Suspense Story: शराब के नशे में शबाब की चाहत

Suspense Story: जय सिंह की नीयत के बारे में जान कर अमरजीत और मीना का खून खौल उठा. इस के बाद जहां जय सिंह अपनी जिद पूरी करने पर अड़ गया वहीं दोनों बहनें भी पीछे नहीं हटीं और…  पि  छले 2 दिनों से हो रही बारिश के थमने के बाद अमेंद्र सिंह 2 मजदूरों को अपने ट्रैक्टर पर बैठा कर खेतों की ओर चल पड़े थे. उन के पास 20 बीघा जमीन थी, जिस में उन्हें गवार की बोआई करनी थी. जैसे ही वह खेतों पर पहुंचे, उन्हें किसी जीव के सड़ने की दुर्गंध महसूस हुई.

अमेंद्र ने इधरउधर नजरें घुमा कर यह जानने की कोशिश की कि यह बदबू आखिर आ कहां से रही है. तभी उन्हें खेतों के नीचे वाले हिस्से में 5-7 कुत्तों का झुंड दिखाई दिया. कुत्ते जमीन के अंदर से कुछ खींच रहे थे. उन्हें लगा कि कोई जानवर मरा पड़ा है, जिसे कुत्ते खा रहे हैं.

उन्होंने गांव के कोटवाल भजनलाल को बुलाने के लिए अपने एक मजदूर को भेज दिया. गांवों में आज भी मृत जानवरों को दफनाने का काम कोटवाल करते हैं. भजनलाल आया तो उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘भैयाजी, यह जानवर की नहीं, किसी आदमी की लाश है.’’

आदमी की लाश होने की बात सुन कर खेतों में बुआई कर रहे अमेंद्र चौंके. वह भाग कर लाश के पास पहुंचे. वहां गड्ढा खोद कर दफनाई गई आदमी की लाश को कुत्तों ने पंजों से खोदखोद कर बाहर निकाल लिया था. लाश बाहर आ गई थी, इसलिए बदबू फैल रही थी. मजदूरों को लाश के पास छोड़ कर अमेंद्र सिंह कोटवाल भजनलाल को साथ ले कर तुरंत हनुमानगढ़ जंक्शन के थाना सदर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश कुमार सिहाग से मिल कर उन्होंने खेत के पास लाश पड़ी होने की बात बताई तो थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे कर खुद सहयोगियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

राजेश कुमार सिहाग ने घटनास्थल पर पहुंच कर देखा कि खेतों के नीचे वाले हिस्से में एक लाश पड़ी है. उस के शरीर की चमड़ी गायब थी. दोनों पैरों की हड्डियां दिखाई दे रही थीं. देखने से ही लग रहा था कि लाश 8-10 दिन पुरानी थी. थानाप्रभारी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ अतर सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. अब तक वहां काफी भीड़ लग गई थी. पूछने पर भीड़ ने बताया कि मृतक यहां का नहीं लगता. इस से पुलिस को लगा कि हत्या कहीं और कर के सबूत मिटाने के लिए लाश को यहां ला कर गाड़ दिया गया है.

अतर सिंह के निर्देश पर डौग स्क्वायड को लाया गया, लेकिन इस से भी पुलिस को कोई लाभ नहीं मिला. इस के बाद घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस ने थाने आ कर अमेंद्र की तहरीर पर अज्ञात की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. सीओ ने इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर राजेश कुमार सिहाग को सौंप दी. मृतक की पहचान के बिना हत्यारे तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन राजेश कुमार सिहाग का मानना था कि मृतक भले ही यहां का रहने वाला नहीं है, लेकिन हत्यारे यहीं कहीं आसपास के होंगे. मृतक या हत्यारे तक पहुंचना चुनौती था, लेकिन राजेश कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार कर आगे की जांच शुरू कर दी.

घटनास्थल पर लाश के अलावा ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से कुछ मदद मिल सकती. अधिकतर हत्या जैसे मामलों में जरजोरू या जमीन का विवाद सामने आता है. इसी के साथ अधिकतर यह भी देखा गया है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न रहा हो, वारदात की जगह पर अनजाने में ही सही, कोई न कोई सबूत अवश्य छोड़ जाता है. राजेश कुमार सिहाग इन्हीं दोनों तथ्यों के आधार पर मामले का खुलासा करने में लग गए. राजेश कुमार सिहाग ने जिले के ही नहीं, नजदीक के अन्य प्रदेशों के पुलिस थानों से भी पता किया कि कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. लेकिन उन्हें कहीं से भी किसी की गुमशुदगी की कोई सूचना नहीं मिली. मृतक की पहचान न होने की वजह से मामले की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

थानाप्रभारी को उम्मीद थी कि घटनास्थल से कोई न कोई ऐसा सूत्र अवश्य मिल जाएगा, जिस से वह हत्यारे को ढूंढ निकालेंगे. इसी उम्मीद पर वह अपने रीडर बृजमोहन मीणा और किसान अमेंद्र सिंह को साथ ले कर एक बार फिर घटनास्थल पर पहुंचे. अमेंद्र के ही नहीं, आसपास के लगभग सभी खेत अभी खाली पडे़ थे. खेतों के चारों ओर एक निर्माणाधीन मकान के अलावा दूरदूर तक कोई मकान या झोपड़ी नहीं थी. राजेश कुमार सिहाग ने सूत्र की तलाश में पूरी ताकत झोंक दी. घटनास्थल के 20-25 मीटर के दायरे को उन्होंने जांच केंद्र बनाया. बरसात हो जाने की वजह से कोई सूत्र मिलने की उम्मीद कम ही थी, इस के बावजूद उन की कोशिश रंग लाई.

उन्होंने गौर से देखा तो लाश जिस गड्ढे में दफनाई गई थी, वहां खेत में गड्ढे से 7-8 फुट की दूरी पर पश्चिम की ओर लग रहा था कि लाश इधर से घसीट कर लाई गई थी. पानी बरस जाने से घसीटे जाने का वह निशान धूमिल तो पड़ गया था, लेकिन अगलबगल की मिट्टी का जो उभार था, वह किसी भारी चीज के घसीटने की चुगली कर रहा था. घसीटे जाने का वह निशान वहां से थोड़ी दूरी पर स्थित उस निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहा था. राकेश कुमार को सूत्र मिल गया था. वह मन ही मन प्रफुल्लित हो उठे, क्योंकि जांच को दिशा मिल गई थी. उन्होंने अमेंद्र सिंह से पूछा, ‘‘यह सामने वाला घर किस का है, कौन रहता है यहां?’’

‘‘साहब, यह मकान शृंगारा सिंह बाजीगर का है. 7-8 साल पहले बीकानेर क्षेत्र से आ कर यहां 12 बीघा जमीन खरीद कर बस गया था. 2 साल पहले वह मर चुका है. अब उस की पत्नी और छोटा बेटा यहां रह रहे हैं. लेकिन इस समय उस की 2 बेटियां, जिन की शादी हो चुकी हैं और एक दोहती यहीं हैं.’’

राजेश कुमार सिहाग थाने लौट आए और सारी जानकारी सीओ अतर सिंह को दी. इस जानकारी से संतुष्ट हो कर उन्होंने थानाप्रभारी को अपने विवेक के अनुसार काररवाई करने का आदेश दिया. राजेश कुमार सिंह को शृंगारा सिंह के घर में रहने वालों पर संदेह था, इसलिए उन्होंने काररवाई करने का मन बना लिया. 2 महिला सिपाही साथ ले कर राजेश कुमार शृंगारा सिंह के घर पहुंचे. घर में 4 महिलाएं और एक बच्चा था. उन्होंने घर की मालकिन से पूछा, ‘‘मांजी, पुलिस ने अमेंद्र सिंह के खेत में एक लाश बरामद की थी. आप ने बीते 10-12 दिनों में उन के खेत की ओर किसी आदमी को आतेजाते देखा तो नहीं?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने तो इधर किसी को आतेजाते नहीं देखा.’’ शृंगारा की विधवा ने बताया.

उन्होंने शृंगारा की पत्नी से ही नहीं, बेटियों से भी पूछताछ की. सब ने लगभग एक जैसा जवाब दिया. वह पूछताछ कर रहे थे कि  तभी शृंगारा सिंह की दोहती (बेटी की बेटी) गुलबदन (बदला हुआ नाम) उन के लिए चाय ले कर आई. उन की नजर उस पर गई तो वह उन्हें सहमी हुई सी लगी. उन्होंने बाकी लोगों को बाहर भेज कर उसे रोक लिया. जवानी की दहलीज पर कदज रख रही गुलबदन शृंगारा की बड़ी बेटी की बेटी थी, जो मिडिल स्कूल में पढ़ रही थी और छुट्टियां होने की वजह से नानी के पास आई हुई थी. गेहुंआ रंग की आभा के साथ गुल की सुघड़ शारीरिक बनावट गजब का आकर्षण पैदा कर रही थी. धवल दंत पंक्ति और नितंबों तक लहराते काले बालों की चुटिया 14-15 साल की कमसिन गुल को और ज्यादा आकर्षक बनाती थी.

राजेश कुमार सिहाग के सामने आते ही गुल की रुलाई फूट पड़ी. सुबकते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मेरी दोनों मासियां ही कुछ बता सकती हैं.’’

गुल का यह जवाब और चेहरे पर उभरा अपराधबोध का भाव सब कुछ कह गया. राजेश कुमार ने दोनों महिला कांस्टेबलों को इशारा कर के गुल की दोनों मासियां यानी अमरजीत कौर और मीना कौर को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुला लिया. सीओ अतर सिंह की मौजूदगी में राजेश कुमार सिहाग ने दोनों बहनों से कहा, ‘‘गुल तो बच्ची थी, लेकिन तुम दोनों समझदार हो. उस ने मुझे सब कुछ साफसाफ बता दिया है. अब अगर तुम झूठ बोलती हो तो वह तुमहारे लिए ही नुकसानदायक साबित होगा. अगर तुम सबकुछ सचसच बता देती हो तो पुलिस तुम्हारी मदद कर सकती है.’’

अंधेरे में फेंका गया उन का यह तीर सही निशाने पर लगा. दोनों बहनों ने बिना किसी हीलहवाली के 5 दिनों पहले कुल्हाड़ी और कस्सी से की गई जय सिंह की निर्मम हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन का कहना था कि जय सिंह अव्वल दर्जे का शराबी और अय्याश था. उसे अपनी ओछी हरकतों की वजह से जान से हाथ धोना पड़ा. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जय सिंह की हत्या की जो कथा उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. राजस्थान के जिला बीकानेर की तहसील जामनगर का एक गांव है भरूपावा. इसी गांव में रहता था शृंगारा सिंह बाजीगर. परिवार में पत्नी, 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटा सब से छोटा था. बड़ी 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी.

मामूली खेतीबाड़ी होने की वजह से शृंगारा सब्जी की दुकान भी लगाता था. उस के कहीं चले जाने पर दुकान का जिम्मा दोनों छोटी बेटियां अमरजीत कौर और मीना कौर संभालती थीं. उस बीच जय सिंह उन का पक्का और नियमित ग्राहक बन गया था. वह ठीकठाक कपड़ों में किसी हीरो से कम नहीं लगता था. जय सिंह मूलरूप से जिला झुंझुनू के बजावा गांव का रहने वाला था और उन दिनों खनन विभाग की रायल्टी वसूलने वाली टीम में नौकरी कर रहा था. उस का पिता बालू सिंह बीकानेर के एक होटल में वाचमैनी करता था. जय सिंह को जो वेतन मिलता था, वह तो मिलता ही था, ऊपरी कमाई भी कर लेता था. उस का ज्यादातर समय दोनों बहनों की सब्जी की दुकान पर ही बीतता था.

उसी बीच उस ने छोटी बहन मीना का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया तो उसी से नहीं, अमरजीत से भी फोन से बातें करने लगा. वह दोनों बहनों को उपहार भी देता था. धीरेधीरे उस ने दोनों बहनों से दोस्ती गांठ ली थी. सन 2010 के आसपास शृंगारा सिंह भरूपावा के अपने खेत और मकान बेच कर डबली राठान गांव में 12 बीघा जमीन खरीद ली और वहीं पक्का मकान बना कर रहने लगा. यहीं से उस ने बाकी बची दोनों बेटियों, अमरजीत कौर और मीना कौर की शादियां कर दीं. इस के बाद सन 2014 की शुरुआत में उस की मौत हो गई.

शृंगारा के परिवार में बूढ़ी पत्नी और 8-10 साल का बेटा बचा था. चारों बेटियों ने स्वयं को बेटा समझते हुए मां को संभालने का जिम्मा सा ले लिया. हर बेटी 1-2 महीने के लिए मां के पास आ जाती. जय सिंह के पास मीना का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए उस से उस की बातें होती रहती थी. ज्यादातर मीना और अमरजीत एक साथ मायके आती थीं. दोनों बहनों के मायके आने का पता चलते ही जय सिंह उन से मिलने आ जाता. अव्वल दर्जे का शराबी जय सिंह 1-2 दिन रुक कर अपने काम पर लौट जाता. 20 मई को जय सिंह शृंगारा सिंह के घर आ कर 2 दिनों बाद लौट गया था. उसे जब भी आना होता, वह मोबाइल पर बता देता था.

इस बार कुछ दिनों पहले जय सिंह के जाने के बाद गुलबदन गुमसुम सी आंगन में बैठी थी. उस के दाएं गाल पर बड़ा सा चकता उभरा था. उसे इस तरह उदास देख कर अमरजीत ने पूछा, ‘‘क्या बात है गुल, उदास क्यों है? तेरे गाल को क्या हुआ?’’

जवाब देने के बजाए गुल रोने लगी. अमरजीत ने गुल को सीने से लगा कर ढांढ़स बंधाया. आंसू पोंछ कर पूछा, ‘‘सचसच बता क्या बात है?’’

गुल ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मौसी कल रात जय मामा रात में मेरी चारपाई पर आ कर बैठ गए. उन्होंने दांतों से यहां काट लिया,’’ चकत्ते पर अंगुली रख कर गुल ने कहा, ‘‘उस के बाद उस ने मेरी सलवार खोलने की कोशिश की. तभी मीना मौसी जाग गईं. अंधेरा होने की वजह से वह मामा को देख नहीं पाईं और वह चुपके से अपनी चारपाई पर चला गया. सुबह उन्होंने कहा कि अगर मैं ने यह बात किसी को बताई तो वह मेरा गला दबा कर मुझे मार देंगे.’’

जय सिंह की इस घिनौनी हरकत के बारे में सुन कर अमरजीत का खून खौल उठा. मीना भी आंगन में आ गई थी. वह तो गुस्से में कांपने लगी थी. अमरजीत ने तुरंत जय सिंह को फोन किया. उस के फोन रिसीव करते ही वह उसे धमकाते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू ने गुल को हाथ लगा दिया. आइंदा गुल को हाथ लगाना तो दूर, उस की तरफ गंदी नजरों से देखा भी तो तेरी आंखें फोड़ दूंगी. तेरी बोटीबोटी कर के चीलकौवों को खिला दूंगी. मेरी ढाणी की तरफ रुख भी किया तो मेरी जैसी कोई बुरी नहीं होगी.’’

जो मुंह में आया जय सिंह को कह कर अमरजीत ने फोन काट दिया. उस के मुंह बोले भाई जय सिंह ने सफाई देनी चाही, पर मीना और अमरजीत ने फोन रिसीव नहीं किया.  पिछले 4-5 दिनों से जय सिंह फोन कर रहा था, पर उस का फोन रिसीव नहीं किया गया. 2 जून, 2015 को अमरजीत मां के साथ खेतों की ओर गई थी. घर पर मीना और गुल थीं. तभी मोबाइल की घंटी बजी. मीना ने देखा कि जय सिंह का फोन है. उस ने फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से जय सिंह ने कहा, ‘‘देख मीना, तुम दोनों बहनें बेकार ही मुझ पर नाराज हो. मैं ने कोई गलती नहीं की थी. आरोप लगाने और सच्चाई को आंखों से देखने में रातदिन का फर्क होता है. सच्चाई यह है कि उस रात मैं नहीं, गुल मेरी चारपाई पर आ कर लेट गई थी.

वह तो मैं था जो गुल को दुत्कार कर भगा दिया. मेरी जगह कोई और होता तो निश्चय ही अनर्थ हो जाता. और अब आगे सुन, आज रात मैं तेरे घर आ रहा हूं. गुल ने मेरे ऊपर जो झूठा आरोप लगाया था, आज रात मैं उस झूठे आरोप को सच कर दूंगा. तुम दोनों बहनों से जो बन पड़े कर लेना.’’

इस तरह की धमकी दे कर जय सिंह ने फोन काट दिया. लगभग 2 घंटे बाद अमरजीत मां के साथ घर लौटी तो मीना और गुल को डरी देख कर चौंकी. अमरजीत कुछ पूछती, उस के पहले ही मीना ने कहा, ‘‘दीदी, अभी जय सिंह का फोन आया था. वह आज रात आ रहा है. उस का कहना है कि गुल ने उस पर झूठा आरोप लगाया है.’’

‘‘मीना गुल ने झूठा आरोप नहीं लगाया, बल्कि सच्चाई वही है. गुल झूठा आरोप क्यों लगाएगी.’’ अमरजीत ने कहा.

‘‘दीदी, जय सिंह ने धमकी दी है कि वह आज रात गुल के साथ हमारी मौजूदगी में ही मनमानी करेगा.’’ मीना ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों इस बात को ले कर इतना डरी हुई क्यों हो? मेरे जीतेजी वह मनमानी तो दूर, गुल को छू भी नहीं पाएगा.’’ अमरजीत ने दृढ़ता से कहा.

अमरजीत जय सिंह के जिद्दी स्वभाव को जानती थी. उसे यह भी पता था कि ट्रक चालकों से जानपहचान होने की वजह से वह फोकट में कहीं भी आजा सकता है. अमरजीत भी जय सिंह की इस धमकी से डर गई, इसलिए खलिहान में पड़ी कुल्हाड़ी और कस्सी को ला कर उस ने आंगन में छिपा कर रख दिया. दोनों बहनें अभी जाग रही थीं. रात 12-1 बजे के बीच जय सिंह उन के घर पहुंचा. शराब के नशे में वह लड़खड़ा रहा था. वह सीधे गुल की चारपाई के पास पहुंचा और उसे बांहों में भर कर उठाने की कोशिश करने लगा. लेकिन नशे में होने की वजह से वह खुद ही गिर गया. इस के बाद नींद में गाफिल गुल के बाल पकड़ कर घसीटा तो वह जाग गई. उस के इस रूप को देख कर मासूम गुल ‘बचाओबचाओ’ कह कर रोने लगी.

गुल की करुणामयी पुकार ने अमरजीत और मीना को चंडी बना दिया. अगले ही पल एक ने कुल्हाड़ी तो दूसरी ने कस्सी उठा ली और जय सिंह पर हमला बोल दिया. एक ही वार में वह लुढ़क गया. कुछ देर छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. लाश ठिकाने लगाने के लिए दोनों बहनें उसे उठा कर खेतों की ओर ले गईं. अमेंद्र के खेत के पास पहुंचतेपहुंचते वे थक गईं. मीना कस्सी लेने घर लौट गईं तो अमरजीत अकेली ही लाश को कई फुट तक घसीट कर ले आई. इसी घसीटने के निशान के आधार पर राजेश कुमार सिहाग उन के घर तक पहुंच गए थे.  कस्सी से दोनों बहनों ने गड्ढा खोदना शुरू किया. मानसिकशारीरिक थकावट की वजह से वे एकडेढ़ फुट से ज्यादा गहरा गड्ढा नहीं खोद पाईं. उसी गड्ढे में लाश दफना कर दोनों बहनें घर आ कर सो गईं.

पुलिस ने दोनों बहनों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ एवं साक्ष्य जुटाने के लिए पुलिस ने 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान जांच अधिकारी ने वारदात में प्रयुक्त कस्सी और कुल्हाड़ी बरामद कर ली. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद दोनों बहनों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family Crime: चरित्रहीन मां का गैरतमंद बेटा

Family Crime: भुलऊराम ने जो  हरकत की थी, कोई  भी गैरतमंद बेटा   बरदाश्त नहीं कर सकता था तो समयलाल कैसे बरदाश्त करता. आखिर मां की चरित्रहीनता ने उसे कातिल बना दिया. लंबी बीमारी के बाद ढेलाराम की जब मौत हुई तो पत्नी सुरजाबाई के लिए वह संपत्ति के नाम पर 6 बच्चे और एक छोटा सा मकान छोड़ गया था. गनीमत यह थी कि उस समय तक उस का बड़ा बेटा समयलाल 25 साल का हो चुका था. लड़का कमाने लायक हो गया था, इसलिए पति की मौत से सुरजाबाई को दिक्कतों का ज्यादा सामना नहीं करना पड़ा.

सुरजाबाई जवान थी, इसलिए खुद तो मजदूरी करती ही थी, समयलाल ने भी बलौदा बाजार मंडी के सामने साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली थी. मांबेटे की कमाई से किसी तरह खींचखांच कर गुजरबसर होने लगा था. इस की वजह यह थी कि कमाई के साथसाथ बच्चे बड़े हो रहे थे, जिस से खर्च बढ़ता जा रहा था. सुरजाबाई गांव के ही राजमिस्त्री भुलऊराम के साथ मजदूरी करने बलौदा बाजार जाती थी. उस के साथ आनेजाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. वह अपनी साइकिल से उसे साथ ले जाता और ले आता था.

सुरजाबाई अभी अधेड़ थी, इसलिए उसे मर्द की जरूरत महसूस होती थी. दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन रातें तनहाई में बेचैन करती थीं. तब जिस्मानी भूख उसे व्याकुल करती तो वह मन ही मन किसी ऐसे मर्द की कल्पना करती थी, जो उस की जिस्मानी भूख को शांत करता. उस की इस कल्पना में सब से पहले जिस का चेहरा आंखों के सामने आया, वह था भुलऊराम का, जिस के साथ वह पूरा दिन रहती थी. लोकलाज के भय से किसी तरह वह अपनी इस भूख को 2 सालों तक दबाए रही. लेकिन किसी भी चीज को आखिर कब तक दबाया जा सकता है. सुरजाबाई भी अपनी इस भूख को नहीं दबा सकी.

भुलऊराम ही सुरजाबाई के सब से करीब था. वह सुबह उस की साइकिल पर बैठ कर घर से निकलती थी तो सूर्यास्त के बाद ही घर लौटती थी. भुलऊराम था भी उस के जोड़ का. एक तो दोनों का हमउम्र होना, दूसरे पूरे दिन साथ रहने का नतीजा यह निकला कि वे एकदूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे.

एक दिन काम करते हुए भुलऊराम ने कहा, ‘‘सुरजा, काम तो तुम मेरे साथ करती हो, जबकि मैं देखता हूं तुम्हारा मन कहीं और रहता है.’’

‘‘भुलऊ, तुम ठीक कह रहे हो. दिन तो तुम्हारे साथ गुजर जाता है, लेकिन रात गुजारे नहीं गुजरती. ऐसे में मन तो भटकेगा ही.’’ भुलऊराम को घूरते हुए सुरजाबाई ने कहा.

भुलऊराम ने जानबूझ कर यह बात कही थी. सुरजाबाई ने जवाब भी उसी तरह दिया था. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सुरजाबाई बोली, ‘‘भुलऊ, तुम्हारी पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली जाती है तो तुम्हें कैसा लगता है?’’

भुलऊराम ने सहज भाव से कहा, ‘‘मैं तो 10 दिनों में ही बेचैन हो जाता हूं. नहीं रहा जाता तो ससुराल जा कर ले आता हूं.’’

‘‘तुम 10 दिनों में ही बेचैन हो जाते हो, यहां तो मेरे पति को मरे 2 साल हो गए हैं. मेरी क्या हालत होती होगी, कभी सोचा है?’’ सुरजाबाई ने बेचैन नजरों से ताकते हुए कहा.

भुलऊराम इतना भोला नहीं था, जो सुरजाबाई के मन की बात न समझता. लेकिन वहां और भी तमाम लोग थे, इसलिए दोनों मन मसोस कर रह गए. दोनों ने उस दिन समय से पहले ही काम निपटा दिया और घर की ओर चल पड़े. सावन का महीना था, आसमान में घने काले बादल छाए थे. दोनों आधे रास्ते पहुंचे थे कि हवा के साथ बरसात शुरू हो गई. भुलऊराम ने एक पेड़ के नीचे साइकिल रोक दी. बरसात की वजह से रास्ता सूना हो गया था. दोनों भीग गए  थे, इसलिए उन के शरीर के उभार झलकने लगे थे. उस मौसम में रहा नहीं गया तो भुलऊराम ने सुरजा का हाथ थाम लिया. सुरजा ने उस की आंखों में झांका तो उस ने कहा, ‘‘सुरजा, तुम्हारा बदन तो तप रहा है. तुम्हें बुखार है क्या?’’

सुरजा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भुलऊ, यह बुखार की तपन नहीं, यह तपन दिल में जो आग जल रही है, उस की है. आज तुम ने इस आग को और भड़का दिया है. अब तुम्हीं इस आग को बुझा सकते हो. आज रात को मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. दरवाजा खुला रहेगा और मैं दहलीज में ही लेटूंगी.’’

भुलऊराम ने चाहतभरी नजरों से सुरजा को ताका और फिर साइकिल पर सवार हुआ तो पीछे कैरियर पर सुरजा बैठ गई. गांव आते ही सुरजा अपने घर चली गई तो भुलऊ अपने घर चला गया. कपड़े बदल कर उस ने खाना खाया और सब के सोने का इंतजार करने लगा. गांवों में तो वैसे भी लोग जल्दी सो जाते हैं. भुलऊराम के गांव वाले भी सो गए तो वह सुरजाबाई के घर की ओर चल पड़ा. बरसात होने की वजह से मौसम ठंडा था. बरसाती मेढक टर्रटर्र कर रहे थे तो झींगुरों की तीखी आवाज सन्नाटे को तोड़ रही थी. 5 मिनट बाद वह सुरजाबाई के घर के सामने खड़ा था. उस ने हलके हाथ से दरवाजा ठेला तो वह खुल गया. उस ने धीरे से आवाज दी, ‘‘सुरजा… ओ सुरजा.’’

सुरजा जाग रही थी. इसलिए उस के आवाज देते ही वह उस के सामने आ कर खड़ी हो गई. उस का हाथ थाम कर धीरे से फुसफुसाई, ‘‘बड़ी देर कर दी.’’

‘‘घर वाले जाग रहे थे. जब सब सो गए, तभी निकला. इसी चक्कर में देर हो गई.’’ भुलऊराम ने कहा.

सुरजा भुलऊराम का हाथ पकड़ कर कमरे में ले आई. उसे चारपाई पर बैठा कर खुद भी सट कर बैठ गई. तन की आंखों से भले ही वे एकदूसरे को नहीं देख रहे थे, लेकिन मन की आंखों से वे एकदूसरे का तनमन सब देख रहे थे.

सुरजाबाई ने भुलऊराम का हाथ थाम कर कहा, ‘‘तुम एकदम चुप हो. कुछ सोच रहे हो क्या?’’

भुलऊराम विचारों के भंवर से निकल कर बोला, ‘‘कल की सुरजा में और आज की सुरजा में कितना अंतर है.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रहे हो, मैं समझी नहीं?’’ सुरजा ने पूछा.

‘‘सुरजा थोड़ा ही सही, लेकिन तुम ने खुद को बदला है, यह अच्छी बात है. इंसान के मन को जो अच्छा लगे, वही करना चाहिए.’’

इस के बाद सुरजाबाई का मिजाज बदलने लगा. उसने भुलऊराम के कंधे पर हाथ रखा तो उस के सोए हुए अरमान जाग उठे. उस की पत्नी 15 दिनों से मायके गई हुई थी, इसलिए वह औरत की नजदीकी पाने के लिए बेचैन था. सुरजाबाई तो सालों से प्यासी थी. भुलऊराम पर टूट पड़ी. इस तरह भुलऊराम और सुरजाबाई के बीच नए संबंध बन गए. इस के बाद घरबाहर जहां भी मौका मिलता, दोनों संबंध बना लेते. वैसे भी दोनों दिन भर साथ ही रहते थे. आतेजाते भी साथ थे, इसलिए उन्हें न मिलने में दिक्कत थी, न संबंध बनाने में. इस के अलावा दोनों अपनी मर्जी के ही नहीं, घर के भी मालिक थे, इसलिए उन्हें कोई रोकटोक भी नहीं सकता था.

लेकिन जब दोनों का मिलनाजुलना खुलेआम होने लगा तो उन के संबंधों की चर्चा गांव में होने लगी. इस के बाद सुरजाबाई को बिरादरी वालों ने बाहर कर दिया. दूसरी ओर भुलऊराम की पत्नी भी इस संबंध का विरोध करने लगी. बिरादरी से बाहर किए जाने के बाद सुरजाबाई का बड़ा बेटा समयलाल भी मां के इस संबंध का विरोध करने लगा. इस की एक वजह यह भी थी कि गांव में सब समयलाल का मजाक उड़ाते थे. इसलिए पहले उस ने मां को समझाया. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने सख्ती की. लेकिन अब तक वह भुलऊराम के साथ संबंधों की आदी हो चुकी थी, इसलिए बेटे के रोकने पर उस ने कहा,

‘‘किस के लिए मैं दिनरात मेहनत करती हूं, तुम्हीं लोगों के लिए न? इतनी मेहनत कर के अगर मुझे किसी के साथ 2 पल की खुशी मिलती है तो तुम लोगों को परेशानी क्यों हो रही है?’’

‘‘तुम जिस तरह मुझे बहका रही हो, मैं सब जानता हूं. इस दुनिया में ऐसी तमाम औरतें हैं, जिन के पति मर चुके हैं, क्या वे सभी तुम्हारी तरह नाक कटाती घूम रही हैं. अपना नहीं तो कम से कम बच्चों का खयाल करो. तुम मां के नाम पर कलंक हो.’’ समयलाल गुस्से में बोला.

‘‘आज तू मुझे सिखा रहा है. कभी सोचा है मैं ने किन परिस्थितियों से गुजर कर तुम लोगों को पाला है. तुम्हारा बाप क्या छोड़ कर गया था? सिर्फ बच्चे पैदा कर के मर गया था. आज जो बकरबकर बोल रहा है, मुझे कुलटा कह रहा है, इस लायक मैं ने ही अपना खून जला कर बनाया है.’’ सुरजा गुस्से में बोली, ‘‘गनीमत है कि मैं तुम लोगों के साथ हूं. अगर छोड़ कर चली गई होती, तो…?’’

‘‘छोड़ कर चली गई होती, तभी अच्छा रहता. लोग आज हमारी हंसी तो न उड़ाते.’’

‘‘मुझे तुम से कोई सीख नहीं लेनी. मैं जैसी हूं, वैसी ही रहने दे. तुझ से नहीं देखासुना जाता तो तू घर छोड़ कर चला जा. और सुन, आज के बाद इस मामले में मुझ से कोई बात भी मत करना.’’ सुरजा ने साफ कह दिया कि कुछ भी हो, वह उन लोगों को छोड़ सकती है, पर भुलऊराम को नहीं छोड़ सकती.

इसी तरह दिन महीने बीतते रहे. न तो भुलऊराम ने अनीति का रास्ता छोड़ा और न ही सुरजाबाई ने. धीरेधीरे 3 साल बीत गए. इस बीच समयलाल ने मां को न जाने कितनी बार समझाया, लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आई. समयलाल खून का घूंट पी कर समय से तालमेल बिठाने की कोशिश करता रहा, लेकिन लाख प्रयास के बावजूद वह इस बदनामी को झेल नहीं सका, क्योंकि पानी अब सिर से ऊपर गुजरने लगा था. उस दिन यानी 3 अप्रैल को तो हद हो गई. अभी तक जो चोरीछिपे होता था, उस दिन सब के सामने ही भुलऊराम सुरजा से मिलने आ धमका. हुआ यह कि शाम को बलौदा बाजार से लौटते समय सुरजाबाई और भुलऊराम ने रास्ते में गोश्त और शराब खरीद लिया था.

घर आ कर सुरजा गोश्त बना रही थी कि कपड़े बदल कर भुलऊराम आ गया. इस के बाद दोनों शराब पीने लगे. खाना खातेखाते दोनों ने इतनी पी ली कि भुलऊराम को जहां सुरजाबाई के अलावा कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था, सुरजा का भी कुछ वैसा ही हाल था. दोनों की हरकतों से तंग आ कर समयलाल ने भुलऊराम के पास जा कर कहा, ‘‘रात काफी हो गई है, अब तुम अपने घर जाओ. तुम्हारे घर वाले तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘मैं घर जाऊं या यहां सोऊं, तुम मुझ से कहने वाले कौन होते हो?’’ भुलऊराम ने कहा.

समयलाल को गुस्सा आ गया. वह अंदर से चारपाई का पाया उठा लाया और उसी से भुलऊराम पर हमला कर दिया. उस ने पूरी ताकत से पाया भुलऊराम के सिर पर मारा तो उस की खोपड़ी पहली ही बार में फट गई. फिर तो उस ने उसे तभी छोड़ा, जब वह मर गया. उसे मार कर वह घर से गायब हो गया. सुबह गांव वाले दिशामैदान के लिए गांव से बाहर निकले तो बाठी में उन्हें एक लाश दिखाई दी. पल भर में इस की चर्चा पूरे गांव में फैल गई. लाश औंधे मुंह पड़ी थी, उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था, इस के बावजूद गांव वालों को उसे पहचानने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. लाश भुलऊराम की थी. भुलऊराम के भाई पुनीतराम ने बलौदा बाजार के थाना सिटी जा कर भाई की हत्या की सूचना दी.

हत्या का मामला था, इसलिए थानाप्रभारी डी.के. मरकाम ने घटनास्थल पर जाने से पहले घटना की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. जिस से उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते आईएसपी अभिषेक सांडिल्य, एसडीएपी सी.पी. राजभानु भी घटनास्थल पहुंच गए थे. लाश की स्थिति से ही पता चल रहा था कि हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. लाश वहां घसीट कर लाई गई थी. पुलिस जब लाश घसीट कर लाने के निशान की ओर बढ़ी तो वह निशान सुरजाबाई के घर जा कर खत्म हो गया था.

मृतक भुलऊराम की साइकिल वहां से 2 सौ मीटर की दूरी पर खड़ी मिली. पूछताछ में पता चला कि वह उसी के यहां गया था और सुरजाबाई से उस के संबंध थे तो पुलिस के लिए आशंका की कोई बात नहीं रही. पुलिस ने सुरजाबाई और उस के बड़े बेटे समयलाल को हिरासत में ले लिया. इस तरह पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने से पहले ही अभियुक्तों को पकड़ लिया था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मांबेटे को ले कर थाने आ गई.

थाने आ कर पहले मृतक के भाई पुनीतराम की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज किया, उस के बाद समयलाल से पूछताछ शुरू की. सख्ती के डर से उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर के भुलऊराम की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. भुलऊराम के उस की मां से संबंध हैं, यह वह जानता ही था. सब कुछ जान कर भी वह चुप था. लेकिन उस दिन तो भुलऊराम ने हद ही कर दी. उस के यहां शराब पी कर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस के सामने ही वह उस की मां से अश्लील हरकतें करने लगा. उस ने मना किया तो उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर कहा, ‘‘मैं यहीं तेरे सामने ही तेरी मां से संबंध बनाऊंगा, देखता हूं तू क्या करता है.’’

भुलऊराम ने जो कहा था, और जो करने जा रहा था, समयलाल की जगह कोई भी गैरतमंद बेटा होता, बरदाश्त नहीं कर सकता था. उस से भी नहीं बरदाश्त हुआ. उस ने इधरउधर देखा, चारपाई का एक पाया पड़ा दिखाई दिया. उस ने उसे उठाया और भुलऊराम पर पिल पड़ा. इस के बाद तो वहां खून ही खून नजर आने लगा. भुलऊराम खून में डूबता गया. भुलऊराम की हत्या कर के समयलाल अपने दोस्त के यहां चला गया. सुबह जब वह घर पहुंचा तो लाश वहां नहीं थी. लाश बाठी तक कैसे पहुंची, उसे मालूम नहीं.

इस के बाद पुलिस ने सुरजाबाई से पूछताछ की तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं दरवाजे के पास खड़ी सब देख रही थी. मैं पतिता ही सही, पर इस की मां हूं. साहब मेरी वजह से आज यह हत्यारा हो गया है. इसे बचाने के लिए मैं लाश को घसीट कर बाठी में डाल आई और सुबह होने से पहले गोबर से लिपाई कर के खून साफ कर दिया.’’

इस के बाद समयलाल की निशानदेही पर पुलिस ने चारपाई का पाया, खून से सने उस के कपड़े बरामद कर लिए. सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने समयलाल और उस की मां सुरजाबाई को कोर्ट में पेश किया, जहां से उस की मां को रायपुर की महिला जेल तो समयलाल को बलौदा बाजार जेल भेज दिया गया. Family Crime

Hindi Stories: कातिल दरोगा

Hindi stories: फरियाद ले कर पुलिस चौकी पहुंची खूबसूरत ईशा को देख कर दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह इतना प्रभावित हुआ कि शादीशुदा होते हुए भी वह उसे चाहने लगा. इतना ही नहीं, खुद को अविवाहित बता कर उस ने ईशा से शादी भी कर ली. बाद में यही झूठ ऐसा जी का जंजाल बना कि वह एक खौफनाक अपराध कर बैठा. कानपुर के थाना काकादेव क्षेत्र में एक मोहल्ला है नवीन नगर. कौशलेश सचान अपनेपरिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा एक बेटा ऐश्वर्य राज, 2 बेटियां ईशा व प्रगति थीं. कौशलेश साधन संपन्न व्यक्ति थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

कौशलेश सचान की बड़ी बेटी का नाम वैसे तो ईशा था लेकिन घर में सब लोग उसे ईशू कहते थे. गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली ईशा सुशील और विनम्र स्वभाव की थी. ईशा तनमन से जितनी खूबसूरत थी, पढ़नेलिखने में भी उतनी ही तेज थी. उस ने कानपुर के सरस्वती बालिका इंटर कालेज से प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट और एएनडी कालेज में बीए पास किया. ईशा की इच्छा थी कि वह आईएएस बने. इसलिए प्रथम श्रेणी में बीए पास करने के बाद उस ने आईएएस की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी. लेकिन लगातार 3 साल तक परीक्षा देने के बाद भी वह सिविल सर्विस में न निकल सकी.

एक दिन ईशा अपनी मां विनीता के साथ जेके मंदिर गई. दर्शन करने के बाद जब वह गेट के बाहर निकली, तो एक झपटमार ने उस के गले की सोने की चेन खींच ली और साथ ही उस का पर्स भी छीन कर भाग निकला. बदहवास मांबेटी थाना नजीराबाद पहुंचीं. उस इलाके के चौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल उस समय थाने में ही थे. ईशा ने ज्ञानेंद्र सिंह को लूट की पूरी घटना बताई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर के लुटेरे की तलाश शुरू कर दी. 3-4 दिन बाद ही ज्ञानेंद्र ने छोटे यादव नाम के लुटेरे को पकड़ लिया. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह की इस त्वरित काररवाई से ईशा काफी प्रभावित हुई.

बयान दर्ज कराने, लुटेरे और सामान की शिनाख्त करने के लिए ईशा को कई बार थाना नजीराबाद आनाजाना पड़ा. इसी आनेजाने में ईशा और दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. ज्ञानेंद्र सिंह जहां ईशा की खूबसूरती पर फिदा था, वहीं ईशा भी शरीर से हृष्टपुस्ट व स्मार्ट दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को देख कर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. दोनों को एक अनजाना आकर्षण एकदूसरे की तरफ खींचने लगा था. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को ईशा कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी, इसलिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था. वह जब तब ईशा से बातें करने लगा. ईशा को भी उस की रसभरी बातों में प्यार झलकता था. वह भी उस से खूब बातें करने लगी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं. बात आगे बढ़ी तो दोनों साथसाथ सैरसपाटे के लिए भी जाने लगे. ज्ञानेंद्र ईशा को फिल्म भी दिखाता और रेस्तरां में खाना भी खिलाता.

सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल मूल रूप से चित्रकूट जिले के मऊ थाना अंतर्गत आने वाले गांव छिवलहा का रहने वाला था. उस का सलेक्शन 2007 के बैच में हुआ था. उस की पहली पोस्टिंग कानपुर के किदवई नगर थाने की साकेत नगर पुलिस चौकी में हुई थी. इस के बाद वह कानपुर शहर और देहात के कई थानों में तैनात रहा. कुछ समय वह क्राइम ब्रांच में भी रहा. ज्ञानेंद्र सिंह नौकरी के अलावा प्लौटिंग का भी काम करता था. इस काम में उस ने खूब पैसा कमाया. उस के पास 4-5 लग्जरी कारें थीं, जिन्हें उस ने एक ट्रैवलिंग एजेंसी में लगवा रखा था. ज्ञानेंद्र सिंह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस की शादी मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले की बछरांवा निवासी नीलम के साथ हुई थी.

पत्नी और बच्चों के साथ वह साकेत नगर, कानपुर में रह रहा था. जबकि ईशा से उस ने खुद को अविवाहित बताया था. एक रोज ज्ञानेंद्र सिंह ईशा के घर पहुंचा, तो उस वक्त वह घर में अकेली थी. उस के मातापिता किसी काम से माल रोड गए हुए थे, और भाईबहन कालेज में थे. ज्ञानेंद्र सिंह और ईशा कमरे में बैठ कर बातचीत करने लगे. बातोंबातों में ज्ञानेंद्र ने ईशा की खूबसूरती के कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए. यह देख उस ने ज्ञानेंद्र की बेचैन आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘ज्ञानेंद्र, क्या सचमुच मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं? कहीं तुम मुझे खुश करने के लिए मेरी झूठी तारीफ तो नहीं कर रहे?’’

ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा को चाहत भरी नजरों से देखा, वह उसे ही अपलक निहार रही थी. ज्ञानेंद्र ने महसूस किया कि दिल की बात कहने का ऐसा मौका मुश्किल से ही मिलेगा. इसलिए वह ईशा की कलाई थामते हुए बोला, ‘‘ईशा, मुझे तुम से प्यार हो गया है. तुम्हारे बगैर सबकुछ सूनासूना सा लगता है. मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए ऐसी ही फीलिंग्स हैं. अगर ऐसा है तो प्लीज मेरा प्यार स्वीकार कर लो.’’

‘‘ज्ञानेंद्र, तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये शब्द सुनने के लिए कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपने दिल की बात कहने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं तुम से कितना प्यार करती हूं. आई लव यू ज्ञानेंद्र.’’

उस दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया, इस के बाद जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई. समय के साथ उन की मोहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी परवान चढ़ती गई. ज्ञानेंद्र जब ड्यूटी पर होता तो ईशा से मोबाइल पर बातें करता और जब समय मिलता तो उस के साथ घूमताफिरता. इस तरह दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन्हें लगने लगा, अब एकदूसरे के बिना नहीं रहा जा सकता. अंतत: शुरुआत ईशा ने की. उस ने अपने दिल की बात घरवालों को बता कर ज्ञानेंद्र सिंह से शादी करने की इच्छा जाहिर की.

ईशा की बात सुन कर पहले तो उस की मां विनीता और पिता कौशलेश चौंके, लेकिन बाद में बेटी की खुशी के लिए राजी हो गए. दरअसल ईशा ने उन्हें समझाया था कि दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह उन की ही जातिबिरादरी का है. अच्छा कमाता है और पुलिस विभाग में अच्छे पद पर तैनात है. बेटी की मरजी जान कर वे लोग ईशा की शादी ज्ञानेंद्र से करने को राजी हो गए. सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र से बात की गई तो उस ने बताया कि कुछ कारणों से उस ने अपने घर वालों से संबंध विच्छेद कर रखा है इसलिए उस के परिवार का कोई सदस्य शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.

बहरहाल, बातचीत के बाद कौशलेश ने 10 मार्च, 2013 को अपनी बेटी ईशा का विवाह ज्ञानेंद्र सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद ज्ञानेंद्र उसे साकेत नगर स्थित अपने घर ले गया. उस वक्त उस की पत्नी नीलम मायके गई हुई थी. इस के बाद ईशा ज्यादातर मायके में ही रही. वह उसे अपने घर तभी ले जाता था, जब नीलम मायके गई होती थी. बहरहाल, हंसीखुशी से एक वर्ष कब बीत गया, पता ही न चला. इसी बीच ईशा ने एक खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सान्या रखा. सान्या के जन्म से जहां ईशा के जीवन में बहार आ गई थी, वहीं ज्ञानेंद्र खोयाखोया सा रहने लगा था. दिखावे के तौर पर तो वह उसे प्यार करता था, लेकिन अंदर ही अंदर परेशान रहता था.

ईशा और ज्ञानेंद्र में पहली बार तकरार तब शुरू हुई जब वह अपनी बेटी सान्या का बर्थडे सर्टिफिकेट बनवाने नगर निगम पहुंची. दरअसल, ज्ञानेंद ने सर्टिफिकेट में पिता की जगह अपना नाम लिखवाने से मना कर दिया था. इस बात को ले कर ईशा और ज्ञानेंद्र में काफी विवाद हुआ. यहीं से ईशा को ज्ञानेंद्र पर शक हुआ. जब ईशा ने गुप्त रूप से ज्ञानेंद्र के संबंध में जानकारी हासिल की तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि ज्ञानेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता है. वह अपनी पत्नी नीलम और बच्चों के साथ कानपुर में ही रहता है. वह उसे तभी अपने घर ले जाता है, जब नीलम मायके गई होती है.

उस दिन देर रात ज्ञानेंद्र सिंह घर आया तो ईशा ने उस से पूछा, ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी. पत्नी, प्रेमिका या रखैल?’’

‘‘यह तुम कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो? तुम पत्नी हो मेरी.’’ ज्ञानेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘झूठ बोल रहे हो, तुम शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता हो. तुम्हारी पत्नी का नाम नीलम है, जिस के साथ तुम वैवाहिक जीवन बिता रहे हो. तुम फरेबी और धोखेबाज हो. प्यार का नाटक कर के तुम ने मुझे धोखा दिया और मुझ से शादी कर ली. लेकिन अब मैं चुप नहीं बैठूंगी. तुम्हारे खिलाफ लड़ाई लड़ूंगी. जरूरत पड़ी तो रिपोर्ट भी दर्ज कराऊंगी.’’

ज्ञानेंद्र सिंह समझ गया कि ईशा को असलियत का पता चल गया है, इसलिए उस ने माफी मांग ली. फिर बोला, ‘‘ईशा तुम मेरी दूसरी पत्नी बन कर रह सकती हो. मैं तुम्हें पूरा सम्मान दूंगा. कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. चाहो तो अपने और बेटी के नाम पर जितना चाहे पैसा जमा करा सकती हो. मैं खुशीखुशी जमा कर दूंगा.’’

‘‘मिस्टर ज्ञानेंद्र, पत्नी दूसरी पहली नहीं होती. पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपनी पत्नी नीलम को तलाक दे दो.’’

‘‘उसे तलाक देना आसान नहीं है.’’ ज्ञानेंद्र ने मजबूरी जाहिर की तो ईशा बोली, ‘‘मेरा क्या होगा. यह सोचा है तुम ने? अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का स्वांग कर के धोखे से शादी क्यों की? अगर तुम ने नीलम को तलाक नहीं दिया तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी या फिर तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी से शादी रचाने और शारीरिक शोषण करने की रिपोर्ट दर्ज कराऊंगी.’’

ईशा की धमकी सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह अंदर तक कांप गया.वह तनाव में रहने लगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियां बढ़ना स्वभाविक था. फलस्वरूप दोनों में आएदिन झगड़ा होने लगा. लड़झगड़ कर ईशा मायके आ गई. आखिरकार इस गंभीर समस्या के निदान के लिए दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा के कत्ल की योजना बना डाली. अपनी इस योजना में उस ने अपने साथी मनीष कठेरिया, उस के भाई बच्चा और मनीष के साथी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को शामिल कर लिया. मनीष कठेरिया किदवई नगर में रहता था. वह दबंग किस्म का आदमी था. साकेत नगर में उस की ‘टेलीकाम विला’ नाम से मोबाइल शौप तथा ‘बालाजी ट्रैवल्स’ के नाम से ट्रैवलिंग एजेंसी थी. इस के अलावा वह कमेटी भी चलाता था. पुलिस से दोस्ती करना उस का शौक था.

दर्जनों थानेदारों से उस के दोस्ताना संबंध थे. जिन्हें वह मुफ्त में मोबाइल फोन और आनेजाने के लिए लग्जरी गाडि़यां मुहैया कराता था. इस सेवा के एवज में वह अपने काम निकलवाता था. ज्ञानेंद्र सिंह जब साकेत नगर चौकी इंचार्ज था, तभी उस की दोस्ती मनीष से हुई थी. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गई. अर्जुन जूही बारादेवी में रहता था और मनीष कठेरिया का दोस्त था. वह मनीष की ट्रैवलिंग एजेंसी में लग्जरी कार चलाता था. अर्जुन की प्रेमिका अवंतिका किदवई नगर में रहती थी. दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. मनीष कठेरिया ने ही अर्जुन और अवंतिका का परिचय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह से कराया था. मनीष का भाई बच्चा गोविंद नगर में रहता था.

आर्थिक मदद के लिए वह मनीष के पास आता था. मनीष के कहने पर बच्चा हर काम करने के लिए तत्पर रहता था. मनीष की कमेटी का पैसा बच्चा ही वसूल किया करता था. वह हमेशा मारपीट पर आमादा रहता था. इसी बीच ज्ञानेंद्र सिंह का तबादला प्रतापगढ़ हो गया था. वहां वह आंसपुर (देवसरा) थाने में तैनात रहा. बाद में काम में लापरवाही बरतने के कारण उसे लाइन हाजिर कर दिया गया था. लाइन हाजिर होने के बाद वह पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहा था. ईशा की धमकी ने उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर दी थी. उसे पता था कि ईशा ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो उस की नौकरी तो जाएगी ही उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह जल्द से जल्द ईशा का काम तमाम करना चाहता था. इस के लिए वह बराबर अपने दोस्तों से संपर्क बनाए हुए था. उस ने उन से मिल कर ईशा की हत्या की योजना बना ली थी.

अपनी योजना के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह 17 मई, 2015 को ईशा के घर नवीन नगर, काकादेव पहुंचा. वहां उस ने ईशा की मां, मौसी, मामा व अन्य घरवालों से माफी मांगी और वादा किया कि वह ईशा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और जैसा वह कहेगी, वैसा ही करेगा. उस के कहने पर पहली पत्नी नीलम को तलाक भी दे देगा. उस ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से वह नीलम को तलाक न दे सका तो ईशा व उस की बेटी के भरणपोषण के लिए मोटी रकम देगा. ईशा के घरवालों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया. 18 मई, 2015 की शाम 4 बजे दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह अपने साथी मनीष कठेरिया के साथ लग्जरी कार से ईशा के घर पहुंचा और उस की मां विनीता के पैर छू कर बोला, ‘‘मांजी, हम ईशा को कुष्मांडा देवी के दर्शन कराने ले जाना चाहते हैं. हमें आप की इजाजत चाहिए.’’

ईशा ज्ञानेंद्र की पत्नी थी, सो उन्हें क्या ऐतराज हो सकता था. लिहाजा उन्होंने ईशा को ज्ञानेंद्र के साथ जाने की इजाजत दे दी. ईशा व ज्ञानेंद्र को रात 8 बजे तक मंदिर से वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब दोनों रात 10 बजे तक वापस नहीं आए तो ईशा की मां विनीता सचान को चिंता हुई. उन्होंने ईशा और ज्ञानेंद्र से मोबाइल पर बात करनी चाही, लेकिन दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ थे. रात भर विनीता बेटी के आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन वह वापस नहीं लौटी. सुबह को परेशानहाल विनीता सचान थाना काकादेव पहुंचीं. थाने पर उस समय थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव मौजूद थे. उन्होंने सारी बात बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगई. लेकिन विभाग का मामला होने की वजह से पुलिस ने उन्हें टरका दिया. इस पर विनीता सचान डीआईजी आशुतोष पांडेय से मिलीं और शक जताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराने की विनती की.

डीआईजी आशुतोष पांडेय को मामला गंभीर लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी उदय प्रताप को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दे दिया. आदेश मिलते ही उदय प्रताप ने विनीता सचान की ओर से भादंवि की धारा 364 के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 20 मई को काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को कौशांबी के थाना महेवाघाट द्वारा एक युवती की सिर विहीन लाश मिलने की सूचना दी गई. शक के आधार पर थानाप्रभारी विनीता सचान, उन के पुत्र ऐश्वर्य राज व अन्य घरवालों के साथ महेवाघाट थाना पहुंचे. पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी थी. विनीता सचान ने जब उस लाश को देखा तो वह फफक कर रो पड़ीं. यह लाश उन की बेटी ईशा की ही थी. विनीता ने लाश की पहचान ईशा के हाथ में बंधी कलाई घड़ी तथा बांह पर गुदे लव आकार के टैटू से की थी.

लाश की शिनाख्त होने पर महेवाघाट थाना पुलिस ने अपने यहां दर्ज हत्या के मामले को थाना काकादेव, कानपुर ट्रांसफर कर दिया. चूंकि ईशा की लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए काकादेव पुलिस ने अपहरण के इस मामले में धारा 302/201/120बी और जोड़ दी. साथ ही विनीता के बयान के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह के साथसाथ बच्चा, मनीष कठेरिया, अर्जुन और उस की कथित पत्नी अवंतिका को भी आरोपी बना दिया. चूंकि यह मामला पुलिस के एक दरोगा से जुड़ा था इसलिए डीआईजी आशुतोष पांडेय ने ईशा के हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने, कत्ल में प्रयुक्त हथियार और सिर बरामद करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सीओ स्वरूप नगर आतिश कुमार, क्राइम ब्रांच के सीओ अमित कुमार राय, प्रभारी आर.के. सक्सेना तथा काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ज्ञानेंद्र, बच्चा, मनीष कठेरिया तथा उस के साथी अर्जुन के ठिकानों पर ताबड़तोउ़ छापे मारे. लेकिन सभी आरोपी फरार थे. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही करीब एक दर्जन लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. निर्दोष पाए जाने पर बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस टीम को ईशा के मोबाइल की लोकेशन आगरा में मिली. पुलिस टीम आगरा गई और हाइवे के एक ढाबे के कर्मचारी से ईशा का मोबाइल बरामद कर लिया. उस कर्मचारी ने बताया कि कुछ लोग यह मोबाइल खाना खाने के बाद मेज पर छोड़ गए थे. पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि हत्यारोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए ऐसा किया होगा.

25 मई, 2015 को पुलिस टीम ने हत्यारोपी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को छपेड़ा पुलिया, काकादेव से कार सहित गिरफ्तार कर लिया. अर्जुन अपनी प्रेमिका को स्विफ्ट डिजायर कार से घुमाने बिठूर जा रहा था. यह कार मनीष कठेरिया की थी. अर्जुन और अवंतिका के पास से ईशा का एक कंगन भी बरामद हुआ. पूछताछ में अर्जुन ने बताया कि घटना वाले दिन शाम 4 बजे ज्ञानेंद्र सिंह स्विफ्ट कार से ईशा के घर पहुंचा था. उस वक्त कार में मनीष और उस का भाई बच्चा भी मौजूद था. ईशा को साथ ले कर तीनों नौबस्ता आए. मनीष ने उसे व अवंतिका को फोन कर के वहीं बुला लिया.

सभी 6 लोग 2 गाडि़यों के साथ विधनू, घाटमपुर, फतेहपुर होते हुए कौशांबी की ओर बढ़े. रास्ते में एक सुनसान जगह पर ज्ञानेंद्र ने गाड़ी रोक दी. उसी वक्त मनीष ने ईशा को दबोच लिया और ज्ञानेंद्र ने तेज धार वाले चाकू से ईशा का सिर धड़ से अलग कर दिया. धड़ से खून का फव्वारा छूटा तो मनीष ने अपनी शर्ट उतार कर सिर को धड़ से बांध दिया. फिर ईशा के शरीर से कपड़े और जेवर उतार कर सिर को यमुना नदी में तथा धड़ को महेवाघाट यमुना पुल के पास फेंक दिया. तत्पश्चात गाड़ी की अदलाबदली कर के तथा कंगन दे कर उसे वापस भेज दिया गया. मनीष, बच्चा व दरोगा ज्ञानेंद्र दूसरी गाड़ी से कहीं चले गए. अर्जुन व अवंतिका का बयान दर्ज करने के बाद काकादेव पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया.

अब पुलिस टीम ने शातिर दिमाग ज्ञानेंद्र सिंह, उस के साथी मनीष कठेरिया व बच्चा को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. इस से घबरा कर 30 मई को मनीष कठेरिया ने सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे 3 दिनों की रिमांड पर ले लिया. मनीष से कोहना व किदवई नगर थाने में कड़ाई से पूछताछ की गई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की मां उषा को थाने बुलवा लिया. दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस टीम ने पूछताछ शुरू की. जबान न खुलने पर पुलिस ने उस की मां उषा को जेल भेजने की धमकी दी. इस धमकी से मनीष टूट गया और उस ने जबान खोल दी.

वह पुलिस टीम को महेवाघाट थाना क्षेत्र ले गया. वहां उस ने एक गड्ढे से मृतक ईशा का पर्स व सोने का एक कंगन बरामद करा दिया. पर्स में कुछ नकदी व जरूरी कागजात थे. पुलिस टीम ने यहीं से मनीष की खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली, जिसे उस ने हत्या के बाद खून रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने मनीष को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. मनीष को जेल भेजने के बाद पुलिस टीम ने ईशा की हत्या के मुख्य आरोपी दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को पकड़ने की कवायद शुरू की. एसएसपी शलभ माथुर ने उसे पकड़ने के लिए 12 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. लेकिन दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह पुलिस की हर युक्ति को धता बता कर 8 जून को कोर्ट में हाजिर हो गया. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हाथ मलती रह गई.

दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा आत्मसमर्पण की बात कानपुर कोर्ट में फैली तो वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वे झुंड बना कर सीजेएमएम कोर्ट जा पहुंचे. पुलिस जब ज्ञानेंद्र को ले जाने लगी तो वकील उस पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से जम कर पीटा, उन्होंने उस के कपड़े फाड़ दिए और मुंह पर थूका. बड़ी मसक्कत के बाद पुलिस उसे जेल ले जा सकी. कत्ल में इस्तेमाल हथियार और मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस टीम ने दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को 17 जून को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. काफी जद्दोजहद के बाद ज्ञानेंद्र सिंह ने मुंह खोला. वह पुलिस टीम को महेवाघाट, कौशांबी में यमुना नदी के दूसरी तरफ ले गया, जहां उस ने जमीन में गड़े सर्जिकल चाकू, ईशा का मंगलसूत्र, चेन और अंगूठी बरामद कराई. ईशा के सिर के संबंध में पूछने पर ज्ञानेंद्र ने बताया कि उसे यमुना नदी की तेज धारा में फेंक दिया गया था.

सिर को बरामद करने के लिए पुलिस ने यमुना नदी में जाल डलवाया, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका था. पुलिस पूछताछ में ज्ञानेंद्र ने बताया कि ईशा उस पर पहली पत्नी नीलम को तलाक देने का दबाव बना रही थी. जिस से परेशान हो कर उस ने उसे ठिकाने लगा दिया. वह उसे मंदिर दर्शन कराने के बहाने ले गया था. रास्ते में कार के भीतर ही उस का काम तमाम कर दिया गया. फिर धड़ को महेवाघाट थाने के पास यमुना नदी के पास फेंक दिया गया और सिर यमुना नदी में. वारदात के वक्त मनीष कठेरिया, उस का भाई बच्चा, अर्जुन तथा उस की प्रेमिका अवंतिका उस के साथ थे.

19 जून, 2015 को काकादेव पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. अभियुक्त बच्चा फरार था. Hindi stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: सीमा के स्वप्न संसार में सेंध

UP Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है, लेकिन अतिमहत्त्वाकांक्षा हमेशा कष्टदायी होती है. सीमा अगर खुद पर नियंत्रण रख कर अपने पति पर भरोसा रखती तो उस का और उस के परिवार का ऐसा भयानक अंजाम कभी न होता.

उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के कस्बा बकेवर के रहने वाले रामलाल तोमर के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा व 3 बेटियां थीं, जिन में सीमा सब से बड़ी थी. वह अपने भाई बहनों से हर मामले में तेज थी. पढ़नेलिखने में भी वह पीछे नहीं थी. उस ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. सीमा जब जवान हुई तो उस के मातापिता को उस की शादी की चिंता होने लगी.  रामलाल तोमर ने सीमा के लिए रिश्ता देखना शुरू किया तो औरैया के मोहल्ला आर्यनगर का राकेश उर्फ राजू उन्हें पसंद आ गया. पेशे से ड्राइवर राजू का अपना मकान था. देखने में भी वह हृष्टपुष्ट था. उस का एक ही भाई था नरेश, जो प्राइवेट नौकरी करता था. लड़का भी ठीक था और उस का परिवार भी. रामलाल तोमर ने बेटी का रिश्ता उस के साथ तय कर दिया.

सीमा खूबसूरत लड़की थी. राकेश को भी वह पसंद आ गई. फलस्वरूप दोनों की शादी हो गई. यह सन 2006 की बात है. गोरा रंग, भरा हुआ चेहरा, कटीले नैननक्श, छरहरा बदन, ऊपर से भरपूर जवानी. राकेश को लगा जैसे सीमा के रूप में उसे हूर मिल गई है. वह उस की खूबसूरती में डूब कर रह गया. सीमा भी राकेश को पा कर खुश थी. दोनों का जीवन हंसीखुशी से कटने लगा. परिवार की स्थिति के अनुसार जीवन की लगभग हर आर्थिक जरूरत पूरी हो रही थी. विवाह के शुरुआती दिनों में तो पतिपत्नी दोनों खूब खुश थे, लेकिन जब जिम्मेदारियां बढ़ीं तो धीरेधीरे दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण कम होने लगा. वक्त के साथ राकेश को लगने लगा कि सीमा कुछ ज्यादा ही महत्त्वाकांक्षी औरत है.

वजह यह थी कि अब वह राकेश से तरहतरह की फरमाइशें करने लगी थी. जबकि ड्राइवरी कर के अपने परिवार का बोझ उठाने वाले राकेश के लिए उस की फरमाइशें पूरा करना आसान नहीं था. लेकिन यह बात सीमा की समझ में नहीं आती थी. वह पति की मजबूरी समझने के बजाय उस से लड़ाईझगड़ा करने लगती थी. सीमा के इसी स्वभाव की वजह से दोनों के दांपत्य जीवन में कटुता आने लगी. फिर भी विषम परिस्थितियों के बावजूद वक्त अपनी चाल चलता रहा. इस बीच सीमा एक बेटी हिना और एक बेटे रूपेश की मां बन गई थी.

सीमा अपने बच्चों का पालनपोषण अच्छी तरह से करना चाहती थी. वह उन्हें अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहती थी, लेकिन राकेश की सीमित आय में यह संभव नहीं था. सीमा बच्चों की परवरिश और उन की पढ़ाईलिखाई को ले कर अकसर पति से झगड़ती रहती थी. रोजरोज के झगड़े से राकेश तनाव में रहने लगा था. इस तनाव को दूर करने के लिए उस ने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया था. दिन भर के कामकाज से थका मादा राकेश अब ज्यादातर नशे में धुत हो कर देर रात घर लौटता था. घर आ कर वह थोड़ाबहुत खाना खाता और बिस्तर पर लुढक जाता. सीमा अभी जवान थी, उस की रातें बिस्तर पर करवटें बदलते गुजरतीं. उस का मन करता था कि उस का पति उसे प्यार करे, उस की शारीरिक जरूरतों को पूरा करे. लेकिन राकेश की उपेक्षा की वजह से वह मन मार कर रह जाती थी.

आर्यनगर मोहल्ले में ही सीमा के घर से कुछ दूरी पर सुरेश शर्मा का अपना मकान था, जहां वह सपरिवार रहता था. सुरेश शर्मा प्रौपर्टी डीलर था, साथ ही जरूरतमंदों को ब्याज पर पैसा भी देता था. उस ने अपने घर के भूतल पर प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस बना रखा था. उस का काम अच्छा चल रहा था. एक दिन अचानक सीमा की बेटी हिना की तबियत खराब हो गई. उसे नर्सिंगहोम में भरती कराना पड़ा. सीमा को पैसों की जरूरत थी, इसलिए वह अपने पति राकेश के साथ प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा के औफिस जा पहुंची. खूबसूरत सीमा को देख कर सुरेश के दिल में हलचल मच गई. उस ने आने का कारण पूछा तो सीमा बोली, ‘‘शर्माजी, मेरी बेटी हिना अस्पताल में भरती है. मुझे 10 हजार रुपए चाहिए.’’

सुरेश शर्मा गोरी रंगत व तीखे नयननक्श वाली सीमा के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए बोला, ‘‘मैडम, आप जरूरतमंद हैं और मैं जरूरतमंदों को कभी निराश नहीं करता, लेकिन आप को मूल के साथसाथ ब्याज भी देना होगा.’’

‘‘यह मेरे पति राकेश हैं, ड्राइवर की नौकरी करते हैं. हम आप की पाईपाई चुका देंगे.’’ सीमा ने गारंटी सी दी.

सुरेश शर्मा सोचने लगा, ‘इतनी खूबसूरत औरत एक मामूली ड्राइवर की बीवी. इसे तो किसी उस जैसे दौलतवाले की होना चाहिए.’

सोचविचार कर शर्मा सीमा के पति से मुखातिब हुआ, ‘‘क्यों भाई राजू, तुम्हारी बीवी जो वादा कर रही है, उसे पूरा करोगे?’’

‘‘हां शर्माजी, मैं वादा करता हूं कि आप का पैसा ब्याज समेत चुका दूंगा.’’ राजू हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘फिर ठीक है.’’ कह कर शर्मा ने 10 हजार रुपए सीमा को दे दिए. सीमा तो पैसे ले कर चली गई, लेकिन सुरेश शर्मा के दिल में खलबली मचा गई. दरअसल वह पहली ही नजर में उस के दिलोदिमाग पर छा गई थी. फलस्वरूप वह उसे हासिल करने के लिए तानेबाने बुनने लगा. उस ने थोड़ी छानबीन की तो उसे पता चला कि सीमा का पति राकेश शराब का लती है. सुरेश शर्मा खुद भी शराब का शौकीन था. उस ने कोशिश की तो पीनेपिलाने के नाम पर जल्द ही दोनों की दोस्ती हो गई. बस फिर क्या था, दोनों की राकेश के घर में महफिल जमने लगी. पीनेपिलाने के दौरान सुरेश शर्मा की नजरें सीमा पर ही टिकी रहती थीं.

30 वर्षीया सीमा 2 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी. उस का गोरा रंग, मांसल शरीर तथा बड़ीबड़ी आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं. वह सजसंवर कर आंखों पर काला चश्मा पहन कर जब घर से निकलती तो किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी. अधेड़ उम्र का सुरेश शर्मा सीमा का दीवाना बन गया था. अपनी दीवानगी के चलते जबतब उस ने सीमा के घर आनाजाना शुरू कर दिया था. वह जब भी आता, बच्चों और सीमा के लिए कुछ न कुछ ले कर आता. वह सीमा से लच्छेदार बातें करता, जो उसे बहुत अच्छी लगतीं. रहीबची कमी उस के लाए उपहार पूरी कर देते. फलस्वरूप धीरेधीरे वह भी सुरेश शर्मा की ओर आकर्षित होने लगी.

सीमा महत्त्वाकांक्षी औरत थी. उसे लगा कि धनाढ्य सुरेश शर्मा के माध्यम से उस की महत्त्वाकांक्षा पूरी हो सकती है. एक रोज जब सुरेश शर्मा उस के घर आया तो वह उस के सामने खुलेपन से पेश आई. बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘शर्माजी, मेरी एक चाहत है. अगर आप चाहें तो पूरी कर सकते हैं.’’

सही मौका देख सुरेश शर्मा उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘बोलो, क्या चाहती हो?’’

‘‘मेरे पति राकेश दूसरे की वैन चलाते हैं. नौकरी से घर का खर्चा नहीं चल पाता. मैं चाहती हूं कि आप उन्हें एक वैन खरीदवा दें. कमाई का आधा रुपया वह आप को देंगे और बाकी रुपए से घर का खर्च चलता रहेगा.’’

सीमा की डिमांड बड़ी थी. सुरेश शर्मा खामोश हो गया. वह मन ही मन सोचने लगा, ‘सीमा वाकई चालाक औरत है. अभी पिछला कर्ज चुका नहीं पाई, दूसरी बड़ी डिमांड कर दी. लेकिन वह भी प्रौपर्टी डीलर है. घाटे का सौदा नहीं करेगा. सीमा कर्ज नहीं चुका पाएगी तो वह उस के शरीर से वसूल कर लेगा.’

सुरेश शर्मा को खामोश देख कर सीमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है शर्माजी, आप को तो सांप सूंघ गया. कोई जोरजबरदस्ती नहीं है. मैं तो वैसे ही आप की एहसानमंद हूं. आप ने मदद न की होती तो पता नहीं मेरी बेटी का क्या हाल होता.’’

‘‘नहीं…नहीं सीमा, तुम निराश मत हो. तुम्हारी चाहत पूरी होगी.’’ इस के बाद महीना बीतते सुरेश शर्मा ने सीमा के पति राकेश को वैन खरीद कर दे दी. वैन पा कर राकेश शर्मा खुशी से झूम उठा. उस ने वैन को एक अंगे्रजी माध्यम स्कूल में अटैच करा लिया. दिन में वह बच्चों को ढोता और रात में शादी समारोह या बुकिंग पर चला जाता. इस तरह वह दोहरी कमाई करने लगा. कमाई बढ़ी तो घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक हो गई. सुरेश शर्मा वैन की कमाई के रुपए लेने अकसर सीमा के घर आता रहता था. पहले वह आता था तो गंभीर बना रहता था. लेकिन अब वह सीमा से हंसीमजाक के साथ उस के शरीर से हलकीफुलकी छेड़छाड़ भी कर लेता था. सीमा न उस के मजाक का बुरा मानती थी, न शारीरिक छेड़छाड़ का.

कहते हैं, औरत मर्द की निगाहों की बेहद पारखी होती है. सीमा भी समझ गई थी कि प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा उस से क्या चाहता है. सीमा का पति बिस्तर पर उस का साथ नहीं देता था. वह शराब पी कर देर रात घर आता और खापी कर चारपाई पर लुढ़क जाता. वह रात भर तड़पती रहती. यही वजह थी कि जब सुरेश शर्मा ने उस से शारीरिक छेड़छाड़ शुरू की तो उस ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. एक दिन एकांत पा कर सुरेश शर्मा ने जब सीमा को छेड़ा तो वह स्वयं को रोक नहीं सकी और मुसकराते हुए पूछ लिया, ‘‘शर्माजी, आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘मैं तो तुम्हें चाहता हूं.’’ सुरेश शर्मा ने आगे बढ़ कर सीमा के कंधों पर हाथ रखते हुए मादक स्वर में कहा. उस वक्त उस के स्वर में ही नहीं, आंखों में भी मादकता तैर रही थी. सीमा चाह कर भी सुरेश शर्मा के हाथ को अपने कंधों से नहीं हटा सकी. सुरेश शर्मा का हौसला बढ़ा तो वह उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. फिर उस ने सीमा को अपनी बांहों में भर लिया. सीमा भी उस से लिपट गई. इस के बाद दोनों तभी अलग हुए, जब उन के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि के भाव उभर आए.

सुरेश शर्मा और सीमा के बीच जब एक बार नाजायज रिश्ते बन गए तो फिर यह सिलसिला दिनोंदिन बढ़ता ही गया. जब भी मौका मिलता, दोनों एकदूसरे में समा जाते. शर्मा से शारीरिक सुख मिलने लगा तो सीमा ने पति को दिल से ही निकाल दिया. वह केवल प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा की हो कर रह गई. कहते हैं, पाप कितना भी छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. धीरेधीरे सुरेश शर्मा और सीमा के अवैध रिश्तों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस बात की भनक राकेश तोमर को लगी तो उस का माथा ठनका. उसे अपनी बीवी पर शक तो पहले से ही था, लेकिन लोगों की चर्चाओं ने उस के शक को पक्का कर दिया.

राकेश दोनों को रंगेहाथ पकड़ना चाहता था. इसलिए उस ने गुप्तरूप से सुरेश शर्मा और सीमा पर नजर रखनी शुरू कर दी. एक शाम राकेश यह कह कर घर से निकला कि वह वैन ले कर बुकिंग पर जा रहा है. अब वह सुबह तक आ पाएगा. राकेश के जाते ही सीमा ने सुरेश शर्मा को मोबाइल से यह जानकारी दे कर उसे घर बुला लिया. कुछ देर तक दोनों हंसीठिठोली करते रहे, फिर बिस्तर पर पहुंच गए. दोनों रंगरेलियां मना ही रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई. सीमा ने दरवाजा खोला तो सामने राकेश खड़ा था. उसे देख कर सीमा ने घबरा कर पूछा, ‘‘तुम तो सुबह आने को कह कर गए थे?’’

सीमा के अस्तव्यस्त कपड़े, उलझे बाल और घबराहट देख कर राकेश समझ गया कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. वह सीमा को परे धकेल कर घर के अंदर कमरे में पहुंचा तो सुरेश शर्मा वहां मौजूद था. वह कपड़े पहन चुका था. शर्मा राकेश को देखते ही बोला, ‘‘तुम आ गए, दरअसल मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी, इसलिए तुम्हारा इंतजार कर रहा था.’’

राकेश गुस्से में बोला, ‘‘शर्माजी, आज के बाद तुम मेरे घर में कदम भी नहीं रखोगे. पैसे मैं खुद देने आऊंगा. तुम्हारे कारण हमारी कितनी बदनामी हो रही है, इस का अंदाजा है तुम्हें? मैं तुम्हारे एहसान के बोझ तले दबा हूं, ऊपर से तुम्हारी उम्र का खयाल. वरना अब तक मेरे हाथ तुम्हारी गर्दन तक पहुंच गए होते.’’

राकेश के तेवर देख कर सुरेश शर्मा ने नजरें झुका लीं और वहां से चला गया. उस के जाते ही राकेश का सारा गुस्सा सीमा पर फूट पड़ा. उस ने उस की जम कर पिटाई की. सीमा चीखनेचिल्लाने लगी. पत्नी के साथ मारपीट कर के राकेश चारपाई पर जा कर लेट गया. कुछ देर में उसे नींद आग गई. जबकि सीमा रात भर दर्द से तड़पती रही. इस के बाद तो मारपीट का सिलसिला सा चल पड़ा. राकेश शराब तो पीता ही था, लेकिन अब वह कुछ ज्यादा ही पीने लगा. देर रात वह नशे में धुत हो कर आता. बातबेबात सीमा से उलझता और फिर उसे जानवरों की तरह पीटता. कभीकभी दोनों का झगड़ा घर से शुरू होता और सड़क पर आ जाता. पासपड़ोस के लोग बड़े मजे से दोनों का झगड़ा देखते. लेकिन सीमा की मदद के लिए कोई नहीं आता.

मारपीट और बदनामी के बावजूद सीमा ने सुरेश शर्मा का साथ नहीं छोड़ा. उसे जब भी मौका मिलता मोबाइल से बात कर के वह उसे बुला लेती और दोनों हमबिस्तर हो जाते. यह अलग बात थी कि अब वे सतर्कता बरतने लगे थे. लेकिन उन की सतर्कता के बावजदू एक दिन राकेश ने दोनों को फिर रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन राकेश ने पहले सुरेश शर्मा की पिटाई की, उस के बाद सीमा को मारमार कर अधमरा कर दिया. सीमा कहीं उस के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट न दर्ज करा दे, राकेश घर से गायब हो गया. इधर जब सुरेश शर्मा को इस बात का पता चला कि राकेश घर से गायब है तो वह सीमा का हालचाल जानने जा पहुंचा. सीमा उसे देख कर फफक कर रो पड़ी,

‘‘राकेश का जुल्म अब मुझ से बरदाश्त नहीं होता. उस ने पीटपीट कर मेरा पूरा शरीर काला कर दिया है. अब मैं उस से छुटकारा पाना चाहती हूं.’’

‘‘छुटकारा… मतलब… हत्या?’’ शर्मा चौंका.

‘‘हां, मेरे पति को मार डालो, वरना एक दिन वह हम दोनों को मार डालेगा.’’ सीमा ने मन की बात कह दी.

‘‘शायद, तुम ठीक कहती हो. लेकिन इस काम के लिए हम दोनों को प्रयास करना होगा. पैसा तो मैं खर्च कर सकता हूं, पर भरोसे का कोई आदमी चाहिए.’’ सुरेश शर्मा ने भी अपनी बात कह दी.

‘‘भरोसे का आदमी है, मैं उस की पत्नी से बात करती हूं.’’ सीमा ने कहा तो सुरेश शर्मा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘कौन है वह?’

‘‘मेरी सहेली छाया वर्मा का पति राजेश वर्मा.’’

‘‘सुपारी किलर राजेश वर्मा?’’ सुरेश ने चौंक कर पूछा.

‘‘हां, वही राजेश वर्मा, पर कितनी रकम लेगा, यह बात कर के बताऊंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम बात करो. मैं पैसे का बंदोबस्त करता हूं.’’ शर्मा ने आश्वासन दिया.

इस के बाद सीमा शुक्ला टोला में रहने वाली अपनी सहेली छाया वर्मा से मिली और उस से पति से निजात दिलाने की बात कही. इस के लिए छाया वर्मा ने 2 लाख रुपए मांगे. लेकिन बातचीत के बाद एक लाख 60 हजार रुपए में सौदा तय हो गया. छाया वर्मा का पति राजेश वर्मा दिखावे के लिए तो कार ड्राइवर था, लेकिन असल में वह अपराधी था और पैसा ले कर हत्या जैसे जघन्य अपराध करता था. छाया वर्मा ने अपने पति राजेश वर्मा को राकेश उर्फ राजू तोमर की हत्या के लिए राजी कर लिया. सीमा ने सुरेश शर्मा की मुलाकात राजेश वर्मा व उस की पत्नी छाया वर्मा से करवाई और सुपारी किलर राजेश वर्मा को 20 हजार रुपए एडवांस दिलवा दिए. शेष रुपए काम हो जाने के बाद देने को कहा गया. सुपारी लेने के बाद राजेश वर्मा ने इस काम में अपने दोस्त कल्लू सक्सेना को भी शामिल कर लिया.

करीब एक सप्ताह तक इधरउधर घूमने के बाद राकेश घर लौट आया. अब वह पूरी तरह निश्चिंत था. क्योंकि सीमा ने पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी. उस ने बच्चों से प्यार भरी बातें कीं और सीमा के साथ भी सहज व्यवहार किया. यहां तक कि उस ने सीमा से मारपीट के लिए माफी भी मांग ली. सीमा के व्यवहार में भी बदलाव आ चुका था. दिखावे के लिए वह भी उस से प्यार करने लगी थी. राकेश को क्या मालूम था कि पत्नी का यह प्यार उस के लिए मौत की दस्तक है.

16 मार्च, 2015 की सुबह औरैया के कुछ लोगों ने शहर के पास वाली नहर के किनारे स्थित वीरेंद्र कुशवाहा के खेत में लगे ट्यूबवेल के कमरे के पास एक युवक की लाश पड़ी देख कर औरैया कोतवाली पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी अजय पाठक अपने सहयोगी उपनिरीक्षक मोहम्मद शाकिर व अनिल पांडेय के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पाठक ने लाश पाए जाने की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी और निरीक्षण में जुट गए. युवक की हत्या किसी तेज धार वाले हथियार से की गई थी. उस का गला आधे से ज्यादा कटा हुआ था. हाथ पर भी जख्म थे. मृतक की उम्र 35 साल के आसपास थी. जामातलाशी में उस के पास से ऐसा कुछ भी बरामद नहीं हुआ, जिस से उस का नामपता मालूम हो जाता. लाश को सैकड़ों लोगों ने देखा, लेकिन कोई भी मृतक को पहचान नहीं सका.

थानाप्रभारी अजय पाठक अभी लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सूचना पा कर एसपी मनोज तिवारी, एएसपी विपुल कुमार श्रीवास्तव और सीओ (सिटी) रमेशचंद्र भारतीय भी आ गए. उन्होंने डौग स्क्वायड को भी बुला लिया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. लेकिन मृतक की पहचान नहीं हो सकी. खोजी कुत्ता भी लाश को सूंघ कर भौंकता हुआ नहर तक गया और वापस लौट आया. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने लाश की फोटो वगैरह करा कर उसे पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. पुलिस अधीक्षक मनोज तिवारी ने मृतक और हत्यारों का पता लगाने के लिए एएसपी विपुल कुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में एक सशक्त पुलिस टीम बनाई.

इस टीम में सीओ सिटी रमेशचंद्र भारतीय, कोतवाली प्रभारी निरीक्षक अजय पाठक, एसआई मोहम्मद शाकिर, अनिल पांडेय तथा सर्विलांस टीम को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम 4 दिनों तक पसीना बहाती रही, लेकिन मृतक की हत्या का रहस्य खुलना तो दूर उस की शिनाख्त तक नहीं हो सकी. 21 मार्च, 2015 को आर्यनगर मोहल्ला निवासी नरेश तोमर ने थाना कोतवाली आ कर बताया कि उस का भाई राकेश उर्फ राजू तोमर करीब एक हफ्ते से गायब है. इस पर अजय पाठक ने उसे मृतक की फोटो दिखाई. फोटो देखते ही नरेश फफक पड़ा. उस ने बताया कि यह फोटो उस के भाई राकेश की है.

लाश की शिनाख्त होते ही पुलिस हरकत में आ गई. पुलिस टीम ने नरेश से पूछताछ की तो उस ने अपने भाई की हत्या का संदेह प्रौपर्टी डीलर सुरेश शर्मा और उस के बेटे शिवम शर्मा पर जाहिर किया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. थाना कोतवाली ला कर जब पुलिस टीम ने सुरेश शर्मा से पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने हत्या का जुर्म कबूल लिया. पूछताछ में सुरेश शर्मा ने बताया कि राकेश की पत्नी सीमा से उस के नाजायज संबंध बन गए थे. राकेश इन संबंधों का विरोध करता था और सीमा को बुरी तरह पीटता था. आजिज आ कर सीमा और उस ने राकेश की हत्या की साजिश रची. इस के बाद उन दोनों ने सुपारी किलर राजेश वर्मा और उस की पत्नी छाया वर्मा से बात की.

बातचीत के बाद सीमा ने अपने सुहाग का सौदा एक लाख 60 हजार में कर डाला और एडवांस के तौर पर 20 हजार रुपए भी दे दिए. राजेश वर्मा ने ही राकेश की हत्या की है. सुरेश शर्मा के बयान के आधार पर पुलिस टीम ने ताबड़तोड़ छापे मार कर राजेश वर्मा, उस की पत्नी छाया वर्मा और मृतक की पत्नी सीमा तोमर को गिरफ्तार कर लिया. थाना कोतवाली में जब उन से पूछताछ की गई तो सभी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. राजेश वर्मा ने कत्ल में प्रयोग किया गया गंड़ासा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने नहर के किनारे झाडि़यों से छिपा दिया था. राजेश के पास से पुलिस टीम ने 7500 रुपए भी बरामद कर लिए. शेष रुपए वह खर्च कर चुका था.

राजेश वर्मा ने पूछताछ में बताया कि सुपारी लेने के बाद उस ने यह काम करने के लिए अपने दोस्त कल्लू सक्सेना को शामिल कर लिया था. पीनेपिलाने के दौरान उस ने राजू से दोस्ती गांठ ली थी. 15 मार्च को वह राजेश उर्फ राजू को शहर के बाहर नहर पर ले गया और फिर खेत पर वहां पहुंचा, जहां ट्यूबवेल था. ट्यूबवेल के पास कमरा था. राकेश वहीं पसर गया. सही मौका देख कर उस ने कल्लू की मदद से राजू की गर्दन गंड़ासे से काट दी और गंड़ासा छिपा दिया. उस के बाद राकेश की हत्या की सूचना सुरेश शर्मा को दे दी. राकेश की हत्या कर के राजेश और कल्लू सक्सेना घर लौट आए थे.

चूंकि अभियुक्तों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी अजय कुमार पाठक ने मृतक के भाई नरेश को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201/120बी, के तहत, सुरेश शर्मा, राजेश वर्मा, छाया वर्मा, सीमा तोमर और कल्लू सक्सेना के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 24 मार्च, 2015 को पुलिस ने अभियुक्त सुरेश शर्मा, राजेश वर्मा, छाया वर्मा तथा सीमा तोमर को औरैया की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. कल्लू सक्सेना फरार था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Uttar Pradesh Crime Story: खुले दिल वाली औरत

Uttar Pradesh Crime Story: 3 शादियां करने के बाद भी सरस्वती अपने दिल को काबू में नहीं कर सकी. उस का दिल पड़ोस के ओमवीर पर आ गया. इस नए प्रेमी के साथ उस ने ऐसी साजिश रची कि…

रामपुर बुजुर्ग गांव में सुबहसुबह रोने बिलखने की आवाज सुन कर लोगों की नींद टूट गई. वह आवाज किसी महिला की थी. लोग सोचने लगे कि पता नहीं क्या हो गया जो वह महिला इस तरह रो रही है. लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई और वे अपनेअपने घरों से बाहर निकल कर उस तरफ जाने लगे, जिधर से रोने की आवाज आ रही थी. वह आवाज रामस्वरूप के घर की तरफ से आ रही थी. इसलिए लोगों का उस के घर के बाहर जुटना शुरू हो गया. बाद में पता चला कि रामस्वरूप की मौत हो गई है. रामस्वरूप की पत्नी सरस्वती रोते हुए कह रही थी कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. उस की लाश कमरे में एक चारपाई पर पड़ी थी. रामस्वरूप की मां मोरकली और भाई ऋषिपाल भी वहां खड़े आंसू बहा रहे थे.

वहां मौजूद लोगों में से किसी ने फोन कर के रामस्वरूप के आत्महत्या करने की जानकारी भमोरा थाने को दे दी. जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव गांव रामपुर बुजुर्ग में रामस्वरूप के घर पहुंच गए. यह गांव उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के अंतर्गत आता है. पुलिस को देखते ही सरस्वती दहाड़े मार कर रोने लगी. थानाप्रभारी ने सरस्वती को दिलासा देते हुए चुप कराया. इस के बाद उस से रामस्वरूप की मौत के बारे में बात की. उस ने रुंधे गले से बताया कि थकान होने की वजह से रात को वह बच्चों के साथ सो गई थी. सुबह आंखें खुलीं तो उस ने पति की लाश धोती के फंदे से लटकी देखी. इस हाल में उस ने जल्दी से धोती को बीच से काट दिया और लोगों को बुलाया.

थानाप्रभारी ने लाश का मुआयना किया तो देखा कि रामस्वरूप की लाश चारपाई पर चित अवस्था में पड़ी थी. उस के शरीर पर कमीज और केवल अंडरवियर था. गले पर किसी रस्सी के बांधने जैसे निशान थे. पुलिस ने मृतक के छोटे भाई ऋषिपाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रामस्वरूप ने 2 दिन पहले ही अपने हिस्से की जमीन बेची थी. इसलिए फांसी लगा कर आत्महत्या करने का कोई कारण समझ में नहीं आ रहा. ऋषिपाल की बातों से थानाप्रभारी को दाल में काला नजर आने लगा. चूंकि उस समय सरस्वती बुरी तरह बिलख रही थी, इसलिए उस से पूछताछ करनी जरूरी नहीं समझी. उन्होंने लाश का पंचनामा करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए बरेली के जिला अस्पताल  भेज दिया. यह बात 17 दिसबंर, 2014 की है.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव रिपोर्ट पढ़ कर हैरान रह गए. रिपोर्ट में बताया गया था कि रामस्वरूप की मौत गला घुटने से हुई थी. जिस तरह उस के गले पर रस्सी के बांधने का निशान था. उस से यही लगता था कि सोते समय उस के गले में रस्सी बांध कर उस का गला घोंटा गया था. पुलिस को यह मामला हत्या का लगा. जबकि उस की पत्नी इसे आत्महत्या बता रही थी. केस की गुत्थी सुलझाने के लिए थानाप्रभारी उस के घर पहुंचे. घर में सरस्वती तथा उस की सास मोरकली मिलीं. उन्होंने सरस्वती से पूछताछ शुरू की तो उस ने वही कहानी बताई, जो घटना वाले दिन बताई थी. इस के अलावा उस ने इस बार एक नई बात बताई कि उस का पति अपने छोटे भाई ऋषिपाल तथा मां के भी हिस्से की 8 बीघा जमीन बेचना चाहता था.

पहले तो वे दोनों इस के लिए राजी थे. लेकिन जब जमीन लिखने की बात आई तो दोनों मुकर गए. इस के बाद शर्मिंदगी के मारे उन्होंने आत्महत्या कर ली. सरस्वती के बयान की तसदीक करने के लिए पुलिस ने ऋषिपाल और उस की मां मोरकली से पूछताछ की तो दोनों ने बताया कि रामस्वरूप ने केवल अपने ही हिस्से की जमीन श्रीपाल को बेची थी. उन के हिस्से की जमीन बेचने की तो कोई चर्चा ही नहीं हुई. इस से पुलिस को यही लगा कि सरस्वती ने जो कुछ बताया, वह सरासर झूठ था. ऋषिपाल ने आरोप लगाया कि रामस्वरूप की हत्या में उस की पत्नी सरस्वती और उस के तीनों भाइयों रामवीर, भगवानदास तथा जानकी प्रसाद का हाथ है. इन सभी के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने की तहरीर उस ने 9 जनवरी, 2015 को थाने में दे दी. इस के बाद पुलिस ने उन चारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

सरस्वती का मायका बरेली जिले के कैंट थाने के पालपुर गांव में था. उस के भाइयों की तलाश में पुलिस अगले दिन ही पालपुर गांव पहुंच गई. रामवीर, भगवानदास तथा जानकी घर पर ही मिल गए. तीनों को हिरासत में ले कर पुलिस टीम थाने लौट आई. तीनों से पूछताछ शुरू की तो तीनों ने खुद को बेगुनाह बताया. उन्होेंने बताया कि रामस्वरूप ने अपनी 8 बीघा जमीन का बैनामा 15 दिसबंर, 2014 को कराया था तो उस दिन वे उस के साथ थे. अगले दिन 16 दिसबंर की शाम को वे अपने घर लौट आए थे. उस समय तक रामस्वरूप बिलकुल ठीक था और सभी से हंसबोल रहा था. इस के बाद रात में उस की मौत कैसे हो गई, उन्हें नहीं पता?

थानाप्रभारी को शक हो गया कि हो न हो, जमीन की बिक्री से मिले रुपयों को पाने के लिए उन लोगों ने रामस्वरूप की हत्या कर दी और रात में ही अपने घर लौट गए हों. इस के बाद सरस्वती ने लोगों को दिखाने के लिए रोनेचिल्लाने का नाटक करना शुरू कर दिया हो. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने तीनों भाइयों से सख्ती से पूछताछ करनी शुरू की. सरस्वती को जब पता चला कि पुलिस उस के भाइयों से सख्ती कर रही है तो वह घबरा गई. अपने भाइयों को पुलिस से बचाने के लिए उस ने थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव को फोन कर के बताया कि वह पति की हत्या के बारे में कुछ अहम बातें बताना चाहती है. सरस्वती की बात सुन क र थानाप्रभारी 11 जनवरी, 2015 की सुबह सरस्वती के घर पहुंच गए.

सरस्वती ने पति की हत्या के बारे में उन्हें जो कुछ बताया उसे सुन कर वह हैरान रह गए. सरस्वती ने बताया कि पति की हत्या उसी ने अपने प्रेमी ओमवीर साहू के साथ मिल कर की थी. उस के तीनों भाई बेकुसूर हैं, उन्हें हत्या के बारे में कुछ पता नहीं है. वे उस दिन शाम को ही अपने गांव पालपुर लौट गए थे. इस तरह अचानक केस खुलने पर थानाप्रभारी ने राहत की सांस ली. उन्होंने उसी समय सरस्वती को गिरफ्तार कर थाने ले आए. उस के तीनों भाई बेकुसूर थे, इसलिए उन्हें रिहा कर दिया. एक पुलिस टीम उस के प्रेमी ओमवीर को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर भेजी गई, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि ओमवीर गांव के बाहर मोड पर अपने कुछ साथियों के साथ मौजूद है. यह सूचना मिलते ही टीम उसी जगह पहुंच गई. मुखबिर की सूचना सही निकली. ओमवीर अपने दोस्तों के साथ गपशप करता मिल गया.

पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. ओमवीर को इस बात की बिलकुल भी जानकारी नहीं थी कि उस की प्रेमिका सरस्वती पुलिस गिरफ्त में है और वह अपना गुनाह कुबूल कर चुकी है. इसलिए जब उस से रामस्वरूप की हत्या के बारे में पूछा गया तो वह खुद को बेगुनाह बताता रहा. लेकिन जब थाने में उस का सामना सरस्वती से कराया गया तो उस का चेहरा सफेद पड़ गया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सरस्वती और ओमवीर से की गई पूछताछ में रामस्वरूप की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो दास्तान उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के कैंट थाने का एक गांव है पालपुर. पतिराम इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सोनादेवी के अलावा 3 बेटे और एक बेटी सरस्वती थी. वह किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. घर की आर्थिक तंगी की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा भी नहीं सका. वक्त गुजरने के साथसाथ बच्चे भी बड़े होते गए. सरस्वती 3 भाइयों की एकलौती बहन थी. इसलिए भाई उसे पलकों पर बिठा कर रखते थे. सरस्वती जवान हुई तो गांव के ही कुछ लड़के उस पर डोरे डालने लगे. वे उस के घर के आसपास चक्कर काटने लगे. लड़कों को देख कर सोनादेवी बेटी पर नजर रखने लगी. पतिराम तो सारा दिन घर से बाहर रहता था.

उसे इन सब बातों की जानकारी नहीं थी. एक दिन सोनादेवी ने पति को इस की जानकारी दी. पतिराम गरीब था, इसलिए उस ने किसी से पंगा लेने के बजाय बेटी के हाथ पीले करने की सोची. वह उस के लिए लड़का देखने लगा. उस के एक रिश्तेदार ने उसे बरेली के ही सीबीगंज थानाक्षेत्र के मथुरापुर गांव के एक युवक ओमप्रकाश के बारे में बताया. पतिराम ने ओमप्रकाश के बारे में जांच की तो पता चला कि वह मेहनती है. उस का घर परिवार भी ठीक था. वह बेटी के लिए सही लगा तो उस ने उस के साथ सरस्वती की शादी कर दी. यह 10 साल पहले की बात है.

शादी के बाद कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक था, परंतु बाद में उन दोनों के बीच छोटीछोटी बातों को ले कर झगड़े होने शुरू हो गए. अभी उन की शादी को एक साल पूरा भी नहीं हुआ था कि सरस्वती को लगा कि अब उस का ओमप्रकाश के साथ गुजारा होना मुश्किल है. इसी दौरान उस की मुलाकात बदायूं जिले के मोहल्ला टिकटगंज निवासी पप्पू से हुई. पप्पू बनठन कर रहने वाला युवक था. दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ गई कि सरस्वती पति ओमप्रकाश को छोड़ कर पप्पू के साथ रहने लगी. करीब एक साल बाद सरस्वती ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम स्वाति रखा गया. सरस्वती पति को छोड़ कर पप्पू के पास इसलिए आई थी कि उस के साथ उस की जिंदगी हंसीखुशी से कटेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. एक दिन जब वह सो कर उठी तो पप्पू अपने बिस्तर पर मृत मिला. पप्पू की मौत के बाद सरस्वती की जिंदगी में जैसे अंधेरा छा गया था.

पप्पू की मौत के 1-2 महीने बाद ही पप्पू के घर वालों ने सरस्वती के ऊपर आरोप लगाने शुरू कर दिए कि पप्पू की मौत स्वाभाविक नहीं हुई, बल्कि उस ने खाने में जहर दे कर उस की हत्या की थी. सरस्वती इस का लाख विरोध करती रही. उस की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. मामला पुलिस तक तो नहीं गया, लेकिन घर वालों ने उस का ससुराल में रहना दूभर कर दिया. रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर एक दिन वह बेटी को ले कर अपने मायके आ गई. बरेली के ही भमोरा थानाक्षेत्र के रामपुर बुजुर्ग गांव में रछपाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मोरकली के अलावा 2 बेटे थे, रामस्वरूप और ऋषिपाल. रछपाल की गांव में खेती की काफी जमीन थी, कुल मिला कर वह साधनसंपन्न थे. दोनों बच्चे बड़े हुए तो सब को उन की शादी की चिंता हुई.

चूंकि रामस्वरूप बड़ा था, इसलिए उस की शादी के रिश्ते आने शुरू हुए तो रामस्वरूप लड़की में सौ कमियां निकाल कर शादी करने से इनकार कर देता. गांव में अपनी हैसियत को देखते हुए रछपाल को उम्मीद थी कि बेटे के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता अवश्य आएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब रामस्वरूप हर रिश्ते में कोई न कोई कमी निकालने लगा तो उस के लिए रिश्ते आने बंद हो गए. समय के साथ उस की उम्र भी बढ़ती गई. अब उसे कोई अपनी लड़की नहीं देना चाहता था. इस से उस के घर वाले भी परेशान रहने लगे कि इस की शादी कैसे हो. यही हाल रहा तो यह कुंवारा ही रह जाएगा. ऐसी हालत में उन्होंने तय कर लिया कि किसी भी हालत में उस का घर बसाने की कोशिश करेंगे. अब वह तलाकशुदा या गरीब परिवार की महिला तक से उस का घर बसाने की बात करने लगे.

इसी बीच एक दिन किसी परिचित ने उन्हें पालपुर की सरस्वती के बारे में बता कर कहा कि वह एक बेटी की मां है और मायके में रह रही है. अगर वह कहें तो उस से शादी की बात चलाई जाए. अंधा क्या चाहे दो आंखें, रछपाल ने तुरंत हामी भर दी. इस बार रामस्वरूप कुछ नहीं बोला. सरस्वती के भाई भी बहन की शादी रामस्वरूप से करने के लिए तैयार हो गए. एक सादे समारोह में सरस्वती और रामस्वरूप की शादी हो गई. सरस्वती की यह तीसरी ससुराल थी. उस ने अपने व्यवहार से सभी लोगों का दिल जीत लिया. रामस्वरूप तो सरस्वती का दीवाना था. वह उस की बातों पर आंखें मूंद कर विश्वास करने लगा. वह भी बहुत खुश थी. रामस्वरूप से सरस्वती को 2 बच्चे हुए. बेटा गौरव तथा बेटी गुडि़या.

समय के साथ सरस्वती का घर में दखल बढ़ता गया. यह देख कर उस की सास मोरकली को आभास होने लगा कि यदि बहू को नहीं रोका गया तो जल्दी ही पूरे घर में सिर्फ उस का ही सिक्का चलने लगेगा. इसलिए मोरकली ने उसे बातबात पर टोकना शुरू कर दिया. सरस्वती को सास की दखलंदाजी पसंद नहीं थी. लिहाजा उन दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. घर में रोजरोज ही कलह होने लगी. रामस्वरूप भी मां के बजाय पत्नी का पक्ष लेता था. रछपाल और मोरकली ने देखा कि उन का बेटा ही बीवी का गुलाम बन कर अच्छेबुरे को नहीं पहचान रहा तो उन्होंने बेटाबहू को अलग कर दिया. फिर वह गांव में ही दूसरे घर में रहने लगा. अलग होने पर सरस्वती बहुत खुश हुई. क्योंकि अब उसे ज्यादा जनों का काम नहीं करना पड़ता था.

रामस्वरूप के पड़ोस में हरिबाबू का परिवार रहता था. वह आबकारी विभाग में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी कमलेश तथा 6 बच्चे थे. इन में चार लड़के और 2 लड़कियां थीं. वह साधनसंपन्न थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए. वह उन की शादियां करते गए. शादी के लिए उन का सब से छोटा बेटा ओमवीर ही बचा था.पड़ोसी होने की वजह से रामस्वरूप और हरिबाबू के परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना बना रहता था. ओमवीर सरस्वती को भाभी कहता था. वह उस से उम्र मे कई साल छोटा था. 28 साल की सरस्वती अपनी उम्र से छोटे ओमवीर से अकसर हंसीमजाक करती रहती थी. ओमवीर को भी यह सब अच्छा लगता था. वह भी मौका ताड़ कर सरस्वती के दिल की थाह लेने लगा. वह उस के मजाक करने का मतलब समझ चुका था. इसलिए उस के मन में भी चाहत पैदा हो गई. वह भी उसी के अंदाज में उस से मजाक करने लगा.

रामस्वरूप और ओमवीर की उम्र में इतना अंतर था कि रामस्वरूप ने उसे गोद खिलाया था. इसलिए सरस्वती का झुकाव ओमवीर की तरफ हो गया. ओमवीर जब भी उस के घर आता सरस्वती के चेहरे की रौनक बढ़ जाती. एक दिन जब रामस्वरूप घर में नहीं था, तभी ओमवीर ‘भाभीभाभी…’ पुकारता हुआ उस के घर में आया तो देखा कि सरस्वती आईने के सामने खड़ी शृंगार कर रही थी. ओमवीर दबे पांव उस के पीछे खड़ा हो गया. लेकिन सरस्वती ने उसे आईने में देख लिया था. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आओ ओमवीर इधर बैठो.’’ सरस्वती ने कुरसी की तरफ इशारा किया.

वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. ओमवीर सरस्वती के पास कुरसी पर बैठ गया. उस समय उस के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. सरस्वती ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘‘ओमवीर, मैं तुम्हें कैसी लगती हूं?’’

‘‘भाभी, तुम कितनी खुबसूरत हो, यह बात मेरे दिल से पूछो. तभी तो मैं तुम्हारी खुबसूरती का दीदार करने यहां चला आता हूं.’’ अपनी तारीफ सुनते ही सरस्वती ओमवीर के करीब आ गई. वह उस के गले में बांहें डालते हुए बोली, ‘‘सच, क्या मैं इतनी सुदंर हूं?’’

उस के नजदीक आते ही ओमवीर की धड़कनें बढ़ गईं. उस का शरीर जैसे तपने लगा. अब वह अपनी भाभी के इरादे समझ चुका था. वह भी अपनी कुरसी से खड़ा हो गया. उस ने भी झट से उस के गाल पर चुम्मा लेते हुए कहा, ‘‘सचमुच तुम बहुत खुबसूरत हो,’’

सरस्वती भी खिलाड़ी थी. उस ने मौके का फायदा उठाना मुनासिब समझा और अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया. फिर क्या था, थोड़ी ही देर में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. सरस्वती को ढलती उम्र के पति की जगह ओमवीर का साथ अच्छा लगा. इस के बाद तो पति के जाते ही सरस्वती उसे फोन कर के उसे अपने घर में बुला लेती. जब पति की गैरमौजूदगी में ओमवीर के सरस्वती के घर कुछ ज्यादा चक्कर लगने शुरू हो गए तो पड़ोसियों को शक हो गया. यह बात रामस्वरूप के कानों में भी पहुंची, मगर पत्नी पर अंधविश्वास की वजह से उस ने लोगों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया.

सरस्वती के चक्कर में ओमवीर अपने कामधंधे पर भी ध्यान नहीं दे रहा था. इस के अलावा वह रामस्वरूप के घर के काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता था. ओमवीर के घर वालों को यह सब अच्छा नहीं लगता था, इसलिए वे उसे रामस्वरूप के घर जाने को मना करते थे, लेकिन वह घर वालों की बातों पर ध्यान न दे कर उस के घर चला जाता था. रामस्वरूप की रेलवे लाइन के नजदीक 8 बीघा जमीन थी. वह ज्यादा उपजाऊ नहीं थी. दिसंबर, 2014 में एक दिन सरस्वती ने पति से उस जमीन को बेच कर कोई अच्छा सा ध्ांधा करने को कहा. पहले तो रामस्वरूप को बीवी की बात अटपटी लगी. मगर जब सरस्वती ने जिद की तो उसे बीवी की बात माननी पड़ी. इस बारे में उस ने अपने तीनों सालों से बात की तो उन्होंने भी अपनी बहन की बात में हां मिला दिया. पत्नी और ससुराल वालों की बातों में आ कर रामस्वरूप ने अपनी 8 बीघा जमीन बेचने का फैसला कर लिया.

रामस्वरूप ने भी सोचा कि जमीन बेच कर वह शहर में कोई अच्छा धंधा कर लेगा. उस ने यह बात पत्नी को बताई कि यहां रह कर धंधा करने से कोई फायदा नहीं है. अगर शहर में जा कर कोई धंधा करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा. शहर में रहने से बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से हो जाएगी. पति के मुंह से शहर जाने की बात सुन कर सरस्वती को पांव तले से धरती खिसकती हुई दिखाई दी. वह किसी भी हालत में ओमवीर से दूर नहीं जाना चाहती थी. इस के लिए पहले तो उस ने जमीन बेचने के बाद भी पति को गांव में रहने के लिए मनाना शुरू किया, मगर जब वह नहीं माना तो वह इस का कोई समाधान निकालने में लग गई.

इसी बीच रामस्वरूप की गैरमौजूदगी में जब ओमवीर उस से मिलने पहुंचा तो सरस्वती ने उस से कहा, ‘‘रामस्वरूप जमीन बेच कर शहर में रहने की बातें कह रहा है. यदि ऐसा हो गया तो हम दोनों एकदूसरे से दूर हो जाएंगे.’’

‘‘बताओ, इस क ा उपाय क्या है?’’ ओमवीर गंभीर हो कर बोला.

‘‘उपाय यह है कि जमीन बेचने के बाद उसे ठिकाने लगा दिया जाए. हमारे पास पैसे भी आ जाएंगें और हमारे बीच का रोड़ा भी हट जाएगा.’’ सरस्वती ने अपने मन की बात कही.

ओमवीर भी सरस्वती से दूर नहीं होना चाहता था, इसलिए वह सरस्वती के साथ मिल कर रामस्वरूप की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. 15 दिसंबर, 2014 को रामस्वरूप की जमीन का बैनामा होना तय हुआ था, इसलिए सरस्वती के तीनों भाई जानकीप्रसाद, रामवीर और भगवानदास पालपुर से रामपुर बुजुर्ग आ गए. जमीन का बैनामा होने के बाद 16 दिसंबर की शाम को तीनों भाई गांव लौट गए. जमीन बेचने से जो रकम मिली थी, वह रामस्वरूप ने सरस्वती को रखने के लिए दे दी थी.

16 दिसंबर की रात को खाना खाने के बाद रामस्वरूप ने थोड़ी देर बच्चों से बातें की. इस के बाद बिस्तर पर जा कर सो गया. योजना के मुताबिक आधी रात होने पर ओमवीर अपने घर की मुंडेर फांद कर उस के घर में आ गया. उस समय सरस्वती जाग रही थी. वह भी बेचैनी से उसी के आने का इंतजार कर रही थी. ओमवीर के आने के बाद उस ने पति को हिलाडुला कर देखा. वह गहरी नींद में था. पति को गहरी नींद में देख कर सरस्वती ने ओमवीर को आंखों से इशारा किया. ओमवीर अपने साथ प्लास्टिक की रस्सी का टुकड़ा लाया था. प्रेमिका का इशारा मिलते ही उस ने प्लास्टिक की रस्सी रामस्वरूप के गले में लपेटी और पूरी ताकत से खींचने लगा. कुछ देर छटपटाने के बाद रामस्वरूप ने दम तोड़ दिया.

रामस्वरूप की हत्या करने के बाद ओमवीर और सरस्वती ने शारीरिक संबंध बनाए. प्रेमी को खुश करने के बाद सरस्वती ने जमीन बेचने से मिली रकम में से कुछ ओमवीर को दे दी. इस हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए सरस्वती ने सुबह होते ही रोनापीटना शुरू कर दिया और उस ने पति के आत्महत्या करने की कहानी गढ़ दी. लेकिन उस का गुनाह छिप न सका. थानाप्रभारी राकेश सिंह ने सरस्वती और ओमवीर को हत्या के केस में गिरफ्तार कर सक्षम न्यायालय में पेश किया. वहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Jawaharlal Nehru: फिर आया जिन्न बाहर नेहरू – बोस के रिश्तों का

लेखक – एम.जेड. बेग, Jawaharlal Nehru: देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा महान देशभक्त सुभाषचंद्र बोस के घर वालों की आईबी से जांच कराने के मामले ने राजनैतिक रूप लेना शुरू कर दिया है. जब बात उठी है तो नेताजी के रहस्यमय तरीके से गायब होने की भी इस बार जांच हो ही जानी चाहिए. पिछले दिनों एक पत्रिका में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिस में बताया गया था कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजाद हिंद फौज के संस्थापक और महान देशभक्त सुभाषचंद्र बोस के परिवार की निगरानी भारतीय खुफिया जांच एजेंसी आईबी से कराई थी और यह निगरानी नेहरू की मृत्यु के 4 साल बाद तक होती रही. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही भारतीय राजनीति में एक उबाल सा आ गया.

रिपोर्ट के अनुसार सन 1948 से ले कर 1968 तक आईबी के लोग नेताजी सुभाषचंद्र बोस  के परिवार वालों की निगरानी करते रहे. वे इस बात की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजते थे कि नेताजी के रिश्तेदारों से मिलने कौन आया, कितनी देर रुका. उन के पते पर जो भी पत्र आता था, उसे पहले आईबी वाले खोल कर पढ़ते थे, उस के बाद ही वह पत्र संबंधित व्यक्ति तक पहुंचता था. नेताजी जैसे महान देशभक्त के परिवार के लोगों की निगरानी भारत सरकार द्वारा करवाना अवश्य ही अचरज भरी बात थी. वैसे तो सभी जानते हैं कि सुभाषचंद्र बोस और नेहरू व गांधी के बीच बहुत गहरे मतभेद थे. इस निगरानी प्रकरण को समझने के लिए हमें स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के घटनाक्रम को देखना होगा. क्योंकि इस सारे प्रकरण की असली जड़ें तो वहीं हैं.

23 जनवरी, 1897 को कटक के एक मशहूर वकील जानकीनाथ बोस के घर में पैदा हुए बच्चे को ही लोग आज सुभाषचंद्र बोस के नाम से जानते हैं. 14 भाईबहनों में नौवें नंबर के सुभाषचंद्र बोस शुरू से ही होनहार थे. हर इम्तहान में वह कामयाबी की एक नई दास्तान लिखते गए. यहां तक कि सन 1920 में भारत की सिविल सर्विस के लिए दिए गए इम्तहान में भी वह मैरिट में चौथे नंबर पर रहे, जोकि एक भारतीय के लिए बहुत बड़ी बात थी. लेकिन जलियांवाला बाग की घटना से व्यथित हो कर उन्होंने सिविल सर्विस छोड़ दी और 1921 में भारत लौट आए. भारत आ कर वह गांधीजी से प्रभावित हो कर कांग्रेस में शामिल हो गए. लेकिन जल्द ही उन के गांधीजी से वैचारिक मतभेद हो गए.

असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण जिस समय सुभाषचंद्र बोस जेल में थे, उस समय गांधीजी ने लार्ड इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिस की एक शर्त थी कि असहयोग आंदोलन को वापस लेना होगा. यह बात सुभाषचंद्र बोस को नागवार लगी. यहीं से गांधीजी और सुभाषचंद्र बोस के बीच मतभेद उभर कर सामने आने लगे. सुभाषचंद्र बोस पूर्ण स्वतंत्रता से पहले असहयोग आंदोलन वापस नहीं लेना चाहते थे और ऐसी स्थिति में तो बिलकुल ही नहीं, जबकि उन्हीं दिनों भगत सिंह और उन के साथियों को फांसी दी गई थी. लार्ड इरविन और गांधीजी के समझौते के अनुसार, सन 1937 में हुए प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में कांग्रेस 7 राज्यों में विजयी हुई. सन 1938 के हरीपुरा में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया. कांग्रेस का अध्यक्ष बनते ही सुभाषचंद्र बोस ने भारत के भविष्य के लिए योजनाएं बनानी शुरू कर दीं.

सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पूर्ण स्वतंत्रता का नारा दिया. वह चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार को 6 महीने का इस बात का अल्टीमेटम दिया जाए कि या तो वह भारत को स्वतंत्र कर दे अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहे. यहीं से गांधी व नेहरू और नेताजी के बीच मतभेद हो गए. इस के विपरीत सुभाषचंद्र बोस की ख्याति और विश्वसनीयता भारत के जनमानस में बढ़ती गई. यह वह समय था, जब यूरोप में अशांति बढ़ती जा रही थी और आने वाले समय में एक और विश्वयुद्ध की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं. सुभाषचंद्र बोस की दूरगामी दृष्टि यह देख रही थी कि निकट भविष्य में युद्ध होगा और अंगरेज भारतीयों को भी इस युद्ध की भट्ठी में झोंक देंगे. इसलिए वह चाहते थे कि भारत जल्द से जल्द पूर्ण स्वतंत्र हो जाए जिस से होने वाले युद्ध की विभीषिका से भारतीय सुरक्षित रह सकें.

जबकि गांधीजी और नेहरू की सोच यह थी कि जिस तरह ब्रिटिश हुकूमत धीरेधीरे भारतीयों को अधिकार दे रही है, इसी तरह चलती रहनी चाहिए. गांधीजी ने नई साजिश रचनी शुरू कर दी. सुभाषचंद्र बोस का राजनीतिक प्रभाव कम करने के लिए 1939 में जब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव का समय आया तो गांधीजी ने चाहा कि सुभाषचंद्र बोस चुनाव में भाग न लें. वह डा. पट्टाभि को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के पक्षधर थे. मगर सुभाषचंद्र बोस चुनाव में खड़े हुए और गांधीजी के भरपूर विरोध के बावजूद भी भारी मतों से दोबारा कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. डा. पट्टाभि सीतारमय्या की हार को गांधीजी ने अपनी हार माना, क्योंकि उन्हें जिताने में उन की प्रतिष्ठा दांव पर जो लगी थी.

सुभाषचंद्र बोस दोबारा अध्यक्ष चुन तो लिए गए, लेकिन बाकी पूरी कार्यकारिणी पर गांधीजी का प्रभाव था. इसलिए कांग्रेस कार्यकारिणी ने सुभाषचंद्र बोस की राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए. एक दिन तो ऐसा हुआ कि पूरी कार्यकारिणी ने त्यागपत्र दे दिया. सुभाषचंद्र बोस के लिए नई कार्यकारिणी का चुनाव कराना आसान नहीं था. हालात इतने बिगड़ गए कि उन के लिए काम तक करना मुश्किल हो गया. आखिर उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे कर कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया. इस के बाद उन्होंने अपना एक अलग दल फारवर्ड ब्लौक का गठन किया. संगठन को मजबूत करने के लिए उन्होंने भारतीयों को इकट्ठा करना शुरू किया, ताकि एक बड़े संग्राम की शुरुआत की जा सके. इस से ब्रिटिश हुकूमत हरकत में आ गई. उन की गतिविधियों को देखते हुए हुकूमत ने उन्हें जेल में बंद कर दिया. जेल में उन का स्वास्थ्य खराब हो गया तो उन्हें उन के घर में ही नजरबंद कर दिया गया.

सन 1941 में सुभाषचंद्र बोस योजना बना कर कलकत्ता के अपने घर से गायब हो गए और अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंच गए. वहां वह उस समय के जरमन शासक एडोल्फ हिटलर से मिले. उस समय विश्वयुद्ध चल रहा था और सिंगापुर में रासबिहारी बोस ने भारत की आजादी के लिए एक सेना का गठन किया हुआ था, जिस को आजाद हिंद फौज के नाम से जाना जाता था. तब सन 1943 में सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से सिंगापुर आ गए और आजाद हिंद फौज की कमान उन्होंने संभाल ली. आजाद हिंद फौज को ले कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारत की ओर पेशकदमी शुरू कर दी. उन्होंने इसी फौज की बदौलत अंडमान व निकोबार द्वीप समूह को अंगरेजी शासन से मुक्ति दिलाई. जनवरी, 1944 में आजाद हिंद फौज का मुख्यालय रंगून में स्थापित किया और 18 मार्च, 1944 को बर्मा की सीमा पार करते हुए आजाद हिंद फौज भारत पहुंच गई.

कहा जाता है कि विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश हुकूमत में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था. यानी धरती के इतने बड़े भूभाग पर अंगरेजों का शासन था कि कहीं न कहीं दिन होता ही था. इतना बड़ा साम्राज्य होने के कारण अंगरेज एक तरह से आलसी हो चुके थे. यही वजह थी कि जब जापानियों ने सिंगापुर पर आक्रमण किया तो अंगरेज वहां से बिना लड़े ही भाग खड़े हुए. बाद में भारतीय लोगों से सुसज्जित सेना को लड़ने के लिए सिंगापुर भेजा. भारतीय सेना ने जापानी सेना से लोहा लिया. नेताजी का अंदेशा सही साबित हुआ, क्योंकि उन का यही मानना था कि जब भी युद्ध होगा, अंगरेज स्वयं न लड़ कर भारतीयों को ही युद्ध के मोरचे पर भेजेंगे.

सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस से परिस्थितिवश विदा होने से एक बात साफ हो गई थी कि कांग्रेस में वही होगा, जो गांधीजी और नेहरू चाहेंगे. और शायद यही सोच आगे चल कर भारत के विभाजन की वजह बनी. क्योंकि सुभाषचंद्र बोस की कांग्रेस से विदाई और अंगरेज सरकार द्वारा उन्हें नजरबंद करने के बाद ही मुसलिम लीग और जिन्ना का उदय हुआ. सुभाषचंद्र बोस चाहते थे कि भारत में कुछ ऐसा ही हो, जैसा तुर्की के अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने किया था. खिलाफत खत्म कर के वह देश में केवल एक भाषा चलाना चाहते थे, जिस से पूरा देश एक सूत्र में बंध जाए. देश में सारे धर्मों को बराबर सम्मान दिया जाना चाहिए और किसी को कोई आरक्षण नहीं, केवल योग्यता ही मापदंड हो. जबकि गांधीजी ने खिलाफत खत्म करने का विरोध किया.

सुभाषचंद्र बोस ने जब सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की कमान संभाली तो उस समय जापानी आगे बढ़ते ही जा रहे थे और अंगरेज पीछे भागते जा रहे थे. अंगरेजों के भागने का सिलसिला उस वक्त थमा, जब अमेरिका ने 6 और 9 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए. इस के कुछ दिनों बाद ही अंगरेज सरकार ने घोषणा की कि 18 अगस्त, 1945 को ताइपे में जिस विमान में आग लगी थी, उस में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी थे. यानी विमान में आग लगने से नेताजी की मृत्यु हो गई. इसी के साथ शुरू हो गया यह विवाद कि क्या सचमुच उस समय सुभाषचंद्र बोस उस विमान में मौजूद थे भी या नहीं?

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया, मगर इस बात पर संशय बरकरार रहा कि नेताजी की मृत्यु हो चुकी है या वह अभी जीवित हैं. नेताजी का रहस्य जानने के लिए भारत सरकार ने कई बार आयोग बिठाए, मगर उन सब का नतीजा कुछ खास नहीं निकला. लोग दावे करते रहे कि नेताजी ताइपे विमान हादसे में नहीं मरे थे. कुछ लोग कहते थे कि वह जापान की हार के बाद मंचूरिया होते हुए रूस चले गए थे, जहां स्टालिन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. चूंकि ब्रिटिश शासन और नेहरू व स्टालिन तीनों ही नहीं चाहते थे कि सुभाषचंद्र बोस भारत आएं, जिस से कि इन तीनों के हित प्रभावी हों. क्योंकि वे जानते थे कि नेताजी की भारत में उपस्थिति एक राजनीतिक हलचल पैदा कर देगी. दूसरी तरफ कुछ लोगों का दावा था कि सुभाषचंद्र बोस फैजाबाद के एक आश्रम में गुमनामी बाबा की हैसियत से रह रहे हैं.

सच्चाई कुछ भी हो, मगर यह बात तय है कि आधिकारिक तौर पर 18 अगस्त, 1945 के बाद से उन का कोई पता नहीं है. इस सच्चाई को कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय राजनीति में 1940-50 के दशक में यदि नेहरू को कोई चुनौती दे सकता था तो वह सुभाषचंद्र बोस ही थे. हाल ही में सामने आए दस्तावेजों से भी यह बात साबित होती है कि जवाहरलाल नेहरू भी शायद यह नहीं मानते थे कि वास्तव में सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हो चुकी है. उन्हें डर था कि सुभाषचंद्र बोस कभी भी प्रकट हो सकते हैं. उन के सामने आने से नेहरू के लिए बहुत ही ज्यादा परेशानियां खड़ी हो जातीं.

नेहरू को सत्ता संभालने की जल्दी थी, इसलिए उन्होंने अपने हाथ में सत्ता लेते समय अंगरेज शासन से कई समझौते किए थे. उन में से एक यह भी था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अगर आजाद हिंद फौज का कोई ऐसा व्यक्ति भारत सरकार के हाथ लगता है, जिस पर ब्रिटिश हुकूमत ने केस कर रखा है तो उस व्यक्ति को ब्रिटिश सरकार को सौंपना होगा. ऐसे व्यक्तियों में सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. आज भारत को स्वतंत्र हुए 7 दशक होने को हैं. अब शायद इस बात का महत्त्व नहीं है कि सुभाषचंद्र बोस की विमान हादसे में मृत्यु हुई या नहीं? मगर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के रवैए से यह सवाल उठ खड़े होते हैं कि क्या वास्तव में भारत को स्वतंत्र कराने में कांग्रेस का हाथ था या इस के पीछे और कोई दूसरे कारण थे, जिस की वजह से अंगरेजों ने भारत को बहुत जल्दी में स्वतंत्रता प्रदान कर दी.

अब भारत सरकार को चाहिए कि नेताजी से संबंधित सारी जानकारी सार्वजनिक करे. क्योंकि भारतीयों का यह अधिकार है कि वह सच्चाई और सुभाषचंद्र बोस की महिमा को जाने.  एक बार इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटली, जोकि भारत की स्वतंत्रता के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे, से भारत की आजादी के बाद जब बंगाल के राज्यपाल चटर्जी ने उन से सवाल किया था कि भारत को आजादी दिलाने में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन की क्या भूमिका थी तो अटली का जवाब था कि बहुत ही कम. अर्थात कुछ और दूसरे कारण थे, जिन की वजह से अंगरेजों को भारत छोड़ना पड़ा. नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस के परिवार की निगरानी कराई या नहीं, मगर अब समय आ गया है कि सारी वास्तविकता लोगों के सामने लाई जाए.

 

Firozabad Crime: प्यार की राह का रोड़ा – पति को बनाया पराया

Firozabad Crime: घटना उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना टूंडला के गांव नगला राधेलाल की है. 30 अक्तूबर की सुबह जब हरभेजी सो कर उठी तो बराबर के कमरे में उन्हें कोई हलचल नहीं दिखी. उस कमरे में उन का बेटा गब्बर बहू विवेक कुमारी उर्फ लालपरी तथा पोते अनुज के साथ सोया था. गब्बर के 2 बच्चे हरभेजी के साथ ही सोए थे. हरभेजी जब गब्बर के कमरे में गईं तो अंदर का दृश्य देखते ही उन के मुंह से चीख निकल गई.

उन का 40 वर्षीय बेटा गब्बर पंखे से बंधे फंदे पर लटका हुआ था, उस के पैर कमरे के फर्श को छू रहे थे. गब्बर के चेहरे से खून टपक रहा था. मां हरभेजी ने बहू लालपरी को आवाज लगाई, लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. न ही वहां उस का बेटा अनुज था. बहू की तलाश की गई पर उस का कोई पता नहीं चला. इस घटना से परिवार में कोहराम मच गया. मां के रोने की आवाज सुन कर उन के और बेटे भी वहां आ गए. कुछ ही देर में मोहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. उसी दौरान किसी ने आत्महत्या करने की सूचना पुलिस को फोन द्वारा दे दी.

सूचना पर थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय फोर्स सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने शव के साथ मकान का भी निरीक्षण किया. सूचना मिलने पर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां आ गए. निरीक्षण के उपरांत पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि गब्बर ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उस की पीटपीट कर हत्या करने के बाद शव को फंदे पर लटकाया गया है. गब्बर के साथ कमरे में उस की पत्नी ही सोई थी, जो वहां से फरार थी, इसलिए पूरा शक पत्नी पर ही था. अब सवाल यह था कि शव को अकेले पत्नी पंखे पर नहीं लटका सकती. इस काम में किसी ने उस की मदद जरूर की होगी.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो वहां एक ऐसी मैक्सी मिली, जिस पर खून लगा हुआ था. पता चला कि वह मैक्सी मृतक की पत्नी लालपरी की थी. लालपरी के कुछ कपड़े और अन्य सामान कमरे से गायब थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि वह पति की हत्या के बाद अपना सामान व अपने साथ सोए बच्चे को ले कर फरार हो गई है. पुलिस ने घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि रात को पतिपत्नी में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था. झगड़े के समय लालपरी का प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा भी वहां मौजूद था. स्वामी टूंडला थाने के गांव बन्ना का रहने वाला था. उस समय परिवार के लोगों ने दोनों को समझाबुझा कर झगड़ा शांत करा दिया था. इस के बाद वे अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे.

मृतक के भाई योगेश ने पुलिस को बताया कि शादी के पहले से ही लालपरी के स्वामी से अवैध संबंध थे. मौके की जांच करने के बाद पुलिस ने गब्बर की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फिरोजाबाद भेज दी. पुलिस ने मृतक के भाई योगेश की ओर से विवेक कुमारी उर्फ लालपरी व उस के प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस नामजद आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस ने कई संभावित स्थानों पर दबिश भी दी, लेकिन उन का कोई पता नहीं लगा. तब पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

लालपरी की शादी गब्बर से हो जरूर गई थी लेकिन वह उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. वह अपने घर वालों की मरजी का विरोध भी नहीं कर सकी थी. यानी घर वालों की वजह से उस ने गब्बर से शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस का प्रेमी बसा था. यही वजह थी कि वह प्रेमी को शादी के बाद भी भुला न सकी. प्रेमी स्वामी उस के पति की गैरमौजूदगी में उस के घर आनेजाने लगा. जब पति काम पर चला जाता तो मौका देख कर लालपरी प्रेमी को फोन कर बुला लेती थी. इस के बाद दोनों ऐश करते थे लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी तो नहीं रहतीं.

लालपरी व स्वामी के संबंधों की जानकारी मोहल्ले के साथ ससुराल के लोगों को भी हो गई. इस की भनक जब गब्बर को लगी तो उस ने कई बार पत्नी को समझाया, लेकिन लालपरी की समझ में कुछ नहीं आया. इस बात को ले कर दोनों में कई बार झगड़ा भी हुआ, पर उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना जारी रखा. घटना के 3 सप्ताह बाद भी लालपरी और उस के प्रेमी स्वामी के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिली थी. 21 नवंबर, 2018 को पुलिस को एक जरूरी सूचना मिली कि लालपरी और उस का प्रेमी इस समय टूंडला से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित एफएच मैडिकल कालेज में मौजूद हैं. थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने एसआई नेत्रपाल शर्मा के नेतृत्व में तुरंत एक पुलिस टीम वहां भेज दी.

पुलिस को अस्पताल में स्वामी घायलावस्था में उपचार कराते मिला, जबकि उस की प्रेमिका लालपरी अस्पताल में उस की देखभाल कर रही थी. पता चला कि स्वामी एक सप्ताह पहले सड़क हादसे में घायल हो गया था. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. उस की प्रेमिका उसे गंभीर हालत में उपचार के लिए एफ.एच. मैडिकल कालेज ले कर आई थी. लेकिन उपचार के दौरान दोनों के बीच अस्पताल में ही किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था. झगड़े में वे दोनों गब्बर की हत्या को ले कर एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे.

करीब 3 सप्ताह पहले हुई गब्बर की हत्या की जानकारी मीडिया द्वारा अस्पताल के स्टाफ को मिल चुकी थी. उन की बातों से वहां के स्टाफ को यह शक हो गया कि गब्बर हत्याकांड में ये लोग शामिल हैं. इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी थी. पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को हिरासत में ले लिया. स्वामी और उस की प्रेमिका लालपरी को थाने ले जा कर उन से पूछताछ की गई. हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की खबर पा कर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए. उन के सामने थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने लालपरी और स्वामी से पूछताछ की तो उन्होंने गब्बर की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने गब्बर की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी-

रोजाबाद जिले के गांव नगला राधेलाल के रहने वाले गब्बर की शादी करीब 9 साल पहले विवेक कुमारी उर्फ लालपरी से हुई थी. बाद में वह 3 बच्चों का बाप बन गया. गब्बर के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उस से बमुश्किल परिवार का गुजारा होता था. तब खाली समय में गब्बर राजमिस्त्री का काम कर लेता था. शादी से पहले ही लालपरी के पैर बहक गए थे. बन्ना गांव के रहने वाले स्वामी उर्फ सुम्मा से उस का चक्कर चल रहा था. करीब एक साल पहले की बात है. लालपरी का अपने प्रेमी स्वामी के साथ रंगरेलियां मनाते हुए अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इस से गब्बर और उस के परिवार की बड़ी बदनामी हुई थी.

इस के बाद गब्बर को मोहल्ले के लोगों के ताने सुनने पड़े थे. गब्बर ने पत्नी से कहा कि वह स्वामी से संबंध खत्म कर ले, लेकिन वह इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उलटे पति से ही झगड़ने लगती थी. एक बार वह पति से झगड़ कर बन्ना स्थित कांशीराम कालोनी में जा कर रहने लगी थी. कुछ समय बाद जब लालपरी का गुस्सा शांत हो गया तो वह पति के घर लौट आई. वहां वह कुछ दिनों तक तो ठीक से रही लेकिन बाद में उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना फिर शुरू कर दिया. पति जब उसे टोकता तो उसे उस की बात बुरी लगती थी. एक तरह से उसे पति रास्ते का कांटा नजर आने लगा. उस कांटे से वह हमेशा के लिए निजात पाना चाहती थी, ताकि प्रेमी के साथ चैन से रह सके.

एक दिन उस ने इस सिलसिले में प्रेमी से बात करने के बाद पति को ठिकाने लगाने की तरकीब खोजी. लालपरी ने एक बार पति को मारने के लिए उस के खाने में जहर मिला दिया. जहर का असर होते ही गब्बर सिंह की हालत बिगड़ गई. घर वाले उसे इलाज के लिए तुरंत आगरा ले गए और उसे एक अस्पताल में भरती करा दिया. परिवार वालों को लालपरी पर शक तो था, लेकिन वे यह भी सोच रहे थे कि कहीं खाने में छिपकली तो नहीं गिर गई. बहरहाल, उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को नहीं दी. उन्होंने लालपरी से इस बारे में पूछताछ की तो उस ने कहा कि हो सकता है उस की लापरवाही से खाने में कोई छिपकली वगैरह गिर गई हो. इस के लिए लालपरी ने घर वालों से माफी मांग ली.

अस्पताल से पति के घर वापस आने के बाद लालपरी ने रोरो कर गब्बर से भी माफी मांग ली. यह सब लालपरी का ड्रामा था. सीधेसादे गब्बर ने पत्नी को इस घटना के बाद भी माफ कर दिया और खुद पत्नी की तरफ से बेफिक्र हो गया. लालपरी भले ही अपने मतलब के लिए पति से माफी मांग लेती थी, लेकिन हकीकत यह थी कि वह दबंग थी. सीधेसादे गब्बर पर वह अकसर हावी रहती थी. स्वामी से उस के संबंधों को ले कर पति जब उस पर नाराज होता तो वह उलटे उस की शिकायत थाने में कर आती थी. कई बार वह पति व ससुरालियों के खिलाफ मारपीट की थाने में शिकायत दर्ज करा चुकी थी. इस के चलते पति व ससुराल वाले उस का कोई विरोध नहीं कर पाते थे.

समाज को दिखाने के लिए उस ने करवाचौथ का व्रत भी रखा था. लेकिन वह अब पति से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी. इस बारे में उस ने अपने प्रेमी स्वामी के साथ एक अंतिम योजना तैयार कर ली थी. 29 अक्तूबर, 2018 को स्वामी लालपरी के घर आया. गब्बर ने स्वामी से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन पत्नी से झगड़ने लगा. स्वामी और घर वालों ने दोनों को समझा कर शांत कराया. उसी समय लालपरी ने स्वामी से कह दिया था कि इस कांटे को आज रात ही निकाल देना है. प्रेमिका की बात सुन कर स्वामी वहां से चला गया.

उस रात लालपरी अपने 6 साल के बेटे अनुज के साथ पति के कमरे में ही सोई थी. उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं लगाई. जब गब्बर गहरी नींद में सो गया तो लालपरी ने फोन कर के प्रेमी को बुला लिया. दोनों ने मिल कर सोते हुए गब्बर को दबोच लिया और मारपीट की, फिर गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए दोनों ने उस की लाश पंखे पर लटका दी. उस ने अपने प्रेम संबंधों की राह में रोड़ा बने पति को हटा दिया. पुलिस ने स्वामी उर्फ सुम्मा और लालपरी से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया.

लालपरी ने प्यार की खातिर अपने घर को ही नहीं, अपनी मांग के सिंदूर को भी उजाड़ लिया. बच्चों के सिर पर भी मांबाप का साया नहीं रहा. बिलखते हुए बच्चों को देख कर लोग लालपरी को कोस रहे थे कि प्रेमी के साथ जाना था तो ऐसे ही चली जाती, पति को क्यों मार डाला. Firozabad Crime.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: अपमान और नफरत की साजिश

Crime Stories: पहली मई, 2019 की बात है. दिन के करीब 12 बजे का समय था, जब महाराष्ट्र के अहमदनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर थाना पारनेर क्षेत्र के गांव निधोज में उस समय अफरातफरी मच गई, जब गांव के एक घर में अचानक आग के धुएं, लपटों और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आनी शुरू हुईं. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर गांव वाले एकत्र हो गए. लेकिन घर के मुख्यद्वार पर ताला लटका देख खुद को असहाय महसूस करने लगे.

दरवाजा टूटते ही घर के अंदर से 3 बच्चे, एक युवक और युवती निकल कर बाहर आए. बच्चों की हालत तो ठीक थी, लेकिन युवती और युवक की स्थिति काफी नाजुक थी. गांव वालों ने आननफानन में एंबुलेंस बुला कर उन्हें स्थानीय अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन का प्राथमिक उपचार कर के उन्हें पुणे के सेसूनडाक अस्पताल के लिए रेफर कर दिया. साथ ही इस मामले की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से मिली जानकारी पर थाना पारनेर के इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने चार्जरूम में मौजूद ड्यूटी अफसर को बुला कर तुरंत इस मामले की डायरी बनवाई और बिना विलंब के एएसआई विजय कुमार बोत्रो, सिपाही भालचंद्र दिवटे, शिवाजी कावड़े और अन्ना वोरगे के साथ अस्पताल की तरफ रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने अपने मोबाइल फोन से मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में पहुंची, वहां काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. इन में अधिकतर उस युवक और युवती के सगेसंबंधी थे. पूछताछ में पता चला कि युवती का नाम रुक्मिणी है और युवक का नाम मंगेश रणसिंग लोहार. रुक्मिणी लगभग 70 प्रतिशत और मंगेश 30 प्रतिशत जल चुका था. अधिक जल जाने के कारण रुक्मिणी बयान देने की स्थिति में नहीं थी. मंगेश रणसिंग भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था.

इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने मंगेश रणसिंग और अस्पताल के डाक्टरों से बात की. इस के बाद वह अस्पताल में पुलिस को छोड़ कर खुद घटनास्थल पर आ गए.

घटना रसोईघर के अंदर घटी थी, जहां उन्हें पैट्रोल की एक खाली बोतल मिली. रसोईघर में बिखरे खाना बनाने के सामान देख कर लग रहा था, जैसे घटना से पहले वहां पर हाथापाई हुई हो.

जांचपड़ताल के बाद उन्होंने आग से बच गए बच्चों से पूछताछ की. बच्चे सहमे हुए थे. उन से कोई खास बात पता नहीं चली. वह गांव वालों से पूछताछ कर थाने आ गए. मंगेश रणसिंग के भाई महेश रणसिंग को वह साथ ले आए थे. उसी के बयान के आधार पर रुक्मिणी के परिवार वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी.

इस मामले में रुक्मिणी का बयान महत्त्वपूर्ण था. लेकिन वह कोई बयान दर्ज करवा पाती, इस के पहले ही 5 मई, 2019 को उस की मृत्यु हो गई. मंगेश रणसिंग और उस के भाई महेश रणसिंग के बयानों के आधार पर यह मामला औनर किलिंग का निकला.

रुक्मिणी की मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया, जिसे ले कर सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग सड़क पर उतर आए और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. इस से जांच टीम पर वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव बढ़ गया. उसी दबाव में पुलिस टीम ने रुक्मिणी के चाचा घनश्याम सरोज और मामा सुरेंद्र भारतीय को गिरफ्तार कर लिया. रुक्मिणी के पिता मौका देख कर फरार हो गए थे.

पुलिस रुक्मिणी के मातापिता को गिरफ्तार कर पाती, इस से पहले ही इस केस ने एक नया मोड़ ले लिया. रुक्मिणी और मंगेश रणसिंग के साथ आग में फंसे बच्चों ने जब अपना मुंह खोला तो मामला एकदम अलग निकला. बच्चों के बयान के अनुसार पुलिस ने जब गहन जांच की तो मंगेश रणसिंग स्वयं ही उन के राडार पर आ गया.

मामला औनर किलिंग का न हो कर एक गहरी साजिश का था. इस साजिश के तहत मंगेश रणसिंग ने अपनी पत्नी की हत्या करने की योजना बनाई थी. पुलिस ने जब मंगेश से विस्तृत पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए रुक्मिणी हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह रुक्मिणी के परिवार वालों और रुक्मिणी के प्रति नफरत से भरी हुई थी.

23 वर्षीय मंगेश रणसिंग गांव निधोज का रहने वाला था. उस के पिता चंद्रकांत रणसिंग जाति से लोहार थे. वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर राजगीर का काम करते थे. घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर भी गांव में उन की काफी इज्जत थी. सीधेसादे सरल स्वभाव के चंद्रकांत रणसिंग के परिवार में पत्नी कमला के अलावा एक बेटी प्रिया और 3 बेटे महेश रणसिंग और ओंकार रणसिंग थे.

मंगेश रणसिंग परिवार में सब से छोटा था. वह अपने दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करता था. गांव के स्कूल से वह किसी तरह 8वीं पास कर पाया था. बाद में वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगा. धीरेधीरे उस में पिता के सारे गुण आ गए. राजगीर के काम में माहिर हो जाने के बाद उसे पुणे की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई.

वैसे तो मंगेश को पुणे से गांव आनाजाना बहुत कम हो पाता था, लेकिन जब भी वह अपने गांव आता था तो गांव में अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर इधरउधर घूमता और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर गप्पें मारता. इसी के चलते जब उस ने रुक्मिणी को देखा तो वह उसे देखता ही रह गया.

20 वर्षीय रुक्मिणी और मंगेश का एक ही गांव था. उस का परिवार भी उसी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था, जिस पर मंगेश अपने पिता के साथ काम करता था. इस से मंगेश रणसिंग का रुक्मिणी के करीब आना आसान हो गया था. रुक्मिणी का परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता रामा रामफल भारतीय जाति से पासी थे. सालों पहले वह रोजीरोटी की तलाश में गांव से अहमदनगर आ गए थे. बाद में वह अहमदनगर के गांव निधोज में बस गए थे. यहीं पर उन्हें एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम मिल गया था.

बाद में उन्होंने अपनी पत्नी सरोज और साले सुरेंद्र को भी वहीं बुला लिया था. परिवार में रामा रामफल भारतीय के अलावा पत्नी, 2 बेटियां रुक्मिणी व 5 वर्षीय करिश्मा थीं.

अक्खड़ स्वभाव की रुक्मिणी जितनी सुंदर थी, उतनी ही शोख और चंचल भी थी. मंगेश रणसिंग को वह अच्छी लगी तो वह उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा.

मंगेश रणसिंग पहली ही नजर में रुक्मिणी का दीवाना हो गया था. वह रुक्मिणी को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. उस की यह मुराद पूरी भी हुई.

कंस्ट्रक्शन साइट पर रुक्मिणी के परिवार वालों का काम करने की वजह से मंगेश रणसिंग की राह काफी आसान हो गई थी. वह पहले तो 1-2 बार रुक्मिणी के परिवार वालों के बहाने उस के घर गया. इस के बाद वह मौका देख कर अकेले ही रुक्मिणी के घर आनेजाने लगा.

मंगेश रुक्मिणी से मीठीमीठी बातें कर उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता. साथ ही उसे पैसे भी देता और उस के लिए बाजार से उस की जरूरत का सामान भी लाता. जब भी वह रुक्मिणी से मिलने उस के घर जाता, उस के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता. साथ ही उस के भाई और बहन के लिए भी खानेपीने की चीजें ले जाता था.

मांबाप की जानपहचान और उस का व्यवहार देख कर रुक्मिणी भी मंगेश की इज्जत करती थी. रुक्मिणी उस के लिए चायनाश्ता करा कर ही भेजती थी. मंगेश रणसिंह तो रुक्मिणी का दीवाना था ही, रुक्मिणी भी इतनी नादान नहीं थी. 20 वर्षीय रुक्मिणी सब कुछ समझती थी.

वह भी धीरेधीरे मंगेश रणसिंग की ओर खिंचने लगी थी. फिर एक समय ऐसा भी आया कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह मंगेश की बांहों में आ गिरी.

अब दोनों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एकदूसरे के लिए बेचैन रहने लगे. उन के प्यार की ज्वाला जब तेज हुई तो उस की लपट उन के घर वालों तक ही नहीं बल्कि अन्य लोगों तक भी जा पहुंची.

मामला नाजुक था, दोनों परिवारों ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों शादी करने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

आखिरकार मंगेश रणसिंग के परिवार वालों ने उस की जिद की वजह से अपनी सहमति दे दी. लेकिन रुक्मिणी के पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. फिर भी वह पत्नी के समझाने पर राजी हो गए. अलगअलग जाति के होने के कारण दोनों की शादी में उन का कोई नातेरिश्तेदार शामिल नहीं हुआ.

एक सादे समारोह में दोनों की शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में दरार आने लगी. दोनों के प्यार का बुखार उतरने लगा था. दोनों छोटीछोटी बातों को ले कर आपस में उलझ जाते थे. अंतत: नतीजा मारपीट तक पहुंच गया.

30 अप्रैल, 2019 को मंगेश रणसिंग ने किसी बात को ले कर रुक्मिणी को बुरी तरह पीट दिया था. रुक्मिणी ने इस की शिकायत मां निर्मला से कर दी, जिस की वजह से रुक्मिणी की मां ने उसे अपने घर बुला लिया. उस समय रुक्मिणी 2 महीने के पेट से थी. इस के बाद जब मंगेश रणसिंग रुक्मिणी को लाने के लिए उस के घर गया तो रुक्मिणी के परिवार वालों ने उसे आड़ेहाथों लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया.

रुक्मिणी के परिवार वालों के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग नाराज हो गया. उस ने इस अपमान के लिए रुक्मिणी के घर वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली.

बदमाश प्रवृत्ति के मंगेश रणसिंग की इस धमकी से रुक्मिणी के परिवार वाले डर गए, जिस की वजह से वे रुक्मिणी को न तो घर में अकेला छोड़ते थे और न ही बाहर आनेजाने देते थे.  रुक्मिणी का परिवार सुबह काम पर जाता तो रुक्मिणी को उस के छोटे भाइयों और छोटी बहन के साथ घर के अंदर कर बाहर से दरवाजे पर ताला डाल देते थे, जिस से मंगेश उन की गैरमौजूदगी में वहां आ कर रुक्मिणी को परेशान न कर सके.

इस सब से मंगेश को रुक्मिणी और उस के परिवार वालों से और ज्यादा नफरत हो गई. उस की यही नफरत एक क्रूर फैसले में बदल गई. उस ने रुक्मिणी की हत्या कर पूरे परिवार को फंसाने की साजिश रच डाली.

घटना के दिन जब रुक्मिणी के परिवार वाले अपनेअपने काम पर निकल गए तो अपनी योजना के अनुसार मंगेश पहले पैट्रोल पंप पर जा कर इस बहाने से एक बोतल पैट्रोल खरीद लाया कि रास्ते में उस के दोस्त की मोटरसाइकिल बंद हो गई है. यही बात उस ने रास्ते में मिले अपने दोस्त सलमान से भी कही.

फिर वह रुक्मिणी के घर पहुंच गया. उस समय रुक्मिणी रसोईघर में अपने भाई और बहन के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. घर के दरवाजे पर पहुंच कर मंगेश रणसिंग जोरजोर दरवाजा पीटते हुए रुक्मिणी का नाम ले कर चिल्लाने लगा. वह ताले की चाबी मांग रहा था.

दरवाजे पर आए मंगेश से न तो रुक्मिणी ने कोई बात की और न दरवाजे की चाबी दी. वह उस की तरफ कोई ध्यान न देते हुए खाना बनाने में लगी रही.

रुक्मिणी के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग का पारा और चढ़ गया. वह किसी तरह घर की दीवार फांद कर रुक्मिणी के पास पहुंच गया और उस से मारपीट करने लगा. बाद में उस ने अपने साथ लाई बोतल का सारा पैट्रोल  रुक्मिणी के ऊपर डाल कर उसे आग के हवाले कर दिया.

मंगेश की इस हरकत से रुक्मिणी के भाईबहन बुरी तरह डर गए थे. वे भाग कर रसोई के एक कोने में छिप गए. जब आग की लपटें भड़कीं तो रुक्मिणी दौड़ कर मंगेश से कुछ इस तरह लिपट गई कि मंगेश को उस के चंगुल से छूटना मुश्किल हो गया. इसीलिए वह भी रुक्मिणी के साथ 30 प्रतिशत जल गया.

इस के बावजूद भी मंगेश का शातिरपन कम नहीं हुआ. अस्पताल में उस ने रुक्मिणी के परिवार वालों के विरुद्ध बयान दे दिया. उस का कहना था कि उस की इस हालत के लिए उस के ससुराल वाले जिम्मेदार हैं.

उस की शादी लवमैरिज और अंतरजातीय हुई थी. यह बात रुक्मिणी के घर वालों को पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे घर बुला कर पहले उसे मारापीटा और जब रुक्मिणी उसे बचाने के लिए आई तो उन्होंने दोनों पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी.

अपमान और नफरत की आग में जलते मंगेश रणसिंग की योजना रुक्मिणी के परिवार वालों के प्रति काफी हद तक कामयाब हो गई थी. लेकिन रुक्मिणी के भाई और उस के दोस्त सलमान के बयान से मामला उलटा पड़ गया.

अब यह केस औनर किलिंग का न हो कर पति और पत्नी के कलह का था, जिस की जांच पुलिस ने गहराई से कर मंगेश रणसिंग को अपनी हिरासत में ले लिया.

उस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 307, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद रुक्मिणी के परिवार वालों को रिहा कर दिया गया. Crime Stories

Real Crime Story: इश्क में फिर बहा खून

Real Crime Story: पासपड़ोस में रहने के कारण दीपक और जावित्री को एकदूसरे से कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला. एक दिन जावित्री के पिता वीरपाल ने उन दोनों को ऐसी हालत में देखा कि वह अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर सका और फिर…

जावित्री जैसे ही स्कूल जाने के लिए साइकिल से निकली, रास्ते में इंतजार कर रहे दीपक ने अपनी साइकिल उस के पीछे लगा दी. जावित्री ने दीपक को पीछे आते देखा तो उस ने साइकिल की गति और तेज कर दी. दीपक ने भी अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाई और कुछ देर में जावित्री की साइकिल के आगे अपनी साइकिल इस तरह खड़ी कर दी कि अगर जावित्री ने पूरी ताकत से ब्रेक न लगाई होती तो उस की साइकिल से टकरा जाती. साइकिल संभालते हुए जावित्री खीझ कर बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो मैं स्कूल जा रही हूं. एक तो वैसे ही देर हो गई है, ऊपर से तुम ने रास्ता रोक लिया. अभी किसी ने हम दोनों को इस तरह देख लिया तो बिना मतलब का बात का बतंगड़ बनने लगेगा.’’

‘‘जिसे जो कहना है, कहता रहे. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ दीपक ने अपनी यह बात इस तरह अकड़ कर कही, जैसे सचमुच उसे किसी का कोई डर नहीं है.

जावित्री को स्कूल जाने के लिए देर हो रही थी. इसलिए वह बेचैन थी. उस ने दीपक को देखा, उस के बाद विनती के स्वर में बोली, ‘‘दीपक, मुझे सचमुच देर हो रही है, बिना मतलब स्कूल में झूठ बोलना पड़ेगा. अभी जाने दो, मैं तुम से बाद में मिल लूंगी, तब जो बात कहनी हो, कह देना’’

जावित्री की विनती पर दीपक नरम पड़ गया. साइकिल हटाते हुए उस ने जावित्री के सुंदर मुखड़े को देखते हुए कहा, ‘‘जावित्री, तुम मेरी आंखों में देखो, प्यार का सागर लहराता नजर आएगा. तुम्हें पता है, तुम्हारे प्यार में मैं सब कुछ भूल गया हूं. दिनरात सिर्फ तुम्हारी ही यादों में खोया रहता हूं.’’

‘‘वह सब ठीक है दीपक, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि हम एक ही गांव में रहते हैं. हमारे और तुम्हारे घरों के बीच ज्यादा दूरी भी नहीं है. अगर हम दोनों इसी तरह प्यारमोहब्बत की पींगे बढ़ाते रहे तो मोहल्ले वालों से यह बात छिपी नहीं रहेगी. तुम मेरे पापा को तो जानते ही हो, वह बातबात में गुस्सा हो जाते हैं. कही उन्हें हम दोनों के प्रेम की भनक लग गई तो मैं बदनाम हो जाऊंगी. उस के बाद मेरे पापा मेरी क्या गत बनाएंगे, तुम सोच भी नहीं सकते.’’

‘‘जावित्री, मैं तुम्हें सपने में भी बदनाम करने के बारे में नहीं सोच सकता. तुम मेरा प्यार हो और प्यार के लिए लोग न जाने क्याक्या करते हैं. एक तुम हो कि जरा सी बदनामी से डर रही हो. मैं तुम से मिलने और 2 बातें करने के लिए कितने तिकड़म भिड़ाता हूं. तब कहीं जा कर तुम से मुलाकात होती है. जबकि तुम बदनामी का बहाना कर के मुझ से पीछा छुड़ाना चाहती हो. मैं तुम्हें भला क्यों बदनाम होने दूंगा. तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी तुम्हीं से करूंगा. तुम्हारे अलावा मेरी दुलहन कोई दूसरी नहीं हो सकती. तब बदनामी कैसी?’’

दीपक की बातों के जवाब मे लंबी सांस ले कर जावित्री बोली, ‘‘अच्छा अब बस करो. मुझे स्कूल जाना है. वैसे ही देर हो चुकी है. अब और देर मत करो.’’

कह कर जावित्री साइकिल पर चढ़ी और चल पड़ी तो दीपक ने पीछे से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अभी तो प्यार की शुरुआत है, इसलिए मिलने के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करो.’’

जावित्री बिना कुछ बोले चली गई. दीपक अकसर जावित्री के स्कूल जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का रास्ता रोकता और कभी प्रेम से तो कभी थोड़ा गुस्से से अपने प्रेम का मनुहार करता. उत्तर प्रदेश के महानगर बरेली के फतेहगंज पश्चिमी थाना कस्बा के मोहल्ला लोधीनगर में वीरपाल मौर्य रहता था. उस के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. परिवार में पत्नी कमला देवी और 4 बेटियां थीं. सभी अववाहित थीं. जावित्री सब से छोटी थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खुबसूरत और चंचल थी. घर में सब से छोटी होने की वजह से मांबाप भी उसे ज्यादा प्यार करते थे.

जावित्री उम्र के उस पायदान पर खड़ी थी, जब शरीर में अनेक बदलाव आते हैं और दिल में उमंग की लहरें हिचकोले लेने लगती हैं. लोग उसे गहरी नजरों से देखने लगे थे. वह उन नजरों को पहचानने भी लगी थी. लेकिन दीपक उन सब से अलग था, उस की नजरें हमेशा उसे प्यार से देखती थीं. उस की आंखों में उस के लिए अलग तरह की चाहत थी. दीपक भी कम स्मार्ट और खूबसूरत नहीं था. वह भिठौरा मोहल्ले में रहता था. जावित्री और उस के घर के बीच की दूरी दो, ढाई सौ मीटर रही होगी. दीपक के पिता कांताप्रसाद मौर्य उर्फ पप्पू मेहनतमजदूरी करते थे. घर में पिता के अलावा मां रामवती और 2 बड़े भाई थे.

वीरपाल और कांताप्रसाद का ही नहीं, पूरे परिवार का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसी आनेजाने में जवान हो रही जावित्री पर दीपक की नजर पड़ी तो बरबस वह उस की ओर खिंचने लगा. घर में अन्य लोगों के होने की वजह से दीपक जावित्री से मन की बात कर नहीं पाता था. इसलिए वह इस फिराक में रहने लगा कि जावित्री अकेले में मिल जाए. संयोग से एक दिन ऐसा ही मौका उस के हाथ लग गया. जावित्री के घर वाले किसी समारोह में शामिल होने के लिए गए थे. जावित्री घर पर ही रह गई थी. इस बात का पता चलते ही किसी बहाने से दीपक उस के घर पहुंच गया. दरवाजे पर दस्तक दी तो जावित्री ने दरवाजा खोला. दीपक को देखते ही वह बोली, ‘‘सभी लोग शादी में गए हैं, घर में कोई नहीं है.’’

जावित्री की बात खत्म होते ही दीपक ने कहा, ‘‘जावित्री, मैं घर वालों से नहीं, सिर्फ तुम से मिलने आया हूं. चाचा से मिलना होता तो बाहर ही मिल लेता.’’

‘‘ठीक है, अंदर आ जाओ और बताओ मुझ से क्या काम है?’’ बगल होते हुए ही जावित्री बोली.

दीपक अंदर आ कर कमरे में खड़ा हो गया. तभी जावित्री ने कहा, ‘‘अब बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

दीपक जावित्री को घूरते हुए बोला, ‘‘दरअसल, मैं बहुत दिनों से तुम से अकेले में मिलना चाहता था. क्योंकि मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिल नहीं माना तो तुम से मिलने चला आया.’’

दीपक आगे कुछ और कहता, जावित्री को हंसी आ गई. उस ने हंसते हुए ही कहा, ‘‘आतेजाते तुम मुझे जिस तरह से देखते थे, उसी से मुझे तुम्हारे दिल की बात का पता चल गया था.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी मुझे पंसद करती हो. तुम्हारी बातों से तो यही लगता है कि जो मेरे दिल है, वही तुम्हारे दिल में भी है.’’

दीपक कुछ और कहता, जावित्री झट से बोली, ‘‘मम्मीपापा के आने का समय हो रहा है. वह कभी भी आ सकते हैं, इसलिए तुम अभी यहां से चले जाओ. मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम से बात कर लूंगी.’’

जावित्री के यह कहने के बावजूद भी दीपक वहीं खड़ा रहा और उस की खूबसूरती का बखान करता रहा. जावित्री को इस बात का डर था कि कहीं उस के मम्मीपापा न आ जाएं, इसलिए उस ने दीपक का हाथ पकड़ कर उसे  बाहर कर के अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन जातेजाते दीपक ने जावित्री को याद करा दिया कि उस ने बाहर मिलने का वादा किया है. जावित्री वादे को नहीं भूली और अगले दिन स्कूल जाते समय रास्ते में हमेशा की तरह दीपक दिखाई दिया तो इशारे से समझा दिया कि स्कूल से लौटते समय वह उस से मिलेगी. दीपक समय से पहले ही जावित्री के लौटने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का बेसब्री से इंतजार करने लगा.

जावित्री स्कूल से लौटी तो दीपक से उस की मुलाकात हुई. दीपक के प्यार को स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘हमें इस बात का खयाल रखना होगा कि हमारे प्यार को किसी की नजर न लगे. इस के लिए हमें सावधान रहना होगा. दीपक जावित्री के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, कौन प्रेमी चाहेगा कि उस की प्रेमिका की रुसवाई हो. तुम मुझ पर पूरा भरोसा रखो, मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हारा सिर नीचा हो.’’

समय बीतता रहा, लोगों की नजरों से बच कर दोनों मिलते रहे. जल्दी ही दोनों का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे एकदूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे, यहां तक कि जान भी दे सकते थे, पर एकदूसरे से कतई अलग नहीं हो सकते थे. लेकिन उन के यह प्रेमिल संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. दोनों के ही घर वालों तक उन के संबंधों की बात पहुंच गई. रिश्तेदारों को पता चला तो वे भी नाराज हो उठे. उस दिन जिंदगी में पहली बार वीरपाल ने बेटी को मारने के लिए हाथ उठाया. उस ने जावित्री की खूब पिटाई की. कमला ने किसी तरह पति को शांत कर के जावित्री को सामने से हटाया.

इस के बाद वीरपाल सीधे कांताप्रसाद के घर गया और उसे हिदायत दी कि वह दीपक को रोके वरना ठीक नहीं होगा. दीपक मिला तो वीरपाल ने उसे भी समझाया, लेकिन वह नहीं माना. इस के बाद वीरपाल और उस का भाई राजेंद्र तनाव में रहने लगे. उन्हें चिंता थी कि जावित्री और दीपक के प्रेमसंबधों की बात खुल गई तो समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन ऐसी बातें कहां छिपती हैं. घर वालों ने दीपक पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो पूरे समाज में बात फैल गई. एक दिन वीरपाल के चाचा प्रेमशंकर दीपक को रोक कर समझाने लगे तो वह उस से भिड़ गया. इस पर प्रेमशंकर ने उसे थप्पड़ मार दिया. उस समय तो दीपक खून का घूंट पी कर चला गया. लेकिन अगले दिन जब प्रेमशंकर घर के बाहर बैठे थे तो दीपक अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा और बेल्टों से उन्हें जम कर पीटा. इस तरह उस ने अपने अपमान का बदला ले लिया.

प्रेमशंकर ने थाना फतेहगंज पश्चिमी में दीपक और उस के दोस्तों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. प्रेमशंकर के साथ घटी घटना की जानकारी वीरपाल को हुई तो उस ने कुछ दिनों बाद दीपक के दोस्तों से मारपीट की. अब तक जावित्री और दीपक का मिलना आम हो गया था. इस बात से वीरपाल बेहद खफा रहता था. ढाई महीने पहले उस ने वार्ड मेंबर को बीच में डाल कर एक पंचायत बुलाई. पंचायत ने दीपक को जावित्री से मिलने से मना किया तो उस ने भरी पंचायत में कह दिया कि यह संभव नहीं है. वह जावित्री से हरगिज दूर नहीं रह सकता. इस पर वीरपाल भड़क उठा और पंचायत के सामने ही दीपक को लातघूंसों से मारा.

इस के बाद दीपक दिल्ली चला गया. मार्च में होली पर घर लौटा तो 10 दिनों के लिए कांवर लेने हरिद्वार चला गया. वहां से वह 15 मार्च को लौटा. उस का एक दोस्त था सोनू, जो ट्रैक्टर मैकेनिक था और वीरपाल के मकान में किराए पर रहता था. 24 मार्च को उस की बेटी का नामकरण संस्कार था, जिस में दीपक को भी निमंत्रण दिया गया था. 24 मार्च की रात दीपक दावत में पहुंचा, लेकिन वहां से वह लौट कर नहीं आया. दावत में जावित्री भी थी, वह भी गायब हो गई थी. अगले दिन दोनों के घर वालों ने उन की तलाश शुरू की. जब वे नहीं मिले तो दोनों के घर वाले थाना फतेहगंज पश्चिम पहुंचे. वीरपाल ने दीपक के खिलाफ जावित्री के अपहरण की रिपोर्ट लिखवाई तो कांताप्रसाद ने वीरपाल, राजेंद्र, प्रेमशंकर और कमला देवी के खिलाफ दीपक के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर वे अपनेअपने घर लौट आए.

6 अप्रैल को भिठौरा के एक तालाब में एक बोरा तैरता दिखाई दिया, जिस में से इंसानी पैर बाहर निकले थे. मोहल्ले वालों ने इस बात की जानकारी थाना फतेहगंज पश्चिमी पुलिस को दी. थानाप्रभारी अखिलेश सिंह यादव छुट्टी पर थे, इसलिए थाने का प्रभार देख रहे एसआई अवधेश कुमार पुलिस बल के साथ उस तालाब के किनारे पहुंचे. उन्होंने बोरे को तालाब से निकलवाया तो उस में से एक लड़की की लाश बरामद हुई. लोगों ने उस लाश की शिनाख्त जावित्री के रूप में की. लाश के साथ बोरे से 8 ईंटें भी बरामद हुईं. अनुमान लगाया गया कि लाश को पानी में डुबोने के लिए लाश के साथ बोरे में ईंटें भी रखी गई थीं. लाश सड़ गई तो बोरा तालाब की सतह पर आ गया. जावित्री के घर वाले भी वहां मौजूद थे.

पुलिस ने उन से पूछताछ की तो वे जावित्री की हत्या का आरोप दीपक पर लगाने लगे. उसी बीच एसआई अवधेश कुमार के इशारे पर सिपाहियों ने वीरपाल के मकान का मुआयना किया तो वहां से पुलिस को जो सुराग मिले, वे कुछ और ही कहानी कह रहे थे. एक तो जिस तालाब में जावित्री की लाश मिली थी, वह वीरपाल के मकान के ठीक पीछे था. इस के अलावा जिस तरह के बोरे में जावित्री की लाश मिली थी, उसी तरह के धान भरे हुए बोरे वीरपाल के घर में रखे थे. बोरे से ईंटें बरामद हुई थीं, उसी मार्का की ईंटें वीरपाल के घर में लगी थीं. लेकिन पुलिस ने उस समय वीरपाल से कुछ नहीं कहा, उन्होंने घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इसी बीच घटना की जानकारी मिलने पर थानाप्रभारी अखिलेश यादव थाने आ गए. उन्होंने पूरी घटना पर गंभीरता से विचार किया. इस के बाद पुलिस ने वीरपाल और उस के भाई राजेंद्र को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी. वीरपाल का कहना था कि दीपक ने उस की बेटी की हत्या की है. लेकिन जब सुबूतों का हवाला देते हुए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने जावित्री की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. हत्या में उस का भाई राजेंद्र और लाश ठिकाने लगाने में उस का साढ़ू राजाराम और साथी टेनी उर्फ अरविंद ने साथ दिया था. राजाराम और टेनी भिठौरा में ही रहते थे. पुलिस ने उसी दिन टेनी को भी गिरफ्तार कर लिया. राजाराम घर से फरार था.

उस ने थानाप्रभारी को बताया कि दीपक खुद गायब नहीं हुआ, बल्कि उसे गायब कर के उस की हत्या कर दी गई है. जो बाप अपनी बेटी की हत्या कर सकता है, उस के लिए दीपक का कत्ल करना कोई बड़ी बात नहीं है. इस के बाद पुलिस ने 8 अप्रैल को सभी से अलगअलग पूछताछ की तो उन्होंने दीपक और जावित्री की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

24 मार्च को दीपक सोनू के यहां दावत में पहुंचा तो वहां जावित्री से उस की मुलाकात हो गई. दीपक ने उसे इशारे से पीछे आने को कहा. जावित्री सब की नजरें बचा कर उस के पीछेपीछे चली गई. उधर वीरपाल को जावित्री नहीं दिखी तो उस ने दीपक के बारे में पता किया. वह भी वहां नहीं था. वह समझ गया कि दीपक उस की बेटी को अपने साथ कहीं ले गया है. उस ने वहां मौजूद अपने भाई राजेंद्र को यह बात बताई और उसे साथ ले कर उस की खोज में निकल पड़ा. कुछ ही दूरी पर उन्हें एक खंडहर में दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिल गए. उन्हें उस स्थिति में देख कर उन का खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने दीपक को पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. जावित्री घर की ओर भागी कि वह लोगों को दीपक को बचाने के लिए बुला लाए. वीरपाल और राजेंद्र ने दीपक को पीटपीट कर अधमरा कर दिया.

इस के बाद ईंटों से उस का सिर और चेहरा कुचल कर मार डाला. तभी जावित्री लौट कर आ गई. उस ने दीपक को मरा पाया तो वह बगावत पर उतर आई. उस ने कहा कि वह सब कोबता देगी कि दीपक की हत्या उन्होंने की है. वह उन्हें सजा दिलवा कर रहेगी. इस पर दोनों भाइयों ने जावित्री को पकड़ लिया और बेल्ट से उस का गला कस कर उसे भी मार डाला. रात 12 बजे वीरपाल ने मोहल्ले में ही रहने वाले साढू राजाराम और उस के साथ काम करने वाले टेनी को फोन कर के बुलाया. दोनों के आने पर उस ने उन्हें पूरी बात बता कर मदद मांगी. इस के बाद वह घर गया और धान के 2 बोरे ले आया. एक बोरे में उस ने जावित्री की लाश भरी और दूसरे में दीपक की.

जावित्री की लाश वाला बोरा वीरपाल, राजाराम और टेनी घर ले गए और उस में 8 ईंटें डाल कर बोरे का मुंह बंद करके घर के पीछे वाले तालाब में फेंक दिया. वजन की वजह से बोरा तलहटी में बैठ गया. इस के बाद टेनी अपने घर चला गया. राजाराम वहां से अपने छोटे भाई के घर गया और मोटरसाइकिल ले आया. राजाराम और राजेंद दीपक के लाश वाले बोरे को ले कर मोटरसाइकिल से नेशनल हाईवे पर मीरगंज के पहले भखड़ा नदी के पुल पर ले गए और ऊपर से ही बोरे को नीचे फेंक दिया. नदी सूखी थी, इसलिए लाश जमीन पर जा गिरी. वे घर लौट आए और घर से फावड़ा ले कर फिर वहां पहुंचे. नदी में बने टापू पर करीब तीन फुट गहरा गड्ढा खोद कर उस में दीपक की लाश वाला बोरा गाड़ दिया और घर लौट आए.

वीरपाल ने तो अपने हिसाब से सब कुछ बड़े अच्छे तरीके से किया था. लेकिन बेटी की लाश ने पानी के ऊपर आ कर उस की चुगली कर दी तो पुलिस के हाथ उस तक पहुंच ही गए. उस की निशानदेही पर पुलिस ने भखड़ा नदी में बने मिट्टी के टापू से दीपक की लाश बरामद कर ली और पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने दीपक के अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं जोड़ कर सभी अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त ईंटें, बेल्ट और फावड़ा बरामद कर लिया. 9 अप्रैल को पुलिस ने वीरपाल, राजेंद्र और टेनी को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 10 अप्रैल को पुलिस ने राजाराम को भी गिरफ्तार कर कर के जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.