UP Crime News : पूजा ने प्रौपर्टी के लिए सास को मरवाया

UP Crime News : पति को छोडऩे के बाद 28 वर्षीय पूजा को कल्याण राजपूत से प्यार हो गया. उस के साथ वह लिवइन रिलेशन में रहने लगी. एक्सीडेंट में कल्याण की मृत्यु हो जाने के बाद पूजा ने जेठ संतोष राजपूत को फांस लिया. खूबसूरत पूजा से शादी करने के बाद संतोष की पहली पत्नी रागिनी उपेक्षा के चलते मायके चली गई. इसी बीच पूजा की 55 वर्षीय सास सुशीला की हत्या हो गई. किस ने की यह हत्या और इस की क्या वजह रही?

पूजा अपनी मासूम बेटी रूबी के साथ बड़ी बहन कमला उर्फ कामिनी के घर ग्वालियर पहुंची तो कमला ने उसे हाथोंहाथ लिया और खूब खातिरदारी की. पूजा को बहन के घर रहते कई दिन बीत चुके थे, लेकिन वह खुश नहीं थी. वह हमेशा चिंता में डूबी रहती. न ढंग से खाना खाती और न ही चेहरे पर मुसकान होती.

कमला उर्फ कामिनी ने छोटी बहन को इस हाल में देखा तो एक रोज शाम को चाय पीने के दौरान उस ने पूछा, ”पूजा, तुम दिनरात किस चिंता में डूबी रहती हो. न ढंग से बात करती हो और न ही हंसतीमुसकराती हो. क्या पति से झगड़ कर आई हो या फिर ससुर ने कुछ कहा है. जो भी बात हो मुझे खुल कर बताओ.’’

”दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. न मैं पति से झगड़ कर आई हूं और न ही ससुर ने कुछ कहा है. वे दोनों तो मुझे खूब प्यार करते हैं और हर बात मानते हैं. उन से हमें कोई शिकवाशिकायत नहीं है.’’ पूजा बोली.

”फिर इतनी परेशान क्यों है?’’ कमला ने पूजा को बीच में ही टोका.

”दीदी, मेरी परेशानी की वजह मेरी सास सुशीला देवी है.’’

”वह कैसे?’’ कमला ने पूजा के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं.

”दीदी, मैं अपने हिस्से की 8 बीघा जमीन बेच कर ग्वालियर शहर में बसना चाहती हूं. मेरी बेटी अब सयानी हो रही है. उसे शहर में पढ़ालिखा कर उस का जीवन संवारना चाहती हूं. मेरे पति व ससुर तो जमीन बेचने को राजी हैं, लेकिन सास सुशीला देवी अड़चन बनी है.’’

कमला और पूजा अभी आपस में बातें कर ही रही थीं कि तभी कमला का प्रेमी अनिल वर्मा वहां आ गया. वह भी उन की बातों में शामिल हो गया. पूजा की समस्या को समझने के बाद अनिल वर्मा बोला, ”पूजा, यदि सासरूपी तुम्हारी बाधा को मैं दूर कर दूं तो मुझे और कमला को क्या हासिल होगा?’’

पूजा को बाधा यानी यह समस्या दूर होने की उम्मीद जागी तो वह बोली, ”जमीन बिकने पर जो पैसा मिलेगा, उस में से तुम दोनों को भी हिस्सा दूंगी. बस किसी तरह इस प्रौब्लम दूर कर दो.’’

पैसा मिलने के लालच में अनिल वर्मा व उस की प्रेमिका कमला उर्फ कामिनी, पूजा की सास सुशीला देवी की हत्या करने को राजी हो गए. इस के बाद पूजा, कमला व अनिल वर्मा ने कान से कान जोड़ कर सुशीला देवी की हत्या की योजना बनाई. साथ ही प्लान ए और बी भी बनाया. प्लान ए के तहत हत्या के आरोप में पूजा के ससुर को जेल भिजवाना तथा प्लान बी के तहत पुलिस से बचाव करना.

22 मई 2025 को पूजा की बेटी रूबी का जन्मदिन था. पूजा ने योजना के तहत अपने पति संतोष राजपूत व ससुर अजय प्रताप राजपूत से फोन पर बात की और उन्हें बेटी के जन्मदिन पर आने का न्योता दिया और ग्वालियर आने को कहा. उस ने ऐसा इसलिए किया ताकि घर में सास सुशीला अकेली पड़ जाए और उस की हत्या आसानी से की जा सके.

पूजा के बुलाने पर संतोष और उस के पापा अजय प्रताप राजपूत ग्वालियर आ गए. रूबी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया. जश्न में कमला का प्रेमी अनिल वर्मा भी शामिल हुआ. दूसरे रोज पूजा ने पति संतोष को यह कह कर रोक लिया कि वह पेट से है, लेकिन दूसरा बच्चा अभी नहीं चाहती. अत: अस्पताल चल कर गर्भपात कराना है. ससुर अजय प्रताप को भी पूजा ने बहाने से रोक लिया. ससुर ने उसे 5 हजार रुपए भी खर्च के लिए दिए. अजय प्रताप को क्या पता था कि उस की शातिर बहू उसी के साथ छल कर रही है और उस की पत्नी का काल बनने जा रही है.

पूजा का पति व ससुर ग्वालियर में थे और पूजा की सास सुशीला देवी गांव में अकेली थी, अत: उचित मौका देख कर योजना के तहत कमला और अनिल वर्मा 24 जून, 2025 की सुबह 5 बजे बाइक से कुम्हरिया गांव स्थित सुशीला देवी के घर पहुंचे. सुशीला घर पर ही थी. पूजा की बहन कमला को सुशीला जानती थी. अत: उस ने उसे घर के अंदर आदर भाव से बिठाया और चायनाश्ता कराया. दोनों ने आधेआधे कप चाय पी. फिर अनिल और कमला ने सुशीला को अचानक दबोच लिया और बैड पर गिरा कर रस्सी से उस के हाथपैर बांध कर बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया.

सुशीला चीख न सके, इस के लिए उन दोनों ने उस के मुंह में कपड़ा ठूूंस दिया, फिर उसी की चुनरी से उसे गला घोंट कर मार डाला. हत्या करने के बाद कमला व अनिल ने घर में लूटपाट की और नकदी तथा सोनेचांदी के गहने ले कर फरार हो गए. 24 जून, 2025 को दोपहर बाद अजय प्रताप राजपूत ग्वालियर से कुम्हरिया गांव स्थित अपने घर पहुंचे तो घर के मुख्य दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद थी. वह कुंडी खोल कर घर के अंदर कमरे में पहुंचे तो कमरे का नजारा देख कर चौंक गए. बैड पर उन की पत्नी सुशीला देवी की लाश पड़ी थी. वह चीखते हुए बाहर आए.

चाचा की चीख सुन कर सौरभ राजपूत आ गया. उस ने चाची की हत्या की बात सुनी तो वह भी दंग रह गया. इस के बाद तो पूरे गांव में कोहराम मच गया और लोगों की भीड़ अजय प्रताप के घर जुटने लगी. इसी बीच सौरभ ने चाची सुशीला की हत्या की सूचना थाना टहरौली पुलिस तथा डायल 112 पर दे दी. हत्या की सूचना पाते ही एसएचओ सुरेश कुमार पुलिस टीम के साथ कुम्हरिया गांव पहुंच गए. उन की सूचना पर एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, सीओ अरुण कुमार राय तथा एसपी (सिटी) ज्ञानेंद्र कुमार सिंह भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया.

मृतका सुशीला का शव बैड पर पड़ा था. बैड के एक सिरे से उस के हाथ तथा दूसरे सिरे से रस्सी से उस के पैर बंधे थे. मुंह में कपड़ा ठूंसा गया था. मृतका की उम्र 55 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या बेहोश कर गला घोंट कर की गई थी. बेहोशी का इंजेक्शन बेड के नीचे पड़ा था. साक्ष्य के तौर पर पुलिस ने उस खाली पड़े इंजेक्शन को सुरक्षित कर लिया. एक कमरे का ताला टूटा पड़ा था और बक्से का ताला भी टूटा पड़ा था. उस में रखा सामान कमरे में फैला था. जिस कमरे में बैड पर लाश पड़ी थी, उसी कमरे में छोटी सी मेज पर चाय के 2 कप तथा नमकीन, बिसकुट की प्लेटें रखी थीं. आधाआधा कप ही चाय पी गई थी.

निरीक्षण के बाद एसएसपी ने शव को झांसी के जिला अस्पताल पोस्टमार्टम हेतु भिजवा दिया और एसपी (सिटी) ज्ञानेंद्र कुमार सिंह को हत्या के खुलासे की जिम्मेदारी सौंपी. ज्ञानेंद्र कुमार सिंह ने तब एक स्पैशल टीम बनाई, जिस में एसएचओ के अलावा सर्विलांस तथा एसओजी के तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. साथ ही खास खबरियों को भी लगा दिया. पुलिस की इस स्पैशल टीम ने सब से पहले घर के मुखिया अजय प्रताप से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि हत्यारे एक लाख नकद तथा 8 लाख के जेवर भी लूट ले गए थे.

”तुम्हें किसी पर शक है?’’ एसपी ज्ञानेंद्र सिंह ने अजय राजपूत से पूछा.

”हां सर, मुझे बड़ी बहू रागिनी और उस के भाई आकाश पर शक है. रागिनी सुशीला से खुन्नस रखती थी. इसी खुन्नस में दोनों ने मिल कर मेरी पत्नी की हत्या की होगी.’’

अजय राजपूत के अलावा पुलिस टीम ने उस के बेटे संतोष व भतीजे सौरभ राजपूत से भी पूछताछ की.

ससुर को क्यों फंसाना चाहती थी पूजा

अजय के भतीजे सौरभ राजपूत ने बताया कि चाचा की चीख सुन कर वह घर आया तो चाची बैड पर मृत पड़ी थीं. उस ने ही पुलिस को सूचना दी थी. उस ने बताया कि सुबह 5 बजे एक युवक व एक युवती चाची के घर बाइक से आए थे. वे दोनों मुंह पर कपड़ा बांधे थे. उन्होंने घर से करीब 100 मीटर दूर अपनी बाइक खड़ी की थी. लगभग डेढ़ घंटा बाद वे चले गए थे. उस समय भी दोनों के मुंह पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन दोनों को पहचान नहीं पाया था. बाइक दूर खड़ी थी, इसलिए नंबर भी नोट नहीं कर पाया.

सौरभ ने यह भी बताया कि 3:10 बजे उस की पत्नी के मोबाइल फोन पर एक काल आई थी. यह काल पूजा ने अपने नंबर से न कर के दूसरे के मोबाइल नंबर से की थी और चाची का हालचाल पूछा था. सौरभ ने वह नंबर पुलिस को दे दिया. इधर संदेह के आधार पर पुलिस ने अजय प्रताप की तहरीर पर दतिया निवासी आकाश व उस की बहन रागिनी के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली और जांच में जुट गई. पुलिस टीम दूसरे रोज रागिनी व आकाश की तलाश में दतिया को निकलने ही वाली थी कि आकाश और रागिनी स्वयं ही थाना टहरौली आ गए. उन्होंने बताया कि जब उन्हें पता चला कि सुशीला देवी की हत्या हो गई है और रिपोर्ट उन के खिलाफ दर्ज की गई है तो वे घबरा गए और थाने आ गए.

रागिनी ने पुलिस के सामने कहा कि यह बात सही है कि वह पूरे परिवार से नफरत करती है, क्योंकि पति संतोष राजपूत ने विधवा देवरानी पूजा से शादी रचा कर उस के साथ छल किया तो दूसरी ओर सासससुर ने पूजा को जरूरत से ज्यादा प्यारदुलार दे कर उस के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई. वह सौतन को कब तक बरदाश्त करती. इसलिए ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. रागिनी ने कहा कि उस ने सास की हत्या नहीं की. उसे और उस के भाई को हत्या के मामले में झूठा फंसाया जा रहा है. सास की हत्या का राज ससुर अजय व उस की बहू पूजा के पेट में ही छिपा है.

रागिनी ने जिस बेबाकी से अपनी बात पुलिस को बताई, उस से पुलिस को लगा कि रागिनी व उस का भाई आकाश निर्दोष हैं. उन्हें थाने से जाने दिया. हां, इतना जरूर कहा कि सहयोग के लिए जब भी उन्हें बुलाया जाए, वे थाने पर जरूर आएं. रागिनी के बयान के आधार पर अजय प्रताप की बहू पूजा शक के दायरे में आ गई थी. शक का दूसरा कारण यह भी था कि सास सुशीला की हत्या को 3 दिन बीत गए थे, लेकिन पूजा ग्वालियर से ससुराल नहीं आई थी. मोबाइल फोन के जरिए ही वह पति व ससुर के संपर्क में थी और पुलिस की हर गतिविधि की जानकारी ले रही थी. जबकि सास की मौत की खबर पाते ही उसे ससुराल आ जाना चाहिए था.

27 जून, 2025 को पुलिस टीम ने शक के आधार पर पूजा को उस के पति संतोष के सहयोग से ग्वालियर स्थित घर से हिरासत में ले लिया और थाना टहरौली ले आई. थाने में उस से सास सुशीला की हत्या के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गई. बोली, ”साहब, मैं तो ग्वालियर में थी. पति व ससुर भी मेरे साथ थे. मुझे क्या पता कि सास को किस ने मारा?’’

”तुम ने सुशाीला की हत्या नहीं की तो फिर किस ने की?’’ टीम के एक दरोगा ने उस से पूछा.

”साहब, मुझे तो अपने ससुर अजय प्रताप राजपूत पर ही शक है. वह सास से खुन्नस रखते थे. सास को शक था कि ससुर मुझे चाहते हैं और संबंध बनाना चाहते हैं.’’

पूजा के बयान के आधार पर पुलिस टीम कुम्हरिया गांव पहुंची और अजय प्रताप राजपूत को पकड़ कर थाने ले आई. रात भर उन से सख्ती से पूछताछ की गई, लेकिन वह अपनी बेगुनाही के सबूत पेश करते रहे.

सुबह पुलिस टीम ने पूजा व अजय प्रताप राजपूत को आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की. पूजा ने अपनी बात दोहराई और ससुर अजय प्रताप से कहा कि वह सास की हत्या का जुर्म कुबूल कर लें. वह उन्हें जल्द ही जमानत पर छुड़ा लेगी.

पूजा की बात सुन कर अजय प्रताप सन्न रह गए. वह सोचने लगे जिस बहू को उन्होंने ससम्मान घर में रखा, लाड़प्यार दिया, वही बहू उसे हत्या जैसे मामले में फंसाना चाहती है. उन के दिमाग में विचार कौंधा कि कहीं पूजा ने ही तो सुशीला की हत्या नहीं कराई. क्योंकि पूजा जमीन बेचना चाहती थी और सुशीला विरोध करती थी.

अजय ने तब सारी बात पुलिस को बताई और अब हत्या का शक पूजा पर जताया. पूजा अब पूरी तरह से शक के घेरे में आ गई थी. अत: पुलिस टीम ने पूजा से सख्ती से पूछताछ की. पूजा ने तब सास की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. पूजा ने बताया कि मैं अपने हिस्से की 8 बीघा जमीन बेच कर ग्वालियर में बसना चाहती थी. लेकिन सास सुशीला बाधक बन गई थी. इसी जमीन के लिए मैं ने सास की हत्या करवाई. हत्या के लिए मैं ने रुपयों का लालच दे कर बड़ी बहन कमला उर्फ कामिनी व उस के प्रेमी अनिल वर्मा को तैयार किया. ससुर को फंसाना भी साजिश का हिस्सा था. ससुर जेल चले जाते तो जमीन बिकने में कोई अड़चन नहीं आती. कमला व उस के प्रेमी अनिल वर्मा ने ही प्लान के तहत सास की हत्या की और घर में लूटपाट भी की.

पूजा ने गुनाह कुबूल किया तो पूजा की मदद से पुलिस टीम ने पूजा की बड़ी बहन कमला उर्फ कामिनी को भी ग्वालियर से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन अनिल वर्मा पुलिस को चकमा दे गया. कमला उर्फ कामिनी को थाना टहरौली लाया गया. एसपी (सिटी) ज्ञानेंद्र कुमार सिंह व सीओ (टहरौली) अरुण कुमार राय ने जब कमला से सुशीला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने सहज ही हत्या व लूटपाट का जुर्म कुबूल कर लिया, लेकिन उस के पास से लूटपाट की ज्वैलरी बरामद नहीं हुई. जेवर के बारे में पूछने पर कमला ने बताया कि लूटपाट के जेवर उस के प्रेमी अनिल वर्मा के पास हैं. वह जेवर को बेचने की फिराक में किसी ज्वैलर के संपर्क में है.

चूंकि पूजा और उस की बहन कमला उर्फ कामिनी ने सुशीला देवी की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने मृतका के पति अजय प्रताप की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) व (61) के तहत आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. दूसरे रोज (29 जून) को उन्हें झांसी की कोर्ट में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. चूंकि लूट का माल कमला के प्रेमी अनिल वर्मा के पास था. उस की खोज में पुलिस टीम जुट गई. पुलिस ने उस की टोह में खास खबरियों को भी लगा दिया.

30 जून, 2025 की रात 9 बजे एक खास मुखबिर से थाना टहरौली के एसएचओ सुरेश कुमार को सूचना मिली कि वांछित अपराधी अनिल वर्मा किसी रिश्तेदार के यहां लूटी गई ज्वैलरी पहुंचाने के इरादे से बघौरा के घुरैया तिराहे से निकलने वाला है. इस सूचना पर सीओ (टहरौली) अरुण कुमार राय, इंसपेक्टर सुरेश कुमार तथा उल्दन थाने के एसएचओ दिनेश कुमार पुलिस टीम के साथ घुरैया तिराहे पहुंचे और चैकिंग शुरू कर दी.

रात 10 बजे के लगभग पुलिस को एक संदिग्ध बाइक सवार आता दिखा. पुलिस ने रुकने का इशारा किया, लेकिन उस ने बाइक दौड़ा दी और पुलिस पर फायर झोंक दिया. जवाबी काररवाई में पुलिस ने भी गोली चलाई. गोली अनिल वर्मा के पैर में लगी और वह घायल हो गया. पुलिस ने तब अनिल वर्मा को दबोच लिया. पुलिस को उस के पास से 8 लाख रुपए कीमत के आभूषण बरामद हो गए, जो उस ने सुशीला देवी हत्या के बाद लूटे थे. पुलिस ने हत्या में प्रयोग उस की बाइक तथा तमंचा भी अपने कब्जे में ले लिया. उस ने हत्या में प्रयुक्त सीरिंज भी बरामद करा दी, जो उस ने बाइक की डिक्की में छिपा दी थी.

पुलिस जांच, आरोपियों के बयानों एवं मृतका के फेमिली वालों द्वारा दी गई जानकारी के तहत झांसी की कातिल हसीना की दिल को झकझोर देने वाली कहानी प्रकाश में आई. उत्तर प्रदेश के झांसी शहर के थाना प्रेमनगर अंतर्गत एक मोहल्ला है— नगरा महावीरन. इसी मोहल्ले में बोधराम जाटव परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी सरला के अलावा 2 बेटे निरपत, गणपत तथा 2 बेटियां कमला तथा पूजा थीं. बोधराम रेलवे में लोको पायलट थे. बड़ी बेटी कमला उर्फ कामिनी सयानी हुई तो उन्होंने उस का विवाह हजीरा (ग्वालियर) निवासी सूरज जाटव से कर दिया.

बोधराम की बेटी पूजा अपने भाईबहनों में सब से छोटी थी. जब वह 7 साल की थी, तभी उस की मम्मी सरला की मौत हो गई थी. पूजा की भाभी लीलावती ने उसे पालपोस कर बड़ा किया था. यौवन की दहलीज पर आते ही उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया था. जो भी उसे देखता, मंत्रमुग्ध सा हो जाता. घर के सभी लोग उसे बेहद प्यार करते थे. इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद पूजा की पढ़ाई पर विराम लग गया था. पूजा सयानी हुई तो बोधराम को उस के विवाह की चिंता सताने लगी. उस ने बेटी के लिए योग्य वर की खोज शुरू की तो उसे रमेश जाटव पसंद आ गया. रमेश जाटव रेलवे में नौकरी करता था और संयुक्त परिवार के साथ ओरछा में रहता था. रमेश पसंद आया तो बोधराम ने 4 मई, 2014 को पूजा का विवाह रमेश के साथ धूमधाम से कर दिया.

शादी के बाद कुछ माह तक दोनों का जीवन हंसीखुशी से बीता. उस के बाद दोनों के बीच कलह होने लगी. कलह का पहला कारण था संयुक्त परिवार में रहना. पूजा अपने सासससुर के साथ रहने के बजाय अलग रहना चाहती थी. लेकिन रमेश को अलग रहना पसंद न था. दूसरा कारण था पूजा की फैशनपरस्ती. वर्ष 2016 के जुलाई माह में रमेश पर किसी ने जानलेवा हमला किया. उस पर गोली चला दी, लेकिन उस की जान बच गई. उस रोज वह पूजा को मायके से ले कर अपने घर ओरछा जा रहा था. रमेश को शक हुआ कि गोली पूजा ने चलवाई थी, अत: उस ने थाना प्रेमनगर में पूजा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने पूजा को आम्र्स एक्ट की धारा 25/4 व आईपीसी की धारा 506 के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस के बाद पूजा व रमेश के बीच अलगाव हो गया. पूजा लगभग 6 माह तक जेल में रही. उस के बाद बोधराम ने पूजा की जमानत करा ली और वह मायके में रहने लगी. मुकदमे की पैरवी के लिए पूजा झांसी कोर्ट जाती थी. कोर्ट में ही एक रोज पूजा की मुलाकात कल्याण उर्फ लाखन राजपूत से हुई. कल्याण पर भी चोरी, लूट व मारपीट के लगभग आधा दरजन मुकदमे दर्ज थे. इन्हीं की पैरवी के लिए वह भी कोर्ट आता था.

कोर्ट की हुई मुलाकात ऐसे बदली प्यार में

कल्याण उर्फ लाखन के पापा अजय प्रताप राजपूत झांसी जिले के कुम्हरिया गांव के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी सुशीला देवी के अलावा 2 बेटे संतोष व कल्याण थे. उन के पास खेती की 16 बीघा भूमि थी. बड़े बेटे संतोष की शादी हो चुकी थी. उस की पत्नी रागिनी सुंदर व सुशील थी. घरगृहस्थी वही संभालती थी. उन का छोटा बेटा कल्याण उर्फ लाखन अपराधी प्रवृत्ति का था, इसलिए उस का विवाह नहीं हुआ था.  पूजा और कल्याण राजपूत पहली ही मुलाकात में एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. उन के बीच दोस्ती हो गई और खुल कर बातचीत होने लगी. मोबाइल फोन पर भी वे घंटों बतियाने लगे. धीरेधीरे उन की दोस्ती प्यार में बदल गई.

प्यार परवान चढ़ा तो पूजा झांसी के गुमनावारा में किराए के मकान में कल्याण के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. पूजा के भाई निरपत को कल्याण के साथ रहना अच्छा न लगा, इसलिए उस ने पूजा से रिश्ता खत्म कर लिया. बोधराम भी चिंता में लकवाग्रस्त हो गए. उन्होंने भी पूजा से नाता तोड़ दिया. 25 मई, 2019 को कोंछा झाबर के पास सड़क दुर्घटना में कल्याण की मौत हो गई. पूजा विधवा हो गई और उस पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा. बेटे की मौत का अजय व उन की पत्नी सुशीला को भी गहरा सदमा लगा.

कल्याण की तेरहवीं वाले दिन पूजा कुम्हरिया गांव ससुराल आ गई. वह सुशीला देवी की गोद में सिर रख कर रोने लगी और बोली, ”मम्मी, अब मैं कहां जाऊं. मेरा कोई नहीं है. बचपन में मम्मी मर गई और भाई व पापा ने भी नाता तोड़ लिया. अब मैं एक तरह से अनाथ हूं.’’

पूजा के आंसुओं ने सुशीला देवी का दिल पिघला दिया. उस ने पूजा को गले लगा कर उसे बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. हालांकि फेमिली के लोगों ने विरोध किया और कहा कि वह छोटी जाति की है. लेकिन सुशीला के आगे किसी की नहीं चली.

पूजा अब ससुराल में खुशीखुशी रहने लगी. रागिनी ने भी पूजा को अपनी देवरानी के रूप में स्वीकार कर लिया. देवरानीजेठानी घर का काम मिलजुल कर करतीं और हंसीखुशी से रहतीं. पूजा ने अपनी सेवा से सासससुर का भी दिल जीत लिया था. पूजा खूबसूरत व जवान थी. उस ने जेठ संतोष पर नजरें गड़ानी शुरू कर दीं. संतोष भी पूजा की खूबसूरती का कायल था और मन ही मन उसे चाहता था. संतोष रंगीनमिजाज था. रिश्तेनाते उस के लिए कोई मायने नहीं रखते थे. बहू और जेठ का रिश्ता होने के बावजूद वह पूजा के जिस्म को पाने के लिए लालायित रहने लगा. पूजा को रिझाने के लिए उस ने तरहतरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए.

मर्द जिस नजर से औरत को देखता है, उस से वह उस के मन का भाव समझ जाती है. संतोष जिस तरह से ललचाई नजरों से उस के शबाब को निहारता था, उस से पूजा समझ गई कि जेठ की नीयत ठीक नहीं है. पूजा भी जेठ को अपना बनाना चाहती थी, इसलिए उस ने कभी टोकाटाकी नहीं की.

जेठ को फांस कर जेठानी को किया दूर

संतोष अब पूजा से बतियाने भी लगा था. बातचीत में वह पूजा के रूप की प्रशंसा तो करता ही, उस के व्यवहार की भी खूब तारीफ करता. पूजा भी उस की बातों में रस लेने लगी थी. धीरेधीरे दोनों के बीच का परदा हटता गया और फिर एक दिन उन के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. रागिनी मायके से वापस आई तो उसे पूजा की चालढाल पर शक हुआ. उस ने निगरानी शुरू की तो एक रात उस ने पति को पूजा की बांहों में झूलते देख लिया. वह समझ गई कि पूजा उस की सौतन बन गई है.

उस ने इस नाजायज रिश्ते का विरोध किया तो संतोष और पूजा उसी पर हावी हो गए. सास और ससुर ने भी चुप्पी साध ली. उन दोनों ने रागिनी को समझाया कि घर की बात है, घर में ही रहने दो. मजबूरन रागिनी ने पूजा को सौतन के रूप में स्वीकार कर लिया. कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ा तो संतोष ने पूजा के साथ शादी रचा ली और उसे पत्नी का दरजा दे दिया. शादी के एक साल बाद पूजा ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी के जन्म से घर में खुशियां छा गईं. सभी उसे बेहद चाहते थे.

पूजा से शादी करने के बाद संतोष ज्यादा समय उसी के साथ बिताता था. वह पूजा की हर बात मानता था और उसे भरपूर प्यार देता था. जबकि रागिनी पति के प्यार के लिए तरसती रहती थी. संतोष उस की कोई बात नहीं मानता था और अकसर उसे अपमानित करता रहता था. वक्त के साथ पूजा की बेटी 3 साल की हो गई थी. पूजा को गांव में अच्छा नहीं लगता था. वह ग्वालियर शहर में बसना चाहती थी. एक रोज उस ने पति व ससुर के सामने इच्छा जताई कि वह अपने हिस्से की 8 बीघा जमीन बेचना चाहती है. इस पर थोड़ा नानुकुर के बाद संतोष व अजय प्रताप राजी हो गए, लेकिन जब सास सुशीला को जमीन बेचने की बात पता चली तो उस ने पूजा को आड़े हाथों लिया और जमीन बेचने का विरोध किया.

इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. पूजा जब भी जमीन बेचने की बात करती, सास सुशीला विरोध करती. इस विरोध के कारण पूजा मन ही मन सास से नफरत करने लगी थी. हालांकि पूजा अपने लाड़प्यार तथा सेवा भाव से सास को पटाने की पूरी कोशिश करती थी. इधर घर में रागिनी की हैसियत एक दासी जैसी थी. उसे न कोई प्यार देता था न सम्मान. सास ने मंगलसूत्र भी उस से छीन लिया था. हताश रागिनी का ससुराल में जीना दूभर हो गया तो पिछले साल से वह अपने मायके दतिया में आ कर रहने लगी.

मई, 2025 के पहले सप्ताह में पूजा ने फिर से जमीन बेचने की बात चलाई तो सास सुशीला बाधा बन गई. उस ने पूजा को डांटफटकार भी लगाई. पूजा तब सास से लड़झगड़ कर 16 मई, 2025 को अपनी बड़ी बहन कमला उर्फ कामिनी के घर हजीरा (ग्वालियर) आ गई. बहन के घर रह कर पूजा ने सास सुशीला की हत्या की योजना बनाई.

3 जुलाई, 2025 को पुलिस ने आरोपी अनिल वर्मा को झांसी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. पूजा व कमला पहले ही जेल जा चुकी थीं.पूजा के जेल जाने के बाद उस की बेटी संतोष के घर पलबढ़ रही थी. UP Crime News

 

 

Hindi love Story in Short : अपने अस्पताल की मैनेजर से चक्कर डाक्टर पत्नी खल्ल्लास

Hindi love Story in Short : मैडिकल की पढ़ाई करने के दौरान ही राकेश रोशन और सुरभि राज को प्यार हो गया. फेमिली वालों की मरजी के बिना दोनों ने शादी भी कर ली थी. आगे चल कर दोनों ने एक आधुनिक अस्पताल बनवाया. अस्पताल में तैनात एचआर मैनेजर अलका से डा. राकेश की आंखें 4 हो गईं. इन दोनों की जुनूनी मोहब्बत में 35 वर्षीया डा. सुरभि राज ऐसी पिसी कि…

”यार अलका, आजकल मैं बहुत टेंशन में रहता हूं,’’ डा. राकेश रोशन ने अपनी प्रेमिका अलका से आगे कहा, ”लगता है सुरभि को हमारे संबंधों पर शक हो गया है. तभी तो वह आजकल मुझ से उखड़ीउखड़ी सी रहती है और हम दोनों पर नजर भी गड़ाए हुए है कि मैं कहां जा रहा हूं? तुम से कब मिल रहा हूं? हमारे बीच बात क्या हो रही है…’’

”हां, मुझे भी ऐसा लगता है कि सुरभि मैम को हमारे अफेयर के बारे में पक्की जानकारी हो चुकी है. तभी तो वह मुझे भी शक की नजरों से घूरघूर कर देखती हैं.’’ जवाब देते वक्त अलका के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही थीं.

”अलका, बात यह है कि मैं तुम्हें दूर कर भी नहीं सकता और न ही तुम्हारे बिना जीने की कल्पना ही कर सकता हूं. मुझे तो यही लगता है कि अब सुरभि को रास्ते से हटाना ही होगा.’’

”मगर कैसे?’’ अलका ने सवाल दागा, ”तुम्हारे लिए उसे रास्ते से हटाना इतना आसान नहीं होगा राकेश, जितना आसान तुम समझ रहे हो. वो तुम्हारी पत्नी है.’’

”जानता हूं मैं. मगर उसे रास्ते से हटाने के लिए चक्रव्यूह की रचना करनी होगी. ऐसी रचना, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. फिलहाल, ससुराल वालों को हमारे खटास होते रिश्तों के बारे में भनक लग चुकी है. ऐसे में अगर मैं ने कोई कदम उठाया और उसे कुछ हुआ तो सीधा शक हम पर ही आ जाएगा, इसलिए मैं चाहता हूं कि हम उसे ऐसे ठिकाने लगाएं कि न तो किसी को हम पर शक हो और न ही कोई सबूत मिले. इस के लिए हमें जबरदस्त प्लान करना होगा.’’ कहते हुए राकेश के चेहरे पर अजीब सी शैतानी चमक थिरक उठी थी.

”हूं. तो कैसा प्लान किया जाए, जिस से सुरभि की मौत के बाद किसी को हम पर शक न हो?’’ अलका ने फिर से सवाल दागा.

प्रेमिका का सवाल सुन कर राकेश ने कुछ पल के लिए चुप्पी साध ली. फिर कुछ देर सोचने के बाद बोला, ”यही कि अपने इस खतरनाक प्लान में कुछ और भरोसेमंद लोगों को शामिल करूंगा, जो हमारे लिए हर वक्त खड़े रहते हैं.’’

”किस की बात कर रहे हो तुम? कौन है जो हमारे भरोसे पर खरा उतर सकता है? हमें कदम बहुत फूंकफंूक कर उठाने होंगे.’’

पटना के अगमकुआं का रहने वाला डा. राकेश रोशन उर्फ चंदन सिंह और अलका यह सोच कर काफी परेशान थे कि अच्छाभला उन का प्यार चल रहा था, बीच में अचानक सुरभि कहां से आ टपकी कि सारा मजा ही किरकिरा हो गया. ऊपर से पैसों का हिसाब लेने लगी, सो अलग. मेरी बिल्ली मुझ से म्याऊं कर रही है. उस की ये बातें अब बरदाश्त के बाहर हो गई थीं, इसलिए इस का कुछ इंतजाम करना ही होगा.

”तो बताया नहीं तुम ने? हमारी प्लानिंग में किसे शामिल करना चाहतेे हो, जो हमारे राज को राज बनाए रखने में हमारा साथ देगा?’’ अलका ने एक बार फिर पूछा.

”मैं ने इस योजना में अपने छोटे भाई रमेश और अस्पताल के कर्मचारी अनिल और मसूद आलम को शामिल करने का फैसला किया है मेरी जान. ये तीनों मेरे सब से खास और हमराज हैं. तीनों इतने वफादार हैं कि अपनी जान तो दे सकते हैं, लेकिन जीते जी अपना मुंह नहीं खोलेंगे.’’ राकेश ने कहा. राकेश का जबाव सुन कर अलका खुशी से झूम उठी और राकेश को खींच कर अपनी बांहों में भर लिया. यह बात घटना से करीब 3 महीने पहले यानी जनवरी, 2025 की है. प्रेमिका अलका के साथ योजना बनाने के बाद राकेश ने अगले दिन हौस्पिटल के अपने औफिस में एक मीटिंग बुलाई.

उस मीटिंग में राकेश ने अपने छोटे भाई रमेश, हौस्पिटल के दोनों कर्मचारी अनिल और मसूद आलम को बुलाया था. इस मीटिंग में उस ने अलका को भी शामिल किया था. राकेश ने गार्ड को सख्त हिदायत दे रखी थी कि केबिन में सीक्रेट मीटिंग चल रही है. किसी को भी उस के केबिन की ओर मत आने देना.

”जानते हो, आप सभी को यहां क्यों बुलाया गया है?’’ राकेश ने सभी से सवाल किया था

”नहीं, सर.’’ राकेश के छोटे भाई रमेश ने सवाल का जबाव देते हुए आगे कहा, ”हमें नहीं पता, हमें यहां क्यों बुलाया गया है.’’

”एक सीक्रेट काम के लिए हम ने यहां आप सभी को जिस काम के लिए बुलाया है, वह आप सभी के बिना संभव नहीं हो सकता.’’

”कैसा काम, सर?’’ रमेश ने फिर सवाल किया था.

”बताता हूं…बताता हूं…पहले आप सभी वादा करो कि इस मीटिंग की भनक बाहर नहीं जानी चाहिए.’’

राकेश की बात सुन क र सभी एकदूसरे का मुंह ताकने लगे और एक सुर में कहा कि इस की भनक बाहर तक नहीं जाएगी. एक पल के लिए हम सांस लेना तो भूल सकते हैं, किंतु मालिक के साथ गद्दारी कभी नहीं कर सकते. हम सभी की ओर से आप निश्चिंत रहें.

”दैट्स वैरी गुड. हमें सभी से यही उम्मीद थी.’’ राकेश ने अपनी बात आगे जारी रखी, ”दरअसल, मैं पत्नी सुरभि राज को अपने रास्ते से हमेशाहमेशा के लिए हटाना चाहता हूं. इस काम में आप सभी की हेल्प चाहिए. बताओ, आप सभी मेरा साथ दोगे?’’

राकेश की बात सुन कर सभी सन्न रह गए. पलभर केबिन में गहरी खामोशी छाई रही. फिर रमेश ने ही खामोशी तोड़ी, ”हां, साथ देने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमें करना क्या होगा?’’

”इस योजना को इस तरीके से अंजाम देना होगा कि हम पुलिस के शक के चक्रव्यूह में कभी भी न फंसें और न ही पुलिस को कभी यह शक हो कि घटना को हम ने अंजाम दिया है.’’

”फिर तो हर कदम फूंकफूंक कर रखना होगा.’’ इस बार अनिल बोला था.

”कैसे करना होगा, इसे आप सभी तय करोगे. रही बात पैसों की तो पैसों की चिंता मत करो, पैसों का इंतजाम हो जाएगा. बस काम बिलकुल परफेक्ट होना चाहिए.’’

”सर, मेरे जानने वालों में कई हार्डकोर क्रिमिनल हैं, जो काम को बड़े सफाई से अंजाम दे सकते हैं. उन से बात करनी होगी. वे कई मर्डर कर चुके हैं.’’ मसूद आलम बोला.

”फिर देर किस बात की.’’ राकेश उतावला हो कर आगे बोला, ”अभी कांटैक्ट कर के उसे सुपारी दे दो, मसूद.’’

”थोड़ी मोहलत दे दो सर, मैं उन से बात कर के आप को बता दूंगा.’’

”तो फिर ठीक है, आज की मीटिंग यहीं खत्म करता हूं. 2 दिनों बाद फिर यहीं मिलते हैं और उस दिन फाइनल रूपरेखा तैयार होनी चाहिए, क्योंकि हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है.’’

इस के बाद सभी केबिन से बाहर निकले और अपनेअपने कामों में जुट गए. 2 दिनों बाद फिर राकेश, रमेश, अनिल, मसूद और अलका उसी केबिन में मिले, जहां पहले मीटिंग हुई थी.

”मुझे लगता है कि सभी ने अपनीअपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा दिया होगा?’’ राकेश ने रमेश की ओर देखते हुए सवाल किया.

”यस सर, प्लान तैयार हो चुका है, बस शिकार को घेरना बाकी है. जैसे ही शिकार उस जाल में आया, समझिए कि उस का काम तमाम हो जाएगा. लेकिन इस से पहले हमें यहां (हौस्पिटल) के सभी सीसीटीवी कैमरे बंद करने होंगे, ताकि हमारे क्रियाकलाप उस में कैद न हो सकें, वरना पुलिस से हमें कोई बचा नहीं सकता.’’

”रमेश सर बिलकुल ठीक कह रहे हैं, सर.’’ अलका ने रमेश का समर्थन किया, ”सीसीटीवी कैमरे बंद नहीं हुए तो हमारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा और हम सभी पकड़े जाएंगे.’’

”मैं कोई भी रिस्क नहीं ले सकता. ऐसा ही होगा. यहां के सभी सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए जाएं. कोई पूछेगा तो कह देंगे कि खराब हो गए थे.’’

डा. सुरभि राज की हत्या की पूरी फुलप्रूफ योजना बन गई थी. सुरभि का देवर रमेश और मसूद आलम ने सुपारी किलर को मोटी रकम दे कर हायर कर लिया था. यह बात घटना से करीब डेढ़ महीने पहले की है. पति, देवर और पति की प्रेमिका अलका ने मिल कर इतनी बड़ी और खतरनाक साजिश रच डाली, जिस की भनक सुरभि को कानोकान तक नहीं लगी.

हां, यह सच था कि पति की इश्कबाजी और प्रेमिका के ऊपर पानी की तरह पैसे बहाने से डा. सुरभि पति डा. राकेश से परेशान भी थी और नाराज भी.

खैर, इधर सुपारी किलर सुरभि की हत्या का कौन्ट्रैक्ट लेने के बाद उस की रेकी करता रहा. वह कब घर से निकलती है? किस के साथ और किस रास्ते से हो कर जातीआती है? उस ने तकरीबन 15 दिनों तक रेकी की, लेकिन इस दौरान उसे इतना मौका नहीं मिला कि सुरभि की हत्या को अंजाम दे सके.

इधर राकेश यह सोचसोच कर परेशान हो रहा था क्योंकि टास्क अभी तक पूरा नहीं हुआ था. तब उस ने सुरभि को आतेजाते रास्ते में मारने का प्लान कैंसिल करवा दिया. फिर उस ने उसे हौस्पिटल में ही मारने का प्लान बनाया. योजना के अनुसार, घटना से करीब 20 दिन पहले राकेश ने रमेश से कह कर हौस्पिटल के सारे सीसीटीवी कैमरे खराब करवा दिए, जिस से उस में घटना की कोई रिकौर्डिंग न हो सके. उस ने खुद भी हौस्पिटल आनाजाना कम कर दिया. ताकि इस बीच कोई घटना घटे तो उस पर कोई शक न कर सके. इस दौरान डा. सुरभि रोजाना हौस्पिटल आतीजाती रही.

बात 22 मार्च, 2025 की है. रोजाना की तरह डा. सुरभि घर के कामकाज निबटा कर करीब साढ़े 11 बजे हौस्पिटल गई थी और दूसरी मंजिल पर बने अपने केबिन में बैठी जरूरी फाइलों को निबटाने में बिजी थी. हौस्पिटल मरीजों से भरा हुआ था. डा. राकेश बीमारी का बहाना बना कर घर पर आराम कर रहा था. दोपहर 2 बजे के करीब 2 युवक सुरभि के केबिन में चुपके से घुस गए. दोनों सुपारी किलर थे, जो उस की हत्या करने के पैसे ले चुके थे. अचानक अपने केबिन में 2 अनजान युवकों को देख कर सुरभि घबरा गई, ”कौन हो तुम लोग? बिना नौक किए मेरे केबिन में कैसे घुस आए? सिक्योरिटी…सिक्योरिटी…’’

गोलियों से भून डाला डा. सुरभि को जैसे ही उस ने आवाज लगाने की कोशिश की एक झन्नाटेदार चांटा उस के गाल पर पड़ा.

”चुप हरामजादी, एकदम चुप.’’ एक युवक ने अपनी कमर में खोंस कर रखा साइलेंसरयुक्त पिस्टल निकाल कर सुरभि की कनपटी पर तान दिया, ”जरा भी चूंचपड़ की या शोर मचाया तो सारी गोलियां भेजे में उतार दूंगा.’’

”मुझे मार क्यों रहे हो? मैं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है.’’ सुरभि हाथ जोड़ते हुए दोनों युवकों के सामने गिड़गिड़ाई, ”छोड़ दो मुझे…’’ वो आगे कुछ और कहती, इस से पहले युवक ने ताबड़तोड़ गोलियों से उसे छलनी कर दिया.

सुरभि अपने ही खून में सनी रिवौल्विंग चेयर पर एक ओर लुढ़क गई. वह मर चुकी थी. फर्श पर खून फैल गया था. डा. सुरभि राज मर गई है, यह इत्मीनान हो जाने के बाद दोनों युवकों ने पिस्टल से साइलेंसर निकाल कर पिस्टल अपनी कमर में खोंस लिया और फिर उसी रास्ते बाहर निकल गए, जिस रास्ते से वे हौस्पिटल में दाखिल हुए थे. लेकिन जातेजाते हत्यारे ने रमेश को फोन कर के ‘टारगेट पूरा हो गया’ की सूचना भी दे दी थी. सूचना पा कर रमेश खुशी से झूम उठा और यह बात बड़े भाई डा. राकेश को बता दी. यह खबर सुन कर राकेश भी मन ही मन खुश हो गया. फिर उस ने रमेश को अच्छी तरह समझाया कि वहां हत्या का कोई सबूत नहीं रहना चाहिए.

केबिन के फर्श पर फैले खून को इस तरह साफ कराना कि देखने से लगे कि यहां कुछ भी नहीं हुआ था. रमेश ने भाई को भरोसा दिलाया कि वैसा ही होगा, जैसा वह चाहते हैं. वगैर वक्त गंवाए रमेश ने हौस्पिटल में झाड़ूपोंछा लगाने वाली बाई बीना को फोन कर के वापस हौस्पिटल झूठ बोल कहते हुए बुलाया कि सुरभि मैडम को खून की उल्टियां हो रही हैं, आ कर उन का केबिन साफ कर दो फिर चली जाना. मालिक का आदेश मिलते ही बीना हौस्पिटल आ गई थी, जो एक घंटे पहले ही वहां से काम निबटा कर अपने घर गई थी.

ऐसे नष्ट किए मौके के सबूत

खैर, बीना हौस्पिटल पहुंची और उन के केबिन में दाखिल हुई. डा. सुरभि राज अपनी चेयर पर एक ओर लुढ़की हुई थीं. बीना को इस की भनक तक नहीं थी कि उस की मालकिन की हत्या की जा चुकी है. उस ने तो सिर्फ वही किया, जो उसे करने के लिए कहा गया था. उस ने फर्श पर फैले खून को बड़ी सफाई से साफ कर दिया. फर्श की सफाई करते हुए गोलियों के पीतल के 7 खाली खोल मिले. उन्हें नीचे फर्श से उठा कर उस ने मेज पर रख दिए और फिर दरवाजा बंद कर वापस घर लौट गई थी. उसे समझ में नहीं आया था कि वह क्या चीज थी और फर्श पर क्यों पड़े हैं.

हौस्पिटल का वार्डबौय दीपक, जो डा. सुरभि राज का सब से खासमखास और वफादार था. पता नहीं क्यों उसे सुरभि मैडम को ले कर कुछ बेचैनी सी हो रही थी. शाम के साढ़े 4 बज गए थे. उन की केबिन से कोई हरकत नजर नहीं आ रही थी तो उस ने केबिन का दरवाजा खोल कर भीतर झांका. डा. सुरभि को चेयर पर औंधे मुंह पड़ा देख कर उस के मुंह से चीख निकल पड़ी और वह उलटे पांव दूसरी मंजिल से दौड़ता नीचे हाल में आया. हाल में चीखचीख कर डा. सुरभि की हालत के बारे में सब को बता दिया.

दीपक की बात सुन कर अस्पताल के सभी स्टाफ दौड़ेभागे उन की केबिन में पहुंचे तो देखा वह अचेत पड़ी हुई थीं और शरीर खून से भीगा था. आननफानन में उन्हें एंबुलेंस से पटना एम्स ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था. इधर डा. राकेश कुमार ने झूठ बोलते हुए शाम साढ़े 4 बजे अपने ससुर राजेश सिन्हा को फोन किया कि सुरभि अचानक बीमार हो गई है. उसे पटना एम्स में भरती किया गया है, आ कर उसे देख लें. बेटी के अचानक बीमार होने की खबर मिली तो वह घबरा गए. क्योंकि दिन में ही तो उन्होंने उस से बात की थी, तब उस ने किसी बीमारी के बारे में कोई जिक्र नहीं किया था. अचानक क्या हो गया उसे? वह समझ नहीं पा रहे थे.

आननफानन में वह घर से सीधा पटना एम्स पहुंचे, जहां सुरभि के भरती होने की सूचना मिली थी. जब वह हौस्पिटल पहुंचे तो पता चला कि बेटी की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. इतना सुनते ही वह पछाड़ खा कर फर्श पर गिरे और यह सोच कर और भी परेशान हो गए कि आखिर दामाद ने उन से झूठ क्यों बोला कि बेटी बीमार है. फिर उन्होंने अगमकुआं थाने को फोन कर के बेटी सुरभि की हत्या की सूचना दी.

एशिया हौस्पिटल की डायरेक्टर डा. सुरभि राज की हत्या की सूचना मिलते ही पुलिस के हाथपांव फूल गए थे. एसएचओ रामायण राम ने घटना की सूचना एएसपी अतुलेश कुमार झा, एसपी अखिलेश झा और एसएसपी अवकाश कुमार को दे कर खुद एम्स हौस्पिटल पहुंचे. थोड़ी देर बाद सभी पुलिस अधिकारी भी हौस्पिटल पहुंच गए, जहां मृतका के पिता राजेश सिन्हा दहाड़ मार कर रो रहे थे. शहर की कानूनव्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने डा. सुरभि राज की डैडबौडी अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दी थी. सुरभि के पापा राजेश सिन्हा ने दामाद डा. राकेश कुमार, उस के छोटे भाई रमेश और अस्पताल की एचआर मैनेजर अलका को नामजद करते हुए पुलिस को तहरीर सौंपी.

पुलिस ने तहरीर के आधार पर तीनों के खिलाफ हत्या की धारा में मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी. एसपी अखिलेश झा के नेतृत्व में पुलिस फोर्स धुनकी मोड़ स्थित एशिया हौस्पिटल पहुंची और जांच की काररवाई आगे बढ़ाई तो जो पहली जानकारी मिली, उसी से पुलिस का शक भी मजबूत होने लगा. पता चला कि सुरभि की हत्या दोपहर तकरीबन 2 बजे के आसपास हुई थी और पुलिस को सूचना शाम साढ़े 4 बजे के करीब दी गई. यही नहीं, जिस केबिन में डा. सुरभि की हत्या की गई थी, फर्श पर खून का एक कतरा तक मौजूद नहीं था. बड़ी सफाई के साथ फर्श से खून को साफ कर सबूत को मिटा दिया गया था. पुलिस की निगाह सीसीटीवी कैमरे पर गई.

जब वह डिजिटल वीडियो रिकौर्डिंग सिस्टम (डीवीआर) तक पहुंची तो और भी चकरा गई. डीवीआर गायब था. इस बारे पुलिस ने जब हौस्पिटल के मालिक डा. राकेश से पूछा तो उस ने बताया पिछले 20 दिनों से डीवीआर खराब पड़ी है, उसे मरम्मत के लिए दुकान पर दिया गया है. राकेश का जबाव सुन कर पुलिस आश्चर्यचकित रह गई. पुलिस को लगा कि कुल मिला कर एक बड़ी साजिश के तहत डा. सुरभि राज की हत्या की गई थी और बड़ी सफाई से एकएक सबूत को गायब कर दिया गया.

अस्पताल के कर्मचारियों, मृतका के फेमिली वालों और सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर पुलिस को पूरी तरह से नामजद आरोपियों पर शक मजबूत होने लगा. पुलिस डा. राकेश, रमेश और अलका को हिरासत में ले कर अगमकुआं थाने लौट आई. वहां सीओ अतुलेश झा और एसपी अखिलेश झा ने तीनों से सख्ती से अलगअलग पूछताछ की तो उन्होंने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. राकेश के बयान के आधार पर पुलिस ने हौस्पिटल से गायब डीवीआर मसूद आलम के घर से बरामद कर लिया. अब इस केस में अनिल का नाम भी जुड़ गया था. पुलिस ने मसूद आलम और अनिल को गिरफ्तार कर पूछताछ की तो सुरभि का गायब मोबाइल फोन राकेश के पास से बरामद कर लिया, जिस पर गोली के निशान मौजूद थे.

यही नहीं, पांचों आरोपियों की निशानदेही पर एप्पल कंपनी का एक सिल्वर रंग का मैकबुक, एक एचपी कंपनी का प्रो बुक, 2 पैन ड्राइव, विभिन्न कंपनियों के 15 सिमकार्ड, एक ग्रे कलर की टोपी और 7 मोबाइल फोन बरामद किए. पूछताछ में पांचों आरोपियों ने डा. सुरभि राज की साजिशन हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. पूछताछ में हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली. 35 वर्षीय सुरभि राज मूलरूप से पटना के रहने वाले राजेश सिन्हा की बेटी थी. राजेश सिन्हा की 5 बेटियां थीं, बेटा एक भी नहीं था. उन्होंने बेटियों को बेटे की तरह परवरिश कर पढ़ायालिखाया, ताकि वे खुद के पैरों पर खड़े हो कर अपनी घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां संभाल सकें.

पांचों बेटियों में सुरभि सब से बड़ी थी. वह निहायत समझदार और पढ़ाई में अव्वल भी थी. उस का सपना था भविष्य में एक ऐसा बिजनैस खड़ा करना, जिस में पैसे तो आएं, साथ ही समाजसेवा भी होती रहे.

मैडिकल की पढ़ाई में परवान चढ़ा प्यार

बात 2015 की है. कालेज का दौर था. जिस मैडिकल कालेज में वह पढ़ती थी, उसी में राकेश रोशन उर्फ चंदन सिंह भी पढ़ता था. नोट्स लेतेदेते दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी. इस दोस्ती ने कब प्यार का रूप ले लिया, उन्हें पता ही नहीं चला. उन्हें पता तो तब चला जब दोनों एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. कालेज कैंपस से अलग होते ही दोनों तड़पने लगते थे. 3 साल तक दोनों का प्यार यूं ही चलता रहा और साल 2018 में प्रेमीप्रेमिका से पतिपत्नी बन गए थे. हालांकि सुरभि के फेमिली वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था, लेकिन औलाद की खुशी के आगे दिल पर पत्थर रख कर उन्हें झुकना पड़ा था.

 

शादी के बाद डा. राकेश पटना के एक निजी अस्पताल में नौकरी करने लगा था. डा. सुरभि राज भी उसी निजी हौस्पिटल में पति के साथ नौकरी करने लगी थी. दोनों साथसाथ नौकरी करते थे. उसी अस्पताल में अलका नाम की युवती भी नौकरी करती थी. वह खूबसूरत थी. तब उस की उम्र 25 साल के करीब रही होगी, जब पहली बार राकेश की नजर उस पर पड़ी तो वह उस की खूबसूरती को एकटक निहारता ही रह गया था. इस दरमियान सुरभि भी 2 बच्चों की मां बन चुकी थी.

जब से राकेश और सुरभि ने हौस्पिटल में नौकरी शुरू की थी, हौस्पिटल की बेशुमार आमदनी देख कर उन की आंखें फटी रह गईं. दोनों ने मिल कर एक अपना भी नर्सिंग होम बनाने के ठान ली. साल 2020 में दोनों ने अपने सपनों को पंख देना शुरू किया और अगमकुंआ थाना क्षेत्र के धुनकी मोड़ पर एक प्लौट खरीद कर एक बड़ा अस्पताल बनवाया, जिस नाम ‘एशिया हौस्पिटल’ रखा. अस्पताल को चलाने के लिए डा. राकेश रोशन और डा. सुरभि राज ने दिनरात जीतोड़ मेहनत की और कौन्ट्रैक्ट पर शहर के मानेजाने डाक्टरों को अपने अस्पताल में पैनल पर रख लिया. अस्पताल चल निकला और रुपयों की बरसात होने लगी.

राकेश और सुरभि ने अपने सपने जी लिए जो उन्होंने ठाना था, उसे पूरा कर लिया था. डा. सुरभि ने अस्पताल का पूरा दायित्व पति के कंधों पर छोड़ दिया और खुद वहां जानाआना कम कर दिया. राकेश का दिल अभी भी अलका के लिए धड़क रहा था. फोन पर अभी भी दोनों के बीच बातचीत होती रहती थी. अलका चाहती थी, वह भी उसी के साथ उसी के अस्पताल में काम करे. उस ने अपनी दिली इच्छा राकेश के सामने रख दी.

राकेश के दिल में अलका के लिए पहले से ही सौफ्ट कार्नर था, जैसे ही उस का प्रस्ताव आया तो वह न नहीं कर सका और उसे अपने वहां बुला लिया. यही नहीं उसे एचआर मैनेजर बना दिया. राकेश की इस दयालुता पर वह नतमस्तक हो गई थी. राकेश के दिल में पहले से जन्मे प्यार ने अंकुरित हो कर पौधे का रूप ले लिया था. अलका भी उसे पंसद करने लगी थी. यह जानते हुए भी कि डा. राकेश शादीशुदा है और उस के 2 बच्चे हैं. फिर भी अलका राकेश को अपना दिल दे बैठी और उस के दिल पर अपनी हुकूमत चलाने लगी.

4 साल तक उन का प्यार परदे के पीछे छिपा रहा. आखिरकार डा. सुरभि को कहीं से भनक लग ही गई कि उस के पति का एचआर मैनेजर अलका के बीच काफी दिनों से अफेयर चल रहा है और उस के पति अलका पर पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं. सुरभि यह यह कतई बरदाश्त नहीं कर सकती थी कि उस का सिंदूर बंट जाए. उस ने इस पर पति से सवाल किया और अलका को नौकरी से हटाने का दबाव बनाया, लेकिन पति डा. राकेश ने उस की दोनों बातें मानने से इंकार कर दिया. पति की यह बात डा. सुरभि को काफी नागवार लगी और उस ने फैसला कर लिया किवह अलका को अपने यहां से हटा कर ही दम लेगी.

सुरभि के जिद्दी स्वभाव से राकेश अच्छी तरह परिचित था. किसी कीमत पर वह अलका को अपने से दूर होने देना नहीं चाहता था. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच मनमुटाव तक हो गया और झगड़े भी होने लगे. सुरभि घर की सारी बातें मायके खासकर अपनी मम्मी और पापा को बताया करती थी. प्रेम विवाह करने पर अब उसे पछतावा हो रहा था. सुरभि किसी कीमत पर पति को मनमानी नहीं करने देना चाहती थी. इस के लिए वह घर में बैठने की बजाए नर्सिंगहोम में बैठना शुरू कर दिया. यह बात घटना से करीब डेढ़ महीने पहले की है.

सुरभि के हौस्पिटल आने से डा. राकेश की परेशानियां बढ़ गई थीं. अब न तो वह खुल कर प्रेमिका अलका से रंगीन बातें कर सकता था और न ही पैसों की मनमानी ही कर सकता था. दिन पर दिन सुरभि पति के प्रति सख्त होती जा रही थी. पत्नी का यह रूप देख कर राकेश परेशान हो गया. इसी परेशानी को दूर करने के लिए उस ने सुरभि को रास्ते से हटाने की खतरनाक योजना बना ली थी. उसी योजना के तहत राकेश ने हौस्पिटल के अपने खासमखास सिपहसालारों भाई रमेश कुमार, अनिल, मसूद आलम और प्रेमिका अलका के साथ मिल कर सुरभि को मौत के घाट उतार दिया था.

सुरभि की हत्या करवा कर डा. राकेश रोशन ने अपने रास्ते के कांटे को हमेशाहमेशा के लिए उखाड़ फेंका था. साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने सुरभि हत्याकांड की गुत्थी तो फिलहाल सुलझा ली थी. जांच में यह बात भी साबित हो गई थी कि डा. राकेश रोशन, रमेश, अलका, अनिल और मसूद आलम ने मिल कर ही डा. सुरभि राज की हत्या करवाई थी, लेकिन करीब 3 माह बीत जाने के बाद भी उस पिस्टल को पुलिस ढूढ नहीं पाई, जिस से उस की हत्या की गई. और न ही वो हत्यारे ट्रेस हो सके थे, जिन्होंने उस की हत्या की थी.

 

 

 

Crime Kahani : पैसों के लालच में दोस्त का गला दबा कर मार डाला

Crime Kahani : सुरेश चौहान और लेखराज चौहान की 35 साल पुरानी इतनी गहरी दोस्ती थी कि दोनों बिजनैस भी साझे में करते थे. पिता की तरह इन दोनों के बेटे सचिन और हर्ष में भी दांतकाटी दोस्ती थी. लेकिन मोटी रकम के लालच में लेखराज के बेटे हर्ष ने यह दोस्ती पीपीई किट में दफन कर दी

21 जून, 2021 की दोपहर करीब साढ़े 3 बजे सचिन अपने घर पर सो रहा था, तभी उस के मोबाइल पर वाट्सऐप काल आई. सचिन उठा और जाने के लिए तैयार हुआ. लेकिन वह गया नहीं, कुछ देर बाद कपड़े उतार कर वह लेट गया. बिस्तर पर लेटे हुए वह कुछ सोचने लगा, तभी उसे भूख लगी तो उस ने मां अनीता से खाने के लिए कुछ देने को कहा. मां ने उसे सैंडविच बना कर दिया. इसी बीच दोबारा फोन आया तो सचिन टीशर्ट और लोअर में ही सैंडविच खाते हुए चप्पलें पहने ही घर से जाने लगा. मां ने कहा, ‘‘बेटा, तुम ने अभी नाश्ता भी नहीं किया है, कहां जा रहे हो, पहले नाश्ता तो कर लो?’’

उस ने कहा, ‘‘मां, बस अभी लौट कर आता हूं.’’  सचिन ने कहा और वह घर से चला गया. काफी देर तक जब सचिन नहीं आया तो मां को चिंता हुई. वह उसे लगातार उसे फोन कर रही थी, लेकिन सचिन काल रिसीव करने के बजाय बारबार फोन काट देता था. अनीता समझ नहीं पा रही थीं कि सचिन ऐसा क्यों कर रहा है. उस के आने के इंतजार में रात हो गई. रात 11.37 बजे सचिन के पिता सुरेश चौहान के फोन की घंटी बजी. लेकिन नींद में होने के कारण वह फोन उठा नहीं सके. तब अनीता ने देखा तो वह मिस्ड काल उन के बेटे सचिन की ही थी. तब उन्होंने 11.55 बजे कालबैक की.

मगर सचिन की जगह कोई और फोन पर बात कर रहा था. अनीता ने पूछा कौन बोल रहे हो? इस पर उस ने कहा, ‘‘मैं सचिन का दोस्त हूं.’’

‘‘सचिन कहां हैं?’’ अनीता ने पूछा.

‘‘उस ने शराब ज्यादा पी ली है, इसलिए वह सो रहा है. वैसे सचिन इस समय नोएडा में है.’’ उस ने बताया.

‘‘नोएडा…वह वहां कैसे पहुंचा?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘यह बात तो आप को सचिन ही बताएगा.’’

‘‘तुम मेरी सचिन से बात कराओ.’’

‘‘सचिन अभी बात करने की कंडीशन में नहीं है, आप सुबह बात कर लेना,’’ कहते हुए उस ने सचिन का फोन स्विच्ड औफ कर दिया.

उत्तर प्रदेश की ताजनगरी आगरा के थाना न्यू आगरा के दयालबाग क्षेत्र की जयराम बाग कालोनी निवासी कोल्ड स्टोरेज कारोबारी सुरेश चौहान के 25 वर्षीय इकलौते बेटे सचिन चौहान का घरवाले सारी रात बैचेनी से इंतजार करते रहे. लेकिन उस का फोन औन नहीं हुआ.  बेटे के बारे में कोई सुराग न मिलने पर दूसरे दिन मंगलवार को घर वालों ने आसपड़ोस के साथ ही रिश्तेदारी में तलाश किया. लेकिन सचिन का कोई सुराग नहीं मिला. पूरे दिन तलाश करने के बाद 22 जून की शाम तक जब सचिन नहीं लौटा और न उस का मोबाइल औन हुआ, तब पिता सुरेश चौहान अपने पार्टनर लेखराज चौहान के साथ थाना न्यू आगरा पहुंचे.

गंभीरता से नहीं लिया केस उन्होंने थानाप्रभारी को बेटे के लापता होने के बारे में बताया. पुलिस ने उन की तहरीर पर सचिन की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने उन से फिरौती के लिए फोन आने के बारे में पूछा. सुरेश चौहान ने इस पर इनकार कर दिया. फिरौती के लिए फोन न आने की बात पर पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया. कह दिया कि यारदोस्तों के साथ कहीं चला गया होगा और 1-2 दिन में आ जाएगा. पुलिस के रवैए से असंतुष्ट सुरेश चौहान तब खुद ही अपने बेटे की तलाश में जुट गए. उन्होंने कालोनी में रहने वाले एक सेवानिवृत्त अधिकारी से भी मदद ली. उन्हें सीसीटीवी की एक फुटेज मिली, जिस में बाइक सवार 2 युवक नजर आ रहे थे. इन में से पीछे बैठा युवक भी हेलमेट लगाए था.

यह सचिन ही था. यह जानकारी उन्होंने पुलिस को दी. फुटेज देखने के बाद पुलिस ने कहा कि इस में अपहरण जैसी कोई बात नहीं है. इस में तो आप का बेटा सचिन खुद अपनी मरजी से बाइक पर बैठा नजर आ रहा है. 3 दिन तक जब सचिन का कोई सुराग नहीं मिला तो घर वाले परेशान हो गए. पुलिस भी उन से परिचितों व रिश्तेदारी में तलाश करने की बात कहती रही. सुरेश चौहान के बिजनैस पार्टनर लेखराज चौहान के एक रिश्तेदार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय में तैनात हैं. लेखराज ने उन्हें फोन किया. फिर मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद मामला एसटीएफ के सुपुर्द किया गया. एसटीएफ ने 23 जून को इस मामले में छानबीन शुरू कर दी.

सब से पहले एसटीएफ ने सीसीटीवी वाली फुटेज देखी. जिस में सचिन बाइक पर पीछे हेलमेट लगाए बैठा था. एसटीएफ ने टेक्निकल रूप से जांच शुरू की. जांच शुरू की तो कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गई और पुलिस केस के खुलासे के नजदीक पहुंच गई. पुलिस को पता चला कि सचिन का अपहरण कर लिया गया है. 27 जून की रात को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि इस घटना में शामिल एक आरोपी वाटर वर्क्स चौराहे पर मौजूद है. समय पर पुलिस वहां पहुंच गई और एसटीएफ ने उसे धर दबोचा. पकड़ा गया आरोपी हैप्पी खन्ना था. पता चला कि वह फरजी दस्तावेज से सिम लेने की फिराक में था. लेकिन सिम लेने से पहले ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया था. उस ने बताया कि फरजी सिम से सचिन के पिता से 2 करोड़ की फिरौती मांगी जाती.

हैप्पी ने बताया कि सचिन अब इस दुनिया में नहीं है, उस की हत्या तो किडनैप करने वाले दिन ही कर दी थी. यह सुनते ही सनसनी फैल गई. पुलिस ने गुमशुदगी की सूचना को भादंवि की धारा 364ए, 302, 201, 420 में तरमीम कर दिया. दोस्त ही निकला कातिल हैप्पी से पूछताछ के आधार पर अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए ताबड़तोड़ दबिशें दे कर पुलिस ने 4 अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया. इन में मृतक के पिता के बिजनैस पार्टनर लेखराज चौहान का बेटा हर्ष चौहान के अलावा सुमित असवानी निवासी दयाल बाग,  मनोज बंसल उर्फ लंगड़ा व रिंकू  निवासी कमलानगर शामिल थे.

चौंकाने वाली बात यह निकली  कि अपने दोस्त सचिन की तलाश में पुलिस और एसटीएफ की मदद करने का दिखावा करने वाला हर्ष चौहान स्वयं भी इस साजिश में शामिल था. 27 जून, 2021 को परिजनों को जैसे ही पता चला कि सचिन की हत्या उस के कुछ दोस्तों ने कर दी है तो घर में कोहराम मच गया. परिजनों का रोरो कर बुरा हाल  हो गया. सचिन अपने घर का इकलौता चिराग था, जिसे दोस्तों ने बुझा दिया था. पुलिस की कड़ी पूछताछ में सभी आरोपी टूट गए. सभी ने स्वीकार किया कि उन्होंने सचिन का अपहरण कर उस की हत्या कर लाश का अंतिम संस्कार पीपीई किट पहना कर करने के बाद उस की अस्थियां यमुना में विसर्जित करने का जुर्म कबूल कर लिया.

28 जून, 2021 को प्रैस कौन्फ्रैंस में एसएसपी मुनिराज जी. ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. सचिन की मौत की पटकथा एक महीने पहले ही लिख ली गई थी. आरोपियों ने पहले ही तय कर रखा था कि सचिन का अपहरण कर हत्या कर देंगे. उस के बाद 2 करोड़ रुपए की फिरौती उस के पिता से वसूलेंगे. पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों द्वारा सचिन के अपहरण और हत्या के बाद उस के शव का दाह संस्कार की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही खौफनाक थी—

मूलरूप से बरहन कस्बे के गांव रूपधनु निवासी सुरेश चौहान आगरा के दयाल बाग क्षेत्र की जयराम बाग कालोनी में रहते हैं. उन का गांव में ही एसएस आइस एंड कोल्ड स्टोरेज है. इस के अलावा वह आगरा और हाथरस में जिला पंचायत की ठेकेदारी भी करते हैं. लेखराज चौहान भी उन के गांव का ही है. दोनों ने एक साथ काम शुरू किया. ठेकेदारी भी साथ करते हैं. उन दोनों के बीच पिछले 35 सालों से बिजनैस की साझेदारी चल रही थी. सुरेश चौहान का बेटा सचिन व लेखराज का बेटा हर्ष भी दोनों अच्छे दोस्त थे और एक साथ ही व्यापार व ठेकेदारी करते थे. दयाल बाग क्षेत्र की कालोनी तुलसी विहार का रहने वाला सुमित असवानी बड़ा कारोबारी है. 2 साल पहले तक वह अपनी पत्नी व 2 बेटों के साथ चीन में रहता था.

वहां उस का गारमेंट के आयात और निर्यात का व्यापार था. लेकिन 2019 में चीन में जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो वह परिवार सहित भारत आ गया. दयालबाग में ही सौ फुटा रोड पर उस ने सीबीजेड नाम से स्नूकर और स्पोर्ट्स क्लब खोला. सुमित महंगी गाड़ी में चलता था. वहीं वह रोजाना दोस्तों के साथ पार्टी भी करता था. उस के क्लब में हर्ष और सचिन भी स्नूकर खेलने आया करते थे. इस दौरान सुमित की भी उन दोनों से गहरी दोस्ती हो गई. बताया जाता है कि हर्ष चौहान के कहने पर सुमित असवानी ने धीरेधीरे कर के सचिन चौहान को 40 लाख रूपए उधार दे दिए. जब उधारी चुकाने की बारी आई तो सचिन टालमटोल कर देता. जबकि उस के खर्चों में कोई कमी नहीं आ रही थी.

कई बार तकादा करने पर भी सचिन ने रुपए नहीं लौटाए. यह बात सुमित असवानी को नागवार गुजरी. तब उस ने मध्यस्थ हर्ष चौहान पर भी पैसे दिलाने का दबाव बनाया, क्योंकि उस ने उसी के कहने पर सचिन को पैसे दिए थे. सुमित था मास्टरमाइंड  हर्ष के कहने पर भी सचिन ने उधारी की रकम नहीं लौटाई. यह बात हर्ष को भी बुरी लगी. इस पर एक दिन सुमित असवानी ने हर्ष से कहा, ‘‘अब जैसा मैं कहूं तुम वैसा करना. इस के बदले में उसे भी एक करोड़ रुपए मिल जाएंगे.’’

रुपयों के लालच में हर्ष चौहान सुमित असवानी की बातों में आ गया. दोनों ने मिल कर घटना से एक महीने पहले सचिन चौहान के अपहरण की योजना बनाई. फिर योजना के अनुसार, सुमित असवानी ने इस बीच सचिन चौहान से अपने मधुर संबंध बनाए रखे ताकि उसे किसी प्रकार का शक न हो. इस योजना में सुमित असवानी ने रुपयों का लालच दे कर अपने मामा के बेटे हैप्पी खन्ना को तथा हैप्पी ने अपने दोस्त मनोज बंसल और उस के पड़ोसी रिंकू को भी शामिल कर लिया. उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि अपहरण के बाद सचिन की हत्या कर के उस के पिता से जो 2 करोड़ रुपए की फिरौती वसूली जाएगी. उस में से एक करोड़ हर्ष चौहान को, 40 लाख सुमित असवानी को और बाकी पैसे अन्य भागीदारों में बांट दिए जाएंगे.

षडयंत्र के तहत उन्होंने अपनी योजना को अमली जामा 21 जून को पहनाया. सुमित असवानी ने अपने मोबाइल से उस दिन सचिन चौहान को वाट्सऐप काल की. उस ने सचिन से कहा, ‘‘आज मस्त पार्टी का इंतजाम किया है. रशियन लड़कियां भी बुलाई हैं. बिना किसी को बताए, चुपचाप आ जा.’’

सचिन उस के जाल में फंस गया. घर पर बिना बताए वह पैदल ही निकल आया. वे लोग क्रेटा गाड़ी से आए थे. रिंकू गाड़ी चला रहा था. मनोज बंसल उस के बगल में बैठा था. वहीं सुमित और हैप्पी पीछे की सीट पर बैठे थे. सचिन बीच में बैठ गया. सुमित असवानी व साथी शाम 4 बजे पहले एक शराब की दुकान पर पहुंचे. वहां से उन्होंने शराब खरीदी. इस के बाद सभी दोस्त कार से शाम साढ़े 4 बजे सौ फुटा रोड होते हुए पोइया घाट पहुंचे. हैप्पी के दोस्त की बहन का यहां पर पानी का प्लांट है. इन दिनों वह प्लांट बंद पड़ा था. हैप्पी ने पार्टी के नाम पर प्लांट की चाबी पहले ही ले ली थी.

पीपीई किट से लगाई लाश ठिकाने वहां पहुंच कर सभी पहली मंजिल पर बने कमरे में पहुंचे. शाम 5 बजे शराब पार्टी शुरू हुई. जब सचिन पर नशा चढ़ने लगा, तभी सभी ने सचिन को पकड़ लिया. जब तक वह कुछ समझ पाता, उन्होंने उस के चेहरे  पर पौलीथिन और टेप बांध दिया, जिस से सचिन की सांस घुटने लगी. उसी समय सुमित असवानी उस के ऊपर बैठ गया और उस का गला दबा कर हत्या कर दी. इस बीच अन्य उस के हाथपैर पकड़े रहे. सचिन की हत्या के बाद उस के शव का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया गया. इस के लिए शातिर दिमाग सुमित असवानी ने पीपीई किट में लाश को श्मशान घाट पर ले जाने का आइडिया दिया ताकि पहचान न हो सके और कोई उन के पास न आए.

इस के लिए कमला नगर के एक मैडिकल स्टोर से एक पीपीई किट यह कह कर खरीदी कि एक कोरोना मरीज के अंतिम संस्कार के लिए चाहिए. रिंकू शव को बल्केश्वर घाट पर ले जाने के लिए एक मारुति वैन ले आया. सचिन के शव को पीपीई किट में डालने के बाद वह बल्केश्वर घाट पर रात साढ़े 8 बजे पहुंचे. वहां उन्होंने बल्केश्वर मोक्षधाम समिति की रसीद कटवाई व अंतिम संस्कार का सामान खरीदा. उन्होंने मृतक का नाम रवि वर्मा और पता 12ए, सरयू विहार, कमला नगर लिखाया था. इस दौरान कर्मचारी ने मोबाइल नंबर पूछा. तब एक हत्यारोपी ने हड़बड़ी में अपने जीजा का मोबाइल नंबर बता दिया. उसे लगा कि यह गलती हो गई. तब उस ने वह नंबर कटवा दिया, बाद में परची पर फरजी मोबाइल नंबर लिखवा दिया.

यह भी बताया कि मृतक कोरोना पौजिटिव था, इस के चलते उस की मौत हो गई. शव को जलाने के बाद रात साढ़े 10 बजे सभी अपनेअपने घर चले गए.  हर्ष ने मनोज बंसल को सचिन का मोबाइल दे कर उसी शाम साढ़े 7 बजे ही खंदारी से इटावा की बस में बैठा दिया. उस से कहा गया कि इटावा पहुंच कर वह मोबाइल औन कर ले, जिस से लोकेशन इटावा की मिले. फिर इटावा से वह सचिन के घर फोन कर 2 करोड़ की फिरौती मांगे. फिरौती की काल करने के बाद वह मोबाइल औफ कर ले. इस के बाद वह वहां से कानपुर चला जाए. वहां मोबाइल चालू करे. ताकि पुलिस भ्रमित रहे और हम लोग पकड़ में न आएं.

पुलिस को भटकाने की साजिश रात 12 बजे इटावा पहुंच कर मनोज ने जैसे ही मोबाइल औन किया तो देखा मोबाइल पर सचिन की मां अनीता के लगातार फोन आ रहे थे. मनोज ने डर से फोन नहीं उठाया और न फिरौती मांगी. उस ने उसी समय फोन स्विच्ड औफ कर दिया. सुबह 4 बजे मनोज दूसरी बस पकड़ कर कानपुर पहुंचा. वहां पहुंच कर फिर से मोबाइल औन किया और बाद में उसे कानपुर के झकरकटी स्टैंड पर फेंक दिया. ऐसा इसलिए किया ताकि पुलिस सचिन की तलाश करे तो उस के मोबाइल की लोकेशन इटावा व कानपुर की मिले. पुलिस समझे कि अपहर्त्ता उसे कानपुर की तरफ से ले गए हैं. वह पुलिस को भ्रमित करना चाहते थे. पूरे घटनाक्रम के दौरान किसी ने एकदूसरे से फोन पर बात तक नहीं की, ताकि पुलिस पकड़ न सके.

दूसरे दिन 22 जून की सुबह 8 बजे जा कर हैप्पी और रिंकू ने सचिन की अस्थियां यमुना में विसर्जित कर दीं. वे लोग दोपहर 12 बजे पानी के प्लांट से सचिन की चप्पलें उठा कर जंगल में फेंक आए. बताते चलें आरोपी मनोज एक पैर से विकलांग है. उस के 2 बच्चे हैं. पिता की दुकान थी, लेकिन बंद हो गई. लौकडाउन में ढाई लाख का कर्ज हो गया था. हैप्पी सुमित का ममेरा भाई था. उस की शादी नहीं हुई है. सुमित के साथ ही काम करता है. पिता की मौत हो चुकी है. उसे रुपयों की जरूरत थी. रिंकू एक स्कूल की वैन चलाता था. लौकडाउन के कारण स्कूल बंद होने से वह भी बेरोजगार था. इसलिए वे सभी पैसों के लालच में आ गए थे.

सचिन ने बीबीए तक की पढ़ाई की थी.  वह पिता के साथ उन के कारोबार में हाथ बंटाता था. जबकि उन के पार्टनर लेखराज चौहान का बेटा हर्ष सचिन से 2 साल छोटा था और बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. वह भी पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाता था. 2 करोड़ की फिरौती के लालच में दोस्तों ने भरोसे को तारतार कर दिया. शातिरों ने अपहरण और हत्या की पूरी साजिश इस तरह रची कि पुलिस उलझ कर रह जाए. सामान्य काल की जगह वाट्सऐप काल की. फोन भी दूसरे शहर में ले जा कर फेंक दिया. सबूत मिटाने के लिए अंतिम संस्कार भी पीपीई किट में कर दिया ताकि कोई सवाल न उठाए. यहां तक कि अस्थियों को यमुना में विसर्जित कर दीं ताकि डीएनए टेस्ट भी न कराया जा सके.

पुलिस ने जुटाए सबूत लेकिन फिर भी आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बच न सके. अपहरण व हत्या के बाद फिरौती वसूलने का सारा तानाबाना सुमित व हर्ष ने ही बुना था. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए हत्यारोपियों से 7 मोबाइल, 1200 रुपए नकदी के साथ ही 2 कारें भी बरामद कीं. इस के चलते पुलिस को न तो लाश मिली न ही अस्थियां मिलीं. ऐसे में केस में मजबूत साक्ष्य ही आरोपियों को सजा दिला पाएंगे. इस के लिए पुलिस ने फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम की मदद से 28 जून के बाद 29 जून को भी अन्य साक्ष्य जुटाए. जिस पानी के प्लांट में हत्याकांड को अंजाम दिया गया, वहां से फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को सचिन का एटीएम कार्ड मिला. यह सचिन की हत्या के दौरान संघर्ष में गिर गया होगा.

इस के अलावा टीम को वहां फिंगर और फुटप्रिंट भी मिले हैं, ये आरोपियों के अलावा सचिन के हो सकते हैं. वहीं कुछ बाल भी मिले हैं. यह आरोपियों के हो सकते हैं. इन्हें फोरैंसिक साइंस लैब भेजा गया है. यहां से पुलिस ने जली हुई सिगरेट, खाली गिलास और पानी की बोतल बरामद की है.  इन पर फिंगरप्रिंट थे. इन्हें लिया गया है. वहीं पुलिस ने श्मशान घाट पर रवि वर्मा के नाम से रसीद कटवाई गई थी. पता सरयू विहार, कमला नगर का लिखाया गया था, मगर यहां कोई रहता नहीं है. पुलिस ने घाट के कर्मचारी के बयान दर्ज किए हैं. कमला नगर में जिस मैडिकल स्टोर से पीपीई किट खरीदी थी, उस के मालिक के बयान के साथ ही दुकान में लगे कैमरों के फुटेज भी लिए गए हैं.

इस के साथ ही पुलिस को कमला नगर व बल्केश्वर क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी मिल गई है, जिस में आरोपी साफ नजर आ रहे हैं. उन की लोकेशन भी है, जो केस में आरोपियों को सजा दिलाने के लिए साक्ष्य बनेंगे. आरोपियों की कार और वैन पुलिस ने बरामद कर ली है. कार में वे सचिन को ले गए थे, जबकि वैन में शव को ले कर गए थे. इस साल सचिन की शादी की तैयारी थी. उस के लिए कई रिश्ते आए थे. बात भी चल रही थी. सोचा था कि नवंबर में उस की शादी कर देंगे. बेटे की शादी कर बहू घर लाने की ख्वाहिश अब चौहान दंपति का सपना ही बन कर रह गई.

29 जून को पुलिस ने गिरफ्तार किए गए पांचों हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. Crime Kahani

 

Crime Kahani : जायदाद के लिए बड़े बेटे ने किया परिवार के चार लोगों का कत्ल

Crime Kahani : कभीकभी घर के छोटेछोटे विवादों को जब गंभीरता से नहीं लिया जाता है तो वह भयानक रूप भी ले लेते हैं. काश! बालाराम अपने बड़े बेटे गंगाराम की समस्या पर ध्यान देते तो शायद उन के घर से 4 अर्थियां न उठतीं…

गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा…अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी. दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में…’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए. गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है. इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे. टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की.

गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था. इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया. पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तन रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया. निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी.

अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी. जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया. मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी.

बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा. नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था.

18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया. आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.Crime Kahani

 

UP Crime News : प्रेमिका संग बनाए संबंध फिर चाकू मारकर किया कत्ल

UP Crime News : बीएससी में पढ़ने वाली सीमा एक होशियार लड़की थी. वह मोहम्मद कैफ से बहुत प्यार करती थी. इसी प्यार और सैक्स के चक्कर में वह एक दिन ऐसी फंसी कि..

‘‘सी मा, देखो शाम का समय है. मौसम भी मस्तमस्त हो रहा है. घूमने का मन कर रहा है. चलो, हम लोग कहीं घूम कर आते हैं.’’ लखनऊ के स्कूटर इंडिया के पास रहने वाली सीमा नाम की लड़की से उस के बौयफ्रैंड कैफ ने मोबाइल पर बात करते हुए कहा.

‘‘कैफ, अभी तो कोई घर में है नहीं, बिना घर वालों के पूछे कैसे चलें?’’ सीमा ने अनमने ढंग से मोहम्मद कैफ को जबाव दिया.

‘‘यार जब घर में कोई नहीं है तो बताने की क्या जरूरत है? हम लोग जल्दी ही वापस आ जाएंगे. जब तक तुम्हारे पापा आएंगे उस के पहले ही हम वापस लौट आएंगे. किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा.’’ कैफ को जैसे ही यह पता चला कि घर में सीमा अकेली है, वह जिद करने लगा. सीमा भी अपने प्रेमी कैफ को मना नहीं कर पाई. सीमा के पिता सीतापुर जिले के खैराबाद के रहने वाले थे. लखनऊ में इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित एक प्राइवेट कंपनी में वह शिफ्ट के हिसाब से काम करते थे. सीमा ने पिछले साल बीएससी में एडमिशन लिया था. इसी बीच कोरोना के कारण स्कूलकालेज बंद हो गए. इस के बाद वह अपने पिता रमेश कुमार के पास रहने चली आई थी. सीमा के एक छोटा भाई और एक बहन भी थी.

घर में वह बड़ी थी. इसलिए पिता की मदद के लिए उस ने पढ़ाई के साथ नादरगंज में चप्पल बनाने की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. गांव और शहर के माहौल में काफी अंतर होता है. लखनऊ आ कर सीमा भी यहां के माहौल में ढलने लगी थी. चप्पल फैक्ट्री में काम करते समय वहां कैफ नाम के लड़के से उस की दोस्ती हो गई. यह बात फैक्ट्री के गार्ड को पता चली तो वह भी उसे छेड़ने की कोशिश करने लगा. यह जानकारी जब सीमा के पिता को हुई तो उन्होंने चप्पल फैक्ट्री से बेटी की नौकरी छुड़वा दी. नौकरी छोड़ने के बाद सीमा ज्वैलरी शौप पर नौकरी करने लगी. कैफ के साथ दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. अब वह घर वालों को बिना बताए उस से मिलने जाने लगी थी. दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन चुके थे.

12 जून की शाम करीब साढ़े 7 बजे सीमा के पिता रमेश कुमार अपनी ड्यूटी पर जा रहे थे. सीमा उस समय शौप से वापस आ चुकी थी. रमेश कुमार ने सीमा को समझाते कहा, ‘‘बेटी रात में कहीं जाना नहीं. कमरे का दरवाजा बंद कर लो. खाना खा कर चुपचाप सो जाना.’’

‘‘जी पापा, आप चिंता न करें. मैं कहीं नहीं जाऊंगी. घर पर ही रहूंगी.’’

इस के बाद पिता के जाते ही कैफ का फोन आ गया और सीमा उसे मना करती रही पर उस की जबरदस्ती के आगे वह कुछ कर नहीं सकी. शाम 8 बजे के करीब कैफ सीमा के घर के पास आया और उसे बुला लिया. मां ने शाम 5 बजे के करीब बेटी से फोन पर बात की थी. उसे हिदायत दी थी कि कहीं जाना नहीं. पिता ने भी उसे समझाया था कि घर में ही रहना, कहीं जाना नहीं. इस के बाद भी सीमा ने बात नहीं मानी. वह अपने प्रेमी मोहम्मद कैफ के साथ चली गई. पिता जब अगली सुबह 8 बजे ड्यूटी से वापस घर आए तो सीमा वहां नहीं थी. उन्होंने सीमा के फोन पर काल करनी शुरू की तो उस का फोन बंद था. यह बात उन्होंने अपनी पत्नी को बताई तो बेटी की चिंता में वह सीतापुर से लखनऊ के लिए निकल गई.

इस बीच पिपरसंड गांव के प्रधान रामनरेश पाल ने सरोजनीनगर थाने में सूचना दी कि गहरू के जंगल में एक लड़की की लाश पड़ी है. लड़की के कपडे़ अस्तव्यस्त थे. देखने में ही लग रहा था कि पहले उस के साथ बलात्कार किया गया है. गले में दुपट्टा कसा हुआ था. पास में ही शराब, पानी की बोतल, 2 गिलास, एक रस्सी और सिगरेट के टुकड़े भी पड़े थे. घटना की सूचना पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर, डीसीपी (सेंट्रल) सोमेन वर्मा और एडिशनल डीसीपी (सेंट्रल) सी.एन. सिन्हा को भी दी गई. पुलिस ने छानबीन के लिए फोरैंसिक और डौग स्क्वायड टीम को भी लगाया.

इस बीच तक सीमा के मातापिता भी वहां पहुंच चुके थे. पुलिस ने अब तक मुकदमा अज्ञात के खिलाफ कायम कर के छानबीन शुरू कर दी थी. सीमा के घर वालों ने पुलिस को बताया कि मोहम्मद कैफ नाम के लड़के पर उन्हें शक है. दोनों की दोस्ती की बात सामने आई थी. पुलिस ने मोहम्मद कैफ के मोबाइल और सीमा के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक करनी शुरू की. पुलिस को कैफ के मोबाइल को चैक करने से पता चला कि उस ने सीमा से बात की थी. उस के बाद से सीमा का फोन बंद हो गया. अब पुलिस ने कैफ को पकड़ा और उस से पूछताछ की तो प्यार, सैक्स और हत्या की दर्दनाक कहानी सामने आ गई.

12 जून, 2021 की शाम मोहम्मद कैफ अपने 2 दोस्तों विशाल कश्यप और आकाश यादव के साथ बैठ कर ताड़ी पी रहा था. ये दोनों दरोगाखेड़ा और अमौसी गांव के रहने वाले थे. ताड़ी का नशा तीनों पर चढ़ चुका था. बातोंबातों में लड़की की बातें आपस में होने लगीं.  कैफ ने कहा, ‘‘ताड़ी पीने के बाद तो लड़की और भी नशीली दिखने लगती है.’’

आकाश बोला, ‘‘दिखने से काम नहीं होता. लड़की मिलनी भी चाहिए.’’

कैफ उसे देख कर बोला, ‘‘तुम लोगों का तो पता नहीं, पर मेरे पास तो लड़की है. अब तुम ने याद दिलाई है तो आज उस से मिल ही लेते हैं.’’

यह कह कर कैफ ने सीमा को फोन मिलाया और कुछ देर में वह सीमा को बुलाने चला गया. इधर आकाश और विशाल को भी नशा चढ़ चुका था. दोनों भी इस मौके का लाभ उठाना चाहते थे. उन को पता था कि कैफ कहां जाता है. ये दोनों जंगल में पहले से ही पहुंच गए और वहीं बैठ कर पीने लगे. सीमा और कैफ ने जंगल में संबंध बनाए. तभी विशाल और आकाश वहां पहुंच गए. वे भी सीमा से संबंध बनाने के लिए दबाव बनाने लगे. पहले तो कैफ इस के लिए मना करता रहा, बाद में वह भी सीमा पर दबाव बनाने लगा. जब सीमा नहीं मानी तो तीनों ने जबरदस्ती उस के साथ बलात्कार करने का प्रयास किया. अब सीमा ने खुद को बचाने के लिए शोर मचाना चाहा और कच्चे रास्ते पर भागने लगी. इस पर विशाल ने सीमा की पीठ पर चाकू से वार किया. सीमा इस के बाद भी बबूल की झडि़यों में होते हुए भागने लगी.

‘‘इसे मार दो नहीं तो हम सब फंस जाएंगे.’’ विशाल और आकाश ने कैफ से कहा.

सीमा झाडि़यों से निकल कर जैसे ही बाहर खाली जगह पर आई, तीनों ने उसे घेर लिया. ताबड़तोड़ वार करने के साथ ही साथ उस के गले को भी दबा कर रखा. मारते समय चाकू सीमा के पेट में होता हुआ पीठ में फंस गया और वह टूट गया. 15 से 20 गहरे घाव से खून बहने के कारण सीमा की मौत हो गई. पेट में चाकू के वार से सीमा का यूरिनल थैली तक फट गई थी. 2 महीने पहले जब सीमा ने मोहम्मद कैफ से दोस्ती और प्यार में संबंध बनाए थे, तब यह नहीं सोचा था कि एक दिन उसे यह दिन देखना पड़ेगा.

लखनऊ पुलिस ने एसीपी स्वतंत्र कुमार सिंह की अगुवाई में बनी पुलिस टीम को पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की. पुलिस ने मोहम्मद कैफ और उस के दोनों साथी विशाल और आकाश को भादंवि की धारा 302 में गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. UP Crime News

(कथा में सीमा और उस के परिजनों के नाम बदल दिए गए हैं

Crime Story : प्रेमिका की हत्या कर पिता को फंसाने की रची चाल

Crime Story : कृष्णा कुमारी की हत्या के बाद पुलिस को जांच में जो सबूत मिल रहे थे, उस से मामला औनर किलिंग का लग रहा था, लेकिन कृष्णा कुमारी के पिता और भाई खुद को बेकसूर ही बताते रहे. इसी दौरान कृष्णा कुमारी के प्रेमी संजय चौहान से पूछताछ की तो न सिर्फ केस का खुलासा हो गया बल्कि इस की कहानी भी प्यार के इर्दगिर्द की निकली…

30 मई, 2021 की सुबह छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के गांव तुमान में दिगपाल सिंह वैष्णव जब अपनी कोरा बाड़ी की ओर हमेशा की तरह दातून कर के चहलकदमी करते हुए पहुंचा था तो उस ने देखा कि उस की बेटी कृष्णा बेसुध पड़ी हुई है. गले में साड़ी का फंदा फंसा हुआ है. दिगपाल यह देखते ही घबरा गया. उस ने दातून एक तरफ फेंकी और तेजी से बेटी कृष्णा के पास पहुंच गया. उस ने सब से पहले उस के गले में पड़ी साड़ी की गांठ खोल दी. उस ने अपनी बेटी को खूब हिलायाडुलाया. लेकिन उस में कोई हरकत नहीं हुई तो वह घबरा गया. उस के आंसू टपकने लगे. उसे लगा कि कहीं कृष्णा ने आत्महत्या तो नहीं कर ली है या फिर उस की यह हालत किस ने की है.

वह समझ गया कि कृष्णा की सांसें थम चुकी हैं. दिगपाल चिल्लाता हुआ अपने घर की ओर भागा, ‘‘कृष्णा की मां… कृष्णा की मां, देखो यह कैसा अनर्थ हो गया है. किसी ने हमारी बेटी को मार कर घर के पिछवाड़े बाड़ी में फेंक दिया है.’’

यह सुन कर दिगपाल की पत्नी भी रोने लगी. कहने लगी कि किस ने मार दिया बेटी को. थोड़ी ही देर में यह खबर तुमान गांव में फैल गई. इस के बाद तो दिगपाल के घर के बाहर लोगों की भीड़ जुटने लगी. उसी समय गांव के सरपंच सचिन मिंज ने कटघोरा थाने फोन कर के घटना की जानकारी थानाप्रभारी अविनाश सिंह को दे दी. थानाप्रभारी अविनाश सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हुए और सुबह लगभग 8 बजे तुमान गांव पहुंच कर घटनास्थल का मुआयना करने में जुट गए. थानाप्रभारी ने घटनास्थल से ही अनुविभागीय अधिकारी (पुलिस) रामगोपाल कारियारे, एसपी अभिषेक सिंह मीणा को घटना की जानकारी दे दी.

कुछ ही देर में कोरबा से डौग स्क्वायड टीम वहां पहुंच गई. जांच के लिए खोजी कुत्ता बाघा को मृत शरीर के पास ले जा कर अपराधी को पकड़ने के लिए छोड़ दिया गया. यह अजूबा पहली बार गांव वालों ने देखा. जब खोजी कुत्ता अपराधी को पकड़ने के लिए शव को सूंघ रहा था तो लोग यह मान रहे थे कि अब जल्द ही वह आरोपी को पकड़ लेगा. मगर लोगों ने आश्चर्य से देखा कुत्ता इधरउधर घूमते हुए मृतका कृष्णा कुमारी के पिता दिगपाल वैष्णव और भाई राजेश के आसपास मंडराने लगा. यह देखते ही थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने कृष्णा के पिता दिगपाल और राजेश को हिरासत में लेने का निर्देश दिए.

दिगपाल वैष्णव स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कंपाउंडर था. क्षेत्र में उस की अच्छी इज्जत थी. इसलिए वह थानाप्रभारी से गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब, मैं भला क्यों अपनी ही बेटी को मारूंगा. आप यकीन मानिए, मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है.’’

वह बारबार कह रहा था, मगर 2 सिपाहियों ने उसे हिरासत में ले लिया और एक कमरे में ले जा कर के उस से इकबालिया बयान देने को कहा. तब वह आंसू बहाते हुए हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है, कृष्णा मुझे जान से भी ज्यादा प्यारी थी, मैं उसे नहीं मार सकता.’’

इस पर अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘देखो, पुलिस के सामने सचसच बता दो, जितना हो सकेगा हम तुम्हारे साथ रियायत करेंगे. खोजी डौग गलत नहीं हो सकता, यह जान लो.’’

इस पर आंसू बहाते हुए दिगपाल वैष्णव ने कहा, ‘‘साहब, मेरा यकीन मानिए मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. मैं तो  सुबह जब गया तो उसे मृत अवस्था में देखा था और उसे अपनी गोद में ले कर के रोता रहा था.’’

दिगपाल को याद आया कि यही कारण हो सकता है कि कुत्ते ने उसे आरोपी माना है. जब यह बात उस ने जांच अधिकारी अविनाश सिंह को बताई तो उन्हें समझ में आया. उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारी बात सही हो सकती है, मगर यह जान लो कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं. हमारी जांच में और भी बहुत सारे ऐसे सबूत हमें आखिर मिल ही जाएंगे, जिस से यह सिद्ध हो जाएगा कि आरोपी कौन है. अच्छा है कि अभी भी अपना अपराध कबूल कर लो.’’

‘‘नहींनहीं साहब, मैं ने यह कर्म नहीं किया है.’’ दिगपाल ने कहा.

विवेचना अधिकारी और अन्य पुलिस जो जांच कार्य में लगी हुई थी, ने यह निष्कर्ष निकाला कि हो सकता है सुबह जब कृष्णा की लाश दिगपाल ने देखी तो उसे स्पर्श किया होगा. शायद यही कारण है कि खोजी कुत्ता उसे आरोपी मान रहा है. इस तरह जांच आगे एक नई दिशा में आगे बढ़ने लगी. जांच में पता चला कि पिछले लंबे समय से कृष्णा कुमारी का प्रेमसंबंध पास के गांव पुटुंवा निवासी संजय चौहान (23 साल) नामक युवक से था और उन के संबंध इतने मजबूत थे कि कृष्णा कुमारी ने संजय चौहान को एक बाइक और मोबाइल भी गिफ्ट किया था. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने गौर किया. जब संजय चौहान घटनास्थल पर पहुंचा था तो उस समय उस का चेहरा उतरा हुआ था और आंखें लाल थीं, ऐसा लग रहा था कि वह बहुत रोया हो.

अविनाश सिंह ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने उन के सामने अपना मोबाइल रख दिया, जिसे देख कर थानाप्रभारी चौंक गए. उस मैसेज से यह बात स्पष्ट थी कि हत्यारा दिगपाल वैष्णव ही है. संजय चौहान के मोबाइल में कृष्णा कुमारी का  मैसेज था, जिस में लिखा था, ‘आज की रात मैं नहीं बच पाऊंगी, मेरे पिता मुझे मार डालेंगे, मुझे बचा लो…’

यह मैसेज यह बता रहा था कि हत्या दिगपाल ने ही की है. इस सबूत के बाद अविनाश सिंह ने दिगपाल को फिर तलब किया और उसे मैसेज दिखाते हुए कठोर शब्दों में कहा, ‘‘दिगपाल, अब तुम सचसच बता दो, अब हमारे हाथ में सबूत आ गया है. यह देखो, तुम्हारी बेटी ने कल रात संजय को यह मैसेज किया था. बताओ, रात को क्याक्या हुआ था.’’

यह सुन कर दिगपाल भयभीत होते हुए बोला, ‘‘साहब, क्या मैसेज लिखा है मुझे बताया जाए.’’

इस पर थानाप्रभारी ने संजय के मोबाइल में लिखा हुआ मैसेज उसे पढ़ कर सुना दिया. उसे सुन कर वह आंसू बहाने लगा और सिर पकड़ कर बैठ गया. थानाप्रभारी ने थोड़ी देर बाद उस से कहा, ‘‘अब बताओ, तुम स्वीकार करते हो कि कृष्णा की हत्या तुम्हीं ने की है. हमें यह जानकारी भी मिली है कि तुम उस का विवाह दूसरी जगह करने वाले थे, जिस से वह बारबार मना भी कर रही थी. मगर इस बात पर घर में विवाद भी चल रहा था. इन सब बातों को देखते हुए स्पष्ट है कि हत्या कर के तुम्हीं लोगों ने की है.’’

दिगपालरोआंसा हो गया. उस ने कहा, ‘‘साहबजी, मैं फिर हाथ जोड़ कर बोल रहा हूं कि कृष्णा मेरी जान से भी प्यारी थी. मैं ने उसे नहीं मारा है.’’

यह सुन कर जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘तुम चाहे जितना भी कहो, सारे सबूत चीखचीख कर तुम्हें हत्यारा बता रहे हैं. साक्ष्य तुम्हारे खिलाफ हो चुके हैं. तुम बताओ, तुम्हारे पास ऐसा क्या सबूत है, जिस से यह सिद्ध हो सके कि तुम ने बेटी की हत्या नहीं की.’’

यह सुन कर दिगपाल बोला, ‘‘मैं क्या बताऊं मेरे पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. मगर मैं यही कहूंगा कि मैं ने अपनी बेटी को नहीं मारा है.’’

इस पर अविनाश सिंह ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम पुलिस को चाहे कितना ही चक्कर पर चक्कर लगवाओ, मैं यह जान चुका हूं कि कृष्णा का मर्डर तुम्हारे ही हाथों से हुआ है. तुम बड़े ही शातिर और चालाक हत्यारे हो.’’

थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने वहां मौजूद अपने स्टाफ से कहा, ‘‘इसे हिरासत में ले कर  थाने ले चलो, बापबेटे से आगे की पूछताछ वहीं पुलिसिया अंदाज में करेंगे.’’

छत्तीसगढ़ का औद्योगिक जिला कोरबा ऊर्जा राजधानी के रूप में जाना जाता है. इस के अलावा यह कोयला खदानों के कारण एशिया भर में विख्यात है. कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर तुमान गांव स्थित है. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि तुमान छत्तीसगढ़ यानी दक्षिण कौशल की प्रथम राजधानी हुआ करती थी. यहां का एक रोमांचक इतिहास अभी भी लोगों को पर्यटनस्थल के रूप में तुमान की ओर आकर्षित करता है. इतिहास के अनुसार, सन 850-1015 के मध्य कलचुरी राजाओं का शासन था. वर्तमान जिला बिलासपुर की रतनपुर नगरी  राजा रत्नसेन प्रथम का प्राचीन काल में यहां शासन था और हैहय वंश ने यहां अपनी राजधानी बनाई थी. यहीं से पूरे छत्तीसगढ़ का राजकाज संभाला जाता था.

थाना कटघोरा में जब दिगपाल और उन के बेटे राजेश से पूछताछ की गई तो वह एक ही बात कहते रहे कि उन्होंने कृष्णा को नहीं मारा है… नहीं मारा है. मगर विवेचना के बाद सारे सबूत यही कह रहे थे कि मामला सीधेसीधे औनर किलिंग का है. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि कृष्णा कुमारी की हत्या पिता दिगपाल और भाई राजेश ने ही की है. जांच अधिकारी अविनाश सिंह यही सब सोचते हुए अपने कक्ष में बैठे कुछ दस्तावेजों को देख रहे थे कि थोड़ी देर में एक एसआई ने उन के सामने मृतका कृष्णा के एक दूसरे प्रेमी नेवेंद्र देवांगन को सामने ला कर खड़ा कर दिया.

कटघोरा निवासी नेवेंद्र देवांगन जोकि रायपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुका था. कृष्णा उस से भी कुछ समय से वाट्सऐप पर चैट यानी बातचीत करती थी. नेवेंद घबराया हुआ सामने खड़ा था. अविनाश सिंह ने उस की आंखों में देखते हुए  कहा, ‘‘कृष्णा कुमारी को तुम कब से जानते हो? सब कुछ सचसच बताओ, कोई भी बात छिपाना नहीं. देखो तुम पढ़ेलिखे नौजवान हो और मामला हत्या का है.’’

यह सुन कर उस ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, लगभग एक महीने से एक लूडो गेम में खेलते हुए कृष्णा से मेरा परिचय हुआ था. इस के बाद हमारी अकसर मोबाइल पर ही बात होती थी. मैं कभी उस से आमनेसामने नहीं मिला हूं. मगर हां, बीती रात उस का यह मैसेज आया था.’’ कह कर उस ने अपना मोबाइल अविनाश सिंह के समक्ष रख दिया. थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने देखा, मैसेज जैसा संजय चौहान के मोबाइल में था, ठीक वैसा ही नेवेंद्र के मोबाइल में भी आया था. सब कुछ साफ था. अब तो अविनाश सिंह के सामने पूरा चित्र स्पष्ट था कि हत्या औनर किलिंग में दिगपाल और उस के बेटे ने ही की है.

उन्होंने नेवेंद्र का पूरा बयान रिकौर्ड किया. उच्च अधिकारियों को सारी जानकारी से अवगत कराते हुए बताया कि मामला लगभग स्पष्ट हो चुका है हत्या बाप और बेटे ने ही की है. दिगपाल और राजेश को कृष्णा कुमारी के हत्या के आरोप में पुलिस न्यायालय में पेश करने की तैयारी कर रही थी कि इस बीच अविनाश सिंह के दिमाग में एक आइडिया कौंध गया. उन्होंने दिगपाल और राजेश को फिर से अपने कक्ष में बुलाया और सामने बैठा कर के पानी और चाय पिलवाई और फिर धीरे से कहा, ‘‘देखो दिगपाल, तुम जिन परिस्थितियों में थे, वैसे में कोई भी बेटी की करतूत को बरदाश्त नहीं कर सकता. मैं जानता हूं, गलती तुम से हो गई है.

यह मैं भलीभांति समझ रहा हूं. अच्छा है कि पुलिस को सहयोग करो और सारी परिस्थितियों को हमारे सामने साझा करो, ताकि मैं तुम्हारी ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकूं.’’

यह एक पुलिसिया पासा था. मगर इस के बाद भी दिगपाल ने भीगी पलकों से कहा, ‘‘साहब, मैं अपनी बेटियों की कसम खा कर कहता हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. अगर यह काम मुझ से हुआ होता तो मैं अवश्य आप को बता देता.’’

कृष्णा कुमारी के भाई राजेश से भी अलग से पूछताछ की गई. उस ने भी साफसाफ यही कहा कि उस ने कृष्णा को नहीं मारा है. अब अविनाश सिंह के सामने एक ऐसा मोड़ था, जहां से रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. उन्हें बापबेटे की बातों में सच्चाई का एहसास हो रहा था. मगर लाख टके का सवाल यह था कि आखिर जब इन लोगों ने हत्या नहीं की तो फिर हत्यारा कौन है? कृष्णा की हत्या में सारे साक्ष्य साफ कह रहे थे कि हत्या पिता और पुत्र ने ही की है. वह कुछ समय तक अपने कक्ष में सिर पर हाथ रख कर आंख मूंद कर बैठ गए और सोचते रहे कि आखिर क्या हो सकता है, आखिर कृष्णा की हत्या कौन कर सकता है?

जांच अधिकारी के दिमाग में अब एक ही संदिग्ध सामने था और वह था कृष्णा का प्रेमी संजय चौहान. अगर कोई हत्या कर सकता था तो वह संजय हो सकता था. मगर उस के खिलाफ कोई भी सबूत पुलिस के पास नहीं था. इस के बावजूद संजय चौहान को उन्होंने तलब किया और उस से एक बार फिर पूछताछ शुरू की गई. 23 वर्षीय संजय चौहान ने बताया कि लगभग 8 साल से उस के कृष्णा के साथ शारीरिक संबंध हैं. लेकिन अलगअलग जाति के होने के कारण उन का विवाह नहीं हो पाया था. मगर जल्द ही वे आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में विवाह भी करने वाले थे. उस ने जोर दे कर यह भी कहा कि हमारे विवाह में सब से बड़ी बाधा कृष्णा के पिता दिगपाल वैष्णव थे, जो उस का विवाह कहीं दूसरी जगह करने के लिए अकसर कृष्णा पर दबाव डालते थे, उस से झगड़ा करते थे.

पुलिस के सामने एक बार फिर यह तथ्य भी सामने आ गए कि हत्या दिगपाल और उस के भाई राजेश ने ही की है. अविनाश सिंह के समक्ष दिगपाल का मासूम चेहरा घूम रहा था, जो बड़े ही दुख के साथ यह कह रहा था कि उस ने हत्या नहीं की है. अविनाश सिंह ने अंतिम जांच प्रक्रिया के तहत मनोवैज्ञानिक तरीके से संजय चौहान से पूछताछ करने का निर्णय किया और 3 अलगअलग अधीनस्थ अधिकारियों को कहा कि इस से थोड़ीथोड़ी देर में मिलना है और इस के बयान लेना है. हमें देखना है यह बयान में क्या कहता है. संजय चौहान ने एक एसआई से जांच के दौरान कहा, ‘‘कृष्णा और उस का बहुत पुराना प्रेम संबंध है.’’

एसआई ने जब उस से पूछा कि उस ने घटना के दिन अपना फोन बंद क्यों रखा था. इस के जवाब में उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी उस रात तबीयत ठीक नहीं थी.’’

एक एएसआई से जब संजय का अलग से सामना हुआ तो बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘साहब, उस दिन मोबाइल की बैटरी लो हो गई थी. इसलिए मोबाइल बंद हो गया था.’’

जबकि तीसरे अधिकारी को उस ने अपने बयान में कहा, ‘‘सर, मोहल्ले में झगड़ा होने के कारण मैं ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.’’

तीनों अधिकारियों ने संजय के तीनों अलगअलग बयानों के बारे में बताया तो वह खुशी से उछल पड़े और बोले कि अब बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है. कृष्णा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि संजय ने ही की है. उन्होंने संजय को बुला कर बातचीत की तो उन्होंने यह नोट किया कि बात करते समय वह उन से आंखें चुरा लेता. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने उस से पूछा, ‘‘मैं ने गौर किया कि जब तुम सुबह घटनास्थल पर आए थे तो तुम्हारी आंखें लाल थीं. इस का क्या कारण है?’’

इस पर संजय ने कहा, ‘‘साहब मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. रात को मैं सो भी नहीं पाया था.’’

अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारे मोबाइल फोन की जांच करवाई है और यह जानकारी सामने आई है कि तुम कभी भी अपना मोबाइल रात को बंद नहीं करते थे. फिर उस रात आखिर मोबाइल क्यों बंद किया.

‘‘अगर मोबाइल बंद भी कर दिया तो फिर सुबह उस में सारे मैसेज को तुम ने डिलीट क्यों किया था? हमें अब विश्वास है कि हत्या तुम ने ही की है. सबूत हमें मिल चुका है, तुम सचसच बताओ. इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

इस पर संजय चौहान गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब, कृष्णा की हत्या की बात सुन कर मैं घबरा गया था, इसलिए अपने मोबाइल का सारा मैसेज डिलीट कर दिया था.’’

संजय चौहान को घूरते हुए उन्होंने कहा, ‘‘जब तुम घर में थे तो तुम्हें कैसे पता चल गया कि कृष्णा की हत्या हुई है, बिना देखे जाने?’’

संजय चौहान ने घबरा कर आंखें चुराते हुए कहा, ‘‘मैं ने सुना तो मुझे लगा कि जरूर परिवार वालों ने उसे मार कर फेंक दिया है.’’

‘‘देखो, तुम पुलिस को धोखा नहीं दे सकते, तुम ने बारबार अपना बयान बदला है और तीनों बातें सही नहीं हो सकतीं. अब साफसाफ बता दो, हम ने तुम्हारे मोबाइल की काल डिटेल्स भी चैक करवाई है.’’ थानाप्रभारी ने कहा. अब संजय चौहान टूट गया और बोला, ‘‘सर…गलती मुझ से हुई है. मैं बताता हूं उस रात क्या हुआ था.’’

और उस ने जो कहानी बताई, उस के अनुसार कृष्णा कुमारी और वह दोनों आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में जल्द ही शादी करने वाले थे कि नेवेंद्र की उन के बीच एंट्री हुई. अकसर कृष्णा नेवेंद्र से मोबाइल पर बात करती थी, एक दिन जब वह रात को कृष्णा से मिलने गया तो मोबाइल मैं उस ने नेवेंद्र का चैट पढ़ लिया. चैट पढ़ कर उस का दिमाग घूमने लगा. उस ने उसी समय स्वयं कृष्णा के रूम में रात को जब वाट्सऐप पर नेवेंद्र से बातें की तो उस के सामने खुलासा हो गया कि कृष्णा का उस से कुछ ज्यादा ही गहरा संबंध हो चुका है. दोनों आपस में अश्लील बातें भी किया करते थे.

इस पर एक दिन कृष्णा से झगड़ा कर के संजय चौहान ने कहा, ‘‘सारी सच्चाई मैं जान गया हूं. तुम अगर अब आगे उस के साथ बात करोगी तो ठीक नहीं होगा.’’

इस पर कृष्णा कुमारी ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं किसी की जायजाद नहीं हूं. ऐसा है तो अभी से संबंध खत्म समझो.’’

संजय को भी गुस्सा आ गया. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘कृष्णा, अगर तुम मेरी नहीं होगी तो मैं किसी की तुम्हें नहीं होने दूंगा, मैं तुम्हें मार दूंगा.’’

संजय ने बताया कि एक टीवी सीरियल में उस ने ऐसी ही कहानी देखी थी, वही सीरियल देख कर उस ने प्रेमिका कृष्णा की हत्या कर उस के पिता को फंसाने की योजना बनाई. योजनानुसार, 29 मई 2021 की रात को जब संजय चौहान कृष्णा से  मिलने गया तो अपनी बाइक को दूर झाडि़यों के पास खड़ी कर गया था और पैदल बिना चप्पल के धीरेधीरे उस के घर की ओर गया. रात को लगभग 12 बजे उस ने एक पत्थर इशारे के रूप में कृष्णा की छत पर फेंका. बाद में थोड़ी देर में कृष्णा आई और दोनों एक कमरे में बैठ कर के आपस में बातचीत कर रहे थे. इसी तरह से वह पहले भी कृष्णा से मिलता था.

संजय ने उसे फुसला कर कहा, ‘‘कृष्णा, तुम एक मैसेज लिखो कि मुझे मेरे पिता मार डालेंगे, मुझे बचा लो. और यह मैसेज मुझे और नेवेंद्र को भेज दो.’’

कृष्णा ने विश्वास में आ कर ऐसा ही किया. बाद में कृष्णा ने वह मैसेज अपने फोन से डिलीट कर दिया. आगे बातों ही बातों में जब उसे यह समझ में आया कि कृष्णा अब उस के हाथ से पूरी तरह निकल चुकी है तो उस ने वहीं पास में रखी हुई एक साड़ी उस के गले में डाल कर उस का गला घोंट दिया फिर लाश उठा कर के बाड़ी में फेंक कर अपने घर चला गया. पुलिस ने संजय चौहान के इकबालिया बयान के बाद उसे कृष्णा कुमारी वैष्णव की हत्या के आरोप में 31 मई, 2021 को भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत गिरफ्तार कर लिया. फिर उसे प्रथम न्यायिक दंडाधिकारी, कटघोरा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Crime Story

 

 

Crime Story Hindi : बेटी और प्रेमी संग मिलकर कर डाला पति का कत्ल

Crime Story Hindi : लौकडाउन में पति अशोक घर पर रहा तो उस की पत्नी राजबाला की परेशानी बढ़ गई, क्योंकि पति के रहते हुए वह प्रेमी वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू से नहीं मिल पा रही थी. प्रेमी के सिंदूर के लिए बेटी शीतल के साथ मिल कर राजबाला ने इस का ऐसा रास्ता निकाला कि…

17 मई की शाम करीब साढ़े 5 बजे थे जब दिल्ली में द्वारका सेक्टर 29 से सटे छावला के थाने के टेलीफोन की घंटी बजी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत फाइल समेटते हुए अपना हाथ टेलीफोन का रिसीवर उठाने के लिए आगे बढ़ाया. जैसे ही ड्यूटी औफिसर ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से किसी ने घबराते हुए बोला, ‘‘छावला पुलिस स्टेशन?’’

ड्यूटी औफिसर, ‘‘मैं छावला थाने से बोल रहा हूं. बताइए आप क्या कहना चाहते हैं?’’ ड्यूटी औफिसर ने कहा.

‘‘साहब, निर्मलधाम के पास सड़क किनारे एक आदमी की लाश पड़ी है. मैं यहां से गुजर रहा था तो मैं ने देखा. आप यहां आ कर देख लीजिए.’’

ड्यूटी औफिसर ने फोन के रिसीवर को अपने दांए कंधे और कान के सहारे दबाया, अपने दोनों हाथों को आजाद किया और टेबल पर कहीं पड़े नोट्स वाली डायरी ढूंढने लगे. वह लगातार फोन पर उस राहगीर से वारदात की घटना के बारे में पूछ रहे थे और डायरी ढूंढ रहे थे. टेबल पर बिखरे सारे सामान को उलटने पुलटने के बाद जब डायरी नहीं मिली तो एक फाइल के पीछे ही उन्होंने वारदात की जगह समेत बाकी जरूरी जानकारियां लिख डालीं. ड्यूटी औफिसर ने उस राहगीर को वारदात की जगह से कहीं भी हिलने से मना कर दिया और फोन काट दिया. ये सारी जानकारी ड्यूटी औफिसर ने उस समय थाने में मौजूद थानाप्रभारी राजवीर राणा को दी. राजवीर राणा बिना किसी देरी के थाने में मौजूद स्टाफ को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां पहुंचते ही पुलिस की टीम ने उस सुनसान सी सड़क के एक किनारे पर एक बाइक खड़ी देखी. बाइक के बिलकुल बगल में खून से लथपथ एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. लाश को देखते ही वहां मौजूद पुलिस टीम चौकन्नी हो गई और सबूत जमा करने के मकसद से घटनास्थल के इर्दगिर्द फैल गई. थानाप्रभारी राजवीर राणा जब लाश का मुआयना करने के लिए बौडी के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस के बदन पर किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. जो साफ दिखाई दे रहे थे. उन्होंने लाश के अगलबगल नजर घुमाई तो एक मोबाइल फोन वहीं पास में पड़ा था, जो कि संभवत: मरने वाले शख्स का रहा होगा. रात होने को थी.

मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने बिना किसी देरी के बाइक और मोबाइल जब्त कर लिया और लाश की काररवाई आगे बढ़ाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम के आने का इंतजार करने लगे. उस सड़क से पैदल आने जाने वाले लोगों ने पुलिस और वहां मौजूद लाश को देख कर घटनास्थल पर जमावड़ा लगा दिया. सब टकटकी लगाए पुलिस को अपना काम करते देख आपस में फुसफुसाहट करने लगे. जब वहां मौजूद पुलिस ने आसपास के मूकदर्शक बने लोगों से लाश की पहचान करने के लिए पूछताछ की तो कुछ लोगों ने लाश की शिनाख्त करते हुए कहा कि इस का नाम अशोक कुमार है और यह पेशे से टैक्सी ड्राईवर है.

तब तक मौके पर क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम भी आ पहुंची. टीम ने अपना काम शुरू किया. उन्होंने सब से पहले लाश की फोटोग्राफी की. उन्होंने सबूत के तौर पर घटनास्थल से खून लगी मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर लिए. यह सब काम कर लेने के बाद थानाप्रभारी राजवीर राणा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मौर्चरी भेज दिया. सारे काम निपटा लेने के बाद पुलिस की टीम थाने लौट आई तथा इस केस के संबंध में काम आगे बढ़ाने लगी. पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी राजवीर राणा ने स्वयं संभाली. केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए थानाप्रभारी राणा ने सब से पहले घटनास्थल से बरामद किए गए मोबाइल फोन को निकलवाया. यह फोन टूटा नहीं था. सिर्फ बैटरी चार्जिंग खत्म होने की वजह से बंद हो गया था.

उस की काल डिटेल्स निकलवाई और देखा कि आखिरी बार एक नंबर से अशोक कुमार को कई बार काल की गई थी. इस के कुछ देर बाद ही अशोक कुमार की हत्या हो गई थी. शक की सूई अब इसी आखिरी नंबर पर आ कर रुक गई थी. राजवीर राणा ने अपने फोन से इस नंबर को डायल किया तो दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज आई. थानाप्रभारी ने पहले अपना परिचय दिया और उस के बाद उस महिला से अशोक कुमार के रिश्ते के बारे में पूछा. महिला ने अपना नाम शीतल और खुद को अशोक कुमार की बेटी बताया. राजवीर ने फोन पर बड़े दु:ख के साथ शीतल को बताया कि उस के पिता सड़क दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो चुके हैं, यह जानने के बाद शीतल उसी समय ही बिलखने लगी.

उन्होंने उस से उस की मां के बारे में पूछा तो शीतल ने अपनी मां राजबाला से उन की बात करा दी. थानाप्रभारी ने राजबाला को अशोक की मौत की खबर देते हुए उन से शीघ्र ही थाने पहुंचने को कहा 2-3 घंटे बाद जब राजबाला थाने पहुंची तो वह राजवीर राणा को देखते ही फफकफफक कर रोने लगी. अपने पति की हत्या की खबर सुन कर वह आहत थी. राजवीर राणा ने राजबाला को हौसला रखने को कहा और उस से उस के पति से किसी से साथ दुश्मनी होने के बारे में पूछा. राजबाला ने रोते हुए कहा कि अशोक की किसी के साथ भी कोई दुश्मनी नहीं थी. राजबाला से बात करते समय थानाप्रभारी राजवीर राणा को उस की बातों से ऐसा नहीं लग रहा था कि उसे पति की मौत का दुख है. बेशक राजबाला राजवीर राणा के सामने रो रही थी और दुखी दिखाई दे रही थी. लेकिन राजवीर को राजबाला पर शक हो चुका था.

राजबाला के आंसू घडि़याली लग रहे थे. दाल में कहीं तो कुछ काला जरुर था, जिस का पता लगाना जल्द से जल्द जरुरी था. आखिर एक व्यक्ति का कत्ल जो हुआ था. राजबाला से पूछताछ खत्म होने पर वह अपने घर के लिए रवाना हो गई और पीछे कई तरह के शक और सवाल छोड़ गई. इन सभी शकों को दूर करने के लिए और इस मामले से जुडे़ सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए थानाप्रभारी ने शीतल और राजबाला की काल डिटेल्स मंगवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स को बेहद बारीकी से परखी और उस की जांच की तो वह बेहद हैरान रह गए.

काल डिटेल्स से उन्हें यह पता लगा कि शीतल जिस समय अशोक को लगातार काल कर रही थी उस के ठीक बाद उस ने एक अन्य नंबर पर काफी देर तक बातचीत की थी. यह सब देख कर पुलिस ने यह अनुमान लगाया कि यदि इस मामले में शीतल को थोडा ढंग से कुरेदा जाए तो शायद इस केस में एक और लीड मिल सकती है. राजवीर ने बिना देरी किए फिर से एक बार राजबाला और शीतल को थाने बुला लिया. उन्होंने इस बार दोनों से अलगअलग पूछताछ की. उन्होंने पहले शीतल से इस घटना के बारे में विस्तार से पूछा. शीतल का बयान लेने के बाद उन्होंने राजबाला से इस मामले में फिर से पूछताछ की. क्रास पूछताछ में दोनों की चोरी पकड़ी गई.

दोनों के बयान एक दूसरे से अलग थे. जब राजवीर राणा ने दोनों को कानून का थोड़ा डर दिखा कर उन पर दबाव बनाया तो शीतल ज्यादा देर टिक नहीं सकी. शीतल ने रोतेबिलखते, अपने हाथ से अपना सिर पीटते हुए अपनी मां राजबाला और उस के प्रेमी वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू के साथ साजिश रच कर अपने पिता की हत्या कराने की बात कबूल कर ली. यह सब सुनते ही बेटी के सामने राजबाला का चेहरा पीला पड़ गया. उसे जैसे न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रहा था. थाने में शीतल के सामने राजबाला अपनी बेटी को घूरे जा रही थी. वह उसे ऐसे घूर रही थी जैसे मानो अगर उसे मौका मिलता तो वह वहीं पर शीतल का भी कत्ल कर बैठती.

शीतल द्वारा जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. फिर राजबाला की निशानदेही पर उस के प्रेमी वीरेंद्र को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने अशोक की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. वीरेंद्र के बताए हुए पते पर जा कर पुलिस टीम ने अशोक कुमार की हत्या में इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू और उस की कार बरामद कर ली. तीनों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में अशोक कुमार की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो सनसनीखेज दास्तान सामने आई, कुछ इस तरह थी—

अशोक कुमार दिल्ली के नजफगढ़ के नजदीक भरथल गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस का 3 सदस्यों का छोटा परिवार था जिस में अशोक, उस की पत्नी राजबाला और बेटी शीतल ही थी. अशोक की कमाई का जरिया उस की टैक्सी थी. वह बेटी शीतल की शादी जाफरपुर कला के पास इशापुर गांव के रहने वाले हिमांशु से कर चुका था. शीतल अपने पति के साथ बेहद खुश थी. बेटी की शादी के बाद अशोक के सिर पर अब कोई और जिम्मेदारी नहीं थी. लेकिन पिछले साल कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में लौकडाउन लगा तो ज्यादातर लोगों की तरह अशोक भी अपने घर में कैद हो कर रह गया. उस का काम न के बराबर रह गया. घर पर रहने पर अशोक बहुत ज्यादा परेशान नहीं था.

अशोक को महसूस हुआ कि वैसे भी अपने काम के दौरान वह अकसर अपने घर से बाहर ही रहता है, ऐसे में न जाने कितने अरसे बाद उसे इतने लंबे समय के लिए घर में रहना नसीब हुआ है. अपने काम से हमेशा बाहर रहने वाले व्यक्ति को जब घर में कैद होना पड़ जाए तो जाहिर सी बात है कि वह घर की हर एक चीज को बारीकी से परखता है, गौर करता है. ऐसे ही लौकडाउन के एक दिन अशोक घर का सामान लेने के लिए गांव में निकला तो दुकानदार से बातचीत के दौरान उस ने जो सुना उस से उस के होश ही उड़ गए. दुकानदार ने कहा, ‘‘क्या भई अशोक. मजा आ रहा है घर में कैद हो कर?’’

‘‘कैद होना किस को अच्छा लगता है भला. अब समस्या सिर पर बैठी है तो हम बस उसे झेलने को मजबूर हैं. घर में रहने के अलावा और कुछ कर भी तो नहीं सकते.’’ अशोक बोला.

‘‘अब तो तुम्हारी महरिया भी तुम्हारे साथ कैद हो गई होगी. अब तो लोग आ जा भी नहीं सकते तुम्हारे घर. दुकानदार ने जोर देते हुए कहा.’’

‘‘वो घर में कैद हो गई…? क्या मतलब. और घर में लोगों के आने की क्या बात कह रहे हो.’’ अशोक भौंहें चढ़ाते हुए बोला.

दुकानदार ने धीमी, दबी आवाज में कहा, ‘‘अरे वो तो लौकडाउन लग गया तब जा कर तुम्हारी महरिया घर पर रुकने को मजबूर है. नहीं तो तुम्हारे घर से निकलते ही तुम्हारी महरिया आशिकी करने निकल जाती थी.’’

‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो. कौन है उस का आशिक?’’ अशोक ने गुस्से से पूछा.

दुकानदार दबी आवाज में बोला, ‘‘अरे ढिल्लू का नाम सुना है न तुम ने? वीरेंद्र का? वही तो है जो शीतल की मां के साथ आशिकी करता फिरता है. यह बात तो पूरे गांव वालों को पता है. चाहे तो पूछ लो.’’

ये सब सुनते ही अशोक के दाएं हाथ में थामी पौलिथिन थैली छूट गई. थैली फटने से चीनी, आटा, दाल और घर का कुछ और सामान नीचे पथरीली सड़क पर गिर कर फैल गया. अशोक को इस बात पर जितना सदमा लगा था उस से कहीं ज्यादा उसे इस बात को सुन कर गुस्सा आ रहा था. लोग उस की पत्नी राजबाला और गांव के बदमाश वीरेंद्र के बारे में उलटी सीधी बातें कर रहे थे. दुकानदार से यह सब सुन कर उस ने 2-4 और लोगों से इस बारे में पूछताछ की. हर किसी ने दबी आवाज में अशोक को वही बताया जो कि उस दुकानदार ने बताया था. दरअसल 43 वर्षीय वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू भरथल का ही निवासी था. वीरेंद्र उस इलाके का नामचीन बदमाश था. दिल्ली के कई थानों में उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. एक तरह से जेल उस का दूसरा घर था.

लोगों के अनुसार जब अशोक घर पर नहीं रहता था तब उस के पीठ पीछे वीरेंद्र राजबाला के साथ गुलछर्रे उड़ाता था. अशोक ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजबाला से इस बारे में पूछा. लेकिन राजबाला ने पति की बात से कन्नी काट ली. उस ने उस की बात से साफ इनकार कर दिया. लेकिन उस दिन के बाद राजबाला अशोक की नजरों का ज्यादा देर तक सामना नहीं कर पाई. राजबाला के मोबाइल पर जब कभी भी वीरेंद्र का फोन आता तो वह पति से दूर जा कर बात करती, जब अशोक उस से पूछता कि किस का फोन आया था तो वह रिश्तेदार होने का बहाना बनाने लगती. यह सब कुछ देख कर अशोक को यह यकीन जरूर हो गया कि दाल में जरूर कुछ काला है.

अकसर पति के घर पर रहने से पत्नी को खुशी होती है लेकिन अशोक के घर पर होने से राजबाला की खुशियों पर मानो बादल छा गए थे. राजबाला वीरेंद्र से मिलने के लिए तड़पने लगी. उसे अपने पति से ज्यादा वीरेंद्र पसंद था. वीरेंद्र के साथ मां की आशिकी के किस्से बेटी शीतल से भी नहीं छिपे थे. वह भी उन के रिश्ते के बारे में बखूबी जानती थी और वह भी तो वीरेंद्र से पिता का महत्त्व देती थी. शीतल वीरेंद्र को पिता अशोक से ज्यादा पसंद करती थी. क्योंकि अशोक जब घर पर नहीं रहता था, उस समय वीरेंद्र राजबाला से मिलने आता तो शीतल के लिए महंगे तोहफे साथ लाता था. दरअसल लौकडाउन की वजह से अशोक अपनी पत्नी राजबाला, बेटी शीतल और वीरेंद्र के लिए गले की हड्डी बन गया था.

लौकडाउन के चलते जेल में बंद वीरेंद्र को भी पैरोल पर छोड़ दिया गया था. एक दिन अशोक की नजरों से बचते बचाते वीरेंद्र राजबाला से मिला. उस दिन राजबाला ने वीरेंद्र पर इस कदर प्यार लुटाया जैसे वीरेंद्र के पर लग गए हों. शारीरिक सुख भोग लेने के बाद जब राजबाला और वीरेंद्र एकदूसरे से अलग हुए तो उस ने वीरेंद्र्र से कहा कि अगर उस ने उस के पति अशोक को जल्द ठिकाने नहीं लगाया तो वह आत्महत्या कर लेगी. तब वीरेंद्र ने प्रेमिका से कहा, ‘‘तुम्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं है. मैं उसे ही निपटा दूंगा.’’

इस के बाद राजबाला और वीरेंद्र ने योजना बनाई. इस योजना में उन्होंने शीतल को शामिल कर लिया. शीतल इस काम के लिए खुशी से तैयार हो गई. 17 मई, 2021 को शीतल ने अपने पिता अशोक को मिलने के लिए निर्मलधाम बुलाया. अशोक अपनी बाइक से निर्मलधाम के रास्ते में ही था. शीतल पलपल पिता को काल कर उस से खबर लेती रही. जब अशोक निर्मलधाम के नजदीक पहुंचा तो शीतल ने वीरेंद्र को काल कर यह बात बता दी. वीरेंद्र अपनी हुंडई कार से वहां पहुंच गया और अशोक को सड़क किनारे रोक कर चाकू से गोद दिया. अशोक की लाश को वहीं छोड़ कर वीरेंद्र्र वहां से फरार हो गया. काम हो जाने पर वीरेंद्र्र ने राजबाला और शीतल को इस बात की जानकारी फोन कर के दी.

राजबाला, शीतल और वीरेंद्र्र तीनों अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे थे लेकिन पुलिस ने अपनी सूझबूझ के साथ 12 घंटे के अंदर ही अशोक कुमार हत्याकांड का परदाफाश कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी राजवीर राणा कर रहे थे. Crime Story Hindi

 

Crime Story Real : देवर संग मिलकर पत्नी ने रची साजिश फिर पति का गला दबाकर मार डाला

Crime Story Real :  दिव्यांग सिकंदर शरीर से कमजोर था पर मेहनतकश था. लेकिन काम के चक्कर में वह पत्नी ललिता की खुशियों का गला घोंटता रहा. सिकंदर की यह लापरवाही ललिता पर भारी पड़ने लगी. इसी दौरान ललिता ने अपने कदम देवर जितेंद्र की तरफ बढ़ा दिए. यहीं से ललिता की ऐसी खतरनाक लीला शुरू हुई कि… दे

32 वर्षीया ललिता झारखंड के कोडरमा जिले के गांव दौंलिया की रहने वाली थी. उस की मां का नाम राजवती और पिता का नाम दुल्ली था. वह 4 भाइयों की इकलौती बहन थी. इसलिए घर में सभी की लाडली थी. 16 साल की होते ही उस पर यौवन की बहारें मेहरबान हो गई थीं. बाद में समय ऐसा भी आया कि वह किसी प्रेमी की मजबूत बांहों का सहारा लेने की कल्पना करने लगी. गांव के कई नवयुवक ललिता पर फिदा थे. ललिता भी अपनी पसंद के लड़के से नैन लड़ाने लगी. इस के बाद तो दिन प्रतिदिन उस की आकांक्षाएं बढ़ने लगीं तो अनेक लड़कों के साथ उस के नजदीकी संबंध हो गए.

Ghar ki Kahaniyan

दुल्ली के कुछ शुभचिंतक उसे आईना दिखाने लगे, ‘‘तुम्हारी बेटी ने तो यारबाजी की हद कर दी. वह खुद तो खराब है, गांव के लड़कों को भी खराब कर रही है. लड़की जब दरदर भटकने की शौकीन हो जाए तो उसे किसी मजबूत खूंटे से बांध देना चाहिए. जितनी जल्दी हो सके, ललिता का विवाह कर दो, वरना तुम बहुत पछताओगे.’’

अपमान का घूंट पीने के बाद दुल्ली ने एक दिन ललिता को समझाया. उसी दौरान मां राजवती ने ललिता की पिटाई करते हुए चेतावनी दी, ‘‘आज के बाद तेरी कोई ऐसीवैसी बात सुनने को मिली तो मैं तुझे जिंदा जमीन में दफना दूंगी.’’

उस समय ललिता ने कसम खा कर किसी तरह अपनी मां को यकीन दिला दिया कि वह किसी लड़के से बात नहीं करेगी. ललिता बात की पक्की नहीं, बल्कि ख्वाहिशों की गुलाम थी. कुछ समय तक ललिता ने अपनी जवानी के अरमानों को कैद रखा, लेकिन अरमान बेलगाम हो कर उस के जिस्म को बेचैन करते तो वह अंकुश खो बैठी और फिर से लड़कों के साथ मटरगश्ती करने लगी. लेकिन यह मटरगश्ती अधिक दिनोें तक नहीं चल सकी. इस की वजह थी कि उस के पिता दुल्ली ने उस का रिश्ता तय कर दिया था. ललिता का विवाह कोडरमा जनपद के ही गांव करौंजिया निवासी काली रविदास के बेटे सिकंदर रविदास से तय हुआ था.

सिकंदर किसान था और एकदम सीधासादा इंसान था. लेकिन एक पैर से दिव्यांग था. उस का एक छोटा भाई जितेंद्र रविदास था. सिकंदर की उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी, इसलिए ललिता का रिश्ता सिकंदर के लिए आया तो काली रविदास मना नहीं कर सके.  12 साल पहले दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से हो गया. कालांतर में ललिता 3 बेटों की मां बन गई. विवाह के बाद से ही सिकंदर ललिता के साथ अलग मकान में रहने लगा था. सिकंदर का छोटा भाई जितेंद्र अपने मातापिता के साथ रहता था. सिकंदर दिव्यांग होने पर भी खेतों में दिनरात मेहनत करता रहता था. इसलिए जब वह घर पर आता तो थकान से चूर हो कर सो जाता था, जिस से ललिता की ख्वाहिशें अधूरी रह जाती थीं.

पति के विमुख होने से ललिता बेचैन रहने लगी. इस स्थिति में कुछ औरतों के कदम गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं, ऐसा ही ललिता के साथ भी हुआ. अब उसे ऐसे शख्स की तलाश थी, जो उसे भरपूर प्यार दे और उस की भावनाओं की इज्जत करे. उस शख्स की तलाश में उस की नजरों को अधिक भटकना नहीं पड़ा. घर में ही वह शख्स उसे मिल गया, वह था जितेंद्र. सिकंदर जहां अपने भविष्य के प्रति गंभीर तथा अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाला था, वहीं जितेंद्र गैरजिम्मेदार था. जितेंद्र का किसी काम में मन नहीं लगता था.

जितेंद्र की निगाहें ललिता पर शुरू से थीं. वह देवरभाभी के रिश्ते का फायदा उठा कर ललिता से हंसीमजाक भी करता रहता था.  जितेंद्र की नजरें अपनी ललिता भाभी का पीछा करती रहती थीं. दरअसल जितेंद्र ने ललिता को विवाह मंडप में जब पहली बार देखा था, तब से ही वह उस के हवास पर छाई हुई थी. अपने बड़े भाई सिकंदर के भाग्य से उसे ईर्ष्या होने लगी थी. वह सोचता था कि ललिता जैसी सुंदरी के साथ उस का विवाह होना चाहिए था. काश! ललिता उसे पहले मिली होती तो वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाता और उस की जिंदगी इस तरह वीरान न होती, उस की जिंदगी में भी खुशियां होतीं.

ललिता के रूप की आंच से आंखें सेंकने के लिए ही वह ललिता के घर के चक्कर लगाता. चूंकि वह घर का ही सदस्य था, इसलिए उस के आनेजाने और वहां हर समय बने रहने पर कोई शक नहीं करता था. जितेंद्र की नीयत साफ नहीं थी, इसलिए वह ललिता से आंखें लड़ा कर और हंसमुसकरा कर उस पर डोरे डाला करता था. सिकंदर सुबह खेत पर जाता तो दीया बाती के समय ही लौट कर आता. जितेंद्र के दिमाग में अब तक ललिता के रूप का नशा पूरी तरह हावी हो गया था. इसलिए ललिता को पाने की चाह में उस के सिकंदर के घर के फेरे जरूरत से ज्यादा लगने लगे.

ललिता घर पर अकेली होती थी, इसलिए जितेंद्र के पास मौके ही मौके थे. एक दिन जितेंद्र दोपहर के समय आया तो ललिता दोपहर के खाने में तहरी बनाने की तैयारी कर रही थी, जिस के लिए आलू व टमाटर काट रही थी. जितेंद्र ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘लगता है, आज अपने हाथों से स्वादिष्ट तहरी बनाने जा रही हो.’’

‘‘हां, खाने का इरादा है क्या?’’

‘‘मेरा ऐसा नसीब कहां, जो तुम्हारे हाथों का बना स्वादिष्ट खाना खा सकूं. नसीब तो सिकंदर भैया का है, जो आप जैसी रूपसी उन को पत्नी के रूप में मिलीं.’’

यह सुन कर ललिता मुसकान बिखेरती हुई बोली, ‘‘ठीक है, मुझ से विवाह कर के तुम्हारे भैया ने अपनी किस्मत चमका ली तो तुम भी किसी लड़की की मांग में सिंदूर भर कर अपनी किस्मत चमका लो.’’

‘‘मुझे कोई दूसरी नहीं, तुम पसंद हो. भाभी, अगर तुम तैयार हो तो मैं तुम्हारे साथ अपना घर बसाने को तैयार हूं.’’

ललिता जितेंद्र के रोज हावभाव पढ़ती रहती थी. इसलिए जान गई थी कि जितेंद्र के दिल में उस के लिए नाजुक एहसास है. लेकिन वह इस तरह चाहत जाहिर कर के उस से प्यार की सौगात मांगेगा, ललिता ने सोचा तक न था. अचानक सामने आई ऐसी असहज स्थिति से निपटने के लिए वह उस से आंखें चुराने लगी और कटी हुई सब्जी उठा कर रसोई की तरफ चल दी. तभी उस के बच्चे भी घर आ गए. प्यार में विघ्न पड़ता देख कर जितेंद्र भी वहां से उठ गया. उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, वह ललिता के पास पहुंच जाता और अपने प्यार का विश्वास दिलाता. धीरेधीरे ललिता को उस के प्यार पर यकीन होने लगा. उसे भी अपने प्रति जितेंद्र की दीवानगी लुभाने लगी थी.

उस की दीवानगी को देख कर ललिता के दिल में उस के लिए प्यार उमड़ पड़ा. कल तक जो ललिता जितेंद्र के हवास पर छाई थी, अब जितेंद्र ललिता के हवास पर छा गया. एक दिन जितेंद्र ने फिर से ललिता के सामने अपने प्यार का तराना सुनाया तो वह बोली, ‘‘जितेंद्र, मेरे प्यार की चाहत में पागल होने से तुम्हें क्या मिलेगा. मैं विवाहित होने के साथसाथ 3 बच्चों की मां भी हूं. इसलिए मुझे पाने की चाहत अपने दिल से निकाल दो.’’

‘‘यही तो मैं नहीं कर पा रहा, क्योंकि यह दिल पूरी तरह से तुम्हारे प्यार में गिरफ्तार है.’’

ललिता कुछ नहीं बोल सकी. जैसे उस के जेहन से शब्द ही मिट गए थे. जितेंद्र ने अपने हाथ उस के कंधे पर रख दिए, ‘‘भाभी, कब तक तुम अपने और मेरे दिल को जलाओगी. कुबूल कर लो, तुम्हें भी मुझ से प्यार है.’’

ललिता ने सिर झुका कर जितेंद्र की आंखों में देखा और फिर नजरें नीची कर लीं. प्रेम प्रदर्शन के लिए शब्द ही काफी नहीं होते, शारीरिक भाषा भी मायने रखती है. जितेंद्र समझ गया कि मुद्दत बाद सही, ललिता ने उस का प्यार कुबूल कर लिया है. उस ने ललिता के चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. ललिता भी सुधबुध खो कर जितेंद्र से लिपट गई. उस समय मन के मिलन के साथ तन की तासीर ऐसी थी कि ललिता का जिस्म पिघलने लगा.  इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. यह बात करीब 6 साल पहले की है. बाद में यह मौका मिलने पर चलता रहा.

13 मई, 2021 को दोपहर करीब 12 बजे सिकंदर दास लोचनपुर गांव के निजी कार चालक विजय दास के साथ चरवाडीह के संजय दास के यहां शादी समारोह में गया. सिकंदर और विजय दोनों कार से गए थे. कार विजय की थी. साढ़े 3 बजे शादी से दोनों निकल आए. लेकिन सिकंदर दास घर नहीं लौटा. उस के नंबर पर सिकंदर के चाचा ने फोन किया गया तो विजय ने उठाया. उस से पूछा गया कि सिकंदर कहां है तो विजय द्वारा अलगअलग ठिकाने का पता बताते हुए फोन काट दिया. इस के बाद सिकंदर की काफी तलाश की गई, वह नहीं मिला. 16 मई को ललिता ने कोडरमा के थानाप्रभारी और एसपी को एक पत्र दिया, जिस में उस ने अपने पति सिकंदर दास के लापता होने की बात लिखी. सिकंदर के गायब होने का आरोप उस ने कार चालक विजय दास पर लगाया था.

चूंकि मामला चांदवारा थाना क्षेत्र के करौंजिया गांव का था. इसलिए एसपी पुलिस ने मामला चांदवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया. चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह ने पूरा मामला जान कर थाने में सिकंदर की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी सोनी प्रताप ने 20 मई को जामू खाड़ी से विजय दास को गिरफ्तार कर लिया. सख्ती से पुलिस ने पूछताछ की तो विजय ने सिकंदर की हत्या करने की बात स्वीकारी. उस ने इस हत्या में सिकंदर की पत्नी ललिता और भाई जितेंद्र का भी हाथ होने की बात बताई. 20 मई को विजय के बाद ललिता और जितेंद्र को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर रात में कोटवारडीह के बंद पड़े मकान से सिकंदर की लाश बरामद कर ली.

वह अर्द्धनिर्मित मकान सिकंदर का था. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह अभियुक्तों को ले कर थाने आ गए. थाने में सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी. एक दोपहर को जितेंद्र और ललिता घर में बेधड़क रंगरलियां मना रहे थे कि अचानक किसी काम से सिकंदर खेतों से घर लौटा तो उस ने उन दोनों को रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. यह देख कर उसे एक बार तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि उस की पत्नी ऐसा भी कर सकती है. वह ललिता पर खुद से भी ज्यादा विश्वास करता था. लेकिन हकीकत तो सामने उस की दगाबाजी की तरफ इशारा कर रही थी.

दूसरी ओर सगा छोटा भाई जितेंद्र था, जिसे वह बहुत प्यार करता था, उस का खूब खयाल रखता था. वही उस की गृहस्थी में आग लगा रहा था. अपनों की इस दगाबाजी से सिकंदर इतना आहत हुआ कि उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. ललिता और जितेंद्र ने भी उस से अपनी गलती की माफी मांग ली और भविष्य में ऐसा कुछ न करने का वादा किया तो सिकंदर शांत हुआ. जितेंद्र और ललिता ने उस समय तो अपनी जान छुड़ाने के लिए वादा कर दिया था, लेकिन वे इस पर अमल करने को कतई तैयार नहीं थे. लेकिन उन का भेद खुल चुका था, इसलिए मिलन में उन को बहुत ऐहतियात बरतनी पड़ती थी. वे चोरीछिपे फिर से मिल लेते थे.

सिकंदर ने देखा तो उस ने विरोध किया. मामला घर की चारदीवारी से निकल कर गांव के लोगों तक पहुंच गया. पंचायत तक बैठ गई. भरी पंचायत में ललिता ने जितेंद्र के साथ रहने की बात कही. लेकिन फैसला न हो सका. इस के बाद सिकंदर उन दोनों के बीच की एक बड़ी दीवार था, जिसे गिराए बिना वे हमेशा के लिए एक नहीं हो सकते थे. इसलिए ललिता और जितेंद्र ने सिकंदर की हत्या करने की ठान ली. सिकंदर दास ने विजय दास से लोन दिलाने के नाम पर डेढ़ लाख रुपए लिए थे. सिकंदर ने जब लोन नहीं दिलाया तो विजय उस से अपने दिए रुपए वापस मांगने लगा. सिकंदर रुपए देने में टालमटोल कर रहा था. ऐसे में ललिता ने जितेंद्र से बात कर के विजय को अपने प्लान में शामिल करने की बात कही.

उस ने यह भी कहा कि सिकंदर का काम तमाम होने के बाद वह अकेले विजय को उस की हत्या में फंसवा देगी, जिस से वे दोनों बच जाएंगे. जितेंद्र को उस की बात सही लगी. दोनों ने विजय से बात की तो वह सिकंदर की हत्या में उन दोनों का साथ देने को तैयार हो गया. 13 मई, 2021 को एक शादी समारोह से लौटने के बाद विजय सिकंदर को ले कर कोटवारडीह में उस के अर्धनिर्मित मकान पर ले गया. वहां ललिता और जितेंद्र पहले से मौजूद थे. तीनों ने मिल कर सिकंदर की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश एक कमरे में डाल कर कमरा बंद कर दिया.

लेकिन सिकंदर की हत्या में विजय को फंसाने की योजना ही ललिता और जितेंद्र को भारी पड़ गई. ललिता ने उस पर शक जताया तो पुलिस विजय को पकड़ कर उन तक पहुंच गई. तीनों अभियुक्तों के खिलाफ हत्या व साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर के चांदवारा पुलिस ने तीनों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. Crime Story Real

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Ghar ki Kahaniyan : चाची के प्यार में भतीजे ने ताऊ की कर दी हत्या

Ghar ki Kahaniyan : रामपाल ने सविता से दूसरी शादी कर जरूर ली थी, लेकिन वह उस की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा था. इसी दौरान सविता का दिल पति के भतीजे मंजीत पर आ गया. युवा मंजीत भी चाची की चाहत का ऐसा दीवाना हुआ कि रिश्ते की सारी दीवारें टूट गईं. और फिर…

14 जून, 2021 की सुबह के 5 बजे का वक्त रहा होगा. सचिन उठते ही सब से पहले अपने घेर की तरफ चला गया. सचिन के पिता चंद्रपाल घर के पीछे बने जानवरों के घेर में ही सोते थे. घेर में जाते ही सचिन की निगाह पिता की चारपाई पड़ी, तो उस की जोरदार चीख निकल गई. चंद्रपाल की चारपाई खून से लथपथ पड़ी थी. चंद्रपाल के ऊपर पड़ी चादर तो लहूलुहान थी ही, साथ ही तमाम खून उस की चारपाई के नीचे भी पड़ा था. सचिन की चीखपुकार सुन कर आसपड़ोस के लोग भी जाग गए थे. देखते ही देखते चंद्रपाल के घेर में लोगों का जमावड़ा लग गया. चारपाई के पास खून से सनी एक ईंट भी पड़ी थी.

हालांकि चंद्रपाल की हालत देखते हुए कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस की सांसें अभी भी चल रही होंगी, इस के बावजूद भी सचिन पिता को अस्पताल ले गया. जहां पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. इस घटना की जानकारी पुलिस को अस्पताल के द्वारा ही पता चली थी. यह घटना उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा की थी. सूचना पाते ही कुंडा थानाप्रभारी अरविंद चौधरी कुछ कांस्टेबलों को साथ ले कर सीधे काशीपुर एल.डी. भट्ट अस्पताल पहुंचे. सरकारी अस्पताल में ही पुलिस ने मृतक के परिजनों से घटना की जानकारी जुटाई. इस के बाद एसआई महेश चंद ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. बाद में पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर खून से सनी ईंट और अन्य सबूत जुटाए.

पुलिस केस की जांच में जुट गई. सचिन ने पुलिस को बताया कि 2 दिन पहले ही उस के पिता के साथ उस की चाची सविता की किसी बात को ले कर तूतूमैंमैं हुई थी. लेकिन उसे उम्मीद है कि उस की चाची इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकती. यह जानकारी भले ही सचिन के लिए कोई मायने नहीं रखती थी. लेकिन पुलिस के लिए यह सूत्र अहम मायने रखता था. पुलिस ने सविता को पूछताछ के लिए अपनी हिरासत में ले लिया. पूछताछ के दौरान सविता ने साफ शब्दों में जबाव दिया कि वह अपने जेठ का खून क्यों करेगी. उस के जेठ तो उस के बच्चों को बहुत ही प्यार करते थे. उसी दौरान चंद्रपाल के छोटे भाई ने बताया कि सविता का चालचलन ठीक नहीं है. वह 2 दिन पहले ही अपने भतीजे मंजीत को ले कर मुरादाबाद भाग गई थी. उसी बात को ले कर चंद्रपाल ने उसे काफी डांटफटकार लगाई थी.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस समझ गई कि माजरा क्या है. इस से पहले मंजीत कहीं भाग पाता, पुलिस ने उसे भी अपनी कस्टडी में ले लिया और दोनों को थाने ले आई. थाने ला कर दोनों से कड़ी पूछताछ हुई. पुलिस ने मंजीत से इस मामले में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस रात तो वह फैक्ट्री में काम करने गया हुआ था. ऐसे में वह अपने ताऊ की हत्या कैसे कर सकता है. इस सच्चाई को जानने के लिए पुलिस की एक टीम उस फैक्ट्री में भी गई. वहां पर सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो सचमुच मंजीत की एंट्री वहां दर्ज थी. उपस्थिति वाले रजिस्टर पर उस के हस्ताक्षर भी मौजूद थे. यह सब देख कर पुलिस की जांच पर पानी फिर गया. पुलिस ने इस बारे में सविता के पति रामपाल से पूछताछ की. रामपाल ने बताया कि वह सारे दिन मेहनतमजदूरी कर इतना थक जाता है कि सोने के बाद उसे होशोहवास नहीं रहता.

उसी जांचपड़ताल के दौरान पुलिस की नजर रामपाल के दरवाजे पर पड़ी. जिस पर खून की अंगुलियों के निशान साफ नजर आ रहे थे. फिर पूरे घर की तलाशी ली गई. तभी पुलिस को बाथरूम में खून से सना एक कपड़ा भी मिला, जिस से खून साफ किया गया था. यह सब तथ्य जुटाने के बाद पुलिस ने मंजीत और सविता से अलगअलग पूछताछ की. जिस के दौरान थानाप्रभारी ने सविता से सीधा प्रश्न किया, ‘‘हमें तुम्हारी सारी सच्चाई पता चल गई है. हमें बाथरूम में वह कपड़ा भी मिल गया, जिस से खून साफ किया गया था. यह बात तो पक्की है कि चंद्रपाल की हत्या में तुम्हारा पूरा हाथ है. तुम्हारे लिए यही सही है कि सीधेसीधे सब कुछ बता दो. तुम ने चंद्रपाल की हत्या क्यों की.’’

पुलिस पूछताछ में सविता ज्यादा देर तक नहीं टिक पाई. उस ने बता दिया कि उस ने ही भतीजे के साथ मिल कर अपने जेठ की हत्या की है. सविता के बाद पुलिस ने मंजीत को अलग ले जा कर कहा कि तुम्हारी प्रेमिका चाची ने हमें सब कुछ बता दिया है. लेकिन हम तुम से केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम ने फैक्ट्री में ड्यूटी करते हुए भी किस तरह से चंद्रपाल की हत्या की? मंजीत भी कच्चा खिलाड़ी था. उस ने भी पुलिस को सब कुछ साफसाफ बताते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया था. इस केस के खुलने के बाद जो चाचीभतीजे की प्रेम कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. यह मामला उत्तराखंड के जिला ऊधमसिंह नगर के कुंडा थाना से उत्तर दिशा में लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित गांव टीले का है.

बहुत पहले गांव मैरकपुर पाकवाड़ा, मुरादाबाद निवासी सुमेर सिंह रोजीरोटी की तलाश में यहां आए और यहीं के हो कर रह गए. सुमेर सिंह के 4 बेटे थे, जिन में चंद्रपाल सब से बड़ा, उस के बाद विक्रम तथा रामपाल सब से छोटा था. समय के साथ तीनों की शादियां भी हो गईं. शादी होते ही सभी भाइयों ने अपनी गृहस्थी संभाल ली और अलगअलग मकान बना कर रहने लगे थे. अब से 5 साल पहले चंद्रपाल का चचेरा भाई करन अपने परिवार से मिलने आया था. करन ने यहां का रहनसहन देखा तो वह भी यहीं का दीवाना हो गया. करन के परिवार से संबंध रखने के कारण चंद्रपाल ने उसे रहने के लिए अपने ही घर में शरण दी थी. रामपाल की शादी काशीपुर के टांडा उज्जैन से हुई थी. रामपाल शुरू से ही सीधेसरल स्वभाव का था.

जबकि रामपाल की बीवी शहर की रहने वाली और तेजतर्रार थी. शादी के बाद गांव का रहनसहन उसे पसंद नहीं था. एक साल उस ने जैसेतैसे उस के साथ काटा और फिर उस ने रामपाल से संबंध विच्छेद कर लिया. उस समय तक उस की बीवी के कोई औलाद पैदा नहीं हुई थी. रामपाल की बीवी उसे छोड़ कर चली गई तो रामपाल उदास रहने लगा. इस के बाद भाइयों ने फिर से रामपाल की शादी मुरादाबाद जिले के टांडा स्वार के मानपुर की रहने वाली सविता से करा दी. सविता के साथ दूसरी शादी हो जाने से रामपाल खुश रहने लगा था. रामपाल सुबह ही मेहनतमजदूरी करने के लिए घर से निकल जाता, फिर देर शाम ही घर पहुंच पाता था. गुजरते समय के साथ सविता 2 बच्चों की मां भी बन गई. हालांकि सविता पहले से ही देखनेभालने में सुंदर थी, लेकिन 2 बच्चों को जन्म देने के बाद तो उस की देह और भी चमक उठी थी.

रामपाल के मकान के सामने ही करन सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस वक्त करन का बड़ा बेटा मंजीत जवानी के दौर से गुजर रहा था. मंजीत आवारा किस्म का था. हर समय वह अपनी चाची सविता के पास ही पड़ा रहता था. उस के साथ रहने से सविता को एक सब से बड़ा फायदा था कि वह उस के बच्चों को संभालने में उस की मदद करता था. सविता को जब कभी भी अपने घर का कामकाज निपटाना होता था तो वह अपने बच्चों को मंजीत के पास ही छोड़़ देती थी. कुसगंति से मंजीत के मन में गंदगी पनपनी शुरू हुई तो चाची के प्रति उस की सोच भी बदल गई थी. हालांकि सविता उसे अपने भतीजे के रूप में ही देखती आ रही थी. लेकिन जैसे ही मंजीत का बदलता नजरिया देख कर सविता के मन में भी उथलपुथल पैदा हो गई.

उसे अब पति रामपाल का शरीर कुछ थकाथका सा महसूस होने लगा था. कई बार सविता बच्चों को मंजीत को सौंप कर उसी के सामने नहाने लगती थी, जिसे आंख चुरा कर देखने में मंजीत की आंखों को बहुत ही सुख मिलता था. सविता नहाने के बाद अपने तन को तौलिए से ढंक कर कमरे में जाती तो मंजीत की हवस भरी निगाहें उस के शरीर का पीछा करती रहती थीं. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि सविता कमरे में तौलिए से अपने तन का पानी पोंछ रही थी, उसी दौरान उस के हाथ से तौलिया छूटा और नीचे गिर गया. सविता ने बड़ी ही फुरती से तौलिया उठाने की कोशिश की तो सामने दरवाजे के सामने ही मंजीत खड़ा देख रहा था.

‘‘अरे मंजीत, तुम यहां? तुम ने कुछ देखा तो नहीं?’’

‘‘नहींनहीं चाची, मैं ने कुछ नहीं देखा.’’

मंजीत की बात सुनते ही सविता मुसकराई, ‘बुद्धू कहीं का, पूरा सीन हो गया, लेकिन ये कुछ समझने को तैयार ही नहीं.’

एक दिन मंजीत जुलाई महीने में अपनी सविता चाची के घर पहुंचा. उस के परिवार वाले खेतों पर काम करने गए हुए थे. सविता के बच्चे सोए पड़े थे. सविता बच्चों के पास ही सोई हुई थी. उस समय नींद की आगोश में उस के अंगवस्त्र अस्तव्यस्त हो चुके थे. मंजीत ने अपनी चाची को इस हाल में सोते देखा तो उस के तनमन के तार झनझनाने लगे. उसी समय सविता की आंखें खुलीं तो उस ने सामने मंजीत को बैठे देखा. वह पहल करते हुए बोली, ‘‘मंजीत तू कब आया? तेरे आने का तो मुझे पता ही नही चला.’’

‘‘बस चाची, यूं समझो कि अभीअभी आया था. घर पर नींद नहीं आ रही थी तो सोचा चाची के पास थोड़ा वक्त काट आऊं. लेकिन यहां आ कर देखा तो आप गहरी नींद में सोई पड़ी थीं.’’

‘‘अरे नहीं, आजकल मुझे गहरी नींद कहां आ रही है. मेरी कमर में दर्द है. उसी से परेशान रहती हूं. कई बार तेरे चाचा से तेल की मालिश करने को कहती हूं, लेकिन उन के पास टाइम ही नहीं है.’’

‘‘कोई बात नहीं, चाचा के पास टाइम नहीं है तो मैं तो हर वक्त खाली ही रहता हूं. अगर आप कहें तो मैं ही आप की मालिश कर देता हूं.’’

सविता का निशाना बिलकुल सही लक्ष्य भेदने को तैयार था. मंजीत की बात सुनते ही सविता उठ खड़ी हुई. उस ने घर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. फिर उस ने तेल की शीशी उस के हाथ में थमा दी और कंधे पर मालिश करने को कहा. मंजीत ने हाथ में तेल ले कर सविता के कंधों से मालिश शुरू की तो उस के हाथ धीरेधीरे कंधे से नीचे फिसलने लगे. सविता को भी उन्हीं पलों का इंतजार था. सविता की बीमारी का इलाज होना शुरू हुआ तो वह इतनी मदहोश हो गई कि उस ने अपनी ब्रा के हुक खोल दिए और सीने के बल चारपाई पर लेट गई. धीरेधीरे मंजीत का धैर्य जबाव दे चुका था. दोनों की रगों में खून गर्म हो कर दौड़ने लगा था. अंत में वह पल भी आ गया कि दोनों ही कामवासना की आग से गुजर गए.

मंजीत ने उस दिन जिंदगी में पहली बार किसी औरत के शरीर का सुख पाया था. वहीं सविता भी बहुत खुश थी. उस दिन दोनों के बीच चाचीभतीजे के रिश्ते तारतार हुए तो यह सिलसिला अनवरत चलता गया. दोनों के बीच लगभग 3 साल से अनैतिक रिश्ते चले आ रहे थे. लेकिन जब दोनों के बीच नजदीकियां ज्यादा ही बढ़ गईं तो उन की प्रेम कहानी की चर्चा पूरे गांव में फैल गई. इस बात की जानकारी परिवार तक पहुंची तो चंद्रपाल ने करन से वह मकान खाली करा लिया. करन ने गांव के पास ही थोड़ी सी जमीन खरीद रखी थी, वह उसी में बच्चों को ले कर झोपड़ी डाल कर रहने लगा. इस बात को ले कर पंचायत हुई. पंचायत में सविता को भी बुलाया गया था. भरी पंचायत में सविता ने अपने ही जेठ पर उसे बदनाम करने का आरोप लगाया था.

बातों ही बातों में चंद्रपाल सविता पर गर्म पड़ा तो करन ने उसे मारने के लिए घर से कुल्हाड़ी तक निकाल ली थी. जिस के बाद से चंद्रपाल उस से डर कर रहता था. उस के बाद उस ने न तो कभी मंजीत को ही टोका और न ही सविता को. उस के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच फिर से खिचड़ी पकने लगी थी. चंद्रपाल ने कई बार रामपाल को टोका कि तेरी बीवी जो कर रही है वह ठीक नहीं है. उसे थोड़ा समझा कर रख. इन दोनों के कारण पूरे गांव में उन के परिवार की बदनामी होती है. लेकिन रामपाल तो अपनी बीवी से इतना दब कर रहता था कि उसे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था.

मंजीत और सविता के बीच जो कुछ चल रहा था, रामपाल भी जानता था. लेकिन वह मजबूर था. उस के बाद तो सविता रामपाल पर इस कदर हावी हो चुकी थी कि उस के सामने ही मंजीत को अपने घर पर बुला लेती थी. इस बार देश में फिर से लौकडाउन लगा तो दोनों ही एकदूसरे से मिलने के लिए परेशान रहने लगे थे. उस दौरान दोनों के बीच जो भी बात होती थी, वह मोबाइल पर ही होती थी. लेकिन दोनों ही एकदूसरे की चाहत में बुरी तरह से परेशान थे. जब मंजीत की जुदाई सविता से सहन नहीं हो पाई तो उस ने उस के सामने एक प्रश्न रखा. अगर तुम मुझे दिल से प्यार करते हो तो दुनिया की चिंता क्यों करते हो. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं. लेकिन यह जुदाई अब मुझ से सहन नहीं

होती. मैं तुम्हारे लिए यह घर छोड़ने को तैयार हूं. लेकिन मंजीत हमेशा उस की हिम्मत तोड़ देता था. अगर हम दोनों घर से भाग कर शादी कर भी लें तो तुम्हारे बच्चों का क्या होगा? फिर उस के बाद तो हम समाज में मुंह दिखाने लायक भी नही रहेंगे. मंजीत इस वक्त काशीपुर की एक पेपर मिल में काम करता था. काम करते हुए उस ने कुछ पैसे भी इकट्ठा कर लिए थे. उस ने सोचा उन पैसों के सहारे वह सविता के साथ बाहर कुछ दिन ठीक से काट लेगा. सविता ने भी काफी समय से रामपाल की चोरी से कुछ पैसे इकट्ठा किए थे. 2 जून, 2021 को दोनों ने घर से भागने का पूरा प्लान तैयार किया और काशीपुर से ट्रेन पकड़ कर घर वालों की चोरीछिपे मुरादाबाद जा पहुंचे. मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही दोनों जीआरपी की निगाहों में संदिग्ध के रूप में चढ़ गए.

जीआरपी ने उन से पूछताछ की तो मंजीत ने साफसाफ बता दिया कि वह उस की चाची है. हम दोनों किसी बीमार रिश्तेदार को देखने के लिए आए हुए हैं. लेकिन पुलिस को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो उन्होंने परिवार वालों से बात कराने को कहा. तब मंजीत ने अपनी बुआ की नातिन से जीआरपी वालों की बात करा दी. जिस के बाद पुलिस वालों ने उन्हें सीधे घर जाने की हिदायत देते हुए छोड़ दिया. रेलवे पुलिस से छूटने के बाद भी मंजीत बुरी तरह से घबराया हुआ था. उसे पता था कि इस वक्त देश बुरे हालात से गुजर रहा है. घर से जाने के बाद न तो उन्हें कहीं भी इतनी आसानी से नौकरी ही मिलने वाली है और न ही उस के बाद उस के घर वाले उसे शरण देने वाले हैं.

यह सब मन में विचार उठते ही सविता ने मंजीत के सामने एक प्रश्न किया, ‘‘मंजीत, मैं तेरी खातिर अपना घरबार, बच्चों तक को छोड़ आई. लेकिन तेरे अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं कि तू अपने ताऊ को सबक सिखा सके. उस ने ही हम दोनों का जीना हराम कर रखा है. अगर वह न हो तो हमें घर से भागने की जरूरत भी नहीं होती.’’

सविता की बात मंजीत के दिल को छू गई, ‘‘चाची, तुम अब बिलकुल भी चिंता मत करो. मैं घर वापस जाते ही उस ताऊ का ऐसा इलाज करूंगा कि वह कुछ कहने लायक भी नहीं रहेगा.’’

सविता को विश्वास में ले कर मंजीत अपने घर वापस चला गया. घर जाने के बाद वही सब कुछ हुआ, जिस की उम्मीद थी. दोनों के घर पहुंचते ही परिवार वालों ने उन्हें उलटासीधा कहा. चंद्रपाल ने सविता को घर तक में नहीं जाने दिया था. जिस के कारण मंजीत ने उसी रात अपने ताऊ को मौत की नींद सुलाने का प्रण कर लिया था. 14 जून, 2021 की शाम को मंजीत अपने काम पर चला गया. लेकिन फैक्ट्री में काम करते वक्त भी उस की निगाहों के सामने उस के ताऊ की सूरत ही घूमती रही. उसी वक्त मशीनों में कोई तकनीकी खराबी आ गई, जिस के कारण मशीन बंद करनी पड़ी. मंजीत को लगा कि वक्त उस का साथ दे रहा है. उस ने तभी सविता को फोन मिलाया और आधे घंटे बाद ताऊ के घेर के पास मिलने को कहा. मंजीत की बात सुनते ही सविता के हाथपांव थरथर कांपने लगे थे.

उसे लगा कि आज वह जो काम करने जा रही है वह ठीक से हो पाएगा भी या नहीं. उस की चारपाई के पास ही पति रामपाल खर्राटे मार कर सो रहा था. रामपाल को सोते देख उस ने किसी तरह से हिम्मत जुटाई और धीरे से घर का दरवाजा खोल कर दबे पांव चंद्रपाल के घेर की तरफ बढ़ गई. मंजीत किसी तरह से फैक्ट्री की पिछली दीवार फांद कर बाहर आया और सीधे अपने ताऊ चंद्रपाल के घेर में पहुंचा. उस वक्त सभी लोग गहरी नींद में सोए हुए थे. सविता मंजीत के पहुंचने से पहले ही वहां पहुंच चुकी थी. घेर में पहुंचते ही मंजीत ने घेर में जल रहे बल्ब को उतार दिया, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके. चंद्रपाल भी सारे दिन मेहनतमजदूरी कर के थक जाता था.

उसी थकान को उतारने के लिए वह अकसर ही रात में शराब पी कर ही सोता था. जिस वक्त मंजीत और सविता उस के पास पहुंचे, वह गहरी नींद में सोया हुआ था. चंद्रपाल को सोते देख मंजीत ने सविता को उस का मुंह बंद करने का इशारा किया, फिर उस ने अपने हाथ में थामी ईंट से लगातार कई वार कर डाले. मुंह बंद होने के कारण चंद्रपाल की चीख तक न निकल सकी. थोड़ी देर तड़पने के बाद उस की सांसें थम गईं. इस के बावजूद भी मंजीत बेरहमी दिखाते हुए उस के चेहरे व सिर पर कई वार ईंट से प्रहार किया. जब चंद्रपाल का शरीर पूरी तरह से शांत हो गया तो दोनों वहां से चले गए. सविता के हाथों पर खून लगा हुआ था, जो उस के घर के दरवाजे पर भी लग गया था.

घर पहुंच कर सविता ने एक कपड़े से हाथों का खून पोंछा. वह कपड़ा उस ने बाथरूम में डाल दिया था, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया था. ताऊ को  मौत की नींद सुला कर मंजीत सीधा फैक्ट्री में पहुंच गया, जिस के बाद उस ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की. लेकिन पुलिस के आगे उस की सारी होशियारी धरी की धरी रह गई. चंद्रपाल के बेटे सचिन की तरफ से भादंवि की धारा 302 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने इस मामले में दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया था. Ghar ki Kahaniyan

 

Family Story : पति की प्रताड़ना से तंग आकर पत्नी ने आठवीं मंजिल से लगाई छलांग

Family Story : करीब 2 साल पहले ही डा. मंजू वर्मा का विवाह डा. सुशील वर्मा से हुआ था. लेकिन शादी के डेढ़ साल बाद ही लालची प्रवृत्ति के डा. सुशील ने मंजू वर्मा को 40 लाख रुपए का लोन चुकाने के लिए प्रताडि़त करना शुरू कर दिया. इस प्रताड़ना से डा. मंजू वर्मा इतनी परेशान हो गईं कि…

15  मई, 2021 की सुबह 4 बजे बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा को सूचना मिली कि सिंहपुर स्थिति रूद्रा ग्रीन्स अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल से कूद कर किसी महिला ने जान दे दी है. सूचना अपार्टमेंट के सिक्योरिटी गार्ड जगदीश ने दी थी. रूद्रा ग्रीन्स अपार्टमेंट में ज्यादातर धनवान लोग ही रहते थे. अत: उन्होंने मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस टीम के साथ तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो लिए. रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट बिठूर थाने से करीब 4 किलोमीटर दूर कल्याणपुर-बिठूर मार्ग पर स्थित है. वहां पहुंचने में थानाप्रभारी को ज्यादा समय नहीं लगा. उस समय वहां भीड़ जुटी थी. शव के पास एक युवक सुबक रहा था. अमित मिश्रा ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का नाम डा. सुशील वर्मा है और मृतका उस की पत्नी डा. मंजू वर्मा है.

वह अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए में रहते हैं. वहीं बालकनी से कूद कर इन्होंने खुदकशी की है. हम ने उस की मौत की सूचना उस के मायके वालों तथा अपने परिजनों को दे दी है. चूंकि मौत का मामला हाईप्रोफाइल था और जरा सी चूक भारी पड़ सकती थी. अत: प्रभारी निरीक्षक अमित मिश्रा ने इस मामले की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. थोड़ी देर बाद ही एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी तथा डीएसपी (कल्याणपुर) दिनेश कुमार शुक्ला घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका डा. मंजू वर्मा की लाश अपार्टमेंट के नीचे फर्श पर पड़ी थी. उन की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. रंग गोरा तथा शरीर स्वस्थ था.

ऊंचाई से गिरने के कारण उन के शरीर की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं. पुलिस अधिकारी 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए पहुंचे जहां की बालकनी से डा. मंजू वर्मा ने छलांग लगाई थी. उन्होंने उस कुरसी का भी निरीक्षण किया, जिस पर चढ़ कर वह कूदी थीं. पुलिस अधिकारियों ने फ्लैट की सघन तलाशी कराई. लेकिन उन्हें फ्लैट से सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ. अधिकारियों को मामला संदिग्ध लगा. घटनास्थल पर फोरैंसिक टीम मौजूद थी. टीम प्रभारी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव ने बड़ी बारीकी से जांच शुरू की. उन्होंने ग्राउंड फ्लोर से ले कर 8वीं मंजिल पर स्थित फ्लैट की जांच की. जांच में उन्होंने पाया कि जहां से डा. मंजू वर्मा कूदी, वहां की बालकनी की बाउंड्री 3 फीट ऊंची है.

बाउंड्री के पास कुरसी मिली, जोकि 40 सेंटीमीटर ऊंची थी. कुरसी पर चढ़ कर ही डा. मंजू वर्मा ने छलांग लगाई. टीम ने कई जगह से फिंगरप्रिंट भी लिए. फोरैंसिक टीम की रिपोर्ट के अनुसार डा. मंजू वर्मा ने खुदकुशी की थी. पुलिस अधिकारी अभी छानबीन कर ही रहे थे कि मृतका के पिता अर्जुन प्रसाद आ गए. उन के साथ पत्नी मीरा, बेटा विष्णुकांत, बेटी गरिमा व सरिता भी थी. बेटी का शव देख कर अर्जुन प्रसाद व मीरा फफक पड़ी. गरिमा, सरिता व विष्णुकांत भी बहन का शव देख कर रो पड़े. एसपी संजीव त्यागी ने उन्हें धैर्य बंधाया. घटनास्थल का निरीक्षण व मृतका के परिजनों के आ जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया. आक्रोश को देखते हुए पोस्टमार्टम हाउस पर सुरक्षा भी बढ़ा दी.

एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी ने मृतका डा. मंजू वर्मा के पिता अर्जुन प्रसाद से घटना के संबंध में पूछताछ की तो वह रो पड़े. कुछ देर बाद आंसुओं का सैलाब थमा तो उन्होंने बताया कि दामाद सुशील वर्मा व उस का परिवार उन की डा. बेटी को दहेज के लिए प्रताडि़त करता था. डा. सुशील वर्मा रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट के जिस फ्लैट में रहता है. उसे उस ने 80 लाख रुपए में खरीदा था. इस पर 40 लाख रुपए का लोन था, जो उस ने उन की बेटी मंजू वर्मा के नाम पर लिया था. इस लोन की अदायगी हेतु डा. सुशील वर्मा, डा. मंजू वर्मा पर दबाव डाल रहा था. लेकिन बेटी कहती थी कि वह अभी प्रैक्टिस भी नहीं कर रही है. इतना बड़ा लोन वह कहां से चुकाए. तब वह बेटी पर मायके से रकम लाने को कहता था. मना करने पर उस के साथ मारपीट करता था.

अर्जुन प्रसाद ने आगे बताया, ‘‘13 मई को मोबाइल फोन पर मेरी बात मंजू से हुई थी. तब उस ने बताया था कि डा. सुशील से लोन को ले कर उस की बहस हुई थी. बहस के दौरान उन्होंने उस से मारपीट की थी. तब से वह परेशान है. बेटी की व्यथा सुन कर मैं ने उसे समझाया था और दामादजी से बात कर कोई हल निकालने का आश्वासन दिया था.

‘‘इस के बाद 14 मई की शाम मैं ने बेटी से बात करने का प्रयास किया, लेकिन उस का फोन बंद था. रात 2 बजे उन के फोन पर काल आई. काल दामाद के छोटे भाई सुधीर की थी. उस ने बताया कि मंजू भाभी ने बालकनी से छलांग लगा कर जान दे दी है.

‘‘यह बात सुनते ही हमारे तो जैसे होश ही उड़ गए थे. फिर हम सभी प्रयागराज से अपने निजी वाहन से घटनास्थल पहुंचे. सर, मेरी बेटी मंजू ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि दामाद सुशील वर्मा ने उसे बालकनी से धक्का दे कर मार डाला. दामाद को उकसाने में उन के बड़े भाई सुनील वर्मा का भी हाथ है, जो कानपुर (देहात) जिले में बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर है. आप मेरी रिपोर्ट दर्ज कर दहेज लोभियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें.’’

एसपी(वेस्ट) संजीव त्यागी ने अर्जुन प्रसाद की बात गौर से सुनी, फिर रिपोर्ट लिखने का आदेश कर दिए. आदेश पाते ही बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा ने अर्जुन प्रसाद की तहरीर पर दहेज हत्या की धारा 304बी के तहत डा. सुशील कुमार वर्मा तथा उन के बड़े भाई सुनील वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होते ही अमित मिश्रा ने मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को हिरासत में ले लिया. मृतका डा. मंजू वर्मा के शव का पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों के एक पैनल ने किया. परीक्षण के बाद शव को मृतका के पिता अर्जुन प्रसाद को सौंप दिया गया. दरअसल ससुराल पक्ष से शव लेने कोई भी पोस्टमार्टम हाउस नहीं आया था.

अर्जुन प्रसाद बेटी का शव प्रयागराज ले जाना चाहते थे और वहीं अंतिम संस्कार करना चाहते थे, जबकि बिठूर पुलिस कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती थी और अंतिम संस्कार कानपुर के भैरवघाट पर कराना चाहती थी. थानाप्रभारी ने इस बाबत अर्जुन प्रसाद से बात की तो वह इस शर्त पर मान गए कि बेटी को मुखाग्नि उस का पति दे. इस पर बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा मृतका के पति डा. सुशील वर्मा को ले कर भैरव घाट पहुंचे, जहां सुशील वर्मा ने पत्नी मंजू की चिता को अग्नि दी. उस के बाद उसे पुन: थाने लाया गया. इधर मृतका की मां मीरा देवी व उस की बेटियों सरिता व गरिमा सुशील वर्मा के फ्लैट पर पहुंची. उस समय फ्लैट पर डा. सुशील वर्मा की मां कौशल्या देवी तथा छोटा भाई सुधीर वर्मा मौजूद था. मांबेटियों ने वहां जम कर भड़ास निकाली और बेटी की सास कौशल्या देवी को खूब खरीखोटी सुनाई.

मीरा देवी ने आरोपों की झड़ी लगाई तो कौशल्या देवी ने कहा कि वह गांव में रहती है. बेटा और बहू शहर में रहते हैं. उन्हें न तो लोन के संबंध में जानकारी थी और न ही दोनों के बीच मनमुटाव की. बहू ने क्यों और कैसे जान दी, वह नहीं जानती. दहेज मांगने और प्रताडि़त करने की बात सरासर गलत है. उधर एसपी (वेस्ट) संजीव त्यागी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को गौर से पढ़ा. रिपोर्ट के अनुसार लगभग 75 फीट की ऊंचाई से गिरने के कारण डा. मंजू वर्मा की लगभग सारी पसलियां टूट कर चकनाचूर हो गई थीं. दिल और लिवर फट गया था. आंतरिक रक्तस्राव हुआ, जिस की वजह से मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद एसपी संजीव त्यागी व डीएसपी दिनेश कुमार शुक्ला ने आरोपी डा. सुशील वर्मा से बिठूर थाने में घटना के संबंध में पूछताछ की.

उस ने बताया कि 14 मई, 2021 की शाम सब कुछ सामान्य था. रात 8 बजे उस ने औनलाइन पिज्जा मंगाया. इस के बाद हम ने व मंजू ने पिज्जा खाया. कुछ देर तक हम दोनों बातचीत करते रहे. उस के बाद सोने चले गए. रात 2 बजे डेढ़ वर्षीय बेटे रुद्रांश के रोने की आवाज सुन कर उस की नींद खुल गई. कमरे में आया तो देखा मंजू कमरे में नहीं है. कमरे से बाहर आ कर बालकनी में देखा तो मंजू वहां भी नहीं थी. बालकनी से नीचे झांका तो शोर सुनाई पड़ा. नीचे आ कर देखा तो मंजू की लाश पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने घर वालों को सूचना दी.

‘‘तुम्हारी पत्नी मंजू वर्मा ने आत्महत्या की या तुम ने उसे मार डाला?’’ डीएसपी दिनेश शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने उस की हत्या नहीं की. मंजू ने स्वयं आत्महत्या की है.’’ सुशील ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन डा. मंजू वर्मा ने आत्महत्या क्यों की?’’ श्री शुक्ला ने पूछा.

‘‘सर, डा. मंजू वर्मा ने एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी. शादी के पूर्व वह प्रैक्टिस करती थी. लेकिन शादी के बाद उन की प्रैक्टिस छूट गई थी. उन की साथी उन्हें चिढ़ाती थीं कि एमबीबीएस करने से क्या फायदा जो प्रैक्टिस न कर सको. वह एमडी करना चाहती थी. लेकिन बच्चा होने से वह पढ़ाई नहीं कर पा रही थी. इसी कारण वह डिप्रेशन में चली गई और उन्होंने आत्महत्या कर ली.’’

लेकिन सुशील कुमार की बात पुलिस अधिकारियों के गले नहीं उतरी और उन्होंने सुशील कुमार को दहेज हत्या में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सुशील के बड़े भाई सुनील वर्मा से भी पूछताछ की, जो बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर कानपुर (देहात) जिले में तैनात है. उन्होंने बताया कि डा. मंजू वर्मा कांड की मौत से उन का कोई लेनादेना नही है. डा. मंजू वर्मा ने मौत को गले क्यों लगाया, उन्हें कोई जानकारी नही है. डा. मंजू वर्मा के पिता अर्जुन प्रसाद ने उन की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है. पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतका के घर वालों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर डा. मंजू वर्मा की मौत की जो कहानी प्रकाश में आई, उस का विवरण इस प्रकार है.

उत्तर प्रदेश का प्रयागराज शहर कई मायनों में चर्चित है. गंगा यमुना के संगम तट पर बसा प्रयागराज धर्म नगरी के रूप में भी जाना जाता है. हर 12 साल में यहां संगम तट पर कुंभ का मेला लगता है. देशविदेश के लाखों श्रद्धालु एवं संत मेले में आते हैं और गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं. मेले का आकर्षण देख कर विदेशी श्रद्धालु अचरज से भर उठते हैं. प्रयागराज शहर में उच्च न्यायालय भी है, जहां प्रदेश के मुकदमों की सुनवाई होती है. पूर्व में प्रयागराज को इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता था. इसी प्रयागराज का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-नैनी. नैनी क्षेत्र की पीडीए कालोनी में अर्जुन प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मीरा देवी के अलावा 3 बेटियां मंजू, सरिता, गरिमा तथा एक बेटा विष्णुकांत था.

अर्जुन प्रसाद औद्योगिक न्यायाधिकरण प्रयागराज में सहायक लिपिक पद पर कार्यरत थे. वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. लेकिन रहनसहन साधारण था. अर्जुन प्रसाद की बड़ी बेटी मंजू दिखने में जितनी सुंदर थी, पढ़ने में भी उतनी ही तेज थी. हाईस्कूल तथा इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद मंजू ने प्रयागराज के स्वरूप रानी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर ली थी. उस के बाद वह प्रैक्टिस करने लगी थी. मंजू डाक्टर बन गई थी और कमाने भी लगी थी. लेकिन अर्जुन प्रसाद के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगी थीं. एक देहाती कहावत है ‘जब बेटी भई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ अर्जुन प्रसाद और उन की पत्नी मीरा भी इस कहावत से अछूते नहीं थे. मंजू के ब्याह की चिंता उन्हें सताने लगी थी.

वह मंजू का विवाह ऐसे युवक से करना चाहते थे, जो उस के समकक्ष हो. मंजू डाक्टर थी, सो वह डाक्टर वर की ही खोज कर रहे थे. अथक प्रयास के बाद उन्हें एक लड़का पसंद आ गया. लड़के का नाम था सुशील कुमार वर्मा. सुशील कुमार वर्मा मूलरूप से रायबरेली जिले के चतुर्भुज गांव का रहने वाला था. 3 भाइयों में वह मंझला था. सुशील का छोटा भाई सुधीर, गांव में मां कौशल्या देवी के साथ रहता था और पेशे से वकील था, जबकि सुशील का बड़ा भाई सुनील बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर था. वह कानपुर देहात में कार्यरत था. सुशील कुमार वर्मा स्वयं डाक्टर था. वह उरई मैडिकल कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात था और कानपुर (बिठूर) स्थित रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट में रहता था.

अर्जुन प्रसाद बेटी के लिए जैसा वर चाहते थे, सुशील कुमार वैसा ही था. अत: उन्होंने उसे पसंद कर लिया. इस के बाद 29 जनवरी, 2019 को अर्जुन प्रसाद ने अपनी बेटी डा. मंजू वर्मा का विवाह डा. सुशील कुमार वर्मा के साथ धूमधाम से कर दिया. शादी में उन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया था. डा. मंजू वर्मा बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में जिस ने भी उसे देखा, उसी ने उस के रूपसौंदर्य की तारीफ की. डा. सुशील वर्मा जहां सुंदर पत्नी पा कर खुश थे, वहीं डा. मंजू भी काबिल पति पा कर अपने भाग्य को सराह रही थी. कौशल्या देवी भी सुंदर बहू पा कर खुशी से इतरा उठी थी. डा. मंजू वर्मा कुछ दिन ससुराल में रही फिर पति सुशील वर्मा के साथ बिठूर (कानपुर) स्थित रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट की 8वीं मंजिल के फ्लैट नंबर 8ए में रहने लगी.

बड़े प्यार से दोनों ने जिंदगी की शुरुआत की. शादी के एक साल बाद डा. मंजू ने एक बेटे को जन्म दिया. उस का नाम रखा रुद्रांश. रुद्रांश के जन्म से उन की खुशियां दोगुनी बढ़ गईं. एक रोज बातचीत के दौरान डा. सुशील वर्मा ने मंजू को बताया कि जिस फ्लैट में वह रह रहे हैं, उसे उस ने 80 लाख रुपए में खरीद लिया है. इस पर उस ने 40 लाख रुपए का लोन तुम्हारे नाम पर लिया है जिसे तुम्हें चुकाना है. पति की बात सुन कर डा. मंजू वर्मा चौंक पड़ी और बोली, ‘‘मैं 40 लाख रुपए का लोन कैसे चुकाऊंगी. मैं तो बच्चे की परवरिश के कारण प्रैक्टिस भी नहीं कर रही हूं.’’

‘‘यह सब मैं नहीं जानता. लोन तुम्हें ही चुकाना है. तुम्हारे पास पैसा नही है तो पिताजी से मांग लो. वह तुम्हें कभी मना नहीं करेंगे.’’

डा. मंजू वर्मा समझ गई कि पति लालची है. दहेज के रूप में मायके वालों से पैसा लेना चाहता है. फिर भी मंजू ने पति को समझाया कि पिता की हैसियत ऐसी नहीं है कि वह लाखों रुपए दे सकें. इस के बाद तो अकसर लोन अदायगी को ले कर मंजू और सुशील वर्मा में तकरार होने लगी. एक रोज मंजू ने पिता अर्जुन प्रसाद को फोन किया, ‘‘पिताजी, आप से दामाद चुनने में बड़ी भूल हो गई. आप का दामाद लालची है. उस ने मेरे नाम पर 40 लाख रुपए का लोन लिया है. वह कहता है कि यह लोन मुझे चुकाना होगा.’’

बेटी की बात सुन कर अर्जुन प्रसाद चिंतित हो उठे. फिर भी उन्होंने मंजू को समझाया कि वह इस बाबत दामादजी से बात करेंगे और उन्हें समझाएंगे. उन्होंने ऐसा किया भी. पर बात नहीं बनी. अब तो दिन पर दिन लोन अदायगी को ले कर मंजू और सुशील में तकरार होने लगी. सुशील, मंजू को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताडि़त करने लगा. मंजू एमडी की पढ़ाई पूरा करना चाहती थी. इस के लिए उस ने प्रयास भी शुरू कर दिया था. लेकिन पति की प्रताड़ना और बच्चे की परवरिश के कारण वह टूट गई और पढ़ाई का इरादा बदल दिया. अब वह मानसिक तौर पर परेशान रहने लगी. 13 मई, 2021 को भी डा. मंजू वर्मा और डा. सुशील वर्मा के बीच लोन अदायगी को ले कर झगड़ा हुआ.

झगड़ा इतना बढ़ा कि सुशील वर्मा ने मंजू की पिटाई कर दी. पिटाई से आहत मंजू ने पिता से फोन पर बात की और अपनी व्यथा बताई. अर्जुन प्रसाद ने उसे समझाया कि वह कोई रास्ता निकालेंगे. 14 मई, 2021 की शाम को भी सुशील ने मंजू को प्रताडि़त किया. इस पर उस ने खाना नहीं बनाया. तब सुशील ने औनलाइन पिज्जा मंगाया और खाया भी. लेकिन तनाव व गुस्से में मंजू ने कुछ नहीं खाया. रात 10 बजे मंजू अपने डेढ़ वर्षीय बेटे रुद्रांश के साथ कमरे में पड़े पलंग पर लेट गई तथा सुशील वर्मा दूसरे कमरे में जा कर लेट गया. कुछ देर बाद वह गहरी नींद सो गया. डा. सुशील वर्मा तो सो गया. लेकिन गुस्से और तनाव में डा. मंजू वर्मा को नींद नहीं आई. इसी तनाव में मंजू कमरे से बाहर निकली और बालकनी में चहलकदमी करने लगी.

लेकिन उस का तनाव फिर भी कम नहीं हुआ. इसी तनाव में डा. मंजू वर्मा ने बालकनी में रखी कुरसी पर चढ़ कर नीचे छलांग लगा दी. नीचे गिरते ही उस की मौत हो गई. रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट के सिक्योरिटी गार्ड जगदीश ने किसी भारी वस्तु के गिरने की आवाज सुनी तो वह वहां पहुंचा और महिला की लाश देख कर शोर मचाया. शोर व बच्चे के रोने की आवाज सुन कर सुशील वर्मा की नींद खुली तो वह कमरे में आया. कमरे में मंजू नहीं दिखी तो बालकनी पर पहुंचा. वहां से झांका तो उस के होश उड़ गये. नीचे आ कर देखा तो मंजू की लाश पड़ी थी. उस ने फोन से मंजू की मौत की सूचना बड़े भाई सुनील वर्मा तथा छोटे भाई सुधीर को दी. सुधीर ने मंजू के पिता अर्जुन प्रसाद को फोन पर सूचना दी. तब वह कानपुर पहुंचे.

इधर सिक्योरिटी गार्ड जगदीश की सूचना पर बिठूर थानाप्रभारी अमित मिश्रा रुद्रा ग्रींस अपार्टमेंट पहुंचे और शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की. जांच से पता चला कि मंजू वर्मा ने तनाव में 8वीं मंजिल से छलांग लगा कर जान दी है. लेकिन उन के पिता ने दहेज हत्या मे रिपोर्ट दर्ज कराई थी. अत: रिपोर्ट के आधार पर ही मंजू वर्मा के पति सुशील वर्मा को गिरफ्तार किया गया. 16 मई, 2021 को बिठूर पुलिस ने डा. सुशील वर्मा को चौबेपुर की अस्थाई जेल भेजा, जहां कोरोना जांच तथा अन्य औपचारिकताएं पूरी की गईं. इस के बाद 27 मई, 2021 को उन्हें कानपुर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

दूसरे आरोपी सुनील वर्मा जो बेसिक शिक्षा अधिकारी है, को पुलिस ने अभी तक गिरफ्तार नहीं किया था. शासनप्रशासन की अनुमति के बाद ही उस की गिरफ्तारी संभव हो सकेगी. कथा संकलन तक सुशील वर्मा की जमानत मंजूर नहीं हुई थी. Family Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित