Agra News : अवैध संबंध का खौफनाक अंजाम – प्रेमी से करवाया पति का मफलर से गला घोंटकर कत्ल

Agra News : कमाऊ पति प्रमोद को छोड़ कर शिखा ने 5 बच्चों के पिता अतिराज से शादी कर ली. इसी दौरान अतिराज का दिल एक दूसरी औरत से लग गया. शिखा भी कम नहीं थी. उस ने पड़ोसी युवक ऋषिकेश को फांस लिया. बिस्तर की तरह औरत बदलने का परिणाम यह निकला कि…

ताज नगरी आगरा की तहसील बाह का एक थाना है बासौनी. इसी थाने के गांव लखनपुरा के बाहर स्थित घूरे पर मायाराम की 15 वर्षीय बेटी स्नेहा सुबह करीब 7 बजे कूड़ा डालने आई  थी.  अचानक उस की नजर कुछ दूरी पर खेत के किनारे कंटीले तारों के पास संदिग्ध अवस्था में पड़े एक व्यक्ति पर गई. वह उसे देखते ही पहचान गई. वह उसी के गांव का अतिराज सिंह था. स्नेहा ने वहां से लौट कर इस की जानकारी अतिराज की पत्नी शिखा के साथ ही गांव वालों को दी. जानकारी मिलते ही वहां अतिराज के घर वाले पहुंच गए. अतिराज को गांव वालों ने हिलायाडुलाया लेकिन वह मर चुका था. घटना की जानकारी होते ही गांव में हड़कंप मच गया. बड़ी संख्या में गांव वालों की भीड़ जुट गई. इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. यह बात 4 जनवरी, 2021 की है.

घटना की जानकारी मिलते ही मौके पर थानाप्रभारी दीपकचंद्र दीक्षित अपनी टीम के साथ पहुंच गए. 42 वर्षीय मृतक अतिराज सिंह बघेल किसान था. मामले की गंभीरता को देखते हुए थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना की जानकारी दी. इस पर एसपी (पूर्वी) अशोक वैंकट, सीओ (बाह) प्रदीप कुमार फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी. मृतक के गले व सीने पर चोट के निशान दिखाई दे रहे थे. इस से अनुमान लगाया गया कि युवक की हत्या गला दबा कर की गई है. वहीं फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए. शव के पास ही पुलिस को शराब का एक खाली पव्वा भी मिला. पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद शव मोर्चरी भिजवा दिया.

तब तक मृतक के बेटे नोएडा से आ गए थे. बड़े बेटे विक्रम सिंह बघेल ने पुलिस को बताया कि पिताजी रात को खेत की रखवाली को गए थे. सुबह उन की लाश दूसरे खेत में मिली. उस ने बताया कि हमारी रंजिश गांव की राधा देवी व उस के देवर फौरन सिंह से चल रही है. उन्होंने एक साल पहले पिताजी को हत्या की धमकी दी थी. उन्होंने ही पिताजी की हत्या की है. पति की हत्या की जानकारी मिलते ही पत्नी शिखा का रोरो कर बुरा हाल था. पुलिस का खोजी कुत्ता भी राधा के घर वाली गली तक जा कर रुक गया था. राधा का परिवार घर पर न मिलने से पुलिस का शक गहरा गया.

इस संबंध में विक्रम बघेल ने 38 वर्षीय विधवा राधा देवी, उस के देवर फौरन सिंह तथा राधा देवी के भाई सोहन (काल्पनिक) निवासी दिमनी, मुरैना, मध्य प्रदेश के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई. एसएसपी (आगरा) बबलू कुमार ने इस घटना के शीघ्र परदाफाश के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वैंकट, सीओ प्रदीप कुमार व थानाप्रभारी बासौनी की टीम गठित कर आवश्यक दिशानिर्देश दिए. ग्रामीणों से पुलिस ने इस संबंध में पूछताछ की. जानकारी में आया कि मृतक अतिराज की राधा देवी से दोस्ती थी. राधा के पति करन सिंह की मौत हो चुकी थी. करन सिंह और अतिराज दोनों मित्र थे. इस के चलते राधा और अतिराज के बीच प्रेमसंबंध हो गए. राधा के घर वाले इस का विरोध करते थे. इसी के चलते उस पर हत्या का शक गया.

पुलिस ने राधा, उस के देवर फौरन सिंह व भाई सोहन को हिरासत में ले लिया. पुलिस तीनों को ले कर थाने आई. यहां पर तीनों से इस संबंध में गहनता से पूछताछ की गई. लेकिन तीनों ने अपने को निर्दोष बताया. जांच में भी अतिराज की हत्या में उन की कोई भूमिका नहीं दिखाई दी. इस बीच पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में गला दबा कर हत्या करना बताया गया था. इस दौरान पुलिस को पता चला कि अतिराज की हत्या में उस की दूसरी पत्नी शिखा व उस के प्रेमी का हाथ है. इस के बाद पुलिस ने अभियोग में भादंवि की धारा 120बी की बढ़ोत्तरी कर दी. सही खुलासे के लिए जांच में जुटी पुलिस टीम ने सर्विलांस सैल की भी मदद ली.

पुलिस ने 7 जनवरी, 2021 को अतिराज की दूसरी पत्नी शिखा, उस के प्रेमी ऋषिकेश तथा प्रेमी के दोस्त सुशील उर्फ भूरा को गांव से गिरफ्तार कर लिया. ऋषिकेश का घर लखनपुरा में शिखा के घर के पास ही है, जबकि सुशील बाह के गांव खोडन का निवासी है तथा वर्तमान में पश्चिमी दिल्ली के थाना निहाल विहार के गांव निलौठी में रहता है. हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने वाली टीम में थानाप्रभारी दीपकचंद्र दीक्षित, एसआई सुमित कुमार, हैडकांस्टेबल सुनील कुमार,गजेंद्र सिंह, अमित कुमार, कांस्टेबल सूरज कुमार, रनवीर सिंह, कपिल कुमार, महिला कांस्टेबल ज्योति व शांति सिंह शामिल थीं.

तीनों हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. मृतक के बेटे ने जिन 3 लोगों को रिपोर्ट में नामजद किया था, वे जांच में निर्दोष पाए गए. इस तरह 3 निर्दोष जेल जाने से बच गए. हकीकत यह थी कि अतिराज की हत्या दूसरी पत्नी ने अपने पड़ोसी युवक से प्रेमसंबंधों के चलते की थी. एसएसपी बबलू कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस में हत्याकांड का खुलासा करते हुए वास्तविक हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी. इस सनसनीखेज हत्याकांड के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली निकली—

शिखा विश्वकर्मा कानपुर देहात की रहने वाली थी. उस की पहली शादी सन 2002 में औरैया जिले के गांव सराय निवासी प्रमोद विश्वकर्मा के साथ हुई थी. प्रमोद से शिखा के 3 बेटे हुए, इन में रोहित, मोहित व निक्की शामिल हैं. शिखा का पति प्रमोद पंजाब में स्थित एक सरिया मिल में काम करता था. एक दिन शिखा पति को फोन लगा रही थी कि गलती से उस का रौंग नंबर अतिराज को लग गया. दूसरी ओर से अंजान व्यक्ति की आवाज सुनते ही शिखा ने फोन काट दिया. रौंग नंबर लगने के बाद अतिराज ने उसे काल बैक किया. शिखा ने कहा, गलती से आप का नंबर लग गया था. अतिराज ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कहां रहती हैं और क्या करती हैं?’’

इस पर शिखा ने कहा, ‘‘हम तो कानपुर (देहात) में रहते हैं. पति पंजाब में काम करते हैं.’’ फिर दोनों ने एकदूसरे के बारे में जानकारी की. धीरेधीरे बातों का सिलसिला आगे बढ़ता गया. बाद में हाल यह हो गया कि दोनों दिन में जब तक कई बार बात नहीं कर लेते, दोनों को चैन नहीं मिलता था. अतिराज ने उसे बताया, ‘‘मेरी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है. अब मुझ से अकेला नहीं रहा जाता.’’

पति के पंजाब में काम करने से शिखा भी अकेली हो गई थी. दोनों के दिलों में धधक रही प्यार की आग की गरमी बढ़ती जा रही थी. दिल में लगी आग जब बुझाए नहीं बुझी तब सन 2010 में शिखा ने भाग कर अतिराज से कोर्टमैरिज कर ली. अतिराज सिंह की पहली पत्नी से 5 बच्चे थे. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी. तीनों बेटे नोएडा में टेंट आदि का काम करते थे. शिखा से दूसरी शादी करने के बाद दोनों पतिपत्नी गांव में ही रहने लगे. सन 2012 में शिखा और अतिराज के घर एक बेटी अंशिका पैदा हुई. इस बीच अतिराज के गांव की 38 वर्षीय एक विधवा राधा देवी से अवैध संबंध हो गए. जब राधा से प्रेमसंबंधों की जानकारी शिखा को हुई तो उस ने इस का विरोध किया.

वह पति को राधा से संबंध तोड़ने की कहती तो वह उस के साथ मारपीट करता. खर्चे के लिए रुपए भी नहीं देता था. इस से शिखा परेशान रहने लगी. घटना से करीब एक साल पहले शिखा की पड़ोस में ही रहने वाले 32 वर्षीय ऋषिकेश से नजरें टकरा गईं. इस के बाद रोज ही शिखा उसे अपने घर से टकटकी लगाए देखती रहती थी. इस का आभास ऋषिकेश को भी हो गया. पति की बेरुखी के चलते उस का झुकाव ऋषिकेश की तरफ होने लगा. लेकिन समाज के डर से वह उस से बात नहीं कर पाती थी. इस पर ऋषिकेश ने एक छोटा मोबाइल फोन ला कर उसे दे दिया. अब पति के काम पर चले जाने के बाद शिखा ऋषिकेश को फोन मिला लेती.

दोनों मोबाइल पर बातें करते और एकदूसरे से बातें करते और अपने दिल का हाल बताते. बात करने के बाद शिखा मोबाइल को स्विच औफ कर एक पाइप में छिपा देती थी. ऋषिकेश अतिराज का पड़ोसी था. अतिराज शराब पीने का आदी था. ऋषिकेश के साथ भी उस की दिल्ली से आने पर शराब पार्टी हो जाती थी. ऋषिकेश दिल्ली में ऊबर कंपनी में टैक्सी चलाता था. शिखा और ऋषिकेश में घटना से एक साल पहले से प्रेम संबंध चल रहे थे. शिखा फोन पर अपने प्रेमी ऋषि को बताती थी कि उस का पति अतिराज शराब पी कर घर आता है और मारपीट करता है. इस बात पर ऋषिकेश ने कहा कि वह उसे दिल्ली ले जाएगा.

तब शिखा ने कहा, पहले रास्ता साफ करो तब तुम्हारे साथ दिल्ली चल कर रहूंगी, क्योंकि अतिराज के जिंदा रहते मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती. वह मुझे ढूंढ कर मार डालेगा. शिखा की इस बात पर ऋषिकेश सोच में पड़ गया. उस ने अपने दूर के रिश्ते की मौसी के बेटे सुशील उर्फ भूरा से संपर्क किया, उसे सारी बात बताई और लखनपुरा के अतिराज की हत्या करने की बात की. सुशील हत्या के लिए तैयार हो गया, उस ने इस की एवज में 50 हजार रुपए की मांग की. ऋषिकेश ने शिखा के दिल्ली आने पर उस के जेवर बेच कर देने की बात कही. सुशील के राजी हो जाने के बाद 2 जनवरी, 2021 की रात को वैगनआर कार से दोनों 3 जनवरी की सुबह लखनपुरा पहुंच गए. दोपहर में अतिराज को फोन कर उस के घर पहुंच गए. शिखा व अतिराज घर पर मिले.

दोस्त के घर आने पर उस ने शिखा से दाल, रोटी बनवाई. उसी समय अतिराज किसी काम से चला गया. तब तीनों में अतिराज को मारने की योजना बनी. दोपहर डेढ़ बजे जब अतिराज घर आया उसे ऋषिकेश और सुशील शराब पीने के लिए वैगनआर कार से जरार ले गए. गाड़ी में शराब पहले से ही रखी थी. सभी ने गाड़ी में शराब पी. अतिराज को ज्यादा शराब पिलाई. इस के बाद बाह में माधव सिंह के ढाबे पर पहुंचे, जहां तीनों ने चिकन खाया. शाम को ढाबे से सभी लोग गांव के लिए वापस चल दिए. ऋषिकेश ने अपनी बगल वाली सीट पर आगे अतिराज को बैठाया. पीछे की सीट पर सुशील बैठ गया. अतिराज को मारने के लिए गाड़ी को आगरा-बाह रोड पर गुगावली जाने वाले सुनसान मार्ग पर ले गए.

सर्दियों के चलते जल्दी ही अंधेरा घिरने लगा था. अतिराज शराब के नशे में बेसुध था. दोनों को इसी का इंतजार था. इस बीच ऋषिकेश और शिखा की मोबाइल पर कई बार बात हुई. शिखा ने कहा, नशा रहते उसे जल्दी मार दो, होश में आने के बाद उसे नहीं मार पाओगे. लेकिन जब वे लोग आगे नहर के किनारे चल कर खेतों की तरफ पहुंचे. यहां गांव वाले खेतों की रखवाली कर रहे थे. इसलिए गाड़ी नहीं रोकी. आगे चल कर खिल्ला पड़कौली पहुंचे तथा गांव लखनपुरा की तरफ कार मोड़ दी. तब तक रात के 9 बज गए थे. रास्ते में अच्छा मौका देख कर गाड़ी रोक ली. ऋषिकेश के इशारे पर सुशील ने सीट बेल्ट जो पहले से ही काट ली थी, का फंदा अतिराज के गले में डाल कर गला दबा कर जान से मारने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली.

तब सुशील ने अपने मफलर का फंदा उस के गले में डाल दिया और दोनों ने एकएक सिरा खींच कर अतिराज की हत्या कर दी. हत्या के बाद लाश पीछे की सीटों के बीच लिटा दी. इस के बाद षडयंत्र के तहत अतिराज के मोबाइल से उस की प्रेमिका राधा के मोबाइल पर काल की थी. उधर से राधा हैलोहैलो करती रही, लेकिन हत्यारों ने कोई जवाब नहीं दिया. अतिराज के मोबाइल से काल राधा को फंसाने के लिए की गई थी. अतिराज की हत्या के बाद लाश को गाड़ी में ही ले कर दोनों लखनपुरा अतिराज के घर के पास पहुंचे. गाड़ी कुछ दूरी पर खड़ी कर तथा सुशील को गाड़ी में ही बैठा कर ऋषिकेश रात में ही शिखा के घर पहुंचा. उस समय उस की बेटी अंशिका सोई हुई थी. ऋषिकेश ने पूरी जानकारी शिखा को दी.

दोनों ने लाश ठिकाने लगाने के लिए आपस में बातचीत की. ऋषिकेश ने कहा, तुम कहो तो अतिराज की लाश चंबल नदी में फेंक दें, मगरमच्छ खा जाएंगे. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. इस पर शिखा ने कहा, नहीं लाश को राधा के घर की तरफ गांव के किनारे फेंक दो. सभी का शक उसी पर जाएगा. रास्ते के रोड़े को हटाने की खुशी का जश्न दोनों ने रात में ही अपने शरीर की भूख मिटा कर मनाया. जश्न के बाद ऋषिकेश कार ले कर गांव से करीब 100 मीटर दूर पहुंचा. दोनों ने महेश भदौरिया के खेत के बीच कूड़े के ढेर के पास अतिराज की लाश लिटा दी और उस के पास शराब का एक खाली पव्वा भी रख दिया. इस के बाद दोनों कार से दिल्ली निकल गए.

ऋषिकेश व सुशील अतिराज के परिवार वालों के बुलाने व पड़ोसी होने के नाते कार द्वारा दिल्ली से गांव आ गए थे. ऋषिकेश ने आगरा-बाह रोड पर हनुमान नगर के पास अपनी रिश्तेदारी में कार खड़ी की और दोनों गांव पहुंच गए. उन्होंने अतिराज की मौत पर दुख जताते हुए उस के घर वालों को सांत्वना भी दी. पुलिस ने हत्यारों की निशानदेही पर आलाकत्ल मफलर, शीट बेल्ट, वैगनआर कार तथा शिखा, ऋषिकेश व अतिराज के मोबाइल फोन बरामद कर लिए. पुलिस ने हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया. घटना का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी बबलू कुमार ने ईनाम के साथ प्रशस्ति पत्र देने की घोषणा की.

कहते हैं कि दूसरी औरत से शादी कर लो, लेकिन दूसरे की औरत से नहीं. अतिराज ने दूसरे की औरत से शादी कर के जो भूल की उसे उस का परिणाम अपनी जान दे कर भुगतना पड़ा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News : शराब की बोतल तोड़ी, नुकीले हिस्से से पति पर वार कर किया कत्ल

UP News : यह सच्चाई है कि अवैध संबंधों को ज्यादा दिनों तक छिपाए नहीं रखा जा सकता. खुलासा होने पर ये आपराधिक वारदात को जन्म देते हैं. काश! इस बात को पेशे से अध्यापक रहे इंद्रपाल और उस की पत्नी सीमा समझ पाती तो शायद…

कन्नौज जिले का एक बड़ा कस्बा है सौरिख. इसी कस्बे के नगरिया तालपार में शिक्षक इंद्रपाल रहते थे. उन के पिता श्रीकृष्ण मुर्रा गांव के निवासी थे. वहां उन का पुश्तैनी मकान तथा खेती की जमीन है. उन के बेटे इंद्रपाल ने सौरिख कस्बे में दोमंजिला मकान बनवा लिया था. इंद्रपाल की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. वह शिक्षक संघ का अध्यक्ष भी था. वर्ष 2001 में इंद्रपाल का विवाह फर्रुखाबाद (गदराना) निवासी सरयू प्रसाद की बेटी सुधा के साथ हुआ था. सुधा साधारण रंगरूप वाली युवती थी. लगभग 2 साल तक दोनों का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से बीता, उस के बाद कड़वाहट घुलने लगी.

कड़वाहट का पहला कारण था, इंद्रपाल का शराब पी कर घर आना तथा दूसरा कारण था झगड़ा और मारपीट करना. सुधा शराब पीने को मना करती तो वह उसे ही दोषी ठहराता और उस के चरित्र पर अंगुली उठाता, सुधा तब परेशान हो कर मायके चली जाती. सुधा जब पहले मायके आती थी तो उल्लास से भरे उस के पैर एक स्थान पर नहीं टिकते थे. लेकिन अब जब भी आती थी तो वह गुमसुम और उदास रहती थी. उस की मां तारावती ने कई बार उस से पूछा भी कि बेटी, क्या ससुराल में तुम्हें किसी तरह का दुख या परेशानी है?

‘‘नहीं मां सब ठीक है. ऐसा कुछ भी गलत नहीं है कि उसे सही करने के लिए तुम्हें दखल देने की जरूरत हो.’’ कह कर सुधा हर बार टाल देती.

तारावती के सीने में मां का दिल था. वह खूब समझ रही थी कि सुधा असल बात बता नहीं रही, कुछ छिपाए हुए है. इस बारे में उस ने पति से राय ली तो सरयू प्रसाद ने कहा कि उन लोगों का कोई घरेलू और आपसी मामला होगा. उन्हें ही सुलझाने दो. हमें दखल देने की जरूरत नहीं है. हम दखल देंगे, तो बात बनने के बजाय बिगड़ने का अंदेशा है. लेकिन तारावती का मन बेटी की उदासी को स्वाभाविक मतभेद मानने को तैयार नहीं था. उसे लग रहा था कि कोई तो बात है, जो सुधा को घुन की तरह खाए जा रही है. उस ने तय कर लिया कि अब की बार सुधा आई, तो वह उस से जान कर रहेगी कि उस की उदासी का कारण क्या है?

कुछ दिनों बाद सुधा मायके आई तो उस के चेहरे पर पहले की तरह उदासी की परछाइयां कायम थीं. उचित समय पर तारावती ने सुधा को पास बिठा कर स्नेह से उस के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘बेटी मां से बड़ी शुभचिंतक और हितैषी कोई दूसरी नहीं होती. न ही मां से बेहतर कोई सहेली होती है.’’

सुधा ने सिर उठा कर मां को सूनीसूनी आंखों से देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं. तारावती ने अपनी रौ में बोलना जारी रखा, ‘‘सुधा, मैं तुम्हें दुखी और उदास नहीं देख सकती. मां न सही सहेली ही समझ कर आज तुम अपना दुख कह दो.’’

संभवत: उस दिन सुधा का अंतस कुछ अधिक भरा हुआ था. ममता की आंच से वह पिघल गई. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. कुछ देर बाद सुधा के आंसू थमे तो वह बोली, ‘‘मां मेरा दुख यह है कि कुछ महीनों से इंद्रपाल पहले जैसे नहीं रहे, वह बहुत बदल गए हैं.’’

सुधा ने रुंधे कंठ से बताया, ‘‘न वह सीधे मुंह बात करते है. न प्यार से पेश आते हैं. शराब पी कर झगड़ा भी करते हैं. मैं थाली परोसती हूं तो, वह उस पर नजर तक नहीं डालते. मेरे साथ सोते जरूर हैं, पर पीठ कर के.’’

सुधा की बात सुन कर तारावती की आंखें हैरत से फैल गईं. वह जान गई कि बेटी का जीवन अंधकारमय है. तारावती ने इस बाबत इंद्रपाल से बात की तो वह झगड़े पर उतारू हो गया. उस ने साफ कह दिया कि वह सुधा को पसंद नहीं करता. वह उस से तलाक चाहता है. दामाद की बात सुन कर तारावती सन्न रह गई. उस ने दोनों के बीच तनाव खत्म करने के लिए अनेक उपाय किए. रिश्तेदारों के बीच समझौते का प्रयास किया. लेकिन जब बात नहीं बनी तो मामला कोर्टकचहरी तक जा पहुंचा. आखिर में दोनों की रजामंदी से इंद्रपाल और सुधा का तलाक हो गया. फिर सुधा मायके में रहने लगी.

सुधा से तलाक होने के बाद इंद्रपाल दूसरी शादी के लिए प्रयास करने लगा. परिवार के लोग भी चाहते थे कि इंद्रपाल का दूसरा विवाह हो जाए, तो वह भी प्रयास करने लगे. घर वालों को कई रिश्ते पसंद भी आए, लेकिन इंद्रपाल ने रिश्ता नकार दिया. परिवार के लोग भी समझ गए कि इंद्रपाल अपनी मनपसंद युवती से ही शादी करेगा. इंद्रपाल फर्रूखाबाद शहर के आरबीआरडी इंटर कालेज में पढ़ाता था. वह प्राइवेट शिक्षक था. इसी कालेज में सीमा पाल नाम की लड़की पढ़ती थी. इंटरमीडिएट में पढ़ाई के दौरान सीमा और इंद्रपाल एकदूसरे की ओर आकर्षित हुए. कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकातें कालेज के बाहर भी होने लगीं.

सीमा पाल के पिता अवध पाल, हुसैनपुर के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा मनोज तथा बेटी सीमा थी. अवध पाल किसान थे. सीमा उन की होनहार बेटी थी. पढ़ने में भी तेज थी, सो वह उसे पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते थे. सीमा, छरहरी काया और तीखे नाकनक्श वाली लड़की थी. उस की मुसकान सामने वाले पर गहरा असर करती थी. सीमा की खूबसूरती और मुसकान इंद्रपाल के दिल पर भी असर कर गई थी. एक दिन इंद्रपाल ने उस से अपने मन की बात भी कह दी, ‘‘सीमा हंसते हुए तुम बहुत अच्छी लगती हो. इसी तरह हंसती रहा करो. यदि तुम मेरा प्यार कबूल कर लोगी तो मैं खुद को दुनिया का सब से खुशनसीब आदमी समझूंगा.’’

सीमा उम्र के जिस पायदान पर थी, उस में लड़कियों को ऐसी बातें गुदगुदा देती हैं. सीमा का भी दिलोदिमाग सुखद सनसनी से भर गया. उस ने इंद्रपाल की आंखों में देखा. उन आंखों में प्यार का सागर ठाठे मार रहा था. उस की आंखों में देखते हुए कुछ देर तक वह सोच में डूबी रही, उस के बाद बोली, ‘‘अगर मैं तुम्हारा प्यार कबूल कर लूं तो तुम्हारा अगला कदम क्या होगा?’’

‘‘शादी.’’ इंद्रपाल ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘लेकिन मेरे घर वाले राजी नहीं हुए तो..?’’ सीमा ने पूछा.

‘‘…तो हम दोनों प्रेम विवाह कर लेंगे.’’

सीमा मुसकराई और फिर नजरें झुका कर स्वीकृति में सिर हिला दिया. इंद्रपाल का दिल बल्लियां उछल पड़ा. उस ने तो एक मुट्ठी आसमान की तमन्ना की थी, लेकिन यहां तो पूरा का पूरा आसमान उस का हो गया था. कुछ दिनों बाद इंद्रपाल के कहने पर सीमा ने घर वालों को अपने प्रेम से अवगत कराया और विवाह की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने सीमा को समझाया, ‘‘बेटी, इंद्रपाल पहली पत्नी को धोखा दे चुका है. तुम्हें भी धोखा दे सकता है. बेहतर यही होगा कि उस का खयाल अपने मन से निकाल दो.’’

सीमा ने मुलाकात कर ये सारी बातें इंद्रपाल को बताईं, तो उस ने पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो? तुम्हारे जवाब पर ही सब कुछ निर्भर है.’’

‘‘मैं तुम्हें पाना चाहती हूं.’’ सीमा ने जवाब दिया. इस के बाद वर्ष 2007 में सीमा पाल ने अपने घर वालों की मरजी के बिना इंद्रपाल के साथ प्रेम विवाह कर लिया और उस की दुलहन बन कर इंद्रपाल के साथ रहने लगी. इंद्रपाल के घर वालों ने भी सीमा को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. चूंकि सीमा और इंद्रपाल ने प्रेम विवाह किया था. अत: दोनों खुश थे. वैसे भी संपन्न घर और शिक्षक पति पा कर सीमा फूली नहीं समा रही थी. सौरिख कस्बे के नगरिया तालपार स्थित 2 मंजिला मकान की ऊपरी मंजिल पर वह पति इंद्रपाल के साथ रहती थी, भूतल और प्रथम तल पर किराएदार रहते थे. हंसीखुशी से 3 साल कब बीत गए, दोनों को पता ही न चला.

इन 3 सालों में सीमा ने एक बेटी रक्षा को जन्म दिया. रक्षा के जन्म के 3 साल बाद सीमा ने एक और बेटी दीक्षा को जन्म दिया. दोनों बेटियों को सीमा और इंद्रपाल बेहद प्यार करते थे. सीमा पाल की इच्छा टीचर बनने की थी. अत: उस ने इंद्रपाल से प्रेम विवाह करने के बावजूद पढ़ाई जारी रखी. इस में इंद्रपाल ने भी उस का सहयोग किया. बीए पास करने के बाद उस ने बीएड किया. फिर जब शिक्षकों की भरती निकली तो उस ने भी आवेदन किया. सीमा पाल के भाग्य ने साथ दिया और उस का चयन प्राथमिक पाठशाला की शिक्षिका के लिए हो गया. चयन होने के बाद सीमा पाल प्राथमिक पाठशाला, चिकनपुर में सहायक अध्यापिका के तौर पर पढ़ाने लगी.

सीमा पाल को सरकारी नौकरी मिली तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. अब वह मायके भी जाने लगी थी. उस का भाई मनोज पाल भी उस के घर आनेजाने लगा था. इंद्रपाल का भी ससुराल आनाजाना शुरू हो गया था. मनोज की शादी में सीमा और इंद्रपाल ने मनोज की हरसंभव मदद भी की थी. वैसे भी मनोज को जब भी आर्थिक परेशानी होती थी, इंद्रपाल उस की मदद कर देता था. सीमा और इंद्रपाल की जिंदगी खुशियों से भरी थी. दोनों खूब कमाते थे. सीमा सरकारी टीचर थी, तो इंद्रपाल ने भाउलपुर में अपना निजी विद्यालय खोल लिया था. दोनों की खुशियों में ग्रहण तब लगा, जब एक रोज मनोज अपने जीजा इंद्रपाल की शिकायत करने बहन के घर आया.

उस ने सीमा को बताया कि जीजाजी ने उस के घर आतेजाते उस की पत्नी शिखा को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उस से नाजायज रिश्ता बना लिया है. बहन आप उन को समझाओ कि वह उस का घर बरबाद न करें. भाई की बात सुन कर सीमा के तनबदन में आग लग गई. शाम को इंद्रपाल जब विद्यालय से घर आया तो सीमा ने शिखा को ले कर सवालजवाब किया. इस पर इंद्रपाल हंस कर बोला, ‘‘शिखा हमारी सलहज है. उस से मैं हंसबोल कर अपना मन बहला लेता हूं. उस से हमारा कोई नाजायज रिश्ता नहीं है. किसी ने जरूर तुम्हारे कान भरे हैं.’’

लेकिन सीमा को पति की बात पर यकीन नहीं हुआ. उसे पता था कि उस का भाई झूठ नहीं बोल सकता. इस के बाद तो शिखा को ले कर अकसर सीमा और इंद्रपाल में झगड़ा होने लगा. कभीकभी झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ जाता कि दोनों के बीच मारपीट हो जाती. इंद्रपाल शराब तो पहले से ही पीता था, लेकिन अब वह कुछ ज्यादा ही पीने लगा और सीमा से झगड़ा करने लगा. इसी लड़ाईझगड़े के बीच सीमा ने तीसरी बेटी दिशा को जन्म दिया. सीमा और इंद्रपाल के बीच में अब गहरी दरार पड़ गई थी. वह दोनों रहते जरूर एक छत के नीचे थे, लेकिन दोनों के बिस्तर अलग हो गए थे.

सीमा अपने बच्चों के साथ अलग कमरें में रहने लगी थी. इंद्रपाल दूसरे कमरे में बिस्तर पर करवटें बदलता रहता था. कईकई दिनों तक दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी. पतिपत्नी के बीच तनाव चल ही रहा था कि इसी बीच अशोक ने सीमा के घर आनाजाना शुरू किया. अशोक, सौरिख में ही रहता था और रिश्ते में इंद्रपाल का भाई लगता था. वह कार चलाता था और खूब सजसंवर कर रहता था. अशोक को सीमा और इंद्रपाल के बीच तनाव की बात पता चली तो वह सीमा को रिझाने की कोशिश करने लगा. वह जब भी आता, सीमा से मीठीमीठी बातें करता तथा उस के रूप की प्रशंसा भी करता. सीमा पति की उपेक्षा की शिकार थी.

इस कारण धीरेधीरे सीमा, अशोक की ओर आकर्षित होने लगी. दोनों के बीच देवरभाभी का रिश्ता था, सो हंसीमजाक भी होने लगी. सीमा और अशोक के बीच चाहत बढ़ी तो अवैध रिश्ता कायम होने में भी देर नहीं लगी. अशोक का सीमा से मिलनाजुलना बढ़ा तो इंद्रपाल के कान खड़े हो गए. उस ने दोनों पर नजर रखनी शुरू की तो एक रोज दोनों को रंगे हाथ पकड़ लिया. फिर तो उस रोज इंद्रपाल ने सीमा की जम कर पिटाई की और सारा गुबार निकाला. इस के बाद तो यह रवैया ही चल पड़ा. जिस रोज इंद्रपाल को पता चल जाता कि अशोक आया था, वह सीमा की जम कर पिटाई करता. कई बार उस का अशोक से भी झगड़ा हुआ.

सीमा, अशोक की इतनी दीवानी बन गई थी कि वह पति की पिटाई के बावजूद उस का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. एक दिन तो सीमा ने हद ही कर दी. उस ने अपनी तीनों बेटियों को बहाने से अपनी सास माया के पास छोड़ा और प्रेमी अशोक के साथ भाग गई. इंद्रपाल और उस के घरवालों को जानकारी हुई तो वह सब दंग रह गए. उन्होंने थाना सौरिख में शिकायत दर्ज कराई. तब पुलिस ने कई रोज बाद सीमा को अशोक के एक रिश्तेदार के घर से बरामद किया. घरवालों के मनाने व समझाने के बाद सीमा, इंद्रपाल के साथ रहने को राजी हुई. सीमा और इंद्रपाल में समझौता तो हो गया था, लेकिन उन के दिलों में गांठ पड़ गई थी. दोनों एक दूसरे पर शक भी करते थे.

उन के बीच तूतू मैंमैं अब भी होती रहती थी. कभीकभी मारपीट भी हो जाती थी. सीमा ने अशोक से संबंध अब भी खत्म नहीं किए थे. वह उस से चोरीछिपे मिलती रहती थी. 28 नवंबर, 2020 की सुबह 4 बजे सीमा चीखनेचिल्लाने लगी कि उस के पति इंद्रपाल की किसी ने हत्या कर दी. उस की चीख सुन कर उस के मकान में रहने वाले किराएदर आ गए. इन्हीं में से किसी ने इंद्रपाल के घर वालोें को सूचना दे दी. उस के बाद तो घर में सनसनी फैल गई. इंद्रपाल के पिता श्रीकृष्ण, मां माया देवी, चाचा लंकुश तथा चचेरा भाई राजू आ गया. इंद्रपाल का शव देख कर वह सब हैरान रह गए. कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ने बेटे की हत्या की सूचना थाना सौरिख पुलिस को दी.

सूचना पाते ही थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा पुलिस दल के साथ रवाना हो लिए. रवाना होने से पहले उन्होंने शिक्षक इंद्रपाल की हत्या की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा जिस समय इंद्रपाल के नगरिया तालपार स्थित मकान पर पहुंचे. उस समय वहां भारी भीड़ जुटी थी. श्री वर्मा पुलिसकर्मियों के साथ मकान के द्वितीय तल स्थित उस कमरे में पहुंचे जहां इंद्रपाल की लाश पड़ी थी. श्री वर्मा ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. इंद्रपाल की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के शरीर पर चोटों के कई निशान थे. शरीर को किसी नुकीली चीज से गोदा गया था. शव के पास ही शराब की टूटी बोतल पड़ी थी. संभवत: इसी टूटी बोतल से उस के शरीर को गोदा गया था.

हत्या संभवत: मुंह नाक दबा कर की गई थी. कमरे में खून फैला था. मृतक की उम्र लगभग 45 वर्ष के आसपास थी. पुलिस ने शराब की टूटी बोतल को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह तथा डीएसपी शिवकुमार थापा मौका ए वारदात आ गए. उन्होंने मौके पर फौरेंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा मृतक की पत्नी व घर वालों से पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. उस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए कन्नौज के जिला अस्पताल भेज दिया गया.

हत्या का खुलासा करने के लिए एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने डीएसपी शिवकुमार थापा के निर्देशन में पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा, स्वाट टीम प्रभारी राकेश कुमार सिंह तथा सर्विलांस प्रभारी शैलेंद्र सिंह को शामिल किया गया. गठित टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर मृतक की पत्नी सीमा पाल से पूछताछ की. सीमा ने बताया कि पति की हत्या उस के मकान में रहने वाले किराएदार प्रवीण उर्फ विक्की ने की है. उस का पति से झगड़ा हुआ था. टीम ने प्रवीण को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि इंद्रपाल ने प्लौट खरीदने के लिये डेढ़ लाख रुपए उस से उधार लिया था, जिस में 70 हजार रुपए वह लौटा चुका था.

उस का इंद्रपाल से कोई झगड़ा न था. सीमा उसे गलत फंसा रही है. जबकि सच्चाई यह है कि इंद्रपाल की हत्या का रहस्य सीमा के ही पेट में छिपा है. प्रवीण से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने मृतक के पिता श्रीकृष्ण, चाचा लंकुश, मां माया देवी तथा चचेरे भाई राजू से पूछताछ की. उन सब ने बताया कि सीमा बदचलन है. उस ने अपने प्रेमी अशोक के साथ मिल कर इंद्रपाल की हत्या की है. यदि उस से सख्ती से पूछताछ की जाए तो आज ही हत्या का भेद खुल सकता है. सीमा संदेह के घेरे में आई तो पुलिस टीम ने उसे घर से गिरफ्तार कर लिया तथा उस का मोबाइल कब्जे में ले लिया. सर्विलांस प्रभारी शैलेंद्र सिंह ने उस के मोबाइल को खंगाला तो 27 नवंबर की रात 11 बजे उस ने 2 मोबाइल नंबरों पर बात की थी.

इन नंबरों को खंगाला गया तो पता चला कि एक मोबाइल नंबर सीमा के भाई मनोज पाल का है तथा दूसरा सीमा के प्रेमी अशोक का है. पुलिस टीम ने इन फोन नंबरों के आधार पर सीमा से कड़ाई से पूछताछ की तो वह टूट गई और पति इंद्रपाल की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. सीमा ने बताया कि अशोक के साथ उस के नाजायज संबंध थे, जिस का विरोध इंद्रपाल करता था और उस के साथ मारपीट करता था. इस मारपीट से वह आजिज आ गई थी और पति से छुटकारा पाना चाहती थी. 27 नवंबर की रात 10 बजे इंद्रपाल शराब पी कर घर आया और अशोक को ले कर झगड़ा करने लगा. उस ने उसे खूब पीटा. तब उस ने फोन कर अपने भाई मनोज पाल व प्रेमी अशोक को बुलवा लिया. अशोक अपने भाई राजेश को भी साथ लाया था.

उन चारों ने मिल कर इंद्रपाल की हत्या की योजना बनाई. इंद्रपाल उस समय अपने कमरे में नशे में धुत पड़ा था. उन चारों ने मिल कर पहले इंद्रपाल की पिटाई की फिर शराब की बोतल जो कमरे में लुढ़की पड़ी थी, अशोक ने उसी बोतल को तोड़ कर उस के नुकीले भाग से उस के शरीर को गोदा. उस के बाद नाकमुंह दबा कर उस की हत्या कर दी. फिर अशोक, राजेश व मनोज फरार हो गए. उन के जाने के बाद वह रोनेधोने का ड्रामा करने लगी. सीमा से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए मुखबिरों को लगाया. दूसरे ही दिन एक मुखबिर की सूचना पर मनोज पाल को सौरिख विधूना मार्ग स्थित बिजलीघर के पास से गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. अशोक व राजेश पुलिस की गिरफ्त में न आ सके. चूंकि सीमा व मनोज पाल ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था. अत: थानाप्रभारी विजय बहादुर वर्मा ने मृतक के पिता श्रीकृष्ण की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत सीमा, मनोज, अशोक तथा राजेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सीमा व मनोज को विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. 2 दिसंबर 2020 को पुलिस ने अभियुक्त सीमा व मनोज पाल को कन्नौज कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अशोक व राजेश फरार थे. आरोपी सीमा की बेटियां बाबा श्रीकृष्ण के संरक्षण में पल रही थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News : भतीजे संग रंगे हाथों पकड़ी गई पत्नी को मारकर पंखे में लटकाया

UP News : पारिवारिक रिश्ते और मानमर्यादाएं परिवार को बांधने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन 2 बच्चों की मां सुमन ने इन रिश्तों को इस तरह तारतार किया कि…

महेंद्र सिंह को पिछले कुछ दिनों से अजय का अपने घर में आनाजाना ठीक नहीं लग रहा था. वह आता था तो उस की पत्नी सुमन उस से कुछ ज्यादा ही घुलमिल कर बातें करती थी. वैसे तो अजय उस के भाई का ही बेटा था, लेकिन महेंद्र सिंह को उस के लक्षण कुछ ठीक नहीं लग रहे थे. अजय जब महेंद्र सिंह की मानसिक परेशानी का कारण बनने लगा तो एक दिन उस ने सुमन से पूछा कि अजय क्यों बारबार घर के चक्कर लगाता है. इस पर सुमन ने तुनकते हुए कहा, ‘‘अजय तुम्हारे भाई का बेटा है. वह आता है, तो क्या मैं इसे घर से निकाल दूं?’’

महेंद्र सिंह को सुमन की बात कांटे की तरह चुभी तो लेकिन उस के पास सुमन की बात का जवाब नहीं था. वह चुप रह गया. महेंद्र सिंह कानपुर शहर के बर्रा भाग 6 में रहता था. वह मूलरूप से औरैया जिले के कस्बा सहायल का रहने वाला था. वह अपने भाइयों में सब से छोटा था. उस से बड़े उस के 2 भाई थे— मानसिंह और जयसिंह. सब से बड़े भाई मानसिंह के 2 बेटे थे अजय सिंह और ज्ञान सिंह. ज्ञान सिंह की शादी हो गई थी. अजय सिंह अविवाहित था. महेंद्र सिंह की शादी जिला कन्नौज के कस्बा तिर्वा निवासी नरेंद्र सिंह की बेटी सुमन के साथ हुई थी. नरेंद्र के 2 बच्चे थे सुमन और गौरव. लाडली और बड़ी होने की वजह से सुमन शुरू से ही जिद्दी स्वभाव की थी. वह जो ठान लेती, वही करती.

शादी हो कर सुमन जब ससुराल आई, तो उसे ससुराल रास नहीं आई. चंद महीने बाद ही वह पति के साथ कानपुर आ कर रहने लगी. सुमन का पति महेंद्र सिंह दादानगर स्थित एक फैक्ट्री में सुरक्षागार्ड की नौकरी करता था. उस की आमदनी सीमित थी. इस के बावजूद सुमन फैशनपरस्त थी. वह अपने बनावशृंगार पर खूब खर्च करती थी. लेकिन शुरूशुरू में जवानी का जुनून था, इसलिए महेंद्र सिंह ने इन सब पर ध्यान नहीं दिया था. उसे तो बस उस की अदाएं पसंद थीं. समय के साथ सुमन ने पूजा और विभा 2 बेटियों को जन्म दिया. शादी के कुछ समय बाद ही महेंद्र सिंह महसूस करने लगा था कि उस की पत्नी उस के साथ संतुष्ट नहीं है.

दरअसल, सुमन नरेंद्र सिंह की एकलौती बेटी थी और अपनी शादी के बारे में बड़ेबड़े ख्वाब देखा करती थी. लेकिन उस के पिता ने उस की शादी एक साधारण सुरक्षा गार्ड से कर दी थी, जिस से उस के सारे अरमान चूरचूर हो गए थे. और वह बच्चों और चौकेचूल्हे में उलझ कर रह गई थी. फिर भी जिंदगी की गाड़ी जैसेतैसे चलती रही. कहानी ने मान सिंह के बड़े बेटे ज्ञान सिंह की शादी के बाद एक नया मोड़ लिया. ज्ञान सिंह की शादी के मौके पर सुमन ने महसूस किया कि अजय उस का कुछ ज्यादा ही खयाल रख रहा है. वह खाने की थाली ले कर सुमन के पास आया और उस के सामने टेबल पर रखते हुए बोला, ‘‘यहां बैठ कर खाओ चाची.’’

सुमन मुसकरा कर थाली अपनी ओर खिसकाने लगी, तो अजय भी उस की ओर देख कर मुसकराते हुए चला गया. थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में दूसरी थाली थी. वह सुमन के पास ही बैठ कर खाना खाने लगा. खाना खातेखाते दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा, तो अजय बोला, ‘‘चाची तुम सुंदर भी हो और स्मार्ट भी. लेकिन चाचा ने तुम्हारी कद्र नहीं की.’’

अजय सिंह ने यह कह कर सुमन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. ज्ञान सिंह की बारात करीब के ही गांव में जानी थी. शाम को रिश्तेदार व परिवार के लोग बारात में चले गए. लेकिन अजय बारात में नहीं गया. उसी रात जब दरवाजे पर दस्तक हुई, तो सुमन ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर अजय खड़ा था. सुमन ने हैरानी से पूछा, ‘‘तुम… बारात में नहीं गए. यहां कैसे?’’

दरवाजा खुला था, अजय सिंह अंदर आ गया तो सुमन ने दरवाजा बंद कर दिया. सुमन की आंखें तेज थीं. उस ने अजय की आंखों की भाषा पढ़ ली.

‘‘चाची, मुझे तुम से कुछ कहना है. बहुत दिनों से सोच रहा हूं, पर मौका ही नहीं मिल पा रहा था. आज अच्छा मौका मिला, इसलिए मैं बारात में नहीं गया.’’ अजय ने कमरे में पड़े पलंग पर बैठते हुए कहा.

‘‘ऐसी क्या बात है, जिस के लिए तुम्हें मौके की तलाश थी?’’ सुमन ने पूछा, तो अजय तपाक से बोला,‘‘चाची आया हूं तो मन की बात कहूंगा जरूर. तुम्हें बुरा लगे या अच्छा. दरअसल बात यह है कि तुम मेरे मन को भा गई हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार…’’ सुमन ने अजय को गौर से देखा.

आज वह पहले वाला अजय नहीं था, जिसे वह बच्चा समझती थी. अजय जवान हो चुका था. पलभर के लिए सुमन डर गई. उस ने कभी नहीं सोचा था कि वह उस से ऐसा भी कुछ कह सकता है.

‘‘अजय, तुम यहां से जाओ, अभी इसी वक्त.’’ सुमन ने सख्ती से कहा, तो अजय ने पूछा, ‘‘चाची क्या तुम मेरी बात का बुरा मान गईं. मैं ने तो मजाक में कहा था.’’

‘‘अजय, मैं ने कहा न जाओ यहां से.’’ डांटते हुए सुमन ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया, तो उस के तेवर देख अजय डर कर वहां से चला गया.

अजय तो चला गया लेकिन सुमन रात भर सोच में डूबी अपने मन को टटोलती रही. वह सचमुच महेंद्र सिंह से संतुष्ट नहीं थी. उस की जिंदगी फीकी दाल और सूखी रोटी की तरह थी. पिछले कुछ समय से महेंद्र सिंह की तबियत भी ढीली चल रही थी. ड्यूटी से आने के बाद वह खाना खाते ही सो जाता था. वह पति से क्या चाहती है, यह महेंद्र सिंह ने न तो कभी सोचा और न जानने की कोशिश की. यही वजह थी कि सुमन का मन विद्रोह कर उठा. उस ने मन को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन न चाहते हुए भी उस की सोच नएनए जवान हुए अजय के आस पास ही घूमती रही. उस का मन पूरी तरह बेइमान हो चुका था.

आखिरकार उस ने निर्णय ले लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. चाहे इस के लिए रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. कोई भी औरत जब बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही सुमन के मामले में हुआ. दूसरी ओर अजय यह सोच कर डरा हुआ था कि चाची ने चाचा को सब कुछ बता दिया तो तूफान आ जाएगा. इसी डर से वह सुमन से नहीं मिला. इधर सुमन फैसला करने के बाद तैयार बैठी अजय का इंतजार कर रही थी. उस ने मिलने की कोशिश नहीं की, तो सुमन ने उसे स्वयं ही बुला लिया.

अजय आया तो सुमन ने उसे देखते ही उलाहने वाले लहजे में कहा, ‘‘मुझे राह बता कर खुद दूसरी राह चले गए. क्या हुआ, आए क्यों नहीं?’’

‘‘मैं ने सोचा, शायद तुम्हें मेरी बात बुरी लगी. इसीलिए…’’ अजय ने कहा तो सुमन बोली, ‘‘रात में आना, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

अजय सिंह समझ गया कि उस का तीर निशाने पर भले ही देर से लगा हो, पर लग गया है. वह मन ही मन खुश हो कर लौट गया. सुमन का पति महेंद्र सिंह दूसरे दिन ही बारात से लौटने के बाद वापस कानपुर आ गया था. लेकिन पत्नी व बच्चों को गांव में ही छोड़ गया था. इसी बीच सुमन और अजय नजदीक आने का प्रयास करने लगे थे. सुमन ने अजय को मिलन का खुला आमंत्रण दिया था. अत: वह बनसंवर कर देर शाम सुमन के कमरे पर पहुंच गया. उस ने दरवाजे पर दस्तक दी तो सुमन ने दरवाजा खोल कर उसे तुरंत अंदर बुला लिया. उस के अंदर आते ही सुमन ने दरवाजा बंद कर लिया.

अजय पलंग पर बैठ गया, तो सुमन उस के करीब बैठ कर उस का हाथ सहलाने लगी. अजय के शरीर में हलचल मचने लगी. वह समझ गया कि चाची ने उस की मोहब्बत स्वीकार कर ली. इसी छेड़छाड़ के बीच कब संकोच की सारी दीवारें टूट गईं, दोनों को पता हीं नहीं चला. बिस्तर पर रिश्ते की मर्यादा भले ही टूट गई, लेकिन सुमन और अजय के बीच स्वार्थ का पक्का रिश्ता जरूर जुड़ गया. अपने इस रिश्ते से दोनों ही खुश थे. सुमन अपनी मौजमस्ती के लिए पाप की दलदल में घुस तो गई, पर उसे यह पता नहीं था कि इस का अंजाम कितना भयंकर हो सकता है. उस दिन के बाद अजय और सुमन बिस्तर पर जम कर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे.

अजय सुमन के लिए बेटे जैसा था और अजय के लिए वह मां जैसी. लेकिन वासना की आग ने उन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया था. सुमन लगभग एक माह तक गांव में रही और गबरू जवान अजय के साथ मौजमस्ती करती रही. उस के बाद वह वापस कानपुर आ गई और पति के साथ रहने लगी. अजय और सुमन के बीच अब मिलन तो नहीं हो पाता था, लेकिन मोबाइल फोन पर दोनों की बात होती रहती थी. सुमन के बिना न अजय को चैन था और न अजय के बिना सुमन को. आखिर जब अजय से न रहा गया तो वह सुमन के बर्रा भाग 6 स्थित घर पर किसी न किसी बहाने से आने लगा. उस ने सुमन के साथ फिर से संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो सब गुपचुप चलता रहा.

लेकिन फिर अजय का इस तरह सुमन के पास आनाजाना पड़ोसियों को खटकने लगा. लोगों को पक्का यकीन हो गया कि चाचीभतीजे के बीच नाजायज रिश्ता है. नाजायज रिश्तों को ले कर पड़ोसियों ने टोकाटाकी की तो महेंद्र सिंह के होश उड़ गए. उस की पत्नी उसी के सगे भतीजे के साथ मौजमस्ती कर रही थी, यह बात भला वह कैसे बरदाश्त कर सकता था. वह गुस्से में तमतमाता घर पहुंचा. सुमन उस समय घर के कामकाज निपटा रही थी. उसे देखते ही वह गुस्से में बोला, ‘‘तेरे और अजय के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुमन ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘मतलब छोड़ो. यह बताओ कि अजय यहां क्या करने आता है?’’ महेंद्र सिंह ने पूछा तो सुमन बोली, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो तुम? अजय तुम्हारा भतीजा है. बात क्या है. उखड़े हुए से क्यों लग रहे हो?’’

‘‘तू मेरी पीठ पीछे क्या करती है, मुझे सब पता है. तेरी पाप लीला पूरे मोहल्ले के सामने आ चुकी है. तूने मुझे किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘अपनी पत्नी पर गलत इलजाम लगा रहे हो. तुम्हें शर्म आनी चाहिए.’’ सुमन ने रोते हुए कहा, तो महेंद्र सिंह बोला, ‘‘देखो, अब भी वक्त है. संभल जा, नहीं तो अंजाम अच्छा न होगा.’’

महेंद्र सिंह ने भतीजे अजय सिंह को भी फटकार लगाई और बिना मतलब घर न आने की हिदायत दी. महेंद्र सिंह की सख्ती से सुमन और अजय डर गए. अजय का आनाजाना भी कम हो गया. अब वह तभी आता जब उसे कोई जरूरी काम होता. वह भी चाचा महेंद्र सिंह की मौजूदगी में. महेंद्र सिंह अपने बड़े भाई मान सिंह का बहुत सम्मान करता था. इसलिए उस ने अजय की शिकायत भाई से नहीं की थी. लौकडाउन के दौरान मान सिंह ने महेंद्र सिंह से 5 हजार रुपए उधार लिए थे और फसल तैयार होने के बाद रुपया वापस करने का वादा किया था. अजय का आनाजाना कम हुआ तो महेंद्र सिंह ने राहत की सांस ली. उसे भी लगने लगा था कि अब सुमन और अजय का अवैध रिश्ता खत्म हो गया है. लिहाजा उस ने सुमन पर निगाह रखनी भी बंद कर दी थी.

20 जनवरी, 2021 की दोपहर 12 बजे महेंद्र सिंह ने पड़ोसियों को बताया कि उस की पत्नी सुमन ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस की बात सुन कर पड़ोसी सन्न रह गए. कुछ ही देर बाद उस के दरवाजे पर भीड़ बढ़ने लगी. इसी बीच महेंद्र सिंह ने पत्नी के मायके वालों तथा थाना बर्रा पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह घटनास्थल पर आ गए. उस समय महेंद्र सिंह के घर पर भीड़ जुटी थी. मृतका सुमन की लाश कमरे में पलंग पर पड़ी थी. उस के गले में फांसी का फंदा था, किंतु गले में रगड़ के निशान नहीं थे. फांसी के अन्य लक्षण भी नजर नहीं आ रहे थे.

संदेह होने पर थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने पुलिस अधिकारियों को सूचित किया तो कुछ देर बाद एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन्हें भी महिला की मौत संदिग्ध लगी. फोरैंसिक टीम को भी आत्महत्या जैसा कोई सबूत नहीं मिला. पुलिस अधिकारी मौकाएवारदात पर अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि मृतका सुमन के मायके पक्ष के दरजनों लोग आ गए. आते ही उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया और महेंद्र पर सुमन की हत्या का आरोप लगाया तथा उसे गिरफ्तार करने की मांग की.

चूंकि पुलिस अधिकारी वैसे भी मामले को संदिग्ध मान रहे थे, अत: पुलिस ने मृतका के पति महेंद्र सिंह को हिरासत में ले लिया तथा शव पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. दूसरे रोज शाम 5 बजे मृतका सुमन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह को प्राप्त हुई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो उन की शंका सच साबित हुई. रिपोर्ट में बताया गया कि सुमन ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि गला दबा कर उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने मृतका के पति महेंद्र सिंह से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने पत्नी सुमन की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

महेंद्र सिंह ने बताया कि उस की पत्नी सुमन के भतीजे अजय सिंह से नाजायज संबंध पहले से थे. उस ने कल शाम 4 बजे सुमन और अजय को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस समय अजय तो सिर पर पैर रख कर भाग गया. लेकिन सुमन की उस ने जम कर पिटाई की. देर रात अजय को ले कर उस का फिर सुमन से झगड़ा हुआ. गुस्से में उस ने सुमन का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. पुलिस और पड़ोसियों को गुमराह करने के लिए उस ने सुमन के शव को उसी की साड़ी का फंदा बना कर कुंडे से लटका दिया. सुबह वह बड़ी बेटी पूजा को ले कर डाक्टर के पास चला गया.

उसे हल्का बुखार था. वहां से दोपहर 12 बजे वापस आया तो उस ने पत्नी द्वारा आत्महत्या कर लेने का शोर मचाया. उस के बाद पड़ोसी आ गए. चूंकि महेंद्र सिंह ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने मृतका के भाई गौरव को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत महेंद्र सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे गिरफ्तार कर लिया. 22 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त महेंद्र सिंह को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सुमन की मासूम बेटियां पूजा और विभा ननिहाल में नानानानी के पास रह रही थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affair : प्रेमी से कराई पति की हत्या, वजह सुनकर उड़ जाएंगे होश

Extramarital Affair : अलगअलग धर्मों के होने के बावजूद भी संजय और रेशमा ने प्रेम विवाह किया था. शादी के 11 साल बाद 3 बच्चों की मां रेशमा के पैर बहक गए. इस के बाद रेशमा ने प्रेमी सचिन के साथ मिल कर ऐसा खेल खेला कि…

संजय उर्फ कल्लू शाहजहांपुर के सदर बाजार क्षेत्र के मोहल्ला महमंद जलालनगर में रहता था. उस के पिता अनिल प्राइवेट नौकरी करते थे. मां रमा देवी गृहिणी थीं. संजय का एक छोटा भाई दीपक भी था. करीब 11 साल पहले संजय ने रेशमा नाम की युवती से प्रेम विवाह किया था, वह दूसरे धर्म की थी. कालांतर में रेशमा ने 2 बेटों अंशू (10 वर्ष), अजय (4 वर्ष) और एक बेटी चांदनी (डेढ़ वर्ष) को जन्म दिया. संजय मैडिकल कालेज में प्राइवेट तौर पर लगी बोलेरो को चलाता था. संजय चूंकि संयुक्त परिवार में रहता था, इसलिए रेशमा की आजादी पर बंदिशें थीं. उस ने संजय से कहना शुरू कर दिया,

‘‘आखिर कब तक तुम अपने पिता के बताए रास्ते पर चल कर दिन भर की गाढ़ी कमाई उन के हाथों में थमाते रहोगे. अब हमारा भी तो परिवार है, क्या हम अपने परिवार के लिए कुछ भी जमा कर के नहीं रखेंगे? तुम कहीं और मकान देख लो, अब हम यहां नहीं रह सकते.’’

रेशमा की बातों को एकाध बार तो संजय ने नजरअंदाज कर दिया और रेशमा को समझाया भी लेकिन वह नहीं मानी और बारबार उस पर अलग होने का दबाव बनाने लगी. आखिर संजय ने रेशमा की इच्छा के सामने घुटने टेक दिए. इस के बाद संजय रेशमा और तीनों बच्चों के साथ कांशीराम कालोनी में रहने चला गया. यहां वे सब मजे से रहने लगे. कालोनी की जिस बिल्डिंग में संजय रहता था, उसी बिल्डिंग में भूतल पर सचिन नाम का एक 19 वर्षीय युवक रहता था. सचिन शहर के ही अजीजगंज मोहल्ले में रहने वाले सुमित कुमार का बेटा था. कांशीराम कालोनी में भी उसे आवास आवंटित हो गया था. सचिन का परिवार अजीजगंज में तो सचिन कांशीराम कालोनी में रहता था. सचिन ईरिक्शा चलाता था. वह अविवाहित था.

सचिन कम पढ़ालिखा था, लेकिन उस के व्यक्तित्व और बात करने के अंदाज से कभी यह नहीं लगता था कि वह अधिक पढ़ा नहीं है. देखने में भी काफी सुंदर था. उस का मन होता तो ईरिक्शा ले कर काम पर चला जाता, मन नहीं होता तो घर पर ही पड़ा रहता. एक ही बिल्डिंग में होने के कारण सचिन की नजर रेशमा पर पड़ गई थी. रेशमा भी सचिन के सामने आने पर एकटक उसे निहारती रहती थी. निगाहें मिलतीं तो दोनों के होंठ मुसकराने लगते. उन के बीच परिचय हुआ तो बातें भी होने लगीं. सचिन के पास एक कुत्ता था जो रेशमा को बहुत अच्छा लगता था. उसी कुत्ते की वजह से ही सचिन और रेशमा में परिचय और बातें होनी शुरू हुई थीं. रेशमा के नजदीक बने रहने के लिए सचिन को कुत्ते से बढि़या कोई तरीका नहीं लगा.

सचिन ने संजय से भी दोस्ती कर ली. रेशमा ने संजय से सचिन का कुत्ता मांग लेने की जिद की तो संजय ने उसे कई बार समझाया लेकिन रेशमा नहीं मानी. रेशमा की जिद के आगे संजय को झुकना पड़ा. एक दिन संजय ने सचिन से बात की कि अगर उसे बुरा न लगे तो वह उस का कुत्ता लेना चाहता है. इस पर सचिन ने अपना कुत्ता उसे दे दिया. सचिन ने उस से इस की कोई कीमत भी नहीं ली. संजय के दिमाग में यह कभी नहीं आया कि यह भेंट उस पर कितनी भारी पड़ेगी. जिस फ्लोर पर संजय रहता था, वहां तक पानी आसानी से नहीं पहुंचता था. इसलिए संजय ने सचिन से कह दिया कि वह अपनी मोटर से पाइप लगा कर पानी भरवा दिया करे. सचिन ने हामी भर दी.

सचिन काफी खुश था, वह जानता था कि संजय सुबह का निकला शाम को ही घर में घुसता था, पूरे दिन उस की पत्नी रेशमा घर में अकेली रहती थी. बच्चे तो उस के छोटे थे. ऐसे में रेशमा को अपने रंग में रंगने का उसे अच्छा मौका मिला था. जब से उस ने रेशमा को देखा था, उस का सौंदर्य उस की आंखों में रचबस गया था. संजय तो उस के सामने पानी भरता था, मतलब लंगूर के हाथ हूर लग गई थी. अब हर रोज किसी भी समय पानी खत्म हो जाता तो रेशमा आवाज दे कर सचिन को पानी का पाइप लगाने को कह देती. पहले कुत्ते के बहाने से और अब पानी भरवाने के बहाने से सचिन रेशमा के पास उस के कमरे में जाने लगा. इस के बाद उन के बीच बातचीत का सिलसिला और तेजी से बढ़ने लगा. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे से काफी खुल गए. उन के बीच हंसीमजाक भी शुरू हो गया.

दिन भर अकेले रहने के कारण रेशमा का मन नहीं लगता था. लेकिन जब से सचिन ने उस के यहां आनाजाना शुरू किया था, तब से उस का अकेलापन दूर हो गया था. वह अब दिन भर हंसतीमुसकराती रहती थी. उस के खिले चेहरे को देख कर सचिन को भी अच्छा लगता था. रेशमा सचिन से 12 साल बड़ी थी. रेशमा की उम्र 31 साल थी तो सचिन की 19 साल. सर्दी का समय था. घना कोहरा छाया था. ऐसे में सचिन ने रेशमा के घर का पानी भरवाया तो उस में वह भीग गया, जिस से वह सर्दी से और कांपने लगा. उस ने जा कर कपड़े चेंज किए और रेशमा के पास उस के कमरे में पहुंच गया. उसे सर्दी से कंपकंपाते हुए रेशमा ने देखा तो उस से कहा, ‘‘बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं.’’ कह कर रेशमा रसोई में चाय बनाने चली गई. सचिन भी उस के साथ पीछेपीछे रसोई में पहुंच गया.

‘‘अरे तुम क्यों आ गए, वहीं कुरसी पर बैठते. और कुछ खाना हो तो बताओ?’’

‘‘जो चाहो, खिला दो. मैं तो तुम्हारे इन कोमलकोमल हाथों से जहर खाने के लिए भी तैयार हूं.’’ कह कर सचिन ने रेशमा का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया.

‘‘हाय राम, ये क्या कर रहे हो.’’ रेशमा ने झट से अपना हाथ छुड़ा लिया.

‘‘क्यों, कुछ गलत कर दिया क्या? तुम भी तो मुझे प्यार करती हो, मैं यह अच्छी तरह से जानता हूं.’’ सचिन ने कहा.

‘‘किस ने कहा?’’ रेशमा इठलाते हुए बोली.

‘‘तुम्हारी आंखों ने…क्यों सच कह रही हैं न तुम्हारी आंखें?’’ सचिन ने रेशमा की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘तुम बड़े बेशर्म हो.’’ रेशमा ने इतरा कर बोली..

‘‘वह कैसे?’’

‘‘इतना भी नहीं जानते कि दरवाजा खुला है और इस बीच कोई आ गया तो आफत आ जाएगी.’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘अरे हां, मैं तो भूल ही गया था. क्या करूं, तुम्हारा रूप ही ऐसा है कि देखते ही सब भूल जाता हूं. संजय भाई की तो पांचों अंगुलियां घी में तैरती हैं.’’

रेशमा ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उन की छोड़ो वह जैसे हैं वैसे ही रहेंगे जिंदगी भर. तुम अपनी बताओ कि तुम्हारे दिल में क्या है मेरे रूप का नशा तुम पर किस हद तक चढ़ा है.’’ रेशमा ने कहा. रेशमा की बात सुन कर सचिन को इस बात का एहसास हो गया कि रेशमा को भी उस से लगाव हो गया है. वह भी उस के सान्निध्य में आना चाहती है. उस ने देर न करते हुए रेशमा को बांहों में भर लिया. रेशमा ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि मंदमंद मुसकराने लगी. क्योंकि वह भी यही चाहती थी. दरअसल, जब से उस ने सचिन को देखा था तब से वह उस के मन को भा गया था. संजय से मिलने वाले सुख की उसे कमी नहीं थी, लेकिन वह उतना उसे पसंद नहीं था जितना सचिन. सचिन के आगे संजय कहीं नहीं ठहरता था.

जब आंखें किसी को देखना पसंद करने लगें तो दिल भी उसे चाहने लगता है. दिल की चाहत में वह बहकती चली गई और सचिन ने भी अपना हाथ बढ़ा कर उसे पाना चाहा तो वह उस के आगोश में जाने से अपने आप को रोक न सकी. सचिन ने उसे गोद में उठा कर बैड पर लिटाया और उस के दिल के अरमानों को हवा देनी शुरू कर दी. थोड़ी ही देर में दोनों के निर्वस्त्र शरीर एकदूसरे से गुंथे हुए थे. उस दिन रेशमा ने मानमर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ कर नाजायज रिश्तों के दलदल में पैर डाले तो उस में धंसती चली गई. अब हर रोज संजय की गैरमौजूदगी में सचिन उस के घर में ही पड़ा रहता और रेशमा भी उस की बांहों का हार बनी रहती.

इस की जानकारी कालोनी के लोगों को भी हो गई. वे तरहतरह की बातें करने लगे. जल्द ही यह बात संजय के कानों तक भी पहुंच गई. संजय ने जब रेशमा से इस बारे में बात की तो वह संजय से बोली कि सचिन के साथ भाईबहन के रिश्ते के अलावा कोई रिश्ता नहीं है. संजय को पत्नी रेशमा की बात पर यकीन करना ही पड़ा. लेकिन उस के मन से शक का बीज नहीं निकला. फिर एक दिन उस ने अचानक घर पहुंच कर दोनों को रंगेहाथ पकड़ा तो उस ने रेशमा की जम कर पिटाई की.  रेशमा नाराज हो कर अपने मायके चली गई. बाद में संजय उसे मायके से बुला कर ले आया. पर रेशमा के दिल से सचिन के लिए मोहब्बत कम न हुई.

3/4 दिसंबर, 2020 की रात चौक कोतवाली की अजीजगंज चौकी के इंचार्ज जितेंद्र प्रताप सिंह रात्रि गश्त पर निकले. रात करीब साढ़े 12 बजे आवास विकास कालोनी पावर हाउस के सामने एक बोलेरो खड़ी मिली, जिस में ड्राइविंग सीट पर एक व्यक्ति था जो बाईं ओर लुड़का हुआ था. जब पास जा कर जांच की तो उस व्यक्ति की कनपटी के पीछे गोली लगने का निशान था. गोली कनपटी से लग कर माथे के पास से निकल गई थी. चौकी इंचार्ज सिंह घायल व्यक्ति को तुरंत जिला अस्पताल ले गए. वहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. मृत व्यक्ति की जेब से मिले मोबाइल फोन में सेव नंबरों पर पुलिस ने बात की तो उन्हीं नंबरों में उस की पत्नी रेशमा का फोन नंबर मिल गया. पुलिस ने रेशमा को जिला अस्पताल बुलाया. लाश देख कर रेशमा ने इस की शिनाख्त अपने पति संजय के रूप में की.

चौक थानाप्रभारी प्रवेश सिंह को चौकी इंजार्ज जितेंद्र प्रताप सिंह ने सूचना दे दी थी. सूचना पा कर वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. बोलेरो का निरीक्षण किया तो बाईं ओर खिड़की के पास पायदान पर हत्या में प्रयुक्त गोली पड़ी मिली, जिसे उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया. ड्राइविंग सीट के पास वाली सीट पर खून फैला हुआ था. इस का मतलब यह था कि किसी ने दाईं ओर से ड्राइविंग सीट पर बैठे संजय को गोली मारी थी और गोली काफी नजदीक से मारी गई थी. हत्यारा संजय का परिचित था, जिस के कहने पर या उसे देख कर संजय ने गाड़ी रोक ली होगी. गाड़ी रुकते ही हत्यारे ने तमंचे से संजय पर फायर कर दिया होगा.

इस के बाद जिला अस्पताल जा कर उन्होंने संजय की लाश का निरीक्षण किया. निरीक्षण कर डाक्टरों से बात करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी. रेशमा से थानाप्रभारी ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि रात साढ़े 11 बजे पति के मोबाइल पर किसी का फोन आया था, जिस के बाद वह बोलेरो ले कर घर से निकल गए थे. इस के बाद क्या हुआ, उसे कुछ नहीं पता. कोतवाली आ कर इंसपेक्टर प्रवेश सिंह ने रेशमा की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. संजय के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो रात साढे़ 11 बजे गुड्डू नाम के व्यक्ति द्वारा काल करने की बात पता चली. गुड््डू संजय का दोस्त था. इंसपेक्टर सिंह ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि एक काम के सिलसिले में उस ने संजय को बुलाया था.

संजय के घर आनेजाने वाले लोगों के बारे में पूछने पर गुड्डू ने बताया कि 2 महीने पहले तक कांशीराम कालोनी की उसी बिल्डिंग में रहने वाले सचिन का संजय के घर काफी आनाजाना था. संजय की पत्नी रेशमा से सचिन के अवैध संबंध थे. लेकिन संजय ने उसे रंगेहाथों पकड़ा, तब से वह अपने अजीजगंज के पुराने घर में रहने लगा था. यह जानकारी पुलिस के लिए बड़े काम की थी. इंसपेक्टर सिंह ने रेशमा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस की सचिन से रोज घंटों बातें होने की बात पता चली. यह भी पता चला कि संजय के घर से निकलने के समय पर ही रेशमा ने सचिन को काल भी की थी, शायद संजय के घर से बाहर निकलने की बात बताने के लिए. उस ने सचिन को फोन किया होगा. साक्ष्य मिले तो इंसपेक्टर सिंह ने सचिन के घर पर दबिश दी, लेकिन वह घर से फरार मिला.

9 दिसंबर, 2020 को दोपहर लगभग 2 बजे इंसपेक्टर प्रवेश सिंह ने चांदापुर तिराहे से सचिन को गिरफ्तार कर लिया. उस के बाद रेशमा को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. कोतवाली में जब उन दोनों से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी. घटना से 2 महीने पहले रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद से रेशमा और संजय में अकसर विवाद होने लगा. यहां तक कि संजय ने रेशमा का मोबाइल भी तोड़ दिया था. इस पर सचिन ने उसे बात करने के लिए दूसरा मोबाइल ला कर दे दिया था. सचिन अब कांशीराम कालोनी में नहीं रहता था, लेकिन वहां रोज आताजाता था.

अपने बीच संजय को आया देख कर रेशमा बौखला उठी. वह पति को छोड़ कर सचिन से शादी कर के उस के साथ रहना चाहती थी. इस के लिए रेशमा ने सचिन पर दबाव बनाया कि वह संजय की हत्या कर दे. उस के बाद वह शादी कर के उस के साथ रहने लगेगी. संजय के जीवित रहते यह  संभव नहीं होगा. प्रेमिका की सलाह पर अमल करने के लिए सचिन तैयार हो गया. इस के बाद उस ने तमंचे व कारतूस का इंतजाम किया. उस ने एकदो नहीं 4 बार संजय को मारने की कोशिश की थी, लेकिन तमंचा चलाने की उस की हिम्मत नहीं हुई. इस पर रेशमा ने सचिन को धमकी दी कि यदि उस में यह थोड़ा सा काम करने की हिम्मत नहीं है तो वह उसे छोड़ देगी. इस से सचिन ने अगली बार हर हाल में संजय को मारने का वादा किया.

3 दिसंबर को रात साढ़े 11 बजे जब गुड्डू का फोन आया तो संजय बोलेरो से उस से मिलने के लिए निकला. संजय के घर से निकलते ही रेशमा ने सचिन को फोन किया और संजय के घर से निकलने की बात बताई. सचिन उस समय कांशीराम कालोनी में ही था. सचिन के पास बजाज पल्सर बाइक थी. सचिन संजय को ओवरटेक करते हुए आगे निकला और गोल चक्कर से मुड़ कर वापस आते हुए संजय को रुकने का इशारा किया. उस के इशारे को समझ कर संजय ने गाड़ी रोक दी. संजय ने जैसे ही कार का शीशा नीचे किया. सचिन ने साथ लाए तमंचे से संजय पर फायर कर दिया. गोली संजय की कनपटी के पास लग कर माथे से निकल गई. गोली लगते ही संजय बाईं ओर लुढ़क गया और उस की मौत हो गई.

गोली मारने के बाद सचिन ने तमंचा और 2 कारतूस गर्रा नदी के किनारे फेंक दिए. इस के बाद रेशमा को संजय का काम तमाम होने की बात पता चली तो उस ने भी अपना मोबाइल तोड़ दिया. लेकिन दोनों के गुनाह छिप न सके और पकड़े गए. इंसपेक्टर सिंह ने सचिन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा, 2 जिंदा कारतूस, पल्सर बाइक नंबर यूपी27यू1043, सचिन का मोबाइल 2 सिम सहित और रेशमा का टूटा मोबाइल एक सिम सहित बरामद कर लिया. मुकदमे में रेशमा को धारा 120बी का अभियुक्त बना दिया गया. आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश किया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

Crime News : प्रिंसिपल की डर्टी फिल्म

Crime News : पूर्व प्रिंसिपल श्यामलाल राठौर के 2 बेटियां थीं. वंश चलाने के लिए वह बेटा चाहते थे, लेकिन पत्नी की मौत हो चुकी थी. इस के लिए उन्होंने गीता नाम की महिला से संबंध बना लिए, लेकिन शातिर गीता ने अपने पति हिमांशु चौधरी के साथ मिल कर प्रिंसिपल साहब की ऐसी डर्टी फिल्म बनाई कि…

हिमांशु चौधरी देहरादून के एक प्रतिष्ठित मैडिकल कालेज से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा था. पढ़ाई के दौरान ही उसे विवाहिता गीता से प्यार हो गया. फिर बाद में पिछले साल 2024 के मई महीने में उस ने उस के साथ मंदिर में लव मैरिज कर ली थी. उस की एक प्यारी सी बेटी भी थी. गीता पहले पति से 3 साल पहले ही संबंध तोड़ चुकी थी. वह बेटी और हिमांशु के साथ देहरादून के किशननगर क्षेत्र के सिरमौर मार्ग पर रहने लगी थी. जल्द ही हिमांशु को यह भी जानकारी मिल गई कि गीता के किसी और से भी अवैध संबंध हैं. इस का उस ने विरोध जताने के बजाय अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की योजना बना ली.

दरअसल, हिमांशु मैडिकल की अपनी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पा रहा था. वह कई बार पेपरों में फेल भी हो चुका था. दूसरी तरफ उस ने गीता से शादी रचा कर अपना खर्च और बढ़ा लिया था. उसे अब भी पढ़ाई के लिए फीस देनी थी, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह ऐसा नहीं कर पा रहा था. इसी बीच उस ने पाया कि गीता से मिलने के लिए एक बुजुर्ग श्यामलाल अकसर आते हैं. जल्द ही उसे यह भी मालूम हो गया कि गीता और उस बुजुर्ग के संबंध काफी पुराने और गहरे हैं. उन के बीच लंबे समय से नाजायज रिश्ता बना हुआ है. संभवत: गीता के पूर्व पति से संबंध खत्म होने के यही कारण रहे होंगे.

गीता के बुजुर्ग के साथ अवैध संबंध को नजरंदाज करते हुए हिमांशु चौधरी के दिमाग में एक योजना कौंध गई. उस ने श्यामलाल राठौर को ब्लैकमेल कर उन से पैसे ऐंठने का प्लान बना डाला. इस बारे में उस ने गीता से बात की. वह भी इस के लिए सहमत हो गई. योजना के अनुसार, गीता ने 2 फरवरी, 2025 को श्यामलाल को फोन किया, ”हैलो डार्लिंग, तुम कहां हो? कई दिनों से मिले नहीं.’’

”अरे वाह! क्या बात है? मैं भी तुम्हें ही याद कर रहा था. सोच रहा था कि इस वैलेंटाइन डे पर तुम्हारी पसंद का कोई गिफ्ट दूं.’’ श्यामलाल की आवाज सुन कर गीता भी खुश हो गई.

वह चहकती हुई सैक्सी अंदाज में बोली, ”तो फिर आज ही मिलो न! अपनी पसंद भी बता दूंगी और तुम्हारी चाहत भी पूरी कर दूंगी.’’

”चलो, आता हूं, लेकिन वादे से मुकर मत जाना.’’ श्यामलाल बोले.

”अरे, आओ तो सही डार्लिंग. आज की पूरी रात तुम्हारे नाम है. पति को हौस्टल भेज दिया है. तुम से मालिश करवाने की इच्छा हो रही है.’’ गीता रामांटिक अंदाज में बोली

”ठीक है, कहो तो कुछ खानेपीने के लिए ले कर आऊं.’’ श्यामलाल की आवाज में रूमानीपन आ गया था.

”जो तुम्हारा दिल करे. तुम्हें तो मेरी पसंद का ब्रांड मालूम है. बाकी नानवेज यहीं पका लूंगी.’’ गीता बोली.

इस तरह से 2 प्रेमी युगल के बीच कुछ देर तक रोमांटिक बातें होती रहीं. जबकि दोनों की उम्र में काफी अंतर था. गीता एक खिली हुई गुलाब थी, जबकि श्यामलाल उम्र की ढलान पर दिमाग में यौवन का जोश भरे हुए थी. उन्होंने पाया कि काफी समय बाद गीता ने फोन पर ऐसी सैक्सी बातें की थीं. इसीलिए उन के दिमाग में मधुर घंटियां बज उठी थीं. देह में सिहरन पैदा हो गई थी. दैहिक मिलन का खुला निमंत्रण जो मिल चुका था. गीता ने अपने 12 साल पुराने आशिक श्यामलाल राठौर को सिरमौर मार्ग स्थित अपने घर बुलाया. वह एक रिटायर प्रिंसिपल थे. इलाके में लोग उन्हें गुरुजी कह कर बुलाते थे.

वहां पहले से ही हिमांशु चौधरी मौजूद था. उन की योजना थी कि गीता और श्यामलाल की अश्लील वीडियो हिमांशु रिकौर्ड कर लेगा. फिर उस वीडियो द्वारा उन्हें ब्लैकमेल कर मोटी रकम ऐंठ लेंगे. गीता और श्यामलाल जैसे ही एक साथ आए. हमबिस्तर होते ही किसी तरह श्यामलाल को अहसास हो गया कि कोई कमरे में छिपा हुआ है. खुद के पकड़े जाने की आशंका को भांप कर वह चिल्लाने लगे. तभी गीता और कमरे में छिपे हिमांशु चौधरी ने श्यामलाल का मुंह दबा दिया. दोनों ने हाथपांव पकड़ कर श्यामलाल को किसी तरह काबू में किया. गीता और हिमांशु भीतर से घबरा गए कि कहीं श्यामलाल उन दोनों के बारे में लोगों को बता न दें, इसलिए उन्होंने गला दबा कर उन की हत्या कर दी. इस के बाद शव को वहीं बैड के नीचे डाल कर छिपा दिया.

हिमांशु चौधरी एमबीबीएस की चतुर्थ वर्ष की पढ़ाई कर रहा था. उस ने गीता से कहा था कि वह काफी समय तक सर्जरी विभाग में रहा है. ऐसे में उसे पता है कि यदि 24 घंटे बाद शव को काटा जाए तो खून नहीं निकलेगा. लिहाजा दोनों ने इंतजार किया और शव को अगले दिन काटने की योजना बनाई. इस तरह से 3 फरवरी, 2025 की रात को हिमांशु ने रसोईघर के चाकू से ही शव को जोड़ के हिस्सों से काट डाला. पहले शव के कंधों से हाथ काटे गए. इस के बाद दोनों पैर अलग किए गए. बाद में सिर को काट कर प्लास्टिक के बोरे में बांध दिया. आगे की योजना के तहत गीता हिमांशु को शव ठिकाने लगाने के लिए कह चुकी थी.

दूसरी तरफ श्यामलाल की बेटी निधि राठौर 5 दिनों से परेशान हो रही थी. उसे रात को नींद नहीं आ रही थी. अपने पापा के अचानक लापता होने से निधि बेहद चिंता में थी. वह 7 फरवरी, 2025 को देर तक सोई हुई थी. सुबह के 9 बज चुके थे. बिस्तर से उठी थी. उस वक्त उस के सिर में दर्द हो रहा था. वह उस समय चाय बना कर पीने के मूड में थी, लेकिन मूड खराब था. उस के मन में बारबार एक ही विचार आ रहा था कि अब क्या करे? पापा को कहां ढूंढे?

देहरादून के पटेल नगर की रहने वाली निधि राठौर के पापा पूर्व प्रिंसिपल श्यामलाल उर्फ गुरुजी को लापता हुए 5 दिन गुजर चुके थे. उन्हें ढूंढने के लिए निधि समेत उन के कई रिश्तेदार लगे हुए थे. मगर उन के बारे में किसी को भी कुछ पता नहीं चल पाया था कि वे आखिर गए तो कहां गए?

अंत में निधि राठौर ने अपने रिश्तेदारों के साथ मिल कर उन की गुमशुदगी देहरादून की पटेल नगर कोतवाली में दर्ज करा दी. कोतवाली पटेल नगर के एसएचओ प्रदीप सिंह राणा ने तत्काल बुजुर्ग श्यामलाल की गुमशुदगी दर्ज कर उन की तलाश करने के निर्देश जारी कर दिए थे. बेटी निधि ने रिपोर्ट में लिखवाया कि उस के पापा श्यामलाल 2 फरवरी को किसी काम की बात बोल कर घर से अपनी स्पलेंडर बाइक से निकले थे. पुलिस ने मामले में जांच शुरू की. जांच की शुरुआत उन के फोन की अंतिम लोकेशन से शुरू की. यह लोकेशन सिरमौर मार्ग की निकली. उन के फोन में गीता नाम की महिला से कई बार बातचीत की जानकारी मिली, जो सिरमौर में रहती थी.

श्यामलाल की गुमशुदगी की जांच का काम कोतवाली के एसएसआई योगेश दत्त के जिम्मे थी, जिन्होंने इस गुमशुदगी के बारे में सीओ अंकित कंडारी और एसपी (सिटी) प्रमोद कुमार से जांच का आदेश हासिल कर लिया था. फिर लापता श्यामलाल राठौर के बारे में जानकारी करने के लिए सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक किए गए थे. सीसीटीवी फुटेज में श्यामलाल अपनी स्पलेंडर बाइक यूके07डी टी1685 से कृष्णा नगर चौक होते हुए सिरमौर रोड पर स्थित किशन नगर में स्थित एक मकान में जाते दिखाई दिए थे. पुलिस ने जब उस मकान के बारे में छानबीन की, तब पता चला कि वह मकान गीता नामक महिला का है. जांच टीम को सीसीटीवी फुटेज में श्यामलाल को गीता के घर से लौटने की एक भी तसवीर नहीं मिली.

पुलिस ने श्यामलाल के बारे में और अधिक जानकारी जुटाई. पता चला कि उन के 2 बेटियां हैं. उन्हें लोगों ने गीता से हमेशा मिलतेजुलते देखा है. वह गीता के घर मिलने के लिए जाते रहते थे. गीता का मायका जिला सहारनपुर के कस्बा देवबंद में है. पुलिस ने जब गीता और हिमांशु के मोबाइल नबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो उन के द्वारा 2 मोबाइल नंबरों पर बहुत देर तक बातें करना रिकौर्ड हुआ था. वे मोबाइल नंबर जांच में गीता के भाई अजय और हिमांशु के बहनोई धनराज निवासी कैलाश कालोनी, देवबंद के थे.

पुलिस टीम ने इन दोनों से पूछताछ करने का फैसला लिया. एसएसपी अजय सिंह ने इस जांच के लिए कोतवाल प्रदीप सिंह राणा, एसएसआई योगेश दत्त, प्रभारी विनोद गोसाईं, थानेदार विनोद राणा व कांस्टेबल आशीष शर्मा, विपिन व महिला कांस्टेबल मोनिका को भी इस टीम में शामिल कर लिया. इस के बाद पुलिस की टीम अजय और धनराज की तलाश के सिलसिले में देवबंद के लिए निकल गई. देवबंद पहुंच कर पुलिस टीम ने मुखबिर की सूचना पर अजय और धनराज को गिरफ्तार कर लिया.

दोनों को पटेलनगर कोतवाली ला कर सख्ती से पूछताछ की गई. अजय कुमार ने पुलिस को बताया कि 2 फरवरी को उस के पास उस की बहन गीता ने फोन कर बताया कि उन्होंने किसी की हत्या कर दी है. अब उस की लाश ठिकाने लगाने में मदद चाहिए. यह सुनने के बाद उस ने अपने जीता धनराज चावला को बुलाया. फिर दोनों गीता के घर पहुंच गए. वहां लाश के टुकड़े बोरे में बंद थे. उन्होंने वह बोरा उठाया और उसे 4 फरवरी को मिनी ट्रक से देवबंद लाया गया. देवबंद के गांव साखन की नहर में रात के अंधेरे में शव को फेंक दिया गया था.

इस के बाद देवबंद की साखन नहर से श्यामलाल के शव की तलाशी अभियान शुरू किया गया, लेकिन गोताखोरों को वहां शव के टुकड़े नहीं मिले. तब पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. सहारनपुर पुलिस को 20 फरवरी, 2025 को किसी इंसान की लाश के टुकड़े मिले. यह जानकारी मीडिया के द्वारा देहरादून पुलिस को मिली तो कोतवाल श्यामलाल के फेमिली वालों को ले कर सहारनपुर पहुंचे तो निधि ने उन की पहचान अपने पापा श्यामलाल के रूप में की. बरामद लाश के टुकड़ों का पंचनामा भर कर पुलिस ने उन्हें पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया.

हिमांशु और गीता तब तक पुलिस की पकड़ में नहीं आए थे. पुलिस के साइबर विभाग ने उन के मोबाइलों के लोकेशन के आधार पर बताया कि वे मुंबई में हैं. पुलिस जब मुंबई पहुंची, तब तक वे वहां से भी फरार हो चुके थे. इस के बाद पुलिस को इन दोनों की लोकेशन जयपुर की मिलने लगी. पुलिस जब वहां पहुंची, तब उन की लोकेशन प्रयागराज के महाकुंभ की मिलने लगी. वहां 4 दिनों तक दोनों की लोकेशन मिली, लेकिन उस भीड़ में उन्हें ढूंढा नहीं जा सका.

इस चूहेबिल्ली के खेल में गीता और हिमांशु पलिस की पकड़ में नहीं आ पा रहे थे. उन पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया. उन की लोकेशन 24 फरवरी को अमृतसर, पंजाब की मिली. इस लोकेशन के मुताबिक उन्होंने ट्रेन से यात्राएं की थीं. बाद में उन की लोकेशन गोल्डन टेंपल के पास आ कर ठहर गई थी. आखिरकार 26 फरवरी, 2025 की रात में पुलिस टीम को सफलता मिल गई. गीता और हिमांशु चौधरी को अमृतसर से गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों को देहरादून लाया गया. उन के सारे कारनामों की जानकारी पहले गिरफ्तार किए गए अजय कुमार और धनराज से मालूम हो चुकी थी. फिर तो गीता ने भी पुलिस के सामने सारे राज खोल दिए. उस के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

पत्नी की मौत के बाद 2 बेटियों के पिता श्यामलाल को सब से बड़ी चिंता यह थी कि उन के बाद वंश आगे नहीं बढ़ पाएगा. इसी कारण वह गीता के साथ अपने संबंधों से एक बेटा पैदा करना चाहते थे. पुलिस के मुताबिक श्यामलाल ने इस काम के लिए गीता को 20 लाख रुपए तक देने का वादा किया था. इस औफर के बाद ही गीता और हिमांशु ने अनुमान लगाया कि श्यामलाल के पास काफी रुपया है. गीता भी एकमुश्त रकम ऐंठ कर श्यामलाल से पीछा छुड़ाने की फिराक में थी. ऐसे में गीता और हिमांशु ने श्यामलाल की अश्लील वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने और रुपए ऐंठने का प्लान बनाया था. गीता ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उस के श्यामलाल के साथ पिछले 12 सालों से अनैतिक संबंध थे.

श्यामलाल उसे हर माह 50 हजार से एक लाख रुपए खर्चा दे रहे थे. बुजुर्ग श्यामलाल की एक संस्था थी. वहीं दोनों की मुलाकात हुई थी. श्यामलाल की पत्नी का लगभग 20 साल पहले निधन हो गया था. उन की 2 बेटियों में से एक की शादी हो चुकी है, जबकि दूसरी अविवाहित थी. ऐसे में श्यामलाल अपने वंश को ले कर चिंतित रहते थे. 7 महीने पहले गीता की मुलाकात हिमांशु चौधरी से हुई, जो एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा था. वे दोनों करीब आ गए और शादी कर ली. इस के बाद श्यामलाल से गीता का मिलनाजुलना कम हो गया, जिस से श्यामलाल परेशान हो गए. जबकि वह अकसर गीता पर मिलने का दबाव डाल रहे थे.

उन्होंने बेटा देने के बदले गीता को 20 लाख रुपए देने की पेशकश कर दी थी. यही एक वजह श्यामलाल की मौत का कारण भी बन गई. किंतु जब हत्या के बाद श्यामलाल के मोबाइल फोन से खाते की डिटेल खंगाली तो उन के बैंक खाते खाली मिले. इस हत्याकांड में पुलिस की जांच में यह बात भी सामने आई कि जरूरत पूरी करने की चाहत में ही श्यामलाल, गीता और हिमांशु एकदूसरे के करीब आए थे. श्यामलाल को बेटा पैदा करने की चाहत थी तो गीता श्यामलाल से रुपए ऐंठना चाहती थी. वहीं हिमांशु भी गीता के जरिए अपनी आर्थिक तंगी दूर करना चाहता था.

गीता पहले ब्यूटीपार्लर चलाती थी, लेकिन एक बेटी की मां बनने के बाद उस ने काम बंद कर दिया था. रुपए की जरूरत वह श्यामलाल से पूरी करती रही. वैसे गीता जानती थी कि रुपए की जरूरत तो श्यामलाल ही पूरी कर सकते थे. इस मामले की जांच के समय गीता 5 महीने की गर्भवती पाई गई. उस के गर्भ में पल रही संतान हिमांशु की है या श्यामलाल की, इस संबंध में पुलिस ने मैडिकल जांच कराने की तैयारी कर ली थी. पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गीता अब तक श्यामलाल से करीब 10 लाख रुपए से अधिक धनराशि ले चुकी थी. मृतक के नाम पर दून में करोड़ों की जमीन भी है.

श्यामलाल की हत्या के बाद जब रुपए भी नहीं मिले तो गीता और हिमांशु को अपने अपराध का बोध हुआ. इसी अपराध का पश्चाताप करने के लिए दोनों प्रयागराज गए थे. उन्होंने महाकुंभ में संगम में डुबकी लगाई. 4 दिनों तक साधुसंतों की शरण में रहे. वहीं खाना खाया और रातें गुजारीं. इस बीच दोनों दिल्ली पहुंचे और वहां से कुरुक्षेत्र होते हुए अमृतसर चले गए. उन के पास से तब तक बहुत सारे पैसे खर्च हो गए थे. रुपए न होने के चलते 200 रुपए में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. कथा लिखे जाने तक एसएसआई योगेश दत्त द्वारा मामले की जांच जारी थी. योगेश दत्त द्वारा गीता व हिमांशु के खिलाफ सबूत एकत्र कर के अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई.

 

 

UP News : सुहागसेज पर मौत

UP News : 24 वर्षीय प्रदीप कुमार पासवान और 22 वर्षीय शिवानी की सुहागसेज फूलों से सजाई गई थी. उन्हें हंसीखुशी से कमरे में भेजा गया था, लेकिन सुबह को सुहागसेज पर दोनोंं की लाशें मिलीं. शादी की पहली रात को दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ? किस ने छीन ली दोनों की जिंदगी? पढ़ें, सुहागरात को दोनों की मौत की सच्चाई को बयां करने वाली यह कहानी…

9 मार्च, 2025 को सुबह लगभग 6 बजे दीपक कुमार पासवान सब्जी मंडी जाने के लिए तैयार हो गया. रात को उस के छोटे भाई प्रदीप ने कह दिया था कि वह भी सुबह मंडी उस के साथ चलेगा. मंडी जाते समय दीपक ने प्रदीप कुमार पासवान के कमरे का दरवाजा खटखटाया और कहा कि प्रदीप मैं तो मंडी जा रहा हूं, तुम भी आ जाना.

अयोध्या के थाना कैंट क्षेत्र के सहादतगंज मुरावन टोला निवासी 24 वर्षीय प्रदीप कुमार पासवान की शादी खंडासा थाना क्षेत्र के डीली सरैया के मजरा (मौजा) मोहलिया निवासी मंतूराम पासवान की बेटी 22 वर्षीय शिवानी से 7 मार्च, 2025 को हुई थी. 8 मार्च को दूल्हा बना प्रदीप अपनी नईनवेली दुलहन को विदा करा कर अपने घर लाया था. 9 मार्च को प्रीतिभोज का कार्यक्रम होना था.

रिसैप्शन के लिए हलवाई को खाना बनाने की तैयारी करनी थी, इसलिए दीपक अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ सब्जी खरीदने के लिए मंडी आया था. मंडी पहुंचने पर जब उस का भाई प्रदीप नहीं आया तो भाई दीपक ने सोचा रात को शादी की थकान के चलते प्रदीप सो रहा होगा, इसलिए आंख नहीं खुली होगी. दीपक ने अपने रिश्तेदारों के साथ सब्जी खरीदना शुरू की ही थी कि उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. फोन घर से ही उस की बहन अनीता ने किया था. वह हड़बड़ाते हुए बोली, ”भैया, घर जल्दी आ जाओ.’’

इतना कह कर उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी. इस पर दीपक हड़बड़ा गया. वह यह भी नहीं पूछ सका कि बात क्या है? आननफानन में दीपक उल्टे पैर घर लौट आया. घर में घुसते ही महिलाओं के रोनेचीखने की आवाजें सुन कर दीपक के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. पता चला कि नवविवाहित जोड़े की सुहागसेज पर ही मौत हो गई है. यह कैसे हो गया?

पता चला कि 9 मार्च की सुबह 7 बजे तक प्रदीप और नवविवाहिता शिवानी सो कर नहीं उठे. इस पर प्रदीप की मां ने बेटी से प्रदीप को जगाने और मंडी भेजने के लिए कहा. नवविवाहित जोड़े के कमरे का दरवाजा काफी देर तक खटखटाने और प्रदीप और शिवानी को कई आवाजें देने के बाद भी जब अंदर से कोई जबाव नहीं मिला और दरवाजा नहीं खुला, तब परिजन व रिश्तेदार कमरे के बाहर जमा हो गए. सभी डर गए थे. मां ने बेटी अनीता से कमरे की पीछे की खिड़की से देखने को कहा.

इस पर अनीता ने खिड़की के पल्लों को धकेल कर खोला तो अंदर का सीन देखते ही उस की चीख निकल गई. प्रदीप पंखे से लटका हुआ था. सभी ने मिल कर तय किया कि अब और देर नहीं की जाए. तब खिड़की तोड़ कर खिड़की के रास्ते कमरे में घुसा गया और कमरे का दरवाजा खोला. कमरे के अंदर का नजारा देख कर फेमिली वालों के साथसाथ सभी रिश्तेदार सन्न रह गए. प्रदीप का शव बंद कमरे में फंदे से लटका हुआ था जबकि दुलहन शिवानी मृत अवस्था में सुहाग सेज पर पड़ी थी.

सुहागसेज पर मिलीं नवविवाहित जोड़े की लाशें

प्रदीप की बहन

रहस्यमय तरीके से दोनों की मौत से शादी के घर में कोहराम मच गया. जहां कल तक शहनाई बज रही थी, वहीं अब महिलाओं की चीखें सुनाई दे रहीं थीं. इन में प्रदीप की मम्मी की भी आवाज थी, ‘नागिन मेरे बेटे को खा गई.’

ऐसा क्या हुआ, जो कुछ घंटों में ही दोनों की मौत हो गई? क्या किसी ने दोनों की हत्या तो नहीं कर दी? लेकिन दरवाजा तो अंदर से बंद था, फिर ऐसा होना कैसे संभव था?

नवविवाहित युगल की मौत का रहस्य गहराता जा रहा था. हर कोई चाहता था कि दोनों की मौत के रहस्य से जल्द से जल्द परदा उठे. फेमिली वाले भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे. यह सब कैसे और क्यों हो गया?

मामले की गंभीरता को देखते हुए दीपक ने पुलिस के साथ ही दुलहन शिवानी के फेमिली वालों को भी घटना की जानकारी दे दी. खबर मिलते ही शिवानी के मायके में भूचाल सा आ गया. ऐसी क्या बात हो गई, जो दुलहन और दूल्हे की शादी के कुछ घंटे बाद ही मौत हो गई? पड़ोसी भी शिवानी के घर पर जा पहुंचे. थाना कैंट के एसएचओ पंकज सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने आते ही कमरे का निरीक्षण किया. इस के बाद प्रदीप के शव को फंदे से उतारा. प्रदीप ने अपनी शेरवानी के दुपट्टे से फांसी लगाई थी. घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को दी गई.

सूचना मिलते ही एसएसपी राज करण नैय्यर, सीओ शैलेंद्र सिंह भी वहां पहुंच गए. पुलिस का कहना था कि फोरैंसिक टीम ने सैंपल लिए हैं. कमरा अंदर से बंद था, ऐसे में मामला सुसाइड का लग रहा है. हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत का कारण स्पष्ट होगा. पुलिस को कमरे के अंदर से प्रदीप का मोबाइल भी मिला, जिसे कब्जे में ले लिया गया. फेमिली वालों ने पुलिस को बताया कि 8 मार्च को सुबह 11 बजे दुलहन शिवानी विदा हो कर राजीखुशी से अपनी ससुराल पहुंची थी. शाम होतेहोते घर और रिश्ते की महिलाएं ढोलक ले कर बैठ गईं और फिर देर रात तक शादी के गीत गाए जाते रहे.

पूजापाठ के साथ जरूरी रस्में निभाई गईं. सभी ने खाना खाया और हंसीठिठोली के बीच रात लगभग 11 बजे के बाद दूल्हादुलहन को भाभी व बहनों ने कमरे में छोड़ा था. कमरे को फूलों की लडिय़ों तथा सुहागसेज को गुलाब की पंखुडिय़ों से सजाया गया था. शादी में कामकाज के चलते सभी थके हुए थे, इसलिए सोने चले गए थे. रात को घर में सो रहे मेहमानों व परिजनों ने किसी प्रकार की कोई आवाज या शोर भी नहीं सुना.

पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के साथ ही दोनों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने अपनी जांच कई एंगल से शुरू की. सुहागरात पर दोनों के बीच किसी बात पर विवाद हुआ हो. इस के बाद प्रदीप ने दुलहन की हत्या कर दी, फिर खुद फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली. अथवा दोनों के बीच विवाद के बाद दुलहन ने आत्महत्या कर ली. इस के बाद डर कर प्रदीप ने भी फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. पुलिस के पहुंचने से पहले ही घर वालों ने खिड़की का दरवाजा तोड़ कर कमरे में प्रवेश किया था. ऐसे में पुलिस हत्या के एंगल से भी जांच में जुटी और घर में कौनकौन रिश्तेदार थे, उन के बारे में फेमिली वालों से पूछताछ शुरू की.

9 मार्च को शाम 3 बजे शिवानी और प्रदीप का पोस्टमार्टम हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डाक्टरों ने शिवानी की मौत का कारण उस की गला दबा कर हत्या करना बताया. वहीं प्रदीप की मौत हैंगिग से होना बताया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इस बात का भी खुलासा हुआ कि शिवानी का गला जोर से दबाया गया था.

हत्या और आत्महत्या बनी पहेली           

              

अब प्रश्न यह था कि नईनवेली दुलहन शिवानी की हत्या किस ने की और प्रदीप को पंखे से किस ने लटकाया? यह सभी के लिए पहेली बनी हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शिवानी की मौत रात 3 बजे हुई थी, जबकि उस के लगभग एक घंटे बाद प्रदीप की मौत हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट की खास बात यह थी कि मरने से पहले सुहागरात पर दोनों के रिलेशन बने थे. दोनों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मौत की उलझी गुत्थियों को कुछ हद तक सुलझा दिया था.

फोरैंसिक टीम की जांच से एक फैक्ट और सामने आया. प्रदीप ने शिवानी की हत्या करने के बाद करीब 45 मिनट तक यह सोचा कि वह खुद की जिंदगी को कैसे खत्म करे. शिवानी की लाश के पास बैठ कर वह सोचता रहा. कमरे में एक चाकू भी मिला था. हालांकि उस पर खून के निशान नहीं थे. कमरे में बैड पर प्रदीप ने कुरसी और स्टूल रख कर पंखे तक पहुंचने की कोशिश की थी, क्योंकि ये सब सामान बिखरा हुआ था.

अब सवाल यह था कि जब दोनों हंसीखुशी अपने कमरे में गए थे. तब देर रात ऐसा क्या हुआ? रात को उन के कमरे में कौन आया, जिस से दूल्हे प्रदीप को सुहागरात मनाने के बाद अपनी नवविवाहिता पत्नी शिवानी की गला घोंट कर हत्या करनी पड़ी? और लगभग एक घंटे के अंतराल में ही प्रदीप को फंदे पर लटक कर आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ा?

जबकि कुछ घंटे पहले अपनी शादी में प्रदीप दोस्तों के साथ डांस कर रहा था. प्रदीप और शिवानी अपनी शादी से खुश थे. दोनों के बीच कोई अनबन नहीं थी.

मोबाइल के मैसेज में छिपा राज

शादी तय होने के बाद पिछले एक साल से दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर दिल खोल कर बातें करते थे. दोनों को अपनी शादी के दिन का बेसब्री से इंतजार था. दोनों को एकएक दिन भारी पड़़ रहा था. फिर ऐसा क्या हुआ, जो विवाहित जीवन शुुरू होने से पहले ही खत्म हो गया.

पुलिस ने बताया कि दुलहन शिवानी का गला इतनी जोर से दबाया गया कि वह चिल्ला भी नहीं सकी. उस की आवाज गले में घुट कर रह गई. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि जिस कमरे में प्रदीप और दुलहन शिवानी मौजूद थे, उस कमरे की खिड़की से सिर्फ 5 फीट की दूरी पर बाकी परिजन सोए हुए थे. अगर शिवानी की आवाज बाहर तक पहुंचती तो शिवानी को बचाने के लिए फेमिली वाले आ जाते, लेकिन उन्हें घटना के बारे में सुबह 7 बजे ही पता चला.

पुलिस ने कमरे में मिले प्रदीप के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. बताया जाता है कि मोबाइल में ज्यादातर काल शादी से संबंधित ही थे. एक मैसेज आया था. इस मैसेज में लिखा था, ”तुम कैसी हो… मुझे छोड़ कर अच्छा नहीं किया…’’

सीओ शैलेंद्र सिंह ने बताया, ”प्रदीप के मोबाइल पर एक अधूरा मैसेज मिला. उस मैसेज की भाषा कुछ ऐसी है, जैसे प्रदीप पत्नी शिवानी से कुछ सवाल पूछना चाहता है. ऐसा अनुमान है कि उसी मैसेज को दिखा कर दोनों में विवाद हुआ होगा. फिर प्रदीप ने शिवानी की हत्या कर दी और खुद फंदे पर लटक गया.’’

उन का मानना था कि प्रदीप ने खुद ही अपने दूसरे नंबर से इस मैसेज को किया था. वह इस मैसेज के जरिए नवविवाहिता पत्नी शिवानी के पुराने रिलेशनशिप के बारे में जानना चाहता था. उन्होंने बताया कि इस मामले में अभी जांच जारी है. दोनों परिवारों की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली है. कोई शिकायत मिलेगी, तब उसी के अनुसार काररवाई की जाएगी.’’

मोबाइल के मैसेज और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से धीरेधीरे इस वारदात से परदा उठता चला गया. प्रदीप ने शिवानी का गला जिस समय दबाया, उस समय शिवानी गहरी नींद में थी. दम घुटने से उस की नींद टूट गई. आंखें खुलीं तो उस ने प्रदीप को देखा होगा. शिवानी के गले पर जितने गहरे नीले रंग के निशान बने थे, उस से स्पष्ट है कि प्रदीप ने दोनों हाथों से शिवानी का गला दबा रखा होगा. शिवानी ने बचने के लिए ताकत लगाई, लेकिन प्रदीप की पकड़ से वह छूट नहीं पाई.

जिंदगी के लिए जुझते हुए उस ने प्रदीप के चेहरे और सीने पर हाथ मारे. प्रदीप के हाथों पर नोचा, लेकिन 3 मिनट में उस की सांसें घुट गईं. डाक्टर को शिवानी के हाथ के नाखूनों से प्रदीप के शरीर की स्किन मिली थी. वहीं प्रदीप का पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर को उस की बौडी पर भी नोचे जाने के निशान मिले थे. डाक्टर के अनुसार शिवानी और प्रदीप के खून की जांच में किसी तरह का कैमिकल नहीं मिला. यानी दोनों ने कोई नशा नहीं किया था और न कोई दवा ली. प्रदीप ने पूरे होशोहवास में घटना को अंजाम दिया था.

मोहलिया निवासी शिवानी सिलाई का काम करती थी और अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहती थी. वह 8वीं कक्षा तक पढ़ी थी. उस के पिता  मंतूराम पासवान भी दिल्ली में सिलाई का काम करते थे. मंतूराम शिवानी के लिए लड़का तलाश रहे थे. किसी ने उन्हें प्रदीप के बारे में बताया.

तब मंतूराम प्रदीप के घर मुरावन टोला पहुंचे. मुरावन टोला और मोहनिया गांव के बीच 25 किलोमीटर की दूरी है. मंतूराम ने प्रदीप की फेमिली से रिश्ते की बात की. प्रदीप टाइल्स लगाने का काम करता था. वह दसवीं पास था. उस के पिता भग्गन पासवान की मौत हो चुकी थी. बड़ी बहन अनीता और भाई दीपक की शादी हो चुकी थी. प्रदीप सीधासादा युवक था. गौसेवक था. उस ने एक गाय भी पाल रखी थी. उस का चारापानी प्रदीप ही करता था. घर के सभी फैसले वही करता था. बड़ा भाई दीपक ट्रक मैकेनिक है.

शिवानी की मरजी से हुई थी शादी

दोनों ही परिवार शादी के लिए तैयार हो गए. इस के बाद लड़की को दिखाया गया. दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. शादी अप्रैल, 2025 में करना तय हुआ था, लेकिन प्रदीप की मम्मी की तबियत खराब रहती थी, इसलिए शादी की तारीख अप्रैल की जगह 7 मार्च, 2025 रखी गई. मंतूराम शादी से एक महीने पहले अपने पुश्तैनी गांव के मकान पर परिवार सहित आ गए थे. शिवानी के पिता मंतूराम पासवान जानकारी मिलने पर अपने परिवार के साथ शिवानी की ससुराल पहुंचे. उन्होंने बताया कि शादी बेटी शिवानी की मरजी से ही की थी.

8 मार्च को सुबह 11 बजे बारात को हंसीखुशी विदा किया था. सभी बाराती और दूल्हादुलहन खुश थे. बारात विदा हो कर जब मुरावन टोला आई तो 4-5 घंटे में क्या हुआ, यह पता नहीं है. शिवानी की मम्मी सुमन देवी ने भी यही बात बताई और कहा कि हम किसी पर आरोप नहीं लगाएंगे. शिवानी दिल्ली में रहती थी. पुलिस के अनुसार उस का रहनसहन भी ठीक था. उस के फेमिली वालों से पुलिस ने संपर्क किया. शिवानी अपना मोबाइल मायके में ही छोड़ आई थी. पुलिस को शिवानी का मोबाइल रिकवर करना था.

सुमन देवी ने बताया कि शिवानी डेढ़ साल की थी, तब उसे दिल्ली ले गए थे और वहीं बस गए. पति लोहा फैक्ट्री में और मैं भी पास की एक कंपनी में काम करती थी. शिवानी घर पर ही सिलाई का काम करती थी. एक दिन काम करते हुए शिवानी का मोबाइल पानी में गिर गया था. इस के बाद उस के पास कोई मोबाइल नहीं था. मेरे ही मोबाइल से प्रदीप से बात करती थी.’’

प्रदीप ने वारदात से लगभग 2 घंटे पहले अपने भांजे अनुज को फोन किया था. पुलिस ने इस संबंध में अनुज से पूछताछ की. अनुज ने बताया कि मामा प्रदीप ने रविवार यानी 9 मार्च को उस से नया मोबाइल फोन खरीदने को कहा था. माना जा रहा है कि पत्नी शिवानी के पास कोई फोन न होने पर प्रदीप उसे नया फोन देना चाह रहा था. फैजाबाद के समाजवादी पार्टी सांसद अवधेश प्रसाद घटना की जानकारी मिलने पर प्रदीप पासवान के घर पहुंचे. उन्होंने प्रदीप के परिजनों को सांत्वना दी. उन्होंने कहा कि पीडि़त परिवार की हरसंभव मदद की जाएगी.

फेमिली वालों ने शिवानी का शव लेने से क्यों किया इंकार

मायका पक्ष ने अंतिम संस्कार के लिए शिवानी के शव को लेने से इंकार कर दिया. उन का कहना था कि हम ने लड़की की शादी कर दी. लड़की अब आप के परिवार की हो गई. आप ही अब उस का क्रियाकर्म करें. इस बात ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि शिवानी के परिजनों को उस से जरा भी प्यार नहीं था, जो उस के शव को भी अपने गांव नहीं ले गए. यह बात भी चर्चा का विषय बनी रही. शिवानी के ससुराल वालों ने एक ही चिता पर दोनों के शव रख कर उन का अंतिम संस्कार किया. नवविवाहित युगल की चिता को जलते देख सभी की आंखें भर आईं. जहां कुछ घंटों पहले खुशी का माहौल था, वहीं अब मातम पसरा हुआ था.

अयोध्या के जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डा. आलोक मनदर्शन का मानना है कि पत्नी की हत्या के बाद प्रदीप के सुसाइड के पीछे 3 कारण हो सकते हैं. बेवफाई, सामाजिक डर और तीसरा तुम नहीं तो मैं भी नहीं. उन का कहना था कि प्रदीप सुसाइड मामले में ऐसा नहीं हो सकता कि अचानक कुछ बड़ा हो गया हो. प्रदीप के मन में पहले से कुछ शंकाएं रहीं होंगी. सुहागरात में प्रदीप को और क्लीयरेंस मिल गया होगा कि उस का शक सही है. इस के बाद ही प्रदीप ने ऐसा निर्णय लिया होगा.

फिलहाल नवविवाहिता युगल की मौत को ले कर चर्चाओं का बाजार गरम है. जितने मुंह उतनी बातें. शिवानी अपना मोबाइल मायके में क्यों छोड़ आई? शिवानी का मोबाइल पानी में गिरने पर खराब हो जाने की बात कही जा रही है तो क्या उसे अब तक सही नहीं कराया जा सका? आजकल कौन लड़की अपना मोबाइल मायके में छोड़ कर आती है. सुहागरात वाले दिन प्रदीप ने शिवानी का पास्ट जानने का प्रयास किया और स्वयं ही अपने मोबाइल पर मैसेज भेजा. इस के पीछे उस की नीयत थी कि वह पहली ही रात में यह जान लेना चाहता था कि शिवानी शादी से पहले किसी से प्यार करती थी और उस के साथ रिलेशन बना चुकी थी या नहीं? उस का अनुमान रहा होगा कि हड़बड़ी में शिवानी कुछ न कुछ बात जरूर कहेगी.

माना जाता है कि मैसेज दिखाने पर शिवानी ने विरोध किया होगा और दोनों के बीच झगड़ा हुआ होगा. गुस्से में उस ने शिवानी का गला घोंट दिया. शिवानी की हत्या करने के बाद लगभग 45 मिनट प्रदीप जिंदा रहा. आंकलन लगाया जा रहा है कि इस अंतराल में प्रदीप को यह एहसास हुआ होगा कि अब पत्नी की हत्या के आरोप में पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी. वह परिवार और समाज को क्या मुंह दिखाएगा? बहरहाल, शक, अविश्वास और रिश्तों की उलझन में दोनों की जिंदगी छिन गई.

 

 

UP Crime News : दुबई से लौटे पति को काट कर सूटकेस में फेंका

UP Crime News : पिछले एक महीने में प्रेमिका के साथ मिल कर पति द्वारा पत्नी को ठिकाने लगाने या पत्नी द्वारा प्रेमी के साथ मिल कर पति का कत्ल करने की अलगअलग राज्यों में 20 से अधिक घटनाएं सामने आई हैं. इन में जहां मेरठ की ड्रम वाली घटना में क्रूरता की पराकाष्ठा थी तो देवरिया की यह घटना भी उस से किसी मामले में कम नहीं है.

नौशाद के दुबई जाने के बाद रजिया सुलतान पूरी तरह रोमान के वश में आ गई थी. अब उस के लिए अलग घर बन ही गया था. नौशाद यहां जो पैसे भेजता था, उसी के अकाउंट में आता था. इसलिए उस के अकाउंट में काफी रकम जमा हो गई थी. यही वजह थी कि अब उसे लगने लगा था कि अगर नौशाद नहीं भी रहेगा तो वह रोमान के साथ आराम से गुजारा कर लेगी. क्योंकि रोमान भी तो कमाता था. उस के साथ वह सुखी रहेगी, क्योंकि वह उस के साथ रहेगा.

अब वह बाकी की जिंदगी अपने प्रेमी रोमान के साथ बिताना चाहती थी. लेकिन इस के लिए नौशाद से छुटकारा चाहिए था. नौशाद से वह तलाक लेना नहीं चाहती थी. इस की वजह यह थी कि अगर वह नौशाद से तलाक लेती तो उस के हाथ कुछ न लगता. घर भी छोडऩा पड़ता और नौशाद के रुपए भी देने पड़ते. जबकि वह यह सब हड़पने के चक्कर में थी.

अब नौशाद से छुटकारा पाने का एक ही तरीका बचा था कि उसे ठिकाने लगा दिया जाए यानी उस की हत्या कर दी जाए. लेकिन यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था. अभी यह भी कंफर्म नहीं था कि रोमान नौशाद की हत्या के लिए तैयार होगा भी या नहीं. रजिया दुविधा में फंसी थी. लेकिन उस ने यह तय कर लिया था कि अब वह नौशाद के साथ नहीं, प्रेमी रोमान के साथ रहेगी. यह निर्णय लेने के बाद अब उसे रोमान को अपने मामा की हत्या के लिए तैयार करना था, साथ ही इस के लिए भी मनाना था कि सारा मामला शांत होने के बाद वह उस के साथ निकाह करेगा. इस के बाद उस ने धीरेधीरे रोमान को मनाना शुरू किया कि नौशाद के न रहने पर दोनों सुख और शांति से रह सकेंगे.

रोमान को भी मामी रजिया से जो सुख मिल रहा था, उसे वह किसी भी हालत में छोडऩा नहीं चाहता था. इस के लिए उसे चाहे कुछ भी करना पड़े. आखिर वह रजिया की देह के चक्कर में उस के लपेटे में आ ही गया और नौशाद की हत्या के लिए राजी हो गया. रोमान के राजी होने के बाद नौशाद की हत्या की योजना बनने लगी, क्योंकि इसी अप्रैल महीने में वह आने वाला था. हत्या करना तो आसान था, लेकिन मुश्किल काम था लाश को ठिकाने लगाना. फिर यह काम रोमान के अकेले के वश का भी नहीं था. इस काम में रजिया किसी तरह की मदद भी नहीं कर सकती थी.

काफी सोचविचार और सलाहमशविरे के बाद तय हुआ कि लाश का चेहरा बिगाड़ कर कहीं दूर ले जा कर फेंक दिया जाएगा, जहां कोई उसे पहचान नहीं पाएगा. उस के बाद दोनों निकाह कर के आराम से रहेंगे. रजिया और रोमान नौशाद के आने से पहले पूरी तैयारी कर लेना चाहते थे. क्योंकि इस बार रजिया नौशाद से छुटकारा पा लेना चाहती थी.

अपनी इस योजना को साकार करने के लिए रोमान को एक साथी की जरूरत थी. रोमान ड़ाइवर था. उस की तमाम ड्राइवरों से दोस्ती थी. लेकिन गांव विशौली के रहने वाले हिमांशु से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी. दोनों का अकसर रात का खानापीना साथ होता था. उसे रोमान और रजिया के संबंधों के बारे में पता भी था. इसलिए जब रोमान ने पूरी बात बता कर सहयोग मांगा तो हिमांशु हर तरह से उस की मदद करने को तैयार हो गया.

अब रजिया और रोमान को नौशाद के आने का इंतजार था. 10 अप्रैल, 2025 को जब नौशाद दुबई से घर आया तो रजिया ने बड़े जोश के साथ उस का स्वागत किया. नौशाद को लगा कि पत्नी अब सुधर गई है. वह बहुत खुश हुआ. वह भी एक साल पत्नी से अलग रहा था, इसलिए उस ने पत्नी को खूब प्यार किया. इस बीच रजिया सुलतान और रोमान की फोन पर बातें होती रहीं. नौशाद को कैसे मारा जाए, इस की योजना बनती रही. बात गला दबा कर मारने की आई तो नौशाद इतना हट्टाकट्टा था कि तीनों मिल कर उसे काबू नहीं कर सकते थे. किसी हथियार से मारने की बात चली तो चीखपुकार होती और सभी जान जाते.

इसलिए तय हुआ कि नौशाद को पहले नशे की दवा दे कर सुला दिया जाए. उस के बाद गला दबा कर हत्या कर दी जाए. फिर लाश को किसी चीज में लपेट कर कहीं दूर फेंक दिया जाए. इस बीच नौशाद दुबई जाने की तैयारी करने लगा था. वह हवाई टिकट की कोशिश में लगा था. नौशाद दुबई वापस चला जाए, उस के पहले ही उस का काम तमाम करना था. रोमान ने नशे की दवा की व्यवस्था कर दी तो 19 अप्रैल, 2025 की शाम रजिया ने रात के खाने में नींद की दवा नौशाद को खिला दी. दवा देने के बाद रजिया ने इस बात की जानकारी रोमान को दे दी.

रजिया की बेटी सो गई तो उसे उस ने अलग कमरे में सुला कर दरवाजा बंद कर दिया. अब्बू बाहर के कमरे में सोए थे. घर के अंदर रजिया और नौशाद ही थे. रात 11 बजे के आसपास रोमान और हिमांशु बोलेरो ले कर आ गए. रजिया ने पीछे का दरवाजा खोल कर दोनों को अंदर बुला लिया.

गहरी नींद में सोए शौहर को लगाया ठिकाने

नौशाद नशे में गहरी नींद सो रहा था. रजिया ने नौशाद के पैर पकड़ लिए तो हिमांशु ने सिर. इस के बाद रोमान ने नौशाद के सीने पर बैठ कर उस का गला दबा दिया. नौशाद थोड़ा छटपटाया, फिर शांत हो गया. नौशाद कहीं जीवित न रह जाए, रजिया ने मूसल से उस के सिर पर कई वार किए. जब उसे विश्वास हो गया कि नौशाद अब जीवित नहीं हो सकता तो उस की पहचान न हो सके, इस के लिए रजिया ने चापर की नोंक से उस का पूरा चेहरा गोद दिया.

अब बारी थी लाश को ठिकाने लगाने की. वे लाश को ले जा कर कहीं दूर फेंक आना चाहते थे, जहां लाश की शिनाख्त न हो सके. रजिया के घर में 2 सूटकेस थे. पहले उन्होंने लाश को छोटे सूटकेस में भरने की कोशिश की. लेकिन उस में लाश नहीं आई. तब रजिया ने बड़ा सूटकेस खाली किया और उसे ला कर रोमान को दिया.

रोमान और हिमांशु ने नौशाद के शव को बड़े सूटकेस में भरना चाहा तो लाश उस में भी नहीं आई. इस के बाद रोमान और हिमांशु ने नौशाद की लाश को कुल्हाड़ी और चापर से 2 हिस्सों में काट कर सूटकेस में भरा. तब भी पैर अंदर नहीं जा रहे थे. तब पैरों को तोड़ कर अंदर डाला और सूटकेस बंद कर दिया. रजिया ने सूटकेस खाली करते समय उस में से एकएक कागज तक निकाल लिया था, जिस से पता न चल सके कि सूटकेस किस का है.

इस के बाद रोमान और हिमांशु सूटकेस बोलेरो में रख कर चल पड़े. वे सूटकेस को ले कर वहां से 55 किलोमीटर दूर थाना तरकुलवा के अंतर्गत आने वाले गांव छापर पटखौली पहुंचे और एक खाली पड़े खेत में उसे फेंक दिया. उस समय सुबह के 4 बज रहे थे. लाश से भरा सूटकेस फेंक कर दोनों अपनेअपने घर चले गए. लाश फेंकने की सूचना रोमान ने रजिया को फोन द्वारा दे दी थी. उस के बाद वह निश्चिंत हो गई थी. उसे पूरा विश्वास था कि पुलिस किसी भी हालत में उस तक पहुंच नहीं पाएगी.

दूसरी ओर गांव छापर पटखौली के रहने वाले किसान जितेंद्र गिरि कंबाइन मशीन ले कर गेहूं कटवाने पहुंचे तो उन्हें बगल वाले खेत में एक बड़ा सा सूटकेस पड़ा दिखाई दिया. सूटकेस में खून लगा था, इसलिए उन्होंने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. थोड़ी ही देर में थाना तरकुलवा पुलिस वहां आ गई. घटनास्थल की स्थिति देख कर थाना तरकुलवा के एसएचओ ने यह जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी थी. थाना पुलिस ने आते ही सब से पहले लोगों को वहां से हटा कर आसपास के इलाके को बैरिकेड्स करवा दिया था.

थोड़ी ही देर में एएसपी अरविंद वर्मा, सीओ (सिटी) संजय रेड्डी, स्वाट टीम के प्रभारी दीपक कुमार, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम के साथ आ गए थे. अरविंद वर्मा ने सूटकेस खुलवाया तो उस में 2 टुकड़ों में एक युवक की लाश थी. सिर से कमर तक का हिस्सा प्लास्टिक में लिपटा था तो कमर से पैर तक का हिस्सा बोरे में भरा था. सिर पर चोट के तथा धारदार हथियार के निशान थे.

कैसे हुई लाश की पहचान

पुलिस ने इकट्ठा लोगों से लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर कोई मरने वाले युवक को पहचान नहीं सका. तब सूटकेस की तलाशी ली गई कि उसी से ऐसा कुछ मिल जाए, जिस से मरने वाले के बारे में कुछ पता चल जाए. पर यह कोशिश भी बेकार गई. तलाशी के दौरान ही अरविंद वर्मा की नजर सूटकेस पर लगे एक स्टिकर पर पड़ी, जो एयरपोर्ट का बारकोड था. सूटकेस से थोड़ी दूरी पर पुलिस को एक विदेशी सिम भी मिला.

तब उन्होंने वह बारकोड एयरपोर्ट पर भेज कर पता करवाया. उस बारकोड से पता चला कि वह सूटकेस देवरिया के ही थाना मईल के अंतर्गत आने वाले गांव भटौली के रहने वाले नौशाद का है. पुलिस को लगा कि यह लाश नौशाद की हो सकती है या फिर उस के किसी रिश्तेदार की. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर पुलिस भटौली गांव के लिए रवाना हो गई.

भटौली पहुंच कर पुलिस को पता चला कि वह लाश नौशाद की ही थी. नौशाद की पत्नी से नौशाद के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह रात को कहीं चले गए थे. पुलिस ने जाने का कारण और कहां गए होंगे, पूछा तो वह पुलिस को गुमराह करने लगी. पुलिस को उस की बातों से शक हुआ तो उस के घर की तलाशी ली. इस तलाशी में पुलिस को एक सूटकेस मिला, जिस में खून लगा था. यह वही सूटकेस था, जिस में पहले लाश रखने की कोशिश की गई थी.

इस के बाद पुलिस ने रजिया सुलतान से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने पति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करते हुए हत्या के पीछे की पूरी कहानी सुना दी. पुलिस ने तुरंत उसे हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि रजिया ने बेहद चालाकी से नौशाद को ठिकाने लगाने की साजिश रची थी. जबकि वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. शायद इसीलिए सूटकेस में लगे बारकोड का मतलब वह समझ नहीं सकी थी. उस ने सूटकेस का एकएक सामान तो निकाल लिया था, पर जल्दबाजी में वह बारकोड नहीं निकाल पाई थी.

सुबह जब नौशाद के पिता ने बेटे के बारे में पूछा था, तब उस ने कहा था कि रात में वह कहीं चले गए थे. इस के बाद पूरा परिवार उस की तलाश में लग गया था. दोपहर को पुलिस पहुंची तो पता चला कि उस की हत्या हो चुकी है.

आरोपियों से पूछताछ करने के बाद नौशाद की हत्या के पीछे की जो दिलचस्प कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला देवरिया के थाना मईल के अंतर्गत आने वाले गांव भटौली का रहने वाला नौशाद अहमद और देवरिया से लगे जिला बलिया की रहने वाली रजिया सुलतान उर्फ शिबा एकदूसरे को तब से जानते थे, जब से वे समझने लायक हुए थे. इस की वजह यह थी कि रजिया नौशाद की फूफी यानी बुआ की बेटी थी. रजिया जब भी ननिहाल आती, हमउम्र होने की वजह से रजिया और नौशाद साथसाथ खेलते. ऐसे में ही एक दिन दरवाजे पर खेलने के बाद दोनों एकदूसरे का हाथ थामे घर में घुसे तो बरामदे में चारपाई पर बैठी नौशाद की अम्मी के मुंह से अचानक निकल गया,

”हाय रब्बा, दोनों की कितनी सुंदर जोड़ी है. एकदम गुड्डेगुडिय़ा की जोड़ी लग रही है. अगर इन दोनों का निकाह कर दिया गया तो बहुत सुंदर जोड़ी लगेगी.’’

बात सच भी थी. जितनी गोरीचिट्टी रजिया सुलतान उर्फ शिबा थी तो उस से जरा भी कम गोराचिट्टा नौशाद भी नहीं था, इसलिए रजिया की अम्मी को भी यह जोड़ी भा गई थी. उन्होंने उस समय तो कुछ नहीं कहा था, पर मन ही मन तय कर लिया था कि अगर उस के भाई मबू अहमद नौशाद के लिए रजिया का हाथ मांगने आएंगे तो वह खुशीखुशी बेटी का निकाह नौशाद के साथ कर देगी.

रजिया की अम्मी ने उस समय भले ही कोई जवाब नहीं दिया था, पर नौशाद की अम्मी रजिया को बहू बनाने का ख्वाब मन ही मन पालने लगी थीं. रजिया जब भी अपनी अम्मी के साथ मामा के घर आती, नौशाद की अम्मी ननद को यह बात जरूर याद दिलातीं. जब तक नौशाद और रजिया नासमझ थे, तब तक तो कोई बात नहीं थी. लेकिन जब दोनों समझदार हो गए तो एकदूसरे को देख कर लजाने लगे.

फुफेरी बहन रजिया से हुई नौशाद की शादी

रजिया सुलतान थोड़ा और बड़ी हुई तो उस ने शर्म की वजह से मामा के घर आनाजाना बंद कर दिया. उस की अम्मी कहती भी थीं कि इस में शरमाने की क्या बात है, पर रजिया किसी भी हालत में मामा के घर आने के लिए राजी नहीं होती थी. जबकि नौशाद रजिया से मिलने के लिए बेचैन रहता था. मबू अहमद ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे. उन की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए जब उन का बड़ा बेटा कमाने लायक हुआ तो उन्होंने उसे ड्राइविंग सिखवा दी. कुछ दिनों तक उस ने यहीं किसी की गाड़ी चलाई. फिर उस ने पासपोर्ट बनवाया और जुगाड़ लगा कर दुबई चला गया. दुबई जाने से पहले ही मबू अहमद ने उस का निकाह जैतून से कर दिया था.

बड़े भाई की ही तरह नौशाद भी दुबई जाना चाहता था, इसलिए उस ने भी ड्राइविंग सीख ली थी. कुछ दिनों तक यहां इधरउधर गाड़ी चलाते हुए उस ने अपना पासपोर्ट बनवा लिया. अब तक वह शादी लायक भी हो चुका था. मबू अहमद ने उस के लिए अपनी बहन से रजिया का हाथ मांगा तो उन्होंने खुशीखुशी इस रिश्ते को मंजूरी दे दी. क्योंकि नौशाद हर तरह से रजिया के लायक था. उसे यह भी पता था कि आज नहीं तो कल नौशाद दुबई चला ही जाएगा. फिर उस की बेटी राज करेगी. जल्दी ही घर वालों की मरजी से रजिया और नौशाद का निकाह हो गया. यह करीब 10 साल पहले की बात है.

निकाह के बाद नौशाद दुबई जाने की तैयारी में लग गया. वहां उस का बड़ा भाई भले ही रहता था, लेकिन अच्छी कंपनी में ड्राइवर का वीजा मिलने में उसे 3 साल लग गए. इस बीच वह एक बेटी का बाप भी बन गया. इस समय उस की वह बेटी 8 साल की है. नौशाद को वीजा मिल गया तो वह नौकरी करने दुबई चला गया. नौशाद को दुबई की जिस कंपनी में नौकरी मिली थी, उस में साल में केवल 15 दिन की ही छुट्टी मिलती थी. इसलिए नौशाद साल में केवल 15 दिनों के लिए ही परिवार के साथ रह पाता था. बाकी का समय वह अकेला दुबई में रहता था तो उस की पत्नी रजिया यहां गांव में परिवार के साथ रहती थी.

पति के विदेश चले जाने के बाद रजिया आजाद हो गई. सास थी नहीं, जेठानी से कोई मतलब नहीं था. देवर भी मुंबई कमाने चला गया था. घर में केवल ससुर था और एक बेटी. इसलिए काम भी ज्यादा नहीं होता था. सुबह नाश्ता और खाना एक साथ बना कर रख देती. इस तरह पूरा दिन खाली रहती. इस खाली समय को बिताने के लिए जैसा आजकल हो रहा है, वैसे ही वह भी मोबाइल का सहारा लेती या अगलबगल वालों के यहां जा कर गप्पें मारती. पैसे की कमी थी नहीं, नौशाद दुबई से भेजता ही था. इसलिए रजिया ठाठ से रहती थी. रजिया सुलतान शुरू से ही थोड़ा चंचल स्वभाव की थी. मनमाना खर्च मिलने लगा तो विलासी भी हो गई.

उसे सारे सुख तो मिल रहे थे, लेकिन पति से अलग रहने की वजह से उसे शारीरिक सुख यानी सैक्स का सुख नहीं मिल रहा था, जिस के लिए वह छटपटाती रहती थी. पति साल भर में केवल 15 दिनों के लिए ही आता था. साल भर की सैक्स की भूखी रजिया का 15 दिनों में कुछ नहीं होता था. उस की देह की आग बुझने के बजाय और भड़क उठती थी.

रजिया का दिल आया जवान भांजे पर

कुछ दिनों तक तो रजिया ने खुद को संभाला. पर जब उस का मन नहीं माना तो वह अपने लिए एक ऐसे पुरुष की तलाश में लग गई, जो उस की कामना पूरी कर सके. उस की यह तलाश पति नौशाद के ही भांजे रोमान सिद्दीकी पर जा कर ठहर गई. दरअसल, नौशाद की एक बहन नूनहार गांव में ही ब्याही थी. रोमान उसी बहन का बेटा था. उस की शादी अभी नहीं हुई थी. वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था. आठवीं तक पढ़ाई कर के उस ने अपने मामा की तरह ड्राइविंग सीख ली थी और पहले छोटी गाडिय़ां चलाने लगा था. जब हाथ साफ हो गया तो ट्रक चलाने लगा. भांजा होने की वजह से वह बेरोकटोक रजिया यानी नौशाद के घर आताजाता था.

रोमान सिद्दीकी अजीब शख्सियत वाला था. कुंवारा होने की वजह से उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं थी. इसलिए जो कमाता था, उस में से थोड़ा घर वालों को दे कर बाकी खुद पर खर्च करता था. इस में उस के कुछ आवारा दोस्त भी शामिल थे, जिन के पास कोई कामधंधा नहीं था. रोमान जब भी गांव आता, उस के वे दोस्त रातदिन उस के आगेपीछे घूमा करते. रोमान जो कमा कर लाता था, अपने साथ उन पर भी खर्च करता. जेब में पैसे होते ही थे, इसलिए रोजाना रात को मुर्गा और शराब की पार्टी होती.

पार्टी कर के रोमान कभीकभी मामी के घर आ जाता. नशे में होने पर रोमान को मामी भी अच्छी लगती और उस से बातें करना भी. पुरुष की संगत को तरस रही रजिया को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा था. इसलिए वह भी उस से खूब मजे ले कर बातें करती थी. कभीकभी नशा ज्यादा हो जाता तो रोमान रजिया के यहां ही सो जाता था. ऐसे में रजिया को ही उस के लिए बिस्तर की भी व्यवस्था करनी पड़ती और उस के जूते और कपड़े भी उतारने पड़ते. कपड़े उतारने में रोमान का शरीर उस के शरीर से छू जाता या रगड़ जाता तो वह रोमांचित हो उठती. मन भटकने लगता और जी करता कि उस से लिपट जाए. लेकिन संकोचवश वह ऐसा कर नहीं पाती थी.

रोमान भी जवान था, इसलिए किसी महिला का सान्निध्य पाने के लिए वह भी लालायित रहता था. जब कभी जवानी ज्यादा उफान मारती तो सड़क के किनारे ढाबों पर मिलने वाली औरतों के साथ इच्छा पूरी कर लेता था. पर उन के साथ वह मजा नहीं आता था, जिस की कामना रोमान करता था. इसलिए जवान मामी की ओर उस का भी झुकाव होने लगा था. इस की वजह यह थी कि उस ने रजिया की बातों से महसूस किया था कि वह सैक्स की भूखी है. क्योंकि कभीकभी बातचीत में वह रोमान से ऐसी बात कह देती, जो औरत किसी पराए मर्द से नहीं कह सकती.

इन्हीं बातों से रोमान को लगने लगा था कि अगर वह मामी से अपने मन की बात कहे तो मामी बुरा मानने के बजाय उस की इच्छा पूरी कर देगी. लेकिन मुंह से ऐसी बात कहना आसान नहीं होता. रोमान सोचता कुछ भी रहा हो, लेकिन रजिया मामी से दिल की बात कह नहीं सका. फिर इस के लिए उस ने एक नाटक किया. एक रात को जब वह रजिया के घर पहुंचा तो चल नहीं पा रहा था. लडख़ड़ाते हुए वह रजिया के दरवाजे पर पहुंचा और किसी तरह धीमे से दरवाजा खटखटाया. उस समय तक रजिया की छोटी सी बेटी सो चुकी थी. बूढ़ा ससुर घर के बाहर सोता था, इसलिए उसे पता नहीं चल सकता था.

रजिया ने दरवाजा खोला तो सामने नशे में धुत रोमान खड़ा था. दरवाजा खुलने पर वह घर में दाखिल होने लगा तो लडख़ड़ाया. रजिया ने झट उसे दोनों बांहों भर लिया कि कहीं वह गिर न पड़े. रोमान को ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने भी अपनी दोनों बांहें फैला कर रजिया के दोनों कंधों पर रख दीं और अपना पूरा शरीर उस के ऊपर डाल दिया. रजिया उसे ले कर बैड के पास पहुंची तो रोमान रजिया को ले कर बैड पर गिरा तो उसे तभी उठने दिया, जब उस की इच्छा पूरी हो गई. सब कुछ होने के बाद दोनों के चेहरों पर मलाल होने के बजाए खुशी और संतुष्टि थी.

इस के बाद तो दोनों का जब मन होता, अपनी इच्छाएं पूरी कर लेते. रोमान रजिया का भांजा था, इसलिए उस का जब मन होता यानी जब उसे मौका मिलता, वह मामी के पास पहुंच जाता और फिर वही होता, जिस के बारे में कोई अन्य सोच भी नहीं सकता था. दोनों की उम्र में ज्यादा फर्क भी नहीं था, इसलिए दोनों एकदूसरे का पूरा साथ देते थे और शारीरिक सुख का पूरा आनंद उठाते थे.

रोमान अच्छाखासा कमाता था.  इसलिए वह पहले जो रुपए दोस्तों पर खर्च करता था, रजिया मामी से प्यार मिलने के बाद उस पर खर्च करने लगा. नौशाद दुबई से रजिया के लिए पैसे भेजता ही था. इसलिए अब उस के मजे ही मजे थे. वह ठाठ से रहती और खूब पैसे खर्च करती. बढिय़ाबढिय़ा कपड़े और गहने पहनती. जब मन होता, खरीदारी के लिए शहर चली जाती. शहर में रोमान मिलता तो सिनेमा दिखाता, होटल में खाना खिलाता और शौपिंग कराता.

बहू के चालचलन पर ससुर को कैसे हुआ शक

लेकिन यह सब ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहा. जिस तरह रोमान रजिया के घर आनेजाने लगा था और रातदिन उस के घर में पड़ा रहने लगा था, उस से जल्दी ही वे लोगों की नजरों में चढ़ गए. अगलबगल वाले कानाफूसी करने लगे. फिर रजिया के ससुर मबू अहमद खुद ही अनुभवी थे. उन्होंने दुनिया देख रखी थी. घर में जवान बहू अकेली रहती थी. उस का पति परदेस में रहता था. ऐसे में किसी जवान आदमी का घर बेरोकटोक आना खतरे से खाली नहीं था.

वह सीधे बहू से कुछ कह नहीं सकते थे. क्योंकि अपनी आंखों से कुछ देखा तो था नहीं. फिर भी इशारोंइशारों में उस ने बहू को समझाया और रोमान को भी टोका. पर दोनों को जो सुख मिल रहा था, वे उसे छोडऩा नहीं चाहते थे. इसलिए नौशाद के पिता मबू अहमद की बातों का न तो रजिया सुलतान पर कोई असर पड़ा न तो नाती रोमान पर.

मबू अहमद ज्यादा कुछ कह नहीं सकते थे, क्योंकि बात खुलती तो बदनामी उन्हीं की होती. जब रजिया ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया तो उन्होंने बड़ी बहू जैतून से इशारे में कहा कि वह अपनी देवरानी को समझाए. क्योंकि अब लोग उन से खुलेआम कहने लगे थे कि रोमान उन के घर कुछ ज्यादा ही आताजाता है. कभीकभी वह रात में भी उन के घर रुकता है. बेटा बाहर रहता है, कहीं बहू के पैर न फिसल जाएं. अगर ऐसा हो गया तो ऐसे संबंधों का परिणाम अच्छा नहीं होता.

मबू अहमद ने बड़ी बहू से देवरानी को समझाने को कहा था. ससुर के कहने पर जब जैतून ने देवरानी रजिया को समझाने की कोशिश की तो वह उस से लडऩे लगी. तब जैतून ने देवरानी से अपनी बेइज्जती कराने से अच्छा चुप रहना ही समझा. अंतत: मबू अहमद को ही खुल कर सामने आना पड़ा. उन्होंने रोमान को अपने घर आने से साफ मना कर दिया. रजिया को भी बाहर जाने से रोका, पर उस ने उन की बात नहीं मानी. अब रजिया रोमान से बाहर मिलती या फिर रात को चोरी से घर पर बुलाती. इस का भी पता घर वालों को चल गया. तब मजबूर हो कर मबू अहमद ने दुबई में रह रहे बेटे को इस बारे में बता दिया. यह करीब डेढ़ साल पहले की बात है.

अब्बू ने जो बताया था, नौशाद से हजम नहीं हुआ. उस ने तुरंत रजिया को फोन किया. वह ससुर को झूठा साबित करने के लिए हजार कसमें खाने लगी. पर नौशाद इतना भी बेवकूफ नहीं था कि वह पत्नी की बात पर विश्वास कर लेता और अब्बू की बात को नकार देता. उस ने छुट्टी ली और गांव आ गया. गांव में घर वालों ने ही नहीं, उस के यारदोस्तों और कुछ बुजुर्गों ने भी उसे बताया कि रजिया के कदम बहक गए हैं. उस का भांजा भी नालायक है. उस ने रिश्ते का भी लिहाज नहीं किया. इन बातों से नौशाद को बहुत तकलीफ पहुंची कि जिस पत्नी के लिए वह घरपरिवार छोड़ कर हजारों मील दूर पड़ा है, वही पत्नी उस के साथ विश्वासघात कर रही है.

उस ने रजिया सुलतान को समझाना चाहा तो वह अपनी जिद पर अड़ी रही कि सभी उस पर झूठा आरोप लगा रहे हैं. तब उसे रजिया पर गुस्सा आ गया और उस ने तलाक देने का फैसला कर लिया. पर रजिया इस के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि नौशाद जैसा कमाऊ पति जल्दी कहां मिलता. उस ने नौशाद से माफी मांगी और कसम खाई कि अब वह रोमान से कभी नहीं मिलेगी. पंचायत भी बुलाई गई थी. सभी के सामने रजिया और रोमान ने वचन दिया कि अब वे एकदूसरे से कभी नहीं मिलेंगे.

नौशाद भी रजिया से बहुत प्यार करता था, इसलिए उस ने अपना तलाक देने वाला फैसला रद्द कर दिया. इस के बाद रजिया ने नौशाद से अपना अलग घर बनवाने के लिए कहा तो नौशाद ने गांव के बाहर थोड़ी जमीन खरीदी और उस घर बनवाने की सारी व्यवस्था कर के अपनी नौकरी पर चला गया, क्योंकि उसे केवल 15 दिनों की ही छुट्टी मिली थी.

रजिया का गांव के बाहर अलग घर बन कर तैयार हो गया तो वह उसी में आ कर रहने लगी. उस का घर गांव से थोड़ा बाहर पड़ता था, इसलिए मबू अहमद उसी के घर रात को सोते थे. लेकिन इस का रजिया पर कोई असर नहीं पड़ता था. यहां आ कर उस का रोमान से मिलना और आसान हो गया था. इस घर में वह अकेली ही रहती थी. ससुर भले ही रात को उस के घर सोने आते थे. पर पीछे भी तो दरवाजा था. रोमान पीछे के दरवाजे से आता और जो करना होता, कर के पीछे से ही निकल जाता.

अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने नौशाद की बहन निशात द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर नौशाद की हत्या का मुकदमा रजिया सुलतान, रोमान और हिमांशु के खिलाफ दर्ज कर लिया था. रजिया को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. जबकि रोमान और हिमांशु फरार थे. अगले दिन फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने रोमान को भी गिरफ्तार कर लिया था. जबकि कहानी लिखे जाने तक हिमांशु नहीं पकड़ा जा सका था.

पुलिस ने उन हथियारों चापर, कुल्हाड़ी और मूसल को बरामद कर लिया था, जिन से नौशाद की हत्या की गई थी. पुलिस को उस बोलेरो की भी तलाश है, जिस से नौशाद की लाश को ठिकाने लगाने के लिए उतनी दूर ले जाया गया था.

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Crime News : शादीशुदा और 4 बच्चों की मां रीनू ने पहली गलती कपिल से अवैध संबंध बना कर की, दूसरी गलती उस ने इस संबंध को स्थाई बनाने के लिए अपनी छोटी बहन की शादी कपिल से करा कर की. उस की तीसरी गलती कपिल को रिश्तेदार बना कर घर में रखने की थी. और चौथी गलती पति शिवकुमार को मौत के घाट उतरवाने की. इतनी गलतियां करने के बाद…

इसलिए तकनीकी टीम के प्रभारी एसआई रामकुमार रघुवंशी और आरक्षक मोइन खान ने चाय व समोसे वाला बन कर उन की रैकी करनी शुरू कर दी, जिस से जल्द ही जानकारी हासिल कर सम्राट उर्फ वीरामान धामी को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में वीरामान पहले तो कुछ भी बताने की राजी नहीं था. लेकिन जब उस ने मुंह खोला तो चौंकाने वाला सच सामने आया. वास्तव में वीरामान खुद वारदात करने के लिए पचोर जाने वाली टीम में शामिल था. अन्य 2 पुरुषों और महिला के बारे में पूछताछ की तो सम्राट ने बताया कि अनुष्का अपने प्रेमी तेज के साथ नई दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहती है.

पुलिस ने बदरपुर इलाके में छापेमारी कर के दोनों को वहां से गिरफ्तार कर उन के पास से चोरी का माल बरामद कर लिया. यहां तेज रोक्यो और अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल के साथ उन का तीसरा साथी भरतलाल थापा भी पुलिस गिरफ्त में आ गए. मौके पर की गई पूछताछ के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस की मदद से मामले के मुख्य आरोपी वीरामान उर्फ सम्राट मूल निवासी धनगढ़ी, नेपाल, अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल निवासी जनकपुर, तेज रोक्यो मूल निवासी जिला अछम, नेपाल, भरतलाल थापा को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी.

इस के अलावा आरोपियों को पचोर तक कार बुक करने वाला पवन थापा निवासी उत्तम नगर नई दिल्ली, बेहोशी की दवा उपलब्ध कराने वाला कमल सिंह ठाकुर निवासी जिला बजरा नेपाल, चोरी के जेवरात खरीदने वाला मोहम्मद हुसैन निवासी जैन कालोनी उत्तम नगर, जेवरात को गलाने में सहायता करने वाला विक्रांत निवासी उत्तम नगर भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. अनुष्का को कंपनी में काम पर लगवाने वाली सरिता शर्मा निवासी किशनपुरा, नोएडा तथा अनुष्का को नौकरानी के काम पर लगाने वाला बिलाल अहमद उर्फ सोनू निवासी जामिया नगर, नई दिल्ली को गिरफ्तार कर के बरामद माल सहित पचोर लौट आई. जहां एसपी श्री शर्मा ने पत्रकार वार्ता में महज 7 दिनों के अंदर जिले में हुई चोरी की सब से बड़ी घटना का राज उजागर कर दिया.

अनुष्का ने बताया कि राम गोयल का पूरा परिवार उस पर विश्वास करता था. इसलिए परिवार के अन्य लोगों की तरह अनुष्का भी घर में हर जगह आतीजाती थी. एक दिन उस के सामने घर की तिजोरी खोली गई तो उस में रखी ज्वैलरी और नकदी देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं और उस के मन में लालच आ गया. यह बात जब उस ने दिल्ली में बैठे अपने प्रेमी तेज रोक्यो को बताई तो उसी ने उसे तिजोरी पर हाथ साफ करने की सलाह दी. योजना को अंजाम देने के लिए उस का प्रेमी तेज रोक्यो ही दिल्ली से बेहोशी की दवा ले कर पचोर आया था. वह दवा उस ने रात में खिचड़ी में मिला कर पूरे परिवार को खिला दी.

जिस से खिचड़ी खाते ही पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. तब अनुष्का अलमारी में भरा सारा माल ले कर पे्रमी के संग चंपत हो गई. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक करोड़ 53 लाख रुपए का चोरी का सामान और नकदी बरामद कर ली. पुलिस ने सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच टीआई डी.पी. लोहिया कर रहे थे.

Crime Story : तीसरे पति की चाहत में दूसरे पति का मर्डर

Crime Story : पति की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद 3 बच्चों की मम्मी गीता यादव ने चरन सिंह से दूसरी शादी कर ली थी. इसी दौरान गीता की लाइफ में जबर सिंह आ गया. उस के आने से घर में ऐसा जलजला आया कि…

गीता यादव फितरती औरत थी. उसे बच्चों से तो हमदर्दी थी, लेकिन पति चरन सिंह फूटी आंख भी नहीं सुहाता था. पति रूपी बाधा को दूर करने के लिए एक रोज गीता ने प्रेमी जबर सिंह को उकसाया, ”जबर, हम कब तक परदेस में पड़े रहेंगे. कब तक हम मजदूरीधतूरी करते रहेंगे. तुम्हें मेरे साथ जीवन बिताना है तो कुछ करना होगा?’’

”क्या करना होगा?’’ जबर सिंह ने पूछा.

”तुम्हें मेरे सिंदूर को मिटाना होगा, ताकि मैं तुम्हारे हाथ का सिंदूर अपनी मांग में सजा सकूं. अभी तो मैं तुम्हारी रखैल ही हूं.’’

”चाहता तो मैं भी हूं, लेकिन पकड़े गए तो..?’’

”कुछ नहीं होगा. तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी. ऐसा प्लान बनाऊंगी कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

कुछ देर चुप्पी साधने के बाद वह फिर बोली, ”चरन सिंह जीवित नहीं रहेगा तो उस के घर तथा जमीनजायदाद पर भी उसी का कब्जा हो जाएगा. हम दोनों उसी घर में बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहेंगे.’’

”ठीक है. मैं तैयार हूं.’’ जबर सिंह ने सहमति जताई.

उस के बाद गीता और जबर सिंह ने कान से कान जोड़ कर चरन सिंह की हत्या का प्लान बनाया. तय हुआ कि इस बार जब गांव जाएंगे, तब योजना के तहत चरन सिंह को ठिकाने लगा देंगे. 14 नवंबर, 2024 को इटावा कोर्ट में गीता द्वारा पति के खिलाफ दर्ज कराए गए मारपीट के मुकदमे की तारीख थी. इसलिए गीता प्रेमी जबर सिंह के साथ सोनीपत से गांव रम्पुरा लौहरई आई. कोर्ट में तारीख पर गई, फिर शाम को वापस घर आ गई. उस ने घर में खाना पकाया और बच्चों को खिलाया. पति चरन सिंह से भी हमदर्दी भरी बातें कीं. चरन सिंह को लगा कि गीता को अपनी भूल का अहसास हो गया है. अब वह घर में बच्चों के साथ ही रहेगी, लेकिन यह उस की भूल थी.

गांव के बाहर प्राइमरी स्कूल था. यहां कई कमरे ऐसे थे, जिस में दरवाजे नहीं लगे थे. ऐसे ही एक कमरे में चरन सिंह का कब्जा था. यहां वह आलू का बीज रखे था, जिसे वह 2 दिन बाद खेत में लगाने वाला था. बीज की रखवाली के लिए वह रात में स्कूल वाले कमरे में सोता था. गीता ने इस की जानकारी पहले ही कर ली थी. 15 नवंबर, 2024 की शाम गीता पति चरन सिंह के साथ स्कूल वाले कमरे में सोने के लिए गई. इस की जानकारी गीता ने मोबाइल फोन के जरिए प्रेमी जबर सिंह को दे दी. योजना के तहत गीता चरन सिंह से मीठीमीठी बातें करती रही. चरन सिंह भी उस से बतियाता रहा. फिर वह सो गया. लेकिन गीता की आंखों में नींद नहीं थी. वह तो जबर सिंह के आने का इंतजार कर रही थी.

गीता क्यों बनी पति का काल

आधी रात को जब गांव के लोग गहरी नींद में सो गए, तब जबर सिंह लोहे की रौड ले कर घर से निकला. रौड का इंतजाम जबर सिंह ने गीता का फोन आने के बाद कर लिया था. जबर सिंह स्कूल पहुंचा तो गीता ने उस के कान में कुछ फुसफुसाया. इस के बाद गीता ने चरन सिंह के पैर दबोच लिए और जबर सिंह ने उस के सिर पर रौड से कई प्रहार किए. चरन सिंह की हल्की चीख निकली, फिर शांत हो गया. हत्या करने के बाद दोनों चरन सिंह के शव को स्कूल की टूटी बाउंड्री वाल के पास ले गए, फिर शव पर घासफूस डाल कर जलाने का प्रयास किया. इस के बाद जबर सिंह फरार हो गया और गीता अपने घर आ गई.

16 नवंबर, 2024 की सुबह पढऩे वाले बच्चे स्कूल पहुंचे तो उन्होंने बाउंड्री वाल के पास अधजला शव देखा. बच्चों ने शोर मचाया तो गांव वाले आ गए. ग्राम प्रधान सुधर सिंह ने थाना बसरेहर पुलिस को सूचना दी तो एसएचओ समित चौधरी पुलिस बल के साथ घटनास्थल आ गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को घटना से अवगत कराया तो एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा डीएसपी पुहुप सिंह मौकाएवारदात पर आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

अब तक ग्रामीणों ने शव की पहचान कर ली थी. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मृतक का नाम चरन सिंह है. वह रम्पुरा गांव का ही रहने वाला था. शव के पास मृतक की पत्नी गीता छाती पीटपीट कर रो रही थी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधाया, फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक चरन सिंह की उम्र 48 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर में प्रहार कर की गई थी. पहचान मिटाने के लिए शव को जलाने का प्रयास किया गया था. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर जांच की और सबूत जुटाए. निरीक्षण के बाद पुलिस ने चरन सिंह के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद मृतक की पत्नी गीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति चरन सिंह की हत्या उस के देवर मुन्नालाल ने की है. वह उस की जमीन हड़पना चाहता था. यह पता चलते ही पुलिस ने मुन्नालाल को हिरासत में ले लिया. अधिकारियों ने जब मुन्नालाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गीता झूठ बोल रही है. वह उसे फंसाना चाहती है. रोनेधोने का नाटक कर वह पुलिस को गुमराह करना चाहती है. जबकि हकीकत यह है कि गीता ने ही अपने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर भाई की हत्या की है.

उस का भाई चरन सिंह नाजायज रिश्तों का विरोध करता था. गीता अपने पति व 3 बच्चों को छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई थी. वह सोनीपत में उस के साथ रहने लगी थी. अवैध रिश्तों की बात पता चली तो पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ समित चौधरी ने गीता को हिरासत में ले लिया. गीता की 13 वर्षीया बेटी सान्या ने भी पुलिस को बताया कि उस के पिता की हत्या मम्मी गीता ने जबर सिंह के साथ मिल कर की है.

एसएचओ समित चौधरी ने थाने पर जब गीता से चरन सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई और त्रियाचरित्र दिखाने लगी, लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गई और उस ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया. दूसरे रोज पुलिस ने नाटकीय ढंग से जबर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया और हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड भी बरामद करा दी, जिसे उस ने स्कूल के पास झाडिय़ों में छिपा दिया था.

हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की सूचना एसएचओ समित चौधरी ने पुलिस अधिकारियों को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थित सभागार में प्रैसवार्ता की और हत्या का खुलासा किया. गीता यादव और उस के प्रेमी जबर सिंह से पूछताछ के बाद चरन सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियद पर रचीबसी निकली—

गीता 3 साल में हो गई विधवा

गीता के पिता रूपसिंह यादव औरैया जनपद के दिबियापुर कस्बे के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी गोमती के अलावा एक बेटा भागीरथ तथा 2 बेटियां गीता व अनीता थी. रूपसिंह बढ़ईगीरी का काम करता था. इस काम में बेटा भागीरथ भी उस की मदद करता था. रूपसिंह की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. बड़ी मुश्किल से परिवार चल पाता था.

भाईबहनों में सब से बड़ी गीता यादव थी. वह घर में सब की लाडली थी. इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. उस का रूपरंग तो साधारण था, लेकिन नैननक्श आकर्षक थे. गीता ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, फिर भी ऊंचे ख्वाब देखा करती थी. जब वह बनठन कर अपनी जवानी के जलवे बिखेरती हुई गलियों से गुजरती तो मनचलों के दिलों पर बिजली सी गिरती थी. गीता यादव आजादखयाल की जरूर थी, लेकिन मनचलों को अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह बस यही कल्पना करती कि उस का पति भी उसी की तरह हैंडसम और आजादखयाल का होगा.

गीता यौवन के भार से लद गई तो रूपसिंह को उस की शादी की चिंता हुई. रूपसिंह ने लड़का देखना शुरू किया तो उसे संजय के बारे में पता चला. संजय के पिता रामसिंह कानपुर के घाटमपुर कस्बे के रहने वाले थे. उन के 2 बेटे अजय व संजय थे. अजय का विवाह हो चुका था. संजय कुंवारा था. वह आटो चलाता था. संजय देखने में आकर्षक व शरीर से हृष्टपुष्ट था. कमाता भी था. अत: रूपसिंह ने संजय को अपनी बेटी गीता के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद रूपसिंह ने गीता का विवाह संजय के साथ कर दिया.

शादी के बाद गीता व संजय ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. सुखमय जीवन व्यतीत करते 5 साल कब बीत गए, दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला. इन 5 सालों में गीता ने एक बेटी को जन्म दिया. गीता ने उस का नाम सान्या रखा. नन्ही परी सान्या से गीता व संजय दोनों ही बेहद प्यार करते थे. उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं रखते थे. संजय घाटमपुर-कानपुर मार्ग पर आटो चलाता था. वह सुबह 8 बजे घर से निकलता, फिर रात 8 बजे तक ही घर वापस आता था. दोपहर का खाना वह होटल पर खाता था, जबकि रात का खाना पत्नी व बेटी के साथ ही खाता था. गीता उस के खानपान का विशेष ध्यान रखती थी.

जीवन सुखमय बीत रहा था. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था, जिस ने गीता की जिंदगी में अंधेरा कर दिया. उस दिन संजय सुबह आटो ले कर घर से निकला. दोपहर बाद गीता को खबर मिली कि संजय का एक्सीडेंट हो गया. उस के आटो में किसी लोडर चालक ने टक्कर मार दी. वह सीएचसी घाटमपुर में भरती है. गीता अपने ससुर रामसिंह के साथ अस्पताल पहुंची. लेकिन तब तक डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. बेटी सान्या अभी 3 साल की ही थी कि उस के सिर से पिता का साया उठ गया. गीता ने कुछ महीने तक तो आंसू बहाए, उस के बाद बेटी के भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सासससुर ने कुछ दिनों तक तो हमदर्दी जताई, उस के बाद उन का भी रवैया बदल गया.

विधवा बहू व उस की बेटी उन्हें बोझ लगने लगी थी. वह उसे ताने भी मारने लगे थे. सास कहती, ‘बहू उस के बेटे को खा गई.’ ससुर कहता, ‘अभागिन बहू ने उस के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया.’ गीता कब तक ससुराल वालों के ताने सहती. एक रोज उस ने बेटी को साथ लिया और मायके आ गई. मम्मीपापा ने उस के दर्द को समझा और उसे घर में शरण दे दी. गीता उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, अत: उस ने काम की तलाश शुरू कर दी. काफी प्रयास के बाद उसे बाल भारती स्कूल में आया की नौकरी मिल गई. नौकरी से वह अपना तथा बेटी का भरणपोषण करने लगी.

गीता भरी जवानी में विधवा हो गई थी. पेरेंट्स को चिंता सता रही थी कि वह पूरा जीवन कैसे बिताएगी. कोई न कोई सहारा उसे जरूर चाहिए. अत: रूपसिंह उस का घर बसाने के प्रयास में जुट गए. एक रोज एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें चरन सिंह के बारे में पता चला. चरन सिंह इटावा जिले के बसरेहर थाना के गांव रम्पुरा लौहरई का रहने वाला था. बड़ा भाई मुन्नालाल अपने परिवार के साथ अलग रहता था. दोनों भाइयों के बीच घर जमीन का बंटवारा हो चुका था. चरनसिंह किसान था. मनरेगा में भी मजदूरी कर लेता था. चरन सिंह उम्रदराज जरूर था, फिर भी रूपसिंह ने उसे पसंद कर लिया था. कारण उन की बेटी गीता भी विधवा और एक बेटी की मां थी.

दूसरे पति से खुश क्यों नहीं थी गीता

गीता और चरन सिंह का कोई मेल नहीं था. गीता 30 साल की थी तो चरन सिंह 40 साल का था. गीता दिखने में आकर्षक व सुंदर थी, जबकि चरन सिंह सांवले रंग का इकहरे बदन का था. इस बेमेल विवाह में गीता का विधवा होना तथा उस के पिता की गरीबी, चरन सिंह के लिए वरदान बन गई. मजबूरी में गीता का विवाह चरन सिंह से हो गया. मन मसोस कर गीता ने भी इस बेमेल संबंध को स्वीकार कर लिया. गीता जैसी जवान और सुंदर पत्नी पा कर अधेड़ उम्र का चरन सिंह अपने भाग्य पर इतरा उठा. गीता के घर संभालते ही चरन सिंह ने उसे घर की चाबी सौंप दी. वह गीता से तो प्यार करता ही था, उस की बेटी को भी भरपूर प्यार देता था. सान्या भी चरन सिंह को पापा कह कर बुलाती थी. अब चरन सिंह जो कमाता था, वह गीता के हाथ पर रखता था. दूसरे पति के रूप में गीता को चरन सिंह का सहारा मिल गया था. अत: उस के दिन सुख से बीतने लगे थे.

समय बीतता गया. गीता के एक बेटी पहले से थी. दूसरे पति चरन सिंह से उस ने एक के बाद एक 2 बेटों अमन व करन को जन्म दिया. इस तरह गीता अब 3 बच्चों की मां बन चुकी थी. गीता यादव अपने तीनों बच्चों से बेहद प्यार करती थी तथा उन के पालनपोषण में कोई कोताही नहीं बरतती थी. चरन सिंह भी अपने बेटों जैसा ही सान्या को भी प्यार देता था और उस की हर जिद पूरी करता था. गीता 3 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस के आकर्षण में कमी नहीं आई थी. वह अब भी हर रात पति का साथ चाहती थी. जबकि 2 बेटों के जन्म के बाद चरन सिंह की कामेच्छा कम हो गई थी.

5 साल भी नहीं बीते थे कि गीता की रातें काली होनी शुरू हो गईं. अब उस की समझ में आया कि चरन सिंह के हाथों से मंगलसूत्र पहनना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. ऐसी भूल, जिसे सुधारा भी नहीं जा सकता था. चरन सिंह तो बुझता हुआ दीया था. बुझने से पहले जिस तरह दीया भड़कता है, शादी के बाद चरन सिंह उसी तरह भड़का था. इसी अंतिम जोश में 2 बच्चे हो गए और खुद चरन सिंह बुझ गया. हर रात की असफलता चरन सिंह की रोजमर्रा बन गई तो शर्मिंदगी से बचने के लिए वह गीता का सामना करने से कतराने लगा. दिन में वह खेत पर रहता. शाम को दारू पी कर आता. कभी खाना खाता, कभी बिना खाए ही सो जाता. गीता रात भर करवटें बदलती रहती.

पति की उपेक्षा से गीता यादव का मन गृहस्थी में कम ही लगता था. अब तक उस की बेटी सान्या 10 वर्ष की उम्र पार कर चुकी थी. घर का कुछ काम वह संभाल लेती थी. दोनों भाइयों का भी खयाल रखती थी. पापा को भी नाश्तापानी खेत पर दे आती थी. वहीं गीता एक तरफ उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. चंचल चितवन की गीता के चेहरे पर अकसर उदासी के बादल छाए रहने से उस के घर से 4 घर दूर रहने वाला युवक जबर सिंह समझ गया कि अवश्य उसे कोई दुख कचोट रहा है. वह गीता को जब भी देखता, उसे बांहों में लेने को मचलने लगता. गीता भी उसे देख कभीकभी मुसकरा देती. इस से जबर सिंह को यकीन हो गया कि गीता उस से कुछ चाहती है.

जबर सिंह के पापा गजोधर की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बेटे गब्बर व जबर सिंह थे. गब्बर दूध का व्यवसाय करता था. जबकि जबर सिंह खेतीकिसानी के साथ मनरेगा में मजदूरी भी करता था. मनरेगा मे काम करने के दौरान ही जबर सिंह की दोस्ती गीता के पति चरन सिंह से हुई थी. हालांकि जबर सिंह और चरन सिंह की उम्र में 10-12 साल का फासला था. लेकिन दोनों शराब के लती थे, सो उन के बीच दोस्ती हो गई थी. जबर सिंह का आनाजाना गीता के घर बना रहता था. देखनेभालने में जबर सिंह गठीले बदन वाला युवक था. गीता का हमउम्र था. बातें भी लच्छेदार करता था. गीता को उस की बातें अच्छी लगती थीं. वह जब भी जबर सिंह को देखती, सोचने लगती कि काश! उस का पति भी मजबूत कदकाठी वाला और चुहलबाज होता तो उस की भी जिंदगी मजे से बीतती.

चरन सिंह कमजोर शौहर तो था ही, शराब का लती भी था. इसलिए गीता उस से मन ही मन नफरत करने लगी. पति से निराश हुई तो उस का झुकाव जबर सिंह की तरफ होने लगा. जबर सिंह जब भी आता था, गीता व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ खानेपीने की चीज जरूर लाता था. इस से गीता यही सोचती कि जबर सिंह उस का कितना खयाल रखता है. गीता का पति चरन सिंह उस के आनेजाने पर ऐतराज न करे, इसलिए जबर सिंह उस की आर्थिक मदद करता रहता था. चरन सिंह को दारू भी पिलाता था. उस के घर में बैठ कर एकदो पैग वह भी लगा लेता था. ऐसा वह गीता की नजदीकी हासिल करने के लिए करता था. इस बीच गीता और जबर के बीच नैनमटक्का चलता रहता था. कभीकभी चरन सिंह की नजर बचा कर वह गीता को छेड़ भी देता था.

इस के बावजूद चरन सिंह जब पत्नी और जबर सिंह को हंसीमजाक व बतियाते देख लेता था तो वह पत्नी पर नाराज होता था और लांछन लगाने लगता था. लेकिन जबर सिंह बीच में आ जाता और दारू का लालच दे कर चरन सिंह का गुस्सा शांत कर देता था. एक रोज जबर सिंह शाम को गीता के घर आया. उस के एक हाथ में बोतल तथा दूसरे में मीट की थैली थी. आते ही उस ने पूछा, ”भाभी, भैया नहीं दिख रहे हैं, आज मैं उन की मनपसंद चीज लाया हूं.’’

”ऐसी क्या चीज लाए हो, जिस से तुम्हारे भैया खुश हो जाएंगे?’’ गीता ने आंखें नचाईं.

”बकरे का मीट और शराब की बोतल.’’ जबर सिंह ने थैली और शराब दिखाते हुए गीता से कहा.

”लेकिन वो तो आज घर पर हैं नहीं.’’

”कहां गए हैं?’’ जबर ने पूछा.

”किसी काम से रिश्तेदारी में गए हैं. कल दोपहर तक वापस आएंगे.’’ गीता ने बताया.

”तब तो कल ही महफिल जमेगी.’’ जबर सिंह मायूस हो गया.

”अरे भैया नहीं तो क्या हुआ, मैं तो हूं. मैं मीट पका लूंगी. तुम मायूस क्यों होते हो.’’ कहते हुए उस ने मीट की थैली जबर सिंह के हाथ से ले ली. इस के बाद गीता ने पानी, गिलास तथा नमकीन जबर सिंह के आगे रख दी. गीता मटन पकाने लगी. जबर सिंह पैग बनाबना कर मजे से पीने लगा. रसोई का काम निपटा कर गीता पास आ बैठी तो नशे के सुरूर में जबर सिंह उस के हुस्न के कसीदे पढऩे लगा. गीता को उस की बातों में रस आ रहा था. जबर सिंह शराब का गिलास उठा कर बोला, ”भाभी, भैया न जानें क्यों शराब का नशा करते हैं, आप की मदभरी आंखों में इतना नशा है कि कोई भी शराब उस का मुकाबला नहीं कर सकती.’’

”ये तुम समझते हो, वो तो नहीं समझते.’’ गीता ने ठंडी आह भरी.

”मैं तो भाभी यह भी कहता हूं…’’ नशे की झोंक में वह गीता के पास खिसक आया फिर बोला, ”भाभी, तुम्हारे रस भरे होठों में इतनी तासीर है कि इन्हें अंगुली से छू कर शराब में अंगुली डुबो दो, नशा 4 गुना बढ़ जाएगा.’’

”वो कैसे?’’ गीता ने आंखें नचाते हुए पूछा.

”वो ऐसे भाभी,’’ जबर सिंह ने अपनी तर्जनी अंगुली गीता के निचले होंठ पर फिराई, फिर अंगुली शराब के गिलास में डुबो कर एक ही सांस में पूरी शराब गटक गया. जबर सिंह के इस स्पर्श ने गीता की देह में अंगारे भर दिए. कामाग्नि की आंच से उस का बदन सुलगने सा लगा. चारपाई से उठते हुए वह बोली, ”अब बस करो, बहुत पी चुके हो. मैं खाना ले कर आती हूं.’’

5 मिनट बाद ही गीता थाली परोस कर ले आई. जबर सिंह को लगा, शायद उस की हरकत से गीता नाराज है, इसलिए वह बिना कुछ बोले चुपचाप खाना खाता रहा और सामने बैठी गीता अपलक उसे देखती रही. देह की भड़की हुई प्यास उसे बेचैन किए थी. जबर सिंह का मजबूत बदन रहरह कर उस की कामनाओं को हवा दे रहा था. वह किसी तरह खुद को संभाले हुए थी. खाना खा कर जबर सिंह जाने लगा तो गीता फंसीफंसी आवाज में बोली, ”कैसे मर्द हो तुम? मुझ अकेली औरत को यूं तन्हा छोड़ कर जा रहे हो?’’

”तुम्हें डर लग रहा है तो मैं यहीं सो जाता हूं.’’ जबर सिंह बोला.

गीता के बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे. बच्चे जाग न जाएं और उस के खेल में खलल न डाल दें, सो उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. गीता ने जबर सिंह की कलाई पकड़ी और अपने कमरे में ले गई. फिर चारपाई की ओर इशारा करते हुए बोली, ”जबर सिंह, तुम इस पर लेट जाओ.’’

”खाट तो एक ही है, फिर तुम कहां सोओगी?’’ जबर ने उत्सुकता से पूछा.

”इसी चारपाई पर तुम्हारे साथ.’’ वासना ने गीता का विवेक हर लिया था. उस ने धक्का दे कर जबर सिंह को चारपाई पर गिरा दिया और स्वयं उस पर ढेर हो गई, ”बुद्धू, इतना भी नहीं समझते कि शबाब मिले तभी शराब पीने का मजा आता है.’’

जबर सिंह नशे में था तो गीता कामातुर थी. पका हुआ फल खुद ही गोद में आ गिरा था. जबर सिंह ने कामातुर गीता को अपनी बांहों में भर लिया और चारपाई पर लुढ़क गया. उस के बाद कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. काम पिपासा मिटाने के बाद ही दोनों एकदूसरे से अलग हुए. दोनों के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि थी. गीता यादव और जबर सिंह एक बार अवैध संबंधों के दलदल में समाए तो समाते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते. गीता ने जहां पति के साथ विश्वासघात किया था तो वहीं जबर सिंह ने दोस्ती में दगा दी थी. लेकिन उन दोनों को कोई मलाल न था.

जबर सिंह के बारबार घर आनेजाने पर चरन सिंह को शक हो गया कि जरूर इस का गीता के साथ कोई चक्कर चल रहा है, जिस से यह यहां इतने चक्कर लगाता है. एक दिन चरन सिंह ने इस बाबत पत्नी गीता से पूछा तो वह झूठ बोली, ”जरूर तुम्हें कोई वहम हो गया है. जैसा तुम सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है.’’

पति ने रंगेहाथ ऐसे पकड़ा गीता को

 

दिन भर का थकाहारा चरन सिंह शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे जबर सिंह पर पड़ी. वह उस की पत्नी गीता से हंसीठिठोली कर रहा था. गीता भी उस की बातों में सराबोर थी. यह देख कर चरन सिंह का गुस्सा सातवेें आसमान पर जा पहुंचा. वह चीखते हुए बोला, ”गीता, अपने यार से ही बतियाती रहेगी या फिर चायपानी को भी पूछेगी.’’

पति का कटाक्ष सुन कर गीता भी फट पड़ी, ”कैसी बातें करते हो, थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. जबर सिंह मेरा यार नहीं, गलीटोला के नाते देवर लगता है. वैसे भी जबर सिंह तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो, कामधंधा करते हो और शराब की महफिल सजाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का घर आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो उसे बेइज्जत कर भगा दो. ताकि दोबारा उस के कदम घर की ओर न बढ़ें.’’

”तेरी लोमड़ी चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तू चाहती है कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तू उस की भली बनी रहे. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तेरे दिल में उस के लिए जो प्यार उमड़ता है, उसे मैं भलीभांति जानता हूं. तेरे कारण ही वह कुत्ते की तरह पूंछ हिलाता हुआ चला आता है. मुझ से मिलने का तो बस बहाना होता है.’’

गीता और चरन सिंह की तूतूमैंमैं की भनक जबर सिंह के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर बरामदे में आ गया और बोला, ”चरन भैया, लगता है आप खेतों पर किसी से झगड़ कर आए हो. इसलिए मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भौजाई पर उतार रहे हो. लेकिन भैया, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लाल परी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

चरन सिंह शराब का लती था. जबर सिंह ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा. वह खुशी का मुखौटा ओढ़ कर बोला, ”जबर सिंह, मैं तेरी भौजाई से झगड़ नहीं रहा था. बीजखाद का इंतजाम करने की बात कर रहा था.’’

उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”गीता, कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम और जबर सिंह महफिल सजाएंगे.’’

पति की हांक सुन कर गीता मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा पति है. कुछ देर पहले लांछन लगा रहा था. जबर सिंह को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है?’’

गीता ने कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद चरन सिंह और जबर सिंह शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त जबर सिंह की निगाहें गीता पर ही टिकी रहीं. गीता भी मंदमंद मुसकरा कर जबर सिंह का नशा बढ़ाती रही. लेकिन गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिपता, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रोज चरन सिंह खेतों पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी जबर सिंह उस के घर आ गया. आते ही उस ने गीता को बांहों में भर लिया. दोनों काम वासना में अभी डूबे हुए ही थे कि चरन सिंह की पुकार सुन कर दोनों घबरा गए.

गीता ने अपने कपड़े तुरंत दुरुस्त किए और दरवाजा खोल दिया. घर में अंदर जबर सिंह मौजूद था. बिस्तर कुछ पल पहले गुजरे तूफान की चुगली कर रहा था. चरन सिंह सब समझ गया. उस ने गीता को धुनना शुरू किया तो जबर सिंह चुपके से खिसक लिया. चरन सिंह जान गया था कि जबर सिंह उस पर इतना मेहरबान क्यों था? अब उस ने जबर सिंह के साथ शराब पीना बंद कर दी और उस के घर आने पर पाबंदी भी लगा दी. देह की लगी पाबंदियों को भला कहां मानती है.

चरन सिंह ने जब एक रोज जबर सिंह को गीता के साथ बतियाते देख लिया तो उस ने जबर सिंह के साथ गालीगलौज व मारपीट की. साथ ही जबर सिंह को चेतावनी भी दे डाली कि वह उस की पत्नी का पीछा छोड़ दे, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा. यही नहीं, उस ने जबर की शिकायत भी उस के बड़े भाई गब्बर से कर दी. गब्बर सिंह ने भाई को समझाया और गीता से दूर रहने को कहा. लेकिन जबर सिंह ने भाई की बात नहीं मानी. वह गीता के इश्क में इतना अंधा हो चुका था कि उसे अपनी पत्नी बनाने के सपने देखने लगा था. दोनों के मिलने पर पाबंदी लगी तो वे मोबाइल फोन के जरिए एकदूसरे से बात करने लगे. गीता को मोबाइल फोन जबर सिंह ने ही मुहैया करा दिया था.

एक रात चरन सिंह ने पत्नी गीता को फोन पर बतियाते छत पर पकड़ा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. उस ने गीता से फोन छीन कर दूर फेंक दिया, फिर उस ने गीता को डंडे से जम कर पीटा. इस पिटाई से गीता का सिर फट गया. उस ने सुबह जा कर बसरेहर थाने में पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस पर पुलिस ने चरन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. 2 दिन बाद उसे जमानत मिली.

इस घटना के बाद गीता ने तय कर लिया कि वह पति की मार अब और सहन नहीं करेगी. वह उस के साथ रहेगी भी नहीं. गीता का नाजायज रिश्ता जबर सिंह के साथ बन ही चुका था, इसलिए उस ने जबर सिंह को तीसरे पति के रूप में चुन लिया और बच्चों का मोह त्याग कर जबर सिंह के साथ रहने की ठान ली. उस ने अपनी मंशा से जबर सिंह को भी अवगत करा दिया.

बच्चों को छोड़ प्रेमी के साथ भाग गई गीता

जबर सिंह तो गीता को पत्नी बनाने का प्रयास पहले से ही कर रहा था, अत: गीता ने प्रस्ताव रखा तो वह उसे पत्नी का दरजा देने को राजी हो गया. इस के बाद गीता और जबर सिंह ने गांव छोडऩे का निश्चय किया. उन्होंने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी. मौका देख कर एक रात गीता अपने तीनों बच्चों को घर में छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई. जबर सिंह गीता को सोनीपत (हरियाणा) ले गया. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. जीविका चलाने के लिए दोनों मेहनतमजदूरी करने लगे. वहां गीता को किसी तरह का डर नहीं था. गीता व जबर सिंह को सोनीपत में बसाने का काम जबर सिंह के एक दूर के रिश्तेदार ने किया था, जो पहले से वहां रहता था.

इधर चरन सिंह की सुबह आंखें खुलीं तो पत्नी घर से गायब थी. तीनों बच्चे भी मां को खोजने लगे. चरन सिंह ने गांव भर में गीता की खोज की, जब वह नहीं मिली तो वह समझ गया कि गीता जबर सिंह के साथ भाग गई है. उस ने यह बात पूरे गांव को भी बता दी. कुछ लोगों ने उसे रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. लेकिन उस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. गीता कई महीने तक जबर सिंह के साथ रही, उस के बाद उसे बच्चों की याद सताने लगी. उस से नहीं रहा गया, तब वह एक रोज गांव वापस आ गई. बच्चों ने मां को सामने देखा तो उन की आंखों से आंसू बहने लगे. गीता ने बच्चों को गले लगा लिया. चरन सिंह भी बच्चों की देखभाल के लिए परेशान था सो उस ने झगड़ा करने की बजाय गीता को बच्चों के साथ रहने के लिए समझाया. उस ने मारपीट के लिए क्षमा भी मांगी.

लेकिन जबर सिंह के पौरुष की दीवानी गीता ने चरन सिंह की बात ठुकरा दी. वह सप्ताह भर बच्चों के साथ रही, उस के बाद सोनीपत लौट गई. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गीता 2-4 महीने में जबर सिंह के साथ गांव आती और हफ्ता-10 दिन बच्चों के साथ रहती, फिर दोनों वापस चले जाते. गांव प्रवास के दौरान गीता का चरन सिंह से झगड़ा भी होता. कुछ समय बाद गीता का मारपीट वाले मुकदमे की कोर्ट में तारीखें पडऩे लगीं. अत: उसे इटावा कोर्ट में तारीख पर आना पड़ता. तारीख पर आने के बाद वह बच्चों से भी मिल लेती थी. तारीख पर चरन सिंह भी जाता था.

वहां कभी दोनों की नोंकझोंक होती तो कभी साथ बैठ कर बतियाते और खातेपीते भी थे, लेकिन गीता केस में सुलह को राजी नहीं होती थी. फिर 15 नवंबर की रात को गीता यादव ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति चरन सिंह की हत्या कर दी. चूंकि गीता यादव और जबर सिंह ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल लोहे की रौड भी बरामद करा दी थी, अत: एसएचओ समित चौधरी ने मृतक की बेटी सान्या की तहरीर के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 238(ए) के तहत गीता व जबर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

19 नवंबर, 2024 को पुलिस ने गीताजबर सिंह को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा में सान्या परिवर्तित नाम है

 

 

Extramarital Affair : सरिता क्यों बनी पति की कातिल

Extramarital Affair : पति की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद 34 वर्षीय सरिता ने कुख्यात बदमाश सोनू नागर से शादी कर ली थी. कुछ दिनों बाद ही ऐसा क्या हुआ कि सरिता को सोनू नागर की हत्या की सुपारी देनी पड़ी? पढ़ें, फेमिली क्राइम की यह खास स्टोरी.

मोबाइल फोन की घंटी लगातार रुकरुक कर बज रही थी. गुरमीत उस समय बाथरूम में था. जैसे ही फोन की घंटी की आवाज गुरमीत के कानों में पड़ी तो वह फटाफट नहा कर बाथरूम से बाहर आ गया. गुरमीत ने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश होते नाम को देखा तो उस के चेहरे पर मुसकान तैर गई. उस ने तुरंत काल रिसीव कर ली.

”हैलो बग्गा! आज सुबहसुबह कैसे याद आ गई अपने यार की?’’ गुरमीत ने चहक कर पूछा.

”तुझे तो मैं हर वक्त दिल में रखता हूं गुरप्रीत.’’ बग्गा सिंह दूसरी ओर से बोला, ”फिर याद तो अपनों को ही किया जाता है.’’

”ठीक है.’’ गुरमीत हंसा, ”बोल, कैसे फोन किया?’’

”एक मुरगे को टपकाना है गुरमीत.’’

”टपका देंगे.’’ गुरमीत ने लापरवाही से गरदन झटकी, ”मुरगा वजनदार तो है ना?’’

”मैं वजनदार मुरगा ही हलाल करता हूं गुरमीत. पूरे डेढ़ लाख में सौदा किया है.’’

”वाह!’’ गुरमीत ने होंठों पर जुबान फिराई, ”मोटी कटेगी यार, लेकिन सौदा फिफ्टीफिफ्टी का रहेगा बग्गा भाई.’’

”नहीं, पार्टी मेरी है इसलिए मैं तुम्हें 50 हजार दूंगा.’’ बग्गा सिंह की आवाज में अडिय़लपन था, ”देख, जब तेरी पार्टी होती है तो मैं भी वही लेता हूं जो तू देता है.’’

गुरमीत ने बात काट दी, ”वो सब ठीक है बग्गा, लेकिन 50 कुछ कम है.’’

”चल मैं 10 हजार और बढ़ा देता हूं.’’ बग्गा ने कहा, ”अब कुछ नहीं कहना.’’

”ओके.’’ गुरमीत ने गहरी सांस ली, ”मुरगा कहां टपकाना है?’’

”दिल्ली में.’’ बग्गा सिंह ने धीमी आवाज में कहा, ”तू आज ही दिल्ली पहुंच. मैं भी घर से निकल रहा हूं.’’

”तू इस वक्त कहां है?’’

”मैं भटिंडा में हूं, लेकिन हर हाल में शाम तक दिल्ली पहुंच जाऊंगा. तू मुझे फोन कर लेना. हमें कहां मिलना है, कहां ठहरना है, मैं तुझे बता दूंगा. अब तू तैयार हो, मैं काल काट रहा हूं.’’ बग्गा की तरफ से कहा गया. फिर संपर्क काट दिया गया.

गुरमीत ने मोबाइल टेबल पर रखा और दिल्ली जाने की तैयारी करने लगा. आधा घंटा बाद ही वह बैग ले कर घर से निकला और बसअड्ïडे के लिए आटो से रवाना हो गया.

3 फरवरी, 2025 की सुबह उत्तरी दिल्ली में शक्ति नगर के एफसीआई गोदाम के पास बहने वाले नाले में एक युवक औंधे मुंह पड़ा हुआ था. वहां से गुजर रहे एक व्यक्ति ने उस युवक को देखा तो वह ठिठक गया. उसे लगा कि शायद कोई शराबी नशे में गिर गया होगा. वह उसे गौर से देखने लगा. वह व्यक्ति नाले में औंधे मुंह पड़ा था, लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं दिखी तो उस ने अनुमान लगा लिया कि शायद इस की मौत हो चुकी है. उस ने अपना शक दूर करने के लिए दूर खड़े 2 व्यक्तियों को इशारे से अपने पास आने को कहा. वे दोनों व्यक्ति आपस में बातें कर रहे थे. इशारा मिलने पर वह उस व्यक्ति के पास आ गए.

”क्या आप हमें जानते हैं?’’ उन में से एक व्यक्ति ने पूछा.

”नहीं भाई, मैं आप दोनों को नहीं जानता. मुझे तो यहां नाले में पड़े इस युवक को देख कर संदेह हो रहा है कि वह युवक जीवित भी है या नहीं. आप देख कर बताएं.’’

नाले में मिली लाश

दोनों व्यक्ति नाले में देखने लगे. वहां पड़े युवक को देख कर वे घबरा गए. उन में से एक बोला, ”नूर, सरक ले यहां से. यह लाश है, यदि पुलिस आ गई तो बेकार के लफड़े में फंस जाएंगे हम लोग.’’

उस के साथ वाला व्यक्ति यह सुनते ही तेजी से एक तरफ चल पड़ा. उस के साथ वाला व्यक्ति उस के पीछे लपका. वहां खड़ा पहले वाला व्यक्ति जिम्मेदार नागरिक था. वह वहां से नहीं भागा, बल्कि उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर वहां पड़ी लाश की सूचना दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. कंट्रोल रूम से उसे वहीं खड़े रहने को कह दिया गया. करीब आधा घंटा बाद पुलिस वैन वहां सायरन बजाती हुई आ गई. इस वैन में रूपनगर थाने के एसएचओ रमेश कौशिक थे. उन के साथ पुलिस के 5 कांस्टेबल भी थे. सभी सावधानी से नाले में उतर गए. वह लाश औंधे मुंह पड़ी थी, उसे सीधा करने से पहले उस लाश की बहुत बारीकी से जांच की गई.

पीठ की ओर उन्हें कोई जख्म नजर नहीं आया. इसी एंगल से उस की मोबाइल द्वारा फोटो खींची गईं, फिर उसे सीधा किया गया. यह कोई 40-45 साल का व्यक्ति था. उस के शरीर पर पैंटशर्ट थी. उस के चेहरे पर गौर से देखने पर खिंचाव महसूस हो रहा था. एसएचओ रमेश कौशिक को लगा कि वह व्यक्ति जान निकलते समय बहुत तड़पा है. ऐसा उस हाल में होता है जब किसी का गला घोंटा जाता है. सांसें रुकने से व्यक्ति छटपटाता है और तड़पते हुए उस के प्राण निकलते हैं. कौशिक ने उस आदमी के गले का निरीक्षण किया तो उन का अनुमान सही साबित हुआ. उस के गले पर दबाब के कारण लाल निशान पड़ गए थे, जो साफ दिखाई दे रहे थे.

लाश की जेबों की तलाशी ली गई तो उस की जेब में कुछ नहीं मिला. इस से अनुमान लगाया गया कि इस की हत्या करने के बाद जेब से सारा सामान निकाल लिया गया है, ताकि कोई सुराग पुलिस के हाथ न आ पाए. रमेश कौशिक की सूचना पर नौर्थ डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी राजा बांठिया और एसीपी (सिविल लाइंस) विनीता त्यागी भी थोड़ी देर में मौके पर पहुंच गईं. उस से पहले एसएचओ रमेश कौशिक ने एक बार और मृतक की जेबें टटोलीं. हाथ की कलाई देखी, ताकि कोई गुदा हुआ नाम दिख जाए. लेकिन न जेबों में कुछ मिला, न उस की कलाई पर कुछ गुदा हुआ था.

नाले के ऊपर अब तक लाश की सूचना पा कर काफी लोग एकत्र हो गए थे. रमेश कौशिक ने ऊपर आ कर उन लोगों से लाश की पहचान करने को कहा, लेकिन किसी ने भी उस युवक को नहीं पहचाना. इस से यह अनुमान लगाया गया कि इस की हत्या कहीं और कर के उसे यहां ला कर फेंक दिया गया है, इस क्षेत्र में इस आदमी की लाश को शायद ही कोई पहचान पाएगा. यह व्यक्ति इस क्षेत्र का नहीं है. काफी पूछताछ करने के बाद भी उस व्यक्ति की पहचान नहीं हो पाई. उसी दौरान फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट की टीम भी वहां पहुंच चुकी थी. 2 फोटोग्राफर्स भी इस टीम में थे.

आते ही यह टीम अपने काम में लग गई. एसएचओ ने डीसीपी को बताया कि लाश की शिनाख्त नहीं हो पा रही है, लगता है इसे कहीं और मारा गया है. पहचान न हो, इसलिए इस की लाश को यहां ला कर नाले में फेंक दिया गया है.

”इंसपेक्टर कौशिक, लाश की पहचान तो आवश्यक है. अपराधी तक हम तभी पहुंचेंगे, जब इस की पहचान होगी.’’ डीसीपी गंभीर स्वर में बोले.

”जी सर.’’ एसएचओ ने सिर हिलाया, ”हम पूरी कोशिश कर रहे हैं.’’

डीसीपी बांठिया ने युवक की लाश का निरीक्षण किया. गले पर लाल निशान देख कर वह समझ गए थे कि इस की हत्या गला घोंट कर की गई है. वहां ऐसे सुराग नजर नहीं आ रहे थे, जिस से समझा जा सके कि इसे यहीं खत्म किया गया है. हत्या कहीं और कर के इस की लाश को यहां फेंक दिया गया है.

पूरा निरीक्षण कर लेने के बाद डीसीपी ने इंसपेक्टर कौशिक से कहा, ”मामला पेचीदा लग रहा है. मैं आप की हैल्प के लिए स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर रोहित को भी बुला लेता हूं.’’

”यह उचित रहेगा सर. स्पैशल स्टाफ के आने से यह केस आसानी से सौल्व हो जाएगा. आप रोहितजी को बुलवा लीजिए.’’

डीसीपी बांठिया ने स्पैशल स्टाफ (नौर्थ डिस्ट्रिक्ट) के इंसपेक्टर रोहित से बात की और पूरी बात बता कर उन्हें घटनास्थल पर बुला लिया. इंसपेक्टर रोहित अपनी टीम के साथ कुछ ही देर में वहां आ गए. उन की टीम ने युवक की लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. इंसपेक्टर रोहित ने फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट से बात कर के कुछ निर्देश दिए और इंसपेक्टर कौशिक को लाश पोस्टमार्टम हेतु हिंदूराव हौस्पिटल भेजने को कह दिया.

दिशानिर्देश दे कर डीसीपी और एसीपी भी घटनास्थल से चले गए. इंसपेक्टर कौशिक लाश का पंचनामा बनाने में जुट गए. यह काम पूरा होने तक स्पैशल स्टाफ वहां नहीं रुक सकता था, वे आगे की जांच के लिए वहां से निकल गए. इंसपेक्टर कौशिक ने लाश की शेष काररवाई निपटा कर पोस्टमार्टम के लिए हिंदूराव हौस्पिटल भेज दी और थाना रूपनगर लौट आए. यह केस बहुत पेचीदा था. मरने वाला व्यक्ति कौन है, उसे किस ने गला घोंट कर मारा, उस का कुसूर क्या था. इन सभी बातों का जवाब तभी मिल सकता था, जब उस की पहचान हो जाती. उस की लाश उस के परिजनों के लिए पोस्टमार्टम करवा कर सुरक्षित रखवा दी गई थी. अभी तक उस की पहचान नहीं हुई थी.

मृतक था दिल्ली का घोषित बदमाश

उस की पहचान करने के लिए इंसपेक्टर कौशिक और स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर रोहित पूरी कोशिश कर रहे थे, लेकिन कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था, लाश को ज्यादा दिनों तक रखा भी नहीं जा सकता था. पुलिस ने उस के शव की शिनाख्त के लिए पैंफ्लेट छपवा कर शक्ति नगर, रूपनगर और आसपास के क्षेत्र मे चस्पा कर दिए थे. अखबारों में भी शव की पहचान करने की अपील छपवाई गई, लेकिन कोई रिस्पौंस नहीं मिला. अब स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर रोहित सारस्वत ने आखिरी उपाय करने के लिए युवक के फिंगरप्रिंट्स को कमला मार्किट क्रिमिनल रिकौर्ड औफिस (सीआरओ) भेजा गया. आशा नहीं थी, यह उपाय कारगर सिद्ध होगा, लेकिन ऐसा करने से पुलिस को सफलता मिल गई. उस के फिंगरप्रिंट्स क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो में पहले से दर्ज फिंगरप्रिंट्स से मेल खा गए.

पहले वाले फिंगरप्रिंट्स सोनू नागर नाम के अपराधी के थे. यह युवक हौजकाजी थाने का घोषित बदमाश था और इस पर 10 से अधिक आपराधिक मामले कई थानों में दर्ज थे, विशेष कर हौजकाजी थाने में. यहां से उस के घर का एड्रैस मिल गया. यह युवक गुलाबी बाग, सीनियर सैकेंड्री गवर्नमेंट स्कूल के पास टाइप वन के क्वार्टर में रहता था. क्वार्टर का नंबर 570 था. इंसपेक्टर रमेश कौशिक और स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर रोहित सारस्वत, मनोज कुमार और हैडकांस्टेबल जितेंद्र के साथ उस क्वार्टर पर पहुंच गए. क्वार्टर 570 में एक महिला मिली. इस का नाम सरिता था. उस की उम्र करीब 34 साल थी. दरवाजे पर पुलिस को देख कर उस के चेहरे का रंग सफेद पड़ गया, किंतु तुरंत ही उस ने खुद को संभाल कर प्रश्न कर दिया, ”आप कोई अच्छी खबर ले कर आए हैं मेरे लिए.’’

इंसपेक्टर रोहित सारस्वत उस महिला के चेहरे पर नजरें जमाए हुए थे. पुलिस को सामने वाले के चेहरे के उतारचढ़ाव से उस की मनोस्थिति का अनुमान लगाना सिखाया जाता है. इंसपेक्टर रोहित मन ही मन मुसकराए. प्रत्यक्ष में वह चौंकने का अभिनय करते हुए बोले, ”अच्छी खबर! क्या तुम्हें उम्मीद थी कि पुलिस तुम्हारे दरवाजे पर अच्छी खबर ले कर आने वाली है?’’

”जी हां.’’ सरिता ने सिर हिलाया, ”मेरे पति कुछ दिनों से गुम हैं. मैं समझ रही हूं कि आप उन के बारे में अच्छी खबर ले कर आए हैं.’’

”तुम्हारे पति गुम हैं?’’ इंसपेक्टर ने चौंकते हुए कहा, ”क्या नाम है तुम्हारे पति का?’’

”सोनू… सोनू नागर पूरा नाम है जी.’’

”वह कब से लापता है?’’

”2 फरवरी की रात से.’’ सरिता ने बताया.

”क्या तुम ने सोनू नागर के गुम होने की सूचना लिखवाई है?’’

”हां साहब,’’ सरिता ने सिर हिलाया, ”मैं ने 7 फरवरी को थाना गुलाबी बाग में पति के गुम होने की सूचना लिखवा दी थी. वह 2 फरवरी की रात 10 बजे घर से गए थे, तब से वापस नहीं लौटे हैं. क्या वह आप को मिल गए हैं?’’

”मिले तो हैं लेकिन,’’ इंसपेक्टर रोहित ने बात अधूरी छोड़ दी.

”लेकिन क्या साहब, जल्दी बताइए… मेरा दिल बैठा जा रहा है.’’

”तुम्हारा पति अब इस दुनिया में नहीं रहा है, उस की डैडबौडी हमें शक्तिनगर में गंदे नाले के पास मिली है.’’

”ओहऽऽ नहींऽऽ’’ सरिता जोर से चीखी और दहाड़े मार कर रोने लगी.

उस की रोने की आवाज सुन कर अंदर से एक महिला निकल कर बाहर आ गई. सरिता को रोती देख कर उस ने घबरा कर पूछा, ”क्या हुआ बहू, तू रो क्यों रही है?’’

”मांजी हम लुट गए, बरबाद हो गए. पुलिस को तुम्हारे बेटे की लाश मिल गई है.’’ सरिता ने रोते हुए बताया.

वह महिला भी रोने लगी. पुलिस ने उन का मन हलका होने दिया. फिर सरिता को टोका, ”हमें सोनू नागर की हत्या की जांच करनी है. तुम हमारे साथ थाने चलो, वहीं तुम से कुछ बात करनी है.’’

”चलिए साहब. अब तो यही सब होगा, मेरा पति जान से गया है. मुझे अन्य सभी टोकेंगे.’’

पुलिस ने कोई ध्यान नहीं दिया कि वह क्या बोल रही है. वह तो दोनों को ले कर थाने में आ गए. सरिता की सास का नाम मिथिलेश था. फिलहाल उन दोनों का रोनाधोना थम गया था. इंसपेक्टर रोहित सारस्वत ने सरिता से पूछा, ”2 फरवरी की रात को तुम्हारा पति सोनू नागर घर से गया तो क्या वह तुम्हें कुछ बता कर गया था?’’

”सिर्फ इतना कहा था साहब, मैं बाहर ही हूं, इन से बात कर के मैं आ रहा हूं. फिर वह उन दोनों व्यक्तियों के साथ बाहर चले गए थे. तब से उन का कुछ पता नहीं चल रहा था.’’

”वह 2 व्यक्ति आखिर कौन थे

जिन के साथ तुम्हारे पति सोनू नागर बाहर

गए थे?’’ इंसपेक्टर रोहित सारस्वत ने पूछा.

”मैं उन्हें नहीं जानती. वे दोनों साढ़े 11 बजे बाइक से मेरे घर आए थे. उन से मेरे पति की कुछ बातें हुईं. क्या बातें हुईं, यह मैं नहीं सुन सकी. मेरे पति उन के साथ घर से निकलते हुए इतना ही बोले कि मैं थोड़ी देर में वापस आ रहा हूं. लेकिन काफी देर बीत जाने पर भी वह नहीं लौटे तो मुझे चिंता होने लगी. मैं ने उन्हें फोन लगाया, लेकिन उस वक्त उन की काल नहीं लगी. यह सोच कर कि वह किसी काम में उलझ गए होंगे, मैं सो गई थी.’’

”फिर अगले दिन तुम्हारे पति नहीं लौटे तो क्या तुम ने उन्हें तलाश करने की जरूरत नहीं समझी?’’ सारस्वत ने प्रश्न किया.

”दूसरे दिन मैं ने उन्हें तलाश किया था साहब. दोस्तों, रिश्तेदारी सब जगह तलाश किया था, लेकिन वह नहीं मिले.’’ सरिता ने बताया, ”उन को 2-4 दिन और ढूंढा, फिर हार कर गुलाबी बाग थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी.’’

”वह 2 व्यक्ति दिखने में कैसे लग रहे थे?’’ इंसपेक्टर रमेश कौशिक ने पूछा.

”उन की उम्र 35-40 के बीच की थी. रंग सांवला था. सामान्य कदकाठी के थे. एक के सिर पर ब्लैक कलर की कैप थी, जिस के हेड पर क्करू्र लिखा था.’’

”हूं, तुम मोबाइल इस्तेमाल करती हो?’’ कौशिक ने प्रश्न किया.

”जी हां.’’ सरिता ने कह कर अपना मोबाइल दिखाया.

मोबाइल फोन में मिले अहम सबूत

इंसपेक्टर कौशिक ने वह मोबाइल ले लिया और बाहर निकल गए. बाहर आ कर उन्होंने मोबाइल से की गई काल लिस्ट देखी, उस में काफी नंबर थे. इंसपेक्टर ने 2 और 3 तारीख की आउटगोइंग काल्स देखी. वह चौंक पड़े. 2 फरवरी की रात को सरिता की ओर से 12 बजे रात को किसी एक नंबर पर फोन किया गया था. वही नंबर बाद में भी था. यानी सरिता ने उस नंबर पर रात में 3-4 बार अलगअलग समय पर काल कर के काफी देरदेर तक बातें की थी.

इंसपेक्टर रमेश कौशिक के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैर गई. वह अंदर आ गए और सरिता से बोले, ”तुम्हारा मोबाइल हम कस्टडी में ले रहे हैं. इस की जांच करनी है हमें.’’

”ज…जी, मेरे फोन में ऐसा क्या है साहब,’’ सरिता अचकचा कर बोली.

”वह बाद में मालूम हो जाएगा. तुम यह बताओ, यह सोनू नागर तुम्हारी जिंदगी में कैसे आया? यह तो यहां के हौजकाजी थाने का घोषित अपराधी था. इस पर 10 अपाराधिक मामले दर्ज हैं.’’

सरिता ने नीचे सिर झुका लिया. कुछ देर वह खामोश रही, फिर एक गहरी सांस भर कर वह बोली, ”साहब, मेरा नाम सरिता है. मेरी शादी पहले किसी और से हुई थी. उस से मुझे एक लड़की और एक लड़का हुआ. मेरा पति तीस हजारी कोर्ट के पास पान की दुकान लगाता था. यहां पर सोनू नागर आताजाता रहता था. यहीं से मैं सोनू नागर को जानने लगी.

”अभी 8 महीने पहले मेरे पति की एक एक्सीडेंट में मौत हो गई. तब सोनू मेरी मदद के लिए आगे आया. मैं उस के अहसान तले दब गई और उस के सहारे रहने लगी. फिर मैं ने उस से शादी कर ली. नियति को मुझ से न जाने क्या नाराजगी है, उस ने मेरा यह दूसरा पति भी मुझ से छीन लिया.’’ कहतेकहते सरिता भावुक हो गई और रोने लगी.

”अपने आप को संभालो और घर जाओ, जरूरत पड़ी तो बुलवा लेंगे.’’ इंसपेक्टर रोहित सारस्वत ने उस से कहा और उठ कर खड़े हो गए.

सरिता अपनी सास के साथ थाने से बाहर निकल गई. उन के जाने के बाद इंसपेक्टर रमेश कौशिक ने कहा, ”मुझे सरिता पर संदेह है. इस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाइए. इस ने पति के लापता होने वाली रात यानी 2 फरवरी को रात में 3-4 बार एक ही नंबर पर बातें की थीं. मालूम करना है वह नंबर किस का और क्या सरिता पहले भी इस नंबर के संपर्क में रही है?’’

इंसपेक्टर सारस्वत ने हैडकांस्टेबल जितेंद्र कुमार को मोबाइल दे दिया और जनवरीफरवरी माह की तमाम काल डिटेल्स निकलवा कर लाने का आदेश दे दिया. अगले दिन उन की टेबल पर सरिता के मोबाइल की जनवरी-फरवरी माह की काल डिटेल्स रखी थी. उस को बहुत बारीकी से देखा गया. सरिता द्वारा एक नंबर पर जनवरी फरवरी माह की 10 तारीख तक कईकई बार बातें की गई थीं. इस नंबर की फोन प्रदाता कंपनी से जांच की गई तो यह नंबर पंजाब के किसी बग्गा सिंह नाम के व्यक्ति का निकला. उस का एड्रैस भी मिल गया. यह था गांव लांबी, जिला श्रीमुक्तसर साहिब, पंजाब. इस के बाद गुप्तरूप से सोनू नागर के घर गुलाबी बाग के आसपास इस नंबर की जांच की गई तो पुलिस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. 2 फरवरी की रात साढ़े 11 बजे से 12 बजे तक इस नंबर की लोकेशन वहां थी.

इस तरह सरिता ने खोला राज

यह विश्वास हो जाने के बाद कि बग्गा सिंह का सोनू नागर की हत्या में कोई न कोई रोल है, श्रीमुक्तसर साहिब जा कर बग्गा सिंह को घर से उठा लिया गया. उसे दिल्ली लाया गया. थाने में जब 19 वर्षीय बग्गा सिंह से सरिता से संबंध के विषय में पूछा गया तो पहले वह किसी सरिता को पहचानने से इंकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो वह कांपते हुए बोला, ”साहब, मैं सरिता को पहचानता हूं. उस से मेरी मुलाकात एक महीने पहले भटिंडा में हुई थी.’’

”सरिता वहां क्या करने गई थी?’’ इंसपेक्टर रोहित सारस्वत ने पूछा.

”वहां उस की बहन रहती है.’’

”हूं.’’ इंसपेक्टर ने सिर हिलाया, ”सरिता तुम से किस मकसद से मिली थी?’’

”साहब, वह मुझ से अपने पति का खून करवाना चाहती थी.’’ बग्गा सिंह ने चौंकाने वाला खुलासा किया.

”ओह!’’ इंसपेक्टर हैरानी से बोले, ”यानी सरिता अपने पति सोनू नागर की हत्या तुम से करवाना चाहती थी.’’

”जी साहब.’’ बग्गा ने सिर हिलाया.

”इस सुपारी की तुम्हें कितनी रकम मिली बग्गाï?’’

”डेढ़ लाख रुपए में यह सौदा हुआ था. सरिता ने 50 हजार रुपए पेशगी दी थी.’’

”पेशगी लेने के बाद तुम ने सोनू की हत्या कैसे की, अब यह भी बता दो हमें.’’ बग्गा के चेहरे पर नजरें जमा कर इंसपेक्टर रमेश कौशिक ने पूछा.

”साहब, मेरा एक दोस्त है गुरमीत, वह भी सुपारी किलर है. मैं ने उसे फोन कर के 2 फरवरी को दिल्ली पहुंचने को कहा. मैं भी दिल्ली आ गया. हम कश्मीरी गेट बस अड्ïडा पर मिले, वहां से एक होटल में ठहर गए. सरिता से संपर्क कर के हम ने उसे बता दिया कि हम दिल्ली आ गए हैं. सरिता ने हमें सोनू नागर का काम तमाम करने के लिए रात को आने को कहा. हम ने दिन में ही सरिता के मकान की रेकी कर ली थी और रात को साढ़े 11 बजे हर ओर सन्नाटा होने पर उस के दरवाजे पर पहुंच गए.

”सरिता ने चुपके से घर का कुंडी खोल दी. हम दबे पांव अंदर घुसे. सोनू नागर उस वक्त सो चुका था. हम ने सोते हुए सोनू नागर को दबोच लिया. सरिता ने पांव पकड़े. गुरमीत ने सोनू नागर के हाथ पकड़े. मैं ने छाती पर चढ़ कर सोनू की गरदन दबा कर उस की हत्या कर दी.

”सोनू नागर की हत्या करने के बाद उस की लाश को हम ने बाइक पर बीच में इस तरह बिठा लिया, जैसे वह जीवित हो और हम कहीं जा रहे हों. हम सोनू की लाश ले कर शक्ति नगर के एरिया में आए और सुनसान पड़े नाले में इस लाश को फेंक दिया. इस के बाद सरिता को सब बता कर हम होटल चले गए. अगले दिन हम सरिता से रुपए ले कर श्रीमुक्तसर साहिब गुरमीत के घर आ गए.’’

बग्गा सिंह का यह बयान कलमबद्ध कर लिया गया. सरिता को पकड़ कर थाने लाने के लिए इंसपेक्टर रमेश कौशिक अपनी पुलिस टीम के साथ गुलाबी बाग पहुंच गए. सरिता घर में ही थी. उसे महिला पुलिस ने पकड़ कर पुलिस की गाड़ी में बिठा लिया. सरिता चिल्लाई, ”मुझे इस तरह पकड़ कर पुलिस की गाड़ी में क्यों बिठाया गया है? इंसपेक्टर साहब, यह कैसी बेहूदगी है?’’

”बेहूदगी कहां है सरिताजी, हम तो तुम्हें थाने ले जा रहे हैं, वहां हम ने तुम्हारे पति के कातिल को पकड़ कर बिठा लिया है. तुम्हें वही दिखाने ले जा रहे हैं.’’ इसपेक्टर कौशिक ने मुसकरा कर कहा. सरिता यह सुन कर खामोश बैठ गई.

थाने में उसे जब बग्गा सिंह के सामने ला कर खड़ा किया गया तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया, वह धम्म से कुरसी पर बैठ गई. सरिता ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पूछताछ में उस ने कहा कि पहले पति की मौत के बाद उस की जिंदगी में सोनू नागर आ गया. कुछ दिनों तक वह सोनू नागर के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रही, फिर उस से शादी कर ली. शादी के बाद उसे मालूम हुआ कि सोनू नागर अपराधी प्रवृत्ति का आदमी है, उस की नजर उस की दुकान और मकान पर थी. वह उन्हें बेचने के चक्कर में था.

उस ने मेरी बेटी, जो स्कूल में पढ़ती थी, उस की इज्जत पर भी हाथ डाला. मैं सोनू से डरती थी, इसलिए खून का घूंट पी कर रह गई. सोनू मुझ से गालीगलौज और मारपीट भी करने लगा था. मुझे यह भी लगा कि मेरी जायदाद के लिए वह मेरी हत्या कर सकता है, इसलिए तंग आ कर मैं ने बग्गा सिंह को उस के कत्ल की सुपारी डेढ़ लाख रुपए में दे दी.

बग्गा ने अपने साथी गुरमीत के साथ

सोनू की हत्या 2 फरवरी, 2025 की रात को कर दी और लाश शक्ति नगर ले जा कर नाले में फेंक दी, जो 3 फरवरी को रूपनगर पुलिस को मिली थी. सरिता के इकबालिया बयान के बाद इस अपराध को भारतीय न्याय संहिता की धारा-103(1) के तहत सरिता और सुपारी किलर बग्गा सिंह को सक्षम न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. गुरमीत को पकडऩे के लिए पुलिस टीम श्री मुक्तसर साहिब में छापेमारी करने गई तो वह फरार हो गया था. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस के हाथ नहीं आया था.