UP Crime News : गलती खुद की सजा किसी और को

UP Crime News : राजकुमार पढ़ालिखा ही नहीं था, सरकारी नौकरी में भी था. उस की पत्नी आशा भी पढ़ीलिखी होने के साथसाथ खूबसूरत भी थी. दोनों की अच्छी जोड़ी थी. अचानक राजकुमार के मन में ऐसा क्या आया कि वह बीवी का हत्या करने को मजबूर हो गया. उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के नंदगांव का रहने वाला सुनहरीलाल इलाहाबाद में किसी सरकारी विभाग में नौकरी करता था. उस के परिवार में पत्नी शारदा के अलावा बेटी आशा और बेटा राजकुमार उर्फ राजू था. चूंकि सुनहरीलाल इलाहाबाद में परिवार के साथ रहता था, इसलिए आशा और राजकुमार ने वहीं पढ़ाई की थी.

आशा एमए कर के कोई नौकरी कर पाती, सुनहरीलाल रिटायर हो कर गांव आ गया था. आशा की पढ़ाई पूरी हो गई थी और वह शादी लायक हो गई थी, इसलिए सुनहरीलाल को उस की शादी की चिंता हुई. वह लड़के की तलाश में भागदौड़ करने लगे. भागदौड़ का सुखद परिणाम भी निकला. एटा के थाना सकीट के गांव नौरंगाबाद निवासी रौशनलाल बघेल का छोटा बेटा राजकुमार उन्हें आशा के लिए पसंद आ गया तो उन्होंने बेटी की शादी उस के साथ तय कर दी. आशा पढ़ीलिखी तो थी ही, खूबसूरत भी थी, इसलिए लड़के वालों के मना करने का सवाल ही नहीं था. राजकुमार भी कम खूबसूरत नहीं था. एकदम आशा के जोड़ का था. लेकिन वह आशा से कम पढ़ा था.

आशा एमए पास थी, जबकि वह बीए तक ही पढ़ा था. लेकिन उसे शीतलपुर विकास खंड में सफाईकर्मी की नौकरी मिल गई थी. बीए पास राजकुमार ने यह नौकरी मजबूरी में की थी. क्योंकि काफी भागदौड़ और मेहनत के बाद भी उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली थी. संयोग से मायावती शासनकाल में सफाईकर्मियों की भरती की गई तो उसे यह नौकरी मिल गई थी. राजकुमार सरकारी नौकरी में था. स्मार्ट होने के साथसाथ व्यवहारकुशल भी था. इसलिए उस से झाड़ू लगवाने के बजाय विकास खंड अधिकारी औफिस का काम कराने लगे थे. वह मेहनत और लगन से काम करता था, इसलिए औफिस के लोग उसे पसंद करते थे. यही सब देख कर सुनहरीलाल ने आशा के लिए राजकुमार को पसंद किया था.

आशा की शादी हो गई और वह दुलहन बन कर पिया राजकुमार के घर आ गई. पढ़ीलिखी और सुंदर पत्नी पा कर राजकुमार तो खुश था ही, घर वाले भी फूले नहीं समा रहे थे. क्योंकि गांव में उन्हीं की बहू सब से ज्यादा पढ़ीलिखी थी. राजकुमार को शीतलपुर विकास खंड परिसर में आवास भी मिला था, इसलिए शादी के बाद वह आशा को भी वहीं ले आया. आते ही आशा ने पति की पूरी गृहस्थी संभाल ली. दिन हंसीखुशी से गुजर रहे थे. आशा पढ़ीलिखी थी, इसलिए वह भी चाहती थी कि कोई नौकरी मिल जाए, जिस से गृहस्थी की गाड़ी आराम से चल सके. वह नौकरी तलाश रही थी कि तभी पता चला वह गर्भवती हो चुकी है. अब बच्चा होने तक कुछ नहीं हो सकता था.

शादी के साल भर बाद आशा ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अनंत रखा गया. बेटे के जन्म के बाद खुशियां दोगुनी हो गईं. अनंत थोड़ा बड़ा हुआ तो आशा की नौकरी करने वाली लालसा फिर जाग उठी. आशा पढ़ीलिखी थी, लेकिन उस के पास कोई प्रोफेशनल डिग्री नहीं थी. इस के लिए उस ने राजकुमार से कंप्यूटर सीखने की इच्छा जाहिर की. तब राजकुमार ने कहा कि अभी अनंत इस लायक नहीं है कि उसे घर में अकेला छोड़ा जा सके. उसे थोड़ा बड़ा हो जाने दो. फिर अभी कहां उस की उम्र निकली जा रही है.

‘‘ठीक है, तुम कहते हो तो मैं अनंत के कुछ और बड़े होने तक इंतजार कर लेती हूं.’’ आशा ने कहा.

इस के बाद आशा ने महसूस किया कि राजकुमार अब मोबाइल फोन से कुछ ज्यादा ही चिपका रहने लगा है. वह हंसहंस कर इस तरह फुसुरफुसुर बातें करता है, जैसे उस से कुछ छिपाना चाहता है. वह जिस तरह बातें कर रहा था, उस तरह तो किसी लड़की से ही बातें की जाती हैं. यह शंका होने पर आशा ने राजकुमार से पूछा भी, लेकिन कुछ बताने के बजाय वह टाल गया, जिस से आशा का संदेह बढ़ गया. उस का यह संदेह तब विश्वास में बदल गया, जब वह दिवाली पर ससुराल गई. उस ने देखा कि पड़ोस में रहने वाली सुनीता राजकुमार से हंसहंस कर बातें करती थी. औरत होने के नाते उस ने सुनीता की नजरों से ही जान लिया कि मामला गड़बड़ है.

उस ने इस बारे में जानकारी जुटाई तो उसे पता चला कि सुनीता और राजकुमार का प्रेमसंबंध शादी से पहले से चल रहा है. यह जानने के बाद आशा से रहा नहीं गया और उस ने राजकुमार से पूछ लिया, ‘‘मुझे पता चला है कि सुनीता से तुम्हारा अफेयर था? अगर ऐसा था तो तुम ने मुझ से शादी क्यों की? परेशानी की बात यह है कि तुम अभी भी उसे भूल नहीं पाए हो और उस से फोन पर बातें करते हो.’’

यह सुन कर राजकुमार के चेहरे का रंग उड़ गया, क्योंकि उस की चोरी पकड़ी गई थी. उस ने खुद को संभाल कर आशा को आश्वस्त करने के लिए कहा, ‘‘शादी के पहले क्या था, अब यह सोचनेविचारने की जरूरत नहीं है. अब मैं सिर्फ तुम्हारा हूं और वादा करता हूं कि आज से तुम्हें शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा.’’

राजकुमार ने भले ही आशा से वादा किया था कि अब उसे शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा, लेकिन आशा को अब पति पर भरोसा नहीं रह गया था. उसे अपने और बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी थी. उसे लगने लगा था कि अब उस का और बेटे का भविष्य तभी सुरक्षित हो सकता है, जब वह नौकरी कर ले. आशा ने कंप्यूटर का कोर्स करने के लिए ब्रज कंप्यूटर सेंटर में दाखिला ले लिया. घर के बाहर निकलने से आशा का मनोबल थोड़ा बढ़ा. परिणामस्वरूप कभीकभी बातचीत में वह राजकुमार को ताना मार देती कि उस की सफाईकर्मी वाली नौकरी उसे बिलकुल पसंद नहीं है. पत्नी के इस ताने से राजकुमार के मन में हीनभावना पैदा होने लगी.

उस की पत्नी सुंदर तो थी ही, उस से ज्यादा पढ़ीलिखी भी थी. यह बात उसे खटकने लगी. हीनभावना से ग्रस्त राजकुमार के मन में तरहतरह के विचार आने लगे. वह खुद को आशा से हीन समझने लगा था, इसलिए आशा को किसी आदमी से बातचीत करते देख लेता तो जरूर पूछ लेता, ‘‘क्या बातें हो रही थीं, तुम्हें किसी पराए मर्द से बातें करते शरम नहीं आती?’’

शुरू में तो आशा ने राजकुमार की इस बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब राजकुमार कुछ ज्यादा ही टोकाटाकी करने लगा तो आशा उसे परेशान करने के लिए लोगों से कुछ ज्यादा ही बातें करने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि राजकुमार भी उसे परेशान करने के लिए फिर से सुनीता से फोन पर बातें करने लगा. अब आशा को इस बात की चिंता सताने लगी कि पति की इन हरकतों का असर उस की गृहस्थी पर न पड़े. अपनी गृहस्थी को बचाने के लिए आशा ने सारी बात मांबाप और भाई को बताई. उस ने पिता से कहा कि उस की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. एक तो राजकुमार के गांव की एक लड़की से नाजायज संबंध हैं, दूसरे वह उसे किसी से बात भी नहीं करने देता. उस की समझ में नहीं आता कि वह क्या करे.

बेटी की जिंदगी का सवाल था, इसलिए सुनहरीलाल को ये बातें परेशान करने लगीं. मांबाप को जैसा करना चाहिए, उसी तरह पतिपत्नी ने आशा को समझाया कि जैसे भी हो, वह खुद को संभाले और राजकुमार को प्यार से समझाए, जिस से उस की गृहस्थी में दरार न आए. पढ़ीलिखी होने की वजह से आशा काफी समझदार थी. इसी वजह से राजकुमार के व्यवहार से वह परेशान रहती थी. क्योंकि वह उस की जासूसी करने लगा था. आशा उस की अनुपस्थिति में भी पड़ोस में किसी के घर चली जाती या किसी से बातचीत कर लेती तो घर आ कर वह उस से लड़ाईझगड़ा ही नहीं करता, मारपीट भी करता. कोई पड़ोसी भी उस से बात कर लेता तो पिटाई उसी की होती.

यही नहीं, कंप्यूटर सीखने जाते समय राजकुमार उस के पीछेपीछे जाता. शायद उसे लगने लगा था कि आशा उस से ज्यादा पढ़ीलिखी है, खूबसूरत है, जबकि वह मात्र बीए पास है और सफाईकर्मी की नौकरी करता है, इसलिए दूसरे तो आशा को ताकतेझांकते ही हैं, आशा भी उसे पसंद नहीं करती. इसीलिए उस का भी मन बहक रहा है. ऐसे में कभी औफिस में कोई आशा की तारीफ कर देता तो घर आ कर वह इस का बदला आशा से लेता. मांबाप के इस लड़ाईझगड़े से परेशानी 4 साल के अनंत को भी होती थी. वह सहमासहमा रहता था. आशा बेटे का हवाला दे कर राजकुमार को समझाती भी थी कि उसे अपने इस व्यवहार में बदलाव लाना चाहिए, वरना घर तो बरबाद होगा ही, बेटे का भी भविष्य बरबाद हो जाएगा.

लेकिन राजकुमार की शंका बढ़ती जा रही थी. एक दिन आशा कंप्यूटर सीख कर निकल रही थी तो उस के किसी साथी ने उस से कुछ पूछ लिया. राजकुमार उस पर नजर रख ही रहा था. उस ने आशा को लड़के से बात करते देख लिया तो घर आ कर पूछा, ‘‘वह लड़का कौन था, जिस से तुम बातें कर रही थी?’’

‘‘वह भी मेरे साथ कंप्यूटर सीख रहा है. नईनई जानकारियों के लिए आपस में बात करनी ही पड़ती है. उस ने मुझ से कुछ पूछ लिया तो इस में परेशानी क्या है?’’ आशा ने कहा.

‘‘मुझे लगता है कि तुम वहां कंप्यूटर सीखने नहीं, गुलछर्रे उड़ाने जाती हो.’’

पति के इस आरोप से आशा तड़प उठी, ‘‘तुम मुझे भी अपनी तरह समझते हो क्या? पहले खुद को देखो, उस के बाद किसी को कुछ कहो.’’

आशा का इतना कहना था कि राजकुमार ने उसे 3-4 तमाचे जड़ दिए. पति की इस हरकत से आशा तिलमिला कर बोली, ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं. आज के बाद फिर कभी हाथ उठाया तो जेल भिजवा दूंगी. नौकरी तो जाएगी ही, जेल में पड़े सड़ते रहोगे.’’

आशा की इस धमकी से राजकुमार डर गया. उसे लगा कि उस की पत्नी को बाहर की हवा लग गई है. कंप्यूटर सीख रही है तो इस का यह हाल है, नौकरी लग जाएगी तब तो यह उसे छोड़ ही देगी. यही हाल आशा का भी था. पति की हरकतों से उसे अपने और बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी थी. आखिर वह कब तक मारपीट सह कर इस शादी को बचा सकती है? अगर पति ने छोड़ दिया तो वह बेटे को ले कर कहां जाएगी. राजकुमार के दुर्व्यवहार से त्रस्त आशा उस से कटीकटी रहने लगी थी. परेशान आशा जब देखो, तब मायके चली जाती थी. इस से राजकुमार को लगने लगा कि आशा का मायके में किसी से संबंध है, जिस की वजह से वह उस की उपेक्षा कर के मायके जाने लगी है. यह बात मन में आते ही राजकुमार और क्रूर हो गया.

आशा ने कंप्यूटर सीख लिया तो नौकरी ढूंढने लगी. वह सोच रही थी कि नौकरी लगने पर वह अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो राजकुमार से अलग हो जाएगी. क्योंकि अगर ऐसे में अलग हो जाती है तो मायके वालों पर वह बोझ बन जाएगी. नौकरी से रिटायर हो चुके पिता पर वह बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए पति की मारपीट झेल रही थी. एक दिन आशा का भाई शीतलपुर उस से मिलने आया तो उस ने रोरो कर कहा कि राजकुमार ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि अब जिंदा रहना मुश्किल हो गया है. उस ने उस की जिंदगी को नरक बना दिया है.

बहन की परेशानी जान कर राजू परेशान हो उठा. उस ने राजकुमार से बात करने का निश्चय किया. शाम को जब राजकुमार घर आया तो उस ने कहा, ‘‘जीजाजी, आखिर आप चाहते क्या हैं, जो मेरी बहन का जीना हराम कर दिया है?’’

‘‘भई, आप रिश्तेदार हैं, रिश्तेदार बन कर रहिए. हमारा पतिपत्नी का मामला है, आप को बीच में पड़ने की जरूरत नहीं है.’’ राजकुमार ने कहा.

‘‘तुम्हारी पत्नी होने से पहले वह मेरी बहन है और मैं अपनी बहन को कभी दुखी एवं परेशान नहीं देख सकता. अच्छा होगा कि तुम अपनी हद में रहो. अपनी गृहस्थी को संभालो, वरना सब बरबाद हो जाएगा.’’

‘‘इसी तरह की धमकी कुछ दिनों पहले तुम्हारी बहन ने भी दी थी, अब तुम दे रहे हो. एक बात याद रखना, तुम ने अगर कुछ ऐसावैसा किया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’ राजकुमार ने भी धमकाया. इस के बाद राजू ने राजकुमार से कुछ कहने के बजाय आशा से कहा, ‘‘दीदी, मैं घर जा कर पापा से बात करूंगा. अब कोई न कोई ठोस निर्णय लेना ही होगा.’’

बातचीत कर के राजू चला गया. इतना सब होने के बाद भी राजकुमार की समझ में बात नहीं आई. उस ने आशा की जम कर पिटाई की. पिटाई करते हुए उस के दिमाग में आया कि अब अगर यह मायके गई तो उसे बिलकुल नहीं छोड़ेगी. निश्चित दहेज उत्पीड़न का मुकदमा कर देगी. उस के बाद तो उस की जमानत भी नहीं हो पाएगी. इसलिए इसे मार देना ही ठीक है. राजकुमार ने आशा को मारने का निर्णय लिया तो इस बात पर विचार करने लगा कि उसे मारे कैसे. चाकूछुरे से वह उस की हत्या कर नहीं सकता था. इसलिए देसी तमंचा और कारतूस खरीद लाया.

दोनों चीजें घर में छिपा दीं. इस के बाद वह मौके की तलाश में लग गया. वह आशा की हत्या इस तरह करना चाहता था कि पुलिस उसे पकड़ न सके, क्योंकि पकड़े जाने पर नौकरी तो जाती ही, पूरी जिंदगी जेल में कटती. दूसरी ओर राजू ने घर जा कर पूरी बात सुनहरीलाल को बताई तो उन्होंने तुरंत आशा को फोन किया. बेटी को आश्वासन देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘अब तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं जल्दी ही आ कर तुम्हें ले आता हूं. उस के बाद राजकुमार के खिलाफ मारपीट और दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करा दूंगा.’’

संयोग से आशा जब पिता सुनहरीलाल से ये बातें कर रही थी, राजकुमार घर आ चुका था. उसे फोन पर बातें करते देख वह दरवाजे की ओट में खड़ा हो कर उस की बातें सुनने लगा. सुनहरीलाल की बातें तो वह नहीं सुन सका, लेकिन आशा की बातों से उसे ससुर के इरादे का पता चल गया कि वह आशा को ले जा कर उस के खिलाफ कानूनी काररवाई करने का मन बना चुके हैं. वह वहीं से बाहर निकल गया तो रात 9 बजे लौटा. तब तक आशा अनंत को सुला चुकी थी. उस ने उठ कर राजकुमार को खाना दिया तो वह खाना खा कर बाहर टहलने चला गया. इस के बाद रात 11 बजे के बाद लौटा तो किसी से फोन पर बातें करते हुए अंदर आया.

उस समय तक आशा सो गई थी. लेकिन उस की बातचीत से आशा जाग गई. राजकुमार को फोन पर हंसहंस कर बातें करते देख वह समझ गई कि बातचीत सुनीता से हो रही है. उसे गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘तुम सुनीता से बातें कर रहे हो न, कल पापा आएंगे, मैं उन के साथ चली जाऊंगी. उस के बाद तुम सुनीता से खूब बातें करना. मन हो तो उसे ला कर साथ रख लेना.’’

राजकुमार ने फोन काट कर कहा, ‘‘क्या, कल तुम सचमुच जा रही हो?’’

‘‘हां, कल पापा आ रहे हैं, मैं उन के साथ जा रही हूं. बहुत जुल्म सह लिया मैं ने, अब सहने की हिम्मत नहीं रह गई है. अब मैं तुम से छुटकारा चाहती हूं.’’

‘‘तुम्हें मैं इतनी आसानी से नहीं छोड़ सकता.’’ राजकुमार ने कहा और अलमारी में रखा तमंचा निकाल लिया. राजकुमार के हाथ में तमंचा देख कर आशा डर गई. वह चीखती, उस के पहले ही राजकुमार ने गोली चला दी. शायद उस ने आशा को मारने की पहले से ही तैयारी कर रखी थी, क्योंकि तमंचे में उस ने पहले से गोली भर रखी थी. गोली लगने से जहां आशा पलंग पर ढेर हो गई, वहीं उस की आवाज सुन कर अगलबगल रहने वाले जाग गए. गोली चलाने के साथ राजकुमार चिल्लाने लगा था, ‘बचाओ… बचाओ…बदमाश आ गए.’

पड़ोस में रहने वाले उमेश और कप्तान सिंह राजकुमार के घर पहुंचे तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. वे दरवाजा खुलवा कर अंदर आए तो देखा पलंग पर खून से लथपथ आशा की लाश पड़ी थी. राजकुमार बेटे को गोद में लिए रो रहा था और कह रहा था, ‘‘बदमाश आए थे. वे आशा को गोली मार कर चले गए.’’

पड़ोसियों ने देखा था कि दरवाजा अंदर से बंद था, खिड़की भी बंद थी. फिर बदमाश घर के अंदर कैसे घुसे? अगर आ ही गए तो उन्होंने आशा को ही क्यों गोली मारी? जबकि बदमाश अकसर गोली घर के मर्द को मारते हैं. पड़ोसियों ने कोतवाली सकीट पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी दिनेश कुमार दुबे और सीओ अंबेशचंद्र त्यागी पुलिस बल के साथ विकास खंड परिसर में आ पहुंचे. घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने राजकुमार से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कुछ बदमाश घर में घुस आए और आशा को गोली मार दी. गोली क्यों मारी, यह पूछने पर वह कोई जवाब नहीं दे सका.

पुलिस को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. क्योंकि एक तो खिड़की-दरवाजा अंदर से बंद था, दूसरे बदमाशों ने उसे क्यों छोड़ दिया था, बदमाश मारते तो पहले उसे ही मारते. सीओ अंबेशचंद्र त्यागी ने देखा कि राजकुमार पलंग के इर्दगिर्द नाच रहा है. उन्होंने काररवाई करवा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. इस के बाद पुलिसकर्मियों को बारीकी से तलाशी लेने को कहा. लूटपाट का कोई निशान पहले ही नहीं नजर आ रहा था. लूटपाट हुई भी नहीं थी. तलाशी के दौरान पलंग पर बिछे गद्दे को पलटा गया तो वहां तमंचा मिल गया, जिस से राजकुमार ने आशा की हत्या की थी.

पुलिस ने जब उस से उस तमंचे के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि इसे उस ने अपनी सुरक्षा के लिए रखा था. लेकिन जब पुलिस ने उस की नाल चैक की तो पता चला कि उस से गोली चलाई गई थी. पुलिस ने आशा के घर वालों को उस की हत्या की सूचना दे दी और राजकुमार को ले कर कोतवाली आ गई. सूचना पाते ही सुनहरीलाल बेटे राजू के साथ सुबह ही कोतवाली सकीट पहुंच गया. बापबेटे ने पूरी बात पुलिस अधिकारियों को बताई तो साफ हो गया कि आशा की हत्या राजकुमार ने ही की थी.

7 अक्तूबर, 2014 को सुनहरीलाल की ओर से आशा की हत्या का मुकदमा राजकुमार के खिलाफ दर्ज कर के पूछताछ की गई तो उस ने हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. हथियार पुलिस ने पहले ही बरामद कर लिया था. सारी काररवाई निपटा कर उसी दिन राजकुमार को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affair : देह सुख के लिए

Extramarital Affair : संजय और कंचन की गृहस्थी बढि़या चल रही थी. दोनों 2 प्यारेप्यारे बच्चों के मांबाप भी थे. इस के बावजूद संजय में ऐसा क्या बदलाव आ गया कि कंचन को पड़ोसी मनीष ज्यादा भाने लगा.15  दिसंबर, 2014 की सुबह करीब 10 बजे थाना बरौर के थानाप्रभारी संजय कुमार अपने कक्ष में बीती रात पकड़े गए 2 अपराधियों से पूछताछ कर रहे थे कि तभी एक अधेड़ उन के पास आया. थानाप्रभारी ने एक सरसरी नजर उस पर डाली. वह बेहद घबराया हुआ लग रहा था. उन्होंने पूछा, ‘‘कहां से आए हो? क्या काम है?’’

‘‘साब, मैं बसहरा गांव से आया हूं. मेरा नाम गोपीचंद है. बीती रात हमारे भतीजे संजय की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ थानाप्रभारी संजय कुमार ने गोपीचंद्र के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए पूछा.

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि उसे कोई बीमारी नहीं थी. देर शाम तक वह मुझ से बतियाता रहा था, उस के बाद घर जा कर सो गया था. मुझे सुबह जानकारी मिली कि उस की मौत हो गई है. मुझे शक है कि उस की मौत स्वाभाविक नहीं है, मुझे लगता है उस की हत्या की गई है.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’

‘‘जी साब,’’

‘‘किस पर?’’

‘‘साब, यकीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन मुझे बहू कंचन पर शक है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘मुझे कंचन पर इसलिए शक है, क्योंकि पड़ोस का एक लड़का मनीष उस के यहां आता रहता है. उसे ले कर संजय और कंचन के बीच अकसर झगड़ा होता रहता था. इसीलिए मैं यह बात कह रहा हूं.’’

गोपीचंद की बात सुन कर थानाप्रभारी संजय कुमार सबइंसपेक्टर आर.के. शुक्ला, कांस्टेबल अमर सिंह, शिवप्रताप तथा नीलेश कुमार को साथ ले कर बसहरा गांव की तरफ रवाना हो गए. बसहरा गांव थाने से 5 किलोमीटर दूर औरैया रोड पर है. इसलिए 10-15 मिनट में वह वहां पहुंच गए. गोपीचंद थानाप्रभारी को उस कमरे में ले गया, जहां उस के भतीजे संजय की लाश पड़ी थी. पुलिस को देख कर एक औरत छाती पीटपीट कर रोने लगी. पता चला कि वह मृतक की पत्नी कंचन थी. वहां गांव के और लोग भी मौजूद थे. थानाप्रभारी ने लाश की जांच की तो उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नजर नहीं आया. गले में खरोंच का निशान तथा हलकी सूजन जरूर थी.

मरने वाले की उम्र यही कोई 35 साल के आसपास थी. जामा तलाशी में उस की पैंट की जेब से 70 रुपए, पान मसाला के 2 पाउच तथा एक डायरी मिली, जिस में घरगृहस्थी का हिसाब तथा कुछ नातेरिश्तेदारों के नामपते लिखे थे. निरीक्षण के बाद थानाप्रभारी ने मृतक संजय के शव का पंचनामा भरा और सीलमोहर कर के माती स्थित पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. मृतक की पत्नी कंचन का रोनाधोना अब तक बंद हो गया था. थानाप्रभारी ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का पति संजय देर रात घर आया और खाना खा कर कमरे में सो गया. सुबह जब वह 8 बजे तक नहीं उठा तो वह उस के कमरे में गई. रजाई हटा कर देखा तो उस की धड़कनें बंद थीं.

वह घबरा गई और जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगी. उस की आवाज सुन कर पासपड़ोस के लोग आ गए.

‘‘क्या तुम बता सकती हो कि संजय की मौत कैसे हुई होगी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘क्या संजय नशा भी करता था?’’

‘‘सर, वह शराब, गांजा, अफीम जैसी नशीली चीजों का सेवन करते थे. उन की मौत या तो हार्टअटैक से हुई है या फिर ज्यादा नशा करने से.’’ कंचन ने जवाब में कहा. कंचन से पूछताछ के बाद थानाप्रभारी को उस पर शक हुआ, क्योंकि जैसा दुख पति की मौत पर एक जवान औरत के चेहरे पर झलकना चाहिए, वैसा कंचन के चेहरे पर नहीं था. रोनेधोने का भी उस ने नाटक ही किया था, आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे. पुलिस और मौजूद लोगों की गतिविधियों पर भी वह विशेष नजर रख रही थी. चचिया ससुर गोपीचंद को वह नफरत से घूर रही थी. चूंकि कंचन के खिलाफ उन के पास कोई सुबूत नहीं था, इसलिए उन्होंने उसे गिरफ्तार नहीं किया.

अगले दिन थानाप्रभारी को संजय की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो रिपोर्ट पढ़ कर वह चौंके. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि उस की मौत गला कसने से हुई थी. उस ने शराब नहीं पी थी और उस ने मृत्यु से पूर्व खाना भी नहीं खाया था. हत्या की पुष्टि होने पर थानाप्रभारी ने कंचन को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. महिला दरोगा सरला यादव ने कंचन से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने पति की हत्या की सारी सच्चाई बयां कर दी. उस ने बताया कि पति की हत्या उस ने अपने प्रेमी मनीष के साथ मिल कर की थी. हत्या में मनीष का नाम आने पर पुलिस ने उस के घर पर दबिश दी, लेकिन वह फरार हो गया था. तब पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बनाया.

घर वालों के सहयोग से पुलिस ने मनीष को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. दोनों अभियुक्तों से की गई पूछताछ में एक ऐसी नारी की कहानी सामने आई, जिस ने देहसुख के लिए अपने पति की आहुति दे दी थी. उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जनपद के पुखरायां कस्बे में रामगोपाल अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां और 2 बेटे थे. कंचन उसी की छोटी बेटी थी. रामगोपाल की कस्बे में ही लकड़ी की टाल थी. उसी की कमाई से पूरे परिवार का भरणपोषण होता था. कंचन ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस के रूपरंग में और निखार आ गया. रामगोपाल दोनों बड़ी बेटियों की शादी कर चुका था.

छोटी बेटी कंचन के जवान होने पर उसे उस के विवाह की चिंता सताने लगी थी. वह उस के लिए योग्य वर खोजने लगा. काफी भागदौड़ के बाद रामगोपाल को कंचन के लिए संजय पसंद आ गया. संजय कानपुर देहात के ही बरौर बसहरा गांव के रहने वाले रामचंद्र का बेटा था. वह अपनी खेतीकिसानी करता था. रीतिरिवाज से कंचन का विवाह संजय के साथ कर दिया गया. संजय सीधासादा था, जबकि कंचन तेजतर्रार व चंचल स्वभाव की थी. वह न तो अपने ससुर से परदा करती थी और न ही चचिया ससुर से. गांव में भी वह हमेशा बनसंवर कर रहती थी. कंचन की ये आदतें उस की सास को अच्छी नहीं लगती थीं.

कंचन को ससुराल में रहते 2 साल भी नहीं बीते थे कि चचिया सास लक्ष्मी से उस का मनमुटाव हो गया. गोपीचंद्र उस समय अपने बड़े भाई रामचंद्र के साथ संयुक्त परिवार में रहता था. कंचन और लक्ष्मी में जब रोजरोज झगड़ा होने लगा तो लक्ष्मी अपने पति गोपीचंद के साथ अलग रहने लगी. इस के बाद जमीन तथा मकान का भी बंटवारा हो गया. रामचंद्र नहीं चाहता था कि उस का भाई उस से अलग रहे. इस बंटवारे से वह इतना दुखी हुआ कि घर छोड़ कर चला गया और संन्यासी बन गया. उस के घर छोड़ने के एक साल के अंदर ही उस की पत्नी की भी मौत हो गई. अब घर में कंचन और उस का पति संजय ही रह गया. कंचन को अब कोई रोकनेटोकने वाला तो था नहीं, इसलिए वह पूरी तरह स्वच्छंद हो गई.

कुछ समय यूं ही बीत चला. इस दरम्यान कंचन 2 बार गर्भवती हुई. पर किसी वजह से उस का दोनों ही बार गर्भ गिर गया. कंचन को लगा कि कोई व्याधा उस का गर्भ गिरा देती है. अत: वह तांत्रिकों के पास जाने लगी. उन के पास जाने के बाद कंचन ने 2 बच्चों के जन्म दिया, जिन में एक बेटा और एक बेटी हुई. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी कंचन के शरीर में कसाव था, ऊपर से वह बनसंवर कर रहती थी. वह चाहती थी कि पति उसे बहुत प्यार करे, लेकिन संजय उस की भावना को नहीं समझता था. वह दिन भर खेतीबाड़ी के काम से थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर जल्द ही सो जाता. पति की बेरुखी से कंचन ने देहरी लांघने का फैसला कर लिया. अब उस का मन आसपास रहने वाले ऐसे मर्द की तलाश करने लगा, जो उसे भरपूर प्यार दे सके.

उसी समय उस का ध्यान पड़ोस में रहने वाले 24-25 वर्षीय मनीष की तरफ गया. पढ़नेलिखने में तेज मनीष बीए पास कर चुका था और सरकारी नौकरी पाने की कोशिश में लगा था. वह अकसर उस के यहां आताजाता भी रहता था. वह उसे भाभी कहता था. इस नाते दोनों के बीच हलकाफुलका मजाक भी होता रहता था. मनीष, कंचन से 8-10 साल छोटा जरूर था, लेकिन उस का गठीला बदन कंचन को भा गया था. धीरेधीरे कंचन ने उस पर अपने रूप का जादू चलाना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में मनीष को उस ने अपने रूप और बातों के जाल में फांस लिया. मनीष भी इतना नासमझ नहीं था, जो कंचन के हावभाव का मतलब न समझता. दोनों ही धीरेधीरे अपनी हदें लांघने लगे और एक दिन ऐसा भी आ गया, जब उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. अपने से छोटे युवक का प्यार पा कर कंचन फूली नहीं समा रही थी.

इस के बाद एक साल तक उन का यह खेल बेरोकटोक चलता रहा. संजय को इन संबंधों की भनक तक नहीं लगी. वह रोज सुबह खेतों पर निकल जाता और अंधेरा होने पर घर लौटता. उसे क्या पता था कि पत्नी क्या गुल खिला रही है. लेकिन मनीष का जब कंचन के यहां आनाजाना ज्यादा बढ़ गया तो पासपड़ोस की औरतों तथा चचिया सास लक्ष्मी को उन दोनों के रिश्तों पर शक होने लगा. बाद में संजय को पत्नी के संबंधों की जानकारी हुई तो उसे बड़ा दुख हुआ. सच्चाई अपनी आंखों से देखने के लिए संजय अब कंचन व मनीष पर नजर रखने लगा. एक दिन उस ने दोनों को अपने यहां रंगेहाथ पकड़ लिया. पति को सामने देख कर कंचन घबरा गई. मनीष तो सिर पर पैर रख कर भाग गया.

संजय का सारा गुस्सा कंचन पर फूटा. उस ने उस की खूब पिटाई की. तब कंचन ने माफी मांगते हुए वादा किया कि अब वह मनीष से कभी नहीं मिलेगी. लेकिन कहते हैं कि औरत एक बार बहक जाए तो उस का संभलना मुश्किल होता है. कंचन अपने जेहन से मनीष की यादों को निकाल नहीं पा रही थी. बहरहाल उस ने मनीष से मिलनाजुलना फिर से शुरू कर दिया. लेकिन अब वह पहले से ज्यादा सावधानी बरतने लगी थी. कंचन भले ही पति की नजरों से बच कर रंगरलियां मना रही थी, लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों को वह कैसे धोखा दे सकती थी. यानी मोहल्ले में कंचन और मनीष के संबंधों को ले कर फिर चर्चाएं होने लगीं.

पत्नी की बदचलनी के कारण संजय का गांव में सिर उठा कर चलना दूभर हो गया था. लोग उस पर फब्तियां कसने लगे थे. जिस से वह तिलमिला उठता था. घर आ कर वह सारा गुस्सा कंचन पर उतारता था.  घर में रोजरोज की कलह से तंग आ कर संजय शराब पीने लगा. जिस दिन शराब नहीं मिलती, उस दिन वह चरस, गांजा आदि पीता. इस नशाखोरी के कारण संजय की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई. नशा के लिए उस ने कंचन के गहने तक बेच डाले. कंचन विरोध करती तो वह उसे जलील करता और पीट देता. पति की पिटाई से कंचन परेशान रहने लगी. कलह के कारण उस ने दोनों बच्चों को अपने मायके भेज दिया.

पिटाई के बावजूद कंचन अपने प्रेमी मनीष को नहीं भुला पाई. एक रोज वह मनीष से बोली, ‘‘मनीष, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती. अब मुझे हमेशा के लिए तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘संजय भैया के रहते यह संभव नहीं है. वह हम दोनों के मिलन में दीवार बने हैं.’’

‘‘तो उस दीवार को ढहा क्यों नहीं देते. वैसे भी नशेड़ीगंजेड़ी पति से मैं नफरत करती हूं. कंचन ने अपनी मंशा जाहिर की.’’

‘‘तो ठीक है, जिस दिन मौका मिलेगा, उस दिन यह काम कर दूंगा.’’ मनीष ने वादा किया.

14 दिसंबर, 2014 की रात गांव के प्रधान नरेश पांडेय के घर कीर्तन का आयोजन था. संजय भी कीर्तन सुनने वहां गया था. कंचन को उम्मीद थी कि वह अब आधी रात से पहले घर नहीं लौटेगा. इसलिए मौका देख कर उस ने मनीष को फोन कर के अपने यहां बुला लिया. इस के बाद दोनों जिस्म का खेल खेलने में व्यस्त हो गए. संजय का मन कीर्तन में नहीं लगा तो वह घर की ओर चल पड़ा. रास्ते में उसे चाचा गोपीचंद्र मिल गए. वह उन से कुछ देर बतियाता रहा, फिर घर पहुंचा. उस ने घर की कुंडी खटखटाई, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. संजय ने सोचा कि शायद कंचन सो गई होगी. अत: वह पिछवाड़े की दीवार फांद कर घर में दाखिल हुआ. दबे पांव वह कमरे में पहुंचा तो वहां का दृश्य देख कर उस का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस की पत्नी और मनीष आपत्तिजनक स्थिति में थे.

संजय को देखते ही वे दोनों उठ गए और कपड़े पहनने लगे. लेकिन दोनों ही बेहद घबरा रहे थे. संजय ने गुस्से में कंचन के गाल पर 2-3 थप्पड़ जड़ दिए. इस के बाद वह मनीष से भिड़ गया. मनीष ने उसे धक्का दिया तो वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. उसी समय कंचन ने प्रेमी को उकसाया, ‘‘देखते क्या हो मनीष, आज इस बाधा को दूर ही कर दो. आखिर मैं कब तक इस के जुल्म सहती रहूंगी.’’

यह सुनते ही मनीष संजय की छाती पर सवार हो गया और दोनों हाथों से उस का गला दबाने लगा. संजय हाथपैर पटकने लगा तो कंचन ने उस के पैर दबोच लिए. कुछ ही देर में संजय की सांसें थम गईं. हत्या करने के बाद दोनों ने कमरा दुरुस्त किया और संजय की लाश को चारपाई पर लिटा कर रजाई से ढंक दिया. मनीष व कंचन संजय के शव को गांव के बाहर झाडि़यों में फेंकना चाहते थे, लेकिन गांव में कीर्तन होने के कारण चहलपहल थी, इसलिए वे हिम्मत नहीं जुटा सके. मनीष तो रात के अंतिम पहर में वहां से फरार हो गया और कंचन सवेरा होते ही त्रियाचरित्र का नाटक कर रोनेचीखने लगी.

उस की चीखपुकार सुन कर पासपड़ोस के लोग आ गए. उन सब को कंचन ने बताया कि पता नहीं कैसे रात में संजय की मौत हो गई. गोपीचंद को जब भतीजे संजय की मौत का पता चला तो उन्हें शक हुआ. अत: वह रिपोर्ट दर्ज कराने थाना बरौर पहुंच गए. पुलिस ने मनीष और कंचन को संजय की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी. Extramarital Affair

—कथा पुलिस सूत्रो

Bareilly News : बॉयफ्रेंड बना काल

Bareilly News : इमरान प्रियांगी उर्फ प्रिया को प्यार ही नहीं करता था, बल्कि धर्मांतरण करा कर उस से शादी करना चाहता था. इतना गहरा प्रेम होने के बावजूद दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि इमरान को प्रियांगी उर्फ प्रिया के खून से हाथ रंगने पड़े. बरेली के थाना प्रेमनगर की शास्त्रीनगर कालोनी के रहने वाले राजेश गंगवार थे तो इंजीनियर, लेकिन जब उन्हें नौकरी रास नहीं आई तो वह समाजसेवा में जुट गए. दिल्ली के चर्चित निर्भया सामूहिक दुष्कर्म कांड के विरोध में 17 दिनों तक चले आंदोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया था. उन के परिवार में पत्नी पुष्पा के अलावा 2 बच्चे थे, बेटी प्रियांगी उर्फ प्रिया और बेटा प्रियांश.

प्रिया बीटेक करने के बाद मेरठ के साईं कालेज से बीएड कर रही थी, जबकि बेटा प्रियांश एनआईटी, कालीकट, केरल से बीटेक कर रहा था. नवंबर, 2014 के पहले हफ्ते में प्रिया अपने घर बरेली आई थी. उसे आंखों में तकलीफ थी, इसलिए 5 नवंबर की दोपहर को 2 बजे वह अपनी स्कूटी से डा. भृमरेश शर्मा के आई क्लीनिक जाने के लिए घर से निकली. उन का क्लीनिक धर्मकांटा के पास था. प्रिया को घर से निकले एक घंटे से ज्यादा हो गया था. अब तक उसे घर लौट आना चाहिए था, लेकिन जब वह घर नहीं लौटी तो पिता राजेश ने उसे फोन किया. फोन बंद था, इसलिए बात नहीं हो सकी. प्रिया कभी फोन बंद नहीं करती थी, इसलिए राजेश को थोड़ी चिंता हुई.

थोड़ीथोड़ी देर में वह बेटी को फोन करते रहे, लेकिन हर बार फोन बंद मिला. जब प्रिया का फोन नहीं मिला तो वह डा. भृमरेश शर्मा के क्लीनिक जा पहुंचे. वहां पता चला कि प्रिया ढाई बजे के करीब दवा ले कर चली गई थी. दवा ले कर प्रिया को घर जाना चाहिए था. घर जाने के बजाय बिना बताए वह कहां चली गई? इस बात को ले कर राजेश गंगवार परेशान हो उठे. घर आ कर उन्होंने यह बात पत्नी को बताई तो वह भी परेशान हो गईं. संभावित जगहों पर उन्होंने उस की तलाश शुरू की, लेकिन कहीं भी उस का पता नहीं चला. बेटी को ढूंढ़तेढूंढ़ते काफी रात हो गई तो वह घर आ गए.

जवान लड़कियों के गायब होने पर पहले यही सोचा जाता है कि कहीं वह अपने प्रेमी के साथ भाग तो नहीं गईं? लेकिन राजेश और पुष्पा की नजरों में प्रिया ऐसी लड़की नहीं थी. वह उन से कोई बात नहीं छिपाती थी. इसलिए उन्हें उस के किसी के साथ भाग जाने की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. उन्हें लग रहा था कि जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घट गई है. बेटी की चिंता में रात भर पतिपत्नी को नींद नहीं आई.  सुबह होते ही राजेश गंगवार ने फिर बेटी की तलाश शुरू कर दी. प्रिया की एक सहेली थी शालिनी, जो डीडीपुरम में रहती थी. उस ने और प्रिया ने साथसाथ बीटेक किया था. जब उसे प्रिया के गायब होने की जानकारी हुई तो वह उस के घर आ पहुंची.

उस ने प्रिया की मां पुष्पा को बताया कि कल दोपहर को वह प्रिया के साथ राजेंद्रनगर स्थित इमरान के औफिस गई थी. प्रिया और इमरान में किसी बात को ले कर जोरजोर से झगड़ा होने लगा तो उन्हें झगड़ते देख वहां से अपने घर चली गई थी. घर आने के बाद देर रात को इमरान ने उसे फोन कर के धमकाया था कि अगर उस ने प्रिया के साथ उस के औफिस आने वाली बात किसी को बताई तो उस के लिए अच्छा नहीं होगा. इस से वह तो फंसेगा ही, साथ ही वह भी फंस जाएगी. पुष्पा ने यह बात पति को बताई. राजेश गंगवार इमरान को जानते थे. पत्नी की बात सुन कर राजेश को इमरान पर शक हुआ. वह तुरंत थाना प्रेमनगर पहुंचे और इंसपेक्टर अशोक सिंह को पूरी बताई.

उन्होंने सीबीगंज थाना क्षेत्र के तिलियापुर गांव के रहने वाले इमरान पर बेटी के गायब करने का शक जताया था. उन के इसी शक के आधार पर थानाप्रभारी अशोक सिंह ने प्रियांगी उर्फ प्रिया की गुमशुदगी दर्ज कर ली थी. प्रिया की गुमशुदगी दर्ज किए 3 दिन बीत गए, लेकिन थाना प्रेमनगर पुलिस ने इमरान को पूछताछ तक के लिए थाने नहीं बुलाया. इस के बाद 10 नवंबर को राजेश गंगवार एडीशनल एसपी राजीव मल्होत्रा से मिले. उस समय सीओ (प्रथम) असित श्रीवास्तव भी वहां मौजूद थे. एडीशनल एसपी ने असित श्रीवास्तव से कहा कि तुरंत प्रियांगी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराएं और इस मामले में क्या हो सकता है, इसे देखें.

रिपोर्ट दर्ज करने के लिए सीओ ने राजेश गंगवार को थाने भेज दिया. राजेश गंगवार थाना प्रेमनगर पहुंचे तो इंसपेक्टर अशोक सिंह ने एडीशनल एसपी के आदेश के बावजूद प्रियांगी के अपहरण का मुकदमा दर्ज नहीं किया. हां, इमरान रजा खान को पूछताछ के लिए थाने जरूर बुलवा लिया. उन्होंने उस से प्रियांगी के बारे में पूछा तो वह इधरउधर की बातें करने लगा. लेकिन जब अशोक सिंह ने थोड़ी सख्ती की तो इमरान ने उन्हें जो बताया उस के अनुसार, उस की और प्रिया की दोस्ती करीब 2 साल से थी. 5 नवंबर, 2014 को वह उस के राजेंद्रनगर स्थित स्पीड ग्रुप औफ कंपनीज के औफिस आई थी. औफिस की 3 चाबियां थीं, एक उस के पास रहती थी, दूसरी प्रिया के पास और तीसरी उस के यहां काम करने वाली एक अन्य लड़की अनुपम के पास.

प्रिया के उस पर 6 हजार रुपए निकल रहे थे. उस दिन वह अपने 6 हजार रुपए ले कर चली गई थी. रात साढे़ 8 बजे उस ने प्रिया को फोन किया तो उस ने फोन नहीं उठाया. उसी समय वह औफिस पहुंचा तो वहां प्रिया की लाश पंखे से लटकी मिली. प्रिया को उस हालत में देख कर वह डर गया. पुलिस के लफड़े से बचने के लिए उस ने उस की लाश उतार कर एक बोरी में भरी और उसे ठिकाने लगाने के लिए अपनी बाइक से नैनीताल रोड स्थित बिलवा पुल के आगे सड़क किनारे एक गड्ढे में फेंक आया. अगले दिन वह प्रिया की स्कूटी से वहां गया और फावड़े से लाश पर मिट्टी डाल कर वहां से कुछ दूरी पर उस की स्कूटी खड़ी कर के अपने औफिस आ गया.

इस पूछताछ से पुलिस को पता चल गया था कि प्रिया की मौत हो चुकी है. इसलिए उस की लाश बरामद करने के लिए पुलिस इमरान को उस जगह पर ले गई, जहां उस ने लाश दफन करने की बात बताई थी. राजेश गंगवार की मौजूदगी में इमरान द्वारा बताई जगह पर पुलिस ने खुदाई कराई तो वहां औंधे मुंह बैग में पड़ी एक लड़की की लाश मिली. उसे सीधा किया गया तो वह लाश प्रिया की ही थी. उसे देखते ही राजेश गंगवार रोने लगे. उसे दफनाए कई दिन बीत चुके थे, इसलिए लाश काफी सड़गल गई थी. प्रिया के कपड़े फटे हुए थे. पैरों में चप्पलें थीं, लेकिन उस के गले की सोने की चेन नहीं थी. उस का मोबाइल भी नहीं था और न ही वे 6 हजार रुपए मिले, जो उस ने इमरान से लिए थे.

उस की लाश से कुछ दूरी पर एक खेत में प्रिया की स्कूटी अलगअलग पार्ट्स में खुली मिली. मौके पर जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने प्रिया की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इमरान ने जिस तरह प्रिया की लाश को आननफानन में चोरीछिपे ठिकाने लगाया था, उस से पुलिस को लगा कि यह मामला आत्महत्या का नहीं हो सकता. इसलिए पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो इमरान टूट गया. उस ने बताया कि प्रिया ने सुसाइड नहीं किया था, बल्कि उस ने तिलियापुर के रहने वाले अपने दोस्त गुड्डू के साथ मिल कर उस की हत्या की थी. हत्या की वजह उस ने यह बताई कि अपने पैसे मांगते समय प्रिया ने उसे बेइज्जत किया था.

उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने उसे मार डाला. पूछताछ के बाद पुलिस ने इमरान को 17 नवंबर, 2014 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने आननफानन में इमरान को जेल तो भेज दिया, लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही थी कि अकेला इमरान लाश को मोटरसाइकिल पर रख कर कैसे ले गया था? लाश को ठिकाने लगाने में निश्चित उस के साथ और लोग रहे होंगे. इंसपेक्टर अशोक सिंह ने एक बार फिर इमरान के औफिस से लाश ठिकाने लगाने वाली जगह तक का बारीकी से मुआयना किया.

उस रास्ते में उन्हें कई जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगे दिखाई दिए. उन्होंने उन सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई. एक फुटेज में एक औटो में कुछ युवक बैठे दिखाई दिए. उस औटो को इमरान चला रहा था और उस में एक बड़ा सा बैग भी रखा नजर आ रहा था. औटो में एक लंबा व्यक्ति भी बैठा था. इस के बाद उन्होंने इमरान के फोन नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन भी निकलवाई. इंसपेक्टर अशोक सिंह इस से आगे की जांच करते, उस से पहले उन का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह पर इंसपेक्टर विद्याराम दिवाकर नए थानाप्रभारी आए. जाते समय इंसपेक्टर अशोक सिंह ने विद्याराम दिवाकर को इस मामले की पूरी जानकारी दे दी थी. चार्ज लेने के बाद इंसपेक्टर विद्याराम ने आगे की जांच शुरू की.

समाजसेवी राजेश गंगवार की बेटी की हत्या के विरोध में कई सामाजिक संगठनों के साथ मिल कर शहर वालों ने कैंडिल मार्च निकाला. अन्य अभियुक्तों को जल्द गिरफ्तार कर के उन के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग को ले कर राजेश गंगवार 16 नवंबर से अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठ गए. कई सामाजिक संगठनों ने उन का साथ दिया. 11 दिनों बाद पुलिस प्रशासन की नींद टूटी. जिले के पुलिस अधिकारी 26 नवंबर को उन के पास पहुंचे और उन की मांगे मानते हुए अनशन समाप्त कराया. दूसरी ओर लाश के सड़ जाने की वजह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में प्रिया की मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो सका. दुष्कर्म की आशंका को देखते हुए डाक्टर ने गुप्तांग को प्रिजर्व करने के साथ स्लाइड भी बनवा ली थी.

इस के अलावा उस के विसरा और गले को भी जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेज दिया गया था. हत्या के राज उगलवाने, प्रिया का सामान बरामद करने और अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए इमरान से पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए इंसपेक्टर विद्याराम ने 25 नवंबर को अदालत में प्रार्थनापत्र दे कर इमरान को 36 घंटे के पुलिस रिमांड पर देने की अपील की. अदालत ने उन की अर्जी को मंजूर करते हुए इमरान को 36 घंटे के लिए पुलिस रिमांड पर दे दिया.

पुलिस ने इमरान को उस से औटो में रखे बडे़ बैग के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस बैग में प्रिया की लाश थी. उस ने कहा कि गुड्डू ने केवल हत्या करने में उस की मदद की थी, जबकि लाश ठिकाने लगाने में उस का भाई सलमान और भांजा मोहम्मद अहमद औटो में उस के साथ थे. उस ने बताया कि प्रिया की सोने की चेन उस की स्कूटी के पार्ट्स के पास ही फेंक दी थी. पुलिस ने इमरान की निशानदेही पर बिलवा पुल के पास स्थित वीरपुर उर्फ कासिमपुर गांव के पास हनीफ के खेत से प्रिया की चेन और स्कूटी के खुले हुए पार्ट्स बरामद कर लिए थे.

रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने इमरान को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने अन्य आरोपियों की तलाश शुरू कर दी. मुखबिर की सूचना पर 27 नवंबर को इमरान के दोस्त गुड्डू को मिली बाईपास से गिरफ्तार कर लिया था. अगले दिन इमरान का भाई सलमान भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ के बाद उन्हें भी न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इमरान से हुई पूछताछ व केस की तफ्तीश के बाद जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. इमरान रजा खान बिलकुल अपने पिता बुंदन खान के नक्शे कदम पर चल रहा था. बुंदन खान भी एक वहशी दरिंदा था. बुंदन ने 1980 में पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ का चुनाव लड़ा था. हाथ उठा कर मतदान कराने के दौरान तब उस के क्लास की 6 लड़कियों ने उसे वोट नहीं दिया था.

इस से बौखलाए बुंदन ने उन से बदला लेने के लिए साजिश रची और चुनाव के कुछ दिनों बाद सभी लड़कियों के साथ क्लास में ही हैवानियत की. उन लड़कियों की हालत बिगड़ गई. कमरा बंद करने पहुंचे चौकीदार ने उन की हालत देख कर कालेज प्रबंधन को इस घटना की सूचना दी. मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को बुलाया गया. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने सभी पीडि़त लड़कियों को अस्पताल पहुंचाया. घटना की खबर फैलते ही पूरे शहर में बवाल मच गया. उस समय शांति की अपील के लिए खुद मदर टेरेसा बरेली आई थीं. उस के बाद ही शहर का माहौल सामान्य हुआ था. बुंदन खान पर पहले से ही दुष्कर्म आदि के दरजन भर से अधिक मुकदमे चल रहे थे.

पुलिस ने इस मामले में बुंदन खान को गिरफ्तार कर के उस पर गुंडा ऐक्ट तथा गैंगस्टर लगाने के साथ उस की हिस्ट्रीशीट खोल दी थी. कई वर्षों बाद जब वह जेल से जमानत पर बाहर आया तो जुर्म की दुनिया में उस के कदम दलदल की तरह धंसते गए. 2 हत्याओं के अलावा उस पर 22 दुष्कर्म के मुकदमे दर्ज हुए थे. उस की मौत होने के बाद उस के मुकदमों की फाइल अपने आप बंद हो गई थी. अपनी आपराधिक वारदातों से चर्चित रहे बुंदन खान का बेटा इमरान भी अपने पिता की ही तरह अपराधों में लिप्त रहा. उस पर भी 3 दुष्कर्म और एक हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था.  4 भाइयों में तीसरे नंबर का इमरान शातिर दिमाग था. पिता की ही तरह उस का दिमाग भी अच्छे कामों के बजाय गलत कामों में ज्यादा चलता था. वह गलत कामों से पैसा कमाने में लग गया.

उस ने दिल्ली जा कर एक फाइनेंस कंपनी खोली और प्रौपर्टी ब्रोकर का भी काम करने लगा. फाइनेंस कंपनी के नाम पर वह लोगों को ठगने लगा. औफिस में काम करने वाली एक युवती की हत्या में वह फंस गया तो दिल्ली से भाग कर बरेली आ गया. इस के बाद उस ने उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी और चंपावत में रियल एस्टेट कंपनी के औफिस खोले और लोगों को ठगना शुरू कर दिया. मौजमस्ती करने के लिए वह अपने औफिस में केवल लड़कियों को ही नौकरी पर रखता था. उस के औफिस में अर्शी उर्फ रूबी नाम की एक लड़की काम करती थी. वह बेहद खूबसूरत थी.

वह अर्शी की खूबसूरती और अदाओं के जाल में उलझ गया. इमरान लड़कियों से अपने संबंध मौजमस्ती तक ही सीमित रखता था, लेकिन अर्शी को देख कर उस ने उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने का फैसला किया. जल्द ही उस ने अर्शी को प्यार के जाल में फांस लिया. उन का प्यार अमरबेल की तरह बढ़ता गया. अर्शी के मांबाप को पता चला तो उन्होंने उसे समझाया, लेकिन वह नहीं मानी. अर्शी के मांबाप का दबाव बढ़ने पर इमरान अर्शी को ले कर बरेली आ गया और उस से निकाह कर लिया. यह 6 साल पहले की बात है. बाद में अर्शी ने एक बेटे और एक बेटी को जन्म दिया.

बरेली आने के बाद इमरान ने इज्जतनगर क्षेत्र में स्पीड स्काई रियल एस्टेट इंडिया लिमिटेड और बी.के. जनसेवा समिति के नाम से औफिस खोल कर अपना गोरखधंधा शुरू किया. वह लोगों से हर महीने 1,600 रुपए जमा करा कर प्लाट देने का वादा करता था. इस के अलावा वह रुहेलखंड ऐक्शन फ्रंट नाम से एक संस्था चलाता था. इस के जरिए वह सरकारी सस्ते गल्ले के डीलरों और प्रधानों की शिकायतें करता था और बाद में उन्हें ब्लैकमेल करता था. उस का यह धंधा खूब फलफूल रहा था.

2010 में इमरान ने पुराना औफिस बंद कर के बरेली की पौश कालोनी राजेंद्रनगर में नया औफिस स्पीड ग्रुप औफ कंपनीज के नाम से खोला. यह औफिस उस ने एक्सिस कोचिंग चलाने वाले डब्ल्यू.एच. सिद्दीकी की कोठी का पिछला हिस्सा किराए पर ले कर खोला था. स्टाफ की नियुक्ति के लिए उस ने कई अखबारों में विज्ञापन दिए थे. इसी विज्ञापन को देख कर प्रियांगी उर्फ प्रिया इमरान से उस के औफिस में मिली थी. इमरान ने उसे औफिस में कंप्यूटर औपरेटर के पद पर रख लिया था.

औफिस में काम के दौरान ही इमरान और प्रिया में अच्छी दोस्ती हो गई. इमरान उस का पूरा ध्यान रखता था. उसे अपने साथ घुमाने ले जाता. दोनों एकदूसरे से काफी घुलमिल गए. धीरेधीरे उन के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों एकदूसरे के प्यार में डूब गए. उसी दौरान प्रिया बीएड करने मेरठ चली गई. वहां के हौस्टल में रह कर वह साईं कालेज से बीएड करने लगी. भले ही वह इमरान से दूर जा चुकी थी, लेकिन इमरान उस के दिल में बसा था. हफ्ते, 2 हफ्ते में जब भी उसे बरेली अपने घर आना होता तो इमरान ही उसे मेरठ लेने जाता था और मेरठ छोड़ने भी उस के साथ जाता था. वह प्रिया के ऊपर काफी पैसे खर्च कर रहा था. अचानक जरूरत पड़ने पर वह प्रिया से पैसे उधार भी ले लेता था.

जब इमरान की इस प्रेम कहानी का पता उस की पत्नी अर्शी को चला तो वह परेशान हो उठी. अर्शी को रोज डायरी लिखने का शौक था. उस ने डायरी में इमरान और अर्शी के प्रेमसंबंधों का जिक्र कर के अपनी जिंदगी तबाह होने का अंदेशा व्यक्त किया था. क्योंकि उस के मांबाप का देहांत हो चुका था. उन के बाद इमरान ही उस का सब कुछ था. ऐसे में अगर इमरान उस से दूर चला गया तो उस की जिंदगी बर्बाद हो जाती. इमरान ने प्रिया के धर्मांतरण के लिए नवंबर, 2013 में कुछ मौलवियों से बात भी की थी. उस का धर्म बदलवा कर वह उस से निकाह करना चाहता था. इस बात का अर्शी को पता लग गया था. उस ने डायरी में 20 नवंबर, 2013 के पेज पर इस बात का जिक्र भी किया था. करीब 2 महीने पहले प्रिया को जानकारी मिली कि इमरान के अन्य लड़कियों से भी संबंध हैं.

सच्चाई का पता लगाने के लिए उस ने अपने स्तर से छानबीन की तो उसे पता चला कि इमरान के सचमुच अनेक लड़कियों से अवैधसंबंध हैं. हकीकत पता चलने पर प्रिया को अपने आप पर खीझ होने लगी कि उस ने ऐसे गंदे इंसान से प्यार क्यों किया. इस के बाद प्रिया ने तय कर लिया कि वह इमरान से कोई संबंध नहीं रखेगी. उस ने उस से दूरी भी बनानी शुरू कर दी. उस ने इमरान को 6 हजार रुपए उधार दे रखे थे. उस ने कई बार उस से अपने पैसों का तकादा किया, लेकिन कोई न कोई बहाना बना कर इमरान उसे टालता रहा. अब वह मेरठ से जब भी घर आती, अकेली ही आती और अकेली ही जाती थी. प्रिया में आए इस बदलाव को इमरान समझ नहीं पाया. वह उस से बात करने की कोशिश करता तो प्रिया उसे कोई महत्त्व नहीं देती.

प्रिया जब भी मेरठ से बरेली आती, इमरान से अपने पैसे मांगने उस के औफिस पहुंच जाती और उस से झगड़ा करने लगती. एक बार तो उस ने इमरान को स्टाफ के सामने ही थप्पड़ मार दिया था, जिस से इमरान को काफी बेइज्जती महसूस हुई थी. प्रिया के रोजरोज के झगड़ों से वह काफी तंग आ चुका था. 5 नवंबर, 2014 को प्रिया अपनी आंखों की दवा लेने के लिए स्कूटी से धर्मकांटा के पास स्थित डा. भृमरेश शर्मा के क्लीनिक पर पहुंची. वहां से दवा ले कर वह अपनी सहेली शालिनी से मिली और उस से कहा कि वह आज अपने पैसे इमरान से ले कर ही आएगी.

शालिनी को साथ ले कर वह इमरान के औफिस पहुंच गई. वहां इमरान और प्रिया में पैसों को ले कर झगड़ा होने लगा. उन का झगड़ा खत्म न होता देख लगभग 25 मिनट बाद शालिनी वहां से चली गई. प्रिया ने गुस्से में औफिस में चीखना शुरू कर दिया. इमरान उसे समझाने की कोशिश करते हुए औफिस से सटे कमरे में ले गया. उसी कमरे में इमरान लड़कियों के साथ मौजमस्ती करता था. कमरे में उस समय उसी के गांव का रहने वाला उस का दोस्त गुड्डू भी था. कमरे में इमरान ने प्रिया के मुंह पर हाथ रख कर उसे चुप कराने की कोशिश की. वह नहीं मानी तो उस ने बगल में खड़े गुड्डू को इशारा किया.

इस के बाद दोनों ने प्रिया की नाक व मुंह दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उस के गले में पड़ी सोने की चेन, मोबाइल फोन और रुपए निकाल लिए. इमरान ने गुड्डू की मदद से प्रिया की लाश को एक क्रिकेट बैग में भरा और उसे वहीं छोड़ कर औफिस बंद कर के चला गया. वहां से गुड्डू के साथ सीधे अपने गांव तिलियापुर पहुंचा. गांव पहुंचते ही गुड्डू इमरान को छोड़ कर चला गया. इमरान ने उसे बुलाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह वापस नहीं आया. लाश ठिकाने लगाने के लिए इमरान को एक आदमी की जरूरत थी. उस ने गांव के ही बबलू से कहा कि वह उसे बरेली जंक्शन पर छोड़ आए. बबलू उस के साथ स्टेशन तक गया. वहां से इमरान किसी बहाने उसे अपने औफिस ले गया.

जिस बैग में प्रिया की लाश रखी थी, वह बैग उठाने में उस ने बबलू से मदद करने को कहा. बबलू को पता नहीं था कि बैग में क्या है. उस ने बैग उठाना चाहा तो वह बहुत भारी लगा. उसे शक हो गया. उस ने बैग खोल कर देखा तो उस में लाश रखी थी. लाश देख कर वह डर के मारे भाग गया. इमरान ने उसे दौड़ कर पकड़ने की कोशिश भी की, लेकिन वह पकड़ में नहीं आया. इमरान लाश को ठिकाने लगाने के लिए काफी परेशान था. वह अपने गांव आ गया और गांव के ही आजाद का औटो रेलवे स्टेशन तक जाने के बहाने ले लिया. अपने भाई सलमान और भांजे मोहम्मद अहमद को साथ ले कर वह आधी रात को अपने औफिस पहुंचा.

उन के सहयोग से उस ने प्रिया की लाश वाले क्रिकेट बैग को औटो में रखा. सलमान और मोहम्मद अहमद पिछली सीट पर बैग के साथ बैठ गए तो वह औटो चला कर नैनीताल रोड पर स्थित बिलवा पुल के पास ले गया. वहां पानी से कट कर जमीन में एक गड्ढा बन गया था. इमरान ने अपने भाई व भांजे की मदद से प्रिया की लाश वाले बैग को उसी गड्ढे में डाल दिया. इस के बाद तीनों गांव लौट आए. 6 नवंबर, 2014 को इमरान औफिस के बाहर खड़ी प्रिया की स्कूटी से वहां पहुंचा, जहां प्रिया की लाश फेंकी थी. अपने साथ वह एक फावड़ा भी ले आया था. फावड़े की मदद से उस ने प्रिया की लाश वाले बैग पर मिट्टी डाल दी. इस के बाद वह वहां से कुछ दूरी पर स्थित हनीफ के खेत में प्रिया की स्कूटी के पार्ट्स खोल कर छिपा दिए. प्रिया का मोबाइल उस ने किला नदी में फेंक दिया.

इमरान जानता था कि प्रिया अपनी सहेली शालिनी के साथ उस के यहां आई थी, इसलिए उस ने शालिनी को धमकी दी कि वह प्रिया के उस के औफिस आने की बात किसी को नहीं बताएगी, वरना दोनों फंस सकते हैं. इमरान ने सोचा था कि शालिनी खुद के फंस जाने के डर से किसी को कुछ नहीं बताएगी. लेकिन हुआ इस का उलटा. शालिनी ने प्रिया की मां पुष्पा को सब कुछ बता दिया था. इमरान से पूछताछ के बाद पुलिस ने गुड्डू, सलमान और मोहम्मद अहमद के खिलाफ भादंवि की धारा 364, 302, 201 और 404 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. सलमान की निशानदेही पर पुलिस ने अभियुक्त गुड्डू और सलमान को भी गिरफ्तार कर लिया था. जबकि मोहम्मद अहमद पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका.

इमरान की निशानदेही पर पुलिस ने लाश ठिकाने लगाने में प्रयुक्त औटो भी तिलियापुर गांव से बरामद कर लिया था. गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया था. Bareilly News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, शालिनी परिवर्तित नाम है.

 

UP Crime : बदनामी का खून

UP Crime : नवीन की शादी इसलिए नहीं हो रही थी, क्योंकि उस की दलित प्रेमिका सीमा को उस से बेटा हो गया था. इस से उस की ही नहीं, घर वालों की भी बदनामी हो रही थी. घर वालों ने इस बदनामी से बचने का जो उपाय किया, क्या वह उचित था?

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर थानाकोतवाली बड़हलगंज का एक गांव है तिहामोहम्मद. इसी गांव में रामाश्रय अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी केसरी देवी के अलावा 2 बेटे संजय, राकेश कुमार उर्फ हृदय कुमार और 2 बेटियां सीमा तथा आशा थीं. बात 10 नवंबर, 2014 की है. सुबह साढ़े 6 बजे के करीब गांव के ग्रामप्रधान काशी राय टहलने के लिए घर से निकल कर गलियों से होते हुए गांव के बाहर रह रहे दलितों के मोहल्ले से होते हुए चले जा रहे थे कि गली के किनारे बने रामाश्रय के झोपड़ानुमा मकान की खुली दालान में चारपाई पर उन की नजर पड़ी तो उस की हालत देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

दालान में पड़ी उस चारपाई पर एकएक कर के 3 लाशें पड़ी थीं. सब से नीचे रामाश्रय के नाती आशीष उर्फ लालू, उस के ऊपर उस की पत्नी केसरी देवी और सब से ऊपर उस की बेटी सीमा की लाश पड़ी थी. उन्होंने आवाज लगा कर कुछ लोगों को बुलाया और घटना के बारे में बताया. इस के बाद थोड़ी ही देर में घटना की सूचना पूरे गांव में फैल गई. इस के बाद तो रामाश्रय के घर के सामने भीड़ लग गई. ग्रामप्रधान काशी राय ने घटना की सूचना थानाकोतवाली बड़हलगंज पुलिस को दी तो कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर सुनील कुमार राय एसआई वी.पी. सिंह, देवेंद्र मौर्य, हरिकेष कुमार आर्या, हेडकांस्टेबल रमाकांत पांडेय, कांस्टेबल समतुल्ला खान, सुरेश सिंह, अनिल पाल, शंभू सिंह के साथ गांव तिहामोहम्मद आ पहुंचे.

दिल दहला देने वाली स्थिति देख कर इंसपेक्टर सुनील कुमार राय ने इस बात की जानकारी आईजी सतीश कुमार माथुर, डीआईजी डा. संजीव कुमार, एसएसपी राजकुमार भारद्वाज, एसपी (ग्रामीण) बृजेश सिंह और सीओ अशोक कुमार को दी. पुलिस अधिकारियों को सूचना देने के बाद वह साथियों के साथ घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण करने के लिए दालान में पहुंचे. दालान में पड़ी चारपाई पर तीनों लाशें एक के ऊपर एक पड़ी थीं. चारपाई के पास ही 315 बोर के 5 खोखे और कांच की टूटी चूडि़यों के टुकड़े पड़े थे. वे टुकड़े मृतका सीमा की कलाई की चूडि़यों के थे, इसलिए उन टुकड़ों को देख कर अनुमान लगाया गया कि मृतका सीमा ने खुद या बच्चे और मां को बचाने के लिए हत्यारों से संघर्ष किया होगा.

पुलिस ने गोलियों के खोखे के साथ टूटी चूडि़यों के उन टुकड़ों को भी कब्जे में ले लिया. लाशों के निरीक्षण में पता चला, मृतका सीमा की पीठ और सिर में बाईं ओर केसरी देवी के सिर और कान के ऊपर बाईं ओर तथा सब से नीचे पड़े आशीष उर्फ लालू के सीने में दाहिनी ओर गोली मारी गई थी. स्थिति देख कर ही लग रहा था कि हत्यारे कम से कम 3-4 रहे होंगे. आसपास वालों से की गई पूछताछ में पता चला कि मृतकों के परिवार में और कोई नहीं है. एक बेटी आशा ससुराल में है और बेटा राकेश मुंबई में है. एक बेटा संजय 18 साल से लापता है. परिवार के मुखिया रामाश्रय की 8-9 साल पहले मौत हो चुकी है. मृतकों के घर में उस समय कोई ऐसा नहीं था, जिस से कुछ जानकारी मिल पाती.

इंसपेक्टर सुनील कुमार राय पूछताछ कर रहे थे कि अन्य पुलिस अधिकारी भी आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर लिया तो ग्रामप्रधान काशी राय की उपस्थिति में घटनास्थल की काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया गया. इस के बाद ग्रामप्रधान काशी राय द्वारा दी गई तहरीर पर थानाकोतवाली बड़हलगंज में अज्ञात लोगों के खिलाफ तीनों हत्याओं का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली प्रभारी सुनील कुमार राय ने मामले की जांच शुरू की.

सब से पहले उन्होंने पड़ोसियों से राकेश का फोन नंबर ले कर उसे घटना की सूचना दी. स्थिति को देखते हुए हत्या की वजह रंजिश लग रही थी, क्योंकि घर का सारा सामान जस का तस था. इस से साफ था कि हत्यारे सिर्फ हत्या करने आए थे. घर वालों की हत्या की जानकारी मिलते ही राकेश गोरखपुर के लिए चल पड़ा. 11 नवंबर, 2014 को वह घर पहुंचा और सामान वगैरह रख कर सीधे कोतवाली बड़हलगंज के लिए रवाना हो गया. कोतवाली पहुंच कर उस ने इंसपेक्टर सुनील कुमार राय को एक प्रार्थना पत्र दिया, जिस में उस ने गांव के हीरा राय और उन के 4 बेटों, परविंद कुमार राय, अरुण कुमार राय उर्फ विक्की, अरविंद कुमार राय और नवीन कुमार राय उर्फ टुनटुन को अपनी मां, बहन और भांजे की हत्याओं का दोषी ठहराया था.

कोतवाली पुलिस ने राकेश के उस प्रार्थना पत्र के आधार पर अज्ञात की जगह प्रार्थना पत्र में लिखे पांचों को नामजद अभियुक्त बना कर मुकदमे में एससीएसटी ऐक्ट जोड़ दिया. इस के बाद इस मामले की जांच सीओ अशोक कुमार को सौंप दी गई. राकेश द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र के अनुसार उस की बहन सीमा के अवैधसंबंध 13-14 सालों से हीरा राय के तीसरे नंबर के बेटे नवीन कुमार राय उर्फ टुनटुन से थे, जिस की वजह से नवीन के घर वाले आए दिन लड़ाईझगड़ा करते रहते थे. मौका मिलने पर उन्होंने ही ये तीनों हत्याएं की हैं. अगर राकेश भी घर में होता तो उस की भी हत्या हो सकती थी.

नामजद मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने गिरफ्तारी के लिए हीरा राय के घर छापा मारा, लेकिन घर में सिर्फ महिलाएं मिलीं. सारे के सारे पुरुष घर छोड़ कर भाग गए थे. सीमा का मोबाइल फोन मिल गया था. फोन से पता चला कि घटना वाली रात 12 बजे सीमा के फोन पर एक फोन आया था. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो वह नंबर गांव के अरुण का था. इस से साफ हो गया था कि अरुण ने सीमा को फोन कर के स्थिति के बारे में पता किया होगा. इस का मतलब राकेश का शक सही था.

पुलिस को हत्यारों के बारे में पता चल गया, लेकिन वे पकड़ में नहीं आए, क्योंकि वे सभी के सभी फरार थे. गिरफ्तारी न हो पाने की वजह से 13 नवंबर को एसएसपी औफिस के सामने बहुजन समाज पार्टी के जिलाध्यक्ष सुरेश कुमार भारती के नेतृत्व में 6 सूत्रीय मांगें ले कर धरनाप्रदर्शन किया गया. उसी दिन समाजवादी पार्टी की पूर्व विधायक शारदा देवी, राकेश के गांव तिहामोहम्मद पहुंची और राकेश को ढांढस बंधाया. उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सरकार को मुआवजा के लिए पत्र तो भेजा ही, अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पर भी दबाव बनाया.

इन्हीं दबावों का ही परिणाम था कि 14 नवंबर को नामजद अभियुक्तों में से 3 अभियुक्तों परविंद कुमार, अरुण कुमार राय उर्फ विक्की और अरविंद कुमार राय को ओझौली गांव के पास से रात डेढ़ बजे गिरफ्तार कर लिया गया. बाकी बचे 1 अभियुक्त हीरा राय का पता नहीं था, जबकि नवीन कुमार राय उर्फ टुनटुन 2 साल पहले बैंकाक चला गया था और घटना के समय भी वहीं था. इस के बावजूद पुलिस ने हत्या के जुर्म में उसे भी आरोपी बना दिया था. पुलिस परविंद, अरुण और अरविंद को कोतवाली बड़हलगंज कोतवाली ले आई, जहां उन से हत्याओं के बारे में पूछताछ की जाने लगी. तीनों अभियुक्तों ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उन्होंने तीनों हत्याओं की जो कहानी बताई, वह कुछ इस प्रकार थी.

दलित बस्ती में रहने वाला रामाश्रय खेती कर के अपने परिवार को पाल रहा था. बड़ा बेटा संजय 15 साल का हुआ तो अपने किसी रिश्तेदार के साथ गुजरात के सूरत शहर चला गया. 6 महीने तो उस ने कमा कर रुपए भेजे, लेकिन उस के बाद अचानक उस ने रुपए भेजने बंद कर दिए. घर वालों ने रिश्तेदार को फोन कर के पूछा तो उस ने बताया कि अब वह उन के पास नहीं रहता. इस के बाद से आज तक उस का कुछ पता नहीं चला है. बेटे के इस तरह लापता हो जाने से रामाश्रय को इतना गहरा आघात पहुंचा कि वह बीमार पड़ गया. कुछ दिनों बाद उस की मौत हो गई तो 2 बेटियों और एक बेटे की जिम्मेदारी केसरी देवी पर आ पड़ी.

केसरी देवी की बड़ी बेटी सीमा कीचड़ में खिले कमल की तरह थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस की सुंदरता में जो निखार आया, वह गांव के लड़कों को लुभाने लगा. मजे की बात यह थी कि वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही चंचल भी थी. चंचल, चपल और चालाक सीमा अपनी सीमा जानती थी. वह गरीब घर की बेटी थी, जिस की जमापूंजी सिर्फ इज्जत होती है. वह अपनी इज्जत को बचा कर रखना चाहती थी, लेकिन गांव के ही हीरा राय के तीसरे नंबर का बेटा नवीन कुमार राय उर्फ टुनटुन उस का ऐसा दीवाना हुआ कि उस ने कोशिश कर के उसे अपने रंग में ढाल ही लिया. यह 12-13 साल पहले की बात है.

उस समय सीमा की उम्र 19-20 साल रही होगी. नवीन भी उम्र लगभग उतनी ही थी. नवीन गबरू जवान तो था ही, खातेपीते घर का होने के साथसाथ खूबसूरत भी था. शायद उस की खूबसूरती पर ही सीमा भी मर मिटी थी. प्यार हुआ तो दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे. इस के बाद दोनों के संबंधों की बात गांव में चर्चा का विषय बन गई. सीमा दलित थी, जबकि नवीन भूमिहार यानी सामान्य वर्ग का था. नवीन के घर वालों ने सोचा दलित होने के नाते सीमा के घर वाले क्या कर लेंगे. साल, 2 साल बाद दोनों की शादी हो जाएगी तो संबंध अपने आप खत्म हो जाएंगे.

तिहामोहम्मद गांव के ही रहने वाले हीरा राय साधनसंपन्न आदमी थे. उस की 5 संतानों में 4 बेटे, अरविंद कुमार राय, परविंद कुमार राय उर्फ गुड्डू, नवीन कुमार राय उर्फ टुनटुन, अरुण कुमार राय और एक बेटी संध्या राय थी. उस के 2 बेटे अरविंद और परविंद बैंकाक में रहते थे. इन से छोटा नवीन पढ़ाई के साथसाथ खेती के कामों में पिता की मदद करता था. सब से छोटा अरुण समझदार होते ही बड़े भाइयों के पास बैंकाक चला गया था, जहां वह नौकरी करने लगा था. बैंकाक से आने वाले रुपयों से हीरा राय गांव में जमीनें खरीदते गए, जिस से जल्दी ही उन की गिनती बड़े लोगों में होने लगी. बाद में बड़ा बेटा अरविंद गांव आ गया और यहीं रहने लगा. लेकिन परविंद और अरुण वहीं रह कर नौकरी करते रहे.

नवीन और सीमा के संबंध हद पार करने लगे तो हीरा राय और उन के बड़े बेटे अरविंद को लगा कि आगे चल कर बात बिगड़ सकती है. कहीं बात शादी की आ गई तो वे समाज को कैसे मुंह दिखा पाएंगे. यही सोच कर अरविंद ने केसरी देवी को धमकाया कि वह अपनी बेटी को काबू में रखे. उस ने केसरी देवी को ही नहीं धमकाया, नवीन पर भी सीमा से मिलने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी. नवीन कोई लड़की नहीं था कि घर वाले उस के पैरों में जंजीर डाल कर उसे कमरे में कैद कर देते. उस ने पिता और भाई के दबाव में भले ही सीमा से मिलने के लिए मना कर दिया था, लेकिन यह दिखावा मात्र था. सीमा उस की धमनियों में खून बन कर बह रही थी. इसलिए वह पिता और भाई को दिए आश्वासन पर अटल नहीं रह सका और चोरीछिपे लगातार सीमा से मिलता रहा.

परिणामस्वरूप  बिना शादी के ही सीमा गर्भवती हो गई. धीरेधीरे गांव में यह बात फैली तो केसरी देवी की बदनामी होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने देवरिया जिले के थाना एकौना के गांव छपना के रहने वाले दीपचंद के साथ सीमा की शादी कर दी. सीमा ससुराल चली तो गई, लेकिन उस के गर्भ में पल रहा पाप पति से छिपा नहीं रहा. दीपचंद को जब पता चला कि सीमा की कोख में किसी दूसरे का 2-3 महीने का बच्चा पल रहा है तो उस ने इज्जत के साथ सीमा को उस के मायके पहुंचा दिया और सीमा की सहमति से तलाक ले लिया. यह बात 11-12 साल पहले की है.

इस के बाद सीमा मां और बहनभाई के साथ मायके में ही रहने लगी. समय पर उस ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम आशीष उर्फ लालू रखा. यह सभी को पता था कि सीमा का बेटा आशीष नवीन कुमार राय का बेटा है. नवीन सीमा को अपनाने के लिए तैयार भी था, लेकिन घर वाले इस शादी के सख्त खिलाफ थे. इस की सब से बड़ी वजह सीमा का दलित होना था. लालू धीरेधीरे बड़ा होने लगा. सीमा ने स्कूल में उस का दाखिला कराते समय पिता के नाम के रूप में नवीन कुमार राय का ही नाम लिखाया था. इस से हीरा राय और उन के बेटों, अरविंद, परविंद और अरुण को इस बात का डर सताने लगा कि बड़ा हो कर लालू उन की संपत्ति में हिस्सा ले सकता है.

जबकि नवीन पर इस बात का कोई असर नहीं था, क्योंकि वह सीमा और लालू को अपनाने को तैयार था. शायद इसीलिए वह कहीं और शादी नहीं कर रहा था. लालू और सीमा को ले कर हीरा राय के परिवार में महाभारत छिड़ा हुआ था. सीमा से छुटकारा पाने का अब एक ही उपाय था कि उस की शादी कहीं और हो जाए. हीरा राय और उस के बेटे इस के लिए कोशिश भी कर रहे थे, लेकिन नवीन ऐसा होने नहीं दे रहा था. इस से घर वालों ने सोचा कि अगर नवीन को गांव से हटा दिया जाए तो यह काम आसानी से हो जाएगा.

नवीन के 2 भाई, परविंद और अरुण बैंकाक में रह ही रहे थे. हीरा और अरविंद ने नवीन का पासपोर्ट और वीजा तैयार करा कर उसे भी बैंकाक भेज दिया. नवीन के हटते ही हीरा राय और अरविंद दिमाग चलाने लगे. योजना के अनुसार नवीन के बैंकाक पहुंचते ही परंविद और अरुण गांव आ गए. अरविंद, परविंद और अरुण रास्ते का कांटा लालू को हटाने की योजना बनाने लगे. लालू की ही वजह से नवीन की भी शादी नहीं हो रही थी, बदनामी अलग से हो रही थी. नवीन भले ही बैंकाक चला गया था, लेकिन फोन से वह बराबर सीमा और उस के बेटे का हालचाल लेता रहता था.

अरुण काफी दबंग किस्म का युवक था. बैंकाक से खूब रुपए कमा कर लाया ही था, इसलिए पैसों की भी गरमी थी. उस का उठनाबैठना भी बदमाशों के बीच था, इसलिए लालू को रास्ते से हटाने के लिए उस ने अपने उन्हीं दोस्तों की मदद से कट्टा और कारतूस का इंतजाम किया हथियारों का इंतजाम हो गया तो एक दिन तीनों भाइयों ने पिता हीरा राय के साथ बैठ कर लालू को खत्म करने की योजना बना डाली. 9/10 नवंबर की रात 12 बजे अरुण ने सीमा के मोबाइल पर फोन कर के पता किया कि वह सो गई है या जाग रही है. वैसे तो सीमा सो रही थी, लेकिन मोबाइल की घंटी ने उसे जगा दिया. 2-4 बातें हुईं, उस के बाद सीमा फोन काट कर सो गई.

सीमा से बात होने के काफी देर बाद अरुण, अरविंद और परविंद 315 बोर के देसी कट्टे और कारतूस ले कर केसरी देवी के घर जा पहुंचे. बिजली न होने की वजह से गांव में अंधेरा था. अरुण को पता था कि लालू अपनी नानी के पास बरामदे में चारपाई पर सोता है, जबकि सीमा अंदर कमरे में सोती है. अरुण को सारी स्थिति का पता था, इसलिए सीमा के घर पहुंचते ही उस ने एक, डेढ मीटर की दूरी से लालू पर निशाना साध कर कट्टे से गोली चला दी. गोली लालू के सीने में दाईं ओर लगी. सोया लालू छटपटा कर हमेशाहमेशा के लिए सो गया.

गोली की आवाज सुन कर केसरी देवी जाग गई. पकड़े जाने के डर से अरुण और अरविंद ने एक साथ केसरी देवी को गोली मार दी. केसरी देवी भी लहरा कर नाती लालू के ऊपर गिर गई. दूसरी ओर गोली की आवाज सुन कर कमरे में सो रही सीमा भी जाग गई थी और उठ कर बाहर आ गई थी. उस ने तीनों भाइयों को पहचान भी लिया था. मां को बचाने के चक्कर में वह अरुण से भिड़ गई थी. उसी दौरान उस की चूडि़यां टूट कर नीचे गिर गई थीं. सीमा ने उन्हें पहचान लिया था, इसलिए उसे भी जिंदा नहीं छोड़ा जा सकता था. अरुण और अरविंद ने एक साथ गोलियां चला कर उसे भी मार दिया. मां को बचाने के लिए वह चारपाई के पास ही खड़ी थी. इसलिए गोलियां लगने के बाद भी वह मां के ऊपर चारपाई पर गिर पड़ी थी.

इस तरह एक हत्या करने के चक्कर में अरविंद, अरुण और परविंद ने 3 हत्याएं कर डालीं थीं. फिर भी उन्हें न किसी बात की चिंता थी, न किस तरह का पछतावा. वे घर जा कर आराम से सो गए. लेकिन सुबह होते ही हीरा राय और उन के तीनों बेटे अरविंद, परविंद और अरुण घर छोड़ कर भाग गए. 14 नवंबर, 2014 की रात अरविंद, परविंद और अरुण ओझौली गांव से गिरफ्तार हो गए. पुलिस ने अरुण के पास से 315 बोर का एक कट्टा, कारतूस के 3 खोखे, एक जिंदा कारतूस, अरविंद के पास से 315 बोर का एक कट्टा, कारतूस के 2 खोखे और 1 जिंदा कारतूस बरामद कर लिया था. इस के बाद पुलिस ने तीनों को अदालत मे पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था.

21 नवंबर को पुलिस ने गांव के बाहर हीरा राय को भी गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे भी जेल भेज दिया है. पुलिस का मानना है कि साजिश रचने में नवीन भी शामिल था, इसलिए धारा 120बी के तहत उसे भी आरोपी बनाया है. लेकिन इस समय वह बैंकाक में है. पुलिस उसे वहां से बुला कर गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है. UP Crime

Agra News : बेवफाई या मजबूरी

Agra News : अंजलि सनी का बचपन का प्यार थी, इसलिए वह उसे हर हालत में अपनी बनाना चाहता था, अंजलि भी उस की बनने को तैयार थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि सनी को प्रेमिका अंजलि का हत्यारा बनना पड़ा…

5 नवंबर, 2014 की शाम पौने 7 बजे के आसपास अंधेरा घिरने पर आगरा के थाना हरिपर्वत के मोहल्ला नाला बुढ़ान सैयद में रेल की पटरियों के किनारे रहने वाले सतीशचंद की बेटी अंजलि किसी काम से पटरियों की ओर गई तो किसी ने उस पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया. जान बचाने के लिए अंजलि चिल्लाते हुए घर की ओर भागी, लेकिन हमलावर ने उसे गिरा कर गर्दन पर ऐसा वार किया कि उस की गर्दन कट गई और वह तुरंत मर गई. शोर सुन कर आसपास के लोग वहां पहुंच पाते, हमलावर अंजलि को मार कर अंधेरे में गायब हो गया.

शोर सुन कर अंजलि के घर वाले भी आ गए थे. उस की हालत देख कर वे रोने लगे. थोड़ी ही देर में वहां पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया. हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस को सूचना दी गई. थाना हरिपर्वत पास में ही था, इसलिए सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह एसएसआई शैलेश कुमार सिंह, एसआई अभय प्रताप सिंह, हाकिम सिंह, सिपाही परेश पाठक और रामपाल सिंह को साथ ले कर तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए.

चूंकि इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी गई थी, इसलिए जिले के पुलिस अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी. इसलिए थोड़ी ही देर में एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ हरिपर्वत अशोक कुमार सिंह, मनीषा सिंह, एएसपी शैलेष पांडे भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. हत्यारे ने जिस तरह चाकू से वार कर के मृतका की हत्या की थी, उस से अंदाजा लगाया कि हत्यारा अंजलि से गहरी नफरत करता था.

पुलिस अधिकारियों ने डौग स्क्वायड टीम भी बुलाई थी. लेकिन कुत्ते पुलिस की कोई मदद नहीं कर सके. वे वहीं आसपास घूम कर रह गए थे. इस हत्या से नाराज मोहल्ले वालों ने पुलिस के विरोध में नारे लगाने के साथ घोषणा कर दी कि वे लाश तब तक नहीं उठाने देंगे, जब तक हत्यारा पकड़ा नहीं जाता. पुलिस अधिकारियों ने समझायाबुझाया और हत्यारे को जल्द पकड़ने का आश्वासन दिया, तब कहीं जा कर घर और मोहल्ले वालों ने लाश ले जाने की अनुमति दी. पुलिस ने जल्दीजल्दी घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. अब तक सूचना पा कर पड़ोस के मोहल्ले में रहने वाला मृतका का पति सुनील भी आ गया था.

उस ने पुलिस को बताया कि उस की पत्नी की हत्या उस की ससुराल वालों के पड़ोस में रहने वाले उत्तमचंद के बेटे सनी ने की है. इस के बाद सुनील की ओर से थाना हरिपर्वत में अंजलि की हत्या का मुकदमा नाला बुढ़ान सैयद के रहने वाले उत्तम चंद के बेटे सनी के खिलाफ नामजद दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने सनी को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर छापा मारा तो वह घर से गायब मिला. सनी के घर छापा मारने गई पुलिस टीम से घर वालों से कहा कि अंजलि की हत्या उस के पति सुनील ने ही की है. लेकिन पुलिस टीम को उन की इस बात पर विश्वास नहीं हुआ.

हत्या के इस मामले की जांच थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह ने खुद संभाल रखी थी. पुलिस अधिकारियों की भी नजर इस मामले पर थी. इसलिए सनी को पकड़ने के लिए सीओ हरिपर्वत अशोक कुमार सिंह के नेतृत्व में 3 टीमें बनाई गईं. एसएसपी शलभ माथुर ने तीनों टीमों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा था कि उन्हें किसी भी तरह उसी रात सनी को पकड़ना है. क्योंकि उन्हें पता था कि पोस्टमार्टम के बाद मृतका के घर वाले फिर हंगामा करेंगे. वह नहीं चाहते थे कि पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के समय घर वाले किसी तरह का हंगामा करें. सब से बड़ी बात यह थी कि मोहल्ले के पास से रेलवे लाइन गुजरती थी, हंगामा करने वाले लाइन पर बैठ कर गाडि़यों का आवागमन रोक सकते थे.

देर रात सीओ अशोक कुमार सिंह को कहीं से सूचना मिली कि सनी राजा मंडी रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली जा सकता है. इसी सूचना के आधार पर इंसपेक्टर हरिमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पुलिस टीम राजा मंडी रेलवे स्टेशन पर सनी की तलाश में जा पहुंची. सुबह 6 बजे के आसपास वहां से दिल्ली के लिए इंटरसिटी एक्सप्रेस जाती थी, इसलिए तीनों टीमें पूरी सतर्कता के साथ ट्रेन पर चढ़ने वाली सवारियों पर नजर रखने लगीं. सनी को पहचानने वाला एक आदमी पुलिस टीमों के साथ था. ट्रेन छूटने में 5 मिनट बाकी था, तभी उस आदमी ने एक युवक की ओर इशारा किया. चूंकि पुलिस टीमों के सदस्य वर्दी में नहीं थे, इसलिए सनी को पता नहीं चला कि पुलिस स्टेशन पर उसे तलाश रही है.

सनी निश्ंिचत हो कर ट्रेन पर चढ़ रहा था, इसलिए पुलिस ने आराम से उसे पकड़ लिया. थाना हरिपर्वत ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई. वह कोई बहानेबाजी करता, उस के पहले ही पुलिस ने उस के कपड़ों पर लगे खून के छींटों की ओर इशारा किया तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के अंजलि की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. अंजलि आगरा के थाना हरिपर्वत के मोहल्ला नाला बुढ़ान सैयद के रहने वाले सतीशचंद की 6 संतानों में पांचवें नंबर की बेटी थी. शहर के पौश इलाके हरिपर्वत से सटा रेलवे लाइन को किनारे बसा है मोहल्ला नाला बुढान सैयद. यहां रहने वाले लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कभी यह गरीबों का मोहल्ला था. लेकिन आज यहां लगभग सभी के मकान 3 तीन मंजिल बन चुके हैं.

सतीशचंद के पड़ोस में उत्तमचंद का मकान था. उस के परिवार में पत्नी बेबी के अलावा तीन बेटे, भोलू, बबलू और सनी थे. निम्न मध्यम वर्गीय परिवार होने की वजह से उत्तमचंद के बच्चे पढ़ नहीं सके. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वे छोटेमोटे काम करने लगे. सनी ने भी हाईस्कूल कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. पड़ोसी होने की वजह से सनी और अंजलि साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे और एक ही स्कूल में पढ़े थे. अंजलि ने जहां आठवीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी, वहीं सनी ने हाईस्कूल पास कर के. हमउम्र होने की वजह से दोनों में कुछ ज्यादा ही पटती थी. यही पटरी किशोरावस्था आतेआते प्यार में बदल गया.

अंजलि के मांबाप ने पहले तो दोनों के मेलमिलाप व मुलाकातों पर कोई बंदिश नहीं लगाई, लेकिन जब उन्हें लगा कि बेटी अब सयानी हो गई है तो उन्हें लगा कि जवान बेटी का किसी जवान लड़के से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. बस इस के बाद उन्होंने समझदारी से काम लेते हुए अंजलि को ऊंचनीच का पाठ पढ़ाते हुए उसे सनी से दूर रहने की सलाह दी. अंजलि ने मांबाप को भले ही आश्वासन दिया कि वह सनी से नहीं मिलेगी, लेकिन उस के लिए ऐसा करना आसान नहीं था. सनी अब तक उस के लिए उस की जिस्म की जान बन चुका था, उस के दिल की धड़कन बन चुका था. ऐसे में वह सनी से दूर कैसे रह सकती थी.

अंजलि उस से मिलतीजुलती रही. हां, अब वह उस से मिलने में थोड़ा सावधानी जरूर बरतने लगी थी. लेकिन उस की मुलाकातों की भनक सतीशचंद और विमला देवी को लग ही गई. उन्हें लगा कि अब अंजलि का विवाह कर देना ही ठीक है. उन्होंने आननफानन में लड़का देखा और अंजलि की शादी कर दी. यह 3 साल पहले की बात है. अंजलि का पति सुनील नाला बुढान सैयद से लगे मोहल्ले पीर कल्याणी में रहता था. वह एक जूते की फैक्ट्री में सुपरवाइजर था. नौकरी की वजह से वह सुबह 8 बजे घर से निकल जाता तो देर रात को ही घर लौटता था. शादी के बाद कुछ दिनों तक तो अंजलि ने सनी से दूरी बनाए रखी, लेकिन कुछ दिनों बाद वह उस से फिर मिलनेजुलने लगी. इसी बीच वह एक बेटे की मां बन गई.

अंजलि का सोचना था कि उस का सनी से मिलनाजुलना किसी को पता नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं था. उस की हरकतों पर ससुराल वालों की नजर थी. वे एकएक बात सुनील से बताते रहते थे. सुनील ने अंजलि की आशनाई का सुबूत जुटाने के लिए उसे एक ऐसा मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था, जिस में बातचीत करते समय पूरी बात रिकौैर्ड हो जाती थी. इस तरह अंजलि और सनी की अंतरंग बातें रिकौर्ड कर के सुनील ने सुबूत इकट्ठा कर लिए थे. इस के बाद उस ने अंजलि को समझाना चाहा तो वह बगावत पर उतर आई. नाराज हो कर वह बेटे चीनू को ले कर मायके चली गई.

मायके वाले उसे दोष न दें, इसलिए उस ने अपनी मां से बताया कि सुनील का किसी औरत से संबंध है, जिस की वजह से वह उस से प्यार नहीं करता. इसीलिए दुखी हो कर वह मायके आ गई है. विमला देवी को लगा कि बेटी सच कह रही है. इस की वजह यह थी कि सुनील अंजलि और सासससुर से बहुत कम बातें करता था. अंजलि लगभग 6 महीने तक लगातार मायके में रह गई तो आसपड़ोस वाले सवालजवाब करने लगे. इस के बाद सतीशचंद ने सुनील को घर बुलाया तो सच्चाई का पता चला. तब सतीशचंद और विमला देवी ने बेटीदामाद को समझाबुझा कर अंजलि को सुनील के साथ ससुराल भेज दिया.

सुनील अंजलि को साथ ले तो नहीं जाना चाहता था, लेकिन सासससुर का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह अंजलि को साथ ले आया. 2-3 महीने तक सब ठीकठाक चला. लेकिन इस के बाद जो होने लगा, वह पहले से भी ज्यादा खतरनाक था. सनी पहले तो अंजलि से फोन पर ही बातें करता था, इस बार वह सुनील की अनुपस्थिति में अंजलि से मिलने उस के पीर कल्याणी स्थित घर आने लगा. अंजलि ने ससुराल वालों से उसे दूर का रिश्तेदार बताया था. 6 महीने तक सनी पीर कल्याणी अंजलि से मिलने आताजाता रहा. लेकिन एक दिन दोपहर को सुनील घर आ गया तो उस ने सनी को अंजलि के कमरे में बैठे बातें करते देख लिया.

पहले तो उस की सनी से हाथापाई हुई, इस के बाद सुनील ने उसे तो बेइज्जत कर के भगाया ही, अंजलि को भी उस की मां विमला देवी से सारी हकीकत बता कर मायके छोड़ आया. विमला देवी उस दिन तो सुनील से कुछ नहीं कह सकी, लेकिन बाद में उस पर अंजलि को ले जाने का दबाव बनाने लगी. सुनील अंजलि को ले जाता, उस के पहले ही एक दोपहर अंजलि बेटे को मायके में छोड़ कर सनी के साथ भाग निकली. इस से दोनों ही परिवारों में हड़कंप मच गया. पता चला कि अंजलि बेटे की दवा लेने के बहाने से घर निकली और राजामंडी चौराहे से धौलपुर जाने वाली बस में सवार हो कर सनी के साथ चली गई थी.

धौलपुर में सनी की मौसी रहती थी. सनी अंजलि को ले कर उन के यहां पहुंचा तो उन्होंने फोन द्वारा अपनी बहन बेबी को इस बात की सूचना दे दी. सतीशचंद सनी के पिता उत्तमचंद के साथ धौलपुर जाने की तैयारी कर रहे थे कि बेटे से मिलने के लिए सुनील ससुराल आ पहुंचा. इस तरह उसे भी पत्नी के सनी के साथ भाग जाने की जानकारी हो गई. उसी शाम सुनील ने थाना लोहामंडी जा कर सनी के खिलाफ अपनी पत्नी अंजलि को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही सुनील विमला देवी, सतीशचंद और बेबी उत्तमचंद के साथ धौलपुर गया और अंजलि को आगरा ले आया. आगरा आ कर उस ने थाना लोहामंडी पुलिस को धौलपुर में जहां सनी ठहरा था, वहां का पता बता दिया.

इस के बाद थाना लोहामंडी पुलिस धौलपुर गई और सनी को पकड़ कर ले आई. इस के बाद पुलिस ने सनी को अदालत में पेश करने के साथ अंजलि का भी बयान दर्ज कराया, जहां उस ने सनी के खिलाफ जम कर जहर उगला. उस ने कहा कि सनी ने उस का जबरन अपहरण किया था और उसे बंधक बना कर उस के साथ दुष्कर्म किया था. अंजलि के इसी बयान की वजह से सनी को हाईकोर्ट से अपनी जमानत करानी पड़ी. सनी के साथ जो हुआ था, इस के लिए उस ने अंजलि को दोषी माना. इसलिए उसे अंजलि से गहरी नफरत हो गई. अब वह उस की हत्या करने के बारे में सोचने लगा. जेल से बाहर आने के बाद 1-2 बार उस ने अंजलि से मिलने और बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन अंजलि ने साफ मना कर दिया.

इस की वजह यह थी कि सुनील ने साफसाफ कह दिया था कि अगर अब उस ने सुन भी लिया कि वह सनी से बातचीत करती है तो वह उसे तलाक दे देगा. इसलिए अपने और बच्चे के भविष्य को देखते हुए अंजलि ने सनी से दूर रहने का फैसला कर लिया था. कहा जाता है कि अंजलि ने अदालत में सनी के खिलाफ जो बयान दिया था, वह भी सुनील के ही कहने पर दिया था. सुनील का सोचना था कि अंजलि के इस बयान से दोनों के बीच दरार पड़ जाएगी और हुआ भी वही.

जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद सनी अपने घर आने के बजाय धौलपुर जा कर मौसी के यहां रह रहा था. लेकिन वह अपने दोस्तों से अंजलि के बारे में पता करता रहता था. जैसे ही उसे पता चला कि अंजलि मायके आई है, वह मौसी से मांबाप से मिलने की बात कह कर आगरा आ गया. सनी भले ही घर आ गया था, लेकिन वह ज्यादातर घर में ही रहता था. 4 नवंबर, 2014 की शाम वह छत पर बैठा था, तभी उसे अंजलि रेलवे की पटरियों की ओर जाती दिखाई दी. सनी को लगा कि अपमान का बदला लेने के लिए यह अच्छा मौका है.

वह नीचे उतरा और बाजार जा कर खुद को कसाई बता कर गोश्त काटने वाला छुरा खरीद लाया. अगले दिन यानी 5 नवंबर को अंधेरा होने से पहले ही वह वहां छिप कर बैठ गया, जिधर अंजलि जाती थी. अंधेरा होने पर अंजलि उधर आई तो उस ने उस की हत्या कर के अपनी नफरत की आग बुझा ली. अंजलि की चीख सुन कर जब तक मोहल्ले वाले वहां पहुंचते, सनी उस की हत्या कर के जा चुका था. उस समय कोई नहीं जान सका कि अंजलि को किस ने इतनी बेरहमी से मार दिया. वहां से भाग कर सनी राजामंडी रेलवे स्टेशन पर पहुंचा. उसे लग रहा था कि लोग उसे खोजते हुए वहां आ सकते हैं, इसलिए वह एक खोखे के पीछे छिप गया.

उसे यह भी पता था कि पुलिस उसे खोजते हुए धौलपुर जा सकती है, इसलिए उस ने दिल्ली जाने का निर्णय लिया. वह दिल्ली जा पाता, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर रेलवे लाइन के किनारे से पत्थरों के नीचे से वह छुरा बरामद कर लिया था, जिस से उस ने अंजलि की हत्या की थी. सारे सुबुत जुटा कर पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था. Agra News

कहानी पुलिस सूत्रों व सुनील के बयान

UP Crime : बीवी के बिस्तर का साथी

UP Crime : मुकेश जगदीश को अपना अच्छा दोस्त समझता था, जबकि जगदीश उस का दोस्त नहीं, उस की बीवी के बिस्तर का साथी था…

मीना और जगदीश पहली मुलाकात में ही एकदूजे को अपना दिल दे बैठे थे. मीना को पाने की चाह जगदीश के दिल में हिलोरे मारने लगी थी. इसलिए वह किसी न किसी बहाने से मीना से मिलने उस के घर अकसर आने लगा. घर आने पर मीना उस की आवभगत करती. चायपानी के दौरान जगदीश जानबूझ कर मीना के शरीर को स्पर्श कर लेता तो वह बुरा मानने के बजाय मुसकरा देती. इस से जगदीश की हिम्मत बढ़ती गई और वह मीना को जल्द से जल्द पाने की कोशिश में लग गया.

एक दिन जगदीश सुमन के घर आया तो सुमन उस समय घर में अकेली आईने के सामने शृंगार करने में मशगूल थी. उस की साड़ी का पल्लू गिरा हुआ था. जगदीश दबे पांव आ कर उस के पीछे चुपचाप खड़ा हो गया. उस की कसी देह आईने में नुमाया हो रही थी. मीना उस की मौजूदगी से अंजान थी. जगदीश कुछ देर तक मंत्रमुग्ध सा आईने में मीना के निखरे सौंदर्य को अपनी आंखों से समेटने की कोशिश करता रहा. इस तरह देख कर उस की चाहत दोगुनी होती जा रही थी.

इसी बीच मीना ने आईने में जगदीश को देखा तो तुरंत पीछे मुड़ी. उसे देख कर जगदीश मुसकराया तो मीना ने अपना आंचल ठीक करने के लिए हाथ बढ़ाया. तभी जगदीश ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘मीना, बनाने वाले ने खूबसूरती देखने के लिए बनाई है. मेरा बस चले तो अपने सामने तुम को कभी आंचल डालने ही न दूं. तुम आंचल से अपनी खूबसूरती को बंद मत करो.’’

‘‘तुम्हें तो हमेशा शरारत सूझती रहती है. किसी दिन तुम से बात करते हुए मुसकान के पापा ने देख लिया तो तुम्हारी चोरी पकड़ में आ जाएगी.’’ मीना मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ, कहीं तुम मीठीमीठी बातें कर के मुझ पर डोरे डालने की कोशिश तो नहीं कर रहे?’’

‘‘लगता है, तुम ने मेरे दिल की बात जान ली. मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. अब तो मेरी हालत ऐसी हो गई है कि जिस रोज तुम्हें देख नहीं लेता, बेचैनी महसूस होती है. इसलिए किसी न किसी बहाने से यहां चला आता हूं. तुम्हारी चाहत कहीं मुझे पागल न…’’

जगदीश की बात अभी खत्म भी न हो पाई थी कि मीना बोली, ‘‘पागल तो तुम हो चुके हो. तुम ने कभी मेरी आंखों में झांक कर देखा कि उन में तुम्हारे लिए कितनी चाहत है. मुझे ऐसा लग रहा है कि दिल की भाषा को आंखों से पढ़ने में भी तुम अनाड़ी हो.’’

‘‘सच कहा तुम ने. लेकिन आज यह अनाड़ी तुम से बहुत कुछ सीखना चाहता है. क्या तुम मुझे सिखाना चाहोगी?’’ कहते हुए जगदीश ने मीना के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया. मीना ने भी अपनी आंखें बंद कर के अपना सिर जगदीश के सीने पर टिका दिया. दोनों के जिस्म एकदूसरे से चिपके तो सर्दी के मौसम में भी उन के शरीर दहकने लगे. जब उन के जिस्म मिले तो हाथों ने भी हरकतें करनी शुरू कर दीं और कुछ ही देर में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. शराब पीपी कर खोखले हो चुके पति मुकेश के शरीर में वह बात नहीं रह गई थी, जो उसे जगदीश से मिली. इसलिए उस के कदम जगदीश की तरफ बढ़ते चले गए. इस तरह उन का अनैतिकता का यह खेल चलता रहा.

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के निगोही थानाक्षेत्र में एक गांव है हमजापुर. इसी गांव में 30 वर्षीय मुकेश कुमार. अपनी पत्नी मीना और 2 बच्चों के साथ रहता था. मुकेश के पास 20 बीघा जमीन थी. जमीन मुख्य सड़क के किनारे होने की वजह से बहुत कीमती थी. उसी पर खेती कर के वह अपने परिवार का खर्च चलाता था. उस की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. खर्च उठाने में उसे कभी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा. मुकेश को शराब पीने की लत थी. मीना ने उसे कई बार समझाया भी, लेकिन उस ने पत्नी की बात नहीं मानी. इस के अलावा वह पत्नी की जरूरतों को भी अनदेखा करने लगा. करीब 6 महीने पहले उस ने जगदीश नाम के राजमिस्त्री को बुलाया.

जगदीश मुकेश का परिचित था और उस के गांव से 2 किलोमीटर दूर गांव पैगापुर में रहता था. जगदीश अय्याश प्रवृत्ति का था. 2 बच्चों का बाप होने के बाद भी उस की प्रवृत्ति नहीं बदली थी. जब वह मुकेश के घर गया तो उस की पत्नी मीना को देख कर उस की नीयत बदल गई. चाहत की नजरें मीना के जिस्म पर टिक गईं. उसी पल मीना भी उस की नजरों को भांप गई थी. जगदीश हट्टाकट्टा युवक था. मीना पहली नजर में ही उस की आंखों के रास्ते के दिल में उतर गई. मुकेश से बातचीत करते समय उस की नजरें बारबार मीना पर ही टिक जाती थीं. मीना को भी जगदीश अच्छा लगा. जगदीश की भूखी नजरों की चुभन जैसे उस की देह को सुकून पहुंचा रही थी.

मीना को पाने के लालच में जगदीश ने काम के पैसे भी कम बताए थे. अगले दिन से जगदीश ने काम शुरू कर दिया. काम शुरू करते ही जगदीश ने अपनी बातों के जरिए मुकेश से दोस्ती कर ली. जगदीश को जब भी मौका मिलता, वह मीना के सौंदर्य की तारीफ करने लग जाता. मीना को भी उस का व्यवहार अच्छा लगता था. वह जब कभी उसे चाय, पानी देने आती, जानबूझ कर उस के हाथों को छू लेता. इस का मीना ने विरोध नहीं किया तो जगदीश की हिम्मत बढ़ती गई. फिर उस की मीना से होने वाली बातों का दायरा भी बढ़ने लगा. मीना का भी जगदीश की तरफ झुकाव होने लगा था.

जगदीश को पता था कि मुकेश को शराब पीने की लत है. इसी का फायदा उठाने के लिए उस ने शाम को मुकेश के साथ ही शराब पीनी शुरू कर दी. मीना से नजदीकी बनाने के लिए वह मुकेश को ज्यादा शराब पिला कर धुत कर देता था. कहते हैं, जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. आखिर एक दिन जगदीश को मीना के सामने अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया और उस के बाद दोनों के बीच वह रिश्ता बन गया, जो दुनिया की नजरों में अनैतिक कहलाता है. दोनों ने इस रास्ते पर कदम बढ़ा तो दिए, लेकिन उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि वे अपने जीवनसाथी के साथ कितना बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं.

तन से तन का रिश्ता कायम होने के बाद मीना और जगदीश उसे बारबार दोहराने लगे. जगदीश ने मुकेश के यहां का मरम्मत का काम पूरा कर दिया, इस के बावजूद भी वह वहां आताजाता रहा. मुकेश जैसे ही अपने खेतों पर जाने के लिए निकलता, झट से मीना जगदीश को फोन कर देती. अवैधसंबंधों को कोई भले ही लाख छिपाने की कोशिश क्यों न करे, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक दिन ऐसा ही हुआ. मुकेश जैसे ही अपने खेतों की तरफ निकला, मीना ने अपने प्रेमी जगदीश को फोन कर दिया. मीना जानती थी कि मुकेश सुबह घर से निकलने के बाद शाम को ही घर लौटता है. इस दौरान वह प्रेमी से साथ मौजमस्ती कर लेगी. प्रेमिका का फोन आते ही जगदीश  साइकिल से मीना के घर पहुंच गया.

उस दिन भी आते ही उस ने मीना के गले में अपनी बांहों का हार डाल दिया. तभी मीना इठलाते हुए बोली, ‘‘अरे, यह क्या कर रहे हो, थोड़ा सब्र तो करो.’’

‘‘कुआं जब सामने हो तो प्यासे को सब्र थोड़े ही होता है.’’ कहते हुए जगदीश ने उस का मुंह चूम लिया.

‘‘तुम्हारी इन नशीली बातों ने ही तो मुझे अपना दीवाना बना रखा है. न दिन को चैन मिलता है और न रातों को. पता है, जब मैं मुकेश के साथ होती हूं तो केवल तुम्हारा ही चेहरा मेरे समाने होता है.’’ मीना ने इतना कह कर जगदीश के गालों को चूम लिया.

जगदीश से भी रहा नहीं गया, वह मीना को बांहों में उठा कर पलंग पर ले गया. इस से पहले कि वे कुछ कर पाते, दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. इस आवाज को सुनते ही उन के दिमाग से वासना का बुखार उतर गया. मीना ने जल्दी से अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को ठीक किया और दरवाजा खोलने भागी. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने पति को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया.

‘‘तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’ मीना हकलाते हुए बोली.

‘‘क्यों… क्या मुझे अपने घर आने के लिए भी किसी की इजाजत लेनी होगी? अब दरवाजे पर ही खड़ी रहोगी या मुझे अंदर भी आने दोगी.’’ कहते हुए मुकेश ने मीना को एक ओर किया और अंदर घुसा तो सामने जगदीश को देख कर उस का माथा ठनका.

‘‘अरे, तुम कब आए?’’ मुकेश ने पूछा तो जगदीश ने कहा, ‘‘बस अभीअभी आ रहा हूं.’’

मीना का व्यवहार मुकेश को कुछ अजीब सा लग रहा था, उस ने पत्नी की तरफ देखा. वह घबरा सी रही थी. उस के बाल बिखरे हुए थे, माथे की बिंदिया भी उस के गले पर चिपकी हुई थी. यह सब देख कर शक होना लाजिमी था. जगदीश भी उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. ठंड में भी उस के माथे पर पसीना छलक रहा था. मुकेश उस से कुछ पूछता, उस से पहले ही वह वहां से भाग गया.

उस के जाते ही मुकेश ने पत्नी से पूछा, ‘‘यह जगदीश यहां क्या करने आया था?’’

‘‘मुझे क्या पता, तुम से मिलने आया होगा.’’ असहज होते हुए मीना बोली.  ‘‘लेकिन मुझ से तो कोई ऐसी

बातें नहीं की.’’

‘‘अब मैं क्या जानूं, यह तो तुम्हें ही पता होगा.’’ मीना ने कहा तो मुकेश गुस्से का घूंट पी कर रह गया. उस के मन में पत्नी को ले कर शक पैदा हो गया. मुकेश ने सख्ती का रुख अख्तियार करते हुए पत्नी पर निगाह रखनी शुरू कर दी और हिदायत दे दी कि जगदीश से वह आइंदा न मिले. वह पत्नी की पिटाई भी करने लगा. पति की सख्ती के बावजूद मीना जगदीश से कई बार मिली. मीना को प्रेमी से चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था. उधर जगदीश भी चाहता था कि मीना जीवन भर उस के साथ रहे. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए उन दोनों ने मुकेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

22-23 सितंबर की रात 8 बजे मुकेश ने रोजाना की तरह खाना खाया. उस से पहले वह जम कर शराब पी चुका था और काफी नशे में था. खाना खाने के बाद मुकेश सोने के लिए पहली मंजिल पर बने कमरे में चला गया. उस के सोते ही मीना ने जगदीश को फोन कर के बुला लिया. सुबह 4 बजे के करीब मीना और जगदीश ने गहरी नींद में सो रहे मुकेश को दबोच लिया और उस के हाथपैर बांध दिए. फिर उसे जीवित अवस्था में ही उठा कर पड़ोसी ज्ञान सिंह के खाली पड़े मकान के आंगन में छत से फेंक दिया. जमीन पर गिरते ही मुकेश गंभीर रूप से घायल हो गया.

वह दर्द से तड़पने लगा. मुकेश के बेटे कल्लू ने यह सब होते हुए अपनी आंखों से देख लिया, लेकिन डर की वजह से वह चुपचाप आंखें बंद किए बिस्तर पर ही लेटा रहा. इस के बाद जगदीश वहां से चला गया. मुकेश के गिरने की आवाज से ज्ञान सिंह के परिवार वालों की नींद टूट गई. वे उठ कर आंगन की तरफ आए तो रस्सी से बंधे मुकेश को देख कर हतप्रभ रह गए. उन के शोर मचाने पर आसपड़ोस के अन्य लोग भी वहां आ गए. जब तक मीना वहां पहुंची, तब तक मुकेश की आवाज बंद हो चुकी थी. वहां आते ही मीना घडि़याली आंसू बहा कर रोने लगी. मुकेश की हालत गंभीर बनी हुई थी. वह बोल नहीं पा रहा था. उसी हालत में उसे जिला अस्पताल ले जाया गया.

बासप्रिया गांव में मुकेश के मामा हरद्वारी और उस की बहन राजबेटी रहती थी. उन्हें भी घटना की सूचना दी गई तो वे भी जिला अस्पताल पहुंचे. मुकेश की गंभीर हालत को देखते हुए शाहजहांपुर जिला अस्पताल से उसे बरेली रेफर किया गया, लेकिन बरेली पहुंचने से पहले ही उस ने दम तोड़ दिया. तब मुकेश की लाश को वापस घर ले आया गया. दोपहर बाद करीब 2 बजे किसी ने इस की सूचना निगोही थानापुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी आशीष शुक्ला पुलिस टीम के साथ तुरंत मुकेश के घर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थानाप्रभारी ने मुकेश की बहन राजबेटी से पूछताछ की तो उस ने अपनी भाभी मीना और जगदीश के अवैधसंबंधों की जानकारी उन्हें देते हुए शक जताया कि उस की हत्या में इन दोनों का ही हाथ है. उधर मुकेश के बेटे कल्लू ने भी मां की करतूत का खुलासा कर दिया. थानाप्रभारी आशीष शुक्ला ने राजबेटी की तहरीर पर मीना और उस के आशिक जगदीश के खिलाफ भादंवि की धारा 302 और 304 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर दोनों को गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद उन्हें सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. UP Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Story in Hindi : प्यार का गुलाल

Love Story in Hindi : शराबखोरी की दोस्ती हमेशा घातक होती है, खास कर तब जब शराबी दोस्त की नजर जवान बीवी पर पड़ जाए. संतोष ने सब से बड़ी गलती यही की कि वह अपने दोस्त लक्ष्मण को घर में बुला कर शराब पिलाने लगा. जब लक्ष्मण और संतोष की पत्नी सत्यरूपा के बीच अवैधसंबंध बन गए तो संतोष की शामत आनी ही थी. 4  अक्तूबर की सुबह की बात है. लोगबाग रोजाना की तरह उठ कर अपने दैनिक कार्यों में लग गए थे. तभी खेतों की ओर गए किसी व्यक्ति ने तालाब के किनारे खून से लथपथ

पड़ी लाश देखी. इस के बाद जल्दी ही यह बात आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई. जहां लाश पड़ी थी, वह क्षेत्र लखनऊ के थाना विभूति खंड मे आता था. तालाब किनारे लाश पड़ी होने की खबर सुन कर विभूति खंड के ही मोहल्ला बड़ा भरवारा में रहने वाली सत्यरूपा भी वहां पहुंच गई. उस का पति संतोष रात से गायब था. लाश देख कर वह दहाड़ मारमार कर रोने लगी. लाश उस के पति संतोष साहू की थी.

इसी बीच किसी ने इस मामले की सूचना थाना विभूति खंड को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. मृतक संतोष की उम्र करीब 45 साल थी. उस के पेट पर किसी तेज धारदार हथियार से कई वार किए गए थे, जिस से पेट में गहरे घाव लगे थे. लाश के पास ही उस की साइकिल पड़ी थी. मृतक की पत्नी के अनुसार उस के पास मोबाइल भी था, लेकिन कपड़ों की तलाशी में उस का मोबाइल नहीं मिला था.

थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने सत्यरूपा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि बीती रात संतोष अपने बेटे राकेश के साथ मछली खरीदने निकला था. मछली खरीद कर संतोष ने राकेश को घर भेज दिया था और खुद कुछ देर में आने की बात कह कर कहीं चला गया था. जब वह काफी देर तक नहीं लौटा तो उस ने फोन किया, लेकिन उस का मोबाइल बंद मिला. वह पूरी रात उस का नंबर मिलाती रही, लेकिन मोबाइल बराबर बंद ही मिला. सवेरा होते ही उस ने पति की तलाश शुरू की. पड़ोस में ही टिंबर का काम करने वाले सोनू को साथ ले कर जब वह पति को तलाश रही थी, तभी उसे तालाब किनारे एक लाश पड़ी होने की खबर मिली. इस के बाद वह तुरंत तालाब किनारे पहुंच गई.

सत्यरूपा ने बताया था कि संतोष राजगीर था और इन दिनों वह एक डाक्टर के घर पर काम कर रहा था. गत दिवस उसे पैसे मिले थे जिन में से थोड़े उस ने घर में दे दिए, बाकी अपने पास रख लिए थे. सत्यरूपा ने आशंका भी जताई थी कि कहीं लूट का विरोध करने पर उस के पति का कत्ल न कर दिया गया हो? प्राथमिक पूछताछ और काररवाई के बाद थानाप्रभारी दुबे ने संतोष की लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया. थाने लौट कर उन्होंने सत्यरूपा की तहरीर के आधार पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने सब से पहले संतोष के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. सीडीआर के मुताबिक संतोष के नंबर पर 3 अक्तूबर यानी घटना वाली रात आखिरी काल लखनऊ के थाना गुडंबा के आदिलनगर निवासी लक्ष्मण साहू ने की थी. पुलिस ने जब लक्ष्मण साहू के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि पेशे से लक्ष्मण भी राजगीर था और संतोष का करीबी दोस्त था. संतोष के घर उस का काफी आनाजाना था. यहां तक कि वह संतोष की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आताजाता था और काफी देर तक रुकता था. इस से अनुमान लगाया गया कि यह मामला अवैधसंबंधों का हो सकता है. संभव है संतोष के विरोध करने पर उस की हत्या की गई हो.

संदेह हुआ तो थानाप्रभारी देवेंद्र दुबे ने 7 अक्तूबर को लक्ष्मण और सत्यरूपा को हिरासत में ले कर उन से कड़ाई से पूछताछ की. थोड़ी सी सख्ती करने पर उन दोनों ने संतोष की हत्या का जुर्म कुबूल लिया. इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने अपने सहयोगियों के नाम भी बता दिए. पूछताछ के बाद पुलिस ने निखिल उर्फ पिंकू निवासी विकासनगर, लखनऊ और अजय चौहान उर्फ मुक्कू निवासी लखनऊ विश्वविद्यालय आवासीय परिसर को भी गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का मूल निवासी संतोष साहू अपने परिवार के साथ लखनऊ के विभूति खंड में बड़ा भरवारा में रहता था. वह राजगिरी का काम करता था.

संतोष का काम ठीक चल रहा था, जिस की वजह से परिवार का भरणपोषण करने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती थी. काम के दौरान ही एक दिन संतोष की मुलाकात लखनऊ के थाना गुडंबा के आदिलनगर मोहल्ले में रह रहे लक्ष्मण साहू से हुई. लक्ष्मण भी छत्तीसगढ़ के कमरधा जनपद के गांव पिपरिया थारा का रहने वाला था. वह लखनऊ में आदिलनगर में किराए पर रह कर राजगिरी का काम करता था. वह था तो शादीशुदा, लेकिन अकेला रहता था. उस के बीवीबच्चे कमरधा में ही रह रहे थे.

पहली मुलाकात में ही संतोष और लक्ष्मण कुछ इस तरह घुलमिल गए, मानो पुराने दोस्त हों. पीनेपिलाने वालों के बीच अकसर ऐसा ही होता है. एक ही राज्य से होने और खानेपीने के शौकीन होने की वजह से दोनों में अच्छी पटने लगी. लक्ष्मण ने संतोष को कई अच्छे काम दिलाए. इसी वजह से संतोष उस की दोस्ती पर पूरी तरह कुर्बान था. जब भी खुशी की कोई बात होती, दोनों खूब जश्न मनाते. पीनेपिलाने की महफिल हर बार लक्ष्मण के कमरे पर ही जमती थी.

एक दिन जब एक काफी बड़ा काम मिला तो संतोष बोला, ‘‘लक्ष्मण, आज खुशी का दिन है, इसलिए जश्न होना चाहिए.’’

‘‘जरूर,’’ लक्ष्मण चहका, ‘‘चलो, कमरे पर चलते हैं, वहीं बोतल खाली करेंगे.’’

‘‘तुम्हारे कमरे पर बहुत महफिलें हो चुकीं, आज तुम मेरे घर चलो,’’ संतोष बोला, ‘‘मेरी घर वाली बहुत बढि़या नौनवेज पकाती है. घर में बैठ कर शराब का भी मजा आएगा और मीट का भी.’’

‘‘अगर ऐसी बात है तो आज रहने दो,’’ लक्ष्मण ने अपनी राय जाहिर की, ‘‘अगले हफ्ते होली है, उस दिन दोहरा जश्न मनाएंगे.’’

‘‘होली का जश्न भी हो जाएगा,’’ संतोष अपनी खुशी नहीं दबा पा रहा था, ‘‘मुझे इतना बड़ा काम मिला है, इसलिए आज भी दावत होनी चाहिए.’’

लक्ष्मण संतोष की खुशी कम नहीं करना चाहता था. उस की बात मान कर वह उस के साथ उस के घर चला गया. घर में संतोष की पत्नी और बच्चे मौजूद थे. संतोष ने लक्ष्मण को उन सब से मिलवाया. चूंकि संतोष अपनी पत्नी सत्यरूपा से अकसर लक्ष्मण की बात किया करता था, इसलिए वह उस से मिल कर खुश हुई. लक्ष्मण सत्यरूपा को देख कर आश्चर्य में रह गया. कई बच्चों की मां हो कर भी उस के रूपलावण्य में कमी नहीं आई थी. न उस की त्वचा की दमक फीकी पड़ी थी और न ही पेट या कूल्हों पर चर्बी की परत जमी थी. उस के चेहरे में कशिश थी और मुसकान कातिलाना.

संतोष बोतल और मीट साथ लाया था. वह मीट वाली थैली सत्यरूपा को देते हुए बोला, ‘‘जल्दी से बढि़या मीट पका. ऐसा कि लक्ष्मण भी अंगुलियां चाटता रह जाए.’’

सत्यरूपा मीट ले कर किचन में चली गई तो संतोष लक्ष्मण के साथ शराब पीने बैठ गया. लक्ष्मण बातें करते हुए शराब तो संतोष के साथ पी रहा था, लेकिन उस का मन सत्यरूपा में उलझा हुआ था और उस की निगाहें लगातार उसी का पीछा कर रही थीं. जैसेजैसे नशा चढ़ता गया, वैसेवैसे उस की निगाहों में सत्यरूपा नशीली होती गई. शराब का दौर खत्म हुआ तो सत्यरूपा खाना परोस कर ले आई. खाना खा कर लक्ष्मण ने उस की दिल खोल कर तारीफ की. सत्यरूपा भी उस की बातों में खूब रस ले रही थी. खाना खाने के बाद लक्ष्मण अपने कमरे पर लौट गया.

इस के बाद लक्ष्मण जब भी संतोष से मिलता, उसे होली की दावत की याद दिलाना नहीं भूलता. लक्ष्मण को भी होली का बेसब्री से इंतजार था. उस ने मन ही मन सोच लिया था कि उसे होली में कैसे हुड़दंग मचाना है. उसे संतोष से कम, सत्यरूपा से ज्यादा होली खेलनी थी. सत्यरूपा को छूने, टटोलने और दबाने का इस से बेहतर मौका और कोई नहीं मिल सकता था. भाभी संग होली खेलने की रस्म भी है और दस्तूर भी. कुछ भी कर गुजरो, केवल एक ही जुमले में सारी खताएं माफ, ‘बुरा न मानो होली है.’ लक्ष्मण ने इसी हथियार को आजमाने का फैसला कर लिया था. उसे पूरा यकीन था कि होली में अगर वह मनमानी करेगा तो सत्यरूपा बुरा नहीं मानेगी.

आखिर इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और होली आ गई. होली के दिन 2 बजे तक रंग चला. उस के बाद लक्ष्मण ने नहाधो कर साफसुथरे कपड़े पहने और संतोष के घर पहुंच गया. दोस्त से रंग खेलने के लिए संतोष रंगों से सना बैठा था. लक्ष्मण को साफसुथरा आया देख कर संतोष ने रंग खेलने के बजाय उसे केवल गुलाल लगाया और गुझिया खिलाई. फिर उसे बैठाते हुए बोला, ‘‘मैं जरा नहा लूं, उस के बाद दोनों आराम से बैठ कर पिएंगे.’’

संतोष कपड़े ले कर बाथरूम में जा घुसा. लक्ष्मण को जैसे इसी समय का इंतजार था. उस ने साथ लाए पैकेट से गुलाल निकाला और अंदर पहुंच गया. सत्यरूपा उसे आंगन में मिल गई. वह उसे देखते ही चहका, ‘‘भाभी, होली मुबारक हो.’’ उस ने सत्यरूपा के गाल पर अंगुली से थोड़ा गुलाल लगा दिया. सत्यरूपा भी उसे होली की बधाई देते हुए बोली, ‘‘भाभी से होली खेलने आए हो तो ढंग से खेलो. यह क्या कि अंगुली से थोड़ा गुलाल लगा दिया.’’

लक्ष्मण ने सत्यरूपा की बात का गलत मतलब निकाला. फलस्वरूप उस की हसरतें जोश में आ गईं. उस की मुट्ठी में गुलाल था ही, अच्छा मौका देख उस ने गुलाल वाला हाथ सत्यरूपा के वर्जित क्षेत्रों तक पहुंचा दिया और उन्हें रंगने लगा. सत्यरूपा उस के गुलाल से सने दोनों हाथ पकड़ कर कसमसाते हुए बोली, ‘‘छोड़ो, यह क्या पागलपन है?’’

‘‘बुरा न मानो होली है.’’ लक्ष्मण ने कहा और अंगुलियों का खेल जारी रखा. सत्यरूपा किसी तरह उस से अपने आप को छुड़ा कर बोली, ‘‘अभीअभी नहाई थी, अब फिर से नहाना पड़ेगा.’’

‘‘नहा लेना,’’ लक्ष्मण हंसते हुए बोला, ‘‘साल भर में रंगों का त्यौहार एक ही दिन तो आता है.’’

सत्यरूपा के इस व्यवहार से यह बात साफ हो गई कि उस ने लक्ष्मण की इस अमर्यादित हरकत का बुरा नहीं माना था. लक्ष्मण वह नहीं समझ सका कि ऐसा होली की वजह से हुआ था, सत्यरूपा भी उस के जैसा भाव अपने मन में पाले हुए थी. इस हकीकत को जानने के लिए उस ने फिर से उसे बांहों में भर कर रंग लगाना शुरू कर दिया. सत्यरूपा को जिस तरह पुरजोर विरोध करना चाहिए था, उस ने वैसा विरोध नहीं किया. शायद उसे लक्ष्मण की यह हरकत अच्छी लगी थी. शायद वह कुछ देर और यूं ही लक्ष्मण की बांहों में सिमटी रहती, लेकिन तभी उसे संतोष के बाथरूम से बाहर निकलने की आहट सुनाई दी तो उस ने खुद को लक्ष्मण से अलग कर लिया.

जैसे ही संतोष बाथरूम से निकला, सत्यरूपा झट से बाथरूम में घुस गई. उसे डर था कि कहीं संतोष लक्ष्मण की हरकतों के सुर्ख निशान देख न ले. जब तक संतोष ने कपड़े पहने, तब तक लक्ष्मण ने भी गुलाल से सने हाथ धो लिए. इस के बाद वह कमरे में बैठ गया. नहाधो कर संतोष शराब की बोतल, पानी, गिलास और नमकीन ले आया. इस के बाद दोनों ने जाम से जाम लड़ाने शुरू कर दिए. सत्यरूपा भी नहा कर आ चुकी थी. हया से उस के गाल अब भी लाल हो रहे थे. वह दूर खड़ी अजीब सी नजरों से लक्ष्मण को देख रही थी.

सत्यरूपा के इस व्यवहार से लक्ष्मण को लगा कि सत्यरूपा भी उस की तरह ही मिलन को प्यासी है. अगर वह पहल करेगा तो शायद वह इनकार न करे. यही सोच कर उस ने उसी दिन सत्यरूपा पर अपने प्यार का रंग चढ़ाने का निश्चय कर लिया. लक्ष्मण ने मन ही मन योजना बना कर खुद तो कम शराब पी, संतोष को जम कर शराब पिलाई. देर रात शराब की महफिल खत्म हुई तो दोनों ने खाना खाया. लक्ष्मण ने भरपेट खाना खाया, जबकि संतोष चंद निवाले खा कर एक तरफ लुढ़क गया.

लक्ष्मण की मदद से सत्यरूपा ने संतोष को चारपाई पर लिटा दिया. इस के बाद वह हाथ झाड़ते हुए बोली, ‘‘अब इन के सिर पर कोई ढोल भी बजाता रहे तो भी यह सुबह से पहले जागने वाले नहीं.’’ इस के बाद उस ने लक्ष्मण की आंखों में झांकते हुए भौंहें उचकाईं, ‘‘तुम घर जाने लायक हो या इन के पास ही तुम्हारा भी बिस्तर लगा दूं.’’

लक्ष्मण के दिल में उमंगों का सैलाब उमड़ रहा था. उसे लगा कि सत्यरूपा भी यही चाहती है कि वह यहीं रुके और उस के साथ प्यार की होली खेले. इसलिए बिना देर किए उस ने कहा, ‘‘हां, नशा कुछ ज्यादा हो गया है, मेरा भी बिस्तर यहीं लगा दो.’’

सत्यरूपा ने लक्ष्मण के लिए भी चारपाई बिछा कर बिस्तर लगा दिया और बच्चों के साथ दूसरे कमरे में सोने चली गई. लक्ष्मण की आंखों में नींद नहीं थी. उसे सत्यरूपा के साथ दिन में बिताए पल बारबार याद आ रहे थे. उस के शारीरिक स्पर्श से वह काफी रोमांचित हुआ था. वह उस स्पर्श की दोबारा अनुभूति पाने के लिए बेकरार था. संतोष की ओर से वह पूरी तरह निश्चिंत था. आखिर फैसला कर के वह दबे पैर चारपाई से उठा और संतोष के पास जा कर उसे हिला कर देखा. उस पर किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह धड़कते दिल से उस कमरे की ओर बढ़ गया, जिस में सत्यरूपा बच्चों के साथ सो रही थी.

कमरे में चारपाई पर बच्चे लेटे थे, जबकि सत्यरूपा जमीन पर बिस्तर लगा कर लेटी थी. कमरे में जल रही लाइट बंद कर के लक्ष्मण सत्यरूपा के पास जा कर उस के बिस्तर पर लेट गया. जैसे ही उस ने सत्यरूपा को बांहों में भरा वह दबी जुबान में बोली, ‘‘मनमानी कर तो चुके, अब क्या करने आए हो, जाओ यहां से.’’

‘‘उस वक्त तो बनावटी रंग लगाए थे, अब तुम्हें अपने प्यार के असली रंग में सराबोर करने आया हूं. कह कर उस ने सत्यरूपा को अपने अंदाज में प्यार करना शुरू कर दिया. इस के बाद तो 2 जिस्मों के अरमानों की होड़ सी लग गई. बदन से कपड़े उतरते गए और हसरतें बेलिबास हो गईं. जल्दी ही उन के बीच वह संबंध बन गए, जो सिर्फ पतिपत्नी के बीच में होने चाहिए. एक ने अपने पति के साथ बेवफाई की थी तो दूसरे ने दोस्त के साथ दगाबाजी.’’

उस रात के बाद सत्यरूपा और लक्ष्मण एकदूसरे को समर्पित हो गए. सत्यरूपा लक्ष्मण के साथ रंगरलियां मनाने लगी. उस ने लक्ष्मण को अपना सब कुछ मान लिया. यही हाल लक्ष्मण का भी था. सत्यरूपा के साथ मौजमस्ती करने के लिए लक्ष्मण हर दूसरेतीसरे दिन संतोष के घर महफिल जमाने लगा. संतोष को वह नशे में धुत कर के सुला देता और बाद में सत्यरूपा के बिस्तर पर पहुंच जाता. जब लक्ष्मण की रातें अकसर संतोष के घर में गुजरने लगीं तो पड़ोसियों में कानाफूसी शुरू हो गई कि खानेपीने तक तो ठीक है, लेकिन पराए मर्द को घर में सुलाना कैसी दोस्ती है. जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है.

लोगों ने तांकझांक की तो लक्ष्मण और सत्यरूपा के संबंध का भेद खुलने में देर नहीं लगी. इस के बाद तो उन के अवैधसंबंध के चर्चे आम हो गए. आसपड़ोस में फैली बात संतोष के कानों तक पहुंची तो उस ने सत्यरूपा से पूछा. इस पर उस ने कहा कि वह उस का दोस्त है, उस के साथ ही खातापीता, उठताबैठता है. इस में वह क्या कर सकती है, लोगों का तो काम ही दूसरों की गृहस्थी में चिंगारी लगाना होता है.

इस के बाद संतोष ने फिर कभी सत्यरूपा से इस संबंध में कोई बात नहीं की. लेकिन सत्यरूपा और लक्ष्मण के दिमाग में यह बात आ गई कि आखिर कब तक वे इस तरह संतोष और दुनिया वालों की नजरों से बच पाएंगे. इस का कोई न कोई स्थाई हल निकालना ही होगा. दोनों ने इस मुद्दे पर काफी सोच विचार किया तो नतीजा यही निकला कि संतोष को बिना रास्ते से हटाए वे दोनों एकसाथ अपनी जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते. दोनों की सहमति बनी तो योजना बनते देर नहीं लगी.

इसी योजना के तहत लक्ष्मण ने अपने दोस्तों निखिल उर्फ पिंटू और अजय चौहान उर्फ मुक्कू से संतोष की हत्या करने की बात की तो दोनों ने हत्या के लिए 20 हजार रुपए मांगे. लक्ष्मण खुशी से पैसे देने के लिए तैयार हो गया. पेशगी के तौर पर उस ने दोनों को 5 हजार रुपए दे भी दिए. 3 अक्तूबर की रात लक्ष्मण अपने दोनों साथियों निखिल और अजय के साथ हनीमैन चौराहे पर पहुंचा. उस ने संतोष को काम दिलाने के बहाने वहीं से उस के मोबाइल पर बात की. सुन कर संतोष खुश हुआ तो लक्ष्मण ने उसे साइट दिखाने को कहा. वह आने को तैयार हो गया.

संतोष उस वक्त अपने बेटे राकेश के साथ मछली खरीदने के लिए मछली मंडी आया था. लक्ष्मण का फोन सुनने के बाद उस ने मछली खरीद कर बेटे राकेश को दे दी और कुछ देर में घर आने की बात कह कर उसे घर भेज दिया. इस के बाद संतोष साइकिल से हनीमैन चौराहे पर पहुंच गया. वहां लक्ष्मण उसे अपने 2 साथियों के साथ मिला. चारों ने एक ठेके पर बैठ कर शराब पी. शराब पीने के बाद लक्ष्मण और उस के साथी टहलने का बहाना बना कर उसे रेलवे लाइन के किनारे तालाब के पास ले गए. वहां दूरदूर तक कोई नहीं दिख रहा था.

सुनसान जगह देख कर लक्ष्मण ने निखिल और अजय के साथ मिल कर संतोष को दबोच लिया और उस के पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ कई वार कर दिए, जिस से संतोष जमीन पर गिर कर कुछ देर तड़पा, फिर हमेशा के लिए शांत हो गया. उसे मारने के बाद लक्ष्मण ने फोन कर के सत्यरूपा को उस की हत्या की जानकारी दे दी और तीनों वहां से फरार हो गए. पुलिस काल डिटेल्स के सहारे उन तक पहुंची तो घटना का खुलासा होने में देर नहीं लगी. सत्यरूपा और लक्ष्मण से पूछताछ के बाद पुलिस ने निखिल और अजय को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उन की निशानदेही पर घटनास्थल के पास की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया.

मुकदमे में चारों आरोपियों के नाम दर्ज करने के बाद पुलिस ने उन्हें उसी दिन सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Love Story in Hindi

— कथा

UP News : एक नाम पर 25 स्कूलों में नौकरी

UP News : आजकल जहां एक ओर शिक्षित युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं तो वहीं भाजपा के डबल इंजन की सरकार वाले राज्य में शिक्षा माफिया दोनों हाथों से अपनी तिजोरी भर रहे हैं. इन माफियाओं की मिलीभगत से एक टीचर प्रदेश के 25 विद्यालयों में पिछले 13 महीने से नौकरी करती पाई गई. कौन थी ये टीचर और कैसे व किस के रहमोकरम पर चल रहा था ये पूरा गोरखधंधा? पढ़ें, शिक्षक घोटाले की परतदरपरत खोलती यह खास कहानी.

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में एक ऐसा घोटाला सामने आया, जिस ने उत्तर प्रदेश ही नहीं अपितु पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. जिस ने पूरे सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े कर दिए थे. यह मामला गोंडा जिले का था. अनामिका शुक्ला केस, जिस में एक ही नाम के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर 25 विद्यालयों में फरजी नौकरियां हासिल की गईं और करोड़ों रुपए का वेतन लिया गया. इस केस ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. इस मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पैशल टास्क फोर्स को सौंपी थी, लेकिन जांच अधूरी रहने और नए खुलासों के साथ यह केस अब और भी उलझता जा रहा है.

मामला तब सुर्खियों में छाया रहा, जब सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने इस मामले में गंभीर आरोप लगाते हुए अनामिका शुक्ला को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया था, जिस में बेसिक शिक्षा विभाग में एक संगठित गिरोह की ओर इशारा करते हुए डेटा लीक और फरजी नियुक्तियों के जरिए सरकारी धन की लूट का दावा किया गया. बात 5 मई, 2025 की थी. जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) अंकित सिंह की अदालत में अनामिका शुक्ला प्रकरण को ले कर एक याचिका दायर की थी, जिस में उन्होंने 8 लोगों को आरोपी ठहराया था.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) अंकित सिंह ने आरोपी बनाए गए सिद्धार्थ दीक्षित (वित्त एवं लेखा अधिकारी), अतुल कुमार तिवारी (जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी), सुधीर सिंह (पटल लिपिक),  अनुपम पांडेय (वित्त एवं लेखा अधिकारी), दिग्विजय नाथ पांडेय (प्रबंधक, भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय रामपुर टेंगरहा), अज्ञात और अनामिका शुक्ला पुत्री सुभाष चंद्र शुक्ला (भुईनडीह, कमरवा, गोंडा) समेत 8 लोगों पर नगर कोतवाली थाने को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए.

अदालत के आदेश के बाद कोतवाल विवेक द्विवेदी ने मुकदमा अपराध संख्या 658/2025 भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 319(2) (प्रतिरूपक द्वारा छल), 318(4) (छल और बेइमानी से संपत्ति के परिदान के लिए उत्प्रेरित करना), 338 (मूल्यवान प्रतिभूति या किसी धन आदि को प्राप्त करने के प्राधिकार की कूटरचना), 336(3) (छल के प्रयोजन के लिए कूट रचना), 340(2) (कूटरचित दस्तावेज को जानबूझ कर असली के रूप में उपयोग में लाना), 316(5) (लोकसेवक द्वारा आपराधिक न्यास भंग करना) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया और आवश्यक काररवाई में जुट गए.

कोर्ट ने नगर कोतवाली पुलिस को आदेश दिया कि वह 10 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट अदालत में पेश करे. कोर्ट के आदेश पर मुकदमा दर्ज होते ही एक बार फिर से अनामिका शुक्ला केस सुर्खियों में छा गया और आरोपियों में बुरी तरह बेचैनी छा गई. वे खुद को निर्दोष बताते हुए गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट तक पहुंच गए.

अनामिका शुक्ला केस क्या है? इसे जानने के लिए पीछे की कहानी के काले पन्नों को उलटना होगा, जहां इस की बुनियाद डाली गई थी. कैसे प्रकाश में आया था अनामिका शुक्ला प्रकरण? इस पर भी रोशनी डालनी होगी. तो आइए पढ़ते हैं, हैरान कर देने वाली इस कहानी को, जहां शिक्षा विभाग के महासागर में ऐसेऐसे एनाकोंडा कुंडली मार कर बैठे हैं कि सरकारी धन को बिना डकार के पचाए जा रहे हैं.

साल 2020 की बात है. उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज की बेसिक शिक्षा अधिकारी अंजलि अग्रवाल ने विभाग के शिक्षकों का डिजिटल डेटाबेस तैयार करना शुरू किया था. जब उन की नजर अनामिका शुक्ला नाम पर गई तो वह बुरी तरह चौंक गईं.

ऐसे पकड़ में आया फरजी शिक्षक घोटाला

उन के सामने एक ऐसा चौंकाने वाला तथ्य आया, जिसे देखते ही वह बुरी तरह उछल गईं. वह नाम था अनामिका शुक्ला. एक ही नाम के दस्तावेजों के आधार पर उत्तर प्रदेश के 25 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियां की गई थीं. यह देखते ही उन का माथा ठनक गया था. इन नियुक्तियों के जरिए करीब 13 महीनों में लगभग एक करोड़ रुपए का वेतन भुगतान किया जा चुका था.

यह खुलासा होते ही विभाग में हड़कंप मच गया. जब दस्तावेजों की और गहराई से जांच की गई तो अनामिका शुक्ला नाम के दस्तावेजों में धुंधली तसवीरों और फरजी आधार कार्ड का इस्तेमाल किया गया प्रतीत हुआ, जिस के जरिए बैंक अकाउंट खोले गए और सैलरी ट्रांसफर की गई. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि अनामिका शुक्ला के नाम पर कोई दूसरी महिला नौकरी कर कर रही थी. उस महिला का नाम प्रिया जाटव था, जिस ने गोंडा के रघुकुल विद्यापीठ में बीएससी की पढ़ाई की थी. पता चला कि प्रिया की मुलाकात एक शख्स से हुई, जो मैनपुरी का रहने वाला था और उस का नाम था राज.

राज का शिक्षा विभाग के बड़ेबड़े अधिकारियों से गहरी पैठ थी, जो पैसे ले कर नौकरी दिलाने का काम करते थे. प्रिया जाटव भी नौकरी करना चाहती थी. उस ने राज नामक शख्स से संपर्क किया. राज ने कथित तौर पर एक लाख रुपए ले कर प्रिया जाटव को फरजी दस्तावेजों के जरिए शिक्षा विभाग में नौकरी दिलवाई. उस ने प्रिया जाटव के नौकरी के लिए जो फरजी दस्तावेज तैयार करवाए थे, वह किसी अनामिका शुक्ला के थे. उन्हें ऐसा धुंधला कर दिया गया था, जिस से वे आसानी से न तो पढ़े जा सकें और न ही पकड़ में आ सकें.

लेकिन किसी तरह भेद खुला तो पुलिस ने अनामिका शुक्ला उर्फ प्रिया जाटव को कासगंज से गिरफ्तार कर लिया. उस के गिरफ्तार होते ही राज फरार हो गया. लेकिन यह खेल यहीं नहीं थमा. इस कड़ी का एक सूत्रधार जसवंत सिंह, जो राज का भाई था, को पुलिस ने मैनपुरी से गिरफ्तार कर लिया गया. जसवंत ने पूछताछ में खुलासा किया कि उस ने 17-18 और लड़कियों को भी इसी फरजी दस्तावेजों के जरिए नौकरियां दिलवाई थीं.

अब सवाल यह उठ रहा था कि असली अनामिका शुक्ला कौन है? कहां की रहने वाली है? इस कहानी में उस समय सब से हैरान करने वाला नया मोड़ आया, जब 9 जून, 2020 को एक महिला, जो खुद को असली अनामिका शुक्ला बताती हुई गोंडा के बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय पहुंची और तत्कालीन बीएसए डा. इंद्रजीत प्रजापति से मिली और उन्हें एक प्रार्थना पत्र सौंपा. प्रार्थना पत्र का मजमून इस प्रकार से था—

जिला बेसिक अधिकारी गोंडा मैं अनामिका शुक्ला पुत्री श्री सुभाष चंद्र, गांव भुलईडीह पोस्ट- कमरावा की हूं. मैं ने निम्न वर्षों में शिक्षा ग्रहण किया है, जिस का विवरण निम्नवत है.

1- हाईस्कूल, कस्तूरबा बालिका इंटर कालेज, गोंडा, वर्ष- 2007, डिवीजन- प्रथम.

2- इंटरमीडियट, बेनीमाधव जंग बहादुर इंटर कालेज, परसपुर, गोंडा, वर्ष-2009, डिवीजन- प्रथम.

3- बीएससी, श्री रघुकुल महिला विद्यापीठ, सिविल लाइंस, गोंडा, वर्ष-2012, डिवीजन- द्वितीय.

4- बीएड, आदर्श कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जियापुर बरुवा, जलाकी टांडा, अंबेडकर नगर, वर्ष-2014, डिवीजन- प्रथम.

5- टीईटी परीक्षा नियामक प्राधिकारी उत्तर प्रदेश 23 ऐलनगंज, इलाहाबाद, वर्ष 2015, डिवीजन- प्रथम.

मैं ने वर्ष 2017 में निम्नलिखित जिले में कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में साइंस टीचर हेतु जनपद सुलतानपुर, जौनपुर, बस्ती, मिर्जापुर और लखनऊ में आवेदन किया था, परंतु काउंसलिंग हेतु वह कहीं भी उपस्थित नहीं हुई और न ही कहीं भी कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी की थी और न ही वर्तमान समय में किसी कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी कर रही हूं. आज दिनांक 9 जून, 2020 के अखबार में छपी खबर को पढ़ कर प्रतीत हुआ कि मेरे सभी शैक्षिक प्रमाण पत्रों का दुरुपयोग कर के फरजी लोगों द्वारा कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में नौकरी प्राप्त कर ली गई है.

मैं अपने समस्त शैक्षिक प्रमाण पत्रों की मूल प्रति के साथ आप के समक्ष उपस्थित हुई हूं. मेरे फोटो से परीक्षा दिए गए केंद्रों से मिलान कर के फरजी लोगों के विरुद्ध काररवाई करने की कृपा की जाए एवं प्रार्थिनी को प्रताडि़त न किया जाए.

प्रार्थिनी

(अनामिका शुक्ला पुत्री श्री सुभाष चंद्र)

और अंगरेजी में दस्तखत कर के प्रार्थना पत्र की ये प्रतिलिपियां बेसिक शिक्षा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) लखनऊ, परीक्षा निदेशक, शिक्षा निदेशालय, लखनऊ, पुलिस उपमहानिरीक्षक, देवीपाटन मंडल, गोंडा, आयुक्त देवीपाटन गोंडा, जिलाधिकारी गोंडा और जनपद के समस्त संवाददाता (मीडिया/इलैक्ट्रौनिक मीडिया) को भेज दी थी.

एक टीचर कैसे कर रही थी 25 स्कूलों में नौकरी

यह सुन कर इंद्रजीत प्रजापति के होश फाख्ता हो गए थे. उन्हें ऐसा लगा था, जैसे उन्होंने जो अभीअभी सुना था, वह सच भी हो सकता है. उन्होंने अनामिका शुक्ला को भरोसा दिलाया कि अगर उन के मूल दस्तावेजों के साथ वाकई छेड़छाड़ कर दुरुपयोग किया गया है तो इस की जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ विधिक काररवाई की जाएगी.

एक ही नाम से कई लोगों के नौकरी करने का मामला संज्ञान में आया तो महानिदेशक (बेसिक शिक्षा) विजय किरन आनंद ने पूरे मामले की जांच अपर निदेशक (बेसिक शिक्षा) रमेश कुमार तिवारी से कराई, जिस में कस्तूरबा विद्यालय (प्रयागराज) में पढ़ा रही एक शिक्षिका के सभी दस्तावेज और निवास प्रमाण पत्र फरजी पाए गए. जिस के बाद उन्होंने जांच रिपोर्ट महानिदेशक (बेसिक शिक्षा) विजय किरन आनंद को काररवाई के लिए भेज दी. महानिदेशक किरन ने प्रयागराज बीएसए संजय कुशवाहा को आगे की काररवाई के लिए आदेश दिया.

जो अध्यापिका अनामिका शुक्ला बन कर कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय में पढ़ा रही थी, उस का असली नाम रीना था. वह जिला फर्रुखाबाद की तहसील कायमगंज के राजपालपुर गांव की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम चंद्रभान सिंह था. यही पता निवास प्रमाणपत्र पर भी अंकित था. रीना ने असली अनामिका शुक्ला के शैक्षिक दस्तावेजों के साथ कूटरचना कर के, उसे लगा कर साइंस टीचर के रूप में गलत तरीके से कस्तूरबा विद्यालय में संविदा पर नियुक्ति हासिल की थी. जांच में मामला खुलने के बाद 16 मार्च, 2020 के बाद से उस ने विद्यालय आना बंद कर दिया था.

जांच के आधार पर बीएसए संजय कुशवाहा ने प्रयागराज के कर्नलगंज थाने में रीना उर्फ अनामिका शुक्ला के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. उस के खिलाफ पुलिस ने आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. मुकदमा दर्ज होने के बाद जांच शुरू हो गई थी. तब प्रयागराज के एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज थे, जो एक बेहद कड़क अफसर के रूप में जाने जाते थे. एसएसपी ने आरोपी रीना उर्फ अनामिका शुक्ला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया और वह गिरफ्तार कर जेल भेज दी गई थी.

अनामिका शुक्ला यहां चुप नहीं बैठी. उस ने भी गोंडा की नगर कोतवाली में एक तहरीर दे कर अपने दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल करने के खिलाफ एक केस दर्ज कराया. यह मामला मुकदमा अपराध संख्या-385/2020 पर आईपीसी की विविध धाराओं के साथ दर्ज कर जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ को सौंप दी गई. एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश के दिशानिर्देश में जांच शुरू की गई थी. इस दौरान एसटीएफ को बड़ी सफलता मिली. एसटीएफ की टीम ने लखनऊ से 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिन के नाम राज उर्फ पुष्पेंद्र जाटव उर्फ गुरुजी निवासी मैनपुरी, जो मुख्य आरोपी था.

इस की तैनाती फर्रुखाबाद में सहायक समन्वयक के पद पर थी. इस के अलावा जौनपुर में बेसिक शिक्षा कार्यालय में जिला समन्वयक अधिकारी आनंद और लखीमपुर में बेसिक शिक्षा कार्यालय में प्रधान लिपिक राजनाथ था. तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर एसटीएफ ने गोंडा पुलिस के हवाले कर दिया, जिन्हें पूछताछ के बाद जेल भेज दिया गया था.

पुलिस पूछताछ में सरगना पुष्पेंद्र जाटव उर्फ राज उर्फ गुरुजी ने बड़े चौंकाने वाले खुलासे किए थे. उस ने बताया था कि वह सुशील पुत्र गुलाब चंद के नाम से फरजी तरीके से सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त है. साल 2010 में उस की मुलाकात राजनाथ से हुई थी. राजनाथ की मदद से अंजलि नाम की महिला की नियुक्ति फरजी दस्तावेजों के जरिए कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में कराई थी. फिर उस ने अपने भाई जसवंत जाटव को विभव कुमार के नाम से फरजी डाक्युमेंट्स के जरिए कन्नौज में नौकरी पर लगवाया था.

एक बार अपनी कारस्तानी में गजब की सफलता पा लेने के बाद सरगना पुष्पेंद्र को मोटी कमाई का चस्का लग गया, जिस के लिए वह हमेशा लालायित रहने लगा. फिर तो उस की चांदी हो गई थी और यह सिलसिला आगे भी जारी रहा. इसी कड़ी में पुष्पेंद्र, रामनाथ और आनंद के माध्यम से दस्तावेजों में हेराफेरी कर के जौनपुर में फर्रुखाबाद की रहने वाली दीप्ति की फरजी दस्तावेजों के आधार पर शिक्षिका की नौकरी लगवाई थी.

सरगना पुष्पेंद्र ने पूछताछ में आगे जो बयान दिया था, उस से फरजीवाड़े की कहानी प्याज के छिलके की तरह परतदरपरत खुलती जा रही थी. उस ने आगे बताया कि उस की मुलाकात रामनाथ ने ही आनंद से कराई थी. आनंद की पत्नी शोभा तिवारी की जिला समन्वयक बालिका शिक्षा में भरती जौनपुर में कराई थी.

परतदरपरत खुलता गया केस

इस के आगे की पूछताछ की कड़ी में उस ने जो खुलासा किया था, उसे जानते ही पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई थी. आनंद जिस सीट पर बैठता था, बेहद जिम्मेदारी वाली थी. विद्यालय में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के आवेदन पत्र और अंक प्रमाणपत्र उसी के संरक्षण में रखे जाते थे. उसी के जरिए काउंसलिग में उपस्थित न होने वाले अभ्यर्थियों के बारे में जानकारी मिलती थी. इसी कड़ी में आनंद ने ही गोंडा की अनामिका शुक्ला के शैक्षिक दस्तावेज उसे उपलब्ध कराए थे. उसी ने वह दस्तावेज जिला बेसिक शिक्षा कार्यालय, हरदोई में तैनात लिपिक रामनाथ को दिए थे.

रामनाथ ने भी अपनी डफली अलग बजाई थी. रीना व अन्य महिला अभ्यर्थियों को रामनाथ ने अनामिका शुक्ला के नाम से सहारनपुर, बागपत, रायबरेली, अमेठी, अंबेडकरनगर में नियुक्त कराया था. यही नहीं, इसी कड़ी में जौनपुर की प्रीति यादव भी छली गई थी. आरोपी पुष्पेंद्र ने बताया कि आनंद ने ही उसे जौनपुर की रहने वाली प्रीति यादव को शैक्षिक प्रमाण पत्र दिए थे और उस ने वर्ष 2017 में कस्तूरबा गांधी विद्यालय, जौनपुर में नौकरी के लिए आवेदन किया था. उस के अभिलेखों के जरिए जौनपुर व आजमगढ़ में प्रीति यादव नाम की 4 फरजी टीचरों की नियुक्ति कराई गई थी.

इस के बाद उस ने ऐसे तमाम खुलासे किए, जिन में प्रत्येक महिला टीचर से 2-2 लाख रुपए लेने का दावा किया था, जिस का विवरण यहां देना मुश्किल होगा, क्योंकि उन तथ्यों का विवरण दिया जाए तो एक मजे की किताब तैयार हो सकती है. लेकिन बाद में किसी कारणवश जांच को बीच में ही रोक दिया गया. उत्तर प्रदेश में अनामिका शुक्ला के नाम पर प्राइमरी स्कूलों में बड़े पैमाने (25 टीचर) पर फरजी टीचर मामला गरमाया तो आयोग ने जांच के आदेश दिए. इतना बड़ा घोटाला सामने आते ही अफसरों की नींद उड़ गई. उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने भ्रष्टाचार निवारण, बेसिक शिक्षा विभाग और वित्त विभाग को इस प्रकरण में गहराई तक जा कर मामले को खंगालने का आदेश दिया.

फरजी शिक्षिकाओं को भरती कर के करोड़ों रुपए के घोटाले का मामला प्रकाश में आते ही गोंडा जिले के सुनील त्रिपाठी ने 17 मार्च, 2020 को पूरे मामले की खबर सूचना आयोग को दी. इस के बाद सूचना आयोग के कान खड़े हो गए. आयोग ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच के आदेश दिए. इसी कड़ी में सुनील त्रिपाठी ने सूचना आयोग में शिकायत की थी कि अनामिका शुक्ला टीचर घोटाले की जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश एसटीएफ से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई थी.

उन का कहना था कि इस घोटाले में प्रदेश भर के 20 से ज्यादा फरजी शिक्षकों ने अनामिका शुक्ला के डाक्युमेंट्स इस्तेमाल कर करोड़ों की सैलरी हड़प ली. उस की जांच रिपोर्ट की प्रमाणित प्रति उपलब्ध क्यों नहीं कराई जा रही है? बहरहाल, अनामिका शुक्ला प्रकरण की एसटीएफ की जांच ढीली पड़ी तो दूसरी ओर इसी मामले को एसआईटी से भी जांच कराई जा रही थी. जो आज भी चल रही है. सुनील त्रिपाठी के साथ ही जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय भी अनामिका शुक्ला प्रकरण को अदालत की चौखट तक खींच कर ले गए.

उन का आरोप यह था कि यह जांच एसटीएफ ने जानबूझ कर अधूरी छोड़ी थी ताकि असली संगठित गिरोह का खुलासा न हो सके. हैरानी की बात यह है कि अनामिका शुक्ला को 12 जून, 2020 में गोंडा के भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय, रामपुर टेंगरहा, तरबगंज में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति पत्र दिलवाया गया.

नियुक्ति पत्र में लिखा गया था, ”आप की नियुक्ति प्राइमरी अनुभाग में पूर्व की भांति कर ली जाए. उक्त निर्णय के क्रम में आप की नियुक्ति प्राइमरी अनुभाग में सहायक अध्यापक पद प्रशासन द्वारा देय वेतनमान में नियमावली के तहत की जाती है. आप की नियुक्ति पूर्णतया अस्थाई है. नियुक्ति पत्र आप को हस्तगत कराया जा रहा है. आप की नियुक्ति पत्र के क्रम में आज दिनांक 12/06/2020 से 3 दिन कार्य दिवस के अंदर अपने मूल शैक्षिक व प्रशिक्षण प्रमाण पत्रों के साथ स्वप्रमाणित छायाप्रतियां ले कर कार्यभार ग्रहण करने का कष्ट करें,’’ नीचे विद्यालय के प्रबंधक दिग्विजय नाथ पांडेय के दस्तखत थे.

अनामिका शुक्ला का यह नियुक्ति पत्र सामने आते ही भूचाल आ गया. दावा किया गया कि अनामिका को रोजगार मिल गया है. जबकि अनामिका शुक्ला के पति दुर्गेश कुमार शुक्ला ने बातचीत में बताया कि वह उसी विद्यालय में साल 2016 से स्थाई शिक्षिका है. वह 2016 से ही उसी विद्यालय में स्थाई सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत थी और वेतन ले रही थी. अब यह सवाल उठता है कि अगर अनामिका 2016 से कार्यरत थी तो 2020 में उसे दोबारा अस्थाई नियुक्ति क्यों दी गई? इस के बाद तो यह मामला बुरी तरह से उलझ गया.

साल 2024 में स्थानीय जनसंवाद मंच के कार्यकर्ताओं ने इस मामले को फिर से उठाया. उन की ओर से दिए गए शिकायती पत्रों से पता चला कि अनामिका शुक्ला की कोई स्थाई नियुक्ति भैया चंद्रभान दत्त विद्यालय में नहीं थी. न तो बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय में उन की नियुक्ति से जुड़ी कोई फाइल थी, न ही वेतन भुगतान का कोई आदेश डिस्पैच रजिस्टर में दर्ज था. फिर भी, फाइनैंस ऐंड अकाउंट औफिसर की ओर से अनामिका शुक्ला को नियमित रूप से वेतन दिया जा रहा था. दिसंबर 2024 में अचानक अनामिका शुक्ला का वेतन रोक दिया गया, जिस के बाद यह मामला एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया.

जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने 5 मई, 2025 को कोर्ट में प्रार्थना पत्र दे कर दावा किया कि बेसिक शिक्षा विभाग में एक संगठित गिरोह सक्रिय है, जो युवाओं के डेटा को लीक कर फरजी नियुक्तियां करता है और करोड़ों रुपए के सरकारी धन की लूट करता है. उन्होंने अनामिका शुक्ला के मामले को इस का उदाहरण बताया. प्रदीप कुमार पांडेय के मुताबिक अनामिका ने जून, 2020 में खुद को पीडि़ता (बेरोजगार) बता कर मुकदमा दर्ज कराया था, लेकिन जांच में यह सामने आया कि वह खुद इस घोटाले की लाभार्थी थी.

संगठित माफिया ने बुना पूरा जाल

प्रदीप पांडेय ने यह भी खुलासा किया कि 9 जनवरी, 2025 को अनामिका शुक्ला के खाते में वेतन भेजा गया, जिस के बारे में फाइनैंस ऐंड अकाउंट औफिसर ने बताया कि यह अगस्त 2024 के सैलरी रिविजन के आधार पर किया गया था. गोंडा के बेसिक शिक्षा अधिकारी अतुल कुमार तिवारी ने साफ किया कि उन के कार्यालय से अनामिका के वेतन के लिए कोई बिल या प्रस्ताव वित्त एवं लेखा कार्यालय को नहीं भेजा गया. फिर भी, वेतन संशोधन के नाम पर पन्ने बदल कर अनामिका को भुगतान किया गया.

बीएसए ने यह भी स्वीकार किया कि 2024 तक वेतन संशोधन की प्रक्रिया सीधे वित्त एवं लेखा कार्यालय की ओर से की जाती थी, जिस में बेसिक शिक्षा विभाग को कोई जानकारी नहीं थी. सचिव प्रदीप कुमार पांडेय ने आरोप लगाया कि यह पूरा खेल एक सिंडिकेट माफिया का हिस्सा है, जिस में वित्त एवं लेखा कार्यालय के कुछ कर्मचारी और बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल हैं. यह इसी से पता चलता है कि डिस्पैच रजिस्टर में अनामिका शुक्ला की नियुक्ति या वेतन से जुड़ा कोई रिकौर्ड नहीं है, जिस से यह साफ होता है कि यह भुगतान अवैध रूप से किया गया.

अनामिका शुक्ला केस उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में फैला हुआ भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक जीताजागता उदाहरण है. सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप कुमार पांडेय ने न्यायालय से इस मामले की गहन जांच की मांग की है, ताकि इस गिरोह के सभी सदस्य बेनकाब हो सकें और सरकारी धन की लूट को रोका जा सके. यह मामला न सिर्फ अनामिका शुक्ला के इर्दगिर्द घूमता है, बल्कि उन हजारों युवाओं की उम्मीदों को भी उजागर करता है, जिन के सपनों को शिक्षा माफिया ने कुचल कर रख दिया है. क्या अनामिका शुक्ला सचमुच में पीडि़ता है या वह इस घोटाले की एक कड़ी है? क्या बेसिक शिक्षा विभाग में चल रहा यह खेल कभी रुकेगा? इन तमाम सवालों का जवाब सिर्फ एक निष्पक्ष और गहन जांच ही दे सकती है.

सामाजिक कार्यकर्ता और जनसंवाद मंच के सचिव प्रदीप पांडेय की इसी शिकायत पर आयोग ने सिद्धार्थ दीक्षित (वित्त एवं लेखाधिकारी), अतुल कुमार तिवारी (जिला बेसिक शिक्षा अधिकरी), सुधीर सिंह (पटल लिपिक), अनुपम पांडेय (वित्त एवं लेखाधिकारी), दिग्विजय नाथ पांडेय (प्रबंधक भैया चंद्रभान दत्त स्मारक विद्यालय रामपुर टेंगरहा), अज्ञात और अनामिका शुक्ला पुत्री सुभाष चंद्र शुक्ला (भुईनडीह, कमरवा, गोंडा) समेत 8 लोगों पर नगर कोतवाली थाने को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे. मुकदमा दर्ज होते ही गोंडा के बेसिक शिक्षा विभाग के आला अफसरों की नींद हराम हो गई थी.

बेसिक शिक्षा अधिकारी अतुल तिवारी, तत्कालीन वित्त एवं लेखाधिकारी सिद्धार्थ दीक्षित और 2 पटल लिपिक सुधीर कुमार सिंह व अनुपम पांडेय एफआईआर रद्द करने की मांग को ले कर जज राजेश सिंह चौहान की कोर्ट नंबर 9 लखनऊ हाईकोर्ट पहुंच गए और हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. याचिका की सुनवाई के बाद चारों आरोपियों की अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. तब कहीं जा कर उन की सांस में सांस आई थी. चारों याचिकाकर्ताओं ने एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह विभाग) उत्तर प्रदेश, एसपी गोंडा, कोतवाली नगर और मुकदमा वादी प्रदीप कुमार पांडेय को पार्टी बनाया था.

लेखक ने इस संबंध में अनामिका शुक्ला का पक्ष जानने के लिए उन के मोबाइल नंबर-3333335430 पर कौल की तो अनामिका के पति दुर्गेश कुमार पांडेय ने कौल रिसीव की. चर्चित प्रकरण के संबंध में बातचीत करने पर उन्होंने बताया कि अनामिका शुक्ला को जबरन केस में फंसाया जा रहा है. वह पूरी तरह निर्दोष है. इस सारे फसाद का जड़ सुनील है. उन्होंने मुझ से पैसों की मांग की थी. जब मैं ने उन्हें पैसे देने से मना कर दिया तो उन्होंने प्रदीप से मिल कर पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. मगर मैं भी चुप बैठने वालों में से नहीं हूं. मुझे गोंडा पुलिस पर कतई भरोसा नहीं है कि वह निष्पक्ष तरीके से जांच करेगी, इसीलिए इस केस की मैं ने एसटीएफ जांच के लिए मांग की है और वह मांग स्वीकार हो गई है.

एसटीएफ की जांच पर है सब की नजर

19 सितंबर, 2025 को बहुचर्चित अनामिका शुक्ला प्रकरण एसटीएफ (अयोध्या) को जांच सौंप दिया गया. सीओ सौरभ मिश्र के नेतृत्व में 3 सदस्यीय टीम ने जांच संभाली है. जांच मिलते ही वे शाम को गोंडा बेसिक शिक्षा कार्यालय पहुंचे. यहां टीम ने बीएसए अतुल तिवारी से करीब 3 घंटे तक पूछताछ की. फिर टीम वहां से भैया चंद्रभान दत्त विद्यालय गई, जहां विद्यालय बंद मिला तो टीम वापस लौट आई थी.

एसटीएफ की जांच के दायरे में खुद अनामिका शुक्ला, गोंडा के वित्त एवं लेखा विभाग के साल 2017 से 2024 तक तैनात रहे लेखाधिकारी सिद्धार्थ दीक्षित, पटल लिपिक अनुपम पांडेय, अरुण शुक्ला और बीएसए अतुल तिवारी रडार पर हैं. फिलहाल अनामिका शुक्ला को 27 अक्तूबर, 2025 तक गिरफ्तार करने पर रोक लगा दी गई थी.

एक बार फिर अनामिका शुक्ला नाम का जिन्न बोतल से बाहर आ गया है. कौन सच्चा है और कौन झूठा? इस सचझूठ की जांच के लिए एसटीएफ को नाकों चबाने पड़ सकते हैं. फिर कहीं जा कर इस संगठित गिरोह का परदाफाश हो सकता है. जिस दिन इस सच से परदा उठा तो इस खेल के पीछे छिपे सफेदपोश माफिया भी बाहर आ सकते हैं. क्या इस सच से परदा उठ पाएगा? UP News

(कथा अनामिका शुक्ला के पति से बातचीत, दस्तावेज एवं मीडिया जानकारी पर आधारित)

 

 

Love Story in Hindi : गुनाह प्यार, सजा मौत

Love Story in Hindi : आरती का गुनाह यही था कि उस ने नेतराम से प्यार किया और घर वालों के मना करने के बावजूद उस से कोर्टमैरिज कर ली. घर के अन्य लोगों ने इसे एक दुर्घटना माना और सोच लिया कि आरती मर गई. लेकिन राकेश इस बात को भुला नहीं सका और 7 सालों बाद उसे मौत के घाट उतार दिया.

आरती आगरा की डिफेंस कालोनी के रहने वाले लौहरे सिंह चाहर की बेटी थी. उस के अलावा उन की 3 संतानें और थीं, जिन में 2 बेटे प्रवीण, राकेश और एक बेटी बीना थी. लौहरे सिंह सेना से सूबेदार से रिटायर हुए थे. उन का बड़ा बेटा प्रवीण भी पढ़लिख कर सेना में भर्ती हो गया था. नौकरी लगते ही लौहरे सिंह ने उस का विवाह कर दिया था. इस के बाद उस से छोटी बेटी बीना का भी विवाह लौहरे सिंह ने सेना में सिपाही की नौकरी करने वाले कमल सिंह सोलंकी के साथ किया था. वह चाहते थे कि उन का छोटा बेटा भी सेना में जाए. वह अपनी छोटी बेटी आरती की भी शादी सेना में नौकरी करने वाले से करना चाहते थे, लेकिन न तो उन का छोटा बेटा सेना में गया और न ही वह छोटी बेटी आरती की शादी सेना में नौकरी वाले लड़के से कर पाए.

दरअसल, लौहरे सिंह का छोटा बेटा राकेश लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. पढ़नेलिखने के बजाय यारदोस्तों की सोहबत उसे कुछ ज्यादा अच्छी लगती थी. दोस्तों के साथ वह जो उलटेसीधे काम करता था, उस की शिकायतें घर आती रहती थीं, जिस से लौहरे सिंह परेशान रहते थे. उन्होंने बड़े बेटे प्रवीण के साथ मिल कर उसे सुधारने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की इस कोशिश का कोई लाभ नहीं हुआ. राकेश को न सुधरना था, न सुधरा. बेटे की वजह से लौहरे सिंह की काफी बदनामी हो रही थी. बेटे को इज्जत की धज्जियां उड़ाते देख उन्होंने सोचा कि उसे किसी रोजगार से लगा दिया जाए तो दोस्तों का साथ अपनेआप छूट जाएगा.

इस के लिए उन्होंने बगल वाले मोहल्ले चावली में आटा चक्की लगवा कर उस पर उसे बैठा दिया. उस की मदद के 15 साल के मुकेश को नौकर रख दिया. मुकेश था तो नौकर, लेकिन राकेश से उस की खूब पटती थी. जबकि मुकेश की उम्र राकेश से काफी काम थी. चक्की पर अकसर आने वाली एक लड़की पर मुकेश का दिल आ गया. मुकेश ने उसे अपने प्रेमजाल में फंसाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लड़की ने उसे भाव नहीं दिया. चूंकि राकेश मुकेश से दोस्त जैसा व्यवहार करता था, इसलिए उस ने लड़की वाली बात राकेश को भी बता दी थी. जब लड़की ने मुकेश को भाव नहीं दिया तो राकेश ने कहा, ‘‘अगर किसी तरह तू उस लड़की से शारीरिक संबंध बना ले तो वह अपनेआप तेरी मुरीद हो जाएगी.’’

इस के बाद मुकेश उस लड़की से शारीरिक संबंध बनाने का मौका ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका तो मिल गया, लेकिन उस में उसे राकेश को भी साझा करना पड़ा. हुआ यह कि लड़की चक्की पर आटा लेने आई तो किसी बहाने से मुकेश उसे चक्की के पीछे बने कमरे में ले गया और उस के साथ जबरदस्ती कर डाली. उस समय राकेश भी वहां मौजूद था, इसलिए इस काम में उसे साझा करना पड़ा. राकेश ने सोचा था कि इज्जत के डर से लड़की कुछ नहीं बोलेगी. लेकिन जब उस ने कहा कि वह उन की करतूत घर वालों से बताएगी तो दोनों डर के मारे उसे चक्की के अंदर बंद कर के भाग गए. बाद में लड़की ने रोते हुए शोर मचाया तो मोहल्ले वालों ने उसे बाहर निकाला.

इस के बाद पीडि़त लड़की के घर वालों ने मुकेश और राकेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. चूंकि पीडि़त लड़की नाबालिग थी, इसलिए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने रातदिन एक कर के राकेश और मुकेश को पकड़ कर अदालत में पेश किया, जहां से राकेश को जेल भेज दिया गया तो नाबालिग होने की वजह से मुकेश को बाल सुधार गृह. मुकेश नाबालिग था, इसलिए करीब साढ़े 3 महीने बाद उसे जमानत मिल गई, लेकिन बालिग होने की वजह से राकेश की जमानत की अर्जियां एक के बाद एक खारिज होती गईं, जिस की वजह वह जेल से बाहर नहीं आ सका. यह सन 2006 की बात थी.

बेटे के जेल जाने से लौहरे सिंह की बदनामी तो हुई ही, परेशानी भी बढ़ गई थी. बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए वह काफी भागदौड़ कर रहे थे. इस में उन का समय भी बरबाद हो रहा था और पैसा भी. राकेश की वजह से वह छोटी बेटी आरती पर ध्यान नहीं दे पाए और उस ने भी जो किया, उस से एक बार फिर उन्हें बदनामी का दंश झेलना पड़ा. जिन दिनों राकेश ने यह कारनामा किया था, उन दिनों आरती कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. ग्रेजुएशन उस ने कर ही रखा था, इसलिए कंप्यूटर का कोर्स पूरा होते ही उसे एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर पर कंप्यूटर सिखाने की नौकरी मिल गई. इस नौकरी में वेतन तो ठीकठाक मिल ही रहा था, इज्जत भी मिल रही थी.

आरती ने जो चाहा था, वह उसे मिल गया था. मांबाप की लाडली होने की वजह वह वैसे भी जिद्दी थी, अब ठीकठाक नौकरी मिल गई तो घर में दबंगई दिखाने लगी. आरती जो चाहती थी, वही होता था. कमाऊ बेटी थी, इसलिए मांबाप भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे. जिस कंप्यूटर सेंटर पर आरती नौकरी कर रही थी, उसी में आगरा के थाना तेहरा (सैया) के गांव बेहरा छरई का रहने वाला नेतराम कुशवाह भी नौकरी करता था. वह चंदन सिंह की 9 संतानों में चौथे नंबर पर था. एमए करने के बाद उस ने कंप्यूटर कोर्स किया और उसी कंप्यूटर सेंटर पर शिक्षक की नौकरी करने लगा, जहां आरती नौकरी कर रही थी.

आरती और नेतराम हमउम्र और हमपेशा थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. इस के बाद दोनों साथसाथ बैठ कर चाय भी पीने लगे और लंच भी करने लगे. नेतराम को जब पता चला कि आरती डिफेंस कालोनी में रहती है और उस के पिता लौहरे सिंह चहार सेना से रिटायर सूबेदार हैं. उस का बड़ा भाई ही नहीं, बड़ी बहन का पति भी सेना में है तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘आरती, तब तो तुम्हारी शादी भी किसी फौजी से ही होगी.’’

‘‘हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती. मैं शादी उसी से करूंगी, जो मुझे अच्छा लगेगा. आप को बता दूं, यह जरूरी नहीं कि वह मेरी जाति का ही हो. वह किसी अन्य जाति से भी हो सकता है. तुम भी हो सकते हो.’’

आरती की इस बात से नेतराम हैरान रह गया. चूंकि वह कुंवारा था और आरती उसे पसंद थी. वह उस से शादी भी करना चाहता था, लेकिन जाति अलग होने की वजह से यह बात कहने की वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. जबकि लड़की हो कर आरती ने यह बात कह दी थी. लगातार मिलते रहने और साथसाथ खानापीना होने से आरती और नेतराम का आपसी सामंजस्य बैठता गया और फिर उन की दोस्ती सचमुच प्यार में बदल गई. इस के बाद नेतराम आरती के घर भी आनेजाने लगा. घर वाले उसे आरती का दोस्त मानते थे, इसलिए कभी किसी ने न तो उस के घर आने पर ऐतराज जताया, न उस से मिलनेजुलने पर.

इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि एक तो वह कमाऊ बेटी थी, दूसरे उन्हें विश्वास था कि उन की बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना करना पड़े. धीरेधीरे आरती और नेतराम का आपसी लगाव बढ़ता गया. उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे अलगअलग जाति से हैं. समय के साथ उन के प्यार की गांठ मजबूत होती गई और वे आपस में शादी के बारे में सोचने लगे. जब इस बात की जानकारी चाहर परिवार को हुई तो घर में हंगामा मच गया. एक तो जाट परिवार, दूसरे फौजी, हंगामा तो मचना ही था. लौहरे सिंह और प्रवीण ने आरती पर बंदिशें लगानी चाहीं तो वह बगावत पर उतर आई.

उस ने साफ कह दिया कि यह जिंदगी उस की अपनी है, वह जैसे चाहे जिए. अगर उसे परेशान किया गया या बंदिश लगाई गई तो वह उन की इज्जत का भी खयाल नहीं करेगी. इस के बाद आरती ने नेतराम से कहा कि जो भी करना है, जल्द कर लिया जाए. क्योंकि जितना समय बीतेगा, तनाव बढ़ता ही जाएगा. आरती का बड़ा भाई प्रवीण नौकरी की वजह से ज्यादातर बाहर ही रहता था. छोटा भाई जेल में था. घर में मातापिता थे, वे भी बूढ़े हो चुके थे. बेटे की वजह से वे वैसे ही परेशान थे, इसलिए आरती के बारे में वे वैसे भी ज्यादा नहीं सोच पाते थे.

नेतराम के भी इरादे मजबूत थे. वह जानता था कि पढ़ीलिखी, समझदार आरती के साथ उस की जिंदगी मजे से कटेगी. आरती उस के प्यार में इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उस का पीछे लौटना मुश्किल था. जबकि वह जानती थी कि अलग जाति होने की वजह से नेतराम से शादी करना उस के परिवार पर भारी पड़ सकता है. पूरी बिरादरी हायतौबा मचाएगी, लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी. उसे अपना भविष्य नेतराम में ही दिखाई दे रहा था. यही वजह थी कि न चाहते हुए भी उस ने 12 दिसंबर, 2007 में नेतराम के साथ कोर्टमैरिज कर ली. उस दिन सुबह आरती नौकरी के लिए घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. मां ने फोन किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है.

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, इसलिए लौहरे सिंह को समझते देर नहीं लगी कि आरती कहां गई होगी. अगले दिन आरती ने फोन कर के अपनी शादी के बारे में बड़ी बहन बीना को बताया तो उन्होंने इस बात की जानकारी मांबाप को दे दी. आखिर वही हुआ, जिस का चाहर परिवार को डर था. बेटी की इस करतूत से घर वालों को गहरा आघात लगा. एक बेटा दुष्कर्म के आरोप में जेल में था, बेटी ने गैर जाति के लड़के से शादी कर ली थी. बदनामी के डर से भले ही उन्होंने कोई काररवाई नहीं की, लेकिन वे उस के इस अपराध को माफ नहीं कर सकते थे. बेटी बालिग थी, वह उस का कुछ कर भी नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने यह सोच कर संतोष कर लिया कि वह उन के लिए मर गई. घर के अन्य लोगों ने तो खुद को संभाल लिया, पर आरती की मां खुद को नहीं संभाल पाई और बेटी के इस निर्णय की वजह से उस की मौत हो गई.

आरती ने नेतराम से शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली थी. वह उस के साथ खुश थी. पतिपत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे थे. इस के अलावा नेतराम घर से भी संपन्न था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई कभी नहीं थी. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद आरती ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम हर्षित रखा गया. आरती के घर वालों ने शादी के बाद कभी आरती के बारे में कुछ जानने की कोशिश नहीं की तो उस ने भी कभी कुछ नहीं बताया. नेतराम और आरती, दोनों ही पढ़ेलिखे और महत्वाकांक्षी थे. दोनों ठीकठाक कमाते भी थे, इस के अलावा वह घर से भी संपन्न था, इसलिए मजे से जिंदगी कट रही थी.

सन 2009 में नेतराम की मां सुमित्रा देवी का निधन हो गया था. तब तक आरती चाहर ने बीएड भी कर लिया था, इसलिए उस ने नेतराम से अपना एक स्कूल खोलने को कहा. नेतराम के पास पैसे भी थे और जमीन भी, उस ने अपने करीबी कस्बे तेहरा में मां के नाम सुमित्रा देवी कन्या इंटरकालेज खोल दिया. नेतराम खुद स्कूल का मैनेजर बन गया और पत्नी आरती को स्कूल का प्रिंसिपल बना दिया. उन का यह स्कूल जल्दी ही बढि़या चलने लगा, जिस से कमाई भी बढि़या होने लगी. इस के बाद नेतराम ने आगरा की नई विकसित हो रही कालोनी रचना पैलेस में एक प्लाट ले कर उस में 10 कमरों का बढि़या 2 मंजिला मकान बनवा लिया. इस मकान का नंबर था 93. मकान तैयार हो गया तो नेतराम पत्नी और बच्चों के साथ उसी में रहने लगा. अब तक आरती एक और बेटे की मां बन चुकी थी, जिस का नाम युवराज रखा गया था.

सन 2007 से सन 2014 तक के 7 साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला. नेतराम तरक्की के नित नए आयाम स्थापित करते चले गए. अब वह एक टैक्निकल कालेज खोलना चाहते थे. वह अपनी एक संस्था भी चला रहे थे, जिस के अंतर्गत गरीब और असहाय बच्चों को कंप्यूटर सिखाया जाता था. राष्ट्रीय कंप्यूटर शिक्षा मिशन के अंतर्गत चल रही इस संस्था की कई जिलों में शाखाएं खुल गई थीं. इन सभी शाखाओं का कोऔर्डिनेशन नेतराम खुद कर रहे थे. नेतराम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे थे. उन्हें अब किसी चीज की कमी नहीं थी. भरपूरा परिवार तो था ही, समाज में अच्छीखासी शोहरत और इज्जत मिलने के साथ पैसे भी खूब आ रहे थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक 20 नवंबर, 2014 को आरती की हत्या हो गई.

हुआ यह कि दिन के डेढ़ बजे नेतराम ने आरती को फोन किया तो फोन नहीं उठा. कई बार फोन करने के बाद जब आरती की ओर से फोन रिसीव नहीं किया गया तो उन्हें हैरानी हुई. इस के बाद उन्होंने ऊपर की मंजिल  में रहने वाले अपने किराएदार को फोन कर के आरती से बात कराने का अनुरोध किया. किराएदार अपना मोबाइल फोन ले कर नीचे आया और ‘भाभीजी… भाभीजी…’ आवाज लगाते हुए घर के अंदर पहुंचा तो बैडरूम का नजारा देख कर उस के होश उड़ गए. उस ने शोर मचा कर पूरी कालोनी तो इकट्ठा कर ही ली, नेतराम से भी तुरंत घर आने को कहा.

5-7 मिनट में ही नेतराम घर आ गए. मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह तेजी से घर के अंदर पहुंचे. उन के साथ कालोनी के कई लोग अंदर आ गए थे. घर के अंदर की स्थिति बड़ी ही खौफनाक थी. आरती की लाश बैड पर एक किनारे पड़ी थी, उस का सिर नीचे की ओर लटका हुआ था. गरदन से बह रहा खून फर्श पर फैल रहा था. आरती की बगल में बैठा युवराज रो रहा था. वह मर चुकी मां को उठाने के चक्कर में खून से सन चुका था. पत्नी की हालत देख कर नेतराम फफकफफक कर रोने लगे. रोते हुए ही उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े युवराज को उठाया और किराएदार को थमा कर उसे नहला कर कपड़े बदल देने का अनुरोध किया.

अब तक उन का बड़ा बेटा हर्षित भी स्कूल से आ चुका था. मां की हालत देख कर वह भी रोने लगा. पड़ोस की औरतों ने उसे संभाला. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पुलिस अधिकारियों की आधा दर्जन गाडि़यां रचना पैलेस में आ कर खड़ी हो गईं. एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ (सदर) असीम चौधरी थाना ताजगंज के थानाप्रभारी मधुर मिश्रा घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. डौग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और फोटोग्राफर को भी बुला लिया गया था. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से मकान और उस कमरे का निरीक्षण किया, जिस में आरती की लाश पड़ी थी. इस मामले में डौग स्क्वायड कोई खास मदद नहीं कर सका. उस ने बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक 3-4 चक्कर लगाए और मकान से बाहर आ कर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास रुक गया.

पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्यारे बैडरूम और ड्राइंगरूम के बीच चहलकदमी करते रहे होंगे. उस के बाद मकान से निकल कर बगल वाले मकान चारदीवारी के पास आए होंगे, जहां उन की मोटरसाइकिल या स्कूटर खड़ी रही होगी. मकान के निरीक्षण में पुलिस ने देखा कि हत्या के बाद हत्यारों ने बैडरूम के बगल में लगे वाशबेसिन में खून सने हाथ धोए थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स ने ड्राइंगरूम में रखे चाय के 2 कपों से फिंगरप्रिंट उठाए. चाय के कप और ट्रे में रखी नमकीन, मिठाई देख कर पुलिस अधिकारी समझ गए कि जिस ने भी यह कत्ल किया है, वह कोई खास परिचित रहा होगा.

अब पुलिस को यह पता करना था कि खास लोगों में ऐसा कौन हो सकता है, जो हत्या कर सकता है. पुलिस ने जब इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि मृतका आरती चाहर ने घर वालों के खिलाफ जा कर अन्य जाति के नेतराम कुशवाह से करीब 7 साल पहले प्रेमविवाह किया था. तब उस के घर वालों ने इस बात को अपना अपमान मान कर खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी. पुलिस को जांच आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिल गया था, लेकिन फिलहाल तो उन्हें घटनास्थल की काररवाई निपटानी थी. आवश्यक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने आरती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उसी 7 साल पुरानी धमकी के आधार पर नेतराम ने आरती के भाई राकेश चाहर के खिलाफ आरती की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

चूंकि राकेश का एक साथी लोकेश भी अकसर नेतराम के घर आता रहता था, इसलिए नेतराम को शक था कि हत्या के समय वह भी साथ रहा होगा, इसलिए मुकदमे में उस का नाम भी शामिल करा दिया था. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए राकेश और लोकेश के फोन नंबर ले लिए. इस के बाद उन नंबरों पर फोन किए गए तो वे नंबर बंद पाए गए. हत्या के बाद नंबर बंद होने से पुलिस का संदेह बढ़ गया. इस मामले की जांच थाना ताजगंज का उसी दिन चार्ज संभालने वाले थानाप्रभारी मधुर मिश्रा को सौंपी गई.

उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक टीम बनाई, जिस में एसएसआई प्रमोद कुमार यादव, नरेंद्र कुमार, सिपाही रामन और आशीष कुमार को शामिल किया. चूंकि एक स्कूल प्रिंसिपल की दिनदहाड़े हत्या का मामला था, इसलिए सीओ सिटी असीम चौधरी भी इस मामले पर नजर रखे हुए थे. पुलिस को राकेश की तलाश थी. इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो घर में मौजूद उस का बड़ा भाई प्रवीण सिंह फौजी वर्दी की धौंस दिखाते हुए पुलिस से उलझ गया. नाराज पुलिस टीम उसे हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में उस से पूछताछ चल रही थी कि मुखबिर से पुलिस टीम को राकेश के साथी लोकेश के बारे में पता चल गया.

पुलिस लोकेश को पकड़ कर थाने ले आई. शुरुआती पूछताछ में तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. उस ने एक पान वाले से भी कहलवाया कि उस दोपहर को वह उस की दुकान पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था. पुलिस पान वाले को भी ले आई. इस के बाद जब पुलिस ने अपने ढंग से पूछताछ की तो पान वाले ने बक दिया कि उस ने लोकेश के कहने पर झूठ बोला था. इस के बाद पुलिस ने लोकेश से सच्चाई उगलवा ली. लोकेश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो उस की निशानदेही पर पुलिस ने थाना एत्माद्दौला की ट्रांस यमुना कालोनी के बी ब्लाक के मकान नंबर 3/5 से राकेश को गिरफ्तार कर लिया. सीओ असीम चौधरी दोनों को अपने औफिस ले आए, जहां की गई लगभग एक घंटे की पूछताछ में राकेश ने आरती की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

जिन दिनों आरती ने प्रेमविवाह किया था, उन दिनों राकेश जेल में था. दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत से उसे 10 साल के कैद की सजा हुई थी. घर वालों के खिलाफ आरती की छोटीमोटी बगावतें वह पहले से ही सुनता आ रहा था, लेकिन जब बड़े भाई प्रवीण ने उसे नेतराम से विवाह की खबर सुनाई तो उस का खून खौल उठा. नेतराम कुशवाह से उसे कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि अगर उस की बहन आरती न चाहती तो भला उस की क्या मजाल थी कि वह आरती से जबरदस्ती कोर्टमैरिज कर लेता. उस की नजरों में इस के लिए दोषी उस की बड़ी बहन आरती थी.

राकेश ने अपने घर वालों की इज्जत बचाने के लिए आरती को खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने जेल से ही आरती को धमकी दी कि उस ने जो किया है, इस के लिए वह उसे सबक जरूर सिखाएगा. उसी बीच आरती की वजह से मां की मौत हो गई तो राकेश को आरती से नफरत हो गई. उस ने कसम खा ली कि कुछ भी हो, वह आरती को जीवित नहीं छोड़ेगा. राकेश जेल की जिस बैरक में सजा काट रहा था, उसी में लोकेश नाम का एक लड़का आया. वह पड़ोस के ही मोहल्ले का रहने वाला था, इसलिए राकेश से उस की दोस्ती हो गई. जल्दी ही दोनों के संबंध इतने मधुर हो गए कि वे एक ही थाली में खाना खाने लगे. उन्होंने जीवन भर इस संबंध को निभाने की कसमें भी खाईं.

राकेश और लोकेश हमउम्र थे. दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे, इसलिए राकेश ने अपनी बहन आरती के प्रेमविवाह के बारे में बता कर पूछा कि इस मामले में क्या किया जाना चाहिए? समझदारी दिखाते हुए लोकेश ने सलाह दी कि इस मामले में अभी इंतजार करना चाहिए. आरती को उस के किए की सजा इस तरह दी जाए कि पुलिस भी पता न कर सके कि ऐसा किस ने किया होगा. आरती ने जो किया था, उस से घर के सभी लोग नाराज थे. इसलिए जब कभी कोई जेल में राकेश से मिलने आता तो उस का जिक्र जरूर छिड़ता. राकेश के लिए परेशानी यह थी कि उस के मुकदमे की कोई ठीक से पैरवी करने वाला नहीं था. मां मर चुकी थी, बाप बूढ़ा था, बड़ा भाई और बहनोई फौज में थे. जिस की वजह से वे ज्यादातर बाहर रहते थे. एक बहन थी बीना, वही कभीकभी मिलने आ जाती थी.

राकेश चाहता था कि किसी तरह हाईकोर्ट से उस की जमानत हो जाए. बूढ़े होने की वजह से पिता भागदौड़ नहीं कर पा रहे थे. इसलिए राकेश ने बीना से कहा कि वह आरती से बात कर के उस की जमानत करवा दे. बीना ने आरती को फोन कर के कहा भी कि वह जेल जा कर राकेश से मिल ले और उस की जमानत करा दे. लेकिन आरती न तो राकेश से मिलने जेल गई और न ही उस की जमानत कराई. जबकि राकेश के पिता लौहरे सिंह ने आरती को उस की जमानत कराने के लिए एक लाख रुपए नकद और इतने के गहने भी दिए थे. रुपए और गहने ले कर भी आरती ने राकेश की जमानत के प्रति ध्यान नहीं दिया.

राकेश जेल से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था. आरती न तो उस से मिलने गई थी और न उस की जमानत कराई थी. इस से उसे लगा कि बहन उस के बारे में जरा भी नहीं सोच रही है. लगभग 6 महीने पहले हाईकोर्ट से उस की जमानत हुई. राकेश घर आ गया. बहन के व्यवहार से उस के मन में एक टीस सी उठती थी. लेकिन अभी वह जमानत पर जेल से आया था, इसलिए कोई अपराध नहीं करना चाहता था. इस के बावजूद वह बहन को उस के किए की सजा देना चाहता था. लेकिन वह यह काम इस तरह करना चाहता था कि उस पर आरोप लगने की बात तो दूर, कोई शक भी न कर सके. इस के लिए उस ने आरती से मधुर संबंध बनाने शुरू किए. जल्दी ही उस ने इस तरह संबंध बना लिए, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है.

राकेश के बदले व्यवहार से आरती भी उसे मानने लगी थी. वह जब भी आता था, आरती उसे खूब खिलातीपिलाती थी, जाते समय कुछ न कुछ बांध भी देती थी. जरूरत पड़ने पर रुपएपैसे से भी उस की मदद करती थी. इस के अलावा अगर वह पति और बच्चों के साथ कहीं बाहर घूमने जाती थी तो उसे भी साथ ले जाती. उसी बीच लोकेश भी जेल से बाहर आ गया तो दोनों साथसाथ दिखाई देने लगे. आरती के ठाठबाट और सुखी जीवन से राकेश को ईर्ष्या हो रही थी. वह सोचता था कि अगर आरती चाहती तो बहुत पहले ही वह जेल से बाहर आ जाता. लेकिन उस ने उस की परेशानी को बिलकुल नहीं समझा. आरती भले ही राकेश का खूब खयाल रखती थी, लेकिन सही बात यह थी कि आरती बिलकुल नहीं चाहती कि राकेश उस के घर आए.

इस बात को राकेश समझ गया था, इसलिए वह खुद को अपमानित महसूस करता था. इन सब बातों से उसे लगता था कि इस तरह की बहन को सुख से जीने का कोई अधिकार नहीं है. राकेश के मन में क्या है, शायद आरती ने ताड़ लिया था. इसलिए वह उस की ओर से निश्चिंत नहीं थी. वह नेतराम से कहती भी रहती थी कि उसे राकेश से डर लगता है. जबकि नेतराम का कहना था कि राकेश तो वैसे ही कानून के शिकंजे में है, इसलिए अब वह कोई गैरकानूनी काम कर के अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करेगा. एक दिन राकेश लोकेश को साथ ले कर आरती के घर पहुंचा. जब आरती को पता चला कि लोकेश भी जेल से छूट कर आया है तो उसे झटका सा लगा. उस ने राकेश से कहा भी, ‘‘उसे ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहिए.’’

राकेश को बहन की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘‘यह मेरा देस्त है. दोस्त कैसा भी हो, दोस्त ही होता है.’’

इस के बाद राकेश आरती के घर से बाहर आया तो लोकेश से बोला, ‘‘दोस्त, मैं अपनी इस बहन को सहन नहीं कर पा रहा हूं. मेरे घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर देखो यह किस तरह सुख और चैन से जी रही है.’’

‘‘उस कालिख को तो इस के खून से ही धोया जा सकता है.’’ लोकेश ने कहा. राकेश भी यही सोच रहा था. साथी मिल गया तो उस का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि परिवार की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली बहन को कैसे सबक सिखाया जाए. आरती को भले ही राकेश पर विश्वास नहीं था, लेकिन राकेश बहन और बहनोई का विश्वास जीतने कोशिश कर रहा था. हफ्ते में 2-3 बार वह बहनबहनोई और भांजों से मिलने उन के घर आता था. उस के साथ लोकेश भी होता था. आरती के पास किसी चीज की कमी नहीं थी, इसलिए अच्छाअच्छा खिलानेपिलाने के साथ वह छोटे भाई राकेश को पौकेट मनी भी देती थी. इस की वजह यह थी कि आरती और नेतराम राकेश से अपने संबंध मधुर बना लेना चाहते थे.

26 नवंबर, 2014 को वैष्णो देवी जाने के लिए नेतराम ने पूरे परिवार का टिकट कराया था. नेतराम ने साथ ले जाने के लिए राकेश की भी टिकट करा रखी थी. जबकि राकेश बहन को सबक सिखाने का मौका तलाश रहा था. 18 नवंबर को राकेश और लोकेश आरती के यहां बैठे बातें कर रहे थे, तभी बातोंबातों में नेतराम ने कहा कि 20 नवंबर को उसे सजावट का सामान (झूमर झाड़फानूस) लेने फिरोजाबाद जाना है. यह सुन कर राकेश की आंखों में चमक आ गई. थोड़ी देर बाद राकेश लोकेश के साथ बाहर आ गया. इस के बाद उस ने लोकेश के साथ मिल कर आरती की हत्या की योजना बना डाली.

18 नवंबर की बातचीत के अनुसार, 20 नवंबर की सुबह के करीब 11 बजे नेतराम को फिरोजाबाद जाने के लिए घर से निकलना था. लेकिन इस बीच उस का प्रोग्राम बदल गया. उस ने डिजाइन पसंद करने के लिए आरती को भी साथ चलने के लिए तैयार कर लिया था. इस नए प्रोग्राम के अनुसार उसे 2 बजे के आसपास घर से निकलना था. नेतराम का बड़ा बेटा हर्षित स्कूल गया था, जिसे डेढ़ बजे तक घर आना था. आरती चाहती थी कि वह अपने हाथों से उसे खाना खिला कर फिरोजाबाद जाए.

नेतराम के फिरोजाबाद जाने के प्रोग्राम में बदलाव हो चुका है, यह राकेश और लोकेश को पता नहीं था. 20 नवंबर, 2014 दोपहर के बाद नेतराम और आरती को फिरोजाबाद जाना था, इसलिए नेतराम अपने कंप्यूटर सेंटर के काम से 2-3 घंटे में आने के लिए कह कर सेवला स्थित एक साइबर कैफे पर चला गया. आरती घर के कामों में लग गई. नेतराम के जाते ही साढ़े 10 बजे के आसपास राकेश मोटरसाइकिल से लोकेश को साथ ले कर आरती के घर के लिए चल पड़ा. आरती को सबक सिखाने की योजना राकेश ने 18 नवंबर को ही बना डाली थी, इसलिए 19 नवंबर की शाम को उस ने चाकू खरीद लिया था. हत्या करने में किसी तरह की झिझक न हो, इसलिए एकएक क्वार्टर शराब खरीद कर पी लिया.

सवा 11 बजे जब राकेश और लोकेश मोटरसाइकिल से रचना पैलेस कालोनी की ओर जा रहे थे तो उन्हें नेतराम जाता दिखाई दिया. उन्हें लगा कि वह फिरोजाबाद जा रहा है. इस के बाद दोनों एक पान के खोखे के पास खड़े हो गए. आधेपौने घंटे बाद जब उन्हें लगा कि नेतराम शहर से बाहर निकल गया होगा तो दोनों आरती के घर की ओर चल पड़े. योजनानुसार राकेश ने मोटरसाइकिल आरती के घर से कुछ दूरी पर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास खड़ी कर दी और इधरउधर देख कर लोकेश के साथ बहन के घर जा पहुंचा. भाई और उस के दोस्त के आने पर आरती ने फटाफट चाय बनाई और नमकीन एवं मिठाई के साथ उन्हें पीने को दी. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘राकेश, तुम दोनों चाय पियो, तब तक मैं युवराज को नहला देती हूं.’’

यह कह कर आरती युवराज को गोद में ले कर कपड़े उतारने लगी तो राकेश ने कहा, ‘‘दीदी, आप ने कुछ देने को कहा था. लाइए उसे दे दीजिए.’’

आरती ने युवराज को लोकेश को थमाया और खुद किचन में गई. अब तक चाय खत्म हो चुकी थी. इसलिए किचन में जा कर जैसे ही आरती ने फ्रिज खोलना चाहा, पीछे से राकेश पहुंच गया. उस ने आरती के गले में पड़े दुपट्टे की लपेट कर पकड़ लिया और घसीटते हुए बैडरूम ले गया. हक्काबक्का आरती कुछ कहती, युवराज को लोकेश की गोद में देख कर डर गई कि उस के चिल्लाने पर वह उस के बेटे का अनिष्ट न कर दे. इस के बाद राकेश ने आरती को बैड पर गिरा कर चाकू से हमला कर दिया. गला रेत कर उस की हत्या करने के बाद गले की चेन और कान के कुंडल उतार लिए. इस के बाद अलमारी वगैरह खोल कर उस में रखा कीमती सामान ले कर इधरउधर फैला दिया, जिस से लगे कि यह हत्या लूट के लिए की गई है.

आरती की हत्या करने के बाद दोनों घर से निकले और मोटरसाइकिल से आराम से चले गए. लोकेश अपने घर चला गया, जबकि राकेश अपने एक दोस्त के घर जा कर लोकल न्यूज चैनल पर समाचार देखने लगा कि पुलिस की जांच किस दिशा में जा रही है. राकेश पुलिस जांच का पता लगा पाता, पुलिस ने पहले लोकेश को और फिर उस की मदद से उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, गहने, मोटरसाइकिल और कपड़े बरामद कर के दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

राकेश ने बहन को मौत के घाट उतार कर उस के मासूम बच्चों को अनाथ कर दिया है. लेकिन उसे न तो बहन की हत्या का कोई दुख है, न उस के बच्चों के अनाथ होने का. उस का कहना है कि बहन ने परिवार पर बदनामी का जो दाग लगाया था, उस के खून से उस ने वह दाग धो दिया है. अब उसे चाहे जो भी सजा मिले, उसे उस का कोई दुख नहीं है. Love Story in Hindi

 

UP Crime News : बहन के प्यार का साइड इफेक्ट

UP Crime News : गगन उर्फ गौतम नहीं चाहता था कि उस की सौतेली बहन नंदिनी मोहल्ले के दूसरी बिरादरी के युवक से प्यार करे. लेकिन नंदिनी भी जिद्दी थी. अपनी जिद पूरी करने के लिए उस ने भाई गगन की पूर्व प्रेमिका ममता के साथ मिल कर भाई के खिलाफ ऐसी खूनी साजिश रची कि…

घर में सभी लोगों की लाडली नंदिनी की शादी को ले कर उस के पिता ओमप्रकाश चिंतित रहते थे. उस की शादी की उम्र हो चुकी थी. वह जितनी चंचल, उतनी ही हिम्मती और बातबात पर अड़ जाने वाली थी. जिद्दी इतनी कि एक बार जो मन में ठान लिया, उसे पूरा कर के ही छोड़ती थी. मुरादाबाद की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाले ओमप्रकाश के खातेपीते सुखीसंपन्न परिवार में पत्नी ओमवती के अलावा बेटी नंदिनी और बेटा गगन था.

मुरादाबाद की लालबाग रामगंगा कालोनी में रहने वाले इस परिवार के सभी सदस्य सौतेलेपन की कुंठा से ग्रसित थे. वहीं सौतेलापन नंदिनी को भी भीतर ही भीतर कुछ ज्यादा ही कुरेदता रहता था. उस की बड़ी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी. वह अपने घर में खुश थी, लेकिन नंदिनी को पड़ोस में रहने वाले प्रदीप नाम के युवक से प्यार हो गया. लेकिन वह उस की बिरादरी का नहीं था. इस के अलावा वह बेरोजगार भी था. इसी बात को ले कर गगन उस के प्रेम में रोड़ा बन बैठा था. नंदिनी गगन की भले ही सौतेली बहन थी, लेकिन वह नहीं चाहता था कि नंदिनी प्रदीप से प्यार करे. गगन अपने मातापिता को इस बारे में उकसाता भी रहता था. पिता भी गगन का ही पक्ष लेते थे. सौतेली मां कलावती का निधन भी बीते साल कैंसर से हो चुका था.

घर में नंदिनी की एकमात्र हमदर्द गगन की पत्नी राधा बन सकती थी, लेकिन उस की घर में जरा भी नहीं चलती थी. गगन नंदिनी के साथसाथ उसे भी काफी डांटडपट कर रखता था. कई बार इस वजह से नंदिनी काफी दुखी हो जाती थी और गगन के विरोधी तेवर को अपने दिल पर लेती हुई बिफर भी पड़ती थी. उस के मुंह से निकल पड़ता था, ‘‘गगन उस का दुश्मन है, क्योंकि वह सौतेला भाई जो है, अपना होता तो…’’

अब नंदिनी को यह समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने दिल की बात कहे तो किस से? अपनी समस्या का समाधान निकाले भी तो किस की मदद ले? यही सोच कर वह हमेशा तनाव में रहती थी. प्रेमी प्रदीप के साथ वह ज्यादा समय तक मिलबैठ भी नहीं सकती थी. क्योंकि गगन उस पर हमेशा पहरेदार की तरह तना रहता था. हर बात में मिर्चमसाला लगा कर पिता को बताता था और घर में बात का बतंगड़ बना डालता था. और तो और, उस के प्रेमी को नाकारा निकम्मा कहता हुआ घर में सभी के सामने उसे काफी जलील करता था. इस बात को ले कर नंदिनी परेशान रहने लगी थी. उस के मन में तरहतरह के खयाल आतेजाते रहते थे.

अपनी समस्याओं को ले कर उधेड़बुन में एक बार नंदिनी बाजार से गुजर रही थी. तभी अचानक उस की मुलाकात ममता से हो गई. उसी ने टोका, ‘‘अरे नंदिनी तुम! काफी परेशान दिख रही हो? क्या बात है?’’

‘‘अरे ममता! तुम तो पहचानने में ही नहीं आ रही हो. तुम्हारी शादी होने वाली है क्या? बहुत दिनों बाद मिली… कैसी हो तुम?’’ नंदिनी ने चौंकते हुए उसी की तरह एक साथ कई सवाल दाग दिए.

‘‘मैं तो बस अपने दिल को बहला रही हूं. खुद को दिलासा दे रही हूं. तुम्हारे भाई ने जब से मुझे धोखा दिया है, उस के बाद समझो आज ही मूड फ्रैश करने के लिए थोड़ा बनठन कर निकली हूं… अच्छी लग रही हूं न?’’ ममता ने भी नंदिनी के अंदाज में जवाब दिया.

‘‘बहुत ही अच्छी, ग्लैमरस. तुम्हारी सुंदरता का कोई जवाब नहीं. तुम कुछ भी पहन लो हीरोइन दिखती हो…’’ नंदिनी बोली.

‘‘बसबस, किसी की अधिक तारीफ नहीं करते. उस से उस की मुराद पूरी होने में अड़चन आ जाती है.’’ ममता बोली.

‘‘तुम्हारी मुराद क्या है?’’ नंदिनी तपाक से पूछ बैठी.

‘‘बदला,’’ नंदिनी के लहजे में ममता बोली.

‘‘एेंऽऽ बदला… यह कोई मुराद हुई? मगर किस से?’’ चौंकती हुई नंदिनी ने पूछा.

‘‘तुम्हारे उसी भाई से, जो मेरी जिंदगी उजाड़ कर तुम्हारी जिंदगी भी बरबाद करने पर तुला है.’’ ममता गुस्से में बोली.

‘‘कह तो तुम बिलकुल सही रही हो, मगर क्या कर सकती हूं, समझ नहीं पा रही हूं.’’ नंदिनी ने कहा.

वह मायूसी के साथ आगे कहने लगी, ‘‘गगन सौतेला भाई है न, इसलिए अपना सौतेलापन खुल कर दिखा रहा है. प्रदीप को मेरा और पूरे परिवार का दुश्मन बताता है. पापा को उस के खिलाफ काफी भड़का दिया है. पापा से बोलता है कि उन की जायदाद पर प्रदीप की नजर है. तुम तो जानती हो उसे, वह ऐसा बिलकुल ही नहीं है. वह मुझे बहुत प्यार करता है. मैं भी उसे बहुत चाहती हूं.’’

‘‘देखो, नंदिनी तुम्हारे चाहने और नहीं चाहने से क्या होता है. गगन कभी नहीं चाहता है कि तुम्हारी प्रदीप के साथ शादी हो. इस के पीछे छिपा हुआ उस का मकसद समझो. वह जानता है कि तुम्हारी प्रदीप से शादी होने पर तुम इसी मोहल्ले में रहने लगोगी… और फिर अपने पिता की संपत्ति पर हक जताने लगोगी. इसलिए वह तुम्हारी शादी कहीं दूर करवाना चाहता है.’’ ममता ने समझाया.

इसी के साथ उस ने यह भी कह दिया कि उन दोनों का एक ही दुश्मन है गगन. गगन की प्रेमिका थी ममता यह बात नंदिनी के दिमाग में घर कर गई. उस वक्त तो ममता और नंदिनी अपनीअपनी उलझनों का बोझ एकदूसरे पर उतार कर विदा हो लिए, लेकन दोनों के दिमाग में गगन के विरोध की ज्वाला धधकने लगी. ऐसा होना भी स्वाभाविक था. नंदिनी को गगन हमेशा कहता रहता था कि प्रदीप उस का हितैषी नहीं दुश्मन है, वह उस के साथ प्रेम का नाटक कर रहा है और उस की मंशा जमीनजायदाद हथियाने की है. एक समय में लालबाग रामगंगा कालोनी निवासी रमेश कुमार की बेटी ममता गगन की प्रेमिका हुआ करती थी. गगन उस पर जान छिड़कता था. गगन भी ममता से बेइंतहा मोहब्बत करता था. उस का दीवाना था.

वह बेहद सुंदर और मांसलता के दैहिक आकर्षण से भरी हुई थी, अपनी खूबसूरती को आधुनिक पहनावे और स्टाइल से और भी ग्लैमर बना देती थी. बौडी लैंग्वेज से ले कर बोलचाल तक से किसी को भी पलक झपकते ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी. उस के स्वच्छंद विचार और आधुनिक पहनावे से निखरे रूपरंग का कई लोग गलत अर्थ भी निकालते थे. दबी जुबान में उसे बदचलन तक कह देते थे. ऐसी धारणा रखने वालों में गगन के पिता ओमप्रकाश भी थे. उन्होंने ममता को ले कर गगन को एक बार खूब डांटा था. उस से दूर रहने की चेतावनी दी. यहां तक कि उन्होंने भी उसे बदचलन करार दे दिया था. दुर्भाग्य से 2018 में गगन की मां कलावती का कैंसर से निधन हो गया.

करीब 25 साल पहले ही ओमप्रकाश ने अमरोहा निवासी विवाहिता कलावती से दूसरा विवाह तब किया था, जब उन की पहली पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. विवाह के वक्त कलावती की गोद में 3 साल का गगन भी था. नंदिनी का बचपन उसी सौतेले भाई के साथ गुजरा, जो अब 28 साल का हो चुका था. ओमप्रकाश की पहली पत्नी से उन के 2 बच्चे पूजा और नंदिनी थी. वे पूजा की शादी कर चुके थे और नंदिनी की शादी के प्रयास में थे. कलावती के निधन के बाद ओमप्रकाश घर को संभालने के लिए गगन की शादी की योजना बनाने लगे थे. इसी सिलसिले में ममता के साथ उस के प्रेम संबंध का मामला सामने आ गया था. उन्होंने ममता से शादी करना सिरे से मना कर दिया था.

इस पर गगन न तो पिता का विरोध कर पाया, और न ही ममता की भावनाओं की कद्र. और फिर गगन की शादी 6 जुलाई 2018 को मुरादाबाद में ही बलदेवपुरी थाना कटघर निवासी कुंदन कुमार की बेटी राधा से हो गई. गगन का राधा के साथ शादी होना ममता को अच्छा नहीं लगा. वह खुल कर विरोध नहीं कर पाई, लेकिन भीतर ही भीतर नफरत की आग में जल उठी. इस का जिक्र उस ने कई बार अपने दूसरे दोस्तों से भी किया, वह अकसर महीने-2 महीने के लिए दूसरे शहर चली जाया करती थी और लोगों को कभी बरेली तो कभी लखनऊ में नौकरी लगने की बातें बताती रहती थी.

यहां तक कि वह अपने मातापिता से अलग किराए का कमरा ले कर रहने लगी थी. वह जिगर कालोनी में स्थित एक्सपोर्ट फर्म में काम करती थी. वह प्रदीप को भी ताने मारती थी, जो उस के दूर का रिश्तेदार था. ममता ने प्रदीप को एक बार तो साफसाफ कह दिया था कि जब तक गगन रहेगा तब तक उस की नंदिनी से शादी नहीं हो पाएगी.

यही बात वह नंदिनी को भी ताना देते हुए अकसर कहती थी कि गगन उसे उस के प्रेमी प्रदीप से कभी मिलने नहीं देगा. गगन भले ही उस का सौतेला भाई है, लेकिन उस की पिता की संपत्ति का वारिस वही बनेगा. उस दिन बाजार में ममता ने नंदिनी को एक बार फिर उस के हरे जख्म को कुरेद दिया था. ममता से बात कर के नंदिनी विचलित हो गई थी. गगन चाहता था कि उस की बहन की शादी किसी रोजगारशुदा व्यक्ति से ही हो. इस में उसे सौतेले पिता का भी समर्थन मिला हुआ था. नंदिनी के पिता हमेशा गगन का पक्ष ले कर नंदिनी को समझाते थे कि प्रदीप न तो बिरादरी का है, और न ही बराबरी का. जबकि इस की नंदिनी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी. वह मस्ती में रहती हुई अपनी जिद पर अड़ी थी.

कबाड़ी का कारोबार करने वाले गगन का यही सोचना था कि प्रदीप की निगाह उस के पिता की प्रौपर्टी पर टिकी है. ओमप्रकाश एक्सपोर्ट फर्म में काम करते थे. उन के लाड़प्यार में पली नंदिनी ही घर की देखभाल और खर्च की पूरी जिम्मेदारी संभाले हुई थी. बाजार और बैंक आदि का हिसाबकिताब नंदिनी के जिम्मे था. फिर भी घर में गगन की ही मनमानी चलती थी. वह पत्नी राधा को इस से दूर रखता था. नंदिनी नहीं चाहती थी कि उस की शादी किसी दूसरे शहर में हो. वह हमेशा पिता के मकान में ही रहना चाहती थी. प्रदीप को ले कर गगन के साथ नंदिनी का हमेशा झगड़ा होता रहता था.

बात जून 2021 की है. जब एक दिन नंदिनी के साथ गगन का झगड़ा काफी बढ़ गया था. इस कारण गगन अपनी ससुराल जा कर रहने लगा था. तब उस की पत्नी राधा भी अपने मायके में ही थी. एक तरफ नंदिनी थी, और दूसरी तरफ ममता. दोनों के दिल में गगन को ले कर विरोध की सुलगती चिंगारी जबतब भड़क उठती थी. नंदिनी अपने प्रेमी से शादी में आई बाधा को ले कर परेशान थी तो ममता को गगन से शादी नहीं हो पाने का मलाल था. कारण ममता ने गगन के साथ कई साल साथ गुजारे थे और विवाह होने के कसमेवादे किए थे. उन पलों को याद करके हुए ममता भावुक हो जाती थी. ममता ने प्रण कर लिया था कि वह गगन को जरूर सबक सिखाएगी. ममता को बस समय का इंतजार था.

नंदिनी से मिलने के बाद ममता ने अपने दिल की भड़ास निकाल दी थी. तभी ममता को मालूम हुआ था कि गगन 2 महीने से अपनी ससुराल बलदेवपुरी में रह रहा है. नंदिनी से मुलाकात से कुछ दिन पहले ही ममता की मुलाकात प्रदीप से भी हुई थी. उस ने नंदिनी की परेशानी के बारे में उसे जानकारी दे दी थी. उस ने भी बदले की आग में जलती ममता और नंदिनी की पीड़ा गहराई से महसूस की. जल्द ही तीनों ने गगन को लक्ष्य बना कर एक मीटिंग की. विशेषकर नंदिनी और ममता ने प्रदीप को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

योजना के मुताबिक प्रदीप ने अपने एक दोस्त वीरू उर्फ हरीश को भी साथ ले लिया. वीरू मुरादाबाद में थाना मझोला के गांव जयंतीपुर का रहने वाला एक बदमाश किस्म का युवक था. तीनों ने वीरू से गगन को ठिकाने लगाने की बात कही. उन्होंने बदले में उसे 50 हजार रुपए दिए. दरअसल, नंदिनी और ममता ने मिल कर प्रदीप के माध्यम से गगन को रास्ते से हमेशा के लिए हटाने की योजना बनाई थी.

योजना के अनुसार नंदिनी ने ममता को गगन का मोबाइल नंबर दिया. ममता ने अपने पूर्व प्रेमी गगन को काल की, ‘‘हैलो गगन.’’

‘‘हां, कौन?’’ गगन ने पूछा

‘‘अरे मुझे पहचाना नहीं, मैं तुम्हारी ममता बोल रही हूं.’’

ममता ने उलझाया मीठी बातों में गगन अचानक ममता की आवाज सुन कर एकदम से भौचक्का रह गया. भले ही ममता से उस की शादी नहीं हुई थी, किंतु उस के दिल में ममता अभी भी बसी हुई थी. न चाहते हुए भी अचरज से बोला, ‘‘चलो, तुम्हें मेरी याद तो आई.’’

‘‘मुझ से मिलोगे नहीं? तुम्हें तो पता ही होगा कि अब मेरा घर वालों से कोई वास्ता नहीं रहा. मैं बंगला गांव में रह रही हूं किराए पर. पास ही जिगर कालोनी में जौब करती हूं, फोन में तुम्हारा नंबर अचानक दिख गया तो तुम्हारी याद आ गई. फिर मैं ने फोन कर लिया.’’ ममता बोली.

गगन अभी कुछ बोलता इस से पहले ही ममता बोली, ‘‘मैं हर्बल पार्क घूमने आई थी. पार्क की सुंदरता देख कर तुम्हारे साथ यहां गुजारे पुराने दिन याद आ गए. आ जाओ यहीं पार्क के रेस्तरां में एक बार फिर मिलते हैं. साथ बैठते हैं…’’

बीते दिनों की कई पुरानी बातें बता कर ममता ने गगन को काफी भावुक कर दिया था. वह ममता की बातें सुन कर पुराने दिनों के हसीन लम्हों में खो गया. ममता गगन का पहला प्यार थी. गगन को ममता के साथ बिताए पल अचानक झिलमिलाने लगे थे. वह ममता से बोला,‘‘तुम बुलाओ और हम न आएं, ऐसा नहीं हो सकता.’’

थोड़ी देर में ही गगन हर्बल पार्क पहुंच गया. ममता जींस टौप पहने बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. गगन ने आते ही ममता को बाहों में भर लिया. ममता उस से छूटते ही बोली, ‘‘तुम अभी भी वही पुराने वाले गगन, जरा भी नहीं बदले…लेकिन अब तुम शादीशुदा हो आगे से ध्यान रखना हां. …अच्छा चलो पार्क के बाहर झाडि़यों की ओर चलते हैं. वहीं बैठ कर कुछ बातें करेंगे, आराम से.’’

गगन को झाडि़यों में ले गई ममता गगन ने महसूस किया कि ममता में कोई बदलाव नहीं आया है, वही पहले की तरह चंचल अदाएं, कसक और अपनापन….

‘‘ थोड़ा रुको यार, बहुत दिनों बाद मिले हो तुम्हारे लिए कोल्ड ड्रिंक्स और नमकीन लाती हूं. वहीं पार्क में बैठ कर साथसाथ पीएंगे.’’

ममता के बोलने पर गगन बोला, ‘‘हांहां क्यों नहीं.’’

‘‘ बस मैं कैंटीन गई और अभी आई.’’ बोलती हुई ममता कैंटीन की ओर जाने लगी.

तभी गगन हाथ खींचते हुआ बोला, ‘‘यह काम तुम्हारा नहीं मेरा है.’’

‘‘देखो मैं ने तुम्हें बुलाया है. समझो कि आज तुम हमारे मेहमान हो.’’ ममता कहती हुई गगन से हाथ छुड़ा कर तेजी से कैंटीन की ओर दौड़ी चली गई. गगन उसे देखता रह गया.

ममता यह सब योजना के मुताबिक कर रही थी. ममता की जिद के आगे गगन कुछ नहीं कर पाया. वह केवल ममता के साथ गुजारे पुराने लम्हों को ही याद करता रह गया.

‘‘ आओ चलें…’’ ममता बोली.

गगन एक बार फिर सपनों की दुनिया से बाहर आया. ममता के हाथ से कोल्ड ड्रिंक अपने हाथ में ले ली. ममता डिसपोजल गिलास और नमकीन का पैकेट संभालती हुई झाडि़यों की ओर बढ़ गई. कुछ पल में ही दोनों पार्क के मुख्य मार्ग से नजर नहीं आने वाली झाडि़यों के पीछे थे. गगन टायलेट का इशारा करते हुए उस ओर चला गया. ममता के लिए इस से अच्छा मौका और क्या हो सकता था. उस ने तुरंत दोनों डिसपोजल गिलास निकाले. उन में दोतिहाई कोल्ड ड्रिंक भरा और अपने साथ लाई नशीले पदार्थ की पुडि़या एक गिलास में डाल दी. गगन के आते ही उस ने अपने बाएं हाथ का गिलास उस की ओर बढ़ा दिया.

‘‘नहींनहीं, इस हाथ से नहीं दाएं हाथ वाला दो. तुम्हारी बाएं हाथ से किसी को सामन देने की आदत अभी तक गई नहीं है.’’ गगन बोला.

‘‘क्या करूं गगन, मेरा दायां हाथ चलता ही नहीं है. तुम्हारे साथ शादी हो जाती तब  शायद यह आदत छूट जाती. अच्छा लो इसे पकड़ो.’’ कहती हुई ममता ने अपने दाएं हाथ का कोल्ड ड्रिंक भरा गिलास आगे कर दिया. गगन ने गिलास हाथ में ले लिया. उस से एक घूंट पीने के बाद ममता मंदमंद मुसकराई. उस की मुसकान में कुटिलता छिपी थी, कारण वह अपनी योजना में कामयाब हो रही थी. नशीला पदार्थ मिला कोल्ड ड्रिंक का गिलास गगन के हाथ में था और वह नमकीन के साथसाथ घूंटघूंट कर चुस्की लेने लगा था.

कुछ समय में ही गगन बोला. ‘‘ममता… म… ममता,  मुझे तुम्हारा चेहरा साफ क्यों नहीं दिख रहा.’’ गगन की आवाज में लड़खड़ाहट थी. ममता समझ गई कि उस पर नशा हावी हो रहा है. ममता ने प्रेम भरी हमदर्दी दर्शाते हुए उस का सिर अपनी गोद में ले लिया. उस के बालों में अंगुलियां घुमाने लगी. कुछ पल में ही गगन पूरी तरह से बेहोश हो चुका था. ममता ने तुरंत थोड़ी दूर दूसरी झाड़ी के पीछे छिपे वीरू को इशारा किया. इशारा पाते ही ताक में बैठा वीरू ममता के पास आ गया. ममता वहां से उठती हुई बोली, ‘‘शिकार को संभालो, मैं ने अपना काम कर दिया, आगे का काम तुम्हारा.’’

उस के बाद नंदिनी और प्रदीप को भी इस की जानकारी दे दी कि उस का काम पूरा हो चुका है. हालांकि तब तक गगन के मुंह से केवल एक ही बड़बड़ाने की आवाज निकल रही थी, ‘‘ममता क्या हुआ है मुझे…’’

‘‘कुछ नहीं तुम्हें थोड़ा चक्कर आ गया है, अभी तुम्हें डाक्टर के यहां ले जाने का इंतजाम करवाती हूं.’’ ममता बोली. ममता उसे सहारा देते हुए वीरू के साथ उस की मोटरसाइकिल तक ले गई. वहां प्रदीप पहले से मौजूद था.

गगन को प्रदीप और वीरू ने पकड़ कर मोटरसाइकिल पर बिठा दिया. वीरू मोटरसाइकिल चलाने के लिए बैठ गया, जबकि प्रदीप गगन को गिरने से थामे हुए था. वीरू और प्रदीप गगन को जयंतीपुर ले गए. वहां एक खाली प्लौट में उन दोनों ने गगन को जबरदस्ती शराब पिलाई. फिर गगन के गले में पड़े गमछे से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उन्होंने उस के पैर गमछे से बांध दिए. फिर वीरू जयंतीपुर स्थित अपने घर से एक कंबल ले आया. उस कंबल में उन्होंने गगन की लाश लपेट दी. कंबल में उन्होंने कुछ ईंटें भी रख दी थीं. वह लाश को पास में बह रहे गहरे नाले में डुबोना चाहते थे, इसलिए 2 कट्टों में उन्होंने ईंटें भर कर वे कट्टे कंबल से बांधने के बाद लाश नाले में डाल दी. ईंटों की वजह से लाश नाले में डूब गई. यह बात 13 जुलाई, 2021 की है.

लाश ठिकाने लगाने के बाद वीरू ने रात करीब 10 बजे नंदिनी को फोन कर के गगन की लाश ठिकाने लगाने की जानकारी दी. उस समय गगन की पत्नी राधा तो अपने मायके गई हुई थी. पहली अगस्त को वह अपनी ससुराल  गई. उसे अपने मायके में होने वाले एक कार्यक्रम का निमंत्रण देना था. वहां पति नहीं दिखा तो राधा ने नंदिनी से पूछा. नंदिनी ने उसे बताया कि जब से गगन तुम्हारे घर पर रह रहा था. तब से यहां आया ही नहीं है. राधा ने पति को फोन मिलाया तो उस का फोन भी बंद मिला. उस ने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर के पति के बारे में पूछा. लेकिन पता चला कि गगन किसी रिश्तेदारी में गया ही नहीं था.

जब कहीं से जानकारी नहीं मिली तो नंदिनी भी राधा के साथ गगन को ढूंढने का नाटक करती रही. जब गगन कहीं नहीं मिला तो पिता ओमप्रकाश ने मुरादाबाद शहर के थाना मुगलपुरा में गगन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी अमित कुमार ने गगन के लापता होने की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मुरादाबाद का मुसलिम बाहुल्य लालबाग क्षेत्र बहुत संवेदनशील है. क्षेत्र में लापता युवक को ले कर वहां अशांति न हो जाए, इसलिए एसएसपी पवन कुमार ने एएसपी अनिल यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में मुगलपुरा के थानाप्रभारी अमित कुमार, एसआई नितेश सहरावत, ताजवर सिंह, जगजीत सिंह, राजवंदर कौर, कांस्टेबल संगम कसाना, नीरज कुमार, समीर आदि को शामिल किया.

टीम अपने स्तर से केस की छानबीन में जुट गई. इस के अलावा लालबाग क्षेत्र में भारी मात्रा में पुलिस फोर्स भी तैयार कर दी. पुलिस टीम ने सब से पहले गगन के घर वालों से पूछताछ करने के बाद गगन के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि 13 जुलाई को शाम 5 बजे गगन की एक फोन नंबर पर बात हुई थी. जांच में वह नंबर बंगला गांव मोहल्ले की रहने वाली ममता का निकला. पुलिस ममता के घर पहुंची तो उस का कमरा बंद मिला. पुलिस को पता चला कि ममता जिगर कालोनी स्थित एक एक्सपोर्ट फर्म में नौकरी करती है. पुलिस उस फर्म में पहुंची तो ममता वहां मिल गई. पूछताछ के लिए पुलिस उसे मुगलपुरा थाने ले आई.

पुलिस ने ममता से पूछताछ की तो वह खुद को बेकुसूर बताती रही. उस ने कहा कि गगन से उस के प्रेम संबंध जरूर थे लेकिन जब से गगन की शादी हुई है, वह संबंध खत्म हो गए.

‘‘जब तुम्हारे संबंध खत्म हो गए तो तुम ने 1 जुलाई को गगन को फोन क्यों किया?’’ थानाप्रभारी अमित कुमार ने उस से पूछा.

‘‘सर, उस का नंबर मेरे फोन में सेव था, जो गलती से लग गया.’’ ममता ने बताया.

थानाप्रभारी को लग रहा था कि ममता कुछ छिपा रही है, इसलिए उन्होंने पास में बैठी एसआई राजवेंदर कौर को इशारा किया. राजवेंदर कौन ने ममता से पूछताछ करते हुए एक थप्पड़ उस के गाल पर जड़ा. थप्पड़ लगते ही ममता हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘मुझे मत मारो, मैं सब कुछ बताती हूं.’’

इस के बाद ममता ने गगन से उस का प्यार होने से ले कर अब तक की सारी कहानी बताते हुए कहा कि गगन ने उस की सारी जिंदगी खराब कर दी. उसी का बदला लेने के लिए उस की सौतेली बहन नंदिनी और दीपक के साथ मिल कर उस की हत्या करनी पड़ी. उस ने बताया कि दीपक उस का रिश्तेदार है. अब पुलिस को लाश बरामद करनी थी लिहाजा पुलिस ने 5 घंटे तक गगन की लाश नाले में तलाश कराई, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. इसी दौरान पुलिस ने हरीश उर्फ वीरू को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरू ने बताया कि उस की लाश के साथ ईंटें बंधी थीं. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 3 अगस्त, 2021 को नाले से गगन की सड़ीगली लाश बरामद कर ली. उधर पुलिस ने नंदिनी और प्रदीप को तलाशा तो दोनों फरार मिले. उन के फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उन्हें नोएडा से गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने बताया कि उन्होंने 3 अगस्त को ही नोएडा के मंदिर में शादी कर ली थी. उन से भी पूछताछ की गई तो उन्होंने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पुलिस ने हत्यारोपी हरीश उर्फ वीरू, प्रदीप, नंदिनी और ममता को गिरफ्तार कर मुरादाबाद की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अमित कुमार कर रहे थे. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित