Agra News : बेवफाई या मजबूरी

Agra News : अंजलि सनी का बचपन का प्यार थी, इसलिए वह उसे हर हालत में अपनी बनाना चाहता था, अंजलि भी उस की बनने को तैयार थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि सनी को प्रेमिका अंजलि का हत्यारा बनना पड़ा…

5 नवंबर, 2014 की शाम पौने 7 बजे के आसपास अंधेरा घिरने पर आगरा के थाना हरिपर्वत के मोहल्ला नाला बुढ़ान सैयद में रेल की पटरियों के किनारे रहने वाले सतीशचंद की बेटी अंजलि किसी काम से पटरियों की ओर गई तो किसी ने उस पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया. जान बचाने के लिए अंजलि चिल्लाते हुए घर की ओर भागी, लेकिन हमलावर ने उसे गिरा कर गर्दन पर ऐसा वार किया कि उस की गर्दन कट गई और वह तुरंत मर गई. शोर सुन कर आसपास के लोग वहां पहुंच पाते, हमलावर अंजलि को मार कर अंधेरे में गायब हो गया.

शोर सुन कर अंजलि के घर वाले भी आ गए थे. उस की हालत देख कर वे रोने लगे. थोड़ी ही देर में वहां पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया. हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस को सूचना दी गई. थाना हरिपर्वत पास में ही था, इसलिए सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह एसएसआई शैलेश कुमार सिंह, एसआई अभय प्रताप सिंह, हाकिम सिंह, सिपाही परेश पाठक और रामपाल सिंह को साथ ले कर तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए.

चूंकि इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी गई थी, इसलिए जिले के पुलिस अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी. इसलिए थोड़ी ही देर में एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ हरिपर्वत अशोक कुमार सिंह, मनीषा सिंह, एएसपी शैलेष पांडे भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. हत्यारे ने जिस तरह चाकू से वार कर के मृतका की हत्या की थी, उस से अंदाजा लगाया कि हत्यारा अंजलि से गहरी नफरत करता था.

पुलिस अधिकारियों ने डौग स्क्वायड टीम भी बुलाई थी. लेकिन कुत्ते पुलिस की कोई मदद नहीं कर सके. वे वहीं आसपास घूम कर रह गए थे. इस हत्या से नाराज मोहल्ले वालों ने पुलिस के विरोध में नारे लगाने के साथ घोषणा कर दी कि वे लाश तब तक नहीं उठाने देंगे, जब तक हत्यारा पकड़ा नहीं जाता. पुलिस अधिकारियों ने समझायाबुझाया और हत्यारे को जल्द पकड़ने का आश्वासन दिया, तब कहीं जा कर घर और मोहल्ले वालों ने लाश ले जाने की अनुमति दी. पुलिस ने जल्दीजल्दी घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. अब तक सूचना पा कर पड़ोस के मोहल्ले में रहने वाला मृतका का पति सुनील भी आ गया था.

उस ने पुलिस को बताया कि उस की पत्नी की हत्या उस की ससुराल वालों के पड़ोस में रहने वाले उत्तमचंद के बेटे सनी ने की है. इस के बाद सुनील की ओर से थाना हरिपर्वत में अंजलि की हत्या का मुकदमा नाला बुढ़ान सैयद के रहने वाले उत्तम चंद के बेटे सनी के खिलाफ नामजद दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने सनी को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर छापा मारा तो वह घर से गायब मिला. सनी के घर छापा मारने गई पुलिस टीम से घर वालों से कहा कि अंजलि की हत्या उस के पति सुनील ने ही की है. लेकिन पुलिस टीम को उन की इस बात पर विश्वास नहीं हुआ.

हत्या के इस मामले की जांच थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह ने खुद संभाल रखी थी. पुलिस अधिकारियों की भी नजर इस मामले पर थी. इसलिए सनी को पकड़ने के लिए सीओ हरिपर्वत अशोक कुमार सिंह के नेतृत्व में 3 टीमें बनाई गईं. एसएसपी शलभ माथुर ने तीनों टीमों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा था कि उन्हें किसी भी तरह उसी रात सनी को पकड़ना है. क्योंकि उन्हें पता था कि पोस्टमार्टम के बाद मृतका के घर वाले फिर हंगामा करेंगे. वह नहीं चाहते थे कि पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के समय घर वाले किसी तरह का हंगामा करें. सब से बड़ी बात यह थी कि मोहल्ले के पास से रेलवे लाइन गुजरती थी, हंगामा करने वाले लाइन पर बैठ कर गाडि़यों का आवागमन रोक सकते थे.

देर रात सीओ अशोक कुमार सिंह को कहीं से सूचना मिली कि सनी राजा मंडी रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली जा सकता है. इसी सूचना के आधार पर इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पुलिस टीम राजा मंडी रेलवे स्टेशन पर सनी की तलाश में जा पहुंची. सुबह 6 बजे के आसपास वहां से दिल्ली के लिए इंटरसिटी एक्सप्रेस जाती थी, इसलिए तीनों टीमें पूरी सतर्कता के साथ ट्रेन पर चढ़ने वाली सवारियों पर नजर रखने लगीं. सनी को पहचानने वाला एक आदमी पुलिस टीमों के साथ था. ट्रेन छूटने में 5 मिनट बाकी था, तभी उस आदमी ने एक युवक की ओर इशारा किया. चूंकि पुलिस टीमों के सदस्य वर्दी में नहीं थे, इसलिए सनी को पता नहीं चला कि पुलिस स्टेशन पर उसे तलाश रही है.

सनी निश्ंिचत हो कर ट्रेन पर चढ़ रहा था, इसलिए पुलिस ने आराम से उसे पकड़ लिया. थाना हरिपर्वत ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई. वह कोई बहानेबाजी करता, उस के पहले ही पुलिस ने उस के कपड़ों पर लगे खून के छींटों की ओर इशारा किया तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के अंजलि की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. अंजलि आगरा के थाना हरिपर्वत के मोहल्ला नाला बुढ़ान सैयद के रहने वाले सतीशचंद की 6 संतानों में पांचवें नंबर की बेटी थी. शहर के पौश इलाके हरिपर्वत से सटा रेलवे लाइन को किनारे बसा है मोहल्ला नाला बुढान सैयद. यहां रहने वाले लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कभी यह गरीबों का मोहल्ला था. लेकिन आज यहां लगभग सभी के मकान 3 तीन मंजिल बन चुके हैं.

सतीशचंद के पड़ोस में उत्तमचंद का मकान था. उस के परिवार में पत्नी बेबी के अलावा तीन बेटे, भोलू, बबलू और सनी थे. निम्न मध्यम वर्गीय परिवार होने की वजह से उत्तमचंद के बच्चे पढ़ नहीं सके. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वे छोटेमोटे काम करने लगे. सनी ने भी हाईस्कूल कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. पड़ोसी होने की वजह से सनी और अंजलि साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे और एक ही स्कूल में पढ़े थे. अंजलि ने जहां आठवीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी, वहीं सनी ने हाईस्कूल पास कर के. हमउम्र होने की वजह से दोनों में कुछ ज्यादा ही पटती थी. यही पटरी किशोरावस्था आतेआते प्यार में बदल गया.

अंजलि के मांबाप ने पहले तो दोनों के मेलमिलाप व मुलाकातों पर कोई बंदिश नहीं लगाई, लेकिन जब उन्हें लगा कि बेटी अब सयानी हो गई है तो उन्हें लगा कि जवान बेटी का किसी जवान लड़के से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. बस इस के बाद उन्होंने समझदारी से काम लेते हुए अंजलि को ऊंचनीच का पाठ पढ़ाते हुए उसे सनी से दूर रहने की सलाह दी. अंजलि ने मांबाप को भले ही आश्वासन दिया कि वह सनी से नहीं मिलेगी, लेकिन उस के लिए ऐसा करना आसान नहीं था. सनी अब तक उस के लिए उस की जिस्म की जान बन चुका था, उस के दिल की धड़कन बन चुका था. ऐसे में वह सनी से दूर कैसे रह सकती थी.

अंजलि उस से मिलतीजुलती रही. हां, अब वह उस से मिलने में थोड़ा सावधानी जरूर बरतने लगी थी. लेकिन उस की मुलाकातों की भनक सतीशचंद और विमला देवी को लग ही गई. उन्हें लगा कि अब अंजलि का विवाह कर देना ही ठीक है. उन्होंने आननफानन में लड़का देखा और अंजलि की शादी कर दी. यह 3 साल पहले की बात है. अंजलि का पति सुनील नाला बुढान सैयद से लगे मोहल्ले पीर कल्याणी में रहता था. वह एक जूते की फैक्ट्री में सुपरवाइजर था. नौकरी की वजह से वह सुबह 8 बजे घर से निकल जाता तो देर रात को ही घर लौटता था. शादी के बाद कुछ दिनों तक तो अंजलि ने सनी से दूरी बनाए रखी, लेकिन कुछ दिनों बाद वह उस से फिर मिलनेजुलने लगी. इसी बीच वह एक बेटे की मां बन गई.

अंजलि का सोचना था कि उस का सनी से मिलनाजुलना किसी को पता नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं था. उस की हरकतों पर ससुराल वालों की नजर थी. वे एकएक बात सुनील से बताते रहते थे. सुनील ने अंजलि की आशनाई का सुबूत जुटाने के लिए उसे एक ऐसा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था, जिस में बातचीत करते समय पूरी बात रिकौैर्ड हो जाती थी. इस तरह अंजलि और सनी की अंतरंग बातें रिकौर्ड कर के सुनील ने सुबूत इकट्ठा कर लिए थे. इस के बाद उस ने अंजलि को समझाना चाहा तो वह बगावत पर उतर आई. नाराज हो कर वह बेटे चीनू को ले कर मायके चली गई.

मायके वाले उसे दोष न दें, इसलिए उस ने अपनी मां से बताया कि सुनील का किसी औरत से संबंध है, जिस की वजह से वह उस से प्यार नहीं करता. इसीलिए दुखी हो कर वह मायके आ गई है. विमला देवी को लगा कि बेटी सच कह रही है. इस की वजह यह थी कि सुनील अंजलि और सासससुर से बहुत कम बातें करता था. अंजलि लगभग 6 महीने तक लगातार मायके में रह गई तो आसपड़ोस वाले सवालजवाब करने लगे. इस के बाद सतीशचंद ने सुनील को घर बुलाया तो सच्चाई का पता चला. तब सतीशचंद और विमला देवी ने बेटीदामाद को समझाबुझा कर अंजलि को सुनील के साथ ससुराल भेज दिया.

सुनील अंजलि को साथ ले तो नहीं जाना चाहता था, लेकिन सासससुर का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह अंजलि को साथ ले आया. 2-3 महीने तक सब ठीकठाक चला. लेकिन इस के बाद जो होने लगा, वह पहले से भी ज्यादा खतरनाक था. सनी पहले तो अंजलि से फोन पर ही बातें करता था, इस बार वह सुनील की अनुपस्थिति में अंजलि से मिलने उस के पीर कल्याणी स्थित घर आने लगा. अंजलि ने ससुराल वालों से उसे दूर का रिश्तेदार बताया था. 6 महीने तक सनी पीर कल्याणी अंजलि से मिलने आताजाता रहा. लेकिन एक दिन दोपहर को सुनील घर आ गया तो उस ने सनी को अंजलि के कमरे में बैठे बातें करते देख लिया.

पहले तो उस की सनी से हाथापाई हुई, इस के बाद सुनील ने उसे तो बेइज्जत कर के भगाया ही, अंजलि को भी उस की मां विमला देवी से सारी हकीकत बता कर मायके छोड़ आया. विमला देवी उस दिन तो सुनील से कुछ नहीं कह सकी, लेकिन बाद में उस पर अंजलि को ले जाने का दबाव बनाने लगी. सुनील अंजलि को ले जाता, उस के पहले ही एक दोपहर अंजलि बेटे को मायके में छोड़ कर सनी के साथ भाग निकली. इस से दोनों ही परिवारों में हड़कंप मच गया. पता चला कि अंजलि बेटे की दवा लेने के बहाने से घर निकली और राजामंडी चौराहे से धौलपुर जाने वाली बस में सवार हो कर सनी के साथ चली गई थी.

धौलपुर में सनी की मौसी रहती थी. सनी अंजलि को ले कर उन के यहां पहुंचा तो उन्होंने फोन द्वारा अपनी बहन बेबी को इस बात की सूचना दे दी. सतीशचंद सनी के पिता उत्तमचंद के साथ धौलपुर जाने की तैयारी कर रहे थे कि बेटे से मिलने के लिए सुनील ससुराल आ पहुंचा. इस तरह उसे भी पत्नी के सनी के साथ भाग जाने की जानकारी हो गई. उसी शाम सुनील ने थाना लोहामंडी जा कर सनी के खिलाफ अपनी पत्नी अंजलि को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही सुनील विमला देवी, सतीशचंद और बेबी उत्तमचंद के साथ धौलपुर गया और अंजलि को आगरा ले आया. आगरा आ कर उस ने थाना लोहामंडी पुलिस को धौलपुर में जहां सनी ठहरा था, वहां का पता बता दिया.

इस के बाद थाना लोहामंडी पुलिस धौलपुर गई और सनी को पकड़ कर ले आई. इस के बाद पुलिस ने सनी को अदालत में पेश करने के साथ अंजलि का भी बयान दर्ज कराया, जहां उस ने सनी के खिलाफ जम कर जहर उगला. उस ने कहा कि सनी ने उस का जबरन अपहरण किया था और उसे बंधक बना कर उस के साथ दुष्कर्म किया था. अंजलि के इसी बयान की वजह से सनी को हाईकोर्ट से अपनी जमानत करानी पड़ी. सनी के साथ जो हुआ था, इस के लिए उस ने अंजलि को दोषी माना. इसलिए उसे अंजलि से गहरी नफरत हो गई. अब वह उस की हत्या करने के बारे में सोचने लगा. जेल से बाहर आने के बाद 1-2 बार उस ने अंजलि से मिलने और बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन अंजलि ने साफ मना कर दिया.

इस की वजह यह थी कि सुनील ने साफसाफ कह दिया था कि अगर अब उस ने सुन भी लिया कि वह सनी से बातचीत करती है तो वह उसे तलाक दे देगा. इसलिए अपने और बच्चे के भविष्य को देखते हुए अंजलि ने सनी से दूर रहने का फैसला कर लिया था. कहा जाता है कि अंजलि ने अदालत में सनी के खिलाफ जो बयान दिया था, वह भी सुनील के ही कहने पर दिया था. सुनील का सोचना था कि अंजलि के इस बयान से दोनों के बीच दरार पड़ जाएगी और हुआ भी वही.

जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद सनी अपने घर आने के बजाय धौलपुर जा कर मौसी के यहां रह रहा था. लेकिन वह अपने दोस्तों से अंजलि के बारे में पता करता रहता था. जैसे ही उसे पता चला कि अंजलि मायके आई है, वह मौसी से मांबाप से मिलने की बात कह कर आगरा आ गया. सनी भले ही घर आ गया था, लेकिन वह ज्यादातर घर में ही रहता था. 4 नवंबर, 2014 की शाम वह छत पर बैठा था, तभी उसे अंजलि रेलवे की पटरियों की ओर जाती दिखाई दी. सनी को लगा कि अपमान का बदला लेने के लिए यह अच्छा मौका है.

वह नीचे उतरा और बाजार जा कर खुद को कसाई बता कर गोश्त काटने वाला छुरा खरीद लाया. अगले दिन यानी 5 नवंबर को अंधेरा होने से पहले ही वह वहां छिप कर बैठ गया, जिधर अंजलि जाती थी. अंधेरा होने पर अंजलि उधर आई तो उस ने उस की हत्या कर के अपनी नफरत की आग बुझा ली. अंजलि की चीख सुन कर जब तक मोहल्ले वाले वहां पहुंचते, सनी उस की हत्या कर के जा चुका था. उस समय कोई नहीं जान सका कि अंजलि को किस ने इतनी बेरहमी से मार दिया. वहां से भाग कर सनी राजामंडी रेलवे स्टेशन पर पहुंचा. उसे लग रहा था कि लोग उसे खोजते हुए वहां आ सकते हैं, इसलिए वह एक खोखे के पीछे छिप गया.

उसे यह भी पता था कि पुलिस उसे खोजते हुए धौलपुर जा सकती है, इसलिए उस ने दिल्ली जाने का निर्णय लिया. वह दिल्ली जा पाता, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर रेलवे लाइन के किनारे से पत्थरों के नीचे से वह छुरा बरामद कर लिया था, जिस से उस ने अंजलि की हत्या की थी. सारे सुबुत जुटा कर पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था. Agra News

कहानी पुलिस सूत्रों व सुनील के बयान

UP Crime : बीवी के बिस्तर का साथी

UP Crime : मुकेश जगदीश को अपना अच्छा दोस्त समझता था, जबकि जगदीश उस का दोस्त नहीं, उस की बीवी के बिस्तर का साथी था…

मीना और जगदीश पहली मुलाकात में ही एकदूजे को अपना दिल दे बैठे थे. मीना को पाने की चाह जगदीश के दिल में हिलोरे मारने लगी थी. इसलिए वह किसी न किसी बहाने से मीना से मिलने उस के घर अकसर आने लगा. घर आने पर मीना उस की आवभगत करती. चायपानी के दौरान जगदीश जानबूझ कर मीना के शरीर को स्पर्श कर लेता तो वह बुरा मानने के बजाय मुसकरा देती. इस से जगदीश की हिम्मत बढ़ती गई और वह मीना को जल्द से जल्द पाने की कोशिश में लग गया.

एक दिन जगदीश सुमन के घर आया तो सुमन उस समय घर में अकेली आईने के सामने शृंगार करने में मशगूल थी. उस की साड़ी का पल्लू गिरा हुआ था. जगदीश दबे पांव आ कर उस के पीछे चुपचाप खड़ा हो गया. उस की कसी देह आईने में नुमाया हो रही थी. मीना उस की मौजूदगी से अंजान थी. जगदीश कुछ देर तक मंत्रमुग्ध सा आईने में मीना के निखरे सौंदर्य को अपनी आंखों से समेटने की कोशिश करता रहा. इस तरह देख कर उस की चाहत दोगुनी होती जा रही थी.

इसी बीच मीना ने आईने में जगदीश को देखा तो तुरंत पीछे मुड़ी. उसे देख कर जगदीश मुसकराया तो मीना ने अपना आंचल ठीक करने के लिए हाथ बढ़ाया. तभी जगदीश ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘मीना, बनाने वाले ने खूबसूरती देखने के लिए बनाई है. मेरा बस चले तो अपने सामने तुम को कभी आंचल डालने ही न दूं. तुम आंचल से अपनी खूबसूरती को बंद मत करो.’’

‘‘तुम्हें तो हमेशा शरारत सूझती रहती है. किसी दिन तुम से बात करते हुए मुसकान के पापा ने देख लिया तो तुम्हारी चोरी पकड़ में आ जाएगी.’’ मीना मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ, कहीं तुम मीठीमीठी बातें कर के मुझ पर डोरे डालने की कोशिश तो नहीं कर रहे?’’

‘‘लगता है, तुम ने मेरे दिल की बात जान ली. मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. अब तो मेरी हालत ऐसी हो गई है कि जिस रोज तुम्हें देख नहीं लेता, बेचैनी महसूस होती है. इसलिए किसी न किसी बहाने से यहां चला आता हूं. तुम्हारी चाहत कहीं मुझे पागल न…’’

जगदीश की बात अभी खत्म भी न हो पाई थी कि मीना बोली, ‘‘पागल तो तुम हो चुके हो. तुम ने कभी मेरी आंखों में झांक कर देखा कि उन में तुम्हारे लिए कितनी चाहत है. मुझे ऐसा लग रहा है कि दिल की भाषा को आंखों से पढ़ने में भी तुम अनाड़ी हो.’’

‘‘सच कहा तुम ने. लेकिन आज यह अनाड़ी तुम से बहुत कुछ सीखना चाहता है. क्या तुम मुझे सिखाना चाहोगी?’’ कहते हुए जगदीश ने मीना के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया. मीना ने भी अपनी आंखें बंद कर के अपना सिर जगदीश के सीने पर टिका दिया. दोनों के जिस्म एकदूसरे से चिपके तो सर्दी के मौसम में भी उन के शरीर दहकने लगे. जब उन के जिस्म मिले तो हाथों ने भी हरकतें करनी शुरू कर दीं और कुछ ही देर में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. शराब पीपी कर खोखले हो चुके पति मुकेश के शरीर में वह बात नहीं रह गई थी, जो उसे जगदीश से मिली. इसलिए उस के कदम जगदीश की तरफ बढ़ते चले गए. इस तरह उन का अनैतिकता का यह खेल चलता रहा.

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के निगोही थानाक्षेत्र में एक गांव है हमजापुर. इसी गांव में 30 वर्षीय मुकेश कुमार. अपनी पत्नी मीना और 2 बच्चों के साथ रहता था. मुकेश के पास 20 बीघा जमीन थी. जमीन मुख्य सड़क के किनारे होने की वजह से बहुत कीमती थी. उसी पर खेती कर के वह अपने परिवार का खर्च चलाता था. उस की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. खर्च उठाने में उसे कभी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा. मुकेश को शराब पीने की लत थी. मीना ने उसे कई बार समझाया भी, लेकिन उस ने पत्नी की बात नहीं मानी. इस के अलावा वह पत्नी की जरूरतों को भी अनदेखा करने लगा. करीब 6 महीने पहले उस ने जगदीश नाम के राजमिस्त्री को बुलाया.

जगदीश मुकेश का परिचित था और उस के गांव से 2 किलोमीटर दूर गांव पैगापुर में रहता था. जगदीश अय्याश प्रवृत्ति का था. 2 बच्चों का बाप होने के बाद भी उस की प्रवृत्ति नहीं बदली थी. जब वह मुकेश के घर गया तो उस की पत्नी मीना को देख कर उस की नीयत बदल गई. चाहत की नजरें मीना के जिस्म पर टिक गईं. उसी पल मीना भी उस की नजरों को भांप गई थी. जगदीश हट्टाकट्टा युवक था. मीना पहली नजर में ही उस की आंखों के रास्ते के दिल में उतर गई. मुकेश से बातचीत करते समय उस की नजरें बारबार मीना पर ही टिक जाती थीं. मीना को भी जगदीश अच्छा लगा. जगदीश की भूखी नजरों की चुभन जैसे उस की देह को सुकून पहुंचा रही थी.

मीना को पाने के लालच में जगदीश ने काम के पैसे भी कम बताए थे. अगले दिन से जगदीश ने काम शुरू कर दिया. काम शुरू करते ही जगदीश ने अपनी बातों के जरिए मुकेश से दोस्ती कर ली. जगदीश को जब भी मौका मिलता, वह मीना के सौंदर्य की तारीफ करने लग जाता. मीना को भी उस का व्यवहार अच्छा लगता था. वह जब कभी उसे चाय, पानी देने आती, जानबूझ कर उस के हाथों को छू लेता. इस का मीना ने विरोध नहीं किया तो जगदीश की हिम्मत बढ़ती गई. फिर उस की मीना से होने वाली बातों का दायरा भी बढ़ने लगा. मीना का भी जगदीश की तरफ झुकाव होने लगा था.

जगदीश को पता था कि मुकेश को शराब पीने की लत है. इसी का फायदा उठाने के लिए उस ने शाम को मुकेश के साथ ही शराब पीनी शुरू कर दी. मीना से नजदीकी बनाने के लिए वह मुकेश को ज्यादा शराब पिला कर धुत कर देता था. कहते हैं, जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. आखिर एक दिन जगदीश को मीना के सामने अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया और उस के बाद दोनों के बीच वह रिश्ता बन गया, जो दुनिया की नजरों में अनैतिक कहलाता है. दोनों ने इस रास्ते पर कदम बढ़ा तो दिए, लेकिन उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि वे अपने जीवनसाथी के साथ कितना बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं.

तन से तन का रिश्ता कायम होने के बाद मीना और जगदीश उसे बारबार दोहराने लगे. जगदीश ने मुकेश के यहां का मरम्मत का काम पूरा कर दिया, इस के बावजूद भी वह वहां आताजाता रहा. मुकेश जैसे ही अपने खेतों पर जाने के लिए निकलता, झट से मीना जगदीश को फोन कर देती. अवैधसंबंधों को कोई भले ही लाख छिपाने की कोशिश क्यों न करे, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक दिन ऐसा ही हुआ. मुकेश जैसे ही अपने खेतों की तरफ निकला, मीना ने अपने प्रेमी जगदीश को फोन कर दिया. मीना जानती थी कि मुकेश सुबह घर से निकलने के बाद शाम को ही घर लौटता है. इस दौरान वह प्रेमी से साथ मौजमस्ती कर लेगी. प्रेमिका का फोन आते ही जगदीश  साइकिल से मीना के घर पहुंच गया.

उस दिन भी आते ही उस ने मीना के गले में अपनी बांहों का हार डाल दिया. तभी मीना इठलाते हुए बोली, ‘‘अरे, यह क्या कर रहे हो, थोड़ा सब्र तो करो.’’

‘‘कुआं जब सामने हो तो प्यासे को सब्र थोड़े ही होता है.’’ कहते हुए जगदीश ने उस का मुंह चूम लिया.

‘‘तुम्हारी इन नशीली बातों ने ही तो मुझे अपना दीवाना बना रखा है. न दिन को चैन मिलता है और न रातों को. पता है, जब मैं मुकेश के साथ होती हूं तो केवल तुम्हारा ही चेहरा मेरे समाने होता है.’’ मीना ने इतना कह कर जगदीश के गालों को चूम लिया.

जगदीश से भी रहा नहीं गया, वह मीना को बांहों में उठा कर पलंग पर ले गया. इस से पहले कि वे कुछ कर पाते, दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. इस आवाज को सुनते ही उन के दिमाग से वासना का बुखार उतर गया. मीना ने जल्दी से अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को ठीक किया और दरवाजा खोलने भागी. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया.

‘‘तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’ मीना हकलाते हुए बोली.

‘‘क्यों… क्या मुझे अपने घर आने के लिए भी किसी की इजाजत लेनी होगी? अब दरवाजे पर ही खड़ी रहोगी या मुझे अंदर भी आने दोगी.’’ कहते हुए मुकेश ने मीना को एक ओर किया और अंदर घुसा तो सामने जगदीश को देख कर उस का माथा ठनका.

‘‘अरे, तुम कब आए?’’ मुकेश ने पूछा तो जगदीश ने कहा, ‘‘बस अभीअभी आ रहा हूं.’’

मीना का व्यवहार मुकेश को कुछ अजीब सा लग रहा था, उस ने पत्नी की तरफ देखा. वह घबरा सी रही थी. उस के बाल बिखरे हुए थे, माथे की बिंदिया भी उस के गले पर चिपकी हुई थी. यह सब देख कर शक होना लाजिमी था. जगदीश भी उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. ठंड में भी उस के माथे पर पसीना छलक रहा था. मुकेश उस से कुछ पूछता, उस से पहले ही वह वहां से भाग गया.

उस के जाते ही मुकेश ने पत्नी से पूछा, ‘‘यह जगदीश यहां क्या करने आया था?’’

‘‘मुझे क्या पता, तुम से मिलने आया होगा.’’ असहज होते हुए मीना बोली.  ‘‘लेकिन मुझ से तो कोई ऐसी

बातें नहीं की.’’

‘‘अब मैं क्या जानूं, यह तो तुम्हें ही पता होगा.’’ मीना ने कहा तो मुकेश गुस्से का घूंट पी कर रह गया. उस के मन में पत्नी को ले कर शक पैदा हो गया. मुकेश ने सख्ती का रुख अख्तियार करते हुए पत्नी पर निगाह रखनी शुरू कर दी और हिदायत दे दी कि जगदीश से वह आइंदा न मिले. वह पत्नी की पिटाई भी करने लगा. पति की सख्ती के बावजूद मीना जगदीश से कई बार मिली. मीना को प्रेमी से चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था. उधर जगदीश भी चाहता था कि मीना जीवन भर उस के साथ रहे. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए उन दोनों ने मुकेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

22-23 सितंबर की रात 8 बजे मुकेश ने रोजाना की तरह खाना खाया. उस से पहले वह जम कर शराब पी चुका था और काफी नशे में था. खाना खाने के बाद मुकेश सोने के लिए पहली मंजिल पर बने कमरे में चला गया. उस के सोते ही मीना ने जगदीश को फोन कर के बुला लिया. सुबह 4 बजे के करीब मीना और जगदीश ने गहरी नींद में सो रहे मुकेश को दबोच लिया और उस के हाथपैर बांध दिए. फिर उसे जीवित अवस्था में ही उठा कर पड़ोसी ज्ञान सिंह के खाली पड़े मकान के आंगन में छत से फेंक दिया. जमीन पर गिरते ही मुकेश गंभीर रूप से घायल हो गया.

वह दर्द से तड़पने लगा. मुकेश के बेटे कल्लू ने यह सब होते हुए अपनी आंखों से देख लिया, लेकिन डर की वजह से वह चुपचाप आंखें बंद किए बिस्तर पर ही लेटा रहा. इस के बाद जगदीश वहां से चला गया. मुकेश के गिरने की आवाज से ज्ञान सिंह के परिवार वालों की नींद टूट गई. वे उठ कर आंगन की तरफ आए तो रस्सी से बंधे मुकेश को देख कर हतप्रभ रह गए. उन के शोर मचाने पर आसपड़ोस के अन्य लोग भी वहां आ गए. जब तक मीना वहां पहुंची, तब तक मुकेश की आवाज बंद हो चुकी थी. वहां आते ही मीना घडि़याली आंसू बहा कर रोने लगी. मुकेश की हालत गंभीर बनी हुई थी. वह बोल नहीं पा रहा था. उसी हालत में उसे जिला अस्पताल ले जाया गया.

बासप्रिया गांव में मुकेश के मामा हरद्वारी और उस की बहन राजबेटी रहती थी. उन्हें भी घटना की सूचना दी गई तो वे भी जिला अस्पताल पहुंचे. मुकेश की गंभीर हालत को देखते हुए शाहजहांपुर जिला अस्पताल से उसे बरेली रेफर किया गया, लेकिन बरेली पहुंचने से पहले ही उस ने दम तोड़ दिया. तब मुकेश की लाश को वापस घर ले आया गया. दोपहर बाद करीब 2 बजे किसी ने इस की सूचना निगोही थानापुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी आशीष शुक्ला पुलिस टीम के साथ तुरंत मुकेश के घर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थानाप्रभारी ने मुकेश की बहन राजबेटी से पूछताछ की तो उस ने अपनी भाभी मीना और जगदीश के अवैधसंबंधों की जानकारी उन्हें देते हुए शक जताया कि उस की हत्या में इन दोनों का ही हाथ है. उधर मुकेश के बेटे कल्लू ने भी मां की करतूत का खुलासा कर दिया. थानाप्रभारी आशीष शुक्ला ने राजबेटी की तहरीर पर मीना और उस के आशिक जगदीश के खिलाफ भादंवि की धारा 302 और 304 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर दोनों को गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद उन्हें सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. UP Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Story in Hindi : प्यार का गुलाल

Love Story in Hindi : शराबखोरी की दोस्ती हमेशा घातक होती है, खास कर तब जब शराबी दोस्त की नजर जवान बीवी पर पड़ जाए. संतोष ने सब से बड़ी गलती यही की कि वह अपने दोस्त लक्ष्मण को घर में बुला कर शराब पिलाने लगा. जब लक्ष्मण और संतोष की पत्नी सत्यरूपा के बीच अवैधसंबंध बन गए तो संतोष की शामत आनी ही थी. 4  अक्तूबर की सुबह की बात है. लोगबाग रोजाना की तरह उठ कर अपने दैनिक कार्यों में लग गए थे. तभी खेतों की ओर गए किसी व्यक्ति ने तालाब के किनारे खून से लथपथ

पड़ी लाश देखी. इस के बाद जल्दी ही यह बात आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई. जहां लाश पड़ी थी, वह क्षेत्र लखनऊ के थाना विभूति खंड मे आता था. तालाब किनारे लाश पड़ी होने की खबर सुन कर विभूति खंड के ही मोहल्ला बड़ा भरवारा में रहने वाली सत्यरूपा भी वहां पहुंच गई. उस का पति संतोष रात से गायब था. लाश देख कर वह दहाड़ मारमार कर रोने लगी. लाश उस के पति संतोष साहू की थी.

इसी बीच किसी ने इस मामले की सूचना थाना विभूति खंड को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. मृतक संतोष की उम्र करीब 45 साल थी. उस के पेट पर किसी तेज धारदार हथियार से कई वार किए गए थे, जिस से पेट में गहरे घाव लगे थे. लाश के पास ही उस की साइकिल पड़ी थी. मृतक की पत्नी के अनुसार उस के पास मोबाइल भी था, लेकिन कपड़ों की तलाशी में उस का मोबाइल नहीं मिला था.

थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने सत्यरूपा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि बीती रात संतोष अपने बेटे राकेश के साथ मछली खरीदने निकला था. मछली खरीद कर संतोष ने राकेश को घर भेज दिया था और खुद कुछ देर में आने की बात कह कर कहीं चला गया था. जब वह काफी देर तक नहीं लौटा तो उस ने फोन किया, लेकिन उस का मोबाइल बंद मिला. वह पूरी रात उस का नंबर मिलाती रही, लेकिन मोबाइल बराबर बंद ही मिला. सवेरा होते ही उस ने पति की तलाश शुरू की. पड़ोस में ही टिंबर का काम करने वाले सोनू को साथ ले कर जब वह पति को तलाश रही थी, तभी उसे तालाब किनारे एक लाश पड़ी होने की खबर मिली. इस के बाद वह तुरंत तालाब किनारे पहुंच गई.

सत्यरूपा ने बताया था कि संतोष राजगीर था और इन दिनों वह एक डाक्टर के घर पर काम कर रहा था. गत दिवस उसे पैसे मिले थे जिन में से थोड़े उस ने घर में दे दिए, बाकी अपने पास रख लिए थे. सत्यरूपा ने आशंका भी जताई थी कि कहीं लूट का विरोध करने पर उस के पति का कत्ल न कर दिया गया हो? प्राथमिक पूछताछ और काररवाई के बाद थानाप्रभारी दुबे ने संतोष की लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया. थाने लौट कर उन्होंने सत्यरूपा की तहरीर के आधार पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने सब से पहले संतोष के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. सीडीआर के मुताबिक संतोष के नंबर पर 3 अक्तूबर यानी घटना वाली रात आखिरी काल लखनऊ के थाना गुडंबा के आदिलनगर निवासी लक्ष्मण साहू ने की थी. पुलिस ने जब लक्ष्मण साहू के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि पेशे से लक्ष्मण भी राजगीर था और संतोष का करीबी दोस्त था. संतोष के घर उस का काफी आनाजाना था. यहां तक कि वह संतोष की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आताजाता था और काफी देर तक रुकता था. इस से अनुमान लगाया गया कि यह मामला अवैधसंबंधों का हो सकता है. संभव है संतोष के विरोध करने पर उस की हत्या की गई हो.

संदेह हुआ तो थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने 7 अक्तूबर को लक्ष्मण और सत्यरूपा को हिरासत में ले कर उन से कड़ाई से पूछताछ की. थोड़ी सी सख्ती करने पर उन दोनों ने संतोष की हत्या का जुर्म कुबूल लिया. इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने अपने सहयोगियों के नाम भी बता दिए. पूछताछ के बाद पुलिस ने निखिल उर्फ पिंकू निवासी विकासनगर, लखनऊ और अजय चौहान उर्फ मुक्कू निवासी लखनऊ विश्वविद्यालय आवासीय परिसर को भी गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मूल निवासी संतोष साहू अपने परिवार के साथ लखनऊ के विभूति खंड में बड़ा भरवारा में रहता था. वह राजगिरी का काम करता था.

संतोष का काम ठीक चल रहा था, जिस की वजह से परिवार का भरणपोषण करने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती थी. काम के दौरान ही एक दिन संतोष की मुलाकात लखनऊ के थाना गुडंबा के आदिलनगर मोहल्ले में रह रहे लक्ष्मण साहू से हुई. लक्ष्मण भी छत्तीसगढ़ के कमरधा जनपद के गांव पिपरिया थारा का रहने वाला था. वह लखनऊ में आदिलनगर में किराए पर रह कर राजगिरी का काम करता था. वह था तो शादीशुदा, लेकिन अकेला रहता था. उस के बीवीबच्चे कमरधा में ही रह रहे थे.

पहली मुलाकात में ही संतोष और लक्ष्मण कुछ इस तरह घुलमिल गए, मानो पुराने दोस्त हों. पीनेपिलाने वालों के बीच अकसर ऐसा ही होता है. एक ही राज्य से होने और खानेपीने के शौकीन होने की वजह से दोनों में अच्छी पटने लगी. लक्ष्मण ने संतोष को कई अच्छे काम दिलाए. इसी वजह से संतोष उस की दोस्ती पर पूरी तरह कुर्बान था. जब भी खुशी की कोई बात होती, दोनों खूब जश्न मनाते. पीनेपिलाने की महफिल हर बार लक्ष्मण के कमरे पर ही जमती थी.

एक दिन जब एक काफी बड़ा काम मिला तो संतोष बोला, ‘‘लक्ष्मण, आज खुशी का दिन है, इसलिए जश्न होना चाहिए.’’

‘‘जरूर,’’ लक्ष्मण चहका, ‘‘चलो, कमरे पर चलते हैं, वहीं बोतल खाली करेंगे.’’

‘‘तुम्हारे कमरे पर बहुत महफिलें हो चुकीं, आज तुम मेरे घर चलो,’’ संतोष बोला, ‘‘मेरी घर वाली बहुत बढि़या नौनवेज पकाती है. घर में बैठ कर शराब का भी मजा आएगा और मीट का भी.’’

‘‘अगर ऐसी बात है तो आज रहने दो,’’ लक्ष्मण ने अपनी राय जाहिर की, ‘‘अगले हफ्ते होली है, उस दिन दोहरा जश्न मनाएंगे.’’

‘‘होली का जश्न भी हो जाएगा,’’ संतोष अपनी खुशी नहीं दबा पा रहा था, ‘‘मुझे इतना बड़ा काम मिला है, इसलिए आज भी दावत होनी चाहिए.’’

लक्ष्मण संतोष की खुशी कम नहीं करना चाहता था. उस की बात मान कर वह उस के साथ उस के घर चला गया. घर में संतोष की पत्नी और बच्चे मौजूद थे. संतोष ने लक्ष्मण को उन सब से मिलवाया. चूंकि संतोष अपनी पत्नी सत्यरूपा से अकसर लक्ष्मण की बात किया करता था, इसलिए वह उस से मिल कर खुश हुई. लक्ष्मण सत्यरूपा को देख कर आश्चर्य में रह गया. कई बच्चों की मां हो कर भी उस के रूपलावण्य में कमी नहीं आई थी. न उस की त्वचा की दमक फीकी पड़ी थी और न ही पेट या कूल्हों पर चर्बी की परत जमी थी. उस के चेहरे में कशिश थी और मुसकान कातिलाना.

संतोष बोतल और मीट साथ लाया था. वह मीट वाली थैली सत्यरूपा को देते हुए बोला, ‘‘जल्दी से बढि़या मीट पका. ऐसा कि लक्ष्मण भी अंगुलियां चाटता रह जाए.’’

सत्यरूपा मीट ले कर किचन में चली गई तो संतोष लक्ष्मण के साथ शराब पीने बैठ गया. लक्ष्मण बातें करते हुए शराब तो संतोष के साथ पी रहा था, लेकिन उस का मन सत्यरूपा में उलझा हुआ था और उस की निगाहें लगातार उसी का पीछा कर रही थीं. जैसेजैसे नशा चढ़ता गया, वैसेवैसे उस की निगाहों में सत्यरूपा नशीली होती गई. शराब का दौर खत्म हुआ तो सत्यरूपा खाना परोस कर ले आई. खाना खा कर लक्ष्मण ने उस की दिल खोल कर तारीफ की. सत्यरूपा भी उस की बातों में खूब रस ले रही थी. खाना खाने के बाद लक्ष्मण अपने कमरे पर लौट गया.

इस के बाद लक्ष्मण जब भी संतोष से मिलता, उसे होली की दावत की याद दिलाना नहीं भूलता. लक्ष्मण को भी होली का बेसब्री से इंतजार था. उस ने मन ही मन सोच लिया था कि उसे होली में कैसे हुड़दंग मचाना है. उसे संतोष से कम, सत्यरूपा से ज्यादा होली खेलनी थी. सत्यरूपा को छूने, टटोलने और दबाने का इस से बेहतर मौका और कोई नहीं मिल सकता था. भाभी संग होली खेलने की रस्म भी है और दस्तूर भी. कुछ भी कर गुजरो, केवल एक ही जुमले में सारी खताएं माफ, ‘बुरा न मानो होली है.’ लक्ष्मण ने इसी हथियार को आजमाने का फैसला कर लिया था. उसे पूरा यकीन था कि होली में अगर वह मनमानी करेगा तो सत्यरूपा बुरा नहीं मानेगी.

आखिर इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और होली आ गई. होली के दिन 2 बजे तक रंग चला. उस के बाद लक्ष्मण ने नहाधो कर साफसुथरे कपड़े पहने और संतोष के घर पहुंच गया. दोस्त से रंग खेलने के लिए संतोष रंगों से सना बैठा था. लक्ष्मण को साफसुथरा आया देख कर संतोष ने रंग खेलने के बजाय उसे केवल गुलाल लगाया और गुझिया खिलाई. फिर उसे बैठाते हुए बोला, ‘‘मैं जरा नहा लूं, उस के बाद दोनों आराम से बैठ कर पिएंगे.’’

संतोष कपड़े ले कर बाथरूम में जा घुसा. लक्ष्मण को जैसे इसी समय का इंतजार था. उस ने साथ लाए पैकेट से गुलाल निकाला और अंदर पहुंच गया. सत्यरूपा उसे आंगन में मिल गई. वह उसे देखते ही चहका, ‘‘भाभी, होली मुबारक हो.’’ उस ने सत्यरूपा के गाल पर अंगुली से थोड़ा गुलाल लगा दिया. सत्यरूपा भी उसे होली की बधाई देते हुए बोली, ‘‘भाभी से होली खेलने आए हो तो ढंग से खेलो. यह क्या कि अंगुली से थोड़ा गुलाल लगा दिया.’’

लक्ष्मण ने सत्यरूपा की बात का गलत मतलब निकाला. फलस्वरूप उस की हसरतें जोश में आ गईं. उस की मुट्ठी में गुलाल था ही, अच्छा मौका देख उस ने गुलाल वाला हाथ सत्यरूपा के वर्जित क्षेत्रों तक पहुंचा दिया और उन्हें रंगने लगा. सत्यरूपा उस के गुलाल से सने दोनों हाथ पकड़ कर कसमसाते हुए बोली, ‘‘छोड़ो, यह क्या पागलपन है?’’

‘‘बुरा न मानो होली है.’’ लक्ष्मण ने कहा और अंगुलियों का खेल जारी रखा. सत्यरूपा किसी तरह उस से अपने आप को छुड़ा कर बोली, ‘‘अभीअभी नहाई थी, अब फिर से नहाना पड़ेगा.’’

‘‘नहा लेना,’’ लक्ष्मण हंसते हुए बोला, ‘‘साल भर में रंगों का त्यौहार एक ही दिन तो आता है.’’

सत्यरूपा के इस व्यवहार से यह बात साफ हो गई कि उस ने लक्ष्मण की इस अमर्यादित हरकत का बुरा नहीं माना था. लक्ष्मण वह नहीं समझ सका कि ऐसा होली की वजह से हुआ था, सत्यरूपा भी उस के जैसा भाव अपने मन में पाले हुए थी. इस हकीकत को जानने के लिए उस ने फिर से उसे बांहों में भर कर रंग लगाना शुरू कर दिया. सत्यरूपा को जिस तरह पुरजोर विरोध करना चाहिए था, उस ने वैसा विरोध नहीं किया. शायद उसे लक्ष्मण की यह हरकत अच्छी लगी थी. शायद वह कुछ देर और यूं ही लक्ष्मण की बांहों में सिमटी रहती, लेकिन तभी उसे संतोष के बाथरूम से बाहर निकलने की आहट सुनाई दी तो उस ने खुद को लक्ष्मण से अलग कर लिया.

जैसे ही संतोष बाथरूम से निकला, सत्यरूपा झट से बाथरूम में घुस गई. उसे डर था कि कहीं संतोष लक्ष्मण की हरकतों के सुर्ख निशान देख न ले. जब तक संतोष ने कपड़े पहने, तब तक लक्ष्मण ने भी गुलाल से सने हाथ धो लिए. इस के बाद वह कमरे में बैठ गया. नहाधो कर संतोष शराब की बोतल, पानी, गिलास और नमकीन ले आया. इस के बाद दोनों ने जाम से जाम लड़ाने शुरू कर दिए. सत्यरूपा भी नहा कर आ चुकी थी. हया से उस के गाल अब भी लाल हो रहे थे. वह दूर खड़ी अजीब सी नजरों से लक्ष्मण को देख रही थी.

सत्यरूपा के इस व्यवहार से लक्ष्मण को लगा कि सत्यरूपा भी उस की तरह ही मिलन को प्यासी है. अगर वह पहल करेगा तो शायद वह इनकार न करे. यही सोच कर उस ने उसी दिन सत्यरूपा पर अपने प्यार का रंग चढ़ाने का निश्चय कर लिया. लक्ष्मण ने मन ही मन योजना बना कर खुद तो कम शराब पी, संतोष को जम कर शराब पिलाई. देर रात शराब की महफिल खत्म हुई तो दोनों ने खाना खाया. लक्ष्मण ने भरपेट खाना खाया, जबकि संतोष चंद निवाले खा कर एक तरफ लुढ़क गया.

लक्ष्मण की मदद से सत्यरूपा ने संतोष को चारपाई पर लिटा दिया. इस के बाद वह हाथ झाड़ते हुए बोली, ‘‘अब इन के सिर पर कोई ढोल भी बजाता रहे तो भी यह सुबह से पहले जागने वाले नहीं.’’ इस के बाद उस ने लक्ष्मण की आंखों में झांकते हुए भौंहें उचकाईं, ‘‘तुम घर जाने लायक हो या इन के पास ही तुम्हारा भी बिस्तर लगा दूं.’’

लक्ष्मण के दिल में उमंगों का सैलाब उमड़ रहा था. उसे लगा कि सत्यरूपा भी यही चाहती है कि वह यहीं रुके और उस के साथ प्यार की होली खेले. इसलिए बिना देर किए उस ने कहा, ‘‘हां, नशा कुछ ज्यादा हो गया है, मेरा भी बिस्तर यहीं लगा दो.’’

सत्यरूपा ने लक्ष्मण के लिए भी चारपाई बिछा कर बिस्तर लगा दिया और बच्चों के साथ दूसरे कमरे में सोने चली गई. लक्ष्मण की आंखों में नींद नहीं थी. उसे सत्यरूपा के साथ दिन में बिताए पल बारबार याद आ रहे थे. उस के शारीरिक स्पर्श से वह काफी रोमांचित हुआ था. वह उस स्पर्श की दोबारा अनुभूति पाने के लिए बेकरार था. संतोष की ओर से वह पूरी तरह निश्चिंत था. आखिर फैसला कर के वह दबे पैर चारपाई से उठा और संतोष के पास जा कर उसे हिला कर देखा. उस पर किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह धड़कते दिल से उस कमरे की ओर बढ़ गया, जिस में सत्यरूपा बच्चों के साथ सो रही थी.

कमरे में चारपाई पर बच्चे लेटे थे, जबकि सत्यरूपा जमीन पर बिस्तर लगा कर लेटी थी. कमरे में जल रही लाइट बंद कर के लक्ष्मण सत्यरूपा के पास जा कर उस के बिस्तर पर लेट गया. जैसे ही उस ने सत्यरूपा को बांहों में भरा वह दबी जुबान में बोली, ‘‘मनमानी कर तो चुके, अब क्या करने आए हो, जाओ यहां से.’’

‘‘उस वक्त तो बनावटी रंग लगाए थे, अब तुम्हें अपने प्यार के असली रंग में सराबोर करने आया हूं. कह कर उस ने सत्यरूपा को अपने अंदाज में प्यार करना शुरू कर दिया. इस के बाद तो 2 जिस्मों के अरमानों की होड़ सी लग गई. बदन से कपड़े उतरते गए और हसरतें बेलिबास हो गईं. जल्दी ही उन के बीच वह संबंध बन गए, जो सिर्फ पतिपत्नी के बीच में होने चाहिए. एक ने अपने पति के साथ बेवफाई की थी तो दूसरे ने दोस्त के साथ दगाबाजी.’’

उस रात के बाद सत्यरूपा और लक्ष्मण एकदूसरे को समर्पित हो गए. सत्यरूपा लक्ष्मण के साथ रंगरलियां मनाने लगी. उस ने लक्ष्मण को अपना सब कुछ मान लिया. यही हाल लक्ष्मण का भी था. सत्यरूपा के साथ मौजमस्ती करने के लिए लक्ष्मण हर दूसरेतीसरे दिन संतोष के घर महफिल जमाने लगा. संतोष को वह नशे में धुत कर के सुला देता और बाद में सत्यरूपा के बिस्तर पर पहुंच जाता. जब लक्ष्मण की रातें अकसर संतोष के घर में गुजरने लगीं तो पड़ोसियों में कानाफूसी शुरू हो गई कि खानेपीने तक तो ठीक है, लेकिन पराए मर्द को घर में सुलाना कैसी दोस्ती है. जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है.

लोगों ने तांकझांक की तो लक्ष्मण और सत्यरूपा के संबंध का भेद खुलने में देर नहीं लगी. इस के बाद तो उन के अवैधसंबंध के चर्चे आम हो गए. आसपड़ोस में फैली बात संतोष के कानों तक पहुंची तो उस ने सत्यरूपा से पूछा. इस पर उस ने कहा कि वह उस का दोस्त है, उस के साथ ही खातापीता, उठताबैठता है. इस में वह क्या कर सकती है, लोगों का तो काम ही दूसरों की गृहस्थी में चिंगारी लगाना होता है.

इस के बाद संतोष ने फिर कभी सत्यरूपा से इस संबंध में कोई बात नहीं की. लेकिन सत्यरूपा और लक्ष्मण के दिमाग में यह बात आ गई कि आखिर कब तक वे इस तरह संतोष और दुनिया वालों की नजरों से बच पाएंगे. इस का कोई न कोई स्थाई हल निकालना ही होगा. दोनों ने इस मुद्दे पर काफी सोच विचार किया तो नतीजा यही निकला कि संतोष को बिना रास्ते से हटाए वे दोनों एकसाथ अपनी जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते. दोनों की सहमति बनी तो योजना बनते देर नहीं लगी.

इसी योजना के तहत लक्ष्मण ने अपने दोस्तों निखिल उर्फ पिंटू और अजय चौहान उर्फ मुक्कू से संतोष की हत्या करने की बात की तो दोनों ने हत्या के लिए 20 हजार रुपए मांगे. लक्ष्मण खुशी से पैसे देने के लिए तैयार हो गया. पेशगी के तौर पर उस ने दोनों को 5 हजार रुपए दे भी दिए. 3 अक्तूबर की रात लक्ष्मण अपने दोनों साथियों निखिल और अजय के साथ हनीमैन चौराहे पर पहुंचा. उस ने संतोष को काम दिलाने के बहाने वहीं से उस के मोबाइल पर बात की. सुन कर संतोष खुश हुआ तो लक्ष्मण ने उसे साइट दिखाने को कहा. वह आने को तैयार हो गया.

संतोष उस वक्त अपने बेटे राकेश के साथ मछली खरीदने के लिए मछली मंडी आया था. लक्ष्मण का फोन सुनने के बाद उस ने मछली खरीद कर बेटे राकेश को दे दी और कुछ देर में घर आने की बात कह कर उसे घर भेज दिया. इस के बाद संतोष साइकिल से हनीमैन चौराहे पर पहुंच गया. वहां लक्ष्मण उसे अपने 2 साथियों के साथ मिला. चारों ने एक ठेके पर बैठ कर शराब पी. शराब पीने के बाद लक्ष्मण और उस के साथी टहलने का बहाना बना कर उसे रेलवे लाइन के किनारे तालाब के पास ले गए. वहां दूरदूर तक कोई नहीं दिख रहा था.

सुनसान जगह देख कर लक्ष्मण ने निखिल और अजय के साथ मिल कर संतोष को दबोच लिया और उस के पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ कई वार कर दिए, जिस से संतोष जमीन पर गिर कर कुछ देर तड़पा, फिर हमेशा के लिए शांत हो गया. उसे मारने के बाद लक्ष्मण ने फोन कर के सत्यरूपा को उस की हत्या की जानकारी दे दी और तीनों वहां से फरार हो गए. पुलिस काल डिटेल्स के सहारे उन तक पहुंची तो घटना का खुलासा होने में देर नहीं लगी. सत्यरूपा और लक्ष्मण से पूछताछ के बाद पुलिस ने निखिल और अजय को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उन की निशानदेही पर घटनास्थल के पास की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया.

मुकदमे में चारों आरोपियों के नाम दर्ज करने के बाद पुलिस ने उन्हें उसी दिन सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Love Story in Hindi

— कथा

UP News : एक नाम पर 25 स्कूलों में नौकरी

UP News : आजकल जहां एक ओर शिक्षित युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं तो वहीं भाजपा के डबल इंजन की सरकार वाले राज्य में शिक्षा माफिया दोनों हाथों से अपनी तिजोरी भर रहे हैं. इन माफियाओं की मिलीभगत से एक टीचर प्रदेश के 25 विद्यालयों में पिछले 13 महीने से नौकरी करती पाई गई. कौन थी ये टीचर और कैसे व किस के रहमोकरम पर चल रहा था ये पूरा गोरखधंधा? पढ़ें, शिक्षक घोटाले की परतदरपरत खोलती यह खास कहानी.

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में एक ऐसा घोटाला सामने आया, जिस ने उत्तर प्रदेश ही नहीं अपितु पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. जिस ने पूरे सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े कर दिए थे. यह मामला गोंडा जिले का था. अनामिका शुक्ला केस, जिस में एक ही नाम के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर 25 विद्यालयों में फरजी नौकरियां हासिल की गईं और करोड़ों रुपए का वेतन लिया गया. इस केस ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. इस मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पैशल टास्क फोर्स को सौंपी थी, लेकिन जांच अधूरी रहने और नए खुलासों के साथ यह केस अब और भी उलझता जा रहा है.

मामला तब सुर्खियों में छाया रहा, जब सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने इस मामले में गंभीर आरोप लगाते हुए अनामिका शुक्ला को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया था, जिस में बेसिक शिक्षा विभाग में एक संगठित गिरोह की ओर इशारा करते हुए डेटा लीक और फरजी नियुक्तियों के जरिए सरकारी धन की लूट का दावा किया गया. बात 5 मई, 2025 की थी. जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) अंकित सिंह की अदालत में अनामिका शुक्ला प्रकरण को ले कर एक याचिका दायर की थी, जिस में उन्होंने 8 लोगों को आरोपी ठहराया था.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) अंकित सिंह ने आरोपी बनाए गए सिद्धार्थ दीक्षित (वित्त एवं लेखा अधिकारी), अतुल कुमार तिवारी (जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी), सुधीर सिंह (पटल लिपिक),  अनुपम पांडेय (वित्त एवं लेखा अधिकारी), दिग्विजय नाथ पांडेय (प्रबंधक, भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय रामपुर टेंगरहा), अज्ञात और अनामिका शुक्ला पुत्री सुभाष चंद्र शुक्ला (भुईनडीह, कमरवा, गोंडा) समेत 8 लोगों पर नगर कोतवाली थाने को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए.

अदालत के आदेश के बाद कोतवाल विवेक द्विवेदी ने मुकदमा अपराध संख्या 658/2025 भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 319(2) (प्रतिरूपक द्वारा छल), 318(4) (छल और बेइमानी से संपत्ति के परिदान के लिए उत्प्रेरित करना), 338 (मूल्यवान प्रतिभूति या किसी धन आदि को प्राप्त करने के प्राधिकार की कूटरचना), 336(3) (छल के प्रयोजन के लिए कूट रचना), 340(2) (कूटरचित दस्तावेज को जानबूझ कर असली के रूप में उपयोग में लाना), 316(5) (लोकसेवक द्वारा आपराधिक न्यास भंग करना) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया और आवश्यक काररवाई में जुट गए.

कोर्ट ने नगर कोतवाली पुलिस को आदेश दिया कि वह 10 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट अदालत में पेश करे. कोर्ट के आदेश पर मुकदमा दर्ज होते ही एक बार फिर से अनामिका शुक्ला केस सुर्खियों में छा गया और आरोपियों में बुरी तरह बेचैनी छा गई. वे खुद को निर्दोष बताते हुए गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट तक पहुंच गए.

अनामिका शुक्ला केस क्या है? इसे जानने के लिए पीछे की कहानी के काले पन्नों को उलटना होगा, जहां इस की बुनियाद डाली गई थी. कैसे प्रकाश में आया था अनामिका शुक्ला प्रकरण? इस पर भी रोशनी डालनी होगी. तो आइए पढ़ते हैं, हैरान कर देने वाली इस कहानी को, जहां शिक्षा विभाग के महासागर में ऐसेऐसे एनाकोंडा कुंडली मार कर बैठे हैं कि सरकारी धन को बिना डकार के पचाए जा रहे हैं.

साल 2020 की बात है. उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज की बेसिक शिक्षा अधिकारी अंजलि अग्रवाल ने विभाग के शिक्षकों का डिजिटल डेटाबेस तैयार करना शुरू किया था. जब उन की नजर अनामिका शुक्ला नाम पर गई तो वह बुरी तरह चौंक गईं.

ऐसे पकड़ में आया फरजी शिक्षक घोटाला

उन के सामने एक ऐसा चौंकाने वाला तथ्य आया, जिसे देखते ही वह बुरी तरह उछल गईं. वह नाम था अनामिका शुक्ला. एक ही नाम के दस्तावेजों के आधार पर उत्तर प्रदेश के 25 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियां की गई थीं. यह देखते ही उन का माथा ठनक गया था. इन नियुक्तियों के जरिए करीब 13 महीनों में लगभग एक करोड़ रुपए का वेतन भुगतान किया जा चुका था.

यह खुलासा होते ही विभाग में हड़कंप मच गया. जब दस्तावेजों की और गहराई से जांच की गई तो अनामिका शुक्ला नाम के दस्तावेजों में धुंधली तसवीरों और फरजी आधार कार्ड का इस्तेमाल किया गया प्रतीत हुआ, जिस के जरिए बैंक अकाउंट खोले गए और सैलरी ट्रांसफर की गई. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि अनामिका शुक्ला के नाम पर कोई दूसरी महिला नौकरी कर कर रही थी. उस महिला का नाम प्रिया जाटव था, जिस ने गोंडा के रघुकुल विद्यापीठ में बीएससी की पढ़ाई की थी. पता चला कि प्रिया की मुलाकात एक शख्स से हुई, जो मैनपुरी का रहने वाला था और उस का नाम था राज.

राज का शिक्षा विभाग के बड़ेबड़े अधिकारियों से गहरी पैठ थी, जो पैसे ले कर नौकरी दिलाने का काम करते थे. प्रिया जाटव भी नौकरी करना चाहती थी. उस ने राज नामक शख्स से संपर्क किया. राज ने कथित तौर पर एक लाख रुपए ले कर प्रिया जाटव को फरजी दस्तावेजों के जरिए शिक्षा विभाग में नौकरी दिलवाई. उस ने प्रिया जाटव के नौकरी के लिए जो फरजी दस्तावेज तैयार करवाए थे, वह किसी अनामिका शुक्ला के थे. उन्हें ऐसा धुंधला कर दिया गया था, जिस से वे आसानी से न तो पढ़े जा सकें और न ही पकड़ में आ सकें.

लेकिन किसी तरह भेद खुला तो पुलिस ने अनामिका शुक्ला उर्फ प्रिया जाटव को कासगंज से गिरफ्तार कर लिया. उस के गिरफ्तार होते ही राज फरार हो गया. लेकिन यह खेल यहीं नहीं थमा. इस कड़ी का एक सूत्रधार जसवंत सिंह, जो राज का भाई था, को पुलिस ने मैनपुरी से गिरफ्तार कर लिया गया. जसवंत ने पूछताछ में खुलासा किया कि उस ने 17-18 और लड़कियों को भी इसी फरजी दस्तावेजों के जरिए नौकरियां दिलवाई थीं.

अब सवाल यह उठ रहा था कि असली अनामिका शुक्ला कौन है? कहां की रहने वाली है? इस कहानी में उस समय सब से हैरान करने वाला नया मोड़ आया, जब 9 जून, 2020 को एक महिला, जो खुद को असली अनामिका शुक्ला बताती हुई गोंडा के बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय पहुंची और तत्कालीन बीएसए डा. इंद्रजीत प्रजापति से मिली और उन्हें एक प्रार्थना पत्र सौंपा. प्रार्थना पत्र का मजमून इस प्रकार से था—

जिला बेसिक अधिकारी गोंडा मैं अनामिका शुक्ला पुत्री श्री सुभाष चंद्र, गांव भुलईडीह पोस्ट- कमरावा की हूं. मैं ने निम्न वर्षों में शिक्षा ग्रहण किया है, जिस का विवरण निम्नवत है.

1- हाईस्कूल, कस्तूरबा बालिका इंटर कालेज, गोंडा, वर्ष- 2007, डिवीजन- प्रथम.

2- इंटरमीडियट, बेनीमाधव जंग बहादुर इंटर कालेज, परसपुर, गोंडा, वर्ष-2009, डिवीजन- प्रथम.

3- बीएससी, श्री रघुकुल महिला विद्यापीठ, सिविल लाइंस, गोंडा, वर्ष-2012, डिवीजन- द्वितीय.

4- बीएड, आदर्श कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जियापुर बरुवा, जलाकी टांडा, अंबेडकर नगर, वर्ष-2014, डिवीजन- प्रथम.

5- टीईटी परीक्षा नियामक प्राधिकारी उत्तर प्रदेश 23 ऐलनगंज, इलाहाबाद, वर्ष 2015, डिवीजन- प्रथम.

मैं ने वर्ष 2017 में निम्नलिखित जिले में कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में साइंस टीचर हेतु जनपद सुलतानपुर, जौनपुर, बस्ती, मिर्जापुर और लखनऊ में आवेदन किया था, परंतु काउंसलिंग हेतु वह कहीं भी उपस्थित नहीं हुई और न ही कहीं भी कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी की थी और न ही वर्तमान समय में किसी कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी कर रही हूं. आज दिनांक 9 जून, 2020 के अखबार में छपी खबर को पढ़ कर प्रतीत हुआ कि मेरे सभी शैक्षिक प्रमाण पत्रों का दुरुपयोग कर के फरजी लोगों द्वारा कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी प्राप्त कर ली गई है.

मैं अपने समस्त शैक्षिक प्रमाण पत्रों की मूल प्रति के साथ आप के समक्ष उपस्थित हुई हूं. मेरे फोटो से परीक्षा दिए गए केंद्रों से मिलान कर के फरजी लोगों के विरुद्ध काररवाई करने की कृपा की जाए एवं प्रार्थिनी को प्रताडि़त न किया जाए.

प्रार्थिनी

(अनामिका शुक्ला पुत्री श्री सुभाष चंद्र)

और अंगरेजी में दस्तखत कर के प्रार्थना पत्र की ये प्रतिलिपियां बेसिक शिक्षा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) लखनऊ, परीक्षा निदेशक, शिक्षा निदेशालय, लखनऊ, पुलिस उपमहानिरीक्षक, देवीपाटन मंडल, गोंडा, आयुक्त देवीपाटन गोंडा, जिलाधिकारी गोंडा और जनपद के समस्त संवाददाता (मीडिया/इलैक्ट्रौनिक मीडिया) को भेज दी थी.

एक टीचर कैसे कर रही थी 25 स्कूलों में नौकरी

यह सुन कर इंद्रजीत प्रजापति के होश फाख्ता हो गए थे. उन्हें ऐसा लगा था, जैसे उन्होंने जो अभीअभी सुना था, वह सच भी हो सकता है. उन्होंने अनामिका शुक्ला को भरोसा दिलाया कि अगर उन के मूल दस्तावेजों के साथ वाकई छेड़छाड़ कर दुरुपयोग किया गया है तो इस की जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ विधिक काररवाई की जाएगी.

एक ही नाम से कई लोगों के नौकरी करने का मामला संज्ञान में आया तो महानिदेशक (बेसिक शिक्षा) विजय किरन आनंद ने पूरे मामले की जांच अपर निदेशक (बेसिक शिक्षा) रमेश कुमार तिवारी से कराई, जिस में कस्तूरबा विद्यालय (प्रयागराज) में पढ़ा रही एक शिक्षिका के सभी दस्तावेज और निवास प्रमाण पत्र फरजी पाए गए. जिस के बाद उन्होंने जांच रिपोर्ट महानिदेशक (बेसिक शिक्षा) विजय किरन आनंद को काररवाई के लिए भेज दी. महानिदेशक किरन ने प्रयागराज बीएसए संजय कुशवाहा को आगे की काररवाई के लिए आदेश दिया.

जो अध्यापिका अनामिका शुक्ला बन कर कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में पढ़ा रही थी, उस का असली नाम रीना था. वह जिला फर्रुखाबाद की तहसील कायमगंज के राजपालपुर गांव की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम चंद्रभान सिंह था. यही पता निवास प्रमाणपत्र पर भी अंकित था. रीना ने असली अनामिका शुक्ला के शैक्षिक दस्तावेजों के साथ कूटरचना कर के, उसे लगा कर साइंस टीचर के रूप में गलत तरीके से कस्तूरबा विद्यालय में संविदा पर नियुक्ति हासिल की थी. जांच में मामला खुलने के बाद 16 मार्च, 2020 के बाद से उस ने विद्यालय आना बंद कर दिया था.

जांच के आधार पर बीएसए संजय कुशवाहा ने प्रयागराज के कर्नलगंज थाने में रीना उर्फ अनामिका शुक्ला के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. उस के खिलाफ पुलिस ने आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. मुकदमा दर्ज होने के बाद जांच शुरू हो गई थी. तब प्रयागराज के एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज थे, जो एक बेहद कड़क अफसर के रूप में जाने जाते थे. एसएसपी ने आरोपी रीना उर्फ अनामिका शुक्ला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया और वह गिरफ्तार कर जेल भेज दी गई थी.

अनामिका शुक्ला यहां चुप नहीं बैठी. उस ने भी गोंडा की नगर कोतवाली में एक तहरीर दे कर अपने दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल करने के खिलाफ एक केस दर्ज कराया. यह मामला मुकदमा अपराध संख्या-385/2020 पर आईपीसी की विविध धाराओं के साथ दर्ज कर जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ को सौंप दी गई. एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश के दिशानिर्देश में जांच शुरू की गई थी. इस दौरान एसटीएफ को बड़ी सफलता मिली. एसटीएफ की टीम ने लखनऊ से 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिन के नाम राज उर्फ पुष्पेंद्र जाटव उर्फ गुरुजी निवासी मैनपुरी, जो मुख्य आरोपी था.

इस की तैनाती फर्रुखाबाद में सहायक समन्वयक के पद पर थी. इस के अलावा जौनपुर में बेसिक शिक्षा कार्यालय में जिला समन्वयक अधिकारी आनंद और लखीमपुर में बेसिक शिक्षा कार्यालय में प्रधान लिपिक राजनाथ था. तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर एसटीएफ ने गोंडा पुलिस के हवाले कर दिया, जिन्हें पूछताछ के बाद जेल भेज दिया गया था.

पुलिस पूछताछ में सरगना पुष्पेंद्र जाटव उर्फ राज उर्फ गुरुजी ने बड़े चौंकाने वाले खुलासे किए थे. उस ने बताया था कि वह सुशील पुत्र गुलाब चंद के नाम से फरजी तरीके से सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त है. साल 2010 में उस की मुलाकात राजनाथ से हुई थी. राजनाथ की मदद से अंजलि नाम की महिला की नियुक्ति फरजी दस्तावेजों के जरिए कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में कराई थी. फिर उस ने अपने भाई जसवंत जाटव को विभव कुमार के नाम से फरजी डाक्युमेंट्स के जरिए कन्नौज में नौकरी पर लगवाया था.

एक बार अपनी कारस्तानी में गजब की सफलता पा लेने के बाद सरगना पुष्पेंद्र को मोटी कमाई का चस्का लग गया, जिस के लिए वह हमेशा लालायित रहने लगा. फिर तो उस की चांदी हो गई थी और यह सिलसिला आगे भी जारी रहा. इसी कड़ी में पुष्पेंद्र, रामनाथ और आनंद के माध्यम से दस्तावेजों में हेराफेरी कर के जौनपुर में फर्रुखाबाद की रहने वाली दीप्ति की फरजी दस्तावेजों के आधार पर शिक्षिका की नौकरी लगवाई थी.

सरगना पुष्पेंद्र ने पूछताछ में आगे जो बयान दिया था, उस से फरजीवाड़े की कहानी प्याज के छिलके की तरह परतदरपरत खुलती जा रही थी. उस ने आगे बताया कि उस की मुलाकात रामनाथ ने ही आनंद से कराई थी. आनंद की पत्नी शोभा तिवारी की जिला समन्वयक बालिका शिक्षा में भरती जौनपुर में कराई थी.

परतदरपरत खुलता गया केस

इस के आगे की पूछताछ की कड़ी में उस ने जो खुलासा किया था, उसे जानते ही पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई थी. आनंद जिस सीट पर बैठता था, बेहद जिम्मेदारी वाली थी. विद्यालय में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के आवेदन पत्र और अंक प्रमाणपत्र उसी के संरक्षण में रखे जाते थे. उसी के जरिए काउंसलिग में उपस्थित न होने वाले अभ्यर्थियों के बारे में जानकारी मिलती थी. इसी कड़ी में आनंद ने ही गोंडा की अनामिका शुक्ला के शैक्षिक दस्तावेज उसे उपलब्ध कराए थे. उसी ने वह दस्तावेज जिला बेसिक शिक्षा कार्यालय, हरदोई में तैनात लिपिक रामनाथ को दिए थे.

रामनाथ ने भी अपनी डफली अलग बजाई थी. रीना व अन्य महिला अभ्यर्थियों को रामनाथ ने अनामिका शुक्ला के नाम से सहारनपुर, बागपत, रायबरेली, अमेठी, अंबेडकरनगर में नियुक्त कराया था. यही नहीं, इसी कड़ी में जौनपुर की प्रीति यादव भी छली गई थी. आरोपी पुष्पेंद्र ने बताया कि आनंद ने ही उसे जौनपुर की रहने वाली प्रीति यादव को शैक्षिक प्रमाण पत्र दिए थे और उस ने वर्ष 2017 में कस्तूरबा गांधी विद्यालय, जौनपुर में नौकरी के लिए आवेदन किया था. उस के अभिलेखों के जरिए जौनपुर व आजमगढ़ में प्रीति यादव नाम की 4 फरजी टीचरों की नियुक्ति कराई गई थी.

इस के बाद उस ने ऐसे तमाम खुलासे किए, जिन में प्रत्येक महिला टीचर से 2-2 लाख रुपए लेने का दावा किया था, जिस का विवरण यहां देना मुश्किल होगा, क्योंकि उन तथ्यों का विवरण दिया जाए तो एक मजे की किताब तैयार हो सकती है. लेकिन बाद में किसी कारणवश जांच को बीच में ही रोक दिया गया. उत्तर प्रदेश में अनामिका शुक्ला के नाम पर प्राइमरी स्कूलों में बड़े पैमाने (25 टीचर) पर फरजी टीचर मामला गरमाया तो आयोग ने जांच के आदेश दिए. इतना बड़ा घोटाला सामने आते ही अफसरों की नींद उड़ गई. उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने भ्रष्टाचार निवारण, बेसिक शिक्षा विभाग और वित्त विभाग को इस प्रकरण में गहराई तक जा कर मामले को खंगालने का आदेश दिया.

फरजी शिक्षिकाओं को भरती कर के करोड़ों रुपए के घोटाले का मामला प्रकाश में आते ही गोंडा जिले के सुनील त्रिपाठी ने 17 मार्च, 2020 को पूरे मामले की खबर सूचना आयोग को दी. इस के बाद सूचना आयोग के कान खड़े हो गए. आयोग ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच के आदेश दिए. इसी कड़ी में सुनील त्रिपाठी ने सूचना आयोग में शिकायत की थी कि अनामिका शुक्ला टीचर घोटाले की जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश एसटीएफ से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई थी.

उन का कहना था कि इस घोटाले में प्रदेश भर के 20 से ज्यादा फरजी शिक्षकों ने अनामिका शुक्ला के डाक्युमेंट्स इस्तेमाल कर करोड़ों की सैलरी हड़प ली. उस की जांच रिपोर्ट की प्रमाणित प्रति उपलब्ध क्यों नहीं कराई जा रही है? बहरहाल, अनामिका शुक्ला प्रकरण की एसटीएफ की जांच ढीली पड़ी तो दूसरी ओर इसी मामले को एसआईटी से भी जांच कराई जा रही थी. जो आज भी चल रही है. सुनील त्रिपाठी के साथ ही जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय भी अनामिका शुक्ला प्रकरण को अदालत की चौखट तक खींच कर ले गए.

उन का आरोप यह था कि यह जांच एसटीएफ ने जानबूझ कर अधूरी छोड़ी थी ताकि असली संगठित गिरोह का खुलासा न हो सके. हैरानी की बात यह है कि अनामिका शुक्ला को 12 जून, 2020 में गोंडा के भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय, रामपुर टेंगरहा, तरबगंज में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति पत्र दिलवाया गया.

नियुक्ति पत्र में लिखा गया था, ”आप की नियुक्ति प्राइमरी अनुभाग में पूर्व की भांति कर ली जाए. उक्त निर्णय के क्रम में आप की नियुक्ति प्राइमरी अनुभाग में सहायक अध्यापक पद प्रशासन द्वारा देय वेतनमान में नियमावली के तहत की जाती है. आप की नियुक्ति पूर्णतया अस्थाई है. नियुक्ति पत्र आप को हस्तगत कराया जा रहा है. आप की नियुक्ति पत्र के क्रम में आज दिनांक 12/06/2020 से 3 दिन कार्य दिवस के अंदर अपने मूल शैक्षिक व प्रशिक्षण प्रमाण पत्रों के साथ स्वप्रमाणित छायाप्रतियां ले कर कार्यभार ग्रहण करने का कष्ट करें,’’ नीचे विद्यालय के प्रबंधक दिग्विजय नाथ पांडेय के दस्तखत थे.

अनामिका शुक्ला का यह नियुक्ति पत्र सामने आते ही भूचाल आ गया. दावा किया गया कि अनामिका को रोजगार मिल गया है. जबकि अनामिका शुक्ला के पति दुर्गेश कुमार शुक्ला ने बातचीत में बताया कि वह उसी विद्यालय में साल 2016 से स्थाई शिक्षिका है. वह 2016 से ही उसी विद्यालय में स्थाई सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत थी और वेतन ले रही थी. अब यह सवाल उठता है कि अगर अनामिका 2016 से कार्यरत थी तो 2020 में उसे दोबारा अस्थाई नियुक्ति क्यों दी गई? इस के बाद तो यह मामला बुरी तरह से उलझ गया.

साल 2024 में स्थानीय जनसंवाद मंच के कार्यकर्ताओं ने इस मामले को फिर से उठाया. उन की ओर से दिए गए शिकायती पत्रों से पता चला कि अनामिका शुक्ला की कोई स्थाई नियुक्ति भैया चंद्रभान दत्त विद्यालय में नहीं थी. न तो बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय में उन की नियुक्ति से जुड़ी कोई फाइल थी, न ही वेतन भुगतान का कोई आदेश डिस्पैच रजिस्टर में दर्ज था. फिर भी, फाइनैंस ऐंड अकाउंट औफिसर की ओर से अनामिका शुक्ला को नियमित रूप से वेतन दिया जा रहा था. दिसंबर 2024 में अचानक अनामिका शुक्ला का वेतन रोक दिया गया, जिस के बाद यह मामला एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया.

जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने 5 मई, 2025 को कोर्ट में प्रार्थना पत्र दे कर दावा किया कि बेसिक शिक्षा विभाग में एक संगठित गिरोह सक्रिय है, जो युवाओं के डेटा को लीक कर फरजी नियुक्तियां करता है और करोड़ों रुपए के सरकारी धन की लूट करता है. उन्होंने अनामिका शुक्ला के मामले को इस का उदाहरण बताया. प्रदीप कुमार पांडेय के मुताबिक अनामिका ने जून, 2020 में खुद को पीडि़ता (बेरोजगार) बता कर मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन जांच में यह सामने आया कि वह खुद इस घोटाले की लाभार्थी थी.

संगठित माफिया ने बुना पूरा जाल

प्रदीप पांडेय ने यह भी खुलासा किया कि 9 जनवरी, 2025 को अनामिका शुक्ला के खाते में वेतन भेजा गया, जिस के बारे में फाइनैंस ऐंड अकाउंट औफिसर ने बताया कि यह अगस्त 2024 के सैलरी रिविजन के आधार पर किया गया था. गोंडा के बेसिक शिक्षा अधिकारी अतुल कुमार तिवारी ने साफ किया कि उन के कार्यालय से अनामिका के वेतन के लिए कोई बिल या प्रस्ताव वित्त एवं लेखा कार्यालय को नहीं भेजा गया. फिर भी, वेतन संशोधन के नाम पर पन्ने बदल कर अनामिका को भुगतान किया गया.

बीएसए ने यह भी स्वीकार किया कि 2024 तक वेतन संशोधन की प्रक्रिया सीधे वित्त एवं लेखा कार्यालय की ओर से की जाती थी, जिस में बेसिक शिक्षा विभाग को कोई जानकारी नहीं थी. सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने आरोप लगाया कि यह पूरा खेल एक सिंडिकेट माफिया का हिस्सा है, जिस में वित्त एवं लेखा कार्यालय के कुछ कर्मचारी और बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल हैं. यह इसी से पता चलता है कि डिस्पैच रजिस्टर में अनामिका शुक्ला की नियुक्ति या वेतन से जुड़ा कोई रिकौर्ड नहीं है, जिस से यह साफ होता है कि यह भुगतान अवैध रूप से किया गया.

अनामिका शुक्ला केस उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में फैला हुआ भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक जीताजागता उदाहरण है. सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप कुमार पांडेय ने न्यायालय से इस मामले की गहन जांच की मांग की है, ताकि इस गिरोह के सभी सदस्य बेनकाब हो सकें और सरकारी धन की लूट को रोका जा सके. यह मामला न सिर्फ अनामिका शुक्ला के इर्दगिर्द घूमता है, बल्कि उन हजारों युवाओं की उम्मीदों को भी उजागर करता है, जिन के सपनों को शिक्षा माफिया ने कुचल कर रख दिया है. क्या अनामिका शुक्ला सचमुच में पीडि़ता है या वह इस घोटाले की एक कड़ी है? क्या बेसिक शिक्षा विभाग में चल रहा यह खेल कभी रुकेगा? इन तमाम सवालों का जवाब सिर्फ एक निष्पक्ष और गहन जांच ही दे सकती है.

सामाजिक कार्यकर्ता और जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप पांडेय की इसी शिकायत पर आयोग ने सिद्धार्थ दीक्षित (वित्त एवं लेखाधिकारी), अतुल कुमार तिवारी (जिला बेसिक शिक्षा अधिकरी), सुधीर सिंह (पटल लिपिक), अनुपम पांडेय (वित्त एवं लेखाधिकारी), दिग्विजय नाथ पांडेय (प्रबंधक भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय रामपुर टेंगरहा), अज्ञात और अनामिका शुक्ला पुत्री सुभाष चंद्र शुक्ला (भुईनडीह, कमरवा, गोंडा) समेत 8 लोगों पर नगर कोतवाली थाने को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे. मुकदमा दर्ज होते ही गोंडा के बेसिक शिक्षा विभाग के आला अफसरों की नींद हराम हो गई थी.

बेसिक शिक्षा अधिकारी अतुल तिवारी, तत्कालीन वित्त एवं लेखाधिकारी सिद्धार्थ दीक्षित और 2 पटल लिपिक सुधीर कुमार सिंह व अनुपम पांडेय एफआईआर रद्द करने की मांग को ले कर जज राजेश सिंह चौहान की कोर्ट नंबर 9 लखनऊ हाईकोर्ट पहुंच गए और हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. याचिका की सुनवाई के बाद चारों आरोपियों की अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. तब कहीं जा कर उन की सांस में सांस आई थी. चारों याचिकाकर्ताओं ने एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह विभाग) उत्तर प्रदेश, एसपी गोंडा, कोतवाली नगर और मुकदमा वादी प्रदीप कुमार पांडेय को पार्टी बनाया था.

लेखक ने इस संबंध में अनामिका शुक्ला का पक्ष जानने के लिए उन के मोबाइल नंबर-3333335430 पर कौल की तो अनामिका के पति दुर्गेश कुमार पांडेय ने कौल रिसीव की. चर्चित प्रकरण के संबंध में बातचीत करने पर उन्होंने बताया कि अनामिका शुक्ला को जबरन केस में फंसाया जा रहा है. वह पूरी तरह निर्दोष है. इस सारे फसाद का जड़ सुनील है. उन्होंने मुझ से पैसों की मांग की थी. जब मैं ने उन्हें पैसे देने से मना कर दिया तो उन्होंने प्रदीप से मिल कर पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. मगर मैं भी चुप बैठने वालों में से नहीं हूं. मुझे गोंडा पुलिस पर कतई भरोसा नहीं है कि वह निष्पक्ष तरीके से जांच करेगी, इसीलिए इस केस की मैं ने एसटीएफ जांच के लिए मांग की है और वह मांग स्वीकार हो गई है.

एसटीएफ की जांच पर है सब की नजर

19 सितंबर, 2025 को बहुचर्चित अनामिका शुक्ला प्रकरण एसटीएफ (अयोध्या) को जांच सौंप दिया गया. सीओ सौरभ मिश्र के नेतृत्व में 3 सदस्यीय टीम ने जांच संभाली है. जांच मिलते ही वे शाम को गोंडा बेसिक शिक्षा कार्यालय पहुंचे. यहां टीम ने बीएसए अतुल तिवारी से करीब 3 घंटे तक पूछताछ की. फिर टीम वहां से भैया चंद्रभान दत्त विद्यालय गई, जहां विद्यालय बंद मिला तो टीम वापस लौट आई थी.

एसटीएफ की जांच के दायरे में खुद अनामिका शुक्ला, गोंडा के वित्त एवं लेखा विभाग के साल 2017 से 2024 तक तैनात रहे लेखाधिकारी सिद्धार्थ दीक्षित, पटल लिपिक अनुपम पांडेय, अरुण शुक्ला और बीएसए अतुल तिवारी रडार पर हैं. फिलहाल अनामिका शुक्ला को 27 अक्तूबर, 2025 तक गिरफ्तार करने पर रोक लगा दी गई थी.

एक बार फिर अनामिका शुक्ला नाम का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है. कौन सच्चा है और कौन झूठा? इस सचझूठ की जांच के लिए एसटीएफ को नाकों चबाने पड़ सकते हैं. फिर कहीं जा कर इस संगठित गिरोह का परदाफाश हो सकता है. जिस दिन इस सच से परदा उठा तो इस खेल के पीछे छिपे सफेदपोश माफिया भी बाहर आ सकते हैं. क्या इस सच से परदा उठ पाएगा? UP News

(कथा अनामिका शुक्ला के पति से बातचीत, दस्तावेज एवं मीडिया जानकारी पर आधारित)

 

 

Love Story in Hindi : गुनाह प्यार, सजा मौत

Love Story in Hindi : आरती का गुनाह यही था कि उस ने नेतराम से प्यार किया और घर वालों के मना करने के बावजूद उस से कोर्टमैरिज कर ली. घर के अन्य लोगों ने इसे एक दुर्घटना माना और सोच लिया कि आरती मर गई. लेकिन राकेश इस बात को भुला नहीं सका और 7 सालों बाद उसे मौत के घाट उतार दिया.

आरती आगरा की डिफेंस कालोनी के रहने वाले लौहरे सिंह चाहर की बेटी थी. उस के अलावा उन की 3 संतानें और थीं, जिन में 2 बेटे प्रवीण, राकेश और एक बेटी बीना थी. लौहरे सिंह सेना से सूबेदार से रिटायर हुए थे. उन का बड़ा बेटा प्रवीण भी पढ़लिख कर सेना में भर्ती हो गया था. नौकरी लगते ही लौहरे सिंह ने उस का विवाह कर दिया था. इस के बाद उस से छोटी बेटी बीना का भी विवाह लौहरे सिंह ने सेना में सिपाही की नौकरी करने वाले कमल सिंह सोलंकी के साथ किया था. वह चाहते थे कि उन का छोटा बेटा भी सेना में जाए. वह अपनी छोटी बेटी आरती की भी शादी सेना में नौकरी करने वाले से करना चाहते थे, लेकिन न तो उन का छोटा बेटा सेना में गया और न ही वह छोटी बेटी आरती की शादी सेना में नौकरी वाले लड़के से कर पाए.

दरअसल, लौहरे सिंह का छोटा बेटा राकेश लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. पढ़नेलिखने के बजाय यारदोस्तों की सोहबत उसे कुछ ज्यादा अच्छी लगती थी. दोस्तों के साथ वह जो उलटेसीधे काम करता था, उस की शिकायतें घर आती रहती थीं, जिस से लौहरे सिंह परेशान रहते थे. उन्होंने बड़े बेटे प्रवीण के साथ मिल कर उसे सुधारने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की इस कोशिश का कोई लाभ नहीं हुआ. राकेश को न सुधरना था, न सुधरा. बेटे की वजह से लौहरे सिंह की काफी बदनामी हो रही थी. बेटे को इज्जत की धज्जियां उड़ाते देख उन्होंने सोचा कि उसे किसी रोजगार से लगा दिया जाए तो दोस्तों का साथ अपनेआप छूट जाएगा.

इस के लिए उन्होंने बगल वाले मोहल्ले चावली में आटा चक्की लगवा कर उस पर उसे बैठा दिया. उस की मदद के 15 साल के मुकेश को नौकर रख दिया. मुकेश था तो नौकर, लेकिन राकेश से उस की खूब पटती थी. जबकि मुकेश की उम्र राकेश से काफी काम थी. चक्की पर अकसर आने वाली एक लड़की पर मुकेश का दिल आ गया. मुकेश ने उसे अपने प्रेमजाल में फंसाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लड़की ने उसे भाव नहीं दिया. चूंकि राकेश मुकेश से दोस्त जैसा व्यवहार करता था, इसलिए उस ने लड़की वाली बात राकेश को भी बता दी थी. जब लड़की ने मुकेश को भाव नहीं दिया तो राकेश ने कहा, ‘‘अगर किसी तरह तू उस लड़की से शारीरिक संबंध बना ले तो वह अपनेआप तेरी मुरीद हो जाएगी.’’

इस के बाद मुकेश उस लड़की से शारीरिक संबंध बनाने का मौका ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका तो मिल गया, लेकिन उस में उसे राकेश को भी साझा करना पड़ा. हुआ यह कि लड़की चक्की पर आटा लेने आई तो किसी बहाने से मुकेश उसे चक्की के पीछे बने कमरे में ले गया और उस के साथ जबरदस्ती कर डाली. उस समय राकेश भी वहां मौजूद था, इसलिए इस काम में उसे साझा करना पड़ा. राकेश ने सोचा था कि इज्जत के डर से लड़की कुछ नहीं बोलेगी. लेकिन जब उस ने कहा कि वह उन की करतूत घर वालों से बताएगी तो दोनों डर के मारे उसे चक्की के अंदर बंद कर के भाग गए. बाद में लड़की ने रोते हुए शोर मचाया तो मोहल्ले वालों ने उसे बाहर निकाला.

इस के बाद पीडि़त लड़की के घर वालों ने मुकेश और राकेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. चूंकि पीडि़त लड़की नाबालिग थी, इसलिए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने रातदिन एक कर के राकेश और मुकेश को पकड़ कर अदालत में पेश किया, जहां से राकेश को जेल भेज दिया गया तो नाबालिग होने की वजह से मुकेश को बाल सुधार गृह. मुकेश नाबालिग था, इसलिए करीब साढ़े 3 महीने बाद उसे जमानत मिल गई, लेकिन बालिग होने की वजह से राकेश की जमानत की अर्जियां एक के बाद एक खारिज होती गईं, जिस की वजह वह जेल से बाहर नहीं आ सका. यह सन 2006 की बात थी.

बेटे के जेल जाने से लौहरे सिंह की बदनामी तो हुई ही, परेशानी भी बढ़ गई थी. बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए वह काफी भागदौड़ कर रहे थे. इस में उन का समय भी बरबाद हो रहा था और पैसा भी. राकेश की वजह से वह छोटी बेटी आरती पर ध्यान नहीं दे पाए और उस ने भी जो किया, उस से एक बार फिर उन्हें बदनामी का दंश झेलना पड़ा. जिन दिनों राकेश ने यह कारनामा किया था, उन दिनों आरती कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. ग्रेजुएशन उस ने कर ही रखा था, इसलिए कंप्यूटर का कोर्स पूरा होते ही उसे एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर पर कंप्यूटर सिखाने की नौकरी मिल गई. इस नौकरी में वेतन तो ठीकठाक मिल ही रहा था, इज्जत भी मिल रही थी.

आरती ने जो चाहा था, वह उसे मिल गया था. मांबाप की लाडली होने की वजह वह वैसे भी जिद्दी थी, अब ठीकठाक नौकरी मिल गई तो घर में दबंगई दिखाने लगी. आरती जो चाहती थी, वही होता था. कमाऊ बेटी थी, इसलिए मांबाप भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे. जिस कंप्यूटर सेंटर पर आरती नौकरी कर रही थी, उसी में आगरा के थाना तेहरा (सैया) के गांव बेहरा छरई का रहने वाला नेतराम कुशवाह भी नौकरी करता था. वह चंदन सिंह की 9 संतानों में चौथे नंबर पर था. एमए करने के बाद उस ने कंप्यूटर कोर्स किया और उसी कंप्यूटर सेंटर पर शिक्षक की नौकरी करने लगा, जहां आरती नौकरी कर रही थी.

आरती और नेतराम हमउम्र और हमपेशा थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. इस के बाद दोनों साथसाथ बैठ कर चाय भी पीने लगे और लंच भी करने लगे. नेतराम को जब पता चला कि आरती डिफेंस कालोनी में रहती है और उस के पिता लौहरे सिंह चहार सेना से रिटायर सूबेदार हैं. उस का बड़ा भाई ही नहीं, बड़ी बहन का पति भी सेना में है तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘आरती, तब तो तुम्हारी शादी भी किसी फौजी से ही होगी.’’

‘‘हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती. मैं शादी उसी से करूंगी, जो मुझे अच्छा लगेगा. आप को बता दूं, यह जरूरी नहीं कि वह मेरी जाति का ही हो. वह किसी अन्य जाति से भी हो सकता है. तुम भी हो सकते हो.’’

आरती की इस बात से नेतराम हैरान रह गया. चूंकि वह कुंवारा था और आरती उसे पसंद थी. वह उस से शादी भी करना चाहता था, लेकिन जाति अलग होने की वजह से यह बात कहने की वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. जबकि लड़की हो कर आरती ने यह बात कह दी थी. लगातार मिलते रहने और साथसाथ खानापीना होने से आरती और नेतराम का आपसी सामंजस्य बैठता गया और फिर उन की दोस्ती सचमुच प्यार में बदल गई. इस के बाद नेतराम आरती के घर भी आनेजाने लगा. घर वाले उसे आरती का दोस्त मानते थे, इसलिए कभी किसी ने न तो उस के घर आने पर ऐतराज जताया, न उस से मिलनेजुलने पर.

इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि एक तो वह कमाऊ बेटी थी, दूसरे उन्हें विश्वास था कि उन की बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना करना पड़े. धीरेधीरे आरती और नेतराम का आपसी लगाव बढ़ता गया. उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे अलगअलग जाति से हैं. समय के साथ उन के प्यार की गांठ मजबूत होती गई और वे आपस में शादी के बारे में सोचने लगे. जब इस बात की जानकारी चाहर परिवार को हुई तो घर में हंगामा मच गया. एक तो जाट परिवार, दूसरे फौजी, हंगामा तो मचना ही था. लौहरे सिंह और प्रवीण ने आरती पर बंदिशें लगानी चाहीं तो वह बगावत पर उतर आई.

उस ने साफ कह दिया कि यह जिंदगी उस की अपनी है, वह जैसे चाहे जिए. अगर उसे परेशान किया गया या बंदिश लगाई गई तो वह उन की इज्जत का भी खयाल नहीं करेगी. इस के बाद आरती ने नेतराम से कहा कि जो भी करना है, जल्द कर लिया जाए. क्योंकि जितना समय बीतेगा, तनाव बढ़ता ही जाएगा. आरती का बड़ा भाई प्रवीण नौकरी की वजह से ज्यादातर बाहर ही रहता था. छोटा भाई जेल में था. घर में मातापिता थे, वे भी बूढ़े हो चुके थे. बेटे की वजह से वे वैसे ही परेशान थे, इसलिए आरती के बारे में वे वैसे भी ज्यादा नहीं सोच पाते थे.

नेतराम के भी इरादे मजबूत थे. वह जानता था कि पढ़ीलिखी, समझदार आरती के साथ उस की जिंदगी मजे से कटेगी. आरती उस के प्यार में इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उस का पीछे लौटना मुश्किल था. जबकि वह जानती थी कि अलग जाति होने की वजह से नेतराम से शादी करना उस के परिवार पर भारी पड़ सकता है. पूरी बिरादरी हायतौबा मचाएगी, लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी. उसे अपना भविष्य नेतराम में ही दिखाई दे रहा था. यही वजह थी कि न चाहते हुए भी उस ने 12 दिसंबर, 2007 में नेतराम के साथ कोर्टमैरिज कर ली. उस दिन सुबह आरती नौकरी के लिए घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. मां ने फोन किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है.

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, इसलिए लौहरे सिंह को समझते देर नहीं लगी कि आरती कहां गई होगी. अगले दिन आरती ने फोन कर के अपनी शादी के बारे में बड़ी बहन बीना को बताया तो उन्होंने इस बात की जानकारी मांबाप को दे दी. आखिर वही हुआ, जिस का चाहर परिवार को डर था. बेटी की इस करतूत से घर वालों को गहरा आघात लगा. एक बेटा दुष्कर्म के आरोप में जेल में था, बेटी ने गैर जाति के लड़के से शादी कर ली थी. बदनामी के डर से भले ही उन्होंने कोई काररवाई नहीं की, लेकिन वे उस के इस अपराध को माफ नहीं कर सकते थे. बेटी बालिग थी, वह उस का कुछ कर भी नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने यह सोच कर संतोष कर लिया कि वह उन के लिए मर गई. घर के अन्य लोगों ने तो खुद को संभाल लिया, पर आरती की मां खुद को नहीं संभाल पाई और बेटी के इस निर्णय की वजह से उस की मौत हो गई.

आरती ने नेतराम से शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली थी. वह उस के साथ खुश थी. पतिपत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे थे. इस के अलावा नेतराम घर से भी संपन्न था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई कभी नहीं थी. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद आरती ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम हर्षित रखा गया. आरती के घर वालों ने शादी के बाद कभी आरती के बारे में कुछ जानने की कोशिश नहीं की तो उस ने भी कभी कुछ नहीं बताया. नेतराम और आरती, दोनों ही पढ़ेलिखे और महत्वाकांक्षी थे. दोनों ठीकठाक कमाते भी थे, इस के अलावा वह घर से भी संपन्न था, इसलिए मजे से जिंदगी कट रही थी.

सन 2009 में नेतराम की मां सुमित्रा देवी का निधन हो गया था. तब तक आरती चाहर ने बीएड भी कर लिया था, इसलिए उस ने नेतराम से अपना एक स्कूल खोलने को कहा. नेतराम के पास पैसे भी थे और जमीन भी, उस ने अपने करीबी कस्बे तेहरा में मां के नाम सुमित्रा देवी कन्या इंटरकालेज खोल दिया. नेतराम खुद स्कूल का मैनेजर बन गया और पत्नी आरती को स्कूल का प्रिंसिपल बना दिया. उन का यह स्कूल जल्दी ही बढि़या चलने लगा, जिस से कमाई भी बढि़या होने लगी. इस के बाद नेतराम ने आगरा की नई विकसित हो रही कालोनी रचना पैलेस में एक प्लाट ले कर उस में 10 कमरों का बढि़या 2 मंजिला मकान बनवा लिया. इस मकान का नंबर था 93. मकान तैयार हो गया तो नेतराम पत्नी और बच्चों के साथ उसी में रहने लगा. अब तक आरती एक और बेटे की मां बन चुकी थी, जिस का नाम युवराज रखा गया था.

सन 2007 से सन 2014 तक के 7 साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला. नेतराम तरक्की के नित नए आयाम स्थापित करते चले गए. अब वह एक टैक्निकल कालेज खोलना चाहते थे. वह अपनी एक संस्था भी चला रहे थे, जिस के अंतर्गत गरीब और असहाय बच्चों को कंप्यूटर सिखाया जाता था. राष्ट्रीय कंप्यूटर शिक्षा मिशन के अंतर्गत चल रही इस संस्था की कई जिलों में शाखाएं खुल गई थीं. इन सभी शाखाओं का कोऔर्डिनेशन नेतराम खुद कर रहे थे. नेतराम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे थे. उन्हें अब किसी चीज की कमी नहीं थी. भरपूरा परिवार तो था ही, समाज में अच्छीखासी शोहरत और इज्जत मिलने के साथ पैसे भी खूब आ रहे थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक 20 नवंबर, 2014 को आरती की हत्या हो गई.

हुआ यह कि दिन के डेढ़ बजे नेतराम ने आरती को फोन किया तो फोन नहीं उठा. कई बार फोन करने के बाद जब आरती की ओर से फोन रिसीव नहीं किया गया तो उन्हें हैरानी हुई. इस के बाद उन्होंने ऊपर की मंजिल  में रहने वाले अपने किराएदार को फोन कर के आरती से बात कराने का अनुरोध किया. किराएदार अपना मोबाइल फोन ले कर नीचे आया और ‘भाभीजी… भाभीजी…’ आवाज लगाते हुए घर के अंदर पहुंचा तो बैडरूम का नजारा देख कर उस के होश उड़ गए. उस ने शोर मचा कर पूरी कालोनी तो इकट्ठा कर ही ली, नेतराम से भी तुरंत घर आने को कहा.

5-7 मिनट में ही नेतराम घर आ गए. मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह तेजी से घर के अंदर पहुंचे. उन के साथ कालोनी के कई लोग अंदर आ गए थे. घर के अंदर की स्थिति बड़ी ही खौफनाक थी. आरती की लाश बैड पर एक किनारे पड़ी थी, उस का सिर नीचे की ओर लटका हुआ था. गरदन से बह रहा खून फर्श पर फैल रहा था. आरती की बगल में बैठा युवराज रो रहा था. वह मर चुकी मां को उठाने के चक्कर में खून से सन चुका था. पत्नी की हालत देख कर नेतराम फफकफफक कर रोने लगे. रोते हुए ही उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े युवराज को उठाया और किराएदार को थमा कर उसे नहला कर कपड़े बदल देने का अनुरोध किया.

अब तक उन का बड़ा बेटा हर्षित भी स्कूल से आ चुका था. मां की हालत देख कर वह भी रोने लगा. पड़ोस की औरतों ने उसे संभाला. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पुलिस अधिकारियों की आधा दर्जन गाडि़यां रचना पैलेस में आ कर खड़ी हो गईं. एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ (सदर) असीम चौधरी थाना ताजगंज के थानाप्रभारी मधुर मिश्रा घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. डौग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और फोटोग्राफर को भी बुला लिया गया था. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से मकान और उस कमरे का निरीक्षण किया, जिस में आरती की लाश पड़ी थी. इस मामले में डौग स्क्वायड कोई खास मदद नहीं कर सका. उस ने बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक 3-4 चक्कर लगाए और मकान से बाहर आ कर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास रुक गया.

पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्यारे बैडरूम और ड्राइंगरूम के बीच चहलकदमी करते रहे होंगे. उस के बाद मकान से निकल कर बगल वाले मकान चारदीवारी के पास आए होंगे, जहां उन की मोटरसाइकिल या स्कूटर खड़ी रही होगी. मकान के निरीक्षण में पुलिस ने देखा कि हत्या के बाद हत्यारों ने बैडरूम के बगल में लगे वाशबेसिन में खून सने हाथ धोए थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स ने ड्राइंगरूम में रखे चाय के 2 कपों से फिंगरप्रिंट उठाए. चाय के कप और ट्रे में रखी नमकीन, मिठाई देख कर पुलिस अधिकारी समझ गए कि जिस ने भी यह कत्ल किया है, वह कोई खास परिचित रहा होगा.

अब पुलिस को यह पता करना था कि खास लोगों में ऐसा कौन हो सकता है, जो हत्या कर सकता है. पुलिस ने जब इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि मृतका आरती चाहर ने घर वालों के खिलाफ जा कर अन्य जाति के नेतराम कुशवाह से करीब 7 साल पहले प्रेमविवाह किया था. तब उस के घर वालों ने इस बात को अपना अपमान मान कर खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी. पुलिस को जांच आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिल गया था, लेकिन फिलहाल तो उन्हें घटनास्थल की काररवाई निपटानी थी. आवश्यक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने आरती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उसी 7 साल पुरानी धमकी के आधार पर नेतराम ने आरती के भाई राकेश चाहर के खिलाफ आरती की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

चूंकि राकेश का एक साथी लोकेश भी अकसर नेतराम के घर आता रहता था, इसलिए नेतराम को शक था कि हत्या के समय वह भी साथ रहा होगा, इसलिए मुकदमे में उस का नाम भी शामिल करा दिया था. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए राकेश और लोकेश के फोन नंबर ले लिए. इस के बाद उन नंबरों पर फोन किए गए तो वे नंबर बंद पाए गए. हत्या के बाद नंबर बंद होने से पुलिस का संदेह बढ़ गया. इस मामले की जांच थाना ताजगंज का उसी दिन चार्ज संभालने वाले थानाप्रभारी मधुर मिश्रा को सौंपी गई.

उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक टीम बनाई, जिस में एसएसआई प्रमोद कुमार यादव, नरेंद्र कुमार, सिपाही रामन और आशीष कुमार को शामिल किया. चूंकि एक स्कूल प्रिंसिपल की दिनदहाड़े हत्या का मामला था, इसलिए सीओ सिटी असीम चौधरी भी इस मामले पर नजर रखे हुए थे. पुलिस को राकेश की तलाश थी. इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो घर में मौजूद उस का बड़ा भाई प्रवीण सिंह फौजी वर्दी की धौंस दिखाते हुए पुलिस से उलझ गया. नाराज पुलिस टीम उसे हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में उस से पूछताछ चल रही थी कि मुखबिर से पुलिस टीम को राकेश के साथी लोकेश के बारे में पता चल गया.

पुलिस लोकेश को पकड़ कर थाने ले आई. शुरुआती पूछताछ में तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. उस ने एक पान वाले से भी कहलवाया कि उस दोपहर को वह उस की दुकान पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था. पुलिस पान वाले को भी ले आई. इस के बाद जब पुलिस ने अपने ढंग से पूछताछ की तो पान वाले ने बक दिया कि उस ने लोकेश के कहने पर झूठ बोला था. इस के बाद पुलिस ने लोकेश से सच्चाई उगलवा ली. लोकेश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो उस की निशानदेही पर पुलिस ने थाना एत्माद्दौला की ट्रांस यमुना कालोनी के बी ब्लाक के मकान नंबर 3/5 से राकेश को गिरफ्तार कर लिया. सीओ असीम चौधरी दोनों को अपने औफिस ले आए, जहां की गई लगभग एक घंटे की पूछताछ में राकेश ने आरती की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

जिन दिनों आरती ने प्रेमविवाह किया था, उन दिनों राकेश जेल में था. दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत से उसे 10 साल के कैद की सजा हुई थी. घर वालों के खिलाफ आरती की छोटीमोटी बगावतें वह पहले से ही सुनता आ रहा था, लेकिन जब बड़े भाई प्रवीण ने उसे नेतराम से विवाह की खबर सुनाई तो उस का खून खौल उठा. नेतराम कुशवाह से उसे कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि अगर उस की बहन आरती न चाहती तो भला उस की क्या मजाल थी कि वह आरती से जबरदस्ती कोर्टमैरिज कर लेता. उस की नजरों में इस के लिए दोषी उस की बड़ी बहन आरती थी.

राकेश ने अपने घर वालों की इज्जत बचाने के लिए आरती को खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने जेल से ही आरती को धमकी दी कि उस ने जो किया है, इस के लिए वह उसे सबक जरूर सिखाएगा. उसी बीच आरती की वजह से मां की मौत हो गई तो राकेश को आरती से नफरत हो गई. उस ने कसम खा ली कि कुछ भी हो, वह आरती को जीवित नहीं छोड़ेगा. राकेश जेल की जिस बैरक में सजा काट रहा था, उसी में लोकेश नाम का एक लड़का आया. वह पड़ोस के ही मोहल्ले का रहने वाला था, इसलिए राकेश से उस की दोस्ती हो गई. जल्दी ही दोनों के संबंध इतने मधुर हो गए कि वे एक ही थाली में खाना खाने लगे. उन्होंने जीवन भर इस संबंध को निभाने की कसमें भी खाईं.

राकेश और लोकेश हमउम्र थे. दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे, इसलिए राकेश ने अपनी बहन आरती के प्रेमविवाह के बारे में बता कर पूछा कि इस मामले में क्या किया जाना चाहिए? समझदारी दिखाते हुए लोकेश ने सलाह दी कि इस मामले में अभी इंतजार करना चाहिए. आरती को उस के किए की सजा इस तरह दी जाए कि पुलिस भी पता न कर सके कि ऐसा किस ने किया होगा. आरती ने जो किया था, उस से घर के सभी लोग नाराज थे. इसलिए जब कभी कोई जेल में राकेश से मिलने आता तो उस का जिक्र जरूर छिड़ता. राकेश के लिए परेशानी यह थी कि उस के मुकदमे की कोई ठीक से पैरवी करने वाला नहीं था. मां मर चुकी थी, बाप बूढ़ा था, बड़ा भाई और बहनोई फौज में थे. जिस की वजह से वे ज्यादातर बाहर रहते थे. एक बहन थी बीना, वही कभीकभी मिलने आ जाती थी.

राकेश चाहता था कि किसी तरह हाईकोर्ट से उस की जमानत हो जाए. बूढ़े होने की वजह से पिता भागदौड़ नहीं कर पा रहे थे. इसलिए राकेश ने बीना से कहा कि वह आरती से बात कर के उस की जमानत करवा दे. बीना ने आरती को फोन कर के कहा भी कि वह जेल जा कर राकेश से मिल ले और उस की जमानत करा दे. लेकिन आरती न तो राकेश से मिलने जेल गई और न ही उस की जमानत कराई. जबकि राकेश के पिता लौहरे सिंह ने आरती को उस की जमानत कराने के लिए एक लाख रुपए नकद और इतने के गहने भी दिए थे. रुपए और गहने ले कर भी आरती ने राकेश की जमानत के प्रति ध्यान नहीं दिया.

राकेश जेल से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था. आरती न तो उस से मिलने गई थी और न उस की जमानत कराई थी. इस से उसे लगा कि बहन उस के बारे में जरा भी नहीं सोच रही है. लगभग 6 महीने पहले हाईकोर्ट से उस की जमानत हुई. राकेश घर आ गया. बहन के व्यवहार से उस के मन में एक टीस सी उठती थी. लेकिन अभी वह जमानत पर जेल से आया था, इसलिए कोई अपराध नहीं करना चाहता था. इस के बावजूद वह बहन को उस के किए की सजा देना चाहता था. लेकिन वह यह काम इस तरह करना चाहता था कि उस पर आरोप लगने की बात तो दूर, कोई शक भी न कर सके. इस के लिए उस ने आरती से मधुर संबंध बनाने शुरू किए. जल्दी ही उस ने इस तरह संबंध बना लिए, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है.

राकेश के बदले व्यवहार से आरती भी उसे मानने लगी थी. वह जब भी आता था, आरती उसे खूब खिलातीपिलाती थी, जाते समय कुछ न कुछ बांध भी देती थी. जरूरत पड़ने पर रुपएपैसे से भी उस की मदद करती थी. इस के अलावा अगर वह पति और बच्चों के साथ कहीं बाहर घूमने जाती थी तो उसे भी साथ ले जाती. उसी बीच लोकेश भी जेल से बाहर आ गया तो दोनों साथसाथ दिखाई देने लगे. आरती के ठाठबाट और सुखी जीवन से राकेश को ईर्ष्या हो रही थी. वह सोचता था कि अगर आरती चाहती तो बहुत पहले ही वह जेल से बाहर आ जाता. लेकिन उस ने उस की परेशानी को बिलकुल नहीं समझा. आरती भले ही राकेश का खूब खयाल रखती थी, लेकिन सही बात यह थी कि आरती बिलकुल नहीं चाहती कि राकेश उस के घर आए.

इस बात को राकेश समझ गया था, इसलिए वह खुद को अपमानित महसूस करता था. इन सब बातों से उसे लगता था कि इस तरह की बहन को सुख से जीने का कोई अधिकार नहीं है. राकेश के मन में क्या है, शायद आरती ने ताड़ लिया था. इसलिए वह उस की ओर से निश्चिंत नहीं थी. वह नेतराम से कहती भी रहती थी कि उसे राकेश से डर लगता है. जबकि नेतराम का कहना था कि राकेश तो वैसे ही कानून के शिकंजे में है, इसलिए अब वह कोई गैरकानूनी काम कर के अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करेगा. एक दिन राकेश लोकेश को साथ ले कर आरती के घर पहुंचा. जब आरती को पता चला कि लोकेश भी जेल से छूट कर आया है तो उसे झटका सा लगा. उस ने राकेश से कहा भी, ‘‘उसे ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहिए.’’

राकेश को बहन की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘‘यह मेरा देस्त है. दोस्त कैसा भी हो, दोस्त ही होता है.’’

इस के बाद राकेश आरती के घर से बाहर आया तो लोकेश से बोला, ‘‘दोस्त, मैं अपनी इस बहन को सहन नहीं कर पा रहा हूं. मेरे घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर देखो यह किस तरह सुख और चैन से जी रही है.’’

‘‘उस कालिख को तो इस के खून से ही धोया जा सकता है.’’ लोकेश ने कहा. राकेश भी यही सोच रहा था. साथी मिल गया तो उस का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि परिवार की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली बहन को कैसे सबक सिखाया जाए. आरती को भले ही राकेश पर विश्वास नहीं था, लेकिन राकेश बहन और बहनोई का विश्वास जीतने कोशिश कर रहा था. हफ्ते में 2-3 बार वह बहनबहनोई और भांजों से मिलने उन के घर आता था. उस के साथ लोकेश भी होता था. आरती के पास किसी चीज की कमी नहीं थी, इसलिए अच्छाअच्छा खिलानेपिलाने के साथ वह छोटे भाई राकेश को पौकेट मनी भी देती थी. इस की वजह यह थी कि आरती और नेतराम राकेश से अपने संबंध मधुर बना लेना चाहते थे.

26 नवंबर, 2014 को वैष्णो देवी जाने के लिए नेतराम ने पूरे परिवार का टिकट कराया था. नेतराम ने साथ ले जाने के लिए राकेश की भी टिकट करा रखी थी. जबकि राकेश बहन को सबक सिखाने का मौका तलाश रहा था. 18 नवंबर को राकेश और लोकेश आरती के यहां बैठे बातें कर रहे थे, तभी बातोंबातों में नेतराम ने कहा कि 20 नवंबर को उसे सजावट का सामान (झूमर झाड़फानूस) लेने फिरोजाबाद जाना है. यह सुन कर राकेश की आंखों में चमक आ गई. थोड़ी देर बाद राकेश लोकेश के साथ बाहर आ गया. इस के बाद उस ने लोकेश के साथ मिल कर आरती की हत्या की योजना बना डाली.

18 नवंबर की बातचीत के अनुसार, 20 नवंबर की सुबह के करीब 11 बजे नेतराम को फिरोजाबाद जाने के लिए घर से निकलना था. लेकिन इस बीच उस का प्रोग्राम बदल गया. उस ने डिजाइन पसंद करने के लिए आरती को भी साथ चलने के लिए तैयार कर लिया था. इस नए प्रोग्राम के अनुसार उसे 2 बजे के आसपास घर से निकलना था. नेतराम का बड़ा बेटा हर्षित स्कूल गया था, जिसे डेढ़ बजे तक घर आना था. आरती चाहती थी कि वह अपने हाथों से उसे खाना खिला कर फिरोजाबाद जाए.

नेतराम के फिरोजाबाद जाने के प्रोग्राम में बदलाव हो चुका है, यह राकेश और लोकेश को पता नहीं था. 20 नवंबर, 2014 दोपहर के बाद नेतराम और आरती को फिरोजाबाद जाना था, इसलिए नेतराम अपने कंप्यूटर सेंटर के काम से 2-3 घंटे में आने के लिए कह कर सेवला स्थित एक साइबर कैफे पर चला गया. आरती घर के कामों में लग गई. नेतराम के जाते ही साढ़े 10 बजे के आसपास राकेश मोटरसाइकिल से लोकेश को साथ ले कर आरती के घर के लिए चल पड़ा. आरती को सबक सिखाने की योजना राकेश ने 18 नवंबर को ही बना डाली थी, इसलिए 19 नवंबर की शाम को उस ने चाकू खरीद लिया था. हत्या करने में किसी तरह की झिझक न हो, इसलिए एकएक क्वार्टर शराब खरीद कर पी लिया.

सवा 11 बजे जब राकेश और लोकेश मोटरसाइकिल से रचना पैलेस कालोनी की ओर जा रहे थे तो उन्हें नेतराम जाता दिखाई दिया. उन्हें लगा कि वह फिरोजाबाद जा रहा है. इस के बाद दोनों एक पान के खोखे के पास खड़े हो गए. आधेपौने घंटे बाद जब उन्हें लगा कि नेतराम शहर से बाहर निकल गया होगा तो दोनों आरती के घर की ओर चल पड़े. योजनानुसार राकेश ने मोटरसाइकिल आरती के घर से कुछ दूरी पर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास खड़ी कर दी और इधरउधर देख कर लोकेश के साथ बहन के घर जा पहुंचा. भाई और उस के दोस्त के आने पर आरती ने फटाफट चाय बनाई और नमकीन एवं मिठाई के साथ उन्हें पीने को दी. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘राकेश, तुम दोनों चाय पियो, तब तक मैं युवराज को नहला देती हूं.’’

यह कह कर आरती युवराज को गोद में ले कर कपड़े उतारने लगी तो राकेश ने कहा, ‘‘दीदी, आप ने कुछ देने को कहा था. लाइए उसे दे दीजिए.’’

आरती ने युवराज को लोकेश को थमाया और खुद किचन में गई. अब तक चाय खत्म हो चुकी थी. इसलिए किचन में जा कर जैसे ही आरती ने फ्रिज खोलना चाहा, पीछे से राकेश पहुंच गया. उस ने आरती के गले में पड़े दुपट्टे की लपेट कर पकड़ लिया और घसीटते हुए बैडरूम ले गया. हक्काबक्का आरती कुछ कहती, युवराज को लोकेश की गोद में देख कर डर गई कि उस के चिल्लाने पर वह उस के बेटे का अनिष्ट न कर दे. इस के बाद राकेश ने आरती को बैड पर गिरा कर चाकू से हमला कर दिया. गला रेत कर उस की हत्या करने के बाद गले की चेन और कान के कुंडल उतार लिए. इस के बाद अलमारी वगैरह खोल कर उस में रखा कीमती सामान ले कर इधरउधर फैला दिया, जिस से लगे कि यह हत्या लूट के लिए की गई है.

आरती की हत्या करने के बाद दोनों घर से निकले और मोटरसाइकिल से आराम से चले गए. लोकेश अपने घर चला गया, जबकि राकेश अपने एक दोस्त के घर जा कर लोकल न्यूज चैनल पर समाचार देखने लगा कि पुलिस की जांच किस दिशा में जा रही है. राकेश पुलिस जांच का पता लगा पाता, पुलिस ने पहले लोकेश को और फिर उस की मदद से उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, गहने, मोटरसाइकिल और कपड़े बरामद कर के दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

राकेश ने बहन को मौत के घाट उतार कर उस के मासूम बच्चों को अनाथ कर दिया है. लेकिन उसे न तो बहन की हत्या का कोई दुख है, न उस के बच्चों के अनाथ होने का. उस का कहना है कि बहन ने परिवार पर बदनामी का जो दाग लगाया था, उस के खून से उस ने वह दाग धो दिया है. अब उसे चाहे जो भी सजा मिले, उसे उस का कोई दुख नहीं है. Love Story in Hindi

 

UP Crime News : बहन के प्यार का साइड इफेक्ट

UP Crime News : गगन उर्फ गौतम नहीं चाहता था कि उस की सौतेली बहन नंदिनी मोहल्ले के दूसरी बिरादरी के युवक से प्यार करे. लेकिन नंदिनी भी जिद्दी थी. अपनी जिद पूरी करने के लिए उस ने भाई गगन की पूर्व प्रेमिका ममता के साथ मिल कर भाई के खिलाफ ऐसी खूनी साजिश रची कि…

घर में सभी लोगों की लाडली नंदिनी की शादी को ले कर उस के पिता ओमप्रकाश चिंतित रहते थे. उस की शादी की उम्र हो चुकी थी. वह जितनी चंचल, उतनी ही हिम्मती और बातबात पर अड़ जाने वाली थी. जिद्दी इतनी कि एक बार जो मन में ठान लिया, उसे पूरा कर के ही छोड़ती थी. मुरादाबाद की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाले ओमप्रकाश के खातेपीते सुखीसंपन्न परिवार में पत्नी ओमवती के अलावा बेटी नंदिनी और बेटा गगन था.

मुरादाबाद की लालबाग रामगंगा कालोनी में रहने वाले इस परिवार के सभी सदस्य सौतेलेपन की कुंठा से ग्रसित थे. वहीं सौतेलापन नंदिनी को भी भीतर ही भीतर कुछ ज्यादा ही कुरेदता रहता था. उस की बड़ी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी. वह अपने घर में खुश थी, लेकिन नंदिनी को पड़ोस में रहने वाले प्रदीप नाम के युवक से प्यार हो गया. लेकिन वह उस की बिरादरी का नहीं था. इस के अलावा वह बेरोजगार भी था. इसी बात को ले कर गगन उस के प्रेम में रोड़ा बन बैठा था. नंदिनी गगन की भले ही सौतेली बहन थी, लेकिन वह नहीं चाहता था कि नंदिनी प्रदीप से प्यार करे. गगन अपने मातापिता को इस बारे में उकसाता भी रहता था. पिता भी गगन का ही पक्ष लेते थे. सौतेली मां कलावती का निधन भी बीते साल कैंसर से हो चुका था.

घर में नंदिनी की एकमात्र हमदर्द गगन की पत्नी राधा बन सकती थी, लेकिन उस की घर में जरा भी नहीं चलती थी. गगन नंदिनी के साथसाथ उसे भी काफी डांटडपट कर रखता था. कई बार इस वजह से नंदिनी काफी दुखी हो जाती थी और गगन के विरोधी तेवर को अपने दिल पर लेती हुई बिफर भी पड़ती थी. उस के मुंह से निकल पड़ता था, ‘‘गगन उस का दुश्मन है, क्योंकि वह सौतेला भाई जो है, अपना होता तो…’’

अब नंदिनी को यह समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने दिल की बात कहे तो किस से? अपनी समस्या का समाधान निकाले भी तो किस की मदद ले? यही सोच कर वह हमेशा तनाव में रहती थी. प्रेमी प्रदीप के साथ वह ज्यादा समय तक मिलबैठ भी नहीं सकती थी. क्योंकि गगन उस पर हमेशा पहरेदार की तरह तना रहता था. हर बात में मिर्चमसाला लगा कर पिता को बताता था और घर में बात का बतंगड़ बना डालता था. और तो और, उस के प्रेमी को नाकारा निकम्मा कहता हुआ घर में सभी के सामने उसे काफी जलील करता था. इस बात को ले कर नंदिनी परेशान रहने लगी थी. उस के मन में तरहतरह के खयाल आतेजाते रहते थे.

अपनी समस्याओं को ले कर उधेड़बुन में एक बार नंदिनी बाजार से गुजर रही थी. तभी अचानक उस की मुलाकात ममता से हो गई. उसी ने टोका, ‘‘अरे नंदिनी तुम! काफी परेशान दिख रही हो? क्या बात है?’’

‘‘अरे ममता! तुम तो पहचानने में ही नहीं आ रही हो. तुम्हारी शादी होने वाली है क्या? बहुत दिनों बाद मिली… कैसी हो तुम?’’ नंदिनी ने चौंकते हुए उसी की तरह एक साथ कई सवाल दाग दिए.

‘‘मैं तो बस अपने दिल को बहला रही हूं. खुद को दिलासा दे रही हूं. तुम्हारे भाई ने जब से मुझे धोखा दिया है, उस के बाद समझो आज ही मूड फ्रैश करने के लिए थोड़ा बनठन कर निकली हूं… अच्छी लग रही हूं न?’’ ममता ने भी नंदिनी के अंदाज में जवाब दिया.

‘‘बहुत ही अच्छी, ग्लैमरस. तुम्हारी सुंदरता का कोई जवाब नहीं. तुम कुछ भी पहन लो हीरोइन दिखती हो…’’ नंदिनी बोली.

‘‘बसबस, किसी की अधिक तारीफ नहीं करते. उस से उस की मुराद पूरी होने में अड़चन आ जाती है.’’ ममता बोली.

‘‘तुम्हारी मुराद क्या है?’’ नंदिनी तपाक से पूछ बैठी.

‘‘बदला,’’ नंदिनी के लहजे में ममता बोली.

‘‘एेंऽऽ बदला… यह कोई मुराद हुई? मगर किस से?’’ चौंकती हुई नंदिनी ने पूछा.

‘‘तुम्हारे उसी भाई से, जो मेरी जिंदगी उजाड़ कर तुम्हारी जिंदगी भी बरबाद करने पर तुला है.’’ ममता गुस्से में बोली.

‘‘कह तो तुम बिलकुल सही रही हो, मगर क्या कर सकती हूं, समझ नहीं पा रही हूं.’’ नंदिनी ने कहा.

वह मायूसी के साथ आगे कहने लगी, ‘‘गगन सौतेला भाई है न, इसलिए अपना सौतेलापन खुल कर दिखा रहा है. प्रदीप को मेरा और पूरे परिवार का दुश्मन बताता है. पापा को उस के खिलाफ काफी भड़का दिया है. पापा से बोलता है कि उन की जायदाद पर प्रदीप की नजर है. तुम तो जानती हो उसे, वह ऐसा बिलकुल ही नहीं है. वह मुझे बहुत प्यार करता है. मैं भी उसे बहुत चाहती हूं.’’

‘‘देखो, नंदिनी तुम्हारे चाहने और नहीं चाहने से क्या होता है. गगन कभी नहीं चाहता है कि तुम्हारी प्रदीप के साथ शादी हो. इस के पीछे छिपा हुआ उस का मकसद समझो. वह जानता है कि तुम्हारी प्रदीप से शादी होने पर तुम इसी मोहल्ले में रहने लगोगी… और फिर अपने पिता की संपत्ति पर हक जताने लगोगी. इसलिए वह तुम्हारी शादी कहीं दूर करवाना चाहता है.’’ ममता ने समझाया.

इसी के साथ उस ने यह भी कह दिया कि उन दोनों का एक ही दुश्मन है गगन. गगन की प्रेमिका थी ममता यह बात नंदिनी के दिमाग में घर कर गई. उस वक्त तो ममता और नंदिनी अपनीअपनी उलझनों का बोझ एकदूसरे पर उतार कर विदा हो लिए, लेकन दोनों के दिमाग में गगन के विरोध की ज्वाला धधकने लगी. ऐसा होना भी स्वाभाविक था. नंदिनी को गगन हमेशा कहता रहता था कि प्रदीप उस का हितैषी नहीं दुश्मन है, वह उस के साथ प्रेम का नाटक कर रहा है और उस की मंशा जमीनजायदाद हथियाने की है. एक समय में लालबाग रामगंगा कालोनी निवासी रमेश कुमार की बेटी ममता गगन की प्रेमिका हुआ करती थी. गगन उस पर जान छिड़कता था. गगन भी ममता से बेइंतहा मोहब्बत करता था. उस का दीवाना था.

वह बेहद सुंदर और मांसलता के दैहिक आकर्षण से भरी हुई थी, अपनी खूबसूरती को आधुनिक पहनावे और स्टाइल से और भी ग्लैमर बना देती थी. बौडी लैंग्वेज से ले कर बोलचाल तक से किसी को भी पलक झपकते ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी. उस के स्वच्छंद विचार और आधुनिक पहनावे से निखरे रूपरंग का कई लोग गलत अर्थ भी निकालते थे. दबी जुबान में उसे बदचलन तक कह देते थे. ऐसी धारणा रखने वालों में गगन के पिता ओमप्रकाश भी थे. उन्होंने ममता को ले कर गगन को एक बार खूब डांटा था. उस से दूर रहने की चेतावनी दी. यहां तक कि उन्होंने भी उसे बदचलन करार दे दिया था. दुर्भाग्य से 2018 में गगन की मां कलावती का कैंसर से निधन हो गया.

करीब 25 साल पहले ही ओमप्रकाश ने अमरोहा निवासी विवाहिता कलावती से दूसरा विवाह तब किया था, जब उन की पहली पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. विवाह के वक्त कलावती की गोद में 3 साल का गगन भी था. नंदिनी का बचपन उसी सौतेले भाई के साथ गुजरा, जो अब 28 साल का हो चुका था. ओमप्रकाश की पहली पत्नी से उन के 2 बच्चे पूजा और नंदिनी थी. वे पूजा की शादी कर चुके थे और नंदिनी की शादी के प्रयास में थे. कलावती के निधन के बाद ओमप्रकाश घर को संभालने के लिए गगन की शादी की योजना बनाने लगे थे. इसी सिलसिले में ममता के साथ उस के प्रेम संबंध का मामला सामने आ गया था. उन्होंने ममता से शादी करना सिरे से मना कर दिया था.

इस पर गगन न तो पिता का विरोध कर पाया, और न ही ममता की भावनाओं की कद्र. और फिर गगन की शादी 6 जुलाई 2018 को मुरादाबाद में ही बलदेवपुरी थाना कटघर निवासी कुंदन कुमार की बेटी राधा से हो गई. गगन का राधा के साथ शादी होना ममता को अच्छा नहीं लगा. वह खुल कर विरोध नहीं कर पाई, लेकिन भीतर ही भीतर नफरत की आग में जल उठी. इस का जिक्र उस ने कई बार अपने दूसरे दोस्तों से भी किया, वह अकसर महीने-2 महीने के लिए दूसरे शहर चली जाया करती थी और लोगों को कभी बरेली तो कभी लखनऊ में नौकरी लगने की बातें बताती रहती थी.

यहां तक कि वह अपने मातापिता से अलग किराए का कमरा ले कर रहने लगी थी. वह जिगर कालोनी में स्थित एक्सपोर्ट फर्म में काम करती थी. वह प्रदीप को भी ताने मारती थी, जो उस के दूर का रिश्तेदार था. ममता ने प्रदीप को एक बार तो साफसाफ कह दिया था कि जब तक गगन रहेगा तब तक उस की नंदिनी से शादी नहीं हो पाएगी.

यही बात वह नंदिनी को भी ताना देते हुए अकसर कहती थी कि गगन उसे उस के प्रेमी प्रदीप से कभी मिलने नहीं देगा. गगन भले ही उस का सौतेला भाई है, लेकिन उस की पिता की संपत्ति का वारिस वही बनेगा. उस दिन बाजार में ममता ने नंदिनी को एक बार फिर उस के हरे जख्म को कुरेद दिया था. ममता से बात कर के नंदिनी विचलित हो गई थी. गगन चाहता था कि उस की बहन की शादी किसी रोजगारशुदा व्यक्ति से ही हो. इस में उसे सौतेले पिता का भी समर्थन मिला हुआ था. नंदिनी के पिता हमेशा गगन का पक्ष ले कर नंदिनी को समझाते थे कि प्रदीप न तो बिरादरी का है, और न ही बराबरी का. जबकि इस की नंदिनी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी. वह मस्ती में रहती हुई अपनी जिद पर अड़ी थी.

कबाड़ी का कारोबार करने वाले गगन का यही सोचना था कि प्रदीप की निगाह उस के पिता की प्रौपर्टी पर टिकी है. ओमप्रकाश एक्सपोर्ट फर्म में काम करते थे. उन के लाड़प्यार में पली नंदिनी ही घर की देखभाल और खर्च की पूरी जिम्मेदारी संभाले हुई थी. बाजार और बैंक आदि का हिसाबकिताब नंदिनी के जिम्मे था. फिर भी घर में गगन की ही मनमानी चलती थी. वह पत्नी राधा को इस से दूर रखता था. नंदिनी नहीं चाहती थी कि उस की शादी किसी दूसरे शहर में हो. वह हमेशा पिता के मकान में ही रहना चाहती थी. प्रदीप को ले कर गगन के साथ नंदिनी का हमेशा झगड़ा होता रहता था.

बात जून 2021 की है. जब एक दिन नंदिनी के साथ गगन का झगड़ा काफी बढ़ गया था. इस कारण गगन अपनी ससुराल जा कर रहने लगा था. तब उस की पत्नी राधा भी अपने मायके में ही थी. एक तरफ नंदिनी थी, और दूसरी तरफ ममता. दोनों के दिल में गगन को ले कर विरोध की सुलगती चिंगारी जबतब भड़क उठती थी. नंदिनी अपने प्रेमी से शादी में आई बाधा को ले कर परेशान थी तो ममता को गगन से शादी नहीं हो पाने का मलाल था. कारण ममता ने गगन के साथ कई साल साथ गुजारे थे और विवाह होने के कसमेवादे किए थे. उन पलों को याद करके हुए ममता भावुक हो जाती थी. ममता ने प्रण कर लिया था कि वह गगन को जरूर सबक सिखाएगी. ममता को बस समय का इंतजार था.

नंदिनी से मिलने के बाद ममता ने अपने दिल की भड़ास निकाल दी थी. तभी ममता को मालूम हुआ था कि गगन 2 महीने से अपनी ससुराल बलदेवपुरी में रह रहा है. नंदिनी से मुलाकात से कुछ दिन पहले ही ममता की मुलाकात प्रदीप से भी हुई थी. उस ने नंदिनी की परेशानी के बारे में उसे जानकारी दे दी थी. उस ने भी बदले की आग में जलती ममता और नंदिनी की पीड़ा गहराई से महसूस की. जल्द ही तीनों ने गगन को लक्ष्य बना कर एक मीटिंग की. विशेषकर नंदिनी और ममता ने प्रदीप को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

योजना के मुताबिक प्रदीप ने अपने एक दोस्त वीरू उर्फ हरीश को भी साथ ले लिया. वीरू मुरादाबाद में थाना मझोला के गांव जयंतीपुर का रहने वाला एक बदमाश किस्म का युवक था. तीनों ने वीरू से गगन को ठिकाने लगाने की बात कही. उन्होंने बदले में उसे 50 हजार रुपए दिए. दरअसल, नंदिनी और ममता ने मिल कर प्रदीप के माध्यम से गगन को रास्ते से हमेशा के लिए हटाने की योजना बनाई थी.

योजना के अनुसार नंदिनी ने ममता को गगन का मोबाइल नंबर दिया. ममता ने अपने पूर्व प्रेमी गगन को काल की, ‘‘हैलो गगन.’’

‘‘हां, कौन?’’ गगन ने पूछा

‘‘अरे मुझे पहचाना नहीं, मैं तुम्हारी ममता बोल रही हूं.’’

ममता ने उलझाया मीठी बातों में गगन अचानक ममता की आवाज सुन कर एकदम से भौचक्का रह गया. भले ही ममता से उस की शादी नहीं हुई थी, किंतु उस के दिल में ममता अभी भी बसी हुई थी. न चाहते हुए भी अचरज से बोला, ‘‘चलो, तुम्हें मेरी याद तो आई.’’

‘‘मुझ से मिलोगे नहीं? तुम्हें तो पता ही होगा कि अब मेरा घर वालों से कोई वास्ता नहीं रहा. मैं बंगला गांव में रह रही हूं किराए पर. पास ही जिगर कालोनी में जौब करती हूं, फोन में तुम्हारा नंबर अचानक दिख गया तो तुम्हारी याद आ गई. फिर मैं ने फोन कर लिया.’’ ममता बोली.

गगन अभी कुछ बोलता इस से पहले ही ममता बोली, ‘‘मैं हर्बल पार्क घूमने आई थी. पार्क की सुंदरता देख कर तुम्हारे साथ यहां गुजारे पुराने दिन याद आ गए. आ जाओ यहीं पार्क के रेस्तरां में एक बार फिर मिलते हैं. साथ बैठते हैं…’’

बीते दिनों की कई पुरानी बातें बता कर ममता ने गगन को काफी भावुक कर दिया था. वह ममता की बातें सुन कर पुराने दिनों के हसीन लम्हों में खो गया. ममता गगन का पहला प्यार थी. गगन को ममता के साथ बिताए पल अचानक झिलमिलाने लगे थे. वह ममता से बोला,‘‘तुम बुलाओ और हम न आएं, ऐसा नहीं हो सकता.’’

थोड़ी देर में ही गगन हर्बल पार्क पहुंच गया. ममता जींस टौप पहने बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. गगन ने आते ही ममता को बाहों में भर लिया. ममता उस से छूटते ही बोली, ‘‘तुम अभी भी वही पुराने वाले गगन, जरा भी नहीं बदले…लेकिन अब तुम शादीशुदा हो आगे से ध्यान रखना हां. …अच्छा चलो पार्क के बाहर झाडि़यों की ओर चलते हैं. वहीं बैठ कर कुछ बातें करेंगे, आराम से.’’

गगन को झाडि़यों में ले गई ममता गगन ने महसूस किया कि ममता में कोई बदलाव नहीं आया है, वही पहले की तरह चंचल अदाएं, कसक और अपनापन….

‘‘ थोड़ा रुको यार, बहुत दिनों बाद मिले हो तुम्हारे लिए कोल्ड ड्रिंक्स और नमकीन लाती हूं. वहीं पार्क में बैठ कर साथसाथ पीएंगे.’’

ममता के बोलने पर गगन बोला, ‘‘हांहां क्यों नहीं.’’

‘‘ बस मैं कैंटीन गई और अभी आई.’’ बोलती हुई ममता कैंटीन की ओर जाने लगी.

तभी गगन हाथ खींचते हुआ बोला, ‘‘यह काम तुम्हारा नहीं मेरा है.’’

‘‘देखो मैं ने तुम्हें बुलाया है. समझो कि आज तुम हमारे मेहमान हो.’’ ममता कहती हुई गगन से हाथ छुड़ा कर तेजी से कैंटीन की ओर दौड़ी चली गई. गगन उसे देखता रह गया.

ममता यह सब योजना के मुताबिक कर रही थी. ममता की जिद के आगे गगन कुछ नहीं कर पाया. वह केवल ममता के साथ गुजारे पुराने लम्हों को ही याद करता रह गया.

‘‘ आओ चलें…’’ ममता बोली.

गगन एक बार फिर सपनों की दुनिया से बाहर आया. ममता के हाथ से कोल्ड ड्रिंक अपने हाथ में ले ली. ममता डिसपोजल गिलास और नमकीन का पैकेट संभालती हुई झाडि़यों की ओर बढ़ गई. कुछ पल में ही दोनों पार्क के मुख्य मार्ग से नजर नहीं आने वाली झाडि़यों के पीछे थे. गगन टायलेट का इशारा करते हुए उस ओर चला गया. ममता के लिए इस से अच्छा मौका और क्या हो सकता था. उस ने तुरंत दोनों डिसपोजल गिलास निकाले. उन में दोतिहाई कोल्ड ड्रिंक भरा और अपने साथ लाई नशीले पदार्थ की पुडि़या एक गिलास में डाल दी. गगन के आते ही उस ने अपने बाएं हाथ का गिलास उस की ओर बढ़ा दिया.

‘‘नहींनहीं, इस हाथ से नहीं दाएं हाथ वाला दो. तुम्हारी बाएं हाथ से किसी को सामन देने की आदत अभी तक गई नहीं है.’’ गगन बोला.

‘‘क्या करूं गगन, मेरा दायां हाथ चलता ही नहीं है. तुम्हारे साथ शादी हो जाती तब  शायद यह आदत छूट जाती. अच्छा लो इसे पकड़ो.’’ कहती हुई ममता ने अपने दाएं हाथ का कोल्ड ड्रिंक भरा गिलास आगे कर दिया. गगन ने गिलास हाथ में ले लिया. उस से एक घूंट पीने के बाद ममता मंदमंद मुसकराई. उस की मुसकान में कुटिलता छिपी थी, कारण वह अपनी योजना में कामयाब हो रही थी. नशीला पदार्थ मिला कोल्ड ड्रिंक का गिलास गगन के हाथ में था और वह नमकीन के साथसाथ घूंटघूंट कर चुस्की लेने लगा था.

कुछ समय में ही गगन बोला. ‘‘ममता… म… ममता,  मुझे तुम्हारा चेहरा साफ क्यों नहीं दिख रहा.’’ गगन की आवाज में लड़खड़ाहट थी. ममता समझ गई कि उस पर नशा हावी हो रहा है. ममता ने प्रेम भरी हमदर्दी दर्शाते हुए उस का सिर अपनी गोद में ले लिया. उस के बालों में अंगुलियां घुमाने लगी. कुछ पल में ही गगन पूरी तरह से बेहोश हो चुका था. ममता ने तुरंत थोड़ी दूर दूसरी झाड़ी के पीछे छिपे वीरू को इशारा किया. इशारा पाते ही ताक में बैठा वीरू ममता के पास आ गया. ममता वहां से उठती हुई बोली, ‘‘शिकार को संभालो, मैं ने अपना काम कर दिया, आगे का काम तुम्हारा.’’

उस के बाद नंदिनी और प्रदीप को भी इस की जानकारी दे दी कि उस का काम पूरा हो चुका है. हालांकि तब तक गगन के मुंह से केवल एक ही बड़बड़ाने की आवाज निकल रही थी, ‘‘ममता क्या हुआ है मुझे…’’

‘‘कुछ नहीं तुम्हें थोड़ा चक्कर आ गया है, अभी तुम्हें डाक्टर के यहां ले जाने का इंतजाम करवाती हूं.’’ ममता बोली. ममता उसे सहारा देते हुए वीरू के साथ उस की मोटरसाइकिल तक ले गई. वहां प्रदीप पहले से मौजूद था.

गगन को प्रदीप और वीरू ने पकड़ कर मोटरसाइकिल पर बिठा दिया. वीरू मोटरसाइकिल चलाने के लिए बैठ गया, जबकि प्रदीप गगन को गिरने से थामे हुए था. वीरू और प्रदीप गगन को जयंतीपुर ले गए. वहां एक खाली प्लौट में उन दोनों ने गगन को जबरदस्ती शराब पिलाई. फिर गगन के गले में पड़े गमछे से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उन्होंने उस के पैर गमछे से बांध दिए. फिर वीरू जयंतीपुर स्थित अपने घर से एक कंबल ले आया. उस कंबल में उन्होंने गगन की लाश लपेट दी. कंबल में उन्होंने कुछ ईंटें भी रख दी थीं. वह लाश को पास में बह रहे गहरे नाले में डुबोना चाहते थे, इसलिए 2 कट्टों में उन्होंने ईंटें भर कर वे कट्टे कंबल से बांधने के बाद लाश नाले में डाल दी. ईंटों की वजह से लाश नाले में डूब गई. यह बात 13 जुलाई, 2021 की है.

लाश ठिकाने लगाने के बाद वीरू ने रात करीब 10 बजे नंदिनी को फोन कर के गगन की लाश ठिकाने लगाने की जानकारी दी. उस समय गगन की पत्नी राधा तो अपने मायके गई हुई थी. पहली अगस्त को वह अपनी ससुराल  गई. उसे अपने मायके में होने वाले एक कार्यक्रम का निमंत्रण देना था. वहां पति नहीं दिखा तो राधा ने नंदिनी से पूछा. नंदिनी ने उसे बताया कि जब से गगन तुम्हारे घर पर रह रहा था. तब से यहां आया ही नहीं है. राधा ने पति को फोन मिलाया तो उस का फोन भी बंद मिला. उस ने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर के पति के बारे में पूछा. लेकिन पता चला कि गगन किसी रिश्तेदारी में गया ही नहीं था.

जब कहीं से जानकारी नहीं मिली तो नंदिनी भी राधा के साथ गगन को ढूंढने का नाटक करती रही. जब गगन कहीं नहीं मिला तो पिता ओमप्रकाश ने मुरादाबाद शहर के थाना मुगलपुरा में गगन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी अमित कुमार ने गगन के लापता होने की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मुरादाबाद का मुसलिम बाहुल्य लालबाग क्षेत्र बहुत संवेदनशील है. क्षेत्र में लापता युवक को ले कर वहां अशांति न हो जाए, इसलिए एसएसपी पवन कुमार ने एएसपी अनिल यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में मुगलपुरा के थानाप्रभारी अमित कुमार, एसआई नितेश सहरावत, ताजवर सिंह, जगजीत सिंह, राजवंदर कौर, कांस्टेबल संगम कसाना, नीरज कुमार, समीर आदि को शामिल किया.

टीम अपने स्तर से केस की छानबीन में जुट गई. इस के अलावा लालबाग क्षेत्र में भारी मात्रा में पुलिस फोर्स भी तैयार कर दी. पुलिस टीम ने सब से पहले गगन के घर वालों से पूछताछ करने के बाद गगन के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि 13 जुलाई को शाम 5 बजे गगन की एक फोन नंबर पर बात हुई थी. जांच में वह नंबर बंगला गांव मोहल्ले की रहने वाली ममता का निकला. पुलिस ममता के घर पहुंची तो उस का कमरा बंद मिला. पुलिस को पता चला कि ममता जिगर कालोनी स्थित एक एक्सपोर्ट फर्म में नौकरी करती है. पुलिस उस फर्म में पहुंची तो ममता वहां मिल गई. पूछताछ के लिए पुलिस उसे मुगलपुरा थाने ले आई.

पुलिस ने ममता से पूछताछ की तो वह खुद को बेकुसूर बताती रही. उस ने कहा कि गगन से उस के प्रेम संबंध जरूर थे लेकिन जब से गगन की शादी हुई है, वह संबंध खत्म हो गए.

‘‘जब तुम्हारे संबंध खत्म हो गए तो तुम ने 1 जुलाई को गगन को फोन क्यों किया?’’ थानाप्रभारी अमित कुमार ने उस से पूछा.

‘‘सर, उस का नंबर मेरे फोन में सेव था, जो गलती से लग गया.’’ ममता ने बताया.

थानाप्रभारी को लग रहा था कि ममता कुछ छिपा रही है, इसलिए उन्होंने पास में बैठी एसआई राजवेंदर कौर को इशारा किया. राजवेंदर कौन ने ममता से पूछताछ करते हुए एक थप्पड़ उस के गाल पर जड़ा. थप्पड़ लगते ही ममता हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘मुझे मत मारो, मैं सब कुछ बताती हूं.’’

इस के बाद ममता ने गगन से उस का प्यार होने से ले कर अब तक की सारी कहानी बताते हुए कहा कि गगन ने उस की सारी जिंदगी खराब कर दी. उसी का बदला लेने के लिए उस की सौतेली बहन नंदिनी और दीपक के साथ मिल कर उस की हत्या करनी पड़ी. उस ने बताया कि दीपक उस का रिश्तेदार है. अब पुलिस को लाश बरामद करनी थी लिहाजा पुलिस ने 5 घंटे तक गगन की लाश नाले में तलाश कराई, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. इसी दौरान पुलिस ने हरीश उर्फ वीरू को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरू ने बताया कि उस की लाश के साथ ईंटें बंधी थीं. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 3 अगस्त, 2021 को नाले से गगन की सड़ीगली लाश बरामद कर ली. उधर पुलिस ने नंदिनी और प्रदीप को तलाशा तो दोनों फरार मिले. उन के फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उन्हें नोएडा से गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने बताया कि उन्होंने 3 अगस्त को ही नोएडा के मंदिर में शादी कर ली थी. उन से भी पूछताछ की गई तो उन्होंने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पुलिस ने हत्यारोपी हरीश उर्फ वीरू, प्रदीप, नंदिनी और ममता को गिरफ्तार कर मुरादाबाद की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अमित कुमार कर रहे थे. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News : छलिया प्रेमी को पहचानना जरूरी

UP News : ज्यादातर महिलाएं प्यार की कद्रदान होती हैं. जब वह एक बार किसी पुरुष को अपने दिल में बसा लेती हैं तो उस का साथ ताउम्र चाहने की लालसा रखती हैं, लेकिन पुरुष उस के साथ दगा करने से नहीं चूकता. जब कभी उस महिला का दिल टूटता है तो वह कुछ भी करने से नहीं झिझकती. पढ़ें, हवस में अंधे पुरुषों से धोखा खाई महिलाओं की यह दिलचस्प कहानी…

उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना गुरबख्शगंज के एसएचओ प्रवीण गौतम ने गीता को समझाते हुए कहा, ”अगर तुम्हारे साथ कुछ गलत हुआ है तो मुझे बताओ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मुझ से जितना हो सकेगा, मैं तुम्हारी मदद करूंगा.’’

एसएचओ का इतना कहना था कि गीता फफकफफक कर रोने लगी. रोते हुए ही उस ने कहा, ”क्या करती साहब, जवान बेटी की इज्जत का सवाल था. अगर मैं उसे मार न डालती तो वह मेरी बेटी की जिंदगी को नरक बना देता. मजबूर हो कर मुझे उस की हत्या करनी पड़ी.’’

एसएचओ ने गिलास का पानी गीता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ”यह लो पहले पानी पियो. मन को थोड़ा शांत करो, उस के बाद बताओ कि मेड़ीलाल ने तुम्हारे साथ या तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा क्या किया कि तुम्हें उस की हत्या करनी पड़ी?’’

एसएचओ के हाथ से पानी का गिलास ले कर गीता ने थोड़ा पानी पिया. खाली गिलास सिपाही को पकड़ा कर साड़ी के पल्लू से मुंह और आंखें पोंछ कर सिसकते हुए गीता अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगी. गीता ने एसएचओ को अपनी जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. हरियाणा की रहने वाली गीता की शादी दयाशंकर से हुई थी. दयाशंकर ठीक आदमी नहीं था. इसलिए गीता पति से परेशान रहती थी, लेकिन कोई ढंग का सहारा न मिलने की वजह से वह किसी तरह उस से निभा रही थी. दूसरों के घर काम कर के वह किसी तरह जीवन काट रही थी. उसी बीच उसे एक बेटी हो गई, जिस का नाम उस ने रोशनी रखा.

उसे लगा कि रोशनी के आने के बाद शायद उस के जीवन में रोशनी आ जाए, पर उस के जीवन में वैसा ही अंधेरा बना रहा. धीरेधीरे रोशनी बड़ी होने लगी, पर गीता के जीवन में वैसा ही अंधेरा बना रहा. अचानक एक दिन उस के जीवन में उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना गुरबख्शगंज के गांव दाउदपुर रामनगर का रहने वाला मेड़ीलाल आया. रोजीरोटी की तलाश में मेड़ीलाल हरियाणा गया था. जबकि उस का परिवार गांव में ही रहता था. गीता ने जब अपनी दुखभरी कहानी मेड़ीलाल को सुनाई तो उसे गीता से सहानुभूति हो गई और वह गीता की हर तरह से मदद करने लगा.

मेड़ीलाल पत्नी और बच्चों से दूर अकेला रहता था. गीता से मुलाकात होने के बाद मेड़ीलाल जब काम से घर आता तो गीता उसे एक गिलास पानी ही नहीं चाय भी बना कर देने लगी. मेड़ीलाल भी हर तरह से गीता का खयाल रखने लगा था. गीता जहां पति के प्यार से वंचित थी, वहीं मेड़ीलाल भी पत्नी से दूर था. दोनों को प्यार की नहीं, शरीर की भूख सताती थी. इसलिए उन्हें नजदीक आने में देर नहीं लगी. नजदीकी बढ़ी तो दोनों एक साथ रहने लगे, जिसे आज लिवइन कहा जाता है. मेड़ीलाल गीता की बेटी का भी खयाल रखता था. उस की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथसाथ उस की हर जरूरत पूरी करता था. गीता की बेटी तब यही कोई 14 साल की थी.

सब कुछ बढिय़ा चल रहा था. गीता का साथ पाने के बाद मेड़ीलाल घर और परिवार को लगभग भूल सा गया था. शायद वह गांव लौट कर आता भी न. पर जब देश में कोरोना फैला तो बहुत लोगों के रोजगार चले गए. उन्हीं में एक मेड़ीलाल भी था. कोरोना की वजह से काम बंद हुआ तो मेड़ीलाल ने गांव लौटने का विचार किया. जब वह गांव जाने के लिए तैयार हुआ तो गीता ने कहा, ”तुम गांव चले जाओगे तो मेरा क्या होगा? मैं अकेली पड़ जाऊंगी. इतने दिन साथ रहने के बाद अब में तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊंगी.’’

मेड़ीलाल जहां 55 साल का था, वहीं गीता 35 साल की थी. उस की पत्नी भी बूढ़ी हो चुकी थी. इस के अलावा गीता उस की पत्नी से सुंदर भी थी. यही सब सोच कर उस ने गीता से कहा, ”तुम ने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें छोड़ कर अकेला गांव जाऊंगा. अब तो जहां मैं रहूंगा, वहीं तुम्हें भी रखूंगा.’’

इस के बाद परिणाम की चिंता किए बगैर मेड़ीलाल गीता और उस की बेटी रोशनी को साथ ले कर गांव आ गया. मेड़ीलाल गीता के साथ घर पहुंचा तो घर में बवाल हो गया. फेमिली वालों ने गीता और रोशनी को घर में रखने से साफ मना कर दिया. मेड़ीलाल का गांव के बाहर थोड़ा खेत था, उसी में उस ने गीता के लिए झोपड़ी डाल दी. गीता के रहने की व्यवस्था हो गई. खर्च भी मेड़ीलाल ही उठाता था. वह कभी घर में रहता तो कभी गीता के साथ. इसी तरह समय बीतता रहा.

रोशनी का दाखिला यहां भी गीता ने एक स्कूल में करा दिया था. गीता अब तक 12वीं पास कर चुकी थी. उस की उम्र भी 19 साल हो गई थी. देखा जाए तो अब वह जवान हो गई थी. ऐसे में ही किसी दिन मेड़ीलाल की नजर उस पर पड़ी तो उस की नीयत बदल गई. फिर क्या था, वह बेटी की तो क्या पोती की उम्र की रोशनी के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. मेड़ीलाल को लगता था कि वही उसे खिलातापिलाता है तो वह जो चाहेगा, उस के साथ कर लेगा. लेकिन रोशनी ने उसे छूने नहीं दिया. एक दिन तो उस ने हद ही कर दी. उस दिन उस ने उस के नाजुक अंगों पर हाथ लगा दिया.

मेड़ीलाल की इस हरकत पर रोशनी को गुस्सा आ गया. उस ने कह भी दिया, ”आज के बाद इस तरह की हरकत की तो ठीक नहीं होगा.’’

मेड़ीलाल को इस के बाद पीछे हट जाना चाहिए था. पर उस की मम्मी गीता को उस ने रखैल बना रखा था, इसलिए उसे लगता था कि बेटी भी वैसी ही होगी. आज नखरे कर रही है, पर कभी न कभी समर्पित ही हो जाएगी. पर ऐसा हुआ नहीं. उस ने उसी दिन मेड़ीलाल की शिकायत मम्मी से कर दी. प्रेमी की इस हरकत पर गीता सोच में पड़ गई. बेटी की जिंदगी का सवाल था. उसी का प्रेमी उस की बेटी की जिंदगी नरक बनाने पर तुला था. गीता जानती थी कि मेड़ीलाल समझाने से नहीं मानेगा. क्योंकि अब तक वह उस के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हो चुकी थी. इसलिए उस ने बेटी से सलाह कर के उसे खत्म करने का निर्णय ले लिया.

यह निर्णय लेने के बाद गीता मेड़ीलाल से मिली और उसे लालच दिया कि शाम को वह उस के घर आ जाए. रात में पार्टी करेंगे. उस के बाद रोशनी को समझाबुझा कर वह उस के पास भेज देगी. मेड़ीलाल तो यही चाहता था. रात होते ही वह शराब की बोतल ले कर गीता के घर पहुंच गया. गीता और रोशनी ने मेड़ीलाल को जम कर शराब पिलाई. जब वह विरोध करने की स्थिति में नहीं रहा तो गीता और रोशनी ने पहले तो लाठीडंडे से मेड़ीलाल की खूब पिटाई की. ज्यादा डंडे उस के सीने पर ही मारे, जिस से उस की पसलियां टूट गईं. उस के गुप्तांग पर भी डंडों से मारा. मार खातेखाते जब मेड़ीलाल बेहोश हो गया तो गीता और रोशनी ने चुन्नी से उस का गला घोंट दिया.

मेड़ीलाल का खेल खत्म कर गीता और रोशनी ने उस की लाश एक चादर में लपेटी और अपने घर से करीब 100 मीटर दूर ले जा कर झाडिय़ों में फेंक दी. इस के बाद अपने घर आ कर मांबेटी सो गईं. सवेरा होने पर देर तक मेड़ीलाल घर नहीं आया तो उस की खोज शुरू हुई. गांव में इधरउधर तलाशा गया, गीता के घर भी जा पर पूछा गया, लेकिन मेड़ीलाल का कुछ पता नहीं चला. दोपहर के करीब किसी व्यक्ति ने झाडिय़ों के बीच लाश देखी तो उस ने शोर मचाया तो गांव वालों ने उस लाश की शिनाख्त मेड़ीलाल के रूप में की. मेड़ीलाल के बेटे सुशील कुमार ने थाना गुरबख्शगंज जा कर पिता की हत्या की सूचना पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही एसएचओ प्रवीण गौतम, सीओ (लालगंज) पुलिस बल एवं फोरैंसिक टीम के साथ गांव दाउदपुर रामनगर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर परिवार के लोगों तथा गांव वालों से पूछताछ शुरू की. जब उस के चरित्र के बारे में पूछा तो गीता का नाम पुलिस के सामने आया. तब पुलिस गीता से पूछताछ करने लगी. पहले तो गीता पुलिस को इधरउधर की कहानियां सुनाती रही, पर उस की बौडी लैंग्वेज और बारबार झूठ बोलने पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ने उसे विश्वास में लेने की कोशिश की. उस से कहा गया कि अगर वह सब कुछ सचसच बता देगी तो जितना हो सकेगा, पुलिस उस की मदद करेगी. इस के बाद गीता ने रोते हुए मेड़ीलाल की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए उस की हत्या की सारी कहानी सुना दी.

मेड़ीलाल की हत्या की सच्चाई जान कर पुलिस का मन भी द्रवित हो उठा, लेकिन अपराध तो अपराध है. गीता ने अपराध किया था, इसीलिए पुलिस ने उस के साथ उस की 19 साल की बेटी रोशनी को भी गिरफ्तार कर लिया. इसी के साथ वह चुन्नी भी बरामद कर ली, जिस से मेड़ीलाल का गला घोंटा गया था. उन डंडों को पुलिस ने बरामद कर लिया, जिन से मेड़ीलाल की पिटाई की गई थी. सारे सबूत जुटाने के बाद एसपी आलोक प्रियदर्शी ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पत्रकारों को मेड़ीलाल की हत्या का खुलासा करते हुए आरोपियों के गिरफ्तार करने की सूचना दी. अगले दिन मांबेटी को रायबरेली की अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

यह ऐसी सत्य घटना थी, जिस में एक मां गीता ने अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए अपने प्रेमी और पालनहार की जान ले ली. लेकिन दूसरी जो घटना गोरखपुर की है, उस में अपनी हवस मिटाने के लिए एक सुनीता ने बेटी को फंदे से लटकाने वाले प्रेमी को बचाने की कोशिश की. गोरखपुर का एक थाना है कैंपियरगंज. इसी थाने के अंतर्गत एक परिवार रहता था, जिस के मुखिया मुंबई में रहते थे. पत्नी सुनीता और 15 साल की बेटी रजनी गांव में ही रहती थी. बेटी 9वीं क्लास में पढ़ती थी. पति के बाहर होने की वजह से घर और बाहर के सारे काम सुनीता ही देखती थी. इन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिस का दूध बेच कर कुछ पैसे कमा लेती थीं. इस के अलावा पति कुछ पैसे भेज देता था, जिस से मांबेटी का गुजारा आराम से हो जाता था.

गाय के लिए भूसे की जरूरत पड़ती थी. भूसा थाना पीपीगंज के अंतर्गत आने वाले गांव जंगल अगही के रहने वाले सुनील गौड़ से खरीदती थीं. जब भी इन्हें भूसे की जरूरत पड़ती, वह सुनील गौड़ को फोन कर देतीं, सुनील भूसा पहुंचा देता था. अगर पैसे होते तो उसी समय दे देतीं, न होते सुनील को बाद में ले जाने के लिए कह दिया जाता. सुनील को भी ऐतराज नहीं होता, क्योंकि वह हमेशा उसी से भूसा लेती थीं. सुनीता अभी जवान थी. पति परदेश में रहता था. साल, डेढ़ साल में महीने, 2 महीने के लिए आता था और फिर वापस चला जाता था. इतने दिनों में उस की पति के साथ रहने की हसरतें अधूरी ही रह जाती थीं. जबकि सुनीता चाहती थी कि उस का पति हमेशा उस के साथ रहे.

प्यार की भूखी सुनीता के घर जब सुनील का आनाजाना बढ़ा तो वह उस में पति वाला प्यार ढूंढने लगी. सुनील जवान और कुंवारा था, इसलिए वह किसी भी औरत के प्यार की तलाश में रहता था. सुनील को सुनीता की आंखों में अपने लिए प्यार दिखाई दिया तो उसे उस के करीब आते देर नहीं लगी. क्योंकि आग दोनों ओर लगी थी. सुनीता और सुनील के बीच संबंध बने तो जब देखो, तब सुनील सुनीता के घर आनेजाने लगा. घर में कोई मर्द तो था नहीं कि रोकटोक होती, इसलिए सुनील कभीकभी रात को भी सुनीता के घर रुक जाता.

सुनीता की बेटी रजनी नाबालिग जरूर थी, पर इतनी भी छोटी नहीं थी कि उसे यह न पता चलता कि उस की मम्मी और सुनील के बीच क्या चल रहा है. कुछ दिनों तो वह चुप रही, लेकिन जब बात हद से ज्यादा बढ़ी तो वह मम्मी के इस संबंध का विरोध करने लगी. वह सुनील को अपने घर आने से रोकने लगी. इस से सुनील को भी परेशानी होने लगी और सुनीता को भी. क्योंकि न तो सुनीता सुनील को छोडऩा चाहती थी और न ही सुनील सुनीता को. जब इस मामले पर सुनीता और सुनील ने सलाह की तो उन्होंने इस का एक ही हल निकाला कि रजनी को भी इस की लत लगा दी जाए. उस के बाद न तो वह किसी से इस बात की शिकायत कर सकेगी और न ही विरोध कर सकेगी.

फिर क्या था, सुनील तो चाहता ही यही था. रजनी अभी कुंवारी थी. हर मर्द ऐसी लड़कियों को पाना चाहता है. सुनील गौड़ प्रेमिका सुनीता की बेटी रजनी पर भी डोरे डालने लगा. सुनीता की ओर से उसे पूरी छूट थी, इसलिए वह उस से शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगा. इस तरह जल्दी ही रजनी सुनील के जाल में फंस गई और अपना सब कुछ सुनील को दे बैठी. फिर तो सुनील की चांदी हो गई. वह मांबेटी से संबंध बनाता. यह सब इसी तरह चलता रहा. सुनीता के सुनील से संबंध केवल शारीरिक भूख मिटाने के लिए थे. पर रजनी को तो सुनील से प्यार हो गया था. जबकि उसे पता था कि सुनील के उस की मम्मी से भी संबंध हैं.

इस के बावजूद वह सुनील को इस कदर चाहने लगी कि उसे लगने लगा कि वह सुनील के बगैर नहीं रह सकती. इसलिए वह सुनील पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. जबकि सुनील ने केवल मौजमजे के लिए मांबेटी से संबंध बनाए थे. रजनी पहले तो सुनील से ऐसे ही विवाह के लिए कहती रही. पर जब देखा कि सुनील गंभीर नहीं है तो वह उस के पीछे पड़ गई. जब सुनील के लिए रजनी गले की हड्डी बनने लगी तो वह परेशान रहने लगा. उस ने यह बात अपने ही टोले के रहने वाले अपने दोस्त दुर्गेश यादव को बताई तो उस ने साफ कहा, ”अगर प्रेमिका गले की हड्डी बन रही है तो निकाल फेंको, वरना तुम्हारी ही जान ले लेगी.’’

इस के बाद सुनील रजनी को रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका मिल गया. सुनीता के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. पति बाहर था, इसलिए संवेदना व्यक्त करने उसे ही जाना पड़ा. बेटी को घर में अकेली छोड़ कर वह रिश्तेदार के यहां संवेदना व्यक्त करने चली गई. शाम को सुनीता लौट कर आई तो उसे बेटी रजनी की साड़ी से लटकी लाश मिली. रोते हुए उस ने यह बात पड़ोसियों को बताई तो मोहल्ले की तमाम महिलाएं व पुरुष संवेदना व्यक्त करने पहुंच गए. उसी दौरान किसी पड़ोसी ने यह जानकारी थाना कैंपियरगंज पुलिस को दे दी.

पहली नजर में पुलिस को लगा कि यह सुसाइड का मामला है, लेकिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि यह सुसाइड का मामला नहीं, बल्कि रजनी की गला दबा कर हत्या की गई थी. यही नहीं, हत्या से पहले उस के साथ शारीरिक संबंध भी बनाया गया था. पुलिस चौंकी, क्योंकि रजनी अभी नाबालिग थी. पुलिस को शुरुआती जांच में घर में जोरजबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले थे. मां सुनीता से भी पूछताछ की गई कि लड़की का किसी से प्रेमसंबंध तो नहीं था?

सुनीता ने भी मना कर दिया. तब पुलिस ने घर के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स से पता चला कि इस नंबर से एक नंबर पर रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर थाना पीपीगंज के गांव जंगल अगही के टोला भरवल के रहने वाले सुनील गौड़ का निकला. पुलिस ने सुनील को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की तो हर अपराधी की तरह उस ने भी पहले इधरउधर की कहानियां सुनाईं. लेकिन जब पुलिस अपनी पर आई तो उस ने सारी सच्चाई उगल दी. उस ने रजनी की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया और रजनी से शारीरिक संबंध बनाने से ले कर हत्या तक की पूरी कहानी सुना दी.

रजनी सुनील पर विवाह के लिए दबाव डाल रही थी, इसलिए सुनील अब उस से पीछा छुड़ाना चाहता था. 26 सितंबर को जब सुनील को पता चला कि रजनी घर में अकेली है तो वह अपने दोस्त दुर्गेश यादव के साथ उस के घर पहुंच गया. पहले तो उस ने रजनी के साथ शारीरिक संबंध बनाए. इस के बाद जब रजनी ने विवाह की बात की तो उस ने विवाह करने से साफ मना कर दिया. फिर तो रजनी बिफर उठी और सुनील से उलझ गई. पीछा छुड़ाने के लिए सुनील ने रजनी की गला दबा कर हत्या कर दी.

इस बीच दुर्गेश घर के बाहर बैठा निगरानी करता रहा. हत्या करने के बाद सुनील ने दुर्गेश को अंदर बुलाया और उस की मदद से आंगन में फैली सुनीता की साड़ी में फंदा बना कर रजनी की लाश को लटका दिया, ताकि लगे कि रजनी ने आत्महत्या की है. अपना काम कर के दोनों अपनेअपने घर चले गए. रजनी की मम्मी सुनीता को पता था कि यह काम कौन कर सकता है, पर अपना पाप छिपाने के चक्कर में उस ने यह बात पुलिस को नहीं बताई थी.

सुनील गौड़ के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने दुर्गेश यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद एसएसपी गोरखपुर डा. गौरव ग्रोवर ने पुलिस लाइन में पत्रकार वार्ता कर के इस बात की जानकारी दी और थाना कैंपियरगंज में आरोपियों के खिलाफ हत्या और पोक्सो ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. यह तीसरी घटना है गुजरात के जिला भुज की. भुज का एक थाना है मुंद्रा मरीन. इसी थाने के अंतर्गत आने वाले गांव हमीरमोरा के रहने वालों ने समुद्र के किनारे एक लाश पड़ी देखी. यह जानकारी उन्होंने थाना मुंद्रा मरीन पुलिस को दी तो थाना पुलिस तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गई.

लाश की स्थिति काफी खराब थी. इस से साफ लग रहा था कि हत्या कई दिनों पहले की गई थी. पुलिस ने लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, पर पता चला कि यह महिला वहां की रहने वाली नहीं है. पुलिस ने लाश के फोटो करवा कर वह पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और थाने आ कर उस की शिनाख्त की कोशिश करने लगी. काफी कोशिश के बाद भी जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने फोटो से महिला का स्केच बनवा कर उस के पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर लगवाए, लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ.

पुलिस ने उस स्थान का मोबाइल का डंप डाटा निकलवाया, जहां वह लाश मिली थी. जब इस डंप डाटा की स्क्रीनिंग की गई तो उस में 2 नंबर ऐसे मिले, जो वहां के रहने वालों के नहीं थे. जब इस बारे में पुलिस ने गांव वालों से पूछताछ की तो गांव के एक आदमी ने बताया, ”जी साहब, कुछ दिनों पहले 3 लोग यहां दिखाई दिए थे, जो यहां के रहने वाले नहीं थे. उन लोगों ने यहां पार्टी वगैरह की थी. उस के बाद चले गए थे.’’

पुलिस को डंप डाटा से बाहर के 2 नंबर मिले थे. इस से पुलिस को लगा कि वे दोनों नंबर उन्हीं लोगों के हो सकते हैं, जो बाहर से आए थे.

इस के बाद पुलिस ने उन लोगों के बारे में पता कराया तो जानकारी मिली कि ये नंबर नवावास के रहने वाले योगेश और नारण के थे. इस के बाद पुलिस ने घटना के लगभग एक महीने बाद लोकेशन के आधार पर योगेश और नारण को उठा लिया. थाने में योगेश और नारण से पूछताछ की तो पहले तो दोनों पुलिस को घुमाने की कोशिश करते रहे. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तो उन्होंने लक्ष्मी की हत्या की बात स्वीकारते हुए असली कहानी सुनानी शुरू कर दी. पुलिस ने दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. फिर जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस तरह थी.

इस कहानी को जानने के लिए 9 साल पीछे जाना होगा. मूलरूप से जूनागढ़ के रहने वाले जितेंद्र भट्ट को 9 साल पहले लक्ष्मी बेकरिया से प्यार हो गया. लक्ष्मी शादीशुदा ही नहीं, 3 बच्चों की मां थी, लेकिन पति से न पटने के कारण उस का झुकाव जितेंद्र की ओर हो गया तो वह पति को छोड़ कर जितेंद्र के साथ रहने लगी थी. उस ने एक बेटे को तो पति के पास छोड़ दिया था, जबकि एक बेटी और एक बेटे चेतन को साथ रख लिया था. बाद में उस ने पति से तलाक ले कर जितेंद्र से विवाह भी कर लिया था.

जब तक बच्चे छोटे थे, तब तक तो जितेंद्र की कमाई से घर का खर्च चलता रहा, लेकिन जब बच्चे बड़े हो गए तो घर का खर्च भी बढ़ गया. अब तक लक्ष्मी भी बच्चों की देखभाल से फुरसत पा गई थी. इस के बाद आमदनी बढ़ाने के लिए वह भी काम की तलाश में बाहर निकली. उसे कोई और काम नहीं मिला तो वह रंगरोगन का काम करने लगी. क्योंकि यह काम उसे आता था. इसी रंगरोगन का काम करने के दौरान उस की मुलाकात योगेश जोतियाना से हुई तो वह उसे दिल दे बैठी. इस के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो योगेश लक्ष्मी के घर भी आनेजाने लगा.

जितेंद्र को पता चल गया कि उस की पत्नी का संबंध योगेश से हो गया है, लेकिन योगेश थोड़ा अपराधी प्रवृत्ति का था, इसलिए जितेंद्र उस से कुछ कहने या उसे रोकने से घबराता था. दूसरी ओर लक्ष्मी भी पति का कहना नहीं मानती थी. ऐसे में योगेश का जब मन होता, लक्ष्मी के घर आ धमकता. लक्ष्मी के घर आनेजाने में योगेश की नजर लक्ष्मी की नाबालिग बेटी पर पड़ी तो वह अधेड़ लक्ष्मी के सहारे उसे पाने के रास्ता खोजने लगा. वह लक्ष्मी की बेटी पर भी डोरे डालने लगा. जिस घर में अनैतिक काम हो रहा हो, उस घर के बच्चों को बहकते देर नहीं लगती. लक्ष्मी की बेटी भी जल्दी ही योगेश के झांसे में आ गई और उसे अपना सब कुछ सौंप बैठी.

जल्दी ही बेटी और योगेश के संबंधों की जानकारी लक्ष्मी को तो हो ही गई, जितेंद्र को भी हो गई. तब जितेंद्र ने पत्नी को ताना मारा, ”देख लिया न अपनी अय्याशी का नतीजा. तुम्हारी ही वजह से आज नाबालिग बेटी की जिंदगी बरबाद हो रही है.’’

बेटी भले ही लक्ष्मी के पहले पति की थी, लेकिन जितेंद्र का अपना कोई बच्चा न होने की वजह से वह लक्ष्मी के पहले पति के बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानता था. इसलिए बेटी के गलत रास्ते पर जाने की वजह से वह परेशान तो था ही, इस की वजह भी पत्नी लक्ष्मी को मानता था. योगेश और बेटी के संबंधों के बारे में जान कर लक्ष्मी भी परेशान थी. उस ने बेटी को समझाया. पर बेटी नहीं मानी तो उस ने योगेश को घर आने से रोक दिया, लेकिन अब तक बेटी शारीरिक संबंधों की आदी हो चुकी थी और योगेश का भी वही हाल था. अब दोनों के बीच में लक्ष्मी कांटा बन रही थी, इसलिए दोनों ने सलाह की कि लक्ष्मी नाम के इस कांटे को ही निकाल फेंका जाए.

योगेश ने अपने एक दोस्त नारण से बात की तो वह योगेश का साथ देने को तैयार हो गया. 10 जुलाई, 2023 को योगेश ने लक्ष्मी को फोन कर के कहा, ”चलो, कहीं घूम कर आते हैं.’’

पहले तो लक्ष्मी ने मना किया, पर जब योगेश ने मिन्नतें की तो लक्ष्मी साथ चलने को तैयार हो गई. नारण के पास अपनी कार थी. योगेश नारण की कार में लक्ष्मी को बैठा कर थाना मुंद्रा मरीन के अंतर्गत आने वाले गांव हमीरमोरा पहुंचा. पहले तो तीनों ने शराब पी. उस के बाद योगेश ने लक्ष्मी के साथ संबंध बनाए और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. लक्ष्मी की हत्या कर उस की लाश को वहीं समुद्र किनारे बालू में दबा कर योगेश और नारण नवावास लौट आए.

समुद्र की लहरों की वजह से लाश के ऊपर की बालू हट गई तो गांव वालों की नजर उस पर पड़ गई और बात पुलिस तक जा पहुंची. इस के बाद काफी प्रयास कर महीनों बाद पुलिस ने लाश की शिनाख्त कर आरोपियों को पकड़ा. पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि मां की हत्या में नाबालिग बेटी का कितना हाथ है. पुलिस ने जब लक्ष्मी के पति जितेंद्र से पूछा कि उस ने पत्नी की गुमशुदगी क्यों नहीं दर्ज कराई तो जितेंद्र ने कहा, ”साहब, जब मैं ने पहले इसे योगेश से मिलनेजुलने से रोका था, तब इस ने मुझ से कहा था कि उसे मेरे साथ रहना हो तो रहे, वरना चला जाए. उस का जहां मन होगा जाएगी. साहब, इसीलिए मुझे लगा कि वह योगेश के साथ कहीं गई होगी. जब उस का मन भर जाएगा तो वापस आ जाएगी.’’

जितेंद्र के इस बयान में जो दर्द था, उसे सुनने वाले हर व्यक्ति ने महसूस किया. पुलिस ने पूछताछ के बाद योगेश और नारण को जेल भिजवा दिया है. UP News

—कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं

 

 

Agra Crime News : बंद बोरे का खुला राज

Agra Crime News : अवैध संबंध अकसर अपराध को जन्म देते हैं. इतना सब जानते हुए भी सुनीता उर्फ सुषमा ने पति के रहते हुए मान सिंह से नाजायज संबंध बना लिए. इस के बाद जो हुआ, वह..

8 जून, 2021 की बात है. आगरा के थाना सदर के सेवला में रात के 11 बजे एक आदमी कंधे पर बोरा ले कर जा रहा था. अचानक बोरे के वजन के कारण उस का पैर फिसला और वह बोरे सहित  गिर पड़ा. इस पर वहां से निकल रहे लोगों की नजरें उस आदमी की तरफ गईं. वह किसी तरह उठा और बोरे को उठाने का प्रयास करने लगा. उसी समय बोरा खुल गया और उस में से एक हाथ बाहर निकल आया. यह देखते ही लोग उस की ओर दौड़े और उसे पकड़ लिया. बोरे को खुलवा कर देखा तो उस में एक युवक का शव था जिसे देख कर सभी के होश उड़ गए. बोरे में युवक की लाश मिलने से वहां सनसनी फैल गई. इस घटना की सूचना तुरंत पुलिस को दे दी गई.

सूचना मिलते ही थाना सदर के थानाप्रभारी अजय कौशल अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां लोग एक व्यक्ति को पकड़े हुए थे. यह माजरा देखते ही उन्होंने वहां मौजूद लोगों से जानकारी ली. लोगों ने बताया कि यही व्यक्ति कंधे पर बोरे में किसी की लाश ले कर जा रहा था. वजन के कारण वह बोरे सहित गिर गया. बोरा खुलने से लाश के बारे में पता चला. पुलिस ने देखा बोरे में एक युवक की लाश थी. शव की पहचान 40 वर्षीय जूता कारीगर संजय के रूप में हुई. पुलिस ने शव की पहचान होने के बाद उस के घरवालों को सूचना दी. जानकारी होते ही परिवार में कोहराम मच गया.

इस बीच घटना की जानकारी थानाप्रभारी द्वारा अपने उच्च अधिकारियों को दी गई. सूचना मिलते ही एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे वहां पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. युवक के गले  पर चोट के निशान दिखाई दे रहे थे. मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस ने शव को मोर्चरी भिजवा दिया. प्रेमी हुआ गिरफ्तार पुलिस पकड़े गए युवक मान सिंह को हिरासत में ले कर थाने लाई. थाने पर उस से पूछताछ की गई. जानकारी देने पर पुलिस ने रात में ही मृतक संजय के घर पहुंच कर उस की 35 वर्षीय पत्नी सुनीता उर्फ सुषमा से पूछताछ की.

सुनीता ने बताया कि वह दवा लेने गई हुई थी. जब लौट कर आई तो पति संजय घर पर नहीं मिले. उस ने सोचा कि कहीं गए होंगे. जब देर हो गई तो उस ने पति की तलाश शुरू की. बाद में पता चला कि उस के जाने के बाद पति की किसी ने हत्या कर दी थी. उधर हिरासत में लिए गए युवक ने बिना कुछ छिपाए पुलिस को सच्चाई बता दी. उस ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने बताया कि मृतक संजय की पत्नी से उस के प्रेम संबंध हैं. पति विरोध करता था.  हम दोनों के प्यार के बीच संजय रोड़ा बना हुआ था. वह अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता था. मुझे भी घर आने से मना करता था. इसलिए हम दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी.

वह शव को बोरे में बंद कर ठिकाने लगाने ले जा रहा था. लेकिन बोरे के गिर जाने से भेद खुल गया. पुलिस समझ गई कि मृतक की पत्नी सुनीता इस हत्याकांड में शामिल होने के बावजूद अपने को निर्दोष बता रही है. जबकि उस के प्रेमी मान सिंह ने पुलिस को सारी हकीकत बता दी थी. पुलिस ने सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया और फोरैंसिक टीम को बुला लिया. टीम ने मृतक के घर से कई साक्ष्य जुटाए. 9 जून, 2021 को प्रैस कौन्फ्रैंस में एसएसपी मुनिराज जी. ने इस हत्याकांड का खुलासा करते हुए हत्या में शामिल मृतक की पत्नी सुनीता उर्फ सुषमा व उस के 38 वर्षीय प्रेमी मान सिंह की गिरफ्तारी की जानकारी दी. संजय की हत्या के पीछे जो कहानी निकल कर आई वह 4 प्रेमियों के प्यार के बीच कांटा बनने की इस प्रकार निकली—

मृतक संजय आगरा की एक जूता फैक्ट्री में कारीगर था. वह मूलरूप से निबोहरा के मूसे का पुरा का रहने वाला है. देवरी रोड पर मकान ले कर वह परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुनीता सुषमा के अलावा 3 बच्चे भी हैं. कुछ समय पहले संजय ने अपना मकान बेच दिया. मकान बेचने के बाद वह सेवला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. संजय शराब पीने का शौकीन था. वह शराब पी कर अकसर सुनीता से झगड़ा करता और उस के साथ मारपीट करता था. सुनीता की दोस्ती थाना सदर के ही टुंडपुरा के रहने वाले मान सिंह से थी. दोनों की मुलाकात कुछ महीने पहले हुई थी. दोस्ती गहरी हो गई. एकदूसरे को पसंद करने लगे.

धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. सुनीता मान सिंह के साथ कई बार पति की गैरमौजूदगी में घूमने जा चुकी थी. संजय को यह जानकारी हो गई. वह पत्नी को भलाबुरा कहता था. उस के पास कोई सबूत नहीं था. इसलिए वह मौके की तलाश में रहता था. जब संजय पत्नी के साथ मारपीट करता तो मानसिंह बीच में पड़ कर मामला शांत करा देता. कई बार उस ने सुनीता को बचाया भी था. संजय शराब पी कर सुनीता से अभद्रता करता था. मान सिंह ने इसी बात का फायदा उठाया. सुनीता के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लिया.

पति संजय को पत्नी की मान सिंह से दोस्ती पसंद नहीं थी. वह इस का विरोध करता था. जबकि मान सिंह व सुनीता के बीच प्रेम संबंध दिनप्रतिदिन पुख्ता होते जा रहे थे. दोनों एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. पति की आदतों से अब सुनीता को वह अपना दुश्मन दिखाई देता था. प्रेमी संग पकड़ी गई सुनीता सुनीता और मान सिंह को जब भी मौका मिलता दोनों तनमन की प्यास बुझा लेते थे. संजय को दोनों पर शक हो गया. एक दिन संजय ने दोनों को घर में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. इस से मान सिंह तिलमिला कर रह गया. लेकिन वक्त की नजाकत को देखते हुए मान सिंह बिना कुछ बोले उस दिन वहां से चला गया. मान सिंह के जाने के बाद संजय ने सुनीता की पिटाई कर दी.

वह दोनों के संबंधों का विरोध करने लगा. सुनीता खून का घूंट पी कर रह गई थी. रंगेहाथों पकड़े जाने से वह विरोध की स्थिति में भी नहीं थी. संजय ने सुनीता को चेतावनी दी कि यदि मान सिंह से उस ने बात करते भी देख लिया तो दोनों को जान से मार देगा. सुनीता ने दूसरे दिन प्रेमी मान सिंह से पति द्वारा की गई पिटाई और धमकी के बारे में मोबाइल पर बताया. यह सुन कर मान सिंह का खून खौलने लगा. तब एक दिन सुनीता और मान सिंह ने अपने प्यार की राह के रोड़े को हटाने की योजना बनाई. सुनीता ने प्रेमी का प्यार पाने के लिए पति की हत्या की साजिश रची.

घटना वाले दिन सोमवार की शाम प्रेमी मान सिंह सुनीता से मिलने उस के घर गया. उस समय संजय भी घर पर मौजूद था. मान सिंह को देखते ही उस ने कहा, ‘‘जब मना कर दिया था फिर भी तू आ गया?’’

इस पर मानसिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की चीज लाया हूं.’’ यह कहते हुए उस ने साथ लाई शराब की बोतल उसे दिखाई. मान सिंह जानता था कि संजय की कमजोरी शराब है. इसलिए वह बेधड़क घर आ गया था. मान सिंह और सुनीता ने  संजय को जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में बेसुध हो गया तब दोनों ने उस के गले में दुपट्टा डाल कर कस दिया. दोनों ने गला घोट कर उस की हत्या कर दी. इस से पहले सुनीता ने बच्चों को खाना खिलाया और उन्हें कमरे में टीवी चला कर बैठा दिया. कमरे की बाहर से कुंडी लगा दी थी. हत्या के बाद दोनों ने शव को बोरे में बंद कर दिया. सुनीता ने प्रेमी मान सिंह से पति की लाश इलाके से दूर ले जा कर किसी तालाब में फेंकने को कहा. ताकि लोगों को लगे कि पानी में डूबने से उस की मौत हुई है.

तब मान सिंह शव को बोरे में भर कर कंधे पर रख उसे फेंकने के लिए रात में ही चल पड़ा. जब वह शव को ठिकाने लगाने जा रहा था तभी रास्ते में पैर फिसलने से बोरा गिर गया और हत्या का भेद खुल गया. प्रेमी मान सिंह द्वारा लाश फेंकने से पहले ही लोगों ने उसे रंगेहाथों दबोच लिया. आशिकी में पत्नी ने पति की हत्या करा दी थी. सुनीता को अपने पति की हत्या का कोई अफसोस नहीं था. अपने प्यार की खातिर प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या करने वाली सुनीता के चेहरे पर गिरफ्तारी के बाद भी पछतावे के भाव नहीं दिखाई दिए.

इतना ही नहीं, पति की हत्या के मामले में पकड़े जाने पर बच्चों का क्या होगा? उस ने इस बारे में भी नहीं सोचा. मगर जब उसे पता चला कि अब उस की और प्रेमी दोनों की बाकी जिंदगी जेल में कटेगी तो वह रोने लगी. सुनीता की शादी को 10 साल से अधिक हो गए थे. 3 बच्चों में सब से बड़ा बेटा 9 साल का है. लोगों की सतर्कता के चलते पुलिस ने एक हत्या का परदाफाश घटना के कुछ घंटे बाद ही कर दिया था. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से फंदा लगाने वाला दुपट्टा, मृतक का मोबाइल फोन और आधार कार्ड बरामद कर दोनों को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Agra Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP Crime News : बेवफा बीवी बरदास्त नहीं

UP Crime News : दीक्षा की खूबसूरती पर फिदा हो कर ही हरेंद्र ने उस से विवाह किया था. लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही हरेंद्र को शक हो गया कि पत्नी के अन्य कई लोगों के साथ संबंध हैं. इस की पुष्टि उसे पत्नी के फोन के काल रिकौर्डर की बातों से हो गई. फिर क्या था, उस ने बेवफा पत्नी को बीच सड़क पर ऐसी सजा दी कि…

हरेंद्र और दीक्षा की शादी के 2 साल हो चुके थे, मगर उन के बीच अटूट रिश्ता नहीं बन पाया था. वे पतिपत्नी जरूर थे, लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे एकदूसरे को बेइंतहा मोहब्बत करते थे. कारण हरेंद्र की कई आदतें दीक्षा को पसंद नहीं थीं और हरेंद्र को भी दीक्षा का बारबार मायके जाने की जिद करना अच्छा नहीं लगता था. एक तरफ दीक्षा की 17-18 साल की कच्ची उम्र थी तो वहीं दूसरी तरफ कामधंधे से बेफिक्र हरेंद्र को अपनी पुश्तैनी धनसंपत्ति पर बहुत ही गुमान था. रक्षाबंधन के एक सप्ताह पहले से ही दीक्षा मायके जाने की जिद करने लगी थी, जबकि हरेंद्र उस की बात को टालने लगा था. वह दीक्षा के मायके जाने का कारण जान गया था. उस के मोबाइल फोन में रिकौर्ड बातों से उस का संदेह और भी गहरा हो गया था.

‘‘मुझे मायके जाना है तो जाना है… मैं और कोई बहाना नहीं सुनूंगी.’’ दीक्षा अपनी बात पर अड़ती हुई बोली.

‘‘पिछले महीने ही तो तुम मायके गई थी…’’ हरेंद्र ने कहा.

‘‘गई थी, लेकिन 4 दिन बाद रक्षाबंधन है…राखी पर घर जाना है…सभी जाते हैं,’’ दीक्षा विफरती हुई बोली.

‘‘सभी जाते हैं तो क्या हुआ? आनेजाने में खर्च भी तो होगा.’’ हरेंद्र ने कहा.

‘‘तो मैं क्या करूं? कोई काम क्यों नहीं करते हो? कमातेधमाते क्यों नहीं हो?’’ दीक्षा बोली.

‘‘नहीं कमाता हूं तो क्या तुम्हें भूखा रखता हूं? खानेपहनने के लिए नहीं देता हूं? 2 महीने पहले ही तुम्हें 10 हजार रुपए का स्मार्टफोन खरीद कर दिया है.’’

‘‘वो तो तुम्हारा फर्ज बनता है पत्नी को खुश रखना और उस की अच्छी देखभाल करना,’’ दीक्षा बोली.

‘‘तुम हो तो पांचवीं फेल, पर बातें पढ़़ेलिखों जैसी करती हो. मुझे ही अधिकार और फर्ज का पाठ पढ़ा रही हो. तुम्हारा क्या कर्तव्य है, कभी समझा है?’’ हरेंद्र ने जवाबी हमला बोलते हुए ताना मारा.

‘‘तुम ने भी हमारी बात कभी नहीं मानी, जब देखो तब शराब के नशे में धुत रहते हो. बापदादा की कमाई पर गुजारा कर रहे हो, आवारा दोस्तों के साथ घूमतेफिरते रहते हो और कितने ऐब गिनवाऊं, बताओ…’’ दीक्षा लगातार बोलती जा रही थी. उस की एकएक बात हरेंद्र को चुभ रही थी. गुस्से में उस ने हाथ उठाया और एक थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया. थप्पड़ खा कर दीक्षा तिलमिला गई. तन कर बोलने लगी, ‘‘ऐंऽऽ तुम ने मुझे थप्पड़ मारा. अब तो मैं यहां एक पल भी रुकने वाली नहीं हूं. अभी के अभी मायके जाऊंगी. देखती हूं कि तुम कैसे रोकते हो मुझे.’’ यह कहती हुई दीक्षा अपने कमरे से बाहर जा कर सूखने के लिए फैले कपड़े समेटने लगी.

हरेंद्र भी गुस्से से कमरे से बाहर निकल आया. बाइक स्टार्ट की और कहीं चला गया. कहां गया, इस की जानकारी केवल उस के यारों को ही थी. 2 घंटे बाद घर लौटा तो देखा, दीक्षा मायके जाने के लिए अपने सामान के साथ तैयार बैठी थी. हरेंद्र के हाथ में एक थैला था. उस का गुस्सा शांत हो चुका था. उस ने थैला उसे देते हुए सौरी बोला. फिर कहा, ‘‘इस में तुम्हारी छोटी बहन शीतल और तुम्हारे लिए सलवारसूट के कपड़े हैं, मायके में सिलवा लेना.’’

इसी के साथ उस के चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ कर अगले दिन सुबहसुबह मायके छोड़ आने का वादा किया. सलवारसूट का कपड़ा देख कर दीक्षा पति का थप्पड़ भूल गई. खुश हो कर बोली, ‘‘बहुत सुंदर है, तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं.’’

दीक्षा चली गई मायके अगले रोज वह अपने मायके चली गई. दीक्षा का मायका मुरादाबाद जिले की तहसील बिलारी के गांव मुडि़या राजा का था. वह अरविंद कुमार की बेटी थी. अरविंद कुमार के 2 बेटियों दीक्षा व शीतल के अलावा 2 बेटे अभिषेक व आयुष थे. दीक्षा बड़ी बेटी थी. उन्होंने दीक्षा का विवाह 28 नवंबर, 2019 को पास के ही गांव ढकिया नरू निवासी भागीरथ के बेटे हरेंद्र के साथ किया था. बात 18 अगस्त, 2021 की है. रात के समय करीब साढ़े 9 बजे थे. अरविंद  कुमार के पिता अतर सिंह अपनी पोतियों शीतल और दीक्षा के साथ घर पर थे.

उन दिनों उन का बड़ा बेटा अपने परिवार के साथ हिमाचल के सोलन में रह रहा था. उस की रोजीरोटी वहीं से चलती थी. और छोटा बेटा राजकुमार अपनी रिश्तेदारी में गया हुआ था और रक्षाबंधन की वजह से उस की पत्नी अपने मायके गई हुई थी. इस तरह से उस समय घर में केवल दीक्षा और उस की छोटी बहन शीतल ही थी. रात को दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर अतर सिंह ने अपनी पोती को आवाज दी, ‘‘शीतल बेटा, देखो तो इस वक्त कौन आया है?’’

शीतल दादा की आवाज सुन कर नीचे गई. दरवाजा खोला. देखा उस के जीजा हरेंद्र थे. शीतल वहीं से बोली, ‘‘दादाजी, जीजाजी आए हैं.’’

हरेंद्र सीढि़यां चढ़ता हुआ सीधे अतर सिंह के कमरे में जा पहुंचा. बोला, ‘‘रामराम बाबा, कैसे हैं?’’

‘‘रामराम बेटा, आओ बैठो. अच्छा हुआ तुम आ गए मैं घर में अकेला बैठा ऊब रहा था.’’ कहते हुए उन्होंने फिर शीतल को आवाज लगाई, ‘‘बेटा शीतल, दीक्षा को बोलो हरेंद्र के लिए पानी और कुछ खाने को ले कर आए.’’

‘‘अरे नहीं बाबाजी, मैं तो बस समझिए आप का हालचाल लेने आया हूं. कल रक्षाबंधन है. सुबहसुबह चला जाऊंगा.’’

अतर सिंह ने हरेंद्र को सम्मान के साथ बैठाया. वैसे भी दीक्षा रक्षाबंधन के त्यौहार की वजह से आई हुई थी. किसी तरह की कोई शिकायत नहीं थी.

‘‘बाइक से आए हो?’’ अतर सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं कार से आया हूं.’’ थोड़ी देर में ही हरेंद्र ने अंग्रेजी शराब का एक अद्धा अपनी जेब से निकालते हुए बोला, ‘‘बाबाजी, गिलास मंगाओ. आज आप के साथ हो जाए एकएक पैग.’’

अतर सिंह हरेंद्र के इस व्यवहार को देख कर हतप्रभ रह गए.

फिर भी शांति से कहा, ‘‘बेटा तुम्हारी शादी को करीब 2 साल होने जा रहे हैं, आज तक तो तुम ने मेरे सामने कभी शराब नहीं पी. तो फिर आज तुम ऐसा कैसे कह रहे हो?’’

‘‘बाबाजी, यूं ही मूड हो आया. सोचा कि अपने दोस्तों के साथ तो पीता ही रहता हूं, क्यों न आप के साथ पी कर कुछ गिलेशिकवे दूर कर लिए जाएं.’’ हरेंद्र बोला.

‘‘लेकिन बेटा मेरी तबीयत ठीक नहीं है. ये देखो मेरी दवाई.’’ अतर सिंह ने जेब से दवाई निकाल कर दिखाते हुए कहा, ‘‘मैं शराब नहीं पीऊंगा.’’

उसी वक्त दीक्षा भी कमरे में पानी का गिलास और खाने की थाली ले कर आ गई. सामने शराब देख कर गुस्से भरी नजरों से हरेंद्र को घूरा. बोली कुछ नहीं. खाने की थाली सामने रखी और गिलास को रख कर तेजी से जाने लगी. गिलास का पानी छलक कर वहीं छोटे से स्टूल पर फैल गया.

‘‘दिखता नहीं है, यहीं मोबाइल रखा हुआ है, गीला हो गया तो..?’’ हरेंद्र की बात पूरी भी नहीं हुई कि उस के मोबाइल की रिंगटोन बजने लगी. उस ने काल रिसीव की, ‘‘हैलो…’’

उधर से जो आवाज आई, उसे सुन कर दीक्षा को आवाज लगाई, ‘‘…ये लो सुनो, तुम्हारा ही फोन है, मेरे जीजाजी हैं, तुम से ही बात करना चाहते हैं.’’

ननदोई की उस के लिए आई काल जान कर दीक्षा ने तुरंत हरेंद्र के हाथों से फोन ले लिया और नीचे सीढि़यों से उतरने लगी. हरेंद्र भी उस के पीछेपीछे आया और चुपके से दीक्षा और अपने बहनोई के बीच फोन पर हो रही बातों का अनुमान लगाने लगा. हरेंद्र ने दीक्षा को यह कहते हुए सुना, ‘‘मैं ने पहले मना किया है हरेंद्र के फोन पर मेरे लिए फोन नहीं   करें, क्योंकि उसे हम पर अब शक है.’’

वास्तव में हरेंद्र अपनी पत्नी को हमेशा ही शक की निगाह से देखता था. यहां तक कि उस ने दीक्षा को जो मोबाइल दिया था, उस में आटोमैटिक वायस रिकौर्डिंग का ऐप डाउनलोड कर दिया था. दीक्षा की गैरमौजूदगी में वह उस के सभी काल की रिकौर्डिंग सुनता था. उसी से उसे इस बात का पता चल गया था कि उस के कई चाहने वाले हैं. उन्हीं में एक उस का बहनोई भी था. उस की लच्छेदार बातों से हरेंद्र को अनुमान हो गया था कि दीक्षा उस के साथ बेवफाई कर रही है. यही नहीं हरेंद्र को यह भी शक था कि उस के मायके में भी कई प्रेमी हैं. ऐसा होना भी स्वाभाविक था. क्योंकि दीक्षा बला की खूबसूरत थी, उसे देख कर कोई भी उस पर मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था. हरेंद्र भी उस की खूबसूरती को देख कर ही शादी करने के लिए राजी हुआ था.

दूसरी बात दीक्षा के बातें करने का लहजा और मजाक का जवाब मजाक में देने का अंदाज किसी को भी पसंद आ जाता था. वीडियो कालिंग की दीवानी थी. उस के कई वीडियो कालिंग की क्लिपिंग्स हरेंद्र भी देख चुका था. उसे देखते हुए हरेंद्र के सीने पर सांप लोटने लगते थे कि दीक्षा उस के साथ प्रेम से क्यों नहीं पेश आती है? वह उस से हमेशा रूखी बातें क्यों करती है. जबकि दूसरों के साथ वह दिल की बातें उड़ेल कर रख देती  थी. वीडियो कालिंग, फ्लाइंग किस तो ऐसे देती थी जैसै वह प्रेमी नहीं पति हो. यह सब बातें हरेंद्र को भीतर से खाए जा रही थीं. उस के वैवाहिक संबंध में मधुरता कम कड़वाहट अधिक भर गई थी.

ऊपर से दीक्षा द्वारा बारबार शराबीकबाबी कहना, नाकारा, नालायक मर्द कहते हुए ताने मारना हरेंद्र को काफी दुखी कर देता था. बातबात पर उस की दीक्षा से बहस हो जाती थी. ऐसी बहस रक्षाबंधन के कुछ रोज पहले भी हो गई थी. दीक्षा को मारी गोली कुछ समय बाद दीक्षा हरेंद्र के कमरे में आ कर उस का मोबाइल लौटाने आई. खाना स्टूल पर पड़ा देख कर बोली, ‘‘आप ने कुछ खाया नहीं?’’

‘‘अरे बेटी, इसे अपने कमरे में ले जा, वहीं तुम दोनों खाना खा लेना. और हां, शीतल को एक गिलास गर्म दूध ले कर भेज देना. सोने से पहले वाली दवाई खानी है.’’ अतर सिंह बोले.

उस के बाद दीक्षा और हरेंद्र नीचे के अपने कमरे में आ गए. अगले दिन अतर सिंह को जो सूचना मिली उस से पूरा परिवार सदमे में आ गया. बात ही कुछ ऐसी हुई कि अतर सिंह के परिवार से ले कर भागीरथ के परिवार में खलबली मच गई. हरेंद्र भागीरथ का सब से छोटा बेटा था. उन का पुश्तैनी मकान बिलारी से सिरसी जाने वाले मार्ग के किनारे ग्राम ढकिया नरू में है. भागीरथ का परिवार वहीं सालों से रहते आए हैं. सिरसी मार्ग पर सड़क के किनारे उन की अच्छी खेतीबाड़ी भी है. अतर सिंह की नींद सुबह देर से तब खुली, जब नीचे घर में कोई हलचल सुनाई दी. शीतल से कुछ लोग तेज आवाज में बातें कर रहे थे. आवाज सुन कर अतर सिंह भी नीचे गए. घर पर आए एक सिपाही को देख कर वह अचंभित हो गए.

जल्द ही उन्हें मालूम हो गया कि दीक्षा को गोली लगी है. वह मुरादाबाद अस्पताल में है. अतर सिंह अभी पूरा मामला समझ पाते इस से पहले ही सिपाही ने बताया कि दीक्षा की मौत हो चुकी है. वह बेहद घायलावस्था में थाना कुंदरकी क्षेत्र के बाईपास के किनारे पैट्रोलिंग पुलिस को मिली थी. वह खून से लथपथ तड़प रही थी. पुलिस ने इस की सूचना थानाप्रभारी संदीप कुमार को देने के बाद उसे निकट के अस्पताल पहुंचा दिया था. डाक्टर ने उस के सिर में गोली लगने की जानकारी दी और प्राथमिक उपचार के बाद जिला मुख्यालय रेफर कर दिया, परंतु उस ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

थाना कुंदरकी पुलिस मृतका की शिनाख्त में जुट गई. अभी वह इस केस की कागजी काररवाई कर ही रहे थे. तभी उन्हें कोतवाली बिलारी से सूचना मिली कि कुंदरकी बाईपास के किनारे घायलावस्था में जो युवती मिली थी, उस के हमलावर ने कोतवाली में सरेंडर कर दिया है. वह हमलावर कोई और नहीं बल्कि दीक्षा का पति हरेंद्र ही था. हरेंद्र ने ही अपनी पत्नी दीक्षा की हत्या की सूचना कोतवाली बिलारी को दे दी थी. बिलारी कोतवाली के प्रभारी आर.पी. सिंह  ने हरेंद्र से मामले की पूछताछ की. हरेंद्र ने अपना अपराध स्वीकारते हुए बताया कि उस का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था. विवाह के 2 महीने बाद ही उसे मालूम हो गया था कि उस की पत्नी के और भी प्रेमी हैं. इस कारण वह हमेशा मायके जाती रहती थी.

हरेंद्र ने अपनी मृतक बीवी पर यह भी आरोप लगाया कि वह किसी की चिकनीचुपड़ी बातों में तुरंत आ जाती थी और पति को छोड़ कर उस के ही प्रेम इजहार को महत्त्व देती थी. हरेंद्र का कहना था कि दीक्षा ही प्रेमी को फंसा कर रखती थी. इस कारण वह हमेशा पत्नी से नाराज रहता था. इस की वजह से घर में कलह काफी बढ़ गई थी. घटना के दिन भी रात को उस की ननदोई से फोन पर हुई बात को ले कर काफी बहस हो गई थी. उस रात बात इतनी बिगड़ गई कि जबरन रात को ही घर से बाहर उसे ले कर निकल पड़ा. उसे अपनी गाड़ी में बिठाया और बाईपास पर नीचे उतार कर उस के सिर में गोली मार दी.

उस के बाद कुछ दूर जा कर सोच में पड़ गया कि उसे अब क्या करना चाहिए. हालांकि गोली लगने से दीक्षा तड़पती हुई गिर पड़ी थी. पुलिस के आने तक उस की सांसें चल रही थीं. हरेंद्र के बयानों के आधार पर उस से पूछताछ थाना कुंदरकी में भी हुई. वहां उस ने पुलिस को घटनास्थल पर ले जा कर हत्या में इस्तेमाल तमंचा बरामद करा दिया, जो उस ने जंगल में फेंक दिया था. उस की बताई हुई जगह पर तलाशी के बाद एक बाइक भी कब्जे में ली गई. पुलिस ने दीक्षा के पिता अरविंद कुमार की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर ली. हरेंद्र से पूछताछ के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

पुलिस का कहना है कि घटनास्थल पर मोटरसाइकिल बरामद हुई है. यह सवाल बना रहा कि जब हरेंद्र अपनी ससुराल कार से आया था तब मोटरसाइकिल कहां से आ गई? क्या हत्या में हरेंद्र के साथ कोई और भी शामिल था? इस बारे में पुलिस कोई जवाब नहीं दे सकी थी. बहरहाल, थानाप्रभारी संदीप कुमार चार्जशीट तैयार करने से पहले इस बात की जांच कर रहे हैं कि मृतका के पति हरेंद्र ने पत्नी पर जो आरोप लगाए थे, उन में कितनी सच्चाई है? UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story : इश्क का दरवाजा

Love Story : अनैतिक रिश्ते को अधिक दिनों तक परदे में नहीं छिपाया जा सकता. इस से परदा हटते ही भूचाल आ जाता है. कई बार इस कारण आक्रोश की भड़की ज्वाला में जीवनलीला ही भस्म हो जाती है. ऐसा ही कानपुर के एक बैंककर्मी के साथ हुआ. अवैध संबंध में न केवल उस की जान गई, बल्कि 3 जिंदगियां भी तबाह हो गईं गु मशुदा विशाल अग्रवाल की लाश बरामद होने पर उन्नाव के दही थाने की पुलिस ने पहली जांच में ही उस के हत्या किए जाने की पुष्टि

कर दी थी. करीब 25 वर्षीय विशाल एक बैंककर्मी था, जिस की लाश जिले में शारदा नहर के किनारे झाडि़यों में लावारिस हालत में पड़े ड्रम से मिली थी. लाश को एक प्लास्टिक के ड्रम में ठूंस कर पैक किया गया था. ड्रम पुरवा मार्ग पर स्थित बंद पड़ी एलए आयरन फैक्ट्री से एक किलोमीटर दूर सराय करियान गांव के पास गुजरने वाली नहर के किनारे पड़ा था. ड्रम से दुर्गंध आने की सूचना ग्रामीणों ने पुलिस को दी थी. सूचना के आधार पर ही खेड़ा चौकीप्रभारी अंशुमान सिंह ने ड्रम को खुलवाया, जिस में से 25 वर्षीय युवक की रक्तरंजित लाश बरामद हुई.

वहीं पास में ही एक स्कूटी की चाबी भी मिली. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और उस की शिनाख्त के लिए जिले के सभी थानों में सूचना प्रसारित करवा दी. उन्हीं दिनों नौबस्ता थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह विशाल अग्रवाल नामक युवक की तलाशी कर रहे थे. उस के लापता होने की सूचना अंशुल अग्रवाल ने दर्ज करवाई थी. वह अंशुल का छोटा भाई था. नौबस्ता थानाप्रभारी को दही थानाक्षेत्र में एक युवक की लाश बरामद होने की सूचना मिली तो वह अंशुल को साथ ले कर उन्नाव के थाना दही जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उन्होंने चौकीप्रभारी अंशुमान सिंह से मुलाकात की. तब चौकीप्रभारी ने मोर्चरी ले जा कर बरामद लाश थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह और उन के साथ आए युवक अंशुल को दिखाई. अंशुल ने उस लाश की शिनाख्त अपने छोटे भाई विशाल अग्रवाल के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद थानाप्रभारी नौबस्ता लौट आए. उन्होंने सब से पहले गुमशुदगी के मामले को हत्या में तरमीम कराया फिर वह हत्यारे की तलाश में जुट गए. उन्होंने पहले मृतक के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस का मोबाइल 7 सितंबर को रात 10 बजे के बाद स्विच्ड औफ हो गया था. उस मोबाइल से अंतिम बातचीत 8 बज कर 50 मिनट पर हुई थी, जबकि साढ़े 8 बजे उस पर एक मिस्ड काल भी आई थी. जांच का सिलसिला मोबाइल से मिली कुछ जानकारियों के साथ शुरू किया गया.

जिस नंबर से विशाल के मोबाइल पर काल की गई थी, वह नंबर सत्यम ओमर नाम के व्यक्ति का था. सत्यम कानपुर निवासी अनिल ओमर का बेटा था. पुलिस द्वारा उस मोबाइल नंबर पर काल की गई तो वह बंद मिला. फिर पुलिस ने नंबर से मिले पते पर दबिश दी, किंतु वहां सत्यम नहीं मिला. सिर्फ इतना मालूम हुआ कि वह इस पते पर ढाई साल पहले रहता था. हालांकि जल्द ही थानाप्रभारी को मुखबिरों से सत्यम के नए पते की जानकारी मिल गई. पता चला कि वह अब रामनारायण बाजार स्थित फ्लैट में रहता है. पुलिस को मुखबिर से उस के उस फ्लैट में उपस्थित रहने के समय का भी पता लग गया.

इस सूचना के आधार पर थानाप्रभारी ने क्राइम ब्रांच इंसपेक्टर छत्रपाल सिंह, उस्मानपुर चौकीइंचार्ज प्रमोद कुमार, बसंत विहार चौकीइंचार्ज मनीष कुमार, एसआई रवींद्र कुमार, हैडकांस्टेबल अरविंद सिंह, सुरेंद्र सिंह, दीपू भारतीय, राजीव यादव, कांस्टेबल सौरभ पाडेय, महिला सिपाही पल्लवी के साथ उक्त फ्लैट पर दबिश दी. उस समय फ्लैट से 2 युवक सीढि़यों से उतर रहे थे. पुलिसकर्मियों को देखते ही दोनों भागने लगे, लेकिन वे पकड़ लिए गए. पुलिस दोनों को ले कर उस फ्लैट में गई. उन से पूछताछ करने पर एक युवक ने अपना नाम सत्यम ओमर, जबकि दूसरे ने सरवन बताया. वहीं 16-17 साल की एक लड़की भी मौजूद थी. उस ने पुलिस को बताया कि वह सत्यम की मौसेरी बहन है और पास ही दूसरे मकान में रहती है. उस का नाम राधा (परिवर्तित) था.

उन से पूछताछ के बाद पुलिस ने फ्लैट के बारीकी से निरीक्षण में पाया कि कमरे की दीवारों को जगहजगह खुरचा गया है. इस का कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि डिस्टेंपर करवाना है. यह बात पुलिस को हजम नहीं हुई, क्योंकि वहां डिस्टेंपर के लिए किसी तरह के इंतजाम कहीं नहीं दिखा. दीवारों पर खुरचने के निशान भी जहांतहां मिले. उस बारे में सभी ने हिचकिचाट के साथ बताया. थानाप्रभारी ने राधा के चेहरे पर भी गौर किया, जिस का रंग अचानक तब फीका पड़ गया था, जब उन्होंने कहा कि वे विशाल अग्रवाल की हत्या के सिलसिले में पूछताछ करने आए हैं. इस में उस ने साथ नहीं दिया तो वह भी मुश्किल में पड़ जाएगी. इसी के साथ थानाप्रभारी दोनों युवकों को विशेष पूछताछ के लिए थाने ले आए. उन्होंने सत्यम से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने 7 सितंबर की शाम साढ़े 8 बजे विशाल को मिस्ड काल क्यों की थी?’’

इस का जवाब देते हुए सत्यम हकबकाता हुआ बोला, ‘‘वह नंबर मैं नहीं, मेरी मौसेरी बहन इस्तेमाल करती है. उसी से पूछना होगा.’’

‘‘वह विशाल को कैसे जानती है?’’ सिंह ने सवाल किया.

‘‘मुझे नहीं मालूम,’’ सत्यम बोला.

उस के बाद थानाप्रभारी को उस की मौसेरी बहन राधा भी संदिग्ध लगी. उन्होंने उसे भी तुरंत थाने बुलाया और पूछताछ शुरू की. उस से फोन काल के बारे में नहीं पूछा, बल्कि सीधे लहजे में पूछ लिया कि विशाल से उस के क्या संबंध थे. यह सवाल सुन कर सामने बैठे अपने भाई और उस के दोस्त सरवन को देख कर घबरा गई. उस के कुछ बोलने से पहले ही थानाप्रभारी ने समझाया, ‘‘तुम्हारे विशाल से जो भी संबंध रहे, वे उस की मौत के साथ खत्म हो गए. तुम्हारे भाई ने भी मुझे कई बातें बताई हैं, जिस से तुम पर भी उस की हत्या में साथ देने का शक है. मुझे पता है कि विशाल ने तुम्हारे मिस्ड काल के थोड़ी देर बाद फोन किया था. तुम सिर्फ इतना बता दो कि उस से तुम्हारी क्या बात हुई थी.’’

यह सुन कर राधा कभी पुलिस को देखती, तो कभी इधरउधर देखने के बहाने से सत्यम को देखने लगती. वह यह सोच कर भीतर से डर गई कि लगता है सरवन ने पुलिस को सब कुछ बता दिया. कुछ सेकेंड बाद सिंह ने फिर सवाल किया, ‘‘बताया नहीं, तुम्हारे विशाल से क्या संबंध थे?’’

‘‘सर, मैं उसे प्यार करती थी,’’ राधा धीमी आवाज में बोली.

‘‘इस का सत्यम को पता था?’’ सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ राधा बोली.

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं डर गई थी.’’

‘‘भाई से डर कर कुछ नहीं बताया था या फिर कुछ और बात है?’’

‘‘सर, मैं भाई से डरती थी, इसलिए नहीं बताया.’’ राधा बोली.

‘‘अच्छा चलो, अब यह बता दो कि 7 सितंबर की शाम को तुम्हारी विशाल से क्या बात हुई थी?’’

अलगअलग तरह से बदले हुए सवालों को सुन कर राधा पसीनेपसीने हो गई थी, दुपट्टे से पसीना पोछती हुई बोली, ‘‘उस से मिलना चाहती थी.’’

‘‘वह भी रात में! मिलने के लिए कहां बुलाया था?’’ सिंह ने पूछा.

‘‘भाई के फ्लैट पर,’’ राधा ने बताया.

‘‘क्यों, क्या उसे भाई से मिलवाना था? लेकिन भाई तो बोला कि वह उस दिन कहीं गया हुआ था. घर पर था ही नहीं.’’ थानाप्रभारी के सवालों से राधा खुद को घिरा महसूस करने लगी. कुछ भी नहीं बोल पाई. बीच में सत्यम कुछ बोलने को हुआ, तब थानाप्रभारी ने उसे डपट दिया. उस के बाद राधा रोने लगी. थानाप्रभारी ने तुरंत महिला सिपाही को एक गिलास पानी लाने के लिए कहा और खुद उठ कर अलमारी खोलने लगे. महिला सिपाही से पानी पीने के बाद सिंह एक बार फिर बोले, ‘‘सचसच बताओ, 7 सितंबर को तुम्हारे और विशाल के साथ क्याक्या हुआ? अभी मैं तुम से प्यार से पूछ रहा हूं, लेकिन मुझे सच्चाई बाहर निकलवाना भी आता है. देखो उसे, जिस ने तुम्हें पानी पिलाया है, वही तुम्हारे मुंह में अंगुली डाल कर सारी बातें भी निकलवा लेगी.’’ यह कहते हुए थानाप्रभारी ने सत्यम और सरवन को दूसरे कमरे में भेज दिया.

अब तक पुलिस दबाव में आ कर राधा पूरी तरह से टूट गई थी. उस ने विशाल के साथ अपने अवैध संबंध को स्वीकार करते हुए 7 सितंबर की पूरी घटना बता दी. फिर क्या था, जो बातें थानाप्रभारी ने सत्यम और सरवन से भी नहीं पूछी थीं और उन पर विशाल की हत्या का सिर्फ संदेह था, उस की पुष्टि राधा ने ही कर दी. थानाप्रभारी के लिए राधा द्वारा दी गई जानकारी बेहद महत्त्वपूर्ण थी. वह मुसकराए और राधा को महिला सिपाही के साथ बैठा कर सत्यम व सरवन के पास जा पहुंचे. उन से भी उन्होंने विशाल अग्रवाल की हत्या के संबंध में घुमाफिरा कर कई सवाल पूछे.

कुछ सवाल उन्होंने हवा में तीर की तरह चलाए. जबकि कुछ सवालों के साथ सबूत होने के दावे और राधा द्वारा बताए जाने की बातें कह कर उन्हें उलझा दिया. नतीजा यह हुआ कि सत्यम और सरवन भी टूट गए और उन्होंने विशाल हत्याकांड से ले कर उस की लाश को ठिकाने लगाने तक की बात बता दी. राधा, सरवन और सत्यम के द्वारा जुर्म स्वीकार किए जाने के बाद सरवन ने विशाल के शव को फेंकने का खुलासा कर दिया. इस तरह राधा ने विशाल के साथ अनैतिक संबंध बनाते हुए रंगेहाथों पकड़े जाने से ले कर उस की हत्या संबंधी साक्ष्य मिटाने का जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने साक्ष्य को मजबूत बनाने के लिए राधा का वैजाइनल टेस्ट करवाया. साथ ही आरोपियों की निशानदेही पर विशाल अग्रवाल की स्कूटी, लैपटाप तथा हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली. य्याशी के चक्कर में जान गंवाने वाले बैंककर्मी विशाल की प्रेम कहानी इस प्रकार सामने आई—

उत्तर प्रदेश जिला कानपुर के थाना नौबस्ता अंतर्गत संजय नगर कालोनी मछिरिया में विष्णु प्रसाद अग्रवाल के 2 बेटे अंशुल (26 वर्ष) औरविशाल (25 वर्ष) के अलावा बेटी दिव्या (23 वर्ष) थी. इन में से विशाल कुंवारा था. वह भी अपने भाई अंशुल की तरह ही  बैंक मैनेजर था और मातापिता के साथ ही रहता था. स्वभाव से वह आशिक मिजाज था. जल्द ही किसी लड़की के पीछे पड़ जाता था. आकर्षक और सैक्स अपील होने के कारण कोई भी लड़की पहली ही नजर में उस की ओर आकर्षित हो जाती थी. उस के दिलफेंक होने के कारण ही वह किसी के साथ भी यौन संबंध बनाने से परहेज नहीं करता था. उस ने मौका पा कर राधा को भी अपने प्रेमजाल में फंसा लिया था. उसे शादी के सपने दिखाते हुए ऐशोआराम की जिंदगी देने के वादे किए थे. राधा भी उस के प्रेम में फंस चुकी थी.

सत्यम ओमर अपने मातापिता के साथ पहले माहेश्वरी मोहाल में रहता था. बाद में उन के देहांत के बाद वह घंटाघर स्थित अपने मामा के यहां रहने लगा था. हालांकि 6 साल पहले उस के मामा की भी मृत्यु हो गई थी. उस की मामी अपने मायके में रहती थी, जिस कारण उस ने घंटाघर में ही एक फ्लैट किराए पर ले लिया था. वहीं विशाल अग्रवाल भी आताजाता था. बताते हैं कि वहां दोनों के एक बैंक में इंश्योरेंस का काम करने वाली युवती के साथ अवैध संबंध हो गए थे. विशाल और सत्यम के लिए वह युवती केवल मौजमस्ती का साधन भर थी. दोनों बदले में युवती को कुछ पैसे या गिफ्ट दे दिया करते थे.

वह फ्लैट सत्यम और विशाल के लिए मौजमस्ती का अड्डा बन कर रह गया था. कई बार वहां सरवन के साथ भी बैठकें होती थीं और पार्टी का दौर चलता था. उस फ्लैट पर एक और लड़की राधा का भी अकसर आनाजाना लगा रहता था. वह वहां बेधड़क आती थी और अधिकार के साथ कुछ समय वहां गुजार कर चली जाती थी. हालांकि वह दूसरे मोहल्ल्ले मनीराम बगिया में रहती थी. वास्तव में वह सत्यम की मौसेरी बहन थी. सत्यम ने एक चाबी राधा को भी दे रखी थी. वहीं करीब 2 साल पहले एक बार उस की विशाल से मुलाकात हो गई थी. पहली नजर में ही दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे.

विशाल राधा की खिलती किशोरावस्था को देख कर हतप्रभ रह गया था, जबकि राधा उस की बातें और माचो बदन की दीवानी बन गई थी. उस के बाद से विशाल और राधा अकसर साथसाथ घूमनेफिरने लगे थे, लेकिन दोनों सत्यम की नजरों से बच कर भी रहते थे. वे नहीं चाहते थे कि उन के प्रेम संबंध के बारे में सत्यम को कोई जानकारी हो. जल्द ही विशाल ने मौका पा कर राधा से शारीरिक संबंध भी बना लिए. राधा की भी उस में स्वीकृति मिल गई थी. सत्यम की गैरमौजूदगी में राधा विशाल को उसी फ्लैट पर बुला लेती थी.  7 सितंबर, 2021 को सत्यम ओमर ने राधा को फोन पर बताया था कि वह आज वहां नहीं आएगा. बाहर बालकनी में उस के कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें अलमारी में रख दे. किचन और दूसरे कमरे के बिखरे सामान आ कर ठीक कर दे.

अपने भाई की बातों पर अमल करते हुए राधा ने अपने प्रेमी विशाल के साथ मौज करने की भी योजना बना ली. उस ने तुरंत फोन कर इस की सूचना विशाल को दी और शाम को खानेपीने का सामान ले कर फ्लैट पर आने को कहा. शाम होने से पहले वह फ्लैट पर चली गई, किचन और कमरे को दुरुस्त किया. तब तक शाम के साढ़े 8 बज चुके थे. अब तक विशाल को आ जाना चाहिए था, क्योंकि उस ने 8 बजे तक आने को कहा था. देर होने पर राधा ने विशाल को फोन किया, जिसे विशाल ने रिसीव नहीं किया. करीब 20 मिनट बाद विशाल ने फोन कर राधा को बताया कि वह पहुंचने वाला है. और फिर वह ठीक 9 बजे फ्लैट पर पहुंच गया. वहीं अपार्टमेंट की पार्किंग में उस ने अपनी स्कूटी भी लगा दी.

राधा उस का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही वह उस के गले लग गई. दोनों अकेले में कई हफ्तों बाद मिले थे. इस मौके को किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहते थे. राधा के लिए पूरी रात थी. विशाल भी खानेपीने के सामान के साथ आया था. दोनों बेफिक्र थे. मौजमस्ती के लिए पूरी तरह से तैयार और तत्पर भी थे. इसी तत्परता में उन से एक भूल हो गई. मुख्य दरवाजे की अंदर से कुंडी लगाना भूल गए. वे बैडरूम में थे. ड्राइंगरूम की ओर उन का जरा भी ध्यान नहीं था.

दोनों एकदूसरे पर प्यार की बौछार करते हुए कब यौनाचार में लीन हो गए, पता ही नहीं चला. दूसरी ओर वाटर प्लांट में काम समाप्त हो जाने पर सत्यम फ्लैट पर अचानक आ गया. फ्लैट का दरवाजा खुला होने पर वह सीधे ड्राइंगरूम में दाखिल हुआ. बैडरूम में रोशनी देख कर चौंक गया और वहां जा कर दरवाजे पर लगे परदे को हटाया. बैड पर अपनी बहन राधा के साथ विशाल को लिपटा देख सन्न रह गया. वे दोनों आंखें मूंदे इतने बेफिक्र थे कि सत्यम के दरवाजे पर आने की जरा भी आहट नहीं हुई. गुस्से की ज्वाला को दबाए सत्यम चुपचाप फ्लैट के नीचे आया.

नीचे से लोहे की रौड निकाली और ऊपर पहुंच कर राधा के आलिंगन में बंधे विशाल के सिर पर दे मारी. एक ही वार में सिर से खून बहने लगा. राधा अपनी जान बचाते हुए दूसरे कमरे में भागी. गुस्से में सत्यम ने विशाल के सिर पर दनादन 3-4 और वार कर दिए. सिर पर ताबड़तोड़ वार से विशाल की वहीं मौत हो गई. राधा के सामने ही विशाल की मौत हो गई थी, लेकिन वह डर गई थी कि कहीं सत्यम उसे भी न मार डाले. सत्यम ने डपटते हुए इस बारे में किसी को बताने की उसे सख्त हिदायत दे दी. उसे जल्दी से दीवार पर लगे खून के दाग मिटाने को कहा. उस के बाद तुरंत अपने दोस्त सरवन को बुलाया.

सरवन भागाभागा आया. लाश देख कर उस के होश उड़ गए, लेकिन जल्द ही सामान्य होने पर लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. तब तक रात के साढ़े 11 बज गए थे. इसलिए सरवन योजना के अनुसार अगले रोज 8 सितंबर को प्लास्टिक का एक ड्रम खरीद लाया. उस में विशाल की लाश ठूंस कर पैक कर दी. ड्रम को उस पर लगी स्टील की स्ट्रिप से पैक कर दिया. उस के बाद ड्रम को विशाल की स्कूटी पर लादकर कैंट होते हुए जाजमऊ गंगापुल से दही थाने की खेड़ा चौकी क्षेत्र जा पहुंचे. उन्होंने ड्रम को नहर के पास झाडि़यों में फेंक दिया. साथ ही विशाल का मोबाइल फोन भी नहर में फेंक दिया. उस की स्कूटी से वापस कानपुर आ गए.

सत्यम ने विशाल की स्कूटी अपने यशोदा नगर स्थित प्लौट के पास पेड़ के नीचे खड़ी कर दी. जबकि उस के खून से सने कपड़ों को कूड़ाघर में फेंक आया. आरोपियों द्वारा अपना जुर्म स्वीकार कर लेने के बाद थानाप्रभारी सतीश कुमार सिंह ने आईपीसी की धारा 302/201/120बी के तहत हत्यारोपी सत्यम ओमर, सरवन किशोरी राधा को न्यायालय में पेश किया. वहां से सत्यम और सरवन को कानपुर के जिला कारागार भेज दिया गया, जबकि साक्ष्य छिपाने के आरोप में राधा को नारी निकेतन के सुरक्षा गृह में भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है तथा किशोरी राधा का नाम कल्पनिक है