True Crime Story: जब माया की सास बनीं फांस

True Crime Story: 8 जनवरी, 2020 की बात है. पन्ना, अजयगढ़ में सर्दी का भारी प्रकोप था. पवई थाना क्षेत्र के बधाई गांव का रहने वाला संजय चौधरी खेतों की रखवाली के लिए रात को खेतों पर ही सोता था, उस के पिता मलुवा चौधरी भी खेत पर ही सोते थे. घर खेत के करीब ही थे.8 जनवरी की रात को दोनों बापबेटे खेत पर सोने गए थे, जबकि घर पर संजय की पत्नी मायाबाई और मां कसुम थी. सुबह को संजय की पत्नी मायाबाई ने उसे फोन पर बताया कि थोड़ी देर पहले वह सो कर उठी तो उस के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद मिला. मायाबाई ने उसे आगे बताया कि फोन लगाने से पहले उस ने सासू मां को कई आवाजें दी थीं. लेकिन जब उन की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला, तब उस ने उन्हें फोन लगाया.

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि अम्मा दिशामैदान चली गई हों, तुम इंतजार करो. हो सकता है, थोड़ी देर में आ जाएं.’’ संजय बोला.‘‘मैं काफी देर से उन का इंतजार कर रही हूं, आज तक वह बाहर से दरवाजा बंद कर के कभी नहीं गईं. आप जल्द दरवाजा खोल दो.’’ मायाबाई ने पति से कहा.पत्नी की बात सुन कर संजय घर पहुंच गया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो माया बहुत घबराई हुई थी. संजय ने उस से पूछा तो उस ने कहा कि पता नहीं किस ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था.इस के बाद मियांबीवी दोनों मां के कमरे में गए तो वह कमरे में नहीं थी. कुछ देर तक दोनों ने उस के लौटने का इंतजार किया. काफी देर बाद भी जब वह नहीं लौटी तो संजय ने खेत पर जा कर पिता को यह जानकारी दे दी. मायाबाई भी खेत पर पहुंच गई थी.

पत्नी के गायब होने की बात सुन कर मलुवा चौधरी भी परेशान हो गए. उन के एक खेत में अरहर की फसल खड़ी थी. मायाबाई पति के साथ जब उसी खेत के किनारे से जा रही थी, तभी संजय की नजर अरहर के खेत में पड़ी एक लाश पर गई. वह लाश के नजदीक पहुंचा तो उस की चीख निकल गई. लाश उस की मां कुसुम की थी.उस की गरदन के आसपास कई जगह कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे. खून से सनी कुल्हाड़ी भी वहीं पड़ी थी. इस से लग रहा था कि किसी ने उसी कुल्हाड़ी से उस की हत्या की है.

संजय की चीखपुकार पर पास के खेतों में सो रहे किसान कन्हैयालाल और मांगीलाल भी आ गए. कुछ देर बाद संजय ने यह खबर डायल 100 को दे दी. कुछ देर बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. डायल-100 के एक पुलिसकर्मी ने मामले की जानकारी पवई थाने के टीआई एस.पी. शुक्ला को दे दी.महिला की हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सिपाही संजय को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. टीआई ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका कुसुम के शव से बहा खून अभी भी सूखा नहीं था. इस से टीआई समझ गए कि घटना सुबह हुई है. उन्होंने सोचा कि जब कुसुम दिशामैदान के लिए खेत में आई होगी, तभी किसी ने उस की हत्या कर दी. लेकिन शव के पास लोटा वगैरह नहीं था. सवाल यह उठा कि अगर कुसुम शौच के लिए नहीं आई तो खेत पर सुबहसुबह क्यों आई.

हत्या की खबर पा कर एसपी मयंक अवस्थी, डीएसपी (पवई) डी.एस. परिहार भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी मौकामुआयना किया. टीआई द्वारा पूछताछ करने पर कुसुम के पति मलुवा और बेटे संजय ने किसी से दुश्मनी होने की बात से इनकार कर दिया. संजय की पत्नी मायाबाई ने भी सारी जानकारी पुलिस को दे दी.इस के बाद पुलिस ने उन के घर का मुआयना किया. पूछताछ करने पर टीआई को कुसुम के किसी परिचित पर ही हत्या का शक था, क्योंकि जिस कमरे में कुसुम सो रही थी, वहां किसी संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले थे. इस से लग रहा था कि कुसुम अपनी मरजी से उठ कर ही बाहर आई थी.

मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद किए जाने को ले कर टीआई का मानना था कि संभव है, कुसुम के गांव के किसी आदमी से अवैध संबंध हों. उस का आशिक रात में कुसुम से मिलने घर आया होगा. कहीं बहू अपने कमरे से निकल कर सास के कमरे में न आ जाए, इसलिए उस ने ही मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया होगा. इस के बाद किसी बात को ले कर कुसुम का उस के प्रेमी से विवाद हुआ होगा. इसी के चलते उस व्यक्ति ने कुसुम की हत्या कर दी होगी. लेकिन 56 साल की कुसुम का प्रेम पुलिस के गले नहीं उतर रहा था. फिर भी टीआई ने पुष्टि के लिए गांव में कुसुम के चालचलन की जानकारी जुटानी शुरू की.

इस जांच में कुसुम के बारे में तो नहीं लेकिन उस की बहू मायाबाई के बारे में यह जानकारी निकल कर आई कि गांव में सब से ज्यादा सुंदर मानी जाने वाली मायाबाई का चालचलन संदिग्ध था. आसपास के लोगों ने यह भी बताया कि मायाबाई का चक्कर पड़ोस में रहने वाले एक 19 वर्षीय युवक हलके चौधरी के साथ था.
पुलिस पहले भी संजय की पत्नी मायाबाई से पूछताछ कर चुकी थी, लेकिन उस के बयानों में पुलिस को कुछ भी संदिग्ध नहीं लगा था. सिवाय इस के कि बयान देते समय मायाबाई एक हाथ लंबा घूंघट निकाले रहती थी. इस से टीआई को लगा कि हो सकता है मायाबाई अपने चेहरे के भाव छिपाने के लिए घूंघट का सहारा लेती हो, इसलिए उस के बारे में नई जानकारी मिलने के बाद टीआई शुक्ला ने एक महिला पुलिसकर्मी को मायाबाई से पूछताछ करने को कहा.

महिला पुलिसकर्मी ने उस का घूंघट खुलवा कर उस से घटना वाली रात के बारे में कई सवाल पूछते हुए अचानक से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बता कि हलके तेरे पास कितने बजे आया था?’’हलके का नाम सुनते ही मायाबाई का चेहरा बुझ गया. पहले तो वह सकपकाई फिर बोली, ‘‘कौन हलके? वो मेरे पास क्यों आएगा?’’‘‘ज्यादा सयानी मत बन. पुलिस को सारी बात पता चल गई है. उस रात हलके तुझ से मिलने आया था, इसलिए सीधेसीधे बता दे कि हलके ने तेरी सास को क्यों मारा? देख, तू सच बता देगी तो पुलिस तुझे छोड़ देगी वरना तुझे जेल जाने से कोई नहीं रोक सकेगा.’’मायाबाई पुलिस की बातों में आ गई, उस ने स्वीकार कर लिया कि उस रात सास ने उसे उस के प्रेमी हलके के साथ देख लिया था. इस के बाद हालात ऐसे बने कि उस ने प्रेमी के साथ मिल कर सास की हत्या कर दी.पुलिस पूछताछ में बहू के इश्क में सास के कत्ल की कहानी इस प्रकार सामने आई—

कोई 5 साल पहले मायाबाई जब संजय के साथ ब्याह कर गांव में आई, तब उस की उम्र 21 साल थी. पति के साथ कुछ समय तो उस के दिन अच्छे बीते लेकिन बाद में संजय पत्नी के बजाए खेती पर ज्यादा ध्यान देने लगा. पत्नी की भावनाओं को नजरंदाज करते हुए वह घर के बजाए रात को खेतों पर ही सोने लगा.
ऐसे में मायाबाई की नजरें पड़ोस में रहने वाले युवक हलके चौधरी से लड़ गईं. वह मायाबाई से 2 साल छोटा था और उसे भौजी कहता था. गांव में मायाबाई के आते ही उस की सुंदरता के चर्चे होने लगे थे. लेकिन उस वक्त हलके इन सब बातों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था. धीरेधीरे उस की उम्र बढ़ी तो उस के मन में भी मायाबाई की खूबसूरती गुदगुदी करने लगी.

मायाबाई के कच्चे मकान में कच्चा बाथरूम बाहर आंगन में था, जो हलके के घर से साफ दिखाई देता था. इसलिए 20 साल की उम्र तक आतेआते जब हलके के मन में जवानी की तरंगें उछाल मारने लगीं तो वह मायाबाई को नहाते हुए छिप कर देखने लगा. इसी बीच करीब साल भर पहले एक दिन नहा रही मायाबाई की नजर हलके पर पड़ गई. उस ने उस से कुछ नहीं कहा. वह समझ गई थी कि हलके चौधरी की जवानी अंगड़ाई ले रही है.फिर मायाबाई के मन में भी चुहल करने की बात घर कर गई. अगले दिन से वह चोरीछिपे ताकाझांकी करने वाले हलके को अपने रूप के और भी खुले दर्शन करवाने लगी. मायाबाई ने यह खेल हलके के मन में आग लगाने के लिए खेला था. लेकिन धीरेधीरे उसे न केवल इस खेल में मजा आने लगा, बल्कि हलके के प्रति उस के मन में भी चाहत पैदा हो गई.

हलके का मायाबाई के घर आनाजाना था, इसलिए जब भी हलके मायाबाई के घर आता तो वह उस से हंसीमजाक करती, जिस से कुछ दिनों में हलके की समझ में भी आ गया कि मायाबाई उस के मन की बात समझ चुकी है. इसलिए एक दिन दोपहर में वह उस समय मायाबाई के घर पहुंचा, जब वह घर पर अकेली थी. मायाबाई को भी ऐसे ही मौके का इंतजार था. उस रोज मायाबाई ने बातोंबातों में हलके से पूछ लिया, ‘‘हलके, तुम मुझे यह बताओ कि तुम्हारी कोई प्रेमिका है?’’‘‘नहीं.’’ हलके चौधरी ने जवाब दिया.
‘‘क्यों, अभी तक क्यों नहीं बनाई? तुम्हारा मन तो होता होगा?’’ मायाबाई ने पूछा.
‘‘नहीं.’’ हलके ने झूठ बोला.

‘‘मन नहीं होता तो फिर छिप कर मुझे नहाते क्यों देखते हो? मैं तो समझी थी कि मेरा देवर कई लड़कियों से दोस्ती कर चुका होगा, इसलिए अब मेरे साथ दोस्ती करना चाहता है.’’ मायाबाई मुसकराते हुए बोली.
‘‘वो तो इसलिए कि आप अच्छी लगती हो.’’‘‘कभी मेरी सुंदरता को पास से देखने का मन नहीं करता तुम्हारा?’’ मायाबाई ने पूछा.‘‘करता है, लेकिन डर लगता है कि कहीं आप गुस्सा न हो जाओ.’’ हलके ने बताया.‘‘मैं ने कब कहा कि मैं गुस्सा हो जाऊंगी. अच्छा, एक काम करो अभी तो अम्मा खेत से आने वाली हैं. कल सुबह जल्दी आ जाना फिर देख लेना, अपनी भाभी को एकदम पास से और मन करे तो छू कर भी देखना.’’ इतना कह कर मायाबाई ने नौसिखिया हलके के गाल पर एक पप्पी दे कर उसे उस के घर भेज दिया.

दूसरे दिन हलके चौधरी मायाबाई के घर पहुंच गया. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई नहीं था. मायाबाई ने इस का फायदा उठाया. उस ने हलके को कामकला का ऐसा पाठ पढ़ाया कि वह उस का मुरीद बन गया. इस के बाद तो दोनों के बीच आए दिन वासना का खेल खेला जाने लगा.

मायाबाई को कम उम्र का प्रेमी मिला तो वह उसे बढ़चढ़ कर वासना के खेल सिखाने लगी. जिस के चलते हलके उस का ऐसा दीवाना हुआ कि हर दिन मायाबाई से अकेले में मिल कर प्यार करने की जिद करने लगा. लेकिन यह रोजरोज कैसे संभव हो पाता. इसलिए मायाबाई ने एक रास्ता निकाला.
रात को जब उस का पति और ससुर खेत की रखवाली करने चले जाते तो सास के सो जाने के बाद आधी रात में वह अपने प्रेमी हलके को कमरे में बुला लेती और फिर पूरी रात उसके संग अय्याशी करने के बाद सुबह होने से पहले वापस भेज देती.

8 जनवरी, 2020 की रात को भी यही हुआ. रात में संजय और उस के पिता मलुवा खेत पर चले गए. फिर सास भी खाना खापी कर गहरी नींद सो गई तो मायाबाई ने हलके को बुला लिया. हलके अब प्यार के खेल में काफी होशियार हो चुका था. वह अपने मोबाइल पर अश्लील फिल्में लगा कर मायाबाई को गुदा मैथुन के लिए मना रहा था लेकिन मायाबाई तैयार नहीं हो रही थी. उस रोज हलके ने जिद की तो मायाबाई गुदा मैथुन के लिए राजी हो गई.

उसी दौरान मायाबाई के मुंह से चीख निकली तो बाहर कमरे में सो रही सास की नींद टूट गई. अनुभवी सास ऐसी चीख का मतलब अच्छी तरह जानती थी, सो उस ने उठ कर चुपचाप बहू के कमरे में झांक कर देखा तो पड़ोसी हलके के साथ बहू को अय्याशी करते देख उस की आंखें फटी रह गईं. सास ने गुस्से में किवाड़ पर लात मार कर दरवाजा खोला और मायाबाई और हलके को खूब खरीखोटी सुनाई. सास बहू की करतूत अपने बेटे को बताने के लिए रात में ही खेत पर जाने लगी.यह देख कर मायाबाई के हाथपैर फूल गए. उस ने पास पड़ी कुल्हाड़ी उठा कर हलके के हाथ में पकड़ाते हुए कहा कि वह सास की कहानी खत्म कर दे वरना उन के प्यार की कहानी खत्म हो जाएगी.

हलके के हाथपैर कांपने लगे. उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बाहर जा कर कुसुम की हत्या कर सके. लेकिन जब मायाबाई भी साथ हो गई तो दोनों ने पीछे से जा कर खेतों पर पहुंच चुकी कुसुम की गरदन पर कुल्हाड़ी से वार किया, जिस से वह वहीं गिर गई. इस के बाद उस के शरीर पर कुल्हाड़ी से कई वार और किए, जिस से कुसुम की मृत्यु हो गई.कुछ देर बाद मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर हलके चौधरी अपने घर चला गया. दोनों को भरोसा था कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी, लेकिन पवई पुलिस ने 4 दिन में ही दोनों को कानून की ताकत का अहसास करवा दिया.

Crime Story: खुल गया हत्या का रहस्य

Crime Story: रात लगभग 2 बजे का समय था. घर के दरवाजे की कुंडी बजी. दरवाजा राजरानी ने खोला राजरानी ने देखा कि उस के पति मूलचंद प्रजापति को 2 लोग बाइक से घायल व अचेत अवस्था में ले कर आए थे. पति की हालत देख कर राजरानी घबरा गई.

इस से पहले कि वह उन दोनों से पति की हालत के बारे में पूछती, वे दोनों मूलचंद को बेहोशी की हालत में दरवाजे पर ही छोड़ यह कह कर चले गए कि इन्होंने ज्यादा शराब पी रखी है. दोनों व्यक्तियों के चेहरे कपड़े से ढके थे. वह अपने पति को किसी तरह घर के अंदर लाई और होश में लाने के लिए उस के चेहरे पर पानी के छींटे मारती रही, लेकिन होश नहीं आया. पति के गले और सिर पर चोट के निशान दिख रहे थे. उस ने बच्चों को जगाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे गहरी नींद में सोए थे.

सुबह लगभग 6 बजे मूलचंद की मौत हो गई. यह घटना 7 अक्तूबर, 2020 की है. फिरोजाबाद शहर के थाना उत्तर क्षेत्र स्थित श्रीराम कालोनी निवासी 39 वर्षीय मूलचंद शटरिंग मिस्त्री था. पत्नी राजरानी घर पर ही चूडि़यों पर नग लगाने का काम करती थी. पति की मौत पर राजरानी व बच्चों की चीखपुकार सुन कर मोहल्ले में जगार हो गई थी. पड़ोसियों ने उस के घर आ कर देखा, मूलचंद की मौत हो चुकी थी. मूलचंद के बेटे राहुल ने पिता की मौत की जानकारी द्वारिकापुरी में रहने वाले अपने ताऊ रामदास को दी.

कुछ ही देर में रामदास भी वहां पहुंच गया. जैसेजैसे लोगों को इस घटना की जानकारी मिलती गई. वैसेवैसे वहां पर लोगों का जमघट लगता गया. तब तक सुबह के लगभग 7 बज गए थे. इसी बीच किसी ने थाना उत्तर में सूचना दे दी. थानाप्रभारी अनूप कुमार भारतीय सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. सूचना मिलने पर सीओ (सिटी) हरिमोहन सिंह भी मौके पर पहुंच गए.घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस ने जांचपड़ताल की. मृतक मूलचंद के सिर से खून बह कर जम चुका था तथा गले पर भी चोट के निशान थे. मिस्त्री की मौत होने से उस के बच्चों व पत्नी का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

पुलिस ने समझाबुझा कर राजरानी को शांत कराया. पूछताछ में मृतक की पत्नी राजरानी ने पुलिस को बताया कि उस के पति शटरिंग का काम करते थे. बुधवार की शाम 5 बजे बाजार से सामान लेने के लिए निकले थे. इस के बाद देर रात तक नहीं लौटे. उन के लौटने का इंतजार करतेकरते घर में सभी जने सो गए. रात 2 बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया तो उस ने दरवाजा खोला. देखा 2 युवक बाइक से पति को बेहोशी की हालत में ले कर आए थे. वह कुछ समझ पाती, उस से पहले ही उन्होंने अधिक शराब पीने से तबीयत खराब होने की बात कह कर दरवाजे पर डाल कर भाग गए.

राजरानी ने उन युवकों पर पति की हत्या करने का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों के चेहरे ढके हुए थे. इसलिए वह उन्हें पहचान नहीं पाई. पुलिस ने कहा कि घायल पति को उपचार के लिए अस्पताल क्यों नहीं ले गई? इस पर राजरानी ने बताया कि पति रोज ही शराब पी कर गिरतेपड़ते घर आते थे. उस ने सोचा थोड़ी देर में उन्हें होश आ जाएगा. इसलिए वह उन्हें अस्पताल नहीं ले गई. सुबह जब वह सो कर उठी तो देखा, उन की मौत हो गई थी. पड़ोसियों से भी पुलिस ने पूछताछ की.

उन्होंने बताया कि सुबह राजरानी व बच्चों की चीख सुन कर उन्हें घटना की जानकारी हुई थी. मृतक के भाई रामदास ने पुलिस को बताया कि सुबह भतीजे राहुल का फोन आने पर उन्हें घटना की जानकारी मिली थी. जब वे घर पर पहुंचे, उन्हें भाई मृत अवस्था में मिला था.पुलिस ने शटरिंग मिस्त्री के मकान के आसपास भी पड़ताल की. उन्हें खाली पड़े प्लौट में खून के निशान मिले. पुलिस का मानना था कि मिस्त्री के साथ घर के आसपास ही मारपीट की गई थी. पुलिस ने मृतक मूलचंद के मोबाइल को कब्जे में ले लिया ताकि काल डिटेल्स के माध्यम से हत्यारों तक पहुंचा जा सके.

इंसपेक्टर भारतीय ने मौके की आवश्यक काररवाई निपटाने के साथ ही लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया और थाने लौट आए.भाई रामदास ने मृतक भाई की पत्नी राजरानी के बताए अनुसार 2 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. दूसरे दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में मूलचंद की गला दबा कर व सिर पर चोट पहुंचा कर हत्या किए जाने की बात कही गई थी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने केस की जांच शुरू करते हुए मूलचंद के बारे में पता किया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. जानकारी मिली कि मूलचंद सीधासादा व्यक्ति था. शटरिंग के काम से जो आमदनी होती थी, उसी से अपने परिवार को पालता था.

हत्याकांड के खुलासे के लिए एसएसपी सचिंद्र पटेल ने जिम्मेदारी एसपी (सिटी) मुकेशचंद्र मिश्र को सौंपी. साथ ही उन्होंने उन की मदद के लिए सीओ (सिटी) हरिमोहन सिंह और थानाप्रभारी अनूप कुमार भारतीय को ले कर एक पुलिस टीम का गठन कर दिया. पुलिस ने जांच के दौरान मृतक मूलचंद और राजरानी के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स खंगाली. राजरानी के फोन की काल डिटेल्स में घटना वाली रात आखिरी काल गौरव चौहान को की गई थी. शक गहराने के बाद पुलिस ने गौरव के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह 26 साल का अविवाहित युवक है और मृतक के घर के पास ही रहता है.

गौरव भी चूड़ी पर मोती लगाने का काम करता था. जांच के दौरान पूछताछ में यह भी पता चला कि गौरव का राजरानी के घर काफी आनाजाना था.इस के बाद राजरानी से पूछताछ की गई. पुलिस ने उस से गौरव के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि हमारे व गौरव के यहां चूड़ी का काम होता है. घर भी पासपास हैं इसलिए हमारा परिवार उस से परिचित है. पुलिस ने उस से पूछा कि जब पति घायल और बेहोशी की हालत में था तो अपने जेठ रामदास को फोन कर जानकारी क्यों नहीं दी? रात में तुम ने गौरव को फोन क्यों किया था? इस प्रश्न पर राजरानी ने चुप्पी साध ली.

राजरानी बारबार बयान बदलने लगी. इस से पुलिस का शक मजबूत हो गया. जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तो उस ने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस ने 8 अक्तूबर को घर से राजरानी को तथा कोटला से गौरव को गिरफ्तार कर लिया.

एसपी (सिटी) मुकेशचंद्र मिश्र ने अपने औफिस में आयोजित प्रैस कौन्फ्रैंस में शटरिंग मिस्त्री मूलचंद की हत्या का 24 घंटे में ही खुलासा करने तथा 2 हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी. इस हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.28 वर्षीय गौरव चौहान फिरोजाबाद की श्रीराम कालोनी में मृतक मूलचंद के घर के पास रहता था. मूलचंद शराब पीने का आदी था. वह अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च कर देता था. पत्नी विरोध करती तो वह नशे में उस के साथ मारपीट करता था.

लौकडाउन के दौरान मूलचंद का शटरिंग का काम बंद हो जाने से उस की माली हालत बिगड़ गई. उस के सामने 8 लोगों का पेट पालने की समस्या खड़ी हो गई.गौरव और राजरानी चूड़ी का काम अपनेअपने घरों पर ही करते थे. इस से वे एकदूसरे को जानते थे. आर्थिक संकट आने पर गौरव ने राजरानी की काफी मदद की. वह गौरव के एहसानों के तले दब गई थी. धीरेधीरे दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ता गया.

6 बच्चों की मां बनने के बाद भी भरेपूरे बदन की 30 साल की राजरानी का जादू अविवाहित गौरव पर पूरी तरह छाने लगा था. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे. इस बीच दोनों के अवैध संबंध भी बन गए थे.पति के काम पर जाने के बाद दोनों चोरीछिपे मिलते थे. दोनों का यह रिश्ता बिना रोकटोक के चल रहा था. एक बार मूलचंद ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. इस पर उस का पत्नी से विवाद हो गया. गुस्से में उस ने पत्नी की पिटाई कर दी.

इस की जानकारी प्रेमी गौरव को हुई. प्रेमिका के साथ हुई मारपीट पर गौरव को बहुत गुस्सा आया. उस ने राजरानी के साथ मिल कर अपने प्यार की राह के रोड़े को हटाने की योजना बनाई.मूलचंद बुधवार 7 अक्तूबर, 2020 की शाम 5 बजे सामान लेने बाजार गया था. रात साढ़े 11 बजे मूलचंद शराब के नशे में गिरतापड़ता घर लौटा. तब तक सभी बच्चे सो चुके थे. पत्नी राजरानी पति को नशे में पकड़ कर घर की छत पर बने कमरे में ले गई थी. इस के बाद उस ने अपने प्रेमी गौरव को फोन कर घर पर बुला लिया. उस ने फोन पर कहा कि तुम यहां इस तरह चोरीछिपे आना कि कोई तुम्हें देख न सके.

गौरव दबे पांव राजरानी के घर पहुंच गया. गौरव ने देखा मूलचंद शराब के नशे में बेसुध पड़ा था.राजरानी और गौरव के लिए यह एक अच्छा मौका था. राजरानी ने पति के पैर पकड़े और गौरव ने चुनरी से मूलचंद का गला घोंट दिया. राजरानी ने तसल्ली के लिए उस के सिर पर ईंट से प्रहार भी किया. हत्या के बाद उस के शव को दोनों ने बरामदे में बिछी चारपाई पर ला कर डाल दिया. खून से सनी ईंट मकान के बगल में खाली पड़े प्लौट में फेंक दी. इस के बाद गौरव अपने घर चला गया था.प्रेमी के साथ पति की हत्या करने के बाद राजरानी ने 2 युवकों द्वारा पति को बेहोश व घायल अवस्था में बाइक से घर ला कर छोड़े जाने की कहानी बना दी. इस के साथ ही राजरानी के बताने पर जेठ रामदास ने 2 अज्ञात युवकों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. जबकि सच्चाई कुछ और ही थी.

पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर वारदात में प्रयुक्त चुनरी (दुपट्टा) व खून सनी ईंट बरामद कर ली.इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम में थानाप्रभारी अनूप कुमार भारतीय, एसएसआई नरेंद्र कुमार शर्मा, कांस्टेबल विनीत कुमार, तेजवीर सिंह, अजय कुमार, आशीष कुमार, मोहनश्याम, नेत्रपाल, प्रवीन कुमार, लव प्रकाश, महिला कांस्टेबल उपासना शामिल थे.

आवश्यक काररवाई करने के बाद पुलिस ने दोनों दोषियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. एक बेवफा पत्नी ने अपने पति से बेवफाई कर दूसरे मर्द से अवैध संबंध बना कर अपने हंसतेखेलते घर को हमेशाहमेशा के लिए उजाड़ दिया. Crime Story

Delhi Crime: इश्क में राहुल ने उजाड़ दिया पूरा परिवार

Delhi Crime: 8 जनवरी, 2017 को दोपहर बाद की बात है. 34 साल का राहुल माटा पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अजंता अपार्टमेंट के गेट पर पहुंचा. इसी अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर-32 में उस के मातापिता रहते थे. लेकिन राहुल की गलत आदतों की वजह से उस के पिता रविंद्र माटा ने उसे घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद उस के सोसाइटी में घुसने तक पर रोक लगा दी गई थी. जाहिर है, राहुल की कोई न कोई बात उस सोसाइटी के पदाधिकारियों को बुरी लगी होगी, तभी तो गेट पर तैनात गार्डों से भी कह दिया गया था कि उसे किसी भी सूरत में सोसाइटी के अंदर न आने दिया जाए.

उस दिन राहुल अपने फ्लैट पर जाने के लिए सोसाइटी के गेट पर पहुंचा तो वहां मौजूद सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक दिया. गार्ड ने कहा कि सोसाइटी के पदाधिकारियों के आदेश पर ही वह यह कर रहा है. एक सुरक्षागार्ड की राहुल के सामने भला क्या औकात थी. गार्ड द्वारा रोकने की बात राहुल को बुरी लगी. वह गार्ड को डांटते हुए आगे बढ़ा तो गार्ड ने इस का विरोध किया. क्योंकि उसे तो अपनी ड्यूटी करनी थी. राहुल को गार्ड की यह जुर्रत नागवार लगी और वह गार्ड से झगड़ने लगा तथा उस की पिटाई कर दी.

शोरशराबा सुन कर सोसाइटी के कई लोग अपनेअपने फ्लैट से निकल आए. उन लोगों ने भी सुरक्षागार्ड का पक्ष लिया, पर राहुल सभी की बात अनसुनी कर के जबरदस्ती आगे बढ़ गया. तब तक राहुल के 63 वर्षीय पिता रविंद्र माटा भी फ्लैट से बाहर निकल आए थे. बेटे का गार्ड से झगड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस से बात करने के लिए वह उस की तरफ बढ़े. चूंकि वह उसे संपत्ति से पहले ही बेदखल कर चुके थे, इसलिए राहुल ने उन से झगड़ना शुरू कर दिया.

उसी दौरान राहुल ने अपने साथ लाए नारियल काटने वाले चापड़ से पिता पर हमला कर दिया. वहां जितने भी लोग मौजूद थे, उन में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह रविंद्र माटा को बचा सकते. बल्कि वह अपनी जान बचाने के लिए अपने फ्लैटों में चले गए और दरवाजे बंद कर लिए. राहुल पिता पर करीब ढाई मिनट तक चापड़ से वार करता रहा और वह जमीन पर गिर कर तड़पते रहे. इस दौरान किसी ने पुलिस के 100 नंबर पर फोन कर के वारदात की जानकारी देने का साहस जरूर कर दिया था.

राहुल को जब लगा कि उस के पिता मर चुके हैं तो वह खून से सना चापड़ हाथ में थामे अपने फ्लैट पर पहुंचा. पर उस की मां विभा माटा ने पहले ही दरवाजा बंद कर लिया था. राहुल ने मां को आवाज देते हुए कई बार दरवाजा खटखटाया, पर विभा ने दरवाजा नहीं खोला. राहुल को अब इस बात का डर लगा कि कहीं सोसाइटी के लोग उसे पकड़ न लें. इसलिए खुद को बचाने के लिए वह किसी दूसरे फ्लैट में जा रहा था, तभी रास्ते में रेनू बंसल नाम की महिला मिलीं, जो पास के फ्लैट में ही रहती थीं. राहुल ने चापड़ से उन्हें भी घायल कर दिया. रेनू को घायल करने के बाद वह तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 35 में घुस गया.

यह फ्लैट फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा का था. उस समय वह अपने बेटे कशिश के साथ मौजूद थे. राहुल के हाथ में खून से सना चापड़ देख कर वह भी डर गए. राहुल ने दोनों बापबेटों को धक्का दे कर कहा, ‘‘मेरे पास मत आना, वरना मार डालूंगा.’’

वी.के. शर्मा ने अपनी फिल्मी लाइफ में फिल्मी गुंडों को देखा था पर अब तो राहुल उन के सामने सचमुच का गुंडा था. उस से कोई पंगा लेने के बजाए उन्होंने खुद को बचाना जरूरी समझा और बेटे के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. राहुल उन के किचन में चला गया और अंदर से किचन का दरवाजा बंद कर लिया. तब तक मधु विहार थाने की पुलिस अजंता अपार्टमेंट पहुंच चुकी थी. गेट से कुछ कदम दूर रविंद्र माटा की लहूलुहान लाश पड़ी थी. सोसाइटी के लोगों ने बताया कि इन की हत्या इन के बेटे राहुल ने की है जो फ्लैट नंबर 35 में छिपा है.

पुलिस टीम फ्लैट नंबर 35 में पहुंची. उस फ्लैट का किचन और एक कमरा अंदर से बंद था. पुलिस ने दोनों जगह दस्तक दी तो पुलिस का नाम सुनते ही अभिनेता वी.के. शर्मा ने दरवाजा खोल दिया. सामने पुलिस देख कर उन्होंने राहत की सांस ली. उन्होंने बताया कि राहुल उन के किचन में है.

पुलिस ने किचन का दरवाजा खटाखटा कर राहुल से दरवाजा खोलने को कहा. पर राहुल ने दरवाजा नहीं खोला. उसे डर था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी. इसलिए वह अपने बचाव का रास्ता खोजने लगा. पर उसे ऐसा कोई रास्ता नहीं मिला. जब काफी देर तक राहुल ने दरवाजा नहीं खोला तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

तब राहुल ने रसोई गैस (पीएनजी) खोल कर पुलिस को धमकी दी. इतना ही नहीं उस ने आग भी लगा दी. रसोई गैस की आग ने पूरे किचन को चपेट में ले लिया. पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर किचन की आग की लपटों में घुस कर राहुल माटा को बाहर निकाल लिया. उस समय तक राहुल काफी जल गया था. राहुल को सुरक्षित निकालने में 10 पुलिसकर्मी भी झुलस गए. झुलसे हुए पुलिसकर्मियों में इंसपेक्टर मनीष जोशी, एसआई संजय, निशाकर, अंशुल, मनीष, एएसआई सुनील कुमार, चंद्रघोष, हैडकांस्टेबल रामकुमार, कांस्टेबल सुधीर, गजराज शामिल थे. खुद के घायल होने के बावजूद भी पुलिस राहुल को मैक्स अस्पताल ले गई.

तब तक आग पूरे फ्लैट में फैल चुकी थी. फायर ब्रिगेड की 10 गाडि़यां मौके पर पहुंच गईं. घंटे भर की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका. पर आग में अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट का सारा सामान स्वाहा हो चुका था. उन्हें उत्कृष्ट अदाकारी के लिए संगीत नाटक अकादमी से मिला पुरस्कार भी स्वाहा हो गया था.

बचाव के दौरान पुलिसकर्मियों के झुलसने की बात सुन कर डीसीपी ओमवीर सिंह बिश्नोई भी अस्पताल पहुंच गए. आरोपी राहुल माटा और 4 पुलिसकर्मियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया गया. राहुल 40 प्रतिशत जल चुका था. घायल पुलिसकर्मियों को देखने के लिए पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा भी अस्पताल पहुंचे.

राहुल ने रेनू बंसल नाम की जिस महिला को घायल किया था, उसे भी 26 टांके लगे थे. राहुल की हालत सामान्य होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की तो चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

राहुल माटा एक धनाढ्य परिवार से था. उस के पिता रविंद्र माटा का कनाडा में अपना बिजनैस था. करीब 20 साल पहले वह कनाडा चले गए थे. परिवार में पत्नी विभा माटा के अलावा 2 बेटे ही थे. एक राहुल माटा और दूसरा मुकुल माटा. दोनों बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई दिल्ली में हुई थी. विभा दिल्ली में सरकारी नौकरी करती थीं. स्कूली शिक्षा पूरी  करने के बाद राहुल ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया. आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने उसे अमेरिका भेज दिया. सन 1995 से 1999 तक उस ने अमेरिका में पढ़ाई की.

इस के बाद सन 2000 में उस ने अमेरिका की ही एक बैंक में नौकरी कर ली. 8 सालों तक वहां काम करने के बाद वह पिता के पास कनाडा चला गया. पिता को कनाडा की नागरिकता मिली हुई थी. कनाडा में उस ने मर्चेंट नेवी में नौकरी की पर अनुशासनहीनता के आरोप में उसे सन 2011 में नौकरी से निकाल दिया गया.  कनाडा की एक लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में राहुल को जेल जाना पड़ा, जिस में उसे 2 साल की सजा भी हुई. इस आरोप की वजह से राहुल को कनाडा से डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया.

बाद में सन 2014 में उस का मर्चेंट नेवी का लाइसैंस भी निरस्त हो गया. तब मर्चेंट नेवी में नौकरी करने का उस का रास्ता भी बंद हो गया.

रविंद्र माटा ने अपने छोटे बेटे मुकुल माटा को भी कनाडा बुला लिया था. उस की वहां एक मोबाइल फोन कंपनी में नौकरी लग गई थी. दोनों बापबेटे कनाडा में रहते थे, जबकि राहुल अपनी मां विभा के साथ दिल्ली के अजंता अपार्टमेंट के फ्लैट में रहता था. अब से करीब 2 साल पहले विभा भी रिटायर हो गई थीं. अजंता अपार्टमेंट का यह फ्लैट रविंद्र ने सन 1994 में खरीदा था.

दिल्ली में कोई कामधाम करने के बजाय राहुल दिन भर दोस्तों के साथ घूमता रहता था. खर्च के लिए पैसे मां से ले जाता था. विभा जब उसे कोई काम करने को कहतीं तो वह काम न मिलने का बहाना बना देता. इस के बावजूद भी मां उसे समझाती रहतीं. पर वह उन की सलाह को अनसुना कर देता था.

जिस अपराध की वजह से राहुल को कनाडा छोड़ना पड़ा था, उसी तरह का आरोप उस पर सोसाइटी की एक महिला ने भी लगाया था. राहुल पर बारबार इस तरह के आरोप लगने के बाद भी मांबाप ने उस की शादी नहीं की. इस का नतीजा यह हुआ कि राहुल 2 बच्चों की मां निशा के चक्कर में पड़ गया. निशा के 15 और 16 साल के 2 बच्चे थे. वह एक स्कूल में टीचर थी. राहुल निशा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा. एक दिन राहुल ने यह बात मां को बताई तो उन्हें यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना.

इतना ही नहीं, वह निशा को मां के पास फ्लैट पर भी लाने लगा. विभा ऐतराज जताती रहीं और उसे फ्लैट पर लाने के लिए मना करती रहीं. मां की आपत्ति पर राहुल ने कहा कि उस ने उस के साथ मंदिर में शादी कर ली है. यह सुन कर विभा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने यह जानकारी कनाडा में रह रहे पति को दे दी, साथ ही यह भी कह दिया कि मना करने के बावजूद राहुल जबरदस्ती निशा को फ्लैट पर लाता है.

तब वीडियो कौन्फ्रैंसिंग कर रविंद्र ने भी बेटे राहुल को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर तो प्यार का फितूर चढ़ा था. वह भी अपनी जिद पर अड़ा था. राहुल की जिद से रविंद्र माटा और उन की पत्नी को इस बात की आशंका होने लगी कि कहीं बिना शादी की हुई यह महिला और उस के बच्चे उन के फ्लैट पर कब्जा न कर लें.

राहुल की हठधर्मिता से विभा का उस के प्रति व्यवहार भी बदल गया. हर महीने वह उसे खर्च के जो पैसे देती थीं, उन्होंने देने बंद कर दिए. तब राहुल उन से झगड़ता और उन की पिटाई तक कर देता. कभीकभी तो मांबेटे के बीच झगड़ा इतना बढ़ जाता कि पड़ोसियों को बीचबचाव के लिए आना पड़ता.

उस के हिंसक मिजाज से सोसाइटी के लोग भी परेशान थे. एकदो बार पड़ोसियों ने हस्तक्षेप किया तो राहुल ने उन के साथ भी बदतमीजी की. विभा के परिवार में कलह लगातार बढ़ती जा रही थी. फोन कर के वह कनाडा में बैठे पति को सब बताती रहती थीं. बेटे के आचरण से रविंद्र माटा भी परेशान हो गए.

12 अक्तूबर, 2016 को वह कनाडा से दिल्ली आ गए. उन्होंने एक बार फिर बेटे राहुल को समझाया. उन्हें लगा कि राहुल सुधरने वाला नहीं है तो उन्होंने उसे अपनी चलअचल संपत्ति से पूरी तरह से बेदखल करने की चेतावनी दे दी और कह दिया कि वह आइंदा उन के फ्लैट पर न आए.

सोसाइटी वाले तो राहुल के व्यवहार और उस के शोरशराबा करने से पहले परेशान थे. ऊपर से रविंद्र माटा ने सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता से कह दिया कि राहुल को उन के फ्लैट में आने की अनुमति न दी जाए. इस के बाद अजंता रेजीडैंशियल सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता ने गेट पर तैनात सुरक्षागार्डों को राहुल की एंट्री पर बैन लगाने की हिदायत दे दी.

बेटे से खतरे को देखते हुए रविंद्र माटा ने अपने फ्लैट की एंट्री और बालकनी में लोहे के ग्रिल और दरवाजे भी लगवा दिए. बेटे के तेवर देखते हुए उन्होंने इस की शिकायत थाने में भी कर दी थी. सीनियर सिटिजन सेफ्टी के लिहाज से पुलिस ने उन्हें कुछ सेफ्टी टिप्स दिए, साथ ही पुलिस ने पड़ोसियों से भी उन का ध्यान रखने को कह दिया. बहरहाल रविंद्र माटा और विभा अब सतर्क रहने लगे. हालात सामान्य होने पर रविंद्र माटा का कनाडा लौटने का कार्यक्रम निश्चित था.

घर से बेदखल होने के बाद राहुल निशा के साथ पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर में रहने लगा था. अब उसे अपने मांबाप दुश्मन लगने लगे. इतना ही नहीं, उस ने दोनों की हत्या करने की ठान ली. इस के लिए उस ने बाजार से एक चापड़ खरीद लिया. चापड़ अपने साथ ले कर वह 8 जनवरी को दोपहर के समय अजंता अपार्टमेंट पहुंच गया. वह जैसे ही गेट पर पहुंचा, वहां तैनात सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक लिया और बता दिया कि उस के अपार्टमेंट में घुसने पर बैन लगा है.

सुरक्षागार्ड के इतना कहते ही राहुल उस से उलझ गया और अपना रौब दिखाने लगा. गार्ड तो अपनी ड्यूटी कर रहा था, पर राहुल नहीं माना. सुरक्षागार्ड की पिटाई करने के बाद राहुल अपने फ्लैट की तरफ जाने लगा. इस के बाद शोर सुन कर बाहर आए पिता को उस ने चापड़ से वार कर मौत के घाट उतार दिया.

पिता की हत्या करने के बाद वह मां की हत्या करने के लिए फ्लैट पर गया. फ्लैट का दरवाजा बंद होने पर उस ने दूसरी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया.

रेनू बंसल को घायल करने के बाद वह फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट में घुस गया और खुद को बचाने के चक्कर में उन के घर को आग के हवाले कर दिया. वी.के. शर्मा पिछले 15 सालों से इस फ्लैट में रह रहे थे.

राहुल माटा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 9 जनवरी, 2017 को कड़कड़डूमा अदालत में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. राहुल ने जज को बताया कि उस ने अपने पिता की हत्या नहीं की और वी.के. शर्मा के फ्लैट में आग उस ने नहीं, बल्कि पुलिस ने लगाई थी. बहरहाल पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उसे जेल भेज दिया. मामले की जांच इंसपेक्टर अजीत सिंह कर रहे हैं. Delhi Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है.

Hindi Stories: उतावली – क्या कमी थी सारंगी के जीवन में

Hindi Stories: ‘‘मैं क्या करती, उन से मेरा दुख देखा नहीं गया तो उन्होंने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया.’’ सारंगी का यह संवाद सुन कर हतप्रभ सौम्या उस का मुंह ताकती रह गई. महीनेभर पहले विधवा हुई सारंगी उस की सहपाठिन थी. सारंगी के पति की असामयिक मृत्यु एक रेल दुर्घटना में हुई थी.

सौम्या तो बड़ी मुश्किल से सारंगी का सामना करने का साहस जुटाती दुखी मन से उस के प्रति संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करने आई थी. उलझन में थी कि कैसे उस का सामना करेगी और सांत्वना देगी. सारंगी की उम्र है ही कितनी और ऊपर से 3 अवयस्क बच्चों का दायित्व. लेकिन सारंगी को देख कर वह भौचक्की रह गई थी. सारंगी की मांग में चटख सिंदूर था, हथेलियों से कलाइयों तक रची मेहंदी, कलाइयों में ढेर सारी लाल चूडि़यां और गले में चमकता मंगलसूत्र. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.

विश्वास होता भी कैसे. तीजत्योहार पर व्रतउपवास रखने वाली, हर मंदिरमूर्ति के सामने सिर झुकाने वाली व अंधभक्ति में लीन रहने वाली सारंगी को इस रूप में देखने की कल्पना उस के मन में नहीं थी. वह तो सोचती आई थी कि सारंगी सूनी मांग लिए, निपट उदास मिलेगी. सारंगी की आंखों में जरा भी तरलता नहीं थी और न ही कोई चिंता. वह सदा सुहागन की तरह थी और उस के चेहरे पर दिग्विजयी खुशी फूट सी रही थी. सब कुछ अप्रत्याशित.

एक ही बस्ती की होने से सारंगी और सौम्या साथसाथ पढ़ने जाती थीं. दोनों का मन कुछ ऐसा मिला कि आपस में सहेलियों सा जुड़ाव हो गया था. सौम्या की तुलना में सारंगी अधिक यौवनभरी और सुंदर थी. उम्र में उस से एक साल बड़ी सारंगी, पढ़ाई में कमजोर होने के कारण वह परीक्षाओं में पास होने के लिए मंदिरों और देवस्थानों पर प्रसाद चढ़ाने की मनौती मानती रहती थी. सौम्या उस की मान्यताओं पर कभीकभी मखौल उड़ा देती थी. सारंगी किसी तरह इंटर पास कर सकी और बीए करतेकरते उस की शादी हो गई. दूर के एक कसबे में उस के पति का कबाड़ खरीदनेबेचने का कारोबार था.

शुरूशुरू में सारंगी का मायके आनाजाना ज्यादा रहा. जब आती तो गहनों से लद के सजीसंवरी रहती थी. खुशखुश सी दिखती थी.

एक दिन सौम्या ने पूछा था, ‘बहुत खुश हो?’

‘लगती हूं, बस’ असंतोष सा जाहिर करती हुई सारंगी ने कहा.

‘कोई कमी है क्या?’ सौम्या ने एकाएक तरल हो आई उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘पूछो मत,’ कह कर सारंगी ने निगाहें झुका लीं.

‘तुम्हारे गहने, कपड़े और शृंगार देख कर तो कोई भी समझेगा कि तुम सुखी हो, तुम्हारा पति तुम्हें बहुत प्यार करता है.’

‘बस, गहनों और कपड़ों का सुख.’

‘क्या?’

‘सच कहती हूं, सौम्या. उन्हें अपने कारोबार से फुरसत नहीं. बस, पैसा कमाने की धुन. अपने कबाड़खाने से देररात थके हुए लौटते हैं, खाएपिए और नशे में. 2 तरह का नशा उन पर रहता है, एक शराब का और दूसरा दौलत का. अकसर रात का खाना घर में नहीं खाते. घर में उन्हें बिस्तर दिखाई देता है और बिस्तर पर मैं, बस.’ सौम्या आश्चर्य से उस का मुंह देखती रही.

‘रोज की कहानी है यह. बिस्तर पर प्यार नहीं, नोट दिखाते हैं, मुड़ेतुड़े, गंदेशंदे. मुट्ठियों में भरभर कर. वे समझते हैं, प्यार जताने का शायद यही सब से अच्छा तरीका है. अपनी कमजोरी छिपाते हैं, लुंजपुंज से बने रहते हैं. मेरी भावनाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं. मैं क्या चाहती हूं, इस से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं.

‘मैं चाहती हूं, वे थोड़े जोशीले बनें और मुझे भरपूर प्यार करें. लेकिन यह उन के स्वभाव में नहीं या यह कह लो, उन में ऐसी कोईर् ताकत नहीं है. जल्दी खर्राटे ले कर सो जाना, सुबह देर से उठना और हड़बड़ी में अपने काम के ठिकाने पर चले जाना. घर जल्दी नहीं लौटना. यही उन की दिनचर्या है. उन का रोज नहानाधोना भी नहीं होता. कबाड़खाने की गंध उन के बदन में समाई रहती है.’

सारंगी ने एक और रहस्य खोला, ‘जानती हो, मेरे  मांबाप ने मेरी शादी उन्हें मुझे से 7-8 साल ही बड़ा समझ कर की थी लेकिन वे मुझ से 15 साल बड़े हैं. जल्दी ही बच्चे चाहते हैं, इसलिए कि बूढ़ा होने से पहले बच्चे सयाने हो जाएं और उन का कामधंधा संभाल लें. लेकिन अब क्या, जीवन तो उन्हीं के साथ काटना है. हंस कर काटो या रो कर.’

चेहरे पर अतृप्ति का भाव लिए सारंगी ने ठंडी सांस भरते हुए मजबूरी सी जाहिर की. सौम्या उस समय वैवाहिक संबंधों की गूढ़ता से अनभिज्ञ थी. बस, सुनती रही. कोई सलाह या प्रतिक्रिया नहीं दे सकी थी.

समय बीता. सौम्या बीएड करने दूसरे शहर चली गई और बाहर ही नौकरी कर ली. उस का अपना शहर लगभग छूट सा गया. सारंगी से उस का कोई सीधा संबंध नहीं रहा. कुछ वर्षों बाद सारंगी से मुलाकात हुई तो वह 2 बच्चों की मां हो चुकी थी. बच्चों का नाम सौरभ और गौरव बताया, तीसरा होने को था परंतु उस के सजनेधजने में कोई कमी नहीं थी. बहुत खुश हो कर मिली थी. उस ने कहा था, ‘कभी हमारे यहां आओ. तुम जब यहां आती हो तो तुम्हारी बस हमारे घर के पास से गुजरती है. बसस्टैंड पर किसी से भी पूछ लो, कल्लू कबाड़ी को सब जानते हैं.’

‘कल्लू कबाड़ी?’

‘हां, कल्लू कबाड़ी, तेरे जीजा इसी नाम से जाने जाते हैं.’ ठट्ठा मार कर हंसते हुए उस ने बताया था.

सौम्या को लगा था कि वह अब सचमुच बहुत खुश है. कुछ समय बाद आतेजाते सौम्या को पता चला कि सारंगी के पति लकवा की बीमारी के शिकार हो गए हैं. लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी थीं कि वह चाहते हुए भी उस से मिल न सकी. लेकिन इस बार सौम्या अपनेआप को रोक न पाई थी. सारंगी के पति की अचानक मृत्यु के समाचार ने उसे बेचैन कर दिया था. वह चली आई. सोचा, उस से मिलते हुए दूसरी बस से अपने शहर को रवाना हो जाएगी.

बसस्टैंड पर पता करने पर एक दुकानदार ने एक बालक को ही साथ भेज दिया, जो उसे सारंगी के घर तक पहुंचा गया था. और यहां पहुंच कर उसे अलग ही नजारा देखने को मिला.

‘कौन है वह, जिस से सारंगी का वैधव्य देखा नहीं गया. कोई सच्चा हितैषी है या स्वार्थी?’ सनसनाता सा सवाल, सौम्या के मन में कौंध रहा था.

‘‘सब जान रहे हैं कि कल्लू कबाड़ी की मौत रेल दुर्घटना में हुई है लेकिन मैं स्वीकार करती हूं कि उन्होंने आत्महत्या की है. सुइसाइड नोट न लिखने के पीछे उन की जो भी मंशा रही हो, मैं नहीं जानती,’’ सारंगी की सपाट बयानी से अचंभित सौम्या को लगा कि उस की जिंदगी में बहुत उथलपुथलभरी है और वह बहुतकुछ कहना चाहती है.

सौम्या अपने आश्चर्य और उत्सुकता को छिपा न सकी. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘ऐसा क्या?’’

‘‘हां सौम्या, ऐसा ही. तुम से मैं कुछ नहीं छिपाऊंगी. वे तो इस दुनिया में हैं नहीं और उन की बुराई भी मैं करना नहीं चाहती, लेकिन अगर सचाई तुम को न बताऊं तो तुम भी मुझे गलत समझोगी. विनय से मेरे विवाहेतर संबंध थे, यह मेरे पति जानते थे.’’

‘‘विनय कौन है?’’ सौम्या अपने को रोक न सकी.

‘‘विनय, उन के दोस्त थे और बिजनैसपार्टनर भी. जब उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ तो विनय ने बहुत मदद की, डाक्टर के यहां ले जाना, दवादारू का इंतजाम करना, सब तरह से. विनय उन के बिजनैस को संभाले रहे. और मुझे भी. जब पति बीमार हुए थे, उस समय और उस के पहले से भी.’’

सौम्या टकटकी लगाए उस की बातें सुन रही थी.

‘‘जब सौरभ के पापा की शराबखोरी बढ़ने लगी तो वे धंधे पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते थे और स्वास्थ्य भी डगमगाने लगा. मैं ने उन्हें आगाह किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. एक दिन टोकने पर गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए तो मैं ने गुस्से में कह दिया कि अगर अपने को नहीं सुधार सकते तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊंगी.’’

‘‘फिर भी कोई असर नहीं?’’ सौम्या ने सवाल कर दिया.

‘‘असर हुआ. असर यह हुआ कि वे डर गए कि सचमुच मैं कहीं उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. वे अपनी शारीरिक कमजोरी भी जानते थे. उन्होंने विनय को घर बुलाना शुरू कर दिया और हम दोनों को एकांत देने लगे. फिसलन भरी राह हो तो फिसलने का पूरा मौका रहता है. मैं फिसल गई. कुछ अनजाने में, कुछ जानबूझ कर. और फिसलती चली गई.’’

‘‘विनय को एतराज नहीं था?’’

‘‘उन की निगाहों में शुरू से ही मेरे लिए चाहत थी.’’

‘‘कितनी उम्र है विनय की?’’

‘‘उन से 2 साल छोटे हैं, परंतु देखने में उम्र का पता नहीं चलता.’’

‘‘और उन के बालबच्चे?’’

‘‘विधुर हैं. उन का एक बेटा है, शादीशुदा है और बाहर नौकरी करता है.’’

सौम्या ने ‘‘हूं’’ करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पति ने आत्महत्या क्यों की?’’

‘‘यह तो वे ही जानें. जहां तक मैं समझती हूं, उन में सहनशक्ति खत्म सी हो गई थी. पैरालिसिस के अटैक के बाद वे कुछ ठीक हुए और धीमेधीमे चलनेफिरने लगे थे. अपने काम पर भी जाने लगे लेकिन परेशान से रहने लगे थे. मुझे कुछ बताते नहीं थे. उन्हें डर सताने लगा था कि विनय ने बीवी पर तो कब्जा कर लिया है, कहीं बिजनैस भी पूरी तरह से न हथिया ले. एक बार विनय से उन की इसी बात पर कहासुनी भी हुई.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, मुझे विनय ने बताया तो मैं ने उन से पूछा. अब मैं तुम्हें क्या बताऊं, सौम्या. कूवत कम, गुस्सा ज्यादा वाली बात. वे हत्थे से उखड़ गए और लगे मुझ पर लांछन लगाने कि मैं दुश्चरित्र हूं, कुल्टा हूं. मुझे भी गुस्सा आ गया. मैं ने भी कह दिया कि तुम्हारे में ताकत नहीं है कि तुम औरत को रख सको. अपने पौरुष पर की गई

चोट शायद वे सह न सके. बस, लज्जित हो कर घर से निकल गए. दोपहर में पता चला कि रेललाइन पर कटे हुए पड़े हैं.’’

बात खत्म करतेकरते सारंगी रो पड़ी. सौम्या ने उसे रोने दिया.

थोड़ी देर बाद पूछा, ‘‘और तुम ने शादी कब की?’’

‘‘विनय से मेरा दुख देखा नहीं जाता था, इसलिए एक दिन मेरी मांग…’’ इतना कह कर सारंगी चुप हो गई और मेहंदी लगी अपनी हथेलियों को फैला कर देखने लगी.

‘‘तुम्हारी मरजी से?’’

‘‘हां, सौम्या, मुझे और मेरे बच्चों को सहारे की जरूरत थी. मैं ने मौका नहीं जाने दिया. अब कोई भला कहे या बुरा. असल में वे बच्चे तीनों विनय के ही हैं.’’

कुछ क्षण को सौम्या चुप रह गई और सोचविचार करती सी लगी. ‘‘तुम ने जल्दबाजी की, मैं तुम्हें उतावली ही कहूंगी. अगर थोड़े समय के लिए धैर्य रखतीं तो शायद, कोई कुछ न कह पाता. जो बात इतने साल छिपा कर रखी थी, साल 2 साल और छिपा लेतीं,’’ कहते हुए सौम्या ने अपनी बायीं कलाई घुमाते हुए घड़ी देखी और उठ जाने को तत्पर हो गई. सारंगी से और कुछ कहने का कोई फायदा न था. Hindi Stories

Suspense Crime Story: परदेसी पति की बेवफा पत्नी

Suspense Crime Story: उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना कैंपियरगंज के थानाप्रभारी चौथीराम यादव रात की गश्त से लौट कर लेटे ही थे कि उन के फोन की घंटी बजी. बेमन से उन्होंने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘‘सर मैं टैक्सी ड्राइवर किशोर बोल रहा हूं.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘जो भी कहना है, सुबह थाने में आ कर कहना. अभी मैं सोने जा रहा हूं.’’

‘‘सर, जरूरी बात है… मोहम्मदपुर नवापार सीवान के पास सड़क के किनारे एक औरत की लाश पड़ी है. उस के सीने से एक छोटा बच्चा चिपका है. अभी बच्चा जीवित है.’’ किशोर ने कहा.

लाश की बात सुन कर थानाप्रभारी की नींद गायब हो गई. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, मैं पहुंच रहा हूं. मेरे आने तक तुम वहीं रहना. बच्चे का खयाल रखना.’’

‘‘ठीक है सर, आप आइए. आप के आने तक मैं यहीं रहूंगा.’’

कह कर किशोर ने फोन काट दिया.

सूचना गंभीर थी, इसलिए थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने तुरंत इस घटना की सूचना अधिकारियों को दी और खुद जल्दीजल्दी तैयार हो कर सबइंसपेक्टर विनोद कुमार सिंह, कांस्टेबल रामउजागर राय, अवधेश यादव और जगरनाथ यादव के साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. अब तक उजाला फैल चुका था. घटनास्थल पर काफी लोग जमा हो चुके थे. घटनास्थल पर पहुंचते ही थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने सब से पहले उस बच्चे को उठाया, जो मरी हुई मां के सीने से चिपका सो रहा था. स्थिति यही बता रही थी कि वह मृतका का बेटा था. उठाते ही बच्चा जाग गया. वह बिलखबिलख कर रोने लगा. चौथीराम ने उसे एक सिपाही को पकड़ाया तो वह उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा.

पहनावे से मृतका मध्यमवर्गीय परिवार की लग रही थी. उस की उम्र यही कोई 25 साल के आसपास थी. उस के मुंह और सीने में एकदम करीब से गोलियां मारी गई थीं. मुंह में गोली मारी जाने की वजह से चेहरा खून से सना था. घावों से निकल कर बहा खून सूख चुका था. मृतका की कदकाठी ठीकठाक थी. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे कम से कम 2 तो रहे ही होंगे. पुलिस ने घटनास्थल से 315 बोर के 2 खोखे बरामद किए थे. खोखे वही रहे होंगे, जो 2 गोलियां मृतका को मारी गई थीं. घटनास्थल पर मौजूद लोग लाश की शिनाख्त नहीं कर सके थे. इस का मतलब मृतका वहां की रहने वाली नहीं थी.

पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की काररवाई कर रही थी कि अचानक वहां एक युवक आया और लाश देख कर जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने का मतलब था, वह मृतका का कोई अपना रहा होगा.

पुलिस ने उसे चुप करा कर पूछताछ की तो पता चला कि वह मृतका का भाई दीपचंद था. मृतका का नाम शीला था. कल सुबह वह ससुराल से अपने बेटे को ले कर मायके जाने के लिए निकली थी. शाम तक वह घर नहीं पहुंची तो उसे चिंता हुई. सुबह वह उसी की तलाश में निकला था. यहां भीड़ देख कर वह रुक गया. पूछने पर पता चला कि यहां एक महिला की लाश पड़ी है. वह लाश देखने आया तो पता चला वह लाश उस की बहन की है. उस के साथ उस का बेटा कृष्णा भी था.

पुलिस ने कृष्णा को उसे सौंप दिया. दीपचंद ने फोन द्वारा घटना की सूचना पिता वृजवंशी को दी तो घर में कोहराम मच गया. गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर वृजवंशी भी वहां पहुंच गया, जहां लाश पड़ी थी. बेटी की लाश और मासूम नाती कृष्णा को रोते देख वृजवंशी भी बिलखबिलख कर रोने लगा. उस से रहा नहीं गया और उस ने नाती को दीपचंद से ले कर सीने से चिपका लिया. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस दीपचंद के साथ थाने आ गई. थाने में उस की ओर से शीला की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. यह 23 जनवरी, 2014 की बात है.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने जांच शुरू की. हत्यारों ने सिर्फ शीला की हत्या की थी, उस के बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था. इस का मतलब उस का जो कुछ था, वह शीला से ही था. उसे सिर्फ उसी से परेशानी थी. ऐसे में उस का कोई प्रेमी भी हो सकता था, जो उस से पीछा छुड़ाना चाहता रहा हो.

शीला की ससुराल गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा सरहरी में थी. थानाप्रभारी चौथीराम दीपचंद को ले कर शीला की ससुराल जा पहुंचे. बनरहा पहुंचने में उन्हें करीब 2 घंटे का समय लगा. शीला की ससुराल में उस की सास और ससुर थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि 22 जनवरी, 2014 को शीला अपने मुंहबोले भाई पप्पू और उस के दोस्त के साथ मोटरसाइकिल से मायके के लिए निकली थी. कृष्णा को भी वह अपने साथ ले गई थी. इस के अलावा वे और कुछ नहीं बता सके थे. पूछताछ में सासससुर ने यह भी बताया था कि पप्पू अकसर उन के यहां आता रहता था. चौथीराम यादव ने दीपचंद से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि पप्पू उसी के गांव का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का लड़का था.

थानाप्रभारी बनरहा से सीधे दीपचंद के गांव अहिरौली जा पहुंचे. पप्पू के बारे में पता किया गया तो घर वालों ने बताया कि वह 22 जनवरी, 2014 को नौतनवा जाने की बात कह कर घर से निकला था. तब से लौट कर नहीं आया है. दीपचंद की मदद से पप्पू और शीला का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि 22 जनवरी की सुबह शीला ने पप्पू को फोन किया था. उस के बाद पप्पू का मोबाइल फोन बंद हो गया था. काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि दोनों में रोजाना घंटों बातें होती थीं. इस से साफ हो गया कि दोनों में संबंध थे. पप्पू ने ही किसी बात से नाराज हो कर दोस्त की मदद से शीला की हत्या की थी.

जांच कहां तक पहुंची है, थानाप्रभारी चौथीराम इस की जानकारी क्षेत्राधिकारी अजय कुमार पांडेय और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) डा. यस चेन्नपा को भी दे रहे थे. पप्पू के बारे में जब घर वालों से कोई जानकारी नहीं मिली तो थानाप्रभारी ने उस के बारे में पता करने के लिए उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर 2 फरवरी, 2014 को घटना के 10 दिनों बाद पुलिस ने मुखबिर के जरिए पप्पू और उस के दोस्त को मोटरसाइकिल सहित लोरपुरवा के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों नेपाल की ओर जा रहे थे.

पुलिस पप्पू और उस के दोस्त अवधेश को थाने ले आई. तलाशी में पुलिस को अवधेश के पास से 315 बोर का देशी तमंचा और कारतूस भी मिले. पुलिस ने दोनों चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. जबकि पप्पू उर्फ दुर्गेश के पास से सिर्फ 2 सिम वाला मोबाइल फोन मिला था. पुलिस दोनों से अलगअलग पूछताछ करने लगी. दोनों ने पहले तो शीला की हत्या से इनकार किया, लेकिन पुलिस के पास उन के खिलाफ इतने सुबूत थे कि ज्यादा देर तक वे अपनी बात पर टिके नहीं रह सके और सच्चाई कुबूल कर के शीला की हत्या की पूरी कहानी उगल दी. इस पूछताछ में पप्पू और अवधेश ने शीला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

जिला महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव अहिरौली में रहता था वृजवंशी. उस के परिवार में पत्नी फूलवासी के अलावा कुल 7 बच्चे थे. शीला उन में पांचवें नंबर पर थी. वृजवंशी के पास इतनी खेती थी कि उसी से उन के इतने बड़े परिवार का गुजरबसर हो रहा था. लेकिन बेटे बड़े हुए, उन्होंने काफी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले ली थीं. बेटों की शादियां हो गईं तो बेटों की मदद से वृजवंशी बेटियों की शादियां करने लगा. शीला जवान हुई तो वृजवंशी को उस की शादी की चिंता हुई. बाप और भाई उस के लिए लड़का ढूंढ पाते उस के पहले ही वह गांव में ही बचपन के साथी दुर्गेश उर्फ पप्पू से आंखें लड़ा बैठी. दोनों साथसाथ खेलेकूदे ही नहीं थे, बल्कि एक ही स्कूल में पढ़े भी थे.

दुर्गेश उर्फ पप्पू के पिता दूधनाथ भी खेती किसानी करते थे. उस के परिवार में पत्नी के अलावा एकलौता बेटा पप्पू और 3 बेटियां थीं. एकलौता होने की वजह से पप्पू को घर से कुछ ज्यादा ही लाडप्यार मिला, जिस की वजह से वह बिगड़ गया. जैसेतैसे उस ने इंटरमीडिएट कर के पढ़ाई छोड़ दी. इस के बाद गांव में घूमघूम कर आवारागर्दी करने लगा. शीला और पप्पू के संबंधों की जानकारी गांव वालों को हुई तो इस से वृजवंशी की बदनामी होने लगी. तब उसे चिंता हुई कि बात ज्यादा फैल गई  तो बेटी की शादी होना मुश्किल हो जाएगा. अब इस से बचने का एक ही उपाय था, शीला की शादी. वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगा. क्योंकि अब देर करना ठीक नहीं था.

उस ने कोशिश की तो गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा का रहने वाला दिनेश उसे पसंद आ गया. उस ने जल्दी से शीला की शादी उस के साथ कर दी. शीला विदा हो कर ससुराल आ गई. दिनेश मुंबई में रहता था. कुछ दिन पत्नी के साथ रह कर वह मुंबई चला गया. शीला को उस ने बूढ़े मांबाप के पास उन की सेवा के लिए छोड़ दिया, ताकि किसी को कुछ कहने का मौका न मिले. क्योंकि उन्हें तो पूरी जिंदगी साथ रहना है.

शीला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन पति के परदेस में रहने की वजह से वह अपने पहले प्यार दुर्गेश उर्फ पप्पू को कभी नहीं भूल पाई. शादी के बाद भी वह प्रेमी से मिलती रही. शीला का मुंहबोला भाई बन कर वह उस की ससुराल भी आता रहा. उस के सासससुर पप्पू को उस का भाई समझते थे, इसलिए उस के आनेजाने पर कभी रोक नहीं लगाई. जबकि भाईबहन के रिश्ते की आड़ में दोनों कुछ और ही गुल खिला रहे थे.

पप्पू ने बातचीत के लिए शीला को मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था. सासससुर रात में सो जाते तो शीला मिस्डकाल कर देती. इस के बाद पप्पू फोन करता तो दोनों के बीच घंटों बातें होतीं. शीला को कई बार पप्पू से गर्भ भी ठहरा, लेकिन पप्पू ने हर बार उस का गर्भपात करा दिया. बारबार गर्भपात कराने से तंग आ कर शीला उस के साथ रहने की जिद करने लगी. जबकि पप्पू को शीला से नहीं, सिर्फ उस की देह से प्रेम था. शीला जब भी उस से साथ रखने के लिए कहती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. शीला जब उस पर जोर डालने लगी तो वह दूर भागने लगा. उस का कहना था कि घर वाले उसे रहने नहीं देंगे. अपना अलग घर है नहीं. तब शीला ने पप्पू को 1 लाख रुपए जमीन खरीद कर घर बनाने के लिए दिए. इस की जानकारी न तो शीला के पति को थी, न सासससुर को.

पप्पू ने पैसे तो लिए, लेकिन उस ने जमीन नहीं खरीदी. जब भी शीला जमीन और घर के बारे में पूछती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. जब शीला को लगने लगा कि पप्पू उसे बेवकूफ बना रहा है तो वह बेचैन हो उठी. वह समझ गई कि उस से बहुत बड़ी भूल हो गई है. जिस के लिए उस ने घरपरिवार के साथ विश्वासघात किया, वह उस के साथ विश्वासघात कर रहा है. उस ने ठान लिया कि वह ऐसे आदमी को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी. वह पप्पू से अपने रुपए मांगने लगी.

शीला ने जब पैसे के लिए पप्पू पर दबाव बनाया तो वह विचलित हो उठा. उस की समझ में आ गया कि शीला उस की नीयत जान गई है. अब उस की दाल गलने वाली नहीं है. शीला के पैसे उस ने खर्च कर दिए थे.  लाख रुपए की व्यवस्था वह कर नहीं सकता था. इसलिए शीला से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. शीला की हत्या करना उस के अकेले के वश का नहीं था, इसलिए उस ने एक पेशेवर बदमाश अवधेश से बात की.

अवधेश महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव खजुही का रहने वाला था. पप्पू से उस की दोस्ती भी थी. पनियरा थाने में उस के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट और राहजनी के कई मुकदमे दर्ज थे. योजना के मुताबिक, अवधेश ने 315 बोर के देशी कट्टे का इंतजाम किया. इस के बाद दोनों को मौके की तलाश थी. 22 जनवरी, 2014 की सुबह 7 बजे शीला ने पप्पू को फोन कर के पूछा कि इस समय वह कहां है, तो उस ने कहा कि इस समय वह शहर में है. कुछ देर में उस के पास पहुंच जाएगा.

इस के बाद शीला ने फोन काट दिया. जबकि सही बात यह थी कि पप्पू उस समय नौतनवा में मौजूद था. उस ने शीला से झूठ बोला था. शीला से बात करने के बाद उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया. दुर्गेश उर्फ पप्पू को वह मौका मिल गया, जिस की तलाश में वह था. उस ने अवधेश को तैयार किया और मोटरसाइकिल से शीला की ससुराल बनरहा 11 बजे के आसपास पहुंच गया. शीला उसी का इंतजार कर रही थी. चायनाश्ता करा कर शीला मायके जाने की बात कह कर उन के साथ निकल पड़ी. उस ने सास से कहा था कि 2-1 दिन में वह लौट आएगी.

दिन में कुछ हो नहीं सकता था. इसलिए पप्पू को किसी तरह रात करनी थी. इस के लिए वह कुसुम्ही के जंगल स्थित बुढि़या माई के मंदिर दर्शन करने गया. वहां से निकल कर वह सब के साथ शहर में घूमता रहा. अचानक रात साढ़े 8 बजे पप्पू को कुछ याद आया तो उस ने मोबाइल औन कर के फोन किया. उस समय वह चिलुयाताल के मोहरीपुर में था. इस के बाद वे कैंपियरगंज पहुंचे.

रात साढ़े 10 बजे के करीब पप्पू सब के साथ मोहम्मदपुर नवापार पहुंचा तो ठंड का मौसम होने की वजह से चारों ओर सुनसान हो चुका था. पप्पू ने अचानक मोटरसाइकिल सड़क के किनारे रोक दी. शीला ने रुकने की वजह पूछी तो पप्पू ने कहा कि पेशाब करना है. पेशाब करने के बहाने वह थोड़ा आगे बढ़ गया तो अवधेश शीला के पास पहुंचा और कमर में खोंसा तमंचा निकाला और उस के सीने से सटा कर ट्रिगर दबा दिया.

गोली लगते ही शीला के मुंह से एक भयानक चीख निकली. तभी उस ने कट्टे की नाल उस के मुंह में घुसेड़ कर दूसरी गोली चला दी. इसी के साथ बच्चे को गोद में लिए हुए शीला जमीन पर गिरी और मौत के आगोश में समा गई. उस का मासूम बेटा सीने से चिपका सोता ही रहा. अपना काम कर के पप्पू और अवधेश चले गए. टैक्सी ड्राइवर किशोर सुबह उधर से गुजरा तो उस ने सड़क किनारे पड़ी शीला की लाश देख कर थानाप्रभारी चौथीराम यादव को सूचना दी.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, 315 बोर का तमंचा और मोबाइल फोन बरामद कर लिया था. थाने की सारी काररवाई निबटा कर थानाप्रभारी चौथीराम ने पप्पू और अवधेश को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Suspense Story: प्यार की खातिर दोस्त को दगा

Suspense Story: सुबह के साढ़े 6 बजे थे. बिहार के मुंगेर शहर में रहने वाला प्रेमनारायण सिंह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा तो पास में खड़ी पत्नी शिवानी की तरफ देख कर मुसकराया. पत्नी भी पति की तरफ देख कर मंदमंद मुसकराई. उधर प्रेमनारायण सिंह की बाइक घर से मुश्किल से डेढ़ सौ मीटर आगे ब्रह्मï चौक पहुंची थी कि अचानक किसी ने पीछे से उस पर लगातार 2 फायर कर दिए. गोली लगते ही वह सडक़ पर गिर कर बुरी तरह तड़पनेे लगा.

सुबह की फिजा में गोली चलने की आवाज दूरदूर तक गूंज उठी. गोली की आवाज सुन आसपास के घरों से कुछ लोग निकल कर लहूलुहान प्रेमनारायण सिंह के समीप पहुंचे. किसी ने उस के घर जा कर प्रेमनारायण को गोली लगने की बात कही तो प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी और अन्य लोग रोतेबिलखते घायल प्रेमनारायण सिंह के पास पहुंचे और उसे तुरंत एक निजी क्लिनिक ले गए, लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

शिवानी ने फोन कर के मुंगेर के पूरब सराय पुलिस चौकी में अपने पति की हत्या की सूचना दी तो चौकी इंचार्ज राजीव कुमार कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर क्लिनिक पहुंच गए और प्रेमनारायण सिंह की लाश अपने कब्जे ले कर घटना की सूचना एसएचओ को दे दी. हत्या की खबरसुन कर एसएचओ भी क्लिनिक पहुंच गए. लाश का प्रारंभिक निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस वारदात वाली जगह ब्रह्मï चौक के निकट पहुंची और वहां का बारीकी से मुआयना करने लगी. सडक़ पर जहां प्रेमनारायण गोली लगने के बाद गिरा था, वहां पर काफी खून था. उस की बाइक भी वहीं पड़ी थी. वहां उपस्थित लोगों से पूछताछ करने पर बस इतना पता चला कि कोई बाइक सवार प्रेमनारायण को गोली मार कर फरार हो गया था.

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

कई लोगों से पूछताछ के बाद भी कोई भी बाइक का नंबर या उसेे चलाने वाले बदमाशों का हुलिया नहीं बता पाया. चौकी इंचार्ज राजीव कुमार ने प्रेमनारायण सिंह की पत्नी शिवानी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति की इलाके में किसी से दुश्मनी नहीं है. घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद पुलिस वापस लौट आई. शिवानी की शिकायत पर प्रेमनारायण सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसएचओ ने इस घटना के बारे में मुंगेर के एसपी जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी को विस्तार से जानकारी दी तो उन्होंने इस सनसनीखेज हत्याकांड के रहस्य से परदा हटाने के लिए एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एसडीपीओ (सदर) राजीव कुमार, ओपी प्रभारी राजीव कुमार, कासिम बाजार एसएचओ मिंटू कुमार, जमालपुर एसएचओ सर्वजीत कुमार, पूरब सराय चौकी इंचार्ज राजीव कुमार तथा अन्य कई सिपाही शामिल थे.

टीम ने इस मर्डर केस को सुलझाने के लिए घटनास्थल और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर बारीकी से उस की जांच शुरू की तो उन्होंने फुटेज में 2 बाइक सवारों के अलावा कुछ संदिग्ध चेहरों की पहचान की. इस के अलावा मृतक प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच में एक संदिग्ध नंबर मिला, जिस पर घटना के पहले और उस के बाद शिवानी धड़ल्ले से बातें कर रही थी. जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो वह नंबर गौरव कुमार नाम के युवक का निकला.

हत्या के पीछे निकली लव क्राइम की कहानी

जब गौरव कुमार को थाने में बुला कर उस के और शिवानी के बीच मोबाइल पर चल रही लंबी बातचीत के बारे में पूछताछ की गई तो गौरव ने बताया कि वह प्रेमनारायण का दोस्त है, इसलिए उस का उन के घर आनाजाना है. इसी वजह से वह शिवानी से बातें करता है. लेकिन हैरत की बात थी कि जितनी वह शिवानी से बातें करता था, उतनी बातें शिवानी अपने पति से भी नहीं करती थी.

मामला संदेहास्पद लगा, इसलिए जब गौरव को थाने में बुला कर पूछताछ की गई तो थोड़ी देर के बाद उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में अपना जुर्म स्वीकार करते हुए पुलिस टीम को जो बातें बताईं, उस में पति पत्नी और वो के रिश्तों में उलझी लव क्राइम की एक दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई. उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में शामिल सभी लोगों के नामपते बताए, जिस में प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी तथा शूटर अभिषेक कुमार, इंद्रजीत कुमार, मोहम्मद इरशाद, राजीव, दीपक कुमार उर्फ दीपू थे. गौरव कुमार को हिरासत में लेने के बाद पुलिस टीम मृतक प्रेमनारायण के घर पहुंची और पति की मौत का नाटक कर रही शिवानी को हिरासत में ले लिया गया.

10 और 11 अगस्त को 2 आरोपी और 12 अगस्त को 3 आरोपियों को उन के ठिकानों पर दबिश डाल कर गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद इस हत्याकांड के पीछे जो खौफनाक कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है. 32 वर्षीय प्रेमनारायण सिंह मुंगेर के वार्ड नंबर 14 में अपनी पत्नी शिवानी और 4 साल की बेटी के साथ रहता था. करीब 5 साल पहले दोनों की शादी हुई थी. प्रेमनारायण मुंगेर में ही स्थित आईटीसी कंपनी में नौकरी करता था.

नौकरीपेशा होने की वजह से प्रेमनारायण सिंह के जीवन में हर प्रकार का सुखवैभव मौजूद था, लेकिन इस घर में उन के बड़े भाई का परिवार भी रहता था. शिवानी को जौइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं था. इस के अलावा शिवानी की सास भी रहती थी. शिवानी के ससुर की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी थी. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होने से शिवानी घर में अपनी मनमरजी से नहीं रह पाती थी. जबकि वह बिना किसी रोकटोक के आजाद रहना पसंद करती थी. ऐसा तभी संभव था, जब वह बाकी लोगों से अलग हो कर कहीं दूसरा घर खरीद लेते या किराए के मकान में रहने चले जाते.

प्रेमनारायण इस घर को छोड़ कर कहीं भी जाना नहीं चाहता था. यहां से जाने पर एक तो उसे घर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते, दूसरे उसे अपनी मां और भाईभाभी से अलग होना पड़ जाता, जोकि वह चाहता नहीं था. रोजरोज की इस घरेलू कलह से बचने के लिए प्रेमनारायण ने अपने एक दोस्त गौरव कुमार की मदद ली.

दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध का खेल

गौरव कुमार मुंगेर के नजदीक नंदलालपुर का रहने वाला था और उसी के साथ सिगरेट फैक्ट्री में काम करता था. दोनों के बीच खूब जमती थी. वे रोज अपने घरों का हाल अकसर एकदूसरे को बताते रहते थे. कहते हैं कि अपनी परेशानी बांटने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है. इसी कारण प्रेमनारायण अपनी परेशानी गौरव के साथ शेयर कर लेता था. प्रेमनारायण के घर का हाल जानने के बाद गौरव भी उस के घर की समस्या हल करने में मदद करने की कोशिश करता.

2023 के जनवरी महीने में गौरव ने प्रेमनारायण के घर आनाजाना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त का पक्ष ले कर शिवानी को मनाने का प्रयास करना शुरू किया, लेकिन कुछ ही मुलाकातों के बाद शिवानी की बातों का गौरव के दिलोदिमाग पर कुछ ऐसा जादू हुआ कि वह जिस दिन शिवानी से नहीं मिलता, उस के दिल को सुकून नहीं मिलता था. शिवानी जानती थी कि गौरव कुंआरा है. वह गौरव को पसंद करने लगी. गौरव को जब भी वक्त मिलता, वह शिवानी को समझाने के बहाने उस से मिलने आ जाता. कुछ ही दिनों में उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात हो गए. उधर गौरव और शिवानी दोनों ने प्रेमनारायण को सदा अंधरे में रखा.

गौरव और शिवानी बड़ी खामोशी से प्यार की पींगें बढ़ाते रहे. प्रेमनाराण को कभी गौरव और शिवानी के अवैध संबंधों की भनक तक नहीं लगी. जब उन के अंतरंग संबंध प्रगाढ़ हो गए तो उन्होंने प्रेमनारायण को अपने रास्ते से सदा के लिए हटाने का फैसला कर लिया. गौरव ने शिवानी को समझाया कि प्रेमनारायण की हत्या के बाद उस की जगह पर तुम्हारी नौकरी लग जाएगी.

कुछ समय के बाद जब मामला ठंडा पड़ जाएगा, तब हम दोनों आपस में शादी कर लेंगे. इस बीच हम दुनिया वालों की आखों में धूल झोंक कर मिलते रहेंगे. शिवानी इस बात के लिए तैयार हो गई. तब गौरव कुमार अपने कुछ जानकारों की मदद से कुछ शातिर बदमाशों से मिला, जो सुपारी ले कर हत्या की वारदात को अंजाम देते थे. बदमाशों से प्रेमनारायण की हत्या की बात 7 लाख रुपए में तय हो गई. शिवानी ने बदमाशों को देने के लिए 7 लाख रुपए गौरव को सौंप दिए.

सुपारी दे कर शूटरों से कराई हत्या

4 अगस्त, 2023 को बेगूसराय का शूटर अभिषेक कुमार और समस्तीपुर का शूटर इंद्रजीत तथा मोहम्मद इरशाद मुंगेर स्थित गौरव कुमार के ठिकाने पर पहुंचे. गौरव कुमार मुंगेर के मंगल बाजार स्थित माधोपुर में किराए का कमरा ले कर रहता था. मुस्सफिल थाना क्षेत्र के नंदलालपुर से 2 बदमाश राजीव कुमार तथा दीपक कुमार उर्फ दीपू भी वहां पहुंचे. इन दोनों ने 5 अगस्त को प्रेमनारायण के घर के बाहर मौजूद रह कर उस की रेकी की. 6 अगस्त, 2023 की सुबह प्रेमनारायण सिंह जैसे ही अपनी बाइक से ड्यूटी जाने के लिए घर से निकला. पीछे से अभिषेक कुमार भी बाइक चलाते हुए उस के निकट पहुंचा और पीछे बैठे इंद्रजीत ने प्रेमनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी.

घटना को अंजाम देने के बाद अभिषेक कुमार और शूटर इंद्रजीत मुख्य आरोपी गौरव कुमार के मंगल बाजार स्थित कमरे पर पहुंचे. वहां अपने हथियारों को छोड़ कर सभी मुंगेर से फरार हो गए. पुलिस एसआईटी की टीम ने गौरव के कमरे से 2 देशी पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और 2 चले हुए कारतूस के खोखे बरामद कर लिए. कथा लिखे जाने तक मुंगेर पुलिस ने इस घटना में शामिल आरोपी गौरव समेत कुल 7 बदमाशों को गिरफ्तार कर मुंगेर की जिला अदालत में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story Hindi: नाबालिग मोहब्बत का तीखा जहर

Crime Story Hindi: रोमिला अपनी बेटी सलोनी के साथ लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहती थी. उस का 3 मंजिल का मकान था. पहली दोनों मंजिलों पर रहने के लिए कमरे थे और तीसरी मंजिल पर गोदाम बना था, जहां कबाड़ और पुरानी चीजें रखी रहती थीं.

ईसाई समुदाय की रोमिला मूलत: सुल्तानपुर जिले की रहने वाली थी. उस ने जौन स्विंग से प्रेम विवाह किया था. सलोनी के जन्म के बाद रोमिला और जौन स्विंग के संबंध खराब हो गए. रोमिला ने घुटघुट कर जीने के बजाय अपने पति जौन स्विंग से तलाक ले लिया. इसी बीच रोमिला को लखनऊ के सरकारी अस्पताल में टैक्नीशियन की नौकरी मिल गई. वेतन ठीकठाक था. इसलिए वह अपनी आगे की जिंदगी अपने खुद के बूते पर गुजारना चाहती थी.

स्विंग से प्यार, शादी और फिर तलाक ने रोमिला की जिंदगी को बहुत बोझिल बना दिया था. कम उम्र की तलाकशुदा महिला का समाज में अकेले रहना सरल नहीं होता, इस बात को ध्यान में रखते हुए रोमिला ने अपने को धर्मकर्म की बंदिशों में उलझा लिया. समय गुजर रहा था, बेटी बड़ी हो रही थी. रोमिला अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर बड़ा बनाना चाहती थी. क्योंकि अब उस का भविष्य वही थी. सलोनी कावेंट स्कूल में पढ़ती थी, पढ़ने में होशियार. रोमिला ने लाड़प्यार से उस की परवरिश लड़कों की तरह की थी.

सलोनी भी खुद को लड़कों की तरह समझने लगी थी. वह जिद्दी स्वभाव की तो थी ही गुस्सा भी खूब करती थी. जन्म के समय ही कुछ परेशानियों के कारण सलोनी के शरीर के दाएं हिस्से में पैरालिसिस का अटैक पड़ा था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उस का असर करीब करीब खत्म हो गया था. सलोनी बौबकट बाल रखती थी. उस की उम्र हालांकि 15 साल थी पर वह अपनी उम्र से बड़ी दिखाई देती थी. वह लड़कों की तरह टीशर्ट पैंट पहनती थी. सलोनी के साथ पढ़ने वाले लड़के लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल करते थे. सलोनी ने भी मां से जिद कर के स्मार्टफोन खरीदवा लिया.

रोमिला जानती थी कि आजकल के बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगा कर फेसबुक और वाट्सएप जैसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं जो सलोनी जैसी कम उम्र लड़की के लिए ठीक नहीं है. लेकिन एकलौती बेटी की जिद के सामने उसे झुकना पड़ा. रोमिला सुबह 8 बजे अस्पताल जाती थी और शाम को 4 बजे लौटती थी. सलोनी भी सुबह 8 बजे स्कूल चली जाती थी और 2 बजे वापस आती थी. कठिन जीवन जीने के लिए रोमिला ने बेड की जगह घर में सीमेंट के चबूतरे बनवा रखे थे. मांबेटी बिस्तर डाल कर इन्हीं चबूतरों पर सोती थीं.

रोमिला को अस्पताल से 45 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. इस के बावजूद मांबेटी का खर्च बहुत कम था. रोमिला जो खाना बनाती थी वह कई दिन तक चलता था. मोबाइल फोन लेने के बाद सलोनी ने इंटरनेट के जरीए अपना फेसबुक पेज बना लिया था. वह अकसर अपने दोस्तों से चैटिंग करती रहती थी. इसी के चलते उस के कई नए दोस्त बन गए थे. उस के इन्हीं दोस्तों में से एक था पश्चिम बंगाल के मालदा का रहने वाला सुदीप दास. 19 साल का सुदीप एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता था.

उस के घर की हालत ठीक नहीं थी. उस का पिता सुधीरदास मालदा में मिठाई की एक दुकान पर काम करता था. जबकि मां कावेरी घरेलू महिला थी. उस का छोटा भाई राजदीप कोई काम नहीं करता था. सुदीप और उस के पिता की कमाई से ही घर का खर्च चलता था. सुदीप और सलोनी के बीच चैटिंग के माध्यम से जो दोस्ती हुई धीरेधीरे प्यार तक जा पहुंची. नासमझी भरी कम उम्र का तकाजा था. चैटिंग करतेकरते सुदीप और सलोनी एकदूसरे के प्यार में पागल से हो गए. स्थिति यह आ गई कि सुदीप सलोनी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा.

दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. सो दोनों खूब बातें करते थे. मोबाइल पर ही दोनों की मिलने की बात तय हुई. सितंबर 2013 में सुदीप सलोनी से मिलने लखनऊ आ गया. सलोनी ने सुदीप को अपनी मां से मिलवाया. रोमिला बेटी को इतना प्यार करती थी कि उस की हर बात मानने को तैयार रहती थी. 2 दिन लखनऊ में रोमिला के घर पर रह कर सुदीप वापस चला गया. अक्तूबर में सलोनी का बर्थडे था. उस के बर्थडे पर सुदीप फिर लखनऊ आया. अब तक सलोनी ने सुदीप से अपने प्यार की बात मां से छिपा कर रखी थी. लेकिन इस बार उस ने अपने और सुदीप के प्यार की बात रोमिला को बता दी.

सलोनी और सुदीप दोनों की ही उम्र ऐसी नहीं थी कि शादी जैसे फैसले कर सकें. इसलिए रोमिला ने दोनों को समझाने की कोशिश की. ऊंचनीच दुनियादारी के बारे में बताया. लेकिन सुदीप और सलोनी पर तो प्यार का भूत चढ़ा था. रोमिला को इनकार करते देख सुदीप बड़े आत्मविश्वास से बोला, ‘‘आंटी, आप चिंता न करें. मैं सलोनी का खयाल रख सकता हूं. मैं खुद भी नौकरी करता हूं और मेरे पिताजी भी. हमारे घर में भी कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

बातचीत के दौरान रोमिला सुदीप के बारे में सब कुछ जान गई थी. इसलिए सोचविचार कर बोली, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी सारी बातें अपनी जगह सही हैं. मुझे इस रिश्ते से भी कोई ऐतराज नहीं है. पर मैं यह रिश्ता तभी स्वीकार करूंगी जब तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगोगे. आजकल 10-5 हजार की नौकरी में घरपरिवार नहीं चलते. अभी तुम दोनों में बचपना है.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं आप की बात मान लेता हूं. लेकिन आप वादा करिए कि आप उसे मुझ से दूर नहीं करेंगी. जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो सलोनी को अपनी बनाने आऊंगा.’’ सुदीप ने फिल्मी हीरो वाले अंदाज में रोमिला से अपनी बात कही.

इस बार सुदीप सलोनी के घर पर एक सप्ताह तक रहा. इसी बीच रोमिला ने सुदीप से स्टांप पेपर पर लिखवा लिया कि वह किसी लायक बन जाने के बाद ही सलोनी से शादी करेगा. इस के बाद सुदीप अपने घर मालदा चला गया. लेकिन लखनऊ से लौटने के बाद उस का मन नहीं लग रहा था. जवानी में, खास कर चढ़ती उम्र में महबूबा से बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता. कामधाम, भूखप्यास, घरपरिवार सब बेकार लगने लगते हैं. सुदीप का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस की आंखों के सामने सलोनी का गोलगोल सुंदर चेहरा और बोलती हुई आंखें घूमती रहती थीं. वह किसी भी सूरत में उसे खोने के लिए तैयार नहीं था.

जब नहीं रहा गया तो 10 दिसंबर, 2013 को सुदीप वापस लखनऊ आया और रोमिला को बहका फुसला कर सलोनी को मालदा घुमाने के लिए साथ ले गया. हालांकि सलोनी की मां रोमिला इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. लेकिन सलोनी ने उसे मजबूर कर दिया. दरअसल मां के प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं होती थी. रोमिला के लिए बेटी ही जीने का सहारा थी. वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. इस लिए वह सलोनी की जिद के आगे झुक गई. करीब ढाई माह तक सलोनी सुदीप के साथ मालदा में रही.

मार्च, 2014 में सलोनी वापस आ गई. सुदीप भी उस के साथ आया था. बेटी का बदला हुआ स्वभाव देख कर रोमिला को झटका लगा. सलोनी उस की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी. पति से अलग होने के बाद रोमिला ने सोचा था कि वह बेटी के सहारे अपना पूरा जीवन काट लेगी. अब वह बेटी के दूर जाने की कल्पना मात्र से बुरी तरह घबरा गई थी.

लेकिन हकीकत वह नहीं थी जो रोमिला देख या समझ रही थी. सच यह था कि सलोनी का मन सुदीप से उचट गया था. उस का झुकाव यश नाम के एक अन्य लड़के की ओर होने लगा था. जबकि सुदीप हर हाल में सलोनी को पाना चाहता था. वह कई बार उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर चुका था. यह बात मांबेटी दोनों को नागवार गुजरने लगी थी. रोमिला ने अस्पताल से 1 मार्च, 2014 से 31 मार्च तक की छुट्टी ले रखी थी. उस ने अस्पताल में छुट्टी लेने की वजह बेटी की परीक्षाएं बताई थीं.

7 अप्रैल, 2014 की सुबह रोमिला के मकान के पड़ोस में रहने वाले रणजीत सिंह ने थाना गाजीपुर आ कर सूचना दी कि बगल के मकान में बहुत तेज बदबू आ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालकिन रोमिला काफी दिनों से घर पर नहीं है. सूचना पा कर एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही, सीनियर इंसपेक्टर रामराज कुशवाहा और सिपाही अरूण कुमार सिंह रोमिला के मकान पर पहुंच गए.

देखने पर पता चला कि मकान के ऊपर के हिस्से में बदबू आ रही थी. पुलिस ने फोन कर के मकान मालकिन रोमिला को बुला लिया. वहां उस के सामने ही मकान खोल कर देखा गया तो पूरा मकान गंदा और रहस्यमय सा नजर आया. सिपाही अरूण कुमार और एसएसआई रामराज कुशवाहा तलाशी लेने ऊपर वाले कमरे में पहुंचे तो कबाड़ रखने वाले कमरे में एक युवक की सड़ीगली लाश मिली.

पुलिस ने रोमिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह लाश मालदा, पश्चिम बंगाल के रहने वाले सुदीप दास की है. वह उस की बेटी सलोनी का प्रेमी था और उस से शादी करना चाहता था. जब सलोनी ने इनकार कर दिया तो सुदीप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. रोमिला ने आगे बताया कि इस घटना से वह बुरी तरह डर गई थी. उसे लग रहा था कि हत्या के इल्जाम में फंस जाएगी. इसलिए वह घर को बंद कर के फरार हो गई थी.

पुलिस ने रोमिला से नंबर ले कर फोन से सुदीप के घर संपर्क किया और इस मामले की पूरी जानकारी उस के पिता को दे दी. लेकिन उस के घर वाले लखनऊ आ कर मुकदमा कराने को तैयार नहीं थे. कारण यह कि वे लोग इतने गरीब थे कि उन के पास लखनऊ आने के लिए पैसा नहीं था. इस पर एसओ गाजीपुर ने अपनी ओर से मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच शुरू कर दी. प्राथमिक काररवाई के बाद सुदीप की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

8 अप्रैल 2014 को सुदीप की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जो सच सामने आया, वह चौंका देने वाला था. इस बीच सलोनी भी आ गई थी. रोमिला और उस की बेटी सलोनी ने अपने बयानों में कई बातें छिपाने की कोशिश की थी. लेकिन उन के अलगअलग बयानों ने उन की पोल खोल दी. एसपी ट्रांस गोमती हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय पुलिस विवेचना पर नजर रख रहे थे जिस से इस पूरे मामले का बहुत जल्दी पर्दाफाश हो गया. मांबेटी से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई वह कुछ इस तरह थी.

13 मार्च, 2014 की रात को सलोनी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. इसी बीच सुदीप उस से झगड़ने लगा. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने मांबेटी दोनों को कितनी बार समझाया है कि मुझे खीर में इलायची डाल कर खाना पसंद नहीं है. लेकिन तुम लोगों पर मेरी बात का कोई असर नहीं होता.’’

उस की इस बात पर सलोनी को गुस्सा आ गया. उस ने सुदीप को लताड़ा, ‘‘तुम मां से झगड़ने के बहाने तलाश करते रहते हो. बेहतर होगा, तुम यहां से चले जाओ. मैं तुम से किसी तरह की दोस्ती नहीं रखना चाहती.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं? मैं ने स्टांपपेपर पर लिख कर दिया है, तुम्हें मेरे साथ ही शादी करनी होगी. बस तुम 18 साल की हो जाओ. तब तक मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूंगा और फिर तुम से शादी कर के तुम्हें साथ ले जाऊंगा. अब तुम्हारी मां चाहे भी तो तुम्हारी शादी किसी और से नहीं करा सकती.’’ सुदीप ने भी गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो तुम्हें इतना मुंह लगा लिया.’’ कह कर सलोनी ऊपर चली गई. वहां उस की मां पहले से दोनों का लड़ाईझगड़ा देख रही थी.

‘‘सुदीप, तुम मेरे घर से चले जाओ.’’ रोमिला ने बेटी का पक्ष लेते हुए चेतावनी भरे शब्दों में कहा तो सुदीप उस से भी लड़नेझगड़ने लगा. यह देख मांबेटी को गुस्सा आ गया. सुदीप भी गुस्से में था. उस ने मांबेटी के साथ मारपीट शुरू कर दी. जल्दी ही वह दोनों पर भरी पड़ने लगा. तभी रोमिला की निगाह वहां रखी हौकी स्टिक पर पड़ी.

रोमिला ने हौकी उठा कर पूरी ताकत से सुदीप के सिर पर वार किया. एक दो नहीं कई वार. एक साथ कई वार होने से सुदीप की वहीं गिर कर मौत हो गई. सुदीप की मृत्यु के बाद मांबेटी दोनों ने मिल कर उस की लाश को बोरे में भर कर कबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद अगली सुबह दोनों घर पर ताला लगा कर गायब हो गईं. पुलिस को उलझाने के लिए रोमिला ने बताया कि वह यह सोच कर डर गई थी कि सुदीप का भूत उसे परेशान कर सकता है. इसलिए, वे दोनों हवन कराने के लिए हरिद्वार चली गई थीं.

सलोनी ने भी 14 मार्च को अपनी डायरी में लिखा था, ‘आत्माओं ने सुदीप को मार डाला. हम फेसबुक पर एकदूसरे से मिले थे. आत्माओं के पास लेजर जैसी किरणें हैं. वह हमें नष्ट कर देंगी. आत्माएं हमें फंसा देंगी.’ सलोनी ने इस तरह की और भी तमाम अनापशनाप बातें डायरी में लिखी थीं. रोमिला भी इसी तरह की बातें कर रही थी. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि मांबेटी हरिद्वार वगैरह कहीं नहीं गई थी बल्कि दोनों लखनऊ में इधरउधर भटक कर अपना समय गुजारती रही थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि इस मामले को कैसे सुलझाएं, क्योंकि सुदीप की लाश घर में पड़ी थी.

बहरहाल, उस की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो गया था कि मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का था. गाजीपुर पुलिस ने महिला दारोगा नीतू सिंह, सिपाही मंजू द्विवेदी और उषा वर्मा को इन मांबेटी से राज कबूलवाने पर लगाया. जब उन्हें बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुदीप की मौत का का कारण सिर पर लगी चोट को बताया गया है, तो वे टूट गईं. दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. रोमिला की निशानदेही पर हौकी स्टिक भी बरामद हो गई.

8 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने मां रोमिला को जेल और उस की नाबालिग बेटी सलोनी को बालसुधार गृह भेज दिया. जो भी जैसे भी हुआ हो, लेकिन सच यह है कि फेसबुक की दोस्ती की वजह से सुदीप का परिवार बेसहारा हो गया है.

पुलिस उस के परिवार को बारबार फोन कर के लखनऊ आ कर बेटे का दाह संस्कार कराने के लिए कह रही थी. लेकिन वे लोग आने को तैयार नहीं थे. सुदीप की लाश लखनऊ मेडिकल कालेज के शवगृह में रखी थी. एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही ने सुदीप के पिता सुधीर दास को समझाया और भरोसा दिलाया कि वह लखनऊ आएं, वे उन की पूरी मदद करेंगे. पुलिस का भरोसा पा कर सुदीप का पिता सुधीर दास लखनऊ आया. बेटे की असमय मौत ने उस का कलेजा चीर दिया था.

सुधीर दास पूरे परिवार के साथ लखनऊ आना चाहता था लेकिन उस के पास पैसा नहीं था. इसलिए परिवार का कोई सदस्य उस के साथ नहीं आ सका. वह खुद भी पैसा उधार ले कर आया था. सुधीर दास की हालत यह थी कि बेटे के दाह संस्कार के लिए भी उस के पास पैसा नहीं था. जवान बेटे की मौत से टूट चुका सुधीर दास पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रहा था. उन की हालत देख कर गाजीपुर पुलिस ने अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम किया और सुदीप का क्रियाकर्म भैंसाकुंड के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पर किया. सुदीप की अभागी मां कावेरी और भाई राजदीप तो उसे अंतिम बार देख भी नहीं सके.

क्रियाकर्म के बाद पुलिस ने ही सुधीर के वापस मालदा जाने का इंतजाम कराया. गरीबी से लाचार यह पिता बेटे की हत्या करने वाली मांबेटी को सजा दिलाने के लिए मुकदमा भी नहीं लड़ना चाहता. अनजान से मोहब्बत और उस से शादी की जिद ने सुदीप की जान ले ली. सुदीप अपने परिवार का एकलौता कमाऊ बेटा था. उस के जाने से पूरा परिवार पूरी तरह से टूट गया है. सलोनी और सुदीप की एक गलती ने 2 परिवारों को तबाह कर दिया है. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में आरोपी सलोनी का नाम परिवर्तित है.

Property Dispute: परिवार के 5 जनों को डसने वाला आस्तीन का सांप

Property Dispute: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मुरादनगर से सटा गांव है बसंतपुर सैंथली. यहां भी तेजी से शहरीकरण के चलते जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं. बिल्डर आते हैं, किसानों को लुभाते हैं और उस भाव में खेतीकिसानी की जमीनों के सौदे करते हैं, जिस की उम्मीद किसानों ने कभी सपने में भी नहीं की होती.

एक बीघा के 50 लाख से ले कर एक करोड़ रुपए सुन कर किसानों का मुंह खुला का खुला रह जाता है कि इतना तो वे सौ साल खेती कर के भी नहीं कमा पाएंगे. और वैसे भी आजकल खेतीकिसानी खासतौर से छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है. लिहाजा वे एकमुश्त मिलने वाले मुंहमांगे दाम का लालच छोड़ नहीं पाते और जमीन बेच कर पास के किसी कसबे में बस जाते हैं. इसी गांव का एक ऐसा ही किसान है 48 वर्षीय लीलू त्यागी, जिस के हिस्से में पुश्तैनी 15 बीघा जमीन में से 5 बीघा जमीन आई थी. बाकी 10 बीघा 2 बड़े भाइयों सुधीर त्यागी और ब्रजेश त्यागी के हिस्से में चली गई थी.

जमीन बंटबारे के बाद तीनों भाई अपनीअपनी घरगृहस्थी देखने लगे और जैसे भी हो खींचतान कर अपने घर चलाते बच्चों की परवरिश करने लगे. बंटवारे के समय लीलू की शादी नहीं हुई थी, लिहाजा उस पर घरगृहस्थी के खर्चों का भार कम था. गांव के संयुक्त परिवारों में जैसा कि आमतौर पर होता है, दुनियादारी और रिश्तेदारी निभाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, इसलिए भी लीलू बेफिक्र रहता था और मनमरजी से जिंदगी जीता था. साल 2001 का वह दिन त्यागी परिवार पर कहर बन कर टूटा, जब सुधीर अचानक लापता हो गए. उन्हें बहुत ढूंढा गया पर पता नहीं चला कि उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

कुछ दिनों की खोजबीन के बाद त्यागी परिवार ने तय किया कि सुधीर की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी जाए. लेकिन इस पर लीलू बड़ेबूढ़ों के से अंदाज में बोला, ‘‘इस से क्या होगा. उलटे हम एक नई झंझट में और फंस जाएंगे. पुलिस तरहतरह के सवाल कर हमें परेशान करेगी. हजार तरह की बातें समाज और रिश्तेदारी में होंगी. उस से तो अच्छा है कि उन का इंतजार किया जाए. हालांकि वह किसी बात को ले कर गुस्से में थे और मुझ से यह कह कर गए थे कि अब कभी नहीं आऊंगा.’’

परिवार वालों को लीलू की सलाह में दम लगा. वैसे भी अगर सुधीर के साथ कोई अनहोनी या हादसा हुआ होता तो उन की लाश या खबर मिल जानी चाहिए थी और वाकई पुलिस क्या  कर लेती. वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो घर का रास्ता भूल जाएं.  यह सोच कर सभी ने मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया.  उन्हें चिंता थी तो बस उन की पत्नी अनीता और 2 नन्हीं बेटियों पायल और पारुल की, जिन के सामने पहाड़ सी जिंदगी पड़ी थी.

यह परेशानी भी वक्त रहते दूर हो गई, जब गांव में यह चर्चा शुरू हुई कि अब सुधीर के आने की तो कोई उम्मीद रही नहीं, अनीता कब तक उस की राह ताकती रहेगी. इसलिए अगर लीलू उस से शादी कर ले तो उन्हें सहारा और बेटियों को पिता मिल जाएगा. घर की खेती भी घर में रहेगी. गांव और रिश्ते के बड़ेबूढ़ों का सोचना ऐसे मामले में बहुत व्यावहारिक यह रहता है कि जवान औरत कब तक बिना मर्द के रहेगी. आज नहीं तो कल उस का बहकना तय है, इसलिए बेहतर है कि अगर देवरभाभी दोनों राजी हों तो उन की शादी कर दी जाए.

बात निकली तो जल्द उस पर अमल भी हो गया. एक सादे समारोह में लीलू और अनीता की शादी हो गई जो कोई नई बात भी नहीं थी. क्योंकि गांवों में ऐसी शादियां होना आम बात है, जहां देवर ने विधवा भाभी से शादी की हो. इतिहास भी ऐसी शादियों से भरा पड़ा है. देखते ही देखते अपने देवर की पत्नी बन अनीता विधवा से फिर सुहागन हो गई और वाकई में पारुल और पायल को चाचा के रूप में पिता मिल गया. इस के बाद तो बड़े भाई सुधीर की जमीन भी लीलू की हो गई. जल्द ही लीलू और अनीता के यहां बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम विभोर रखा गया. घर में सब उसे प्यार से शैंकी कहते थे.

कभीकभार जरूर गांव के कुछ लोगों में यह चर्चा हो जाती थी कि चलो जो हुआ सो अच्छा हुआ, लेकिन कभी सुधीर अगर वापस आ गया तो क्या होगा. मुमकिन है जी उचट जाने से वह साधुसंन्यासियों की टोली में शामिल हो गया हो और वहां से भी जी उचटने के कारण कभी घर आ जाए. फिर अनीता किस की पत्नी कहलाएगी? सवाल दिलचस्प था, जिस का मुकम्मल जबाब किसी के पास नहीं था. पर एक शख्स था जो बेहतर जानता था कि सुधीर अब कभी वापस नहीं आएगा. वह शख्स था लीलू.

इसी तरह 5 साल गुजर गए. अब सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही साल 2006 में पारुल की मृत्यु हो गई. घर और गांव वाले कुछ सोचसमझ पाते, इस के पहले ही लीलू ने कहा कि उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था और आननफानन में उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया. गांवों में ऐसे यानी सांप वगैरह के काटे जाने के हादसे भी आम होते हैं, इसलिए कोई यह नहीं सोच पाया कि यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोचसमझ कर की गई हत्या है. और आगे भी त्यागी परिवार में ऐसी हत्याएं होती रहेंगी, जो सामान्य या हादसे में हुई मौत लगेंगी और हैरानी की बात यह भी रहेगी किसी भी मामले में न तो लाश मिलेगी और न ही किसी थाने में रिपोर्ट दर्ज होगी.

इस के 3 साल बाद ही पायल भी रहस्यमय ढंग से गायब हो गई तो मानने वाले इसे होनी मानते रहे. लेकिन अनीता अपनी दोनों बेटियों की मौत का सदमा झेल नहीं पाई और बीमार रहने लगी, जिस का इलाज भी लीलू ने कराया. अब सुधीर की जमीन का कोई वारिस नहीं बचा था, सिवाय अनीता के, जो अब हर तरह से लीलू और बड़े होते शैंकी की मोहताज रहने लगी थी. लीलू की तो जान ही अपने बेटे में बसती थी और वह उसे चाहता भी बहुत था. लेकिन यह नहीं देख पा रहा था कि उस के लाड़प्यार के चलते शैंकी गलत राह पर निकल पड़ा है.

और देख भी कैसे पाता क्योंकि वह खुद ही एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था, जिसे कलयुग का महाभारत कहा जा सकता है और वह उस का धृतराष्ट्र है, जो पुत्र मोह में अंधा हो गया था. इसी अंधेपन का नतीजा था कि बीती 9 जुलाई को लीलू गाजियाबाद के सिहानी गेट थाने में पुलिस वालों के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था कि शैंकी मेरा इकलौता बेटा है, आप जितने चाहो पैसे ले लो लेकिन उसे छोड़ दो. बेटा छूट जाए, इस के लिए वह 10 लाख रुपए देने को तैयार था. लेकिन जुर्म की दुनिया में दाखिल हो चुके बिगड़ैल शैंकी ने जुर्म भी मामूली नहीं किया था, लिहाजा उस का यूं छूटना तो नामुमकिन बात थी.

दरअसल, शैंकी ने केन्या की एक लड़की, जिस का नाम रोजमेरी वाजनीरू है, से 7 जुलाई को 12 हजार रुपए नकद और एक मोबाइल फोन लूटा था. रोजमेरी से उस का संपर्क सोशल मीडिया के जरिए हुआ था. जब वह दिल्ली आई तो शैंकी बहाने से उसे अपनी कार में बैठा कर गाजियाबाद ले गया और हथियार दिखा कर लूट की इस वारदात को अंजाम दिया. दूसरे दिन सुबह रोजमेरी ने सिहानी गेट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तो शैंकी पकड़ा गया. वारदात में उस का साथ देने वाला शुभम भी गिरफ्तार किया गया था. वह भी मुरादनगर का रहने वाला है.

दोनों से वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार, 11 हजार रुपए नकद और वह कार भी बरामद की गई थी, जिस में बैठा कर रोजमेरी से लूट की गई थी. कुछ दिनों बाद दोनों को अदालत से जमानत मिल गई थी. लेकिन अब खुद जेल में बंद लीलू को जमानत मिल पाएगी, इस में शक है. क्योंकि उस के गुनाहों के आगे तो बेटे का गुनाह कुछ भी नहीं. बीती 24 सितंबर को लीलू को गाजियाबाद पुलिस ने अपने भतीजे रेशू की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया तो सख्ती से पूछताछ में उस ने खुलासा किया कि उस ने कोई एकदो नहीं बल्कि 20 साल में एकएक कर 5 हत्याएं की हैं. और ये पांचों ही उस के अपने सगे हैं.

यह सुन कर पुलिस वालों के मुंह तो खुले के खुले रह गए, साथ ही जिस ने भी सुना उस के भी होश उड़ गए कि कैसा कलयुग आ गया है, जिस में जमीन के लालच में एक सगे भाई ने दूसरे सगे बड़े भाई और 2 भतीजियों जो अनीता से शादी के बाद उस की बेटियां हो गई थीं, सहित 2 सगे भतीजों को भी इतनी साजिशाना और शातिराना तरीके से मारा कि किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ. रेशू की हत्या के आरोप में वह कैसे पकड़ा गया, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले की 4 हत्याएं उस ने कैसे की थीं. इन में से 2 का जिक्र ऊपर किया जा चुका है.

अपने बड़े भाई सुधीर की हत्या लीलू ने एक लाख की सुपारी दे कर मेरठ में करवाई थी और लाश को नदी में बहा दिया था. इसलिए अनीता से शादी करने के बाद वह बेफिक्र था कि सुधीर आएगा कहां से, उसे तो मौत की नींद में वह सुला चुका है. यह कातिल कितना खुराफाती है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 20 साल पहले ही अपने गुनाहों की स्क्रिप्ट लिख चुका था और हरेक कत्ल के बाद किसी को शक न होने पर उस के हौसले बढ़ते जा रहे थे.

जब शैंकी पैदा हुआ तो उसे लगा कि सुधीर की जमीन उस की बेटियों के नाम हो जाएगी, लिहाजा पहले उस ने पारुल को खाने में जहर दे कर मारा और फिर पायल की भी हत्या कर उस की लाश को नदी में बहा दिया. इस दौरान जमीनजायदाद का धंधा करने के लिए उस ने अपने हिस्से की जमीन बेच दी और मुरादनगर थाने के सामने एक आलीशान मकान भी बनवा लिया. जब इस निकम्मे और लालची से दलाली का धंधा नहीं चला तो उस की नजर दूसरे भाई ब्रजेश की जमीन पर जा टिकी. उसे लगा कि अगर ब्रजेश और उस के बेटों व पत्नी को भी इसी तरह ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की ढाई करोड़ की जमीन भी उस की हो जाएगी.

नेकी तो नहीं बल्कि बदी और पूछपूछ की तर्ज पर उस ने साल 2013 में  ब्रजेश के छोटे बेटे 16 वर्षीय नीशू की भी हत्या कर लाश नदी में बहा दी और अपनी गोलमोल बातों से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से ब्रजेश को रोक लिया था. यह उस के द्वारा की गई चौथी हत्या थी. अब तक उसे समझ आ गया था कि और साल, 2 साल या 4 साल लगेंगे, लेकिन जमीन तो उस की हो ही जाएगी. असल में वह चाहता था कि पूरे कुटुंब की जमीन उस के बेटे शैंकी को मिल जाए, जिस से उसे जिंदगी में मेहनत ही न करनी पड़े जैसे कि उसे नहीं करनी पड़ी थी. जाहिर है रेशू की हत्या के बाद वह ब्रजेश और उन की पत्नी को भी ऊपर पहुंचा देने का मन बना चुका था.

ब्रजेश का बेटा 24 वर्षीय रेशू बीती 8 अगस्त को गायब हो गया था. यह उन के लिए एक और सदमे वाली बात थी. क्योंकि नीशू को गुजरे 8 साल बीत गए थे, अब रेशू ही उन का आखिरी सहारा बचा था जिस की सलामती के लिए वे दिनरात दुआएं मांगा करते थे. लेकिन यह अंदाजा दूसरों की तरह उन्हें भी नहीं था कि परिवार को डसने वाला सांप आस्तीन में ही है. लीलू ने इस बाबत और लोगों को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया था. उस ने योजना के मुताबिक रेशू को फोन कर गांव के बाहर मिलने बुलाया और घूमने चलने के बहाने कार में बैठा लिया. इस आई ट्वेंटी कार में इन दोनों के अलावा विक्रांत, सुरेंद्र त्यागी, राहुल और लीलू का भांजा मुकेश भी मौजूद था.

चलती कार में ही इन लोगों ने रेशू की हत्या रस्सी और लोहे की जंजीर से गला घोंट कर दी और उसे सीट पर जिंदा लोगों की तरह बिठा कर बुलंदशहर की तरफ चल पड़े. कहीं किसी को शक न हो जाए, इसलिए कुछ दूर जंगल में कार रोक कर इन्होंने रेशू की लाश को कार की डिक्की में डाल दिया. असल काम हो चुका था, बस लाश और ठिकाने लगानी बाकी थी. इस के लिए मूड बनाने के लिए इन लोगों ने बुलंदशहर में विक्रांत के ट्यूबवैल पर जोरदार पार्टी की. जब रात गहराने लगी तो इन वहशियों ने रेशू की लाश को एक बोरे में ठूंसा और बोरा पहासू इलाके में ले जा कर गंगनहर में बहा दिया. इस के बाद सभी अपनेअपने रास्ते हो लिए.

आरोपियों में से सुरेंद्र त्यागी हापुड़ का रहने वाला है और पुलिस में दरोगा पद से रिटायर हुआ है जबकि राहुल उस का नौकर था. लीलू ने सुरेंद्र को रेशू की हत्या की सुपारी दी थी, जिस ने बुलंदशहर के आदतन अपराधी विक्रांत को भी इस वारदात में शामिल कर लिया था. इन दोनों का याराना विक्रांत के एक जुर्म में जेल में बंद रहने के दौरान हुआ था. लीलू ने हत्या के एवज में 4 लाख रुपए नकद दिए थे और बाकी बाद में एक बीघा जमीन बेचने के बाद देने का वादा किया था. रेशू के लापता होने के बाद ब्रजेश ने बेटे को काफी खोजा और फिर थकहार कर 15 अगस्त को मुरादनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि लीलू ने इस बार भी उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से क्या फायदा होगा.

लेकिन फायदा हुआ. 24 सितंबर को वह पकड़ा गया और अपने साथियों सहित जेल में है. लीलू इत्तफाकन पकड़ा गया, नहीं तो पुलिस भी हार मान चुकी थी कि अब रेशू नहीं मिलने वाला. पुलिस के पास रेशू को ढूंढने का कोई सूत्र नहीं था, सिवाय इस के कि उस के और लीलू के फोन की लोकेशन एक ही जगह की मिल रही थी, जो उसे हत्यारा मानने के लिए पर्याप्त नहीं था. लेकिन इनवैस्टीगेशन के दौरान एक औडियो रिकौर्डिंग पुलिस के हत्थे लग गई, जिस में लीलू रेशू की हत्या का प्लान बाकी चारों में से किसी को बता और समझा रहा था. फिर लीलू ने 5 हत्याओं की बात कुबूली. हत्याओं में 2-3 साल का गैप वह इसीलिए रखता था कि हल्ला न मचे और लोग पिछली हत्या का दुख भूल जाएं.

पुलिस हिरासत में लीलू कभी यह कहता रहा कि उसे उन हत्याओं का कोई मलाल नहीं. तो कभी यह कहता रहा कि सजा भुगतने के बाद वह भाईभाभी की सेवा कर किए गए जुर्म का प्रायश्चित करना चाहता है. हैरानी की बात सिर्फ यह है कि 5 हत्याओं का यह गुनहगार लीलू जेल से छूट जाने की उम्मीद पाले बैठा है. वह शायद इसलिए कि 5 में से एक भी लाश बरामद नहीं हो सकी. लेकिन अब लोगों की मांग है कि ऐसे आस्तीन के सांप का जिंदा रहना ठीक नहीं है, लिहाजा उसे फांसी की सजा मिलनी चहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह जरूर एक बड़ी कानूनी खामी साबित होगी. Property Dispute

Crime Kahaniyan: मामी की बेवफाई – लता बनी परिवार की बर्बादी का कारण

Crime Kahaniyan: 19वर्षीया काजल बेचैन हो कर अपने घर में टहल रही थी. वह बारबार रो रहे अपने छोटे भाई शिवम को चुप कराती थी, मगर शिवम मां को याद कर के बारबार रोने लगता था. हरिद्वार जिले के गांव हेतमपुर की रहने वाली काजल व शिवम की मां लता चौहान (38) गत शाम को पास के ही कस्बे बहादराबाद में सब्जी खरीदने के लिए घर से निकली थी, मगर आज तक वह वापस घर नहीं लौटी थी.

उस का मोबाइल भी स्विच्ड औफ आ रहा था. मां के वापस न लौटने व मोबाइल के स्विच्ड औफ होने से काजल व शिवम का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. दोनों भाईबहन पिछली शाम से ही अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर कर के अपनी मां के बारे में जानकारी कर रहे थे, मगर उन की मां के बारे में सभी रिश्तेदारों ने मोबाइल पर अनभिज्ञता जताई. इस के बाद सूचना पा कर कुछ रिश्तेदारों व कुछ पड़ोसियों का भी उन के घर पर आना शुरू हो गया था. सभी भाईबहन को दिलासा दे कर चले जाते.

इसी प्रकार 3 दिन बीत गए थे, लेकिन काजल व शिवम को अपनी मां के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिली. इस के बाद अब उन के रिश्तेदार काजल पर लता की गुमशुदगी थाने में दर्ज कराने पर जोर देने लगे. लेकिन थाने जाने के नाम से काजल को एक अंजाना सा डर लग रहा था. वह 14 जून, 2021 का दिन था. आखिर उस दिन काजल हरिद्वार के थाना सिडकुल पहुंच ही गई. वह थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला से मिली और उन्हें अपनी मां लता चौहान के गत 4 दिनों से लापता होने की जानकारी दी.

जब थानाप्रभारी बुटोला ने काजल से उस के पिता के बारे में पूछा तो काजल ने बताया, ‘‘सर पिछले 2-3 सालों से मेरे पिता चंदन सिंह नेगी व मां लता चौहान के बीच अनबन चल रही है. मेरे पिता फरीदाबाद (हरियाणा) में रह कर ड्राइवरी करते हैं. यहां पर 2 साल पहले मेरे फुफेरे भाई अंकित चौहान ने हमें एक मकान खरीद कर दिया था. इस मकान में हम तीनों रहते हैं. घर से चलते समय मेरी मां हरे रंग का सूट सलवार व पैरों में सैंडिल पहने थी.’’

इस के बाद काजल ने मां का मोबाइल नंबर भी थानाप्रभारी बुटोला को नोट करा दिया. फिर थानाप्रभारी के कहने पर काजल वापस घर आ गई. काजल की तहरीर पर थानाप्रभारी बुटोला ने लता की गुमशुदगी दर्ज कर ली और इस केस की जांच एसआई अमित भट्ट को सौंप दी. लता की गुमशुदगी का केस हाथ में आते ही अमित भट्ट सक्रिय हो गए. उन्होंने सब से पहले लता के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने के लिए साइबर थाने से संपर्क किया था और थाने के 2 सिपाहियों को लता चौहान की डिटेल्स का पता करने के लिए सादे कपड़ों में गांव हेतमपुर में तैनात कर दिया.

उसी दिन शाम को थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला ने लता की गुमशुदगी की सूचना एएसपी डा. विशाखा अशोक भडाने व एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी. 2 दिनों में पुलिस को लता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स मिल गई थी. काल डिटेल्स के अनुसार 10 जून, 2021 की शाम को लता चौहान व उस के भांजे अंकित चौहान की लोकेशन हेतमपुर से सलेमपुर की गंगनहर तक एक साथ थी. इस से पहले दोनों में बातें भी हुई थीं. इस के अलावा लता के मोबाइल पर अंतिम काल अंकित चौहान के ही मोबाइल से आई थी. इस के कुछ समय बाद लता चौहान व अंकित चौहान की लोकेशन भी अलगअलग हो गई थी. काल डिटेल्स की यह जानकारी तुरंत ही थानाप्रभारी ने एसपी (सिटी) कमलेश उपाध्याय को दी.

एसपी उपाध्याय ने थानाप्रभारी बुटोला व एसआई अमित भट्ट को अंकित चौहान से पूछताछ करने के निर्देश दिए. बुटोला व भट्ट ने जब अंकित चौहान से संपर्क करने का प्रयास किया, तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. पुलिस ने जब अंकित चौहान के बारे में जानकारी की तो पता चला कि वह लता का सगा भांजा था. अंकित मूलरूप से बिजनौर जिले के गांव मानपुर शिवपुरी का रहने वाला था. अंकित एमएससी करने के बाद किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था.  3 साल पहले जब लता के अपने पति से संबंध बिगड़ गए थे, तब से अंकित की लता से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस दौरान अंकित लता व उस के दोनों बच्चों का पूरापूरा खयाल रखता था. लता के रहनेखाने से ले कर वह उन्हें हर चीज मुहैया कराता था.

यह जानकारी प्राप्त होने पर बुटोला व अमित भट्ट ने अंकित की तलाश में धामपुर व हेतमपुर में कुछ मुखबिर सतर्क कर दिए थे. विवेचक अमित भट्ट ने भी अंकित की तलाश में उस के धामपुर स्थित गांव मानपुर शिवपुरी में कई बार दबिश दी, मगर अंकित उन्हें न मिल पाया. इसी प्रकार 9 दिन बीत गए तथा पुलिस को अंकित चौहान के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई. वह 27 जून, 2021 का दिन था. शाम के 7 बज रहे थे. तभी श्री बुटोला के मोबाइल पर उन के खास मुखबिर का फोन आया. मुखबिर ने उन्हें बताया कि सर, जिस अंकित को तलाश कर रहे हो, वह इस समय यहां हरिद्वार के रोशनाबाद चौक पर खड़ा है. यह सुनते ही बुटोला की बांछें खिल गईं.

बुटोला ने इस मामले में विलंब करना उचित नहीं समझा. उन्होंने तुरंत अपने साथ विवेचक अमित भट्ट व फोर्स को साथ लिया और 5 मिनट में ही रोशनाबाद चौक पर पहुंच गए. मुखबिर के इशारे पर उन्होंने वहां से अंकित को हिरासत में ले लिया. वह उसे थाने ले आए. यहां पर जब बुटोला व भट्ट ने उस से लता के लापता होने के बारे में पूछताछ की, तो पहले तो वह पुलिस को गच्चा देने की कोशिश करता रहा. वह पुलिस को बताता रहा कि लता उस की मामी अवश्य थी, मगर अब वह कहां है, उस की उसे कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सख्ती करने पर वह टूट गया और बोला, ‘‘साहब, अब लता इस दुनिया में नहीं है. 10 जून, 2021 की रात को मैं ने अपने दोस्त अमन निवासी कस्बा शेरकोट जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश के साथ मिल कर उस की

गला घोंट कर हत्या कर दी थी तथा उस की लाश हम ने गांव सलेमपुर स्थित गंगनहर में फेंक दी थी. लता को मैं घुमाने की बात कह कर सलेमपुर गंगनहर तक लाया था.’’

अंकित के मुंह से लता की हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी बुटोला तथा वहां मौजूद अन्य पुलिस वाले सन्न रह गए. पूछताछ में उस ने लता की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

अंकित गांव मानपुर में अपने पिता हरगोविंद, मां सरोज तथा छोटे भाई अनुज के साथ रहता था. उस ने बताया कि 3 साल पहले जब लता का अपने पति के साथ विवाद हुआ था तो उस दौरान उस ने ही लता की काफी मदद की थी. उसी दौरान लता उस की ओर आकर्षित हो गई थी. लता और अंकित के बीच अवैध संबंध बन गए थे. फिर अंकित ने लता को हेतमपुर में एक मकान खरीद कर दे दिया था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि करीब 2 महीने पहले अंकित ने लता को उस के पड़ोसी के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया था. यह देख कर अंकित को गुस्सा आ गया था. गुस्से में उस ने लता को उसे खरीद कर दिया हुआ मकान अपने नाम वापस करने का कहा तो वह टालने लगी और 2 लाख रुपए की मांग करने लगी.

लता की इस हरकत से अंकित परेशान हो गया था और अंत में वह उस की हत्या की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने दोस्त अमन को बताई तो वह भी अंकित का साथ देने को राजी हो गया. दोनों ने इस की योजना बनाई. योजना के अनुसार 10 जून, 2021 को अंकित अमन के साथ रात 8 बजे लता के घर पहुंचा था. इस के बाद उसे घुमाने की बात कह कर वह लता को ले कर गंगनहर किनारे गांव सलेमपुर पहुंचा था. उस समय वहां रात का अंधेरा छाया था.

मौका मिलने पर अमन ने तुरंत ही लता को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया था. लता के मरने के बाद दोनों ने उस की लाश गंगनहर में फेंक दी थी. उस समय रात के 11 बज चुके थे. इस के बाद अमन वापस अपने घर चला गया था. लता का मोबाइल उस समय अंकित के पास ही था. जब उस ने 12 जून, 2021 को मोबाइल औन किया तो उस में फोन आने शुरू हो गए थे. तब अंकित ने उस में से सिमकार्ड निकाल कर मोबाइल व सिम को सिंचाई विभाग की गंगनहर में फेंक दिया था. इस के बाद पुलिस ने अंकित के बयान दर्ज कर लिए और लता की गुमशुदगी के मुकदमे को हत्या में तरमीम कर दिया.

पुलिस ने इस केस में आईपीसी की धाराएं 302 व 120बी और बढ़ा दी थीं. 2 जुलाई, 2021 को पुलिस ने अंकित को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक आरोपी अंकित जेल में ही बंद था. थानाप्रभारी लखपत सिंह बुटोला द्वारा गंगनहर में लता के शव को तलाश किया जा रहा था. दूसरी ओर पुलिस दूसरे आरोपी अमन की तलाश में जुटी थी.

छाया : सोहेब मलिक

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Illicit Relationship: दिलबर ने ली जान

Illicit Relationship: कमलेश और जीरा के बीच भले ही शादी से पहले के संबंध रहे थे, लेकिन जीरा की शादी के बाद दोनों को यह गलती दोहरानी नहीं चाहिए थी. उन दोनों की इस गलती ने जब विकराल रूप ले लिया तो फिर खून की नदी तो बहनी ही थी, भले ही उस में लाश जीरा की बहती या कमलेश की.

खिदिरपुर गांव से सटा हुआ गांव है ताजपुर माझा. 23 जुलाई, 2015 की सुबह का उजाला फैला तो ताजपुर माझा के लोगों ने खेतों का रुख किया. एक ग्रामीण ने सिट्टू राय के खेत के पास की झाड़ी में एक जवान युवक को रक्तरंजित पड़ा देखा तो उस की घिग्गी बंध गई. उस ने हिम्मत कर के उस युवक के जिस्म पर नजर डाली तो उसे समझते देर नहीं लगी कि वह जीवित नहीं है. वह ग्रामीण चिल्लाता हुआ वहां से भागा, ‘‘झाडि़यों में लाश है, झाडि़यों में लाश है.’’

उस की आवाज सुन कर लोग खेतों के पास खड़ी झाडि़यों की तरफ दौड़ पड़े. देखते ही देखते लाश के पास काफी लोग जमा हो गए. मृतक जवान युवक था. उस के शरीर पर नई पैंट शर्ट और जूते थे, ऐसा लगता था जैसे वह किसी रिश्तेदारी में आया था. क्योंकि गांव के ज्यादातर लोग कहीं बाहर या रिश्तेदारी में आनेजाने पर ही नए कपड़े पहनते हैं. मृतक का सिर फटा हुआ था, जिस से बहा खून उस के चेहरे और शर्ट के काफी हिस्से पर फैल गया था.

खून चूंकि जम कर काला पड़ गया था, इस से लग रहा था कि उसे मरे हुए काफी समय हो गया है. आसपास एकत्र भीड़ में तरहतरह की चर्चाएं हो रही थीं, उसे पहचानने की कोशिश भी की गई, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. इसी बीच किसी ने थाना जमानियां की पुलिस को फोन कर के युवक की लाश मिलने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी जमानियां अवधेश नारायण सिंह पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. उन्हें देख कर भीड़ लाश के पास से हट गई. अवधेश नारायण सिंह ने युवक की लाश का निरीक्षण किया. उस के फटे सिर को देख कर ही उन्हें अनुमान हो गया कि उस की मौत ज्यादा खून बह जाने की वजह से हुई है.

मृतक के शरीर पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे. मरने से पहले शायद उसे काफी पीटा गया था. अवधेश नारायण सिंह को उस की जेबों की तलाशी में जो पर्स मिला, उस में केवल कुछ रुपए थे. इस के अलावा उस के पास से ऐसा कोई सामान नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. लाश की पहचान के लिए उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछा तो सभी ने उसे पहचानने से मना कर दिया. लोगों ने यही शंका जाहिर की कि हो सकता है यह आसपास के किसी गांव का रहने वाला हो. इस पर अवधेश नारायण सिंह ने एक सिपाही को भेज कर पड़ोसी गांव खिदिरपुर से वहां के चौकीदार राममिलन को बुलवा लिया.

राममिलन ने युवक की लाश को देखते ही बता दिया कि मृतक राधोपुर गांव का कमलेश यादव है. राममिलन ने यह भी बताया कि कमलेश यादव का खिदिरपुर में जीरा देवी के पास काफी आनाजाना था. दोनों के अवैधसंबंधों के बारे में पूरा खिदिरपुर जानता है. इस महत्वपूर्ण जानकारी को सुन कर अवधेश नारायण सिंह को पक्का यकीन हो गया कि कमलेश यादव की हत्या अवैधसंबंधों के कारण ही हुई है और इस के सूत्र खिदिरपुर में जीरा देवी के घर से ही मिलेंगे. उन्होंने लिखापढ़ी कर के कमलेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपने मातहतों को निर्देश दिया कि वे कमलेश यादव के गांव राधोपुर खबर भेज कर उस के घर वालों को थाने बुला लें.

तत्पश्चात अवधेश नारायण सिंह 2 सिपाहियों और चौकीदार के साथ गांव खिदिरपुर की ओर रवाना हो गए. खिदिरपुर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. जब वह जीरा देवी के दरवाजे पहुंचे तो अंदर तेजी से हलचल हुई, लगा कोई भागा है. दरवाजा खुला था. अवधेश नारायण सिंह धड़धड़ाते हुए अंदर चले गए. घर के आंगन में एक युवती घबराई हुई खड़ी थी. वही जीरा देवी थी. घर में पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

अवधेश नारायण सिंह की पैनी नजरों ने घर के आंगन में पड़े खून के उन धब्बों को देख लिया, जिन्हें साफ करने की कोशिश की तो गई थी, पर वे पूरी तरह से साफ नहीं हो पाए थे. श्री सिंह ने जीरा देवी को घूरते हुए पूछा, ‘‘अंदर कौन भागा है?’’

‘‘ज…जी… मेरी सास अंदर गई है.’’ जीरा देवी ने घबराई हुई आवाज में कहा और अंदर की तरफ जाने लगी. अवधेश सिंह ने उसे रोका नहीं, बल्कि उस के पीछे हो लिए. जीरा देवी जिस कमरे में गई, उस में कमलेश यादव की हत्या के पुख्ता सबूत मौजूद थे. कमरे में जीरा देवी की सास संधारी देवी खड़ी मिली, उस के हाथ में लोहे की खून सनी रौड थी, जिसे वह एक गीले कपड़े से साफ करने की कोशिश कर रही थी.

अब कुछ भी पूछने की आवश्यकता नहीं थी, उन्होंने वहां मौजूद सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया और जीरा देवी व संधारी देवी को साथ ले कर थाने लौट आए. एक आदमी की हत्या और कुछ लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी मिलने पर पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण भी आ गए थे. उन की और मीडिया की उपस्थिति में दोनों से सख्ती से पूछताछ हुई. आखिरकार जीरा देवी पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए जो कुछ बताया, उस से कमलेश की हत्या की पूरी कहानी साफ हो गई. जीरा देवी ने बताया, ‘‘कमलेश अकसर मेरे साथ अनैतिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाता था. इस से मेरी ससुराल वालों की बहुत बदनामी हो रही थी.

अपने पड़ोसी प्यारेलाल के कहने पर कल रात मैं ने उसे घर पर बुलाया. कमलेश मुझ से मिलने के लिए घर आया तो मैं ने और मेरी सास ने लोहे की रौड और लाठी से उस पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद हम ने उस की लाश पास के गांव ताजपुर के एक खेत के पास खड़ी झाड़ी में फेंक दी. इस में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है.’’

अवधेश सिंह जानते थे कि कमलेश की लाश को 2 औरतें पास के गांव के खेतों में ले जा कर नहीं फेंक सकतीं, इस में अवश्य ही किसी पुरुष का भी हाथ रहा होगा. उन्होंने अपनी पुलिस टीम को जीरा के पति करिमन यादव उर्फ करिया और उस के पड़ोसी प्यारेलाल को पकड़ कर लाने के आदेश दिए. गाजीपुर जिले के जमानियां थाना क्षेत्र का एक गांव है राधोपुर. इस गांव के एक छोटे से किसान रामअधार यादव की बेटी थी जीरा. रामअधार के पास खेती लायक इतनी जमीन थी कि वह अपने परिवार का भरणपोषण अच्छे से कर लेता था. जीरा बचपन से ही नटखट और चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई के साथ खेतखलिहान और गांव की गलियों में खेलतेकूदते जीरा कब जवान हो गई, उसे पता ही नहीं चला.

उसे अपनी जवानी का अहसास तब हुआ, जब उस के जीवन में प्यार का एक मदहोश कर देने वाला झोंका आया. वह मदमस्त कर देने वाला आवारा झोंका था कमलेश. वह भी इसी गांव में जवान हुआ था. उस के पिता रामविलास यादव भी किसान थे. कमलेश की पढ़ने में ज्यादा रुचि नहीं थी. सारा दिन अपने दोस्तों के साथ गांव की गलियों में घूमना, फिल्मी गाने गुनगुना कर खुद को हीरो साबित करने की कोशिश करना उस का काम था. एक दिन वह अपनी साइकिल से कस्बे की ओर जा रहा था, तभी उस की नजरें सामने से आती हुई जीरा पर पड़ गईं.

19 वर्षीया कमसिन, अल्हड़, खूबसूरत जीरा की बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, कमर तक लहराते काले बाल, पतली छरहरी कंचन सी काया किसी भी युवा दिल को आकर्षित करने के लिए काफी थी. उस के चेहरे पर ऐसा चुंबकीय आकर्षण था कि कमलेश अपनी आंखें तक झपकाना भूल गया. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उस का दिल सीने से निकल कर बाहर आ गया हो.

‘‘हाय, इतनी दिलकश हसीना मेरे गांव में रहती है और मुझे पता ही नहीं चला.’’ कमलेश ने सर्द आह भर कर कहा तो जीरा ने आंखें तरेरते हुए जवाब दिया, ‘‘अच्छा, अगर पहले पता चल जाता तो क्या कर लेते?’’

‘‘कसम पैदा करने वाले की, मैं तुम्हारा हाथ मांगने खुद ही तुम्हारे दरवाजे पर आ जाता.’’

जीरा थोड़ी शरमाई, फिर झेंप कर बोली, ‘‘क्यों घर में मांबाप नहीं हैं क्या तुम्हारे?’’

‘‘हैं, कहो तो भेज दूं अपने बाप को?’’ कमलेश ने शरारत से पूछा.

‘‘धत!’’ जीरा लाज से दोहरी हो कर तेजी से कमलेश की बगल से निकल गई.

‘‘उफ, यह शरमाना…’’ कमलेश ने फिर ठंडी सांस भरी और बोला, ‘‘अरे नाम तो बताती जाओ.’’

‘‘जीरा नाम है मेरा.’’ जीरा ने पलट कर बड़ी अदा से बताया और फिर लहराती हुई चली गई. कमलेश तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक जीरा उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. उसे लगा जैसे आज उस का दिल उस के पास नहीं है, उसे जीरा चुरा कर ले गई है. वह उस दिन बेमन से कस्बे के बाजार गया.

इत्तफाक से दूसरे दिन जीरा उसे खेत में मिल गई. उस दिन सांझ ढल रही थी. जीरा ने जानवरों के लिए घास का गट्ठर तैयार कर लिया था और उसे उठाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. गट्ठर भारी था और आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था. तभी कमलेश वहां पहुंच गया. उस ने जीरा को देखा तो उस के पास चला आया.

‘‘क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं?’’ कमलेश ने प्यार से पूछा.

‘‘ना बाबा?’’ जीरा ने अपनी मुसकराहट छिपा कर घबराने का अभिनय किया, ‘‘तुम से उठवाऊंगी तो दंड भोगना पड़ेगा.’’

‘‘दंड.’’ कमलेश चौंका, ‘‘कैसा दंड?’’

‘‘मैं जानती हूं, फोकट में मुझ पर एहसान नहीं करोगे. बोझ उठवा दिया तो कहोगे, मुझ पर उपकार किया है, अब बापू को भेजूं तो ‘हां’ बोल देना.’’

कमलेश हंस पड़ा, ‘‘वह तो तुम्हें वैसे भी बोलना पड़ेगा जीरा. जानती हो तुम्हें जब से देखा है न दिन को चैन है, न रात को ठीक से सो पाया हूं. पता नहीं कैसा जादू कर दिया है तुम ने मुझ पर.’’

‘‘जादू तो तुम ने भी चला दिया मुझ पर.’’ जीरा सिर झुका कर लजाते हुए बोली, ‘‘लड़की हूं न, अपने दिल की बात होंठों पर लाते हुए झिझक होती है.’’

कमलेश ने प्यार से उस की कलाई थाम ली, ‘‘तुम्हारी हां की गवाही तुम्हारी शरम से झुकी आंखें भी दे रही है जीरा. मेरा यकीन करो, मैं ने तुम्हें अपना बनाया तो है रानी बना कर रखूंगा… तुम राज करोगी मेरे दिल पर.’’

जीरा ने आंखें तरेरी, ‘‘तुम्हारी रानी तो मैं तब बनूंगी, जब मुझे ब्याह लोगे. अगर मेरा ब्याह किसी और से हो गया तो मैं तुम्हारी रानी…’’

कमलेश ने जल्दी से उस की बात काट दी, ‘‘गलती से कह दिया पगली, तुम तो हर तरह से मेरी रानी रहोगी, शादी मुझ से हुई तब भी और नहीं हुई तब भी.’’

‘‘शादी तो तुम से ही होगी मेरी.’’ जीरा हंस कर बोली, ‘‘कोई और मुझे ब्याह कर ले जाए, मैं ऐसा होने नहीं दूंगी.’’

‘‘इतना चाहती हो मुझे?’’ कमलेश ने भावविभोर हो कर जीरा को अपने सीने से लगा लिया. क्षणभर के लिए तो जीरा भी कमलेश के सीने से लग कर अपनी सुधबुध भूल गई, लेकिन जल्दी ही वह संभल कर उस से अलग हटते हुए इधरउधर देखने लगी.

‘‘कोई नहीं है जीरा, बस यहां मैं हूं और तुम हो.’’ कमलेश ने अपनी उखड़ी सांसों को व्यवस्थित करते हुए कहा.

‘‘तुम पुरुष हो कमलेश, मैं स्त्री हूं और स्त्री को अपनी सीमा में रहने का पाठ पढ़ाया जाता है. अभी कोई देख लेता तो मेरी बदनामी हो जाती.’’

‘‘आगे से ध्यान रखूंगा जीरा.’’ कमलेश सिर झुका कर धीरे से बोला, ‘‘लेकिन तुम्हें इस बेचैन दिल को सुकून देने का वादा करना पड़ेगा.’’

‘‘स्त्री मन से कुछ छिपा नहीं रहता, वह पुरुष की नजरों को पल भर में पढ़ लेती है. मैं जान चुकी हूं कि तुम मुझे बेइंतहा प्यार करते हो और मुझे धोखा नहीं दोगे. औरत को अगर इतना विश्वास हो जाए तो वह पुरुष को बेझिझक अपना तनमन समर्पित कर देती है. मैं भी तुम्हारी बांहों में समा कर अपना सबकुछ तुम्हें सौंपने को आतुर हूं, लेकिन इस के लिए सही वक्त का इंतजार करना होगा.’’

‘‘ठीक है.’’ कमलेश ने ठंडी आह भर कर कहा, ‘‘मैं उस समय की प्रतीक्षा करूंगा.’’ इस के बाद कमलेश ने जीरा का घास का गट्ठर उठवा दिया. फिर दोनों अपनेअपने रास्ते घर चले गए.

जीरा कमलेश के मन में इस कदर समा गई थी कि वह जब तक दिन में एक बार उस का दीदार नहीं कर लेता था, उसे चैन नहीं पड़ता था. उसे देखे बिना जीरा का खाना भी गले से नीचे नहीं उतरता था. एक ही गांव के होने के कारण, कभी गली, कभी तालाब तो कभी खेत में उन्हें एकदूसरे का दीदार करने का अवसर मिल ही जाता था. वह एकदूसरे को देख कर आंखों की प्यास बुझा लेते थे, लेकिन उन के तन की प्यास उन्हें बेचैन कर रही थी.

एक दिन कमलेश को अपने खेत से लौटते वक्त देर हो गई. सांझ ढल गई थी और हलका अंधेरा जमीन पर उतर आया था. तभी एकाएक आसमान में काले बादलों के साए मंडराए और देखते ही देखते तेज बारिश होने लगी. कमलेश तेजी से दौड़ पड़ा. अभी वह कुछ ही दूर पहुंचा था कि उसे बरगद के पेड़ के नीचे जीरा नजर आई. वह पेड़ के नीचे खड़ी बारिश से बचने का प्रयास कर रही थी. वहां दूरदूर तक कोई नहीं था. कमलेश दौड़ता हुआ जीरा के पास पहुंच गया.

‘‘आज तुम्हें देर हो गई जीरा?’’ कमलेश ने सिर का पानी पोंछते हुए जीरा के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा तो जीरा उस के करीब सरक आई. ‘‘आज तुम्हारे लिए मैं ने देर कर दी है. मुझे मालूम था तुम अभी खेत में ही हो.’’

‘‘तुम्हारा इरादा नेक नहीं है?’’ कमलेश उस के और करीब आ कर फुसफुसाया.

‘‘तुम्हारा कौन सा नेक है.’’ जीरा को अपनी आवाज हलक में फंसती महसूस हुई. दोनों अब इतना करीब थे कि उन्हें एकदूसरे के दिलों की धड़कनें स्पष्ट सुनाई देने लगीं. कमलेश ने अपनी बांहों को आगे बढ़ाया तो जीरा उन में सिमट गई. तूफानी बारिश में दोनों के जिस्म सुलगने लगे. कमलेश ने जीरा का चेहरा दोनों हथेलियों में समेट कर उस के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

जीरा की पूरी काया कसमसा उठी, वह कमलेश से कस कर लिपट गई. कमलेश ने उसे जकड़ लिया और अपने में समेटने लगा. जीरा ने अपना तन ढीला कर के मौन स्वीकृति दी तो कमलेश उसे ले कर जमीन पर झुकता चला गया. उस बारिश में दो तन एक हुए तो दोनों की आंखों में अजीब चमक और चेहरे पर तृप्ति के भाव थे. उस दिन के बाद जीरा अकसर खेतों से घर लौटने में देर करने लगी. कमलेश के साथ प्यार का अनैतिक खेल खेलने के लिए जीरा ने उपयुक्त स्थान और समय खोज निकाला था. सांझ के धुंधलके में जब खेतों में सन्नाटा व्याप्त हो जाता था, दोनों प्रेमी अपने तनमन की प्यास बुझाते थे.

जैसेजैसे यह खेल आगे बढ़ रहा था, उन के प्यार का बंधन भी मजबूत होता जा रहा था. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां है? एक दिन कमलेश और जीरा को एक आदमी ने बरगद के पेड़ के नीचे आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो बात जीरा के बाप को पता लगने में देर नहीं लगी. जीरा की पिटाई तो हुई ही, उस के घर से बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई. जीरा के बाप ने आननफानन में उस के लिए वर की तलाश की और उसे शादी के बंधन में बांध कर राधोपुर से खिदिरपुर भेज दिया. जीरा चाह कर भी विरोध नहीं कर पाई. सब कुछ इतनी जल्दी से हुआ कि कमलेश भी मूकदर्शक बना रह गया.

2 प्यार करने वालों के दरमियान समाज ने एक ऐसी रेखा खींच दी, जिसे लांघना जीरा और कमलेश के लिए नामुमकिन तो नहीं था, लेकिन मुश्किल जरूर था. उधर जीरा लोकलाज के डर से ससुराल में अपने मन पर पत्थर रख कर बैठ गई. प्रेमिका की जगहंसाई न हो, इसलिए कमलेश भी खामोश हो कर रह गया. लेकिन अधिक समय तक ऐसा नहीं हो सका. 2 दिलों में धधक रही प्रीत और कामना की ज्वाला ने सारे बंधन तोड़ डाले. एक दिन जीरा ने ही कमलेश को अपनी ससुराल आने का न्योता दे दिया. कमलेश को उस ने ससुराल वालों के सामने मुंहबोले भाई के रूप में पेश कर दिया. परिणामस्वरूप जीरा की ससुराल में कमलेश की खूब आवभगत हुई. इसी की आड़ में कमलेश और जीरा की देह का मिलन भी हुआ.

दोनों तृप्त हुए तो इस रिश्ते की आड़ में कमलेश बारबार खिदिरपुर आने लगा. धीरेधीरे पहले गांव में, फिर जीरा की ससुराल वालों में भी इस रिश्ते को ले कर चर्चाएं होने लगीं. इन चर्चाओं में विश्वास कम, शक अधिक था. जीरा और कमलेश को इस की भनक लगी तो दोनों घर से भाग गए. कमलेश अपनी प्रेमिका जीरा को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस ने एक वर्ष तक जीरा को पत्नी के रूप में रखा. उस ने किराए का कमरा ले लिया था और एक कंपनी में काम करने लगा था. यह बात 2013 की है.

इधर जीरा के ससुराल वाले खुद और पुलिस की मदद से उन दोनों की तलाश करते रहे और अंत में दोनों को दिल्ली से ढूंढ़ निकाला. पुलिस उन्हें पकड़ कर खिदिरपुर ले आई. जीरा ने कोतवाली जमानियां में बयान दे कर कहा कि वह खुद कमलेश को ले कर दिल्ली गई थी. इस तरह उस ने कमलेश को सजा से तो बचा लिया, लेकिन पुलिस के और ससुराल वालों के समझाने पर उस ने कसम खाई कि अब वह पति की वफादार बन कर रहेगी. उस ने कमलेश को स्पष्ट रूप से कह दिया कि अब वह उस की वैवाहिक जिंदगी में दखल देने की कोशिश न करें, वह उसे भूल कर अपना विवाह कर ले और पत्नी के साथ राधोपुर में रहे.

कमलेश ने इसे प्यार भरी झिड़की समझ कर एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. वह थोड़े दिनों तक तो शांत रहा, लेकिन फिर जीरा की याद आई तो शराब पी कर उस की ससुराल खिदिरपुर पहुंच गया. जीरा घर में अकेली मिली, उस ने कमलेश को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन कमलेश अपनी मनमानी कर के ही वहां से गया. ऐसा बारबार होने लगा. यह बात जीरा की ससुराल वालों को मालूम हुई तो वह कमलेश को सबक सिखाने की योजना बनाने लगे. जीरा भी चाहती थी कि कमलेश को अब उस की वैवाहिक जिंदगी से दूर कर दिया जाए. इस परिवार के पड़ोस में प्यारेलाल रहता था, वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. उसी ने अपने फोन से जीरा की बात कमलेश से करवाई.

योजना के अनुसार जीरा ने उस दिन एक प्रेमिका का सच्चा अभिनय किया. उस ने मोबाइल पर कमलेश का नंबर मिला कर सुरीली आवाज में कहा, ‘‘कमलेश मैं तुम्हारी जीरा बोल रही हूं, कैसे हो तुम?’’

‘‘तुम पूछ रही हो जीरा,’’ कमलेश गहरी सांस भर कर बोला, ‘‘मैं तो तुम्हारे प्रेम के सहारे जिंदा रहना चाहता था, लेकिन तुम ही बेवफाई पर उतर आई हो. तुम्हारे पास आता हूं तो तुम बेरुखी से मुंह मोड़ लेती हो. अब तुम मेरी वाली जीरा नहीं रह गई.’’

‘‘नहीं कमलेश, जीरा तुम्हारी थी, तुम्हारी ही रहेगी.’’ जीरा गंभीर हो कर बोली, ‘‘मुझे अपनी ससुराल वालों के दबाव में तुम से बेरुखी करनी पड़ी थी. लेकिन वह सब नाटक था, हकीकत नहीं. मैं तुम्हें आज भी बहुत चाहती हूं.’’

‘‘सच,’’ कमलेश खुश हो कर बोला, ‘‘कहो कैसे फोन किया?’’

‘‘आज घर के सब लोग एक शादी में जा रहे हैं, तुम रात को खिदिरपुर आ जाओ, खूब मौजमस्ती करेंगे.’’

‘‘मैं आऊंगा जीरा, तुम दरवाजा खुला रखना.’’ कमलेश खुशी से चहका और फोन बंद कर के खिदिरपुर जाने की तैयारी करने लगा. उस दिन 22 जुलाई, 2015 का दिन था.

रात गहराने पर कमलेश ने जीरा के दरवाजे पर पहुंच कर हलकी सी दस्तक दी और हौले से दरवाजा धकेला. दरवाजा खुद ही अंदर की तरफ खुल गया. कमलेश के दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं. वह उस पल की कल्पना कर के ही रोमांचित होने लगा, जब जीरा उस की बांहों के समाने वाली थी. अब वह पल बहुत करीब था. कमलेश ने उन्माद में अपने कदम आगे बढ़ा दिए. छोटी सी गली पार कर के जैसे ही उस ने आंगन में कदम रखा, उस के सिर पर एक भरपूर प्रहार हुआ. उस के मुंह से दर्दभरी हलकी चीख निकली और वह लहराता हुआ नीचे झुकता चला गया. बस इस के बाद उस पर रौड और डंडों से वार पर वार होने लगे. अचेत अवस्था में ही इस जानलेवा हमले में कब उस के प्राण निकल गए, पता ही नहीं चला. कुछ देर बाद हमलावरों का जुनून शांत हुआ तो जीरा की सास संधारी ने कमलेश की सांसे टटोलीं.

‘‘मर गया कमीना.’’ वह नफरत से थूकती हुई बोली.

‘‘हमारे रास्ते का कांटा निकल गया, चलो अब इसे ठिकाने लगा देते हैं.’’ जीरा के पति करिमन उर्फ करिया यादव ने अपने पास खड़ी अपनी पत्नी जीरा और मां संधारी की तरफ देख कर कहा.

इस के बाद 22 जुलाई की रात में ही उन लोगों ने कमलेश की लाश को पास के गांव ताजपुर माझा में सिट्टू राय के खेत की झाड़ी में ले जा कर छिपा दिया. उन्हें लगा था, दूसरे गांव में इस की पहचान नहीं हो पाएगी तो मामला रफादफा हो जाएगा. लेकिन कोतवाली जमानियां के प्रभारी अवधेश नारायण सिंह ने पहली इन्वैस्टीगेशन में ही कातिलों के गिरेबान पर हाथ डाल दिया. बेशक करिमन यादव भाग निकला, लेकिन थानाप्रभारी को विश्वास था कि वह जल्द ही पकड़ में आ जाएगा. प्यारेलाल को भी पकड़ लिया गया था.

कमलेश की हत्या का जुर्म जीरा और संधारी देवी कबूल कर चुकी थीं. थानाप्रभारी सिंह ने कमलेश के पिता रामविलास यादव को वादी बना कर हत्यारों के नाम एक तहरीर लिखवा ली और उन के विरुद्ध अपराध भा.दं.वि. की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर के तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कमलेश की हत्या में शामिल प्यारेलाल पकड़ में आ गया था, जबकि करिमन की तलाश जारी थी. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित