Haryana Crime Story: मोहब्बत बनी मौत

Haryana Crime Story: अविवाहित मुकेश की फेसबुक द्वारा 2 बच्चों की मां निशा से दोस्ती हुई तो दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि घर छोड़ कर भाग भी गए. लेकिन निशा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह वापस आ गई. मुकेश को प्रेमिका की यह बेवफाई पसंद नहीं आई और वह उस का खून कर बैठा….

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना शहर की राजीव कालोनी में ज्यादातर वे लोग रहते हैं, जो वहां की छोटीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं. यहां की आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो बतौर किराएदार रहता है. चोरीचकारी और मारपीट जैसे अपराधों को छोड़ दें तो इस कालोनी में कभी ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई कि यहां के लोग दहल उठते.

लेकिन कब, कहां और किस प्रकार का अपराध घट जाए, इस बात को पहले से कौन जानता है. 3 फरवरी, 2016 की दोपहर को इस कालोनी में जो सनसनीखेज वारदात हुई, उस ने न सिर्फ पुलिस वालों को हैरान कर दिया, वहां रहने वालों को भी डरा दिया. दरअसल, कालोनी के ही एक सिरफिरे नौजवान ने सरेआम चाकू से एक महिला की गला काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी. हैरानी और खौफ पैदा करने वाली बात यह थी कि हत्यारा महिला की लाश के पास ही कुर्सी डाल कर आराम से बैठा था. लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वह चाकू लहरा कर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा था.

दिल दहलाने वाले इस खूनी मंजर और हत्यारे की धमकी के डर का आलम यह था कि कोई भी आगे बढ़ने की हिममत नहीं जुटा पा रहा था. हत्यारा कह रहा था, ‘‘यह सिर्फ मेरे लिए बनी थी, लेकिन इस ने मेरी होने से मना कर दिया, इसलिए इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं रह गया था.’’

घटना की सूचना पा कर थाना शहर के थानाप्रभारी सुरेश कुमार, किला चौकीइंचार्ज प्रवीण कुमार और महिला एसआई नीलम आर्य पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई थीं. थोड़ी देर में डीएसपी दलबीर सिंह भी आ गए थे. घटनास्थल की हालत देख कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे़ हो गए थे. मृतका खून से लथपथ पड़ी थी. लाश के पास ही कुर्सी डाले हत्यारा बैठा था. पुलिस को देख कर वह थोड़ा सतर्क हो गया था. पुलिस ने आगे  बढ़ कर कहा, ‘‘चाकू फेंक कर खुद को कानून के हवाले कर दो. यही तुम्हारे लिए ठीक भी रहेगा.’’

इस से युवक को गुस्सा आ गया. उस ने लाश की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी आगे बढ़ा तो उस का भी यही अंजाम कर दूंगा, जो इस का किया है.’’

उस की इस धमकी से पुलिसकर्मियों के भी कदम ठिठक गए. थानाप्रभारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘हमारी बात तो सुनो…’’

उन की बात पूरी होती, उस के पहले ही वह चिल्लाया, ‘‘कहा न, कोई आगे नहीं आएगा. अगर कोई आगे आया तो मैं अपनी गर्दन काट लूंगा.’’

कह कर उस ने चाकू अपनी गर्दन पर रख दिया. उस युवक की इस हरकत से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे समझ गए कि इस के सिर पर खून सवार है. इस स्थिति में यह कुछ भी कर सकता है. इसलिए पुलिस उसे समझातीबुझाती रही. मृतका की सास और उस का पति जोरजोर से रो रहे थे. जब युवक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो उस ने कहा, ‘‘चलो, पहले लाश उठाओ.’’

पुलिस जैसे ही आगे बढ़ी, उसी बीच उस ने अपने हाथ की कलाई पर चाकू से वार कर लिया. खून की धार फूट पड़ी. ऐसे में ही पुलिस ने चकमा दे कर उसे पकड़ लिया और फुर्ती से चाकू छीन लिया. इस के बाद तुरंत अपनी जीप से अस्पताल पहुंचाया. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी घटना आखिर घटी क्यों थी? इस बारे में पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जिस युवक ने खौफनाक तरीके से फिल्मी अंदाज में यह हत्या की थी, उस का नाम मुकेश था. मृतका का नाम निशा था.

जिस समय यह वारदात हुई थी, मृतका निशा छत पर कपड़े फैलाने गई थी. उसी बीच मुकेश चाकू ले कर वहां आ गया. वह सीधे छत पर गया और निशा का हाथ पकड़ कर नीचे खींच लाया. वह उस से साथ चलने को कह रहा था. निशा ने मना किया तो उस ने उस का गला काट दिया. सास ने बहू को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन बचा नहीं सकी. बहरहाल, पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद मृतका के पति संजय वर्मा की तहरीर पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया गया. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने मुकेश को कस्टडी में ले लिया और थाने ला कर विस्तार से पूछताछ की.

मुकेश, निशा के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में एक ऐसे सिरफिरे आशिक की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, जो फेसबुक से करीब आई निशा को हमेशा के लिए अपनी बनाने की जिद पर अड़ा था, जबकि उस के प्यार में पड़ कर वादे करने वाली निशा हालात बदलने पर बदल चुकी थी. खूबसूरत और बनसंवर कर रहने वाली 30 वर्षीया निशा संजय वर्मा की पत्नी थी. संजय एक पावरलूम फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के 2 बेटे, 8 साल का आदी और 6 साल का वंश था. उस के मातापिता भी साथ रहते थे. वैसे तो ये लोग मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बलरामपुर के रहने वाले थे, लेकिन लगभग 15 सालों से पानीपत में रह रहे थे. परिवार में खुशियों का बसेरा था. वक्त अपनी गति से चल रहा था.

मूलत: बिहार का रहने वाला 22 वर्षीय मुकेश भी कालोनी में किराए पर रहता था और अमन भवन चौक स्थित एक फैक्ट्री में कपड़ा सिलाई का काम करता था. चूंकि वह संजय के घर के नजदीक रहता था, इसलिए अक्सर उस की नजरें निशा पर पड़ जाती थीं. धीरेधीरे उस की खूबसूरती उसे भाने लगी. फिर तो वह उसे देखने के बहाने तलाशने लगा. निशा जल्दी ही उस की मंशा भांप गई. 3 महीने पहले मुकेश ने निशा को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी तो उस ने सहर्ष स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए.

दोनों के बीच चैटिंग होने लगी. निशा किस डगर पर चल चुकी है, यह बात परिवार का कोई नहीं जानता था. चैटिंग और मोबाइल पर होने वाली बातों से दोस्ती गहराई तो मुकेश निशा से प्यार करने लगा. एक दिन मौका पा कर उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया. निशा ने नासमझी दिखाई और परिवार के बारे में सोचे बगैर उस के प्यार पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. दिलों में प्यार का पौधा अंकुरित हुआ तो वे एकदूसरे के खयालों में डूबे रहने लगे. जल्दी ही चोरीछिपे दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला.

मुकेश रसिया किस्म का युवक था. निशा से मुलाकात होती तो वह उस की इतनी तारीफें करता था कि वह खुशी से फूली नहीं समाती. पति और प्रेमी में फर्क होता है. घरपरिवार की जिम्मेदारियों में पति वह प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता, जो मुकेश करता था. यह एक बड़ी सच्चाई है कि परिवार सिर्फ प्रेम करने से नहीं चलता. उस के लिए पैसों की भी जरूरत पड़ती है, जिसे हासिल करने के लिए काम करना पड़ता है. संजय परिवार के लिए समर्पित था, जिस के लिए वह मेहनत भी खूब करता था. उसी के बलबूते घर चल रहा था.

दूसरी ओर मुकेश अविवाहित था. उस के पास समय ही समय था. वह निशा से मीठीमीठी बातें कर के अपना वक्त बिता रहा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवारें टूट गई. मुकेश और निशा एकदूसरे का सान्निध्य पा कर खुश थे. अनैतिक रिश्तों की गर्त ऐसी होती है, जिस पर कदम बढ़ा कर पीछे हटाना मुश्किल होता है. वक्त के साथ निशा और मुकेश के रिश्ते गहराते गए. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. उड़तेउड़ते खबर संजय तक पहुंची, पत्नी के किस्से सुने तो उस ने उस से बात की. लेकिन वह साफ मुकर गई.

प्रेमिल रिश्तों में मुकेश और निशा ने साथ जीने और मरने की कसमें खाईं थीं. मुकेश ने तय कर लिया था कि वह निशा से विवाह कर के उसे अपने साथ रखेगा. सोच को साकार करने के लिए 7 दिसंबर, 2015 को वह निशा को ले कर भाग गया. बहू की इस हरकत से वर्मा परिवार को भारी बदनामी का सामना करना पड़ा. संजय ने किला चौकी में निशा की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर सच्चाई पुलिस को बता दी. मोबाइल लोकेशन के जरिए 5 दिनों में ही घर वालों और पुलिस ने निशा को खोज निकाला.

दोनों फरीदाबाद में रह रहे थे. 11 दिसंबर को पुलिस दोनों को पकड़ कर ले आई. इस के बाद दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा हुए. निशा को भी समझाया गया और मुकेश को भी. दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. तय हुआ कि निशा अपने घर रहेगी और मुकेश उसे परेशान नहीं करेगा. निशा का मन बदल जाए और मुकेश भी उसे परेशान न करे, इस के लिए संजय ने उसे दिल्ली स्थित उस के मायके पहुंचा दिया. लेकिन इस तरह भला कब तक चलता. संजय की मां शीला बुजुर्ग थीं, बच्चे स्कूल जाते थे. घर के तमाम काम होते थे, कौन संभालता.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में संजय निशा को घर ले आया. घर वालों ने एक बार फिर उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. उस ने वादा किया कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से परिवार की बदनामी हो. उस ने मन ही मन तय भी कर लिया कि अब वह मुकेश से कोई वास्ता नहीं रखेगी. दूसरी ओर मुकेश को पता चला कि निशा आ गई है तो वह उस से मिलने की कोशिश करने लगा. उस ने कई बार मोबाइल से फोन किया, लेकिन निशा ने उस का कोई जवाब नहीं दिया. उस ने निशा को देखने के लिए उस के घर के बाहर के कई चक्कर लगाए, लेकिन निशा की नजर उस पर पड़ती तो वह उसे नजरअंदाज कर देती.

निशा के इस बदलाव ने उसे बेचैन कर दिया. निशा शादीशुदा थी और अपनी गलतियों को सुधार रही थी. मुकेश को भी खुद में सुधार लाना चाहिए था, लेकिन वह निशा पर अपना पूरा हक समझने लगा था. उस ने साथ जीनेमरने की जो कसमें खाई थीं, उन्हें वह भुला नहीं पा रहा था. निशा की उपेक्षा से वह बुरी तरह आहत होता जा रहा था. एक बार मौका देख कर उस ने निशा से कहा, ‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मुकेश मेरी मजबूरियों को समझो. और मुझे भूल जाओ. अब मैं शादीशुदा हूं.’’

मुकेश तड़प उठा, ‘‘कैसी बात कर रही हो, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘अब यह नहीं हो सकता मुकेश,’’ कहने के साथ निशा ने चेतावनी दी, ‘‘मुझे आइंदा परेशान करने की कोशिश मत करना, वरना ठीक नहीं होगा.’’

मुकेश बुरी तरह हताश हो गया. उस की हालत हारे हुए जुआरी सी हो गई. निशा की बेरुखी से उस की रातों की नींद उड़ गई. उस के सिर पर निशा को हासिल करने का जुनून सवार था, लेकिन उस के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. वह दिनरात इसी बारे में सोचता रहता था. यही वजह थी कि उस ने मन ही मन खतरनाक निर्णय ले लिया कि अगर निशा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे किसी और की भी नहीं रहने देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और निशा से आखिरी बार बात करने की ताक में रहने लगा.

3 फरवरी की दोपहर निशा नहाधो कर कपड़े फैलाने छत पर गई तो मुकेश की नजर उस पर पड़ गई. अपने कपड़ों में चाकू छिपा कर वह संजय के घर में दाखिल हो गया. उस समय निशा की सास शीला रसोई में थीं. वह सीधे छत पर पहुंच गया. उसे सामने पा कर निशा सकपका गई, ‘‘त…त…तुम यहां कैसे आए?’’

‘‘निशा मुझे तुम से आखिरी बार बात करनी है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी.’’

मुकेश को गुस्सा आ गया. उस ने ताव में निशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बात तो तुम्हें करनी होगी. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा.’’

‘‘छोड़ो मुझे, तुम पागल हो गए हो क्या?’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया हूं.’’ कह कर वह निशा को खींच कर नीचे ले आया.

शीला ने यह नजारा देखा तो हक्कीबक्की रह गईं. उन्होंने मुकेश को रोकना चाहा तो उस ने चाकू निकाल कर उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया. इस के बाद उस ने चाकू दिखा कर निशा से पूछा, ‘‘बोलो, साथ चलोगी या नहीं?’’

‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी, छोड़ो मुझे.’’

निशा ने खुद को उस के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की तो वह आपा खो बैठा और पलक झपकते चाकू से उस की गर्दन पर घातक वार कर दिया. निशा फर्श पर गिर पड़ी और कुछ ही सैकेंड में उस ने दम तोड़ दिया. शीला चीखीचिल्लाईं तो आसपास के लोग आ गए. लेकिन मुकेश हाथ में चाकू लिए कुर्सी डाल कर वहीं बेखौफ हो कर बैठ गया और सब को धमकाने लगा. उस की धमकी से डर कर कोई उसे पकड़ने का साहस नहीं कर सका. उस के बाद सूचना पा कर पुलिस आ गई.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. निशा उस के प्यार में न पड़ी होती और अपने बहके कदमों को वक्त रहते संभाल लिया होता तो यह नौबत कभी न आती. मुकेश ने भी निशा को जबरन हासिल करने की कोशिश न की होती तो उस का भविष्य चौपट न होता. अब उस की जिंदगी जेल में ही कटेगी. Haryana Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

TV Actress Suicide: एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का चेहरा – अंधेरे में खो गई प्रत्यूषा

TV Actress Suicide: ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी प्रत्यूषा बनर्जी की आत्महत्या का मामला पहला नहीं है. टेलीविजन और फिल्मों से जुड़ी कई लड़कियां पहले भी आत्महत्या कर चुकी हैं. वजह होेती है, उन का जज्बाती होना. जबकि ग्लैमर की दुनिया में जज्बात  काम नहीं आते…

प्रत्यूषा यानी अलसभोर. रात ढलने और सूर्योदय से पहले अंधेरेउजाले का रेशमी समीकरण. 2013 में प्रत्यूषा बनर्जी जब कलर्स चैनल के धारावाहिक ‘बालिका वधू’ के माध्यम से छोटे परदे पर आई थी तो वाकई अलसभोर सी ही थी. सुंदर भी चंचल भी, फूलों सी कोमलांगी भी और झील के ठहरे हुए शांत जल सी गंभीर भी. भले ही बात अभिनय की थी, लेकिन वह हंसती थी तो फूल से झरते थे और उदास होती थी तो लगता था जैसे शाम ढल रही हो. उस के व्यक्तित्व में भी अनूठा आकर्षण था और अभिनय में भी. अभिनय की यही खूबियां कलाकार को लोकप्रिय बनाती हैं. उस के चित्ताकर्षक सौंदर्य और सीधे दिल में उतर जाने वाले अभिनय ने उसे भी लोकप्रिय बनाया.

यही वजह थी कि बीती 1 अप्रैल की शाम को जब उस की मौत का समाचार आया तो उस के परिचित ही नहीं, उसे छोटे परदे की आनंदी के रूप में जानने वाले लाखोंलाख लोग भी सन्न रह गए. लगा जैसे मौत के बादलों ने सूर्य की किरणों का मुंह देखने से पहले अलसभोर को अपने विकराल पंजों में दबोच लिया हो.

बालिका वधू की आनंदी बन कर रातोंरात लाखों दिलों की चहेती बन जाने वाली प्रत्यूषा के उत्थान और पतन की कहानी को रोचक तो नहीं कह सकते, लेकिन यह एक ऐसी लड़की के जीवन का थ्रिल जरूर था, जो न तो अपनी शोहरत को पचा पाई और न गमों को पी सकी. वह खिली तो उस फूल की तरह, जो सूरज की पहली किरण का स्पर्श पा कर खिलता है और सब का मन मोह लेता है, लेकिन बुझी तो शमा की उस लौ की तरह, जो हवा के एक तेज झोंके की ताब न ला कर क्षणभर में दम तोड़ देती है.

प्रत्यूषा के जीवन का प्रभात कलर्स चैनल के धारावाहिक ‘बालिका वधू’ से हुआ था और शाम भी तभी से ढलने लगी थी, जब उस ने ‘बालिका वधू’ छोड़ा. इसलिए शुरुआत भी वहीं से होनी चाहिए. कलर्स एंटरटेनमेंट चैनल के साथ ही जुलाई, 2008 में शुरू हुए इस के धारावाहिक ‘बालिका वधू’ ने ऐसी धूम मचाई कि इस की प्रस्तुति देख कर इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में तो बदलाव की लहर आई ही, जल्दी ही यह धारावाहिक घरघर में देखा जाने लगा. छोटे परदे पर ताजा हवा के झोंके की तरह आई ‘बालिका वधू’ की केंद्रीय पात्र आनंदी (अविका गौर) चंद दिनों में ही हरदिल अजीज बन गई. उस खूबसूरत बच्ची का अभिनय इतना नैसर्गिक था कि अभिनय लगता ही नहीं था. अभिनय में उस की चंचलता रही हो या मासूम चेहरे की उदासी, दर्शकों को वह हर रूप में पसंद आई.

‘बालिका वधू’ के किसी भावनात्मक दृश्य में जब आनंदी के चेहरे की उदासी उकेरने के लिए धारावाहिक का थीम सौंग बजता था, ‘छोटी सी उमर परनाई रे बाबो सा, करयो थारो कई मैं कसूर हो. इतना दिन्ना तो लाड लगाया, अब क्यूं करो मन्ने हिवड़े से दूर हो.’ तो कितनी ही आंखें डबडबा जाती थीं. इस धारावाहिक को बुलंदियों पर पहुंचाने में अविका गौर के अभिनय का तो हाथ था ही, इस राजस्थानी थीम सौंग ने भी बहुत बड़ी भूमिका अदा की.

सन 2008 से 2010 तक जब तक बालिका वधू आनंदी के रूप में अविका गौर रही, इस धारावाहिक ने नित नई ऊंचाइयों को छुआ. आनंदी के रूप में अविका गौर में किसी को अपनी बेटी नजर आती थी तो किसी को एक ऐसा पात्र, जिसे रीतिरिवाजों के नाम पर बाली उम्र में शादी कर के बड़ों के हाथों का खिलौना बना दिया गया था. बहरहाल अविका गौर ने बालिका वधू आनंदी के उतारचढ़ाव भरे जीवन के हर रंग को अपने स्वाभाविक अभिनय से इस तरह साकार किया था कि वह अभिनय कम और हकीकत ज्यादा लगता था.

लेकिन धारावाहिक को छोटी आनंदी के चरित्र के साथ एक लिमिट तक ही खींचा जा सकता था. कहानी की मांग के हिसाब से आनंदी को बड़ा दिखाना जरूरी था. अंतत: कलर्स चैनल और ‘बालिका वधू’ धारावाहिक की टीम ने सन 2010 में फैसला लिया कि अब लीप ले कर आनंदी को युवा रूप में लाया जाए. जाहिर है, इस के लिए किसी ऐसी लड़की की जरूरत थी, जो छोटी आनंदी (अविका गौर) के समकक्ष अभिनय भी कर सके और दर्शकों को ऐसा भी न लगे कि आनंदी का मूल चरित्र बदल गया है.

निस्संदेह यह आसान काम नहीं था, लेकिन करना तो था ही. फलस्वरूप आनंदी के युवा पात्र के लिए अभिनय की कसौटी पर खरी उतरने वाली लड़की की तलाश शुरू की गई. आनंदी की भूमिका के लिए कलर्स का विज्ञापन देख कर देश भर से लाखों लड़कियों ने अपना प्रोफाइल और आवेदन भेजे. प्रत्यूषा उस समय 17 साल की थी. उस ने जमशेदपुर में रहते कुछ नाटकों और एकदो फैशन शो में भाग लिया था, जिस के लिए प्रशंसा के साथसाथ उसे अवार्ड भी मिले थे. बचपन से ही उस की चाह टीवी सीरियल में जाने की थी. अपनी यह इच्छा उस ने अपने पिता शंकर बनर्जी और मां सोमा बनर्जी को भी बता रखी थी. अच्छा मौका मिल रहा था, प्रत्यूषा ने भी आवेदन के साथ अपना प्रोफाइल कलर्स चैनल को भेज दिया.

जल्दी ही कलर्स चैनल की ओर से बुलावा आ गया. चैनल ने उसे औडिशन के लिए मुंबई बुलाया. बड़ा मौका मिल रहा था, प्रत्यूषा अपने मातापिता के साथ मुंबई पहुंच गई. वहां सैकड़ों लड़कियां आई हुई थीं. औडिशन के आधार पर चैनल की ओर से फाइनलिस्ट के तौर पर जिन 3 लड़कियों को चुना गया, उन में प्रत्यूषा भी थी. इस चुनाव के बाद चैनल ने तीनों लड़कियों के फोटोग्राफ्स टीवी स्क्रीन पर दिखा कर दर्शकों से उस लड़की को चुनने को कहा, जिसे वे युवा आनंदी के रूप में देखना चाहते हों. इस से यह प्रतियोगिता और भी रोमांचक हो गई.

अंतत: दर्शकों के वोटों के आधार पर युवा आनंदी की भूमिका के लिए प्रत्यूषा को चुना गया. यह प्रत्यूषा के लिए बहुत बड़ी जीत भी थी और उस के लिए बहुत बड़ा अवसर भी. बालिका वधू की युवा आनंदी के लिए प्रत्यूषा को चुन तो लिया गया, लेकिन समस्या थी जमशेदपुर जैसे छोटे शहर से निकल कर मुंबई में रहने की. लेकिन यह समस्या भी हल हो गई. प्रत्यूषा के चाचाचाची मुंबई में रहते थे. शंकर बनर्जी और सोमा बनर्जी ने बेटी को साथ ले कर उन्हीं के यहां डेरा जमाया. चैनल ने इन लोगों को पूरा सहयोग दिया. थोड़ी सी ट्रेनिंग के बाद प्रत्यूषा ने ‘बालिका वधू’ में युवा आनंदी के रूप में काम करना शुरू कर दिया.

दर्शकों ने युवा आनंदी के रूप में प्रत्यूषा को अविका गौर की तरह ही पसंद किया. उस में वे सारे गुण थे, जो अविका में थे. अछूता सौंदर्य, मन मोह लेने वाला व्यक्तित्व और कमाल का अभिनय. यहां तक कि चेहरे की मासूमियत भी अविका गौर जैसी ही. धनदौलत हो, संपत्ति हो, अभिनय हो या कुछ और विरासत में मिल जाना अलग बात है और उसे पूरी जिम्मेदारी से संभालना अलग बात. प्रत्यूषा को आनंदी की भूमिका के लिए जो कुछ मिला था, वह अविका गौर की विरासत ही थी.

प्रत्यूषा ने उस विरासत को वाकई बहुत जिम्मेदारी से संभाला. नतीजा यह हुआ कि प्रत्यूषा ने चंद हफ्तों में ही अविका गौर की तरह दर्शकों के घरों की देहरी लांघ कर उन के दिलों में जगह बना ली. कालांतर में प्रत्यूषा को ऐसी प्रसिद्धि मिली कि उस की हैसियत टीवी के चुनिंदा स्टारों जैसी हो गई. इस बीच उस ने कांदीवली में किराए का फ्लैट ले कर मातापिता के साथ रहना शुरू कर दिया था. उस के पास गाड़ी सहित सुखसुविधा के सारे साधन आ गए थे. अब उसे पैसे की कोई कमी नहीं थी. पूरा देश उसे छोटे परदे की आनंदी के रूप में जानने लगा था. अभी तक वह जमशेदपुर जैसे शहर से आई प्रत्यूषा और ‘बालिका वधू’ की आनंदी ही बनी हुई थी.

सप्ताह में 5 दिन आने वाले धारावाहिकों के चुनिंदा कलाकार अपने अभिनय के बूते पर भले ही लोगों के दिलों पर राज करते हों, पर ऐश्वर्य से भरी उन की जिंदगी एकदम खोखली होती है. कई बार तो 20-25 मिनट के एपिसोड के लिए उन्हें 12-14 घंटे प्रतिदिन काम करना पड़ता है. चेहरे पर मेकअप थोपे, भारीभरकम पोशाक पहने. कभीकभी तो उन का यह समय कई महीनों तक एक ही छत के नीचे गुजर जाता है.

बोरियत भरे इस समय में रोजाना के उन के वही संगीसाथी होते हैं. वही एक जैसा माहौल. खाना भी वही पिज्जा, बर्गर, कौफी और कोल्डड्रिंक. उन्हें 10-12 घंटे का जो समय मिलता है, उसी में उन्हें शारीरिक फिटनेस के लिए जिम जाना, घर वालों, दोस्तों से मिलना और सोना होता है. उन के अपने लिए समय होता ही नहीं. शनिवार, रविवार को साप्ताहिक सीरियल नहीं आते, इसलिए इन कलाकारों को सप्ताह में 2 दिन का समय मिल जाना चाहिए. लेकिन ज्यादातर प्रोड्यूसर डायरेक्टर उन के इन 2 दिनों को भी अपने हक में इस्तेमाल कर लेते हैं.

फिल्में हों या सीरियल्स, जैसेजैसे कलाकार लोकप्रिय होता जाता है, उस का एटीट्यूड भी बदलने लगता है. वे प्रोड्यूसर डायरेक्टर पर हावी हो कर उन से मनमानी मांगें पूरी कराने लगते हैं. समय पर सेट पर न आना तो उन का अधिकार सा बन जाता है. वे यह भी भूल जाते हैं कि जिस सीरियल में वह काम कर रहे हैं, वही उन की लोकप्रियता का धरातल है. अगर उन के नीचे से जरा सी जमीन खिसकी तो वे कहीं के नहीं रहेंगे.

प्रत्यूषा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. जैसेजैसे उस की लोकप्रियता बढ़ती गई, उस का दिमाग घूमता गया. अब वह छोटे शहर की संस्कारी लड़की या बालिका वधू की सीधीसादी आनंदी नहीं रही थी, बल्कि महानगर मुंबई की मौडर्न और प्रैक्टिकल लड़की बन गई थी, हालांकि अंतरमन में समाए उस के संस्कारों पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. 2 साल तक ‘बालिका वधू’ की आनंदी की भूमिका निभातेनिभाते प्रत्यूषा को लगने लगा था कि देश का सब से लोकप्रिय सीरियल सिर्फ उस की वजह से चल रहा है. अपनी इस लोकप्रियता से अभिभूत हो कर उस में एटीट्यूड आने लगा. कभी सेट पर समय से नहीं आना तो कभी बातबात में नखरे दिखाना. कभी तरहतरह की मांगें तो कभी दूसरों पर रौब झाड़ना.

जब प्रत्यूषा की ऐसी हरकतें बढ़ती गईं तो प्रोड्यूसरडायरेक्टर और उस के बीच टकराव बढ़ने लगा. प्रत्यूषा को इस मुकाम तक बालिका वधू के निर्माता निर्देशक ने पहुंचाया था, आखिर वे उस की ऐसी हरकतों को कब तक बरदाश्त करते. उन्होंने प्रत्यूषा को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला कर लिया. आखिर सन 2013 में प्रत्यूषा को बालिका वधू से निकाल दिया गया. उस की जगह आनंदी के किरदार के लिए लिया गया तोरल रसपुत्र को. हालांकि उस वक्त प्रत्यूषा ने यही कहा कि उस ने मां की बीमारी के चलते बालिका वधू छोड़ दिया है. यह खबर भी आई कि उसे विक्रम भट्ट ने अपनी फिल्म में काम करने का औफर दिया है, इसलिए सीरियल छोड़ रही है. इस बात में काफी कुछ सच्चाई भी थी. यह अलग बात है कि वह फिल्म कभी बन नहीं सकी.

दरअसल, प्रत्यूषा को यह गलतफहमी थी कि वह इतनी लोकप्रिय है कि उसे काम की कोई कमी नहीं रहेगी. लेकिन ‘बालिका वधू’ से निकलने के बाद उसे जल्दी ही अहसास हो गया कि भले ही कितना भी जानापहचाना लोकप्रिय चेहरा क्यों न हो, ‘बालिका वधू’ के स्तर का काम मिलना आसान नहीं होगा. वैसे एक सच यह भी है कि प्रत्यूषा के जाने के बाद ‘बालिका वधू’ की टीआरपी भी लगातार गिरती गई. यहां तक कि ज्यादातर लोगों ने यह सीरियल ही देखना बंद कर दिया. इस की एक वजह सीरियल की कहानी को बेवजह लंबा खींचा जाना और कई पुराने पात्रों का सीरियल से अलग हो जाना भी हो सकता है.

बहरहाल, ‘बालिका वधू’ छोड़ने के कुछ समय बाद ही सन 2013 के ‘बिग बौस सीजन-7’ में प्रत्यूषा को प्रतिभागी के रूप में एंट्री मिल गई. ‘बिग बौस’ के घर का हाल बिलकुल उन कैदियों जैसा है, जो भले ही छोटेमोटे अपराध की सजा काटने जेल आए हों, पर वहां से कुख्यात बन कर निकलते हैं. प्रत्यूषा भले ही 63 दिन ‘बिग बौस’ के घर में रही. पर जब वह बाहर आई तो बिलकुल बदल चुकी थी. हालांकि ‘बिग बौस’ से भी उसे काफी फायदा हुआ. आर्थिक रूप से भी और जानेपहचाने चेहरे के रूप में भी.

जब प्रत्यूषा के पास काम नहीं था और लंबे समय तक उस का ‘बिग बौस’ में जाना तय हो गया था तो उस के मातापिता जमशेदपुर स्थित अपने घर चले गए थे. ‘बिग बौस’ से बाहर आने के बाद प्रत्यूषा ने अपने लिए काम ढूंढना शुरू किया. 2014 में उसे सोनी एंटरटेनमेंट चैनल के सीरियल ‘हम हैं न’ में काम मिला भी, लेकिन यह ऐसा सीरियल नहीं था कि ‘बालिका वधू’ की तरह प्रत्यूषा की शोहरत में इजाफा कर पाता. अंतत: कुछ ही दिन में यह सीरियल बंद हो गया.

इस बीच प्रत्यूषा को मुंबई की हवा लग गई थी. अब वह जमशेदपुर की संस्कारी लड़की नहीं, बल्कि मुंबई की मौडर्न गर्ल बन गई थी. दोस्तों की पार्टियों में जाना, शराब सिगरेट पीना उस के लिए आम बात थी. हालांकि भावनात्मक स्तर पर वह अब भी पहले जैसी ही थी. इसी बीच प्रत्यूषा की मुलाकात युवा बिजनैसमेन मकरंद मल्होत्रा से हुई.

दोनों मानसिक स्तर पर जुड़े तो प्रत्यूषा मकरंद में अपना भावी जीवनसाथी खोजने लगी. संभवत: प्रत्यूषा शादी कर के अपने जीवन को एक नई ही दिशा देने की सोच रही थी, लेकिन उस का यह सपना अधूरा ही रह गया. कुछ महीनों के बाद प्रत्यूषा को लगा कि मकरंद वैसा नहीं है, जैसा जीवनसाथी उसे चाहिए. फलस्वरूप दोनों का बे्रकअप हो गया. ब्रेकअप के बाद प्रत्यूषा ने पुलिस में मकरंद के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी.

सन 2015 में ही प्रत्यूषा को सोनी एंटरटेनमेंट चैनल का एक और सीरियल मिला ‘इतना करो ना मुझे प्यार’. साथ ही स्टार प्लस का ‘गुलमोहर ग्रैंड’ भी. लेकिन ये दोनों सीरियल भी प्रत्यूषा को वह मुकाम न दे सके जो उसे चाहिए था. इन सीरियलों की अवधि भी सीमित ही रही. इसी बीच खबर आई कि प्रत्यूषा का अफेयर प्रोड्यूसर विकास गुप्ता से चल रहा है. लेकिन यह बात भी अफवाह ही साबित हुई. इस के बाद प्रत्यूषा की जिंदगी में आया जमशेदपुर का रहने वाला राहुलराज सिंह. राहुल ने अपने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत सहारा एंटरटेनमेंट चैनल के सीरियल ‘माता की चौकी’ से की थी. सीरियल ‘अंबरधरा’ में उस ने काम किया था.

इस के साथ ही राहुल की एक तथाकथित प्रोडक्शन कंपनी ‘युवा टाइगर एंटरटेनमेंट ऐंड मैग्नम औप्स फिल्म्स’ भी थी. उस की इस कंपनी के बैनर तले कोई प्रोडक्शन हुआ भी या नहीं, कोई नहीं जानता. प्रत्यूषा को राहुलराज सिंह इसलिए भी भाया, क्योंकि एक तो वह उस की जन्मभूमि जमशेदपुर का रहने वाला था, दूसरे वह जानीमानी कवयित्री प्रभा ठाकुर का बेटा था. प्रत्यूषा का वह संघर्ष का समय था. उसे किसी भावनात्मक सहारे की जरूरत थी. राहुलराज सिंह से पटरी बैठी तो वह अपने कांदीवली वाले फ्लैट में राहुलराज सिंह के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी. उस का इरादा राहुलराज सिंह के साथ घर बसाने का था. राहुल भी इस के लिए तैयार था. यहां तक कि वह प्रत्यूषा को अपने मातापिता से मिलाने जमशेदपुर भी ले गया.

इस बीच प्रत्यूषा को लाइफ ओके चैनल के कौमेडी शो ‘कौमेडी क्लासेज’, कलर्स चैनल के सीरियल ‘ससुराल सिमर का’, जी टीवी के सीरियल ‘कुमकुम भाग्य’, सोनी चैनल के ‘आहट’ में छोटेछोटे रोल मिले, जिसे उस ने अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मजबूरी में किया. इसी बीच सोनी चैनल के रियलिटी शो ‘पावर कपल’ में प्रत्यूषा और राहुलराज सिंह को बतौर कंटेस्टेंट साथसाथ काम करने का मौका मिला. शो तो यह जोड़ी नहीं जीत सकी, लेकिन लंबे समय तक प्रतिभागी रहने के लिए दोनों को काफी मोटी रकम मिली. प्रत्यूषा से जुड़े रहे लोगों का कहना है कि यह रकम प्रत्यूषा के खाते में गई जरूर, पर इस का उपयोग राहुलराज सिंह ने किया.

प्रत्यूषा के बारे में यह भी सुनने में आया है कि जब उस का कैरियर पीक पर था तो उस ने फ्लैट खरीदने के लिए बैंक से 50 लाख रुपए का लोन लिया था, जिसे वह कैरियर डगमगाने की वजह से चुका नहीं पाई थी. यह भी पता चला है कि जनवरी में जब बैंक अफसर पुलिस को ले कर उस पर पैसा लौटाने के लिए दबाव बनाने के लिए उस के घर आए थे तो प्रत्यूषा ने उन की वीडियो फिल्म बना ली थी और बाद में उसी के बूते पर कांदीवली थाने में उन लोगों के खिलाफ बदसलूकी और छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज करा दिया था.

इस के बाद प्रत्यूषा ने कांदीवली का फ्लैट छोड़ दिया था और बांगुरनगर लिंक रोड स्थित हार्मोनी रेजीडेंट सोसायटी के फ्लैट नंबर 703 में किराए पर रहने लगी थी. राहुल राज सिंह भी उस के साथ इसी फ्लैट में रहता था. प्रत्यूषा राहुलराज सिंह से शादी का मन बना चुकी थी. राहुलराज सिंह भी इस के लिए तैयार था. दोनों ने 14 अप्रैल को सगाई और जून में शादी करने का फैसला किया था. खबर है कि राहुल के पिता राजवर्द्धन और मां प्रभा ठाकुर भी अपनी स्वीकृति दे चुके थे. लेकिन इसी बीच राहुल की कुछ ऐसी हरकतें प्रत्यूषा के सामने आईं, जो बरदाश्त के काबिल नहीं थीं. मसलन राहुल के कई लड़कियों से संबंध, पैसों की चीटिंग और थोक के भाव बोले गए झूठ.

खबरों के अनुसार, प्रत्यूषा और राहुलराज सिंह के बीच तब तनाव और बढ़ा, जब राहुल अपनी गर्लफ्रैंड्स को प्रत्यूषा के फ्लैट नंबर 703 पर लाने लगा. वह अपनी फ्रैंड्स को न केवल लाता, बल्कि प्रत्यूषा के साथ बैठ कर उसे शराब भी पिलाता था. बताते चलें कि इस बीच प्रत्यूषा भी शराब पीने लगी थी. आरोप यह भी है कि राहुल और उस की गर्लफ्रैंड सलोनी शर्मा प्रत्यूषा के साथ मारपीट भी करते थे. प्रत्यूषा की मृत्यु के बाद सलोनी शर्मा ने पुलिस को दिए अपने बयान में यह बात स्वीकार भी की है कि उस के और प्रत्यूषा के बीच मारपीट हुई थी. सलोनी ने राहुलराज पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह प्रत्यूषा से पहले उस का बौयफ्रैंड था और उस ने राहुलराज की इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में 30 लाख रुपए लगाए थे, जो उस ने नहीं लौटाए. इसी बीच प्रत्यूषा उस की जिंदगी में आ गई थी और राहुल उस से दूर हो गया था.

सलोनी के अनुसार, जब वह राहुलराज से पैसा मांगने जाती थी तो प्रत्यूषा बीच में आ जाती थी, जिस की वजह से दोनों में मारपीट हो जाती थी. इस सिलसिले में उस ने राहुल के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस ने अपनी शिकायत इसलिए वापस ले ली थी, क्योंकि राहुल के जेल जाने से उस के पैसे डूब जाने का खतरा था. लेकिन प्रत्यूषा के दोस्त और करीबी सलोनी की इस बात को सही नहीं मानते.

बहरहाल, प्रत्यूषा के कुछ दोस्तों और हार्मोनी रेजीडेंट सोसायटी के कुछ लोगों ने इस बात को सच बताया है कि राहुलराज प्रत्यूषा के साथ मारपीट करता था और इस से वह बहुत दुखी थी. यहां तक राहुल ने प्रत्यूषा को मानसिक रूप से छल कर एक तरह से बंधक बना लिया था, वह उसे उस के मांबाप से भी दूर रखता था. प्रत्यूषा के मौत को गले लगाने से 15 दिन पहले से राहुलराज सिंह ने प्रत्यूषा का साथ छोड़ कर कहीं और रहना शुरू कर दिया था. अलबत्ता वह उस के पास आताजाता रहता था.

जो भी हो, 1 अप्रैल 2016 को शाम 4 बजे प्रत्यूषा ने अपनी चुन्नी गले में बांधी और पंखे से लटक कर अपनी जीवनलीला खत्म कर ली. जाहिर है, ऐसा इंसान तभी करता है जब वह बहुत ज्यादा दबाव में हो और उस के जीने का कोई मकसद ही न बचा हो. प्रत्यूषा की पंखे में लटकी लाश सब से पहले देखी भी राहुल ने ही. उस ने कुछ लोगों की मदद से प्रत्यूषा की लाश उतारी और कोकिलाबेन अस्पताल ले गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

बांगुरनगर थाने की पुलिस को प्रत्यूषा की मौत की खबर भी कोकिलाबेन अस्पताल ने ही दी. क्योंकि राहुल लाश को छोड़ कर कहीं चला गया था, संदेह का एक आधार यह भी था कि राहुलराज प्रत्यूषा की लाश को कोकिलाबेन अस्पताल क्यों ले गया, जबकि वह उसे इलाके के किसी निकटवर्ती अस्पताल में भी ले जा सकता था. बहरहाल, बांगुरनगर पुलिस ने प्राथमिक काररवाई के बाद प्रत्यूषा की लाश को सिद्धार्थ हौस्पिटल भेज दिया, जहां उस का पोस्टमार्टम होना था. इस बीच प्रत्यूषा के मातापिता को उस की मौत की सूचना दे दी गई थी. राहुलराज न केवल गायब था, बल्कि उस का फोन भी स्विच्ड औफ था.

काफी देर बाद वह पुलिस के सामने आया तो बांगुरनगर पुलिस ने उस का बयान लिया. खुद को निर्दोष कह कर उस ने जो कुछ बताया, उस के आधार पर उसे निर्दोष नहीं माना जा सकता था. फिर भी पुलिस ने उसे हिरासत में नहीं लिया, क्योंकि उस के खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं थी. प्रत्यूषा भले ही समय के साथ बदल गई थी या कहिए मुंबई की चकाचौंध ने उसे अपने रंग में रंग लिया था. लेकिन अपने चाहने वालों के लिए वह आज भी आनंदी ही थी. भोलीभाली, मासूम चेहरे वाली अपने ही घर की लड़की जैसी, अपने दोस्तों के लिए भी वह एक अच्छी लड़की थी. एक ऐसी लड़की जो ग्लैमर इंडस्ट्री में रह कर भी दिमाग से नहीं दिल से सोचती थी.

भले ही वह मौडर्न बन गई थी, लेकिन ‘बालिका वधू’ की भोली आनंदी अब भी उस के अंदर कहीं छिपी थी. यही वजह थी कि जिस ने भी सुना कि प्रत्यूषा बनर्जी ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली है, सन्न रह गया. सुन कर सभी को धक्का सा लगा. खबर पा कर दूसरे दिन प्रत्यूषा के मातापिता, चाचाचाची और परिवार के अन्य सदस्य मुंबई पहुंच गए. तब तक प्रत्यूषा की लाश का पोस्टमार्टम हो चुका था. लाश उस के परिजनों को सौंप दी गई.  2 अप्रैल को उसे दुलहन के जोड़े में सजाया गया. जीवन के अंतिम सफर में उसे वही लहंगा पहनाया गया, जो उस ने फैशन डिजाइनर रोहित वर्मा से अपनी शादी के लिए बनवाया था.

उसी शाम पुलिस की मौजूदगी में ओशिवारा श्मशान घाट में उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. इस मौके पर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के तमाम लोगों के साथसाथ प्रत्यूषा के सारे दोस्त भी मौजूद थे. अगले दिन प्रत्यूषा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई, जिस में उस की मृत्यु का कारण दम घुटना बताया गया था. उस के गले पर जो निशान मिले, वे संभवत: उस के उस दुपट्टे के थे, जिस से लटक कर उस ने आत्महत्या की थी. पोस्टमार्टम के समय ही प्रत्यूषा का विसरा रख लिया गया था, ताकि उस की मौत की गहनता से जांच हो सके. साथ ही इस संदेह की पुष्टि के लिए कि प्रत्यूषा गर्भवती तो नहीं थी, उस की यूटरस के स्राव के कुछ नमूने जेजे अस्पताल भेज दिए गए थे.

जेजे अस्पताल ने स्राव की जांच के बाद बताया है कि प्रत्यूषा ने मृत्यु को गले लगाने से 1-2 दिन पहले गर्भपात कराया था. अस्पताल में प्रत्यूषा के यूटरस का हिस्टोपैथोलौजिकल एग्जामिनेशन किया गया था. उसी के बाद उस के प्रैग्नेंट होने की पुष्टि हुई. मृत्यु से काफी दिनों पहले से प्रत्यूषा गहरे अवसाद से गुजर रही थी. यह अवसाद संभवत: राहुल को ले कर ही था. इसीलिए उस ने मृत्यु से पहले भी शराब पी थी. इस की पुष्टि पुलिस ने भी की है.

बांगुरनगर पुलिस ने प्रत्यूषा की मृत्यु के मामले में किसी पर आरोप न लगा कर आकस्मिक मृत्यु का मामला दर्ज किया था. इस के बावजूद राहुलराज सिंह को क्लीन चिट नहीं दी गई थी. इस की एक वजह यह भी थी कि मौके से पुलिस को प्रत्यूषा का कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था, साथ ही वह कोकिलाबेन अस्पताल में प्रत्यूषा की लाश को छोड़ कर गायब भी हो गया था. यहां तक कि उस का मोबाइल भी बंद था. संभावना थी कि उस ने अपने मोबाइल से कुछ चीजें डिलीट करने के लिए ऐसा किया होगा.

प्रत्यूषा बनर्जी की असामयिक मौत को ले कर कई सवाल उठ रहे थे. मसलन प्रत्यूषा ने खुदकुशी क्यों की? उस की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसे आत्महत्या करनी पड़ी? क्या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया? आखिर सुसाइड से पहले कुछ लोगों ने उसे रोते हुए क्यों देखा था? उस के पड़ोसियों ने भी उस के रोने की बात बताई थी. 2 अप्रैल शनिवार की शाम पुलिस ने राहुलराज सिंह का बयान दर्ज किया. उस ने यही बताया कि 1 अप्रैल शुक्रवार को शाम 4 बजे जब वह फ्लैट पर गया तो प्रत्यूषा पंखे से लटकी हुई थी. पड़ोसियों की मदद से उतार कर वह उसे कोकिलाबेन अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस ने उसी दिन प्रत्यूषा के पिता शंकर बनर्जी और मां सोमा बनर्जी ने अपने बयान में कहा कि वे लोग प्रत्यूषा को राहुलराज सिंह से बच कर रहने को कहते थे, लेकिन वह नहीं मानी. उन्होंने संदेह जाहिर किया है कि प्रत्यूषा की मौत का जिम्मेदार राहुल ही है. प्रत्यूषा के दोस्त एजाज खान, काम्या पंजाबी और लीना डायस का भी यही कहना था. उन्होंने बताया कि प्रत्यूषा की मौत की वजह बनी राहुलराज की गर्लफ्रैंड सलोनी शर्मा. दोनों के बीच उसी की वजह से दूरियां बढ़ी थीं. कई बार वह प्रत्यूषा के फ्लैट पर आ कर राहुल के सामने ही उस के साथ मारपीट करती थी.

बहरहाल, पुलिस ने अपनी जांच जारी रखी. एजाज खान ने तो इसे साजिश के तहत मौत का मामला बताया. पुलिस ने अगले दिन रविवार को भी राहुलराज सिंह से पूछताछ जारी रखी. इसी बीच प्रत्यूषा के फ्लैट की तलाशी ली गई तो वहां से 2 मोबाइल फोन, शराब की बातलें और गांजे के 2 पैकेट मिले. प्रत्यूषा के मोबाइल को देखा गया तो उस के व्हाट्सऐप में एक मैसेज था, ‘मर के भी मुंह न तुझ से मोड़ना’. यह मैसेज राहुल के लिए ही था. इस के बाद प्रत्यूषा औफलाइन हो गई थी.

उधर पूछताछ के दौरान ही राहुलराज को सीने में दर्द और लो ब्लडप्रेशर की शिकायत हुई. राहुल को पुलिस कांदीवली के श्रीसाईं अस्पताल ले गई, जहां उसे आईसीयू में भरती कर लिया गया. राहुल को गिरफ्तारी का डर था, इसलिए उस के मातापिता की ओर से आवेदन दे कर उच्च न्यायालय में उस की अग्रिम जमानत की मांग की गई. न्यायालय ने 25 अप्रैल तक उस की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी, लेकिन अग्रिम जमानत नहीं दी.

इस बीच खबर आई कि राहुलराज सिंह शादीशुदा था. 9 साल पहले उस ने एक एयरहोस्टेस से शादी की थी और बाद में उसे तलाक दे दिया था. प्रत्यूषा के कुछ दोस्तों और राहुलराज सिंह द्वारा प्रताडि़त कुछ लड़कियों के माध्यम से यह खबर भी आई कि राहुल ‘सीरियल चीटर’ था. उस ने दा्रेस्ती के नाम पर कई लड़कियों से दोस्ती की, शादी का वादा किया और अपनी कंपनी में उन से मोटी रकमें लगवाईं. एक टीवी एक्ट्रेस हीर पटेल का कहना था कि राहुल कई लड़कियों को धोखा दे चुका है. उस ने उन से भी 25 लाख रुपए लिए थे, जिन में से एक पैसा भी वापस नहीं किया. वह उन्हें किडनैपिंग केस में फंसाने की धमकी देता था. फिलहाल हीर पटेल और राहुल के बीच केस चल रहा है.

ऐसी ही एक पीडि़ता शीतल मालवीय ने राहुल को अपना भाई मान कर उस की कंपनी में 10 लाख रुपए लगा दिए थे. लेकिन राहुल ने एक पैसा नहीं लौटाया. एक अन्य लड़की मिस्टी मुखर्जी से राहुल ने शादी का झांसा दे कर रिलेशनशिप बनाई और उस से अपनी कंपनी में 10 लाख रुपए लगवा लिए. उस ने मिस्टी को एक पैसा नहीं लौटाया. इसी बीच उसे शीतल मालवीय से पता चला कि राहुल की शादी एक एयरहोस्टेस से हो चुकी है. यह जानने के बाद मिस्टी ने उस से रिश्ता तोड़ दिया.

सलोनी शर्मा से भी राहुल ने रिलेशनशिप बना कर मोटी रकम ली थी. सलोनी ने पुलिस में अपना बयान भी दर्ज करा दिया है. बहरहाल एक बात यह भी सामने आई है कि घटना वाले दिन दोपहर में राहुलराज और प्रत्यूषा मलाड के कार्निवाल मौल गए थे. जहां दोनों के बीच झगड़ा हुआ था. राहुल ने वहां अपना आपा खो कर प्रत्यूषा को थप्पड़ मार दिया था, जिस से वह गिर पड़ी थी. राहुल ने उसे उठाने की भी जरूरत नहीं समझी. उस के बाद प्रत्यूषा घर लौटी और उस ने आत्महत्या कर ली.

बहरहाल, सच्चाई तो जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इस में कोई दोराय नहीं कि प्रत्यूषा की मौत के लिए किसी न किसी रूप में राहुलराज सिंह ही जिम्मेदार है. इस बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रत्यूषा की आत्महत्या के मामले की जांच क्राइम ब्रांच से कराने का ऐलान कर दिया है. जो भी हो, सच्चाई यही है कि प्रत्यूषा अपनी जिंदगी को मौत के आंचल से ढांप कर दूर चली गई, कभी वापस न आने के लिए. लेकिन उस की मौत का सच तो सामने आना ही चाहिए, ताकि ऐसी प्रतिभावान किसी और लड़की को जज्बाती बन कर ऐसा कदम न उठाना पड़े. TV Actress Suicide

 

Real Crime Story: बेवफाई का ऐसा सिला

Real Crime Story: शिवप्रसाद सचमुच अर्शली को बहुत प्यार करता था. यही वजह थी कि उस ने उस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर दी थी. यही नहीं, अपनी सारी कमाई भी उस पर लुटा दी थी. इस के बावजूद जब अर्शली ने उस से किनारा कर लिया तो प्रेमिका की यह बेवफाई उस से बरदाश्त नहीं हुई और…

सपना 22 वर्षीया अर्शली लौरेंस उर्फ जैनी उर्फ छोटी को बेटी की तरह मानती थी. जब वह उसे 2 दिनों से दिखाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. अर्शली की मां सोफिया भी नजर नहीं आ रही थी. उन के कमरे में बाहर से ताला बंद था. उन की स्कूटी भी गैलरी में नहीं थी. उन का फोन भी बंद था. सपना की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी बिना बताए कहां चली गईं. जबकि इस से पहले वे जब भी कहीं बाहर जाती थीं, बता कर जाती थीं. यही नहीं, घर की चाबी दे कर सारी जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप जाती थीं.

सपना किन्नर थी और अपनी साथी बौबी के साथ सोफिया के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर रहती थी. वह सुबह निकलती थी तो शाम को ही घर आती थी. 3 अप्रैल की दोपहर सपना घर से निकलने लगी तो सोफिया के कमरे से उसे दुर्गंध सी आती महसूस हुई. उस ने खिड़की के पास खड़ी हो कर लंबी सांस ली तो उसे लगा कमरे से मांस के सड़ने की दुर्गंध आ रही है. उस की समझ में नहीं आया कि सोफिया के कमरे से इस तरह की दुर्गंध क्यों आ रही है? चूंकि मांबेटी 3 दिनों से गायब थीं, इसलिए सपना को किसी अनहोनी की आशंका हुई. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया.

चूंकि यह इलाका थानाकोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने इस की सूचना थानाकोतवाली शाहपुर पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली  प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला एसआई विमलेंद्र कुमार, देवेंद्र कुमार सिंह, सिपाही मनीष सिंह, राजीव शुक्ला, रामविनय, रामनिहाल, संतोष कुमार और शिवानंद उपाध्याय को साथ ले कर बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा स्थित सोफिया लौरेंस के घर पहुंच गए.

चूंकि मोहल्ले वालों को अभी तक कुछ पता नहीं था, इसलिए एकाएक इतने पुलिस वालों को देख कर सब हैरान रह गए. सभी अपनेअपने घरों से निकल कर बाहर आ गए. सपना घर के बाहर ही खड़ी थी. पुलिस वालों ने उस से बात की तो उस ने जो आशंका व्यक्त की, सुन कर पुलिस वालों को भी किसी अनहोनी की आशंका हुई. दरवाजे पर ताला लगा था. आनंद प्रकाश शुक्ला ने दरवाजा खोलने से पहले घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में सीओ अभय कुमार मिश्र, एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, एसएसपी अनंतदेव के अलावा कई थानों के थानाप्रभारी भी पुलिस बल के साथ वहां आ गए. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आ गई थी.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोफिया के कमरे के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ कर दरवाजा खोला गया तो तेज दुर्गंध बाहर निकली. दरवाजे के पास खड़े पुलिस अधिकारी पीछे हट गए. थोड़ी देर में दुर्गंध थोड़ी कम हुई तो नाक पर रूमाल रख कर पुलिस अधिकारी कमरे में घुसे. सामने ही बैड पर 2 महिलाओं की लाशें कंबल से ढकी पड़ी थीं. दोनों ही लाशें बुरी तरह से सड़ चुकी थीं. कमरे का सामान यथावत था. बिस्तर पर खून बहा था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों महिलाओं की हत्या की गई थी.

लाशें बुरी तरह सड़ चुकी थीं, इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हत्याएं कैसे की गई थीं. पूछने पर पता चला कि मरने वाली दोनों महिलाएं मांबेटी थीं. उस समय उन का वहां अपना कोई नहीं था. इसलिए पुलिस ने किराएदार सपना की उपस्थिति में घर की तलाशी ली. घर के आंगन के एक कोने में शराब और बीयर की तमाम बोतलें पड़ी थीं. पूछने पर पता चला कि मांबेटी दोनों शराब और बीयर पीती थीं. चूंकि वे क्रिश्चियन थीं, इसलिए पुलिस के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पुलिस ने कमरे में मांबेटी के मोबाइल फोन तलाशे तो वे गायब मिले. इस के अलावा सपना ने बताया था कि उन की स्कूटी थी, जो गैलरी में खड़ी रहती थी, वह भी नहीं थी. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा दोनों के मोबाइल फोन के अलावा स्कूटी भी ले गया था.

फोरैंसिक टीम ने अपना काम निबटा लिया तो पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. उस समय वहां मृतका सोफिया और उस की बेटी अर्शली के बारे में बताने वाला उन का कोई नहीं था. सोफिया की सास मरियम 3 महीने पहले बड़ी पोती एलिना की हत्या हो जाने के बाद अपनी बेटी सन्नो के पास जौनपुर चली गई थीं. इसलिए इन दोनों हत्याओं की रिपोर्ट किराएदार किन्नर सपना की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई.

मामला गंभीर था, इसलिए इस के खुलासे के लिए एसएसपी अनंतदेव ने अपने औफिस में एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, सीओ अभय कुमार मिश्र, कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला और क्राइम ब्रांच की एक मीटिंग बुलाई. मीटिंग में उन्होंने हेमराज मीणा के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस ने सीओ अभय कुमार मिश्र की देखरेख में मामले की जांच शुरू की. जांच के लिए पुलिस टीम घटनास्थल पर दोबारा पहुंची तो पता चला कि मकान के भूतल पर सोफिया लौरेंस अपनी बेटी अर्शली के साथ रह रही थीं, जबकि पहली मंजिल के 2 कमरों में एक में किन्नर सपना और बौबी रहती थीं तो दूसरे कमरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी.

इन किराएदारों को सोफिया की सास मरियम लौरेंस ने रखा था. जबकि इस समय मरियम जौनपुर में अपनी बेटी सन्नो लौरेंस के पास थीं. यह भी पता चला कि मरियम लौरेंस की बड़ी पोती यानी मृतका सोफिया की बड़ी बेटी एलिना लौरेंस की 7-8 दिसंबर, 2015 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी. वह मोहल्ले के ही अभिषेक मधई से 7 सालों से प्रेम करती आ रही थी. अभिषेक भी उसे प्यार करता था. मरने से 3 महीने पहले वह अभिषेक के साथ लिवइन रिलेशन में रहने उस के घर चली गई थी. यह बात अभिषेक के पिता मोटीन मधई और मां अर्चना लौरेन को पसंद नहीं थी. इसलिए वे बेटे अभिषेक और एलिना को ताने मारते रहते थे.

7 दिसंबर, 2015 की रात अभिषेक और एलिना रात 9 बजे के करीब घर लौटे तो उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे शराब पिए हुए हैं. रात के 3 बजे के करीब अभिषेक के कमरे में किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई तो अर्चना की नींद टूट गई. भाग कर वह अभिषेक के कमरे में पहुंची तो वह बैड पर औंधे मुंह पड़ा उल्टियां कर रहा था, जबकि एलिना फर्श पर निढाल पड़ी थी. पूछने पर अभिषेक ने बताया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया है.

बेटे की बात सुन कर अर्चना बुरी तरह डर गईं. उस ने पति को जगा कर सारी बात बताई. पतिपत्नी ने तड़पती एलिना को वहीं छोड़ दिया और बेटे को ले कर अस्पताल चले गए. डाक्टरों ने अभिषेक को तो बचा लिया, लेकिन घर में पड़ी एलिना ने दम तोड़ दिया. एलिना की मौत की खबर मरियम और सोफिया को मिली तो वे सन्न रह गईं. पोती की आकस्मिक मौत से मरियम लौरेंस को गहरा सदमा लगा. सोफिया और मरियम ने कोतवाली शाहपुर में मुकदमा दर्ज कराया कि अभिषेक के घर वालों ने एलिना की हत्या की है. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली पुलिस ने एलिना की हत्या के जुर्म में अभिषेक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

इस के बाद पुलिस यह पता लगाने लगी कि सोफिया के घर किनकिन लोगों का आनाजाना था. इसी बात की जानकारी जुटाने में पुलिस को पता चला कि मोहल्ले के रहने वाले मिंटू के दोस्त शिवप्रसाद का उस के घर काफी आनाजाना था. लोगों का यह भी कहना था कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. पुलिस ने मिंटू से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. हत्याएं उस ने की हैं या किसी और ने, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता. पुलिस मिंटू को साथ ले कर आम बाजार स्थित शिवप्रसाद के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया.

पुलिस वालों को देख कर जहां शिवप्रसाद के घर वाले हैरान थे, वहीं उस ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि आप लोग जल्दी ही मेरे घर आने वाले हैं. इसीलिए मैं घर छोड़ कर कहीं गया नहीं. क्योंकि अगर मैं घर छोड़ कर कहीं भाग जाता तो आप लोग मेरे घर वालों को परेशान करते. आप लोगों को बता दूं कि मैं ने ही सोफिया और अर्शली की हत्या की है.’’

शिवप्रसाद की बातें हैरान करने वाली थीं. पुलिस को लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है. इसलिए उन्हें उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पुलिस को उस की बातों पर यकीन तब हुआ, जब उस ने अर्शली की स्कूटी, सोफिया तथा अर्शली के मोबाइल फोन और लोहे की वह रौड तथा धारधार रेडियम वाला चाकू बरामद करा दिया, जिस से अर्शली और सोफिया की हत्या की गई थी. आम लोगों के लिए यह हैरान करने वाली ही बात थी. शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कातिल घर में बैठ कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था. आनंद प्रकाश शुक्ल शिवप्रसाद और बरामद सामान ले कर कोतवाली आ गए और हत्यारे की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों की उपस्थिति में शिवप्रसाद ने अर्शली और सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह प्रेम में धोखा खाने के बाद बदला लेने की कहानी थी. अगले दिन 4 अप्रैल को एसएसपी अनंतदेव ने पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में पत्रकारवार्ता आयोजित कर शिवप्रसाद को पत्रकारों के सामने पेश किया तो प्रेमिका की बेवफाई की जो कहानी उस ने पुलिस को बताई थी, वही कहानी पत्रकारों को भी सुना दी. सीधेसादे शिवप्रसाद ने हालात और परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर प्रेमिका अर्शली और उस की मां सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा में ज्यादातर ईसाई रहते हैं. इसी मोहल्ले में मरियम लौरेंस भी रहती थी. उन की 2 संतानें थीं, बेटा एलिसिएंस लौरेंस उर्फ पन्नो तथा बेटी सन्नो. मरियम लौरेंस रेलवे अस्पताल में नर्स थीं. उन के पति की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद उन्होंने ही बेटे और बेटी को पालपोस कर बड़ा किया था. पन्नो बड़ा हुआ और उस में दुनियादारी की समझ आई तो उस ने परिवार का सहारा बनना चाहा. मरियम ने अपनी मेहनत की बदौलत काफी चलअचल संपत्ति जुटा रखी थी. पन्नो ने नौकरी करने के बजाय घर के सामने पड़ी अपनी खाली जमीन पर आटा चक्की लगा ली. उस की मेहनत रंग लाई और उस की आटा चक्की चल निकली.

लेकिन जब पन्नो के पास पैसे आए तो एकाएक उस के दोस्तों की संख्या बढ़ गई. इन्हीं दोस्तों की वजह से उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई. जब इस की जानकारी मरियम को हुई तो बेटे को लाइन पर लाने के लिए उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी. पर पन्नो पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ. धीरेधीरे पन्नो की लत बढ़ती गई और उस की आटा चक्की की सारी कमाई शराब में उड़ने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि आटा चक्की बंद हो गई.

मरियम बेटे की आदत से परेशान रहने लगी थीं. उसे सुधारने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्हें एक रास्ता उस की शादी कर देना नजर आया. मरियम ने खूब सोचसमझ कर उस की शादी सोफिया लौरेंस से कर दी. इस के बाद बेटी सन्नो की शादी जौनपुर में कर के वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं. शादी के बाद पन्नो पर गृहस्थी का बोझ पड़ा तो उस ने आटा चक्की की जगह जनरल स्टोर खोल लिया. उस की दुकान चल निकली और ठीकठाक कमाई होने लगी. पन्नो को सोफिया से 2 बेटियां हुई एलिना और अर्शली. इस तरह भरापूरा परिवार हो गया. पोतियों के साथ मरियम का भी समय आराम से कटने लगा.

चूंकि एलिना पहली संतान थी, इसलिए मरियम उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थीं. अर्शली छोटी थी, इसलिए वह मांबाप को ज्यादा प्यारी थी. वे उसे प्यार से जैनी कहते थे. एलिना और अर्शली बड़ी हुईं तो उन की खूबसूरती में निखार आ गया. दोनों बहनें थीं भी बला की खूबसूरत. पन्नो की बेटियां बड़ी हो रही थीं, जिस से घर का खर्च बढ़ रहा था, लेकिन उस की कमाई घटती जा रही थी. इस की सब से बड़ी वजह थी पन्नो की शराब पीने की आदत. अब तो उस के साथ सोफिया भी बीयर पीने लगी थी. रोजाना शाम को पतिपत्नी शराब और बीयर की बोतलें ले कर बैठ जाते, इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे दुकान की पूजी शराब में उड़ती गई.

मरियम पोतियों का वास्ता दे कर बेटेबहू को समझातीं तो वे उन की बात समझने के बजाय डांट कर उन्हें ही चुप करा देते. जब उन्होंने देखा कि उन की बातों का बेटे और बहू पर कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप रहने में ही वह अपनी भलाई समझने लगीं. बेटेबहू के व्यवहार से वह बहुत दुखी रहती थीं. पन्नो की कमाई का एक मात्र जरिया दुकान थी. धीरेधीरे दुकान खाली हो गई. इस तरह कमाई का रास्ता बंद हो गया. बेटियां बड़ी हो रही थीं, उन के भी खर्चे थे. पन्नो और सोफिया को चिंता सताने लगी कि परिवार का खर्च कैसे चलेगा. सोचविचार कर पन्नो ने एक औटो खरीद लिया और उसे चलाने लगा.

उसी बीच एलिना अपने घर के पीछे रहने वाले अभिषेक मधई को दिल दे बैठी. उस समय एलिना 17 साल की थी. दोनों छिपछिप कर मिलने लगे. उन के इस प्यार की जानकारी सिर्फ अर्शली को थी. सोफिया के मकान के बगल में मिंटू रहता था. चूंकि मिंटू सोफिया का पड़ोसी था, इसलिए वह उस के घर भी आताजाता था. मिंटू का दोस्त था शिवप्रसाद, जो कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आने वाले आम बाजार के रहने वाले रामप्रसाद का बेटा था. रामप्रसाद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, लेकिन नौकरी से रिटायर हो चुके थे, इसलिए घर खर्च चलाने के लिए शिवप्रसाद औटो चलाता था. उस के परिवार में पिता और 2 बहनें थीं.

मिंटू के यहां आनेजाने में शिवप्रसाद की नजर खूबसूरत अर्शली पर पड़ी तो वह उसे भा गई. उस ने उस के बारे में मिंटू से पूछा तो उस ने उस के बारे में उसे सब कुछ बता दिया. अर्शली शिवप्रसाद को इतनी पसंद आ गई कि ईसाई होने के बावजूद वह उसे दिल दे बैठा. मिंटू के जरिए दोनों का परिचय हुआ तो जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. उन की यह दोस्ती प्यार में बदली तो उन का यह प्यार जुनूनी हो गया. हालत यह हो गई कि दोनों ही रातदिन एकदूसरे के खयालों में खोए रहने लगे. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

उसी बीच सोफिया पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. शराब पीने से खोखले हो चुके पन्नो की अचानक मौत हो गई. पति की मौत से जहां सोफिया टूट गई, वहीं अर्शली को भी पिता की मौत का गहरा सदमा लगा था. लेकिन दुख की इस घड़ी में शिवप्रसाद साया की तरह हर घड़ी उस के साथ खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि हर तरह से उस की मदद भी की.

उन्हीं दिनों शिवप्रसाद का मकान बन रहा था. उस के पिता रामप्रसाद ने मकान बनवाने के लिए उसे ढाई लाख रुपए दिए थे. अर्शली के प्यार में पागल शिवप्रसाद ने सारे रुपए उस पर लुटा दिए. इन पैसों को ले कर बापबेटे में खूब झगड़ा भी हुआ, लेकिन रामप्रसाद कर ही क्या सकते थे. एकलौती औलाद थी, घर से भी तो नहीं निकाल सकते थे. शिवप्रसाद औटो से जो कमाता था, अर्शली पर खर्च करता था. पिता की मौत के बाद अर्शली की पढ़ाई छूट गई थी. शिवप्रसाद ने उस का दाखिला कराया, इस साल उस ने 12वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं था.

पन्नो की मौत के बाद कमाई का कोई जरिया नहीं रहा तो मरियम ने अपने मकान की पहली मंजिल पर बने 2 कमरों को किराए पर उठा दिया, जिस से सोफिया और अर्शली का खर्च निकल सके. एक कमरे में किन्नर सपना और बौबी रहती थी, जबकि दूसरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी. इसी किराए और मरियम की पेंशन से घर का खर्च चल रहा था. एलिना और अभिषेक का प्रेमप्रसंग पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया था. इस की वजह यह थी कि बिना ब्याह के ही एलिना प्रेमी के घर रहने चली गई थी, लेकिन 3 महीने बाद ही प्रेमी के घर जहर खाने से एलिना की मौत हो गई. सोफिया ने बेटी की हत्या का आरोप लगा कर अभिषेक को जेल भिजवा दिया.

एलिना की मौत से मरियम को ऐसा आघात लगा कि वह बीमार रहने लगीं. उन की हालत दिन पर दिन बिगड़ती गई तो मां की हालत देख कर सन्नो उन्हें अपने साथ जौनपुर ले गई. मरियम के जाने के बाद घर में सोफिया और अर्शली ही रह गईं. सोफिया को अर्शली और शिवप्रसाद के रिश्ते की जानकारी थी. एलिना की मौत के बाद वह डर गई कि अर्शली के साथ भी कहीं वैसा ही हो गया तो उस का एकमात्र सहारा छिन जाएगा. इस के बाद उस ने एलिना का उदाहरण दे कर अर्शली को समझा कर कहा कि अब उस की शादी उस के पसंद के लड़के के साथ होगी.

अर्शली ने मां की भावना का आदर करते हुए वादा किया कि अब वह उन की मर्जी के खिलाफ कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें परेशानी हो. मां से किए वादे के अनुसार अर्शली ने शिवप्रसाद से अचानक बातचीत बंद कर दी. उस ने उस से कह भी दिया कि वह उस का पीछा करना छोड़ दे. अगर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा तो वह उस की शिकायत पुलिस से कर देगी. अब वह वहीं शादी करेगी, जहां मां कहेंगी.

अचानक अर्शली में आए इस बदलाव से शिवप्रसाद हैरान रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि अर्शली ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया? वह जब भी उस से बात करने की कोशिश करता, अर्शली पुलिस की धमकी दे कर उसे चुप करा देती. अर्शली की यह बेवफाई शिवप्रसाद को शूल बन कर चुभने लगी. शिवप्रसाद ने अर्शली से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस पर लाखों रुपए खर्च भी किए थे. एक तरह से उस ने अर्शली के लिए खुद को बरबाद कर लिया था.  घरपरिवार से उस के लिए बगावत की थी. ऐसे में भला वह कैसे चाहता कि अर्शली किसी और की हो जाए.

शायद यही सोच कर शिवप्रसाद ने तय कर लिया कि अर्शली अगर उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. सोफिया ने अर्शली को उस से दूर किया था, इसलिए शिवप्रसाद की नजरों में असली गुनहगार वही थी. अर्शली को पाने के लिए शिवप्रसाद पागल था. एक दिन वह बहुत बेचैन हुआ तो ‘रौकी हैंडसम’ फिल्म देखने चला गया. फिल्म में हत्या का एक सीन दिखाया गया था, जिस में रेडियम (चमकदार) चाकू से अंधेरे में हत्या की गई थी. फिर क्या था, शिवप्रसाद ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उसे क्या करना है.

उस रात वह बिना कुछ खाएपिए ही सो गया. अगले दिन वह कोतवाली शाहपुर के असुरन चौक की एक दुकान से रेडियम वाला चाकू खरीद लाया. 29 मार्च की रात 11 बजे वह अर्शली के घर के पिछवाड़े से छत पर जा कर छिप गया. चूंकि तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए उसे छत पर चढ़ते किसी ने नहीं देखा था. सोफिया और अर्शली रात में सोने से पहले बीयर पीती थीं. उस रात भी मांबेटी ने बीयर पी और खाना खा कर एक ही बैड पर सो गईं. यह बात शिवप्रसाद को पता थी. शिवप्रसाद रात गहराने की प्रतीक्षा करता रहा. रात 3 बजे वह दबे पांव सीढि़यों से नीचे उतरा और सीधे सोफिया के कमरे में जा पहुंचा.

मांबेटी को एक ही बैड पर सोई देख कर उस ने कमरे के एक कोने में रखी लोहे की रौड उठाई और सोफिया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. सोफिया चीखी तो अर्शली उठ कर बैठ गई और चिल्लाने लगी. शिवप्रसाद डर गया और उस ने अपने बचाव के लिए चाकू से अर्शली के पेट में ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. अर्शली तड़पने लगी तो उस ने खून सने हाथों से उस का गला दबा दिया. मांबेटी मर चुकीं थीं. उन के ऊपर कंबल डाल कर उस ने बैड पर रखे दोनों के मोबाइल फोन उठा कर जेब में डाल लिए.

शिवप्रसाद ने गैलरी में रखी स्कूटी बाहर निकाली और दरवाजे पर ताला बंद कर के उसी स्कूटी से अपने घर चला गया. वह करीब 4 बजे अपने घर पहुंचा और इत्मीनान से सो गया. वह सुबह उठा तो भी घर छोड़ कर कहीं नहीं गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने शिवप्रसाद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह पुलिस ने 12 घंटे में ही हत्यारोपी शिवप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया था. इस के लिए एसएसपी अनंतदेव ने शिवप्रसाद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

शिवप्रसाद ने जो किया, शायद अब उसे पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब वह कर ही क्या सकता है. उस की अब बाकी की जिंदगी तो जेल में ही बीतनी है. दुख की बात तो यह है कि सोफिया और अर्शली का अंतिम संस्कार भी करने वाला कोई नहीं था. उन का अंतिम संस्कार पुलिस ने किया था. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Kidnaping Case: छोटी उम्र के बड़े खिलाड़ी

Kidnaping Case: अपहरण कांड के खुलासे के लिए पुलिस की 15 टीमों ने लगभग 7 सौ लोगों से पूछताछ की और 3 लाख रुपए के इनाम की भी घोषणा की. आखिर 2 महीने बाद जब मामला खुला तो पता चला कि अपहर्त्ता पेशेवर नहीं, नौसिखिए थे, जिन्होंने टीवी शो देख कर योजना बनाई थी.

अंकित गुप्ता उत्तरपूर्वी दिल्ली के विक्टोरिया पब्लिक स्कूल में 12वीं में पढ़ता था. 11 फरवरी, 2016 को उस का फिजिकल एजुकेशन का प्रैक्टिकल था. प्रैक्टिकल देने के लिए वह नियत समय से पहले बाबरपुर स्थित अपने घर से बाइक ले कर स्कूल के लिए निकला. जैसे ही वह स्कूल पहुंचा, उसे जानकारी मिली कि स्कूल की टीचर चांदनी के पति की मौत हो गई है.

चांदनी अंकित की प्रिय टीचर थीं, इसलिए दोपहर एक बजे प्रैक्टिकल खत्म हो जाने के बाद वह अपने एक दोस्त के साथ शालीमार गार्डन स्थित चांदनी के घर चला गया. उसी समय उस के पिता अनिल गुप्ता को बाइक से कहीं जाना था. उन्होंने अंकित को फोन कर के पूछा कि वह कितनी देर में घर पहुंच रहा है. तब अंकित ने बताया कि वह शाम 4 बजे तक घर पहुंच जाएगा.

अपनी टीचर के यहां संवेदना प्रकट करने के बाद अंकित शाम 4 बजे अपने घर पहुंच गया. स्कूल की ड्रैस चेंज करने के बाद वह खाना खा रहा था, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद अंकित ने फटाफट खाना खाया और अपनी मां मीरा गुप्ता से बोला, ‘‘मम्मी, मैं कहीं जा रहा हूं और एकडेढ़ घंटे में आ जाऊंगा.’’ इतना कह कर वह खुश होता हुआ पैदल ही घर से निकल गया.

उत्तरपूर्वी दिल्ली के बाबरपुर की गली नंबर 2 में रहने वाले अनिल गुप्ता के 4 बेटों और एक बेटी में अंकित सब से छोटा था. अनिल गुप्ता स्क्रैप व्यापारी थे. उन की अच्छीखासी आमदनी थी, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया. उन के परिवार का रहनसहन भी अच्छा था. अनिल एकडेढ़ घंटे में घर आने की बात कह कर गया था, लेकिन वह रात 9 बजे तक नहीं आया. वैसे भी वह अपने दोस्तों के साथ कहीं जाता था तो 8-9 बजे तक घर आ जाता था. पर उस दिन वह नहीं आया तो उस की मां ने उस का नंबर मिलाया तो नंबर नहीं मिला. उस का फोन कंप्यूटर द्वारा बंद बताया. अंकित के पास 2 फोन थे, जिन में 3 सिमकार्ड थे. उन्होंने उस के तीनों नंबरों पर बात करने की कोशिश की, लेकिन तीनों ही नंबर स्विच्ड औफ मिले.

अनिल गुप्ता उस समय सोनिया विहार स्थित अपनी दुकान पर थे. मीरा ने फोन कर के उन्हें भी अंकित के घर न लौटने की जानकारी दे दी. अनिल गुप्ता ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि अपने यारदोस्तों के साथ कहीं गपशप मार रहा होगा, जिस की वजह से उस ने अपने फोन बंद कर दिए होंगे या फिर बैटरी डिस्चार्ज हो गई होगी. पति से बात करने के बाद मीरा ने भी सोचा कि अंकित इतना नासमझ नहीं है. थोड़ीबहुत देर में आ ही जाएगा.

अनिल गुप्ता अपनी दुकान बंद कर के घर लौट आए. तब तक अंकित घर नहीं लौटा था. उन्होंने बेटे को कई बार फोन किए, लेकिन उस के फोन बंद ही आ रहे थे. पता नहीं वह कहां चला गया, जो अभी तक नहीं आया, वह बुदबुदा रहे थे. बेटे के जितने दोस्तों को वह जानते थे, उन में से जिनजिन के फोन नंबर उन्हें मिले, उन से उन्होंने बात की. दोस्तों ने यही बताया कि अंकित उन्हें स्कूल में ही मिला था, उस के बाद उन्होंने उसे नहीं देखा. अब तक रात काफी हो चुकी थी. लिहाजा उन्होंने उसे सुबह ढूंढने का फैसला लिया.

अनिल और उन की पत्नी को बेटे की चिंता में रात भर नींद नहीं आई. वह यही सोचते रहे कि पता नहीं अंकित कहां और किस हालत में होगा. सुबह होते ही अनिल अपने छोटे भाई संजीव के साथ बेटे को ढूंढने निकल गए. घरपरिवार के लोग उसे संभावित जगहों पर तलाश करने लगे. दोपहर हो गई लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर बाद 2 बजे के करीब अनिल गुप्ता संजीव को ले कर थाना वेलकम पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को उन्होंने बेटे के गायब होने की बात बताई. अनिल गुप्ता थानाप्रभारी से बात कर ही रहे थे कि उसी समय उन के फोन की घंटी बजी. जैसे ही उन्होंने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘तुम्हारा लड़का हमारे कब्जे में है. यदि उसे जिंदा चाहते हो तो एक करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.’’ कहने के बाद उस ने फोन काट दिया.

बेटे के अपहरण की बात सुन कर अनिल घबरा गए. उन्होंने कई बार ‘हैलोहैलो’ कहा, लेकिन वह काल डिसकनेक्ट की चुकी थी. जिस नंबर से वह काल आई थी, अनिल ने वह नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. घबराते हुए उन्होंने थानाप्रभारी को बताया, ‘‘सर, मेरे बेटे का किसी ने अपहरण कर लिया है. अभीअभी किसी ने फोन कर के मुझ से एक करोड़ रुपए मांगे हैं. मेरे बेटे को उन लोगों के चंगुल से छुड़ा लीजिए सर.’’

अनिल गुप्ता की बात सुन कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उन का मोबाइल ले कर उस फोन नंबर को नोट किया, जिस से उन्हें फोन किया गया था. वह नंबर 750363333 एयरसेल कंपनी का था. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसीपी शाहदरा और डीसीपी ए.के. सिंगला को दी. उन के निर्देश पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 363 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

डीसीपी ए.के. सिंगला ने शाहदरा क्षेत्र के एसीपी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रशांत कुमार, अतिरिक्त थानाप्रभारी हरेंद्र सिंह, एसआई तेजबीर सिंह, हेडकांस्टेबल पूनमरानी, कांस्टेबल रामप्रसाद आदि को शामिल किया गया.

अपहरण के मामले बड़े ही संवेदनशील होते हैं. इस में पुलिस की यही कोशिश रहती है कि किसी भी तरह अपहृत शख्स को सुरक्षित बरामद किया जाए. पुलिस टीम ने सब से पहले एयरटेल के उस नंबर की जांच करवाई, जिस से फिरौती की काल की गई थी. जांच में पता चला कि वह नंबर वेस्ट ज्योतिनगर के किसी आदमी के नाम से लिया गया था और फिरौती की काल वैशाली, गाजियाबाद इलाके से की गई थी. तुरंत ही 2 पुलिस टीमें उक्त दोनों जगहों पर भेज दी गईं.

वहां जा कर पता चला कि जिस व्यक्ति के नाम पर यह सिमकार्ड खरीदा गया था, उस नाम का कोई शख्स वेस्ट ज्योतिनगर वाले पते पर नहीं रहता था. इस का मतलब अपहर्त्ता ने फरजी आईडी पर वह नंबर खरीदा था. लिहाजा यह टीम वापस आ गई. जो टीम वैशाली गई थी, उसे भी कोई सफलता नहीं मिली, लिहाजा वह भी लौट आई. जिस वक्त पुलिस जांच में लगी थी, उसी दौरान सवा 2 और ढाई बजे के बीच अनिल गुप्ता के मोबाइल पर अपहर्त्ताओं ने 2 बार और फोन किए. उन में भी यही कहा कि पैसों का इंतजाम जितनी जल्दी कर लोगे, उतना ही अच्छा रहेगा. अनिल ने अपहर्त्ता से कहा कि यह रकम बहुत बड़ी है, इंतजाम करने में टाइम तो लगेगा ही. उन्होंने उस से अनुरोध किया कि वह पैसों का इंतजाम कर देंगे, लेकिन बेटे को कुछ न कहें.

अनिल ने यह जानकारी भी पुलिस को दे दी. अपहर्त्ताओं के पास जाने का पुलिस के पास कोई जरिया नहीं था. पुलिस ने अंकित के मांबाप से फिर से बात की. पुलिस ने उन से अंकित के दोस्तों के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अंकित स्कूल से लौटने के बाद दोस्तों के साथ क्रिकेट और मौल में पूल खेलने जाता था. जिन दोस्तों के साथ वह यह खेल खेलता था, पुलिस ने उन दोस्तों की भी लिस्ट बनाई. इस के अलावा उन्होंने अनिल से यह भी मालूम किया कि उन्हें किसी पर कोई शक तो नहीं है.

अनिल गुप्ता ने किसी पर कोई शक नहीं जताया, तब पुलिस ने अंकित के दोस्तों से ही जांच शुरू की. एकएक कर उस के साथ पूल और क्रिकेट खेलने वाले बच्चों से पूछताछ की गई, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. अंकित के पास जो 3 फोन नंबर थे, उन तीनों की काल डिटेल्स निकलवाई गई. इस से पता चला कि उस के पास आखिरी बार 880233333 नंबर से काल आई थी. इसी नंबर से आई काल के बाद वह घर से गया था. इतना ही नहीं, इस फोन नंबर पर अंकित की 11 फरवरी को 7 बार और 8 फरवरी को 3 बार बात हुई थी. इस से पहले इस नंबर से अंकित को कोई काल नहीं आई थी.

फोन नंबर हासिल होने पर पुलिस को उम्मीद की किरण दिखाई दी. जांच करने पर पता चला कि यह नंबर अशोकनगर के किसी आदमी का है. फौरन एक टीम अशोकनगर में उस पते पर भेज दी गई. लेकिन वहां जा कर पता चला कि यह सिम भी फरजी आईडी से लिया गया था. लिहाजा पुलिस टीम बैरंग लौट आई. पुलिस उस डीलर के पास पहुंची, जिस की मार्फत इस नंबर को एक्टिवेट कराया गया था. वह दुकानदार कबीरनगर का दानिश था. दानिश से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने फरजी आईडी से यह फोन नंबर एक्टिवेट करा रखा था. लेकिन इस नंबर को उस ने किसे बेचा, यह नहीं बता पाया. चूंकि उस ने फरजी आईडी से सिम एक्टिवेट करा कर के गैरकानूनी काम किया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ काररवाई कर के उसे जेल भेज दिया.

अगले दिन दोपहर बाद 2 बजे अनिल के मोबाइल पर अपहर्त्ता का फिर फोन आया. इस बार उस ने धमकी दी, ‘‘पैसे जल्दी इकट्ठे कर लो, वरना तुम्हारे बेटे को मार दिया जाएगा.’’

‘‘नहीं…नहीं, बेटे को कुछ नहीं कहना, मैं पैसों का जुगाड़ कर रहा हूं.’’ अनिल गुप्ता ने अनुरोध करते हुए कहा, लेकिन उन की बात सुनने से पहले ही अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद फोन काट देता था. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन नवीन शाहदरा की आ रही थी. नवीन शाहदरा में किस जगह से उस ने काल की थी, यह पता लगाना आसान नहीं था.

उधर अंकित की चिंता में घर वाले तो परेशान हो ही रहे थे, साथ ही पुलिस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. क्योंकि उसे ऐसा कोई क्लू नहीं मिल रहा था, जिस से अपहर्त्ताओं के पास पहुंचा जा सके. फिर भी पुलिस अपने हिसाब से काररवाई कर रही थी.

उसी दिन शाम 7 बजे अंकित के ही मोबाइल पर अपहर्त्ता ने फिर से फोन किया, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

‘‘कर रहे हैं. अभी भी मैं पैसों के लिए ही किसी के पास जा रहा हूं.’’ अनिल ने कहा.

‘‘पुलिस को खबर करने की भूल मत करना, वरना…’’ अपहर्त्ता ने चेतावनी दी.

‘‘नहीं, मैं पुलिस को कुछ नहीं बताऊंगा. लेकिन मेरे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ अनिल ने कहा पर अपहर्त्ता ने जवाब दिए बिना ही फोन काट दिया.

इस बार अपहर्त्ता के फोन की लोकेशन जीटी रोड, शाहदरा की आ रही थी. पुलिस ने जीटी रोड शाहदरा और नवीन शाहदरा में सड़कों के किनारे जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, उन सभी की फुटेज निकलवा कर फोन करते हुए अपहर्त्ता की रिकौर्डिंग ढूंढनी चाही. इस काम में कई पुलिसकर्मियों को लगाया गया, पर पुलिस को ऐसी फुटेज नहीं मिली.

14 फरवरी की शाम को अपहर्त्ता ने अनिल को फोन कर के पैसों के इंतजाम के बारे में पूछा तो अनिल ने बताया कि अभी तक 20 लाख का ही इंतजाम हो पाया है. इस पर अपहर्त्ता ने कहा कि एक बैग में पैसे रख कर बाइक से भजनपुरा रेडलाइट पहुंच जाओ. ध्यान रखना कि साथ में पुलिस न हो.

अपहर्त्ता का जब भी फोन आता, अनिल उस की सूचना पुलिस को जरूर दे देते थे. इस काल की जानकारी के बाद पुलिस ने अपहर्त्ताओं को जाल में फांसने का पुख्ता इंतजाम कर लिया. भजनपुरा रेडलाइट और उस के आसपास सादा कपड़ों में पुलिस तैनात कर दी गई. एक बैग में जीपीएस चिप लगा कर उस में नोटों के आकार की कागज की गड्डियां, फिर उन के ऊपर असली नोट रख कर बाइक से अनिल गुप्ता को रवाना कर दिया गया. उन के पीछे पुलिस टीम की गाड़ी भी लग गई. टीम के सभी लोग सादा लिबास में थे.

भजनपुरा रेडलाइट पर अनिल गुप्ता काफी देर तक खड़े रहे, लेकिन उन के पास बैग लेने कोई नहीं आया. करीब 2-3 घंटे बाद उन के पास अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘मैं ने तुम से पुलिस साथ में लाने को मना किया था ना, पर तुम नहीं माने. अब मूड खराब है, इसलिए घर जाओ बाद में बात करूंगा.’’

अनिल की बात सुने बिना ही उस ने फोन काट दिया था. अनिल से इस बार भी अपनी बात कहने के लिए अपहर्त्ता को फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. अपहर्त्ता ने गुस्से में बात की थी, इसलिए बेटे की सलामती को ले कर उन की चिंता बढ़ने लगी. इस के बाद 14 फरवरी को अलगअलग जगहों से 6 बार काल आई. इन सब बातों से पुलिस को यकीन हो गया कि अपहर्त्ता बेहद शातिर है. पुलिस ने इस तरह की वारदातों में शामिल रहे अनेक बदमाशों को हिरासत में ले कर पूछताछ की, पर नतीजा कुछ नहीं निकला.

अपहर्त्ता बात करने के लिए केवल एयरटेल के 7503633333 नंबर का ही उपयोग कर रहा था और बात करते ही वह फोन स्विच्ड औफ कर देता था. इस के अलावा इस नंबर से किसी और से बात नहीं करता था. इसलिए पुलिस अपहर्त्ता के पास नहीं पहुंच पा रही थी. 15 फरवरी को अनिल के पास अपहर्त्ता का फिर फोन आया, उस में उन्हें पैसे ले कर एकडेढ़ बजे मोहननगर की रेडलाइट के पास बुलाया गया. अनिल निर्धारित समय से पहले ही बाइक से मोहननगर की रेडलाइट के पास जा कर खड़े हो गए. उन के आसपास दिल्ली पुलिस थी. वहां खड़े हो कर काफी देर इंतजार करने के बाद भी उन से पैसों का बैग लेने तो कोई नहीं आया, पर अपहर्त्ता का फोन जरूर आ गया. उस ने कहा, ‘‘यहां से तुम मेरठ रोड पर आ जाओ.’’

अनिल उस के कहे अनुसार, मेरठ रोड पहुंच गए. वहां भी उन के पास पैसे लेने कोई नहीं आया. अनिल के साथसाथ पुलिस टीम भी परेशान हो रही थी.

एकडेढ़ घंटा इंतजार करने के बाद अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘गुप्ताजी, लगता है तुम्हें अपना बेटा जिंदा नहीं चाहिए, इसलिए तुम हर बार पुलिस को साथ ला रहे हो.’’

‘‘मेरे साथ पुलिस नहीं है. मैं बिलकुल अकेला आया हूं. आप मुझ से पैसे ले लीजिए और बेटे को छोड़ दीजिए.’’ अनिल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘अब तुम जाओ. आज शाम को बता देंगे कि पैसे कहां पहुंचाने हैं. अबकी बार चालाकी दिखाने की कोशिश मत करना.’’ कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.

अनिल उदास चेहरा ले कर घर लौट गए. जैसे ही वह घर जाते, उन की पत्नी उन से मालूम करतीं कि अपहर्त्ताओं से क्या बात हुई और बेटा घर कब आएगा, तब अनिल पत्नी को भरोसा दे देते कि चिंता मत करो, बेटा जल्दी ही आ जाएगा. पुलिस जांच में पता चला कि अपहर्त्ता ने उस दिन गाजियाबाद के अलगअलग इलाके से फोन किए थे.15 फरवरी को ही रात 8 बजे फोन कर के अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘एक कट्टे (बोरे) में पैसे रख कर उस पर कूड़ा भर कर उसे कर्दमपुरी के कूड़ाघर में रात 9 बजे फेंक आना.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, पर आप कम से कम एक बार मेरे बच्चे से मेरी बात तो करा दीजिए.’’ अनिल ने कहा. लेकिन उन की बात का जवाब दिए बिना ही उस ने फोन काट दिया.

बेटे को ले कर अनिल गुप्ता की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उन की पत्नी मीरा की तो रोरो कर आंखें सूज आई थीं. अपहर्त्ता से बात होते ही अनिल ने चावल के एक खाली कट्टे में केवल कुछ कूड़ा भरा. उन्होंने इस बार उस में रुपए नहीं रखे. फिर उस कट्टे को अपने भाई राजीव के साथ ले जा कर कर्दमपुरी के कूड़ाघर में डाल आए. योजना के अनुसार, पुलिस पहले से उस जगह पर निगाह रख रही थी. कट्टा डालने के कई घंटे बाद भी न तो किसी ने उस बोरे को उठाया और न ही अनिल के पास कोई फोन आया.

अगले दिन सुबह के समय अपहर्त्ता का फोन आया, ‘‘तुझे कई बार मना किया था न कि पुलिस के चक्कर में मत पड़, मगर तू नहीं माना. तू बहुत सयाना बन रहा है, अब तू पुलिस से ही ऐसीतैसी कराते रहना. तू पैसे नहीं दे रहा तो कोई बात नहीं.’’

अनिल ने सफाई देनी चाही, लेकिन उन की बात सुनने से पहले उस ने फोन काट दिया. इस के बाद अनिल के पास अपहर्त्ता का कोई फोन नहीं आया. अनिल ने बेटे का पता लगाने वाले को 2 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा कर दी. उन्होंने पूरे यमुनापार इलाके में इस तरह के 10 हजार पोस्टर भी छपवा कर चस्पा करवा दिए. पुलिस को भी अंकित के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

इस बीच दिल्ली और एनसीआर में अंकित की उम्र के किसी लड़के की अज्ञात लाश बरामद होती तो पुलिस उस के फोटो अनिल गुप्ता को दिखाती. उन में किसी में अंकित की लाश नहीं मिली. ऐसी उन्हें 26 लाशें दिखाई गईं. 14 फरवरी को नोएडा के दादरी क्षेत्र में एक लड़के की डैडबौडी मिली. इस की सूचना दिल्ली पुलिस को मिली तो पुलिस ने उस लाश के फोटो भी अनिल को दिखाए. वह फोटो कुछकुछ अंकित की तरह लग तो रही थी. लेकिन कपड़ों की वजह से उन्होंने उस लाश को पहचानने से इनकार कर दिया. मरने वाला लड़का कत्थई रंग की शर्ट पहने हुए था, जबकि अंकित घर से निकलने समय लाल रंग की शर्ट पहन कर गया था.

तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी.एस. बस्सी भी इस केस पर बराबर निगाह रखे हुए थे. वह केस की रोजाना की प्रोग्रैस रिपोर्ट देखते थे. उन्होंने इस केस को सुलझाने के लिए उत्तरपूर्वी दिल्ली के स्पैशल स्टाफ, एएटीएस, एसटीएफ के अलावा क्राइम ब्रांच की एंटी किडनैपिंग सेल, स्पैशल सेल को भी लगा दिया. डीसीपी ए.के. सिंगला के ही निर्देशन में 15 पुलिस टीमें इस केस को सुलझाने में जुट गईं. सभी टीमें अलगअलग दृष्टिकोण से केस को सुलझाने में लगी थीं. इतना ही नहीं, पुलिस आयुक्त ने भी अंकित का पता बताने वाले को एक लाख रुपए इनाम देने की घोषणा कर दी.

एसीपी वाई.के. त्यागी अपनी टीम के इंसपेक्टर के.जी. त्यागी, एसआई मुकेश कुमार, प्रदीप कुमार, नीरज कुमार, पंकज, अमर सिंह, एएसआई ओमेंद्र सिंह, कांस्टेबल नितिन के साथ लगे हुए थे. इस टीम ने अपहृत अंकित के तीनों फोन नंबरों की फिर से जांच की. टीम ने पता लगाया कि वह पूल खेलने कहां जाता था और क्रिकेट किन के साथ खेलता था. टीम को यह पता चला कि वह डांस का भी शौकीन था. वह गोकलपुरी में डांस सीखने जाता था.

पुलिस टीम ने उस के स्कूल के दोस्तों, गली के दोस्तों, रिश्तेदारों के अलावा दुश्मनों की भी लिस्ट बनाई. इस के बाद इन सभी से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी. टीम ने जिले के आपराधिक तत्वों को भी निशाने पर लिया. करीब 6-7 सौ लोगों से पूछताछ की, लेकिन उन से कोई क्लू नहीं मिला. अंकित को घर से निकलने के बाद किसी ने किसी के साथ जाते हुए नहीं देखा था, इसलिए पुलिस को केस खोलने में सफलता नहीं मिल रही थी.

इंसपेक्टर के.जी. त्यागी ने अब उस फोन नंबर पर अपना ध्यान लगाया, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. पता चला कि वह फोन जनवरी, 2016 में एक्टिवेट हुआ था. अंकित जब 11 फरवरी को घर से निकला था, यह कह कर गया था कि वह कहीं जा रहा है और थोड़ी देर में लौट आएगा. इस से उन्होंने यही अनुमान लगाया कि जिस का फोन सुन कर वह घर से निकला था, वह व्यक्ति केवल अंकित का ही परिचित था. उसे अंकित की मां नहीं जानती थीं. अगर वह मां का भी जानने वाला होता तो अंकित सीधे कहता कि मैं फलां के साथ जा रहा हूं. पुलिस ने काफी घोड़े दौड़ाए, पर वह उस व्यक्ति को नहीं पहचान पाई, जिस ने अंकित को फोन कर के बुलाया था.

घूमफिर कर पुलिस उसी फोन नंबर की जांच में लग गई, जिसे अपहर्त्ता ने प्रयोग किया था. इस के अलावा अंकित के तीनों फोन नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन कर के उन नंबरों को छांटा, जिन से अंकित की कभीकभार बात होती थी. ऐसे 50-60 संदिग्ध नंबर पुलिस के सामने आए. इन 50-60 नंबरों में पुलिस को एक नंबर ऐसा मिला, जिस से अंकित की केवल 6 फरवरी, 2016 को ही बात हुई थी. वह फोन नंबर एयरसेल कंपनी का था.

जांच में पता चला कि एयरसेल का यह नंबर अंकित के दोस्त जीशान का था. जीशान विजय पार्क, मौजपुर का रहने वाला था. पुलिस ने जीशान से अभी कुछ नहीं कहा, बल्कि यह पता लगाया कि अपहर्त्ता ने जिन जगहों से फिरौती की काल की थी, उन में से किसी जगह पर एयरसेल का यह नंबर मौजूद था या नहीं. टीम ने आखिर यह पता लगा ही लिया. काल डिटेल्स से इस बात की पुष्टि हो गई कि कई जगहों पर एयरसेल का यह नंबर और अपहर्त्ता के नंबर की लोकेशन एक ही थी. इस से यह बात पता लगी कि दोनों फोन नंबर साथसाथ ही थे. इस जांच से जीशान पुलिस के शक के दायरे में आ गया. फिर 4 अप्रैल, 2016 को उसे उस के घर से पूछताछ के लिए उठा लिया गया.

19 साल के जीशान से पुलिस ने सख्ती के साथ अंकित के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाया. उस ने बताया कि उस ने अपने दोस्त इलियास (17) के साथ मिल कर अंकित का अपहरण किया था और 11 फरवरी को ही उस की हत्या कर लाश दादरी थाने के बादलपुर इलाके में डाल दी थी. हत्या की बात सुन कर पुलिस सन्न रह गई. फिर पुलिस ने उस की निशानदेही पर उसी दिन यमुनाविहार के रहने वाले इलियास को भी हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों अभियुक्तों को उसी जगह पर ले गई, जहां उन्होंने लाश फेंकी थी. संपर्क करने पर दादरी पुलिस ने बताया कि 14 फरवरी, 2016 को सुबह करीब 8 बजे बादलपुर से जूट के बोरे में एक लड़के की लाश बरामद की थी, जिस के हाथपैर बंधे हुए थे. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद 16 फरवरी को उस का अंतिम संस्कार करा दिया था. दिल्ली पुलिस ने अनिल गुप्ता को दादरी ले जा कर उस लाश के फोटो दिखाए. उन फोटो को वह पहले भी देख चुके थे. तब उन्होंने शर्ट का रंग दूसरा होने और लाश के फूले होने की वजह से शिनाख्त नहीं की थी. अब गौर से देखा तो लाश उन के बेटे अंकित की ही निकली.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने 5 अप्रैल को अभियुक्त जीशान और इलियास को न्यायालय में पेश कर 3 दिनों का पुलिस रिमांड लिया. रिमांड अवधि में पूछताछ करने पर अंकित के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली. 19 वर्षीय जीशान एक ड्राइवर था. पास के ही रहने वाले इलियास से उस की दोस्ती थी. इलियास नाबालिग था. उस ने 7वीं तक पढ़ाई की थी. दोनों ही आवारा थे. वे जल्द से जल्द मोटा पैसा कमाना चाहते थे. इस के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. दोनों यह जानते थे कि ज्यादा पैसा कमाने के लिए कोई न कोई उल्टासीधा काम तो करना ही पड़ेगा. वह काम कौन सा और क्या किया जाए, इस के लिए वे टीवी पर प्रसारित होने वाले क्राइम पैट्रोल कार्यक्रम को बड़े गौर से देखते थे.

यह कार्यक्रम देखने के बाद उन्होंने किसी का अपहरण करने की योजना बनाई. अब समस्या यह आई कि अपहरण किस का किया जाए. उसी समय इलियास के दिमाग में अपने दोस्त अंकित का चेहरा घूम गया. अंकित बहुत बनठन कर रहता था और दोस्तों पर खुले हाथों से पैसे खर्च करता था. अंकित के अलावा उन्होंने एक और लड़के को टारगेट में रखा. योजना के अनुसार, उन्होंने एक दुकानदार से किसी बहाने से ऐसे 3 सिमकार्ड खरीदे, जो पहले से ही एक्टिवेट थे. कई महीने की प्लानिंग के बाद इलियास ने फरवरी के पहले हफ्ते में अपने एक नाबालिग दोस्त का अपहरण करने के लिए उसे फोन कर के बुलाया, पर वह किसी वजह से नहीं आया तो इलियास ने दूसरे दोस्त अंकित को 11 फरवरी, 2016 को साढ़े 4 बजे दूसरे फोन नंबर 7503633333 से फोन कर के 100 फुटा रोड पर बुलाया.

इलियास अंकित के साथ 7वीं कक्षा तक पढ़ा था. पढ़ाई छोड़ने के बाद भी दोनों मिलते रहते थे. उन की दोस्ती बरकरार थी. इलियास अंकित के घर नहीं जाता था, तभी तो उसे अंकित के घर वाले नहीं जानते थे. इलियास के बात करने के बाद अंकित फटाफट खाना खा कर घर के बाहर आ गया. 100 फुटा रोड पर जीशान और इलियास मारुति आल्टो कार नंबर डीएल9सीएस 9715 में उस का इंतजार कर रहे थे. यह कार जीशान के एक परिचित की थी. जैसे ही अंकित उन के पास पहुंचा, इलियास ने उस का जीशान से परिचय कराया और कहा कि आज एक खुशी है, इसलिए साथ खाएंगेपिएंगे.

तीनों उस आल्टो कार से भजनपुरा पहुंचे. वहां से जीशान ने शराब खरीदी. भजनपुरा के सुभाष मोहल्ले में जीशान के बहनोई का एक फ्लैट था. वह अकसर खाली रहता था. उस की चाबी जीशान के पास ही रहती थी. जीशान अंकित को उसी फ्लैट पर ले आया. वहां उन्होंने अंकित को जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में धुत हो गया तो साथ लाई रस्सी से उन्होंने उस का गला घोंट दिया. उस की पहचान न हो, इसलिए इलियास ने उस की लाल रंग की शर्ट उतार कर अपनी कत्थई रंग की शर्ट पहना दी. उस की जेब में रखा उस का आईडी कार्ड, गले में पड़ा सोने का लौकेट, मोबाइल फोन, जूते, पर्स आदि अपने पास रख लिए.

फिर उस के हाथपैर रस्सी से बांध कर जूट के एक बोरे में भर कर बांध दिया. वह बोरे को ऐसी जगह ठिकाने लगाना चाहते थे, जिस से उस की शिनाख्त न हो. इस के बाद वह उस बोरे को कार में डाल कर गौतमबुद्ध नगर के बादलपुर इलाके में ले गए. उसे दादरी बाईपास के किनारे डाल कर वह रात 11 बजे दिल्ली लौट आए.

लाश ठिकाने लगा कर वे बेफिक्र हो गए थे. अब उन का मकसद उस के घर वालों से फिरौती वसूलना था. अगले दिन से उन्होंने उस के पिता को फोन कर के एक करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. वह अलगअलग जगहों से फिरौती की काल करते रहे. उन्होंने उसे पहले इसलिए मार दिया, ताकि उसे बंधक बनाने का झंझट ही न रहे. इन्होंने इतनी फूलप्रूफ योजना बनाई थी कि पुलिस के लिए यह केस एक चुनौती बन गया था. दोनों नौसिखिए एक शातिर अपराधी की तरह पुलिस को करीब 2 महीने तक घुमाते रहे.

दिल्ली पुलिस के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी भी उन की शातिराना चाल को नहीं समझ पा रहे थे. बड़ी मशक्कत के बाद आखिर पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन अंकित के परिजनों का कहना है कि दोनों लड़कों के पीछे किसी शातिर बदमाश का हाथ जरूर रहा होगा. इन की निशानदेही पर पुलिस ने मारुति आल्टो कार, अंकित की शर्ट, पर्स, लौकेट, आईडी कार्ड, जूते, फोन आदि बरामद कर लिए हैं. पुलिस ने 7 अप्रैल को जीशान को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया, जबकि नाबालिग इलियास को बाल न्यायालय में पेश कर बालसुधार गृह भेज दिया. मामले की जांच थानाप्रभारी प्रशांत कुमार कर रहे हैं. Kidnaping Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. इलियास परिवर्तित नाम है.

 

Delhi News: 400 रुपए के विवाद में ली जान

Delhi News: अक्सर हम देखते हैं कि लोग पैसों के लिए झगड़ते हैं, लेकिन क्या आप ने कभी पैसे के लिए किसी की जान लेने की कहानी सुनी है? ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 3 नाबालिगों ने सिर्फ 400 रुपए के लिए एक शख्स की चाकुओं से हत्या कर दी. अब सवाल उठता है कि क्या सच में केवल 400 रुपए ही इस हत्या की वजह थे या इस के पीछे कोई और राज छिपा था. चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को सोचने पर मजबूर कर देगी.

उत्तर पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद से एक खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने इलाके में सनसनी मचा दी. यहां 3 नाबालिगों ने सिर्फ 400 रुपए के मामूली विवाद के चलते 26 साल के कैफ की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी, जबकि चौथा साथी पूरी वारदात का वीडियो बनाता रहा. शव मिलने के बाद गुस्साए परिजनों ने सड़क पर हंगामा किया, जिस से करीब एक घंटे तक यातायात बाधित रहा. पुलिस ने तुरंत तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, 3 अप्रैल, 2026 को देर शाम 25 फुटा रोड स्थित बाबू हलवाई की दुकान के पास कैफ को 3 नाबालिगों ने घेर लिया. भागते समय कैफ पास खड़ी साइकिल से टकरा कर गिर गया और तब नाबालिगों ने उस पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए. उसे गंभीर हालत में जगप्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल 3 चाकू बरामद किए और प्रारंभिक जांच में पता चला कि मामूली 400 रुपए के विवाद ने इतनी बड़ी वारदात को जन्म दिया. Delhi News

Beed Crime News: 16 की उम्र में शादी, 17 में मौत

Beed Crime News: यह कहानी एक ऐसी मासूम की है, जिस की जिंदगी बचपन में ही शादी के बंधन में बांध दी गई और फिर कुछ ही समय बाद उस की मौत की खबर ने सबको हिला कर रख दिया. 17 साल की उम्र, जब बच्चे अपने सपने पूरे करने की सोचते हैं, उस उम्र में इस लड़की की जिंदगी रहस्यमय तरीके से खत्म हो गई. उस की मौत हादसा थी, आत्महत्या थी या फिर सोचीसमझी साजिश, यही सवाल अब सबके मन में उठ रहा है.

यह मामला महाराष्ट्र के बीड जिले से सामने आया है, जहां एक 17 वर्षीय लड़की का शव कुएं से बरामद होने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. बताया जा रहा है कि लड़की पिछले 3 दिनों से लापता थी. फेमिली वालों ने उस की काफी तलाश की, लेकिन जब कहीं पता नहीं चला तो पुलिस में गुमशुदगी की दर्ज कराई गई.

पुलिस ने जांच शुरू की और तलाश के दौरान धारूर तहसील के एक कुएं से उस का शव बरामद किया गया. जांच में सामने आया कि लड़की की शादी करीब एक साल पहले वडवणी तहसील के एक गांव में रहने वाले युवक से कर दी गई थी. शादी के बाद वह करीब 6 महीने तक ससुराल में रही, लेकिन बाद में वह अपने मायके कासारी लौट आई थी और वहीं रह रही थी. इसी बीच वह अचानक लापता हो गई और कुछ दिनों बाद उस की लाश कुएं में मिली, जिस से मामला और भी संदिग्ध हो गया.

पुलिस के अनुसार, मौत के समय लड़की की उम्र 17 साल 10 महीने थी, यानी जब उस की शादी हुई थी तब वह नाबालिग थी. अब पुलिस इस मामले में बाल विवाह के एंगल से भी जांच कर रही है. साथ ही यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यह आत्महत्या है या हत्या.

सच्चाई जानने के लिए शव को फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया है और रिपोर्ट आने के बाद ही मौत की असली वजह साफ हो पाएगी. Beed Crime News

Chandrapur Murder Case: लिवइन पार्टनर ही निकला कातिल, आत्महत्या की कहानी के पीछे छिपा था मर्डर का सच

Chandrapur Murder Case: यह मामला एक ऐसे रिश्ते की कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, जहां भरोसा ही जानलेवा साबित हो गया. एक युवती, जो अपने पार्टनर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही थी, उसे क्या पता था कि उस का यही फैसला उस की जिंदगी का अंत बन जाएगा. शुरुआत में इस घटना को आत्महत्या बताकर मामला शांत करने की कोशिश की गई, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो हर कोई हैरान रह गया.

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के दुर्गापुर थाना क्षेत्र के तुकूम इलाके में रहने वाली 29 वर्षीय प्रियंका अपने प्रेमी अंकेश योगेश बहीरवार के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. दोनों के बीच कुछ समय से नजदीकियां थीं और वे एक साथ रह रहे थे. लेकिन इस रिश्ते के पीछे क्या चल रहा था, यह किसी को नहीं पता था. जब प्रियंका की अचानक मौत की खबर सामने आई तो पहले इसे आत्महत्या बताया गया, जिस से किसी को शक न हो.

पुलिस के अनुसार, 14 मार्च,2026 की रात करीब सवा 8 बजे यह घटना हुई, लेकिन इस का खुलासा कई दिनों बाद हुआ. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हुआ कि प्रियंका की मौत आत्महत्या नहीं, बल्कि गला घोंटकर की गई हत्या थी. जांच में सामने आया कि आरोपी ने मोबाइल चार्जर के केबल का इस्तेमाल कर उस का गला दबाया, जिस से उस की मौत हो गई.

घटना के बाद आरोपी ने परिजनों को फोन कर बताया कि प्रियंका बात नहीं कर रही है. जब परिजन मौके पर पहुंचे तो वह अचेत अवस्था में पड़ी थी और उस के गले पर निशान साफ दिखाई दे रहे थे. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. शुरुआत में पुलिस ने इसे सामान्य मौत मानते हुए मामला दर्ज किया, लेकिन बाद में रिपोर्ट आने के बाद जांच का रुख बदल गया.

2 अप्रैल,2026 को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि होते ही पुलिस हरकत में आई और जांच तेज कर दी. इस के बाद आरोपी अंकेश योगेश बहीरवार को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में कई अहम बातें सामने आने की उम्मीद है. बताया जा रहा है कि प्रियंका अपने पति से अलग हो चुकी थी और अंकेश के साथ रह रही थी, लेकिन आपसी विवाद ने इस रिश्ते को खौफनाक अंजाम तक पहुंचा दिया. पुलिस अब पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है. Chandrapur Murder Case

Delhi News: एकतरफा प्यार में मौत, 10वीं की छात्रा की चाकू से गोदकर हत्या

Delhi News: यह घटना एक ऐसी दर्दनाक सच्चाई को सामने लाती है, जिस ने पूरे इलाके को दहला कर रख दिया. एक नाबालिग लड़की, जो अपने भविष्य के सपनों के साथ घर से निकली थी, उसे क्या पता था कि यह उस का आखिरी दिन साबित होगा. दिनदहाड़े हुई इस वारदात ने न सिर्फ एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि इलाके के लोगों को भी डर और गुस्से से भर दिया. आखिर क्या वजह थी कि एक लड़की को इतनी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया. आइए जानते हैं इस पूरी घटना को विस्तार से.

उत्तर पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी इलाके में 3 अप्रैल, 2026 को जाह्नवी दवा लेने के लिए बाजार गई थी. उसी दौरान वहां उसे जतिन मिल गया, जो पिछले काफी समय से उसे जानता था. बताया जा रहा है कि दोनों की पहले से पहचान थी, लेकिन उस दिन जो हुआ उस ने सब कुछ खत्म कर दिया. अचानक ही जतिन ने जाह्नवी पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया, जिस से वह गंभीर रूप से घायल हो कर वहीं गिर पड़ी और आरोपी मौके से फरार हो गया.

घायल हालत में भी जाह्नवी ने हिम्मत नहीं हारी. मौके पर मौजूद एक युवक से फोन ले कर उस ने अपनी मम्मी को कौल किया और अपने ऊपर हुए हमले की जानकारी दी. इस के बाद उसे तुरंत जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उस की हालत बहुत गंभीर थी. शनिवार सुबह इलाज के दौरान उस ने दम तोड़ दिया. पोस्टमार्टम के बाद जब उस का शव परिजनों को सौंपा गया तो परिवार में कोहराम मच गया.

इस घटना से गुस्साए परिजनों और स्थानीय लोगों ने सीमापुरी गोलचक्कर के पास शव रखकर प्रदर्शन किया और इस मामले में शामिल अन्य लोगों की गिरफ्तारी की मांग की. लोगों का कहना था कि सिर्फ एक आरोपी ही नहीं, बल्कि इस मामले में और भी लोग शामिल हो सकते हैं. पुलिस अधिकारियों ने लोगों को आश्वासन दिया कि मामले की पूरी जांच की जाएगी, तब जा कर लोग वहां से हटे. वहीं, घटना के बाद आरोपी जतिन ने भी आत्महत्या कर ली. बताया जा रहा है कि वह अपने घर गया और सिलेंडर का पाइप निकालकर खुद को आग लगा ली, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

शुरुआती जांच में सामने आया है कि जतिन पिछले 2 सालों से जाह्नवी पर शादी का दबाव बना रहा था, लेकिन वह लगातार मना कर रही थी. इसी बात से गुस्से में आ कर उस ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दे दिया. पुलिस अब पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है. Delhi News

Gujrat News: पैसों की चकाचौंध में बह गई भावना

Gujrat News: 30 जून, 2023 को गुजरात के जिला भरूच के थाना जंबुसर पुलिस को सूचना मिली कि पगरनाला में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. लाश किसी पुरुष की थी, जिस की उम्र 36 साल के आसपास थी.

मरने वाले के शरीर पर कपड़े के नाम पर सिर्फ पैंट थी. पुलिस ने पैंट की तलाशी ली कि शायद उस की जेब से ऐसा कुछ मिल जाए, जिस से उस की पहचान हो जाए. पर उस की जेब से कुछ भी नहीं मिला. आसपास भी ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो पाती. तब पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद थाने आ कर यह पता करने की कोशिश की जाने लगी कि जिले में कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. पर जिले के किसी थाने में उस हुलिए के किसी व्यक्ति की कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने लाश को बड़ौदा की मोर्चरी में रखवा दी. इस के बाद पुलिस यह पता करने की कोशिश करती रही कि मरने वाला कौन है?

10 दिन बाद हुई लाश की शिनाख्त

लाश मिलने के 10 दिनों बाद थाना जंबुसर से करीब 400 किलोमीटर दूर जिला बनासकांठा के थाना थराद के एसएचओ इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी ने फोन कर के जंबुसर पुलिस से पूछा, “पता चला है कि आप के थानांतर्गत एक पुरुष की लाश मिली है. मरने वाले की उम्र 36 साल के आसपास है.”

“जी, आज से 10 दिन पहले नाले में एक लाश मिली थी. मरने वाले की यही उम्र होगी, जितनी आप बता रहे हैं. मैं उस के फोटो भेज रहा हूं. लाश अभी मोर्चरी में रखी है.” थाना जंबुसर पुलिस ने कहा.

जंबुसर पुलिस ने लाश के फोटो भेजे तो पता चला कि वह लाश गुजरात के जिला बनासकांठा की तहसील थराद के गांव चोटपा के रहने वाले मारवाड़ी चौधरी पटेल शंकरभाई की थी. वह गांव में रह कर खेती करने के साथसाथ मकान बनाने के ठेके लेता था. उस के परिवार में पत्नी भावना पटेल के अलावा 3 बच्चे और बूढ़े मांबाप थे. पिता को लकवा मार दिया था, इसलिए वह चलफिर नहीं सकते थे.

29 जून, 2023 को साइट से आने के बाद शाम का खाना खा कर शंकर यह कह कर घर से निकला था कि वह पड़ोस में रहने वाले ऊदाजी के पास जा रहा है. वह घर से गया तो फिर लौट कर नहीं आया. घर वालों ने थोड़ी देर इंतजार किया. पर जब समय ज्यादा होने लगा तो उस के बारे में पता करने लगे. फोन किया गया तो पता चला फोन बंद है.

अगले दिन यानी 30 जून को थाना थराद पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन थाना थराद पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय एकदो दिन और इंतजार करने के लिए कह कर सूचना देने गई शंकर की मां मीरादेवी को वापस भेज दिया था.

गुमशुदगी दर्ज कर पुलिस ने की कार्यवाही

जब 2 जुलाई तक शंकर नहीं आया तो मीरादेवी दोबारा थाने जा पहुंची. इस बार इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी से उन की मुलाकात हो गई. उन्होंने तुरंत शंकर की गुमशुदगी दर्ज कराई और शंकर के बारे में पता कराने का आश्वासन दे कर मीरादेवी को घर भेज दिया.

इस के बाद एसएचओ ने शंकर की तलाश शुरू की. गांव वालों से पूछताछ में पता चला कि शंकर की पत्नी भावनाबेन का चरित्र ठीक नहीं है. इस के बाद उन्होंने भावना का फोन सर्विलांस पर लगवा दिया. इस से उन्हें पता चला कि भावना लगातार पड़ोसी गांव कलश के रहने वाले शिवा पटेल के संपर्क में है.

जब उन्होंने शिवा पटेल के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह 29 जून को अंकलेश्वर से गांव आया तो था, पर अपने घर नहीं गया था. इस के अलावा 29 जून को उस ने शंकर को फोन भी किया था. 29 जून की शंकर और शिवा के फोन की लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि दोनों के फोन की लोकेशन एक साथ थी.

इस से पुलिस को उस पर शक हुआ तो पुलिस ने उस की लोकेशन निकलवाई. उस की लोकेशन अंकलेश्वर की मिली. इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी की टीम अंकलेश्वर पहुंची और शिवा को गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

थाने ला कर शिवा से पूछताछ शुरू हुई. शिवा पुलिस को गोलगोल घुमाता रहा. उस का कहना था कि वह 29 जून को गांव गया ही नहीं था. इधर शंकर से उस की मुलाकात ही नहीं हुई, लेकिन जब पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की लोकेशन उस के सामने रखी तो उस ने शंकर के मर्डर में अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि भावना के साथ रहने के लिए उस ने शंकर की हत्या की है. इस के बाद उस ने भावना से प्यार होने से ले कर शंकर की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मेले में मिल गए दोनों के दिल

शंकरभाई पटेल और भावनाबेन का विवाह करीब 14 साल पहले हुआ था. शंकर अपने परिवार के साथ चोटपा गांव में खेतों के बीच मकान बना कर रहता था. उस की दोस्ती कलश गांव के शिवाभाई पटेल से थी. वह भी मारवाड़ी चौधरी पटेल था. वह भी खेतों के बीच घर बना कर रहता था, शायद इसीलिए दोनों में कुछ ज्यादा पटती थी.

शिवा शंकर के घर भी खूब आताजाता था. शिवा अंकलेश्वर में मेटल का धंधा करता था. वह जब भी अंकलेश्वर से गांव आता, शंकर को अपनी क्रेटा गाड़ी में बैठा कर घुमाता था.

एक बार वह राजस्थान के बौर्डर पर लगने वाले लवाड़ा के मेले में घूमने जा रहा था तो शंकर के साथ उस की पत्नी भावना भी मेला देखने गई थी. उसी मेले में शिवा और भावना ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया था. बाद में दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. फोन पर बातें करतेकरते दोनों के बीच प्रेम संबंध बना तो फिर शारीरिक संबंध भी बन गए.

शिवा कुंवारा था, जवान था, अच्छा पैसा कमाता था, उसे एक महिला शरीर की जरूरत भी थी, जो भावना ने पूरी कर दी थी. शिवा के पास पैसों की कमी नहीं थी, वह दिल खोल कर भावना पर पैसे खर्च करता था तो भावना भी प्यार से उस की शारीरिक जरूरतें पूरी करती थी. यह अवैध संबंध इसी तरह चलते रहे.

यह लगाव जब गहराया तो भावना अकसर शिवा से शिकायत करने लगी, “मेरा पति शंकर मुझे बहुत परेशान करता है. जराजरा सी बात पर मुझे मारता है.”

शिवा के प्यार में डूब गई भावना

जब कभी भावना और शंकर में झगड़ा होता तो भावना शिवा को फोन कर के पति और अपना झगड़ा शिवा को सुनाती भी थी. शंकर भावना के साथ जो बरताव कर रहा था, वह शिवा को अच्छा नहीं लगता था. पर वह शंकर से कुछ कह भी नहीं सकता था.

शिवा भावना से बहुत प्यार करता था, इसलिए एक दिन उस ने कहा, “तुम शंकर को छोड़ कर मेरे साथ क्यों नहीं रहने आ जाती? मैं तुम्हें रानी की तरह रखूंगा.”

इस पर भावना ने कहा, “घर में बूढ़े मांबाप हैं, उन्हें छोड़ कर आऊंगी तो समाज मुझ पर थूकेगा. मेरी बहुत बदनामी होगी.”

“तब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?” शिवा ने कहा.

“कुछ तो करना ही होगा, मैं इस आदमी के साथ अब नहीं रह सकती.” भावना बोली.

28 जून, 2023 को किसी बात पर शंकर और भावना में झगड़ा हुआ. तब भावना ने शिवा को फोन कर के कहा, “शिवा, तुम किसी भी तरह मुझे इस आदमी से छुड़ाओ. अब मैं इस आदमी के साथ बिलकुल नहीं रह सकती.”

शिवा भावना से प्यार तो करता ही था. पर उस के लिए परेशानी यह थी कि उस की बिरादरी में पति या पत्नी को छोडऩा आसान नहीं है. इसलिए जब उस ने भावना से एक बार फिर शंकर को छोड़ कर आने को कहा तो भावना बोली, “अगर मैं शंकर को छोड़ कर आती हूं तो समाज में मेरी बहुत बदनामी होगी. इसलिए शंकर से छुटकारा पाने के लिए उस का कुछ करना होगा.”

“वही तो मैं पूछ रहा हूं कि शंकर का किया जाए?” शिवा ने पूछा.

“ऐसा है, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो उसे खत्म कर दो. वह नहीं रहेगा तो हम दोनों आराम से रह सकेंगे.” भावना ने कहा.

“ठीक है, जैसा तुम कह रही हो, वैसा ही करते हैं. आराम से बैठ कर योजना बनाते हैं, उस के बाद शंकर को खत्म कर देते हैं.” शिवा ने कहा.

शंकर की हत्या की हुई प्लानिंग

28 जून को यह बात हुई थी. इस के पहले भी दोनों में शंकर नाम के कांटे को निकालने की कई बार बात हो चुकी थी, लेकिन इस के पहले फाइनल योजना नहीं बनी थी. पर इस बार दोनों ने फोन पर ही शंकर को खत्म करने की फाइनल योजना बना डाली.

योजना बनाने के बाद किसी को शक न हो, इसलिए भावना 28 जून को ही मायके चली गई. 29 जून को शिवा ने एक दूसरे नंबर से अपने दोस्त शंकर को फोन कर के अच्छीअच्छी बातें करने के बाद विश्वास में ले कर कहा, “यार शंकर, तुम से एक जरूरी काम है. मैं गाड़ी ले कर आ रहा हूं. तुम ऐसा करो, सडक़ पर आ कर मुझ से मिलो.”

इस बीच भावना से भी शिवा की बातचीत होती रही. 2 महीने पहले भावना और शिवा के बीच शंकर को मारने की बात हुई थी, तब भावना ने कहा था कि शंकर को नींद की गोली खिला कर खत्म कर दो. इसलिए 2 महीने पहले ही उस ने भरूच सिटी से नींद की गोलियां खरीद कर रख ली थीं, जो उस की गाड़ी में ही रखी थीं. 2 महीने पहले हुई बातचीत के अनुसार शिवा अपनी योजना में आगे बढ़ रहा था.

कार में गला घोंट कर की थी हत्या

29 जून, 2023 की दोपहर को अपनी क्रेटा कार नंबर जीजे16डी के1389 ले कर शिवा अंकलेश्वर से निकला. उस ने अपने निकलने की बात शंकर को बता दी थी. चलने के पहले उस ने नींद की गोलियां पीस कर पानी की बोतल में मिला दी थीं.

रात करीब 9 बजे वह गांव चोटपा पहुंचा. उस ने शंकर से बता ही दिया था कि एक जरूरी काम से उसे साथ चलना है, इसलिए वह खाना खा कर तैयार था. गांव पहुंचते ही शिवा ने फोन किया तो शंकर आ कर उस की कार में बैठ गया. शिवा इधरउधर गाड़ी घुमाने लगा.

शिवा समय गुजार रहा था कि शंकर उस से पानी पीने के लिए मांगे. इसलिए वह शंकर को चोटपा से खोडा चरकपोस्ट, साचोर, ननेवा से घानेरा ले गया. जब वह काफी दूर निकल गया तो शंकर ने पानी पीने के लिए मांगा. शिवा ने तुरंत पानी की वही बोतल पकड़ा दी, जिस में उस ने नींद की गोलियां पीस कर मिलाई थीं.

वह पानी पीने के थोड़ी देर बाद शंकर को नींद आ गई. इस के बाद शिवा घानेरा से सीधे डीसा रोड पर गया. सडक़ पर सुनसान जगह देख कर शिवा ने कार रोकी और शंकर के मोबाइल को स्विच्ड औफ कर दिया कि किसी को पता न चल सके.

इस के बाद वह गाड़ी ले कर चल पड़ा. काफी दूर जाने के बाद सुनसान जगह देख कर उस ने सडक़ के किनारे गाड़ी रोक दी. शंकर गहरी नींद में था. शिवा ने कार में रखी रस्सी निकाली और शंकर के गले में लपेट कर कस दी. गला घोंटने से शंकर की सांस हमेशा हमेशा के लिए रुक गई.

बच्चों के अनाथ होने पर समाज ने की मदद

अब उसे शंकर की लाश को ठिकाने लगाना था. वह लाश को ऐसी जगह फेंकना चाहता था, जहां कोई उस की पहचान न कर सके. उस ने शंकर को आगे की सीट पर इस तरह बैठा दिया, जिस से लगे कि वह बैठेबैठे सो रहा हो.

शंकर की लाश को ले कर वह डीसा, पालनपुर, मेहसाणा, अहमदाबाद, बड़ौदा होते हुए वह जंबुसर गया. जंबुसर चौराहे से थोड़ी दूर आगे से सिंगल रोड गई थी. उसे वह रोड सुनसान दिखाई दी तो उस ने कार उसी रोड पर उतार दी. लगभग एक किलोमीटर जा कर शिवा को एक पगरनाला दिखाई दिया तो उस ने शंकर की लाश उसी पगरनाले में फेंक दी. उस समय सुबह के 6 बज रहे थे.

लाश को ठिकाने लगाने के बाद शिवा ने फोन कर के यह बात भावना को बताई और वहां से सीधे अंकलेश्वर चला गया. 2 दिन बाद भावना भी ससुराल आ गई, जिस से किसी को उस पर शक न हो.

हत्याकांड का खुलासा हो जाने के बाद थाना थराद पुलिस ने भावना को भी गिरफ्तार कर लिया. शिवा को थाने में देख कर उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इस के बाद थाना थराद पुलिस ने शिवा और भावना को बनासकांठा की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों का 6 दिन का रिमांड लिया गया.

रिमांड के दौरान बनासकांठा के एसपी अक्षयराज मकवाना ने प्रैस कौन्फ्रैंस की. पत्रकारों के सामने भी प्रेमिका प्रेमी भावना और शिवा ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

शंकर, जिस की हत्या हुई है, उस के पिता लकवाग्रस्त हैं, मां बूढ़ी है. 3 बच्चे हैं, जिस में सब से बड़ी बेटी 7 साल, उस से छोटा बेटा 4 साल और सब से छोटा बेटा 2 साल का है. पिता की हत्या हो गई है. पिता की हत्या के आरोप में मां जेल में है. बच्चों की हालत पर दया खा कर आजणा चौधरी समाज के बुजुर्गों ने बच्चों की मदद के लिए 15 लाख रुपए इकट्ठा कर के दिए हैं. Gujrat News

Love Crime: खूनी बन गई झूठी मोहब्बत

Love Crime: 19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत कौर अपने पति हरजिंदर सिंह से यह कहते हुए घर से निकली थी कि उस के मायके में किसी की तबीयत खराब है, इसलिए वह राहुल को ले कर वहां जा रही है. पत्नी की यह बात सुन र हरजिंदर ने कहा, ‘‘ठीक है, हो आओ. ज्यादा परेशानी वाली बात हो तो तुम मुझे फोन कर देना. मैं भी पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘हां, तुम्हारी जरूरत हुई तो फोन कर दूंगी और कोई ज्यादा चिंता वाली बात नहीं हुई तो 2 दिन में वापस लौट आऊंगी.’’ कमलप्रीत बोली.

मूलरूप से पंजाब के जिला पटियाला के गांव बल्लोपुर की रहने वाली थी कमलप्रीत. करीब 12 साल पहले जब वह 19 बरस की थी, तब उस की शादी हरियाणा के गांव गणौली के रहने वाले हरजिंदर सिंह से हुई थी. यह गांव जिला अंबाला की तहसील नारायणगढ़ के तहत आता है.शादी के ठीक एक साल बाद कमलप्रीत ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम राहुल रखा गया. इन दिनों वह गांव के सरकारी स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ रहा था.

हरजिंदर का अपना खेतीबाड़ी का काम था, जिस में वह काफी व्यस्त रहता था. कमलप्रीत घर पर रहते हुए चौकेचूल्हे से ले कर सब कम संभाले हुए थी. जो भी था, सब बड़े अच्छे से चल रहा था. पतिपत्नी में खूब प्यार था. दोनों में अच्छी अंडरस्टैंडिंग भी थी. दोनों अपने बच्चों का भी सलीके से ध्यान रखे हुए थे.

काफी दिनों से राहुल पिता से कहीं घुमा लाने की जिद कर रहा था तो पिता ने उस से पक्का वादा किया था कि वह उस के इम्तिहान खत्म होने के बाद उसे 2 दिन के लिए घुमाने शिमला ले चलेगा. मगर पेपर खत्म होने के अगले रोज ही उसे अपनी मां के साथ नानी के यहां जाना पड़ गया. पत्नी के मायके जाने वाली बात पर हरजिंदर को कोई परेशानी वाली बात नहीं थी. पति की निगाह में कमलप्रीत एक सुलझी हुई मेहनती औरत थी, जो ससुराल के साथसाथ अपने मायके वालों का भी पूरा ध्यान रखती थी.

सुखदुख में वह अपने अन्य रिश्तेदारों के यहां भी अकेली आयाजाया करती थी. कुल मिला कर बात यह थी कि हरजिंदर को पत्नी की तरफ से कोई चिंता नहीं थी. इसलिए जब वह 19 मार्च को बेटे के साथ मायके के लिए घर से अकेली निकली तो हरजिंदर ने कोई चिंता नहीं की.

उसी रोज शाम के समय हरजिंदर ने पत्नी को यूं ही रूटीन में फोन कर के पूछा, ‘‘हां कमल, पहुंचने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? बल्लोपुर पहुंच कर तुम ने फोन भी नहीं किया?’’

‘‘हांहां…वो ऐसा है कि अभी मैं बल्लोपुर नहीं पहुंच पाई.’’ कमलप्रीत बोली तो उस की आवाज में हकलाहट थी.

society

पत्नी की ऐसी आवाज सुन कर हरजिंदर को थोड़ी घबराहट होने लगी. उस ने पूछा, ‘‘बल्लोपुर नहीं पहुंची तो फिर कहां हो?’’

‘‘अभी मैं शहजादपुर में हूं. किसी जरूरी काम से मुझे यहां रुकना पड़ गया.’’ कमलप्रीत ने पहले वाले लहजे में ही जवाब दिया.

‘‘शहजादपुर में ऐसा क्या काम पड़ गया तुम्हें? वहां तुम किस के यहां रुकी हो? सब ठीक तो है न? बताओ, कोई परेशानी हो तो मैं भी आ जाऊं क्या?’’

‘‘सब ठीक है, घबराने वाली कोई बात नहीं है. अच्छा, मैं फ्री हो कर अभी कुछ देर बाद फोन करती हूं. तब सब कुछ विस्तार से भी बता दूंगी.’’ कहने के साथ ही कमलप्रीत की ओर काल डिसकनेक्ट कर दी गई.

लेकिन हरजिंदर की घबराहट बढ़ गई थी. उस ने कमलप्रीत का नंबर फिर से मिला दिया. पर अब उस का फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

अचानक यह सब होने पर हरजिंदर का फिक्रमंद हो जाना लाजिमी था. कुछ नहीं सूझा तो उस ने उसी समय अपनी ससुराल के लैंडलाइन नंबर पर फोन किया. यहां से उसे जो जानकारी मिली, उस से उस के पैरों तले की जमीन सरक गई. ससुराल से उसे बताया गया कि यहां तो घर में कोई बीमार नहीं है और न ही कमलप्रीत के वहां आने की किसी को कोई जानकारी थी.

अब हरजिंदर के लिए एक मिनट भी रुके रहना संभव नहीं था. उस ने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और शहजादपुर की ओर रवाना हो गया. रास्ते भर वह कमलप्रीत को फोन भी मिलाता रहा था, पर हर बार उसे फोन के स्विच्ड औफ होने की ही जानकारी मिलती रही.

आखिर वह शहजादपुर जा पहुंचा. पत्नी और बच्चे की तलाश में उस ने उस गांव का चप्पाचप्पा छान मारा मगर पत्नी और बेटे राहुल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वहां से वह मोटरसाइकिल से ही अपनी ससुराल बल्लोपुर चला गया. कमलप्रीत को ले कर वहां भी सब परेशान हो रहे थे.

इस के बाद तो हरजिंदर सिंह और उस की ससुराल वालों ने कमलप्रीत व राहुल की जैसे युद्धस्तर पर तलाश शुरू कर दी. मगर कहीं भी दोनों मांबेटे के बारे में जानकारी हाथ नहीं लगी.

19 मार्च, 2018 का दिन तो गुजर ही गया था, पूरी रात भी निकल गई. 20 मार्च को भी दोपहर तक तलाश करते रहने के बाद सभी निराश हो गए तो हरजिंदर शहजादपुर थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को उस ने पत्नी और बेटे के रहस्यमय तरीके से गायब होने की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने कमलप्रीत और उस के बेटे राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अपने स्तर से दोनों मांबेटे को ढूंढने की काररवाई शुरू कर दी.

देखतेदेखते इस बात को एक सप्ताह गुजर गया, मगर पुलिस भी इस मामले में कुछ कर पाने में असफल रही.

बात 26 मार्च, 2018 की थी. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह उस वक्त अपने औफिस में थे. तभी एक अधेड़ उम्र के शख्स ने उन के सामने आ कर दोनों हाथ जोड़ते हुए दयनीय भाव से कहा, ‘‘सर, मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं यमुनानगर में रहता हूं.’’

‘‘जी हां, कहिए.’’ शैलेंद्र सिंह बोले.

‘‘अब क्या कहूं सर, एक भारी मुसीबत आन पड़ी है हमारे परिवार पर.’’

‘‘हांहां बताइए, क्या परेशानी है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

society

‘‘सर, मेरा एक भांजा है नीटू. उम्र उस की करीब 21 साल है. किसी बात पर उस का एक औरत से झगड़ा हुआ और हाथापाई में वह औरत मर गई. उस ने उस की लाश को कहीं ले जा कर दफन कर दिया. जब इस की जानकारी मुझे हुई तो हम ने उसे समझाया कि गलती हो जाने पर कानून से आंखमिचौली खेलने के बजाय पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना ही बेहतर होगा.’’ ओमप्रकाश ने बताया.

इस पर एकबारगी तो शैलेंद्र सिंह चौंके. फिर खुद को संभालने का प्रयास करते हुए बोले, ‘‘मतलब यह कि आप के भांजे ने किसी की जान ली, फिर उस की लाश भी ठिकाने लगा दी. अब सरेंडर का प्रस्ताव लेकर आए हो. तो यह भी बता दो कि किन शर्तों पर सरेंडर करवाओगे?’’

‘‘कोई शर्त नहीं सर. लड़का आप के सामने तो अपना अपराध कबूलेगा ही, अदालत में भी ठीक ऐसा ही बयान देगा. भले उसे कितनी भी सजा क्यों न हो जाए. बस आप से हमें सिर्फ इतना सहयोग चाहिए कि थाने में उस पर ज्यादा सख्ती न हो.’’ ओमप्रकाश ने कहा.

‘‘देखो, अगर वह हमें सहयोग करते हुए सच्चाई बयान करता रहेगा तो हमें क्या जरूरत पड़ी है उस से सख्ती से पेश आने की. जाओ, लड़के को ला कर पेश कर दो. यदि वह सच्चा है तो यहां उस के साथ किसी तरह की ज्यादती नहीं होगी.’’

‘‘ठीक है सर, मैं समझ गया. लड़का थाने के बाहर ही खड़ा है. मैं अभी उसे ला कर आप के सामने पेश करता हूं.’’ कहने के साथ ही ओमप्रकाश बाहर गया और थोड़ी ही देर में एक लड़के को ले कर थाने में आ गया.

‘‘यही है मेरा भांजा नीटू, सर.’’ उस ने बताया.

जिस वक्त ओमप्रकाश नीटू को ले कर थानाप्रभारी के औफिस में पहुंचा था, पुलिस वाले बगल वाले कमरे में एक अभियुक्त से गहन पूछताछ कर रहे थे. जरा सी देर में वहां से चीखचिल्लाहट की भयावह आवाजें आने लगी थीं.

ये आवाजें सुन कर नीटू थरथर कांपने लगा. फिर वह दबी सी आवाज में ओमप्रकाश से बोला, ‘‘मामा, ये लोग मेरा भी क्या ऐसा ही हाल करेंगे?’’

‘‘नहीं करेंगे बेटा, मैं ने एसएचओ साहब से सारी बात कर ली है. फिर जब तुम एकदम सच्चाई बयान कर ही रहे हो तो फिर डर कैसा?’’ ओमप्रकाश ने समझाया.

‘‘यही तो डर है मामा, मैं ने आप को भी पूरी सच्चाई नहीं बताई. दरअसल, मैं ने औरत के साथसाथ उस के बेटे का भी मर्डर कर दिया है और दोनों की लाशें एक साथ दफनाई हैं.’’

नीटू की यह बात थानाप्रभारी के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने नीटू को खा जाने वाली नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘मुझे पहले ही से शक था कि तुम्हारे अपराध का संबंध गणौली की कमलप्रीत और उस के बच्चे की गुमशुदगी से है.

अब तुम्हारे लिए बेहतर यही है कि तुम अपने घिनौने अपराध की सच्ची दास्तान अपने मामा को बता दो, वरना दूसरे तरीके से सच्चाई उगलवानी भी आती है.’’

थानाप्रभारी के इतना कहते ही ओमप्रकाश नीटू को ले कर एक दूसरे कमरे में ले गया. इस के बाद नीटू ने अपने अपराध की पूरी कहानी मामा को बता दी. नीटू के बताने के बाद ओमप्रकाश ने सारी कहानी थानाप्रभारी को बता दी.

थानाप्रभारी ने ओमप्रकाश के बयान दर्ज करने के बाद उसे घर भेज दिया फिर नीटू को गिरफ्तार कर उसे अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से अपराध की एक सनसनीखेज कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

करीब एक साल पहले की बात है. अपनी रिश्तेदारी के एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए कमलप्रीत अकेली नारायणगढ़ के बड़ागांव गई थी. वहां जब वह नाचने लगी तो एक लड़के ने भी उस का खूब साथ दिया. उस ने बहुत अच्छा डांस किया था.

इस डांस के बाद भी दोनों एक साथ बैठ कर बतियाते रहे. लड़के ने अपना नाम सुमित उर्फ नीटू कहते हुए बताया कि यों तो वह शहजादपुर का रहने वाला है, मगर बड़ागांव में किराए का कमरा ले कर एक कंप्टीशन की तैयारी कर रहा है.

society

कमलप्रीत उस की बातों से तो प्रभावित हो ही रही थी, उस का सेवाभाव भी उसे खूब पसंद आया. कमलप्रीत तो थकहार कर एक जगह बैठ गई थी, पार्टी में खाने की जिस चीज का भी उस ने जिक्र किया, वह ला कर उसे वहीं बैठी को खिलाता रहा.

इसी तरह काफी रात गुजर जाने पर कमलप्रीत को नींद सताने लगी. नीटू ने सुझाव दिया कि वह उसे अपने कमरे पर छोड़ आता है, जहां वह बिना किसी शोरशराबे के आराम से सो सकती है. थोड़ी झिझक के बाद वह मान गई.

अब तक नीटू को भी नींद आने लगी थी. अत: कमरे में चारपाई पर कमलप्रीत को सुलाने के बाद वह खुद भी जमीन पर दरी बिछा कर सो गया.

आगे का सिलसिला शायद इन के वश में नहीं था. रात के जाने किस पहर में दोनों की एक साथ आंखें खुलीं और बिना आगेपीछे की सोचे, दोनों एकदूसरे में समा गए. कमलप्रीत से नीटू 10 साल छोटा था, अत: उस मिलन के बाद कमलप्रीत उस की दीवानी हो गई. इस के बाद यही सिलसिला चल निकला. दोनों किसी न किसी तरीके से, कहीं न कहीं मौजमस्ती करने का तरीका निकाल लेते.

देखतेदेखते एक बरस गुजर गया. अब कमलप्रीत ने नीटू से यह कहना शुरू कर दिया था कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर लेगी. मौजमस्ती तक तो ठीक था, कमलप्रीत की इस बात ने नीटू को परेशान कर डाला.

नीटू ने इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए आखिर मन ही मन यह निर्णय लिया कि वह कमलप्रीत को अच्छी तरह से समझाएगा. फिर भी न मानी तो वह उस का खून कर देगा. इस के लिए उस ने एक चाकू भी खरीद कर रख लिया था.

19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत उस के यहां आ धमकी. उस के साथ एक लड़का था, जिसे उस ने अपना बेटा बताया. आते ही उस ने कहा कि वह अपने पति को हमेशा के लिए छोड़ आई है. आगे वह उस से शादी कर के अपने लड़के सहित उसी के साथ रहेगी.

नीटू ने उसे समझाने की कोशिश की. लगातार समझाते समझाते पूरा दिन और सारी रात भी निकल गई. मगर वह अपनी जिद पर अड़ी रही तो 20 मार्च को नीटू ने चाकू से कमलप्रीत की हत्या कर दी.

यह देख कर उस का लड़का राहुल सहम गया. मगर वह इस मर्डर का चश्मदीद गवाह बन सकता था. इसलिए नीटू ने चाकू से उस का भी गला रेत दिया. दोनों लाशों को कमरे में छिपा कर नीटू अमृतसर चला गया.

वहां गोल्डन टेंपल में उस ने वाहेगुरु से अपने इस गुनाह की माफी मांगी. रात में वापस आ कर बड़ागांव के पास से गुजर रही बेगना नदी की तलहटी में दोनों लाशों को दफन कर आया. इस के बाद वह अपने मामा के पास यमुनानगर चला गया, जिन्होंने उसे पुलिस के सामने सरेंडर करने का सुझाव दिया था.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर न केवल चाकू बरामद किया बल्कि दोनों लाशें भी खोज लीं, जो जरूरी काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर नीटू को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में अंबाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया था. Love Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित