UP News: मांगा सिंदूर मिली मौत

UP News: रचना की मांग में सिंदूर भले ही पति शिवराज के नाम का होता था, लेकिन वह प्रेमी संजय पटेल को ही पति मानती थी. वह प्रेमी के लिए तनमन से पूरी तरह समर्पित थी. पति शिवराज की मौत के बाद रचना ने संजय पर शादी का दबाव डाला तो ऐसी घटना घटी, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

संजय के लिए रचना से विवाह रचाना नामुमकिन था. वह गांव का पूर्वप्रधान था. गांव में उस की प्रतिष्ठा थी. रचना से विवाह कर वह अपनी मानमर्यादा को मिट्टी में नहीं मिलाना चाहता था, अत: उस ने रचना से पीछा छुड़ाने की सोची. मन में यह विचार आते ही संजय को रिश्ते के भतीजे संदीप पटेल व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार की सुध आई. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे. एक शाम संजय ने भतीजे संदीप और उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार से मुलाकात कर रचना से छुटकारा दिलाने में मदद की गुहार की.

रुपयों के लालच में वे दोनों राजी हो गए. इस के बाद संजय ने संदीप व प्रदीप की मदद से रचना की हत्या करने व उस की लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. संजय ने रचना की मौत का सौदा एक लाख रुपए में किया और प्रदीप को 15 हजार रुपए पेशगी दे दी. शेष रकम काम होने के बाद देने का वादा किया. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के किशोरपुरा गांव निवासी विनोद पटेल पशुओं का चारा काटने अपने महेबा रोड स्थित खेत पर पहुंचा. वहां खेत किनारे बने कुएं से तेज बदबू आ रही थी. उस ने कुएं में झांक कर देखा तो कुएं के पानी में 2 बोरियां तैर रही थीं.

विनोद ने अपने खेत के कुएं में पड़ी 2 बोरियों से तेज बदबू आने की सूचना थाना टोड़ी फतेहपुर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ अतुल कुमार राजपूत पुलिस बल के साथ किशोरपुरा गांव के बाहर स्थित विनोद के कुएं पर जा पहुंचे. उस समय वहां ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. एसएचओ अतुल कुमार राजपूत ने पुलिसकर्मियों व ग्रामीणों की मदद से दोनों बोरियों को कुएं से बाहर निकलवाया. बोरियां खोली गईं तो सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. प्लास्टिक की एक बोरी में महिला की लाश का गरदन से ले कर कमर तक का हिस्सा था, जबकि दूसरी बोरी में कमर से ले कर जांघ तक का हिस्सा था.

इस के बाद कुएं को खाली कराया गया तो उस में एक बोरी और मिली, जिस में कटा हुआ एक हाथ था. कलाई में लाल रंग का धागा बंधा हुआ था. महिला का सिर और पैर अब भी नहीं मिले थे. बिना सिर के लाश की शिनाख्त होनी मुश्किल थी. बोरियों में शव के टुकड़ों के साथ ईंटपत्थर भी भरे गए थे, ताकि बोरियां पानी में उतरा न सकें. इंसपेक्टर अतुल कुमार ने टुकड़ों में विभाजित महिला की लाश मिलने की सूचना पुलिस के आला अधिकारियों को दी तो कुछ देर बाद ही एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार तथा सीओ (सिटी) अनिल कुमार राय घटनास्थल आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मृतका के अन्य अंगों की खोज में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन सफलता नहीं मिली तो बरामद अंगों को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल झांसी भेज दिया. 72 घंटे बाद भी शव की शिनाख्त न होने पर उन का पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने अज्ञात में दाह संस्कार कर दिया गया. एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने महिला के इस ब्लाइंड मर्डर को बड़ी गंभीरता से लिया और उस की शिनाख्त व हत्याकांड के खुलासे के लिए एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार व सीओ अनिल कुमार की देखरेख में 18 टीमें गठित कीं.

टीम में टोड़ी फतेहपुर थाने के एसएचओ अतुल राजपूत, स्वाट प्रभारी जितेंद्र तक्खर, सर्विलांस टीम से दुर्गेश कुमार, रजनीश तथा तेजतर्रार दरोगा रजत सिंह, शैलेंद्र, हर्षित आदि को शामिल किया गया. टीम में शामिल पुलिसकर्मियों ने आंगनबाड़ी गु्रप, ग्राम पंचायत गु्रप, आशा वर्कर तथा राशन कोटेदारों का भी सहयोग लिया. 500 से अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाले. इतनी मशक्कत के बाद भी शव की पहचान नहीं हो पाई. अब तक यह मामला डीआईजी (झांसी रेंज) केशव चौधरी के संज्ञान में भी आ गया था. अत: उन्होंने इस ब्लाइंड मर्डर केस को जल्द से जल्द खोलने व हत्यारों को पकडऩे का आदेश एसपी व एसएसपी को दिया. इस आदेश के बाद पुलिस और भी सक्रिय हो गई.

इधर एसपी (ग्रामीण) की टीम भी जांच में जुटी थी. शव के टुकड़े जिन बोरियों में पाए गए थे, वे खाद की बोरियां थीं. उन पर कृभको लिखा था, लेकिन कोड नंबर साफ नजर नहीं आ रहा था. टीम यह जानना चाहती थी कि बोरी किस सहकारी समिति से खरीदी गईं और यह किस गांव के किसान ने खरीदी थीं. जांच के लिए टीम ने खाद की कई सहकारी समितियों से संपर्क किया, लेकिन कोड नंबर स्पष्ट न होने से कोई खास जानकारी हासिल न हो सकी. टीम ने बोरी से बरामद ईंट की मिट्टी का भी परीक्षण कराया तो जांच में टोड़ी फतेहपुर की मिट्टी पाई गई. जांच से यह बात स्पष्ट हो गई कि महिला टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के ही किसी गांव की हो सकती है.

इसी बीच मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के थाना चंदेरा के मैलवारा गांव निवासी दीपक यादव को किसी महिला के कटे अंग मिलने की खबर लगी. उस की बहन रचना भी 8 दिनों से गायब थी. 19 अगस्त, 2025 की सुबह 10 बजे दीपक यादव गांव के सरपंच मोनू यादव के साथ थाना टोड़ी फतेहपुर पहुंचा. उस ने इंसपेक्टर अतुल राजपूत को बताया कि उस की बहन रचना यादव इसी थाना क्षेत्र के महेबा गांव निवासी शिवराज यादव को ब्याही थी. शिवराज की मौत हो चुकी है.

इन दिनों रचना महेबा गांव के ही पूर्वप्रधान संजय पटेल के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. 8 अगस्त को उस ने रचना से बात करने की कोशिश की थी. वह किसी अस्पताल में भरती थी. बात करने के दौरान पूर्वप्रधान संजय पटेल ने रचना के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया और मुझे धमकाया कि फोन मत किया करो. 2 रोज बाद फोन किया तो संजय बोला कि मैं ने तेरी बहन को मार डाला है. यह सुन कर उसे लगा कि वह गुस्से व नशे में बात कर रहा है. लेकिन अब लग रहा है कि संजय पटेल ने उसे सचमुच मार डाला है. आप सच्चाई का पता लगाइए. दीपक यादव की बात सुन कर एसएचओ अतुल राजपूत ने रचना का फोन नंबर सर्विलांस पर लगाया. इस से पता चला कि रचना और पूर्वप्रधान संजय के बीच बातचीत होती रहती थी.

इस के बाद पुलिस टीम महेबा गांव पहुंची. वहां ग्रामीणों से पता चला कि रचना और पूर्व ग्राम प्रधान संजय के बीच अफेयर है. अब रचना लापता है. पुलिस टीम ने 20 अगस्त की रात नाटकीय ढंग से संजय पटेल व उस के भतीजे संदीप को टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के लखेरी बांध के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने पर उन्होंने रचना की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. संजय की निशानदेही पर पुलिस टीम ने हत्या में प्रयुक्त कार व मृतका रचना का मोबाइल फोन भी संजय के घर से बरामद कर लिया. संजय पटेल व संदीप को थाने लाया गया. थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस ने अपने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप के साथ मिल कर रचना की हत्या की थी. फिर उस ने शव के 7 टुकड़े कर 4 बोरियों में भरे थे. 3 बोरियां कुएं में फेंक दी थी तथा चौथी बोरी लखेरी नदी में डाल दी थी.

संजय व संदीप की निशानदेही पर पुलिस ने लखेरी नदी में नाव से सर्च औपरेशन चलाया और रचना का सिर, पैर व एक हाथ भी बरामद कर लिया. ये अंग भी बोरी में भरे गए थे. बरामद अंगों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए झांसी के जिला अस्पताल भेज दिया. अभी तक पुलिस टीम ने 2 आरोपियों को तो गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन तीसरा आरोपी प्रदीप अहिरवार फरार था. 21 अगस्त, 2025 की रात 10 बजे पुलिस टीम ने एक मुठभेड़ के बाद प्रदीप अहिरवार को भी गिरफ्तार कर लिया. मुठभेड़ के दौरान उस के पैर में गोली लगी थी. कातिलों के पकड़े जाने के बाद डीआईजी केशव कुमार चौधरी, एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने झांसी पुलिस सभागार में एक संयुक्त प्रैस कौन्फ्रैंस कर रचना यादव हत्याकांड का खुलासा किया.

कातिलों को पकडऩे वाली पुलिस टीम पर आला कमान अधिकारियों ने इनामों की खूब बौछार की. डीआईजी केशव चौधरी ने टीम को 50 हजार रुपए नकद इनाम देने की घोषणा की. एसएसपी ने 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को दिया. वहीं एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने भी 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को पुरस्कार के रूप में दिए. चूकि कातिलों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: एसएचओ अतुल राजपूत ने मृतका रचना के भाई दीपक यादव की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) तथा 201(3)(5) के तहत संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

रचना कौन थी? वह संजय पटेल के संपर्क में कैसे आई? संजय ने उस की हत्या क्यों और कैसे कराई? यह सब जानने के लिए रचना के अतीत की ओर झांकना होगा. मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के चंदेरा थाना अंतर्गत एक गांव है मैलवारा. इसी गांव में फूलसिंह यादव सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी लौंगश्री के अलावा एक बेटा दीपक तथा बेटी रचना थी. फूलसिंह प्राइवेट नौकरी करता था. फूलसिंह की बेटी रचना खूबसूरत थी. 16 बसंत पार करने के बाद जब उस ने जवानी की डगर पर पैर रखा तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया. जो भी उसे देखता, मंत्रमुग्ध हो जाता. रचना खूबसूरत तो थी, लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं था. जैसेतैसे कर के उस ने दसवीं की परीक्षा पास की फिर घर के काम में मम्मी का हाथ बंटाने लगी.

फूल सिंह ने रचना की शादी टीकमगढ़ शहर के मोहल्ला सलियाना में रहने वाले जयकरन यादव से कर दी. वह तहसील में काम करता था. उस के 2 अन्य भाई थे, जो पन्ना शहर में नौकरी करते थे. शादी के बाद ससुराल में रचना के हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच वह 2 बेटियों की मां बन गई. बेटियों के जन्म के बाद जब खर्च बढ़ा तो घर में आर्थिक परेशानी रहने लगी. घर खर्च को ले कर रचना व जयकरन के बीच झगड़ा होने लगा. धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच इतना मनमुटाव बढ़ गया कि रचना अपनी दोनों मासूम बेटियों को पति के हवाले कर मायके में आ कर रहने लगी.

मायके में कुछ समय तो उस का ठीक से बीता, उस के बाद घरपरिवार के लोगों के ताने मिलने लगे. भाई दीपक को भी रचना का ससुराल छोड़ कर मायके में रहना नागवार लगता था. गांव में उस की बदनामी होने लगी थी. घरपरिवार के तानों से परेशान रचना ने जैसेतैसे 2 साल मायके में बिताए. उस के बाद एक रिश्तेदार के माध्यम से रचना ने शिवराज यादव से विवाह कर लिया. शिवराज यादव झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के गांव महेबा का रहने वाला था. वह किसान था. उस के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी. वह अपने बड़े भाई रघुराज के साथ रहता था.

शादी रचाने के बाद रचना अपने दूसरे पति शिवराज के साथ महेबा गांव में रहने लगी. रचना स्वच्छंद स्वभाव की थी. उसे घूंघट में रहना पसंद न था, अत: वह न जेठ से परदा करती थी और न ही बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से. उस की अपनी जेठानी से भी नहीं पटती थी. घरेलू कामकाज को ले कर दोनों में अकसर तूतूमैंमैं होती रहती थी. रचना को संयुक्त परिवार में रहना पसंद न था, अत: वह पति पर अलग रहने का दबाव बनाने लगी. घर और जमीन के बंटवारे को ले कर रचना और शिवराज के बीच मनमुटाव शुरू हो गया. दोनों के बीच झगड़ा व मारपीट होने लगी. बंटवारे को ले कर रचना की कहासुनी जेठजेठानी से भी होने लगी.

अत: उस ने जेठ रघुराज पर इलजाम लगाना शुरू कर दिया कि वह उस पर बुरी नजर रखता है. 25 मई, 2023 की शाम रेप हत्या के इलजाम को ले कर रचना का जेठजेठानी व पति से झगड़ा हुआ. तीनों ने मिल कर रचना की जम कर पिटाई की. इस पिटाई ने आग में घी डालने जैसा काम किया. सुबह होते ही रचना थाना टोड़ी फतेहपुर में जेठ व पति के खिलाफ रेप व हत्या की कोशिश करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने रचना के जेठ रघुराज व पति शिवराज को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस घटना के बाद रचना का ससुराल में रहना संभव न था, अत: वह एक बार फिर मायके आ गई. उस ने अपने भाई दीपक के सामने आंसू बहाए तो उस ने बहन को घर में शरण दे दी.

रचना के रेप व हत्या के प्रयास का मामला झांसी के गरौठा कोर्ट में शुरू हो चुका था. केस की पैरवी हेतु रचना को कोर्ट आना पड़ता था. गरौठा कोर्ट आतेजाते ही एक रोज रचना की मुलाकात संजय पटेल से हुई. दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे. जिस महेबा गांव में रचना की ससुराल थी, संजय पटेल भी उसी गांव का रहने वाला था. वह गांव का प्रधान भी रह चुका था. रचना और संजय की दोस्ती हो गई. दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. संजय अब रचना के केस की पैरवी करने लगा और उस की आर्थिक मदद भी करने लगा.

संजय नहीं चाहता था कि उस की प्रेमिका रचना उस से दूर मायके में रहे, अत: उस ने झांसी के गुरदासपुर में एक मकान किराए पर लिया और रचना को इस मकान में शिफ्ट कर दिया. संजय ने मकान में सारी सुविधाएं भी मुहैया करा दीं. इस के बाद रचना और संजय इस किराए के मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. रचना जो भी डिमांड करती, संजय उस डिमांड को पूरी करता. उस ने गहनोंकपड़ों से रचना को लाद दिया था. लाखों रुपए नकद भी दे चुका था. संजय पटेल शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. बड़ा बेटा 20 वर्ष की उम्र पार कर चुका था, लेकिन रचना से नाजायज रिश्ता जोडऩे के बाद उसे अपनी पत्नी ममता फीकी लगने लगी थी.

ममता को जब पता चला कि पति संजय व गांव के शिवराज की पत्नी रचना के बीच नाजायज रिश्ता है तो उसे अपना व बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस ने दोनों के नाजायज संबंधों का जम कर विरोध किया. घर में कलह मचाई, लेकिन वह सफल नहीं हो पाई. संजय और रचना के संबंध आम हो गए थे. शिवराज यादव को जब पत्नी रचना के नाजायज संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने माथा पीट लिया. वह पहले भी उस के परिवार को बदनाम कर चुकी थी, लेकिन अब तो उस ने हद ही कर दी थी. पत्नी के कृत्य से वह इतना टूट गया कि बीमार पड़ गया. जून, 2025 की 10 तारीख को उस की बीमारी के चलते मौत हो गई.

पति की मौत के बाद रचना विधवा हो गई, लेकिन रचना को विधवा कहलाना तथा विधवा का जीवन बिताना मंजूर नहीं था. एक शाम संजय पटेल अपनी प्रेमिका रचना से मिलने आया तो वह उदास बैठी थी. संजय ने उदासी का कारण पूछा तो वह बोली, ”संजय, तुम्हें तो पता ही है कि मैं विधवा हो गई हूं. लोग मुझे विधवा की नजर से देखें, यह मुझे पसंद नहीं है.’’

”तो तुम चाहती क्या हो?’’ संजय ने रचना से पूछा.

रचना बोली, ”संजय, तुम मेरी मांग में सिंदूर भर कर मुझे अपनी पत्नी बना लो. शेष जीवन मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूं.’’

रचना की बात सुन कर संजय को लगा कि जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. वह असमंजस की स्थिति में बोला, ”रचना, मैं कपड़ा, गहना, रुपयापैसा जैसी तुम्हारी हर डिमांड को पूरा कर रहा हूं. फिर यह सिंदूर जैसी अटपटी डिमांड क्यों?’’

रचना तुनक कर बोली, ”तुम्हें मेरी डिमांड अटपटी लग रही है. औरत का सब से कीमती गहना उस का सिंदूर होता है. वही मैं तुम से मांग रही हूं. सिंदूर के आगे बाकी सारी सुविधाएं फीकी हैं.’’

”रचना, मैं शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप हूं. तुम्हारी मांग में सिंदूर भर कर मैं अपनी पत्नी से विश्वासघात नहीं कर सकता.’’ संजय ने समझाया.

”जब मेरे साथ रात बिताते हो, मेरे शरीर को रौंदते हो, तब तुम पत्नी के साथ विश्वासघात नहीं करते. सिंदूर की मांग की तो मुझे विश्वासघात का पाठ पढ़ा रहे हो. मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूंगी. तुम्हें मेरी मांग में सिंदूर भर कर पत्नी का दरजा देना ही होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन सिंदूर की बात को ले कर रचना और संजय में तकरार होने लगी. संजय जब भी रचना से मिलने जाता, वह मांग में सिंदूर भरने और पत्नी का दरजा देने का दबाव बनाती. रचना अब उसे ब्लैकमेल करने पर उतर आई थी. रचना ने शादी की जिद पकड़ी तो संजय घबरा उठा. उस ने रचना को बहुत समझाया, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस ने रचना को खत्म करने का निश्चय किया. इस के लिए उस ने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार को चुना. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे.

संदीप झांसी के बिजौली कस्बे में रहता था और एक फैक्ट्री में काम करता था. साल 2022 में उस ने एक महिला की हत्या की थी. हत्या के मामले में वह जेल गया था, जेल में ही संदीप की दोस्ती प्रदीप से हुई थी. प्रदीप अहिरवार मूलरूप से झांसी के थाना गरौंठा के गांव पसौरा का रहने वाला था, लेकिन मऊरानीपुर में किराए पर रहता था. वह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहता था. संजय पटेल ने संदीप व प्रदीप अहिरवार से संपर्क कर रचना की मौत का सौदा किया. फिर हत्या करने व लाश को ठिकाने लगाने तथा किसी भी सूरत में पकड़े न जाने का प्लान बनाया.

संजय व उस के साथी रचना की हत्या करते, उस के पहले ही रचना 6 अगस्त, 2025 को बीमार पड़ गई. संजय ने उसे झांसी के प्राइवेट अस्पताल रामराजा में भरती कराया. रचना को ब्लीडिंग हो रही थी. 2 दिन में रचना ठीक हो गई. 8 अगस्त को संजय उसे डिस्चार्ज करा कर घर लाने पहुंचा तो वह बोली, ”यहीं से कोर्ट चलो. शादी करने के बाद ही घर में जाएंगे.’’ संजय ने उसे समझाया, लेकिन वह मान नहीं रही थी. संजय ने तब रचना को ठिकाने लगाने की ठान ली. उस ने संदीप से बात की और उसे अस्पताल बुला लिया. संदीप ने तब दोस्त प्रदीप से बात की और उसे तैयार रहने को कहा. उस ने तेजधार वाली कुल्हाड़ी का इंतजाम करने की भी बात प्रदीप से कही.

सब कुछ तय होने के बाद संजय ने रचना को 9 अगस्त, 2025 की शाम 5 बजे अस्पताल से डिस्चार्ज कराया. हालांकि वह डिस्चार्ज होने से मना कर रही थी, लेकिन जब संजय ने दूसरे रोज 10 अगस्त को शादी करने का वचन दिया तो वह मान गई. संजय की कार अस्पताल के बाहर ही खड़ी थी. वह कार की पीछे की सीट पर बैठ गई. उस के बगल में संजय भी बैठ गया. संदीप कार ले कर हाइवे पर आया तो संजय बोला, ”रचना, तुम इतने दिन अस्पताल में रही, तुम्हारा मन खराब हो गया होगा. थोड़ा घूम कर आते हैं.’’

लगभग एक घंटा सफर के बाद संजय मऊरानीपुर हाइवे पहुंचा. यहां प्रदीप अहिरवार उस का पहले से इंतजार कर रहा था. उस ने प्लास्टिक बोरी में लिपटी कुल्हाड़ी कार की डिक्की में रखी. फिर आगे की सीट पर संदीप के बगल में आ कर बैठ गया. इस के बाद यह लोग घूमते रहे. एक जगह रुक कर संजय ने शराब खरीदी और तीनों ने मिल कर कार के अंदर ही शराब पी. घूमते हुए सभी लहचूरा बांध पर कार ले कर पहुंचे. अब तक अंधेरा हो गया था. वहां सन्नाटा छाया था. प्रदीप कार में बैठी रचना से बोला, ”भाभी, तुम कितनी भी जिद कर लो, लेकिन संजय भैया तुम से शादी नहीं करेंगे.’’

इतना सुनते ही रचना भड़क गई और प्रदीप से बोली, ”तुम कौन होते हो यह सब कहने वाले?’’

रचना ने संजय से पूछा तो उस ने भी कह दिया कि प्रदीप ठीक बोल रहा है. वह उस से शादी नहीं कर सकता. तब रचना गुस्से से बोली, ”मैं क्या सिर्फ मजे लेने के लिए हूं. शहर वापस चलो. तुम सब को देख लूंगी. सब के दिमाग ठिकाने लग जाएंगे.’’

रचना की धमकी सुनते ही संदीप व प्रदीप ने उसे दबोच लिया और संजय ने कार में ही गला घोंट कर रचना को मार डाला. शव में पत्थर बांध कर लहचूरा डैम में फेंकने गए तो वहां पुलिस की गाड़ी खड़ी थी. कार में लाश थी, इसलिए तीनों वहां से भाग निकले. फिर वह लाश फेंकने खजूरी नदी पहुंचे, लेकिन वहां गार्ड था, इसलिए शव को नहीं फेंक सके. आधी रात को संजय साथियों के साथ किशोरपुरा गांव पहुंचा. गांव के बाहर सड़क किनारे उस ने कार रोकी. यहां खेत के पास कुआं था. तीनों ने मिल कर रचना के शव को कार से निकाला और कुएं में फेंकने को ले आए. लेकिन यहां से संजय का गांव महेबा मात्र 5 किलोमीटर दूर था, जिस से शव की पहचान हो सकती थी. अत: उन्होंने समूचा शव कुएं में नहीं फेंका.

शातिर अपराधी प्रदीप कार से कुल्हाड़ी ले आया, फिर रचना के शव के 7 टुकड़े किए. शव के अंगों को 4 बोरियों में भरा गया. बोरियां पानी में न उतराएं, इस के लिए बोरियों में ईंटपत्थर भी भर दिए. फिर बोरियों का मुंह बांध कर 3 बोरियां कुएं में फेंक दीं और चौथी बोरी जिस में सिर व पैर थे, कार में रख कर वहां से 7 किलोमीटर दूर रेवन गांव के पास लखेरी नदी के पुल पर आए. इस के बाद पुल के नीचे नदी में बोरी फेंक दी. शव को ठिकाने लगाने के बाद संजय ने कार से प्रदीप को मऊरानीपुर तथा संदीप को विजौली पहुंचाया, फिर खुद कार ले कर अपने गांव महेबा आ गया.

संजय को विश्वास था कि उस का अपराध उजागर नहीं होगा, लेकिन यह उस की भूल थी. भीषण बरसात के कारण कुएं का जलस्तर बढ़ा तो बोरियां उतराने लगीं. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर किशोरपुरा गांव का विनोद पटेल चारा काटने खेत पर गया तो कुएं में बोरियां उतराती दिखीं और उन से दुर्गंध भी आ रही थी. उस ने सूचना पुलिस को दी. पूछताछ करने के बाद 23 अगस्त, 2025 को पुलिस ने आरोपी संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार को झांसी कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. UP New

 

UP Crime: 70 करोड़ के लिए पेरेंट्स और वाइफ का मर्डर

UP Crime: लालची व अय्याश विशाल सिंघल अपनी पत्नी और मम्मी की हत्या कर बीमा कंपनियों से लगभग सवा करोड़ का क्लेम पा चुका था. हिम्मत बढ़ गई तो उस ने अपने पापा मुकेश सिंघल की भी योजनानुसार हत्या कर दी. वह उन की 64 बीमा पौलिसियों के 70 करोड़ रुपए का क्लेम हासिल करने की काररवाई कर रहा था, लेकिन उस से पहले उस की चौथी पत्नी श्रेया सामने आ गई. फिर इस के बाद जो हुआ…

उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के मोहल्ला गंगानगर के रहने वाले मुकेशचंद सिंघल पेशे से फोटोग्राफर थे. बाजार में उन की अपना फोटो स्टूडियो था. वह दुकान संभालते थे तो पत्नी प्रभा देवी घर संभालती थीं. उन का एक ही बेटा था विशाल, जो उन्हीं के साथ कभीकभार दुकान पर बैठता था. बाकी आवारागर्दी करता था. विशाल ने इसी साल 2025 के अप्रैल महीने में 39 करोड़ रुपए का बीमा क्लेम किया था, जिस में उस ने बताया था कि उस के पापा मुकेश सिंघल 27 मार्च, 2025 को दोपहर को यूपी के गढग़ंगा यानी गढ़मुक्तेश्वर से लौट रहे थे, तब एक अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी थी, जिस में उन की मौत हो गई थी. एक बीमा कंपनी से उसे डेढ़ करोड़ रुपए मिल भी गए थे.

लेकिन निवा बूपा हेल्थ कंपनी ने क्लेम किए गए रुपए देने से पहले जांच शुरू कर दी. जांच में पता चला कि पिछले 8 सालों में विशाल की पत्नी, मम्मी और पापा की मौत हादसों में हुई थी. 22 जून, 2017 को विशाल की मम्मी प्रभा देवी की मौत हापुड़ में रोड एक्सीडेंट में हुई थी. विशाल ने पुलिस को बताया था कि वह मम्मी प्रभा देवी को ले कर बाइक से जा रहा था, तभी अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी थी. इस हादसे में उसे भी चोटें आई थीं, जबकि मम्मी की मौत हो गई थी. पुलिस ने इस दुर्घटना की जांच कर के फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी. उस के बाद विशााल को प्रभा देवी की बीमा के 25 लाख रुपए मिल गए थे.

इस के बाद साल 2022 में विशााल की पत्नी एकता की संदिग्ध अवस्था में मौत हो गई थी. वह करीब एक सप्ताह तक मेरठ के प्रमुख आनंद अस्पताल में भरती रही थी. बीमारी से मौत दिखा कर विशाल ने एकता की बीमा के 80 लाख रुपए ले लिए थे. पहली अप्रैल, 2025 को विशााल ने अपने पापा मुकेश सिंघल को मेरठ के आनंद अस्पताल में भरती कराया था. अगले दिन यानी 2 अप्रैल को उन की मौत हो गई थी. विशाल के अनुसार उस के पापा गढग़ंगा से आते समय दुर्घटनाग्रस्त हुए थे. मौत की वजह उन के सिर की गहरी चोटें थीं. मुकेश सिंघल के नाम कुल 64 बीमा पौलिसी थीं, जिन की कीमत 50 करोड़ से अधिक थी.

इसी जांच में यह भी पता चला था कि विशाल ने अपने जिस पापा मुकेश सिंघल की मौत के बाद बीमा की राशि के लिए क्लेम किया था, उन्होंने निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस के अलावा टाटा एआईजी, मैक्स लाइफ, टाटा एआईए, आदित्य बिड़ला, एचडीएफसी एर्गो सहित 50 से अधिक बीमा कंपनियों में 39 करोड़ की बीमा पौलिसियां ले रखी थीं. जबकि उन की सालाना आमदनी 12 से 15 लाख थी. उन्हें अपनी पौलिसियों के लिए हर साल 30 लाख रुपए का प्रीमियम चुकाना पड़ रहा था. देखा जाए तो यह सिंघल परिवार की हैसियत के बाहर था. मुकेश सिंघल एक साधारण फोटोग्राफर थे और विशाल भी कोई खास काम नहीं करता था. फिर इधर 2 साल से उन की फोटोग्राफी की दुकान भी बंद थी. यह देखते हुए सवाल उठा कि आखिर इतनी मोटी रकम की पौलिसियां क्यों ली गईं?

विशाल ने पापा की मौत के बाद क्लेम के लिए जो दस्तावेज जमा कराए थे, उन में बताया गया था कि हादसे के बाद उस ने पापा को मेरठ के आनंद अस्पताल में भरती कराया था. जबकि कंपनी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अस्पताल में डाक्टरों ने जो रिपोर्ट तैयार की थी, दोनों का मिलान किया तो दोनों रिपोर्टों में जो चोटें बताई गई थीं, वे आपस में मिल नहीं रही थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह पहले से लगी चोट बताई गई थी, जबकि अस्पताल ने सड़क हादसे में लगी चोटों का जो विवरण दिया था, वह बिलकुल अलग था.

विशााल ने कंपनी द्वारा बारबार मांगने पर भी क्लेम के लिए जरूरी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए थे. यही नहीं, जांच में यह भी सामने आया कि क्लेम जल्दी मिल जाए, इस के लिए विशााल ने कंपनी के एक अधिकारी को रिश्वत देने की भी पेशकश की थी. इस से कंपनी को विश्वास हो गया कि इस मामले में कुछ न कुछ तो गड़बड़ है. आगे की जांच में इस बात का भी खुलासा हो गया कि विशाल ने जिन लोगों के बयान दिलाए थे, उन्हें पैसे दिए गए थे. इस के अलावा विशाल के आधार कार्ड और पेन कार्ड में दर्ज उम्र में भी गड़बड़ी पाई गई थी. यह आधिकारिक रिकौर्ड से मेल नहीं खा रहा था. इस के अलावा विशाल ने उस गाड़ी के कोई कागजात भी नहीं जमा कराए थे, जिस से हादसे में उस के पापा की मौत हुई थी.

पता चला कि मुकेश सिंघल को पहले नवजीवन अस्पताल में भरती कराया गया था. लेकिन विशाल ने कंपनी को यह बात नहीं बताई थी. दुर्घटना सार्वजनिक स्थान पर होनी बताई गई थी, लेकिन इस दुर्घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. इस के बाद शक के आधार पर कंपनी ने विशाल के खिलाफ पहले मेरठ में मामला दर्ज कराया. उस के बाद उसी एफआईआर के आधार पर उत्तर प्रदेश की हापुड़ कोतवाली में विशाल के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया गया.

इसी बीच पुलिस के पास एक और सनसनीखेज शिकायत पहुंची. यह शिकायत विशाल की चौथी पत्नी बताने वाली एक महिला ने दर्ज कराई थी, जिस का नाम श्रेया था. उस ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार, विशाल और उस की शादी साल 2024 के फरवरी महीने में हुई थी. शादी के बाद विशाल ने उसे बीमा कंपनियों के साथ करने वाली धोखाधड़ी के बारे में बताया था. यही नहीं, उस ने श्रेया से अपने पापा की हत्या करने की योजना के बारे में भी बताया था. यह सब बताते हुए उस ने उसे धमकी दी थी कि अगर उस ने यह बात किसी को बताई या उस ने उस के पापा की हत्या करने में उस की मदद नहीं की तो वह उस की और उस की बेटी की हत्या कर देगा. उसी बीच श्रेया को किसी से पता चला कि विशाल उस के नाम से भी पौलिसी खरीदने वाला है. विशाल की सच्चाई उसे पता चल ही चुकी थी.

इसी दौरान 100 करोड़ से ज्यादा का बीमा घोटाले का परदाफाश करने वाली संभल (उत्तर प्रदेश) की एएसपी (दक्षिण) अनुकृति शर्मा ने बीमा कंपनियों से ऐसे लोगों के बारे में पूछा था, जहां पौलिसीधारकों की पौलिसी खरीदने के एक साल के अंदर ही मौत हो गई थी. खासकर हार्टअटैक या एक्सीडेंट के कारण. इस में उन के पास जो नाम आए थे, उस में मेरठ के मुकेशचंद सिंघल का भी नाम सामने आया था, जिस ने 64 बीमा पौलिसियां करा रखी थीं, जिन की कीमत करीब 70 करोड़ थी. उन की मौत के बाद इन का लाभ विशाल को मिलना था. ये सभी बीमा पौलिसियां साल 2018 से 2023 के बीच कराई गई थीं.

यही नहीं, 25 जनवरी, 2025 से 6 फरवरी, 2025 के बीच मुकेशचंद सिंघल के नाम 4 गाडिय़ां टोयोटा लीजेंडर, निशान मेग्नाइट, ब्रेजा और रौयल इनफील्ड लोन पर खरीदी गई थीं. इन के अलावा महंगे गैजेट्स-2 आईफोन, एक मैकबुक और एयरपोड्स भी खरीदे थे. कथित रूप से जिस कार ने विशाल के पापा मुकेश सिंघल को टक्कर मारी थी, उसे विशाल का बहुत करीबी दोस्त चला रहा था. बीमा एजेंट ने मुकेश की मौत की रिपोर्ट मेरठ के अस्पताल को सत्यापन के लिए भेजी तो उस में कहा गया था कि कथित दुर्घटना में उस के शरीर पर एक भी खरोंच नहीं आई थी. यह जान कर एएसपी अनुकृति शर्मा को लगा कि फोटोग्राफी-कम-जेरोक्स की दुकान से 25 हजार रुपए कमाने वाला आदमी 64 पौलिसियों का प्रीमियम और इतनी गाडिय़ों की ईएमआई कहां से भरता रहा होगा. इस में कुछ न कुछ तो गड़बड़ है.

पुलिस जांच के अनुसार विशाल के घर में 3 लोगों की मौत हुई थी. तीनों लोगों के नाम बीमा पौलिसी थीं, जिन का सीधा फायदा विशाल को होना था. वह पहली पत्नी एकता और मम्मी प्रभा देवी की बीमा पौलिसी से एक करोड़ 5 लाख रुपए हासिल कर चुका था. इस के अलावा पापा की मौत के बाद 2 पौलिसियों के डेढ़ करोड़ से अधिक रुपए पा चुका था. अभी 62 पौलिसियों का करोड़ों रुपए का क्लेम और आना था. हालांकि बीमा कंपनियों ने पिछले साल स्थानीय पुलिस को विशाल की चौथी पत्नी श्रेया द्वारा संपर्क किए जाने की सूचना दी थी, लेकिन स्थानीय पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी. श्रेया द्वारा रिपोर्ट लिखाने के बाद अनुकृति शर्मा की टीम ने 29 सितंबर, 2025 को विशाल को अपने मम्मीपापा और पहली पत्नी की हत्या कर के उन के जीवन बीमा की रकम वसूलने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने पहली पत्नी और मम्मी की हत्या का अपराध स्वीकार भी कर लिया था. इस पूछताछ में उस ने अपने अपराध की जो कहानी सुनाई थी, वह कुछ इस प्रकार थी. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला हापुड़ के एक गांव का रहने वाला विशाल 15 साल पहले मेरठ आ कर 3 बैडरूम वाले मकान में रहने लगा था. गांव में रहते समय विशाल का परिवार काफी गरीब था. गांव में उस का परिवार कच्चे मकान में रहता था. गुजरबसर के लिए विशाल एक स्थानीय चाय की दुकान पर नौकरी करता था. वहां काम करने के दौरान ही विशाल की मुलाकात एकता से हुई.

एकता काफी संपन्न परिवार से थी, लेकिन दिव्यांग थी. इसलिए उस का विवाह नहीं हो रहा था. इसीलिए उस ने अपना दिल विशाल को दे दिया था. बाद में एकता के घर वालों ने उस का विवाह विशाल के साथ कर दिया था. विवाह के बाद एकता के फेमिली वालों ने बेटी और दामाद के रहने लिए मेरठ के गंगानगर में कसेरू बक्सर के पास 3 बैडरूम का एक मकान खरीद दिया था. विशाल उसी मकान में परिवार के साथ रहने लगा था. पड़ोसियों का तो यह भी कहना है कि एकता और विशाल की जोड़ी को देख कर आश्चर्य होता था. क्योंकि एकता जहां बहुत बड़े घर की बेटी थी, वहीं विशाल का परिवार बहुत गरीब था. यही नहीं, कहा जाता है कि विशाल की ससुराल वालों ने जो घर उसे रहने के लिए दिया था, उस पर उस ने कब्जा कर लिया था.

विशाल के पापा फोटोग्राफर थे. वह फोटोग्राफी की अपनी दुकान चलाते थे, लेकिन 2 साल से उन की वह दुकान बंद पड़ी है. विशाल भी कुछ नहीं करता था, जबकि मेरठ आने के बाद उस के खर्च बहुत बढ़ गए थे. यहां आने के बाद उस ने आधुनिक जीवनशैली अपना ली थी. पापा की कमाई उतनी थी नहीं. फिर उन्हें घर भी तो चलाना था. विशाल पैसे कमाने के शार्टकट रास्ते खोजने लगा. तभी उस ने एक दिन बीमा कंपनियों से पत्नी के नाम बीमा पौलिसी ले कर उस की हत्या कर मोटी रकम वसूल करने का समाचार पढ़ा. यह उपाय उसे उचित लगा. इस के बाद उस ने अपनी पत्नी एकता के नाम 80 लाख रुपए का जीवन बीमा कराया.

बीमा कराए साल भर भी नहीं बीता था कि एक दिन एकता को दस्त के इलाज के लिए मेरठ के एक निजी अस्पताल में भरती कराया गया. जबकि अस्पताल में बताया गया था कि उसे हार्टअटैक आया है, लेकिन जांच में हार्टअटैक का कोई लक्षण नहीं मिला था. फिर भी एक सप्ताह बाद उस की मौत हो गई थी. उस की मौत के बाद बीमा कंपनी को विशाल को 80 लाख रुपए का भुगतान करना पड़ा था. एक बार बीमा कंपनी से मोटी रकम मिलने के बाद विशाल के लिए यह व्यवसाय बन गया. उस ने मम्मी के नाम 25 लाख रुपए की बीमा पौलिसी ली और उन की भी हत्या कर के 25 लाख रुपए बीमा कंपनी से वसूल लिए.

उस ने बताया था कि उस की मम्मी प्रभा देवी का पिलखुवा के पास एक अज्ञात वाहन से एक्सीडेंट हो गया था. जबकि जांच में पता चला कि एक्सीडेंट के समय दोनों अकेले थे. इस एक्सीडेंट में प्रभा देवी की मौत हो गई थी, जबकि उसे मामूली चोट आई थी. बाद में पता चला कि प्रभा देवी की मौत सिर में चोट लगने से हुई थी. उन की मौत के बाद विशाल को उन की बीमा की 25 लाख की रकम मिल गई थी. अब विशाल की हिम्मत और बढ़ गई. बीमा कंपनियों को धोखा देने का उसे रास्ता भी मिल गया था. ऐसा ही कुछ उस के पापा मुकेशचंद सिंघल की मौत में भी हुआ था. मम्मी और पत्नी की हत्या कर के एक करोड़ 5 लाख वसूलने के बाद विशाल की नजर पापा मुकेशचंद पर टिक गई. उस ने उन के नाम से कई बीमा कंपनियों से करोड़ों रुपए की 64 पौलिसियां कराईं. इन सभी पौलिसियों में एक ही नौमिनी था— विशाल.

यही नहीं, उस ने उन के नाम से लोन पर कई लग्जरी कारें और महंगे गैजेट्स खरीदे. फिर उस ने उन्हें भी एक्सीडेंट के बहाने ठिकाने लगा दिया. उस के बाद उस ने बीमा कंपनियों से बीमा राशि के लिए क्लेम किया. 2 पौलिसियों का पैसा उसे मिल भी गया था. लेकिन बाकी पौलिसियों का पैसा मिलने के पहले उस की धोखाधड़ी का खुलासा हो गया. विशाल ने अपने पापा मुकेशचंद सिंघल के नाम जो गाडिय़ां और गैजेट्स खरीदे थे, नियम के तहत वह कर्ज माफ हो गया था. इस तरह वह फ्री में 4 लग्जरी गाडिय़ों का मालिक हो गया. गैजेट्स भी फ्री में मिल गए, लेकिन अब पुलिस ने सारा कुछ जब्त कर लिया है.

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि विशाल ने एकता के बाद एकएक कर के 3 शादियां और की थीं. विशाल की तीनों पत्नियां उस के साथ रह नहीं सकीं. पड़ोसियों के बताए अनुसार, उस की ये पत्नियां जवान थीं, लेकिन वे परदे में रहती थीं. अगर उन से कोई गलती होती तो विशाल उन की पिटाई कर देता था. शायद वे सभी कुछ ही दिनों में उसे छोड़छोड़ कर चली गई थीं. चौथी पत्नी श्रेया, जिस की शिकायत पर विशाल की गिरफ्तारी हुई है, वह मेरठ की रहने वाली थी. जब उसे विशाल के बारे में पता चला तो उस के इरादे को भांप कर किसी तरह वह उस के चंगुल से भाग निकली थी.

शादी के बाद ही उसे पता चल गया था कि विशाल पहले भी कई शादियां कर चुका था. पुलिस को उस ने बताया था कि उसे जो जानकारी मिली थी, उस के हिसाब से वह उस की 14वीं पत्नी थी. पापा की मौत से कुछ दिनों पहले विशाल ने श्रेया से कहा था कि 5-7 दिनों में उस के पापा की मौत होने वाली है, क्योंकि उन्हें कैंसर है. तब श्रेया ने कहा था कि वह क्या बेकार की बातें करता है? पापा तो एकदम ठीक हैं. उन्हें कैंसर कब हो गया? इस पर विशाल बहाने बनाने लगा. श्रेया ने जिद पकड़ ली तो विशाल ने बताया कि उस ने पापा का 70 करोड़ का बीमा करवा रखा है. उन की हत्या करवा कर वह पौलिसी की रकम हासिल करेगा. पापा की हत्या में उसे भी उस की मदद करनी होगी. अगर पापा की हत्या करने में उस ने उस की मदद नहीं की तो वह उस की और उस की बेटी की हत्या कर देगा.

इस के बाद विशाल ने उस के नाम भी 3 करोड़ का बीमा करवा दिया था. मुकेशचंद सिंघल की हत्या के बाद बीमा कंपनियों के अधिकारी जांच के लिए आने लगे तो श्रेया विशाल का इरादा भांप गई. एक रात नाराज हो कर विशाल ने श्रेया की इस तरह पिटाई कर दी कि उस की रीढ़ की हड्ïडी में फ्रैक्चर हो गया था. शायद वह उसे जान से मार देना चाहता था. श्रेया ने अपने मायके वालों को फोन किया. तब उस के पापा और भाई आए और उसे अपने साथ ले गए. इस तरह उस की जान बच गई. विशाल ने कई बार उसे साथ ले जाने की कोशिश की, लेकिन फिर वह विशाल के घर नहीं गई.

श्रेया ने 21 अक्तूबर, 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक शिकायती पत्र भेजा था. इस से पहले उस ने मेरठ के एसएसपी औफिस में कई बार विशाल के बारे में लिखित शिकायत की थी. लेकिन पुलिस ने हर बार फेमिली मैटर बता कर मामला टाल दिया था.

18 दिसंबर, 2024 को 8 अलगअलग इंश्योरेंस कंपनियों के प्रतिनिधियों ने मेरठ के एसएसपी को अलग शिकायत पत्र दिए थे. इन्होंने बताया कि विशाल सिंघल ने अपने पापा मुकेश सिंघल के नाम पर 70 करोड़ रुपए का बीमा कराया था. लोन से 4 गाडिय़ां खरीदी थीं. विशाल ने पिता की दुर्घटना में मौत बता कर बीमा की रकम पाने के लिए क्लेम किया है. आंतरिक जांच के दौरान पता चला है कि यह एक तरह की धोखाधड़ी है. इसलिए इस मामले की बारीकी से जांच की जाए. कहा जाता है कि मेरठ पुलिस ने इंश्योरेंस कंपनियों की शिकायतों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया था.

इसी तरह हापुड़ पुलिस की भी लापरवाही सामने आई है. विशाल ने जब अपनी मम्मी की सड़क दुर्घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई थी तो पुलिस ने उसे सही मान कर फाइल बंद कर दी थी. जब संभल पुलिस ने हापुड़ पुलिस को सूचना दी, तब हापुड़ पुलिस ने दोबारा सड़क दुर्घटना की रिपोर्ट फाइल की थी. संभल की एएसपी अनुकृति शर्मा को इंश्योरेंस कंपनी के जरिए इस धोखाधड़ी की जानकारी मिली थी. इस पर उन्होंने अपने स्तर से जांच शुरू कर की और मामले का खुलासा किया.

संभल पुलिस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि यह पूरा मामला मेरठ और हापुड़ से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने डीआईजी मेरठ कलानिधि नैथानी को मामले से अवगत कराया. तब डीआईजी के निर्देश पर हापुड़ जिले में एक नई रिपोर्ट दर्ज की गई. इस के बाद विशाल सिंघल और उस के सहयोगी सतीश कुमार की गिरफ्तारी दर्शाई गई. पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर साक्ष्य जुटा रही है. फिर भी अब तक की जांच से यह साबित हो गया है कि बीमा की मोटी रकम पाने के लिए विशाल सिंघल ने अपने मम्मीपापा और पत्नी की हत्या की है. अपनों का खून कर अय्याशी से रहने का सपना देखने वाला विशाल अपने साथी सतीश के साथ फिलहाल जेल में है. UP Crime

 

 

UP News: लव के गेम की खिलाड़ी बनी पिंकी

UP News: कहते हैं कि घर की देहरी लांघने के बाद भी यदि किसी महिला के पैर नहीं रुकते हैं तो उस घर की बरबादी निश्चित है. मुरादाबाद की पिंकी ने भी यही किया. अपने ब्याहता को छोड़ कर वह किशनवीर के साथ रहने लगी. इस के बावजूद चाचाभतीजे से उस के अवैध संबंध हो गए. इस के बाद जो हुआ, वह…

पति की रोजरोज की कलह से पिंकी परेशान हो चुकी थी, इसलिए उस ने अपने दोनों प्रेमियों से बात कर किशन को रास्ते से हटाने के लिए खतरनाक योजना बना डाली. किशन को कई दिनों से नशे के लिए शराब की व्यवस्था नहीं हो पाई थी. जेब में कोई पैसा भी नहीं था. योजना के अनुसार पिंकी ने अपने पति किशन से कहा कि इस समय नितिन स्योंडारा में है, उस से बात हो गई है. तुम उस के पास चले जाओ, वह 4 हजार तुम्हें देगा, ले कर आ जाओ.

ग्राम स्योंडारा मिट्ठनपुर मौजा गांव से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर है. किशन स्योंडारा पहुंच गया. वहां पर चमन शर्मा, नितिन शर्मा, अवनेश और रविकांत मौजूद थे. बराबर में ही शराब की दुकान थी. नितिन ने जा कर 2 बोतल शराब खरीदी और एकांत में पांचों जा कर बैठ गए. किशन ने नितिन से कहा कि पिंकी ने पैसों के लिए भेजा है.

”हमें पता है, पहले एक पेग ले ले, फिर चले जाना.’’

योजना के अनुसार, उन्होंने किशन को जम कर शराब पिलाई. किशन नशे में इतना चूर हो गया कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकता था. तीनों ने किशन को उठा कर एक बाइक पर बैठाया. नितिन उसे पकड़ कर पीछे बैठ गया. बाकी दोनों लोग बाइक के पीछेपीछे चल दिए. अंधेरा हो चुका था. करीब 15 किलोमीटर दूर गांव ढकिया नरू पहुंचने पर उन्हें धान के खेत में पानी भरा दिखाई दिया. यह एक सुनसान जगह थी. उस समय उधर से किसी का आनाजाना भी नहीं हो रहा था. तीनों ने फिर उसे बाइक से उतारा. उसे खेत में ले जा कर औंधे मुंह गिरा दिया और वे उस के ऊपर खड़े हो गए. वह छटपटाता रहा, हाथपांव मारता रहा, लेकिन जब तक सांसें रुक नहीं गईं, वे उस के ऊपर खड़े रहे.

किशन की मौत होते ही सब घबरा कर वहां से भाग गए. पिंकी शुरू से पूरी लोकेशन मोबाइल से ले रही थी. नितिन लगातार अपने मोबाइल से पिंकी को अपडेट दे रहा था. उस की सांस रुक जाने पर नितिन ने बता दिया कि रास्ते का कांटा हट गया है. जिला मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्रांतर्गत ग्राम ढकिया नरू को जाने वाले रोड किनारे प्रेम सिंह का खेत स्थित है. खेत में धान लगे थे. 31 जुलाई, 2025 को उन के धान के खेत में शव पड़े होने की सूचना से गांव में हड़कंप मच गया. वह व्यक्ति कोई अनजान था.

अज्ञात व्यक्ति का शव पड़े होने की सूचना ग्रामप्रधान मनोहर सिंह द्वारा पुलिस को दी गई. ग्रामप्रधान की सूचना पर मौके पर पहुंचे कोतवाल मोहित कुमार मलिक और फोरैंसिक टीम ने बारीकी से शव और मौके की जांच की. वहां मोजूद कोई भी व्यक्ति शव की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेज दिया. दूसरे दिन अखबारों में किसी व्यक्ति की लाश मिलने की खबरें छपीं. खबर पढ़ कर महेंद्र नाम का व्यक्ति कोतवाली बिलारी पहुंचा, क्योंकि उस का भाई किशनवीर एक दिन पहले शाम साढ़े 4 बजे से गायब था.

महेंद्र सिंह जिला संभल के थाना कुढफ़तेहगढ़ के गांव मिठनपुर मौजा निवासी पर्वत सिंह का बेटा था. पुलिस उसे मोर्चरी ले गई. पुलिस ने उसे मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो लाश देख कर महेंद्र के होश उड़ गए. उस की चीख निकल गई. उसे चक्कर आने लगा. साथ के लोगों ने उसे संभाला. क्योंकि वह लाश किसी और की नहीं बल्कि उस के 40 वर्षीय भाई किशनवीर की थी. पुलिस उसे दुर्घटना मान रही थी, क्योंकि पुलिस को पता चला कि किशनवीर शराबी था. इसलिए पुलिस ने सोचा कि यह नशे में धुत हो कर खेत की तरफ चला आया होगा और मुंह के बल गिरा होगा.

मुंह और नाक में पानी मिट्टी भर जाने से सांस न आने पर मौत हो गई होगी. किंतु यहां पर एक सवाल यह उठ रहा था कि किशनवीर अपने घर से करीब 15 किलोमीटर दूर एकांत जगह किसी खेत में कैसे आया, क्यों आया? उधर पति के लापता होने के दूसरे दिन पिंकी गांव के लोगों से कहती रही कि उस के पति रात से अभी तक नहीं आए हैं. तीसरे दिन बड़े भाई महेंद्र सिंह ने अखबारों में खबर छपने के बाद बिलारी कोतवाली पुलिस से संपर्क किया और पोस्टमार्टम हाउस में जा कर अपने भाई की लाश की पहचान की. डैडबौडी को ले कर वे लोग अपने गांव आ गए.

12 अगस्त, 2025 को कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज हुई. महेंद्र सिंह ने बताया कि ये लोग किशन की मृत्यु के बाद होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में लगे हुए थे. इसलिए 12 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराई. गांव में खूब चर्चा थी कि चाचाभतीजे चमन शर्मा और नितिन शर्मा ने ही किशनवीर की हत्या की है. पुलिस ने पिंकी से जानकारी की तो उस ने कहा कि उस के पति तो शराबी थे. कहीं चले गए होंगे. नशे में होने के कारण उस खेत में गिर गए होंगे, जिस से उन की मौत हो गई होगी. पुलिस को पिंकी से पूछताछ के समय ज्यादा सख्ती की जरूरत नहीं पड़ी. धमकाने पर ही उस ने सारा सच उगल दिया.

कोतवाल मोहित कुमार मलिक के निर्देशन में गठित पुलिस टीम ने अभियुक्त चमन शर्मा नितिन शर्मा निवासी गांव मनकुला, रविकांत निवासी मोहल्ला प्रेम विहार, बिलारी, पिंकी निवासी गांव मिठनपुर मौजा थाना कुढफ़तेहगढ़ जनपद संभल को गिरफ्तार किया गया. आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद किशनवीर की हत्या की चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद की तहसील बिलारी से करीब 13 किलोमीटर दूर एक गांव है मिठनपुर मौजा. इस गांव का थाना कुढ़ फतेहगढ़ लगता है. गांव मिट्ठनपुर मौजा के रहने वाले पर्वत सिंह के 3 बेटे और एक बेटी थी. सब से बड़ा सतपाल सिंह, दूसरे नंबर का महेंद्र सिंह तीसरे नंबर पर किशनवीर उर्फ ऋषिपाल. इस गांव में अधिकांश लोग यादव जाति के ही हैं. सब से बड़े भाई सतपाल की किशनवीर के मर्डर से 27 दिन पहले ही मृत्यु हुई थी. वह बीमार थे. दूसरे नंबर के महेंद्र सिंह ने अभी तक शादी नहीं की है.

महेंद्र सिंह और किशनवीर का मकान संयुक्त रूप से बना हुआ है. सतपाल बराबर में अलग से रहते थे. मातापिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. यह परिवार किसान वर्ग में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इतनी कृषि भूमि इन के पास नहीं है कि खेती कर के गुजरबसर कर सकें. तीनों भाइयों के पास मिला कर 8-9 बीघा खेती की जमीन थी, इसलिए मेहनतमजदूरी कर के यह परिवार अपनी गुजरबसर कर रहा था. बड़े भाई सतपाल का विवाह हो गया था. गनीमत तो यह रही कि पर्वत सिंह ने अपने सामने ही अपनी बेटी का विवाह कर दिया था.

पिंकी नाम की एक युवती जो किसी कारणवश शादी के कुछ महीने बाद ससुराल से भाग गई. किशनवीर के बहनोई रघुवीर के वह संपर्क में आ गई. वह ट्रक चलाते हैं. युवती ससुराल जाने को तैयार नहीं थी. रघुवीर का अपना परिवार था, जो ठीकठाक चल रहा था. किसी अज्ञात महिला को अपने साथ रख कर वह अपनी फेमिली में कोई लफड़ा करना नहीं चाहते थे. पिंकी की शादी अभी कुछ ही महीने पहले बड़े धूमधाम से हुई थी, पर ससुराल की चौखट उस के लिए वैसी नहीं निकली, जैसी उस ने सपनों में देखी थी. रोज की तकरार, छोटेछोटे आरोप और दबाव ने उस का मन तोड दिया था.

एक दिन आंसुओं से भीगी आंखों के साथ पिंकी ने तय कर लिया कि वह अब और सहन नहीं करेगी. बिना किसी को बताए वह रात में घर से निकल पड़ी.

किशन की जिंदगी में इस तरह आई पिंकी

सड़क पर भटकतेभटकते उस की मुलाकात ट्रक ड्राइवर रघुवीर से हुई. रघुवीर ने उस की परेशानी देखी और उसे अपने साथ ले गया. पिंकी का कहना था कि वह ससुराल नहीं जाएगी और मायके भी नहीं जाएगी. दोनों जगह ही उसे जान का खतरा है. पिंकी की मजबूरी और हालत को देखते हुए रघुवीर ने सोचा कि इस की शादी अपने किसी साले से करा दी जाए. रघुवीर ने अपने साले महेंद्र और किशन से बात की. दोनों साले अभी कुंवारे थे.

महेंद्र ने किशनवीर के साथ ही पिंकी की शादी कराने का सुझाव दिया. रघुवीर ने किशन से बात की तो वह तैयार हो गया. बड़े भाई और बहनोई के कहने पर किशन पिंकी को साथ रखने को तैयार हो गया. फिर सामाजिक रीतिरिवाज से पिंकी और किशनवीर के साथ सात फेरे करा दिए. किशनवीर के साथ रह कर पिंकी को पहली बार अपनापन और सुकून महसूस हुआ. धीरेधीरे दोनों में विश्वास और लगाव पैदा होता गया.

जब पिंकी के ससुराल वालों को पिंकी के घर से भाग जाने का पता चला तो उन्होंने कोई काररवाई नहीं की. उन के लिए पिंकी का घर से चले जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि वे लोग उस से पीछा छुड़ाना ही चाहते थे. अपने बचाव में पिंकी के ससुराल वालों ने दूसरे दिन सुबह को ही फोन कर के बता दिया कि तुम्हारी बेटी पिंकी यहां से रात किसी टाइम चली गई है. मायके वाले बेटी के गायब होने से परेशान थे. खोजबीन करने पर किसी तरह उन्हें पता चल गया कि पिंकी इस समय जिला संभल के एक गांव मिठनपुर मौजा में है. उन्होंने थाने के चक्कर काटे, पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई और हर जगह गुहार लगाई.

इन सब उथलपुथल के बीच पिंकी ने अपने दिल की सुनने का फैसला किया. उस ने सब के सामने घोषणा कर दी कि अब किशनवीर ही उस का पति है. लोगों ने तरहतरह की बातें कीं. किसी ने इसे पिंकी की गलती बताया, किसी ने उस की हिम्मत की तारीफ की, लेकिन पिंकी के लिए सच यही था कि उस ने अपने जीवन का नया रास्ता चुन लिया था. अब वह बीते कल की कैदी नहीं थी. वह पिंकी नहीं, बल्कि अपनी नई कहानी की नायिका थी. पिंकी के दूसरी बिरादरी में शादी करने पर उस के मायके वालों की बहुत बदनामी हो रही थी. लोग ताने दे रहे थे.

समय पंख लगा कर उड़ रहा था. किशनवीर और पिंकी अपनी जिंदगी को और विशाल बनाने के लिए कोशिश करते रहे. एक दिन किशन अपनी पत्नी पिंकी को ले कर अलीगढ़ चला गया. वहां उस ने एक कारखाने में नौकरी कर ली. दिन भर मेहनत कर के आता, पत्नी उस के स्वागत में तैयार गेट पर ही मिलती. कभी देर हो जाती है तो पिंकी शिकायत करती, ”टाइम से घर आया करो, अकेले मुझे डर लगता है.’’

तब किशन पत्नी पिंकी को बाहों में भर लेता, ”मैं हूं तो तुझे डरने की क्या बात है.’’

गोद न भरने पर अधूरी थी पिंकी की जिंदगी

सब कुछ खुशहाल गुजर रहा था. लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद भी इन को संतान सुख नहीं मिला. जब दोनों ने  वैवाहिक जिंदगी की शुरुआत की थी, तब एक दिन किशन ने अपनी पत्नी पिंकी से कहा था कि जल्द ही हमारा घर बच्चों की हंसी से गूंजेगा. लेकिन समय बीतता गया, पर हंसी उन के आंगन में नहीं आई. किशन हर शाम जब काम से लौटता तो आसपास के बच्चों को खेलते देख उस की आंखें भर आतीं. भीतर ही भीतर सोचता कि अगर मेरा भी एक बेटा होता तो थके होने पर मेरी गोद में बैठ जाता. अगर एक बेटी होती तो घर में आते ही मेरे गले में हाथ डाल कर उछल कर मेरी बाहों में समा जाती. उस की हंसी मेरे सारे दर्द भुला देती.

पिंकी की पीड़ा और गहरी थी. गांव की औरतें जब मेले या त्यौहार पर अपने बच्चों का हाथ थामे जातीं तो उस के खाली हाथ और भारी हो जाते. रिश्तेदार और पड़ोसी ताने कसते, ‘संतान नहीं तो जीवन का क्या सुख?’

इन तानों से वह चुप हो जाती, लेकिन रात को आंसू उस के तकिए भिगोते. किशन उस का हाथ पकड़ कर कहता, ”मुझे तेरी हंसी ही सब से बड़ा सहारा है. दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तू मेरे साथ है तो मैं सब से अमीर हूं.’’

फिर भी दोनों के भीतर कहीं एक अधूरी चाह थी. उन का प्यार मजबूत था, लेकिन समाज की बातें और भीतर की कसक बारबार दिल चीर देतीं. कभीकभी दोनों बैठ कर सोचते कि क्या हमारा प्यार ही हमारी संतान नहीं? क्या हमारी मेहनत से बनी ये रोटी ही हमारी विरासत नहीं? किशन की अपनी मर्दानगी पर सवाल उठने लगे, पर वह इन्हें मेहनत में डुबो देता. वह खुद को तसल्ली देता. उसे अपनी मर्दानगी में कोई कमी कभी नजर नहीं आई. पिंकी ने इस तरह की शिकायत कभी नहीं की. वह मंदिर जाती, मन्नतें मांगती, व्रत रखती.

किशन भी उस का साथ देता, पर उस का विश्वास धीरेधीरे टूट रहा था. किशन ने कहा, ”क्या हमारा प्यार अधूरा है? क्या हमारी जिंदगी में बस यही कमी रह जाएगी?’’

उस की आवाज में दर्द था, जो पिंकी के सीने में भी उतर गया. पिंकी ने उस का हाथ थामा और बोली, ”हमारा प्यार अधूरा नहीं है, बच्चा नहीं हुआ तो क्या? हम एकदूसरे के लिए तो हैं.’’

लेकिन सच तो यह था कि दोनों के दिल में एक टीस थी. पिंकी को लगता, शायद वह मां बनने के लायक नहीं. किशन को लगता, शायद वह एक पिता बनने का फर्ज नहीं निभा पाया. फिर भी, दोनों एकदूसरे का सहारा बने रहे. दिन भर की मेहनत के बाद, जब वे रात को एकदूसरे के पास बैठते तो सारी दुनिया की थकान और दुख जैसे पलभर के लिए गायब हो जाते. यहां यादव जाति के लोग बहुत पिछड़े हुए हैं. बच्चा पैदा होने के लिए दोनों में से किसी ने कभी किसी डौक्टर की सलाह पाने के लिए अज्ञानतावश जरूरत नहीं समझी.

करीब 3 साल पहले दोनों अलीगढ़ को छोड़ कर अपने घर गांव वापस आ गए. किशनवीर ने एक ईरिक्शा लोन पर ले लिया, जिस से गुजर ठीकठाक हो रही थी. इसी बीच उस की मुलाकात करीब 4-5 किलोमीटर दूर मनकुला गांव निवासी चमन शर्मा से हुई. चमन शर्मा क्षेत्र में पंडिताई करता था. मुरादाबाद जिले के ग्रामीण इलाकों में पंडित (ब्राह्मण) समाज का एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान होता है. गांवों में उन की भूमिका सिर्फ धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी होती है. ब्राह्मïण गांव में धार्मिक परामर्शदाता माने जाते हैं.

पहले ब्राह्मïणों को कृषि पर निर्भर लोगों से दक्षिणा के रूप में धान, गेहूं, अनाज, सब्जी, कपड़ा आदि मिलती थी. अब धीरेधीरे लोग नकद दक्षिणा देने लगे हैं. आधुनिकता के बावजूद गांवों में ब्राह्मïणों का सम्मान और धार्मिक आयोजन में उन की भूमिका लगभग उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले थी. परिस्थितियों के चलते 50 वर्षीय चमन शर्मा का आनाजाना किशन के घर हो गया. चमन 3 भाई हैं. चमन का विवाह हो चुका है. एक बच्चा भी है.

पिंकी थी यजमान उसे बना लिया प्रेमिका

चमन दुनियादारी में बड़ा चालाक था. किशनवीर के घर जाते समय वह उस के घर के जरूरत के सामान भी ले जाने लगा. फिर पिंकी उस का बहुत आदरसत्कार करती और उसे खाना खिलाती थी. एक दिन चमन पनीर और उस से संबंधित मसाले व अन्य सामान भी ले कर आया, लेकिन उस दिन थैले में एक शराब की बोतल भी थी. चमन ने बोतल निकाल कर थैला पिंकी को थमाते हुए कहा, ”लो भाभी, आज पनीर बनाओ. लेकिन पहले 2 गिलास और लोटे में पीने का पानी दे दो.’’

चमन ने गिलास में पैग तैयार किया. किशन ने मना किया, ”मैं नशा नहीं करूंगा, मैं शराब नहीं पीता हूं. कभी तीजत्यौहार की बात अलग है.’’

दोस्ती का वास्ता दे कर चमन ने किशन को शराब पीने के लिए राजी कर लिया. चमन ने अपने दोस्त किशन से कहा, ”जाम उठा ले और मुंह से लगा ले, मुंह से लगा कर पी.’

दोस्त के इस शायरी अंदाज पर किशन मुसकराया. पीतेपीते दोनों मस्त हो गए. इतनी देर में खाना तैयार हो चुका था. दोनों ने खाना खाया. अगले दिन फिर मुलाकात हुई तो किशन ने चमन का रात की पार्टी के लिए एहसान व्यक्त किया. चमन ने मुसकराते हुए कहा, ”अरे, दोस्ती किस दिन काम आएगी? और फिर, मैं तेरे दुखदर्द का हल भी लाया हूं.’’

किशन चौंका, ”कौन सा हल?’’

चमन धीरेधीरे अपनी चाल चलने लगा. उस ने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ”भाभी को बच्चा न होने की चिंता है न? मेरे पास ऐसा नुस्खा है जिस से निस्संतान दंपति भी मातापिता बन जाते हैं. अगर भरोसा हो तो मैं मदद कर सकता हूं.’’

यह सुनते ही पिंकी की आंखों में चमक आ गई. 9 साल से उस का यही सपना अधूरा था, लेकिन किशन को कुछ अटपटा लगा. वह बोला, ”क्या वाकई ऐसा संभव है?’’

चमन ने रहस्यमई अंदाज में कहा, ”हां, मगर यह बात नुस्खे तक नहीं है. साथ में धार्मिक अनुष्ठान व खास उपाय करना पड़ता है. वह सब मैं करूंगा और अपने खर्चे पर करूंगा, लेकिन यह राज बाहर न जाए.’’

धीरेधीरे चमन ने पिंकी के मन में झूठे सपनों की डोर बुननी शुरू कर दी. कभी दवाइयों के नाम पर, कभी ताबीजटोने के बहाने, वह उसे समझाने लगा कि बच्चा तभी आएगा, जब वह उस के बताए ‘खास उपायों’ पर भरोसा करेगी. किशन सीधासादा था. उस के दोस्त ने कुछ पुडिय़ा ला कर दीं. कहा संभोग से एक घंटा पहले खा लेना. अवश्य संतान की प्राप्ति होगी. पिंकी मासूम थी, मां बनने की चाहत में उस ने चमन की हर बात पर विश्वास कर लिया. वह सोचती, ‘सच में अब मेरी गोद भर जाएगी.’

इस तरह चमन और पिंकी के बीच देवरभाभी का रिश्ता गहरा होता चला गया. चमन मजाक के साथसाथ मौका लगता तो थोड़ी छेड़छाड़ और चुम्माचाटी भी कर लेता था. इसी लालच और विश्वास के बीच चमन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया. किशन को लगा उस का दोस्त मददगार है, जबकि असलियत में वह उस की कमजोरी का फायदा उठा रहा था. जिस दिन चमन शर्मा को दक्षिणा अधिक मिल जाती, वह कुछ न कुछ अच्छे भोजन के लिए सामान ले कर किशन के घर आ जाता.

एक दिन चमन खाने के व्यंजन के साथ में हमेशा की तरह बोतल भी लाया था. उस दिन चमन ने अपने दोस्त को कुछ अधिक शराब पिलाई. मौका लगते ही नशे की गोलियों की पुडिय़ा लाया था, एक पैग में मिला दी. कुछ ही देर बाद किशन चारपाई पर बेसुध हो कर लुढ़क गया.

फिर चमन ने अपनी भाभी पिंकी को बुला कर बाहों में समेट लिया. वह बोली, ”अरे क्या कर रहे हो, वो देख लेंगे.’’

चमन मुसकराता हुआ बोला, ”उस का पूरा इलाज आज कर दिया है. वैसे इसे अब सुबह तक भी होश नहीं आएगा.’’

पिंकी शरमाते हुए बोली, ”ऐसा क्या कर दिया?’’

चमन ने पूरी बात बताई और कहा कि आज हम खुल कर रोमांस करेंगे. इस के बाद कमरे का माहौल अचानक बदल गया.

पिंकी भी चमन की आंखों में अजीब सी मोहब्बत देख रही थी. इतने दिनों से वह समझ रही थी कि चमन सिर्फ पति का दोस्त ही नहीं, बल्कि उस के दिल में कुछ और जगह बना चुका है.

चमन ने कहा,”पिंकी, तुम जानती हो कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. आज हालात ने हमें मौका दिया है. अगर तुम चाहो तो यह रात हमारी हो सकती है.’’

पिंकी कुछ पल चुप रही, फिर उस की आंखों में हलकी मुसकान तैर गई.

”देवरजी, शायद किस्मत ने ही यह मौका दिया है. मैं भी अब रुकना नहीं चाहती.’’

इस के बाद दोनों के बीच की दूरी मिट गई. सारी बंदिशें टूट गईं और वो रात उन के लिए इश्क की एक नई दास्तां बन गई.

2 जिस्म जैसे एक जान हो गए. रात का आखिरी पहर था. चमन की अचानक आंखें खुलीं तो सुबह होने वाली थी. पिंकी भी उठ चुकी थी. पिंकी का चेहरा चमक रहा था और चमन की आंखों में संतोष था. दोनों जानते थे कि यह रिश्ता अब सिर्फ एक रात का नहीं, बल्कि उन के जीवन की नई शुरुआत है. पिंकी ने कमरे से बाहर निकल कर देखा, उस के जेठ का कमरा भी बंद था. फिर वह मेनगेट पर आई, बाहर जा कर इधरउधर देखा. कोई नहीं था. पूरा सन्नाटा छाया हुआ था. उस ने चमन को इशारा किया और वह दबेपांव घर से निकल कर अपने घर चला गया.

फिर यह सिलसिला चलता रहा. पिंकी गर्भवती हो गई और उसे एक बेटा पैदा हुआ. किशन बहुत खुश था. समझ रहा था कि उस के दोस्त ने जो दवा दी थी, उस की वजह से संतान हुई है. किशन ने कर्ज ले कर जो ईरिक्शा लिया था, उसे भी बेच दिया. क्योंकि उसे शराब की लत लग चुकी थी. कारोबार कुछ नहीं था. चमन कभीकभी उस के घर आता तो अब वह इतनी मदद नहीं कर पा रहा था, जितनी पहले कर दिया करता था. बड़ी तंगी से दिन गुजर रहे थे. बेटा पैदा होने से खर्चे और भी बढ़ गए थे.

इसी दौरान इस लव स्टोरी में एक और किरदार प्रवेश कर गया. उस का नाम था नितिन. 20 साल का नितिन पिंकी के प्रेमी चमन का सगा भतीजा था. किशन और नितिन के बीच ईरिक्शा चलाते समय दोस्ती हो गई थी. वह किशन के आर्थिक हालात से भलीभांति परिचित था. नितिन अपने पिता की अकेली संतान था. बहुत बड़ा परिवार नहीं है. अपनी सामान्य आर्थिक स्थिति होने के बावजूद नितिन समयसमय पर किशन को कुछ रुपए उधार दे दिया करता था. कई दिनों से किशन से उस की मुलाकात नहीं हुई. एक दिन वह अपने उधार की रकम का तकाजा करने किशन के घर गया.

शाम का समय था. सूर्यास्त हो रहा था. किशन और चमन आंगन में बैठे हुए शराब का दौर चला रहे थे. दोनों ने एक साथ नितिन को आवाज लगाई, ”आओ नितिन, आओ.’’

वह अंदर आया. दोनों ने उसे भी अपनी महफिल में शामिल कर लिया. जाम का दौर खत्म हो जाने पर पिंकी से खाना लाने को कहा. पिंकी 3 थालियों में खाना ले कर आई. पिंकी ने आदतन नितिन से नमस्ते की. नितिन ने सर उठा कर देखा तो देखता ही रह गया. नशे का सुरूर उसे चढ़ ही रहा था. नितिन ने देखा, उस की आंखों में चमक थी, चेहरे पर ऐसा तेज जैसे कोई दीपक जल उठा हो. बच्चा पैदा होने के बाद तो जैसे उस के हुस्न में नया निखार आ गया था. उस के गालों पर हलकी लाली, आंखों की गहराई में शांति और होंठों पर हमेशा रहने वाली

हलकी मुसकान, सब कुछ उसे और भी आकर्षक बना रहे थे. खाना खाते समय भी नितिन की नजरें पिंकी का ही पीछा करती रहीं. नितिन ने अपने कर्ज की कोई बात किशन से नहीं की. जाते समय किशन से कहा कि अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो मुझे जरूर बताना. मैं तुम्हारा दोस्त हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तैयार रहूंगा. इस समय भी उस की नजरें टकटकी लगाए पिंकी को ही देख रही थीं. पहली ही मुलाकात में वह पिंकी को दिल दे बैठा. इस के बाद मुलाकातें बढती रहीं. पिंकी भी नितिन को चाहने लगी. नितिन ने भी अपने चाचा की तरह का तरीका अपनाया.

एक दिन वह भी थैला भर कर खानेपीने का अच्छा सामान किशन के घर ले गया. दारू की बोतल और साथ में नशीली गोलियों की पिसी हुई पुडिय़ा भी थी. उस ने भी दारू पीते समय किशन के पैग में नशा की गोलियों का पाउडर मिला दिया. इस के बाद किशन के बेहोशी जैसी हालत में पहुंच जाने पर पिंकी और नितिन ने रात भर एकदूसरे पर जम कर प्यार लुटाया. जवानी से भरपूर नितिन के साथ पिंकी ने भी खूब मौजमस्ती की. इस तरह चाचाभतीजा दोनों ही पिंकी के आशिक हो गए. कभी चाचा तो कभी भतीजा पिंकी की मस्त जवानी का आनंद लेने आ जाते.

पिंकी का नितिन की तरफ ज्यादा झुकाव हो गया था. फिर भी पिंकी उस के चाचा चमन को नाराज करना नहीं चाहती थी. गाहेबगाहे वह चमन को भी खुश कर दिया करती थी. दोनों पिंकी का पूरा खयाल रखते. साथ में किशन की भी समयसमय पर दारू की व्यवस्था कर दिया करते थे. अपनी पत्नी और उस के आशिकों के बीच होने वाली रंगीन रात का किशन को पूरा अहसास था. दिन में नशा उतर जाने पर इधरउधर गांव के लोगों के बीच जाता, तब लोग उस के घर की हालत बयान करते तो वह बहुत शर्मिंदा होता.

मामला पूरे गांव में चर्चा का विषय बना हुआ था. क्योंकि दोनों किशन के दोस्त थे, इसलिए कोई सीधे आरोप नहीं लगा रहा था. वह चाचाभतीजे दोनों से टकराने की स्थिति में नहीं था. उन दोनों से टकराने का मतलब उसे साफ दिख रहा था मौत. इसलिए वह पत्नी पर ही अपना गुस्सा उतार देता था. पिंकी की मुसकान में मासूमियत का मुखौटा था, लेकिन उस की आत्मा में विश्वासघात की आग धधक रही थी. वह प्यार नहीं, बल्कि वासना का खेल खेल रही थी. इसी खेल के चलते उस ने अपने पति किशनवीर उर्फ ऋषिपाल की अपने प्रेमियों के द्वारा हत्या करा दी.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. पिंकी के साथ उस का 2 साल का बेटा भी जेल चला गया. एक आरोपी अवनीश कुमार निवासी गांव रमपुरा थाना सोनकपुर जिला मुरादाबाद को पुलिस ने 14 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया. उसे भी अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. केस की जांच कोतवाल मोहित कुमार मलिक कर रहे थे. UP News

 

 

UP Crime News: महिला महामंडलेश्वर का कामुक प्यार

UP Crime News: प्रोफेसर की नौकरी छोड़ पूजा शकुन पांडेय संन्यासिनी बन गई. वह हिंदू महासभा से भी जुड़ी हुई थी. इस के बाद वह निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर बना दी गई. अब उसे अन्नपूर्णा भारती के नाम से जाना जाने लगा. महामंडलेश्वर बनने के बाद पूजा शकुन पांडेय ने अपना जीवन भले ही सनातन धर्म की सेवा के लिए समॢपत कर दिया था, लेकिन वह अपने प्रेमी अभिषेक गुप्ता को नहीं भुला सकी थी. प्रेमी को पाने की जिद एक दिन पूजा शकुन पांडेय को जेल की सलाखों के पीछे इस तरह ले गई कि…

कहते हैं इंसान की महत्त्वाकांक्षा या तो उसे शिखर पर पहुंचा देती है या शून्य पर ले आती है. बस फेर उस की सोच और नीयत का होता है. एक साधारण सी युवती पूजा शकुन पांडे कुछ ही सालों में धर्म के क्षेत्र में इतना आगे पहुंची कि देश के सब से बड़े अखाड़े ने उसे महामंडलेश्वर की उपाधि दे दी और वह महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा भारतीपुरी बन गई.

ये सब संभव हुआ महत्त्वाकांक्षा के कारण. लेकिन बात वहीं आ गई, सोच और नीयत की. चूंकि महामंडलेश्वर जैसे रसूखदार और सम्मानित ओहदे पर पहुंचने के बाद भी अन्नपूर्णा भारती ने अपनी छोटी सोच के कारण कुछ ऐसा कर दिया कि आज हर कोई उस के नाम पर थूथू कर रहा है. पूरा माजरा समझने के लिए कहानी को पूरा जानना जरूरी है, जिस की शुरुआत कब और कैसे हुई, ये तो बाद में बताएंगे, लेकिन पहले उस घटना को जान लेते हैं जो 26 सितंबर, 2025 को हुई.

उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस में सिकंदराराऊ क्षेत्र के गांव कचौरा निवासी अभिषेक गुप्ता (30) खैर तहसील में टीवीएस बाइक का शोरूम चलाते थे. उन्होंने 21 अगस्त, 2025 को ही टीवीएस का ये शोरूम खोला था. इस से पहले वह पिता के साथ कचौरा में ही आढ़त का कारोबार करते थे. वैसे तो उन के पापा नीरज गुप्ता आढ़त का ही कारोबार करते हैं, लेकिन यदाकदा जब काम थोड़ा कम होता था तो वह बेटे का हाथ बंटाने के लिए उस के शोरूम पर चले आते थे. वैसे बाइक शोरूम को अभिषेक ही अपने चचेरे भाई जीतू के साथ चलाते थे.

हाथरस के कचौरा गांव में रहने वाले अभिषेक के परिवार में मम्मीपापा के अलावा एक छोटा भाई आशीष गुप्ता व बहन है. कुल मिला कर उस का परिवार काफी संपन्न है. 26 सितंबर, 2025 शुक्रवार की रात करीब 9 बजे थे. अभिषेक अपने पापा नीरज गुप्ता व चचेरे भाई शिवांग गुप्ता उर्फ जीतू के साथ टीवीएस शोरूम को बंद कर के पहले रोडवेज बस से खेरेश्वर चौराहा स्थित बस अड्डे पर पहुंचे, जहां उन्हें सिकंदराराऊ अपने घर लौटने के लिए बस में सवार होना था.

बस आने पर पिता व चचेरा भाई जीतू तो बस में चढ़ गए. अभिषेक बस में सवार होने के लिए गेट की तरफ बढ़ा ही था कि तभी उस के समीप तेजी से एक बाइक आ कर रुकी. बाइक पर 2 लोग सवार थे. बाइक सवारों में से एक ने हेलमेट पहन रखा था. पिछली सीट पर बैठे युवक ने अभिषेक को निशाना साध कर 2 गोलियां मारीं. एक गोली अभिषेक के सिर पर लगी. गोली सिर में लगते ही अभिषेक लहरा कर जमीन पर गिर पड़ा.

सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि पिता नीरज गुप्ता व चचेरा भाई जीतू बस में सवार होने के कारण बाइक सवार बदमाशों के चेहरे व उन की बाइक का नंबर भी नहीं देख सके. बाइक सवार बदमाश जितनी तेजी से मौके पर आए थे, उतनी ही तेजी से गोली मार कर फरार हो गए. गोली चलते ही आसपास भगदड़ मच गई. आननफानन में पापा नीरज व भाई जीतू जितनी तेजी से बस में चढ़े थे, उतनी ही तेजी से नीचे उतरे और अभिषेक को खून से लथपथ पड़े देख कर उन का चीखना व रोना शुरू हो गया.

5 मिनट तक ऐसे ही अफरातफरी मची रही. जब नीरज गुप्ता को होश आया तो उन्होंने 112 नंबर पर पीसीआर को कौल कर दी. चूंकि खेरेश्वर चौक काफी व्यस्त और अहम इलाका है, वहां पुलिस की पीसीआर व पिकेट मौजूद रहती ही है. अगले 5 मिनट में पुलिस और पीसीआर दोनों वहां पहुंच गए. चूंकि अभिषेक खून से लथपथ था. उस की स्थिति गंभीर थी, इसलिए पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए पहले उसे मैडिकल सहायता दिलाने को प्राथमिकता दी. पुलिस ने खून से लथपथ अभिषेक को उस के पापा व भाई की मदद से पुलिस की गाड़ी में डलवाया और तत्काल जे. एन. मैडिकल कालेज ले गए.

एमरजेंसी में डौक्टर ने तत्काल अभिषेक का परीक्षण शुरू कर दिया, लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी. क्योंकि अभिषेक के शरीर में किसी तरह की हरकत नहीं हो रही थी, इसीलिए डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद शुरू हुई पुलिस की औपचारिक काररवाई. पीसीआर पुलिस की सूचना पर स्थानीय थाने रोरावर के एसएचओ विजय सिंह और एसपी (सिटी) मृगांक शेखर पाठक व सीओ मयंक पाठक सूचना मिलने के बाद जे.एन. मैडिकल कालेज पहुंचने वाले सब से पहले अधिकारी थे. कुछ देर बाद ही अलीगढ़ के एसएसपी नीरज सिंह जादौन क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए.

फेमिली ने क्या बताया पुलिस को

एसएसपी नीरज सिंह जादौन ने क्राइम ब्रांच में तैनात सर्विलांस प्रभारी इंसपेक्टर विपिन कुमार को भी टीम के साथ मौके पर बुला लिया. सब से बड़ा सवाल था कि अभिषेक गुप्ता को गोली मारने वाले कौन लोग थे और उन का मकसद क्या था? बेटे की हत्या के बारे में नीरज गुप्ता ने अपने परिवार के साथ रिश्तेदारों को भी सूचित कर दिया था, जिस के बाद कुछ ही समय में उन के परिजनों का अस्पताल में तांता लग गया. हालांकि नीरज गुप्ता बेटे की मौत से टूट गए थे और बेहद दुखी थे, लेकिन फिर भी उन्होंने बेटे के कातिलों के बारे में पूछे गए सवालों का जो जवाब दिया, उसे सुन कर तमाम पुलिस वाले भी सन्न रह गए. नीरज गुप्ता के आरोप बेहद संगीन थे, इसलिए एसएसपी नीरज सिंह जादौन ने तत्काल पुलिस की एक टीम गठित कर दी.

एसएसपी नीरज जादौन ने अभिषेक गुप्ता के शव का पोस्टमार्टम करने व घटनास्थल पर प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ व मौके की जांच के आदेश भी दिए. उसी रात अभिषेक के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. अभिषेक के छोटे भाई आशीष ने एसएचओ विजय सिंह को हत्या का मामला दर्ज करने के लिए जो लिखित तहरीर दी, उस में 2 अज्ञात व 2 लोगों को नामजद किया गया. नामजद आरोपियों में अलीगढ़ के गांधी पार्क क्षेत्र के नौरंगाबाद निवासी पूजा शकुन पांडेय व उस के पति अशोक पांडेय के अलावा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या करने का शक बताया गया था.

एसएचओ विजय सिंह ने उसी रात अपराध संख्या 321 पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 61(2), 351(3) में मुकदमा दर्ज कर जांच अपने हाथ में ले ली. नामजद पूजा शकुन पांडे के पति अशोक पांडेय को उसी रात हिरासत में ले लिया गया. जब वह जे.एन. मैडिकल कालेज अस्पताल में अभिषेक गुप्ता की हत्या का समाचार पा कर खैरखबर लेने पहुंचा था. परिवार ने उस पर पहले ही शक जताया था. इधर जब अभिषेक गुप्ता की हत्या के शोक में डूबे फेमिली वाले कचौरा गांव पहुंचे तो वहां विलाप शुरू हो गया. आसपास के इलाकों से व्यापारी व जानकार लोग मौके पर एकत्र हो गए.

अगले दिन दोपहर तक अभिषेक के शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव को परिजनों को सौंप दिया. उसी दिन भारी जनसमूह की मौजूदगी में अभिषेक का अंतिम संस्कार कर दिया गया. तब आसपास के बाजार भी बंद रहे, क्योंकि गुप्ता परिवार इलाके में काफी प्रतिष्ठित था.

कैसे पुलिस के हत्थे चढ़े आरोपी

पुलिस ने अशोक कुमार पांडेय से जो पूछताछ की थी, उस के आधार पर यह बात साबित हो गई कि अभिषेक की हत्या अशोक कुमार पांडेय व उस की पत्नी पूजा शकुन पांडेय ने 2 लोगों को सुपारी दे कर कराई है. हालांकि पुलिस टीम ने रात में ही पूजा के अलीगढ़ स्थित गांधी पार्क आवास पर छापा मारा था, लेकिन तब तक वह फरार हो चुकी थी. पुलिस समझ गई पूजा शकुन पांडेय इस मामले में शामिल है. इसी के आधार पर एसएसपी नीरज जादौन ने एक विशेष पुलिस टीम का गठन कर दिया, जिस में रोरावर थाने के तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के साथ सर्विलांस टीम को भी शामिल किया गया.

अशोक पांडेय से 2 सुपारी किलर्स के फोन नंबर मिले थे, जिन्हें सर्विलांस पर लगा कर पुलिस टीम ने कातिलों का पीछा शुरू कर दिया. इन में से एक मोहम्मद फजल पुत्र मोहम्मद नसीर रोरावर थाना क्षेत्र के गोडा रोड, नीवरी गली नंबर 2 का रहने वाला था. उसे फोन की सर्विलांस की मदद से पहली अक्तूबर को मथुरा बाईपास पुल के नीचे से पकड़ लिया गया. उस के पास से .315 बोर का एक तमंचा व 2 कारतूस व करीब 7,100 रुपए बरामद हुए. ये वो बची रकम थी, जो उन्हें अभिषेक गुप्ता की सुपारी किलिंग के लिए एडवांस मिली थी.

उस से पूछताछ में पुलिस को हत्या के बारे में अहम जानकारी के साथ सुपारी किलिंग में उस के साथी आसिफ के बारे में पता चला. पुलिस टीम उसे लगातार ट्रैक कर रही थी. इसी दौरान अलीगढ़ डीआईजी ने आसिफ और पूजा शकुन पांडेय की गिरफ्तारी पर 50-50 हजार व एसएसपी अलीगढ़ की तरफ से 25-25 हजार का ईनाम घोषित कर दिया गया. संयोग से पुलिस को आसिफ के मोबाइल की लोकेशन मिल गई और उसे 3 अक्तूबर, 2025 को पकड़ लिया गया. उस के पास से भी पुलिस को हत्या में प्रयुक्त हथियार व कुछ नकदी मिली. पुलिस टीम ने उस के बयानों से मेल के लिए अशोक पांडेय को रिमांड पर लिया.

दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस ने हत्याकांड की  सारी कडिय़ां जोड़ीं और दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया. पुलिस को अब शिद्ïदत के साथ पूजा शकुन पांडेय यानी महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा भारतीपुरी की तलाश थी, जो लगातार अपने ठिकाने बदल रही थी. यूपी के कई जिलों गाजियाबाद, प्रयागराज, हरिद्वार दिल्ली और हरियाणा के बाद राजस्थान के भरतपुर में उस की लोकेशन पुलिस ने ट्रैस कर ली. अलीगढ़ पुलिस ने इस बार ऐसी घेराबंदी की, जिस से 10 अक्तूबर को पूजा शकुन पांडेय पुलिस के चंगुल में फंस गई.

गिरफ्तार होने के बाद पहले तो वह अभिषेक गुप्ता की हत्या से इंकार करती रही, लेकिन जब महिला पुलिस की सख्ती हुई तो वह सच को ज्यादा देर तक छिपा न सकी. महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा भारतीपुरी ने कुबूल कर लिया कि अभिषेक गुप्ता की हत्या उसी ने अपने पति व 2 सुपारी किलर्स मोहम्मद फजल व आसिफ से 3 लाख की सुपारी दे कर कराई थी, जिस में से एक लाख रुपए उस ने दोनों को एडवांस दिए थे.

पूजा ने क्यों कराई अभिषेक की हत्या

दरअसल, पहले से शादीशुदा लेकिन बाद में महामंडलेश्वर का पद लेने के लिए अपने पति अशोक पांडे से केवल कागजों पर तलाक देने वाली पूजा का कमउम्र के गबरू व अमीर नौजवान अभिषेक पर दिल आ गया था. वह उस के प्यार में पागल थी. दोनों 6 साल से प्रेमप्रसंग में थे. महामंडलेश्वर उस से शादी करना चाहती थी. वह अभिषेक को खुद से एक भी दिन दूर रखने के लिए तैयार नहीं थी.

अभिषेक की फैमिली को ये बातें पता चलीं तो उन्होंने अभिषेक को महामंडलेश्वर से दूरियां बनाने की नसीहत दी. फैमिली के कहने पर अभिषेक पूजा से दूरियां बनाने लगा. पूजा शकुन पांडेय ने अभिषेक को हासिल करने के लिए साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल शुरू कर दिया. इस वजह से अभिषेक पर न केवल 2 बार हमला कराया, बल्कि वह बाइक शोरूम में पार्टनरशिप भी मांगने लगी. मकसद सिर्फ एक ही था कि अभिषेक किसी भी तरह परेशान हो कर फिर से उस के पास आ जाए.

पूजा ने कई बार अभिषेक को वाट्सऐप कौल की, पुलिस की जांच में अभिषेक व पूजा के बीच संबंधों की बात सामने आई है. पूजा की ओर से आखिरी बार 27 अगस्त, 2025 को अभिषेक को कौल की गई. इस के बाद कई वाट्सऐप कौल किए गए, लेकिन अभिषेक उसे काट देता था. इस के चलते पूजा परेशान हो गई थी. वह तरहतरह से अभिषेक को ब्लैकमेल करती रही. चाहती थी कि अभिषेक उसी के साथ रहे. खैर में बाइक की किस्त को ले कर हुए विवाद में भी उस ने पैरवी करा कर अभिषेक के खिलाफ मुकदमा लिखाना चाहा था.

पूजा को जब घटना की जानकारी हुई तो वह खुद परिजनों के पास नहीं पहुंची. बल्कि अपने पति अशोक को हालात को भांपने के लिए भेज दिया. वहां परिजनों का गुस्सा देख कर अशोक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इस की सूचना मिलते ही पूजा फरार हो गई. उस ने फोन भी बंद कर लिया. इसी से पुलिस का शक उस पर और गहरा गया. पुलिस ने अपनी जांच में 150 से अधिक सीसीटीवी कैमरे खंगाले, जिस में बाइक सवार आरोपी कैद हुए थे. एक ने हेलमेट लगा रखा था, दूसरे का चेहरा खुला था. बाद में इन की तलाश में 4 टीमें लगाई गईं. शूटरों ने खैर से ही अभिषेक का पीछा शुरू कर दिया था. खेरेश्वर चौराहे पर मौका मिलते ही उन्होंने उसे गोली मार दी.

महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा भारती उर्फ पूजा शकुन पांडेय को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत अरजी मंजूर होने की आस थी. इसी आस में वह 15 दिनों तक 2,300 किलोमीटर तक भागी. उस ने अलीगढ़ में दायर अग्रिम जमानत अरजी वापस ले कर अगले दिन हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत अरजी दायर कराई. खुद वह वकीलों के संग हाईकोर्ट तक गई थी. घटना वाली रात ही पूजा अलीगढ़ से भाड़े की कार से बुरका पहन कर पहले गाजियाबाद में यति नरसिंहानंद के डासना आश्रम पहुंची.

जब पुलिस वहां पहुंची तो पता चला कि 27 सितंबर को तड़के ही उसे वहां से हरिद्वार भेज दिया गया. जब पुलिस हरिद्वार पहुंची तो पता चला कि 28 की शाम को उसे वहां से भी निकाल दिया गया. इस के बाद पुलिस पूरी तरह खाली हाथ थी. मगर तभी पुलिस को 7 अक्तूबर को यह खबर मिली कि पूजा शकुन के वकील ने सत्र न्यायालय में दायर की अग्रिम जमानत अरजी नौट प्रेस यानी बेल दिए जाने से इनकार के बाद वापस ले ली है. इस प्रक्रिया पर पुलिस का ध्यान गया, तब पुलिस ने करीबियों के नंबरों के जरिए जांच शुरू किया तो पता चला कि हरिद्वार से चल कर पूजा 29 सितंबर को मुरादाबाद पहुंची थी.

मुरादाबाद में 6 दिन रुकने के बाद 7 अक्तूबर की शाम को प्रयागराज भी गई. वहां उस ने अलीगढ़ से वापस कराई अग्रिम जमानत अरजी इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर की. इस के बाद वह वापस मुरादाबाद आई. यहां से 9 अक्तूबर को जयपुर रवाना हो गई, मगर जयपुर में रुकने के बजाय उस ने वापस आने का मन बना लिया. तभी पुलिस टीम 10 अक्तूबर की दोपहर उसे भरतपुर से पकडऩे में सफल हो गई.

पूजा ने इस बीच अपना नंबर कभी नहीं चलाया. न उसे साथ ले कर गई, मगर पुलिस ने अलीगढ़ व मुरादाबाद के जिन करीबियों के नंबरों का अध्ययन किया, उस जांच में यही आया कि पूजा ने हमेशा कभी कार चालक, कभी आटो चालक तो कभी होटल स्टाफ या किसी सरेराह चलते व्यक्ति का मोबाइल प्रयोग किया. कोई भी व्यक्ति महिला द्वारा परेशानी बताने पर मोबाइल प्रयोग करने को दे देता था. बस इसी सहारे पुलिस आगे बढ़ी, जिस से सफलता मिल गई.

कौन है पूजा शकुन पांडेय

पुलिस जांच में उजागर हुआ कि पूजा शकुन को उस के वकीलों ने यह समझा दिया था कि जब तक हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत अरजी पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक गिरफ्तारी से बचना है. साथ में अलीगढ़ से इतनी दूरी पर रहना है कि जरूरत पड़े तो आसानी से समय पर अलीगढ़ पहुंचा जा सके. इसीलिए पूजा भरतपुर से वापस आगरा आ रही थी. पूजा शकुन पांडेय मूलरूप से उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के सिकंदराराऊ कस्बे की रहने वाली है. सेना के कैप्टन पद से वीआरएस लेने वाले पिता आर.आर. आजाद की बेटी पूजा पांडेय उत्तर प्रदेश में पलीबढ़ी. पूजा जब छोटी थी, तब सेना से वीआरएस लेने वाले पिता ने कायमगंज में अध्यापन शुरू किया. पूजा की स्कूलिंग कायमगंज में ही हुई. बाद में पिता हरियाणा के हिसार व फिर सहारनपुर पहुंचे.

वहां जैन डिग्री कालेज में प्राचार्य बने, वहीं से सेवानिवृत्त हुए. इसी बीच उस की इंटरमीडिएट व स्नातक की पढ़ाई हिसार व सहारनपुर में हुई. वह पढऩे में हमेशा मेधावी रही और कभी 80 प्रतिशत से कम अंक नहीं लाई थी.बाद में मेरठ विश्वविद्यालय से गणित में एमफिल करने के बाद गाजियाबाद के कालेज में खुद प्रोफेसर बन गई. इधर इन के एक भाई अलीगढ़ में ही कार्यरत हैं, इसलिए सेवानिवृत्त होने के बाद पिता कुछ दिन रामपुर के जौहर विश्वविद्यालय में रहे. बाद में अलीगढ़ आ कर बस गए. गाजियाबाद में पढ़ाने के समय ही पूजा शकुन व अशोक पांडेय की मुलाकात कमलेश तिवारी से हो गई. बाद में अखिल भारत हिंदू महासभा में उन्हें राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया. मैनपुरी के किशनी कस्बा निवासी अशोक पांडेय से प्रेम संबंध होने पर दोनों ने प्रेम विवाह किया.

हालांकि परिवार ने विरोध भी किया, मगर बाद में मान गया. इसी बीच 2015-16 में गाजियाबाद से नौकरी छोड़ कर अशोक पांडेय संग अलीगढ़ आ कर बस गई. इस बीच यहां एक निजी कालेज में नौकरी की, मगर बाद में सामाजिक रूप से सक्रियता बढऩे के कारण यह नौकरी भी छोड़ दी. पूजा पहले गणित की टीचर थी और बाद में उस ने संन्यासी बनने का फैसला कर लिया. वह हिंदू धर्म और राजनीति में सक्रिय रही और हिंदू महासभा के कई प्रमुख पदों पर रही है. पूजा शकुन धार्मिक और सामाजिक विवादों को ले कर लगातार सुर्खियों में रहती थी.

पूजा शकुन पांडेय का पति अशोक पांडेय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और संगठन के प्रचारप्रसार से जुड़ा रहा है. साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर उन की पहचान राजनीति और संगठनों में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में है. 2016 में वह हिंदू महासभा से सक्रिय रूप से जुड़ी और धीरेधीरे विवादित बयानों और गतिविधियों के चलते सुर्खियों में आ गई थी. गांधी के पुतले को गोली मारने का मामला हो या जुमे की नमाज पर पाबंदी की मांग, इन घटनाओं ने उसे लगातार चर्चा में बनाए रखा था. साल 2021 में निरंजनी अखाड़े ने उन्हें महामंडह्यलेश्वर की उपाधि दी थी.

संन्यास लेने से पहले पूजा शकुन पांडेय 2 बच्चों की मां बनी थी, जिन में बड़ा बेटा वर्तमान में दसवीं व छोटा आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है. मगर संन्यास ग्रहण करने के कारण उस ने पति को कागजों पर तलाक दे दिया. वैसे वो साथ ही रहता था.

कैसे हुई पूजा की अभिषेक से मुलाकात

बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी पति अशोक पांडे ने संभाली थी. घर में ही बगलामुखी माता का मंदिर बनवाया गया और इस के बाद से उस के अनुयायी और खुद पति भी उसे माता कह कर संबोधित करने लगे थे. अब बताते हैं कि पूजा और अभिषेक की मुलाकात कैसे हुई और वह उस के जाल में कैसे फंसा. दरअसल, पूजा की अपने पापा के गांव कचौरा में पैतृक जमीन थी. इस जमीन में पूजा को भी हिस्सा मिला. उस ने 2012-13 में इस जमीन पर मकान बनवाया. इस मकान का नाम ‘श्रीराम भवन’ रखा. अभिषेक की मम्मी उसी गांव की होने के नाते इस मकान की देखरेख करती थीं.

पूजा जब भी गांव जाती तो अभिषेक के परिवार से मिलती. अभिषेक को पाने के नाम पर पूजा उसे अपने साथ ले कर अलीगढ़ आ गई. पढ़ाई के दौरान अभिषेक गुप्ता प्राइवेट जौब करने लगा. इस दौरान वह पूजा के साथ गांधी पार्क के बी. दास कंपाउंड में उस के ही मकान में साथ रहता था. साध्वी बनने के बाद पूजा यानी अन्नपूर्णा भारती ने अलीगढ़ के गांधी पार्क क्षेत्र के बी. दास कंपाउंड में अपने पिता के नाम पर मकान बनाया. अभिषेक लगभग 9 साल तक अलीगढ़ में पूजा के साथ रहा. पूजा और अशोक के सारे कामकाज अभिषेक ही देखता था. लेकिन 6 महीने पहले अभिषेक और पूजा के बीच अनबन हो गई.

अभिषेक ने पूजा और अशोक से दूरी बना ली. दरअसल, पूजा सुडौल शरीर और दमकते चेहरे की मालकिन थी. उधर अभिषेक भी बेहद आकर्षक व सुर्दशन व्यक्तित्त्व का स्वामी था. न जाने कब कैसे पूजा और अभिषेक एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. दोनों के बीच कब जिस्मानी रिश्ते बन गए, कुछ पता ही नहीं चला. एक बार जब ये रिश्ते बने तो पूजा पूरी तरह अभिषेक पर आसक्त हो गई. अभिषेक गुप्ता परिवार का बड़ा बेटा था. मम्मीपापा पहले उस की शादी करना चाहते थे, मगर पूजा ने ऐसा नहीं होने दिया. वे जब भी उस पर शादी का दबाव डालते, वह पूजा के दबाव में मना कर देता. इसलिए पेरेंट्स को छोटे बेटे की शादी पहले करनी पड़ी.

10 दिसंबर, 2024 को छोटे भाई आशीष की शादी हुई थी. इस में पूजा और अशोक पांडेय भी आए थे. इस शादी में पूजा ने भी अभिषेक की मैचिंग वाली पिंक ड्रेस पहनी और उस के साथ जम कर डांस भी किया. इस शादी के बाद पहली बार परिवार को दोनों के बीच अवैध रिश्तों की बात पता चली. जिस के बाद पेरेंट्स ने अभिषेक को समाज की ऊंचनीच समझाई तो बात उस की समझ में आ गई. इधर अशोक पांडेय को भी इस बात का पता चल चुका था कि अभिषेक व पूजा के नाजायज संबध हैं, इसलिए एकदो बार उस की अभिषेक से लड़ाई भी हो गई थी. चूंकि अशोक पांडेय जानता था कि भले ही वह पूजा के साथ रहता है, लेकिन कागजों में उस का पूजा से तलाक हो चुका है.

वैसे भी पूजा के प्रभाव और उस के सख्त मिजाज व जिद के आगे अशोक खुद को बेबस पाता था. इधर, परिवार के समझाने का असर ये हुआ कि अब अभिषेक पूजा से कटने लगा था, लेकिन पूजा लगातार अभिषेक पर साथ रहने और शादी करने का दबाव बनाने लगी थी. वह अभिषेक को अपने साथ अलीगढ़ में ही रहने पर मजबूर करती. उसे घर नहीं जाने देती थी. अभिषेक अब पूजा से परेशान हो गया था. इसीलिए उस ने अलीगढ़ में उस के घर जाना बंद कर दिया और उस का नंबर भी ब्लौक कर दिया. इस के बाद बाइक शोरूम खोला.

बन गया अभिषेक को ठिकाने लगाने का प्लान

पूजा द्वारा उस पर शादी का दबाव बनाने की बात भी अभिषेक ने अपनी मम्मी को बता दी थी और अगस्त महीने में अभिषेक ने टीवीएस बाइक का शोरूम खोल लिया. कई तरह की प्रताडऩा और दबाव के बावजूद जब अभिषेक पूजा के पास वापस आने को तैयार नहीं हुआ तो पूजा ने तय कर लिया कि वह उसे किसी और का भी नहीं होने देगी. इस काम में पूजा की मदद की मोहम्मद फजल व आसिफ ने. फजल रोरावर का रहने वाला था और वैल्डिंग का काम करता था. 7-8 साल से वह उस के पति अशोक पांडेय को जानता था. जब पूजा ने अपना मकान बनवाया था तो वैल्डिंग का काम फजल ने ही किया था.

अगस्त के शुरुआती हफ्ते में जब फजल अशोक पांडेय के घर वैल्डिंग का कुछ काम करने गया तो अशोक पांडे ने उस से कहा कि एक लड़के की हत्या करानी है, क्या वह किसी शूटर से मिलवा सकता है. इस के बदले वे पैसा देंगे. दरअसल, अशोक पांडेय भी दिल से चाहता था कि पूजा खुद ही अभिषेक को रास्ते से हटवा दे. फजल ने अशोक पांडेय के प्रपोजल पर उस से कहा कि वह इस काम में उस की मदद करेगा. इस के बाद फजल ने अपने एक दोस्त आसिफ से इस बारे में बात की तो उस ने हामी भर दी. लिहाजा कुछ दिन बाद फजल व आसिफ की अशोक पांडेय व पूजा शकुन पांडेय से उन के आवास पर एक मीटिंग हुई. उन्होंने अभिषेक की फोटो दिखा कर व सारी बता बता कर उस की हत्या करने के लिए 3 लाख रुपए में सौदा फिक्स कर दिया. यह सितंबर, 2025 के शुरुआत की बात है.

अशोक पांडेय ने दोनों को ले जा कर अभिषेक का शोरूम व घर सब दिखा दिए, लेकिन फजल व आसिफ जब भी रास्ते में अभिषेक को मारने का प्लान बनाते तो कुछ अड़चन आ जाती. आखिरकार 26 सितंबर को उन्हें मौका मिल गया और उन्होंने बस अड्डे पर काफी इंतजार के बाद गोली मार कर अभिषेक की हत्या कर दी. कितनी हैरत की बात है कि महामंडलेवर बनने के बाद जिस पूजा पांडेय ने कभी अपना जीवन ‘सनातन धर्म’ को समर्पित करने का फैसला किया था. वह एक

युवक के प्यार में उसे पाने के लिए इतनी अंधी हो गई कि उस ने खुद ही पतन की राह चुन ली.

कभी सरकारी नौकरी करने वाली पूजा ने जब अपनी नौकरी छोड़ी तो अपने पिता के नाम पर बने एनजीओ ‘अहसास’ (आजाद हिंद सामाजिक कल्याण सोसाइटी) की स्थापना की. यह एनजीओ उस ने पिता के नाम पर पंजीकृत कराया और वह इस की बनी, जबकि उस के पति अशोक पांडेय इस के प्रमोटर हैं. इस के एक साल के भीतर ही वह हिंदू महासभा में शामिल हो गई थी. साल 2017 में पूजा ने कट्टर हिंदूवादी महिला साध्वी के रूप में अपनी छवि बदलनी शुरू की. 2018 में पूजा शकुन पांडेय गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर में साध्वी अन्नपूर्णा बन गई.

इस के बाद वह निरंजनी अखाड़े की महामंडलेश्वर बन गई. इस के बाद से जहां भी वह जाती, उस का भगवा वस्त्र, लंबी रुद्राक्ष माला और एक बड़ा लाल तिलक सम्मान का पात्र बन जाता. 15 अगस्त, 2018 को मेरठ में उस ने खाप पंचायतों या फिर कहें तो शरिया अदालतों की तर्ज पर एक अस्थायी हिंदू अदालत की स्थापना की और इसे सनातन हिंदू न्यायपीठ नाम दिया. वह इस की पहली ‘मुख्य न्यायाधीश’ बनी. उस ने कई दीवानी मामलों का आपसी सहमति से निपटारा किया और लोगों ने इस का पालन भी किया.

कहते हैं बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा. पूजा शकुन पांडेय यानी महामंडलेश्वर अन्नपूर्णा भारती के साथ ऐसा ही हुआ. 2019 को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन के पुतले को एयरगन से गोली मारने का उस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिस ने उसे राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर दिया. अखिल भारतीय हिंदू महासभा की पूजा पांडेय ने अपने साथियों के साथ मिल कर गांधीजी के पुतले पर 3 गोलियां चलाईं, पेट्रोल छिड़क कर पुतले को फूंका और मिठाई बांटी. इतना ही नहीं, इस दौरान ‘गोडसे जिंदाबाद’ के नारे भी लगाए. जिस के बाद उसे खूब शोहरत मिली. इस के बाद से हिंदूवादी संगठनों के बीच पूजा को ‘लेडी गोडसे’ कहा जाने लगा.

इस घटना के बाद पूजा शकुन ने मीडिया को बताया कि उस के संगठन ने हत्या का ‘रिक्रिएशन’ कर के नई परंपरा की शुरुआत की है और अब दशहरा पर राक्षस राजा रावण के उन्मूलन के समान इस का अभ्यास किया जाएगा. नाथूराम गोडसे के सम्मान में हिंदू महासभा महात्मा गांधी पुण्यतिथि को शौर्य दिवस के रूप में मनाती है. हालांकि बाद में सोशल साइट पर वीडियो और तसवीरें सामने आने के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली. एफआईआर में हिंदू महासभा की राष्ट्रीय महासचिव पूजा शकुन और उस के पति अशोक पांडेय सहित 13 लोगों का नाम लिखा गया है. बाद में सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया.

पूजा शकुन पांडेय बीजेपी के दिग्गज नेताओं के साथ दिख चुकी है. अपने फेसबुक पोस्ट में पूजा शकुन पांडेय मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री उमा भारती के साथ भी नजर आ चुकी है. इस फोटो को 19 मार्च, 2017 को पोस्ट किया गया था, मगर अब शायद इसे हटा लिया गया है. पूजा निरंजनी अखाड़े से निष्कासित की जा चुकी है. प्रयागराज के श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी ने अन्नपूर्णा भारती को 4 अक्तूबर, 2025 को निष्कासित कर दिया था. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्र पुरी ने कहा था कि महिला साध्वी का कृत्य सनातन परंपरा के खिलाफ है. UP Crime News

—कथा आरोपियों व पीडि़तों के बयान पर आधारित

Love Crime Story: मन को भा गई जब दोस्त की प्रेमिका

Love Crime Story: अजय ने अरविंद के साथ दोस्ती का ही फर्ज नहीं निभाया, बल्कि हर तरह से सहारा भी दिया. इतने घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि दोस्त ही दुश्मन बन गया…

सुबहसुबह गांव अहिलापुर के ग्रामप्रधान सियाराम को गांव वालों ने बताया कि बाईपास के पास गन्ने के खेत में किसी युवक की लाश पड़ी है तो सियाराम कुछ लोगों के साथ खेत के अंदर जा पहुंचे. वहां सचमुच खून से लथपथ एक युवक की लाश पड़ी थी. उन्होंने फौरन इस बात की जानकारी बरेली के थाना इज्जतनगर पुलिस को दी. कत्ल की सूचना मिलते ही थाना इज्जतनगर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम सहयोगियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

बाईपास पर पहुंच कर थानाप्रभारी ने देखा कि गन्ने के खेत में एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश देख कर ही लग रहा था कि उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार कर के उस की हत्या की गई थी. तलाशी में मृतक युवक के पास से ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. उस के एक हाथ पर एकेवाईयूएमके जरूर गुदा था. इस से पुलिस कुछ अंदाजा नहीं लगा सकी. आसपड़ोस के लोगों को घटनास्थल पर बुला कर शिनाख्त कराने की कोशिश की गई, लेकिन कोई भी उस के बारे में कुछ नहीं बता सका. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाश की फोटो करा कर घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अगले दिन के अखबार में लाश की फोटो छपवाई गई तो उसे देख कर मुरादाबाद के पिपली ठाकुरद्वारा गांव का रहने वाला सुधीर थाना इज्जतनगर पहुंचा. अखबार में छपी फोटो इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम के सामने रख कर उस ने कहा, ‘‘साहब, इस आदमी की शक्ल मेरे छोटे भाई अरविंद से मिलती है. मैं उस लाश को देखना चाहता हूं, जिस की यह फोटो है.’’

इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने एक सिपाही के साथ उस लड़के को बरेली स्थित पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया. सुधीर ने लाश देख कर उस की शिनाख्त अपने छोटे भाई अरविंद की लाश के रूप में कर दिया. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने थाना इज्जतनगर में अपराध संख्या 610/14 पर अरविंद की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी. पूछताछ में मृतक अरविंद के बड़े भाई सुधीर ने बताया था कि अरविंद बरेली के सुभाषनगर में संगीता के यहां किराए पर रहता था. वहां वह अकेला ही रहता था और औटो चलाता था.

दूसरी ओर अरविंद की हत्या की जानकारी उस के जानने वालों को हुई तो वे पोस्टमार्टम हाऊस के बाहर इकट्ठा होने लगे. अरविंद जिस संगीता के मकान में रहता था, वह भी आ गई थी. अरविंद की परिचितों में एक औरत सरला भी थी. आते ही वह संगीता पर उस की हत्या का आरोप लगाने लगी तो संगीता ने सरला को अरविंद की हत्या का जिम्मेदार ठहराया. उन की बातें सुन कर इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम को लगा कि अगर इन दोनों महिलाओं से अरविंद के बारे में पूछताछ की जाए तो शायद हत्यारों तक पहुंचना आसान हो जाएगा. इसलिए उन्होंने संगीता और सरला को पूछताछ के लिए थाना इज्जतनगर आने को कहा.

थाने में की गई पूछताछ में सरला ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ बिहारीपुर में किराए के मकान में रहती थी. संगीता के यहां जाने से पहले अरविंद उसी के साथ उस के मकान में रहता था. लेकिन इधर कुछ महीनों से वह सुभाषनगर की तिलक कालोनी में रहने वाली संगीता के घर रहने चला गया था. संगीता ठीक औरत नहीं थी. 2 दिन पहले अरविंद उस से मिलने उस के घर आया था. तब उस ने मुरादाबाद जाने की बात कही थी. थोड़ी देर रुक कर वह चला गया था. बाद में जब उस ने अरविंद को फोन कर के मुरादाबाद जाने के बारे में पूछा तो उस ने फोन काट दिया था. इस से वह समझ गई कि अरविंद मुरादाबाद नहीं गया था.

सरला से पुलिस को मृतक अरविंद का मोबाइल नंबर मिल गया था. संगीता ने पूछताछ में बताया था कि इन दिनों अरविंद उसी के घर किराए पर रह रहा था, इसलिए सरला उस से जलती थी. इसी वजह से उस ने अरविंद की हत्या करा दी थी. दोनों महिलाओं से पूछताछ के दौरान इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम ने उन के घर के सभी लोगों के मोबाइल नंबर ले लिए और उन की काल डिटेल्स निकलवाई. मृतक अरविंद के फोन नंबर की काल डिटेल्स से उस के कुछ दोस्तों के भी नंबर मिल गए थे. पुलिस ने उस के सभी दोस्तों को भी बुला कर पूछताछ की.

अरविंद के दोस्तों से पता चला कि उस की दोस्ती सरला के बेटे अजय से थी. इस के बाद अजय को भी थाने बुला कर पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस को अजय पर शक हुआ तो पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. काल डिटेल्स के अनुसार उस की घटना वाले दिन अरविंद से तो बात हुई  ही थी, एक अन्य मोबाइल नंबर पर भी 6 मिनट से ज्यादा बात हुई थी. अजय से उस नंबर के बारे में पूछा गया तो वह नंबर उस की प्रेमिका कामिनी का निकला.

कामिनी का भी संगीता के यहां आनाजाना था. अरविंद भी वहीं रहता था. काल डिटेल्स से पता चला था कि अजय की कामिनी से हर रोज लंबीलंबी बातें होती थीं. इस से इंसपेक्टर मोहम्मद कासिम को लगा कि अरविंद की हत्या की वजह कहीं कामिनी तो नहीं. अगर कामिनी की वजह से हत्या हुई होगी तो यह हत्या अजय ने की होगी. संदेह होने पर थानाप्रभारी ने अजय से पूछा कि घटना वाले दिन वह उस समय कहां था, जिस समय अरविंद की हत्या हुई थी. थानाप्रभारी के इसी सवाल में अजय फंस गया और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने अपने 2 दोस्तों विमल और पालू के साथ मिल कर अरविंद की हत्या की थी. अजय ने पूछताछ में अरविंद की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह प्रेमिका के लिए की गई हत्या की कहानी थी.

एकेवाईयूएमके यानी अरविंद कुमार यादव उर्फ मुन्नू कुमार उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गांव पिपली ठाकुरद्वारा का रहने वाला था. उस के मातापिता गुजर चुके थे. एक बड़ा भाई था, जो गांव में ही रहता था. अरविंद की उम्र 28 साल थी. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. गांव में खेतीबाड़ी न होने की वजह से उस ने गाड़ी चलाना सीखा और बरेली में औटो चला कर गुजरबसर करने लगा. गांव से बरेली आनेजाने में उसे परेशानी होती थी. उस ने अपनी यह परेशानी बरेली के कुछ दोस्तों को बताई तो उस के एक दोस्त अजय ने इसे गंभीरता से लिया. 19 वर्षीय अजय मां और 3 बहनों के साथ बरेली के बिहारीपुर में किराए पर रहता था. उस की बहनों में मधु उस से बड़ी थी, जबकि बाकी की 2 बहनें छोटी थीं. अजय के पिता नेत्रपाल की कुछ साल पहले बीमारी से मौत हो चुकी थी. पिता की मौत के बाद बारादरी की एक फर्नीचर की दुकान पर नौकरी कर के वही पूरे परिवार को पाल रहा था.

अरविंद ने जब अजय से अपनी परेशानी बताई तो उसे उस पर तरस आ गया था. उस ने अरविंद के सामने अपने साथ रहने का प्रस्ताव रखा. हालांकि अजय उम्र में अरविंद से काफी छोटा था, लेकिन वह उसे पक्का दोस्त समझता था. दोस्त के इस प्रस्ताव पर उस की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. उसे अजय की दोस्ती पर गर्व महसूस हुआ. जिस हौसले से उस ने अरविंद को अपने घर में रहने को कहा था, अरविंद की नजरों में उस का कद काफी बढ़ गया था. अरविंद अजय के घर रहने लगा. कुछ ही दिनों में अरविंद अजय की मां एवं बहनों से इस तरह घुलमिल गया, जैसे वे सब उस की अपनी हों. अजय की बहनें भी उसे सगे भाई की तरह मानती थीं. अरविंद अजय के घर रहनेखाने के रूप में एक तय रकम देता था. अजय के घर रहने से अरविंद को अपने काम पर जाने में काफी आसानी हो गई थी.

उस का काम ऐसा था कि हर रोज नएनए लोगों से मुलाकात होती थी. इन में अच्छे लोग भी होते थे और बुरे लोग भी. एक दिन अरविंद के औटो में एक महिला सवार हुई. बातचीत में उस ने अरविंद से उस के बारे में पूरी जानकारी ले ली. अरविंद ने उसे उस के घर छोड़ा और अपना किराया ले कर चला गया. लेकिन उस दिन के बाद उस महिला को जब भी कहीं आनाजाना होता, वह अरविंद के ही औटो से आतीजाती. लगातार मिलते रहने की वजह से अरविंद उस महिला से काफी घुलमिल गया.

अरविंद के पूछने पर उस हंसमुख स्वभाव की महिला ने अपना नाम संगीता बताया. संगीता का पति मोहरपाल भी औटो चलाता था. उस के 3 बच्चों में 2 बेटे आकाश उर्फ बबलू, विशाल और एक बेटी पूजा थी. अरविंद अविवाहित था, इसलिए हंसमुख स्वभाव की संगीता उसे काफी अच्छी लगी. बातचीत और हावभाव से उसे लगा कि अगर वह संगीता के ऊपर थोड़ा खर्च करता है तो संगीता जल्दी ही उस के काबू में आ सकती है. दूसरी ओर खुले विचारों वाली संगीता के दिल में भी अरविंद के प्रति कुछ ऐसी ही सोच थी. अरविंद ने संगीता से नजदीकियां बढ़ाने के लिए कोशिशें तेज कर दीं. वह संगीता को मुफ्त में सैरसपाटा कराने के साथसाथ उस पर पैसे भी खर्च करने लगा.

संगीता ने अरविंद का झुकाव अपनी ओर देखा तो उस ने उसे खुली छूट दे दी. इस का नतीजा यह निकला कि उन दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद संगीता के करीब आने के लिए अरविंद बेचैन रहता था. संगीता को भी अरविंद से जो सुख मिलता था, उस के लिए वह भी परेशान रहने लगी थी. इस दिक्कत को दूर करने के लिए अरविंद अजय का घर छोड़ कर संगीता के यहां रहने आ गया. सरला की समझ में यह नहीं आया कि इतना प्यार मिलने के बावजूद अरविंद अचानक उस का घर छोड़ कर क्यों चला गया? लेकिन अजय अरविंद का दोस्त था, इसलिए उसे अरविंद के जाने की वजह पता थी. लेकिन यह बात वह मां को बता नहीं सकता था.

इधर कुछ दिनों से संगीता के घर एक खूबसूरत लड़की कामिनी आनेजाने लगी थी. अरविंद ने उस के बारे में पूछा तो संगीता ने बताया कि उसे काम की तलाश है. दरअसल संगीता चालू किस्म की औरत थी. वह भोलीभाली और गरीब लड़कियों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर अपने परिचित ग्राहकों के आगे परोसती थी. कामिनी संगीता की इस वास्तविकता को नहीं जानती थी. वह जब भी संगीता से मिलने आती, संगीता उसे अपने पास बिठा कर सुनहरे ख्वाब दिखाती. इस बीच अगर वहां अरविंद होता तो वह कामिनी से हंसीमजाक कर के उस के करीब आने की कोशिश करता. जबकि कामिनी उसे जरा भी तवज्जो नहीं देती थी.

अरविंद भले ही अजय का घर छोड़ कर चला आया था, लेकिन उन की दोस्ती अभी भी पहले जैसी ही थी. इसलिए अजय अकसर उस से मिलने संगीता के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में किसी दिन अरविंद ने अजय का परिचय कामिनी से करा दिया. अजय और कामिनी हमउम्र थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई, जो जल्दी ही प्यार में बदल गई. अजय और कामिनी में निकटता बढ़ी तो एक दिन कामिनी ने अजय से अरविंद की शिकायत करते हुए कहा कि अरविंद की नीयत उस के प्रति ठीक नहीं है. जब देखो, तब वह उस से छेड़छाड़ करता रहता है.

कामिनी की इस शिकायत पर अजय ने अरविंद से कहा कि वह कामिनी से प्यार करता है, इसलिए वह उसे परेशान न करे. इस के बाद अरविंद कामिनी को और परेशान करने लगा. तब अजय ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली. अरविंद ने उस की धमकी एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी. जब भी उस की मौजूदगी में कामिनी संगीता से मिलने आती, वह उसे पटाने की कोशिश में लग जाता. अरविंद की इन ओछी हरकतों का कामिनी ने विरोध भी किया, लेकिन संगीता की ओर से खुली छूट मिली होने की वजह से अरविंद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. कामिनी के खूबसूरत जिस्म को पाने के लिए उस का मन मचल रहा था. वह जब भी कामिनी को छेड़ता, कामिनी उस की शिकायत अपने प्रेमी अजय से करती. इस के बाद अजय गुस्से में अरविंद के पास पहुंच जाता और उस से लड़ाईझगड़ा करता.

इस तरह कामिनी को ले कर दोनों के बीच आए दिन लड़ाईझगड़ा होने लगा. जब अजय ने देखा कि अरविंद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है तो उस ने अपने दोस्तों, विमल पुत्र रामशरण निवासी कोधल, थाना सिकंदरा, आगरा और पालू पुत्र सूरजपाल निवासी नौरंगपुर, थाना ममौरा, बरेली के साथ मिल कर अरविंद की हत्या की योजना बना डाली.  विमल पहले आगरा में रहता था. वह फेसबुक के जरिए अजय की बड़ी बहन मधु के संपर्क में आया था. दोनों में घनिष्ठता बढ़ी तो वह मधु से मिलने बारबार बरेली आने लगा. मधु से मिलनेजुलने में परेशानी न हो, इस के लिए उस ने उस के भाई अजय से दोस्ती गांठ ली थी. अजय से दोस्ती के बाद विमल उस के घर बेरोकटोक आनेजाने लगा था. मधु के ही लिए विमल अरविंद की हत्या की योजना में अजय का साथ देने को तैयार हुआ था.

27 नवंबर को अजय ने कामिनी को फोन किया तो उस ने एक बार फिर अरविंद की शिकायत की. तब अजय ने कहा, ‘‘आज के बाद अरविंद तुम्हें फिर कभी परेशान नहीं करेगा.’’

यह सुन कर कामिनी खुश हो गई. उसी रात अजय लोहे की रौड ले कर अरविंद को सबक सिखाने के लिए बाईपास के सुनसान रास्ते पर पहुंच गया. विमल और पालू भी उस के साथ थे. कुछ देर इंतजार करने के बाद जब अरविंद आया तो तीनों ने उसे घेर लिया. अरविंद कुछ समझ पाता, अजय ने लोहे की रौड से पीटपीट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अरविंद की हत्या करने के बाद लाश को घसीट कर उन्होंने सड़क के किनारे के एक गन्ने के खेत में फेंक दिया और खून से सनी वह रौड भी उन्होंने वहीं फेंक दी थी.

पुलिस ने अजय की निशानदेही पर लोहे की वह रौड भी बरामद कर ली थी, जिस से उस ने अरविंद की हत्या की थी. दोनो अन्य अभियुक्तों, विमल और पालू में से पुलिस ने विमल को तो अजय के घर से गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन पालू पकड़ में नहीं आया. पूछताछ के बाद अजय और विमल को पुलिस ने अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पालू की तलाश की जा रही है. Love Crime Story

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. संगीता और कामिनी प

UP Crime News : एक नाबालिग के 2 दीवाने दोनों ने कर दी हत्या

UP Crime News : कुशीनगर की 17 वर्षीय अमृता शर्मा और 26 वर्षीय सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली एकदूसरे को दिलोजान से प्यार करते थे. सैफ अली का लंगोटिया यार इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू भी अमृता से एकतरफा मोहब्बत करता था. प्यार में अंधी अमृता एक दिन अपना घर छोड़ कर प्रेमी सैफ अली के पास आ गई. इस के बाद इन दोनों दोस्तों ने अमृता के साथ जो किया वो…

26 वर्षीय सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली घर में नमाज अता करते वक्त इबादत कर रहा था, ”मेरी महबूबा अमृता पर किसी आवारा आशिक की बुरी नजर न लगे. वह मेरी थी, मेरी है और मेरी ही रहेगी. किसी आवारा आशिक की जब भी उस पर गंदी नजर पड़ती है या उसे घूर कर कोई देखता है तो मेरे कलेजे में आग सी लग जाती है. उस समय जी तो यही चाहता है कि उसे कत्ल कर दूं, लेकिन मैं ऐसा कर नहीं सकता. क्योंकि बेपनाह मोहब्बत करता हूं मैं उसे. पलकों पर बैठा कर रखना चाहता हूं उसे. या मेरे परवरदिगार, अगर कहीं मेरे से महबूबा की शान में कोई गुस्ताखी हो जाए तो मुझे माफ करना. आमीन.’’

सैफ अली ने अपने एक कमरे में तरीके से सारा सामान सजा कर रखा था. कमरे में एक तख्त था, जिस पर बिस्तर बिछा हुआ था. फर्श पर वह एक साफसुथरी चादर बिछा कर नमाज अता कर रहा था और महबूबा अमृता की सलामती के लिए दुआ मांग रहा था. उस वक्त शाम ढल चुकी थी. नमाज अता कर के जैसे ही सैफ अली फारिग हुआ, तभी उस का अजीज दोस्त इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू उस से मिलने आया. दोनों ने एकदूसरे से दुआसलाम की. तभी इम्तियाज बोला, ”कई दिनों से मैं तुम से मुलाकात करने की सोच रहा था. फिर आज आ ही गया.’’

”अच्छा किया, जो मिलने आ गए. तुम से मिलने के लिए मेरा मन भी बेचैन था.’’ सैफ अली ने कहा.

”और भाभीजान कैसी हैं?’’ टिंकू ने सैफ अली की महबूबा अमृता के बारे में सवाल किया था.

”मजे में है.’’ उस ने सपाट लहजे में जवाब दिया.

जवाब सुन कर टिंकू चुप रह गया. पल भर कमरे में सन्नाटा छा गया था. फिर सन्नाटे को टिंकू ही तोड़ा, ”दोस्त, मुझ से नाराज हो क्या?’’

”नहीं तो, बाई दि वे तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम से नाराज हूं?’’

”मेरी दिल्लगी करने की आदत जो है, वही कर रहा था.’’

”लेकिन मेरी ऐसा करने की कोई आदत नहीं, सो प्लीज यार, सीरियस हो जाओ.’’

”कहीं ऐसा तो नहीं, जानेअनजाने में मैं ने तेरा दिल दुखा दिया हो. अगर ऐसी बात है तो यार माफ करना मुझे, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था, जिस से तेरा दिल दुखे और तू तकलीफ में आ जाए.’’

”खैर, छोड़ यार. वैसे भी मेरा मूड कुछ अपसेट है. थोड़ा फ्री रहना चाहता हूं. कल मिलता हूं, फिर बात करता हूं.’’

”चलता हूं.’’ इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू दोस्त को सलाम कर वहां से अपने घर के लिए चला गया. रास्ते भर वह यही सोचता रहा कि सचमुच दोस्त किसी बात को ले कर परेशान दिख रहा था. कहीं भाभीजान की खैरियत पूछ लेने से तो नाराज नहीं हो गया या कोई और बात है. कल मुलाकात करने पर जरूर पूछूंगा. सोचतेसोचते टिंकू घर पहुंच गया.

सैफ अली अजीज दोस्त टिंकू से वाकई नाराज था. क्योंकि उस की प्रेमिका अमृता ने सैफ को बताया था कि टिंकू उस पर बुरी तरह से फिदा है. वह भी उसे चाहता है. उस ने अपना प्रेम निवेदन मुझ तक शेयर कर के अपने दिल की बात बताई थी कि वह भी उस से दिलोजान से मोहब्बत करता है. उसे अपने दिल रूपी घर में पनाह ले लेने दे.

सैफ अली ने अमृता के मुंह से जब से यह बात सुनी, तब से उस के तनबदन में आग सी लग गई थी. उस की हिम्मत कैसे हुई कि उस ने मेरे प्यार को बहकाने की जुर्रत की. मजा तो इस का उसे चखा कर ही रहूंगा. अमृता मेरी थी, मेरी है और मेरी ही रहेगी. कोई भी हमारे बीच में आने की जुर्रत करेगा तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पडेगा. टिंकू ने अमृता को बुरी नजर से देख कर उसे नापाक करने की कोशिश की है, छोड़ूंगा नहीं उसे, कल मिलता हूं फिर उसे मजा चखाता हूं. इसीलिए उसे देख कर सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली का मूड खराब हो गया था और अपने घर से उसे जल्दी से लौटा दिया था.

सैफ अली उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के हाटा पिपरा कपूर गांव का रहने वाला था. 3 भाइयों में वह सब से बड़ा था. पढ़लिख कर भी वह बेरोजगार था. नौकरी की तलाश में वह जुटा हुआ था, लेकिन नौकरी नहीं मिलने पर वह खाली बैठा था. इसी गांव में उस की प्रेमिका अमृता शर्मा भी रहती थी.

7171 गैंग के सदस्य थे दोनों दोस्त

सोशल मीडिया पर ‘लाला 7171 गैंग’ सक्रिय था. यह रील बना कर सोशल मीडिया पर खतरनाक असलहों और धारदार हथियारों के साथ रील बना कर पोस्ट कर के लोगों में अपने गैंग का खौफ भरते थे. सैफ अली और टिंकू दोनों उस खतरनाक गैंग के सक्रिय सदस्य थे. 20 सदस्यों वाला यह गैंग किसी से झगड़ा होने पर एकजुट हो कर खतरनाक असलहे और लाठीडंडा ले कर मारपीट करने पर उतारू हो जाता था. कुशीनगर जिले में इस गैंग की इतनी दहशत थी कि कोई गलती से भी पंगा लेने के बारे में सोचता नहीं था.

इसी गैंग के सदस्य बनने के बाद सैफ अली और टिंकू दोनों एकदूसरे के निकट आए और दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी. इम्तियाज उर्फ टिंकू हाटा कस्बे के अंबेडकर नगर मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहता था. परिवार में मम्मीपापा के अलावा 4 भाईबहन थे. उन में वह दूसरे नंबर का था. वह भी पढ़लिख कर बेरोजगार था और कामधंधे की तलाश थी, इसलिए वह भर दिन यहांवहां तफरीमस्ती करता था.

पड़ोस में रहने वाली नाबालिग अमृता शर्मा (17 वर्षीय) से सैफ अली प्यार करता था. अपने दिल की हर बात वह दोस्त इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू से शेयर करता था. टिंकू से दिल की बात शेयर किए बिना उस का जैसे खाना हजम ही नहीं होता था. एक दिन की बात है. शाम का वक्त हो रहा था. घर पर सैफ अली का मन नहीं लग रहा था. वह हाटा कस्बे में घूमने आया तो वहां उसे टिंकू मिल गया.

उस समय सैफ अली के चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया भर की खुशियां उस की झोली में आ गिरी हों या कोई मन की मुराद पूरी हो गई हो. सैफ अली  के चमकते चेहरे को देख कर उसे रहा नहीं गया तो वह दोस्त से खुशी का राज पूछ बैठा, ”क्या बात है यार, आज तो बड़े खुश नजर आ रहे हो. भाभी ने किसविस दे दी क्या?’’

”तुम्हें जलन हो रही है मेरी खुशी देख कर,’’ टिंकू की बात सुन कर उस का पूरा मूड खराब हो गया, ”हां, किस दे दी है तो… देख रहा हूं आजकल तेरी मेरे प्यार पर कुछ खास ही नजर रहती है. बड़ा मेहरबान रहता है तू उस पर.’’

”दोस्त, मैं ने तो मजाक में ऐसे ही कह दिया था.’’ टिंकू समझ गया था कि वह नाराज हो गया है, इसीलिए वह बात बदलते हुए आगे बोला, ”अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो माफ कर देना.’’

”देख, तू मेरा यार है, बात यारी तक ही रह जाए तो अच्छा है, वरना दोस्ती में खटास आ जाएगी, कह देता हूं.’’

”मतलब! ऐसा मैं ने क्या किया, जो तुम मेरे को धमका रहे हो कि दोस्ती में खटास आ जाएगी.’’

”तू तो ऐसा भोला बन रहा है, जैसे तेरे को कुछ पता ही नहीं. लेकिन मैं तेरे को आखिरी बार समझा देता हूं कि तू मेरे प्यार से जितनी दूरी बना कर रखेगा, तेरी सेहत के लिए उतना ही अच्छा होगा. अमृता ने मुझ से सब साफसाफ बता दिया है कि तू उस पर डोरे डाल रहा है, उसे लाइन मारता है.’’

”क्यों बकवास किए जा रहा है यार.’’ टिंकू दोस्त पर बिदक गया, ”झूठ बोलती है, वो. मैं सच कहता हूं कि ऐसा कुछ भी नहीं है. दोस्त, हमारी पाक दोस्ती के बीच गलतफहमी पैदा कर वह हमें आपस में लड़ाना चाहती है. दोस्तों के बीच दरार पैदा करना चाहती. कसम से कह रहा हूं कि मेरे दिल में भाभी के लिए सिर्फ इज्जत है और कुछ नहीं.’’

”झूठ नहीं बोलती वो.’’ सैफुद्दीन जोर से चीखा. चीख सुन कर आसपास के लोग दोनों को देखने लगे कि वे क्यों झगड़ रहे हैं.

”झूठ तू बोल रहा है. हमारे बीच गलतफहमी का बीज वो नहीं बो रही है, तू बो रहा है. तू उस पर फिदा है, मरता है तू उस पर. तूने अपनी मोहब्बत का पैगाम उसे दिया, उस ने तेरे प्यार को ठुकरा दिया और कहता कि वह हमारे बीच दरार डालने की कोशिश कर रही है. देख टिंकू, मैं सब कुछ बरदाश्त कर सकता हूं, लेकिन मेरे प्यार के साथ कोई छेड़छाड़ करे, ये कतई बरदाश्त नहीं कर सकता. समझे.’’

”बात मान यार मेरी तू, अमृता भाभी मेरे पर जो इलजाम लगा रही है, सरासर गलत है. ऐसा मैं ने कुछ नहीं किया है, जो मेरे पर इलजाम लगाए. ये सब बेबुनियाद इलजाम हैं. तू यकीन कर मेरे दोस्त.’’

”चल, कुछ देर के लिए मैं ने तेरी बात मान ली, अमृता तुझे बदनाम करने के लिए झूठ बोल रही थी. तू सोच वह झूठ क्यों बोलेगी? ऐसा कर के उसे क्या मिलेगा? वह क्यों खुद के ऊपर कीचड़ उछालेगी, जिस से वह खुद ही गंदी हो जाए. है तेरे पास इस का कोई जबाव तो बता.’’

सैफ अली की बात सुन कर टिंकू एकदम चुप रह गया. कोई उत्तर नहीं दिया.

”नहीं हैं न, तेरे पास इस का कोई जवाब. मतलब साफ है कि तू झूठ बोलता है न कि अमृता. बस बहुत हो गया, उस से दूर हो जा, नहीं तो मैं दोस्ती तोडऩे में जरा भी वक्त नहीं लगाऊंगा. ये मेरी पहली और आखिरी चेतावनी है. आगे तेरी मरजी.’’

इम्तियाज ने इस तरह रची खतरनाक साजिश

एक लड़की के चलते पहली बार टिंकू को इतना जलील होना पड़ा था. सैफ अली ने पहली बार अपनी प्रेमिका के लिए अपने अजीज दोस्त को जलालतमलामत का सबक सिखाया था. जबकि उन की दोस्ती लोगों में मिसाल बना करती थी. यह बात टिंकू को बहुत बुरी लगी थी. उसे कतई अमृता से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि मेरे प्रेम निवेदन वाली बात दोस्त से साझा कर देगी. उसी पल टिंकू ने कसम खाई कि अमृता मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की नहीं होने दूंगा. उस के जीवन में ऐसी आग लगाऊंगा कि वह उस की आग में अपनी सारी खुशियां झुलसा देगी. दोस्तों के बीच गहरी खाई खोद कर अच्छा नहीं किया है.

दरअसल, टिंकू दोस्त की प्रेमिका अमृता शर्मा से एकतरफा प्यार करने लगा था. चूंकि अमृता अपने प्रेमी का दोस्त समझ कर उस से हंसबोल लिया करती थी. उस की उसी हंसी को वह प्यार समझने की भूल कर बैठा था. ऊपर से सैफ अली भी अपने प्यार का बखान समयसमय पर उस के सामने करता रहता था. इसी से उस का झुकाव अमृता की ओर बढ़ता गया और उसे उस से प्यार हो गया था. लेकिन अमृता उसे प्यार नहीं करती थी, बल्कि वह इस बात से अंजान थी टिंकू भी उस से प्यार करता था.

खैर, टिंकू दोस्त से हुए अपमान को बदला लेने के लिए फडफ़ड़ाने लगा था. उस ने फैसला कर लिया था कि अगर वह मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की भी नहीं होने दूंगा. दोस्त सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली और अमृता के बीच चल रहे प्यार वाली बात अमृता के घर वालों को बता देगा. उस के बाद जो खेल होगा, उस में हाथ सेंकने में बड़ा मजा आएगा. तब कहीं जा कर मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचेगी. टिंकू ने जैसा सोचा था, वैसा ही किया. 10 जुलाई, 2025 की दोपहर वह अमृता के घर पहुंच गया. उस समय वह घर पर नहीं थी, स्कूल गई थी. उस के घर पर उस की मम्मी और उस क ी बहनें थीं. यही मौका उसे सही और उचित लगा था घर वालों को भड़काने के के लिए.

फिर क्या था, टिंकू ने मौका देख कर चौका मार दिया. उस ने अमृता की मम्मी से सैफ अली और उस की बेटी की प्रेम लीला वाली बात खोल अपनी जलन पर बर्फ का मरहम लगा लिया और वहां से अपने घर लौट आया. अब जा कर उस के कलेजे को ठंडक पहुंची थी. एक दूसरे समुदाय के लड़के से अमृता प्यार करती है, यह बात सुन कर फेमिली वाले आगबबूला हो गए थे. बेटी से उन्हें कतई ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह अपनी कुलच्छन हरकत से घर वालों का नाम डुबोएगी. शाम में जब अमृता के पापा राघव कामधंधे से वापस घर लौटे तो उन की पत्नी ने बेटी की करतूतों की पोटली उन के सामने खोल कर रख दी थी.

बेटी की करतूत सुन कर राघव का खून खौल उठा था. उन्होंने आव देखा न ताव, हाथ में जो भी मिला, उसी से बेटी को पीटने लगे. उसे बुरी तरह लात, चप्पल और डंडे से तब तक पीटते रहे, जब तक उन का गुस्सा शांत नहीं हुआ. जब गुस्सा शांत हुआ, तब पत्नी से बोल दिया कि उसे घर में कैद कर के रखो और इस का स्कूल जाना बंद कर दो. इस पर इतनी कड़ाई करो कि इस के सिर से उस बेहूदा इश्क का भूत उतर जाएगा. अगर तुम से यह नहीं हो सकता तो बता दो मैं ही कोई इंतजाम कर दूं. इस नालायक ने तो हमारी इज्जत मटियामेट कर दी है.

अमृता पापा की मार से बुरी तरह आहत थी. रोरो कर उस का बुरा हाल था. गनीमत थी कि उस का फोन उसी के पास सुरक्षित रह गया था. वह छीन नहीं पाए थे. यह सोच कर उसे थोड़ी तसल्ली हुई. थोड़ी देर बाद जब उस का मन शांत हुआ तो उस ने प्रेमी सैफ अली के पास चुपके से फोन किया. उस समय रात के करीब 9 बज रहे थे. प्रेमिका का रात के समय फोन आया देख सैफुद्दीन घबरा गया और कमरे से फोन ले कर बाहर निकल आया.

”हैलो! इतनी रात गए तुम ने फोन क्यों किया?’’ दबी जुबान में उस ने पूछा.

”मैं हमेशाहमेशा के लिए घर छोड़ कर आप के पास रहने आ रही हूं.’’ अमृता सुबकती हुई बोली.

”पहले तुम रोनाधोना बंद करो और बताओ बात क्या है? किसी ने तुम्हें कुछ कहा है या कोई और बात है. साफसाफ बताओ मुझे.’’

”हमारे प्यार के बारे में मेरे घर वालों को पता चल गया. पापा ने डंडे से मुझे बहुत मारा है. मुझे घर से निकलने पर पाबंदी लगा दिए हैं. मैं आप के बिना  जी नहीं सकती, मर जाऊंगी. मुझे आप के साथ रहना है.’’

”आखिर उन्हें हमारे प्यार के बारे पता कैसे चला?’’

”कैसे पता चला! अपने दोस्त टिंकू से पूछिए. उसी ने जा कर मेरे घर वालों को बताया है.’’

”टिंकू ने ऐसा किया!’’ सैफुद्दीन चौंक पड़ा, ”मुझे यकीन नहीं हो रहा कि टिंकू ने ऐसी गद्दारी की हमारे साथ. उस हरामी के पिल्ले को तो मैं छोड़ूंगा नहीं, लेकिन तुम इतनी रात गए घर से निकलना मत. थोड़ा सोचने का मौका दो.’’

”मैं कुछ नहीं जानती हूं. मुझे अब घर नहीं रहना तो नहीं रहना. बस कह दिया मैं ने. मैं आ रही हूं घर छोड़ कर.’’

”ठीक है, नहीं मानोगी तो गांव के बाहर आ कर मिलो. मिल कर फिर सोचता हूं कि क्या करना है.’’ कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया सैफ अली ने और आगे के रास्ते के बारे में सोचने लगा.

अमृता अपनी जिद पर अड़ी रही और उस ने घर छोडऩे का पक्का मूड बना लिया. बस घर वालों के गहरी नींद में जाने के इंतजार में बेकरार थी.

अमृता का फोन आने के बाद से सैफ अली का दिमाग काम करना बंद कर दिया था. जैसे उस की सोचनेसमझने की शक्ति कम हो गई थी. वह बुरी तरह परेशान हो कर इधरउधर टहलता रहा. दिल जोरजोर से सीने में बेखौफ धड़कने लगा था और माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा उठी थीं. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे इतनी रात गए घर पर तो नहीं ला सकता था. घर वाले जानेंगे तो क्या सोचेगें. अब्बूअम्मी तो मेरी जान ले लेंगे. यह किस मुसीबत में डाल दिया तूने टिंकू. मैं तेरे को छोड़ूंगा नहीं.

सैफ अली सोचता हुआ घर वालों से झूठ बोल कर बाइक ले कर गांव के बाहर चकरी पट्टी नहर पहुंच गया, जहां अमृता शर्मा उस से मिलने आ रही थी. इस से पहले उस ने टिंकू को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया था. टिंकू की हरकतों से वह गुस्से से लालपीला हुआ जा रहा था.

साजिश में शमिल हो गया सैफ अली

सैफ अली का फोन रिसीव कर टिंकू गांव के बाहर पैदल ही आ चुका था. टिंकू को देखते ही सैफुद्दीन का पारा सावतें आसमान पर चढ़ गया. इस बात पर दोनों आपस में झगड़ते रहे कि उस ने प्यार वाली बात अमृता के फेमिली वालों को क्यों बताई? इस पर सफाई देते हुए उस ने कहा, ”तू उस की मक्कारी को समझ नहीं रहा है, वह तुझे अंधेरे में रख कर मेरे से नैन मटक्का करती है. पूछने पर कहती है कि वह मुझ से प्यार करती है. तुम से नहीं.’’

”जानता है तू इस प्यार के लफड़े ने हमें कितनी बड़ी मुसीबत में डाल दिया है. वह हमेशाहमेशा के लिए अपना घर छोड़ कर मेरे पा रहने आ रही है. तू बता मैं क्या करूं? कहां रखूं उसे?’’

”क्या..? अमृता घर छोड़ कर आ रही है? वह भी इतनी रात गए?’’ टिंकू भी चौंके बिना नहीं रह सका. वह भी उतना ही परेशान हुआ था, जितना सैफ अली परेशान था.

”यार, मैं तो कहता हूं इस संकट की घड़ी में हम अपनी दुश्मनी भुला कर कोई रास्ता निकालते हैं, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

”सारे फसाद की जड़ तू है. न तू अकड़ दिखाता और न ही हमें फंसना पड़ता.’’

”देख भाई, जो होना था सो हो गया. अब क्या करना है उस के बारे में सोच. कैसे इस मुसीबत से बाहर निकला जाए, उस के बारे में सोच.’’

”तू ही बता इस मुसीबत से कैसे बाहर निकला जाए?’’

”बात मानोगे भाई मेरी?’’

”बक, क्या बकना चाहता है?’’

”इस लड़की ने हमारी दोस्ती में दरार डाली और हमारे बीच गलतफहमी पैदा की है. जब तक जिंदा रहेगी, यूं ही परेशान करती रहेगी.’’

”क्या मतलब है तेरा?’’

”इसे रास्ते से हटा दो भाई. सारा लफड़ा ही खत्म हो जाएगा.’’ टिंकू ने उसे सुझाव दिया.

”कह तो तू ठीक ही रहा है.’’ सैफ अली को टिंकू की बात में दम दिखाई दिया, ”जैसे भी हो, गले की इस हड्डी को अपनी जिंदगी से दूर करना है, वरना हमारा मरना तय है.’’

”तो ठीक है, आने दो साली को, आज ही निबटा देते हैं. सारे फसाद की जड़ ही खत्म हो जाएगी.’’

”तो ठीक है, जो करना है आज ही करना है, मार दो साली को.’’ सैफ अली ने सारे शिकवेगिले भुला कर टिंकू से हाथ मिला लिया और चकरी पट्टी नहर पर अमृता के आने का इंतजार करने लगा. टिंकू को भी वहीं मिलने को बुलाया था. फिर दोनों ने मिल कर आगे की योजना बनाई. अमृता की हत्या कर उस की लाश वहां दूर रामपुर कारखाना स्थित नहर में डाल देंगे, जिस का पता किसी को कभी नहीं हो सकता.

दोनों की जैसे ही बातें पूरी हुईं, अमृता वहां आ धमकी थी. उसे सामने देख दोनों ही हक्काबक्का रह गए थे. मन ही मन उस की दिलेरी को सलाम किया और उस की हिम्मत देख कर दंग रह गए. गजब की दिलेर लड़की है, बिना डरे इतनी रात गए यहां आ सकती है तो आगे हमारे लिए परेशानी का बड़ा सबब भी बन सकती है, इसे जल्द से जल्द रास्ते से हटा देना ही अच्छा होगा. उस समय दोनों के सिर से इश्क का भूत उतर चुका था. अब वही अमृता दोनों के लिए विष का प्याला जैसी दिख रही थी.

आते ही अमृता सैफ अली से बोली, ”सदा के लिए मैं ने अपने मम्मीपापा का घर छोड़ कर आप के पास आ गई हूं. चलिए, यहां से कहीं दूर ले चलिए मुझे, जहां हमारे प्यार के सिवाय कोई और न रहता हो. हमें कोई रोकनेटोकने वाला न हो और न ही बोलने वाला हो. दोनों एकदूसरे की बाहों में लिपटे प्यार करते रहें. बस, ऐसी जगह हमें ले चलिए.’’

सैफ अली को अमृता की इन रोमांटिक बातों में जरा सी भी दिलचस्पी नहीं थी. वह तो पहले से ही यह सोचसोच कर परेशान हो रहा था कि इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाए. ऊपर से यह थी कि बकबक किए जा रही थी. सैफ अली उस के किसी भी सवाल का जबाव देना उचित नहीं समझ रहा था. योजना के मुताबिक, इतने में उस ने टिंकू को इशारा किया कि वह धीरे से अमृता के पीछे पहुंचे और उसे दबोच ले. इशारा पा कर वह दबे पांव अमृता के पीछे जा पहुंचा और उसे कस कर अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया. अचानक खुद को टिंकू की बाहों में जकड़ा देख वह घबरा गई और उस की बाहों से आजाद होने के लिए छटपटाने लगी, ”यह क्या बत्तमीजी है टिंकू. छोड़ो मुझे.’’

”सौरी अमृता, हमें माफ कर देना. तुम्हारा खेल खत्म. तुम्हारे सपने कभी पूरे नहीं हो सकते. तुम हमेशा के लिए हमें छोड़ कर जा रही हो, अलविदा.’’ कह कर सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली के दोनों हाथ उस की गरदन की ओर बढ़ गए. उस ने उस का गला तब तक कस कर दबाए रखा, जब तक कि अमृता की मौत न हो गई. दोनों ने अमृता को हिलाडुला कर देखा. उस के शरीर में कोई हरकत नहीं थी. जब वे पूरी तरह संतुष्ट हो गए कि वह मर चुकी है तो सैफ अली ने बाइक स्टार्ट कर ड्राइविंग खुद संभाली.

टिंकू अमृता को बीच में बैठा कर खुद पीछे बैठ गया और दोनों अपनी योजना में तबदीली लाते हुए देवरिया के बजाय कुशीनगर के ही हाटा रजवाहा नहर पहुंचे. वहां लाश नहर में फेंक कर अपनेअपने घर वापस लौट आए. यह सब करतेकरते रात के करीब 3 बज गए थे. घर आ कर दोनों आराम से सो गए.

नहर में मिली अमृता की लाश

इधर पूरी रात बीत गई. अगली सुबह यानी 11 जुलाई, 2025 को अमृता घर नहीं लौटी तो घर वालों को चिंता सताने लगी थी. उस के नाना विश्राम शर्मा ने नतिनी अमृता की चिंता में पूरी रात आंखों में काट दी थी. जब उन्हें उस का कहीं पता नहीं लगा तो वह तहरीर ले कर हाटा कोतवाली पहुंच गए और कोतवाल रामसहाय चौहान को विस्तार से पूरी बात बता कर अमृता की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई. गुमशुदगी दर्ज कर पुलिस ने आगे की काररवाई शुरू की.

12 जुलाई, 2025 को देवरिया जिले के थाना रामपुर कारखाना स्थित नहर में एक लड़की की लाश पाई गई. यह सूचना हाटा कोतवाली को मिली तो यहां की पुलिस वादी विश्राम शर्मा को साथ ले कर रामपुर कारखाना पहुंची, ताकि लाश की शिनाख्त की जा सके. क्योंकि लाश की कदकाठी 2 दिनों से गुम हुई अमृता शर्मा की कदकाठी से काफी मेल खा रही थी. नाना विश्राम शर्मा ने लाश की पहचान कर ली. वह लाश अमृता की थी. फिर क्या था? लाश मिलते ही घर में कोहराम मच गया था. सभी का रोरो कर हाल बुरा हुए जा रहा था.

हाटा पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए कुशीनगर जिला अस्पताल भेजवा दी और अपनी टीम के साथ थाने वापस लौट आए और आगे की काररवाई में जुट गए. उन्होंने अमृता की गुमशुदगी को बीएनएस की धारा 103(1) (हत्या) और 238 (सबूत मिटाने) में तरमीम कर कातिलों की तलाश शुरू कर दी थी. कोतवाल रामसहाय चौहान ने घटना की सूचना एसपी संतोष कुमार मिश्र और एएसपी निवेश कटियार को दे दी. एसपी संतोष मिश्र ने एएसपी निवेश कटियार के नेतृत्व में पुलिस की 4 टीमें गठित कर के केस का जल्द से जल्द खुलासा करने का निर्देश दिया. निवेश कटियार ने कोतवाल रामसहाय चौहान को मृतका के सिम नंबर की काल डिटेल्स निकाल कर उसे खंगालने के आदेश दिए, ताकि जल्द से जल्द सच तक पहुंचा जा सके.

काल डिटेल्स की गहन जांचपड़ताल करने पर 2 फोन नंबर ऐसे मिले थे, जिस से मृतका की अकसर लंबीलंबी बातें होती थीं. घटना वाली रात भी उन्हीं दोनों में से एक नंबर पर उस की बात हुई थी. उस के बाद मृतका का फोन स्विच्ड औफ हो गया था. जांच में दोनों नंबरों में एक नाम सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली निवासी पिपरा कपूर (हाटा) और दूसरा नाम इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू प्रकाश में आया. आगे की काररवाई और कौल डिटेल्स की पड़ताल से मामला दोनों प्रेमियों द्वारा प्रेम संबंधों में दावे को ले कर हुई हत्या के रूप में सामने आया. जैसे ही यह खुलासा हुआ कि हत्या में विशेष समुदाय के लोग शामिल हैं, कस्बा तनाव की आग में जल उठा.

चूंकि दोनों प्रेमी विशेष समुदाय के थे, यह बात गांव की फिजा से तैरती हुई पौलिटिक्स के गलियारों तक पहुंच गई थी. सूचना मिलते ही कुशीनगर के सांसद विजय कुमार दूबे, हाटा के विधायक मोहन शर्मा, रामकोला के विधायक विजय प्रकाश गौड़ और खड्डा के विधायक विवेकानंद पांडेय पिपरा कपूर गांव पहुंच गए और उन्होंने मृतका के फेमिली वालों से मिल कर उन्हें न्याय दिलाने और बेटी के हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. इस के बाद गांव वालों को साथ मिला कर आंदोलन छेड़ दिया और थाने का घेराव कर के बेटी अमृता के कातिलों को अतिशीघ्र गिरफ्तार करने का दवाब बनाया.

आंदोलन भयानक रूप ले चुका था. तनावपूर्ण स्थिति देखते हुए एसपी संतोष कुमार मिश्र ने पिपरा कपूर गांव में भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी थी, ताकि कोई अप्रिय घटना न घट सके. इधर पुलिस कातिलों की तलाश में जुटी हुई थी. कातिलों के जहां छिपे होने की संभावना थी, वहां छापे डाल रही थी, लेकिन वे उन की पकड़ से काफी दूर थे. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई और 15 जुलाई, 2025 को रात के समय आरोपी सैफुद्ïदीन उर्फ सैफ और इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू को हाटा से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वे कहीं भागने की फिराक में बस का इंतजार कर रहे थे. इस के बाद पुलिस ने ‘लाला 7171 गैंग’ के दरजन भर सदस्यों को भी गिरफ्तार कर लिया.

गैंग के सभी सदस्यों ने थाने में हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए कसम खाई कि भविष्य में वह कोई भी गलत काम नहीं करेंगे और एएसपी निवेश कटियार के सामने सख्ती से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने उन के सामने घुटने टेक दिए. उन्होंने कुबूल कर लिया कि उन दोनों ने ही मिल कर अमृता की हत्या की थी. अगले दिन यानी 16 जुलाई को एसपी संतोष कुमार मिश्र और एएसपी निवेश कटियार दोनों अधिकारियों ने कुशीनगर पुलिस लाइंस में संयुक्त प्रैसवार्ता बुला कर घटना का खुलासा कर दिया और आरोपियों को अदालत में पेश कर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

17 वर्षीय अमृता शर्मा कुशीनगर के हाटा कोतवाली के पिपरा कपूर गांव की रहने वाली थी. राघव शर्मा उस के पिता का नाम था. उन का अपना खुद का व्यापार था. उसी की आमदनी से घरपरिवार चलाते थे. मजे से परिवार का भरणपोषण होता था. राघव के पड़ोस में सरफुद्दीन अली परिवार के साथ रहते थे. सैफुद्दीन उर्फ सैफ अली उन का बड़ा बेटा था. इंटर तक पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने आगे की पढ़ाई छोड़ कर ‘लाला 71-71 गैंग’ जौइन कर लिया था, जिस का कहानी में पहले जिक्र किया जा चुका है.

किशोरावस्था में ऐसे परवान चढ़ा प्यार

बात करीब 3 साल पहले की थी. अमृता शर्मा बेहद चंचल और हंसमुख के साथ खूबसूरत भी थी. सजसंवर कर जब घर से निकलती थी तो सैफ की नजर उस पर पड़ ही जाती थी और उसे तब तक निहारता रहता था, जब तक वह उस की नजर से ओझल नहीं हो जाती थी. सैफ का प्रेम भरी नजरों से उसे देखना बहुत अच्छा लगता था. उस का रोमरोम खिल उठता था. मन ही मन वह बहुत खुश होती थी. बदले में अमृता भी उसे चाहत भरी नजरों से देखती थी.

धीरेधीरे दोनों के दरमियान दोस्ती हुई. इस दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया, न तो अमृता जान पाई और न ही सैफ को अहसास हुआ. दोनों को इस का तब पता चला, जब वे एकदूसरे से अलग होते थे. उस के बाद जो तड़प होती थी, वे दोनों समझ नहीं पाते थे ऐसा क्यों हो रहा है. दिल की तड़प ने अहसास दिलाया. उन्हें एकदूसरे से प्यार हो गया है. फिर दोनों ने अपने प्यार का इजहार एकदूसरे के सामने कर दिया. धीरेधीरे दोनों का प्यार जवां होता गया. दोनों ही भविष्य के सपने संजोने लगे थे. चाहत की दुनिया बसाने के लिए अपने पंख फैलाए जीने की हसरतें पालने लगे.

उसी गांव में सैफ का दोस्त इम्तियाज अहमद उर्फ टिंकू पुत्र मैनुद्दीन भी रहता था. टिंकू का एक मकान हाटा कस्बे के वार्ड नंबर 10, अंबेडकरनगर में भी था. घर के आधे सदस्य वहां रहते थे और आधे गांव वाले मकान में. सैफ अली और टिंकू के बीच दांत काटी रोटी जैसी दोस्ती थी. एकदूसरे के दुखसुख में साथ देते थे. अमृता से प्यार हो गया है, सैफ अली ने जब अपने दिल का हाल दोस्त टिंकू के सामने बयान किया तो वह खुशी से झूम उठा था. सैफ ने ही प्रेमिका अमृता से दोस्त टिंकू का परिचय करवाया था, ”अमृता, ये मेरा बचपन का दोस्त टिंकू है. समझो, दो जिस्म एक जान हैं हम. इस के बिना मैं नहीं और मेरे बिना ये नहीं.  एकदूसरे के बिना हम दोनों अधूरे हैं.’’

टिंकू का परिचय जान कर अमृता हौले से मुसकरा दी थी. कोई जवाब नहीं दिया. अपनी प्रेमिका अमृता के सामने दोस्त सैफ अली द्वारा दोस्ती का बखान सुन कर टिंकू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था. उसे अपनी दोस्ती पर नाज हो गया था. टिंकू जब भी सैफ से मिलता था, वह अपनी प्रेम कहानी उसे सुनाने लगता था. दोस्त की जुबान से उस की प्रेम कहानी सुनसुन कर टिंकू भी अमृता की ओर आकर्षित होता चला गया. चंूकि वह जब भी टिंकू से कहीं भी मिलती थी तो उसे रोक कर अपने प्रेमी सैफ का हालचाल पूछ बैठती थी. खुशदिलमिजाज अमृता की बात करने की अंदाज और बातबात पर मुसकरा कर बात करने की अदा ने टिंकू के दिल में घर बना लिया था.

टिंकू अमृता से एकतरफा प्यार करने लगा था. जबकि अमृता उस के इस भाव से बेखबर थी कि टिंकू के दिल में उस के प्रति प्रेम का अंकुर फूट चुका है और वह उसे चाहता है. एक फूल पर 2 आवारा भौंरों ने अपना कब्जा जमा लिया था. एक दिन टिंकू ने अपना प्रेम निवेदन अमृता के सामने रख दिया कि वह भी उस से बेहद प्यार करता है. उस के बिना जी नहीं सकता. उस के प्यार पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा कर जीवनदान दे दो.

टिंकू की जुबान से यह सुन कर वह हक्कीबक्की रह गई थी. उस ने साफसाफ कह दिया था कि वह सिर्फ सैफ से प्यार करती है, सिर्फ उस के बारे में सोचती है. उस के अलावा किसी के बारे में सपने में भी नहीं सोचती. वही उस का पहला और आखिरी प्यार है. थोड़ी सी हंस कर बात क्या कर ली, उसे प्यार समझ बैठे तो इस में मेरी क्या गलती है. टिंकू के प्रेम निवेदन वाली बात अमृता ने अपने प्रेमी सैफ को बता दी थी. उस के जुबान से यह बात सुन कर वह आगबबूला हो गया था. इस बात को ले कर दोनों के बीच में झगड़ा भी हो गया था. अपनेअपने तरीके से दोनों दावे करने लगे थे कि अमृता तुम से नहीं मुझ से प्यार करती है. इसी टकराव के चलते उन की दोस्ती में खटास आ गई थी.

टिंकू ने तय कर लिया था कि अगर अमृता मेरी नहीं हो सकती तो किसी और की भी नहीं होने दूंगा. साम दाम दंड भेद चाहे जैसे भी हो, उस की जिंदगी झंड बना दूंगा. और फिर उस ने अमृता के घर वालों के सामने उस की और सैफ की प्यार वाली बातें बता कर आग लगा दी. प्यार का दावा करने वाले दोनों प्रेमियों ने इस आग के दरिया में अमृता को झोंक कर उस की जिंदगी लील ली.             खैर, कुशीनगर सांसद विजय कुमार दूबे, हाटा विधायक मोहन शर्मा, रामकोला विधायक विजय प्रकाश गोंड और खड्डा विधायक विवेकानंद पांडेय ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने और कातिलों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की गुहार लगाई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की सही जांच करने और अमृता के कातिलों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का भरोसा दिलाया है. यही नहीं, आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलवाने के जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव पर जांच जारी थी. कथा लिखे जाने तक उन के घरों पर कोई काररवाई नहीं हुई थी. UP Crime News

(कथा में अमृता शर्मा परिवर्तित नाम है)

 

 

UP Crime News : मीत न मिला मन का

UP Crime News : प्रीति की ख्वाहिश थी कि उस की शादी किसी सरकारी नौकरी वाले युवक के साथ हो, लेकिन वह किसान ओमपाल से ब्याह दी गई. वह 2 बेटियों की मां जरूर बन गई, लेकिन पति उस की भावनाओं को नजरअंदाज करता रहा. ऐसे में वह गांव के देवर अभय सिंह के संपर्क में आई. अपने प्यार को रिश्ते में बदलने के लिए इन दोनों ने ऐसा कदम उठाया कि…

रात के कोई 2 बजे का वक्त रहा होगा, कमरे में पतिपत्नी और एक 12 वर्षीय बच्ची ममता सो रही थी. अचानक बच्ची की आंखें खुलीं. उस बच्ची की नजर अपनी चाची पर पड़ी. चाची ने किसी गैरमर्द को इशारा किया. फिर दोनों उस के सो रहे चाचा ओमपाल की ओर बढ़ गए. चाची ने अपना तकिया उठाया और वह वहां पर सो रहे अपने पति की तरफ बढ़ चली.

चाची को देखते ही बच्ची सहम गई. फिर उस ने सोने की ऐक्टिंग करते हुए जो देखा, उसे देखते ही उस की रूह कांप उठी. वह डर के मारे थरथर कांपने लगी. चाची ने उस तकिए से उस के चाचा ओमपाल का मुंह दबा दिया. उस के साथ ही उस अन्य पुरुष ने चुनरी से उस के चाचा का गला दबा दिया. थोड़ी देर छटपटाने और इधरउधर पैर मारने के बाद उस के चाचा पूरी तरह से शांत हो गए. यह कोई फिल्मी स्टोरी नहीं, बल्कि एक हकीकत है. फिर उस के बाद जो हुआ, इस कहानी में पढि़ए.

8 सितबंर, 2025 को रात के कोई 2 बजे का वक्त था. बुलंदशहर के गांव परतापुर की रहने वाली प्रीति ने अचानक अपनी जेठानी सीता का दरवाजा खटखटाना शुरू किया.

”दीदी, जल्दी चलिए, देखिए मेरे पति को अचानक क्या हो गया? वह बिलकुल भी बोल नहीं रहे.’’

इतना सुनते ही सीता देवी अपनी देवरानी के पीछेपीछे उस के कमरे में पहुंची. ओमपाल एक खटिया पर पड़ा हुआ था. सीता ने अपने देवर ओमपाल के पास जाते ही उस के चेहरे को हिलाया.

”ओमपाल…ओमपाल, क्या हो गया तुम्हें.’’

उस के बाद सीता ने उस के सीने पर भी हाथ लगा कर देखा, लेकिन ओमपाल कुछ नहीं बोला. ओमपाल की हालत देखते ही सीता देवी ने अपने पति रवि करन को बुलाया. रवि करन ने भी छोटे भाई की नब्ज टटोली, लेकिन वह शांत थी. भाई की हालत देख रवि करन भी बुरी आशंका से भयभीत हो गया था. ओमपाल को ऐसी हालत में देखते ही रवि करन ने तुरंत ही अपने परिचित एक डौक्टर को फोन मिलाया. कोई आधा घंटे के बाद डौक्टर ओमपाल को देखने के लिए उस के घर पर पहुंचा. डौक्टर ने ओमपाल की नब्ज चैक की. नब्ज चैक करते ही डौक्टर ने जबाव दे दिया, ”ओमपाल की मौत हो चुकी है.’’

इतना सुनते ही ओमपाल के घर में कोहराम मच गया. सब बुरी तरह से रोनेधोने लगे. घर में सब को रोते देख ममता और नेहा नाम की 2 बच्चियां भी रोने लगी थीं.

डौक्टर ने ओमपाल की पत्नी से पूछा, ”आप के पति को हुआ क्या था?’’

तब प्रीति ने रोते हुए बताया, ”उन्होंने मुझे सोते से जगाया. फिर बोले प्रीति मेरे सीने में बहुत ही भयंकर दर्द हो रहा है. उस के बाद मैं ने उन के सीने को काफी देर तक मसला भी, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ. तब मैं ने सोचा कि मैं सीता भाभी को बुला कर लाती हूं. जैसे ही मैं उन को साथ ले कर अपने कमरे में पहुंची तो उन की सांस थम चुकी थी.’’

इतना सुनते ही डौक्टर ने बताया कि उन्हें शायद हार्ट अटैक आ गया था, जिस के कारण आननफानन में उस की मौत हो गई. ओमपाल की मौत से उस के परिवार में मातम छा गया. ओमपाल की 2 छोटी बेटियां थीं. एक 4 वर्ष की दूसरी ढाई वर्ष की. घर में रोनेचिल्लाने को देख कर उन का भी रोरो क र बुरा हाल था, जिन को उन की ताई सीता ने संभाल रखा था. अगले दिन सुबह ही ओमपाल के दाह संस्कार की तैयारी होने लगी. सभी रिश्तेदारों को खबर दी गई थी. ओमपाल का हार्ट अटैक से निधन हो गया. पूरे गांव में इसी बात की चर्चा थी. फिर कुछ ही समय बाद नैचुरल डेथ समझ कर उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था. सभी मेहमान अपनेअपने घर को जा चुके थे.

लेकिन उस घटना के बाद से 12 वर्षीय ममता कुछ बीमार सी रहने लगी थी. उस की मम्मी सीता ने कई बार उस से उस की परेशानी के बारे में पूछा, लेकिन वह पूरी तरह से अपना मुंह बंद किए हुए थी. न तो वह कुछ खापी रही थी और न ही किसी से कोई बात ही कर रही थी. ओमपाल की हत्या के बाद सीता देवी वहीं पर काम में लगी हुई थी, लेकिन ममता एक बार भी अपनी चाची प्रीति के घर नहीं गई थी. तभी सीता देवी ने महसूस किया कि ममता जबजब प्रीति के सामने जाती है, वह बुरी तरह से घबरा जाती है. इस बात में जरूर कोई राज है.

ममता की बिगड़ती हालत को देखते हुए पहले तो उस के फेमिली वालों ने सोचा कि उसे अपने चाचा के खत्म होने का गहरा सदमा लग गया है. क्योंकि ओमपाल उसे बहुत प्यार करता था. उसे भी उस से बहुत लगाव था. इसी कारण वह अकसर ओमपाल के घर पर ही पड़ी रहती थी. फिर वहीं पर खाना खापी कर सो भी जाती थी.

ममता की हालत को देखते हुए उस के पापा ने उसे डौक्टर के पास ले जा कर भी दिखाया. उसे न तो कोई बुखार वगैरह था और न ही कोई बीमारी. उस के बाद ममता की मम्मी ने उसे एकांत में ले जा कर उस से पूछताछ की तो उस ने अपनी मम्मी को जो जानकारी दी, वह हैरान कर देने वाली थी. ममता ने ओमपाल की मौत की हकीकत खोलते हुए बताया, ”चाचा की हार्ट अटैक से मौत नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या गांव के ही अभय सिंह ने चाची प्रीति के साथ मिल कर की थी.’’

इस जानकारी ने ओमपाल फेमिली में हड़कंप मचा दिया. ममता ने बताया कि रात में अचानक उस की आंखें खुलीं तो चाची प्रीति और अभय सिंह चाचा ओमपाल को बुरी तरह से मार रहे थे. यह देख कर वह बुरी तरह से डर गई. फिर वह सोने का नाटक करते हुए यूं ही बिस्तर पर पड़ी रही.

ममता ने आगे बताया, ”जिस वक्त मैं चाची के घर पर पहुंची तो चाचा और चाची खाना खा कर सोने जा रहे थे. तब मैं ने चाची से कहा, ‘चाची, मैं भी तुम्हारे पास ही सोऊंगी.’ फिर मैं चाची के साथ ही सो गई. रात में मेरी आंखें खुलीं तो चाची मेरे पास नहीं थी. उस के बाद मैं ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा.’’

ओमपाल की मौत की हकीकत सामने आते ही उस के बड़े भाई रवि करन को प्रीति पर गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उन्होंने किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू किया. फिर यह बात उन्होंने उस से छिपाते हुए पुलिस को इस बात की सूचना दे दी. उस वक्त तक प्रीति अपने पति की मौत का गम मनाने की ऐक्टिंग करने में लगी हुई थी. उस का ओमपाल की मौत के वक्त से ही रोरो कर बुरा हाल था.

ओमपाल की मौत की हकीकत की जानकारी मिलते ही थाना बीबीनगर पुलिस उस के घर पर जा पहुंची. पुलिस ने प्रीति से सख्ती से पूछताछ की तो प्रीति ने पुलिस की मार से बचने के लिए सहज ही अपना अपराध कुबूल कर लिया था. प्रीति के जुर्म कुबूलते ही पुलिस ने अभय सिंह को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से भी कड़ी पूछताछ की तो उस ने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस घटना की जानकारी मिलते ही एसएचओ राहुल चौधरी ने मृतक ओमपाल के फेमिली वालों के साथसाथ गांव वालों से भी विस्तृत जानकारी ली. ओमपाल की मौत की सच्चाई सामने आते ही गांव में तरहतरह की चर्चा होने लगी थी. लोग विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि ओमपाल की हत्या उस की पत्नी के इशारे पर ही की गई थी. ओमपाल की हत्या का राज खुलते ही पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त की गई चुन्नी और तकिया भी बरामद कर लिया था. इस मामले की जानकारी मिलते ही एसपी (सिटी) शंकर प्रसाद ने घटनास्थल पर जा कर जानकारी जुटाई.

यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव परतापुर की है. इसी गांव में रहता था मोहर सिंह का परिवार. मोहर सिंह एक किसान थे. उन के 3 बेटों देवीशरण, रवि करन में ओमपाल सब से छोटा था. तीनों की शादी हो जाने के बाद तीनों भाई गांव में अलगअलग घर बना कर रह रहे थे. रवि करन और ओमपाल के घर आसपास में ही थे. जबकि उस का बड़ा भाई देवीशरण गांव के बाहरी छोर पर रह रहा था.

ओमपाल की शादी अब से लगभग 7 साल पहले प्रीति के साथ हुई थी. शादी के कुछ समय बाद तक तो ओमपाल और प्रीति के संबंध मधुर रहे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद ओमपाल प्रीति की नजरों से उतरने लगा. प्रीति देखनेभालने में खूबसूरत थी, लेकिन ओमपाल गांव का सीधासादा युवक. समय के साथसाथ प्रीति 2 बच्चों की मां भी बन गई थी, लेकिन 2 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी उस की खूबसूरती में चार चांद लगे हुए थे.

ओमपाल हर वक्त खेती के काम में ही लगा रहता था. शाम को खेतीबाड़ी का कामकाज निपटा कर आता, फिर वह जल्दी ही खाना खा कर सो जाता था. यह बात प्रीति को बिलकुल भी पसंद नहीं थी. वह एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. शादी से पहले उस ने भी एक सुंदर सरकारी जौब वाले पति के सपने देखे थे, लेकिन शादी के बाद उस के सारे अरमानों पर पानी फिर गया था. फिर भी उस ने काफी समय तक ओमपाल के साथ निभाने की कोशिश की.

ओमपाल हर शाम को अपने सारे दिन की थकान मिटाने के लिए शराब का आदी भी हो गया था. उस के बाद वह अपनी ही धुन में रहने लगा था. बीवी की उसे कोई परवाह नहीं थी. ओमपाल की हरकतों को देख कर प्रीति ने अपनी किस्मत को कोसना शुरू कर दिया था. प्रीति जब कभी भी अपने खेतों पर जाती तो उस की मुलाकात खेतों पर ही अभय सिंह से होने लगी थी. उस वक्त तक अभय सिंह कुंवारा था. हालांकि दोनों के बीच चाचीभतीजे का रिश्ता था. लेकिन अभय जब कभी भी प्रीति से मिलता तो उस की सुंदरता की तारीफ करना नहीं भूलता था.

खेतों पर काम करते देख कर प्रीति ने उसे अपने पास बुलाया, फिर वह उस से मजाक भरी बातें करने लगी. चाची की बातें सुनते ही अभय ने बात आगे बढ़ाते हुए प्रश्न किया. ”चाची, चाचा के क्या हालचाल हैं?’’

”अभय, तुम्हारे चाचा की चाल तो जैसे बिलकुल ही शांत पड़ गई. सारे दिन मजदूरों की तरह खेतों में लगे रहते हैं. उस के बाद शाम को खाना खा कर सो जाते हैं. उन्हें तुम्हारी चाची से तो जैसे कोई मतलब ही नहीं. मेरी किस्मत फूटी थी, जो मुझे ऐसा पति मिला. न काम

का न काज का, दुश्मन अनाज का.’’

”अरे चाची, कैसी बात करती हो. चाचा सारे दिन इतना काम करते हैं और आप कह रही हो कि वह कुछ नहीं करते.’’ अभय ने चाची की बात को आगे बढ़ाया.

”लेकिन लाला, एक मर्द को अपनी औरत की भावनाओं को भी पढऩा चाहिए. एक औरत को रोटी के अलावा और कुछ भी चाहिए.’’

”चाची, तुम भी कैसी बात करती हो. एक इंसान को पेट भर रोटी मिल जाए तो उस से बड़ी और क्या बात हो सकती है. चाची, हम तो रोटी खा कर पेट पर हाथ फेरते हैं. हमें तो फिर किसी चीज की इच्छा नहीं होती.’’

”लगता है अभय, तुम भी अपने चाचा की तरह ही हो. किसी औरत के दिल की भाषा पढऩे में तुम भी फेल हो.’’

”अरे चाची, आप क्या बात करती हो. मेरी शादी हो जाने दो. अपनी पत्नी को रानी बना कर रखूंगा. मैं अपने चाचा की तरह अपनी पत्नी को खेतों की मिट्टी चटाने के लिए शादी नहीं करूंगा.’’ अभय ने चाची के सामने अपनी शेखी बघारी.

प्रीति हंसते हुए बोली, ”अभय, मुझे तो तुम्हारे जैसा ही पति चाहिए था, लेकिन मेरी किस्मत में मिट्टी का पुतला मिला. पता नहीं कब तक उसे झेलना पड़ेगा.’’

”अभय, तुम बताओ, तुम्हें कैसी पत्नी चाहिए?’’

”चाची, अब मैं अपने मुंह से तुम्हारी क्या तारीफ करूं. जब भी तुम्हें देखता हूं, मेरे दिल में कुछकुछ होने लगता है. मुझे तो तुम्हारी जैसी ही सुंदरसलोनी पत्नी चाहिए.’’

अभय की बात सुनते ही प्रीति ने उस का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया, ”अभय देख, मेरा दिल भी तेरे लिए कितना उछलकूद कर रहा है. यह काफी समय से तेरे लिए पागल हो कर तेरा पीछा कर रहा है.’’

चाची के सीने पर हाथ जाते ही अभय के दिल की धड़कनें भी दोगुनी हो चुकी थीं. फिर उसी दिन प्रीति ने अभय को कसम खिलाई कि हम दोनों पतिपत्नी तो नहीं बन सकते, लेकिन दोस्ती तो कर ही सकते हैं. उस दिन अभय और प्रीति के बीच दोस्ती हो गई. फिर क्या था, दोनों के बीच रिश्ता ही ऐसा था कि जिस के कारण दोनों का मिलनाजुलना बेरोकटोक चलने लगा. उसी दौरान दोनों के बीच अवैध संबंध भी बन गए. ओमपाल अपने कामकाज में इतना व्यस्त रहता था कि प्रीति हर रोज के घरेलू जरूरतों के लिए अभय को ही इस्तेमाल करने लगी थी. इसी सब के चलते दोनों के बीच मधुर संबंध स्थापित हो गए थे.

अभय भी ज्यादातर अपनी चाची के घर पर ही पड़ा रहता था. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि ओमपाल ने प्रीति और अभय को प्यार की तपिश में तपते देख लिया था. ओमपाल मजबूर था. अभय उस के रिश्ते के बड़े भाई का बेटा था, जिसे ले कर वह गांव में अपनी पत्नी को बदनाम नहीं करना चाहता था. इसी कारण ओमपाल ने अभय से विरोध करने के बजाए प्रीति पर ही पाबंदी लगानी शुरू कर दी, लेकिन प्रीति भी पाबंदी की बेडिय़ों में जकड़ कर जीना नहीं चाहती थी. वह अभय के प्यार में इतनी पागल हो चुकी थी कि वह उसे किसी भी कीमत पर छोडऩे को तैयार नहीं थी.

उस के बाद दोनों ने मोबाइल का रास्ता पकड़ा और फिर दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर प्यार भरी बातें करने लगे, लेकिन यह बात भी ओमपाल से ज्यादा दिन तक छिप न सकी. उस के बाद ओमपाल ने अभय के साथसाथ प्रीति को भी प्यार से समझाया, लेकिन दोनों ही मानने को तैयार न थे.

नतीजतन दोनों परिवार के बीच में गहरा विवाद पैदा हो गया. पतिपत्नी दोनों के बीच मनमुटाव के साथ ड़ाईझगड़ा भी होने लगा था. उस के बाद ओमपाल ने प्रीति के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी थी. पाबंदी लगते ही प्रीति पिंजरे में कैद चिडिय़ा की तरह अभय से मिलने की चाहत में फडफ़ड़ाने लगी. उसी दौरान एक दिन मौका पाते ही प्रीति ने अभय को अपने खेतों पर मिलने के लिए बुलाया.

प्रीति अभय को देखते ही रोने लगी, ”अभय, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती. अगर तुम मुझे तनिक भी प्यार करते हो तो मुझे किसी भी तरह से इस कैद से मुक्त कराओ. फिर मुझे कहीं भी ले चलो. मगर मैं इस जाहिल इंसान के साथ नहीं रहना चाहती. पहले तो वह मेरे साथ गालीगलौज ही करता था, अब तो हर रोज मेरे साथ मारपीट भी करने लगा है. मुझे तुम्हारे साथ ही सच्चा प्यार मिलता है. मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती.’’

प्रीति की आंखों में आंसू देख कर अभय ने उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उस ने कहा, ”चाची तुम परेशान मत हो. मैं कोई उपाय करता हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं ओमपाल को इस दुनिया से ही विदा किए देता हूं.’’

तभी प्रीति ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ”अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है तो उस के लिए ऐसा उठाना ही होगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

उसी दिन दोनों ने ओमपाल को अपने बीच से निकाल फेंकने की योजना बना डाली थी. ओमपाल प्रीति की बेवफाई से तंग आ कर नशे का आदी बन चुका था. उस के घर में हमेशा ही शराब एडवांस में रखी रहती थी. यह जानकारी अभय को पहले ही थी. इसी बात का लाभ उठाते हुए अभय ने प्रीति को नशे के कुछ पाउच ला कर दे दिए थे. मौका पाते ही प्रीति वह पाउच खोल कर पति की शराब में मिला देती थी, जिसे पीने के बाद ओमपाल गहरी नींद में सो जाता था. उस के बाद प्रीति अभय को अपने घर बुला लेती और फिर दोनों मौजमस्ती के समंदर में गोते लगाने लगते थे.

लेकिन इस के बावजूद भी दोनों को डर लगा रहता था कि कोई उन के फेमिली वाला आ कर उन्हें रंगेहाथों पकड़ न ले. इस सब झंझट से छुटकारा पाने के लिए दोनों ने मिल कर ओमपाल को मौत की नींद सुलाने का प्लान बना डाला.

उसी प्लान के तहत 8 सितंबर, 2025 को जब ओमपाल खापी कर सो गया तो प्रीति ने प्रेमी अभय सिंह को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस दिन जेठानी की 12 वर्षीय बेटी ममता भी उस के बच्चों के साथ वहीं पर सोई हुई थी. अभय के आने से पहले प्रीति ने सभी बच्चों को चैक किया, सभी गहरी नींद में सोए पड़े थे. फिर दोनों ने ओमपाल की गला घोंट कर हत्या कर दी.

लेकिन अभय के घर में घुसते ही ममता की आंखें खुल गईं. उस ने उस रात अपनी आंखों से हत्या का जो लाइव मंजर देखा, उसे देख कर बुरी तरह से डर गई थी. उस दिन ममता वहां पर मौजूद न होती तो ओमपाल की मौत का खुलासा न हो पाता. इस मामले में मृतक ओमपाल के भाई रवि करन की तरफ से प्रीति व अभय सिंह को आरोपी मान कर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसे पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत दर्ज किया था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने के बाद दोनों को जेल भेज दिया था. UP Crime News

(कथा में ममता और नेहा परिवर्तित नाम है)

 

 

UP Crime : पति और प्रेमी नहीं समझे बीनू का दर्द

UP Crime : बीनू शर्मा को अपने घर और बच्चों की चिंता थी, तभी तो वह पति संजय शर्मा से शराब पीने को मना करती थी, लेकिन समझाने पर उसे मिला शारीरिक और मानसिक उत्पीडऩ. फिर बड़ी उम्मीद के साथ उस ने देहरी लांघ कर अनुज दुबे की तरफ कदम बढ़ाए. प्यार करते हुए उस को अपना सब कुछ समर्पित कर दिया. इस के बावजूद प्रेमी अनुज ने उस के साथ ऐसा छल किया कि…

अनुज दुबे बहुत बेचैन था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह बेवफा प्रेमिका बीनू शर्मा का क्या करे. क्योंकि वह उस से दूरी बना कर अशोक नाम के युवक के संपर्क में आ गई थी. इस बात को ले कर अनुज परेशान था. 11 मई, 2025 की रात 9 बजे अनुज ने बीनू को कौल लगाई और उसे बताया कि वह उस से मिलने आ रहा है. उसे कुछ जरूरी बात करनी है. बीनू इस का कुछ जवाब दे पाती, उस से पहले ही अनुज ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

लगभग एक घंटा बाद रात 10 बजे अनुज बीनू के घर आ गया. उस समय बीनू के बच्चे कमरे के बाहर बरामदे में तख्त पर सो रहे थे और पति संजय शर्मा काम पर गया था. संजय शर्मा एक होटल में काम करता था और रात 12 बजे के बाद ही घर लौटता था. अनुज ने कमरे में घुसते ही बीनू से कहा कि छत पर चलो, वहां एकांत में कुछ जरूरी बातें करनी है. इस पर बीनू ने पूछा कि छत पर ही क्यों? कमरे में बैठ कर भी तो बात कर सकते हैं. तब अनुज ने कहा कि यहां बच्चों के जाग जाने का खतरा है. वह उन की बातों में खलल डाल सकते हैं.

बीनू ने बुझे मन से अनुज की बात मान ली. फिर दोनों सीढिय़ों से छत पर पहुंचे. वहां दोनों बैठ कर बातें करने लगे. बातों ही बातों में अनुज ने बीनू के नए आशिक अशोक की चर्चा छेड़ दी. अशोक के नाम से बीनू भड़क गई और दोनो में गरमागरम बहस होने लगी. इसी बहस में अनुज को गुस्सा आ गया और उस ने बीनू को दबोच लिया. फिर चाकू से उस के गले व सिर पर कई प्रहार किए, जिस से उस का गला कट गया और खून बहने लगा. सिर से भी खून की धार बह निकली. कुछ देर तड़पने के बाद बीनू ने दम तोड़ दिया.

प्रेमिका बीनू की हत्या करने के बाद अनुज ने उस के शव को छत से नीचे खंडहर में फेंक दिया. इस के बाद अनुज ने बीनू का मोबाइल फोन अपने कब्जे में किया और चाकू को साथ ले कर फरार हो गया. इधर रात 12 बजे के बाद संजय शर्मा होटल से घर आया. उस समय वह नशे में था. उस ने एक नजर तख्त पर सो रहे बच्चों पर तो डाली, लेकिन पत्नी बीनू की तरफ उस का ध्यान ही नहीं गया. फिर वह चारपाई पर पसर गया.

सुबह 7 बजे बीनू की 10 वर्षीया बेटी जागी तो उस ने देखा कि पापा तो चारपाई पर सो रहे हैं, लेकिन मम्मी कमरे में नहीं है. उस ने तब अपने छोटे भाई शुभ को जगाया और मम्मी की तलाश में जुट गई. दोनों ने घर का कोनाकोना छान मारा, लेकिन मम्मी कहीं नहीं दिखी. बेटी ने सोचा कि मम्मी गरमी के कारण कहीं छत पर तो सोने नहीं चली गई. अत: भाई को साथ ले कर वह छत पर पहुंची. छत पर खून फैला देख कर दोनों घबरा गए. बेटी ने छत के नीचे झांक कर देखा तो मकान के पिछवाड़े खंडहर में उसे एक लाश दिखी.

बेटी को समझते देर नहीं लगी कि लाश उस की मम्मी की है. अत: दोनों भाईबहन रोने लगे. रोते हुए दोनों ज्योति शुक्ला के कमरे में पहुंचे. ज्योति भी इसी मकान में किराएदार थी और भूतल पर अपने पति सौरभ शुक्ला के साथ रहती थी. बीनू के बच्चे ज्योति को मौसी कह कर बुलाते थे. सुबहसुबह किराएदार के बच्चों को रोते देख कर मकान मालिक ज्योति ने पूछा, ”क्या बात है बच्चो, तुम दोनों रो क्यों रहे हो? क्या पापा ने मम्मी को मारापीटा है?’’

बेटी बोली, ”नहीं मौसी, पापा तो सो रहे हैं, लेकिन मम्मी घर में नहीं है. छत पर खून फैला है और मकान के पीछे खंडहर में एक लाश पड़ी है. लगता है किसी ने छत पर मम्मी की हत्या कर दी और लाश को छत से नीचे फेंक दिया है.’’

बच्ची की बात सुन कर ज्योति शुक्ला घबरा गई. उस ने दोनों बच्चों को पुचकारा, फिर बच्ची के पापा संजय शर्मा को झकझोर कर जगाया. इस के बाद ज्योति शुक्ला अपने पति सौरभ व बीनू के पति संजय के साथ मकान के पिछवाड़े पहुंची, जहां लाश पड़ी थी. लाश देखते ही सभी के मुंह से चीख निकल पड़ी. क्योंकि वह लाश संजय शर्मा की पत्नी बीनू शर्मा की ही थी. ज्योति शुक्ला ने सूचना थाना चौबेपुर पुलिस को दी.

सूचना के मुताबिक हत्या की यह घटना कानपुर जिले के चौबेपुर कस्बा के ब्रह्मïनगर मोहल्ले में घटित हुई थी. अत: थाना चौबेपुर के एसएचओ राजेंद्र कांत शुक्ला सूचना मिलते ही सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन की सूचना पर डीसीपी (वेस्ट) दिनेशचंद्र त्रिपाठी तथा एसीपी अमरनाथ यादव भी मौकाएवारदात पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

पुलिस अधिकारियों ने जांच शुरू की तो पता चला कि मृतका का नाम बीनू शर्मा है, जो इस मकान में अपने पति संजय शर्मा व 3 बच्चों के साथ रहती थी. बीनू की हत्या किसी नुकीली चीज से गोद कर बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले व सिर पर गहरे घाव थे. हत्या छत पर की गई थी, फिर शव को छत से नीचे फेंका गया था. मृतका की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. मृतका का मोबाइल फोन भी गायब था. फोरैंसिक टीम ने भी छत से ले कर खंडहर तक बारीकी से जांच की और सबूत जुटाए.

घटनास्थल पर मृतका की मां लक्ष्मी देवी भी मौजूद थी. वह बेटी के शव के पास सुबक रही थी. डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने जब उन से पूछताछ की तो वह फफक पड़ी, ”साहब, हमारी बेटी की हत्या हमारे दामाद संजय शर्मा ने की है. वह आदमी नहीं दानव है. वह शराब का लती है. मेरी बेटी को मारतापीटता था. उस की प्रताडऩा से वह मायके आ जाती थी. लेकिन माफी मांग कर बेटी को साथ ले जाता था. बीती रात वह नशे में आया होगा. बेटी के टोकने पर मारापीटा होगा और हत्या कर दी होगी. हुजूर, उसे गिरफ्तार कर लो. उसे फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए.’’

चूंकि लक्ष्मी के आरोप गंभीर थे, अत: डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी के आदेश पर मृतका बीनू के पति संजय शर्मा को इंसपेक्टर राजेंद्र कांत शुक्ला ने हिरासत में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने संजय शर्मा के कपड़ों व हाथों का बेंजाडीन टेस्ट किया तो खून के धब्बे पाए गए. सबूत मिलने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

एसीपी अमरनाथ यादव ने मृतका की बेटी तथा किराएदार ज्योति शुक्ला से भी पूछताछ की. बेटी ने बताया कि बीती रात 8 बजे मम्मी ने खाना बनाया था. फिर हम सब ने खाना खाया. उस के बाद हम तीनों भाईबहन तख्त पर सो गए. सुबह आंखें खुलीं तो मम्मी घर में नहीं थी. हम उन्हें खोजते छत पर गए. वहां खून फैला था. छत से नीचे झांका तो खंडहर में मम्मी की लाश पड़ी थी. हम ने ज्योति मौसी को बताया. मौसी ने पापा को जगाया और पुलिस को सूचना दी. मम्मी की हत्या किस ने की, उसे इस बारे में कुछ भी नहीं पता.

किराएदार ज्योति शुक्ला ने बताया कि संजय अपनी पत्नी बीनू को प्रताडि़त करता था. कभीकभी उस की चीखें कानों में पड़ती थीं तो वह उसे बचाने उस के कमरे में जाती थी और संजय को डांटती थी. लेकिन संजय बीनू की हत्या कर देगा, ऐसा उस ने कभी नहीं सोचा था. आज सुबह बच्चे रोते हुए आए थे और मम्मी की हत्या की बात बताई थी. उस के बाद वह उन के साथ गई थी. फिर पुलिस को सूचित किया था. घटनास्थल का निरीक्षण और पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल माती भिजवा दिया. संजय शर्मा को थाना चौबेपुर लाया गया.

थाने में जब पुलिस अधिकारियों ने संजय शर्मा से बीनू की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो संजय ने यह बात स्वीकार की कि वह बीनू को प्रताडि़त करता था, लेकिन इस बात से साफ इंकार कर दिया कि उस ने बीनू की हत्या की है. पुलिस ने कई राउंड में संजय से पूछताछ की और हर हथकंडा अपनाया, लेकिन संजय ने बीनू की हत्या का जुर्म स्वीकार नहीं किया. हर राउंड की पूछताछ में संजय एक ही बात कहता कि उस ने हत्या नहीं की.

संजय शर्मा के खिलाफ हत्या के पर्याप्त सबूत थे. बेंजाडीन टेस्ट में भी हाथों व कपड़ों पर खून के सबूत मिले थे. लेकिन वह हत्या से इंकार कर रहा था. हालांकि अभी तक पुलिस आलाकत्ल भी बरामद नहीं कर पाई थी. इसलिए पुलिस के मन में भी संदेह पैदा होने लगा था कि कहीं हत्यारा कोई और तो नहीं. इस संदेह को दूर करने के लिए डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने एक बार फिर संजय से पूछताछ की, ”संजय, यदि तुम ने बीनू की हत्या नहीं की तो तुम्हारे हाथों व कपड़ों पर खून के धब्बे कैसे पड़े?’’

”सर, सुबह मैं बीनू के शव के पास गया था. यह जानने के लिए कि कहीं उस की सांसें चल तो नहीं रही हैं. इसी आस में हम ने उस के शव को हिलायाडुलाया था, तभी हाथ व कपड़ों पर खून लग गया होगा. यही बेंजाडीन टेस्ट में आ गया. मैं निर्दोष हूं.’’

”तुम निर्दोष हो तो तुम्हारी पत्नी बीनू का हत्यारा कौन है?’’ डीसीपी ने संजय से पूछा.

”सर, मैं यकीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन मुझे शक है कि बीनू की हत्या में अनुज दुबे का हाथ हो सकता है.’’

”यह अनुज दुबे कौन है?’’ डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने पूछा.

”सर, अनुज दुबे रौतेपुर गांव का रहने वाला है. किराएदार ज्योति शुक्ला का पति सौरभ शुक्ला भी रौतेपुर गांव का निवासी है. सौरभ और अनुज गहरे दोस्त हैं. अनुज का सौरभ के घर आनाजाना था. सौरभ के घर आतेजाते अनुज की बुरी नजर मेरी पत्नी पर पड़ी. उस ने उसे प्रेमजाल में फंसा लिया. दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. हम ने बीनू को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी.

”इधर बीते कुछ दिनों से दोनों के बीच किसी बात को ले कर मनमुटाव हो गया था, जिस से अनुज का आनाजाना कम हो गया था. सर, मुझे शक है कि बीती रात अनुज घर आया होगा. गरमी के कारण दोनों छत पर बतियाने गए होंगे. फिर वहीं अनुज ने बीनू की हत्या कर दी होगी.’’

अनुज दुबे संदेह के घेरे में आया तो पुलिस ने उस के खिलाफ साक्ष्य जुटाने के लिए बीनू और अनुज दुबे के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि बीनू के मोबाइल फोन पर अनुज की ही आखिरी कौल रात 9 बजे आई थी. रात 11 बजे तक बीनू और अनुज के फोन की लोकेशन बीनू के घर की थी. उस के बाद 11:52 पर बीनू का फोन बंद हुआ था. उस समय उस के फोन की लोकेशन रौतेपुर गांव के पास थी. इस से साफ हो गया कि अनुज फोन कर बीनू के घर रात 10 बजे के आसपास आया, फिर बीनू की हत्या कर उस का फोन साथ ले कर गांव गया और फिर दोनों फोन बंद कर लिए.

पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ राजेंद्र कांत शुक्ला ने 13 मई की सुबह अपनी टीम के साथ रौतेपुर गांव में अनुज के घर छापा मारा और अनुज को दबोच लिया. उसे थाना चौबेपुर लाया गया. पुलिस अधिकारियों ने अनुज से बीनू की हत्या के बारे में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया और उस ने बीनू की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं, अनुज ने हत्या में प्रयुक्त चाकू व खून से सने कपड़े भी बरामद करा दिए, जो उस ने अपने गांव के बाहर झाडिय़ों में छिपा दिए थे.

मृतका बीनू का मोबाइल फोन जिसे अनुज ने तोड़ कर एक गड्ढे में फेंक दिया था. पुलिस ने उस फोन को भी बरामद कर लिया. साक्ष्य के तौर पर पुलिस ने बरामद सामान को सुरक्षित कर लिया. अनुज ने पुलिस को बताया कि वह बीनू से बहुत प्यार करता था. उस के प्यार में इतना डूब गया था कि उसे अपनी पत्नी मान बैठा था. उस के प्यार में उस ने शादी भी नहीं की. उस के सारे खर्च भी वही उठाता था, लेकिन प्यार में उसे धोखा मिला. बीनू उस का प्यार ठुकरा कर किसी और से प्यार करने लगी. प्रेमिका की बेवफाई उसे बरदाश्त नहीं हुई और उसे मार डाला. उसे बीनू की हत्या का कोई अफसोस नहीं है.

चूंकि अनुज ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल चाकू भी बरामद करा दिया था, अत: पुलिस ने मृतका के पति संजय शर्मा को निर्दोष मानते हुए थाने से जाने दिया. साथ ही मृतका की मां लक्ष्मी देवी की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत अनुज दुबे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पति व प्रेमी से प्रताडि़त महिला की सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक बड़ा व्यापारिक कस्बा है- चौबेपुर. यह कानपुर (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. इसी कस्बे से 2 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव गबड़हा. रामकिशन शर्मा का परिवार इसी गांव में रहता था. परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे संजय व अजय थे. रामकिशन की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. मेहनतमजदूरी कर किसी तरह वह परिवार का पालनपोषण करता था. समय बीतने के साथ दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी परिवार की सहायता करने लगे.

संजय जब शादी के लायक हो गया तो रामकिशन ने उस का ब्याह बीनू के साथ कर दिया. आकर्षक कदकाठी की छरहरी तथा गौरवर्ण वाली बीनू पचौर गांव के रमेश शर्मा की बेटी थी. 3 भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. संजय बीनू को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, उसे बिलकुल वैसी ही पत्नी मिली थी. बीनू की मोहक मुसकान, कजरारी आंखें एवं छरहरी काया का वह दीवाना हो गया था. समय हंसीखुशी से बीतता रहा. इस दौरान बीनू 3 बच्चों की मां बन गई. उस का घरआंगन किलकारियों से गूंजने लगा.

बच्चों के जन्म के बाद संजय की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने शहर कस्बा जा कर पैसा कमाने का फैसला किया. इस बारे में उस ने परिवार वालों से बात की तो वे भी राजी हो गए. अगले ही दिन उस ने अपना सामान समेटा और चौबेपुर कस्बा आ गया. यहां उस ने काम की तलाश शुरू की तो उसे कस्बे के जीटी रोड स्थित राही होटल में वेटर का काम मिल गया. वह अन्य कर्मचारियों के साथ होटल में ही रहने लगा. वेटरों के बीच अकसर शराब पीनेपिलाने का दौर भी चलता था. संजय भी उन के साथ पीता था. धीरेधीरे वह शराब का लती बन गया.

संजय जब कमाने लगा तो उस ने चौबेपुर कस्बे के ब्रह्मïनगर मोहल्ले में एक कमरा किराए पर ले लिया. उस के बाद पत्नी व बच्चों को भी ले आया. किराए के इस मकान में बीनू के 2 साल हंसीखुशी से बीते. उस के बाद दोनों के बीच तकरार होने लगी. तकरार का पहला कारण था- संजय का शराब पी कर घर आना. बीनू शराब पी कर घर आने को मना करती तो वह गालीगलौज करता और बीनू की पिटाई करता. तकरार का दूसरा कारण था- आर्थिक अभाव. बीनू बच्चों व घर खर्च के लिए पैसे मांगती तो वह मना कर देता. जोर देने पर बीनू की धुनाई कर देता.

पति की प्रताडऩा से बीनू परेशान रहने लगी थी. उसे जब अधिक पीड़ा महसूस होती तो वह मायके चली जाती, लेकिन संजय वहां भी पहुंच जाता और हाथपैर जोड़ तथा माफी मांग कर बीनू को ले आता. एकदो माह उस का रवैया ठीक रहता, उस के बाद वह बीनू को फिर प्रताडि़त करने लगता. बीनू यह सोच कर प्रताडऩा सहती कि पति आज नहीं तो कल वह सुधर जाएगा. फिर उस का भी जीवन सुधर जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दिनप्रतिदिन संजय की प्रताडऩा बढ़ती ही गई.

बीनू जिस मकान में किराएदार थी, उसी में ज्योति शुक्ला भी किराएदार थी. ज्योति अपने पति सौरभ शुक्ला के साथ भूतल पर रहती थी, जबकि बीनू पहली मंजिल पर रहती थी. बीनू बच्चों का मुंह देख कर दिन बिता रही थी और पति की प्रताडऩा सह रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार बीनू ज्योति के कमरे में चली जाती थी. वहीं एक रोज उस की मुलाकात हुई अनुज दुबे से. अनुज दुबे रौतेपुर गांव का रहने वाला था. ज्योति शुक्ला का पति सौरभ शुक्ला भी रौतेपुर गांव का था. अनुज और सौरभ बचपन के दोस्त थे. दोस्ती के नाते अनुज सौरभ के घर जबतब आता रहता था. अनुज के पिता की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. अनुज भी नौकरी करता था और खूब कमाता था.

ज्योति शुक्ला के घर अनुज व बीनू का आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे को देख कर पलक झपकाना भूल गए. जहां बीनू की आकर्षक देहयष्टि देख अनुज की आंखों में लालच के डोरे उतर आए, वहीं अनुज का खूबसूरत चेहरामोहरा एवं गठीले बदन से बीनू मंत्रमुग्ध सी हो गई थी. ज्योति ने दोनों का एकदूसरे से परिचय कराया तो अनुज ने जल्दी ही अपनी वाकपटुता से बीनू का दिल जीत लिया. बातचीत के दौरान अनुज की नजरें बीनू के जिस्म को तौलती रहीं. वह बारबार कनखियों से उस की तरफ देखता. बीनू की नजरें जब उस की नजरों से टकरातीं तो वह कामुक अंदाज से मुसकरा देता. उस की मुसकराहट से बीनू के दिलोदिमाग में हलचल मचनी शुरू हो गई थी.

दरअसल, बीनू पति की प्रताडऩा से ऊब चुकी थी. अत: जब अनुज की हमदर्दी उसे मिली तो वह उस की ओर आकर्षित हो गई. चूंकि चाहत दोनों तरफ से थी, इसलिए जल्द ही उन के बीच प्यार पनपने लगा. प्यार पनपा तो शारीरिक मिलन शुरू हो गया. बातचीत के लिए अनुज ने उसे एक फोन भी खरीद कर दे दिया. बीनू से अवैध रिश्ता बना तो अनुज उस की आर्थिक मदद करने लगा. उस के बच्चों का भी खयाल रखने लगा. बीनू उस की बाइक पर बैठ कर सैरसपाटे पर भी जाने लगी. बीनू का पति संजय शर्मा होटल में काम करता था. वह दोपहर 11 बजे घर से निकलता और फिर रात 12 बजे के बाद ही घर लौटता था.

पति संजय के होटल जाने के बाद अनुज बीनू के पास आ जाता. दोनों खूब हंसतेबोलते, बतियाते और फिर रंगरलियां मनाते. बीनू अब खुश रहने लगी थी. उस की पेट की और शारीरिक भूख पूरी होने लगी थी. अनुज इतना दीवाना बन गया था कि वह बीनू को अपनी जागीर समझने लगा था. लेकिन एक रोज उन के नाजायज रिश्तों का भांडा फूट गया. उस रोज संजय होटल गया तो था, लेकिन होटल किसी कारण बंद था, इसलिए वापस घर आ गया था. घर आ कर उस ने जो अनर्थ देखा, उस से उस का पारा चढ़ गया. कमरे में बीनू और अनुज हमबिस्तर थे. संजय ने उन्हें धिक्कारा तो कपड़े दुरुस्त कर अनुज तो भाग गया, लेकिन बीनू कहां जाती. उस ने बीनू की जम कर पिटाई की.

अभी तक घर में कलह मारपीट, शराब व आर्थिक परेशानी को ले कर होती थी. अब अनुज को ले कर बीनू का उत्पीडऩ शुरू हो गया था. एक रात पिटाई के दौरान बीनू का धैर्य टूट गया. वह पति से बोली, ”मारपीट कर तुम मुझे चोट पहुंचा सकते हो, लेकिन उस के प्यार को कम नहीं कर सकते. तुम ने कभी सोचा कि बच्चों का पेट भरा है या वह खाली पेट सो रहे हैं. उन के बदन पर कपड़ा है या नहीं. अनुज ने साथ न दिया होता तो मैं कब की बच्चों सहित सुसाइड कर लेती. इसलिए कान खोल कर सुन लो, मैं तुम्हारा साथ छोड़ सकती हूं, लेकिन अनुज का नहीं.’’

बीनू की धमकी से संजय डर गया. इस के बाद उस ने बीनू से टोकाटाकी बंद कर दी. हालांकि उस का उत्पीडऩ जारी रहा. बीनू अब स्वच्छंद रूप से अनुज के साथ घूमने लगी. दोनों के बीच रिश्ता भी कायम रहा. बीनू अनुज के साथ रंगरलियां जरूर मनाती थी, लेकिन कभीकभी उसे ग्लानि भी होती. वह सोचती कि अनुज से दिल लगा कर उस ने अच्छा नहीं किया. पति के साथ धोखा तो किया ही, बच्चों के भविष्य के बारे में भी नहीं सोचा. कल को उस की बेटी सयानी होगी और अनुज उस पर डोरे डालने लगा तो कैसे उसे रोक पाएगी. धीरेधीरे बीनू का प्यार फीका पडऩे लगा और वह अनुज से दूरियां बनाने लगी.

बीनू को मोबाइल फोन चलाने का शौक था. वह फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाती थी. इंस्टाग्राम के माध्यम से उस की दोस्ती अशोक नाम के युवक से हुई. दोस्ती प्यार में बदली और दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई. अशोक से प्यार हुआ तो बीनू अनुज की उपेक्षा करने लगी. अनुज पिछले कई महीने से महसूस कर रहा था कि जब भी वह अपनी प्रेमिका बीनू के घर उस से मिलने जाता है तो वह उस की उपेक्षा करती है. पहले जब वह बीनू के घर जाता था तो वह उस से खूब हंसती, बोलती और बतियाती थी. आवभगत करती थी. लेकिन अब आते ही उस का चेहरा लटक जाता है. न हंसती और न बतियाती है.

बीनू की जुबान में अब कड़वाहट भी आ गई थी. आवभगत करना तो जैसे वह भूल ही गई थी. अनुज की समझ में नहीं आ रहा था कि बीनू के स्वभाव में यह परिवर्तन क्यों और कैसे आया? आखिर एक रोज इस राज का परदाफाश हो ही गया. उस रोज अनुज बीनू से मिलने आया तो वह बाथरूम में नहा रही थी. अनुज कमरे में जा कर पलंग पर बैठ गया. उसी समय उस की नजर बीनू के मोबाइल फोन पर पड़ी, जो पलंग पर तकिए के पास रखा था. अनुज ने उत्सुकतावश बीनू का फोन उठा लिया और चैक करने लगा. अनुज जैसेजैसे मोबाइल फोन चैक करता गया, वैसेवैसे उस के माथे पर बल पड़ते गए.

बीनू का मोबाइल फोन खंगालने के बाद अनुज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि बीनू ने इंस्टाग्राम के जरिए किसी अशोक नाम के युवक से दोस्ती गांठ ली थी. दोनों के बीच चैटिंग होती थी. बीनू का इंस्टाग्राम पर अकाउंट था. उस ने एक जगह लिखा था, ‘तुम ने तो 2 बूंद ही मांगी थी, हम ने तो समंदर ही लुटा दिया.’ इस का मतलब था कि दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन चुका था. फोन में दोनों के अश्लील फोटो भी मौजूद थे. अनुज अब समझ गया था कि बीनू ने उसे दिल से क्यों निकाल फेंका है. क्योंकि उस ने नए आशिक अशोक को दिल में बसा लिया है. इसी कारण उस के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है.

कुछ देर बाद बीनू बाथरूम से निकली तो कमरे में बैठे अनुज को देख कर सकपका गई. फिर गुस्से से बोली, ”अनुज, तुम्हें फोन कर के आना चाहिए था. इस तरह किसी के घर आना अच्छी बात नहीं. आइंदा इस बात का खयाल रखना.’’

”मैं कोई पहली बार तो तुम्हारे घर आया नहीं. इस के पहले भी बेधड़क आताजाता रहा हूं. तब तो तुम ने कभी टोकाटाकी नहीं की.’’ अनुज ने बीनू की बात का जवाब दिया. कुछ देर कमरे में सन्नाटा पसरा रहा. फिर अनुज ने बीनू के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ”बीनू, यह अशोक कौन है? इस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

अशोक का नाम सुनते ही बीनू अंदर ही अंदर घबरा गई. वह जान गई कि अनुज ने उस का मोबाइल फोन खंगाला है. फिर भी वह संभलते हुए बोली, ”अशोक मेरा दूर का रिश्तेदार है. हम दोनों की इंस्टाग्राम के जरिए से दोस्ती हुई थी.’’

”सिर्फ दोस्ती या फिर नाजायज रिश्ता भी है.’’ अनुज ने कटाक्ष किया.

”तुम मुझ पर लांछन लगा कर अपनी हद पार कर रहे हो अनुज,’’ बीनू भी भड़क उठी.

”मैं अपनी हद पार नहीं कर रहा हूं, बल्कि सच्चाई बयां कर रहा हूं. मोबाइल फोन में मौजूद अश्लील फोटो और चैटिंग इस बात का सबूत है कि तुम दोनों के बीच नाजायज रिश्ता है. इसी कारण तुम मेरी उपेक्षा करती हो.’’

पोल खुल जाने से बीनू डर गई थी. वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी, अत: धीमी आवाज में बोली, ”अनुज, तुम्हें जो समझना है, समझो. मैं तुम्हारा शक तो दूर नहीं कर सकती.’’

उस दिन बहस के बाद अनुज घर चला तो गया, लेकिन उस के बाद उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई. उसे प्रेमिका बीनू की बेवफाई रास नहीं आई. वह सोचता कि जिस के लिए उस ने अपना तन, मन, धन सब न्यौछावर कर दिया, वही बेवफा बन गई, जिस को वह प्रेमिका की जगह पत्नी मानने लगा, जिसे वह अपनी जागीर समझने लगा, जिस के लिए उस ने शादी भी नहीं की. उसी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. ऐसी बेवफा प्रेमिका को वह कभी माफ नहीं करेगा. उसे उस की बेवफाई की सजा जरूर मिलेगी. वह उस की न हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

इस के बाद अनुज ने अपनी प्रेमिका बीनू की हत्या का प्लान बनाया. प्लान के मुताबिक वह चौबेपुर बाजार गया और एक तेज धार वाला चाकू खरीदा और उसे अपने पास सुरक्षित रख लिया. फिर योजनानुसार उस की हत्या कर दी. अनुज से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 14 मई, 2025 को अनुज को कानपुर (देहात) की माती कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मृतका के बच्चे नानी लक्ष्मी के साथ रह रहे थे.

 

 

UP News : हत्या को बना न पाए आत्महत्या

UP News : 15 साल की आशू और 19 साल के राहुल निषाद को साथसाथ पढ़ते हुए ही प्यार हो गया था. कई साल बाद जब उन के प्यार की पोल खुली, तब तक उन के संबंध बहुत गहरे हो चुके थे. घर वालों ने उन के प्यार पर नकेल कसने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे. अंत में यह जोड़ा भी औनर किलिंग के गर्त में इस तरह समा गया कि…

उत्तर प्रदेश का कुशीनगर जिला एक पर्यटनस्थल के रूप में जाना जाता है. यहां देशविदेश से बौद्ध भिक्षु घूमने आया करते हैं. बताया जाता है कि यहीं पर गौतम बुद्ध ने अपनी अंतिम सांस ली थी, इसलिए यह जिला देशविदेश में काफी प्रसिद्ध है. इसी जिले के तमकुहीराज थाना अंर्तगत परसौनी गांव में 58 वर्षीय रामदेव कुशवाहा अपने परिवार के साथ रहता था. परिवार में 3 बेटियां थीं. पत्नी की कई साल पहले बीमारी से मृत्यु हो गई थी. बेटियों के अलावा रामदेव के कोई बेटा नहीं था.

रामदेव के बड़े भाई के 3 बेटे थे, इसलिए उन्हें कभी इस बात का मलाल नहीं हुआ कि उन्हें बेटा क्यों नहीं पैदा हुआ. बड़े भाई के दूसरे नंबर का बेटा, जिस का नाम सिकंदर कुशवाहा था, दुखसुख में चाचा रामदेव के पास हर घड़ी खड़ा रहता था. उन की एक आवाज पर कड़ी धूप हो या चाहे तूफान आ जाए, उन का आदेश सिरआंखों पर रख पहले फरमाइश पूरी करता था.

रामदेव सिकंदर को बेटे की तरह मानते थे और उस के लिए हमेशा समर्पित रहते थे. उस की बातों और भावनाओं को सिर माथे लगाए रखते थे. बेटियां भी सिंकदर को अपने सगे भाई से कम नहीं समझती थीं. हर साल रक्षाबंधन के त्योहार पर सिकंदर की कलाई पर राखी बांध कर उस से ढेरों आशीर्वाद लेती थीं. इस दिन सिकंदर दिल खोल कर बहनों को आशीर्वाद देता था.

बात 30 जून, 2025 की रात की है. गांव के पट्टीदारी में एक बारात आई थी. उस बारात में रामदेव कुशवाहा भी पूरे परिवार के साथ आमंत्रित थे. वह तीनों बेटियों विमला, सुमन, आशू और बेटे सिकंदर के साथ लड़की के घर बारात में पहुंचे थे. वहां पहुंच कर सभी पार्टी एंजौय करने में मशगूल हो गए थे. सिकंदर अपने हमजोलियों के साथ मस्त था तो रामदेव की सब से छोटी बेटी आशू कुशवाहा अपनी बहनों और सहेलियों के साथ पार्टी एंजौय करने में मस्त थी.

पार्टी एंजौय करतेकरते आशू कहीं नजर नहीं आ रही थी. चचेरा भाई सिकंदर भले ही पार्टी एंजौय कर रहा था, लेकिन उस का पूरा ध्यान पार्टी नहीं सिर्फ आशू पर था. वह क्या कर रही है, किस से मिल रही है, उन के बीच क्या बातचीत कर रही है, घूमघूम कर यही निगरानी वह कर रहा था. अचानक से जब आशू पार्टी में कहीं नहीं दिखी तो उस का माथा ठनक गया. पागल कुत्ते के माफिक वह आशू को पार्टी में इधरउधर ढूंढने लगा. वह कहीं नहीं दिखी. चाचा रामदेव ने भी सिकंदर को हिदायत दी थी कि आशू पर निगरानी रखे. इतना समझाने के बावजूद अगर उस के पांव उस के बस में नहीं होते हैं तो इज्जत बचाने के लिए जो अच्छा लगे, फैसला कर सकते हो.

रंगेहाथों पकड़ी गई आशू

बहन आशू को ढंूढतेढूंढते सिकंदर पार्टी वाली जगह से थोड़ा बाहर निकला तो अंधेरे में उसे किसी के फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी. वह दबे पांव और आहिस्ताआहिस्ता वहां पहुंचा तो उसे आशू दिख गई. वह अपने प्रेमी राहुल निषाद से बातें कर रही थी. पास खड़े चचेरे भाई को देख कर आशू एकदम सकपका गई. उस का चेहरा पीला पड़ गया था. बहन की इस हरकत पर सिकंदर गुस्से से लाल हो गया. उस ने आव देखा न ताव, बहन की बाजू पकड़ कर खींचता हुआ वहां से ले कर घर चल दिया.

”क्या कर रहे हो भैया?’’ आशू दर्द से बिलबिलाई और भाई की मजबूत पकड़ से छूटने की कोशिश की, ”दर्द हो रहा है, छोड़ो मेरा हाथ. टूट जाएगा.’’

”तुझे दर्द हो रहा है, हाथ टूट जाएगा तेरा, चल घर चल.’’ घसीटते हुए सिकंदर आगे बोला, ”बताता हूं तुझे. घर की इज्जत डुबोते हुए तुझे तब दर्द नहीं हो रहा था, बेशरम कहीं की.’’

”मेरा हाथ छोड़ दो.’’

”तू घर तो चल पहले, फिर तेरा हाथ भी छोड़ दूंगा और तेरी अच्छे से खातिर भी करूंगा. तूने समझ क्या रखा है हमें. इतना समझाने के बाद भी तेरे कान पर जूं तक नहीं रेगती और तू फिर उस लुच्चे से चोंच मिलाने चली गई. तेरी इस गुस्ताखी की तो आज सजा मिल कर ही रहेगी. थोड़ी देर तू और रुक जा. चाचा को आ जाने दे. उस के बाद बताता हूं तेरे को.’’ कहता हुआ सिकंदर आशू को कमरे में धकेल कर बाहर से दरवाजे पर सिटकनी लगा दी.

गुस्से के मारे सिकंदर का नथुना फूलपिचक रहा था और बदन थरथरा रहा था. उस समय वह अपने काबू में नहीं था. क्षण भर बाद जैसेतैसे उस ने खुद पर काबू पाया और मोबाइल निकाल कर चाचा रामदेव को फोन कर के फौरन घर आने को कह दिया. जिस लहजे में सिकंदर ने बात की थी, उस से रामदेव को समझने में देर नहीं लगी थी कि वह बहुत गुस्से में है. फिर वह सोचने लगे, अभी तो वह यहीं था, कब घर चला गया और ऐसी क्या बात हो गई कि उस ने तुरंत घर पहुंचने को कहा है.

रामदेव खाना बीच में छोड़ कर बहू रामदुलारी और बेटियों को साथ ले कर लंबेलंबे डग भरते हुए घर निकल पड़े. थोड़ी देर में वह अपने घर पहुंचे तो देखा कि सिंकदर दरवाजे पर खड़ा था और लंबीलंबी सांसें ले रहा था, ”सिकंदर, क्या बात हो गई, जो तुम ने फौरन घर बुला लिया, खाने भी नहीं दिया. आखिर क्या बात है?’’

”आप को खाना खाने की पड़ी है? सुनोगे तो आप के पैरों तले से जमीन खिसक जाएगी.’’

”बात बताओ, जलेबी की तरह गोलगोल मत घुमाओ, आसमान टूट पड़ा या जमीन फट गई? बात क्या है, जो तुम इतने गुस्से में हो.’’

”न आसमान टूट पड़ा और न ही जमीन फट पड़ी, सुनोगे तो आप भी गुस्से से दहकने लगोगे.’’

”अब मुझ से और सब्र नहीं हो रहा, जो कहना है जल्दी कह.’’ रामदेव ने इधरउधर देखते हुए भतीजे सिकंदर से सवाल किया, ”यहां सब तो दिख रहे हैं, लेकिन आशू कहीं दिख नहीं रही है, कहां है? पार्टी से आई नहीं क्या?’’

”अरे चाचा, जब हम पार्टी में मशगूल थे तब वह घर के पिछवाड़े अपने यार की बाहों में चिपकी झप्पी ले रही थी. वहां जब कहीं नहीं दिखी तो मैं ने उसे ढूंढना शुरू किया, तब वह पकड़ में आई थी. उसे पकड़ कर घर लाया और कमरे में बंद कर दिया हूं. फडफ़ड़ा रही है, बंद कमरे में आजाद होने के लिए.’’

”क्या कह रहे हो?’’ रामदेव भतीजे की बात सुन कर गुस्से से तमतमा उठा, ”उस बेशरम नालायक की इतना मजाल, बारबार समझाने के बावजूद भी उस के सिर से राहुल के इश्क का भूत उतर नहीं रहा है, आज तो उस ने सारी हदें ही पार कर दीं, इस गुस्ताखी की सजा तो उसे जरूर मिलेगी. खोल री दरवाजा. जवानी का सारा पानी नींबू की तरह निचोड़ नहीं दिया तो… रोजरोज की बदनामी का किस्सा ही खत्म कर देते हैं,  खोल दरवाजा सिकंदर, जल्दी खोल.’’

चाचा रामदेव का आदेश पा कर सिकंदर ने दरवाजा खोल दिया. एलईडी की सफेद रोशनी से कमरा नहा रहा था और आशू दीवार के एक कोने से दुबकी, डरीसहमी घुटने मोड़ कर बैठी हुई थी. रामदेव की नजर जैसे ही उस की नजर से टकराई, गुस्से से लाल हो गया. उस ने आव देखा न ताव, उस पर लातघूसों की बरसात शुरू कर दी.

डरीसहमी आशू अपनी जान की भीख मांगती रही, उन के सामने गिड़गिड़ाती रही, लेकिन इंसान से हैवान बन चुके रामदेव ने उस की एक न सुनी. कल तक जिस बेटी की एक आवाज पर सारी दुनिया को सिर पर उठा लेने को तैयार था, आज वही पिता पूरी तरह शैतान बन चुका था, ”तुझे बारबार समझाया था बेशरम, उस आवारा राहुलवा से दूर रहना, मत करना नैन मटक्का. तेरे चलते गांव में मेरी कितनी बदनामी हो रही है, लेकिन तूने मेरी एक न सुनी, करती रही नैन मटक्का तो ले भुगत.’’

पीटपीट कर मार डाला फेमिली वालों ने

रामदेव, चचेरा भाई सिकंदर और उस की पत्नी रामदुलारी तीनों मिल कर आशू पर हैवानों की तरह टूट पड़े और जिसे जो हाथ मिला, उसी से तब तक मारते रहे, जब तक उस की मौत न हो गई. लहूलुहान आशू अपने ही खून में डूबी फर्श पर औंधे मुंह निढाल पड़ी हुई थी. थोड़ी देर बाद जब उन का गुस्सा शांत हुआ और होश में आए तो तीनों में से सिकंदर ने उसे हिलाडुला कर देखा. उस के शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी. वह मर चुकी थी. इस के बाद उन्होंने लाश पर चादर डाल दी और दरवाजे पर ताला जड़ दिया.

फिर तीनों एक पेट हो हत्या की बात हजम कर गए. घर के सभी सदस्यों को धमका दिया था कि किसी ने भी इस घटना को घर से बाहर किया तो उस का भी वही हाल होगा, जो आशू का हुआ है. इसलिए चुप रहने में सब की भलाई है आशू की निर्मम हत्या करने बाद भी तीनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ था. उसी रात उन्होंने आशू के प्रेमी राहुल को भी जान से मार डालने की योजना को अंतिम रूप दे दिया. योजना के अनुसार, अगली सुबह यानी पहली जुलाई के दिन सुबह से ही सिकंदर राहुल को गांव में यहांवहां ढंूढता रहा, लेकिन वह उसे कहीं नजर नहीं आया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर गया तो गया कहां? कहीं दिख क्यों नहीं रहा है वह उसे.

इकहरे बदन वाला सिकंदर था तो एकदम दुबलापतला, लेकिन दिमाग से शातिरों का शातिर था. काफी देर तक मंथन करने के बाद उस ने राहुल तक पहुंचने का एक नायाब और आसान सा रास्ता निकाल ही लिया. उसे पता था विनय और विकास नाम के 2 युवक उस के जिगरी यार थे. तीनों में गहरी छनती थी. किसी तरह उन्हें अपनी ओर मिला लें तो काम आसान हो सकता है. फिर क्या था, यह सोच कर वह मन ही मन गदगद हो उठा और विनय और विकास से जा मिला.

”हैलो विनय, कैसे हो?’’ मुसकराते हुए सिकंदर आगे बोला, ”आओ, चलो चाय पीते हैं.’’

उस समय विनय अपने दोस्त विकास के साथ गांव के बीच स्थित चाय की दुकान पर खड़ा था और राहुल का इंतजार कर रहा था.

”नहीं भैया, मैं चाय नहीं पीता.’’ विनय ने सामान्य तरीके से उत्तर दिया.

”तो बिसकुट ही खा लो,’’ कह कर सिकंदर ने डिब्बे में रखे 4 बिसकुट निकाले और 2 बिसकुट विनय की ओर और 2 बिसकुट विकास की ओर बढ़ाए. दोनों ने बिसकुट पकड़ लिए और खाने लगे. फिर बड़ी चालाकी से अपनी बातों में दोनों को उलझाते हुए वहां से बाहर ले गया और बातों बातों में उस से राहुल के बारे में पूछा कि राहुल कहां है, आज दिख नहीं रहा. आशू उसे याद कर रही थी, मिलना चाहती थी उस से, तभी तो मैं तुम्हारे पास मिलने आया हूं. तुम दोनों उस के सब से अच्छे दोस्त हो, मेरी बात उस से करा सकते हो क्या? तुम उसे यहां बुला दो. बड़ा एहसान होगा तुम दोनों का.’’

”इस में एहसान की क्या बात है भैया,’’ इस बार विकास बोला था, ”मैं अभी फोन कर के बुला देता हूं. दोस्त दोस्त के काम न आए तो फिर दोस्ती किस काम की.’’

सिकंदर ने दोनों की थोड़ी तारीफ क्या कर दी थी, वे चने के झाड़ पर चढ़ गए. वाहवाही में विकास ने फोन कर के राहुल को चाय की दुकान पर बुला लिया. लोमड़ी से ज्यादा शातिर सिकंदर तो यही चाहता था, किसी तरह राहुल बिल से बाहर निकले. उस के बाद क्या करना है, पहले से सोच रखा था. विनय और विकास शातिर सिकंदर के दिमाग को पढ़ नहीं सके और दोनों उस के चक्रव्यूह में फंस गए. दोस्त विकास का फोन रिसीव करते ही राहुल चाय की दुकान पर पहुंच गया. जैसे ही उस की नजर सिकंदर पर पड़ी तो वह घबरा गया और वापस मुडऩे लगा. बड़ी मुश्किल से शिकार चंगुल में फंसा था और उस के हाथों से फिसल रहा था. वह उसे हाथों से फिसलने देना नहीं चाहता था.

वह राहुल के नजदीक जा कर बोला, ”डरो मत भाई, जो होना था सो हो गया. मुझे अपनी गलतियों का पश्चाताप है, माफी चाहता हूं. आशू तुम से मिलना चाहती है. मैं तुम्हें उस से मिलाना चाहता हूं. मिलना चाहोगे?’’

कह कर सिकंदर ने राहुल के चेहरे को पढऩे की कोशिश की कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है. राहुल कुछ सोच कर आशू से मिलने के लिए तैयार हो गया था. उस ने अपने साथ विनय और विकास को भी चलने के लिए तैयार कर लिया था. आगेआगे सिकंदर और राहुल चल रहे थे, पीछेपीछे विनय और विकास. उस ने राहुल को भरोसा दिला दिया था कि घर पर चाचा रामदेव नहीं हैं, किसी काम से बाहर गए हुए हैं और शाम तक आएंगे. तभी वह प्रेमिका आशू से मिलने के लिए तैयार हुआ था.

इधर बातोंबातों में उस ने कब चाचा रामदेव को फोन कर ‘शिकार खुद बलि चढऩे के लिए आ रहा है, सतर्क हो जाएं.’ कह कर उन्हें अलर्ट कर दिया था. इस की भनक न तो राहुल को लगी थी और न ही विनय और विकास को ही. राहुल निषाद को देखते ही सिकंदर का खून खौल उठा था, लेकिन अपनी भावनाओं को उन के सामने जाहिर नहीं होने दिया था. उस के दिल में कसक तो इस बात की थी कि इसी कमीने के चलते बहन को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था तो ये कैसे जिंदा रहे. इसे भी बहन की तरह तड़पतड़प कर मरना होगा, बस किसी तरह घर तक पहुंच जाए, फिर देखेंगे क्या होता है.

इधर भतीजे से सूचना मिलते ही रामदेव सतर्क हो गया था और बहू को भी सतर्क कर दिया था ताकि शिकार चंगुल से छूट कर भाग न सके. उसे भी जान से मार देना होगा. इस कमीने की वजह से इज्जत तारतार हुई है, किसी कीमत पर जिंदा बच कर जाना नहीं चाहिए.

एक ही कमरे में मार डाला प्रेमीप्रेमिका को

घर पहुंचते ही सिकंदर के शरीर में जैसे शैतानी ताकत कुलांचे मारने लगी. गजब की फुरती आ गई थी उस में. उस ने राहुल को अपनी दोनों मजबूत भुजाओं में कस कर जकड़ लिया. जोरजोर से आवाज दे कर चाचा रामदेव को बाहर बुलाया. राहुल खुद को सिकंदर की भुजाओं में जकड़ा देख समझ गया कि उस के साथ बड़ा धोखा हुआ है. उस ने दोस्तों के साथ मिल कर धोखा किया है. राहुल ने सिकंदर की मजबूत बाहों से आजाद होने के लिए बहुत दम लगाया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उस की मजबूत पकड़ से वह आजाद नहीं हो सका. चाचाभतीजा दोनों मिल कर उसे उसी कमरे में धकेल कर ले गए थे, जहां पहले से आशू की लाश पड़ी थी.

इधर सिकंदर ने विनय और विकास को धमका कर अपने पक्ष में मिला लिया था कि अगर किसी से कुछ भी कहा तो दोनों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है, इसलिए भलाई इसी में है कि हमेशा के लिए अपनी जुबान बंद कर लें. सिकंदर की धमकियों से दोनों बुरी तरह डर गए और चुप हो गए. उस ने दोनों को दूसरे कमरे में बंद कर दिया था. भतीजा सिकंदर, चाचा रामदेव और बहू रामदुलारी तीनों मिल कर उस पर टूट पड़े. लाठी, डंडे और लातघंूसों से उसे मारने लगे.

राहुल जान बचाने के लिए भीख मांग रहा था. कमरे में चीखताचिल्लाता इधरउधर भाग रहा था, लेकिन उन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. गुस्से से लाल हुए तीनों बस लाठी, डंडे की बरसात करते रहे. इस से भी जब उन का मन नहीं भरा तो सिकंदर दरवाजे पर रखी एक ईंट उठा लाया और उसी ईंट से राहुल के सिर के पीछे जोरदार वार किया. ईंट का वार इतना जोरदार था कि पल भर में उस की आवाज शांत हो गई और उस का शरीर निढाल हो कर शांत हो गया.

सिकंदर ने राहुल को हिलाडुला कर देखा. उस की सांसें टूट चुकी थीं. शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी. वह मर चुका था. सिर से खून का रिसाव हो रहा था. लाश देख कर तीनों नफरत भरी हुंकार भर और लाश वहीं छोड़ कर कमरे से बाहर निकल आए और फिर उस कमरे में दाखिल हुए, जहां मृतक राहुल के दोस्तों विनय और विकास को बंद कर के रखा था. शातिर सिकंदर ने दोनों को धमकाते हुए इस शर्त पर वहां से जाने दिया कि वह जब भी उसे बुलाएगा, दोनों को आना होगा और यहां जो कुछ भी हुआ है, अगर किसी से भी कुछ कहा तो उन्हें भी जान से मार देंगे, इसलिए चुप रहने में ही दोनों की भलाई है.

रामदेव के घर में 2 लाशें पड़ी हुई थीं. इस के बावजूद उन के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी. तीनों खुद को बचाते हुए कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहते थे, जिस में यह घटना मर्डर के बजाए आत्महत्या की लगे. इस के लिए मतबूत और लंबी रस्सी की जरूरत थी. सिकंदर बाजार से नायलोन की 2 बंडल मजबूत और मोटी रस्सी खरीद कर ले आया और घर में छिपा कर रख दी और रात होने का इंतजार करने लगे.

इधर राहुल को घर से निकले 4 घंटे बीत चुके थे. वह तक घर वापस नहीं पहुंचा था. यह देख कर उस के फेमिली वाले परेशान हो गए थे. राहुल की मम्मी ने फोन कर के पति अशरफी निषाद को बताया कि 10 बजे का निकला बेटा अभी तक घर नहीं लौटा है, मेरा दिल बैठा जा रहा है. उस समय अशरफी अपनी नौकरी पर थे. बेटे के गायब होने की सूचना मिलते ही वह बुरी तरह परेशान हो गए और ड्यूटी से छुट्टी ले कर वापस घर आ गए.

अशरफी ने अपने गांव और आसपास के गांवों में बेटे की तलाश की, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. देखते ही देखते गांव में राहुल के गायब होने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई थी. बेटा जब कहीं नहीं मिला तो शाम को थाना तमकुहीराज में गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. उसी दौरान रामदेव तक खबर पहुंची तो उस के हाथपांव फूल गए. आननफानन में उस ने भी बेटी आशू के रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर गांव में फैला दी, ताकि उस पर किसी का शक न जाए.

अचानक आशू और राहुल दोनों के एक साथ गायब होने से गांव में यही चर्चा होने लगी कि कहीं दोनों गांव से भाग तो नहीं गए. यह बात सभी पहले से जानते थे कि दोनों के बीच में 4 सालों से लव अफेयर है. इसे ले कर 2 बार पंचायत भी बुलाई गई थी. दोनों के अचानक गायब हो जाने से गांव में खुसरफुसर शुरू हो गई. मामले की नजाकत को समझते हुए उसी शाम रामदेव भतीजे सिकंदर के साथ तमकुहीराज थाने पहुंचा और बेटी आशू के रहस्यमय तरीके से गायब होने की सूचना दर्ज करा दी, ताकि वह ऐसा कर के खुद सुरक्षित रह सके.

तमकुहीराज के इंसपेक्टर सुशील कुमार शुक्ला को जब परसौनी गांव की आशू और राहुल के गायब होने की तहरीर मिली थी. छानबीन में पता चला कि दोनों एकदूसरे से प्रेम करते थे. इस के अलावा कोई और खास जानकारी नहीं मिल सकी थी. पुलिस अपनी आगे की काररवाई में जुटी रही. पुलिस रामदेव कुशवाहा तक पहुंच पाती, इस से पहले वे दोनों लाशों को ठिकाने लगा देना चाहता था. क्योंकि 2-2 लाशों को हजम कर पाना रामदेव के बस की बात नहीं थी. वह रात गहराने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. रात जैसे गहराई, सिकंदर ने विनय को काल कर के उस की स्कूटी मंगाई.

हत्या को दे दिया आत्महत्या का रूप

विनय और विकास चुपके से उस समय अपने घर से स्कूटी ले कर निकले थे, जब घर वाले गहरी नींद में जा चुके थे. सिकंदर की धमकी से दोनों बुरी तरह डरे हुए थे. अगर वे उस का साथ नहीं देंगे तो उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता था. सिकंदर, विनय और विकास के सहारे स्कूटी पर पहले आशू की लाश घर से करीब 400 मीटर दूर आम के घने बगीचे में पहुंचा दी. वहां पहले से रामदेव मौजूद था. फिर चाचा रामदेव को वहीं छोड़ कर विनय और विकास को साथ ले कर वापस घर आया और राहुल की लाश को स्कूटी पर लाद कर बगीचे में पहुंचा दी.

फिर साथ लाई रस्सी को 2 बराबर टुकड़ों में काट कर बारीबारी से दोनों लाशें आम की मजबूत डाली से लटका दी, ताकि देखने से लगे कि दोनों ने आत्महत्या की है, इस काम को अंजाम देने में सिकंदर का साथ चाचा रामदेव, विनय और विकास तीनों ने बराबरबराबर साथ दिया था. लाश ठिकाने लगाने के बाद चारों ने राहत भरी सांसें लीं और मोबाइल की टौर्च के उजाले में बगीचे के चारों ओर देखा. जब चारों आश्वस्त हो गए कि उन्हें कोई देख नहीं रहा है, तब वहां से अपनेअपने घरों को लौट गए और घर जा कर इत्मीनान से सो गए.

अगले दिन यानी 2 जुलाई, 2025 की सुबह परसौनी गांव का तापमान उस समय बढ़ गया था, जब गांव से 400 मीटर दूर आम के बगीचे में आशू और राहुल की पेड़ से लटकती हुई लाशें मिलने की खबर गांव वालों को मिली. खबर मिलते ही गांव वाले मौके पर पहुंच गए थे. बेटे की लाश मिलने की सूचना जैसे ही अशरफी को मिली तो उन के तो हाथपांव ढीले हो गए और गश खा कर नीचे गिर गए और घर में कोहराम मच गया था. लाश की सूचना मिलते ही दिखावे के तौर पर रामदेव और सिकंदर भी मौके पर पहुंच गए थे, ताकि किसी को उन पर कोई शक न हो.

थोड़ी देर में ये खबर तमकुहीराज थाने तक पहुंच गई. सूचना मिलते ही इंसपेक्टर सुशील कुमार शुक्ला आननफानन में पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे और निरीक्षण में जुट गए. प्रथमदृष्टया मामला आत्महत्या का नहीं, मर्डर का लग रहा था. पेड़ की जिस ऊंचाई से मृतक लटक कर आत्महत्या किए थे, उन के घुटने जमीन पर मुड़े हुए थे और दोनों की जीभ भी बाहर नहीं निकली थी. अमूमन आत्महत्या के केस में मृतक की जीभ बाहर निकल जाती है, यही बात इंसपेक्टर शुक्ला को खटक रही थी. घटनास्थल की छानबीन के दौरान मौके से एक ईंट बरामद हुई थी. ईंट पर खून लगा हुआ था, जो सूख चुका था. पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर वह अपने कब्जे में ले ली.

इंसपेक्टर सुशील कुमार शुक्ला ने घटना की सूचना एसपी संतोष कुमार मिश्रा और एएसपी निवेश कटियार को दे दी. सूचना पा कर दोनों पुलिस अधिकारी और फोरैंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थी. एजेंसी अपनी जांच में जुट गई थी. कागजी काररवाई पूरी कर लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल कुशीनगर भेज दिया और आगे की काररवाई में जुट गई थी. अगले दिन 3 जुलाई, 2025 को आशू और राहुल की पोस्टमार्टम की रिपोर्ट इंसपेक्टर सुशील कुमार शुक्ला के सामने थी. जिसे पढ़ कर वह चौंके बिना नहीं रहे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो उन की आंखें देख रही हैं, वो सच हो सकता है. रिपोर्ट में उल्लेख था कि दोनों मौतों के बीच में करीब 8 से 10 घंटे का अंतर है.

दोनों ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि उन की मौतें सिर पर लगे गहरे जख्म की वजह से हुई थीं. जिस का मतलब शीशे की तरह साफ था कि दोनों की हत्या कर के उसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद इंसपेक्टर शुक्ला की जांच की दिशा तेज हो गई थी. वैज्ञानिक साक्ष्य, कौल डिटेल्स और मुखबिर की निशानदेही ने पुलिस के शक की सूई रामदेव कुशवाहा की ओर घुमा दी थी. तब उन का शक और पुख्ता हो गया था, जब घटनास्थल से बरामद ईंट रामदेव के दरवाजे पर रखे ईंट के मार्का आपस में मेल खा लिए थे. फिर क्या था? पुलिस अधिकारियों के दिशानिर्देश से सप्ताह के भीतर दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो गया.

शक के आधार पर तमकुहीराज पुलिस 9 जुलाई, 2025 की दोपहर रामदेव कुशवाहा को उस के घर से हिरासत में ले लिया. उस से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए और अपना जुर्म कुबूल कर लिया कि उस ने अपने भतीजे सिकंदर, बहू रामदुलारी देवी, राहुल के दोस्तों विनय और विकास की मदद से बेटी आशू और उस के प्रेमी राहुल को मौत के घाट उतारा था. बेटी और उस के प्रेमी ने इज्जत का बट्टा लगा दिया था. गांव और इलाके में थूथू हो रही थी. बेटी को बहुत समझाया, लेकिन उस के सिर से राहुल के इश्क का भूत उतर ही नहीं रहा था तो क्या करता? इज्जत की खातिर उसे ये खौफनाक कदम उठाना ही पड़ा.

किशोर उम्र में हो गया आशू और राहुल को प्यार

रामदेव कुशवाहा कुशीनगर जिले के तमकुहीराज थानाक्षेत्र के परसौनी गांव में परिवार सहित रहता था. परिवार में 3 बेटियां ही थीं. तीनों बेटियों में सब से छोटी बेटी आशू थी. आशू गजब की खूबसूरत थी. उस पर किसी की नजर पड़ जाती तो उस के सुंदर चेहरे से जल्दी नजर हटती नहीं थी. आशू थी तो 15 साल की. उस का अंगअंग विकसित हो चुका था. देखने से कोई नहीं कह सकता था कि पूरी तरह परिपक्व नहीं है. औसत कदकाठी की आशू नागिन सी लहराती कालीकाली जुल्फें खुली छोड़ कर जब घर से बाहर निकलती थी, मनचलों के दिलों पर छुरियां चल जाती थीं. बिलकुल कीचड़ में खिली कमल जैसी थी.

राहुल निषाद आशू का पड़ोसी था. वह 19 साल का था और 10वीं में उसी स्कूल में पढ़ता था, जहां आशू पढ़ती थी. वह 8वीं क्लास की छात्रा थी. करीब 4 साल पहले ही राहुल आशू के जुल्फों में इस कदर कैद हो चुका था कि अपना दिल उस के नाम कुरबान कर दिया था. तब उस की उम्र 15 साल के करीब रही होगी और आशू यही कोई 12 साल के करीब रही होगी, जिस ने अपने दिल के कोरे पन्ने पर प्रेमी राहुल का नाम लिख दिया था. कच्ची उम्र में आशू राहुल को दिल दे बैठी थी.

समय के साथ दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर दिया था. उम्र के साथसाथ दोनों का प्यार भी प्रगाढ़ होता चला गया था. जिस कच्ची उम्र में दोनों ने प्यार की दहलीज पर पांव रखा था, उस उम्र में उन्हें प्यार का मतलब समझ में आ रहा था या नहीं, ये बता पाना मुश्किल होगा, लेकिन उन के बीच में गजब का आकर्षण था. आलम यह था कि एक दिन वे एकदूसरे को देखे बिना रह नहीं पाते थे.

चूंकि दोनों के घर अगलबगल थे, इसलिए वे एकदूसरे के घरों को आतेजाते भी थे. घंटों बैठ कर वे आपस में प्रेमभरी मीठी बातें करते थे. घर वालों को उन पर शक नहीं हुआ कि उन के बीच में क्या खिचड़ी पक रही है. घर वाले यही समझते थे कि दोनों बच्चे हैं, एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, साथसाथ आतेजाते हैं तो आपस में स्कूल को ले कर बातचीत करते होंगे, इसलिए उन पर कोई खास तवज्जो नहीं देते थे.

धीरेधीरे 3 साल बीत गए थे. आखिरकार उन के प्यार की गगरी फूट ही गई. इश्क का भांडा फूटते ही घर वालों की चिंता बढ़ गई. रामदेव कुशवाहा को तो ऐसा लगा, जैसे उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. जिस बेटी को वह अभी छोटी सी बच्ची समझ रहा था, वह तो प्रेम की पाठशाला में अव्वल निकली. माथे पर हाथ रख कर रामदेव जमीन पर बैठ गया था. बेटी ने इज्जत की धज्जियां उड़ा दी थीं. गांव में रामदेव की किरकिरी मची हुई थी. उस का घर से निकलना मुश्किल हो गया था. वह जहां जाता था, वहीं बेटी के प्यार के चर्चे चटखारे ले कर होते थे. सुनसुन कर रामदेव के कान पक गए. अब और बदनामी उस से बरदाश्त नहीं हो पा रही थी, इसलिए उस ने कारगर फैसला करने का निर्णय ले लिया था.

रामदेव कुशवाहा ने बेटी को समाज की ऊंचनीच का पाठ तो पढ़ाया ही, साथ ही भतीजे सिकंदर को साथ ले कर उस के प्रेमी राहुल के घर पहुंच कर पिता अशरफी निषाद से राहुल की शिकायत करते हुए आड़े हाथों लेते हुए उसे समझाया, ”देख अशरफी, तुम से या तुम्हारे परिवार से मेरा कोई बैर नहीं है. पड़ोसी होने के नाते हमारे रिश्ते अच्छे हैं. हम दोनों एकदूसरे के दुखसुख में बराबर खड़े रहते हैं. बता, सच है कि नहीं.’’

”सच तो है.’’ असमंजस की स्थिति में अशरफी ने उत्तर दिया, ”लेकिन बात क्या है, रामदेव भाई. आज आप ये कैसी बात कर रहे हैं? मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है. क्या कहना चाहते हो?’’

”सब समझ में आ जाएगा अशरफी, चिंता मत कर. तुझे सब समझाता हूं. लगता है, इसी उमर में तेरा बेटा जवान हो गया है.’’

”मतलब?’’

”मतलब यह कि आजकल तेरा बेटा राहुल मेरी बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा है.’’

”मेरा बेटा तुम्हारी बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा है, अभी भी मैं समझा नहीं. जो कहना है, खुल कर कर कहो भाई.’’

”लगता है तुम्हारी खोपड़ी में बात उतरी नहीं.’’ इस बार रामदेव का भतीजा सिकंदर गुर्राते हुए बोला था, ”चाचा कह रहे हैं कि तुम्हारा बेटा राहुल मेरी बहन के पीछे हाथ धो कर पड़ा है तो बात समझ में नहीं आ रही है या समझाऊं तुम्हें. देखो अशरफी चाचा, मैं तुम्हें हिंदी में समझा रहा हूं कि अपने बेटे को समझा लो. उस से कह दो कि आशू से दूरी बना ले, अगर वह दूरी नहीं बनाता है तो उस की सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा. मैं आप को समझा कर जा रहा हूं, दोबारा उस से बातें करते या उस से मिलते देख लिया तो जान से मार दूंगा. समझा देना अपने बेटे को.’’

चेतावनी से बुरी तरह डर गए थे अशरफी

सिकंदर अशरफी निशाद को चेता कर चाचा रामदेव के साथ घर वापस लौट गया, लेकिन उस के कानों में सिकंदर की धमकी भरी बातें गंूजती रहीं. उस की धमकी से वह बुरी तरह डर गया था. राहुल उस का इकलौता बेटा था. सचमुच उस के साथ कुछ अनहोनी हो गई तो वह तो जीते जी मर जाएगा. उस शाम उस ने बेटे को बुलाया और अपने पास बैठा कर उसे समझाया कि अभी ये उम्र पढऩेलिखने की है. मन लगा कर पढ़ाई करो, जब समय आएगा तो अच्छी सी लड़की देख कर उस से तुम्हारा ब्याह रचा दूंगा. तुम आशू से दूरियां बना लो, इसी में हम सभी की भलाई है.

आशू के पापा रामदेव और उस का भाई सिकंदर धमकी दे कर गए हैं कि अगर तुम ने उस से बात की या उस से मिला तो तुम्हें जान से मार देंगे. इसलिए मेरा कहना मान ले बेटा, तू आशू नाम की उस बला से दूरियां बना ले, नहीं तो कोई अनहोनी तुम्हारे साथ हो गई तो जीवन भर हम रोते रहेंगे. मेरी बात मान ले और उस से दूरी बना ले.’’

सिर नीचे झुकाए राहुल अपने पापा की बातें ध्यान से सुनता रहा, मानो ऐसा लग रहा था कि जैसे धरती फटे और वह उस में समा जाए. उस समय उस ने पापा को भरोसा दिलाया कि दोबारा उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा. राहुल ने अपने पापा से झूठ बोल कर खुद को बचा लिया था. अगले दिन किसी तरह वह आशू से मिला और सारी बातें उसे बता दीं कि उस के पापा को हमारे प्यार वाली बात पता चल गई. और तुम से मिलने से मना कर रहे थे. ऐसे में आशू ने भी उसे बता दिया कि उस के घर वालों ने इज्जत की दुहाई देते हुए तुम से मिलने से मना किया है.

”चाहे कुछ भी हो जाए आशू, हमें प्यार करने से कोई रोक नहीं सकता. हमारा प्यार अमर है, क्या हुआ अगर जमाने वाले हमारे प्यार को नहीं समझते. वक्त आने दो, मैं जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा होऊंगा, भाग कर हम दोनों शादी कर लेंगे. फिर घर लौट कर कभी नहीं आएंगे.’’ राहुल बोला.

मांबाप के समझाने का आशू और राहुल दोनों पर कोई असर नहीं हुआ था. दोनों छिपछिप कर मिलते रहे और प्यार की गाड़ी मजे से चलती रही, लेकिन उन की ज्यादा दिनों तक फर्राटे नहीं भर सकी थी. घरवालों को पता चल गया कि आशू उन की आंखों में धूल झोंक कर अपने प्रेमी से छिपछिप कर मिलती है. यह बात न तो रामदेव को हजम हुई और न ही भतीजे सिकंदर को ही. दोनों का खून खौल उठा और राहुल को सबक सिखाने की ठान लिया.

इस के बाद रामदेव कुशवाहा और सिकंदर दोनों ने मिल कर गांव में पंचायत बुलाई. पंचायत में अशरफी निषाद और राहुल को खड़ा किया. घंटों पंचायत चली. इस दौरान पंचों ने निर्णय लिया कि राहुल को समझाबुझा कर छोड़ दिया जाए, दोबारा गलती करते पकड़े जाने पर पंचायत सख्त काररवाई करने के लिए बाध्य होगी. पंचों का निर्णय सुन कर रामदेव और सिकंदर अंदर ही अंदर झुलस कर रह गए. उन्हें इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि पंचायत ऐसा छोटा निर्णय ले कर राहुल को छोड़ देगी. लेकिन उन्हें पंचों के निर्णय के आगे झुकना पड़ा. सिकंदर भी चुप रहने वालों में से नहीं था. उस दिन के बाद से वह दोनों पर और कड़ी नजर रखने लगा था, ताकि मौका मिलते ही राहुल को सजा दे सके.

पंचायत में बदनामी होने के बाद अशरफी निषाद ने बेटे को टाइट कर के रखा और आशू से मिलते पर सख्त पाबंदी लगा दी. बेटे की करतूत से उसे काफी बदनामी झेलनी पड़ी थी. अब और बदनामी झेलने की क्षमता नहीं थी. लेकिन राहुल पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा था और वह आशू से मिलताजुलता रहा. फिर यह खबर रामदेव तक पहुंच गई थी. खबर मिलते ही वह आगबबूला हो गया था और एक बार फिर पंचायत बुलाई गई. उस पंचायत में राहुल के साथसाथ आशू को भी पेश किया गया था. पंचायत के दौरान काफी हंगामा हुआ और गुस्साए सिकंदर ने भरी पंचायत में राहुल को ललकारा, जहां देखेंगे, उसे जान से मार देंगे. इस ने हमारी इज्जत की छिछालेदर मचा दी है, छोड़ूंगा नहीं किसी कीमत पर, चाहे कुछ भी हो जाए. मरना है तो उसे मरना है.

बात आई गई, खत्म हो गई. पंचायत की यह बात घटना से 2 दिन पहले यानी 28 जून, 2025 की थी. 2 दिन बाद यानी 30 जून को गांव में एक लड़की की शादी थी. शादी का कार्यक्रम रात में होना तय था. शादी में गांव के सभी लोग आमंत्रित थे. उस में रामदेव और अशरफी दोनेां का परिवार भी आमंत्रित था. सभी के साथ दोनों परिवार वाले पार्टी का आनंद ले रहे थे. इसी बीच आशू और राहुल दोनों के घर वाले जब पार्टी में व्यस्त हो गए थे, तभी मौका देख कर आशू और राहुल घर के पिछवाड़े जा पहुंचे और प्यार भरी बातें करने लगे थे. सिकंदर ने उन दोनों को पकड़ लिया. इस के बाद दोनों की हत्या कर दी गई.

पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने वाले रामदेव कुशवाहा के इकरारेजुर्म के बाद उस के भतीजे सिकंदर, रामदुलारी, विनय और विकास को गिरफ्तार कर लिया. पहले से दी गई अशरफी की तहरीर के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103/238/61 (2)/315 के तहत रामदेव कुशवाहा, सिकंदर कुशवाहा, रामदुलारी देवी को जेल और नाबालिग विनय और विकास को बाल सुधार गृह भेज दिया. UP News

(कथा में विनय और विकास परिवर्तित नाम है.)

 

 

Ghaziabad News : करोड़ों की चोरियां कर बना रोबिनहुड़

Ghaziabad News : महानगरों की कोठी और बंगलों में चोरी होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के कवि नगर इलाके की कोठी नंबर केडी-12 में रहने वाले स्टील कारोबारी कपिल गर्ग के घर में 3 सितंबर, 2021 की रात को हुई चोरी की वारदात कुछ अलग थी. पहली खास बात तो यह थी कि कपिल गर्ग उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य राज्यमंत्री अतुल गर्ग के मकान से चंद कदमों कीदूरी पर रहते थे, जिस से वहां की सुरक्षा चाकचौबंद थी. दूसरी बात यह थी कि चोरों ने कपिल गर्ग के मकान में खिड़की की ग्रिल तोड़ कर प्रवेश किया था और वह अलमारी में रखे हुए हीरे व सोने के करोड़ों रुपए के जेवर व नकदी चुरा ले गए थे.

यही कारण था कि चोरी की इस घटना को पुलिस ने असाधारण मान कर इस की गंभीरता से तफ्तीश शुरू की थी. कारोबारी कपिल कुमार गर्ग की कविनगर औद्योगिक क्षेत्र में हरि स्टील एंड क्रेन सर्विस के नाम से फर्म है. यहां इस कोठी में वह अपने बेटे वंश गर्ग, पुत्रवधू शिवानी और 8 माह की पोती के साथ रह रहे थे. कुछ महीने पहले उन की पत्नी की कोरोना से मृत्यु हो गई थी. 3 सितंबर, 2021 की रात कपिल और उन का बेटा वंश एक कमरे में सोए हुए थे, जबकि पुत्रवधू व पोती दूसरे कमरे में सो रही थी.

इस दौरान रात के किसी वक्त कोठी के पीछे की तरफ से छत से होते हुए चोर कोठी में दाखिल हुए और प्रथम तल पर बनी खिड़की की ग्रिल तोड़ कर कोठी के भीतर प्रवेश किया. चोर सीधे उन की बहू के कमरे में पहुंचे और कमरे के भीतर बने स्टोर में रखी अलमारी में से सोने व हीरे के जेवर चोरी कर ले गए. सुबह उठने पर वारदात का पता चला तो घर में कोहराम मच गया. हैरानी यह थी कि परिवार में सोते हुए किसी भी सदस्य को इस की भनक तक नहीं लगी. तत्काल पुलिस को सूचना दी गई. वारदात चूंकि शहर की सब से पौश कालोनी की थी. इसलिए कविनगर थानाप्रभारी संजीव शर्मा टीम के साथ तत्काल मौके पर पहुंच गए.

एसएसपी पवन कुमार, एसपी (सिटी प्रथम) निपुण अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का निरीक्षण किया. मौके पर फोरैंसिक टीम ने भी पहुंच कर जांच के लिए नमूने एकत्र किए. डौग स्क्वायड को भी मौके पर बुलाया गया, लेकिन उन से कोई खास मदद नहीं मिली. शुरुआत में कपिल गर्ग इतना ही बता सके कि घर में करीब एक करोड़ रुपए से अधिक के गहनों व नकदी की चोरी हुई है. चोरी हुए जेवरों में उन की विवाहित बेटी के भी आभूषण थे, जो उन के पास ही रखे थे. चोरों ने जिस तरह सफाई के साथ घर में प्रवेश किया था और उस स्थान को ही निशाना बनाया था, जहां कीमती गहने रखे थे, उस से साफ था कि चोरी की वारदात में किसी पहचान वाले का ही हाथ होगा.

दरअसल, चोरों ने मकान के पिछले हिस्से से, जोकि बंद रहता है, उस तरफ से कोठी में प्रवेश किया. उन को शायद जानकारी थी कि जेवर कहां रखे हैं. इस के चलते वह कोठी में बने सिर्फ उस कमरे में पहुंचे, जहां जेवर रखे हुए थे. गार्ड व घरेलू सहायक को भी पता नहीं चला कि घर में चोर घुसे हैं. घटना के समय गार्ड व घरेलू सहायक भी घर में मौजूद थे. घरेलू सहायक मनोज पहली मंजिल पर बने कमरे में सोया हुआ था, जबकि गार्ड दिल बहादुर बाहर गार्डरूम में तैनात झपकी ले रहा था. पुलिस ने दोनों से ही पूछताछ की और उन की बैकग्राउंड के बारे में जानकारी हासिल की.

लेकिन कपिल गर्ग ने उन में से किसी पर भी शक जाहिर नहीं किया था. पुलिस ने तहकीकात के लिए दोनों के पहचानपत्र और मोबाइल नंबर ले लिए ताकि उन के फोन की काल डिटेल्स निकाली जा सके. घर में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, इसलिए पुलिस को लगा कि चलो जिस ने भी चोरी की है, वह सावधानी बरतने के बावजूद पकड़ में आ जाएगा. लेकिन जब कैमरों की जांच की गई तो पता चला कि पिछले काफी समय से सीसीटीवी कैमरे खराब पड़े हुए थे. पुलिस ने परिवार की इस लापरवाही पर माथा पीट लिया. अकसर ऐसा ही होता है लोग हजारों रुपए खर्च कर देते हैं, लेकिन अपनी हिफाजत के लिए लगे सीसीटीवी कैमरे लगवाने के बाद कभी यह देखने की कोशिश नहीं करते कि वे काम कर भी रहे हैं या नहीं.

एसएसपी पवन कुमार के निर्देश पर कपिल गर्ग की शिकायत पर कविनगर थाने में 4 सितंबर, 2021 को भारतीय दंड संहिता में चोरी की धारा 380, 457 के अंतर्गत केस दर्ज कर के थाने के एसएसआई देवेंद्र कुमार सिंह को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. पहले दिन से ही पुलिस पर वारदात का खुलासा करने के लिए उच्चाधिकारियों का जबरदस्त दबाव था. इसीलिए एसपी (सिटी) निपुण अग्रवाल ने थानाप्रभारी संजीव शर्मा के साथ क्राइम ब्रांच प्रभारी सचिन मलिक की एक विशेष टीम का गठन कर दिया. थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीमें इलाके में मुखबिरों की सहायता से सुरागसी के काम में जुट गईं.

थाने की पुलिस कपिल गर्ग के परिचितों, उन के घर आने वाले लोगों, फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों के साथ कालोनी में आने वाले वेंडरों की लिस्ट बना कर उन से पूछताछ का काम करने लगी. सीसीटीवी फुटेज से दिखी आशा की किरण दूसरी तरफ क्राइम ब्रांच की टीम ने केडी ब्लौक में सभी कोठियों और रोड साइड में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने का काम शुरू कर दिया. पुलिस की टीमों में 2 दिन के भीतर 25 से अधिक सीसीटीवी के फुटेज देखे तो क्राइम ब्रांच की टीम को आशा की किरण दिखाई देनी शुरू हो गई. दरअसल, घटना वाली रात 3 से 4 बजे के बीच एक काले रंग की स्कौर्पियो गाड़ी कपिल गर्ग के घर के आसपास तथा उन की गली के बाहर मंडराती नजर आई.

लेकिन फुटेज इतनी धुंधली थी कि उस में सवार लोगों व गाड़ी का नंबर स्पष्ट नहीं दिखा. लेकिन इस से उम्मीद का एक सिरा पुलिस के हाथ लग गया था. जिस जगह चोरी हुई, वहां से 3 रास्ते शहर से बाहर जाने वाले थे. पुलिस ने उन सभी रास्तों पर आगे की तरफ बढ़ते हुए जितने भी सीसीटीवी कैमरे रोड साइडों में लगे थे, उन्हें खंगालने का काम शुरू कर दिया. जैसेजैसे टीम वहां के सीसीटीवी फुटेज खंगालती रही, वैसेवैसे सुराग पुख्ता होता चला गया. ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रैसवे पर बने टोल प्लाजा की तरफ बढ़ते हुए ये काली स्कौर्पियो गाड़ी एक के बाद एक कई सीसीटीवी में कैद हो गई, लेकिन कहीं भी गाडी का नंबर साफतौर पर दिखाई नहीं दिया.

सीसीटीवी की जांच में ये गाड़ी जब टोल प्लाजा के पास एक पैट्रोल पंप पर पहुंची, गाड़ी कुछ देर वहां रुकी, लेकिन उस ने पैट्रोल पंप से उस में तेल नहीं भरवाया. वह गाड़ी थोड़ी देर रुक कर टोल को पार कर ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रैसवे पर चढ़ गई, जिस से साफ हो गया कि ये गाड़ी गाजियाबाद से बाहर चली गई थी. लेकिन इस पूरी कवायद का फायदा ये हुआ कि पुलिस को टोल प्लाजा के सीसीटीवी से स्कौर्पियो कार का नंबर मिल गया. इस जगह मिली सीसीटीवी में यह भी साफ हो गया कि गाड़ी में ड्राइवर समेत कुल 2 लोग सवार थे. पुलिस ने टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज को भी जांच के लिए कब्जे में ले लिया. टोल प्लाजा के फास्टटैग एकाउंट की जांचपड़ताल की तो पता चला कि किसी इरफान नाम के व्यक्ति के वालेट से ये पेंमेट हुई थी.

टोल प्लाजा और परिवहन विभाग से सभी डिटेल्स निकलवा कर जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि ये गाड़ी और फास्टटैग से जुड़ा बैंक खाता इरफान पुत्र मोहम्मद अख्तर, निवासी गांव जोगिया गाढ़ा, थाना पुपरी, जिला सीतामढ़ी, बिहार के नाम पर है. कविनगर थानाप्रभारी संजीव कुमार शर्मा ने जब इस जांच प्रगति से एसपी (सिटी) निपुण अग्रवाल को अवगत कराया तो उन्होंने एक टीम तत्काल बिहार के सीतामढ़ी रवाना करने का आदेश दिया. उसी दिन आरटीओ विभाग से भी स्कौर्पियो गाड़ी के बारे में जानकारी हासिल कर ली गई थी.

यूपी पुलिस टीम पहुंची सीतामढ़ी एसएसआई देवेंद्र सिंह और क्राइम ब्रांच प्रभारी सचिन मलिक के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम सीतामढ़ी के लिए भेज दी गई. 7 सितंबर, 2021 को पुलिस की टीम ने स्थानीय पुपरी थाने से इरफान के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि इरफान एक शातिर अपराधी है. उस के खिलाफ पुपरी थाने में ही झगड़ा, जानलेवा हमला करने और धमकी देने के मामले दर्ज हैं. स्थानीय पुलिस से गाजियाबाद पुलिस को पता चला कि दिल्ली, पंजाब, गोवा, कर्नाटक, ओडिशा व तेलंगाना की पुलिस इरफान की तलाश में अकसर उस के गांव में छापा मारती रहती है लेकिन वह इतना शातिर है कि पुलिस के हत्थे नहीं चढता.

स्थानीय पुलिस को साथ ले कर जब पुलिस की टीम ने इरफान के गांव जोगिया गाढ़ा में उस के घर पर छापा मारा तो वहां इरफान नहीं मिला, लेकिन उस की पत्नी गुलशन परवीन पुलिस को मिल गई. पुलिस को गांव में उस के घर में खड़ी वह स्कौर्पियो कार भी मिल गई, जिसे कविनगर में कपिल गर्ग के घर में चोरी के दौरान सीसीटीवी फुटेज में देखा गया था. इतना ही नहीं, वहां बिहार नंबर की एक महंगी जगुआर कार भी मिली. पुलिस समझ गई कि गाजियाबाद में चोरी के बाद इरफान सीधे अपने गांव आया था और चोरी का माल ठिकाने लगाने के बाद वह वहां से खिसक गया. पुलिस को पूरा यकीन था कि इतनी बड़ी चोरी करने के बाद इतनी जल्दी उस ने चोरी का सारा माल नहीं बेचा होगा, लिहाजा पुलिस ने इरफान के घर की तलाशी ली.

पुलिस को वहां से नकदी तो ज्यादा नहीं मिली, लेकिन कई लाख रुपए के गहने बरामद हुए जो कपिल गर्ग के घर हुई चोरी का माल था या नहीं, यह जानने के लिए पुलिस टीम ने घर से बरामद हुए सामान के फोटो खींच कर गाजियाबाद में एसएचओ संजीव शर्मा को भेजे. संजीव शर्मा ने कपिल गर्ग के परिवार को बुला कर वाट्सऐप से आई फोटो जब परिजनों को दिखाई तो उन्होंने बता दिया कि इस में से अधिकांश गहने उन के घर से ही चोरी हुए हैं. अब यह बात पूरी तरह साफ हो गई कि कपिल गर्ग के घर हुई चोरी में इरफान का ही हाथ है. पुलिस ने उस की पत्नी गुलशन उर्फ परवीन को चोरी का माल घर में रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस को स्थानीय पुलिस से इस बात की जानकारी भी मिल चुकी थी कि इरफान ने अपने गांव व आसपास के इलाकों में बहुत सारे लोगों को शार्टकट से पैसा कमाने का लालच दे कर अपने गैंग में शामिल कर लिया था. इसलिए पुलिस ने उस की पत्नी गुलशन से स्थानीय थाने में महिला पुलिस की मदद से सख्ती के साथ पूछताछ की तो पता चला कि गाजियाबाद के कविनगर में हुई चोरी के दौरान पुपरी थाना क्षेत्र का ही इरफान का ड्राइवर मोहम्मद शोएब पुत्र गुलाम मुर्तजा निवासी राजाबाग कालोनी तथा विक्रम शाह पुत्र रामवृक्ष शाह निवासी गाढ़ा कालोनी भी शामिल था.

पुलिस ने उसी रात छापा मारा. संयोग से दोनों अपने घर पर ही मिल गए और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. उन के घर से भी तलाशी के दौरान चोरी के कुछ आभूषण बरामद हुए जो उन्होंने कपिल गर्ग के घर से चोरी किए थे. तीनों आरोपियों को सीतामढ़ी की अदालत में पेश करने के बाद कविनगर पुलिस उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर ले कर गाजियाबाद आ गई. यहां पर सक्षम न्यायालय में पेश कर तीनों को पुलिस ने 3 दिन की रिमांड पर ले लिया. जिस के बाद उच्चाधिकारियों ने गुलशन परवीन, शोएब और विक्रम से विस्तृत पूछताछ की. शोएब तथा विक्रम ने घटनास्थल केडी 12 में कपिल गर्ग की कोठी पर जा कर इस बात की पहचान कर दी कि वे इरफान के साथ 3 सितंबर को चोरी करने आए थे. इस के बाद शुरू हुआ ताबड़तोड गिरफ्तारियों का सिलसिला.

पुलिस की टीमों ने इरफान के गिरोह में काम करने वाले इमरान पुत्र अकीउर्रहमान मूल निवासी एकता नगर, थाना क्वारसी, अलीगढ़ जो इन दिनों बरेली के खुशबू एनक्लेव इलाके में रहता था, को भी गिरफ्तार किया. इमरान चोरी के आभूषण बिकवाने में इरफान की मदद करता था. पुलिस ने अलीगढ़ के रहने वाले 3 सर्राफा कारोबारियों मुरारी वर्मा, शिवम वर्मा तथा धीरज वर्मा को भी गिरफ्तार किया. जिन से चोरी के कुछ आभूषण भी बरामद किए गए. इन चारों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस टीमों ने जांचपड़ताल और पूछताछ को आगे बढ़ाते हुए इरफान के गांव के रहने वाले मोहम्मद मुजाहिद और पड़ोस के जाहिदपुर गांव में रहने मोहम्मद सरबरूल हुदा को भी गिरफ्तार कर लिया. लेकिन यह सिलसिला यहीं खत्म होने वाला नहीं था.

छानबीन आगे बढ़ी तो पता चला कि अलीगढ़ में बरौला जाफराबाद में रहने वाली इरफान की प्रेमिका रूपाली उर्फ संगीता गांव गाढ़ा जोगिया में रहने वाली उस की विधवा बहन लाडली खातून को भी इरफान के चोरी के कारनामों की पूरी जानकारी रहती है. वे दोनों न सिर्फ पुलिस से बचने के लिए छिपने में उस की मदद करती हैं, बल्कि चोरी के माल को ठिकाने लगाने से ले कर उस से ऐश भरी जिंदगी जीने में भी हिस्सेदार बनी रहती हैं. एक के बाद एक पुलिस इरफान से जुड़े 11 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थी, लेकिन पुलिस के लिए छलावा बन चुका इरफान उर्फ उजाला हर बार पुलिस की पकड़ से फिसल जाता था.

इस दौरान साक्ष्यों के अभाव में उस की बहन लाडली खातून तथा प्रेमिका रूपाली उर्फ संगीता की जमानत भी हो गई. लेकिन इरफान फिर भी पुलिस की पकड़ में नहीं आया. कविनगर पुलिस तथा क्राइम ब्रांच की टीम लगातार उस की गिरफ्तारी के प्रयास में लगी रही. इस दौरान कविनगर थाने के प्रभारी संजीव शर्मा का तबादला हो गया था. उन की जगह अब्दुल रहमान सिद्दीकी कविननगर थाने के नए थानाप्रभारी बन कर आए. उन्होंने जांच अधिकारी देवेंद्र सिंह के साथ मिल कर नई रणनीति तैयार की और अब तक पूछताछ में आए तमाम लोगों की निगरानी का काम शुरू करा दिया जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इरफान के साथ जुड़े थे.

लगातार प्रयास के बाद पुलिस टीम को जानकारी मिली कि इरफान 24 अक्तूबर को गाजियाबाद कोर्ट में अपने वकील से मिलने के लिए आएगा. क्योंकि उस ने अपने गिरोह के गिरफ्तार साथियों की जमानत करानी है. पुलिस ने 24 अक्तूबर को इरफान को पकड़ने के लिए बड़ा जाल बिछाया. अदालत में वकीलों के चैंबर से ले कर अदालत के बाहर जाने वाले रास्तों पर सादा लिबास में पुलिस की टीमों ने जाल बिछा दिया. दोपहर बाद करीब साढ़े 3 बजे जब इरफान अपने वकील से मिल कर आरडीसी कालोनी से निकल कर बसअड्डे की तरफ जाने के लिए कचहरी के गेट से बाहर निकला तो सादा लिबास में खड़ी पुलिस की टीमों ने उसे दबोच लिया और गाड़ी में डाल कर कविनगर थाने ले आई.

जिस इरफान को पकड़ने के लिए कविनगर थाने की पुलिस 2 महीनों से हाथपांव मार रही थी, उस से पूछताछ करने के लिए एसपी (सिटी) निपुण अग्रवाल और एसएसपी पवन कुमार ने खुद इरफान उर्फ उजाला उर्फ आर्यन से पूछताछ की तो उस के बारे में जान कर सभी की आंखें हैरत से फैल गईं. शातिर चोर निकला इलाके का रौबिनहुड क्योंकि जिस शख्स को वे महानगर का सब से बड़ा चोर मान कर पकड़ने में लगे थे, असल में अपराधी के रूप में वह एक रौबिनहुड था, जो अमीरों के घर में चोरी कर के उन से की गई कमाई को गरीबों में बांट देता था. वह गरीब परिवार की लड़कियों की शादियां कराता था.

सीतामढ़ी में उस के गांव में रहने वाला कोई गरीब अगर बीमार पड़ता या किसी ऐसी गंभीर बीमारी से पीडि़त हो जाता कि उस का इलाज करना उस की सामर्थ्य में नहीं होता तो वह ऐसे लोगों के इलाज का पूरा खर्च खुद उठाता था. किसी गरीब की बेटी की डोली अगर पैसे के बिना न उठ रही हो तो इरफान पैसा दे कर इस नेक काम में परिवार की मदद करता. इरफान दिल्ली के कुख्यात चोर बंटी के कारनामे से बेहद प्रभावित था और उसे वह अपना आदर्श मानता है.

मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी में जोगिया गाढ़ा गांव के रहने वाले इरफान (35) का परिवार पहले बहुत गरीब था. पिता खेतों में मजदूरी किया करते थे और साल 2000 में उन की मौत हो गई. छोटे से टूटेफूटे मकान में रहने वाले इरफान के परिवार में उस के 2 भाई और 2 बहनें हैं. इरफान के साथ उस की 65 साल की मां नसीमा खातून, बड़ा भाई फरमान भाभी गिन्नी खातून और इरफान की पत्नी गुलशन परवीन तथा उस की 2 बेटियां रहते हैं. उस की एक बड़ी विधवा बहन लाडली खातून भी अपने एक बच्चे के साथ उसी के साथ रहती थी. पांचवीं कक्षा तक पढ़ा इरफान लिखना नहीं जानता. बस वह अपने हस्ताक्षर कर सकता है. लेकिन इस के बावजूद उस के अंदर ऐसी खासियत है कि वह जिस से भी एक बार मिल ले, वह उस का मुरीद हो कर रह जाता है.

इरफान ने 2 शादियां की थीं. उस की दोनों ही शादियां प्रेम विवाह थीं. पहली शादी उस ने सीतामढ़ी की गुलशन परवीन से की, जबकि दूसरी मुंबई में रहने वाली हिंदू भोजपुरी एक्ट्रैस से. पहली चोरी में ही मिले थे 35 लाख रुपए पहली पत्नी गुलशन को उस ने पहली बार अपनी बड़ी भाभी के घर जाने के दौरान देखा था. वहीं दोनों में प्यार हो गया और जल्द ही दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. उस वक्त इरफान चोरी के धंधे में नहीं था और परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी. दोनों की शादी के लिए उन के परिवार वाले रजामंद नहीं थे, लेकिन उन की मरजी के खिलाफ दोनों ने शादी कर ली.

शादी के बाद गुलशन परवीन ने पति इरफान के साथ घर की गरीबी को दूर करने के लिए एक छोटा सा होटल खोलने से ले कर कपड़े की दुकान चलाने तक के कई छोटेबड़े काम किए. लेकिन हालात नहीं सुधरे. इसीलिए कुछ समय बाद अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए इरफान पत्नी को गांव में छोड़ कर मुंबई से दिल्ली तक घूमा. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. तभी उस की छोटी बहन की शादी तय हो गई. लेकिन परिवार के पास इतना भी पैसा नहीं था कि उस की शादी की जा सके. यह 11 साल पहले की बात है. तब इरफान को लगा कि सीधे रास्ते से जिदंगी में कुछ नहीं किया जा सकता. इरफान ने बहन की शादी के लिए पहली बार बिहार में ही बड़ी चोरी की थी, जिस में उसे 35 लाख रुपए मिले.

बहन की शादी हो गई, लेकिन इस के बाद इरफान की जिदंगी बदल गई. इस के बाद इरफान ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उसे लगा कि अगर किसी नेक काम के लिए अमीर लोगों के घर से माल उड़ा कर जरूरतमंदों की मदद की जाए तो यह पाप नहीं, बल्कि दुनिया का सब से नेक काम है. बस रौबिनहुड के इसी सिद्धांत को अपना कर इरफान अपराध के दलदल में उतरा तो फिर उस ने वापस मुड़ कर नहीं देखा. वह चोरी दर चोरी करता चला गया. इरफान उर्फ उजाला 22 साल की उम्र में ही मुंबई चला गया. उस के बारे में लोगों को यही जानकारी थी कि वह मुंबई, हैदराबाद, कानपुर, दिल्ली में बैग बनाने का बिजनैस करता है. बाद में 2012 में जब वह घर आया तो उस ने लोगों को बताया कि कि वह मुंबई में बियर बार चलाता है.

हालांकि एक जमाना था जब इरफान का परिवार मजदूरी करता था. रहने के नाम पर बस एक झोपड़ी थी. काम नहीं मिलने पर खाने को लाले पड़ जाते थे. लेकिन परिवार की माली हालत सुधारने के लिए जब उस ने चोरी करनी शुरू की तो उस का रुतबा ही बदल गया था. गांव वालों को वह अपने काम के बारे में कुछ नहीं बताता था. गांव आते ही करीब करीब 10 साल पहले उस ने गांव में पहले जमीन खरीदी, उस के बाद जब और पैसा आया तो आलीशान घर बनवाया. फिर एक से एक महंगी बाइक खरीदी और लाखों रुपए की कीमत की लग्जरी कारें खरीदीं. बाद में उस ने अपने गैंग में गांव के कुछ युवकों को भी शामिल कर लिया और उन्हें अपने साथ घुमाने लगा.

गांव के युवकों पर वह पानी की तरह रुपए खर्च करता, जिस से वह भी उस की तरह जिंदगी बसर करने के लिए उस के चोरी के धंधे से जुड़ते चले गए. धीरेधीरे महंगी कार खरीदने के बाद उसे विदेशी गाडि़यां खरीदने का शौक लग गया. जगुआर से जाता था चोरी करने  साल 2012 में वह पहली बार तब खबरों में आया जब उस ने दरभंगा में एक नाचने वाली पर लाखों रुपए उड़ाए. बाद में 2013 में कानपुर पुलिस उसे 30 लाख की ज्वैलरी चोरी के मामले में गिरफ्तार करने गांव आई तो वह पुपरी थाने से भाग गया.

फिर वह 2014 में चुनाव के दौरान अपनी महंगी गाड़ी में 4 लाख रुपए के साथ पकड़ा गया था. इस के बाद धीरेधीरे लोगों को पता चलने लगा कि वह एक अपराधी है और बड़े महानगरों में रहने वाले लोगों के घरों में चोरियां करता है. कविनगर (गाजियाबाद) में चोरी की वारदात से कुछ दिन पहले बिहार जाते हुए इरफान की जगुआर कार सड़क दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हो गई थी. इस के बाद उस ने अपनी पत्नी गुलशन के नाम से नई स्कौर्पियो कार खरीद ली. कपिल गर्ग के घर चोरी करने के लिए इरफान इसी स्कौर्पियो से अपने ड्राइवर शोएब के साथ आया था. इरफान ने दिल्ली में नोटबंदी से पहले एक जज के घर 65 लाख रुपए की चोरी की थी. जब वह चोरी करने के लिए घर में घुसा तो अलमारी में नोटों की गड्डियां मिलीं.

उस ने 2 बैगों में नोट भरे, लेकिन वह एक ही बैग उठा पाया और ले कर चला गया. चोरी के बाद नोट गिने तो 65 लाख रुपए निकले. बाद में पता चला कि जज ने केस ही दर्ज नहीं कराया था.  इरफान अपराध की दुनिया का अब वह नाम बन चुका नाम था, जो चोरी के मामले में एक्सपर्ट बन चुका था. वह बंटी चोर की तरह अकेले ही चोरी की वारदात को अंजाम दिया करता था. चोरी की वारदात को अंजाम देने के समय इरफान अपने साथ महज पेचकस रखता था. पूरे तरीके से काले कपड़े पहन कर घर में प्रवेश किया करता था. आमतौर वह नंगे पांव ही घरों में घुसता था. वह दीवार पर नंगे पैर चढ़ कर कोठियों में ऐसे घुस जाता था जैसे स्पाइडरमैन फिल्म का हीरो दीवारों पर चढ़ता है. वह कभी भी मेनगेट से नहीं जाता, बल्कि पिछली दीवार से चढ़ कर चोरी करता था.

कविनगर के कारोबारी कपिल गर्ग की कोठी में भी वह पीछे के रास्ते से ही अकेले घुसा था. पिछले 10 सालों से चोरी की वारदात करने के बावजूद इरफान आज तक किसी भी वारदात में रंगेहाथ नहीं पकड़ा गया. वारदात के दौरान न तो किसी कोठी के गार्ड ने उसे पकड़ा और न ही कोठियों में पलने वाले कुत्तों ने उस पर हमला किया. इरफान चोरी के दौरान कीमती गहनों और नकदी पर ही हाथ साफ करता था. घर के सामान में वह कीमती इलैक्ट्रौनिक सामानों को ही अपने साथ ले जाता था.

इरफान जब चोरी करने के लिए जाता तो वह यह नहीं देखता कि घर किस का है और उस के आसपास कौन रहता है. बस उस के दिल से अगर ये आवाज निकल जाती कि फलां घर पर हाथ साफ करना है तो वह बेधड़क उस घर में रखे कीमती सामान पर हाथ साफ कर देता. देश के बड़े शहरों में थे इस शातिर चोर की गैंग के सदस्य 2 साल पहले उस ने गोवा के राज्यपाल के घर के पास से एक व्यापारी के घर से लाखों रुपए की नकदी और गहने चुरा लिए क्योंकि उस के दिल से आवाज निकली कि इस घर में मोटा माल मिलेगा.

इरफान की खूबी थी कि किसी भी वारदात को करने से पहले खुद कभी रेकी नहीं करता था. हां, देश के कई बड़े शहरों में फैले उस के गैंग के सदस्य जरूर रेकी कर के उसे जरूर बता देते थे कि अमुक घर में मोटा माल मिल सकता है या उस में रहने वाले लोग घर से बाहर हैं. लेकिन तब भी इरफान तब तक चोरी नहीं करता था, जब तक मौके पर जा कर उस के दिल से आवाज नहीं निकलती. वह अपनी महंगी गाड़ी से निकलता और दिल की गवाही देते ही वारदात को अंजाम दे देता था. उस का अंदाजा इतना सटीक था कि वह आज तक जिस घर में गया, लाखों रुपया ले कर ही निकला.

इरफान उर्फ उजाला लग्जरी गाडि़यों से अपने ड्राइवर व साथियों के साथ चोरी करने निकलता. कविनगर में चोरी करने के बाद वह अपने गांव सीतामढ़ी, बिहार चला गया था. वहां उस ने कुछ दिनों के लिए चुराई गई ज्वैलरी अपने खेत के गड््ढे में दबा दी थी. इस के बाद ज्वैलरी को बिहार के मुजफ्फरपुर व दरभंगा के सुनारों के यहां गिरवी रख कर मोटी रकम ले ली थी. कुछ ज्वैलरी उस ने बेच भी दी थी. इस के बाद वह अलीगढ़ चला गया, जहां 3 सुनारों को उस ने चोरी के कुछ जेवर बेचे. 1-2 दिन अपनी माशूका रूपाली के पास रहा उस के बाद वहीं से नेपाल भाग गया. इस दौरान उस के लोग चोरी के मामले में गिरफ्तार हो चुकी गुलशन, बहन लाडली व माशूका रूपाली की जमानत कराने में जुटे रहे. इरफान लगातार अपने लोगों के संपर्क में था.

इरफान ने पूछताछ में बताया कि वह तो बस गरीबों की मदद करने के लिए चोरी करता है, लेकिन पुलिस तो उस से भी बड़ी चोर है. जिस का उदाहरण देने के लिए इरफान ने गाजियाबाद पुलिस को एक किस्सा सुनाया. उस ने बताया कि बंगलुरु में उस ने चोरी की एक वारदात को अंजाम दिया था, जिस में उसे मात्र डेढ़ लाख रुपए मिले थे. इस वारदात के बाद उस ने हैदराबाद में चोरी की एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया. लेकिन तब तक बंगलुरु पुलिस ने उसे अपने इलाके में हुई चोरी की वारदात में गिरफ्तार कर लिया और उस के घर से 40 लाख रुपए बरामद हुए. लेकिन यह रकम को बंगलुरु पुलिस ने बरामदगी में नहीं दिखाई थी और डेढ़ लाख रुपए की चोरी का खुलासा कर दिया.

इरफान ने दिल्ली में चोरी की कई वारदातों को अंजाम दिया, लेकिन वह केवल 2 बार पकड़ा गया. पहली बार 2017 में इरफान को दक्षिणपूर्वी दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. दरअसल इस मामले में गिरफ्तारी की भी एक दिलचस्प कहानी है. 24 मई, 2017 को उस ने न्यू फ्रैंड्स कालोनी में रहने वाले राजीव खन्ना के घर में लाखों रुपए के सोने और हीरे के आभूषण चोरी किए थे. इस मामले में स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने सीसीटीवी फुटेज तथा मौके पर मिले एक मोबाइल फोन से सुराग लगा कर इरफान व उस के एक साथी को गिरफ्तार कर लिया था.

दरअसल, इस वारदात में इरफान गलती से अपना मोबाइल घटनास्थल पर भूल गया था. यही मोबाइल फोन उस की गिरफ्तारी का सबब बन गया. हालांकि इस वारदात के बाद उस ने अपने व अपने घर वालों तक के फोन नंबर बदलवा दिए थे, मगर अंत में पकड़ा गया. दूसरी बार इरफान उर्फ उजाला को जनवरी 2021 में दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच की इंटरस्टेट यूनिट के एसीपी संदीप लांबा व इंसपेक्टर गुरमीत की टीम ने गिरफ्तार किया था. तब उस ने दिल्ली एनसीआर सहित आधा दरजन राज्यों में चोरी करने का खुलासा किया था.

उस ने पुलिस को बताया था कि उस के गैंग के सदस्य दिल्ली, यूपी, बिहार, पंजाब आदि राज्यों में फैले हुए हैं. दिन के समय वे गरीबों की मदद के लिए चंदा मांगने के बहाने रेकी करते थे और जो घर बंद मिलता, उस के बारे में उसे बता देते थे. इरफान उर्फ उजाला ने करीब 3 साल पहले दिल्ली में ताबड़तोड़ चोरी की घटनाएं कर दिल्ली पुलिस की नींद उड़ा दी थी. बाद में जब लांबा की टीम ने उसे पकड़ा तो उन्होंने इरफान को कुरान शरीफ की कसम दिला कर दिल्ली में चोरी न करने का वादा लिया. तब उस ने भरोसा दिया था कि वह आज के बाद दिल्ली में कभी चोरी नहीं करेगा.

दिल्ली पुलिस को किए वादे पर इरफान खरा भी उतर रहा था. इसीलिए इरफान ने दिल्ली को छोड़ कर गाजियाबाद को अपना निशाना बना लिया था. 2 बीवी और 4 प्रेमिकाएं हैं इस चोर की इंसान में कुछ खूबियां होती हैं तो कुछ बुरी लतें भी होती हैं. इरफान की 2 बीवी तथा  4 प्रेमिकाएं हैं. चोरी में मोटा माल हाथ लगने के बाद सब से पहले किसी प्रेमिका के पास ही जाता था. दोनों बीवियों के अलावा वह अपनी इन प्रेमिकाओं पर भी दिल खोल कर पैसा खर्च करता था. इन में से अलीगढ़ में रहने वाली प्रेमिका रूपाली को तो कविनगर पुलिस ने गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. जबकि उस की दूसरी माशूकाएं आगरा, सवाई माधोपुर तथा बंगलुरु की रहने वाली हैं. चोरी की रकम से वह इन्हें महंगे उपहार देता था. बदले में वे उसे न सिर्फ छिपने में मदद करतीं बल्कि उस की अय्याशी का सामान भी बनतीं.

इरफान मुंबई, चंडीगढ़, बंगलुरु और दिल्ली के लाउंज व बारों में जम कर मौजमस्ती करता व रुपए उड़ाता था. महंगी कारों, डिजाइनर कपड़ों और विलासितापूर्ण जीवन का शौकीन इरफान बार में एकएक गाने की फरमाइश पूरी करने पर 10-10 हजार रुपए उड़ाता था. भोजपुरी फिल्मों की एक अभिनेत्री मुंबई में रहने के दौरान उस की दोस्त बन गई थी, जो मुंबई में रहती थी, जब भी चोरी की बड़ी वारदात को अंजाम देता तो पहले गांव जाता, वहां लोगों की मदद करने के लिए जो भी पैसा खर्च करना होता करता. कुछ रोज अपनी पत्नी गुलशन के साथ गुजरता, उस के बाद वह मुंबई चला जाता और अपनी भोजपुरी फिल्मों की अभिनेत्री प्रेमिका के साथ रह कर जम कर मौजमस्ती करता.

उस की पहचान एक पैसे वाले के रूप में होने लगी. अपनी फिल्मी माशूका पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता और जब पैसा खत्म होने लगता तो किसी दूसरे शिकार की तलाश में मोटा हाथ मारने के लिए किसी दूसरे शहर का रुख कर लेता. बाद में उस ने इस एक्ट्रैस से शादी कर ली. उस की कमजोरी थी फेसबुक, जिस पर इरफान अपनी विलासितापूर्ण जिदंगी की फोटो और वीडियो अपलोड करता रहता था. इरफान ने एक साल पहले ही अपनी पत्नी के नाम से महंगी जगुआर कार खरीदी थी, जिस से इलाके में उस की शान और भी बढ़ गई. शोएब नाम के अपने ड्राइवर के साथ वह कार में चलता था.

जब वह दूसरे महानगरों में चोरी करने के लिए जाता तो अकसर अपने ड्राइवर व गाड़ी को ले कर चोरी करने जाता था. इतनी महंगी कार होने के कारण कोई भी उस पर शक नहीं करता था. वह महंगे होटलों में रुकता है. जब वह कार से चोरी करने नहीं जाता तो बिहार से दूसरे शहरों में आनेजाने के लिए हवाई जहाज से सफर करता था. धीरेधीरे जब दूसरे राज्यों की पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव पहुंचने लगी तो गांव वालों को पता चल गया कि वह एक कुख्यात चोर है. लेकिन तब तक वह गांव वालों के बीच अपनी छवि एक फरिश्ते के रूप में गढ़ चुका था. पुलिस कुछ भी कहती, लेकिन लोग उस के खिलाफ न तो कुछ बोलते न ही उस के बारे में गलत सुनने को तैयार होते थे.

चोरी के पैसों से उस ने धीरेधीरे अपने गांव व आसपास के लोगों को सहयोग करना शुरू कर दिया. अपने गांव की नाली खडं़जे से ले कर जर्जर सड़कों को भी बनवाना शुरू कर दिया. धीरेधीरे लोग उस के पास मदद मांगने आने लगे तो उसे भी अपनी तारीफें सुनने के कारण उन की मदद करने का चस्का लग गया. वह कभी किसी गरीब की बेटी की शादी करा देता तो कभी गांव में किसी बीमार के इलाज का खर्च उठा लेता. जरूरतमंदों की खुले रूप से करता था आर्थिक मदद उस की छवि गांव में रौबिनहुड जैसी बन गई. सामाजिक काम में इरफान किस कदर सक्रिय हो चुका था, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2 साल पहले अपने पड़ोस में रहने वाली एक गरीब लड़की के कैंसर के औपरेशन पर उस ने 20 लाख रुपए खर्च कर दिए थे.

वह अपने गांव में हर महीने चिकित्सा शिविर का आयोजन करता था. गांव के लोगों को अब पता था कि वह बड़े शहरों का महाचोर है. इस के बावजूद गांव के लोगों के लिए वह फरिश्ता ही था, जो उन की जिंदगी में उजाला भरने के लिए चोरी कर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहा था. इसीलिए लोग उस के नाम के आगे उजाला लगाने लगे थे. इरफान जब लोगों की मदद करता तो इस में वह ये नहीं देखता था कि मदद मांगने वाला किस मजहब का है. इरफान के मुसलिम बहुल गांव जोगिया में केवल 4 हिंदू परिवार रहते हैं. वहां के जोगिंदर राम की भी उजाला ने मदद की है.

उस ने 3 महीने पहले ही जोगिंदर की बेटी की शादी में 4 हजार रुपए से मदद की तो कुछ साल पहले लीवर इंफेक्शन के औपरेशन के लिए उसे 5 हजार रुपए दिए थे. इसी गांव में रहने वाली रामसती का 2 साल पहले बच्चेदानी का औपरेशन कराने के लिए इरफान उर्फ उजाला ने उसे 10 हजार रुपए दिए थे. सामाजिक काम कर के फरिश्ते के रूप में बनाई गई छवि के कारण गांव तथा आसपास के इलाकों के लोग अब इरफान पर दबाव डालने लगे कि अगर वह राजनीति में आ जाएगा तो उन की जिंदगी संवर जाएगी. इरफान भी जानता था कि राजनीति में आने के बाद ही वह अपनी कौम और लोगों की मदद कर सकता है.

लोगों ने उस पर ज्यादा दबाव डाला तो उस ने गांव व आसपास के क्षेत्र में और तेजी से सामाजिक कार्य शुरू कर दिए. उस ने राजनीति में कदम रखने के लिए अपनी पत्नी गुलशन परवीन को आगे कर दिया. वह गांव और इलाके की राजनीति से राजनीति में आगे बढ़ना चाहता था. इसलिए उस ने कुछ दिन पहले ही पुपरी के जिला परिषद क्षेत्र संख्या 34 से अपनी पत्नी को प्रत्याशी बनाया. नामांकन से ले कर चुनाव प्रचारप्रसार में उस ने दिल खोल कर रुपए खर्च किए. हालांकि इस दौरान पुलिस ने गुलशन को गिरफ्तार कर के जेल भी भेजा, लेकिन जेल से निकलने के बाद उस ने नामांकन किया और लोगों ने जम कर उस के प्रचार में साथ दिया.

इसे इरफान की पत्नी की मेहनत कहें या इरफान की सामाजिक कामों से मिली शोहरत, उस की पत्नी भारी मतों से चुनाव जीत गई. दरअसल, चुनाव से कुछ दिन पहले ही इरफान ने करीब डेढ़ करोड़ रुपया खर्च कर के 7 गांवों की सड़कें बनवाई थीं. इस से इलाके के लोगों को लगने लगा कि वह चुनाव जीतने से पहले इतना विकास कर सकती है तो चुनाव जीतने के बाद इलाके को जन्नत बना देगी. कविनगर पुलिस ने इरफान व उस के पकड़े गए साथियों से अब तक चोरी में प्रयुक्त की जाने वाली स्कौर्पियो व जगुआर समेत एक करोड़ की कीमत से अधिक के सोने व हीरे के जेवर बरामद किए हैं. उस के खिलाफ विभिन्न प्रदेशों में चोरी के 25 मामले दर्ज हैं. तथा उस ने अब तक करीब 20 करोड़ से अधिक की चोरियां की हैं.

उस ने अपनी पत्नी गुलशन परवीन से चुनाव जीतने के बाद चोरी न करने का वायदा किया था. उस की पत्नी अब जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीत चुकी है. लेकिन रौबिनहुड बनने का उस का ख्वाब उसे जरायम की दुनिया से दूर नहीं रख पाया. Ghaziabad News

—कथा पुलिस की जांचपड़ताल व आरोपियों से हुई पूछताछ पर आधारित)