UP News : पति की हत्‍या को बना दिया आत्‍महत्‍या

UP News : चंदन रेलवे में नौकरी करता था. ड्यूटी पर जाता तो देर रात लौटता. उस की पत्नी पिंकी दिन भर अकेली रहती थी. अकेलेपन से ऊब कर उस ने पड़ोस में रहने वाले अविवाहित किशन से दोस्ती कर ली. जल्दी ही दोनों ने मर्यादाओं को तारतार कर डाला. जाहिर है पति पत्नी और वो का मामला था. एक न एक को तो…

उस दिन जून 2020 की 6 तारीख थी. सुबह होने पर प्रियंका की आंखें खुलीं तो खिड़की से आती तेज रोशनी उस की आंखों में लगी. पिंकी ने आंखें बंद कर लीं, फिर आंखों को मलते हुए जम्हाई ले कर बैड पर उठ कर बैठ गई. कुछ देर वह अलसाई सी बैठी रही, फिर मुंह घुमा कर बैड के दूसरे किनारे की ओर देखा तो पति चंदन वहां नहीं था. शायद आज जल्दी उठ गया, बाहर होगा, सोच कर वह बैड से उठी और पैरों में चप्पल पहन कर बैडरूम से बाहर निकल आई. जैसे ही वह बाहर आई तो बाहर का दृश्य देख कर सन्न रह गई. चंदन नायलौन की रस्सी से मुख्यद्वार की लोहे की चौखट से लटका था. यह देख पिंकी के मुंह से चीख निकल गई.

चीखते हुए वह बाहर की तरफ भागी और पड़ोसियों को बुला लिया. पड़ोसियों ने आ कर देखा तो सब अपनेअपने कयास लगाने लगे. चंदन रेलवे में नौकरी करता था और पत्नी के साथ रहता था. यह मामला सोनभद्र जिले के थाना कोतवाली राबर्ट्सगंज क्षेत्र के बिचपई गांव का था. किसी ने सुबह 8 बजे राबर्ट्सगंज कोतवाली को घटना की सूचना दे दी. सूचना पा कर इंसपेक्टर मिथिलेश मिश्रा टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चंदन की उम्र 34-35 वर्ष रही होगी. वह दरवाजे की लोहे की चौखट से नायलोन की रस्सी से लटका हुआ था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे, घुटने मुड़े हुए थे.

देखने से लग रहा था जैसे चंदन ने आत्महत्या की हो, लेकिन पैर जमीन पर लगे होने से थोड़ा संदेह भी था कि क्या वाकई चंदन ने आत्महत्या की है या किसी ने उस की हत्या कर के आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की है. इंसपेक्टर मिश्रा के दिमाग में ऐसी ही बातें उमड़घुमड़ रही थीं. फिर मिश्राजी ने सोचा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सारी हकीकत सामने आ जाएगी. उन्होंने सिर को झटका और सोचों के भंवर से बाहर आए. उन्होंने पास में बैठी मृतक चंदन की पत्नी पिंकी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रात में खाना खा कर दोनों साथ बैड पर सोए थे. सुबह उस की आंख खुली तो चंदन बैड पर नहीं था. वह बाहर आई तो चंदन को इस हालत में चौखट से लटकते हुए पाया.

इंसपेक्टर मिथिलेश मिश्रा ने उस से और विस्तृत पूछताछ की तो पता चला वह चंदन के साथ जिस मकान में रह रही थी, वह पिंकी के पिता परमेश्वर भारती का था. वह खुद बीजपुर में रहते हैं. पिंकी और चंदन के दोनों बच्चे भी अपने नाना के पास रह रहे थे. पतिपत्नी के अलावा उस मकान में कोई नहीं रहता था. चंदन बिचपई से 25 किमी दूर मदैनिया गांव का निवासी था, जो करमा थाना क्षेत्र में आता था. घटना की सूचना करमा थाने को दी गई, वहां से यह खबर चंदन के परिवार तक पहुंचा दी गई. इंसपेक्टर मिश्रा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया और कोतवाली लौट आए. 2 घंटे बाद चंदन का भाई अपने गांव से राबर्ट्सगंज कोतवाली पहुंचा. उस ने इंसपेक्टर मिश्रा को एक लिखित तहरीर दी, जिस में उस ने चंदन की हत्या का आरोप उस की पत्नी पिंकी उर्फ प्रियंका, ससुर परमेश्वर भारती, सास चमेली, साले पिंटू और पड़ोसी कृष्णा चौहान पर लगाया था.

भाई ने तहरीर में कृष्णा से पिंकी के संबंध होने का जिक्र किया था. तहरीर देख कर इंसपेक्टर मिश्रा चौंके. उन के मन का संदेह सच होता दिखने लगा. लाश की स्थिति देख कर उन्हें पहले ही चंदन के आत्महत्या पर संदेह था. पति की मौत पर पिंकी भी उतनी दुखी नहीं लग रही थी, उस का चीखनाचिल्लाना नाटक सा लग रहा था. खैर, अब इंसपेक्टर मिश्रा को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने का इंतजार था. शाम को जब रिपोर्ट आई तो उस में चंदन की हत्या किए जाने की पुष्टि हो गई. इस के बाद इंसपेक्टर मिश्रा ने चंदन की लिखित तहरीर के आधार पर पिंकी, कृष्णा चौहान, परमेश्वर भारती, चमेली और पिंटू के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

इंसपेक्टर मिथिलेश मिश्रा ने केस की जांच शुरू करते हुए कृष्णा चौहान उर्फ किशन के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह आपराधिक प्रवृत्ति का था. बिचपई में वह पिंकी के घर के पड़ोस में अपनी मां के साथ किराए पर रहता था. जांच के दौरान पूछताछ में यह भी पता चला कि कृष्णा का पिंकी के घर काफी आनाजाना था. वह घर से गायब भी था. पिंकी और कृष्णा की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो उस से भी दोनों के संबंधों की पुष्टि हो गई. इस के बाद इंसपेक्टर मिश्रा किशन उर्फ कृष्णा की गिरफ्तारी के प्रयास में लग गए. 11 जून को उन्होंने मुखबिर की सूचना पर राबर्ट्सगंज के रोडवेज बस स्टैंड से किशन और प्रियंका को गिरफ्तार कर लिया. भेद खुल जाने की आशंका से प्रियंका किशन के साथ कहीं भाग जाने की फिराक में थी, लेकिन पकड़ी गई.

कोतवाली ला कर जब दोनों से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने चंदन की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया और हत्या करने के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी—

उत्तर प्रदेश के जिला सोनभद्र के थाना करमा क्षेत्र के मदैनिया गांव में शंकर भारती रहते थे. वह रेलवे में थे. उन के परिवार में पत्नी कबूतरी के अलावा एक बेटी राजकुमारी और 2 बेटे चंद्रशेखर व चंदन थे. उन्होंने सब से बड़ी बेटी राजकुमारी का विवाह समय रहते कर दिया था. बेटों में चंद्रशेखर बड़ा था. वह किसी के यहां कार ड्राइवर की नौकरी करता था. सब से छोटे चंदन ने बीए तक पढ़ाई की थी. सब कुछ अच्छा चल रहा था कि 2002 में शंकर भारती की मृत्यु हो गई. मृतक आश्रित कोटे में नौकरी की बात आई तो आपसी सहमति से चंदन का नाम दिया गया. 2004 में चंदन रेलवे में भरती हो गया. वर्तमान में वह चुर्क में बतौर केबिनमैन कार्यरत था. रेलवे में नौकरी लगते ही चंदन के लिए रिश्ते आने लगे.

एनटीपीसी में इंजीनियर परमेश्वर भारती बीजपुर में रहते थे. परिवार में पत्नी चमेली और एक बेटी पिंकी उर्फ प्रियंका व 2 बेटे थे पिंटू और रिंकू. पिंकी सब से बड़ी थी. उस ने बीए कर रखा था. परमेश्वर को चंदन के बारे में पता चला तो उन्होंने उस के बारे में जानकारी हासिल की. उस समय करमा थाने के जो इंसपेक्टर थे, वह परमेश्वर के रिश्तेदार थे. परमेश्वर ने उन से बात की तो उन्होंने पता करके परमेश्वर को बताया कि लड़का बहुत अच्छा और सीधासादा है. उस में कोई ऐब भी नहीं है, सरकारी नौकरी में है. फिर रिश्ता तय हुआ और 2005 में चंदन और पिंकी का विवाह हो गया.

पिंकी खबसूरत और पढ़ीलिखी थी. वह अच्छे खातेपीते परिवार से ताल्लुक रखती थी. विवाह के बाद जब वह अपनी ससुराल आई तो वहां का मकान और रहनसहन उसे अच्छा नहीं लगा. लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकती थी. शादी के बाद पिंकी चंदन से जिद करने लगी कि वह बिचपई में रहे. बिचपई में पिंकी के पिता का एक मकान खाली पड़ा था. पिंकी ने उस में चंदन के साथ रहने की बात अपने पिता परमेश्वर से कर ली थी. चंदन को मानना पड़ा आए दिन पिंकी चंदन से बिचपई चल कर रहने की जिद करती. चंदन अपने परिवार के साथ रहना चाहता था, इसलिए पिंकी की बात पर ध्यान नहीं देता था. अपनी बात न मानते देख पिंकी बीवियों वाले हथकंडे अपनाने लगी. उस से नाराज हो कर बोलना बंद कर देती, खाना नहीं खाती थी. इस पर चंदन समझाता तो उस की बात सुनती तक नहीं थी. आखिर चंदन को उस की जिद के आगे झुकना ही पड़ा.

वह पिंकी के साथ बिचपई में अपने ससुर परमेश्वर के मकान में रहने लगा. कालांतर में प्रियंका 2 बेटों अमन और नमन की मां बनी. स्कूल जाने लायक तो प्रियंका ने उन्हें नाना परमेश्वर के पास भेज दिया. चंदन कभीकभी शराब पी लेता था. पीने पर पिंकी कुछ कहती तो वह उस की पिटाई कर देता था. पिंकी भी चंदन के साथ कुछ अच्छा व्यवहार नहीं करती थी. वह ज्यादातर मायके का ही गुणगान करती रहती थी. चंदन अपने घरवालों से बात करता या उन की तारीफ करने लगता तो पिंकी के तनबदन में आग लग जाती थी. पत्नी के रूखे व्यवहार के कारण चंदन ज्यादा शराब पीने लगा था. शराब पीने के बाद दोनों में झगड़ा जरूर होता था.

किशन उर्फ कृष्णा चौहान फुलाइच तरवा आजमगढ़ का रहने वाला था. उस के पिता रामत चौहान ने 2 शादियां की थीं. रामत चौहान पहली पत्नी और उस की 2 बेटियों के साथ आजमगढ़ में रह रहा था. किशन उस की दूसरी पत्नी रमा का बेटा था. कृष्णा अपनी मां के साथ डेढ़ साल से पिंकी के घर के पड़ोस में किराए पर रह रहा था. वह अपराधी प्रवृत्ति का था. राबर्ट्सगंज कोतवाली में उस पर 2019 में धारा 457/380/411 के तहत मुकदमा भी दर्ज था. 29 साल का किशन अविवाहित था. पड़ोस में रहते हुए उस की नजर पिंकी पर गई तो उस की खूबसूरती देख कर किशन उस की ओर आकर्षित हो गया. चंदन ड्यूटी पर रहता था, प्रियंका घर में अकेली होती थी.

पड़ोसी होने के नाते पिंकी और किशन एकदूसरे को जानते  थे, पर अभी तक बात नहीं हुई थी. दोनों की नजर एकदूसरे पर पड़ती, तो जल्दी नहीं हटती थी. एक दिन किशन सुबहसुबह पिंकी के घर पहुंच गया. हमेशा की तरह पिंकी उस समय भी अकेली थी. दरवाजा खटखटाने पर पिंकी ने दरवाजा खोला तो किशन को खडे़ पाया और मुंह से निकला, ‘‘अरे आप…’’

‘‘जी, मैं आप का पड़ोसी किशन.’’

‘‘जानती हूं आप को, बताने की जरूरत नहीं.’’ पिंकी ने मुस्करा कर कहा, ‘‘अरे अंदर आइए, बाहर क्यों खड़े हैं.’’

औपचारिकतावश पिंकी ने कहा तो किशन बोला, ‘‘चाय बनाने जा रहा था तो देखा चीनी नहीं है. अभी दुकानें भी नहीं खुली हैं. फिर सोचा पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है, इसलिए आप के पास चला आया. इस बहाने आप से परिचय भी हो जाएगा.’’

‘‘अच्छा किया. अब मैं खुद आप को चाय बना कर पिलाती हूं. उस के बाद आप चीनी भी ले जाइएगा.’’ कह कर पिंकी ने उसे कुरसी पर बैठाया और खुद चाय बनाने किचन में चली गई.

कामी नजर किशन जिस जगह कुरसी पर बैठा था, ठीक उसी के सामने किचन थी. किशन चाय बनाती पिंकी को पीछे से ताड़ रहा था. पिंकी के शरीर की बेहतरीन बनावट उस की आंखों में प्यास जगा रही थी. इसी बीच पिंकी ने पलट कर उस की ओर देखा तो उसे अपनी ओर देखते पाया. एकाएक दोनों की आंखें मिलीं तो होंठ खिल उठे. चाय के कप टे्र में रख कर पिंकी किचन से बाहर आई और टे्र मेज पर रख कर किशन को चाय देते हुए पूछा, ‘‘आप लोग कुछ समय पहले यहां रहने आए हैं, इस से पहले कहां रहते थे?’’

‘‘भाभी, मैं पहले आजमगढ़ में रहता था. वहां मेरे पिता रहते हैं. यहां मैं अपनी मां के साथ रहता हूं.’’

फिर चाय का घूंट भरते हुए किशन पिंकी की तारीफ करते हुए बोला, ‘‘वाह, आप चाय बहुत बढि़या बनाती हैं.’’

‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया.’’ तारीफ सुन कर पिंकी खुशी से बोली.

चाय पीतेपीते उन दोनों ने एकदूसरे के बारे में जानकारी ली. पिंकी को किशन से बात करना बहुत अच्छा लग रहा था. उस की बातें और बात करने का ढंग अलग ही था. काफी देर तक बातें करने के बाद किशन वहां से चला गया. इस के बाद तो दोनों के बीच हर रोज बातें होने लगीं. किशन किसी न किसी बहाने से पिंकी के पास पहुंच जाता. पिंकी भी जान गई थी कि किशन उस से मिलने और बातें करने के लिए बहानों का सहारा लेता है. इसलिए एक दिन उस ने किशन से कह दिया कि उसे मिलने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं है. वह ऐसे भी मिलने आ सकता है. किशन खुश हो गया कि अब उसे बहाने नहीं बनाने पड़ेंगे.

अब जब देखो किशन पिंकी के पास ही नजर आने लगा. घर के कामों में भी उस की मदद करने लगा. साथ में काम करतेकरते हंसीमजाक करते कब समय बीत जाता, पता ही नहीं चलता. चंदन के घर आने से पहले ही किशन वहां से चला आता था. कुछ ही दिनों में दोनों काफी घुलमिल गए. दोनों को एकदूसरे के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता था. किशन तो जानता था कि वह पिंकी को जी जान से चाहने लगा है. लेकिन अब पिंकी को भी एहसास होने लगा कि किशन चुपके से आ कर किस तरह उस की जिंदगी बन गया, उस के दिलोदिमाग पर छा गया. पिंकी के दिमाग में सिर्फ उस की बातें ही घूमती रहती थीं. किशन पिंकी के दिलोदिमाग पर ऐसा छाया कि वह भी उस की ओर खिंचने लगी. जब प्यार का एहसास हुआ तो वह भी किशन से मजाक कर के लिपटनेचिपटने लगी. पिंकी का ऐसा करना किशन के लिए शुभ संकेत था कि वह उस की होने के लिए

बेताब है. एक दिन दोनों पासपास बैठे किशन की लाई आइसक्रीम खा रहे थे. किशन ने अपनी आइसक्रीम खाई तो उस ने ऐसा मुंह बनाया जैसे उसे आइसक्रीम अच्छी न लगी हो. फिर उस ने पिंकी की आइसक्रीम की ओर देखा और तेजी से उस का हाथ पकड़ कर उस की आइसक्रीम की एक बाइट खा ली. किशन की इस हरकत पर पिंकी भौंचक्की रह गई. फिर शरारती अंदाज में उस की पीठ पर प्यार से धौल जमाने लगी. उस के इस अंदाज से किशन हंसने लगा. फिर बोला, ‘‘आप की आइसक्रीम सच में बहुत मीठी है.’’

पिंकी उस से नाराज होने की बात कह कर चुपचाप बैठ गई तो किशन की नजर पिंकी के पिंक लिप्स पर गई, जहां कुछ आइसक्रीम लगी हुई थी. उसे शरारत सूझी, वह अपने चेहरे को पिंकी के चेहरे के पास ले गया और उस के चेहरे को अपने हाथों में ले कर उस के पिंक लिप्स को अपने होंठों से चाट लिया. इस शरारत से पिंकी अचंभित रह गई, लेकिन इस शरारत ने उस के शरीर में आग भरने का काम किया. किशन भी अपने आप को नहीं रोक पाया. वह बराबर पिंकी के लिप्स को चूमने लगा तो पिंकी ने मस्त हो कर आंखें मूंद लीं. इस के बाद तो उन के बीच वही हुआ जो अकसर उन्माद के क्षणों में होता है. दोनों बहके तो ऐसे फिसले कि अपनी इच्छा पूरी करने के बाद ही अलग हुए.

बन गए रिश्ते उन के बीच एक बार जो अनैतिक रिश्ता बना तो वह बारबार दोहराया जाने लगा. लेकिन ऐसे रिश्ते की सच्चाई अधिक दिनों तक छिपी नहीं रह पाती. एक दिन चंदन ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. इस के बाद किशन तो वहां से चला गया, लेकिन चंदन ने पिंकी को जम कर पीटा. साथ ही आगे से ऐसी नापाक हरकत न करने की हिदायत दी. पिंकी के इस गलत कदम से चंदन परेशान रहने लगा. उस की अपने भाई चंद्रशेखर से बात होती रहती थी. उस ने भाई को भी पिंकी के किशन से अवैध संबंध के बारे में बता दिया. दूसरी ओर पिंकी पर चंदन द्वारा की गई पिटाई और हिदायत का कोई असर नहीं हुआ. वैसे भी चंदन हर वक्त घर पर रह नहीं सकता था. इस के अलावा घर में पिंकी पर नजर रखने वाला कोई नहीं था.

पिंकी पहले की तरह ही किशन के साथ रंगरलियां मनाती रही. वह चाहती थी कि उस के और किशन के रिश्ते पर कोई तर्कवितर्क न करे. 5/6 जून की रात किशन और पिंकी रंगरलियां मना रहे थे कि रात 12 बजे चंदन घर लौट आया. उस ने पिंकी और किशन को एक साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो वह उन से झगड़ने लगा. इस पर किशन ने पिंकी से कहा कि आज इस का काम खत्म कर देते हैं. पिंकी भी उस की बात से सहमत थी, इसलिए उस का साथ देने लगी. वह घर में पड़ी नायलोन की रस्सी उठा लाई. दोनों ने मिल कर रस्सी से चंदन का गला घोंट दिया, जिस से उस की मौत हो गई. चंदन की हत्या करने के बाद दोनों ने उस की लाश को नायलोन की रस्सी से बांध कर घर की लोहे की चौखट से लटका दिया, जिस से यह लगे कि चंदन ने आत्महत्या की है. इस के बाद किशन वहां से चला गया.

सुबह जब पुलिस आई तो पिंकी ने उस के आत्महत्या कर लेने की बात ही बताई. लेकिन उन दोनों की चाल काम न आई और दोनों पकड़े गए. आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी कर के दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों व चंद्रशेखर से पूछताछ पर आधारित

 

Love Crime : बेटी के अफेयर के चक्कर में मारा गया पिता

Love Crime : नाबालिग बेटी खुशबू के पैर बहक जाने की जानकारी मिलने पर मां रानी देवी को बेटी को समझा कर सही रास्ते पर लाना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने के बजाय उस ने बेटी के सहारे अपना प्रेमी ही ढूंढ लिया. इस के बाद जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

‘‘भा भी, भैया कहां हैं? दिन ढल गया, दिखाई नहीं दे रहे. किसी काम से गए हैं क्या?’’ राकेश सिंह ने अपनी भाभी रानी से पूछा.

‘‘दोपहर में किसी का फोन आया था, फोन पर बात करते हुए थोड़ी देर में आने को कह कर घर से निकले. लेकिन सांझ हो गई है, अभी तक नहीं लौटे. मुझे चिंता हो रही है.’’ परेशान रानी ने देवर राकेश से कहा.‘‘मैं भैया को ढूंढने जा रहा हूं. अगर कुछ पता नहीं चला तो मैं पहासू थाने चला जाऊंगा और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दूंगा.’’

‘‘आप के जो समझ में आए, करो. किसी भी तरह उन का का पता लगाओ.’’ रानी बोली.

‘‘जी छोटा मत करो भाभी.’’ राकेश ने भाभी को समझाया. राकेश भाई को ढूंढने निकल गया. उस समय शाम के करीब साढ़े 6 बज रहे थे. तारीख थी 9 जुलाई 2020. जितना संभव था, राकेश ने बड़े भाई बलवीर सिंह को ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. बलवीर सिंह न तो किसी दोस्त के यहां गया था और न ही किसी परिचित के यहां. राकेश भी परेशान था कि बाइक ले कर वह कहां गया होगा. बलवीर का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. फोन बंद होने से राकेश के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. जब बलवीर का कहीं पता नहीं चला तो राकेश पहासू थाने पहुंच गया.

थाने के दीवान अशोक कुमार को अपनी परेशानी बता कर उस ने भाई की गुमशुदगी की तहरीर उन्हें दे दी. अशोक कुमार ने राकेश को विश्वास दिलाया कि बड़े साहब के आते ही आवश्यक काररवाई हो जाएगी. रात काफी हो गई है, अभी अपने घर जाओ. दीवान के आश्वासन पर राकेश घर लौट आया. उस समय रात के करीब 10 बज रहे थे. घर वालों की बढ़ी चिंता रानी और राकेश ने किसी तरह रात काटी. बलवीर की पत्नी रानी दरवाजे पर इस आस से टकटकी लगाए रही कि वह अब घर लौटेंगे तो दरवाजा कौन खोलेगा.  बलवीर सिंह को घर से गए 24 घंटे हो गए. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. समझ नहीं आ रहा था कि वह गया तो कहां गया? इस बात को ले कर घर वालों को चिंता सताने लगी. डर था कि उस के साथ कहीं कोई अप्रिय घटना तो नहीं घट गई, क्योंकि उस का फोन अब भी बंद आ रहा था.

उस के फोन का बंद आना, घर वालों की चिंता बढ़ा रहा था. पहासू थाने के थानाप्रभारी आर.के. यादव ने राकेश की तहरीर पर बलवीर की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर आवश्यक काररवाई शुरू कर दी थी. गुमशुदगी के तीसरे दिन यानी 11 जुलाई को पुलिस को दिन के करीब 11 बजे सूचना मिली कि थाने से करीब 6 किलोमीटर दूर गंगावली नहर के किनारे झाड़ी में एक अधेड़ उम्र के आदमी की लाश पड़ी है. लाश बुरी तरह झुलसी हुई है और उस के पास एक लावारिस बाइक खड़ी है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की जानकारी राकेश को भी दे दी थी और उसे लाश की शिनाख्त के लिए मौके पर पहुंचने को कह दिया.

जानकारी मिलते ही राकेश घटनास्थल पहुंच गया. लाश की कदकाठी और कपड़ों से उस ने लाश की पहचान अपने भाई बलवीर सिंह के रूप में कर ली. पुलिस ने लाश झाड़ी के अंदर से बाहर निकलवाई. उस का चेहरा बुरी तरह झुलसा हुआ था. हत्यारों ने बलवीर की हत्या करने के बाद पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे पर कोई ज्वलनशील पदार्थ उड़ेल कर आग लगा दी थी. शव के पास जो मोटरसाइकिल बरामद हुई, वह भी बलवीर की ही थी. पुलिस ने लाश और बाइक दोनों को अपने कब्जे में ले लिया. घटनास्थल का निरीक्षण करने पर मौके से कोई अन्य चीज बरामद नहीं हुई थी.

घटनास्थल की काररवाई कर पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. थाने लौट कर पुलिस ने राकेश सिंह की तहरीर पर धारा 302 भादंसं के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और आगे की काररवाई शुरू कर दी. बलवीर सिंह की हत्या की सूचना मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. मृतक की पत्नी रानी, बेटी खुशबू और राकेश का रोरो कर बुरा हाल था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बलवीर की हत्या किस ने और क्यों की? जबकि उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. वह सीधासादा किसान था, अपने काम से काम रखने वाला.

बलवीर सिंह की हत्या ब्लांइड मर्डर थी. पुलिस के लिए चुनौती. पुलिस को बलवीर का मोबाइल नंबर मिल गया था. नंबर ही एक ऐसा आधार था जिस से पुलिस कातिलों तक पहुंच सकती थी. यह भी पता चल सकता था कि उस के फोन पर आखिरी बार किस ने काल की थी.  2 दिनों बाद पुलिस को बलवीर के मोबाइल की कालडिटेल्स मिल गई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस के नंबर पर आखिरी काल दोपहर एक बजे के करीब आई थी. फिर एक घंटे बाद उस का फोन स्विच्ड औफ हो गया था. इस से एक बात साफ हो गई कि बलवीर के साथ जो कुछ हुआ, वह इसी एक घंटे के बीच में हुआ था. हत्यारों ने इसी एक घंटे के भीतर अपना काम कर के लाश ठिकाने लगा दी होगी.

पुलिस को मिली अहम जानकारी पुलिस को जांचपड़ताल से पता चला कि बलवीर के फोन पर आखिरी बार जिस नंबर से काल आई थी, वह नंबर हेमंत का था. हेमंत पहासू थाने के जाटोला का रहने वाला था. मृतक भी पहासू का रहने वाला था और फोन करने वाला भी. इस का मतलब बलवीर और हेमंत के बीच जरूर कोई संबंध था. बलवीर और हेमंत के बीच की बिखरी कडि़यों को जोड़ते हुए पुलिस को मुखबिर के जरिए ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि पुलिस भौचक रह गई. मृतक की बेटी खुशबू और गांव के हेमंत के बीच कई सालों से अफेयर था. इतना ही नहीं, बलवीर की पत्नी रानी के भी गांव के ही एक युवक से मधुर संबंध थे. मांबेटी का अफेयर गांव के 2 अलगअलग युवकों से चल रहा था.

बलवीर सिंह को मांबेटी के अनैतिक संबंधों की जानकारी हो गई थी. वह दोनों के संबंधों का विरोध करता था. इसे ले कर पतिपत्नी के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था. पुलिस के लिए यह जानकारी काफी थी. उस की हत्या प्रेम में बाधा बनने के कारण हुई थी. लेकिन पुलिस के पास इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं था, जिस से वह मांबेटी को गिरफ्तार कर सके. मांबेटी तक पहुंचने के लिए पुलिस को दोनों के मोबाइल नंबरों की जरूरत थी. पुलिस चाहती थी कि मांबेटी को इस की भनक तक न लगे. बहरहाल, किसी तरह पुलिस ने मांबेटी के फोन नंबर हासिल कर लिए. नंबर मिल जाने के बाद दोनों नंबर सर्विलांस पर लगा दिए गए. साथ ही दोनों नंबरों की काल डिटेल्स भी निकलवा ली गई. इस से पता चला कि खुशबू की काल डिटेल्स में हेमंत का वही नंबर था जो नंबर मृतक बलवीर सिंह की काल डिटेल्स में मिला था.

हेमंत और खुशबू के बीच घटना वाले दिन और उस से पहले कई बार बातचीत हुई थी. घटना के बाद भी खुशबू और हेमंत फोन पर बातचीत कर रहे थे. दोनों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पुलिस उन के नंबरों को सर्विलांस पर लगा कर उन की बातचीत सुन रही है.  घटना के कई दिनों बाद हेमंत ने खुशबू को फोन कर के कहा, ‘‘अब तो हमारे रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल चुका है. अब हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता.’’

इस पर खुशबू ने जवाब दिया, ‘‘ज्यादा इतराओ मत. पुलिस को हमारे राज के बारे में पता चल गया तो जिंदगी भर जेल में बैठे चक्की पीसेंगे. फिर सलाखों के पीछे बैठे इश्क की माला जपते रहना. थोड़ा सब्र रखो, ऐसा कोई काम मत करना जिस से हम पकड़े जाएं.’’

पुलिस को सुराग तो मिल गया था लेकिन उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि बलवीर की हत्या मांबेटी ने मिल कर अपने आशिकों से कराई थी. मृतक की पत्नी रानी की अपने आशिक से बातचीत का रिकौर्ड पुलिस के पास मौजूद था. इन्हीं पुख्ता सबूतों के आधार पर पुलिस 22 जुलाई, 2020 को रानी और उस की बेटी खुशबू को गिरफ्तार कर पहासू थाने ले आई. दोनों से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पता चला कि बलवीर की हत्या प्रेम संबंधों में बाधक बनने की वजह से हुई थी. माशूकाओं ने पकड़वाया आशिकों को रानी और खुशबू से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसी दिन शाम को उन के आशिकों हेमंत, गोली और उस के दोस्त आकाश को बसअड्डा, पहासू से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर के पहासू थाने ले आई. उन तीनों ने खुशबू और उस की मां रानी को पुलिस हिरासत में देखा तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने भी बड़ी आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. 14 दिनों से राज बने बलवीर सिंह हत्याकांड से आखिर परदा उठ ही गया. पुलिस ने अज्ञात की जगह मृतक पत्नी रानी, बेटी खुशबू, उन के आशिकों हेमंत और गोली व उस के दोस्त आकाश को नामजद कर दिया. एसपी गोपालकृष्ण चौधरी ने उसी दिन पुलिस लाइंस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर के बलवीर हत्याकांड के पांचों आरोपियों को पत्रकारों के सामने पेश कर घटना का खुलासा कर दिया. पुलिसिया पूछताछ में बलवीर सिंह हत्याकांड की कहानी ऐसे सामने आई—

45 वर्षीय बलवीर सिंह उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना पहासू के गांव जाटोला में रहता था. उस का छोटा सा परिवार था, जिस में पत्नी रानी और बेटी खुशबू तथा एक बेटा था. बलवीर का एक छोटा भाई था राकेश सिंह. बलवीर और राकेश दोनों भाइयों के बीच अटूट प्रेम था. दोनों भाई एकदूसरे के दुखसुख में हमेशा खड़े रहते थे.  बलवीर सिंह को इलाके का सब से बड़ा किसान कहा जाता था. उस के पास खेती की कई एकड़ जमीन थी, जिस पर वह वैज्ञानिक विधि से खेती करवाता था. इस से उसे अच्छा मुनाफा होता था. इसी आमदनी से वह दोनों बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहा था. बच्चों की पढ़ाई के साथ वह कोई समझौता नहीं करता था. धीरेधीरे बलवीर के दोनों बच्चे बड़े हो रहे थे. बेटी खुशबू बड़ी थी और बेटा छोटा.

कब बचपन को पीछे छोड़ कर खुशबू ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया था. वह 17 साल की हो चुकी थी. खुशबू कब तक कोरे दिल को आशिकों की नजरों से बचाती फिरती, आखिरकार वह हेमंत को अपना दिल दे बैठी. हेमंत उसी गांव का रहने वाला था. आतेजाते हेमंत की नजर खुशबू पर पड़ी तो वह उस के दिल में समा गई. खुशबू को भी हेमंत पसंद था. 22 साल का हेमंत गबरू जवान था. वह अभी पढ़ाई कर रहा था. पढ़ाई के दौरान नौकरी की तैयारी में भी जुटा था. जल्दी ही दोनों ने एकदूसरे से प्रेम का इजहार कर दिया. हेमंत से मोहब्बत की लगन लगने के बाद खुशबू के चेहरे पर कुछ अलग ही तरह का निखार आ गया था. उस के चेहरे पर हर घड़ी मुसकान थिरकने लगी. यह देख कर उस की मां रानी को शक हुआ कि खुशबू के चेहरे पर बिन बरसात हरियाली क्यों छाई रहती है. कहीं कोई इश्कविश्क का चक्कर तो नहीं है.

खुशबू की मां रानी औरत थी. एक औरत दूसरी औरत के मन की बात को जल्दी भांप लेती है. यहां तो खुशबू उस की बेटी थी, वह बेटी के दिल की बात जान सकती थी. वैसे भी मांबेटी के बीच सहेलियों जैसा रिश्ता था. मां ने पूछी दिल की बात एक दिन दोपहर का समय था. घर में मां और बेटी के अलावा कोई नहीं था. बेटा और पिता बलवीर सिंह के साथ खेती के काम से बाहर गया हुआ था. मांबेटी दोनों एक साथ पलंग पर लेटी हुई थीं. उन के बीच में घर की बातों को ले कर बातचीत हो रही थी. इसी दरमियान रानी ने बेटी के मन की बात जानने के लिए पूछा,‘‘क्या बात है खुशबू, आजकल तुम्हारे चेहरे पर कुछ ज्यादा ही चमक रहती है. कहीं प्यारव्यार का चक्कर तो नहीं है?’’

‘‘मम्मी, कैसी बातें कर रही हो?’’ खुशबू एकदम से हड़बड़ा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. वह बोली, ‘‘कोई अपनी बेटी से ऐसे बात करता है क्या?’’

‘‘देखो बेटी, मैं मां हूं तुम्हारी. तुम मेरे सामने मत उड़ो.’’ कह कर रानी ने जता दिया कि वह अनुभवी है. उस से कोई बात छिपी नहीं रह सकती.

‘‘कहां मां, मैं कहां उड़ रही हूं. जैसा तुम सोच रही हो, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ खुशबू ने मां से झूठ बोलने की कोशिश की, लेकिन रानी ने उस का झूठ पकड़ लिया.

‘‘मुझे सब पता है. तुम मुझ से झूठ बोल कर बच नहीं सकती.’’

‘‘क….क्या पता है?’’ खुशबू हड़बड़ा गई.

‘‘यही कि तुम जिस से प्यार करती हो वो कौन है?’’

‘‘क…कौन है? बताओ..बताओ कौन है?’’

‘‘उस का नाम हेमंत है न.’’ मां की जुबान से प्रेमी का नाम सुनते ही खुशबू के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. बेटी के चेहरे का रंग बदलते देख रानी खिलखिला कर हंस पड़ी. मां की रहस्यमई हंसी देख कर खुशबू और भी परेशान हो गई.

‘‘देखा, उड़ा दिए न तुम्हारे होश.’’ रानी बेटी के चेहरे को ध्यान से देखती हुई बोली, ‘‘वैसे हेमंत के साथ घूमने वाला दूसरा गबरू जवान कौन है, जो अकसर उस के साथ घूमताफिरता है?’’

‘‘वो…वो तो उस का दोस्त गोली है. पर बात क्या है मां? तुम क्यों पूछ रही हो?’’

‘‘बड़ा बांका छोरा है. जब तेरे पापा घर पर न रहें तो उसे हेमंत के साथ घर बुलवाना.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘उसे बुलवाओ तो सही, पता चल जाएगा. लेकिन याद रहे कि ये बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए. किसी तीसरे तक बात पहुंची तो तुम्हारी खैर नहीं.’’ कहती हुई रानी बिस्तर से नीचे उतरी और सीधे किचन में चली गई. खुशबू मां की बातों से अवाक थी क्योंकि वह उस की प्रेम कहानी जान गई थी. मां की बात नहीं मानी तो पापा से कह सकती है. इसलिए उस ने मां की बात मानने में ही भलाई समझी. रानी को बेटी के बहकते कदमों को रोकना चाहिए था. लेकिन ऐसा न कर के वह पति के होते हुए पराए पुरुष के आगोश में समाने को बेकरार होने लगी. बेटी के जरिए मिला मां को यार खुशबू ने हेमंत से कह कर उस के दोस्त गोली को अपने घर बुलाया. उस गबरू जवान को देख कर रानी खुश हो गई. बेशरमी की सारी हदें पार कर के रानी बेटी के सामने ही गोली से हंसहंस कर बातें करने लगी.

रानी गोली से पहली बार मिली थी. पहली ही मुलाकात में उस ने गोली के मन को टटोल लिया. बेटी के सामने जो नहीं कहना चाहिए था, रानी वहां तक कह गई थी. खुशबू की मां की जुबान से ऐसी बातें सुन कर गोली भी अवाक रह गया. वह समझ नहीं पा रहा था इन के सवालों का क्या और कैसे जवाब दे. कुछ देर बाद हेमंत गोली को ले कर वापस चला गया. जाते समय रानी ने दोनों को आते रहने के लिए कह दिया. 23 साल का बांका जवान गोली रानी के मन की बात समझ गया था. उस दिन के बाद से हेमंत और गोली रानी के घर ऐसे समय पर जाते थे जब उस का पति बलवीर सिंह और बेटा घर पर नहीं होते थे. धीरेधीरे गोली और रानी के बीच प्रेम प्रसंग बढ़ा और दोनों का रिश्ता जिस्मानी संबंधों तक पहुंच गया. उधर उस की बेटी खुशबू भी खुलेआम अपने प्रेमी की बांहों में रंगरलियां मनाने लगी.

अनैतिक काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिप पाता. धीरेधीरे मांबेटी के प्रेम के चर्चे गांव में फैलने लगे. यह बात जब बलवीर सिंह तक पहुंची तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. उसे सुनी बातों पर यकीन नहीं हुआ. क्योंकि वह पत्नी व बेटी पर बहुत विश्वास करता था. इस खबर ने उस के मन में वहम पैदा कर दिया था. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि जब तक वह अपनी आंखों से देख नहीं लेगा, किसी का विश्वास नहीं करेगा. वह पत्नी और बेटी दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहता था. दोनों को रंगेहाथों पकड़ने के लिए बलवीर ने एक युक्ति निकाली. घटना से करीब 3 माह पहले की बात है. वह सुबह के समय जानबूझ कर बेटे को साथ ले कर खेतों पर चला गया. यह बात उस ने घर में बता दी थी. उस ने पत्नी से कहा था कि लौटने में शाम हो सकती है. पति की बात सुन कर मांबेटी दोनों मन ही मन खुश हुईं.

मां के कहने पर दोपहर के समय खुशबू ने अपने और मां के प्रेमी दोनों को घर बुला लिया और दोनों अलगअलग कमरों में रंगरलियां मनाने लगीं. बलवीर शाम को आने की बात कह कर गया था लेकिन वह दोपहर में ही घर लौट आया. दरवाजा बेटी खुशबू ने ही खोला था. सामने पापा को देख कर उस के होश उड़ गए. तब तक बलवीर की नजर कमरे में पड़ चुकी थी. रंगेहाथों पकड़ा मांबेटी को  घर में गांव के 2 युवक हेमंत और गोली कुरसी पर आराम से बैठे थे. बलवीर को देख कर दोनों वहां से दबेपांव भाग गए. बलवीर का खून खौल उठा. बलवीर ने न आव देखा न ताव, पत्नी और बेटी दोनों को लातथप्पड़ों से जम कर पीटा और धमकाया भी आज के बाद तुम दोनों ने घिनौनी हरकतें कीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.

उस दिन के बाद से घर में जो विवाद शुरू हुआ, उस ने थमने का नाम नहीं लिया. इस प्रेम प्रसंग को ले कर आए दिन घर में पत्नीबेटी और पिता के बीच महाभारत होने लगी थी. इस विवाद से घर की शांति खत्म हो गई थी. कोई सुकून से रोटी नहीं खा पा रहा था. रोजरोज के विवाद और टोकाटाकी से मांबेटी बलवीर से तंग आ गई थीं. बेटी ने मां को समझाया कि क्यों न इस विवाद की जड़ को ही हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाए. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. मां ने बेटी को मंजूरी दे दी. फिर क्या था. खुशबू ने हेमंत को फोन कर के अपने पापा बलवीर सिंह को रास्ते से हटाने का फरमान जारी कर दिया. खुशबू के प्यार में अंधे हेमंत ने हां कर दी. हेमंत ने गोली से मिल कर बलवीर की हत्या की योजना बनाई. इन्होंने एक अवैध पिस्टल भी खरीद ली. इस के बाद हेमंत ने खुशबू को बता दिया कि पूरी योजना बन गई है, शिकार का शिकार कब करना है बताओ. खुशबू की ओर से जवाब आया, ‘‘ठीक है, जल्द बताती हूं.’’

बात 7 जुलाई, 2020 की है. बलवीर सिंह अपनी बाइक से मोबाइल खरीदने बाजार गया. दोपहर एक बजे के करीब नया मोबाइल खरीद कर वह घर लौटा. बलवीर के घर लौटते ही खुशबू ने हेमंत को फोन कर दिया कि शिकार घर आ गया है. फिर तय योजना के अनुसार, हेमंत ने अपने फोन के ऊपर रुमाल रख कर बलवीर को फोन किया ताकि बलवीर उस की आवाज न पहचान सके. उस ने बलवीर को बाजार में जरूरी काम से मिलने के लिए बुलाया. नंबर अंजान था फिर भी बलवीर बाइक ले कर उस अंजान व्यक्ति से मिलने बाजार चला गया. हो गई योजना पूरी  बाजार में हेमंत, गोली और उस का दोस्त आकाश मिल गए. बलवीर को देखते ही दोनों नाटक करते हुए माफी मांगने लगे और उसे अपनी बातों में उलझा कर बाजार से काफी दूर सुनसान इलाके में ले आए.

गोली और उस का दोस्त आकाश बलवीर को अपनी बातों में उलझाए रहे. तभी हेमंत ने अपने साथ लाए लकड़ी के एक मोटे डंडे से उस के सिर पर पीछे से जोरदार वार किया. सिर पर वार होते ही बलवीर जमीन पर गिर गया. उस के बाद हेमंत ने बलवीर को पिस्टल से 2 गोलियां सिर और सीने में मार दीं. बलवीर की मौत हो गई. फिर तीनों ने बलवीर की लाश गंगावली नहर के किनारे झाड़ी में डाल दी. उसे कोई आसानी से न पहचान सके, इस के लिए आधा लीटर की प्लास्टिक की बोतल में लाया तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया, जिस से उस का चेहरा झुलस गया. उस की बाइक भी उसी झाड़ी में छिपा दी और तीनों अपनेअपने घरों को लौट आए.

हेमंत ने काम पूरा हो जाने के बाद फोन कर के खुशबू को जानकारी दे दी कि हमारे प्यार के रास्ते का सब से बड़ा कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल गया है, अब हमें मिलने से कोई नहीं रोक सकता है. लेकिन मृतक के छोटे भाई राकेश की हिम्मत ने हत्यारों के मंसूबे पर पानी फेर दिया. जेल की सलाखों के पीछे पहुंचने के बाद रानी और खुशबू को अपने किए पर पश्चाताप हो रहा था कि खुद अपने ही हाथों सुखमय गृहस्थी में आग लगा दी, लेकिन अब पछताने से क्या होगा, जो होना था सो हो चुका था.

—कथा में खुशबू परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Extramarital Affair : देवर के इश्क में पत्नी ने कराई पति की हत्या

Extramarital Affair : 3 बच्चों की मां बन जाने के बाद रीना को अपने परिवार की ठीक से देखरेख करनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा करने के बजाए वह अपने देवर के साथ इश्क की पतंग उड़ाने लगी. इसी बीच उस ने एक दिन…

जनपद हरदोई के अतरौली थाना क्षेत्र के गांव बहोइया के रहने वाले रामसिंह की भरावन चौराहे पर दरजी की दुकान थी. उस का विवाह गांव मांझगांव की रीता से हुआ था. बाद में उस से एक बेटा हुआ. लेकिन रीता राम सिंह से उम्र में बड़ी थी, इसी बात को ले कर उस का पत्नी से विवाद होता रहता था. यह विवाद इतना बढ़ गया कि रीता अपने मायके चली गई, तो फिर लौट कर वापस नहीं आई. रामसिंह ने कई सालों तक उस के वापस आने की राह देखी, जब वह वापस नहीं आई तो राम सिंह ने करीब 12 साल पहले गांव बसंतापुर की रीना से विवाह कर लिया. रीना रामसिंह से 10 साल छोटी थी. कालांतर में रीना 2 बच्चों की मां बनी. उस के बड़े बेटे का नाम सौरभ था और छोटे का गौरव. बाद में रीना आंगनवाड़ी में सहायिका के रूप में काम करने लगी.

जैसेजैसे उम्र बढ़ रही थी, रामसिंह का दमखम जवाब देने लगा था. दिन भर दुकान पर खटने के बाद वह घर आता तो रास्ते में दारू के ठेके से दारू पी कर घर लौटता था. घर आ कर खाना खाते ही सो जाता था. उसे बीवी की जरूरतों को पूरा करने की सुध ही नहीं रहती थी. रामसिंह के मकान के बराबर में ही उस के चाचा श्रीपाल रहते थे. श्रीपाल के 2 बेटे थे सोनेलाल उर्फ भूरा और कमलेश. कमलेश लखनऊ में बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. भूरा भरावन चौराहे पर ही एक दुकान पर सिलाई का काम करता था. वह अविवाहित था. रामसिंह और भूरा की उम्र में काफी अंतर था, इस के बावजूद भी दोनों भाइयों में अच्छी पटती थी. एक दिन भूरा अपने साथियों के साथ तालाब में मछलियां पकड़ने गया.

वह काफी मछलियां पकड़ कर लाया. उस ने सोचा क्यों न थोड़ी मछलियां रामसिंह भैया को दे आए. वह मछलियां ले कर रामसिंह के घर पहुंचा तो रीना सब्जी बनाने के लिए बैंगन काट रही थी. थैला उस के आगे रखते हुए भूरा बोला, ‘‘छोड़ो भाभी, ये बैंगनसैंगन काटना. ये लो मस्त मछलियां, इन को साफ कर के पकाओ. आज रात मैं भी खाना यहीं खाऊंगा.’’

रीना ने एक नजर मछलियों पर डाली, फिर होंठों पर मुसकान सजाते हुए बोली, ‘‘भूरा शिकार फंसाने में तो तुम माहिर हो. गजब की मछलियां फंसाई हैं.’’

भूरा ने भी मजाकिया अंदाज में जवाब दिया, ‘‘ये तो छोटीछोटी मछलियां हैं, कोई बड़ी मछली फंसे तो बात बने.’’

‘‘देवरजी, उस के लिए दमदार कांटा होना चाहिए.’’ रीना ने तिरछी नजरों से कामुक वार किया.

‘‘कांटा तो दमदार है भाभी, पर कोई आजमाए तो.’’ भूरा की इस बात पर रीना लजा गई.

मछलियां दे कर भूरा बाहर निकला तो घर के बाहर बैठे राम सिंह ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘आज भाभी मछलियां बनाएंगी और मैं शाम को यहीं आ कर खाना खाऊंगा.’’ भूरा बोला.

‘‘फिर तो दारू मुझे ही मंगानी पड़ेगी. शाम को जल्दी आ जाना.’’ रामसिंह ने कहा. शाम हुई तो रीना ने मछली और रोटियां तैयार कर के रख दीं. इस बीच रामसिंह और भूरा भी आ गए. रामसिंह और भूरा दारू पीते हुए गपशप करने लगे. कितना समय बीत गया, पता ही नहीं चला. रामसिंह ने कुछ ज्यादा ही शराब पी ली. जब वह सुधबुध खोने लगा तो रीना ने कलाई पकड़ कर उसे उठाया और कमरे के अंदर ले जा कर पलंग पर लिटा दिया. पलंग पर ढेर होते ही राम सिंह खर्राटे भरने लगा. भूरा ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘भाभी, भैया कुछ ज्यादा ही पी गए. गलती मेरी भी है, मुझे उन को रोकना चाहिए था. खैर आप भी खाना खा लो. मछलियां बहुत स्वादिष्ट बनाई हैं आप ने, मजा आ गया.’’ भूरा  ने रीना की प्रशंसा की.

रीना ने भरपूर नजरों से भूरा को देखा. भूरा का युवा चेहरा नशे की मस्ती में चमक रहा था. वह बोली, ‘‘तुम्हारे भैया को सचमुच ज्यादा चढ़ गई, पड़ते ही सो गए.’’

‘‘शराब चीज ही ऐसी है, भाभी. कितनी भी थकान हो, गम हो, परेशानी हो, आराम से नींद आ जाती है.’’

रीना ने ठंडी आह भरी, ‘‘हां दारू पी कर लोग थकान उतार लेते हैं. जहां असली नशा हो, वहां नजर भी नहीं डालते.’’

रीना के इन शब्दों में दर्द भी था और आमंत्रण भी. भूरा ने उस की आंखों में आंखें डालीं तो वहां उसे प्यास का समंदर ठाठें मारता दिखा. वह रोमांटिक अंदाज में बोला, ‘‘सच कहती हो भाभी. अब खुद को ही देख लो. आप के पास क्या नहीं है. अपने आप में पूरा मयखाना हो. जिस के रोमरोम में नशा है और भैया घर के मयखाने न देख कर शराब में डूब जाते हैं.’’

‘‘ओह, तो मैं तुम्हें नशे की बोतल लगती हूं.’’ रीना एकदम से भूरा के करीब आ गई. भूरा ने दुस्साहस किया. रीना की कलाई पकड़ कर उसे अपने पास खींच लिया और उस का हाथ अपने सीने पर रखते हुए बोला, ‘‘मेरे दिल से पूछ कर देख लो. यह बता देगा कि तुम कैसी हो. तुम हसीन हो, नशीली हो, मस्त हो.’’

3 बच्चों की मां, जो शरीर सुख से वंचित हो, कोई कुंवारा जवां मर्द उस के हुस्न की तारीफ करे, उस का हाथ थामे तो उस का बहकना स्वाभाविक है. रीना भी भूरा का अंदाज देख कर गदगद हो गई. भूरा ने उस का चेहरा थाम कर अपनी हथेलियों में लिया और अपनी गर्म सांसों से उस के चेहरे को नहलाना शुरू किया तो वह सुधबुध खोने लगी. धीरेधीरे यह खेल अपनी सीमाएं लांघता गया और उन के बीच अनैतिक संबंध बन गए. कुंवारे भूरा ने रीना की व्याकुल देह को उस रात जो सुख दिया, उस से रीना उस की दीवानी हो गई. अब वह अकसर पति रामसिंह की नजरों से बच कर वासना का खेल खेलने लगी.

महीनों बीत गए. उन का खेल इसी तरह चलता रहा. भूरा रीना से ऐसे समय मिलने जाता, जब रामसिंह दुकान पर होता. एक दिन भूरा रीना को अपनी बांहों में समेटे पड़ा था. तभी अचानक रीना ने सास की झलक देखी तो उस ने भूरा को धक्का दे कर परे किया और हड़बड़ा कर उठ बैठी. भूरा पकड़े गए चोर की तरह सिर झुका कर वहां से चला गया. रीना भी सिर झुकाए धरती निहारने लगी. सास राधा देवी का खून खौल रहा था. उस ने आंखें निकाल कर कहा, ‘‘कुलच्छिनी, तू इतनी नीच निकली. अरे, कुछ तो शरम की होती.’’

रीना ने सास के पैर पकड़ लिए, ‘‘अम्मा, इस में मेरा कोई कुसूर नहीं है. भूरा ही न जाने क्यों मेरे पीछे पड़ा रहता है.’’

‘‘पीछे पड़ा रहता है,’’ राधा अपना हाथ नचाते हुए बोली, ‘‘आज मैं ने तेरी चोरी पकड़ ली तो पाकसाफ होने का ढोंग कर रही है. मैं कल ही तेरे बाप को बुला कर तेरी करतूत बताती हूं.’’ सास ने धमकी दी. रीना सास के पैरों में गिर पड़ी. माफी मांगते हुए गिड़गिड़ाई, ‘‘इस बार माफी दे दो अम्मा. आइंदा उस से बात करते भी देखा तो अपने हाथों से मेरा गला घोंट देना.’’

खानदान की इज्जत का सवाल था. इसलिए राधा देवी ने चेतावनी दे कर रीना को माफ कर दिया. बाद में उन्होंने यह बात अपने पति श्यामलाल को जरूर बता दी. बहू की हरकत से श्यामलाल भी सन्न रह गए. उन्होंने राधा से कहा, ‘‘बात अपनी ही इज्जत की है, इसलिए ज्यादा तूल देंगे तो अपनी ही बदनामी होगी. बहू ने अगर गलती मान ली है और दोबारा गलती न करने का भरोसा दिया है तो एक बार उसे सुधरने का मौका देना ही ठीक है.’’

उस दिन से राधा सतर्क हो गई. सासससुर ने यह बात राम सिंह की जानकारी में नहीं आने दी थी. इस के बाद भूरा ने रीना के घर आनाजाना बंद कर दिया.  कुछ दिन दोनों शांत रहे, पर अंदर ही अंदर दोनों बेचैन थे. उन से यह दूरी बरदाश्त नहीं हो पा रही थी. आखिरकार एक दिन दोनों को मौका मिल ही गया. भूरा अपनी ताई राधा की नजरें बचा कर किसी तरह रीना के पास पहुंच गया और हसरतें पूरी कर लौट आया. इस के बाद दोनों को लंबे समय तक मिलन का मौका नहीं मिला. राधा की नजरें हमेशा बहू की पहरेदारी करती रहतीं.

एक दिन शाम को दुकान से वापस आते समय राम सिंह को भूरा मिल गया. राम सिंह ने उस से पूछा, ‘‘भूरा, क्या बात है आजकल तुम मिलते ही नहीं, घर भी नहीं आते.’’

भूरा चौंका. इस का मतलब राधा ताई ने रामसिंह को कुछ नहीं बताया था. भूरा ने तुरंत बहाना ढूंढ लिया, ‘‘अरे भैया, बस ऐसे ही कुछ काम में फंसा हुआ था.’’

‘‘बहुत दिन हो गए हैं, बैठे हुए. कल शाम को आओ, फिर महफिल जमाते हैं.’’

भूरा ने हां तो कर दी, पर उसे डर था कि रामसिंह के साथ उस के घर में खातेपीते देख कर राधा कहीं तूफान न खड़ा कर दे. उस का साहस जवाब दे गया. उस ने राम सिंह के घर न जाने का निश्चय कर लिया. अगले दिन शाम को भूरा घर नहीं पहुंचा तो रामसिंह उसे खुद जा कर पकड़ लाया. इत्तफाक से राधा और श्यामलाल घर पर ही थे. दोनों को देख कर भूरा की नजरें झुक गईं. वे दोनों भूरा को देख कर कुढ़ रहे थे, पर बेटे का भूरा के प्रति अपनत्व देख कर उन्होंने उस वक्त कुछ कहना ठीक नहीं समझा. भूरा ऐसा जाहिर कर रहा था, जैसे उसे अपनी गलती का बहुत पछतावा हो. उस ने रीना को नजर उठा कर भी नहीं देखा.

उस दिन से भूरा के लिए फिर से रीना के घर जाने का रास्ता खुल गया. राधा चाह कर भी रामसिंह को रीना और भूरा के रिश्ते की बात नहीं बता सकी. उस ने इशारोंइशारों में बेटे को समझाना चाहा कि जवान लड़के का यों उस के घर में घुसे रहना ठीक नहीं है. लेकिन रामसिंह भूरा पर कुछ ज्यादा ही विश्वास करता था. उस के इस विश्वास का फायदा उठाते हुए रीना और भूरा फिर से वासना के खेल में डूब गए. अब उन को राधा की भी परवाह नहीं थी. लेकिन एक साल पहले राम सिंह ने दोनों को एक दिन खेत पर रंगरलियां मनाते हुए देख लिया. रामसिंह ने दोनों को जम कर मारापीटा. उस दिन के बाद से रीना और भूरा मोबाइल पर बात कर के अपने मन को समझाने लगे. जब मौका होता, रीना उसे बुला लेती.

भूरा भी रामसिंह के सामने पड़ने से बचने लगा. इस के बाद तो भूरा अपनी दुकान से हट कर कहीं जाता तो रामसिंह उस का पीछा करता कि कहीं वह घर पर रीना से तो मिलने नहीं जा रहा. करीब 8 महीने पहले रीना ने एक बेटी को जन्म दिया लेकिन वह अधिक दिन जीवित नहीं रह सकी. भूरा उसे अपनी बेटी मान रहा था. उस के मरने से वह बहुत दुखी हुआ. 17 जुलाई, 2020 की शाम 7 बजे रामसिंह अपनी दुकान से लौटा. वह शराब पी कर आया था. उस ने खाना खाया, रीना घर पर नहीं थी. उस की बहन शिल्पी आई हुई थी, पता चला कि रीना सुबह ही उसी के साथ मायके बसंतापुर चली गई थी. इसलिए रामसिंह खाना खा कर घर के बाहर चारपाई डाल कर सो गया. दूसरे दरवाजे पर उस के पिता श्यामलाल और रामसिंह के बच्चे सो रहे थे.

18 जुलाई की सुबह साढ़े 5 बजे गांव की महिलाएं बाहर निकलीं तो उन्होंने राम सिंह की चारपाई के नीचे खून पड़ा देखा तो दंग रह गईं. महिलाओं ने शोर मचाया तो रामसिंह के घर वाले व गांव के अन्य लोग वहां एकत्र हो गए. घर वालों ने रीना को खबर करने के बाद अतरौली थाने में घटना की सूचना दे दी. सूचना पा कर इंसपेक्टर संतोष तिवारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. रामसिंह की लाश चारपाई पर पड़ी थी. उस के सिर, चेहरे व पेट पर गहरे घाव थे जो किसी तेज धारदार हथियार के मालूम पड़ रहे थे. घटनास्थल के आसपास का निरीक्षण किया गया तो वहां से करीब 70 मीटर की दूरी पर एक सूखे कुएं में खून से सनी एक कुल्हाड़ी पड़ी दिखी.

इस पर इंसपेक्टर तिवारी ने फोरैंसिक टीम बुला ली. फोरैंसिक टीम ने कुएं से कुल्हाड़ी निकलवा कर उस के हत्थे से फिंगरप्रिंट उठाए. घटना की खबर पा कर रीना भी तुरंत घर वापस आ गई थी. इंसपेक्टर संतोष तिवारी ने घटनास्थल का मुआयना करने के बाद रीना, श्यामलाल व घर के अन्य लोगों से पूछताछ की तो उन्हें आभास हो गया कि हत्या के पीछे किसी करीबी का ही हाथ है. घर वाले जानते हैं लेकिन बता नहीं रहे हैं. आलाकत्ल कुल्हाड़ी का घटनास्थल के पास मिलना दर्शा रहा था कि घटना को अंजाम देने के बाद हत्यारे ने जल्दी में कुल्हाड़ी को कुएं में फेंका और घर जा कर सो गया. फिलहाल इंसपेक्टर तिवारी ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

रीना की तरफ से उन्होंने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इंसपेक्टर तिवारी ने घर वालों से सख्ती से पूछताछ की तो सारी हकीकत सामने आ गई. पूछताछ के बाद उन्होंने 19 जुलाई, 2020 को रीना और सोनेलाल को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया और थाने ला कर उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. रामसिंह के बराबर निगरानी रखने से भूरा और रीना का मिलना मुश्किल होता जा रहा था. घटना से एक महीने पहले भूरा अपनी दुकान से कहीं काम से गया और वापस लौट कर आया तो राम सिंह को शक हुआ कि वह रीना से मिल कर आ रहा है. गुस्से से उबल रहे रामसिंह ने भूरा को कैंची से मारा. अपने आप को बचाने के लिए भूरा ने अपना दायां हाथ आगे किया तो से उस के हाथ में घाव हो गया और खून बहने लगा.

घर आ कर उस ने मोबाइल पर बात कर के रीना को खेत पर बुलाया और उसे अपना हाथ दिखा कर पूरी बात बताई. इस पर रीना ने कहा, ‘‘अब बहुत ज्यादा हो गया. अगर साथ रहना है तो इसे (रामसिंह को) रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.’’

इस के बाद दोनों घर लौट गए. अब भूरा राम सिंह से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा, जिस से उसे विश्वास में ले कर उस की हत्या कर सके. लेकिन राम सिंह शराब पी कर अकसर भूरा को डांट देता था. 17 जुलाई, 2020 की सुबह रीना भूरा से मिली और कहा, ‘‘मैं आज मायके जा रही हूं, मौका देख कर आज इस का काम तमाम कर देना.’’ कह कर रीना चली गई. रीना के जाने के बाद रामसिंह दुकान पर चला गया, उस के पीछे से भूरा भी अपनी दुकान चला गया. शाम को रामसिंह दुकान से सीधे शराब के ठेके पर गया और शराब पी कर घर चला गया. उस के जाने के 10 मिनट बाद भूरा भी शराब पी कर घर चला आया.

शाम 7 बजे खाना खाने के बाद राम सिंह सो गया. रात 10 बजे भूरा ने राम सिंह के बड़े बेटे बिन्नू से कुल्हाड़ी ले कर अपने पास रख ली. रात साढ़े 12 बजे के आसपास भूरा अपने घर से निकला. बीच रास्ते में गाय बंधी थी. किसी तरह की आवाज न हो, इस के लिए उस ने गाय की रस्सी खूंटे से खोल दी, जिस से गाय वहां से चली गई. भूरा रामसिंह की चारपाई के पास पहुंचा और रामसिंह के सिर पर साथ लाई कुल्हाड़ी का एक तेज प्रहार कर दिया. रामसिंह के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई. इस के बाद भूरा ने उस के ऊपर 4 वार किए. रामसिंह की मौत होने के बाद वह पास के एक सूखे कुएं के पास गया और कुल्हाड़ी कुएं में फेंक दी. फिर घर आ कर सो गया.

लेकिन भूरा और रीना का गुनाह कानून की नजर में आ ही गया. कागजी खानापूर्ति करने के बाद दोनों को सक्षम न्यायालय में पेश किया गया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Murder Stories : साला ने पहले जीजा को मौत के घाट उतारा फिर बहन को भी मार डाला

Murder Stories : बिजनैसमैन सुखबीर ने फरीदाबाद में 500 वर्गगज में एक आलीशान कोठी बनाई थी. जिस में वह अपनी पत्नी मोनिका के साथ रहते थे. शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी उन के आंगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी. इसी दौरान ऐसा क्या हुआ कि किसी ने उन की कोठी में घुस कर दोनों की हत्या कर दी और…

रात के लगभग सवा 9 बजे का वक्त था. लेकिन कई बार कालबेल बजाने के बाद भी जब मोनिका ने दरवाजा नहीं खोला तो मनीष को कोफ्त होने लगी. उसे गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि एक तो उस की बहन मोनिका घर पर दूध लेने के लिए नहीं पहुंची थी, दूसरे जब वह खुद दूध देने के लिए आया तो कालबेल की आवाज सुन कर 10 मिनट बाद भी मोनिका और सुखबीर ने दरवाजा नहीं खोला था. आश्चर्य की बात यह थी कि घर का मुख्यद्वार भी अंदर से लौक नहीं था. जीजा सुखबीर ने करीब 15 दिन पहले ही 40 लाख रुपए में औडी क्यू-3 कार खरीदी थी, वह पोर्च में खड़ी थी. सब से बड़ी हैरानी इस बात पर थी कि घर के अंदर और बाहर पूरी तरह अंधेरा था और एक भी लाइट नहीं जल रही थी.

ये सब बातें ऐसी थी कि कोफ्त होने के साथसाथ मनीष का मन आशंका से भी भर उठा था. बहन की इस लापरवाही पर उसे गुस्सा आ रहा था. मनीष ने दरवाजे को जोरजोर से पीटना शुरू कर दिया. 1-2 बार दरवाजे को जोर लगा कर थपथपाया तो अचानक दरवाजा खुल गया और वह अंदर दाखिल हो गया. अंदर घुप्प अंधेरा था. मनीष ने मोबाइल की टौर्च जला कर स्विच बोर्ड तलाश किया और ड्राइंगरूम की लाइट जला दी, जिस से कमरा रोशन हो गया. लेकिन इतना सब होने के बावजूद घर के भीतर कोई हलचल नहीं हुई तो मनीष का दिल किसी अनहोनी के डर से कांपने लगा. क्योंकि ड्राइंगरूम से ले कर कई जगह घर का सामान अस्तव्यस्त पड़ा था. वह दौड़ता हुआ उस कमरे तक पहुंचा, जहां उस की बहन मोनिका का बैडरूम था.

उस ने दरवाजे से लगे बिजली के स्विच बोर्ड से कमरे की बत्ती जलाई तो बैडरूम के अंदर का दृश्य देख कर उस के हलक से हृदयविदारक चीख निकल गई. कमरे के भीतर उस की बहन मोनिका और जीजा सुखबीर के खून से लथपथ शव पड़े थे. दोनों के हाथपांव और मुंह सर्जिकल टेप से बंधे थे. घर की अलमारियां खुली थीं और सारा सामान अस्तव्यस्त था. घर से लाए दूध का डिब्बा मनीष के हाथ से छूट गया और और वह जमीन पर दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गया. कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो वह घर से बाहर दौड़ा और खून…खून चिल्लाता हुआ लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा. कालोनी में रहने वाले लोग दरवाजा खोल कर घर से बाहर आए और मनीष से चिल्लाने का कारण पूछा.

मनीष ने वह सब बयान कर दिया जो उस ने अंदर देखा था. कुछ ही देर में वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. इसी दौरान मनीष ने गांव में रहने वाले अपने परिजनों को भी फोन कर दिया. थोड़ी देर बाद मनीष का पूरा परिवार, गांव में रहने वाले दूसरे रिश्तेदार व अड़ोसपड़ोस में रहने वाले लोगों की भीड़ सुखबीर के घर के बाहर जमा हो गई. मनीष ने सुखबीर के परिवार वालों को भी फोन कर के इस बात की जानकारी दे दी थी. गांव वालों के कहने पर मनीष ने पुलिस कंट्रोल रूम को भी वारदात की सूचना दे दी. 11 अगस्त को जन्माष्टमी के दिन ये वारदात दिल्ली से सटे ग्रेटर फरीदाबाद के गांव जसाना में हुई थी. जिस गांव में वारदात हुई थी, वह फरीदाबाद के तिगांव थाना क्षेत्र में आता है. सूचना मिलने के आधे घंटे बाद तिगांव थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई.

सुखबीर के बड़े भाई ओमबीर और पिता रिछपाल भी अपने परिवार के साथ मौके पर आ गए थे. पुलिस ने सभी घरवालों से एकएक कर के पूछताछ शुरू कर दी. वारदात की जानकारी सब से पहले मनीष को ही मिली थी, लिहाजा पुलिस ने सब से पहले उस से ही पूरी का घटना का ब्यौरा हासिल किया. मनीष ने पुलिस को बताया कि उस की बहन मोनिका (25) की शादी साल 2013 में मूलरूप से फरीदाबाद के ही फतेहपुर चंदीला गांव के रहने वाले सुखबीर (27) के साथ हुई थी. सुखबीर को अपनी फैक्ट्री तक आने के लिए गांव से लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी. उस का इलाका काफी भीड़भाड़ वाला भी था, इसलिए उस ने 2 साल पहले ससुराल वालों की मदद से जसाना गांव के बाहर एक नवनिर्मित बस्ती में 500 गज का प्लौट ले कर उस पर दोमंजिला आलीशान मकान बनवा लिया और मोनिका के साथ यहीं आ कर रहने लगा.

घर में सभी आधुनिक सुखसुविधाएं मौजूद थीं. छत पर एक्सरसाइज के लिए ओपन जिम भी बनवाया था. गांव का दामाद होने के कारण गांव के सभी लोग सुखबीर को पाहूना या रिश्तेदार कह कर संबोधित करते थे. सुखबीर मिलनसार और हंसमुख स्वभाव का था इसलिए सभी उस की बहुत इज्जत करते थे. उस की बेदर्दी से हुई हत्या से सभी दुखी थे. करीब 15 दिन पहले ही सुखबीर ने औडी क्यू-3 कार खरीदी थी. इस कार की कीमत 35 से 40 लाख रुपए है. कार लेने के बाद सुखबीर ने अपने घर पर इस की पार्टी भी दी थी, जिस में उस की ससुराल वालों के अलावा घर के लोग भी शामिल हुए थे. सुखबीर ने अपने पिता व भाई की मेहनत व लगन के बूते काफी कम समय में अच्छी तरक्की की थी. गांव बड़खल में उन की लिक्विड फिलिंग मशीनें बनाने की फैक्ट्री है, जिसे वे सब खुद संभालते थे.

सुखबीर सीए भी कर चुका था. इसलिए फैक्ट्री के एकाउंट का काम भी वह खुद ही संभालता था. जबकि उस की पत्नी मोनिका गृहिणी थी. सुखबीर के भाई ओमबीर और पिता रिछपाल सप्ताह में कम से कम एक बार सुखबीर और मोनिका का हालचाल लेने गांव जसाना जरूर जाते थे. फोन पर भी उन की दोनों से रोजाना बातचीत होती थी. कुल मिला कर सुखबीर के घर में काफी प्रेम था. पतिपत्नी भी एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. बस कमी थी तो यह कि शादी को 7 साल होने के बावजूद सुखबीर व मोनिका के घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी.

11 अगस्त को सुबह से ही सुखबीर के पेट में दर्द था इसलिए मोनिका के कहने पर वह उस दिन फैक्ट्री नहीं गया और घर पर आराम करता रहा. दिन भर आराम करने के बावजूद जब पेट की तकलीफ कम नहीं हुई तो मोनिका सुखबीर को सुबह 11 बजे दवा दिलाने के लिए अपने साथ डाक्टर के पास ले गई. वहां से दोनों एक घंटे बाद घर लौट आए थे. चूंकि जसाना गांव मोनिका का मायका था और घर में दूध का काम होता था लिहाजा उस का दूध मायके से ही आता था. मोनिका रोज शाम को घर की डेरी पर ही दूध लेने जाती थी. लेकिन 11 अगस्त को सुखबीर की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण वह दूध लेने के लिए नहीं जा सकी. पिता रामबीर से उस ने फोन कर के कह दिया था कि शाम को कोई घर की तरफ आए तो खुद ही दूध भिजवा दें.

रात को 9 बजे जब उन का छोटा बेटा मनीष गांव के घेर में सोने के लिए जाने लगा तो उन्होंने उस से कहा कि जाते वक्त दूध का डिब्बा मोनिका के घर पकड़ा देना. दूध का वही डिब्बा देने के लिए मनीष मोनिका के घर आया था. लेकिन वहां बहन और जीजा की लाशें देख कर उस के होश उड़ गए. जब वह घर पहुंचा तो देखा सभी लाइटें बंद थी और अंदर दोनों की लाशें पड़ी थीं. रात के 12 बजे तक फरीदाबाद के पुलिस कमिश्नर ओ.पी. सिंह और क्राइम ब्रांच के अधिकारी भी मौके पर आ गए. डौग स्क्वायड के साथ फोरैंसिक टीम भी जांचपड़ताल में जुट गई. घर के हर कोने से बदमाशों की पहचान के लिए फिंगरप्रिंट तथा सबूत एकत्र किए जाने लगे. घर वालों से अब तक की पूछताछ में जो जानकारी हासिल हुई थी, उस से लग रहा था कि बदमाशों ने इस वारदात को लूटपाट के लिए अंजाम दिया था.

सुखबीर व उस की पत्नी इतने बड़े मकान में अकेले रहते थे. उन के घर तथा महंगी गाड़ी को देख कर किसी को भी उन की हैसियत का अंदाजा लग सकता था. इसलिए पहली नजर में लग रहा था कि लूटपाट करने वाले बदमाशों ने ही वारदात को अंजाम दिया होगा. वैसे भी घर में जिस तरह से सारी अलमारियां खुली हुई थीं, घर के कीमती जेवरात लापता थे, उस से भी यही लगता था. जहां तक सुखबीर की किसी से रंजिश की बात थी तो परिवार वालों ने साफ कर दिया था कि सुखबीर की किसी से भी आज तक कोई रंजिश नहीं रही. बस एक बात ऐसी थी, जिस ने पुलिस को उलझा कर रख दिया था. वह यह कि अगर बदमाशों ने घर में घुसने के बाद सुखबीर तथा मोनिका को काबू में कर के उन के हाथपांव और मुंह सर्जिकल टेप से बांध दिए थे तो वे लूटपाट करने के बाद आराम से भाग सकते थे.

बदमाश और लुटेरे आमतौर पर किसी की हत्या तभी करते हैं, जब उन का विरोध होता है. लेकिन यहां तो सुखबीर तथा मोनिका के बंधे होने के कारण विरोध की संभावना ही नहीं थी. इस का मतलब साफ था कि बदमाशों को पता था कि अगर वे उन्हें जिंदा छोड़ कर गए तो पकड़े जा सकते हैं. ऐसा भी तभी होता है जब बदमाश पीडि़त का कोई जानकार होता है. एक दूसरी बात यह भी थी कि बदमाश वारदात को अंजाम देने के बाद घर में लगे सीसीटीवी कैमरे का डीवीआर उखाड़ कर ले गए थे. ऐसा तभी होता है जब बदमाश पहचान वाला हो और सीसीटीवी की फुटेज से आसानी से पहचाने जाने के डर से आशंकित हो.

मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों को इस बात का पूरा यकीन हो गया कि हो न हो इस वारदात के पीछे सुखबीर या मोनिका के किसी जानकार का ही हाथ है. सुखबीर व मोनिका की हत्या सिर में गोली मार कर की गई थी. कई घंटे की जांचपड़ताल तथा परिवार वालों से की गई पूछताछ के बाद तिगांव थाना पुलिस ने सुखबीर व मोनिका के शवों को पोस्टमार्टम के लिए बी.के. अस्पताल भिजवा दिया और अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंसं की धारा 302, 395 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस कमिश्नर ओ.पी. सिंह ने उसी रात इस केस को सुलझाने का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंप दिया और एक विशेष टीम का गठन भी कर दिया. विशेष टीम में सीआईए सेक्टर-30 के इंचार्ज विमल कुमार, सेक्टर-85 सीआईए प्रभारी सुमेर सिंह, डीएलएफ प्रभारी सुरेंद्र व एनआईटी क्राइम ब्रांच प्रभारी को शामिल किया गया.

डीसीपी (क्राइम) मकसूद अहमद ने खुद इस केस की मौनिटरिंग का काम संभाला और एसीपी (क्राइम) अनिल कुमार तथा एसीपी (तिगांव) को विशेष टीमों की अगुवाई करने का जिम्मा सौंपा गया. एसीपी धारणा यादव को भी विशेष टीम की अगुवाई करने का जिम्मा दिया गया था. मामला चूंकि सीधे पुलिस कमिश्नर की दिलचस्पी का केंद्र बन गया था, इसलिए अगली सुबह से विशेष टीम ने अलगअलग बिंदुओं को आधार बना कर जांचपड़ताल करने का काम तेजी से शुरू कर दिया. बदमाश घर से कितनी नकदी व जेवरात लूट कर ले गए गए थे, यह तो पुलिस को कोई नहीं बता सका लेकिन ये साफ था कि घर में लूटपाट जरूर हुई थी. इतना ही नहीं, बदमाश सुखबीर व मोनिका के मोबाइल भी लूट ले गए थे, क्योंकि पुलिस को काफी तलाश करने पर भी मोबाइल घर में नहीं मिले थे. दोनों मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहे थे. घर से सुखबीर का लैपटाप भी गायब था.

इधर, बदमाशों ने घर के सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए और डीवीआर उखाड़ कर ले गए थे. लेकिन पुलिस को यकीन था कि आसपास के किसी मकान में सीसीटीवी जरूर लगा होगा, जिस से बदमाशों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है. पुलिस ने जब सीसीटीवी की जानकारी हासिल कर उन्हें खंगालने का काम शुरू किया तो सुखबीर के मकान से 2 मकान छोड़ कर एक दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी की फुटेज में पुलिस को वह फुटेज मिल गई, जिस में बदमाश आतेजाते दिख रहे थे. इस फुटेज से पता चला कि 11 अगस्त, 2020 की दोपहर 1 बज कर 37 मिनट पर 4 युवक 2 बाइकों से मकान के पास गली में आए. उन्होंने बाइकों को मकान से कुछ दूर खड़ा किया. वे घर के भीतर करीब 42 मिनट तक रहे, जिस के बाद वे 2 बज कर 18 मिनट पर वापस जाते दिखे.

2 युवक पहले घर से निकले, जिन्होंने बाइक स्टार्ट की और मकान के पास आ कर खड़े हो गए. कुछ ही देर बाद 2 युवक मकान में से भागते हुए आए और बाइकों पर बैठ गए. जिस के बाद वे फरार हो गए. वारदात की फुटेज और बदमाशों के सीसीटीवी कैमरे में कैद हो जाना पुलिस के लिए संजीवनी की तरह काम आया. पुलिस ने इन सीसीटीवी फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया. हालांकि इन फुटेज में किसी भी मोटरसाइकिल का नंबर तो साफ नहीं दिख रहा था. लेकिन चेहरे रूमाल से ढके होने के बावजूद उन्हें पहचानने में कोई परेशानी नहीं थी. मोनिका व सुखबीर दोनों के घर वालों को बुला कर पुलिस ने वह फुटेज दिखाई तो मनीष ने देखते ही साफ कर दिया कि उन चारों बदमाशों में से एक बदमाश का हुलिया उस के बड़े भाई ब्रह्मजीत की पत्नी उषा (परिवर्तित नाम) के भाई विष्णु से काफी मिलताजुलता है.

जब पुलिस ने उषा व ब्रह्मजीत को वह फुटेज दिखाई तो वे घबरा गए. उन्होंने बताया कि हुलिया विष्णु से मिलताजुलता जरूर है, लेकिन वह अपने ही जीजा की बहन के घर पर ऐसी वारदात क्यों करेगा. विष्णु के वारदात में शामिल होने की पुष्टि करने के लिए पुलिस ने मोनिका के घर वालों से विष्णु का फोन नंबर तथा घर का पता सब हासिल कर लिया. पुलिस ने विष्णु को दबोचने की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन इस से पहले पुलिस ने विष्णु के फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. क्योंकि पुलिस यह विश्वास कर लेना चाहती थी कि जिस बदमाश के विष्णु होने की शंका जताई जा रही है वो असल में विष्णु है भी या नहीं.

काल डिटेल्स सामने आई तो पता चला कि सीसीटीवी फुटेज में जिस वक्त 4 बदमाश सुखबीर के घर में वारदात करने के लिए घुसे थे, उस वक्त विष्णु के मोबाइल की लोकेशन सुखबीर के घर पर ही थी. इस से साफ हो गया कि इस वारदात में विष्णु शामिल था. पुलिस के लिए इस वारदात का खुलासा करने के लिए यह एक बड़ी लीड थी. पुलिस की एक टीम ने दिल्ली का रुख किया. विष्णु दिल्ली के भजनपुरा में रहता था. पुलिस की टीम ने उसे रात के वक्त सोते हुए उस के घर से ही दबोच लिया. विष्णु को फरीदाबाद के तिगांव थाने में ला कर जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कुबूल कर लिया कि सुखबीर व मोनिका की हत्या उस ने मेरठ के किला परीक्षितगढ़ के रहने वाले अपने 3 साथियों के साथ मिल कर की थी. इस वारदात को उस ने अपने जीजा यानी बहन उषा के पति ब्रह्मजीत के कहने पर अंजाम दिया.

एक भाई आखिर अपनी बहन और उस के पति की हत्या क्यों करवाएगा? पुलिस को यह बात थोड़ी अटपटी लगी. लेकिन जब विष्णु से गहराई से पूछताछ हुई और उस ने कारण बताया तो पुलिस भी चौंकी. पुलिस को यकीन हो गया कि ब्रह्मजीत ही इस हत्याकांड का असली मास्टरमाइंड है. लिहाजा पुलिस ने उसी रात ब्रह्मजीत को भी हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू की और जल्द ही विष्णु के तीनों साथी सोनू, यतिन उर्फ छोटू और कुलदीप कुमार उर्फ कैलाश सिंह को भी मेरठ से गिरफ्तार कर लिया.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद सुखबीर व मोनिका हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. सुखबीर चूंकि पिछले 2 साल से अपनी ससुराल जसाना में ही मकान बना कर रहने लगा था. इसलिए अपनी ससुराल वालों के घर में उस का बेधड़क आनाजाना था. पुराने और गांवदेहात के लोग आज भी घर के दामाद को बड़ा मान देते हैं. सुखबीर की पत्नी मोनिका के 2 भाई हैं मनीष और ब्रह्मजीत. दोनों ही शादीशुदा हैं और दोनों लंबेचौड़े घर में अलगअलग हिस्सों में रहते हैं. सुखबीर अपने दोनों सालों के घर में बेधड़क आताजाता था. ब्रह्मजीत की पत्नी उषा देखने में परिवार की दूसरी महिलाओं से कुछ ज्यादा सुंदर थी. लिहाजा सुखबीर उस के घर कुछ ज्यादा और बेधड़क आताजाता था. उषा भी खुले स्वभाव की थी.

चूंकि सुखबीर उस की ननद का पति था, इसलिए वह उस का बेहद सम्मान करती थी. लेकिन जब कभी सुखबीर उस के साथ हंसीमजाक करता तो वह भी उस से हंसीमजाक कर लेती थी. हुआ यूं कि करीब 2 महीने पहले सुखबीर जब ब्रह्मजीत के घर पहुंचा तो वह घर में नहीं था और उस की पत्नी नहाने के लिए बाथरूम में थी. सुखबीर सोफे पर बैठ कर उस के बाहर आने का इंतजार कर रहा था कि उस की नजर सामने पड़े उषा के मोबाइल फोन पर पड़ी. उत्सुकतावश उस ने उषा का फोन उठा लिया और उसे चैक करने लगा. उस ने उत्सुकता में ही फोन उठा कर परिवार की फोटो तथा वीडियो देखना शुरू कर दिया. अचानक कुछ ऐसी वीडियो और फोटो देख कर उस के होश उड़ गए, जिस में उषा ने अपने निजी पलों की ऐसी तसवीरें तथा वीडियो बनाए हुए थे, जिस में वह पूरी तरह या तो निर्वस्त्र थी या उस के शरीर पर बहुत कम कपडे़ थे.

सुखबीर की पत्नी मोनिका भी हालांकि बेहद खूबसूरत थी लेकिन ब्रह्मजीत की पत्नी उषा जिसे वह भाभी कहता था, अपने कदकाठी और छरहरे बदन के कारण हमेशा उस के आकर्षण का केंद्र रही. उस दिन सुखबीर ने जब उषा की ऐसी फोटो तथा वीडियो क्लिप देखीं तो उस की आंखों में उषा के प्रति कामना के डोरे तैरने लगे. मन में उषा को अपना बनाने की तमन्ना का ज्वार फूटने लगा. हालांकि किसी की इजाजत के बिना चोरीछिपे उस का मोबाइल देखना एक तरह गलत काम है. लेकिन उस दिन पूरे परिवार की इज्जत का तारा बना सुखबीर यह पाप कर बैठा. उस ने उषा के बाथरूम से आने के पहले ही उस के मोबाइल में पड़ी उस की निजी पलों की फोटो और वीडियो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर लीं और ट्रांसफर हिस्ट्री को डिलीट कर दिया ताकि किसी को पता न लगे.

उस वक्त सुखबीर को नहीं पता था कि उस ने किस मकसद से उषा के फोटो और वीडियो अपने फोन में ट्रांसफर किए हैं. लेकिन कुछ दिन बाद जब उस ने एकांत में उन तसवीरों और क्लिप को देखना शुरू किया तो उस के मन में उषा को पाने की लालसा जाग उठी. आखिर एक दिन सुखबीर जब ब्रह्मजीत के घर गया और उस ने उषा को अकेला पाया तो उस ने अपने दिल की बात उषा से कह दी. दरअसल, उस दिन सुखबीर ने उषा से ऐसी द्विअर्थी बातचीत शुरू की जिस से उषा भी अचकचा गई. सुखबीर ने उषा से उस के छरहरे बदन, उस के सांचे में ढले जिस्म की तारीफें इस तरह करनी शुरू कर दीं कि उषा ने पूछ ही लिया, ‘‘जीजाजी, आज आप ये कैसी बहकीबहकी सी बातें कर रहे हैं?’’

सुखबीर ने मौका देख कर खुल कर बताने की जगह अपना मोबाइल खोल कर उषा को उस की तसवीरें और वीडियो दिखानी शुरू कर दीं और बोला, ‘‘उषा भाभी, आप की ऐसी तसवीरें देख कर तो विश्वामित्र की तपस्या भी भंग हो सकती है हम तो वैसे भी आप के हुस्न के पहले से कद्रदान हैं. भाभी, कभी हम पर भी अपने इस हुस्न की बरसात कर दो.’’

दरअसल सुखबीर को लगा था कि अपने फोन से उषा को उसी की आपत्तिजनक तस्वीरें दिखाने से उषा की उस के प्रति हिचक दूर हो जाएगी और वह शरमातेसकुचाते हुए उस के अंकपाश में आ जाएगी. लेकिन हुआ इस का उलटा. उस दिन उषा की सुखबीर से खूब बहस हुई. उस ने सुखबीर की खूब लानतमलामत की और उसे चेतावनी दी कि अगर उस ने अपने मोबाइल से चोरी से ट्रांसफर की गई उस की फोटो और वीडियो डिलीट नहीं कीं तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा. सुखबीर को उषा के ऐसे रिएक्शन की उम्मीद नहीं थी. लेकिन उसे उम्मीद थी कि अगर वह थोड़ा सा और प्रयास करेगा तो उषा उस की बाहों में जरूर आ जाएगी. उस ने उषा की फोटो तथा वीडियो तो डिलीट नहीं कीं, लेकिन इस के बाद उषा से ऐसे वक्त पर फोन कर के बातचीत जरूर शुरू कर दी, जब वह घर में अकेली होती थी.

वह सब बातें वाट्सऐप काल के जरिए करता था. उस ने उषा पर दबाव डालना शुरू कर दिया कि अगर उस ने उस का दिल नहीं बहलाया तो हो सकता है वह उस की ये फोटो और वीडियो कुछ ऐसे लोगों तक पहुंचा दे, जिस से उस का जीना मुश्किल हो जाए और दुनिया भर में उस की बदनामी हो जाए. इस बात को ले कर उषा अकसर तनाव में रहने लगी. इसी दौरान ब्रह्मजीत को भी उषा के बदले हुए व्यवहार तथा उस के तनाव में रहने का अहसास हुआ. जब उस ने पत्नी उषा से इस की वजह पूछी तो उषा अपने दिल में भरे गुबार को रोक न सकी. उस ने पति को ननदोई सुखबीर की सारी बात बता दी कि वह किस तरह उसे ब्लैकमेल कर रहा है.

किसी भी पति के लिए पत्नी की इज्जत सब से बड़ी चीज होती है. लेकिन मुश्किल यह थी कि इस हरकत को करने वाला भी कोई गैर नहीं, बल्कि एकलौती बहन का पति था. उस ने उषा को समझाया कि फिलहाल वह चुप रहे, वह जल्द ही कोई रास्ता निकालेगा. इसी तरह कई दिन बीत गए. दूसरी तरफ सुखबीर फोन कर के उषा को हर दिन ब्लैकमेल कर के अपना दबाव बढ़ाता जा रहा था. इसी बीच 3 अगस्त को रक्षाबंधन आ गया. चूंकि उषा का तनाव के कारण मन ठीक नहीं था, इसलिए उस ने अपने भाई विष्णु से कह दिया कि वह इस बार घर नहीं आ सकेगी. वह राखी बंधवाने खुद ही आ जाए.

उषा का भाई विष्णु जब रक्षाबंधन पर उस के पास आया तो बहन के चेहरे पर फैली उदासी तथा तनाव उस से छिप नहीं सका. उस ने अपनी कसम दे कर उषा से पूछ ही लिया कि ऐसी कौन सी बात है जिस की वजह से वह परेशान है. न चाहते हुए भी उषा को भाई से सुखबीर की तरफ से उसे ब्लैकमेल किए जाने की सारी बात बतानी पड़ी. किसी भाई के लिए रक्षाबंधन के दिन उस की बहन की अस्मत पर आंच आने की बात पता चलना कितनी बड़ी पीड़ा होती है, यह कोई उस दिन विष्णु के दिल से पूछ सकता था. सुखबीर की इस घिनौनी हरकत को जान कर उस का खून खौल उठा लेकिन उस की बहन उषा ने उसे अपनी कसम दे कर शांत कर दिया.

उस दिन विष्णु को सुखबीर से ज्यादा गुस्सा अपने जीजा ब्रह्मजीत पर आया. उस ने अपने जीजा को खूब लानत दी और धिक्कारा कि पत्नी के इतने बड़े अपमान के बाद भी किस तरह उस का खून ठंडा पड़ा है.

‘‘ऐसा नही है विष्णु कि मेरा खून ठंडा पड़ा है. मेरा मन तो चाहता है कि उस कमीने को अभी जा कर खत्म कर दूं लेकिन फिर सोचता हूं कि अगर मैं ने जोश में ये काम कर दिया तो मुझे पुलिस पकड़ लेगी.

‘‘फिर उषा का क्या होगा. क्योंकि सब जानते हैं कि वह मेरा जीजा है…कितनी भी सफाई से काम करूं लेकिन भेद तो देरसबेर खुल ही जाएगा.’’

बात विष्णु की भी समझ में आ गई. उस ने जीजा से कहा, ‘‘तुम कहो तो मैं ऐसे लोगों का इंतजाम कर दूं कि वे इस हरामजादे का काम तमाम कर दें.’’

‘‘कोई है तुम्हारी नजर में तो देखो.क्योंकि उषा की इस बेइज्जती के बाद से मेरी रातों की नींद उड़ी हुई है.’’ ब्रह्मजीत ने कहा.

लेकिन साथ ही उस ने यह भी कहा कि उस के पास इस काम को करने वाले लोगों को देने के लिए पैसा नहीं है. लेकिन उन्हें सुखबीर के घर में इतना माल तो मिल ही जाएगा कि उन्हें काम करने का मलाल नहीं होगा. क्योंकि उस के पास पैसे की कोई कमी नहीं है. उस दिन ब्रह्मजीत और विष्णु ने सुखबीर की हत्या का पूरा मन बना लिया और विष्णु दिल्ली आने के बाद इस काम के लिए भाडे़ के हत्यारे जुटाने में लग गया. सब से पहले उस ने हत्या के लिए 2 तंमचे व कारतूस खरीदे तथा उन्हें ला कर अपने जीजा को दे गया. इस के बाद उस ने अपने 3 पुराने जानकारों मेरठ के परीक्षितगढ़ निवासी सोनू, यतिन उर्फ छोटू व कुलदीप कुमार उर्फ कैलाश सिंह से इस बारे में बात की.

दरअसल, विष्णु अवैध शराब की तस्करी के धंधे से जुडा था. मेरठ के उस के तीनों दोस्त भी इसी धंधे में थे और कभीकभी उस से माल खरीदते थे. विष्णु ने उन से बताया कि उस की बहन को उस का ननदोई कुछ गलत फोटो और वीडियो दिखा कर ब्लैकमेल कर रहा है. वह चाहता है कि वे तीनों बहन के ननदोई की हत्या करने में उस की मदद करें. उन्हें घर से इतना माल मिल जाएगा कि इस काम के लिए उन्हें पछताना नहीं पडे़गा. माल मिलने और बहन की खातिर दोस्त की मदद करने के नाम पर सोनू, छोटू व कुलदीप इस काम को करने के लिए तैयार हो गए. बस इस के बाद विष्णु ने जीजा ब्रह्मजीत के साथ मिल कर सुखबीर की हत्या का पूरा तानाबाना बुन लिया.

वारदात को अंजाम देने से पहले एक दिन शाम के वक्त तीनों ने विष्णु के साथ आ कर सुखबीर के घर का निरीक्षण भी कर लिया. उस के बाद उन्होंने परतापुर इलाके से 2 मोटरसाइकिल चुराईं. जन्माष्टमी के दिन वारदात करने के लिए चुना और उस दिन चोरी की दोनों मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर विष्णु अपने तीनों दोस्तों के साथ जसाना गांव पहुंच गया. गांव के बाहर ब्रह्मजीत से उन की मुलाकात हुई. उस ने चारों को पहले से खरीदे गए तमंचे और एक पिस्टल दिया. इस के बाद ब्रह्मजीत अपने घर चला गया और बाकी चारों लोग अपना काम करने के लिए सुखबीर के घर पहुंच गए.

संयोग यह था कि सुखबीर जहां रहता था, वह गली सुनसान रहती थी. इसलिए उन्हें वहां आते किसी ने नहीं देखा. उन्होंने घर में घुसते ही सुखबीर तथा मोनिका को बंधक बना लिया. बड़ी सर्जिकल टेप से दोनों के हाथपांव बांध दिए. फिर घर में लूटपाट की. घर में जो भी गहना व नकदी मिली उसे एक बैग में भर लिया और बाद में सुखबीर तथा मोनिका को गोली मार दी. हालांकि ब्रह्मजीत ने कहा था कि उन्हें मुंह पर कपड़ा बांध कर केवल सुखबीर की हत्या करनी है. लेकिन मोनिका ने वारदात के दौरान विष्णु का चेहरा देख लिया और पहचान लिया था. इसलिए उन्होंने पकड़े जाने के डर से मोनिका की भी हत्या कर दी थी.

चूंकि सुखवीर जिस जगह पर मकान बना कर रहता था, वहां पर आसपास और पीछे के एरिया में सभी प्लौट खाली थे. जबकि सामने पड़ोस में रहने वाले मकान मालिक घटना के समय घर पर नहीं थे. यह परिवार किसी काम से बाहर गया हुआ था. किसी ने भी गोली चलने की आवाज नहीं सुनी. लेकिन उन के घर के बाहर बनी एक दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में बदमाशों के आने की सारी रिकार्डिंग हो गई. वारदात को अंजाम देने के बाद उन्होंने घर में रखा एक लैपटौप, सुखबीर व मोनिका के मोबाइल फोन तथा सीसीटीवी का डीवीआर भी उखाड़ कर बैग में भर लिया और सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए.

क्योंकि ब्रह्मजीत ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि सुखबीर के घर में सीसीटीवी लगा है. इस से उन्हें लगा कि अब उन्हें कोई नहीं पकड़ पाएगा. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि पड़ोस के मकान में लगा सीसीटीवी उन के अपराध की चुगली कर देगा. 13 अगस्त को जरूरी पूछताछ के बाद पुलिस ने पांचों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 3 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. हिरासत में पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयोग किए गए 2 देसी तमंचे, 1 पिस्तौल, एक जिंदा कारतूस और एक चोरी की मोटरसाइकिल मेरठ शहर के पास मेन रोड पर झाड़ी से बरामद कर ली.

दूसरी मोटरसाइकिल पास ही दूसरी झाड़ी में मिली जो उन्होंने मेरठ के थाना परतापुर एरिया से चोरी की थी. आरोपी विष्णु के घर से सैमसंग फोन, सोने की एक चेन और 1200 रुपए नकद बरामद किए गए.  आरोपी कुलदीप से एक हजार रुपए नकद, सोने के एक जोड़ी झुमके, चांदी की एक चेन उस की बहन की ससुराल से बरामद की. आरोपी सोनू से एक लूटा हुआ लैपटौप एक मोबाइल फोन सिम कार्ड के साथ 2 हजार रुपए नकद बरामद किए गए. आरोपी जतिन से सोने के एक जोड़ी झुमके, डकैती के 2 हजार रुपए और वारदात में पहने हुए कपड़े बरामद किए गए. इस के साथ ही उस का खुद का एक मोबाइल और सिम भी बरामद किया गया.

पूछताछ में विष्णु ने बताया कि हत्या के बाद सुखबीर का मोबाइल वह अनलौक नहीं कर पा रहा था. सुखवीर के मोबाइल और लैपटौप में उस की बहन की अश्लील तसवीरें थीं. इसी वजह से हत्या के बाद विष्णु उसे साथ ले गया था. पुलिस ने दोनों मोबाइल और लैपटौप उस के पास से ही बरामद किए. सुखबीर की हत्या उस के ही घर में करने की प्लानिंग ब्रह्मजीत ने इसीलिए रची थी कि भाड़े पर लाए गए शूटरों को पैसे न देने पड़ें. उन्होंने लूटा हुआ माल सुपारी के तौर पर शूटरों को ही रखने का लालच दिया था. लेकिन बदमाशों को दुर्भाग्य से वहां से ज्यादा नकदी और गहने नहीं मिले. ब्रह्मजीत ने ही उस दिन विष्णु को सुखबीर के घर पर होने की जानकारी दी थी.

पुलिस ने 16 अगस्त, 2020 को मुकदमे में शस्त्र अधिनियम तथा साजिश की धारा जोड़ कर पांचों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें नीमका जेल भेज दिया गया है. दूसरी तरफ मृतक सुखबीर के बड़े भाई सतबीर चंदीला ने मीडिया के सामने खुलासा किया है कि उन के भाई पर साले की पत्नी से ब्लैकमेलिंग का झूठा आरोप लगा कर जानबूझ कर बदनाम किया है. उन्होंने बताया कि सुखबीर ने खुद अपनी पत्नी और ससुराल वालों से भाभी की शिकायत की थी कि वह उसे अश्लील तसवीरें भेजती है. इस बात को ले कर रक्षाबंधन से पहले सुखबीर के ससुराल में तीखी नोंकझोंक भी हुई थी.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों के बयानों पर आधारित

 

Crime Stories : पत्रकारिता की आड़ में चल रहा था देह व्यापार का धंधा

Crime Stories : मुगलों के समय से चला आ रहा देह व्यापार थमा कभी नहीं. हां, वक्त और जरूरत के हिसाब से इस के रंगरूप और ठिकाने जरूर बदलते रहे. अब यह व्यापार ऐसा बन गया है, जिस की जड़ें हर शहर तक फैली हैं. कानपुर में…

एस एसपी अनंत देव तिवारी को पिछले कुछ दिनों से जानकारी मिल रही थी कि  कानपुर शहर में कुछ फरजीपत्रकार सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे हैं. इस देह व्यापार से मोटी कमाई होती है. यह भी पता चला कि पत्रकारिता की आड़ में ये लोग स्थानीय थाना और चौकी पुलिस पर भी रौब गांठते हैं. दिन में ये लोग पुलिस के साथ उठतेबैठते हैं और रात में देह व्यापार का धंधा चलाते हैं. पौश इलाकों में महंगा मकान या फ्लैट किराए पर ले कर ये लोग कालगर्लों को बुलाते हैं और उन की बुकिंग करते हैं. चूंकि उन का उठना बैठना पुलिस वालों के साथ होता है, इसलिए पासपड़ोस के लोग उन के गलत धंधों की जानकारी पुलिस को देने में कतराते हैं.

पत्रकारों को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है. लेकिन कुछ कथित पत्रकार गलत कामधंधे कर गौरवपूर्ण पत्रकारिता को बदनाम करने पर तुले हुए थे. ऐसे कथित पत्रकारों के खिलाफ एसएसपी अनंत देव ने कड़ी कारवाई करने का निश्चय किया. इस के लिए उन्होंने पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाई. इस बैठक में एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल, एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार, सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव और सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान ने भाग लिया. एसएसपी अनंत देव ने पुलिस अधिकारियों को जानकारी दी कि कानपुर शहर में देह व्यापार का धंधा फैल रहा है. इस धंधे का संचालन कुछ फरजी पत्रकार कर रहे हैं.

आप लोग इस बात को गंभीरता से ले कर मुखबिरों के जरिए पता लगाएं कि देह व्यापार का धंधा शहर के किन क्षेत्रों में हो रहा है. फरजी पत्रकार निर्बाध रूप से किस के संरक्षण में धंधा कर रहे हैं. एसएसपी साहब ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर स्थानीय थाना या चौकी पुलिस की संलिप्तता पाई जाए तो उन के खिलाफ भी काररवाई करें. फरजी पत्रकारों की गिरफ्तारी में कोई सफेदपोश नेता बाधा डाले तो उसे गिरफ्तार कर लें. जितना जल्दी हो सके सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ करें और फरजी पत्रकारों को गिरफ्तार कर लें. एसएसपी के आदेश पर एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल ने थाना नवाबगंज, कोहना, कर्नलगंज तथा स्वरूपनगर के थाना प्रभारियों से सख्त लहजे में कहा कि वे अपनेअपने थाना क्षेत्रों में खबरियों के जरिए पता लगाएं कि देह व्यापार का धंधा कहां चल रहा है.

उस का संचालक कौन है और कब से इस धंधे में लिप्त है. आदेश के मुताबिक सभी ने अपनेअपने क्षेत्र में मुखबिरों का जाल फैला दिया. इसी तरह एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने भी थाना गोविंद नगर, नौबस्ता तथा बर्रा के थाना प्रभारियों के साथ मीटिंग की और क्षेत्र में चल रहे देह व्यापार के धंधे के संबंध में मुखबिरों के जरिए जानकारी जुटाने का आदेश दिया. आदेश पाते ही थाना प्रभारियों ने मुखबिरों को सतर्क किया और खुद भी पता लगाने में जुट गए. 28 मई, 2020 की शाम 5 बजे कोहना थानाप्रभारी प्रभुकांत क्षेत्रीय गश्त पर निकलने वाले थे, तभी उन के खास मुखबिर ने उन के कक्ष में प्रवेश किया. उस के चेहरे पर मुसकान थी, जिस से उन्हें समझते देर नहीं लगी कि वह कोई खास खबर लाया है. फिर भी उन्होंने पूछा, ‘‘कोई खास बात?’’

‘‘हां हुजूर, खास बात ही है. तभी तो आप के सामने हाजिर हुआ हूं.’’

‘‘तो फिर बताओ, क्या बात है?’’

‘‘हुजूर, आर्य नगर मोहल्ले के मकान नंबर 8/58 में देह व्यापार का धंधा फलफूल रहा है. रैकेट चलाने वाला कथित पत्रकार है मोहम्मद यूनुस. उस ने यह मकान किराए पर ले रखा है. विगत एक साल से वह इसी जगह धंधा चला रहा है.’’

मुखबिर की बात सुन कर थानाप्रभारी प्रभुकांत चौंके. उन्हें यह जान कर आश्चर्य हुआ कि उन के थाना क्षेत्र में एक साल से देहव्यापार का धंधा चल रहा और उन्हें कानोंकान खबर नहीं लगी. प्रभुकांत एसपी (पूर्वी) कार्यालय पहुंचे और मुखबिर की जानकारी से राजकुमार अग्रवाल को अवगत कराया. अग्रवाल ने सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ करने के लिए एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव, सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान, प्रभारी निरीक्षक (नवाबगंज) रमाकांत पचौरी, प्रभारी निरीक्षक (स्वरूप नगर) अश्वनी पांडेय तथा प्रभारी निरीक्षक (कोहना) प्रभुकांत को शामिल किया गया.

29 मई, 2020 की रात 8 बजे गठित पुलिस टीम आर्यनगर स्थित मकान नंबर 8/58 पर पहुंची. सीओ श्वेता सिंह यादव ने दरवाजा खटखटाया तो एक अधेड़ व्यक्ति ने दरवाजा खोला. सामने पुलिस को देख वह घबरा गया. फिर अपने को संभालते हुए बोला, ‘‘सर, आप लोग… आने की वजह?’’

‘‘मुझे खबर मिली है कि इस मकान में देह व्यापार होता है. आप कौन?’’ श्वेता सिंह यादव ने पूछा.

‘‘मैडम, मेरा नाम मोहम्मद यूनुस है. मैं पत्रकार हूं. इस मकान में किराए पर रहता हूं. आप लोग गलतफहमी के शिकार हुए हैं.’’

इंसपेक्टर प्रभुकांत ने मोहम्मद यूनुस को हिरासत में ले लिया. फिर बोले, ‘‘गलतसही का पता जल्द ही चल जाएगा.’’

पुलिस टीम ने मकान के अंदर प्रवेश किया. घर के अंदर का नजारा बड़ा ही शर्मसार कर देने वाला था. 2 अलगअलग कमरों में युवक और युवतियां जिस्म की प्यास बुझा रहे थे. पुलिस को देख कर उन्होंने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें अर्धनग्न अवस्था में ही दबोच लिया. सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता यादव ने दोनों युवतियों को तथा सीओ (स्वरूप नगर) अजीत सिंह चौहान ने दोनों युवकों को हिरासत में ले लिया. थानाप्रभारी रमाकांत पचौरी ने कमरों की तलाशी ली तो वहां से कई आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं. इन में कंडोम, कामोत्तेजना बढ़ाने वाले कैप्सूल तथा स्प्रे आदि थे. घर के बाहर एक अय्याश की कार भी खड़ी थी.

स्वरूपनगर थाना प्रभारी अश्वनी पांडेय ने उस कार को कब्जे में ले लिया. कथित पत्रकार मोहम्मद यूनुस से सीओ अजीत सिंह ने 36,100 रुपए भी बरामद किए. यह रुपया ग्राहकों से वसूला गया था. पुलिस ने इन रुपयों को कब्जे में ले लिया. रुपयों के अलावा पकड़े गए युवकयुवतियों के पास से 6 मोबाइल फोन भी बरामद हुए. मोबाइल फोन को पुलिस टीम ने अपने कब्जे मे ले लिया. सैक्स रैकेट संचालक कथित पत्रकार मोहम्मद यूनुस के पास से पुलिस टीम को एक प्रैस कार्ड बरामद हुआ. यह प्रैस कार्ड ‘दैनिक सहारा टुडे’ हिंदी समाचार पत्र का था. इस प्रैस कार्ड के संबंध में पुलिस टीम ने सहारा टुडे कार्यालय से जानकारी की तो पता चला कि कार्ड फरजी है. कानपुर में मोहम्मद यूनुस नाम का उन का कोई संवाददाता नहीं है.

यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी थी कि मोहम्मद यूनुस फरजी पत्रकार है. पत्रकारिता की आड़ में वह देह व्यापार का धंधा कर रहा था. संचालक सहित पकड़े गए दोनों युवक व युवतियों, बरामद सामान तथा कार सहित सभी को थाना कोहना लाया गया. बरामद सामान और बरामद आपत्तिजनक वस्तुओं को पुलिस ने लिखापढ़ी कर सील कर दिया. कार थाना परिसर में खड़ी कर दी गई. अड्डे से बरामद 36,100 रुपए की भी लिखापढ़ी की गई. थानाप्रभारी प्रभुकांत ने फरजी पत्रकार के सैक्स रैकेट के पकड़े जाने की जानकारी एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को दी तो वह थाना कोहना आ गए और पूछताछ की. पकड़े गए युवकों में से एक ने अपना नाम मोहम्मद यूनुस निवासी कर्नलगंज (कानपुर शहर) बताया. दूसरे युवक ने अपना नाम विशाल तथा तीसरे ने गौरव बताया. ये दोनों औरैया के रहने वाले थे.

पकड़ी गई युवतियों में से एक ने अपना नाम रेहाना निवासी कर्नलगंज तथा दूसरी ने अपना नाम रिंकी निवासी बजरिया (कानपुर शहर) बताया. इन में मोहम्मद यूनुस संचालक था. चूंकि पुलिस टीम द्वारा सभी रंगेहाथ पकड़े गए थे, अत: सीओ (कलक्टरगंज) श्वेता सिंह यादव ने स्वयं वादी बन कर देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की धारा 3, 4, 5, 6 के तहत मोहम्मद यूनुस, गौरव, विशाल, रेहाना तथा रिंकी के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी. सभी को विधिसम्मत बंदी बना लिया गया. चूंकि देह व्यापार संचालक मोहम्मद यूनुस के पास से फरजी प्रैस कार्ड बरामद हुआ था. अत: पुलिस ने उस के विरुद्ध 420 आईपीसी के तहत एक अन्य मुकदमा दर्ज किया.

इधर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता को मुखबिर के जरिए पता चला कि बर्रा थाना क्षेत्र के मेहरबान सिंह पुरवा में अतुल के मकान में ‘न्यूज पोर्टल’ की आड़ में सैक्स का धंधा चल रहा है. इस जानकारी पर उन्होंने बर्रा पुलिस तथा सीओ (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता के सहयोग से उक्त मकान पर छापा मारा और 4 युवक तथा 2 युवतियों को गिरफ्तार किया. पकड़े गए चारों युवक खुद को पत्रकार बता रहे थे, जबकि युवतियां आगरा से बुलाई गई थीं. मकान के अंदर से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद हुई. युवकयुवतियों के पास से 8 मोबाइल फोन मिले थे. जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. सभी को थाना बर्रा लाया गया. बरामद सामान तथा मोबाइल फोन को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया गया.

पूछताछ में पकड़े गए युवकों में से एक ने अपना नाम मंगल प्रसाद पासवान निवासी नई बस्ती नौबस्ता कानपुर, दूसरे ने अपना नाम विमलेश तिवारी निवासी बर्रा-8 कानपुर, तीसरे ने अपना नाम मुन्ना सिंह निवासी दादा नगर कानपुर और चौथे ने अपना नाम नीरेंद्र सिंह निवासी हंसपुरम, नौबस्ता कानपुर बताया. पकड़ी गई 2 कालगर्ल रीना कश्यप व पिंकी जाटव थी. दोनों आगरा की रहने वाली थीं. ये 3 दिन पहले ही बुकिंग पर आई थीं. पकड़े गये युवकों के पास से 2 प्रैस आईडी कार्ड बरामद हुए. एक ‘भारत एक्सप्रैस न्यूज चैनल’ का था, जिस में मुन्ना सिंह चौहान को हैड स्टेट दर्शाया गया था. दूसरा प्रैस कार्ड भी इसी चैनल का था, जिस में विमलेश तिवारी को मंडल प्रभारी दर्शाया गया था. पुलिस ने जब इन प्रैस कार्डों की जानकारी जुटाई तो पता चला कि वे फरजी थे. मतलब पकड़े गए सभी फरजी पत्रकार थे और न्यूज पोर्टल की आड़ में वह सब सैक्स रैकेट चला रहे थे.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने जब पकड़े गए युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे फरजी पत्रकार हैं और न्यूज पोर्टल की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा करते थे. संचालक मंगल प्रसाद पासवान ने बताया कि उस ने अतुल कुमार का मकान न्यूज चैनल का औफिस बनाने के नाम पर 15000 रुपए मासिक किराए पर लिया था. उस के सहयोगी मुन्ना सिंह, विमलेश तिवारी तथा नीरेंद्र सिंह ग्राहक खोजते थे. इस के एवज में उन्हें कमीशन दिया जाता था. मंगल प्रसाद ने बताया कि फेसबुक पर फेक आईडी बना कर वह लोगों को जोड़ता था. फिर नंबरों का आदानप्रदान कर के डील करता था. यह डील ढाई हजार से 10 हजार रुपए तक में होती थी. इस में कालगर्ल के आनेजाने का खर्च भी जोड़ा जाता था.

डिमांड पर युवतियोें को बाहर से भी बुलाते थे. पूरी रात 10 हजार में बुक करते थे. पिछले 8 महीने से वे इस मकान में देह व्यापार करा रहे थे. पकड़ी गई रीना कश्यप व पिंकी जाटव को डिमांड पर आगरा से बुलाया गया था. चूंकि सभी आरोपियों ने जुर्म कबूल कर लिया था, अत: सीओ मनोज कुमार गुप्ता ने स्वयं वादी बन कर बर्रा थाने में धारा 3, 4, 5, 6, 7, 8 (देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की धारा) के तहत मंगल प्रसाद पासवान, मुन्ना सिंह चौहान, विमलेश तिवारी, नीरेंद्र सिंह, पिंकी जाटव तथा रीना कश्यप के विरुद्व रिपोर्ट दर्ज करा दी. फिर उन्हें विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. चूंकि युवकों के पास से फरजी प्रैस कार्ड बरामद हुए थे, अत: उन के विरुद्व धारा 420 आईपीसी के तहत एक अन्य मुकदमा दर्ज किया गया.

पकड़ी गई युवतियों ने इस धंधे में आने की अपनी अलगअलग मजबूरी बताई. रीना कश्यप ने बताया कि वह मूलरूप से फिरोजाबाद की रहने वाली है. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. उस के पिता दयाराम कश्यप कांच फैक्ट्री में काम करते थे, जहां मामूली वेतन मिलता था. बड़ी मुश्किल से परिवार का भरणपोषण होता था. जब वह सयानी हुई तो उस के पिता को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. लेकिन गरीबी की वजह से उस का ब्याह न हो सका. कुछ समय बाद एक खास रिश्तेदार के माध्यम से उस का विवाह किनारी बाजार (आगरा) निवासी राजेश कश्यप के साथ हो गया. राजेश एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह आगरा की बाह तहसील का रहने वाला था. कुछ समय वह गांव में रही, उस के बाद पति के साथ आगरा शहर मे रहने लगी.

उस का पति राजेश उसे बेहद प्यार करता था और उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करता था. शादी के कई साल तक उस की कोख सूनी रही. उस के बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया. जिस का नाम सूरज था. सूरज हम दोनों की आंखों का तारा था. राजेश उस का बर्थडे बड़े धूमधाम से मनाता था. बर्थडे पर वह अपने यारदोस्तों को भी बुलाता था. सब कुछ हंसीखुशी से चल रहा था. पर कुदरत को यह खुशी अच्छी नहीं लगी. सूरज एक रोज बीमार हुआ तो राजेश उसे चैकअप कराने डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने चैकअप के बाद सूरज को दिल की बीमारी बताई. इलाज थोड़ा महंगा था, पर राजेश ने हिम्मत नहीं हारी. धीरेधीरे इलाज में जमापूंजी खर्च हो गई और 50 हजार का कर्ज भी हो गया. इस कर्ज को चुकाने के लिए राजेश परेशान रहने लगा.

पति को परेशान देख मैं ने भी नौकरी करने का निश्चय किया. मैं ने कई जगह कोशिश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली. सौंदर्य प्रसाधन की एक दुकान पर नौकरी मिली भी, लेकिन मालिक की नीयत खराब थी. एक रोज एकांत में उस ने छेड़खानी की तो मैं ने नौकरी छोड़ दी. एक माह का वेतन लेने भी नहीं गई. उन्हीं दिनों उस की मुलाकात एक खूबसूरत महिला से हुई. वह सब्जी मंडी के पास रहती थी. मैं ने उसे अपनी व्यथा बताई तो वह खिलखिला कर हंसी फिर बोली, ‘‘कभी मैं भी तुम्हारी तरह परेशान थी. लेकिन अब मैं ऐसी जौब कर रही हूं जिस में काम कम और दाम अधिक है. अब मैं खुश हूं. मुझे किसी तरह की कोई परेशानी नही है.’’

‘‘आप ऐसा कौन सा जौब करती हैं, जिस में कम समय में अधिक दाम मिलता है?‘‘रीना कश्यप ने पूछा.

‘‘मैं तन बेचने का जौब करती हूं. घंटे भर में हजार 2 हजार कमा लेती हूं.’’

‘‘यानी देह व्यापार का धंधा.‘‘रीना ने विस्मय से पूछा.

‘‘हां, देह व्यापार. तुम भी खूबसूरत हो, जवान हो. चाहो तो मेरे साथ यह धंधा कर के अपनी सारी परेशानियां दूर कर सकती हो.’’

उस रोज मैं रात भर परेशान रही और उस महिला की बातों पर विचार करती रही. आखिर मैं ने भी परेशानी दूर करने के लिए देह व्यापार का धंधा करने का निश्चय कर लिया. उस के बाद मैं ने उस महिला से संपर्क किया. फिर उस के साथ जिस्म बेचने लगी. शुरुआत में मुझे झिझक हुई, फिर अभ्यस्त हो गई. आगरा की कई कालगर्ल सरगनाओं से मेरे संबंध बन गए. वे डिमांड पर मुझे आगरा के अलावा दूसरे शहरों में भी भेजने लगी. 3 दिन पहले मैं पिंकी के साथ कानपुर आई थी, यहां पुलिस छापे में पकड़ी गई.  पिंकी जाटव ने पूछताछ में बताया कि वह आगरा में जमुना किनारे स्थित कच्ची बस्ती की रहने वाली है. उस के पिता राजाराम जाटव जूता बनाने का काम करते हैं.

5 भाईबहनों में वह सब से छोटी है. जब वह 14 साल की थी, तभी मां की मौत हो गई थी. उसे सैरसपाटा करने तथा अच्छा खानेपहनने का शौक था. बाप की कमाई से घर का खर्च ही चल पाता था. उस के अपने शौक थे, जो पूरे नहीं हो पाते थे. पैसा मांगने पर पिताजी डांटतेफटकारते थे और आवारा कहते थे. पर उस पर जवानी का रंग चढ़ने लगा था. मन करता था कि कोई बांहों में ले कर प्यार का इजहार करे. उस के खर्चे उठाए और उसे घुमाने ले जाए. वह खूबसूरत तो थी ही, उस ने नैनों के बाण चलाने शुरू किए तो कई युवक घायल हो गए. वह उन के साथ मौजमस्ती करने लगी, शौक व खर्चे पूरे होने लगे. इन्हीं प्रेमियों में एक था राजन.

राजन गीता कालोनी में रहता था और उस पर जान छिड़कता था. वह भी उसे मन ही मन चाहती थी. एक रोज राजन उसे होटल में ले गया. वहां उस ने उस के शरीर को भोगा और 5 सौ रुपए दिए. इस के बाद उसे अपने दोस्तों को भी परोसने लगा. मैं समझ गई कि राजन का प्यार दिखावा है. वह केवल उस के शरीर से प्यार करता हैं. उसे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि राजन उस की देह की दलाली भी करने लगा है. दोस्त उसे जो पैसा देते हैं, उस का आधा वह खुद रख लेता है. यह देख उस ने निश्चय किया कि जब शरीर ही बेचना है, तो राजन का साथ क्यों पकड़े. इस के बाद वह खुल कर देह व्यापार करने लगी. उस ने आगरा के कुख्यात कालगर्ल सरगनाओं से तार जोड़ लिए और आगरा के अलावा अन्य बड़े शहरों में जाने लगी. कम उम्र की थी, सो डिमांड अधिक होती थी.

कानपुर में वह 5 दिन के लिए 30 हजार रुपए में आई थी. लेकिन तीसरे रोज ही पुलिस छापे में पकड़ी गई. फरजी पत्रकार मोहम्मद यूनुस के आर्य नगर के अड्डे से पकड़ी गई रेहाना घरेलू महिला थी. वह कर्नलगंज में अपने शौहर के साथ रहती थी. उस का शौहर शराबी और  औरतखोर था, जो कमाता था सब खर्च कर देता था. रेहाना कुछ कहती तो उसे बेरहमी से पीटता था. आजिज आ कर उस ने शौहर का साथ छोड़ दिया और अलग रहने लगी. कुछ समय बाद वह मोहम्मद यूनुस के संपर्क में आ गई. उस ने रेहाना पर डोरे डालने शुरू किए तो वह उस के जाल में फंस गई. बाद में मोहम्मद यूनुस ने उसे देह धंधे में उतार दिया. घटना वाली रात जब पुलिस का छापा पड़ा, तब वह ग्राहक के साथ हमबिस्तर थी ग्राहक के साथ वह भी पकड़ी गई.

रिंकी बजरिया की रहने वाली थी. जब वह 5 साल की थी, तभी उस की मां की मौत हो गई थी. मां की मौत के बाद पिता लक्ष्मण ने दूसरी शादी कर ली थी. सौतेली मां ने आते ही उस पर कहर बरपाना शुरू कर दिया. वह दिन भर उस से घर का काम करवाती, फिर भी शाम को बाप के घर आते ही वह उस पर कामचोर का आरोप लगा देती. बाप भी उसे मारतापीटता और खरीखोटी सुनाता. आजिज आ कर वह मौसी के घर सीसामऊ चली गई. लेकिन दुर्भाग्य ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा. एक रोज अधेड़ मौसा ने उसे जबरदस्ती हवस का शिकार बना डाला और जुबान बंद रखने की धमकी दी. परेशान हो कर उस ने मौसा का घर छोड़ दिया और अपने घर आ गई.

अब वह नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. एक दिन नौकरी की तलाश में घर से निकली तो नगर निगम के गेट पर एक समाजसेवी महिला से मुलाकात हो गई. वह उसे अपने घर ले गई. उस ने उस की खूब आवभगत की. बाद में पता चला कि महिला समाजसेवी नहीं, बल्कि सैक्स वर्कर है. उस ने उस क ी परेशानियों का फायदा उठा कर उसे भी देह के धंधे में धकेल दिया. तब से वह उसी के घर में रहती है. उस ने उसे पूरा संरक्षण दे रखा है. उसी के मार्फत वह घटना वाली रात मोहम्मद यूनुस के अड्डे पर पहुंची थी. वह ग्राहक के साथ कमरे में हमबिस्तर थी, तभी पुलिस का छापा पड़ा और वह पकड़ी गई.

पुलिस द्वारा पकड़ा गया अय्याश विशाल औरैया का रहने वाला था. वह टायर व्यवसाई था. अपनी कार से वह कानपुर शहर आया था. उसे गड़रियन पुरवा में टायर खरीदने थे. सौदा ठीक से नहीं पटा तो उस का मूड खराब हो गया. मूड ठीक करने के लिए विशाल ने सैक्स रैकेट संचालक मोहम्मद यूनुस को फोन किया. विशाल उस का पुराना ग्राहक था और पहले भी 2 बार अड्डे पर जा चुका था. सौदा पटते ही विशाल अपने दोस्त गौरव के साथ अड्डे पर पहुंच गया. गौरव विशाल का दोस्त था और वह औरैया से उस के साथ ही आया था. गौरव और विशाल अलगअलग कमरों में कालगर्ल्स के साथ मौजमस्ती कर रहे थे तभी पुलिस का छापा पड़ा और वे दोनों भी पकड़े गए.

सैक्स रैकेट संचालक मोहम्मद यूनुस बड़ा शातिर दिमाग था. उस की अपने घरवालों से नहीं पटती थी. शुरू में उस ने कई छोटेमोटे धंधे किए, पर कमाई नहीं हुई. मोहम्मद यूनुस महत्त्वाकांक्षी था. वह कम समय में लखपति बनना चाहता था. इस के लिए उस ने सैक्स का धंधा चुना. पर इस में पुलिस का भय था. इस भय को कम करने के लिए उस ने पत्रकारिता का लबादा ओढ़ा. उस का एक मित्र अखलाक था. उस ने उसी की मार्फत एक दैनिक समाचार पत्र का प्रैस कार्ड बनवा लिया. फरजी प्रैस कार्ड के माध्यम से मोहम्मद यूनुस पुलिस के संपर्क में रहने लगा. शहर में जहां भी सैक्स रैकेट पकड़ा जाता, वह वहां पहुंच जाता और पूछताछ के बहाने कालगर्ल और सरगना से मिलता. इस तरह संपर्क बढ़ा कर वह खुद सैक्स रैकेट चलाने लगा.

उस ने एक साल पहले आर्यनगर में यह मकान 10 हजार रुपए प्रति महीने के किराए पर लिया और पत्रकारिता की आड़ में देह व्यापार करने लगा. उस का भांडा तब फूटा जब पासपड़ोस वालों ने उस की शिकायत गुप्तरूप से एसएसपी से कर दी. एसएसपी ने जांच का आदेश दिया तो वह फंस गया और पकड़ा गया. थाना कोहना तथा थाना बर्रा पुलिस ने सभी आरोपियों को कानपुर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Extramarital Affair : पत्‍नी के प्रेमी ने ही दुपट्टे से पति का गला घोंट डाला

Extramarital Affair : ड्राइवर नरेंद्र राठी शराब का इतना आदी हो गया था कि उस ने अपनी घरगृहस्थी की तरफ ध्यान नहीं दिया. इस का नतीजा यह हुआ कि उस की पत्नी पूजा राठी के पांव बहक गए. पूजा ने अपने प्रेमी अमन के साथ मिल कर ऐसी साजिश रची कि…

वह 10 जुलाई, 2020 का दिन था. दोपहर के 3 बज रहे थे. उत्तराखंड की योगनगरी ऋषिकेश के कोतवाल रीतेश शाह कोतवाली में ही थे. तभी एक महिला उन के पास पहुंची. महिला ने बताया, ‘‘सर, मैं गली नंबर 2, चंद्रशेखर नगर में रहती हूं और मेरा नाम कुसुम है. मेरा बेटा नरेंद्र राठी टैक्सी चलाता है. वह शादीशुदा है और उस के 2 बेटे हैं. वह पहली जुलाई को घर से निकला था, उस के बाद वह अभी तक नहीं लौटा है.’’

‘‘आप के बेटे की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी?’ शाह ने पूछा

‘‘नहीं सर, उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, बल्कि वह तो अपने काम से काम रखता था.’’ कुसुम ने बताया.

‘‘तुम ने उसे कहांकहां तलाश किया है?’’ शाह ने पूछा.

‘‘सर पिछले 10 दिनों में मैं और मेरे रिश्तेदार नरेंद्र के दोस्तों और अपने सभी रिश्तेदारों के घर पर उसे तलाश कर चुके हैं, मगर हमें अभी तक उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. सर, मेरी आप से विनती है कि आप मेरे बेटे को तलाश करने में मेरी मदद करें.’’ कुसुम बोली.

इंसपेक्टर रीतेश शाह ने नरेंद्र राठी की गुमशुदगी दर्ज कर ली और जांच एसआई चिंतामणि को सौंप दी. एसआई चिंतामणि ने सब से पहले नरेंद्र राठी की पत्नी पूजा से पूछताछ की. इस के बाद उन्होंने नरेंद्र के पड़ोसियों से भी उस के बारे में जानकारी जुटाई. उन्हें पता चला कि नरेंद्र के अपनी पत्नी पूजा के साथ अच्छे संबंध नहीं थे. वह अकसर शराब पी कर उस से मारपीट करता था. इस के अलावा यह भी जानकारी मिली कि नरेंद्र की गैरमौजूदगी में उस के घर पर अमन नामक एक प्लंबर ठेकेदार अकसर आताजाता है.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने नरेंद्र के फोन को सर्विलांस पर लगा दिया. इस से पुलिस को जानकारी मिली कि नरेंद्र का मोबाइल 27 जून, 2020 से स्विच्ड औफ चल रहा था. इस बाबत पूजा ने बताया कि नरेंद्र का मोबाइल खराब हो गया है. उन्होंने सिम अपने पास रख कर मोबाइल को ठीक करने के लिए एक दुकानदार को दे रखा है. पुलिस के पास नरेंद्र तक पहुंचने का कोई जरिया नहीं था. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उस के साथ कोई अप्रिय घटना हो गई हो और हत्यारे ने लाश गंगा नदी में बहा दी हो. इस आशंका को दूर करने के लिए एसएसआई ओमकांत भूषण ने जल पुलिस के साथ ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट से बैराज तक गंगा किनारे तलाश करवाई, मगर कोई जानकारी नहीं मिल सकी.

अचानक 20 जुलाई, 2020 को नरेंद्र राठी की पत्नी पूजा राठी कोतवाली ऋषिकेश पहुंची. उस ने पुलिस को बताया कि 4 दिन पहले मेरे पति नरेंद्र राठी ने मुझे फोन कर के जान से मारने की धमकी दी थी. उस की धमकी के बाद मुझे बहुत डर लग रहा है. आप तुरंत उस के खिलाफ काररवाई करें. यह सुन कर पुलिस चौंकी. आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो पति अपनी पत्नी को जान से मारने की धमकी दे रहा है. इस शिकायत से तो यही लग रहा था कि नरेंद्र जहां कहीं भी है, ठीकठाक है. इंसपेक्टर रीतेश शाह ने यह जानकारी एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोवाल को दी. एसपी डोवाल ने एसएसआई को नरेंद्र राठी के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने के निर्देश दिए ताकि उसकी लोकेशन पता चल सके.

एसएसआई ओमकांत भूषण ने तुरंत नरेंद्र राठी के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि नरेंद्र राठी के नंबर से 2 काल्स पूजा राठी को तथा 3 काल्स कुसुम राठी को की गई थीं. जिस वक्त ये काल्स की गई थी, उस समय उस के फोन की लोकेशन हरिद्वार की थी. इस के बाद उस का फोन स्विच्ड औफ हो गया था. जिस फोन से ये काल्स की गई थीं, पुलिस ने उस का आईएमईआई नंबर हासिल कर लिया था. जांच अधिकारी ने नरेंद्र की पत्नी पूजा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से पुलिस को चौंकाने वाली जानकारी मिली.

पता चला कि जिस फोन का प्रयोग पूजा को धमकी देने के लिए किया गया था, उसी फोन में कोई दूसरा सिमकार्ड डाल कर पूजा से पहले काफीकाफी देर तक बातें हुई थीं. पुलिस ने इस की जांच की तो वह मोबाइल नंबर उसी ठेकेदार का निकला, जिस का पूजा के घर आनाजाना था. अब पूजा और अमन पुलिस के शक के दायरे में आ गए. पुलिस को संदेह हो गया कि नरेंद्र राठी की गुमशुदगी में कहीं न कहीं पूजा व अमन का हाथ है. इस के बाद पुलिस ने अमन व पूजा को पूछताछ के लिए कोतवाली बुलवाया. जानकारी मिलने पर सीओ भूपेंद्र सिंह धोनी व एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोवाल भी वहां पहुंच गए थे. पुलिस ने पूजा व अमन से नरेंद्र के गायब होने के मामले में गहन पूछताछ शुरू की.

पहले तो दोनों पुलिस को इधरउधर की बातें कर के गच्चा देते रहे,  मगर जब दोनों से अलगअलग ले जा कर पूछताछ की गई, तो दोनों के बयान भिन्नभिन्न निकले. इसी के मद्देनजर जब पुलिस ने उन से सख्ती की तो वे टूट गए और दोनों ने पुलिस के सामने नरेंद्र की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उन्होंने उस की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

पूजा उत्तराखंड के शहर ऋषिकेश के मोहल्ला चंद्रशेखर नगर, शीशम झाड़ी के रहने वाले संतोष की बेटी थी. रुढि़वादी विचारों वाले संतोष ने वर्ष 2002 में नरेंद्र राठी से पूजा का विवाह तब कर दिया था, जब वह मात्र 13 साल की थी. नरेंद्र ड्राइवर था. वह जब ससुराल पहुंची तो पता चला उस का पति शराबी है और कुसुम उस की सौतेली मां है. पूजा ने जब पति को समझाने की कोशिश की तो उस पर समझाने का कोई असर नहीं हुआ. पूजा जब भी शराब पीने का विरोध करती तो वह उस की पिटाई कर देता था. पूजा ने यह बात जब अपनी सौतेली सास कुसुम को बताई, तो उस ने भी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया.

इसी तरह कलह के साथ समय गुजरता गया और पूजा 2 बेटों की मां बन गई. शराब पी कर नरेंद्र अकसर पूजा की पिटाई करता था. करीब एक साल पहले पूजा राठी का सिटी गेट, ऋषिकेश में एक ट्रक से एक्सीडेंट हो गया था. एक्सीडेंट के समय उधर से बापू ग्राम निवासी प्लंबर अमन जा रहा था. उस ने पूजा को तत्काल ऋषिकेश के एक अस्पताल में भरती कराया. खबर मिलने पर पूजा के घर वाले भी अस्पताल पहुंच गए. उन सभी ने अमन की बहुत तारीफ की. जब तक पूजा अस्पताल में रही, अमन ने ही उस की सब से ज्यादा देखभाल की. दोनों में लंबीलंबी बातें होने लगीं और बाद में दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे. उसी दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए.

जब अमन का नरेंद्र के घर में ज्यादा आनाजाना हुआ तो नरेंद्र को पत्नी पर संदेह हो गया. इस के बाद वह पूजा से ज्यादा मारपीट करने लगा था. रोजरोज की पिटाई से पूजा आजिज आ चुकी थी. इस बारे में उसने प्रेमी अमन से बात की. दोनों ने मिल कर नरेंद्र को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. वह पहली जुलाई, 2020 का दिन था. उस दिन शाम को ही पूजा ने अमन को अपने मकान में बुला कर छिपा दिया था. इस के बाद रात को उस ने दोनों बच्चों का छत पर सुला दिया और ठंडी हवा के लिए कूलर चला दिया था. कूलर तेज आवाज करता था. रात को जब नरेंद्र शराब के नशे में घर आया तो उस ने पहले पत्नी से आमलेट बनवा कर खाया और फिर सो गया.

इस के बाद अमन ने दुपट्टे का फंदा बना कर गहरी नींद में सोए नरेंद्र का गला घोंट दिया. इस दौरान पूजा उस के पैर पकड़े रही थी. जब दोनों को यकीन हो गया कि नरेंद्र मर चुका है, तो उन्होंने उस की लाश प्लास्टिक के एक सफेद बोरे में छिपा कर घर में रख दी. अगले दिन अमन 2 मजदूरों को घर में ले कर आया. इस के बाद अमन ने मजदूरों की मदद से टौयलेट की शीट उखड़वाई और शौचालय के गड्ढे में लाश सहित बोरे को डाल दिया. फिर अमन ने वहां पर नई टौयलेट शीट व नई टाइल्स लगवा कर शौचालय सही कर दिया था. उधर हफ्ता भर तक जब कुसुम को नरेंद्र नहीं दिखा तो उस ने कुसुम से नरेंद्र के बारे में पूछा. पूजा ने अपनी सास को बताया कि वह पहली जुलाई को गाड़ी ले कर गए थे, लेकिन अभी तक नहीं लौटे हैं.

नरेंद्र इतने दिनों तक जब कभी घर के बाहर रहता तो कुसुम को फोन जरूर कर दिया करता था. लेकिन इस बार उस ने कोई फोन नहीं किया, जिस से कुसुम को उस की चिंता हुई और उस ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. नरेंद्र के बारे में खोजबीन करते हुए 8 दिन बीत गए लेकिन पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. नरेंद्र की हत्या करने के बाद उस के मोबाइल का सिम पूजा ने अपने पास रख लिया था. खुद को इस अपराध से बचाने व पुलिस का ध्यान भटकाने के लिए उन दोनों ने एक ऐसी योजना बनाई जिस से पुलिस को उन पर शक न हो तथा नरेंद्र की सौतेली मां को यह भ्रम रहे कि नरेंद्र अभी जिंदा है. योजना के अनुसार 18 जुलाई को अमन ने अपने मोबाइल में नरेंद्र का सिम डाला और हरिद्वार जा कर उसी मोबाइल से 2 बार पूजा को फोन किया तथा 3 मिस काल कुसुम के मोबाइल नंबर पर की थीं.

पुलिस ने पूजा राठी और अमन से पूछताछ के बाद इस केस में भादंवि की धाराएं 302, 201 तथा 34 और बढ़ा दीं. इस के बाद पुलिस उन्हें ले कर पूजा के घर पहुंची और उन की निशानदेही पर शौचालय के गड्ढे की खुदाई कराई. खुदाई में गड्ढे में नरेंद्र का सड़ागला शव पुलिस ने बरामद कर लिया, जिसे उन्होंने पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. काररवाई पूरी करने के बाद एसएसआई ओमकांत भूषण ने अमन के कब्जे से वह मोबाइल भी बरामद कर लिया, जिस में उस ने नरेंद्र का सिमकार्ड डाल कर हरिद्वार से पूजा और कुसुम को काल की थीं. उस मोबाइल में नरेंद्र का ही सिम था.

अमन के पास से पुलिस ने 2 कागज भी बरामद किए थे, जिन में क्रमश: नरेंद्र व कुसुम के फोन नंबर लिखे थे. पूजा राठी और अमन से विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया.

पुलिस ने नरेंद्र राठी के शव का विसरा और डीएनए टेस्ट के सैंपल जांच के लिए एफएसएल देहरादून भिजवा दिए. कथा लिखे जाने तक एसएसआई ओमकांत भूषण द्वारा इस केस की विवेचना की जा रही थी.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

MP News : जज के बेटे को सांप का जहर देकर मरवाया

MP News : एनजीओ चलाने वाली संध्या सिंह ने अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश (एडीजे) महेंद्र कुमार त्रिपाठी को पूरी तरह अपने जाल में फांस लिया था. जब उन्होंने उस से किनारा करने की कोशिश की तो संध्या ने तंत्रमंत्र के नाम पर ऐसी खूनी साजिश रची कि जज साहब और उन के बड़े बेटे को जान से हाथ धोना पड़ा. फिर…

मध्य प्रदेश का जिला बैतूल. बैतूल का जिला मुख्यालय कालापाठा. 27 जुलाई, 2020 को कालापाठा स्थित जज आवासीय  कालोनी एक घर से रोनेधोने की चीखोपुकार से थर्रा उठी. रुदन ऐसा कि किसी का भी दिल दहल जाए. रोने की आवाजें बैतूल के जिला न्यायालय में पदस्थ अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) महेंद्र कुमार त्रिपाठी के घर से आ रही थीं. लोग वहां पहुंचे तो पता चला महेंद्र त्रिपाठी और उन के जवान बेटे अभियान राज त्रिपाठी की अचानक मृत्यु हो गई थी. खबर सनसनीखेज थी. जरा सी देर कालोनी में रहने वाले तमाम जज और मजिस्ट्रैट वहां आ गए. सूचना मिली तो पुलिस अधिकारियों के अलावा प्रशासनिक अधिकारी भी जज साहब के घर पहुंच गए. यह खबर बड़ी तेजी से पूरे बैतूल में फैल गई.

जज साहब के परिवार में कुल 4 सदस्य थे. वह और उन की पत्नी भाग्य त्रिपाठी और 2 बेटे अभियान राज त्रिपाठी व आशीष राज त्रिपाठी. 4 में से अब 2 बचे थे पत्नी भाग्य त्रिपाठी और छोटा बेटा आशीष राज. पत्नी और बेटा महेंद्र त्रिपाठी और अभियान राज त्रिपाठी के शवों को देख बिलखबिलख कर रो रहे थे. महेंद्र त्रिपाठी व उन के बड़े बेटे के कफन में लिपटे शव देख कर उन की पत्नी की समझ नहीं आ रहा था कि अचानक उन की खुशियों को कौन सा ग्रहण लग गया कि देखते ही देखते हंसतीखेलती जिंदगी मातम में बदल गई.

घटनाक्रम की शुरुआत 20 जुलाई, 2020 को तब हुई थी, जब रात करीब साढ़े 10 बजे पूरे त्रिपाठी परिवार ने डाइनिंग टेबल पर एक साथ खाना खाया था. बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी की पत्नी अपने मायके इंदौर में थी. खाना खाने के कुछ देर बाद छोटे बेटे आशीष को उल्टियां होने लगीं. थोड़ी देर बाद महेंद्र त्रिपाठी व उन के बड़़े बेटे अभियान के पेट में भी दर्द होने लगा. आशीष को 2-3 बार उल्टियां हुई. उस के बाद पिता व बड़े भाई के पेट में भी दर्द बढ़ता गया तो पूरा परिवार चिंता में डूब गया. चिंता इस बात की थी कि कहीं खाने की वजह से कोई फूड पौइजनिंग हो गई हो. मिसेज त्रिपाठी ने कुल 6 चपाती बनाई थीं, जिस में से एक रोटी आशीष ने खाई थी. बाकी 5 चपातियां आधीआधी महेंद्र त्रिपाठी और उन के बड़े बेटे ने खा ली थीं.

मिसेज त्रिपाठी ने दाल के साथ सुबह के रखे बासी चावल खाए थे. उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई थी. आमतौर पर घर में जब किसी को खाने के कारण फूड पौइजनिंग होती है या पेट दर्द होता है, तो लोग घरेलू उपचार पर ध्यान देते हैं. मिसेज त्रिपाठी ने भी ऐसा ही किया. उन्होंने पति और दोनों बेटों को गर्म पानी में हींग और नींबू घोल कर दे दिया. इस से छोटे बेटे आशीष की तबीयत में सुधार हुआ और उस की उल्टियां बंद हो गईं. लेकिन जज साहब और उन के बड़े बेटे का दर्द कुछ देर के लिए कम जरूर हुआ, मगर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.

चूंकि शाम के खाने में इस्तेमाल सब्जी व दाल सुबह की बनी थी, जिन क ा इस्तेमाल सुबह के खाने में भी हुआ था. इसलिए उन से किसी तरह की फूड पौइजनिंग की संभावना कम ही थी, वैसे भी इन का इस्तेमाल शाम के खाने में मिसेज त्रिपाठी ने भी किया था और वे पूरी तरह ठीक थीं. लिहाजा सब्जी और दाल से कोई बीमारी हुई होगी, इस की आशंका कम ही थी. मिसेज त्रिपाठी ने रोटी ताजी बनाई थीं. घर में जितने भी लोग बीमारी हुए थे उन्होंने रोटी ही खाई थीं. रोटियां खाने के बाद ही सब की तबियत खराब हुई थी. रात के करीब डेढ़ बजे जज साहब और बड़े बेटे की तबियत जब ज्यादा खराब होने लगी तो मिसेज त्रिपाठी ने डाक्टर को फोन कर के घर पर बुला लिया.

21 जुलाई की अलसुबह करीब 3 बजे डाक्टर घर आया और उस ने त्रिपाठी व उन के बेटों को देखा. खाने के बारे में पूछा तो मिसेज त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने क्या खाया था. आशंका इसी बात की थी कि खाने से फूड पौइजनिंग हुई होगी. डाक्टर ने तीनों को दवा मिला कर लिक्विड पीने को दिया और उल्टी करवाई, जिस के बाद उन्हें दवाइयां दीं. बिगड़ती गई दोनों की हालत अगली दोपहर तक आशीष तो पूरी तरह ठीक हो गया. लेकिन जज साहब व उन के बड़े बेटे की तबियत वैसी ही बनी रही. इसी तरह 21 व 22 जुलाई का पूरा दिन व रात गुजर गए, सब का घर में ही इलाज चलता रहा. लेकिन 23 जुलाई को जज साहब व उन के बड़े बेटे की तबियत कुछ जयादा ही खराब होने लगी.

जिला चिकित्सालय के डा. आनंद मालवीय को घर बुला कर दिखाया तो उन्होंने उन दोनों को पाढर जिला अस्पताल, बैतूल में भरती करवा दिया. दोनों को ही आईसीयू में रखा गया. लेकिन इस के बावजूद जज साहब व उनके बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. वैसे भी सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों की इतनी कमी होती है कि गंभीर बीमारियों को काबू में करने के लिए कभीकभी बहुत समस्या हो जाती है. पाढर जिला अस्पताल में भी यही हालत थी. जज साहब और उन के बड़े बेटे की स्थिति जिस तरह तेजी से बिगड़ रही थी, उसे देखते हुए डाक्टरों ने परिवार वालों को सलाह दी कि दोनों को नागपुर के प्रसिद्ध एलेक्सिस अस्पताल में भरती करवा दिया जाए.

घर वालों ने डाक्टरों की बात मान कर 25 जुलाई को महेंद्र त्रिपाठी व अभियान को एंबुलेंस से ले जा कर नागपुर के एलेक्सिस अस्पताल में भरती करवा दिया, जहां दोनों के सभी तरह के टेस्ट शुरू हो गए. बापबेटे को गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया. लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी. 25 जुलाई की शाम को पहले अभियान की मौत हो गई. फिर 26 जुलाई को सुबह करीब साढ़े 4 बजे महेंद्र त्रिपाठी की भी मौत हो गई. बापबेटे की एक साथ मौत त्रिपाठी परिवार पर वज्रपात था. चूंकि मामला एक जज और उन के बेटे की मौत से जुड़ा था. इसलिए अस्पताल की तरफ से एमएलसी बना कर नागपुर के मानकापुर पुलिस थाने को भेज दी गई. पुलिस ने अस्पताल में पहुंच कर आशीष त्रिपाठी के बयान दर्ज किए और आवश्यक काररवाई के बाद उन के इलाज के सभी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए.

दोनों मृतक पितापुत्र का इंदिरा गांधी मैडिकल कालेज नागपुर में विधिवत पोस्टमार्टम डाक्टरों के एक बोर्ड द्वारा किया गया. आवश्यक जांच के लिए बैतूल पुलिस के अनुरोध पर डाक्टरों ने विसरा तथा सिर के बाल और हाथ के नाखून सुरक्षित कर लिए. नागपुर पुलिस ने यह प्रकरण अपराध संख्या शून्य पर अकाल मृत्यु की धारा 174 में दर्ज कर लिया . साथ ही दोनों की मौत से जुड़ी पुलिस डायरी तथा अन्य साक्ष्य व सैंपल बैतूल पुलिस को सौंप दिए. क्योंकि अपराध का न्यायिक क्षेत्र मध्य प्रदेश का बैतूल ही था. दूसरी तरफ महेंद्र त्रिपाठी व उन के बेटे के शव का पोस्टमार्टम करवा कर जिला प्रशासन ने शव परिजनों के सुपुर्द कर दिए. परिवार वाले शवों को पहले बैतूल में उन के सरकारी आवास पर ले गए, जहां उन की पहचान वालों ने शव के अंतिम दर्शन किए.

इस के बाद परिवार वाले बापबेटे के शव को अंतिम संस्कार के लिए कटनी में उन के पैतृक गांव ले गए, जहां 26 जुलाई की शाम को उन का अंतिम संस्कार कर कर दिया गया. लेकिन बापबेटे की मौत में सब से बड़ा पेंच ये था कि आखिर खाने में ऐसा क्या था कि जिसे खाने के बाद उन की तबियत खराब हो गई. चूंकि मामला एक जज और उन के बेटे की संदिग्ध परिस्थिति में हुई मौत से जुड़ा था, इसलिए बैतूल के एसपी सिमाला प्रसाद ने अपने मातहतों को बुला कर निर्देश दिया कि जांचपड़ताल और मामले की तह में जाने के लिए किसी तरह की कोताही न बरती जाए.

27 जुलाई को इस मामले में जिलाधिकारी बैतूल व जिला न्यायाधीश के आदेश पर एसपी सिमाला प्रसाद ने एक एसआईटी का गठन कर जांच का काम शुरू करवा दिया. विशेष जांच दल ने एडीशनल सेशन जज महेंद्र त्रिपाठी व उन के बेटे की विषाक्त भोजन खाने से हुई मौत के मामले की जांच शुरू कर दी.  विशेष जांच दल ने घटना की शुरुआत से सारे साक्ष्यों को जोड़ने का काम शुरू कर दिया. बैतूल पुलिस को जज महेंद्र त्रिपाठी व उन के बेटे के अस्पताल में भरती होने की पहली सूचना 24 जुलाई को पाढर अस्पताल बैतूल द्वारा मिली थी, जिस के बाद चौकी प्रभारी ने जज महेंद्र त्रिपाठी और उन के बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी के बयान लिए थे. दोनों ने आशंका जताई थी कि उन्हें रोटियां खाने से फूड पौइजनिंग हुई है.

जिस आटे की रोटियां बनी थीं, उस में वह आटा भी शामिल था जो जज साहब को उन की एक महिला मित्र ने दिया था. एसआईटी ने शुरू की जांच विशेष जांच दल ने जज साहब व उन के बेटे द्वारा दिए गए बयान चौकी प्रभारी से ले लिए. साथ ही जांच दल ने नागपुर में हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट भी अपने कब्जे में ले ली, जिस में आशंका व्यक्त की गई थी कि दोनों की मौत खाने में तीक्ष्ण जहर मिला होने की वजह से हुई थी.  विशेष जांच दल ने जज महेंद्र त्रिपाठी की पत्नी भाग्य त्रिपाठी और छोटे बेटे आशीष त्रिपाठी के बयान भी कलमबद्ध किए. उन दोनों ने यही बताया कि जज साहब की एक महिला मित्र संध्या सिंह ने किसी तांत्रिक से अभिमंत्रित करा कर ये आटा दिया था, जिसे संध्या के बताए अनुसार घर के आटे में मिला कर रोटियां बनाई गई थीं ताकि घर में सुखसमृद्धि आ सके.

‘‘क्या वो आटा अभी भी आप के पास है?’’ एसपी सिमाला प्रसाद ने जज महेंद्र त्रिपाठी की पत्नी से पूछा.

‘‘जी हां, उस दिन खाने के बाद से हम ने उस आटे का इस्तेमाल ही नहीं किया है. सारा आटा ज्यों का त्यों रखा है.’’ मिसेज त्रिपाठी के बताने के बाद विशेष जांच दल ने उस आटे को अपने कब्जे में ले कर उसी दिन जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिया. इसी दौरान जांच दल को पता चला कि 21 जुलाई को जब विषाक्त खाना खाने से जज महेंद्र त्रिपाठी की तबीयत खराब हुई थी, तब उन्होंने अपने कई जानकारों से फोन पर बात की थी. पुलिस ने महेंद्र त्रिपाठी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर उन तमाम लोगों से बातचीत की तो उन्होंने भी यही बताया कि उन की एक दोस्त संध्या सिंह ने उन्हें जो आटा दिया था, घर के आटे में उस के मिश्रण से बनी रोटियां खाने के बाद ही उन की और उन के बेटों की तबियत खराब हुई थी.

पुलिस को काल डिटेल्स में संध्या सिंह नाम की एक महिला का नंबर भी मिला, जिसे इलाज के दौरान जज साहब ने कई बार काल की थी. लेकिन किसी भी काल पर बहुत लंबी बात नहीं हुई थी. जज त्रिपाठी के छोटे बेटे आशीष राज ने भी पुलिस को बयान दिया कि जब उन के पिता व भाई को नागपुर के अस्पताल में शिफ्ट किया जा रहा था तो पिता ने रास्ते में उसे बताया था कि वह आटा उन की परिचित महिला संध्या सिंह ने दिया था, जिसे घर के आटे में मिला कर बनी रोटियां खाने से सब की तबियत खराब हुई थी. उन्होंने बताया था कि उस आटे की पूजा किसी पंडित ने की थी.

विशेष जांच दल को अब तक इस बात के पर्याप्त सुबूत मिल चुके थे कि एडीशनल सेशन जज महेंद्र त्रिपाठी व उन के बेटे की मौत विषाक्त आटे से बनी रोटियां खाने से हुई थी. अभी तक की जांच में संध्या सिंह नाम की महिला मुख्य किरदार के रूप में सामने आई थी. विशेष जांच दल ने एसपी सिमाला सिंह के निर्देश पर बैतूल के थाना गंज में 27 जुलाई, 2020 की सुबह जज त्रिपाठी व उन के बेटे की अकाल मृत्यु के मामले को अपराध क्रमांक 26 / 2020 पर दर्ज कर लिया. लेकिन जब इस मामले में साक्ष्य एकत्र हो गए तो इसे हत्या की धारा 302, 323, 307, 120बी में पंजीकृत किया गया.

इस मामले में मुख्य किरदार संध्या सिंह थी, इसलिए विशेष जांच दल ने उस की जोरशोर से तलाश शुरू कर दी. पुलिस के लिए सब से बड़ी परेशानी यह थी कि महेंद्र त्रिपाठी न्यायिक अधिकारी थे, उन का परिवार भी संध्या सिंह के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं दे रहा था, मसलन वह कौन है, कहां रहती है और उस के दिए गए आटे को उन्होंने क्यों इस्तेमाल किया. इस के अलावा पुलिस टीम यह भी नहीं समझ पा रही थी कि जज साहब के घर में आखिर ऐसी कौन सी कलह थी जिसे दूर करने के लिए वह पंडित या तांत्रिक का मंत्रपूरित आटा घर ले आए और उन्हें उस की बनी रोटियां खाने को विवश होना पड़ा.

सवाल अनेक थे, लेकिन उन का जवाब किसी के पास नहीं था इसलिए पुलिस ने सारा ध्यान संध्या सिंह पर फोकस कर दिया क्योंकि उस से पूछताछ करने के बाद ही इन सवालों का जवाब मिल सकता था. पुलिस लगातार संध्या सिंह के मोबाइल की लोकेशन ट्रेस करने में लगी थी क्योंकि वही एक जरिया था, जिस के माध्यम से उस तक पहुंचा जा सकता था. संध्या सिंह का मोबाइल लगातार बंद मिल रहा था. बीचबीच में वह औन होता और फिर बंद हो जाता था. पुलिस ने जब मोबाइल की लोकेशन की जांच की तो वह हाउसिंग बोर्ड कालोनी छिंदवाड़ा स्थित एक मकान की मिली. इस के बाद पुलिस टीम उस मकान पर पहुंची, तो वहां ताला लगा मिला. मिल गई संध्या पुलिस टीम संध्या सिंह तक पहुंचने के लिए लगातार काम करती रही.

30 जुलाई की शाम के समय संध्या सिंह के मोबाइल की लोकेशन रीवा में मिली. छिंदवाड़ा में भटक रही पुलिस टीम को तुरंत रीवा भेजा गया, जहां संयोग से संध्या अपने कुछ साथियों के साथ मौजूद थी. पुलिस उन सभी को हिरासत में ले कर बैतूल लौट आई. संध्या सिंह की टाटा इंडिगो कार एमपी28 सीबी-3302 भी पुलिस ने जब्त कर ली थी. संध्या सिंह की उम्र करीब 50 साल थी. पहनावे और बातचीत से वह एक आधुनिक महिला लग रही थी. शुरुआती पूछताछ में संध्या सिंह एसपी सिमाला प्रसाद से ले कर पूरे जांच दल को इधरउधर की बातें बना कर समय खराब करती रही. उस ने पुलिस को बताया कि एडीजे त्रिपाठी से उस की जानपहचान जरूर थी, लेकिन उन की मौत से उस का कोई संबध नहीं है.

लेकिन पुलिस ने जब उस के सामने उस के खिलाफ मौजूद सारे सुबूत रखे तो उस ने कबूल कर लिया कि उसी ने सर्प विष मिला आटा एडीजे त्रिपाठी को दिया दिया था. संध्या सिंह ने बताया कि उस का इरादा पूरे त्रिपाठी परिवार को खत्म करने का था. संध्या सिंह के साथ जो 5 अन्य लोग पकड़े गए थे, वे भी हत्या की इस साजिश में शामिल थे. संध्या सिंह कौन थी, जज साहब से उस की जानपहचान कैसे हुई तथा उस ने उन्हें परिवार के साथ मारने के लिए जहरीला आटा क्यों दिया, यह सब जानने के लिए पुलिस ने संध्या सिंह से सख्ती से पूछताछ की तो सारे सवालों का जवाब मिल गया.

मूलरूप से मध्य प्रदेश के सिंगरौली की रहने वाली संध्या सिंह की शादी रीवा के एक संपन्न परिवार के व्यक्ति संतोष सिंह से हुई थी. लेकिन स्वच्छंदता से जीवन व्यतीत करने वाली पढ़ीलिखी संध्या की अपनी ससुराल वालों और पति से अनबन रहने लगी. शादी के कुछ समय बाद वह अपने पति के साथ रीवा से छिंदवाड़ा आ गई. उस ने वहां दुर्गा महिला शिक्षा समिति नाम से एक एनजीओ संचालित करना शुरू कर दिया. बाद में संध्या सिंह की महत्त्वाकांक्षाएं उड़ान भरने लगीं. वह देर रात तक पार्टियों में अपना वक्त बिताने लगी तो संतोष सिंह से उस का मनमुटाव शुरू हो गया और संतोष सिंह संध्या से अलग हो गए और अपने शहर वापस चले गए. इस के बाद संध्या सिंह खुला और एकाकी जीवन बसर करने लगी.

इसी दौरान 10 साल पहले महेंद्र त्रिपाठी की नियुक्ति छिंदवाड़ा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट के पद पर हो गई. महेंद्र त्रिपाठी की पत्नी भाग्य त्रिपाठी मध्य प्रदेश के एक सरकारी विभाग में नौकरी करती थीं. उन के दोनों बेटे भी उन्हीं के साथ भोपाल में रहते थे. कभी त्रिपाठी अपने परिवार से मिलने भोपाल चले जाते थे तो कभी उन का परिवार मिलने के लिए उन के पास आ जाता था. एक तरह से महेंद्र त्रिपाठी छिंदवाड़ा में अकेले रहते थे. तैनाती के कुछ महीने बाद ही एक समारोह में संध्या सिंह की मुलाकात जज महेंद्र त्रिपाठी से हुई. त्रिपाठी और संध्या सिंह दोनों ही एकदूसरे से प्रभावित हुए और पहली ही मुलाकात में उन की दोस्ती हो गई. ये दोस्ती इस कदर आगे बढ़ी कि कुछ ही दिनों में उन के रिश्ते आत्मीय हो गए.

दरअसल संध्या सिंह को लगा कि न्यायिक अधिकारी होने के कारण उसे महेंद्र कुमार त्रिपाठी के बडे़ लोगों के साथ रसूख का लाभ मिल सकता है और उन के जरिए वह अपने एनजीओ के लिए बहुत से लाभ ले सकती है. इंसान भले ही किसी भी पेशे से जुड़ा हो लेकिन प्रकृति का एक नियम है कि जब वह किसी महिला के आकर्षण या रूप जाल में फंस जाता है तो उस का विवेक काम करना बंद कर देता है. वह इस बात को भी भूल जाता है कि वह जिस पेशे से जुड़ा है, उस की मर्यादा क्या है. संध्या के जाल में फंसे जज साहब जैसे ही महेंद्र त्रिपाठी की संध्या सिंह के साथ आसक्ति बढ़ी तो संध्या की तरक्की भी होने लगी. उस ने अब त्रिपाठीजी को अपनी तरक्की की सीढ़ी बना कर पूरी तरह अपने आकर्षण के जाल में फंसा लिया था. उस ने त्रिपाठीजी से आर्थिक मदद ले कर कपड़ों का कारोबार भी शुरू कर दिया था.

संध्या सिंह ने दुर्गा महिला शिक्षा समिति के नाम से जो एनजीओ बना रखा था, उस के लिए वह त्रिपाठीजी के सहयोग से सरकारी प्रोजेक्ट भी हासिल करने लगी. चूंकि उस वक्त त्रिपाठीजी छिंदवाड़ा में सीजेएम जैसे महत्त्वपूर्ण ओहदे पर तैनात थे. संध्या सिंह ने छिंदवाड़ा की उसी हाउसिंग बोर्ड कालोनी में किराए का मकान भी ले कर अपना निवास बना लिया, जहां सीजेएम महेंद्र कुमार त्रिपाठी रहते थे. उन दिनों नगर निगम छिंदवाड़ा ने त्रिपाठीजी के कहने पर संध्या सिंह को आजीविका मिशन के तहत प्रशिक्षण देने का लाखों रुपए का एक प्रोजेक्ट भी दिया था. इस के अलावा संध्या सिंह महेंद्र त्रिपाठी के रसूख का इस्तेमाल कर जम कर फायदे उठाने लगी.

संध्या सिंह और महेंद्र त्रिपाठी के बीच के दोस्ताना रिश्तों की भनक उन की पत्नी व परिवार के दूसरे सदस्यों को भी लग गई थी. जिस के कारण उन के घर में कलह रहने लगी. इसी दौरान 2 साल पहले महेंद्र त्रिपाठी की पदोन्नति हो गई और वे एडीजे बन कर छिंदवाड़ा से बैतूल आ गए. महेंद्र त्रिपाठी के बैतूल आ जाने के बाद संध्या सिंह की मुश्किलें बढ़ गईं. उन के ज्यादा व्यस्त रहने की वजह से न तो आसानी से उस की उन से मुलाकात हो पाती थी और न ही वह उन से कोई फायदा ले पाती थी. हां, इतना जरूर था कि वह महेंद्र त्रिपाठी से मिलने के लिए महीने में 1-2 बार बैतूल आती रहती थी. एडीजे त्रिपाठी उस के लिए सर्किट हाउस में ठहरने की व्यवस्था करा देते थे. जहां 1-2 दिन उन से मिलने के बाद वह वापस चली जाती थी.

लेकिन संध्या सिंह से महेंद्र त्रिपाठी के इस मेलजोल की खबर भी उन के परिवार तक पहुंचने लगी, जिस के कारण उन की अपनी पत्नी व बच्चों से कलह होती रहती थी. आखिरकार महेंद्र त्रिपाठी की पत्नी ने अपनी गृहस्थी को बचाने के लिए कुछ महीने पहले अपनी नौकरी से वीआरएस ले लिया और वे जज साहब के पास बैतूल आ कर रहने लगीं. इस दौरान बड़ा बेटा अभियान भी इंदौर से उन्हीं के पास बैतूल आ कर रहने लगा. वह बैतूल में नौकरी की तलाश कर रहा था. छोटा बेटा आशीष पहले से ही मां के पास रहता था.

इधर 4 महीने से जब से महेंद्र त्रिपाठी का परिवार उन के पास आया था, तब से संध्या सिंह का न तो महेंद्र त्रिपाठी से मिलनाजुलना होता था, न ही त्रिपाठीजी उस की आर्थिक मदद करते थे. इतना ही नहीं, अब महेंद्र त्रिपाठी ने अपने बच्चों को सैटल करने के लिए संध्या सिंह से अपने दिए पैसों का हिसाबकिताब लेना भी शुरू कर दिया था. वे संध्या से अकसर कहते थे कि उन्हें अपने बच्चों को कामधंधा कराना है, इसलिए वह उन से लिए गए पैसे वापस करे. पिछले 10 सालों में महेंद्र त्रिपाठी से संध्या सिंह की दोस्ती आत्मीयता की इस हद तक पहुंच गई थी कि 4 महीने की दूरी उसे सालों की दूरी सी लगने लगी. अब वह महेंद्र त्रिपाठी से कतई दूर नहीं रहना चाहती थी. जबकि महेंद्र त्रिपाठी उस से दूरी बनाना चाहते थे.

जब महेंद्र त्रिपाठी से उस ने कटेकटे रहने और दूरी बनाने का कारण पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया कि उस की वजह से उन के परिवार में कलह रहने लगी है, लिहाजा अब वे एकदूसरे से दूर ही रहे तो अच्छा है, साथ ही उन्होंने संध्या से उन पैसों की मांग फिर से कर दी जो संध्या ने उन से लिए थे. संध्या नहीं लौटाना चाहती थी जज साहब के पैसे इन बातों से उपजे तनाव से संध्या सिंह को लगने लगा कि अगर उसे महेंद्र त्रिपाठी का पैसा लौटाना पड़ा तो कहां से इंतजाम करेगी. वैसे भी अब उसे महेंद्र त्रिपाठी से अपनी दोस्ती पहले जैसी होने की कोई उम्मीद नहीं बची थी. अचानक संध्या सिंह के दिमाग में इन मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए एक साजिश कुलांचे मारने लगी.

उस ने अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर एक ऐसी साजिश रची, जिस से वह महेंद्र त्रिपाठी से लिए गए पैसे लौटाने से भी बच सकती थी और उन के परिवार से उस का इंतकाम भी पूरा हो जाता. इस साजिश को अंजाम देने के लिए उस ने अपने ड्राइवर संजू और संजू के फूफा देवीलाल निवासी काशीनगर, छिंदवाड़ा, मुबीन खान निवासी छिंदवाड़ा और कमल तथा बाबा उर्फ रामदयाल को तैयार कर लिया. संध्या जानती थी कि महेंद्र त्रिपाठी तंत्रमंत्र और पंडितों पर बहुत विश्वास करते हैं. उस ने त्रिपाठीजी की इसी कमजोरी का लाभ उठाया. उस ने साथियों की मदद से सांप का विष हासिल कर लिया. फिर उस ने सर्प विष मिला आटा खिला कर महेंद्र त्रिपाठी व उन के परिवार को खत्म करने की योजना बनाई.

इस षडयंत्र को अंजाम देने के लिए संध्या कुछ दिन पहले बाबा उर्फ रामदयाल को ले कर छिंदवाडा से बैतूल पहुंची और वहां सर्किट हाउस में महेंद्र त्रिपाठी को मुलाकात के लिए बुलवाया. संध्या ने रामदयाल से महेंद्र त्रिपाठी का परिचय एक पहुंचे हुए तांत्रिक के रूप में कराया. उस ने उन्हें बताया कि बाबा ऐसे तांत्रिक हैं, जो उन के घर की आबोहवा देख कर पहचान लेंगे कि घर में किस तरह की कलह है. फिर बाबा अपने तंत्रमंत्र से घर में होने वाली कलह को दूर कर देंगे. एडीजे महेंद्र त्रिपाठी संध्या के झांसे में आ कर बाबा रामदयाल को अपने घर ले गए. जहां बाबा ने घर के हर कोने में जा कर कुछ मंत्र पढ़ने का नाटक किया और जज साहब से कहा कि वह अपने घर में रखा थोड़ा सा आटा एक पौलीथिन में ला कर उन्हें दें.

जज साहब ने वैसा ही किया. उस आटे को ले कर बाबा चला गया और कहा कि वह उस आटे को अभिमंत्रित कर के जल्द ही उन को वापस भिजवा देगा. महेंद्र त्रिपाठी थोड़ा धार्मिक प्रवृत्ति के थे. लिहाजा वे संध्या सिंह के झांसे में आ गए थे. बाबा रामदयाल ने उस आटे को ला कर संध्या सिंह को दे दिया, जो त्रिपाठीजी ने पौलीथिन में भर कर बाबा उर्फ रामदयाल को दिया था. 2 दिन उस आटे को अपने पास रख कर संध्या सिंह ने उस में सांप का विष मिला दिया. 20 जुलाई, 2020 को दोपहर में इसी आटे को ले कर संध्या सिंह अपने ड्राइवर संजू और कमल को ले कर बैतूल पहुंची. कमल को उस ने बैतूल में मुल्ला पैट्रोल पंप के पास उतार दिया. संध्या सिंह अपने ड्राइवर को ले कर कार से सर्किट हाउस बैतूल पहुंची, जहां पहले से एडीजे महेंद्र त्रिपाठी मौजूद थे.

वहां करीब एक घंटे तक संध्या महेंद्र त्रिपाठी के साथ एक बंद कमरे में रही. यहां संध्या सिंह ने उन्हें यह बात समझाने में सफलता हासिल कर ली कि उन का दिया हुआ ये आटा बाबा ने मंत्रपूरित किया है. बाबा की पूजा वाला ये आटा उन के सारे कष्टों का निवारण कर देगा. इतना ही नहीं परिवार में उन के संबंधों के कारण जो कलह हो रही थी, वह भी खत्म हो जाएगी. बस, उन्हें इस आटे को घर के आटे में मिलाना है और इस से बनी हुई रोटियां पूरे परिवार को खानी हैं. संध्या सिंह से महेंद्र त्रिपाठी की यह आखिरी मुलाकात थी. उन्होंने घर आ कर आटा अपनी पत्नी को दिया और उन्हें उस आटे को घर के आटे में मिला कर रोटी बना कर सब को खिलाने के लिए कहा.

मंत्रपूरित आटे की रोटियां बस उसी रात इसी आटे की रोटियां खाने के बाद एडीजे महेंद्र त्रिपाठी और उन के दोनों बेटों की तबियत खराब हो गई और बाद में महेंद्र त्रिपाठी तथा बड़े बेटे अभियान की मौत हो गई थी. संध्या से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के चालक संजू, उस के फूफा देवीलाल, मुबीन खान और कमल को गिरफ्तार कर लिया . पुलिस बाबा उर्फ रामदयाल नाम के उस तथाकथित तांत्रिक की भी तलाश कर रही है, जिस ने झाड़फूंक कर जहरीला आटा संध्या को दिया था. महेंद्र त्रिपाठी को न तो संध्या सिंह के इरादों का पता था और न ही यह कि उस कथित मंत्रपूरित आटे में जहर मिला है. हालांकि एडीजे त्रिपाठी और उन के बेटे की हत्या की मुख्य आरोपी संध्या सिंह से महेंद्र त्रिपाठी के संबंधों को ले कर पुलिस कुछ

भी साफ कहने से बचती रही. पुलिस का यही कहना है कि दोनों की 10 साल से दोस्ती थी. लेकिन एक न्यायिक अधिकारी की एक अकेली रहने वाली महिला से दोस्ती, उस से एकांत में होने वाली मुलाकातें, इस दोस्ती के कारण त्रिपाठी के अपने परिवार से कलह और अपने पद के प्रभाव से संध्या के एनजीओ को प्रोजैक्ट दिलवाने जैसी बातें साफ इशारा करती हैं कि दोनों के रिश्ते एकदूसरे के लिए कितने खास थे.  एसपी सिमाला प्रसाद के मुताबिक, त्रिपाठी की फैमिली में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था और एडीजे दंपति में मनमुटाव था. संध्या ने इसी का फायदा उठाया. संध्या सिंह को पता था कि महेंद्र त्रिपाठी धर्मकर्म को बहुत मानते हैं और तंत्रमंत्र तथा पूजापाठ की बातों पर बहुत यकीन करते हैं

इसीलिए उस ने उन के पूरे परिवार का खात्मा करने के लिए ऐसी चाल चली कि काम भी हो जाए और किसी को पता भी न चले कि इस काम को किस ने अंजाम दिया है. लेकिन संयोग से इस हादसे में महेंद्र त्रिपाठी की पत्नी जहां खाना नहीं खाने के कारण बच गईं, वहीं उन का छोटा बेटा कम खाने के कारण मामूली रूप से ही बीमार हुआ. इस साजिश की कडि़यां जुड़ती गईं और फूड पौइजनिंग का साधारण सा मामला हत्या की एक अनोखी कहानी में बदल गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने संध्या सिंह से बरामद कार की तलाशी ली तो उस में रखे कुछ बैग में तंत्रमंत्र की सामग्री मिली. आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने सभी छहों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया है. द्य

—कहानी पुलिस की जांच व आरोपियों तथा पीडि़त परिवार के बयानों पर आधारित

Agra News : एकतरफा इश्‍म में अंधे डॉक्‍टर ने प्रेमिका को मारी 3 गोलियां

Agra News : डिगरी ले कर डाक्टर बन जाना ही सब कुछ नहीं होता. इस पेशे में डाक्टर के लिए सेवाभाव, संयम, विवेक और इंसानियत भी जरूरी हैं. विवेक तिवारी डाक्टर जरूर बन गया था, लेकिन उस में इन में से कोई भी गुण नहीं था. अपने एक तरफा प्यार में वह चाहता था कि डा. योगिता वही करे जो वह चाहता है. ऐसा नहीं हुआ तो…

बीते 19 अगस्त की बात है. उत्तर प्रदेश पुलिस को सूचना मिली कि आगरा फतेहाबाद हाईवे पर बमरोली कटारा के पास सड़क किनारे एक महिला की लाश पड़ी है. यह जगह थाना डौकी के क्षेत्र में थी. कंट्रोल रूप से सूचना मिलते ही थाना डौकी की पुलिस मौके पर पहुंच गई. मृतका लोअर और टीशर्ट पहने थी. पास ही उस के स्पोर्ट्स शू पड़े हुए थे. चेहरेमोहरे से वह संभ्रांत परिवार की पढ़ीलिखी लग रही थी, लेकिन उस के कपड़ों में या आसपास कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. युवती की उम्र 25-26 साल लग रही थी.

पुलिस ने शव को उलटपुलट कर देखा. जाहिरा तौर पर उस के सिर के पीछे चोट के निशान थे. एकदो जख्म से भी नजर आए. युवती के हाथ में टूटे हुए बाल थे. हाथ के नाखूनों में भी स्कीन फंसी हुई थी. साफतौर पर नजर आ रहा था कि मामला हत्या का है, लेकिन हत्या से पहले युवती ने कातिल से अपनी जान बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. मौके पर शव की शिनाख्त नहीं हो सकी, तो डौकी पुलिस ने जरूरी जांच पड़ताल के बाद युवती की लाश पोस्टमार्टम के लिए एमएम इलाके के पोस्टमार्टम हाउस भेज दी. डौकी थाना पुलिस इस युवती की शिनाख्त के प्रयास में जुट गई.

उसी दिन सुबह करीब साढ़े 9 बजे दिल्ली के शिवपुरी पार्ट-2, दिनपुर नजफगढ़ निवासी डाक्टर मोहिंदर गौतम आगरा के एमएम गेट पुलिस थाने पहुंचे. उन्होंने अपनी बहन डाक्टर योगिता गौतम के अपहरण की आशंका जताई और डाक्टर विवेक तिवारी पर शक व्यक्त करते हुए पुलिस को एक तहरीर दी. डाक्टर मोहिंदर ने पुलिस को बताया कि डाक्टर योगिता आगरा के एसएन मेडिकल कालेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही है. वह नूरी गेट में गोकुलचंद पेठे वाले के मकान में किराए पर रहती है. कल शाम यानी 18 अगस्त की शाम करीब सवा 4 बजे डाक्टर योगिता ने दिल्ली में घर पर फोन कर के कहा था कि डाक्टर विवेक तिवारी उसे बहुत परेशान कर रहा है. उस ने डाक्टरी की डिगरी कैंसिल कराने की भी धमकी दी है.

फोन पर डाक्टर योगिता काफी घबराई हुई थी और रो रही थी. पुलिस ने डाक्टर मोहिंदर से डाक्टर विवेक तिवारी के बारे में पूछा कि वह कौन है? डा. मोहिंदर ने बताया कि डा. योगिता ने 2009 में मुरादाबाद के तीर्थकर महावीर मेडिकल कालेज में प्रवेश लिया था. मेडिकल कालेज में पढ़ाई के दौरान योगिता की जान पहचान एक साल सीनियर डा. विवेक से हुई थी. डाक्टरी करने के बाद विवेक को सरकारी नौकरी मिल गई. वह अब यूपी में जालौन के उरई में मेडिकल औफिसर के पद पर तैनात है. डा. विवेक के पिता विष्णु तिवारी पुलिस में औफिसर थे. जो कुछ साल पहले सीओ के पद से रिटायर हो गए थे. करीब 2 साल पहले हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई थी.

डा. मोहिंदर ने पुलिस को बताया कि डा. विवेक तिवारी डा. योगिता से शादी करना चाहता था. इस के लिए वह उस पर लगातार दबाव डाल रहा था. जबकि डा. योगिता ने इनकार कर दिया था. इस बात को लेकर दोनों के बीच काफी दिनों से झगड़ा चल रहा था. डा. विवेक योगिता को धमका रहा था. नहीं सुनी पुलिस ने पुलिस ने योगिता के अपहरण की आशंका का कारण पूछा, तो डा. मोहिंदर ने बताया कि 18 अगस्त की शाम योगिता का घबराहट भरा फोन आने के बाद मैं, मेरी मां आशा गौतम और पिता अंबेश गौतम तुरंत दिल्ली से आगरा के लिए रवाना हो गए. हम रात में ही आगरा पहुंच गए थे. आगरा में हम योगिता के किराए वाले मकान पर पहुंचे, तो वह नहीं मिली. उस का फोन भी रिसीव नहीं हो रहा था.

डा. मोहिंदर ने आगे बताया कि योगिता के नहीं मिलने और मोबाइल पर भी संपर्क नहीं होने पर हम ने सीसीटीवी फुटेज देखी. इस में नजर आया कि डा. योगिता 18 अगस्त की शाम साढ़े 7 बजे घर से अकेली बाहर निकली थी. बाहर निकलते ही उसे टाटा नेक्सन कार में सवार युवक ने खींचकर अंदर डाल लिया. डा. मोहिंदर ने आरोप लगाया कि सारी बातें बताने के बाद भी पुलिस ने ना तो योगिता को तलाशने का प्रयास किया और ना ही डा. विवेक का पता लगाने की कोशिश की. पुलिस ने डा. मोहिंदर से अभी इंतजार करने को कहा. जब 2-3 घंटे तक पुलिस ने कुछ नहीं किया, तो डा. मोहिंदर आगरा में ही एसएन मेडिकल कालेज पहुंचे. वहां विभागाध्यक्ष से मिल कर उन्हें अपना परिचय दे कर बताया कि उन की बहन डा. योगिता लापता है. उन्होंने भी पुलिस के पास जाने की सलाह दी.

थकहार कर डा. मोहिंदर वापस एमएम गेट पुलिस थाने आ गए और हाथ जोड़कर पुलिस से काररवाई करने की गुहार लगाई. शाम को एक सिपाही ने उन्हें बताया कि एक अज्ञात युवती का शव मिला है, जो पोस्टमार्टम हाउस में रखा है. उसे भी जा कर देख लो. मन में कई तरह की आशंका लिए डा. मोहिंदर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे. शव देख कर उन की आंखों से आंसू बहने लगे. शव उन की बहन डा. योगिता का ही था. मां आशा गौतम और पिता अंबेश गौतम भी नाजों से पाली बेटी का शव देख कर बिलखबिलख कर रो पड़े. शव की शिनाख्त होने के बाद यह मामला हाई प्रोफाइल हो गया. महिला डाक्टर की हत्या और इस में पुलिस अधिकारी के डाक्टर बेटे का हाथ होने की संभावना का पता चलने पर पुलिस ने कुछ गंभीरता दिखाई और भागदौड़ शुरू की.

आगरा पुलिस ने जालौन पुलिस को सूचना दे कर उरई में तैनात मेडिकल आफिसर डा. विवेक तिवारी को तलाशने को कहा. जालौन पुलिस ने सूचना मिलने के 2 घंटे बाद ही 19 अगस्त की रात करीब 8 बजे डा. विवेक को हिरासत में ले लिया. जालौन पुलिस ने यह सूचना आगरा पुलिस को दे दी. जालौन पुलिस उसे हिरासत में ले कर एसओजी आफिस आ गई. जालौन पुलिस ने उस से आगरा जाने और डा. योगिता से मिलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बिफर गया. उस ने कहा कि कोरोना संक्रमण की वजह से वह क्वारंटीन में है. विवेक तिवारी बारबार बयान बदलता रहा. बाद में उस ने स्वीकार किया कि वह 18 अगस्त को आगरा गया था और डा. योगिता से मिला था. विवेक ने जालौन पुलिस को बताया कि वह योगिता को आगरा में टीडीआई माल के बाहर छोड़कर वापस उरई लौट आया था.

आगरा पुलिस ने रात करीब 11 बजे जालौन पहुंचकर डा. विवेक को हिरासत में ले लिया. उसे जालौन से आगरा ला कर 20 अगस्त को पूछताछ की गई. पूछताछ में वह पुलिस को लगातार गुमराह करता रहा. पुलिस ने उस की काल डिटेल्स निकलवाई, तो पता चला कि शाम सवा 6 बजे से उस की लोकेशन आगरा में थी. डा. योगिता से उस की शाम साढ़े 7 बजे आखिरी बात हुई थी. इस के बाद रात सवा बारह बजे विवेक की लोकेशन उरई की आई. कुछ सख्ती दिखाने और कई सबूत सामने रखने के बाद उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई. आखिरकार उस ने डा. योगिता की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. बाद में पुलिस ने उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पुलिस ने 20 अगस्त को डाक्टरों के मेडिकल बोर्ड से डा. योगिता के शव का पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार डा. योगिता के शरीर से 3 गोलियां निकलीं. एक गोली सिर, दूसरी कंधे और तीसरी सीने में मिली. योगिता पर चाकू से भी हमला किया गया था. पोस्टमार्टम कराने के बाद आगरा पुलिस ने डा. योगिता का शव उस के मातापिता व भाई को सौंप दिया. प्रतिभावान डा. थी योगिता पूछताछ में डा. योगिता के दुखांत की जो कहानी सामने आई, वह डा. विवेक तिवारी के एकतरफा प्यार की सनक थी.

दिल्ली के नजफगढ़ इलाके की शिवपुरी कालोनी पार्ट-2 में रहने वाले अंबेश गौतम नवोदय विद्यालय समिति में डिप्टी डायरेक्टर हैं. वह राजस्थान के उदयपुर शहर में तैनात हैं. डा. अंबेश के परिवार में पत्नी आशा गौतम के अलावा बेटा डा. मोहिंदर और बेटी डा. योगिता थी. योगिता शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल रहती थी. उस की डाक्टर बनने की इच्छा थी. इसलिए उस ने साइंस बायो से 12वीं अच्छे नंबरों से पास की. पीएमटी के जरिए उस का सलेक्शन मेडिकल की पढ़ाई के लिए हो गया. उस ने 2009 में मुरादाबाद के तीर्थंकर मेडिकल कालेज में एमबीबीएस में एडमिशन लिया.

इसी कालेज में पढ़ाई के दौरान योगिता की मुलाकात एक साल सीनियर विवेक तिवारी से हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. दोस्ती इतनी बढ़ी कि वे साथ में घूमनेफिरने और खानेपीने लगे. इस दोस्ती के चलते विवेक मन ही मन योगिता को प्यार करने लगा लेकिन योगिता की प्यारव्यार में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह केवल अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान देती थी. इसी दौरान 2-4 बार विवेक ने योगिता के सामने अपने प्यार का इजहार करने का प्रयास किया लेकिन उस ने हंस मुसकरा कर उस की बातों को टाल दिया. योगिता के हंसनेमुस्कराने से विवेक समझ बैठा कि वह भी उसे प्यार करती है. जबकि हकीकत में ऐसा कुछ था ही नहीं. विवेक मन ही मन योगिता से शादी के सपने देखता रहा.

इस बीच, विवेक को भी डाक्टरी की डिगरी मिल गई और योगिता को भी. बाद में डा. विवेक तिवारी को सरकारी नौकरी मिल गई. फिलहाल वह उरई में मेडिकल आफिसर के पद पर कार्यरत था. डा. विवेक मूल रूप से कानपुर का रहने वाला है. कानपुर के किदवई नगर के एन ब्लाक में उस का पैतृक मकान है. इस मकान में उस की मां आशा तिवारी और बहन नेहा रहती हैं. विवेक के पिता विष्णु तिवारी उत्तर प्रदेश पुलिस में अधिकारी थे. वे आगरा शहर में थानाप्रभारी भी रहे थे. कहा जाता है कि पुलिस विभाग में विष्णु तिवारी का काफी नाम था. वे कानपुर में कई बड़े एनकाउंटर करने वाली पुलिस टीम में शामिल रहे थे. कुछ साल पहले विष्णु तिवारी सीओ के पद से रिटायर हो गए थे. करीब 2 साल पहले उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी.

मुरादाबाद से एमबीबीएस की डिगरी हासिल कर डा. योगिता आगरा आ गई. आगरा में 3 साल पहले उस ने एसएन मेडिकल कालेज में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए एडमिशन ले लिया. वह इस कालेज के स्त्री रोग विभाग में पीजी की छात्रा थी. वह आगरा में नूरी गेट पर किराए के मकान में रह रही थी. इस बीच, डा. योगिता और विवेक की फोन पर बातें होती रहती थीं. कभीकभी मुलाकात भी हो जाती थी. डा. विवेक जब भी मिलता या फोन करता, तो अपने प्रेम प्यार की बातें जरूर करता लेकिन डा. योगिता उसे तवज्जो नहीं देती थी.

दोनों के परिवारों को उन की दोस्ती का पता था. डा. विवेक के पास योगिता के परिजनों के मोबाइल नंबर भी थे. उस ने योगिता के आगरा के मकान मालिकों के मोबाइल नंबर भी हासिल कर रखे थे. कहा यह भी जाता है कि विवेक और योगिता कई साल रिलेशन में रहे थे. पिछले कई महीनों से डा. विवेक उस पर शादी करने का दबाव डाल रहा था, लेकिन डा. योगिता ने इनकार कर दिया था. इस से डा. विवेक नाराज हो गया. वह उसे फोन कर धमकाने लगा. 18 अगस्त को विवेक ने योगिता को फोन कर शादी की बात छेड़ दी. योगिता के साफ इनकार करने पर उस ने धमकी दी कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा, उस की एमबीबीएस की डिगरी कैंसिल करा देगा. इस से डा.

योगिता घबरा गई. उस ने दिल्ली में अपनी मां को फोन कर रोते हुए यह बात बताई. इसी के बाद योगिता के मातापिता व भाई दिल्ली से आगरा के लिए चल दिए थे. योगिता को धमकाने के कुछ देर बाद डा. विवेक ने उसे दोबारा फोन किया. इस बार उस की आवाज में क्रोध नहीं बल्कि अपनापन था. उस ने कहा कि भले ही वह उस से शादी ना करे लेकिन इतने सालों की दोस्ती के नाम पर उस से एक बार मिल तो ले. काफी नानुकुर के बाद डा. योगिता ने आखिरी बार मिलने की हामी भर ली. उसी दिन शाम करीब साढ़े 7 बजे डा. विवेक ने योगिता को फोन कर के कहा कि वह आगरा आया है और नूरी गेट पर खड़ा है. घर से बाहर आ जाओ, आखिरी मुलाकात कर लेते हैं. योगिता बिना सोचेसमझे बिना किसी को बताए घर से अकेली निकल गई. यही उस की आखिरी गलती थी.

घर से बाहर निकलते ही नूरी गेट पर टाटा नेक्सन कार में सवार विवेक ने उसे कार का गेट खोल कर आवाज दी और तेजी से कार के अंदर खींच लिया. रास्ते में डा. विवेक ने योगिता से फिर शादी का राग छेड़ दिया, तो चलती कार में ही दोनों में बहस होने लगी. डा. विवेक उस से हाथापाई करने लगा. इसी हाथापाई में योगिता ने अपने हाथ के नाखूनों से विवेक के बाल खींचे और चमड़ी नोंची, तो गुस्साए विवेक ने उस का गला दबा दिया. डा. विवेक योगिता को कार में ले कर फतेहाबाद हाईवे पर निकल गया. एक जगह रुक कर उस ने अपनी कार में रखा चाकू निकाला. चाकू से योगिता के सिर और चेहरे पर कई वार किए. इतने पर भी विवेक का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो उस ने योगिता के सिर, कंधे और छाती में 3 गोलियां मारीं. यह रात करीब 8 बजे की घटना है.

हत्या कर के रातभर सक्रिय रहा विवेक इस के बाद योगिता के शव को बमरौली कटारा इलाके में सड़क किनारे एक खेत में फेंक दिया. पिस्तौल भी रास्ते में फेंक दी. रात में ही वह उरई पहुंच गया. रात को ही वह उरई से कानपुर गया और अपनी कार घर पर छोड़ आया. दूसरे दिन वह वापस उरई आ गया. बाद में पुलिस ने कानपुर में डा. विवेक के घर से वह कार बरामद कर ली. यह कार 2 साल पहले खरीदी गई थी. कार में खून से सना वह चाकू भी बरामद हो गया, जिस से हमला कर योगिता की जान ली गई थी. बहुत कम बोलने वाली प्रतिभावान डा. योगिता गौतम का नाम कोरोना संक्रमण काल में यूपी की पहली कोविड डिलीवरी करने के लिए भी दर्ज है. कोरोना महामारी जब आगरा में पैर पसार रही थी, तब आइसोलेशन वार्ड विकसित किया गया.

इस के लिए स्त्री और प्रसूति रोग विभाग की भी एक टीम बनाई गई. जिसे संक्रमित गर्भवतियों के सीजेरियन प्रसव की जिम्मेदारी दी गई. विभागाध्यक्ष डा. सरोज सिंह के नेतृत्व में गठित इस टीम में शामिल डा. योगिता ने 21 अप्रैल को यूपी और आगरा में कोविड मरीज के पहले सीजेरियन प्रसव को अंजाम दिया था. इस के बाद भी उन्होंने कई सीजेरियन प्रसव कराए. डा. योगिता के कराए प्रसव की कई निशानियां आज उन घरों में किलकारियां बन कर गूंज रही हैं. सिरफिरे डाक्टर आशिक के हाथों जान गंवाने से 5 दिन पहले ही 13 अगस्त को डा. योगिता का पीजी का रिजल्ट आया था. जिस में वह पास हो गई थी. पीजी कर योगिता विशेषज्ञ डाक्टर बन गई थी. लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था.

लोगों की जान बचाने वाली डा. योगिता की उस के आशिक ने ही जान ले ली. घटना वाले दिन भी वह दोपहर 3 बजे तक अस्पताल में अपनी ड्यूटी पर थी. डा. योगिता की मौत पर आगरा के एसएन मेडिकल कालेज में कैंडल जला कर योगिता को श्रद्धांजलि दी गई. कालेज के जूनियर डाक्टरों की एसोसिएशन ने प्रदर्शन कर सच्ची कोरोना योद्धा की हत्या पर आक्रोश जताया. बहरहाल डा. विवेक ने अपने एकतरफा प्यार की सनक में योगिता की हत्या कर दी. उस की इस जघन्य करतूत ने योगिता के परिवार को खून के आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया. वहीं, खुद का जीवन भी बरबाद कर लिया. डाक्टर लोगों की जान बचाने वाला होता है, लोग उसे सब से ऊंचा दर्जा देते हैं, लेकिन यहां तो डाक्टर ही हैवान बन गया. दूसरों की जान बचाने वाले ने साथी डाक्टर की जान ले ली.

 

Murder Stories : पत्नी ने पति को थप्पड़ मारा तो गुस्साए पति ने पत्नी और उसके मामा की कर दी हत्या

Murder Stories : लगातार होने वाला अत्याचार पति का हो या पत्नी का, जीवनसाथी कब तक बरदाश्त कर सकता है. उस के अंदर पलने वाला क्रोध का ज्वालामुखी कभी न कभी फटता ही है. जयवंत नाटेकर के साथ…

6फरवरी, 2020 की बात है. दिन के करीब 11 बजे थे. महाराष्ट्र की उप राजधानी नागपुर शहर के सक्करदारा पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर अजीत सीद को एक अहम सूचना मिली. सूचना देने वाले ने फोन पर उन्हें बताया कि सुपर बाजार के दत्तात्रेय नगर स्थित देशमुख अपार्टमेंट की पहली मंजिल के फ्लैट नंबर 40 में कोई हादसा हो गया है. फ्लैट के अंदर से दुर्गंध आ रही है. सीनियर इंसपेक्टर अजीत सीद ने इस सूचना को गंभीरता से लिया और अपने सहायक सबइंसपेक्टर प्रवीण बड़े, विनोद म्हात्रे और विजय मसराम को साथ ले कर तुरंत घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल सक्करदारा थाने से करीब एक किलोमीटर दूर था. पुलिस टीम को वहां पहुंचने में 10 मिनट का समय लगा. इस बीच यह खबर उस इलाके में आग की तरह फैल गई थी, भीड़ देख कर पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि उसे किस अपार्टमेंट में जाना है. पुलिस टीम भीड़ को हटा कर फ्लैट नंबर 40 के सामने जा पहुंची. फ्लैट के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. पड़ोसियों ने बताया कि फ्लैट भारतीय ज्ञानपीठ प्राइमरी स्कूल की हेडमिस्ट्रेस मंजूषा नाटेकर का है, जिस में वह अपने छोटे मामा अशोक काटे के साथ रहती थीं. मंजूषा और जयवंत नाटेकर का एक बेटा है सुजय नाटेकर, जो अपनी पत्नी के साथ चंद्रपुर में रहता है.

मंजूषा नाटेकर का एक भाई राजेश खड़खड़े पास ही के मानवेड़ा परिसर के एक अपार्टमेंट में किराए पर रहता है और नौकरी करता है. फ्लैट की एक चाबी उस के पास रहती है. सूचना दे दी गई है, वह आता ही होगा. दुर्गंध चूंकि काफी तेजी थी, इसलिए पुलिस टीम ने नाक पर रूमाल बांध कर दरवाजा खोला तो अंदर का दृश्य दिल दहला देने वाला था. फ्लैट के अंदर एक नहीं 2 शव पड़े थे. एक शव मंजूषा के मामा अशोक काटे का था, जो हौल में था, जबकि दूसरा शव फ्लैट की किचन में रक्त में डूबा मंजूषा नाटेकर का था. उस का बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था. कत्ल संभवत: 2 दिन पहले हुए थे. शवों में सड़न पैदा हो गई थी और दुर्गंध फैल रही थी.

सीद ने घटना की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. साथ ही फोरैंसिक टीम को भी मौकाएवारदात पर बुला लिया. सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर डा. भूषण कुमार उपाध्याय, एडिशनल सीपी शशिकांत महावरकर, डीसीपी चिन्मय पंडित और डीसीपी (क्राइम) गजानन राजमने भी वहां आ गए. फौरेंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल की. पड़ोसियों के बयान दर्ज किए. घटनास्थल की सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के शवों को पोस्टमार्टम के लिए नागपुर मैडिकल कालेज भेज दिया गया. मंजूषा नाटेकर के भाई राजेश खड़खडे़ को ले कर पुलिस थाने लौट आई.

पूछताछ में राजेश खडखड़े ने दोनों हत्याओं का आरोप सीधेसीधे अपने बहनोई जयवंत नाटेकर पर लगाया. उस का कहना था कि उस के बहनोई और बहन में अकसर लड़ाईझगड़े होते थे. मंजूषा नाटेकर के पड़ोसियों ने भी पूछताछ के दौरान यही बात पुलिस को बताई थी. पड़ोसियों के अनुसार उस दिन पहले फ्लैट से तेजतेज आवाजें आती सुनाई दीं. हालांकि टीवी की तेज आवाज में बातें स्पष्ट नहीं सुनी जा सकीं. कुछ देर बाद जब टीवी की आवाज बंद हुई तो उन्होंने जयवंत नाटेकर को फ्लैट में ताला लगा कर बाहर जाते हुए देखा. शुरूआती जांचपड़ताल के बाद मंजूषा नाटेकर के पति जयवंत नाटेकर की गिरफ्तारी के बाद ही सामने आ सकती थीं.

जयवंत नाटेकर कहां होगा, इस की जानकारी किसी को नहीं थी. एक तरफ जहां इंसपेक्टर अजीत सीद अपने सहायकों के साथ मामले पर विचारविमर्श कर तफ्तीश की रूपरेखा तैयार कर रहे थे. वहीं दूसरी तरफ मामले की गंभीरता को देखते हुए सीपी डा. भूषण कुमार उपाध्याय ने तफ्तीश की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर राठौर, हेडकांस्टेबल आनंद जांमुले, गोविंद देशमुख्र कांस्टेबल राशिद, रोहन और संजय सोनपणे की टीम बना कर जांच शुरू कर दी. क्राइम ब्रांच की टीम ने तफ्तीश का केंद्रबिंदु उन लोगों को बनाया, जिन से जयवंत के करीबी संबंध थे. इस का नतीजा भी जल्द सामने आ गया. उस के एक दोस्त ने बताया कि जयवंत नाटेकर के पास एक मोबाइल और 2 सिम थे.

इन में से एक सिम का इस्तेमाल वह अपनी पत्नी मंजूषा से छिपा कर करता था. वह अपने बेटे और बहू के साथ अपना दुखदर्द साझा करता था. जबकि दूसरे सिम से अपना दिल बहलाने के लिए खास दोस्तों से बात कर लिया करता था. क्राइम ब्रांच को दूसरे सिम कार्ड से कामयाबी मिली, क्योंकि पहला सिम कार्ड बंद था. दूसरे सिम से जब जयवंत नाटेकर से संपर्क हुआ तो क्राइम ब्रांच की टीम ने अपना परिचय छिपा कर उस से इधरउधर की बात की. इस से उस की लोकेशन मिल गई. मोबाइल लोकेशन के आधार पर क्राइम ब्रांच ने जयवंत नाटेकर को रात 8 बजे उस समय दबोच लिया, जब वह नागपुर रेलवे स्टेशन पर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने के लिए अजमेर शरीफ की टिकट ले रहा था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने जयवंत नाटेकर को गिरफ्तार कर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सामने खड़ा कर दिया. उस से विस्तार से पूछताछ की गई तो पता चला वह एक ऐसा पीडि़त पति था, जिस के अंदर का मर्द अचानक जाग गया था और वह उसी मर्दानगी में 2 कत्ल कर बैठा. जयवंत ने बिना किसी दबाव के अपना अपराध स्वीकार कर के पुलिस को अपने उत्पीड़न की पूरी कहानी बता दी, जो कुछ इस तरह थी—

चंद्रपुर निवासी 50 वर्षीय जयवंत नाटेकर सरल स्वभाव का व्यक्ति था. गांव के स्कूल से 10वीं जमात पास करने के बाद उसे चंद्रपुर की रेफ्रीजरेटर बनाने वाली एक कंपनी में वाहन चालक की नौकरी मिल गई. अच्छी नौकरी और वेतन होने के बाद परिवार वालों ने 1980 में उस की शादी नागपुर के भंडारा जवाहर नगर की मंजूषा खड़खड़े से कर दी. 45 वर्षीय मंजूषा खड़खड़े संपन्न परिवार की एकलौती बेटी थी. उस के 2 भाई थे संजय खड़खड़े और राजेश खड़खड़े. मंजूषा सब से छोटी थी. उस का बड़ा भाई संजय खड़खड़े अपने गांव में रह कर काश्तकारी करता था.

जबकि छोटा भाई राजेश खड़खड़े नागपुर की एक प्राइवेट कंपनी में सर्विस कर रहा था और दत्तात्रेय नगर, मानवेड़ा के एक अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहता था. मंजूषा खड़खड़े जितनी स्वस्थ और सुंदर थी, उतनी ही स्मार्ट और महत्त्वाकांक्षी भी थी. जयवंत नाटेकर से शादी होने के बाद उसे अपने सारे सपने बिखरते नजर आए. यह बात जब जयवंत नाटेकर को पता चली तो उस ने मंजूषा के सपनों को मरने नहीं दिया. उस ने मंजूषा की इच्छाओं को पूरा किया और उसे वह मुकाम दिलवाया जो वह चाहती थी. लेकिन उस के मन में पति के इस सहयोग की कोई कीमत नहीं थी.

वह वैसे भी अपनी पसंद और कल्पना के अनुसार पति न पा कर दुखी थी. प्रतिष्ठित स्कूल की नौकरी पाने के बाद वह गांव छोड़ कर नागपुर के दत्तात्रेय नगर जैसे पौश इलाके में आ कर रहने लगी. मंजूषा नाटेकर और जयवंत का एक बेटा था सुजय. सरल स्वभाव का जयवंत मंजूषा की ज्यादतियों पर भी कुछ नहीं कहता था. नतीजा यह हुआ कि मंजूषा का हौसला बढ़ता गया और वह अपनी नारी मर्यादा को ही भूल गई. इस का एहसास नाटेकर को तब हुआ जब एक हादसे के चलते दिसंबर, 2000 में उस की नौकरी चली गई. पेंशन के रूप में उसे सिर्फ 2000 रुपए मिलते थे, जिस की मंजूषा की नजर में कोई अहमियत नहीं थी. मंजूषा स्कूल की हेडमास्टर थी. मानसम्मान, अच्छा वेतन और समाज में उस की काफी इज्जत थी.

लेकिन घर में वह अपने पति नाटेकर के साथ नौकरों जैसा व्यवहार करती थी. घर के सारे काम झाड़ू, बर्तन, कपड़े धोने वगैरह के काम तो जयवंत को करने ही पड़ते थे, कभीकभी वह पति से अपनी मालिश तक करवाती थी. जयवंत के न करने पर वह उसे थप्पड़ तक जड़ देती थी. इस के बावजूद भी मंजूषा का मन नहीं भरता तो वह अपने मायके वालों को बुला कर उन के सामने पति को अपमानित करती थी. मायके वाले उसी का पक्ष लेते और जयवंत को डांटतेफटकारते थे. पिता के प्रति अपनी मां और उस के मायके वालों का बर्ताव देख बेटा सुजय नाटेकर दुखी हो जाता था. वह पिता के साथ हमदर्दी रखते हुए मां को समझाने की कोशिश करता, लेकिन मां पर इस का कोई असर नहीं होता था.

इस की जगह मंजूषा कभीकभी उसे भी आडे़ हाथों लेती थी. सुजय नाटेकर जवान हो गया था. पिता के प्रति मां का व्यवहार उस से देखा नहीं जाता था. वह जिस कालेज में पढ़ता था, उसी कालेज की एक लड़की से लवमैरिज कर के अपने पुश्तैनी घर चंद्रपुर चला गया. जब कभी पिता की याद आती तो वह आ कर मिल लेता था. जब इस पर भी मां मंजूषा ने ऐतराज किया तो उस ने मां से छिपा कर पिता जयवंत को एक मोबाइल और 2 सिम ला कर दे दिए थे. जिस से चोरीछिपे पितापुत्र की बातें हो जाया करती थीं. समय अपनी गति से दौड़ रहा था. 2019 में जब मंजूषा की मां का देहांत हुआ तो वह अपने मायके गई और लौटते समय अपने मामा अशोक काटे को साथ ले आई.

पहले तो जयवंत पत्नी मंजूषा से ही परेशान था, अब उसे मंजूषा के मामा अशोक काटे से भी कोई राहत नहीं मिली. वह भी बहन के सुर से सुर मिलाने लगा. मामाभांजी के रोज के बर्ताव से जयवंत की सहनशक्ति जवाब दे गई. उस के अंदर इतना गुबार भर गया था, जो कभी भी ज्वालामुखी की तरह फट सकता था. घटना के 2 दिन पहले 3 फरवरी, 2020 को सुबहसुबह स्कूल जाते समय मंजूषा ने अपनी 4 साडि़यां अलमारी से निकाल कर जयवंत के सामने डाल दीं और धो कर प्रेस करने को कहा. जयवंत पहले से ही त्रस्त था, उस ने इस काम के लिए इनकार कर दिया.

इस पर मंजूषा ने पति के गाल पर इतने जोर से थप्पड़ मारा कि उस का पूरा शरीर झन्ना कर रह गया. थप्पड़ जड़ कर मंजूषा बड़बड़ाती हुई किचन में चली गई. जयवंत कुछ देर गाल पर हाथ रखे खड़ा रहा. जयवंत को बरदाश्त नहीं हुआ. अचानक उस का पुरुषत्व जाग उठा. टीवी की आवाज तेज कर के वह मंजूषा के पीछेपीछे किचन में गया और बदले में उस ने मंजूषा के गाल पर वैसा ही थप्पड़ जड़ दिया, जिस से मंजूषा तिलमिला कर रह गई. वह जयवंत का कालर पकड़ कर उस से उलझ गई. इसी बीच जयवंत नाटेकर ने किचन में रखा सब्जी काटने वाला चाकू उठाया और मंजूषा पर कई वार कर दिए. मंजूषा की चीख सुन कर अशोक काटे उसे बचाने के लिए जब बैडरूम से बाहर आया तो जयवंत ने उस का भी वही हाल कर दिया जो मंजूषा का किया.

दोनों बचाव के लिए चीखेचिल्लाए लेकिन उन दोनों की चीखें टीवी की तेज आवाज में दब कर रह गई थी. मंजूषा और अशोक काटे को मौत की नींद सुलाने के बाद जयवंत ने राहत की सांस ली. कपड़े बदले और फ्लैट में ताला लगा कर 2 दिनों तक अपने एक पुराने दोस्त के पास रहा. उस के बाद उस ने अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए अजमेर जाने का फैसला किया. लेकिन जाने से पहले वह पकड़ा गया. क्राइम ब्रांच की टीम ने अपनी तफ्तीश पूरी कर अभियुक्त जयवंत नाटेकर को थाना सक्करदारा को सौंप दिया. जहां की पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. औरत अगर अपने ही घर में कांटे बिखेर दे तो उस के पांव कब तक सुरक्षित रह सकते हैं.

UP News : जिंदा बेटी के कत्‍ल के इल्‍जाम में पिता महीनों रहा जेल में बंद

UP News : बेटी कमलेश के गायब होने के बाद सुरेश ने नामजद रिपोर्ट लिखाई. लेकिन पुलिस ने डंडे के बल पर सुरेश, उस के बेटे व रिश्तेदार को औनर किलिंग के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. फिर 17 महीने बाद कमलेश अपने प्रेमी के साथ जीवित मिली तो…

चंद्रवती के पति और बेटे को जेल गए लगभग 7 महीने बीत चुके थे. लेकिन उसे अभी भी न्याय मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. उन दोनों की जमानत होने की सब से बड़ी अड़चन थी देश में लौकडाउन का लगना. इस लौकडाउन के चलते उस के घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी. कोर्ट में कुछ इमरजेंसी केसों की औनलाइन सुनवाई चालू हुई तो चंद्रवती ने अपने वकील से मिल कर पति सुरेश सिंह और बेटे रूपकिशोर की जमानत की अरजी लगवा दी. पति और बेटे को जेल से छुड़ाने के लिए चंद्रवती ने जुतासे की अपनी ढाई बीघा जमीन भी बेच दी. लेकिन उस के बाद भी उस के हाथ खाली के खाली रहे.

चंद्रवती ने जैसेतैसे 6 अगस्त, 2020 को 5 हजार रुपयों का बंदोबस्त किया और वह पैसे अपने बेटे राहुल को देते हुए वकील साहब के खाते में डालने को कहा, जिस से पति और बेटे की जमानत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके. राहुल बाइक ले कर हसनपुर स्थित बैंक चला गया. उस समय न तो उस के पास बाइक के कागज थे और न ही ज्यादा पैट्रोल. अपना काम पूरा करने के बाद उस ने घर का रुख किया तो रास्ते में एक जगह पुलिस वाहनों की चैकिंग करती मिली. चैकिंग के डर से राहुल ने अपना रास्ता बदला. वह गांव रहरा से पौरारा गांव की ओर चल पड़ा. लेकिन परेशानी ने उस का वहां भी पीछा नहीं छोड़ा.

पौरारा गांव पहुंचते ही उस की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया. बाइक साइड में लगा कर राहुल सोचने लगा कि अब क्या करे. उसी दौरान उस की नजर सामने के घर से निकलती एक युवती पर पड़ी तो उस का माथा झनझना उठा. पलभर के लिए उसे लगा कि कहीं सपना तो नहीं देख रहा. एकबारगी आंखों पर यकीन नहीं हुआ तो उस ने आंखें मल कर फिर देखा. लेकिन उस ने जो देखा था, उस पर वह उस का मन विश्वास करने को तैयार नहीं था. उस के दिमाग से बाइक का पैट्रोल खत्म होने की बात पूरी तरह निकल गई थी. उस ने घर पर फोन मिला कर मां को वह बात बताई तो चंद्रवती ने राहुल को समझाया,

‘‘बेटा, पागल हो गया है क्या. जिस की हत्या के आरोप में तेरा बाप और भाई जेल काट रहे हैं, तू उस के जिंदा होने की बात कह रहा है.’’

राहुल किसी भी कीमत पर अपनी आंखों देखी बात झुठलाने को तैयार नहीं था. फिर भी उस ने जैसेतैसे पौरारा गांव में किसी से पैट्रोल लिया और घर लौट आया. जब वह घर पहुंचा, तो उस के घर वाले उसी बात की चर्चा कर रहे थे. राहुल ने घर वालों को अपनी बहन कमलेश, जो मर चुकी थी, के जिंदा होने की बात बताई तो घर वालों को सहजता से यकीन नहीं हुआ. उसी शाम राहुल ने यह बात घर के सभी सदस्यों और गांव वालों के सामने रखी. राहुल की बात की सच्चाई जानने के लिए गांव वालों ने अगली सुबह पौरारा गांव जाने की योजना बना ली. 7 अगस्त, 2020 को राहुल गांव वालों के साथ गांव पौरारा जा पहुंचा. जिस घर में राहुल ने युवती को देखा था, उस घर में पहुंच कर सब ने जो देखा, उसे देख सब की आंखें फटी रह गईं.

घर के आंगन में कमलेश अपने नवजात शिशु को खिला रही थी. उस के पास ही एक चारपाई और पड़ी थी, जिस पर एक युवक बैठा उन दोनों को देख रहा था. घर में अचानक आए दरजनों लोगों को देख कर दोनों सहम गए. पलभर को उन की समझ में कुछ नहीं आया. लेकिन जैसे ही कमलेश की नजर मां और भाई पर पड़ी तो उसे सब कुछ समझ आ गया. बेटी की हकीकत जानने के बाद मांबेटा दोनों आदमपुर थाने पहुंच गए. चंद्रवती ने पुलिस को बताया कि जिस बेटी की हत्या के आरोप में उस का पति और बेटा जेल की सजा काट रहे हैं, वह जिंदा है. लेकिन पुलिस ने उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया. इस के बाद चंद्रवती ने सीओ सत्येंद्र सिंह को इस बात से अवगत कराया, जिन के आदेश के तुरंत बाद थाना पुलिस हरकत में आई. आननफानन में पुलिस गांव पौरारा पहुंच गई.

जिस वक्त पुलिस राहुल के बताए घर पर पहुंची, उस वक्त कमलेश और उस का प्रेमी घर पर मौजूद थे. कमलेश के जिंदा होने की खबर क्षेत्र में फैल गई थी. लेकिन कमलेश को देख कर पुलिस को जैसे सांप सूंघ गया था. कमलेश के जिंदा होने की खबर पा कर मलकपुर के सैकड़ों ग्रामीण पहले ही पौरारा पहुंच गए थे. कमलेश को ले कर काफी हंगामा हुआ. कमलेश की हकीकत आई सामने अपने घर पर हंगामा होते देख कमलेश का प्रेमी राकेश अपने मोबाइल से लोगों की रिकौर्डिंग करने लगा तो उत्तेजित भीड़ ने उस का मोबाइल छीन लिया. उस के बाद कमलेश की मां ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू की तो कमलेश अपने पति राकेश के बचाव में सामने आ खड़ी हुई.

उस का साफ कहना था कि राकेश उस का पति है. उस ने उस के साथ प्रेम विवाह किया है. अगर किसी ने भी उस के ऊपर हाथ उठाने की कोशिश की तो उस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. राकेश के घर पर भीड़ को बेकाबू होते देख पुलिस दोनों को अपने साथ थाने ले आई. जहां पर पुलिस ने दोनों से विस्तार से पूछताछ की. पुलिस पूछताछ में कमलेश के गायब होने की जो गाथा खुल कर सामने आई, उस से खुद पुलिस ही अपराधी के कटघरे में आ खड़ी हुई. उत्तर प्रदेश के जिला अमरोहा का एक थाना है आदमपुर. इस थाना क्षेत्र का का एक गांव है मलकपुर. सुरेश सिंह का 11 सदस्यों का परिवार इसी गांव में रहता था. सुरेश के पास गांव में जुतासे की जमीन थी, जिस के सहारे उस के परिवार की जीविका चलती थी. बेटे बड़े हुए तो सुरेश का सहारा बन गए. वे खेती के अलावा दूसरा कामधंधा कर के पैसा कमाने लगे.

कमलेश सुरेश के बच्चों में चौथे नंबर की बेटी थी. वह अभी नाबालिग थी. सुरेश सिंह को उस की शादी की अभी कोई चिंता भी नहीं थी. सुरेश सिंह के परिवार में सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि 6 फरवरी, 2019 को खेतों से चारा लेने गई कमलेश वापस नहीं लौटी. उस के गायब होने से पूरा गांव सन्न सा रह गया. उस के घर वालों ने गांव वालों के सहयोग से उसे हरसंभव जगह पर खोजा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चल सका. जब सुरेश के घर वाले कमलेश की तलाश करतेकरते थक गए तो उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई. रिपोर्ट में सुरेश ने अपने एक रिश्तेदार की संलिप्तता का शक जाहिर किया था. कमलेश के गायब होने से 15 दिन पूर्व कमलेश की चचेरी बहन भी अचानक गायब हो गई थी, जिस के गायब होने में 2 लोगों के नाम सामने आए थे.

ये दोनों लोग सुरेश के दूर के रिश्तेदार थे. लेकिन पुलिस ने उन दोनों पर कोई काररवाई नहीं की थी. इसी आधार पर सुरेश को कमलेश के लापता होने में उन्हीं का हाथ होने की शंका थी. फरवरी, 2019 को सुरेश सिंह के बेटे रूपकिशोर की ओर से थाना बछरायूं, सुल्तानपुर निवासी होमराम, हरफूल, खेमवती, जयपाल और सुरेंद्र के खिलाफ कमलेश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. एक युवती के अपहरण की नामजद रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस ने त्वरित काररवाई कर के इस मामले में होमराम व हरफूल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

इस मामले की विवेचना स्वयं आदमपुर थानाप्रभारी अशोक कुमार शर्मा कर रहे थे. उसी विवेचना के दौरान पुलिस को पता चला कि सुरेश का अपने भाइयों के साथ जुतासे की जमीन को ले कर विवाद चल रहा था. जिस का फैसला होने में भाई का दामाद होमराम और हरफूल व उन के रिश्तेदार फैसला नहीं होने दे रहे थे. इसी रंजिश के चलते सुरेश ने दोनों को अपनी लड़की के अपहरण के आरोप में जेल भिजवा दिया था. यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने इस मामले की फिर से तफ्तीश शुरू की. जांच अधिकारी अशोक कुमार ने इस केस को नया मोड़ देते हुए 28 दिसंबर, 2019 को दूसरे पक्ष के लोगों के दबाव में आ कर सुरेश व उस के बेटे रूपकिशोर और उस के एक रिश्तेदार देवेंद्र को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. तीनों से गहनता के साथ पूछताछ की गई.

सुरेश पहले ही अपनी बेटी के गायब होने से परेशान था, पुलिस की उलटी काररवाई देख उस का मनोबल पूरी तरह से टूट गया. पुलिस ने सुरेश और उस के बेटे के साथ उस के एक रिश्तेदार को इतना टौर्चर किया कि सुरेश का मानसिक संतुलन ऐसा गड़बड़ाया कि उस ने स्वयं को बेटी का हत्यारा मान लिया. पुलिस की काररवाई ने सुरेश व उस के घर वालों को ऐसा दर्द दिया कि उन की रातों की नींद ही उड़ गई थी. पहले से ही अपनी बेटी के खो जाने का गम मन में पाले सुरेश सिंह की बीवी ने अपने पति और बेटे पर बेटी की मौत का कलंक लगने से क्षुब्ध थी और खानापीना त्याग दिया था.

आखिर पुलिस ने बना दिया रस्सी का सांप पुलिस की बेरहमी के सामने दुखी और कुंठित सुरेश ने आत्मसमर्पण तो कर दिया, लेकिन पुलिस ने उस के कबूलनामे में जो बात पत्रकारों को बताई, वह निराधार थी. पुलिस विवेचना के अनुसार सुरेश ने अपनी बेटी की हत्या का जुर्म कबूलते हुए बताया था कि उस की लड़की गलत संगत में पड़ गई थी, उस के चालचलन से बदनामी हो रही थी. काफी समझाने की कोशिश की गई, लेकिन उस ने उस की एक नहीं मानी. उसी से तंग आ कर उस ने अपने बेटे रूपकिशोर और रिश्तेदार देवेंद्र के साथ मिल कर कमलेश की गोली मार कर हत्या कर दी. इस के बाद तीनों ने उस की लाश बोरे में भर कर गंगा नदी में फेंक दी थी.

कमलेश को मौत के घाट उतारने के बाद तीनों अपने घर चले आए. उस के बाद उन्होंने इस केस में अपने भाई रोहताश के दामाद होमराम और उस के परिजनों को फंसाने के लिए षडयंत्र रचा. फिर होमराम और उस के घर वालों सहित 5 लोगों के खिलाफ अपनी बेटी के अपहरण का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया था, ताकि उन के जेल चले जाने के बाद विवाद वाली भूमि उन्हें मिल जाए. पुलिस ने आरोपी पिता सुरेश की निशानदेही पर उसी के घर के संदूक से कमलेश की हत्या में इस्तेमाल तमंचा, कारतूस और जंगल में छिपाए गए कमलेश के कपड़े बरामद कर लिए. इस केस का खुलासा स्वयं अमरोहा एसपी डा. विपिन ताड़ा व एएसपी ने किया था. 29 दिसंबर, 2019 को पुलिस ने सुरेश सिंह व उस के बेटे रूपकिशोर व टेलर देवेंद्र को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया था.

पुलिस ने इस मामले की तहकीकात में लगी पुलिस टीम में शामिल एसएसआई विनोद कुमार त्यागी, एसआई राकेश कुमार, आरिफ मोहम्मद, कांस्टेबल कृष्णवीर सिंह, दीपक कुमार, अनिरुद्ध, महिला कांस्टेबल अपेक्षा तोमर और निधि सिंह की भी इस केस को खोलने में सराहना की थी. सुरेश सिंह के जेल जाने से पूरे परिवार पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. गांव वालों की नजरों में सुरेश और उस का परिवार बेटी का कातिल बन गया था. गांव के लोग उस के परिवार वालों से मिलते हुए भी कतराने लगे थे. लेकिन उस के घर वालों को उम्मीद थी कि जिस तरह का इलजाम सुरेश सिंह पर लगाया गया है वह निराधार  है.

घर वाले जेल में सुरेश से मिलने जाते. उस से हकीकत पूछते तो उस का साफ कहना होता था कि वह इतना पागल नहीं कि अपनी ही बेटी को मौत की नींद सुला सके. सुरेश हर बार यही सफाई देता कि पुलिस ने होमराम और उस के परिवार वालों से मिल कर उसे साजिशन फंसाया है. यह बात जब गांव वालों के सामने आई तो गांव वाले भी उस की जमानत कराने की कोशिश करने लगे. इसी दौरान घर वालों ने जेल में बंद पिता और बेटे की जमानत के लिए 2 बार आवेदन किया. लेकिन पुलिस के पक्के दावे के कारण दोनों बार आवेदन खारिज हो गया. इस पर घर वालों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण लेते हुए बेटी का शव बरामद नहीं होने को आधार बना कर जमानत पत्र दाखिल किया. लेकिन लौकडाउन के चलते सब कुछ खटाई में पड़ गया.

सुरेश के वकील ने हर तारीख पर तीनों को झूठे मुकदमे में फंसाने की वकालत की, लेकिन पुलिस की ओर से इस मामले को औनर किलिंग का मामला दिखा कर केस को काफी मजबूती से पेश किया गया था, जिस के चलते उन की जमानत में अड़चनें आ रही थीं. समय गुजरता गया. सुरेश जेल की सलाखों में पड़ा अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाता रहा. एक बार उस की जमानत की उम्मीद जागी तो देश में लौकडाउन लग गया. देश की सभी अदालतों के दरवाजे बंद हुए तो सुरेश सिंह की दिक्कतें और भी बढ़ गईं. इस मामले को हुए पूरे 17 महीने गुजर गए.

अपनी बेटी को खो चुके सुरेश के परिवार वाले उस की जमानत के लिए तारीखों पर पैसे खर्च कर रहे थे. 2 महीने पहले सुरेश के एक मिलने वाले ने उस की बीवी चंद्रवती को बताया कि उस ने बिलकुल उस की बेटी की तरह एक लड़की को देखा है. लेकिन किसी ने भी उस की बात पर गहराई से नहीं सोचा. जबकि चंद्रवती अपनी बेटी जैसी युवती दिखने वाली बात सुन कर परेशान हो उठी. चंद्रवती को पूरा विश्वास था कि उस की बेटी जिंदा है और एक न एक दिन घर वापस जरूर आएगी. यही सोच कर चंद्रवती ने अपनी बेटी के जिंदा होने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर उसे बरामद कराने की मांग की थी. लेकिन लौकडाउन के चलते उस के प्रार्थना पर कोई सुनवाई न हो सकी.

कमलेश को जीवित देख कर पुलिस रह गई भौचक मामला खुलने पर जब पुलिस को पता चला कि जिस कमलेश की हत्या के आरोप में वह उस के पिता और भाई को 7 महीने पहले जेल भेज चुकी है, वह जिंदा मिल गई है तो पुलिस के होश फाख्ता हो गए. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एसपी डा. विपिन ताड़ा, सीओ धनौरा और इंसपेक्टर पंकज वर्मा ने किशोरी व राकेश से विस्तृत जानकारी हासिल की. इस मामले में पुलिस का फरजीवाड़ा उजागर होते ही लोगों का गुस्सा भड़क उठा. देखते ही देखते थाने पर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई. उस के बाद भीड़ ने खूब हंगामा किया. थाने पर लोगों की भीड़ जुटने की सूचना पाते ही शासनप्रशासन हिल गया.

सूचना पाते ही एसपी डा. विपिन ताड़ा थाने पहुंचे और वहां पर इकट्ठा भीड़ को भरोसा दिया कि इस मामले में फिर से निष्पक्ष जांच कर के दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों को उचित दंड दिया जाएगा. इस के तुरंत बाद उन्होंने थानाप्रभारी अशोक कुमार शर्मा को निलंबित कर दिया. पुलिस ने कमलेश और राकेश से कड़ी पूछताछ की. पुलिस पूछताछ में राकेश और उस की प्रेमिका कमलेश के द्वारा जो जानकारी मिली वह इस प्रकार थी. मलकपुर गांव से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित था राकेश का गांव पौरारा. राकेश सैनी शादियों में खाना बनाने का काम करता था. उसी काम के सिलसिले में उसे आसपास के गांवों में जाना पड़ता था.

सुरेश ने अपनी बेटी राधा और बेटे राहुल की शादी में खाना बनवाने के लिए राकेश को ही बुलाया था. उसी दौरान राकेश को खाना बनाने के लिए किसी सामान की जरूरत होती तो घर के सदस्यों के व्यस्त होने की वजह से कमलेश ही सामान ला कर देती थी. इसी के चलते कमलेश उस के दिल को भा गई थी. उस की नजर हर वक्त उसी की राह ताकती रहती थी. हालांकि कमलेश नाबालिग थी. लेकिन उसे दूसरों की नजरें पढ़ने का भी ज्ञान था. वह समझ गई कि राकेश उस से क्या चाहता है. धीरेधीरे दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार अंकुरित हुआ. राकेश ने कमलेश को अपने दिल की रानी बनाने का निर्णय ले लिया.

कमलेश ने राकेश का मोबाइल नंबर ले लिया और उस के जाने के बाद जब कभी उस की याद सताती तो वह परिवार वालों से नजर बचा कर उस से बात करने लगी थी. राकेश भी उस के गांव आ कर कमलेख से खेतों पर मिलने लगा. राकेश के साथ हो गई फरार इस प्रेम कहानी के चलते दोनों को फिर से रूबरू होने का मौका मिल जाता. राकेश और कमलेश के बीच काफी समय से प्रेम प्रसंग चला आ रहा था, लेकिन उस के परिवार वालों को इस की भनक तक नहीं थी. इसी प्रेम प्रसंग के चलते ही दोनों ने एक साथ जीनेमरने की कसम ली और जिंदगी के सफर पर आगे बढ़ने के लिए घर से भागने का फैसला भी कर लिया.

6 फरवरी, 2019 को वादे के मुताबिक दोनों अपनेअपने घरों से निकले. राकेश को कहीं भी जाने से रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. कमलेश ने उस दिन घर वालों से खेतों पर जाने की बात कही और निकल पड़ी गंगा किनारे की ओर. राकेश पहले से ही गंगा पुल पर खड़ा मिल गया. राकेश पक्का खिलाड़ी था. उस ने घाटघाट का पानी पी रखा था. कमलेश को साथ ले कर वह सीधा दिल्ली पहुंचा. वहां उस ने दोस्त की मदद से दिल्ली में एक किराए का कमरा लिया और वहीं रह कर काम करने लगा. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद दोनों गाजियाबाद में आ कर रहने लगे थे. वहीं पर दोनों ने लव मैरिज कर ली. लव मैरिज कर के दोनों घर वालों की चिंता से मुक्त हो गए. राकेश के साथ शादी करने के बाद कमलेश ऐसी मस्त हुई कि उस ने एक बार भी अपने परिवार वालों की खैरखबर तक जानने की कोशिश नहीं की.

गाजियाबाद में शादी कर के राकेश कमलेश को साथ ले कर मुरादाबाद आ कर रहने लगा था. मुरादाबाद में उस का काम ठीकठाक चलने लगा था. इसी दौरान कमलेश एक बेटे की मां बनी. मुरादाबाद आ कर राकेश की आर्थिक स्थिति ठीकठाक हो गई थी. लेकिन इसी दौरान मार्च में लौकडाउन लग गया, जिस के बाद शहर में काम के लाले पड़ने लगे थे. ऐसे में राकेश को कमलेश के साथ अपने गांव पौरारा लौट पड़ा. तब से दोनों गांव में रह रहे थे. इसी दौरान राहुल को घर के बाहर कमलेश दिखाई दी. जिस के बाद उस की पोल खुल गई थी. षडयंत्रकारी आदमपुर पुलिस की झूठी स्क्रिप्ट ने सुरेश और उस के परिवार वालों को जो दर्द दिया, उस की भरपाई कभी नहीं हो सकती.

लेकिन सुरेश के परिवार को इस बात की खुशी थी कि उस पर लगने वाला बेटी के कत्ल का कलंक गया था. उन्हें गम भी नहीं था कि उन की बेटी ने घर से भाग कर उन के चेहरे पर कालिख पोती थी. उन्हें सब से ज्यादा दुख पुलिस की षडयंत्रकारी दरिंदगी का था. पुलिस ने सुरेश सिंह, उस के बेटे रूपकिशोर व रिश्तेदार को असहनीय यातनाएं दे कर मुलजिम बना कर जेल में डाल दिया था. इस केस के खुलते ही इस केस की तफ्तीश कर रहे पंकज वर्मा ने कमलेश के सीआरपीसी की धारा 164 के तहत न्यायालय में बयान दर्ज कराए. कोर्ट ने कमलेश को मुरादाबाद स्थित बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया. समिति के सदस्य मसरूर सिद्दीकी और जहीरुल इसलाम ने कमलेश की काउंसलिंग की.

समिति ने कमलेश के सामने नारी निकेतन या फिर अपने मातापिता के पास जाने के विकल्प रखे. कमलेश ने अपने पति राकेश के साथ जाने की इच्छा जताई. उस की मां चंद्रवती ने उस से अनुरोध किया कि वह उस के साथ घर चले. कोई भी उसे कुछ नहीं कहेगा लेकिन कमलेश अपनी जिद पर अड़ी रही. इसलिए समिति ने उसे 6 महीने के लिए नारी निकेतन भेज दिया ताकि वह सोच कर अपने लिए सही फैसला कर सके.  दूसरी ओर आदमपुर पुलिस ने बेगुनाही में जेल में बंद उस के पिता सुरेश सिंह, भाई रूपकिशोर और रिश्तेदार देवेंद्र की रिहाई के लिए कोर्ट में प्रार्थनापत्र दे दिया. कानूनी प्रक्रियाओं के बाद तीनों को रिहा कर दिया गया.