Illicit Relationship: मामी से मोहब्बत

Illicit Relationship: लखनऊ के रेल कर्मचारी की हत्या का कारण उस का शराबी होना, गुस्सैल बने रहना या चालचलन था या फिर मामीभांजे के बीच नाजायज रिश्ते की नादानी. इन सब के अलावा एक सच्चाई यह भी थी कि मंजू अपने पति की बुरी आदतों से इतनी परेशान रहती थी कि…

मई, 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू की रिश्तेदारी में शादी थी. उस के सासससुर 24 मई, 2025 की रात को उसी शादी के लिए गए थे. पति ड्यूटी पर था. मंजू घर पर अकेली थी. शाम का वक्त था. इसी बीच एक कौल आ गई. स्क्रीन पर प्रेमी का नाम पढ़ कर उस के होंठों पर मुसकान बिखर गई. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली. कौल उस के प्रेमी आकाश वर्मा की थी, जो रिश्ते में उस का भांजा लगता था.

”हैलो! मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रही हूं. तुम उस का काम तमाम कर दो, बहुत दिन हो गए,’’ मंजू शिकायती लहजे में उस से बोली.

”मैं ने फोन किया न! …मुझे तुम से अधिक बेचैनी है…मैं चाहता हूं कि जितना जल्द हो, काम निपटा लिया जाए. मुझे तुम्हारे पति सिद्धि प्रसाद का काम तमाम हर हालत में करना है.’’ आकाश बोला.

”अब यह बताओ कि तुम कितनी देर में आ रहे हो?’’ मंजू का सीधा सवाल था.

”पहले यह बताओ कि घर का क्या हाल है?’’ उस ने सवाल का जवाब सवाल से ही किया.

”अकेली हूं. सभी लोग रिश्तेदार की शादी में गए हैं. तुम्हारा मामा ड्यूटी पर है… आधी रात को आएगा.’’ मंजू बोली.

”चलो ठीक है, मैं आ जाऊंगा, तुम दरवाजा खुला रखना,’’ कह कर आकाश ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रात गहराई. आकाश अपने दोस्त के साथ पूरी तैयारी के साथ प्रेमिका मंजू के घर आ गया. चुपके से घर में घुसने का इंतजाम मंजू पहले से ही कर चुकी थी. मंजू अपने कमरे में पति सिद्धि प्रसाद लोधी के साथ लेटी हुई थी, जबकि वह गहरी नींद में था. मंजू के घर में आने पर आकाश ने उस के इशारे पर अपने दोस्त के साथ कमरे में रखी प्लास्टिक की रस्सी से एक फंदा बना लिया. मंजू की मदद से फंदा गहरी नींद में सो रहे सिद्धि के गले में डाल दिया. दोनों ने मिल कर उस फंदे को कस दिया. थोड़ी देर सिद्धि प्रसाद छटपटाया, फिर शांत हो गया.

कुछ देर के बाद जब सिद्धि प्रसाद मरणासन्न हालत में पहुंच गया. वह जिंदा न बच जाए, इसलिए आकाश ने अपने दोस्त संजय के साथ उस के सिर पर हथौड़े से हमला कर दिया. उस वार से सिद्धि रक्तरंजित हो गया. लोहे के पाइप से भी उस के सिर पर कई हमले करने के बाद जब उस की मौत हो गई, तब आकाश ने अपने दोस्त की मदद से रात के अंधेरे में घर के पीछे एक तालाब के निकट सूखे गड्ïढे में उस की लाश फेंक दी. वह गड्ïढा झाडिय़ों की ओट में था. सिद्धि प्रसाद का मोबाइल, खून सने कपड़े भी वहीं झाडिय़ों में फेंक दिए.

25 मई, 2025 की सुबह लखनऊ-कानपुर रोड पर थाना बंथरा के एसएचओ राजेश कुमार सिंह को उसी थाने की पुलिस चौकी हरौनी के इंचार्ज एसआई अर्जुन राजपूत ने कौल कर बताया कि बीती रात सिद्धि प्रसाद लोधी नामक एक रेलकर्मी की हत्या हो गई है. उस की लाश उस के घर के ठीक पीछे तालाब के पास गड्ढे में पड़ी है. सिद्धि प्रसाद लोधी का घर दरियापुर मझरा गढ़ी चुनौटी में है. उस की लाश मिलने की सूचना पर चौकी इंचार्ज अरविंद कुमार एसआई श्यामजी मिश्रा, कांस्टेबल देवेंद्र कुमार के अलावा एसएचओ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. साथ ही इस की सूचना कृष्णा नगर के एसीपी विकास पांडेय को भी दे दी गई.

घटनास्थल पर उन के साथ एडिशनल डीसीपी अमित कुमावत भी घटनास्थल पर पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने सघन जांच के आदेश दिए. घटनास्थल पर मृतक की पत्नी मंजू देवी भी मौजूद थी. उसी ने अपने पति की हत्या की सूचना पुलिस को दी थी. मंजू रोरो कर पुलिस अधिकारियों को घटना के बारे में बताया, ”साहब, सुबह 6 बजे के करीब जब मैं सो कर उठी, तब पाया कि पति कमरे में नहीं हैं. इन्हें ढूंढते हुए मकान के बाहर निकल गई. घर के पीछे लगभग 50 मीटर दूर तालाब के पास झाडिय़ों में मुझे पति के कपड़े दिखाई दिए. पैंट और शर्ट वही थे, जो उन्होंने रात में पहने थे. पास ही पति औंधे मुंह पड़े थे.

”पास जा कर देखा तो देखते ही मेरे होश उड़ गए. मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई हो. पति के सिर पर गहरी चोट थी. काफी खून बह चुका था. वह एकदम से बेजान से थे. पति को इस हालत में देख कर ऐसा लगा, जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई.’’

घटनास्थल पर नहीं मिली खून की एक भी बूंद

पुलिस ने मंजू से प्रारंभिक पूछताछ के बाद शव की जांचपड़ताल की. एसएचओ के साथ आई पुलिस टीम ने उस की चप्पल, मोबाइल, शर्ट और पैंट पास से ही बरामद कर ली. जांच में घटनास्थल पर खून की एक बूंद भी नहीं थी, जबकि मृतक के सिर से काफी खून बह चुका था. इस से पुलिस ने सहज अनुमान लगा लिया कि इस की हत्या किसी दूसरी जगह पर करने के बाद हत्यारों ने लाश यहां ला कर फेंकी है. उन्होंने अनुमान लगाया कि हत्या करने वाले 2-3 लोग हो सकते हैं. शव की हालत देख कर पुलिस ने रात 2 और 3 बजे हत्या होने का अनुमान लगाया.

शव को ध्यान से देखने पर उस के सिर से खून बहने और गले में किसी चीज से कसाव के निशान का पता चला. एसीपी विकास पांडेय के सामने बंथरा थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की औपचारिकताएं पूरी कीं. आगे की प्रक्रिया के लिए मृतक की पत्नी मंजू देवी को थाने बुलाया गया. उस की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ सिद्धि प्रसाद लोधी की हत्या का मुकदमा धारा-103 बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया गया. मंजू देवी से जांच टीम की कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी ने पूछताछ की. साथ ही उस के घर जा कर भी तहकीकात की गई.

हरौनी के चौकीप्रभारी अर्जुन राजपूत, एसआई श्याम मिश्रा, अरविंद कुमार, संदीप सिंह और कांस्टेबल देवेंद्र के साथ देर रात तक ग्रामीणों से पूछताछ करते रहे. इस पूछताछ में हत्याकांड के संबंध में चौंकाने वाली बात सामने आई. पुलिस को विशेष सूत्रों से पता चला कि मंजू ने ही योजना बना कर अपने प्रेमी की मदद से पति की हत्या करवाई है. उस का प्रेमी आकाश वर्मा उर्फ लकी 25 साल का नवयुवक है और रिश्ते में उस के पति का भांजा है. वह जनपद लखनऊ के नरपतखेड़ा गांव का निवासी है. यह भी पता चला कि इस हत्याकांड में उस का दोस्त भी शामिल था.

आकाश वर्मा के संदिग्ध आरोपी होने की जानकारी मिलने पर पुलिस उसे घटना के एक हफ्ते बाद ही गिरफ्त में ले लिया. उसे बंथारा थाने लाया गया. खासकर उस के बारे में मंजू देवी को भनक तक नहीं लगने दी गई. पुलिस ने उस से सिद्धि प्रसाद की हत्या के बारे में कड़ाई से पूछताछ की. काफी समय तक आकाश वर्मा पुलिस को गुमराह करता रहा. सच उगलवाने के लिए आखिरकार पुलिस टीम ने उस पर थोड़ी सख्ती की. पुलिस के दबाव और पूछताछ के तरीके के आगे उस ने हार मान ली और सिद्धि प्रसाद की हत्या करने की बात कुबूल कर ली. उस ने यह भी बताया कि यह हत्या सिद्धि प्रसाद की पत्नी  मंजू देवी की शह पर की थी.

आकाश से पूछताछ पूरी होने के अगले दिन सुबहसुबह पुलिस मंजू देवी को थाने ले आई. जैसे ही उस की नजर थाने के हवालात में बंद आकाश वर्मा पर गई तो वह चौंक गई. उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. महिला कांस्टेबल मनीषा रावत और सावित्री देवी उसे पकड़ कर एक कोने में ले गईं. जोरदार लहजे में उस से सवाल किया, ”सचसच बता, तूने ही अपने पति की हत्या की है न?’’

दूसरी सिपाही उस की आंखों के आगे बेंत घुमाने लगी. मंजू सिपाहियों के तेवर देख कर सहम गई. उस की जुबान खुल ही नहीं रही थी. वह एकदम से निस्तब्ध थी. तभी डंडे घुमाती सिपाही कड़कती हुई बोली, ”मंजू, तू सचसच सब कुछ बताती है या मुझे कोई दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा..?’’

मंजू फिर भी कुछ नहीं बोली. दूसरी महिला सिपाही ने उस के ऊपर बेंत उठाया ही था कि मंजू बोल पड़ी, ”मुझे मारिए मत, मैं सारा सच बता दूंगी.’’

उस के बाद मंजू ने जो कहानी बताई, वह और भी चौंकाने वाली थी. उस की कहानी में पति की हत्या ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मर्यादा को लांघने की भी बात थी. उस का प्रेमी रिश्ते में पति का भांजा था. इस नाते उस के साथ मांबेटा समान मामीभांजे का रिश्ता था. आकाश और मंजू देवी के बीच लव अफेयर के साथ हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

सिद्धि प्रसाद कैसे बना शराब का लती

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के कानपुर रोड पर थाना बंथरा के अंतर्गत पुलिस चौकी हरौनी है. थाने से लगभग 12 किलोमीटर दूर बीहड़ जंगल का यह सुनसान इलाका भी है. यहीं दरियापुर गढ़ी चुनौटी नाम का गांव बसा हुआ है. सिद्धि प्रसाद लोधी अपनी फेमिली के साथ यहीं रहता था. सिद्धि प्रसाद की उम्र लगभग 40 वर्ष की हो चुकी थी. उस का विवाह मंजू देवी के साथ करीब 8 साल पहले हुआ था. मंजू खूबसूरत थी. सिद्धि प्रसाद मंजूू देवी को पा कर बहुत खुश था. वह उस की सुंदरता और यौवन का दीवाना बना हुआ था.

वह रेलवे विभाग में सम्पार (गेट कीपर) के पद पर नौकरी करता था. उसे अच्छी सैलरी मिलती थी. उस की संगत कुछ गलत लोगों के साथ थी, जिस से वह मांसाहारी होने के साथसाथ शराबी भी बन गया था. ड्यूटी पूरी करने के बाद वह जब थकामांदा लौट कर घर वापस आता था, तब अपनी थकान मिटाने के बहाने शराब पीता था. साथ में खूब मटन और चिकन उड़ाता था. उस के बाद बिस्तर पर जाते ही अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए मंजू को बांहों में दबोच लेता था. इस का वह जरा भी खयाल नहीं करता था कि पत्नी की इच्छा है भी या नहीं! कई बार वह उस की इच्छा के खिलाफ जिस्मानी भूख मिटाता था. ऐसा वह मंजू के साथ आए दिन करता था. उस की इस आदत से मंजू परेशान हो गई थी.

उस के 2 बच्चों में से एक की असामयिक मौत होने से एकमात्र बेटी ही बची थी. दूसरे बच्चे की चाहत में वह मंजू को अपनी हवस का शिकार बनाता था. जबकि मंजू पति के वहशी व्यवहार से तंग आ गई थी. उस से घृणा करने लगी थी. सिद्धि प्रसाद  की फिजूलखर्ची बढ़ती जा रही थी. मंजू देवी इस का विरोध करती थी. विरोध करने पर सिद्धि उसे प्रताडि़त करता था. मंजू कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह अपने पति की बढ़ती शराब की लत को कैसे रोके.

मंजू और आकाश ऐसे आए करीब

जनवरी, 2025 का महीना था. सिद्धि प्रसाद खाना खा कर ड्यूटी पर चला गया था. उस के जाने के बाद मंजू अपने कमरे में लेटी थी. अपनी मुसीबतों के बारे में सोच रही थी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. वह करवट लिए लेटी हुई थी. सिर पर हाथ रखे तकिए में मुंह छिपाए काफी समय तक सिसकती रही.  दिन के 11 बजने को आए थे. चारपाई पर लेटेलेटे उस की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. जब आंखें खुलीं, तब उस ने अपने बगल में बैठे आकाश को पाया.

वह हड़बडाती हुई उठी और कपड़े संभालने लगी. उस ने महसूस किया कि आकाश की नजर उस की मांसल शरीर पर टिकी है. थोड़ी देर के लिए वह शरमा गई. फिर भी बोली, ”अरे आकाश, तू कब आया? …आ न! बैठ यहीं, तू कोई गैर थोड़े है.’’

”मैं अभीअभी आया मामी, तुम उदास दिख रही हो? क्या बात है फिर मामा से बहस हुई क्या?’’ आकाश ने हमदर्दी जताई.

”अच्छा, तुम्हें याद भी कर रही थी.’’

”सौरी मामी, मैं तुम्हें कुछ और नजरों से देख रहा था.’’

”अरे कुछ नहीं, तुम जैसा गबरू जवान मेरी जवानी को नहीं देखेगा तो और कौन..?’’ मंजू बोली.

”अच्छा! …तो आप ने मुझे माफ कर दिया.’’ झेंपता हुआ आकाश बोला.

उस के बाद दोनों के बीच हंसीमजाक और इधरउधर की बातें होती रहीं. बातोंबातों में मंजू ने अपनी पीड़ा भांजे आकाश वर्मा के सामने उड़ेल कर रख दीं. इस से उस ने महसूस किया कि गम थोड़ा हलका हो गया. फिर उस के कंधे पर अपना सिर टिका कर सिसकती हुई बोली, ”आकाश, तुम ही कोई तरीका निकालो!’’

”हां मामी, मैं कुछ करता हूं आप के लिए. थोड़ा वक्त दो… अभी चलता हूं. जब भी कोई जरूरत हो तो फोन कर देना.’’ आकाश बोला और वहां से चला गया.

आकाश वर्मा सिद्धि प्रसाद का रिश्ते में भांजा लगता था. वह मूलरूप से लखनऊ के ही थाना पारा के अंतर्गत नरपत खेड़ा गांव का रहने वाला था. अकसर खाली समय में अपने मामा सिद्धि प्रसाद के यहां मिलने आताजाता रहता था. मौका मिलने पर मंजू से आंखें छिपा कर अपने मामा सिद्धि प्रसाद के साथ शराब पीने का मौका भी निकाल लेता था. शराब के नशे में दोनों काफी देर तक गपशप किया करते थे. आकाश सरोजनी नगर के नादरगंज की एक नमकीन बनाने वाली कंपनी में काम करता था और समय मिलने पर सिद्धि प्रसाद के घर चला आता था.

हसरतों में बह गया रिश्ता

25 वर्षीय आकाश वर्मा मंजू देवी को बहुत प्यार करता था, किंतु उस ने अपने मन की बात का इजहार करने के लिए मंजू के सामने कभी पेशकश नहीं की थी. आकाश मंजू के सामने जब भी आता तो बैठ कर उसे हसरत भरी नजरों से देखा करता था. वह मंजूू से अपने दिल की बात उजागर करने का कोई अवसर भी नहीं ढूंढ पाया. मंजू को अपने दिल में बसाने के बाद उस की रातों की नींद उड़ चुकी थी. चाहत छिपती नहीं है, जब 2 प्रेमी सामने हों तो आंखों में समाई प्यार की भाषा को समझते देर भी नहीं लगती.

आकाश के अकसर घर आने के बाद मंजू भी उसे चाहत की नजरों से देखा करती थी, किंतु वह विवाहिता थी. उस के सामने समाज की कुछ मर्यादाएं भी थीं. आकाश को मन ही मन में चाहने के बाद मंजू भी अपने मन की भावना व्यक्त नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे मंजू के मन में आकाश के प्रति सम्मान व प्यार का दीप जल उठा था. दोनों उचित अवसर की तलाश में थे. जनवरी माह में उस दिन आकाश के समक्ष उस ने अपनी दुखती रग को व दर्द को बयान किया तो आकाश के मन में दया व प्यार का सागर उमड़ पड़ा, लेकिन समझदारी व अवसर की तलाश में उस दिन मंजू नेे अपनी आंखों की मूक भाषा से सब कुछ समझा दिया कि वह भी इस नरक से उसे छुटकारा दिला दे.

मार्च 2025 के अंतिम सप्ताह में मंजू ने फोन पर आकाश के पूछने पर बताया कि उस दिन सिद्धि प्रसाद रात की ड्यूटी पर घर से गया हुआ है, इसलिए वह घर पर आ जाए, कुछ जरूरी बात करनी है.   आकाश ड्यूटी की छुटटी के बाद मंजू के घर देर रात पहुंच गया. उस ने धीरेधीरे आहट पा कर जानने की कोशिश की कि घर की बगल की दूसरी कोठरी में मंजू के सासससुर अपने कमरे में लिहाफ ओड़े सो रहे हैं. मंजू ने आकाश को घर आया देख कर राहत की सांस ली और चुपके से अपनी कोठरी में आकाश को एकांत में बुला लिया. कमरे में पहुंचने के बाद आकाश ने जाते ही मंजूू को अपनी बाहों में भर लिया. जी भर गालों को चूमने व प्यार करने के बाद वह खाना खाने बैठ गया.

उस दिन आकाश मंजू को पाने को आतुर हो गया था. पति द्वारा प्रताडि़त करने की बात कहते हुए मंजू ने उसे अपनी पीठ पर चोट के निशान दिखाए. पीठ पर पिटाई के निशान देख कर आकाश ने हमदर्दी जताई. इसी हमदर्दी में दोनों प्रेम और सहानुभूति की भावना में बह गए थे. वे कब एकदूसरे की बाहों में आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. फिर दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. थोड़ी देर में जब आकाश जाने लगा, तब मंजू उस का हाथ पकड़ कर बोली, ”आकाश, जल्द कुछ उपाय करो… अब छिपछिप कर रहना सहन नहीं होता…और उस का जुल्म भी बढ़ता जा रहा है.’’

”जल्द ही कुछ करूंगा. चिंता मत करो.’’

आकाश जब भी आता था, तब मंजू घर में अकेले होती थी. उसे नहीं पता था कि उस की गतिविधियों पर पासपड़ोस की नजर बनी हुई है. कई बार वह रात के अंधेरे में भी आने लगा था. उस का मंजू के साथ बेमेल ही सही, लेकिन नाजायज रिश्ता बन चुका था. आकाश उस से उम्र में करीब 10 साल छोटा था. मंजू के मन का दर्द आकाश के लिए भी असहनीय हो गया था. सिद्धि प्रसाद की हत्या के 2 दिन पहले जब आकाश आया था, तब घर में बिखरे हुए सामान को देख कर समझ लिया था कि सिद्धि ने उस पर किस तरह का जुल्म ढाया होगा. घर में चारपाई के नीचे शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं.

अभी आकाश घर के चारों ओर नजरें दौड़ा ही रहा था कि उस ने मंजू की सिसकती आवाज सुनी, ”जी तो करता है कि मैं कहीं जा कर डूब मरूं और अपनी जान दे दूं.’’

आकाश तेजी से मंजू की ओर मुड़ा और उस के पास जा कर कान में कुछ फुसफुसाया. मंजू उस की बात सुन कर चौंकती हुई बोली, ”ऐसा हो सकता है तो जल्दी करो, मैं तुम्हारा साथ दूंगी. जितना भी खर्च आएगा, उस का भी इंतजाम करूंगी.’’

”मैं तुम्हें 24 मई को फोन करूंगा.’’ आकाश बोल कर वहां से जाने लगा. आकाश को जाता देख मंजू बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे देखने लगी. घर से निकलने से पहले आकाश ने एक बार फिर आश्वासन देते हुए कहा, ”मामी, आप को सब्र से काम लेना होगा. मुझे पूरी प्लानिंग बनाने का मौका दो. काम बहुत जोखिम भरा है.’’

प्रेमी के साथ मिल कर बनाया हत्या का प्लान

23 मई, 2025 की रात को आकाश और मंजू जब फोन पर बातें कर रहे थे, तभी  अचानक रात की ड्यूटी समाप्त कर सिद्धि प्रसाद घर लौट आया था. अचानक पति को घर आया देख कर मंजू सहम गई थी. तुरंत फोन कट कर दिया था. किंतु सिद्धि प्रसाद समझ गया था कि मंजू जरूर अपने प्रेमी से बात कर रही है. इस बारे में पड़ोसियों द्वारा उस के कान पहले से ही भरे जा चुके थे. उस ने तुरंत मंजू की जम कर पिटाई कर डाली. वह कहती रही कि उस की बात सहेली से हो रही थी, लेकिन सिद्धि ने पीटना नहीं छोड़ा.

राज खुलने के डर से मंजू एकाएक वह घबरा गई. परेशान सी हो उठी. किसी तरह उस ने दर्द से कराहते हुए रात बिताई. अगले रोज पति के ड्यूटी पर जाने के बाद आकाश को बीती रात की पूरी बात बता दी. अगले रोज 24 मई को उस का पति सो गया, तब आकाश का फोन आया. उस के बाद उस ने पहले तय प्लान के मुताबिक सिद्धि प्रसाद की प्लास्टिक की रस्सी के फंदे से पहले गला घोंट दिया, फिर उस के सिर पर भारी चीज से हमला कर मार डाला. इस काम में आकाश ने अपने दोस्त संजय निषाद की भी मदद ली थी.

अगले दिन ही मंजू द्वारा की गई पुलिस में शिकायत के बाद सिद्धि प्रसाद की लाश बरामद कर ली गई. इस की हफ्ते भर चली जांच में हत्या का न केवल खुलासा हो गया, बल्कि इस में शामिल आरोपियों में मंजू देवी, आकाश वर्मा और उस के दोस्त संजय निषाद की गिरफ्तारी भी हो गई. उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा के रहने वाले संजय निषाद को 40 हजार रुपए देने का वादा किया था, उसे मात्र 5 हजार रुपए एडवांस में दिए थे. मंजू देवी ने पुलिस के सामने अपने पति की क्रूरता का जिक्र करते हुए पति की प्रताडऩा से परेशान रहने की बात कही.

 

उस ने पति पर अय्याशी करने का आरोप लगाया. उस ने यह भी बताया कि सिद्धि प्रसाद के गांव की एक विधवा महिला से कई सालों से  अवैध संबंध बने हुए थे. पुलिस ने आकाश से संजय निषाद का फोन नंबर ले कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. तकनीकी जांच से  वह 10 जुलाई, 2025 को उत्तर पूर्व दिल्ली के सोनिया विहार से पकड़ा गया. संजय वारदात के बाद लखनऊ से फरार हो कर दिल्ली चला गया था. वहां वह एक दुकान पर नौकरी करने लगा था. फोन की लोकेशन के आधार पर वह भी पुलिस की पकड़ में आ गया.

पुलिस ने आरोपी मंजू देवी, उस के प्रेमी आकाश वर्मा और संजय निषाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Illicit Relationship

 

Extramarital Affair: दोस्त की पत्नी पर प्यार का पासा

Extramarital Affair: घर में आर्थिक तंगी क्या हुई, एक बच्चे की मां नेहा रौनियार ने पति नागेश्वर रौनियार को दरकिनार कर उस के दोस्त जितेंद्र का हाथ थाम लिया. वह प्रेमी जितेंद्र के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इन्हीं संबंधों ने एक दिन ऐसे अपराध को जन्म दिया कि…

नेहा पति को रास्ते से हटाने के लिए प्रेमी जितेंद्र पर दबाव डाल रही थी कि उसे जल्द से जल्द रास्ते से हटा दे, ताकि वे दोनों जल्द से जल्द एक हो जाएं. उसे अब उस की दूरी और जुदाई बरदाश्त नहीं होती.

”बताओ मुझे कि रास्ते से उसे कैसे हटाओगे?’’ नेहा ने प्रेमी से सवाल किया.

”तुम्हीं बताओ, रास्ते से हटाने के लिए मैं क्या करूं?’’ जितेंद्र ने उसी भाषा में उत्तर दिया.

”मार दो. मैं ने उस के नाम के सिंदूर को अपनी मांग से बहुत पहले ही धो डाला है. रही बात पछतावे की तो उस की मैयत पर घडिय़ाली आंसू बहा लूंगी. लोग तो यही कहेंगे कि बेचारी भरी जवानी में विधवा हो गई.’’

”कहती तो तुम ठीक ही हो, तलाक तुम्हें तो वो दे नहीं रहा है तो उसे रास्ते से हटाना ही अच्छा होगा. मगर कैसे? सोचना पड़ेगा. उस की मौत भी हो जाए और हम पर कोई आंच भी न आए.’’

”मैं भी यही सोचती हूं कि उसे ऐसी मौत दें, जिस से उस की मौत एक हादसा लगे. मगर कैसे होगा ये? मैं कुछ समझ नहीं पा रही.’’

”वो ऐसे बनाया जा सकता है कि वह एक नंबर का दारूबाज है. इसी का हम दोनों फायदा उठा सकते हैं. दारू पिला कर उस की हत्या कर देंगे और बाइक उसी के ऊपर गिरा देंगे. ऐसा लगेगा जैसे बाइक से गिर कर उस की मौत हुई हो?’’

”वाह! कमाल का आइडिया आया है तुम्हारे दिमाग में.’’ नेहा भी खुशी से झूम उठी.

नागेश्वर को अपने कमरे में बुलाने के लिए दोनों ने आपस में गुफ्तगू की. जितेंद्र जानता था कि उस के बुलाने पर नागेश्वर नहीं आएगा, लेकिन अगर नेहा बुलाए तो संभव है कि वह यहां (कमरे) आ जाए. यह घटना से करीब एक महीने पहले की बात थी.

पत्नी के जाल में ऐसे फंसा नागेश्वर

नागेश्वर पत्नी नेहा और बेटे से बेहद प्यार करता था. उस के रोमरोम में पत्नी नेहा रचीबसी थी. बेटा तो उस के दिल की धड़कन था. उस के बिना एक पल भी जीना उस के लिए गवारा न था. नेहा जब से बेटे को ले कर प्रेमी जितेंद्र के पास रहने चली गई थी, तब से ले कर अब तक हजारों बार उस ने फोन कर के उसे वापस घर लौट आने को कहा था. घर छोड़ कर प्रेमी के साथ चले जाने पर गांवसमाज में नागेश्वर और उस के फेमिली वालों की चारों ओर थूथू हो रही थी. नातेरिेश्तेदार उस पर हंस रहे थे, उस की खिल्ली उड़ा रहे थे, लेकिन उस के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी.

वह प्रेमी जितेंद्र को छोड़ कर उस के पास लौट कर आने के लिए तैयार नहीं थी. नागेश्वर के दबाव से जितेंद्र और नेहा दोनों डर गए थे कि कहीं वह उन्हें एकदूसरे से अलग न कर दे. इस से पहले कि नागेश्वर कोई ठोस कदम उठाए और वह अपने मकसद में कामयाब हो पाए, वे दोनों जल्द से जल्द नागेश्वर को खत्म कर देना चाहते थे.

”जितेंद्र, एक बात का डर मुझे खाए जा रहा है.’’ नेहा ने कहा.

”किस बात का डर?’’

”यही कि लाश को ठिकाने कहां लगाएंगे?’’ नेहा बोली.

”मैं ने पहले से सोच लिया है कि लाश का क्या करना है. अब सुनो मेरी प्लानिंग क्या है. उसे दारू पिलाने के बाद गला दबा कर मार डालेंगे. फिर उसी की बाइक पर बैठा कर यहां से कहीं दूर सुनसान जगह ले जाएंगे, जहां कोई आताजाता न हो और लाश नीचे गिरा कर उस पर बाइक पलट देंगे, ताकि लगे कि दारू पी कर बाइक चला रहा था, एक्सीडेंट हुआ और उस में इस की मौत हो गई. फिर हम दोनों सुरक्षित बच जाएंगे और हमारे रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए साफ भी हो जाएगा. बोलो, कैसा लगा हमारा प्लान?’’

”क्या शैतानी दिमाग पाया है यार.’’

आया तो था संबंधों को सुलझाने लेकिन…

जितेंद्र और नेहा ने मिल कर नागेश्वर की हत्या की जो योजना बनाई थी, उसी के अनुसार सब कुछ चल रहा था. 12 सितंबर, 2025 की दोपहर में नेहा ने पति नागेश्वर को फोन कर महाराजगंज सिटी अपने किराए के कमरे पर समझौता करने के बहाने से बुलाया. नागेश्वर पत्नी नेहा को बहुत प्यार करता था. पहले तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे मनाने के लिए नेहा ने फोन किया था. उस का फोन रिसीव कर के वह इतना खुश था कि उस के मुंह से बोल तक नहीं फूट रहे थे कि वह उस से क्या कहे. यही नहीं, पत्नी की बातों पर विश्वास कर के बात अपने तक ही सीमित रखी. फेमिली वालों को कुछ भी नहीं बताया था. उसे क्या पता था कि जिस नेहा से वह समुद्र की गहराइयों से भी ज्यादा प्यार करता था, उसी पत्नी नेहा ने उस के लिए मौत का जाल बिछाया है.

नागेश्वर ने उस दिन शाम 4 बजे अपने पापा केशवराज रौनियार से झूठ बोलते हुए कहा कि बाजार जा रहा हूं, थोड़ी देर में लौटता हूं और कह कर अपनी बाइक पर सवार हो कर निकला था. पत्नी से मिलन को ले कर वह इतना उतावला हुआ जा रहा था कि करीब 40 किलोमीटर की दूरी जान की परवाह किए बिना उस ने 40 मिनट में तय कर ली थी. इधर नेहा ने प्रेमी जितेंद्र को कुछ देर के लिए अपने कमरे में बैड के नीचे छिपा कर उस पर चादर इस तरह बिछा कर ढक दिया कि नीचे क्या है? कोई भी सामान किसी को आसानी से दिखाई न दे.

पत्नी नेहा के दिए एड्रेस पर नागेश्वर पहुंचा तो देखा नेहा दरवाजे पर खड़ी उसी के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करती खड़ी मिली. उसे देखते ही नागेश्वर ने अपनी सुधबुध खो दी थी. बाइक पर सवार ही उसे अपलक निहारता रहा. थोड़ी देर बाद जब वह होश में आया तो वह झेंप गया और बाइक से नीचे उतर कर उस के साथ कमरे में चला गया. कमरे में पहुंचते ही बैड पर बेटे को बैठा देख उस का प्यार जाग गया और झट उठा कर उसे अपने सीने से चिपका लिया. 6 महीने हो गए थे नेहा को पति नागेश्वर का घर छोड़े हुए. पत्नी और बेटे की याद में दिनरात वह तड़प रहा था.

नेहा पति की आवभगत में लगी हुई थी, ताकि उसे उस पर कहीं से शक न हो. और वह तो यह सोचसोच कर मन ही मन खुश हो रही थी. क्योंकि उस के रास्ते का बड़ा कांटा हमेशा के लिए साफ होने जा रहा है. इधर नागेश्वर सारे गिलेशिकवे भूल चुका था. वह नेहा को एक बार फिर समझाने की कोशिश में जुटा रहा कि जो हुआ, उसे अब से भुला दो. मम्मीपापा के साथ नहीं रहना चाहती हो, न सही. दोनों शहर में कहीं किराए का कमरा ले कर अलग रहेंगे, लेकिन एक बार मेरे लिए घर वापस लौट चलो. उस की बात सुन कर नेहा ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, बल्कि इतना ही कहा कि आज अभी रुक तो रहे ही हो, सुबह होने दो, तब हम इस टौपिक पर बात करेंगे.

नागेश्वर पत्नी की बात मान गया. कब 3 घंटे बीत गए, नागेश्वर को पता ही नहीं चला. रात के समय नागेश्वर बाजार से आधा किलोग्राम चिकन खरीद कर ले आया. नेहा ने उसे पकाया. इधर पहले से नींद की गोली मिठाई में मिला कर बेटे को खिला दी. मिठाई खाने के थोड़ी देर बाद बेटे को गहरी नींद आ गई. वह जगा रहता तो शायद नेहा अपने बुरे मकसद में कामयाब नहीं हो पाती. नेहा ने चिकन के साथ अंगरेजी शराब की एक बोतल पति के सामने रख दी. मंहगी शराब देख नागेश्वर की आंखों में अजीब सी चमक जाग उठी थी. नेहा अपने हाथों से पैग बना कर पति को देती गई. देखते ही देखते नागेश्वर ने पूरी शराब की बोतल खाली कर दी. थोड़ी देर बाद वह नशे के आगोश में समा गया और शरीर बेकाबू होने लगा तो नेहा ने बैड के नीचे से प्रेमी जितेंद्र को बाहर निकलने का इशारा किया.

नागेश्वर बेसुध हो कर बिस्तर पर अचेतावस्था में गिर पड़ा था. फिर क्या था? उस ने छाती पर डाल रखा अपना दुपट्टा उतारा और पति के पैरों के पास जा कर खड़ी हो गई. फिर उसी दुपट्टे से उस के दोनों पैर बांध दिए, ताकि वह कोई हरकत न कर सके. जितेंद्र ने खा जाने वाली नजरों से उसे घूर कर देखा और कूद कर उस के सीने पर जा बैठा तो नेहा ने कस कर मजबूती के साथ उस के दोनों पैर पकड़ लिए तो जितेंद्र ने पूरी ताकत के साथ नागेश्वर का गला तब तक दबाए रखा, जब तक उस की मौत न हो गई. दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी और लाश वहीं बिस्तर पर छोड़ दी थी. उस समय रात काफी हो चुकी थी.

उस समय रात का करीब एक बज रहा होगा. पहले से तय की गई योजना के अनुसार, रात डेढ़ बजे के करीब जितेंद्र ने कमरे से बाहर गली में निकल कर इधरउधर झांक कर देखा. उस समय चारों ओर गली में दूरदूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था. फिर तेजी से वह भीतर कमरे की ओर लौट आया. नेहा से उस ने कहा कि रास्ता साफ है, लाश को ठिकाने लगा देते हैं. इस के बाद दबेपांव जितेंद्र ने नागेश्वर की बाइक बाहर निकाली. धीरे से उस पर नागेश्वर के शव को बैठाया. खुद बाइक को संभाला और नेहा से लाश को कस कर पकड़ कर बैठने को कहा. नेहा ने वैसा ही किया, जैसा उसे जितेंद्र ने करने को कहा.

केशवराज की टूट गई सहारे की लाठी

महाराजगंज शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने जितेंद्र ने बाइक रोक दी और लाश को सड़क की बाईं पटरी पर लिटा कर उस पर बाइक गिरा दी, ताकि यह एक्सीडेंट लगे. उस के बाद दोनों पैदल वापस लौटे तो कुछ दूरी पर एक टैक्सी खड़ी मिली. टैक्सी में सवार हो कर दोनों वापस कमरे पर लौट आए. दोनों खुश थे, क्योंकि उन के रास्ते का कांटा हमेशाहमेशा के लिए निकल चुका था. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी संबंध बनाए और सो गए.

इधर 12/13 सितंबर, 2025 की रात 3 बजे निचलौल थाने के इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा को किसी ने फोन कर के सूचना दी कि सिंदुरिया-निचलौल हाइवे पर एक्सीडेंट हुआ है, जिस में 25-26 साल के युवक की मौके पर ही मौत हो गई है. सूचना मिलते ही गश्त पर निकले एसएचओ अखिलेश कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे, जहां दुर्घटना होने की बात कही गई थी. मौके पर पहुंची पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो उसे एक्सीडेंट जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, क्योंकि मृतक युवक के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. मामला पूरी तरह संदिग्ध लग रहा था. जामातलाशी लेने पर युवक की पैंट की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. फिर उसी रात लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया और बाइक को भी कब्जे में ले लिया.

बाइक के नंबर से मृतक की पहचान नागेश्वर रौनियार निवासी राजाबारी, थाना ठूठीबारी, जिला महराजगंज के रूप में हुई थी. पुलिस ने मृतक की जेब से जो मोबाइल फोन बरामद किया था, उस पर कई मिस्ड कौल पड़े थे. उसी में एक मिस्ड कौल पापा के नाम से भी थी. एसएचओ अखिलेश कुमार वर्मा ने उस नंबर पर कौल बैक की. मोबाइल की घंटी बजते ही केशवराज रौनियार की नींद उचट गई. बेटे के इंतजार में वह रात भर सो नहीं पाए थे. जैसे ही फोन बजा तो बिस्तर पर उठ कर बैठ गए और दीवार घड़ी की ओर देखा. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे.

उन्होंने कौल रिसीव की तो दूसरी ओर से आवाज आई, ”हैलो! आप कौन साहब बोल रहें हैं?’’

”मैं केशवराज रौनियार, राजाबारी से बोल रहा हूं आप कौन?’’ केशवराज रौनियार ने सवाल किया.

”इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा, निचलौल थाने से बोल रहा हूं.’’

”इंसपेक्टर…’’ पुलिस का नाम सुनते ही  केशवराज बुरी तरह चौंक पड़े, ”सुबहसुबह पुलिस का फोन. क्या बात है साहब, मुझ से कोई गुस्ताखी तो नहीं हुई है.’’

”नहीं…नहीं… दरअसल, बीती रात सिंदुरिया-निचलौल हाइवे स्थित दमकी गैस एजेंसी के सामने सड़क किनारे एक युवक की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. जामातलाशी लेने पर उस की जेब से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था, उसी फोन से यह नंबर मिला था तो मैं ने कौल किया था. निचलौल थाने आ कर उस की पहचान कर लीजिए. मृतक का नाम नागेश्वर रौनियार पता चला है.’’

”क्याऽऽ नागेश्वर रौनियार.’’ इतना सुनते ही उन के मुंह से चीख निकल गई और फोन हाथ से छूट कर नीचे फर्श पर जा गिरा था.

पति की चीख सुनते ही ममता भी झट से बिस्तर पर उठ कर बैठ गईं और पति से पूछने लगी, ”ऐ जी क्या हुआ? सुबहसुबह किस का फोन था? क्या बात कर रहे थे उस से? सब ठीक तो है न. क्यों कुछ बोल नहीं रहे?’’ पत्नी ममता पति को जोरजोर से हिलाने लगीं.

लेकिन केशवराज को जैसे काठ मार गया हो. वह एकदम मौन से हो गए थे. थोड़ी देर बाद जब वह खुद से नारमल हुए तो दहाड़ मार कर रोने लगे, ”हम लो लुट गए नागेश्वर की मम्मी. अब हम कैसे जिएंगे. हमारे बुढ़ापे का सहारा छिन गया. हमारा बेटा नागेश्वर नहीं रहा. थाने से बड़े साहब का फोन आया था. उन्होंने निचलौल थाने लाश की शिनाख्त के लिए बुलाया है. हमारी तो कमर ही टूट गई. कैसे देखेंगे बचवा की लाश को. कैसी विपदा में आ गए हम?’’ कह कर केशवराज पत्नी से लिपट कर रोने लगे.

काम न आए घडिय़ाली आंसू

उधर पत्नी ममता बेटे की मौत की खबर सुनते ही दहाड़ मार कर रोने लगीं. सुबहसुबह केशवराज के घर में कोहराम सुन कर पड़ोसी भी हैरान रह गए थे कि आखिर क्या हो गया जो सब के सब रो रहे हैं. पड़ोसी जब वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि नागेश्वर की एक्सीडेंट में मौत हो गई है. गांव के कुछ संभ्रात लोगों को साथ ले कर केशवराज सुबह निचलौल थाने पहुंचे. फोटो देख कर उन्होंने मृतक की अपने बेटे के रूप में शिनाख्त कर ली थी. इस बात से पुलिस को थोड़ी राहत मिली. उसी दिन यानी 13 सितंबर की शाम को पोस्टमार्टम रिपोर्ट इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा की टेबल पर थी. रिपोर्ट पढ़ कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह एक्सीडेंट नहीं, दम घुटने से हुई दर्ज थी. यानी नागेश्वर की गला दबा कर हत्या की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे केस को उझला कर रख दिया था.

इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने फोन कर के केशवराज को दोबारा निचलौल थाने बुलाया और बताया कि तुम्हारे बेटे की मौत एक्सीडेंट से नहीं बल्कि गला घोंटने से हुई है. यह सुन कर केशवराज रौनियार एकदम से सन्न रह गए थे. इंसपेक्टर वर्मा ने उन से किसी पर शक होने की बात पूछी तो उन्होंने बिना सोचेसमझे अपनी बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार का नाम लिया और कहा कि इन्हीं दोनों ने मिल कर बेटे की हत्या की होगी. पीडि़त केशवराज रौनियार ने बहू नेहा रौनियार और उस के प्रेमी जितेंद्र कुमार के खिलाफ लिखित तहरीर दी.

तहरीर के आधार इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की हत्या और साक्ष्य मिटाने की धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया और आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इंसपेक्टर अखिलेश कुमार ने घटना से एसपी सोमेंद्र मीणा को भी अवगत करा दिया. एसपी सोमेंद्र मीणा के दिशानिर्देश पर जांच की काररवाई आगे बढ़ाई. पुलिस ने नेहा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में घटना वाले दिन पत्नी नेहा और नागेश्वर के बीच कई बार लंबीलंबी बातें हुई थीं. वैज्ञानिक साक्ष्य को ठोस आधार मान पुलिस आगे बढ़ती गई तो मामला लव अफेयर का नजर आया. यह भी शीशे की तरह साफ हो गया था कि घटना वाले दिन नागेश्वर नेहा से मिलने महराजगंज सिटी गया था.

15 सितंबर की भोर में इंसपेक्टर अखिलेश कुमार वर्मा अपनी टीम के साथ नेहा के कमरे पर पहुंचे और मौके से उसे और उस के प्रेमी जितेंद्र को हिरासत में ले कर थाना निचलौल लौट आए. थाने में दोनों से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. एसपी सोमेंद्र मीणा ने उसी दिन शाम 3 बजे पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में प्रैसवार्ता बुलाई और नागेश्वर रौनियार हत्या से परदा उठा दिया.

चट्टान जैसे इरादों वाली नेहा के चेहरे पर पति की मौत का जरा भी अफसोस नहीं था. गिरफ्तारी के समय वह मुसकरा रही थी. पुलिस ने दोनों आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में हत्या के पीछे की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

दिल लगा बैठी नेहा

 

26 वर्षीय नागेश्वर रौनियार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के राजाबारी गांव का रहने वाला था. उस के पापा केशवराज रौनियार थे. 2 बेटों और एक बेटी में नागेश्वर सब से बड़ा था. था तो वह इकहरे बदन वाला, लेकिन उस में गजब का जोश और फुरती थी. केशवराज रौनियार प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. वह इतना कमा लेते थे कि अपने 5 सदस्यों वाले परिवार का पालनपोषण बड़े मजे से कर लेते थे. नागेश्वर बड़ा था और काफी समझदार भी. वह बचपन की गलियों को पीछे छोड़ कर जैसेजैसे जवानी की दहलीज पर पांव रखता गया, उस में अपने पैरों पर खड़े होने और पिता का हाथ बंटाने की ललक जोर मारने लगी थी.

वैसे भी नागेश्वर जिस जगह रहता था, वहां से नेपाल करीब 10-15 किलोमीटर दूर था. नेपाल की खूबसूरत वादियां राजाबारी (ठूठीबारी) से साफ दिखती थीं तो उन्हें देखने के लिए वह हमेशा लालायित रहता था. उसी के गांव में जितेंद्र भी रहता था. उस से उस की काफी निभती थी. दोनों अच्छे दोस्त भी थे और हमराज और हमउम्र भी. जितेंद्र की ठूठीबारी कस्बे में बाइक के स्पेयर पाट्र्स की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी. आमदनी भी अच्छी होती थी. नागेश्वर उस की दुकान पर नौकरी करता था. पाट्र्स को बेचने के लिए वह अकसर नेपाल के खूबसूरत जिला नवलपरासी आताजाता रहता था. जातेआते वक्त इसी जिले के गोपालपुर की रहने वाली बेहद खूबसूरत युवती नेहा पर उस की नजर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा था.

नागेश्वर पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठा था. इस के बाद उस का नवलपरासी आनाजाना और बढ़ गया था. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया और फेमिली वालों की रजामंदी से प्रेम विवाह कर लिया था. यह करीब 6 साल पहले की बात है, तब उस की उम्र 20 साल के आसपास रही होगी. नागेश्वर अपने प्यार को पा कर बेहद खुश था. फेमिली वाले भी चांद सी बहू पा कर फूले नहीं समा रहे थे. शादी के 3 साल बाद नेहा ने एक बेटे को जन्म दिया. पोते के पैदा होने पर केशवराज में जीने की लालसा और बढ़ गई थी. बेटे के जन्म के बाद नागेश्वर के बाद उस के खर्चे बढ़ गए थे. वह जो कमाता था, उस से उस के खर्चे पूरे नहीं होते थे. धीरेधीरे उस का झुकाव नशीले पदार्थों की ओर बढ़ता गया और नशा बेचने का काम शुरू कर दिया.

जितेंद्र जब भी नागेश्वर से मिलने उस के घर जाता तो नेहा को जितेंद्र से बात करना अच्छा लगता था. इसी दरमियान नागेश्वर के साथ एक घटना घटी. वह नशीले पदार्थ के साथ पकड़ा गया. पुलिस ने गिरफ्तार कर उसे जेल भेज दिया. नागेश्वर के जेल जाते ही जितेंद्र की तकदीर खुल गई. वह नेहा के साथ हमदर्दी दिखाता था. उस ने अपने दिल में नेहा के लिए जगह तो पहले ही बना ली थी, बस साक्षात उस के सामने होना शेष रह गया था. जितेंद्र के दिल में उसे पाने की हसरतें उमडऩे लगीं. जितेंद्र के सामने नेहा के करीब आने का एक ही रास्ता दिख रहा था, वह था उस का जमानत कराना.

जितेंद्र ने कुछ महीनों बाद नागेश्वर की जमानत करा कर नेहा के दिल पर कब्जा जमा लिया. धीरेधीरे वह भी जितेंद्र की ओर आकर्षित होती गई और दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे. जमानत पर छूट कर जेल से आने के बाद नागेश्वर के व्यवहार में काफी बदलाव आ चुका था. नागेश्वर को पत्नी नेहा की हरकतों के बारे में पता चल गया था कि उस का जितेंद्र के साथ कुछ चक्कर चल रहा है. इस बात को ले कर दोनों के बीच तकरार होती गई और दांपत्य जीवन में दरारें बढ़ती गईं. नागेश्वर ने पत्नी को बहुत समझाने की कोशिश की कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता है. भले ही आज वह आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, कल उस के पास भी पैसे आ जाएंगे.

वह बुरी आदतों और बुरी लत से तौबा कर लेगा, अपनी बसीबसाई गृहस्थी में अपने हाथों आग न लगाओ. पर नेहा ने उस की एक नहीं सुनी और बेटे को साथ ले कर प्रेमी जितेंद्र के साथ रहने के लिए महाराजगंज सिटी में एक किराए का कमरा ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी.

नागेश्वर नेहा पर घर वापस लौट आने का दबाव बनाने लगा था. नेहा उस के पास लौटने के लिए तैयार नहीं थी. नेहा रौनियार और जितेंद्र ताउम्र साथ रहना चाहते थे, लेकिन उन के लिए यह आसान नहीं था. नेहा का पति नागेश्वर अभी जिंदा था. उस के जीते जी उन के यह ख्वाब कभी पूरे नहीं हो सकते थे. पत्नी ने पति पर तलाक देने का दबाव डाला था. वह उस के साथ अब रहना नहीं चाहती थी. बाकी की जिंदगी वह अपने प्रेमी जितेंद्र के साथ उस की बांहों में बिताना चाहती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच कई बार झगड़े भी हुए थे और उस ने पत्नी नेहा को तलाक देने से साफतौर पर मना कर दिया था. इसी खुन्नस में नेहा और उस के प्रेमी जितेंद्र के साथ मिल कर पति नागेश्वर रौनियार की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

पुलिस को दिए बयान में नेहा ने बताया था कि पति पैसों के अभाव में गैरमर्दों के पहलू में भेज कर उस से धंधा कराना चाहता था. यह बात उसे गवारा नहीं थी. उस के जमीर को गहराइयों तक झकझोर दिया था, इसलिए उस का झुकाव जितेंद्र की ओर तेजी से बढ़ा था. और उस ने फैसला कर लिया कि वह जितेंद्र के साथ अपना बाकी का जीवन गुजारेगी. कथा लिखे जाने तक नागेश्वर रौनियार हत्याकांड के दोनों आरोपी नेहा रौनियार और उस का प्रेमी जितेंद्र जेल की सलाखों के पीछे कैद थे. पति की हत्या की नेहा के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी और न ही पश्चाताप का कोई भाव था.

जेल से छूटने के बाद नेहा ने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई है. उस का बेटा अपने दादा केशवराज रौनियार के साथ रह रहा था. Extramarital Affair

 

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.

Bihar News: मोहब्बत में जाति बंधन क्यों

लेखक – शंभु शरण सत्यार्थी

Bihar News: बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई करते समय अलगअलग जाति के राहुल मंडल और तनुप्रिया झा न सिर्फ एकदूसरे को दिल दे चुके थे, बल्कि कोर्ट मैरिज भी कर ली. तनुप्रिया के फेमिली वालों को यह बात इतनी नागवार लगी कि…

बिहार के सुपौल जिले का तुलापट्टी गांव, जहां खेतों की हरियाली और कोसी नदी की शांति जीवन को एक सादगी भरा रंग देती है, एक ऐसी त्रासदी का गवाह बना, जिस ने न केवल एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि भारतीय समाज में गहरे जड़ जमाए जातिगत भेदभाव की क्रूर सच्चाई को भी उजागर किया.

यह कहानी राहुल कुमार मंडल और तनु प्रिया की प्रेम कहानी है. एक ऐसी कहानी, जो प्रेम की पवित्रता और समाज की रूढिय़ों के बीच टकराव की मार्मिक गाथा है. यह न केवल एक हत्याकांड की सच्चाई को बयान करती है, बल्कि उन सामाजिक पूर्वाग्रहों पर भी सवाल उठाती है, जो आज भी प्रेम और इंसानियत को कुचल देते हैं. इस कहानी को जातिगत भेदभाव के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक समाज की इस बीमारी को गहराई से समझ सकें.

तुलापट्टी गांव की संकरी गलियों में गणेश मंडल का घर मेहनत और सादगी की मिसाल था. गणेश एक छोटेमोटे किसान, अपनी छोटी सी जमीन पर खेती कर के परिवार का गुजारा करते थे. उन की पत्नी सुशीला घर की धुरी थीं, जिन का एकमात्र सपना अपने इकलौते बेटे राहुल कुमार मंडल को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना था. राहुल, जो अतिपिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से था, बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल था. गांव के स्कूल में उस की मेहनत की चर्चा हर जुबान पर थी. शिक्षक अकसर कहते कि राहुल इस गांव का गौरव बनेगा.

राहुल ने अपनी मेहनत से दरभंगा मैडिकल कालेज  में बीएससी नर्सिंग में दाखिला लिया. सेकेंड सेमेस्टर में पढ़ते हुए उस का सपना था कि वह अपने गांव में एक छोटा सा अस्पताल खोले, जहां गरीबों का मुफ्त इलाज हो. कालेज में उस की मुलाकात तनु प्रिया से हुई. तनु प्रिया सहरसा के एक रूढि़वादी ब्राह्मïण परिवार से थी और बीएससी नर्सिंग के फस्र्ट सेमेस्टर की छात्रा थी. उस की मुसकान और सादगी ने राहुल का दिल जीत लिया. तनु का परिवार सामाजिक रुतबे और जातिगत श्रेष्ठता में विश्वास रखता था, लेकिन तनु ने अपनी पढ़ाई और सपनों के लिए घर की रूढिय़ों को चुनौती दी थी.

पहली मुलाकात कालेज की लाइब्रेरी में हुई. राहुल किताबों में खोया हुआ था, जब तनु ने उस से एक किताब मांगी.

”यह फार्माकोलौजी की किताब आप के पास है?’’ तनु की आवाज में मासूमियत थी. राहुल ने मुसकराते हुए किताब दी और यहीं से उन की दोस्ती की शुरुआत हुई. कालेज की कैंटीन में चाय की चुस्कियां, लाइब्रेरी में किताबों के बीच बातें और कालेज के मैदान में सैर, इन सब ने उन की दोस्ती को प्यार में बदल दिया. राहुल की सादगी और तनु की हंसी ने उन के रिश्ते को एक अनमोल बंधन में बांध दिया.

राहुल और तनु को पता था कि उन का प्यार समाज की जातिगत दीवारों को तोडऩे की चुनौती है. भारत में जाति व्यवस्था सदियों से सामाजिक संरचना को नियंत्रित करती आई है, जो आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक अवसरों को प्रभावित करती है. तनु का परिवार ब्राह्मण था और उस के पापा प्रेमशंकर झा, सहरसा में एक रसूखदार व्यक्ति थे. उन के लिए बेटी की शादी अपनी ही जाति के अच्छे परिवार के लड़के से करना सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल था. दूसरी ओर, राहुल का परिवार साधारण और पिछड़ी जाति का था.

तनु ने हिम्मत जुटा कर अपने फेमिली वालों को राहुल के बारे में बताया. उस ने कहा, ”पापा, राहुल मेहनती और अच्छा इंसान है. हम एकदूसरे से प्यार भी करते हैं.’’

लेकिन प्रेम शंकर ने गुस्से में जवाब दिया, ”तूने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी. उस नीची जाति के लड़के से शादी का खयाल तू मन से निकाल दे!’’

कमरे में ही मौजूद तनु की मम्मी गुंजन कुमारी ने भी उसे डराया, ”तू हमारे खानदान की इज्जत का कुछ तो खयाल कर.’’

इतना ही नहीं, तनु के भाई अवनीश वत्स और बहन प्रीति कुमारी ने भी उस का साथ नहीं दिया, लेकिन तनु अपने प्यार पर अडिग थी. उस ने राहुल से कहा, ”मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती राहुल, चाहे दुनिया मेरे खिलाफ हो जाए.’’

राहुल ने अपने परिवार को इस रिश्ते के बारे में बताया. गणेश मंडल ने बेटे की खुशी को देखते हुए उस का समर्थन किया. उस की मम्मी सुशीला ने तनु से फोन पर बात की और कहा, ”बेटी, तुम मेरे बेटे की पसंद हो तो मेरी भी बेटी हो.’’

दोनों ने गुपचुप तरीके से कोर्ट मैरिज करने का फैसला किया. 5 जुलाई, 2025 को दरभंगा के एक मंदिर में राहुल और तनु प्रिया ने सात फेरे लिए और कोर्ट में शादी रजिस्टर कराई. शादी के बाद दोनों कालेज के हौस्टल में रहने लगे. राहुल ने तनु को अपने गांव तुलापट्टी ले जाने का वादा किया. तनु के परिवार में उस के द्वारा राहुल से शादी करने की खबर आग की तरह फैल गई. पापा प्रेमशंकर झा के लिए यह शादी उन की इज्जत पर धब्बा थी. प्रेमशंकर ने अपने बेटे अवनीश, पत्नी गुंजन, बेटी प्रीति और मां अरुण देवी के साथ मिल कर राहुल को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली.

तनु को कई बार धमकी भरे फोन आए. अवनीश ने उसे फोन पर कहा, ”घर वापस आ जा, नहीं तो उस लड़के की लाश तेरे सामने होगी.’’

तनु ने डरते हुए पति राहुल को बताया, ”राहुल, मुझे लगता है कि मेरे फेमिली वाले कुछ गलत करने की सोच रहे हैं.’’

इस के बाद तनु ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की, जिस में उस ने अपने फेमिली वालों की धमकियों का जिक्र किया. लेकिन पुलिस ने इसे पारिवारिक मामला कह कर टाल दिया. तनु और राहुल ने हिम्मत नहीं हारी. राहुल ने तनु से कहा, ”हमारा प्यार इन दीवारों को तोड़ देगा.’’

5 अगस्त, 2025 की रात दरभंगा मैडिकल कालेज के हौस्टल गेट पर सन्नाटा था. रात के 9 बजे राहुल अपनी बाइक लेने गया था. तनु अपने कमरे में थी और राहुल से फोन पर बात कर रही थी. दोनों अगले दिन तुलापट्टी जाने की योजना बना रहे थे. राहुल ने हंसते हुए कहा, ”तनु तुम्हें मालूम है कि मम्मी तुम्हारे स्वागत का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं, वह तुम्हारे लिए खीर बनाएंगी.’’

तनु ने जवाब दिया, ”बस तुम सुरक्षित आ जाओ, बाकी बातें हम बाद में करेंगे.’’

उसी समय अचानक एक नकाबपोश शख्स, जिस ने मास्क, रेनकोट, और दस्ताने पहने थे, राहुल के पास पहुंचा. उस ने पूछा, ”यह बाइक किस की है?’’

राहुल ने जवाब दिया, ”मेरी है.’’

इस से पहले कि राहुल कुछ समझ पाता, नकाबपोश ने देसी कट्टे से उस के सीने में गोली मार दी. गोली की आवाज सुन कर तनु का दिल धक से रह गया. वह दौड़ती हुई गेट की ओर भागी. वहां उस ने देखा कि राहुल खून से लथपथ जमीन पर गिरा है. तनु ने उसे गोद में लिया और चीखी, ”राहुल, जागो!’’ लेकिन राहुल की सांसें थम चुकी थीं. तनु ने देखा कि नकाबपोश कोई और नहीं, उस के पापा प्रेमशंकर झा थे. वह चिल्लाई, ”पापा, आप ने यह क्या किया?’’ प्रेमशंकर भागने की कोशिश में था, लेकिन छात्रों और स्थानीय लोगों ने उसे पकड़ लिया और पिटाई कर दी.

इसी दौरान किसी ने पुलिस को फोन द्वारा सूचना दे दी. पुलिस ने प्रेम शंकर को हिरासत में लिया. तनु ने बताया कि उस के पापा, भाई, मम्मी, बहन, और दादी इस साजिश में शामिल थे. उस ने कहा, ”मेरे परिवार को मेरी अंतरजातीय शादी मंजूर नहीं थी. मैं ने पहले थाने में शिकायत की थी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.’’ सीसीटीवी फुटेज और फोरैंसिक साक्ष्यों ने प्रेम शंकर की संलिप्तता की पुष्टि की. राहुल और तनु की कहानी इस बात का सबूत है कि जातिगत मानसिकता आज भी समाज को बांट रही है.

राहुल का शव उस के गांव तुलापट्टी पहुंचा तो गांव मातम में डूब गया. सुशीला बारबार बेहोश हो रही थीं. गणेश ने कहा, ”मेरा बेटा बस अपने सपनों को जीना चाहता था.’’

तनु ने माफी मांगी, लेकिन सुशीला ने उसे गले लगा कर कहा, ”गलती तुम्हारी नहीं बेटा, समाज की है.’’ सोशल मीडिया पर JusticeForRahul ट्रेंड करने लगा. लोग पुलिस की लापरवाही और जातिगत हिंसा पर सवाल उठा रहे थे. तनु की गवाही ने सभी को झकझोर दिया. उस ने कहा, ”मेरे परिवार ने मेरे प्यार को अपराध माना.’’ भारत का संविधान जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को प्रतिबंधित करता है, लेकिन सामाजिक स्तर पर यह प्रथा आज भी जारी है. तनु ने फैसला किया कि वह राहुल के सपने को पूरा करेगी और तुलापट्टी में ‘राहुल स्मृति अस्पताल’ खोलेगी.

राहुल और तनु की कहानी जातिगत भेदभाव की क्रूरता को उजागर करती है. यह समाज से सवाल पूछती है कि क्या प्रेम अपराध है? क्या इज्जत के नाम पर हिंसा जायज है ? हमें शिक्षा, जागरूकता और सख्त कानूनी काररवाई के जरिए जातिगत भेदभाव को खत्म करना होगा, ताकि कोई और राहुल व तनु इस दर्द से न गुजरें. Bihar News

 

 

Stories in Hindi Love: बहार आई भी तो उदासउदास

लेखक – रुखसाना, Stories in Hindi Love: कागज का पुर्जा मेरे हाथों में फड़फड़ा रहा था. मेरी रगों में भयानक बेचैनी दौड़ने लगी थी. दिल में दहकती हुई आग भर गई थी. बड़े घरों में बसने वाले लोग कितने बेबस और मजबूर होते हैं, यह अब मेरी समझ में अच्छी तरह आ रहा था. आ पी ने खीर की प्लेट अपनी तरफ सरका कर चोर नजरों से बारीबारी सबकी तरफ देखा. मैं अनजान बन गई, लेकिन जिम्मी भाई ने मम्मी से बात करतेकरते तेज नजरों से आपी को घूर कर तल्ख लहजे में कहा, ‘‘ज्यादा खाने ने तुम्हें तबाह कर दिया है आपी जान! पता नहीं तुम वाकई नासमझ हो या जानबूझ कर ऐसा करती हो. अगर तुम्हें अपने पर तरस नहीं आता तो कम से कम हम पर तो तरस खाओ.’’

लेकिन

‘‘तुम ने तो जहां मुआपी ने जिम्मी भाई की तरफ नजर उठा कर भी न देखा. वह उसी तरह अपने दिलबहलाव यानी खाने में यों मगन रहीं, जैसे जिम्मी भाई ने किसी और से कहा हो.

मम्मी ने उन्हें टोका, ‘‘फरजाना, यह जमशेद तुम से कुछ कह रहा है. क्या तुम उस की बात सुन नहीं रही हो?’’झे खाते देखा, टोकना शुरू कर दिया,’’ कह कर खाली प्याली मेज पर पटक कर आपी उठ खड़ी हुईं और धपधप करती खाने के कमरे से बाहर चली गईं. उन के बाहर जाते ही जिम्मी भाई अपना सिर दोनों हाथों में थाम कर बोले, ‘‘इस का क्या होगा मम्मी? मैं तो इसे समझासमझा कर हार गया हूं. अगर यह खुद अपनी जिंदगी संवारना नहीं चाहती तो हम सब क्या कर सकते हैं इस के लिए?’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो जिम्मी.’’ मम्मी ठंडी आह भर कर बोलीं, ‘‘मेरी तो समझ में नहीं आता कि इसे कैसे समझाऊं? किसी नसीहत, किसी डांट का इस पर असर ही नहीं होता. खानदान में तो कोई इस के लिए तैयार नहीं और बाहर से जो रिश्ता आता है, इस का डीलडौल देख कर भाग जाता है. ऊपर से इस की आदतें…’’

मैं बेजार हो कर मेज से उठ गई. रोज खाने पर ऐसी ही बहस छिड़ जाती. मम्मी को आपी की बहुत फिक्र थी. बात भी ठीक थी. उन की उम्र शादी की उम्र को पार कर गई थी. ऊपर से उन के बेपनाह खाने की आदत ने उन का मोटापा हद से ज्यादा बढ़ा दिया था. उन पर मानो गोश्त चढ़ता जा रहा था. थोड़ा-सा चलतीं तो उन की सांस फूलने लगती. उन्हें और किसी चीज में दिलचस्पी नहीं थी. न घर के कामकाज में, न सिलाईकढ़ाई में. वह कहीं आनाजाना भी पसंद नहीं करती थीं. सैरसपाटे का भी उन्हें कोई शौक नहीं था. बस उन के 2 ही शौक थे, खाना और सोना. जाहिर है, मोटी उन्हें होना ही था. कोई भी मेहमान हमारी हवेली में आता, कहीं से भी आता, वह जरा भी किसी को लिफ्ट न देतीं. किसी से कोई मतलब न रखतीं.

आपी का रंग साफ था. नैननक्श भी बुरे नहीं थे. मम्मी का खयाल था कि अगर उन का वजन कम हो जाए तो वह भद्दी नहीं लगेंगी और अल्लाह का कोई बंदा उस के जाल में फंस जाएगा. लेकिन मम्मी और जिम्मी भाई के लाख समझाने का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था. यों लगता था, जैसे उन्हें अपनी शादी से भी कोई दिलचस्पी नहीं थी. अगर बड़ी हवेली और कीमती दहेज की कशिश में एकाध रिश्ता आ भी जाता तो रिश्ता लाने वाले आपी को देख कर और उन से मिल कर दोबारा हवेली का रुख न करते. मम्मी को आपी की फिक्र थी, क्योंकि वह मां थीं, लेकिन जिम्मी भाई की फिक्र में उन की अपनी गरज शामिल थी. मैं यह बताना भूल गई कि हमारी हवेली खुदगर्ज लोगों का डेरा थी.

यहां हर इंसान सिर्फ अपने लिए सोचता था. जिम्मी भाई की मोहब्बत बड़े जोरदार तरीके से अपनी फुफेरी बहन नाइला से चल रही थी और वह चाहते थे कि जल्दी से जल्दी नाइला को दुलहन बना कर हवेली में ले आएं. लेकिन हमारे खानदान में रिवाज था कि छोटों की शादी उस वक्त तक नहीं हो सकती थी, जब तक कि बड़ी बहन या बड़े भाई की शादी न हो जाए. अगर ऐसा किया जाता तो खानदान वाले एक तरह से उस घराने का बायकाट कर देते थे. इसलिए उस रिवाज को तोड़ने में सब डरते थे. हमारी मम्मी गैरखानदान से थीं. मेरे वालिद इलाके के बहुत बड़े रईस थे. मम्मी से शादी उन्होंने अपनी मरजी से की थी. आपी मम्मी और डैडी की पहली औलाद थीं. दूसरे नंबर पर जमशेद भाई थे.

सब से छोटी मैं थी. मैं एक साल की थी, जब डैडी का दिल के दौरे से इंतकाल हो गया था. उन के बाद मम्मी ने इतनी बड़ी हवेली में हम तीनों बच्चों और ढेर सारे नौकरों के बीच अपना वक्त गुजारा. वह काफी पढ़ीलिखी थीं. हवेली को उन्होंने अपनी पसंद के मुताबिक ढाला था. वह पुराने रिवाज पसंद नहीं करती थीं. इसलिए आपी की शादी से मायूस हो कर उन्होंने जमशेद भाई के लिए फुफ्फू जानी से नाइला का रिश्ता मांगा. लेकिन फुफ्फू पुराने खयालात की औरत थीं. उन्होंने साफ कह दिया था कि जब तक फरजाना की डोली नहीं उठेगी, जमशेद की शादी नाइला या किसी और से नहीं हो सकती.

फुफ्फू जानी का हमारे यहां बहुत दखल था. वह डैडी की एकलौती बहन थीं और हर काम, हर बात में उन से सलाह ली जाती थी. फिर भी आखिरी कोशिश के तौर पर मम्मी ने उन से कहा कि अगर सारी उम्र फरजाना बिनब्याही बैठी रही तो क्या होगा? इस के जवाब में फुफ्फू ने कहा था, ‘‘अव्वल तो ऐसा होगा नहीं. और अगर ऐसा हुआ भी तो जमशेद और नाइला को भी सारी उम्र क्वांरे रहना होगा.’’

हर तरह से हार कर मम्मी ने आपी की शादी के लिए अपनी कोशिशें फिर से तेज कर दीं. इस से पहले जिम्मी भाई को आपी से कोई सरोकार नहीं था. शायद वह समझते थे कि मम्मी इस मसले को संभाल लेंगी और फूफ्फू को राजी कर लेंगी. लेकिन अब तो आपी के लिए दूल्हा तलाश करना उन का ‘मिशन’ बन गया था. मैं ने एमए पास कर लिया था और हौस्टल छोड़ कर हवेली में आ गई थी. लेकिन हवेली आ कर मैं सख्त बोर हो रही थी. सारासारा दिन किसी बदरूह की तरह सारी हवेली में घूमती रहती या किताबें पढ़पढ़ कर अपना वक्त बिताया करती. आपी और मेरे बीच उम्र का फर्क था. बहनों वाली बेतकल्लुफी भी नहीं थी, हमारी आदतों और खयालों में भी कोई तालमेल नहीं था.

आपी को हर वक्त खाते रहने का शौक था, जबकि मैं दोपहर को फलों का लंच करती और अकसर रात का खाना गोल कर जाती. इसलिए मेरा बदन स्मार्ट था. नैननक्श तीखे थे. बाल लंबे और घने थे. यूनिवर्सिटी में तालीम हासिल कर के मैं खासी सोशल हो गई थी. हर मामले में अच्छा बोल लेती थी और सुनने वाला मेरी आवाज के जादू में खो जाता था. इसलिए जब से मैं घर आई, मेरे लिए तमाम रिश्ते आ रहे थे. लेकिन मम्मी को मेरी तरफ से कोई फिक्र नहीं थी. जिम्मी भाई की जरूरत आपी की शादी से ही पूरी हो सकती थी, मेरी शादी से नहीं. इसलिए मेरे लिए आया हुआ अच्छे से अच्छा रिश्ता भी बेजारी से रद्द कर दिया जाता. मुझे खुद भी अभी शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए हर रिश्ते पर मेरी राय भी मम्मी या जिम्मी भाई से अलग न होती.

मैं भी चूंकि खुदगर्जी के इसी माहौल में पलीबढ़ी थी, सो मुझे न तो आपी के मोटापे से सरोकार था, न उन की शादी से. आपी की एक खामी तालीम की कमी भी थी. मम्मी के लाख चाहने के बावजूद वह मैट्रिक से आगे न पढ़ी सकी थीं. मैट्रिक भी उन्होंने 2 साल में किया था. सर्दियों के दिन थे. मौसम बहुत खुशगवार हो रहा था. शाम का समय था. मैं, मम्मी और आपी, तीनों लौन में बैठे शाम की चाय पी रहे थे. आपी गुलाबजामुनों के साथ इंसाफ कर रही थीं. मैं और मम्मी चाय की प्यालियां हाथों में थामे बातों में मशगूल थीं कि अचानक जिम्मी भाई गेट के अंदर दाखिल हुए और बड़ी खुशदिली से करीब आए. उन्हें यों खुश देख कर मम्मी बोलीं, ‘‘कहां से आ रहे हो?’’

‘‘फुफ्फू की तरफ से आ रहा हूं. नाइला ने बुलाया था.’’

हमारे खानदान में मां से ऐसी बातचीत नहीं की जाती थी, लेकिन मम्मी ने हमारी परवरिश अलग तरीके से की थी. उन्होंने हमें अपने खानदान के उसूलों, रस्मों और रिवाजों से दूर रखा था. वह औलाद और मांबाप के बीच फासलों के हक में नहीं थी. औलाद पर बंदिशें लगाना उन्हें पसंद नहीं था. इसलिए हम अपने दिल की बात मम्मी से खुल कर कह सकते थे. इस वक्त भी मम्मी को जिम्मी भाई की बात बुरी नहीं लगी. हंस कर वह बोलीं, ‘‘चलो, तुम्हारी मुलाकात तो हो गई. लेकिन मेरा खयाल है, तुम वह काम फिर भूल गए होगे?’’

‘‘कौन सा काम?’’ जिम्मी भाई मम्मी को देखने लगे. अचानक उन्हें याद आया तो वह शर्मिंदा हो गए, ‘‘ओह मम्मी, मैं तो बिलकुल ही भूल गया. वह चुड़ैल नाइला जब भी बुलाती है, मैं सब कुछ भूल जाता हूं.’’

‘‘जिम्मी डियर, एक जवान और सेहतमंद जेहन को इतना भुलक्कड़ नहीं होना चाहिए. तुम जानते हो, यह कितना अहम काम है? बहरहाल कल तुम जरूर जा कर नए असिस्टैंट कमिश्नर से मिल लो और उसे खाने की दावत दे दो.’’

‘‘कल जरूर याद रखूंगा मम्मी.’’ फिर उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘रुखसाना, एक कप चाय बना दो मेरे लिए और खाने को भी कुछ दो. मैं ने अभी तक लंच नहीं किया.’’

मैं ने मेज पर गुलाबजामुनों की तलाश में नजरें दौड़ाईं, लेकिन आपी जिम्मी के टोकने के डर से गुलाबजामुनों समेत नौ दो ग्यारह हो गई थीं. मम्मी ने नौकर को बिस्कुट लाने के लिए कहा और मैं चाय बनाने लगी.

डैडी की जिंदगी में हमारी हवेली का यह रिवाज था कि जो भी सरकारी अफसर किसी सरकारी या निजी दौरे पर इलाके में आता, हमारी हवेली में उस की दावत जरूर होती. डैडी की मौत के बाद मम्मी ने इस रिवाज को जिंदा रखा और हर बार जो भी असफर आता, हमारी हवेली का मेहमान जरूर बनता. इस बार कोई नया असिस्टैंट कमिश्नर दौरे पर आया था और रेस्ट हाउस में ठहरा था. उसे आए हुए दूसरा दिन था. मम्मी रोजाना जिम्मी भाई को याद दिलातीं कि वह उस से मिल कर खाने पर बुला लें. लेकिन जिम्मी भाई भूल जाते.

उस दिन शाम को मैं गुलाबों के कुंज में बैठी ‘रिमूवर’ से अपने नाखूनों का रंग साफ कर रही थी. मम्मी ने बालों में हेयर कलर लगा लिया था और उन्हें खुश्क करने लौन में आ कर मेरे पास बैठ गईं. आपी अपने कमरे में थीं. मैं ने देखा, जिम्मी भाई सीधा रास्ता अपनाने के बजाए मोतियों की बाड़ फलांगते हुए हमारे करीब आ गए. उन का रंग जोश से तमतमा रहा था और वह कुछ कहनेसुनने के लिए बेचैन हो रहे थे. मैं एक निगाह उन पर डाल कर फिर से अपने काम में लग गई. मम्मी ने पूछ लिया, ‘‘क्या बात है, बहुत पुरजोश नजर आ रहे हो?’’

‘‘हां मम्मी, बड़ी अजीब खबर लाया हूं. आप सुनेंगी तो सख्त हैरान होंगी.’’

‘‘अच्छा, ऐसी कौन सी खबर है, जिस ने तुम्हें इतना हैरानपरेशान कर दिया है?’’ मम्मी हंस पड़ीं. मैं ने तीखे अंदाज से जिम्मी भाई की तरफ देखा. उन की खबरें सदा ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ वाली कहावत साबित होती थीं, सो मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी उन की खबर सुनने में. वह मुझे नहीं, मम्मी को बता रहे थे.

‘‘आप अंदाजा भी नहीं लगा सकतीं मम्मी कि मैं किस से मिल कर आ रहा हूं.’’

‘‘तुम शायद उस नए असिस्टैंट कमिश्नर से मिलने गए थे?’’

‘‘हां, लेकिन आप को यह जान कर हैरत का शदीद धक्का लगेगा कि वह असिस्टैंट कमिश्नर कौन है?’’

‘‘क्या सनसनी फैला रहे हो जिम्मी? सीधी बात करो न, क्या वह हमारा कोई जानने वाला है?’’ मम्मी ने पूछा.

‘‘आप उसे जानने वाला नहीं कह सकती मम्मी, वह इस हवेली में पल कर बड़ा हुआ है. खैर, बड़ा तो हम नहीं कह सकते, लेकिन अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उस ने इसी हवेली में गुजारा है.’’

मम्मी के साथसाथ मैं भी चौंक उठी. मम्मी हैरत से पूछ रही थीं, ‘‘कौन है वह? तुम बताते क्यों नहीं हो जिम्मी? पहेलियां क्यों बुझा रहे हो?’’

‘‘वह जैदा है मम्मी, हमारी आया का बेटा. अब वह जावेद खां बन गया है.’’

‘‘क्या?’’ मम्मी को सचमुच हैरत का झटका लगा. वह जिम्मी भाई को देखते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हें यकीनन कोई बड़ी गलतफहमी हुई है. कहां एक बेसहारा लड़का जैदा और कहां असिस्टैंट कमिश्नर.’’

‘‘लेकिन मम्मी, उस ने मुझे खुद बताया है. जब मैं उस से मिला और मैं ने अपना परिचय दिया तो वह बेअख्तियार अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और मुझे गले लगाते हुए बोला, ‘अरे जिम्मी भाई, तुम ने मुझे पहचाना नहीं? मैं जैदा हूं तुम्हारी आया का बेटा. तुम ने यहां आने की तकलीफ क्यों की? मैं तो खुद हवेली आने वाला था.’ फिर उस ने बारीबारी सब के बारे में पूछा. अपने हालात बताते हुए उसे जरा भी शरम नहीं आ रही थी. वहां और भी लोग बैठे थे, लेकिन उन सब के सामने अपनी गरीबी की दास्तान सुना रहा था. वैसे मम्मी, मैं तो उस की हिम्मत की दाद देता हूं. यह मुकाम उस ने अपनी मेहनत, हिम्मत और कोशिश से हासिल किया है. और मम्मी, वह मरियल सा लड़का ऐसा गबरू जवान निकल आया है कि आप देखेंगी तो हैरान रह जाएंगी. अगर वह खुद न बताता तो मैं कयामत तक उसे पहचान नहीं सकता. ऊपर से अपने ओहदे का जरा भी गरूर नहीं.’’

मैं और मम्मी सकते की हालत में जिम्मी भाई की बातें सुन रही थीं. मेरे दिल में बड़े जोर की धड़कन हो रही थी. मैं मुंह फाड़े जिम्मी भाई की तरफ देखे जा रही थी. मम्मी भी सन्न थीं. फिर कुछ दबेदबे लहजे में उन्होंने जिम्मी भाई से पूछा, ‘‘तुम ने खाने की दावत दे दी उसे?’’

‘‘हां, कल रात की दावत दी है. वह तो दावत कबूल ही नहीं कर रहा था. कह रहा था कि खुद आऊंगा और सब से मिलूंगा. लेकिन मैं ने उस से मनवा कर ही छोड़ा.’’

जिम्मी भाई काफी देर तक उस की बातें करते रहे. मम्मी बारबार कह रही थीं कि उन्हें यकीन नहीं आ रहा  कि जैदा इस मुकाम तक पहुंच गया है. मम्मी और जिम्मी भाई वहां से उठ गए लेकिन मैं वहीं बैठी रही. फिजा में ठंडक उतर आई थी. मैं अपने जिस्म के गिर्द चादर लपेटे लगातार उस के बारे में सोच रही थी, जिस का नाम एक अरसे के बाद सुना था. मेरे दिल में उस की यादों के साथ उदासी उतरने लगी. मैं ने कुर्सी की पुश्त के टेक लगा कर आंखें बंद कर लीं. मेरी नजरों के सामने बहुत पहले का जमाना आ गया.

तब हम बहुत छोटे थे. हमारी आया बहुत बूढ़ी हो गई थी. इसलिए आए दिन बीमार रहती थी. जब वह काम के काबिल नहीं रही तो उस ने अपनी बेवा बेटी को बुलवा लिया, जिस के साथ एक बेटा भी था. वह अपने जेठ के साथ रहती थी और जेठानी के जुल्मों से तंग आ गई थी. मम्मी को उस के बेटे पर खासा ऐतराज था. लेकिन आया बहुत मेहनती और ईमानदार औरत थी, इसलिए मम्मी को चुप रहना पड़ा. जैदा का असली नाम जावेद था. आया कभीकभी दुलार से उसे जावेद खां कह कर बुलाती थी. जैदा मेरा हमउम्र था. हम दोनों जब भी एक साथ खेलते, मम्मी को गुस्सा आ जाता. वह डांट कर उसे भगा देतीं और मुझे अपने कमरे में ले आतीं. जैदे को पढ़ाई का बहुत शौक था.

जब मैं पढ़ती तो न जाने कहां से वह निकल आता और हसरतभरी नजरों से मुझे देखता रहता. अक्सर जब मेरी कोर्स की किताबें फट जातीं तो मैं मम्मी से छिपा कर उसे दे देती. वह बहुत खुश होता. फटे हुए पेजों को गोंद से चिपका देता और अकसर मेरे पास बैठ कर उन किताबों को पढ़ने की कोशिश करता रहता. हवेली में मेरे साथ खेलने वाला कोई नहीं था. बच्चों को आम तौर पर अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलने का शौक होता है. आपी और जिम्मी भाई, दोनों मुझ से बड़े थे. मैं जब कीमती खिलौनों से खेलखेल कर उकता जाती तो मम्मी से छिप कर जैदे की तरफ चली जाती और जब तक मम्मी अनजान रहतीं, हम दोनों खेलते रहते.

मम्मी ने सब नौकरों को ताकीद की थी कि मुझे जैदे के साथ न खेलने दिया जाए, सो हर तरफ से मेरी निगरानी की जाती थी, यहां तक कि जैदे की मां और नानी भी मेरी मिन्नत करतीं कि मैं जैदे के साथ न खेलूं. वह कहतीं, ‘‘छोटी बीबी, हवेली में चली जाएं. बेगम साहिबा आप को इधर देखेंगी तो नाराज होंगी. उन का सारा गुस्सा हम पर उतरेगा.’’

लेकिन मुझे मम्मी की परवाह न होती. वक्ती तौर पर उन की डांट से मैं सहम जाती, मगर बाद में हम दोनों सब कुछ भुला कर दोबारा खेलने में लग जाते. मम्मी ने कई बार जैदे के गाल पर थप्पड़ मारे थे. उसे बुराभला कहा था और हवेली में तो उस का घुसना ही मना कर दिया गया था. नौकरों को सख्ती से ताकीद थी कि जैदे को हवेली में आने न दिया जाए. लेकिन इन सारी पाबंदियों ने हमारे इकट्ठे खेलने के शौक को और ज्यादा भड़का दिया था. वह हवेली न आता तो मैं उस के कमरे में चली जाती. मम्मी अक्सर मुझे समझातीं, ‘‘रुखसाना बेटी, छोटे लोगों को ज्यादा मुंह नहीं लगाते. इस तरह तुम्हारी आदतें बिगड़ जाएंगी. तुम जैदे के साथ मत खेला करो. वह छोटा है. हमारा उन का कोई जोड़ नहीं.’’

मम्मी न जाने क्याक्या कहती रहतीं, लेकिन उस छोटी सी उम्र में मम्मी की ‘बड़ीबड़ी’ बातें मेरी समझ में न आतीं और मैं उकता कर वहां से उठ जाती. पढ़ाई के जैदे के बेपनाह शौक को देख कर उस की मां ने उसे प्राइमरी स्कूल में दाखिल करवा दिया था. हम रोजाना अपनी जीप में शहर जाया करती थीं, जहां चोटी के एक स्कूल में हम पढ़ती थीं. जैदे के स्कूल में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी, लेकिन उसे अंग्रेजी पढ़ने और सीखने का शौक था. इसलिए अपने स्कूल की छुट्टी के बाद वह मेरी पुरानी किताबें पढ़ा करता था. जो उस की समझ में न आता, वह मुझ से पूछ लिया करता. बचपन में टीचर बनने में बहुत मजा आता था. इसी तरह साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए हम छठी जमात तक आ गए थे.

उन्हीं दिनों जैदे पर 2 इतने बड़े दुख आ पड़े कि उस का नन्हा वजूद उन दुखों तले दब कर रह गया. हमारे इलाके में हैजे की जबरदस्त बीमारी फैली थी. तब इलाज की सहूलियतें न के बराबर थीं. लोग मर रहे थे. जैदे की मां और नानी भी उस की लपेट में आ गईं. जैदे की नानी बेचारी तो पहले ही झटके में मर गईं. जैदे की मां अलबत्ता कुछ दिन जिंदा रही. मम्मी ने उस की दवादारू का इंतजाम भी किया. लेकिन उस का वक्त पूरा हो चुका था. इसलिए वह जैदे को रोताबिखलता छोड़ कर चल बसी. जैदा बिलकुल अकेला और बेसहारा रह गया. वह सारासारा दिन रोता रहता. मेरे सिवा हवेली में उस का कोई हमदर्द नहीं था. मैं खुद भी नासमझ थी. लेकिन हर मुमकिन तरीके से उस का दुख बांटा करती.

मम्मी को तो शुरू से जैदा नापसंद रहा था. इसलिए उन्होंने एक नौकर को जैदे के ताया का पता करने भेजा, ताकि वह आ कर बकौल मम्मी के, इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा दिला दे. लेकिन जैदे का ताया उसे लेने नहीं आया, बल्कि उस ने हवेली के नौकर को अपनी गरीबी की लंबीचौड़ी दास्तान सुनाई, जिस का निचोड़ यही था कि वह अपने बच्चों को ही नहीं पाल सकता तो जैदे को कहां से खिलाएगा? नौकर जब नाकाम लौटा तो मम्मी ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया कि वह जैदे का क्या करेंगी? लेकिन खुदा बड़ा कारसाज है. हमारी हवेली का चौकीदार एक बूढ़ा था. मम्मी ने उसे अलग कमरा दे रखा था. वह बिलकुल अकेला रहता था. उस ने मम्मी से कह कर अपना सामान समेटा और जैदे के पास रहने लगा. इस तरह दोनों को एकदूसरे का सहारा मिल गया.

हालांकि जैदा कमउम्र था, फिर भी बेहद सुलझा हुआ था. छोटी सी उम्र में तल्ख तजुर्बों ने उस की दिमागी उम्र बढ़ा दी थी. उस ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा. खाली समय में वह किराने की एक दुकान पर काम करता. अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए वह रात गए तक बैठा लिफाफे बनाता रहता. छोटी सी उम्र में वह बेहद संजीदा हो गया था. मैं उसे अब भी अपना साथी और दोस्त समझती थी. मम्मी से छिप कर मैं उस के कमरे में चली जाया करती. लेकिन अब हम खेलने से ज्यादा पढ़ा करते थे. मैं जो भी सबक स्कूल में पढ़ती, वह जैदे को जरूर पढ़ाया करती. जैदा मेरे लाख कहने पर भी हवेली में न आता, बल्कि मुझे भी अपने कमरे में आने से मना करता.

उस दिन मेरे सिर में मामूली सा दर्द था. मैं ताजा सबक जैदे को पढ़ाना चाहती थी, लेकिन कमरे में जाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. सुस्ती सी महसूस हो रही थी. मम्मी किसी जलसे में शरीक होने चली गईं तो मैं ने नौकर को भेज कर जैदे को बुलवा लिया. वह पढ़ने के शौक में आ तो गया, लेकिन बेहद सहमा हुआ था. बारबार कह रहा था, ‘‘रुखसाना, बेगम साहिबा ने देख लिया तो बहुत मारेंगी.’’

‘‘अरे कुछ नहीं होता. मम्मी तो हवेली में मौजूद ही नहीं हैं. वह किसी जलसे में हिस्सा लेने शहर गई हैं. रात गए लौटेंगी.’’

मैं और जैदा गुलाबों के कुंज में बैठ गए. मैं उसे पढ़ाने लगी. वह बहुत मन लगा कर पढ़ रहा था कि न जाने कहां से आपी आ गईं. आपी ने तेज नजरों से हमें घूरा और कुछ कहेसुने बगैर अंदर चली गईं. जैदा बेहद घबरा गया और सहमी आवाज में बोला, ‘‘अब मैं जाता हूं रुखसाना. आपी ने देख लिया है. अब वह बेगम साहिबा से शिकायत करेंगी.’’

‘‘अरे बैठो, मम्मी हवेली में मौजूद ही नहीं, तो किस से शिकायत करेंगी? तुम आराम से पढ़ो.’’

जैदा सहमा सा बैठा पढ़ता रहा. लेकिन उस का शक सही था. मम्मी शहर से आ गई थीं और आपी ने जा कर उन से हमारी शिकायत कर दी थी. कुछ देर बाद मम्मी हमारे सामने खड़ी थीं. गुस्से की शिदद्त से वह हांफ रही थीं. उन्होंने आव देखा न ताव, जैदे को पकड़ कर बेतहाशा मारने लगीं. साथसाथ वह बोल भी रही थीं, ‘‘कमबख्त, जलील, कमीने, सौ बार तुझे मना किया कि हवेली में मत आया कर, पर तू मानता ही नहीं.’’

मैं गुमसुम खड़ी उसे मार खाते देखती रही. मम्मी जब उसे मारमार कर थक गईं तो नौकर को बुला कर हुक्म दिया, ‘‘शैदे, क्वार्टर से इस का सामान निकाल कर फेंक दो. देखती हूं, अब यह यहां कैसे रहता है.’’ फिर वह जैदे से कहने लगीं, ‘‘निकल जा, अभी और इसी वक्त निकल जा. अगर आइंदा तू हवेली के आसपास भी देखा गया तो तेरी लाश किसी गंदे नाले में फेंकवा दूंगी.’’

जैदा रोता हुआ वहां से चला गया. आपी और जिम्मी भाई यह तमाशा देखदेख कर खुश हो रहे थे, जबकि मैं मम्मी का दामन पकड़े रो रही थी, ‘‘जैदे को माफ कर दो मम्मी, इसे क्वार्टर से न निकालो. मम्मी, यह कहां जाएगा? यह तो एकदम अकेला है.’’

मम्मी ने मेरे हाथ झटक कर मुझे नौकरानी के सुपुर्द कर दिया, जो मुझे मेरे कमरे में ले गई. वह जैदे से मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस दिन के बाद उस का कोई पता न चल सका. बाद में मैं एक अरसे तक उसे याद करकर के रोती रही. मम्मी ने मुझे और जिम्मी भाई को हौस्टल में दाखिल करवा दिया, क्योंकि अब हमारी क्लासें बड़ी हो गई थीं और घर में पढ़ाई का हर्ज होता था. मैं अक्सर जैदे के बारे में सोचती रहती थी कि वह हवेली से जाने के बाद कहां गया होगा? उस का तो कोई अपना न था, किस ने उसे पनाह दी होगी?

लेकिन आज… आज एक लंबे अरसे के बाद मैं ने उस का नाम सुना भी तो किस अंदाज में? एक इज्जतदार शख्स की शक्ल में, जिस के पास एक बड़ा ओहदा था, इज्जत थी और जिसे मेरा भाई इस बड़ी और आनबान वाली हवेली के मालिक की हैसियत से दावत दे आया था. यह सब क्या था? सब हैरान थे कि यह कैसे हो गया? एक ही छलांग में जैदा जावेद खां कैसे बन गया? जमीन से आसमान तक का यह सफर कैसे तय किया उस ने? लेकिन मुझे कोई हैरानी नहीं थी. उसे तालीम हासिल करने की लगन थी. दीवानगी की हद तक पढ़ने का शौक था और जब शौक जुनून बन जाए तो राह की सारी रुकावटें दूर हो जाती हैं. इसलिए अगर वह कुछ न बनता तो मुझे हैरत होती, लेकिन अब जब वह अपनी मंजिल तक पहुंच गया था, मुझे दूसरों की तरह कोई हैरत नहीं, बल्कि एक इत्मीनान था.

अगले दिन वह हमारे बीच बैठा था. यह वही हवेली थी, जिस में उस का कदम रखना मना था, जहां से उसे मारपीट कर बेइज्जत कर के निकाला गया था. लेकिन आज हालात बदल गए थे. आज मम्मी उस की आवभगत में बिछी जा रही थीं. खाने की मेज पर एकएक चीज उस के सामने रख कर आग्रह से उसे खिला रही थीं, ‘‘खाओ जावेद मियां, तुम तो बराए नाम खा रहे हो. यह शामी कबाब तो तुम ने चखे भी नहीं.’’

‘‘बस बेगम साहिबा, बहुत खा चुका हूं. अब और गुंजाइश नहीं बेगम साहिबा.’’

मैं और जिम्मी भाई बेसाख्ता हंस पड़े. मम्मी बनावटी नाराजगी से कहने लगीं, ‘‘आंटी कहो बेटा.’’

‘‘मैं अपनी औकात नहीं भूला हूं बेगम साहिबा.’’ वह संजीदगी से बोला, ‘‘मैं बहुत छोटा आदमी हूं और इस हवेली के मुझ पर बेशुमार एहसान हैं. खासतौर पर रुखसाना साहिबा का तो मैं बेहद शुक्रगुजार हूं. इन्होंने मेरे मन में पढ़ाई का शौक दोगुना कर दिया था.’’

उस ने गहरी नजरों से मेरी तरफ देखा तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई. मैं गड़बड़ा गई. बेअख्तियार हो कर मैं ने अपनी नजरें झुका लीं. उसे अब नजर भर कर देखना भी मुमकिन नहीं रहा था. वह बड़ा खूबसूरत जवान निकल आया था. वह बारबार मुझे मुखातिब करता और पिछली बातें याद दिलाता, लेकिन मैं जो हर बात पर जम कर बोला करती थी, बहस कर के उसे हरा दिया करती थी, अब उस के सामने बोलना भूल गई थी. अल्फाज जैसे खो गए थे मुझ से. मैं तो उस की शख्सियत के जादू में डूब कर रह गई थी. वह एक अदा से सिगरेट पी रहा था. चेहरे पर कमतरी के निशान बिलकुल नहीं थे. वह कीमती सूट पहने था. मैं गुमसुम बैठी हां में जवाब देती रही.

आपी खाने में मगन थीं. मेहमानों की मौजूदगी में उन्हें खाने पर टोका नहीं जा सकता था और वह ऐसे मौके का खूब फायदा उठाती थीं. रात गए जब वह वापस जाने लगा तो मम्मी ने बड़ी मोहब्बत से उसे आते रहने को कहा. पूरी रात मैं सो न सकी. जावेद मेरे खयालों में आता रहा. उस की रौबदार शख्सियत बारबार मेरी नजरों के सामने आ जाती. उस की धीमी मुसकराहट मेरे दिल में नई उमंग जगाने लगी. फिर सब से ज्यादा उस का बड़प्पन कि एक बार भी उस ने मम्मी को उन का वह सुलूक याद नहीं दिलाया, जो उन्होंने उस के साथ किया था. हां, अपनी जद्दोजहद और कोशिशों की कहानी उस ने जरूर सुनाई कि किस तरह वह अपनी मंजिल तक पहुंचा. लेकिन उस ने एक बार भी मम्मी से यह नहीं कहा कि मुझ यतीम और बेसहारे के सिर पर अगर आप लोग हाथ रख देते तो आप की दौलत में क्या कमी आ जाती? मम्मी शर्मिंदा सी लग रही थीं.

सुबह नाश्ते पर फिर जावेद का जिक्र छिड़ गया. मम्मी हैरानी से कह रही थीं, ‘‘मुझे कभी उस की काबिलियत का अंदाजा नहीं हो सका था. एक छोटा इंसान इतनी मेहनत भी कर सकता है, यकीन नहीं आता.’’

जिम्मी भाई टोस्ट पर जैम लगाते हुए बोले, ‘‘लेकिन आंखों देखे पर तो यकीन करना ही पड़ता है मम्मी. वैसे आप कल बारबार जावेद को हवेली आने के लिए कह रही थीं. क्या आप भूल गईं कि एक दिन वह इसी हवेली से दुत्कार कर निकाला गया था और उस का छोटामोटा सामान आप ने नौकरों के हाथों बाहर फेंकवा दिया था.’’

‘‘आप भूल गए हैं जिम्मी भाई,’’ मैं तल्खी से बोली, ‘‘जब मम्मी ने ऐसा किया था, तब जावेद ‘जैदा’ था, बिन मांबाप का गरीब बच्चा. लेकिन आज वह एक बहुत बड़े ओहदे पर लगा हुआ है, इज्जतदार बंदा है. मम्मी दरअसल जावेद की नहीं, उस के ओहदे की इज्जत कर रही हैं.’’

मम्मी ने तेज नजरों से मुझे घूरा और बोलीं, ‘‘रुखसाना, बड़ों से ऐसी बात नहीं की जाती. क्या तुम ने बाहर रह कर यही सब कुछ सीखा है? जाओ, अपने कमरे में चली जाओ.’’

मैं मुंह बना कर उठ खड़ी हुई. जिम्मी भाई भी उठने लगे तो मम्मी ने उन से कहा, ‘‘तुम बैठो जिम्मी, तुम से कुछ बात करना है मुझे.’’

मैं कमरे से निकल तो आई, लेकिन मेरे कदम रुक गए. मम्मी यकीनन जावेद के बारे में ही जिम्मी भाई से बात करना चाहती थीं. मैं सांस रोक कर दरवाजे की आड़ में खड़ी हो गई. मम्मी धीमी आवाज में जिम्मी भाई से कह रही थी, ‘‘जिम्मी, जब से मैं ने जावेद को देखा है, एक अनोखा खयाल मेरे दिमाग में आ रहा है.’’

‘‘कैसा खयाल मम्मी?’’ जिम्मी भाई की आवाज में हैरत थी.

‘‘सोचती हूं,’’ मम्मी जरा सा रुक कर बोलीं, ‘‘अगर फरजाना का रिश्ता जावेद से तय हो जाए तो कैसा रहेगा?’’

‘‘लेकिन…’’ जिम्मी भाई हकलाते हुए बोले, ‘‘जावेद तो उम्र में मुझ से भी छोटा है और आपी उम्र में मुझ से बड़ी हैं. यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘होने को क्या नहीं हो सकता जिम्मी?’’ मम्मी खुदगर्जी से बोलीं, ‘‘बस जरा चालाकी की जरूरत है. वैसे भी यह तो जावेद के लिए इज्जत की बात है कि हम उसे हवेली का दामाद बना रहे हैं, वरना तालीम और ओहदे को उस की शख्सियत से अलग कर दो तो उस की क्या हैसियत रह जाती है? हवेली की एक नौकरानी का बेटा और बस.’’

‘‘अगर ऐसा हो जाए मम्मी तो हमारी बहुत बड़ी मुश्किल हल हो जाएगी और आपी की जिंदगी सही मायनों में संवर जाएगी. खानदान के जिन लड़कों ने आपी को ठुकराया है, वे मुंह देखते रह जाएंगे. उन में से कोई भी इतने बड़े ओहदे पर नहीं है.’’ जिम्मी भाई जोश से बोल रहे थे और मम्मी शेखी से कह रही थीं, ‘‘यह भी तो कहो न जिम्मी कि तुम्हारे लिए रास्ता साफ हो जाएगा और तुम नाइला को दुलहन बना कर जल्दी ला सकोगे.’’

‘‘अच्छा मम्मी,’’ वह हंस कर बोले, ‘‘आप तो मजाक कर रही हैं.’’

वे दोनों इसी मुद्दे पर बातें करते रहे. लेकिन मेरे सीने में बडे़ जोर का दर्द उठने लगा था. मेरे अंदर जोरदार धमाके होने लगे थे. हाथपांव ठंडे पड़ने लगे. मेरी आंखों में अंधेरा लहरें लेने लगा. मेरा दिल चाहा कि मैं धड़ाम से दरवाजा खोल कर अंदर घुस जाऊं और चिल्लाचिल्ला कर उन से कह दूं, ‘‘ऐ बड़ी हवेली के अंदर बसने वाले छोटे लोगों, जरा अपने गरेबान में झांक कर देखो कि तुम क्या कर रहे हो? क्या जावेद की किस्मत में कूड़ा ही लिखा है? जावेद ने जिस मेहनत और जिस लगन से अपनी जिंदगी बनाई है, तुम लोग आपी को उस की जिंदगी में दाखिल कर के उस की जिंदगी तबाह कर दोगे. यही इंसाफ है तुम्हारा?’’

लेकिन मैं कुछ भी न कर सकी, कुछ भी न कह सकी. बस बेजान कदमों से अपने कमरे में आ गई. यह बात इतनी छोटी नहीं थी कि मैं इस पर चुप रहती. मैं ने जोरशोर से इस पर ऐतराज किया और आपी के सामने कह दिया, ‘‘मम्मी, आप ज्यादती कर रही हैं. आपी और जावेद का कोई जोड़ नहीं है, किसी भी लिहाज से. उम्र में भी आपी जावेद से बहुत बड़ी हैं. खुदा के लिए यह जुल्म न कीजिए, ऐसी शादियां ज्यादा दिन पनप नहीं सकतीं. अंजाम अच्छा नहीं होता ऐसी शादियों का.’’

‘‘तुम बीच में मत बोलो.’’ मम्मी का रंग गुस्से के मारे सुर्ख हो गया.

जिम्मी भाई ने नाराजगी से मुझे घूरा, ‘‘तुम से किस ने राय मांगी है रुखसाना?’’

मैं ने आपी की तरफ देखा. शायद वही ऐतराज कर दे इस बेजोड़ रिश्ते पर, लेकिन उन्हें तो खाने के सिवा किसी बात से कोई सरोकार ही नहीं था. वे सब क्या कर रहे थे? किस के लिए कर रहे थे? उन्हें परवाह ही नहीं थी कोई. थकहार कर मैं चुप हो गई. जावेद 2-3 बार हवेली में आया. सब साथ ही बैठे रहते. वह अक्सर कहता, ‘‘तुम बहुत चुपचुप सी हो गई हो रुखसाना. बचपन में तो तुम ऐसी नहीं थीं. बहुत ही शरारती और बातूनी हुआ करती थीं. तुम्हें याद है जब तुम ने…’’ वह बचपन का कोई किस्सा सुनाने लगा. मैं खोईखोई बैठी रहती….खालीखाली नजरों से उसे देखती रहती. जिम्मी भाई और मम्मी बेमकसद हंसने लगते. मम्मी उस की खूब आवभगत करतीं. आपी को हर रोज बेहतरीन सूट पहनातीं. जावेद जब मेरे बारे में बात करता तो मम्मी घुमाफिरा कर आपी की बात शुरू कर देतीं.

वह जावेद के दौरे का आखिरी दिन था. कल उसे वापस जाना था. उस दिन वह सब से मिलने के लिए हवेली आया तो उस ने सब को दावत दी कि शहर आ कर कुछ दिन उस को मेजबानी का मौका दें. मुझ से वह बारबार कह रहा था, ‘‘रुखसाना, मैं ने अपने लौन में मोतिया के बेशुमार पौधे लगाए हैं. तुम्हें बचपन में मोतिया की खुशबू कितनी पसंद थीं, तुम मेरे घर आना. तुम्हें बेहद भला लगेगा.’’

मेरे बजाय मम्मी ने जवाब दिया, ‘‘हां…हां… जावेद मियां, जरूर आएंगे.’’

वह चला गया. उस के जाने के बाद मुझे यों लगा, जैसे चिरागों में रोशनी न रही हो. मेरे अंदर अंधेरा फैलने लगा. जिम्मी भाई और मम्मी क्या बातें कर रहे थे, मुझे सुनाई नहीं दे रहा था. मैं अपने वजूद को संभालती हुई अपने कमरे में आ गई और बेदम हो कर बिस्तर पर ढह गई. यों सुबह मेरी आंखें देर से खुलीं. रात भर मैं परेशान रही थी. मुझे चाहिए था कि मैं जावेद को खबरदार कर देती कि कहीं वह मम्मी के बिछाए जाल में न फंस जाए. मैं खुद को मुजरिम समझ रही थी, लेकिन कुसूर मेरा भी नहीं था. मम्मी और जिम्मी भाई ने एक मिनट के लिए भी मुझे अकेले नहीं छोड़ा जावेद के पास. शायद वे समझ गए थे कि मैं मौका पा कर जावेद को सारी बात बता दूंगी.

मेरा दिल हौल रहा था. मैं ने जल्दीजल्दी मुंह पर पानी के छपाके मारे और ड्राइंगरूम की तरफ चल दी. लेकिन मुझे ठिठक कर रुकना पड़ गया. वहां तो नजारा ही और था. मम्मी गुस्से के मारे लालपीली हो रही थीं. हमेशा नरम आवाज में बात करने वाली मम्मी बुरी तरह चीख रही थीं, ‘‘कमीना, बदजात, गंदी नाली का कीड़ा, दो टके का आदमी, आज हमारी बराबरी करना चाहता है?’’

उधर जिम्मी भाई मुट्ठियां भींचभींच कर तैश में कह रहे थे, ‘‘मैं उस खबीस के टुकड़ेटुकडे़ कर दूंगा. उस की यह हिम्मत कैसे हुई? जलील इंसान अपनी हैसियत भूल गया. लेकिन मैं उसे अपनी हैसियत याद दिलाऊंगा. समझता क्या है खुद को?’’

‘‘क्या हुआ मम्मी?’’ मैं घबराकर बोली. आपी जो टोस्ट पर मक्खन की तह लगा रही थीं, मुझे देख कर अजीब बेढंगेपन से हंसने लगीं. मैं घबरा कर बारीबारी सब की तरफ देखने लगी, ‘‘आप सब मुझे बताते क्यों नहीं कि आखिर क्या बात हुई है?’’

अजीब ठंडे अंदाज में मम्मी ने एक मुड़ातुड़ा कागज मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो, उस खबीस की हिम्मत खुद देख लो.’’ मम्मी कमरे से बाहर चली गईं. उन के पीछेपीछे जिम्मी भाई भी चले गए. आपी अपना नाश्ता खत्म कर चुकी थीं. सो उन के रुकने की भी कोई वजह नहीं थी. वह मुझे देखती और मुसकराती हुई कमरे से बाहर निकल गईं. अजीब बेवकूफी भरी मुसकराहट थी उन के होंठों पर. या खुदा, मैं पागल हो गई हूं या ये सब पागल हो गए हैं? मैं ने झुंझला कर वह मुड़ातुड़ा कागज खोला और मेरी नजरें तेजी से उन सतरों पर दौड़ने लगीं. वह जावेद का खत था मम्मी के नाम. लिखा था : बेगम साहिबा,

आदाब! आप का पैगाम मिला. इज्जतअफजाई का शुक्रिया. मैं यकीनन इस रुतबे और मकाम के काबिल नहीं हूं और आप का जितना भी शुक्रिया अदा करूं, कम होगा. लेकिन गुस्ताखी माफ बेगम साहिबा! आपी को मैं ने हमेशा से अपनी बड़ी बहन का दर्जा दिया है. इस नजर से मैं ने उन्हें कभी नहीं देखा. उन की शख्सियत मेरे लिए काबिलेइज्जत रही है और सारी उम्र काबिलेइज्जत रहेगी.

दरअसल, खुद मैं भी आप से हाथ जोड़ कर दरख्वास्त करना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ रही थी. ऐसा लगता था, जैसे छोटे मुंह बड़ी बात कह दी जाए. आप की नाराजगी और कहर का डर था. अपनी कमतरी का अहसास था. इसलिए मैं अपने दिल की सारी ख्वाहिशें दिल में ही छिपा कर यहां से विदा होना चाहता था. लेकिन आज जब आप का पैगाम मिला तो मेरे अंदर भी हिम्मत पैदा हो गई और मैं ने सोचा कि अगर आप मुझे दामाद की हैसियत देना ही चाहती हैं तो रुखसाना का हाथ मेरे हाथ में दे दीजिए. मैं सारी जिंदगी आप का एहसान नहीं भूलूंगा बेगम साहिबा! यह आज की ख्वाहिश नहीं, मुद्दतों पहले की ख्वाहिश है, तब की, जब आप की डांट और मार के बावजूद हम इकट्ठे खेलने और इकट्ठे पढ़ने से बाज नहीं आते थे. तब मैं कुछ भी नहीं था और आज जो कुछ बना हूं, इसी ख्वाहिश की बदौलत बना हूं. मैं जल्दी ही आ कर आप का जवाब लूंगा.

—खैरअंदेश जावेद खां

कागज का पुर्जा मेरे हाथों में फड़फड़ा रहा था. मेरी रगों में भयानक बेचैनी दौड़ने लगी थी. दिल में दहकती हुई आग भर गई थी. बड़े घरों में बसने वाले लोग कितने बेबस और मजबूर होते हैं, यह अब मेरी समझ में अच्छी तरह आ रहा था.

मैं भागीभागी अपने कमरे में आई. मुलायम बिस्तर जहरीले कांटों की सेज लग रहा था. रोती रही… सैलाब आ गया था मेरी आंखों में. …फिर उठी और सोचने लगी.

आखिरकार मेरे दिल ने और मेरे दिमाग ने भी वह फैसला ले लिया, जो कभी मेरे तसव्वुर में भी न आया था. एक दिन सहेली के घर जाने के बहाने निकली तो फिर हवेली लौटी ही नहीं. आज मेरी जिंदगी के गुलशन में बेहद प्यारी खुशबू वाले दो फूल खिले हैं. बताने को कहिए बता दूं कि आपी के लिए एक गरीब दूल्हा खरीद लिया गया और फिर जिम्मी भाई की भी नाइला से शादी हो गई. लेकिन इतना सब होने में इतनी आंधियां चलीं, इतना गुबार उठा कि खुदा न करे, किसी खानदान में वैसा हो. इसीलिए तो कभीकभी शिद्दत से महसूस होता है कि बहार आई भी तो …

 

Love Story Hindi Kahani: प्रेमिका ही क्यों झेले शक के ताने

Love Story Hindi Kahani: 29 वर्षीय रितिका सेन को 2 बच्चों के बाप सचिन राजपूत से प्यार हो गया. सचिन भी रितिका को अपना दिल दे बैठा. सचिन उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगा. एकदूसरे को दिलोजान से चाहने वाले इस प्रेमी युगल के संबंधों में कड़वाहट भी पैदा हो गई. फिर एक दिन यही कलह उस मुकाम पर पहुंची कि…

27 जून, 2025 की रात को भी रितिका देर से घर लौटी तो उस के चरित्र को ले कर सचिन ने एक बार फिर से गंभीर टीकाटिप्पणी की तो रितिका की उस से तीखी नोकझोंक हो गई.

”मैं जानता हूं कि तू अपने बौस के साथ गुलछर्रे उड़ा कर आ रही है, इसी कारण घर आने में देर हुई.’’

”तुम्हें शर्म आनी चाहिए ऐसी बात कहते हुए.’’ रितिका कह देती, ”कोई एक बात तो बताओ जो मुझे चरित्रहीन साबित कर दे. कम से कम तोहमत लगाने से पहले मेरी नौकरी करने वाली कंपनी में जा कर लोगों से पूछ तो लेते मेरा चरित्र कैसा है. मैं नौकरी सिर्फ इसलिए करती हूं कि जब तक तुम बेरोजगार हो, तब तक घर अच्छे से चल सके.’’ रितिका ने समझाया.

”मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं है, मैं सब जानता हूं. तुझे घर चलाने की फिक्र नहीं, बौस से मिलने की फिक्र ज्यादा होती है.’’ सचिन ने ताना दिया.

उसी समय सचिन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया था. सचिन देर रात तक जागता रहा. रात तकरीबन 12 बजे का समय था, समूचे गायत्री नगर में सन्नाटा पसरा हुआ था, तभी सचिन ने पूरी ताकत से रितिका का गला दबा दिया. उस की चीख भी नहीं निकल सकी. सचिन के शक्की मिजाज ने उसे हैवान बना दिया था. लगभग साढ़े 3 साल से सचिन राजपूत के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही रितिका को मौत के घाट उतारते वक्त उस के हाथ नहीं कांपे. हत्या करने के बाद उस की लाश चादर में लपेट कर बैड पर रख दिया और 2 दिनों तक लाश के बगल में शराब पी कर बिना किसी हिचकिचाहट के सोता रहा.

अपनी प्रेमिका की हत्या करने के बाद जैसे ही सचिन राजपूत नशे की हालत से बाहर आया तो उस ने मिसरोद में रहने वाले अपने दोस्त अनुज उपाध्याय को फोन कर अपनी प्रेमिका रितिका की हत्या की सूचना दे दी. रितिका की हत्या बात सुन कर पहले तो अनुज को सचिन की बात पर भरोसा नहीं हुआ, लेकिन जब सचिन ने जोर दे कर कहा तो अनुज उपाध्याय ने बिना देरी किए बजरिया थाने की एसएचओ शिल्पा कौरव को इस की सूचना दे दी. हत्या की सूचना पा कर एसएचओ शिल्पा कौरव तुरंत अपने सहायकों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गईं. रास्ते में ही उन्होंने इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी थी.

कुछ देर में वह गायत्री नगर, भोपाल के फ्लैट नंबर 34 पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल और शव का बारीकी से निरीक्षण किया. रितिका की लाश 48 घंटे से ज्यादा समय तक चादर में लिपटे पड़े रहने से डीकंपोज (खराब) होने लगी थी, अत: उन्होंने जरूरी काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और फ्लैट में ही मौजूद मृतका के हत्यारे लिवइन पार्टनर सचिन राजपूत को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी. पूछताछ में सचिन ने अपनी प्रेमिका रितिका सेन की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

उधर जिस फ्लैट में रितिका और सचिन पिछले 9 महीने से किराए पर रह रहे थे, उस के मालिक शैलेंद्र वर्मा ने पुलिस को बताया कि वह तो दोनों को पतिपत्नी ही समझते थे. फ्लैट किराए पर लेते वक्त सचिन ने रितिका को अपनी पत्नी बताया था. हालांकि रितिका की मांग में सिंदूर भरा न देख मेरी पत्नी ने रितिका को टोका भी था. तब रितिका ने कहा था कि आंटीजी, मैं प्राइवेट कंपनी में काम करती हूं, वहां कोई भी शादीशुदा महिला मांग भर कर नहीं आती, इसलिए मैं भी नहीं भरती. वैसे भी मैं नए खयालातों की हूं. गहनता से की गई पूछताछ में ऐसी कहानी निकल कर सामने आई कि पुलिस भी सोचने पर मजबूर हो गई. चौंकाने वाली बात यह थी कि सचिन राजपूत ऐसा हैवान था, जिसे अपनी प्रेमिका की हत्या करने का तनिक भी मलाल नहीं था.

29 वर्षीय रितिका सेन और सचिन राजपूत के बीच शुरुआत में मोबाइल पर प्यार भरी बातों का सिलसिला शुरू हुआ, फिर छोटीछोटी मुलाकातें जब आगे बढ़ीं तो दोनों के दिलों में प्यार का अंकुर फूटने लगा. कुछ ही दिनों में उस ने वृक्ष का रूप अख्तियार कर लिया. कुछ समय तक पिकनिक स्पौट, कैफे और पार्क में मुलाकातें करने के बाद दोनों ने बिना किसी हिचकिचाहट के लिवइन रिलेशनशिप में रहने का फैसला कर लिया. यह बात जैसे ही दोनों के फेमिली वालों को मालूम हुई तो उन्होंने इस का विरोध किया. क्योंकि रितिका सेन समाज की थी, जबकि सचिन जाति से राजपूत था. इतना ही नहीं, वह 2 बच्चों का बाप था और रितिका के चक्कर में पत्नी से तलाक लेने की कोशिश कर रहा था. दोनों के फेमिली वाले उन की आशिकी को ले कर परेशान थे.

फेमिली वालों ने उन्हें हर तरह से समझाया. ऊंचनीच का वास्ता दिया, लेकिन फेमिली वालों के विरोध की परवाह किए बिना ही दोनों भोपाल के गायत्री नगर इलाके में किराए पर फ्लैट ले कर रहने लगे. शुरुआत के दिनों में दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहते हुए बेहद खुश थे. सचिन विदिशा जिले के सिरोंज का रहने वाला था, जबकि रितिका भोपाल की. वह अपने फेमिली वालों को छोड़ कर अपने प्रेमी के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी. इस का असर यह हुआ कि वे एकदूसरे की अच्छाइयों और कमजोरी को जान गए. समय अपनी गति से गुजरता रहा. इस बीच सचिन रितिका के मोबाइल फोन के हर वक्त बिजी रहने से काफी तनावग्रस्त रहने लगा था. क्योंकि वह जब भी उसे फोन करता, उस का मोबाइल व्यस्त ही आता था. सचिन समझ नहीं पा रहा था कि वह हर वक्त किस से बात करती है.

इसी हकीकत को जानने के लिए सचिन ने एक दिन उस का मोबाइल चैक किया तो पता चला कि वह घंटों अपने बौस से बातें करती है. सचिन समझ गया कि रितिका और उस के बौस के बीच अवश्य चक्कर है. चरित्र पर संदेह करने की वजह से दोनों में अकसर लड़ाई होने लगी थी. यह लड़ाई कभीकभी मारपीट तक पहुंच जाती थी. सचिन बेरोजगार था. रितिका के नौकरी करने से किसी तरह उस की गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी. रितिका को प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने की वजह से घर आने में अकसर देर हो जाती थी. उधर अकसर उस का मोबाइल फोन भी व्यस्त रहता था.

यह बात सचिन को कतई पसंद नहीं थी. रितिका जिस दिन भी घर देर से आती, सचिन जरूर उस से झगड़ा करता. अनेक बार रितिका ने सचिन को समझाया भी कि देखो, तुम्हारा शक झूठा है. तुम्हें घर पर निठल्ले बैठेबैठे शक करने की बीमारी हो गई है. इस उम्र में मैं अपने बौस से इश्क लड़ा कर क्या अपना भविष्य चौपट करूंगी.

”मैं सब जानता हूं, तुम जैसी लड़कियां अपने प्रेमी को बहलाने के लिए इसी तरह की नौटंकियां किया करती हैं,’’ सचिन ने गहरी नजर से घूरते हुए कहा.

रितिका ने कहा, ”तुम्हें तो कोई चिंता है नहीं, तुम यूं ही शक करते रहे तो न जाने एक दिन क्या होगा.’’

सचिन अपने शक से बाहर निकलने को कतई तैयार नहीं था. रितिका सचिन को समझातेसमझाते थक चुकी थी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था.

27 जून, 2025 की रात रितिका ने सचिन से दोटूक शब्दों में कहा, ”आए दिन तुम मेरे चरित्र पर तोहमत लगाते रहते हो, यह अच्छी बात नहीं है.’’

रितिका की बात पर सचिन को ताव आ गया. बोला, ”तेरी जुबान आजकल कुछ ज्यादा ही चलने लगी है,’’ कहते हुए उस ने रितिका पर हाथ छोड़ दिया. कहते हैं कि शक इंसान को किसी भी हद तक सोचने पर मजबूर कर देता है, एक बार शक ने पैर जमाए तो वह दिमाग में घर कर के बैठ गया, लाख समझाने के बाद भी सचिन का शक बढ़ता गया तो वह खोयाखोया रहने लगा. शक पूरी तरह से उस की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. जिस दिन भी रितिका देर शाम अपनी नौकरी से घर वापस आती, सचिन ने घर में तूफान खड़ा कर देता.

बात 26 जून, 2025 की है. शाम के 6 बजे थे. उस दिन सचिन का मन रितिका से तकरार हो जाने की वजह से कुछ उखड़ा हुआ था, लेकिन इस के बावजूद भी वह अपने मित्र अनुज उपाध्याय को ले कर अपने फ्लैट पर आया था. फ्लैट के भीतर कदम रखते ही सचिन ने मित्र को बैठक में बिठा दिया और रितिका को आवाज लगाई. कई बार आवाज लगाने के बावजूद रितिका ने कोई जवाब नहीं दिया, इस पर सचिन बैडरूम का दरवाजा धकेल कर जैसे ही बैडरूम में घुसा, उस ने रितिका को गहरी नींद में सोता हुआ पाया. तब वह बोला, ”रितिका डार्लिंग, देखो मेरे साथ कौन आया है?’’

फिर भी रितिका ने कोई उत्तर नहीं दिया. तब सचिन अपने दोस्त की ओर मुंह कर धीरे से बोला, ”गहरी नींद में सो रही है.’’

जबकि असलियत यह थी कि उसे नींद से जगाने का साहस सचिन जुटा नहीं पा रहा था. इस की वजह थी, बीती रात रितिका के साथ हुई उस की तीखी नोकझोंक. रितिका के चरित्र को ले कर शुरू हुई नोकझोंक में जितना सचिन ने कहा, उस से कहीं ज्यादा जलीकटी बातें रितिका ने उसे सुना दी थीं. एक तरह से रितिका ने अपना सारा गुस्सा उस पर उतार दिया था. सुबह होने पर सचिन ने रितिका को गुस्से के मूड में ही पाया. वह अपनी नौकरी पर जाने से पहले गुमसुम रह कर किचन में अपने लिए लंच तैयार करने में जुटी हुई थी. इस दौरान न तो सचिन ने रितिका से एक भी शब्द बोला और न रितिका ने अपनी जुबान खोली. यहां तक कि उस ने बेमन से नाश्ता तैयार किया.

दरअसल, रितिका अपना काम मेहनत और लगन से करती थी, जिस से उस के बौस उस से काफी खुश थे. रितिका का अपने बौस से बेझिझक और खुल कर बातें करना सचिन के संदेह का कारण बन गया, जो वक्त के साथ गंभीर होता जा रहा था. सचिन इस के लिए रितिका को कई बार समझा भी चुका था, लेकिन रितिका ने उस पर ध्यान नहीं दिया था. उस का कहना था कि कंपनी में वह जिस माहौल में काम करती है, उस में बौस से ले कर अन्य कर्मचारियों से संपर्क में रहना ही पड़ता है. मगर सचिन यह मानने को तैयार नहीं था. रितिका के चरित्र को ले कर सचिन राजपूत का संदेह दिनप्रतिदिन गहरा होता जा रहा था.

सचिन बीती रात से ले कर सुबह होने तक की यादों से तब बाहर निकला, जब उस के दोस्त अनुज ने आवाज लगाई, ”सचिन, क्या हुआ, सब खैरियत तो है न? रितिका भाभी कहीं गई हैं क्या?’’

”अरे नहीं यार, अभी तक वह सो रही है. लगता है गहरी नींद में है, उसे गहरी नींद से जगाना उचित नहीं होगा.’’ सचिन वहीं से तेज आवाज में बोला.

”कोई बात नहीं, तुम यहां आ जाओ.’’ अनुज बोला और सचिन ने बैडरूम का दरवाजा खींच कर बंद कर दिया.

संयोग से दरवाजे के हैंडल पर उस का हाथ लग गया और दरवाजा खट से तेज आवाज के साथ बंद हो गया. इसी खटाक की आवाज से रितिका की नींद भी खुल गई. सचिन बैडरूम से निकल कर अपने दोस्त अनुज के पास आ कर बैठ गया. कुछ देर में रितिका भी आंखें मलती हुई बैडरूम से किचन में चली गई. किचन में जाते हुए उस की नजर बैठक में बैठे सचिन के दोस्त अनुज उपाध्याय पर पड़ गई थी. अनुज ने भी रितिका को देख लिया था और देखते ही तुरंत बोल पड़ा, ”भाभीजी नमस्ते, कैसी हैं आप?’’

थोड़ी देर में रितिका ने एक ट्रे में पानी से भरे 2 गिलास टेबल पर रख दिए. अनुज ने भी पानी पीने के बाद खाली गिलास ट्रे में रख दिया. रितिका अनुज से परिचित थी और यह भी जानती थी कि यह सचिन का करीबी दोस्त है. इस कारण उस के मानसम्मान में कभी कोई कमी नहीं रखती थी. अनुज से अनौपचारिक बातें करने के बाद दोबारा वह किचन में चली गई. कुछ मिनट में ही रितिका अनुज और सचिन के पास 3 कप चाय के ट्रे में ले कर उन के सामने ही सोफे पर बैठ गई थी. हकीकत में अनुज को सचिन के साथ आया देख कर रितिका कुछ सुकून महसूस कर रही थी. वह भी बीती रात से ले कर कुछ समय पहले तक के मानसिक तनाव से उबरना चाह रही थी.

रितिका ने चाय का कप उठा कर मुसकराते हुए अनुज की ओर बढ़ा दिया. अनुज हाथ में कप लेते हुए बोला, ”भाभीजी, आप ठीक तो हैं न? कैसी हालत बना रखी है आप ने? लगता है, सारी रात ठीक से सो नहीं पाई हो?’’

रितिका मौन बनी रही. उधर सचिन भी मौन रहा. कुछ पल बाद रितिका धीमे स्वर में बोली, ”यह अपने जिगरी दोस्त से पूछो, तुम्हारे सामने ही बैठा है.’’

”क्यों भाई सचिन, क्या बात है?’’

”अरे यह क्या बोलेगा, इस ने तो मेरी जिंदगी में तूफान ला दिया है. अब शेष बचा ही क्या है, अपने दोस्त को तुम ही समझाओ.’’ रितिका थोड़ा तल्ख आवाज में बोली.

”क्या बात हो गई? क्या तुम दोनों के बीच फिर से तूतूमैंमैं हुई है?’’ अनुज बोला.

”आप तूतूमैंमैं की बात करते हो,’’ कुछ देर मौन रह कर रितिका ने फिर बोलना शुरू किया, ”साढ़े 3 साल मेरे साथ गुजारने के बाद तुम्हारा मित्र कहता है कि मैं चरित्रहीन हूं, मेरा अपने बौस के साथ चक्कर चल रहा है. मुझे अब भलीभांति समझ में आ गया है कि तुम्हारे बेरोजगार दोस्त को सिर्फ मेरे कमसिन जिस्म और पैसों में दिलचस्पी थी. उसे न मेरी जिंदगी से कोई मतलब और न ही मेरी भावनाओं से, वह तो सिर्फ मेरे जिस्म से अपनी कामोत्तेजना शांत कर मेरे द्वारा नौकरी कर के मेहनत से लाए पैसों से मौज कर रहा है.

”साढ़े 3 साल तक मेरे साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद अब तुम्हारे दोस्त को मैं चरित्रहीन नजर आने लगी. इस के इश्क के चक्कर में मैं ने अपने घर वालों से नाता तोड़ लिया. और अब ये कह रहा है कि तू चरित्रहीन है, मैं अब तेरे साथ नहीं रह सकता, तू तो अपने बौस के साथ रह. अनुज, अब तुम ही बताओ कि मैं कहां जाऊं? क्या करूं? क्या जहर खा कर आत्महत्या कर लूं?’’

”भाभीजी, आप ऐसा कुछ भूल कर भी मत कर लेना वरना सचिन को जेल की हवा खानी पड़ेगी.’’ अनुज ने सचिन को समझाने का भरपूर प्रयास किया.

”यही तो मेरी जिंदगी बन गई है. कहां तो मुझ पर बड़ा प्यार उमड़ता था. कहता था जानेमन, तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता. कहां गईं वो प्यार की बातें? कहां गए वादे, जिस के भरोसे मैं ने अपने पेरेंट्स और भाई से नाता तोड़ दिया था.’’

रितिका भाभी ने जब अपने मन की भड़ास पूरी तरह से निकाल ली, तब अनुज सचिन से बोला, ”क्यों भाई सचिन, ये मैं क्या सुन रहा हूं? रितिका भाभी जो कुछ कह रही हैं, क्या वह सही है? यदि हां तो तुम्हें रितिका भाभी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए.’’

सचिन दोस्त अनुज की बातें चुपचाप सुनता रहा. उस की जुबान से एक शब्द नहीं निकला. सचिन की चुप्पी देख कर अनुज फिर बोलने लगा, ”तुम्हें रितिका भाभी के चरित्र पर संदेह करते हुए जरा भी शर्म नहीं आती?

”भाभी का अपने बौस के साथ चक्कर चलने का बेबुनियाद आरोप लगा कर तुम उन की चारित्रिक हत्या करने के साथ जिंदगी के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हो. देखो, तुम दोनों की भलाई इसी में है कि तुम जितनी जल्दी हो सके, रितिका भाभी से माफी मांगने के बाद विधिवत शादी कर लो और उन्हें समाज में सिर उठा कर पूरे मानसम्मान के साथ जीने का अधिकार दे दो.’’

मानसम्मान की बात सुनते ही सचिन बिफर पड़ा. तल्ख स्वर में बोला, ”अनुज, किस मानसम्मान की बात कर रहे हो, रितिका के चरित्र को ले कर इस के औफिस के लोगों से ले कर कालोनी के लोग क्या कुछ नहीं कहते हैं. ये भी रोज ताना मारती है कि मैं यदि नौकरी करने नहीं जा रही होती तो नानी याद आ जाती, कहां से देते फ्लैट का भाड़ा, लाइट का बिल, दूध और किराने वाले को पैसे. खुद बेरोजगार होते हुए भी काम की तलाश में नहीं जाते, सारा दिन मोबाइल फोन और टीवी सीरियल देखने में वक्त जाया करते रहते हो.’’

इतना सब सुनने के बाद अजीब दुविधा में फंसा अनुज समझ नहीं पा रहा था कि वह किस का पक्ष ले और किसे समझाए? फिर भी अनुज ने दोनों को बात का बतंगड़ न बनाने और प्रेम से मिल कर रहने की सलाह दे सचिन के घर से विदा ली. अनुज उपाध्याय के जाते ही दोनों आपस में फिर से उलझ गए. दोनों में तूतूमैंमैं होने लगी. दोनों तेज आवाज में एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगाने लगे कि उन के आपसी विवाद में अनुज को क्यों लाया गया? इसी बात को ले कर रितिका और सचिन में नोकझोंक होती रही.

उन दोनों में नोकझोंक होने की आवाज पड़ोसियों को सुनाई दे रही थी, लेकिन उस के भाड़े के फ्लैट के आसपास कोई ऐसा पड़ोसी नहीं था, जो उन दोनों को झगडऩे से रोक सके, उन को शांत कर सके या फिर उन्हें समझा सके. पड़ोसियों के लिए तो उन के झगड़े आए दिन की बात हो चुकी थी. फिर रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर सचिन राजपूत ने रितिका सेन की हत्या कर दी. पूछताछ के बाद पुलिस ने सचिन राजपूत को अदालत में पेश किया, जहां से उसे हिरासत में जेल भेज दिया गया. सचिन ने यदि अपने शक्की मिजाज को काबू रख कर अपनी प्रेमिका की बात पर भरोसा कर के जिंदगी जी होती तो शायद जेल जाने की नौबत नहीं आती. Love Story Hindi Kahani

 

 

Love Story in Hindi: प्यार में न बनें बौयफ्रेंड का खिलौना

Love Story in Hindi: एक निजी अस्पताल में नर्स 24 वर्षीय समरीन की दिनचर्या भले ही व्यस्त थी, लेकिन उस के दिल का कोना खाली था. अपने सपनों के राजकुमार की उसे भी तलाश थी. इंस्टाग्राम के जरिए उस की जिंदगी में 25 वर्षीय गौसे आलम ने एंट्री तो की, लेकिन उस ने समरीन को एक ऐसा खिलौना समझा कि…

समरीन ने इंस्टाग्राम पर अपनी जो फोटो पोस्ट की थी, उस में उस का चेहरा आधा दिखता, आधा छिपा हुआ था. उस का हिजाब उस की पहचान बन चुका था. लोग यही समझते थे कि वह एक शरीफ मुसलिम लड़की है, परदे में रहती है. वह जनपद मुरादाबाद के गांव रुस्तम नगर सहसपुर में स्थित अपने घर से करीब 12 किलोमीटर दूर सेफनी कस्बे के एक अस्पताल में नर्स थी. समरीन अस्पताल की लंबी शिफ्ट से थक जाती थी, लेकिन मरीजों की देखभाल में अपना सारा दर्द भूल जाती थी, परंतु रात में अकेलापन उसे घेर लेता.

वह अस्पताल में हर दिन मौत और जिंदगी की जंग देखती थी. रोजाना घर से अस्पताल जाना और वापस घर आना सफर की थकान, साथ में अस्पताल के काम की थकान यह सब समरीन की जिंदगी का हिस्सा था. फिर भी उस के दिल में प्यार की गहराई, भावनाओं का सैलाब, दर्द, तड़प सब कुछ अनुभव करने की अपार क्षमता थी. अपने सपनों के राजकुमार की उसे भी तलाश थी. समरीन को इंस्टाग्राम पर नएनए लोगों से दोस्ती करना अच्छा लगता था. वह फोटोग्राफी और किताबों की तसवीरें डालती, छोटेछोटे कैप्शन में अपने दिल की बातें लिखती.

एक दिन उसे एक युवक का मैसेज मिला. उस की प्रोफाइल खंगाली तो वहां थोड़ेबहुत सुंदर फोटो थे, गौसे आलम नाम था उस का. नाम ऐसा था जो सुनने में सुकून दे रहा था. शुरुआत में तो बस सामान्य ‘हाय’ लिखा मैसेज देखा तो नसरीन ने भी उस का उत्तर ‘हाय’ में ही दे दिया. गौसे आलम एक 25 साल का ट्रक ड्राइवर था, जो लंबी दूरी की सड़कों पर जीवन बिताता था. अकेलापन, परिवार की जिम्मेदारी और जीवन की कठोर सच्चाइयां उस की साथी थीं. गौसे आलम की जिंदगी ट्रक की स्टीयरिंग और राजमार्गों पर लंबीलंबी दूरी तक माल ढोते हुए ही गुजर रही थी. कहीं वह रात में विश्राम करता तो वह रातों में खुद को अकेला महसूस करता. परिवार के लिए पैसा कमाता, लेकिन दिल खाली था. रात में मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया घूमना उस का शौक था.

वह जनपद मुरादाबाद के ही थाना कुंदरकी के चकफाजलपुर गांव का निवासी था. उस का इंस्टाग्राम अकाउंट जैसे उस की छोटी सी दुनिया था. तसवीरें, शायरी और कभीकभी दिल की बातें. हर रात वह अपनी किसी पोस्ट के नीचे लिखता, ‘कोई तो होगी, जो मेरे दिल की बात समझेगी’. वह चाहता था कोई ऐसी लड़की, जो उस की पोस्टों में छिपे जज्बात को महसूस कर सके, उस की अकेली जिंदगी में रंग भर सके. धीरेधीरे उसे समझ आया कि तमाम लड़के आजकल इंस्टाग्राम पर किस तरह की मोहब्बत ढूंढते हैं. कभी लाइक के जरिए, कभी कमेंट से बात शुरू कर के तो कभी किसी की स्टोरी पर रिप्लाई दे कर. गौसे आलम भी वही करने लगा. हर नई तसवीर पर मुसकराहट के साथ एक दिल भेज देता, कभी किसी शायरी पर ‘वाह!’ लिख देता.

एक रात ट्रक सड़क किनारे खड़ा कर के  उस ने इंस्टाग्राम ओपन किया. उस की निगाहें हिजाब पहने हुए एक फोटो पर टिक गईं. उस का नाम था समरीन. वह काफी देर चेहरे को देखता रहा. उस की एक पोस्ट ने गौसे आलम का ध्यान खींचा. अस्पताल की बालकनी से ली गई तसवीर, जहां वह मास्क लगाए एक बच्चे को गोद में ले कर मुसकरा रही थी. यह पोस्ट उस की भावनात्मक थकान दिखाती थी. नर्स की जिम्मेदारी में छिपा दर्द उस की आंखों से छलक रहा था. फिर उस ने समरीन की प्रोफाइल देखी. उस की प्रोफाइल की तसवीर में हल्की मुसकान थी और बायो में लिखा था, ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए.’

गौसे आलम ने हिम्मत की और उस की  शायरी पर कमेंट किया, ‘लफ्ज तो बहुत लोग लिखते हैं, पर एहसास सिर्फ तुम लाती हो.’ समरीन ने भी उसे ‘शुक्रिया’ लिखा, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. धीरेधीरे चैट शुरू हुई, फिर देर रात तक चलने लगी. दोनों अपनीअपनी जिंदगी की खाली जगहों को एकदूसरे के शब्दों से भरने लगे. गौसे आलम अब हर सुबह उस की ‘गुड मार्निंग’ का इंतजार करता. समरीन उसे अपने कालेज की बातें बताती और गौसे आलम अपने लंबे सफर की दास्तान सुनाता. अपनी दिन भर की थकान के बीच उस की हंसी में सुकून ढूंढता. उस दिन के बाद से इंस्टाग्राम अब सिर्फ एक ऐप नहीं रहा, वो उन की मोहब्बत की गवाही देने वाला आईना बन गया.

गौसे आलम अब रोज नई तसवीर नहीं डालता, बस एक ही कैप्शन लिखता है ‘मिल गई वो, जिस से जिंदगी रंगीन हो गई.’ इस तरह दोनों तरफ से मैसेज का सिलसिला शुरू हो गया. समरीन हर रोज सुबहशाम 1-2 लाइनें हंसीमजाक, मजहबी और कभी गहराई की बातें पोस्ट किया करती थी. जैसे कोई साथी मिल गया हो. गौसे आलम ने एक दिन दिल  की गहराई से एक पोस्ट लिखी, ‘तुम्हारी मुसकराहट तो मेरी रातों की थकान मिटा देती है. तुम्हारे जैसे लोगों को सलाम, जो दूसरों के लिए हर वक्त लगे रहते हैं. मैं एक ट्रक ड्राइवर हूं, इसलिए मेरी सड़कें भी बहुत तनहा होती हैं.’

गौसे आलम की यह पोस्ट समरीन के दिल में उतर गई. गौसे आलम एक आम युवक था. उम्र बस 25 की, पर सपने बहुत बड़े. समरीन और गौसे आलम एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर ले ही चुके थे. इसलिए दिल खोल कर प्यारमोहब्बत की बातें होने लगीं. जिंदगी भर साथ निभाने की कसमें भी खाई जाने लगीं. गौसे आलम का कहना था कि जल्दी एक मुलाकात हो जाए तो हमारा प्यार और भी परवान चढऩे लगेगा.

समरीन ने महसूस किया कि गौसे आलम उस के लिए बेहद समझदार है और सहानुभूति दिखाने लगा है. उस की बातों पर समरीन का दिल खोयाखोया सा रहने लगा. वह सोचती कि कोई तो है, जो उस की बात ध्यान से सुनता है, उस की परेशानी पर संवेदना दिखाता है और मुश्किल में साथ देने का वादा करता है. वह कहता कि समरीन मैं तुम से शादी करूंगा. तुम मेरी जिंदगी हो. समरीन भी उस की बातों पर गहरा विश्वास करने लगी थी. वह सोचती कि गौसे आलम दिल का सच्चा है. भले ही वह एक ट्रक ड्राइवर है, लेकिन दिल का अच्छा है.

 

इन दोनों की कहानी में पहला मोड़ तब आया, जब वह अकसर ‘सिर्फ तुम्हारे लिए’ जैसी बातें करता. वह कहता कि समरीन मेरा साथ कभी मत छोडऩा, मेरा इस दुनिया में तुम्हारे अलावा कोई नहीं है. मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हूं. मुझे कभी किसी से कोई प्यार नहीं मिला. यदि तुम ने मेरा दिल तोड़ दिया तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा. इसलिए समरीन को यह अहसास होता कि उन दोनों का यह रिश्ता कुछ खास है. उस ने अपनी सब से करीबी सहेली को ये सारी बातें बताईं.

तब सहेली ने कहा, ”तेरी बातों से तो ऐसा लगता है कि वह तुझ से सच्चा प्यार करता है.’’

कुछ दिनों में उन का रिश्ता इंस्टाग्राम की स्क्रीन से निकल कर असल जिंदगी में उतरने लगा. उन का प्यार परवान चढऩे लगा.

पहली मुलाकात में जब गौसे आलम ने समरीन को देखा तो कहा, ”समरीन, तुम तो तसवीरों से ज्यादा हसीन हो और हकीकत में ज्यादा सच्ची भी.’’

समरीन भी मुसकराती हुई बोली, ”और तुम इंस्टाग्राम से ज्यादा शरमीले हो.’’

फिर दोनों हंस पड़े.

गौसे आलम को जब यकीन हो गया कि समरीन अब उस के फरेबी प्यार के जाल में फंस चुकी है तो  एक दिन वह अपने असली रूप में आ गया. उस ने ‘ओयो होटल’ में एक कमरा बुक किया. फोन कर के उस ने होटल में समरीन को भी बुला लिया.

जनपद मुरादाबाद में ‘ओयो’ जैसे और भी बहुत से केंद्र काफी चर्चित हो चुके हैं, जहां प्रेमी युगल दिन में 2-4 घंटे के लिए कमरा बुक करते हैं और मौजमस्ती कर के चले जाते हैं. होटल में पहुंच कर समरीन को जब गौसे आलम के इरादे का पता चले तो उस ने साफ इनकार किया. उस ने कहा कि शादी से पहले प्यार की अंतिम चरम सीमा पर नहीं पहुंचना चाहिए. तब गौसे आलम ने कहा, ”प्यार में सब जायज है. शादी तो होगी ही. जब हमें जिंदगी भर साथ ही रहना है तो फिर हम दोनों के बीच में किसी भी तरह की यह दूरी क्यों?’’

इस तरह हमबिस्तरी के पक्ष और विपक्ष में दोनों के बीच काफी चर्चा हुई और अंत में वह सब कुछ हो गया, जो सिर्फ सुहागरात को होना चाहिए था. समय बीतता रहा, समरीन ने महसूस किया कि गौसे आलम पहले की तरह प्यारमोहब्बत के लिए नहीं मिलता है. वह तो सिर्फ अंतिम प्यार का मौका देखता है. बस अपनी हवस मिटा लेता है. जब उसे शक हुआ तो समरीन ने उस से शादी के लिए कहा. शादी की बात सुनते ही गौसे आलम का तो नजरिया बदल गया. वैसे तो इन दोनों के प्यार के किस्से दोनों के फेमिली वालों और रिश्तेदारियों में आम हो चुके थे. समरीन ने उस के फेमिली वालों से भी कहा कि उस की शादी अब जल्द करा दी जाए. उन दोनों के प्यार को अब कई महीने बीत चुके हैं.

चारों तरफ से घिरता देख 25 वर्षीय गौसे आलम अब प्रेमिका समरीन से पीछा छुड़ाने के तरीके सोचने लगा. इस का एक कारण दोनों की जातियों का अलगअलग होना भी था. गौसे आलम की जाति के लोग इस क्षेत्र में अपने आप को उच्च जाति का समझते हैं. जबकि समरीन सलमानी यानी पिछड़ी जाति की थी.

 

‘एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज, न कोई बंदा रहा, न कोई बंदा नवाज.’ यह कहावत यहां शादीविवाह में लागू नहीं होती. खासकर तो तुर्क बिरादरी के लोगों के लड़के तो अपनी बिरादरी में ही शादी करते हैं.

सलमानी बिरादरी के लोग भी जनपद में निवास करते हैं. ये लोग अभी तक अपने पारंपरिक कार्य को अंजाम दे रहे हैं. दूसरों के सिर के बाल, दाढ़ी और मूंछें संभालना इन का पेशा है. इन्हें अभी समानता का दरजा इस क्षेत्र में नहीं मिला है. जाति को ले कर भी गौसे आलम के फेमिली वाले समरीन से शादी करने के लिए राजी नहीं थे. समरीन को ले कर गौसे आलम की चिंता अब बढ़ती जा रही थी. इसलिए उसे लगा कि अब इसे ठिकाने लगा कर ही वह पीछा छुड़ा सकता है.

गौसे आलम को समरीन के व्यवहार से ऐसा लग रहा था कि वह शादी न करने पर उसे कानूनी पेंच में फंसा कर जेल भिजवा सकती है. समरीन पढ़ीलिखी थी. एक नर्स का काम करती है. समाज में अच्छेबुरे सभी तरह के लोगों से उस की डीलिंग अस्पताल में रहती है. इसलिए वह भी बड़ी दिलेरी से शादी  करने  के लिए अड़ी हुई थी. अधिकतर ड्राइवरों के चेहरे पर हमेशा एक मुसकान, लेकिन आंखों में हवस की चमक छिपी होती है. ऐसा ही गौसे आलम था. वह खुद को प्यार का पुजारी कहता, लेकिन सच तो यह थी कि वह हवस का गुलाम था.

छोटेछोटे गांवों और शहरों में उस की कई कहानियां बिखरी पड़ी थीं. लड़कियां जो उस के मीठे व झूठे वादों में फंसतीं और फिर छोड़ दी जातीं. लेकिन समरीन की कहानी अलग थी. यह कहानी प्यार की नहीं, बेवफाई की थी, जो दिल को छलनी कर देती है. इस से पहले कि समरीन नाम की फांस गौसे आलम के लिए नासूर बन जाए, उस ने एक दिन अपने इरादे को अंजाम दे दिया. यह काम गौसे आलम ने इतनी चालाकी और प्लानिंग के साथ किया कि पुलिस के हाथ उस की गरदन तक न पहुंचें. समय बलवान होता है. अपराधी कोई न कोई सबूत छोड़ जाता है. अब तो डिजिटल युग है. कोई न कोई सबूत कहीं न कहीं से मिल ही जाता है. आखिरकार वही हुआ यह सब उस ने कैसे किया? यह घटना बहुत ही दिल दहलाने वाली है.

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है तहसील बिलारी. इसी तहसील का एक गांव रुस्तम नगर सहसपुर है. यह बिलारी से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है. बिलारी और सहसपुर के बीच की इस दूरी में भी मकान बन रहे हैं. आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि कुछ ही सालों में गांव सहसपुर भी बिलारी का एक मोहल्ला जैसा हो जाएगा. रुस्तम नगर सहसपुर तहसील क्षेत्र का सब से बड़ा गांव है. इस को नगर पंचायत बनाने की बात भी चल रही है. इस का प्रस्ताव सरकार को भेजा जा चुका है. इसी गांव के मोहल्ला साहूकारा में रियासत हुसैन का परिवार निवास करता है. नर्स समरीन इन्हीं की बेटी थी. अपने 4 भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. इस की बड़ी बहन फरहा की शादी हो चुकी है. जबकि 2 बड़े भाई सुहेल और रिजवान दिल्ली में सैलून पर काम करते हैं. उस की अम्मी शाहिदा परवीन की 10 साल पहले मौत हो चुकी है.

रियासत हुसैन शादीविवाह में कौफी मशीन चलाते हैं. सर्दियों में अधिकांश समारोह में कौफी की व्यवस्था मेहमानों के लिए की जाती है. कौफी का स्टाल लगाने वाले अलग लोग होते हैं. इन का हलवाइयों के स्टाल से कोई मतलब नहीं होता है. एक तरह की मजदूरी का काम है. रियासत हुसैन ने भी एक कौफी मशीन ले रखी है. सर्दियों में अधिकांशत: रात में ही बुकिंग मिलती है. यह अपनी कौफी मशीन ले जा कर अपनी स्टाल सजा कर शादी समारोह में बैठ जाते हैं. दूध और काफी बाकी सामान की व्यवस्था समारोह के आयोजकों द्वारा की जाती है. इन की तो सिर्फ मशीन और खुद की मेहनत होती है.

रियासत हुसैन की बेटी समरीन रामपुर जिले के सेफनी कस्बे में स्थित इनाया हेल्थकेयर क्लीनिक में नर्स का काम करती थी. उस से परिवार को बहुत सारी उम्मीदें थीं. सेफनी जिला रामपुर की तहसील शाहबाद के अंतर्गत एक नगर पंचायत है, यानी सेफनी जिला मुरादाबाद की सीमा से एकदम सटा हुआ है. 22 वर्षीय समरीन 24 अगस्त, 2025 की सुबह 10 बजे रोजाना की तरह घर से नर्सिंग होम जाने की बात कह कर निकली थी, लेकिन देर शाम तक वह वापस नहीं लौटी. रियासत हुसैन ने उस के क्लीनिक पर कौल की तो पता चला कि समरीन क्लीनिक पर आज नहीं पहुंची थी.

यह जानकारी मिलने पर फेमिली वालों के होश उड़ गए. इस के बाद परिजन उस की तलाश में जुट गए. अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों को मोबाइल फोन पर संपर्क कर के समरीन के बारे में पूछा गया, लेकिन कहीं से भी यह जवाब नहीं मिला कि समरीन को उन्होंने कहीं देखा है या उन के घर आई है. तब रियासत हुसैन ने दिल्ली में रह रहे अपने दोनों बेटों को फोन से सूचना दी कि समरीन आज सुबह से लापता है. दोनों बेटे भी रात में ही दिल्ली से घर के लिए रवाना हो गए. सुबह रियासत हुसैन और उन के बेटों ने अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों से राय ली. सब की सहमति के बाद उन्होंने 25 अगस्त, 2025 को बिलारी कोतवाली में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

समरीन के मोबाइल की पुलिस ने कौल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह बिलारी से 7 किलोमीटर दूर थाना कुंदरकी क्षेत्र के रहने वाले गौसे आलम नाम के युवक से बात करती थी. पुलिस गौसे आलम की तलाश में जुट गई. गौसे आलम ट्रक ले कर कहीं गया हुआ था. उस की लोकेशन पुलिस लगातार ट्रेस कर रही थी. पुलिस की कई टीमें इस मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए लगाई गईं. आखिरकार 30 अगस्त, 2025 दिन शनिवार को गौसे आलम पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. चूंकि घटना थाना कुंदरकी क्षेत्र की थी, इसलिए गौसे आलम से कुंदरकी पुलिस ने पूछताछ शुरू की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. यह साबित करने की कोशिश करता रहा कि उसे समरीन के बारे में कोई जानकारी नहीं है. वह ट्रक ले कर बाहर गया हुआ था, लेकिन पुलिस द्वारा थोड़ी सख्ती करने पर गौसे आलम टूट गया. उस ने समरीन की हत्या करना कुबूल कर लिया.

इस के बाद गौसे आलम की निशानदेही पर पुलिस ने 30-31 अगस्त की रात को थाना कुंदरकी क्षेत्र के चकफजालपुर गांव के गन्ने के खेत से समरीन का सड़ागला शव बरामद कर लिया. समरीन की लाश मिलने की सूचना पर उस के अब्बू, भाई और रिश्तेदार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना की सूचना जंगल की आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई. बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर जमा हो गए. थाना कुंदरकी के एसएचओ प्रदीप सहरावत मय फोर्स के घटना स्थल पर मौजूद थे. सूचना पर एसपी (देहात) कुंवर आकाश सिंह भी घटनास्थल का मुआयना करने पहुंच गए. गौसे आलम को थाने भेज दिया गया. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. उस ने मौके पर जांच कर के साक्ष्य जुटाए.

मौके की जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया. थाना कुंदरकी के एसएचओ प्रदीप सहरावत की गहन पूछताछ के बाद हत्या का एक दिल दहलाने वाला खुलासा हुआ. समरीन का यह कोई पहला मौका नहीं था, जो उस ने किसी युवक पर भरोसा किया था. पहले भी एक युवक उस की जिंदगी में आया था. उस ने भी उस से कहा था, ”चेहरा क्या है, मैं तुम्हारे दिल से प्यार करता हूं.’’ जब शादी की बात आई तो वही आशिक उस के चेहरे व गले पर स्पष्ट दिखाई देने वाले जलने के निशान देख कर पीछे हट गया.

समरीन ने उस से लाख कहा कि इन दागों के नीचे भी मैं वही लड़की हूं. पर उस युवक और उस के फेमिली वालों ने उसे ‘अधूरी’ कह दिया. इसी तरह गौसे आलम ने उसे स्वीकार नहीं किया तो वह टूट गई. उस ने जिद की कि तुम शादी नहीं करोगे तो मैं खुद को खत्म कर दूंगी. इन बातों का समरीन के प्रेमी पर कोई असर नहीं हुआ. उस के फेमिली वालों ने भी समरीन की विनती को ठुकरा दिया. मामला पुलिस तक भी पहुंचा. मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला. मजबूरन समरीन और उस के परिवार को समझौता करना पड़ा.

दरअसल, कुछ साल पहले समरीन ने किसी कलह के चलते खुद को आग लगा दी थी. आग की चपेट में आ जाने से वह काफी झुलस गई थी. उस के चेहरे पर आग से जले हुए निशान अब भी स्पष्ट दिखाई देते थे. उस की गरदन पर भी जले हुए के निशान थे. शरीर के और भी हिस्सों पर निशान थे, जो कपड़ों से दब जाया करते थे. जबकि गरदन और चेहरे के निशान ढकने के लिए वह अकसर हिजाब पहना करती थी. समरीन की जले हुए की घटना की जिन्हें जानकारी नहीं थी, वो यही समझते थे कि बहुत ही मजहबी लड़की है. इसलाम और शरीयत की रोशनी में घर से हिजाब पहन कर ही निकलती है. बाहर के लोगों ने कभी उसे बिना हिजाब के नहीं देखा.

गौसे आलम ने जब पहली मर्तबा समरीन के चेहरे और गरदन के जले हुए निशान देखे थे, तब एकदम उस के चेहरे की रंगत बदल गई थी. वह उदास हो गया था. समरीन उस की हालत देख कर घबरा गई थी. वह रोने लगी थी. कहने लगी कि शायद मेरे चेहरे के निशान देख कर आप मायूस हो रहे हैं. निराश हो रहे हैं. आप मुझ से नहीं मेरे चेहरे से मोहब्बत करते हैं. गौसे आलम ने कहा कि ऐसी बात नहीं है. उस ने एकदम अपने चेहरे की रंगत बदली. चेहरे पर शगुफ्तगी लाने की कोशिश की और कहा कि मैं तुम्हें दिल से चाहता हूं. ऐसा कभी मत सोचना. मैं तुम्हारा जिंदगी भर साथ निभाऊंगा.

कस्बा बिलारी से करीब 7 किलोमीटर दूर बिलारी तहसील का ही एक कस्बा कुंदरकी है. गौसे आलम  कुंदरकी कस्बे से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित चकफाजलपुर गांव का निवासी है. यह 3 भाई और 2 बहनें हैं. गौसे आलम बीच का है. एक बहन की शादी हो चुकी है. एक बहन मानसिक रूप से विकलांग है. गौसे आलम के चेहरे पर मासूमियत और बातों में जादू होता था. गांव में उसे सब ‘आशिक आलम’ कह कर चिढ़ाते थे. असली दुनिया उस की इंस्टाग्राम थी. हर शाम हाथ में मोबाइल आता और फिर शुरू होती उस की औनलाइन मोहब्बत की दुनिया.

गौसे आलम का अंदाज ऐसा कि कोई भी लड़की उस की बातों में जल्दी बहक जाती. सिर्फ दोस्ती के नाम पर शुरू होने वाली बातें धीरेधीरे रोमांस में बदल जातीं. शेर ओ शायरी लिखता और हर चैट के अंत में दिल का इमोजी डाल देता. वह कई लड़कियों से चैट करता था. हर किसी से वही बातें ‘तुम बहुत अलग हो’, ‘काश तुम मेरे शहर में होतीं’, ‘तुम्हारी मुसकान दिल में उतर जाती है’.

उस के चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत थी, जो किसी भी इंसान के दिल में भरोसा जगा दे. बड़ीबड़ी आंखों में अजीब सी शांति थी, जैसे उस में कभी तूफान उठा ही न हो. चेहरे की वो हलकी मुसकान, मानो किसी दर्द को छिपाने का हुनर हो. कोई पहली नजर में उसे देखे तो कहेगा ‘इतना सादा, इतना खूबसूरत चेहरा कैसे किसी का खून कर सकता है?’ लेकिन वही चेहरा था, जिस ने मोहब्बत की आड़ में मौत की कहानी लिखी थी.

एक दिन गलती से उस ने सना को वही मैसेज भेज दिया जो किसी और को भेजना था. ‘कह दो न, तुम भी मुझ से प्यार करती हो, शाइस्ता?’

मैसेज पड़ कर सना चौंक गई, ”शाइस्ता..? मैं तो सना हूं!’’

गौसे आलम की पोल खुल गई. उस दिन के बाद सना ने उसे ब्लौक कर दिया, उस के बाद से गौसे आलम ने बड़ी ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी. इस तरह समरीन उस के प्यार के जाल में तो फंस गई, लेकिन बाद में गले की हड्ïडी भी बन गई. गौसे आलम ने यह एहसास समरीन को होने नहीं दिया. हमेशा की तरह उस ने समरीन को फोन कर के कहा कि बह बिलारी के महाराणा प्रताप चौक पर आ जाए. गौसे आलम बाइक ले कर वहीं खड़ा था. बिलारी का यह वही स्थान था, जहां से अकसर गौसे आलम अपनी बाइक पर बैठा कर समरीन को ले जाया करता था.

उस समय सुबह के लगभग 10 बजे थे. यही वह समय था, जब समरीन अपनी ड्यूटी करने जाया करती थी. अपने गांव रुस्तम नगर सहसपुर से समरीन बैटरी रिक्शा में बैठ कर आई थी. बैटरी रिक्शा से उतर कर समरीन गौसे आलम की बाइक पर बैठ गई और दोनों मौजमस्ती करने मुरादाबाद चले गए. गौसे आलम ने वादा किया था कि आज घर वालों से मिल कर शादी की बात करेंगे और जल्दी ही तारीख भी तय कर लेंगे. समरीन भी चाहती थी कि फेमिली वालों की मंजूरी व सामाजिक नियमकानून के अनुसार शादी होगी तो समाज में दोनों के फेमिली वालों की इज्जत बनी रहेगी.

गौसे आलम की योजना के अनुसार रास्ते में एक निश्चित स्थान पर उस का दोस्त मिल गया, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखने  वाला था, लेकिन अभी नाबालिग था. गौसे आलम ने अपने मित्र से ऐसे अनजान बन कर बात की जैसे पहले से कोई प्लानिंग न हो. समरीन ने पूछा कौन है तो उस ने बताया कि यह मेरा कजिन है. उसे भी बाइक पर बैठा लिया. अपने गांव चकफाजलपुर और रूपपुर के बीच रेलवे ट्रैक के पास बाइक रोकी. उस की आंखों में वही मोहब्बत थी, वही भरोसा, जो समरीन को इस जंगल तक लाया था.

अभी तक समरीन को गौसे आलम पर किसी तरह का कोई शक नहीं था. वो नहीं जानती थी कि उसी के साथ में उस का कातिल भी है. गौसे आलम के मन में कुछ और ही तूफान उमड़ रहा था. विश्वास की नींव पर खड़ी उन की कहानी, अब धोखे की चट्टानों से टकराने वाली थी. समरीन बाइक से नीचे उतर गई. गौसे आलम ने मुसकरा कर उस की ओर देखा. वह उसे यहां लाया था, प्रेम की मिठास का वादा कर के.

नीचे उतर कर समरीन ने पूछा, ”क्या हुआ?’’

गौसे आलम ने कहा, ”कुछ नहीं, बस हलका होना है.’’

इस से पहले कि समरीन कुछ समझ पाती गौसे आलम ने उसे वहीं गिरा लिया. उस के साथी ने दबोच लिया. फिर उन्होंने उस की हत्या कर दी. उस की चीख सुनने वाला भी वहां कोई नहीं था. दोनों ने लाश को उठा कर गन्ने के खेत में डाल दिया. प्यार के वादों से शुरू हुई कहानी, उस शाम विश्वासघात की आग में जल कर राख हो गई. गौसे आलम की दास्तान सुन कर पुलिस भी दंग रह गई. पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया. अदालत ने गौसे आलम को जेल भेज दिया और उस के नाबालिग दोस्त को बाल सुधार गृह के हवाले कर दिया.

पुलिस ने घटना में इस्तेमाल की गई बाइक भी बरामद कर ली. समरीन के मोबाइल को गौसे आलम ने तोड़ कर फेंक दिया था, जो कहानी लिखने तक पुलिस बरामद नहीं कर सकी. Love Story in Hindi

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MP News: बेटी के स्केच में छिपा मां की हत्या का राज

MP News: सोनाली बुधौलिया की मौत को पुलिस भी आत्महत्या ही मान रही थी, लेकिन उस की 5 वर्षीय बेटी रिंकी ने अपनी आंखों देखी का एक स्केच बनाया तो पुलिस समझ गई कि यह मामला कुछ गंभीर है. स्केच के आधार पर पुलिस ने मृतका के पति संदीप बुधौलिया से पूछताछ की तो उस ने पत्नी की हत्या का ऐसा राज खोला कि…

मध्य प्रदेश के जिला निवाड़ी के गांव लिधौरा निवासी संजीव त्रिपाठी की बेटी सोनाली त्रिपाठी 14 फरवरी को अपनी 5 साल की बेटी के साथ ममेरे भाई की शादी में गई हुई थी. उस की ससुराल उत्तर प्रदेश में स्थित झांसी के शिव परिवार कालोनी में थी. पति संदीप बुधौलिया विवाह में शामिल नहीं हो पाया था. हालांकि वह बारात के दिन आने वाला था. परिवार के लोग सभी रिश्तेदार शादी के माहौल का आनंद ले रहे थे. वे एकदूसरे से मिलतेजुलते हुए अपनीअपनी बातें कर रहे थे. कइयों का तो पहली बार मिलनाजुलना हुआ था तो कुछ रिश्तेदारों ने सोनाली की बेटी रिंकी को पहली बार देखा था. वे उस की चंचलता, मासूमियत, सुंदरता और बातूनी व्यवहार से बहुत प्रभावित हो रहे थे.

रिंकी की एक और आदत लोगों की निगाह में बसी हुई थी. असल में कहीं से उसे रंगीन पेंसिलों का पैकेट हाथ लग गया था. वह उसी से दीवारों पर जहांतहां आड़ीतिरछी रेखाएं खींच कर कुछ रेखाचित्र बनाती रहती थी. उन रेखांकनों के बारे में जब कोई पूछता कि यह किन की हैं? तब वह चंचलता के साथ बताती कि ये नाना की हैं, ये नानी की हैं. ये हलवाई की है. ये मौसी की है. वगैरहवगैरह. उस की बातें सुन कर लोग और भी हैरान हो जाते और उन रेखाचित्रों से परिवार में मौजूद लोगों को जोडऩे लगते. फिर कहते थे, ”मेरी भी एक फोटो बना दो.’’

इस पर मचलती हुई वह कहती, ‘ऐसे नहीं, पहले मेरे सामने कोई काम करो… या फिर डांस करो.’

वह शादी के माहौल में लोगों का अलग तरह से दिल बहला रही थी. सभी का  मनोरंजन हो रहा था. बदले में लोग उसे भी प्यार से खानेपीने की चीजें दे रहे थे. उस की मांगें तुरंत पूरी कर देते थे. सब कुछ ठीक चल रहा था. सोनाली भी अपनी बेटी रिंकी को खुश देख कर काफी संतुष्ट थी. उस ने रिंकी को इस तरह चहकतेफुदकते अपनी ससुराल में शायद ही कभी देखा था. वहां उसे लोग अकसर डांटतेडपटते रहते थे, जबकि उसे यहां काफी दुलारप्यार मिल रहा था. वह सोचने लगी थी कि कितना अच्छा होता, जो उसे ऐसी और शादियों में जाने का मौका मिले.

 

रात को सोते समय रिंकी को मिल रहे लोगों के प्यार के बारे में काफी देर तक सोचती रही थी. अगले रोज 16 फरवरी, 2025 को उस की आंखें मोबाइल की घंटी से खुलीं. रिंकी ही मोबाइल हाथ में लिए उस के पास खड़ी थी. वह बोली, ”मम्मीमम्मी, पापा का फोन आ रहा है.’’

”ला देखती हूं…सुबहसुबह क्यों फोन किए, आज तो यहां आना था उन को.’’ बोलती हुई सोनाली ने अपने पति का फोन रिसीव कर लिया.

मुश्किल से 15-20 सेकेंड ही बात हुई. पति संदीप बुधौलिया का फोन सुन कर वह कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गई. फोन कट किया और एक ओर रख दिया. वह एकदम से शांत हो गई और अपना सिर ऊपर उठा लिया.

”क्या हुआ मम्मी, पापा ने फोन पर डांटा क्या?’’ रिंकी मासूमियत से बोली.

”अरे नहीं रे!’’ सोनाली बोली और अपनी दोनों हथेलियों से उस के चेहरे पर आ गए बालों को हटाने लगी.

”क्या बोले पापा! मेरे बारे में कुछ बोले?’’ रिंकी फिर बोली.

”तुम्हारे कपड़े कहांकहां हैं, सब इकट्ठा करो, हमें आज यहां से जाना होगा.’’

”क्यों मम्मी? हमें मामा की बारात में जाना है.’’

”कहीं नहीं जाना है. हमें इसी वक्त अपने घर जाना है. वहां तेरी चाची की तबियत खराब है, पापा ने तुरंत आने को कहा है.’’

”मम्मी!’’ रिंकी ठुनकती हुई बोली और मायूस हो गई.

सोनाली अपना सामान समेटने लगी. सोनाली की मम्मी ने उसे कपड़े समेटते देखा तो वह चाह कर भी कुछ नहीं बोली, क्योंकि तबियत खराब की खबर पा कर उस का ससुराल जाना भी जरूरी था. मामामामी सभी स्तब्ध थे. सभी उसे कैसे रुकने के लिए कहते. सोनाली ने अपनी बेटी को गोद में उठाया और दूसरे हाथ से ट्रौली बैग खींचती हुई अपने मामा के घर से विदा हो गई. शाम होने से पहले वह अपनी ससुराल पहुंच गई थी. वहां एकदम शांति का माहौल था. उस वक्त पति भी घर पर नहीं था. परिवार में लोगों से हालचाल पूछा. बीमारी के बारे में पूछा. सभी ने कहा, ”यहां तो कोई बीमार नहीं है!’’

सोनाली को समझने में देर नहीं हुई. वह गुमसुम अपने बैडरूम में गई और औंधे मुंह गिर कर रोने लगी. पीछेपीछे रिंकी भी आ गई. बोली, ”क्या हुआ मम्मी? पापा कहां हैं?’’

रिंकी की मासूमियत भरी बातें सुन कर वह बैड पर उठ बैठी. उसे बांहों में भर लिया. सुबकती हुई बोली, ”कुछ नहीं, मेरी बच्ची! यहां कोई बीमार नहीं है. हमें बहाने से बुलाया गया है.’’

सोनाली उसे मामा के घर से ले कर आई कुछ मिठाई और नमकीन रिंकी को खाने के लिए दी. रिंकी का मन खाने को नहीं हुआ. वह बैड पर चली गई. कब उसे नींद आ गई, सोनाली को भी नहीं पता चला. सोनाली उदास मन से घर में बिखरी चीजों को सहजने लगी. इस बीच उस की पति से फोन पर बात हो गई. उस की पसंद का खाना पकाने के बाद अपने कमरे में चली गई. सो रही रिंकी के सिर को सहलाया और उस की बगल में बैठ गई. रात को संदीप देर से आया. आते ही सोनाली बिफर पड़ी. गुस्से में बहाने से बुलाने का कारण पूछा. उस का गुस्सा देख कर संदीप भी उसी लहजे में बातें करने लगा. डपटते हुए उस पर ही मनमरजी करने का आरोप मढ़ दिया.

सोनाली ने जब घरपरिवार और समाज का हवाला दिया तो संदीप और भी आक्रोश से भर गया. मांबाप और मायके वालों पर अधिक ध्यान देने का आरोप लगा दिया. गुस्से में सोनाली भी जवाबी आरोप लगाते हुई बोली कि वह अपनी बेटी पर ध्यान नहीं देता है. बेटी की बात आते ही संदीप बोला, ”तुम्हारा बाप कौन अपनी बेटीदामाद पर ध्यान दे रहा है? 2 साल हो गए गाड़ी देने के वादे से मुकर गया.’’

”जो दहेज में 20 लाख मिले, वह कम था क्या?’’

”मैं उतने के काबिल हूं?’’

”तो करोड़पति खानदान के हो? तुम ने तो मेरे पिता को धोखा दिया. बताया डाक्टरी पढ़ रहे हो. जब यहां आई, तब पता लगा कि दवाई बेचने का काम करते हो.’’

सोनाली का जवाबी हमला सुनते ही संदीप आगबबूला हो गया. उस ने गुस्से में उस पर हाथ उठा लिया. सोनाली उस का हाथ पकड़ती हुई बोली, ”खबरदार! जरा भी कुछ हुआ तो मैं अभी थाने चली जाऊंगी. भूल जाऊंगी कि तुम मेरे पति हो.’’

दोनों के बीच जबरदस्त तूतूमैंमैं होने लगी. उन की तेज आवाज से रिंकी की अचानक आंखें खुल गईं. बोली,”क्या हुआ मम्मी? पापा आ गए?’’

”कुछ नहीं रिंकी, सो जाओ.’’ सोनाली प्यार से बोली.

जबकि संदीप डपटता हुआ बोला, ”चुपचाप सोई रह, वरना एक झापड़ दूंगा!’’

डांट सुन कर रिंकी कंबल में दुबक गई. मम्मीपापा की बातें साफ सुनाई दे रही थीं. कंबल के भीतर से ही झांक कर मालूम करने की कोशिश करने लगी कि बाहर क्या हो रहा है.

…लेकिन यह क्या? कमरे में उस के मम्मीपापा के बीच जबरदस्त लड़ाई हो रही थी. उस के पापा ने मम्मी के दोनों हाथ पीछे की ओर पकड़ रखे थे. मम्मी हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रही थी. कुछ पल में ही पापा का एक हाथ मम्मी की गरदन पर था. वह एक हाथ से मम्मी के दोनों हाथ पकड़े हुए थे और दूसरे हाथ से गरदन दबाए जा रहे थे. मम्मी बचने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह कमजोर बनती जा रही थी. उस की आवाज भी कम होने लगी थी. वह औंधे मुंह बैड पर गिर गई. पापा उस की पीठ पर जम कर बैठ गए और दोनों हाथों से मम्मी का गला दबाते रहे. मम्मी छटपटाती रही. कुछ समय में ही छटपटाहट बंद हो गई. पापा वहां से उठ कर कमरे से बाहर चले गए.

रिंकी यह सब देख कर सहम गई थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि मम्मी को क्या हुआ? वह डर से मम्मी को आवाज भी नहीं दे पा रही थी. रिंकी ने देखा कि थोड़ी देर में उस के पापा एक रस्सी ले कर कमरे में आए. पापा को कमरे में आया देख कर उस ने कंबल में खुद को छिपा लिया. डर गई कि कहीं वह उस की पिटाई न कर दें. उस ने महसूस किया कि बैड पर कुछ हलचल हो रही है, लेकिन क्या हो रहा है, देखने की हिम्मत नहीं हुई. जब हलचल शांत हो गई, तब रिंकी ने डरते हुए कंबल के भीतर से झांक कर देखने लगी. बैड पर कोई नहीं था. सोचने लगी कि मम्मी कहां गई? पापा भी नहीं नजर आए, वह कहां गए?

यह जानने की जिज्ञासा में उस ने कंबल से अपना चेहरा निकाला. उस ने चारों ओर अपनी नजर दौड़ाई. जैसे ही रिंकी की नजर ऊपर की ओर गई, उस की चीख निकल गई. उठ बैठी. अपने दोनों हाथों से मुंह ढंक लिया. उस की मम्मी कमरे में पंखे से झूल रही थी. वहां उस के अलावा और कोई नहीं था. अगले रोज 17 फरवरी, 2025 को संदीप ने अपनी ससुराल में फोन कर सूचना दी कि सोनाली ने बीती रात फांसी लगा ली है. सोनाली के फेमिली वाले भागेभागे मौके पर पहुंचे. रोतीबिलखती बच्ची रिंकी को संभाला. वह अपने नानानानी की गोद में दुबक गई. धीमी आवाज में बोली, ”पापा ने मम्मी को मार दिया है.’’

यह सुनते ही उन के कान खड़े हो गए. उन्होंने शहर कोतवाली पुलिस को यह बात बताई. पुलिस को यह सुन कर हैरानी हुई. वह जिसे आत्महत्या समझ रही थी, उस की हत्या की बात सामने आने पर रिंकी से पूछताछ की गई. उस के बाद रिंकी ने अपनी कौपी और पेंसिल मंगवाई. उस ने आड़ीतिरछी लकीरें खींच कर एक रेखांकन बना दिया. पहली नजर में उस में कोई खास बात का अनुमान नहीं लगा, किंतु सरसरी निगाह से देखने पर वह अलग तरह की लगी. रेखांकन में रिंकी ने अपनी मम्मी के दोनों हाथ बराबर बनाए. लेकिन मम्मी की गरदन की दाईं तरफ उस ने एक और हाथ बनाया. इस तीसरे हाथ के साथ कोई चेहरा नहीं था. रिंकी ने बताया कि तीसरा हाथ उस के पापा का है. उस हाथ को उस ने मम्मी की गरदन के काफी करीब से बनाया.

इस रेखांकन को बनाने के बाद रिंकी ने वारदात की पूरी बातें बता दीं. इस जानकारी के बाद सोनाली के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. मौके पर पहुंची पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को शांत कराया और एकमात्र चश्मदीद गवाह रिंकी के बयान के आधार पर आरोपी पति संदीप बुधौलिया, मां विनीता, भाई कृष्णकांत और उस की पत्नी मनीषा के खिलाफ केस दर्ज करने के बाद आरोपी पति को हिरासत में ले कर आगे की काररवाई शुरू कर दी है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि सोनाली की मौत गला घोंट कर की गई थी. मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ निवासी मृत महिला सोनाली के पिता संजीव त्रिपाठी ने पुलिस को बताया कि उन्होंने वर्ष 2019 में अपनी बेटी की शादी झांसी के शिव परिवार कालोनी में संदीप बुधौलिया से की थी.

संदीप मैडिकल रिप्रेजेंटेटिव है. शादी के बाद से ही दामाद और उस के फेमिली वाले बेटी को प्रताडि़त करने लगे थे. सोनाली ने 5 साल पहले बेटी (रिंकी) को जन्म दिया था. तभी उस को ताने मारने के साथ अस्पताल में अकेला छोड़ कर भाग गए थे, जिस पर वह बेटी को अपने साथ घर ले गए. करीब एक साल बाद ससुराल वाले सोनाली को साथ ले गए और फिर उत्पीडऩ करने लगे, जिस पर बेटी ने मुकदमा दर्ज कराया था. हालांकि घटना के 6 माह पहले ही समझौता हो गया था. सोनाली के मामा के बेटे की शादी थी. सोनाली अपनी मासूम बेटी रिंकी को ले कर 12 फरवरी को शादी में गई थी. शादी कार्यक्रम के दौरान ही पति ने फोन कर उसे घर बुला लिया था. तब उस ने कहा था, ‘अभी नहीं आई, तब कभी मत आना.’

सोनाली की ससुराल से 17 फरवरी की सुबहसुबह फोन आया कि सोनाली की तबीयत खराब है. फिर फोन आया कि उस ने फांसी लगा ली. वे मैडिकल कालेज पहुंचे. वहां नातिन (रिंकी) ने बताया कि पापा ने मम्मी को मारा और फिर गला दबा दिया. इस पूरे मामले की तहकीकात करने वाले सीओ (सिटी) रामवीर सिंह ने मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. पतिपत्नी के बीच चल रहे विवाद के बारे में सोनाली के पिता संजीव त्रिपाठी ने बताया कि 2 साल तक पतिपत्नी का विवाद चलता रहा. कोर्ट से राजीनामा कर उन की बेटी को घर ले गए. उस के बाद पूरी प्लानिंग के साथ उन की बेटी को बीती रात फांसी के फंदे पर लटका दिया और मौत के बाद मैडिकल कालेज में भरती कर दिया.

जैसे ही मायके वाले पहुंचे तो उन्हें देख कर ससुराल वाले भाग गए. इस के बाद मृतका के परिजनों ने मैडिकल कालेज में ही हंगामा किया. उन्होंने कहा कि पहले बेटी की मारपीट की, फिर फांसी लगाई गई है, उस के चेहरे और पैर पर चोट के निशान दिखाई दे रहे थे. कथा लिखे जाने तक आरोपी संदीप बुधौलिया न्यायिक हिरासत में था. पुलिस द्वारा सुलझाया गया यह अनोखा केस था, जिसे में एक 5 साल की बच्ची के रेखांकन के आधार पर मामला जल्द सुलझा लिया गया था. सोनाली का पोस्टमार्टम होने के बाद अंतिम संस्कार में उस की बेटी ने ही मुखाग्नि दी थी. MP News

—कथा में रिंकी परिवर्तित नाम है

 

 

Love story in Hindi: कालेज स्टूडेंट का खूनी प्रेमी

Love story in Hindi : कालेज में पढ़ाई के दौरान 19 साल की वर्षिता चेतन नाम के युवक को दिल दे बैठी थी. बाद में पता चला कि चेतन स्टेज थ्री का कैंसर पेशेंट है. इस के बावजूद हालात ऐसे बन गए कि वर्षिता के पेरेंट्स को कैंसर पीडि़त चेतन के साथ सगाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन शादी होने से पहले चेतन ने एक दिन न सिर्फ वर्षिता की हत्या कर दी, बल्कि उस की लाश पेट्रोल से जला दी. आखिर मंगेतर क्यों बना खूनी?

कर्नाटक के जिला चित्रदुर्ग के रहने वाले चेतन को पता चला कि उसे तीसरी स्टेज का कैंसर है. यह जानकारी होने के बाद 19 वर्षीय प्रेमिका वर्षिता उस से कटीकटी रहने लगी थी. इस बीच उस ने किसी अन्य युवक से संबंध बना लिए थे. बस, इसी बात से चेतन नाराज हो गया था और वर्षिता को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा था. उसी बीच जब वर्षिता के गर्भवती होने का पता चलने के बाद उस की चाची ने चेतन से वर्षिता से विवाह की बात की तो उस की नाराजगी और बढ़ गई. वह धोखेबाज और स्वार्थी वर्षिता से विवाह बिलकुल नहीं करना चाहता था.

जबकि वर्षिता के फेमिली वाले उस पर विवाह के लिए दबाव डाल रहे थे. इसलिए चेतन वर्षिता से बचने के उपाय सोचने लगा. वर्षिता से बचने का जब कोई उपाय चेतन को नहीं सूझा तो उस ने उस की हत्या की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत उस ने 14 अगस्त, 2025 को वर्षिता को फोन कर के कहीं घूमने चलने के लिए कहा. वर्षिता को पता था कि उस के पेरेंट्स उस के विवाह की बात चेतन से कर रहे हैं, इसलिए वह खुशीखुशी उस के साथ जाने के लिए राजी हो गई.

शाम को अपनी बाइक ले कर चेतन वर्षिता के हौस्टल पहुंचा तो वर्षिता ने वार्डन से घर जाने के बहाने छुट्टी ली और चेतन के साथ घूमने के लिए निकल पड़ी. चेतन अपनी योजना के अनुसार, पूरी तैयारी कर के आया था. शाम के धुंधलके में गोनूर के पास सुनसान स्थान देख कर एक ब्रिज के पास उस ने बाइक रोक दी. चेतन के मन में क्या है, यह तो वर्षिता को पता नहीं था. इसलिए जब चेतन ने बाइक रोकी तो उस ने हंसते हुए कहा, ”जंगल में मंगल मनाने का मन है क्या?’’

”वह तो बाद की बात है. मैं यह जानना चाहता हूं कि तुम्हारे पेट में जो बच्चा है, वह किस का है? क्योंकि जब तुम्हें पता चला कि मुझे कैंसर है, तब तुम ने किसी दूसरे युवक से संबंध बना लिए थे.’’ चेतन ने कहा.

”तुम से किस ने कहा कि मैं ने दूसरे से संबंध बना लिए थे?’’ वर्षिता ने पूछा.

”हर चीज कहने से ही पता नहीं चलती. कुछ बातें हवा में फैल जाती हैं, जो अपने आप कानों तक पहुंच जाती हैं.’’ चेतन ने तल्खी से कहा, ”अब जब उस का पाप तुम्हारे पेट में पलने लगा है तो तुम्हारे फेमिली वाले तुम्हें मेरे गले में बांधना चाहते हैं. लेकिन अब मैं तुम से विवाह नहीं करने वाला.’’

”क्यों नहीं करोगे मुझ से विवाह? विवाह तो तुम्हें मुझ से हर हालत में करना होगा.’’ वर्षिता गुस्से में बोली.

”मैं और तुम से विवाह, कतई नहीं. मैं तुम से बिलकुल विवाह नहीं करूंगा. तुम्हें जो करना हो, कर लेना.’’ चेतन ने कहा.

”मैं तुम्हारे खिलाफ पुलिस में शिकायत करूंगी. तुम्हें जेल भिजवा दूंगी.’’ वर्षिता चिल्लाई.

तभी चेतन ने उसे धक्का देते हुए कहा, ”तू मेरे खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर मुझे जेल भिजवाएगी? मैं तुझे उस लायक ही नहीं छोड़ूंगा. मैं अभी तुझे खत्म कर दूंगा.’’

इतना कह कर चेतन लातघूंसों से वर्षिता की पिटाई करने लगा. जब वर्षिता की पिटाई करतेकरते उस का मन भर गया और वर्षिता अधमरी हो गई तो गला दबा कर उस की हत्या कर चेतन ने साथ लाए पेट्रोल को उस के ऊपर डाल कर आग लगा दी. इस के बाद अपनी बाइक ले कर वह चित्रदुर्ग अपने घर वापस आ गया. नैशनल हाइवे नंबर-48 पर गोनूर ब्रिज के नीचे विश्राम के लिए रुके 2 लोगों ने सड़क किनारे एक अधजली लाश देखी. इस बात की सूचना चित्रदुर्ग थाना पुलिस को दी गई. पुलिस ने लाश की पहचान की कोशिश की, लेकिन तत्काल उस की शिनाख्त नहीं हो सकी.

लेकिन जब पुलिस को पता चला कि सरकारी डिग्री कालेज में पढऩे वाली एक लड़की वर्षिता की गुमशुदगी हिरियूर थाने में दर्ज कराई गई है. तब चित्रदुर्ग पुलिस ने तुरंत वर्षिता के पेरेंट्स को बुला लिया. पेरेंट्स ने अस्पताल पहुंच कर वर्षिता के शरीर के टैटू से लाश की शिनाख्त की. वर्षिता की लाश मिलने के बाद दलित संगठनों ने हत्यारे को गिरफ्तार करने के लिए आंदोलन भी किया था. उन की मांग थी कि जब तक हत्यारे को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, तब तक वह अपना आंदोलन जारी रखेंगे. मृतका की मम्मी ज्योति थिप्पेस्वामी ने हत्यारे को जल्द गिरफ्तार कर फांसी की सजा दिए जाने की मांग की.

पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपी चेतन को गिरफ्तार कर उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर मामले की जांच शुरू की. सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, दोस्तों व रिश्तेदारों से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि वर्षिता और चेतन के बीच पिछले लगभग 10 महीने से प्रेम संबंध था. लोगों ने यह भी बताया कि चेतन ने उसे नौकरी का लालच दिया था. परेशानी की बात यह थी कि कोई चश्मदीद नहीं था, जो घटना की सटीक जानकारी देता. पर वर्षिता के हौस्टल से निकलने के बाद सीसीटीवी फुटेज में दोनों साथ जाते नजर आए थे. आगे चेतन चल रहा था और उस के पीछे वर्षिता चल रही थी.

हौस्टल से निकलने के बाद दोनों बाइक से जाते समय पेट्रोल पंप पर पहुंचे और वहां बाइक में पेट्रोल भराया था. वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में भी दोनों साथ नजर आए थे. इस के अलावा दोनों के मोबाइल की लोकेशन भी एक साथ मिली थी. यही नहीं, वर्षिता के हौस्टल से निकलने से पहले चेतन ने उस से फोन पर बात भी की थी. इस के बाद पुलिस ने वर्षिता के प्रेमी चेतन को गिरफ्तार कर लिया. उस ने चित्रदुर्ग के एसपी रंजीत कुमार बंडारू की मौजूदगी में वर्षिता की हत्याकांड की चौंकाने वाली कहानी बताई.

कर्नाटक के जिला चित्रदुर्ग के थाना हिरियूर के गांव कोवरहट्टी की रहने वाली 19 साल की वर्षिता चित्रदुर्ग के सरकारी डिग्री कालेज में सेकेंड ईयर की छात्रा थी और वहीं एससीएसटी हौस्टल में रहती थी. मम्मीपापा गांव में रह कर मेहनतमजदूरी करते थे. एकलौती संतान होने की वजह से वर्षिता ही अपने मम्मीपापा के जीवन का आधार थी. गरीब होने की वजह से वे यही सोचते थे कि बेटी पढ़लिख कर कुछ बन जाएगी तो कम से कम उन का बुढ़ापा तो सुख से कट जाएगा. इसीलिए गरीब होने के बावजूद वे उसे एक बेटे की तरह पढ़ालिखा रहे थे.

दूसरी ओर वर्षिता सरकार से मिलने वाली सहायता यानी स्कौलरशिप से अपनी पढ़ाई कर रही थी. मम्मीपापा तो किसी तरह अपना ही खर्च चला रहे थे, इसलिए उन से उसे कोई ज्यादा उम्मीद नहीं रहती थी. फिर भी वे मिलने वाली मजदूरी से कुछ न कुछ रुपए बचा कर वर्षिता को देते ही रहते थे, जबकि वह वर्षिता के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के समान था. गरीबी में जीने वाली वर्षिता हमेशा मुसकराती रहती थी. लडख़ड़ाते सपनों और किताबों में उलझी होने के बावजूद उसे उम्मीद थी कि एक दिन वह अपने सपने पूरे करने में सफल जरूर होगी. पर उस के भीतर कुछ और भी था. मजबूर होने के

बाद भी वह किसी की चाह में डूब चुकी थी. इंस्टाग्राम पर मैसेज करतेकरते उस की धीरेधीरे चेतन नाम के युवक से दोस्ती हो गई थी. दोस्ती ने भरोसा दिया. फिर भरोसे ने उम्मीद जगाई और उसी उम्मीद में वह उस के प्यार के रंग में रंग गई. चेतन देखने में साधारण, पर सोच से बेहद चालाक और स्वार्थी था. वह एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करता था. वह उस कंपनी में भरती का काम देखता था. वह बातचीत में थोड़ा झिझकता था, क्योंकि उस पर जिम्मेदारियों का बोझ था. दोनों की जानपहचान इंस्टाग्राम से हुई थी. चेतन से जब वर्षिता ने अपनी परेशानी बता कर उस से नौकरी दिलाने को कहा तो उस ने कहा था कि वह उस के लिए जरूर कुछ करेगा. वह उसे कहीं न कहीं नौकरी जरूर दिला देगा.

इसी उम्मीद में वर्षिता ने उस का हाथ थाम लिया था. उन की बातचीत शाम की गपशप तक ही सीमित नहीं रही थी, दोनों ही एकदूसरे का भरोसा बनते गए और रिश्ते के तार गुंथते गए थे. वे एकदूसरे का इस तरह भरोसा बन गए थे कि उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे.फिर जो सच सामने आया, वह बहुत ही दुखद था. पता चला कि चेतन को कैंसर हो गया है. डौक्टरों के अनुसार उसे तीसरी स्टेज का कैंसर था. चेतन की जिंदगी अब सवालों में घिर गई थी. उस का जीवन भरोसे का नहीं रह गया था. इसलिए उस पर भरोसा करना वर्षिता के लिए मुश्किल हो गया था. इलाज, खर्च, भविष्य के फैसले, ये सब चीजें अचानक रिश्ते के बीच आ गई थीं.

वर्षिता ने चेतन से दूरी बढ़ानी शुरू कर दी, जिस से चेतन को झटका सा लगा. दोनों ने शादी के बारे में सोच लिया था. ऐसे में चेतन को वर्षिता से प्यार और सहारे की उम्मीद थी. जबकि वह उस से दूर जाने लगी थी. दोनों की दुनिया में दरारें पडऩे लगी थीं.फिर वह खबर आई, जिस ने वर्षिता के परिवार को हिला कर रख दिया. पता चला कि वर्षिता गर्भवती थी. जब घर वालों को इस बात का पता चला तो सभी घबरा गए. बात इज्जत की थी, इसलिए घर वाले इज्जत बचाने के लिए वर्षिता और चेतन की शादी के बारे में सोचने ही नहीं लगे, बल्कि वर्षिता की चाची ने चेतन से वर्षिता से विवाह करने की बात की. उन्होंने कहा कि वर्षिता जिस स्थिति में है, उस में अब उसे उस से विवाह कर लेना चाहिए, वरना वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.

चेतन ने वर्षिता से विवाह के लिए मना करते हुए कहा कि वर्षिता का अब किसी अन्य युवक से संबंध है. इसलिए हो सकता है, यह बच्चा उसी का हो. इस के बाद चेतन वर्षिता से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा था. क्योंकि अब वह वर्षिता को धोखेबाज और स्वार्थी मानने लगा था और ऐसी लड़की से वह विवाह नहीं करना चाहता था. 14 अगस्त, 2025 को वर्षिता ने घर जाने के लिए हौस्टल से छुट्टी ली. पर वह गांव गई नहीं.  मम्मीपापा तो यही सोच रहे थे कि बेटी हौस्टल में होगी, लेकिन जब अगले दिन वर्षिता से फेमिली वालों की बात नहीं हुई तो फेमिली वालों को चिंता हुई. पापा ने हौस्टल में पता किया तो मालूम हुआ कि वह तो एक दिन पहले ही घर के लिए हौस्टल से छुट्टी ले कर निकल चुकी है.

यह सुन कर फेमिली वाले घबरा गए और वर्षिता के पापा थिप्पेस्वामी ने तुरंत हिरियूर थाने में बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. बाद में उन्हें बेटी की हत्या की सूचना मिली. पुलिस ने आरोपी चेतन से पूछताछ के बाद उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love story in Hindi

 

 

MP News: रिश्तों की बलिवेदी

MP News: मुकेश रिश्तेनातों को भूल कर अपनी ही सगी बहन पूजा को एकतरफा प्यार करने लगा था. पूजा को उस की हकीकत पता चली तो उसे दुत्कार कर वह उस से कन्नी काटने लगी. उसे क्या पता था कि भाई कसाई भी बन सकता है. एएसआई के.के. दुबे अपनी पत्नी माया व कुछ रिश्तेदारों के साथ शाम लगभग 5 बजे अपने क्वार्टर पहुंचे. उन का क्वार्टर थाना रांझी के प्रांगण में था. दरवाजा खुलवाने के लिए उन्होंने अपनी बेटी पूजा को आवाज दी. लेकिन घर के अंदर से न तो कोई जवाब मिला और न कोई हलचल ही हुई. वह पूजा को अकेली ही छोड़ कर गए थे, इसलिए सोचा कि वह सो रही होगी. उसे जगाने के लिए उन्होंने जोरजोर से दरवाजा पीटा, साथ ही उस का नाम ले कर आवाजें दीं.

क्वार्टर में जाने के लिए एक दरवाजा पीछे से भी था. जब आवाजें देने के बाद भी पूजा ने दरवाजा नहीं खेला तो के.के. दुबे क्वार्टर के पीछे गए. पिछला दरवाजा खुला देख कर उन्हें मामला कुछ गड़बड़ लगा. वह दबे पांव खुले दरवाजे के अंदर घुस कर कमरे में पहुंचे तो फर्श पर पूजा को लहूलुहान अवस्था में देख कर अवाक रह गए. आंखों से आंसू टपकने लगे. जब तक वह कमरे से बाहर निकले, तब तक पत्नी और रिश्तेदार भी पीछे वाले दरवाजे की तरफ आ गए थे. पति की आंखों में आंसू देख कर माया समझ गई कि कुछ न कुछ गड़बड़ है. उन्होंने पति से पूजा के बारे में पूछा तो उन की कुछ भी बताने की हिम्मत नहीं हुई और वह जोरजोर से रोने लगे. यह देख कर माया भी घबरा गई. वह तुरंत कमरे में गई. उस के पीछेपीछे रिश्तेदार भी पहुंच गए.

उन के क्वार्टर से थाने का दफ्तर करीब 100 मीटर दूर था, इसलिए रोने की आवाजें दफ्तर तक पहुंच गईं. रोनेधोने की आवाज सुन कर थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य के.के. दुबे के क्वार्टर पर पहुंच गए. उन्होंने जब सुना कि दुबे की बेटी की हत्या कर दी गई है तो उन के भी होश उड़ गए. कमरे का मुआयना करने के बाद उन्होंने अपने अधिकारियों को भी घटना से अवगत करा दिया. एएसआई की बेटी की हत्या थाना प्रांगण स्थित उन के क्वार्टर में हुई थी, इसलिए यह खबर हैरान कर देने वाली थी. सूचना पा कर डीएम एस.एन. रूपला, एसपी हरिनारायणचारी मिश्रा, एएसपी अमरेंद्र सिंह, एसपी (सिटी) जे.पी. मिश्रा, एसपी सिटी (ओमती) आजम खान भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने फोरेंसिक और डाग स्क्वायड टीम को भी मौके पर बुला लिया.

पूजा की लाश के पास ही एक टेप कटर और एक ईअर फोन पड़ा था. टेप कटर पर खून के धब्बे लगे थे. फोरेंसिक एक्सपर्ट ने टेप कटर और अन्य सामानों से फिंगर प्रिंट इकट्ठे किए. खोजी कुत्ता लाश सूंघ कर दरवाजे के पास जा कर रुक गया. उस से भी पुलिस को कोई खास सहायता नहीं मिली. बाद में पुलिस ने मौके से सुबूत जब्त कर लिए. पुलिस अधिकारियों ने लाश का मुआयना किया तो उस की गरदन पर 3 घाव थे और उस की दोनों कलाइयों की नसें कटी हुई थी. छानबीन के बाद पुलिस ने मृतका पूजा की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल जबलपुर भेज दी.

श्वांस नली और दोनों कलाइयों की नसें कटी होने की वजह से कुछ पुलिस वाले इसे आत्महत्या का मामला मान रहे थे. जब कोई पढ़ालिखा व्यक्ति आत्महत्या करता है तो वह सुसाइड नोट लिख कर ऐसी जगह रख देता है, जिस पर सभी की नजर पड़े. पुलिस ने पूरा कमरा छान मारा, लेकिन कहीं भी सुसाइड नोट नहीं मिला. थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य को यह मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का लग रहा था. इस की वजह यह थी कि कोई भी व्यक्ति धारदार हथियार से अपना गला नहीं काट सकता. पूजा के गले पर तो कटने के 3 निशान थे. इस के अलावा उस की कलाइयों की नसें भी काटी थीं.

उन्हें लग रहा था कि हत्यारे ने इस मामले को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की है. घर का कोई सामान भी चोरी नहीं हुआ था. इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे का मकसद केवल पूजा की हत्या करना था. हत्यारा कौन हो सकता है, इस का पता लगाने के लिए उन्होंने मृतका के पिता एएसआई के.के. दुबे से बात की. के.के. दुबे ने बताया कि उन की 5 बेटियां हैं, जिस में से 4 बेटियों की वह शादी कर चुके हैं. शादी के लिए सब से छोटी बेटी पूजा दुबे ही रह गई थी. वह एमए की पढ़ाई कर रही थी. थाने के सरकारी क्वार्टर में वह पत्नी माया दुबे और छोटी बेटी पूजा के साथ रहते थे. चूंकि पूजा भी शादी योग्य हो चुकी थी.

उस की पढ़ाई भी पूरी होने वाली थी इसलिए उन्होंने उस की शादी पनानगर के एक अच्छे परिवार के लड़के से तय कर दी थी. फरवरी, 2015 में उस की शादी होनी थी. लेकिन इस से पहले ही यह घटना घट गई. बतातेबताते दुबेजी की आंखें भर आईं. थानाप्रभारी ने उन्हें ढांढस बंधाया तो के.के. दुबे ने आगे बताया कि 29 जनवरी, 2015 को उन की सुसराल बूढ़ानगर में तेरहवीं का कार्यक्रम था. उस में भोपाल के रहने वाले उन के साढ़ू मुनेंद्र उपाध्याय को भी शामिल होना था. इसलिए 28 जनवरी को वह अपने बच्चों के साथ हमारे क्वार्टर पर आ गए थे. यहीं से हम सब 29 जनवरी को साढ़े 11 बजे बूढ़ानगर के लिए निकल गए. पूजा से हम ने चलने को कहा तो उस ने पढ़ाई की वजह से जाने से मना कर दिया. क्वार्टर थाने के प्रांगण में था, इसलिए उस के घर रुकने पर वह निश्चिंत थे.

दुबे के अनुसार तेरहवीं का कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन्होंने रांझी के लिए वापसी की. शाम करीब 5 बजे वह अपने क्वार्टर पर आए. यहां आ कर दरवाजा खुलवाने के लिए उन्होंने पूजा को कई आवाजें दीं और दरवाजा खटखटाया. लेकिन घर के अंदर से न तो पूजा की कोई आवाज आई और न ही कोई हलचल सुनाई दी. तब वह पीछे के दरवाजे पर पहुंचे. पीछे वाला दरवाजा खुला पड़ा था. उन्होंने कमरे में जा कर देखा तो बैड के करीब फर्श पर पूजा की लहूलुहान लाश पड़ी थी.

के.के. दुबे ने बताया कि पूजा आत्महत्या नहीं कर सकती, क्योंकि वह बहुत हिम्मत वाली लड़की थी. पढ़नेलिखने में भी वह तेज थी. शादी तय हो जाने के बाद से वह काफी खुश थी. जब थानाप्रभारी ने उन से किसी पर शक वगैरह होने की बात पूछी तो उन्होंने अपने साढू मुनेंद्र के बेटे मुकेश उपाध्याय पर हल्का शक जाहिर किया. उन्होंने बताया कि शहपुरा और जबलपुर के थानों में तैनाती के दौरान मुकेश ने उन के यहां कुछ ज्यादा आनाजाना कर दिया था. उस दौरान उस ने पूजा के साथ कुछ ऐसी हरकतें कीं, जो बहनभाई के संबंधों में नहीं होनी चाहिए थीं. पूजा ने जब यह बात उन्हें बताई थी तो वह उस के साथ उपेक्षा भरा बर्ताव कर के उस से बेरुखी से पेश आने लगे. इस के बाद मुकेश पूजा के मोबाइल पर ऐसी बातें करने लगा जो पूजा को पसंद नहीं थीं.

मुकेश के बारबार फोन करने से पूजा परेशान हो उठी. उस ने मुकेश को डांटा और उसे फोन न करने की सख्त हिदायत दी. लेकिन मुकेश ने अपनी हरकतें बंद नहीं कीं. परेशान हो कर अंत में उन्होंने उस के मातापिता से शिकायत की. इस से वह और उग्र हो गया और फोन बदलबदल कर पूजा को धमकियां देने लगा. इसी दौरान दिसंबर, 2014 में उन्होंने पूजा की शादी तय कर दी थी. बाद में जनवरी, 2015 के प्रथम सप्ताह में उन्होंने पूजा की मंगनी भी कर दी थी. जब इस बात की जानकारी मुकेश को हुई तो वह 14 जनवरी को भोपाल से जबलपुर आ गया. वह घर न आ कर सीधे पूजा के कोचिंग सेंटर के बाहर पहुंच गया. जैसे ही वह कोचिंग सेंटर से बाहर निकली तो रास्ते में उस ने पूजा को रोक लिया और उस से विवाह करने की जिद करने लगा.

पूजा ने उसे झिड़क दिया और घर आ कर अपनी मां को मुकेश की हरकतों के बार में बताया. मुकेश की पागलपन की इन हरकतों से वे लोग बेहद परेशान थे, लेकिन लोकलाज के कारण चुप थे. मौसेरे भाई की एकतरफा प्यार की कहानी सुन कर थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य ने मृतका पूजा व मुकेश के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई और मुकेश के नंबर को सर्विलांस पर लगा कर केस के खुलासे की कोशिश शुरू कर दी. मुकेश की काल डिटेल्स की समीक्षा से पता चला कि घटना के दौरान उस के फोन की लोकेशन जबलपुर और थाना रांझी के टावरों के पास थी. इस से पुलिस का शक मुकेश पर और गहरा गया.

थानाप्रभारी अनिल मौर्य ने दलबल के साथ पहली फरवरी, 2015 को कोहेफिजा, भोपाल स्थित मुकेश के घर छापा मारा. मुकेश घर पर ही मिल गया. तलाशी लेने पर उस के घर में खून लगी जैकेट मिली. वह पुलिस ने बरामद कर ली. पुलिस ने उसी समय उसे हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए थाना रांझी ले आई. थाने में मुकेश से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह पुलिस के सामने ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. उस ने स्वीकार कर लिया कि पूजा की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

मुकेश मध्य प्रदेश के जिला भोपाल के कस्बा कोहेफिजा के रहने वाले मुनेंद्र उपाध्याय का बेटा था. मुनेंद्र उपाध्याय प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. मुकेश गलत साथियों की संगत में पड़ जाने की वजह से इंटरमीडिएट से आगे की पढ़ाई नहीं कर सका. वह दिन भर आवारागर्दी करता. मातापिता ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं सुधरा. करीब 7 साल पहले की बात है. मुकेश पहली बार परिवार वालों के साथ पूजा के घर गया था. जब उस ने पहली बार पूजा को देखा तो वह उसे भा गई. उस की सुंदरता के आकर्षण में वह ऐसा डूबा कि उस का दीवाना हो गया. मुकेश चूंकि पूजा का मौसेरा भाई था, इसलिए वह उस से घुलमिल कर बातें करती थी. पूजा के इसी अपनत्व भरे व्यवहार को मुकेश पूजा की चाहत समझ बैठा. इस तरह उस के दिल में पूजा के प्रति एकतरफा प्यार उमड़ने लगा.

इस के बाद वह अकसर कोई न कोई बहाना बना कर भोपाल से जबलपुर स्थित पूजा के घर आनेजाने लगा. बहन का बेटा होने की वजह से पूजा की मां माया उसे बड़े प्यारदुलार से रखती थी. मानसम्मान पा कर मुकेश अकसर पूजा के घर आने लगा. वह वहां कईकई दिन रुकता था. मुकेश की नजरें पूजा पर ही लगी रहती थीं, इसलिए वह जब भी वहां आता, पूजा के आसपास ही मंडराता रहता था. चूंकि मुकेश सगा रिश्तेदार था, इसलिए परिवार वाले उस पर किसी तरह का शक नहीं करते थे. धीरेधीरे वह पूजा के साथ अजीब तरह की हरकतें करने लगा. फिर भी पूजा मुकेश के अटपटे व्यवहार को उस का भोलापन मान कर नजरअंदाज करती रही. इसे मुकेश पूजा के प्यार करने की मूक सहमति समझने लगा.

समय के साथ मुकेश का प्यार विकृत हो कर भयावह होता जा रहा था. वहीं दूसरी ओर पूजा के दिल में मुकेश के प्रति भाई का प्यार पवित्र और सामान्य स्थिति में था. मुकेश एकतरफा प्यार में अंधा होता जा रहा था. इतना ही नहीं, वह गलतफहमी में पूजा को अपना जीवनसाथी बनाने के सतरंगी सपने देखने लगा. समय गुजरता गया. 6 साल कब गुजर गए, पता तक नहीं चल पाया. इधर पूजा एमए कर रही थी. शादी योग्य समझ कर उस के घर वालों ने उस का विवाह तय कर दिया. यह खबर सुन कर मुकेश की स्थिति कटे हुए वृक्ष जैसी हो गई. वह कई बार पूजा के घर बहाना बना कर आया, लेकिन समय न पा कर मुकेश पूजा से अपने दिल की बात नहीं कह पाया.

जब मुकेश को पता चला कि पूजा की मंगनी नए साल के पहले सप्ताह में होने वाली है तो वह विचलित हो उठा. उस ने मोबाइल से फोन कर के पूजा से पहली बार प्यार का इजहार करते हुए कहा, ‘‘पूजा, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. मैं तुम से विवाह करना चाहता हूं. अगर तुम ने मुझ से विवाह न किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा.’’

‘‘मुकेश, यह तुम क्या कह रहे हो. लगता है तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. तुम मेरे मौसेरे भाई हो. आइंदा ऐसी गंदी सोच वाली बात मुझ से न करना.’’ डांटते हुए पूजा बोली.

‘‘पूजा, तुम अच्छी तरह सुन लो कि मैं तुम्हें जान से ज्यादा चाहता हूं और तुम्हें अपना मान चुका हूं. मैं ने तय कर लिया है कि शादी तुम से ही करूंगा. अगर तुम ने मुझे धोखा दिया तो समझ लो परिणाम गंभीर होंगे.’’ चेतावनी देते हुए मुकेश बोला, ‘‘यह याद रखो पूजा, अगर तुम मेरी न हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं बनने दूंगा. भले ही नतीजा कुछ भी हो.’’

‘‘मुकेश भइया तुम पागल हो चुके हो. कहीं भाईबहन में शादी होती है?’’ कह कर पूजा ने फोन काट दिया.

दूसरी तरफ मुकेश पूजा की बेरुखी को देख कर गहरे तनाव में आ गया. उसे पूरी रात नींद नहीं आई. उस के मनमस्तिष्क में पूजा की ही तस्वीर घूमती रही. सुबह उठा तो उस की आंखें सूजी हुई थीं. तनाव से वह बेहद खामोश एवं गंभीर हो गया. मुकेश की खामोशी को घरपरिवार वाले समझ नहीं पा रहे थे. वह अकसर गुमशुम रहने लगा. उधर मुकेश की बहकीबहकी बातें सुन कर पूजा बहुत परेशान हो उठी. उस ने मुकेश के मोबाइल की काल को रिसीव करना बंद कर दिया, जिस से मुकेश और बेचैन हो गया. पूजा की मंगनी होने की बात सुन कर मुकेश 14 जनवरी, 2015 को भोपाल से जबलपुर आ गया और जब पूजा अपने कोचिंग सेंटर से बाहर निकली तो उस ने पूजा को रोक लिया.

उस ने पूजा के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पूजा, मैं तुम्हें जान से ज्यादा चाहता हूं. तुम किसी और से विवाह न कर के मुझ से कर लो. हम दोनों के बीच जो भी रोड़े आएंगे, हम उन से निपट लेंगे. लेकिन तुम मेरी चाहत और प्यार को धोखा मत दो.’’

‘‘मुकेश, मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ रही हूं, लेकिन हम दोनों के बीच भाईबहन का पवित्र रिश्ता है. बेहतर यही है कि तुम होश में आ जाओ. अगर तुम मुझे ज्यादा परेशान करोगे तो मैं तुम्हारी शिकायत मौसाजी से कर दूंगी.’’ पूजा उसे सख्त हिदायत देते हुए बोली. घर लौट कर पूजा ने यह बात अपनी मां माया दुबे को बताई तो उन्होंने उसी समय अपनी बहन और बहनोई को फोन कर के उन से मुकेश की शिकायत कर दी. उस ने कहा कि मुकेश को समझाओ. उस की हरकतों से पूजा की शादी में व्यवधान पडे़गा और अगर शादी के बाद किसी तरह यह बात उस के ससुराल वालों को मालूम हो गई तो उस का पारिवारिक जीवन नरक हो जाएगा.

मुकेश के घर वालों ने उसे डांटा. इस से वह आगबबूला हो गया. उस ने पूजा की हत्या करने की ठान ली. संयोग से मुकेश को पता चला कि 29 जनवरी, 2015 को उस के मातापिता मौसामौसी के साथ बूढ़ानगर स्थित ननिहाल में तेरहवीं कार्यक्रम में जाएंगे. पूजा की हत्या करने का उस के लिए यह अच्छा मौका था. 28 जरवरी, 2015 को मुकेश के मातापिता भोपाल से पूजा के घर के लिए चल दिए. मुकेश भी उन्हीं के पीछेपीछे रवाना हो गया. उसी दिन देर रात वे लोग पूजा के घर पहुंच गए. जबकि मुकेश जबलपुर स्टेशन पर पहुंच गया. अपनी योजना के मुताबिक वह पूरी रात स्टेशन पर ही रहा. 29 जनवरी की सुबह 10 बजे मुकेश रांझी पहुंच गया और थाना रांझी से कुछ दूर खड़े हो कर अपने और पूजा के मातापिता के घर से निकलने का इंतजार करने लगा.

वे लोग साढे़ 11 बजे के लगभग थाने के क्वार्टर के बाहर आ गए तो कुछ देर बाद वह पूजा के घर पहुंच गया. उन के जाने के बाद उस ने निश्चिंत हो कर दरवाजा खटखटाया. जैसे ही पूजा ने दरवाजा खोला, वह अंदर घुस गया. फुरती से अंदर घुस कर उस ने दरवाजा बंद कर लिया. फिर वह पूजा को पकड़ कर पीछे वाले कमरे में ले गया और उस से शादी करने के लिए उस पर घर से भाग चलने का दबाव बनाने लगा. पूजा मुकेश पर बिगड़ी और पिता को उस की बातें बताने की धमकी दे कर बैड पर पड़े अपना मोबाइल उठाने के लिए लपकी.

पूजा की हरकत देख कर मुकेश ने जेब से टेप कटर निकाला और पूजा की गरदन को 3 बार रेत दिया. वह लहूलुहान हो कर फर्श पर गिर गई. उस के बाद पूजा की हत्या को आत्महत्या के रूप में दर्शाने के लिए उस ने उस के दोनों हाथों की कलाई की नसों को काट दिया और कमरे में उसे तड़पता छोड़ कर चुपचाप पीछे वाले दरवाजे से निकल गया. उस की जैकेट पर खून के छींटे आ गए थे, इसलिए उस ने जैकेट उतार कर हाथ में पकड़ ली थी. फिर वह अपने घर भोपाल आ गया. मुकेश ने थानाप्रभारी अनिल सिंह मौर्य को बताया कि पहले पूजा भी उसे खूब चाहती थी. जब भी उस से मिलताजुलता था, वह उस से बड़े प्यार से बातें करती थी.

लेकिन शादी तय हो जाने के बाद वह पूरी तरह बदल गई और उस से  नफरत करने लगी थी. उस ने पूजा को अपने साथ शादी करने के लिए बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी तो मजबूर हो कर उस ने उस की हत्या कर डाली. मुकेश से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302, 450 के तहत गिरफ्तार कर 2 फरवरी, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल जबलपुर भेज दिया. एसपी हरिनारायणचारी मिश्रा ने इस मामले का खुलासा करने वाली टीम को बधाई देते हुए उन्हें पुरस्कृत किया. MP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित