Love Story in Hindi: दूसरे की प्रेमिका

Love Story in Hindi: प्राची खूबसूरत भी थी और अल्हड़ भी. वह लंच बौक्स सप्लाई का काम करती थी. इसी बीच उस की मुलाकात समीर रोहितकर से हुई और वह अपने पति से तलाक ले कर उस की हो गई. लेकिन बाद में जब प्राची की जिंदगी में प्रसाद मांडवकर आया तो…

25 वर्षीय प्रसाद प्रकाश मांडवकर मराठी दैनिक अखबारों का फ्रीलांस रिपोर्टर और फोटोग्राफर था. काम की वजह से उस के घर आनेजाने का कोई निश्चित समय नहीं था. लेकिन जब कभी लौटने में देरी होती थी, तो वह फोन कर के अपनी मां राधा को घर लौटने का समय बता देता था. रोजाना की तरह उस दिन सुबह भी वह काम पर जाने के लिए घर से तो निकला लेकिन वापस नहीं लौटा. जब वह न खुद आया और न उस का कोई फोन आया तो उस की मां राधा ने उसे फोन किया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. प्रसाद प्रकाश जिस पेशे में था, उस में देरसवेर होना या फोन बंद मिलना आम बात थी. इसलिए उस की मां राधा ने उसे दोबारा फोन नहीं किया.

लेकिन जब रात के 12 बज गए तो राधा को चिंता हुई. उस ने दोबारा बेटे का फोन ट्राई किया, लेकिन उस का फोन अब भी बंद था. देरसवेर भले ही हो जाती थी लेकिन ऐसा कभी नहीं होता था कि लगातार फोन बंद रहे. ऐसी स्थिति में राधा की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राधा का मन नहीं माना तो वह बेटे की तलाश में घर से निकल पड़ी. उस ने अपनी चाल और बस्ती के रहने वाले प्रसाद प्रकाश के सारे दोस्तों से उस के बारे में पता किया. उस के एक दोस्त समीर ने उसे बताया कि प्रसाद रात 8 बजे के करीब उसे मिला था. लेकिन उस के बाद वह कहां गया, इस की उसे कोई जानकारी नहीं है.

राधा ने अपनी जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों से भी फोन पर संपर्क कर के बेटे के बारे में पूछताछ की. जब प्रसाद मांडवकर के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो उस की मां राधा बुरी तरह घबरा गई. उस की चिंता बढ़ गई और भूखप्यास मर गई. किसी अनहोनी की आशंका से राधा के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी, निगाहें घर के दरवाजे पर टिकी हुई थीं. बाहर जरा सी भी आहट होती तो वह लपक कर घर के दरवाजे पर आ जाती. लेकिन जब कोई दिखाई नहीं देता तो मायूस हो कर अंदर चली जाती.

बेटे के लौटने की आशा लिए प्रसाद की मां राधा ने जैसेतैसे रात बिताई. सुबह होते ही वह अपने घर वालों के साथ थाना ताड़देव पहुंची और वहां मौजूद पुलिस अफसर से सारी बात बता कर प्रसाद मांडवकर की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. यह 7 जनवरी, 2015 की बात है. शिकायत दर्ज करने के बाद पुलिस ने वायरलेस से यह सूचना अन्य थानों को दे दी. 8 जनवरी, 2015 को सुबह लगभग 10 बजे मुंबई के उपनगर घाटकोपर स्थित तिलक नगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले को किसी राहगीर ने फोन पर जानकारी दी कि घाटकोपर-मानखुर्द रोड स्थित पी.डब्ल्यू.डी. कंपाउंड, तिलक ब्रिज के पास एक अज्ञात युवक की लाश पड़ी है.

सूचना मिलते ही तिलक नगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया और यह खबर कंट्रोल रूम को देने के बाद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से महज एक किलोमीटर दूर था इसलिए पुलिस को वहां पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगी. इस बीच इस घटना की खबर पूरे इलाके में फैल गई थी और घटनास्थल पर काफी लोगों की भीड़ एकत्र हो चुकी थी. पुलिस ने भीड़ को वहां से हटा कर घटनास्थल का निरीक्षण किया. लाश को ठीक से देखने के बाद पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से उस की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका.

इस से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि मृतक उस इलाके का रहने वाला नहीं था. निस्संदेह हत्यारों ने कहीं दूसरी जगह से ला कर वहां उस की हत्या की थी. मृतक के सिर और गले पर किसी तेजधार वाले हथियार के गहरे घाव थे. सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले अभी घटना का निरीक्षण और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर ही रहे थे कि सूचना पा कर क्राइमब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर सदानंद दाते, अपर पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना, एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी, असिस्टैंट कमिश्नर प्रफुल्ल भोसले और क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर वांकट पाटील, इंसपेक्टर संजय सुर्वे, असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले अपने सहायकों के साथ घटना पर पहुंच गए. सभी ने तिलकनगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर के साथ घटनास्थल का निरीक्षण किया.

इंसपेक्टर भगवत सोनावले ने घटनास्थल की जांच पड़ताल और औपचारिक काररवाई पूरी कर के मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भेज दिया. शव के कपड़ों की तलाशी ले कर उन्होंने सील कर के अपने कब्जे में ले लिया. तत्पश्चात वे थाने लौट आए. थाने लौट कर वह मृतक की शिनाख्त में जुट गए. क्योंकि बिना उस की शिनाख्त के तफ्तीश की दिशा तय करना संभव नहीं था. इधर क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटील अपने सहायकों के साथ मामले की तफ्तीश और उस के विषय में विचारविमर्श कर रहे थे तो उधर क्राइम ब्रांच के उच्चाधिकारी भी चुप नहीं बैठे थे. एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को जब लगा कि मृतक की शिनाख्त जल्दी होना संभव नहीं है तो उन्होंने उस की लाश की फोटो सोशल मीडिया पर डाल दी.

इस का जल्दी ही नतीजा निकला. मृतक का फोटो सोशल मीडिया पर आते ही दैनिक मराठी सामना के एक रिपोर्टर ने मृतक को पहचान कर क्राइम ब्रांच यूनिट-3 के सीनियर इंसपेक्टर अरविंद सावंत को बताया कि मृतक का नाम प्रसाद प्रकाश मांडवकर है और वह मुंबई सेंट्रल (पश्चिम) का रहने वाला है. रिपोर्टर ने यह भी बताया था कि उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट ताड़देव पुलिस थाने में दर्ज कराई गई है. उस रिपोर्टर की सूचना पर क्राइम ब्रांच यूनिट-3 के सीनियर इंसपेक्टर अरविंद सावंत ने मामले को तफ्तीश के लिए इंसपेक्टर अविनाश धर्माधिकारी, इंसपेक्टर दीपक चव्हाण, इंसपेक्टर संजय तिकुंव, सिपाही हसन मुजावर, नंद कुमार आड़ावकर, प्रकाश कोठालकर आदि को नियुक्त कर के इस की जानकारी एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी और असिस्टेंट कमिश्नर प्रफुल्ल भोसले को दे दी.

इंसपेक्टर अविनाश धर्माधिकारी ने तुरंत अपने सहायकों को साथ लिया और ताड़देव पुलिस थाने से जानकारी ले कर मृतक प्रसाद मांडवकर के घर पहुंच गए. जब मृतक प्रसाद मांडवकर की फोटो उस की मां राधा को दिखाई गई तो वह सन्न रह गई और छाती पीटपीट कर रोने लगी. जांच अधिकारियों ने उसे सांत्वना दे कर समझाया और प्रसाद मांडवकर का शव लेने के लिए राजाबाड़ी अस्पताल भेज दिया. मृतक की शिनाख्त हो गई तो जांच अधिकारियों का आधा सिरदर्द खत्म हो गया. लेकिन अब जो समस्या सामने थी, वह मृतक प्रसाद मांडवकर के हत्यारों को ले कर थी. लेकिन यह समस्या भी शीघ्र ही हल हो गई. क्राइम ब्रांच ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए मृतक की मां राधा से पूछताछ करने का फैसला किया.

इस बारे में राधा से पूछा गया तो उस ने बताया कि प्रसाद प्रकाश का न तो किसी से कोई लड़ाईझगड़ा था और किसी की देनदारी. यहां तक कि उस का कोई दुश्मन भी नहीं था. इस पर क्राइम ब्रांच के अफसरों ने राधा से प्रसाद के दोस्तों और रिश्तेदारों के पते और फोन नंबर लिए. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. क्राइम ब्रांच के पास अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा था कि प्रसाद मांडवकर के मोबाइल की सीडीआर (कौल डिटेल्स रिकौर्ड) चेक करे. जब उस के नंबर की सीडीआर निकलवाई गई तो उस के कई दोस्तों के नंबर सामने आए. जब उन नंबरों की गहराई से जांच की गई तो उन की नजर एक नंबर पर ठहर गई. वह नंबर प्रसाद के पड़ोस में रहने वाले उस के दोस्त समीर का था, जिस से वह गायब होने के कुछ घंटों पहले मिला था. उस ने प्रसाद माडंवकर की मां राधा को भी यही बताया था.

समीर ब्रीच कैंडी अस्पताल के सामने वाली इमारत में कार ड्राइवर की नौकरी करता था. समीर की पूरी कुंडली निकालने के बाद क्राइम ब्रांच ने उसे 10 जनवरी, 2015 को हिरासत में ले लिया. क्राइम ब्रांच के औफिस में ला कर उस से प्रसाद मांडवकर की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो पहले तो वह खुद को प्रसाद की हत्या से अनभिज्ञ बताता रहा. लेकिन वह जांच अधिकारियों के सवालों के आगे ज्यादा देर तक नहीं ठहर सका. अंतत: उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रसाद मांडवकर की हत्या में सामिल अपने सभी साथियों के नाम पते बता दिए. समीर ने प्रसाद मांडवकर हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह काफी चौंकाने वाली थी.

31 वर्षीय समीर रोहितकर मुंबई सेंट्रल (पश्चिम) के जरीवाला चाल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के पिता का नाम वसंत रोहितकर था. परिवार में उस के मातापिता के अलावा 2 बहने थीं. उस के पिता भी कार ड्राइवर थे. परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. इसलिए समीर रोहितकर कुछ खास पढ़लिख नहीं पाया था. जब समीर जवान हुआ तो पिता वसंत रोहितकर ने उसे भी कार ड्राइवरी का लाइसेंस बनवा कर ब्रीच कैंडी अस्पताल के पास रहने वाले एक व्यापारी के यहां नौकरी पर रखवा दिया.

वह व्यापारी समीर रोहितकर को अपने बेटे की तरह मानता था. जब कभी वह मुंबई के बाहर जाता था, तो अपनी कार समीर रोहितकर की हिफाजत में छोड़ जाता था. समीर रोहितकर जिस चाल में रहता था, उसी चाल में प्रसाद मांडवकर और प्राची के परिवार भी रहते थे. प्राची का परिवार काफी गरीब था. उस के पति की कोई खास आमदनी नहीं थी. विवाह के बाद प्राची जब उस घर में आई थी तो घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. लेकिन शादी के बाद प्राची ने अपनी मेहनत और परिश्रम से घर की स्थिति को काफी हद तक संभाल लिया था. अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए वह हाउस कैटरिंग का काम करने लगी थी. वह अपने घर में अच्छा और स्वादिष्ट खाना बनवा कर काम धंधे वालों को पहुंचाने लगी थी.

प्राची जितनी सुंदर थी, उस से कहीं अधिक चंचल थी. उस ने महानगर पालिका के स्कूल से 8वीं पास की थी. उस की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह बहुत मिलनसार थी. वह जिस से भी बातचीत करती खुल कर करती थी और अपनी बातों से किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेती थी. शादी के बाद जब प्राची अपनी ससुराल आई थी, उस के कुछ दिनों बाद ही समीर का दिल उस पर आ गया था. सोतेजागते वह प्राची को ही सपने में देखने लगा था. वह जब भी कमसिन अल्हड़ प्राची को देखता तो उस के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. वह उस की नजदीकी पाने के लिए छटपटा उठता था.

कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. समीर रोहितकर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. प्राची एक कर्मठ महिला थी. वह अपने परिवार और घर की स्थिति को सुधारने के लिए हाउस कैटरिंग का काम करती थी, उसी हाउस कैटरिंग के सहारे समीर प्राची के करीब पहुंच गया. दरअसल समीर ने अपने घर का लंचबौक्स लाना बंद कर के प्राची का लंच बौक्स मंगवाना शुरू कर दिया. फिर इसी बहाने वह कभीकभी प्राची के घर भी खाना खाने जाने लगा. जल्दी ही वह उस के परिवार वालों से घुलमिल गया. जरूरत पड़ने पर वह उस के परिवार की आर्थिक मदद भी करने लगा था.

प्राची भी कोई बच्ची नहीं थी. वह समीर रोहितकर के मन की बातों को अच्छी तरह समझने लगी थी. समीर रोहितकर को अपनी तरफ आकर्षित होते देख कर धीरेधीरे वह भी उस की तरफ खिंचती चली गई. दोनों के दिलों में जब एकदूसरे के लिए प्रेम के अंकुर फूटे तो जल्दी ही वह समय भी आ गया, जब दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया. यह स्थित आई तो दोनों अपने आप को रोक नहीं पाए और मौका पाते ही एकदूसरे की बांहों में समा गए. दोनों ने एक ही झटके में सारी मर्यादाएं तोड़ डालीं. एक बार जब सीमाएं टूटीं तो फिर दोनों की नजदीकियां बढ़ती ही गईं. अब जब भी प्राची और समीर को मौका मिलता तो दोनों अपने तनमन की प्यास बुझा लेते. दोनों के बीच यह सिलसिला 2 साल तक चुपचाप चलता रहा. इस बीच उन के संबंधों के बारे में कोई नहीं जान सका.

इश्क और मुश्क अधिक दिनों तक छिपाए नहीं छिपता. धीरेधीरे पड़ोसियों में जब इस बात की चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ते यह खबर प्राची के परिवार और उस के पति के कानों तक भी जा पहुंची. हकीकत जान कर उस के पति के होश उड़ गए. प्राची के पति को यह बात तो मालूम थी कि समीर रोहितकर उस की पत्नी के हाथों के बने लंच बौक्स का खाना खाता है और उस के घर भी आताजाता है. लेकिन खाना खाने के बहाने समीर का उस की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध हो जाएगा, यह उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. मामला नाजुक था. शोरशराबे से बदनामी हो सकती थी. इसलिए उस ने प्राची को शांति से समझाना चाहा. लेकिन प्राची ने पति की बातों को न समझ कर पूरा घर सिर पर उठा लिया. वह उलटा अपने पति पर ही बरस पड़ी और उसे काफी खरीखोटी सुनाई. प्राची पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो उस के पति ने उसे तलाक दे दिया. यह बात 2005 की थी.

पति से तलाक होने के बाद प्राची भायखाला आ कर रहने लगी. यहां वह समीर रोहितकर से खुल कर मिलती थी. हालांकि समीर प्राची से शादी नहीं की थी, लेकिन दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे थे. समीर प्राची की सभी जरूरतों को पूरी करता था. उस के अलावा प्राची ने अपना कैटरिंग का काम भी चालू रखा था. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. धीरेधीरे प्राची और समीर को साथसाथ रहते और मौजमस्ती करते हुए 8 साल गुजर गए. लेकिन 2013 में इस हवा का रुख बदला और प्राची समीर की बांहों को छोड़ कर प्रसाद मांडवकर की बांहों में आ गई. यह बात जब समीर रोहितकर को पता चली तो उस का खून खौल उठा. वह प्रसाद मांडवकर के खून का प्यासा हो गया.

प्रसाद मांडवकर भी उसी चाल में रहता था, जिस चाल में समीर रोहितकर रहता था. दोनों बचपन के दोस्त थे. दोनों एक साथ खेलेकूदे और जवान हुए थे. प्रसाद मांडवकर के पिता प्रकाश मांडवकर की मृत्यु हो चुकी थी. मां राधा ने उसे मेहनतमशक्कत करके पालापोसा और उसे पढ़ायालिखाया था. प्रसाद मांडवकर महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह पढ़लिख कर जवान हुआ तो उस का झुकाव नौकरी या किसी व्यवसाय की तरफ नहीं था. इस की जगह उस ने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया और मराठी दैनिक अखबारों में फ्रीलांस फोटोग्राफी और न्यूज रिपोर्टिंग करने लगा. धीरेधीरे उस की कई मराठी न्यूज रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों से जानपहचान हो गई.

प्रसाद मांडवकर ने जब कई बार प्राची और समीर रोहितकर को एकदूसरे से मिलतेजुलते मौजमस्ती करते देखा, तो उस का दिल भी प्राची के लिए धड़कने लगा. न चाहते हुए भी वह धीरेधीरे प्राची की तरफ झुकने लगा. प्राची की सुंदरता और उस के व्यवहार से प्रसाद मांडवकर की भी वही हालत हुई जो कभी समीर रोहितकर की हुई थी. फलस्वरूप प्रसाद मांडवकर का दिल भी प्राची की नजदीकियां पाने के लिए तड़प उठा. उस ने भी प्राची को पाने के लिए वही रास्ता अपनाया जो कभी समीर रोहितकर ने अपनाया था.

उस ने समीर रोहितकर से प्राची का मोबाइल नंबर ले लिया और अगले दिन ही अपने लिए प्राची का लंच बौक्स मंगवाने के बहाने उस से बातचीत शुरू कर दी. शुरूशुरू में प्राची ने प्रसाद मांडवकर को लंच बौक्स भेजने के अलावा उस की और कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब प्रसाद उस के लंच बौक्स और उस के रूप सौंदर्य की खुल कर तारीफ करने लगा तो प्राची को भी उस की बातें अच्छी लगने लगीं. नतीजतन वह भी प्रसाद की बातों का जवाब उसी की तरह देने लगी.

औरत हमेशा अपने रूप सौंदर्य और अपनी तारीफों की भूखी होती है. प्रसाद मांडवकर ने इस का लाभ उठाया. प्राची का प्रोत्साहन मिलते ही वह उस के करीब आने की कोशिश करने लगा. धीरेधीरे दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों फोन पर खूब बातें करने लगे. इतना ही नहीं प्रसाद अब लंच बौक्स मंगाने के बजाए उसी के घर जा कर लंच करने लगा. कभीकभी वह उसे अपने साथ घुमाने भी ले जाने लगा. प्राची जब सुंदर स्वस्थ और मजबूत कदकाठी वाले प्रसाद मांडवकर की तरफ आकर्षित हुई तो समीर रोहितकर को वह नजरअंदाज करने लगी. प्राची को अब समीर रोहितकर की बांहों में वह आनंद नहीं मिलता था, जो प्रसाद मांडवकर की बांहों में मिलता था.

उसे अब समीर रोहितकर की बांहों से मजबूत बांहें प्रसाद मांडवकर की लगने लगी थीं. कुछ दिनों बाद जब समीर रोहितकर को प्रसाद मांडवकर और प्राची के मधुर संबंधों की जानकारी हुई तो वह बौखला उठा. इस बात को ले कर उस ने जब प्राची को आड़े हाथों लिया तो वह उस पर बरस पड़ी. उस ने समीर को बताया कि प्रसाद से उस का रिश्ता भाईबहन जैसा है. लेकिन समीर को प्राची की बातों पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ. वह यह बात अच्छी तरह जान चुका था कि प्रसाद मांडवकर और प्राची के बीच कुछ अलग ही तरह के संबंध हैं.

आखिरकार उन दोनों के रिश्तों की सच्चाई जानने के लिए समीर प्रसाद मांडवकर से मिला और उस के व प्राची के संबंधों के बारे में पूछा. साथ ही उस ने उसे अपने और प्राची के बीच से निकल जाने के लिए भी कहा. लेकिन प्रसाद ने उस की बात मानने से इनकार करते हुए कहा कि प्राची अब उस की प्रेमिका है. प्रमाण के लिए प्रसाद ने उसे अपने नजदीकी संबंधों के कुछ फोटोग्राफ्स भी दिखाए जिनमें वे दोनें साथसाथ थे. यह देखकर समीर ने गुस्से में कहा, ‘‘प्रसाद, यह तुम ने ठीक नहीं किया. दोस्त हो कर दोस्त की पीठ में छुरा घोंपना ठीक नहीं है.’’

इस बात पर प्रसाद को भी गुस्सा आ गया. वह बोला, ‘‘यह सब कहने से पहले अपने गिरेबान में झांको. तुम ने कौन अच्छा किया था? एक सीधेसादे आदमी का घरबार बरबाद करने वाले तुम ही थे न? वह कौन सी तुम्हारी पत्नी है जो तुम उस के लिए मरे जा रहे हो. जो तुम कर रहे हो वही मैं भी कर रहा हूं. इस में बुरा मानने वाली बात क्या है?’’

अपने घर लौट कर प्रसाद मांडवकर तो रिलेक्श हो गया लेकिन समीर रोहितकर को रातभर नींद नहीं आई. उसे प्रसाद मांडवकर की कही बातें कांटों की तरह चुभ रही थीं. रातभर सोचने के बाद उस ने प्रसाद को अपने और प्राची के बीच से निकाल फेंकने का खतरनाक फैसला कर लिया. लेकिन यह काम उस के अकेले के बस की बात नहीं थी. इसलिए उस ने इस काम में अपने 2 दोस्तों की मदद लेने की सोची. इस काम के लिए उस ने अपने दोस्त रोहित वंगर और जार्ज फर्नांडीस से बात की. दोनों उस के खास दोस्त थे. उस की बात सुन कर वह खुशीखुशी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जार्ज फर्नांडीस मुंबई स्थित ब्रीच कैंडी अस्पताल के पास एक सैंडविच और जूस सेंटर पर नौकरी करता था, जहां समीर अकसर अपने मालिकों के लिए सैंडविच और जूस लेने आताजाता था.

यहीं पर रोहितकर से उस की दोस्ती हुई थी. जार्ज फर्नांडीस के पिता वहीं की एक इमारत में कार ड्राइवरी करते थे. वह अपने पिता के लिए उसी दुकान पर उन का लंच बौक्स ले कर आता था. सैंडविच और जूस सेंटर पर ही तीनों की मुलाकातें होती थीं. तीनों गहरे दोस्त बन गए थे. अब समीर रोहितकर को इंतजार था एक ऐसे मौके का जब वह अपना काम आसानी से कर सके. उसे यह मौका घटना वाले दिन मिल गया. संयोग से उस दिन समीर रोहितकर के मालिक किसी काम से मुंबई से बाहर चले गए थे. उन की कार 24 घंटों के लिए समीर के हाथों मे ंआ गई थी. निस्संदेह उस के लिए यह एक अच्छा मौका था. समीर रोहितकर ने जार्ज फर्नांडीस और रोहित वंगर से फोन पर बात की और प्रसाद मांडवकर को सारे गिले शिकवे भुला कर सैंडविच सेंटर पर आने के लिए कहा.

जिस वक्त प्रसाद मांडवकर सैंडविच सेंटर पर पहुंचा, उस समय समीर रोहितकर अपने मालिक की कार लिए खड़ा था. उस ने प्रसाद मांडवकर को बड़े प्यार से अपनी कार में बैठा लिया और इधरउधर की बातें करने लगा. इसी बीच समीर ने अपने दोस्त जार्ज फर्नांडीस को इशारा किया. जार्ज फर्नांडीस ने प्रसाद मांडवकर को पीने के लिए जूस का गिलास ला कर दिया जिस में योजनानुसार नींद की गोलियां मिली हुई थीं. जूस पीने के थोड़ी देर बाद जब उस पर खुमारी छाने लगी तो अपनी योजना के अनुसार समीर ने कपड़ा धोने वाले डिटर्जेंट के पाउडर और बोरिक ऐसिड से बनाया गया इंजेक्शन अपने दोस्तों की मदद से प्रसाद मांडवकर के गले में लगा दिया. उन का मानना था कि इस इंजेक्शन से प्रसाद मांडवकर की मौत हो जाएगी और किसी को उस की मौत के कारणों का पता भी नहीं चलेगा.

लेकिन जब उन की यह योजना फेल हो गई तो समीर बेहोश प्रसाद को देर रात गए अपने दोस्तों के साथ कार में ले कर चेंबूर, घाटकोपर, तिलक नगर इलाके की तरफ निकल गया. इन लोगों ने तिलक नगर पीडब्ल्यूडी कंपाउंड की सुनसान जगह पर जा कर प्रसाद मांडवकर को कार से बाहर निकाला और कंपाउंड की दीवार के सहारे सीधा खड़ा कर के उस के गले पर चापर से वार कर दिया. इस के बाद उन्होंने प्रसाद के कपड़ों की तलाशी ली. उन्होंने उस की जेब से शिनाख्त के सारे कागजात और उस का मोबाइल निकाल लिया और वहां से लौट आए.

समीर रोहितकर और उस के दोनों दोस्त यह मान कर चल रहे थे कि पहले तो प्रसाद मांडवकर की लाश किसी को मिलेगी ही नहीं और अगर मिल भी गई तो उस की शिनाख्त होनी असंभव थी. मगर यह उन की भूल थी. कुछ ही घंटों बाद किसी राहगीर ने लाश की सूचना तिलकनगर पुलिस थाने को दे दी थी. फलस्वरूप पुलिस ने उस की लाश बरामद कर ली थी. क्राइम ब्रांच ने समीर रोहितकर के साथसाथ उस के दोस्त रोहित वंगर ओर जार्ज फर्नांडीस को अपनी गिरफ्त में ले लिया. यह खबर जब प्राची को मिली तो वह सन्न रह गई. समीर बंसत रोहितकर, रोहित विश्वनाथ और जार्ज अरुण फर्नांडीस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद क्राइम ब्रांच ने उन्हें महानगर मेटोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. इस केस की जांच तिलकनगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले कर रहे हैं. तीनों अभियुक्त जेल में हैं. Love Story in Hindi

कथा में प्राची का नाम काल्पनिक है और कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

 

Love Story: दिल लगाने का अपराध

Love Story: मारपीट, चोरीडकैती, अपहरण और फिरौती वसूलने जैसे अपराध करने वाले वैभव को शादीशुदा ज्योत्सना से दिल लगा कर जिंदगी से हाथ क्यों धोना पड़ा. 23 अगस्त की रात के यही कोई 8 बजे महानगर मुंबई के व्यस्ततम थाना डोंगरी के चार्जरूम में ड्यूटी पर मौजूद महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के के सामने रोनी सूरत लिए एक चेहरा अपने पूरे परिवार के साथ आ कर खड़ा हो गया. गिरिजा मस्के उस चेहरे और उस के परिवार वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. वह विशाल आचरेकर था, जो आपराधिक प्रवृत्ति के वैभव आचरेकर का बड़ा भाई था.

भाई के मामलों में वह अकसर थाना डोंगरी आता रहता था, इसलिए सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के उसे और उस के घर वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. इसी वजह से उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, वैभव ने फिर कोई कांड कर दिया क्या?’’

‘‘नहीं मैडम, इस बार उस ने कोई कांड नहीं किया, बल्कि लगता है वह खुद ही किसी कांड का शिकार हो गया है.’’ विशाल आचरेकर ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैडम, 20 अगस्त की सुबह वह घर से निकला था, तब से उस का कुछ अतापता नहीं है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है.’’

‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं है. अपराध कर के कहीं छिपा होगा. 2-4 दिनों में अपने आप ही आ जाएगा.’’ सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने उस की शिकायत को हल्के में लेते हुए कहा, ‘‘हो सकता है, यारोंदोस्तों के साथ कहीं चला गया हो. ऐसे लोगों का क्या भरोसा.’’

‘‘नहीं मैडम, हम लोगों ने उसे हर जगह ढूंढ लिया है. पूरी तरह निराश हो कर ही आप के पास आए हैं. वह कहीं छिपा नहीं, उस के साथ जरूर कोई अनहोनी हो गई है. अब आप ही हमारी कुछ मदद कर सकती हैं.’’

विशाल और उस के घर वालों की विनती पर सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने वैभव की गुमशुदगी दर्ज करा कर इस बात की जानकारी अपने सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल को दे दी. इस के बाद उन्होंने विशाल और उस के घर वालों को आश्वासन दे कर घर भेज दिया. थाना डोंगरी के सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने तत्काल इस मामले की जानकारी अधिकारियों को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. इस के बाद अधिकारियों के दिशानिर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने सहायक इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर के साथ जांच की रूपरेखा तैयार की और फिर उन्हीं को इस मामले की जांच सौंप दी.

जांच की जिम्मेदारी मिलने के बाद इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर ने एक टीम बनाई, जिस में असिस्टेंट इंसपेक्टर शशिकांत यादव, सबइंसपेक्टर संतोष कांबले, महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के, पुलिस नायक सैयद सांलुके, कांबले, धार्गे, कनकुटे और वोडरे को शामिल किया. इस टीम ने जांच तो तेजी से शुरू की, लेकिन कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई. 31 वर्षीय वैभव आचरेकर अपने मातापिता, भाईभाभी और बहनों के साथ मुंबई के डोंगरी इलाके में स्थित पोद्दार इमारत की दूसरी मंजिल पर रहता था. पिता का नाम देवीदास आचरेकर था. वैभव डोंगरी के जिस इलाके में रहता था, वह इलाका किसी जमाने में जानेमाने कुख्यात तस्कर करीम लाला और हाजी मस्तान का माना जाता था.

उस समय पठान भाइयों की इजाजत के बगैर इस इलाके का एक पत्ता भी नहीं हिलता था. शायद वैभव पर भी इलाके का असर पड़ गया था और वह भी अपराधी प्रवृत्ति का हो गया था. इलाके के सभी छोटेबड़े अपराधियों के बीच उस की अच्छी पैठ थी. उस के खिलाफ मारपीट, चोरीडकैती और अपहरणफिरौती जैसे कई अपराधों के मामले दर्ज थे, इसलिए थाना डोंगरी पुलिस उसे ही नहीं, उस के घर के हर सदस्य को पहचानती थी. शुरू में वैभव की अपराधी प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर पुलिस टीम ने उस के बारे में पता लगाना शुरू किया. पुलिस को लगता था, कि अपने कारनामों की वजह से कहीं उसे मार न दिया गया हो. लेकिन इस बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

धीरेधीरे दिन बीतते गए. वैभव को गायब हुए 4 महीने बीत गए और उस का कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी नहीं मिली कि मान लिया जाता कि उसे मार दिया गया है. अगर वह कोई अपराध कर के भी छिपा होता तो इतने दिनों तक न उस का अपराध छिपा रह सकता था और न वह खुद. जांच टीम वैभव के बारे में जो सोच कर जांच कर रही थी, उस से कोई फायदा नहीं हुआ, इसलिए जांच अधिकारी इंसपेक्टर महादेव कदम ने जांच की दिशा बदल दी. माना जाता है कि लड़ाईझगड़े या हत्या जैसे अपराधों की वजह जर, जमीन और जोरू होती है. यहां जर, जमीन का कोई कारण नहीं दिख रहा था, इसलिए उन का ध्यान जोरू की तरफ गया. वैभव जवान, सुंदर और अविवाहित युवक था, इसलिए उन्हें लगा कि कहीं वह किसी जोरू की वजह से तो नहीं गायब कर दिया गया.

इस की एक वजह यह भी थी कि जिस दिन वैभव गायब हुआ था, उस दिन की उस के मोबाइल फोन की लोकेशन मुंबई के उपनगर दहिसर की लाभदर्शन इमारत के आसपास की पाई गई थी. वहां उस के जाने की क्या वजह हो सकती थी? जांच टीम यह जानने के लिए उस के घर गई तो घर वाले इस बारे में कुछ खास नहीं बता सके. लेकिन जब इस टीम ने किसी महिला से संबंध के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसी इमारत में रहने वाली ज्योत्सना मोरे से वैभव के मधुर संबंध थे. उस के घर भी उस का खूब आनाजाना था.

पुलिस ने जब ज्योत्सना मोरे से पूछताछ की तो उस ने यह तो स्वीकार कर लिया कि पड़ोसी होने के नाते वैभव का उस के घर आनाजाना था. लेकिन न तो उस के उस से कोई गलत संबंध थे, न उसे उस की गुमशुदगी के बारे में कुछ पता है. इमारत में ईर्ष्या करने वाले लोगों ने उसे बदनाम करने के लिए उस का नाम वैभव के साथ जोड़ दिया होगा. पुलिस ने ज्योत्सना मोरे को गिरफ्तार तो नहीं किया, लेकिन वह संदेह के घेरे में आ गई थी, इसलिए उस का मोबाइल अपने पास रखने के साथ इस हिदायत के साथ घर जाने दिया कि वह पुलिस को बताए बिना मुंबई छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. इस के बाद पुलिस ने ज्योत्सना के बारे में पता लगाना शुरू किया.

जुटाई गई जानकारियों के आधार पर पुलिस को ज्योत्सना मोरे के बारे में जो पता चला, वह चौंकाने वाला था. पुलिस को उस के नंबर की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर उस ने वैभव के गायब होने वाले दिन कई बार बात की थी. उस नंबर वाले फोन की लोकेशन भी उसी जगह की पाई गई थी, जहां की वैभव के मोबाइल फोन की मिली थी. ज्योत्सना के भी मोबाइल फोन की लोकेशन वहां की थी. तीनों मोबाइल फोनों की लोकेशन एक जगह की मिलने की वजह से ज्योत्सना मोरे संदेह के घेरे में आ गई. यह संदेह तब और गहरा गया, जब पुलिस ने उस से उस नंबर के बारे में पूछा तो उस ने साफ कहा कि वह उस नंबर के बारे में बिलकुल नहीं जानती.

जबकि उस नंबर पर उस की लगातार बातें हो रही थीं. पुलिस को अब तक यह भी पता चल चुका था कि दहिसर की लाभदर्शन इमारत में उस का मायका था. साफ था, ज्योत्सना ने ही वैभव को वहां बुलाया होगा. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. 20 दिसंबर, 2014 को इंसपेक्टर महादेव कदम ने सीनियर अधिकारियों की उपस्थिति में जब ज्योत्सना से सुबूतों के आधार पर सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने वैभव की हत्या का अपना अपराध तो स्वीकार कर ही लिया, उस मोबाइल नंबर के बारे में भी बता दिया, जिस के बारे में वह अनभिज्ञता प्रकट कर रही थी.

वह मोबाइल नंबर ज्योत्सना के पुराने प्रेमी प्रकाश पाटिल का था. उसी के साथ मिल कर उस ने वैभव आचरेकर को ठिकाने लगा दिया था. इस के बाद उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर महादेव कदम ने उसी रात उस के साथी प्रकाश पाटिल को भी गिरफ्तार कर लिया था. थाने में दोनों से की गई पूछताछ में वैभव आचरेकर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्रेम त्रिकोण में की गई हत्या की थी. 34 वर्षीय प्रकाश पाटिल महाराष्ट्र के जनपद पालघर की तहसील वसई के गांव ज्यूचंद्र का रहने वाला था. उस के पिता रामचंद्र  पाटिल गांव के सुखीसंपन्न किसान थे. बीए करने के बाद प्रकाश नगर महापालिका में ठेकेदारी करने लगा था, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो रही थी.

जिन दिनों वह बीए कर रहा था, उन्हीं दिनों साथ पढ़ने वाली ज्योत्सना से उसे प्यार हो गया था. ज्योत्सना भी उसे प्यार करती थी, इसलिए दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन किन्हीं कारणों से यह शादी नहीं हो पाई. प्रकाश के घर वालों ने उस की शादी कहीं और कर दी थी तो ज्योत्सना के घर वालों ने भी उस उस की शादी मुंबई के रहने वाले अमित मोरे से कर दी थी. दोनों ही अपनेअपने घरसंसार में सुखी थे. प्रकाश जहां 2 बेटियों का बाप बन गया था, वहीं ज्योत्सना भी एक बेटे की मां बन चुकी थी. लेकिन जब कई सालों बाद बिछड़े हुए प्रेमी एक विवाह समारोह में मिले तो इन का प्यार एक बार फिर उमड़ पड़ा.

गिलेशिकवे दूर करने के बाद प्रकाश और ज्योत्सना ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए थे. फोन पर बातचीत करतेकरते धीरेधीरे दोनों एक बार फिर पुराने रंग में रंग गए. ज्योत्सना पति अमित मोरे और बेटे के साथ मुंबई के डोंगरी में रहती थी. दरअसल वह अपने पति अमित मोरे से खुश नहीं थी. अमित मोरे एक बीमा कंपनी का एजेंट था. वह ज्योत्सना जैसी सुंदर और पढ़ीलिखी पत्नी पा कर खुद को धन्य समझ रहा था. इसीलिए वह उसे खुश रखने और उस की सुखसुविधाओं का पूरा खयाल रखता था. पत्नी और बेटे को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो, इस के लिए वह दिनरात मेहनत करता था.

इसी चक्कर में वह यह भूल भी गया था कि सुखसुविधा के अलावा पत्नी को पति का प्यार भी चाहिए. देर रात वह घर लौटता तो बुरी तरह थका होता. खापी कर वह बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता. सुबह उठता और चायनाश्ता कर के काम पर निकल जाता. उस के पास ज्योत्सना के लिए समय ही नहीं होता था. पति की इसी उपेक्षा से ज्योत्सना अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस का फायदा उसी इमारत में रहने वाले वैभव आचरेकर ने उठाया. वैभव आचरेकर और अमित मोरे के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. यह अलग बात थी कि अमित मोरे ईमानदारी और मेहनत की कमाई खाता था, जबकि वैभव आचरेकर अपराध की कमाई से मौज कर रहा था. दोनों की दिशाएं अलग थीं, इस के बावजूद उन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा था.

वैभव कभी अमित मोरे के साथ उस के घर आया तो खूबसूरत ज्योत्सना को देख कर उस पर मर मिटा. कुंवारा होने की वजह से स्त्रीसुख से वंचित वैभव ज्योत्सना को पाने की कोशिश करने लगा. उस के हावभाव से जब उस के मन की बात ज्योत्सना को पता चली तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी. क्योंकि वह यही तो चाहती थी. धीरेधीरे ज्योत्सना वैभव की ओर खिंचने लगी. फिर तो वह स्वयं को संभाल नहीं सकी और वैभव की बांहों में समा गई. ज्योत्सना को वैभव की सशक्त बांहों का सुख मिला तो वह अमित मोरे को भूल कर उसी की हो गई. उसे जब भी मौका मिलता, वैभव को अपने फ्लैट पर बुला लेती. पहले तो वैभव ज्योत्सना के बुलाने का इंतजार करता था, लेकिन कुछ दिनों बाद जब भी उस का मन होता, वह खुद ही ज्योत्सना के फ्लैट पर पहुंच जाता.

धीरेधीरे वह ज्योत्सना को प्रेमिका कम, पत्नी ज्यादा समझने लगा. लेकिन जब ज्योत्सना की मुलाकात उस के पुराने प्रेमी प्रकाश से हुई तो वह वैभव से किनारे करने लगी. अपराधी प्रवृत्ति के वैभव को ज्योत्सना का यह व्यवहार पसंद नहीं आया. क्योंकि वह उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था. उसे जब जैसी जरूरत पड़ती थी, वह ज्योत्सना को उसी हिसाब से इस्तेमाल कर लेता था. यह बात ज्योत्सना को पसंद नहीं थी. प्रकाश से मिलने के बाद वह वैभव से संबंध नहीं रखना चाहती थी. ज्योत्सना जब वैभव की मनमानियों से तंग आ गई तो उस से मुक्ति पाने के लिए परेशान रहने लगी. जब उस की परेशानी के बारे में प्रकाश पाटिल को पता चला तो उस ने ज्योत्सना के साथ मिल कर वैभव को अपने बीच से निकाल फेंकने की खतरनाक योजना बना डाली.

लेकिन वैभव मजबूत कदकाठी और अपराधी प्रवृत्ति का युवक था, इसलिए उस से सीधे निपटना ज्योत्सना और प्रकाश के वश की बात नहीं थी. इसलिए प्रकाश ने अपनी योजना में अपने एक दोस्त माइकल को भी शामिल कर लिया. योजना के अनुसार, ज्योत्सना 19 अगस्त, 2014 को अपने मायके दहिसर आ गई. वहीं से उस ने वैभव को फोन कर के मिलने के लिए वसई के रेलवे स्टेशन नायगांव बुलाया. 20 अगस्त, 2014 की सुबह वैभव अपने घर वालों को बताए बगैर ज्योत्सना से मिलने नायगांव पहुंच गया. साढ़े 10 बजे वैभव नायगांव रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो पहले से ही इंतजार कर रहे प्रकाश और माइकल ने उसे पकड़ लिया. दोनों खुद को पालिका इंसपेक्टर बता कर वैभव को पूछताछ के बहाने नायगांव पूर्व मित्तल क्लब हाउस के पास ले गए.

वहां पहुंच कर प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की यह कर पिटाई शुरू कर दी कि वह डोंगरी में रहने वाली ज्योत्सना मोरे को परेशान करता है और उसे धमकी दे कर बिना उस की मरजी के उस के साथ शारीरिक संबंध बनाता है. प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की इस तरह पिटाई की कि थोड़ी देर में वह बेहोश हो गया. उस के बेहोश होने के बाद प्रकाश पाटिल ने वैभव के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई.

वैभव को मौत के घाट उतार कर उस की लाश एक चादर में लपेटी और रात में ही माइकल की मारुति कार में रख कर उसे ठिकाने लगाने के लिए मुंबई-अहमदाबाद एक्सप्रेस हाइवे पर चल पड़े. रात 12 बजे के आसपास वे मनोर के पास बह रही नदी के पुल पर पहुंचे. उन्होंने लाश कार से निकाली और तलाशी में उस का सारा सामान निकाल कर लाश को नदी में फेंक दिया. लाश ठिकाने लगाने के बाद प्रकाश ने फोन कर के ज्योत्सना को वैभव की हत्या के बारे में बता दिया. अगले दिन वैभव की लाश किसी मछुआरे के जाल में फंस गई तो उस ने इस बात की जानकारी थाना मनोर पुलिस को दी. पुलिस ने शव बरामद कर के शिनाख्त कराने की कोशिश की. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद थाना मनोर पुलिस ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया.

वैभव की हत्या से ज्योत्सना तो खुश थी ही, प्रेमिका को खुश कर के प्रकाश भी खुश था. जिस तरह प्रकाश ने वैभव को अपने रास्ते से हटाया था, उस का सोचना था कि पुलिस उस तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. 4 महीने बीत गए तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि अब वह बच गया. लेकिन पुलिस खोजतेखोजते ज्योत्सना तक पहुंच गई तो वैभव आचरेकर की हत्या का रहस्य खुल गया और वह भी पकड़ा गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रकाश के दोस्त माइकल को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद वैभव की हत्या का मुकदमा प्रकाश पाटिल, ज्योत्सना और माइकल के खिलाफ दर्ज कर के महानगर मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में ही थे. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Short love Story in Hindi: जानी जान का दुश्मन – क्या किया उमा के साथ

Short love Story in Hindi: राजवीर देखने में भले ही साधारण व्यक्ति था, लेकिन वह बातों का धनी था. अपनी लच्छेदार बातों से वह किसी का भी मन मोह लेता था. राजवीर मेवाराम की पत्नी उमा के खूबसूरत हुस्न का दीवाना था. उमा भी उस की जवांदिली पर लट्टू थी.

शाम का समय था. राजवीर घर आया तो उमा उस के लिए चाय बना लाई. चाय के साथ गरमागरम पकौड़े भी थे. पकौड़े राजवीर को बहुत पसंद हैं, यह बात उमा जानती थी. राजवीर चहक उठा, ‘‘भई वाह, ये हुई न बात.’’फिर एक पकौड़ा मुंह में रख कर स्वाद लेते हुए पूछ बैठा, ‘‘तुम मेरे दिल की बात कैसे जान गईं?’’
उमा मुसकराते हुए बोली, ‘‘जब हमारे दिल के साथसाथ शरीर भी एक हो चुके हैं तो दिल की बात एकदूसरे से कैसे छिपी रह सकती है.’’

‘‘वाकई तुम्हारी यह बात बिलकुल सही है. देखो, तुम्हारी चाय का रंग भी तुम्हारे रंग जैसा है. लगता है जैसे चाय में तुम ने अपने हुस्न का रंग मिला दिया हो. चाय का स्वाद भी तुम्हारे जैसा मीठा है. पकौड़े भी तुम्हारे जिस्म के अंगों की तरह गर्म और स्वादिष्ट है.’’अपने हुस्न की तारीफ का यह अंदाज उमा को अच्छा लगा. वह राजवीर से सट कर उस की आंखों में आंखें डाल कर बोली, ‘‘जो कुछ मेरे पास है, उस पर तुम्हारा ही तो अधिकार है.’’

राजवीर ने उस की दुखती रग को छेड़ते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे खूबसूरत जिस्म पर तो तुम्हारे पति मेवाराम का सर्वाधिकार है. लोग भी उस के ही अधिकार को स्वीकृति देंगे.’’‘‘वह तो सिर्फ नाम का पति है. बीवी की जगह शराब की बोतल को सीने से लगाए घूमता है, मुझे बिस्तर पर तड़पने के लिए छोड़ देता है. वैसे भी शराब ने उस के शरीर को इतना खोखला कर दिया है कि उस में शबाब के उफनते तटबंधों की गरमी शांत करने का माद्दा नहीं बचा.’’‘‘तुम्हारी हसीन चाहतों की कसौटी पर मैं खरा उतरा हूं कि नहीं?’’ कह कर राजवीर ने उमा के दिल की बात जाननी चाही.

मन के भंवर में डूबी उमा के कानों में राजवीर की बात पहुंची तो एकाएक उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई, वह बोली, ‘‘तुम ने मेरे हुस्न की बगिया को अपने प्रेम की बरसात से ऐसा सींचा है कि रोमरोम खिल कर महकने लगा है. तुम्हारे जोश की तो मैं कायल हूं. तुम्हारे साथ आनंदलोक की यात्रा करना सुखद अहसास होता है. मैं तो सोचसोच कर ही रोमांचित हो जाती हूं.’’ उमा बेबाकी से कहती चली गई.
‘‘तो फिर चलें आनंदलोक की यात्रा पर…’’ राजवीर ने उमा के गले में हाथ डाल कर उसे अपने बदन से सटाते हुए कहा. इस पर उमा ने मुसकरा कर मूक सहमति दे दी.

राजवीर उमा के कपोलों को चूमने के साथसाथ उस के होंठों का भी रसपान करने लगा. उमा ने शरमा कर अपना मुंह उस के सीने में छिपा लिया. साथ ही उस ने राजवीर के गले में बांहों का हार डाल दिया. फिर दोनों एकदूसरे में समा गए. आनंदलोक की यात्रा पूरी कर के दोनों एकदूसरे से अलग हुए. उन के शरीर पसीने से लथपथ थे, लेकिन चेहरों पर संतुष्टि के भाव थे.

जिला हरदोई के थाना कोतवाली हरपालपुर के अंतर्गत एक गांव है कूड़ा नगरिया. मेवाराम अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. परिवार में पत्नी उमा और 5 बेटियों के अलावा 2 बेटे अश्विनी और अंकुर थे. मेवाराम के पास खेती की जमीन थी, जिस की आय से उस के परिवार का गुजारा हो जाता था.

मेवाराम भागवत कथा करने का भी काम करता था. उस के काम में उस के बड़े भाई सेवाराम भी साथ देते थे. धार्मिक कार्यों में रमे रहने की वजह से मेवाराम पत्नी की शारीरिक जरूरतों पर ध्यान नहीं दे पाता था. वैसे भी वह 50 साल से ऊपर का हो गया था. थोड़ाबहुत दमखम था भी तो उसे धीरेधीरे शराब पी रही थी.
दूसरी ओर 7 बच्चे पैदा करने के बाद भी उमा के बदन की आग अभी तक सुलग रही थी. 45 साल की उम्र में उस ने खुद को टिपटौप बना रखा था. उस की खूबसूरती अभी तक कहर ढाती थी.

शरीर की आग ठंडी न हो तो इंसान में चिड़चिड़ापन आ जाता है, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. उमा के साथ भी ऐसा ही था. ऐसे में उस ने अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरा ठौर तलाशना शुरू कर दिया. उसे अपने सुख के साधन की तलाश थी. उस की तलाश खत्म हुई राजवीर पर.

वह भी कूड़ा नगरिया में ही रहता था. उस के पिता रामकुमार चौकीदारी का काम करते थे. 22 साल पहले राजवीर का विवाह कमला से हुआ था. उस से 3 बच्चे हुए. उस की शादी को अभी 6 साल ही बीते थे कि पति की रंगीनमिजाजी से परेशान हो कर कमला अपने 2 छोटे बच्चों को ले कर हमेशा के लिए मायके चली गई.

पत्नी के जाने के बाद राजवीर को शारीरिक सुख मिलना बंद हो गया. उमा की तरह वह भी शारीरिक सुख के लिए दूसरा ठौर ढूंढ रहा था. उस की नजर कई औरतों पर पड़ी, लेकिन उन में से उसे उमा ही मन भाई. उमा की कदकाठी और खूबसूरत देह राजवीर के दिलोदिमाग में उतर गई.

दूसरी ओर उमा भी राजवीर को पसंद करने लगी थी. जब दोनों सामने पड़ते तो एकदूसरे पर नजरें जम जातीं. आग दोनों तरफ लगी थी. दोनों को अपनी अंदरूनी तपिश का अहसास हो गया था.

एक दिन जब मेवाराम घर में नहीं था तो राजवीर उस के घर पहुंच गया. उस के आने का मकसद उमा से नजदीकियां बना कर उस का सान्निध्य पाना था. उमा को उस का आना अच्छा लगा. उस दिन दोनों काफी देर तक बातें करते रहे. न तो उन की बातें खत्म होने का नाम ले रही थीं और न ही उन का मन भर रहा था.
लेकिन जुदा तो होना ही था, दिल पर पत्थर रख कर राजवीर उमा से विदा ले कर घर आ गया. लेकिन दिल की चाहत फिर भी तनमन को बेचैन करती थी. यह ऐसी बेचैनी थी जो दोनों के दिलों को और करीब ला रही थी.

चिंगारी को जब तक हवा नहीं लगती, तब तक वह शोला नहीं बनती. उमा के मन में दबी चिंगारी को अब तक हवा नहीं लगी थी. लेकिन उस दिन राजवीर उस के पास आ कर दबी चिंगारी को एकाएक शोला बना गया था.

मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा तो दोनों एकदूसरे से काफी खुल गए. राजवीर हंसीमजाक करते वक्त जानबूझ कर उमा के शरीर के नाजुक अंगों को छू लेता तो उमा के चेहरे पर मादक मुसकराहट उतर आती. राजवीर का शरीर भी झनझना जाता, दिल बेकाबू होने लगता.

आखिर एक दिन मुलाकात रंग ले ही आई. राजवीर के मन की बात होंठों पर आ गई. उस ने उमा के हाथों को अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर हो, उमा.’’

‘‘सचऽऽ’’ उमा ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘हां, तुम बहुत सुंदर हो.’’

‘‘कितनी?’’ उमा ने फुसफुसाते हुए पूछा.

‘‘चांद से भी…’’ इस के आगे वह कुछ नहीं कह सका. वह उस के बदन की गरमी से पिघलने लगा था.
राजवीर की बात सुन कर उमा के चेहरे पर चमक आ गई. राजवीर को नशीली मदमस्त निगाहों से देखते हुए वह उस से सट गई और उस के कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘शादी कर लो, तुम्हें मुझ से भी सुंदर पत्नी मिल जाएगी.’’

उस की बातों ने आग में घी का काम किया. वह बोला ‘‘लेकिन फिर तुम तो नहीं मिलोगी.’’
‘‘अगर मैं मिल जाती तो तुम क्या करते..?’’ उमा ने शरारत में कहा और बदन को मोड़ कर नशीली अदा से अंगड़ाई ली. उसी वक्त राजवीर के हाथ उस के वक्षस्थल से टकरा गए.

उमा की कातिल अदा उसे पागल कर गई. वह बोला, ‘‘मैं तुम्हें जी भर कर प्यार करता.’’

‘‘कितना?’’ उमा ने उसे उकसाया तो राजवीर ने साहस जुटा कर उमा को अपनी बांहों में ले कर जोर से दबाते हुए कहा, ‘‘इतना.’’उमा ने राजवीर के अंदर दबी चिंगारी को हवा दे दी, ‘‘बस, इतना ही.’’

‘‘नहीं, इस से भी ज्यादा…और इतना ज्यादा.’’ कहने के साथ ही राजवीर ने उसे बांहों में लिए लिए पलंग पर लिटा दिया.

अपनी अतृप्त प्यास बुझाने की चाह में उमा ने उस का रत्ती भर विरोध नहीं किया. इस की जगह वह उसे और उकसाती रही. लोहार की धौंकनी की तरह चलती दोनों की तेज सांसें और उन के मिलन की सरगम ने कमरे में तूफान सा ला दिया. राजवीर के सामीप्य से उमा को एक अलौकिक सुख का आनंद मिला.

उमा को अपने पति मेवाराम का सामीप्य बिलकुल नहीं भाता था, लेकिन राजवीर को वह दिल से चाहने लगी. वह राजवीर के बारे में सोचने लगी कि क्यों न हमेशा के लिए उसी की हो कर रह जाए.
उस की यह सोच गलत नहीं थी, क्योंकि उस के भीतर मचलते जिस तूफान को उस का पति एक बार भी शांत नहीं कर पाया था, राजवीर ने उस तूफान को पहली मुलाकात में ही शांत कर दिया था.

फिर एकाएक उमा उसे बेतहाशा प्यार करने लगी. उस की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली. उसे रोते देख राजवीर घबरा गया. वह बोला, ‘‘यह तुम्हें क्या हो गया उमा? तुम पागल तो नहीं हो गईं?’’

‘‘नहीं राजवीर, आज मैं बहुत खुश हूं. तुम ने आज जो सुख, जो खुशी मुझे दी है, उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती. आज तक इतना सुख, इतनी खुशी मुझे मेरे पति से नहीं मिली.

‘‘सुहागरात से मैं जिस सुख की कल्पना करती आ रही थी, आज तुम से मिल गया. उस रात जब वह कमरे में आए और मैं ने घूंघट की आड़ से देखा तो मंत्रमुग्ध सी देखती रह गई. भरेपूरे शरीर और उन की गहरी नशीली आंखों में मैं डूबती चली गई. मैं उन को और वह मुझे देर तक एकदूसरे को देखते रहे, फिर एकाएक उन के स्पर्श ने मेरी तंद्रा भंग कर दी.’’

थोड़ा रुक कर वह बोली, ‘‘वह आए और मेरी बांहों को पकड़ कर बैठ गए. फिर धीरे से घूंघट उठा दिया. कुछ देर वह सम्मोहित से मुझे देखते रहे. उन के होंठ मेरी ओर बढ़े और उन्होंने मेरे चेहरे को अपने हाथों में समेट लिया, फिर मेरे होंठों पर अपने तपते होंठ रख दिए. उन का स्पर्श पा कर मैं सिहर उठी.‘‘मैं लाज से दोहरी होती गई. मगर मेरा दिल कह रहा था कि वह इसी तरह हरकत करते रहें. उन्होंने बेझिझक मुझे सहलाना शुरू कर दिया, मेरे ऊपर जैसे नशा छा गया. मेरी आंखें धीरेधीरे बंद होती जा रही थीं और बदन अंगारों की तरह दहकने लगा था. फिर मैं भी उन का सहयोग करने लगी.

‘‘बंद कमरे में फूलों की सेज पर जैसे तूफान आ गया था. लेकिन थोड़ी देर में वह तूफान तो शांत हो गया लेकिन मैं फिर भी जलती रही. उस वक्त वह मेरे बदन पर ही नहीं, मेरे दिल पर भी बोझ लग रहे थे. उस का एक ही कारण था कि उन्होंने जो आग मुझ में लगाई थी, उसे बुझाए बिना निढाल हो गए थे.

‘‘पहली रात ही क्या, किसी भी रात वह मुझे सुख नहीं दे पाए. मेरे दुख का कारण वे रातें थीं, जो मैं ने उन के बगल में तड़पते और जलते हुए गुजारी थीं. हमारी जिंदगी जैसेतैसे कट रही थी. देखने वालों को लगता कि मैं बहुत खुश हूं, मगर वास्तविकता ठीक इस के विपरीत थी. मैं ठीक वैसे ही जल रही थी, जैसे राख के नीचे दबी चिंगारी.’’

इतना कह कर उमा ने दुखी मन से अपना चेहरा झुका लिया. राजवीर ने देखा तो उस से रहा न गया, ‘‘दुखी क्यों होती हो उमा, अब तो मैं तुम्हारी जिंदगी में आ गया हूं. मैं तुम्हारी चाहतों को पूरी करूंगा.’’
इस के बाद दोनों के बीच कुछ देर और बातें होती रहीं. फिर राजवीर वहां से चला गया.

उस दिन के बाद से उमा खुश और खिलीखिली सी रहने लगी. दोनों की चाहतें, जरूरतें एकदूसरे से पूरी होने लगीं. किसी को भी इस सब की कानोंकान खबर तक नहीं लगी.अब जब दोनों का मन होता, एक हो जाते. दोनों का यह खेल बेरोकटोक चलने लगा. देखतेदेखते 5 साल गुजर गए. रात में खेतों की रखवाली के लिए उमा खेत में बनी झोपड़ी में रुक जाती थी. उस के खेतों के बराबर में ही पड़ोसी गांव प्रतिपालपुर के राजेश (परिवर्तित नाम) का खेत था.

जब वह खेत पर होती तो राजेश से बातें करती रहती. दोनों एकदूसरे के खेतों में जानवर घुसने पर भगा देते थे. खेतों के मामले में दोनों पड़ोसी थे. पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है. यह सब राजवीर ने देखा तो वह उमा पर शक करने लगा कि वह अब उस के बजाए राजेश में रुचि ले रही है. जब वह अपने पति के होते हुए उस से संबंध बना सकती है तो राजेश के साथ संबंध बनाने में उसे क्या दिक्कत होगी.

उस ने कई बार उमा को राजेश से काफी नजदीक हो कर बातें करते देखा तो उस ने समझ लिया कि दोनों के बीच नाजायज संबंध बन गए हैं. राजवीर को यह बात नागवार गुजरी. उस की प्रेमिका उस के होते हुए किसी और से संबंध रखे, यह उसे मंजूर नहीं था.

8 जनवरी, 2020 की शाम 4 बजे उमा खेतों की रखवाली के लिए गई. अगले दिन सुबह उस की लाश खेत में पड़ी मिली. गांव वालों के बताने पर उमा के बच्चे खेतों पर पहुंचे. मेवाराम भागवत कथा के लिए कहीं गया हुआ था, किसी ने इस घटना की सूचना हरपालपुर थाना कोतवाली को दे दी थी.

सूचना पा कर इंसपेक्टर भगवान चंद्र वर्मा पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतका के शरीर पर किसी प्रकार की चोट के निशान नहीं थे. लेकिन गले पर दबाए जाने के निशान थे.

निरीक्षण के बाद उन्होंने उमा के बच्चों व ग्रामीणों से पूछताछ की तो उन्होंने उस के प्रेमी राजवीर पर शंका जताई. इस के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और उमा की बेटी मुसकान को ले कर थाने आ गए.

इंसपेक्टर वर्मा ने मुसकान की तरफ से लिखित तहरीर ले कर राजवीर के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.राजवीर घर से फरार था. 13 जनवरी, 2020 की सुबह 5:20 बजे एक मुखबिर की सूचना पर इंसपेक्टर वर्मा ने राजवीर को गांव अर्जुनपुर के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने उमा की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

8 जनवरी को उमा खेतों में खड़ी गेहूं की फसल की रखवाली के लिए गई थी. रात 8 बजे राजवीर उस के पास पहुंचा तो वह अकेली थी. राजेश से संबंध होने की बात कह कर वह उमा से भिड़ गया. वादविवाद होने पर दोनों में गालीगलौज होने लगी. इस पर राजवीर ने उमा को दबोच कर दोनों हाथों से उस का गला दबा दिया, जिस से उमा की मौत हो गई. उस के मरते ही राजवीर वहां से फरार हो गया.राजवीर की गिरफ्तारी के बाद इंसपेक्टर वर्मा ने आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी कर के उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. Short love Story in Hindi

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan News: वासना की भेंट चढ़ा ससुर

Rajasthan News: अणछी और नाथू सिंह बेरोकटोक मजे से रंगरलियां मना रहे थे. अचानक ऐसा क्या हुआ कि अणछी और नाथू सिंह को हत्या जैसा अपराध करने को मजबूर होना पड़ा. राजस्थान के जिला राजसमंद के थाना खमनेर के एएसआई रामचंद्र औफिस के सामने गुनगुनी धूप में खड़े मौसम का आनंद ले रहे थे, तभी गांव ढीमड़ी से शंभू सिंह ने फोन द्वारा सूचना दी कि ग्रामपंचायत उनवास के गांव ढीमड़ी के एक बाड़े में एक बूढ़े की लाश पड़ी है.

घटना की गंभीरता को देखते हुए एएसआई रामचंद्र ने तत्काल हत्या की यह सूचना थानाप्रभारी रमेश कविया को दी. पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर थानाप्रभारी रमेश कविया पुलिस बल के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. यह 23 जुलाई, 2014 की सुबह की बात थी. पुलिस जीप उनवास पहुंची तो घटनास्थल के बारे में पता लगाने के लिए थानाप्रभारी रमेश कविया ने गायभैंस का झुंड ले कर जा रहे एक बूढ़े से पूछा, ‘‘दादा, ये ढीमड़ी में लाश कहां मिली है?’’

‘‘सीधे चले जाओ, जहां भीड़ दिखाई दे, वहीं बाड़े में लाश पड़ी है.’’ बूढ़े ने कहा.

जीप थोड़ा आगे बढ़ी तो पुलिस को रोने की आवाज सुनाई दी. थानाप्रभारी ने जीप रुकवाई और पैदल ही वहां पहुंच गए, जहां से रोने की आवाज आ रही थी. लाश वहीं एक बाड़े में पड़ी थी. घटनास्थल के निरीक्षण में उन्होंने देखा कि जूते और कपड़े इधरउधर बिखरे पड़े थे. वहीं एक लाश पड़ी थी. पूछने पर पता चला कि मृतक का नाम किशन सिंह था. दीवार पर खून के छींटे पड़े थे. मृतक की उम्र 70 साल के आसपास थी. सिर पर किसी भारी चीज से वार कर के हत्या की गई थी. सिर फट जाने की वजह से उस का चेहरा काफी वीभत्स लग रहा था. थानाप्रभारी ने तुरंत लाश को कंबल से ढक दिया.

एफएसएल टीम अपना काम निपटा रही थी कि डीएसपी सिद्धांत शर्मा आ गए. घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद डीएसपी और थानाप्रभारी ने औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस ने मृतक किशन सिंह के घरपरिवार के बारे में तहकीकात शुरू की तो पता चला कि उस के बेटे मांगू सिंह की पत्नी अणछी का चरित्र ठीक नहीं था. उस का बगल के गांव के नाथू सिंह से प्रेम संबंध था. इस के बाद पुलिस को अणछी और उस के प्रेमी पर शक हुआ.

आसपड़ोस के लोगों ने भी इस बात का समर्थन किया तो थानाप्रभारी ने मृतक किशन सिंह की पत्नी वृद्धा सवाबाई से पूछताछ की. उस ने बताया कि अणछी का सोलंकियों की भागल (सेमा) निवासी नाथू सिंह राजपूत से अवैध संबंध था. इसी के चलते आए दिन परिवार में क्लेश होता रहता था. थानाप्रभारी ने बीट कांस्टेबल धीरचंद जांगिड़ से सोलंकियों की भागल के नाथू सिंह राजपूत के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सर, यह वही नाथू सिंह है, जो कुछ दिनों पहले शांतिभंग के आरोप में पकड़ा गया था.’’

‘‘इस समय वह कहां मिलेगा?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘अभी पता किए लेते हैं सर.’’ कह कर कांस्टेबल धीरचंद ने मोटरसाइकिल उठाई और एक सिपाही को बैठा कर नाथू सिंह की तलाश में निकल पड़ा. वह सीधा बसअड्डे पहुंचा तो नाथू सिंह उसे दिखाई दे गया. बैग लिए वह कहीं जाने की तैयारी में था. कांस्टेबल धीरचंद को देख कर वह कांप उठा. वह भागने की सोच रहा था कि धीरचंद ने अपनी मोटरसाइकिल उस के सामने ला कर खड़ी कर दी. नाथू सिंह ने उस की ओर देखा तो उस ने पूछा, ‘‘इधर कहां?’’

‘‘साहब मुंबई जा रहा हूं. बस के इंतजार में खड़ा हूं.’’

‘‘फिलहाल तो तू मेरे साथ थाने चल, मुंबई जाना बाद में.’’ धीरचंद ने कहा.

‘‘साहब, थाने जाने में मेरी बस चली जाएगी.’’ नाथू सिंह हकलाया.

‘‘अब तुझे मुंबई नहीं, जेल जाना है. तू ने जो किया है, उस के लिए तुझे अब जेल जाना होगा.’’

कह कर धीरचंद ने नाथू सिंह को मोटरसाइकिल पर बैठाया और थाने आ गया. तब तक थानाप्रभारी रमेश कविया भी थाने आ गए थे. नाथू सिंह की हालत देख कर ही थानाप्रभारी समझ गए कि किशन सिंह की हत्या इसी ने की है. उस के सामने आते ही उन्होंने पूछा ‘‘किशन सिंह की हत्या तू ने ही की है न?’’

‘‘नहीं साहब, उस की हत्या मैं क्यों करूंगा?’’ नजरें चुराते हुए नाथू सिंह ने कहा.

‘‘अणछी ने तो कहा है कि किशन सिंह की हत्या तू ने ही की है.’’

अणछी का नाम सामने आते ही नाथू सिंह ढीला पड़ गया. उस ने सच बोलने में ही अपना भला समझा. इसलिए किशन सिंह की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं अणछी से प्यार करता था. एक साल से हमारे बीच संबंध थे. किशन सिंह हमारे प्यार में रोड़ा अटका रहा था, इसीलिए मैं ने और अणछी ने पीटपीट कर उस की हत्या कर दी थी.’’

इस के बाद पुलिस ने किशन सिंह की बहू अणछी को भी गिरफ्तार कर लिया. थाने में की गई पूछताछ में दोनों ने किशन सिंह की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. राजस्थान के जिला राजसमंद के थाना खमनेर के गांव ढीमड़ी की रहने वाली अणछी का पति मांगू सिंह राजपूत मुंबई में किसी कबाड़ी के यहां नौकरी करता था. उस का देवर मोहन सिंह भी भाई के साथ मुंबई में ही रहता था. मांगू सिंह मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर था. उस की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी. इसलिए अणछी भी इधरउधर मजदूरी कर के कुछ कमा लेती थी. पति और देवर मुंबई में रहते थे, जबकि अणछी ससुर किशन सिंह और सास सवाबाई की देखभाल के लिए उन के साथ गांव में रहती थी. उस की 3 बेटियां, ललिता, हंजा एवं सीता थीं.

अणछी शादीब्याह के मौके पर खाना बनाने वालों के साथ पूडि़यां बेलने भी जाती थी. इस में पैसा तो मिलता ही था, खाना भी मिल जाता था. ऐसे में ही अणछी की मुलाकात सोलंकियों की भागल के रहने वाले नाथू सिंह से हुई तो पहली ही मुलाकात में उस का दिल अणछी पर आ गया. नाथू सिंह खाना बनाने का कारीगर था. नाथू सिंह ने अणछी को चाहतभरी नजरों से देखा तो वह असहज हो गई. धीरेधीरे जानपहचान बढ़ी तो घरपरिवार के साथसाथ मन की बातें भी होने लगीं. ऐसे में नाथू सिंह ने कहा, ‘‘अणछी, तुम चाहो तो हमेशा के लिए मेरे साथ आ सकती हो.’’

‘‘क्या, क्या कहा तुम ने?’’ अनमने और रोबीले स्वर में अणछी बोली.

‘‘मेरा मतलब है कि मैं रसोइया हूं और आए दिन शादीब्याह में खाना बनाने जाता हूं. मुझे पूडि़यां बेलने के लिए औरतों की जरूरत होती ही है, इसलिए कहा कि तुम चाहो तो मेरे साथ हमेशा काम कर सकती हो.’’

‘‘ठीक है, तुम जब भी बुलाओगे, मैं आऊंगी.’’

इस के बाद अक्सर शादीब्याह में नाथू सिंह और अणछी की मुलाकातें होने लगीं. कभी देर हो जाती तो नाथू सिंह खुद ही उसे ढीमड़ी उस के घर पहुंचाने चला जाता. पति के दूर रहने की वजह से अणछी धीरेधीरे नाथू सिंह के नजदीक आती गई.

एक दिन शादी समारोह में खाना बनाने के बाद नाथू सिंह और अणछी बैठे बातें कर रहे थे तो नाथू सिंह ने कहा, ‘‘अणछी, मैं एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’

अणछी हंसते बोली, ‘‘ऐसी क्या बात हो गई, जो कहने के पहले पूछ रहे हो?’’

‘‘मैं तेरे साथ रहना भी चाहता हूं और सोना भी.’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अणछी मंदमंद मुसकराते हुए बोली, ‘‘साथ तो रह ही रहे हो, जब मन हो, सो भी जाना.’’

यह सुन कर नाथू खुश हो गया. अब वह अणछी के साथ सोने के बारे में सोचने लगा. मजे की बात यह थी कि नाथू सिंह अणछी से उम्र में छोटा था. अणछी के पास नाथू सिंह के साथ सोने के बहुत मौके थे. घर में सासससुर बूढ़े थे और बच्चे छोटे. पति और देवर बहुत दूर रहते थे. इसलिए अणछी नाथू सिंह को घर पर ही बुलाने लगी. जल्दी ही दोनों वासना के तालाब में इस कदर डूब गए कि न उन्हें घरपरिवार की चिंता रह गई न इज्जत की. नाथू सिंह का जब मन होता, अणछी के घर पहुंच जाता. ढीमड़ी में अणछी के दो मकान थे. पुराने मकान में ससुर किशन सिंह और सास सवाबाई के साथ उस की 2 बड़ी बेटियां रहती थीं. जबकि दूसरे नए मकान में अणछी अपनी 5 साल की सब से छोटी बेटी सीता के साथ रहती थी. इसलिए नाथू सिंह को उस के घर आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

घर वाले भले ही अलग रहते थे, मगर गलीमोहल्ले के लोग तो दोनों को मिलतेजुलते देख ही रहे थे. उन्होंने ही यह बात किशन सिंह से बताई तो वह बहू पर नजर रखने लगा. एक दिन शाम को किशन सिंह ने नाथू सिंह को अणछी के घर से निकलते देखा तो चिल्लाया, ‘‘अरे नाथू, तेरे पास कोई कामधाम नहीं है क्या, जो दिनभर इधर ही भटकता रहता है?’’

यह सुन कर नाथू सकपकाया तो लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर बोला, ‘‘मेरे पास बहुत काम है काका. काम के लिए ही तो अणछी को बुलाने आया था.’’

‘‘ठीक है, ऐसा कर तू अणछी की जगह किसी और को बुला ले. अब अणछी तेरे साथ नहीं जाएगी. और हां, अब तू इधर दिखाई भी मत देना, वरना मुझ से बुरा कोई और नहीं होगा.’’

किशन सिंह की इस धमकी से नाथू सिंह घबरा गया. वह समझ गया कि उन के संबंधों की जानकारी बूढे़ को हो गई है. वह उदास हो गया. क्योंकि अणछी से मिलना अब उस के लिए मुश्किल हो गया था. जब अणछी से मिले कई दिन हो गए तो वह परेशान रहने लगा. दूसरी ओर प्रेमी से न मिल पाने की वजह से अणछी भी बेचैन रहने लगी थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि प्रेमी से कैसे मिले. एक दिन मायके जाने के बहाने अणछी घर से निकली और सीधे प्रेमी नाथू सिंह के घर जा पहुंची. न जाने कैसे इस बात की भनक उस के ससुर किशन सिंह को लग गई. वह सीधे नाथू सिंह के घर पहुंचा और पूरी बात नाथू सिंह के पिता हिम्मत सिंह को बताई.

हिम्मत सिंह ने नाथू सिंह को डांटाफटाकारा ही नहीं, पिटाई भी की. इस के बाद नाथू सिंह और अणछी का मेलमिलाप एकदम बंद हो गया. लेकिन यह ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका, क्योंकि दोनों ही एकदूसरे से मिले बिना रह नहीं सकते थे. मुलाकात को आसान करने के लिए नाथू सिंह ने एक मोबाइल फोन खरीद कर अणछी को दे दिया. इस के बाद उन के बीच रात में घंटोंघंटों बातें होने लगीं. चूंकि बात दोनों के परिवारों के सभी लोगों को पता चल चुकी थी, इसलिए वे जब भी मिलते, काफी चोरीछिपे मिलते थे. ऐसे में अणछी और नाथू सिंह को अपने ही दुश्मन लगने लगे थे. अणछी पर नजर रखने के लिए किशन सिंह उस के मकान के बाहर बाड़े में सोने लगा था.

22 जुलाई, 2014 की शाम किशन सिंह बाड़े में सोने आया तो अणछी और उस के बीच काफी कहासुनी हुई. गुस्से में किशन सिंह ने अणछी के साथ गालीगलौज की. तब गुस्से में अणछी ने नाथू सिंह को फोन कर के किशन सिंह को खत्म करने के लिए कह दिया. अणछी के प्यार में अंधा नाथू सिंह ठीक साढ़े 12 बजे ढीमड़ी पहुंच गया और दबे पांव अणछी के कमरे में जा पहुंचा. इस के बाद दोनों ने सलाहमशविरा कर के रात ठीक 3 बजे गहरी नींद में सो रहे किशन सिंह के सिर पर लाठियां बरसा कर उसे खत्म कर दिया. उस के चेहरे को भी पत्थर से कुचल दिया.

किशन सिंह की हत्या करने के बाद दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए, सुबह होने से पहले नाथू सिंह अपने घर चला गया. सवेरा होने पर किशन सिंह की हत्या की जानकारी शंभू सिंह को हुई तो उस ने पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दे दी. पुलिस ने वह लाठी और पत्थर बरामद कर लिया था, जिस से किशन सिंह की हत्या की गई थी. पूछताछ और सुबूत जुटाने के बाद थाना खमनेर पुलिस ने नाथू सिंह और अणछी को राजसमंद की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Rajasthan News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आध

UP Crime News: ईंट से लगातार प्रहार कर ली पत्नी की जान

UP Crime News: घरपरिवार और समाज की बंदिशें तोड़ कर बबलू ने शादीशुदा रूबी से प्रेमविवाह किया था. 2 बच्चों के मांबाप दोनों के बीच ऐसी कौन सी वजह पैदा हो गई कि बबलू को पत्नी का हत्यारा बनना पड़ा…

थाना बर्रा के रहने वाले विशाल रफूगर ने सीटीआई नहर के करीब से बहने वाले नाले में बोरे में भरी एक युवती की लाश देखी, जिस का सिर बाहर निकल गया था. उस का क्षतविक्षत चेहरा साफ दिखाई दे रहा था, जिसे चीलकौए नोचनोच कर खा रहे थे. विशाल ने शोर मचाया तो देखतेदेखते वहां भीड़ एकत्र हो गई. किसी राहगीर ने सीटीआई के पास वाले नाले में एक महिला की लाश पड़ी होने की सूचना 100 नंबर पर दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना गोविंदनगर को दी गई. थाना गोविंदनगर की पुलिस आई जरूर लेकिन शव थाना बर्रा क्षेत्र में पड़े होने की बात कह कर लौट गई. नतीजतन 2 घंटे तक लाश नाले में पड़ी रही.

मामला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में आया तो एसपी (पूर्वी) हरीशचंदर, सीओ (गोविंदनगर) ओमप्रकाश सिंह थाना बर्रा पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने साक्ष्य एकत्र करने के लिए फोरेंसिक टीम को भी फोन कर के मौके पर बुला लिया था. पुलिस ने लाश वाले बोरे को नाले से बाहर निकाला. बोरे से लाश निकलवा कर निरीक्षण शुरू हुआ. मृतका की उम्र 30-35 साल रही होगी. वह नीले रंग की सलवार, हरे रंग की लैगिग, लाल कुरता, गुलाबी रंग का स्वेटर पहने थी. उस के पैर की अंगुलियों में बिछिया थीं. दाएं हाथ पर बबलू और ॐ गुदा हुआ था. कपड़ों और रूपरंग से लग रहा था कि मृतका किसी अच्छे परिवार से रही होगी.

शव देख कर ही लग रहा था कि किसी धारदार हथियार से उस की गरदन काटी गई थी. पहचान छिपाने के लिए मृतका का चेहरा बुरी तरह कुचला गया था. यही नहीं, उस के चेहरे पर तेजाब भी डाला गया था. हत्यारों ने मृतका के स्तन और अन्य कोमल अंगों पर भी गंभीर चोटें पहुंचाई थीं. इस से यही अंदाजा लगाया गया कि महिला की हत्या घृणा एवं क्रोध में की गई थी. घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करने के बाद थाना बर्रा के प्रभारी रामबाबू सिंह उसे अज्ञात महिला के शव की शिनाख्त कराने में जुट गए. आननफानन में शहर के सभी थानों से गुमशुदा महिलाओं की दर्ज सूचनाएं एकत्र कराई गईं. लेकिन शहर के थानों में दर्ज अज्ञात महिलाओं की गुमशुदगी की जानकारियों से मृतका का कोई सुराग नहीं मिल सका.  6 फरवरी को अचानक किसी ने पुलिस को फोन कर के सूचना दी कि 3 फरवरी, 2015 को सीटीआई नहर के पास नाले में मिली लाश कानपुर के सीसामऊ के रहने वाले बबलू की पत्नी रूबी की है. उस की हत्या में उस के पति बबलू की मुख्य भूमिका है. इसीलिए उस ने थाने में अपनी पत्नी रूबी की गुमशुदगी दर्ज नहीं करवाई.

इस सूचना की पुष्टि करने के लिए थानाप्रभारी रामबाबू सिंह पुलिस टीम के साथ सीसामऊ स्थित बबलू के घर जा पहुंचे. लेकिन वहां ताला लटका हुआ था. मामले की तह तक पहुंचने के लिए उन्होंने बबलू के पड़ोसियों से पूछताछ की. मोहल्ले वालों ने बताया कि जितेंद्र शुक्ला उर्फ बबलू किसी बैंक में चपरासी है. उस की पत्नी रूबी का चालचलन ठीक नहीं था. बबलू की गैरमौजूदगी में उस के घर कई लोग आतेजाते थे. एक बार बबलू ने रूबी को एक युवक के साथ घर में रंगरलियां मनाते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया था. जिस के बाद मारपीट हुई थी और मामला थाने तक जा पहुंचा था. लेकिन रूबी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही थी. बबलू से उसे बच्चे थे, जिन के मोह की वजह से वह रूबी को छोड़ना नहीं चाहता था और उसे समझाबुझा कर लाइन पर लाना चाहता था.

लेकिन रूबी पर बबलू की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था. वह बबलू के पीछे खुल कर रंगरलियां मनाती थी, जिस से वह काफी परेशान था. अचानक 31 जनवरी की रात को पता नहीं क्या हुआ कि रूबी और उस के बच्चे गायब हो गए. बबलू भी अपने घर पर ताला डाल कर कहीं चला गया. अब उस ने सिर मुड़वा लिया है और कभीकभी चोरीछिपे अपने घर आता है. मोहल्ले वालों से पूछताछ में यह बात भी सामने आई थी कि रूबी के हाथ पर बबलू का नाम और ‘ॐ’ गुदा हुआ था. इस से यह बात साफ हो गई कि सीटीआई नहर के पास नाले में मिली लाश रूबी की ही थी. मोहल्ले वालों से मिली जानकारी से पुलिस को पक्का विश्वास हो गया था कि रूबी की हत्या उस के पति बबलू ने ही करवाई है.

मोहल्ले वालों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस लाश की शिनाख्त करवाने के लिए वनखंडेश्वर मंदिर, पीरोड पहुंची. वहां से पुलिस मंदिर के पुरोहित गणेशशंकर जोशी को हिरासत में ले कर थाना बर्रा लौट आई. थाने ला कर गणेशशंकर जोशी को मृतका की लाश के फोटो और कपड़े दिखाए गए. सारी चीजें देखने के बाद बबलू के पिता गणेशशंकर ने पुलिस को बताया कि लाश उस की बहू रूबी की ही है. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने गणेशशंकर जोशी से रूबी की हत्या की सच्चाई जानने का प्रयास किया.

जोशी ने बताया कि उस के 2 बेटे हैं, बबलू और धर्मेंद्र. बबलू बैंक औफ बड़ौदा, पनकी में चपरासी था. उस के 2 बच्चे थे 11 वर्षीय बेटा शिवा और 9 साल की बेटी प्रियंका. वह स्वयं वनखंडेश्वर मंदिर, थाना बजरिया से पुरोहितगीरी करते थे और वहीं एक कमरे में रहते थे. करीब 12 वर्ष पहले जितेंद्र उर्फ बबलू ने रूबी से प्रेमविवाह किया था. इसलिए उस ने उस के साथ अपने संबंध तोड़ लिए थे. बबलू अपनी पत्नी रूबी को ले कर 104/313 बड़ा चौराहा, सीसामऊ में रहता था. उस का घर आनाजाना बहुत कम था. 31 जनवरी को बबलू रात 10 बजे के लगभग अपने दोनों बच्चों को ले कर उस के पास आया था और यह कह कर उन्हें रखने को कहा था कि उस के ऊपर एक बड़ी मुसीबत आ पड़ी है.

उस ने बताया कि रूबी बैंक से रुपए निकाल कर घरगृहस्थी का सामान खरीदने के लिए शाम 4 बजे सीसामऊ बाजार के लिए निकली थी. लेकिन इतनी रात होने पर भी वह वापस नहीं आई थी.  उस ने पूरे कानपुर में छानबीन कर डाली, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शायद वह चेन्नई चली गई हो. वह अपने छोटे भाई धर्मेंद्र को ले कर उसे ढूंढने चेन्नई गया है. इस के अलावा रूबी की हत्या के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है.

गणेशशंकर से पुलिस को जो भी जानकारी मिली, उस से पुलिस को पक्का विश्वास हो गया कि बबलू रूबी की हत्या के बारे में अच्छी तरह जानता है. यह भी संभव था कि वह खुद भी हत्या में शामिल हो या फिर उस ने हत्या अन्य लोगों से करवाई हो? इसी कारण बबलू पुलिस के सामने आने में डर रहा है. पुलिस मृतका के पति जितेंद्र उर्फ बबलू की तलाश में जगहजगह दबिश देने लगी. पुलिस ने हत्या का खुलासा जल्द से जल्द करने के लिए बबलू के मिलने के संभावित स्थानों पर छापे डाले, लेकिन वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया. मजबूर हो कर पुलिस ने बजरिया थाना क्षेत्र में अपने मुखबिरों का जाल बिछा दिया.

9 फरवरी, 2015 की सुबह पुलिस को सूचना मिली कि रूबी का पति बबलू शास्त्री चौक के पास किसी के इंतजार में खड़ा है. सूचना मिलते ही थान बर्रा पुलिस ने बबलू को घेर कर पकड़ लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई. उस से पूछताछ शुरू हुई तो वह काफी देर तक पुलिस को बरगलाता रहा. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने जो कुछ बताया, वह इस तरह था.

जितेंद्र उर्फ बबलू 104/312 बड़ा चौराहा, सीसामऊ, थाना बजरिया, कानपुर में रहता था. वह बैंक औफ बड़ौदा में चपरासी था. करीब 12 साल पहले चंद मुलाकातों में ही उसे विजयनगर, कानपुर निवासी छोटे की पत्नी रूबी से प्यार हो गया था. धीरेधीरे जितेंद्र उर्फ बबलू और रूबी का प्यार ऐसे मुकाम पर पहुंच गया कि दोनों को एकदूसरे की दूरी खलने लगी. फलस्वरूप बबलू और रूबी ने घरपरिवार और सामाजिक मानमर्यादाओं को ताक पर रख कर घर से भाग कर प्रेमविवाह कर लिया. कुछ महीने लुकछिप कर रहने के बाद दोनों सीसामऊ मोहल्ले में खुल कर पतिपत्नी बन कर रहने लगे. कालांतर में दोनों के शिवा और प्रियंका 2 बच्चे हुए.

कुछ सालों तक रूबी ईमानदारी से जीवन जीती रही. उस के बाद उस के कदम बहकने लगे. उस ने पति की गैरमौजूदगी का लाभ उठा कर मोहल्ले के कुछ युवकों से अवैध संबंध बना लिए और घर में रंगरलियां मनाने लगी. इस से मोहल्ले में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब पत्नी की चरित्रहीनता और नएनए लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ाने की खबर बबलू को हुई तो सच्चाई जानने के लिए एक दिन वह अपनी बैंक ड्यूटी छोड़ कर घर आ गया. घर में उस ने रूबी को मोहल्ले के एक युवक के साथ रंगरलियां मनाते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया.

उस दिन उस ने रूबी को जम कर मारापीटा और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने की सख्त हिदायत दी, लेकिन इस से रूबी के चालचलन में कोई बदलाव नहीं आया. यह देख कर बबलू को रूबी से नफरत हो गई. बच्चों का भविष्य बरबाद न हो, यह सोच कर बबलू रूबी को हर तरह से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने का प्रयास किया कि वह ईमानदारी भरा जीवन गुजारे, लेकिन रूबी पर इस का कोई असर नहीं हुआ. नतीजतन घरपरिवार और रिश्तेदारों के बीच बबलू की बदनामी होने लगी. दूसरी ओर रूबी स्वयं पर अंकुश लगाने को ले कर सख्त होने लगी और पति को मुंह पर जवाब देने लगी, जिस के चलते बबलू और रूबी में 2 बार जम कर मारपीट हुई.

रूबी ने इस की शिकायत थाने में की. लेकिन पुलिस ने इसे पतिपत्नी का मामला मान कर दोनों को समझाबुझा कर लौटा दिया. तीसरी बार बबलू ने बाहरी लड़कों को घर में बैठाने को ले कर रूबी को जम कर पीटा. इस बार भी पुलिस ने रूबी का पक्ष लिया और सही न्याय करने के बजाय दोनों का समझौता करा दिया. इस समझौते में तय हुआ कि रूबी अपने बच्चों के साथ अलग रहेगी और बबलू उसे 4 हजार रुपए महीने खर्च देगा. इस के बाद रूबी बबलू से 4 हजार रुपए प्रति माह लेती रही. इस के बाद रूबी ने बबलू को अपने पास रहने के लिए मजबूर कर दिया. इस तरह रूबी हर महीने बंधीबंधाई रकम ले कर पत्नी की तरह बबलू के साथ रहती भी रही और उसे पुलिस का डर दिखा कर पूरी तरह अपने कब्जे में किए रही. जरा भी कोई बात होती तो वह उसे जेल भिजवाने की धमकी दे देती.

इस सब के चलते बबलू गहरे तनाव में रहने लगा. इस स्थिति का फायदा उठा कर रूबी खुल कर मनमानी करने लगी. इतना ही नहीं, अब वह अपने चाहने वालों से पति के सामने ही मिलनेजुलने लगी. बबलू से जब पत्नी की हरकतें सही नहीं गईं तो उस ने रूबी को अपनी जिंदगी से हटाने का इरादा बना लिया. जितेंद्र शुक्ला उर्फ बबलू ने गोविंदनगर निवासी अपने खास दोस्त राधेश तिवारी से अपनी पत्नी रूबी की अय्याशी के बारे में पूरी बात बता कर कहा कि अब उस से रूबी की हरकतें बरदाश्त नहीं होतीं. घर में मेरी स्थित एक भड़ुए जैसी हो गई है. उस के कारनामे मुझ से देखे नहीं जा रहे हैं. मैं उस से अपना पिंड छुड़ाना चाहता हूं. वह उसे बातबात में जेल भिजवाने की धमकी देती है, अब वह उस की हत्या कर के ही जेल जाना चाहता है. बबलू की बात सुन कर राधेश तिवारी उस की मदद के लिए तैयार हो गया.

राधेश तिवारी समाचार पत्र विके्रता था. उस की काफी दूरदूर तक अच्छी जानपहचान थी. राधेश तिवारी ने गोविंदनगर में रहने वाले पेशेवर हत्यारे शुभम मौर्य से जितेंद्र जोशी उर्फ बबलू की मुलाकात करवा कर बातचीत करवाई. शुभम मौर्य से रूबी की हत्या का सौदा 30 हजार रुपए में तय हो गया. बबलू ने शुभम मौर्य को रूबी की हत्या के लिए 25 हजार रुपए एडवांस दे दिए. शेष 5 हजार रुपए रूबी की हत्या के बाद देना तय हुआ. योजना के मुताबिक, 31 जनवरी, 2015 की रात 10 बजे के लगभग राधेश तिवारी, शुभम मौर्य व उस का साथी विजय उर्फ पुच्ची बबलू के घर आ गए.

चारों ने घर पर ही देर रात तक शराब पी. उसी दौरान शुभम मौर्य के इशारे पर बबलू अपने बेटे शिवा और बेटी प्रियंका को यह कह कर घर के बाहर ले कर चला गया कि ‘आप लोग बैठो, मैं बच्चों को बाजार से नाश्ता दिलवा कर जल्द वापस आता हूं. जैसे ही बबलू बच्चों को ले कर घर से बाहर गया, शुभम मौर्य, राधेश तिवारी और विजय कमरे में बैठी रूबी के पास पहुंच गए और उसे दबोच कर उस का मुंह दबा लिया. विजय उस के सिर पर ईंट से वार करने लगा. विजय रूबी के सिर पर तब तक ईंट मारता रहा, जब तक वह मरणासन्न नहीं हो गई. इस के बाद विजय ने सूजे से रूबी के गले को बुरी तरह से गोद दिया.

बबलू बच्चों को पिता के घर छोड़ कर पुन: लौट आया. तब तक रूबी मर चुकी थी. योजना के मुताबिक रूबी की लाश की शिनाख्त मिटाने के लिए उस के चेहरे पर ईंटें मारमार कर बुरी तरह से कुचल दिया गया. चेहरे की शिनाख्त किसी परिस्थितियों में न हो सके, इस के लिए उस के चेहरे पर तेजाब भी डाला गया. इस के बाद रूबी के क्षतविक्षत शव को आननफानन में वाटरपू्रफ बोरे में भर कर अच्छी तरह सिल दिया गया. लाश को ठिकाने लगाने के लिए रात के अंधेरे में शुभम मौर्य फरजी नंबर की अपनी स्कूटी पर रूबी के लाश वाले बोरे को लाद कर विजय के साथ चला गया और उस बोरे को सीटीआई नहर के पास नाले में फेंक कर अपने घर चला गया.

जितेंद्र उर्फ बबलू ने पुलिस को बताया कि वह रूबी के मोहल्ले के लड़कों के साथ अवैधसंबंधों से त्रस्त था. रूबी तृप्ति इतनी कामांध हो गई थी कि समझाने के बाद भी वह नहीं मानती थी. इसलिए उस के सामने उस की हत्या करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था. इसलिए 30 हजार रुपए की सुपारी दे कर उस ने उस की हत्या करवा दी थी. पुलिस बबलू को अपने साथ गोविंदनगर के ब्लाक नंबर 10 ले गई. उस की निशानदेही पर राधेश तिवारी, विजय उर्फ पुच्ची, शुभम मौर्य को गिरफ्तार कर लिया गया. साथ ही लाश को ठिकाने लगाने में इस्तेमाल की गई स्कूटी, मृतका और उस के पति बबलू के मोबाइल भी बरामद कर लिए गए.

पूछताछ के बाद जांच अधिकारी ने उपर्युक्त चारों अभियुक्तों को भादंवि. की धारा 302, 201, 120बी के अंतर्गत चालान तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. इस तरह रूबी की बदचलनी की वजह से एक परिवार बरबाद हो गया. UP Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News: रिश्तों की कच्ची डोर

UP News: घर वालों ने मनोज की शादी कर के सोचा था कि पत्नी के आने पर वह अपनी भाभी के प्रेमजाल से निकल जाएगा. लेकिन क्या ऐसा हो पाया? त्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के कस्बा मोदीनगर के निकट गांव सीकरी खुर्द में हर साल चैत महीने की नवरात्र में एक विशाल मेला लगता है. इस मेले में आसपास के लोग तो आते ही हैं, अगलबगल के जिलों के भी काफी लोग आते हैं. उसी मेले में मेरठ के थाना रसूखपुर जाहिद का रहने वाला मनोज भी पत्नी संगीता और बेटी अनुष्का के साथ मेला देखने जाना चाहता था. इसलिए उस ने संगीता से कहा, ‘‘संगीता, कल सुबह जल्दी तैयार हो जाना, हम सीकरी का मेला देखने चलेंगे.’’

मनोज संगीता से अकसर लड़नेझगड़ने के साथ मारपीट करता रहता था, इसलिए संगीता ने कहा, ‘‘मुझे तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना है, मैं ऐसे ही ठीक हूं. मुझे मेलाठेला देखने का शौक नहीं है.’’

‘‘तुम भी जराजरा सी बात का बतंगड़ बना देती हो. अरे रात गई बात गई. रात में जो हुआ, उसे भूल जाओ. एक ओर तो कहती हो कि मैं तुम्हारे लिए कुछ करता नहीं, तुम्हें कहीं ले नहीं जाता. अब चलने को कह रहा हूं तो नखरे दिखा रही हो.’’ मनोज ने संगीता की खुशामद करते हुए कहा. संगीता कुछ कहती, उस के पहले ही मनोज की मां यानी संगीता की सास शकुंतला ने कहा, ‘‘अरे इतने प्यार से कह रहा है तो चली जा , मेला ही दिखाने तो ले जा रहा है. कुएं में धकेलने थोड़े ही ले जा रहा है.’’

‘‘इन का क्या भरोसा. मेला दिखाने के बहाने ले जा कर कहीं कुएं में ही धकेल दें. लेकिन आप कह रही हैं, इसलिए चली जाती हूं. कितने बजे निकलना है?’’ संगीता ने पूछा.

  ‘‘9 बजे तक निकलेंगे. नहाधो कर आराम से तैयार हो जाना.’’ मनोज ने कहा.

 अगले दिन रविवार था. संगीता ने बेटी अनुष्का को भी तैयार किया और खुद भी तैयार हो गई. मनोज तैयार ही बैठा था. पत्नी और बेटी को ले कर वह बस से मोदीनगर के लिए रवाना हो गया. मोदीनगर के सीकरी खुर्द पहुंच कर दिन भर वह संगीता के साथ मेले में घूमता रहा. इस बीच मनोरंजन के साथसाथ घर के लिए कुछ खरीदारी भी की. छुट्टी का दिन होने की वजह से मेले में भीड़भाड़ ज्यादा थी, डेढ़ साल की बेटी अनुष्का को मनोज खुद ही लिए था. अंधेरा होने लगा तो मनोज घर लौटने की तैयारी करने लगा. उस ने संगीता से मेले से बाहर चलने को कहा. वह तो बेटी को ले कर मेले के बाहर गया, लेकिन संगीता नहीं पाई.

कुछ देर बाहर खड़े हो कर मनोज ने संगीता का इंतजार किया. जब काफी देर तक संगीता नहीं आई तो वह उसे तलाशने के लिए फिर मेले में घुस गया. काफी देर तक वह उसे ढूंढ़ता रहा. जब रात ज्यादा होने लगी तो उस ने इस बात की जानकारी घर वालों के साथ ससुराल वालों को दी. रात ज्यादा हो गई थी और बेटी रो रही थी, इसलिए वह पत्नी के मेले में खो जाने की सूचना थाना पुलिस को दिए बगैर ही घर गया. लेकिन अगले दिन सवेरा होते ही वह थाना मोदीनगर पहुंचा और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

मनोज ने संगीता के मेले में खो जाने की जानकारी ससुराल वालों को भी दे दी थी. इसलिए अगले दिन संगीता के पिता जयपाल सिंह भी थाना मोदीनगर पहुंच गए थे. लेकिन उन के पहुंचने तक मनोज संगीता की गुमशुदगी दर्ज करा कर जा चुका था. जयपाल सिंह ने थानाप्रभारी दीपक शर्मा से मिल कर बेटी के गायब होने का आरोप उस की ससुराल वालों पर लगाते हुए एक प्रार्थना पत्र दिया, जिस के आधार पर थानाप्रभारी ने संगीता के पति मनोज सिंह तथा उस के घर वालों के खिलाफ अपराध संख्या 237/2014 पर भादंवि की धाराओं 498, 420 एवं 364 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर रोशन सिंह को सौंप दी. चूंकि रिपोर्ट नामजद दर्ज थी, इसलिए सबइंसपेक्टर रोशन सिंह ने मनोज के घर छापा मारा.

शायद रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी मनोज और उस के घर वालों को हो गई थी, इसलिए घर पर कोई नहीं मिला. पूरा परिवार भूमिगत हो गया था. फिर भी कोशिश कर के किसी तरह उन्होंने मनोज को हिरासत में ले ही लिया. उसे थाने ला कर पूछताछ शुरू हुई. पहले तो मनोज यही कहता रहा कि संगीता मेले में कहीं खो गई है. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती के साथ सवालों की झड़ी लगा दी तो पुलिस के सवालों के जाल में फंसे मनोज ने स्वीकार कर लिया कि उस ने संगीता की हत्या कर के उस की लाश नहर में फेंक दी है. इस के बाद उस ने संगीता की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के थाना सरूरपुर खुर्द के गांव रसूखपुर जाहिद में रहते थे देवकरण सिंह. उन के पास मात्र 5 बीघा खेती की जमीन थी, जिस पर वह परिवार की मदद से मेहनत से खेती करते थे. यही खेती उन की आजीविका का साधन थी. इसी की कमाई से परिवार का गुजरबसर होता था. देवकरण सिंह के परिवार में पत्नी शकुंतला के अलावा 2 बेटे, सुरेश और मनोज थे. सुरेश ज्यादा पढ़लिख नहीं सका तो पिता के साथ खेती के कामों में मदद करने लगा. पढ़ालिखा तो मनोज भी ज्यादा नहीं था, लेकिन खेती के काम में उस का मन नहीं लगा. उस ने भी पढ़ाईलिखाई छोड़ दी तो देवकरण सिंह ने उसे गांव में ही जनरल स्टोर की दुकान खुलवा दी, जिसे वह अकेला ही संभालता था.

 देवकरण सिंह ने मरने से पहले अपने बड़े बेटे सुरेश की शादी बुलंदशहर के कस्बा स्यान के रहने वाले क्षेत्रपाल सिंह की बेटी शशि से कर दी थी. शशि तीखे नैननक्श वाली खूबसूरत लड़की थी. इसलिए आते ही उस ने ससुराल के सभी लोगों का मन मोह लिया था. वह व्यवहारकुशल के साथसाथ घर के कामों में भी निपुण थी, इसलिए घर का हर आदमी उस से खुश रहने लगा था. इस के बाद जल्दी ही गांव में उस के रूप और गुण की चर्चा होने लगी.

शशि के आगे उस का पति सुरेश कहीं नहीं ठहरता था. सुरेश को भी इस बात का अहसास था. शशि और सुरेश को देख कर कोई अंधा भी कह सकता था कि लंगूर के हाथ अंगूर लगने वाली कहावत यहां पूरी तरह चरितार्थ हो रही है. शशि को अपनी सुंदरता पर गुमान था, इसलिए अपनी उसी सुंदरता के बल पर वह पति सुरेश पर पहले ही दिन से हावी हो गई थी. शशि को सुरेश बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन अब वह कर भी क्या सकती थी. घर वालों ने ब्याह दिया था, इसलिए तकदीर मान कर उस ने उसे गले लगा लिया था. उस ने जैसेतैसे उस के साथ निर्वाह करने का मन बना लिया था. जिस दिन उस ने ससुराल में कदम रखा था, उसी दिन से वह देख रही थी कि उस का देवर मनोज उस का कुछ ज्यादा ही खयाल रखता था.

वह जब भी घर में अकेली होती, मनोज उसे चाहत भरी नजरों से ताकते हुए उस के आगेपीछे नाचता रहता. शुरुआत में तो शशि को लगा कि वह नईनई आई है, इसलिए आकर्षणवश मनोज उस के आगेपीछे घूमता है. लेकिन जब मौका मिलने पर मनोज उस से छेड़छाड़ करने लगा तो शशि को समझते देर नहीं लगा कि उस का प्यारा देवर क्या चाहता है. क्योंकि अब वह बच्ची नहीं रही थी कि मनोज के दिल की बात समझती.

सच भी है, जो बातें जुबान नहीं कह पाती, आंखें उन्हें इशारोंइशारों में कह देती हैं. मनोज भी भले ही दिल की बात मुंह से नहीं कह सका था, लेकिन आंखों ने इशारोंइशारों में कह दिया था. शशि को भी मनोज अच्छा लगता था, क्योंकि वह बड़े भाई सुरेश से काफी ठीकठाक था. लेकिन वह मन की बात देवर से कह नहीं सकती थी. इसलिए वह चाहती थी कि पहल देवर ही करे. इस के लिए वह मनोज को देख कर अकसर मुसकराती तो रहती ही थी, उस की हंसीमजाक और छेड़छाड़ का जवाब भी उसी के अंदाज में देती थी.

समझदार के लिए इशारा काफी होता है. मनोज भी जवान हो चुका था. स्त्रीसुख के लिए बेचैन भी रहता था. इसलिए भाभी की ओर से इशारा मिला तो एक दिन दोपहर में जब घर में शशि और उस के अलावा कोई और नहीं था तो उचित मौका देख कर वह शशि के कमरे में घुस गया. उसे अपने कमरे में देख कर शशि ने कहा, ‘‘इस समय तो तुम्हें दुकान पर होना चाहिए, यहां मेरे कमरे में क्या कर रहे हो?’’

‘‘तुम से एक बात कहनी थी, इसलिए दुकान छोड़ कर चला आया.’’

‘‘कहो, क्या कहना है?’’ शशि ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘भाभी, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो.’’

‘‘सिर्फ अच्छी लगती हूं, और कुछ नहीं?’’

शशि ने यह कहा तो मनोज का हौसला बढ़ा. उस ने कहा, ‘‘भाभी, अच्छा लगने का मतलब है कि मैं तुम से प्यार करता हूं.’’

‘‘तो करो प्यार, मना किस ने किया है. मैं तो कब से तुम्हारे मुंह से यह बात सुनने का इंतजार कर रही हूं. क्योंकि मुझे तो बहुत पहले ही तुम्हारे दिल की बात का पता चल गया था. मैं इशारे भी कर रही थी. इस के बावजूद तुम ने यह बात कहने में इतने दिन लगा दिए.’’

‘‘तुम्हारे इशारों की वजह से ही तो हिम्मत कर सका हूं. नहीं तो किसी की पत्नी से भला यह कहने की हिम्मत कहां थी.’’ कह कर मनोज ने शशि का हाथ पकड़ा तो वह उस की बांहों में समा गई.

 मनोज ने शशि को बांहों में भर लिया. इस के बाद देवरभाभी का पवित्र रिश्ता कलंकित होने से कैसे बच सकता था. रिश्तों की परिभाषा बदली तो आयाम भी बदल गए. एक ही घर में रहने की वजह से मर्यादा तोड़ने में दिक्कत भी नहीं होती थी. घर वालों के खेतों पर जाते ही देवरभाभी पतिपत्नी बन जाते. यह ऐसा काम है, जिसे लोग करते तो बहुत चोरीछिपे हैं, इस के बावजूद लोगों की नजरों में ही जाता है. मनोज और शशि के मामले में भी ऐसा ही हुआ. घर वालों को जब मनोज और शशि के बदले संबंधों की जानकारी हुई तो दोनों को रोकने की कोशिश शुरू कर दी गई. इसी के मद्देनजर फैसला लिया गया कि अब जितनी जल्दी हो सके, मनोज की शादी कर दी जाए. पत्नी के आने से वह शशि से संबंध तोड़ लेगा.

शादी की बात रिश्तेदारों के बीच पहुंची तो दौराला के गांव पनवाड़ी के रहने वाले जयपाल सिंह बड़ी बेटी संगीता का रिश्ता ले कर उस के यहां पहुंच गए. बातचीत के बाद शादी तय हो गई. 25 जनवरी, 2012 को मनोज और संतीगा का विवाह भी हो गया. संगीता दुलहन बन कर रसूलपुर गई. मनोज की शादी पर शशि ने खूब हंगामा किया. लेकिन मनोज ने कहा था कि कुछ ही दिनों की तो बात है, बाद में सब ठीक हो जाएगा तो वह मान गई थी. संगीता के ससुराल आने के बाद कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक रहा, लेकिन अचानक मनोज संगीता में कमियां निकालने लगा. यही नहीं, कम दहेज लाने के ताने मार कर उस के साथ मारपीट भी करने लगा. इस बात में घर वाले भी उस का साथ दे रहे थे, खासकर शशि.

शुरूशुरू में तो संगीता की समझ में नहीं आया कि अचानक मनोज को ऐसा क्या हो गया कि उस में उसे इतनी सारी कमियां नजर आने लगीं. लेकिन जैसे घर वालों को देवरभाभी के रिश्ते की जानकारी हो गई थी, उसी तरह कुछ दिनों में संगीता को भी पति की असलियत का पता चल गया था. दरअसल एक दिन उस ने पति को भाभी के साथ रंगरलियां मनाते देख लिया था. संयोग से अब तक संगीता एक बेटी अनुष्का की मां बन चुकी थी. उसे लग रहा था कि बेटी का मुंह देख कर ही शायद मनोज का व्यवहार बदल जाए, लेकिन जब उस ने देवरभाभी को रंगेहाथों पकड़ लिया तो समझ गई कि अब कुछ नहीं हो सकता.

 मनोज लगातार संगीता पर मायके से 50 हजार रुपए नगद, अंगूठी और फ्रिज लाने की बात कह कर जुल्म ढा रहा था. 1 मार्च, 2013 को मनोज और उस के घर वालों ने संगीता को मायके भेज दिया और साफसाफ कह दिया कि जितना कहा जा रहा है, उतना सामान और रुपए ले कर ही वह ससुराल आएं, तभी उसे रहने दिया जाएगा. जयपाल ने पंचायत में गुहार लगाई. 24 जून, 2013 को गांव में हुई पंचायत ने फैसला किया कि भविष्य में मनोज के घर वाले कोई दानदहेज नहीं मांगेगे और संगीता को ठीक से रखेंगे. उसे परेशान नहीं करेंगे. समझौते के बाद 2-3 महीने तक तो मनोज और उस के घर वालों ने संगीता को कुछ नहीं कहा. उस के बाद वे अपनी पुरानी हरकतों पर उतर आए.

संगीता मायके वालों से शिकायत करती और वे कुछ करते, उस के पहले ही 6 अप्रैल, 2014 को मनोज ने ससुर जयपाल सिंह को फोन कर के बताया कि संगीता सीकरी के मेले से गायब हो गई है. हैरानपरेशान जयपाल सिंह बेटों के साथ थाना मोदीनगर पहुंचे और मनोज तथा उस के घर वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, अपहरण और हत्या का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करा दी. थाना मोदीनगर पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में मनोज ने बताया कि पहले से बनाई गई योजना के तहत मेला दिखाने के बहाने वह संगीता को सीकरी खुर्द ले गया. पूरे दिन मेला देखते हुए वह खरीदारी करता रहा. शाम का धुंधलका हो गया तो वह उसे साथ ले कर गंगनहर के चित्तौड़ा पुल की ओर चल पड़ा. तब संगीता ने उस से पूछा, ‘‘इधर कहां जा रहे हो, हमारा घर तो उस ओर है.’’

‘‘यहीं पास के गांव में मेरा एक दोस्त रहता है, इधर आया हूं तो चलो उस से भी मिल लेते हैं.’’ मनोज ने कहा.

इस के बाद संगीता ने कोई सवाल नहीं किया और उस के साथ चल पड़ी. जब संगीता पुल पर पहुंची तो उस ने गोद में ली बेटी को उतार कर खड़ी कर दिया और लापरवाह खड़ी संगीता को एकदम से गिरा दिया. संगीता कुछ कह पाती, उस के पहले ही उस के गले में पड़े दुपट्टे को लपेट कर कस दिया. संगीता छटपटा कर मर गई. संगीता की हत्या कर मनोज ने उस की लाश को गंगनहर में फेंक दिया और वापस गया. उस ने फोन कर के संगीता के गायब होने की सूचना ससुराल वालों को भी दे दी थी और अगले दिन थाने में उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा दी थी. लेकिन उस की चालाकी चली नहीं और पकड़ा गया.

अगले दिन मनोज को गाजियाबाद की जिला अदालत में पेश कर के लाश बरामद करने के लिए 3 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर लिया गया. घटनास्थल पर मनोज को ले जा कर पुलिस ने संगीता की लाश बरामद करने की बहुत कोशिश की, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. रिमांड अवधि खत्म होने पर मनोज को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने मनोज के घर वालों को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. UP News

Crime News: ऐसे घर नही बसते

Crime News: जरूरत पड़ने पर अकसर शगुफ्ता खान अरविंद गुप्ता की मदद करती रहीं. फिर ऐसा क्या हुआ कि अरविंद को अपनी मददगार का खून करना पड़ा…

स्कूल से छुट्टी होने के बाद 12 वर्षीया आलिया अपनी 8 वर्षीया छोटी बहन जिया के साथ अपने फ्लैट पर पहुंची तो उस दिन हमेशा की तरह उसे फ्लैट की डोरबेल नहीं बजानी पड़ी, क्योंकि फ्लैट का दरवाजा पहले से ही खुला हुआ था. वह बहन के साथ अंदर चली गई. ड्राइंगरूम में उसे मम्मी शगुफ्ता खान नहीं दिखाई दीं तो वह उन्हें खोजते हुए बैडरूम में पहुंची. वहां उस ने जो देखा, एकदम से डर गई. बैडरूम में एक लड़का शगुफ्ता खान को दबोचे हुए एक लंबे फल वाले चाकू से उन पर हमला करने की कोशिश कर रहा था.

मम्मी की जान खतरे में देख कर आलिया ने अपना स्कूल बैग उतार कर फेंका और मम्मी को बचाने के लिए उस लड़के के कपड़े पीछे से पकड़ कर खींचते हुए बोली, ‘‘अंकल, मेरी मम्मी को छोड़ दो, उन्हें मत मारो.’’

लेकिन लड़के ने आलिया की बात सुनने के बजाय उसे झटक दिया और उस के सामने ही शगुफ्ता खान की गरदन पर चाकू से वार कर के काट दिया. गरदन कटने से शगुफ्ता खान छटपटाने लगीं और फिर थोड़ी देर में शांत हो गईं. शगुफ्ता खान की हत्या करने के बाद उस लड़के ने आलिया और जिया को वही चाकू दिखा कर बैडरूम के एक कोने में बैठा कर बोला, ‘‘तुम दोनों बहनें चुपचाप यहीं बैठी रहना, वरना तुम्हारी मम्मी की तरह तुम्हारा भी गला काट दूंगा.’’

आलिया और जिया को कोने में बैठा कर वह लड़का एक बार फिर मर चुकी शगुफ्ता खान के पास पहुंचा और उन की कमर में लटक रहा अलमारी की चाबियों का गुच्छा ले कर अलमारी खोली और उस में रखे गहने दी, तथा नगद को एक थैले में डाला और जल्दी से बाहर आ कर इमारत के कंपाउंड में खड़े औटो पर सवार हो कर भाग गया. यह 11 नवंबर, 2014 की घटना थी. हत्यारे के जाने के बाद आलिया और जिया जब थोड़ा सहज हुईं तो आलिया ने सब से पहले इस घटना की जानकारी आस्ट्रेलिया गए अपने पिता सोनू जालान और उस के बाद अपने कार ड्राइवर को दी. इस के बाद दोनों बहनें फ्लैट के बाहर आईं और मदद के लिए शोर मचाने लगीं.

चूंकि कार का ड्राइवर इमारत के कंपाउंड में ही था, इसलिए वह तुरंत भाग कर आलिया और जिया के पास आ गया. उस के आतेआते शोर सुन कर अगलबगल रहने वाले लोग भी आ गए थे. उन लोगों ने आलिया और जिया को संभालने के बाद जो देखासुना, उस से उन का कलेजा मुंह को आ गया. इमारत में रहने वाले इस घटना की सूचना पुलिस को देते, उस के पहले ही थाना मलाड पुलिस घटनास्थल पर आ गई. दरअसल आलिया ने जैसे ही मां की हत्या की बात पापा सोनू जालान को बताई, उन्होंने आस्ट्रेलिया से ही अपने दोस्त विमल अग्रवाल को फोन किया. इस के बाद विमल अग्रवाल ने मुंबई के उपनगर कांदीवली पश्चिम स्थित सीआईडी क्राइम ब्रांच को फोन कर के बताया कि मलाड पश्चिम के रुस्तमजी रिवेरा इमारत की छठवीं मंजिल स्थिति फ्लैट नंबर 64 में एक हत्या हो गई है. वहीं से इस घटना की सूचना थाना मलाड पुलिस को भी दे दी गई थी.

घटना की सूचना मिलने के तुरंत बाद इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव ने इस घटना की जानकारी अपने सीनियर इंसपेक्टर अभिनाश सावंत के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम एवं उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी. इस के बाद अपने साथ सहायक इंसपेक्टर नितिन विचारे, मनोहर हरपुड़े, शरद झीने, सिपाही वुगड़े, मोरे, माने, कोड़े और गोले को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े थे. घटनास्थल क्राइम ब्रांच सीआईडी औफिस से 4-5 किलोमीटर दूर था, इसीलिए पुलिस की इस टीम को वहां पहुंचने में 20-25 मिनट लगे. तब तक थाना मलाड पुलिस वहां पहुंच चुकी थी. पूछताछ में पता चला कि जिस फ्लैट के अंदर हत्या हुई थी, वह फ्लैट क्रिकेट के एक बड़े बुकी (सट्टेबाज) सोनू जालान का था. हत्या उस की पत्नी शगुफ्ता खान की हुई थी.

उस फ्लैट में शगुफ्ता खान अपनी 2 बेटियों, आलिया एवं जिया के साथ रहती थीं. उस समय किसी बात को ले कर पतिपत्नी में विवाद चल रहा था, जिस की वजह से सोनू जालान अपनी वृद्ध मां के साथ कांदीवली के महावीरनगर में रहता था. इस के बावजूद वह पत्नी और बेटी का पूरा खयाल रखता था. घटना के समय वह आस्टे्रलिया में था. शुरुआती जांच में इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव को मामला काफी रहस्यमय लगा. फ्लैट के बैडरूम में शगुफ्ता खान की लाश पड़ी थी. लाश के पास ही वह चाकू भी पड़ा था, जिस से उस की हत्या की गई थी. ऐसा लगता था, जैसे हत्यारे को मृतका से गहरी नफरत थी. बैडरूम में रखी अलमारी के दोनों पट खुले थे और उस का सारा सामान बिखरा पड़ा था. तिजोरी में चाबियों का गुच्छा लटक रहा था, जिस से स्पष्ट था कि हत्यारे ने हत्या करने के बाद लूटपाट भी की थी.

सीआईडी क्राईम ब्रांच और थाना मलाड पुलिस घटनास्थल और लाश की जांच करने के बाद पूछताछ कर के सुबूत जुटाने की कोशिश कर रही थी कि सीआईडी क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट सीपी सदानंद दाते, डीसीपी मोहन कुमार दहिकर, एसीपी सुनील देशमुख, सीनियर इंसपेक्टर अभिनाश सावंत, प्रेस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी घटनास्थल पर आ गई थी. प्रेस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम खत्म कर लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. निरीक्षण के बाद थाना मलाड पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर शगुफ्ता खान की लाश को पोस्टमार्टम के लिए बोरीवली के भगवती अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस आसपड़ोस के लोगों के बयान ले कर थाने आ गई.

शुरुआती जांच में पुलिस को मृतका शगुफ्ता खान के पति सोनू जालान पर शक हुआ. क्योंकि पतिपत्नी के बीच विवाद चल रहा था. हत्या के समय वह देश के बाहर था, इसलिए पुलिस को संदेह हुआ कि कहीं उसी ने पत्नी से छुटकारा पाने के लिए किसी सुपारी किलर से हत्या करा दी है. इस की वजह यह थी कि सोनू जालान क्रिकेट का एक बड़ा बुकी था. उसे सन 2005 से सन 2010 के बीच सीआईडी क्राइम ब्रांच ने 2 बार गिरफ्तार किया था. इस खेल में लाखों का वारान्यारा होता था, जिसे पुलिस ने जब्त भी किया था. उस स्थिति में कई सट्टेबाजों की रकम डूब गई थी. जिस की वजह से सोनू जालान के कई दुश्मन हो गए थे. इस से एक संभावना यह भी बनती थी कि उस के किसी दुश्मन ने इस घटना को अंजाम दिया होगा?

बहरहाल, स्थिति कुछ भी रही हो, जांच टीम के लिए राहत की बात यह थी कि हत्यारा मृतका शगुफ्ता खान की जानपहचान का था और उस के घर आताजाता रहता था. इस बात की जानकारी पड़ोसियों से हुई थी. इमारत में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से उस की शिनाख्त भी हो गई थी. अब पुलिस को उस तक पहुंचने के लिए उस के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटानी थी. हत्यारे के बारे में पता लगाने के लिए सीआईडी क्राइम ब्रांच के सीनियर इंसपेक्टर अविनाश सावंत ने इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. चिंभाजी आढ़ाव टीम के साथ जांच की दशादिशा तय कर रहे थे कि मृतका शगुफ्ता खान का पति सोनू जालान अपनी दोनों बेटियों आलिया और जिया के साथ सीआईडी क्राइम ब्रांच के औफिस आ पहुंचा.

पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि उस की पत्नी की हत्या की सूचना उस की बड़ी बेटी आलिया ने दी थी. उस के बाद सच्चाई का पता लगाने के लिए उस ने अपने दोस्त विमल अग्रवाल को फोन किया था. जब विमल ने हत्या की पुष्टि कर दी तो वह तुरंत फ्लाइट पकड़ सीधे मुंबई आ गया. इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव ने जब उस के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि सन 2010 तक वह क्रिकेट की सट्टेबाजी से जुड़ा रहा. लेकिन उस के बाद उस ने सट्टेबाजी से तौबा कर लिया. इस समय वह औटोपार्ट्स का व्यवसाय कर रहा था. उसी के सिलसिले में वह आस्ट्रेलिया गया था.

रही बात पत्नी से विवाद की तो वह सट्टेबाजी को ही ले कर था. यह काम उस की पत्नी शगुफ्ता खान को पसंद नहीं था. मां से उस की पटती नहीं थी, इसलिए वह यहां अलग रहती थी. सोनू जालान ने हत्यारे का नाम भी बता दिया था. हत्यारे का नाम अरविंद गुप्ता उर्फ गुड्डू था, जो गोरेगांव के सिटी सेंटर मौल स्थित शीराज खान की दुकान पर उठताबैठता था. वहीं से शगुफ्ता खान से  उस की जानपहचान हुई थी और वह उस के घर भी आनेजाने लगा था. जरूरत पड़ने पर शगुफ्ता खान उस की आर्थिक मदद भी कर दिया करती थी. सोनू जालान और उस की बेटियों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव को जांच की दिशा मिल गई थी. इस के बाद पल भर की भी देर किए बगैर वह गोरेगांव के सिटी सेंटर मौल स्थित शीराज खान की दुकान पर पहुंच गए थे.

अरविंद गुप्ता उर्फ गुड्डू के बारे में पूछने पर शीराज खान ने बताया कि वह औटो चलाता था. जब खाली होता था, उस के यहां आ कर बैठ जाता था और इधरउधर की बातें किया करता था. ऐसे में कभीकभार जरूरत पड़ने पर वह उस के छोटेमोटे काम भी कर देता था. काम पड़ने पर ही शीराज खान ने उसे कई बार शगुफ्ता खान के फ्लैट पर भी भेजा था. लेकिन इधर 2, ढाई महीने से वह उसकी दुकान पर नहीं आया था. इस बीच उस की कोई बातचीत भी नहीं हुई थी. जब काफी दिनों से अरविंद दिखाई नहीं दिया तो शीराज खान ने उस के दोस्तों से उस के बारे में पता किया. दोस्तों ने बताया था कि वह कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया से कोई लड़की भगा ले गया था, जिस की वजह से कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया के लड़के उसे खोज रहे थे.

शीराज खान से इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव को कोई काम की जानकारी नहीं मिली. लेकिन उन से उन्हें अरविंद और उस के दोस्तों के बारे में जरूर पता चल गया था. उन्होंने उस के घर वालों और दोस्तों से उस के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि अरविंद कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया की जिस लड़की को भगा कर ले गया था, उस की एक बहन, भाई और एक सहेली रेशमा जनपद थाना के नाला सोपारा में संतोष भवन के आसपास रहती है. रेशमा पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी और बांग्लादेश की सीमा पर दलाली करती थी. वह लोगों को सीमा पार कराने का काम करती थी.

यह जान कर मामले की जांच कर रहे इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव के माथे पर बल पड़ गए, क्योंकि अगर अरविंद सीमा पार कर के बांग्लादेश चला जाता तो पकड़ना मुश्किल हो जाता. इस बात को ध्यान में रख कर पुलिस अरविंद के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. नालासोपारा में रह रही लड़की की बहन, उस की सहेली रेशमा और उस के भाई से अरविंद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि घटना से 2-3 दिन पहले वह उन के पास आया था और सीमा पार कराने के लिए कह रहा था. लेकिन उस के बाद न वह आया और न उस का कोई समाचार ही मिला. उन लोगों ने यह जरूर बताया कि घटना वाले दिन सुबह उस लड़की का बांग्लादेश से जरूर फोन आया था, जिसे अरविंद ने कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया से भगाया था. वह अरविंद के बारे में पूछ रही थी. उस का कहना था कि पिछले 2 दिनों से उस का कोई फोन नहीं आया. उस का फोन भी बंद है.

पुलिस ने बांग्लादेश से आए उस लड़की का मोबाइल नंबर ले लिया और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में अरविंद गुप्ता का नया नंबर मिल गया. पुलिस ने जब इस नंबर पर अरविंद की बात उस लड़की की बहन से कराई तो अरविंद ने उस ट्रेन के बारे में बता दिया, जिस से वह पश्चिम बंगाल जा रहा था. अब पुलिस को उस ट्रेन से पहले हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचना था. इस के लिए टीम ने सीनियर पुलिस अधिकारियों से बात की और हवाईजहाज से ट्रेन से पहले कोलकाता पहुंच गए. पुलिस टीम हवाई अड्डे से टैक्सी से सीधे हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंची और 23 नवंबर, 2014 की सुबह स्थानीय पुलिस की मदद से अरविंद गुप्ता उर्फ गुड्डू को ट्रेन से उतरते ही गिरफ्तार कर लिया.

उसी दिन उसे वहां अदालत में पेश किया गया और ट्रांजिट रिमांड पर मुंबई लाया गया. सीनियर अधिकारियों की उपस्थिति में अरविंद से की गई पूछताछ में शगुफ्ता खान की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. 20 वर्षीया अरविंद गुप्ता उर्फ गुड्डू का परिवार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जनपद आजमगढ़ का रहने वाला था. उस के पिता विजय कुमार गुप्ता सालों पहले रोजीरोटी की तलाश में महानगर मुंबई आ गए थे. मुंबई में वह उपनगर गोरगांव के मंगतसिंहनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे.

गुजरबसर के लिए विजय कुमार औटो चलाने लगे थे. उन की 5 संतानें हुईं, 3 बेटे और 2 बेटियां. विजय कुमार गुप्ता सीधेसाधे सरल स्वभाव के ईमानदार आदमी थे. परिवार बड़ा था. उन की कमाई ज्यादा नहीं थी. आर्थिक तंगी की ही वजह से वह बच्चों को ज्यादा पढ़ालिखा नहीं सके. इसलिए बेटे जैसेजैसे बड़े होते गए औटो चलाना सिखा दिया. बेटे औटो चलाने लगे तो उन्होंने उन की शादियां कर दीं. बेटियों की भी शादियां हो गईं. अरविंद गुप्ता उर्फ गुड्डू विजय कुमार के बच्चों में सब से छोटा था. छोटा होने की वजह से वह सभी का लाडला था. वह जवान भी हो गया और कमाने भी लगा, इस के बावजूद परिवार के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझता था. वह औटो से जो भी कमाता था, अपने ऊपर उड़ा देता था.

अपनी कमाई की एक फूटी कौड़ी घर वालों को नहीं देता था. उस के दोस्त भी वैसे ही थे. इन की कमाई का अधिक आवारागर्दी, तरहतरह के नशे और शबाब पर हिस्सा खर्च होता था. मौजमजे के लिए कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया जाना इन के लिए आम बात थी. इन सब बातों की जानकारी अरविंद के घर वालों को हुई तो उन्होंने उस पर अंकुश लगाने की कोशिश की, लेकिन तब तक वह इतना आगे निकल चुका था कि उस पर घर वालों के अंकुश का कोई असर नहीं पड़ा. मजबूर हो कर घर वालों ने उसे उस की हालत पर छोड़ दिया.

खाली समय में अरविंद गोरेगांव के सिटी सेंटर मौल स्थित सीराज खान की दुकान पर बैठता था. वह मोबाइल फोन बेचने के साथ रिपेयरिंग का भी काम करते थे. बैठनेउठने में अरविंद और सीराज खान के बीच खासी पटने लगी थी. धीरेधीरे वह उन का विश्वासपात्र बन गया. इस के बाद जरूरत पड़ने पर वह उस के भरोसे दुकान छोड़ कर तो जाने ही लगा, किसी ग्राहक के यहां भी जाना होता तो उसे भेज देता था. शगुफ्ता खान भी सीराज खान की ग्राहक थीं. वह काफी संपन्न और सभ्रांत थीं. सिराज खान की दुकान पर आनेजाने में अरविंद से भी उन की जानपहचान हो गई थी. अरविंद के बातव्यवहार से वह काफी प्रभावित थीं.

सीराज खान के कहने पर वह कई बार उन का सामान ले कर शगुफ्ता खान के घर आयागया तो दोनों में काफी घनिष्ठता हो गई. वह परिवार से भी हिलमिल गया. इसी हिलमिल जाने की ही वजह से जरूरत पड़ने पर शगुफ्ता खान ने कई बार उस की आर्थिक मदद भी की थी. शगुफ्ता खान ने जब अरविंद की कई बार मदद की तो उसे लगा कि अगर वह उन से मोटी रकम भी मांगेगा तो वह दे देंगी. यही सोच कर अरविंद शगुफ्ता खान से एक मोटी रकम मांग भी बैठा, लेकिन उन्होंने देने से मना कर दिया. यह बात अरविंद को काफी बुरी लगी और वह उन से नाराज हो गया.

अरविंद का सोचना था कि शगुफ्ता खान को उस पर विश्वास नहीं है, इसलिए वह उसे पैसा नहीं देना चाहती. अरविंद ने वह मोटी रकम शगुफ्ता खान से उस लड़की की मदद के लिए मांगे थे, जिस से वह प्यार करता था और उस से शादी करना चाहता था. दरअसल, वह दोस्तों के साथ कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया की जिस गली में जाता था, उस गली में रानी नाम की एक नई लड़की आई थी. उसे देख कर वह होश खो बैठा था और उस का दीवाना हो गया था. उस से मिलने के बाद जब उसे उस की मार्मिक कहानी का पता चला तो उस का दिल द्रवित हो उठा था.

रानी बांग्लादेश की रहने वाली थी. उस के घर वाले बहुत गरीब थे. उस की एक बहन पहले से ही मुंबई के नाला सोपारा में रहती थी. लेकिन उस की भी आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी, इसलिए वह मांबाप की कुछ खास मदद नहीं कर पाती थी. मांबाप की मदद के लिए रानी भी मुंबई आना चाहती थी, लेकिन समस्या थी सीमा पार करने की. रानी इस बारे में सोचविचार रही थी कि उस की मुलाकात एक ऐसे लड़के से हुई जो गांव की गरीब और भोलीभाली लड़कियों को बहलाफुसला कर मुंबई ले आता था और उन्हें कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया में बेच देता था, जहां उन की जिंदगी में ग्रहण लग जाता था.

रानी को अच्छी नौकरी दिलाने और बहन से मिलाने का वादा कर के वह लड़का उसे मुंबई ले आया और कमाठीपुरा की रेडलाइट एरिया में बेच दिया. रानी को कमाठीपुरा आए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अरविंद गुप्ता उस के यहां जा पहुंचा. जब उसे रानी के बारे में पता चला तो उसे उस से सहानुभूति हो गई और वह उसे उस दलदल से बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन यह इतना आसान काम नहीं था. 24 घंटे मकान मालकिन और उस के आदमियों की रानी पर नजर रहती थी. अरविंद ने मकान मालकिन से रानी को आजाद करने की बात की तो उस ने 50 हजार रुपए मांगे. इतने रुपए अरविंद के पास नहीं थे. उस ने शगुफ्ता खान से मदद मांगी. छोटीमोटी आर्थिक मदद की बात अलग थी, इतने रुपए वह अरविंद को किस भरोसे पर देतीं, सो उन्होंने रुपए देने से मना कर दिया.

इस के बाद अरविंद के पास एक ही उपाय बचा कि वह किसी तरह मकान मालकिन तथा उस के आदमियों का विश्वास जीते और फिर मौका मिलते ही वह रानी को ले कर कहीं भाग जाए. अरविंद ने ऐसा ही किया. सितंबर महीने में वह रानी को ले कर भाग गया. कमाठीपुरा से भागने के बाद दोनों बांग्लादेश जाना चाहते थे, लेकिन वे सीमा नहीं पार कर सके. मजबूरन उन्हें मुंबई वापस आना पड़ा. मुंबई में वह रानी के साथ नाला सोपारा में रहने वाली उस की बहन के यहां रुका. लेकिन जब अरविंद को पता चला कि रानी की मकान मालकिन और उस के आदमी पागल कुत्तों की तरह उन्हें खोज रहे हैं तो रेशमा की मदद से वह रानी के साथ बांग्लादेश चला गया. अरविंद रानी से शादी कर के बांग्लादेश में बस जाना चाहता था. लेकिन वहां रहने के लिए उसे कामधंधे की जरूरत थी, जिस के लिए पैसे चाहिए थे. अब पैसे कहां से आएं?

इस बारे में अरविंद ने सोचाविचारा तो उसे शगुफ्ता खान की याद आ गई. उसे लगा कि शगुफ्ता खान से उसे इतनी रकम तो मिल ही सकती है, जिस से उस का काम आसानी से चल सकता है. उस ने उस की मदद नहीं की थी, इसलिए वह उसे सबक भी सिखाना चाहता था. वह शगुफ्ता खान के यहां लूटपाट की योजना बना कर मुंबई आ गया. मुंबई आने के बाद अरविंद ने रानी की बहन और सहेली रेशमा से बांग्लादेश की सीमा पार कराने की बात की. उस के बाद बाजार से एक चाकू खरीदा, जिस से शगुफ्ता खान को डराया जा सके. इस के बाद औटो ले कर वह शगुफ्ता खान के घर पहुंच गया. औटो वाले को नीचे खड़ा कर के वह उस के फ्लैट पर पहुंचा. उस समय शगुफ्ता खान अकेली थीं. उसे डराधमका वह उस से अलमारी की चाबी मांगने लगा.

अरविंद शगुफ्ता खान की हत्या नहीं करना चाहता था, लेकिन उसी बीच शगुफ्ता खान की दोनों बेटियां आ गईं तो वह घबरा गया. उस की योजना फेल न हो जाए, उस ने उस की हत्या कर के चाबी ली और अलमारी खोल कर नगद और गहने ले कर नीचे आ गया. औटो उस ने रुकवा ही रखा था, उसी पर सवार हुआ और मलाड स्टेशन जा पहुंचा. वहां से लोकल ट्रेन पकड़ कर वह विलेपार्ले में रहने वाले अपने एक दोस्त के पास गया. उस की मदद से उस ने एक मोबाइल फोन, अपने और रानी के लिए कुछ कपड़े खरीदे. वहीं से उस ने रानी से अपने नए मोबाइल फोन से बात की और कुर्ला लोकमान्य तिलक रेलवे स्टेशन से ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस पकड़ कर कोलकाता के लिए रवाना हो गया.

उस का सोचना था कि अगर वह सीमा पार कर के बांग्लादेश पहुंच जाएगा तो मुंबई पुलिस उस का कुछ नहीं कर पाएगी. लेकिन उस ने गलती यह कर दी कि रानी को उस ट्रेन के बारे में बता दिया, जिस से वह जा रहा था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर चिंभाजी आढ़ाव ने लूट का सारा माल जब्त कर के अरविंद को थाना मलाड पुलिस के हवाले कर दिया. मलाड पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.Crime News

 

Hindi Stories Love : प्रेम में दुश्मन बनते भाई

Hindi Stories Love : लड़की के प्यार का जुनून और भाई की जिद में भाईबहन का प्यार और खून का रिश्ता दुश्मनी में बदल रहा है, जो कभीकभी जान पर भी भारी पड़ जाता है. वे एक ही छत के नीचे साथसाथ रह कर, खेलकूद कर, पढ़लिख कर बड़े होते हैं, इस के

बावजूद उम्र के नाजुक पायदान पर कदम पड़ने पर जब कोई लड़की दिल की उमंगों से अपने अंदाज में बेहतर जिंदगी की ख्वाहिश में मोहब्बत का तराना गुनगुनाती है तो उस के खून के रिश्ते का भाई ही उस के प्यार के बीच दीवार बन कर खड़ा हो जाता है. लड़की की मोहब्बत के जुनून और भाई की जिद में प्यार और खून का रिश्ता दुश्मनी में बदल जाता है. यही दुश्मनी एक दिन जान पर भारी पड़ जाती है और सगे भाई ही बहनों का कत्ल कर देते हैं.

मोहब्बत और कत्ल का यह सिलसिला चलता ही रहता है. कानून तो अपना काम करता है, लेकिन समाज खामोशी से देखता रहता है. ऐसा करने वाले यूं तो सलाखों के पीछे होते हैं, लेकिन उन्हें इस का जरा भी मलाल नहीं होता. बात अगर गैरमजहबी युवक से मोहब्बत की हो तो अंजाम और भी दिल दहला देने वाले होते हैं. हापुड़ जनपद के स्याना रोड निवासी इंसाफ अली की 20 साल की बेटी दानिश्ता ने जमाने में देखा, फिल्मों में देखा और कानून की यह बात भी पता चली कि लड़कालड़की बालिग हो जाएं तो अपनी मरजी से जिंदगी जीने के लिए आजाद हैं.

वक्त की बदलती चाल ने दानिश्ता के दिलोदिमाग पर छाप छोड़ी तो वह दूसरे मजहब के सोनू के साथ मोहब्बत का तराना गुनगुनाने लगी. उम्र की दहलीज पर उस ने अपनों से नाफरमानी कर दी. मोहब्बत का जुनून ही था कि उस ने अंजाम की परवाह किए बगैर खूबसूरत भविष्य का ख्वाब संजोया. लेकिन उस के ख्वाबों के महल तब बिखर गए, जब न सिर्फ उस के सगे भाई खलनायक बन कर उभरे, बल्कि परिवार भी उस के खिलाफ हो गया.

29 नवंबर, 2014 की सुबह का वक्त था. दानिश्ता का प्रेमी सोनू किसी काम से जा रहा था कि दानिश्ता के भाइयों तालिब, आसिफ और तसलीम ने उसे घेर लिया और उस के साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी. दानिश्ता ने अपनी मोहब्बत को दम तोड़ते देखा तो वह बचाव के लिए आगे बढ़ी और घर वालों से भिड़ गई. इस पर दानिश्ता और उस के प्रेमी सोनू को धारदार हथियारों से बेरहमी से काट कर मौत की नींद सुला दिया गया.

भाइयों में गुस्सा इस कदर था कि कोई उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर सका. हत्याओं में भाइयों का साथ उन के दोस्तों और मां नूरजहां खातून ने भी दिया. हत्याएं करने के बाद तालिब और नूरजहां खुद ही थाने पहुंच गए और आत्मसमर्पण कर दिया. दानिश्ता और सोनू का प्रेमसंबंध काफी समय से चल रहा था. उन के प्रेमसंबंधों की जानकारी दानिश्ता के घर वालों को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह गैरमजहबी लड़के से कोई रिश्ता न रखे. लेकिन प्यार करने वाले ऐसे किसी बंधन को कहां मानते हैं. वे तो जातिधर्म, ऊंचीनीच की दीवारों को गिराने का दम भरते हैं. प्यार के लिए वे जमाने से भी टकराने को तैयार रहते हैं. वे जानते हैं कि प्रेम में ऐसी बाधाएं आएंगी और उन्हें उन का सामना करना पड़ेगा.

लेकिन उन्हें यह उम्मीद होती है कि एक दिन जीत उन के प्यार की ही होगी. यह बात अलग है कि बड़े शहरों की बात छोड़ दें तो ग्रामीण क्षेत्रों में हर कोई ऐसा खुशनसीब नहीं होता. दानिश्ता और सोनू की सोच भी यही थी कि एक दिन उन का प्यार जीत जाएगा. वे विवाह कर के जीवन भर साथ रहने का निर्णय ले चुके थे. जबकि दानिश्ता के भाई इस के लिए तैयार नहीं थे. वह जब भी सोनू से विवाह की बात घर में करती, उस के साथ मारपीट की जाती. दानिश्ता और सोनू दोनों ही समझ गए कि घर वालों की मरजी से वे कभी शादी नहीं कर पाएंगे.

दोनों ने कानून का सहारा लिया और गुपचुप कोर्टमैरिज कर ली. यह बात दोनों ने ही घर वालों से छिपाए रखी और अपनेअपने घर यह सोच कर रहते रहे कि अच्छे वक्त पर घर वालों को मना कर एक हो जाएंगे. जब इस बात का खुलासा हुआ तो हंगामा मच गया. दानिश्ता की शामत आ गई. इस मुद्दे पर हत्या से एक दिन पहले स्थानीय पंचायत भी हुई. दानिश्ता के भाइयों ने ऐलान कर दिया कि वे बहन की मोहब्बत को कुबूल नहीं करेंगे. पंचायत में कथित समाज के ठेकेदारों का भी फरमान था कि दोनों हमेशा अलग ही रहेंगे. जबकि यह फरमान न दानिश्ता को मंजूर था और न सोनू को. नतीजतन मौका पा कर उन की हत्या कर दी गई.

पुलिस गिरफ्त में हत्यारोपी भाई का कहना था, ‘‘बिरादरी में हमारी बदनामी हो रही थी. हमारा घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था. अब घर वाले समाज में सिर उठा कर जी सकेंगे, क्योंकि हम ने अपनी इज्जत बचा ली है.’’

नूरजहां का बयान भी कुछ ऐसा ही था. उसे भी बेटी की मौत का कोई अफसोस नहीं था. इस दोहरे हत्याकांड के बाद पुलिस ने ऐसे प्रेमी युगलों की सूची बनाई, जिन्होंने अपनी मरजी से विवाह किए थे. पुलिस अधीक्षक आर.पी. पांडे ने कहा, ‘‘हम प्रेमियों को सुरक्षा देने के लिए तत्पर हैं. हमारी कोशिश है कि घृणित कृत्य करने वालों को सख्त सजा मिले.’’

औनर किलिंग की यह पहली वारदात नहीं थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अकसर भाईबहन की मोहब्बत के दुश्मन बन जाते हैं. हैरानी की बात यह है कि अपनों के खून से हाथ रंगने वालों को अपने किए पर अफसोस नहीं होता. शान के लिए लड़कियों और उन के प्रेमियों की हत्या कर दी जाती है. मेरठ की रहने वाली फुरकानी ने भी गैरमजहब के लड़के रविंद्र से मोहब्बत करने का गुनाह किया था. प्रेमसंबंध की जानकारी होने पर जम कर हंगामा हुआ. उस के इस कदम से घर वाले गुस्से में आ गए. दूसरे संप्रदाय के लड़के ने उन की बेटी को दुलहन बना लिया था. उस ने प्रेमी के लिए धर्म ही नहीं, नाम भी बदल लिया था. उस ने अपना नाम निशू रख लिया था.

फुरकानी के घर वालों ने इस बात को आन का सवाल बना लिया. टकराव को टालने के लिए दोनों शहर जा कर रहने लगे. काफी दिनों बाद वे दोनों गांव आ कर रहने लगे तो फुरकानी के घर वाले खफा हो गए. 25 नवंबर को फुरकानी के भाई निजाम और फुरकान उस के घर पहुंचे और उस के सिर में गोली मार कर फरार हो गए.  समय पर उपचार मिलने से निशू की जान तो बच गई, लेकिन उस की एक आंख हमेशा के लिए चली गई. उस के भाइयों को भी गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन निशू के भाई निजाम को उस के जिंदा बच जाने का बहुत अफसोस है.

उस का कहना है कि अगर उसे पता होता कि बहन जिंदा बच जाएगी तो वह उसे एक और गोली मार देता. जब तक वह मरेगी नहीं, उसे चैन नहीं मिलेगा. गैरसमुदाय के लड़के से शादी कर के उस ने उस के परिवार की बहुत बदनामी कराई है, इसलिए उस ने उसे गोली मारी थी. मुजफ्फरनगर के लोई गांव के रहने वाले इलियास की बेटी शाइमा का 2 साल से गांव के ही एक लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था. जब घर वालों को इस बात की खबर हुई तो उन्होंने उस पर बंदिशें लगा दीं. शाइमा लड़के से विवाह करने की जिद पर अड़ गई. बंदिशों को तोड़ कर एक दिन वह घर से भाग गई. शाइमा की इस हरकत से घर वाले आगबबूला हो गए.

कुछ दिनों बाद शाइमा को उन्होंने ढूंढ निकाला और घर ला कर उस के भाई इंतजार ने उसे गोली मार दी. अमित को भी अपनी बहन मोना का प्यार मंजूर नहीं था. वह किसी लड़के से मोबाइल फोन पर बातें किया करती थी. अमित इस बात से बेहद नाराज रहता था. उसे लगता था कि इस से एक दिन परिवार की इज्जत चली जाएगी. एक दिन उस ने बहन को फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो उस ने उसे गोली मार दी. मोना किसी तरह बच गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक परिवेश ऐसा है, जहां प्रेमिल रिश्तों का खुलेआम विरोध है. इस के बावजूद चोरीछिपे रिश्ते पनपते हैं. तेजी से होते शिक्षा और आर्थिक विकास के बीच यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है.

प्रेमसंबंधों को आन से जोड़ कर देखा जाता है. घर की बेटी प्रेम संबंध में अपनी मरजी से विवाह जैसा कदम उठाए, यह किसी भी दशा में मंजूर नहीं होता और अपने ही मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. समाज की टीका टिप्पणियां आग में घी डालने का काम करती हैं. जिस परिवार की लड़की को ले कर इस तरह के मामले सामने आते हैं, उन्हें तरहतरह के ताने दिए जाते हैं. ऐसे में नौजवानों को यह बरदाश्त नहीं होता. मानसिकता ऐसी होती है कि उन्हें लगता है कि हत्या कर देने से उन की इज्जत बच जाएगी और वह शान की जिंदगी जी सकेंगे.

ऐसा करने वाले प्रेम करने वाली लड़की को अपने परिवार के लिए कलंक मानते हैं. कातिल मानते हैं कि सामाजिक तानों व बेइज्जती से बचने के लिए अब यही करना आवश्यक हो गया है. दुखद यह है कि ऐसा कर के भी उन की इज्जत नहीं बचती. समाज भी खुले तौर पर ऐसी हत्याओं का विरोध नहीं करता. कानून का काम लाशों के पंचनामे और हत्यारों की गिरफ्तारी तक सिमट कर रह जाता है. Hindi Stories Love

Stories in Hindi Love : प्यार नहीं, स्वार्थ का रिश्ता

Stories in Hindi Love : पत्नी की कमाई पर पलने वाले पतियों की सोच इतनी गंदी क्यों हो जाती है कि वे उसी के दुश्मन बन जाते हैं. अपनी बैंक मैनेजर पत्नी को मार कर आखिर पवन को क्या मिला? क्या इस मामले में रितु ने प्रेम के नाम पर पवन से शादी कर के बड़ी भूल नहीं की थी?

पवन और रितु की मुलाकात तब हुई थी, जब 2006 में दोनों कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पढ़ रहे थे. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे थे. पवन रितु का हर तरह से ख्याल रखता था. जब कभी घर जाने के लिए कोई साधन नहीं होता था तो वह उसे उस के घर तक छोड़ने जाता था. रितु पढ़ाई में तेज थी, उस ने बैंकिंग की परीक्षा दी तो पास हो गई. फलस्वरूप जल्दी ही उसे नैनीताल बैंक में सहायक प्रबंधक के पद पर नौकरी मिल गई. रितु सेक्टर ए, एलडीए कालोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में अपने पिता के साथ रहती थी. कुछ समय पहले उस की मां सुषमा का देहांत हो चुका था, जिस की वजह से उस के पिता श्यामबिहारी श्रीवास्तव परेशान रहते थे.

रितु अपनी बहनों में सब से छोटी थी. उस की बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी और वह अपने पति के साथ लखनऊ के ही मडि़यांव इलाके रहती थी. रितु और पवन के प्यार के बारे में हालांकि सब को पता था. लेकिन उस के पिता श्यामबिहारी चाहते थे कि बेटी ऐसे आदमी से शादी करे, जो समाज में उस की तरह ही अपनी हैसियत रखता हो. पवन किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था, लेकिन काफी भागदौड़ के बाद भी उसे प्राइवेट नौकरी ही मिल पाई थी.

श्यामबिहारी बूढ़े हो चले थे, उन की तबीयत भी खराब रहती थी. पत्नी की मौत के बाद वह बेटी रितु और बेटे साहिल को ले कर चिंतित रहते थे. वैसे उन्हें पूरा भरोसा था कि रितु हर हाल में अपने भाई का ख्याल रखेगी. बीमारी के चलते ही सन 2009 में उन की मौत हो गई. पिता की मौत के बाद रितु पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी आ गई. ऐसे में अपने लिए कुछ सोचना बहुत मुश्किल था. उस का छोटा भाई साहिल उस के साथ ही रहता था. रितु उसे भाई नहीं, बल्कि बेटे की तरह पाल रही थी. रितु के पिता की मौत के बाद पवन ने उस पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया तो रितु ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘पवन इस बारे में सोचती तो मैं भी हूं, लेकिन साहिल की चिंता है. वह हाईस्कूल में पहुंच जाए तो मैं उसे आगे की पढ़ाई के लिए हौस्टल भेज दूंगी और तुम से शादी कर लूंगी.’’

‘‘देखो रितु, प्राइवेट ही सही, मुझे भी नौकरी मिल गई है. अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. अब नहीं तो क्या हम बुढ़ापे में शादी करेंगे?’’

‘‘ठीक है बाबा, इस बारे में मैं जल्द ही कोई फैसला कर लूंगी.’’ रितु ने पवन को टालने के लिए शादी की हामी भर दी.

सोचविचार कर रितु ने अपनी बहन और भाई ने पवन के साथ शादी करने के बारे में बात की. रीतू के भाई और बहन दोनों का मानना था कि न तो पवन अच्छे स्वभाव का है और न ही वह कहीं अच्छी नौकरी करता है. दरअसल उन दोनों की नजर में पवन में सब से बड़ी बुराई यह थी कि वह शराब पीने का आदी था. भाईबहन की बात सुन कर रितू बोली, ‘‘तुम लोगों की बात अपनी जगह सही है. मैं उस की इस बुराई के बारे में जानती हूं. पर क्या करूं, समझ नहीं पा रही हूं? उस के साथ इतने दिनों की दोस्ती है, उसे भूल कर किसी और से शादी करना मुझे थोड़ा मुश्किल लग रहा है.’’

‘‘दीदी, आप ठीक कह रही हैं, पर हमारा मन इस के लिए तैयार नहीं है.’’ भाईबहन ने दो टूक कहा. इस के बावजूद रितु का खुद का मन शादी टालने का नहीं हो रहा था.

इसी के चलते उस ने अपने परिवार की मरजी के खिलाफ जा कर नवंबर, 2013 में पवन से शादी कर ली. शादी के 2-3 महीने ठीक से गुजरे. इस बीच रितु अपनी ससुराल के बजाय अपने मायके में ही रहती रही. पवन को इस बात से कोई शिकायत नहीं थी. रितु के पास मायके की काफी जायदाद तो थी ही, साथ ही वह बैंक में अच्छे पद पर नौकरी भी करती थी. घर में सुखसुविधा के सारे साधन मौजूद थे. उसे केवल चिंता थी तो अपने छोटे भाई की. एक दिन पवन घर पहुंचा तो बहुत उदास था. रितु ने उसे देखा तो पूछा, ‘‘क्या बात है, उदास क्यों हो?’’

‘‘रितु, आज मेरी कंपनी ने कई लोगों को नौकरी से निकाल दिया है, मेरी भी नौकरी चली गई.’’ पवन ने दुखी हो कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, प्राइवेट नौकरियों में तो यह होता ही रहता है. कहीं और नौकरी तलाश करो.’’ रितु ने पवन को समझाया. पवन को अपना खर्च चलाने के लिए पैसों की ज्यादा जरूरत नहीं थी, क्योंकि उस की पत्नी तो नौकरी कर ही रही थी. उसे पैसों की जरूरत केवल अपने शौक पूरे करने के लिए थी. उसे यह पता था कि रितु को सब से अधिक नफरत उस के शराब पीने से है. इस के लिए वह उसे पैसा देने को तैयार नहीं थी. उस की बात सही भी थी. निठल्ले बैठे पति को शराब के लिए कौन पत्नी अपनी कमाई का पैसा देगी?

इसी बात को ले कर दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. कहासुनी से शुरू होने वाले विवाद धीरेधीरे लड़ाईझगड़े तक पहुंचने लगे. रितु जब भी पवन को समझाने की कोशिश करती, वह उस की बात को गलत तरह से लेता. उसे लगने लगा कि रितु यह सब अपनी नौकरी की धौंस दिखाने के लिए करती है. रितु ने 35 लाख में अपने पिता की एक प्रौपर्टी बेच दी थी ताकि कोई नई जमीन खरीद कर मकान बनवा सके. दरअसल उसे लग रहा था कि मकान बन जाएगा तो वह ठीक से रह सकेगी. इस के लिए उस ने मकान बनाने के लिए एक जमीन पसंद भी कर ली थी.

उस जमीन को खरीदने के लिए 2 लाख रुपए एडवांस देने थे. उस ने यह रकम पवन को दे दी, ताकि वह प्रौपर्टी डीलर को दे दे. लेकिन पवन ने वे पैसे प्रौपर्टी डीलर को देने के बजाय अपने भाई को दे दिए. यह बात जब रितु को पता चली तो वह गुस्से में बोली, ‘‘पवन, पैसे की कीमत को समझो. पैसा डाल पर नहीं लगता कि हाथ बढ़ाया और तोड़ लिया. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पैसा कमाने के लिए. हमें नए मकान के लिए पैसे की जरूरत है और तुम पैसे कहीं और दे आए.’’

लेकिन पवन ने रितु की बात को गंभीरता से न ले कर कड़वाहट से जवाब दिया, ‘‘तुम पैसे को ले कर बहुत झगड़ा करने लगी हो. मैं नौकरी नहीं करता, इसलिए तुम मुझे ताना मारती हो. तुम्हें पैसे का बहुत घमंड हो गया है.’’

‘‘तुम से बात करना ही बेकार है, तुम किसी बात को समझना ही नहीं चाहते.’’ कह कर रितु बैंक चली गई.

रितु ने बाकी बची 33 लाख की रकम अपने बैंक खाते में जमा कर दी थी. इस खाते में उस ने अपने भाई साहिल को नौमिनी बनाया था न कि पति को. इस के बाद पैसे और जायदाद को ले कर पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा और बढ़ गया. प्यारमोहब्बत के बीच पैसा विलेन बन चुका था. इस बीच रितु 6 माह की गर्भवती हो गई थी. इस से वह काफी खुश थी. उसे लग रहा था कि बच्चे के आ जाने के बाद शायद पवन में बदलाव आ जाए.

19 दिसंबर, 2014 की बात है. नादान महल रोड, लखनऊ स्थित नैनीताल बैंक की शाखा में बैंक के लौकर नहीं खुल पाए थे. वजह यह थी कि बैंक के लौकर की चाबी सहायक प्रबंधक रितु के पास रहती थी. जबकि वह बैंक नहीं आई थी. बैंक के मैनेजर दयाशंकर मलकानी ने रितु के मोबाइल फोन पर संपर्क किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है. दयाशंकर ने परेशान हो कर चौक थाने को सूचना दी. इसी बीच रितु के पति पवन का फोन नंबर मिल गया तो उसे फोन किया गया. बातचीत में उस ने बताया कि रितु कल से लापता है. इस जानकारी के बाद थाना चौक पुलिस ने यह बात कैंट थाने की पुलिस को बताई. पुलिस ने पवन के घर जा कर वहां बाहर खड़ी इंडिका कार की तलाशी ली तो उस में बैंक लौकर की चाबियां मिल गईं.

इस के बाद कैंट थाने की पुलिस रितु को तलाशने में जुट गई. एक महिला बैंक अधिकारी के गायब होने का मामला था. पूरे शहर में खलबली मच गई. लखनऊ में नए एसएसपी यशस्वी यादव ने पद संभाला था. तभी पुलिस के लिए यह घटना बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ गई थी. एसएसपी के आदेश पर कैंट क्षेत्र की सीओ बबिता सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी पुलिस टीम को रितु का पता लगाने में लगा दिया. इसी बीच एसओ कैंट सुरेश यादव को सूचना मिली कि कैंट क्षेत्र स्थित फायरिंग रेंज के पास झडि़यों में किसी महिला का शव पड़ा है. सूचना मिलते ही सुरेश यादव अपनी टीम के साथ वहां पहुंच गए. सूचना सही थी. लाश की शिनाख्त होने में भी देर नहीं लगी.

लाश बैंक मैनेजर रितु की ही थी. घटनास्थल पर पुलिस को कोई भी ऐसा सुबूत नहीं मिला, जिस से यह लगता कि रितु के साथ कोई जोरजबरदस्ती की गई थी. उस के शरीर के कपड़े भी सही सलामत थे. किसी प्रकार की कोई लूट भी नहीं हुई थी, क्योंकि मृतका के कानों के आभूषण भी सुरक्षित थे और हाथों की चूडि़यां भी. अलबत्ता उस का पर्स और मोबाइल जरूर गायब था. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि इस घटना में रितु का कोई अपना ही शामिल हो सकता है. पुलिस ने इस बारे में पहले रितु के भाई साहिल से बात की और फिर उस के पति पवन से. दोनों की बातों से पुलिस का शक पवन पर गहरा गया. पुलिस ने काल डिटेल्स हासिल कर के रितु के फोन नंबर और पवन के फोन नंबर की जांच की तो पता चला कि रितु से अंतिम बार पवन ने ही बात की थी.

इस के बाद पुलिस ने पवन को हिरासत में ले कर पूछताछ की. इस पूछताछ में जो बात सामने आई, वह यह थी कि रितु और पवन के बीच दौलत विलेन बन गई थी. पैसे के लिए पवन इतना अंधा हो गया था कि रितु को मौत के घाट उतारते वक्त उसे उस की कोख में पल रहे अपने बच्चे का भी खयाल नहीं आया. 18 दिसंबर, 2014 को रितु अपनी बैंक की ड्यूटी पूरी करने के बाद औटो से चारबाग पहुंची. वहां से उसे दूसरा औटो ले कर अपने घर पहुंचना था. रितु जैसे ही औटो से उतरी, उस ने देखा कि पवन अपने बहनोई की कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. यह देख कर उस ने चौंक कर पूछा, ‘‘तुम यहां, यह कार क्यों लाए?’’

‘‘मैं अपने बीमार भाई से मिलने देहरादून जा रहा हूं, आज ही रात को. उन की तबीयत ज्यादा खराब है.’’ पवन ने कहा.

‘‘मुझे लगा कि तुम मुझे लेने आए हो? तुम्हें तो अपने कामों से ही फुरसत नहीं है. तुम जाओ मैं औटो ले कर घर चली जाऊंगी.’’ अभी रितु ने कहा ही था कि उस के मोबाइल पर उस के भाई साहिल का फोन आ गया. वह उस से घर पहुंचने के बारे में पूछ रहा था. भाई से बात करते हुए रितु ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जीजाजी के साथ हूं, अभी थोड़ी देर में आती हूं.’’

उस वक्त शाम के करीब पौने 7 बजे थे. रितु के फोन बंद करते ही पवन बोला, ‘‘ऐसे नाराज मत हो. चलो, पहले कहीं घूम आते हैं. तुम्हारी शिकायत भी दूर हो जाएगी.’’ पवन ने मिन्नत की तो रितु उस की कार में बैठ गई. मानमनुहार कर के रितु को मनाने के बाद पवन कार ले कर शहीद पथ की ओर बढ़ गया. रितु को लगा कि वह उस से झगड़ा खत्म करने के लिए ऐसा कर रहा है. सुलतानपुर रोड पर अर्जुनगंज ओवर ब्रिज के पास पवन ने कार कच्चे रास्ते पर उतार कर खड़ी कर दी और बहाना कर के नीचे उतरा. रितु उस के मन की बात को समझ पाती, उस के पहले ही वह रितु की गरदन में रस्सी का फंदा डाल कर उसे कसने लगा. इस के लिए वह रस्सी पहले ही साथ लाया था.

इस के अलावा उस ने रितु को मारने के लिए उस के सिर पर 3 वार भी किए. इस का नतीजा यह हुआ कि रितु तत्काल मर गई. गर्भवती पत्नी की हत्या करने के बाद पवन ने उस का मोबाइल बंद कर के उस के पर्स में रखा और पर्स वहीं नाले में फेंक दिया. इस के बाद वह कार ले कर सुनसान जगह की तलाश में आगे बढ़ गया. आगे जा कर उस ने फायरिंग रेंज के पास रितु की लाश जंगल में फेंक दी. वापस लौट कर कार उस ने अपने घर के सामने खड़ी कर दी और सोने की कोशिश करने लगा. देर रात तक जब रितु घर नहीं पहुंची तो साहिल ने करीब 8 बजे के बाद उसे फोन करना शुरू किया. रितु का फोन बंद था. इस से परेशान हो कर साहिल ने अपने जीजा पवन को फोन किया. उधर से पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी दीदी को छोड़ कर देहरादून जा रहा हूं. तुम परेशान मत हो.’’

साहिल ने कई बार पवन के मोबाइल पर फोन किया तो उस ने बताया कि वह लखनऊ में ही है. पुलिस ने रितु की लाश मिलने के बाद जब साहिल से पूछताछ की थी तो उस ने यह बात सीओ कैंट बबिता सिंह को बता दी थी. इसी से वह संदेह के दायरे में आया था. इस से बबिता सिंह को लगा कि जब पवन देहरादून गया नहीं तो उस ने साहिल से झूठ क्यों बोला? दूसरे पवन के फोन की लोकेशन रितु के फोन के साथ मिली थी. संदेह हुआ तो पुलिस ने पवन को गिरफ्तार कर के उस से सख्ती से पूछताछ की. इस से पवन टूट गया और उस ने पुलिस को रितु की हत्या की पूरी जानकारी दे दी थी. शुरू में पवन रितु की हत्या को आत्महत्या साबित करना चाहता था. इस के लिए उस ने एक सुसाइड नोट भी तैयार किया था. लेकिन वह ऐसा कर नहीं सका.

दरअसल पवन के मन में गुस्सा इस बात को ले कर था कि रितु उस से झगड़ा करती है. उस ने अपने बैंक खाते में भी उस की जगह पर भाई को नौमिनी बनाया था. रितु और पवन के बीच मोहब्बत का दौर जरूर लंबा खिंचा, पर शादी के कुछ दिनों के बाद ही उन के बीच अनबन शुरू हो गई थी. इस की वजह थी पवन का नशा करना. जिस समय उस ने रितु का कत्ल किया था, उस समय भी उस ने शराब पी रखी थी. इसीलिए वह यह भी नहीं समझ पाया कि वह केवल अपनी पत्नी की ही हत्या नहीं कर रहा है, बल्कि उस की कोख में पल रहे अपने बच्चे को भी मार रहा है. Stories in Hindi Love

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि