनोज करवट लिए लेटा था. मधु ने समझा कि वह गहरी नींद में है. कुछ देर बाद वह रोहित के बिस्तर पर पहुंच गई.

आधी रात के बाद मनोज पेशाब करने के लिए उठा तो उस के बगल में सो रही मधु गायब थी. वह दबे पांव कमरे से निकल कर आंगन में आ गया. आंगन में आते ही मनोज के पांव ठिठक गए. आंगन से सटे कमरे में फुसफुसाहट और चूडिय़ों के खनकने की आवाजें आ रही थीं. मनोज सधे कदमों से कमरे के पास पहुंचा. दरवाजा उढ़का हुआ था, उस ने दरवाजा ढकेला तो खुल गया. कमरे के अंदर रोहित और मधु निर्वस्त्र हो कर एकदूसरे से गुंथे थे.

रिश्ते के भाई रोहित के साथ मधु को रंगरलियां मनाते देख कर मनोज की मर्दानगी जाग उठी. उस ने पहले दोनों को जलील किया और फिर जम कर मधु की पिटाई की. सुबह उस ने रोहित को भी फटकारा और घर आने को साफ मना कर दिया. अपराधबोध के चलते रोहित चला गया. उस ने मनोज के घर आना बंद कर दिया. रोहित का घर आना बंद हुआ तो मनोज ने राहत की सांस ली, लेकिन यह उस की भूल थी. मधु और रोहित कुछ महीनों तक एकदूसरे से दूर रहे और मोबाइल फोन के जरिए अपनी दिल की लगी बुझाते रहे. उस के बाद उन का फिर से मिलन होने लगा.

मधु रोहित की इस कदर दीवानी थी कि उसे उस के बिना कुछ भी नहीं सुहाता था. अब वह सागभाजी या घर का सामान लाने का बहाना बना कर घर से निकलती और पहुंच जाती रोहित के बताए स्थान पर. जिस्मानी मिलन के बाद मधु घर आ जाती थी. एक रोज मनोज दोपहर में घर आ गया. उस समय घर में ताला लगा था. उस ने पड़ोसियों से मधु के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अकसर घर में ताला लगा कर कहीं चली जाती है. पड़ोसियों की बात सुन यह सोच कर मनोज का माथा ठनका कि कहीं वह रोहित से मिलने तो नहीं जाती. वह सोच ही रहा था कि हाथ में थैला लिए मधु आती दिखाई दी. पास आते ही वह बोली, ”आज इतनी जल्दी आ गए आप?’’

”हां, मैं तो आ गया. पहले तुम बताओ कहां गई थी?’’ मनोज ने मधु को शक की नजर से देखते हुए पूछा.

”और कहां जाऊंगी, सब्जी लेने गई थी.’’ मधु ने रूखी आवाज में जवाब दिया.

”सब्जी लेने क्या रोज जाती होï?’’ मनोज ने सवाल किया तो मधु बोली, ”नहीं, आज ही गई थी.’’

”पड़ोसी तो कहते हैं कि तुम आए दिन घर से निकल जाती हो?’’

”पड़ोसी जलते हैं. उन्हें हमारे घर में कलह कराने में मजा आता है, इसलिए तुम्हारे कान भरते हैं. तुम्हारा बूढ़ा बाप भी मुझे शक की नजर से देखता है और ताकझांक में लगा रहता है और तुम ऐसे शक्की इंसान हो कि भरोसा कर लेते हो.’’ मधु ने पति को बरगलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मनोज नहीं माना. उस ने लांछन लगाते हुए मधु को पीट दिया.

मधु भी ढीठ थी. उस ने तय कर रखा था कि पति कितना भी पूछे, लांछन लगाए पर वह रोहित का साथ नहीं छोड़ेगी. एक रोज मधु रोहित से मिलने पहुंची. वह उसे होटल में ले गया. वहां कमरे में रोहित के सामने उस के मन का दुख आंखों से छलक पड़ा. मधु रोआंसी आवाज में बोली, ”रोहित, मनोज ने मेरा जीना हराम कर दिया है. जब मन होता है, तुम्हारा नाम ले कर मुझे पीटने लगता है. अब मैं उस के साथ नहीं रह सकती. मुझे उस से निजात दिलाओ, नहीं तो मैं खुदकुशी कर लूंगी.’’

”ऐसा मत कहो भाभी,’’ रोहित ने उसे बांहों में भर लिया, ”तुम नहीं मरोगी, बल्कि वह मरेगा जो हमारी खुशियों का दुश्मन है.’’

”यह ठीक रहेगा. उस के जीते जी हम सुख से नहीं जी पाएंगे. तुम किसी सुपारी किलर के जरिए उसे ठिकाने लगवा दो. इस काम के लिए जो रुपया लगेगा, मैं खर्च कर दूंगी. कुछ रुपया पेशगी भी दे दूंगी.’’

पत्नी ने क्यों दी हत्या की सुपारी

भाभी के प्यार में आकंठ डूबे रोहित ने उसे पूरी तरह हासिल करने के लिए ममेरे भाई मनोज की हत्या का फैसला कर लिया. इस के बाद वह सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. लेकिन वह सुपारी किलर हायर करने में सफल नहीं हुआ. रोहित शातिरदिमाग था. उस ने सोचा कि यदि वह स्वयं ही मनोज को ठिकाने लगा दे तो सुपारी किलर को दी जाने वाली रकम उसे ही मिल जाएगी. किसी को कानोकान खबर भी नहीं लगेगी. मन में लालच समाया तो उस ने सावधानी के साथ मधु से मुलाकात की. रोहित ने मधु से कहा कि सुपारी किलर का इंतजाम हो गया है. मोलभाव के बाद साढ़े 3 लाख रुपए में सौदा तय हुआ है. 20 हजार रुपए पेशगी देने होंगे.

रोहित की बात सुन कर मधु बोली, ”रोहित, तुम्हारे प्यार में मैं पागल हूं. तुम्हें पाने के लिए और पति से छुटकारा के लिए मुझे सौदा मंजूर है, लेकिन अभी मेरे पास 15 हजार रुपया है. कल एकदिल रेलवे स्टेशन पर मिलना, वहीं रुपए दे दूंगी. बाकी रकम काम होने के बाद ज्वैलरी बेच कर व एफडी तुड़वा कर दे दूंगी.’’ दूसरे रोज 15 हजार रुपए मिलने के बाद रोहित ने ममेरे भाई मनोज की हत्या का प्लान तैयार किया. इस प्लान में उस ने अपने छोटे भाई राहुल को भी शामिल कर लिया. राहुल बेरोजगार था और पैसेपैसे के लिए परेशान था, इसलिए पैसा मिलने के लालच में भाई का साथ देने को राजी हो गया.

दोनों भाइयों के बीच तय हुआ कि मनोज को इटावा की नुमाइश दिखाने के बहाने इटावा लाया जाए, फिर लौटते समय रास्ते में शराब पिला कर उसे ठिकाने लगा दिया जाए. लेकिन मनोज को नुमाइश दिखाने कैसे लाया जाए. क्योंकि उस के मन में तो रोहित के प्रति गुस्सा भरा था. रोहित ने इस के लिए कोशिश करनी शुरू कर दी. वह उस के घर तो नहीं जाता, लेकिन जब कभी एकदिल कस्बे में मुलाकात हो जाती तो रोहित झुक कर मनोज के पैर छूता, गलती के लिए माफी मांगता, फिर ठेके पर ले जा कर उसे शराब पिलाता. बारबार माफी मांगने और शराब पार्टी करने से कुछ दिनों बाद मनोज के मन में रोहित के प्रति भरा गुस्सा ठंडा पड़ गया.

प्रेमिका के पति की हत्या तो कर दी लेकिन…

3 जनवरी, 2025 की दोपहर रोहित अपनी बाइक से मनोज के एकदिल कस्बा के खेड़ापति मोहल्ला स्थित घर पहुंचा. उस समय मनोज घर पर ही था. रोहित ने उस के पैर छू कर कहा, ”मनोज भैया, इटावा नुमाइश देखने जा रहा हूं. आप भी साथ चलते तो मजा और ही होता. नुमाइश देख कर व खानेपीने के बाद वापस घर आ जाएंगे.’’ चूंकि मनोज शराब का लती था, इसलिए खानेपीने के लालच में रोहित के साथ चलने को राजी हो गया. वह यह भी जानता था कि सारा खर्चा रोहित ही करेगा, इसलिए वह फटाफट तैयार हुआ और रोहित के साथ नुमाइश देखने को बाइक से घर से निकल लिया. अपनी योजना के तहत रोहित ने अपने छोटे भाई राहुल को भी साथ ले लिया.

शाम 5 बजे तीनों इटावा नुमाइश पहुंचे. यहां रात 9 बजे तक वह सब नुमाइश देखते रहे. फिर रोहित मनोज के साथ शराब ठेके पर पहुंचा और दोनों ने शराब पी. राहुल ने शराब नहीं पी. अद्धा बोतल शराब रोहित ने खरीद कर सुरक्षित भी रख ली. इस के बाद तीनों ने एक होटल में खाना खाया. फिर खापी कर तीनों घर वापस जाने को निकल पड़े. योजना के तहत रोहित जब यमुना पुल के करीब सुनवारा बाईपास पर पहुंचा तो उस ने बाइक रोक दी. यहां रोहित ने मनोज को फिर शराब पिलाई. मनोज जब नशे में धुत हो गया, तब रोहित व राहुल ने उसे दबोच लिया और ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों मनोज के शव को यमुना नदी में फेंकने के इरादे से बाइक पर रखा और चल पड़े. लेकिन यमुना नदी तक पहुंचने के पहले ही उन की बाइक फिसल गई और शव सड़क किनारे गिर पड़ा. पकड़े जाने के डर से रोहित व राहुल शव को वहीं छोड़ कर भाग गए. इस बीच मोबाइल फोन के जरिए मधु रोहित के संपर्क में थी. उसे सारी जानकारी मिल रही थी. अब तक रात के 12 बज चुके थे. रोहित ने घर आ कर कार सवार बदमाशों द्वारा मनोज को मारनेपीटने व उस के किडनैप की झूठी खबर फेमिली वालों को दी. यह बात सुनते ही घर में कोहराम मच गया. बेटे के किडनैप की बात सुन कर तहसीलदार घबरा उठा. उस ने फोन के जरिए दामाद श्याम सिंह को खबर दी. मधु त्रियाचरित्र का नाटक कर रोनेपीटने लगी. उस की रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा होने लगे.

सुबह तहसीलदार अपने दामाद श्याम सिंह व अन्य फेमिली वालों के साथ सुनवारा बाईपास के पास पहुंचा और मनोज की खोज शुरू की. यमुना पुल से एक किलोमीटर पहले जब दोनों मानिकपुर जाने वाली रोड पर पहुंचे तो लोगों की भीड़ देखी. पता चला कि किसी युवक की लाश पड़ी है. उस लाश को तहसीलदार ने देखा तो फफक पड़ा, क्योंकि लाश मनोज की थी. लाश जिस जगह सड़क किनारे पड़ी थी, वह क्षेत्र इटावा के बड़पुरा थाने के तहत था, इसलिए पुलिस को सूचना दी गई. सूचना पाते ही बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी पुलिस बल के साथ वहां आ गए.

उन की सूचना पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा सीओ (भरथना) नागेंद्र चौबे भी आ गए. पुलिस अधिकारियों को तहसीलदार ने बताया कि लाश उन के बेटे मनोज की है. कल दोपहर बाद वह रिश्ते के भाई रोहित के साथ नुमाइश देखने गया था. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक मनोज की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी. उस का सिर जख्मी था. देखने से ऐसा लग रहा था कि उस की मौत किसी वाहन से टकराने से हुई थी. शव को पोस्टमार्टम के लिए इटावा के जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.

ससुर ने बहू पर क्यों जताया शक

घटनास्थल पर पिता तहसीलदार मौजूद था. पुलिस अधिकारियों ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने बेटे मनोज की हत्या का शक जाहिर किया. उस ने बताया कि बुसा गांव निवासी रोहित का उस के घर आनाजाना था. रिश्ते में वह मनोज का भाई है. रोहित और उस की बहू मधु के बीच नाजायज रिश्ता बन गया था, जिस का वह और मनोज विरोध करते थे. रोहित ही उसे कल घर से ले गया था. अब मनोज की हत्या की गई या दुर्घटना से मौत हुई, इस का राज तो रोहित और उस की बहू के पेट में ही छिपा है. सुबह बहू भी रोहित के साथ ही चली गई है.

शक के आधार पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने मनोज की मौत के खुलासे के लिए सीओ नागेंद्र चौबे की देखरेख में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम ने रोहित व मधु की टोह में इकदिल, भरथना, लखुना आदि स्थानों पर छापा मारा, लेकिन उन का पता नहीं चला. पुलिस टीम ने रोहित के बुसा गांव स्थित घर पर भी छापा मारा तो पता चला कि रोहित के साथ उस का भाई राहुल भी घर से गायब है. 5 जनवरी, 2025 की दोपहर एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी जमुना पुल के करीब वाहन चेकिंग कर रहे थे. तभी एक बाइक पर 3 सवारी दिखीं. उन्होंने बाइक रोकने का प्रयास किया तो वे भागने लगे. तब पीछा कर पुलिस ने उन्हें दबोच लिया. इन तीनों में एक महिला थी. तीनों को थाना बड़पुरा लाया गया.

थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो पता चला कि महिला का नाम मधु है और वह मृतक मनोज कुमार की पत्नी है. उस के साथ जो अन्य 2 युवक थे, उन में से एक रोहित और दूसरा रोहित का भाई राहुल था.

उन तीनों से जब मनोज की मौत के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने मनोज की हत्या ईंट से सिर कूंचकर करने का जुर्म कुबूला. रोहित ने बताया कि मनोज उस का ममेरा भाई था. घर आनेजाने के दौरान मनोज की पत्नी मधु से उस के संबंध बन गए थे. इस रिश्ते का मनोज विरोध करता था. इसलिए उस ने मधु के साथ मिल कर हत्या की योजना बनाई.

फिर उसे नुमाइश दिखाने के बहाने भाई राहुल के साथ इटावा ले गए. वापसी में राहुल के साथ मिल कर ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी और शव छोड़ कर भाग गए. रोहित ने जुर्म कुबूलने के बाद हत्या में प्रयुक्त ईंट भी बरामद करा दी, जो उस ने झाडिय़ों में फेंक दी थी. एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मनोज की हत्या का खुलासा करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी संजय वर्मा ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और मीडिया के सामने मनोज की हत्या का खुलासा किया. उन्होंने 24 घंटे के अंदर खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 10 हजार रुपए पुरस्कार देने की भी घोषणा की.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल खून से सनी ईंटभी बरामद करा दी थी, इसलिए बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मृतक के पिता तहसीलदार को वादी बना कर बीएनएस की धारा 103(1), 238/61(2) तथा 3(5) के तहत मधु, रोहित व राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

6 जनवरी, 2025 को पुलिस ने मधु, रोहित राहुल को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन तीनों को जिला जेल भेज दिया गया.

 

 

Maharashtra Crime : खाने में जहर खिलाकर पति को मार डाला

Maharashtra Crime : जब महिलाएं पति की व्यस्तता या किसी मजबूरी की वजह से अन्य पुरुष से संबंध बनाती हैं, तब उन्होंने कल्पना भी नहीं की होती है कि यह उन की बरबादी की शुरुआत है. सेना के जवान संजय की पत्नी शीतल ने भी यही किया. नतीजा यह निकला कि उस का पति संजय…

38 वर्षीय संजय भोसले महाराष्ट्र के जनपद सतारा के गांव एक्सल का रहने वाला था. उस के पिता पाडूरंग भोसले की जो थोड़ीबहुत खेती की जमीन थी, उस की उपज से वह परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. गांव में उन की काफी इज्जत और प्रतिष्ठा थी. वह सीधेसरल स्वभाव के व्यक्ति थे. संजय भोसले एक महत्त्वाकांक्षी युवक था. उस की नौकरी भारतीय थल सेना में बतौर ड्राइवर लग गई थी. पुणे में 6 माह की ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग हो गई थी. संजय की नौकरी लग चुकी थी, इसलिए मातापिता उस की शादी करना चाहते थे.

मराठी समाज में जब लड़की शादी योग्य हो जाती है तो लड़की वाले लड़के की तलाश में नहीं जाते, बल्कि लड़के वालों को ही लड़की की तलाश करनी होती है. इसलिए पाडूरंग भोसले भी बेटे संजय के लिए लड़की की तलाश में जुट गए. उन्होंने जब यह बात अपने नाते रिश्तेदारों और जानपहचान वालों में चलाई तो उन के एक रिश्तेदार ने शीतल जगताप का नाम सुझाया. 28 वर्षीय शीतल पुणे शहर के तालुका बारामती, गांव ढाकले के रहने वाले बवन विट्ठल जगताप की बेटी थी. खूबसूरत होने के साथसाथ वह उच्चशिक्षित भी थी. वह डी.फार्मा कर चुकी थी. पाडूरंग भोसले ने बवन विट्ठल से मुलाकात कर अपने बेटे संजय के लिए उन की बेटी शीतल का हाथ मांगा.

संजय पढ़ालिखा था और सेना में नौकरी कर रहा था, इसलिए विट्ठल ने सहमति दे दी. फिर घरवालों ने शीतल और संजय की मुलाकात कराई. हालांकि संजय शीतल से 10 साल बड़ा था, लेकिन वह सरकारी मुलाजिम था, इसलिए शीतल ने उसे पसंद कर लिया. बाद में सामाजिक रीतिरिवाज से अक्तूबर 2008 में दोनों का विवाह हो गया. जहां संजय शीतल को पा कर अपने आप को खुशनसीब समझ रहा था, वहीं शीतल भी मजबूत कदकाठी वाले फौजी संजय से शादी कर के गर्व महसूस कर रही थी. लेकिन शीतल का यह वहम शीघ्र ही धराशायी हो गया. शीलत के हाथों की मेंहदी का रंग अभी छूटा भी नहीं था कि संजय की छुट्टियां खत्म हो गईं. अपनी नईनवेली दुलहन शीलत को उस के मायके छोड़ कर संजय को अपनी ड्यूटी पर जाना पड़ा. जबकि शीतल चाहती थी कि संजय उस के पास कुछ दिन और रहे.

एक खतरनाक इलाके में पोस्टिंग होने के कारण संजय को बहुत कम छुट्टी मिलती थी. ऐसे में शीतल को ज्यादातर समय अपने मायके और ससुराल में ही बिताना पड़ता था. साल दो साल में जब भी संजय को छुट्टी मिलती तभी वह घर आ पाता था. इस बीच शीतल एक बच्चे की मां बन गई थी. आज के जमाने में कोई भी पत्नी अपने पति से दूर नहीं रहना चाहती. लेकिन किसी मजबूरी के चलते उसे समझौता करना पड़ता है. यही हाल शीतल का भी था. उसे अपने मन और तन की प्यास को दबाना पड़ा था. 8 साल इसी तरह बीत गए. इस के बाद संजय का ट्रांसफर पुणे के सेना कैंप में हो गया. शीतल के लिए यह खुशी की बात थी. यहां उसे रहने के लिए सरकारी आवास भी मिल गया था, सो संजय शीतल को पुणे ले आया.

पति के संग रह कर शीतल खुश तो जरूर थी. लेकिन वह खुशी अभी भी उसे नहीं मिल रही थी, जो एक औरत के लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है. यहां भी संजय पत्नी को पूरा समय नहीं दे पाता था. भटकने लगा शीतल का मन हालांकि शीतल 10 वर्षीय बच्चे की मां थी. लेकिन हसरतें अभी भी जवान थीं, जो पति के संपर्क के लिए तरस रही थीं. शीतल का दिन तो बच्चे और घर के कामों में गुजर जाता था लेकिन रात उस के लिए पहाड़ सी बन जाती. एक कहावत है कि नारी सहनशील और बड़े ही धीरज वाली होती है. लेकिन थोड़ी सी सहानुभूति पाने पर वह बहुत जल्दी बहक भी जाती है और उस का फायदा कुछ मनचले लोग उठा लेते हैं.

यही हाल शीतल का भी हुआ. उस के कदम बहक गए. जिस का फायदा योगेश कदम ने उठाया. वह उस की निजी जिंदगी में कब आ गया, इस का शीतल को आभास ही नहीं हुआ. संजय को जो सरकारी क्वार्टर मिला था, किसी वजह से 3 साल बाद उसे वह छोड़ना पड़ा. वह अपनी फैमिली ले कर पुणे के नखाते नगर स्थित अंबर अपार्टमेंट की दूसरी मंजिल के फ्लैट में आ गया. जिस फ्लैट में संजय भोसले अपनी पत्नी और बच्चे को ले कर रहने के लिए आया था. उसी के ठीक सामने वाले फ्लैट में योगेश कदम रहता था. वह एक कैमिकल कंपनी में नौकरी करता था. पड़ोसी होने के नाते पहले ही दिन दोनों का परिचय हो गया. बाद में योगेश का संजय के यहां आनाजाना शुरू हो गया.

अविवाहित योगेश कदम ने जब से शीतल को देखा था, तब से वह उस का दीवाना हो गया था. ऐसा ही हाल शीतल का भी था. जबजब वह योगेश कदम को देखती, उस के मन में एक हूक सी उठती थी. शारीरिक रूप से भी योगेश कदम उस के पति संजय भोसले से ज्यादा मजबूत था. जबजब दोनों की नजरें एकदूसरे से टकरातीं, दोनों के दिलों में हलचल सी मच जाती थी. उन की नजरों में जो चमक होती थी, उसे अच्छी तरह से महसूस करते थे. यही कारण था कि उन्हें एकदूसरे के करीब आने में समय नहीं लगा. योगेश कदम यह बात अच्छी तरह से जानता था कि शीतल अकसर घर में अकेली रहती है. बच्चे को स्कूल छोड़ने के बाद और कभीकभी संजय भोसले की नाइट ड्यूटी लग जाने पर योगेश को शीतल से बात करने का मौका मिल जाता था.

बाद में उस ने शीतल के पति संजय से भी दोस्ती बढ़ा ली, जिस के बहाने वह जबतब शीतल के घर आनेजाने लगा. इस तरह शीतल और योगेश के बीच अवैध संबंध कायम हो गए. जब एक बार मर्यादा की सीमा टूटी तो टूटती ही चली गई. जब भी शीतल और योगेश कदम को मौका मिलता, अपने तनमन की प्यास बुझा लेते थे. योगेश कदम से मिलन के बाद शीतल खुश रहने लगी. उस के चेहरे का रंगरूप बदल गया. वह योगेश के प्यार में इतनी दीवानी हो गई थी कि अब वह पति संजय भोसले की उपेक्षा भी करने लगी. पत्नी के इस बदले रंगरूप और व्यवहार को पहले तो संजय समझ नहीं पाया. लेकिन जब तक समझ पाया, तब तक काफी देर हो चुकी थी.

मामला नाजुक था. लिहाजा एक दिन संजय ने पत्नी को काफी समझाया मानमर्यादा और समाज की दुहाई दी, लेकिन शीतल पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ. पहले तो शीतल घर में ही योगेश के साथ रंगरलियां मनाती थी लेकिन जब संजय ने उस पर निगाह रखनी शुरू कर दी तो वह प्रेमी के साथ मौल और रेस्टोरेंट वगैरह में आनेजाने लगी. जब यह बात संजय को पता चली तो उस ने पत्नी पर सख्ती दिखानी शुरू कर दी. तो इस से शीतल बगावत पर उतर आयी. नतीजा मारपीट तक पहुंच गया. दोनों के बीच अकसर रोजाना ही झगड़ा होता. रोजरोज की कलह से शीतल भी उकता गई. लिहाजा उस ने प्रेमी के साथ मिल कर पति को ही ठिकाने लगाने की योजना बना ली,

लेकिन किसी कारणवश यह योजना सफल नहीं हो सकी. पत्नी की हरकतों से तंग आ कर आखिरकार संजय भोसले ने कहीं दूर जा कर रहने का फैसला किया. यह करीब 5 महीने पहले की बात है. बनने लगी बरबादी की भूमिका साल 2019 के अक्तूबर माह में एक माह की छुट्टी ले कर संजय भोसले ने अपना घर बदल दिया. वह पत्नी और बच्चे को ले कर पुणे के नखाते कालेबाड़ी स्थित एक सोसाइटी में आ गया. लेकिन उसे यहां भी राहत नहीं मिली. शीतल के व्यवहार में जरा भी परिवर्तन नहीं आया. बच्चे के स्कूल और पति के ड्यूटी पर जाने के बाद शीतल फोन कर योगेश को फ्लैट पर बुला लेती थी. किसी तरह यह जानकारी संजय को मिल जाती थी. पत्नी की हठधर्मिता से वह इस प्रकार टूट गया कि उस ने शराब का सहारा ले लिया. शराब के नशे में वह पत्नी को अकसर मारतापीटता था.

इस के अलावा अब वह कभी भी वक्तबेवक्त घर आने लगा, जिस से शीतल और योगेश के मिलनेजुलने में परेशानियां खड़ी हो गईं. इस से छुटकारा पाने के लिए शीतल ने फिर वही योजना बनाई, जो पहले बनाई थी. मौका देख कर शीतल ने योगेश कदम से कहा, ‘‘योगेश तुम अगर मुझ से प्यार करते हो और मुझे पूरी तरह अपना बनाना चाहते हो तो तुम्हें संजय के लिए कोई कठोर कदम उठाना होगा, मतलब उसे हम दोनों के बीच से हटाना पड़ेगा.’’ योगेश कदम भी यही चाहता था. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गया. 8 नवंबर, 2019 की सुबह करीब 5 बजे शिवपुर पुलिस चौकी पर तैनात एसआई समीर कदम को जो सूचना मिली उसे सुन कर वह चौंके.

सूचना देने वाले एंबुलेंस ड्राइवर सूफियान मुश्ताक मुजाहिद, निवासी गांव बेलु, जनपद पुणे ने उन्हें बताया कि शिवपुर टोलनाका क्रौस पुणे सतारा हाइवे पर स्थित होटल गार्गी और कंदील के बीच सर्विस रोड पर एक युवक बुरी तरह घायल पड़ा है. एसआई समीर कदम ने बिना किसी विलंब के इस मामले की जानकारी रायगढ़ थानाप्रभारी दत्तात्रेय दराड़े के अलावा पुलिस कंट्रोलरूम को दी और अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर एसआई अभी वहां का मुआयना कर ही रहे थे कि थानाप्रभारी दत्तात्रेय दराड़े, एसपी संदीप पाटिल और एएसपी अन्नासो जाधव मौकाएवारदात पर आ गए. तब तक वहां पड़ा युवक मर चुका था. उसे देख कर मामला रोड ऐक्सीडेंट का लग रहा था. इसलिए घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर शव पोस्टमार्टम के लिए पुणे के ससून अस्पताल भेज दिया गया.

पुलिस को घटना से एक मोबाइल फोन, ड्राइविंग लाइसेंस और एक डायरी मिली, जिस से पता चला कि मृतक का नाम संजय भोसले है. पुलिस ने फोन से उस की पत्नी शीतल का फोन नंबर हासिल कर के उसे पुलिस चौकी शिवपुर बुला लिया. संजय भोसले की पत्नी शीतल ने संजय भोसले के मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस को पहचान लिया और दहाड़े मारमार कर रोने लगी. पूछताछ में शीतल ने कहा कि उसे नहीं पता है कि संजय घटनास्थल तक कैसे पहुंच गए. आखिर सच आ ही गया सामने शीतल ने आगे बताया कि कल रात उन्होंने परिवार के साथ खाना खाया था. रात 10 बजे के करीब उसे और बच्चे को सोने के लिए बेडरूम में भेज कर खुद हाल में सो गए थे. इस के बाद क्या हुआ, वह कुछ नहीं जानती.

मामला काफी उलझा हुआ था. जांच अधिकारी ने उस समय तो शीतल को घर जाने दिया था. लेकिन उन्होंने उसे क्लीन चिट नहीं दी. उन्हें शीतल के घडि़याली आंसुओं पर संदेह था. बाकी की रही सही कसर पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी कर दी. रिपोर्ट में बताया गया कि मामला दुर्घटना का नहीं है, उसे सल्फास नामक जहरीला पदार्थ दिया गया था, जिस का सेवन तकरीबन 12 घंटे पहले किया गया था. यह जहर कहां से आया, क्यों आया यह जांच का विषय था. पुलिस टीम ने जब गहराई से जांचपड़ताल की और शीतल के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स देखी तो तो वह पुलिस के रडार पर आ गई.

पुलिस ने जब शीतल से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई और अपना गुनाह कबूल कर के प्रेमी योगेश कदम और उस के सहयोगियों का नाम बता दिए. उस ने बताया कि जिस जहरीले पदार्थ से संजय की मौत हुई, वह जहर 7 नवंबर, 2019 को योगेश कदम अपनी कंपनी से लाया था. उस ने वही जहर संजय के खाने में मिला दिया था. जहर खाने से जब उस की मौत हो गई तब उस ने योगेश को वाट्सएप मैसेज भेज कर जानकारी दे दी थी. अब समस्या संजय के शव को ठिकाने लगाने की थी. योगेश ने अपने 2 दोस्तों मनीष कदम और राहुल काले के साथ मिल कर इस का बंदोबस्त पहले ही कर रखा था. उन्होंने एक कार किराए पर ली, उस कार से योगेश रात 2 बजे के करीब शीतल के घर पहुंचा और अपने दोस्तों के साथ संजय भोसले के शव को कार में डाल लिया,

जिसे ये लोग यह सोच कर पुणे सतारा रोड की सर्विस लेन पर डाल आए कि मामला दुर्घटना का लगेगा, लेकिन इस में वह कामयाब नहीं हो सके. शीतल से विस्तृत पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मामले के अन्य अभियुक्तों की धड़पकड़ तेज कर दी और जल्दी ही संजय भोसले हत्याकांड के सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार शीतल संजय भोसले, योगेश कमलाकर राव कदम, मनीष नारायन कदम और राहुल अशोक काले को थानाप्रभारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष पेश किया. उन्होंने भी आरोपियों से पूछताछ की. इस के बाद उन्हें भादंवि की धारा 302, 201, 120बी, 109 के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर पुणे की नरवदा जेल भेज दिया.

 

Bihar Crime : प्रेमी संग रची साजिश और पति को शराब पिला कर हमेशा के लिए सुला दिया

Bihar Crime : लड़कियों या महिलाओं पर बुरी नजर वालों को पता होता है कि उन तक पहुंचने के लिए पहली सीढ़ी उन की तारीफ करना है. रतन ने इसी युक्ति से पुष्पा को पटाया. पति से नाखुश पुष्पा उस के प्रेमजाल में फंस गई और फिर दोनों ने मिल कर…

सांवले रंग का धनंजय सामान्य कदकाठी वाला युवक था. उस की एकमात्र खूबी यही थी कि वह सरकारी नौकरी में था. कहने का अभिप्राय यह कि वह जिंदगी भर अपने परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठा सकता था. बिहार के जिला गोपालगंज के बंगरा बाजार निवासी रामजी मिश्रा ने धनंजय की यही खूबी देख कर उस से अपनी बेटी ब्याही थी. मांबाप ने कहा और खूबसूरत पुष्पा शादी के बंधन में बंध कर मायके की ड्योढ़ी छोड़ ससुराल आ गई. लेकिन उसे धक्का तब लगा, जब उस ने पति को देखा. वह जरा भी उस के जोड़ का नहीं था. पत्नी यदि खूबसूरत हो तो पति उस के हुस्न का गुलाम बन ही जाता है. धनंजय भी पुष्पा का शैदाई बन गया. पुष्पा ने धनंजय की कमजोरी का फायदा उठा कर उसे अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया.

पुष्पा को धनंजय चाहे जैसा लगा हो, लेकिन धनंजय खूबसूरत, पढ़ीलिखी बीवी पा कर खुश था. धनंजय सुबह 9 बजे घर से निकलता था, तो फिर रात 8 बजे के पहले घर नहीं लौटता था. पीडब्ल्यूडी में लिपिक के पद पर कार्यरत धनंजय की ड्यूटी पड़ोसी जिले सीवान में थी. धनंजय को अपने गांव अमवां से सीवान आनेजाने में 2 घंटे लग जाते थे. धनंजय को जितनी पगार मिलती थी, वह पूरी की पूरी पुष्पा के हाथ पर रख देता था. धंनजय के 2 भाई और थे, बड़ा रंजीत और छोटा राजीव. रंजीत मुंबई में तो राजीव दिल्ली में नौकरी करता था. विवाह के बाद से ही धनंजय पुष्पा के साथ अलग घर में रह रहा था. कालांतर में पुष्पा 2 बच्चों की मां बनी. एक बेटा था सौरभ और एक बेटी साक्षी.

गत वर्ष मई महीने में धनंजय के साले का विवाह देवरिया की भुजौली कालोनी में हुआ था. विवाह में धनंजय पांडे की मुलाकात दुलहन के चचेरे भाई रतन पांडे से हुई. मुलाकात के दौरान दोनों की काफी बातें हुई. इसी बातचीत के दौरान धनंजय ने उस से देवरिया में मकान किराए पर दिलाने को कहा तो रतन ने हामी भर दी. विवाह में शामिल  होने के बाद धनंजय और पुष्पा बच्चों के साथ वापस लौट आए. रतन पांडे देवरिया के थाना गौरीबाजार के सिरजम हरहंगपुर निवासी सुभाष पांडेय का बेटा था. सुभाष पांडेय टीवी मैकेनिक थे. 24 वर्षीय रतन 4 बहनों में दूसरे नंबर का था. इंटर पास रतन देवरिया में मोबाइल कंपनी ‘एमआई’ के कस्टमर केयर सेंटर में नौकरी करता था और देवरिया खास में ही किराए पर कमरा ले कर रह रहा था.

धनंजय से बात होने के कुछ ही दिनों के अंदर रतन ने धनंजय को शहर के इंदिरा नगर मोहल्ले में सौरभ श्रीवास्तव का मकान किराए पर दिलवा दिया. धनंजय अपनी पत्नी पुष्पा और दोनों बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. बिहार का सीवान जिला उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की सीमा से सटा है. इसलिए धनंजय को वहां से सीवान जाने में कोई दिक्कत नहीं होती थी, वह अपनी ड्यूटी पर रोजाना आनेजाने लगा. बच्चों का एडमीशन भी पास के एक स्कूल में करा दिया था. धनंजय रोजाना सुबह निकल जाता और देर रात वापस लौटता था. बच्चे भी स्कूल चले जाते थे. पुष्पा घर पर अकेली रह जाती थी. ऐसे में रतन का पुष्पा के पास आनाजाना बढ़ गया. रतन पुष्पा की खूबसूरती पर पहले ही मर मिटा था.

इसीलिए उस ने पुष्पा के नजदीक रहने के लिए धनंजय को देवरिया में किराए पर मकान दिलवाया था. धनंजय के कहने पर वह उस के बच्चों सौरभ और साक्षी को ट्यूशन पढ़ाने लगा था. बच्चों के जन्म के बाद से धनंजय अब पुष्पा में पहले जैसी रुचि नहीं लेता था. वैसे भी जैसेजैसे वैवाहिक जीवन आगे बढ़ता है, कई पतिपत्नी एकदूसरे में दोष खोजने लगते हैं, जो उन के बीच विवाद की जड़ बनते हैं. धनंजय भी पुष्पा में कमियां निकालने लगा था. वैसे भी पुष्पा को तो वह कभी नहीं भाया था, किसी तरह उस के साथ अपनी जिंदगी काट रही थी. जब धनंजय उस के दोष और गलतियां निकालता था तो पुष्पा के अंदर दबा गुस्सा गुबार बन कर बाहर निकल पड़ता था, जिस पर धनंजय उस की पिटाई कर देता था. ऐसा अधिकतर धनंजय के शराब के नशे में होने पर ही होता था. धनंजय मारपिटाई पर उतर आया तो पुष्पा को उस से हद से ज्यादा नफरत हो गई.

रतन ने उस के घर आना शुरू किया तो पुष्पा की नजर उस पर टिकने लगीं. रतन गोराचिट्टा, स्मार्ट और कुंवारा था. पुष्पा ने ऐसे ही युवक की कामना की थी. विवाह से पहले उस की 2 ही इच्छाएं थीं, एक तो उस का जीवनसाथी सरकारी नौकरी वाला हो और दूसरा वह खूबसूरत व स्मार्ट हो. उस की जोड़ी उस के साथ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ जैसी हो. उस की एक इच्छा तो पूरी हो गई थी लेकिन दूसरी इच्छा ने उसे रूला दिया. धनंजय ने कभी भी पुष्पा की तारीफ  नहीं की थी, लेकिन रतन पुष्पा की जम कर तारीफ करता था, साथ ही हंसीमजाक भी. पुष्पा सोचती थी कि रतन को सुंदरता की कद्र करनी आती है, लेकिन धनंजय को नहीं.

रतन लतीफे सुना कर पुष्पा को खूब हंसाता था. उस की पसंदनापसंद की चीजों का ख्याल रखता था. पुष्पा साड़ी या सलवारसूट पहनती तो उसे अपनी राय बताता. इन बातों से पुष्पा मन ही मन बहुत खुश होती. धीरेधीरे पुष्पा को भी रतन की आदत पड़ गई. उस के बिना अब उसे अच्छा नहीं लगता, घर में सब सूनासूना सा महसूस होता. रतन ने पुष्पा को इतनी खुशियां दीं कि वह सोचने को मजबूर हो गई कि काश! मेरा पति रतन जैसा होता, तो कितना अच्छा होता…?

एकांत क्षणों में पुष्पा, रतन की तुलना धनंजय से करने लगती और यह सोच कर मायूस हो जाती कि धनंजय रतन के आगे किसी मामले में नहीं ठहरता. पुष्पा रतन के बारे में ज्यादा सोचती तो उस का मन उस की बांहों में ही सिमटने को मचल उठता. पुष्पा और रतन की निगाहों में एकदूसरे के लिए तड़प भरी रहती थी. पानी का गिलास, चाय का कप लेतेदेते हुए दोनों की अंगुलियों का स्पर्श होता तो दोनों ही ओर चिंगारियां छूटने लगतीं. पुष्पा का रतन रतन का व्यक्तित्व पुष्पा के दिल में हलचल मचाए हुए था तो पुष्पा की आकर्षक देहयष्टि रतन के युवा मन में सरसराहट भरती रहती थी. वह पुष्पा से बिना नजरें मिलाए उस का दीदार करता रहता. उसे पूरी तरह पा कर न सही, स्पर्श कर के ही सुख लूटता रहता.

रतन कुछ कारणों से अपने गांव चला गया तो पुष्पा खुद को फिर तन्हा महसूस करने लगी. उसे ऐसा लगा, जैसे उस की रूह निकल कर चली गई हो और मुरदा जिस्म वहां रह गया हो. धनंजय सीवान से अपनी ड्यूटी से वापस लौटता, रात में जब वह उस से संसर्ग करता, तब भी वह मुर्दों की तरह निष्क्रिय पड़ी रहती. धनंजय उस के व्यवहार से इसलिए स्तब्ध नहीं हुआ, क्योंकि वह जानता था कि पुष्पा उस से बिलकुल खुश नहीं है. उधर गांव गए रतन का हाल भी ऐसा ही था. पुष्पा को याद कर के वह रात भर करवटें बदलता रहता, आंखें बंद करता तो सपने में पुष्पा ही नजर आती. जो वह हकीकत में करने की ख्वाहिश रखता था, उसे कल्पना में ही कर के खुद को तसल्ली दे लेता था.

आखिर रतन गांव से शहर लौटा तो पुष्पा से मिलने गया. पुष्पा उस समय अकेली थी. उसे रतन की यादों ने बेहाल कर रखा था. रतन को देखते ही पुष्पा का चेहरा खिल उठा. रतन के अंदर आते ही पुष्पा ने लपक कर दरवाजा बंद कर दिया. फिर नाराजगी प्रकट करते हुए बोली, ‘‘क्या इस तरह मुझे तड़पाना अच्छा लगता है तुम्हें?’’

‘‘मैं समझा नहीं.’’ रतन अंजान बनते हुए बोला.

‘‘कितने दिन हो गए तुम्हें. मैं तुम्हारी सूरत देखने को तरस गई थी.’’ पुष्पा ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘सच,’’ रतन खुश होते हुए बोला,‘‘मैं यही सुनने को तो गैरहाजिर था. मैं देखना चाहता था कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए कितनी चाहत है. अगर ऐसा नहीं करता, तो तुम शायद आज अपने दिल की बात मुझ से न कहतीं.’’

‘‘तुम सच कह रहे हो रतन. तुम ने मुझ पर न जाने कैसा जादू कर दिया है कि मैं हर पल तुम्हारे बारें में ही सोचती रहती हूं.’’ कहते हुए उस ने रतन के गले में बांहें डाल दीं.

‘‘यही हाल मेरा भी है पुष्पा. जिस दिन तुम्हारा दीदार नहीं होता, वह दिन पहाड़ सा लगता है.’’ पुष्पा की पतली कमर में हाथ डालते हुए रतन ने उसे अपने करीब खींचा और उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

पुष्पा के होंठों में ऐसी तपन थी, कि रतन को लगा जैसे उस ने अंगारों को छू लिया हो. पुष्पा के होंठों से अपने होंठ अलग करते हुए उस ने पुष्पा की सुरमई आंखों में झांका, तो लगा जैसे उन में पूरा मयखाना समाया हो. पुष्पा की नशीली आंखों, फूलों जैसे रुखसार, सुराही जैसी गरदन और उस के नाजुक अंगों को देख कर रतन के रोमरोम में लहर सी दौड़ गई. गजब तो तब हुआ, जब पुष्पा ने अपने बंधे हुए गेसू खोल दिए. थोड़ी देर पहले ही उस ने सिर धोया था. सावन की घटाओं से भी श्यामवर्ण गेसू कमर के नीचे उभारों को छूने लगे, तो रतन बोल पड़ा, ‘‘वाह पुष्पा, क्या लाजवाब हुस्न है तुम्हारा.’’

पुष्पा ने खिलखिला कर हंसते हुए पूछा, ‘‘वो कैसे?’’

‘‘आइने में देख लो, खुद समझ जाओगी.’’

‘‘वो तो मैं तुम्हारी आंखों में देख कर समझ रही हूं.’’

‘‘क्या देख रही हो मेरी आंखों में?’’ रतन ने पूछा.

‘‘बेईमानी. किसी का माल हड़पने के लिए नीयत खराब कर रहे हो.’’ पुष्पा ने हौले से रतन के गाल पर चपत लगाई.

‘‘अगर वह माल लाजवाब और मीठा हो तो उसे उठा कर मुंह में रख लेने में कैसी झिझक. सच में दिल कर रहा है कि आज मैं तुम्हें लूट ही लूं.’’

‘‘तो रोका किस ने है?’’ कहते हुए पुष्पा रतन के गले से झूल गई और बोली,‘‘आओ लूट लो मेरे हुस्न के इस अनमोल खजाने को. मैं तो कब से तुम्हें सौंपने को बेताब थी.’’

रतन का गला सूखने लगा था, ‘‘कोई आ गया तो?’’

‘‘कोई नहीं आ रहा अभी, तुम निश्चिंत रहो.’’

इस के बाद दोनों वासना के खेल में डूबते चले गए. घर की तनहाई दोनों के दिलों की ही नहीं जिस्मों के मिलन की भी साक्षी बन गई. इस के बाद तो रोज ही उन के बीच यह खेल खेला जाने लगा. रतन ने पुष्पा को दिया अपने नाम वाला सिम रतन ने पुष्पा को एक सिम खरीद कर दे दिया. उस ने सिम को अपने मोबाइल में डाल लिया. पुष्पा इस सिम का इस्तेमाल केवल रतन से बात करने के लिए करती थी. धनंजय की अनुपस्थिति में रतन पूरे दिन पुष्पा के साथ उस के घर में मौजूद रहता. उस के साथ समय बिताता तो उन पलों को अपने स्मार्टफोन में भी कैद कर लेता. वह अपने मोबाइल से अंतरंग पलों के फोटो और वीडियो भी बनाता था.

18 अप्रैल की सुबह बंद चीनी मिल के परिसर में कुछ युवक लकड़ी लेने गए. इस बीच उन की नजर एक पेड़ के नीचे पड़ी एक लाश पर गई. उन्होंने आसपास के लोगों को बताया तो चंद मिनटों में वहां काफी भीड़ इकट्ठा हो गई. 112 नंबर पर काल कर के पुलिस को लाश मिलने की सूचना दी गई. घटनास्थल थाना कोतवाली देवरिया में आता था, इसलिए कंट्रोल रूम से यह सूचना कोतवाली पुलिस को दे दी गई. सूचना पा कर इंसपेक्टर टीजे सिंह अपनी पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. मृतक की उम्र 40-42 वर्ष रही होगी. उस के चेहरे को किसी भारी वस्तु से कूंचा गया था. चेहरा क्षतविक्षत होने के कारण मृतक की पहचान होना मुश्किल था. उस के गले पर भी कसे जाने के निशान मौजूद थे.

घटनास्थल पर लाश से कुछ दूरी पर खून से सना एक ईंट का टुकड़ा पड़ा मिला. हत्यारे ने उसी ईंट के टुकड़े से मृतक का चेहरा कुचला था. इंसपेक्टर टीजे सिंह निरीक्षण कर ही रहे थे कि तभी एसपी डा. श्रीपति मिश्र, एएसपी शिष्यपाल, सीओ सिटी निष्ठा उपाध्याय समेत अन्य अधिकारी भी वहां पहुंच गए. अधिकारियों ने भी लाश व घटनास्थल का निरीक्षण किया. इंसपेक्टर टीजे सिंह के आदेश पर कुछ सिपाहियों ने मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो कपड़ों से मृतक का आधार कार्ड मिल गया, जिस में मृतक का नाम धनंजय पांडे लिखा था और पता देवरिया की सीमा से सटे बिहार के गोपालगंज जिले के कुचायकोट थाना क्षेत्र में आने वाले गांव अमवा का लिखा था.

मृतक के घर वालों को कुचायकोट थाना पुलिस के जरीए सूचना भेजी गई. इस के बाद पुलिस अधिकारी इंसपेक्टर टीजे सिंह को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर वापस लौट गए. सूचना पर मृतक के घर वाले और ससुराल वाले वहां पहुंचे. उन लोगों ने धनंजय की लाश की शिनाख्त कर दी. लाश की शिनाख्त होने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया. कोतवाली लौट कर इंसपेक्टर टीजे सिंह ने धनंजय पांडे के ससुर रामजी मिश्रा की लिखित तहरीर के आधार पर अज्ञात के विरूद्ध भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू करते हुए इंसपेक्टर टीजे सिंह ने सर्वप्रथम पुष्पा से पूछताछ की, जो कि घटना से एक महीने पहले से अपने मायके में रह रही थी.

उन्होंने पुष्पा से पूछा, ‘‘धनंजय की किसी से कोई दुश्मनी थी या उस का किसी से हाल ही में कोई लड़ाईझगड़ा हुआ था?’’

‘‘सर, उन की किसी से दुश्मनी नहीं थी और न ही उन का किसी से लड़ाईझगड़ा हुआ था. वह तो सुबह अपने आफिस के लिए निकल जाते थे और रात में लौटते थे.’’

‘‘फिर भी कोई दुश्मनी रही हो, याद करने की कोशिश कीजिए.’’

‘‘सर, मेरी जानकारी में तो नहीं है, अगर औफिस में कोई बात हुई हो तो मुझे पता नहीं. मेरे पति आफिस की कोई भी बात मुझे नहीं बताते थे.’’

पुष्पा बड़े ही सहज भाव से सवालों का जवाब दे रही थी. उस के चेहरे के भावों और बोलने के अंदाज से यह कतई नहीं झलक रहा था कि वह पति की मौत से गमगीन है. यह बात मन में शक पैदा करने वाली थी. पुष्पा के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए इंसपेक्टर टीजे सिंह ने एक और सवाल दागा, ‘‘घर में कौनकौन आता था?’’

‘‘सर, हम देवरिया में किराए पर रह रहे थे. हमारी किसी से जानपहचान नहीं है. इसलिए कोई भी नहीं आताजाता था.’’

‘‘कोई भी नहीं?’’ इंसपेक्टर टीजे सिंह ने उस की आंखों से आंखें मिला कर उस का सच और झूठ पकड़ने के लिए एक बार फिर एकएक शब्द पर जोर देते हुए पूछा. इंसपेक्टर सिंह को घुमाती रही पुष्पा इंसपेक्टर टीजे सिंह द्वारा इस तरह पूछने पर पुष्पा एक पल के लिए हड़बड़ाई, लेकिन अगले ही पल खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘जी सर कोई नहीं, बस मेरे बच्चों को पढ़ाने के लिए रतन पांडे आता था. वह हमारा दूर का रिश्तेदार है, उसी ने हमें देवरिया में रहने के लिए किराए पर मकान दिलवाया था.’’

‘‘तो बताना चाहिए था न… मैं दोबारा न पूछता तो आाप बताती भी नहीं.’’

‘‘सर, वह तो घर का ही है, बाहर का नहीं, इसीलिए नहीं बताया.’’ पुष्पा ने सफाई दी.

‘‘ये आप हमें तय करने दें कि कौन क्या है, हमारे निशाने पर सभी होते हैं चाहे घर के हों या बाहर के. वैसे भी अधिकतर केसों में हत्यारा घर का अपना ही कोई निकलता है.’’ कह कर टीजे सिंह ने पुष्पा की तरफ  देखा तो उस के चेहरे पर आने वाले भाव देख कर वह मुस्करा उठे और फिर उठते हुए बोले, ‘‘खैर अब मैं चलता हूं, जरूरत पड़ी तो आप से दोबारा पूछताछ करूंगा.’’

‘‘जी सर.’’

टीजे सिंह वहां से चले गए. वहां से निकलने से पहले वह पुष्पा का मोबाइल नंबर लेना नहीं भूले. इंसपेक्टर सिंह ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई साथ ही जिस मोबाइल में सिम पड़ा था. उस मोबाइल में दूसरे सिम भी डाले गए थे तो उन सिम के नंबरों की भी डिटेल्स देने को कहा गया. जब पुष्पा के बताए नंबर की काल डिटेल आई तो उस में कुछ खास नहीं मिला. लेकिन साथ में एक और नंबर की काल डिटेल्स आई थी. वह नंबर भी पुष्पा अपने डबल सिम वाले मोबाइल में प्रयोग कर रही थी. लेकिन उस नंबर के बारे में पुष्पा ने कुछ नहीं बताया था. उस नंबर से केवल एक नंबर पर ही रोज बात की जाती थी. उस नंबर की डिटेल्स निकलवाई तो वह नंबर रतन पांडे के नाम पर था. रतन वही था जो धनंजय के घर ट्यूशन पढ़ाने आता था. उस का पता किया तो वह घर से फरार मिला.

20 अप्रैल को इंसपेक्टर टीजे सिंह ने एक मुखबिर की सूचना पर अमेठी तिराहे के खोराराम मोड़ से रतन पांडे को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो रतन ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया, साथ ही हत्या की वजह भी बता दी. इस के बाद इंसपेक्टर सिंह पुष्पा को उस के मायके से गिरफ्तार कर के थाने ले आए.

थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बरगलाने की कोशिश की कि रतन ने उस के अश्लील फोटो व वीडियो बना लिए थे, जिन के सहारे वह उसे ब्लैकमेल कर रहा था. उसी ने उस के पति की हत्या की है. लेकिन जब सख्ती दिखाई गई तो उस ने सच उगल दिया. पुष्पा रतन को अपनी जान से भी ज्यादा चाहने लगी थी, उसी के साथ विवाह कर के वह अपनी आगे की जिंदगी गुजारना चाहती थी. इस के लिए वह रतन के साथ भाग जाती और विवाह कर लेती. लेकिन जिंदगी सिर्फ प्यार से नहीं गुजरती, पैसों की भी जरूरत होती है. रतन छोटीमोटी नौकरी करता था, उस से उस का खुद का गुजारा ही नहीं हो पाता था. ज्यादा पैसा तो सरकारी नौकरी में ही मिलता है जो कि धनंजय के पास थी. इसलिए पैसों की उसे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई.

पुष्पा को सरकारी नौकरी का मोह था. इसलिए उस ने इस का रास्ता निकाल लिया. उस रास्ते पर चल कर उस की सारी इच्छाएं पूरी हो सकती थीं. वह रास्ता था धनंजय की मौत. धनंजय के मरने से पुष्पा को एक तो उस से छुटकारा मिल जाता, दूसरे उस की जगह मृतक आश्रित कोटे से उसे नौकरी मिल जाती और तीसरा वह रतन से विवाह कर के आराम से जिंदगी गुजार सकती थी. पुष्पा अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए पति के खून से हाथ रंगने को तैयार थी. वह यह भूल गई कि केवल सोचने भर से जिंदगी आसान नहीं हो जाती. सब कुछ मनचाहा नहीं होता.

वह जिस रास्ते पर चलने को आमादा थी उस पर उसे सरकारी नौकरी तो नहीं जेल की सलाखें जरूर मिलने वाली थीं. दूसरी ओर धनंजय को अपनी मौत के षड़यंत्र का कैसे पता चलता, जबकि उसे पुष्पा और रतन के अवैध संबंधों तक की जानकारी नहीं थी. पुष्पा अपने इरादों को अंजाम तक पहुंचाने को आतुर थी. रतन तो पहले से ही पुष्पा से बारबार धनंजय को मार देने की बात कहता रहता था. वह तो पुष्पा की तरफ से बस हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहा था. पुष्पा ने अपने दिल की पूरी बात रतन को बता दी. इस के बाद दोनों ने धनंजय की हत्या की योजना बनाई. योजनानुसार 16 मार्च, 2020 को पुष्पा बच्चों के साथ अपने मायके गोपालगंज चली गई.

एक महीना पूरा होने पर 17 अप्रैल की शाम 4 बजे पुष्पा ने रतन को फोन कर के धनंजय की हत्या करने को कहा. काश! धनंजय शराब के लालच में न पड़ता 18 अप्रैल की रात 8 बजे के करीब रतन ने धनंजय को शराब पीने के लिए बंद चीनी मिल परिसर में बुलाया. धनंजय के वहां पहुंचने पर रतन ने एक ईंट के टुकडे़ से उस के सिर पर प्रहार किया. धनंजय दर्द से बिलबिला उठा. इसी बीच रतन ने पास में उगी गिलोय की बेल उखाड़ कर धनंजय के गले में डाल दी और पूरी ताकत से कस दिया.

दम घुटने से धनंजय की मौत हो गई. इस के बाद रतन ने धनंजय के चेहरे को बुरी तरह से कुचल दिया. फिर धनंजय की जेब से मोबाइल निकाल कर रतन वहां से चला गया. उस ने वाट्सऐप पर मैसेज कर के पुष्पा को धनंजय की मौत की जानकारी दे दी. पुष्पा द्वारा मैसेज देख लेने के बाद रतन ने वह मैसेज डिलीट कर दिया. लेकिन दोनों पकड़े गए. रतन ने अपना एंड्रायड मोबाइल फारमेट कर दिया था. इसलिए उस मोबाइल का डाटा रिकवर करने के लिए इंसपेक्टर टीजे सिंह ने मोबाइल में डाटा रिकवरी ऐप इंस्टाल किया और मोबाइल का पूरा डाटा रिकवर कर लिया. मोबाइल की गैलरी में रतन व पुष्पा के अनगिनत फोटो मिले, जिस में कई अश्लील भी थे, जिन को उन्होंने सुबूत के तौर रख लिया.

अभियुक्त रतन के पास से इंसपेक्टर सिंह ने धनंजय का मोबाइल भी सिम सहित बरामद कर लिया. हत्या में प्रयुक्त ईंट का टुकड़ा पहले ही घटनास्थल से बरामद हो गया था. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज  दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Extramarital Affair : पड़ोसी के प्यार में पागल पत्नी ने कराया पति का कत्ल

Extramarital Affair : तमाम पतिपत्नियों की तरह कपिल और खुशबू में लड़ाईझगड़ा होता था. लेकिन खुशबू इस झगड़े को नाक का सवाल बना कर मायके चली गई, जहां उस के संबंध चंदन से बन गए. खुशबू को चंदन की यारी ऐसी भाई कि उस ने…

दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना शाहीनबाग के अंतर्गत नई बस्ती ओखला के रहने वाले कपिल की ससुराल उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के आसफाबाद में थी. करीब 3 साल पहले किसी बात को ले कर उस का अपनी पत्नी खुशबू से विवाद हो गया था. तब खुशबू अपने मायके चली गई थी और वापस नहीं लौटी थी. इतना ही नहीं, ढाई साल पहले खुशबू ने फिरोजाबाद न्यायालय में कपिल के खिलाफ घरेलू हिंसा व गुजारा भत्ते का मुकदमा दायर कर दिया था. कपिल हर तारीख पर फिरोजाबाद कोर्ट जाता था और तारीख निपटा कर देर रात दिल्ली लौट आता था. 10 फरवरी, 2020 को भी वह इसी मुकदमे की तारीख के लिए दिल्ली से फिरोजाबाद आया था. वह रात को घर नहीं पहुंचा तो घर वालों ने उसे 11 फरवरी की सुबह फोन किया.

लेकिन उस का फोन बंद मिला. इस से घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने 11 फरवरी की शाम तक कपिल का इंतजार किया. इस के बाद उन की चिंता और भी बढ़ गई. 12 फरवरी को कपिल की मां ब्रह्मवती, बहन राखी, मामा नेमचंद और मौसी सुंदरी फिरोजाबाद के लिए निकल गए. कपिल की ससुराल वाला इलाका थाना रसूलपुर क्षेत्र में आता है, इसलिए वे सभी थाना रसूलपुर पहुंचे और कपिल के रहस्यमय तरीके से गायब होने की बात बताई. थाना रसूलपुर से उन्हें यह कह कर थाना मटसैना भेज दिया गया कि कपिल कोर्ट की तारीख पर आया था और कोर्ट परिसर उन के थानाक्षेत्र में नहीं बल्कि थाना मटसैना में पड़ता है.

इसलिए वे सभी लोग उसी दिन थाना मटसैना पहुंचे, लेकिन वहां भी उन की बात गंभीरता से नहीं सुनी गई. ज्यादा जिद करने पर मटसैना पुलिस ने कपिल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. गुमशुदगी दर्ज कर के उन्हें थाने से टरका दिया. इस के बाद भी वे लोग कपिल की फिरोजाबाद में ही तलाश करते रहे. इसी बीच 15 फरवरी की दोपहर को किसी ने थाना रामगढ़ के बाईपास पर स्थित हिना धर्मकांटा के नजदीक नाले में एक युवक की लाश पड़ी देखी. इस खबर से वहां सनसनी फैल गई. कुछ ही देर में भीड़ एकत्र हो गई. इसी दौरान किसी ने इस की सूचना रामगढ़ थाने में दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी श्याम सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने शव को नाले से बाहर निकलवाया. मृतक के कानों में मोबाइल का ईयरफोन लगा था.

पुलिस ने युवक की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन वहां मौजूद लोगों में से कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने उस अज्ञात युवक की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय फिरोजाबाद भेज दी. कपिल की मां ब्रह्मवती और बहन राखी उस समय फिरोजाबाद में ही थीं. शाम के समय जब उन्हें बाईपास स्थित नाले में पुलिस द्वारा किसी अज्ञात युवक की लाश बरामद किए जाने की जानकारी मिली तो मांबेटी थाना रामगढ़ पहुंच गईं. उन्होंने थानाप्रभारी श्याम सिंह से अज्ञात युवक की लाश के बारे में पूछा तो थानाप्रभारी ने उन्हें फोन में खींचे गए फोटो दिखाए. फोटो देखते ही वे दोनों रो पड़ीं, क्योंकि लाश कपिल की ही थी. इस के बाद थानाप्रभारी ब्रह्मवती और उस की बेटी राखी को जिला अस्पताल की मोर्चरी ले गए.

उन्होंने वह लाश दिखाई तो दोनों ने उस की शिनाख्त कपिल के रूप में कर दी. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद थानाप्रभारी ने भी राहत की सांस ली. थानाप्रभारी ने शव की शिनाख्त होने की जानकारी एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह को दे दी और उन के निर्देश पर आगे की काररवाई शुरू कर दी. थानाप्रभारी श्याम सिंह ने मृतक कपिल की मां ब्रह्मवती और बहन राखी से बात की तो उन्होंने बताया कि कपिल की पत्नी खुशबू चरित्रहीन थी. इसी बात पर कपिल और खुशबू के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस के बाद खुशबू मायके में आ कर रहने लगी थी. राखी ने आरोप लगाया कि खुशबू ने ही अपने परिवार के लोगों से मिल कर उस के भाई की हत्या की है.

पुलिस ने राखी की तरफ से मृतक की पत्नी खुशबू, सास बिट्टनश्री, साले सुनील, ब्रजेश, साली रिंकी और सुनील की पत्नी ममता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. चूंकि रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस ने मृतक की पत्नी खुशबू व उस की मां को हिरासत में ले लिया. उन से कड़ाई से पूछताछ की गई. खुशबू से की गई पूछताछ में पुलिस को कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी, बस यही पता चला कि कपिल पत्नी के चरित्र पर शक करता था. फिर भी पुलिस यह समझ गई थी कि एक अकेली औरत कपिल का न तो मर्डर कर सकती है और न ही शव घर से दूर ले जा कर नाले में फेंक सकती है. पुलिस चाहती थी कि कत्ल की इस वारदात का पूरा सच सामने आए.

इस बीच जांच के दौरान पुलिस को एक अहम सुराग हाथ लगा. किसी ने थानाप्रभारी को बताया कि खुशबू चोरीछिपे अपने प्रेमी चंदन से मिलती थी. दोनों के नाजायज संबंधों का जो शक किया जा रहा था, उस की पुष्टि हो गई. जाहिर था कि हत्या अगर खुशबू ने की थी तो कोई न कोई उस का संगीसाथी जरूर रहा होगा. इस बीच पुलिस की बढ़ती गतिविधियों और खुशबू को हिरासत में लिए जाने की भनक मिलते ही खुशबू का प्रेमी चंदन और उस का साथी प्रमोद फरार हो गए. इस से उन दोनों पर पुलिस को शक हो गया. उन की सुरागरसी के लिए पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया. मुखबिर की सूचना पर घटना के तीसरे दिन पुलिस ने खुशबू के प्रेमी चंदन व उस के साथी प्रमोद को कनैटा चौराहे के पास से हिरासत में ले लिया. दोनों वहां फरार होने के लिए किसी वाहन का इंतजार कर रहे थे.

थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई. थाने में जब चंदन और प्रमोद से खुशबू का आमनासामना कराया गया तो तीनों सकपका गए. इस के बाद उन्होंने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने खुशबू, उस के प्रेमी चंदन उर्फ जयकिशोर निवासी मौढ़ा, थाना रसूलपुर, उस के दोस्त प्रमोद राठौर निवासी राठौर नगर, आसफाबाद को कपिल की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त रस्सी, मोटा सरिया व मोटरसाइकिल बरामद कर ली. खुशबू ने अपने प्यार की राह में रोड़ा बने पति कपिल को हटाने के लिए प्रेमी व उस के दोस्त के साथ मिल कर हत्या का षडयंत्र रचा था. खुशबू ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस तरह थी—

क्षिणपूर्वी दिल्ली की नई बस्ती ओखला के रहने वाले कपिलचंद्र की शादी सन 2015 में खुशबू के साथ हुई थी. शादी के डेढ़ साल तक सब कुछ ठीकठाक रहा. कपिल की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी. करीब 3 साल पहले जैसे उस के परिवार को नजर लग गई. हुआ यह कि खुशबू अकसर मायके चली जाती थी. इस से कपिल को उस के चरित्र पर शक होने लगा. इस के बाद पतिपत्नी में तकरार शुरू हो गई. पतिपत्नी में आए दिन झगड़े होने लगे. गुस्से में कपिल खुशबू की पिटाई भी कर देता था. गृहक्लेश के चलते खुशबू अपने बेटे को ले कर अपने मायके में आ कर रहने लगी. ढाई साल पहले उस ने कपिल पर घरेलू हिंसा व गुजारा भत्ते के लिए फिरोजाबाद न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया.

मायके में रहने के दौरान खुशबू के अपने पड़ोसी चंदन से प्रेम संबंध हो गए थे. हालांकि चंदन शादीशुदा था और उस की 6 महीने की बेटी भी थी. कहते हैं प्यार अंधा होता है. दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे थे. मायके में रहने के दौरान चंदन खुशबू के पति की कमी पूरी कर देता था. लेकिन ऐसा कब तक चलता. एक दिन खुशबू ने चंदन से कहा, ‘‘चंदन, हम लोग ऐसे चोरीछिपे आखिर कब तक मिलते रहेंगे. तुम मुझ से शादी कर लो. मैं अपने पति से पीछा भी छुड़ाना चाहती हूं. लेकिन वह मुझे तलाक नहीं दे रहा. अगर तुम रास्ते के इस कांटे को हटा दोगे तो हमारा रास्ता साफ हो जाएगा.’’

दोनों एकदूसरे के साथ रहना चाहते थे. चंदन को खुशबू की सलाह अच्छी लगी. इस के बाद खुशबू व उस के प्रेमी चंदन ने मिल कर एक षडयंत्र रचा. मुकदमे की तारीख पर खुशबू और कपिल की बातचीत हो जाती थी. खुशबू ने चंदन को बता दिया था कि कपिल हर महीने मुकदमे की तारीख पर फिरोजाबाद कोर्ट में आता है. 10 फरवरी को अगली तारीख है, वह उस दिन तारीख पर जरूर आएगा. तभी उस का काम तमाम कर देंगे. कपिल 10 फरवरी को कोर्ट में अपनी तारीख के लिए आया. कोर्ट में खुशबू व कपिल के बीच बातचीत हो जाती थी. कोर्ट में तारीख हो जाने के बाद खुशबू ने उसे बताया, ‘‘अपने बेटे जिगर की तबीयत ठीक नहीं है. वह तुम्हें बहुत याद करता है. उस से एक बार मिल लो.’’

अपने कलेजे के टुकड़े की बीमारी की बात सुन कर कपिल परेशान हो गया और तारीख के बाद खुशबू के साथ अपनी ससुराल पहुंचा. कपिल शराब पीने का शौकीन था. खुशबू के प्रेमी व उस के दोस्त ने कपिल को शराब पार्टी पर आमंत्रित किया. शाम को ज्यादा शराब पीने से कपिल नशे में चूर हो कर गिर पड़ा. कपिल के गिरते ही खुशबू ने उस के हाथ पकड़े और प्रेमी चंदन व उस के साथी प्रमोद ने साथ लाई रस्सी से कपिल के हाथ बांधने के बाद उस के सिर पर मोटे सरिया से प्रहार कर उस की हत्या कर दी. कपिल की हत्या इतनी सावधानी से की गई थी कि पड़ोसियों को भी भनक नहीं लगी. हत्या के बाद उसी रात उस के शव को मोटरसाइकिल से ले जा कर बाईपास के किनारे स्थित नाले में डाल दिया गया. 15 फरवरी को शव से दुर्गंध आने पर लोगों का ध्यान उधर गया.

एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह ने बताया कि कपिल की हत्या के मुकदमे में नामजद आरोपियों की भूमिका की जांच की जा रही है. जो लोग निर्दोष पाए जाएंगे, उन्हें छोड़ दिया जाएगा. पुलिस ने तीनों हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने के बाद न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया. निजी रिश्तों में आई खटास के चलते खुशबू ने अपनी मांग का सिंदूर उजाड़ने के साथ पतिपत्नी के पवित्र रिश्ते को कलंकित कर दिया. वहीं कांच की चूडि़यों से रिश्तों को जोड़ने के लिए मशहूर सुहागनगरी फिरोजाबाद को रिश्तों के खून से लाल कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित