Crime Kahani: गुनाह जो माफी लायक नहीं

Crime Kahani: कोकीन की लत लग जाने से रोनाल्ड के ऊपर काफी कर्ज हो गया था. इस कर्ज को उतारने और अपनी लत को पूरा करने के लिए उस ने प्रेमिका के साथ जो घिनौना अपराध किया, वह सचमुच माफी के लायक नहीं है.

रात के साढ़े 11 बजे बौब फ्लारडे घर लौटा तो दरवाजे पर उस ने पत्नी को इंतजार करते पाया. उसदिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसलिए उसे हैरानी हुई. वह कुछ कहता, उस से पहले ही पत्नी ने पूछा, ‘‘तान्या कहां है?’’

‘‘तान्या?’’ फ्लारडे ने जवाब देने के बजाय चौंक कर सवाल किया, ‘‘क्या तान्या अभी तक घर नहीं आई है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो लग रहा था कि तुम उसे साथ ले कर आओगे?’’ मिसेज फ्लारडे ने कहा.

‘‘हां, इरादा तो यही था. उसे क्लब के बाहर छोड़ते हुए मैं ने कहा भी था कि पार्टी खत्म होने पर मैं उसे लेने आ जाऊंगा, पर उस ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि वह अपनी किसी सहेली के साथ घर आ जाएगी.’’

‘‘उस का क्या, तुम्हें सोचना चाहिए था. जवान बेटी का इतनी रात गए घर से बाहर रहना क्या ठीक है?’’ मिसेज फ्लारडे ने चिंता व्यक्त की.

‘‘हमारी बेटी समझदार है, किसी सहेली के यहां चली गई होगी. चलो, उस के मोबाइल पर फोन कर के पूछते हैं कि वह कहां है?’’

बौब फ्लारडे ने ड्राइंगरूम में जा कर वहां रखे लैंडलाइन फोन से तान्या के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उस के मोबाइल का स्विच औफ था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उन्होंने कई बार फोन किया, हर बार जवाब यही मिला कि फोन का स्विच औफ है. बौब फ्लारडे परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात को वह बेटी को ढूंढ़ने कहां जाएं. जवान बेटी थी, कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो?

यह सोच कर उन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने तुरंत जूलियन बिस्त्रे क्लब को फोन किया. पार्टी वहीं थी. काफी देर तक घंटी बजने के बाद फोन उठा तो फ्लारडे ने बेचैनी से पूछा, ‘‘हैलो, बिस्त्रे क्लब?’’

‘‘जी, कहिए?’’ दूसरी तरफ से किसी ने कहा.

‘‘तुम्हारे यहां शाम को स्कूली बच्चों की एक पार्टी थी, क्या वह खत्म हो गई?’’

‘‘पार्टी तो कब की खत्म हो गई, सब बच्चे चले भी गए हैं.’’

‘‘क्या कोई लड़की अभी…?’’ फ्लारडे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए कि दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘अब यहां कोई नहीं है, सिवाय मेरे.’’

‘‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’’ फ्लारडे ने पूछा.

‘‘मैं यहां का चौकीदार हूं,’’ उस व्यक्ति ने तल्खी से कहा, ‘‘शायद अब यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि मैं यहां क्या कर रहा हूं?’’

‘‘तुम मेरी बात का बुरा मन गए,’’ फ्लारडे ने विनम्रता से कहा, ‘‘माफ करना, मैं अपनी बेटी को ले कर परेशान हूं. उस का नाम तान्या है, क्या उसे किसी के साथ देखा है?’’

‘‘सौरी, पार्टी के बाद कौन किस के साथ गया, इस की जानकारी मुझे नहीं है. मेरी ड्यूटी तो क्लब बंद होने के बाद शुरू होती है.’’ चौकीदार ने कहा और फोन काट दिया.

इस के बाद फ्लारडे को ऐनी की याद आई. वह तान्या के साथ ही पढ़ती थी. पार्टी में वह भी गई थी. वह फ्लारडे के खास दोस्त और उन के रेस्तरां के खानसामा के पार्टनर थौमस को बेटी थी. उन्होंने थौमस को फोन किया. पता चला कि वह तो सवा 11 बजे ही घर आ गई थी. उस समय वह सो रही थी. वहां से भी मायूसी ही हाथ लगी. अब एक और व्यक्ति बचा था, जो तान्या के बारे में जानकारी दे सकता था. वह था स्कूल का वार्डन नेड कैली. उसी की निगरानी में स्कूल के बच्चों की यह फेयरवेल पार्टी आयोजित की गई थी.

फ्लारडे ने नेड को फोन किया. काफी देर बाद उस ने फोन रिसीव किया तो फ्लारडे ने जब उसे बताया कि तान्या अभी तक घर नहीं पहुंची है तो वह चौंका. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैं क्लब से घर के लिए निकला था तो वह क्लब में ही थी.’’

‘‘क्या तुम पार्टी खत्म होने से पहले ही चले गए थे?’’

‘‘दरअसल, 11 बजे मेरी पत्नी का फोन आया तो मुझे वहां से निकलना पड़ा. लेकिन तब तक पार्टी खत्म हो चुकी थी. काफी बच्चे जा भी चुके थे. मुझे लगा कि बच्चे समझदार हैं, इसलिए मैं ने उन की सुरक्षा की जरूरत महसूस नहीं की. बहरहाल आप परेशान मत होइए, मैं आ रहा हूं.’’

करीब आधे घंटे बाद नेड आ पहुंचा. इस बीच फ्लारडे ने अपने कुछ परिचितों और तान्या की सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पता किया था, लेकिन कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला था.फ्लारडे नेड को अपना शुभचिंतक मानता था और उस पर विश्वास भी करता था. इसीलिए उसे तान्या का ट्यूटर भी नियुक्त किया था. नेड के आते ही वह अपने आंसू नहीं रोक सका और रोते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया नेड, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘धीरज रखो मि. फ्लारडे. तान्या मिल जाएगी. मेरे खयाल से पुलिस को इत्तिला कर देनी चाहिए.’’

13 जून, 2003 की रात करीब 3 बजे फ्लारडे और नेड पास ही स्थित हाईवे पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी औफिसर को तान्या की फोटो दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत शहर के सभी पुलिस स्टेशनों में तान्या का फोटो सहित हुलिया प्रेषित कर उस की तलाश में सहयोग की अपील की. तान्या दक्षिण अफ्रीका के रैडबर्ग सिटी, जोहानेसबर्ग के रहने वाले बौब फ्लारडे की एकलौती संतान थी. 18 साल की खूबसूरत तान्या चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी. वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के रेस्तरां में भी उन का हाथ बंटाती थी.

उस की लगन और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश को देखते हुए फ्लारडे उसे बतौर मैनेजर ट्रेनिंग दे रहे थे, ताकि वह अपने व्यवसाय को अच्छी तरह संभाल सके. उस के दोस्तों की संख्या ज्यादा नहीं थी. उस का किसी लड़के से प्रेम संबंध भी नहीं था. सुबह 8 बजे फ्लारडे फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. उसे उम्मीद थी कि पुलिस को तान्या के बारे में कुछ न कुछ पता चल ही गया होगा. तब तक चौकीइंचार्ज महिला इंसपेक्टर क्रिस्टीले सटीन होवे अपनी ड्यूटी पर आ चुकी थीं. उन्होंने तान्या की गुमशुदगी के बारे में सारी जानकारी ले ली थी. क्रिस्टीले ने फ्लारडे को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तान्या को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करेंगी.

ठीक उसी समय किसी हेनीर रीडर ने फोन पर सूचना दी कि डैरनवुड स्थित हिलबरोव झील पर एक पेड़ के नीचे एक लड़की की लाश पड़ी है. क्रिस्टीले तुरंत सहकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं. उन्होंने फ्लारडे को भी साथ ले लिया था. वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. वहां एक लड़की की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. लाश पर कुछ मिट्टी और पेड़ के सूखे पत्ते पड़े थे, जिन्हें हटा कर क्रिस्टीले लाश का निरीक्षण करने लगीं. मृतका के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की उम्र 17-18 साल थी. उस के पूरे शरीर पर चोटों के निशान थे, गले में नायलौन की रस्सी बंधी थी. संभवत: उसे उसी रस्सी से गला घोंट कर मारा गया था.

मृतका की हालत देख कर ही पता चला रहा था कि उस के साथ हत्या से पूर्व कई लोगों द्वारा दुष्कर्म किया गया था. उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. क्रिस्टीले को वह लाश तान्या की लगी, इसलिए उन्होंने अब तक फ्लारडे को लाश नहीं दिखाई थी. लाश को चादर से ढक कर सिर्फ उस का चेहरा फ्लारडे को दिखाया गया तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस के इस तरह रोने से ही साफ हो गया कि लाश उस की बेटी तान्या की थी. आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टपार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद फ्लारडे से जब पूछा गया कि उसे किसी पर शक है तो उस ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि उसे नहीं लगता कि उस की बेटी ने आज तक किसी का कुछ बिगाड़ा है. वह बेहद मासूम थी. उस की संगत भी गलत नहीं थी. जाने किस ने उस की बेटी के साथ…?

जब तान्या के ट्यूटर नेड कैली के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह ऐसा कतई नहीं कर सकता. लेकिन पुलिस को उसी पर शक था. इस का कारण यह था कि उस की उम्र अभी 25-26 साल थी. वह तान्या के स्कूल का वार्डन होने के साथसाथ ट्यूटर भी था. तान्या खूबसूरत लड़की थी. संभव था कि पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने के साथ शारीरिक संबंध भी बन गए हों. इस के बाद किसी बात को ले कर दोनों के रिश्ते में खटास आ गई हो और नेड ने दुष्कर्म कर के उस की हत्या कर दी हो. यह भी संभव था कि नेड तान्या से एकतरफा प्रेम करने लगा हो और तान्या ने उस के प्रेम को स्वीकार न किया हो. बदले में उस ने जबरदस्ती कर के उस का कत्ल कर दिया हो?

लेकिन तान्या की हत्या करना अकेले नेड के बस की बात नहीं थी. इसलिए इस मामले में उस के कुछ अन्य साथी भी रहे होंगे. नेड ने उन्हें दौलत और तान्या के कुंवारे जिस्म को भोगने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया होगा. उसी दिन शाम को तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, मरने से पहले तान्या से 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. वह पुरुष संसर्ग की आदी नहीं थी. उस के शरीर पर किसी तेजधार हथियार से वार किए गए थे. उस के साथ मारपीट की गई थी, उस के बाद नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान थे.

फ्लारडे को नेड पर विश्वास था. इस के बावजूद नेड को शक के आधार पर पुलिस चौकी बुला कर कई दौर में पूछताछ की गई. इस पूछताछ में कोई भी तथ्य सामने नहीं आया, जिस से उस पर किए जाने वाले शक की पुष्टि होती. पूछताछ में पता चला कि कुछ समय पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी काफी सुंदर थी. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. नजदीकी होने के बावजूद नेड कभी तान्या के प्रति गलत विचार मन में नहीं लाया. तान्या को ही नहीं, किसी भी लड़की को उस ने बुरी नजरों से नहीं देखा. वह स्कूल का वार्डन था और अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से कर रहा था. नेड से पता चला कि घटना वाली रात तान्या पार्टी में अकेली आई थी. क्लब से जाते समय उस ने तान्या को पार्टी में देखा था.

तान्या के दुष्कर्म और हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. अब जांच के लिए 2 ही चीजें बची थीं, एक तान्या का मोबाइल फोन और दूसरा जुलियन बिस्त्रे क्लब. तान्या के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि घटना की रात तान्या ने न तो किसी को अपने मोबाइल से फोन किया था और न ही उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. हां, उस ने रात करीब डेढ़ बजे अपनी एक सहेली को एसएमएस जरूर भेजा था कि मैं सुरक्षित हूं. वहीं रात भर उस का मोबाइल बंद था, लेकिन उस के मोबाइल सेटर का सिमकार्ड बदला गया था.

इस से भी कोई सार्थक जानकारी नहीं मिली. अब क्लब को जांच का लक्ष्य बनाया गया. जुलियन बिस्त्रे क्लब शहर के बीचोबीच स्थित था. पुलिस टीम ने 13 जून, 2003 को क्लब में हुई पार्टी व अन्य गतिविधियों की जांच की. इस जांच में पता चला कि तान्या ने रात करीब 11 बजे क्लब से एक फोन किया था. टेलीफोन एक्सचेंज से पता चला कि वह फोन रोनाल्ड एडवर्ड ग्रीम्सली को किया गया था. रोनाल्ड का पता भी मिल गया था. वह फोंटने ब्ल्यू स्थित एक छोटे से मकान में रहता था. कुछ पुलिसकर्मी उस के घर भेजे गए तो वहां ताला बंद मिला. आसपड़ोस वालों को भी उस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन लोगों को सिर्फ इतना पता था कि वह किसी विज्ञापन फिल्में बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

रोनाल्ड पूरी तरह शक के घेरे में आ गया था. फ्लारडे से रोनाल्ड के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया, ‘‘हां, एक बार तान्या ने मुझे उस से मिलवाया था. उस ने कहा था कि वह उस का अच्छा दोस्त है. लेकिन तान्या को मैं ने उस के साथ कहीं आतेजाते नहीं देखा था.’’

शहर भर की सभी उन फिल्म कंपनियों को खंगाला गया, जो मुख्य तौर पर विज्ञापन फिल्में बनाती थीं. इस बीच रोनाल्ड के घर जब भी दबिश दी गई, दरवाजे पर ताला ही लटका मिला. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. आखिर 18 जुलाई, 2003 को वह पुलिस की पकड़ में आ गया. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह चुप रहा. वह एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन उस के चेहरे के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह किसी राज को दिल की गहराई में छिपाए है. जब उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला गया तो उस ने बेहद गंभीर स्वर में सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘हां, मैं गुनहगार हूं. मैं ने ही तान्या के साथ दुष्कर्म किया है और फिर गला दबा कर उसे मार दिया है.’’

काफी कोशिश के बाद भी उस ने यह नहीं बताया कि उस ने ऐसा क्यों किया? तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि उस के साथ 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. संभवत: वे भी उस की हत्या में शामिल थे. लेकिन रोनाल्ड ने इस बारे में जुबान नहीं खोली. इस से यही लगा कि या तो रोनाल्ड बेहद शातिर है या फि वह किसी से डरासहमा है. खैर, अपराध स्वीकार करने के बाद रोनाल्ड को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. लेकिन तान्या के साथ दुष्कर्म और उस की हत्या का कारण रहस्य ही बना रहा.

रोनाल्ड ने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की. एक बार उस ने ब्लेड से अपने हाथ की नसें काट डालीं तो दूसरी बार चादर से गला घोंटने की कोशिश की. दोनों बार उसे बचा लिया गया, लेकिन मानसिक तनाव की वजह से वह कोमा में चला गया. इस के बाद बैरक में रखे उस के सामान की तलाश ली गई तो उस में एक पत्र मिला, जिस में उस ने तान्या के पिता फ्लारडे को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘‘मुझे 13 जून के लिए माफ कर देना. खुद को जीवित रखने के लिए मुझे तान्या की हत्या करनी पड़ी थी.’’

इस पत्र ने केस को और पेचीदा बना दिया था. शायद यह उस का सुसाइड नोट था. इस से लगता था कि रोनाल्ड की कोई मजबूरी रही होगी, जिस की वजह से उस ने तान्या की हत्या की थी, वरना वह ऐसा करना नहीं चाहता था. अब पुलिस को इसी तथ्य को उजागर करना था, लेकिन रोनाल्ड कोमा में था. करीब 2 महीने बाद रोनाल्ड कोमा से बाहर आया तो उसे देख कर लगता था कि वह काफी हताश है, अपराधबोध में जकड़ा हुआ है. उस से जब हमदर्दी जताते हुए उस की दुखती रग को दबाया गया तो सचाई उस के मुंह से बाहर आ गई.

उस ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘मैं पिछले 9 सालों से कोकीन का आदी था. इसी वजह से अकसर मेरे पास पैसों की तंगी रहती थी. नशे के सौदागरों का काफी कर्ज मुझ पर चढ़ गया था.’’ इतना कह कर रोनाल्ड रुका. फिर उस ने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘उस दिन मेरे पास कोकीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. नशे के बिना मैं काफी बेचैनी महसूस कर रहा था. मैं चुटकी भर कोकीन के लिए कोकीन बेचने वालों के सामने गिड़गिड़ाया, पर उन्होंने नहीं दी. उलटा कर्ज चुकाने को कहा और धमकी दी कि अगर मैं ने उन के पैसे नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. तब कोकीन और कर्ज की खातिर मैं ने उन से एक डील कर ली.’’

‘‘कैसी डील?’’ इंसपेक्टर क्रिस्टीले ने पूछा.

रोनाल्ड ने चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू भरे थे. वह बोझिल आवाज में बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी लड़की के साथ अपनी ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे दूं तो न केवल वे मेरा सारा कर्ज माफ कर देंगे, बल्कि मुझे नशे की लत को पूरा करने के लिए काफी पैसे भी देंगे. नशे की लत और जिंदगी की चाहत ने मुझे हैवान बना दिया. मैं ने अपनी ही चाहत को दागदार कर के उस की हत्या कर दी.’’

इतना कह कर रोनाल्ड फफकफफक कर रोने लगा. यहां जानने वाली बात यह है कि लड़कों से दूर भागने वाली तान्या करीब 6 महीने पहले रोनाल्ड से मिली थी. तान्या ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा था कि उस के दिल में हलचल सी मच गई थी. उस ने इस के पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था. रोनाल्ड की नजर भी उसी पर जमी थी. पहली नजर और पहली मुलाकात में ही तान्या और रोनाल्ड एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

तान्या की तरह रोनाल्ड भी सभ्य व संस्कारी था, पर उस में एक कमी यह थी कि उसे कोकीन के नशे की लत लग गई थी. बस, इसे छोड़ कर उस में और कोई कमी नहीं थी. उस की इस आदत को तान्या नहीं जान पाई थी. दोनों अकसर मिलने लगे थे. लेकिन मिलने में वे इतनी सावधानी बरतते थे कि कभी किसी को उन के प्यार का पता नहीं चल सका.

रोनाल्ड थोड़ा सामान्य हुआ तो उस ने आगे कहा, ‘‘13 जून को कोकीन न मिलने की वजह से मेरी सांसें घुटी जा रही थीं. हाथपांव कांप रहे थे. मौत नजदीक आती दिखाई दे रही थी. पार्टी के बाद तान्या ने मुझ से मिलने का वादा किया था. रात करीब 11 बजे तान्या का फोन आया तो मुझे जैसे जिंदगी मिलती नजर आई. मेरा जमीर उस पल मर गया और मैं ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस के बारे में मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. मैं इंसान से हैवान बन गया. कुछ सोच कर मैं उसे लेने क्लब चला गया और मैं उसे ले कर अपने घर आ गया.’’

रोनाल्ड ने तान्या के आने की जानकारी कोकीन सप्लाई करने वाले नाइजीरियन सौदागरों को दे दी थी. उस ने कोकीन की एक पुडि़या के लिए उन से वादा कर लिया था कि वह प्रेमिका के साथ ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे देगा. तान्या रोनाल्ड के घर पहुंची तो उन नाइजीरियन युवकों को देख कर डर गई. लेकिन अब तो वह फंस चुकी थी. उन्होंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो उस ने अपने प्रेमी रोनाल्ड की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रही थी कि रोनाल्ड को यह क्या हो गया है?

तान्या ने विरोध किया तो नाइजीरियन युवकों ने उस के साथ मारपीट की. इस के बाद चाकू की नोक पर उस के हाथपैर बांध कर सोफे पर डाल दिया. रोनाल्ड उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा तो वे उस की फिल्म बनाने लगे. रोनाल्ड के बाद उन दोनों ने भी तान्या के साथ जबरदस्ती की. अब तक तान्या अधमरी सी हो चुकी थी. उस के जीवित रहने से तीनों फंस सकते थे, इसलिए वहां पड़ी नायलौन की रस्सी से उस का गला घोंट दिया गया.

इस के बाद तीनों रात के अंधेरे में तान्या की लाश को झील के पास स्थित एक पेड़ के नीचे फेंक आए. दोनों नाइजीरियन अपना कैमरा ले कर चले गए तो रोनाल्ड को होश आया. वह कांप उठा कि उस ने यह क्या कर डाला? मगर अब क्या हो सकता था. वह पुलिस के डर से छिपता भागता रहा, लेकिन कब तक भागता फिरता, आखिर पकड़ा गया. इस के बाद पुलिस ने दोनों नाइजीरियन युवकों को पकड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. 2 सालों तक मुकदमा चला.

17 जुलाई, 2005 को जोहानेसबर्ग कोर्ट के जज बेनडस्टन ने दुष्कर्म, हत्या, चोरी और अश्लील फिल्म बनाने के आरोप में रोनाल्ड को 18 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई. इस बीच रोनाल्ड का नशा छुड़ाने का इलाज भी चलता रहा. सजा के दौरान रोनाल्ड की कोकीन की लत छूट गई. जेल में वह ज्यादातर बाइबल पढ़ता रहता था. उस के चालचलन के मद्देनजर जेल प्रशासन ने उस की सजा कम करने की गुजारिश की, लेकिन रोनाल्ड ने अपने ऊपर किसी तरह का रहम न किए जाने की बात कही.

उस का कहना था कि उस ने जो गुनाह किया है, उस के लिए उसे मौत की सजा मिलनी चाहिए.  अब वह आत्मग्लानि का बोझ ले कर जीना नहीं चाहता. उस के चालचलन को देखते हुए फरवरी, 2015 में उस की बाकी सजा माफ करते हुए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया. लेकिन 25 मार्च, 2015 को उस ने कोर्ट से अपील की कि उसे मौत की सजा दे दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस के बाद 14 मई, 2015 को उस ने दोबारा अपील की है कि उसे ताउम्र कैद की सजा दी जाए. उस की इस अपील पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है. Crime Kahani

 

Crime News: अपहरण के चक्कर में फंस गया मुंबई का किंग

Crime News:15 मई, 2017 की सुबह की बात है. समय 11-साढ़े 11 बजे सीकर जिले के शहर फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार अपनी ज्वैलरी की दुकान पर थे. उन की पत्नी पार्वती और बेटा ध्रुव ही घर पर थे. बेटी वर्षा किसी काम से बाजार गई थी. उसी समय अच्छी कदकाठी का एक सुदर्शन युवक उन के घर पहुंचा. उस के हाथ में शादी के कुछ कार्ड थे. युवक ने ललित के घर के बाहर लगी डोरबेल बजाई तो पार्वती ने बाहर आ कर दरवाजा खोला. युवक ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘नमस्ते आंटीजी, पोद्दार अंकल घर पर हैं?’’

पार्वती ने शालीनता से जवाब देते हुए कहा, ‘‘नमस्ते भैया, पोद्दारजी तो इस समय दुकान पर हैं. बताइए क्या काम है?’’

‘‘आंटीजी, हमारे घर में शादी है. मैं कार्ड देने आया था.’’ युवक ने उसी शालीनता से कहा.

युवक के हाथ में शादी के कार्ड देख कर पार्वती ने उसे अंदर बुला लिया. युवक ने सोफे पर बैठ कर एक कार्ड पार्वती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटीजी, यह कार्ड पोद्दार अंकल को दे दीजिएगा. आप लोगों को शादी में जरूर आना है. बच्चों को भी साथ लाइएगा.’’

पार्वती ने शादी का कार्ड देख कर कहा, ‘‘भैया आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आंटीजी, आप नहीं पहचानतीं, लेकिन पोद्दार अंकल मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’ युवक ने कहा.

पार्वती ने घर आए, उस मेहमान से चायपानी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चायपानी के तकल्लुफ की कोई जरूरत नहीं है, आंटीजी. अभी एक कार्ड आप के भांजे अश्विनी को भी देना है. मैं उन का घर नहीं जानता. आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज देतीं तो वह उन का घर बता देता. कार्ड दे कर मैं आप के बेटे को छोड़ जाऊंगा.’’

बाहर तेज धूप थी. इसलिए पार्वती बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आप कार्ड हमें दे दीजिए. शाम को अश्विनी हमारे घर आएगा तो हम कार्ड दे देंगे.’’

पार्वती की बात सुन कर युवक ने मायूस होते हुए कहा, ‘‘कार्ड तो मैं आप को दे दूं, लेकिन पापा मुझे डांटेंगे. उन्होंने कहा है कि खुद ही जा कर अश्विनी को कार्ड देना.’’

युवक की बातें सुन कर पार्वती ने ड्राइंगरूम में ही वीडियो गेम खेल रहे अपने 13 साल के बेटे ध्रुव से कहा, ‘‘बेटा, अंकल के साथ जा कर इन्हें अश्विनी का घर बता दे.’’

ध्रुव मां का कहना टालना नहीं चाहता था, इसलिए वह अनमने मन से जाने को तैयार हो गया. वह युवक ध्रुव के साथ घर से निकलते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू आंटीजी.’’

ध्रुव और उस युवक के जाने के बाद पार्वती घर के कामों में लग गईं. काम से जैसे ही फुरसत मिली उन्होंने घड़ी देखी. दोपहर के साढ़े 12 बज रहे थे. ध्रुव को कब का घर आ जाना चाहिए था. लेकिन वह अभी तक नहीं आया था. पार्वती ने सोचा कि ध्रुव वहां जा कर खेलने या चायपानी पीने में लग गया होगा. हो सकता है, अश्विनी ने उसे किसी काम से भेज दिया हो. यह सोच कर वह फिर काम में लग गईं.

थोड़ी देर बाद उन्हें जब फिर ध्रुव का ध्यान आया, तब दोपहर का सवा बज रहा था. ध्रुव को घर से गए हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा हो गया था. पार्वती को चिंता होने लगी. 10-5 मिनट वह सेचती रहीं कि क्या करें. कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने पति ललित पोद्दार को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बात सुन कर ललित को भी चिंता हुई. उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘ध्रुव कोई छोटा बच्चा नहीं है कि कहीं खो जाए या इधरउधर भटक जाए. फिर भी मैं अश्विनी को फोन कर के पता करता हूं.’’

ललित ने अश्विनी को फोन कर के ध्रुव के बारे में पूछा तो अश्विनी ने जवाब दिया, ‘‘मामाजी, मेरे यहां न तो ध्रुव आया था और ना ही कोई आदमी शादी का कार्ड देने आया था.’’

अश्विनी का जवाब सुन कर ललित भी चिंता में पड़ गए. वह तुरंत घर पहुंचे और पार्वती से सारी बातें पूछीं. उन्होंने वह शादी का कार्ड भी देखा, जो वह युवक दे गया था. कार्ड पर लियाकत सिवासर का नाम लिखा था. ललित को वह शादी का कार्ड अपने किसी परिचित का नहीं लगा. उन्होंने कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबरों पर फोन किया तो वे नंबर फरजी निकले.

ललित को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. उन के मन में बुरे ख्याल आने लगे. उन्हें आशंका इस बात की थी कि कहीं किसी ने पैसों के लालच में ध्रुव का अपहरण न कर लिया हो. इस की वजह यह थी कि वह फतेहपुर के नामीगिरामी ज्वैलर थे. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उन का अच्छाखासा रसूख था. बेटे के घर न आने से पार्वती का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

ललित ने अपने कुछ परिचितों से बात की तो सभी ने यही सलाह दी कि इस मामले की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए. इस के बाद दोपहर करीब ढाई बजे ललित ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. पार्वती से पूछताछ की गई. शुरुआती जांच से यही नतीजा निकला कि ध्रुव का अपहरण किया गया है.

अपहर्त्ता प्रोफेशनल अपराधी हो सकते थे. क्योंकि रात तक फिरौती के लिए किसी अपहर्त्ता का फोन नहीं आया था. पुलिस को अनुमान हो गया था कि अपहर्त्ता ने ध्रुव के अपहरण का जो तरीका अपनाया था, उस से साफ लगता था कि उन्होंने रेकी कर के ललित पोद्दार के बारे में जानकारियां जुटाई थीं.

पुलिस ने फिरौती मांगे जाने की आशंका के मद्देनजर पोद्दार परिवार के सारे मोबाइल सर्विलांस पर लगवा दिए. लेकिन उस दिन रात तक ना तो किसी अपहर्त्ता का फोन आया और ना ही ध्रुव को साथ ले जाने वाले उस युवक के बारे में कोई जानकारी मिली. पुलिस ने ललित के घर के आसपास और लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब स्थित उस की दुकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, लेकिन उन से पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ.

पुलिस को अब तक केवल यही पता चला था कि ललित पोद्दार के घर जो युवक शादी का कार्ड देने आया था, उस की उम्र करीब 30 साल के आसपास थी. वह सफेद शर्ट पहने हुए था. अगले दिन सीकर के एसपी राठौड़ विनीत कुमार त्रिकमलाल ने ध्रुव का पता लगाने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशानिर्देश दिए. इस के बाद पुलिस ने उस शादी के कार्ड को आधार बना कर जांच आगे बढ़ाई.

परेशानी यह थी कि शादी के कार्ड पर किसी प्रिंटिंग प्रैस का नाम नहीं लिखा था, जबकि हर शादी के कार्ड पर प्रिंटिंग प्रैस का नाम जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि राजस्थान सरकार ने बालविवाह की रोकथाम के लिए यह कानूनी रूप से जरूरी कर दिया है. पुलिस ने शादी के कार्ड छापने वाले प्रिंटिंग प्रैस मालिकों से बात की तो पता चला कि उस कार्ड में औफसेट पेंट का इस्तेमाल किया गया था.

उस पेंट का उपयोग फतेहपुर में नहीं होता था. सीकर में प्रिंटिंग प्रैस वाले उस का उपयोग करते थे. इस के बाद पुलिस ने सीकर, चुरू और झुंझुनूं के करीब डेढ़ सौ प्रैस वालों से पूछताछ की. इस जांच के दौरान एक नया तथ्य यह सामने आया कि ध्रुव के अपहरण से 4 दिन पहले से उसी के स्कूल में पढ़ने वाला छात्र अंकित भी लापता था. अंकित चुरू जिले के रतनगढ़ शहर का रहने वाला था. वह फतेहपुर के विवेकानंद पब्लिक स्कूल में पढ़ता था और हौस्टल में रहता था. गर्मी की छुट्टी में वह रतनगढ़ अपने घर गया था. वह 12 मई को दोपहर करीब सवा बारह बजे बाल कटवाने के लिए घर से निकला था, तब से लौट कर घर नहीं आया था.

तीसरे दिन आईजी हेमंत प्रियदर्शी एवं एसपी राठौड़ विनीत कुमार ने ध्रुव के घर वालों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि ध्रुव का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाएगा. उसी दिन यानी 17 मई को अपहर्त्ता ने ललित पोद्दार को फोन कर के बताया कि उन के बेटे ध्रुव का अपहरण कर लिया गया है. उन्होंने ध्रुव की उन से बात करा कर 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी.

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर पुलिस को बताया तो बच्चे को मार दिया जाएगा. ललित ने समझदारी से बातें करते हुए अपहर्त्ता से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि नोटबंदी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. भाइयों, परिवार वालों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाने के लिए समय चाहिए. चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 70 लाख रुपए इकट्ठे नहीं हो पाएंगे. बैंक से एक साथ ज्यादा पैसा निकाला तो पुलिस को शक हो जाएगा.

ललित ने अपहर्ता को अपनी मजबूरियां बता कर यह जता दिया कि वह 70 लाख रुपए नहीं दे सकते. बाद में अपहर्ता 45 लाख रुपए ले कर ध्रुव को सकुशल छोड़ने को राजी हो गए. अपहर्ताओं ने फिरौती की यह रकम कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर पहुंचाने को कहा. लेकिन बाद में वे फिरौती की रकम मुंबई में लेने को तैयार हो गए.

ललित का मोबाइल पहले से ही पुलिस सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस को अपहर्ता और ललित के बीच हुई बातचीत का पता चल गया. इसी के साथ पुलिस को वह मोबाइल नंबर भी मिल गया, जिस से ललित को फोन किया गया था.

इसी बीच पुलिस ने शादी के उस कार्ड की जांच एक्सपर्ट से कराई तो पता चला कि वह एविडेक प्रिंटर से छपा था. शेखावटी के सीकर, चुरू व झुंझुनूं जिले में करीब 60 एविडेक प्रिंटर थे. इन प्रिंटर मालिकों से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह कार्ड नवलगढ़ के एक प्रिंटर से छपवाया गया था. उस प्रिंटर के मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह कार्ड फतेहपुर के किसी आदमी ने उस के प्रिंटर पर छपवाया था. उस आदमी से पूछताछ में पुलिस को अपहर्त्ता युवक के बारे में कुछ सुराग मिले.

इस के अलावा पुलिस ने 15 मई को ललित पोद्दार के मकान के आसपास घटना के समय हुई सभी मोबाइल कौल को ट्रेस किया. इस में मुंबई का एक नंबर मिला. यह नंबर साजिद बेग का था. काल डिटेल्स के आधार पर यह भी पता चल गया कि साजिद के तार फतेहपुर के रहने वाले अयाज से जुड़े थे.

जांच में यह बात भी सामने आ गई कि अपहर्ता मुंबई से जुड़ा है. इस पर पुलिस ने फतेहपुर से ले कर विभिन्न राज्यों के टोल नाकों पर जांच की और उन नाकों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस में सब से पहले शोभासर के टोल पर सफेद रंग की एसेंट कार पर जयपुर का नंबर मिला. अगले टोल नाके मौलासर पर इसी कार पर महाराष्ट्र की नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. आगे के टोल नाकों पर उसी कार पर अलगअलग नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. जांच में ये सारे नंबर फरजी पाए गए.

सीकर के एसपी ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर से बात कर के ध्रुव के अपहरण की पूरी जानकारी दे कर अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने का आग्रह किया. इसी के साथ एसपी के दिशानिर्देश पर एडिशनल एसपी तेजपाल सिंह ने 3 टीमें गठित कर के 3 राज्यों में भेजी. सब से पहले रामगढ़ शेखावाटी के थानाप्रभारी रमेशचंद्र को टीम के साथ मुंबई भेजा गया. यह टीम मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के साथ मिल कर आरोपियों की तलाश में जुट गई.

फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह ने लगातार जांच कर के ध्रुव के अपहरण में साजिद बेग और फतेहपुर के रहने वाले अयाज के साथ उस के संबंधों के बारे में पता लगाया.

एसपी ध्रुव के घर वालों को सांत्वना देने के साथ यह भी बताते रहे कि उन्हें अपहर्ता को किस तरह बातों में उलझा कर रखना है, ताकि पुलिस बच्चे तक पहुंच सके. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश और एक टीम पश्चिम बंगाल भी भेजी गई. पुलिस को संकेत मिले थे कि अपहर्ता धु्रुव को ले कर मुंबई, कोलकाता या कानपुर जा सकते हैं.

लगातार भागदौड़ के बाद सीकर पुलिस ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की मदद से 21 मई की आधी रात के बाद मुंबई के बांद्रा  इलाके से ध्रुव को सकुशल बरामद कर लिया. पुलिस ने उस के अपहरण के आरोप में साजिद बेग को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया था. इस के अलावा उस की 2 गर्लफ्रैंड्स को भी गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने वह एसेंट कार भी बरामद कर ली, जिस से ध्रुव का अपहरण किया गया था. सीकर पुलिस 22 मई की रात ध्रुव और आरोपियों को ले कर मुंबई से रवाना हुई और 23 मई को फतेहपुर आ गई.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में मुंबई से साजिद बेग और उस की गर्लफ्रैंड्स यास्मीन जान और हालिमा मंडल को गिरफ्तार किया था. पूछताछ के बाद फतेहपुर के रहने वाले अयाज उल हसन उर्फ हयाज को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद सभी आरोपियों से की गई पूछताछ में ध्रुव के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

साजिद बेग पेशे से सिविल इंजीनियर था. वह बांद्रा, मुंबई में मछली बाजार में रहता था. उसे हिंदी, अंग्रेजी व मारवाड़ी का अच्छा ज्ञान था. वह मूलरूप से फतेहपुर का ही रहने वाला था. उस के दादा और घर के अन्य लोग मुंबई जा कर बस गए थे. फतेहपुर में साजिद का 2 मंजिला आलीशान मकान था. वह फतेहपुर आताजाता रहता था. उस की पत्नी भी पढ़ीलिखी है. उस का एक बच्चा भी है.

मुंबई स्थित उस के घर पर नौकरचाकर काम करते हैं. उस के पिता के भाई और अन्य रिश्तेदार भी मुंबई में ही रहते हैं. इन के लोखंडवाला, बोरीवली सहित कई पौश इलाकों में आलीशान बंगले हैं. वह मुंबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करता था. मौजमस्ती के गलत शौक और व्यापार में घाटा होने की वजह से साजिद कई महीनों से आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस पर करीब 30 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. इसलिए वह जल्द से जल्द किसी भी तरीके से पैसे कमा कर अपना कर्ज उतारना चाहता था.

करीब 2 महीने पहले साजिद ने फतेहपुर के रहने वाले अपने बचपन के दोस्त अयाज उल हसन उर्फ हयाज को मुंबई बुलाया. वह 5 दिनों  तक मुंबई में रहा. इस बीच साजिद ने उस से पैसे कमाने के तौर तरीकों के बारे में बात की. इस पर अयाज ने कहा कि फतेहपुर में किसी का अपहरण कर के उस के बदले में अच्छीखासी फिरौती वसूली जा सकती है. हालांकि उस समय यह तय नहीं हुआ था कि अपहरण किस का किया जाएगा.

साजिद ने अयाज को यह कह कर फतेहपुर वापस भेज दिया कि वह किसी ऐसी पार्टी का चयन करे, जिस से मोटी रकम वसूली जा सके. अयाज फतेहपुर आ कर योजना बनाने लगा. अयाज ने पिछले साल फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार के मकान पर पेंट का काम किया था. इसलिए उसे ललित के घरपरिवार की सारी जानकारी थी. उस ने साजिद को ललित के बारे में बताया.

इस के बाद दोनों ने ललित के बेटे ध्रुव के अपहण की योजना बना ली. उसी योजना के तहत शादी का फरजी कार्ड नवलगढ़ से छपवाया गया. इस के बाद कार्ड से कैमिकल द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का नाम हटा दिया गया. योजनानुसार साजिद 10 मई को मुंबई से कार ले कर फतेहपुर आ गया और दरगाह एरिया में रहने वाले अपने दोस्त अयाज से मिला. इस के बाद ध्रुव के अपहरण की योजना को अंतिम रूप दिया गया.

15 मई को शादी का कार्ड देने के बहाने साजिद ललित के घर से उस के बेटे धु्रव को अश्विनी के घर ले जाने की बात कह कर साथ ले गया और उसे घर के बाहर खड़ी एसेंट कार में बैठा लिया. उस ने धु्रव से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है, इसलिए पहले पैट्रोल भरवा लें, फिर अश्विनी के घर चलेंगे.

फतेहपुर में पैट्रोल पंप से पहले ही साजिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी तो ध्रुव को शक हुआ. वह शीशा खोल कर ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगा. इस पर साजिद ने उसे कोई नशीली चीज सुंघा दी, जिस से वह बेहोश हो गया.

ध्रुव को बेहोशी की हालत में पीछे की सीट पर सुला कर साजिद अपनी कार से मुंबई ले गया. बीचबीच में टोलनाकों से पहले उस ने 5 बार कार की नंबर प्लेट बदलीं.

साजिद ने अपहृत ध्रुव को मुंबई में अपनी 2 गर्लफ्रैंड्स के पास रखा. इन में एक गर्लफ्रैंड यास्मीन जान मुंबई के चैंबूर में लोखंड मार्ग पर रहती थी. तलाकशुदा यास्मीन को साजिद ने बता रखा था कि वह कुंवारा है. उस ने उसे शादी करने का झांसा भी दे रखा था. साजिद ने यास्मीन को धु्रव के अपहरण के बारे में बता दिया था. यास्मीन फिरौती में मिलने वाली मोटी रकम से साजिद के साथ ऐशोआराम की जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी. इसलिए उस ने साजिद की मदद की और धु्रव को अपने पास रखा.

साजिद की दूसरी गर्लफ्रैंड हालिमा मंडल मूलरूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी. वह पिछले कई सालों से बांद्रा इलाके में बाजा रोड पर रहती थी. उस के 2 बच्चे हैं. साजिद मुंबई पहुंच कर ध्रुव को सीधे हलिमा के घर ले गया था. उस ने उसे ध्रुव के अपहरण के बारे में बता दिया था. हालिमा ने भी फिरौती में मोटी रकम मिलने के लालच में साजिद का साथ दिया और ध्रुव को अपने पास रखा. वह ध्रुव को नींद की गोलियां देती रही, ताकि वह शोर न मचा सके.

फेसबुक पर एक पोस्ट में खुद को मुंबई का किंग बताने वाला साजिद इतना शातिर था कि ललित पोद्दार से या अयाज से बात करने के बाद मोबाइल स्विच औफ कर लेता था, ताकि पुलिस उसे ट्रेस न कर सके. ध्रुव को जहां रखा गया था, वहां से वह करीब सौ किलोमीटर दूर जा कर नए सिम से फोन करता था, ताकि अगर किसी तरह पुलिस मोबाइल नंबर ट्रेस भी कर ले तो उसी लोकेशन पर बच्चे को खोजती रहे.

साजिद के बताए अनुसार, टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने ध्रुव के अपहरण की साजिश रची थी. सीरियलों को देख कर ही उस ने हर कदम पर सावधानी बरती, लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई. जबकि उस ने पुलिस से बचने के तमाम उपाय किए थे.

23 मई को पुलिस ध्रुव को ले कर फतेहपुर पहुंची तो पूरा शहर खुशी से नाच उठा. पुष्पवर्षा और आतिशबाजी की गई. 9 दिनों बाद बेटे को सकुशल देख कर पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले. पिता ललित पोद्दार ने बेटे को गले से लगा कर माथा चूम लिया. सालासर मंदिर में लोगों ने फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह का सम्मान किया.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में साजिद के अलावा यास्मीन जान, हालिमा मंडल और फतेहपुर निवासी अयाज को गिरफ्तार किया था. फतेहपुर के एक अन्य युवक की भी इस मामले में भूमिका संदिग्ध पाई गई. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर नसरत उर्फ नागा उर्फ चाचा का नाम भी ध्रुव के अपहरण में सहयोगी के रूप में सामने आया है.

नसरत उर्फ नागा उत्तर प्रदेश के सिमौनी का रहने वाला था. वह फिलहाल मुंबई के गौरी खानपुर में रहता है. साजिद काफी समय से उस के संपर्क में था. उस के साथ नागा भी आया था. उस ने नागा को सीकर में ही छोड़ दिया था.

ध्रुव के अपहरण के बाद नागा साजिद के साथ हो गया था. दोनों ध्रुव को ले कर मुंबई गए थे. नागा पर उत्तर प्रदेश और मुंबई में हत्या के 3 मामले और लूट, चाकूबाजी, हथियार तस्करी, गुंडा एक्ट आदि के दर्जनों मामले दर्ज हैं. वह हिस्ट्रीशीटर है. कथा लिखे जाने तक सीकर पुलिस इस मामले में नागा की तलाश कर रही थी. Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: मधुर व सईद जाफरी – सफल प्रेम असफल संबंध

Love Story: सईद जाफरी ने फिल्मों में भले ही कोई भी भूमिका निभाई हो, हकीकत में वह शाही मिजाज के अभिनेता थे. इतने शाही कि शराब पीने के लिए वह अपना चांदी का गिलास जेब में रखते थे. बड़ीबड़ी पार्टियों में वह उसी में शराब पीते थे. लेकिन यह सफल चरित्र अभिनेता अपने दांपत्य जीवन में असफल था.

सन 1985 में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘सागर’. इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था, खासकर इस के गानों को. इस की कई वजहें थीं. इन में पहली वजह तो थी फिल्म ‘बौबी’ के बाद डिंपल कपाडि़या की ऋषि कपूर के साथ वापसी. दूसरी वजह थी प्रेमत्रिकोण, जिस में नायक रवि (ऋषि कपूर) विदेश से लौट कर एक मछुआरन लड़की मोना को चाहने लगता है. दरअसल उसे पता नहीं होता कि राजा यानी कमल हासन मोना से बचपन से प्यार करता है. बाद में जब हकीकत पता चलती है तो दोस्ती की खातिर वह अपने प्यार को कुरबान कर देता है.

इस फिल्म के हिट होने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी घिसेपिटे कथानक पर भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है. बशर्ते उस में अभिनय करने वाले कलाकार दमदार अभिनय करें. फिल्म में रवि की दादी कमलादेवी एक औद्योगिक घराने की मालकिन दिखाई गई थीं, जिन के चेहरे, वेशभूषा और हावभाव से संपन्नता साफ झलकती थी. यह बात उन की बरदाश्त के बाहर थी कि उन का एकलौता पोता एक गरीब मछुआरन से प्यार करे.

यही वजह थी कि रवि और मोना को अलग करने के लिए उन्होंने तरहतरह के हथकंडे अपनाए. यहां तक कि आखिर में उन के आदमी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, जिस में ऋषिकपूर को बचाने में कमल हासन की जान चली जाती है. लेकिन मरतेमरते वह डिंपल का हाथ ऋषिकपूर के हाथों में दे जाते हैं.

फिल्म में कमला देवी यानी दादी का यह किरदार मधुर जाफरी ने निभाया था, जिन्हें दर्शक नाम से भले नहीं जानते थे, लेकिन उन के अभिनय से काफी प्रभावित हुए थे. मधुर जाफरी हिंदी फिल्मों का कोई खास जानापहचाना चेहरा नहीं था, लेकिन इस फिल्म में सशक्त अभिनय के चलते वह दर्शकों के दिल में बस गई थीं. आमतौर पर इस तरह के किरदार ललिता पवार या सुषमा सेठ जैसी अभिनेत्रियां निभाती आई थीं, ऐसी स्थिति में दर्शक खुद से यह सवाल पूछने से रोक नहीं पाए कि आखिर ऋषि कपूर की दादी का किरदार निभाने वाली यह ऐक्ट्रेस कौन है?

इस फिल्म में मधुर जाफरी ऐंग्लो इंडियन सी लगीं, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गुरूर और गुमान था. इसी के चलते वह गरीबों और गरीबी से नफरत करती थीं. यह मधुर जाफरी कोई और नहीं, हाल ही में दिवंगत हुए मशहूर अभिनेता सईद जाफरी की पहली पत्नी थीं, जिन्होंने एक संपन्न एवं क्रूर दादी की भूमिका इसलिए सहजता से निभाई, क्योंकि वह इस किरदार के लिए एकदम फिट थीं. सन 1933 में दिल्ली के एक संपन्न कायस्थ परिवार में पैदा हुईं मधुर परंपराओं और आधुनिकता का अद्भुत मेल थीं. उन के दादा को अंगरेजों से राय बहादुर का खिताब मिला था. वह शाही परिवार से भले नहीं थीं, लेकिन उन का रहनसहन और ठाठबाट किसी शाही परिवार से कम नहीं था.

यह वह दौर था, जब अंगरेज शासकों से नजदीकियां रखने वाले परिवारों की समाज में एक अलग पहचान हुआ करती थी. वे बड़ेबड़े बंगलों में शानोशौकत से रहते थे, बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमते थे. इस तरह के लोग आमतौर पर कला या साहित्य प्रेमी होते थे. उन की लड़कियां बौबकट बाल रख सकती थीं और स्कर्ट पहन कर सड़कों पर घूम सकती थीं, विदेशी कुत्तों को सड़कों पर घुमाया करती थीं. वे फर्राटे से अंगरेजी बोलती थीं. उन के लिए स्कूल और कालेज की शिक्षा इसलिए जरूरी होती थी, क्योंकि समाज में उन्हें अपनी अलग पहचान कायम करनी होती थी. इस तरह के परिवार मध्यमवर्गीय परिवारों के आदर्श हुआ करते थे. रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय होते थे.

मधुर इस का अपवाद इसलिए नहीं रह पाईं, क्योंकि बंदिशें न होते हुए भी उन्होंने कायस्थ परिवारों के संस्कार यथासंभव ढोए. वह बेइंतहा खूबसूरत और प्रतिभावान थीं. अभिनय और नाटकों के प्रति उन का लगाव बचपन से ही था, लेकिन बाद में वह एक इंटरनेशनल शैफ के रूप में जानी गईं. पहले कानपुर और फिर दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मधुर स्थाई रूप से दिल्ली में बस गईं. देश आजाद हो चुका था, लेकिन सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा नहीं बदला था, बल्कि विभाजन के वक्त हुए हिंदूमुसलिम दंगों की वजह से कड़वाहट बढ़ गई थी. मधुर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था, उन की दुनिया तो नाटकों और पढ़ाईलिखाई तक सिमटी रहती थी. अपनी दोनों बड़ी बहनों ललिता और कमल के साथ वह दिल्ली की सड़कों पर घूमतीं तो किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थीं.

मधुर के दादा राय बहादुर राजनारायण का अपना अलग रसूख और रुतबा था. लेकिन घर से बाहर और अंदर एक नई संस्कृति और संस्कार पनप रहे थे, जिन में शिक्षा के साथसाथ दीगर शौक पूरे करने की आजादी सभी सदस्यों को थी. दिल्ली के क्वीन मेरी हायर सैकेंडरी स्कूल की छात्रा रहते मधुर ने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. जिस अभिजात्य वर्ग की वह थीं, वह अंगरेजी नाटकों खासतौर से विलियम शेक्सपियर को ज्यादा पसंद करता था. तब ऐसे ही नाटक ज्यादा खेले जाते थे. सन 1951 आतेआते वह एक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने लगी थीं.

18 साल की यह नवयौवना अभी तक प्यार के अहसास से अछूती थी. दिल्ली की कई नामी कला संस्थाओं के साथसाथ मधुर अब तक आकाशवाणी से भी जुड़ गई थीं, जो उस समय एक उपलब्धि की बात मानी जाती थी. सन 1953 में दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज से मधुर ने बीए कर लिया तो घर में उन की शादी की बात चलने लगी.

लेकिन इस बीच 2 सालों में मधुर काफी बदल चुकी थीं, क्योंकि उन्हें सईद जाफरी नाम के एक मुसलिम युवक से प्यार हो गया था. उन का यह प्यार एकदम या पहली नजर का नहीं था, बल्कि धीरेधीरे परवान चढ़ा था. खुद मधुर को भी इस का पता काफी बाद में चला था. पंजाब के मलेरकोटला में सन 1929 में पैदा हुए सईद की पहचान मूलत: ब्रिटिश अभिनेता की रही थी. मुसलिम पंजाबी परिवार के सईद भी उस समय दिल्ली में एक कलाकार के रूप में संघर्ष कर रहे थे. वह आकाशवाणी से जुड़े थे. वहीं उन की मुलाकात मधुर से हुई थी.

केवल मधुर और उन की रुचियों में ही समानता नहीं थी, बल्कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी मेल खाती थी. सईद के पिता डा. हामिद हुसैन जाफरी अपने जमाने के मशहूर फिजीशियन थे. वह उत्तर प्रदेश के कई शहरों के सरकारी अस्पतालों में पदस्थ रहे थे. सईद के नाना खान बहादुर फैजल ईमान मलेरकोटला रियासत के दीवान थे. इस नाते उन की भी नजदीकियां ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों से थीं.

सईद के पास भी न आत्मविश्वास की कमी थी और न पैसों की. स्कूली जीवन से ही वह रंगमंच से जुड़े हुए थे. वह भी एक खूबसूरत युवक थे, सुर्ख गुलाबी रंगत, चौड़ा माथा, झूलते घुंघराले बाल उन की शख्सियत में चार चांद लगाते थे. उन के बोलने का अंदाज भी हर किसी को लुभाता था. उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले सईद जाफरी ने स्कूल और कालेज में नाटक कर के खूब तारीफ हासिल की थी. तब के हिंदी फिल्मों के अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मोतीलाल के वह मुरीद थे और उन की फिल्में देख उन की नकल उतारा करते थे.

सईद जाफरी बेशक महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभावान थे, लेकिन खुद को साबित करने के लिए उन्हें संघर्ष भी खूब करना पड़ा. कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें दिल्ली ले आया, जहां उन के सामने रहने और खाने की समस्या थी. इस के लिए उन्होंने सन 1951 में आकाशवाणी में 250 रुपए महीने वेतन पर नौकरी कर ली. हालांकि यह वेतन उन के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन इतना भी कम नहीं था कि वह गुजरबसर न कर पाते. शुरुआती दिनों में वह आकाशवाणी के पीछे पार्क में बनी बैंच पर सोते थे. एक दिन उन्हें इस हालत में देख कर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर मसानी मेहरा ने उन्हें वाईएमसीए में 30 रुपए महीने पर एक कमरा किराए पर दिला दिया.

आकाशवाणी में नौकरी करते हुए ही ‘द ईगल हैज टू हैड्स’ नाटक के दौरान उन की मुलाकात मधुर से हुई थी. वह उन के साथ प्रमुख भूमिका में थीं. मधुर सईद के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थीं. सईद उन से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. उन्होंने सन 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया था. उन के अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुला रहा था, जिस की वजह से वह सरकारी नौकरी में नहीं गए थे.

पहले मधुर और सईद की निकटता बढ़ी, फिर धीरेधीरे उन की यह निकटता कब प्यार में तब्दील हो गई, दोनों को ही पता नहीं चला. अभिनय में पारंगत दोनों युवा कलाकार अपनेअपने अव्यक्त तरीके से रोमांस कर रहे थे. संस्कारी परिवार से होने की वजह से मधुर पहल नहीं कर पा रही थीं. दूसरी ओर अपने पिता की गोरखपुर की नियुक्ति के दौरान महंतों और मठों में हिंदू धर्म को नजदीक से देख चुके सईद भी उन्हें प्रपोज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि मधुर के घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी राजी नहीं होंगे.

लेकिन प्यार हो चुका था. मधुर और सईद दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित गेलार्ड रेस्टोरेंट, जिस में अनगिनत प्रेमकथाओं की पटकथा लिखी गई थी, में घंटों बैठ कर थिएटर, सिनेमा और दुनियाजहान की बातें किया करते थे. लेकिन इजहार की बात आते ही दोनों हिचकिचा जाते थे. इस में धर्म ही नहीं, समाज और देश के हालात भी आड़े आ रहे थे. दोनों एकदूसरे को जाननेसमझने लगे थे, पसंद करने लगे थे और प्यार भी करने लगे थे. यह सच है कि प्यार एक मियाद से ज्यादा खामोश नहीं रह सकता.

सन 1955 में मधुर को राडा (रायल एकेडमी औफ ड्रामेटिक आर्ट) में काम करने के लिए अमेरिका जाने का प्रस्ताव मिला तो सईद खुद को रोक नहीं पाए और एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने मधुर के घर वालों से शादी की इच्छा व्यक्त कर दी. उम्मीद के मुताबिक जवाब ना में मिला, लेकिन वजह धर्म नहीं, बल्कि कमाई बताई गई. मधुर के घर वालों, खासतौर पर पिता जो खुद पिता की मौत के बाद आर्थिक परेशानियां झेल चुके थे का खयाल था कि एक कलाकार इतना नहीं कमा सकता कि उन की बेटी को सुखी रख सके.

लेकिन उन के जवाब से सईद निराश नहीं हुए. वह भी अमेरिका चले गए और अपने दिल की बात, जिसे मधुर सालों से जानती थीं, कह दी. मधुर को पता था कि घर वाले तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भी वही जवाब दिया. लेकिन सईद समझ रहे थे कि मधुर का यह इनकार दिल से नहीं है. प्रेमिका की दुविधा वह समझ रहे थे. अनमने मन से न कहने के बावजूद मधुर ने उन के सामने राडा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. बहुत कुछ हासिल करने से पहले सईद मधुर को पा लेना चाहते थे, जिन में उन्हें एक नेक और प्यार करने वाली उदार पत्नी दिख रही थी. बचपन से ही पिता के साथ उत्तर प्रदेश में शहरशहर भटक चुके सईद की ख्वाहिश अपना घर बसाने की थी, कमोवेश यही इच्छा मधुर की भी थी.

आखिर एक दिन हैरतअंगेज तरीके से दोनों ने शादी कर ली और हनीमून मनाने न्यूयार्क चले गए. मधुर सचमुच सईद को बहुत चाहती थीं और शायद इसीलिए उन्होंने अपना नाम सईद की इच्छा के मुताबिक बदल कर मेहरुन्निमा रख लिया था. एक औरत किस हद तक समर्पित होती है, इस से सईद पहली बार रूबरू हुए थे. औरत के समर्पण के बारे में कला और साहित्य की बड़ीबड़ी किताबों में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा और सुना था, लेकिन उस सब को खुद की जिंदगी में उतरते देखा तो निहाल हो उठे. प्यार में एक औरत इतनी सहजता से अपना नाम, जाति, धर्म और पहचान सब कुछ बदलने को तैयार हो जाती है, यह उन्होंने मधुर के समर्पण भाव से ही जाना.

दोनों के पास काम की कमी नहीं थी. लंदन, अमेरिका और भारत घूम कर नाटक करते हुए इन का दांपत्य जीवन शुरू हुआ, जिस में वक्त की कमी के चलते रोमांस शायद उतना नहीं रह गया था, जितना एक नवदंपति में होना चाहिए. इस के बाद भी दोनों संतुष्ट और खुश थे और भविष्य के लिए बहुत सा पैसा कमा लेना चाहते थे. उसी दौरान दोनों मशहूर फिल्मकार इस्माइल मर्चेंट के संपर्क में आए, जिन्हें ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों की जरूरत थी. दोनों शिद्दत के साथ मर्चेंट से जुड़ गए और इस्माइल आइवरी प्रोडक्शन के लिए काम करने लगे.

शादी के एक साल बाद ही बेटी जिया पैदा हुई. 2 सालों के अंतर से मीरा और सकीना हुईं. लगातार मां बनने के कारण मधुर जितना थिएटर से दूर होती गईं, सईद उतना ही काम में व्यस्त होते गए. उन्हें पहले के मुकाबले नाम और पैसा ज्यादा मिलने लगा था. इस दौरान अमेरिका और लंदन में रहते हुए उन्हें मुकम्मल शोहरत और दौलत मिली, जिस के लिए वह कोशिश कर रहे थे.

बेटियों की परवरिश कर रहीं मधुर ने पूरी तरह से काम नहीं छोड़ा था. वह शौकिया ही सही, पहले की तरह यात्रा संस्मरण लिख रही थीं, इसी के साथ वह भारतीय व्यंजनों पर लिखने का काम भी करने लगी थीं. यह उन का बचपन से पसंदीदा काम था. जिंदगी एक ढर्रे पर आ कर ठहर गई थी, जिस में बेटियों की किलकारियां, मासूम शरारतें और जिया के पहली बार स्कूल जाने का अनुभव था. लेकिन इस बीच पति का साथ कम होता गया था. सईद लगातार व्यस्त होते जा रहे थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि वह कामयाब हो रहे थे.

सईद पत्नी, बच्चों और खुद पर खुले हाथों खर्च करने वालों में थे. उन के शौक अब परवान चढ़ते जा रहे थे, जिस में महंगे सूट, सिगरेट और महंगी शराब खास थे. लेकिन वह खुद समझ नहीं पा रहे थे कि ये साधारण सफलताएं उन्हें उदंड क्यों बना रही हैं? वह बेवजह चिड़चिड़े होते जा रहे थे. इंगलैंड और अमेरिका से उन का मन ऊबने लगा था, लिहाजा उन्होंने भारत वापस आने का फैसला ले लिया. मेहरुन्निमा इस फैसले से असहमत नहीं थी. सन 1961 में वे दिल्ली वापस आए और भारत सरकार के टूरिस्ट औफिस में बतौर पब्लिसिटी औफिसर नौकरी कर ली.

लेकिन सईद और मधुर के बीच अब सन्नाटा सा पसरने लगा था. सईद ब्रिटिश संस्कृति से प्रभावित थे, जबकि मधुर उन की तरह पाश्चात्य सभ्यता की दीवानी  नहीं थीं. सईद पत्नी में बदलाव देखना चाहते थे और इस के लिए उन पर दबाव भी बना रहे थे. वैसे तो मधुर एक आज्ञाकारी पत्नी थीं, लेकिन उन्हें दबाव सहन करने की आदत नहीं थी. अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि कोई विवाद और कलह न हो, पर ऐसा होने लगा था.

कुछ दिनों बाद सईद और मधुर की मुलाकात एक बार फिर इस्माइल मर्चेंट और उन के सहयोगी आइवरी से हुई और फिल्मों पर काम शुरू हो गया. अब मधुर के पास ज्यादा वक्त था, लिहाजा मौके भी उन्हें ही ज्यादा मिले. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मधुर का नाम सईद से ज्यादा चलने लगा था. हां, उन की पूछ जरूर बढ़ रही थी. इस के बावजूद सईद उन से पहले की तरह संतुष्ट नहीं थे. जबकि असंतुष्ट रहने की वजह भी उन की समझ में नहीं आ रही थी. मधुर से वह कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लगे थे, पर वे उम्मीदें किस तरह की हैं और उन से हासिल क्या होगा, यह वह नहीं समझ पा रहे थे.

अलगाव के बीज अंकुरित हो उठे थे. दोनों ही अभिजात्य और कुलीन पृष्ठभूमि से थे, लिहाजा उन के बीच का तनाव भी अभिजात्य और कुलीन था, जिस से बचने की वे जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे थे, उतना ही ज्यादा उस की गिरफ्त में आते जा रहे थे. किशोरवय की मेलमुलाकातें, कनाट प्लेस का घूमनाफिरना, गेलार्ड में घंटों एकदूसरे के साथ बैठ कर बातें करना, दीवानों की तरह एकदूसरे को चाहना और डूब कर प्यार करना, गुजरे कल की बातें हो चली थीं.

खटपट शुरू हुई और मुंह खुले तो सन 1966 में दोनों का तलाक हो गया. यह सईद का पुरुषोचित अहं था या फिर शादी से पहले मधुर और उन के अभिभावकों के सामने शादी के लिए गिड़गिड़ाने का प्रतिशोध या ग्लानि, यह तय कर पाना मुश्किल था. उधर मधुर जैसी पत्नी के लिए जिंदगी के वे दिन बेहद कठिन दिन थे. क्योंकि पति ही उन के लिए सब कुछ था. बेटियां छोटी थीं और उन्हें मां के साथसाथ पिता की भी जरूरत थी. लेकिन बात नहीं बनीं. विधिवत तलाक के बाद दोनों अलग हो गए. बेटियां मां के साथ ही रहीं. हैरानी की बात यह थी कि इस तलाक से न सईद टूटे और न ही मधुर विचलित हुईं. इस के बजाए दोनों और ज्यादा ऊर्जा से अपनेअपने कामों में लग गए.

मधुर ने पाक कला पर लिखना शुरू किया तो अमेरिका और इंगलैंड में उन की रैसिपीज को हाथोंहाथ लिया गया. परंपरागत भारतीय व्यंजनों पर उन्होंने पूरी शृंखला लिख डाली, जिस का ताजा संस्करण भारतीय शाकाहारी करी है. पत्रपत्रिकाओं से ले कर टेलीविजन तक मधुर शैफ के रूप में दिखने लगीं. आज भी वह चर्चित और लोकप्रिय शैफों की रोल मौडल हैं. दूसरी ओर मधुर से तलाक के बाद सईद जाफरी जेनिफर ईरीन सोरेल नाम की अमेरिकन महिला से प्यार करने लगे थे, जो पेशे से फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर थी.

वह वैसी ही थी जैसी छवि जाफरी उस में देखना चाहते थे. इस बार उन्होंने प्रपोज करने और शादी का फैसला लेने में देर नहीं की. उन्होंने तलाक के तुरंत बाद शादी कर ली. सईद एक कलाकार जरूर थे, लेकिन उन के दिल में आममर्दों की तरह यह ख्वाहिश भी कहीं दबी थी कि अब मधुर पछताएगी, उन्हें याद करेगी और उन के पास आ कर गिड़गिड़ाएगी.

लेकिन हुआ इस का उलटा. शादी के चंद महीनों बाद ही जेनिफर ने जता दिया कि उसे पति की उतनी परवाह नहीं है, जितनी एक पत्नी को होनी चाहिए. महत्त्वाकांक्षी जेनिफर को अपने काम की फिक्र ज्यादा रहती थी, सईद की बिलकुल नहीं. भारतीय और पाश्चात्य पत्नियों में कितना फर्क है, यह बात सईद की समझ में आ गई थी, लेकिन अब पछतावे के सिवाय उन के पास कुछ नहीं था. फिर भी सईद ने हिम्मत नहीं हारी. सईद को स्टेज कलाकार के रूप में वह सब नहीं मिला था, जो व्यावसायिक हिंदी फिल्मों में काम कर के मिला.

70 के दशक से ले कर 2015 तक उन्होंने सौ से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और सभी में खासे सराहे गए. पैसा भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिला. गांधी फिल्म में वल्लभभाई पटेल की भूमिका में उन्होंने मानों पटेल के रौबीले व्यक्तित्व को साकार कर दिया था. शुरुआती फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से ही उन्होंने जता दिया था कि वह बेहद मंझे और सधे अभिनेता हैं, जिस की संवाद अदायगी की अपनी खास शैली है, जिस के चेहरे के हावभाव किसी दूसरे पेशेवर ऐक्टर से ज्यादा बेहतर तरीके से बदलते हैं. शतरंज के खिलाड़ी में सईद जाफरी ने संजीव कुमार के सामने शतरंज खेलते हुए उन से कमतर अभिनय नहीं किया था. ‘हिना’ से ले कर ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही दम लिया.

सईद जाफरी ने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गजों के साथ काम किया और हर फिल्म में बेहतर से बेहतर अभिनय कर के पहले से ज्यादा वाहवाही लूटी. ‘चश्मेबद्दूर’ और ‘मासूम’ जैसी दर्जनों फिल्मों में वह एकदम अलग रोल में थे. इस के बावजूद वह हर चुनौतीपूर्ण भूमिका में खरे उतरे. सईद जाफरी बेशक बेहतरीन कलाकार थे. लेकिन उन के बारे में यह बात गिनेचुने लोग ही जानते थे कि वह एक असफल पति हैं. मधुर को तलाक दे कर वह जिंदगी भर पछताते रहे. खुद उन का मानना था कि जेनिफर की बेरुखी उन्हें अकसर मेहरुन्निमा की याद दिलाती रही, जो एक आज्ञाकारी नेक और उदार पत्नी थीं. तलाक के 7 सालों बाद उन्होंने कहीं शैफ मधुर जाफरी के बारे में पढ़ा और उन की तसवीर देखी तो चौंक पड़े और उन से मिलने अमेरिका जा पहुंचे, जहां मधुर सेनफोर्ड एलन से शादी कर के दोबारा घरगृहस्थी बसा चुकी थीं.

सईद से तलाक के करीब 3 सालों बाद उन्होंने दोबारा शादी का फैसला लिया था. इस की अहम वजह बेटियों को पिता का प्यार दिलाना था. इस मामले में सेनफोर्ड मधुर से किए अपने वादे पर एकदम खरे उतरे थे. मधुर का दूसरी शादी का फैसला सईद की तरह न गलत था, न चयन में कोई त्रुटि. सईद जब उन से मिलने पहुंचे तो मधुर ने मिलने से साफ मना कर दिया, पर तीनों बेटियों जिया, मीरा और सकीना ने एक बार उन से मिलना जरूर मुनासिब समझा. मुनासिब इसलिए नहीं कि उन्हें सईद से कोई लगाव था, बल्कि इसलिए कि वे सईद को बताना चाहती थीं कि उन के नए पिता दुनिया के बेहतरीन पिता हैं और वह जानते हैं कि सच्चा प्यार क्या होता है. मम्मी जैसी थीं, उन्हें वैसा ही उन्होंने स्वीकार कर लिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में पूरी मदद की.

यह सईद जाफरी की जिंदगी का सब से कड़वा दिन था. जब संतान पिता को अच्छाबुरा सिखाने और समझाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि दुनिया और रिश्तेनाते हमेशा आप के मुताबिक नहीं चलते, क्योंकि आप उन के मुताबिक नहीं चले थे. मधुर के प्रति अपनी क्रूरता को स्वीकारना बताता है कि सईद जाफरी में कन्फैशन की हिम्मत थी, जो आमतौर पर लोगों में नहीं होती. उस दिन सईद की समझ आया कि शायद वह किसी को प्यार नहीं करते, इसलिए कोई उन्हें प्यार नहीं करता.

एक कामयाब रंगमंचीय और फिल्मी कलाकार की इस हालत पर तरह खाया जा सकता है, जिस का जिम्मेदार भी वह खुद ही था. लेकिन दाद उन की चाहत को भी देनी पड़ेगी कि वह अपनी पहली पत्नी मधुर को कभी भुला नहीं पाए. सईद ने बेहद स्वस्थ मन से माना कि दांपत्य में जीवनसाथी को बदलने की कोशिश से ही रिश्ता टूटता है. शायद मधुर के प्रति इसी चाहत का नतीजा था कि फिल्म ‘सागर’, जिस में वह डिंपल कपाडि़या के पिता के रोल में थे. सेट पर आमनासामना होने पर मधुर ने कभी सिर उठा कर उन्हें देखने की जहमत नहीं उठाई, न ही जरूरत महसूस की. लेकिन सईद ने मधुर को जरूर जी भर के देखा होगा. ठीक वैसे ही, जैसे कभी आकाशवाणी और कनाट प्लेस में देखा करते थे. इसलिए अपनी तमाम फिल्मों में सागर उन के लिए ज्यादा अहम थी.

बीते 14 नवंबर को जब सईद की भतीजी शाईन अग्रवाल ने उन की मौत की खबर सोशल मीडिया के जरिए दी तो बौलीवुड में उन्हें नजदीक से जानने वाले कलाकारों ने यह जरूर सोचा होगा कि जरूरी नहीं कि एक सफल अभिनेता सफल पति भी हो. Love Story

 

Bareilly Murder Case: 9 साल का प्यार, 2 महीने की शादी और मर्डर का काला राज

Bareilly Murder Case: प्रेम प्रसंग का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने प्यार शब्द को ही सवालों के घेरे में डाल दिया है. 9 साल तक एक दूसरे के साथ रहने वाले जोड़े की कहानी इस कदर दर्दनाक मोड़ पर पहुंची कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था. 9 साल के रिश्ते में बंधे प्रेमी युगल ने फेमिली वालों की राजी से शादी की, लेकिन शादी के महज 2 महीने बाद ही प्रेमिका ने अपने पति की हत्या कर दी. आइए जानते हैं क्या कारण बना कि इतना लंबा प्यार अचानक खून की वारदात में बदल गया.

यह घटना उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से सामने आई. 33 साल के  जितेंद्र कुमार यादव की शादी 2 महीने पहले 9 साल पुरानी प्रेमिका ज्योति से हुई थी. इस के बाद जितेंद्र का शव शहर के इज्जतनगर इलाके में किराए के मकान में फंदे पर लटका मिला. शुरुआत में हत्या को आत्महत्या माना गया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने चौंकाने वाला सच उजागर किया. रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटना बताया गया.

पुलिस के अनुसार, पूछताछ में ज्योति ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है. ज्योति ने बताया कि शादी के बाद पैसों को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा होता रहता था. जिस की वजह से दोनों के रिश्तों के बीच कड़वाहट बढ़ गई थी. उस दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि उस ने अपने परिवार को बुला लिया.  उस ने मम्मीपापा और भाई के साथ मिलकर जितेंद्र की हत्या कर दी. इन सभी ने जितेंद्र को दबोच लिया फिर ज्योति ने पति का गला गला घोंट दिया. इसके बाद इस हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए शव को खिड़की की ग्रिल में मफलर के सहारे लटकाया.

आपको बता दें कि जितेंद्र और ज्योति स्कूल के दिनों से ही एक दूसरे के संपर्क में थे. 25 नवंबर, 2025 को दोनों ने परिवार की सहमति से शादी की थी. विवाद तब शुरू हुआ, जब जितेंद्र ने कथित तौर पर ज्योति के बैंक खाते से 20,000 रुपए निकाल लिए और औनलाइन जुए में हार गया.

26 जनवरी, 2026 को इसी मुद्दे पर उन की बहस इतनी बढ़ गई कि ज्योति ने अपने मायके वालों को बुला लिया और मिलकर इस हत्या की योजना बनाई. पुलिस ने पत्नी और उस के पेरेंट्स को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि उस के भाई की तलाश अभी जारी है. Bareilly Murder Case

Crime Kahani: प्रेमिका का एसिड अटैक – सोनम ने की प्रेम की हद पार

Crime Kahani: पहली मंजिल पर रह रहे किराएदार के कमरे से सुबहसुबह तेज चीखने की आवाज भूतल पर रह रहे मकान मालिक सुरेशचंद्र की पत्नी ने सुनी. आवाज सुन कर एक बार तो वह सोच में पड़ गईं. लेकिन दूसरे ही पल लगातार आ रही चीखों को सुन कर वह एक ही सांस में सीढि़यां चढ़ कर किराएदार नर्स सोनम पांडेय के कमरे में पहुंच गईं. क्योंकि चीख उसी के कमरे से आ रही थी. वहां का दृश्य देख कर उन की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. पीछेपीछे मकान मालिक सुरेशचंद्र भी वहां पहुंच गए.

कमरे के फर्श पर सोनम और देवेंद्र झुलसे हुए पड़े थे. वहीं पर एक स्टील का डब्बा पड़ा था. कमरे में तेजाब की तेज दुर्गंध आ रही थी. दोनों ही तेजाब की जलन और दर्द से तड़प रहे थे. उस समय सुबह के यही कोई 7 बज रहे थे. इसी बीच झुलसी हालत में ही देवेंद्र ने अपने दोस्त शिवम को फोन किया.

कुछ ही देर में शिवम आटो ले कर वहां पहुंच गया. वह आननफानन में घायल देवेंद्र को आटो में ले कर अस्पताल जाने लगा. इस पर मकान मालिक सुरेशचंद्र ने उस से कहा कि वह घायल सोनम को भी साथ ले जाए. क्योंकि इलाज की उसे भी जरूरत है. तब शिवम ने कहा, ‘‘मैं पहले देवेंद्र को अस्पताल में भरती करा दूं वह ज्यादा झुलस गया है. इस के बाद सोनम को ले जाऊंगा.’’ इस तरह वह देवेंद्र को वहां से ले कर चला गया.

जब शिवम सोनम को काफी देर तक लेने नहीं आया तो सुरेशचंद्र ने इस की सूचना थाना हरीपर्वत के थानाप्रभारी अरविंद कुमार को दे दी. थानाप्रभारी सूचना मिलते ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने तेजाब से झुलसी सोनम को एक निजी अस्पताल में भरती कराया. वहीं अस्पताल में भरती 80 फीसदी झुलसे देवेंद्र की उपचार के दौरान दोपहर करीब ढाई बजे मौत हो गई.

पुलिस ने मरने से पहले देवेंद्र के मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज करा लिए थे. उस ने अपने बयान में सोनम पांडेय को एसिड अटैक के लिए जिम्मेदार बताया था. देवेंद्र के घर वालों को जब यह जानकारी उस के दोस्त शिवम ने दी तो उस के घर में रोना शुरू हो गया. वह 5 बहनों के बीच अकेला भाई था, रोतेरोते मां और बहनों की हालत बिगड़ गई. दरअसल, यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के थाना हरीपर्वत क्षेत्र स्थित शास्त्रीनगर का है.

देवेंद्र ने अपने बयान में बताया था कि 25 मार्च, 2021 की सुबह सोनम ने उसे अपने कमरे में लगे पंखे को ठीक करने के लिए बुलाया था. जैसे ही देवेंद्र कमरे में आया तो सोनम ने स्टील के डब्बे में रखा तेजाब उस के ऊपर उड़ेल दिया. अचानक हुए इस हमले से वह खुद को बचा नहीं सका. एसिड अटैक के दौरान नर्स सोनम पर भी तेजाब गिर गया था, जिस से वह भी झुलस गई थी. अब प्रश्न यह था कि सोनम ने देवेंद्र के ऊपर एसिड अटैक क्यों किया?

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पुलिस ने मकान मालिक सुरेशचंद्र से बात की तो उन्होंने पुलिस को बताया कि सोनम पहले शास्त्रीनगर में ही स्थित किसी दूसरे मकान में रहती थी. 5 महीने से वह उन के मकान में किराए पर रह रही थी. देवेंद्र को वह अपना पति बताती थी. वह कमरे पर उस के पास 10-12 दिनों में आता और 1-2  दिन रुक कर चला जाता था. उस का कहना था कि पति बाहर काम करते हैं.

वहीं सूचना पा कर अस्पताल पहुंचे देवेंद्र के घर वालों ने इन सब बातों से अनभिज्ञता जताई. उन का कहना था कि  सोनम के देवेंद्र से संबंध होने की उन्हें जानकारी नहीं थी. उन्होंने बताया कि देवेंद्र अविवाहित था और उस की 28 अप्रैल को शादी होने वाली थी. देवेंद्र की मां कुसुमा ने सोनम पांडेय पर बेटे की हत्या का आरोप लगाया. सोनम के कमरे की तलाशी के दौरान पुलिस ने स्टील का एक डब्बा बरामद किया. संभवत: इस एक लीटर वाले डब्बे में दूध लाया जाता होगा. इस में ही तेजाब रखा हुआ था. इस डब्बे की तली में तेजाब भी मिला. वहीं कमरे से देवेंद्र के जले हुए कपड़े व जूते भी मिले. पुलिस ने इन साक्ष्यों को जब्त कर जरूरी काररवाई के बाद फोरैंसिक लैब भेज दिया.

घटना की जानकारी मिलने पर एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे ने घटनास्थल का निरीक्षण किया व अस्पताल भी गए. उन्होंने पत्रकारों को बताया कि सोनम और देवेंद्र के बीच प्रेम संबंध थे. आरोपी युवती को गिरफ्तार कर लिया गया है. चूंकि वह भी एसिड की चपेट में आ कर झुलसी है, इसलिए इलाज के लिए उसे अस्पताल में भरती कराया गया है.

पुलिस ने जरूरी काररवाई करने के बाद देवेंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. पुलिस ने मामले की गहनता से जांच की. जांच में पता चला कि सोनम पांडेय मूलरूप से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के भागूपुर की रहने वाली शादीशुदा युवती है. सोनम की शादी करीब 10 साल पहले गुजरात में हुई थी. शादी के कुछ दिनों बाद ही पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा रहने लगा. इस दौरान वह एक बेटे की मां भी बन गई. शादी के 2 साल बाद ही वह अपने बेटे को ले कर अपने मायके आ गई.

कुछ समय बाद वह आगरा आ कर नर्स की नौकरी करने लगी थी. वह सिकंदरा बाईपास स्थित एक अस्पताल में नर्स थी. बेटा ननिहाल में ही रह रहा था. सोनम ने अब तक अपने पति से तलाक नहीं लिया था. उस ने अपने साथी कर्मचारियों को भी अपने शादीशुदा होने के बारे में नहीं बताया था. 28 वर्षीय देवेंद्र राजपूत मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के सहावर क्षेत्र के गांव बाहपुर का रहने वाला था. देवेंद्र चिकित्सा क्षेत्र में बचपन से ही रुचि रखता था. इसलिए उस ने लैब टैक्नीशियन का कोर्स किया था.

सुनहरे भविष्य की तलाश में वह आगरा आ गया था और पिछले 8 साल से लाल पैथ लैब में सहायक के पद पर काम कर रहा था. वह आगरा के ही खंदारी इलाके में किराए पर रहता था. चूंकि सोनम और देवेंद्र एक ही फील्ड से जुड़े थे, एक दिन काम के दौरान दोनों की जानपहचान हो गई. साथसाथ काम करते पहले दोनों में दोस्ती हुई, जो बाद में प्यार में बदल गई.

पिछले 3 सालों से दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. सोनम ने अपने मकान मालिक को बता रखा था कि देवेंद्र उस का पति है. इस तरह देवेंद्र का जब मन होता, वह सोनम से मिलने उस के कमरे पर चला जाता था. इसी बीच सोनम को पता चला कि देवेंद्र की शादी कहीं और तय हो गई है. इस जानकारी से सोनम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. क्योंकि वह देवेंद्र पर शादी करने का दबाव बना रही थी. सोनम ने घटना से कुछ दिन पहले देवेंद्र से कहा, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं और तुम से शादी करना चाहती हूं.’’

देवेंद्र को सोनम के बारे में पता चल चुका था कि वह शादीशुदा है और उस के एक बच्चा भी है. देवेंद्र तो सोनम के साथ पिछले 3 साल से केवल टाइम पास कर रहा था. देवेंद्र ने उसे समझाते हुए कहा,‘‘सोनम तुम शादीशुदा हो. तुम्हारे एक बेटा भी है. और तुम ने अब तक अपने पति से तलाक भी नहीं लिया है. ऐसे में हम शादी कैसे कर सकते हैं? ऐसी स्थिति में मेरे घर वाले भी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे. फिर मेरी भी शादी तय हो चुकी है.’’

देवेंद्र की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. सोनम अपना आपा खो बैठी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने प्रेमी को किसी और का हरगिज नहीं होने देगी. अपने खतरनाक मंसूबे की भनक उस ने देवेंद्र को नहीं लगने दी. इस बीच देवेंद्र ने सोनम के कमरे और उस से मिलनाजुलना भी बंद कर दिया. अपनी योजना को अंजाम देने के लिए सोनम ने 25 मार्च, 2021 की सुबह देवेंद्र को फोन कर कमरे का पंखा ठीक करने के बहाने अपने पास बुलाया था.

देवेंद्र सोनम के कमरे पर पहुंचा तो उन दोनों के बीच शादी की बात को ले कर गरमागरमी हुई. इस के बाद सोनम ने स्टील के डब्बे में पहले से लाए तेजाब से देवेंद्र पर अटैक कर दिया, जिस से वह गंभीर रूप से सिर से पैर तक झुलस गया. जानकारी मिलने पर घटना के दूसरे दिन सोनम के पिता आगरा आ गए. उन्होंने घायल बेटी को एस.एन. मैडिकल कालेज में भरती कराया. वहां उपचार होने से उस की हालत में सुधार हुआ. हालांकि उस समय तक उस के बयान दर्ज नहीं हो सके थे.

प्रेमिका के तेजाबी हमले ने एक साथ 3 परिवारों के अरमानों को झुलसा दिया. 5 बहनों में इकलौता भाई और एक मां से उस का घर का चिराग छीन लिया. मां और बहनें देवेंद्र के सिर पर सेहरा बांधने की तैयारी में जुटी थीं. शादी के कार्ड भी छप गए थे.

शादी में बुलाने वालों को कार्ड भेजने की तैयारी चल रही थी. वहीं कासगंज की रहने वाली जिस युवती से देवेंद्र का रिश्ता तय हो गया था और एक महीने बाद दोनों को फेरे लेने थे, उस के अरमानों को भी तेजाब से हमेशा के लिए झुलसा दिया. पोस्टमार्टम के बाद देवेंद्र का शव रात 9 बजे जब घर पहुंचा तो बेटे का शव देख कर मां बेहोश हो गईं. वहीं पांचों बहनें अपने छोटे भाई के शव से लिपट कर रोने लगीं. पूरे गांव में शोक का माहौल था. उधर जिस घर में देवेंद्र की बारात जानी थी वहां उस की मौत की खबर पहुंचने से कोहराम मच गया.

दूसरे दिन शुक्रवार की सुबह देवेंद्र का शोकपूर्ण माहौल में अंतिम संस्कार किया गया. सभी का कहना था कि देवेंद्र की हत्यारोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. कहानी लिखे जाने तक प्रेमिका का इलाज चल रहा था. ठीक होने पर उसे जेल जाना पड़ेगा. देश भर में हर साल एसिड अटैक की तमाम घटनाएं होती हैं, वह भी तेजाब पर बैन लगाए जाने के बाद. एसिड अटैक एक खतरनाक अपराध है, जो महिला हो या पुरुष सभी की जिंदगी तबाह कर देता है. सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बाद भी देश में गैरकानूनी रूप से होने वाली एसिड की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.

एसिड बिक्री को ले कर जो कानून हैं, उन्हें सख्ती के साथ जमीन पर उतारा जाना बेहद जरूरी है. एसिड अटैक से पीडि़त व्यक्ति के निजी, सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक जीवन पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है. Crime Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: औनलाइन चलता सेक्स रैकेट

Crime Story: 22 जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने  बताया कि मानसी तो काफी देर  पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है.

जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली.

डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करते करते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला.

करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी.

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जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे.

उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली. 12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे.

जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.

आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Story

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान  

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime

Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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