Crime Stories: शादी पर दिया मौत का तोहफा

Crime Stories: ‘‘मैं जया को बेइंतहा चाहता था, बहुत प्यार करता था उस से. इतना प्यार कि मैं पागल हो गया था उस के लिए. अपने जीतेजी मैं उसे किसी और की जागीर बनते नहीं देख सकता था. इसलिए मैं ने उसे मौत के घाट उतार दिया.’’ कहतेकहते अनुराग पलभर के लिए रुका, फिर आगे बोला, ‘‘अब ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, फांसी हो जाएगी. मुझे फांसी भी मंजूर है. कम से कम एक बार में ही मौत तो आ जाएगी. वह किसी और की हो जाती तो मुझे रोजरोज मरना पड़ता.’’

पुलिस हिरासत में यह सब कहते हुए अनुराग नामदेव अपना गुनाह कुबूल कर रहा था या फिर अपनी मोहब्बत की दास्तां सुना कर दिल की भड़ास निकाल रहा था, समझ पाना मुश्किल था. उस की ये बातें सुन कर वहां मौजूद पुलिसकर्मी भी हैरान थे. वजह यह कि इस कातिल के चेहरे पर शर्मिंदगी या पछतावा तो दूर की बात, किसी भी तरह का डर नहीं था.पुलिस हिरासत में अच्छे अच्छे अपराधियों के कसबल ढीले पड़ जाते हैं, पर अनुराग का आत्मविश्वास वाकई अनूठा था. उस की हर बात जया से अपनी मोहब्बत के इर्दगिर्द  घूम रही थी. मानों दुनिया में उस के लिए जया और उस के प्यार के अलावा और कुछ था ही नहीं.

लालघाटी क्षेत्र भोपाल का वह हिस्सा है, जहां शहर खत्म हो जाता है और उपनगर बैरागढ़ शुरू होता है. लालघाटी का चौराहा और रास्ता दोनों भोपाल-इंदौर मार्ग पर पड़ते हैं, जहां चौबीसों घंटे आवाजाही रहती है. एयरपोर्ट भी इसी रास्ते पर है और शहर का चर्चित वीआईपी रोड भी इसी चौराहे पर आ कर खत्म होता है.पिछले 15 सालों में लालघाटी चौराहे और बैरागढ़ के बीच करीब 2 दर्जन छोटेबड़े मैरिज गार्डन बन गए  . इन्हीं में एक है सुंदरवन मैरिज गार्डन. शादियों के मौसम में यह इलाका काफी गुलजार हो उठता है. रास्ते के दोनों तरफ बारातें ही बारातें दिखती हैं. घोड़ी पर सवार दूल्हे, उन के आगे नाचतेगाते बाराती और आसमान छूती रंगबिरंगी आतिशबाजी. नजारा वाकई देखने वाला होता है. शादियों के चलते इस रास्ते पर ट्रैफिक जाम की समस्या आम बात है.

8 मई को सुंदरवन मैरिज गार्डन में रोजाना के मुकाबले कुछ ज्यादा रौनक और चहलपहल थी. रात 8 बजे से ही मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. इस मैरिज गार्डन में डा. जयश्री नामदेव और डा. रोहित नामदेव की शादी होनी थी. वरवधू दोनों ही भोपाल के हमीदिया अस्पताल में कार्यरत थे. डा. जयश्री बाल रोग विभाग में थीं और डा. रोहित सर्जरी डिपार्टमेंट में कार्यरत थे.

जयश्री और रोहित की शादी एक तरह से अरेंज मैरिज थी. जयश्री नामदेव 4 साल पहले ही जबलपुर मेडिकल कालेज से पीजी की डिग्री ले कर भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर तैनात हुई थीं. जयश्री के आने से पहले हमीदिया अस्पताल में एक ही डाक्टर नामदेव थे डा. रोहित. अब दूसरी नामदेव डा. जयश्री आ गई थीं. डा. जयश्री स्वभाव से बेहद हंसमुख और मिलनसार थीं. अस्पताल में स्वाभाविक तौर पर उन की खूबसूरती की चर्चा भी होती रहती थी.

अस्पताल में नामदेव सरनेम वाले 2 डाक्टर थे और दोनों कुंवारे. अगर दोनों शादी कर लें तो कितना अच्छा रहेगा. जयश्री और रोहित को ले कर अस्पताल में अकसर इस तरह का हंसीमजाक होता रहता था. डा. जयश्री के पिता घनश्याम नामदेव को जब पता चला कि उन्हीं की जाति का एक लड़का हमीदिया अस्पताल में डाक्टर है तो उन्होंने अपने स्तर पर पता लगा कर जयश्री की शादी की बातचीत चलाई.रोहित के पिता रघुनंदन नामदेव जिला हरसूद के गांव छनेरा के रहने वाले थे और सिंचाई विभाग में कार्यरत थे. जयश्री और  की शादी की बात चली तो रोहित के घर वाले भी तैयार हो गए. दोनों ही परिवारों के लिए यह खुशी की बात थी, क्योंकि नामदेव समाज में गिनती के ही लड़के लड़कियां डाक्टर हैं.

घनश्याम नामदेव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के कर्मचारी थे, जो रिटायरमेंट के बाद भोपाल के करोंद इलाके में बस गए थे. करोंद में उन्होंने खुद का मकान बनवा लिया था. उन की पत्नी लक्ष्मी घरेलू लेकिन जिम्मेदार महिला थीं. नामदेव दंपति की एक ही बेटी थी जयश्री. होनहार और मेधावी जयश्री ने 2003 में प्री मेडिकल परीक्षा पास करने के बाद भोपाल के गांधी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस किया था और फिर जबलपुर मैडिकल कालेज से पोस्ट ग्रेजुएट.

बहरहाल, डा. रोहित और डा. जयश्री की शादी तय हो गई. 3 फरवरी, 2014 को पुराने भोपाल के एक होटल में रोहित और जयश्री की सगाई की रस्म पूरी की गई. सगाई के बाद दोनों पक्ष शादी की तैयारियों में लग गए.घनश्याम की छोटी बहन अंगूरीबाई का विवाह सागर जिले के गढ़ाकोटा कस्बे में हुआ था. अब से डेढ़ साल पहले उस के पति कल्लूराम की कैंसर से मौत हो गई थी. बहनोई के अंतिम संस्कार का सारा  घनश्याम ने ही उठाया था. अंगूरीबाई के 2 बेटे थे अनुराग नामदेव और अंबर नामदेव. अंबर अभी पढ़ रहा था.  इस परिवार का खरचा कपड़ों के पुश्तैनी व्यापार से चलता था. लेकिन उन का यह व्यापार मामूली स्तर का था, जिसे कल्लूराम के छोटे भाई उमाशंकर नामदेव संभालते थे.

पति की मृत्यु के बाद अंगूरी की सारी दुनिया अपने दोनों बेटों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थी, क्योंकि वह खुद भी कैंसर की चपेट में आ गई थी. बहन की वजह से घनश्याम उस के और उस के बच्चों को ले कर चिंतित रहते थे. समयसमय पर वह उन की हर मुमकिन मदद भी करते रहते थे.जब कल्लूराम जीवित थे तो  दफा उन्होंने घनश्याम से अनुराग की नौकरी के लिए बात छेड़ी थी. इस पर उन्होंने उसे भोपाल आ कर बैंकिंग की कोचिंग लेने को कहा था. अनुराग को सहूलियत यह थी कि रहने और खानेपीने के लिए मामा का घर था. घनश्याम ने कोचिंग की फीस देने के लिए भी कह दिया था. यह सन 2005 की बात है. तब जयश्री एमबीबीएस के दूसरे साल में थी.

मामा से बातचीत के बाद अनुराग भोपाल आ गया और सबधाणी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करने लगा. मामा मामी और ममेरी बहन जयश्री उस का पूरा खयाल रखती थी. सभी को उस के घर के हालात की वजह से सहानुभूति थी. कोचिंग के दौरान एक बार अनुराग गंभीर रूप से बीमार पड़ा तो जयश्री और उस के मामा मामी ने उसे हमीदिया अस्पताल में भरती करवाया. उस की देखभाल से ले कर उस के इलाज का सारा खर्च भी उन्होेंने ही उठाया. मामा के यहां रहते हुए अनुराग जयश्री को एकतरफा प्यार करने लगा था.

कोचिंग के बाद अनुराग का चयन एचडीएफसी बैंक में पीओ के पद पर हो गया. उसे पोस्टिंग मिली सागर में. नौकरी जौइन करने के बाद वह सागर के पौश इलाके सिविल लाइंस में किराए का मकान ले कर रहने लगा. लेकिन सागर जाने के बाद भी भोपाल से उस का नाता नहीं टूटा. अनुराग जयश्री को प्यार से जया कहता था, लेकिन उस का यह प्यार एक भाई का नहीं, बल्कि एक ऐसे आशिक का था, जिसे न तो रिश्तेनातों का लिहाज था और न मान मर्यादाओं की परवाह.

दरअसल अनुराग मन ही मन जयश्री को चाहने लगा था और यह मान कर चल रहा था कि वह भी उसे चाहती है. नजदीकी रिश्तों में इस उम्र में दैहिक आकर्षण स्वाभाविक बात है, पर समझ आने के बाद वह खुद ब खुद खत्म हो जाता है. लेकिन अनुराग यह बात समझने को तैयार नहीं था कि हिंदू सभ्यता में सामाजिक रूप से भी और कानूनी रूप से भी ऐसे रिश्तों में प्यार, सैक्स और शादी सब कुछ वर्जित है.

अनुराग ने जब अपना प्यार जयश्री पर जाहिर किया तो वह सकते में आ गई. अनुराग उस का फुफेरा भाई था और जयश्री को सपने में भी उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. जयश्री ने अपने स्तर पर ही अनुराग को समझाने की कोशिश की. लेकिन अनुराग आसानी से समझने वालों में नहीं था. जब भी मौका मिलता, वह उस से अपने प्यार की दुहाई दे कर शादी की बात कहता रहता. जब अनुराग जयश्री पर बराबर दबाव बनाने की कोशिश करने लगा तो मजबूरी में उस ने यह बात अपने मातापिता को बता दी.

हकीकत जान कर लक्ष्मी और घनश्याम के पैरों तले से जमीन खिसक गई. फिर भी उन्होंने बेटी को सब्र और समझदारी से काम लेने की सलाह दी और जल्दी ही इस परेशानी का हल निकालने का भरोसा दिलाया. निकट की रिश्तेदारी का मामला था. ऐसे में इस का एक ही रास्ता था कि अंगूरी से बात की जाए, ताकि संबंध खराब न हों. बात की भी गई. बड़े भाई के उपकारों तले दबी अंगूरी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह अनुराग को समझाएगी.

लेकिन अनुराग के तथाकथित प्यार का पागलपन समझने समझाने की हदें पार कर चुका था. मां के समझाने पर वह मान भी गया, पर दिखावे और कुछ दिनों के लिए. वक्त गुजरता रहा, लेकिन अनुराग के दिलोदिमाग से ममेरी बहन जयश्री की प्रेमिका की छवि नहीं मिट सकी. मायूस हो कर वह लुटेपिटे आशिकों की तरह दर्द भरे गानों और शेरोशायरी में अपने बीमार दिल की दवा ढूंढने लगा. लेकिन इस से उस का दर्द बढ़ता ही गया.

3 फरवरी को जयश्री और रोहित की सगाई थी. जयश्री के पिता घनश्याम ने इस की भनक अनुराग को नहीं लगने दी. लेकिन रोहित ने सगाई के 2 दिनों बाद 5 फरवरी को अपनी सगाई के फोटो फेसबुक पर शेयर किए तो उन्हें देख कर अनुराग बिफर उठा. उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उस के जख्मों पर नमक छिड़क दिया हो.

उस ने बगैर वक्त गंवाए घनश्याम और जयश्री से संपर्क कर के न केवल शादी की अपनी बेहूदी ख्वाहिश जाहिर की, बल्कि न मानने पर उन्हें देख लेने की धमकी भी दे डाली. उस की बात सुन कर घनश्याम चिंता में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्योंकि कोई कानूनी काररवाई करते तो बदनामी का डर था. वैसे भी एक तो सगी बहन के लड़के का मामला था, दूसरे ऐसे मामलों में बात उछलने पर बदनामी लड़की की ही होती है.

डा. जयश्री इसलिए ज्यादा चिंतित नहीं थी, क्योंकि उन्होंने अपने मंगेतर डा. रोहित को अनुराग के बारे में सब कुछ बता दिया था. यह एक पढ़ीलिखी युवती का अपने भविष्य और दांपत्य के मद्देनजर समझदारी भरा कदम था. उधर फेसबुक पर जयश्री और राहुल की सगाई के फोटो देखदेख कर अनुराग का जुनून और बढ़ता जा रहा था. धमकी के बावजूद घनश्याम और जयश्री पर कोई असर न होता देख वह और भी बौखला गया था. उसे लग रहा था कि अब जयश्री उसे नहीं मिल पाएगी.

दूसरी ओर भोपाल में शादी की तैयारियों में लगे घनश्याम चिंतित थे कि कहीं अनुराग कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे. उस की बेहूदी हरकतों के बारे में सोचसोच कर कभीकभी वह यह सोच कर गुस्से से भी भर उठते थे कि जिस भांजे को बेटे की तरह रखा, वही आस्तीन का सांप निकला. उन के दिमाग में अनुराग की यह धमकी बारबार कौंध जाती थी कि अगर मेरी बात नहीं मानी तो अंजाम भुगतने को तैयार रहना.

उन के डर की एक वजह यह भी थी कि वह अनुराग के स्वभाव को जानते थे. लेकिन जवान बेटी का बाप होने की बेबसी उन्हें कोई कदम नहीं उठाने दे रही थी. इसलिए शादी के कुछ दिनों पहले उन्होंने अपने भतीजे शैलेंद्र नामदेव से इस बारे में सलाहमशविरा किया तो उस ने फोन पर अनुराग को ऊंचनीच समझाने की कोशिश की. इस पर अनुराग का एसएमएस आया कि तू अपनी दोनों बेटियों का खयाल रख, उन्हें अभी बहुत जीना है.

आखिरकार डरते सहमते 8 मई आ गई. उस दिन जयश्री और रोहित की शादी थी. रात के करीब 8 बजे रोहित और जयश्री स्टेज पर बैठे थे. परिचित और रिश्तेदार आने शुरू हुए तो 9 बजे तक मैरिज गार्डन में काफी भीड़ जमा हो गई. हर कोई खुश था. खासतौर से दोनों के घर वाले और हमीदिया अस्पताल के बाल रोग विभाग और शल्य चिकित्सा विभाग के डाक्टर्स और कर्मचारी. खाने के पहले या बाद में लोग स्टेज पर जा कर वरवधू को शुभकामनाएं और आशीर्वाद दे रहे थे. घनश्याम और लक्ष्मी भी लोगों की शुभकामनाएं लेते यहां वहां घूम रहे थे. उन की जिंदगी का वह शुभ समय नजदीक आ रहा था, जब उन्हें एकलौती बेटी के कन्यादान की जिम्मेदारी निभानी थी.

तभी अचानक भीड़ में अनुराग को देख कर लक्ष्मी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं तो वह पति को ढूंढने लगी. घनश्याम नहीं दिखे तो कुछ सोच कर वह एकांत में जा कर खड़ी हो गईं. उसे इस तरह खड़ा देख, उस की एक पड़ोसन ने आ कर पूछा भी कि क्या हुआ जो इस तरह घबराई हुई हो. इस पर लक्ष्मी ने इशारा कर के पड़ोसन को दरवाजे के पास खड़े अनुराग के बारे में बताया.

अनुराग एकदम सामान्य नजर आ रहा था और मेहमानों की तरह ही घूम रहा था. उस के गले में सफेद रंग का गमछा लटका था. तब तक रात के 10 बज चुके थे और भीड़ छटने लगी थी. इस के बावजूद स्टेज के पास वरवधू के साथ फोटो खिंचवाने वालों की लाइन लगी हुई थी. दूसरी ओर अनुराग की निगाहें स्टेज पर ही जमी थीं.

अचानक अनुराग स्टेज की तरफ बढ़ा और पास जा कर रोहित को बधाई दी. इस से पहले कि डा. रोहित उसे धन्यवाद दे पाते, अनुराग ने फुरती से रिवाल्वर निकाला और जयश्री की तरफ तान कर 2 फायर कर दिए. दोनों गोलियां जयश्री के सीने में धंस गईं. कोई कुछ समझ पाता, इस के पहले ही डा. जयश्री स्टेज पर गिर  पड़ीं. इसी बीच अनुराग ने अविलंब रोहित को निशाने पर ले लिया, लेकिन तब तक वह संभल चुके थे. नतीजतन गोली स्टेज के पीछे जा कर लगी, जिस के कुछ छर्रे रोहित के दोस्त कचरू सिसोदिया के पैर में लगे.

करीब 2 मिनट सकते में रहने के बाद जब लोगों को समझ में आया कि दुलहन पर गोली चली है तो उन्होंने गोली चलाने वाले अनुराग को पकड़ कर उस की धुनाई शुरू कर दी. उधर स्टेज पर रोहित जयश्री को संभाल रहे थे. इस बीच वहां मौजूद लेगों में से किसी ने पुलिस और अस्पताल में खबर कर दी थी. जयश्री को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. लेकिन डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. फायर से भगदड़ मच गई थी. डर कर कई लोग वहां से भाग भी गए थे. जहां कुछ देर पहले तक हंसीमजाक चल रहा था, रौनक थी, वहां अब सन्नाटा पसर गया था. स्टेज पर रखे तोहफे और गुलदस्ते डा. जयश्री के खून से सन गए थे.

गुस्साई भीड़ ने अनुराग की जम कर धुनाई की थी, जिस से वह बेहोश हो कर गिर गया था. पुलिस आई तो पता चला कि वह जिंदा है. उसे तुरंत इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. अब तक किसी को यह नहीं मालूम था कि अनुराग दुलहन का ममेरा भाई है. दूसरे दिन जिस ने भी सुना, स्तब्ध रह गया. अपनी ममेरी बहन को माशूका मानने वाले इस सिरफिरे आशिक की चलाई 2 गोलियों की गूंज भोपाल में ही नहीं, पूरे देश भर में सुनाई दी. जब जयश्री की मौत की पुष्टि हो गई तो रात 2 बजे रोहित और उस के पिता बारात वापस ले कर अपने गांव छनेरा चले गए. एक ऐसी बारात, जिस के साथ दुल्हन नहीं थी.

बाद में पता चला कि वारदात के दिन अनुराग सागर से अपने एक दोस्त की मोटरसाइकिल मांग कर लाया था और देसी रिवाल्वर उस ने कुलदीप नाम के एक दलाल से 17 हजार रुपए में खरीदी थी. कत्ल की सारी तैयारियां उस ने पहले ही कर ली थीं. सुंदरवन मैरिज गार्डन में प्रवेश के पहले ही वह पूरी रिहर्सल कर चुका था. उसे इंतजार बस मौका मिलने का था, जो उस वक्त मिल गया जब डा. रोहित और जयश्री स्टेज पर लोगों की शुभकामनाएं ले रहे थे.

पुलिस हिरासत में अनुराग ने बताया कि जैसे ही जयश्री ने राहुल के गले में माला डाली, मैं ने अपना आपा खो दिया था. मुझे नहीं मालूम कि लोगों ने मुझे मारा भी था. मैं तो खुद को भी गोली मारने वाला था, लेकिन मौका नहीं मिला. घायल अनुराग को हमीदिया अस्पताल के बजाय दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. दरअसल पुलिस को डर था कि कहीं अस्पताल के लोग उसे मार न डालें. क्योंकि जयश्री वहां काम करती थी. इस बीच कोहेफिजा थाना पुलिस ने उस के खिलाफ जयश्री की हत्या का मामला दर्ज कर लिया था.

दूसरे दिन पोस्टमार्टम के बाद जब जयश्री की अर्थी उठी तो नामदेव दंपत्ति का दुख देख सारा मोहल्ला रो उठा. लक्ष्मी और घनश्याम रह रह कर बेटी की अर्थी पर सिर पटक रहे थे. हमीदिया अस्पताल में भी मातम छाया था. एकतरफा प्यार में डूबा अनुराग दरअसल मनोरोगी बन गया था. जिस जुनून में उस ने वारदात को अंजाम दिया था, उसे इरोटोमेनिया भी कहते हैं और डिल्यूजन औफ लव भी. इस रोग में मरीज अपनी बनाई मिथ्या धारणा को ही सच मान कर चलता है और किसी के समझाने पर भी नहीं मानता. ऐसा मरीज बेहद शातिर और खतरनाक होता है.

जयश्री और अनुराग के बीच में क्या कभी प्रेमिल संबंध रहे थे, जैसा कि अनुराग कह रहा है, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. बहरहाल सच जो भी रहा हो, जयश्री के साथ चला गया. घनश्याम नामदेव ने बदनामी से बचने की जो कोशिश की थी, वह उन्हें काफी महंगी पड़ी. अगर वह वक्त रहते भांजे के खिलाफ कानूनी काररवाई करते तो जयश्री बच सकती थी. Crime Stories

Love Story Hindi Kahani: प्रेमिका ही क्यों झेले शक के ताने

Love Story Hindi Kahani: 29 वर्षीय रितिका सेन को 2 बच्चों के बाप सचिन राजपूत से प्यार हो गया. सचिन भी रितिका को अपना दिल दे बैठा. सचिन उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगा. एकदूसरे को दिलोजान से चाहने वाले इस प्रेमी युगल के संबंधों में कड़वाहट भी पैदा हो गई. फिर एक दिन यही कलह उस मुकाम पर पहुंची कि…

27 जून, 2025 की रात को भी रितिका देर से घर लौटी तो उस के चरित्र को ले कर सचिन ने एक बार फिर से गंभीर टीकाटिप्पणी की तो रितिका की उस से तीखी नोकझोंक हो गई.

”मैं जानता हूं कि तू अपने बौस के साथ गुलछर्रे उड़ा कर आ रही है, इसी कारण घर आने में देर हुई.’’

”तुम्हें शर्म आनी चाहिए ऐसी बात कहते हुए.’’ रितिका कह देती, ”कोई एक बात तो बताओ जो मुझे चरित्रहीन साबित कर दे. कम से कम तोहमत लगाने से पहले मेरी नौकरी करने वाली कंपनी में जा कर लोगों से पूछ तो लेते मेरा चरित्र कैसा है. मैं नौकरी सिर्फ इसलिए करती हूं कि जब तक तुम बेरोजगार हो, तब तक घर अच्छे से चल सके.’’ रितिका ने समझाया.

”मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं है, मैं सब जानता हूं. तुझे घर चलाने की फिक्र नहीं, बौस से मिलने की फिक्र ज्यादा होती है.’’ सचिन ने ताना दिया.

उसी समय सचिन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया था. सचिन देर रात तक जागता रहा. रात तकरीबन 12 बजे का समय था, समूचे गायत्री नगर में सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी सचिन ने पूरी ताकत से रितिका का गला दबा दिया. उस की चीख भी नहीं निकल सकी. सचिन के शक्की मिजाज ने उसे हैवान बना दिया था. लगभग साढ़े 3 साल से सचिन राजपूत के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही रितिका को मौत के घाट उतारते वक्त उस के हाथ नहीं कांपे. हत्या करने के बाद उस की लाश चादर में लपेट कर बैड पर रख दिया और 2 दिनों तक लाश के बगल में शराब पी कर बिना किसी हिचकिचाहट के सोता रहा.

अपनी प्रेमिका की हत्या करने के बाद जैसे ही सचिन राजपूत नशे की हालत से बाहर आया तो उस ने मिसरोद में रहने वाले अपने दोस्त अनुज उपाध्याय को फोन कर अपनी प्रेमिका रितिका की हत्या की सूचना दे दी. रितिका की हत्या बात सुन कर पहले तो अनुज को सचिन की बात पर भरोसा नहीं हुआ, लेकिन जब सचिन ने जोर दे कर कहा तो अनुज उपाध्याय ने बिना देरी किए बजरिया थाने की एसएचओ शिल्पा कौरव को इस की सूचना दे दी. हत्या की सूचना पा कर एसएचओ शिल्पा कौरव तुरंत अपने सहायकों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गईं. रास्ते में ही उन्होंने इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी थी.

कुछ देर में वह गायत्री नगर, भोपाल के फ्लैट नंबर 34 पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल और शव का बारीकी से निरीक्षण किया. रितिका की लाश 48 घंटे से ज्यादा समय तक चादर में लिपटे पड़े रहने से डीकंपोज (खराब) होने लगी थी, अत: उन्होंने जरूरी काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और फ्लैट में ही मौजूद मृतका के हत्यारे लिवइन पार्टनर सचिन राजपूत को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी. पूछताछ में सचिन ने अपनी प्रेमिका रितिका सेन की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

उधर जिस फ्लैट में रितिका और सचिन पिछले 9 महीने से किराए पर रह रहे थे, उस के मालिक शैलेंद्र वर्मा ने पुलिस को बताया कि वह तो दोनों को पतिपत्नी ही समझते थे. फ्लैट किराए पर लेते वक्त सचिन ने रितिका को अपनी पत्नी बताया था. हालांकि रितिका की मांग में सिंदूर भरा न देख मेरी पत्नी ने रितिका को टोका भी था. तब रितिका ने कहा था कि आंटीजी, मैं प्राइवेट कंपनी में काम करती हूं, वहां कोई भी शादीशुदा महिला मांग भर कर नहीं आती, इसलिए मैं भी नहीं भरती. वैसे भी मैं नए खयालातों की हूं. गहनता से की गई पूछताछ में ऐसी कहानी निकल कर सामने आई कि पुलिस भी सोचने पर मजबूर हो गई. चौंकाने वाली बात यह थी कि सचिन राजपूत ऐसा हैवान था, जिसे अपनी प्रेमिका की हत्या करने का तनिक भी मलाल नहीं था.

29 वर्षीय रितिका सेन और सचिन राजपूत के बीच शुरुआत में मोबाइल पर प्यार भरी बातों का सिलसिला शुरू हुआ, फिर छोटीछोटी मुलाकातें जब आगे बढ़ीं तो दोनों के दिलों में प्यार का अंकुर फूटने लगा. कुछ ही दिनों में उस ने वृक्ष का रूप अख्तियार कर लिया. कुछ समय तक पिकनिक स्पौट, कैफे और पार्क में मुलाकातें करने के बाद दोनों ने बिना किसी हिचकिचाहट के लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला कर लिया. यह बात जैसे ही दोनों के फेमिली वालों को मालूम हुई तो उन्होंने इस का विरोध किया. क्योंकि रितिका सेन समाज की थी, जबकि सचिन जाति से राजपूत था. इतना ही नहीं, वह 2 बच्चों का बाप था और रितिका के चक्कर में पत्नी से तलाक लेने की कोशिश कर रहा था. दोनों के फेमिली वाले उन की आशिकी को ले कर परेशान थे.

फेमिली वालों ने उन्हें हर तरह से समझाया. ऊंचनीच का वास्ता दिया, लेकिन फेमिली वालों के विरोध की परवाह किए बिना ही दोनों भोपाल के गायत्री नगर इलाके में किराए पर फ्लैट ले कर रहने लगे. शुरुआत के दिनों में दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहते हुए बेहद खुश थे. सचिन विदिशा जिले के सिरोंज का रहने वाला था, जबकि रितिका भोपाल की. वह अपने फेमिली वालों को छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी. इस का असर यह हुआ कि वे एकदूसरे की अच्छाइयों और कमजोरी को जान गए. समय अपनी गति से गुजरता रहा. इस बीच सचिन रितिका के मोबाइल फोन के हर वक्त बिजी रहने से काफी तनावग्रस्त रहने लगा था. क्योंकि वह जब भी उसे फोन करता, उस का मोबाइल व्यस्त ही आता था. सचिन समझ नहीं पा रहा था कि वह हर वक्त किस से बात करती है.

इसी हकीकत को जानने के लिए सचिन ने एक दिन उस का मोबाइल चैक किया तो पता चला कि वह घंटों अपने बौस से बातें करती है. सचिन समझ गया कि रितिका और उस के बौस के बीच अवश्य चक्कर है. चरित्र पर संदेह करने की वजह से दोनों में अकसर लड़ाई होने लगी थी. यह लड़ाई कभीकभी मारपीट तक पहुंच जाती थी. सचिन बेरोजगार था. रितिका के नौकरी करने से किसी तरह उस की गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी. रितिका को प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने की वजह से घर आने में अकसर देर हो जाती थी. उधर अकसर उस का मोबाइल फोन भी व्यस्त रहता था.

यह बात सचिन को कतई पसंद नहीं थी. रितिका जिस दिन भी घर देर से आती, सचिन जरूर उस से झगड़ा करता. अनेक बार रितिका ने सचिन को समझाया भी कि देखो, तुम्हारा शक झूठा है. तुम्हें घर पर निठल्ले बैठेबैठे शक करने की बीमारी हो गई है. इस उम्र में मैं अपने बौस से इश्क लड़ा कर क्या अपना भविष्य चौपट करूंगी.

”मैं सब जानता हूं, तुम जैसी लड़कियां अपने प्रेमी को बहलाने के लिए इसी तरह की नौटंकियां किया करती हैं,’’ सचिन ने गहरी नजर से घूरते हुए कहा.

रितिका ने कहा, ”तुम्हें तो कोई चिंता है नहीं, तुम यूं ही शक करते रहे तो न जाने एक दिन क्या होगा.’’

सचिन अपने शक से बाहर निकलने को कतई तैयार नहीं था. रितिका सचिन को समझातेसमझाते थक चुकी थी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था.

27 जून, 2025 की रात रितिका ने सचिन से दोटूक शब्दों में कहा, ”आए दिन तुम मेरे चरित्र पर तोहमत लगाते रहते हो, यह अच्छी बात नहीं है.’’

रितिका की बात पर सचिन को ताव आ गया. बोला, ”तेरी जुबान आजकल कुछ ज्यादा ही चलने लगी है,’’ कहते हुए उस ने रितिका पर हाथ छोड़ दिया. कहते हैं कि शक इंसान को किसी भी हद तक सोचने पर मजबूर कर देता है, एक बार शक ने पैर जमाए तो वह दिमाग में घर कर के बैठ गया, लाख समझाने के बाद भी सचिन का शक बढ़ता गया तो वह खोयाखोया रहने लगा. शक पूरी तरह से उस की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. जिस दिन भी रितिका देर शाम अपनी नौकरी से घर वापस आती, सचिन ने घर में तूफान खड़ा कर देता.

बात 26 जून, 2025 की है. शाम के 6 बजे थे. उस दिन सचिन का मन रितिका से तकरार हो जाने की वजह से कुछ उखड़ा हुआ था, लेकिन इस के बावजूद भी वह अपने मित्र अनुज उपाध्याय को ले कर अपने फ्लैट पर आया था. फ्लैट के भीतर कदम रखते ही सचिन ने मित्र को बैठक में बिठा दिया और रितिका को आवाज लगाई. कई बार आवाज लगाने के बावजूद रितिका ने कोई जवाब नहीं दिया, इस पर सचिन बैडरूम का दरवाजा धकेल कर जैसे ही बैडरूम में घुसा, उस ने रितिका को गहरी नींद में सोता हुआ पाया. तब वह बोला, ”रितिका डार्लिंग, देखो मेरे साथ कौन आया है?’’

फिर भी रितिका ने कोई उत्तर नहीं दिया. तब सचिन अपने दोस्त की ओर मुंह कर धीरे से बोला, ”गहरी नींद में सो रही है.’’

जबकि असलियत यह थी कि उसे नींद से जगाने का साहस सचिन जुटा नहीं पा रहा था. इस की वजह थी, बीती रात रितिका के साथ हुई उस की तीखी नोकझोंक. रितिका के चरित्र को ले कर शुरू हुई नोकझोंक में जितना सचिन ने कहा, उस से कहीं ज्यादा जलीकटी बातें रितिका ने उसे सुना दी थीं. एक तरह से रितिका ने अपना सारा गुस्सा उस पर उतार दिया था. सुबह होने पर सचिन ने रितिका को गुस्से के मूड में ही पाया. वह अपनी नौकरी पर जाने से पहले गुमसुम रह कर किचन में अपने लिए लंच तैयार करने में जुटी हुई थी. इस दौरान न तो सचिन ने रितिका से एक भी शब्द बोला और न रितिका ने अपनी जुबान खोली. यहां तक कि उस ने बेमन से नाश्ता तैयार किया.

दरअसल, रितिका अपना काम मेहनत और लगन से करती थी, जिस से उस के बौस उस से काफी खुश थे. रितिका का अपने बौस से बेझिझक और खुल कर बातें करना सचिन के संदेह का कारण बन गया, जो वक्त के साथ गंभीर होता जा रहा था. सचिन इस के लिए रितिका को कई बार समझा भी चुका था, लेकिन रितिका ने उस पर ध्यान नहीं दिया था. उस का कहना था कि कंपनी में वह जिस माहौल में काम करती है, उस में बौस से ले कर अन्य कर्मचारियों से संपर्क में रहना ही पड़ता है. मगर सचिन यह मानने को तैयार नहीं था. रितिका के चरित्र को ले कर सचिन राजपूत का संदेह दिनप्रतिदिन गहरा होता जा रहा था.

सचिन बीती रात से ले कर सुबह होने तक की यादों से तब बाहर निकला, जब उस के दोस्त अनुज ने आवाज लगाई, ”सचिन, क्या हुआ, सब खैरियत तो है न? रितिका भाभी कहीं गई हैं क्या?’’

”अरे नहीं यार, अभी तक वह सो रही है. लगता है गहरी नींद में है, उसे गहरी नींद से जगाना उचित नहीं होगा.’’ सचिन वहीं से तेज आवाज में बोला.

”कोई बात नहीं, तुम यहां आ जाओ.’’ अनुज बोला और सचिन ने बैडरूम का दरवाजा खींच कर बंद कर दिया.

संयोग से दरवाजे के हैंडल पर उस का हाथ लग गया और दरवाजा खट से तेज आवाज के साथ बंद हो गया. इसी खटाक की आवाज से रितिका की नींद भी खुल गई. सचिन बैडरूम से निकल कर अपने दोस्त अनुज के पास आ कर बैठ गया. कुछ देर में रितिका भी आंखें मलती हुई बैडरूम से किचन में चली गई. किचन में जाते हुए उस की नजर बैठक में बैठे सचिन के दोस्त अनुज उपाध्याय पर पड़ गई थी. अनुज ने भी रितिका को देख लिया था और देखते ही तुरंत बोल पड़ा, ”भाभीजी नमस्ते, कैसी हैं आप?’’

थोड़ी देर में रितिका ने एक ट्रे में पानी से भरे 2 गिलास टेबल पर रख दिए. अनुज ने भी पानी पीने के बाद खाली गिलास ट्रे में रख दिया. रितिका अनुज से परिचित थी और यह भी जानती थी कि यह सचिन का करीबी दोस्त है. इस कारण उस के मानसम्मान में कभी कोई कमी नहीं रखती थी. अनुज से अनौपचारिक बातें करने के बाद दोबारा वह किचन में चली गई. कुछ मिनट में ही रितिका अनुज और सचिन के पास 3 कप चाय के ट्रे में ले कर उन के सामने ही सोफे पर बैठ गई थी. हकीकत में अनुज को सचिन के साथ आया देख कर रितिका कुछ सुकून महसूस कर रही थी. वह भी बीती रात से ले कर कुछ समय पहले तक के मानसिक तनाव से उबरना चाह रही थी.

रितिका ने चाय का कप उठा कर मुसकराते हुए अनुज की ओर बढ़ा दिया. अनुज हाथ में कप लेते हुए बोला, ”भाभीजी, आप ठीक तो हैं न? कैसी हालत बना रखी है आप ने? लगता है, सारी रात ठीक से सो नहीं पाई हो?’’

रितिका मौन बनी रही. उधर सचिन भी मौन रहा. कुछ पल बाद रितिका धीमे स्वर में बोली, ”यह अपने जिगरी दोस्त से पूछो, तुम्हारे सामने ही बैठा है.’’

”क्यों भाई सचिन, क्या बात है?’’

”अरे यह क्या बोलेगा, इस ने तो मेरी जिंदगी में तूफान ला दिया है. अब शेष बचा ही क्या है, अपने दोस्त को तुम ही समझाओ.’’ रितिका थोड़ा तल्ख आवाज में बोली.

”क्या बात हो गई? क्या तुम दोनों के बीच फिर से तूतूमैंमैं हुई है?’’ अनुज बोला.

”आप तूतूमैंमैं की बात करते हो,’’ कुछ देर मौन रह कर रितिका ने फिर बोलना शुरू किया, ”साढ़े 3 साल मेरे साथ गुजारने के बाद तुम्हारा मित्र कहता है कि मैं चरित्रहीन हूं, मेरा अपने बौस के साथ चक्कर चल रहा है. मुझे अब भलीभांति समझ में आ गया है कि तुम्हारे बेरोजगार दोस्त को सिर्फ मेरे कमसिन जिस्म और पैसों में दिलचस्पी थी. उसे न मेरी जिंदगी से कोई मतलब और न ही मेरी भावनाओं से, वह तो सिर्फ मेरे जिस्म से अपनी कामोत्तेजना शांत कर मेरे द्वारा नौकरी कर के मेहनत से लाए पैसों से मौज कर रहा है.

”साढ़े 3 साल तक मेरे साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद अब तुम्हारे दोस्त को मैं चरित्रहीन नजर आने लगी. इस के इश्क के चक्कर में मैं ने अपने घर वालों से नाता तोड़ लिया. और अब ये कह रहा है कि तू चरित्रहीन है, मैं अब तेरे साथ नहीं रह सकता, तू तो अपने बौस के साथ रह. अनुज, अब तुम ही बताओ कि मैं कहां जाऊं? क्या करूं? क्या जहर खा कर आत्महत्या कर लूं?’’

”भाभीजी, आप ऐसा कुछ भूल कर भी मत कर लेना वरना सचिन को जेल की हवा खानी पड़ेगी.’’ अनुज ने सचिन को समझाने का भरपूर प्रयास किया.

”यही तो मेरी जिंदगी बन गई है. कहां तो मुझ पर बड़ा प्यार उमड़ता था. कहता था जानेमन, तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता. कहां गईं वो प्यार की बातें? कहां गए वादे, जिस के भरोसे मैं ने अपने पेरेंट्स और भाई से नाता तोड़ दिया था.’’

रितिका भाभी ने जब अपने मन की भड़ास पूरी तरह से निकाल ली, तब अनुज सचिन से बोला, ”क्यों भाई सचिन, ये मैं क्या सुन रहा हूं? रितिका भाभी जो कुछ कह रही हैं, क्या वह सही है? यदि हां तो तुम्हें रितिका भाभी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए.’’

सचिन दोस्त अनुज की बातें चुपचाप सुनता रहा. उस की जुबान से एक शब्द नहीं निकला. सचिन की चुप्पी देख कर अनुज फिर बोलने लगा, ”तुम्हें रितिका भाभी के चरित्र पर संदेह करते हुए जरा भी शर्म नहीं आती?

”भाभी का अपने बौस के साथ चक्कर चलने का बेबुनियाद आरोप लगा कर तुम उन की चारित्रिक हत्या करने के साथ जिंदगी के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हो. देखो, तुम दोनों की भलाई इसी में है कि तुम जितनी जल्दी हो सके, रितिका भाभी से माफी मांगने के बाद विधिवत शादी कर लो और उन्हें समाज में सिर उठा कर पूरे मानसम्मान के साथ जीने का अधिकार दे दो.’’

मानसम्मान की बात सुनते ही सचिन बिफर पड़ा. तल्ख स्वर में बोला, ”अनुज, किस मानसम्मान की बात कर रहे हो, रितिका के चरित्र को ले कर इस के औफिस के लोगों से ले कर कालोनी के लोग क्या कुछ नहीं कहते हैं. ये भी रोज ताना मारती है कि मैं यदि नौकरी करने नहीं जा रही होती तो नानी याद आ जाती, कहां से देते फ्लैट का भाड़ा, लाइट का बिल, दूध और किराने वाले को पैसे. खुद बेरोजगार होते हुए भी काम की तलाश में नहीं जाते, सारा दिन मोबाइल फोन और टीवी सीरियल देखने में वक्त जाया करते रहते हो.’’

इतना सब सुनने के बाद अजीब दुविधा में फंसा अनुज समझ नहीं पा रहा था कि वह किस का पक्ष ले और किसे समझाए? फिर भी अनुज ने दोनों को बात का बतंगड़ न बनाने और प्रेम से मिल कर रहने की सलाह दे सचिन के घर से विदा ली. अनुज उपाध्याय के जाते ही दोनों आपस में फिर से उलझ गए. दोनों में तूतूमैंमैं होने लगी. दोनों तेज आवाज में एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगाने लगे कि उन के आपसी विवाद में अनुज को क्यों लाया गया? इसी बात को ले कर रितिका और सचिन में नोकझोंक होती रही.

उन दोनों में नोकझोंक होने की आवाज पड़ोसियों को सुनाई दे रही थी, लेकिन उस के भाड़े के फ्लैट के आसपास कोई ऐसा पड़ोसी नहीं था, जो उन दोनों को झगडऩे से रोक सके, उन को शांत कर सके या फिर उन्हें समझा सके. पड़ोसियों के लिए तो उन के झगड़े आए दिन की बात हो चुकी थी. फिर रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर सचिन राजपूत ने रितिका सेन की हत्या कर दी. पूछताछ के बाद पुलिस ने सचिन राजपूत को अदालत में पेश किया, जहां से उसे हिरासत में जेल भेज दिया गया. सचिन ने यदि अपने शक्की मिजाज को काबू रख कर अपनी प्रेमिका की बात पर भरोसा कर के जिंदगी जी होती तो शायद जेल जाने की नौबत नहीं आती. Love Story Hindi Kahani

 

 

MP News: पति के अंतरंग वीडियो बनाने वाली पत्नी

MP News: कोई भी महिला सब कुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अपने पति को किसी दूसरी महिला के साथ रोमांस करते सहन नहीं कर सकती. लेकिन चंद्रिका पालीवाल ऐसी थी, जो अपने पति अविनाश प्रजापति को अपने ही सामने दूसरी महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने को कहती थी. पति को ऐसा करते देख वह बहुत खुश होती थी. आखिर चंद्रिका पालीवाल ऐसा क्यों करती थी? जानने के लिए पढ़ें सोशल क्राइम की यह खास स्टोरी.

एक निजी बैंक में क्लर्क के रूप में काम करने वाली अलका की शादी करीब 5 साल पहले हुई थी, लेकिन एक साल के अंदर ही उस का पति से तलाक हो गया. वह भोपाल की अवधपुरी कालोनी में रहती थी. तलाक के कुछ ही महीनों के बाद बिना जीवनसाथी के अलका को अपने जीवन में सूनापन महसूस होने लगा. लिहाजा अलका ने दूसरी शादी के लिए मैट्रीमोनियल साइट का सहारा लिया.

मैट्रीमोनियल साइट्स पर कई युवकों की प्रोफाइल वह रोज ही देखती थी. एक दिन 36 वर्षीय अविनाश प्रजापति नाम के युवक की फोटो और प्रोफाइल देख कर उस की आंखों में चमक आ गई. प्रोफाइल से पता चला कि भोपाल का ही रहने वाला अविनाश तलाकशुदा है और उस का स्टील का बड़ा कारोबार है. साथ ही वह छत्तीसगढ़ में धनलक्ष्मी नाम की फैक्ट्री का संचालन भी करता है.

अलका को महसूस हुआ कि उस के जैसी तलाकशुदा युवती के लिए शायद अविनाश ही परफेक्ट है और अच्छेखासे कारोबार की वजह से आर्थिक रूप से भी मजबूत है. 2024 के दिसंबर महीने में एक दिन सुबह अलका ने मैट्रीमोनियल साइट पर दिए गए अविनाश के कौन्टेक्ट नंबर पर फोन किया. कौल रिसीव होते ही अलका ने कहा, ”हैलो, मैं अलका बोल रही हूं. मैं एक प्राइवेट बैंक में क्लर्क हूं. मैं ने आप की प्रोफाइल देखी, जो मुझे अच्छी लगी. आप से शादी के संबंध में मैं मिलना चाहती हूं.’’

अंधा क्या चाहे 2 आंखें. अविनाश भी उत्सुकता दिखाते हुए बोला, ”हां, मैं ने भी आप का बायोडाटा चैक किया है. कभी मेरे घर पर आइएगा, यहां बैठ कर इत्मीनान से बात करते हैं.’’

बातचीत से अलका को लगा कि अविनाश भी उसे पसंद करता है. यही सोच कर अलका 6 दिसंबर, 2024 को उस के घर मिलने के लिए पहुंच गई. इत्तफाक से अविनाश भी भोपाल की नई कालोनी प्रतीक गार्डन में रहता था, जहां पर बमुश्किल 20-25 मकान ही बने थे. अलका ने जैसे ही अविनाश के घर पर दस्तक दी तो दरवाजा एक महिला ने खोला. महिला ने उसे अंदर ले जा कर हाल में बैठाया, तभी अविनाश भी वहां आ गया. चायनाश्ते के दौरान जब तीनों डायनिंग टेबल पर बैठे तो अविनाश ने उस महिला का परिचय कराते हुए कहा, ”अलका, यह मेरी मम्मी हैं. इन का नाम चंद्रिका पालीवाल है. यही मुझे रोज शादी के लिए फोर्स करती हैं.’’

अलका को चंद्रिका की फिटनैस देख कर आश्चर्य हुआ तो उस ने पूछ ही लिया, ”मम्मीजी, आप लगती नहीं कि अविनाश की मम्मी हैं. अपनी फिटनैस का राज हमें भी बता दीजिए.’’

”जिस मां की केयर करने वाला अविनाश जैसा बेटा हो, उस की फिटनैस तो अच्छी होगी ही. तुम भी शादी के लिए हां कर दो, यह तुम्हें पलकों पर बिठा कर रखेगा.’’ चंद्रिका ने हंसते हुए जबाब दिया. इतना सुनते ही अलका शरमा गई. चाय नाश्ता करने के बाद चंद्रिका ने कहा, ”बेटा, तुम लोग अंदर जा कर आपस में बातचीत करो, मैं तब तक खाना बनाती हूं. आज संडे है, अलका खाना खा कर ही यहां से जाएगी.’’

अलका भी यही चाह रही थी कि उसे अविनाश के साथ कुछ समय एकांत में बिताने को मिले. चंद्रिका ने जैसे उस के मन की बात पढ़ ली. तभी अविनाश अलका से बोला, ”चलो अंदर बैठ कर बातचीत करते हैं.’’

पहली मुलाकात में ही बांहों में समा गई अलका

अविनाश अलका को अपने बैडरूम में ले गया. अविनाश का बैडरूम बड़े ही करीने से सजा हुआ था, जिसे देख अलका बहुत प्रभावित हुई. बैडरूम में एक ही बैड पर आसपास बैठ कर दोनों के बीच बातचीत चलने लगी. इसी दौरान अविनाश ने अलका की तारीफ करते हुए कहा, ”अलका, तुम गजब की खूबसूरत हो, तुम यदि शादी के लिए हां कह दो तो मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा.’’

”वैसे आप भी बहुत हैंडसम हो, आप की लाइफस्टाइल देख कर मुझे भी यकीन है कि मेरा खयाल आप बहुत अच्छे से रख सकते हो.’’ अलका अपनी तारीफ पर शरमाते हुए बोली.

”आई लव यू अलका, तुम्हारी पारखी नजर का मैं तो कायल हो गया.’’ इतना कहते हुए अविनाश ने अलका के हाथों को अपने हाथों में ले लिया.

”मगर डर भी लगता है कि कहीं धोखा न खा जाऊं, पहली शादी का जख्म मुश्किल से भूल पाई हूं. कहीं मुझे मंझधार में तो नहीं छोड़ दोगे?’’ आंखों में छलके आंसुओं को पोंछते हुए अलका बोली.

”मुझ पर भरोसा रखो, मैं तुम्हारी आंखों में आंसू की एक बूंद भी नहीं आने दूंगा.’’ अविनाश ने अलका के माथे पर चुंबन देते हुए कहा. अविनाश ने अलका के भावुक मन का फायदा उठाते हुए एक कदम और आगे बढ़ाते हुए उसे बैड पर लिटा दिया और उस के होंठों को चूमने लगा. अलका को लंबे समय बाद किसी पुरुष की देह का स्पर्श मिला था, इसलिए वह भी इस आग में जल्दी ही पिघल गई. देह की तपिश जब ठंडी हुई तो अपने कपड़ों की सलवटें ठीक करते हुए वह बैड से उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गई.

उस दिन के बाद उन की मुलाकातों का सिलसिला चलने लगा. अविनाश ने अपने व्यवहार से अलका के दिल में जगह बना ली थी. अलका अविनाश की बातों पर आंखें मूंद कर भरोसा करने लगी थी. मुलाकात के समय जब अलका ने शादी के संबंध में अविनाश से कहा, ”अविनाश, जब हम दोनों एकदूसरे को इतने करीब से समझ चुके हैं तो अब हमें शादी भी कर लेनी चाहिए.’’

”शादी भी जल्द ही कर लेंगे, शादी से पहले बिजनैस बढ़ाने के लिए मुझे कुछ पैसों की जरूरत है. यदि तुम मदद कर दो तो करोड़ों रुपए का मुनाफा बिजनैस में हो जाएगा.’’  अविनाश ने कहा. अलका उस की बातों में आ गई और भावना में बह कर अपनी सारी जमा पूंजी करीब 40 लाख रुपए कैश और 5 लाख रुपए की ज्वैलरी उस ने अविनाश को दे दी. जब अलका ने अविनाश से शादी करने के लिए दबाव बनाया तो उस ने अलका से शादी करने से इंकार कर दिया. अलका को अविनाश से यह उम्मीद कतई नहीं थी. अब तक अलका को यह भी पता चल गया था कि अविनाश के घर रहने वाली चंद्रिका नाम की महिला उस की मम्मी नहीं, उस की दूसरी पत्नी है.

उस ने जब अविनाश से अपने दिए पैसों और ज्वैलरी की मांग की तो अविनाश धमकी देते हुए बोला, ”तुम ने अपनी मरजी से मेरे साथ संबंध बनाए थे, जिस की वीडियो रिकौर्डिंग मेरी पत्नी चंद्रिका ने अपने मोबाइल में सहेज कर रख ली, जिसे कभी भी वायरल कर दूंगा.’’

इतना सुनते ही अलका के पैरों तले से जमीन खिसक गई और वह मन मसोस कर रह गई.

मानसी ने भी सुना दी अलका को आपबीती

एक दिन अलका जब अविनाश से  अपने पैसों का तगादा करने जा रही थी तो अविनाश  के घर से एक युवती को बाहर निकलते देखा तो उसे शक हुआ. अलका अविनाश के घर जाने के बजाय चुपचाप उस के पीछे हो ली. प्रतीक गार्डन कालोनी से बाहर निकलते ही अलका ने उस से बातचीत करनी शुरू कर दी. पहले तो वह युवती अनजान बन कर औपचारिक बातचीत करती रही, लेकिन जब अलका ने उसे अपनी आपबीती बताई तो मानसी नाम की वह युवती अलका को अपनी भी रामकहानी सुनाने लगी. वह भोपाल के ही अशोका गार्डन इलाके में रहती थी. और प्राइवेट जौब करने के साथ घर पर ब्यूटीपार्लर चलाती थी.

मानसी ने अलका से कहा, ”दीदी, मेरे साथ भी अविनाश ने शादी करने का झांसा दे कर कई बार संबंध बनाए हैं.’’

”तुम ने उस को पैसे तो नहीं दिए मानसी?’’ अलका ने पूछा.

”दीदी, अविनाश ने कंपनी में इनवैस्ट करने के लिए 40 लाख रुपए मुझ से यह कह कर लिए थे कि जल्दी ही उस के पैसे दोगुने हो जाएंगे.’’ मानसी ने बताया.

”फिर तुम्हें रुपए वापस  मिले कि नहीं?’’ अलका ने पूछा.

”नहीं मिले दीदी, अभी मैं उस के घर पैसे मांगने ही गई थी, मगर उस ने रुपए देने के बजाय धमकी दी है कि अगर कभी रुपए मांगे तो तुम्हारे साथ बनाए संबंधों का वीडियो वायरल कर दूंगा.’’ मानसी ने रोते हुए बताया.

अलका ने मानसी को ढांढस बंधाते हुए कहा, ”अब रोनेधोने से कुछ नहीं होगा तुम मेरा साथ दो. हम इस धोखेबाज अविनाश को सबक सिखाकर ही मानेंगे.’’

अलका और मानसी ने मिल कर 2 सितंबर, 2025 शाम को भोपाल के एसीपी कार्यालय पहुंच कर एसीपी डा. रजनीश कश्यप को अपने साथ हुई धोखाधड़ी की कहानी विस्तार से सुनाई. एसीपी डा. रजनीश कश्यप ने दोनों को बाग सेवनिया पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए कहा. उसी दिन रात को दोनों ने बाग सेवनिया पुलिस थाने में जा कर लिखित शिकायत दर्ज कराई. टीआई अमित सोनी ने अलका और मानसी की तरफ से आरोपी अविनाश प्रजापति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद दोनों युवतियों के महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में बयान दर्ज किए.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस टीम ने अविनाश प्रजापति के प्रतीक गार्डन कालोनी में स्थित उस के घर पर दबिश दे कर उसे दबोच लिया, लेकिन उस की दूसरी पत्नी चंद्रिका वहां पर नहीं मिली. वह अपने 5 साल के बच्चे को ले कर फरार हो गई. पूछताछ में अविनाश प्रजापति ने कुबूल किया कि उस ने दोनों युवतियों से शादी करने का वादा कर के उन से शारीरिक संबंध बनाए थे. उस ने मैट्रीमोनियल साइट में बायोडाटा डाल कर अपने आप को तलाकशुदा बताया था, जबकि वह पहले से शादीशुदा था और उस का 5 साल का एक बेटा भी था.

अविनाश ने एक कंपनी का सीईओ बता कर दोनों युवतियों से निवेश करने का झांसा दे कर करीब 85 लाख रुपए की रकम ऐंठी थी. यह रकम अविनाश की पत्नी चंद्रिका पालीवाल के खाते में जमा भी हुई थी. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि अविनाश प्रजापति मूलरूप से मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले का रहने वाला है. वह डेढ़ साल पहले ही भोपाल में रहने आया था. शुरू में वह शाहपुरा थाना क्षेत्र स्थित रोहित नगर में रहता था. चंद्रिका पालीवाल उस की दूसरी पत्नी है. पहली पत्नी को वह तलाक दे चुका है.

उस के पिता पुरुषोत्तम प्रजापति नरसिंहपुर जिले के सुआतला गांव में ग्राम सहायक थे. अविनाश खुद को बड़ा बिजनैसमैन बताता था और अलगअलग गाडिय़ों से आताजाता था, जबकि पत्नी चंद्रिका टैक्सी से घूमती थी. कालोनी में लोग इन्हें स्टील का व्यापारी समझते थे. दोनों ने मिल कर एक फरजी फाइनैंस कंपनी भी बना रखी थी. आरोपी के खिलाफ सरिया बेचने के नाम पर ऐप बनाने के नाम पर और निवेश करने का झांसा दे कर लोगों से पैसा ऐंठने की कई एफआईआर अलगअलग थाना क्षेत्रों में दर्ज हैं.

चंद्रिका और अविनाश को ऐसे हुआ था प्यार

चंद्रिका पालीवाल भी राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ की रहने वाली है. वह भोपाल के पास मिसरोद इलाके में एक आटो मोबाइल कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव का काम करती थी. एक दिन अविनाश एक लग्जरी कार की इनक्वायरी करने शोरूम पहुंचा तो उस की मुलाकात चंद्रिका से हुई. एक पेशेवर सेल्स एग्जीक्यूटिव की तरह चंद्रिका ने मुसकरा कर उस का स्वागत किया. तभी अविनाश ने उस से कहा, ”मैडम, मुझे 15-16 लाख की रेंज में और सभी तरह के लेटेस्ट सेफ्टी फीचर्स वाली कार चाहिए.’’ अविनाश ने कहा.

तब एक राउंड टेबल के पास बैठ कर चंद्रिका उसे कार की खूबियां गिना कर अपना एक ग्राहक पक्का कर रही थी, मगर अविनाश की निगाहें उस के खूबसूरत बदन पर टिकी हुई थीं, वह कार से ज्यादा चंद्रिका को निहार रहा था. उस दिन जल्द ही कार खरीदने का आश्वासन दे कर अविनाश चंद्रिका का विजिटिंग कार्ड ले कर घर आ गया था. उस के बाद से ही चंद्रिका अविनाश को रोज ही फोन लगा कर कार खरीदने के बारे में पूछती. फोन पर हुई बातचीत और मुलाकातों के बाद दोनों के बीच दोस्ती हो गई. फिर यह दोस्ती प्यार में कब बदल गई, उन्हें पता नहीं चला. कुछ ही महीने बाद दोनों ने सहमति से शादी भी कर ली.

अविनाश प्रजापति से कहीं ज्यादा शातिर उस की दूसरी पत्नी चंद्रिका पालीवाल है. उस का भाई सूरज पालीवाल भी बहन की ही तरह ठग है. तीनों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित थाना चिरगांव  में 24 अप्रैल, 2023 को गबन का केस दर्ज हुआ था. इस प्रकरण में तीनों आरोपी गिरफ्तार भी हुए थे. इसी गिरफ्तारी के वक्त जेल में बंद मिर्ची बाबा के साथ पतिपत्नी की मुलाकात हुई थी.

अविनाश की पत्नी चंद्रिका पालीवाल का आपराधिक इतिहास भी पुलिस ने खंगाला है. चंद्रिका पालीवाल ने 2023 में सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार ‘मिर्ची बाबा’ (असली नाम रामेश्वर सिंह) के लिए प्रस्तावक के रूप में नामांकन पत्र पर हलफनामा दाखिल किया था. चुनाव आयोग के रिकौर्ड में उस के हस्ताक्षर मौजूद हैं. चंद्रिका की अनेक राजनेताओं से अच्छी जानपहचान भी थी, जिस के चलते वह बेखौफ हो कर इस तरह के अपराधों को अंजाम दे रही थी.

अविनाश प्रजापति ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार की मरजी से पहली शादी की थी. लेकिन वैवाहिक जीवन में अनबन के कारण पहली पत्नी से उस का जल्दी ही तलाक हो गया. तलाक के बाद उस की लाइफ में चंद्रिका आई. चंद्रिका से शादी के बाद अविनाश का बिजनैस घाटे में चला गया तो आर्थिक तंगी से जूझ रहे अविनाश को चंद्रिका ने ठगी करने की सलाह दी.

2023 से दोनों ने मैट्रीमोनियल वेबसाइट्स पर फरजी प्रोफाइल बना कर तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को शादी का झांसा दे कर ठगना शुरू कर दिया. शुरू में यह सिर्फ आर्थिक ठगी थी, लेकिन धीरेधीरे यह खेल शारीरिक शोषण और ब्लैकमेल तक पहुंच गया. चंद्रिका खुद इस साजिश की मास्टरमाइंड थी और अविनाश उस के इशारों पर नाचता था.

अविनाश के खिलाफ दर्ज हैं अनेक मुकदमे

अविनाश प्रजापति की गिरफ्तारी के बाद पुलिस जांच में पता चला है कि अविनाश के खिलाफ अलगअलग थानों में जालसाजी के 8 मुकदमे दर्ज हैं. उस के खिलाफ नरसिंहपुर जिले के सुआतला थाने में पहली पत्नी ने दहेज प्रताडऩा का मुकदमा 2016 में दर्ज कराया था. इस के बाद दूसरा मुकदमा 2022 में सागर जिले के आगासोद थाने में दर्ज हुआ था, जिस में गबन और जालसाजी की धाराएं लगी थीं. 2022 में हरदा जिले के टिमरनी थाने में दर्ज तीसरे प्रकरण में उस के खिलाफ जालसाजी और धमकाने की रिपोर्ट दर्ज हुई थी. चौथा मामला 2022 में सागर जिले के कोतवाली थाने में दर्ज हुआ था.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर  जिले में स्थित कुडवार थाने में पांचवां मुकदमा 2022 में दर्ज हुआ था. ये दोनों मुकदमे जालसाजी और गबन से जुड़े हुए थे. वहीं छठवां प्रकरण 2018 में चंडीगढ़ के सेंट्रल सेक्टर 17 में दर्ज हुआ था. इस प्रकरण में भी जालसाजी, कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल करने में वह आरोपी है. इस के अलावा अविनाश प्रजापति के खिलाफ बैतूल जिले के जेएमएफसी कोर्ट में 13 लाख 61 हजार रुपए की धोखाधड़ी करने का मुकदमा भी चल रहा है.

अविनाश को रिमांड पर ले कर पुलिस ने जब पूछताछ की तो उस ने साफ तौर पर कहा कि उस की पत्नी चंद्रिका ने ही यह प्लान बनाया था कि विधवा महिलाओं को शादी का लालच दे कर उन के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाएं और इस का वीडियो वह बनाएगी. चंद्रिका का मानना था कि वीडियो वायरल होने की धमकी देने पर महिलाएं कभी शिकायत नहीं करेंगी, क्योंकि समाज में बदनामी का डर उन्हें चुप रहने को मजबूर कर देगा.

यही सोच कर दोनों ने कई महिलाओं को अपना शिकार बनाया. ज्यादातर महिलाएं जो विधवा थीं या वैवाहिक जीवन में अकेलापन झेल रही थीं, उन्हें टारगेट बनाया गया. पीडि़ताओं ने डर और शर्म के कारण लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी. सबसे पहले दोनों मैट्रीमोनियल साइट्स का इस्तेमाल कर के तलाकशुदा या विधवा महिलाओं से संपर्क करते थे. कारपोरेट और बैंकिंग सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता था, क्योंकि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं और शादी के लिए योग्य लड़के की तलाश में आसानी से फंस सकती हैं. अलका और मानसी के अलावा भी पुलिस को अब तक और भी कई पीडि़त महिलाओं की शिकायत मिली है.

अविनाश की रिमांड 13 सितंबर को समाप्त होने से पहले ही बाग सेवनिया थाना पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से मजिस्ट्रैट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया. पुलिस ने कोर्ट से चंद्रिका पालीवाल की तलाश और गिरफ्तारी के लिए भी वारंट जारी करने की दरख्वास्त की. आरोपी दंपति के खिलाफ बलात्कार, आपराधिक धमकी और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. चंद्रिका पालीवाल सोशल मीडिया पर भी काफी ऐक्टिव थी. वह अपनी लग्जरी लाइफस्टाइल लोगों को दिखाती रहती थी. इंस्टाग्राम पर उस के 28 हजार से अधिक फालोअर्स हैं. इस केस में नाम आने के बाद से वह गायब है. साथ ही कोई एक्टिविटी भी नहीं है. कथा लिखे जाने तक पुलिस चंद्रिका पालीवाल की तलाश में जुटी हुई थी.

यह घटना समाज के लिए एक बड़ा सबक है कि औनलाइन रिश्तों या फाइनैंस स्कीम्स में आंख बंद कर के भरोसा करना खतरनाक हो सकता है. मैट्रीमोनियल साइट्स पर दी गई अनजान लोगों की प्रोफाइल पर भरोसा करने से पहले जांचपड़ताल जरूरी है. MP News

(कथा में अलका और मानसी परिवर्तित नाम हैं)

 

 

MP News : शिवसेना नेता अनुपमा का जिस्मफरोशी के धंधे का पर्दाफाश

MP News : शिवसेना नेत्री अनुपमा तिवारी की इलाके में एक समाजसेवी, साहित्यकार और पत्रकार के रूप में पहचान थी. लेकिन जब पुलिस ने उसे जिस्मफरोशी का धंधा करने के आरोप में गिरफ्तार किया तो उस भगवाधारी की ऐसी कलई खुली कि…

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सब से नजदीकी जिले सीहोर की दूरी महज 35 किलोमीटर है. इंदौरभोपाल रोड पर हाईवे बन जाने के बाद से यह दूरी महज आधे घंटे में तय हो जाती है. एक तरह से सीहोर भोपाल का ही हिस्सा बनता जा रहा है क्योंकि ये दोनों शहर तेजी से एकदूसरे की तरफ बढ़ रहे हैं.  शहरीकरण का असर ही इसे कहेंगे कि छोटे और घनी बसाहट वाले कसबे सीहोर में भी कालोनियों और अपार्टमेंटों की बाढ़ सी आती जा रही है, जो सारे के सारे बाहर की तरफ बन रहे हैं.

लेकिन सीहोर की पहचान पुराने शहर से ही है खासतौर से बसस्टैंड से, जो शहर को चारों तरफ से जोड़ता है. इस बसस्टैंड पर देर रात तक चहलपहल रहती है. बसस्टैंड के आसपास कई पुराने मोहल्लों में से एक है हाउसिंग बोर्ड कालोनी, जहां आधे पक्के और आधे कच्चे मकान बने हुए हैं. यहीं से आधा किलोमीटर दूर स्थित है सिटी कोतवाली, जो कोतवाली चौराहे पर स्थित है. आमतौर पर बसस्टैंड के आसपास के मोहल्लों में पुश्तों से रह रहे लोग ही ज्यादा हैं और सभी एकदूसरे को जानते हैं. इसी बसस्टैंड के पास एक मकान या योग आश्रम, कुछ भी कह लें, अनुपमा तिवारी का भी है. जिन के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते सिवाय इस के कि वह शिवसेना की नेत्री हैं.

साल 2015 में वह नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव भी इसी पार्टी से लड़ी थीं, जिस के राष्ट्रीय मुखिया कभी बालासाहेब ठाकरे जैसे आक्रामक और कट्टरवादी हिंदू नेता हुआ करते थे और आजकल उन के बेटे उद्धव ठाकरे इन दिनों कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं. शिवसेना की कोई खास पूछपरख सीहोर ही क्या पूरे मध्यप्रदेश में नहीं है. शायद इसीलिए अनुपमा तिवारी को 700 वोट भी नहीं मिले थे और उस की जमानत जब्त हो गई थी. छोटे शहरों में जो स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ लेता है उसे पूरा शहर जानने लगता है, यही अनुपमा के साथ हुआ था कि सीहोर के लोग उस के नाम से परिचित हो गए थे. चुनाव हार चुकी अनुपमा ने हिम्मत नहीं हारी और वह समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गई.

छोटेमोटे जुलूस और धरनेप्रदर्शनों में शिवसेना की अधेड़ और सामान्य दिखने वाली नेत्री अनुपमा तिवारी के इर्दगिर्द कुछ महिलाएं भी नजर आने लगीं तो लोग और मीडिया उस का नोटिस भी लेने लगे और शायद यही वह चाहती थी. कुछ कर गुजरने की कशिश के चलते महत्त्वाकांक्षी अनुपमा ने सन 2017 में शहर के व्यस्ततम कोतवाली चौराहे पर शराब के विरोध में धरना दिया था और शराब को प्रतिबंधित करने की उस की मांग न माने जाने पर हाहाकारी आंदोलन की चेतावनी दी थी. उस वक्त उस के साथ महिलाओं की संख्या पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा थी.

यह धरना शिवसेना गौजन कल्याण संघ के बैनर तले दिया गया था, जिस की प्रमुख अनुपमा तिवारी खुद थी और उस का साथ दे रही महिलाओं को महिला बिग्रेड कहा गया था. इस धरने से भी कुछ हासिल नहीं हुआ, लेकिन अनुपमा को लोग अब अच्छे से पहचानने लगे थे. धीरेधीरे अनुपमा फुलटाइम समाजसेवी होती गई और कई छोटेबड़े समारोहों में नजर आने लगी. महिला हितों की बात करते रहने से फायदा यह हुआ कि उस के आसपास दुखियारी पीडि़त महिलाएं इकट्ठा होने लगीं जिन्हें बड़ी उम्मीद रहती थी कि कोई और उन की बात सुने न सुने, लेकिन अनुपमा दीदी जरूर सुनेंगी और जरूरत पड़ी तो उन के हक में लड़ेंगी भी.

इस सक्रियता का ही नतीजा था कि उसे 21 जून, 2018 को नेहरू युवा केंद्र सीहोर के एक कार्यक्रम में अपर कलेक्टर द्वारा सम्मानित किया गया था. सम्मान की वजह थी उस का योगाचार्य होना. इस समारोह में वह राजनीति में सक्रिय और सफल साध्वियों जैसी भगवा ड्रेस पहन कर गई थी, इसलिए भी आकर्षण का केंद्र रही थी. एक चेहरे पर लगाए कई चेहरे अनुपमा अब तक योगाचार्य ही नहीं रह गई थी, बल्कि नेत्री और समाजसेवी के अलावा वह एक पत्रकार व साहित्यकार के रूप में भी प्रचारित हो चुकी थी. बसस्टैंड वाले मकान में अब अनुपमा का छोटामोटा दरबार भी लगने लगा था, जहां हैरानपरेशान औरतें अपना दुखड़ा ले कर आती थीं और अनुपमा से मदद की गुहार लगाती थीं.

राजनीति और समाजसेवा के इस नए मठ को सीहोर के लोग अब उत्सुकता से देखने लगे थे, जो आश्रम कहलाता हुआ एक शक्ति केंद्र भी बनता जा रहा था. अनुपमा अब औरतों से ताल्लुक रखते राष्ट्रीय मुद्दों पर भी बोलने लगी थी. अपनी आवाज में दम लाने के लिए उस ने सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहना शुरू कर दिया था और तमाम प्लेटफार्मों पर वह दिग्गज सियासी हस्तियों के साथ अपने फोटो व उपलब्धियां भी शेयर करने लगी थी. यह और बात थी कि उसे न तो ज्यादा फालोअर्स कभी मिले और न ही उस का अपना बड़ा प्रशंसक वर्ग बन पाया. लेकिन कुछ महिलाएं जरूर उस की मुरीद हो गई थीं, जिन से वह औफलाइन भी बड़ीबड़ी क्रांतिकारी बातें शेयर करने लगी थी.

ऐसी ही एक पोस्ट उस ने 8 नवंबर, 2017 को शेयर की थी जिस में लिखा था— प्रदेश में महिलाएं सुरक्षित नहीं, बच्चियां वहशी दरिंदों का शिकार हो रही हैं. इत्तफाक से ठीक 4 साल बाद 8 नवंबर, 2021 को ही अनुपमा तिवारी पुलिस की गिरफ्त में आ गई. आरोप था महिलाओं से देह व्यापार करवाना. इन 4 सालों में सीहोर की पार्वती नदी का पानी बहुत बह चुका था और यह अनुपमा अब सैक्स रैकेट की सरगना के तौर पर भी जानी गई, जिस की सीहोर वासियों को कोई खास हैरानी नहीं हुई. क्योंकि जो वह कर रही थी, उस से पूरा शहर वाकिफ हो चुका था.

छापे के बाद लोग हुए हैरान सीहोर के युवा एसपी मयंक अवस्थी को सीहोर आए अभी 2 महीने ही पूरे हुए थे. पदभार संभालते ही उन्हें शिकायतें मिलने लगी थीं कि बसस्टैंड के नजदीक धड़ल्ले से देह व्यापार का अड्डा संचालित हो रहा है जिस की कर्ताधर्ता एक पहुंच वाली और रसूखदार नेत्री है. मुखबिर भी लगातार खबर दे रहे थे कि यह अड्डा कौन संचालित करता है और कैसे काम करता है. इतना ही नहीं, मोहल्ले के लोग भी नाम से और गुमनाम शिकायतें पुलिस को कर चुके थे कि इस मकान में सैक्स रैकेट के चलते उन का वहां रहना मुहाल हो रहा है लिहाजा पुलिस सख्त काररवाई करे.

मयंक अवस्थी ने अनुपमा की कुंडली खंगाली तो उन्हें आरोप व शिकायतें सच और अनुपमा की गतिविधियां संदिग्ध लगीं. लिहाजा उन्होंने सीएसपी समीर यादव की अगुवाई में एक टीम गठित कर दी, जिन के निर्देशन में थानाप्रभारी कोतवाली अर्चना अहीर और उन के साथियों ने 8 नवंबर, 2021 को योजनाबद्ध तरीके से अनुपमा के घर पर छापा मार दिया. जैसे ही पुलिस टीम मकान के अंदर पहुंची तो तीनों कमरों में योगासनों की जगह वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित कामासनों और अय्याशी का खुला खेल चल रहा था. शबाब के साथसाथ शराब भी थी, कंडोम भी थे और उत्तेजक अश्लील सामग्री भी थी, जो इस तरह के हर छापे में आमतौर पर मिलती ही हैं.

एक कमरे में मसाज बैड भी था और बड़ी स्क्रीन वाला टीवी भी दीवार पर टंगा था. जब पुलिस टीम बाहर टोह ले रही थी, तब इस मकान से तेज आवाज में संगीत की भी आवाज आ रही थी. जाहिर है मौजमस्ती के शौकीन गुलाबी सर्दी को पूरी तरह एंजौय कर रहे थे, जिन की सारी खुमारी पुलिस टीम को सामने खड़ा देख हवा हो गई थी. कमरों की मुकम्मल तलाशी के बाद जब आरोपियों को लाइन में खड़ा किया गया तो उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं. रंगेहाथों पकड़े जाने के कारण किसी के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था. शुरुआती पूछताछ में यह बात साफ हो गई कि चारों महिलाएं भोपाल की उपनगरी बैरगढ़ से धंधा करने आईं थीं, जिन का अपना एक वाट्सऐप ग्रुप भी था. ग्राहकों और कालगर्ल्स को इंदुलता नाम की एक महिला मैनेज करती थी.

पकड़े गए चारों ग्राहक सीहोर के ही थे जिन के हावभाव देख साफ लग रहा था कि वे इस अड्डे से अच्छी तरह वाकिफ थे, लेकिन इस बार गच्चा खा गए थे. क्योंकि पुलिस ने अनुपमा मैडम के नाम और रसूख का कोई लिहाज नहीं किया था. कानूनी खानापूर्ति के बाद आरोपियों को थाने लाया गया, लेकिन उस के पहले ही इस छापे की खबर जंगल की आग की तरह सीहोर से भोपाल होती हुई पूरे मध्य प्रदेश और देश में फैल गई थी, जिस की इकलौती वजह यह थी कि इस गिरोह की सरगना शिवसेना की नेत्री थी, जो नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ चुकी थी.

पुलिस टीम ने मौके से 10 मोबाइल फोन और 28 हजार रुपए नगद भी जब्त किए. 2 लग्जरी कारें भी मकान के बाहर से बरामद की गईं. सभी आरोपियों के खिलाफ थाना कोतवाली सीहोर में अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत काररवाई की गई. पुलिस टीम में एसआई प्रिया परते और पूजा राजपूत के अलावा कांस्टेबल कुलदीप, चंद्रभान व विक्रम शामिल थे. बदनामी के डर से कांप रहे आरोपियों और महिलाओं ने उस वक्त चैन की सांस ली, जब उन्हें देर रात थाने से ही बांड भरवा कर जमानत दे दी गई.

गलत क्या कर रही थी अनुपमा अनुपमा ने देह व्यापार की बात स्वीकारी क्योंकि यह तो छापे में ही साबित हो चुका था कि ग्राहकों ने कालगर्ल्स को 500-500 रुपए के हिसाब से भुगतान किया था और ये महिलाएं बैरागढ़ से आई थीं. अनुपमा के पति की मौत कोई 3 साल पहले हो चुकी थी. इस के बाद उसे पैसों की किल्लत होने लगी थी. कुछ दिन मायके होशंगाबाद में रहने के बाद वह ससुराल सीहोर वापस आई और समाजसेवा के काम में जुट गई. लेकिन इस के बाद वह इंदौर चली गई थी. इस दौरान वह सीहोर कभीकभार आती रही लेकिन उस की गतिविधियां और सक्रियता कम हो रही थीं.

आजकल समाजसेवा भी मुफ्त में नहीं होती फिर अनुपमा के खर्चे तो अनापशनाप थे. विधवा होने की त्रासदी भुगत रही अनुपमा ने देखा कि उस के जैसी कई विधवाएं और परित्यक्ताएं बदहाल जिंदगी जी रही हैं. कइयों के पति निकम्मे और शराबी हैं तो कुछ का चक्कर इधरउधर चल रहा है. ऐसी औरतों को कमानेखाने और बच्चे अगर हों तो उन की परवरिश और स्कूलिंग के लिए पैसों के लाले पड़े रहते हैं और उन की कोई सगे वाला तो दूर की बात है दूर वाला भी मदद नहीं करता और जो करता है वह उन से कुछ न कुछ चाहता जरूर है. अनुपमा ने कुछ सोचा और फिर इन बेसहाराओं और जरूरतमंदों की मदद करने की गरज से उन से देहव्यापार करवाना शुरू कर दिया, जिस से उसे भी दलाली के जरिए खासी आमदनी होने लगी.

अनुपमा के संपर्क में लगभग 15 महिलाएं थीं और एकदो को छोड़ कर सभी अधेड़ सी थीं, जिन की अपने पतियों से पटरी नहीं बैठती थी या पतियों ने उन्हें छोड़ रखा था यानी वह इस धंधे में शादीशुदाओं को ही लाती थी. क्योंकि ग्राहक से ज्यादा वे राज उजागर होने से डरती थीं. पैसों के लिए देह व्यापार का शार्टकट अपनाने के लिए अनुपमा ने उन्हें उकसाया और समझाया था, कोई जोरजबरदस्ती की होगी, जैसा कि पुलिस और मीडिया वाले कह रहे हैं, ऐसा लग नहीं रहा. जिस का खुलासा अदालत में हो जाएगा. सीहोर में पकड़े गए रैकेट में सभी महिलाएं अधेड़ और वक्त की मारी थीं, जिन का इकलौता आर्थिक और सामाजिक सहित भावनात्मक सहारा भी अनुपमा ही थी.

अनुपमा ने कानूनन जरूर जुर्म किया है जो अगर साबित हो पाया तो उसे सजा भी मिलेगी. लेकिन देखा जाए तो उस ने बेसहारा औरतों को होने वाले मुफ्त के शारीरिक शोषण को सशुल्क कर दिया था, जिस से उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ता था. अनुपमा के पास बड़ा मकान था और उस का अपना एक अलग रुतबा भी था, जिस का फायदा उठा कर उस ने देह व्यापार का आदिम धंधा शुरू कर दिया. यह भी सोलह आने सच है कि पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी क्योंकि उस के तार कई दिग्गजों से जुड़े थे. लेकिन गिरफ्तारी के बाद चर्चा के मुताबिक कोई बड़ा नाम सामने नहीं आया तो तमाम अटकलों पर विराम लग गया और अनुपमा को भी समझ आ गया कि लोग लुत्फ और फायदा तो उठाने में पीछे नहीं रहते, लेकिन कीचड़ को भी माथे से नहीं लगाते. हर कोई पाकसाफ दिखना चाहता है.

यह भी हर्ज या ऐतराज की बात नहीं, पर सीहोर का यह छापा सोचने को मजबूर करता ही है कि हैरानपरेशान और जरूरतमंद औरतें देह व्यापार में क्यों आती हैं और इन्हें सजा देने से अब तक किस को क्या हासिल हुआ है. देह व्यापार जब कानून से बंद नहीं हो सकता तो इसे कानूनी मान्यता देने में हर्ज क्या है. MP News

 

Crime News : शादियां कर जिस्म के धंधे में धकेलीं 200 लड़कियां

Crime News : बीएसएफ और एनजीओ की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश से हर साल 50 हजार लड़कियां भारत समेत दुबई आदि देशों में जिस्मफरोशी के लिए धकेल दी जाती हैं. ऐसा ही मानव तस्कर मुनीर है जो 200 लड़कियों का जिस्म की मंडी में बेच चुका है. आखिर कौन है मुनीर?

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित स्पैशल इनवैस्टिगेशन टीम (एसआईटी) के आला अधिकारियों द्वारा भोपाल में सितंबर 2021 के अंतिम सप्ताह में एक अहम बैठक की गई. इस दौरान मानव तस्करी समेत हनीट्रैप के बढ़ते मामले को ले कर चिंता जताई गई. राज्य में विगत कुछ माह में ऐसे मामले बढ़ गए थे. राजधानी भोपाल और दूसरे बड़े शहर इंदौर एवं ग्वालियर में एमएलए, एमपी, ब्यूरोक्रेट, बिजनैसमैन या बड़े उद्योगपति को लड़की द्वारा सैक्स जाल में फंसाने और उन से वसूली की कई शिकायतें आ चुकी थीं.

अधिकतर मामलों में लड़की द्वारा फार्महाउस, गेस्ट हाउस, रेंटेड फ्लैट या होटल के कमरे में अवैध सैक्स के वीडियो छिपे कैमरे से बनाए जाते थे. फिर उन से मोटी रकम वसूली जाती थी. इस काम को बड़े ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा था. जबकि पुलिस के बड़े अफसरों पर ऐसे गिरोह को धर दबोचने का पौलिटिकल प्रेशर भी बना हुआ था. कब कौन किस तरह से हनी ट्रैप का शिकार हो जाए, कहना मुश्किल था. वे टेक्नोलौजी, ऐप्स और सोशल साइटों का इस्तेमाल करते हुए बच निकलते थे.

इसी तरह पिछले कुछ महीनों से आए दिन होटल, गेस्टहाउस, स्पा और मसाज सेंटर से सैक्स रैकेट का भी भंडाफोड़ हो रहा था. दूसरे राज्यों से आई जिस्फरोशी में लिप्त लड़कियां वहां से पकड़ी जा रही थीं, लेकिन उन का सरगना गिरफ्त से बाहर था. 2-3 से ले कर कभी 11, तो कभी 15 या 21 पकड़ी गई लड़कियों में अधिकतर बांग्लादेश की होती थीं. वे वहां तक कैसे पहुंचीं, उन का मुखिया कौन है, उन के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं होती थी. यहां तक कि वे ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पाती थीं. अपना सही पताठिकाना तक नहीं बता पाती थीं.

इन्हीं सब बातों को ले कर एसआईटी की बुलाई गई विशेष बैठक में बडे़ अफसरों ने इंदौर, भोपाल और ग्वालियर की पुलिस को आड़ेहाथों लिया था. उन्हें जबरदस्त डांट पिलाई थी. उसी सिलसिले में सैंडो, आफरीन एवं अन्य में मुनीरुल का का नाम भी सामने आया. उस का पुकारू नाम मुनीर था. वही कई एजेंटों का सरगना भी था. इस पर यह सवाल भी उठा कि मुनीर पिछले 11 महीने से क्यों फरार है, जबकि उस पर 10 हजार रुपए का ईनाम भी है. वह पकड़ा क्यों नहीं गया? उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिसंबर में इंदौर के विजय नगर और लसूडि़या इलाके में सैक्स रैकेट के खिलाफ औपरेशन चलाया गया था. तब कुल 15 लड़कियां पकड़ी गई थीं.

उन से मिली जानकारी के आधार पर ही उन आरोपियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे. उस वक्त मुख्य आरोपी मुनीर भाग निकला था. उसे पकड़ने के लिए 10 हजार रुपए ईनाम की भी घोषणा की गई थी. उस के बाद ही इंदौर में हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट और मानव तस्करी की जांच के लिए डीआईजी ने दिसंबर 2020 में ही एसआईटी बनाई थी. इस में पूर्व क्षेत्र के एएसपी राजेश रघुवंशी, विजय नगर सीएसपी राकेश गुप्ता, एमआईजी टीआई विजय सिसौदिया और विजय नगर टीआई तहजीब काजी को रखा गया था. फिर एसआईटी ने सैक्स रैकेट के खिलाफ एक अभियान छेड़ दिया था और जगहजगह सैक्स रैकेट के अड्डों पर लगातार छापेमारी की गई.थी, लेकिन मुनीर पकड़ा नहीं जा सका था. वह पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर हमेशा बच निकलता था.

एसआईटी को मुनीर के सूरत में छिपे होने की सूचना मिली थी. वह बारबार अपना ठिकाना बदलने में माहिर था, उस की लोकेशन की पूरी जानकारी पुख्ता होने के बाद ही एसपी ने उसे पकड़ने के निर्देश दिए.  इस के लिए टीम ने एक सप्ताह तक सूरत में डेरा डाल दिया. टीम को बताया गया था कि वह अपना धंधा वीडियो कालिंग के जरिए करता है. वाट्सऐप से मैसेज करता है. इसे ध्यान में रखते हुए उस की ट्रैकिंग पूरी मुस्तैदी के साथ मोबाइल टेक्नोलौजी का इस्तेमाल करते हुए की जानी चाहिए. जरा सी भी चूक या नजरंदाजी से वह बच निकल सकता था.

टीम के एक्सपर्ट पुलिसकर्मियों ने आखिरकार मोबाइल लोकेशन के आधार पर उसे 30 सितंबर, 2021 की रात को पकड़ ही लिया. पकड़े जाने पर उस ने पहले तो अपनी पहचान छिपाने की हरसंभव कोशिश की, किंतु इस में वह सफल नहीं होने पर तुरंत रुपए ले कर छोड़ने का दबाव बनाया. इस में भी उसे सफलता नहीं मिली. अंतत: टीम उसे पकड़ कर पहली अक्तूबर को इंदौर के पुलिस हेडक्वार्टर ले आई. इंदौर में एसआइटी के सामने सख्ती से पूछताछ में उस ने कई ऐसे राज खोले, जिसे सुन कर सभी को काफी हैरानी हुई. उस ने मानव तस्करी से ले कर लड़कियों को डरानेधमकाने, प्रताडि़त करने, यौन उत्पीड़न किए जाने, बांग्लादेश का बौर्डर पार करवाने,

देह के बाजार के लिए बिकाऊ बनाने के वास्ते ट्रेनिंग देने और कानून को झांसा देने के लिए फरजी शादियां करने तक के कई खुलासे किए. उस के अनुसार जो तथ्य सामने आए वे इस प्रकार हैं. मूलत: बांग्लादेश का रहने वाला मुनीर पिछले 5 सालों से मानव तस्करी के धंधे में था. बांग्लादेश के जासोर में उस का पुश्तैनी घर है. गर्ल्स स्मगलिंग में तो वह एक माहिर और मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस की नजर हमेशा बांग्लादेश के वैसे गरीब परिवारों पर टिकी रहती थी, जिन में लड़कियां होती थीं. उन की उम्र 16-17 के होते ही उन के परिवार वालों को भारत में काम दिलाने के बहाने अच्छी कमाई का लालच दे कर मना लेता था.

शक से बचने के लिए कई बार लड़कियों को वह दुलहन बना कर लाता था. इस के लिए बाकायदा निकाहनामा साथ रखता था, लड़की का पासपोर्ट और टूरिस्ट वीजा बनने में अड़चन नहीं आती थी, भारत में ला कर उन्हें लड़कियों की मांग के आधार पर मुंबई, आगरा, अहमदाबाद, सूरत, इंदौर, भोपाल, दिल्ली आदि में सप्लाई कर देता था. वह भारत में रहते हुए भारत-बांग्लादेश के पोरस बौर्डर पर बने नाले या तार के बाड़ों से हो कर गुप्त रास्ते से पश्चिम बंगाल से सटे बांग्लादेश आताजाता रहता था. इस कारण अपने पसंद की लड़कियों को भी आसानी से बौर्डर पार करवा लेता था.

लड़कियों को एक दिन अपने पास के गांव में एजेंटों के यहां ठहरा देता था. फिर पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद ला कर उन्हें महाराष्ट्र और गुजरात में पहले से तैनात एजेंटों को 75 से एक लाख रुपए में बेच देता था. कुंवारी लड़कियों की कीमत अधिक मिलती थी. कुछ लोग उन लड़कियों का नकली आधार कार्ड और दूसरे कागजात बनाने का काम भी करते थे. एजेंट उन्हें ग्राहकों के सामने पेश करने से पहले दुलहन की तरह सजातासंवारता था. हल्दी उबटन लगा कर स्नान आदि के बाद अच्छे ग्लैमरस कपड़ों में रईस ग्राहकों के पास भेज देता था.

हालांकि इस के लिए सभी लड़कियों को नौकरी के लिए इंटरव्यू का झांसा ही दिया जाता था. जो ऐसा करने से इनकार करती थी या भागने का प्रयास करती थी, उन्हें भूखाप्यासा कमरे में बंद रखा जाता था. बाद में उसे मजबूरन देहव्यापार के धंधे में उतरना पड़ता था. इंदौर के विजय नगर में छापेमारी के दौरान पकड़ी गई 11 लड़कियों में एक लड़की ने पुलिस को अपनी आपबीती सुनाई थी. उस ने बताया था कि साल 2009 में वह 15 साल की थी. उस की मां का निधन हो गया था. तब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. पिता पहले ही गुजर चुके थे.

मां की मौत के बाद वह एकदम से अनाथ हो गई थी. पढ़ाई बंद चुकी थी. पढ़ना चाहती थी. स्कूल की फीस भरने की चिंता में वह एक दिन पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी. तभी उस के पास एक युवती आई. उस से बोली कि बांग्लादेश में कुछ नहीं रखा है. यहां से अच्छा भारत है. वहां बहुत तरह के काम मिल जाते हैं. कंपनियों में अच्छी नौकरी मिल जाती है. कुछ नहीं हुआ तो मौल या बड़ेबड़े होटलों या अस्पतालों में काम मिल जाता है. वहां चाहे तो पढ़ाई भी कर सकती है. वहां दूसरे देशों से आए लोगों के लिए सरकार ने कई शहरों में शेल्टर बना रखे हैं. दिल्ली में तो बांग्लादेशियों के रहने का एक बड़ा मोहल्ला बसा हुआ है.

इसी के साथ युवती ने अपने बारे में बताया कि भारत अकसर आतीजाती रहती है. वहीं उस ने एक युवक से शादी कर ली है. वह भी बांग्लादेशी है. बिल्डिंग बनाने की ठेकेदारी का काम करता है. अच्छी आमदनी हो जाती है. दूर बैठे एक युवक की तरफ इशारा करते उस ने लड़की को बताया कि वह उस का शौहर है. अज्ञात युवती ने लड़की को उस की भी अच्छी शादी हो जाने के सपने दिखाए. उस ने कहा कि भारत में रह रहे बांग्लादेश के कई अविवाहित युवक चाहते हैं कि वह अपने ही देश की लड़की से शादी करे.

वह लड़की न केवल पूरी तरह से उस युवती और युवक की बातों में आ गई, बल्कि वह उन के साथ भारत जाने को राजी भी हो गई. उसे अगले रोज सूरज निकलने से पहले इंडोबांग्ला बौर्डर तक पहुंचने के लिए कहा गया. उस ने ऐसा ही किया, किंतु उसे बौर्डर तक पहुंचने में पूरी रात पैदल चलना पड़ा. वहीं युवकयुवती उस का इंतजार करते हुए मिल गए और उसे बौर्डर पार करवा दिया. कुछ समय बाद ही लड़की उन के साथ मुर्शिदाबाद चली गई. वहीं उसे एक दूसरे आदमी के यहां ठहराया गया और एकदूसरे को मियांबीवी बताने वाले दंपति चले गए. दोनों फिर लड़की को कभी नहीं मिले.

लड़की को जिस व्यक्ति के पास ठहराया गया था, वहां अगले रोज एक दूसरा युवक आया. उस का परिचय मुनीर नाम के व्यक्ति से करवाया गया. उस के साथ लड़की का निकाह करवा दिया गया. लड़की को बताया गया कि इस से उस के भारत में रहने और ठहरने का प्रमाणपत्र बन जाएगा.  फिर मुनीर नवविवाहिता लड़की के साथ गुजरात के सूरत शहर चला आया. मुनीर ने लड़की को अपने साथ 2 दिनों तक एक किराए के कमरे में रखा. इस बीच मुनीर ने उसे छुआ तक नहीं. उसे सिर्फ इतना बताया गया कि दोनों को मुंबई जाना है.

तीसरे दिन मुनीर ने लड़की को एक व्यक्ति के हाथों बेच दिया. लड़की को कहा कि उसे उस के साथ जाना होगा, वहीं उस की नौकरी लग जाएगी. सूरत का कुछ जरूरी काम निपटा कर 2 दिन बाद वह भी आ जाएगा. लड़की को मुनीर भी दोबारा कभी नहीं मिला. इस बात को मुनीर ने भी पूछताछ के दौरान स्वीकार कर लिया था. उस ने बताया कि तब उस का इस धंधे में रखा गया पहला कदम ही था, जिस में उसे सफलता मिलने के बाद उस का उत्साह बढ़ गया था. अब उसे तो याद भी नहीं है कि ऐसी शादी उस ने और कितनी लड़कियों के साथ की है. लड़कियों को ट्रैप करने और उन्हें बहलाफुसला कर अपने जाल में फंसाने के लिए वह तरहतरह के तरीके अपनाता था.

मोबाइल के सहारे वह सारा काम निपटाता था, लेकिन हर महीने 2 महीने पर नया सिम बदल लेता था. उस का टारगेट होता था कि हर महीने कम से कम 50 लड़कियों को बांग्लादेश से ट्रैप करे और उन्हें मानव तस्करी में शामिल एजेंटों के हाथों बेच डाले. इसी के साथ उस ने स्वीकार कर लिया कि वह 200 से अधिक लड़कियों को जिस्मफरोशी में धकेल चुका है. देखते ही देखते वह पुलिस की निगाह में बांग्लादेशी लड़कियों का एक बडा तस्कर बन चुका था. छापेमारी के दौरान जब भी बांग्लादेशी लड़कियां गिरफ्तार होतीं, तब उस का नाम जरूर आता था.

मुनीर का एक बड़ा नेटवर्क था, जिस में ज्यादातर पुरुष थे, लेकिन उन में 20 फीसदी के करीब महिलाएं भी थीं. एजेंट महिलाएं बांग्लादेश में लड़कियों को फंसाने और बांग्लादेश के गांवों से बौर्डर तक पहुंचाने या फिर भारत में बौर्डर के पास के इलाके मुर्शिदाबाद तक लाने का ही काम करती थीं. वे औरतें बौर्डर पर तैनात बीएसएफ के जवानों के लिए खानेपीने का सामान ला कर देती थीं. बदले में लड़कियों को बौर्डर पार करने की थोड़ी छूट मिल जाती थी. एजेंटों द्वारा लड़कियों को मानव तस्करी के लिए जैसोर और सतखिरा से बांग्लादेश में गोजादंगा और हकीमपुर लाया जाता है. कारण वहां के बौर्डर पर कंटीले तारों के बाड़ नहीं लगे हैं. साथ ही वहां की अबादी भी घनी है.

इस कारण रोजाना की जरूरतों के लिए भारत और बांग्लादेश में लोगों का आनाजाना लगा रहता है. उसे बेनोपोल बौर्डर के नाम से जाना जाता है, दक्षिणपश्चिम के  इस हिस्से में खुली जमीन होने के कारण लोग बौर्डर को आसानी से पार लेते हैं. बौर्डर पर पकड़े जाने पर लोग 200 से 400 टका (बांग्लादेश की मुद्रा) दे कर आसानी से छूट जाते हैं. मानव तस्करी के लिए बदनाम अन्य जिलों में कुरीग्राम, लालमोनिरहाट, नीलफामरी, पंचगढ़ी, ठाकुरगांव, दिनाजपुर, नौगांव, चपई नवाबगंज और राजशाही भी है. पुलिस ने पुकारू और मुनीर से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश कर दिया. Crime News

Love Story : बड़ी भाभी का दीवाना देवर 

Love Story : भोपाल से 35 किलोमीटर दूर बैरसिया तहसील हमेशा से अनदेखी का शिकार रही है, जिस का फर्क यहां की जिंदगी पर भी पड़ा है. इस इलाके के पिछड़ेपन के चलते यहां अपराध की दर उम्मीद से ज्यादा है. जंगलों से घिरे बैरसिया के बाहरी इलाकों में आए दिन हत्या की वारदातें होती रहती हैं.

ऐसी ही एक वारदात बीती 26 नवंबर को हुई थी. उन दिनों पूरे मध्यप्रदेश की तरह इस क्षेत्र में भी चुनावी चर्चा और गतिविधियां शवाब पर थीं. चुनाव के वक्त पुलिस वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता. उस रात करीब 12 बजे नजीराबाद थाने के इंचार्ज योगेंद्र परमार थाने में बैठे कामकाज निपटा रहे थे कि तभी अधेड़ उम्र के एक शख्स ने थाने में कदम रखा. इतनी रात गए जो भी थाने आता है वह कोई बुरी खबर ही लाता है, यह बात योगेंद्र परमार जानते थे. वह उस व्यक्ति के चेहरे की बदहवासी देख कर ही समझ गए कि जो भी होगी, अच्छी खबर नहीं होगी. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि खबर हत्या की होगी.

आगंतुक ने अपना नाम लक्ष्मण सिंह गुर्जर, निवासी चंद्रपुर गांव बताया. लक्ष्मण सिंह ने आते ही परमार को बताया कि उस के भाई सोनाथ सिंह की हत्या हो गई है और उस की लाश गांव में उस के घर पर पड़ी है. योगेंद्र परमार ने बिना वक्त गंवाए टेबिल पर बिखरे पड़े कागजात समेटे और लक्ष्मण सिंह के साथ चंद्रपुर गांव की रवानगी डाल दी. उन्होंने कुछ सिपाही भी साथ ले लिए थे. जातेजाते उन्होंने थाना क्षेत्र में हुई हत्या की खबर एसडीपीओ संजीव कुमार सिंह को भी दे दी.

घटनास्थल गांव के कोने का एक मकान था, जहां एक कमरे में 40 वर्षीय सोनाथ सिंह की लाश पड़ी थी. लाश के आसपास काफी मात्रा में खून फैला था. पहली नजर में ही समझ आ रहा था कि हत्या पूरी बेरहमी से की गई है, क्योंकि सोनाथ सिंह की गर्दन पर धारदार हथियार के आधा दर्जन से भी ज्यादा जख्म दिख रहे थे. अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये निशान कुल्हाड़ी या फरसे के हैं, जिन का गांवों में अकसर इस्तेमाल होता है.

लाश पर भरपूर नजर डाल कर योगेंद्र परमार ने जब लक्ष्मण सिंह से हत्या के बारे में पूछा तो उस ने कुछ बातें चौंका देने वाली बताईं, जिस से योगेंद्र परमार समझ गए कि मामला जर, जोरू और जमीन में से जोरू का है. बकौल लक्ष्मण सिंह जब वह खेत में पानी दे कर घर लौट रहा था तो उस ने गांव के बाहर अपनी भाभी भूलीबाई को भागते हुए देखा था. इतनी रात गए भाभी, भतीजी को ले कर कहां जा रही है, इस बात से चौंके लक्ष्मण सिंह ने भूलीबाई को रोक कर जब उस से बात करनी चाही तो बजाए रुकने के उस ने अपने कदमों की गति और बढ़ा दी.

लक्ष्मण सिंह ही नहीं, यह बात पूरा गांव जानता था कि भूलीबाई और सोनाथ सिंह में आए दिन लड़ाईझगड़ा होता रहता है. इसलिए उस ने यह अंदाजा लगाया कि दोनों में किसी बात पर चिकचिक हुई होगी. इसलिए भाभी यूं घर छोड़ जा रही है. पास के ही गांव कढ़ैया में उस का मायका था. आखिर हुआ क्या, यह जानने के लिए लक्ष्मण सिंह सोनाथ सिंह के घर पहुंचा तो वहां उस का सामना भाई की लाश से हुआ. इस के बाद यह खबर देने के लिए वह थाने जा पहुंचा था.

पति की हत्या पर भूलीबाई ने कोई शोरशराबा नहीं मचाया था और न ही किसी से मदद की गुहार लगाई थी. यह बात ही उसे शक के कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी थी. लेकिन अंदाजे की बिना पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना समझदारी नहीं थी, इसलिए योगेंद्र परमार ने तुरंत पुलिस टीम भेज कर भूलीबाई को थाने बुलवा लिया.

भूलीबाई के थाने आने से पहले की गई पूछताछ में पुलिस वालों को कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी थी, सिवाय इस के कि मांगीलाल ने अपनी जमीन दोनों बेटों में बराबर बांट दी थी. लेकिन जमीन इतनी नहीं थी कि उस से किसी एक परिवार का भी गुजारा हो पाता इसलिए सोनाथ सिंह रोजगार की तलाश में बाहर चला गया था. लेकिन साल में कुछ दिनों के लिए वह गांव जरूर आता था. उस की गैरमौजूदगी में भूलीबाई खेतीकिसानी संभालती थी. दोनों बच्चों में से बेटे को उस ने अपने मायके में छोड़ रखा था.

इन जानकारियों से एक कहानी तो आकार लेती दिख रही थी, जिस में भूलीबाई का रोल अहम था. लेकिन पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी. ऐसे में भूलीबाई के बयान ही सोनाथ सिंह की हत्या पर पड़ा परदा उठा सकते थे. थाने आ कर अच्छेअच्छे मुलजिमों के हौसले पस्त पड़ जाते हैं, फिर भूलीबाई की क्या बिसात थी. लेकिन इस के बाद भी वह अनाडि़यों की तरह ही सही पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही.

पहले तो उस ने अपने देवर लक्ष्मण सिंह को ही फंसाने की गरज से यह बयान दे डाला कि जमीन जायदाद के लालच में उस ने सोनाथ की हत्या की है. साथ ही यह भी कि इस में उस के अलावा और लोग भी शामिल हैं. ये और लोग कौन हैं, इस सवाल पर वह चुप रही. बात यहां तक तो सच लग रही थी कि सोनाथ सिंह की हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल हैं, क्योंकि एक हट्टेकट्टे मर्द को काबू करना आसान बात नहीं थी. दूसरे घटनास्थल पर किसी तरह के संघर्ष के निशान भी नजर नहीं आ रहे थे, इस का सीधा सा मतलब यह निकल रहा था कि पहले सोनाथ को काबू किया गया, फिर उस पर धारदार हथियार से प्रहार किए गए.

जाहिर था, हत्या अगर भूलीबाई ने की थी तो कोई न कोई उस का संगीसाथी रहा होगा. लक्ष्मण सिंह पर शक करने की कोई वजह पुलिस वालों को समझ नहीं आ रही थी, क्योंकि वह कोई कहानी गढ़ता या झूठ बोलता नहीं लग रहा था. उलट इस के भूलीबाई अपने बयानों में गड़बड़ा रही थी. पुलिस ने जब सख्ती दिखाई तो कुछ ही देर में उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि सोनाथ सिंह उस के चालचलन पर शक करता और मारतापीटता था, इसलिए उस ने पति की हत्या कर दी.

लेकिन भूलीबाई ने पूरी बात अभी भी नहीं बताई थी. यह तो कोई बच्चा भी कह सकता था कि एक अकेली औरत धारदार हथियार से लगातार इतने वार, वे भी सोनाथ जैसे तगड़े मर्द पर, नहीं कर सकती थी. अब पुलिस को उस के और टूटने का इंतजार था, जिस से कत्ल की इस वारदात का पूरा सच सामने आ जाए. सोनाथ सिंह की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई थी. दूसरी कानूनी औपचारिकताएं भी पुलिस वालों ने पूरी कर ली थीं. सुबह होतेहोते सोनाथ की हत्या की खबर पूरे इलाके में फैल चुकी थी. लोग चुनावी चर्चा छोड़ तरहतरह की बातें करने लगे थे.

भरेपूरे बदन की भूलीबाई को देख कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह 2 बच्चों की मां है. 35 की उम्र में खासी जवान दिखने वाली भूलीबाई ने आखिरकार पति की हत्या क्यों की होगी, यह राज भी सुबह का सूरज उगने से पहले उस ने उगल ही दिया. पता चला कि इस वारदात में उस का चचेरा देवर प्रेम सिंह और उस का एक दोस्त पन्नालाल भी शामिल थे. नाजायज संबंध का जो शक किया जा रहा था, वह सच निकला. हुआ यूं था कि उम्र में आधा रिश्ते का देवर प्रेमसिंह भूलीबाई को दिल दे बैठा था. आजकल हर हाथ में मोबाइल है, जिस का उपयोग प्रेमसिंह जैसे नौजवान पोर्न फिल्में देखने में ज्यादा करते हैं.

दिनरात ऐसी ही अश्लील और सैक्सी वीडियो के समंदर में डूबे प्रेमसिंह को औरत की तलब लगने लगी थी, पर प्यास मिटाने का जरिया उसे नजर नहीं आ रहा था. हालांकि गांव में लड़कियों की कमी नहीं थी, लेकिन पिछड़ेपन के चलते और प्राइवेसी न होने के कारण किसी को पटा पाना आसान काम नहीं था. इन दिनों गांवों में निकम्मे और अय्याश किस्म के नौजवानों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. उन में से एक प्रेमसिंह का दोस्त पन्नालाल भी था.

एक दिन प्रेमसिंह ने जब अपनी जरूरत पन्नालाल को खुल कर बताई तो वह हंस कर बोला, ‘‘लो, बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा.’’

इशारे में कही इस बात को प्रेमसिंह समझ नहीं पाया. लेकिन उम्मीद की एक किरण तो उसे बंधी थी कि पन्नालाल खेला खाया आदमी है, जो उस के लिए जरूर किसी औरत का इंतजाम कर देगा. जल्द ही दारूमुर्गे की एक दावत हुई, जिस में पन्नालाल ने खुल कर उस से कहा कि तू अपनी भाभी भूलीबाई पर लाइन मार, काम बन जाएगा. बात का खुलासा करते हुए पन्नालाल ने उस की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक वजहें भी बताईं. मसलन, तेरा चचेरा भाई साल भर बाहर रहता है, ऐसे में भूलीबाई को मर्द की जरूरत तो पड़ती ही होगी. भूलीबाई किसी को घास नहीं डालती, लेकिन तू ट्राई करेगा तो बात बन भी सकती है.

बात प्रेमसिंह की समझ में आ गई और उस रात वह सो नहीं पाया. रातभर ख्वाबों खयालों में वह भूलीबाई को उसी तरह लपेटे सैक्स करता रहा, जैसा कि पोर्न वीडियो में वह देखता था. इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए प्रेमसिंह अकसर भूलीबाई के घर जा कर बैठने लगा. यह बात भी उसे समझ आ गई थी कि जल्दबाजी, बेसब्री और हड़बड़ाहट दिखाने से बात बिगड़ भी सकती है, इसलिए पहले औरत का दिल जीतो, फिर जिस्म तो वह खुद ही सौंप देती है.

इसी आनेजाने में वह रोज भूलीबाई के अंगों और उभारों को देखता था तो पागल सा हो जाता था. लेकिन प्रेमसिंह मौके की तलाश में था और दिल जीतने की राह पर चल रहा था. छोटे मोटे कामों में वह अपनी भाभी की मदद करने लगा था. यहां तक कि वह पैसा खर्च करने में भी नहीं हिचकता था. अच्छी बात यह थी कि उस पर कोई शक नहीं करता था, क्योंकि वह था तो परिवार के सदस्य सरीखा ही.

भूलीबाई को भी अब समझ आने लगा था कि जिस देवर को शादी के बाद उस ने गोद में खिलाया था, वह कौन सा खेल खेलने की जुगत में आता जाता है. जल्द ही उस की झिझक दूर होने लगी और पन्नालाल की यह सलाह साकार होती दिखने लगी कि एक बार भी सैक्स का लुत्फ उठा चुकी औरत सैक्स के बगैर ज्यादा दिन नहीं रह सकती. अब दिक्कत यह थी कि प्रेमसिंह पहल कैसे करे. भूलीबाई उस की द्विअर्थी बातों पर हंस कर उसे शह देने लगी थी और इशारों में यदाकदा हल्कीफुल्की सैक्स की बातें भी कर लेती थी. लेकिन प्रेमसिंह को डर इस बात का था कि कहीं ऐसा न हो कि वह पहल करे और भाभी झिड़क दे. डर इस बात का भी था कि भूलीबाई ने अगर घर में शिकायत कर दी तो उस की खासी पिटाई होगी.

लेकिन जिस राह पर दोनों चल पडे़ थे, उस में बहाना खुद चाहने वालों को नजदीक लाने का मौका ढूंढ लेता है. एक दिन यूं ही बातोंबातों में प्रेमसिंह ने डरतेडरते भूलीबाई को एक पोर्न फिल्म दिखा डाली तो भूलीबाई की भी कनपटियां गर्म हो उठीं. इस फिल्म में वह सब बल्कि उस से भी ज्यादा मौजूद था, जो वह सोचती रहती थी. बस फिर क्या था, एक दिन झिझक की दीवार टूटी तो दोनों बेशर्मी के समंदर में गोता लगा बैठे.

अब यह रोजरोज का काम हो चला था. कोई रोकटोक न होने से दोनों सैक्स का यह खेल आए दिन खेलने लगे. प्रेमसिंह ने भूलीबाई पर वे सारे टिप्स और तौरतरीके आजमा डाले जो पोर्न फिल्मों में दिखाए जाते हैं. मुद्दत से संसर्ग के लिए तरस रही भूलीबाई के लिए कुछ अनुभव एकदम नए और रोमांचक थे. भूलीबाई के पास पुराना तजुर्बा था और प्रेमसिंह के पास नया जोश. सैक्स के दरिया में दोनों ऐसे डूबे कि उन्हें इस बात का भी होश नहीं रहा कि जो वे कर रहे हैं वह गैरकानूनी न सही लेकिन खतरनाक तो है.

हर साल की तरह बीती दीवाली पर भी सोनाथ सिंह गांव आया. लेकिन जब उस ने यह बताया कि इस बार वह 4-6 दिन नहीं बल्कि महीने भर से भी ज्यादा रुकेगा, तो भूलीबाई बजाय खुश होने के इस गम में डूब गई कि जब तक सोनाथ रुकेगा तब तक वह अपने किशोर प्रेमी से सैक्स का लुत्फ नहीं उठा पाएगी. यही हाल प्रेमसिंह का था, जो अब एक दिन भी भूलीबाई के बगैर नहीं रह पाता था. वह मन ही मन भूलीबाई भाभी से प्यार भी करने लगा था. यह बेमेल प्यार भले ही शरीर की जरूरत भर था, जिसे वह खुद नहीं समझ पा रहा था.

सोनाथ ने ज्यादा दिन रुकने का फैसला बेवजह नहीं लिया था, बल्कि उसे भूलीबाई पर शक हो चला था. इस की पहली वजह तो यह थी कि भूलीबाई अब पहले की तरह सैक्स के लिए उतावली नहीं होती थी और दूसरी वजह वे बातें थीं जो उस ने उड़ते उड़ते सुनी थीं. सोनाथ के पास अपने शक को ले कर कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए वह गुपचुप भूलीबाई की निगरानी करने लगा. फिर एक दिन उस ने भूलीबाई और प्रेमसिंह को नग्नावस्था में रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. बात आई गई नहीं हुई, बल्कि सोनाथ को अब गांव के लोगों की कही पुरानी कहावत याद आने लगी कि खेती खुद न करो तो जमीन कोई और जोतने लगता है. यही बात औरत पर भी लागू होती है.

पत्नी की इस चरित्रहीनता को न तो वह पेट में पचाए रख सकता था और न ही सार्वजनिक कर सकता था, क्योंकि इस से जगहंसाई उस की ही होनी थी. ठंडे दिमाग से विचार करने पर उस ने अब गांव में ही रहने का फैसला कर लिया, इस से भूलीबाई और प्रेमसिंह दोनों परेशान हो उठे, जिन्हें एकदूसरे का चस्का लग चुका था. यही लत उन्हें चोरी छिपे मिलने के लिए उकसाने लगी. सोनाथ ने पत्नी से पहले ही कह दिया था कि अब अगर वह प्रेमसिंह से मिली तो खैर नहीं.

पर वह यह भूल रहा था कि खैर तो अब उस की नहीं थी. एक दिन उस ने भूलीबाई को फोन पर बात करते पकड़ लिया, तो उस की खासी धुनाई कर डाली. यह बात जब प्रेमसिंह को पता चली तो उस का खून खौल उठा. अपने इकलौते इश्किया सलाहकार पन्नालाल को उस ने बताया कि अब उस से भूलीबाई की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही है. दूसरे अगर सोनाथ भूलीबाई की पिटाई करे, यह उस से बरदाश्त नहीं हो रहा है. तैश में आ कर फिल्मी स्टाइल में उस ने सोनाथ के वे हाथ काट डालने की बात भी कह डाली, जो भूलीबाई पर उठे थे.

इस पर पन्नालाल ने बजाए समझाने के आग में घी डालते हुए कहा कि अकेले हाथ काटने से कुछ हासिल नहीं होगा, उलटे सोनाथ पुलिस में सारी बात बता देगा. अगर कांटे को जड़ से खत्म करना है तो सोनाथ की गरदन ही उड़ानी पड़ेगी.

बस फिर क्या था दोनों ने मिल कर सोनाथ के कत्ल की योजना बना डाली. दूसरी ओर वासना की आग में तड़प रही भूलीबाई भी उन का साथ देने तैयार हो गई. पन्नालाल ने प्रेमसिंह को यह भी मशविरा दिया कि सोनाथ के कत्ल के पहले वह जी भर कर भूलीबाई के जिस्म का सुख उठा ले, नहीं तो फिर 13 दिन मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि इस दौरान भूलीबाई शोक में होगी और उस के आसपास कोई न कोई बना रहेगा.

ये तमाम बातें इस ढंग से हुईं, इस्तेमाल  मानो इन्हें कत्ल नहीं करना बल्कि बकरी का बच्चा पकड़ना है. हादसे की रात सोनाथ सिंह के गहरी नींद सो जाने के बाद भूलीबाई ने घर का दरवाजा खोला और प्रेमसिंह को अंदर बुला लिया. पहले तो दोनों ने जी भर के जिस्मों की प्यास बुझाई और फिर पन्नालाल को बुला कर हमेशा के लिए सोनाथ की जिंदगी का चिराग बुझा डाला.

सो रहे सोनाथ पर प्रेमसिंह और पन्नालाल ने कुल्हाड़ी से वार किए. इस दौरान भूलीबाई ने पति के पैर पकड़ रखे थे, सोनाथ सिंह नींद में ही नीचे से ऊपर कब पहुंच गया, यह उसे भी पता नहीं चला. प्लान के मुताबिक भूलीबाई बेटी को गोद में उठा कर भागी, लेकिन इत्तफाकन लक्ष्मण ने उसे देख लिया और तीनों पकड़े गए. जो अब जेल में अपनी करनी की सजा भुगत रहे हैं. Love Story

MP News : सोसाइटी के द्वारा ठगे 10 हजार करोड़

MP News : समीर अग्रवाल ऐसा शातिर व्यक्ति था कि उस ने अपने सागा ग्रुप के अंतर्गत केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय से 7 सोसाइटियों के रजिस्ट्रैशन कराए. इस के बाद उस ने देश के विभिन्न शहरों में दफ्तर खोल कर विभिन्न आकर्षक योजनाओं में लोगों के 10 हजार करोड़ रुपए जमा कराए. लालच में फंसे लोगों को अपने ठगे जाने का अहसास तब हुआ, जब…

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के दबोह कस्बे के रहने वाले गोटीराम राठौर उस दिन अपने खेत में लगी गेहूं की फसल में पानी दे कर अपने घर कुछ समय पहले ही आए थे. पत्नी खाना परोसने की तैयारी कर रही थी कि एक परिचित व्यक्ति ने उन के घर पर दस्तक देते हुए कहा, ”भाईजी नमस्कार, मैं एलजेसीसी (लस्टिनेस जनहित क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड) का एजेंट हूं. सोसाइटी बैंकिंग का काम भी करती है. ग्राहकों के लिए सोसाइटी बहुत सी बचत की स्कीम चला रही है, जिस में रुपए जमा करने पर भरपूर फायदा मिलता है. सोसायटी की कुछ स्कीम के बारे में जानकारी देने आया हूं.’’

”हां जी, बताइए कौन सी स्कीम है आप की सोसायटी की.’’ सामने पड़े लकड़ी के तख्त पर बैठने का इशारा करते हुए गोटीराम ने कहा.

”हमारी सोसायटी की स्कीम के तहत आप का जमा रुपया 5 साल में दोगुना हो जाता है. बैंकों से ज्यादा ब्याज हमारी सोसायटी ग्राहकों को देती है, कम समय में रकम दोगुना करने की स्कीम और किसी भी बैंक में नहीं है.’’ एजेंट बोला.

”इस सोसायटी का औफिस वगैरह कहां है. हमारा जमा पैसा सुरक्षित तो रहेगा न?’’ आशंका जाहिर करते हुए गोटीराम बोले.

”हां जी, सौ फीसदी सेफ. यह सोसायटी भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में रजिस्टर्ड है और भिंड शहर में ही सोसाइटी की ब्रांच है. फिर मैं हूं न.’’ एजेंट बोला.

”कितने रुपए जमा करने होंगे थोड़ा जानकारी दीजिएगा.’’ गोटीराम ने जिज्ञासा दिखाते हुए कहा.

”कम से कम 5 हजार और अधिकतम जितना आप जमा कर सकें.’’ एजेंट बोला.

”हमें जमीन के मुआवजे के तौर पर साढ़े 5 लाख रुपए मिले हैं, क्या पूरी रकम जमा कर सकते हैं?’’ गोटीराम ने पूछा.

”हां, जरूर कर सकते हैं, 5 साल में सोसाइटी आप को 11 लाख रुपए वापस कर देगी.’’ एजेंट ने भरोसा दिलाते हुए कहा.

तभी गोटीराम की पत्नी एजेंट को चाय बना कर ले आई. चाय पीने के बाद गोटीराम ने एजेंट से पूछा, ”इस के लिए कौन से दस्तावेज की जरूरत पड़ेगी और रुपए चैक से देने होंगे या नकद?’’

”भाईजी, बस आप का आधार कार्ड, एक फोटो आप को देनी होगी और नकद रुपए जमा करने पड़ेंगे.’’ एजेंट बोला.

”ठीक है, 2 दिन बाद आ जाइए, मैं बैंक से पैसा निकाल कर ले आऊंगा.’’ गोटीराम ने सहमति देते हुए कहा. गोटीराम राठौर की खेती की जमीन को सरकार ने हाईवे बनाने के लिए अधिगृहीत किया था, इस के एवज में उन्हें साढ़े 5 लाख रुपए का मुआवजा मिला था. गोटीराम ने सोचा यह रकम 5 साल में दोगुनी हो जाएगी यानी 11 लाख रुपए मिलेंगे. फायदे का सौदा देख गोटीराम ने पूरी रकम एजेंट के जरिए सोसाइटी में जमा कर दी. यह बात 2019 की है.

5 साल पूरे होने पर गोटीराम अपने दोगुने रुपए पाने का इंतजार कर रहे थे कि उन्हें पता चला कि यह सोसाइटी बहुत से लोगों का पैसा ले कर चंपत हो गई. आज हालात ये हैं कि सोसाइटी के दफ्तरों में ताले पड़े हुए हैं. गोटीराम राठौर की एक गलती की वजह से उन की जमीन भी चली गई और लालच में पैसा भी गंवा बैठे. एकांत में बैठ कर वे खुद को बारबार अभी भी कोसते हैं. यह कहानी अकेले गोटीराम की नहीं है. भिंड जिले के अलगअलग कस्बों के लोगों के साथ इसी तरह का फ्रौड हुआ है, जिस में लोगों की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए डूब चुके हैं.

टीकमगढ़ में ठेले पर सैंडविच बेचने वाले  अनूप रैकवार ने भी आज से 3 साल पहले एलजेसीसी में हर दिन 500 रुपए जमा किए थे. उसे बताया गया था कि 3 साल में 5 लाख 40 हजार रुपए जमा होंगे और मैच्योरिटी पूरी होने पर 7 लाख रुपए वापस मिलेंगे. अनूप दिन भर जीतोड़ मेहनत कर अपने बच्चों के भविष्य के लिए यह बचत कर रहा था. अब कंपनी भाग गई है. जिस एजेंट ने उस से पैसा जमा करवाया था, उस ने भी पैसा देने से हाथ खड़े कर दिए तो अनूप के सारे सपने बिखर गए.

इसी तरह गंजबासौदा में फेरी लगा कर सामान बेचने वाले सचिन गोयल जेएलसीसी में रोज 100 रुपए जमा करता था. उस ने इस तरह 36 हजार रुपए जमा किए. एक साल में उसे 38 हजार रुपए देने का लालच दिया गया था. अब ब्रांच में ताला लग चुका है तो सचिन अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है.

समीर ने किया 10 हजार करोड़ का फ्रौड

जब इस पूरे मामले की पड़ताल की गई तो पता चला कि एलजेसीसी सोसाइटी ने न केवल भिंड में बल्कि मध्य प्रदेश के 16 जिलों के लोगों के साथ करीब 10 हजार करोड़ का फ्रौड किया है. फ्रौड के शिकार हुए लोग अब पुलिस थानों के चक्कर काट रहे हैं. फ्रौड करने वाली इस सोसाइटी का संबंध सागा ग्रुप से है, जिस ने पिछले 15 सालों में देश के 16 राज्यों के एक हजार शहरों व कस्बों में अलगअलग नाम की कंपनी और फिर सोसाइटियों के दफ्तर खोल रखे थे. एमपी के टीकमगढ़, विदिशा, भिंड, सागर, छतरपुर, दमोह, सागर, कटनी, सीहोर आदि शहरों में जनवरी 2024 से कंपनी ने मैच्योरिटी की राशि का भुगतान करना बंद कर दिया था.

पहले लोगों को लोकसभा चुनाव का हवाला दिया गया, इस के बाद अलगअलग बहाने बनाए गए. जब पैसा नहीं मिला तो लोगों ने थाने पहुंच कर शिकायतें करनी शुरू कीं. अगस्त 2024 में ललितपुर और टीकमगढ़ में एक साथ पुलिस ने पहली बार पीडि़तों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की. अगस्त 2024 में टीकमगढ़  शहर के कई निवेशकों ने एसपी औफिस आ कर शिकायती पत्र देते हुए बताया था कि टीकमगढ़ शहर के चकरा तिराहे स्थित एलजेसीसी औफिस बंद कर के भाग गई है और लोगों का करोड़ों रुपए वापस नहीं कर रहे हैं. टीकमगढ़ के तत्कालीन एसपी रोहित काशवानी के पास सागा ग्रुप की सोसाइटी के खिलाफ 100 लोगों की शिकायतें आईं.

शिकायत मिलने के बाद टीकमगढ़ पुलिस कोतवाली में लस्टिनेस जनहित क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटी के खिलाफ 5 एफआईआर दर्ज कीं और इस मामले की जांच के लिए एडिशनल एसपी के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया गया. टीकमगढ़ शहर में ब्रांच मैनेजर रहे सुबोध रावत सहित 5 लोगों को हिरासत में ले कर जब पूछताछ की गई तो इस पूरी चिट फंड कंपनी और लोगों से ठगी करने वाले गिरोह का परदाफाश हुआ. इस सोसाइटी में काम करने वाले लोगों ने करोड़ों रुपए की ठगी कर के अपनी संपत्ति बनाई. इस कंपनी का सीएमडी समीर अग्रवाल दुबई में रहता है, उस के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया.

एसपी ने बताया कि वर्ष 2012 से ले कर 2024 तक 12 वर्षों के दौरान इस कंपनी ने टीकमगढ़ जिले के निवेशकों से करोड़ों रुपए की राशि फरजी तरीके से हड़प कर के बैंक प्रबंधन में काम करने वाले कर्मचारियों ने जमीन, मकान, वाहन और सरकारी बैंकों में एफडीआर बना लिए और अंत में सोसाइटी को बंद कर के फरार हो गए. इन में से सोसाइटी के टीकमगढ़ हैड सुबोध रावत समेत 11 आरोपियों को पुलिस ने उसी समय गिरफ्तार कर लिया था. साथ ही आरोपियों की 4 करोड़ रुपए कीमत की प्रौपर्टी भी जब्त की थी, जिस में वाहन और जमीनें शामिल थीं.

चिटफंड कंपनी के नाम पर करोड़ों रुपए की ठगी करने वाले 5 आरोपियों ब्रांच मैनेजर सुबोध रावत, अजय तिवारी, विजय कुमार शुक्ला, राहुल यादव और जियालाल राय को गिरफ्तार कर  इन सभी आरोपियों पर बीएनएस की धारा 111, 318, 61(2) के तहत गिरफ्तारी की गई.

मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में भी सोसाइटी द्वारा कई हजार करोड़ की ठगी सिंडिकेट बना कर की गई. ललितपुर के एसपी मोहम्मद मुश्ताक के मुताबिक, अभी तक 13 एफआईआर दर्ज की हैं. इस मामले में ललितपुर के मास्टरमाइंड रवि तिवारी और आलोक जैन को गिरफ्तार किया है. उन के खातों में जमा 54 लाख रुपए फ्रीज कराया गया है. ईडी भी इस मामले की जांच कर रही है. उत्तराखंड पुलिस भी 5 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है. दुबई के अबूधाबी में बैठे मास्टरमाइंड समीर अग्रवाल की गिरफ्तारी के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया गया है.

शुरुआत में सागा ग्रुप ने अपना खूब प्रचारप्रसार करते हुए दावा किया कि उन की कंपनी विदेशों में सोने, कोयले की खदान, तेल कुआं और रियल एस्टेट का काम करती है. कंपनी का सीएमडी समीर अग्रवाल इतना शातिरदिमाग है कि उस ने पिछले 15 साल से अलगअलग नाम की कंपनी और सोसाइटियों के जरिए लोगों से करोड़ों रुपए की ठगी को अंजाम दिया.

सब से पहले साल 2009 में एडवांटेज ट्रेड काम नाम से ग्वालियर में कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराया. उस समय यह कंपनी टूर पैकेज बेचने का काम करती थी. इस में 7,500 रुपए एक ग्राहक से लिए जाते थे. टूर देश के ही अलगअलग हिस्सों में कराया जाता था. 3 साल के इस प्लान में यदि कोई ग्राहक टूर नहीं करता था तो उसे डबल रकम के तौर पर 15,000 रुपए भुगतान का लालच दिया जाता था.

साल 2012 में औप्शन वन इंडस्ट्रीज लिमिटेड कंपनी का ग्वालियर में औफिस खोल लिया और इस कंपनी में एडवांटेज ट्रेड के ग्राहकों को मर्ज कर दिया गया. इस का हैड औफिस इंदौर में खोला गया. कंपनी तब बांड बेचती थी, इस में 5 साल में लोगों की रकम डबल करने का झांसा दे कर लाखों रुपए जमा कराए गए. साल 2016 में कंपनी बंद कर के समीर अग्रवाल ने कृषि मंत्रालय में अलगअलग नामों से 7 सोसाइटियां रजिस्टर्ड करा लीं. मध्य प्रदेश में श्री स्वामी विवेकानंद मल्टीस्टेट कोऔपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी (एसएसवी) ने औप्शन वन इंडस्ट्रीज लिमिटेड कंपनी का स्थान लिया.

जब भोपाल में एसएसवी के खिलाफ शिकायतें और एफआईआर दर्ज होने पर सेबी ने इस के कामकाज पर रोक लगा दी तो साल 2019 में एसएसवी सोसाइटी बंद कर लस्टिनेस जनहित क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड (एलजेसीसी) खोल ली. एमपी में इस सोसाइटी ने काम शुरू किया तो एसएसवी के सभी ग्राहकों को इस में मर्ज कर दिया गया, लेकिन सारा काम पुरानी सोसाइटी की तरह ही होता रहा. सागा ग्रुप ने एमपी में उन जगहों को टारगेट किया, जहां लोगों को सरकारी मुआवजे के तौर पर पैसा मिला था.

एमपी और यूपी के बुंदेलखंड रीजन में पिछले सालों में सरकार के कई बड़े प्रोजेक्ट आए थे. ललितपुर में 2012 में बजाज पावर प्लांट की स्थापना हुई, मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में बानसजारा बांध बना. सरकार ने लोगों की जमीनें अधिगृहीत कर उन्हें मुआवजा दिया. किसानों के पास आए इस पैसे पर सागा ग्रुप ने नजर जमा कर सोसाइटियों के जरिए यह पैसा अपनी स्कीम्स में निवेश करा लिया.

लोगों को प्रलोभन देने के लिए कंपनी ने तरहतरह की स्कीमें चला रखी थीं. इस काम के लिए कंपनी ने एजेंट बना रखे थे. कंपनी ने एजेंटों को भी लुभावने औफर दे कर अपने जाल में फंसा लिया था. कंपनी द्वारा चलाए गए मासिक पेंशन प्लान में 500 से 25 हजार का लगातार 78 महीने तक निवेश करने पर हर महीने 450 रुपए से ले कर 90 हजार रुपए देने का वादा किया गया. धन पेटी स्कीम में एक हजार से 25 हजार रुपए 78 महीने तक इनवैस्टमेंट करने पर 21 साल बाद 3.75 लाख से 93.80 लाख रुपए देने का औफर ग्राहकों को दिया गया था.

सोसाइटी एजुकेशन प्लान के अंतर्गत कहा गया था कि एक से 10 हजार रुपए 7 साल तक हर महीने जमा करने पर 14 साल 6 महीने बाद मैच्योरिटी होने पर 2.50 लाख से ले कर 25 लाख रुपए मिलेंगे. दिवाली औफर के नाम पर शुरू की गई योजना में हर महीने 200 रुपए 3 साल तक जमा करने पर मैच्योरिटी होने पर 9,440 रुपए देने को कहा गया. कंपनी स्कीमों के लिए पासबुक से ले कर बांड देती थी, जिस में पूरा ब्योरा दर्ज होता था.

शातिरों ने कैसे फैलाया ठगी का नेटवर्क

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में  सागा ग्रुप ने साल 2012-13 के बीच कुल 7 सोसाइटियों का रजिस्ट्रैशन कृषि मंत्रालय में कराया, इन में से 2 सोसाइटियों के दफ्तर मध्य प्रदेश में खोले गए. लस्टिनेस जनहित क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड का रजिस्ट्रेशन 24 जनवरी 2013 को हुआ, जिस में समीर अग्रवाल सीएमडी, अनुराग बंसल चेयरमैन, आर.के. शेट्टी वित्तीय सलाहकार, संजय मुदगिल ट्रेनर, सुतीक्ष्ण सक्सेना और पंकज अग्रवाल पार्टनर के तौर पर जुड़े. सागा ग्रुप ने सोसाइटी का रजिस्ट्रैशन लोन देने के लिए किया था.

कंपनी 2016 से बैंकिंग, क्रेडिट, एफडी, आरडी, एमआईएस, सुकन्या, धन पेटी, एजुकेशन प्लान, पेंशन प्लान, आयुष्मान जैसी स्कीम में देश के 6 राज्यों में 7 सोसाइटियों के जरिए लोगों से पैसा इनवेस्ट कराने लगी.  सोसाइटियों के रजिस्ट्रैशन के बाद देशभर में तहसील और ब्लौक स्तर पर एक हजार ब्रांच खोल कर करीब एक लाख एजेंट्स बनाए गए. कुछ को सैलरी पर रखा, बाकियों को इनवैस्टमेंट लाने पर 4 से 12 प्रतिशत का कमीशन दिया जाता था. मध्य प्रदेश के 16 जिलों में 40 ब्रांच औफिस खोले गए. यूपी के ललितपुर समेत 22 जिलों में भी जगहजगह ब्रांच औफिस खोले गए.

ये सोसाइटी लुभावनी स्कीम लांच कर लोगों के पैसे जमा कराती थी, इन में मंथली इनकम सहित एफडी, आरडी, एमआईएस की रसीद दे कर मैच्योरिटी की तारीख तय कर देती थी. नकद लेनदेन पर ज्यादा जोर था. इस में प्रतिदिन के हिसाब से भी लोगों से पैसे जमा कराए जाते थे. सभी सातों सोसाइटियों में एक तरह के निवेश प्लान लांच किए गए थे, इन में एक साल से ले कर 21 साल तक के प्लान शामिल थे. एक हजार रुपए एक साल में जमा करने वाले को 1,172 रुपए दिए जाते थे. वहीं, 5 साल की एफडी पर यह रकम दोगुना करने का दावा करते थे.

इस के अलावा रोजाना और महीने के अनुसार आरडी का भी प्लान था. इस में 200 रुपए महीने जमा करने पर एक साल की मैच्योरिटी पर 2,560 रुपए मिलते थे. आरडी 200 से 5,000 रुपए के बीच कोई भी खोल सकता था, इस में भी एक साल से ले कर 7 साल तक का प्लान पेश किया गया था. लोगों को आकर्षित करने के लिए सागा ग्रुप ने वेबसाइट और ऐप बना रखे थे. सभी एजेंटों को ऐप के जरिए ही लोगों के पैसे जमा कराने होते थे. इस का लौगिन और पासवर्ड होता था. इस में ग्राहक की पौलिसी नंबर के आधार पर एजेंटों को उस की मैच्योरिटी देखने की सुविधा मिलती थी.

एजेंट जोडऩे का चेन सिस्टम था. एजेंट जो भी पैसे निवेश कराते थे, उस के ऊपर वाले एजेंट को भी उस में से कुछ प्रतिशत कमीशन मिलता था. ये चेन सिस्टम सीएमडी समीर अग्रवाल तक बना हुआ था. इसी ऐप में एजेंट्स का कमीशन भी आता था, जो पौइंट्स के रूप में दिखता था. इसे कैश करने का एक ही तरीका था कि उतनी राशि वो किसी ग्राहक से निवेश कराए और उसे खुद रख कर पौइंट के रूप में मिले कमीशन से उस का भुगतान कर दे. एजेंटों को उन के कमीशन पर सोसाइटी जीएसटी भी काटती थी.

एजेंटों को हर महीने ट्रेनिंग के लिए झांसी, सागर, लखनऊ, भोपाल आदि शहरों में बुलाया जाता था, जहां उन के रुकने से ले कर खानेपीने की सारी व्यवस्था सोसाइटी ही करती थी. समयसमय पर एजेंट को औनलाइन ट्रेनिंग कराई जाती थी. ट्रेनर के तौर पर संजय मूट्रिल जुड़ता था, वो एजेंटों को टारगेट पूरा करने पर मिलने वाले औफर्स को इतने लुभावने तरीके से पेश करता था कि एजेंट उसे पूरा करने के लिए जीजान लगा देते थे.

एलजेसीसी सहित सभी सोसाइटी अपने एजेंटों को टारगेट पूरा करने पर मुंबई, गोवा आदि शहरों के साथ बैंकाक, थाईलैंड और दुबई जैसे देशों की सैर भी कराती थी. देश के बड़ेबड़े शहरों जैसे मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद, चेन्नै आदि जगहों पर सेमिनार करती थी. इन में एजेंटों को सम्मानित किया जाता था. साथ ही टारगेट पूरा करने वाले एजेंट्स को बड़ी और महंगी गाडिय़ां गिफ्ट में दी जाती थीं. किसे कौन सी गाड़ी मिलेगी, यह उस के हर महीने के इनवैस्टमेंट पर डिपेंड करता था. न्यूनतम राशि के साथ कंपनी गाड़ी खरीद कर देती थी. बाकी पैसा बैंक से फाइनैंस कराया जाता था, जिस की किस्त एजेंट अपने टारगेट पूरे कर भरता था.

हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा ठगी का मामला

भोपाल की चिटफंड कंपनी सागा ग्रुप  और उस से जुड़ी सहकारी सोसाइटी में 10 हजार करोड़ की धोखाधड़ी, हजारों निवेशकों के साथ ठगी के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच में 2 सितंबर, 2024 को सुनवाई हुई. हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा एवं जस्टिस विनय सराफ की डबल बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार सहित संबंधितों को नोटिस जारी किया है. अदालत ने स्टेटस रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले कोर्ट में पेश करने के भी निर्देश दिए हैं.

याचिका में इस धोखाधड़ी की जांच निष्पक्ष एजेंसी या सीबीआई से कराने की मांग की गई थी. याचिका में डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह विभाग, एसपी भोपाल, कोऔपरेटिव सोसाइटी और उन के पदाधिकारियों सहित अन्य को अनावेदक बनाया गया है. भोपाल के पिपलानी की तरह सागर के रहली थाने में 15 सितंबर, 2024 को पुष्पेंद्र राठौर ने अशोक राज, संजय मिश्रा और सुषमा मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी. पुष्पेंद्र ने शिकायत में बताया था कि वह 2022 में कंपनी से एजेंट के तौर पर जुड़ा था. उस ने लोगों से 14 लाख रुपए जमा कराए थे. साल 2024 में 35 लोगों की मैच्योरिटी पूरी हुई तो उस ने भुगतान के लिए ब्रांच से संपर्क किया.

ब्रांच के लोग कुछ समय तक अलगअलग बहाने बनाते रहे. फिर कहा गया कि रहली की इस ब्रांच को मकरोनिया में मर्ज कर दिया गया है, वहां से भुगतान होगा. किसी तरह 5 लाख रुपए के लगभग भुगतान तो कर दिया  गया, लेकिन अभी 10 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया गया है. इस मामले में बीएनएस की धारा में प्रकरण दर्ज कर रहली पुलिस ने इस मामले में 9 नवंबर, 2024 को ब्रांच मैनेजर अशोक राज को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद आरोपी की ओर से शिकायतकर्ता से समझौता कर लिया गया. शिकायतकर्ता पुष्पेंद्र राठौर ने बताया कि उस के द्वारा कराए गए निवेश की राशि लौटा दी गई है. इस की वजह से उस ने शिकायत वापस ले ली.

निवेशकों को चूना लगाने में उत्तर प्रदेश के एक जीजासाले की जोड़ी की अहम भूमिका रही है. आलोक की ममेरी बहन शैलजा बजाज से रवि तिवारी की शादी हुई थी. इस तरह से दोनों रिश्ते में जीजासाले लगते हैं. ललितपुर के रहने वाले आलोक जैन और रवि तिवारी दोनों ने एक साथ समीर अग्रवाल की कंपनी जौइन की थी. कंपनी से जुडऩे से पहले आलोक ललितपुर मंडी में जूट के बोरे बेचने का काम करता था. आलोक को समीर अग्रवाल ने यूपी और उत्तराखंड का हैड बनाया था. उस ने एमपी में कंपनी के ब्रांच औफिस खोलने में अहम भूमिका निभाई थी. आलोक ने अकेले समीर अग्रवाल की जेएलसीसी और यूएलसीसी सोसाइटियों में 1800 करोड़ रुपए का निवेश कराया था.

आलोक ने ललितपुर, भोपाल, इंदौर में काफी प्रौपर्टी बनाई है. ललितपुर में वह कई कालोनियों में पार्टनर भी है. उस ने हैदराबाद में भी प्रौपर्टी खरीदी है. ललितपुर पुलिस के मुताबिक आलोक जैन के पास 100 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है. उत्तर प्रदेश के ललितपुर के रहने वाले रवि तिवारी के पिता तिलकराम होमगार्ड जवान थे. 3 भाइयों में सब से बड़ा रवि साल 2008-09 में पिता के साथ ललितपुर में चाट फुलकी का ठेला लगाता था. साल 2009 में समीर अग्रवाल ने झांसी में एडवांटेज ट्रेड काम कंपनी का एक कार्यक्रम आयोजित किया था. रवि अपने रिश्तेदार आलोक के साथ इस कार्यक्रम में पहुंचा था. दोनों ने बतौर एजेंट एडवांटेज ट्रेड काम कंपनी जौइन की. उस समय दोनों की उम्र मुश्किल से 17-18 साल रही होगी.

दोनों ने बेहद कम समय में कंपनी को करोड़ों का इनवैस्टमेंट दिलाया तो सीएमडी समीर अग्रवाल के चहेते बन गए. समीर ने उन के काम से खुश हो कर आलोक को यूपी और उत्तराखंड का, जबकि रवि को एमपी का हैड बना दिया. रवि तिवारी ने निवेशकों की जमा रकम से भोपाल, इंदौर, ललितपुर, टीकमगढ़, झांसी में कई प्लौट, खेती की जमीन, फार्महाउस बनाए हैं. उस का परिवार भोपाल के अयोध्या बाइपास के पास नीत ग्रीन कालोनी में रहता है. करोद में उस ने पिता तिलकराम के नाम से एक होटल एंड रेस्टोरेंट खोला है. इस होटल में वह कई रसूखदार लोगों को बुलाता है और सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करता है.

रवि तिवारी के जरिए एलजेसीसी कंपनी में 600 करोड़ रुपए का इनवैस्टमेंट हुआ था. ललितपुर में पीडि़तों की शिकायत के बाद पुलिस ने रवि और उस के भाई विनोद को अगस्त 2024 में गिरफ्तार कर लिया और दोनों फिलहाल ललितपुर जेल में हैं.

और भी अनेक लोग हैं इस गिरोह में शामिल

लोगों की मेहनत की कमाई डकारने वाली इस सोसायटी में समीर अग्रवाल, रवि तिवारी, आलोक जैन के अलावा अंगद कुशवाहा, सुबोध रावत और सुतीक्ष्ण सक्सेना जैसे लोगों का रोल भी रहा है. टीकमगढ़ पुलिस 50 करोड़ रुपए की आसामी सुबोध रावत को गिरफ्तार कर चुकी है. रावत ने पुलिस को अपने बयान में बताया कि 2012 में उस की मुलाकात ललितपुर में अजय तिवारी से हुई थी. तब आप्शन वन नाम से कंपनी का संचालन किया जा रहा था इस के मालिक समीर व पंकज अग्रवाल थे.

अजय के माध्यम से उस की मुलाकात ललितपुर में आलोक जैन, रवि तिवारी और सुरेंद्र पाल सिंह से हुई. उन के कहने पर वह इस कंपनी से जुड़ा. वह निवेशकों के पैसे आलोक, रवि व सुरेंद्रपाल को भेजता था. इस के बाद इस रकम को झांसी चेस्ट में भेज दिया जाता था, वहां से यह रकम हवाला के जरिए समीर के पास विदेश भेजी जाती थी. साल 2020 में जब समीर अग्रवाल की श्री स्वामी विवेकानंद सोसाइटी बंद हुई तो सुतीक्ष्ण सक्सेना की पार्टनरशिप में एलजेसीसी सोसाइटी शुरू की गई. सुतीक्ष्ण ने इनवेस्टर्स के पैसों से टीकमगढ़ में 26 लाख रुपए में 2 हजार वर्गफीट का प्लौट, 900 वर्गफीट का एक डुप्लैक्स भी खरीदा था.

भोपाल के अयोध्या बाइपास पर 50 लाख रुपए में 2 हजार वर्गफीट जमीन, रायसेन-भोपाल रोड पर 4 लाख रुपए में 1200 वर्गफीट के प्लौट के अलावा उस के पास 16 लाख रुपए कीमत की एसयूवी है. उस के एक्सिस बैंक अकाउंट में 50 हजार रुपए जमा मिला. पत्नी प्रीति के नाम पर उस ने एलजेसीसी सोसाइटी में 50 लाख रुपए का इनवैस्टमेंट भी किया है. ठगी के इस कारोबार में शामिल अंगद कुशवाहा मध्य प्रदेश के गंजबासौदा का रहने वाला था, जो मंडी में हम्माल का काम करता था. साल 2015-16 में वह समीर अग्रवाल की कंपनी एसएसवी (श्री स्वामी विवेकानंद सोसाइटी) से एजेंट बन कर जुड़ा था. जब भोपाल के पिपलानी थाने में एसएसवी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई तो समीर अग्रवाल ने इसे बंद कर एलजेसीसी सोसाइटी शुरू कर दी थी

अंगद को एलजेसीसी में गंजबासौदा ब्रांच का हैड बना दिया गया. लोगों द्वारा जमा किए गए रुपयों से अंगद ने प्रौपर्टी खरीदी, बाद में वह भोपाल में प्लौट काटने का काम करने लगा. गंजबासौदा पुलिस को अंगद के खिलाफ 25 से ज्यादा शिकायतें मिलीं. कंपनी का दफ्तर बंद होने के बाद से वह फरार है. एलजेसीसी कंपनी ने गंजबासौदा में सुनील जैन की ही बिल्डिंग में 15 हजार रुपए महीने के किराए पर औफिस खोला था. अब कंपनी भाग गई है. लोग अभी भी यहां पैसा लेने आते हैं. मैनेजर अंगद कुशवाहा भी फरार है.

टीकमगढ़ का रहने वाला सूरज रैकवार एलजेसीसी में कैशियर के तौर पर काम करता था. उसे हर महीने 12 हजार रुपए सैलरी थी, लेकिन वह लग्जरी लाइफ जीता था और उस के पास करीब 20 करोड़ की प्रौपर्टी है. उस की भोपाल में 5-5 हजार वर्गफीट के 2 प्लौट, बानपुर में 10 एकड़ खेती की जमीन, टीकमगढ़ के सुभाषपुरा में 2 प्लौट, 7 दुकानें हैं. इस के अलावा वह 4 गाडिय़ों का मालिक है. उस ने टीकमगढ़ में जो आलीशान मकान बनाया है, उस की कीमत ही 5 करोड़ रुपए है. मकान में विदेशी मार्बल लगा हुआ है. कथा लिखे जाने तक सूरज रैकवार फरार था और उस पर पुलिस ने 25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर रखा है.

एलजेसीसी की ओर से मुंबई, हैदराबाद, गोवा, लखनऊ, झांसी, भोपाल, इंदौर जैसे बड़े शहरों में कार्यक्रम कराए जाते थे. इस में कंपनी की ग्रोथ और एजेंट्स की लग्जरी लाइफ को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जाता था. जेएलसीसी कंपनी के कार्यक्रमों में फिल्मी ऐक्टर श्रेयस तलपड़े से ले कर सुखविंदर सिंह जैसे नामी गायक को बुलाया जाता था. ऐसे कार्यक्रमों के जरिए भीड़ इकट्ठी हो जाती थी और कंपनी अपनी स्कीम का प्रमोशन करती थी. इस वजह से लोग आसानी से कंपनी पर भरोसा करने लगते थे.

ललितपुर पुलिस ने ऐक्टर श्रेयस तलपड़े को भी एक एफआईआर में आरोपी बनाया है. एसपी (ललितपुर) मोहम्मद मुश्ताक के  मुताबिक फिल्मी ऐक्टर ने लोगों को कंपनी में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया था, इस कारण उसे भी आरोपी बनाया गया है और  उस के मुंबई पते पर नोटिस भेजा गया है. बताया जा रहा है कि समीर अग्रवाल  ने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में शामिल एक छोटे से देश सेंट क्रिस्टोफर और नेविस की नागरिकता ले ली है. इस देश का उस का नया पासपोर्ट भी बन चुका है, उस की पत्नी, मम्मी और दोनों बेटियां नवी मुंबई में रहते हैं. कुछ लोग बताते हैं कि दिखावे के तौर पर उस ने पत्नी से तलाक लिया है. पिछले 16 सालों में समीर ने सागा ग्रुप के जरिए करोड़ों रुपए कमाए हैं.

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के टेंट्रा गांव का रहने वाला समीर का परिवार 2 पीढ़ी पहले इंदौर शिफ्ट हो गया था. समीर के पिता राजेंद्र अग्रवाल एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे, समीर उन का इकलौता बेटा है. कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, यही हाल समीर अग्रवाल का रहा है. साल 2008 में उस ने ग्रैजुएशन किया, पढ़ाई के दौरान ही वह मुंबई से औपरेट होने वाले मटका सट्टा से जुड़ा और इंदौर में उस का बुकी बन गया. उस समय चिटफंड कंपनियों की देश में बाढ़ सी आई हुई थी तो समीर ने भी 2009 में पहली चिटफंड कंपनी खोली और उस के बाद से लगातार फरजी कंपनियां बना कर लोगों से पैसा ऐंठता रहा.

दुबई में छिपा है ठगों का सरगना

साल 2012 के बाद समीर इंदौर छोड़ कर नवी मुंबई शिफ्ट हो गया. समीर ने 2012 में ‘आप्शन वन’ नामक कंपनी शुरू की लेकिन, 2016 में सरकारी काररवाई का अंदेशा होते ही 2016 में इस का नाम बदल कर ‘श्री स्वामी विवेकानंद’ कर दिया. 2014 में देश में भाजपा की सरकार बन चुकी थी और हिंदुत्व का राग अलाप रहे लोगों को हिंदू संगठनों से जोडऩे के मकसद से समीर ने इस नाम का उपयोग किया था. समीर अग्रवाल सागा ग्रुप की सालगिरह पर आलीशान होटल में भव्य कार्यक्रम का आयोजन करता था. 2018 में सागा ग्रुप की 10वीं सालगिरह पर भी उस ने कार्यक्रम का आयोजन किया,

जिस में फिल्मी सितारों को भी बुलाया था. सागा ग्रुप की सातों सोसाइटियों की लुभावनी स्कीम्स को देख कर लोग निवेश कर रहे थे. साल 2019 में उसे पहला झटका तब लगा जब उस की एक सोसाइटी श्री स्वामी विवेकानंद मल्टीस्टेट क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसाइटी के कामकाज पर सेबी (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड औफ इंडिया) ने रोक लगा दी. इसी के बाद समीर अग्रवाल मुंबई से दुबई शिफ्ट हो गया.

2020 में भोपाल के पिपलानी थाने में इसी सोसाइटी के खिलाफ अंकित मालवीय ने शिकायत दर्ज कर दी. पुलिस ने समीर अग्रवाल समेत सोसाइटी अध्यक्ष चंदन गुप्ता, आर.के. शेट्टी, एमपी हेड रविशंकर तिवारी उस के भाई विनोद तिवारी और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और पुलिस ने विनोद तिवारी, शशांक श्रीवास्तव और अंगद कुशवाहा को गिरफ्तार कर लिया. इस काररवाई के बाद श्री स्वामी विवेकानंद सोसाइटी की सभी ब्रांचों पर ताला लगा दिया था.

मध्य प्रदेश समेत 10 राज्यों में 10 हजार करोड़ रुपए ठगने वाले समीर अग्रवाल ने इस रकम को अबुधाबी में रियल एस्टेट में निवेश किया है. इसी के बदौलत उस ने 28 नवंबर 2023 को संयुक्त अरब अमीरात की नागरिकता भी ली है. जानकारों के मुताबिक अमीरात एक टैक्स हैवन कंट्री है यानी करदाताओं के लिए स्वर्ग है. यहां इनकम पर कोई टैक्स नहीं लगता साथ ही कमाई और निवेश को ले कर ज्यादा पूछताछ नहीं होती है.

यूएई ने उसे एक साल के लिए नागरिकता दी थी. 27 नवंबर, 2024 को इस की वैधता खत्म हो चुकी है. जानकारों के मुताबिक यूएई की नागरिकता नियम की पहली शर्त है कि वह किसी को भी दोहरी नागरिकता नहीं दे सकता है. एक देश की नागरिकता छोडऩे के बाद ही कोई व्यक्ति वहां की नागरिकता ले सकता है. समीर ने नागरिकता हासिल करने के लिए या तो दस्तावेजों में फरजीवाड़ा किया होगा या फिर किसी और तरीके से नागरिकता हासिल की होगी. यह भी पता चला है कि वहां उस ने दुबई के एक शेख के पार्टनरशिप में हाई एंड सिटी मैनेजमेंट सर्विस एलएलसी नाम की कंपनी बनाई है.

सीएमडी समीर अग्रवाल की गिरफ्तारी पर एमपी और यूपी पुलिस ने 50-50 हजार रुपए इनाम घोषित किया है. सीबीआई ने भी उस के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है. मध्य प्रदेश समेत 10 राज्यों में सागा ग्रुप द्वारा लाखों लोगों के साथ करोड़ों रुपए की ठगी हो गई और सरकारी नुमाइंदे घोड़े बेच कर सोते रहे. सागा ग्रुप की एफआईआर रफादफा करवाने के बाद भोपाल के एक समाजसेवी सौरभ गुप्ता की ओर से साल 2021 में एक जनहित याचिका दायर की गई.

हाईकोर्ट ने एफआईआर निरस्त करने पर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए थे. याचिकाकर्ता की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि कंपनी पर काररवाई नहीं हुई तो देश भर के लाखों निवेशकों का पैसा डूब जाएगा. हाईकोर्ट ने भारत सरकार और प्रदेश सरकार से सागा ग्रुप कंपनी के लोगों के बारे में जानकारी मांगी और कहा कि इतना बड़ा फरजीवाड़ा अंजाम दिया गया, सरकारें क्या कर रही थीं?

कोर्ट में याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील रविंद्र गुप्ता बताते हैं कि 8 नवंबर 2021 को राज्य के महाधिवक्ता ने जवाब देने के लिए समय मांगा था, परंतु साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन जवाब अब तक पेश नहीं किया. इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2025 में हुई थी. अभी मामला न्यायालय में चल रहा है. MP News

 

 

MP News : मसाज सेंटर की आड़ में सैक्स रैकेट, कई खुलासे एक साथ

MP News : यह सच है कि लौकडाउन में जब लोगों को रोजीरोटी के लाले पड़ रहे थे, तब कुछ लोग मजबूर लड़कियों का सहारा ले कर स्पा के नाम पर सैक्स के धंधे में मोटी कमाई कर रहे थे. भोपाल का ‘लंदन इवनिंग फैमिली सैलून ऐंड स्पा’ भी ऐसा ही था. लेकिन…

देह व्यापार ही इकलौता ऐसा धंधा है, जिस ने लौकडाउन की बंदिश हटते ही काफी कम समय में अपनी पुरानी ऊंचाई को छूने में सफलता हासिल की है. गलियों में चलने वाले छोटेछोटे अंधेरे कमरों वाले चकलाघरों से ले कर सैक्स के हाईप्रोफाइल मसाज सैंटरों पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ी. भोपाल क्राइम ब्रांच के एएसपी गोपाल धाकड़ को तेजी से बढ़ते इस कारोबार के बारे में शहर के अलगअलग इलाकों की सूचनाएं मिल रही थीं. सब से अधिक शिकायतें कोलार स्थित एस.के.प्लाजा बिल्डिंग में संचालित ‘लंदन इवनिंग फैमिली सैलून ऐंड स्पा’ के बारे में थीं, जहां मसाज के नाम पर देह का कारोबार कराए जाने की खबर थी.

एएसपी गोपाल धाकड़ ने इस दुकान पर नजर रखने के लिए अपने कुछ खास मुखबिरों को लगा दिया था. कुछ ही दिन में इन मुखबिरों ने उन्हें जानकारी दी कि इस स्पा के बारे में मिली शिकायत सही है. यहां बड़े पैमाने पर ग्राहकों को मसाज के नाम पर सैक्स सर्विस दी जा रही है. एएसपी धाकड़ ने टीआई क्राइम ब्रांच थाना अजय मिश्रा की एक टीम को इस के खुलासे की जिम्मेदारी सौंप दी. पुलिस को पहले ही जानकारी मिल चुकी थी कि इस स्पा में या तो केवल पुराने और भरोसेमंद ग्राहकों को सैक्स सर्विस दी जाती है. अथवा नए ग्राहक को किसी पुराने ग्राहक के रेफरेंस पर लड़की उपलब्ध कराई जाती है. इसलिए एएसपी धाकड़ ने क्राइम ब्रांच के सब से स्मार्ट माने जाने वाले आरक्षक को पूरी ट्रैनिंग के साथ यहां भेजा.

2 दिसंबर को अपराह्न लगभग 4 बजे जब पुलिस टीम ने एस.के. प्लाजा के पास सुरक्षित दूरी पर पोजीशन ले ली, तब नकली ग्राहक बन कर जाने वाले आरक्षक ने स्पा में प्रवेश किया. काउंटर पर बैठे मैनेजर अनिल वर्मा ने वेलकम करते हुए पूछा कि उस की क्या सेवा कर सकता है.

‘‘यार, मसाज सैंटर में आदमी मछलियां पकड़ने तो आया नहीं होगा. जाहिर सी बात है कि आप के यहां मसाज करवाने आया हूं. सुना है आप की लड़कियां कमाल का मसाज देती हैं.’’ नकली ग्राहक ने पूरे विश्वास के साथ वहां बैठे युवक से कहा.

‘‘जी हां, ठीक सुना आप ने. हमारा सैंटर अपनी सर्विस क्वालिटी के लिए पूरे भोपाल में फेमस है. और आसपास के जिलों में भी.’’ मैनेजर ने बात काटते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां सागर, विदिशा के लोग भी आते हैं.’’

‘‘बिलकुल सही. मैं सागर से हूं. मेरे एक दोस्त ने आप के स्पा का पता बताया था. वह कई बार आप के यहां आ चुका है. आई मीन जब भी भोपाल आता है तो वह आप की सर्विस लिए बिना नहीं जाता. और मजेदार बात तो यह है कि बंदे की अभीअभी शादी हुई है, वो भी लव मैरिज. मुझे लगा कि कुछ तो खास होगा आप के यहां जो बंदा नई बीवी छोड़ कर यहां  आता है.’’

शादी और नई बीवी वाली बात नकली ग्राहक ने इसलिए कही थी ताकि स्पा मैनेजर समझ जाए कि वो क्या चाहता है. नकली ग्राहक बन कर गए पुलिसकर्मी का यह तीर निशाने पर लगा. मैनेजर अनिल वर्मा सब भूल गया और उसे अपने किसी पुराने ग्राहक का खास आदमी समझ कर सीधे सैक्स सर्विस की बात करते हुए बोला, ‘‘सर देखिए, इस समय हमारे पास 3 लड़कियां हैं. नेपाली, भोपाली और कानपुरी. इन में से किस की सर्विस लेना पसंद करेंगे आप?

‘‘नेपाली की सर्विस तो कौमन है यार, हर शहर में मिल जाती हैं. नेपाली लोग शोर ज्यादा करते हैं, जो मुझे पसंद नहीं. भोपाली गर्ल की सर्विस तो मैं एमपी नगर के एक स्पा में कई बार टेस्ट कर चुका हूं. ये कानपुरी नाम कुछ नया लगता है.  इस की कुछ क्वालिटी है खास. क्या मैं फोटो देख सकता हूं?’’ नकली ग्राहक ने पूछा.

‘‘फोटो क्या सर, सामने देखिए न,’’ कहते हुए मैनेजर अनिल वर्मा ने काउंटर के नीचे लगा बटन दबा कर घंटी बजाई तो कुछ मिनट में अंदर से लगभग 21-22 साल की एक निहायत खूबसूरत और सैक्सी लुक वाली युवती बाहर आ कर खड़ी हो गई.

‘‘ये लीजिए सर, ये हैं मिस रानी. कानपुर वाली और हमारे यहां आने वाले कस्टमर्स की पहली पसंद भी. आप लकी हैं जो फ्री मिल गई. वरना इन के चाहने वाले खाली ही नहीं छोड़ते.’’

‘‘लगता है इसीलिए मेरा दोस्त आप की इतनी तारीफ करता है,’’ नकली ग्राहक ने मैनेजर का भरोसा जीतने के लिए एक और पासा फेंका.

‘‘सर, पेमेंट आप को पहले करना होगा.’’

‘‘ओके, कितना?’’

‘सर, एक हजार रुपया हमारे स्पा की एंट्री फीस है. 2 हजार इन की बेस प्राइस. कुल 3 हजार.’’

‘‘बेस प्राइस मतलब?’’

‘‘मतलब, सर जो होता है, बस उतना ही. इस के अलावा आप का कुछ स्पैशल शौक है तो रानी उस का चार्ज आप को अलग से बता देंगी.’’

‘‘बहुत स्मार्ट हो दोस्त तुम. ये लो 3 हजार. बाकी हम रानी से डील कर लेंगे, ठीक है न  रानी,’’ नकली ग्राहक ने रानी की तरफ देख कर कहा.

‘‘श्योर सर, आप को सर्विस दे कर मुझे खुशी होगी.’’ रानी ने भी मुसकराते हुए जवाब दिया और उस का हाथ पकड़ कर अंदर बनी केबिन में ले गई, जहां मसाज टेबल नहीं डबल बैड पड़ा था.

‘‘इतना बड़ा बिस्तर, लगता है गु्रप सर्विस भी मिलती है यहां पर.’’

‘‘सब कुछ मिलता है यहां, आप आदेश तो करें. अभी 2 लड़कियां अपने कस्टमर के साथ व्यस्त हैं, फ्री होने वाली हैं. फिर कहेंगे तो आप को भी हम तीनों की गु्रप सर्विस मिल जाएगी.’’

‘‘अरे नहीं आज का दिन तो केवल रानी के नाम.’’ नकली ग्राहक बने पुलिसकर्मी ने रानी को मक्खन लगाया. 2 लड़कियां अपने ग्राहकों को इस समय सर्विस दे रही हैं, यह जान कर उस ने तुरंत कुछ दूरी पर खड़ी अपनी टीम को सिग्नल दे दिया. कुछ ही देर में क्राइम ब्रांच के टीआई अजय मिश्रा अपनी टीम ले कर लंदन इवनिंग फैमिली सैलून ऐंड स्पा में दाखिल हो गए. आननफानन में बंद कमरों से 2 ग्राहकों को अलगअलग 2 युवतियों के संग आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया गया. इस के अलावा बिस्तर पर पडे़ यूज और अनयूज कंडोम आदि भी जब्त कर लिए गए.

दबिश के दौरान पुलिस ने स्पा से 21 वर्षीय नेपाली लड़की कोयल, भोपाल निवासी 20 वर्षीय शबनम और कानपुर की 21 साल की रानी के अलावा बैरागढ़ निवासी हितेश लीलानी और नरेंद्र सिरवानी को गिरफ्तार कर लिया जो शबनम और कोयल के साथ यौनाचार में लिप्त थे. पुलिस ने तलाशी के दौरान स्पा से भारी मात्रा में बीयर की खाली कैन और यूज किए हुए कंडोम बरामद कर मैनेजर अनिल वर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. इस के बाद देह धंधे में आई तीनों युवतियों की कहानी इस प्रकार सामने आई.

नेपाली युवती कोयल पति की मौत के बाद काम की तलाश में भोपाल के माता मंदिर इलाके में रहने वाले अपने एक परिचित के घर आई थी. स्पा में मैनेजर का काम करने वाला अनिल वर्मा का उस इलाके में आनाजाना था. जब उस की नजर कोयल पर पड़ी और जानकारी मिली कि वह काम की तलाश में है तो अनिल ने कोयल को अपने स्पा में काम करने का औफर दिया. कोयल तैयार हो गई तो पहले ही दिन मैनेजर ने उसे बता दिया कि हम केवल मसाज का काम करते हैं, लकिन अगर कोई ग्राहक सैक्स की मांग करे तो तुम समझ लेना. इस में काफी पैसा मिलेगा जिस में से बड़ा हिस्सा तुम्हारा होगा.

चूंकि कोयल को काम की जरूरत थी और लौकडाउन के कारण कहीं दूसरी जगह काम नहीं मिल रहा था, इसलिए वह स्पा में मसाज और सैक्स सर्विस गर्ल के रूप में काम करने लगी थी. भोपाल की शबनम को उस के पति ने छोड़ दिया था. शबनम केवल 20 साल की थी और दूसरे एक युवक के साथ रहती थी. जानकारी के अनुसार शबनम के इस काम की जानकारी उस के साथ रहने वाले युवक को भी थी, लेकिन वह इस से होने वाली मोटी कमाई को देख कर शबनम को खुद भी ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को सर्विस देने की सलाह देता था. कानपुर की रानी कई सालों से कालगर्ल के तौर पर काम कर रही थी.

उसे स्पा के मालिक ने स्पैशली अपने यहां ग्राहकों को सर्विस देने के लिए बुलाया था. रानी को इस व्यापार की एक्सपर्ट माना जाता था, इसलिए उस की फीस भी ज्यादा थी. इस संबंध में एएसपी गोपाल धाकड़ ने बताया कि इस स्पा के बारे में काफी दिनों से शिकायत मिल रही थी, जिस के लिए हम ने नकली ग्राहक भेज कर यहां काररवाई कर 3 युवतियों और 2 ग्राहकों के अलावा मैनेजर को भी गिरफ्तार किया.

महिलाओं ने रची साजिश : ब्याज देने वाली सिंघम चाची की कराई हत्या

MP Crime News : राधा यादव ब्याज पर पैसे देने का धंधा करती थी. इस धंधे में उस ने 50 लाख रुपए से ज्यादा की रकम बांट रखी थी. इसलिए क्षेत्र के लोग उसे सिंघम चाची कहते थे. आखिर ऐसा क्या हुआ कि यही पैसा उस की जान का दुश्मन बन बैठा?

घटना मध्य प्रदेश के भोपाल जिले की है. शाम के कोई 7 साढ़े 7 का समय था. भोपाल के चूना भट्ठी थाने की ट्रेनी एसडीपीओ रिचा जैन अपने चैंबर में किसी केस की फाइल देख रही थीं, तभी उन्हें कोलार सोसायटी में किसी महिला का कत्ल कर दिए जाने की सूचना मिली. महिला की हत्या का मामला गंभीर होने से एसडीपीओ रिचा जैन सीएसपी भूपेंद्र सिंह को ले कर तुरंत ही मौके पर पहुंच गईं. कोलार सोसायटी की एक संकरी गली में लगभग 45-50 साल की एक महिला का खून से सना शव पड़ा हुआ था. उक्त महिला के कपड़े और पहने हुए जेवर से यह साफ लग रहा था कि महिला का संबंध किसी अच्छे परिवार से है.

महिला के जेवर देख कर एसडीपीओ जैन ने अंदाजा लगाया कि हत्या लूट की गरज से नहीं की गई है. वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि मृतका का नाम राधा यादव है, जो करोद क्षेत्र की रहने वाली है. पता चला कि राधा ने कोलार कालोनी की गरीब बस्ती में रहने वाले सैकड़ों लोगों को कर्ज दे रखा था, इसलिए वह अपने कर्ज व ब्याज की वसूली के लिए अकसर वहां आतीजाती रहती थीं. सीएसपी भूपेंद्र सिंह ने अनुमान लगा लिया कि राधा के कत्ल के पीछे लेनदेन का मामला हो सकता है. यह बात 18 मार्च, 2020 की है.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद एसडीपीओ एक टीम को कालोनी में रहने वाले राधा के कर्जदारों की सूची बनाने के काम में लगा दिया. जिस से अगले ही दिन यह बात सामने आई कि लगभग पूरी बस्ती राधा की कर्जदार थी. राधा यादव ने यहां 20 लाख रुपए से अधिक की रकम ब्याज पर दे रखी थी. साथ ही यह भी पता चला कि राधा काफी दबंग किस्म की महिला थी. वह अपना पैसा वसूलने के लिए कर्जदार की सार्वजनिक बेइज्जती करने से भी पीछे नहीं हटती थी, जबकि अधिकांश लोगों का कहना था कि कितना भी चुकाओ मगर राधा का कर्ज हनुमान की पूंछ की तरह बढ़ता ही जाता था.

इन सब बातों के सामने आने से पुलिस के सामने यह बात तो लगभग तय हो गई थी कि राधा की हत्या लेनदेन के विवाद में ही हुई थी, इसलिए राधा के मोबाइल फोन के रिकौर्ड के आधार पर पुलिस ने उन लोगों से पूछताछ शुरू कर दी, जिन्होंने घटना वाले दिन राधा से फोन पर बात की थी. लेकिन इस से कोई खास जानकारी पुलिस के सामने नहीं आई. हां, यह जरूर पता चला कि राधा की हत्या में 2 युवक शामिल थे, जो घटना के बाद अलगअलग दिशा में भागे थे. इन में से एक बदमाश का स्थानीय लोगों ने पीछा भी किया था, मगर वह चारइमली की तरफ भागते हुए एकांत पार्क के पास बहने वाले नाले में कूद कर फरार हो गया था.

पुलिस की जांच चल ही रही थी कि इसी बीच 21 मार्च, 2020 को जनता कर्फ्यू लगा दिया गया. जबकि लौकडाउन से ठीक पहले 23 मार्च को एक कबाड़ का व्यापार करने वाले व्यक्ति ने हबीबगंज पुलिस को एकांत पार्क के पास नाले में लाश पड़ी होने की खबर दी थी. एकांत पार्क के पास बहने वाला नाला चूना भट्ठी और हबीबगंज थाने की सीमा बांटता है. ऐसे में हबीबगंज पुलिस ने जा कर नाले से लाश बरामद की, जिस के पास एक मोबाइल फोन भी मिला. लाश कीचड़ में सनी हुई थी और वह लगभग सड़ने की स्थिति में आ चुकी थी. इसलिए जब पुलिस ने उस के मोबाइल में पड़ी सिम के आधार पर पहचान करने की कोशिश की तो जल्द ही उस की पहचान अभिषेक पुत्र कालू कौशल के रूप में हो गई.

बाबानगर शाहपुरा का रहने वाला अभिषेक हिस्ट्रीशीटर बदमाश था, इसलिए पुलिस को लगा कि उस की हत्या की गई होगी. शव की कलाई पर धारदार हथियार के चोट के निशान भी थे. साथ ही जहां लाश मिली थी, वहां नाले की दीवार के पास चूनाभट्ठी थाने की सीमा में खून भी गिरा था. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि नाले में अभिषेक चूनाभट्ठी की तरफ से गिरा है. इसलिए जब चूनाभट्ठी थाने से संपर्क किया गया तो एसडीपीओ रिचा जैन को 18 मार्च की वह घटना याद आ गई, जिस में लोगों ने बताया था कि राधा यादव का एक हत्यारा पीछा कर रही भीड़ से बचने के लिए नाले में कूद गया था.

कहीं अभिषेक कौशल ही तो राधा का हत्यारा नहीं? यही सोच कर सीएसपी भूपेंद्र सिंह ने नाले के पास मिले खून के नमूनों को घटनास्थल के पास गली में मिले खून से मिलान के लिए भेज दिया. जिस में पता चला कि गली में मिला खून और नाले के पास गिरा खून एक ही व्यक्ति का है. इस से यह साफ हो गया कि 18 मार्च की रात राधा यादव की हत्या कर फरार होने के लिए नाले में कूदने वाला बदमाश कोई और नहीं, बल्कि अभिषेक ही था जो दलदल में फंस कर मर गया था. इसलिए पुलिस ने अभिषेक के मोबाइल की कालडिटेल्स निकाली, जिस में पता चला कि घटना वाले दिन उस की कई बार कोलार कालोनी निवासी अजय निरगुडे से बात हुई थी.

यही नहीं, घटना के समय अजय और अभिषेक दोनों के फोन की लोकेशन एक साथ उसी स्थान की थी, जहां राधा यादव का कत्ल हुआ था. अजय की तलाश की गई तो पता चला कि अजय 18 मार्च, 2020 से लापता है. 18 मार्च को ही राधा की हत्या हुई थी. इस से पुलिस को पूरा भरोसा हो गया कि अजय ही अभिषेक के साथ राधा की हत्या में शामिल था. चूंकि घटना के 4 दिन बाद से ही देश में लौकडाउन लग गया था, इस से पुलिस का काम थोड़ा मुश्किल हो गया. लेकिन एसपी (साउथ) साई कृष्णा के निर्देश पर चूनाभट्ठी पुलिस दूसरी जिम्मेदारियों के साथ अजय की तलाश में जुटी रही.

क्योंकि उसे भरोसा था कि जब तक नाले में अभिषेक की लाश बरामद नहीं हुई थी, तब तक अजय ने भोपाल से भागने की कोई जरूरत ही नहीं समझी होगी. फिर अभिषेक की लाश मिलने के साथ ही देश में ट्रेन बस सब बंद हो गई थी, इसलिए अजय कहीं बाहर नहीं गया होगा, शायद वह भोपाल के आसपास ही कहीं छिपा होगा. उस का पता लगाने के लिए पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया. इस कवायद का नतीजा यह निकला कि घटना के 7 हफ्ते बाद पुलिस को खबर मिली कि अजय ईदगाह हिल्स पर अपनी ससुराल पक्ष के एक रिश्तेदार के घर पर छिपा है.

पुलिस टीम ने वहां छापामारी कर आराम से सो रहे अजय को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में अजय पहले तो इस मामले में कुछ भी जानने से इंकार करता रहा लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सी ही सख्ती दिखाई तो उस ने सुपारी ले कर राधा की हत्या करने की बात कबूल कर ली. उस ने बताया कि 4 महिलाओं रेखा हरियाले, सुनीता प्रजापति, गुलाबबाई प्रजापति और सुलोचना ने राधा की हत्या के लिए उसे एक लाख 80 हजार रुपए की सुपारी देने के साथ 20 हजार रुपए एडवांस में भी दिए थे. पूरे मामले में कोलार कालोनी में राधा के एजेंट के तौर पर काम करने वाला ताराचंद मेहरा एवं उस का भतीजा मनोज भी शामिल था,

सो पुलिस ने तत्काल छापामारी कर सभी को गिरफ्तार कर लिया. जिस के बाद राधा हत्याकांड की कहानी इस प्रकार सामने आई. पंचवटी कालोनी करोंद निवासी राधा यादव कई साल से भोपाल की गरीब बस्तियों में ब्याज पर पैसा देने का काम करती थी. उस का पति एलआईसी में नौकरी करता था. लेकिन किसी वजह से उस की नौकरी छूट गई. राधा के 2 बेटे हैं, जिन की उम्र इस समय 16 और 18 साल है. राधा का पति शराब था, जिस की वजह से पति का उस से झगड़ा होता रहता था. फिर एक दिन ऐसा आया कि पति उसे छोड़ कर कहीं चला गया तो अब तक नहीं लौटा. अपने एकलौते बेटे के घर छोड़ कर चले जाने पर ताराचंद को गहरा सदमा लगा जिस से उन की भी मृत्यु हो गई.

ससुर ताराचंद की मृत्यु के बाद राधा ने उन की खेती की 10-12 बीघा जमीन बेच कर ब्याज पर पैसे देने शुरू कर दिए. लोगों की मानें तो राधा का पूरे भोपाल में 50 लाख से अधिक और अकेली कोलार कालोनी में 20 लाख से अधिक रुपया ब्याज पर चल रहा था. इलाके के लोग राधा को सिंघम चाची कहते थे. राधा अपने दिए पैसों पर मोटा ब्याज वसूलती थी. उसे अपना पैसा वसूल करना भी अच्छी तरह से आता था. लोगों का कहना है कि जो एक बार राधा का कर्जदार हो गया, वह फिर उस कर्ज से नहीं उबर पाया. कर्ज वसूलने का उस का अपना हिसाब था, जिस के अनुसार आदमी का कर्ज कभी पूरा नहीं हो पाता था. इस पर कोई अगर उस का विरोध करता तो राधा गुंडई करने से भी बाज नहीं आती थी.

कर्जदार की कार, आटो भी वह खड़ेखड़े नीलाम कर देती थी और कोई उस का कुछ नहीं कर पाता था. पकड़े गए आरोपियों में से ताराचंद मेहरा कोलार कालोनी में राधा के एजेंट के तौर पर काम करता था. जानकारी के अनुसार राधा ने अकेले उस के माध्यम से ही इस कालोनी में 8 लाख से ज्यादा का कर्ज बांट रखा था. बाकी सभी आरोपी राधा के कर्जदार हैं, जो उस के हाथ कई बार जलील भी किए जा चुके थे. आरोपी महिलाओं ने बताया कि राधा से उन्होंने जितना पैसा कर्ज में लिया था, उस का कई गुना अधिक वे ब्याज के तौर पर वापस कर चुकी थीं.

लेकिन इस के बाद भी राधा आए दिन पैसे वसूलने उन के दरवाजे पर आ कर गालीगलौज करती थी. इस से वे तंग आ चुकी थीं. उन्होंने जब तक राधा जिंदा है, तब तक उस का कर्ज कभी नहीं चुका सकतीं. यही सोच कर उन्होंने राधा की हत्या करवाने की सोच कर अजय से बात की. शाहपुरा का नामी बदमाश अभिषेक अजय निरगुड़े का मुंहबोला साला था. अजय ने अभिषेक से बात की, जिस से एक लाख 80 हजार रुपए में राधा की हत्या का सौदा तय कर दिया. इस काम में राधा का एजेंट ताराचंद और उस का भतीजा मनोज भी साथ देने को राजी हो गए.

योजनानुसार घटना वाले दिन रेखा ने राधा को फोन कर चाय पीने के लिए अपने घर बुलाया. राधा लगभग रोज ही ब्याज की वसूली करने के लिए कालोनी में आती थी, सो रेखा का फोन सुन कर वह उस के घर पहुंच गई, जहां चाय पीने के दौरान ताराचंद ने रेखा को फोन कर ब्याज का पैसा लेने के लिए बुलाया. इसलिए रेखा के घर से उठ कर राधा ताराचंद के घर की तरफ जाने लगी. वास्तव में आरोपियों को मालूम था कि राधा, रेखा के घर से ताराचंद के घर जाने के लिए संकरी गलियों से हो कर गुजरेगी. इसलिए रास्ते में अजय और अभिषेक घात लगा कर बैठ गए और रेखा के वहां आते ही दोनों ने मिल कर चाकू से उस की हत्या कर दी.

रेखा की चीखपुकार सुन कर कालोनी के लोग बाहर निकल आए, लेकिन गलियों से परिचित होने के कारण अजय तो आसानी से मौके से फरार हो गया, जबकि अभिषेक को पकड़ने के लिए भीड़ उस के पीछे पड़ गई. भीड़ ने अभिषेक को पकड़ लिया. भीड़ में मौजूद किसी व्यक्ति ने उस पर धारदार हथियार से हमला किया, जिस से उस की कलाई कट गई. उसी दौरान किसी तरह अभिषेक भीड़ से भाग गया और नाले के पास एक पेड़ के पीछे छिप गया. जब भीड़ उस की तरफ आई तो वह पकड़े जाने से बचने के लिए नाले में कूद गया, जहां नाले के दलदल मे फंस कर उस की मौत हो गई. बाद में पुलिस को मिली अभिषेक की लाश ही राधा यादव के हत्यारों तक पहुंचने की सीढ़ी बनी.

 

Murder Story : पुलिस अधिकारी ने किया पत्नी और साली का मर्डर

Murder Story : पत्नी विनीता मरावी और साली मेघा की हत्या करने के बाद सहायक सबइंसपेक्टर योगेश मरावी एक सबइंसपेक्टर की भी हत्या करना चाहता था, लेकिन इस से पहले ही वह गिरफ्तार कर लिया गया. दूसरों को कानून का पालन कराने वाले एक पुलिस अधिकारी ने आखिर क्यों उठाया ऐसा खौफनाक कदम?

पत्नी विनीता ने योगेश मरावी को धिक्कार दिया तो इस बात से भी योगेश तिलमिला गया, क्योंकि वह पत्नी से दूर नहीं होना चाहता था. योगेश को लग रहा था कि विनीता अपनी बहन मेघा के कहने पर यह सब कर रही है. ऐसे में योगेश मेघा को सबक सिखाने की प्लानिंग बनाने में लग गया था. फिर वह पत्नी से ज्यादा अपनी साली मेघा से नफरत करने लगा था.

उस दिन भोपाल आने के लिए योगेश ने  टैक्सी किराए पर ली थी और टैक्सी ड्राइवर मोहित के साथ वह भोपाल पहुंचा था. सिमी अपार्टमेंट्स के पीछे एकांत क्षेत्र में कार खड़ी करवा कर उस ने ड्राइवर को रुकने को कहा. उस के बाद पत्नी के फ्लैट के सामने वह नौकरानी के आने का इतंजार करने लगा, क्योंकि पत्नी उस के कहने पर फ्लैट का गेट नहीं खोलती. मेघा के फ्लैट में घरेलू काम करने वाली मेड सेवंती पूर्वाह्न करीब 11 बजे फ्लैट पर पहुंची. सेवंती ने जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खटखटाया तो अंदर से आवाज आई, ”कौन..?’’ 

योगेश से मनमुटाव के चलते विनीता पिछले कुछ महीनों से बिना जांचपड़ताल के दरवाजा नहीं खोलती थी. उसे हर समय यह डर लगा रहता था कि कहीं योगेश उस से मिलने न आ जाए.

दीदी, मैं सेवंती.’’ सेवंती की आवाज पहचानते हुए विनीता ने दरवाजा खोला.  

दरवाजा खुलते ही योगेश ने सेवंती को बाहर की तरफ धक्का दिया और खुद अंदर घुस गया. सेवंती परेशान सी घर के बाहर खड़ी कुछ समझ पाती, तभी पलभर में ही अंदर से बचाओ…बचाओकी आवाज आने लगी. नौकरानी ने मदद के लिए सामने वाले फ्लैट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्होंने दरवाजा नहीं खोला. थोड़ी देर बाद योगेश अंदर से निकला और दरवाजे के गेट पर लगे ताले में चाबी डाल कर तेज कदमों से बाहर चला गया.

इस के बाद सेवंती ने दरवाजा खोल कर अंदर प्रवेश किया तो अंदर का नजारा देख कर वह जोर से चीख पड़ी. अंदर कमरे में मेघा और विनीता दोनों फर्श पर खून से लथपथ पड़ी हुई थीं. तब तक आसपास के फ्लैटों में रहने वाले कुछ लोग वहां पहुंच गए और उन्होंने पुलिस को फोन कर इस की जानकारी ऐशबाग पुलिस को दी. यह घटना 3 दिसंबर, 2024 की है. सूचना मिलते ही भोपाल के ऐशबाग थाने के टीआई जितेंद्र गढ़वाल ने वरिष्ठ अधिकारियों को इस की सूचना दी और अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थोड़ी ही देर में डीसीपी जोन-1 प्रियंका शुक्ला, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम भी घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. 

मौके पर पहुंचा खोजी कुत्ता सिम्मी अपार्टमेंट्स के पीछे लगभग 50 मीटर तक जा कर वापस लौट आया था. पुलिस ने फेमिली वालों को घटना की सूचना दी और मौके की काररवाई पूरी कर दोनों डैडबौडी पोस्टमार्टम के लिए भोपाल के हमीदिया अस्पताल भेज दीं. मामले की गंभीरता को देखते हुए भोपाल के पुलिस कमिश्नर हरिनारायणचारी मिश्रा, एडिशनल पुलिस कमिश्नर पंकज श्रीवास्तव ने भी घटनास्थल का मुआयना किया और आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए.

दोनों बहनों का पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर भी यह देख कर हैरान रह गए कि आरोपी ने कितनी बेरहमी से उन पर चाकू से वार किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुलिस को पता चला है कि आरोपी ने चाकू से साली मेघा के शरीर पर 14 और पत्नी विनीता पर 7 वार किए थे. इस में से कई वार तो उन के प्राइवेट पार्ट पर किए गए थे. इस के अलावा कमर पर 2, पेट और बाएं हाथ के अंगूठे पर भी एकएक वार किया था.

सीसीटीवी फुटेज से ऐसे मिला सुराग

जिस सिम्मी अपार्टमेंट्स में वारदात हुई, वह पौश इलाका है. अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर पर व्यावसायिक गतिविधियां चलती हैं. मेघा के फ्लैट के सामने एक जैन परिवार रहता है, जिस ने पुलिस को घटना के बारे में कुछ भी बोलने से मना कर दिया. पहली मंजिल पर रहने वाली स्वीटी वासनिक ने पुलिस को पूछताछ में बताया कि मेघा खादी और ग्रामोद्योग विभाग में अकाउंट औफीसर की पोस्ट पर थी. वह सुबह औफिस जाती और शाम को वापस घर लौटती. दोनों बहनें बहुत कम ही कहीं आतीजाती थीं.

डीसीपी प्रियंका शुक्ला के निर्देश पर भोपाल पुलिस की 3 टीमें आरोपी को सर्च कर रही थीं. घटनास्थल पर पहुंची पुलिस ने घर में पड़ी लाशों को बरामद करने और क्राइम सीन का मुआयना करने के साथसाथ कातिल की तलाश और उस की पहचान के लिए आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की.

टीआई जितेंद्र गढ़वाल ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले तो उस में एक शख्स अपार्टमेंट से बाहर पैदल ही बीवी के उस फ्लैट की तरफ बढ़ता नजर आ रहा था. उस के हाथ में एक बैग था और बैग में चाकू. शख्स की पहचान अपने ही महकमे के एएसआई योगेश मरावी के तौर पर हुई. सिम्मी अपार्टमेंट्स के ग्राउंड फ्लोर में 4 फ्लैट हैं, इन में 2 परिवार रहते हैं. उन के सामने 2 फ्लैट में ईमेजर्स सेल्स प्राइवेट लिमिटेड का औफिस था. इस कंपनी का एक सीसीटीवी कैमरा सीढिय़ों के सामने लगा था. दूसरी मंजिल पर जहां मेघा सिंह और उस की बहन विनीता मरावी की हत्या हुई, उस के बाजू वाला फ्लैट एक महिला का था, जो 2 साल से खाली पड़ा था. 

वहीं सामने एक जैन परिवार रहता था. उन के बाजू वाला फ्लैट भी खाली था. ईमेजर्स सेल्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के कैमरे में हत्या करने से पहले योगेश के जाने और वापस आने के समय में  सिर्फ 6 मिनट का अंतर पाया गया. सीसीटीवी फुटेज के समय से साबित हुआ कि 6 मिनटों में ही इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया गया.

पत्नी की एसआई से क्यों बढ़ीं नजदीकियां

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैहर में रहने वाले जयपाल सिंह सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे. विनीता और मेघा उन की 2 बेटियां थीं. सरकारी स्कूल से प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए जयपाल सिंह का कोई बेटा नहीं था. अपनी दोनों बेटियों की उन्होंने बड़े प्यार से परवरिश कर अच्छी शिक्षा दिलाई थी. छोटी बेटी मेघा खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग में अकाउंट्स औफीसर बन गई, जिस के चलते वह फिलहाल भोपाल के पद्मनाभ नगर के पास सिमी अपार्टमेंट्स फेज-2 की दूसरी मंजिल पर बने फ्लैट में किराए पर रहती थी. 

विनीता की शादी योगेश मरावी से हुई थी, योगेश पुलिस विभाग में है और फिलहाल मंडला के मंडला मवई थाने में एएसआई के पद पर तैनात था. शादी के कई साल बाद भी उन की कोई संतान नहीं हुई. योगेश इस के पहले जब ग्वालियर में तैनात था तो वहां के एक एसआई के साथ उस की दोस्ती थी. एसआई अकसर योगेश के घर आता रहता था फिर विनीता और उस एसआई के बीच नजदीकियां बढ़ रही थीं. एक मामले में योगेश और एसआई सस्पेंड भी हुए थे, इस के बावजूद विनीता और एसआई के बीच नजदीकियां और बढ़ गई थीं. बाद में योगेश को भी इस की भनक लगी तो वह पत्नी के चरित्र पर शक करने लगा था. 

गैरमर्द के साथ अफेयर के कारण उन के बीच करीब 5 सालों से मनमुटाव चलता रहा. योगेश के लगातार शक करने के चलते बीते 4 महीनों में उन का झगड़ा काफी बढ़ गया था. रोजाना के झगड़ों और पति के शक के कारण मानसिक रूप से परेशान विनीता बीते 4 महीनों से अपने मायके आ कर रहने लगी थी. कुछ दिन पहले उन दोनों की फेमिली के बीच बातचीत हुई थी, जिस में दोनों का तलाक करवाने की बात हुई थी. 3 दिसंबर को ही तलाक के पेपर तैयार होने थे. मम्मीपापा के पास रह रही विनीता को भोपाल में रहने वाली उस की छोटी बहन मेघा ने कुछ दिन के लिए अपने पास बुला लिया था, लेकिन योगेश को शक था कि विनीता का भोपाल में किसी से मिलनाजुलना होता है. शक के कारण योगेश विनीता से ससुराल या मायके में रहने की बात कह चुका था. 

पुलिस जांच में सामने आया कि 40 वर्षीय योगेश मरावी अपनी 35 वर्षीय पत्नी विनीता को घर ले जाना चाहता था, लेकिन उस की साली मेघा उसे विनीता से बात नहीं करने देती थी. कुछ दिन पहले वह विनीता को समझाने के मकसद से उस से मिलने भोपाल आया था. उस समय मेघा ने पुलिस को फोन कर दिया था. योगेश इस बात से बहुत परेशान था कि जिस जीवनसाथी के साथ उस ने सात फेरे लिए थे, उस से वह बात करने के लिए भी तरस रहा था. कहने को तो वह मंडला जिले के पुलिस थाने में एएसआई था और इलाके में उस का रौब भी था, मगर घरगृहस्थी के जंजाल में उस का सुखचैन खो चुका था. 

योगेश मरावी की शादी विनीता उर्फ गुडिय़ा से 10 साल पहले हुई थी. शादी के 2-3 साल तो खुशीखुशी गुजर गए, मगर धीरेधीरे दोनों के बीच आपसी मनमुटाव बढऩे लगा. आए दिन उन के बीच नोकझोंक होने लगी. विनीता हर छोटीबड़ी बात अपनी बहन मेघा को बताने लगी तो मेघा ने उसे अपने पास भोपाल बुला लिया. करीब 3 साल से विनीता योगेश से अलग रह रही थी और योगेश उस से मिलने भोपाल जाता था. दीवाली के बाद से विनीता ने योगेश से मिलना बंद कर दिया. योगेश को पता चला कि उस की बहन मेघा के कहने पर विनीता ने उस से बात तक करनी बंद कर दी तो वह मेघा से नफरत करने लगा. योगेश का मन अब अपनी ड्यूटी में नहीं लग रहा था, अपने दांपत्य जीवन का तनाव उस से बरदाश्त नहीं हो रहा था. 

फोन पर कई बार मिन्नतें करने के बाद भी जब विनीता का दिल नहीं पसीजा तो एक दिन वह विनीता से मिलने भोपाल पहुंच गया. वह विनीता से मिल कर उसे अपने साथ फिर से ले जाना चाहता था और पुराने गिलेशिकवे दूर कर एक नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहता था. विनीता अपनी बहन मेघा के जिस फ्लैट में रहती थी, वहां जा कर जैसे ही योगेश ने डोर बेल बजाई तो अंदर से आवाज आई, ”कौन है?’’

विनीता की जानीपहचानी आवाज सुन कर योगेश बोला, ”मैं हूं योगेश, तुम से मिलने आया हूं.’’

लेकिन मुझे नहीं मिलना तुम से.’’ विनीता ने बेरुखी से जवाब दिया.

इतनी नाराजगी भी ठीक नहीं विनीतादरवाजा खोलो, फिर मैं तुम से इत्मीनान से बातें करना चाहता हूं. मैं तुम्हारे बिना मछली जैसा तड़प रहा हूं.’’ योगेश उस से गिड़गिड़ाते हुए कह रहा था.

पत्नी योगेश से क्यों नहीं कर रही थी बात

अंदर से योगेश को मेघा की आवाज भी सुनाई दे रही थी जो विनीता से कह रही थी कि दरवाजा हरगिज नहीं खोलना. काफी मिन्नतों के बाद भी विनीता ने दरवाजा नहीं खोला और अंदर से ही जबाब देते हुए कहा, ”अब हमारा आप से कोई संबंध नहीं रहा, मैं किसी भी सूरत में तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती और न ही मुझ से दोबारा मिलने की कोशिश करना. मैं ने तो तलाक के पेपर भी तैयार करवा लिए हैं. जल्द ही तलाक के पेपर भी तुम्हें मिल जाएंगे.’’

2 दिन पहले भी रात के समय योगेश ने पत्नी के फ्लैट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन किसी अनहोनी की आशंका से पत्नी विनीता ने दरवाजा नहीं खोला था. शादी के 10 साल बीतने पर भी संतान नहीं होने पर पतिपत्नी के बीच तनाव बढ़ रहा था. योगेश को शक था कि उस की पत्नी का किसी से अफेयर चल रहा है. 3 साल से योगेश लगातार विनीता उर्फ गुडिय़ा को साथ रहने के लिए मंडला बुला रहा था, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हो रही थी. गुडिय़ा अपनी बहन मेघा के साथ भोपाल के सिम्मी अपार्टमेंट्स के फेज 3 में दूसरी मंजिल के फ्लैट नंबर सी 13/10 में रहती थी.

योगेश को लगता था कि मेघा ही उस की पत्नी विनीता को लगातार भड़काती रहती है और उस से मिलने से भी रोकती है. योगेश अपने खराब हुए रिश्ते को ले कर पत्नी से समझौता करने की कोशिश भी कर रहा था.  फेमिली वाले भी योगेश और उस की पत्नी के बीच काउंसिलिंग का प्रयास कर रहे थे, लेकिन साली का व्यवहार देख योगेश पत्नी से ज्यादा साली से नफरत रखने लगा और उस ने दोनों को ही सबक सिखाने की ठानते हुए भयानक योजना बना डाली.

भोपाल पुलिस ने आरोपी एएसआई मरावी के मंडला की तरफ भागने की सूचना प्रसारित की थी. चूंकि योगेश मंडला जिले में तैनात था, ऐसे में मंडला जिले के एसपी रजत सकलेचा ने जिले के सभी थानों को इस मामले में अलर्ट रहने के निर्देश जारी किए. 3 दिसंबर, 2024 की शाम को लगभग 5 बजे नैनपुर थाना क्षेत्र में पहुंचते ही मंडला जिले के थाना नैनपुर की पिंडरई चौकी प्रभारी राजकुमार हिरकने ने टैक्सी रोक कर एएसआई योगेश मरावी और ड्राइवर मोहित को हिरासत में ले लिया गया. 

जांच के दौरान एएसआई के कपड़ों से खून के निशान नहीं मिले, संभावना व्यक्त की जा रही थी कि वारदात के बाद उस ने कपड़े बदल लिए होंगे. योगेश जानता था कि मोबाइल की वजह से उस की लोकेशन ट्रेस हो सकती है, इसलिए वह मोबाइल मंडला में ही छोड़ आया था. योगेश को यह भी पता था कि उस की आवाज पर विनीता और मेघा दरवाजा नहीं खोलेगी, इसलिए वह कामवाली बाई के पीछेपीछे पत्नी व साली के फ्लैट पहुंचा और दरवाजा खुलते ही बाई को धक्का दे कर फ्लैट में अंदर घुस गया.

भीतर जा कर उस ने पत्नी और साली के शरीर पर चाकू से इतने वार किए कि उन के शरीर से निकला खून फ्लैट में चारों तरफ फर्श पर फैल गया. पुलिस को शव कपड़े में लपेट कर ले जाने पड़े थे, इस दौरान भी उन के शरीर से निकल रहा खून सीढिय़ों पर गिर रहा था. योगेश सफेद रंग की जिस कार को किराए पर ले कर भोपाल आया था, उस का रजिस्ट्रैशन नंबर सीजी04 एचएस1052 छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर का था. वह अपने साथ मोहित नाम के ड्राइवर को ले कर आया था. पत्नी के फ्लैट के पास ही यह कार खड़ी कर आया था. 

पत्नी व साली के मर्डर के बाद प्रेमी एसआई था अगला निशाना

भोपाल पुलिस ने कार और आरोपी की फोटो नजदीकी जिलों में भेज कर आरोपी की घेराबंदी की योजना बनाई थी. भोपाल से मंडला जाते समय बीच रास्ते में उस ने एक ढाबे पर रुक कर एक सुसाइड नोट भी लिखा, जिस से पता चलता है कि दोहरे कत्ल की वारदात को अंजाम देने के बाद उस का इरादा खुदकुशी करने का था, लेकिन ऐसा करने से पहले ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. सुसाइड नोट से साफ है कि योगेश को अपनी बीवी के साथसाथ अपनी साली मेघा से भी शिकायत थी और उस से सख्त नाराजगी थी. शायद यही वजह थी कि उस ने बीवी से ज्यादा चाकू अपनी साली को मारे. 

अपनी पत्नी और साली की हत्या करने वाले एएसआई की जेब से पुलिस को एक सुसाइड नोट बरामद हुआ था. एएसआई योगेश मरावी ने पत्नी और साली की हत्या से पहले अपने पिता को एक सुसाइड नोट लिखा था. पिता को लिखे पत्र में आरोपी ने लिखा था

पिताजी, मैं विनीता की हत्या करने वाला हूं. 17 साल की शादी में वह मेरे साथ 8-10 दिन भी नहीं रही. मैं उसे साथ लाने की कोशिश करता हूं तो उस की बहन मेघा भड़का देती है. मैं चाहता हूं कि विनीता मेरे साथ मंडला में रहे, लेकिन साली उसे भड़का कर कहती है कि तुम या तो भोपाल में रहो या फिर मायके में. मैं इन चीजों से बुरी तरह प्रताडि़त हो चुका हूं.

इसी पत्र में आरोपी ने विनीता के अफेयर का भी जिक्र किया. आरोपी एएसआई मरावी ने अपनी पत्नी पर किसी दूसरे के साथ अफेयर का आरोप लगाया था.

पुलिस ने योगेश से पूछा, ”आखिर तुम ने अपनी साली मेघा का कत्ल क्यों कर दिया?’’

इस पर योगेश ने कहा, ”मैं विनीता को छोडऩा नहीं चाहता था और उस के साथ रहना चाहता था. इस के लिए हरसंभव कोशिश कर चुका था, मगर वह साथ रहने को राजी नहीं थी. विनीता ने मेघा के कहने पर ही तलाक के पेपर तैयार कराए और मुझे नोटिस भेजा था. मेघा लगातार उस का ब्रेन वाश करती थी. फोन पर मुझ से बात भी नहीं करने देती थी. हमारे रिश्ते के बीच आ कर उस ने सब कुछ बेहद खराब कर दिया था. 

विनीता 4 साल पहले बिना बताए एक अन्य व्यक्ति के साथ चली गई थी. इस के बाद भी मैं उसे साथ रखने के लिए राजी था, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थी. मुझे हत्या के सिवा कोई और रास्ता नहीं सूझ रहा था. इस वजह से मैं ने उसे भी निपटा दिया.’’

जेब से मिले सुसाइड नोट के आधार पर ये तथ्य सामने आए कि आरोपी एएसआई योगेश मरावी को अपनी पत्नी पर शक था कि ग्वालियर में पदस्थ एसआई से उस के संबंध हैं.

पत्नी विनीता और साली मेघा की हत्या करने के बाद आरोपी एएसआई योगेश मरावी ग्वालियर में पदस्थ उस एसआई की भी हत्या कर के खुद आत्महत्या करने वाला था, लेकिन अगली वारदात को अंजाम देने से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. 

4 दिसंबर, 2024 को पुलिस योगेश मरावी को घटनास्थल पर ले कर गई, जहां वारदात का रिक्रिएशन किया गया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी को कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से उसे भोपाल जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित