Lucknow Crime : लखनऊ का गौरी हत्याकांड – फेसबुक की फांस

Lucknow Crime : फेसबुक के माध्यम से गौरी से दोस्ती हो जाने के बाद हिमांशु उसे प्यार करने लगा था. एक दिन अपने दिल की बात कहने के लिए उस ने गौरी को अपने घर बुलाया. लेकिन दोनों के बीच ऐसा कुछ हुआ कि दोस्ती टुकड़ों में बिखर गई. इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद हिमांशु प्रजापति राजस्थान के जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से बीकौम कर रहा था. उस ने सोचा था कि बीकौम करने के बाद लखनऊ के किसी कोचिंग सेंटर से पढ़ाई कर के बैंक या उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंसपेक्टर की नौकरी पाने की कोशिश करेगा.

युवाओं का सोशल साइट्स की तरफ झुकाव बढ़ता जा रहा है. हिमांशु भी पढ़ाई के दौरान फेसबुक और वाट्सएप का प्रयोग करने लगा था. जाहिर है, कोई भी व्यक्ति सोशल साइट प्रयोग करता है तो उस की दोस्ती अनेक लोगों से हो जाती है. हिमांशु की दोस्ती भी लखनऊ के ही गणेशगंज मोहल्ले में रहने वाली गौरी श्रीवास्तव से हो गई. 19 साल की गौरी लखनऊ के ही अंबेडकर ला कालेज से एलएलबी की पढ़ाई कर रही थी. उस का सपना था कि वह मजिस्ट्रेट बने. गौरी को अपने नएनए फोटो फेसबुक और वाट्सएप पर अपने दोस्तों से शेयर करने का शौक था. वह हिमांशु को भी अपने फोटो और विचार भेजती रहती थी.

गौरी बेहद खूबसूरत थी, इसलिए हिमांशु उसे बहुत पसंद करता था. वह उस से अपनी दोस्ती और गहरी करना चाहता था. उन की दोस्ती को एक साल बीत गया था लेकिन उन की मुलाकात नहीं हो पाई थी. हिमांशु गौरी से मिलने के लिए आतुर था. उस से मिलने की चाहत में एक बार तो वह सेल्समैन बन कर गौरी के घर भी पहुंच गया था. लेकिन इस बात की भनक गौरी की मां तृप्ता श्रीवास्तव को लग गई तो उन्होंने हिमांशु को घर से भगा दिया.

हिमांशु गौरी से एकांत में मिल कर उसे अपने दिल की बात बताना चाहता था. इसलिए वह किसी भी तरह गौरी से मिलने की योजना बनाने लगा. पहली फरवरी, 2015 को हिमांशु के मातापिता अपने एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गए थे. हिमांशु ने इस मौके का लाभ उठाने के लिए पढ़ाई का बहाना बना कर उन के साथ जाने से मना कर दिया था. घर वालों के जाने के बाद हिमांशु घर पर अकेला रह गया. उस ने गौरी को फोन कर के कहा, ‘‘गौरी, इस समय मेरे घर पर कोई नहीं है. मैं समझता हूं कि साथ बैठ कर बातचीत करने का हमारे पास यह अच्छा मौका है. मैं चाहता हूं कि तुम मेरे घर आ जाओ.’’

गौरी पहले तो उस के यहां आने में आनाकानी करने लगी लेकिन हिमांशु की जिद पर उस ने हां कर दी. वह बोली, ‘‘ठीक है, तुम मुझे बताओ कि कहां आना है? मैं आ जाऊंगी.’’

‘‘मैं तुम्हारे घर के पास मेनरोड पर मिल जाऊंगा. वहां से हम बाइक से घर चले आएंगे. फिर घर पर ही बैठ कर बातें करेंगे.’’

पहली फरवरी, 2015 को दोपहर करीब 1 बजे गौरी अपने घर से निकली. उसे अपने पिता शिशिर श्रीवास्तव के कपड़े लांड्री में देने थे. लांड्री में कपड़े देने के बहाने वह घर निकली. सब से पहले वह लांड्री में कपड़े देने गई और बाद में उस ने हिमांशु को फोन कर के अपने घर के नजदीक मेनरोड पर पहुंचने को कहा. लांड्री में कपड़े देने के बाद गौरी पैदल चल कर मेनरोड पर पहुंच गई. रास्ते में आतेआते उस ने अपने चेहरे पर दुपट्टा बांध लिया था ताकि कोई उसे पहचान न सके. गौरी से बात करने के कुछ देर बाद हिमांशु मेनरोड पर पहुंच गया था. हिमांशु को खड़ा देख वह उस के पास पहुंच कर उस की बाइक पर बैठ गई. उस के बैठते ही हिमांशु ने बाइक स्टार्ट कर दी और उसे अपने घर ले आया.

उधर काफी देर तक गौरी घर नहीं लौटी तो घर वालों ने उसे फोन किया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. कई बार फोन करने के बाद भी कंप्यूटर द्वारा वही जवाब दिया जाता रहा. इस से घर वाले परेशान हो गए. उस के पिता शिशिर ने फिर से उस का नंबर मिलाया तो इस बार उस के फोन पर घंटी जा रही थी. इस से उन्हें कुछ राहत महसूस हुई कि बेटी से शायद अब बात हो सकती है. लेकिन दूसरी तरफ से गौरी के बजाय किसी लड़के की आवाज आई. उस ने सीधे कहा, ‘‘गौरी की तबीयत खराब है. वह बंगला बाजार रोड पर बने ईको पार्क के पास है.’’ इस के बाद गौरी का मोबाइल फिर स्विच औफ हो गया.

इतना सुनते ही शिशिर घबरा गए कि गौरी ईको पार्क कैसे पहुंची. वह तो लांड्री में कपड़े देने गई थी. खैर, उन के लिए वह समय ज्यादा सोचनेविचारने का नहीं था. गौरी की मां और पिता जल्द ही ईको पार्क के पास पहुंच गए. लेकिन पार्क में और उस के आसपास उन्हें गौरी नहीं दिखी. अब उन्हें बेटी के बारे में कई तरह की आशंकाएं होने लगीं. जब बेटी का कहीं से कोई पता नहीं चला तो शिशिर श्रीवास्तव ने 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस को सूचना दे दी. शिकायत करने के काफी देर तक पुलिस उन के पास नहीं पहुंची तो घर वाले परेशान हो गए. वे आधी रात को ही अमीनाबाद कोतवाली पहुंच गए और बेटी की गुमशुदगी की सूचना दी.

पुलिस ने सूचना दर्ज करने में टालमटोल करते हुए गौरी का फोटो ले कर दूसरे दिन आने को कहा. पुलिस उन से कह रही थी कि गौरी किसी के साथ भाग गई होगी. पुलिस की यह बात शिशिर श्रीवास्तव को बहुत बुरी लगी. लेकिन वह बेबस और लाचार थे. बहरहाल, शिशिर की फरियाद पर पुलिस ने गौरी की गुमशुदगी तो दर्ज कर ली लेकिन उस पर कोई एक्शन नहीं लिया. गौरी को ले कर उस के मातापिता ने कई सपने संजो रखे थे. वह पढ़ने में बहुत होशियार थी. उस ने लखनऊ के सब से प्रतिष्ठित लोरेटो कानवेंट कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की थी. वह पौजिटिव सोच वाली लड़की थी. एलएलबी के बाद वह पीसीएस (जे) करना चाहती थी ताकि सीधे मजिस्ट्रेट बन सके. वह अपने सपने साकार कर सके, इसलिए घर वाले भी उस की पढ़ाई में हर तरह से मदद कर रहे थे.

अपनी एकलौती बेटी की चिंता में गौरी के मातापिता की नींद उड़ चुकी थी. पूरी रात वे सो नहीं पाए. रात भर उन के दिमाग में बेटी के बारे में तरहतरह के खयाल घूमते रहे. वह कामना कर रहे थे कि गौरी जहां भी हो सकुशल हो. 2 फरवरी, 2015 की सुबह लखनऊ के पीजीआई थानाक्षेत्र में शहीदपथ के पास लोगों को जूट का एक बैग दिखा. उस पर खून के धब्बे भी थे. संदिग्ध हालत में पड़े उस बैग की सूचना किसी ने पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पीजीआई थानाप्रभारी संतोष तिवारी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लोगों की मौजूदगी में जब वह बैग खुलवाया तो उस में एक लड़की के कटे हुए पैर मिले. उन्हें देख वहां पर सनसनी फैल गई. पुलिस जरूरी काररवाई कर ही रही थी कि सूचना मिली कि इसी तरह के 2 संदिग्ध बैग शहीदपथ पर ही और पड़े हैं.

थानाप्रभारी ने वहां जा कर उन बैगों को खुलवाया तो उन में लड़की की लाश के शेष टुकड़े मिले. तीनों बैगों में लड़की की लाश के सारे टुकड़े मिल चुके थे. जिस तरह से शव को ला कर फेंका गया था उसे देख कर साफ लग रहा था कि लड़की का कत्ल कहीं और कर के लाश यहां फेंकी गई है. 3 टुकड़ों में लड़की की लाश मिलने की घटना ने लखनऊ पुलिस को झकझोर कर रख दिया. पीजीआई थाने ने वायरलैस द्वारा इस की सूचना लखनऊ के समस्त थानों को दे दी और लाश के तीनों टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. लखनऊ के ही अमीनाबाद थाने में एक दिन पहले जवान लड़की गौरी की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. वायरलैस से मिली सूचना के बाद भी अमीनाबाद थानापुलिस ने पीजीआई थाना पुलिस से संपर्क नहीं किया और न ही गौरी के परिवार को इस संबंध में कुछ बताया.

अज्ञात लड़की की टुकड़ों में मिली लाश की खबर 3 फरवरी को अखबारों में छपी तो गौरी के पिता शिशिर श्रीवास्तव थाना पीजीआई पहुंच गए. पुलिस ने जब लाश के टुकड़े और कपड़े शिशिर को दिखाए तो कपड़े देखते ही उन की आंखों से आंसू टपकने लगे. उन्होंने उन कपड़ों के आधार पर उस की पहचान अपनी बेटी गौरी के रूप में की. बेटी के कत्ल की बात सुन कर मां तो बेहोश ही हो गई थीं. एलएलबी की पढ़ाई करने वाली 19 साल की लड़की गौरी का शव 3 टुकड़ों में मिलने की जानकारी मिलते ही अदब और तहजीब के शहर लखनऊ में रहने वाले लोग भी आक्रोशित हो गए. लोगों को पुलिस की बेरुखी पर गुस्सा आ रहा था. उन का मानना था कि यदि पुलिस शुरू से ही तत्परता से काम करती तो गौरी की जान बच सकती थी.

लोगों के आक्रोश के बाद भी पुलिस अपनी कछुआ गति से ही गौरी हत्याकांड की छानबीन का दिखावा करती रही. घटना के 4 दिन बाद भी जब पुलिस हत्यारों का पता नहीं लगा पाई तो लोरेटो कानवेंट कालेज की लड़कियों और वहां की टीचरों ने पुलिस के खिलाफ लखनऊ विधानसभा और जीपीओ चौराहे पर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन की गूंज प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कानों तक पहुंची तो उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए लखनऊ के डीएम राजशेखर और एसएसपी यशस्वी यादव को न केवल तलब किया बल्कि उन्हें कड़ी फटकार भी लगाई. साथ ही उन्होंने एसएसपी से इस मामले की पूरी प्रगति रिपोर्ट मांगी.

मुख्यमंत्री की फटकार के बाद केवल लखनऊ पुलिस ही नहीं जागी बल्कि प्रदेश के डीजीपी ए.के. जैन भी घटनास्थल का मुआयना करने पहुंच गए. डीजीपी ने इस मामले का खुलासा करने के लिए एक पुलिस टीम बनाई जिस में एसएसपी यशस्वी यादव, एसपी क्राइम दिनेश सिंह, इंसपेक्टर अमीनाबाद महंथ यादव, पीजीआई थानाप्रभारी संतोष तिवारी, सर्विलांस सेल प्रभारी अनुराग मिश्र, एसआई अरुण द्विवेदी, आर.बी. सिंह, राहुल राठौर, कांस्टेबल अनिल सिंह, लवकुश, अमित, सुजीत, रामनिवास, रामनरेश कनौजिया, रामजी, सतीश सिंह, देवेश आदि को सम्मिलित किया गया.

पुलिस की जांच में पता चला कि गौरी का फेसबुक एकाउंट था, साथ ही वह वाट्सऐप पर भी दोस्तों के साथ जुड़ी थी. इसलिए पुलिस टीम ने गौरी के घर वालों से बात करने के बाद सोशल साइटों के उस के एकाउंट की जांच शुरू की. साथ ही पुलिस ने गौरी के घर के आसपास लगे सीसीटीवी के फुटेज देखने शुरू किए. फुटेज में पुलिस को लाटूश रोड पर बने होटल पीसी इंटरनेशनल के नजदीक एक युवक स्प्लेंडर बाइक के पास खड़ा दिखा. वह हेलमेट लगाए था.  हेलमेट लगा होने की वजह से उस का चेहरा नहीं पहचाना जा सका. पुलिस को सीसीटीवी कैमरे में बाइक का पूरा नंबर साफ नहीं दिख रहा था. इस के बाद पुलिस ने टेक्नोलौजी का सहारा ले कर उस नंबर की खोजबीन करनी शुरू की तो वह नंबर यूपी32सी आर 5638 दिखा.

पुलिस ने परिवहन कार्यालय से इस नंबर की तहकीकात करनी शुरू की तो पता चला कि यह बाइक शशांक नामक व्यक्ति के नाम पर दर्ज हुई थी. इस में शशांक का पता अधूरा निकला. इस से पुलिस के लिए जांच का यह रास्ता बंद हो गया. पुलिस के पास ऐसा कोई क्लू नहीं था, जिस से जांच आगे बढ़ सके. इस तरह यह केस पुलिस के लिए एक चुनौती बन गया था. गौरी की जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में बताया गया कि उस की लाश किसी दांतेदार औजार से काटी गई थी. पुलिस मान कर चल रही थी कि वह दांतेदार औजार आरी रही होगी. वह आरी किस दुकान से किस व्यक्ति द्वारा खरीदी गई थी? यह जानने के लिए एसएसपी ने कई टीमें बना कर हार्डवेयर की दुकानों पर भेजीं, जिस से यह पता चल सके कि आरी किस आदमी ने खरीदी थी.

हत्या के 7 दिन तक पुलिस तहकीकात करती रहीं. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. 7 फरवरी को किसी तरह पुलिस को शशांक के घर का पता मिल गया. उस का घर लखनऊ के तेलीबाग इलाके में था. उस की जूट के बैग की दुकान थी. चूंकि गौरी की लाश जूट के बैगों में मिली थी, इसलिए पुलिस का शक शशांक की तरफ गया. रात करीब 12 बजे पुलिस उस के घर के नजदीक पहुंच गई. उस के घर के पास ही पुलिस को वह स्प्लेंडर बाइक दिखी जो सीसीटीवी फुटेज में दिखी थी. इस से पुलिस का शक और मजबूत हो गया.

पुलिस ने शशांक को उस के घर से अपनी हिरासत में ले लिया. उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह अपनी बाइक अपने पड़ोसी हिमांशु प्रजापति को बेच चुका है. हिमांशु का घर उस के घर के पास में ही था. तब पुलिस ने हिमांशु को उस के घर से पूछताछ के लिए उठा लिया और शशांक को बेकुसूर मान कर छोड़ दिया. थाने ला कर जब हिमांशु से पूछताछ की गई तो गौरी हत्याकांड का परदा उठने में देर नहीं लगी. उस ने स्वीकार कर लिया कि गौरी की हत्या उसी ने की थी. गौरी की हत्या करने से ले कर उस की लाश के टुकड़े करने की उस ने जो कहानी बताई, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली निकली.

19 वर्षीय हिमांशु एक मध्यमवर्गीय परिवार से था. उस के पिता रामप्रकाश प्रजापति प्राइवेट नौकरी करते थे. पहली फरवरी, 2015 को जब उस के घर वाले अपने रिश्तेदार की शादी में गए थे, उसी दिन उस ने अपनी दोस्त गौरी को बातचीत के लिए अपने घर आने को राजी कर लिया. गौरी से फोन पर बात होने के बाद वह बाइक से उसे लेने पहुंच गया. गौरी को अपनी बाइक पर बैठा कर वह लखनऊ के तेलीबाग स्थित अपने घर ले आया. घर पहुंच कर उस ने गौरी को खाना खिलाया. इस दौरान दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई. हिमांशु गौरी को अपने मन की बात बताने को बेचैन था. दूसरी ओर गौरी हिमांशु की बातों का जवाब देते हुए अपने फोन पर वाट्सएप और फेसबुक चलाने में व्यस्त थी. यह बात हिमांशु को अखर रही थी. उस ने कई बार गौरी को मना किया. जब गौरी नहीं मानी तो हिमांशु ने कहा, ‘‘गौरी, तुम्हारे फोन में ऐसा क्या है, जो तुम इस में खो गई हो और मेरी बात नहीं सुन रही?’’

‘‘कुछ नहीं, अपने फ्रैंड्स के साथ बातचीत कर रही हूं. साथ ही तुम्हारी बातें भी सुन रही हूं.’’ गौरी ने यह बात बहुत ही रूखे मिजाज में कही. इस के बाद हिमांशु को शक होने लगा. उस ने गौरी से कहा, ‘‘गौरी, तुम मुझे अपना फोन दिखाओ. मैं देखना चाहता हूं कि तुम किस से बातें कर रही हो?’’

‘‘देखो, यह गलत बात है. मैं अपना फोन तुम्हें क्यों दिखाऊं?’’ गौरी ने जब फोन देने से मना किया तो हिमांशु को गुस्सा आ गया. उस ने उस का फोन हाथ से ले लिया और प्यार से उस का पासवर्ड हासिल कर लिया.

हिमांशु ने गौरी के फेसबुक और वाट्सएप एकाउंट खोल कर देखे तो वह चौंक गया. उसे पता चला कि गौरी अपने दूसरे दोस्तों के साथ आपत्तिजनक बातें करती है. इतना ही नहीं, इसी तरह के फोटो भी एकदूसरे को शेयर करती है. इस बात पर हिमांशु को गुस्सा आ गया. गौरी उस से अपना फोन छीनने लगी. छीनाझपटी में हिमांशु से गौरी के गरदन की नस दब गई और वह मर गई. उस समय शाम के करीब 4 बज रहे थे. वह गौरी को घर के अंदर बंद कर के उस का फोन अपने साथ ले कर बाहर चला गया.  3-4 घंटे बाद वह घर वापस आया. इस बीच जब गौरी के घर वालों का फोन आया तो एक बार उस ने गौरी की तबीयत खराब होने की बात कही. इस के बाद उस ने गौरी का फोन बंद कर दिया.

वह गौरी की लाश को ठिकाने लगाने की सोचने लगा. अकेले ही उस की लाश उठा कर ठिकाने लगाना उस के बूते में नहीं था इसलिए उस ने तय कर लिया कि वह उस की लाश के टुकड़े कर के बाहर कहीं फेंक आएगा. फिर से कमरा बंद कर के वह अपने दोस्त अनुज के पास चला गया. दोनों ने मिल कर शराब पी.  शराब पीते समय उस ने अनुज को गौरी की हत्या करने की बात बता दी थी. दोस्त के साथ शराब पीने के बाद हिमांशु ने तेलीबाग के ही काका मार्केट जा कर एक दुकान से लकड़ी काटने की आरी और दूसरी दुकान से जूट के 3 बैग खरीदे. ये सामान ले कर वह घर लौट आया और आरी से गौरी के शरीर के कई टुकड़े कर दिए. खून नाली के रास्ते बह कर बाहर न जाए, इस के लिए उस ने उस के कपड़े नाली के मुहाने पर लगा दिए.

लाश के 3 टुकड़े कर के उस ने जूट के 3 बैगों में भर लिए. आधी रात के करीब वह उन बैगों को शहीदपथ के आसपास फेंक आया. गौरी के कपड़े भी उस ने एक बैग में भर दिए थे. लाश ठिकाने लगा कर उस ने घर की सफाई की. अगले दिन पुलिस ने लाश के टुकडे़   बरामद कर लिए. काफी खोजबीन के बाद भी पुलिस जांच में जब हिमांशु का कहीं नाम नहीं आया तो हिमांशु खुश खुश हुआ कि वह पुलिस को चकमा देने में सफल हो गया है. लेकिन पुलिस ने हिमांशु को खोज कर गौरी हत्याकांड का खुलासा कर दिया. हिमांशु ने अपने दोस्त अनुज को गौरी की हत्या करने की बात बताई थी. इस के बावजूद भी उस ने इस बात की जानकारी पुलिस को नहीं दी. इसी कारण पुलिस ने अनुज को भी गौरी हत्याकांड में शामिल मानते हुए गिरफ्तार कर लिया.

उन की निशानदेही पर पुलिस ने गौरी की लाश को काटने में प्रयुक्त हुई आरी, हिमांशु की बाइक, हेलमेट, खून से सने कपड़े आदि बरामद कर लिए. गौरी हत्याकांड लखनऊ पुलिस के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था. इसलिए अभियुक्तों की गिरफ्तारी होने और केस का खुलासा होने पर पुलिस लाइन में एक प्रैस कौन्फ्रैंस का आयोजन किया गया जिस में डीजीपी ए.के. जैन के अलावा जिला स्तर के पुलिस अधिकारी मौजूद थे. वहां गौरी के मातापिता को भी बुलाया गया. अभियुक्त हिमांशु और अनुज ने गौरी की हत्या की पूरी कहानी मीडिया के सामने बयान की.

दूसरी तरफ गौरी के परिजन पुलिस के खुलासे से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थे. उन का कहना था कि पुलिस तुरंत काररवाई करती तो उन की बेटी की जान बच सकती थी. इसी बीच प्रदेश के डीजीपी ए.के. जैन ने कहा कि हिमांशु के खिलाफ पूरे सुबूत मिले हैं, जो कोर्ट में उसे सजा दिलाने में सफल होंगे. पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस ने हिमांशु पर हत्या कर लाश ठिकाने लगाने की कोशिश करने की धाराओं के साथसाथ उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी निरुद्ध कर दिया. इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को पुलिस विभाग की तरफ से 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की गई है. Lucknow Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories Love : प्रेम में दुश्मन बनते भाई

Hindi Stories Love : लड़की के प्यार का जुनून और भाई की जिद में भाईबहन का प्यार और खून का रिश्ता दुश्मनी में बदल रहा है, जो कभीकभी जान पर भी भारी पड़ जाता है. वे एक ही छत के नीचे साथसाथ रह कर, खेलकूद कर, पढ़लिख कर बड़े होते हैं, इस के

बावजूद उम्र के नाजुक पायदान पर कदम पड़ने पर जब कोई लड़की दिल की उमंगों से अपने अंदाज में बेहतर जिंदगी की ख्वाहिश में मोहब्बत का तराना गुनगुनाती है तो उस के खून के रिश्ते का भाई ही उस के प्यार के बीच दीवार बन कर खड़ा हो जाता है. लड़की की मोहब्बत के जुनून और भाई की जिद में प्यार और खून का रिश्ता दुश्मनी में बदल जाता है. यही दुश्मनी एक दिन जान पर भारी पड़ जाती है और सगे भाई ही बहनों का कत्ल कर देते हैं.

मोहब्बत और कत्ल का यह सिलसिला चलता ही रहता है. कानून तो अपना काम करता है, लेकिन समाज खामोशी से देखता रहता है. ऐसा करने वाले यूं तो सलाखों के पीछे होते हैं, लेकिन उन्हें इस का जरा भी मलाल नहीं होता. बात अगर गैरमजहबी युवक से मोहब्बत की हो तो अंजाम और भी दिल दहला देने वाले होते हैं. हापुड़ जनपद के स्याना रोड निवासी इंसाफ अली की 20 साल की बेटी दानिश्ता ने जमाने में देखा, फिल्मों में देखा और कानून की यह बात भी पता चली कि लड़कालड़की बालिग हो जाएं तो अपनी मरजी से जिंदगी जीने के लिए आजाद हैं.

वक्त की बदलती चाल ने दानिश्ता के दिलोदिमाग पर छाप छोड़ी तो वह दूसरे मजहब के सोनू के साथ मोहब्बत का तराना गुनगुनाने लगी. उम्र की दहलीज पर उस ने अपनों से नाफरमानी कर दी. मोहब्बत का जुनून ही था कि उस ने अंजाम की परवाह किए बगैर खूबसूरत भविष्य का ख्वाब संजोया. लेकिन उस के ख्वाबों के महल तब बिखर गए, जब न सिर्फ उस के सगे भाई खलनायक बन कर उभरे, बल्कि परिवार भी उस के खिलाफ हो गया.

29 नवंबर, 2014 की सुबह का वक्त था. दानिश्ता का प्रेमी सोनू किसी काम से जा रहा था कि दानिश्ता के भाइयों तालिब, आसिफ और तसलीम ने उसे घेर लिया और उस के साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी. दानिश्ता ने अपनी मोहब्बत को दम तोड़ते देखा तो वह बचाव के लिए आगे बढ़ी और घर वालों से भिड़ गई. इस पर दानिश्ता और उस के प्रेमी सोनू को धारदार हथियारों से बेरहमी से काट कर मौत की नींद सुला दिया गया.

भाइयों में गुस्सा इस कदर था कि कोई उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर सका. हत्याओं में भाइयों का साथ उन के दोस्तों और मां नूरजहां खातून ने भी दिया. हत्याएं करने के बाद तालिब और नूरजहां खुद ही थाने पहुंच गए और आत्मसमर्पण कर दिया. दानिश्ता और सोनू का प्रेमसंबंध काफी समय से चल रहा था. उन के प्रेमसंबंधों की जानकारी दानिश्ता के घर वालों को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह गैरमजहबी लड़के से कोई रिश्ता न रखे. लेकिन प्यार करने वाले ऐसे किसी बंधन को कहां मानते हैं. वे तो जातिधर्म, ऊंचीनीच की दीवारों को गिराने का दम भरते हैं. प्यार के लिए वे जमाने से भी टकराने को तैयार रहते हैं. वे जानते हैं कि प्रेम में ऐसी बाधाएं आएंगी और उन्हें उन का सामना करना पड़ेगा.

लेकिन उन्हें यह उम्मीद होती है कि एक दिन जीत उन के प्यार की ही होगी. यह बात अलग है कि बड़े शहरों की बात छोड़ दें तो ग्रामीण क्षेत्रों में हर कोई ऐसा खुशनसीब नहीं होता. दानिश्ता और सोनू की सोच भी यही थी कि एक दिन उन का प्यार जीत जाएगा. वे विवाह कर के जीवन भर साथ रहने का निर्णय ले चुके थे. जबकि दानिश्ता के भाई इस के लिए तैयार नहीं थे. वह जब भी सोनू से विवाह की बात घर में करती, उस के साथ मारपीट की जाती. दानिश्ता और सोनू दोनों ही समझ गए कि घर वालों की मरजी से वे कभी शादी नहीं कर पाएंगे.

दोनों ने कानून का सहारा लिया और गुपचुप कोर्टमैरिज कर ली. यह बात दोनों ने ही घर वालों से छिपाए रखी और अपनेअपने घर यह सोच कर रहते रहे कि अच्छे वक्त पर घर वालों को मना कर एक हो जाएंगे. जब इस बात का खुलासा हुआ तो हंगामा मच गया. दानिश्ता की शामत आ गई. इस मुद्दे पर हत्या से एक दिन पहले स्थानीय पंचायत भी हुई. दानिश्ता के भाइयों ने ऐलान कर दिया कि वे बहन की मोहब्बत को कुबूल नहीं करेंगे. पंचायत में कथित समाज के ठेकेदारों का भी फरमान था कि दोनों हमेशा अलग ही रहेंगे. जबकि यह फरमान न दानिश्ता को मंजूर था और न सोनू को. नतीजतन मौका पा कर उन की हत्या कर दी गई.

पुलिस गिरफ्त में हत्यारोपी भाई का कहना था, ‘‘बिरादरी में हमारी बदनामी हो रही थी. हमारा घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. अब घर वाले समाज में सिर उठा कर जी सकेंगे, क्योंकि हम ने अपनी इज्जत बचा ली है.’’

नूरजहां का बयान भी कुछ ऐसा ही था. उसे भी बेटी की मौत का कोई अफसोस नहीं था. इस दोहरे हत्याकांड के बाद पुलिस ने ऐसे प्रेमी युगलों की सूची बनाई, जिन्होंने अपनी मरजी से विवाह किए थे. पुलिस अधीक्षक आर.पी. पांडे ने कहा, ‘‘हम प्रेमियों को सुरक्षा देने के लिए तत्पर हैं. हमारी कोशिश है कि घृणित कृत्य करने वालों को सख्त सजा मिले.’’

औनर किलिंग की यह पहली वारदात नहीं थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अकसर भाईबहन की मोहब्बत के दुश्मन बन जाते हैं. हैरानी की बात यह है कि अपनों के खून से हाथ रंगने वालों को अपने किए पर अफसोस नहीं होता. शान के लिए लड़कियों और उन के प्रेमियों की हत्या कर दी जाती है. मेरठ की रहने वाली फुरकानी ने भी गैरमजहब के लड़के रविंद्र से मोहब्बत करने का गुनाह किया था. प्रेमसंबंध की जानकारी होने पर जम कर हंगामा हुआ. उस के इस कदम से घर वाले गुस्से में आ गए. दूसरे संप्रदाय के लड़के ने उन की बेटी को दुलहन बना लिया था. उस ने प्रेमी के लिए धर्म ही नहीं, नाम भी बदल लिया था. उस ने अपना नाम निशू रख लिया था.

फुरकानी के घर वालों ने इस बात को आन का सवाल बना लिया. टकराव को टालने के लिए दोनों शहर जा कर रहने लगे. काफी दिनों बाद वे दोनों गांव आ कर रहने लगे तो फुरकानी के घर वाले खफा हो गए. 25 नवंबर को फुरकानी के भाई निजाम और फुरकान उस के घर पहुंचे और उस के सिर में गोली मार कर फरार हो गए.  समय पर उपचार मिलने से निशू की जान तो बच गई, लेकिन उस की एक आंख हमेशा के लिए चली गई. उस के भाइयों को भी गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन निशू के भाई निजाम को उस के जिंदा बच जाने का बहुत अफसोस है.

उस का कहना है कि अगर उसे पता होता कि बहन जिंदा बच जाएगी तो वह उसे एक और गोली मार देता. जब तक वह मरेगी नहीं, उसे चैन नहीं मिलेगा. गैरसमुदाय के लड़के से शादी कर के उस ने उस के परिवार की बहुत बदनामी कराई है, इसलिए उस ने उसे गोली मारी थी. मुजफ्फरनगर के लोई गांव के रहने वाले इलियास की बेटी शाइमा का 2 साल से गांव के ही एक लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था. जब घर वालों को इस बात की खबर हुई तो उन्होंने उस पर बंदिशें लगा दीं. शाइमा लड़के से विवाह करने की जिद पर अड़ गई. बंदिशों को तोड़ कर एक दिन वह घर से भाग गई. शाइमा की इस हरकत से घर वाले आगबबूला हो गए.

कुछ दिनों बाद शाइमा को उन्होंने ढूंढ निकाला और घर ला कर उस के भाई इंतजार ने उसे गोली मार दी. अमित को भी अपनी बहन मोना का प्यार मंजूर नहीं था. वह किसी लड़के से मोबाइल फोन पर बातें किया करती थी. अमित इस बात से बेहद नाराज रहता था. उसे लगता था कि इस से एक दिन परिवार की इज्जत चली जाएगी. एक दिन उस ने बहन को फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो उस ने उसे गोली मार दी. मोना किसी तरह बच गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक परिवेश ऐसा है, जहां प्रेमिल रिश्तों का खुलेआम विरोध है. इस के बावजूद चोरीछिपे रिश्ते पनपते हैं. तेजी से होते शिक्षा और आर्थिक विकास के बीच यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है.

प्रेमसंबंधों को आन से जोड़ कर देखा जाता है. घर की बेटी प्रेम संबंध में अपनी मरजी से विवाह जैसा कदम उठाए, यह किसी भी दशा में मंजूर नहीं होता और अपने ही मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. समाज की टीका टिप्पणियां आग में घी डालने का काम करती हैं. जिस परिवार की लड़की को ले कर इस तरह के मामले सामने आते हैं, उन्हें तरहतरह के ताने दिए जाते हैं. ऐसे में नौजवानों को यह बरदाश्त नहीं होता. मानसिकता ऐसी होती है कि उन्हें लगता है कि हत्या कर देने से उन की इज्जत बच जाएगी और वह शान की जिंदगी जी सकेंगे.

ऐसा करने वाले प्रेम करने वाली लड़की को अपने परिवार के लिए कलंक मानते हैं. कातिल मानते हैं कि सामाजिक तानों व बेइज्जती से बचने के लिए अब यही करना आवश्यक हो गया है. दुखद यह है कि ऐसा कर के भी उन की इज्जत नहीं बचती. समाज भी खुले तौर पर ऐसी हत्याओं का विरोध नहीं करता. कानून का काम लाशों के पंचनामे और हत्यारों की गिरफ्तारी तक सिमट कर रह जाता है. Hindi Stories Love

Stories in Hindi Love : प्यार नहीं, स्वार्थ का रिश्ता

Stories in Hindi Love : पत्नी की कमाई पर पलने वाले पतियों की सोच इतनी गंदी क्यों हो जाती है कि वे उसी के दुश्मन बन जाते हैं. अपनी बैंक मैनेजर पत्नी को मार कर आखिर पवन को क्या मिला? क्या इस मामले में रितु ने प्रेम के नाम पर पवन से शादी कर के बड़ी भूल नहीं की थी?

पवन और रितु की मुलाकात तब हुई थी, जब 2006 में दोनों कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पढ़ रहे थे. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे थे. पवन रितु का हर तरह से ख्याल रखता था. जब कभी घर जाने के लिए कोई साधन नहीं होता था तो वह उसे उस के घर तक छोड़ने जाता था. रितु पढ़ाई में तेज थी, उस ने बैंकिंग की परीक्षा दी तो पास हो गई. फलस्वरूप जल्दी ही उसे नैनीताल बैंक में सहायक प्रबंधक के पद पर नौकरी मिल गई. रितु सेक्टर ए, एलडीए कालोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में अपने पिता के साथ रहती थी. कुछ समय पहले उस की मां सुषमा का देहांत हो चुका था, जिस की वजह से उस के पिता श्यामबिहारी श्रीवास्तव परेशान रहते थे.

रितु अपनी बहनों में सब से छोटी थी. उस की बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी और वह अपने पति के साथ लखनऊ के ही मडि़यांव इलाके रहती थी. रितु और पवन के प्यार के बारे में हालांकि सब को पता था. लेकिन उस के पिता श्यामबिहारी चाहते थे कि बेटी ऐसे आदमी से शादी करे, जो समाज में उस की तरह ही अपनी हैसियत रखता हो. पवन किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था, लेकिन काफी भागदौड़ के बाद भी उसे प्राइवेट नौकरी ही मिल पाई थी.

श्यामबिहारी बूढ़े हो चले थे, उन की तबीयत भी खराब रहती थी. पत्नी की मौत के बाद वह बेटी रितु और बेटे साहिल को ले कर चिंतित रहते थे. वैसे उन्हें पूरा भरोसा था कि रितु हर हाल में अपने भाई का ख्याल रखेगी. बीमारी के चलते ही सन 2009 में उन की मौत हो गई. पिता की मौत के बाद रितु पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी आ गई. ऐसे में अपने लिए कुछ सोचना बहुत मुश्किल था. उस का छोटा भाई साहिल उस के साथ ही रहता था. रितु उसे भाई नहीं, बल्कि बेटे की तरह पाल रही थी. रितु के पिता की मौत के बाद पवन ने उस पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया तो रितु ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘पवन इस बारे में सोचती तो मैं भी हूं, लेकिन साहिल की चिंता है. वह हाईस्कूल में पहुंच जाए तो मैं उसे आगे की पढ़ाई के लिए हौस्टल भेज दूंगी और तुम से शादी कर लूंगी.’’

‘‘देखो रितु, प्राइवेट ही सही, मुझे भी नौकरी मिल गई है. अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. अब नहीं तो क्या हम बुढ़ापे में शादी करेंगे?’’

‘‘ठीक है बाबा, इस बारे में मैं जल्द ही कोई फैसला कर लूंगी.’’ रितु ने पवन को टालने के लिए शादी की हामी भर दी.

सोचविचार कर रितु ने अपनी बहन और भाई ने पवन के साथ शादी करने के बारे में बात की. रीतू के भाई और बहन दोनों का मानना था कि न तो पवन अच्छे स्वभाव का है और न ही वह कहीं अच्छी नौकरी करता है. दरअसल उन दोनों की नजर में पवन में सब से बड़ी बुराई यह थी कि वह शराब पीने का आदी था. भाईबहन की बात सुन कर रितू बोली, ‘‘तुम लोगों की बात अपनी जगह सही है. मैं उस की इस बुराई के बारे में जानती हूं. पर क्या करूं, समझ नहीं पा रही हूं? उस के साथ इतने दिनों की दोस्ती है, उसे भूल कर किसी और से शादी करना मुझे थोड़ा मुश्किल लग रहा है.’’

‘‘दीदी, आप ठीक कह रही हैं, पर हमारा मन इस के लिए तैयार नहीं है.’’ भाईबहन ने दो टूक कहा. इस के बावजूद रितु का खुद का मन शादी टालने का नहीं हो रहा था.

इसी के चलते उस ने अपने परिवार की मरजी के खिलाफ जा कर नवंबर, 2013 में पवन से शादी कर ली. शादी के 2-3 महीने ठीक से गुजरे. इस बीच रितु अपनी ससुराल के बजाय अपने मायके में ही रहती रही. पवन को इस बात से कोई शिकायत नहीं थी. रितु के पास मायके की काफी जायदाद तो थी ही, साथ ही वह बैंक में अच्छे पद पर नौकरी भी करती थी. घर में सुखसुविधा के सारे साधन मौजूद थे. उसे केवल चिंता थी तो अपने छोटे भाई की. एक दिन पवन घर पहुंचा तो बहुत उदास था. रितु ने उसे देखा तो पूछा, ‘‘क्या बात है, उदास क्यों हो?’’

‘‘रितु, आज मेरी कंपनी ने कई लोगों को नौकरी से निकाल दिया है, मेरी भी नौकरी चली गई.’’ पवन ने दुखी हो कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, प्राइवेट नौकरियों में तो यह होता ही रहता है. कहीं और नौकरी तलाश करो.’’ रितु ने पवन को समझाया. पवन को अपना खर्च चलाने के लिए पैसों की ज्यादा जरूरत नहीं थी, क्योंकि उस की पत्नी तो नौकरी कर ही रही थी. उसे पैसों की जरूरत केवल अपने शौक पूरे करने के लिए थी. उसे यह पता था कि रितु को सब से अधिक नफरत उस के शराब पीने से है. इस के लिए वह उसे पैसा देने को तैयार नहीं थी. उस की बात सही भी थी. निठल्ले बैठे पति को शराब के लिए कौन पत्नी अपनी कमाई का पैसा देगी?

इसी बात को ले कर दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. कहासुनी से शुरू होने वाले विवाद धीरेधीरे लड़ाईझगड़े तक पहुंचने लगे. रितु जब भी पवन को समझाने की कोशिश करती, वह उस की बात को गलत तरह से लेता. उसे लगने लगा कि रितु यह सब अपनी नौकरी की धौंस दिखाने के लिए करती है. रितु ने 35 लाख में अपने पिता की एक प्रौपर्टी बेच दी थी ताकि कोई नई जमीन खरीद कर मकान बनवा सके. दरअसल उसे लग रहा था कि मकान बन जाएगा तो वह ठीक से रह सकेगी. इस के लिए उस ने मकान बनाने के लिए एक जमीन पसंद भी कर ली थी.

उस जमीन को खरीदने के लिए 2 लाख रुपए एडवांस देने थे. उस ने यह रकम पवन को दे दी, ताकि वह प्रौपर्टी डीलर को दे दे. लेकिन पवन ने वे पैसे प्रौपर्टी डीलर को देने के बजाय अपने भाई को दे दिए. यह बात जब रितु को पता चली तो वह गुस्से में बोली, ‘‘पवन, पैसे की कीमत को समझो. पैसा डाल पर नहीं लगता कि हाथ बढ़ाया और तोड़ लिया. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पैसा कमाने के लिए. हमें नए मकान के लिए पैसे की जरूरत है और तुम पैसे कहीं और दे आए.’’

लेकिन पवन ने रितु की बात को गंभीरता से न ले कर कड़वाहट से जवाब दिया, ‘‘तुम पैसे को ले कर बहुत झगड़ा करने लगी हो. मैं नौकरी नहीं करता, इसलिए तुम मुझे ताना मारती हो. तुम्हें पैसे का बहुत घमंड हो गया है.’’

‘‘तुम से बात करना ही बेकार है, तुम किसी बात को समझना ही नहीं चाहते.’’ कह कर रितु बैंक चली गई.

रितु ने बाकी बची 33 लाख की रकम अपने बैंक खाते में जमा कर दी थी. इस खाते में उस ने अपने भाई साहिल को नौमिनी बनाया था न कि पति को. इस के बाद पैसे और जायदाद को ले कर पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा और बढ़ गया. प्यारमोहब्बत के बीच पैसा विलेन बन चुका था. इस बीच रितु 6 माह की गर्भवती हो गई थी. इस से वह काफी खुश थी. उसे लग रहा था कि बच्चे के आ जाने के बाद शायद पवन में बदलाव आ जाए.

19 दिसंबर, 2014 की बात है. नादान महल रोड, लखनऊ स्थित नैनीताल बैंक की शाखा में बैंक के लौकर नहीं खुल पाए थे. वजह यह थी कि बैंक के लौकर की चाबी सहायक प्रबंधक रितु के पास रहती थी. जबकि वह बैंक नहीं आई थी. बैंक के मैनेजर दयाशंकर मलकानी ने रितु के मोबाइल फोन पर संपर्क किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है. दयाशंकर ने परेशान हो कर चौक थाने को सूचना दी. इसी बीच रितु के पति पवन का फोन नंबर मिल गया तो उसे फोन किया गया. बातचीत में उस ने बताया कि रितु कल से लापता है. इस जानकारी के बाद थाना चौक पुलिस ने यह बात कैंट थाने की पुलिस को बताई. पुलिस ने पवन के घर जा कर वहां बाहर खड़ी इंडिका कार की तलाशी ली तो उस में बैंक लौकर की चाबियां मिल गईं.

इस के बाद कैंट थाने की पुलिस रितु को तलाशने में जुट गई. एक महिला बैंक अधिकारी के गायब होने का मामला था. पूरे शहर में खलबली मच गई. लखनऊ में नए एसएसपी यशस्वी यादव ने पद संभाला था. तभी पुलिस के लिए यह घटना बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ गई थी. एसएसपी के आदेश पर कैंट क्षेत्र की सीओ बबिता सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी पुलिस टीम को रितु का पता लगाने में लगा दिया. इसी बीच एसओ कैंट सुरेश यादव को सूचना मिली कि कैंट क्षेत्र स्थित फायरिंग रेंज के पास झडि़यों में किसी महिला का शव पड़ा है. सूचना मिलते ही सुरेश यादव अपनी टीम के साथ वहां पहुंच गए. सूचना सही थी. लाश की शिनाख्त होने में भी देर नहीं लगी.

लाश बैंक मैनेजर रितु की ही थी. घटनास्थल पर पुलिस को कोई भी ऐसा सुबूत नहीं मिला, जिस से यह लगता कि रितु के साथ कोई जोरजबरदस्ती की गई थी. उस के शरीर के कपड़े भी सही सलामत थे. किसी प्रकार की कोई लूट भी नहीं हुई थी, क्योंकि मृतका के कानों के आभूषण भी सुरक्षित थे और हाथों की चूडि़यां भी. अलबत्ता उस का पर्स और मोबाइल जरूर गायब था. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि इस घटना में रितु का कोई अपना ही शामिल हो सकता है. पुलिस ने इस बारे में पहले रितु के भाई साहिल से बात की और फिर उस के पति पवन से. दोनों की बातों से पुलिस का शक पवन पर गहरा गया. पुलिस ने काल डिटेल्स हासिल कर के रितु के फोन नंबर और पवन के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि रितु से अंतिम बार पवन ने ही बात की थी.

इस के बाद पुलिस ने पवन को हिरासत में ले कर पूछताछ की. इस पूछताछ में जो बात सामने आई, वह यह थी कि रितु और पवन के बीच दौलत विलेन बन गई थी. पैसे के लिए पवन इतना अंधा हो गया था कि रितु को मौत के घाट उतारते वक्त उसे उस की कोख में पल रहे अपने बच्चे का भी खयाल नहीं आया. 18 दिसंबर, 2014 को रितु अपनी बैंक की ड्यूटी पूरी करने के बाद औटो से चारबाग पहुंची. वहां से उसे दूसरा औटो ले कर अपने घर पहुंचना था. रितु जैसे ही औटो से उतरी, उस ने देखा कि पवन अपने बहनोई की कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. यह देख कर उस ने चौंक कर पूछा, ‘‘तुम यहां, यह कार क्यों लाए?’’

‘‘मैं अपने बीमार भाई से मिलने देहरादून जा रहा हूं, आज ही रात को. उन की तबीयत ज्यादा खराब है.’’ पवन ने कहा.

‘‘मुझे लगा कि तुम मुझे लेने आए हो? तुम्हें तो अपने कामों से ही फुरसत नहीं है. तुम जाओ मैं औटो ले कर घर चली जाऊंगी.’’ अभी रितु ने कहा ही था कि उस के मोबाइल पर उस के भाई साहिल का फोन आ गया. वह उस से घर पहुंचने के बारे में पूछ रहा था. भाई से बात करते हुए रितु ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जीजाजी के साथ हूं, अभी थोड़ी देर में आती हूं.’’

उस वक्त शाम के करीब पौने 7 बजे थे. रितु के फोन बंद करते ही पवन बोला, ‘‘ऐसे नाराज मत हो. चलो, पहले कहीं घूम आते हैं. तुम्हारी शिकायत भी दूर हो जाएगी.’’ पवन ने मिन्नत की तो रितु उस की कार में बैठ गई. मानमनुहार कर के रितु को मनाने के बाद पवन कार ले कर शहीद पथ की ओर बढ़ गया. रितु को लगा कि वह उस से झगड़ा खत्म करने के लिए ऐसा कर रहा है. सुलतानपुर रोड पर अर्जुनगंज ओवर ब्रिज के पास पवन ने कार कच्चे रास्ते पर उतार कर खड़ी कर दी और बहाना कर के नीचे उतरा. रितु उस के मन की बात को समझ पाती, उस के पहले ही वह रितु की गरदन में रस्सी का फंदा डाल कर उसे कसने लगा. इस के लिए वह रस्सी पहले ही साथ लाया था.

इस के अलावा उस ने रितु को मारने के लिए उस के सिर पर 3 वार भी किए. इस का नतीजा यह हुआ कि रितु तत्काल मर गई. गर्भवती पत्नी की हत्या करने के बाद पवन ने उस का मोबाइल बंद कर के उस के पर्स में रखा और पर्स वहीं नाले में फेंक दिया. इस के बाद वह कार ले कर सुनसान जगह की तलाश में आगे बढ़ गया. आगे जा कर उस ने फायरिंग रेंज के पास रितु की लाश जंगल में फेंक दी. वापस लौट कर कार उस ने अपने घर के सामने खड़ी कर दी और सोने की कोशिश करने लगा. देर रात तक जब रितु घर नहीं पहुंची तो साहिल ने करीब 8 बजे के बाद उसे फोन करना शुरू किया. रितु का फोन बंद था. इस से परेशान हो कर साहिल ने अपने जीजा पवन को फोन किया. उधर से पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी दीदी को छोड़ कर देहरादून जा रहा हूं. तुम परेशान मत हो.’’

साहिल ने कई बार पवन के मोबाइल पर फोन किया तो उस ने बताया कि वह लखनऊ में ही है. पुलिस ने रितु की लाश मिलने के बाद जब साहिल से पूछताछ की थी तो उस ने यह बात सीओ कैंट बबिता सिंह को बता दी थी. इसी से वह संदेह के दायरे में आया था. इस से बबिता सिंह को लगा कि जब पवन देहरादून गया नहीं तो उस ने साहिल से झूठ क्यों बोला? दूसरे पवन के फोन की लोकेशन रितु के फोन के साथ मिली थी. संदेह हुआ तो पुलिस ने पवन को गिरफ्तार कर के उस से सख्ती से पूछताछ की. इस से पवन टूट गया और उस ने पुलिस को रितु की हत्या की पूरी जानकारी दे दी थी. शुरू में पवन रितु की हत्या को आत्महत्या साबित करना चाहता था. इस के लिए उस ने एक सुसाइड नोट भी तैयार किया था. लेकिन वह ऐसा कर नहीं सका.

दरअसल पवन के मन में गुस्सा इस बात को ले कर था कि रितु उस से झगड़ा करती है. उस ने अपने बैंक खाते में भी उस की जगह पर भाई को नौमिनी बनाया था. रितु और पवन के बीच मोहब्बत का दौर जरूर लंबा खिंचा, पर शादी के कुछ दिनों के बाद ही उन के बीच अनबन शुरू हो गई थी. इस की वजह थी पवन का नशा करना. जिस समय उस ने रितु का कत्ल किया था, उस समय भी उस ने शराब पी रखी थी. इसीलिए वह यह भी नहीं समझ पाया कि वह केवल अपनी पत्नी की ही हत्या नहीं कर रहा है, बल्कि उस की कोख में पल रहे अपने बच्चे को भी मार रहा है. Stories in Hindi Love

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Crime Stories : कत्ल एक दिलदार का

Crime Stories : कबड्डी खेलते समय नासिर ने चौधरी आफताब की जो बेइज्जती की थी, उस का बदला लेने के लिए उस नेहैदर अली के साथ मिल कर नासिर के साथ ऐसा क्या किया कि उसे और हैदर अली को पछताना पड़ा. उन दिनों मैं जिला छंग के एक देहाती थाने में तैनात था. वह जगह दरिया के करीब थी. मई का महीना होने की वजह से अच्छीभली गरमी पड़ रही थी. अचानक एक दिन पास के गांव से एक वारदात की खबर आई. कांस्टेबल सिकंदर अली ने बताया कि गुलाबपुर में एक गबरू जवान का बड़ी बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया है, जिस की लाश खेतों में पड़ी है. गुलाबपुर मेरे थाने से करीब एक मील दूर था.

वहां से फैय्याज और यूनुस खबर ले कर आए थे. वे दोनों खबर दे कर वापस जा चुके थे. मैं ने पूछा, ‘‘मरने वाला कौन है?’’

‘‘उस का नाम नासिर है, वह कबड्डी का बहुत अच्छा और माहिर खिलाड़ी था.’’ सिकंदर अली ने बताया.

मैं 2 सिपाहियों के साथ गुलाबपुर रवाना हो गया. हमारे घोड़े खेतों के बीच आड़ीतिरछी पगडंडी पर चल रहे थे. जिस खेत में लाश पड़ी थी, वह गांव से एक फर्लांग के फासले पर था. कुछ लोग हमें वहां तक ले गए. वहां एक अधूरा बना कमरा था, न दीवारें न छत. जरूर कभी वहां कोई इमारत रही होगी. नासिर की लाश कमरे के सामने पड़ी थी. लाश के पास 8-9 लोग खड़े थे, जो हमें देख कर पीछे हट गए थे. मैं उकड़ूं बैठ कर बारीकी से लाश की जांच करने लगा. बेशक वह एक खूबसूरत गबरू जवान था. उस की उम्र 23-24 साल रही होगी. वह मजबूत और पहलवानी बदन का मालिक था, रंग गोरा और बाल घुंघराले.

लाश देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस पर तेजधार हथियार या छुरे से हमला हुआ होगा. मारने वाले एक से ज्यादा लोग रहे होंगे. उस के हाथों के जख्म देख कर लगता था कि उस ने अपने बचाव की भरपूर कोशिश की थी. नासिर कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, इसलिए गुलाबपुर के लोग उसे गांव की शान समझते थे. लाश पर चादर डाल कर मैं लोगों से पूछताछ करने लगा. नासिर का 60 साल का बाप वहीं था, उस की हालत बड़ी खराब थी, आंखें आंसुओं से भरी हुईं. उस का नाम बशीर था. मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘चाचा, आप फिकर न करो, आप के बेटे का कातिल पकड़ा जाएगा.’’

उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा बेटा तो चला गया. कातिल के पकड़े जाने से मेरा बेटा लौट कर तो नहीं आएगा.’’

बेटे के गम ने उस की सोचनेसमझने की ताकत खत्म कर दी थी. उसे बस एक ही बात याद थी कि उस का जवान बेटा कत्ल हो चुका है. मुझे उस पर बड़ा तरस आया. मैं ने उसे एक जगह बिठा दिया और अपनी काररवाई करने लगा. सब से पहले मैं ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया. वहां मुझे कत्ल का कोई सुराग नहीं मिला. यहां तक कि वह हथियार भी नहीं, जिस से उस का कत्ल किया गया था.n मैं ने वारदात की जगह पर मौजूद लोगों के बयान लिए. लेकिन सिवाय नासिर की तारीफ सुनने के कोई जानकारी नहीं मिली. मैं ने नासिर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मेरे दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि इतनी रात को नासिर इस सुनसान जगह पर क्या कर रहा था. मेरे अंदाज से कत्ल रात को हुआ था. मैं ने मौजूद लोगों से घुमाफिरा कर कई सवाल किए, पर काम की कोई बात पता नहीं चली. मैं ने यूनुस और फैयाज से भी पूछताछ की. पर वे कुछ खास नहीं बता सके. इलियास जिस ने सब से पहले लाश देखी थी, मैं ने उस से भी पूछा, ‘‘इलियास, तुम सुबहसुबह कहां जा रहे थे?’’

‘‘साहबजी, मैं कुम्हार हूं. मैं मिट्टी के बरतन बनाता हूं. मैं रोजाना सुबह मिट्टी लाने के लिए घर से निकलता हूं. मेरा कुत्ता मोती भी मेरे साथ होता है. वह मुझे इस तरफ ले आया, तभी लाश पर मेरी नजर पड़ी. लाश देख कर मैं ने ऊंची आवाज में चीखना शुरू कर दिया. उस वक्त खेतों में लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. कुछ लोग जमा हो गए. मौजूद लोगों से पता चला कि बशीर लोहार के बेटे नासिर का किसी ने कत्ल कर दिया है.’’

बशीर लोहार का घर गांव के बीच में था. उस का छोटा सा परिवार था. घर में नासिर के मांबाप के अलावा एक बहन थी. बशीर ने अपने घर के बरामदे में भट्ठी लगा रखी थी. वहीं पर वह लोहे का काम करता था. जब मैं उस के घर पहुंचा तो वह मुझे घर के अंदर ले गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा बशीर, जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, बहुत अफसोसनाक है. मैं तुम्हारे गम में बराबर का शरीक हूं. मेरी पूरी कोशिश होगी कि जैसे भी हो, कातिल को कानून के हवाले करूं. लेकिन तुम्हें मेरी मदद करनी होगी. हर बात साफसाफ और खुल कर बतानी होगी.’’

उस की बीवी जुबैदा बोल उठी, ‘‘साहब, आप से कुछ भी नहीं छिपाएंगे. हमारी दुनिया तो अंधेरी हो ही गई है, लेकिन जिस जालिम ने मेरे बच्चे को मारा है, उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’’

‘‘आप दोनों को किसी पर शक है?’’

‘‘साहब, हमें किसी पर शक नहीं है. मेरा बेटा तो पूरे गांव की आंख का तारा था. अभी पिछले महीने ही उस ने कबड्डी का टूर्नामेंट जीता था. इस मुकाबले में 4 गांवों की टीमों ने हिस्सा लिया था. गुलाबपुर की टीम में अगर नासिर न होता तो यह जीत नजीराबाद के हिस्से में जाती. सुल्तानपुर और चकब्यासी पहले दौर में आउट हो गए थे. असल मुकाबला गुलाबपुर और नजीराबाद में था. जीतने पर गांव वाले उसे कंधे पर उठाए घूमते रहे. बताइए, मैं किस पर शक करूं?’’ बशीर ने तफ्सील से बताया.

‘‘नासिर कबड्डी का इतना अच्छा खिलाड़ी था, जहां 10 दोस्त थे, वहां एकाध दुश्मन भी हो सकता है.’’ मैं ने कहा.

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं साहब, पर मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है.’’ बशीर ने बेबसी जाहिर की.

‘‘मुझे उस दसवें आदमी की तलाश है, जिस ने नासिर का बेदर्दी से कत्ल किया है. जरूर यह किसी दुश्मन का काम है. हो सकता है, गांव के बाहर का कोई दुश्मन हो?’’ मैं ने कहा.

‘‘बाहर का भी कोई दुश्मन नहीं है साहब.’’ उस की बीवी जुबैदा ने कहा तो मैं सोच में पड़ गया. अचानक बशीर बोल उठा, ‘‘वह तो सारा दिन मेरे साथ काम में लगा रहता था. शाम को अखाड़े में कसरत वगैरह करता था.’’

‘‘यह अखाड़ा कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अखाड़ा ट्यूबवेल के पास है. उस टूटीफूटी इमारत के करीब, जहां यह वारदात हुई.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘मेरे अंदाज से कत्ल देर रात को हुआ है, इतनी रात को वह अखाड़े में क्या कर रहा था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात हमारी भी समझ में नहीं आ रही है.’’ जुबैदा बोली.

‘‘रात को क्या वह रोजाना की तरह समय पर सोया था?’’

‘‘सोया तो रोजाना की तरह ही था.’’ कहतेकहते जुबैदा रुक गई.

‘‘मुझे खुल कर बताओ, क्या बात है?’’ मैं ने कहा तो वह बोली, ‘‘आप हमारे साथ ऊपर छत पर चलिए. आप खुद समझ जाएंगे.’’

हम छत पर पहुंचे तो जुबैदा कहने लगी, ‘‘मैं रोजाना नासिर को उठाने छत पर आती थी और वह 2 पुकार में उठ जाता था. लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. मैं ने आगे बढ़ कर चादर उठाई तो उस के नीचे एक तकिया रखा हुआ था, जिस पर चादर ओढ़ाई हुई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सो रहा है.’’

मैं खामोश खड़ा रहा तो जुबैदा ने कहा, ‘‘इस का मतलब है कि पिछली रात नासिर अपनी मरजी से घर से निकला था. वह नहीं चाहता था कि किसी को उस के जाने के बारे में पता चले.’’ जुबैदा बोली.

‘‘नहीं जुबैदा, ऐसा नहीं है. वह पहले भी जाता रहा होगा, पर सुबह होने से पहले आ जाता होगा. इसलिए तुम्हें पता नहीं चला. तुम्हारा बेटा रात के अंधेरे में कहीं जाता था और जल्द लौट आता होगा, इसलिए तुम्हें खबर नहीं मिल सकी. मुझे तो किसी लड़की का चक्कर लगता है.’’ मैं ने कहा तो वे दोनों बेयकीनी से मुझे देखने लगे, ‘‘लड़की का चक्कर…’’

बशीर ने कहा, ‘‘साहब, नासिर ऐसा लड़का नहीं था. वह तो गुलाबपुर की लड़कियों और औरतों को मांबहनें समझता था. वह कभी किसी की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.’’

‘‘मैं नहीं मान सकता कि लड़की का चक्कर नहीं था. पिछली रात वह किसी लड़की से मुलाकात करने ही खेत में पहुंचा था. अगर आप लोग लड़की का नाम बता दो तो केस जल्द हल हो जाएगा. मैं कातिलों तक पहुंच जाऊंगा, क्योंकि वही लड़की बता सकती है कि खेत में क्या हुआ था?’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जनाब, हम कसम खा कर कह रहे हैं कि हम ऐसी किसी लड़की को नहीं जानते.’’ दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘मैं आप की बात का यकीन करता हूं, पर इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. मैं कहीं न कहीं से इस का सुराग लगा ही लूंगा. आप यह बताएं कि गुलाबपुर में नासिर का सब से करीबी दोस्त कौन है?’’

‘‘जमील से उस की गहरी दोस्ती थी.’’ बशीर ने कहा.

‘‘ठीक है, अब मैं पता कर लूंगा. दोस्त दोस्त का राज जानते हैं. मुझे जमील से मिलना है. तुम उसे यहां बुला लो?’’ मैं ने कहा.

‘‘उस का घर पड़ोस में है, मैं अभी बुलाता हूं.’’ कहते हुए बशीर बाहर निकल गया.

उस ने वापस लौट कर बताया कि जमील 2 दिनों से टोबा टेक सिंह गया हुआ है.

‘‘ठीक है, कल वह वापस आएगा तो उस से पूछ लूंगा. अभी उस के घर वालों से बात कर लेता हूं.’’ मैं ने कहा.

सामने ही उस की परचून की दुकान थी. उस का बाप वहीं मिल गया. मैं ने करीब 15 मिनट तक उस से बात की, पर कोई काम की बात पता नहीं चल सकी. वह भी कबड्डी की वजह से नासिर का बड़ा फैन था. उसे उस की मौत का बहुत गम था. मेरा दिमाग गहरी सोच में था. मुझे पक्का यकीन था कि जरूर लड़की का चक्कर है. जहां लाश मिली थी, वहां एक अधूरा कमरा था. रात में मुलाकात के लिए वह बेहतरीन जगह थी. मुझे ऐसी लड़की की तलाश थी, जो नासिर से मोहब्बत करती थी और नासिर उस के इश्क में पागल था.

वह जगह गुलाबपुर के करीब ही थी, इसलिए लड़की भी वहीं की होनी चाहिए थी. मेरी सोच के हिसाब से कातिल इस राज से वाकिफ था कि लड़की और नासिर वहां छिपछिप कर मिलते हैं. उसे इस बात का भी यकीन रहा होगा कि नासिर वहां जरूर आएगा. निस्संदेह कातिल उन दोनों की मोहब्बत और मिलन से सख्त नाराज रहा होगा. उस ने वक्त और मौका देख कर नासिर को मौत के घाट उतार दिया होगा. मुझे उस लड़की को तलाश करना था.

दोपहर के बाद मैं ने हमीदा को थाने बुलाया. वह कस्बे में घरघर जा कर क्रीमपाउडर और परांदे वगैरह बेचा करती थी. हर घर की लड़कियों को वह खूब जानती थी और कई की राजदार भी थी. पहले भी वह मेरे कई काम कर चुकी थी. मैं उसे कुछ पैसे दे देता था तो वह खुश हो जाती थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘हमीदा, तुम गुलाबपुर के हर घर से वाकिफ हो. मुझे नासिर के बारे में जानकारी चाहिए. तुम जो जानती हो, बताओ.’’

‘‘साहब, वह तो गुलाबपुर का हीरो था. बच्चाबच्चा उस पर जान देता था.’’ उस ने दुखी हो कर कहा.

‘‘मुझे गुलाबपुर की उस हसीना का नाम बताओ, जो उस पर जान देती थी और नासिर भी उस का आशिक रहा हो.’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘ओह, तो कत्ल की इस वारदात का ताल्लुक नासिर की मोहब्बत की कहानी से जुड़ा हुआ है.’’ उस ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘सौ फीसदी, उस के इश्क में ही कत्ल का राज छिपा है.’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

हमीदा कुछ सोचती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सच क्या है, यह तो नहीं कह सकती. पर मैं ने उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि रेशमा से उस का कुछ चक्कर चल रहा था. रेशमा शकूर जुलाहे की बेटी है.’’

मैं ने हमीदा को इनाम दे कर विदा किया. मैं पहले भी उस से मुखबिरी का काम ले चुका था. उस की खबरें पक्की हुआ करती थीं. अगले दिन गरमी कुछ कम थी. मैं खाने और नमाज से फारिग हो कर बैठा था कि जमील अपने बाप के साथ आ गया. मैं ने उस के बाप को वापस भेज कर जमील को सामने बिठा लिया. वह गोराचिट्टा, मजबूत जिस्म का जवान था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जमील, तुम्हें नासिर के साथ हुए हादसे का पता चल गया होगा?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखें भीग गईं. वह दुखी लहजे में बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपना सब से प्यारा दोस्त खो दिया है. पता नहीं किस जालिम ने उसे कत्ल कर दिया.’’

‘‘तुम उस जालिम को सजा दिलवाना चाहते हो?’’

‘‘जरूर, साहब मैं दिल से यही चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी मदद मुझे कातिल तक पहुंचा सकती है. जमील मुझे यकीन है कि बिस्तर पर तकिया रख कर वह पहली बार रात को घर से बाहर नहीं गया होगा. जरूर वह पहले भी जाता रहा होगा. यह खेल काफी दिनों से चल रहा था. तुम उस के दोस्त हो, राजदार हो, तुम्हें सब पता होगा. मैं सारी हकीकत समझ चुका हूं, पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

कुछ देर सोचने के बाद वह बोला, ‘‘आप का अंदाजा सही है, इस मामले में एक लड़की का चक्कर है.’’

‘‘रेशमा नाम है न उस का?’’ मैं ने बात पूरी की तो वह हैरानी से मुझे देखने लगा. फिर बोला, ‘‘साहब, उस का नाम रेशमा ही है. दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे. धीरेधीरे उन की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया था. मैं उन का राजदार था या यूं कहिए मेरी वजह से ही ये मुलाकातें मुमकिन थीं. रेशमा हमारी दुकान पर सामान लेने आती थी. उसे पता था कि मैं कब दुकान पर रहता हूं. मैं ही रेशमा को बताया करता था कि उसे कब खेतों में पहुंचना है. नासिर उस की राह देखेगा, अगर वह आने को हां कह देती थी तो मैं नासिर को बता देता था. फिर वह उस जगह पहुंच जाता था. इस तरह उन दोनों की मुलाकात हो जाती थी.’’

‘‘क्या मुलाकात के वक्त तुम भी आसपास होते थे?’’

‘‘नहीं साहब, मैं कभी उस तरफ नहीं गया. हां, दूसरे दिन नासिर मुझे सब बता दिया करता था.’’

‘‘दोनों के बीच बात किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी?’’

‘‘दोनों की मोहब्बत शादी तक पहुंच गई थी. रेशमा जल्दी शादी करने का इसरार कर रही थी. नासिर भी शादी करना चाहता था, लेकिन उसे इतनी जल्दी नहीं थी. जबकि रेशमा जल्दी रिश्ता तय करने की बात कर रही थी.’’

‘‘रेशमा की जल्दी के पीछे भी कोई वजह रही होगी?’’

‘‘हां, दरअसल रेशमा की मां सरदारा बी उस का रिश्ता अपनी बहन के लड़के से करना चाहती थी और उस का बाप उस का रिश्ता अपने भाई के लड़के से करना चाहता था. पर बात सरदारा बी की ही चलनी थी, क्योंकि वह काफी तेज है. वही सब फैसले करती है. रिश्ता खाला के बेटे से न तय हो जाए, इस डर से रेशमा नासिर को जल्दी रिश्ता लाने को कह रही थी.’’ जमील ने तफ्सील से बताया.

‘‘एक बात समझ में नहीं आई जमील, तुम्हारे मुताबिक उन की मुलाकातों के तुम अकेले राजदार थे. जबकि कत्ल वाले दिन के पहले से तुम गांव से बाहर थे. फिर उस दिन दोनों की मुलाकात किस ने तय कराई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, जिस दिन मैं टोबा टेक सिंह गया था, उसी दिन मैं ने उन की दूसरे दिन की मुलाकात तय करा दी थी. नासिर ने दूसरे दिन मिलने को कहा था. मैं ने यह बात रेशमा को बता दी थी. उस के हां कहने पर मैं ने नासिर को भी प्रोग्राम पक्का होने के बारे में बता दिया था.’’

‘‘इस का मतलब प्रोग्राम के मुताबिक ही नासिर अगली रात रेशमा से मिलने खेतों में पहुंचा था. यकीनन वादे के मुताबिक रेशमा भी वहां आई होगी और उस रात नासिर के साथ जो खौफनाक हादसा हुआ, वह उस ने भी देखा होगा. उस का बयान कातिल तक पहुंचने में मदद कर सकता है. मुझे रेशमा का बयान लेना होगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘साहब, मामला बहुत नाजुक है. नासिर तो अब मर चुका है, आप रेशमा से इस तरह मिलें कि बात फैले नहीं. नहीं तो बेवजह वह मासूम बदनाम हो जाएगी.’’

‘‘तुम इस की चिंता न करो, मैं उस से बहुत सोचसमझ कर इस तरह मिलूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया जनाब, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

‘‘जमील, तुम एक बात का खयाल रखना, जो बातें हमारे बीच हुई हैं, उन का किसी से जिक्र मत करना.’’

जब मैं नासिर की लाश ले कर गुलाबपुर पहुंचा तो बशीर लोहार के घर तमाम लोग जमा थे. लाश देख कर एक बार फिर रोनापीटना शुरू हो गया. मौका देख कर मैं ने शकूर को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘शकूर, मुझे नासिर के कत्ल के सिलसिले में तुम से कुछ पूछना है. यहां खड़े हो कर बात करने से बेहतर है तुम्हारे घर बैठ कर बात की जाए.’’

उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं उस के साथ उस के घर चला आया और उस की बैठक में बैठ गया. उस की एक बेटी थी रेशमा और एक बेटा शमशाद. बेटा 12-13 साल का रहा होगा, जो उस वक्त बाहर खेल रहा था. अभी थोड़ी ही बातचीत हुई थी कि सरदारा बी चाय की ट्रे ले कर आ गई. शकूर ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, चाय पीएं और सवाल भी पूछते रहें. ये मेरी बीवी सरदारा बी है, इस से भी जो पूछना है पूछ लें.’’

उन की बातचीत से मैं ने अंदाजा लगाया कि उन्हें रेशमा के इश्क के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मैं ने उन से नासिर के बारे में कुछ सवाल पूछे, उन दोनों ने उस की बहुत तारीफें कीं. बातचीत के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप की बेटी रेशमा कहां है?’’

‘‘वह घर में ही है जनाब, कल से उसे तेज बुखार है. हकीमजी से दवा ला कर दी, पर उस का कुछ असर नहीं हुआ.’’ सरदारा बी ने कहा.

‘‘रेशमा का बुखार हकीमजी की दवा से कम नहीं होगा. यह दूसरी तरह का बुखार है.’’ मैं ने कहा तो शकूर ने चौंक कर मेरी ओर देखा. मैं ने आगे कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं, यह इश्क का बुखार है. नासिर की मौत ने रेशमा के दिलोदिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया है.’’

दोनों उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे, ‘‘हमारी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह सब क्या है?’’

‘‘मैं समझाता हूं. यही सच्चाई है. रेशमा और नासिर एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे. दोनों रातों को मिलते भी थे. रेशमा को उस की मौत से बहुत दुख पहुंचा है.’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘मुझे बिलकुल यकीन नहीं आ रहा है.’’ सरदारा बी बोली.

हकीकत जान कर वे दोनों परेशान थे. मैं ने कहा, ‘‘परेशान न हों, आप के घर की बात इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी. रेशमा मेरी बेटी की तरह है और बिलकुल बेगुनाह है. मुझे उस की इज्जत का पूरा खयाल है. आप मुझे उस के पास ले चलो, मैं उस से कुछ बातें करूंगा. इस बात की कानोंकान किसी को खबर नहीं हो पाएगी. आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’

उन्होंने मुझे रेशमा के पास पहुंचा दिया. मैं ने उन दोनों को बाहर भेज दिया. वे दरवाजे के पीछे जा कर खड़े हो गए. मैं ने रेशमा से नरम लहजे में कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. दरअसल मैं तुम से नासिर के बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूं. वैसे तो मैं सब जानता हूं, फिर भी तुम्हारे मुंह से सुनना जरूरी है.’’

‘‘मैं जो जानती हूं, सब बताऊंगी.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘कत्ल की रात तुम खेतों में नासिर से मिलने गई थीं, मुझे यह बताओ कि उस पर हमला किस ने किया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं उस रात नासिर से मिलने नहीं गई थी.’’ वह मजबूती से बोली. उस के लहजे में विश्वास और यकीन साफ झलक रहा था.nमैं ने अगला सवाल किया, ‘‘जमील ने मुझे बताया है कि तुम्हारी और नासिर की मुलाकात पहले से तय थी. यह बात इस से भी साबित होती है, क्योंकि नासिर तुम से मिलने खेतों में गया था.’’

‘‘यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि नासिर वहां क्यों गया था? जबकि उस ने खुद ही प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था.’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

‘‘प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था, यह तुम क्या कह रही हो?’’ उस की बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रही हूं थानेदार साहब, मुझे नहीं पता प्रोग्राम कैंसिल करने के बाद नासिर वहां क्यों गया था. कल से मैं यही बात सोच रही हूं.’’ रेशमा ने सोचते हुए कहा.

‘‘एक मिनट, तुम दोनों के बीच खबर का आदानप्रदान जमील ही करता था न, पर जमील पिछले 2 दिनों से गुलाबपुर में नहीं था. फिर प्रोग्राम कैंसिल होने की खबर तुम्हें किस ने दी?’’ मैं ने उसे देखते हुए पूछा.

‘‘इम्तियाज ने.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘इम्तियाज कौन है?’’

‘‘माजिद चाचा का बेटा.’’

‘‘क्या इम्तियाज को भी तुम दोनों की मोहब्बत की खबर थी?’’

‘‘नहीं जी, वह तो 8 साल का बच्चा है. हमारे पड़ोस में ही रहता है.’’

‘‘इम्तियाज ने तुम से क्या कहा था?’’

‘‘मुझे तो यह जान कर ही बड़ी हैरानी हुई थी कि नासिर ने इम्तियाज के हाथ यह पैगाम क्यों भिजवाया था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैं ने चेक करने के लिए उस से पूछा, ‘कहां नहीं जाना है.’ इस पर उस ने कहा था कि वह इस से ज्यादा कुछ नहीं जानता. नासिर भाई ने कहा है कि रेशमा को कह दो कि आज नहीं आना है. कुछ जरूरी काम है.’’ उस ने रुकरुक कर आगे कहा, ‘‘मैं जमील की दुकान पर जा कर पता कर लेती, पर वह टोबा टेक सिंह चला गया था. इम्तियाज से कुछ पूछना बेकार था. बहरहाल मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं नासिर से मिलने नहीं जाऊंगी.’’

‘‘इस का मतलब है कि नासिर को पूरी मंसूबाबंदी से साजिश के तहत कत्ल किया गया है. मुझे यकीन है कि इम्तियाज उस आदमी को पहचानता होगा, जिस ने नासिर के हवाले से तुम्हारे लिए संदेश भेजा था.’’ मैं ने सोचते हुए कहा.

‘‘आप यह बात इम्तियाज से पूछें. मेरी तबीयत बहुत बिगड़ रही है. चक्कर आ रहे हैं.’’ वह कमजोर लहजे में बोली.

‘‘तुम आराम करो रेशमा, पर इन बातों का किसी से जिक्र मत करना और परेशान मत होना.’’ मैं ने उसे समझाया.

जब मैं कमरे से निकला तो उस के मांबाप ने मुझे घेर कर पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कुछ पता चला?’’

‘‘कुछ नहीं, बल्कि सब कुछ पता चल गया है.’’

‘‘हमें भी तो कुछ बताइए न?’’ शकूर ने कहा.

‘‘पहले आप पड़ोस से इम्तियाज को बुलाएं.’’

थोड़ी देर में सरदारा बी इम्तियाज को बैठक में ले आई. वह 8 साल का मासूम सा बच्चा था. मैं ने उसे प्यार से अपने पास बिठा कर पूछा, ‘‘बेटा इम्तियाज, तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?’’

‘‘हां, आप पुलिस हैं.’’ वह मुझे गौर से देखते हुए बोला.

इधरउधर की एकदो बातें करने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम स्कूल जाते हो, एक अच्छे बच्चे हो, सच बोलने वाले. यह बताओ, परसों शाम को तुम ने रेशमा बाजी से कहा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैं ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा हुआ था न?’’

‘‘हां, ऐसा हुआ था साहब.’’ इम्तियाज बोला.

‘‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो. मैं तुम्हें टाफियां दूंगा. अब यह भी बता दो कि तुम ने रेशमा बाजी को कहां जाने से मना किया था?’’

‘‘यह मुझे नहीं पता.’’ वह मासूमियत से बोला, ‘‘आप को यकीन नहीं आ रहा है तो रब की कसम खाता हूं.’’

‘‘नहीं बेटा, कसम खाने की जरूरत नहीं है. मुझे तुम पर भरोसा है. तुम ने तो रेशमा बाजी से वही कहा था, जो नासिर भाई ने तुम से कहलवाया था, है न?’’

‘‘नहीं जी.’’ वह उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगा.

‘‘क्या नहीं?’’

‘‘यह बात मुझे नासिर भाई ने नहीं कही थी.’’

उस ने कहा तो मैं ने तपाक से सवाल किया, ‘‘फिर किस ने कही थी?’’

‘‘हैदर भाई ने.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है हैदर अली? सरदारा बी का भांजा हैदर अली, जुलेखा का बेटा.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, जी वही हैदर भाई.’’ उस ने जल्दी से कहा.

सरदारा बी की बहन जुलेखा का घर भी गुलाबपुर में ही था. हैदर अली उसी का बेटा था और वह इसी हैदर से रेशमा की शादी करना चाहती थी. यह भी सुनने में आया था कि हैदर का दावा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. मैं सोचने लगा कि जब उसे रेशमा और नासिर की मोहब्बत का पता चला होगा तो उस ने अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाने की कोशिश की होगी. मुझे लगा कि अब केस हल हो जाएगा. जैसे ही वह मेरे हत्थे चढ़ेगा, उसे डराधमका कर मैं उस की जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

जब मैं जुलेखा के घर पहुंचा तो हैदर अली घर पर नहीं था. मैं ने जुलेखा से पूछा, ‘‘हैदर अली कहां गया है?’’

‘‘मुझे तो पता नहीं, बता कर नहीं गया है जी. वैसे आप हैदर को क्यों ढूंढ रहे हैं?’’ वह परेशान हो कर बोली.

उस की परेशानी स्वाभाविक थी. अगर पुलिस किसी के दरवाजे पर आए तो घर के लोग चिंता में पड़ जाते हैं. मैं जुलेखा को अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें यह पता है न कि गुलाबपुर में एक लड़के का कत्ल हो गया है?’’

‘‘जी…जी मालूम है, बशीर लोहार के जवान बेटे का कत्ल हो गया है. किसी जालिम ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा है.’’ उस ने कहा.

‘‘किसी ने नहीं, एक खास बंदे ने जिस की तलाश में मैं यहां आया हूं. तुम्हारा लाडला हैदर अली.’’

‘‘नहींऽऽ.’’ उस ने एक चीख सी मारी, ‘‘मेरा बेटा कातिल नहीं हो सकता. आप को कोई गलतफहमी हुई है थानेदार साहब.’’ वह रोनी आवाज में बोली.

‘‘हर मां का यही खयाल होता है कि उस का बेटा मासूम है. पर मैं तफ्तीश कर के पक्के सुबूत के साथ यहां आया हूं.’’

‘‘कैसा सुबूत साहब?’’ वह परेशान हो कर बोली.

‘‘हैदर अली को मेरे हाथ लगने दो, उसी के मुंह से सुबूत भी जान लेना.’’ मैं ने तीखे लहजे में कहा.

काफी देर राह देखने के बाद मैं ने गांव में अपने 2 लोग उस की तलाश में भेजे. पर वह कहीं नहीं मिला. इस का मतलब था, वह गांव छोड़ कर कहीं भाग गया था. गुलाबपुर में भी किसी को उस के बारे में कुछ पता नहीं था. हैदर अली के गांव से गायब होने से पक्का यकीन हो गया कि वारदात में उसी का हाथ था. मैं काफी देर तक गुलाबपुर में रुका रहा. फिर जुलेखा से कहा, ‘‘जैसे ही हैदर घर आए, उसे थाने भेज देना.’’

एक बंदे को टोह में लगा कर मैं थाने लौट आया. अगले रोज मैं सुबह की नमाज पढ़ कर उठा ही था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कांस्टेबल न्याजू खड़ा था. पूछने पर बोला, ‘‘साहब, जिस सिपाही को हैदर पर नजर रखने के लिए गांव में छोड़ कर आए थे, उस ने खबर भेजी है कि वह देर रात घर लौट आया है.’’

‘‘न्याजू, तुम और हवलदार समद फौरन गुलाबपुर रवाना हो जाओ और हैदर अली को साथ ले कर आओ.’’ मैं ने उसे आदेश दिया.

तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा तो थोड़ी देर बाद हवलदार समद हैदर को गिरफ्तार कर के ले आया. उस के साथ रोती, फरियाद करती जुलेखा भी थी. मैं ने कहा, ‘‘देखो, रोनेधोने की जरूरत नहीं है. यह थाना है शोर मत करो.’’

‘‘साहब, आप मेरे जवान बेटे को पकड़ कर ले आए हैं, मैं फरियाद भी न करूं.’’ वह रोते हुए बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे बेटे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है, फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं. अगर वह बेकुसूर है तो अभी थोड़ी देर में छूट जाएगा. यह मेरा वादा है तुम से.’’

‘‘अल्लाह करे, मेरा बेटा बेगुनाह निकले.’’

‘‘मेरी सलाह है, तुम घर चली जाओ. अगर हैदर बेकुसूर है तो शाम तक घर आ जाएगा.’’

हैदर को मैं ने अपने कमरे में बुलाया. हवलदार समद भी साथ था. मैं ने उसे गहरी नजर से देख कर तीखे लहजे में कहा, ‘‘हैदर, इसी कमरे में तुम्हारी जुबान खुल जाएगी या तुम्हें ड्राइंगरूम की सैर कराई जाए.’’

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उतर गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं ने ऐसा क्या किया है?’’

‘‘क्या के बच्चे, मैं बताता हूं तेरी काली करतूत. तूने नासिर का कत्ल किया है.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने किसी का कत्ल नहीं किया.’’ वह घबरा उठा.

‘‘फिर नासिर का कातिल कौन है?’’ मैं ने उस की आंखों में देखते हुए कहा.

‘‘मुझे कुछ पता नहीं थानेदार साहब.’’ वह हकलाया.

‘‘तुम्हें यह तो पता है न कि रेशमा तुम्हारी बचपन की मंगेतर है.’’ मैं ने टटोलने वाले अंदाज में कहा.

‘‘जी, जी हां, यह सही है.’’ उस ने कहा.

‘‘और यह भी तुम्हें मालूम होगा कि मकतूल नासिर और तुम्हारी मंगेतर रेशमा में पिछले कुछ अरसे से इश्क का चक्कर चल रहा था?’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं थानेदार साहब?’’ उस ने नकली हैरत दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं जो कह रहा हूं, तुम अच्छी तरह समझ चुके हो. सीधी तरह से सच्चाई बता दो, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ मैं ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रहा हूं, मैं ने नासिर का कत्ल नहीं किया.’’ वह नजरें चुराते हुए बोला.

‘‘नासिर के कत्ल वाली बात पहले हो चुकी है. अभी मेरे इस सवाल का जवाब दो कि तुम्हें रेशमा और नसिर के इश्क की खबर थी या नहीं? सच बोलो.’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’’

‘‘तो क्या तुम इम्तियाज को भी नहीं जानते?’’

‘‘कौन इम्तियाज?’’ वह टूटी हुई आवाज में बोला.

‘‘माजिद का बेटा, रेशमा का पड़ोसी बच्चा. याद आया कि नहीं?’’ मैं ने दांत पीसते हुए कहा.

‘‘अच्छाअच्छा, आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं.’’

‘‘हां…हां, वही बच्चा, जिस के हाथ तुम ने रेशमा के लिए संदेश भेजा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैंने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा तो वह हैरानी से बोला, ‘‘मैं ने? मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की…’’

‘‘तुम्हारे इस कारनामे के 2 गवाह मौजूद हैं. एक तो इम्तियाज, जिस के हाथ तुम ने संदेश भेजा था, दूसरी रेशमा, जिस के लिए तुम ने यह पैगाम भेजा था. अब बताओ, क्या कहते हो?’’

मेरी बात सुन कर वह हड़बड़ा गया. हवलदार समद ने कहा, ‘‘आप इस नालायक को मेरे हवाले कर दें, एक घंटे में फटाफट बोलने लगेगा.’’

मैं ने हैदर अली को हवलदार के हवाले कर दिया. थोड़ी देर में उस की चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. एक घंटे के पहले ही हवलदार ने खुशखबरी सुनाई.

‘‘हैदर अली ने जुर्म कुबूल लिया है. आप इस का बयान ले लें.’’

‘‘मतलब यह कि उस ने नासिर के कत्ल की बात मान ली है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी नहीं, बात कुछ और ही है, आप उसी से सुनिए.’’

हैदर अली ने नासिर का कत्ल सीधेसीधे नहीं किया था. अलबत्ता वह एक अलग तरह से इस कत्ल से जुड़ा था. यह भी सच था कि नन्हे इम्तियाज से रेशमा को पैगाम उसी ने भिजवाया था. यह पैगाम उस ने चौधरी आफताब के कहने पर रेशमा को भिजवाया था, ताकि रेशमा वारदात की रात मुलाकात की जगह न पहुंच सके और नासिर को ठिकाने लगाने में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े. चौधरी आफताब नजीराबाद के चौधरी का बेटा था. वह भी कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था. हाल ही में खेले गए टूर्नामेंट में वह नजीराबाद से खेल रहा था. फाइनल मैच में नजीराबाद की बुरी तरह से हार हुई थी. कप और इनाम गुलाबपुर के हिस्से में आए. ढेरों तारीफ व जीत की खुशी भी नासिर के नाम लिखी गई.

एक कबड्डी का दांव नासिर और आफताब के बीच पड़ा था, जिस में नासिर ने चौधरी आफताब को इतनी बुरी तरह से रगड़ा था कि उस की नाक और मुंह से खून बहने लगा था. एक तो गांव की हार, ऊपर से अपनी दुर्गति पर उस का दिल गुस्से और बदले की आग से जलने लगा था. उस का वश चलता तो वह वहीं नासिर का सिर फोड़ देता. उस ने मन ही मन इरादा कर लिया कि नासिर से बदला जरूर लेगा. इस तरह उस का अपने सब से बड़े प्रतिद्वंदी से भी पीछा छूट जाएगा. आफताब से हैदर ने कह रखा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. किसी तरह उसे यह भी पता चल गया था कि नासिर और रेशमा के बीच मोहब्बत और मुलाकात का सिलसिला चल रहा है. इसलिए उस ने एक तीर से दो शिकार करने का खतरनाक मंसूबा बना लिया.

हैदर अली को रेशमा और नासिर के संबंध का शक तो था ही, पर जब आफताब ने इस बारे में उसे शर्मसार किया तो वह आपे से बाहर हो गया. चौधरी आफताब ने उसे समझाया कि जोश के बजाय होश और तरीके से काम लिया जाए तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी. हैदर अली ने चौधरी आफताब का साथ देने का फैसला कर लिया. हैदर अली ने अपने हाथों से नासिर का कत्ल नहीं किया था, पर वह इस साजिश का एक हिस्सा था. जिस में चौधरी के भेजे हुए दो लोगों ने तेजधार चाकू की मदद से नासिर का बेदर्दी से कत्ल कर दिया था. जब कातिल उसे मौत के घाट उतार रहे थे तो हैदर अली थोड़ी दूर अंधेरे में खड़ा यह खूनी तमाशा देख रहा था.

हैदर अली के इकबालेजुर्म और गवाही पर मैं ने उसी रोज खुद नजीराबाद जा कर नासिर के कत्ल के सिलसिले में चौधरी आफताब को भी गिरफ्तार कर लिया था. आफताब गांव के चौधरी का बेटा था, इसलिए उस की गिरफ्तारी को रोकने के लिए मुझ पर काफी दबाव डाला गया था, पर मैं ने उस के असर व पैसे की परवाह न करते हुए चौधरी आफताब और उस की निशानदेही पर उन दोनों कातिलों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख चौधरी ने मुझे धमकी दी थी, ‘‘मलिक साहब, आप को मेरी ताकत का अंदाजा नहीं है. मैं अपने बेटे को अदालत से छुड़वा लूंगा.’’

मैं ने विश्वास से कहा, ‘‘चौधरी साहब, मैं सिर्फ खुदा की ताकत और कानून से डरता हूं. आप को जितना जोर लगाना है, लगा लो. आप का होनहार बेटा अदालत से सीधा जेल जाएगा.’’

मैं ने हैदर अली, चौधरी आफताब और नासिर के दोनों कातिलों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट बनाई और उन्हें अदालत के हवाले कर दिया. दोनों कातिल अपने जुर्म का इकबाल कर चुके थे, इसलिए उन की बाकी जिंदगी जेल में ही गुजरनी थी. Crime Stories

 

UP Crime News : मीत न मिला मन का

UP Crime News : प्रीति की ख्वाहिश थी कि उस की शादी किसी सरकारी नौकरी वाले युवक के साथ हो, लेकिन वह किसान ओमपाल से ब्याह दी गई. वह 2 बेटियों की मां जरूर बन गई, लेकिन पति उस की भावनाओं को नजरअंदाज करता रहा. ऐसे में वह गांव के देवर अभय सिंह के संपर्क में आई. अपने प्यार को रिश्ते में बदलने के लिए इन दोनों ने ऐसा कदम उठाया कि…

रात के कोई 2 बजे का वक्त रहा होगा, कमरे में पतिपत्नी और एक 12 वर्षीय बच्ची ममता सो रही थी. अचानक बच्ची की आंखें खुलीं. उस बच्ची की नजर अपनी चाची पर पड़ी. चाची ने किसी गैरमर्द को इशारा किया. फिर दोनों उस के सो रहे चाचा ओमपाल की ओर बढ़ गए. चाची ने अपना तकिया उठाया और वह वहां पर सो रहे अपने पति की तरफ बढ़ चली.

चाची को देखते ही बच्ची सहम गई. फिर उस ने सोने की ऐक्टिंग करते हुए जो देखा, उसे देखते ही उस की रूह कांप उठी. वह डर के मारे थरथर कांपने लगी. चाची ने उस तकिए से उस के चाचा ओमपाल का मुंह दबा दिया. उस के साथ ही उस अन्य पुरुष ने चुनरी से उस के चाचा का गला दबा दिया. थोड़ी देर छटपटाने और इधरउधर पैर मारने के बाद उस के चाचा पूरी तरह से शांत हो गए. यह कोई फिल्मी स्टोरी नहीं, बल्कि एक हकीकत है. फिर उस के बाद जो हुआ, इस कहानी में पढि़ए.

8 सितबंर, 2025 को रात के कोई 2 बजे का वक्त था. बुलंदशहर के गांव परतापुर की रहने वाली प्रीति ने अचानक अपनी जेठानी सीता का दरवाजा खटखटाना शुरू किया.

”दीदी, जल्दी चलिए, देखिए मेरे पति को अचानक क्या हो गया? वह बिलकुल भी बोल नहीं रहे.’’

इतना सुनते ही सीता देवी अपनी देवरानी के पीछेपीछे उस के कमरे में पहुंची. ओमपाल एक खटिया पर पड़ा हुआ था. सीता ने अपने देवर ओमपाल के पास जाते ही उस के चेहरे को हिलाया.

”ओमपाल…ओमपाल, क्या हो गया तुम्हें.’’

उस के बाद सीता ने उस के सीने पर भी हाथ लगा कर देखा, लेकिन ओमपाल कुछ नहीं बोला. ओमपाल की हालत देखते ही सीता देवी ने अपने पति रवि करन को बुलाया. रवि करन ने भी छोटे भाई की नब्ज टटोली, लेकिन वह शांत थी. भाई की हालत देख रवि करन भी बुरी आशंका से भयभीत हो गया था. ओमपाल को ऐसी हालत में देखते ही रवि करन ने तुरंत ही अपने परिचित एक डौक्टर को फोन मिलाया. कोई आधा घंटे के बाद डौक्टर ओमपाल को देखने के लिए उस के घर पर पहुंचा. डौक्टर ने ओमपाल की नब्ज चैक की. नब्ज चैक करते ही डौक्टर ने जबाव दे दिया, ”ओमपाल की मौत हो चुकी है.’’

इतना सुनते ही ओमपाल के घर में कोहराम मच गया. सब बुरी तरह से रोनेधोने लगे. घर में सब को रोते देख ममता और नेहा नाम की 2 बच्चियां भी रोने लगी थीं.

डौक्टर ने ओमपाल की पत्नी से पूछा, ”आप के पति को हुआ क्या था?’’

तब प्रीति ने रोते हुए बताया, ”उन्होंने मुझे सोते से जगाया. फिर बोले प्रीति मेरे सीने में बहुत ही भयंकर दर्द हो रहा है. उस के बाद मैं ने उन के सीने को काफी देर तक मसला भी, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ. तब मैं ने सोचा कि मैं सीता भाभी को बुला कर लाती हूं. जैसे ही मैं उन को साथ ले कर अपने कमरे में पहुंची तो उन की सांस थम चुकी थी.’’

इतना सुनते ही डौक्टर ने बताया कि उन्हें शायद हार्ट अटैक आ गया था, जिस के कारण आननफानन में उस की मौत हो गई. ओमपाल की मौत से उस के परिवार में मातम छा गया. ओमपाल की 2 छोटी बेटियां थीं. एक 4 वर्ष की दूसरी ढाई वर्ष की. घर में रोनेचिल्लाने को देख कर उन का भी रोरो क र बुरा हाल था, जिन को उन की ताई सीता ने संभाल रखा था. अगले दिन सुबह ही ओमपाल के दाह संस्कार की तैयारी होने लगी. सभी रिश्तेदारों को खबर दी गई थी. ओमपाल का हार्ट अटैक से निधन हो गया. पूरे गांव में इसी बात की चर्चा थी. फिर कुछ ही समय बाद नैचुरल डेथ समझ कर उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था. सभी मेहमान अपनेअपने घर को जा चुके थे.

लेकिन उस घटना के बाद से 12 वर्षीय ममता कुछ बीमार सी रहने लगी थी. उस की मम्मी सीता ने कई बार उस से उस की परेशानी के बारे में पूछा, लेकिन वह पूरी तरह से अपना मुंह बंद किए हुए थी. न तो वह कुछ खापी रही थी और न ही किसी से कोई बात ही कर रही थी. ओमपाल की हत्या के बाद सीता देवी वहीं पर काम में लगी हुई थी, लेकिन ममता एक बार भी अपनी चाची प्रीति के घर नहीं गई थी. तभी सीता देवी ने महसूस किया कि ममता जबजब प्रीति के सामने जाती है, वह बुरी तरह से घबरा जाती है. इस बात में जरूर कोई राज है.

ममता की बिगड़ती हालत को देखते हुए पहले तो उस के फेमिली वालों ने सोचा कि उसे अपने चाचा के खत्म होने का गहरा सदमा लग गया है. क्योंकि ओमपाल उसे बहुत प्यार करता था. उसे भी उस से बहुत लगाव था. इसी कारण वह अकसर ओमपाल के घर पर ही पड़ी रहती थी. फिर वहीं पर खाना खापी कर सो भी जाती थी.

ममता की हालत को देखते हुए उस के पापा ने उसे डौक्टर के पास ले जा कर भी दिखाया. उसे न तो कोई बुखार वगैरह था और न ही कोई बीमारी. उस के बाद ममता की मम्मी ने उसे एकांत में ले जा कर उस से पूछताछ की तो उस ने अपनी मम्मी को जो जानकारी दी, वह हैरान कर देने वाली थी. ममता ने ओमपाल की मौत की हकीकत खोलते हुए बताया, ”चाचा की हार्ट अटैक से मौत नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या गांव के ही अभय सिंह ने चाची प्रीति के साथ मिल कर की थी.’’

इस जानकारी ने ओमपाल फेमिली में हड़कंप मचा दिया. ममता ने बताया कि रात में अचानक उस की आंखें खुलीं तो चाची प्रीति और अभय सिंह चाचा ओमपाल को बुरी तरह से मार रहे थे. यह देख कर वह बुरी तरह से डर गई. फिर वह सोने का नाटक करते हुए यूं ही बिस्तर पर पड़ी रही.

ममता ने आगे बताया, ”जिस वक्त मैं चाची के घर पर पहुंची तो चाचा और चाची खाना खा कर सोने जा रहे थे. तब मैं ने चाची से कहा, ‘चाची, मैं भी तुम्हारे पास ही सोऊंगी.’ फिर मैं चाची के साथ ही सो गई. रात में मेरी आंखें खुलीं तो चाची मेरे पास नहीं थी. उस के बाद मैं ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा.’’

ओमपाल की मौत की हकीकत सामने आते ही उस के बड़े भाई रवि करन को प्रीति पर गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उन्होंने किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू किया. फिर यह बात उन्होंने उस से छिपाते हुए पुलिस को इस बात की सूचना दे दी. उस वक्त तक प्रीति अपने पति की मौत का गम मनाने की ऐक्टिंग करने में लगी हुई थी. उस का ओमपाल की मौत के वक्त से ही रोरो कर बुरा हाल था.

ओमपाल की मौत की हकीकत की जानकारी मिलते ही थाना बीबीनगर पुलिस उस के घर पर जा पहुंची. पुलिस ने प्रीति से सख्ती से पूछताछ की तो प्रीति ने पुलिस की मार से बचने के लिए सहज ही अपना अपराध कुबूल कर लिया था. प्रीति के जुर्म कुबूलते ही पुलिस ने अभय सिंह को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से भी कड़ी पूछताछ की तो उस ने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

इस घटना की जानकारी मिलते ही एसएचओ राहुल चौधरी ने मृतक ओमपाल के फेमिली वालों के साथसाथ गांव वालों से भी विस्तृत जानकारी ली. ओमपाल की मौत की सच्चाई सामने आते ही गांव में तरहतरह की चर्चा होने लगी थी. लोग विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि ओमपाल की हत्या उस की पत्नी के इशारे पर ही की गई थी. ओमपाल की हत्या का राज खुलते ही पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त की गई चुन्नी और तकिया भी बरामद कर लिया था. इस मामले की जानकारी मिलते ही एसपी (सिटी) शंकर प्रसाद ने घटनास्थल पर जा कर जानकारी जुटाई.

यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव परतापुर की है. इसी गांव में रहता था मोहर सिंह का परिवार. मोहर सिंह एक किसान थे. उन के 3 बेटों देवीशरण, रवि करन में ओमपाल सब से छोटा था. तीनों की शादी हो जाने के बाद तीनों भाई गांव में अलगअलग घर बना कर रह रहे थे. रवि करन और ओमपाल के घर आसपास में ही थे. जबकि उस का बड़ा भाई देवीशरण गांव के बाहरी छोर पर रह रहा था.

ओमपाल की शादी अब से लगभग 7 साल पहले प्रीति के साथ हुई थी. शादी के कुछ समय बाद तक तो ओमपाल और प्रीति के संबंध मधुर रहे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद ओमपाल प्रीति की नजरों से उतरने लगा. प्रीति देखनेभालने में खूबसूरत थी, लेकिन ओमपाल गांव का सीधासादा युवक. समय के साथसाथ प्रीति 2 बच्चों की मां भी बन गई थी, लेकिन 2 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी उस की खूबसूरती में चार चांद लगे हुए थे.

ओमपाल हर वक्त खेती के काम में ही लगा रहता था. शाम को खेतीबाड़ी का कामकाज निपटा कर आता, फिर वह जल्दी ही खाना खा कर सो जाता था. यह बात प्रीति को बिलकुल भी पसंद नहीं थी. वह एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. शादी से पहले उस ने भी एक सुंदर सरकारी जौब वाले पति के सपने देखे थे, लेकिन शादी के बाद उस के सारे अरमानों पर पानी फिर गया था. फिर भी उस ने काफी समय तक ओमपाल के साथ निभाने की कोशिश की.

ओमपाल हर शाम को अपने सारे दिन की थकान मिटाने के लिए शराब का आदी भी हो गया था. उस के बाद वह अपनी ही धुन में रहने लगा था. बीवी की उसे कोई परवाह नहीं थी. ओमपाल की हरकतों को देख कर प्रीति ने अपनी किस्मत को कोसना शुरू कर दिया था. प्रीति जब कभी भी अपने खेतों पर जाती तो उस की मुलाकात खेतों पर ही अभय सिंह से होने लगी थी. उस वक्त तक अभय सिंह कुंवारा था. हालांकि दोनों के बीच चाचीभतीजे का रिश्ता था. लेकिन अभय जब कभी भी प्रीति से मिलता तो उस की सुंदरता की तारीफ करना नहीं भूलता था.

खेतों पर काम करते देख कर प्रीति ने उसे अपने पास बुलाया, फिर वह उस से मजाक भरी बातें करने लगी. चाची की बातें सुनते ही अभय ने बात आगे बढ़ाते हुए प्रश्न किया. ”चाची, चाचा के क्या हालचाल हैं?’’

”अभय, तुम्हारे चाचा की चाल तो जैसे बिलकुल ही शांत पड़ गई. सारे दिन मजदूरों की तरह खेतों में लगे रहते हैं. उस के बाद शाम को खाना खा कर सो जाते हैं. उन्हें तुम्हारी चाची से तो जैसे कोई मतलब ही नहीं. मेरी किस्मत फूटी थी, जो मुझे ऐसा पति मिला. न काम

का न काज का, दुश्मन अनाज का.’’

”अरे चाची, कैसी बात करती हो. चाचा सारे दिन इतना काम करते हैं और आप कह रही हो कि वह कुछ नहीं करते.’’ अभय ने चाची की बात को आगे बढ़ाया.

”लेकिन लाला, एक मर्द को अपनी औरत की भावनाओं को भी पढऩा चाहिए. एक औरत को रोटी के अलावा और कुछ भी चाहिए.’’

”चाची, तुम भी कैसी बात करती हो. एक इंसान को पेट भर रोटी मिल जाए तो उस से बड़ी और क्या बात हो सकती है. चाची, हम तो रोटी खा कर पेट पर हाथ फेरते हैं. हमें तो फिर किसी चीज की इच्छा नहीं होती.’’

”लगता है अभय, तुम भी अपने चाचा की तरह ही हो. किसी औरत के दिल की भाषा पढऩे में तुम भी फेल हो.’’

”अरे चाची, आप क्या बात करती हो. मेरी शादी हो जाने दो. अपनी पत्नी को रानी बना कर रखूंगा. मैं अपने चाचा की तरह अपनी पत्नी को खेतों की मिट्टी चटाने के लिए शादी नहीं करूंगा.’’ अभय ने चाची के सामने अपनी शेखी बघारी.

प्रीति हंसते हुए बोली, ”अभय, मुझे तो तुम्हारे जैसा ही पति चाहिए था, लेकिन मेरी किस्मत में मिट्टी का पुतला मिला. पता नहीं कब तक उसे झेलना पड़ेगा.’’

”अभय, तुम बताओ, तुम्हें कैसी पत्नी चाहिए?’’

”चाची, अब मैं अपने मुंह से तुम्हारी क्या तारीफ करूं. जब भी तुम्हें देखता हूं, मेरे दिल में कुछकुछ होने लगता है. मुझे तो तुम्हारी जैसी ही सुंदरसलोनी पत्नी चाहिए.’’

अभय की बात सुनते ही प्रीति ने उस का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया, ”अभय देख, मेरा दिल भी तेरे लिए कितना उछलकूद कर रहा है. यह काफी समय से तेरे लिए पागल हो कर तेरा पीछा कर रहा है.’’

चाची के सीने पर हाथ जाते ही अभय के दिल की धड़कनें भी दोगुनी हो चुकी थीं. फिर उसी दिन प्रीति ने अभय को कसम खिलाई कि हम दोनों पतिपत्नी तो नहीं बन सकते, लेकिन दोस्ती तो कर ही सकते हैं. उस दिन अभय और प्रीति के बीच दोस्ती हो गई. फिर क्या था, दोनों के बीच रिश्ता ही ऐसा था कि जिस के कारण दोनों का मिलनाजुलना बेरोकटोक चलने लगा. उसी दौरान दोनों के बीच अवैध संबंध भी बन गए. ओमपाल अपने कामकाज में इतना व्यस्त रहता था कि प्रीति हर रोज के घरेलू जरूरतों के लिए अभय को ही इस्तेमाल करने लगी थी. इसी सब के चलते दोनों के बीच मधुर संबंध स्थापित हो गए थे.

अभय भी ज्यादातर अपनी चाची के घर पर ही पड़ा रहता था. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि ओमपाल ने प्रीति और अभय को प्यार की तपिश में तपते देख लिया था. ओमपाल मजबूर था. अभय उस के रिश्ते के बड़े भाई का बेटा था, जिसे ले कर वह गांव में अपनी पत्नी को बदनाम नहीं करना चाहता था. इसी कारण ओमपाल ने अभय से विरोध करने के बजाए प्रीति पर ही पाबंदी लगानी शुरू कर दी, लेकिन प्रीति भी पाबंदी की बेडिय़ों में जकड़ कर जीना नहीं चाहती थी. वह अभय के प्यार में इतनी पागल हो चुकी थी कि वह उसे किसी भी कीमत पर छोडऩे को तैयार नहीं थी.

उस के बाद दोनों ने मोबाइल का रास्ता पकड़ा और फिर दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर प्यार भरी बातें करने लगे, लेकिन यह बात भी ओमपाल से ज्यादा दिन तक छिप न सकी. उस के बाद ओमपाल ने अभय के साथसाथ प्रीति को भी प्यार से समझाया, लेकिन दोनों ही मानने को तैयार न थे.

नतीजतन दोनों परिवार के बीच में गहरा विवाद पैदा हो गया. पतिपत्नी दोनों के बीच मनमुटाव के साथ ड़ाईझगड़ा भी होने लगा था. उस के बाद ओमपाल ने प्रीति के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी थी. पाबंदी लगते ही प्रीति पिंजरे में कैद चिडिय़ा की तरह अभय से मिलने की चाहत में फडफ़ड़ाने लगी. उसी दौरान एक दिन मौका पाते ही प्रीति ने अभय को अपने खेतों पर मिलने के लिए बुलाया.

प्रीति अभय को देखते ही रोने लगी, ”अभय, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती. अगर तुम मुझे तनिक भी प्यार करते हो तो मुझे किसी भी तरह से इस कैद से मुक्त कराओ. फिर मुझे कहीं भी ले चलो. मगर मैं इस जाहिल इंसान के साथ नहीं रहना चाहती. पहले तो वह मेरे साथ गालीगलौज ही करता था, अब तो हर रोज मेरे साथ मारपीट भी करने लगा है. मुझे तुम्हारे साथ ही सच्चा प्यार मिलता है. मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती.’’

प्रीति की आंखों में आंसू देख कर अभय ने उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उस ने कहा, ”चाची तुम परेशान मत हो. मैं कोई उपाय करता हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं ओमपाल को इस दुनिया से ही विदा किए देता हूं.’’

तभी प्रीति ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ”अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है तो उस के लिए ऐसा उठाना ही होगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

उसी दिन दोनों ने ओमपाल को अपने बीच से निकाल फेंकने की योजना बना डाली थी. ओमपाल प्रीति की बेवफाई से तंग आ कर नशे का आदी बन चुका था. उस के घर में हमेशा ही शराब एडवांस में रखी रहती थी. यह जानकारी अभय को पहले ही थी. इसी बात का लाभ उठाते हुए अभय ने प्रीति को नशे के कुछ पाउच ला कर दे दिए थे. मौका पाते ही प्रीति वह पाउच खोल कर पति की शराब में मिला देती थी, जिसे पीने के बाद ओमपाल गहरी नींद में सो जाता था. उस के बाद प्रीति अभय को अपने घर बुला लेती और फिर दोनों मौजमस्ती के समंदर में गोते लगाने लगते थे.

लेकिन इस के बावजूद भी दोनों को डर लगा रहता था कि कोई उन के फेमिली वाला आ कर उन्हें रंगेहाथों पकड़ न ले. इस सब झंझट से छुटकारा पाने के लिए दोनों ने मिल कर ओमपाल को मौत की नींद सुलाने का प्लान बना डाला.

उसी प्लान के तहत 8 सितंबर, 2025 को जब ओमपाल खापी कर सो गया तो प्रीति ने प्रेमी अभय सिंह को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस दिन जेठानी की 12 वर्षीय बेटी ममता भी उस के बच्चों के साथ वहीं पर सोई हुई थी. अभय के आने से पहले प्रीति ने सभी बच्चों को चैक किया, सभी गहरी नींद में सोए पड़े थे. फिर दोनों ने ओमपाल की गला घोंट कर हत्या कर दी.

लेकिन अभय के घर में घुसते ही ममता की आंखें खुल गईं. उस ने उस रात अपनी आंखों से हत्या का जो लाइव मंजर देखा, उसे देख कर बुरी तरह से डर गई थी. उस दिन ममता वहां पर मौजूद न होती तो ओमपाल की मौत का खुलासा न हो पाता. इस मामले में मृतक ओमपाल के भाई रवि करन की तरफ से प्रीति व अभय सिंह को आरोपी मान कर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसे पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत दर्ज किया था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने के बाद दोनों को जेल भेज दिया था. UP Crime News

(कथा में ममता और नेहा परिवर्तित नाम है)

 

 

Rajasthan News : नीले ड्रम की मर्डर मिस्ट्री

Rajasthan News : शादी हो जाने के बाद हर पत्नी चाहती है कि वह अपने घर को अच्छे से संभाले और अपने पति व बालबच्चों की ठीक से देखभाल करे. 3 बच्चों की मां सुनीता भी ये सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही थी. फिर एक दिन ऐसा क्या हुआ कि सुनीता ने अपने पति हंसराम उर्फ सूरज की न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उस की लाश को नीले ड्रम में डाल कर ऊपर से नमक भी डाल दी. आखिर सुनीता ने क्यों की पति की हत्या?

बरसात आते ही ईंटभट्ठे के मुनीम जितेंद्र शर्मा के कहने पर हंसराम उर्फ सूरज 3 महीने के लिए शाहजहांपुर में स्थित अपने घर लौटने के बजाए बीवीबच्चों के साथ उसी के साथ राजस्थान के अलवर जिले के किशनगढ़ वास कस्बा चला आया. उसे भट्ठे पर लोग सूरज के नाम से जानते थे. वह अपनी पत्नी सुनीता और 3 बच्चों के साथ वहां की आदर्श नगर कालोनी में जितेंद्र शर्मा की मां मिथिलेश शर्मा के मकान में किराए पर रहने लगा.

जितेंद्र ने सूरज को एक दुकान पर काम भी दिलवा दिया. इस तरह से सूरज की आमदनी का जरिया बन गया और उस की दिनचर्या शुरू हो गई. वह सुबह काम पर जाता और शाम तक घर वापस लौटता था. घर में उस के पीछे पत्नी सुनीता और 3 बच्चे होते थे. बड़ा बेटा 8 साल का, जबकि 2 अन्य बच्चे 4 साल और डेढ़ साल के थे.

सूरज और सुनीता एक तरह से जितेंद्र के एहसान तले आ गए थे. जितेंद्र जबतब छत पर बने घर में सुनीता के पास आनेजाने लगा था. वह सूरज के नहीं रहने पर भी सुनीता के पास चला जाता था. बच्चों से प्यारदुलार करता था. जल्द ही सुनीता जितेंद्र से भावनात्मक लगाव महसूस करने लगी थी. यह लगाव कब सैक्स अपील की भावना में बदल गया, उन्हें पता ही नहीं चला. यानी उन के बीच अवैध संबंध बन गए. दोनों को जब एकांत की चाहत होती, तब जितेंद्र बच्चों को गेम खेलने के लिए अपना मोबाइल फोन दे कर कमरे से बाहर भेज दिया करता था.

सुनीता और जितेंद्र के बीच एक अनैतिक रिश्ता कायम हो चुका था. जबकि सूरज इस से बेखबर था.  सुनीता शुरू से ही अपने पति से संतुष्ट नहीं थी. वह भले ही 3 बच्चों का बाप बन गया था, लेकिन सुनीता की शारीरिक भूख को नहीं मिटा पाता था.

सूरज उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का रहने वाला था, लेकिन रोजीरोटी की तलाश में राजस्थान के खैरथल तिजारा जिलांतर्गत सूर्या ईंटभट्ठे पर काम करने आ गया था. वहीं उस की भट्ठे के मुनीम जितेंद्र से अच्छी जानपहचान हो गई थी. उन्हीं दिनों रंगीनमिजाज जितेंद्र की निगाह सुनीता पर पड़ी थी. उस के खिलते यौवन और सौंदर्य को देख कर मन ही मन उसे पाने की लालसा से भर गया था.

शायद यही कारण था कि जितेंद्र ने सूरज को परिवार समेत अपने गांव वापसी से रोक दिया था. यही नहीं, उस ने सूरज को शराब की ऐसी लत लगा दी कि वह जितेंद्र का पक्का यार बन गया. यह सब जितेंद्र ने सुनीता को हासिल करने के लिए किया था.

जितेंद्र एक तरह से अपनी योजना में सफल हो गया था और उस ने सुनीता के साथ जैसा रिश्ता कायम करना चाहता था, उस में उसे सफलता मिल गई थी. उस की जब इच्छा होती तो मौका निकाल कर सुनीता को अपनी बाहों में दबोच लेता था.

हालांकि जितेंद्र भी शादीशुदा था. वह एक 8 साल के बेटे आदित्य का पिता भी था. उस की पत्नी की करीब 12 साल पहले करंट लगने से मौत हो गई थी. बेटे की देखभाल उस की मां करती थी और जितेंद्र विधुर की जिंदगी गुजार रहा था.

यही कारण था कि वह स्त्रीसुख की आग में बेचैन रहता था. जब से उस ने सुनीता को देखा था, तभी से उसे पाने के लिए तड़प उठा था. इस के प्रयास में लग गया था और उस ने सुनीता को भट्ठे पर कम काम करवाने और शराबी सूरज को मुफ्त शराब पिला कर संतुष्ट कर दिया था.

वैसे जितेंद्र और सुनीता के बीच अवैध संबंध किशनगढ़ आने के पहले से बने हुए थे. जुलाई में बारिश के दिनों में जब सूरज ने सुनीता से वापस गांव चलने की बात कही, तब उस ने जितेंद्र के प्रस्ताव के साथ हां में हां मिला कर सूरज को राजी कर लिया था.

जितेंद्र ने जानबूझ कर सूरज को अपने घर के छत पर बना कमरा मां से कह कर किराए पर दिलवा दिया था. वहां उस की मां कभीकभार जाती थी. वह जगह सुनीता और जितेंद्र दोनों के लिए महफूज थी. सूरज और सुनीता के वहां रहने पर एक तरह से जितेंद्र की मौज आ गई थी.

बदले में वह उस की मदद करने लगा. एक बार जितेंद्र ने किराया ही अपनी जेब से दे दिया था. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह पत्नी से झगड़ पड़ा. उसे पहले से ही पत्नी के चालचलन और जितेंद्र से अधिक घुलनेमिलने से उस पर संदेह होने लगा था. किराए की बात पर उस का संदेह और गहरा हो गया. शराब के नशे में वह सुनीता पर सच उगलवाने का दबाव बनाने लगा था.

तब उलटे सुनीता पति सूरज से ही उलझ गई, गुस्से में बोली, ”तुम्हारे पास किराए का पैसा नहीं था और जब उस ने किराया चुका दिया है, तब उस का एहसान मानने के बजाए उसी पर लांछन लगा रहे हो.’’

”किराए में दोचार रोज देरी हो जाती तो इस से क्या हो जाता,’’ सूरज बोला.

”तुम्हें नहीं मालूम जितेंद्र की मां किराए के मामले में बहुत कड़क बुढिय़ा है. किराया नहीं मिलने पर तुरंत कमरा खाली करवा देती.’’ सुनीता बोली.

पत्नी के इस तर्क पर सूरज चुप लगा गया, किंतु कुछ दिनों बाद ही बेटे के एडमिशन को ले कर सुनीता पति से झगड़ पड़ी. दरअसल, उस के एडमिशन के लिए जितेंद्र ने पहल की थी. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह गुस्से में आ गया और बोला, ”जितेंद्र कौन होता है मेरे बेटे का एडमिशन करवाने वाला?’’

इस पर फिर सुनीता पहले की तरह पति को ताना देती हुई बोली, ”अगर कोई तुम्हें मदद कर रहा है तो इस में बुराई क्या है?’’

”बुराई उस की मदद में नहीं, उस की नीयत में है. उस ने तुम्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है…तुम मेरे कहने का मतलब अच्छी तरह से समझती हो,’’ सूरज नाराजगी के साथ बोला.

तभी जितेंद्र वहां आ गया. उस ने जब सुनीता और सूरज को तूतूमैंमैं करते देखा, तब माहौल को हलका बनाते हुए बोल पड़ा, ”तुम दोनों फिजूल में लड़ते रहते हो. इतना अच्छा मौसम है. चलो बाजार, आज दारू की बोतल और मछली लाते हैं. यहीं दारू पार्टी करेंगे. सुनीता मछली पकाएगी.’’

दारू और मछली का नाम सुनते ही सूरज के मुंह से लार टपकने लगी. वह तुरंत तैयार हो गया और उस के साथ दारू लाने के लिए बाजार चला गया. थोड़ी देर में जितेंद्र और सूरज दारू और मछली ले कर आ गए. दोनों वहीं दारू पार्टी करने लगे. मछली पका कर सुनीता लाई, तब जितेंद्र ने उसे भी एक पैग पीने को दे दिया. उस ने भी खुश हो कर 2-3 पैग दारू का आनंद लिया. शराब के नशे में जितेंद्र ने कहा कि उसे उस की माली हालत पर पर दया आती है, इसलिए वह उस की मदद करता है. अपनी बातों से उस ने सूरज को आश्वस्त किया कि सुनीता और उस के संबंधों को ले कर बेकार में संदेह करता है.

हालांकि यह कहना उस का एक झूठ ही था. हकीकत तो यह थी कि जितेंद्र अकसर सूरज को शराब पिलाता था. उस में सुनीता भी साथ देती थी और जब सूरज नशे में धुत हो जाता था, तब जितेंद्र उस की बीवी के साथ मौजमस्ती करता था. यह सब चलता रहा. सुनीता अपने अनैतिक संबंधों के बचाव में लोगों से पति को शराब की लत लग जाने का दुखड़ा सुनाने लगी थी. जब भी जितेंद्र की मां से मिलती, एक दुखड़ा सुनाती कि वह अपने शराबी पति से परेशान हो गई है. जितेंद्र की मां उसे नसीहत देती. समझाती थी कि वह पति से झगड़ा नहीं करे, बल्कि प्रेम से उसे समझाएबुझाए.

बात 15 अगस्त, 2025 की है. सूरज दुकान से घर लौट आया था. वह गुस्से से भरा हुआ कमरे में बैठा था. जैसे ही पत्नी आई, उस से झगड़ पड़ा. तभी मकान के नीचे बैठा जितेंद्र उस के कमरे में आ गया. वह बोला, ”क्यों झगड़ रहे हो?’’

”क्या करूं? मेरी जिंदगी नरक बन गई है. दारू पिलाओगे, तब बोलूंगा?’’ सूरज निराश भाव से बोला.

”हां, क्यों नहीं, लो अभी गया और ले कर आया.’’ जितेंद्र बोला.

”कहां से लाओगे, आज तो ड्राई डे है.’’

”तो क्या हुआ, मैं ने इंतजाम कर रखा है.’’ जितेंद्र बोला और वहां से चला गया. थोड़ी देर में लौटा, तब उस के हाथ में एक शराब की बोतल थी.

सूरज और जितेंद्र वहीं दारू पीने लगे. सुनीता गुमसुम उन्हें देखती रही. जितेंद्र ने इशारा किया, तब वह भी अपने लिए एक गिलास ले आई. सूरज उस रोज गुस्से में लगातार पैग पर पैग पिए जा रहा था. हर पैग के साथ सुनीता को गालियां बके जा रहा था. उस पर बदलचलनी का आरोप लगाए जा रहा था. हद तो तब हो गई, जब सूरज उस पर गिलास फेंक कर मार दिया. इस पर जितेंद्र बोला, ”क्यों उसे मारते हो? गलत बात है.’’

नशे में सूरज बोला, ”मैं उसे मारूं या प्यार करूं, तुम कौन होते हो इसे बचाने वाले?’’

”तुम्हें जो कुछ करना है वह मेरे सामने मत करो,’’ जितेंद्र डांटता हुआ बोला.

”मैं मारूंगा इसे, आज इस की सारी हेकड़ी निकाल दूंगा.’’ बोलते हुए उस ने सुनीता की गरदन पकड़ ली थी. सुनीता चीख पड़ी थी. चीख सुन कर जब उस का बेटा उसे बचाने आया था, तब सूरज ने बेटे की भी पिटाई शुरू कर दी. वह गुस्से में बावला हो गया था. बचाव करते हुए जितेंद्र बोल पड़ा, ”अरे बच्चे को मार डालेगा क्या? इतना क्यों पीट रहा है उसे?’’

तभी सूरज की नजर लोहे के एक औजार पर गई. उस ने झट से उसे उठा लिया. तब तक सुनीता और उस का बेटा बचाव में भागने लगे. वे सूरज के आक्रामक तेवर को देख कर समझ गए थे कि वह काफी गुस्से में है. कुछ भी कर सकता है. ऐसा ही जितेंद्र ने भी महसूस किया तो वह भी वहां से जाने को उठा. तब सूरज ने तीनों पर लोहे का औजार फेंक मारा.

उस ने अनापशनाप बकना शुरू कर दिया था. उस रोज नशे में उस ने यहां तक कह दिया कि उन के बीच नाजायज संबंध है. उसे अब खत्म कर के ही चैन लेगा. वह शराब के नशे में बकता हुआ इधरउधर चक्कर लगा रहा था. इसी बीच सुनीता ने जितेंद्र को इशारा किया. हाथों के इशारे से धीमी आवाज में बोली, ”अब क्या किया जाए? इस पर तो भूत सवार है.’’

”जो तुम को सही लगे.’’

फिर क्या था. जितेंद्र ने चक्कर काटते सूरज को दबोच लिया. सुनीता ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के गरदन पर जितेंद्र की पकड़ मजबूत होती चली गई. सुनीता ने उस को छटपटाने का मौका तक नहीं दिया. जितेंद्र ने एक हाथ से गरदन और दूसरे हाथ से सूरज का मुंह नाक ऐसे दबाई कि वह कुछ मिनट में ही बेजान हो गया. उस वक्त रात हो चुकी थी. सुनीता और जितेंद्र आपस में विचार करने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? शव को कैसे ठिकाने लगाया जाए?

तभी जितेंद्र को कमरे के बाहर छत पर रखे नीले ड्रम को देख कर एक आइडिया आया. क्यों न शव को ड्रम में डाल कर उस पर नमक डाल दिया जाए, ताकि शव जल्दी सडग़ल जाए. उसे यह आइडिया अचानक कुछ महीने पहले मेरठ के सौरभ हत्याकांड से आया. उस ने वही किया. फर्क इतना था कि सीमेंट का गाढ़ा घोल डालने के बजाय सूरज के शव को ड्रम में डाल कर उस में नमक का घोल डाल दिया. उस के मुंह को चादर से ढंक दिया.

संयोग से जब यह सब किया जा रहा था, तब सूरज का बेटा पेशाब के लिए उठा था. वह अर्धनिद्रा में था, उसे कुछ समझ में नहीं आया कि उस की मम्मी और जितेंद्र अंकल ड्रम के साथ क्या कर रहे हैं? जब उस ने पूछा कि वे क्या कर रहे हैं? तब अचानक जितेंद्र बोल पड़ा, ”तुम्हारे पापा को ठिकाने लगा रहे हैं. वह तुम्हें और मम्मी को मार रहा था न!’’

17 अगस्त, 2025 को जितेंद्र की मां मिथिलेश ने महसूस किया कि छत पर रहने वाले किराएदार सूरज के यहां सन्नाटा है, वहां से किसी की आवाज नहीं आ रही है. जबकि सुबह होते ही सुनीता और सूरज के बीच होने वाली बहस की आवाजें आने लगती थीं. कई बार बच्चों के रोने की भी आवाज सुनाई देती थी.

वह छत पर चली गई. कमरे में कोई नजर नहीं आ रहा था. वहां न तो सुनीता थी और न ही सूरज और उस के बच्चे. उस ने महसूस किया कि जितेंद्र भी बीती रात से अपने कमरे में नजर नहीं आया था. तभी वहां उसे अजीब सी दुर्गंध महसूस हुई. जो पास रखे नीले ड्रम से आ रही थी. उस ने तुरंत अपने पति राजेश शर्मा को यह बात बताई. पति ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर छत पर रखे ड्रम से दुर्गंध आने की सूचना पुलिस को दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना पा कर किशनगढ़ वास के एसएचओ जितेंद्र सिंह शेखावत, एसआई दिनेश कुमार मीणा, एएसआई ज्ञानचंद पुलिस दलबल के साथ आदर्शनगर कालोनी स्थित राजेश शर्मा के घर पहुंच गए. पुलिस टीम छत पर रखे नीले ड्रम के पास गई, जहां से दुर्गंध आ रही थी. एक पुलिसकर्मी ने उस का ढक्कन हटाया तो दुर्गंध और तेज हो गई. उस के भीतर चादर ठूंसी हुई थी. जब चादर बाहर निकली, तब दुर्गंध का तेज भभका निकला और अंदर लाश नजर आई.

लाश की पहचान सूरज के रूप में हुई, जो वहीं किराए पर रहता था. एसएचओ ने इस की सूचना किशनगढ़ वास के डीएसपी राजेंद्र सिंह निर्वाण को दे दी. वह थोड़ी देर में ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने उस के कमरे की तलाशी ली. वहां उन्हें सूरज का आधार कार्ड मिला, जिस पर उस का नाम हंसराज दर्ज था. उस पर उस के पिता का नाम खेमकरण और पता नवादिन नवाजपुर, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश लिखा था. मकान मालकिन को भी यह जान कर हैरानी हुई कि मृतक ने अपना असली नाम उसे नहीं बताया था.

उस वक्त सडऩे की स्थिति में आ चुके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस के सामने सवाल यह था कि मृतक की पत्नी सुनीता और बच्चे कहां गए? जांच और पूछताछ में यह भी मालूम हुआ कि मकान मालकिन का विधुर बेटा जितेंद्र शर्मा भी 16 सितंबर, 2025 से ही लापता है. उन का पता लगाने के लिए जांच टीमें गठित कर दी गईं. उन्हें पकडऩे के लिए टीमें पड़ोसी राज्य हरियाणा और उत्तर प्रदेश भेजी गईं. साथ ही सीसीटीवी के फुटेज निकलवाए गए.

दूसरी तरफ फरार जितेंद्र शर्मा 18 अगस्त को सुनीता और उस के तीनों बच्चों को ले कर अलवर जिले के रामगढ़ इलाके के आलावड़ा गांव जा पहुंचा. वहां लोगों ने एक ईंट भट्ठे पर काम मांगा. भट्ठे के मालिक को उन पर संदेह हो गया था. कारण उसे बीते दिनों किशनगढ़ वास में हत्या संबंधी जानकारी न्यूजपेपर और सोशल मीडिया के जरिए मिल चुकी थी, जिस में फरार लोगों के बारे में भी जिक्र किया गया था.

इस संदेह के आधार पर उस ने तुरंत स्थानीय पुलिस थाने को इस की सूचना दे दी. पुलिस वहां पहुंच गई और उन्हें वही हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन्हें किशनगढ़ वास लाया गया. थाने में पहले से ही सूरज के परिजन मौजूद थे. उन्होंने सूरज की लाश की पहचान कर ली थी. सूरज के पेरैंट्स और भाईबहनों का रोरो कर बुरा हाल था. थाना किशनगढ़ वास की पुलिस ने हंसराज उर्फ सूरज की हत्या का मामला उस के परिजनों की शिकायत पर दर्ज कर लिया गया. हत्याकांड में जितेंद्र शर्मा और सुनीता मुख्य आरोपी बनाए गए.

दोनों ने गहन पूछताछ में हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उन्होंने हत्या किस तरह से की, पुलिस इस की जांच के लिए उन्हें घटनास्थल पर ले गई. वहां आरोपियों द्वारा क्राइम सीन क्रिएट किया गया. उन के बयान लिए गए. अपने बयान में जितेंद्र ने बताया कि सूरज की पत्नी सुनीता के प्रेम में वह अंधा हो गया था. सुनीता भी उसे पसंद करने लगी थी. सूरज उन के प्रेम संबंधों में बाधक था, इसलिए उस की हत्या कर दी थी.

पुलिस ने जितेंद्र शर्मा और सुनीता से गहन पूछताछ के बाद उन्हें मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर दिया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Rajasthan News

 

 

Love Story in Hindi : इश्क पर पहरा बरदाश्त नहीं

Love Story in Hindi : मनोज और स्वाति एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे, लेकिन उन के फेमिली वालों को यह बात बरदाश्त नहीं हुई. उन्होंने न सिर्फ स्वाति पर पहरा लगा दिया, बल्कि उस के प्रेमी मनोज को भी बुरी तरह हड़काया. अंकुश लगाया गया यह प्यार एक दिन ऐसा शोला बन गया कि…

बात 17 सितंबर, 2025 की रात लगभग साढ़े 11 बजे की है. उत्तर प्रदेश के जनपद मुरादाबाद के पुलिस कंट्रोल रूम को एक सूचना मिली. कौल करने वाले ने बताया, ”साहब, मैं गुरैठा गांव का योगेश हूं. गांव के ही शोभाराम और उस के 2 बेटे गौरव व कपिल मेरे साथ मारपीट कर रहे हैं. मैं बुरी तरह से घायल हूं. उन के चंगुल से किसी तरह छूट कर मैं अंधेरे में छिप गया हूं. वे लोग मुझे जान से मार देंगे. मैं इस समय मोढ़ा तैया गांव के कब्रिस्तान से आप को सूचना दे रहा हूं. साहब, मुझे आ कर बचा लो.’’

यह कौल सुन कर पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. पुलिस कंट्रोल रूम (यूपी 112) की गाड़ी तुरंत सूचना में बताए गए पते पर रवाना कर दी गई.यह कब्रिस्तान जिला मुरादाबाद में अगवानपुर से पाकबड़ा की तरफ जाने वाले बाईपास के किनारे मोढ़ा तैया गांव के पास स्थित है. पुलिस जब वहां पहुंची तो वह वह अंधेरे में हाथपैर मार कर वापस आ गई थी. जिस फोन नंबर से पुलिस को सूचना मिली थी, उस नंबर पर कौलबैक की तो उस मोबाइल की घंटी तो बज रही थी, लेकिन उसे कोई उठा नहीं रहा था.

पुलिस ने समझा कि किसी ने शायद फेक कौल कर दी होगी या कोई शरारती तत्त्व नशा कर के पुलिस को गुमराह कर रहा है. यानी उस समय पुलिस ने मामले को हलके में लिया था. अगले दिन 18 सितंबर, 2025 की सुबह 8 बजे किसी व्यक्ति ने फोन द्वारा थाना पाकबड़ा पुलिस को सूचना दी कि मोढ़ा तैया कब्रिस्तान के पास एक रक्तरंजित शव पड़ा हुआ है. सूचना मिलते ही थाना पाकबड़ा के एसएचओ योगेश कुमार पुलिस टीम के घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए. वहां पर लाश के आसपास लोगों का हुजूम लगा हुआ था, पुलिस को देख कर लोग दाएंबाएं हो गए.

एसएचओ योगेश कुमार ने लाश का मुआयना करने के बाद लोगों से शव की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन लोगों ने शव पहचानने से इंकार कर दिया. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि मृतक कहीं दूसरी जगह का हो सकता है. इस की हत्या कहीं और कर के शव यहां पर ला कर डाल दिया गया है. पुलिस को शव के पास से एक मोबाइल फोन भी मिला. मृतक का मुंह किसी भारी चीज से बुरी तरह कुचला गया था. एसएचओ योगेश कुमार ने शव मिलने की सूचना अपने उच्च अधिकारियों को दी.

सूचना मिलते ही मुरादाबाद के एसपी (सिटी) कुमार रणविजय सिंह व सीओ राजेश कुमार मौके पर पहुंच गए थे उन्होंने फोरैंसिक टीम भी बुला ली थी. जांचपड़ताल के बाद शव का पंचनामा भर कर उस मोर्चरी भिजवा दिया गया. इस के बाद जब हत्या की खबर सोशल मीडिया द्वारा फैली तो शव की भी शिनाख्त हो गई. पता चला कि मृतक घटनास्थल से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित गांव गुरैठा का रहने वाला 20 वर्षीय योगेश कुमार था.

उधर शाम तक योगेश की लाश का पोस्टमार्टम भी हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि पहले उस का गला घोंटा गया था, बाद में किसी भारी वस्तु से उस का सिर कुचला गया था. योगेश के फेमिली वालों का रोरो कर बुरा हाल था. मृतक के भाई उमेश ने गांव गुरैठा निवासी शोभाराम व उस के 2 बेटों गौरव व कपिल के खिलाफ अपने भाई योगेश की हत्या का थाना पाकबड़ा में मुकदमा दर्ज करवाया. पुलिस ने नामजद आरोपियों के खिलाफ मुकदमा बीएनएस की धारा 103 (1) व 3 (2)(v) एससी/एसटी ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस के बाद पुलिस ने गांव गुरैठा निवासी नामजद शोभाराम और उस के दोनों बेटों गौरव व कपिल को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. आरोपियों के हिरासत में लेने की सूचना पर मुरादाबाद के एसएसपी सतपाल अंतिल भी थाना पाकबड़ा पहुंच गए. पुलिस ने तीनों आरोपियों शोभाराम, गौरव व कपिल से गहनता से पूछताछ की. तीनों ही अपने को निर्दोष बताते रहे, ”सर, हमारा मृतक योगेश से कोई झगड़ा नहीं था और न उन के यहां पर हमारा कोई आनाजाना था. आप पूरे गांव से पता कर लें, घटना वाली रात हम अपने घर पर ही थे. खाना खाया, घूमे, फिर सो गए.

”सर, हम इस बात से परेशान हैं कि हमें कौन से लोगों ने फंसवा दिया. हम ने तो आज तक मक्खी तक नहीं मारी, हत्या करना तो दूर की बात है. सर, आप जांच करवा लें इस मामले में हमें किसी बड़े षडयंत्र के तहत फंसाया गया है. आप मृतक योगेश के परिवार से भी मालूम करो, हमारा उस परिवार से आज तक कोई लड़ाईझगड़ा तक नहीं हुआ है. हमारे पास तो खाने के भी लाले हैं, हम मुकदमा कैसे लड़ेंगे. न कोई मुकदमा लडऩे वाला. सर, हम तो बरबाद हो गए.’’

उसी समय अभियुक्त शोभाराम का बड़ा बेटा गौरव बोला, ”सर, घटना वाली रात मेरे मोबाइल पर एक कौल आई थी. जैसे ही मैं ने कौल रिसीव की, तभी उधर से कौल डिसकनेक्ट कर दी गई. आप इस कौल को भी चैक करवा लो. सर, हमारे साथ बहुत बड़ी साजिश रची जा रही है.’’ इतना सुनते ही एसएसपी सतपाल अंतिल का माथा ठनका. उन्होंने कौल की जांच करवाई तो वह नंबर मृतक योगेश का ही निकला. इस का मतलब यह हुआ कि  हत्यारों ने मृतक योगेश के फोन से ही कौल की थी.

मामला बड़ा गंभीर था. उन्होंने तुरंत ही थाने में एक इमरजेंसी मीटिंग बुलवाई. मीटिंग में एसपी (सिटी) कुमार रणविजय सिंह, सीओ (हाइवे) राजेश कुमार, एसएचओ (पाकबड़ा) योगेश कुमार, एसओजी प्रभारी अमित कुमार, थाने के एसएसआई आदि की टीम बनाई गई. उन्हें समझाया गया मामला बहुत गंभीर है, इसलिए इस का जल्द से जल्द खुलासा किया जाए.

कप्तान साहब का आदेश मिलते ही टीम हरकत में आ गई. थाने के तमाम मुखबिर सक्रिय हो गए थे. जल्द ही पुलिस ने तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू कर दी. इस जांच से यह पता चला कि घटनास्थल से पहले 3 लोग एक बाइक नंबर यूपी-21बीजेड 5949 से जाते दिखे. पुलिस टीम ने इस नंबर के आधार पर बाइक के मालिक से बात की तो उस ने बताया कि उक्त बाइक मैं ने हाल ही में पाकबड़ा कस्बे के मोहल्ला सैनियों वाला मंदिर के पास रहने वाले मनोज को बेची थी और मनोज राजेश दिवाकर के मकान में किराए पर रहता है. पुलिस ने मनोज के मकान पर दबिश दी तो पता चला कि वह ताला लगा कर वहां से फरार था.

एसपी (सिटी) कुमार रणविजय सिंह व सीओ राजेश कुमार ने वहां पर मनोज के बारे में जानकारी की तो पता चला कि कुछ माह पहले उस की पास के गांव गुरैठा में नाई की दुकान की थी. मनोज आपराधिक प्रवृत्ति का था. गुरैठा गांव के लोगों से अकसर उस का झगड़ा होता रहता था, जिस कारण उस ने अपनी नाई की दुकान बंद कर के मकानों की रंगाईपुताई के ठेके लेना शुरू कर दिया है. पुलिस को यह बात भी पता चली कि मृतक योगेश मनोज द्वारा लिए गए ठेकों में मजदूरी करता था. पुलिस को क्लू मिल चुका था, इसलिए पुलिस ने मनोज के तमाम ठिकानों पर दबिश दी तो वह पुलिस के पहुंचने से पहले गायब हो जाता था.

21 सितंबर रविवार की शाम को पुलिस हुड्डा तिराहे पर नाका लगा कर वाहनों की चैकिंग कर रही थी. तभी 2 व्यक्ति एक बाइक से आते दिखे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया तो उन्होंने बाइक की गति बढ़ा दी. जिस कारण बाइक फिसल कर गिर गई, लेकिन बाइक गिरने से पहले ही दोनों व्यक्ति कूद गए थे. जब पुलिस उन के पास पहुंचने वाली थी तो उन में से एक ने पुलिस पर फायर झोंक दिया. पुलिस ने अपने बचाव में फायर किए. गोली फायर करने वाले की टांग में लगी थी. वह कराह उठा.

फायर की आवाज सुनते ही चैकिंग कर रहे अन्य पुलिसकर्मी भी वहां पहुंच गए थे. पुलिस ने घेराबंदी कर दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने जब उन से उन के नाम व पते पूछे तो एक ने अपना नाम मनोज निवासी मोहल्ला सैनियों वाला मंदिर थाना पाकबड़ा और दूसरे ने अपना नाम मंजीत हाल निवासी एकता कालोनी थाना मझोला (मुरादाबाद) बताया.

पाकबड़ा पुलिस को जिस मनोज की तलाश थी, वही योगेश हत्याकांड का आरोपी था. अभियुक्त मंजीत को पुलिस थाना पाकबड़ा ले आई थी. मनोज पुलिस की गोली से घायल था, इसलिए उसे जिला अस्पताल में भरती करवा दिया. एसएसपी सतपाल अंतिल ने मनोज व मंजीत से योगेश की हत्या के विषय में पूछताछ की तो मनोज ने अपनी प्रेमिका स्वाति को पाने के लिए एक ऐसी साजिश रची, जिसे सुन कर पुलिस अफसरों के भी होश उड़ गए.

आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद एसएसपी ने 22 सितंबर, 2025 को आरोपी मंजीत और स्वाति को पुलिस लाइंस के सभागार में प्रैस कौन्फ्रेंस कर घटना का खुलासा किया. इस खुलासे में योगेश कुमार की हत्या के पीछे प्रेम संबंधों से लबालब एक दिलचस्प कहानी सामने आई. उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद से दिल्ली जाने वाले हाइवे पर करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित है कस्बा पाकबड़ा. इसी थानाक्षेत्र के गांव गुरैठा में रहता था मनोज. वैसे मनोज मूलरूप से जिला बदायूं के गांव खेड़ादास का रहने वाला है. वह शुरू से ही आपराधिक प्रवृत्ति का है. थाना फैजगंज बेहटा, बदायूं में उस पर लूट, हत्या के करीब आधा दरजन मामले दर्ज हैं.

आए दिन पुलिस उसे परेशान करती थी, इसलिए वह अपने गांव से कुछ साल पहले पाकबड़ा कस्बे में राजेश दिवाकर के मकान में किराए पर रहने लगा. मनोज बाल काटने का काम जानता था. थाना पाकबड़ा के अंतर्गत गांव गुरैठा में मनोज ने बाल काटने का सैलून खोल लिया था. बराबर के ही गांव के निवासी शोभाराम की परचून की दुकान थी. शोभाराम के 2 बेटे गौरव व कपिल और एक बेटी स्वाति थी. अकसर शोभाराम की बेटी स्वाति भी परचून की दुकान पर अपने पापा का हाथ बंटाती थी. शातिर मनोज जब स्वाति को दुकान पर बैठे देखता तो वह अकसर सामान खरीदने के बहाने उस की दुकान पर आ धमकता था.

मनोज ने अपनी लच्छेदार बातों से स्वाति से नजदीकियां बढ़ा ली थीं. ज्यादातर समय अब स्वाति परचून की दुकान पर ही बिताती थी. मनोज व स्वाति में नैनमटक्का का खेल शुरू हो गया था. यानी दोनों एकदूसरे को दिल दे चुके थे. फिर एक दिन मौका पा कर उन्होंने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं. स्वाति तो मनोज के प्यार में ऐसी दीवानी हो गई थी कि वह अकसर रात के खाने में अपने फेमिली वालों को नींद की गोलियां डाल कर खिला देती थी. जब सब गहरी नींद में सो जाते तो वह अपने प्रेमी को घर बुला कर पूरी रात मौजमस्ती करती. सुबह होने के पहले ही मनोज स्वाति के घर से निकल कर अपनी दुकान में चला जाता था.

कहते हैं कि इश्क और मुश्क कभी छिपाए नहीं छिपते. यह बात इन के साथ भी चरितार्थ हुई. किसी तरह स्वाति के फेमिली वालों को जब सच्चाई पता लगी तो स्वाति के भाई गौरव ने स्वाति की पिटाई कर दी. इतना ही नहीं, उस के बाहर आनेजाने पर भी रोक लगा दी. उधर घटना से एक महीने पहले स्वाति के भाई गौरव ने मनोज की भी पिटाई कर दी थी. गौरव व गांव वालों ने मनोज को यह हिदायत दी थी कि तू बाहर का रहने वाला है, हमारी बहनबेटियों के साथ गंदी हरकत करता है. उन्होंने उस से साफ शब्दों में कहा कि दुकान बंद कर के यहां से चला जाए, वरना खैर नहीं.

इस धमकी के बाद मनोज ने  दुकान बंद कर दी थी. वह कहीं और किसी दूसरे गांव में सैलून खोलने की सोच रहा था. मनोज बेरोजगार हो गया था. वह रंगाईपुताई का काम भी जानता था. पाकबड़ा दिल्लीमुरादाबाद हाइवे के किनारे पर स्थित है. यहां बड़ीबड़ी एक्सपोर्ट फर्म हैं, बड़ीबड़ी शिक्षण संस्थाए भी हैं. मुरादाबाद विकास प्राधिकरण की कई कालोनियां भी हैं. बहुत बड़ा इलाका आबादी में तब्दील हो चुका है. इसलिए यहां काम की कोई कमी नहीं है.

हाईस्कूल तक पढ़ा मनोज अब मकानों की पुताईरंगाई के ठेके लेने लगा और खुद भी रंगाईपुताई का कारीगर था. गांव गुरैठा निवासी योगेश भी इस के साथ काम करता था. अकसर स्वाति से मिलने के बहाने वह योगेश के घर आताजाता था. फेमिली वालों ने स्वाति पर घर से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा रखी थी. स्वाति व मनोज को एकदूसरे से संपर्क करने का एकमात्र साधन मोबाइल ही था. अकसर स्वाति व मनोज फोन पर घंटों बातें करते थे. यह बात स्वाति के फेमिली वालों को पता नहीं थी. वे तो यही समझ रहे थे कि अब स्वाति मनोज को भूल चुकी है. उन्होंने उस पर ज्यादा ध्यान देना बंद कर दिया था.

स्वाति पर गांव के बाहर आनेजाने पर पाबंदी जरूर थी, लेकिन वह अपने प्रेमी के लगातार संपर्क में थी. मनोज व स्वाति प्यार के लिए तरस रहे थे. आपस में मिलन की सारी योजना जब विफल हो गई तो स्वाति ने एक खतरनाक योजना बना डाली. वह अपने प्रेमी मनोज से बोली, ”क्यों न तुम मेरे पापा और भाइयों को हमेशा के लिए खत्म कर दो.’’

मनोज उस की इस सलाह को टाल गया था. उस ने स्वाति को भरोसा दिया कि वह एक ऐसा प्लान बनाएगा कि इतना खूनखराबा नहीं करना पड़ेगा. शातिर मनोज ने क्राइम सीरियल देख कर एक अलग योजना बनाई. फिर उस ने स्वाति से कहा, ”हम ने एक योजना बनाई कि हम गांव के किसी भी व्यक्ति की हत्या कर देंगे. उस हत्या का इलजाम तुम्हारे पापा शोभाराम, भाई गौरव व कपिल पर लग जाएगा. ऐसा में खुद करूंगा. इन तीनों को जेल जाने से कोई नहीं बचा सकता. इन के जेल जाने के बाद हमारे प्यार में कोई रुकावट नहीं रहेगी.’’

स्वाति व मनोज ने इस प्लान को अंजाम देने की ठान ली थी. मनोज ने अपनी इस योजना में अपने ममेरे भाई मंजीत को भी शामिल कर लिया था. वह थाना मझोला के मोहल्ला एकता कालोनी में रहता था. गुरैठा गांव निवासी योगेश सीधासादा व एक गरीब परिवार का था. मनोज व योगेश अकसर रंगाईपुताई का काम साथसाथ करते थे. उन का उठनाबैठना और खानपान भी साथसाथ चलता था. मनोज ने अपने ममेरे भाई मंजीत से कहा कि योगेश जब मुरादाबाद से काम के बाद शाम को अपने घर गुरैठा गांव लौटता है तो वह अकसर ड्रिंक किए होता है. उस के आनेजाने का समय भी मनोज को पता था. योगेश अकसर गांगन नदी वाले रास्ते से अपने गांव गुरैठा लौटता था.

योजना के मुताबिक 17 सितंबर, 2025 की शाम को मनोज व ममेरा भाई मंजीत दोनों ने योगेश को काम पर जाते देख लिया. वे शाम को गांगन नदी किनारे सड़क पर योगेश के आने का कई घंटे से इंतजार कर रहे थे. शाम करीब 7 बजे योगेश साइकिल से आता दिखाई दिया. मनोज व मंजीत ने योगेश को रोक लिया. मनोज बोला एक पार्टी से पेमेंट ले कर आ रहे हैं. मनोज ने योगेश से कहा कि इसी खुशी में आज की पार्टी मेरी तरफ से. तभी योगेश ने कहा, ”यार, मैं तो आधा क्वार्टर लिए हुए हूं.’’

”आधे से क्या होता है,’’ मनोज बोला.

”थोड़ीथोड़ी और ले लेते हैं. तीनों पी लेंगे.’’

योगेश उन की बातों में आ गया. तीनों वहां से दिल्ली हाइवे पर आ गए. मंगूपुरा के पेट्रोल पंप पर मनोज ने योगेश की साइकिल खड़ी करवा दी. पेट्रोल पंप के सामने ही देशी शराब का ठेका था. मनोज ने मंजीत को पैसे दे कर मंजीत से शराब मंगा ली. उस के बाद योगेश ने अपनी साइकिल उठाई, जबकि मनोज व मंजीत बाइक पर थे. तीनों धीरेधीरे एमडीए कालोनी होते हुए महा कालेश्वर मंदिर के पास से हर्बल पार्क जाने वाले रास्ते पर खड़े हो गए. मनोज ने योगेश को और पैसे दे कर नमकीन का पाउच लाने भेज दिया.

मंजीत ने अपने साथ लाए 3 डिस्पोजल गिलासों में पैग बना दिए. एक गिलास में मनोज ने अपने साथ लाई नींद की गोली के पत्ते से नींद की 7 गोलियां योगेश के क्वार्टर में डाल दीं. फिर उसे अंगुली से घोल दीं. इतनी देर में योगेश नमकीन ले कर लौटा तो मनोज बोला, ”सड़क पर आवाजाही हो रही है. हम तो पी चुके, तू भी पी ले.’’

इतना सुनते ही योगेश ने गिलास को एक सांस में खाली कर दिया. इस के बाद मनोज ने उसे एक और हैवी पैग पिला दिया. इस के बाद योगेश को नशा कुछ ज्यादा ही हो गया था. मनोज ने योगेश को अपनी बाइक पर बैठाया. मंजीत योगेश की साइकिल से चलने लगा. एक किलोमीटर जाने के बाद अंधेरे में योगेश को नीचे लिटा दिया. दोनों ने योगेश की साइकिल नीचे ढलान पर ले जा कर गांगन नदी में फेंक दी. फिर दोनों वहां पर वापस आ गए, जहां पर योगेश बेहोशी की हालत में था.

बाइक मनोज चला रहा था. बीच में योगेश को बैठा कर पीछे योगेश को पकड़ कर मंजीत बैठ गया. तीनों जीरो पौइंट पुल के नीचे से बागड़ पर होते हुए मोढ़ा तैया गांव से एक किलोमीटर दूर कब्रिस्तान के बराबर में पहुंचे. योगेश को नशे की हालत में नीचे उतार लिया. मनोज योगेश के ऊपर बैठ गया, उस ने योगेश के हाथ दबा लिए. वह ममेरे भाई मंजीत से बोला कि पास पड़ी ईंट से इस का सिर कुचल दो. मंजीत ने जब पहला बार योगेश के सिर पर किया तो योगेश चीखा कि मुझे क्यों मार रहे हो? वह नशे में था.

जब मनोज ने देखा कि यह तो बोल रहा है तो मनोज ने योगेश का गला दबा दिया, जिस कारण उस की मौत हो गई. उस के बाद मनोज ने स्वाति को फोन किया, ”अपने भाई गौरव का मोबाइल नंबर दो.’’

तो स्वाति ने गौरव का मोबाइल नंबर मनोज को दे दिया. उस के बाद मनोज ने योगेश के मोबाइल से गौरव को फोन किया. गौरव ने वह कौल उठा ली. दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई तो गौरव ने कौलबैक की तो उधर से कोई उत्तर नहीं मिला. उस के बाद मनोज ने योगेश के फोन से पुलिस कंट्रोल रूम को कौल कर कहा, ”मेरा नाम योगेश है. गांव के निवासी शोभाराम, उस के 2 बेटे गौरव व कपिल मेरे साथ मारपीट कर रहे हैं. मैं घायल होने के बाद भी उन के चंगुल से छूट कर आप को बता रहा हूं. वे मुझे अंधेरे में खोज रहे हैं. पता है मोढ़ा तैया गांव के पास कब्रिस्तान.’’

सूचना मिलते ही पीआरवी वैन वहां पर गई जरूर, लेकिन वहां पर पुलिस को कोई नहीं मिला तो पुलिस वापस लौट आई थी. घटना को अंजाम देने के बाद मनोज व मंजीत वापस पाकबड़ा मनोज के घर आ गए थे. मनोज घटना को अंजाम देने के बाद घबरा रहा था. बोला, ”यार, यहां पर रहना खतरे से खाली नहीं है, चल तेरे कमरे पर चलते हैं.’’

फिर मनोज मंजीत के कमरे एकता विहार वाले कमरे पर आ कर सो गए थे. सुबह उठ कर मंजीत अपने काम पर चला गया था. वह पाकबड़ा में नसीम ज्वैलर्स के यहां काम करता था. मनोज अपने मूल घर गांव खेड़ादास थाना फैजगंज बेहटा जिला बदायूं चला गया था. पुलिस को पीआरवी वैन पर योगेश के फोन से गलत सूचना दी थी. थाना पुलिस ने उस आवाज की रिकौर्डिंग लखनऊ से मंगाई थी. पीआरवी वैन का संबंध लखनऊ से जुड़ा होता है. उक्त काल की रिकौर्डिंग मृतक योगेश के घर वालों को सुनाई तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि यह आवाज योगेश की नहीं है.

पुलिस ने हत्या की साजिश में शामिल मनोज की प्रेमिका स्वाति को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी मनोज, मंजीत व स्वाति को 22 सितंबर, 2025 सोमवार को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Love Story in Hindi

 

UP Crime : पति और प्रेमी नहीं समझे बीनू का दर्द

UP Crime : बीनू शर्मा को अपने घर और बच्चों की चिंता थी, तभी तो वह पति संजय शर्मा से शराब पीने को मना करती थी, लेकिन समझाने पर उसे मिला शारीरिक और मानसिक उत्पीडऩ. फिर बड़ी उम्मीद के साथ उस ने देहरी लांघ कर अनुज दुबे की तरफ कदम बढ़ाए. प्यार करते हुए उस को अपना सब कुछ समर्पित कर दिया. इस के बावजूद प्रेमी अनुज ने उस के साथ ऐसा छल किया कि…

अनुज दुबे बहुत बेचैन था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह बेवफा प्रेमिका बीनू शर्मा का क्या करे. क्योंकि वह उस से दूरी बना कर अशोक नाम के युवक के संपर्क में आ गई थी. इस बात को ले कर अनुज परेशान था. 11 मई, 2025 की रात 9 बजे अनुज ने बीनू को कौल लगाई और उसे बताया कि वह उस से मिलने आ रहा है. उसे कुछ जरूरी बात करनी है. बीनू इस का कुछ जवाब दे पाती, उस से पहले ही अनुज ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

लगभग एक घंटा बाद रात 10 बजे अनुज बीनू के घर आ गया. उस समय बीनू के बच्चे कमरे के बाहर बरामदे में तख्त पर सो रहे थे और पति संजय शर्मा काम पर गया था. संजय शर्मा एक होटल में काम करता था और रात 12 बजे के बाद ही घर लौटता था. अनुज ने कमरे में घुसते ही बीनू से कहा कि छत पर चलो, वहां एकांत में कुछ जरूरी बातें करनी है. इस पर बीनू ने पूछा कि छत पर ही क्यों? कमरे में बैठ कर भी तो बात कर सकते हैं. तब अनुज ने कहा कि यहां बच्चों के जाग जाने का खतरा है. वह उन की बातों में खलल डाल सकते हैं.

बीनू ने बुझे मन से अनुज की बात मान ली. फिर दोनों सीढिय़ों से छत पर पहुंचे. वहां दोनों बैठ कर बातें करने लगे. बातों ही बातों में अनुज ने बीनू के नए आशिक अशोक की चर्चा छेड़ दी. अशोक के नाम से बीनू भड़क गई और दोनो में गरमागरम बहस होने लगी. इसी बहस में अनुज को गुस्सा आ गया और उस ने बीनू को दबोच लिया. फिर चाकू से उस के गले व सिर पर कई प्रहार किए, जिस से उस का गला कट गया और खून बहने लगा. सिर से भी खून की धार बह निकली. कुछ देर तड़पने के बाद बीनू ने दम तोड़ दिया.

प्रेमिका बीनू की हत्या करने के बाद अनुज ने उस के शव को छत से नीचे खंडहर में फेंक दिया. इस के बाद अनुज ने बीनू का मोबाइल फोन अपने कब्जे में किया और चाकू को साथ ले कर फरार हो गया. इधर रात 12 बजे के बाद संजय शर्मा होटल से घर आया. उस समय वह नशे में था. उस ने एक नजर तख्त पर सो रहे बच्चों पर तो डाली, लेकिन पत्नी बीनू की तरफ उस का ध्यान ही नहीं गया. फिर वह चारपाई पर पसर गया.

सुबह 7 बजे बीनू की 10 वर्षीया बेटी जागी तो उस ने देखा कि पापा तो चारपाई पर सो रहे हैं, लेकिन मम्मी कमरे में नहीं है. उस ने तब अपने छोटे भाई शुभ को जगाया और मम्मी की तलाश में जुट गई. दोनों ने घर का कोनाकोना छान मारा, लेकिन मम्मी कहीं नहीं दिखी. बेटी ने सोचा कि मम्मी गरमी के कारण कहीं छत पर तो सोने नहीं चली गई. अत: भाई को साथ ले कर वह छत पर पहुंची. छत पर खून फैला देख कर दोनों घबरा गए. बेटी ने छत के नीचे झांक कर देखा तो मकान के पिछवाड़े खंडहर में उसे एक लाश दिखी.

बेटी को समझते देर नहीं लगी कि लाश उस की मम्मी की है. अत: दोनों भाईबहन रोने लगे. रोते हुए दोनों ज्योति शुक्ला के कमरे में पहुंचे. ज्योति भी इसी मकान में किराएदार थी और भूतल पर अपने पति सौरभ शुक्ला के साथ रहती थी. बीनू के बच्चे ज्योति को मौसी कह कर बुलाते थे. सुबहसुबह किराएदार के बच्चों को रोते देख कर मकान मालिक ज्योति ने पूछा, ”क्या बात है बच्चो, तुम दोनों रो क्यों रहे हो? क्या पापा ने मम्मी को मारापीटा है?’’

बेटी बोली, ”नहीं मौसी, पापा तो सो रहे हैं, लेकिन मम्मी घर में नहीं है. छत पर खून फैला है और मकान के पीछे खंडहर में एक लाश पड़ी है. लगता है किसी ने छत पर मम्मी की हत्या कर दी और लाश को छत से नीचे फेंक दिया है.’’

बच्ची की बात सुन कर ज्योति शुक्ला घबरा गई. उस ने दोनों बच्चों को पुचकारा, फिर बच्ची के पापा संजय शर्मा को झकझोर कर जगाया. इस के बाद ज्योति शुक्ला अपने पति सौरभ व बीनू के पति संजय के साथ मकान के पिछवाड़े पहुंची, जहां लाश पड़ी थी. लाश देखते ही सभी के मुंह से चीख निकल पड़ी. क्योंकि वह लाश संजय शर्मा की पत्नी बीनू शर्मा की ही थी. ज्योति शुक्ला ने सूचना थाना चौबेपुर पुलिस को दी.

सूचना के मुताबिक हत्या की यह घटना कानपुर जिले के चौबेपुर कस्बा के ब्रह्मïनगर मोहल्ले में घटित हुई थी. अत: थाना चौबेपुर के एसएचओ राजेंद्र कांत शुक्ला सूचना मिलते ही सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन की सूचना पर डीसीपी (वेस्ट) दिनेशचंद्र त्रिपाठी तथा एसीपी अमरनाथ यादव भी मौकाएवारदात पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

पुलिस अधिकारियों ने जांच शुरू की तो पता चला कि मृतका का नाम बीनू शर्मा है, जो इस मकान में अपने पति संजय शर्मा व 3 बच्चों के साथ रहती थी. बीनू की हत्या किसी नुकीली चीज से गोद कर बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले व सिर पर गहरे घाव थे. हत्या छत पर की गई थी, फिर शव को छत से नीचे फेंका गया था. मृतका की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. मृतका का मोबाइल फोन भी गायब था. फोरैंसिक टीम ने भी छत से ले कर खंडहर तक बारीकी से जांच की और सबूत जुटाए.

घटनास्थल पर मृतका की मां लक्ष्मी देवी भी मौजूद थी. वह बेटी के शव के पास सुबक रही थी. डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने जब उन से पूछताछ की तो वह फफक पड़ी, ”साहब, हमारी बेटी की हत्या हमारे दामाद संजय शर्मा ने की है. वह आदमी नहीं दानव है. वह शराब का लती है. मेरी बेटी को मारतापीटता था. उस की प्रताडऩा से वह मायके आ जाती थी. लेकिन माफी मांग कर बेटी को साथ ले जाता था. बीती रात वह नशे में आया होगा. बेटी के टोकने पर मारापीटा होगा और हत्या कर दी होगी. हुजूर, उसे गिरफ्तार कर लो. उसे फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए.’’

चूंकि लक्ष्मी के आरोप गंभीर थे, अत: डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी के आदेश पर मृतका बीनू के पति संजय शर्मा को इंसपेक्टर राजेंद्र कांत शुक्ला ने हिरासत में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने संजय शर्मा के कपड़ों व हाथों का बेंजाडीन टेस्ट किया तो खून के धब्बे पाए गए. सबूत मिलने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

एसीपी अमरनाथ यादव ने मृतका की बेटी तथा किराएदार ज्योति शुक्ला से भी पूछताछ की. बेटी ने बताया कि बीती रात 8 बजे मम्मी ने खाना बनाया था. फिर हम सब ने खाना खाया. उस के बाद हम तीनों भाईबहन तख्त पर सो गए. सुबह आंखें खुलीं तो मम्मी घर में नहीं थी. हम उन्हें खोजते छत पर गए. वहां खून फैला था. छत से नीचे झांका तो खंडहर में मम्मी की लाश पड़ी थी. हम ने ज्योति मौसी को बताया. मौसी ने पापा को जगाया और पुलिस को सूचना दी. मम्मी की हत्या किस ने की, उसे इस बारे में कुछ भी नहीं पता.

किराएदार ज्योति शुक्ला ने बताया कि संजय अपनी पत्नी बीनू को प्रताडि़त करता था. कभीकभी उस की चीखें कानों में पड़ती थीं तो वह उसे बचाने उस के कमरे में जाती थी और संजय को डांटती थी. लेकिन संजय बीनू की हत्या कर देगा, ऐसा उस ने कभी नहीं सोचा था. आज सुबह बच्चे रोते हुए आए थे और मम्मी की हत्या की बात बताई थी. उस के बाद वह उन के साथ गई थी. फिर पुलिस को सूचित किया था. घटनास्थल का निरीक्षण और पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल माती भिजवा दिया. संजय शर्मा को थाना चौबेपुर लाया गया.

थाने में जब पुलिस अधिकारियों ने संजय शर्मा से बीनू की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो संजय ने यह बात स्वीकार की कि वह बीनू को प्रताडि़त करता था, लेकिन इस बात से साफ इंकार कर दिया कि उस ने बीनू की हत्या की है. पुलिस ने कई राउंड में संजय से पूछताछ की और हर हथकंडा अपनाया, लेकिन संजय ने बीनू की हत्या का जुर्म स्वीकार नहीं किया. हर राउंड की पूछताछ में संजय एक ही बात कहता कि उस ने हत्या नहीं की.

संजय शर्मा के खिलाफ हत्या के पर्याप्त सबूत थे. बेंजाडीन टेस्ट में भी हाथों व कपड़ों पर खून के सबूत मिले थे. लेकिन वह हत्या से इंकार कर रहा था. हालांकि अभी तक पुलिस आलाकत्ल भी बरामद नहीं कर पाई थी. इसलिए पुलिस के मन में भी संदेह पैदा होने लगा था कि कहीं हत्यारा कोई और तो नहीं. इस संदेह को दूर करने के लिए डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने एक बार फिर संजय से पूछताछ की, ”संजय, यदि तुम ने बीनू की हत्या नहीं की तो तुम्हारे हाथों व कपड़ों पर खून के धब्बे कैसे पड़े?’’

”सर, सुबह मैं बीनू के शव के पास गया था. यह जानने के लिए कि कहीं उस की सांसें चल तो नहीं रही हैं. इसी आस में हम ने उस के शव को हिलायाडुलाया था, तभी हाथ व कपड़ों पर खून लग गया होगा. यही बेंजाडीन टेस्ट में आ गया. मैं निर्दोष हूं.’’

”तुम निर्दोष हो तो तुम्हारी पत्नी बीनू का हत्यारा कौन है?’’ डीसीपी ने संजय से पूछा.

”सर, मैं यकीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन मुझे शक है कि बीनू की हत्या में अनुज दुबे का हाथ हो सकता है.’’

”यह अनुज दुबे कौन है?’’ डीसीपी दिनेशचंद्र त्रिपाठी ने पूछा.

”सर, अनुज दुबे रौतेपुर गांव का रहने वाला है. किराएदार ज्योति शुक्ला का पति सौरभ शुक्ला भी रौतेपुर गांव का निवासी है. सौरभ और अनुज गहरे दोस्त हैं. अनुज का सौरभ के घर आनाजाना था. सौरभ के घर आतेजाते अनुज की बुरी नजर मेरी पत्नी पर पड़ी. उस ने उसे प्रेमजाल में फंसा लिया. दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. हम ने बीनू को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी.

”इधर बीते कुछ दिनों से दोनों के बीच किसी बात को ले कर मनमुटाव हो गया था, जिस से अनुज का आनाजाना कम हो गया था. सर, मुझे शक है कि बीती रात अनुज घर आया होगा. गरमी के कारण दोनों छत पर बतियाने गए होंगे. फिर वहीं अनुज ने बीनू की हत्या कर दी होगी.’’

अनुज दुबे संदेह के घेरे में आया तो पुलिस ने उस के खिलाफ साक्ष्य जुटाने के लिए बीनू और अनुज दुबे के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि बीनू के मोबाइल फोन पर अनुज की ही आखिरी कौल रात 9 बजे आई थी. रात 11 बजे तक बीनू और अनुज के फोन की लोकेशन बीनू के घर की थी. उस के बाद 11:52 पर बीनू का फोन बंद हुआ था. उस समय उस के फोन की लोकेशन रौतेपुर गांव के पास थी. इस से साफ हो गया कि अनुज फोन कर बीनू के घर रात 10 बजे के आसपास आया, फिर बीनू की हत्या कर उस का फोन साथ ले कर गांव गया और फिर दोनों फोन बंद कर लिए.

पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ राजेंद्र कांत शुक्ला ने 13 मई की सुबह अपनी टीम के साथ रौतेपुर गांव में अनुज के घर छापा मारा और अनुज को दबोच लिया. उसे थाना चौबेपुर लाया गया. पुलिस अधिकारियों ने अनुज से बीनू की हत्या के बारे में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया और उस ने बीनू की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं, अनुज ने हत्या में प्रयुक्त चाकू व खून से सने कपड़े भी बरामद करा दिए, जो उस ने अपने गांव के बाहर झाडिय़ों में छिपा दिए थे.

मृतका बीनू का मोबाइल फोन जिसे अनुज ने तोड़ कर एक गड्ढे में फेंक दिया था. पुलिस ने उस फोन को भी बरामद कर लिया. साक्ष्य के तौर पर पुलिस ने बरामद सामान को सुरक्षित कर लिया. अनुज ने पुलिस को बताया कि वह बीनू से बहुत प्यार करता था. उस के प्यार में इतना डूब गया था कि उसे अपनी पत्नी मान बैठा था. उस के प्यार में उस ने शादी भी नहीं की. उस के सारे खर्च भी वही उठाता था, लेकिन प्यार में उसे धोखा मिला. बीनू उस का प्यार ठुकरा कर किसी और से प्यार करने लगी. प्रेमिका की बेवफाई उसे बरदाश्त नहीं हुई और उसे मार डाला. उसे बीनू की हत्या का कोई अफसोस नहीं है.

चूंकि अनुज ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल चाकू भी बरामद करा दिया था, अत: पुलिस ने मृतका के पति संजय शर्मा को निर्दोष मानते हुए थाने से जाने दिया. साथ ही मृतका की मां लक्ष्मी देवी की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत अनुज दुबे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पति व प्रेमी से प्रताडि़त महिला की सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक बड़ा व्यापारिक कस्बा है- चौबेपुर. यह कानपुर (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. इसी कस्बे से 2 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव गबड़हा. रामकिशन शर्मा का परिवार इसी गांव में रहता था. परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे संजय व अजय थे. रामकिशन की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. मेहनतमजदूरी कर किसी तरह वह परिवार का पालनपोषण करता था. समय बीतने के साथ दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी परिवार की सहायता करने लगे.

संजय जब शादी के लायक हो गया तो रामकिशन ने उस का ब्याह बीनू के साथ कर दिया. आकर्षक कदकाठी की छरहरी तथा गौरवर्ण वाली बीनू पचौर गांव के रमेश शर्मा की बेटी थी. 3 भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. संजय बीनू को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, उसे बिलकुल वैसी ही पत्नी मिली थी. बीनू की मोहक मुसकान, कजरारी आंखें एवं छरहरी काया का वह दीवाना हो गया था. समय हंसीखुशी से बीतता रहा. इस दौरान बीनू 3 बच्चों की मां बन गई. उस का घरआंगन किलकारियों से गूंजने लगा.

बच्चों के जन्म के बाद संजय की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने शहर कस्बा जा कर पैसा कमाने का फैसला किया. इस बारे में उस ने परिवार वालों से बात की तो वे भी राजी हो गए. अगले ही दिन उस ने अपना सामान समेटा और चौबेपुर कस्बा आ गया. यहां उस ने काम की तलाश शुरू की तो उसे कस्बे के जीटी रोड स्थित राही होटल में वेटर का काम मिल गया. वह अन्य कर्मचारियों के साथ होटल में ही रहने लगा. वेटरों के बीच अकसर शराब पीनेपिलाने का दौर भी चलता था. संजय भी उन के साथ पीता था. धीरेधीरे वह शराब का लती बन गया.

संजय जब कमाने लगा तो उस ने चौबेपुर कस्बे के ब्रह्मïनगर मोहल्ले में एक कमरा किराए पर ले लिया. उस के बाद पत्नी व बच्चों को भी ले आया. किराए के इस मकान में बीनू के 2 साल हंसीखुशी से बीते. उस के बाद दोनों के बीच तकरार होने लगी. तकरार का पहला कारण था- संजय का शराब पी कर घर आना. बीनू शराब पी कर घर आने को मना करती तो वह गालीगलौज करता और बीनू की पिटाई करता. तकरार का दूसरा कारण था- आर्थिक अभाव. बीनू बच्चों व घर खर्च के लिए पैसे मांगती तो वह मना कर देता. जोर देने पर बीनू की धुनाई कर देता.

पति की प्रताडऩा से बीनू परेशान रहने लगी थी. उसे जब अधिक पीड़ा महसूस होती तो वह मायके चली जाती, लेकिन संजय वहां भी पहुंच जाता और हाथपैर जोड़ तथा माफी मांग कर बीनू को ले आता. एकदो माह उस का रवैया ठीक रहता, उस के बाद वह बीनू को फिर प्रताडि़त करने लगता. बीनू यह सोच कर प्रताडऩा सहती कि पति आज नहीं तो कल वह सुधर जाएगा. फिर उस का भी जीवन सुधर जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दिनप्रतिदिन संजय की प्रताडऩा बढ़ती ही गई.

बीनू जिस मकान में किराएदार थी, उसी में ज्योति शुक्ला भी किराएदार थी. ज्योति अपने पति सौरभ शुक्ला के साथ भूतल पर रहती थी, जबकि बीनू पहली मंजिल पर रहती थी. बीनू बच्चों का मुंह देख कर दिन बिता रही थी और पति की प्रताडऩा सह रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार बीनू ज्योति के कमरे में चली जाती थी. वहीं एक रोज उस की मुलाकात हुई अनुज दुबे से. अनुज दुबे रौतेपुर गांव का रहने वाला था. ज्योति शुक्ला का पति सौरभ शुक्ला भी रौतेपुर गांव का था. अनुज और सौरभ बचपन के दोस्त थे. दोस्ती के नाते अनुज सौरभ के घर जबतब आता रहता था. अनुज के पिता की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. अनुज भी नौकरी करता था और खूब कमाता था.

ज्योति शुक्ला के घर अनुज व बीनू का आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे को देख कर पलक झपकाना भूल गए. जहां बीनू की आकर्षक देहयष्टि देख अनुज की आंखों में लालच के डोरे उतर आए, वहीं अनुज का खूबसूरत चेहरामोहरा एवं गठीले बदन से बीनू मंत्रमुग्ध सी हो गई थी. ज्योति ने दोनों का एकदूसरे से परिचय कराया तो अनुज ने जल्दी ही अपनी वाकपटुता से बीनू का दिल जीत लिया. बातचीत के दौरान अनुज की नजरें बीनू के जिस्म को तौलती रहीं. वह बारबार कनखियों से उस की तरफ देखता. बीनू की नजरें जब उस की नजरों से टकरातीं तो वह कामुक अंदाज से मुसकरा देता. उस की मुसकराहट से बीनू के दिलोदिमाग में हलचल मचनी शुरू हो गई थी.

दरअसल, बीनू पति की प्रताडऩा से ऊब चुकी थी. अत: जब अनुज की हमदर्दी उसे मिली तो वह उस की ओर आकर्षित हो गई. चूंकि चाहत दोनों तरफ से थी, इसलिए जल्द ही उन के बीच प्यार पनपने लगा. प्यार पनपा तो शारीरिक मिलन शुरू हो गया. बातचीत के लिए अनुज ने उसे एक फोन भी खरीद कर दे दिया. बीनू से अवैध रिश्ता बना तो अनुज उस की आर्थिक मदद करने लगा. उस के बच्चों का भी खयाल रखने लगा. बीनू उस की बाइक पर बैठ कर सैरसपाटे पर भी जाने लगी. बीनू का पति संजय शर्मा होटल में काम करता था. वह दोपहर 11 बजे घर से निकलता और फिर रात 12 बजे के बाद ही घर लौटता था.

पति संजय के होटल जाने के बाद अनुज बीनू के पास आ जाता. दोनों खूब हंसतेबोलते, बतियाते और फिर रंगरलियां मनाते. बीनू अब खुश रहने लगी थी. उस की पेट की और शारीरिक भूख पूरी होने लगी थी. अनुज इतना दीवाना बन गया था कि वह बीनू को अपनी जागीर समझने लगा था. लेकिन एक रोज उन के नाजायज रिश्तों का भांडा फूट गया. उस रोज संजय होटल गया तो था, लेकिन होटल किसी कारण बंद था, इसलिए वापस घर आ गया था. घर आ कर उस ने जो अनर्थ देखा, उस से उस का पारा चढ़ गया. कमरे में बीनू और अनुज हमबिस्तर थे. संजय ने उन्हें धिक्कारा तो कपड़े दुरुस्त कर अनुज तो भाग गया, लेकिन बीनू कहां जाती. उस ने बीनू की जम कर पिटाई की.

अभी तक घर में कलह मारपीट, शराब व आर्थिक परेशानी को ले कर होती थी. अब अनुज को ले कर बीनू का उत्पीडऩ शुरू हो गया था. एक रात पिटाई के दौरान बीनू का धैर्य टूट गया. वह पति से बोली, ”मारपीट कर तुम मुझे चोट पहुंचा सकते हो, लेकिन उस के प्यार को कम नहीं कर सकते. तुम ने कभी सोचा कि बच्चों का पेट भरा है या वह खाली पेट सो रहे हैं. उन के बदन पर कपड़ा है या नहीं. अनुज ने साथ न दिया होता तो मैं कब की बच्चों सहित सुसाइड कर लेती. इसलिए कान खोल कर सुन लो, मैं तुम्हारा साथ छोड़ सकती हूं, लेकिन अनुज का नहीं.’’

बीनू की धमकी से संजय डर गया. इस के बाद उस ने बीनू से टोकाटाकी बंद कर दी. हालांकि उस का उत्पीडऩ जारी रहा. बीनू अब स्वच्छंद रूप से अनुज के साथ घूमने लगी. दोनों के बीच रिश्ता भी कायम रहा. बीनू अनुज के साथ रंगरलियां जरूर मनाती थी, लेकिन कभीकभी उसे ग्लानि भी होती. वह सोचती कि अनुज से दिल लगा कर उस ने अच्छा नहीं किया. पति के साथ धोखा तो किया ही, बच्चों के भविष्य के बारे में भी नहीं सोचा. कल को उस की बेटी सयानी होगी और अनुज उस पर डोरे डालने लगा तो कैसे उसे रोक पाएगी. धीरेधीरे बीनू का प्यार फीका पडऩे लगा और वह अनुज से दूरियां बनाने लगी.

बीनू को मोबाइल फोन चलाने का शौक था. वह फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाती थी. इंस्टाग्राम के माध्यम से उस की दोस्ती अशोक नाम के युवक से हुई. दोस्ती प्यार में बदली और दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई. अशोक से प्यार हुआ तो बीनू अनुज की उपेक्षा करने लगी. अनुज पिछले कई महीने से महसूस कर रहा था कि जब भी वह अपनी प्रेमिका बीनू के घर उस से मिलने जाता है तो वह उस की उपेक्षा करती है. पहले जब वह बीनू के घर जाता था तो वह उस से खूब हंसती, बोलती और बतियाती थी. आवभगत करती थी. लेकिन अब आते ही उस का चेहरा लटक जाता है. न हंसती और न बतियाती है.

बीनू की जुबान में अब कड़वाहट भी आ गई थी. आवभगत करना तो जैसे वह भूल ही गई थी. अनुज की समझ में नहीं आ रहा था कि बीनू के स्वभाव में यह परिवर्तन क्यों और कैसे आया? आखिर एक रोज इस राज का परदाफाश हो ही गया. उस रोज अनुज बीनू से मिलने आया तो वह बाथरूम में नहा रही थी. अनुज कमरे में जा कर पलंग पर बैठ गया. उसी समय उस की नजर बीनू के मोबाइल फोन पर पड़ी, जो पलंग पर तकिए के पास रखा था. अनुज ने उत्सुकतावश बीनू का फोन उठा लिया और चैक करने लगा. अनुज जैसेजैसे मोबाइल फोन चैक करता गया, वैसेवैसे उस के माथे पर बल पड़ते गए.

बीनू का मोबाइल फोन खंगालने के बाद अनुज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि बीनू ने इंस्टाग्राम के जरिए किसी अशोक नाम के युवक से दोस्ती गांठ ली थी. दोनों के बीच चैटिंग होती थी. बीनू का इंस्टाग्राम पर अकाउंट था. उस ने एक जगह लिखा था, ‘तुम ने तो 2 बूंद ही मांगी थी, हम ने तो समंदर ही लुटा दिया.’ इस का मतलब था कि दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन चुका था. फोन में दोनों के अश्लील फोटो भी मौजूद थे. अनुज अब समझ गया था कि बीनू ने उसे दिल से क्यों निकाल फेंका है. क्योंकि उस ने नए आशिक अशोक को दिल में बसा लिया है. इसी कारण उस के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है.

कुछ देर बाद बीनू बाथरूम से निकली तो कमरे में बैठे अनुज को देख कर सकपका गई. फिर गुस्से से बोली, ”अनुज, तुम्हें फोन कर के आना चाहिए था. इस तरह किसी के घर आना अच्छी बात नहीं. आइंदा इस बात का खयाल रखना.’’

”मैं कोई पहली बार तो तुम्हारे घर आया नहीं. इस के पहले भी बेधड़क आताजाता रहा हूं. तब तो तुम ने कभी टोकाटाकी नहीं की.’’ अनुज ने बीनू की बात का जवाब दिया. कुछ देर कमरे में सन्नाटा पसरा रहा. फिर अनुज ने बीनू के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ”बीनू, यह अशोक कौन है? इस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

अशोक का नाम सुनते ही बीनू अंदर ही अंदर घबरा गई. वह जान गई कि अनुज ने उस का मोबाइल फोन खंगाला है. फिर भी वह संभलते हुए बोली, ”अशोक मेरा दूर का रिश्तेदार है. हम दोनों की इंस्टाग्राम के जरिए से दोस्ती हुई थी.’’

”सिर्फ दोस्ती या फिर नाजायज रिश्ता भी है.’’ अनुज ने कटाक्ष किया.

”तुम मुझ पर लांछन लगा कर अपनी हद पार कर रहे हो अनुज,’’ बीनू भी भड़क उठी.

”मैं अपनी हद पार नहीं कर रहा हूं, बल्कि सच्चाई बयां कर रहा हूं. मोबाइल फोन में मौजूद अश्लील फोटो और चैटिंग इस बात का सबूत है कि तुम दोनों के बीच नाजायज रिश्ता है. इसी कारण तुम मेरी उपेक्षा करती हो.’’

पोल खुल जाने से बीनू डर गई थी. वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी, अत: धीमी आवाज में बोली, ”अनुज, तुम्हें जो समझना है, समझो. मैं तुम्हारा शक तो दूर नहीं कर सकती.’’

उस दिन बहस के बाद अनुज घर चला तो गया, लेकिन उस के बाद उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई. उसे प्रेमिका बीनू की बेवफाई रास नहीं आई. वह सोचता कि जिस के लिए उस ने अपना तन, मन, धन सब न्यौछावर कर दिया, वही बेवफा बन गई, जिस को वह प्रेमिका की जगह पत्नी मानने लगा, जिसे वह अपनी जागीर समझने लगा, जिस के लिए उस ने शादी भी नहीं की. उसी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. ऐसी बेवफा प्रेमिका को वह कभी माफ नहीं करेगा. उसे उस की बेवफाई की सजा जरूर मिलेगी. वह उस की न हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

इस के बाद अनुज ने अपनी प्रेमिका बीनू की हत्या का प्लान बनाया. प्लान के मुताबिक वह चौबेपुर बाजार गया और एक तेज धार वाला चाकू खरीदा और उसे अपने पास सुरक्षित रख लिया. फिर योजनानुसार उस की हत्या कर दी. अनुज से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 14 मई, 2025 को अनुज को कानपुर (देहात) की माती कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मृतका के बच्चे नानी लक्ष्मी के साथ रह रहे थे.

 

 

Stories in Hindi Love : दिल के मरीज डौक्टर की हैवानियत – बेरहम एकतरफा प्यार

Stories in Hindi Love : बीते 19 अगस्त की बात है. उत्तर प्रदेश पुलिस को सूचना मिली कि आगरा फतेहाबाद हाईवे पर बमरोली कटारा के पास सड़क किनारे एक महिला की लाश पड़ी है. यह जगह थाना डौकी के क्षेत्र में थी. कंट्रोल रूप से सूचना मिलते ही थाना डौकी की पुलिस मौके पर पहुंच गई. मृतका लोअर और टीशर्ट पहने थी. पास ही उस के स्पोर्ट्स शू पड़े हुए थे. चेहरेमोहरे से वह संभ्रांत परिवार की पढ़ीलिखी लग रही थी, लेकिन उस के कपड़ों में या आसपास कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. युवती की उम्र 25-26 साल लग रही थी.

पुलिस ने शव को उलटपुलट कर देखा. जाहिरा तौर पर उस के सिर के पीछे चोट के निशान थे. एकदो जख्म से भी नजर आए. युवती के हाथ में टूटे हुए बाल थे. हाथ के नाखूनों में भी स्कीन फंसी हुई थी. साफतौर पर नजर आ रहा था कि मामला हत्या का है, लेकिन हत्या से पहले युवती ने कातिल से अपनी जान बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. मौके पर शव की शिनाख्त नहीं हो सकी, तो डौकी पुलिस ने जरूरी जांच पड़ताल के बाद युवती की लाश पोस्टमार्टम के लिए एमएम इलाके के पोस्टमार्टम हाउस भेज दी. डौकी थाना पुलिस इस युवती की शिनाख्त के प्रयास में जुट गई.

उसी दिन सुबह करीब साढ़े 9 बजे दिल्ली के शिवपुरी पार्ट-2, दिनपुर नजफगढ़ निवासी डाक्टर मोहिंदर गौतम आगरा के एमएम गेट पुलिस थाने पहुंचे. उन्होंने अपनी बहन डाक्टर योगिता गौतम के अपहरण की आशंका जताई और डाक्टर विवेक तिवारी पर शक व्यक्त करते हुए पुलिस को एक तहरीर दी. डाक्टर मोहिंदर ने पुलिस को बताया कि डाक्टर योगिता आगरा के एसएन मेडिकल कालेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही है. वह नूरी गेट में गोकुलचंद पेठे वाले के मकान में किराए पर रहती है.

कल शाम यानी 18 अगस्त की शाम करीब सवा 4 बजे डाक्टर योगिता ने दिल्ली में घर पर फोन कर के कहा था कि डाक्टर विवेक तिवारी उसे बहुत परेशान कर रहा है. उस ने डाक्टरी की डिगरी कैंसिल कराने की भी धमकी दी है. फोन पर डाक्टर योगिता काफी घबराई हुई थी और रो रही थी. पुलिस ने डाक्टर मोहिंदर से डाक्टर विवेक तिवारी के बारे में पूछा कि वह कौन है? डा. मोहिंदर ने बताया कि डा. योगिता ने 2009 में मुरादाबाद के तीर्थकर महावीर मेडिकल कालेज में प्रवेश लिया था. मेडिकल कालेज में पढ़ाई के दौरान योगिता की जान पहचान एक साल सीनियर डा. विवेक से हुई थी.

डाक्टरी करने के बाद विवेक को सरकारी नौकरी मिल गई. वह अब यूपी में जालौन के उरई में मेडिकल औफिसर के पद पर तैनात है. डा. विवेक के पिता विष्णु तिवारी पुलिस में औफिसर थे. जो कुछ साल पहले सीओ के पद से रिटायर हो गए थे. करीब 2 साल पहले हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई थी. डा. मोहिंदर ने पुलिस को बताया कि डा. विवेक तिवारी डा. योगिता से शादी करना चाहता था. इस के लिए वह उस पर लगातार दबाव डाल रहा था. जबकि डा. योगिता ने इनकार कर दिया था. इस बात को लेकर दोनों के बीच काफी दिनों से झगड़ा चल रहा था. डा. विवेक योगिता को धमका रहा था.

नहीं सुनी पुलिस ने

पुलिस ने योगिता के अपहरण की आशंका का कारण पूछा, तो डा. मोहिंदर ने बताया कि 18 अगस्त की शाम योगिता का घबराहट भरा फोन आने के बाद मैं, मेरी मां आशा गौतम और पिता अंबेश गौतम तुरंत दिल्ली से आगरा के लिए रवाना हो गए. हम रात में ही आगरा पहुंच गए थे. आगरा में हम योगिता के किराए वाले मकान पर पहुंचे, तो वह नहीं मिली. उस का फोन भी रिसीव नहीं हो रहा था.

डा. मोहिंदर ने आगे बताया कि योगिता के नहीं मिलने और मोबाइल पर भी संपर्क नहीं होने पर हम ने सीसीटीवी फुटेज देखी. इस में नजर आया कि डा. योगिता 18 अगस्त की शाम साढ़े 7 बजे घर से अकेली बाहर निकली थी. बाहर निकलते ही उसे टाटा नेक्सन कार में सवार युवक ने खींचकर अंदर डाल लिया. डा. मोहिंदर ने आरोप लगाया कि सारी बातें बताने के बाद भी पुलिस ने ना तो योगिता को तलाशने का प्रयास किया और ना ही डा. विवेक का पता लगाने की कोशिश की. पुलिस ने डा. मोहिंदर से अभी इंतजार करने को कहा.

जब 2-3 घंटे तक पुलिस ने कुछ नहीं किया, तो डा. मोहिंदर आगरा में ही एसएन मेडिकल कालेज पहुंचे. वहां विभागाध्यक्ष से मिल कर उन्हें अपना परिचय दे कर बताया कि उन की बहन डा. योगिता लापता है. उन्होंने भी पुलिस के पास जाने की सलाह दी. थकहार कर डा. मोहिंदर वापस एमएम गेट पुलिस थाने आ गए और हाथ जोड़कर पुलिस से काररवाई करने की गुहार लगाई. शाम को एक सिपाही ने उन्हें बताया कि एक अज्ञात युवती का शव मिला है, जो पोस्टमार्टम हाउस में रखा है. उसे भी जा कर देख लो.

मन में कई तरह की आशंका लिए डा. मोहिंदर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे. शव देख कर उन की आंखों से आंसू बहने लगे. शव उन की बहन डा. योगिता का ही था. मां आशा गौतम और पिता अंबेश गौतम भी नाजों से पाली बेटी का शव देख कर बिलखबिलख कर रो पड़े. शव की शिनाख्त होने के बाद यह मामला हाई प्रोफाइल हो गया. महिला डाक्टर की हत्या और इस में पुलिस अधिकारी के डाक्टर बेटे का हाथ होने की संभावना का पता चलने पर पुलिस ने कुछ गंभीरता दिखाई और भागदौड़ शुरू की.

आगरा पुलिस ने जालौन पुलिस को सूचना दे कर उरई में तैनात मेडिकल आफिसर डा. विवेक तिवारी को तलाशने को कहा. जालौन पुलिस ने सूचना मिलने के 2 घंटे बाद ही 19 अगस्त की रात करीब 8 बजे डा. विवेक को हिरासत में ले लिया. जालौन पुलिस ने यह सूचना आगरा पुलिस को दे दी. जालौन पुलिस उसे हिरासत में ले कर एसओजी आफिस आ गई. जालौन पुलिस ने उस से आगरा जाने और डा. योगिता से मिलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बिफर गया. उस ने कहा कि कोरोना संक्रमण की वजह से वह क्वारंटीन में है.

विवेक तिवारी बारबार बयान बदलता रहा. बाद में उस ने स्वीकार किया कि वह 18 अगस्त को आगरा गया था और डा. योगिता से मिला था. विवेक ने जालौन पुलिस को बताया कि वह योगिता को आगरा में टीडीआई माल के बाहर छोड़कर वापस उरई लौट आया था. आगरा पुलिस ने रात करीब 11 बजे जालौन पहुंचकर डा. विवेक को हिरासत में ले लिया. उसे जालौन से आगरा ला कर 20 अगस्त को पूछताछ की गई. पूछताछ में वह पुलिस को लगातार गुमराह करता रहा. पुलिस ने उस की काल डिटेल्स निकलवाई, तो पता चला कि शाम सवा 6 बजे से उस की लोकेशन आगरा में थी. डा. योगिता से उस की शाम साढ़े 7 बजे आखिरी बात हुई थी.

इस के बाद रात सवा बारह बजे विवेक की लोकेशन उरई की आई. कुछ सख्ती दिखाने और कई सबूत सामने रखने के बाद उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई. आखिरकार उस ने डा. योगिता की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. बाद में पुलिस ने उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया. पुलिस ने 20 अगस्त को डाक्टरों के मेडिकल बोर्ड से डा. योगिता के शव का पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार डा. योगिता के शरीर से 3 गोलियां निकलीं. एक गोली सिर, दूसरी कंधे और तीसरी सीने में मिली. योगिता पर चाकू से भी हमला किया गया था. पोस्टमार्टम कराने के बाद आगरा पुलिस ने डा. योगिता का शव उस के मातापिता व भाई को सौंप दिया.

पूछताछ में डा. योगिता के दुखांत की जो कहानी सामने आई, वह डा. विवेक तिवारी के एकतरफा प्यार की सनक थी. दिल्ली के नजफगढ़ इलाके की शिवपुरी कालोनी पार्ट-2 में रहने वाले अंबेश गौतम नवोदय विद्यालय समिति में डिप्टी डायरेक्टर हैं. वह राजस्थान के उदयपुर शहर में तैनात हैं. डा. अंबेश के परिवार में पत्नी आशा गौतम के अलावा बेटा डा. मोहिंदर और बेटी डा. योगिता थी.

प्रतिभावान डाक्टर थी योगिता

योगिता शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल रहती थी. उस की डाक्टर बनने की इच्छा थी. इसलिए उस ने साइंस बायो से 12वीं अच्छे नंबरों से पास की. पीएमटी के जरिए उस का सलेक्शन मेडिकल की पढ़ाई के लिए हो गया. उस ने 2009 में मुरादाबाद के तीर्थंकर मेडिकल कालेज में एमबीबीएस में एडमिशन लिया.

इसी कालेज में पढ़ाई के दौरान योगिता की मुलाकात एक साल सीनियर विवेक तिवारी से हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. दोस्ती इतनी बढ़ी कि वे साथ में घूमनेफिरने और खानेपीने लगे. इस दोस्ती के चलते विवेक मन ही मन योगिता को प्यार करने लगा लेकिन योगिता की प्यारव्यार में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह केवल अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान देती थी. इसी दौरान 2-4 बार विवेक ने योगिता के सामने अपने प्यार का इजहार करने का प्रयास किया लेकिन उस ने हंस मुसकरा कर उस की बातों को टाल दिया.

योगिता के हंसनेमुस्कराने से विवेक समझ बैठा कि वह भी उसे प्यार करती है. जबकि हकीकत में ऐसा कुछ था ही नहीं. विवेक मन ही मन योगिता से शादी के सपने देखता रहा. इस बीच, विवेक को भी डाक्टरी की डिगरी मिल गई और योगिता को भी. बाद में डा. विवेक तिवारी को सरकारी नौकरी मिल गई. फिलहाल वह उरई में मेडिकल आफिसर के पद पर कार्यरत था. डा. विवेक मूल रूप से कानपुर का रहने वाला है. कानपुर के किदवई नगर के एन ब्लाक में उस का पैतृक मकान है. इस मकान में उस की मां आशा तिवारी और बहन नेहा रहती हैं. विवेक के पिता विष्णु तिवारी उत्तर प्रदेश पुलिस में अधिकारी थे. वे आगरा शहर में थानाप्रभारी भी रहे थे.

कहा जाता है कि पुलिस विभाग में विष्णु तिवारी का काफी नाम था. वे कानपुर में कई बड़े एनकाउंटर करने वाली पुलिस टीम में शामिल रहे थे. कुछ साल पहले विष्णु तिवारी सीओ के पद से रिटायर हो गए थे. करीब 2 साल पहले उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. मुरादाबाद से एमबीबीएस की डिगरी हासिल कर डा. योगिता आगरा आ गई. आगरा में 3 साल पहले उस ने एसएन मेडिकल कालेज में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए एडमिशन ले लिया. वह इस कालेज के स्त्री रोग विभाग में पीजी की छात्रा थी. वह आगरा में नूरी गेट पर किराए के मकान में रह रही थी.

इस बीच, डा. योगिता और विवेक की फोन पर बातें होती रहती थीं. कभीकभी मुलाकात भी हो जाती थी. डा. विवेक जब भी मिलता या फोन करता, तो अपने प्रेम प्यार की बातें जरूर करता लेकिन डा. योगिता उसे तवज्जो नहीं देती थी. दोनों के परिवारों को उन की दोस्ती का पता था. डा. विवेक के पास योगिता के परिजनों के मोबाइल नंबर भी थे. उस ने योगिता के आगरा के मकान मालिकों के मोबाइल नंबर भी हासिल कर रखे थे. कहा यह भी जाता है कि विवेक और योगिता कई साल रिलेशन में रहे थे.

पिछले कई महीनों से डा. विवेक उस पर शादी करने का दबाव डाल रहा था, लेकिन डा. योगिता ने इनकार कर दिया था. इस से डा. विवेक नाराज हो गया. वह उसे फोन कर धमकाने लगा. 18 अगस्त को विवेक ने योगिता को फोन कर शादी की बात छेड़ दी. योगिता के साफ इनकार करने पर उस ने धमकी दी कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा, उस की एमबीबीएस की डिगरी कैंसिल करा देगा. इस से डा. योगिता घबरा गई. उस ने दिल्ली में अपनी मां को फोन कर रोते हुए यह बात बताई. इसी के बाद योगिता के मातापिता व भाई दिल्ली से आगरा के लिए चल दिए थे.

योगिता को धमकाने के कुछ देर बाद डा. विवेक ने उसे दोबारा फोन किया. इस बार उस की आवाज में क्रोध नहीं बल्कि अपनापन था. उस ने कहा कि भले ही वह उस से शादी ना करे लेकिन इतने सालों की दोस्ती के नाम पर उस से एक बार मिल तो ले. काफी नानुकुर के बाद डा. योगिता ने आखिरी बार मिलने की हामी भर ली. उसी दिन शाम करीब साढ़े 7 बजे डा. विवेक ने योगिता को फोन कर के कहा कि वह आगरा आया है और नूरी गेट पर खड़ा है. घर से बाहर आ जाओ, आखिरी मुलाकात कर लेते हैं. योगिता बिना सोचेसमझे बिना किसी को बताए घर से अकेली निकल गई. यही उस की आखिरी गलती थी.

घर से बाहर निकलते ही नूरी गेट पर टाटा नेक्सन कार में सवार विवेक ने उसे कार का गेट खोल कर आवाज दी और तेजी से कार के अंदर खींच लिया. रास्ते में डा. विवेक ने योगिता से फिर शादी का राग छेड़ दिया, तो चलती कार में ही दोनों में बहस होने लगी. डा. विवेक उस से हाथापाई करने लगा. इसी हाथापाई में योगिता ने अपने हाथ के नाखूनों से विवेक के बाल खींचे और चमड़ी नोंची, तो गुस्साए विवेक ने उस का गला दबा दिया.

डा. विवेक योगिता को कार में ले कर फतेहाबाद हाईवे पर निकल गया. एक जगह रुक कर उस ने अपनी कार में रखा चाकू निकाला. चाकू से योगिता के सिर और चेहरे पर कई वार किए. इतने पर भी विवेक का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो उस ने योगिता के सिर, कंधे और छाती में 3 गोलियां मारीं. यह रात करीब 8 बजे की घटना है.

हत्या कर के रातभर सक्रिय रहा विवेक

इस के बाद योगिता के शव को बमरौली कटारा इलाके में सड़क किनारे एक खेत में फेंक दिया. पिस्तौल भी रास्ते में फेंक दी. रात में ही वह उरई पहुंच गया. रात को ही वह उरई से कानपुर गया और अपनी कार घर पर छोड़ आया. दूसरे दिन वह वापस उरई आ गया. बाद में पुलिस ने कानपुर में डा. विवेक के घर से वह कार बरामद कर ली. यह कार 2 साल पहले खरीदी गई थी. कार में खून से सना वह चाकू भी बरामद हो गया, जिस से हमला कर योगिता की जान ली गई थी.

बहुत कम बोलने वाली प्रतिभावान डा. योगिता गौतम का नाम कोरोना संक्रमण काल में यूपी की पहली कोविड डिलीवरी करने के लिए भी दर्ज है. कोरोना महामारी जब आगरा में पैर पसार रही थी, तब आइसोलेशन वार्ड विकसित किया गया.

इस के लिए स्त्री और प्रसूति रोग विभाग की भी एक टीम बनाई गई. जिसे संक्रमित गर्भवतियों के सीजेरियन प्रसव की जिम्मेदारी दी गई. विभागाध्यक्ष डा. सरोज सिंह के नेतृत्व में गठित इस टीम में शामिल डा. योगिता ने 21 अप्रैल को यूपी और आगरा में कोविड मरीज के पहले सीजेरियन प्रसव को अंजाम दिया था.  इस के बाद भी उन्होंने कई सीजेरियन प्रसव कराए. डा. योगिता के कराए प्रसव की कई निशानियां आज उन घरों में किलकारियां बन कर गूंज रही हैं.

सिरफिरे डाक्टर आशिक के हाथों जान गंवाने से 5 दिन पहले ही 13 अगस्त को डा. योगिता का पीजी का रिजल्ट आया था. जिस में वह पास हो गई थी. पीजी कर योगिता विशेषज्ञ डाक्टर बन गई थी. लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था. लोगों की जान बचाने वाली डा. योगिता की उस के आशिक ने ही जान ले ली. घटना वाले दिन भी वह दोपहर 3 बजे तक अस्पताल में अपनी ड्यूटी पर थी. डा. योगिता की मौत पर आगरा के एसएन मेडिकल कालेज में कैंडल जला कर योगिता को श्रद्धांजलि दी गई. कालेज के जूनियर डाक्टरों की एसोसिएशन ने प्रदर्शन कर सच्ची कोरोना योद्धा की हत्या पर आक्रोश जताया.

बहरहाल डा. विवेक ने अपने एकतरफा प्यार की सनक में योगिता की हत्या कर दी. उस की इस जघन्य करतूत ने योगिता के परिवार को खून के आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया. वहीं, खुद का जीवन भी बरबाद कर लिया. डाक्टर लोगों की जान बचाने वाला होता है, लोग उसे सब से ऊंचा दर्जा देते हैं, लेकिन यहां तो डाक्टर ही हैवान बन गया. दूसरों की जान बचाने वाले ने साथी डाक्टर की जान ले ली. Stories in Hindi Love

Romantic Kahani : मोहब्बत का फीका रंग – रास न आया प्यार

Romantic Kahani : लखनऊ के वजीरगंज मोहल्ले की रहने वाली नूरी का असली नाम शनाया था. लेकिन वह देखने में इतनी सुंदर थी कि लोगों ने प्यार से उस का नाम नूरी रख दिया था. नूरी केवल चेहरे से ही नहीं, अपने स्वभाव से भी बहुत प्यारी थी. वह अपनी बातों से सभी का मन मोह लेती थी. एक बार जो उस के करीब आता था, वह हमेशा के लिए उस का हो जाता था.

नूरी के परिवार में उस के पिता मोहम्मद असलम, मां और भाईबहन थे. नूरी पढ़ीलिखी थी. वह स्कूटी चलाती थी और अपने घरपरिवार की मदद के लिए बाहर भी जाती थी. अपने काम के लिए वह किसी पर निर्भर नहीं थी. उस का यह अंदाज लोगों को पसंद आता था. मोहल्ले के कई लड़के उसे अपनी तरफ आकर्षित करना चाहते थे.

वजीरगंज लखनऊ के मुसलिम बाहुल्य इलाकों में से एक है. यहां की आबादी काफी घनी है. लेकिन लखनऊ के कैसरबाग और डौलीगंज जैसे खुले इलाकों से जुड़े होने के कारण वजीरगंज का बाहरी इलाका काफी साफसुथरा और खुलाखुला है. सिटी रेलवे स्टेशन, कैसरबाग बस अड्डा, मैडिकल कालेज के करीब होने के कारण यहां बाहरी लोगों का आनाजाना भी बना रहता है. ऐतिहासिक रूप से भी वजीरगंज लखनऊ की काफी मशहूर जगह है.

यहीं पर नूरी की मुलाकात सुलतान से हुई. जिस तरह से नूरी अपने नाम के अनुसार सुंदर थी, उसी तरह सुलतान भी अपने नाम के हिसाब से दबंग था. लड़कियों को प्रभावित कर लेना उस की खूबी थी. उस की इसी खूबी के चलते नूरी जल्दी ही उस से प्रभावित हो गई. हालांकि नूरी और सुलतान की उम्र में अच्छाखासा फासला था. 20 साल की नूरी को सलमान खान जैसी बौडी रखने वाला सुलतान मन भा गया. घर वालों की मरजी के खिलाफ जा कर नूरी ने सुलतान के साथ निकाह कर लिया.

शादी के बाद दोनों के संबंध कुछ दिन तक बहुत मधुर रहे. प्रेमी से पति बने सुलतान को नूरी में अब पहले जैसा आकर्षण नजर नहीं आ रहा था. इस की वजह यह थी कि सुलतान को नईनई लड़कियों का शौक था. नूरी को भी अब सुलतान की सच्चाई का पता चल गया था. उसे समझ में आ गया था कि उस ने जल्दबाजी में गलत फैसला कर लिया था, लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकती थी.

सैक्स रैकेट चलाता था सुलतान

नूरी को पता चला कि सुलतान लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर उन से शारीरिक संबंध बनाता था. इस के बाद वह लड़कियों के सहारे नशे के साथसाथ सैक्स रैकेट भी चलाता था. यही उस का पेशा था, जिसे वह मोहब्बत समझी थी. नूरी पूरी तरह सतर्क थी, इस कारण सुलतान उस का बेजा इस्तेमाल नहीं कर पाया.वह अपराधी प्रवृत्ति का था, जेल आनाजाना उस के लिए मामूली बात थी.

यह पता चलने पर नूरी को निराशा हुई और अपने फैसले पर बुरा भी लगा. लेकिन अब समय निकल चुका था. नूरी पूरी तरह से सुलतान के कब्जे में थी. दूसरी तरफ उस के परिवार ने भी उस से संबंध खत्म कर दिए थे. हमेशा खुश रहने वाली नूरी के चेहरे की चमक गायब हो चुकी थी. उसे अपने फैसले पर पछतावा हो रहा था. सुलतान जब भी जेल में या घर से बाहर रहता था, उस के घर सुलतान की बहन फूलबानो और बहनोई शबाब अहमद उर्फ शब्बू का आनाजाना बना रहता था. शब्बू का स्वभाव भी सुलतान जैसा ही था.

वह हरदोई जिले के संडीला का रहने वाला था. उस के खिलाफ संडीला कोतवाली में 8, लखनऊ की महानगर कोतवाली में 2 और मलीहाबाद कोतवाली में 2 मुकदमे दर्ज थे. अब वह चौक इलाके में रहता था. जरूरत पड़ने पर वह वजीरगंज में सुलतान के घर भी आताजाता था. सुलतान का रिश्तेदार होने के कारण किसी को कोई शक भी नहीं होता था. सुलतान अकसर जेल में रहता या फरार होता तो शब्बू उस के घर आता और नूरी की मदद करता था. नूरी की सुंदरता से वह भी प्रभावित था.

नूरी के प्रति शब्बू के लगाव को बढ़ता देख सुलतान की बहन फूलबानो को बुरा लगता था. उस ने कई बार पति को मना भी किया कि अकेली औरत के पास जाना ठीक नहीं है. मोहल्ले वाले तरहतरह की बातें बनाते हैं. पर शब्बू को इन बातों से कोई मतलब नहीं था. कई बार जब फूलबानो ज्यादा समझाने लगती तो शब्बू उस से मारपीट करता था.

कुछ समय तक तो फूलबानो ने इस बात का जिक्र अपने भाई सुलतान से नहीं किया, पर धीरेधीरे वह अपने भाई को सब कुछ बताने लगी. बहन को दुखी देख सुलतान ने अपनी पत्नी नूरी से बात कर के शब्बू से दूरी बनाने के लिए कहा. नूरी ने उसे बताया कि शब्बू खुद उस के घर आताजाता था. अपराध जगत से जुड़ा होने के कारण सुलतान को लगने लगा कि शब्बू ऐसे मानने वाला नहीं है. दूसरी तरफ सुलतान की बहन फूलबानो इस सब के लिए अपने पति शब्बू से ज्यादा भाभी नूरी को जिम्मेदार मानती थी. फूलबानो को नूरी की खूबसूरती से भी जलन होती थी. वह अपने भाई को बारबार समझाती थी कि नूरी ही असल फसाद की जड़ है. जब तक वह रहेगी, कोई बात नहीं बनेगी.

हत्या की बनाई योजना

शब्बू सुलतान की मदद भी करता था और उस की बहन फूलबानो का पति भी था. ऐसे में वह उस से दूरी नहीं बना सकता था. फूलबानो अब नूरी के खिलाफ अपने पति को भी यह कह कर भड़काने लगी कि नूरी के दूसरे पुरुषों से भी संबंध हैं. इसी बात को मुद्दा बना कर फूलबानो और सुलतान शब्बू पर नूरी को रास्ते से हटाने का दबाव बनाने लगे. पत्नी और साले के दबाव में शब्बू ने नूरी को रास्ते से हटाने के लिए ऐसी योजना बनाई, जिस से नूरी रास्ते से भी हट जाए और किसी पर कोई आंच भी न आए.

24 फरवरी, 2020 को सुलतान को जेल से पेशी पर कचहरी आना था. फूलबानो और शब्बू के साथ चिकवन टोला का रहने वाला जुनैद भी उन के साथ हो लिया. जब चारों लोग घर से निकले तो शब्बू और जुनैद पल्सर बाइक से और फूलबानो व नूरी स्कूटी से कचहरी जाने के लिए निकले. दोपहर 2 बजे तक ये लोग कचहरी में सुलतान से मिले और फिर नूरी को मारने के इरादे से इधरउधर सुरक्षित जगह की तलाश करने लगे. शब्बू को मलीहाबाद इलाके की पूरी जानकारी थी. उस ने नूरी की हत्या के लिए वही जगह चुनी. इधरउधर घूमने के बाद चारों लोग देर शाम फरीदीपुर गांव पहुंचे. रात 8 बजे सन्नाटे का लाभ उठाते हुए तीनों ने चाकू से नूरी का गला रेत दिया.

नूरी की हत्या आत्महत्या लगे, इस के लिए उस के शव को पास के रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया, ताकि ट्रेन की चपेट में आने के बाद यह आत्महत्या सी लगे. नूरी की स्कूटी, मोबाइल और चाकू ले कर ये लोग संडीला भाग गए. इधर रात को ट्रेन के चालक ने जब रेलवे लाइन पर शव पड़ा देखा तो उस ने स्टेशन मास्टर मलीहाबाद को सूचना दी. स्टेशन मास्टर ने इंसपेक्टर मलीहाबाद सियाराम वर्मा और सीओ मलीहाबाद सैय्यद नइमुल हसन को ट्रैक पर लाश पड़ी होने की जानकारी दी. पुलिस ने अब काररवाई के साथसाथ सब से पहले शव की शिनाख्त के लिए प्रयास किया तो पता चला शव वजीरगंज की रहने वाली नूरी का है.

उस के पिता मोहम्मद असलम ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. पुलिस छानबीन में लग गई. पुलिस ने जब नूरी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर छानबीन की तो उसे संडीला के रहने वाले शब्बू के खिलाफ सबूत मिल गए.

आरोपी चढ़े हत्थे

ऐसे में पुलिस ने पहले शब्बू, बाद में उस की पत्नी फूलबानो व जुनैद को पकड़ लिया. पता चला कि नूरी की हत्या इन तीनों ने ही की थी. पुलिस को गुमराह करने के लिए तीनों लोगों ने अपने मोबाइल घर पर छोड़ दिए थे, जिस से उन की लोकेशन नूरी के साथ न मिले. सीओ नइमुल हसन ने बताया कि घटना में शामिल जुनैद उर्फ रउफ की बाइक रिपेयरिंग की दुकान है. हत्या के बाद इन लोगों ने नूरी की स्कूटी के कई टुकड़े कर के इधरउधर कर दिए थे. शब्बू ने नूरी के मोबाइल फोन के सिम और बैटरी को निकाल कर इधरउधर फेंक दिया था. पुलिस ने इन की निशानदेही पर यह सब सामान बरामद कर लिया.

पुलिस के मुताबिक सुलतान अपनी पत्नी नूरी को रास्ते से हटाना चाहता था. इस की वजह उस के अवैध संबंध बताए जा रहे थे. सुलतान और उस की बहन फूलबानो को लगता था कि नूरी और शब्बू के संबंध थे, परेशानी की एक वजह यह भी थी. इस काम में शब्बू और उस के साथी जुनैद को भी साथ देना पड़ा. पुलिस ने फूलबानो, शब्बू और जुनैद के खिलाफ हत्या का मुकदमा कायम कर तीनों को जेल भेज दिया. नूरी के पति को हत्या की साजिश रचने का आरोपी माना गया.

इस तरह मलीहाबाद पुलिस ने ब्लाइंड मर्डर का खुलासा कर के बता दिया कि अपराधी कितनी ही होशियारी क्यों न दिखा ले, अपराध सिर चढ़ कर बोलता है. नूरी ने जिसे मोहब्बत समझा था, उस सुलतान में कई कमियां थीं, जिन के चलते नूरी को उस की मोहब्बत रास नहीं आई. Romantic Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित