Suspense Crime Story: परदेसी पति की बेवफा पत्नी

Suspense Crime Story: उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना कैंपियरगंज के थानाप्रभारी चौथीराम यादव रात की गश्त से लौट कर लेटे ही थे कि उन के फोन की घंटी बजी. बेमन से उन्होंने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘‘सर मैं टैक्सी ड्राइवर किशोर बोल रहा हूं.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘जो भी कहना है, सुबह थाने में आ कर कहना. अभी मैं सोने जा रहा हूं.’’

‘‘सर, जरूरी बात है… मोहम्मदपुर नवापार सीवान के पास सड़क के किनारे एक औरत की लाश पड़ी है. उस के सीने से एक छोटा बच्चा चिपका है. अभी बच्चा जीवित है.’’ किशोर ने कहा.

लाश की बात सुन कर थानाप्रभारी की नींद गायब हो गई. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, मैं पहुंच रहा हूं. मेरे आने तक तुम वहीं रहना. बच्चे का खयाल रखना.’’

‘‘ठीक है सर, आप आइए. आप के आने तक मैं यहीं रहूंगा.’’

कह कर किशोर ने फोन काट दिया.

सूचना गंभीर थी, इसलिए थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने तुरंत इस घटना की सूचना अधिकारियों को दी और खुद जल्दीजल्दी तैयार हो कर सबइंसपेक्टर विनोद कुमार सिंह, कांस्टेबल रामउजागर राय, अवधेश यादव और जगरनाथ यादव के साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. अब तक उजाला फैल चुका था. घटनास्थल पर काफी लोग जमा हो चुके थे. घटनास्थल पर पहुंचते ही थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने सब से पहले उस बच्चे को उठाया, जो मरी हुई मां के सीने से चिपका सो रहा था. स्थिति यही बता रही थी कि वह मृतका का बेटा था. उठाते ही बच्चा जाग गया. वह बिलखबिलख कर रोने लगा. चौथीराम ने उसे एक सिपाही को पकड़ाया तो वह उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा.

पहनावे से मृतका मध्यमवर्गीय परिवार की लग रही थी. उस की उम्र यही कोई 25 साल के आसपास थी. उस के मुंह और सीने में एकदम करीब से गोलियां मारी गई थीं. मुंह में गोली मारी जाने की वजह से चेहरा खून से सना था. घावों से निकल कर बहा खून सूख चुका था. मृतका की कदकाठी ठीकठाक थी. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे कम से कम 2 तो रहे ही होंगे. पुलिस ने घटनास्थल से 315 बोर के 2 खोखे बरामद किए थे. खोखे वही रहे होंगे, जो 2 गोलियां मृतका को मारी गई थीं. घटनास्थल पर मौजूद लोग लाश की शिनाख्त नहीं कर सके थे. इस का मतलब मृतका वहां की रहने वाली नहीं थी.

पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की काररवाई कर रही थी कि अचानक वहां एक युवक आया और लाश देख कर जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने का मतलब था, वह मृतका का कोई अपना रहा होगा.

पुलिस ने उसे चुप करा कर पूछताछ की तो पता चला कि वह मृतका का भाई दीपचंद था. मृतका का नाम शीला था. कल सुबह वह ससुराल से अपने बेटे को ले कर मायके जाने के लिए निकली थी. शाम तक वह घर नहीं पहुंची तो उसे चिंता हुई. सुबह वह उसी की तलाश में निकला था. यहां भीड़ देख कर वह रुक गया. पूछने पर पता चला कि यहां एक महिला की लाश पड़ी है. वह लाश देखने आया तो पता चला वह लाश उस की बहन की है. उस के साथ उस का बेटा कृष्णा भी था.

पुलिस ने कृष्णा को उसे सौंप दिया. दीपचंद ने फोन द्वारा घटना की सूचना पिता वृजवंशी को दी तो घर में कोहराम मच गया. गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर वृजवंशी भी वहां पहुंच गया, जहां लाश पड़ी थी. बेटी की लाश और मासूम नाती कृष्णा को रोते देख वृजवंशी भी बिलखबिलख कर रोने लगा. उस से रहा नहीं गया और उस ने नाती को दीपचंद से ले कर सीने से चिपका लिया. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस दीपचंद के साथ थाने आ गई. थाने में उस की ओर से शीला की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. यह 23 जनवरी, 2014 की बात है.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने जांच शुरू की. हत्यारों ने सिर्फ शीला की हत्या की थी, उस के बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था. इस का मतलब उस का जो कुछ था, वह शीला से ही था. उसे सिर्फ उसी से परेशानी थी. ऐसे में उस का कोई प्रेमी भी हो सकता था, जो उस से पीछा छुड़ाना चाहता रहा हो.

शीला की ससुराल गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा सरहरी में थी. थानाप्रभारी चौथीराम दीपचंद को ले कर शीला की ससुराल जा पहुंचे. बनरहा पहुंचने में उन्हें करीब 2 घंटे का समय लगा. शीला की ससुराल में उस की सास और ससुर थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि 22 जनवरी, 2014 को शीला अपने मुंहबोले भाई पप्पू और उस के दोस्त के साथ मोटरसाइकिल से मायके के लिए निकली थी. कृष्णा को भी वह अपने साथ ले गई थी. इस के अलावा वे और कुछ नहीं बता सके थे. पूछताछ में सासससुर ने यह भी बताया था कि पप्पू अकसर उन के यहां आता रहता था. चौथीराम यादव ने दीपचंद से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि पप्पू उसी के गांव का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का लड़का था.

थानाप्रभारी बनरहा से सीधे दीपचंद के गांव अहिरौली जा पहुंचे. पप्पू के बारे में पता किया गया तो घर वालों ने बताया कि वह 22 जनवरी, 2014 को नौतनवा जाने की बात कह कर घर से निकला था. तब से लौट कर नहीं आया है. दीपचंद की मदद से पप्पू और शीला का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि 22 जनवरी की सुबह शीला ने पप्पू को फोन किया था. उस के बाद पप्पू का मोबाइल फोन बंद हो गया था. काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि दोनों में रोजाना घंटों बातें होती थीं. इस से साफ हो गया कि दोनों में संबंध थे. पप्पू ने ही किसी बात से नाराज हो कर दोस्त की मदद से शीला की हत्या की थी.

जांच कहां तक पहुंची है, थानाप्रभारी चौथीराम इस की जानकारी क्षेत्राधिकारी अजय कुमार पांडेय और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) डा. यस चेन्नपा को भी दे रहे थे. पप्पू के बारे में जब घर वालों से कोई जानकारी नहीं मिली तो थानाप्रभारी ने उस के बारे में पता करने के लिए उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर 2 फरवरी, 2014 को घटना के 10 दिनों बाद पुलिस ने मुखबिर के जरिए पप्पू और उस के दोस्त को मोटरसाइकिल सहित लोरपुरवा के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों नेपाल की ओर जा रहे थे.

पुलिस पप्पू और उस के दोस्त अवधेश को थाने ले आई. तलाशी में पुलिस को अवधेश के पास से 315 बोर का देशी तमंचा और कारतूस भी मिले. पुलिस ने दोनों चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. जबकि पप्पू उर्फ दुर्गेश के पास से सिर्फ 2 सिम वाला मोबाइल फोन मिला था. पुलिस दोनों से अलगअलग पूछताछ करने लगी. दोनों ने पहले तो शीला की हत्या से इनकार किया, लेकिन पुलिस के पास उन के खिलाफ इतने सुबूत थे कि ज्यादा देर तक वे अपनी बात पर टिके नहीं रह सके और सच्चाई कुबूल कर के शीला की हत्या की पूरी कहानी उगल दी. इस पूछताछ में पप्पू और अवधेश ने शीला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

जिला महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव अहिरौली में रहता था वृजवंशी. उस के परिवार में पत्नी फूलवासी के अलावा कुल 7 बच्चे थे. शीला उन में पांचवें नंबर पर थी. वृजवंशी के पास इतनी खेती थी कि उसी से उन के इतने बड़े परिवार का गुजरबसर हो रहा था. लेकिन बेटे बड़े हुए, उन्होंने काफी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले ली थीं. बेटों की शादियां हो गईं तो बेटों की मदद से वृजवंशी बेटियों की शादियां करने लगा. शीला जवान हुई तो वृजवंशी को उस की शादी की चिंता हुई. बाप और भाई उस के लिए लड़का ढूंढ पाते उस के पहले ही वह गांव में ही बचपन के साथी दुर्गेश उर्फ पप्पू से आंखें लड़ा बैठी. दोनों साथसाथ खेलेकूदे ही नहीं थे, बल्कि एक ही स्कूल में पढ़े भी थे.

दुर्गेश उर्फ पप्पू के पिता दूधनाथ भी खेती किसानी करते थे. उस के परिवार में पत्नी के अलावा एकलौता बेटा पप्पू और 3 बेटियां थीं. एकलौता होने की वजह से पप्पू को घर से कुछ ज्यादा ही लाडप्यार मिला, जिस की वजह से वह बिगड़ गया. जैसेतैसे उस ने इंटरमीडिएट कर के पढ़ाई छोड़ दी. इस के बाद गांव में घूमघूम कर आवारागर्दी करने लगा. शीला और पप्पू के संबंधों की जानकारी गांव वालों को हुई तो इस से वृजवंशी की बदनामी होने लगी. तब उसे चिंता हुई कि बात ज्यादा फैल गई  तो बेटी की शादी होना मुश्किल हो जाएगा. अब इस से बचने का एक ही उपाय था, शीला की शादी. वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगा. क्योंकि अब देर करना ठीक नहीं था.

उस ने कोशिश की तो गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा का रहने वाला दिनेश उसे पसंद आ गया. उस ने जल्दी से शीला की शादी उस के साथ कर दी. शीला विदा हो कर ससुराल आ गई. दिनेश मुंबई में रहता था. कुछ दिन पत्नी के साथ रह कर वह मुंबई चला गया. शीला को उस ने बूढ़े मांबाप के पास उन की सेवा के लिए छोड़ दिया, ताकि किसी को कुछ कहने का मौका न मिले. क्योंकि उन्हें तो पूरी जिंदगी साथ रहना है.

शीला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन पति के परदेस में रहने की वजह से वह अपने पहले प्यार दुर्गेश उर्फ पप्पू को कभी नहीं भूल पाई. शादी के बाद भी वह प्रेमी से मिलती रही. शीला का मुंहबोला भाई बन कर वह उस की ससुराल भी आता रहा. उस के सासससुर पप्पू को उस का भाई समझते थे, इसलिए उस के आनेजाने पर कभी रोक नहीं लगाई. जबकि भाईबहन के रिश्ते की आड़ में दोनों कुछ और ही गुल खिला रहे थे.

पप्पू ने बातचीत के लिए शीला को मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था. सासससुर रात में सो जाते तो शीला मिस्डकाल कर देती. इस के बाद पप्पू फोन करता तो दोनों के बीच घंटों बातें होतीं. शीला को कई बार पप्पू से गर्भ भी ठहरा, लेकिन पप्पू ने हर बार उस का गर्भपात करा दिया. बारबार गर्भपात कराने से तंग आ कर शीला उस के साथ रहने की जिद करने लगी. जबकि पप्पू को शीला से नहीं, सिर्फ उस की देह से प्रेम था. शीला जब भी उस से साथ रखने के लिए कहती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. शीला जब उस पर जोर डालने लगी तो वह दूर भागने लगा. उस का कहना था कि घर वाले उसे रहने नहीं देंगे. अपना अलग घर है नहीं. तब शीला ने पप्पू को 1 लाख रुपए जमीन खरीद कर घर बनाने के लिए दिए. इस की जानकारी न तो शीला के पति को थी, न सासससुर को.

पप्पू ने पैसे तो लिए, लेकिन उस ने जमीन नहीं खरीदी. जब भी शीला जमीन और घर के बारे में पूछती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. जब शीला को लगने लगा कि पप्पू उसे बेवकूफ बना रहा है तो वह बेचैन हो उठी. वह समझ गई कि उस से बहुत बड़ी भूल हो गई है. जिस के लिए उस ने घरपरिवार के साथ विश्वासघात किया, वह उस के साथ विश्वासघात कर रहा है. उस ने ठान लिया कि वह ऐसे आदमी को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी. वह पप्पू से अपने रुपए मांगने लगी.

शीला ने जब पैसे के लिए पप्पू पर दबाव बनाया तो वह विचलित हो उठा. उस की समझ में आ गया कि शीला उस की नीयत जान गई है. अब उस की दाल गलने वाली नहीं है. शीला के पैसे उस ने खर्च कर दिए थे.  लाख रुपए की व्यवस्था वह कर नहीं सकता था. इसलिए शीला से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. शीला की हत्या करना उस के अकेले के वश का नहीं था, इसलिए उस ने एक पेशेवर बदमाश अवधेश से बात की.

अवधेश महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव खजुही का रहने वाला था. पप्पू से उस की दोस्ती भी थी. पनियरा थाने में उस के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट और राहजनी के कई मुकदमे दर्ज थे. योजना के मुताबिक, अवधेश ने 315 बोर के देशी कट्टे का इंतजाम किया. इस के बाद दोनों को मौके की तलाश थी. 22 जनवरी, 2014 की सुबह 7 बजे शीला ने पप्पू को फोन कर के पूछा कि इस समय वह कहां है, तो उस ने कहा कि इस समय वह शहर में है. कुछ देर में उस के पास पहुंच जाएगा.

इस के बाद शीला ने फोन काट दिया. जबकि सही बात यह थी कि पप्पू उस समय नौतनवा में मौजूद था. उस ने शीला से झूठ बोला था. शीला से बात करने के बाद उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया. दुर्गेश उर्फ पप्पू को वह मौका मिल गया, जिस की तलाश में वह था. उस ने अवधेश को तैयार किया और मोटरसाइकिल से शीला की ससुराल बनरहा 11 बजे के आसपास पहुंच गया. शीला उसी का इंतजार कर रही थी. चायनाश्ता करा कर शीला मायके जाने की बात कह कर उन के साथ निकल पड़ी. उस ने सास से कहा था कि 2-1 दिन में वह लौट आएगी.

दिन में कुछ हो नहीं सकता था. इसलिए पप्पू को किसी तरह रात करनी थी. इस के लिए वह कुसुम्ही के जंगल स्थित बुढि़या माई के मंदिर दर्शन करने गया. वहां से निकल कर वह सब के साथ शहर में घूमता रहा. अचानक रात साढ़े 8 बजे पप्पू को कुछ याद आया तो उस ने मोबाइल औन कर के फोन किया. उस समय वह चिलुयाताल के मोहरीपुर में था. इस के बाद वे कैंपियरगंज पहुंचे.

रात साढ़े 10 बजे के करीब पप्पू सब के साथ मोहम्मदपुर नवापार पहुंचा तो ठंड का मौसम होने की वजह से चारों ओर सुनसान हो चुका था. पप्पू ने अचानक मोटरसाइकिल सड़क के किनारे रोक दी. शीला ने रुकने की वजह पूछी तो पप्पू ने कहा कि पेशाब करना है. पेशाब करने के बहाने वह थोड़ा आगे बढ़ गया तो अवधेश शीला के पास पहुंचा और कमर में खोंसा तमंचा निकाला और उस के सीने से सटा कर ट्रिगर दबा दिया.

गोली लगते ही शीला के मुंह से एक भयानक चीख निकली. तभी उस ने कट्टे की नाल उस के मुंह में घुसेड़ कर दूसरी गोली चला दी. इसी के साथ बच्चे को गोद में लिए हुए शीला जमीन पर गिरी और मौत के आगोश में समा गई. उस का मासूम बेटा सीने से चिपका सोता ही रहा. अपना काम कर के पप्पू और अवधेश चले गए. टैक्सी ड्राइवर किशोर सुबह उधर से गुजरा तो उस ने सड़क किनारे पड़ी शीला की लाश देख कर थानाप्रभारी चौथीराम यादव को सूचना दी.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, 315 बोर का तमंचा और मोबाइल फोन बरामद कर लिया था. थाने की सारी काररवाई निबटा कर थानाप्रभारी चौथीराम ने पप्पू और अवधेश को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Crime Story Hindi: नाबालिग मोहब्बत का तीखा जहर

Crime Story Hindi: रोमिला अपनी बेटी सलोनी के साथ लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहती थी. उस का 3 मंजिल का मकान था. पहली दोनों मंजिलों पर रहने के लिए कमरे थे और तीसरी मंजिल पर गोदाम बना था, जहां कबाड़ और पुरानी चीजें रखी रहती थीं.

ईसाई समुदाय की रोमिला मूलत: सुल्तानपुर जिले की रहने वाली थी. उस ने जौन स्विंग से प्रेम विवाह किया था. सलोनी के जन्म के बाद रोमिला और जौन स्विंग के संबंध खराब हो गए. रोमिला ने घुटघुट कर जीने के बजाय अपने पति जौन स्विंग से तलाक ले लिया. इसी बीच रोमिला को लखनऊ के सरकारी अस्पताल में टैक्नीशियन की नौकरी मिल गई. वेतन ठीकठाक था. इसलिए वह अपनी आगे की जिंदगी अपने खुद के बूते पर गुजारना चाहती थी.

स्विंग से प्यार, शादी और फिर तलाक ने रोमिला की जिंदगी को बहुत बोझिल बना दिया था. कम उम्र की तलाकशुदा महिला का समाज में अकेले रहना सरल नहीं होता, इस बात को ध्यान में रखते हुए रोमिला ने अपने को धर्मकर्म की बंदिशों में उलझा लिया. समय गुजर रहा था, बेटी बड़ी हो रही थी. रोमिला अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर बड़ा बनाना चाहती थी. क्योंकि अब उस का भविष्य वही थी. सलोनी कावेंट स्कूल में पढ़ती थी, पढ़ने में होशियार. रोमिला ने लाड़प्यार से उस की परवरिश लड़कों की तरह की थी.

सलोनी भी खुद को लड़कों की तरह समझने लगी थी. वह जिद्दी स्वभाव की तो थी ही गुस्सा भी खूब करती थी. जन्म के समय ही कुछ परेशानियों के कारण सलोनी के शरीर के दाएं हिस्से में पैरालिसिस का अटैक पड़ा था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उस का असर करीब करीब खत्म हो गया था. सलोनी बौबकट बाल रखती थी. उस की उम्र हालांकि 15 साल थी पर वह अपनी उम्र से बड़ी दिखाई देती थी. वह लड़कों की तरह टीशर्ट पैंट पहनती थी. सलोनी के साथ पढ़ने वाले लड़के लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल करते थे. सलोनी ने भी मां से जिद कर के स्मार्टफोन खरीदवा लिया.

रोमिला जानती थी कि आजकल के बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगा कर फेसबुक और वाट्सएप जैसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं जो सलोनी जैसी कम उम्र लड़की के लिए ठीक नहीं है. लेकिन एकलौती बेटी की जिद के सामने उसे झुकना पड़ा. रोमिला सुबह 8 बजे अस्पताल जाती थी और शाम को 4 बजे लौटती थी. सलोनी भी सुबह 8 बजे स्कूल चली जाती थी और 2 बजे वापस आती थी. कठिन जीवन जीने के लिए रोमिला ने बेड की जगह घर में सीमेंट के चबूतरे बनवा रखे थे. मांबेटी बिस्तर डाल कर इन्हीं चबूतरों पर सोती थीं.

रोमिला को अस्पताल से 45 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. इस के बावजूद मांबेटी का खर्च बहुत कम था. रोमिला जो खाना बनाती थी वह कई दिन तक चलता था. मोबाइल फोन लेने के बाद सलोनी ने इंटरनेट के जरीए अपना फेसबुक पेज बना लिया था. वह अकसर अपने दोस्तों से चैटिंग करती रहती थी. इसी के चलते उस के कई नए दोस्त बन गए थे. उस के इन्हीं दोस्तों में से एक था पश्चिम बंगाल के मालदा का रहने वाला सुदीप दास. 19 साल का सुदीप एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता था.

उस के घर की हालत ठीक नहीं थी. उस का पिता सुधीरदास मालदा में मिठाई की एक दुकान पर काम करता था. जबकि मां कावेरी घरेलू महिला थी. उस का छोटा भाई राजदीप कोई काम नहीं करता था. सुदीप और उस के पिता की कमाई से ही घर का खर्च चलता था. सुदीप और सलोनी के बीच चैटिंग के माध्यम से जो दोस्ती हुई धीरेधीरे प्यार तक जा पहुंची. नासमझी भरी कम उम्र का तकाजा था. चैटिंग करतेकरते सुदीप और सलोनी एकदूसरे के प्यार में पागल से हो गए. स्थिति यह आ गई कि सुदीप सलोनी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा.

दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. सो दोनों खूब बातें करते थे. मोबाइल पर ही दोनों की मिलने की बात तय हुई. सितंबर 2013 में सुदीप सलोनी से मिलने लखनऊ आ गया. सलोनी ने सुदीप को अपनी मां से मिलवाया. रोमिला बेटी को इतना प्यार करती थी कि उस की हर बात मानने को तैयार रहती थी. 2 दिन लखनऊ में रोमिला के घर पर रह कर सुदीप वापस चला गया. अक्तूबर में सलोनी का बर्थडे था. उस के बर्थडे पर सुदीप फिर लखनऊ आया. अब तक सलोनी ने सुदीप से अपने प्यार की बात मां से छिपा कर रखी थी. लेकिन इस बार उस ने अपने और सुदीप के प्यार की बात रोमिला को बता दी.

सलोनी और सुदीप दोनों की ही उम्र ऐसी नहीं थी कि शादी जैसे फैसले कर सकें. इसलिए रोमिला ने दोनों को समझाने की कोशिश की. ऊंचनीच दुनियादारी के बारे में बताया. लेकिन सुदीप और सलोनी पर तो प्यार का भूत चढ़ा था. रोमिला को इनकार करते देख सुदीप बड़े आत्मविश्वास से बोला, ‘‘आंटी, आप चिंता न करें. मैं सलोनी का खयाल रख सकता हूं. मैं खुद भी नौकरी करता हूं और मेरे पिताजी भी. हमारे घर में भी कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

बातचीत के दौरान रोमिला सुदीप के बारे में सब कुछ जान गई थी. इसलिए सोचविचार कर बोली, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी सारी बातें अपनी जगह सही हैं. मुझे इस रिश्ते से भी कोई ऐतराज नहीं है. पर मैं यह रिश्ता तभी स्वीकार करूंगी जब तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगोगे. आजकल 10-5 हजार की नौकरी में घरपरिवार नहीं चलते. अभी तुम दोनों में बचपना है.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं आप की बात मान लेता हूं. लेकिन आप वादा करिए कि आप उसे मुझ से दूर नहीं करेंगी. जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो सलोनी को अपनी बनाने आऊंगा.’’ सुदीप ने फिल्मी हीरो वाले अंदाज में रोमिला से अपनी बात कही.

इस बार सुदीप सलोनी के घर पर एक सप्ताह तक रहा. इसी बीच रोमिला ने सुदीप से स्टांप पेपर पर लिखवा लिया कि वह किसी लायक बन जाने के बाद ही सलोनी से शादी करेगा. इस के बाद सुदीप अपने घर मालदा चला गया. लेकिन लखनऊ से लौटने के बाद उस का मन नहीं लग रहा था. जवानी में, खास कर चढ़ती उम्र में महबूबा से बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता. कामधाम, भूखप्यास, घरपरिवार सब बेकार लगने लगते हैं. सुदीप का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस की आंखों के सामने सलोनी का गोलगोल सुंदर चेहरा और बोलती हुई आंखें घूमती रहती थीं. वह किसी भी सूरत में उसे खोने के लिए तैयार नहीं था.

जब नहीं रहा गया तो 10 दिसंबर, 2013 को सुदीप वापस लखनऊ आया और रोमिला को बहका फुसला कर सलोनी को मालदा घुमाने के लिए साथ ले गया. हालांकि सलोनी की मां रोमिला इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. लेकिन सलोनी ने उसे मजबूर कर दिया. दरअसल मां के प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं होती थी. रोमिला के लिए बेटी ही जीने का सहारा थी. वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. इस लिए वह सलोनी की जिद के आगे झुक गई. करीब ढाई माह तक सलोनी सुदीप के साथ मालदा में रही.

मार्च, 2014 में सलोनी वापस आ गई. सुदीप भी उस के साथ आया था. बेटी का बदला हुआ स्वभाव देख कर रोमिला को झटका लगा. सलोनी उस की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी. पति से अलग होने के बाद रोमिला ने सोचा था कि वह बेटी के सहारे अपना पूरा जीवन काट लेगी. अब वह बेटी के दूर जाने की कल्पना मात्र से बुरी तरह घबरा गई थी.

लेकिन हकीकत वह नहीं थी जो रोमिला देख या समझ रही थी. सच यह था कि सलोनी का मन सुदीप से उचट गया था. उस का झुकाव यश नाम के एक अन्य लड़के की ओर होने लगा था. जबकि सुदीप हर हाल में सलोनी को पाना चाहता था. वह कई बार उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर चुका था. यह बात मांबेटी दोनों को नागवार गुजरने लगी थी. रोमिला ने अस्पताल से 1 मार्च, 2014 से 31 मार्च तक की छुट्टी ले रखी थी. उस ने अस्पताल में छुट्टी लेने की वजह बेटी की परीक्षाएं बताई थीं.

7 अप्रैल, 2014 की सुबह रोमिला के मकान के पड़ोस में रहने वाले रणजीत सिंह ने थाना गाजीपुर आ कर सूचना दी कि बगल के मकान में बहुत तेज बदबू आ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालकिन रोमिला काफी दिनों से घर पर नहीं है. सूचना पा कर एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही, सीनियर इंसपेक्टर रामराज कुशवाहा और सिपाही अरूण कुमार सिंह रोमिला के मकान पर पहुंच गए.

देखने पर पता चला कि मकान के ऊपर के हिस्से में बदबू आ रही थी. पुलिस ने फोन कर के मकान मालकिन रोमिला को बुला लिया. वहां उस के सामने ही मकान खोल कर देखा गया तो पूरा मकान गंदा और रहस्यमय सा नजर आया. सिपाही अरूण कुमार और एसएसआई रामराज कुशवाहा तलाशी लेने ऊपर वाले कमरे में पहुंचे तो कबाड़ रखने वाले कमरे में एक युवक की सड़ीगली लाश मिली.

पुलिस ने रोमिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह लाश मालदा, पश्चिम बंगाल के रहने वाले सुदीप दास की है. वह उस की बेटी सलोनी का प्रेमी था और उस से शादी करना चाहता था. जब सलोनी ने इनकार कर दिया तो सुदीप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. रोमिला ने आगे बताया कि इस घटना से वह बुरी तरह डर गई थी. उसे लग रहा था कि हत्या के इल्जाम में फंस जाएगी. इसलिए वह घर को बंद कर के फरार हो गई थी.

पुलिस ने रोमिला से नंबर ले कर फोन से सुदीप के घर संपर्क किया और इस मामले की पूरी जानकारी उस के पिता को दे दी. लेकिन उस के घर वाले लखनऊ आ कर मुकदमा कराने को तैयार नहीं थे. कारण यह कि वे लोग इतने गरीब थे कि उन के पास लखनऊ आने के लिए पैसा नहीं था. इस पर एसओ गाजीपुर ने अपनी ओर से मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच शुरू कर दी. प्राथमिक काररवाई के बाद सुदीप की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

8 अप्रैल 2014 को सुदीप की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जो सच सामने आया, वह चौंका देने वाला था. इस बीच सलोनी भी आ गई थी. रोमिला और उस की बेटी सलोनी ने अपने बयानों में कई बातें छिपाने की कोशिश की थी. लेकिन उन के अलगअलग बयानों ने उन की पोल खोल दी. एसपी ट्रांस गोमती हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय पुलिस विवेचना पर नजर रख रहे थे जिस से इस पूरे मामले का बहुत जल्दी पर्दाफाश हो गया. मांबेटी से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई वह कुछ इस तरह थी.

13 मार्च, 2014 की रात को सलोनी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. इसी बीच सुदीप उस से झगड़ने लगा. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने मांबेटी दोनों को कितनी बार समझाया है कि मुझे खीर में इलायची डाल कर खाना पसंद नहीं है. लेकिन तुम लोगों पर मेरी बात का कोई असर नहीं होता.’’

उस की इस बात पर सलोनी को गुस्सा आ गया. उस ने सुदीप को लताड़ा, ‘‘तुम मां से झगड़ने के बहाने तलाश करते रहते हो. बेहतर होगा, तुम यहां से चले जाओ. मैं तुम से किसी तरह की दोस्ती नहीं रखना चाहती.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं? मैं ने स्टांपपेपर पर लिख कर दिया है, तुम्हें मेरे साथ ही शादी करनी होगी. बस तुम 18 साल की हो जाओ. तब तक मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूंगा और फिर तुम से शादी कर के तुम्हें साथ ले जाऊंगा. अब तुम्हारी मां चाहे भी तो तुम्हारी शादी किसी और से नहीं करा सकती.’’ सुदीप ने भी गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो तुम्हें इतना मुंह लगा लिया.’’ कह कर सलोनी ऊपर चली गई. वहां उस की मां पहले से दोनों का लड़ाईझगड़ा देख रही थी.

‘‘सुदीप, तुम मेरे घर से चले जाओ.’’ रोमिला ने बेटी का पक्ष लेते हुए चेतावनी भरे शब्दों में कहा तो सुदीप उस से भी लड़नेझगड़ने लगा. यह देख मांबेटी को गुस्सा आ गया. सुदीप भी गुस्से में था. उस ने मांबेटी के साथ मारपीट शुरू कर दी. जल्दी ही वह दोनों पर भरी पड़ने लगा. तभी रोमिला की निगाह वहां रखी हौकी स्टिक पर पड़ी.

रोमिला ने हौकी उठा कर पूरी ताकत से सुदीप के सिर पर वार किया. एक दो नहीं कई वार. एक साथ कई वार होने से सुदीप की वहीं गिर कर मौत हो गई. सुदीप की मृत्यु के बाद मांबेटी दोनों ने मिल कर उस की लाश को बोरे में भर कर कबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद अगली सुबह दोनों घर पर ताला लगा कर गायब हो गईं. पुलिस को उलझाने के लिए रोमिला ने बताया कि वह यह सोच कर डर गई थी कि सुदीप का भूत उसे परेशान कर सकता है. इसलिए, वे दोनों हवन कराने के लिए हरिद्वार चली गई थीं.

सलोनी ने भी 14 मार्च को अपनी डायरी में लिखा था, ‘आत्माओं ने सुदीप को मार डाला. हम फेसबुक पर एकदूसरे से मिले थे. आत्माओं के पास लेजर जैसी किरणें हैं. वह हमें नष्ट कर देंगी. आत्माएं हमें फंसा देंगी.’ सलोनी ने इस तरह की और भी तमाम अनापशनाप बातें डायरी में लिखी थीं. रोमिला भी इसी तरह की बातें कर रही थी. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि मांबेटी हरिद्वार वगैरह कहीं नहीं गई थी बल्कि दोनों लखनऊ में इधरउधर भटक कर अपना समय गुजारती रही थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि इस मामले को कैसे सुलझाएं, क्योंकि सुदीप की लाश घर में पड़ी थी.

बहरहाल, उस की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो गया था कि मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का था. गाजीपुर पुलिस ने महिला दारोगा नीतू सिंह, सिपाही मंजू द्विवेदी और उषा वर्मा को इन मांबेटी से राज कबूलवाने पर लगाया. जब उन्हें बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुदीप की मौत का का कारण सिर पर लगी चोट को बताया गया है, तो वे टूट गईं. दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. रोमिला की निशानदेही पर हौकी स्टिक भी बरामद हो गई.

8 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने मां रोमिला को जेल और उस की नाबालिग बेटी सलोनी को बालसुधार गृह भेज दिया. जो भी जैसे भी हुआ हो, लेकिन सच यह है कि फेसबुक की दोस्ती की वजह से सुदीप का परिवार बेसहारा हो गया है.

पुलिस उस के परिवार को बारबार फोन कर के लखनऊ आ कर बेटे का दाह संस्कार कराने के लिए कह रही थी. लेकिन वे लोग आने को तैयार नहीं थे. सुदीप की लाश लखनऊ मेडिकल कालेज के शवगृह में रखी थी. एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही ने सुदीप के पिता सुधीर दास को समझाया और भरोसा दिलाया कि वह लखनऊ आएं, वे उन की पूरी मदद करेंगे. पुलिस का भरोसा पा कर सुदीप का पिता सुधीर दास लखनऊ आया. बेटे की असमय मौत ने उस का कलेजा चीर दिया था.

सुधीर दास पूरे परिवार के साथ लखनऊ आना चाहता था लेकिन उस के पास पैसा नहीं था. इसलिए परिवार का कोई सदस्य उस के साथ नहीं आ सका. वह खुद भी पैसा उधार ले कर आया था. सुधीर दास की हालत यह थी कि बेटे के दाह संस्कार के लिए भी उस के पास पैसा नहीं था. जवान बेटे की मौत से टूट चुका सुधीर दास पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रहा था. उन की हालत देख कर गाजीपुर पुलिस ने अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम किया और सुदीप का क्रियाकर्म भैंसाकुंड के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पर किया. सुदीप की अभागी मां कावेरी और भाई राजदीप तो उसे अंतिम बार देख भी नहीं सके.

क्रियाकर्म के बाद पुलिस ने ही सुधीर के वापस मालदा जाने का इंतजाम कराया. गरीबी से लाचार यह पिता बेटे की हत्या करने वाली मांबेटी को सजा दिलाने के लिए मुकदमा भी नहीं लड़ना चाहता. अनजान से मोहब्बत और उस से शादी की जिद ने सुदीप की जान ले ली. सुदीप अपने परिवार का एकलौता कमाऊ बेटा था. उस के जाने से पूरा परिवार पूरी तरह से टूट गया है. सलोनी और सुदीप की एक गलती ने 2 परिवारों को तबाह कर दिया है. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में आरोपी सलोनी का नाम परिवर्तित है.

Love Story: प्रेमिका की खातिर – अपने ही परिवार का कातिल

Love Story: ठीक 3 साल पहले 26 अप्रैल, 2018 की सुबह के करीब साढ़े 11 बज रहे थे. उत्तर प्रदेश के कासगंज में थाना ढोलना क्षेत्र के पास रेलवे ट्रैक पर बकरियां चराते हुए एक आदमी चला जा रहा था. ट्रैक के दोनों ओर झाड़जंगल की वजह से वह आदमी लगभग हर दिन इसी ट्रैक के पास अपनी बकरियां चराने के लिए आता था.

लेकिन उस दिन उस ने कुछ ऐसा देखा जिस से उस की रूह कांप गई थी. रेलवे ट्रैक पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. उस लाश की स्थिति इतनी भयानक थी, जिसे देख कर उस का दिल दहशत से भर गया था. उस लाश का न तो सिर था और न ही दोनों हाथों की हथेलियां. यह देख बकरियां चराता हुआ यह शख्स अपनी बकरियां उसी ट्रैक पर छोड़ कर सीधा अपने घर की ओर भागा. उस लाश को देख कर वह इतना डर गया था कि उस के गले से आवाज तक नहीं निकल रही थी.

थोड़ा समय बीता तो वह उसी ट्रैक पर ढोलना थाने के पुलिसकर्मियों की टीम को ले कर पहुंचा और उस ने पुलिसकर्मियों को दूर से उस जगह की ओर इशारा कर के दिखाया, जहां पर वह लाश पड़ी थी. ढोलना थाने की पुलिस लाश के पास पहुंची और उन्हें भी अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. वैसे भी बिना गरदन और हथेलियों वाली डैड बौडी हर दिन देखने को नहीं मिलती. मौके पर पहुंची पुलिस की टीम ने आसपास के इलाके की घेराबंदी कर तुरंत जांच शुरू कर दी.

कुछ ही देर में देखते ही देखते उस इलाके में और अधिक पुलिसकर्मी आ पहुंचे और उन के साथ फोरैंसिक की पूरी टीम आ पहुंची. नियमित छानबीन करते हुए पुलिस को लाश के शरीर पर पहने कपड़ों की जेब से एक आधार कार्ड और एलआईसी का एक कागज भी मिला. आधार कार्ड पर मृत शख्स का नाम राकेश था. आधार कार्ड को बेस बना कर पुलिस ने जल्द ही आधार कार्ड पर दिए पते पर संपर्क साधा और मृत व्यक्ति के पिता बनवारी लाल को लाश की पहचान करने के लिए जल्द से जल्द आने के लिए कहा.

कुछ ही घंटों में बनवारी लाल अपने 2 बेटों, राजीव और प्रवेश के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. तीनों का शरीर पसीने से लथपथ था. बनवारी लाल एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी होने के नाते मामले की गंभीरता को बहुत अच्छे से समझ सकते थे. लेकिन बात लाश की पहचान की थी, वह भी तब जब उन्हें अपने बेटे की लाश की पहचान करनी थी तो उन का दिल जोरों से धड़क रहा था.

वह घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों से हांफते हुए बोले, ‘‘साहब, आप ने मुझे याद किया?’’

ढोलना थानाप्रभारी ने बनवारी लाल से कहा, ‘‘जी हां, आप को एक लाश की पहचान करने के लिए बुलाया गया है. क्योंकि मृत व्यक्ति की जेब से बरामद आधार कार्ड में राकेश का नाम दिया हुआ था और कुछ एलआईसी के कागजात भी थे.’’

बनवारी लाल हांफते स्वर में डरते हुए बोले, ‘‘जी साहब, आप हमें लाश के पास ले कर चलिए.’’

यह कहते हुए वह पुलिस टीम के साथ चल दिए. पुलिस की एक टीम बनवारी लाल और उन के दोनों बेटों को वहां ले गई, जहां पर मृत लाश को नीले रंग की प्लास्टिक की शीट में लपेट कर रखा गया था.

बनवारी लाल ने की लाश की शिनाख्त

लाश के पास खड़े व्यक्ति ने बनवारी लाल और अन्य 2 लोगों को आते हुए देख कर नीली शीट में लगी चेन को नीचे की ओर पैरों तक खींचा और बनवारी लाल को मृतक को देखने देने के लिए खुद साइड में खड़ा हो गया. मृत व्यक्ति का सिर नहीं होने की वजह से बनवारी लाल उसे एक नजर देख कर डर से कांप गए. लेकिन अगले ही पल उन का डर शोक में तब तब्दील हो गया, जब उन्होंने मृत व्यक्ति की लाश के पहने कपड़ों को देखा. ये वही कपड़े थे जो बनवारी लाल ने कुछ महीनों पहले अपने बेटे राकेश को उस के जन्मदिन पर गिफ्ट किए थे.

कपड़े देख कर बनवारी लाल अचानक से फूटफूट कर रोनेबिलखने लगे और जोर से चिल्लाचिल्ला कर राकेश का नाम ले कर चीखने लगे. अपने भाई की लाश की ऐसी हालत और पिता को रोताबिलखता देख कर राजीव और प्रवेश की आंखों से आंसू रोके नहीं रुके. लेकिन फिर भी पिता का सहारा बनते हुए दोनों ने बनवारी लाल को लाश से दूर किया. कुछ देर में थानाप्रभारी वहां आए और उन्होंने रोते हुए बनवारी लाल को ढांढस बंधाया. उन्होंने बनवारी लाल से कहा, ‘‘मुझे अफसोस है आप के बेटे की मौत पर. हमारी तफ्तीश जारी है. केस को सुलझाने के लिए हमें आप से राकेश को ले कर कुछ जरूरी सवाल करने हैं. आप थाने में पहुंचिए हम यहां पर अपनी जांच कर के थाने लौट कर आप से बात करेंगे.’’

सिर और हथेलियां कटी लाश को पहचानना किसी के वश की बात नहीं थी, इसलिए थानाप्रभारी ने लाश की पहचान को पुख्ता करने के लिए लाश की डीएनए जांच करवाना जरूरी समझा. उन्होंने जल्द ही राकेश के मातापिता से संपर्क कर उन का डीएनए सैंपल लिया और उसे आगरा स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिया. इस घटना को तीन साल हो गए और साल 2021 की अगस्त में एक दिन अचानक से कासगंज के ढोलना थाने में आगरा के विधि विज्ञान प्रयोगशाला से डीएनए रिपोर्ट का रिजल्ट आया.

डीएनए रिपोर्ट ने बढ़ाई पुलिस की बेचैनी

रिपोर्ट खोल कर जब थानाप्रभारी ने देखा तो उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. उन के मन में हजारों सवाल तूफान की तरह खड़े हो उठे. 3 साल से ठंडे बस्ते में पड़ा मामला अचानक से अब एक नया मोड़ ले चुका था. दरअसल, जिस डीएनए रिपोर्ट का इतने लंबे समय से इंतजार हो रहा था, उस रिपोर्ट में मृत व्यक्ति का डीएनए बनवारी लाल और इंद्रावती के डीएनए से कोई मैच ही नहीं था. यह देख कर थानाप्रभारी ने 3 साल पुरानी इस केस की फाइलें निकलवाईं. मृत व्यक्ति की पहचान का पता लगाने के लिए उन्होंने अप्रैल, 2018 में उस इलाके से गुमशुदा लोगों की लिस्ट निकलवाई.

राकेश की उम्र के लोगों में उस इलाके से सिर्फ एक ही आदमी गायब हुआ था, वह था गांव नौगवां, थाना गंगीरी, अलीगढ़ का रहने वाला राजेंद्र उर्फ कलुआ. बिलकुल समय न गंवाते हुए पुलिस तुरंत कलुआ के घर पहुंची और उन से कलुआ के बारे में पूछताछ की. कलुआ तो नहीं मिला लेकिन पुलिस को कई ऐसे तार मिल गए जोकि इस केस से जुड़े हो सकते थे. कलुआ के मातापिता ने बताया कि उन के बेटे की दोस्ती राकेश के साथ थी. 25 अप्रैल को गायब होने के एक दिन पहले राकेश कलुआ को ले कर अपने बीवीबच्चों को ढूंढने का नाम ले कर उसे अपने साथ ले गया था. जिस के बाद कलुआ फिर कभी घर नहीं लौटा.

कलुआ के मांबाप से उन का डीएनए का सैंपल ले कर पुलिस ने फिर से आगरा स्थित विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया. इस बार डीएनए की रिपोर्ट जल्द ही आ गई थी. रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि 3 साल पहले रेलवे ट्रैक पर मरने वाला व्यक्ति राकेश नहीं बल्कि राजेंद्र उर्फ कलुआ था, क्योंकि डीएनए के सैंपल कलुआ के मांबाप से मिल गए थे. पूरे मामले में कुछ इस तरह से मोड़ आना किसी को भी अपना सिर पकड़ने पर मजबूर कर सकता था जोकि थानाप्रभारी ने किया भी.

थानाप्रभारी ने 3 साल पहले अपने मन में उठने वाले सवालों को एक बार फिर से महसूस किया. उन्हें अचानक से वह सवाल याद आया कि सिर कटी लाश को देख कर बनवारी लाल ने एक पल में कैसे पहचान लिया कि यह उन के बेटे की लाश थी? कलुआ से किस की कैसी दुश्मनी हो सकती थी? इस के अलावा इसी तरह के और भी कई सवाल थानाप्रभारी के मन में उठने लगे थे. इन सभी सवालों को ढूंढने के लिए पुलिस की टीम ने तत्परता से काम करना शुरू कर दिया था.

अगस्त के आखिरी दिनों तक पुलिस ने इस मामले की छानबीन के लिए प्रदेश में अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया था. उसी दौरान 31 अगस्त, 2021 के दिन पुलिस के एक ऐसे ही मुखबिर ने बताया कि वे जिस व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, उसे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर बिसरख गांव में देखा गया है. यह व्यक्ति खुद राकेश ही था. ढोलना पुलिस बिना किसी देरी के मुखबिर की दी हुई सूचना पर बिसरख गांव जाने के लिए निकल पड़ी. उसी बीच ढोलना थानाप्रभारी ने बिसरख थाने की पुलिस को इस की सूचना दी.

करीब 2 घंटे बाद मुखबिर के बताए हुए पते पर छापा मार कर पुलिस की टीम ने दिलीप शर्मा नाम के एक शख्स को पकड़ लिया, जिस का हुलिया काफी हद तक राकेश की तरह था. दिलीप नाम का यह शख्स इलाके में प्रेमिका रूबी के घर में मौजूद था और वे दोनों कमरे में बंद हो कर एकदूसरे के साथ प्रेम प्रसंग में लीन थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए ढोलना थानाप्रभारी बिसरख थाने में दिलीप को पूछताछ के लिए ले आए.

पूछताछ के दौरान पहले तो दिलीप ने खुद की पहचान दिलीप के नाम से बताई, लेकिन जब पुलिस की टीम ने उस की फोन लोकेशन, वाट्सऐप चैट इत्यादि के रिकौर्ड के आधार पर पूछताछ करनी शुरू की तो वह चारों खाने चित्त हो गया और अपना असली नाम राकेश बताते हुए पुलिस के सामने अपना गुनाह कुबूल कर लिया. उस ने सिर्फ अपने दोस्त कलुआ की ही हत्या नहीं, बल्कि अपनी पत्नी और 2 बच्चों की हत्या का जुर्म भी कुबूल कर लिया, जिसे सुन कर सब की आंखें खुली की खुली रह गईं. इस शातिर कातिल के कत्ल की कहानी सुन कर किसी की भी रूह कांप जाए.

नौगवां, गंगीरी अलीगढ़ का रहने वाला राकेश ग्रेटर नोएडा में एक डाइग्नोसिस सेंटर में लैब टेक्नीशियन था. वह अपने छोटे से परिवार, जिस में उस की पत्नी रत्नेश, 3 साल की बेटी अवनि और डेढ़ साल के बेटे अर्पित के साथ ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर चिपयाना गांव की पंचविहार कालोनी में रहता था. यह उस का अपना घर था. उस के छोटे से परिवार में खुशियों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन राकेश अपने शादीशुदा जीवन से खुश नहीं था. राकेश की शादी साल 2012 में उत्तर प्रदेश के एटा की रहने वाली रत्नेश से हुई थी. लेकिन यह शादी उस ने अपने परिवार के दबाव में की थी.

राकेश प्रेमिका से करना चाहता था शादी

दरअसल, राकेश बिसरख गांव की रहने वाली रूबी को अपनी शादी से पहले से प्यार करता था. दोनों किसी समय में साथ में पढ़ते थे. लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ की वजह से उस ने पहले प्राइवेट इंस्टीट्यूट से लैब टेक्नीशियन का कोर्स किया और ग्रेटर नोएडा में जौब करने लगा. परिवार के दबाव में उस ने रत्नेश से शादी तो कर ली लेकिन रूबी के साथ उस का प्रेम संबंध खत्म नहीं हुआ, बल्कि वक्त के साथ उन का प्यार परवान चढ़ता गया. इसी दौरान रुबी की उत्तर प्रदेश में कांस्टेबल के पद पर नौकरी लग गई. राकेश के रत्नेश के साथ बच्चे भी हो गए. पहले अवनि फिर अगले साल अर्पित.

अपने परिवार में इतना उलझा हुआ होने के बावजूद वह रूबी से मिलने के लिए समय निकाल लिया करता था. रूबी और राकेश अकसर वाट्सऐप के जरिए अश्लील चैट भी किया करते थे, जिस से राकेश के मन में रूबी के लिए प्यार का तूफान उमड़ पड़ता था. साल 2018 की वैलेनटाइंस डे (14 फरवरी) के दिन जब राकेश इसी तरह से रूबी के साथ वाट्सऐप पर सैक्स चैट में लीन था तो उस की पत्नी रत्नेश ने राकेश को उसे पीछे से रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन राकेश और रत्नेश का खूब झगड़ा भी हुआ.

प्रेमिका की खातिर पत्नी व 2 बच्चों की हत्या कर आंगन में गाड़ा

दोनों के बीच झगड़ा अपने चरम पर पहुंच चुका था और राकेश ने अपना आपा खो दिया. राकेश ने आव देखा न ताव, रत्नेश पर लोहे की रौड से वार कर उस का सिर फाड़ दिया. रत्नेश की वहीं मौके पर मौत हो गई. लेकिन रत्नेश की मौत के बाद मामला यहीं ठंडा नहीं हुआ. उस ने इस मौके का फायदा उठाया और अपने बच्चों से भी अपना पिंड छुड़ाने के बारे में विचार किया. उस ने जिस लोहे की रौड से रत्नेश की हत्या की थी, उसी से अपने दोनों बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया.

उस ने रातोंरात उन तीनों के लाशों को छिपाने के लिए अपने ही घर के आंगन में गहरा गड्ढा खोद दिया और उन तीनों को उसी में दफना दिया. अगले दिन उस ने मजदूरों को बुलवा कर अपने घर के आंगन में सीमेंट की पुताई कर फर्श बनवा दिया. यही नहीं, उस ने उसी दिन अपने स्थानीय इलाके के पुलिस थाने में जा कर अपने बीवी बच्चों की गुमशुदगी की सूचना भी दर्ज करवा दी. और यह सब उस ने अकेले नहीं किया, बल्कि अपनी प्रेमिका कांस्टेबल रूबी के दिए प्लान के अनुसार किया.

कुछ दिनों बाद जब रत्नेश के मायके से राकेश को फोन आने लगे तो पहले तो राकेश उन की बात यूं ही टालता रहा, लेकिन जब मायके वालों की तरफ से जोर बढ़ता गया तो उस ने अपनी प्रेमिका रूबी को यह बात बताई. रूबी ने इस से बचने के लिए एक और प्लान सुझाया. जिस को सफल बनाने के लिए राकेश को एक और कत्ल करना था, जोकि उसी की उम्र और कदकाठी का होना चाहिए था. इस के लिए उस ने अपने गांव के बचपन के दोस्त राजेंद्र उर्फ कलुआ को चुना.

वह अगले दिन गांव जा कर अपनी बीवीबच्चों की तलाश करने के बहाने अपने साथ कलुआ को ले कर निकल गया. उस ने कलुआ को रास्ते में दारू भी पिलाई और खाना भी खिलाया. जब वे रेलवे ट्रैक के पास सुनसान इलाके में पहुंचे तो राकेश ने मौका देख कर पहले से जंगलों में छिपा कर रखे गंडासे से कलुआ पर प्रहार कर दिया. कलुआ राकेश के पहले ही हमले को नहीं सह पाया और बेहाल हो कर नीचे गिर पड़ा.

राकेश ने घर वालों को किया साजिश में शामिल

राकेश ने मौके का फायदा उठा कर कलुआ पर इतने वार कर दिए कि उस की जान वहीं पर ही निकल गई. राकेश ने उस के बाद कलुआ का सिर और हाथ के पंजे काट दिए ताकि लाश की पहचान न हो सके. अपने इस काले कत्ल की दास्तान में उस ने अपने घरवालों को भी शरीक कर लिया. राकेश ने अपने घर वालों को लालच दिया कि अगर उस की शादी रूबी से हो गई तो मोटा पैसा दहेज में मिलेगा. उस ने लाश की पहचान करने के लिए अपने पिता को राजी कर लिया. जिस के बाद ये सारी कहानी शुरू हुई.

इस बीच राकेश ने अपनी पहचान छिपाने के लिए एक फरजी आधार कार्ड भी बनवा लिया, जिस में उस ने अपना नाम दिलीप शर्मा रखा. रूबी की मदद से उस ने प्राइवेट अस्पताल से कुछ दिनों में कहीं बाहर जा कर अपने नाक की प्लास्टिक सर्जरी भी करवा ली. लेकिन अंत में वह पकड़ा ही गया. पकड़े जाने के बाद पुलिस ने राकेश की निशानदेही पर पंचविहार कालोनी में उस के घर के आंगन में गड्ढा खुदवा कर उस की पत्नी और दोनों बच्चों के कंकाल और उस लोहे की रौड को बरामद कर लिया, जिस से उस ने अपने पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था.

उस के बाद राकेश को साथ ले कर रेलवे स्टेशन के पास उस जगह पर छापा मारा, जहां पर उस ने कलुआ का कत्ल कर गंडासा छिपाया था. पुलिस ने इस पूरे मामले में अभी तक कुल 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. जिन में राकेश, उस की प्रेमिका रूबी, पिता बनवारी लाल, माता इंद्रावती व दोनों भाई राजीव और प्रवेश शामिल हैं. वे सभी फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे हैं. Love Story

Illicit Relationship: मामी से मोहब्बत

Illicit Relationship: लखनऊ के रेल कर्मचारी की हत्या का कारण उस का शराबी होना, गुस्सैल बने रहना या चालचलन था या फिर मामीभांजे के बीच नाजायज रिश्ते की नादानी. इन सब के अलावा एक सच्चाई यह भी थी कि मंजू अपने पति की बुरी आदतों से इतनी परेशान रहती थी कि…

मई, 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू की रिश्तेदारी में शादी थी. उस के सासससुर 24 मई, 2025 की रात को उसी शादी के लिए गए थे. पति ड्यूटी पर था. मंजू घर पर अकेली थी. शाम का वक्त था. इसी बीच एक कौल आ गई. स्क्रीन पर प्रेमी का नाम पढ़ कर उस के होंठों पर मुसकान बिखर गई. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली. कौल उस के प्रेमी आकाश वर्मा की थी, जो रिश्ते में उस का भांजा लगता था.

”हैलो! मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रही हूं. तुम उस का काम तमाम कर दो, बहुत दिन हो गए,’’ मंजू शिकायती लहजे में उस से बोली.

”मैं ने फोन किया न! …मुझे तुम से अधिक बेचैनी है…मैं चाहता हूं कि जितना जल्द हो, काम निपटा लिया जाए. मुझे तुम्हारे पति सिद्धि प्रसाद का काम तमाम हर हालत में करना है.’’ आकाश बोला.

”अब यह बताओ कि तुम कितनी देर में आ रहे हो?’’ मंजू का सीधा सवाल था.

”पहले यह बताओ कि घर का क्या हाल है?’’ उस ने सवाल का जवाब सवाल से ही किया.

”अकेली हूं. सभी लोग रिश्तेदार की शादी में गए हैं. तुम्हारा मामा ड्यूटी पर है… आधी रात को आएगा.’’ मंजू बोली.

”चलो ठीक है, मैं आ जाऊंगा, तुम दरवाजा खुला रखना,’’ कह कर आकाश ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रात गहराई. आकाश अपने दोस्त के साथ पूरी तैयारी के साथ प्रेमिका मंजू के घर आ गया. चुपके से घर में घुसने का इंतजाम मंजू पहले से ही कर चुकी थी. मंजू अपने कमरे में पति सिद्धि प्रसाद लोधी के साथ लेटी हुई थी, जबकि वह गहरी नींद में था. मंजू के घर में आने पर आकाश ने उस के इशारे पर अपने दोस्त के साथ कमरे में रखी प्लास्टिक की रस्सी से एक फंदा बना लिया. मंजू की मदद से फंदा गहरी नींद में सो रहे सिद्धि के गले में डाल दिया. दोनों ने मिल कर उस फंदे को कस दिया. थोड़ी देर सिद्धि प्रसाद छटपटाया, फिर शांत हो गया.

कुछ देर के बाद जब सिद्धि प्रसाद मरणासन्न हालत में पहुंच गया. वह जिंदा न बच जाए, इसलिए आकाश ने अपने दोस्त संजय के साथ उस के सिर पर हथौड़े से हमला कर दिया. उस वार से सिद्धि रक्तरंजित हो गया. लोहे के पाइप से भी उस के सिर पर कई हमले करने के बाद जब उस की मौत हो गई, तब आकाश ने अपने दोस्त की मदद से रात के अंधेरे में घर के पीछे एक तालाब के निकट सूखे गड्ïढे में उस की लाश फेंक दी. वह गड्ïढा झाडिय़ों की ओट में था. सिद्धि प्रसाद का मोबाइल, खून सने कपड़े भी वहीं झाडिय़ों में फेंक दिए.

25 मई, 2025 की सुबह लखनऊ-कानपुर रोड पर थाना बंथरा के एसएचओ राजेश कुमार सिंह को उसी थाने की पुलिस चौकी हरौनी के इंचार्ज एसआई अर्जुन राजपूत ने कौल कर बताया कि बीती रात सिद्धि प्रसाद लोधी नामक एक रेलकर्मी की हत्या हो गई है. उस की लाश उस के घर के ठीक पीछे तालाब के पास गड्ढे में पड़ी है. सिद्धि प्रसाद लोधी का घर दरियापुर मझरा गढ़ी चुनौटी में है. उस की लाश मिलने की सूचना पर चौकी इंचार्ज अरविंद कुमार एसआई श्यामजी मिश्रा, कांस्टेबल देवेंद्र कुमार के अलावा एसएचओ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. साथ ही इस की सूचना कृष्णा नगर के एसीपी विकास पांडेय को भी दे दी गई.

घटनास्थल पर उन के साथ एडिशनल डीसीपी अमित कुमावत भी घटनास्थल पर पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने सघन जांच के आदेश दिए. घटनास्थल पर मृतक की पत्नी मंजू देवी भी मौजूद थी. उसी ने अपने पति की हत्या की सूचना पुलिस को दी थी. मंजू रोरो कर पुलिस अधिकारियों को घटना के बारे में बताया, ”साहब, सुबह 6 बजे के करीब जब मैं सो कर उठी, तब पाया कि पति कमरे में नहीं हैं. इन्हें ढूंढते हुए मकान के बाहर निकल गई. घर के पीछे लगभग 50 मीटर दूर तालाब के पास झाडिय़ों में मुझे पति के कपड़े दिखाई दिए. पैंट और शर्ट वही थे, जो उन्होंने रात में पहने थे. पास ही पति औंधे मुंह पड़े थे.

”पास जा कर देखा तो देखते ही मेरे होश उड़ गए. मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई हो. पति के सिर पर गहरी चोट थी. काफी खून बह चुका था. वह एकदम से बेजान से थे. पति को इस हालत में देख कर ऐसा लगा, जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई.’’

घटनास्थल पर नहीं मिली खून की एक भी बूंद

पुलिस ने मंजू से प्रारंभिक पूछताछ के बाद शव की जांचपड़ताल की. एसएचओ के साथ आई पुलिस टीम ने उस की चप्पल, मोबाइल, शर्ट और पैंट पास से ही बरामद कर ली. जांच में घटनास्थल पर खून की एक बूंद भी नहीं थी, जबकि मृतक के सिर से काफी खून बह चुका था. इस से पुलिस ने सहज अनुमान लगा लिया कि इस की हत्या किसी दूसरी जगह पर करने के बाद हत्यारों ने लाश यहां ला कर फेंकी है. उन्होंने अनुमान लगाया कि हत्या करने वाले 2-3 लोग हो सकते हैं. शव की हालत देख कर पुलिस ने रात 2 और 3 बजे हत्या होने का अनुमान लगाया.

शव को ध्यान से देखने पर उस के सिर से खून बहने और गले में किसी चीज से कसाव के निशान का पता चला. एसीपी विकास पांडेय के सामने बंथरा थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की औपचारिकताएं पूरी कीं. आगे की प्रक्रिया के लिए मृतक की पत्नी मंजू देवी को थाने बुलाया गया. उस की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ सिद्धि प्रसाद लोधी की हत्या का मुकदमा धारा-103 बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया गया. मंजू देवी से जांच टीम की कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी ने पूछताछ की. साथ ही उस के घर जा कर भी तहकीकात की गई.

हरौनी के चौकीप्रभारी अर्जुन राजपूत, एसआई श्याम मिश्रा, अरविंद कुमार, संदीप सिंह और कांस्टेबल देवेंद्र के साथ देर रात तक ग्रामीणों से पूछताछ करते रहे. इस पूछताछ में हत्याकांड के संबंध में चौंकाने वाली बात सामने आई. पुलिस को विशेष सूत्रों से पता चला कि मंजू ने ही योजना बना कर अपने प्रेमी की मदद से पति की हत्या करवाई है. उस का प्रेमी आकाश वर्मा उर्फ लकी 25 साल का नवयुवक है और रिश्ते में उस के पति का भांजा है. वह जनपद लखनऊ के नरपतखेड़ा गांव का निवासी है. यह भी पता चला कि इस हत्याकांड में उस का दोस्त भी शामिल था.

आकाश वर्मा के संदिग्ध आरोपी होने की जानकारी मिलने पर पुलिस उसे घटना के एक हफ्ते बाद ही गिरफ्त में ले लिया. उसे बंथारा थाने लाया गया. खासकर उस के बारे में मंजू देवी को भनक तक नहीं लगने दी गई. पुलिस ने उस से सिद्धि प्रसाद की हत्या के बारे में कड़ाई से पूछताछ की. काफी समय तक आकाश वर्मा पुलिस को गुमराह करता रहा. सच उगलवाने के लिए आखिरकार पुलिस टीम ने उस पर थोड़ी सख्ती की. पुलिस के दबाव और पूछताछ के तरीके के आगे उस ने हार मान ली और सिद्धि प्रसाद की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस ने यह भी बताया कि यह हत्या सिद्धि प्रसाद की पत्नी  मंजू देवी की शह पर की थी.

आकाश से पूछताछ पूरी होने के अगले दिन सुबहसुबह पुलिस मंजू देवी को थाने ले आई. जैसे ही उस की नजर थाने के हवालात में बंद आकाश वर्मा पर गई तो वह चौंक गई. उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. महिला कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी उसे पकड़ कर एक कोने में ले गईं. जोरदार लहजे में उस से सवाल किया, ”सचसच बता, तूने ही अपने पति की हत्या की है न?’’

दूसरी सिपाही उस की आंखों के आगे बेंत घुमाने लगी. मंजू सिपाहियों के तेवर देख कर सहम गई. उस की जुबान खुल ही नहीं रही थी. वह एकदम से निस्तब्ध थी. तभी डंडे घुमाती सिपाही कड़कती हुई बोली, ”मंजू, तू सचसच सब कुछ बताती है या मुझे कोई दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा..?’’

मंजू फिर भी कुछ नहीं बोली. दूसरी महिला सिपाही ने उस के ऊपर बेंत उठाया ही था कि मंजू बोल पड़ी, ”मुझे मारिए मत, मैं सारा सच बता दूंगी.’’

उस के बाद मंजू ने जो कहानी बताई, वह और भी चौंकाने वाली थी. उस की कहानी में पति की हत्या ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मर्यादा को लांघने की भी बात थी. उस का प्रेमी रिश्ते में पति का भांजा था. इस नाते उस के साथ मांबेटा समान मामीभांजे का रिश्ता था. आकाश और मंजू देवी के बीच लव अफेयर के साथ हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

सिद्धि प्रसाद कैसे बना शराब का लती

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के कानपुर रोड पर थाना बंथरा के अंतर्गत पुलिस चौकी हरौनी है. थाने से लगभग 12 किलोमीटर दूर बीहड़ जंगल का यह सुनसान इलाका भी है. यहीं दरियापुर गढ़ी चुनौटी नाम का गांव बसा हुआ है. सिद्धि प्रसाद लोधी अपनी फेमिली के साथ यहीं रहता था. सिद्धि प्रसाद की उम्र लगभग 40 वर्ष की हो चुकी थी. उस का विवाह मंजू देवी के साथ करीब 8 साल पहले हुआ था. मंजू खूबसूरत थी. सिद्धि प्रसाद मंजूू देवी को पा कर बहुत खुश था. वह उस की सुंदरता और यौवन का दीवाना बना हुआ था.

वह रेलवे विभाग में सम्पार (गेट कीपर) के पद पर नौकरी करता था. उसे अच्छी सैलरी मिलती थी. उस की संगत कुछ गलत लोगों के साथ थी, जिस से वह मांसाहारी होने के साथसाथ शराबी भी बन गया था. ड्यूटी पूरी करने के बाद वह जब थकामांदा लौट कर घर वापस आता था, तब अपनी थकान मिटाने के बहाने शराब पीता था. साथ में खूब मटन और चिकन उड़ाता था. उस के बाद बिस्तर पर जाते ही अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए मंजू को बांहों में दबोच लेता था. इस का वह जरा भी खयाल नहीं करता था कि पत्नी की इच्छा है भी या नहीं! कई बार वह उस की इच्छा के खिलाफ जिस्मानी भूख मिटाता था. ऐसा वह मंजू के साथ आए दिन करता था. उस की इस आदत से मंजू परेशान हो गई थी.

उस के 2 बच्चों में से एक की असामयिक मौत होने से एकमात्र बेटी ही बची थी. दूसरे बच्चे की चाहत में वह मंजू को अपनी हवस का शिकार बनाता था. जबकि मंजू पति के वहशी व्यवहार से तंग आ गई थी. उस से घृणा करने लगी थी. सिद्धि प्रसाद  की फिजूलखर्ची बढ़ती जा रही थी. मंजू देवी इस का विरोध करती थी. विरोध करने पर सिद्धि उसे प्रताडि़त करता था. मंजू कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह अपने पति की बढ़ती शराब की लत को कैसे रोके.

मंजू और आकाश ऐसे आए करीब

जनवरी, 2025 का महीना था. सिद्धि प्रसाद खाना खा कर ड्यूटी पर चला गया था. उस के जाने के बाद मंजू अपने कमरे में लेटी थी. अपनी मुसीबतों के बारे में सोच रही थी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. वह करवट लिए लेटी हुई थी. सिर पर हाथ रखे तकिए में मुंह छिपाए काफी समय तक सिसकती रही.  दिन के 11 बजने को आए थे. चारपाई पर लेटेलेटे उस की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. जब आंखें खुलीं, तब उस ने अपने बगल में बैठे आकाश को पाया.

वह हड़बडाती हुई उठी और कपड़े संभालने लगी. उस ने महसूस किया कि आकाश की नजर उस की मांसल शरीर पर टिकी है. थोड़ी देर के लिए वह शरमा गई. फिर भी बोली, ”अरे आकाश, तू कब आया? …आ न! बैठ यहीं, तू कोई गैर थोड़े है.’’

”मैं अभीअभी आया मामी, तुम उदास दिख रही हो? क्या बात है फिर मामा से बहस हुई क्या?’’ आकाश ने हमदर्दी जताई.

”अच्छा, तुम्हें याद भी कर रही थी.’’

”सौरी मामी, मैं तुम्हें कुछ और नजरों से देख रहा था.’’

”अरे कुछ नहीं, तुम जैसा गबरू जवान मेरी जवानी को नहीं देखेगा तो और कौन..?’’ मंजू बोली.

”अच्छा! …तो आप ने मुझे माफ कर दिया.’’ झेंपता हुआ आकाश बोला.

उस के बाद दोनों के बीच हंसीमजाक और इधरउधर की बातें होती रहीं. बातोंबातों में मंजू ने अपनी पीड़ा भांजे आकाश वर्मा के सामने उड़ेल कर रख दीं. इस से उस ने महसूस किया कि गम थोड़ा हलका हो गया. फिर उस के कंधे पर अपना सिर टिका कर सिसकती हुई बोली, ”आकाश, तुम ही कोई तरीका निकालो!’’

”हां मामी, मैं कुछ करता हूं आप के लिए. थोड़ा वक्त दो… अभी चलता हूं. जब भी कोई जरूरत हो तो फोन कर देना.’’ आकाश बोला और वहां से चला गया.

आकाश वर्मा सिद्धि प्रसाद का रिश्ते में भांजा लगता था. वह मूलरूप से लखनऊ के ही थाना पारा के अंतर्गत नरपत खेड़ा गांव का रहने वाला था. अकसर खाली समय में अपने मामा सिद्धि प्रसाद के यहां मिलने आताजाता रहता था. मौका मिलने पर मंजू से आंखें छिपा कर अपने मामा सिद्धि प्रसाद के साथ शराब पीने का मौका भी निकाल लेता था. शराब के नशे में दोनों काफी देर तक गपशप किया करते थे. आकाश सरोजनी नगर के नादरगंज की एक नमकीन बनाने वाली कंपनी में काम करता था और समय मिलने पर सिद्धि प्रसाद के घर चला आता था.

हसरतों में बह गया रिश्ता

25 वर्षीय आकाश वर्मा मंजू देवी को बहुत प्यार करता था, किंतु उस ने अपने मन की बात का इजहार करने के लिए मंजू के सामने कभी पेशकश नहीं की थी. आकाश मंजू के सामने जब भी आता तो बैठ कर उसे हसरत भरी नजरों से देखा करता था. वह मंजूू से अपने दिल की बात उजागर करने का कोई अवसर भी नहीं ढूंढ पाया. मंजू को अपने दिल में बसाने के बाद उस की रातों की नींद उड़ चुकी थी. चाहत छिपती नहीं है, जब 2 प्रेमी सामने हों तो आंखों में समाई प्यार की भाषा को समझते देर भी नहीं लगती.

आकाश के अकसर घर आने के बाद मंजू भी उसे चाहत की नजरों से देखा करती थी, किंतु वह विवाहिता थी. उस के सामने समाज की कुछ मर्यादाएं भी थीं. आकाश को मन ही मन में चाहने के बाद मंजू भी अपने मन की भावना व्यक्त नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे मंजू के मन में आकाश के प्रति सम्मान व प्यार का दीप जल उठा था. दोनों उचित अवसर की तलाश में थे. जनवरी माह में उस दिन आकाश के समक्ष उस ने अपनी दुखती रग को व दर्द को बयान किया तो आकाश के मन में दया व प्यार का सागर उमड़ पड़ा, लेकिन समझदारी व अवसर की तलाश में उस दिन मंजू नेे अपनी आंखों की मूक भाषा से सब कुछ समझा दिया कि वह भी इस नरक से उसे छुटकारा दिला दे.

मार्च 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू ने फोन पर आकाश के पूछने पर बताया कि उस दिन सिद्धि प्रसाद रात की ड्यूटी पर घर से गया हुआ है, इसलिए वह घर पर आ जाए, कुछ जरूरी बात करनी है.   आकाश ड्यूटी की छुटटी के बाद मंजू के घर देर रात पहुंच गया. उस ने धीरेधीरे आहट पा कर जानने की कोशिश की कि घर की बगल की दूसरी कोठरी में मंजू के सासससुर अपने कमरे में लिहाफ ओड़े सो रहे हैं. मंजू ने आकाश को घर आया देख कर राहत की सांस ली और चुपके से अपनी कोठरी में आकाश को एकांत में बुला लिया. कमरे में पहुंचने के बाद आकाश ने जाते ही मंजूू को अपनी बाहों में भर लिया. जी भर गालों को चूमने व प्यार करने के बाद वह खाना खाने बैठ गया.

उस दिन आकाश मंजू को पाने को आतुर हो गया था. पति द्वारा प्रताडि़त करने की बात कहते हुए मंजू ने उसे अपनी पीठ पर चोट के निशान दिखाए. पीठ पर पिटाई के निशान देख कर आकाश ने हमदर्दी जताई. इसी हमदर्दी में दोनों प्रेम और सहानुभूति की भावना में बह गए थे. वे कब एकदूसरे की बाहों में आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. फिर दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. थोड़ी देर में जब आकाश जाने लगा, तब मंजू उस का हाथ पकड़ कर बोली, ”आकाश, जल्द कुछ उपाय करो… अब छिपछिप कर रहना सहन नहीं होता…और उस का जुल्म भी बढ़ता जा रहा है.’’

”जल्द ही कुछ करूंगा. चिंता मत करो.’’

आकाश जब भी आता था, तब मंजू घर में अकेले होती थी. उसे नहीं पता था कि उस की गतिविधियों पर पासपड़ोस की नजर बनी हुई है. कई बार वह रात के अंधेरे में भी आने लगा था. उस का मंजू के साथ बेमेल ही सही, लेकिन नाजायज रिश्ता बन चुका था. आकाश उस से उम्र में करीब 10 साल छोटा था. मंजू के मन का दर्द आकाश के लिए भी असहनीय हो गया था. सिद्धि प्रसाद की हत्या के 2 दिन पहले जब आकाश आया था, तब घर में बिखरे हुए सामान को देख कर समझ लिया था कि सिद्धि ने उस पर किस तरह का जुल्म ढाया होगा. घर में चारपाई के नीचे शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं.

अभी आकाश घर के चारों ओर नजरें दौड़ा ही रहा था कि उस ने मंजू की सिसकती आवाज सुनी, ”जी तो करता है कि मैं कहीं जा कर डूब मरूं और अपनी जान दे दूं.’’

आकाश तेजी से मंजू की ओर मुड़ा और उस के पास जा कर कान में कुछ फुसफुसाया. मंजू उस की बात सुन कर चौंकती हुई बोली, ”ऐसा हो सकता है तो जल्दी करो, मैं तुम्हारा साथ दूंगी. जितना भी खर्च आएगा, उस का भी इंतजाम करूंगी.’’

”मैं तुम्हें 24 मई को फोन करूंगा.’’ आकाश बोल कर वहां से जाने लगा. आकाश को जाता देख मंजू बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे देखने लगी. घर से निकलने से पहले आकाश ने एक बार फिर आश्वासन देते हुए कहा, ”मामी, आप को सब्र से काम लेना होगा. मुझे पूरी प्लानिंग बनाने का मौका दो. काम बहुत जोखिम भरा है.’’

प्रेमी के साथ मिल कर बनाया हत्या का प्लान

23 मई, 2025 की रात को आकाश और मंजू जब फोन पर बातें कर रहे थे, तभी  अचानक रात की ड्यूटी समाप्त कर सिद्धि प्रसाद घर लौट आया था. अचानक पति को घर आया देख कर मंजू सहम गई थी. तुरंत फोन कट कर दिया था. किंतु सिद्धि प्रसाद समझ गया था कि मंजू जरूर अपने प्रेमी से बात कर रही है. इस बारे में पड़ोसियों द्वारा उस के कान पहले से ही भरे जा चुके थे. उस ने तुरंत मंजू की जम कर पिटाई कर डाली. वह कहती रही कि उस की बात सहेली से हो रही थी, लेकिन सिद्धि ने पीटना नहीं छोड़ा.

राज खुलने के डर से मंजू एकाएक वह घबरा गई. परेशान सी हो उठी. किसी तरह उस ने दर्द से कराहते हुए रात बिताई. अगले रोज पति के ड्यूटी पर जाने के बाद आकाश को बीती रात की पूरी बात बता दी. अगले रोज 24 मई को उस का पति सो गया, तब आकाश का फोन आया. उस के बाद उस ने पहले तय प्लान के मुताबिक सिद्धि प्रसाद की प्लास्टिक की रस्सी के फंदे से पहले गला घोंट दिया, फिर उस के सिर पर भारी चीज से हमला कर मार डाला. इस काम में आकाश ने अपने दोस्त संजय निषाद की भी मदद ली थी.

अगले दिन ही मंजू द्वारा की गई पुलिस में शिकायत के बाद सिद्धि प्रसाद की लाश बरामद कर ली गई. इस की हफ्ते भर चली जांच में हत्या का न केवल खुलासा हो गया, बल्कि इस में शामिल आरोपियों में मंजू देवी, आकाश वर्मा और उस के दोस्त संजय निषाद की गिरफ्तारी भी हो गई. उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा के रहने वाले संजय निषाद को 40 हजार रुपए देने का वादा किया था, उसे मात्र 5 हजार रुपए एडवांस में दिए थे. मंजू देवी ने पुलिस के सामने अपने पति की क्रूरता का जिक्र करते हुए पति की प्रताडऩा से परेशान रहने की बात कही.

 

उस ने पति पर अय्याशी करने का आरोप लगाया. उस ने यह भी बताया कि सिद्धि प्रसाद के गांव की एक विधवा महिला से कई सालों से  अवैध संबंध बने हुए थे. पुलिस ने आकाश से संजय निषाद का फोन नंबर ले कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. तकनीकी जांच से  वह 10 जुलाई, 2025 को उत्तर पूर्व दिल्ली के सोनिया विहार से पकड़ा गया. संजय वारदात के बाद लखनऊ से फरार हो कर दिल्ली चला गया था. वहां वह एक दुकान पर नौकरी करने लगा था. फोन की लोकेशन के आधार पर वह भी पुलिस की पकड़ में आ गया.

पुलिस ने आरोपी मंजू देवी, उस के प्रेमी आकाश वर्मा और संजय निषाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Illicit Relationship

 

Love Story: अधूरी मोहब्बत

Love Story: कामरान की शादी उस की चचेरी बहन सदफ से बचपन में ही तय हो गई थी, चाचाचाची भी तैयार थे, अंत में ऐसा क्या हुआ कि उस की शादी सदफ से होने के बजाए किसी और से हो गई, जो उसे जरा भी पसंद नहीं करती थी…

चाय का पहला घूंट लेते हुए मैं ने सदफ से फरमाइश की, ‘‘दुआ करो कि मैं कामयाब हो जाऊं.’’ उस ने गुलाबी होंठों पर शरमीली मुसकराहट लाते हुए कहा, ‘‘आप को यह कहने की जरूरत नहीं है. मैं रातदिन आप के लिए, आप की कामयाबी के लिए दुआ करती रहती हूं.’’

यह सच भी था. मुझे उस से कहने की जरूरत नहीं थी. वह मेरी मंगेतर थी. मेरी दादी ने सदफ के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही ऐलान कर दिया था, ‘‘यह मेरे कामरान की दुलहन बनेगी.’’

दादी की इस बात को भले किसी बंधन में नहीं बांधा गया था, पर सब के दिलों में यह बात बैठ गई थी कि कामरान की शादी सदफ से होगी. मंगनी वगैरह इसलिए नहीं की गई थी, क्योंकि चाचा और हमारा परिवार एक ही मकान में रहता था. हमारे उस पुश्तैनी मकान में ऊपर वाले हिस्से में चाचा रहते थे और नीचे वाले हिस्से में हम लोग. दोनों घरों में बच्चे बराबर थे. हम दो 2 भाई और एक बहन थी. जबकि चाचा की सिर्फ 3 बेटियां थीं. सदफ चाचा की बड़ी बेटी थी. हमारा गुजरबसर आराम से हो रहा था. लेकिन इधर साल भर से हमारे घर के हालात बिगड़ रहे थे. अचानक हार्टअटैक से अब्बा की मौत हो गई थी. वह सरकारी हाईस्कूल में टीचर थे. फंड की रकम और पेंशन मिलने में समय लग रहा था.

घर के हालात रोजबरोज बिगड़ते जा रहे थे. नौकरी की दौड़धूप करने के साथसाथ मैं एक कोचिंग सेंटर में अंग्रेजी और अर्थशास्त्र पढ़ा रहा था, जिस से थोड़ी मदद मिल जाती थी, थोड़ीबहुत मदद चाचा कर देते थे. 8-9 महीने की दौड़भाग के बाद पेंशन मिलने लगी. फंड भी मिल गया था. पर ढेरों खर्च मुंह बाए खड़े थे. छोटा भाई मैट्रिक में था और बहन मिडिल क्लास में थी. किसी तरह काम चल रहा था कि अम्मी बीमार हो गईं. उन्हें बे्रस्ट कैंसर हुआ था. फंड से मिलने वाली रकम उन के इलाज में खर्च हो गई. औपरेशन होने के बाद भी सेहत में कोई खास फर्क नहीं पड़ा. हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. चाचा भी परेशान रहते थे. आखिर वह कितनी मदद करते. उन पर भी 3 बेटियों की जिम्मेदारी थी. इस के बावजूद इस मुसीबत में वह पूरा साथ दे रहे थे. चाची ज्यादा वक्त अम्मी के पास ही बिताती थीं. खाना पकाने का काम सदफ संभाल रही थी.

उस रोज नौकरी का इंटरव्यू देने जाना था. सदफ की दुआओं के साथ मैं घर से निकल रहा था तो उस की नजर मेरे जूतों पर पड़ी. उस ने कहा, ‘‘शूज तो बड़े शानदार हैं, ब्रांडेड लगते हैं?’’

मैं बौखला सा उठा. सच था, इतने कीमती ब्रांडेड शूज मेरे पास कहां से आ सकते थे? मैं ने कहा, ‘‘इंटरव्यू के लिए एक दोस्त से मांग कर लाया हूं.’’

यह कहते हुए मेरी नजरें झुक गई थीं. आंख मिला कर झूठ बोलना मेरे बस की बात नहीं थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में दाखिल होते हुए मैं उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच झूल रहा था. मैं ने एकाउंट विभाग के लिए आवेदन किया था. 4-5 लोग वहां पहले से बैठे थे. मेरा नाम पुकारा गया. केबिन में पहुंचने पर थ्रीपीस सूट पहने एक व्यक्ति ने कहा, ‘‘प्लीज सिट डाउन.’’

उस की पर्सनालिटी कुछ खास नहीं थी, पर कपड़े व स्टाइल शानदार थी. कुरसी पर बैठ कर मैं ने फाइल उस की ओर बढ़ा दी. उस की नजरें मेरे ऊपर ही टिकी थीं. उस की तेज निगाहों से मुझे घबराहट सी हो रही थी. उस ने ठहरी हुई आवाज में कहा, ‘‘मि. कामरान अहमद, आप ने जो शूज पहने हैं, इन्हें कहां से हासिल किए हैं?’’

मुझे लगा, मेरे कानों में किसी ने बम फोड़ दिया है. पहले की ही तरह मैं उस से झूठ नहीं बोल सका. लेकिन सच बोलना भी आसान नहीं था. मैं ने इंटरव्यू की खूब तैयारी कर रखी थी, पर पहले ही सवाल ने मुझे लाजवाब कर दिया था. मेरे दिमाग में धमाका सा हुआ कि यहां सच बोलना ही बेहतर है. मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘सर, आप का यह सवाल हैरान करने वाला है. क्योंकि आप ने मेरी हैसियत और जूतों के फर्क को समझ लिया. इन्हें खरीदना मेरे वश की बात नहीं है. सर, मैं झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं ने दोस्त से मांगे हैं. क्योंकि दोस्त भी हैसियत के मुताबिक ही होते हैं.’’

जूतों की हकीकत बताने से पहले मैं ने अपनी गरीबी, बाप की मौत, मां की बीमारी और भाईबहन की जिम्मेदारी के बारे में सब संक्षेप में बता कर कहा, ‘‘सर, यह नौकरी मेरे लिए बेहद जरूरी है. विज्ञापन के हिसाब से योग्यता भी थी और तैयारी भी अच्छी थी. बस मुझे अपने आप को सलीके से पेश करना था.’’

‘‘जब हालात ठीक थे, तब का यह सूट था, लेकिन जूते फट चुके थे. कल मैं जुम्मे की नमाज पढ़ने मसजिद गया था, वहां मुझे ये जूते नजर आ गए. मेरा मसला हल हो गया. किसी बुरी नीयत से नहीं, सिर्फ इंटरव्यू के लिए मैं ने ये जूते उठाए थे. इरादा यही था कि इंटरव्यू के बाद इन्हें वहीं रख आऊंगा. पता नहीं था कि अल्लाह के घर से की गई पहली चोरी का हिसाब इतनी जल्दी और इस जगह देना होगा.’’

इंटरव्यू लेने वाले ने मेरी पूरी बात ध्यान से सुनी. कुछ देर खामोशी से मुझे परखता रहा. मैं नजरें झुकाए बैठा था. अचानक उस ने कहा, ‘‘तुम्हारे इस सच ने मुझे खुश कर दिया. तुम कितना भी झूठ बोलते, मुझे धोखा नहीं दे सकते थे. मैं कोई नमाजी आदमी नहीं हूं. लेकिन कल मैं एक पार्टी को प्रोजेक्ट दिखाने गया था, रास्ते में नमाज का समय हो गया. वह नमाज के पाबंद थे, उन के साथ मुझे भी नमाज पढ़ने मसजिद जाना पड़ा. वापस आया तो मेरे जूते गायब थे.’’

वह दोस्तों की तरह अपनी परेशानी बता रहे थे. मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘सौरी सर, मैं ने बड़ी मजबूरी में आप के जूते चुराए थे.’’

‘‘इट्स ओके, जो हुआ सो हुआ. शायद इसी तरह हमारी मुलाकात होनी थी. इस में तुम्हें समझने का मौका तो मिल गया. तुम्हारे सच से मैं प्रभावित हूं. क्या तुम पाबंदी से नमाज पढ़ते हो?’’

‘‘नहीं सर, जुम्मेजुम्मे हाजिरी लगा देता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘मि. कामरान अहमद, तुम से बात कर के मुझे लग रहा है कि तुम ही वह व्यक्ति हो, जिस की मुझे जरूरत है. मैं ने नौकरी के लिए तुम्हें सिलेक्ट कर लिया है. 3 महीने तुम टे्रनिंग पर रहोगे. तुम्हारा काम अच्छा हुआ तो तुम परमानेंट कर दिए जाओगे. तब तुम्हारी तनख्वाह बढ़ने के साथ अन्य सुविधाएं भी मिलने लगेंगी.

मुझे लगा, खुशी से कहीं मेरी धड़कनें न रुक जाएं. जिन जूतों की वजह से मुझे यह नौकरी मिली थी, मेरी नजर उन जूतों पर पड़ी तो मैं ने कहा, ‘‘सर, ये शूज…’’

‘‘अब इन्हें तुम रख लो, तुम्हारे पैरों में ये बहुत जंच रहे हैं.’’ उस ने लापरवाही से कहा.

‘‘तुम थोड़ी देर बाहर बैठो, मैं तुम्हारा अपाइंटमेंट लेटर तैयार कराए देता हूं. लेटर ले कर ही घर जाना.’’

उस दिन एच.एच. बिल्डर्स के औफिस से अपाइंटमेंट लेटर ले कर निकला तो मैं हवा में उड़ रहा था. घर में इस खुशखबरी ने मुसकानें बिखेर दीं. चाचा ने उसी समय मिठाई मंगाई. सदफ का चेहरा खुशी से खिला हुआ था. अम्मी भी खुदा का शुक्र अदा कर रही थीं. रात को हम सभी की चाचा के यहां दावत थी, क्योंकि शाम को चाचा की दूसरे नंबर की बेटी सफिया को देखने कुछ लोग आ रहे थे. वह पूरा दिन बड़े हंगामे और खुशी में गुजरा. अब्बा के मरने के बाद पहली बार हम सभी ने इस तरह खुशी मनाई थी. एच.एच. बिल्डर्स के औफिस में पहला दिन बहुत अच्छा गुजरा. चीक एकाउंटैंट सुहैल साहब बड़े दोस्ताना अंदाज में काम समझाते रहे. तसल्ली भी देते रहे कि आगे भी उन का सहयोग मिलता रहेगा. मैं उन फाइलों को देखनेसमझने में लगा रहा, जो मुझे दी गई थीं. 12 बजे के करीब इंटरकौम बजा. बौस मुझे याद कर रहे थे. मेरे बौस वही थे, जिन के जूते चुरा कर मैं पहने बैठा था.

मैं केबिन में पहुंचा तो उन के बगल में एक 20-21 साल की लड़की बैठी थी. बौस ने हमारा परिचय कराया, ‘‘यह एच.एच. बिल्डर्स की औनर और मेरी भतीजी हानिया हसन हैं.’’

मैं ने जल्दी से सलाम किया. वह लापरवाही से सिर हिला कर खिड़की से बाहर देखने लगी. बौस फसील साहब ने आगे कहा, ‘‘हानिया बीकौम कर रही है. आगे एमबीए करने का इरादा है. अपनी पढ़ाई की वजह से औफिस को ज्यादा समय नहीं दे पाती, इसलिए फिलहाल यहां की सारी जिम्मेदारी मुझे ही संभालनी पड़ती है.’’

मैं मुलाजिम था, मुझे औपचारिकता तो निभानी ही थी. मैं ने कहा, ‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई.’’

उस ने मेरी बात का जवाब देने की कौन कहे, मेरी ओर देखा तक नहीं. बौस ने कहा, ‘‘हानिया, यह कामरान अहमद हैं. इन्हें मैं ने एकाउंट डिपार्टमेंट में रखा है. इन्होंने आज ही ज्वाइन किया है.’’

उस ने बेमन से कहा, ‘‘गुड, अच्छा अंकल अब मैं चलूंगी. मुझे काम से कहीं जाना है.’’

‘‘ठीक है बेटा, जाओ.’’ फसील साहब ने कहा. हानिया चली गई.

उस के जाने के बाद फसील साहब ने कहा, ‘‘मेरे बड़े भाई इनायत हसन की 2 साल पहले एक रोड एक्सीडैंट में मौत हो गई थी. उन की पत्नी हानिया के पैदा होते ही गुजर गई थी. भाई साहब ने दूसरी शादी नहीं की थी. बड़े लाडप्यार से हानिया की परवरिश की. यही वजह है कि उन की मौत के 2 साल के बाद भी हानिया अभी तक संभल नहीं पाई है. उन्हीं की याद में डूबी रहती है. इसलिए हमेशा उखड़ीउखड़ी रहती है. इसे ले कर मैं बहुत परेशान रहता हूं.’’

हानिया ने मेरे साथ जो रूखा व्यवहार किया था, उसी की वजह से वह यह सब बता रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘सौरी सर, यह सुन कर बड़ा अफसोस हुआ. हानिया मैडम के लिए मांबाप दोनों को खो देने का बहुत बड़ा सदमा है. लेकिन समय बड़ा मरहम होता है, धीरेधीरे सारे जख्म भर देगा. आप परेशान न हों.’’

‘‘तुम ठीक ही कह रहे हो. मैं सोचता हूं कि कोई अच्छा सा लड़का देख कर इस की शादी कर दूं, ताकि शौहरबच्चों में अपना दुख भूल जाए.’’ फसील साहब ने कहा. इस के बाद हम कामकाज और एकाउंट की बातें करने लगे.

शाम को घर पहुंचा तो सभी ने मुझे अच्छी नौकरी की मुबारकबाद दी. अम्मी बहुत खुश थीं. मैं ने कहा, ‘‘आप सभी दुआएं करें कि मैं खूब तरक्की करूं.’’

रात के खाने के बाद मैं ने चाची से पूछा, ‘‘जो लोग सफिया को देखने आए थे, उन का क्या जवाब आया?’’

कुछ देर चुप रहने के बाद चाची बोलीं, ‘‘बेटा उस में एक पेच फंस गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘चाची, अगर लंबेचौड़े दहेज की डिमांड हो तो आप साफ मना कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. खातेपीते खानदानी लोग हैं. दरअसल बात कुछ और है. वे हमारे घर रिश्ता करने को तैयार तो हैं, लेकिन उन्हें सफिया के बजाय सदफ ज्यादा पसंद है.’’

चाची की बात सुन कर मैं सन्न रह गया. अम्मी के चेहरे पर भी परेशानी झलकने लगी. चाची ने कहा, ‘‘बड़ी होने की वजह से पहला हक सदफ का ही है, पर हम लोग इसलिए सोच में पड़ गए, क्योंकि बड़ी अम्मा ने सदफ का रिश्ता बचपन में तुम्हारे साथ जोड़ दिया था. लेकिन उस के बाद इस बात पर कोई चर्चा ही नहीं हुई. बच्चों के बड़े होने पर उन के खयाल भी बदल जाते हैं, इसलिए हम उलझन में है कि क्या जवाब दें?’’

मेरी अम्मी तड़प उठीं. उन्होंने जल्दी से कहा, ‘‘बच्चों के बड़े होने पर भले रुझान बदल जाते हैं, पर मुझे तो सदफ बहू के रूप में कल भी पसंद थी, आज भी पसंद है. रही बात कामरान की तो सामने बैठा है, अभी पूछ लेते हैं. क्यों कामरान तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं आप बड़ेबुजुर्गों की रजा में राजी हूं. सदफ आप को पसंद है तो वह मेरी भी खुशी है.’’

‘‘जीते रहो बेटा, तुम ने मेरा मान रख लिया. तुम मेरे मरहूम भाई की निशानी हो, किसी और के मुकाबले तुम्हें दामाद बना कर मुझे ज्यादा खुशी होगी.’’ इतना कहते हुए चाचा ने भावुक हो कर मुझे गले लगा लिया.

चाची ने कहा, ‘‘अब साफ हो गया कि सदफ की शादी कामरान से ही होगी. हम उन्हें मना कर देते हैं. कामरान सैटल हो जाए तो मंगनी भी कर देते हैं ताकि सब को इस बात का पता चल जाए.’’

दरवाजे के पीछे सदफ के गुलाबी हुए चेहरे को देख कर मैं निहाल हो गया. एच.एच. बिल्डर्स में मेरी नौकरी बढि़या चल रही थी. मैं अच्छी तरह से ऐडजस्ट हो गया था. काम भी मेहनत और लगन से कर रहा था. मेरे प्रति फसील साहब का व्यवहार अच्छा और नरम था. दिन में एक बार उन से मुलाकात जरूर हो जाती थी. हम दोनों एकदूसरे के हालात से अच्छी तरह वाकिफ थे. मुझे पता चल गया था कि कंपनी में फसील साहब के 10 प्रतिशत शेयर थे. 90 प्रतिशत शेयर के मालिक उन के भाई इनायत हसन थे. दरअसल इनायत हसन को हानिया की मां की ओर से काफी दौलत मिली थी. वह चाहते तो करोबार अलग कर लेते, लेकिन उन्होंने इसी कारोबार में पैसा लगाया, जिस से उन के शेयर बढ़ गए थे. भाई के मरने के बाद वही उन की कंपनी संभाल रहे थे.

उन्हें अपनी भतीजी हानिया से बेहद प्यार था. जल्द ही अच्छा लड़का देख कर वह उस की शादी करना चाहते थे. हानिया जैसी दौलतमंद लड़की से शादी के लिए कोई भी तैयार हो सकता था. खैर, मुझे इन बातों से क्या मतलब था? मेरी अच्छीभली नौकरी चल रही थी, जिस से मेरी जिंदगी खुशी से गुजर रही थी. उस दिन मैं अपनी केबिन में बैठा रोज के काम निपटा रहा था. छुट्टी होने में कुछ ही पल बाकी थे कि फसील साहब ने मुझे अपनी केबिन में बुला कर कहा, ‘‘आओ कामरान, इस वक्त मैं ने तुम्हें एक जरूरी काम से बुलाया है. तुम्हें जरा हानिया के साथ इस के घर तक जाना होगा. दरअसल इस का ड्राइवर आज छुट्टी पर है. वह गाड़ी ड्राइव कर के यहां तक तो आ गई, पर अचानक उस की तबीयत खराब हो गई है, इसलिए मैं नहीं चाहता कि यह अकेली घर जाए. तुम्हें तकलीफ तो होगी, लेकिन…’’

‘‘नो सर, इस में तकलीफ कैसी. मैं इन के साथ चला जाता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘जाओ बेटा हानिया, कामरान के साथ चली जाओ. अब मुझे चिंता नहीं होगी.’’

बिना कुछ कहे हानिया उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई. मैं उस के पीछेपीछे चल रहा था. ड्राइविंग मुझे आती थी, मगर उस ने मुझे मौका नहीं दिया. खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गईं और सपाट चेहरे से मुझे पीछे बैठने का हुक्म दिया. मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर क्या करता. हानिया ने झटके से गाड़ी आगे बढ़ा दी. साफ लग रहा था कि चाचा के कहने पर मजबूरी में वह मुझे अपने साथ ले जा रही थी. 7-8 मिनट के बाद उस ने गाड़ी रोक दी और दोनों हाथों से सिर थाम कर इस तरह बैठ गई, जैसे उसे चक्कर आ रहे हों. मैं ने कहा, ‘‘आर यू ओके मैम?’’

उस की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मैं जल्दी से नीचे उतरा और खिड़की से उसे देखा. उस के चेहरे पर पसीना और तकलीफ साफ झलक रही थी. मैं ने कहा, ‘‘मैम, आप को क्या हो रहा है?’’

उस ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ड्राइव नहीं कर सकूंगी. तुम कार चलाओ.’’

वह पिछली सीट पर चली गई. मैं ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. मैं ने हमदर्दी से पूछा, ‘‘आप को किसी डाक्टर के पास ले चलूं?’’

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘नहीं, मैं सीधे घर जाना चाहती हूं.’’

कोठी का रास्ता उस ने गाइड कर दिया. घर पहुंच कर उस ने मुझे जाने की इजाजत दे दी. बाहर निकल कर मैं ने फसील साहब को फोन कर के हालात बता दिए. उन्होंने कहा, ‘‘हानिया का बीपी अकसर लो हो जाता है, इसलिए मैं उसे गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं देता. कामरान तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया. तुम ने उसे खैरियत से घर पहुंचा दिया. अब तुम अपने घर चले जाओ.’’

मुझे कोई आटो वगैरह नहीं मिला तो मैं पैदल चल कर बसस्टाप पर पहुंचा ही था कि मेरे छोटे भाई जिबरान का फोन आ गया, ‘‘भाई, अम्मी की तबीयत खराब हो गई है. हम उन्हें अस्पताल ले आए हैं. आप सीधे यहीं आ जाइए.’’

भाई की आवाज में घबराहट थी. उस ने अस्पताल का नाम बता दिया था. अम्मी की बीमारी का सुन कर मैं परेशान हो गया. आटो पकड़ा और सीधे अस्पताल जा पहुंचा. मेरी छुट्टी के 2 दिन बड़ी मुश्किल में गुजरे, अम्मी की हालत काफी खराब थी. डाक्टर के मुताबिक उन का मर्ज एक बार फिर फैलने लगा था. उन्हें तकलीफ काफी दिनों से थी, पर उन्हें पता था कि फंड का पैसा पहले ही खत्म हो चुका है, इसलिए वह अपना दर्द हम सभी से छिपाती रहीं. जब वह बेसुध हो गईं तो उन्हें अस्पताल लाना पड़ा. उन के इलाज के लिए काफी ज्यादा पैसों की जरूरत थी, जबकि हमारे पास मुश्किल से 4-5 हजार रुपए थे. किसी से कर्ज भी नहीं मिल सकता था. चाचा भी हम जैसे ही थे. नौकरी नई थी. लाखों रुपए एडवांस में कौन देता? जायदाद कुछ नहीं थी, गहने भी ज्यादा नहीं थे. एक यही घर था, जिस में हम रहते थे और उस का ऊपर का हिस्सा चाचा का था.

अगर मैं घर बेचने की सोचता तो चाचा के भी सिर से छत छिन जाती. जवान बेटियों को ले कर वह कहां जाते? इस परेशानी में कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. चाचा ने अस्पताल पहुंच कर मुझे जबरदस्ती घर भेज दिया. मैं चुपचाप जा कर लेट गया. सदफ दूध और खाना ले कर आई, पर मेरी तो भूखप्यास जैसे मर चुकी थी. उस के बहुत आग्रह पर 2-4 निवाले खा सका. सदफ ने कहा, ‘‘मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं, पर आप वादा करें कि मेरी बात मान लेंगे. मैं ताई अम्मा के इलाज के लिए कुछ देना चाहती हूं.’’

यह कहते हुए उस ने एक पोटली मेरे सामने रख दी. मैं ने पोटली खोली तो उस में कुछ हजार रुपए, सोने की 4 चूडि़यां और एक सेट था. उस ने ट्यूशन की कमाई से यह सब जमा किया था. उस ने कहा, ‘‘यह सब बेच कर आप ताई अम्मा का औपरेशन करा दीजिए.’’

‘‘सदफ, तुम पागल हो गई हो क्या? मैं तुम्हारी इतनी मेहनत से जोड़ी गई ये चीजें कैसे ले सकता हूं? ट्यूशन के अलावा सिलाईकढ़ाई कर के तुम ने एकएक पाई जोड़ कर यह सब बनवाया है. तुम इसे संभाल कर रखो, चाची ने यह तुम्हारे दहेज के लिए रखा है.’’

‘‘मुझे दहेज का क्या करना है? मुझे कौन सा ब्याह कर के बाहर जाना है? भले रकम कम है, पर कुछ तो मदद मिल ही जाएगी.’’

मुझे उस की मासूमियत पर बड़ा प्यार आया. कितनी ईमानदारी से अपनी सारी पूंजी मेरे हवाले कर रही थी. मैं ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘सदफ, मैं तुम्हारे जज्बों और ईमानदारी की कद्र करता हूं. पर मेरी मोहब्बत में इस हद तक मत जाओ कि रुसवा हो जाओ. मैं तुम्हारे ये गहने नहीं ले सकता.’’

‘‘तो क्या ताई अम्मा का औपरेशन नहीं कराओगे. मुझ से उन की तकलीफ देखी नहीं जाती.’’ सदफ रोते हुए बोली.

अगले दिन औफिस पहुंचा तो मैं काफी परेशान था. फसील साहब ने मुझे देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है कामरान, आज तुम काफी परेशान लग रहे हो? कोई परेशानी है तो मुझे बताओ.’’

किसी हमदर्द को पा कर मेरी बरदाश्त की हद जवाब दे गई. मैं ने उन से अम्मी की हालत और इलाज की समस्या के बारे में बताया तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामरान, तुम्हें मुझ से पहले ही बात करनी चाहिए थी. बेकार ही 2 दिन परेशानी उठाते रहे.’’

मैं उन की इस बात पर हैरान रह गया. उन्होंने मुझे हैरान देख कर कहा, ‘‘हैरान क्यों हो रहे हो? तुम्हारी समस्या हमारी समस्या है. तुम परेशान रहो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया सर, 20-25 दिनों की नौकरी में मैं एडवांस मांगने की हिम्मत कैसे कर सकता था? आप ने मेरे दुख को समझ कर मदद के लायक समझा, आप बहुत महान हैं सर.’’

‘‘तुम्हें इतने दिनों में अंदाजा हो जाना चाहिए था कि हमारी नजरों में तुम्हारा एक खास महत्त्व है. दूसरे लोगों के मुकाबले मेरे दिल में तुम्हारी जगह खास है.’’ फसील साहब ने प्यार से कहा.

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर, वरना मैं किस काबिल हूं?’’ मैं ने बड़ी नम्रता से कहा.

‘‘कामरान, इंटरव्यू में तुम से ज्यादा काबिल लोग थे, पर मैं ने तुम्हें तुम्हारी सच्चाई, ईमानदारी और शराफत की वजह से चुना था. तुम ने सच बोला था, जो मुझे बहुत अच्छा लगा था. मुझे लगा कि तुम वही इंसान हो, जिस की मुझे तलाश है. नौकरी देने का मकसद यह था कि मैं तुम्हें अच्छी तरह से परख सकूं, वरना पहली मुलाकात में ही मैं ने तुम्हें अपनी भतीजी हानिया के लिए पसंद कर लिया था.’’

उन्होंने जैसे मेरे सिर पर बम फोड़ दिया था. मैं बौखला गया, ‘‘सर… सर, आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘गलत नहीं कह रहा हूं,’’ हानिया मुझे बहुत प्यारी है. मैं उस का जीवनसाथी एक ऐसे आदमी को बनाना चाहता हूं, जो उस का खूब खयाल रखे और उस की कद्र करे, प्यार करे. ये सारे गुण मुझे तुम्हारे अंदर नजर आए. मुझे यकीन है कि हानिया तुम्हारे साथ बहुत खुश रहेगी.’’

‘‘सर, मैं किसी तरह भी मिस हानिया के काबिल नहीं हूं. मुझ से कहीं ज्यादा अच्छे लोग उन से शादी करने को तैयार हो जाएंगे. उन के आगे मेरी क्या हैसियत है?’’

‘‘मैं जानता हूं, पर उन सब की नजर हानिया से ज्यादा उस की दौलत पर रहेगी. भाई साहब की मौत के बाद वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहती है. उसे मैं ने बड़े प्यार से पाला है. बड़ा खयाल रखा है उस का. मुझे तुम्हारे जैसा लड़का चाहिए, जो उस के नाजनखरे उठा सके. इस सब के बदले उस का सब कुछ तुम्हारा है.’’

मैं समझ गया कि उन्हें ऐसा दामाद चाहिए, जो उन की भतीजी के पीछे हाथ बांधे गुलामों की तरह उस का हुक्म बजाता रहे. मेरी स्थिति उन के सामने थी. अम्मी के इलाज के लिए मुझे एक बड़ी रकम की जरूरत थी. मेरी मजबूरी वह जान गए थे. मैं पढ़ालिखा, स्मार्ट, शरीफ और खानदानी था. आसानी से वह मुझे अपने सोशल सर्किल में शामिल कर सकते थे.

‘‘किस सोच में डूब गए कामरान. यह एक बहुत अच्छी औफर है. तुम्हारी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. हानिया दौलतमंद और खूबसूरत लड़की है. उस की जिंदगी में आते ही तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी. मां का इलाज, भाई की पढ़ाई और बहन की शादी शानदार तरीके से हो जाएगी. तुम खुद ऐश की जिंदगी जियोगे.’’

‘‘सर, मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए.’’ आखिर मैं ने हिम्मत कर के कह दिया.

‘‘जितनी मोहलत चाहो, ले सकते हो. लेकिन जितनी देर करोगे, तुम्हारी मां की तकलीफ उतनी ही बढ़ेगी.’’

मैं अपनी केबिन में आ कर बैठ गया. अजीब उलझन थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक ओर मां का इलाज था, दूसरी ओर मेरी मोहब्बत. एक ओर मेरी गरीबी थी, दूसरी ओर दौलत और ऐशभरी जिंदगी. मैं क्या फैसला करूं? औफिस से सीधे अस्पताल पहुंचा. अम्मी की तकलीफ उसी तरह थी. डाक्टरों का कहना था कि ट्रीटमेंट जल्द से जल्द शुरू होना चाहिए. जिस में लाखों रुपए लगने थे. अम्मी की हालत देख कर दिमाग कह रहा था कि फसील साहब का औफर मान लेना चाहिए. पर दिल सदफ के प्यार में रो रहा था. अगर मैं ने राह बदल ली तो उस पर कयामत टूट पड़ेगी. उस की मोहब्बत अनमोल थी.

अस्पताल से घर आ कर मैं सारी रात जागता रहा. दिमागी उलझनों से तंग आ कर मैं ने सुबह चाचा के सामने बैठ कर उन्हें शुरू से अंत तक की सारी बात यानी फसील साहब का औफर, दौलत की रेलमपेल, अम्मी का इलाज, ऐश भरी जिंदगी सब कुछ बता दिया. पूरी बात सुन कर चाचा गंभीर हो गए. काफी देर बाद उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारा क्या फैसला है?’’

मैं ने आंसू भरी आंखों से कहा, ‘‘चाचा, मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा हूं, इसलिए सब कुछ आप से बता दिया है. सदफ से मैं ने जो वादा किया है, उसे तोड़ना बड़ा मुश्किल है. मेरे इस फैसले से वह टूट जाएगी.’’

‘‘कामरान बेटे, सदफ की चिंता तुम बिलकुल मत करो. वह बहादुर लड़की है, सब बरदाश्त कर लेगी. भाभी के इलाज के लिए वह घर बेचने की बात कर रही थी, वह यह सदमा आसानी से सह लेगी. भाभी की जान बचाने के लिए वह कोई भी कुरबानी दे सकती है. भाभी के भले के लिए तुम निश्चिंत हो कर हानिया के हक में फैसला कर दो.’’

‘‘चाचा मैं बहुत मजबूर हूं. अगर मैं ने फसील साहब को मना कर दिया तो मेरी नौकरी भी जाएगी. मैं जानता हूं कि सदफ जान दे देगी, पर उफ न करेगी.’’

‘‘इसीलिए तो मैं कह रहा हूं कि तुम सब भुला कर उन की बात मान लो. हमारी तरफ से बेफिकर हो जाओ. हमें कोई शिकायत नहीं है. वक्त सारे जख्म भर देगा. तुम्हारे और सदफ के रिश्ते की बात अभी घर में ही है, बाहर किसी को मालूम नहीं है, कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

फसील साहब ने ‘हां’ सुनते ही शादी की जल्दी मचा दी. एक हफ्ते के अंदर की तारीख तय कर दी गई. मेरे पास इनकार की गुंजाइश नहीं थी. मेरे हां करते ही अम्मी के इलाज के लिए मनचाहा पैसा फसील साहब ने दे दिया था, जिस से उन का इलाज शुरू हो गया था. इस से इतना फायदा हुआ था कि मेरी शादी में वह घंटे भर के लिए आई थीं. उन की आंखों में खुशी के बजाय उदासी थी, क्योंकि उन्होंने तो सदफ को बहू के रूप में देखा था. सभी दुखी थे, पर मजबूरी ऐसी थी कि कोई भी खुल कर ऐतराज नहीं कर सकता था.

सदफ समेत चाचा के परिवार के सभी लोग शादी में शामिल हुए थे. सभी मेरा हौसला बढ़ाते रहे, सदफ भी आंसू पी कर मुसकराती रही. सचमुच वह बड़ी सब्र और हिम्मत वाली थी. शादी में शहर के तमाम बड़ेबड़े लोग आए थे. मैं ने अपने कुछ ही दोस्तों को भी बुलाया था, क्योंकि हानिया का ताल्लुक जिस क्लास से था, उस में मेरे रिश्तेदार मिसफिट होते. विदाई का वक्त आया तो दुलहन के बजाय दूल्हे की विदाई हुई. विदा हो कर मैं हानिया की शानदार कोठी में आ गया. फसील साहब ने मुझ से कहा था कि मेरी ख्वाहिश पर मेरे परिवार के लिए शानदार मकान का इंतजाम हो जाएगा, क्योंकि मेरे परिवार का उस कोठी में रहना हानिया के नाजुक मिजाज को पसंद नहीं आएगा. इसलिए मुझे अकेले ही उस कोठी में रहना होगा.

कोठी रोशनी से जगमगा रही थी. हानिया की कीमती कार, जिसे शोफर चला रहा था, से उतर कर मैं पोर्च में खड़ा हो गया. दूसरी गाड़ी में फसील साहब, उन की बीवी और खूबसूरत बेटी तूबा थी. तूबा हानिया से एकदम अलग थी. वह हंसमुख और मिलनसार थी. वह मुझ से हंसीमजाक भी कर रही थी. वही हानिया का हाथ पकड़ कर उसे बैडरूम में ले गई. अंदर आ कर फसील साहब ने कहा, ‘‘कामरान, मेरी लाडली भतीजी तुम्हारे हवाले है. तुम इस का खयाल रखना. इस की हर गलती को अनदेखा कर देना. यह घर, कंपनी अब तुम दोनों की है. हम तो मेहमानों की तरह आएंगे और चले जाएंगे. हर काम के लिए नौकर मौजूद हैं. बस तुम्हारी वजह से हानिया को कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘सर, आप तसल्ली रखें. मैं पूरा खयाल रखूंगा.’’

तूबा हंस कर बोली, ‘‘आप अब हमारे रिश्तेदार हैं, सर न कहें. पापा आप के भी अंकल हैं, आप मेरे दूल्हाभाई हैं.’’

उन के जाने के बाद एक नौकरानी मुझे हानिया के बैडरूम में ले गई. कीमती फरनीचर और फूलों से सजा कमरा बेहद रोमांटिक लग रहा था, पर उस खूबसूरत कमरे में दुलहन नहीं थी. 10-12 मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर आई. मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. उस की सारी सजधज गायब थी. वह नहाईधोई कौटन की नाइटी पहने हुए थी. उस ने मेरी तरफ देखा तक नहीं. डे्रसिंग टेबल के सामने बैठ कर चेहरे व हाथों पर क्रीम लगाने लगी. इस के बाद उठी और बेडरूम से जुड़े दूसरे कमरे में चली गई. उस ने न मुझे देखा, न मुझ से बात की. ऐसा व्यवहार शायद ही किसी दुलहन ने अपने दूल्हे के साथ किया होगा. वह बारबार मेरी तौहीन कर रही थी. अपमान से मैं तिलमिला उठा, पर क्या करता. यह सोच कर दिल को समझाया कि मांबाप के मरने की वजह से ऐसी हो गई है. मुझे ही इसे डिप्रेशन से निकालना है.

मैं ने उठ कर बगल वाला दरवाजा खोला. अंदर हलका उजाला था. वह स्टडीरूम था, जिस में पडे़ सोफे पर हानिया हाथ में एक तसवीर लिए बैठी थी. मैं ने इतने धीरे से दरवाजा खोला था कि उसे पता नहीं चला था. वह तसवीर देखदेख कर रोते हुए उसे प्यार कर रही थी. मुझे लगा कि यह उस के पापा की तसवीर होगी. दिल चाहा कि उसे बांहों में भर कर तसल्ली दूं. मैं आगे बढ़ा तो मेरी आहट पा कर वह ऐसी चौंकी, जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो. हानिया ने मेरा बढ़ा हाथ तेजी से झटकते हुए कहा, ‘‘बिना इजाजत मेरे कमरे में आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

वह गुस्से में बहुत जोर से चिल्लाई थी. तसवीर उस ने सीने से लगा ली थी. मैं ने भी तुनक कर जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हारा शौहर हूं हानिया, जिस से मेरा हक बनता है कि मैं तुम्हारी इजाजत के बिना तुम्हारे कमरे में आ सकता हूं.’’

‘‘किसी गलतफहमी में मत रहिएगा मिस्टर. यह मेरा घर है, जिस पर सिर्फ मेरा हक है. जो यहां रहेगा, मेरी मरजी के मुताबिक रहेगा. जिसे यह न कुबूल हो, वह यहां से जा सकता है.’’ हानिया ने बड़े तैश में बदतमीजी से कहा. अपमान का घूंट पी कर मैं बाहर लौन में चला गया. मेरे वश में होता तो उसी पल मैं हानिया हसन और उस की कोठी को लात मार कर चला आता. पर मेरे पैरों में मजबूरी की जंजीर पड़ी थी. काफी देर तक लौन में टहलता रहा. दिल को समझाया कि अगर अम्मी का इलाज कराना है तो इस बददिमाग, बदमिजाज लड़की को बरदाश्त करना ही पड़ेगा. थोड़ा सह कर कुछ होशियारी से काफी माल समेट कर हानिया को छोड़ दूंगा. उस के बाद अच्छी जिंदगी गुजारूंगा. हो सकता है सदफ भी मुझे मिल जाए.

शाम को फसील साहब परिवार के साथ आए तो उन के सामने हानिया बिलकुल नौर्मल थी, हंसबोल रही थी. फसील साहब ने मुझ से कहा कि मुझे हानिया को अपने घर वालों से मिलाने ले जाना चाहिए. मेरे घर जाते हुए हानिया के चेहरे पर बेजारी थी. रास्ते में ही उस ने कह दिया था, ‘‘मैं वहां ज्यादा देर नहीं ठहरूंगी.’’

जब हम वहां पहुंचे तो कुछ मेहमान आए हुए थे. शीमा, सफिया हमें देख कर बहुत खुश हुईं. आवाज सुन कर चाचा बाहर आए और बड़े मानसम्मान से हमें ड्राइंगरूम में ले गए. वहां 3 औरतें, 2 मर्द बैठे थे, जिन में एक अधेड़ था और एक जवानस्मार्ट युवक. चाचा ने परिचय कराते हुए कहा, ‘‘ये वही लोग हैं, जो सदफ से रिश्ता करने का इसरार कर रहे थे. इन लोगों ने दोबारा फोन कर के आग्रह किया तो मैं ने इन्हें बुला लिया. भाभी की मरजी पूछ ली है, उन का भी कहना है कि आज ही सदफ की मंगनी सादगी से कर दी जाए.’’

मैं सोच रहा था कि हानिया से छुटकारा पा कर सदफ को पा लूंगा, लेकिन मेरा यह ख्वाब टूट कर चकनाचूर हो गया था. अम्मी ने कहा, ‘‘यह सदफ के लिए बहुत अच्छा रिश्ता है. देर करने से क्या फायदा, आज ही मंगनी की रस्म कर लेते हैं.’’

सदफ को ड्राइंगरूम में लाया गया. वह गुलाबी सूट में गजब ढा रही थी. उसे उस खूबसूरत नौजवान, जिस का नाम आतिफ विकास था, के पास बिठा दिया गया. आतिफ की अम्मी ने सदफ को अंगूठी पहना कर मंगनी की रस्म पूरी की. चाचा आतिफ को कैश का लिफाफा देने लगे तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘मैं मिठाई के सिवा और कुछ नहीं लूंगा.’’

इस के बाद जोरदार खातिर शुरू हुई. मुझे छोड़ कर बाकी सभी खुश थे. मैं वापसी के लिए उठ गया, हानिया तो तैयार ही बैठी थी. एक तसल्ली थी कि सदफ को अच्छा लड़का, तथा शरीफ और बढि़या घरपरिवार मिल गया था. दिन हानिया की बदतमीजी व रुखाई के साथ गुजर रहे थे. मेरे पास 2 ही काम थे, औफिस के काम देखना और अम्मी के इलाज के लिए दौड़धूप करना. मैं ने अम्मी से घर बदलने के बारे में कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया था. वह चाचा के साथ उसी पुराने मकान में रहना चाहती थीं. फसील साहब पहले की ही तरह मेहरबान थे. मैं ने उन्हें हानिया के रूखे और बदतमीजी भरे रवैये के बारे में नहीं बताया था कि अभी हम अजनबी की तरह थे. कभी मुझे लगता कि वह किसी को पसंद करती है. लेकिन वह पूरे दिन अपने कमरे में बंद रहती थी. अचानक एक दिन बिना कुछ बताए वह तूबा के साथ अपनी सहेली की शादी अटैंड करने दुबई चली गई.

सदफ की शादी हो गई थी. आतिफ ने दहेज लेने से साफ मना कर दिया था. हानिया की गैरहाजिरी में मैं ने दुबई में बिजनैस डील का बहाना बनाया. अम्मी का इलाज जारी था. अम्मी के इलाज के अलावा कुछ लाख मैं ने अपने एकाउंट में जमा कर लिए थे. फसील साहब मुझ पर अंधा यकीन करते थे. मैं जी खोल कर पैसे खर्च कर रहा था. अपनी बेइज्जती भुलाने और तनहाई का गम गलत करने के लिए मैं ने शराब पीनी शुरू कर दी थी. आवारागर्दी करते हुए उस रात मैं करीब एक बजे घर पहुंचा तो खास नौकरानी सोनिया जाग रही थी. उस ने खाने के लिए पूछा तो मैं ने कौफी लाने को कहा. जाते हुए सोनिया एक डायरी दे कर बोली, ‘‘यह हानिया बीबी की डायरी है, इसे वह एक सहेली के घर भूल आई थीं. उस ने वापस भेजी है. उन का कमरा बंद है, आप संभाल कर रख दें.’’

पता नहीं मेरे दिल में क्या आया कि मैं डायरी खोल कर पढ़ने लगा. शुरू में हानिया का डैडी से लगाव, उन की मौत के बाद उन के गम में डूबे रहने का विवरण था. सच में वह बाप से बहुत प्यार करती थी. उस के बाद कामरान नाम के किसी लड़के का जिक्र था. वह उस के डैडी के वकील और दोस्त रुस्तम मलिक का बेटा था. कामरान ने उस के दुख में उस का बहुत साथ दिया था. उसे गम से बाहर निकाल कर नई जिंदगी की राह पर लाया था. यही हमदर्दी धीरेधीरे मोहब्बत में बदल गई थी और हानिया कामरान को टूट कर चाहने लगी थी. मोहब्बत इतनी बढ़ी कि जल्दी ही दोनों सारी हदें पार कर गए.

इस का परिणाम यह निकला कि हानिया गर्भवती हो गई. हानिया इस बारे में कामरान से कोई बात कर पाती, कामरान एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. सदमे ने हानिया को दीवाना बना दिया. वह अपने महबूब की जुदाई सह नहीं पा रही थी. उस की कजिन तूबा उस के इस मोहब्बत की राजदार थी. उस के जरिए यह इत्तला चाची को मिली तो उन्होंने अबार्शन की सलाह दी, पर हानिया किसी कीमत पर अपनी मोहब्बत की निशानी मिटाने को तैयार नहीं थी. इस के बाद तय किया गया कि खानदान की इज्जत बचाने के लिए किसी काठ के उल्लू की तलाश की जाए. और उल्लू वही बन सकता था, जो हालात और मजबूरी का मारा हो. चाचा ने लाडली भतीजी का गुनाह छिपाने के लिए बड़ी आसानी से मुझे ढूंढ लिया. इत्तफाक से मेरा नाम भी कामरान था. उस के होने वाले बच्चे को वही नाम मिलता, जो उस के असली बाप का था. इसलिए हानिया मुझ से शादी के लिए राजी हो गई थी.

वह अभी तक अपने महबूब के गम में तड़प रही थी. उस रात तसवीर भी उसी की थी. कितनी आसानी से चाचाभतीजी ने एक ‘गुलाम’ शौहर खरीद लिया था. इस तरह उल्लू बनाए जाने पर मुझे बेहद गुस्सा आया. मैं ने उसी वक्त फसील साहब को फोन किया. फोन उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘इतनी रात को फोन, कामरान तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘रात होगी तुम्हारे लिए, मेरी तो अभी आंख खुली है. मैं तुम चाचाभतीजी का दिमाग ठीक करना चाहता हूं. तुम ने मुझे धोखा दिया, बदकिरदार लड़की मुझे पकड़ा दी.’’

गुस्से और नशे से मेरी आवाज फट रही थी. इस के बाद नशे में ही मैं बिस्तर पर ढेर हो गया. सुबह मेरी आंख मुंह पर पानी पड़ने से खुली. कुछ देर तो मामला मेरी समझ में ही नहीं आया. मैं पलकें झपकाझपका कर पुलिस वालों को देख रहा था, जो मुझे घेरे खड़े थे. उन्हीं के साथ गम में डूबे फसील साहब भी थे.

‘‘इसे गिरफ्तार कर लो.’’ मुझे होश में देख कर पुलिस इंसपेक्टर ने कहा.

मैं ने घबरा कर जल्दी से कहा, ‘‘मुझे किस जुर्म में गिरफ्तार किया जा रहा है, अंकल आप मुझे अरैस्ट क्यों करवा रहे हैं? घर की बात घर में ही सुलझ जाती.’’

मुझे रात की बदतमीजी याद आ गई थी.

‘‘बकवास बंद कर कमीने. मैं अपनी भतीजी हानिया का कत्ल किसी सूरत में माफ नहीं कर सकता.’’ फसील साहब मुझे नफरत से देखते हुए दहाड़े. मुझ पर जैसे आसमान टूट पड़ा. हानिया दुबई में थी, यहां उस का कत्ल कैसे हो गया? मैं ने कुछ कहना चाहा, पर पुलिस वाले मुझे घसीटते हुए बाहर ले आए. हवालात के फर्श पर पड़ा मैं बुरी तरह से कराह रहा था. यहां मेरी अच्छीखासी पिटाई की गई थी. यहीं मुझे पता चला कि हानिया आज सुबह ही दुबई से वापस आई थी. मुझ पर इलजाम था कि मैं ने गुस्से और नशे में छुरे से उसे कत्ल कर दिया था, क्योंकि मुझे पता चल गया था कि वह शादी से पहले से गर्भवती थी. किसी और का गुनाह मेरे सिर थोपा जा रहा था. मैं पुलिस वालों से लाख दुहाइयां देता रहा कि कत्ल मैं ने नहीं किया, पर मेरी किसी ने नहीं सुनी. जबकि मैं तो यह भी नहीं जानता था कि वह आज आने वाली थी.

मैं दिन भर भूखाप्यासा, चोटें सहलाता फर्श पर पड़ा रहा. देर रात जब सन्नाटा हो गया तो एक हवलदार ने मेरे पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘तुम्हारे चाचा ससुर ने कहा है कि तुम्हारे खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई की जाए. तुम्हारे खिलाफ साजिश रची गई है. कल अदालत में पेश करने के लिए पक्के सुबूत तैयार कर लिए गए हैं, तुम्हें फंसाने की पूरी योजना बना ली गई है.’’

‘‘हवलदार साहब, मैं बेकुसूर हूं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? मुझ पर झूठा इलजाम लगाया जा रहा है.’’

‘‘मैं जानता हूं. कल अदालत में पेशी के बाद तुम्हें बचाने की योजना बन गई है, उसे मैं तुम्हें कल बताऊंगा. अभी मैं तुम्हारे लिए खाना लाता हूं.’’

उस ने मुझे भरपेट खाना खिलाया और एक सिगरेट भी पिलाई. चाय और दर्द की गोलियां भी दीं. मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर वह मुझ पर इतना मेहरबान क्यों है? अदालत में जब मेरे मामले की सुनवाई शुरू हुई तो हालात इस तरह से बयान किए गए. एच.एच. बिल्डर्स के शेयर होल्डर फसील हसन ने मुझे एक शरीफ, मेहनती और ईमानदार आदमी समझ कर मुझे नौकरी दी और मेरे साथ भतीजी की शादी कर दी कि मैं हानिया का बहुत खयाल रखूंगा, पर हालात बहुत खराब हो गए. लालच में आ कर मैं मां के इलाज के नाम पर रकम अपने एकाउंट में डालता रहा. हानिया के साथ मेरा व्यवहार बहुत बुरा था. वह तंग आ कर दुबई चली गई. बीवी की गैरमौजूदगी में मैं आवारागर्दी करने लगा और खूब शराब पीने लगा.

घरेलू नौकरानी सोनिया का बयान था कि हादसे की रात मैं नशे में धुत घर आया. जब वह कौफी देने बैडरूम में आई तो उस ने मुझे हानिया की डायरी पढ़ते देखा, जो उस ने रखने को दी थी. वह खामोशी से चली गई. सुबह की फ्लाइट से हानिया लौटी तो उस ने हमारे बैडरूम से लड़नेझगड़ने की आवाजें सुनीं. फिर उसे हानिया की 2 चीखें सुनाई दीं, डर के मारे वह अंदर नहीं आई, पर उस ने फसील साहब को फोन कर दिया. उन के आने पर सभी दरवाजा खोल कर अंदर पहुंचे तो उन्होंने मुझे जूते समेत बिस्तर पर सोता पाया. बेडरूम बुरी तरह अस्तव्यस्त था. फसील साहब ने स्टडीरूम में जा कर देखा तो वहां खून में लथपथ हानिया की लाश पड़ी थी. उन्होंने फौरन पुलिस को फोन किया और पुलिस ने आ कर मुझे गिरफ्तार कर लिया.

मेरे खून की जांच से पता चला कि मैं ने खूब शराब पी रखी थी, इसलिए भागने के बजाय वहीं सो गया था. पुलिस ने डायरी भी सुबूत के रूप में पेश की थी. मैं पत्थर बना सब सुन रहा था. अदालत ने सुबूतों के आधार पर मुझे एक हफ्ते के लिए पुलिस रिमांड पर दे दिया था. पुलिस मुझे बाहर ले आई. वह हमदर्द हवलदार मेरे साथ था. उस ने मेरा हाथ पकड़ कर जोर से कहा, ‘‘मुलजिम को पेशाब करने के लिए टायलेट जाना है.’’

इस के बाद सिपाही मुझे टायलेट की ओर ले कर चल पड़े. उस ने धीरे से कहा, ‘‘टायलेट के रोशनदान की सलाखें निकाल दी गई हैं. उस से पीछे की ओर निकल जाना. बाहर नीले रंग की कार तुम्हारा इंतजार कर रही है. बचने का यही एक मौका है.’’

मैं अंदर चला गया. पर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? फिर खयाल आया कि फरार हो कर शायद मैं खुद को बचा सकूं. बाहर नीले रंग की कार खड़ी थी. मेरे बैठते ही वह हवा से बातें करने लगी. मेरे लिए यह पहेली थी कि मुझे कौन भगा रहा था और क्यों? पर यह भी सच था कि मेरे खिलाफ भरपूर साजिश रची गई थी. सजा ही मेरा नसीब थी. मैं ने ड्राइवर से कहा, ‘‘भाई, तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो?’’

‘‘आप के एक हमदर्द के पास. वहां पहुंच कर आप को सब पता चल जाएगा.’’

अलगथलग इलाके में एक घर के आगे जा कर कार रुकी. दरवाजा एक स्मार्ट सी औरत ने खोला. उस ने शोख रंग की साड़ी पहन रखी थी. माथे पर बिंदिया और मांग में सिंदूर था. वह मुझे ड्राइंगरूम में ले आई, जहां एक स्मार्ट आदमी बैठा पाइप पी रहा था. उस ने मुझे देख कर कहा, ‘‘आओ कामरान अहमद बैठो, मैं हूं रुस्तम मलिक, बैरिस्टर, बदनसीब कामरान मलिक का दुखियारा बाप. मेरे ही कहने पर आप को मुसीबत से निकाल कर यहां लाय गया है.’’

‘‘आप ने मेरी मदद क्यों की, मैं यह जानना चाहता हूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘इंसानियत के नाते, हमदर्दी की वजह से. मैं नहीं चाहता था कि कोई और बेगुनाह फसील के जाल में फंस कर मेरे बेटे की तरह मारा जाए.’’

‘‘आप के मुताबिक यह सब फसील साहब ने करवाया है?’’

‘‘उस के सिवा और कौन करवाएगा? उसे ही कुरबानी के लिए एक बकरे की जरूरत थी. मेरे दोस्त इनायत हसन की एकलौती बेटी हानिया कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर की मालकिन थी. वसीयत के अनुसार हानिया की औलाद कुल जायदाद की मालिक होती. मैं उस का लीगल एडवाइजर था. भतीजी की जायदाद पर कोई हक न मिलने से फसील बहुत गुस्से में था.

‘‘अगर उस का बेटा होता तो वह हानिया की शादी उस से करवा देता. मेरे बेटे कामरान मलिक की बचपन की दोस्ती मोहब्बत में बदल गई. हानिया और कामरान एकदूसरे को टूट कर चाहने लगे. फसील ने इलजाम लगाया कि हानिया को बेटे की मोहब्बत में फंसा कर मैं उस की दौलत पर कब्जा करना चाहता हूं.

‘‘मेरा बेगुनाह बेटा एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया. वह बहुत ज्यादा नशे में था. बाद में मुझे पता चला कि एक्सीडेंट के पहले वह फसील के घर पर था, जहां उसे बहुत ज्यादा शराब पिलाई गई थी. पर मैं कुछ नहीं कर सकता था. हानिया कामरान की मौत से पागल सी हो गई. वह कामरान की निशानी को जन्म देना चाहती थी. उस का बच्चा सारी दौलत का मालिक होता. हानिया से तुम्हारी शादी हो गई. हानिया ने शादी सिर्फ इसलिए की थी कि इज्जत के साथ बच्चा इस दुनिया में आ सके. लेकिन तुम्हारे हाथों हानिया के कत्ल का सुन कर मैं हैरान रह गया.

‘‘मुझे पता है कि यह झूठ और साजिश है, इसीलिए मैं ने तुम्हें बाहर निकाला है. पुलिस तुम्हारे पीछे लगी है. अब एक ही रास्ता है कि तुम फसील से सच्चाई निकलवाओ. उस से अपना जुर्म किसी भी सूरत में उगलवाओ. इस काम में मैं तुम्हारी हर तरह से मदद कर सकता हूं, आगे तुम जानो.’’

जब मैं ने सुकून से सोचा तो फसील की सारी साजिश मेरी समझ में आ गई. अब मुझे उस से सच उगलवाना था. मेरी जरूरत का सारा सामान रुस्तम मलिक ने मंगवा दिया, जिस में एक पिस्तौल भी था. रात 12 बजे मैं उस के घर से निकला. मैं फसील के घर 3-4 बार जा चुका था. मैं पीछे की ओर से गया. कुत्तों की हलकी सी आवाज सुन कर मैं ने जहर लगे गोश्त के टुकड़े अंदर उछाल दिए. फिर मैं लौन में कूद गया. कुत्ते जमीन पर पड़े दर्दनाक आवाजें निकाल रहे थे. चौकीदार कुत्तों के पास आया तो उस के पीछे पहुंच कर मैं ने पिस्तौल के हत्थे से मार कर उसे बेहोश कर दिया. उस के हाथपैर रस्सी से बांध दिए. लौन के पास की ग्लासवाल काट कर मैं अंदर पहुंच गया.

पहले मैं तूबा के कमरे में गया. वह सो रही थी. क्लोरोफौर्म में डूबा रूमाल उस की नाक पर रख दिया. इस के बाद फसील के बैडरूम के सामने पहुंचा. दरवाजा लौक था. पिस्तौल की नाल दरवाजे पर रख कर ट्रिगर दबा दिया. दरवाजा खोल कर अंदर घुसा तो दोनों हड़बड़ा कर उठ बैठे. मैं ने पिस्तौल तान दी. वह घबरा कर बोला, ‘‘यह क्या बदतमीजी है कामरान?’’

‘‘तू ने अपनी मासूम भतीजी का जो खून किया है, उस का हिसाब तुझे अभी देना होगा?’’

‘‘बकवास मत करो. हानिया का खून मैं ने नहीं, तू ने किया है. मसजिद से जूते चुराने वाला दो कौड़ी की औकात वाला आदमी मुझ पर इलजाम लगाता है.’’

मैं गुस्से से चीखा, ‘‘यह सारा ड्रामा तेरा रचा है कमीने. तू ने जानबूझ कर सोनिया के हाथों हानिया की डायरी भिजवाई थी. जिस से सुबह उस का कत्ल हो जाए तो पुलिस मुझे कातिल समझे. मुझे तो यह भी पता नहीं था कि हानिया कब दुबई से लौटी? मुझे तो नींद से जगा कर गिरफ्तार किया गया था. तू सच बोल दे, वरना…’’

‘‘बेवकूफ, मैं उसे क्यों मारूंगा?’’

‘‘हानिया के कत्ल के बाद एक तू ही तो उस का सगा चाचा बचता, मुझे फांसी पर लटकवाने के बाद तू ही उस की सारी दौलत और जायदाद का वारिस होता.’’

‘‘नहीं, हानिया के कत्ल के बाद मुझे कुछ नहीं मिल सकता. अगर वह अपने बच्चे के जन्म तक जिंदा रहती तो मुझे फायदा होता, क्योंकि मैं उस के बच्चे का संरक्षक होता. बच्चे और प्रापर्टी की देखभाल मुझे ही करनी होती. अब तो सिवाए 10 प्रतिशत के मुझे कुछ नहीं मिल सकता.’’

मैं सोच में पड़ गया. यानी कि फसील का कत्ल से कोई ताल्लुक नहीं था. तो फिर कातिल कौन हो सकता है? एकदम मुझे सोनिया का खयाल आया. उसी ने उस रात मुझे डायरी दी थी, मेरे खिलाफ झूठा बयान भी दिया था. मैं उस के बारे में सोचने लगा. फसील ने कहा, ‘‘कोठी तो सील है, वह अपने घर पर होगी. और जो कुछ मैं ने किया था, अपने खानदान की इज्जत बचाने को किया था.’’

जैसे ही मैं बंगले से बाहर निकला, चारों ओर से पुलिस ने मुझे घेर लिया. मजबूरन मुझे सरेंडर करना पड़ा. पुलिस वैन की आगे की सीट पर सादा लिबास में चाचा का दामाद यानी सदफ का शौहर आतिफ विकास बैठा था. उसे देख कर मैं दंग रह गया. आतिफ विकास के हाथों गिरफ्तार हो कर मैं थाने पहुंचा. मुझे अलग कमरे में ले जा कर बड़ी नम्रता से उन्होंने कहा, ‘‘आप को इस तरह गिरफ्तार करने के लिए मुझे बड़ा अफसोस है, पर कानूनी तकाजे पूरे करने थे. चाचा आप के लिए बहुत परेशान थे. उन्हीं के कहने पर मैं ने यह केस अपने हाथों में लिया है कि आप पर कत्ल का झूठा इलजाम लगा कर जो साजिश की गई है, उस से आप को बाहर निकाल सकूं.

‘‘लेकिन आप ने अदालत से फरार हो कर केस को खराब कर लिया है. मैं ने मुखबिरों से पता कर लिया था कि आप कहां मिल सकते हैं? मैं फसील के यहां पहुंच गया. आप का केस गौर से स्टडी करने के बाद मुझे नौकरानी सोनिया पर संदेह हो रहा है. आखिर वह आप के खिलाफ क्यों बोल रही थी?

‘‘आप की उस से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. उस की गवाही आप को कातिल साबित कर सकती थी. नशे में आप ने बीवी का कत्ल कर दिया और नशे की ज्यादती की वजह से भाग नहीं सके. मैं इस बात को नहीं मानता. कातिल सब से पहले घटनास्थल से दूर भागता है, पर आप तो पुलिस वालों को अपने बैडरूम में सोए हुए मिले थे.

‘‘बस इसी बुनियाद पर मैं ने सोनिया को गिरफ्तार करवा लिया है. पहले तो वह झूठ बोलती रही, पर उस ने देखा कि बचने का कोई रास्ता नहीं है तो उस ने सच उगल दिया. वह हानिया की खास नौकरानी थी. उसे मालूम था कि हानिया कब दुबई से आ रही है. उसी ने उस आदमी को खबर कर दी थी, जिस से पैसे लिए थे.

‘‘हानिया कत्ल कर दी गई. उस के बाद झूठी गवाही देने पर उसे मजबूर किया गया, तब वह घबराई. इधर आप फसील को कातिल समझ कर उस के बंगले पर पहुंच गए और वहां से मैं ने आप को गिरफ्तार कर लिया, मेरे आदमी आप की तलाश में वहां तैनात थे.’’ आतिफ ने सारी बात डिटेल से बता दी.

‘‘सोनिया को बहकाने वाला आदमी कौन है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी यह पता नहीं चला है. सोनिया के अनुसार सारी बात फोन पर हुई थी, रकम एक खास जगह पर रख कर बता दी गई थी. एक बात और बताऊं, हानिया के कत्ल का फैसला बहुत पहले हो चुका था. कुरबानी का बकरा तुम्हें बनाया गया. यह कत्ल बच्चा पैदा होने के बाद होना था, इस से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘इस में हानिया के अंकल को फायदा था.’’ मैं ने कहा.

‘‘बिलकुल सही, पर उस से पहले किसी और ने काम कर दिखाया. फसील का प्लान फेल हो गया. यह बात मुझे तूबा ने बताई थी कि फसील हानिया को रास्ते से हटा कर बच्चे के जरिए सारी दौलत हासिल करना चाहता था. पर बच्चे के दुनिया में आने से पहले कत्ल किसी और ने कर दिया.’’

‘‘आप के खयाल से उस की मौत से किसे फायदा हो सकता था?’’

‘‘पहले आप यह बताइए कि आप को फरार किस ने करवाया? आप खुद फरार नहीं हो सकते थे.’’ आतिफ ने पूछा.

‘‘मेरी मदद रुस्तम मलिक, जो हानिया के वकील हैं, ने की थी. वह नहीं चाहता था कि उस के बेटे कामरान मलिक की तरह मैं भी बेगुनाह किसी साजिश में फंस कर मारा जाऊं.’’ मैं ने बताया.

‘‘यानी वह अपने बेटे के कातिल को तुम्हारे हाथों सजा दिलवाना चाहता था?’’ आतिफ ने सोच कर कहा.

इस के बाद आतिफ केस सुलझाने में जीजान से जुट गए. उन्होंने मेरे लिए थाने में काफी अच्छा इंजताम करवा दिया था. केस का खुलासा करने के बाद आतिफ ने मुझे जो बताया, वह इस तरह था. हानिया की दौलत के लालच में बैरिस्टर रुस्तम मलिक ने ही अपने बेटे कामरान मलिक को उस के पीछे लगाया था. उस ने उसे मोहब्बत के जाल में फंसा लिया. फसील उस की चालाकी समझ गया था. वह इस शादी के लिए कतई राजी नहीं था. संयोग से वह एक्सीडेंट में मर गया. इस में फसील का हाथ नहीं था.

कामरान की मौत के बाद फसील को सच्चाई का पता चला तो उसने यह योजना बनाई कि हानिया मर जाती है तो मैं फांसी चढ़ जाता. बच्चे के संरक्षक के तौर पर सारी जायदाद वह हासिल कर लेता. यह रुस्तम से बरदाश्त नहीं हुआ. उस ने साजिश रच कर हानिया का पत्ता कटवा दिया. मुझ से हमदर्दी जता कर फसील नाम का कांटा निकालने को भेजा. अगर उस रात मैं फसील को मार देता तो 2 कत्लों के इलजाम में जेल में होता. हानिया के बेऔलाद मरने पर सारी प्रौपर्टी ट्रस्ट में जाती, जिस की देखभाल रुस्तम मलिक करता और उस से पूरा फायदा उठाता. क्योंकि वह बहुत कमीना और शातिर आदमी था. उसे अपने बेटे की निशानी से भी कोई प्यार नहीं था. दौलत के लिए उस ने हानिया का कत्ल करवा दिया था. उस बेचारी ने दौलत की वजह से ही धोखा खाया और मारी भी गई.

मैं अपनी अम्मी को भी नहीं बचा सका. वह कैंसर से नहीं मरी, मेरे ऊपर कत्ल का इलजाम लगने से हार्टफेल की वजह से मरी. आतिफ विकास की मेहनत और केस की सच्चाई के सामने आने से मैं रिहा हो गया. रुस्तम मलिक ने किराए के कातिल से हानिया का कत्ल करवाया था. इस के सुबूत भी मिल गए थे. सोनिया ने भी सच उगल दिया था. शुक्र था कि मैं रुस्तम के जाल में नहीं फंसा. इस घटना को घटे 4 साल हो गए हैं. आतिफ की मदद से मुझे अच्छी नौकरी मिल गई है. सदफ 2 प्यारेप्यारे बच्चों की मां है. मेरा भाई स्कौलरशिप पर मैडिकल कालेज में है. बहन की मंगनी हो गई है. मैं चाचा के साथ हूं, जो पहले की ही तरह मुझ से मोहब्बत करते हैं. शादी करने पर जोर देते हैं, पर अब किसी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है. Love Story

 

Love Story: दिल लगाने का अपराध

Love Story: मारपीट, चोरीडकैती, अपहरण और फिरौती वसूलने जैसे अपराध करने वाले वैभव को शादीशुदा ज्योत्सना से दिल लगा कर जिंदगी से हाथ क्यों धोना पड़ा. 23 अगस्त की रात के यही कोई 8 बजे महानगर मुंबई के व्यस्ततम थाना डोंगरी के चार्जरूम में ड्यूटी पर मौजूद महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के के सामने रोनी सूरत लिए एक चेहरा अपने पूरे परिवार के साथ आ कर खड़ा हो गया. गिरिजा मस्के उस चेहरे और उस के परिवार वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. वह विशाल आचरेकर था, जो आपराधिक प्रवृत्ति के वैभव आचरेकर का बड़ा भाई था.

भाई के मामलों में वह अकसर थाना डोंगरी आता रहता था, इसलिए सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के उसे और उस के घर वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. इसी वजह से उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, वैभव ने फिर कोई कांड कर दिया क्या?’’

‘‘नहीं मैडम, इस बार उस ने कोई कांड नहीं किया, बल्कि लगता है वह खुद ही किसी कांड का शिकार हो गया है.’’ विशाल आचरेकर ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैडम, 20 अगस्त की सुबह वह घर से निकला था, तब से उस का कुछ अतापता नहीं है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है.’’

‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं है. अपराध कर के कहीं छिपा होगा. 2-4 दिनों में अपने आप ही आ जाएगा.’’ सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने उस की शिकायत को हल्के में लेते हुए कहा, ‘‘हो सकता है, यारोंदोस्तों के साथ कहीं चला गया हो. ऐसे लोगों का क्या भरोसा.’’

‘‘नहीं मैडम, हम लोगों ने उसे हर जगह ढूंढ लिया है. पूरी तरह निराश हो कर ही आप के पास आए हैं. वह कहीं छिपा नहीं, उस के साथ जरूर कोई अनहोनी हो गई है. अब आप ही हमारी कुछ मदद कर सकती हैं.’’

विशाल और उस के घर वालों की विनती पर सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने वैभव की गुमशुदगी दर्ज करा कर इस बात की जानकारी अपने सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल को दे दी. इस के बाद उन्होंने विशाल और उस के घर वालों को आश्वासन दे कर घर भेज दिया. थाना डोंगरी के सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने तत्काल इस मामले की जानकारी अधिकारियों को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. इस के बाद अधिकारियों के दिशानिर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने सहायक इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर के साथ जांच की रूपरेखा तैयार की और फिर उन्हीं को इस मामले की जांच सौंप दी.

जांच की जिम्मेदारी मिलने के बाद इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर ने एक टीम बनाई, जिस में असिस्टेंट इंसपेक्टर शशिकांत यादव, सबइंसपेक्टर संतोष कांबले, महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के, पुलिस नायक सैयद सांलुके, कांबले, धार्गे, कनकुटे और वोडरे को शामिल किया. इस टीम ने जांच तो तेजी से शुरू की, लेकिन कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई. 31 वर्षीय वैभव आचरेकर अपने मातापिता, भाईभाभी और बहनों के साथ मुंबई के डोंगरी इलाके में स्थित पोद्दार इमारत की दूसरी मंजिल पर रहता था. पिता का नाम देवीदास आचरेकर था. वैभव डोंगरी के जिस इलाके में रहता था, वह इलाका किसी जमाने में जानेमाने कुख्यात तस्कर करीम लाला और हाजी मस्तान का माना जाता था.

उस समय पठान भाइयों की इजाजत के बगैर इस इलाके का एक पत्ता भी नहीं हिलता था. शायद वैभव पर भी इलाके का असर पड़ गया था और वह भी अपराधी प्रवृत्ति का हो गया था. इलाके के सभी छोटेबड़े अपराधियों के बीच उस की अच्छी पैठ थी. उस के खिलाफ मारपीट, चोरीडकैती और अपहरणफिरौती जैसे कई अपराधों के मामले दर्ज थे, इसलिए थाना डोंगरी पुलिस उसे ही नहीं, उस के घर के हर सदस्य को पहचानती थी. शुरू में वैभव की अपराधी प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर पुलिस टीम ने उस के बारे में पता लगाना शुरू किया. पुलिस को लगता था, कि अपने कारनामों की वजह से कहीं उसे मार न दिया गया हो. लेकिन इस बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

धीरेधीरे दिन बीतते गए. वैभव को गायब हुए 4 महीने बीत गए और उस का कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी नहीं मिली कि मान लिया जाता कि उसे मार दिया गया है. अगर वह कोई अपराध कर के भी छिपा होता तो इतने दिनों तक न उस का अपराध छिपा रह सकता था और न वह खुद. जांच टीम वैभव के बारे में जो सोच कर जांच कर रही थी, उस से कोई फायदा नहीं हुआ, इसलिए जांच अधिकारी इंसपेक्टर महादेव कदम ने जांच की दिशा बदल दी. माना जाता है कि लड़ाईझगड़े या हत्या जैसे अपराधों की वजह जर, जमीन और जोरू होती है. यहां जर, जमीन का कोई कारण नहीं दिख रहा था, इसलिए उन का ध्यान जोरू की तरफ गया. वैभव जवान, सुंदर और अविवाहित युवक था, इसलिए उन्हें लगा कि कहीं वह किसी जोरू की वजह से तो नहीं गायब कर दिया गया.

इस की एक वजह यह भी थी कि जिस दिन वैभव गायब हुआ था, उस दिन की उस के मोबाइल फोन की लोकेशन मुंबई के उपनगर दहिसर की लाभदर्शन इमारत के आसपास की पाई गई थी. वहां उस के जाने की क्या वजह हो सकती थी? जांच टीम यह जानने के लिए उस के घर गई तो घर वाले इस बारे में कुछ खास नहीं बता सके. लेकिन जब इस टीम ने किसी महिला से संबंध के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसी इमारत में रहने वाली ज्योत्सना मोरे से वैभव के मधुर संबंध थे. उस के घर भी उस का खूब आनाजाना था.

पुलिस ने जब ज्योत्सना मोरे से पूछताछ की तो उस ने यह तो स्वीकार कर लिया कि पड़ोसी होने के नाते वैभव का उस के घर आनाजाना था. लेकिन न तो उस के उस से कोई गलत संबंध थे, न उसे उस की गुमशुदगी के बारे में कुछ पता है. इमारत में ईर्ष्या करने वाले लोगों ने उसे बदनाम करने के लिए उस का नाम वैभव के साथ जोड़ दिया होगा. पुलिस ने ज्योत्सना मोरे को गिरफ्तार तो नहीं किया, लेकिन वह संदेह के घेरे में आ गई थी, इसलिए उस का मोबाइल अपने पास रखने के साथ इस हिदायत के साथ घर जाने दिया कि वह पुलिस को बताए बिना मुंबई छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. इस के बाद पुलिस ने ज्योत्सना के बारे में पता लगाना शुरू किया.

जुटाई गई जानकारियों के आधार पर पुलिस को ज्योत्सना मोरे के बारे में जो पता चला, वह चौंकाने वाला था. पुलिस को उस के नंबर की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर उस ने वैभव के गायब होने वाले दिन कई बार बात की थी. उस नंबर वाले फोन की लोकेशन भी उसी जगह की पाई गई थी, जहां की वैभव के मोबाइल फोन की मिली थी. ज्योत्सना के भी मोबाइल फोन की लोकेशन वहां की थी. तीनों मोबाइल फोनों की लोकेशन एक जगह की मिलने की वजह से ज्योत्सना मोरे संदेह के घेरे में आ गई. यह संदेह तब और गहरा गया, जब पुलिस ने उस से उस नंबर के बारे में पूछा तो उस ने साफ कहा कि वह उस नंबर के बारे में बिलकुल नहीं जानती.

जबकि उस नंबर पर उस की लगातार बातें हो रही थीं. पुलिस को अब तक यह भी पता चल चुका था कि दहिसर की लाभदर्शन इमारत में उस का मायका था. साफ था, ज्योत्सना ने ही वैभव को वहां बुलाया होगा. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. 20 दिसंबर, 2014 को इंसपेक्टर महादेव कदम ने सीनियर अधिकारियों की उपस्थिति में जब ज्योत्सना से सुबूतों के आधार पर सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने वैभव की हत्या का अपना अपराध तो स्वीकार कर ही लिया, उस मोबाइल नंबर के बारे में भी बता दिया, जिस के बारे में वह अनभिज्ञता प्रकट कर रही थी.

वह मोबाइल नंबर ज्योत्सना के पुराने प्रेमी प्रकाश पाटिल का था. उसी के साथ मिल कर उस ने वैभव आचरेकर को ठिकाने लगा दिया था. इस के बाद उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर महादेव कदम ने उसी रात उस के साथी प्रकाश पाटिल को भी गिरफ्तार कर लिया था. थाने में दोनों से की गई पूछताछ में वैभव आचरेकर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्रेम त्रिकोण में की गई हत्या की थी. 34 वर्षीय प्रकाश पाटिल महाराष्ट्र के जनपद पालघर की तहसील वसई के गांव ज्यूचंद्र का रहने वाला था. उस के पिता रामचंद्र  पाटिल गांव के सुखीसंपन्न किसान थे. बीए करने के बाद प्रकाश नगर महापालिका में ठेकेदारी करने लगा था, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो रही थी.

जिन दिनों वह बीए कर रहा था, उन्हीं दिनों साथ पढ़ने वाली ज्योत्सना से उसे प्यार हो गया था. ज्योत्सना भी उसे प्यार करती थी, इसलिए दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन किन्हीं कारणों से यह शादी नहीं हो पाई. प्रकाश के घर वालों ने उस की शादी कहीं और कर दी थी तो ज्योत्सना के घर वालों ने भी उस उस की शादी मुंबई के रहने वाले अमित मोरे से कर दी थी. दोनों ही अपनेअपने घरसंसार में सुखी थे. प्रकाश जहां 2 बेटियों का बाप बन गया था, वहीं ज्योत्सना भी एक बेटे की मां बन चुकी थी. लेकिन जब कई सालों बाद बिछड़े हुए प्रेमी एक विवाह समारोह में मिले तो इन का प्यार एक बार फिर उमड़ पड़ा.

गिलेशिकवे दूर करने के बाद प्रकाश और ज्योत्सना ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए थे. फोन पर बातचीत करतेकरते धीरेधीरे दोनों एक बार फिर पुराने रंग में रंग गए. ज्योत्सना पति अमित मोरे और बेटे के साथ मुंबई के डोंगरी में रहती थी. दरअसल वह अपने पति अमित मोरे से खुश नहीं थी. अमित मोरे एक बीमा कंपनी का एजेंट था. वह ज्योत्सना जैसी सुंदर और पढ़ीलिखी पत्नी पा कर खुद को धन्य समझ रहा था. इसीलिए वह उसे खुश रखने और उस की सुखसुविधाओं का पूरा खयाल रखता था. पत्नी और बेटे को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो, इस के लिए वह दिनरात मेहनत करता था.

इसी चक्कर में वह यह भूल भी गया था कि सुखसुविधा के अलावा पत्नी को पति का प्यार भी चाहिए. देर रात वह घर लौटता तो बुरी तरह थका होता. खापी कर वह बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता. सुबह उठता और चायनाश्ता कर के काम पर निकल जाता. उस के पास ज्योत्सना के लिए समय ही नहीं होता था. पति की इसी उपेक्षा से ज्योत्सना अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस का फायदा उसी इमारत में रहने वाले वैभव आचरेकर ने उठाया. वैभव आचरेकर और अमित मोरे के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. यह अलग बात थी कि अमित मोरे ईमानदारी और मेहनत की कमाई खाता था, जबकि वैभव आचरेकर अपराध की कमाई से मौज कर रहा था. दोनों की दिशाएं अलग थीं, इस के बावजूद उन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा था.

वैभव कभी अमित मोरे के साथ उस के घर आया तो खूबसूरत ज्योत्सना को देख कर उस पर मर मिटा. कुंवारा होने की वजह से स्त्रीसुख से वंचित वैभव ज्योत्सना को पाने की कोशिश करने लगा. उस के हावभाव से जब उस के मन की बात ज्योत्सना को पता चली तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी. क्योंकि वह यही तो चाहती थी. धीरेधीरे ज्योत्सना वैभव की ओर खिंचने लगी. फिर तो वह स्वयं को संभाल नहीं सकी और वैभव की बांहों में समा गई. ज्योत्सना को वैभव की सशक्त बांहों का सुख मिला तो वह अमित मोरे को भूल कर उसी की हो गई. उसे जब भी मौका मिलता, वैभव को अपने फ्लैट पर बुला लेती. पहले तो वैभव ज्योत्सना के बुलाने का इंतजार करता था, लेकिन कुछ दिनों बाद जब भी उस का मन होता, वह खुद ही ज्योत्सना के फ्लैट पर पहुंच जाता.

धीरेधीरे वह ज्योत्सना को प्रेमिका कम, पत्नी ज्यादा समझने लगा. लेकिन जब ज्योत्सना की मुलाकात उस के पुराने प्रेमी प्रकाश से हुई तो वह वैभव से किनारे करने लगी. अपराधी प्रवृत्ति के वैभव को ज्योत्सना का यह व्यवहार पसंद नहीं आया. क्योंकि वह उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था. उसे जब जैसी जरूरत पड़ती थी, वह ज्योत्सना को उसी हिसाब से इस्तेमाल कर लेता था. यह बात ज्योत्सना को पसंद नहीं थी. प्रकाश से मिलने के बाद वह वैभव से संबंध नहीं रखना चाहती थी. ज्योत्सना जब वैभव की मनमानियों से तंग आ गई तो उस से मुक्ति पाने के लिए परेशान रहने लगी. जब उस की परेशानी के बारे में प्रकाश पाटिल को पता चला तो उस ने ज्योत्सना के साथ मिल कर वैभव को अपने बीच से निकाल फेंकने की खतरनाक योजना बना डाली.

लेकिन वैभव मजबूत कदकाठी और अपराधी प्रवृत्ति का युवक था, इसलिए उस से सीधे निपटना ज्योत्सना और प्रकाश के वश की बात नहीं थी. इसलिए प्रकाश ने अपनी योजना में अपने एक दोस्त माइकल को भी शामिल कर लिया. योजना के अनुसार, ज्योत्सना 19 अगस्त, 2014 को अपने मायके दहिसर आ गई. वहीं से उस ने वैभव को फोन कर के मिलने के लिए वसई के रेलवे स्टेशन नायगांव बुलाया. 20 अगस्त, 2014 की सुबह वैभव अपने घर वालों को बताए बगैर ज्योत्सना से मिलने नायगांव पहुंच गया. साढ़े 10 बजे वैभव नायगांव रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो पहले से ही इंतजार कर रहे प्रकाश और माइकल ने उसे पकड़ लिया. दोनों खुद को पालिका इंसपेक्टर बता कर वैभव को पूछताछ के बहाने नायगांव पूर्व मित्तल क्लब हाउस के पास ले गए.

वहां पहुंच कर प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की यह कर पिटाई शुरू कर दी कि वह डोंगरी में रहने वाली ज्योत्सना मोरे को परेशान करता है और उसे धमकी दे कर बिना उस की मरजी के उस के साथ शारीरिक संबंध बनाता है. प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की इस तरह पिटाई की कि थोड़ी देर में वह बेहोश हो गया. उस के बेहोश होने के बाद प्रकाश पाटिल ने वैभव के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई.

वैभव को मौत के घाट उतार कर उस की लाश एक चादर में लपेटी और रात में ही माइकल की मारुति कार में रख कर उसे ठिकाने लगाने के लिए मुंबई-अहमदाबाद एक्सप्रेस हाइवे पर चल पड़े. रात 12 बजे के आसपास वे मनोर के पास बह रही नदी के पुल पर पहुंचे. उन्होंने लाश कार से निकाली और तलाशी में उस का सारा सामान निकाल कर लाश को नदी में फेंक दिया. लाश ठिकाने लगाने के बाद प्रकाश ने फोन कर के ज्योत्सना को वैभव की हत्या के बारे में बता दिया. अगले दिन वैभव की लाश किसी मछुआरे के जाल में फंस गई तो उस ने इस बात की जानकारी थाना मनोर पुलिस को दी. पुलिस ने शव बरामद कर के शिनाख्त कराने की कोशिश की. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद थाना मनोर पुलिस ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया.

वैभव की हत्या से ज्योत्सना तो खुश थी ही, प्रेमिका को खुश कर के प्रकाश भी खुश था. जिस तरह प्रकाश ने वैभव को अपने रास्ते से हटाया था, उस का सोचना था कि पुलिस उस तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. 4 महीने बीत गए तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि अब वह बच गया. लेकिन पुलिस खोजतेखोजते ज्योत्सना तक पहुंच गई तो वैभव आचरेकर की हत्या का रहस्य खुल गया और वह भी पकड़ा गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रकाश के दोस्त माइकल को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद वैभव की हत्या का मुकदमा प्रकाश पाटिल, ज्योत्सना और माइकल के खिलाफ दर्ज कर के महानगर मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में ही थे. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News: लव के गेम की खिलाड़ी बनी पिंकी

UP News: कहते हैं कि घर की देहरी लांघने के बाद भी यदि किसी महिला के पैर नहीं रुकते हैं तो उस घर की बरबादी निश्चित है. मुरादाबाद की पिंकी ने भी यही किया. अपने ब्याहता को छोड़ कर वह किशनवीर के साथ रहने लगी. इस के बावजूद चाचाभतीजे से उस के अवैध संबंध हो गए. इस के बाद जो हुआ, वह…

पति की रोजरोज की कलह से पिंकी परेशान हो चुकी थी, इसलिए उस ने अपने दोनों प्रेमियों से बात कर किशन को रास्ते से हटाने के लिए खतरनाक योजना बना डाली. किशन को कई दिनों से नशे के लिए शराब की व्यवस्था नहीं हो पाई थी. जेब में कोई पैसा भी नहीं था. योजना के अनुसार पिंकी ने अपने पति किशन से कहा कि इस समय नितिन स्योंडारा में है, उस से बात हो गई है. तुम उस के पास चले जाओ, वह 4 हजार तुम्हें देगा, ले कर आ जाओ.

ग्राम स्योंडारा मिट्ठनपुर मौजा गांव से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर है. किशन स्योंडारा पहुंच गया. वहां पर चमन शर्मा, नितिन शर्मा, अवनेश और रविकांत मौजूद थे. बराबर में ही शराब की दुकान थी. नितिन ने जा कर 2 बोतल शराब खरीदी और एकांत में पांचों जा कर बैठ गए. किशन ने नितिन से कहा कि पिंकी ने पैसों के लिए भेजा है.

”हमें पता है, पहले एक पेग ले ले, फिर चले जाना.’’

योजना के अनुसार, उन्होंने किशन को जम कर शराब पिलाई. किशन नशे में इतना चूर हो गया कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकता था. तीनों ने किशन को उठा कर एक बाइक पर बैठाया. नितिन उसे पकड़ कर पीछे बैठ गया. बाकी दोनों लोग बाइक के पीछेपीछे चल दिए. अंधेरा हो चुका था. करीब 15 किलोमीटर दूर गांव ढकिया नरू पहुंचने पर उन्हें धान के खेत में पानी भरा दिखाई दिया. यह एक सुनसान जगह थी. उस समय उधर से किसी का आनाजाना भी नहीं हो रहा था. तीनों ने फिर उसे बाइक से उतारा. उसे खेत में ले जा कर औंधे मुंह गिरा दिया और वे उस के ऊपर खड़े हो गए. वह छटपटाता रहा, हाथपांव मारता रहा, लेकिन जब तक सांसें रुक नहीं गईं, वे उस के ऊपर खड़े रहे.

किशन की मौत होते ही सब घबरा कर वहां से भाग गए. पिंकी शुरू से पूरी लोकेशन मोबाइल से ले रही थी. नितिन लगातार अपने मोबाइल से पिंकी को अपडेट दे रहा था. उस की सांस रुक जाने पर नितिन ने बता दिया कि रास्ते का कांटा हट गया है. जिला मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्रांतर्गत ग्राम ढकिया नरू को जाने वाले रोड किनारे प्रेम सिंह का खेत स्थित है. खेत में धान लगे थे. 31 जुलाई, 2025 को उन के धान के खेत में शव पड़े होने की सूचना से गांव में हड़कंप मच गया. वह व्यक्ति कोई अनजान था.

अज्ञात व्यक्ति का शव पड़े होने की सूचना ग्रामप्रधान मनोहर सिंह द्वारा पुलिस को दी गई. ग्रामप्रधान की सूचना पर मौके पर पहुंचे कोतवाल मोहित कुमार मलिक और फोरैंसिक टीम ने बारीकी से शव और मौके की जांच की. वहां मोजूद कोई भी व्यक्ति शव की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेज दिया. दूसरे दिन अखबारों में किसी व्यक्ति की लाश मिलने की खबरें छपीं. खबर पढ़ कर महेंद्र नाम का व्यक्ति कोतवाली बिलारी पहुंचा, क्योंकि उस का भाई किशनवीर एक दिन पहले शाम साढ़े 4 बजे से गायब था.

महेंद्र सिंह जिला संभल के थाना कुढफ़तेहगढ़ के गांव मिठनपुर मौजा निवासी पर्वत सिंह का बेटा था. पुलिस उसे मोर्चरी ले गई. पुलिस ने उसे मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो लाश देख कर महेंद्र के होश उड़ गए. उस की चीख निकल गई. उसे चक्कर आने लगा. साथ के लोगों ने उसे संभाला. क्योंकि वह लाश किसी और की नहीं बल्कि उस के 40 वर्षीय भाई किशनवीर की थी. पुलिस उसे दुर्घटना मान रही थी, क्योंकि पुलिस को पता चला कि किशनवीर शराबी था. इसलिए पुलिस ने सोचा कि यह नशे में धुत हो कर खेत की तरफ चला आया होगा और मुंह के बल गिरा होगा.

मुंह और नाक में पानी मिट्टी भर जाने से सांस न आने पर मौत हो गई होगी. किंतु यहां पर एक सवाल यह उठ रहा था कि किशनवीर अपने घर से करीब 15 किलोमीटर दूर एकांत जगह किसी खेत में कैसे आया, क्यों आया? उधर पति के लापता होने के दूसरे दिन पिंकी गांव के लोगों से कहती रही कि उस के पति रात से अभी तक नहीं आए हैं. तीसरे दिन बड़े भाई महेंद्र सिंह ने अखबारों में खबर छपने के बाद बिलारी कोतवाली पुलिस से संपर्क किया और पोस्टमार्टम हाउस में जा कर अपने भाई की लाश की पहचान की. डैडबौडी को ले कर वे लोग अपने गांव आ गए.

12 अगस्त, 2025 को कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज हुई. महेंद्र सिंह ने बताया कि ये लोग किशन की मृत्यु के बाद होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में लगे हुए थे. इसलिए 12 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराई. गांव में खूब चर्चा थी कि चाचाभतीजे चमन शर्मा और नितिन शर्मा ने ही किशनवीर की हत्या की है. पुलिस ने पिंकी से जानकारी की तो उस ने कहा कि उस के पति तो शराबी थे. कहीं चले गए होंगे. नशे में होने के कारण उस खेत में गिर गए होंगे, जिस से उन की मौत हो गई होगी. पुलिस को पिंकी से पूछताछ के समय ज्यादा सख्ती की जरूरत नहीं पड़ी. धमकाने पर ही उस ने सारा सच उगल दिया.

कोतवाल मोहित कुमार मलिक के निर्देशन में गठित पुलिस टीम ने अभियुक्त चमन शर्मा नितिन शर्मा निवासी गांव मनकुला, रविकांत निवासी मोहल्ला प्रेम विहार, बिलारी, पिंकी निवासी गांव मिठनपुर मौजा थाना कुढफ़तेहगढ़ जनपद संभल को गिरफ्तार किया गया. आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद किशनवीर की हत्या की चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद की तहसील बिलारी से करीब 13 किलोमीटर दूर एक गांव है मिठनपुर मौजा. इस गांव का थाना कुढ़ फतेहगढ़ लगता है. गांव मिट्ठनपुर मौजा के रहने वाले पर्वत सिंह के 3 बेटे और एक बेटी थी. सब से बड़ा सतपाल सिंह, दूसरे नंबर का महेंद्र सिंह तीसरे नंबर पर किशनवीर उर्फ ऋषिपाल. इस गांव में अधिकांश लोग यादव जाति के ही हैं. सब से बड़े भाई सतपाल की किशनवीर के मर्डर से 27 दिन पहले ही मृत्यु हुई थी. वह बीमार थे. दूसरे नंबर के महेंद्र सिंह ने अभी तक शादी नहीं की है.

महेंद्र सिंह और किशनवीर का मकान संयुक्त रूप से बना हुआ है. सतपाल बराबर में अलग से रहते थे. मातापिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. यह परिवार किसान वर्ग में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इतनी कृषि भूमि इन के पास नहीं है कि खेती कर के गुजरबसर कर सकें. तीनों भाइयों के पास मिला कर 8-9 बीघा खेती की जमीन थी, इसलिए मेहनतमजदूरी कर के यह परिवार अपनी गुजरबसर कर रहा था. बड़े भाई सतपाल का विवाह हो गया था. गनीमत तो यह रही कि पर्वत सिंह ने अपने सामने ही अपनी बेटी का विवाह कर दिया था.

पिंकी नाम की एक युवती जो किसी कारणवश शादी के कुछ महीने बाद ससुराल से भाग गई. किशनवीर के बहनोई रघुवीर के वह संपर्क में आ गई. वह ट्रक चलाते हैं. युवती ससुराल जाने को तैयार नहीं थी. रघुवीर का अपना परिवार था, जो ठीकठाक चल रहा था. किसी अज्ञात महिला को अपने साथ रख कर वह अपनी फेमिली में कोई लफड़ा करना नहीं चाहते थे. पिंकी की शादी अभी कुछ ही महीने पहले बड़े धूमधाम से हुई थी, पर ससुराल की चौखट उस के लिए वैसी नहीं निकली, जैसी उस ने सपनों में देखी थी. रोज की तकरार, छोटेछोटे आरोप और दबाव ने उस का मन तोड दिया था.

एक दिन आंसुओं से भीगी आंखों के साथ पिंकी ने तय कर लिया कि वह अब और सहन नहीं करेगी. बिना किसी को बताए वह रात में घर से निकल पड़ी.

किशन की जिंदगी में इस तरह आई पिंकी

सड़क पर भटकतेभटकते उस की मुलाकात ट्रक ड्राइवर रघुवीर से हुई. रघुवीर ने उस की परेशानी देखी और उसे अपने साथ ले गया. पिंकी का कहना था कि वह ससुराल नहीं जाएगी और मायके भी नहीं जाएगी. दोनों जगह ही उसे जान का खतरा है. पिंकी की मजबूरी और हालत को देखते हुए रघुवीर ने सोचा कि इस की शादी अपने किसी साले से करा दी जाए. रघुवीर ने अपने साले महेंद्र और किशन से बात की. दोनों साले अभी कुंवारे थे.

महेंद्र ने किशनवीर के साथ ही पिंकी की शादी कराने का सुझाव दिया. रघुवीर ने किशन से बात की तो वह तैयार हो गया. बड़े भाई और बहनोई के कहने पर किशन पिंकी को साथ रखने को तैयार हो गया. फिर सामाजिक रीतिरिवाज से पिंकी और किशनवीर के साथ सात फेरे करा दिए. किशनवीर के साथ रह कर पिंकी को पहली बार अपनापन और सुकून महसूस हुआ. धीरेधीरे दोनों में विश्वास और लगाव पैदा होता गया.

जब पिंकी के ससुराल वालों को पिंकी के घर से भाग जाने का पता चला तो उन्होंने कोई काररवाई नहीं की. उन के लिए पिंकी का घर से चले जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि वे लोग उस से पीछा छुड़ाना ही चाहते थे. अपने बचाव में पिंकी के ससुराल वालों ने दूसरे दिन सुबह को ही फोन कर के बता दिया कि तुम्हारी बेटी पिंकी यहां से रात किसी टाइम चली गई है. मायके वाले बेटी के गायब होने से परेशान थे. खोजबीन करने पर किसी तरह उन्हें पता चल गया कि पिंकी इस समय जिला संभल के एक गांव मिठनपुर मौजा में है. उन्होंने थाने के चक्कर काटे, पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई और हर जगह गुहार लगाई.

इन सब उथलपुथल के बीच पिंकी ने अपने दिल की सुनने का फैसला किया. उस ने सब के सामने घोषणा कर दी कि अब किशनवीर ही उस का पति है. लोगों ने तरहतरह की बातें कीं. किसी ने इसे पिंकी की गलती बताया, किसी ने उस की हिम्मत की तारीफ की, लेकिन पिंकी के लिए सच यही था कि उस ने अपने जीवन का नया रास्ता चुन लिया था. अब वह बीते कल की कैदी नहीं थी. वह पिंकी नहीं, बल्कि अपनी नई कहानी की नायिका थी. पिंकी के दूसरी बिरादरी में शादी करने पर उस के मायके वालों की बहुत बदनामी हो रही थी. लोग ताने दे रहे थे.

समय पंख लगा कर उड़ रहा था. किशनवीर और पिंकी अपनी जिंदगी को और विशाल बनाने के लिए कोशिश करते रहे. एक दिन किशन अपनी पत्नी पिंकी को ले कर अलीगढ़ चला गया. वहां उस ने एक कारखाने में नौकरी कर ली. दिन भर मेहनत कर के आता, पत्नी उस के स्वागत में तैयार गेट पर ही मिलती. कभी देर हो जाती है तो पिंकी शिकायत करती, ”टाइम से घर आया करो, अकेले मुझे डर लगता है.’’

तब किशन पत्नी पिंकी को बाहों में भर लेता, ”मैं हूं तो तुझे डरने की क्या बात है.’’

गोद न भरने पर अधूरी थी पिंकी की जिंदगी

सब कुछ खुशहाल गुजर रहा था. लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद भी इन को संतान सुख नहीं मिला. जब दोनों ने  वैवाहिक जिंदगी की शुरुआत की थी, तब एक दिन किशन ने अपनी पत्नी पिंकी से कहा था कि जल्द ही हमारा घर बच्चों की हंसी से गूंजेगा. लेकिन समय बीतता गया, पर हंसी उन के आंगन में नहीं आई. किशन हर शाम जब काम से लौटता तो आसपास के बच्चों को खेलते देख उस की आंखें भर आतीं. भीतर ही भीतर सोचता कि अगर मेरा भी एक बेटा होता तो थके होने पर मेरी गोद में बैठ जाता. अगर एक बेटी होती तो घर में आते ही मेरे गले में हाथ डाल कर उछल कर मेरी बाहों में समा जाती. उस की हंसी मेरे सारे दर्द भुला देती.

पिंकी की पीड़ा और गहरी थी. गांव की औरतें जब मेले या त्यौहार पर अपने बच्चों का हाथ थामे जातीं तो उस के खाली हाथ और भारी हो जाते. रिश्तेदार और पड़ोसी ताने कसते, ‘संतान नहीं तो जीवन का क्या सुख?’

इन तानों से वह चुप हो जाती, लेकिन रात को आंसू उस के तकिए भिगोते. किशन उस का हाथ पकड़ कर कहता, ”मुझे तेरी हंसी ही सब से बड़ा सहारा है. दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तू मेरे साथ है तो मैं सब से अमीर हूं.’’

फिर भी दोनों के भीतर कहीं एक अधूरी चाह थी. उन का प्यार मजबूत था, लेकिन समाज की बातें और भीतर की कसक बारबार दिल चीर देतीं. कभीकभी दोनों बैठ कर सोचते कि क्या हमारा प्यार ही हमारी संतान नहीं? क्या हमारी मेहनत से बनी ये रोटी ही हमारी विरासत नहीं? किशन की अपनी मर्दानगी पर सवाल उठने लगे, पर वह इन्हें मेहनत में डुबो देता. वह खुद को तसल्ली देता. उसे अपनी मर्दानगी में कोई कमी कभी नजर नहीं आई. पिंकी ने इस तरह की शिकायत कभी नहीं की. वह मंदिर जाती, मन्नतें मांगती, व्रत रखती.

किशन भी उस का साथ देता, पर उस का विश्वास धीरेधीरे टूट रहा था. किशन ने कहा, ”क्या हमारा प्यार अधूरा है? क्या हमारी जिंदगी में बस यही कमी रह जाएगी?’’

उस की आवाज में दर्द था, जो पिंकी के सीने में भी उतर गया. पिंकी ने उस का हाथ थामा और बोली, ”हमारा प्यार अधूरा नहीं है, बच्चा नहीं हुआ तो क्या? हम एकदूसरे के लिए तो हैं.’’

लेकिन सच तो यह था कि दोनों के दिल में एक टीस थी. पिंकी को लगता, शायद वह मां बनने के लायक नहीं. किशन को लगता, शायद वह एक पिता बनने का फर्ज नहीं निभा पाया. फिर भी, दोनों एकदूसरे का सहारा बने रहे. दिन भर की मेहनत के बाद, जब वे रात को एकदूसरे के पास बैठते तो सारी दुनिया की थकान और दुख जैसे पलभर के लिए गायब हो जाते. यहां यादव जाति के लोग बहुत पिछड़े हुए हैं. बच्चा पैदा होने के लिए दोनों में से किसी ने कभी किसी डौक्टर की सलाह पाने के लिए अज्ञानतावश जरूरत नहीं समझी.

करीब 3 साल पहले दोनों अलीगढ़ को छोड़ कर अपने घर गांव वापस आ गए. किशनवीर ने एक ईरिक्शा लोन पर ले लिया, जिस से गुजर ठीकठाक हो रही थी. इसी बीच उस की मुलाकात करीब 4-5 किलोमीटर दूर मनकुला गांव निवासी चमन शर्मा से हुई. चमन शर्मा क्षेत्र में पंडिताई करता था. मुरादाबाद जिले के ग्रामीण इलाकों में पंडित (ब्राह्मण) समाज का एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान होता है. गांवों में उन की भूमिका सिर्फ धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी होती है. ब्राह्मïण गांव में धार्मिक परामर्शदाता माने जाते हैं.

पहले ब्राह्मïणों को कृषि पर निर्भर लोगों से दक्षिणा के रूप में धान, गेहूं, अनाज, सब्जी, कपड़ा आदि मिलती थी. अब धीरेधीरे लोग नकद दक्षिणा देने लगे हैं. आधुनिकता के बावजूद गांवों में ब्राह्मïणों का सम्मान और धार्मिक आयोजन में उन की भूमिका लगभग उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले थी. परिस्थितियों के चलते 50 वर्षीय चमन शर्मा का आनाजाना किशन के घर हो गया. चमन 3 भाई हैं. चमन का विवाह हो चुका है. एक बच्चा भी है.

पिंकी थी यजमान उसे बना लिया प्रेमिका

चमन दुनियादारी में बड़ा चालाक था. किशनवीर के घर जाते समय वह उस के घर के जरूरत के सामान भी ले जाने लगा. फिर पिंकी उस का बहुत आदरसत्कार करती और उसे खाना खिलाती थी. एक दिन चमन पनीर और उस से संबंधित मसाले व अन्य सामान भी ले कर आया, लेकिन उस दिन थैले में एक शराब की बोतल भी थी. चमन ने बोतल निकाल कर थैला पिंकी को थमाते हुए कहा, ”लो भाभी, आज पनीर बनाओ. लेकिन पहले 2 गिलास और लोटे में पीने का पानी दे दो.’’

चमन ने गिलास में पैग तैयार किया. किशन ने मना किया, ”मैं नशा नहीं करूंगा, मैं शराब नहीं पीता हूं. कभी तीजत्यौहार की बात अलग है.’’

दोस्ती का वास्ता दे कर चमन ने किशन को शराब पीने के लिए राजी कर लिया. चमन ने अपने दोस्त किशन से कहा, ”जाम उठा ले और मुंह से लगा ले, मुंह से लगा कर पी.’

दोस्त के इस शायरी अंदाज पर किशन मुसकराया. पीतेपीते दोनों मस्त हो गए. इतनी देर में खाना तैयार हो चुका था. दोनों ने खाना खाया. अगले दिन फिर मुलाकात हुई तो किशन ने चमन का रात की पार्टी के लिए एहसान व्यक्त किया. चमन ने मुसकराते हुए कहा, ”अरे, दोस्ती किस दिन काम आएगी? और फिर, मैं तेरे दुखदर्द का हल भी लाया हूं.’’

किशन चौंका, ”कौन सा हल?’’

चमन धीरेधीरे अपनी चाल चलने लगा. उस ने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ”भाभी को बच्चा न होने की चिंता है न? मेरे पास ऐसा नुस्खा है जिस से निस्संतान दंपति भी मातापिता बन जाते हैं. अगर भरोसा हो तो मैं मदद कर सकता हूं.’’

यह सुनते ही पिंकी की आंखों में चमक आ गई. 9 साल से उस का यही सपना अधूरा था, लेकिन किशन को कुछ अटपटा लगा. वह बोला, ”क्या वाकई ऐसा संभव है?’’

चमन ने रहस्यमई अंदाज में कहा, ”हां, मगर यह बात नुस्खे तक नहीं है. साथ में धार्मिक अनुष्ठान व खास उपाय करना पड़ता है. वह सब मैं करूंगा और अपने खर्चे पर करूंगा, लेकिन यह राज बाहर न जाए.’’

धीरेधीरे चमन ने पिंकी के मन में झूठे सपनों की डोर बुननी शुरू कर दी. कभी दवाइयों के नाम पर, कभी ताबीजटोने के बहाने, वह उसे समझाने लगा कि बच्चा तभी आएगा, जब वह उस के बताए ‘खास उपायों’ पर भरोसा करेगी. किशन सीधासादा था. उस के दोस्त ने कुछ पुडिय़ा ला कर दीं. कहा संभोग से एक घंटा पहले खा लेना. अवश्य संतान की प्राप्ति होगी. पिंकी मासूम थी, मां बनने की चाहत में उस ने चमन की हर बात पर विश्वास कर लिया. वह सोचती, ‘सच में अब मेरी गोद भर जाएगी.’

इस तरह चमन और पिंकी के बीच देवरभाभी का रिश्ता गहरा होता चला गया. चमन मजाक के साथसाथ मौका लगता तो थोड़ी छेड़छाड़ और चुम्माचाटी भी कर लेता था. इसी लालच और विश्वास के बीच चमन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया. किशन को लगा उस का दोस्त मददगार है, जबकि असलियत में वह उस की कमजोरी का फायदा उठा रहा था. जिस दिन चमन शर्मा को दक्षिणा अधिक मिल जाती, वह कुछ न कुछ अच्छे भोजन के लिए सामान ले कर किशन के घर आ जाता.

एक दिन चमन खाने के व्यंजन के साथ में हमेशा की तरह बोतल भी लाया था. उस दिन चमन ने अपने दोस्त को कुछ अधिक शराब पिलाई. मौका लगते ही नशे की गोलियों की पुडिय़ा लाया था, एक पैग में मिला दी. कुछ ही देर बाद किशन चारपाई पर बेसुध हो कर लुढ़क गया.

फिर चमन ने अपनी भाभी पिंकी को बुला कर बाहों में समेट लिया. वह बोली, ”अरे क्या कर रहे हो, वो देख लेंगे.’’

चमन मुसकराता हुआ बोला, ”उस का पूरा इलाज आज कर दिया है. वैसे इसे अब सुबह तक भी होश नहीं आएगा.’’

पिंकी शरमाते हुए बोली, ”ऐसा क्या कर दिया?’’

चमन ने पूरी बात बताई और कहा कि आज हम खुल कर रोमांस करेंगे. इस के बाद कमरे का माहौल अचानक बदल गया.

पिंकी भी चमन की आंखों में अजीब सी मोहब्बत देख रही थी. इतने दिनों से वह समझ रही थी कि चमन सिर्फ पति का दोस्त ही नहीं, बल्कि उस के दिल में कुछ और जगह बना चुका है.

चमन ने कहा,”पिंकी, तुम जानती हो कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. आज हालात ने हमें मौका दिया है. अगर तुम चाहो तो यह रात हमारी हो सकती है.’’

पिंकी कुछ पल चुप रही, फिर उस की आंखों में हलकी मुसकान तैर गई.

”देवरजी, शायद किस्मत ने ही यह मौका दिया है. मैं भी अब रुकना नहीं चाहती.’’

इस के बाद दोनों के बीच की दूरी मिट गई. सारी बंदिशें टूट गईं और वो रात उन के लिए इश्क की एक नई दास्तां बन गई.

2 जिस्म जैसे एक जान हो गए. रात का आखिरी पहर था. चमन की अचानक आंखें खुलीं तो सुबह होने वाली थी. पिंकी भी उठ चुकी थी. पिंकी का चेहरा चमक रहा था और चमन की आंखों में संतोष था. दोनों जानते थे कि यह रिश्ता अब सिर्फ एक रात का नहीं, बल्कि उन के जीवन की नई शुरुआत है. पिंकी ने कमरे से बाहर निकल कर देखा, उस के जेठ का कमरा भी बंद था. फिर वह मेनगेट पर आई, बाहर जा कर इधरउधर देखा. कोई नहीं था. पूरा सन्नाटा छाया हुआ था. उस ने चमन को इशारा किया और वह दबेपांव घर से निकल कर अपने घर चला गया.

फिर यह सिलसिला चलता रहा. पिंकी गर्भवती हो गई और उसे एक बेटा पैदा हुआ. किशन बहुत खुश था. समझ रहा था कि उस के दोस्त ने जो दवा दी थी, उस की वजह से संतान हुई है. किशन ने कर्ज ले कर जो ईरिक्शा लिया था, उसे भी बेच दिया. क्योंकि उसे शराब की लत लग चुकी थी. कारोबार कुछ नहीं था. चमन कभीकभी उस के घर आता तो अब वह इतनी मदद नहीं कर पा रहा था, जितनी पहले कर दिया करता था. बड़ी तंगी से दिन गुजर रहे थे. बेटा पैदा होने से खर्चे और भी बढ़ गए थे.

इसी दौरान इस लव स्टोरी में एक और किरदार प्रवेश कर गया. उस का नाम था नितिन. 20 साल का नितिन पिंकी के प्रेमी चमन का सगा भतीजा था. किशन और नितिन के बीच ईरिक्शा चलाते समय दोस्ती हो गई थी. वह किशन के आर्थिक हालात से भलीभांति परिचित था. नितिन अपने पिता की अकेली संतान था. बहुत बड़ा परिवार नहीं है. अपनी सामान्य आर्थिक स्थिति होने के बावजूद नितिन समयसमय पर किशन को कुछ रुपए उधार दे दिया करता था. कई दिनों से किशन से उस की मुलाकात नहीं हुई. एक दिन वह अपने उधार की रकम का तकाजा करने किशन के घर गया.

शाम का समय था. सूर्यास्त हो रहा था. किशन और चमन आंगन में बैठे हुए शराब का दौर चला रहे थे. दोनों ने एक साथ नितिन को आवाज लगाई, ”आओ नितिन, आओ.’’

वह अंदर आया. दोनों ने उसे भी अपनी महफिल में शामिल कर लिया. जाम का दौर खत्म हो जाने पर पिंकी से खाना लाने को कहा. पिंकी 3 थालियों में खाना ले कर आई. पिंकी ने आदतन नितिन से नमस्ते की. नितिन ने सर उठा कर देखा तो देखता ही रह गया. नशे का सुरूर उसे चढ़ ही रहा था. नितिन ने देखा, उस की आंखों में चमक थी, चेहरे पर ऐसा तेज जैसे कोई दीपक जल उठा हो. बच्चा पैदा होने के बाद तो जैसे उस के हुस्न में नया निखार आ गया था. उस के गालों पर हलकी लाली, आंखों की गहराई में शांति और होंठों पर हमेशा रहने वाली

हलकी मुसकान, सब कुछ उसे और भी आकर्षक बना रहे थे. खाना खाते समय भी नितिन की नजरें पिंकी का ही पीछा करती रहीं. नितिन ने अपने कर्ज की कोई बात किशन से नहीं की. जाते समय किशन से कहा कि अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो मुझे जरूर बताना. मैं तुम्हारा दोस्त हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तैयार रहूंगा. इस समय भी उस की नजरें टकटकी लगाए पिंकी को ही देख रही थीं. पहली ही मुलाकात में वह पिंकी को दिल दे बैठा. इस के बाद मुलाकातें बढती रहीं. पिंकी भी नितिन को चाहने लगी. नितिन ने भी अपने चाचा की तरह का तरीका अपनाया.

एक दिन वह भी थैला भर कर खानेपीने का अच्छा सामान किशन के घर ले गया. दारू की बोतल और साथ में नशीली गोलियों की पिसी हुई पुडिय़ा भी थी. उस ने भी दारू पीते समय किशन के पैग में नशा की गोलियों का पाउडर मिला दिया. इस के बाद किशन के बेहोशी जैसी हालत में पहुंच जाने पर पिंकी और नितिन ने रात भर एकदूसरे पर जम कर प्यार लुटाया. जवानी से भरपूर नितिन के साथ पिंकी ने भी खूब मौजमस्ती की. इस तरह चाचाभतीजा दोनों ही पिंकी के आशिक हो गए. कभी चाचा तो कभी भतीजा पिंकी की मस्त जवानी का आनंद लेने आ जाते.

पिंकी का नितिन की तरफ ज्यादा झुकाव हो गया था. फिर भी पिंकी उस के चाचा चमन को नाराज करना नहीं चाहती थी. गाहेबगाहे वह चमन को भी खुश कर दिया करती थी. दोनों पिंकी का पूरा खयाल रखते. साथ में किशन की भी समयसमय पर दारू की व्यवस्था कर दिया करते थे. अपनी पत्नी और उस के आशिकों के बीच होने वाली रंगीन रात का किशन को पूरा अहसास था. दिन में नशा उतर जाने पर इधरउधर गांव के लोगों के बीच जाता, तब लोग उस के घर की हालत बयान करते तो वह बहुत शर्मिंदा होता.

मामला पूरे गांव में चर्चा का विषय बना हुआ था. क्योंकि दोनों किशन के दोस्त थे, इसलिए कोई सीधे आरोप नहीं लगा रहा था. वह चाचाभतीजे दोनों से टकराने की स्थिति में नहीं था. उन दोनों से टकराने का मतलब उसे साफ दिख रहा था मौत. इसलिए वह पत्नी पर ही अपना गुस्सा उतार देता था. पिंकी की मुसकान में मासूमियत का मुखौटा था, लेकिन उस की आत्मा में विश्वासघात की आग धधक रही थी. वह प्यार नहीं, बल्कि वासना का खेल खेल रही थी. इसी खेल के चलते उस ने अपने पति किशनवीर उर्फ ऋषिपाल की अपने प्रेमियों के द्वारा हत्या करा दी.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. पिंकी के साथ उस का 2 साल का बेटा भी जेल चला गया. एक आरोपी अवनीश कुमार निवासी गांव रमपुरा थाना सोनकपुर जिला मुरादाबाद को पुलिस ने 14 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया. उसे भी अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. केस की जांच कोतवाल मोहित कुमार मलिक कर रहे थे. UP News

 

 

Heart Touching Story : परियों की तरह जीने वाली लड़की

Heart Touching Story : भारत में क्रिकेट के दीवानों की कमी नहीं है. उन्हीं में एक हैं चंडीगढ़ के धर्मवीर दुग्गल, जिन्होंने क्रिकेट से जुड़े तमाम रिकौर्ड अपने संग्रह में जुटाए हैं. ब्रिटेन के बटारसी में रहने वाली 24 वर्षीय इमा किरबी डिज्नीलैंड की परियों की तरह दिखना चाहती है, आज से नहीं बचपन से. इस के लिए वह अपनी ड्रेसेज पर मोटी रकम खर्च करती है. उसे इस रूप में देख कर कौन, कैसे, क्या रिएक्ट करता है, इस की उसे कोई परवाह नहीं. बस, वह खुद को बहुत स्पैशल महसूस करती है. साथ ही ऐसा कर के उसे अपने आसपास की दुनिया मैजिकल लगती है.

दरअसल, इमा जब 3 साल की थी तभी फ्लोरिडा में डिज्नी वर्ल्ड की शुरुआत हुई थी. जब वह अपने परिवार के साथ डिज्नी वर्ल्ड घूमने गई तो वहां की मैजिकल दुनिया और परियों टिंकरबेल, स्लीपिंग ब्यूटी, रेपुंजल वगैरह को देख कर हैरत में रह गई. उस मासूम के मन में चाह उठी कि काश! वह भी उन्हीं परियों की तरह रहे. खास बात यह कि वह अपना यह सपना सालोंसाल पाले रही.इमा ने अपने बचपन के सपने को पूरा करने के लिए अपना बिजनैस शुरू किया.

नाम रखा वंस अपौन ए टाइम पार्टीज. इसी बिजनैस की बदौलत उस ने अपने बचपन के सपनों को हकीकत में बदला. इमा ने 30 बच्चों का ग्रुप बना रखा है. वह परी बन कर एक म्युजिकल इंस्ट्रूमेंट के संगीत के साथ डिज्नी फिल्मों के गाने गाती है. वह अपने इस कार्यक्रम से प्रत्येक 2 घंटे के अंदर 170 पाउंड कमाती है.इमा अपने इस कार्यक्रम के जरिए छोटेछोटे बच्चों को कुछ शानदार यादें देना चाहती है. वह खुद भी डिज्नी की कहानी और फिल्मों को बहुत पसंद करती है. इमा का कहना है कि लोग भले ही उस के कार्यक्रम का मजाक बनाते हों, लेकिन बच्चे उसे परी मानते हैं और हाथ हिला कर हाय बोलते हैं.

इमा को परियों की कहानियां बहुत पसंद हैं. इसलिए परी जैसी दिखने के लिए वह सुबहशाम परियों जैसी ड्रेस पहनती है. खासकर टिंकरबेल, स्लीपिंग ब्यूटी और रेपुंजल की ड्रेस. परियों की ड्रेस पहन कर वह बाहर भी घूमती है.

 

Love Story : बड़ी भाभी का दीवाना देवर 

Love Story : भोपाल से 35 किलोमीटर दूर बैरसिया तहसील हमेशा से अनदेखी का शिकार रही है, जिस का फर्क यहां की जिंदगी पर भी पड़ा है. इस इलाके के पिछड़ेपन के चलते यहां अपराध की दर उम्मीद से ज्यादा है. जंगलों से घिरे बैरसिया के बाहरी इलाकों में आए दिन हत्या की वारदातें होती रहती हैं.

ऐसी ही एक वारदात बीती 26 नवंबर को हुई थी. उन दिनों पूरे मध्यप्रदेश की तरह इस क्षेत्र में भी चुनावी चर्चा और गतिविधियां शवाब पर थीं. चुनाव के वक्त पुलिस वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता. उस रात करीब 12 बजे नजीराबाद थाने के इंचार्ज योगेंद्र परमार थाने में बैठे कामकाज निपटा रहे थे कि तभी अधेड़ उम्र के एक शख्स ने थाने में कदम रखा. इतनी रात गए जो भी थाने आता है वह कोई बुरी खबर ही लाता है, यह बात योगेंद्र परमार जानते थे. वह उस व्यक्ति के चेहरे की बदहवासी देख कर ही समझ गए कि जो भी होगी, अच्छी खबर नहीं होगी. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि खबर हत्या की होगी.

आगंतुक ने अपना नाम लक्ष्मण सिंह गुर्जर, निवासी चंद्रपुर गांव बताया. लक्ष्मण सिंह ने आते ही परमार को बताया कि उस के भाई सोनाथ सिंह की हत्या हो गई है और उस की लाश गांव में उस के घर पर पड़ी है. योगेंद्र परमार ने बिना वक्त गंवाए टेबिल पर बिखरे पड़े कागजात समेटे और लक्ष्मण सिंह के साथ चंद्रपुर गांव की रवानगी डाल दी. उन्होंने कुछ सिपाही भी साथ ले लिए थे. जातेजाते उन्होंने थाना क्षेत्र में हुई हत्या की खबर एसडीपीओ संजीव कुमार सिंह को भी दे दी.

घटनास्थल गांव के कोने का एक मकान था, जहां एक कमरे में 40 वर्षीय सोनाथ सिंह की लाश पड़ी थी. लाश के आसपास काफी मात्रा में खून फैला था. पहली नजर में ही समझ आ रहा था कि हत्या पूरी बेरहमी से की गई है, क्योंकि सोनाथ सिंह की गर्दन पर धारदार हथियार के आधा दर्जन से भी ज्यादा जख्म दिख रहे थे. अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये निशान कुल्हाड़ी या फरसे के हैं, जिन का गांवों में अकसर इस्तेमाल होता है.

लाश पर भरपूर नजर डाल कर योगेंद्र परमार ने जब लक्ष्मण सिंह से हत्या के बारे में पूछा तो उस ने कुछ बातें चौंका देने वाली बताईं, जिस से योगेंद्र परमार समझ गए कि मामला जर, जोरू और जमीन में से जोरू का है. बकौल लक्ष्मण सिंह जब वह खेत में पानी दे कर घर लौट रहा था तो उस ने गांव के बाहर अपनी भाभी भूलीबाई को भागते हुए देखा था. इतनी रात गए भाभी, भतीजी को ले कर कहां जा रही है, इस बात से चौंके लक्ष्मण सिंह ने भूलीबाई को रोक कर जब उस से बात करनी चाही तो बजाए रुकने के उस ने अपने कदमों की गति और बढ़ा दी.

लक्ष्मण सिंह ही नहीं, यह बात पूरा गांव जानता था कि भूलीबाई और सोनाथ सिंह में आए दिन लड़ाईझगड़ा होता रहता है. इसलिए उस ने यह अंदाजा लगाया कि दोनों में किसी बात पर चिकचिक हुई होगी. इसलिए भाभी यूं घर छोड़ जा रही है. पास के ही गांव कढ़ैया में उस का मायका था. आखिर हुआ क्या, यह जानने के लिए लक्ष्मण सिंह सोनाथ सिंह के घर पहुंचा तो वहां उस का सामना भाई की लाश से हुआ. इस के बाद यह खबर देने के लिए वह थाने जा पहुंचा था.

पति की हत्या पर भूलीबाई ने कोई शोरशराबा नहीं मचाया था और न ही किसी से मदद की गुहार लगाई थी. यह बात ही उसे शक के कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी थी. लेकिन अंदाजे की बिना पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना समझदारी नहीं थी, इसलिए योगेंद्र परमार ने तुरंत पुलिस टीम भेज कर भूलीबाई को थाने बुलवा लिया.

भूलीबाई के थाने आने से पहले की गई पूछताछ में पुलिस वालों को कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी थी, सिवाय इस के कि मांगीलाल ने अपनी जमीन दोनों बेटों में बराबर बांट दी थी. लेकिन जमीन इतनी नहीं थी कि उस से किसी एक परिवार का भी गुजारा हो पाता इसलिए सोनाथ सिंह रोजगार की तलाश में बाहर चला गया था. लेकिन साल में कुछ दिनों के लिए वह गांव जरूर आता था. उस की गैरमौजूदगी में भूलीबाई खेतीकिसानी संभालती थी. दोनों बच्चों में से बेटे को उस ने अपने मायके में छोड़ रखा था.

इन जानकारियों से एक कहानी तो आकार लेती दिख रही थी, जिस में भूलीबाई का रोल अहम था. लेकिन पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी. ऐसे में भूलीबाई के बयान ही सोनाथ सिंह की हत्या पर पड़ा परदा उठा सकते थे. थाने आ कर अच्छेअच्छे मुलजिमों के हौसले पस्त पड़ जाते हैं, फिर भूलीबाई की क्या बिसात थी. लेकिन इस के बाद भी वह अनाडि़यों की तरह ही सही पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही.

पहले तो उस ने अपने देवर लक्ष्मण सिंह को ही फंसाने की गरज से यह बयान दे डाला कि जमीन जायदाद के लालच में उस ने सोनाथ की हत्या की है. साथ ही यह भी कि इस में उस के अलावा और लोग भी शामिल हैं. ये और लोग कौन हैं, इस सवाल पर वह चुप रही. बात यहां तक तो सच लग रही थी कि सोनाथ सिंह की हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल हैं, क्योंकि एक हट्टेकट्टे मर्द को काबू करना आसान बात नहीं थी. दूसरे घटनास्थल पर किसी तरह के संघर्ष के निशान भी नजर नहीं आ रहे थे, इस का सीधा सा मतलब यह निकल रहा था कि पहले सोनाथ को काबू किया गया, फिर उस पर धारदार हथियार से प्रहार किए गए.

जाहिर था, हत्या अगर भूलीबाई ने की थी तो कोई न कोई उस का संगीसाथी रहा होगा. लक्ष्मण सिंह पर शक करने की कोई वजह पुलिस वालों को समझ नहीं आ रही थी, क्योंकि वह कोई कहानी गढ़ता या झूठ बोलता नहीं लग रहा था. उलट इस के भूलीबाई अपने बयानों में गड़बड़ा रही थी. पुलिस ने जब सख्ती दिखाई तो कुछ ही देर में उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि सोनाथ सिंह उस के चालचलन पर शक करता और मारतापीटता था, इसलिए उस ने पति की हत्या कर दी.

लेकिन भूलीबाई ने पूरी बात अभी भी नहीं बताई थी. यह तो कोई बच्चा भी कह सकता था कि एक अकेली औरत धारदार हथियार से लगातार इतने वार, वे भी सोनाथ जैसे तगड़े मर्द पर, नहीं कर सकती थी. अब पुलिस को उस के और टूटने का इंतजार था, जिस से कत्ल की इस वारदात का पूरा सच सामने आ जाए. सोनाथ सिंह की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई थी. दूसरी कानूनी औपचारिकताएं भी पुलिस वालों ने पूरी कर ली थीं. सुबह होतेहोते सोनाथ की हत्या की खबर पूरे इलाके में फैल चुकी थी. लोग चुनावी चर्चा छोड़ तरहतरह की बातें करने लगे थे.

भरेपूरे बदन की भूलीबाई को देख कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह 2 बच्चों की मां है. 35 की उम्र में खासी जवान दिखने वाली भूलीबाई ने आखिरकार पति की हत्या क्यों की होगी, यह राज भी सुबह का सूरज उगने से पहले उस ने उगल ही दिया. पता चला कि इस वारदात में उस का चचेरा देवर प्रेम सिंह और उस का एक दोस्त पन्नालाल भी शामिल थे. नाजायज संबंध का जो शक किया जा रहा था, वह सच निकला. हुआ यूं था कि उम्र में आधा रिश्ते का देवर प्रेमसिंह भूलीबाई को दिल दे बैठा था. आजकल हर हाथ में मोबाइल है, जिस का उपयोग प्रेमसिंह जैसे नौजवान पोर्न फिल्में देखने में ज्यादा करते हैं.

दिनरात ऐसी ही अश्लील और सैक्सी वीडियो के समंदर में डूबे प्रेमसिंह को औरत की तलब लगने लगी थी, पर प्यास मिटाने का जरिया उसे नजर नहीं आ रहा था. हालांकि गांव में लड़कियों की कमी नहीं थी, लेकिन पिछड़ेपन के चलते और प्राइवेसी न होने के कारण किसी को पटा पाना आसान काम नहीं था. इन दिनों गांवों में निकम्मे और अय्याश किस्म के नौजवानों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. उन में से एक प्रेमसिंह का दोस्त पन्नालाल भी था.

एक दिन प्रेमसिंह ने जब अपनी जरूरत पन्नालाल को खुल कर बताई तो वह हंस कर बोला, ‘‘लो, बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा.’’

इशारे में कही इस बात को प्रेमसिंह समझ नहीं पाया. लेकिन उम्मीद की एक किरण तो उसे बंधी थी कि पन्नालाल खेला खाया आदमी है, जो उस के लिए जरूर किसी औरत का इंतजाम कर देगा. जल्द ही दारूमुर्गे की एक दावत हुई, जिस में पन्नालाल ने खुल कर उस से कहा कि तू अपनी भाभी भूलीबाई पर लाइन मार, काम बन जाएगा. बात का खुलासा करते हुए पन्नालाल ने उस की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक वजहें भी बताईं. मसलन, तेरा चचेरा भाई साल भर बाहर रहता है, ऐसे में भूलीबाई को मर्द की जरूरत तो पड़ती ही होगी. भूलीबाई किसी को घास नहीं डालती, लेकिन तू ट्राई करेगा तो बात बन भी सकती है.

बात प्रेमसिंह की समझ में आ गई और उस रात वह सो नहीं पाया. रातभर ख्वाबों खयालों में वह भूलीबाई को उसी तरह लपेटे सैक्स करता रहा, जैसा कि पोर्न वीडियो में वह देखता था. इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए प्रेमसिंह अकसर भूलीबाई के घर जा कर बैठने लगा. यह बात भी उसे समझ आ गई थी कि जल्दबाजी, बेसब्री और हड़बड़ाहट दिखाने से बात बिगड़ भी सकती है, इसलिए पहले औरत का दिल जीतो, फिर जिस्म तो वह खुद ही सौंप देती है.

इसी आनेजाने में वह रोज भूलीबाई के अंगों और उभारों को देखता था तो पागल सा हो जाता था. लेकिन प्रेमसिंह मौके की तलाश में था और दिल जीतने की राह पर चल रहा था. छोटे मोटे कामों में वह अपनी भाभी की मदद करने लगा था. यहां तक कि वह पैसा खर्च करने में भी नहीं हिचकता था. अच्छी बात यह थी कि उस पर कोई शक नहीं करता था, क्योंकि वह था तो परिवार के सदस्य सरीखा ही.

भूलीबाई को भी अब समझ आने लगा था कि जिस देवर को शादी के बाद उस ने गोद में खिलाया था, वह कौन सा खेल खेलने की जुगत में आता जाता है. जल्द ही उस की झिझक दूर होने लगी और पन्नालाल की यह सलाह साकार होती दिखने लगी कि एक बार भी सैक्स का लुत्फ उठा चुकी औरत सैक्स के बगैर ज्यादा दिन नहीं रह सकती. अब दिक्कत यह थी कि प्रेमसिंह पहल कैसे करे. भूलीबाई उस की द्विअर्थी बातों पर हंस कर उसे शह देने लगी थी और इशारों में यदाकदा हल्कीफुल्की सैक्स की बातें भी कर लेती थी. लेकिन प्रेमसिंह को डर इस बात का था कि कहीं ऐसा न हो कि वह पहल करे और भाभी झिड़क दे. डर इस बात का भी था कि भूलीबाई ने अगर घर में शिकायत कर दी तो उस की खासी पिटाई होगी.

लेकिन जिस राह पर दोनों चल पडे़ थे, उस में बहाना खुद चाहने वालों को नजदीक लाने का मौका ढूंढ लेता है. एक दिन यूं ही बातोंबातों में प्रेमसिंह ने डरतेडरते भूलीबाई को एक पोर्न फिल्म दिखा डाली तो भूलीबाई की भी कनपटियां गर्म हो उठीं. इस फिल्म में वह सब बल्कि उस से भी ज्यादा मौजूद था, जो वह सोचती रहती थी. बस फिर क्या था, एक दिन झिझक की दीवार टूटी तो दोनों बेशर्मी के समंदर में गोता लगा बैठे.

अब यह रोजरोज का काम हो चला था. कोई रोकटोक न होने से दोनों सैक्स का यह खेल आए दिन खेलने लगे. प्रेमसिंह ने भूलीबाई पर वे सारे टिप्स और तौरतरीके आजमा डाले जो पोर्न फिल्मों में दिखाए जाते हैं. मुद्दत से संसर्ग के लिए तरस रही भूलीबाई के लिए कुछ अनुभव एकदम नए और रोमांचक थे. भूलीबाई के पास पुराना तजुर्बा था और प्रेमसिंह के पास नया जोश. सैक्स के दरिया में दोनों ऐसे डूबे कि उन्हें इस बात का भी होश नहीं रहा कि जो वे कर रहे हैं वह गैरकानूनी न सही लेकिन खतरनाक तो है.

हर साल की तरह बीती दीवाली पर भी सोनाथ सिंह गांव आया. लेकिन जब उस ने यह बताया कि इस बार वह 4-6 दिन नहीं बल्कि महीने भर से भी ज्यादा रुकेगा, तो भूलीबाई बजाय खुश होने के इस गम में डूब गई कि जब तक सोनाथ रुकेगा तब तक वह अपने किशोर प्रेमी से सैक्स का लुत्फ नहीं उठा पाएगी. यही हाल प्रेमसिंह का था, जो अब एक दिन भी भूलीबाई के बगैर नहीं रह पाता था. वह मन ही मन भूलीबाई भाभी से प्यार भी करने लगा था. यह बेमेल प्यार भले ही शरीर की जरूरत भर था, जिसे वह खुद नहीं समझ पा रहा था.

सोनाथ ने ज्यादा दिन रुकने का फैसला बेवजह नहीं लिया था, बल्कि उसे भूलीबाई पर शक हो चला था. इस की पहली वजह तो यह थी कि भूलीबाई अब पहले की तरह सैक्स के लिए उतावली नहीं होती थी और दूसरी वजह वे बातें थीं जो उस ने उड़ते उड़ते सुनी थीं. सोनाथ के पास अपने शक को ले कर कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए वह गुपचुप भूलीबाई की निगरानी करने लगा. फिर एक दिन उस ने भूलीबाई और प्रेमसिंह को नग्नावस्था में रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. बात आई गई नहीं हुई, बल्कि सोनाथ को अब गांव के लोगों की कही पुरानी कहावत याद आने लगी कि खेती खुद न करो तो जमीन कोई और जोतने लगता है. यही बात औरत पर भी लागू होती है.

पत्नी की इस चरित्रहीनता को न तो वह पेट में पचाए रख सकता था और न ही सार्वजनिक कर सकता था, क्योंकि इस से जगहंसाई उस की ही होनी थी. ठंडे दिमाग से विचार करने पर उस ने अब गांव में ही रहने का फैसला कर लिया, इस से भूलीबाई और प्रेमसिंह दोनों परेशान हो उठे, जिन्हें एकदूसरे का चस्का लग चुका था. यही लत उन्हें चोरी छिपे मिलने के लिए उकसाने लगी. सोनाथ ने पत्नी से पहले ही कह दिया था कि अब अगर वह प्रेमसिंह से मिली तो खैर नहीं.

पर वह यह भूल रहा था कि खैर तो अब उस की नहीं थी. एक दिन उस ने भूलीबाई को फोन पर बात करते पकड़ लिया, तो उस की खासी धुनाई कर डाली. यह बात जब प्रेमसिंह को पता चली तो उस का खून खौल उठा. अपने इकलौते इश्किया सलाहकार पन्नालाल को उस ने बताया कि अब उस से भूलीबाई की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही है. दूसरे अगर सोनाथ भूलीबाई की पिटाई करे, यह उस से बरदाश्त नहीं हो रहा है. तैश में आ कर फिल्मी स्टाइल में उस ने सोनाथ के वे हाथ काट डालने की बात भी कह डाली, जो भूलीबाई पर उठे थे.

इस पर पन्नालाल ने बजाए समझाने के आग में घी डालते हुए कहा कि अकेले हाथ काटने से कुछ हासिल नहीं होगा, उलटे सोनाथ पुलिस में सारी बात बता देगा. अगर कांटे को जड़ से खत्म करना है तो सोनाथ की गरदन ही उड़ानी पड़ेगी.

बस फिर क्या था दोनों ने मिल कर सोनाथ के कत्ल की योजना बना डाली. दूसरी ओर वासना की आग में तड़प रही भूलीबाई भी उन का साथ देने तैयार हो गई. पन्नालाल ने प्रेमसिंह को यह भी मशविरा दिया कि सोनाथ के कत्ल के पहले वह जी भर कर भूलीबाई के जिस्म का सुख उठा ले, नहीं तो फिर 13 दिन मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि इस दौरान भूलीबाई शोक में होगी और उस के आसपास कोई न कोई बना रहेगा.

ये तमाम बातें इस ढंग से हुईं, इस्तेमाल  मानो इन्हें कत्ल नहीं करना बल्कि बकरी का बच्चा पकड़ना है. हादसे की रात सोनाथ सिंह के गहरी नींद सो जाने के बाद भूलीबाई ने घर का दरवाजा खोला और प्रेमसिंह को अंदर बुला लिया. पहले तो दोनों ने जी भर के जिस्मों की प्यास बुझाई और फिर पन्नालाल को बुला कर हमेशा के लिए सोनाथ की जिंदगी का चिराग बुझा डाला.

सो रहे सोनाथ पर प्रेमसिंह और पन्नालाल ने कुल्हाड़ी से वार किए. इस दौरान भूलीबाई ने पति के पैर पकड़ रखे थे, सोनाथ सिंह नींद में ही नीचे से ऊपर कब पहुंच गया, यह उसे भी पता नहीं चला. प्लान के मुताबिक भूलीबाई बेटी को गोद में उठा कर भागी, लेकिन इत्तफाकन लक्ष्मण ने उसे देख लिया और तीनों पकड़े गए. जो अब जेल में अपनी करनी की सजा भुगत रहे हैं. Love Story

Love Story : इश्क का दरवाजा

Love Story : अनैतिक रिश्ते को अधिक दिनों तक परदे में नहीं छिपाया जा सकता. इस से परदा हटते ही भूचाल आ जाता है. कई बार इस कारण आक्रोश की भड़की ज्वाला में जीवनलीला ही भस्म हो जाती है. ऐसा ही कानपुर के एक बैंककर्मी के साथ हुआ. अवैध संबंध में न केवल उस की जान गई, बल्कि 3 जिंदगियां भी तबाह हो गईं गु मशुदा विशाल अग्रवाल की लाश बरामद होने पर उन्नाव के दही थाने की पुलिस ने पहली जांच में ही उस के हत्या किए जाने की पुष्टि

कर दी थी. करीब 25 वर्षीय विशाल एक बैंककर्मी था, जिस की लाश जिले में शारदा नहर के किनारे झाडि़यों में लावारिस हालत में पड़े ड्रम से मिली थी. लाश को एक प्लास्टिक के ड्रम में ठूंस कर पैक किया गया था. ड्रम पुरवा मार्ग पर स्थित बंद पड़ी एलए आयरन फैक्ट्री से एक किलोमीटर दूर सराय करियान गांव के पास गुजरने वाली नहर के किनारे पड़ा था. ड्रम से दुर्गंध आने की सूचना ग्रामीणों ने पुलिस को दी थी. सूचना के आधार पर ही खेड़ा चौकीप्रभारी अंशुमान सिंह ने ड्रम को खुलवाया, जिस में से 25 वर्षीय युवक की रक्तरंजित लाश बरामद हुई.

वहीं पास में ही एक स्कूटी की चाबी भी मिली. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और उस की शिनाख्त के लिए जिले के सभी थानों में सूचना प्रसारित करवा दी. उन्हीं दिनों नौबस्ता थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह विशाल अग्रवाल नामक युवक की तलाशी कर रहे थे. उस के लापता होने की सूचना अंशुल अग्रवाल ने दर्ज करवाई थी. वह अंशुल का छोटा भाई था. नौबस्ता थानाप्रभारी को दही थानाक्षेत्र में एक युवक की लाश बरामद होने की सूचना मिली तो वह अंशुल को साथ ले कर उन्नाव के थाना दही जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उन्होंने चौकीप्रभारी अंशुमान सिंह से मुलाकात की. तब चौकीप्रभारी ने मोर्चरी ले जा कर बरामद लाश थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह और उन के साथ आए युवक अंशुल को दिखाई. अंशुल ने उस लाश की शिनाख्त अपने छोटे भाई विशाल अग्रवाल के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद थानाप्रभारी नौबस्ता लौट आए. उन्होंने सब से पहले गुमशुदगी के मामले को हत्या में तरमीम कराया फिर वह हत्यारे की तलाश में जुट गए. उन्होंने पहले मृतक के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस का मोबाइल 7 सितंबर को रात 10 बजे के बाद स्विच्ड औफ हो गया था. उस मोबाइल से अंतिम बातचीत 8 बज कर 50 मिनट पर हुई थी, जबकि साढ़े 8 बजे उस पर एक मिस्ड काल भी आई थी. जांच का सिलसिला मोबाइल से मिली कुछ जानकारियों के साथ शुरू किया गया.

जिस नंबर से विशाल के मोबाइल पर काल की गई थी, वह नंबर सत्यम ओमर नाम के व्यक्ति का था. सत्यम कानपुर निवासी अनिल ओमर का बेटा था. पुलिस द्वारा उस मोबाइल नंबर पर काल की गई तो वह बंद मिला. फिर पुलिस ने नंबर से मिले पते पर दबिश दी, किंतु वहां सत्यम नहीं मिला. सिर्फ इतना मालूम हुआ कि वह इस पते पर ढाई साल पहले रहता था. हालांकि जल्द ही थानाप्रभारी को मुखबिरों से सत्यम के नए पते की जानकारी मिल गई. पता चला कि वह अब रामनारायण बाजार स्थित फ्लैट में रहता है. पुलिस को मुखबिर से उस के उस फ्लैट में उपस्थित रहने के समय का भी पता लग गया.

इस सूचना के आधार पर थानाप्रभारी ने क्राइम ब्रांच इंसपेक्टर छत्रपाल सिंह, उस्मानपुर चौकीइंचार्ज प्रमोद कुमार, बसंत विहार चौकीइंचार्ज मनीष कुमार, एसआई रवींद्र कुमार, हैडकांस्टेबल अरविंद सिंह, सुरेंद्र सिंह, दीपू भारतीय, राजीव यादव, कांस्टेबल सौरभ पाडेय, महिला सिपाही पल्लवी के साथ उक्त फ्लैट पर दबिश दी. उस समय फ्लैट से 2 युवक सीढि़यों से उतर रहे थे. पुलिसकर्मियों को देखते ही दोनों भागने लगे, लेकिन वे पकड़ लिए गए. पुलिस दोनों को ले कर उस फ्लैट में गई. उन से पूछताछ करने पर एक युवक ने अपना नाम सत्यम ओमर, जबकि दूसरे ने सरवन बताया. वहीं 16-17 साल की एक लड़की भी मौजूद थी. उस ने पुलिस को बताया कि वह सत्यम की मौसेरी बहन है और पास ही दूसरे मकान में रहती है. उस का नाम राधा (परिवर्तित) था.

उन से पूछताछ के बाद पुलिस ने फ्लैट के बारीकी से निरीक्षण में पाया कि कमरे की दीवारों को जगहजगह खुरचा गया है. इस का कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि डिस्टेंपर करवाना है. यह बात पुलिस को हजम नहीं हुई, क्योंकि वहां डिस्टेंपर के लिए किसी तरह के इंतजाम कहीं नहीं दिखा. दीवारों पर खुरचने के निशान भी जहांतहां मिले. उस बारे में सभी ने हिचकिचाट के साथ बताया. थानाप्रभारी ने राधा के चेहरे पर भी गौर किया, जिस का रंग अचानक तब फीका पड़ गया था, जब उन्होंने कहा कि वे विशाल अग्रवाल की हत्या के सिलसिले में पूछताछ करने आए हैं. इस में उस ने साथ नहीं दिया तो वह भी मुश्किल में पड़ जाएगी. इसी के साथ थानाप्रभारी दोनों युवकों को विशेष पूछताछ के लिए थाने ले आए. उन्होंने सत्यम से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने 7 सितंबर की शाम साढ़े 8 बजे विशाल को मिस्ड काल क्यों की थी?’’

इस का जवाब देते हुए सत्यम हकबकाता हुआ बोला, ‘‘वह नंबर मैं नहीं, मेरी मौसेरी बहन इस्तेमाल करती है. उसी से पूछना होगा.’’

‘‘वह विशाल को कैसे जानती है?’’ सिंह ने सवाल किया.

‘‘मुझे नहीं मालूम,’’ सत्यम बोला.

उस के बाद थानाप्रभारी को उस की मौसेरी बहन राधा भी संदिग्ध लगी. उन्होंने उसे भी तुरंत थाने बुलाया और पूछताछ शुरू की. उस से फोन काल के बारे में नहीं पूछा, बल्कि सीधे लहजे में पूछ लिया कि विशाल से उस के क्या संबंध थे. यह सवाल सुन कर सामने बैठे अपने भाई और उस के दोस्त सरवन को देख कर घबरा गई. उस के कुछ बोलने से पहले ही थानाप्रभारी ने समझाया, ‘‘तुम्हारे विशाल से जो भी संबंध रहे, वे उस की मौत के साथ खत्म हो गए. तुम्हारे भाई ने भी मुझे कई बातें बताई हैं, जिस से तुम पर भी उस की हत्या में साथ देने का शक है. मुझे पता है कि विशाल ने तुम्हारे मिस्ड काल के थोड़ी देर बाद फोन किया था. तुम सिर्फ इतना बता दो कि उस से तुम्हारी क्या बात हुई थी.’’

यह सुन कर राधा कभी पुलिस को देखती, तो कभी इधरउधर देखने के बहाने से सत्यम को देखने लगती. वह यह सोच कर भीतर से डर गई कि लगता है सरवन ने पुलिस को सब कुछ बता दिया. कुछ सेकेंड बाद सिंह ने फिर सवाल किया, ‘‘बताया नहीं, तुम्हारे विशाल से क्या संबंध थे?’’

‘‘सर, मैं उसे प्यार करती थी,’’ राधा धीमी आवाज में बोली.

‘‘इस का सत्यम को पता था?’’ सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ राधा बोली.

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं डर गई थी.’’

‘‘भाई से डर कर कुछ नहीं बताया था या फिर कुछ और बात है?’’

‘‘सर, मैं भाई से डरती थी, इसलिए नहीं बताया.’’ राधा बोली.

‘‘अच्छा चलो, अब यह बता दो कि 7 सितंबर की शाम को तुम्हारी विशाल से क्या बात हुई थी?’’

अलगअलग तरह से बदले हुए सवालों को सुन कर राधा पसीनेपसीने हो गई थी, दुपट्टे से पसीना पोछती हुई बोली, ‘‘उस से मिलना चाहती थी.’’

‘‘वह भी रात में! मिलने के लिए कहां बुलाया था?’’ सिंह ने पूछा.

‘‘भाई के फ्लैट पर,’’ राधा ने बताया.

‘‘क्यों, क्या उसे भाई से मिलवाना था? लेकिन भाई तो बोला कि वह उस दिन कहीं गया हुआ था. घर पर था ही नहीं.’’ थानाप्रभारी के सवालों से राधा खुद को घिरा महसूस करने लगी. कुछ भी नहीं बोल पाई. बीच में सत्यम कुछ बोलने को हुआ, तब थानाप्रभारी ने उसे डपट दिया. उस के बाद राधा रोने लगी. थानाप्रभारी ने तुरंत महिला सिपाही को एक गिलास पानी लाने के लिए कहा और खुद उठ कर अलमारी खोलने लगे. महिला सिपाही से पानी पीने के बाद सिंह एक बार फिर बोले, ‘‘सचसच बताओ, 7 सितंबर को तुम्हारे और विशाल के साथ क्याक्या हुआ? अभी मैं तुम से प्यार से पूछ रहा हूं, लेकिन मुझे सच्चाई बाहर निकलवाना भी आता है. देखो उसे, जिस ने तुम्हें पानी पिलाया है, वही तुम्हारे मुंह में अंगुली डाल कर सारी बातें भी निकलवा लेगी.’’ यह कहते हुए थानाप्रभारी ने सत्यम और सरवन को दूसरे कमरे में भेज दिया.

अब तक पुलिस दबाव में आ कर राधा पूरी तरह से टूट गई थी. उस ने विशाल के साथ अपने अवैध संबंध को स्वीकार करते हुए 7 सितंबर की पूरी घटना बता दी. फिर क्या था, जो बातें थानाप्रभारी ने सत्यम और सरवन से भी नहीं पूछी थीं और उन पर विशाल की हत्या का सिर्फ संदेह था, उस की पुष्टि राधा ने ही कर दी. थानाप्रभारी के लिए राधा द्वारा दी गई जानकारी बेहद महत्त्वपूर्ण थी. वह मुसकराए और राधा को महिला सिपाही के साथ बैठा कर सत्यम व सरवन के पास जा पहुंचे. उन से भी उन्होंने विशाल अग्रवाल की हत्या के संबंध में घुमाफिरा कर कई सवाल पूछे.

कुछ सवाल उन्होंने हवा में तीर की तरह चलाए. जबकि कुछ सवालों के साथ सबूत होने के दावे और राधा द्वारा बताए जाने की बातें कह कर उन्हें उलझा दिया. नतीजा यह हुआ कि सत्यम और सरवन भी टूट गए और उन्होंने विशाल हत्याकांड से ले कर उस की लाश को ठिकाने लगाने तक की बात बता दी. राधा, सरवन और सत्यम के द्वारा जुर्म स्वीकार किए जाने के बाद सरवन ने विशाल के शव को फेंकने का खुलासा कर दिया. इस तरह राधा ने विशाल के साथ अनैतिक संबंध बनाते हुए रंगेहाथों पकड़े जाने से ले कर उस की हत्या संबंधी साक्ष्य मिटाने का जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने साक्ष्य को मजबूत बनाने के लिए राधा का वैजाइनल टेस्ट करवाया. साथ ही आरोपियों की निशानदेही पर विशाल अग्रवाल की स्कूटी, लैपटाप तथा हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली. य्याशी के चक्कर में जान गंवाने वाले बैंककर्मी विशाल की प्रेम कहानी इस प्रकार सामने आई—

उत्तर प्रदेश जिला कानपुर के थाना नौबस्ता अंतर्गत संजय नगर कालोनी मछिरिया में विष्णु प्रसाद अग्रवाल के 2 बेटे अंशुल (26 वर्ष) औरविशाल (25 वर्ष) के अलावा बेटी दिव्या (23 वर्ष) थी. इन में से विशाल कुंवारा था. वह भी अपने भाई अंशुल की तरह ही  बैंक मैनेजर था और मातापिता के साथ ही रहता था. स्वभाव से वह आशिक मिजाज था. जल्द ही किसी लड़की के पीछे पड़ जाता था. आकर्षक और सैक्स अपील होने के कारण कोई भी लड़की पहली ही नजर में उस की ओर आकर्षित हो जाती थी. उस के दिलफेंक होने के कारण ही वह किसी के साथ भी यौन संबंध बनाने से परहेज नहीं करता था. उस ने मौका पा कर राधा को भी अपने प्रेमजाल में फंसा लिया था. उसे शादी के सपने दिखाते हुए ऐशोआराम की जिंदगी देने के वादे किए थे. राधा भी उस के प्रेम में फंस चुकी थी.

सत्यम ओमर अपने मातापिता के साथ पहले माहेश्वरी मोहाल में रहता था. बाद में उन के देहांत के बाद वह घंटाघर स्थित अपने मामा के यहां रहने लगा था. हालांकि 6 साल पहले उस के मामा की भी मृत्यु हो गई थी. उस की मामी अपने मायके में रहती थी, जिस कारण उस ने घंटाघर में ही एक फ्लैट किराए पर ले लिया था. वहीं विशाल अग्रवाल भी आताजाता था. बताते हैं कि वहां दोनों के एक बैंक में इंश्योरेंस का काम करने वाली युवती के साथ अवैध संबंध हो गए थे. विशाल और सत्यम के लिए वह युवती केवल मौजमस्ती का साधन भर थी. दोनों बदले में युवती को कुछ पैसे या गिफ्ट दे दिया करते थे.

वह फ्लैट सत्यम और विशाल के लिए मौजमस्ती का अड्डा बन कर रह गया था. कई बार वहां सरवन के साथ भी बैठकें होती थीं और पार्टी का दौर चलता था. उस फ्लैट पर एक और लड़की राधा का भी अकसर आनाजाना लगा रहता था. वह वहां बेधड़क आती थी और अधिकार के साथ कुछ समय वहां गुजार कर चली जाती थी. हालांकि वह दूसरे मोहल्ल्ले मनीराम बगिया में रहती थी. वास्तव में वह सत्यम की मौसेरी बहन थी. सत्यम ने एक चाबी राधा को भी दे रखी थी. वहीं करीब 2 साल पहले एक बार उस की विशाल से मुलाकात हो गई थी. पहली नजर में ही दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे.

विशाल राधा की खिलती किशोरावस्था को देख कर हतप्रभ रह गया था, जबकि राधा उस की बातें और माचो बदन की दीवानी बन गई थी. उस के बाद से विशाल और राधा अकसर साथसाथ घूमनेफिरने लगे थे, लेकिन दोनों सत्यम की नजरों से बच कर भी रहते थे. वे नहीं चाहते थे कि उन के प्रेम संबंध के बारे में सत्यम को कोई जानकारी हो. जल्द ही विशाल ने मौका पा कर राधा से शारीरिक संबंध भी बना लिए. राधा की भी उस में स्वीकृति मिल गई थी. सत्यम की गैरमौजूदगी में राधा विशाल को उसी फ्लैट पर बुला लेती थी.  7 सितंबर, 2021 को सत्यम ओमर ने राधा को फोन पर बताया था कि वह आज वहां नहीं आएगा. बाहर बालकनी में उस के कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें अलमारी में रख दे. किचन और दूसरे कमरे के बिखरे सामान आ कर ठीक कर दे.

अपने भाई की बातों पर अमल करते हुए राधा ने अपने प्रेमी विशाल के साथ मौज करने की भी योजना बना ली. उस ने तुरंत फोन कर इस की सूचना विशाल को दी और शाम को खानेपीने का सामान ले कर फ्लैट पर आने को कहा. शाम होने से पहले वह फ्लैट पर चली गई, किचन और कमरे को दुरुस्त किया. तब तक शाम के साढ़े 8 बज चुके थे. अब तक विशाल को आ जाना चाहिए था, क्योंकि उस ने 8 बजे तक आने को कहा था. देर होने पर राधा ने विशाल को फोन किया, जिसे विशाल ने रिसीव नहीं किया. करीब 20 मिनट बाद विशाल ने फोन कर राधा को बताया कि वह पहुंचने वाला है. और फिर वह ठीक 9 बजे फ्लैट पर पहुंच गया. वहीं अपार्टमेंट की पार्किंग में उस ने अपनी स्कूटी भी लगा दी.

राधा उस का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही वह उस के गले लग गई. दोनों अकेले में कई हफ्तों बाद मिले थे. इस मौके को किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहते थे. राधा के लिए पूरी रात थी. विशाल भी खानेपीने के सामान के साथ आया था. दोनों बेफिक्र थे. मौजमस्ती के लिए पूरी तरह से तैयार और तत्पर भी थे. इसी तत्परता में उन से एक भूल हो गई. मुख्य दरवाजे की अंदर से कुंडी लगाना भूल गए. वे बैडरूम में थे. ड्राइंगरूम की ओर उन का जरा भी ध्यान नहीं था.

दोनों एकदूसरे पर प्यार की बौछार करते हुए कब यौनाचार में लीन हो गए, पता ही नहीं चला. दूसरी ओर वाटर प्लांट में काम समाप्त हो जाने पर सत्यम फ्लैट पर अचानक आ गया. फ्लैट का दरवाजा खुला होने पर वह सीधे ड्राइंगरूम में दाखिल हुआ. बैडरूम में रोशनी देख कर चौंक गया और वहां जा कर दरवाजे पर लगे परदे को हटाया. बैड पर अपनी बहन राधा के साथ विशाल को लिपटा देख सन्न रह गया. वे दोनों आंखें मूंदे इतने बेफिक्र थे कि सत्यम के दरवाजे पर आने की जरा भी आहट नहीं हुई. गुस्से की ज्वाला को दबाए सत्यम चुपचाप फ्लैट के नीचे आया.

नीचे से लोहे की रौड निकाली और ऊपर पहुंच कर राधा के आलिंगन में बंधे विशाल के सिर पर दे मारी. एक ही वार में सिर से खून बहने लगा. राधा अपनी जान बचाते हुए दूसरे कमरे में भागी. गुस्से में सत्यम ने विशाल के सिर पर दनादन 3-4 और वार कर दिए. सिर पर ताबड़तोड़ वार से विशाल की वहीं मौत हो गई. राधा के सामने ही विशाल की मौत हो गई थी, लेकिन वह डर गई थी कि कहीं सत्यम उसे भी न मार डाले. सत्यम ने डपटते हुए इस बारे में किसी को बताने की उसे सख्त हिदायत दे दी. उसे जल्दी से दीवार पर लगे खून के दाग मिटाने को कहा. उस के बाद तुरंत अपने दोस्त सरवन को बुलाया.

सरवन भागाभागा आया. लाश देख कर उस के होश उड़ गए, लेकिन जल्द ही सामान्य होने पर लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. तब तक रात के साढ़े 11 बज गए थे. इसलिए सरवन योजना के अनुसार अगले रोज 8 सितंबर को प्लास्टिक का एक ड्रम खरीद लाया. उस में विशाल की लाश ठूंस कर पैक कर दी. ड्रम को उस पर लगी स्टील की स्ट्रिप से पैक कर दिया. उस के बाद ड्रम को विशाल की स्कूटी पर लादकर कैंट होते हुए जाजमऊ गंगापुल से दही थाने की खेड़ा चौकी क्षेत्र जा पहुंचे. उन्होंने ड्रम को नहर के पास झाडि़यों में फेंक दिया. साथ ही विशाल का मोबाइल फोन भी नहर में फेंक दिया. उस की स्कूटी से वापस कानपुर आ गए.

सत्यम ने विशाल की स्कूटी अपने यशोदा नगर स्थित प्लौट के पास पेड़ के नीचे खड़ी कर दी. जबकि उस के खून से सने कपड़ों को कूड़ाघर में फेंक आया. आरोपियों द्वारा अपना जुर्म स्वीकार कर लेने के बाद थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने आईपीसी की धारा 302/201/120बी के तहत हत्यारोपी सत्यम ओमर, सरवन किशोरी राधा को न्यायालय में पेश किया. वहां से सत्यम और सरवन को कानपुर के जिला कारागार भेज दिया गया, जबकि साक्ष्य छिपाने के आरोप में राधा को नारी निकेतन के सुरक्षा गृह में भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है तथा किशोरी राधा का नाम कल्पनिक है