Ludhiana News : यह तो होना ही था

Ludhiana News : केवल शारीरिक सुख की चाह में 2 बच्चों की मां सुनीता ने अपने किराएदार नरेश की बांहें थाम लीं. पति कृष्णलाल ने उसे समझाने की कोशिश की तो सुनीता और नरेश ऐसा अपराध कर बैठे कि…

कृष्णलाल और सुनीता ने जैसेतैसे कर के अपना एक छोटा सा घर बना लिया था. अपना घर बन जाने से पतिपत्नी बहुत खुश थे. खुश भी क्यों न होते, अपना घर हो जाने से मकान मालिक की किचकिच से छुटकारा जो मिल गया था. अब वे अपने घर में निश्चिंत हो कर रह सकते थे. हर महीने एक मोटी रकम किराए के रूप में देने के बाद और सुबहशाम सिर झुकाने के बाद भी मकान मालिक टोकते रहते, ‘यहां मत बैठो, यहां मत लेटो, नल खुला छोड़ देते हो, तुम्हारे बच्चे शोर बहुत मचा रहे हैं. आज तुम्हारे यहां कौन आया था?’ अपना मकान हो जाने से कम से कम इस तरह की बातें तो सुनने को नहीं मिलेंगी.

कृष्णलाल के पिता रामआसरे लगभग 30 साल पहले रोजीरोटी की तलाश में लुधियाना आए थे. वहां उसे एक फैक्ट्री में चौकीदारी की नौकरी मिल गई तो गांव से वह पत्नी रामदुलारी को भी ले आया था. लुधियाना में रहते हुए ही वह 2 बच्चों, बेटा कृष्णलाल और बेटी सविता का बाप बना. अपनी सामर्थ्य के अनुसार रामआसरे ने बच्चों को पढ़ाना चाहा, लेकिन वे हाईस्कूल से आगे नहीं पढ़ पाए. सविता को घर के कामकाज और सिलाईकढ़ाई सिखा कर सन 2003 में उस की शादी कर दी. सविता का पति मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा का रहने वाला था. जालंधर में वह एक जानेमाने होटल में काम करता था.

कृष्णलाल ने पढ़ाई छोड़ दी तो रामआसरे ने काम सीखने के लिए उसे कई फैक्ट्रियों में भेजा, पर वह कहीं कोई काम न सीख सका. तब उस ने उसे एक स्कूटर मैकेनिक के पास भेजना शुरू किया. लगभग 3 सालों तक उस के यहां काम सीखने के बाद उस ने थाना सलेमटाबरी में जालंघर बाईपास के पास अपनी एक छोटी सी दुकान खोल ली. इस बीच रामआसरे की पत्नी रामदुलारी की मौत हो गई, जिस से खाना वगैरह उन्हें खुद ही बनाना पड़ता था. बाप बूढ़ा था, इसलिए कृष्णलाल पर कुछ ज्यादा ही जिम्मेदारियां आ गई थीं. घर के कामों की वजह से दुकान पर दिक्कत होने लगी तो रामआसरे ने दुलीचंद की बेटी सुनीता से बेटे की शादी तय कर दी.

दुलीचंद मूलरूप उत्तर प्रदेश के जिला सुल्तानपुर का रहने वाला था. लेकिन अब उस का पूरा परिवार लुधियाना में रहता था. सुनीता और कृष्णलाल की शादी धूमधाम से हो गई थी. सुनीता जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर कृष्णलाल फूला नहीं समाया था. सुनीता जितनी सुंदर थी, घर के कामकाज में भी उतनी ही कुशल थी. सांवलासलोना रंग, सुतवा नाक, हिरनी जैसी आंखें, पुष्ट उरोज एवं गदराया भरापूरा बदन दिल की धड़कनें बढ़ा देता था. शादी के बाद कई दिनों तक कृष्णलाल सुनीता की बांहों में खोया रहा, जिस से उस का नयानया काम डगमगा गया. वह अपने काम को संभाल पाता, अचानक पिता की ऐसी तबीयत खराब हुई कि वह उठ नहीं सका. पिता की मौत के बाद कृष्णलाल पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा.

चारों ओर खर्च ही खर्च दिखाई देता था. शादी पर लिए कर्ज को अलग से भरना था. लेकिन कृष्णलाल ने हिम्मत नहीं हारी और पिता का क्रियाकर्म कर के पूरी लगन से अपने काम में जुट गया. दिनरात मेहनत कर के 3 सालों में उस ने हर किसी की पाईपाई अदा कर दी. उसी बीच वह 2 बच्चों, बेटे मनीष और बेटी ज्योति का बाप बन गया. अब उस का भरापूरा परिवार हो गया था. कर्ज अदा कर के कृष्णलाल अपना धंधा व्यवस्थित कर के पैसे जमा करने लगा. अब उस की 2 ही तमन्नाएं थीं, एक अपना खुद का घर और दूसरे बच्चों की पढ़ाई. इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत कर रहा था. आखिर उस की मेहनत रंग लाई. छोटा ही सही, कृष्णलाल ने अपना खुद का मकान बना लिया. जिस दिन वे अपने मकान में रहने गए, पतिपत्नी बहुत खुश थे.

समय अपनी गति से बीतता रहा. कृष्णलाल के दोनों बच्चे स्कूल जाने लगे. दोनों बच्चों को स्कूल पहुंचाते हुए वह दुकान पर चला जाता था. पति और बच्चों के जाने के बाद घर में सुनीता अकेली रह जाती थी. सोने और टीवी देखने के अलावा उस के पास कोई दूसरा काम नहीं होता था. सोने और टीवी देखने की भी एक सीमा होती है. सुनीता कभीकभी ज्यादा ही बोर हो जाती थी. एक दिन उस ने कृष्णलाल से कहा, ‘‘बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां… हां, कहो.’’

‘‘हमारा छोटा परिवार है, बच्चे भी छोटे हैं, अभी हमारा गुजर नीचे के ही दोनों कमरों में हो जाता है. ऊपर वाला कमरा खाली पड़ा रहता है. क्यों न हम उसे किराए पर उठा दें. हर महीने कुछ रुपए भी आएंगे और किराएदार के आने से मेरा मन भी लगा रहेगा.’’

‘‘बात तो तुम्हारी ठीक ही है. किराएदार रखने में हर्ज ही क्या है. कोई किराएदार देख कर कमरा किराए पर उठा दो.’’

कृष्णलाल की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद सुनीता ने अपने पड़ोसियों से अपना कमरा किराए पर देने की बात कह दी तो कुछ दिनों बाद 26-27 साल का एक युवक सुनीता का कमरा किराए पर लेने आ गया. सुनीता से मिल कर उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम नरेश है. मैं माधोपुरी की शौल फैक्टरी में नौकरी करता हूं. मुझे एक कमरे की जरूरत है. मुझे पता चला है कि आप का एक कमरा खाली है. अगर आप उसे मुझे किराए पर दे दें तो..?’’

‘‘कमरा तो मुझे किराए पर देना ही है, लेकिन पहले तुम कमरा तो देख लो.’’

सुनीता ने कहा और नरेश को ऊपर ले कर कमरा दिखाया. लैट्रीन, बाथरूम, पानी आदि के बारे में बता कर किराया जो बताया, नरेश को उचित लगा. सारी बातें तय हो गईं तो सुनीता ने पूछा, ‘‘तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं?’’

‘‘अभी तो मैं अकेला ही हूं. शादी की बात चल रही है. शादी हो जाएगी तो पत्नी को ले आऊंगा.’’

‘‘इस का मतलब अभी तुम अकेले ही हो?’’ सुनीता ने कहा.

दरअसल किसी अकेले लड़के को जल्दी कोई किराए पर कमरा नहीं देना चाहता. इसी वजह से जब सुनीता को पता चला कि नरेश अकेला है तो उस ने कमरा देने से मना कर दिया था. लेकिन जब नरेश ने गुजारिश की तो न जाने क्या सोच कर उस ने हामी भर दी. एडवांस किराया दे कर नरेश उसी दिन रहने आ गया. नरेश सुंदर, स्वस्थ्य और हृष्टपुष्ट युवक था. उस की शादी भी नहीं हुई थी. उस की बलिष्ठ भुजाएं देख कर सुनीता का दिल धड़क उठता. लेकिन वह खुद को यह सोच कर रोके हुए थी कि वह शादीशुदा ही नहीं 2 बच्चों की मां भी है. शायद इसी वजह से उस ने यह जानने की कभी कोशिश नहीं की कि बच्चों के पैदा होने के बाद उस की सुंदरता में कितना निखार आ गया है.

उस के शरीर में इतना कसाव था, जो जल्दी कुंवारी लड़कियों में देखने को नहीं मिलता. शायद घर के झंझटों में फंस कर वह खुद को देख नहीं पाती थी. अभी भी उस के शरीर में ऐसी कशिश थी कि किसी का भी मन डोल सकता था. इसीलिए पहली नजर में ही नरेश उस का दीवाना हो उठा था. लेकिन शादीशुदा और मकान मालकिन होने की वजह से वह डरता था. केवल छिपछिप कर देखने के अलावा उस के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था. यह सन 2012 के जून महीने की दोपहर की बात है. उन दिनों नरेश की नाइट शिफ्ट चल रही थी. दिनभर वह घर में ही रहता था. सुनीता के दोनों बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पिता को खाना देने दुकान पर चले जाते थे तो शाम को ही लौटते थे.

उस दिन घर का काम निपटा कर सुनीता गरमी से परेशान हो कर आंगन में ही नहाने बैठ गई. बाहर का दरवाजा उस ने बंद कर दिया था और उसे पता था कि इस समय नरेश अपने कमरे में सो रहा होगा. इसलिए निश्चिंत हो कर आराम से वह सारे कपड़े उतार कर नहाने लगी. वैसे तो वह समय नरेश के सोने का ही था, लेकिन ना जाने कैसे उस दिन उस की आंखें खुल गईं. आंखें मलते हुए वह अपने कमरे से बाहर आया तो आंगन में सुनीता को उस हालत में देख कर जड़ बन गया. उस की नजरें सुनीता पर पड़ीं तो चिपक कर रह गईं. वह तन्मयता से सुनीता के एकएक अंग का जायजा लेने लगा. उस के लिए यह एक नया और अद्भुत नजारा था. इस के पहले उस ने जीवन में कभी ऐसा नजारा नहीं देखा था.

सुनीता इस बात से बेखबर नहाने में मस्त थी. अचानक उसे अपने सामने किसी परछाई का आभास हुआ तो उस ने तुरंत नजरें उठा कर ऊपर देखा. छत पर खड़े नरेश को देख कर वह शरम से लाल हो गई. अपने दोनों हाथों से वक्षों को ढांपने की नाकाम कोशिश करते हुए वह कमरे की ओर भागी. सुनीता को उस हालत में देख कर नरेश खुद को रोक नहीं सका और सीढि़यां उतर कर उस के कमरे में जा पहुंचा. हैरानपरेशान सुनीता जस की तस खड़ी थी. नरेश ने आगे बढ़ कर सुनीता को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में भर लिया. सुनीता ने कसमसा कर छूटने का हलका सा विरोध किया, लेकिन नरेश की मर्दानगी के आगे उस की एक न चली.

नरेश ने उस की खुली पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं भाभी. मैं तुम्हें इतनी खुशियां और सुख दूंगा, जिस की तुम ने कल्पना भी न की होगी.’’

नरेश की बांहों में सुनीता जिस सुख का अनुभव कर रही थी, वह उसे काफी दिनों से नहीं मिला था. क्योंकि इधर कृष्णलाल अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ ढोतेढोते इस कदर थक चुका था कि बाकी सब कुछ भूल चुका था. सही मायने में वह बूढ़ा हो चुका था. पत्नी या उस के अरमानों की भी उसे चिंता नहीं थी. जबकि सुनीता बेचैन रहती थी. यही वजह थी कि नरेश ने जब उसे बांहों में भरा तो सुनीता के सोए अरमान जाग उठे. उस की तमन्नाएं अंगड़ाइयां लेने लगीं और अंदर सोई औरत ने अपना सिर उठा लिया. वह भी अमरबेल की तरह नरेश से लिपट गई. इस के बाद उन्माद का ऐसा तूफान आया, जिस में सारी मर्यादाएं बह गईं. इस के बाद वह नरेश की मर्दानगी की दीवानी हो गई.

दोनों के बीच यह खेल शुरू हुआ तो रोज का किस्सा बन गया. कृष्णलाल के काम पर और बच्चों के स्कूल जाने के बाद सुनीता के घर के दरवाजे बंद हो जाते. उन बंद दरवाजों के पीछे मकान मालकिन और उस के युवा प्रेमी के बीच इस शिद्दत से वासना का खेल खेला जाने लगा कि उस की धमक पड़ोसियों तक जा पहुंची. चूंकि कृष्णलाल एक शरीफ और मेहनती आदमी था. पूरा मोहल्ला उस की इज्जत करता था, इसलिए गली के कुछ लोगों ने इशारोंइशारों में उसे समझा दिया कि उस की पीठ पीछे सुनीता क्या गुल खिला रही है? कृष्णलाल ने जब सुनीता से उस बारे में पूछा तो उस ने विरोध जताते हुए कहा, ‘‘मोहल्ले वालों की झूठी बातों में आ कर आप ने मुझ पर शक किया?’’

‘‘मैं शक नहीं कर रहा सुनीता, केवल पूछ रहा हूं.’’

‘‘पूछना क्या है, अगर आप को मुझ से ज्यादा मोहल्ले वालों की बातों पर विश्वास है तो बेशक आज ही नरेश से कमरा खाली करा लीजिए. उस के यहां रहने, न रहने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

सुनीता की बातों पर विश्वास कर के कृष्णलाल शांत हो गया. वह जानता था कि सुनीता इस तरह का गलत काम नहीं कर सकती. लेकिन यह उस की भूल थी. एक दिन कृष्णलाल के पास दिल्ली के स्पेयर पार्ट्स के किसी व्यापारी को पैसों के लिए आना था. कृष्णलाल को उसे 27 हजार रुपए देने थे. सुबह जल्दबाजी में दुकान पर आते समय वह पैसे ले जाना भूल गया. व्यापारी आया तो उसे दुकान पर बैठा कर वह रुपए लेने घर आ पहुंचा. इत्तफाक से उस दिन सुनीता मुख्य दरवाजा बंद करना भूल गई थी. उस ने केवल कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था.

कृष्णलाल मुख्य दरवाजा खोल कर अंदर पहुंचा तो उसे सुनीता के कमरे में हंसने की आवाज सुनाई दी. दरवाजा खुलवाने के बजाय उस ने कमरे की खिड़की की झिरी से अंदर झांका तो अंदर का हाल देख कर दंग रह गया. मारे गुस्से के उस का शरीर कांपने लगा. लेकिन वह कुछ बोला नहीं. लगभग 10 मिनट तक उसी तरह खड़ा रहा. उस के बाद दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा खुलते ही नरेश तो भाग गया, जबकि सुनीता उस के पैरों पर गिर कर माफी मांगने लगी. उस ने बच्चों की कसम खा कर कहा कि भविष्य में अब वह ऐसी गलती नहीं करेगी.

सुनीता को माफ करने के अलावा कृष्णलाल के पास दूसरा कोई उपाय नहीं था. बात बढ़ाने से उस का घर ही नहीं बच्चों की भी जिंदगी बरबाद होती. कृष्णलाल ने उसे माफ कर दिया और नरेश से कमरा खाली करवा लिया. नरेश के जाने के बाद सुनीता अकेली पड़ गई. वह जल बिन मछली की तरह छटपटाती रहती थी. एक दिन दोपहर को चुपके से नरेश उस के यहां आया और अपने नए कमरे का पता और मोबाइल नंबर दे गया. इस के बाद सुनीता खुद उस के कमरे पर जाने लगी. कईकई घंटे सुनीता घर से गायब रहने लगी तो कृष्णलाल को उस पर शक हुआ. उस ने सुनीता से पूछा तो वह झूठ बोल गई.

कृष्णलाल ने सुनीता की काफी निगरानी की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. वह किसी न किसी तरह चोरी से नरेश तक पहुंच जाती थी. कृष्णलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. काम देखे, बच्चों खयाल करे या सुनीता की निगरानी करे. उस का गुस्सा सीमा पार करने लगा. तभी एक घटना घट गई. नरेश ने जो नया कमरा किराए पर लिया था, वह सुभाषनगर में था. एक दिन कृष्णलाल को उसी मोहल्ले में अपने किसी ग्राहक का स्कूटर देने के लिए जाना पड़ा. वह जैसे ही उस मोहल्ले में पहुंचा, उसे सुनीता जाती दिखाई दी.

कृष्णलाल ने छिप कर उस का पीछा किया. वह नरेश के कमरे पर जा पहुंची. कृष्णलाल पीछे से वहां पहुंच गया. उस दिन नरेश के कमरे पर खूब हंगामा हुआ. कृष्णलाल ने सुनीता और नरेश की जम कर पिटाई की और सब के सामने कहा कि अगर दोनों अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो वह उन की हत्या कर देगा. इस घटना के बाद लगभग 2 महीने तक शांति रही. सुनीता ने नरेश से मिलना बंद दिया. कृष्णलाल को भी विश्वास हो गया कि सुनीता सुधर गई है. 28 अगस्त, 2014 की बात है. उस दिन सुबह से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिस की वजह से चारों ओर पानी ही पानी भर गया था.

रोज की तरह कृष्णलाल के दोनों बच्चे मनीष और ज्योति खाना ले कर दुकान पर पहुंचे तो वहां कृष्णलाल की खून से लथपथ लाश देख कर दोनों बच्चे डर के मारे रोने लगे. बच्चों को रोते देख पड़ोसी दुकानदार भाग कर आए तो कृष्णलाल की हालत देख कर पुलिस को सूचना दी. सूचना पा कर थाना बस्ती जोधेवाल के अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि स्कूटर का एक इंजन मृतक के शरीर के ऊपर पड़ा है तो दूसरा चेनपुली से बंधा उस के सिर के ठीक ऊपर लटक रहा है.

मृतक का सिर फटा था. वहां से बहा खून पूरी दुकान में फैला था. देखने से यही लगता था कि स्कूटर का भारी इंजन ऊंचाई से मृतक के सिर पर आ गिरा था, जिस की वजह से उस का सिर फट गया था और मौत हो गई थी. लेकिन इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह को यह मामला सिर पर गिरे इंजन द्वारा मौत होने का नहीं लगा. उन्हें यह मामला हत्या का लग रहा था. इस की वजह यह थी कि एक इंजन चैन से बंधा लटक रहा था. अगर मृतक के शरीर पर दूसरा इंजन गिरा था तो वह कहां बंधा था, क्योंकि दुकान में केवल एक ही चैनपुली थी. बहरहाल, इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने लाश का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने आ कर इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह को साफ लग रहा था कि मृतक की मौत हादसा नहीं, बल्कि सोचीसमझी साजिश के तहत हत्या का मामला है. उन्होंने पड़ोसी दुकानदारों से पूछताछ की. सभी ने कहा कि मृतक एक शरीफ और मेहनती आदमी था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. बारिश होने की वजह से उस दिन सभी अपनीअपनी दुकान के अंदर थे, इसलिए किसी को पता नहीं चल सका कि कृष्णलाल की दुकान में क्या और कैसे हुआ. यही बातें मृतक की पत्नी सुनीता ने भी बताई थीं. उस के अनुसार उस के पति का कोई दुश्मन नहीं था. इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने महसूस किया था कि बताते समय सुनीता के रोने में दुख कम, अभिनय अधिक था. उन्होंने मृतक कृष्णलाल के दोनों बच्चों से भी अलगअलग पूछताछ की. वे कुछ बताना चाहते थे, लेकिन डर की वजह से कुछ कह नहीं पा रहे थे.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि कृष्णलाल की मौत किसी चीज के गिरने या टकराने से नहीं हुई थी, बल्कि उस की हत्या सिर पर कोई भारी चीज मार कर की गई थी. अब सवाल यह था कि कृष्णलाल जैसे सीधेसादे इंसान की जान का दुश्मन कौन हो सकता था? इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने अपने कुछ खास मुखबिरों को सुनीता के पीछे लगा दिया और खुद सुनीता के पड़ोसियों से पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में उन्हें कृष्णलाल की हत्या से जुड़ी कई अहम बातें पता चलीं तो उन्होंने लेडी हेडकांस्टेबल जसप्रीत कौर को भेज कर पूछताछ के लिए सुनीता को थाने बुलवा लिया.

पहले तो सुनीता कृष्णलाल की हत्या के बारे अनभिज्ञता प्रकट करती रही, लेकिन जब जसप्रीत कौर ने थोड़ी सख्ती की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि कृष्णलाल की हत्या नरेश ने की है. और हत्या की योजना दोनों ने मिल कर बनाई थी. सुनीता की निशानदेही पर तुरंत नरेश को हिरासत में ले लिया गया. दोनों से हुई पूछताछ के बाद कृष्णलाल की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. दरअसल, कृष्णलाल द्वारा की जाने वाली निगरानी से सुनीता तंग आ चुकी थी. जबकि अब वह नरेश के बिना बिलकुल नहीं रह सकती थी. नरेश भी उस के लिए पागल था. सुनीता को नरेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, कृष्णलाल वैसा सुख कभी नहीं दे सका था. इसलिए वह नरेश की खातिर अपने पति और बच्चों तक को छोड़ने को तैयार थी.

लेकिन कृष्णलाल के रहते यह संभव नहीं था. इस के अलावा सुनीता और नरेश यह भी चाहते थे कि यह मकान भी उन के हाथ से न निकले. इसलिए काफी सोचविचार कर दोनों ने योजना बनाई कि कृष्णलाल की हत्या कर दी जाए. उस के न रहने पर मकान अपनेआप सुनीता को मिल जाएगा, उस के बाद दोनों शादी कर लेंगे. जिस दिन यानी 28 अगस्त, 2014 कृष्णलाल की हत्या हुई, उस से बात करने के बहाने नरेश दोपहर को उस की दुकान पर जा पहुंचा. उस समय तेज बारिश हो रही थी. सड़कें सूनी पड़ी थीं. ग्राहक न आने पर कृष्णलाल भी आराम करने की नीयत से दुकान की फर्श पर दरी बिछा कर लेटा हुआ था.

जिस समय नरेश उस की दुकान पर पहुंचा था, उस समय कृष्णलाल सो रहा था. कृष्णलाल को आभास नहीं हुआ कि मौत दबे पांव उस के सिरहाने आ कर खड़ी हो गई है. कृष्णलाल को सोते हुए पा कर नरेश का काम आसान हो गया. बिना कोई आहट किए वह दुकान में चला गया और वहां रखा भारी हथौड़ा उठा कर कृष्णलाल के सिर पर दे मारा. नरेश का यह वार इतना सटीक और शक्तिशाली था कि उसी एक वार में कृष्णलाल की मौत हो गई. इस के बावजूद उस ने उस पर कई वार कर दिए थे.

नरेश जिस तरह दबे पांव दुकान में आया था, कृष्णलाल को मौत के घाट उतार कर उसी तरह लौट गया. संयोग से दुकान से निकलते हुए उसे कृष्णलाल के बच्चों ने देख लिया था. लेकिन सुनीता ने उन्हें डरा दिया था कि अगर उन्होंने यह बात किसी को बताई तो पुलिस उन्हें पकड़ ले जाएगी. इसीलिए दोनों बच्चे डरे हुए थे. नरेश और सुनीता के अपराध स्वीकार कर लेने के बाद इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने कृष्णलाल की हत्या के आरोप में नरेश तथा साजिश रचने के आरोप में सुनीता को गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान वह हथौड़ा भी बरामद कर लिया गया, जिस से कृष्णलाल की हत्या की गई थी.

रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद दोनों अभियुक्तों को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. सुनीता अगर परपुरुष की बांहों में अपना सुख न तलाशती तो आज उस का और उस के बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहता. उस की बेलगाम इच्छा ने उस का घर तो बरबाद किया ही, साथ ही उस के दोनों बच्चों का भविष्य भी अंधकारमय बना दिया. उस के दोनों बच्चे नानानानी के पास जालंधर में रह रहे हैं. Ludhiana News

 

Love Story in Hindi : गुनाह प्यार, सजा मौत

Love Story in Hindi : आरती का गुनाह यही था कि उस ने नेतराम से प्यार किया और घर वालों के मना करने के बावजूद उस से कोर्टमैरिज कर ली. घर के अन्य लोगों ने इसे एक दुर्घटना माना और सोच लिया कि आरती मर गई. लेकिन राकेश इस बात को भुला नहीं सका और 7 सालों बाद उसे मौत के घाट उतार दिया.

आरती आगरा की डिफेंस कालोनी के रहने वाले लौहरे सिंह चाहर की बेटी थी. उस के अलावा उन की 3 संतानें और थीं, जिन में 2 बेटे प्रवीण, राकेश और एक बेटी बीना थी. लौहरे सिंह सेना से सूबेदार से रिटायर हुए थे. उन का बड़ा बेटा प्रवीण भी पढ़लिख कर सेना में भर्ती हो गया था. नौकरी लगते ही लौहरे सिंह ने उस का विवाह कर दिया था. इस के बाद उस से छोटी बेटी बीना का भी विवाह लौहरे सिंह ने सेना में सिपाही की नौकरी करने वाले कमल सिंह सोलंकी के साथ किया था. वह चाहते थे कि उन का छोटा बेटा भी सेना में जाए. वह अपनी छोटी बेटी आरती की भी शादी सेना में नौकरी करने वाले से करना चाहते थे, लेकिन न तो उन का छोटा बेटा सेना में गया और न ही वह छोटी बेटी आरती की शादी सेना में नौकरी वाले लड़के से कर पाए.

दरअसल, लौहरे सिंह का छोटा बेटा राकेश लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. पढ़नेलिखने के बजाय यारदोस्तों की सोहबत उसे कुछ ज्यादा अच्छी लगती थी. दोस्तों के साथ वह जो उलटेसीधे काम करता था, उस की शिकायतें घर आती रहती थीं, जिस से लौहरे सिंह परेशान रहते थे. उन्होंने बड़े बेटे प्रवीण के साथ मिल कर उसे सुधारने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की इस कोशिश का कोई लाभ नहीं हुआ. राकेश को न सुधरना था, न सुधरा. बेटे की वजह से लौहरे सिंह की काफी बदनामी हो रही थी. बेटे को इज्जत की धज्जियां उड़ाते देख उन्होंने सोचा कि उसे किसी रोजगार से लगा दिया जाए तो दोस्तों का साथ अपनेआप छूट जाएगा.

इस के लिए उन्होंने बगल वाले मोहल्ले चावली में आटा चक्की लगवा कर उस पर उसे बैठा दिया. उस की मदद के 15 साल के मुकेश को नौकर रख दिया. मुकेश था तो नौकर, लेकिन राकेश से उस की खूब पटती थी. जबकि मुकेश की उम्र राकेश से काफी काम थी. चक्की पर अकसर आने वाली एक लड़की पर मुकेश का दिल आ गया. मुकेश ने उसे अपने प्रेमजाल में फंसाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लड़की ने उसे भाव नहीं दिया. चूंकि राकेश मुकेश से दोस्त जैसा व्यवहार करता था, इसलिए उस ने लड़की वाली बात राकेश को भी बता दी थी. जब लड़की ने मुकेश को भाव नहीं दिया तो राकेश ने कहा, ‘‘अगर किसी तरह तू उस लड़की से शारीरिक संबंध बना ले तो वह अपनेआप तेरी मुरीद हो जाएगी.’’

इस के बाद मुकेश उस लड़की से शारीरिक संबंध बनाने का मौका ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका तो मिल गया, लेकिन उस में उसे राकेश को भी साझा करना पड़ा. हुआ यह कि लड़की चक्की पर आटा लेने आई तो किसी बहाने से मुकेश उसे चक्की के पीछे बने कमरे में ले गया और उस के साथ जबरदस्ती कर डाली. उस समय राकेश भी वहां मौजूद था, इसलिए इस काम में उसे साझा करना पड़ा. राकेश ने सोचा था कि इज्जत के डर से लड़की कुछ नहीं बोलेगी. लेकिन जब उस ने कहा कि वह उन की करतूत घर वालों से बताएगी तो दोनों डर के मारे उसे चक्की के अंदर बंद कर के भाग गए. बाद में लड़की ने रोते हुए शोर मचाया तो मोहल्ले वालों ने उसे बाहर निकाला.

इस के बाद पीडि़त लड़की के घर वालों ने मुकेश और राकेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. चूंकि पीडि़त लड़की नाबालिग थी, इसलिए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने रातदिन एक कर के राकेश और मुकेश को पकड़ कर अदालत में पेश किया, जहां से राकेश को जेल भेज दिया गया तो नाबालिग होने की वजह से मुकेश को बाल सुधार गृह. मुकेश नाबालिग था, इसलिए करीब साढ़े 3 महीने बाद उसे जमानत मिल गई, लेकिन बालिग होने की वजह से राकेश की जमानत की अर्जियां एक के बाद एक खारिज होती गईं, जिस की वजह वह जेल से बाहर नहीं आ सका. यह सन 2006 की बात थी.

बेटे के जेल जाने से लौहरे सिंह की बदनामी तो हुई ही, परेशानी भी बढ़ गई थी. बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए वह काफी भागदौड़ कर रहे थे. इस में उन का समय भी बरबाद हो रहा था और पैसा भी. राकेश की वजह से वह छोटी बेटी आरती पर ध्यान नहीं दे पाए और उस ने भी जो किया, उस से एक बार फिर उन्हें बदनामी का दंश झेलना पड़ा. जिन दिनों राकेश ने यह कारनामा किया था, उन दिनों आरती कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. ग्रेजुएशन उस ने कर ही रखा था, इसलिए कंप्यूटर का कोर्स पूरा होते ही उसे एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर पर कंप्यूटर सिखाने की नौकरी मिल गई. इस नौकरी में वेतन तो ठीकठाक मिल ही रहा था, इज्जत भी मिल रही थी.

आरती ने जो चाहा था, वह उसे मिल गया था. मांबाप की लाडली होने की वजह वह वैसे भी जिद्दी थी, अब ठीकठाक नौकरी मिल गई तो घर में दबंगई दिखाने लगी. आरती जो चाहती थी, वही होता था. कमाऊ बेटी थी, इसलिए मांबाप भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे. जिस कंप्यूटर सेंटर पर आरती नौकरी कर रही थी, उसी में आगरा के थाना तेहरा (सैया) के गांव बेहरा छरई का रहने वाला नेतराम कुशवाह भी नौकरी करता था. वह चंदन सिंह की 9 संतानों में चौथे नंबर पर था. एमए करने के बाद उस ने कंप्यूटर कोर्स किया और उसी कंप्यूटर सेंटर पर शिक्षक की नौकरी करने लगा, जहां आरती नौकरी कर रही थी.

आरती और नेतराम हमउम्र और हमपेशा थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. इस के बाद दोनों साथसाथ बैठ कर चाय भी पीने लगे और लंच भी करने लगे. नेतराम को जब पता चला कि आरती डिफेंस कालोनी में रहती है और उस के पिता लौहरे सिंह चहार सेना से रिटायर सूबेदार हैं. उस का बड़ा भाई ही नहीं, बड़ी बहन का पति भी सेना में है तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘आरती, तब तो तुम्हारी शादी भी किसी फौजी से ही होगी.’’

‘‘हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती. मैं शादी उसी से करूंगी, जो मुझे अच्छा लगेगा. आप को बता दूं, यह जरूरी नहीं कि वह मेरी जाति का ही हो. वह किसी अन्य जाति से भी हो सकता है. तुम भी हो सकते हो.’’

आरती की इस बात से नेतराम हैरान रह गया. चूंकि वह कुंवारा था और आरती उसे पसंद थी. वह उस से शादी भी करना चाहता था, लेकिन जाति अलग होने की वजह से यह बात कहने की वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. जबकि लड़की हो कर आरती ने यह बात कह दी थी. लगातार मिलते रहने और साथसाथ खानापीना होने से आरती और नेतराम का आपसी सामंजस्य बैठता गया और फिर उन की दोस्ती सचमुच प्यार में बदल गई. इस के बाद नेतराम आरती के घर भी आनेजाने लगा. घर वाले उसे आरती का दोस्त मानते थे, इसलिए कभी किसी ने न तो उस के घर आने पर ऐतराज जताया, न उस से मिलनेजुलने पर.

इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि एक तो वह कमाऊ बेटी थी, दूसरे उन्हें विश्वास था कि उन की बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना करना पड़े. धीरेधीरे आरती और नेतराम का आपसी लगाव बढ़ता गया. उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे अलगअलग जाति से हैं. समय के साथ उन के प्यार की गांठ मजबूत होती गई और वे आपस में शादी के बारे में सोचने लगे. जब इस बात की जानकारी चाहर परिवार को हुई तो घर में हंगामा मच गया. एक तो जाट परिवार, दूसरे फौजी, हंगामा तो मचना ही था. लौहरे सिंह और प्रवीण ने आरती पर बंदिशें लगानी चाहीं तो वह बगावत पर उतर आई.

उस ने साफ कह दिया कि यह जिंदगी उस की अपनी है, वह जैसे चाहे जिए. अगर उसे परेशान किया गया या बंदिश लगाई गई तो वह उन की इज्जत का भी खयाल नहीं करेगी. इस के बाद आरती ने नेतराम से कहा कि जो भी करना है, जल्द कर लिया जाए. क्योंकि जितना समय बीतेगा, तनाव बढ़ता ही जाएगा. आरती का बड़ा भाई प्रवीण नौकरी की वजह से ज्यादातर बाहर ही रहता था. छोटा भाई जेल में था. घर में मातापिता थे, वे भी बूढ़े हो चुके थे. बेटे की वजह से वे वैसे ही परेशान थे, इसलिए आरती के बारे में वे वैसे भी ज्यादा नहीं सोच पाते थे.

नेतराम के भी इरादे मजबूत थे. वह जानता था कि पढ़ीलिखी, समझदार आरती के साथ उस की जिंदगी मजे से कटेगी. आरती उस के प्यार में इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उस का पीछे लौटना मुश्किल था. जबकि वह जानती थी कि अलग जाति होने की वजह से नेतराम से शादी करना उस के परिवार पर भारी पड़ सकता है. पूरी बिरादरी हायतौबा मचाएगी, लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी. उसे अपना भविष्य नेतराम में ही दिखाई दे रहा था. यही वजह थी कि न चाहते हुए भी उस ने 12 दिसंबर, 2007 में नेतराम के साथ कोर्टमैरिज कर ली. उस दिन सुबह आरती नौकरी के लिए घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. मां ने फोन किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है.

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, इसलिए लौहरे सिंह को समझते देर नहीं लगी कि आरती कहां गई होगी. अगले दिन आरती ने फोन कर के अपनी शादी के बारे में बड़ी बहन बीना को बताया तो उन्होंने इस बात की जानकारी मांबाप को दे दी. आखिर वही हुआ, जिस का चाहर परिवार को डर था. बेटी की इस करतूत से घर वालों को गहरा आघात लगा. एक बेटा दुष्कर्म के आरोप में जेल में था, बेटी ने गैर जाति के लड़के से शादी कर ली थी. बदनामी के डर से भले ही उन्होंने कोई काररवाई नहीं की, लेकिन वे उस के इस अपराध को माफ नहीं कर सकते थे. बेटी बालिग थी, वह उस का कुछ कर भी नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने यह सोच कर संतोष कर लिया कि वह उन के लिए मर गई. घर के अन्य लोगों ने तो खुद को संभाल लिया, पर आरती की मां खुद को नहीं संभाल पाई और बेटी के इस निर्णय की वजह से उस की मौत हो गई.

आरती ने नेतराम से शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली थी. वह उस के साथ खुश थी. पतिपत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे थे. इस के अलावा नेतराम घर से भी संपन्न था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई कभी नहीं थी. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद आरती ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम हर्षित रखा गया. आरती के घर वालों ने शादी के बाद कभी आरती के बारे में कुछ जानने की कोशिश नहीं की तो उस ने भी कभी कुछ नहीं बताया. नेतराम और आरती, दोनों ही पढ़ेलिखे और महत्वाकांक्षी थे. दोनों ठीकठाक कमाते भी थे, इस के अलावा वह घर से भी संपन्न था, इसलिए मजे से जिंदगी कट रही थी.

सन 2009 में नेतराम की मां सुमित्रा देवी का निधन हो गया था. तब तक आरती चाहर ने बीएड भी कर लिया था, इसलिए उस ने नेतराम से अपना एक स्कूल खोलने को कहा. नेतराम के पास पैसे भी थे और जमीन भी, उस ने अपने करीबी कस्बे तेहरा में मां के नाम सुमित्रा देवी कन्या इंटरकालेज खोल दिया. नेतराम खुद स्कूल का मैनेजर बन गया और पत्नी आरती को स्कूल का प्रिंसिपल बना दिया. उन का यह स्कूल जल्दी ही बढि़या चलने लगा, जिस से कमाई भी बढि़या होने लगी. इस के बाद नेतराम ने आगरा की नई विकसित हो रही कालोनी रचना पैलेस में एक प्लाट ले कर उस में 10 कमरों का बढि़या 2 मंजिला मकान बनवा लिया. इस मकान का नंबर था 93. मकान तैयार हो गया तो नेतराम पत्नी और बच्चों के साथ उसी में रहने लगा. अब तक आरती एक और बेटे की मां बन चुकी थी, जिस का नाम युवराज रखा गया था.

सन 2007 से सन 2014 तक के 7 साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला. नेतराम तरक्की के नित नए आयाम स्थापित करते चले गए. अब वह एक टैक्निकल कालेज खोलना चाहते थे. वह अपनी एक संस्था भी चला रहे थे, जिस के अंतर्गत गरीब और असहाय बच्चों को कंप्यूटर सिखाया जाता था. राष्ट्रीय कंप्यूटर शिक्षा मिशन के अंतर्गत चल रही इस संस्था की कई जिलों में शाखाएं खुल गई थीं. इन सभी शाखाओं का कोऔर्डिनेशन नेतराम खुद कर रहे थे. नेतराम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे थे. उन्हें अब किसी चीज की कमी नहीं थी. भरपूरा परिवार तो था ही, समाज में अच्छीखासी शोहरत और इज्जत मिलने के साथ पैसे भी खूब आ रहे थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक 20 नवंबर, 2014 को आरती की हत्या हो गई.

हुआ यह कि दिन के डेढ़ बजे नेतराम ने आरती को फोन किया तो फोन नहीं उठा. कई बार फोन करने के बाद जब आरती की ओर से फोन रिसीव नहीं किया गया तो उन्हें हैरानी हुई. इस के बाद उन्होंने ऊपर की मंजिल  में रहने वाले अपने किराएदार को फोन कर के आरती से बात कराने का अनुरोध किया. किराएदार अपना मोबाइल फोन ले कर नीचे आया और ‘भाभीजी… भाभीजी…’ आवाज लगाते हुए घर के अंदर पहुंचा तो बैडरूम का नजारा देख कर उस के होश उड़ गए. उस ने शोर मचा कर पूरी कालोनी तो इकट्ठा कर ही ली, नेतराम से भी तुरंत घर आने को कहा.

5-7 मिनट में ही नेतराम घर आ गए. मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह तेजी से घर के अंदर पहुंचे. उन के साथ कालोनी के कई लोग अंदर आ गए थे. घर के अंदर की स्थिति बड़ी ही खौफनाक थी. आरती की लाश बैड पर एक किनारे पड़ी थी, उस का सिर नीचे की ओर लटका हुआ था. गरदन से बह रहा खून फर्श पर फैल रहा था. आरती की बगल में बैठा युवराज रो रहा था. वह मर चुकी मां को उठाने के चक्कर में खून से सन चुका था. पत्नी की हालत देख कर नेतराम फफकफफक कर रोने लगे. रोते हुए ही उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े युवराज को उठाया और किराएदार को थमा कर उसे नहला कर कपड़े बदल देने का अनुरोध किया.

अब तक उन का बड़ा बेटा हर्षित भी स्कूल से आ चुका था. मां की हालत देख कर वह भी रोने लगा. पड़ोस की औरतों ने उसे संभाला. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पुलिस अधिकारियों की आधा दर्जन गाडि़यां रचना पैलेस में आ कर खड़ी हो गईं. एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ (सदर) असीम चौधरी थाना ताजगंज के थानाप्रभारी मधुर मिश्रा घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. डौग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और फोटोग्राफर को भी बुला लिया गया था. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से मकान और उस कमरे का निरीक्षण किया, जिस में आरती की लाश पड़ी थी. इस मामले में डौग स्क्वायड कोई खास मदद नहीं कर सका. उस ने बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक 3-4 चक्कर लगाए और मकान से बाहर आ कर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास रुक गया.

पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्यारे बैडरूम और ड्राइंगरूम के बीच चहलकदमी करते रहे होंगे. उस के बाद मकान से निकल कर बगल वाले मकान चारदीवारी के पास आए होंगे, जहां उन की मोटरसाइकिल या स्कूटर खड़ी रही होगी. मकान के निरीक्षण में पुलिस ने देखा कि हत्या के बाद हत्यारों ने बैडरूम के बगल में लगे वाशबेसिन में खून सने हाथ धोए थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स ने ड्राइंगरूम में रखे चाय के 2 कपों से फिंगरप्रिंट उठाए. चाय के कप और ट्रे में रखी नमकीन, मिठाई देख कर पुलिस अधिकारी समझ गए कि जिस ने भी यह कत्ल किया है, वह कोई खास परिचित रहा होगा.

अब पुलिस को यह पता करना था कि खास लोगों में ऐसा कौन हो सकता है, जो हत्या कर सकता है. पुलिस ने जब इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि मृतका आरती चाहर ने घर वालों के खिलाफ जा कर अन्य जाति के नेतराम कुशवाह से करीब 7 साल पहले प्रेमविवाह किया था. तब उस के घर वालों ने इस बात को अपना अपमान मान कर खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी. पुलिस को जांच आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिल गया था, लेकिन फिलहाल तो उन्हें घटनास्थल की काररवाई निपटानी थी. आवश्यक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने आरती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उसी 7 साल पुरानी धमकी के आधार पर नेतराम ने आरती के भाई राकेश चाहर के खिलाफ आरती की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

चूंकि राकेश का एक साथी लोकेश भी अकसर नेतराम के घर आता रहता था, इसलिए नेतराम को शक था कि हत्या के समय वह भी साथ रहा होगा, इसलिए मुकदमे में उस का नाम भी शामिल करा दिया था. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए राकेश और लोकेश के फोन नंबर ले लिए. इस के बाद उन नंबरों पर फोन किए गए तो वे नंबर बंद पाए गए. हत्या के बाद नंबर बंद होने से पुलिस का संदेह बढ़ गया. इस मामले की जांच थाना ताजगंज का उसी दिन चार्ज संभालने वाले थानाप्रभारी मधुर मिश्रा को सौंपी गई.

उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक टीम बनाई, जिस में एसएसआई प्रमोद कुमार यादव, नरेंद्र कुमार, सिपाही रामन और आशीष कुमार को शामिल किया. चूंकि एक स्कूल प्रिंसिपल की दिनदहाड़े हत्या का मामला था, इसलिए सीओ सिटी असीम चौधरी भी इस मामले पर नजर रखे हुए थे. पुलिस को राकेश की तलाश थी. इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो घर में मौजूद उस का बड़ा भाई प्रवीण सिंह फौजी वर्दी की धौंस दिखाते हुए पुलिस से उलझ गया. नाराज पुलिस टीम उसे हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में उस से पूछताछ चल रही थी कि मुखबिर से पुलिस टीम को राकेश के साथी लोकेश के बारे में पता चल गया.

पुलिस लोकेश को पकड़ कर थाने ले आई. शुरुआती पूछताछ में तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. उस ने एक पान वाले से भी कहलवाया कि उस दोपहर को वह उस की दुकान पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था. पुलिस पान वाले को भी ले आई. इस के बाद जब पुलिस ने अपने ढंग से पूछताछ की तो पान वाले ने बक दिया कि उस ने लोकेश के कहने पर झूठ बोला था. इस के बाद पुलिस ने लोकेश से सच्चाई उगलवा ली. लोकेश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो उस की निशानदेही पर पुलिस ने थाना एत्माद्दौला की ट्रांस यमुना कालोनी के बी ब्लाक के मकान नंबर 3/5 से राकेश को गिरफ्तार कर लिया. सीओ असीम चौधरी दोनों को अपने औफिस ले आए, जहां की गई लगभग एक घंटे की पूछताछ में राकेश ने आरती की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

जिन दिनों आरती ने प्रेमविवाह किया था, उन दिनों राकेश जेल में था. दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत से उसे 10 साल के कैद की सजा हुई थी. घर वालों के खिलाफ आरती की छोटीमोटी बगावतें वह पहले से ही सुनता आ रहा था, लेकिन जब बड़े भाई प्रवीण ने उसे नेतराम से विवाह की खबर सुनाई तो उस का खून खौल उठा. नेतराम कुशवाह से उसे कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि अगर उस की बहन आरती न चाहती तो भला उस की क्या मजाल थी कि वह आरती से जबरदस्ती कोर्टमैरिज कर लेता. उस की नजरों में इस के लिए दोषी उस की बड़ी बहन आरती थी.

राकेश ने अपने घर वालों की इज्जत बचाने के लिए आरती को खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने जेल से ही आरती को धमकी दी कि उस ने जो किया है, इस के लिए वह उसे सबक जरूर सिखाएगा. उसी बीच आरती की वजह से मां की मौत हो गई तो राकेश को आरती से नफरत हो गई. उस ने कसम खा ली कि कुछ भी हो, वह आरती को जीवित नहीं छोड़ेगा. राकेश जेल की जिस बैरक में सजा काट रहा था, उसी में लोकेश नाम का एक लड़का आया. वह पड़ोस के ही मोहल्ले का रहने वाला था, इसलिए राकेश से उस की दोस्ती हो गई. जल्दी ही दोनों के संबंध इतने मधुर हो गए कि वे एक ही थाली में खाना खाने लगे. उन्होंने जीवन भर इस संबंध को निभाने की कसमें भी खाईं.

राकेश और लोकेश हमउम्र थे. दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे, इसलिए राकेश ने अपनी बहन आरती के प्रेमविवाह के बारे में बता कर पूछा कि इस मामले में क्या किया जाना चाहिए? समझदारी दिखाते हुए लोकेश ने सलाह दी कि इस मामले में अभी इंतजार करना चाहिए. आरती को उस के किए की सजा इस तरह दी जाए कि पुलिस भी पता न कर सके कि ऐसा किस ने किया होगा. आरती ने जो किया था, उस से घर के सभी लोग नाराज थे. इसलिए जब कभी कोई जेल में राकेश से मिलने आता तो उस का जिक्र जरूर छिड़ता. राकेश के लिए परेशानी यह थी कि उस के मुकदमे की कोई ठीक से पैरवी करने वाला नहीं था. मां मर चुकी थी, बाप बूढ़ा था, बड़ा भाई और बहनोई फौज में थे. जिस की वजह से वे ज्यादातर बाहर रहते थे. एक बहन थी बीना, वही कभीकभी मिलने आ जाती थी.

राकेश चाहता था कि किसी तरह हाईकोर्ट से उस की जमानत हो जाए. बूढ़े होने की वजह से पिता भागदौड़ नहीं कर पा रहे थे. इसलिए राकेश ने बीना से कहा कि वह आरती से बात कर के उस की जमानत करवा दे. बीना ने आरती को फोन कर के कहा भी कि वह जेल जा कर राकेश से मिल ले और उस की जमानत करा दे. लेकिन आरती न तो राकेश से मिलने जेल गई और न ही उस की जमानत कराई. जबकि राकेश के पिता लौहरे सिंह ने आरती को उस की जमानत कराने के लिए एक लाख रुपए नकद और इतने के गहने भी दिए थे. रुपए और गहने ले कर भी आरती ने राकेश की जमानत के प्रति ध्यान नहीं दिया.

राकेश जेल से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था. आरती न तो उस से मिलने गई थी और न उस की जमानत कराई थी. इस से उसे लगा कि बहन उस के बारे में जरा भी नहीं सोच रही है. लगभग 6 महीने पहले हाईकोर्ट से उस की जमानत हुई. राकेश घर आ गया. बहन के व्यवहार से उस के मन में एक टीस सी उठती थी. लेकिन अभी वह जमानत पर जेल से आया था, इसलिए कोई अपराध नहीं करना चाहता था. इस के बावजूद वह बहन को उस के किए की सजा देना चाहता था. लेकिन वह यह काम इस तरह करना चाहता था कि उस पर आरोप लगने की बात तो दूर, कोई शक भी न कर सके. इस के लिए उस ने आरती से मधुर संबंध बनाने शुरू किए. जल्दी ही उस ने इस तरह संबंध बना लिए, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है.

राकेश के बदले व्यवहार से आरती भी उसे मानने लगी थी. वह जब भी आता था, आरती उसे खूब खिलातीपिलाती थी, जाते समय कुछ न कुछ बांध भी देती थी. जरूरत पड़ने पर रुपएपैसे से भी उस की मदद करती थी. इस के अलावा अगर वह पति और बच्चों के साथ कहीं बाहर घूमने जाती थी तो उसे भी साथ ले जाती. उसी बीच लोकेश भी जेल से बाहर आ गया तो दोनों साथसाथ दिखाई देने लगे. आरती के ठाठबाट और सुखी जीवन से राकेश को ईर्ष्या हो रही थी. वह सोचता था कि अगर आरती चाहती तो बहुत पहले ही वह जेल से बाहर आ जाता. लेकिन उस ने उस की परेशानी को बिलकुल नहीं समझा. आरती भले ही राकेश का खूब खयाल रखती थी, लेकिन सही बात यह थी कि आरती बिलकुल नहीं चाहती कि राकेश उस के घर आए.

इस बात को राकेश समझ गया था, इसलिए वह खुद को अपमानित महसूस करता था. इन सब बातों से उसे लगता था कि इस तरह की बहन को सुख से जीने का कोई अधिकार नहीं है. राकेश के मन में क्या है, शायद आरती ने ताड़ लिया था. इसलिए वह उस की ओर से निश्चिंत नहीं थी. वह नेतराम से कहती भी रहती थी कि उसे राकेश से डर लगता है. जबकि नेतराम का कहना था कि राकेश तो वैसे ही कानून के शिकंजे में है, इसलिए अब वह कोई गैरकानूनी काम कर के अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करेगा. एक दिन राकेश लोकेश को साथ ले कर आरती के घर पहुंचा. जब आरती को पता चला कि लोकेश भी जेल से छूट कर आया है तो उसे झटका सा लगा. उस ने राकेश से कहा भी, ‘‘उसे ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहिए.’’

राकेश को बहन की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘‘यह मेरा देस्त है. दोस्त कैसा भी हो, दोस्त ही होता है.’’

इस के बाद राकेश आरती के घर से बाहर आया तो लोकेश से बोला, ‘‘दोस्त, मैं अपनी इस बहन को सहन नहीं कर पा रहा हूं. मेरे घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर देखो यह किस तरह सुख और चैन से जी रही है.’’

‘‘उस कालिख को तो इस के खून से ही धोया जा सकता है.’’ लोकेश ने कहा. राकेश भी यही सोच रहा था. साथी मिल गया तो उस का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि परिवार की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली बहन को कैसे सबक सिखाया जाए. आरती को भले ही राकेश पर विश्वास नहीं था, लेकिन राकेश बहन और बहनोई का विश्वास जीतने कोशिश कर रहा था. हफ्ते में 2-3 बार वह बहनबहनोई और भांजों से मिलने उन के घर आता था. उस के साथ लोकेश भी होता था. आरती के पास किसी चीज की कमी नहीं थी, इसलिए अच्छाअच्छा खिलानेपिलाने के साथ वह छोटे भाई राकेश को पौकेट मनी भी देती थी. इस की वजह यह थी कि आरती और नेतराम राकेश से अपने संबंध मधुर बना लेना चाहते थे.

26 नवंबर, 2014 को वैष्णो देवी जाने के लिए नेतराम ने पूरे परिवार का टिकट कराया था. नेतराम ने साथ ले जाने के लिए राकेश की भी टिकट करा रखी थी. जबकि राकेश बहन को सबक सिखाने का मौका तलाश रहा था. 18 नवंबर को राकेश और लोकेश आरती के यहां बैठे बातें कर रहे थे, तभी बातोंबातों में नेतराम ने कहा कि 20 नवंबर को उसे सजावट का सामान (झूमर झाड़फानूस) लेने फिरोजाबाद जाना है. यह सुन कर राकेश की आंखों में चमक आ गई. थोड़ी देर बाद राकेश लोकेश के साथ बाहर आ गया. इस के बाद उस ने लोकेश के साथ मिल कर आरती की हत्या की योजना बना डाली.

18 नवंबर की बातचीत के अनुसार, 20 नवंबर की सुबह के करीब 11 बजे नेतराम को फिरोजाबाद जाने के लिए घर से निकलना था. लेकिन इस बीच उस का प्रोग्राम बदल गया. उस ने डिजाइन पसंद करने के लिए आरती को भी साथ चलने के लिए तैयार कर लिया था. इस नए प्रोग्राम के अनुसार उसे 2 बजे के आसपास घर से निकलना था. नेतराम का बड़ा बेटा हर्षित स्कूल गया था, जिसे डेढ़ बजे तक घर आना था. आरती चाहती थी कि वह अपने हाथों से उसे खाना खिला कर फिरोजाबाद जाए.

नेतराम के फिरोजाबाद जाने के प्रोग्राम में बदलाव हो चुका है, यह राकेश और लोकेश को पता नहीं था. 20 नवंबर, 2014 दोपहर के बाद नेतराम और आरती को फिरोजाबाद जाना था, इसलिए नेतराम अपने कंप्यूटर सेंटर के काम से 2-3 घंटे में आने के लिए कह कर सेवला स्थित एक साइबर कैफे पर चला गया. आरती घर के कामों में लग गई. नेतराम के जाते ही साढ़े 10 बजे के आसपास राकेश मोटरसाइकिल से लोकेश को साथ ले कर आरती के घर के लिए चल पड़ा. आरती को सबक सिखाने की योजना राकेश ने 18 नवंबर को ही बना डाली थी, इसलिए 19 नवंबर की शाम को उस ने चाकू खरीद लिया था. हत्या करने में किसी तरह की झिझक न हो, इसलिए एकएक क्वार्टर शराब खरीद कर पी लिया.

सवा 11 बजे जब राकेश और लोकेश मोटरसाइकिल से रचना पैलेस कालोनी की ओर जा रहे थे तो उन्हें नेतराम जाता दिखाई दिया. उन्हें लगा कि वह फिरोजाबाद जा रहा है. इस के बाद दोनों एक पान के खोखे के पास खड़े हो गए. आधेपौने घंटे बाद जब उन्हें लगा कि नेतराम शहर से बाहर निकल गया होगा तो दोनों आरती के घर की ओर चल पड़े. योजनानुसार राकेश ने मोटरसाइकिल आरती के घर से कुछ दूरी पर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास खड़ी कर दी और इधरउधर देख कर लोकेश के साथ बहन के घर जा पहुंचा. भाई और उस के दोस्त के आने पर आरती ने फटाफट चाय बनाई और नमकीन एवं मिठाई के साथ उन्हें पीने को दी. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘राकेश, तुम दोनों चाय पियो, तब तक मैं युवराज को नहला देती हूं.’’

यह कह कर आरती युवराज को गोद में ले कर कपड़े उतारने लगी तो राकेश ने कहा, ‘‘दीदी, आप ने कुछ देने को कहा था. लाइए उसे दे दीजिए.’’

आरती ने युवराज को लोकेश को थमाया और खुद किचन में गई. अब तक चाय खत्म हो चुकी थी. इसलिए किचन में जा कर जैसे ही आरती ने फ्रिज खोलना चाहा, पीछे से राकेश पहुंच गया. उस ने आरती के गले में पड़े दुपट्टे की लपेट कर पकड़ लिया और घसीटते हुए बैडरूम ले गया. हक्काबक्का आरती कुछ कहती, युवराज को लोकेश की गोद में देख कर डर गई कि उस के चिल्लाने पर वह उस के बेटे का अनिष्ट न कर दे. इस के बाद राकेश ने आरती को बैड पर गिरा कर चाकू से हमला कर दिया. गला रेत कर उस की हत्या करने के बाद गले की चेन और कान के कुंडल उतार लिए. इस के बाद अलमारी वगैरह खोल कर उस में रखा कीमती सामान ले कर इधरउधर फैला दिया, जिस से लगे कि यह हत्या लूट के लिए की गई है.

आरती की हत्या करने के बाद दोनों घर से निकले और मोटरसाइकिल से आराम से चले गए. लोकेश अपने घर चला गया, जबकि राकेश अपने एक दोस्त के घर जा कर लोकल न्यूज चैनल पर समाचार देखने लगा कि पुलिस की जांच किस दिशा में जा रही है. राकेश पुलिस जांच का पता लगा पाता, पुलिस ने पहले लोकेश को और फिर उस की मदद से उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, गहने, मोटरसाइकिल और कपड़े बरामद कर के दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

राकेश ने बहन को मौत के घाट उतार कर उस के मासूम बच्चों को अनाथ कर दिया है. लेकिन उसे न तो बहन की हत्या का कोई दुख है, न उस के बच्चों के अनाथ होने का. उस का कहना है कि बहन ने परिवार पर बदनामी का जो दाग लगाया था, उस के खून से उस ने वह दाग धो दिया है. अब उसे चाहे जो भी सजा मिले, उसे उस का कोई दुख नहीं है. Love Story in Hindi

 

Family Dispute : ऐसी राहों पर खैर नहीं

Family Dispute : अशोक ने भाई ज्योति कुमार और उस के दोस्त नवल के साथ मिल कर अपनी पत्नी और 2 मासूम बेटियों की हत्या करा दी थी. तब उस ने सोचा कि पीछा छूटा. लेकिन कानून उसे और उस के सहयोगी हत्यारों को उन के अंजाम तक ले ही गया.  25 अप्रैल, 2014 को लुधियाना के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद की अदालत में अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन हत्या के एक महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था. मुकदमा चूंकि दिल दहला देने वाला था, इसलिए अन्य वकील भी बहस सुनने के लिए अदालत में मौजूद थे.

इस मामले में अभियुक्तों ने एक महिला सिमरन कौर उर्फ पिंकी और उस की 8 साल तथा 5 साल की 2 मासूम बेटियों दिव्या और पूजा की बेरहमी से हत्या कर दी थी. बचाव पक्ष के वकील रछपाल सिंह मंड अपने सहायकों के साथ अदालत में मौजूद थे. अभियोजन पक्ष के वकील गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल भी पूरी तैयारी के साथ आए थे. 11 बजे जज साहब के आने पर मकुदमे की काररवाही शुरू हुई. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद ने फाइल पर नजर डाल कर बचाव पक्ष के वकील आर.एस. मंड से कहा, ‘‘मंड साहब, आप को इस मामले में कुछ कहना है?’’

‘‘जी सर,’’ एडवोकेट मंड ने आगे आ कर कहा, ‘‘जैसा कि मैं पहले ही अदालत को बता चुका हूं कि हत्या के इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. पूरा मुकदमा हालात पर निर्भर है. अभियोजन पक्ष को एक भी ऐसा गवाह नहीं मिला, जो इस जघन्य हत्याकांड पर रोशनी डालता. हम सिर्फ यही मान कर चल रहे हैं कि ऐसा हुआ था, वैसा हुआ होगा?’’

जज साहब एडवोकेट मंड की इन बातों पर कोई टिप्पणी करते, उस से पहले ही अभियोजन पक्ष के वकील गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल ने कहा, ‘‘सर, रात में उस सुनसान जगह पर बैठ कर कोई आदमी यह इंतजार तो करेगा नहीं कि वहां हत्याएं होने वाली हैं और उसे उन हत्याओं का चश्मदीद गवाह बनना है. मौकाए वारदात पर अभियुक्तों के जूतों के निशान, चाकू पर मिले अंगुलियों के निशान और मृतका सिमरन की मुट्ठी में मिले आरोपियों के सिर के बाल ही उन्हें दोषी ठहराने के लिए काफी हैं. इन से भी बड़ा सुबूत है, इन हत्याओं के पीछे अभियुक्तों का मकसद, जो पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है. इसलिए मैं एक बार पुन: अदालत से दरख्वास्त करूंगा कि इन हत्याओं के लिए अभियुक्तों को फांसी दी जानी चाहिए.’’

‘‘मैं मानता हूं कि हालात मेरे मुवक्किलों के पक्ष में नहीं हैं,’’ एडवोकेट मंड ने जज साहब को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘इस के बावजूद मैं अदालत से निवेदन करूंगा कि मेरे मुवक्किलों के साथ नरमी बरती जाए और इन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाए.’’

‘‘सर, संदेह का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. 5 चाकुओं पर अंगुलियों के निशान, मृतका की मुट्ठी से बरामद बाल, हत्या का उद्देश्य और गवाहों के बयान से संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. शीशे की तरह साफ है कि हत्याएं इन्हीं लोगों ने की थीं.’’ एडवोकेट गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल ने कहा.

‘‘बिना चश्मदीद गवाह के किसी को सजा देना उस के साथ न्याय नहीं होगा.’’ एडवोकेट मंड ने अपना आखिरी दांव चलाया.

बहस पूरी हुई तो अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद फैसला सुनाने की तैयारी करने लगे. अदालती फैसले से पहले आइए इस हत्याकांड की कहानी जान लें, जिस से फैसले को समझने में आसानी रहे. 28 दिसंबर, 2009 की सुबह लुधियाना पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली थी कि हैबोवाल क्षेत्र में सिविल सिटी स्थित संधुनगर से गुजरने वाली रेलवे लाइन के पास खेतों में एक महिला और 2 बच्चियों की लाशें पड़ी हैं. कंट्रोल रूम ने इस की सूचना संबंधित थाना सलेम टाबरी को दे दी थी. सूचना पा कर थाना सलेम टाबरी पुलिस घटनास्थल पर तो पहुंच गई, लेकिन कोई भी काररवाई करने से मना कर दिया. उस का कहना था कि घटनास्थल थाना जीआरपी के अंतर्गत है.

इस पर थाना जीआरपी को सूचना दी गई. जीआरपी पुलिस ने आ कर कहा कि यह इलाका उन के अंडर में नहीं है. उन का कहना था कि यह क्षेत्र थाना हैबोवाल में आता है. सूचना पा कर थाना हैबोवाल पुलिस घटनास्थल पर आई. लेकिन उस ने भी काररवाई करने से मना कर दिया. इस तरह कई घंटों तक सीमा विवाद को ले कर काररवाई अटकी रही. चूंकि हत्याओं का मामला था, इसलिए यह बात काफी तेजी से शहर में फैल गई थी. मीडियाकर्मी और पुलिस अधिकारी भी आ गए थे. अंत में एसीपी हर्ष बंसल के हस्तक्षेप पर थाना हैबोवाल पुलिस को काररवाई करनी पड़ी.

थाना हैबोवाल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने अपराध संख्या 271/09 पर भादंवि की धारा 302/34 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर के जांच का कार्यभार अतिरिक्त थानाप्रभारी सबइंसपेक्टर अजायब सिंह को सौंप दिया. घटनास्थल पर लगी भीड़ में मृतका सिमरन के घर वाले भी मौजूद थे, इसलिए लाश की शिनाख्त में कोई परेशानी नहीं हुई. लाशों के निरीक्षण में मृतका सिमरन उर्फ पिंकी की मुट्ठी से कुछ बाल बरामद हुए थे, इस का मतलब था कि मृतका और हत्यारे के बीच संघर्ष हुआ था. घटनास्थल से पुलिस को मृत बच्चियों के पास से चिप्स के खाली पैकेट भी मिले थे. मृतका सिमरन और 5 वर्षीया बच्ची पूजा की लाश रेलवे लाइन के बिलकुल पास मिली थी.

जबकि 8 वर्षीया दिव्या की लाश वहां से थोड़ी दूर पर डिप्टी सिंह के खेत से मिली थी. खेत की सिंचाई की गई थी, जिस से उस में कीचड़ था. अंदाजा लगाया गया कि जान बचाने के लिए दिव्या भागी होगी, लेकिन कीचड़ होने की वजह से वह ज्यादा भाग नहीं पाई. रेलवे लाइन से करीब 200 मीटर की दूरी पर मृतका सिमरन का शौल पड़ा था. सबइंसपेक्टर अजायब सिंह ने क्राइम टीम बुला कर घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य एकत्र कराए. उस के बाद घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

स्वरूपनगर निवासी मृतका के पिता विजय ने पुलिस को बताया था कि सिमरन उर्फ पिंकी सहित उन की 4 संताने हैं. सिमरन उर्फ पिंकी की शादी उन्होंने सन 2000 में करनाल, हरियाणा के कुराली निवासी अशोक के साथ की थी. उस की 2 बेटियां थीं, 8 वर्षीया दिव्या और 5 वर्षीया पूजा. शादी के बाद 6-7 सालों तक तो सब ठीकठाक रहा, पर पिछले कुछ समय से पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर झगड़ा होने लगा था. यह बात तलाक तक पहुंच गई थी, लेकिन पंचायत के बीच में आ जाने से तलाक होने से बच गया. विजय ने सबइंसपेक्टर अजायब सिंह को जो बताया था, उस के अनुसार 26 दिसंबर, 2008 को सिमरन अपनी दोनों बेटियों दिव्या, पूजा और पति अशोक के साथ अपने देवर की शादी के कार्ड देने लुधियाना आई थी.

कुछ कार्ड उस ने उसी दिन पहुंचा दिए थे और कुछ कार्ड अगले दिन यानी 27 तारीख को जा कर दिए थे. 27 तारीख की शाम को सिमरन और उस के पति अशोक में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ. लेकिन थोड़ी ही देर में दोनों में समझौता हो गया. उस के बाद अशोक कहीं चला गया. उस के जाने के थोड़ी देर बाद सिमरन दोनों बेटियों को ले कर बाजार घुमाने गई तो लौट कर नहीं आई. अगले दिन उन की लाशें मिलीं. सिमरन और उस की बेटियों की तलाश में वे लोग रात भर भटकते रहे थे.

सबइंसपेक्टर अजायब सिंह ने मृतका के पति अशोक से पूछताछ की, उस ने भी वही सब बताया, जो उस के ससुर ने बताया था. अजायब सिंह की समझ में यह नहीं आ रहा था कि सिमरन बेटियों को ले कर बाजार गई थी तो वह रेलवे लाइनों के पास सुनसान में कैसे पहुंच गई? जरूर वह वहां किसी परिचित के साथ गई होगी, पर किस के साथ? पोस्टमार्टम के बाद तीनों लाशें घर वालों को सौंप दी गईं. पोस्टमार्टम के अनुसार, दोनों लड़कियों की हत्या गला रेत कर की गई थी. सिमरन के शरीर पर चाकू के तमाम घाव थे. इस के अलावा उस के एक पैर की नस भी काटी गई थी. तीनों की मौत शरीर का खून बह जाने की वजह से हुई थी.

पुलिस का मानना था कि इन हत्याओं में किसी परिचित का हाथ था. इसलिए पुलिस का शक बारबार मृतका के पति अशोक पर जा रहा था. इस के बाद पुलिस ने मुखबिरों से जो जानकारी जुटाई, उस के अनुसार अशोक अपनी पत्नी सिमरन उर्फ पिंकी पर संदेह करता था. उसे संदेह था कि किसी के साथ उस के अवैध संबंध हैं. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा होता था और बात तलाक तक पहुंच गई थी. अशोक की करनाल रेलवे स्टेशन रोड पर साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. उस की आमदनी सीमित थी, जबकि सिमरन के खर्च शाही थे. वह एक महत्वाकांक्षी और आजाद खयालों वाली महिला थी. जबकि अशोक का परिवार पुराने खयालों वाला था.

शक के आधार पर अजायब सिंह ने अशोक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि अशोक ने हत्याओं से कुछ घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक अपने भाई ज्योति से कई बार बात की थी. इस के बाद ज्योति के फोन की लोकेशन पता की गई तो उस की लोकेशन पहले करनाल की और उस के बाद लुधियाना की मिली. घटना वाले समय उस की लोकेशन घटनास्थल की पाई गई थी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. इस के बाद पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो अशोक ने अपनी पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि उस ने तीनों हत्याएं छोटे भाई ज्योति कुमार और उस के दोस्त नवल के साथ मिल कर की थीं. इस काम के लिए उस ने नवल को 20 हजार रुपए देने का वादा किया था.

अशोक पकड़ा जा चुका था. ज्योति और नवल को गिरफ्तार करने के लिए सबइंसपेक्टर अजायब सिंह करनाल गए और पूछताछ के बहाने ज्योति और उस के दोस्त नवल को लुधियाना ले आए. पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में अशोक, ज्योति कुमार और नवल से की गई पूछताछ में सिमरन, दिव्या और पूजा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह बहुत ही शर्मनाक थी. अशोक और सिमरन की शादी सन 2000 में हुई थी. शुरूशुरू में दोनों का वैवाहिक जीवन काफी खुशहाल रहा. अशोक की साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. वह मेहनती और दूर की सोच रखने वाला था, जबकि सिमरन इस से बिलकुल उलटी थी. वह आजाद पंछी की तरह जीवन गुजारने वाली महिला थी. आजाद खयाल की होने के साथसाथ, वह महत्वाकांक्षी भी थी.

बनठन कर रहना और खुले हाथों खर्च करना सिमरन की आदत में शुमार था. अशोक को यह सब बिलकुल अच्छा नहीं लगता था, लेकिन किसी तरह वह निर्वाह कर रहा था. सिमरन 2 बेटियों की मां बन गई, इस के बावजूद उस की स्वछंदता में कोई सुधार नहीं हुआ. उसी बीच मिसरन की मुलाकात अपने एक पुराने परिचित से हुई. वह लुधियाना में उस के पड़ोस में रहता था. उन दिनों वह करनाल की किसी कंपनी में नौकरी कर रहा था. सिमरन अपने उस परिचित युवक से मिलनेजुलने लगी. उन की मुलाकातें दिनोंदिन बढ़ती गईं. वह उसे अपने घर भी बुलाने लगी. जब इस बात का पता अशोक को चला तो उस ने सिमरन को डांटा. उस ने सिमरन को उस युवक से संबंध तोड़ने और उसे घर पर न बुलाने के लिए कहा, पर सिमरन उस से संबंध विच्छेद करने को तैयार नहीं थी.

इसी बात को ले कर आए दिन दोनों में झगड़ा होने लगा. अशोक ने जब अपने सूत्रों से सिमरन के बारे में पता किया तो उसे जानकारी मिली कि सिमरन के दोस्ताना संबंध उसी एक युवक से नहीं, बल्कि और भी कई युवकों से हैं. अशोक के लिए यह बात बरदाश्त से बाहर थी, जबकि सिमरन को इस की जरा भी परवाह नहीं थी. परिणामस्वरूप अच्छीखासी चल रही गृहस्थी टूटने के कगार पर आ गई. अशोक ने अपनी गृहस्थी को बचाने के लिए सिमरन को काफी समझाने की कोशिश की, ससुराल वालों से भी शिकायतें कीं. जब कोई नतीजा नहीं निकला तो अशोक उसे तलाक देने के बारे में सोचने लगा.

लेकिन जब तलाक देने की नीयत से अशोक वकील के पास सलाह लेने पहुंचा तो वकील ने जो बताया, उस से उस का मन बदल गया. वकील ने बताया था कि बालिग होने तक बेटियां मां के साथ रहेंगी, लेकिन उन का खर्च उसे देना पड़ेगा. एक तो अशोक की इतनी कमाई नहीं थी कि वह दूसरी शादी कर के बेटियों का खर्च उठाता, दूसरे उसे इस बात का भी डर सता रहा था कि मां के साथ रह कर उस की बेटियां भी चरित्रहीन हो जाएंगी. इस के अलावा उसे यह भी लगता था कि तलाक के बाद अगर बेटियां उस के साथ आ गईं तो वह उन का क्या करेगा.

उस ने इन बातों पर गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि इन सब से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि सब की हत्या कर दी जाए. इस के बाद उस ने सब की हत्या की योजना बना डाली, लेकिन समस्या यह थी कि यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था. अशोक ने घरपरिवार की इज्जत का हवाला दे कर अपने भाई ज्योति कुमार को अपनी योजना में शामिल कर लिया. ज्योति के हामी भरने पर 2 लोग हो गए. लेकिन हत्या उन्हें 3 लोगों की करनी थी, इसलिए उस ने ज्योति से कहा, ‘‘एक आदमी और होता तो काम करने में आसानी रहती.’’

इस पर ज्योति ने अपने दोस्त नवल को 20 हजार रुपए देने का वादा कर के हत्याओं में शामिल होने के लिए तैयार कर लिया. नवल करनाल में टैक्सी चलाता था. वह पैसों की वजह से नहीं, ज्योति की दोस्ती की वजह से हत्या जैसा अपराध करने को तैयार हुआ था. अशोक की बुआ के बेटे राजेश की 7 जनवरी को शादी थी. योजना के अनुसार, राजेश की शादी के कार्ड बांटने के लिए अशोक पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों को ले कर अपनी ससुराल लुधियाना आ गया. यह 26 दिसंबर की बात थी. कुछ कार्ड उन्होंने उसी दिन बांट दिए. इस बीच अशोक फोन से लगातार ज्योति से संपर्क बनाए रहा.

27 दिसंबर, रविवार को योजनानुसार ज्योति अपने दोस्त नवल के साथ सुबह साढ़े 9 बजे की ट्रेन पकड़ कर दोपहर को लुधियाना पहुंच गया. अपने पहुंचने की सूचना उस ने फोन द्वारा अशोक को दे दी. दोपहर को अशोक उन से जालंधर बाईपास चौक पर मिला. वहां से तीनों रेलवे लाइन के किनारेकिनारे पैदल चलते हुए सिविल सिटी संधुनगर काली मंदिर के पास पहुंचे. यही वह स्थान था, जहां उन्हें तीनों हत्याएं करनी थीं. वहां उन्होंने सलाह की कि कैसे और किस तरह तीनों को मारना है. पूरी योजना समझा कर अशोक अपनी ससुराल चला गया.

ससुराल में अशोक सिमरन और दोनों बेटियों के साथ बैठा हंसीमजाक करता रहा. दामाद और बेटी को हंसतेबोलते देख ससुराल वाले भी खुश थे. योजनानुसार कुछ ही देर में अशोक ने सिमरन से झगड़ा कर लिया, लेकिन जल्दी ही उसे मना भी लिया. शाम 7 बजे के आसपास अशोक ने सिमरन को अपने पास बुला कर कहा, ‘‘सिमरन, अभीअभी ज्योति का फोन आया था कि उस ने नई कार खरीदी है और माथा टेकने के लिए वह माता चिंतपूर्णी के दरबार जा रहा है. उस ने कहा है कि जब तक हम लोग साथ नहीं चलेंगे, वह नहीं जाएगा. अब तुम्हीं बताओ हमें क्या करना चाहिए.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है कि देवरजी ने कार खरीद ली है. हम जरूर साथ जाएंगे. इसी बहाने देवी के दर्शन हो जाएंगे.’’ सिमरन ने खुशी प्रकट करते हुए कहा.

इस के बाद अशोक कुछ नहीं बोला तो सिमरन ने कहा, ‘‘तुम कुछ सोच रहे हो क्या?’’

‘‘तुम जैसा सोच रही हो, वैसा नहीं हो सकता.’’

‘‘क्यों?’’ सिमरन ने पूछा.

‘‘क्योंकि तुम्हारे घर वाले हमें जाने नहीं देंगे. हमारे आने की खुशी में आज उन्होंने खानेपीने का इंतजाम किया है.’’ अशोक ने कहा, ‘‘मैं ने दादीजी से पूछा था, उन्होंने डांट कर कहा कि खबरदार जो कहीं गए.’’

‘‘तब क्या किया जाए?’’ सिमरन ने पूछा तो अशोक ने कहा, ‘‘एक तरीका है. तुम दिव्या और पूजा को बाजार घुमाने के बहाने ले कर रेलवे लाइन के उस पार पहुंचो. मैं तुम्हें वहीं मिलता हूं. फोन कर के ज्योति को भी वहीं बुला लेता हूं. वहीं से हम सभी मंदिर चलेंगे. वापसी में ज्योति हमें यहीं छोड़ देगा.’’

सिमरन अशोक की बातों में आ गई.  वैसे तो सिमरन बहुत चालाक थी, लेकिन जब मौत आती है तो चालाकी काम नहीं देती. सिमरन को मना कर अशोक 7 बजे घर से निकल गया. उस के 10 मिनट बाद सिमरन भी दोनों बेटियों को बाजार घुमाने के बहाने ले कर घर से निकल पड़ी. कुछ देर में वह अशोक द्वारा बताई जगह पर पहुंच गई. अशोक भी पीछे से वहां पहुंच गया.

सिमरन ने पूछा, ‘‘ज्योति कहां है?’’

‘‘वह रेलवे लाइन के उस पार आ रहा है. तुम बच्चों को ले कर उस पार चलो. मैं अभी आ रहा हूं.’’

सिमरन दोनों बेटियों दिव्या और पूजा को ले कर लाइन के उस पार जाने लगी तो अशोक ने वहीं छिपे ज्योति और उस के दोस्त नवल को इशारा कर दिया और खुद ससुराल लौट आया, जिस से किसी को उस पर संदेह न हो. अशोक के कहने पर सिमरन दोनों बेटियों को ले कर रेलवे लाइन के उस पार जाने के लिए आगे तो बढ़ी, लेकिन उसे डर लगा, क्योंकि अंधेरा होने के साथ वहां सन्नाटा था. बहरहाल, उस ने जैसे ही रेलवे लाइन पार की, किसी चीते की तरह नवल हाथ में चाकू लिए उस पर झपटा. ज्योति ने दिव्या पर वार करना चाहा. अचानक हुए हमले से घबरा कर सिमरन ने शोर मचा दिया और दोनों बेटियों को ले कर खेत की ओर भागी. लेकिन ज्योति ने दौड़ कर पीछे से उन्हें दबोच लिया.

हाथ में लिए चाकू से ज्योति ने सिमरन की गर्दन पर पूरी ताकत से वार किया. लेकिन चाकू सिमरन की गर्दन की हड्डी में लगा, जिस से वह हत्थे के पास से टूट कर नीचे गिर गया. इस के बाद नवल ने अपने चाकू से उस की हत्या कर दी. मरने से पहले सिमरन ने जान बचाने के लिए ज्योति और नवल से खूब संघर्ष किया था. इसी संघर्ष में नवल के सिर के बाल उस की मुट्ठी में आ गए थे, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया था. सिमरन की हत्या करने के बाद नवल और ज्योति दिव्या और पूजा के पीछे दौड़े. मां की हत्या होते देख दोनों लड़कियां जान बचाने के लिए भागीं तो, लेकिन खेत में कीचड़ होने की वजह से भाग नहीं पाई. वैसे भी पूजा तो अभी छोटी ही थी. ज्योति ने पूजा की और नवल ने दिव्या की गला रेत कर हत्या कर दी.

मांबेटियों को मौत के घाट उतारने के बाद उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी अशोक को दे दी. इस काम में उन्हें 20-25 मिनट लगे थे. तीनों की हत्या और अशोक को सूचना देने के बाद दोनों बस से करनाल के लिए रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने राजपुरा के पास चलती बस से अपनी जैकेट उतार कर फेंक दीं, क्योंकि उस पर खून के छीटें पड़ गए थे. रिमांड के दौरान जांच अधिकारी अजायब सिंह ने चाकू और जैकेट बरामद कर लिए थे. सिमरन की हत्या करने के बाद ज्योति ने कान में पहनीं उस की सोने की बालियां उतार ली थीं. अजायब सिंह ने उन्हें भी बरामद कर लिया था. दूसरी ओर जब काफी देर तक सिमरन बाजार से लौट कर नहीं आई तो योजनानुसार अशोक ने चिंता व्यक्त करते हुए अपने ससुराल में हंगामा खड़ा कर दिया.

वह रिश्तेदारों के साथ खुद भी रात भर सिमरन और बेटियों की तलाश करता रहा. सुबह वह अपने रिश्तेदारों और ससुर विजय को सिमरन की तलाश में जानबूझ कर उस ओर ले गया, जहां मांबेटियों की लाशें पड़ी थीं. इस मामले में अभियोजन पक्ष ने अपनी ओर से कुल 19 गवाह पेश किए थे, जिन में घटनास्थल के फोटो खींचने वाला फोटोग्राफर, क्राइमटीम, पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर और कुछ पुलिसकर्मियों के अलावा मुख्य गवाह था मृतका का पिता विजय. तीनों आरोपियों के इकबालिया बयान भी थे, जिन्हें अदालत ने सच माना था. अपने बयान में तीनों अभियुक्तों ने सिमरन और उस की दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा की हत्या की बात स्वीकार की थी. अदालत ने 23 अप्रैल, 2014 को तीनों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए फैसले की तारीख 25 अप्रैल, 2014 तय की थी.

25 अप्रैल, 2014 को एडिशनल सेशन जज श्री एस.पी. सूद ने इस तिहरे हत्याकांड का फैसला सुनाया. उन्होंने कहा, ‘‘गवाहों के बयान, पुलिस तफ्तीश, घटनास्थल से प्राप्त सुबूतों एवं अभियुक्तों के बयानों से यह सिद्ध हो गया है कि 27-28 दिसंबर, 2009 की रात अभियुक्त अशोक, जो मृतका सिमरन का पति है, ने अपनी पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा को एक सुनसान जगह पर ले गया और अपने भाई ज्योति कुमार तथा भाई के दोस्त नवल से तीनों की बेरहमी से हत्या करा दी.

‘‘घटनास्थल और मृतका की गर्दन से बरामद चाकुओं पर मिले फिंगरप्रिंट व फोरेंसिक जांच रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया है कि फिंगर प्रिंट, जूतों के निशान, डीएनए रिपोर्ट और मृतका की मुट्ठी से बरामद अभियुक्त के सिर के बाल अभियुक्तों के ही हैं.

‘‘इस बात में कोई संदेह नहीं कि तीनों अभियुक्तों ने सिमरन और उस की दोनों बेटियों का बेरहमी से कत्ल किया है. इसलिए ये किसी भी तरह से रहम या माफी के काबिल नहीं हैं. अभियुक्त अशोक कुमार, अभियुक्त ज्योति कुमार और अभियुक्त नवल किशोर को सिमरन, पूजा और दिव्या की हत्या का दोषी मानते हुए जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा दी जाती है.’’

इस तरह अशोक व उस के भाई ज्योति और उस के दोस्त नवल को अपने किए की सजा मिल गई. जज के सजा सुनाते ही पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को अपनी कस्टडी में ले लिया. Family Dispute

 

UP Crime News : पत्नी की अनेदखी न बाबा न

UP Crime News : बलरामपुर की विनीता और उस का पति मदन कुमार आर्य दोनों ही सरकारी नौकरी पर थे. हर महीने मोटी सैलरी मिलती थी. कमाई के चक्कर में मदन कुमार पत्नी की शारीरिक जरूरत को तवज्जो नहीं देता था. ऐसे में 2 जवान बच्चों की 40 वर्षीय मां विनीता का अपने भांजे उमेश कुमार पर दिल आ गया. फिर एक दिन वही हुआ, जिस की…

विनीता आर्य 2 सप्ताह से अपने भांजे उमेश कुमार की काल रिसीव नहीं कर रही थी, जिस से उमेश की उलझन बढ़ती जा रही थी. इसी उलझन में वह शाम करीब 5 बजे विनीता के घर जा पहुंचा. उस ने डोरबैल बजाई तो चंद मिनट बाद विनीता ने दरवाजा खोला. सामने उमेश को देखते ही विनीता तल्ख स्वर में बोली, ”उमेश, तुम्हारे मामा तो घर में हैं नहीं. बेटा मनु भी कोचिंग गया है.’’

”मामी, मामा नहीं, आप तो हैं.’’ कहते हुए उमेश घर के अंदर आ गया और कमरे में पड़े सोफे पर आ कर बैठ गया. उमेश ने एक सरसरी नजर विनीता मामी पर डाली फिर बोला, ”मामी, वैसे भी मैं मामा से नहीं, तुम से मिलने आया हूं. तुम मेरी काल रिसीव क्यों नहीं कर रही थी.’’

”देखो उमेश, अब तुम शादीशुदा और एक बच्चे के बाप हो. इसलिए तुम से फोन पर बतियाना और तुम्हारा घर आना, दोनों ही ठीक नहीं है. वैसे भी पति और बेटा दोनों तुम्हें शक की नजरों से देखते हैं. तुम से नफरत करते हैं.’’

”मामी, मैं पहले भी तो घर आता था. तब तुम खूब हंसती थी, बोलती थी, बतियाती थी. मेरे आने का इंतजार करती थी. 2-4 दिन भी न आऊं तो उलाहना देती थी. अंतरंग क्षणों में तुम्हें सुख की अनुभूति भी होती थी, परंतु अब क्या हो गया है?’’

”तब की बात और थी उमेश. तब मैं तुम से प्यार करती थी. इसलिए खुल कर हंसतीबोलती थी. तुम्हारा बेसब्री से इंतजार भी करती थी. न आने पर बेचैन हो जाती थी. तुम्हारे साथ मिलन में मुझे सुख भी मिलता था. लेकिन अब बात कुछ और है. तुम्हारी खूबसूरत पत्नी है. बच्चा है. अब तुम पतिधर्म का पालन करो और मुझे भूल जाओ. वैसे भी अब मैं तुम से प्यार नहीं करती. मैं ने तुम्हें अपने दिल से निकाल दिया है.’’

”मामी, मैं मानता हूं कि मेरी पत्नी जवान है और खूबसूरत भी है. लेकिन तुम मेरा पहला प्यार हो. तुम्हारे साथ मिलन में मुझे जो सुख मिलता है, वह बीवी के साथ नहीं. वैसे मामी, मुझे पता है कि तुम मुझे क्यों नजरअंदाज कर रही हो और क्यों तुम ने मुझे अपने दिल से निकाल फेंका है. जवान और सुंदर बीवी तो बहाना है.’’

”क्या पता है तुम्हें?’’ विनीता ने अनजान बनते हुए उमेश से पूछा.

”यही कि अब तुम ने अपने दिल में किसी और को बसा लिया है. उसी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो. इसलिए तुम ने मुझे अपने दिल से निकाल दिया है और मुझे नजरअंदाज कर रही हो. तुम मामा की आंखों में धूल झोंक सकती हो, मेरी आंखों में नहीं.’’

विनीता गुस्से से बोली, ”उमेश, तुम हदें पार कर रहे हो. तुम्हारा इलजाम सरासर गलत है. मैं ने किसी को दिल में नहीं बसाया है और न ही पति की आंखों में धूल झोंक रही हूं. तुम्हें नजरअंदाज करने लगी हूं. इसलिए तुम मेरे चरित्र पर अंगुली उठाने लगे हो.’’

उस रोज विनीता और उमेश के बीच नजर अंदाज को ले कर काफी देर तक नरमगरम बहस होती रही. उस के बाद उमेश वापस घर आ गया. दरअसल, उमेश को शक था कि विनीता ने अपने साथ नौकरी करने वाले एक टीचर से रिश्ता जोड़ लिया है. इसलिए वह उसे नजरअंदाज करने लगी है और उस से दूरी बना ली है. उमेश नहीं चाहता था कि उस की प्रेमिका विनीता उस के अलावा किसी और की बांहों में समाए. इसलिए उस ने विरोध जताया और समझाने का प्रयास भी किया. लेकिन विनीता जब नहीं मानी तो उस ने उसे सबक सिखाने की ठान ली. उमेश ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि विनीता उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

पहली अप्रैल, 2025 की शाम 5 बजे उमेश अपनी ब्रेजा कार से वीर विनय चौराहे की ओर जा रहा था, तभी उस की नजर विनीता पर पड़ी. वह बाजार की ओर शायद कुछ घरेलू सामान खरीदने जा रही थी. उमेश कार ले कर विनीता के पास पहुंचा और बोला, ”मामी, क्या बाजार जा रही हो? कार में बैठो, मैं तुम्हें बाजार तक छोड़ देता हूं. बाजार करने के बाद मैं तुम्हें घर भी छोड़ दूंगा.’’

”नहीं, नहीं उमेश, मैं बाजार चली जाऊंगी. तुम मेरे लिए परेशान मत हो. जहां जा रहे हो, जाओ.’’

लेकिन उमेश नहीं माना. उस ने फुरती से कार का दरवाजा खोला और विनीता को अगली सीट पर बिठा लिया. उस के बाद स्वयं ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार बढ़ा दी तो विनीता ने पूछा, ”उमेश, तुम मुझे कहां ले जा रहे हो?’’

उमेश मुसकराते हुए बोला, ”मामी, आज बहुत दिनों बाद मौका मिला है. इसलिए हम सैरसपाटे पर जा रहे है. घंटे दो घंटे में वापस आ जाएंगे.’’

”घर न पहुंची तो तुम्हारे मामा परेशान होंगे. इसलिए मैं घूमने नहीं जाऊंगी. तुम मुझे बाजार छोड़ दो. सामान ले कर मैं समय से घर पहुंच जाऊंगी. मुझे खाना भी बनाना है.’’

लेकिन उमेश ने विनीता की बात अनसुनी कर दी. वह उसे बलरामपुर शहर से श्रावस्ती ले गया, फिर वहां से बहराइच होता हुआ गोंडा जिले के खरगूपुर थाना क्षेत्र के गांव परसौनी पहुंचा. यहां उस ने गांव से कुछ दूर विसुहा नदी के पुल के किनारे कार रोक दी. अब तक रात का अंधेरा घिर आया था. आवाजाही न के बराबर थी. उमेश ने विनीता का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा, ”मामी, सचसच बताओ, क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करती और तुम ने किसी और को अपने दिल में बसा लिया है?’’ कहते हुए उमेश ने विनीता को अपनी बांहों में भर लिया और मनमानी करने लगा. विनीता बचाव करने लगी.

बचाव के दौरान ही विनीता ने एक तमाचा उमेश के गाल पर जड़ दिया. तमाचा पड़ते ही उमेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने विनीता के गले में पड़ा दुपट्टा उसी के गले में लपेटा और गला कसने लगा. कुछ ही देर में विनीता की जीभ और आंखें बाहर आ गईं और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उमेश ने विनीता का मोबाइल फोन व दुपट्टा सुरक्षित किया, फिर शव को कार से निकाल कर विसुहा नदी के पुल के नीचे फेंक दिया. वापस लौटते समय उस ने विनीता का मोबाइल फोन बंद कर दिया. फोन और दुपट्टा दुल्हिनपुर के जंगल में फेंक दिया. इस के बाद वह घर आ गया.

इधर विनीता अपने पति मदन कुमार आर्य से शाम 5 बजे यह कह कर घर से निकली थी कि वह घर का सामान खरीदने सिविल लाइंस बाजार जा रही है. सामान खरीद कर घंटे-दो घंटे बाद वापस आ जाएगी. इंतजार करतेकरते मदन कुमार को 3 घंटे से अधिक का समय बीत चुका था, लेकिन विनीता बाजार से खरीददारी कर वापस नहीं आई थी. पत्नी की खोज में मदन कुमार सिविल लाइंस स्थिति मार्केट भी गया और मार्केट का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन विनीता उसे कहीं नहीं दिखी. अत: हताश हो कर वह वापस आ गया.

सुबह होते ही अड़ोसपड़ोस में भी विनीता के लापता होने की खबर फैल गई. फिर तो विनीता का लापता होना मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया. मदन कुमार आर्य 2 अप्रैल, 2025 की सुबह 10 बजे थाना सिविल लाइंस पहुंचा. उस समय एसएचओ शैलेश सिंह थाने में मौजूद थे. मदन कुमार आर्य ने उन्हें बताया कि उन की पत्नी विनीता कंपोजिट विद्यालय में अनुदेशिका पद पर कार्यरत है. कल शाम 5 बजे वह सिविल लाइंस बाजार गई थी. तब से वह वापस नहीं आई. उस का फोन भी बंद है. उस की खोज हर संभावित स्थान पर की गई है. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि विनीता पूर्व विधायक सुखदेव प्रसाद की बेटी की बहू है.

चूंकि मामला पूर्व विधायक के परिवार से जुड़ा था, अत: एसएचओ शैलेश सिंह ने विनीता के लापता होने की जानकारी एसपी विकास कुमार को दी. साथ ही मदन कुमार की तहरीर पर गुमशुदगी दर्ज कर ली. एसपी विकास कुमार ने विनीता की गुमशुदगी को गंभीरता से लिया और उस की खोज के लिए एएसपी नम्रता श्रीवास्तव की अगुवाई में एक विशेष टीम गठित कर दी. इस टीम में एसएचओ शैलेश सिंह के अलावा कुछ तेजतर्रार पुलिसकर्मियों व सर्विलांस टीम को शामिल किया गया. साथ ही कुछ खास खबरियों को भी विनीता की टोह में लगाया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले विनीता के पति मदन कुमार व उन के बेटे मनु से पूूछताछ की, फिर सर्विलांस टीम की मदद से घर से ले कर बाजार तक सड़क किनारे लगे सीसीटीवी कैमरों को खंगाला. टीम को एक बड़ी सफलता तब मिली, जब सिविल लाइंस बाजार के पहले सड़क किनारे लगे सीसीटीवी कैमरे में विनीता दिखी. वह किसी कार सवार युवक से बात कर रही थी. फिर उसी युवक की कार में बैठ जाती दिखी. पुलिस टीम ने वह फुटेज विनीता के पति मदन कुमार आर्य को दिखाई तो वह चौंकते हुए बोला, ”अरे यह तो उमेश कुमार है. कार भी उसी की है. विनीता उसी से बात कर रही है.’’

”यह उमेश कुमार कौन है?’’ एसएचओ शैलेश सिंह ने मदन कुमार से पूछा.

”सर, उमेश कुमार हमारा भांजा है. वह देहात कोतवाली थाना क्षेत्र के गांव गजाधर सिंह डिडवा में रहता है. बलरामपुर शहर के वीर विनय चौराहा स्थित एचडीएफसी बैंक में सेल्स औफिसर के पद पर कार्यरत है. उस का मेरे घर खूब आनाजाना था. मामीभांजे में खूब पटती थी. परंतु इधर कुछ महीने से उस का घर आनाजाना बेहद कम हो गया है. विनीता भी उस से दूरियां बनाए हुए थी. लेकिन सर..?’’

”लेकिन क्या?’’ एसएचओ शैलेश सिंह ने मदन कुमार की आंखों में झांकते हुए पूछा.

”सर, कल हम ने उमेश को कौल लगा कर विनीता के लापता होने की जानकारी दी थी, लेकिन उस ने साफ मना कर दिया था कि विनीता के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. आखिर उस ने झूठ क्यों बोला? जबकि विनीता उसी की कार में उसी के साथ बैठ कर फुटेज में जाती दिख रही है. सर, मुझे तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है.’’

सेल्स औफिसर उमेश कुमार शक के घेरे में आया तो पुलिस टीम ने उस के घर रात 11 बजे छापा मारा और उसे हिरासत में ले लिया. उसे थाना सिविल लाइंस लाया गया. थाने में एसएचओ शैलेश सिंह ने उमेश से पूछा, ”विनीता कहां है?’’

”सर, मुझे उस के बारे में कुछ भी पता नहीं है.’’ उमेश बोला.

”तुम सरासर झूठ बोल रहे हो. विनीता तुम्हारे साथ ही गई थी. यकीन नहीं तो यह सीसीटीवी फुटेज देख लो.’’ एसएचओ शैलेश सिंह ने कड़ा रुख अपनाया.

उमेश ने सीसीटीवी फुटेज देखी तो वह हक्काबक्का रह गया और बगलें झांकने लगा. इसी समय शैलेश सिंह ने फिर से पूछा, ”अब बताओ, विनीता कहां है?’’

”सर, विनीता अब इस दुनिया में नहीं है.’’ उमेश ने विस्फोट किया.

”क्या तुम ने उसे मार डाला? उस की लाश कहां है?’’ शैलेश सिंह ने पूछा.

”सर, विनीता को मैं घुमाने के बहाने अपनी कार से ले गया था. फिर गोंडा जिले के गांव परसौना के पास कार में ही उस को गला घोंट कर मार दिया और लाश विसुहा नदी के पुल के नीचे फेंक दी थी.’’

एसएचओ शैलेश सिंह ने अनुदेशिका विनीता की हत्या होने व आरोपी के पकड़े जाने की खबर एसपी विकास कुमार को दी तो वह चौंक गए. उन्होंने तत्काल गोंडा के एसपी विनीत जायसवाल से बात की और विनीता का शव विसुहा नदी के पुल के नीचे से बरामद करने को कहा. गोंडा एसपी विनीत जायसवाल की सूचना पर थाना खरगूपुर पुलिस घटनास्थल विसुहा नदी पुल पर पहुंची. एसएचओ शैलेश सिंह भी अपनी टीम तथा आरोपी उमेश को साथ ले कर घटनास्थल पहुंच गए. फिर उमेश की निशानदेही पर पुलिस की संयुक्त टीम ने मृतका विनीता का शव पुल के नीचे से बरामद कर लिया.

बलरामपुर के एसपी विकास कुमार, एएसपी नम्रता श्रीवास्तव तथा गोंडा एसपी विनीत जायसवाल भी घटनास्थल पहुंचे और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका विनीता की उम्र 40 साल के पार थी. उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था. उस का रंग गोरा, औसत कद तथा शरीर स्वस्थ था. इधर पत्नी विनीता की हत्या की खबर पा कर मदन कुमार भी अपने बेटे मनु के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया. पत्नी का शव देख कर मदन कुमार की भी आंखों से आंसू बहने लगे.

पुलिस अधिकारियों ने निरीक्षण के बाद विनीता के शव को पोस्टमार्टम के लिए गोंडा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद पुलिस टीम आरोपी उमेश को थाना सिविल लाइंस ले आई. थाने में एसपी विकास कुमार तथा एएसपी नम्रिता श्रीवास्तव ने आरोपी उमेश कुमार से घटना के संबंध में पूछताछ की. उमेश कुमार ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मामा मदन कुमार आर्य के घर उस का आनाजाना बना रहता था. इसी आनेजाने में उस का लव अफेयर मामी विनीता से बन गया. कुछ समय बाद मामी ने अपने विद्यालय के एक टीचर को अपने दिल में बसा लिया और उसे नजरअंदाज करने लगी.

मामी का दूसरे से संबंध बनाना उसे नागवार लगा. उस ने मामी को समझाया भी, लेकिन जब वह नहीं मानी तो घटना वाले दिन वह उसे घुमाने के बहाने ले गया और कार में उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. उमेश ने हत्या में प्रयुक्त दुपट्टा, कार व मोबाइल फोन भी पुलिस को बरामद करा दिया. दुपट्टा व मोबाइल को उस ने दुल्हिनपुर के जंगल में छिपा दिया था.

चूंकि उमेश कुमार ने विनीता की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: पुलिस ने मृतका के पति मदन कुमार आर्य की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) तथा 238 के तहत उमेश कुमार निवासी गांव गजोधर सिंह डिडवा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में मामीभांजे के लव क्राइम की जो कहानी सामने आई, उस का विवरण इस प्रकार है.

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर शहर के सिविल लाइंस मोहल्ले में मदन कुमार आर्य सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा बेटा मनु व एक बेटी थी. मदन कुमार बिजली विभाग में बाबू था. उस की पत्नी विनीता बलरामपुर जिला पंचायत स्थित आदर्श कंपोजिट विद्यालय में अनुदेशिका के पद पर थी. चूंकि पतिपत्नी दोनों सरकारी नौकरी करते थे, अत: उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. बेटी पढ़लिख कर जवान हुई तो उन्होंने उस का ब्याह रचा दिया था. वह सुखपूर्वक ससुराल में रह रही थी. मदन कुमार आर्य की मां गंगाजली पूर्व विधायक सुखदेव प्रसाद की बेटी थीं. सुखदेव प्रसाद बलरामपुर शहर की तुलसीपुर विधानसभा सीट से 2 बार विधायक चुने गए थे. सिविल लाइंस वाला बंगला विधायक कोटे के तहत आवंटित हुआ था. विधायक पिता सुखदेव की मृत्यु के बाद गंगाजली अपने बेटे मदन कुमार व बहू विनीता के साथ इसी बंगले में रहने लगी थी.

मदन कुमार व उस की पत्नी विनीता, बेटे मनु को बेहद प्यार करते थे. वह उसे अच्छी शिक्षा दिला कर प्रशासनिक सेवा में लाना चाहते थे. इसलिए वह उस की शिक्षा पर पूरा ध्यान दे रहे थे और पैसा भी खूब खर्च कर रहे थे. मनु भी पढऩे में तेज था. अत: वह पढ़ाई पर जोर दे रहा था. विनीता खुद अच्छा कमाती थी और उस के पति मदन कुमार की भी कमाई खूब थी. घर में किसी चीज की कमी न थी. दोनों खुशहाल थे, लेकिन विनीता को पति की कमी खलती थी. दरअसल, विनीता बलरामपुर शहर में कार्यरत थी, जबकि पति गोंडा शहर में बिजली विभाग में बाबू था.

उस का रोजाना घर आना संभव न था, इसलिए वह गोंडा में ही किराए के मकान में रहता था. महीने में एकदो बार ही घर आता था और 2-3 दिनों बाद वापस चला जाता था. विनीता उन दिनों उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जब औरत को पुरुष की नजदीकियों की ज्यादा जरूरत होती है. विनीता 2 जवान बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस की उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था. वह खूब बनसंवर कर रहती थी. वह कुछ समय तक पति की कमी बरदाश्त करती रही. उस के बाद उस का जिस्म अंगड़ाइयां लेने लगा.

एक रोज विनीता सजधज कर घर से निकलने ही वाली थी कि मदन कुमार आर्य का भांजा उमेश कुमार आ गया. विनीता ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ”अरे तुम, इस तरह अचानक?’’

”मामी, अभीअभी गांव से आ रहा हूं.’’ उमेश कुमार ने मुसकरा कर जवाब दिया.

उस दिन उमेश को मामी बहुत ज्यादा खूबसूरत लगी. उस की निगाहें विनीता के चेहरे पर जम गईं. यही हाल विनीता का भी था. उमेश को इस तरह निगाहें जमाए देखा तो विनीता बोली, ”ऐसे क्या देख रहे हो मुझे? क्या पहली बार देखा है? बोलो, किस संकोच में डूबे हो?’’

”नहीं मामी, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो यह देख रहा था कि मेकअप में आप कितनी सुंदर लग रही हैं. खुले बालों में तो आप गजब ही ढा रही हो.’’

”बस… बस रहने दो. बहुत बातें बनाने लगे हो. तुम्हारे मामा तो कभी तारीफ नहीं करते. महीने में एक या 2 बार आते हैं. वह भी थकेथके से रहते हैं.’’

”अरे मामी, औरत की खूबसूरती सब को रास थोड़े ही आती है. मामा बिजली विभाग में हैं. ऊपरी कमाई में जुटे रहते हैं, इसलिए वह तुम्हारी कद्र नहीं करते.’’

”तू तो मेरी बहुत कद्र करता है. महीनों बीत जाते हैं, झांकने तक नहीं आता. जा बहुत देखे हैं, तेरे जैसे बातें बनाने वाले.’’

”मुझे सचमुच आप की कद्र है मामी. यकीन न हो तो परख लो. अब मैं तुम्हारी खैरखबर लेने आता रहूंगा. छोटाबड़ा जो भी काम कहोगी, करूंगा.’’ उमेश ने विनीता की चिरौरी सी की. उमेश की यह बात सुन कर विनीता खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ”तुम आराम से सोफे पर बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’ कह कर विनीता ने रसोई का रुख किया.

थोड़ी देर में विनीता 2 कप चाय और नाश्ता ले आई. दोनों गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के ही दिलोदिमाग में हलचल सी मची हुई थी. सच तो यह था कि विनीता उम्र में कई साल छोटे स्मार्ट उमेश को देख कर उस पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, उमेश भी मामी का दीवाना बन गया था. दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद उमेश कुमार हर सप्ताह विनीता से मिलने आने लगा. विनीता को उस का आना अच्छा लगता था. जल्द ही वे एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगी. चूंकि दोनों के बीच मामीभांजे का रिश्ता था, इसलिए विनीता चाहती थी कि पहल उमेश कुमार करे. जबकि उमेश चाहता था कि जिस्म की भूखी मामी स्वयं उसे उकसाए.

आखिर जब विनीता से नहीं रहा गया तो एक रोज रात में उस ने उमेश को अपने घर रोक लिया. खाना खाने के बाद उमेश कमरे में जा कर पलंग पर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा. थोड़ी देर बाद विनीता भी उसी पलंग पर उमेश के बगल में लेट गई और उस से लिपट गई. विनीता का स्पर्श पा कर उमेश सिहर उठा. लेकिन वह रिश्ते की मर्यादा समझता था. इसलिए चुपचाप लेटा रहा. विनीता उस वक्त अधोवस्त्र में थी, जिस से उस के कोमल उभार उमेश के शरीर को छू रहे थे. वह उस से सटती ही जा रही थी, लेकिन उमेश रिश्ते की मर्यादा सोच कर चुपचाप लेटा था.

लेकिन वह कब तक चुप रहता? विनीता ने उकसाया तो उस रात दोनों के बीच की हर दीवार टूट गई. मामीभांजे का रिश्ता टूट कर बिखर गया और एक नए रिश्ते ने जन्म लिया, वह था अवैध संबंधों का रिश्ता. उस दिन के बाद विनीता और उमेश अकसर देह सुख प्राप्त करने लगे. विनीता भूल गई कि वह 2 जवान बच्चों की मां है और पति से विश्वासघात कर रही है. उस ने पवित्र रिश्ते को भी ताख पर रख दिया. जवां भांजे की वह दीवानी बन गई.

30 वर्षीय उमेश कुमार बलरामपुर (देहात) कोतवाली के गांव गजोधर सिंह डिडवा का रहने वाला था. उस के पिता सालिक राम किसान थे. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ा था. उमेश पढ़ालिखा स्मार्ट था. वह बलरामपुर शहर के वीर विनय चौराहा स्थित एचडीएफसी बैंक में सेल्स औफिसर पद पर था. उस की कमाई अच्छी थी. अत: ठाट से रहता था. उस के पास बे्रजा कार थी, जिस से वह आताजाता था.

दबंग स्वभाव का उमेश अकसर कार से विनीता के घर आता था और मामी के जिस्म से खेल कर वापस चला जाता था. कभीकभी वह रात को भी वहीं रुक जाता था और दोनों रात भर रंगरलियां मनाते. चूंकि दोनों के बीच मामीभांजे का रिश्ता था, इसलिए कोई शक भी नहीं करता था. लेकिन ऐसे संबंध छिपते नहीं. धीरेधीरे मोहल्ले में उन दोनों के संबंधों की चर्चा होने लगी.

विनीता के पति मदन कुमार को जब विनीता और उमेश के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व भांजे से बात की तो दोनों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन एक शाम जब उस ने अचानक दोनों को हंसीठिठोली करते देख लिया तो उस ने दोनों को फटकारा. पर उन पर इस का कोई असर नहीं हुआ. उन का मिलन जारी रहा. इसी बीच विनीता ने अपने रिश्तेदार की लड़की ज्योति से उमेश की शादी करा दी. सुंदर पत्नी पा कर उमेश पत्नी में रम गया. साल भर बाद उमेश एक बच्चे का बाप भी बन गया. पत्नी के आ जाने से उमेश का मामी से शारीरिक मिलन बंद सा हो गया. हां, इतना जरूर था कि उस की फोन पर मामी से बात होती रहती थी.

इधर विनीता पुरुष सुख की आदी बन गई थी, अत: जब उमेश से उस का शारीरिक मिलन बंद हुआ तो उस ने एक जवान टीचर से संबंध बना लिए. कुछ समय बाद नई बीवी का नशा उतरा तो उमेश मामी से संबंध स्थापित करने का प्रयास करने लगा. लेकिन विनीता ने तो किसी और को दिल में बसा लिया था, अत: उस ने उमेश को तवज्जो देनी बंद कर दी और उसे नजरअंदाज करने लगी. उमेश को पहले तो कुछ पता नहीं चला, लेकिन उस ने जब गुप्त रूप से जानकारी जुटाई तो उसे पता चला कि विनीता ने किसी और को दिल में बसा लिया है, जिस से वह उसे नजरअंदाज कर रही है. यही नहीं, उस ने उमेश की काल रिसीव करनी भी बंद कर दी.

मामी की बेवफाई से उमेश बौखला गया. आखिर उस ने विनीता को सबक सिखाने की ठान ली और उस की रेकी करने लगा. पहली अप्रैल, 2025 की शाम 5 बजे विनीता सामान लेने सिविल लाइंस बाजार की ओर गई, तभी उमेश की नजर उस पर पड़ी. इस के बाद वह उस के पास पहुंचा और घुमाने के बहाने विनीता को कार में बिठा लिया. देर रात उस ने विनीता को दुपट्टे से गला घोंट कर मार डाला और लाश को भी ठिकाने लगा दिया.

विस्तार से पूछताछ करने के बाद 4 अप्रैल, 2025 को पुलिस ने हत्यारोपी उमेश कुमार को बलरामपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत लोअर कोर्ट से खारिज हो गई थी. इस के बाद उस के फेमिली वाले जमानत के लिए हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे थे. UP Crime News

 

 

Bihar Crime : पत्नी पर बेवजह शक करना ठीक नहीं

Bihar Crime : समस्तीपुर से दुबई काम करने गए उदय कुमार राय को जब पत्नी रीना राय के अवैध संबंधों की खबर मिली तो वह दुबई से घर लौट आया. फिर वह मन में बैठ चुके शक को ले कर पत्नी से रोजाना झगडऩे लगा. इसी शक के चलते घर में ऐसा खून बहा कि…

बिहार के समस्तीपुर जिले की तहसील ताजपुर के हरिपुर भिंडी गांव का रहने वाला उदय कुमार राय काम करने के लिए दुबई गया हुआ था. इसी साल वह फरवरी में होली से पहले गांव आ गया था. उस के आने से परिवार में खुशी का माहौल बना हुआ था. बच्चे खुश थे. उदय की मम्मी भी खुश थीं. पापा का निधन हो चुका था. विधवा मम्मी उस के आते ही बोलीं, ”बेटा, अब दुबई मत जाना, यहीं गांव में कुछ कामधंधा कर लो. उसी से परिवार का गुजारा हो जाएगा. ’ ’

”ठीकी कह हीं माई…अब हम एहिजे रह के कुछ करबै! ’ ’ उदय ने भी मम्मी की हां में हां मिला दी. उस वक्त उस की पत्नी रीना भी वहीं थी. वह तुरंत आंचल को दांतों तले दबाती हुई ‘हुंह! ’ कह कर से चली गई.

”हम्मे कुछ गलत कहलिया, जे तू मुंह चमका के चल गेलहू! हियां के खेतपथार कौन देखतय…अब हमरा ताकत है…बाबूजी जिंदा रहथुन हल तब कोनो बात नय हलै! उन कर पीछे में उदइये ने हय देखेभाले वाला. गोतिया खेत पर नजर लगैले है, से अलगे समस्या है. ’ ’

पत्नी के मुंह बिदका कर अचानक चले जाने पर उदय को भी बुरा लगा था. वह उस के चेहरे के भाव को देख कर उस के दिलोदिमाग में क्या है, समझने की कोशिश करने लगा था. मम्मी से बातें करते वक्त वह पत्नी को घूरता हुआ ऐसे देख रहा था, जैसे उस के मन में छिपी बात को जानना चाहता हो. शाम हुई. सालों बाद पूरे परिवार ने एक साथ बैठ कर खाना खाया. बच्चों के चेहरे खिले हुए थे. उस रोज कुछ खास पकवान खीर भी पकाई थी. खाना खाते वक्त अपने बच्चों को पुचकारते वक्त भी उस की नजर पत्नी के चेहरे पर ही जमी हुई थी. उस ने महसूस किया कि पत्नी के चेहरे पर खुशी की वह चमक नहीं है, जो उस के आने पर होनी चाहिए थी.

दरअसल, उदय के मन में भी शंका का कीड़ा कुलबुला रहा था. जब तक उसे खत्म नहीं कर लेता, तब तक उस के मन को चैन नहीं मिलने वाला था.

रात हुई. लंबे अरसे बाद वह देर रात को पत्नी के साथ बिस्तर पर था. रीना उसे परे धकेलती हुई बोली, ”दारू पी कर आए हो? ’ ’

”अरे का बताएं…विनोदवा जबरदस्ती पिला दिया. ’ ’

”दुन्हो जेल जैबा…हिंया दारू बंद है… जानत हो न कि..? ’ ’ रीना बोली.

”कोय पुलिस में बतयते तबे न! ’ ’ उदय बोला.

”हम्हीं बता देवो तब? ’ ’ मुसकराती हुई रीना बोली.

”सुबह से अब तुम्हारे चेहरे पर मुसकान दिखी है! ’ ’ चहकता हुआ उदय बोला और उसे अपनी ओर खींचने लगा.

”चलो हटो, दारूबाज से कोई समझौता नहीं! ’ ’ रीना तीखेपन के साथ बोली और वहां से बच्चों के कमरे में चली गई.

उस के जाने के बाद उदय कशमकश में आ गया. दारू का नशा कमजोर पडऩे लगा था. जब तक उस के दिमाग में कई बातें अचानक घूम गई थीं. वे बातें जो विनोद ने दारू पीते वक्त बताई थीं… और वे बातें भी जो उस के दुबई में रहते हुए उसी ने फोन पर बताई थीं… उन के तार रीना के पूरे दिन उस के साथ किए गए बरताव के साथ जोडऩे लगा… बुदबुदाया, ”…तो इस के सच का पता लगाना ही होगा? ’ ’

कब उसे नींद आ गई, इस का उसे पता ही नहीं चला. उस की नींद तब खुली, जब खिड़की से आने वाली सूरज की रोशनी उस की आंखों पर पड़ी. बच्चों ने उसे झकझोरते हुए उठाया था. उस के कानों में विनोद की भी आवाज सुनाई दी, ”का रे उदयवा…खेत पर चले के ना हव का! ’ ’

”हांहां, जाय के है कि…चल न कोय काम दिला दीहे. ’ ’

इस तरह दुबई से आने के बाद उदय की नई दिनचर्या शुरू हो गई थी. उस का हमउम्र चचेरा भाई विनोद दोस्त की तरह जो मिल गया था.

दोनों के बीच खुल कर बातें होती थीं. शराब की ललक दोनों को बनी रहती थी. ब्लैक में ही सही, लेकिन इस का इंतजाम विनोद करता था, लेकिन जेब ढीली उदय की होती थी. वह दुबई से कमा कर लाए पैसे दारू पर उड़ाने लगा था. आए दिन शराब पी कर ही घर आता था. इस पर उस की पत्नी रीना के साथ हमेशा तकरार होने लगी थी. रीना उदय को शराब पीने से रोकती थी, जबकि वह पत्नी की बात को अनसुनी कर देता था. रीना उस पर शराब में पैसे उड़ाने का आरोप लगा कर खूब खरीखोटी भी सुनाने लगी थी.

उस दिन 21 अगस्त की रात को तो हद ही हो गई थी. बरसात का मौसम था, लेकिन दिन में तेज धूप निकली थी, जिस से उस रात उमस भरी गरमी थी. रीना ने छत पर ही सोने का इंतजाम किया हुआ था. घर के नीचे बरामदे में बच्चे अपनी दादी के साथ सोए हुए थे. उसी घर के बरामदे में उदय का चाचा रामपुकार राय भी सोया हुआ था. उस की अपने बेटे विनोद राय और बहू से नहीं बनती थी, इस कारण वह उदय के परिवार के साथ ही रहता था. उदय के पापा की मृत्यु हो चुकी थी, इस कारण वह अपने चाचा को परिवार में एक सहारे के नजरिए से देखता था.

उसी के बारे में विनोद ने उदय को काफी अनापशनाप कान भर रखे थे. उस का कहना था कि उस के पापा रामपुकार के साथ उस की बीवी रीना राय के अवैध संबंध हैं. हालांकि इस में कितनी सच्चाई थी, इस का सबूत किसी के पास नहीं था, किंतु उदय के मन में इस बात का संदेह घर कर चुका था. उस रोज भी उदय नशे में जरूर था, लेकिन पूरी तरह से होशोहवास में बातें कर रहा था. रीना को प्यार से पुचकारते हुए अभद्र हरकत करने लगा था तो रीना ने उसे झिड़क दिया. फिर भी उस ने रीना की मरजी के बगैर उस से संबंध बनाए थे. इस में पत्नी ने बेमन से साथ दिया था और वह चिढ़ गई थी. चिढ़ती हुई गुस्से में बोल पड़ी, ”तुम्हारा यहां रहने से अच्छा है कि तुम फिर से दुबई ही चले जाओ. ’ ’

”हांहां, तुम तो चाहोगी ही…कि मैं यहां से चला जाऊं और तुम यहां बिना किसी रोकटोक के गुलछर्रे उड़ाओ! ’ ’

”मैं यहां गुलछर्रे उड़ाती हूं…और तुम क्या करते हो? दारू में पैसे कौन उड़ा रहा है? मैं या तुम? ’ ’

”मुझे सब पता है, तुम मेरे पीछे यहां क्या गुल खिला रही हो?…किस का बिस्तर गरम करती हो? मैं सब कुछ जान गया हूं! ’ ’ उदय बोला.

यह सुन कर रीना अवाक हो गई थी. उसे गुस्से में देखने लगी थी.

”मुझे क्या घूर रही हो…खा जाओगी? ’ ’

”तुम क्या सब गलतसलत बोले जा रहे हो नशे में…कोई सुनेगा, तब क्या कहेगा? ’ ’

दोनों के बीच बहस का दौर चलता रहा. काफी देर तक दोनों एकदूसरे पर कीचड़ उछालते रहे. थोड़े समय में उदय छत से नीचे आ कर अपने कमरे में सो गया. वैसे तो 22 अगस्त, 2025 की सुबह पिछली कुछ दिनों की सुबह जैसी ही थी. आसमान में बारिश के आसार नजर आ रहे थे, लेकिन सूर्योदय की धूप निकल चुकी थी. उदय अपने कमरे में अधूरे बिस्तर पर सोया हुआ था, लेकिन घर में रीना नजर नहीं आ रही थी. बच्चे अभी सो रहे थे, लेकिन उदय की मम्मी थारा देवी जाग चुकी थीं.

उन्होंने बहू को आवाज लगाई. उस की आवाज का कोई जवाब नहीं मिला…रीना को बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयारी करनी थी. वह बड़बड़ाती हुई धीरेधीरे सीढिय़ां चढ़ कर छत पर चली गईं. वहां उस ने जो देखा, उन की आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. कुछ पल में ही उन की चीख निकल गई. तेजी से उलटे पैर नीचे चली आईं और उदय को झकझोर कर जगाया. दरअसल, छत पर उन की 25 वर्षीय बहू रीना राय मृत पड़ी थी… उस के बिस्तर पर खून ही खून था, जो सूख चुका था. उस की किसी ने गरदन रेत कर हत्या कर दी थी.

रोती हुई थारा देवी छत पर बहू रीना का गला कटा देख कर विचलित हो गईं. उलटे पैर भागीभागी उदय के पास आईं. उसे झिंझोड़ कर जगाया. छत पर मृत पड़ी रीना के बारे में बताया. हड़बड़ाता हुआ उदय छत पर दौड़ता हुआ गया. वहीं से चिल्लाने लगा, ”माई रे! विनोदवा मरिये देल को! गरदन काटिए देल को रीनवा के! ’ ’

छत से नीचे आया. चीखनेचिल्लाने लगा. घर में चीखपुकार मच गई. पड़ोसियों की भीड़ जुट गई. रक्तरंजित लाश जिस ने भी देखी, दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ देर में पुलिस भी आ गई. काफी संख्या में लोग वहां जुट गए. साथ ही ताजपुर, हलई, मुसरीघरारी, सरायरंजन, वैनी, सहित अन्य कई थानों की पुलिस पहुंच गई.

ताजपुर थाने के एसएचओ शंकर शरण दास ने जांच के लिए पुलिस टीम को आवश्यक निर्देश दिए. एफएसएल की टीम ने मामले की जांच में स्पष्ट किया कि रीना की गला काट कर हत्या की गई है. मौके का मुआयना करने के बाद मृतका के पति उदय और उस की सास से पूछताछ की गई. उदय ने पत्नी की हत्या का आरोप सीधेसीधे अपने चचेरे भाई विनोद राय पर लगा दिया. मृतका के पापा अखिलेश कुमार, जो वैशाली में रहते थे, खबर सुन कर वहां आ चुके थे. पुलिस ने उन से भी पूछताछ की.

उन्होंने बताया कि 2018 में उन की बेटी रीना की शादी उदय कुमार राय से हुई थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. सुबह उन्हें जानकारी मिली कि उन की बेटी की छत पर ही किसी ने गला काट कर हत्या कर दी. उन्होंने बताया कि उदय के साथ चचेरे भाई का जमीनी विवाद चल रहा था. इसलिए हो सकता है कि इसी कारण इस घटना को अंजाम दिया गया हो. छत बिलकुल सटी होने के कारण कोई भी उस छत से इस छत पर कूद सकता है.

रीना के 4-5 साल के 2 छोटेछोटे बच्चे हैं. शक के आधार पर पुलिस ने पूछताछ के लिए चचेरे देवर विनोद राय को हिरासत में लिया. पति उदय राय ने बताया कि गरमी के चलते रीना रात में छत पर सोई हुई थी. देर रात मैं शौच के लिए नीचे आया था. मोबाइल चार्ज भी नहीं था. इस वजह से मोबाइल चार्ज लगा कर नीचे ही सो गया था. सुबह पत्नी काफी देर तक नीचे नहीं उतरी. तब उस की मम्मी रीना को उठाने के लिए छत पर गई थीं, जहां उन्होंने उसे मृत पाया था. उस का गला रेता हुआ और आसपास खून पसरा हुआ था.

पुलिस ने उदय और विनोद राय के घर का मुआयना किया. पता चला कि उदय का चचेरे भाई विनोद राय से दरवाजे पर चारदीवारी  को ले कर झगड़ा चल रहा था. एक सप्ताह पहले भी मारपीट की घटना हुई थी. विनोद की रीना के साथ भी मारपीट हुई थी. इस संबंध में थाने में शिकायत भी दी गई थी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी. इस आधार पर ही उदय ने दावा किया कि विनोद ने ही पत्नी को मारा है.

पुलिस को यह मालूम हुआ कि विनोद राय के पापा रामपुकार राय अपने बेटे और बहू को छोड़ कर उदय राय के साथ रहते थे. जब इस बारे में तहकीकात की गई, तब मालूम हुआ कि विनोद इस बात को ले कर भी अपने पापा से नाराज रहता था. कई बार इसे ले कर पंचायत भी हुई. इस के बाद भी रामपुकार राय अपने भतीजे उदय के साथ ही रह रहा था. पुलिस इस एंगल से भी हत्याकांड की छानबीन करने लगी. हालांकि पुलिस को कई अहम सुराग जल्द ही मिल गए थे. हत्याकांड में इस्तेमाल किया गया तेज धारदार चाकू बरामद कर लिया गया, जो लाश के पास ही बिस्तर के नीचे था.

इस मामले की रिपोर्ट रीना राय (25) के पिता अखिलेश कुमार राय द्वारा 22 अगस्त, 2025 को लिखवाई गई थी. मामले का पहला अभियुक्त विनोद राय (48) के अलावा उस के पापा रामपुकार राय (65), विनोद की पत्नी पानवती देवी (45) और उस की 18 वर्षीया बेटी सुष्मिता कुमारी को बनाया गया. उन्हें बीएनएस की धारा 103 (1) 3(5) के तहत आरोपी बनाया गया था.

रीना के शव को पोस्टमार्टम के बाद उदय को सौंप दिया गया था, जिस के अंतिम संस्कार के बाद 13 दिनों के श्रद्मद्धकर्म का अनुष्ठान किया गया था. हालांकि इस बीच पुलिस की छानबीन चलती रही. पुलिस ने विनोद को इसी शक के आधार पर हिरासत में ले रखा था कि उस का पहले उदय से विवाद हुआ था. इस संबंध में पुलिस ने विनोद से पूछताछ की. उस ने जो बयान दिया, उस से पूरी जांच की दिशा ही बदल गई. पुलिस ने खोजबीन की तो उदय पर ही शक गहरा गया.

उदय तो खुद को बेकसूर साबित करने में लगा था. लेकिन पुलिस ने रीना की तेरहवीं तक का इंतजार किया, क्योंकि वही सारे क्रियाकर्म कर रहा था. पुलिस चुपचाप घर के पास डेरा डाले रही और कर्मकांड पूरे होने का इंतजार करने लगी. जैसे ही तेरहवीं का काम पूरा हुआ, पुलिस ने उदय को गिरफ्तार कर पूछताछ की तो उदय कुमार राय ने आखिरकार अपनी पत्नी की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया और कहा कि शक और शराब के नशे में उस ने यह कर डाला.

उदय ने बताया कि 21 अगस्त की रात वह शराब पी कर घर लौटा और पत्नी को सोने के बहाने छत पर ले गया. उस ने फिर पत्नी से चाचा और उस के अवैध संबंधों के बारे में पूछा, लेकिन पत्नी से फिर वही जवाब मिला. इस के बाद उस ने पत्नी संग जबरन शारीरिक संबंध बनाए. जब पत्नी सो गई तो उस ने तकिए के नीचे से चाकू निकाला और पत्नी रीना का गला रेत दिया. रीना तड़पती रही तो उस ने उस का मुंह बंद कर दिया और हाथपैर जकड़ लिए.

हत्या को अंजाम देने के बाद वह चुपचाप छत से नीचे आ कर सो गया. सुबह जब उस की मम्मी छत पर गईं तो रीना की खून से सनी लाश दिखी. चीखपुकार सुन कर वह भी ऊपर पहुंचा और रोने का नाटक करने लगा. बाद में उस ने पत्नी के मर्डर का आरोप चचेरे भाई विनोद पर लगा दिया. वह खुद को मासूम साबित करने में लगा था, लेकिन पुलिस जांच में उस की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई. पुलिस ने जांच पूरी कर पत्नी की हत्या के आरोपी उदय कुमार राय को मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया. वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस ने विनोद राय, उस के पापा रामपुकार राय, पत्नी पानवती देवी और बेटी सुष्मिता कुमारी को बेकसूर मानते हुए छोड़ दिया था. Bihar Crime

 

 

Rajasthan Crime News : दगाबाज प्रेमी और 2 हत्याएं

Rajasthan Crime News : शादीशुदा मोनू का अपनी जवानी पर कंट्रोल नहीं था. फैक्ट्री में साथ काम करने वाली विवाहिता आशा पर वह इस कदर लट्टू हो गया था कि उसे हासिल करने के लिए उस ने परिवार, समाज और देश के कायदेकानून तक ताक पर रख दिए. फिर जो हुआ, वह किसी अनहोनी से कम नहीं था…

जयपुर के सांगानेर सदर इलाके में स्थित कई फैक्ट्रियों में कुरती बनाने की भी एक फैक्ट्री थी. वहीं मोनू पंडित और आशा मीणा काम करते थे. उस का पति राजाराम मीणा भी उसी फैक्ट्री में काम करता था. मोनू और आशा हमउम्र थे. विवाहित थे. जब कभी फुरसत में होते, तब इधरउधर की बातें करते थे. उन के बीच होने वाली कुछ मिनटों की बातों में उन्हें अच्छा सुकून मिलता था. कई बार घरेलू समस्याओं से बेखबर एकदूसरे की तारीफ भी कर दिया करते थे.

आशा की तारीफ करते हुए जब मोनू कह देता कि तुम आज बहुत सुंदर दिख रही हो, तब वह शरमा जाती थी. मुसकराती हुई उस के कसरती बदन को बनाए रखने के लिए खानेपीने पर ध्यान देने की सलाह दे डालती थी. एक दिन जब आशा ने बातोंबातों में अपने 4 साल के बच्चे के बारे में जिक्र किया, तब मोनू चौंंक गया. उस ने तुरंत टिप्पणी कर दी, ”तुम्हें देख कर कोई नहीं कहेगा कि तुम 4 साल के बच्चे की मां हो! आखिर तुम्हारी इस खूबसूरती का राज क्या है…जरा मुझे भी बताओ!’’

इस तरह की मीठीमीठी बातों का असर आशा के मन में गहराई से होने लगा था, जबकि मोनू उस के रूपरंग और अदाओं पर मर मिटा था. वह उस की खूबसूरती, चालढाल और बोलचाल की शैली को ले कर जबतब छेडऩे भी लगा था. सच तो यह था कि मोनू का उस के साथ खुल कर बात करना आशा को भी अच्छा लगने लगा था. वे फैक्ट्री में लंच साथसाथ करने लगे थे, जबकि अधिकतर लड़कियां अपने साथ काम करने वाली महिलाओं के साथ ही लंच करती थीं. मोनू उसे अपनी तरफ से कुछ बाहरी खानेपीने की चीजें, आइसक्रीम, चौकलेट, बिसकुट, चाय वगैरह भी देने लगा था.

आशा और मोनू के बीच नजदीकियां बढ़ चुकी थीं. मोनू की मीठी बातें और उस का खयाल रखने को ले कर आशा को बहुत कुछ समझने में देर नहीं लगी कि वह उस का दीवाना बन चुका है… और उस की चाहत क्या है? कई बार उस ने उस की निगाहों को उस की देह पर टिके होने का भी एहसास किया. एक दिन मोनू ने जब अपने प्यार का इजहार किया, तब वह झेंप गई. उस ने कहा कि वह एक बेटे की मां है. तब मोनू भी बोला, ”तो क्या हुआ? मैं भी एक बेटे का पिता हूं. हमारा दिल तुम पर आ गया है…तो इस में बुराई क्या है?’’

इस के बाद धीरेधीरे आशा और मोनू एकदूसरे के करीब आते चले गए. मोनू ने उसे एक नया एंड्रायड फोन गिफ्ट दिया तो आशा बहुत खुश हुई. आशा अपने कुंवारेपन को याद करती हुई मोनू की ओर एक कदम आगे बढ़ाती तो मोनू उस की ओर 2 कदम आगे बढ़ा देता था. कई महीने तक उन के बीच यह सब चलता रहा. एक रोज इस की भनक आशा के पति राजाराम मीणा को हो गई. पत्नी के प्रेम संबंधों और उसे प्रेमी द्वारा फोन गिफ्ट में देने की जानकारी एक परिचित ने उसे दी. जबकि आशा ने पति को बताया था कि उस के साथ काम करने वाली एक लड़की ने किस्त पर मोबाइल दिलवाया है.

आशा ने अपने फोन में मोनू का नंबर पंडित के नाम से सेव कर रखा था. मोनू का पूरा नाम मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित था. उस नंबर पर आशा के दिन में कई बार कौल करने के रिकौर्ड दर्ज थे. इस पर राजाराम चुप नहीं बैठा. उस ने फोन में सबूत दिखाते हुए नाराजगी दिखाई. साफ लहजे में समझाया कि उस का किसी गैरमर्द के साथ प्रेम संबंध रखना इज्जत नीलाम करने जैसा है. इस का असर उस के बच्चों और परिवार पर होगा. इसलिए यह सब छोड़ कर अपनी नौकरी और परिवार पर ध्यान दे. इस का असर आशा पर हुआ. उस ने पति से माफी मांगी. गलती सुधारने का मौका मांगा. कसम खाई कि वह अब मोनू से बात तक नहीं करेगी.

राजाराम ने अगला कदम उठाते हुए आशा की फैक्ट्री से नौकरी छुड़वा दी. उन दिनों वह भी उसी फैक्ट्री में काम करता था. उस ने भी वहां से नौकरी छोड़ कर आदित्य सोलर कंपनी में नौकरी जौइन कर ली. आशा का मोबाइल भी उस ने अपने कब्जे में ले लिया. इस की जानकारी जब मोनू को हुई, तब वह आगबबूला हो गया. वह आशा से बात करने के लिए तड़पने लगा. उस ने राजाराम को आशा के प्यार का रोड़ा मान लिया. उसे राजाराम पर बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन वह उस के खिलाफ कुछ करने में विवश था.

अचानक उसे आशाराम मीणा उर्फ गोलू का खयाल आया. वह आशा का देवर था. गोलू को अपनी भाभी आशा और मोनू के बीच प्रेम संबंध के बारे में जानकारी हो चुकी थी. यही कारण था कि मोनू ने जब आशा से बात करवाने को कहा, तब उस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. गुस्से में मोनू ने गोलू को धमकी दी. कहा कि इस का अंजाम पूरे परिवार को भुगतना होगा, किंतु मोनू का यह प्रयास भी विफल हो गया. फिर तो वह और भी तड़प उठा. उस के बाद वह 26 वर्षीय राजाराम मीणा को ही रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा. दूसरी तरफ जब से मोनू ने गोलू को धमकी दी थी, तब से आशाराम और राजाराम दोनों भाई सतर्क हो गए थे. खासकर आशा के घर से निकलने पर परिवार का कोई न कोई सदस्य उस के साथ हमेशा रहने लगा था.

24 वर्षीय आशा मीणा अपने पति, 4 साल के बेटे, भाई आशाराम मीणा और बहन मीनाक्षी के साथ जोतवाड़ा के शांति विहार में रहती थी. वैसे वे मूलरूप से जयपुर जिले के चाकसू तहसील में कोटखावदा के रहने वाले थे. आशा राजाराम और गोलू जिस कुरती फैक्ट्री में काम करते थे, वहीं यूपी के आगरा जिले के बंडपुरा गांव का रहने वाला मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित भी काम करता था. सांगानेर में मोनू और आशा के घर के बीच की दूरी करीब आधे किलोमीटर की थी. मोनू किराए के मकान में अपनी पत्नी और 3 बच्चों के साथ रहता था. वह कई साल पहले आगरा से आ कर जयपुर काम करने लगा था.

मोनू के दिलोदिमाग पर आशा छाई हुई थी. वह रातदिन उस की याद में तड़पता रहता था. किंतु जनवरी, 2025 के पहले सप्ताह में जब से आशा का मोबाइल फोन पति ने अपने कब्जे में लिया था, तब से मोनू उस से बात करने तक को तरस गया था. आशा की जुदाई और ऊपर से उस पर लगी पहरेदारी से उस की स्थिति पागलों जैसी हो गई थी. उस की रातों की नींद गायब हो चुकी थी. दिन में बावलों की तरह घूमता रहता था. आशा पर भले ही कई पाबंदियां लगी थीं, लेकिन कई बार उसे अकेले में घर से निकलना ही होता था. इसी सिलसिले में 22 जनवरी, 2025 को वह अपने बेटे को स्कूल से लेने के लिए घर से अकेली निकली जरूर थी, लेकिन गोलू काफी पीछे से उस पर नजर रखे हुए था. अचानक मोनू की नजर आशा पर पड़ी. आशा से बात करने की चाहत में वह उस के पीछेपीछे हो लिया.

किंतु जैसे ही उस की निगाह गोलू पर पड़ी वह सहम गया, तुरंत खुद को संभालते हुए गोलू को धमका कर अपनी राह चल दिया. इस घटना की आशा को भनक तक नहीं लगी, लेकिन जब वह बच्चे को ले कर घर आई, तब गोलू ने उसे और पति को मिली धमकी के बारे में बताते हुए और अधिक सतर्क रहने की हिदायत दी. मोनू अब इस उधेड़बुन में रहने लगा था कि राजाराम को रास्ते से कैसे हटाया जाए, ताकि वह आशा को हासिल कर सके. अंतिम निर्णय लिया, क्यों न उसे गोली मार दी जाए? इसी के साथ अगला सवाल उठा कि गोली दागने का इंतजाम कैसे होगा? उस ने इस का भी हल निकाल लिया.

दिमाग में विचार आया, ‘क्यों न पिस्तौल ही खरीद ली जाए…देसी कट्टा ही सही!’ फिर क्या था, इस बारे में प्रयास तेज कर दिया. पता चला कि धौलपुर में उसे पिस्तौल मिल सकती है. अगले दिन 23 जनवरी, 2025 को ही मोनू धौलपुर के बसेड़ी गांव गया और 50 हजार रुपए में एक देसी पिस्तौल और कारतूस खरीद लाया. तब तक शाम हो चुकी थी. उस ने फैक्ट्री में साथ काम करने वाले अपने दोस्त प्रदीप को वीडियो कौल के जरिए पिस्तौल दिखाई. उस से कहा, ”आशा मुझ से बात नहीं करेगी, तब मैं उस के पति राजाराम मीणा को इसी पिस्तौल से मार दूंगा.’’

प्रदीप को वीडियो कौल से पिस्तौल दिखाने का मकसद उस की धमकी को राजाराम तक पहुंचाने का था. हालांकि प्रदीप ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था. 24 जनवरी, 2025 की सुबहसुबह मोनू ने राजाराम के मोबाइल पर कई कौल कीं, लेकिन उस का मोबाइल साइलेंट मोड पर होने के कारण कौल का पता नहीं चला. उस के बाद मोनू ने गोलू को कौल कर उसे राजाराम को कई कौल करने की बात बताई. उस ने मोनू को कौलबैक की और बताया कि वह घर पर है. थोड़ी देर बाद उस का भाई गोलू ड्यूटी पर चला गया.

उसी रोज 24 जनवरी, 2025 को मोनू पिस्तौल ले कर दोपहर करीब साढ़े 12 बजे राजाराम के घर के बाहर जा पहुंचा. काफी समय तक घर के बाहर मंडराता रहा. कभी कमर मेें खोंस कर रखे पिस्तौल को टटोलने लगता तो कभी मोबाइल पर नंबर सरकाने लगता. उस की स्थिति एक विक्षिप्त जैसी थी. उस ने राजाराम मीणा को कौल की. उस की कौल का जवाब राजाराम ने चिढ़ते हुए दिया, ”बोलो, क्या बात है? क्यों सुबह से मुझे कौल कर के तंग कर रहे हो?’’

जवाब में मोनू बोला, ”घर आओ, तुम से जरूरी बात करनी है. मैं तुम्हारे साथ दुश्मनी रख कर एक ही मोहल्ले में भला कैसे रह पाऊंगा?’’

राजाराम को भी न जाने क्या सूझी, वह मोनू के कहने पर घर आ गया. पीछे से ताक लगाए मोनू भी राजाराम के घर में घुस आया. उस वक्त घर पर आशा और उस की विवाहित बहन मीनाक्षी मौजूद थी. वह अपने मायके आई हुई थी. मोनू ने उस से कहा कि बाहर उस की सहेली बुला रही है. उस के कहे पर मीनाक्षी बाहर चली गई, किंतु वहां सहेली को नहीं पा कर सामने उस के घर ही चली गई. राजाराम मोनू को ले कर घर के पिछले हिस्से में बने कमरे में ले कर चला गया. वहीं आशा भी आ गई. राजाराम के कुछ भी बोलने से पहले मोनू ही कड़े तेवर के साथ बोला, ”राजाराम, तूने आशा को मुझ से बात करने से क्यों मना किया?’’

उस के कड़े रुख को देखते हुए राजाराम नरमी के साथ बोला, ”देख मोनू, तू बालबच्चे वाला है, मैं भी बालबच्चेदार हूं…ऐसे में तू जो चाहता है वह कैसे हो सकता है? समाजपरिवार भी कुछ होता है या नहीं?’’

”मुझे अच्छेबुरे की तुझ से ज्यादा समझ है… प्यारमोहब्बत भी तो कुछ होता है कि नहीं…इस पर दुनियाजहान टिकी हुई है.’’ मोनू ने तर्क दिया.

”लेकिन तुम जो चाहते हो, वह सरासर गलत है…और जब आशा ही तुम से बात नहीं करना चाहती, तब तुम क्यों उस के पीछे पड़े हो?’’ अब राजाराम भी उस की तरह गर्म लहजे में बोला.

आशा ने बीचबचाव करने की कोशिश की, लेकिन कुछ सेकेंड में ही बात बिगड़ती चली गई. उन तीनों के बीच गरमागरम बहस छिड़ गई. यहां तक कि मोनू और राजाराम एकदूसरे को धमकाने लगे…और उन के बीच हाथापाई तक की नौबत आ गई. आशा बीचबचाव करने लगी. मोनू उसे परे धकेलता हुआ बोला, ”तुम हट जाओ…आज में इसे हमेशा के लिए हटा कर रहूंगा.’’

आशा को जोर का धक्का लगा था, जिस से वह थोड़ी दूर जा कर गिर पड़ी. इस बीच मोनू ने कमर में खोंस कर रखी पिस्तौल राजाराम मीणा की कनपटी पर सटा दी. आशा चीखी, बचाने की गुहार लगाई…किंतु तब तक तो मोनू के सिर पर आक्रामकता का भूत सवार हो चुका था. सेकेंड भर में ही उस ने गोली दाग दी, राजाराम मीणा धड़ाम से वहीं गिर गया. आशा अवाक रह गई!

किंतु जल्द ही वह चीखती हुई मोनू को मारने के लिए उस की तरफ दौड़ पड़ी. मोनू आशा के विरोधी तेवर को देख कर डर गया. उस ने महसूस किया कि आशा को पति की मौत का जबरदस्त सदमा लगा है, इसलिए उस की विरोधी बन चुकी है. उसे पुलिस में पकड़वा सकती है. आशा जैसे ही पास आई, उस ने तुरंत उस की कनपटी पर भी पिस्तौल रख कर गोली दाग दी. आशा भी राजाराम की तरह जमीन पर गिर पड़ी. उस के बाद मोनू फरार हो गया.

इस तरह एक घर में डबल मर्डर की घटना हो गई थी. दोनों रक्तरंजित लाशें जमीन पर पड़ी थीं. जब मीनाक्षी घर आई, तब वह भाई और भाभी की लाश देख कर घबरा गई. उस वक्त राजाराम का बेटा स्कूल में था. मीनाक्षी ने सब से पहले अपने भाई गोलू को इस की सूचना दी. वह भागाभागा घर आया. इस घटना की खबर आग की तरह पूरे मोहल्ले में फैल गई. गोलू पड़ोसियों की मदद से राजाराम और आशा को नारायण अस्पताल ले गया. वहां डौक्टर ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

दोपहर ढाई बजे सदर थाना सांगाने को इस वारदात की सूचना मिल गई. इंसपेक्टर  नंदलाल चौधरी दलबल के साथ अस्पताल पहुंचे. घटना की तहकीकात डौक्टरी जांच के आधार पर की, उस के बाद पुलिस घटनास्थल पर गई. इस बीच दोहरे हत्याकांड में मोनू पंडित का हाथ होने की जानकारी मिली. उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. इस घटना की जानकारी एसएचओ नंदलाल चौधरी ने अपने आला अधिकारियों को भी दी. मौके पर डीसीपी (साउथ) दिगंत आनंद अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

एफएसएल टीम को भी मौके पर बुलाया गया. जांच टीम ने वहां से साक्ष्य एकत्रित किए. कमरे में बिखरे खून के नमूने लिए. वहीं से खाली कारतूस भी मिले. घटना के बारे में मृतकों के परिजनों में आशाराम मीणा उर्फ गोलू और मीनाक्षी से तमाम तरह की जानकारियां जुटाई गईं. गोलू ने साफतौर पर कहा कि मोनू ने उसे राजाराम को मारने की धमकी दी थी. वह आशा से प्रेम करता था, जिस का राजाराम ने विरोध जताया था.

इस दोहरे हत्याकांड में मुख्य आरोपी मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित फरार हो गया था. उस के घर में तलाशी ली गई, लेकिन वह दूसरे शहर के लिए निकल चुका था. उस के फेमिली वालों को न तो किसी तरह के प्रेमप्रसंग की जानकारी थी और न ही इस तरह की घटना को ले कर कभी संदेह हुआ था. एडिशनल डीसीपी ललित शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें हत्यारे का पता लगाने में जुट गई थीं. घटनाक्रम से पहले वही व्यक्ति था, जो आशा और राजाराम से घर पर बातचीत के लिए आया था.

तीनों के बीच क्या बातें हुईं और पूर्व में किस तरह का कैसा विवाद था? इस बारे में मृतक के परिजनों और फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगरों से पूछताछ की गई. उस के पकड़े जाने पर ही वारदात का पूरी तरह से खुलासा हो पाएगा. मोनू की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम ने पहले उस के मोबाइल नंबर से लोकेशन का पता लगाई. इसी के साथ पूरे इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की गई. एक फुटेज में मोनू आगरा जाने वाली बस में सवार होता हुआ दिख गया. उस आधार पर पुलिस टीम ने दौसा आगरा की तरफ रुख किया. उस का मोबाइल फोन भी सर्विलांस पर था.

उस ने जैसे ही फोन को औन किया, उस की लोकेशन दौसा की मिल गई. उस आधार पर 25 जनवरी, 2025 की रात को उसे दौसा से महुवा जाने के क्रम में उसे गिरफ्तार कर लिया गया. अगले दिन 26 जनवरी को उसे सांगनेर सदर थाने लाया गया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. उस से पुलिस ने दोनों हत्याओं में प्रयुक्त हुई देसी पिस्तौल भी बरामद कर ली. मोनू को उसी रोज कोर्ट में पेश किया गया, वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Rajasthan Crime News

 

 

Love Story in Hindi : भांजी के प्यार में बना बलि का बकरा

Love Story in Hindi : 12 अगस्त, 2013 की बात है. नेहा तय समय पर कुछ कपड़े और सामान ले कर चुपचाप घर के  बाहर निकल गई. उस ने और महेंद्र ने पहले ही घर से भागने की योजना बना ली थी. गांव से निकल कर नेहा रायबरेली लालगंज जाने वाली सड़क पर पहुंच गई. वहां उस का प्रेमी महेंद्र पहले से उस का इंतजार कर रहा था.

दोनों ने वहां से फटाफट बस पकड़ी और कानपुर चले गए. कानपुर के एक मंदिर में दोनों ने पहले शादी की, फिर वहां से दिल्ली चले गए. दिल्ली में महेंद्र का एक दोस्त रहता था. उस की मार्फत दिल्ली में उस की नौकरी लग गई. बाद में उस ने किराए पर एक कमरा ले लिया. किराए के उस कमरे में वह नेहा के साथ रहने लगा. इधर महेंद्र और नेहा के फरार होने के बाद उन के गांव बीजेमऊ में हंगामा मच गया. नेहा नाबालिग थी, ऐसे में उस के मांबाप ने 15 अगस्त को महेंद्र के खिलाफ खीरो थाने में भादंवि की धारा 363, 366 और 376 के तहत अपहरण और बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया.

खीरो थाने के एसआई राकेश कुमार पांडेय नेहा और महेंद्र की खोज में जुट गए. हफ्ता भर कोशिश करने के बाद उन्होंने दोनों को आखिर ढूंढ लिया. राकेश कुमार ने महेंद्र और नेहा को बरामद कर के 24 अगस्त को न्यायालय में पेश किया. महेंद्र और नेहा ने कोर्ट में सफाई दी कि उन्होंने शादी कर ली है. इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी शादी के फोटो भी कोर्ट में पेश किए लेकिन नेहा के नाबालिग होने की वजह से अदालत ने महेंद्र को जेल भेज दिया और नेहा को उस की मां के हवाले करने का आदेश दिया.

पुलिस ने इस मामले की जांच पूरी करने के बाद 27 अगस्त, 2013 को अदालत में चार्जशीट पेश कर दी. पुलिस की जांच से पता चला कि महेंद्र और नेहा का प्यार 2 साल पहले शुरू हुआ था. नेहा और महेंद्र के प्यार की शुरुआत की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली की रहने वाली नेहा की मां की दोस्ती रेखा गुप्ता नाम की एक महिला से थी. रेखा के पति श्यामू गुप्ता की करीब 8 साल पहले मृत्यु हो गई थी. उन से 3 बेटियां कोमल, करिश्मा और खुशबू थीं. पति की मौत के बाद रेखा किसी तरह परिवार पाल रही थी, उसी दौरान उस की मुलाकात सर्वेश यादव से हुई.

सर्वेश यादव मूल रूप से कन्नौज जिले के मुंडला थाना क्षेत्र के गांव ताल का रहने वाला था. उस के पिता मोहर सिंह किसान थे. सर्वेश काम की तलाश में गांव से रायबरेली आया तो फिर वहीं का हो कर रह गया.   रेखा से मुलाकात होने के बाद उस की उस से दोस्ती हो गई. यह दोस्ती दोनों को इतना करीब ले आई कि रेखा और सर्वेश ने शादी कर ली. सर्वेश से शादी करने के बाद रेखा 2 और बच्चों की मां बनी. बाद में सर्वेश ने रेखा की बड़ी बेटी कोमल की शादी अपने भांजे सुमित से करा दी थी.

सहेली होने के नाते नेहा की मां विनीता अपने घरपरिवार की सारी परेशानी रेखा और सर्वेश से कहती रहती थी. विनीता और सर्वेश एक ही जाति के थे, इसलिए वह विनीता को बहन कहता था. दोनों में बहुत छनती थी. रेखा का घर विनीता के घर से कुछ दूरी पर था. जब भी मौका मिलता था, वह उस के पास चली आती थी. नेहा के भागने के बाद विनीता गांव में खुद को अपमानित महसूस करती थी. वह रेखा के अलावा किसी के घर नहीं जाती थी.

एक बार रेखा और विनीता आपस में बातचीत कर रही थीं तभी वहां मौजूद सर्वेश ने विनीता से कहा, ‘‘बहन, तुम्हारी बेटी नेहा तुम्हारे कहने में नहीं है. अभी तो वह नाबालिग थी तो पुलिस ने उसे पकड़ लिया. बालिग होने के बाद अगर वह किसी के साथ चली जाएगी तो पुलिस भी कोई मदद नहीं करेगी.’’

‘‘भैया, तुम्हारी बात तो सही है. पर क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा है. मैं उसे बहुत समझाने की कोशिश करती हूं लेकिन उस के ऊपर महेंद्र का भूत सवार है.’’ विनीता बोली.

‘‘बहन, तुम चिंता मत करो. मैं अपने गांव में नेहा की शादी की बात करता हूं. वहां के लोगों को नेहा के बारे में कोई बात पता नहीं है. इसलिए शादी होने में कोई परेशानी नहीं आएगी. शादी होने के बाद सब ठीक हो जाता है.’’

सर्वेश का एक भतीजा था जोगिंदर. उस की शादी नहीं हुई थी. सर्वेश ने सोचा कि अगर नेहा और जोगिंदर की शादी हो जाए तो दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी. रायबरेली और कन्नौज के बीच करीब 160 किलोमीटर की दूरी है. ऐसे में नेहा जल्द मायके भी नहीं आजा सकेगी और महेंद्र को भूल कर अपनी गृहस्थी में रचबस जाएगी. विनीता चाहती थी कि महेंद्र के जेल से बाहर आने से पहले नेहा की शादी हो जाए तो अच्छा रहेगा. इसलिए उस ने सर्वेश से कहा कि जितनी जल्दी हो सके, वह इस काम को करवा दे.

सर्वेश ने ऐसा ही किया. जोगिंदर और उस के घरवालों से बात करने के बाद आननफानन में जोगिंदर और नेहा की शादी कर दी गई. शादी के बाद नेहा कन्नौज चली गई. बेटी की शादी हो जाने के बाद विनीता ने राहत की सांस ली. लगभग 3 महीने जेल में रहने के बाद नवंबर, 2013 में महेंद्र जमानत पर घर आ गया. जेल में रहने के बाद भी वह नेहा को भूल नहीं पाया था.  उस ने अपने घरवालों से नेहा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि नेहा के घर वालों ने उस की शादी दूसरी जगह कर दी है. यह सुन कर उसे बहुत बड़ा धक्का लगा.

बाद में महेंद्र ने पता लगा लिया कि नेहा की शादी कराने में सब से बड़ी भूमिका सर्वेश यादव की रही थी. इसलिए उस ने सर्वेश के पास जा कर उसे धमकी दी, ‘‘नेहा मुझे प्यार करती थी और मेरे साथ रहना चाहती थी. तुम सब ने मुझे जेल भिजवा कर उस की शादी कर दी. तुम ने सोचा होगा कि इस से हम दूर हो जाएंगे. लेकिन मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि यह तुम लोगों की गलतफहमी है. मैं नेहा को दोबारा हासिल कर के रहूंगा. जिस ने भी नेहा को मुझ से अलग करने का काम किया है, मैं उसे सबक सिखा कर रहूंगा.’’

सर्वेश ने महेंद्र से उलझना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद वह अपने काम में लग गया. उधर महेंद्र इस कोशिश में लग गया कि किसी तरह उस की एक बार नेहा से बात हो जाए. वह उस से जानना चाहता था कि शादी के बाद भी वह उस के साथ रहना चाहती है या नहीं. यदि वह उसे अब भी चाहती है तो वह उसे ले कर कहीं दूर चला  जाएगा. महेंद्र यह बात अच्छी तरह जानता था कि अब तक नेहा बालिग हो चुकी है. ऐसे में अब अगर वह अपनी मरजी से उस के साथ जाएगी तो पुलिस भी उसे फिर से जेल नहीं भेज पाएगी.

कुछ समय बाद महेंद्र को किसी तरह नेहा का मोबाइल नंबर मिल गया. उस ने नेहा से बात की. महेंद्र के जेल से आने की बात सुन कर नेहा खुश हो गई.  आपसी गिलेशिकवे दूर करने के बाद नेहा ने उसे बताया, ‘‘घरवालों ने मेरी शादी जबरन कराई है. मैं अब भी तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं लेकिन अब इतनी दूर हूं कि मिलना भी संभव नहीं है.’’

प्रेमिका की बात सुन कर महेंद्र का दिल बागबाग हो गया. इस के बाद दोनों ने आगे की रणनीति बनाई.

8 फरवरी, 2014 को नेहा के चचेरे भाई पवन की शादी थी. नेहा ने महेंद्र से कहा कि मैं उस की शादी में शामिल होने के लिए गांव आऊंगी. तब तुम से मिलूंगी.

‘‘बस नेहा एक बार तुम मेरे पास आ जाओ, इस के बाद मैं तुम्हें कभी भी दूर नहीं जाने दूंगा. तुम्हें ले कर इतनी दूर चला जाऊंगा कि किसी को पता तक नहीं चलेगा.’’ महेंद्र ने कहा.

महेंद्र की बातों में आ कर नेहा एक बार फिर से उस के साथ भागने को तैयार हो गई तो महेंद्र ने यह बात अपने कुछ दोस्तों को भी बता दी. फिर क्या था, यह जानकारी सर्वेश को भी मिल गई. महेंद्र के जेल से छूट कर आने के बाद उस ने जब से सर्वेश को धमकी दी थी, तब से वह उस की हर हरकत पर नजर रख रहा था.

सर्वेश को महेंद्र की योजना का पता चल ही गया था. उस की योजना को फेल करने के लिए सर्वेश ने अपने भतीजे जोगिंदर को फोन कर के कहा, ‘‘जोगिंदर पवन की शादी में तुम नेहा को ले कर उस के गांव मत आना. यहां आ कर वह परेशान हो जाती है. अपनी मां, घरपरिवार के मोह में वह यहां आना चाहती है.’’

भतीजे से बात करने के बाद सर्वेश को लगा कि जब नेहा यहां आएगी ही नहीं तो महेंद्र कुछ नहीं कर सकेगा. यही नहीं सर्वेश ने जोगिंदर से कह कर नेहा का मोबाइल नंबर भी बदलवा दिया, ताकि महेंद्र उस से दोबारा बात न कर सके. यह बात जब महेंद्र को पता चली तो उसे शक हो गया कि यह सब सर्वेश ने ही कराया होगा. वह सर्वेश के पास पहुंच गया और आगबबूला होते हुए बोला, ‘‘मैं ने तुम से कहा था कि तुम मेरे बीच में मत आओ लेकिन तुम नहीं माने. अब इस का खामियाजा भुगतने को तैयार रहो.’’

27 मार्च, 2014 की रात को सर्वेश अपने घर के बाहर दरवाजे पर सो रहा था. आधी रात को अचानक उस के चीखने की आवाजें आने लगीं. आवाज सुन कर उस की पत्नी रेखा भाग कर बाहर आई तो सर्वेश का गला कटा हुआ था.  पति की हालत देख कर वह जोरजोर से रोने लगी. उस की आवाज सुन कर गांव के दूसरे लोग भी वहां आ गए. लोगों को इस बात की हैरानी हो रही थी कि इस तरह गला रेत कर सर्वेश की हत्या किस ने कर दी?

सूचना मिलने पर थाना खीरो की पुलिस भी वहां पहुंच गई. पुलिस रेखा और अन्य लोगों से पूछताछ करने लगी. पुलिस को लोगों से तो कुछ पता नहीं चला लेकिन वह इतना जरूर समझ गई कि हत्यारे की सर्वेश से गहरी दुश्मनी रही होगी. पुलिस ने लाश का पंचनामा करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने रेखा की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के तहकीकात शुरू कर दी. पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार पांडेय ने खीरो के थानाप्रभारी विद्यासागर पाल को जल्द से जल्द इस मामले का परदाफाश करने के आदेश दिए.

थानाप्रभारी ने रेखा से बात की तो उस ने बताया कि उन की वैसे तो किसी से भी कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी लेकिन महेंद्र कई बार दरवाजे पर आ कर धमकी दे गया था. चूंकि पुलिस अधीक्षक सीधे इस केस की काररवाई पर नजर रखे हुए थे इसलिए थानाप्रभारी ने रेखा द्वारा कही गई बात उन्हें बताई तो उन्होंने महेंद्र के खिलाफ सुबूत जुटाने को कहा.

थानाप्रभारी ने सर्वेश के घर वालों के अलावा मोहल्ले के अन्य लोगों से बात की तो पता चला कि महेंद्र का विनीता की बेटी नेहा से चक्कर चल रहा था. अपने और नेहा के बीच में वह सर्वेश को रोढ़ा मानता था. लोगों से की गई बात के बाद थानाप्रभारी को भी महेंद्र पर शक होने लगा.

एसपी के आदेश पर खीरो थाने की पुलिस महेंद्र के पीछे लग गई. घटना के 3 दिन बाद 31 मार्च, 2014 को मुखबिर की सूचना पर एसआई राकेश कुमार पांडेय, कांस्टेबल सुरेश चंद्र सोनकर, गोबिंद और कमरूज्जमा अंसारी ने महेंद्र को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से स्वीकार कर लिया कि उस ने ही सर्वेश की हत्या की थी. महेंद्र ने पुलिस को बताया कि वह नेहा से बहुत प्यार करता था. उस के लिए वह जेल भी गया था. इस बीच नेहा की शादी जोगिंदर से हो जरूर गई थी, लेकिन उस के जेल से लौटने के बाद भी नेहा पति को छोड़ उस के साथ ही रहना चाहती थी. सर्वेश उस की और नेहा की राह में रोड़ा बन कर बारबार आ रहा था. तब मजबूरी में उस ने सर्वेश को रास्ते से हटाने की योजना बनाई.

वह सर्वेश को मारने का मौका ढूंढता रहा. जाड़े के दिनों में वह घर में सोता था इसलिए उसे मौका नहीं मिला. जाडे़ का मौसम गुजर जाने के बाद सर्वेश घर के बाहर सोने लगा. महेंद्र मौके की तलाश में रात में रोजाना उस के घर की तरफ जाता था. 27 मार्च को भी वह मौके की फिराक में था. रात साढ़े 12 बजे जब सन्नाटा हो गया तो उस ने सर्वेश का मुंह दबा कर उस का गला चाकू से काट दिया.

सर्वेश जोर से चिल्लाने लगा तो उस ने उस पर चाकू से कई वार किए. इस बीच उस की पत्नी रेखा दरवाजा खोल कर आती दिखी तो वह भाग निकला. हत्या के समय खून के छींटे महेंद्र की शर्ट पर भी आए थे. उस ने चाकू और खून लगी शर्ट महारानीगंज, सिधौर मार्ग पर बने मंदिर के बगल वाली पुलिया के नीचे छिपा दी थी. फिर वह घर चला गया था.

महेंद्र को जब पता चला कि पुलिस ज्यादा एक्टिव हो गई है तो उस ने घर से कानपुर के रास्ते दिल्ली भागने की योजना बना ली. इस से पहले कि वह वहां से भाग पाता पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर उसे समेरी चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. महेंद्र की निशानदेही पर पुलिस ने चाकू और खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली. 1 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने महेंद्र को रायबरेली के जिला न्यायालय में पेश किया. वहां से उसे जेल भेज दिया गया.  महेंद्र ने अपने और अपनी प्रेमिका के बीच सर्वेश के आने पर प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त हो कर उस की हत्या कर दी. भले ही वह अपना प्रतिशोध लेने में सफल हो गया हो पर यह उस के लिए बहुत महंगा साबित हुआ. अब वह हत्या के आरोप में जेल में बंद है. उसे न तो प्रेमिका मिल सकी और न उस का साथ.

प्रतिशोध की भावना लोगों को अंधा कर देती है. ऐसे में यह दिखाई नहीं देता कि प्रतिशोध का अंजाम जीवन बरबाद करने वाला होता है. महेंद्र को यह कदम उठाने से पहले सोच लेना चाहिए था. वह खुद तो तिलतिल मर कर जेल में अपनी जिंदगी गुजार ही रहा होगा लेकिन उसे इस बात का अहसास नहीं होगा कि उस का परिवार उस से भी अधिक मुसीबत में है.

उस के परिवार वाले अपनी जमीनजायदाद बेच कर मुकदमा लड़ने के लिए वकील की फीस चुका रहे हैं. इस सब के बाद भी अदालत इस मामले में जो फैसला सुनाएगी, वह जरूरी नहीं कि महेंद्र के पक्ष में ही आए.

कुल मिला कर बात यहीं आ कर ठहरती है कि महेंद्र ने गुस्से में जो कदम उठाया उस से उस का परिवार ही मुसीबत में नहीं फंसा बल्कि सर्वेश यादव की हत्या के बाद उस की पत्नी और परिवार का जीवन भी अंधकारमय हो गया है. Love Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

UP Crime News : चाहत बनी आफत

UP Crime News : उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर के थाना संदना का एक गांव है हरिहरपुर. रामप्रसाद का परिवार इसी गांव में रहता था. खेती किसानी करने वाले रामप्रसाद के परिवार में पत्नी सोमवती के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे. उन में संगीता सब से बड़ी थी. सांवले रंग की संगीता का कद थोड़ा लंबा था. संगीता जवान हुई तो रामप्रसाद ने उस की शादी अपने ही इलाके के गांव रसूलपुर निवासी मुन्नीलाल के बेटे परमेश्वर के साथ कर दी. यह 6 साल पहले की बात थी.

परमेश्वर के पास 7 बीघा जमीन थी, जिस पर वह खेतीबाड़ी करता था. समय के साथ संगीता 3 बच्चों रजनी, मंजू और रजनीश की मां बनी. शादी के कुछ दिनों बाद ही परमेश्वर अपने घर वालों से अलग रहने लगा, इसलिए पत्नी और बच्चों के भरणपोषण और खेतीबाड़ी की पूरी जिम्मेदारी उसी पर आ गई थी. परमेश्वर खेतों पर जी तोड़ मेहनत करता तो संगीता बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभालती. घरगृहस्थी के चक्रव्यूह में फंस कर परमेश्वर यह भी भूल गया कि उस की पत्नी अभी जवान है और उस की कुछ भी हैं.

यह मानव स्वभाव में है कि जब उस की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो उस में चिड़चिड़ापन आ जाता है. ऐसा ही कुछ संगीता के साथ भी था. वह परमेश्वर से अपने मन की चाह के बारे में भले ही खुल कर बता नहीं पाती थी, लेकिन चिड़चिड़ेपन की वजह से लड़ जरूर लेती थी. इस तरह दोनों के बीच कहासुनी होना आम बात हो गई थी.

गांव में ही बाबूराम का भी परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटियां और 4 बेटे थे. इन में छोटू को छोड़ कर बाकी सभी भाईबहनों की शादियां हो चुकी थीं.19 वर्षीय छोटू वैवाहिक समारोहों में स्टेज बनाने का काम करता था. जब काम न होता तो वह गांव में खाली घूमता रहता था. छोटू परमेश्वर को बड़े भाई की तरह मानता था, इसलिए उस का काफी सम्मान करता था.

एक दिन परमेश्वर खेत पर काम कर रहा था तो छोटू वहां पहुंच गया. उसे वहां आया देख परमेश्वर ने उसे अपने घर से खाना लाने भेज दिया. छोटू परमेश्वर के घर पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात संगीता से हुई. संगीता उसे नहीं जानती थी. उस ने अपने बारे में बता कर संगीता से खाने का टिफिन लगा कर देने को कहा तो संगीता टिफिन में खाना लगाने लगी.

छोटू जवान हो चुका था. इस मुकाम पर महिलाओं के प्रति आकर्षण स्वाभाविक होता है. वह चोर निगाहों से संगीता के यौवन का जायजा लेने लगा. छोटू कुंवारा था, इसलिए नारी तन उस के लिए कौतूहल का विषय था. संगीता के यौवन को देख कर छोटू के तन में कामवासना की आग जलने लगी. वह मन ही मन सोचने लगा कि अगर संगीता का खूबसूरत बदन उस की बांहों में आ जाए तो मजा आ जाए.

संगीता का भी यही हाल था. उसे परमेश्वर से वह सब कुछ हासिल नहीं हो रहा था, जिस की उसे चाह थी. छोटू के बारे में ही सोचतेसोचते उस ने टिफिन में खाना लगा कर उसे थमा दिया. जब छोटू खाना ले कर जाने लगा तो संगीता भी ठीक वैसा ही सोचने लगी, जैसा थोड़ी देर पहले छोटू सोच रहा था. छोटू शारीरिक रूप से हट्टाकट्टा नौजवान ही नहीं था, बल्कि कुंवारा भी था. पहली ही नजर में वह संगीता को भा गया था.

दूसरी ओर छोटू का भी वही हाल था. वह दूसरे दिन का इंतजार करने लगा. परमेश्वर ने जब दूसरे दिन भी उस से खाना लाने को कहा तो वह तुरंत परमेश्वर के घर के लिए रवाना हो गया. वह उस के घर पहुंचा तो संगीता घर के बाहर ही बैठी थी. छोटू को देखते ही संगीता खुश हो गई. वह उसे प्यार से अंदर ले गई. जवान छोटू उसे एकटक निहार रहा था.

छोटू को अपनी ओर एकटक देखते पा कर संगीता ने उस का ध्यान भंग करते हुए कहा, ‘‘ऐसे एकटक क्या देख रहे हो, कभी जवान औरत को नहीं देखा क्या?’’

छोटू तपाक से बोला, ‘‘देखा तो है, पर तुम्हारी जैसी नहीं देखी.’’

संगीता शरमाने का नाटक करती हुई अंदर चली गई और वहीं से उस ने छोटू को आवाज लगाई, ‘‘अंदर आ जाओ, आज खाना लगाने में थोड़ी देर लगेगी.’’

उस के आदेश का पालन करते हुए छोटू अंदर आ गया. दोनों बैठ कर बातें करते हुए एकदूसरे के प्रति आकर्षित होते रहे. अब यही रोज का क्रम बन गया. स्त्रीपुरुष एकदूसरे की तरफ आकर्षित होते हैं तो मतलब की बातों का सिलसिला खुदबखुद जुड़ जाता है. मौका देख एक दिन छोटू ने संगीता की दुखती रग को छेड़ दिया, ‘‘भाभी, तुम खुश नहीं लग रही हो. लगता है, भैया तुम्हारा ठीक से खयाल नहीं रखते?’’

‘‘खुश होने की वजह भी तो होनी चाहिए. तुम्हारे भैया तो सिर्फ खेतों के हो कर रह गए हैं, घर में जवान बीवी है, इस की उन्हें कोई परवाह ही नहीं है.’’

‘‘भैया से इस बारे में बात करतीं तो तुम्हारी समस्या जरूर दूर हो जाती.’’

‘‘मैं ने कई बार उन्हें इस बात का अहसास दिलाया, लेकिन वह अपनी इस जिम्मेदारी को समझने को तैयार ही नहीं हैं. उन्हें पूरे घर की जिम्मेदारी तो दिखती है, लेकिन मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती.’’ संगीता ने बड़े ही निराश भाव से कहा. मौका देख कर छोटू ने अपने मन की बात उस के सामने रख दी, ‘‘भाभी, निराश मत हों. अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें वह खुशियां दे सकता हूं, जो परमेश्वर भैया नहीं दे पा रहे हैं.’’

अपनी बात कह कर छोटू ने संगीता को चाहत भरी नजरों से देखा तो संगीता ने भी उस की आंखों में आंखें डाल दीं. उस की आंखों में जो जुनून था, वह उस की सुलगती कामनाओं को ठंडा करने के लिए काफी था. संगीता ने उस के हाथों में अपना हाथ दे दिया. छोटू उस की सहमति पा कर खुशी से झूम उठा. इस के बाद संगीता ने अपने तन की आग में सारी मर्यादाओं को जला कर राख कर दिया.

एक बार दोनों ने अपने नाजायज रिश्ते की इबारत लिखी तो वह बारबार दोहराई जाने लगी. इसी के साथ उन के रिश्ते में गहराई भी आती गई. रसूलपुर में ही प्रमोद नाम का एक युवक रहता था. उस के पिता हरनाम भी खेतीकिसानी करते थे. 23 वर्षीय प्रमोद अविवाहित था. वह भी परमेश्वर की पत्नी संगीता पर फिदा था और उसे अपने जाल में फांसने का प्रयास करता रहता था.

एक दिन मौका देख कर उस ने संगीता से अपने दिल की बात कह दी. लेकिन संगीता ने उस से संबंध बनाने से साफ इनकार कर दिया. प्रमोद इस से निराश नहीं हुआ. उस ने अपनी तरफ से कोशिश जारी रखी. इसी बीच उसे संगीता के छोटू से बने नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया. प्रमोद को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई कि संगीता उस के अलावा किसी और से संबंध रखे. उस ने परमेश्वर के सामने उन दोनों के नाजायज रिश्ते की पोल खोल दी. परमेश्वर को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मन में शक जरूर पैदा हो गया.

अगले ही दिन परमेश्वर रोज की तरह छोटू से खाना लाने को कहा. छोटू खाना लाने चला गया तो परमेश्वर भी छिपतेछिपाते उस के पीछे घर की तरफ चल दिया. छोटू घर में जा कर संगीता के साथ रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि दोपहर का समय था और किसी के आने का अंदेशा नहीं था, इसलिए दोनों बिना दरवाजा बंद किए ही एकदूसरे से गुंथ गए.

अभी कुछ पल ही बीते थे कि किसी ने भड़ाक से दरवाजा खोल दिया. अचानक दोनों ने घबरा कर दरवाजे की तरफ देखा तो सामने परमेश्वर खड़ा था. उस की आंखों से चिंगारियां फूट रही थीं. उस ने पास पड़ा डंडा उठाया तो छोटू वहां से भागा. लेकिन भागते समय परमेश्वर का डंडा उस की कमर पर पड़ गया. दर्द की एक तेज लहर उस के बदन में दौड़ गई, लेकिन वह रुका नहीं.

उस के जाने के बाद परमेश्वर ने संगीता की जम कर पिटाई की. संगीता ने परमेश्वर से किए की माफी मांग ली और आगे से कभी दोबारा ऐसा कदम न उठाने की कसम खाई. लेकिन एक बार विश्वास की दीवार में दरार आ जाए तो उसे किसी भी तरह भरा नहीं जा सकता.

ऐसे में परमेश्वर भला संगीता पर कैसे विश्वास करता? छोटू ने उस के परिवार की इज्जत से खेलने की जो हिमाकत की थी, उसे वह बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. इस आग में घी डालने का काम किया प्रमोद ने. वह परमेश्वर को छोटू से बदला लेने के लिए उकसाने लगा.

दरअसल प्रमोद यह सब सोचीसमझी साजिश के तहत कर रहा था. उस ने सोचा था कि परमेश्वर छोटू की हत्या कर देगा तो वह छोटू के परिजनों से मिल कर परमेश्वर को जेल भिजवा देगा. इस से छोटू और परमेश्वर नाम के दोनों कांटे उस के रास्ते से हट जाएंगे. फिर संगीता को पाने से उसे कोई नहीं रोक पाएगा.

आखिर प्रमोद ने परमेश्वर को छोटू को मार कर बदला लेने के लिए मना ही लिया. परमेश्वर के कहने पर इस साजिश में वह भी शामिल हो गया. परमेश्वर के कहने पर संगीता को भी इस साजिश में शामिल होना पड़ा. क्योंकि इस के अलावा उस के सामने कोई चारा नहीं था.

24 मार्च की रात परमेश्वर ने संगीता से कह कर छोटू को अपने घर बुलाया. परमेश्वर और प्रमोद घर में ही छिप कर बैठे थे. छोटू घर आया तो संगीता उस के पास बैठ कर मीठीमीठी बातें करने लगी. देर रात होने पर परमेश्वर और प्रमोद चुपचाप बाहर निकले और पीछे से छोटू के गले में अंगौछे का फंदा बना कर डाल कर पूरी ताकत से कसने लगे.

छोटू छूटने के लिए छटपटाने लगा. इस से वह जमीन पर गिर पड़ा. छोटू के जमीन पर गिरते ही संगीता ने उस के पैर कस कर पकड़ लिए तो परमेश्वर व प्रमोद ने पूरी ताकत से अंगौछे से छोटू का गला कस दिया. कुछ ही देर में उस का शरीर शांत हो गया. उस की मौत हो गई.

प्रमोद ने छोटू की जेब से उस का मोबाइल निकाल लिया. इस के बाद परमेश्वर और प्रमोद लाश को एक बोरी में भर कर पास के गांव मेदपुर में मुन्ना सिंह के खेत में ले जा कर डाल आए. बोरी को उन्होंने सरकंडे और घासफूस से ढक दिया था. दूसरे दिन छोटू दिखाई नहीं दिया तो घर वालों ने उस की तलाश शुरू की. लेकिन जब काफी कोशिशों के बाद भी उस का कुछ पता नहीं चला तो 26 मार्च, 2014 को उस के पिता बाबूराम ने थाना संदना में उस की गुमशुदगी लिखा दी.

28 मार्च को मेदपुर में गांव के कुछ लोगों ने मुन्ना सिंह के खेत में एक लाश पड़ी देखी तो यह खबर आसपास के गांवों तक फैल गई. बाबूराम को पता चला तो वह भी अपने घर वालों के साथ वहां पहुंच गया. वहां पड़ी लाश देख कर बिलखबिलख कर रोने लगे. लोगों द्वारा सांत्वना देने के बाद सभी किसी तरह शांत हुए तो लाश की सूचना थाना संदना पुलिस को दी गई.

सूचना पा कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. मृतक छोटू के गले में अगौंछा पड़ा हुआ था. गले में उस के कसे जाने के निशान भी मौजूद थे. इस से यही लगा कि उसी अंगौछे से उस की गला घोंट कर हत्या की गई थी. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय सीतापुर भिजवा दिया.

थाने लौट कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने बाबूराम की लिखित तहरीर पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. दूसरी ओर इस की भनक लगते ही पकड़े जाने के डर से परमेश्वर संगीता के साथ फरार हो गया.

30 मार्च की सुबह 8 बजे थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने एक मुखबिर की सूचना पर संदना-मिसरिख रोड पर भरौना पुलिया के पास से परमेश्वर और संगीता को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब पूछताछ की गई तो दोनों ने छोटू की हत्या की पूरी कहानी बयां कर दी.

31 मार्च को सुबह साढ़े 7 बजे पुलिस ने प्रमोद को भी गोपालपुर चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया.

दरअसल, प्रमोद छोटू की हत्या करवाने के बाद छोटू के घर वालों से जा कर मिल गया था. उसी ने ही उन्हें बताया था कि छोटू और संगीता के नाजायज संबंध थे, जिस के बारे में परमेश्वर को पता चल गया था. इसी वजह से परमेश्वर ने संगीता के साथ मिल कर छोटू की हत्या की थी. प्रमोद ही लाश मिलने की जगह भी बाबूराम को ले गया था. बाबूराम ने उसी की बातों के आधार पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई थी. इतनी चालाकी के बावजूद भी प्रमोद खुद को कानून के शिकंजे से नहीं बचा सका और पकड़ा गया. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : बदले की आग

Crime News : लखनऊ के थाना मडि़यांव के थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को सुबहसुबह किसी ने फोन कर के सूचना दी कि ककौली में बड़ी खदान के पास एक कार में आग लगी है. सूचना मिलते ही रघुवीर सिंह ककौली की तरफ रवाना हो गए. थोड़ी ही देर में वह ककौली की बड़ी खदान के पास पहुंच गए. उन्होंने एक जगह भीड़ देखी तो समझ गए कि घटना वहीं घटी है. जब तक पुलिस वहां पहुंची, कार की आग बुझ चुकी थी. पुलिस ने देखा, कार के अंदर कोई भी सामान सलामत नहीं बचा था.

यहां तक कि कार की नंबर प्लेट का नंबर भी नहीं दिखाई दे रहा था. इसी से अंदाजा लगाया गया कि आग कितनी भीषण रही होगी. जली हुई कार के अंदर कुछ हड्डियां और 2 भागों में बंटी इंसान की एक खोपड़ी पड़ी थी. उन्हें देख कर थानाप्रभारी चौंके. हड्डियों और खोपड़ी से साफ लग रहा था कि कार के अंदर कोई इंसान भी जल गया था.

थानाप्रभारी ने अपने आला अधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी थी. इस के बाद थोड़ी ही देर में क्षेत्राधिकारी (अलीगंज) अखिलेश नारायण सिंह फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. कार के अंदर जली अवस्था में एक छोटा गैस सिलेंडर और शराब की खाली बोतल भी पड़ी थी. फोरेंसिक टीम ने अपना काम निपटा लिया तो पुलिस ने अपनी जांच शुरू की.

कार की स्थिति देख कर पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि साजिशन इसे अंजाम दिया गया है. कार एक खुले मैदान में थी. आबादी वहां से कुछ दूरी पर थी. इसलिए हत्यारों ने वारदात को आसानी से अंजाम दे दिया था. यह 4 दिसंबर, 2013 की बात है.

कार में कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से जल कर खाक हो चुके व्यक्ति की शिनाख्त हो पाती. इसलिए पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर बरामद हड्डियों और खोपड़ी को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया, जहां से हड्डियों को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया.

अब तक इस घटना की खबर जंगल की आग की तरह आसपास फैल चुकी थी. ककौली के ही रहने वाले सुरजीत यादव का छोटा भाई रंजीत यादव 3 दिसंबर को कार से कटरा पलटन छावनी एरिया में किसी शादी समारोह में शामिल होने के लिए घर से निकला था. उसे उसी रात को लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. यही वजह थी कि यह खबर सुनते ही सुरजीत बड़ी खदान की तरफ चल पड़ा. वहां पहुंच कर कार देखते ही वह समझ गया कि यह कार उसी की है.

सुरजीत ने थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को अपने भाई के गायब होने की पूरी बात बता कर आशंका जताई कि कार में जल कर जो व्यक्ति मरा है, वह उस का भाई रंजीत हो सकता है. इस के बाद सुरजीत की तहरीर पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ रंजीत की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सुरजीत से बातचीत के बाद थानाप्रभारी रघुवीर सिंह ने तहकीकात शुरू की तो पता चला कि रंजीत शादी समारोह में जाने के लिए घर से निकला तो था, लेकिन समारोह में पहुंचा नहीं था. अब सोचने वाली बात यह थी कि वह शादी समारोह में नहीं पहुंचा तो गया कहां था. यह जानने के लिए उन्होंने मुखबिर लगा दिए. एक मुखबिर ने बताया कि 3 दिसंबर की शाम रंजीत को देशराज और अजय के साथ देखा गया था. देशराज हरिओमनगर में रह कर सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. रंजीत उसी की सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था.

देशराज से पूछताछ के बाद ही सच्चाई का पता चल सकता था, इसलिए पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी. 5 दिसंबर, 2013 को सुबह 5 बजे के करीब उसे रोशनाबाद चौराहे के पास से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब देशराज से पूछताछ की गई तो उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद उस ने रंजीत यादव को जिंदा जलाने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला देशराज लखनऊ के हरिओमनगर में एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. वहीं पर उस ने एक मकान किराए पर ले रखा था. वह लखनऊ में अकेला रहता था, जबकि उस की पत्नी और बच्चे सीतापुर में रहते थे. समय मिलने पर वह अपने परिवार से मिलने सीतापुर जाता रहता था. उस की एजेंसी अच्छी चल रही थी. जिस से उसे हर महीने अच्छी आमदनी होती थी. कहते हैं, जब किसी के पास उस की सोच से ज्यादा पैसा आना शुरू हो जाता है तो कुछ लोगों में नएनए शौक पनप उठते हैं. देशराज के साथ भी यही हुआ. वह शराब और शबाब का शौकीन हो गया था.

वह पास के ही ककौली गांव भी आताजाता रहता था. वहीं पर एक दिन उस की नजर रानी नाम की एक औरत पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा.

रानी की अजीब ही कहानी थी. उस का विवाह उस उम्र में हुआ था, जब वह विवाह का मतलब ही नहीं जानती थी. नाबालिग अवस्था में ही वह 2 बेटों अजय, संजय और एक बेटी सीमा की मां बन गई थी. उसी बीच किसी वजह से उस के पति की मौत हो गई. पति का साया हटने से उस के ऊपर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. जब कमाने वाला ही न रहा तो उस के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया. मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे वह दो जून की रोटी का इंतजाम करने लगी.

देशराज ने उस की भोली सूरत देखी तो उसे लगा कि वह उसे जल्द ही पटा लेगा. रानी से नजदीकी बढ़ाने के लिए वह उस से हमदर्दी दिखाने लगा. रानी देशराज के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी. बस इतना ही जानती थी कि वह पैसे वाला है. एक पड़ोसन से रानी ने देशराज के बारे में काफी कुछ जान लिया था. इस के बाद धीरेधीरे उस का झुकाव भी उस की तरफ होता गया.

एक दिन देशराज रानी के घर के सामने से जा रहा था तो वह घर की चौखट पर ही बैठी थी. उस समय दूरदूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था. मौका अच्छा देख कर देशराज बोल पड़ा, ‘‘रानी, मुझे तुम्हारे बारे में सब पता है. तुम्हारी कहानी सुन कर ऐसा लगता है कि तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ दुख ही दुख है.’’

‘‘आप के बारे में मैं ने जो कुछ सुन रखा था, आप उस से भी कहीं ज्यादा अच्छे हैं, जो दूसरों के दुख को बांटने की हिम्मत रखते हैं. वरना इस जालिम दुनिया में कोई किसी के बारे में कहां सोचता है?’’

‘‘रानी, दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. खैर, तुम चिंता मत करो. आज से मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. चाहो तो बदले में तुम मेरे घर का कुछ काम कर दिया करना.’’

‘‘ठीक है, आप ने मेरे बारे में इतना सोचा है तो मैं भी आप के बारे में सोचूंगी. मैं आप के घर के काम कर दिया करूंगी.’’

इतना कह कर देशराज ने रानी के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखा तो रानी ने अपनी गरदन टेढ़ी कर के उस के हाथ पर अपना गाल रख कर आशा भरी नजरों से उस की तरफ देखा. देशराज ने मौके का पूरा फायदा उठाया और रानी के हाथ पर 500 रुपए रखते हुए कहा, ‘‘ये रख लो, तुम्हें इस की जरूरत है. मेरी तरफ से इसे एडवांस समझ लेना.’’

रानी तो वैसे भी अभावों में जिंदगी गुजार रही थी, इसलिए उस ने देशराज द्वारा दिए गए पैसे अपने हाथ में दबा लिए. इस से देशराज की हिम्मत और बढ़ गई. वह हर रोज रानी से मिलने उस के घर पहुंचने लगा. वह जब भी उस के यहां जाता, रानी के बच्चों के लिए खानेपीने की कोई चीज जरूर ले जाता. कभीकभी वह रानी को पैसे भी देता. इस तरह वह रानी का खैरख्वाह बन गया.

रानी हालात के थपेड़ों में डोलती ऐसी नाव थी, जिस का कोई मांझी नहीं था. इसलिए देशराज के एहसान वह अपने ऊपर लादती चली गई. पैसे की वजह से उस की बेटी सीमा भी स्कूल नहीं जा रही थी. देशराज ने उस का दाखिला ही नहीं कराया, बल्कि उस की पढ़ाई का सारा खर्च उठाने का वादा किया.

स्वार्थ की दीवार पर एहसान की ईंट पर ईंट चढ़ती जा रही थी. अब रानी भी देशराज का पूरा खयाल रखने लगी थी. वह उसे खाना खाए बिना जाने नहीं देती थी. लेकिन देशराज के मन में तो रानी की देह की चाहत थी, जिसे वह हर हाल में पाना चाहता था.

एक दिन उस ने कहा, ‘‘रानी, अब तुम खुद को अकेली मत समझना. मैं हर तरह से तुम्हारा बना रहूंगा.’’

यह सुन कर रानी उस की तरफ चाहत भरी नजरों से देखने लगी. देशराज समझ गया कि वह शीशे में उतर चुकी है, इसलिए उस के करीब आ गया और उस के हाथ को दोनों हथेलियों के बीच दबा कर बोला, ‘‘सच कह रहा हूं रानी, तुम्हारी हर जरूरत पूरी करना अब मेरी जिम्मेदारी है.’’

हाथ थामने से रानी के शरीर में भी हलचल पैदा हो गई. देशराज के हाथों की हरकत बढ़ने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों बेकाबू हो गए और अपनी हसरतें पूरी कर के ही माने.

देशराज ने वर्षों बाद रानी की सोई भावनाओं को जगाया तो उस ने देह के सुख की खातिर सारी नैतिकताओं को अंगूठा दिखा दिया. अब वह देशराज की बन कर रहने का ख्वाब देखने लगी. देशराज और रानी के अवैध संबंध बने तो फिर बारबार दोहराए जाने लगे. रानी को देशराज के पैसों का लालच तो था ही, अब वह उस से खुल कर पैसों की मांग करने लगी.

देशराज चूंकि उस के जिस्म का लुत्फ उठा रहा था, इसलिए उसे पैसे देने में कोई गुरेज नहीं करता था. इस तरह एक तरफ रानी की दैहिक जरूरतें पूरी होने लगी थीं तो दूसरी तरफ देशराज उस की आर्थिक जरूरतें पूरी करने लगा था. वर्षों बाद अब रानी की जिंदगी में फिर से रंग भरने लगे थे.

ककौली गांव में ही भल्लू का परिवार रहता था. पेशे से किसान भल्लू के 2 बेटे रंजीत, सुरजीत और 2 बेटियां कमला, विमला थीं. चारों में से अभी किसी की भी शादी नहीं हुई थी.

24 वर्षीय रंजीत और 22 वर्षीय सुरजीत, दोनों ही भाई देशराज की सिक्योरिटी एजेंसी में काम करते थे. रंजीत और देशराज की उम्र में काफी लंबा फासला था. देशराज की जवानी साथ छोड़ रही थी, जबकि रंजीत की जवानी पूरे चरम पर थी. वैसे भी वह कुंवारा था. देशराज और रंजीत के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ खातेपीते थे.

एक दिन शराब के नशे में देशराज ने रंजीत को अपने और रानी के संबंधों के बारे में बता दिया. यह सुन कर रंजीत चौंका. यह उस के लिए चिराग तले अंधेरे वाली बात थी. उसी के गांव की रानी अपने शबाब का दरिया बहा रही थी और उसे खबर तक नहीं थी. वह किसी औरत के सान्निध्य के लिए तरस रहा था. रानी की हकीकत पता चलने के बाद जैसे उसे अपनी मुराद पूरी होती नजर आने लगी.

रंजीत के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. वह मन ही मन सोचने लगा कि जब देशराज रानी के साथ रातें रंगीन कर सकता है, तो वह क्यों नहीं? वह देशराज की ब्याहता तो है नहीं.  अगले दिन रंजीत देशराज से मिला तो बोला, ‘‘रानी की देह में मुझे भी हिस्सा चाहिए, नहीं तो मैं तुम दोनों के संबंधों की बात पूरे गांव में फैला दूंगा.’’

देशराज को रानी से कोई दिली लगाव तो था नहीं, वह तो उस की वासना की पूर्ति का साधन मात्र थी. उसे दोस्त के साथ बांटने में उसे कोई परेशानी नहीं थी. वैसे भी रंजीत का मुंह बंद करना जरूरी था. इसलिए उस ने रानी को रंजीत की शर्त बताते हुए समझाया, ‘‘देखो रानी, अगर हम ने उस की बात नहीं मानी तो वह हमारी पोल खोल देगा. पूरे गांव में हमारी बदनामी हो जाएगी. इसलिए तुम्हें उसे खुश करना ही पड़ेगा.’’

रानी के लिए जैसा देशराज था, वैसा ही रंजीत भी था. उस ने हां कर दी. इस बातचीत के बाद देशराज ने यह बात रंजीत को बता दी. फलस्वरूप वह उसी दिन शाम को रानी के घर पहुंच गया. एक ही गांव का होने की वजह से दोनों न केवल एकदूसरे को जानते थे, बल्कि उन में बातें भी होती थीं. रंजीत उसे भाभी कह कर बुलाता था.

सारी बातें चूंकि पहले ही तय थीं, सो दोनों के बीच अब तक बनी संकोच की दीवार गिरते देर नहीं लगी. दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने तो रानी को एक अलग ही तरह की सुखद अनूभूति हुई. रंजीत के कुंवारे बदन का जोश देशराज पर भारी पड़ने लगा. उस दिन के बाद तो वह अधिकतर रंजीत की बांहों में कैद होने लगी. रंजीत भी रानी की देह का दीवाना हो चुका था. इसलिए वह भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. रंजीत ने मारुति आल्टो कार ले रखी थी, जो उस के भाई सुरजीत के नाम पर थी. रंजीत रानी को अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले जाने लगा. वह उसे रेस्टोरेंट वगैरह में ले जा कर खिलातापिलाता और गिफ्ट भी देता.

रानी की जिंदगी में रंजीत आया तो वह देशराज को भी और उस के एहसानों को भूलने लगी. रंजीत उस के दिलोदिमाग पर ऐसा छाया कि उस ने देशराज से मिलनाजुलना तक छोड़ दिया. इस से देशराज को समझते देर नहीं लगी कि रानी रंजीत की वजह से उस से दूरी बना रही है. उसे यह बात अखरने लगी. रानी को फंसाने में सारी मेहनत उस ने की थी, जबकि रंजीत बिना किसी मेहनत के फल खा रहा था.

इसी बात को ले कर रंजीत और देशराज में मनमुटाव रहने लगा. देशराज ने रंजीत से उस की कुछ जमीन खरीदी थी, जिस का करीब 5 लाख रुपया बाकी था. रंजीत जबतब देशराज से अपने पैसे मांगता रहता था. इस बात को ले कर रंजीत कई बार उसे जलील तक कर चुका था.

एक तरफ रंजीत ने देशराज की मौजमस्ती का साधन छीन लिया था तो दूसरी ओर उसे 5 लाख रुपए भी देने थे. इसलिए सोचविचार कर उस ने रंजीत को अपने रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने अपने यहां सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे अजय पांडेय को भी लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया. अजय सीतापुर के कमलापुर थानाक्षेत्र के गांव रूदा का रहने वाला था.

3 दिसंबर की शाम को रंजीत को कटरा पलटन छावनी में एक वैवाहिक समारोह में जाना था. यह बात देशराज को पता थी. उस ने उसी दिन अपनी योजना को अंजाम देने के बारे में सोचा. उस दिन देर शाम रंजीत घर से तैयार हो कर कार से कटरा पलटन जाने के लिए निकला. रास्ते में एक जगह उसे देशराज और अजय पांडेय मिल गए. वहां से वे हाइवे पर ट्रामा सेंटर के पास गए और शराब खरीद कर बड़ी खदान के पास आ गए.

तीनों ने कार के अंदर बैठ कर शराब पी. देशराज और अजय ने खुद कम शराब पी, जबकि रंजीत को ज्यादा पिलाई. जब रंजीत नशे में धुत हो गया तो दोनों ने उसे पिछली सीट पर लिटा दिया. कार में एक छोटा गैस सिलेंडर भरा रखा था, जिसे रंजीत घर से गैस भराने के लिए लाया था. साथ ही कार में एक बोतल पेट्रोल भी रखा था. देशराज ने कार के सभी शीशे चढ़ा कर गैस सिलेंडर की नौब खोल दी, जिस से तेजी से गैस रिसने लगी.

देशराज पेट्रोल की बोतल उठा कर कार से बाहर आ गया और कार के सभी दरवाजे बंद कर दिए. इस के बाद उस ने कार के ऊपर सारा पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. चूंकि कार के अंदर गैस भरी थी, इसलिए आग की लपटें तेजी से बाहर निकलीं. देशराज का चेहरा और हाथ जल गए. गैस और पेट्रोल की वजह से कार धूधू कर के जलने लगी. नशे में धुत अंदर लेटे रंजीत ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन वह नाकामयाब रहा. अपना काम कर के देशराज और अजय वहां से भाग खडे़ हुए.

देशराज मौके से तो भाग गया, लेकिन कानून से नहीं बच सका. इंसपेक्टर रघुवीर सिंह ने रानी से भी पूछताछ की. हत्या के इस मामले में उस की कोई भूमिका नहीं थी. अलबत्ता जब गांव वालों को यह पता चला कि हत्या की वजह रानी थी तो लोगों ने उस के साथ भी मारपीट की.

पुलिस ने देशराज को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा संकलन तक पुलिस अजय पांडेय को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.v Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story : गर्लफ्रेंड के लिए बना चोर

Hindi Story : रात के दस बजने वाले थे. वाराणसी जनपद के सिगरा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली नगर निगम चौकी के प्रभारी सबइंसपेक्टर बसंत कुमार एसआई चंद्रकेश शर्मा और 2 सिपाहियों गामा यादव व बाबूलाल के साथ शिवपुरवा तिराहे के पास मौजूद थे. उसी समय एक मुखबिर ने आ कर बताया कि इलाके में पिछले कुछ महीनों से मोबाइल और लैपटाप वगैरह की जो चोरियां हुई हैं, उन का चोर चोरी का सामान बेचने के लिए खरीदार से संपर्क करने के लिए आने वाला है.

चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर बसंत कुमार के लिए सूचना काफी महत्त्वपूर्ण थी. मुखबिर से कुछ जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्होंने उस चोर को पकड़ने के लिए व्यूह रचना तैयार कर अपने साथी पुलिस वालों को सतर्क कर दिया. मुखबिर को उन्होंने छिप कर खड़ा होने को कह दिया. थोड़ी देर बाद मुखबिर ने सनबीम स्कूल की ओर से पैदल आ रहे 2 युवकों की ओर इशारा कर दिया. उन दोनों की पहचान कराने के बाद मुखबिर वहां से चला गया.

सबइंसपेक्टर बसंत कुमार और उन के साथी चौकन्ने हो गए. दोनों युवकों में से एक के पास एक काले रंग का बड़ा सा बैग था, जिसे वह पीठ की तरफ टांगे हुए था. दोनों युवक जैसे ही रेलवे कालोनी जल विहार मोड़ के पास पहुंचे. सबइंसपेक्टर बसंत कुमार ने उन दोनों को रुकने का आदेश दिया. लेकिन पुलिस को देख कर दोनों तेजी से विपरीत दिशा की ओर भागने लगे. लेकिन पहले से तैयार पुलिस टीम ने दौड़ कर उन्हें पकड़ लिया.

पुलिस के शिकंजे में फंसते ही दोनों युवक गिड़गिड़ाए, ‘‘सर, आप हम लोगों को क्यों पकड़ रहे हैं, हम ने क्या किया है?’’

‘‘कुछ नहीं किया तो भागने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘साहब, हम डर गए थे कि कहीं आप हमें किसी झूठे मुकदमे में न फंसा दें.’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है कि पुलिस वाले यूं ही राह चलते लोगों को फंसा देते हैं. खैर, अपना बैग चेक कराओ.’’ कह कर बसंत कुमार ने सिपाही गामा यादव को आदेश दिया, ‘‘इन का बैग चेक करो.’’

‘‘साहब, बैग में कपड़ेलत्तों के अलावा कुछ नहीं है.’’ एक युवक ने कहा तो बसंत कुमार ने उसे डांटा, ‘‘अगर आपत्तिजनक कुछ नहीं है तो घबरा क्यों रहे हो?’’

सबइंसपेक्टर चंद्रकेश शर्मा ने युवक की पीठ पर टंगा काले रंग का बैग जबरदस्ती ले कर खोला तो उस में लैपटाप और नए मोबाइल सेट के डिब्बे दिखे. बैग में मोबाइल सेट और लैपटाप देखते ही बसंत कुमार समझ गए कि शिकार जाल में फंस चुका है.

बसंत कुमार ने बैग वाले युवक का नाम पूछा तो उस ने अपना नाम जयमंगल निवासी शिवपुरवा बताया. उस के साथी का नाम गुडलक था. वह सिगरा थानाक्षेत्र की महमूरगंज रोड स्थित संपूर्णनगर कालोनी में रहता था. विस्तृत पूछताछ के लिए दोनों युवकों को हिरासत में ले कर चौकीप्रभारी बसंत कुमार अपनी टीम के साथ सिगरा थाने आ गए.

सिगरा थाने में जयमंगल से विस्तृत पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस के बैग में सारा सामान चोरी का है. पुलिस को उस के बैग से 3 लैपटाप, 10 मोबाइल सेट, रितेश नाम से एक वोटर आईडी के अलावा 1560 रुपए और 1 किलो 100 ग्राम चरस मिली. जबकि गुडलक की तलाशी में उस की पैंट की जेब से प्लास्टिक की थैली में रखी 240 ग्राम चरस मिली.

जयमंगल और गुडलक से पूछताछ चल ही रही थी कि तभी गश्त पर गए थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र थाने लौट आए. उन्हें जब पता चला कि पिछले दिनों इलाके में हुई चोरी की घटनाओं में शामिल 2 चोर पकड़े गए हैं तो वह भी पूछताछ में शामिल हो गए. जयमंगल से बरामद रितेश नाम से जारी वोटर आईडी को देखने पर पता चला कि उस पर फोटो जयमंगल का लगा था. इस का मतलब उस ने फरजी नाम से आईडी बनवा रखी थी.

थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र ने इस बारे में जयमंगल से जब अपने तरीके से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने रितेश नाम से फर्जी वोटर आईडी बनवाई थी, ताकि होटल वगैरह में ठहरने के लिए उस आईडी का इस्तेमाल कर के अपनी असली पहचान छिपा सके.

पूछताछ के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि वह शिवपुरवा (सिगरा क्षेत्र) स्थित अपने पैतृक घर में न रह कर पिछले तीन सालों से अपनी प्रेमिका पत्नी के साथ पड़ोसी जनपद भदोही के गोपीगंज थानाक्षेत्र स्थित खमरिया में किराए का मकान ले कर रह रहा था. जयमंगल ने गुडलक को अपना दोस्त बताया. जयमंगल पहले ही स्वीकार कर चुका था कि उस के बैग से बरामद सामान अलगअलग जगहों से चोरी किया गया था. चरस के बारे में उस का कहना था कि नशे के लिए चरस का इस्तेमाल वह खुद करता था.

पूछताछ चल ही रही थी कि तभी थानाप्रभारी शिवानंद मिश्र की नजर जयमंगल के हाथों पर पड़ी. उस के हाथों पर 2-3 लड़कियों के नाम गुदे हुए थे. एक साथ 2-3 लड़कियों के नाम हाथों पर गुदे देख शिवानंद मिश्र ने इस बारे में जयमंगल से पूछा. उस ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर न सिर्फ थानाप्रभारी बल्कि वहां मौजूद सभी पुलिस वाले आश्चर्यचकित रह गए.

जयमंगल ने बताया कि उस के हाथ पर ही नहीं, बल्कि शरीर के विभिन्न हिस्सों पर उस ने पच्चीसों लड़कियों के नाम गोदवाए हुए हैं. जयमंगल की टीशर्ट को पेट के ऊपर तक उठा कर देखा गया तो उस के सीने और पीठ पर दर्जनों लड़कियों के नाम गुदे मिले. दोनों हाथ, छाती और पीठ पर जिन लड़कियों के नाम गुदे थे, वे सब जयमंगल की प्रेमिकाएं थीं. पूछताछ में पता चला कि जयमंगल को नईनई लड़कियों से देस्ती करने का शौक था. वह उन से दोस्ती ही नहीं करता था, बल्कि उन से जिस्मानी संबंध भी बनाता था.

आर्थिक रूप से कमजोर घर की लड़कियों से जानपहचान बढ़ा कर उन से दोस्ती करना उस का शगल था. इस के लिए वह उन्हें उन की पसंद और जरूरत के मुताबिक तोहफे देता था. इतना ही नहीं, जिन लड़कियों से वह दोस्ती करता था, गाहेबगाहे उन के परिवार वालों की भी आर्थिक मदद कर के परिवार वालों की नजरों में शरीफजादा बन जाता था. इसी वजह से परिवार वाले जयमंगल के साथ अपनी लड़की के घूमनेफिरने पर ज्यादा बंदिशें नहीं लगाते थे.

लड़कियों को इंप्रेस करने के लिए शुरूशुरू में जयमंगल उन का नाम अपने बदन पर गुदवा लेता था. लेकिन जब समय के साथ प्रेमिकाओं की संख्या बढ़ने लगी तो बदन में लड़कियों का नाम गुदवाना उस का शौक बन गया. पुलिस के समक्ष जयमंगल ने खुलासा किया कि अब तक वह 27 प्रेमिकाओं के नाम अपने बदन पर गुदवा चुका है.

जिन लड़कियों को किसी कारणवश वह छोड़ देता था या फिर लड़की ही उस से किनारा कर लेती थी, उस लड़की का नाम वह अपने बदन से मिटा देता था. नाम मिटाने के लिए वह उसे ब्लेड से खुरचने के साथसाथ कई बार गुदे हुए नाम को जला देता था. जयमंगल के हाथों में 3-4 जगहों पर जले के निशान भी दिखाई दिए, जिस के बारे में उस ने पुलिस को बताया कि जली हुई जगह पर उस की जिन प्रेमिकाओं के नाम गुदे थे, अब उन से उस का कोई रिश्ता नहीं रहा. इसलिए उस ने उन के नाम भी अपने बदन से मिटा दिए.

पुलिस की माने तो जयमंगल अब तक 30 से अधिक लड़कियों को अपनी प्रेमिका बना चुका था. जिन में से 2 दर्जन से अधिक प्रेमिकाओं के नाम उस ने अपने बदन पर भी गुदवाए थे. अपनी प्रेमिकाओं में से ही एक गुडि़या से उस ने 3 साल पहले एक मंदिर में शादी कर ली थी. फिलहाल वह उसी के साथ रह रहा था.

पूछताछ के दौरान चौंकाने वाली एक बात यह भी पता चली कि जयमंगल एक रईस खानदान का लड़का था. किशोरावस्था में उस के कदम बहक गए और ज्यादा से ज्यादा लड़कियों से दोस्ती करने की आदत ने उसे चोरी करने पर मजबूर कर दिया.

पुलिस की मानें तो बनारस के शिवपुरवा नगर निगम इलाके में जयमंगल का बहुत बड़ा पुश्तैनी मकान था, इस मकान के अलावा भी शहर के कई इलाकों में उस परिवार के कई मकान थे जिन्हें उन लोगों ने किराए पर उठा रखे थे. लेकिन जयमंगल की गलत हरकतों की वजह से परिवार वाले पिछले 5-6 सालों से उसे पैसा नहीं देते थे.  जयमंगल खुद भी परिवार वालों से किसी तरह की आर्थिक मदद लेने के बजाय चोरी कर के अपनी जरूरतें और शौक पूरा करने का आदी हो चुका था.

जयमंगल ने पुलिस को यह भी बताया कि वह चोरी की ज्यादातर घटनाओं को खुद ही अंजाम दिया करता था. हां, कभीकभार वह किसी जरूरतमंद दोस्त को चोरी में जरूर शामिल कर लेता था, ताकि उस की मदद हो सके. चोरी के लिए कई बार वह होटलों में भी ठहरता था. फरजी आईडी उस ने इसीलिए बनवा रखी थी.

पुलिस ने जयमंगल के पास से जो 10 मोबाइल सेट बरामद किए थे, उन में से 2 मोबाइलों की चोरी की रिपोर्ट सिगरा थाने में पहले से ही दर्ज थी. थाने में दर्ज मोबाइल चोरी की रिपोर्ट के अनुसार चोरी का माल उस के पास से बरामद हो गया था.

पुलिस ने जयमंगल के विरुद्ध भादंवि की धारा 419, 420, 468, 467, 471, 41, 411, 414 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया. इस के अलावा उस के पास से बरामद 1 किलो 100 ग्राम चरस के लिए एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/18/20 के अंतर्गत अलग से मुकदमा दर्ज किया गया. जयमंगल के साथी गुडलक के पास से भी 240 ग्राम चरस बरामद हुई थी, इसलिए उस के खिलाफ भी एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/18/20 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया.

जयमंगल और गुडलक की गिरफ्तारी 17 जुलाई, 2014 को हुई थी. अगले दिन 18 जुलाई को दोनों को बनारस के नगर पुलिस अधीक्षक सुधाकर यादव ने एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर दोनों आरोपियों को मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया.

जयमंगल ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि उस ने जो भी चोरियां की थी, वे अपनी माशूकाओं को गिफ्ट देने और उन्हें खुश करने के लिए की थीं. इस के पहले भी वह 3-4 बार जेल जा चुका था और जब भी बाहर आता था, अपने पुराने धंधे में लग जाता था. पुलिस ने दोनों को वाराणसी के जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.  Hindi Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित