Gujarat News: 2 निकाह के बाद भी करिश्मा रही अकेली

Gujarat News: अलगअलग धर्मों के होने की वजह से राजू शिंदे और करिश्मा भले ही विवाह नहीं कर सके, लेकिन 18 साल बाद नियति ने उन्हें जिंदगी के उस मोड़ पर मिलवा दिया, जब दोनों ही अपनेअपने जीवनसाथी को तलाक दे चुके थे. समय की नजाकत को देखते हुए दोनों ने निकाह तो कर लिया, लेकिन इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि 2-2 निकाह करने के बावजूद करिश्मा अकेली ही रह गई.

महाराष्ट्र के शिरडी का रहने वाला राजू शिंदे पिछले 16 सालों से गुजरात के शहर अहमदाबाद के नरोडा में रहता था. वह अपने पेरेंट्स की भले ही इकलौती संतान था, लेकिन कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, इसलिए इलास्टिक की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस समय राजू की उम्र यही कोई 25-26 साल रही होगी. फादर भी कमाते थे, इसलिए उसे किसी बात की चिंता नहीं थी. वह कमाता था और बनठन कर रहता था. खुद की कमाई खुद पर ही खर्च करता था. खानापीना घर से मिलता ही था, इसलिए किसी बात की फिक्र नहीं थी.

उस के पास सब कुछ था, लेकिन कोई ऐसा नहीं था, जो उसे प्यार करे. उसे किसी एक ऐसी लड़की की तलाश थी, जो उसे चाहे. वह जिस कंपनी में नौकरी करता था, उसी कंपनी में करिश्मा नाम की एक लड़की काम करती थी. राजू और करिश्मा एक साथ काम करते थे, इसलिए दोनों लगभग रोज ही मिलते थे और दोनों के बीच बातचीत भी होती रहती थी. इस तरह लगातार मिलने और बातचीत होने से जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई. दोनों में दोस्ती भी हो गई. फिर वे एकदूसरे को चाहने भी लगे थे, पर उन का विवाह नहीं हो सका.

इस का कारण यह था कि दोनों ही अलगअलग धर्मों से थे. बहरहाल, बात विवाह तक पहुंच पाती, उस से पहले ही उसी दौरान साल 2006 में राजू शिंदे का विवाह गीता राठौड़ के साथ हो गया था. इस तरह करिश्मा राजू की सिर्फ दोस्त बन कर ही रह गई थी. राजू शिंदे की शादी होने के 3 साल बाद सन 2009 में करिश्मा का भी निकाह अजीज खान के साथ हो गया था. अजीज खान भी अहमदाबाद के नरोडा में ही रहता था और सोलर पैनल लगाने का काम करता था. शादी के साल भर बाद ही करिश्मा को बेटा हुआ तो उस ने नौकरी छोड़ दी और घर तथा बेटे को संभालने लगी. इस के बाद करिश्मा को 2 बच्चे हुए.

इस तरह वह 3 बच्चों की मां बन गई थी. दूसरी ओर राजू भी अपनी पत्नी गीता के साथ मजे से वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहा था. लेकिन बच्चे पैदा होने के बाद करिश्मा और अजीज खान में अकसर झगड़ा होने लगा था. इस की वजह यह थी कि अजीज शराब पीने लगा था. वह रोजाना शराब पी कर आता. करिश्मा उसे शराब पीने से रोकती, जिस की वजह से दोनों के बीच झगड़ा होता.

करिश्मा: 2 शादियों के बाद भी अकेली रह गई

पति की इस आदत से करिश्मा परेशान हो चुकी थी. आखिर पति की नशे की लत और रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर करिश्मा ने अजीज से तलाक ले लिया. इस के बाद वह वटवा में किराए का मकान ले कर अकेली ही रहने लगी थी. संयोग देखो कि शादी के 18 सालों बाद साल 2024 में किसी कारणवश राजू और गीता के बीच भी तलाक हो गया था. पत्नी से तलाक होने के बाद राजू नरोडा में ही अकेला रहता था.

शादी के बाद राजू शिंदे और करिश्मा की मुलाकात नहीं हुई थी, लेकिन तलाक के बाद अपना घर चलाने तथा अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए करिश्मा सालों पहले जिस इलास्टिक कंपनी में नौकरी करती थी, वहीं वह फिर से नौकरी करने लगी थी.

दूसरी ओर राजू साल 2016 से गांधीनगर के माणसा स्थित स्टेरीकोट हेल्थकेयर कंपनी में फिटर के रूप में नौकरी करने लगा था, लेकिन एक्स्ट्रा पैसे कमाने के लिए वह छुट्टियों के दिन या रात में अन्य कंपनियों में एक्स्ट्रा काम करने जाता था. इसी सिलसिले में एक बार वह उसी पुरानी इलास्टिक कंपनी में भी एक्स्ट्रा काम करने गया तो इत्तफाक से करिश्मा ने वहां राजू को काम करते देख लिया.

दोबारा जाग उठा प्यार

करिश्मा उस से मिलने उस के पास पहुंच गई. सालों बाद करिश्मा को देख कर राजू चौंका. लगभग डेढ़ दशक यानी 15 सालों बाद दोनों एकदूसरे से मिले थे. पुरानी यादें ताजी हुईं. शादी हुई या नहीं, कितने बच्चे हैं, इसी तरह की बातें शुरू हुईं. इन्हीं बातों में करिश्मा ने बताया कि उस का तलाक हो गया है और वह अपने बच्चों के साथ अकेली ही रहती है. घर चलाने के लिए वह फिर से यहां नौकरी कर रही है.

जवाब में राजू ने भी अपनी आपबीती सुनाई कि उस का भी तलाक हो गया है और वह भी अकेला रहता है. इस के बाद उस ने कहा, ”तू भी अकेली और मैं भी अकेला, बोल करेगी मुझ से शादी?’’

उस समय करिश्मा कुछ नहीं बोली, सिर्फ हंस कर रह गई थी. लेकिन दोनों के बीच फोन नंबरों का लेनदेन हो गया था, जिस से दोनों में बातें होने लगी थीं. धीरेधीरे यह बातचीत लंबी होती गई. इसी बातचीत के दौरान एक दिन करिश्मा ने राजू से कहा, ”यार राजू, तुम मेरे लिए कोई दूसरी नौकरी ढूंढ दो. यहां जो सैलरी मिलती है, उस में घर बड़ी मुश्किल से चलता है. 3 बच्चों का पेट बड़ी मुश्किल से भर पाती हूं.’’

इस पर राजू ने उसे एक व्यावहारिक रास्ता सुझाते हुए कहा, ”तू फिर से किसी से शादी कर के उसी के साथ सेट हो जा.’’

”तुम्हारी बात तो सही है राजू, लेकिन 3 बच्चों की मां से अब कौन शादी करेगा?’’ करिश्मा ने कहा. राजू को शायद ऐसे ही मौके की तलाश थी. क्योंकि शरीर की आग बुझाने के लिए उसे भी एक औरत की तलाश थी. करिश्मा ने जब कहा कि उस से कौन शादी करेगा तो जवाब में उस ने अपने दिल की बात कह दी, ”मैं करूंगा तुम से शादी. बोलो, करोगी मुझ से शादी?’’

राजू शिंदे की बात सुन कर करिश्मा को अपनी जिंदगी फिर से संवरती नजर आई. इस के बाद दोनों के बीच घंटों बातें होने लगीं. यही नहीं, दोनों नए प्रेमियों की तरह बाहर मिलने भी लगे. इस तरह बाहर मिलने में मजा नहीं आ रहा था, इसलिए साथ रहने के लिए साल 2023 में राजू ने करिश्मा से एक मसजिद में निकाह कर लिया.

निकाह के बाद राजू करिश्मा के साथ उस के वटवा वाले घर में रहने लगा. इस तरह दोनों ने एक बार फिर से नई जिंदगी शुरू की. राजू ने घर को व्यवस्थित करने यानी गृहस्थी बसाने के लिए लगभग 50 हजार रुपए का सामान भी खरीदा. लगभग 2 सालों तक राजू और करिश्मा का वैवाहिक जीवन हंसीखुशी से बीता, लेकिन धीरेधीरे दोनों के बीच विवाद होने लगा. राजू सुबह 5 बजे नौकरी के लिए निकल जाता था, इसलिए शुरूशुरू में वह बिना टिफिन लिए ही जाता था. इस के लिए वह करिश्मा से कुछ कहता भी नहीं था.

काफी दिनों बाद एक दिन राजू ने करिश्मा से कहा, ”हमारा निकाह हो गया है और हम पतिपत्नी हो गए हैं. पत्नी के होते हुए भी मुझे रोजाना बाहर का खाना खाना पड़ता है. तुम मुझे टिफिन बना कर दे दिया करो.’’

करिश्मा ने टिफिन बना कर देने से मना करते हुए कहा, ”तुम अपनी नौकरी पर 5 बजे जाते हो. तुम्हारा टिफिन बनाने के लिए मुझे सुबह 4 बजे उठ कर खाना बनाना होगा. मुझे घर भी संभालना होता है और बच्चों को भी देखना पड़ता है. इस के अलावा मुझे भी नौकरी पर जाना होता है. इतनी जल्दी उठ कर खाना बनाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है.’’

टिफिन को ले कर शुरू हुई बातचीत घर के अन्य कामों तक फैल गई. धीरेधीरे दोनों के बीच झगड़े होने लगे. झगड़ों की वजह से राजू को शक होने लगा कि करिश्मा का जरूर किसी और के साथ अफेयर चल रहा है, इसीलिए वह उस में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं ले रही है. राजू इस बात को ले कर भी करिश्मा को ताने ही नहीं मारने लगा था, बल्कि झगडऩे भी लगा था.

दूसरी ओर करिश्मा राजू के शक्की स्वभाव से तंग आ कर उसे बिना बताए बाहर आनेजाने लगी थी. इस की वजह राजू को लगने लगा था कि करिश्मा अपने प्रेमी से मिलने जाती है. करिश्मा राजू से जब कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई तो एक दिन उस ने राजू से साफसाफ कह दिया कि जब उसे उस पर विश्वास ही नहीं रह गया है तो वह कहीं और रहने चला जाए, अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती.

उसी दौरान एक घटना और घट गई. करिश्मा के पूर्व पति अजीज की अम्मी की मौत हो गई. इस बात की जानकारी करिश्मा को हुई तो पुराने रिश्ते के नाते वह अजीज के घर शोक व्यक्त करने गई. वहां करिश्मा और अजीज के बीच बातचीत हुई तो पुराने संबंध फिर से ताजे हो गए. राजू से परेशान करिश्मा ने अजीज से कहा कि अगर उसे कोई आपत्ति न हो तो वह फिर से उस के साथ रहना चाहती है, ताकि बच्चों का भविष्य संवारा जा सके.

अजीज को भी करिश्मा और बच्चों की बहुत याद आती थी. इसलिए पुराने झगड़े भुला कर उस ने करिश्मा के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया. चूंकि अब वह अजीज खान के साथ फिर से निकाह करने जा रही थी, इसलिए उस ने राजू को घर से निकल जाने के लिए कह दिया था.

दूसरी ओर राजू किसी भी कीमत पर करिश्मा को छोडऩे के लिए तैयार नहीं था. अब वह करिश्मा के साथ ही रहना चाहता था, क्योंकि यहां उसे पत्नी का सुख मिलने के साथसाथ रहने के लिए घर भी मिला हुआ था, इसलिए उस ने करिश्मा से बहाना बनाया कि उस ने उस के घर के लिए जो 50 हजार रुपए का सामान खरीदा है, उस के वे सारे रुपए वापस कर दे तो वह उस का घर छोड़ कर चला जाएगा.

राजू को लग रहा था कि करिश्मा इतने रुपए कहां से लाएगी? न वह उस के रुपए वापस कर पाएगी, न उसे घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. लेकिन राजू को तब झटका लगा, जब अजीज ने करिश्मा को 50 हजार रुपए दे दिए और उस ने वे रुपए ला कर राजू के मुंह पर दे मारे. उस के बाद वह बोली, ”अब चुपचाप यहां से चला जा और अब कभी मुझे अपना मुंह मत दिखाना.’’

रुपए मिलने के बाद राजू करिश्मा के घर से तो निकल गया, लेकिन उसे करिश्मा और उस के पति अजीज पर बहुत गुस्सा आया. उस का अहंकार (ईगो) बुरी तरह घायल हो गया था. उसे लगा कि यह अजीज उस के और करिश्मा के बीच कबाब में हड्ïडी बन गया है. अगर यह बीच में न आया होता तो करिश्मा उसी की होती, अगर करिश्मा को अपनी बनाए रखना है तो इस अजीज को बीच से हटाना होगा. दूसरी ओर करिश्मा से तलाक होने के बाद अजीज अपने बड़े भाई शब्बीर के साथ रहता था, क्योंकि उसी बीच उस की अम्मी की भी मौत हो गई थी. उन दिनों करिश्मा राजू के साथ रह रही थी.

मातम में बदली मोहब्बत

अजीज की अम्मी की मौत पर करिश्मा अजीज के यहां शोक व्यक्त करने आई थी, तभी उस ने अजीज के बड़े भाई शब्बीर से कहा था कि अब वह राजू के साथ नहीं रहना चाहती और अपने बच्चों के पिता अजीज के पास वापस आना चाहती है. तब शब्बीर ने सोचा था कि अगर करिश्मा वापस आ जाती है और बच्चों के साथ अजीज के साथ रहने लगती है तो यह उस की मेहरबानी होगी. उन्होंने भी हां कर दिया था और कहा था कि रमजान के बाद उन दोनों का फिर से निकाह करा दिया जाएगा.

दरअसल, करिश्मा के चली जाने के बाद अजीज शराब पी कर उसे याद कर के रोता रहता था, लेकिन जब से करिश्मा वापस मिल गई थी, तब से उस के चेहरे पर फिर से खुशी लौट आई थी. लेकिन उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी.

2 दिसंबर, 2025 की रात करीब 9 बजे अजीज नरोडा वाले घर से करिश्मा और बच्चों को कपड़े और रुपए देने वटवा गया था. उसी समय राजू अपनी बाइक से नरोडा की ओर खाना खाने जा रहा था. भारी ट्रैफिक के बीच भी वटवा की ओर जा रहे अजीज को राजू ने देख लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि वह करिश्मा से मिलने जा रहा है. यह सोच कर उस की आंखों में खून उतर आया था. उस का शरीर भी गुस्से से कांपने लगा था.

क्रोध की आग में जलता हुआ वह खाना खाना भूल गया. वह सीधे अपने घर गया और एक तेज धार वाला चाकू निकाला. चाकू की मूठ पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए उस ने कुछ निश्चय कर लिया. उस ने चाकू को एक कागज में लपेटा. फिर उसे पीछे अपनी पैंट में खोंसा और दोबारा अपनी बाइक ले कर निकल पड़ा. उसे पता था कि वटवा से नरोडा आनेजाने वाले लोग इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए उसे पूरा विश्वास था कि अजीज इसी रास्ते से लौटेगा. वह एक सुनसान जगह पर खड़े हो कर शांति से अजीज का इंतजार करने लगा.

मौत का किया इंतजार

एक घंटा, 2 घंटे, 3 घंटा बीत गया, लेकिन उस ने धैर्य नहीं खोया. रात के 12 बज गए. आखिरकार रात के साढ़े 12 बजे उस का इंतजार खत्म हुआ. उसे वटवा कैनाल के पास अजीज फिर से आता दिखाई दिया. अजीज को देख कर राजू शिंदे तुरंत अपने चेहरे पर मासूमियत के भाव ले आया और हाथ दे कर उसे रोका.

पुलिस गिरफ्त में आरोपी राजू शिंदे

अजीज के रुकते ही उस ने कहा, ”एक्सक्यूज मी, आप अजीज भाई हैं न? मेरा नाम राजू है. मैं यहीं नरोडा की ओर रहता हूं. दरअसल, मुझे अपने शेड पर सोलर पैनल लगवाना है. आप का नंबर नहीं था, इसलिए मैं आप के घर गया था. पर आप घर पर मिले नहीं. आप अचानक यहां दिखाई दे गए, इसलिए मैं ने आप को रोक लिया.’’

”आप की बात तो सही है राजूभाई, लेकिन अभी रात के साढ़े 12 बजे हैं और मैं थक भी गया हूं. इसलिए आप कल सुबह मुझे फोन कर लीजिएगा, मैं आप का काम कर दूंगा.’’

राजू ने मन ही मन सोचा कि काम तो बेटा तेरा तमाम करना है और वह भी अभी. इसलिए उस ने कहा, ”अरे अजीजभाई, मुझे थोड़ा अर्जेंट है. आप नरोडा की ओर ही जा रहे हैं, मेरा शेड भी वहीं है. मेरे पास कोई साधन भी नहीं है, इसलिए आप मुझे वहां तक छोड़ भी दीजिएगा और बाहर से शेड भी देख लीजिएगा. इस के बाद कल आ कर काम शुरू कर देना.’’

अजीज थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन फिर सोचा कि काम और पैसा खुद चल कर उस के पास तक आ रहा है और रास्ते में सिर्फ बाहर से ही तो शेड देखना है तो मना क्यों किया जाए? उस ने राजू को अपनी बाइक पर पीछे बैठाया और नरोडा की ओर चल पड़ा.अजीज ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह उस की जिंदगी की सब से बड़ी और आखिरी गलती होने वाली है. उसे क्या पता था कि काम के लालच में उस ने मौत पीछे बैठा ली है.

जैसे ही रास्ते में केडिला ब्रिज के पास अजीज की बाइक पहुंची, अंधेरे का फायदा उठाते हुए राजू बोला, ”अजीजभाई, गाड़ी यहीं साइड में ले लो, मेरा शेड यहीं है.’’

अजीज ने जैसे ही बाइक थोड़ी धीमी की. राजू को अजीज से इतनी नफरत थी कि उस ने बाइक रुकने का भी इंतजार नहीं किया. सुनसान और अंधेरा देख कर राजू ने पैंट में पीछे खोंसा चाकू निकाला और चलती बाइक पर ही अजीज का गला रेत दिया. उस ने इतनी नफरत से अजीज पर हमला किया था कि खून का फव्वारा फूट पड़ा और अजीज की श्वास नली तक कट गई थी. चीखते हुए अजीज बाइक समेत जमीन पर गिर पड़ा. अजीज के साथ राजू भी गिर पड़ा था. संयोग से उसे ज्यादा चोट नहीं लगी थी. उसे मामूली खरोंचें आई थीं. इसलिए वह तुरंत उठ कर खड़ा हो गया.

थोड़ी देर तड़प कर अजीज शांत हो गया. खून से लथपथ अजीज के शरीर को राजू ने पैर से हिला कर देखा कि वह मर चुका है या नहीं? उसे लगा कि अजीज का खेल खत्म हो गया है तो वह अंधेरे में गायब हो गया और घर जा कर इस तरह चैन से सो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो. शायद उसे लगा था कि अंधेरे में किसी ने उसे देखा तो है नहीं, इसलिए पुलिस कभी उस तक पहुंच नहीं सकेगी. 3 दिसंबर की रात 2 से ढाई बजे पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि घोडासर के केडिला ब्रिज के पास एक युवक की गला कटी लाश पड़ी है.

सूचना मिलने पर थाना इसनपुर के इंसपेक्टर बी.एस. जाडेजा अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. बाइक के नंबर से मरने वाले की पहचान नरोडा के रहने वाले अजीज खान के रूप में हो गई थी. इस के बाद लाश को जब्त कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया था. आगे की पुलिस जांच में पता चला कि अजीज का अपनी पत्नी करिश्मा से तलाक हो गया था. उस की पत्नी वटवा में अलग रहती थी. पुलिस करिश्मा के घर पहुंची.

करिश्मा से पूछताछ की गई तो पता चला कि उस ने अजीज से तलाक लेने के बाद राजू नाम के व्यक्ति से निकाह कर लिया था और दोनों साथ रह रहे थे. लेकिन इधर वह राजू को छोड़ कर फिर से अजीज से निकाह करने वाली थी. करिश्मा की इस बात से राजू शक के दायरे में आ गया, लेकिन पुलिस ने सीधे उसे हिरासत में नहीं लिया था.

रह गई अकेली

राजू ने ही यह कांड किया है, यह कंफर्म करने के लिए पुलिस ने उस जगह की सीसीटीवी फुटेज चेक की, जहां अजीज की हत्या हुई थी. पुलिस को सीसीटीवी फुटेज में एक संदिग्ध व्यक्ति जाता दिखाई दिया, जिस की चाल और शरीर की बनावट राजू से हूबहू मेल खाती थी. इस के बाद पुलिस उसे थाने ले आई और सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि अजीज की हत्या उसी ने करिश्मा के लिए की थी.

दरअसल, राजू शिंदे के साथ रहते हुए ही करिश्मा अपने पूर्व पति अजीज से बातचीत करने लगी थी, जो राजू को बिलकुल पसंद नहीं था. यही नहीं, उस ने अजीज की ही वजह से उसे अपने घर से निकाल दिया था. इसलिए उसे लगा कि अगर अजीज नहीं रहेगा तो करिश्मा उस के पास फिर से वापस आ सकती है. यही सोच कर राजू ने नफरत से इस तरह बेरहमी से अजीज की हत्या कर दी थी.

राजू शिंदे की गिरफ्तारी के बाद करिश्मा ने पुलिस को बताया था कि अजीज से तलाक लेने के बाद उस ने राजू से निकाह कर लिया था. उस के बाद अजीज उसे धमकी दे कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने के लिए कह रहा था. वह कह रहा था कि ‘अगर मैं उस के साथ नहीं आई तो इस का अंजाम तू देखेगी.’

इसलिए वह डर गई थी कि कहीं वह कुछ उलटासीधा न कर बैठा तो नुकसान उसे ही होता, क्योंकि राजू और अजीज दोनों ही उस के थे. इसलिए उस ने अजीज के साथ जाने का फैसला किया था. अजीज की हत्या करने वाले अपने दूसरे पति राजू शिंदे के बारे में करिश्मा का कहना था कि राजू बहुत अच्छा इंसान था. वह किसी भी तरह का नशा नहीं करता था. उस ने उस के तीनों बच्चों को सगे पिता से भी ज्यादा प्यार दिया था. उस ने कभी बच्चों को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

लेकिन अजीज उसे बारबार धमका रहा था. यह बात सिर्फ वह और अजीज ही जानते थे. मजबूरी में उसे अजीज के साथ जाना पड़ रहा था. फिलहाल करिश्मा अपने बच्चों के साथ अकेली रह रही है और उस का कहना है कि अब वह तीसरे निकाह के बारे में बिलकुल नहीं सोच रही है. पुलिस को अजीज की हत्या में करिश्मा के कहीं से भी शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला था.

राजू शिंदे से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल भेज दिया था. Gujarat News

 

 

Love Crime: इश्क का खूनी अंजाम

Love Crime: 25 वर्षीय जिकरा परवीन का पति कामधंधा करने दूसरे प्रदेश क्या गया, वह देवर दिलदार कुरैशी के लंगोटिया यार  27 वर्षीय मोहम्मद फैजान को प्यार करने लगी. फैजान ने न सिर्फ जिकरा बल्कि दिलदार की बहन को भी प्यार के जाल में फांस लिया था. फिर एक दिन इन के इश्क का ऐसा खूनी अंजाम हुआ कि…

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में एक रोज दोपहर में दिलदार ने भाभी व दोस्त को हमबिस्तर होते देख लिया. यह देखने के बावजूद उस ने अपने गुस्से पर काबू रखा और दबे पांव घर से चला गया. चूंकि उस समय घर पर उस की बहन भी मौजूद थी, अत: दिलदार को यह भी शक हुआ कि बहन भी भाभी से मिली हुई है. उस के मन में भी फैजान के प्रति चाहत है. उस का भी नाजायज रिश्ता फैजान से हो सकता है.

सच्चाई जानने के बावजूद दिलदार ने एक बार फिर भाभी जिकरा परवीन व फैजान को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे दोनों नहीं माने और मनमानी करते रहे. बहन को समझाया तो वह अपनी भाभी का ही पक्ष लेने लगी. इतना ही नहीं, उस ने दोनों के नाजायज रिश्तों को भी नकार दिया. अपने आप को भी पाकीजा बताया. दिलदार तब समझ गया कि बहन मन्नू भी फैजान के प्रेमजाल में फंस चुकी है. भाभी जिकरा परवीन ने खानदान की इज्जत को खाक में मिलाया था और दोस्त मोहम्मद फैजान ने दोस्ती का छुरा उस की पीठ में घोंपा था, इसलिए दिलदार ने उन दोनों को सबक सिखाने की ठान ली. बहन के प्रेम संबंधों पर भी उसे शक था, अत: उसे भी सबक सिखाने का निश्चय किया.

16 जनवरी, 2026 की दोपहर दिलदार अपनी योजना के तहत हसवा कस्बे के बाजार पहुंचा. वहां उस ने एक दुकान से तेज धार वाला चापडऩुमा चाकू 500 रुपए में खरीदा और उसे कमर में खोंस कर रख लिया. इस के बाद शराब ठेके पर जा कर उस ने शराब पी, साथ ही शराब का एक क्वार्टर और खानेपीने का सामान सुरक्षित कर लिया.

दोपहर बाद लगभग 3 बजे दिलदार अपने दोस्त मोहम्मद फैजान के घर पहुंचा. उस समय वह घर पर ही था. दिलदार उसे क्रिकेट खेलने के बहाने करबला के पास बगीचे में ले गया. कुछ दूरी पर बगीचे में लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. दिलदार ने फैजान से कहा कि पहले शराब पी कर मूड बना लेते हैं, फिर क्रिकेट खेलने चलेंगे. इस के बाद दोनों ने बगीचे में बैठ कर शराब पी.

नशा हावी होने पर दिलदार ने उस से पूछा, ”दोस्त, सचसच बताना कि भाभीजान से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है या नहीं? क्या मेरी बहन से भी तुम्हारे ताल्लुकात हैं?’’

”तुम्हारी भाभी और मेरे बीच वही रिश्ता है जो एक बीवीशौहर के बीच होता है. तुम्हारी बहन से भी मेरे प्रेम संबंध हैं. वह भी मुझ पर जान छिड़कती है.’’ फैजान ने नशे में सच्चाई बयां कर दी.

जिकरा परवीन के अवैध संबंध से बेहद खफा था देवर दिलदार

फैजान की बात सुन कर दिलदार के तनबदन में आग लग गई. उस पर खून का भूत सवार हो गया. उस ने कमर में खोंसा चाकू निकाला और फैजान के गले पर वार कर दिया. फैजान जान बचा कर भागा, लेकिन चंद कदम की दूरी पर लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. उस के बाद दिलदार ने फैजान के गले पर 2 और वार कर उस का गला रेत दिया.

फैजान कुछ देर तड़पा, फिर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या किए जाने की भनक न क्रिकेट खेल रहे लड़कों को लगी और न ही किसी अन्य को. फैजान की हत्या करने के बाद दिलदार हाथ में खून सना चाकू लहराते हुए अपने घर पहुंचा. उस के सिर पर खून का भूत सवार था.

घर में उस समय उस की भाभी जिकरा परवीन व बहन मौजूद थी. अम्मी व छोटी बहन किसी काम से पड़ोस में गई थीं. घर में घुसते ही वह चीखा, ”भाभी… ओ भाभी…’’

2 खून के बाद…

दिलदार के चीखने की आवाज सुन कर जिकरा परवीन कमरे से बाहर आ गई. उसे देख कर दिलदार बोला, ”भाभी, मैं ने तुम्हारे यार फैजान को तो उस की सही जगह में पहुंचा ही दिया है. अब तुम्हारी बारी है.’’

देवर के रूप में साक्षात मौत को सामने देख कर जिकरा परवीन सिर से पांव तक कांप उठी. वह जान बचा कर छत की तरफ भागी, लेकिन दिलदार ने उसे आंगन में ही पकड़ लिया. फिर उस ने उस की पीठ व गरदन पर चाकू से कई प्रहार किए. जिकरा परवीन खून से सराबोर हो कर जमीन पर गिर पड़ी. कुछ पल बाद ही उस ने दम तोड़ दिया. इसी बीच भाभी की चीख सुन कर मन्नू उसे बचाने आई तो दिलदार उस पर भी टूट पड़ा और चाकू से हाथ, सिर व गरदन पर वार कर उसे घायल कर दिया.

मन्नू भी खून से लथपथ हो कर आंगन में धराशाई हो गई. कुछ देर बाद मांबेटी वापस आईं तो घर में खूनी खेल देख कर उन की रूह कांप गई. इस के बाद तो घरमोहल्ले में कोहराम मच गया. इसी बीच फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी होने की खबर लगी तो मोहल्ले के लोग वहां पहुंच गए.

फेमिली वालों ने फैजान का शव देखा तो उन की चीखें गूंजने लगीं. उन की चीखों से लोगों का कलेजा कांप उठा. मृतका जिकरा परवीन के पेरेंट्स को मौत की खबर लगी तो वे भी आ गए और बेटी का शव देख कर बिलख पड़े.

इधर डबल मर्डर करने के बाद दिलदार कुरैशी हसवा कस्बा चौकी पहुंचा. उस समय चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह वहां मौजूद थे. दिलदार उन के पास पहुंचा और बोला, ”सर, मैं ने उन दोनों को मार डाला है.’’

दिलदार की बात सुन कर वी.के. सिंह चौंक पड़े, ”तूने किसे मार दिया? कहीं नशे में तो बकबक नहीं कर रहा है?’’

”सर, मैं नशे में जरूर हूं. लेकिन जो कह रहा हूं, वह सच है. मैं ने सचमुच अपनी भाभी जिकरा परवीन व उस के आशिक फैजान को मार डाला है. भाभी की लाश हमारे घर में तथा फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी है. यकीन न हो तो जा कर देख लो. भाभी को बचाने आई अपनी बहन पर भी हमला किया. पता नहीं वह जिंदा है या वह भी मर गई?’’

रूह कपा देने वाली दिलदार की बात सुन कर चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. इस के बाद डबल मर्डर की सूचना असोथर थाने के एसएचओ राजेंद्र सिंह को दी. सूचना पाते ही राजेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ हसवा कस्बा आ गए और चौधराना मोहल्ला स्थित घटना वाले मकान पर जा पहुंचे. उस समय वहां भीड़ जुटी थी.

जिकरा परवीन के घर के बाहर जमा भीड़

मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने डबल मर्डर की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और निरीक्षण में जुट गए. घर के अंदर आंगन में एक महिला की लाश पड़ी थी, जबकि दूसरी युवती घायल अवस्था में पड़ी थी. राजेंद्र सिंह ने घायल युवती को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे हैलट अस्पताल कानपुर रेफर किया गया.

बाग में मिली लाश

एसएचओ राजेंद्र सिंह अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी महेंद्र पाल सिंह तथा सीओ (थरियांव) वीर सिंह पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

बाग में मिली मोहम्मद फैजान की लाश 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. घर के अंदर आंगन में मृतका जिकरा परवीन खून से लथपथ पड़ी थी. उस की पीठ पर 3 घाव तथा गले पर 5 घाव थे. बदन के सारे कपड़े खून से सने थे. फर्श पर भी खून फैला था. मृतका की उम्र 25 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल से सबूत जुटाए. मृतका जिकरा परवीन के ससुरालीजन मौके से फरार हो गए थे, लेकिन उस की अम्मी तहरून निशा व अब्बू फकीरे वहां मौजूद थे. वे दोनों बेटी के शव के पास बिलख रहे थे.

पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि बेटी का शाम 4 बजे फोन आया था. तब उस ने कहा था कि उसे आ कर ले जाओ. लेकिन देर शाम खबर लगी कि बेटी के देवर दिलदार ने उस की हत्या कर दी और बहन को घायल कर दिया है. पता नहीं मेरी बेटी ने ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे मार डाला. गुनहगार को सख्त सजा मिलनी चाहिए.

इस के बाद पुलिस अधिकारी आम के बगीचे में पहुंचे, जहां मोहम्मद फैजान की लाश पड़ी थी. लाश के पास मृतक के फेमिली वाले बिलख रहे थे. पुलिस अधिकारियों ने उन्हें सांत्वना दी, फिर बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 27 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या बेरहमी से की गई थी. उस के गले में 3 बड़े घाव थे. चाकू से गला रेता गया था. कपड़ेे खून से तरबतर थे. जमीन पर भी खून था.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के अब्बू रुआब व चाचा मोहम्मद शमीम से घटना के बारे में पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि फैजान और दिलदार दोस्त थे. उन की दोस्ती नफरत में क्यों बदल गई, उन्हें पता नहीं. लेकिन हत्या के बाद पता चला कि दिलदार को शक था कि उस की भाभी और फैजान के बीच नाजायज रिश्ता था. शायद इसी शक में उस ने डबल मर्डर कर दिया. मृतक व मृतका के फेमिली वालों से पूछताछ के बाद एसपी अनूप कुमार सिंह ने एसएचओ राजेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद आरोपी दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें.

एसपी के आदेश पर एसएचओ राजेेंद्र सिंह ने जिकरा परवीन व मोहम्मद फैजान के शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फतेहपुर भेज दिए. इस के बाद फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतकों के परिजनों से की गई पूछताछ के आधार पर इश्क के खूनी खेल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार है.

दोनों भाई थे अपराधी

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर का एक मुसलिम बाहुल्य मोहल्ला है— पीरनपुर. इसी मोहल्ले में फकीरे अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी तहरून निशा के अलावा 3 बेटियां थीं, जिस में जिकरा परवीन सब से छोटी थी. दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका था. फकीरे छोटामोटा कामधंधा कर अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

मृतका जिकरा परवीन की अम्मी तहरून

फकीरे की बेटी जिकरा परवीन अपनी बहनों में सब से खूबसूरत और होशियार थी. उस ने मोहल्ले के मदरसे से हाईस्कूल तक तालीम हासिल की थी. जिकरा परवीन 18 साल की हो गई थी. पेरेंट्स की अब एक ही ख्वाहिश थी कि जल्दी से कोई अच्छा लड़का देख कर उस का निकाह कर दिया जाए. इस के लिए फकीरे ने खोजबीन शुरू की तथा नातेरिश्तेदारों से भी कहा. काफी प्रयास के बाद एक रिश्तेदार ने मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू का नाम सुझाया.

आमिर उर्फ बल्लू के वालिद वाजिद कुरैशी, फतेहपुर जनपद के थरियांव थाने के हसवा कस्बे के चौधराना मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में बीवी शकीला के अलावा 6 बेटे व 3 बेटियां थीं. उन का एक बेटा विदेश में था. वाजिद के 2 बेटे आमिर उर्फ बल्लू व दिलदार उस के साथ रहते थे. दोनों पशुओं की खरीदफरोख्त का व्यापार करते थे. आमिर व दिलदार दोनों अविवाहित थे.

अस्पताल में उपचाराधीन दिलदार की छोटी बहन मन्नू और मृतक फैजान के रोतेबिखलते फैमिली वाले

फकीरे ने जब आमिर उर्फ बल्लू को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी जिकरा परवीन के लिए पसंद कर लिया. इस के बाद 13 जून, 2019 को फकीरे ने जिकरा परवीन का निकाह आमिर उर्फ बल्लू के साथ कर दिया. जिकरा परवीन बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में उस का चांद सा मुखड़ा जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूपयौवन की तारीफ की. आमिर उर्फ बल्लू भी खूबसूरत बीवी पा कर खुश था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि उसे इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी.

निकाह के बाद जिकरा परवीन और आमिर ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. इसी चाहत में 3 साल कब बीत गए, पता ही न चला. इन 3 सालों में जिकरा परवीन 3 बेटियों की मां बन गई.

भाभी जिकरा परवीन और उस के प्रेमी मौहम्मद फैजान की हत्या का आरोपी दिलदार कुरैशी 

मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू अपने भाई दिलदार के साथ पशुओं के खरीदनेबेचने का व्यापार करता था. दोनों भाई अपराधी प्रवृत्ति के थे. उन का अकसर किसी न किसी से झगड़ा होता रहता था. थाना थरियांव में दोनों के खिलाफ मारपीट, हत्या का प्रयास, आम्र्स ऐक्ट व गोवध निवारण अधिनियम के तहत कई मुकदमे दर्ज थे. थरियांव थाने में दोनों भाइयों की हिस्ट्रीशीट खुली थी. पुलिस ने जब दोनों भाइयों पर शिकंजा कसा तो वह उत्तर प्रदेश के बजाय मध्य प्रदेश जा कर पशु तसकरी करने लगे. आमिर उर्फ बल्लू अब 2-4 माह में एक बार घर आता और कुछ दिन रह कर वापस चला जाता.

इसी तरह दिलदार भी घर आता और फिर कुछ माह रह कर भाई आमिर के पास चला जाता. दोनों भाइयों को सदैव पुलिस का डर बना रहता था. दिलदार कुरैशी का एक दोस्त था मोहम्मद फैजान. वह भी हसवा कस्बा के चौधराना मोहल्ले में रहता था. उन के घरों के बीच मात्र 200 मीटर का फासला था. फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू टेलर थे.

रुआब के परिवार में पत्नी रोशन बानो के अलावा 2 बेटे मोहम्मद फैजान, मोहम्मद अरमान तथा 2 बेटियां थीं. रुआब खुद तो रायबरेली में रहते थे और वहीं टेलङ्क्षरग का काम करते थे, जबकि उन का परिवार हसवा कस्बे में ही रहता था. दिलदार और फैजान एक ही गली में खेलकूद कर बड़े हुए थे. दोनों बचपन के दोस्त थे. हाईस्कूल तक उन्होंने साथ ही पढ़ाई की थी. लेकिन दिलदार जब हाईस्कूल में फेल हो गया तो उस ने पढ़ाई बंद कर दी. इस के बाद वह अपराधिक गतिविधियों में लग गया.

लेकिन फैजान होनहार युवक था. उस ने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ठाकुर युगराज सिंह महाविद्यालय में बीएससी में प्रवेश ले लिया था. वह पढ़ाई पूरी कर विदेश (सऊदी अरब) जाना चाहता था. दिलदार और फैजान के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ खातेपीते व उठतेबैठते थे. उन को क्रिकेट खेलने का भी शौक था. दिलदार शराब का लती था. उस ने फैजान को भी इस की लत लगा दी थी. दिलदार तो इतना लती हो गया था कि जब उसे शराब नहीं मिलती तो वह नशे का इंजेक्शन लगा लेता था.

दोस्ती के नाते फैजान का दिलदार के घर आनाजाना लगा रहता था. घर आतेजाते ही एक रोज फैजान की नजर दिलदार की खूबसूरत भाभी जिकरा परवीन पर पड़ी. वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहा और उस से रसभरी बातें करता रहा. जिकरा परवीन अब उस के दिल में रचबस गई थी और वह उस से प्यार करने लगा था.

खूबसूरती पर फिदा

जिकरा परवीन की खूबसूरती ने फैजान के दिल में हलचल मचा दी थी. अत: वह खिंचा हुआ उस के घर आ जाता था. जिकरा परवीन भी हंसतीबोलती थी. चूंकि दोनों ने आपस में देवरभाभी का रिश्ता बना रखा था, इसलिए उन में हंसीमजाक भी हो जाता था. एक रोज ऐसे ही हंसीमजाक के दौर में फैजान बोला, ”भाभी, तुम बहुत खूबसूरत हो. जी चाहता है कि…’’

फैजान के इतना कहने पर जिकरा परवीन ने मादक आंखों से उसे देखा और मुसकरा कर बोली, ”तुम्हारा क्या जी चाहता है फैजान?’’

”यही कि तुम्हारा चांद जैसा चेहरा हमेशा मेरी आंखों के सामने रहे.’’ फैजान ने दिल की बात जुबां पर ला दी.

”अच्छा,’’ जिकरा परवीन हंसने लगी, ”मैं तुम्हें इतनी हसीन लगती हूं.’’

”हां भाभी,’’ फैजान जिकरा परवीन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला.

जिकरा परवीन का शौहर आमिर मध्य प्रदेश में पड़ा रहता था, अत: वह पुरुष सुख से वंचित थी. ऐसे में जवान फैजान का घर आना उस को अच्छा लगता था. उस की रसीली बातें उस के दिल में गुदगुदी पैदा करती थीं. अब उस की उमंगें भी छलांग मारने लगी थीं. वह भी फैजान की ओर आकर्षित होने लगी थी.

मौहम्मद फैजान और दिलदार के बीज जबरदस्त याराना था, लेकिन भाभी के साथ अवैध संबंधो ने जानी दुश्मन बना दिया

धीरेधीरे जिकरा परवीन और फैजान के दिल नजदीक आते गए. उन के बीच की दूरियां सिमटती गईं. एक रोज फैजान ने मुसकरा कर जिकरा परवीन की आंखों में देखा तो उन में उसे अजीब सी प्यास मचलती नजर आई. उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसे बांहों में भर लिया. फिर तो तूफान तभी थमा, जब दोनों की हसरतें पूरी हुईं.

इस के बाद अकसर दोनों का मिलन होने लगा. दिलदार की बहन को भी फैजान का घर आना और बतियाना अच्छा लगता था. अत: वह भाभी की वफादार बन गई. वह भी फैजान को पसंद करती थी. वह फैजान के घर आनेजाने की जानकारी परिवार के किसी अन्य सदस्य को नहीं देती थी. जुलाई 2025 में दिलदार मध्य प्रदेश से आ कर घर में रहने लगा. आते ही दोनों के बीच दोस्ती फिर से कायम हो गई. दोनों की महफिल भी सजने लगी. कभीकभी फैजान और दिलदार की महफिल दिलदार के घर पर ही जम जाती. 2 महीने तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक दिन दिलदार कुरैशी शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे मोहम्मद फैजान पर पड़ी. वह उस की भाभी जिकरा परवीन से हंसीठिठोली कर रहा था. जिकरा परवीन भी उस की बातों में सराबोर थी.

यह देख कर दिलदार का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह दांत पीसते हुए बोला, ”भाभीजान, अपने यार से ही बतियाती रहोगी या फिर अपने देवर को भी चायपानी को पूछोगी.’’

दिलदार का कटाक्ष जिकरा परवीन के मन में कांटे की तरह चुभ गया. अत: वह गुस्से से बोली, ”कैसी बातें करते हो दिलदार? थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. मोहम्मद फैजान मेरा यार नहीं, गलीटोले के नाते देवर लगता है. वैसे भी फैजान तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो. गपशप लड़ाते हो और महफिल भी जमाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का यहां आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो बेइज्जत कर के भगा दो, ताकि दोबारा इधर न आए.’’

”भाभीजान, तुम्हारी लोमड़ी वाली चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तुम चाहती हो कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तुम उस की भली बनी रहो. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तुम्हारे दिल में फैजान के लिए जो मोहब्बत है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं. तुम्हारी ही वजह से यह बेशर्मों की तरह चला आता है. मुझ से मिलने का तो बहाना होता है.’’

दिलदार और जिकरा परवीन की बहस की भनक फैजान के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर आंगन में आ गया और बोला, ”दिलदार भाई, लगता है तुम किसी से लड़ कर आए हो. इसलिए तुम्हारा मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भाभीजान पर उतार रहे हो. लेकिन दोस्त, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लालपरी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

दिलदार कुरैशी शराब का लती था. फैजान ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा.

वह खुशी का इजहार करते हुए बोला, ”फैजान भाई, मैं भाभी से बहस नहीं कर रहा था, खानेपीने का सामान लाने की बात हो रही थी.’’ उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”भाभीजान, कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम दोनों महफिल सजाएंगे.’’

देवर की हांक सुन कर जिकरा परवीन मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा देवर है. कुछ देर पहले चरित्र पर लांछन लगा रहा था, अपने दोस्त को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है.’’

जिकरा परवीन ने कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद दिलदार और फैजान शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त फैजान की निगाहें जिकरा परवीन पर ही टिकी रहीं. जिकरा परवीन भी मंदमंद मुसकरा कर फैजान का नशा बढ़ाती रही. दिलदार को मोहम्मद फैजान का घर आनाजाना नागवार लगता था, लेकिन गहरी दोस्ती के चलते वह फैजान से कुछ कह नहीं पाता था. हालांकि उस ने कई बार इस बाबत फैजान से टोकाटाकी की थी, लेकिन फैजान उस की बात अनसुनी कर जाता था.

दिलदार ने भाभी जिकरा परवीन को भी समझाया था और खानदान की इज्जत की दुहाई दी थी, लेकिन उस पर भी कोई असर नहीं पड़ रहा था. दिलदार कुरैशी को अब शक होने लगा था कि भाभी और दोस्त फैजान के बीच नाजायज रिश्ता है. दोनों मौका पा कर रंगरलियां मनाते हैं. शक का बीज दिलदार के मन में पड़ा तो उसे पनपते देर न लगी.

लेकिन शक के आधार पर वह कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था. वह दोनों को रंगेहाथ पकडऩा चाहता था, अत: वह चोरीछिपे दोनों पर नजर रखने लगा. उस ने अपना शक किसी को भी जाहिर नहीं होने दिया. अपनी योजना के तहत दिलदार कुरैशी ने 16 जनवरी, 2026 को बारीबारी से दोनों की हत्या कर दी और बहन को भी जख्मी कर दिया. इस के बाद पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया.

17 जनवरी, 2026 को पुलिस ने आरोपी दिलदार कुरैशी को फतेहपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक आरोपी की बहन कानपुर के हैलट अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी. Love Crime

 

 

UP News: फेमिली को लग जाए – जब प्यार की भनक

UP News: 20 वर्षीय रूबी चाहती थी कि उस की शादी प्रेमी रविशंकर के साथ ही हो, लेकिन फेमिली वालों को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया. फिर रूबी ने अपनी शादी को रुकवाने के लिए ऐसी खूनी साजिश रची कि…

रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को फोन किया और बोली, ”हाथ पर हाथ रखे बैठे रहोगे या कुछ करोगे भी? मेरे घर वालों ने मेरी शादी 18 नवंबर, 2025 की होनी तय कर दी है. यदि कोई उपाय नहीं किया तो हम ने जो सपने देखे हैं, सारे धरे के धरे रह जाएंगे.’’

पे्रमिका के मुंह से अचानक शादी की बात सुन कर रविशंकर के हाथों के तोते उड़ गए. फिर भी उस ने रूबी को समझाया, ”तुम चिंता मत करो, मैं कोई न कोई उपाय खोजता हूं.’’

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के थाना जवां क्षेत्र का एक गांव है चंदौखा. यहीं के रहने वाले हैं मुंशीलाल. उन के घर में 20 वर्षीय बेटी रूबी की शादी की तैयारियां जोरशोर से चल रहीं थीं. रूबी फेमिली वालों द्वारा तय की हुई शादी नहीं करना चाहती थी. क्योंकि वह तो वह 24 वर्षीय बाइक मैकेनिक रविशंकर से प्यार करती थी और उसी के साथ शादी कर अपना घर बसाना चाहती थी, लेकिन फेमिली वालों ने अचानक जब उस का रिश्ता अलीगढ़ के गोंडा मोड़ निवासी एक युवक से तय कर दिया तो रूबी परेशान हो गई.

”यदि हम लोगों ने कोई उपाय नहीं किया और यों ही बैठे रहे तो हम लोगों की शादी नहीं हो सकेगी. फिर जीवन भर पछताना पड़ेगा. तुम्हें पता है कि दादी ने मेरी शादी तय करा दी है.’’ रूबी ने अपनी शादी रुकवाने के लिए प्रेमी रविशंकर को एक उपाय सुझाया. उस ने कहा, ”यदि दादी चंद्रवती की हत्या शादी से पहले कर दी जाए तो मेरी शादी टल जाएगी. फिर हम दोनों भाग कर शादी कर लेंगे.’’

रविशंकर को भी प्रेमिका की यह योजना पसंद आई. इस खतरनाक सोच ने हत्या की नींव रख दी. अब सवाल यह था कि योजना को कैसे अंजाम दिया जाए और हथियारों का इंतजाम कैसे और कहां से किया जाए? उस के लिए रुपयों की भी जरूरत थी, घर में शादी की तैयारी चल ही रही थीं, जिस के लिए रुपयों का भी इंतजाम किया गया था. तभी रूबी ने उन्हीं रुपयों में से 10 हजार रुपए चुरा लिए. रूबी ने प्रेमी रविशंकर को फोन कर एकांत में बुलाया और उसे 10 हजार रुपए तमंचा व कारतूस लाने को दे दिए. रुपए सौंपते समय उस ने कहा, ”अब काम में ढिलाई मत करना वरना देर हो जाएगी.’’

प्रेमिका द्वारा दिए गए रुपयों से प्रेमी ने अपने गांव कस्तली के दोस्त रोहित की मदद से आईटीआई रोड के आयुष से एक तमंचा व कारतूस खरीदे. हत्या वाले दिन की मुखबिरी खुद रूबी ने की. हत्या को ले कर पहले से योजना तय हो गई थी. रूबी ने कह दिया था कि जिस समय दादी चंद्रवती घेर से पशुओं को ले कर घर वापस आएंगी, उसी समय वह उसे सूचना दे देगी. तभी उन की हत्या कर देना. 11 नवंबर, 2025 की शाम हर दिन की तरह ही शुरू हुई थी. गांव चंदौखा निवासी वीरी सिंह की 65 वर्षीय पत्नी चंद्रवती अपने घेर से पशुओं को घर ले आई. वह सुबह के समय पशुओं को घेर में ले जाती थीं और शाम को वापस घर ले आती थीं. पशुओं को घेर से लाने के काम में चंद्रवती की पोती रूबी हर रोज उन की मदद के लिए आ जाती थी, लेकिन उस दिन वह प्लानिंग के तहत कुछ जल्दी घर से निकल गई थी.

हत्या का समय फिक्स था. चंद्रवती की हत्या का स्थान भी निश्चित था. वह रोज जिस रास्ते से पशुओं को ले कर लौटती थीं, वहीं उन की हत्या होनी थी. उस दिन भी चंद्रवती पशुओं को घेर से ले कर वापस घर की ओर आ रही थीं. योजना के अनुसार रूबी उस दिन पहले से तय समय से थोड़ा पहले अपने घर से निकली.

प्रेमिका का इशारा पाते ही रविशंकर एक पेड़ और झाडिय़ों के पीछे छिप गया. रूबी जानबूझ कर जल्दी निकल कर दूर हो गई, ताकि हत्या के समय वह खुद आसपास न हो. इस षडयंत्र से अनजान चंद्रवती कुछ ही मिनट बाद जैसे ही वहां पहुंची, रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर को वाट्सऐप के जरिए सूचना दी, ‘दादी आ गई हैं, अब निकलो.’

शिकार की बाट जोह रहे रविशंकर ने नजदीक से चंद्रवती के सिर में गोली मार दी. गोली सीधे सिर में लगी और गोली लगते ही चंद्रवती जमीन पर गिर पड़ीं. हत्या करने के बाद रविशंकर अंंधेरे में तमंचा झाडिय़ों में फेंक कर गायब हो गया. यह शाम लगभग साढ़े 8 बजे की बात है. वारदात के बाद थोड़ी सी देर में ही घटनास्थल पर तमाम ग्रामीण इकट्ठे हो गए. सूचना मिलते ही चंद्रवती की फेमिली वाले भी वहां आ गए. वह तुरंत ही उन्हें उपचार के लिए क्वार्सी ट्रामा सेंटर ले गए, लेकिन डौक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डौक्टरों ने बताया कि सिर में गोली लगने से इन की मौत हुई है.

सूचना मिलने के एक घंटे बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण भी किया. किसी से रंजिश नहीं होने पर फेमिली वालों ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ थाना जवां में हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गया कि चंद्रवती की हत्या  सिर में गोली लगने से हुई. चंद्रवती की मौत से घर में कोहराम मच गया. शादी वाले घर में जहां कुछ दिनों बाद शहनाइयां गूंजनी थीं, वहां मातम पसर जाने पर रूबी अंदर  ही अंदर खुश हो रही थी. उस के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे.

कहने को दिखावे के लिए वह भी आंसू बहा रही थी. उस ने सोचा कि दादी की मौत के बाद अब क्रियाकर्मों के चलते उस की शादी टल जाएगी और वह इस बीच अपने प्रेमी के साथ घर से भाग कर शादी रचा लेगी.

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चूंकि परिवार में चंद्रवती की हत्या हो गई थी, इसलिए बिना शोरशराबे के सामान्य तरीके से चंद्रवती की मौत के एक सप्ताह बाद यानी 18 नवबंर, 2025 को रूबी की शादी नियत तारीख पर परिवारजनों द्वारा कर दी गई. जबकि रूबी को इस की जरा भी उम्मीद नहीं थी. लेकिन पकड़े जाने के डर से घर में मातम के चलते वह अपनी शादी टालने के लिए भी घर में किसी से कह नहीं सकती थी. रूबी की शादी अपने प्रेमी से न होने पर वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गई. इस बीच उस की अपने प्रेमी रविशंकर से मोबाइल फोन पर कई बार बात भी हुई, लेकिन शादी होने के बाद वह विदा हो कर अपनी ससुराल चली गई. रूबी और प्रेमी रविशंकर के दिल के अरमां आंसुओं में बह कर रह गए.

घर में शादी निपट जाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत मृतका के फेमिली वालों से ही की. शुरुआती जांच में मृतका व उस के फेमिली वालों से किसी की कोई दुश्मनी नहीं मिली. पुलिस को जांच में पहले सप्ताह कोई ठोस सुराग नहीं मिला. पुलिस को लगा कि शायद किसी बाहरी शरारती व्यक्ति ने यह अपराध किया है, लेकिन सच बहुत ज्यादा जटिल और खतरनाक था, लिहाजा पुलिस ने जांच तेज की. मोबाइल सर्विलांस में एक नंबर लगातार हत्या के आसपास ऐक्टिव मिल रहा था. जांच के दौरान पता चला कि यह नंंबर रविशंकर का है. पुलिस ने जांच की तो लोकेशन मैच हुई.

कौल डिटेल्स से पता चला कि हत्या से ठीक पहले रूबी और रविशंकर के बीच कई मर्तबा बात हुई थी. हत्या वाले दिन शाम को दोनों की लोकेशन एक ही दिशा में पाई गई. तब पुलिस का शक गहराया कि जरूर चंद्रवती की हत्या में इन दोनों का कोई हाथ है. तब पुलिस ने बिना देर किए रविशंकर को हिरासत में लिया. पूछताछ में वह टूट गया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इतना ही नहीं, उस ने हत्या की पूरी साजिश पुलिस को बताई.

इस के बाद रविवार पहली दिसंबर को पुलिस ने रूबी को उस की ससुराल से बुलाया. वह मेंहदी लगे हाथों,चूड़ा पहने ही पहुंची. जब पुलिस ने थाने ले जा कर उससे पूछताछ की तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि हां, मैं ने ही दादी की हत्या कराई थी, ताकि मेरी शादी रुक जाए और मैं अपने प्रेमी से शादी कर सकूं. पूछताछ के बाद उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया. इस घटना में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब दादी चंद्रवती की हत्या के बाद फेमिली वाले सदमे में थे. किसी को अंदेशा भी नहीं था कि इस घटना के पीछे रूबी और उस के प्रेमी रविशंकर का हाथ है.

घर वालों ने सोचा था कि मौत हो गई है, लेकिन रिश्ता अचानक तोडऩा ठीक नहीं होगा और उन्होंने रूबी की शादी 18 नबंवर को नियत तारीख पर कर दी. शादी इतनी जल्दी होने से रूबी भी बेबस थी. वह रविशंकर से संपर्क करने की कोशिश करती रही, लेकिन स्थिति उस के हाथ से निकल चुकी थी. इस दिल दहला देने वाली वारदात का परदाफाश पुलिस जांच, मोबाइल सर्विलांस, वाट्सऐप चैट्स, मुखबिरी, हत्या की मिनट दर मिनट प्लानिंग और दोनों आरोपियों रूबी और रविशंकर से हुई पूछताछ के बाद हुआ.

बाइक मैकेनिक रविशंकर गांव कस्तली का रहने वाला था. वह चंदौखा मोड़ पर पिछले 6 साल से बाइक मरम्मत की दुकान चलाता था. उस की दुकान के पीछे मुंशीलाल का परिवार रहता था. मुंशीलाल की बेटी रूबी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी. रूबी चुपकेचुपके रविशंकर को देखा करती थी. लेकिन उस की यह चोरी ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. एक दिन रविशंकर और रूबी की नजरें टकरा गईं. दोनों अपलक एकदूसरे को निहारते रहे. अब तो उन का रोज का सिलसिला बन गया. यहीं दोनों की मुलाकातें शुरू हुई औैर फिर धीरेधीरे रिश्ता प्रेम में बदल गया.

क हते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते हैं. रूबी और रविशंकर के साथ भी यही हुआ. रूबी के पापा मुंशीलाल की चाची चंद्रवती, जो रूबी की दादी लगती थी को दोनों के अफेयर का पता चल गया. प्रेम प्रसंग का पता चलने के बाद दादी चंद्रवती ने रूबी से कुछ नहीं कहा, लेकिन वह पोती रूबी पर लगातार निगरानी रखने लगीं, जिस से अब दोनों के मिलनेजुलने में भी बाधा पडऩे लगी. इस बीच दादी ने परिवार पर दबाव डाल कर रूबी का रिश्ता गोंडा मोड़ अलीगढ़ के एक युवक से तय करा दिया. रूबी के लिए यह रिश्ता मंजूर करना आसान नहीं था. वह किसी भी कीमत पर प्रेमी रविशंकर से अलग नहीं होना चाहती थी.

गांव चंदौखा में इस हत्याकांड से दहशत का माहौल है. लोगों का कहना है कि ऐसी घटना हमारे गांव में आज तक कभी नहीं हुई. घर की बेटी इतनी क्रूर हो सकती है, किसी ने कल्पना तक नहीं की. दादी चंद्रवती का हमेशा पोती से स्नेह भरा रिश्ता था. दादी ने जब रूबी को अपने प्रेमी के साथ गलत राह की तरफ जाते देखा तो घर की इज्जत पर कोई दाग न आए, यही सोच कर उस ने आननफानन में फेमिली वालों से कह कर रूबी का रिश्ता तय करा दिया था. दादी अपनी पोती की शादी की तैयारियों में जुटी थीं, मगर रूबी को यह नागवार गुजरी और दादी के खून से प्रेमी रविशंकर के साथ अपने हाथ भी रंग लिए.

घटना के 20 दिन बाद जब पुलिस ने केस का खुलासा किया तो यह सिर्फ एक हत्या का केस नहीं रहा, बल्कि इंसानी रिश्तों के टूटते मूल्य, विकृत प्रेम और घर के भीतर चल रहे गहरे षडयंत्र की भयावह दास्तां बन कर सामने आया. जो सच सामने आया, उस ने परिवार, गांव और पुलिस सभी को हैरान कर दिया. हत्या किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, बल्कि उसी घर की पोती रूबी ने अपने प्रेमी रविशंकर के साथ मिल कर एक साजिश के तहत कराई थी, जिस की एक ही वजह थी, किसी तरह अपनी शादी टलवाना, ताकि वह प्रेमी के साथ भाग कर शादी कर सके.

सीओ (तृतीय) सर्वम सिंह ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश एक प्रैसवार्ता में करते हुए रूबी और रविशंकर की प्रेम कहानी उजागर कर दी. शादी को रोकने के लिए हत्या जैसा जघन्य अपराध, यह समाज के लिए चेतावनी है. यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है. यह एक सामाजिक चेतावनी है. प्रेम में अंधापन, परिवार से डर, जल्दबाजी, गलत सलाह और अपराध की आसान राह, ये सब मिल कर एक पूरी पीढ़ी को गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं.

रूबी, जो प्रेम में पड़ी एक सामान्य लड़की लग रही थी, वह अचानक एक ऐसी राह पर चली गई, जिस में अब उस की जिंदगी जेल की अंधेरी कोठरी में बीतेगी. इस तरह की घटनाएं परिवार, गांव और समाज सभी के लिए एक झटका हैं. UP News

 

 

Chhattisgarh Crime: प्रेमी को केवल – जिस्मानी प्यार तो नहीं

Chhattisgarh Crime: प्यार में अंधी हुई उर्मिला निषाद शादीशुदा विजय बांधे से प्यार कर बैठी. प्रेमी उस के जिस्म से खेलता रहा, लेकिन जैसे ही उर्मिला ने उस पर शादी का दबाव बनाने की भूल की तो विजय एक दिन इतना खूंखार बन गया कि…

अपनी प्रेमिका उर्मिला निषाद को ठिकाने लगाने के लिए विजय बांधे मौके की तलाश कर रहा था. योजना के मुताबिक उस ने पहले हार्डवेयर दुकान से सब्जी काटने वाला चाकू खरीदा और 7 दिसंबर 2025 रविवार की शाम उस ने उर्मिला को फोन लगाया तो उर्मिला ने उस से कहा, ”हां विजय, बोलो क्या बात है?’’

विजय एक कैटरर था, इसलिए उस ने उर्मिला को बताया, ”उर्मिला, बात दरअसल यह है कि आज रात एक प्रोग्राम में खाना बनाने के लिए और्डर बुक हुआ है, हमें वहां चलना पड़ेगा.’’ विजय ने बताया.

”लेकिन पहले तो तुम ने बताया नहीं कि आज का कोई कैटरिंग का और्डर है.’’ उर्मिला ने आशंका जताते हुए कहा.

”असल में क्या है उर्मिला, यह और्डर अर्जेंट में आज ही बुक हुआ है, इसलिए पहले से तुम्हें मैं कैसे बताता.’’ विजय ने सफाई देते हुए कहा.

”ठीक है, मैं तैयार होती हूं, मगर जाना कहां है, यह तो तुम ने बताया नहीं.’’ उर्मिला बोली.

”तुम्हें आम खाने हैं या पेड़ गिनने हैं, जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं तुम्हें लेने आ रहा हूं.’’ उर्मिला पर अधिकार जमाते हुए विजय ने फोन काट दिया.

शाम का अंधेरा होते ही विजय ने अपनी बाइक निकाली और उर्मिला के घर की तरफ चल दिया. उर्मिला घर से निकलने को तैयार थी. जैसे ही विजय ने उस के घर के सामने बाइक रोक कर हार्न बजाया, उर्मिला अपने छोटे से बैग के साथ घर से बाहर निकल आई और झट से विजय की बाइक पर बैठ गई.

विजय ने रास्ते में एक रेस्टोरेंट के सामने बाइक रोकी तो उर्मिला ने सवाल किया, ”अब क्यों बाइक रोक दी?’’

इस पर विनोद बोला, ”खाना बनाते देर हो जाएगी, मोमोज और पकौड़ा पैक करवा लेता हूं, रास्ते में कहीं बैठ कर खा लेंगे.’’

मोमोज और पकौड़े पैक करवाने के बाद दोनों उतई गांव की तरफ निकल पड़े. रास्ते में नहर के पास खेल मैदान पर विनोद ने बाइक खड़ी करते हुए उर्मिला से कहा, ”शाम के समय यहां कोई नहीं है और लोगों का आनाजाना भी कम होता होगा, यहीं बैठ कर कुछ खा लेते हैं.’’

दोनों बीच मैदान खाने के लिए बैठ गए. पहले तो दोनों के बीच पहले से चल रहे विवादों पर बात शुरू हुई और थोड़ी ही देर में बहस गर्म हो गई. इसी बीच विजय ने बैग में रखे धारदार चाकू से अचानक उर्मिला पर वार कर दिए. पहले गले पर, फिर शरीर पर कई बार हमले किए. उर्मिला वहीं गिर गई. इस के बाद जिस साजिश की तैयारी विनोद ने पहले से की  थी, उसे अंजाम देने का वक्त आ गया था. विजय बोतल में अपने साथ पेट्रोल भी लाया था.

उस ने बाइक की डिक्की में रखी पेट्रोल की बोतल निकाली और उर्मिला के शरीर पर पेट्रोल उड़ेल दिया. इस के बाद उस ने जेब से माचिस निकाली और आग लगा दी. पास में रखी धान की पराली भी उस ने उसी आग में फेंक दी, ताकि शव पूरी तरह जल कर नष्ट हो जाए और कोई उसे पहचान न पाए. इस के बाद विजय सीधे अपने गांव करगाडीह लौट गया और ऐसे व्यवहार करने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. मगर पुलिस की नजरों से उस का कांड छिप नहीं सका और 24 घंटों के अंदर ही पुलिस ने अधजली लाश की गुत्थी सुलझाने में सफलता हासिल कर ली.

उतई पुलिस ने विजय बांधे को उर्मिला के कत्ल के जुर्म में उसे दुर्ग जिले की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के उतई थाना क्षेत्र में 8 दिसंबर की सुबह करगाडीह पऊवारा नहर किनारे बने खेल मैदान में गांव के कुछ लोग एक्सरसाइज करने पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. खेल मैदान के एक कोने में पड़े धान के पुआल के ढेर में एक महिला का अधजला शव पड़ा हुआ था. यह खबर पूरे इलाके में जंगल की आग की तरह फैल गई.

लोगों ने इस की सूचना सब से पहले गांव कोटवार को दी. गांव कोटवार केवल दास मानिकपुरी ने शव देख कर तुरंत पुलिस को सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस टीम को जांच में शव के पास से आधा जला चप्पल और धारदार हथियार मिला, जिस से हत्या की आशंका गहरी हो गई. फोरैंसिक एक्सपर्ट को घटनास्थल पर मौजूद बड़े पत्थरों पर खून के निशान दिखे, जिस से यह संभावना और मजबूत होती गई कि हत्या के बाद शव को पत्थरों से भी कुचला गया है. शुरुआती जांच में यह अंदेशा व्यक्त किया गया है कि युवती की पहले धारदार हथियार से हत्या की गई, फिर सबूत मिटाने के लिए उस पर पराली या किसी ज्वलनशील पदार्थ का इस्तेमाल कर शव को जला दिया गया हो.

फोरैंसिक टीम ने मिट्टी के नमूने, खून के धब्बे, जले हुए अवशेष और हथियार समेत कई महत्त्वपूर्ण साक्ष्य वहां से जुटाए. पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगालने शुरू कर दिए, ताकि हत्या के समय क्षेत्र में आनेजाने वालों की गतिविधियों का पता लगाया जा सके. उतई पुलिस ने आसपास के गांवों में ग्रामीणों से भी पूछताछ की, जिस से लाश की पहचान हो सके.

शुरुआती जांच में न तो मृतका की पहचान हो पाई, न ही कोई गवाह मिला. मौके पर पहुंची पुलिस टीम और फोरैंसिक एक्सपर्ट को पराली के बीच अधजला शव पड़ा मिला था, इसलिए यह साफ था कि हत्या कहीं और नहीं, इसी जगह की गई थी और पहचान छिपाने के इरादे से लाश जलाने की कोशिश भी की गई. एफएसएल टीम और डौग स्क्वायड मौके पर पहुंचे, लेकिन महिला की पहचान स्पष्ट नहीं थी, पुलिस ने इसे ‘ब्लाइंड मर्डर’ मानते हुए कई टीमें गठित कीं. एसएसपी विजय अग्रवाल के निर्देश पर 6 विशेष टीमें रात भर जांच में लगी रहीं.

घटनास्थल से मिले मोमोज के टुकड़ों और मोजों के आधार पर पुलिस ने 5 किलोमीटर के दायरे में दुकानदारों से पूछताछ की और पेट्रोल पंप के सीसीटीवी फुटेज खंगाले. 8 दिसंबर, 2025 की सुबह विजय बांधे सुपेला थाने पहुंचा. एसएचओ को अपना परिचय देते हुए उस ने कहा कि मेरे साथ काम करने वाली उर्मिला निषाद कल रात से घर नहीं पहुंची है.

”तुम उस से आखिरी बार कब मिले थे?’’ एसएचओ ने पूछा.

”सर, कल दिन में मेरी उस से फोन पर बात हुई थी, मगर रात से ही उस का फोन बंद आ रहा है. सुबह मैं ने उस के घर जा कर पता किया तो मालूम हुआ कि वह शाम को कहीं गई थी, मगर रात अपने घर नहीं लौटी.’’

बात महिला के लापता होने की थी, इसलिए उन्होंने उर्मिला निषाद की गुमशुदगी तुरंत दर्ज करा दी. एसएचओ ने इस की इत्तला एसएसपी विजय अग्रवाल को भी दे दी. एसएसपी के निर्देश पर पुलिस टीम ने जिले के सभी थाना क्षेत्रों में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्टों की पड़ताल करनी शुरू कर दी. इस के अलावा गठित टीम ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले तो दूसरी टीम ने मोबाइल लोकेशन देखी. जांच की इसी कड़ी में एक पेट्रोल पंप के सीसीटीवी फुटेज में एक बाइक सवार युवक को पुलिस ने संदिग्ध मान कर जांच शुरू की.

दरअसल, उस युवक के पीछे बाइक पर एक महिला बैठी हुई थी और युवक ने बाइक में पेट्रोल डलवाने के बजाय बोतल में पेट्रोल लिया था. एक रेस्टोरेंट में लगे सीसीटीवी फुटेज में यही युवक मोमोज और चाइनीज पकौड़े पैक करवा रहा था. अंत में शक की सुई विजय बांधे नाम के उस व्यक्ति की ओर घूमी, जिस ने खुद को पीडि़त का परिचित बता कर सुपेला थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. पुलिस ने जब विजय बांधे को पूछताछ के लिए बुलाया तो उस की बातें शुरू से ही बेमेल लगीं. वह बारबार अपने बयान बदल रहा था और घटनाक्रम बताने में हिचक भी दिखाई दे रही थी.

तकनीकी टीम ने जब विजय का मोबाइल लोकेशन व मूवमेंट खंगाला तो पता चला कि घटना वाली शाम उस के मोबाइल की लोकेशन पुरई गांव की उसी नहर की थी, जहां पर अधजली लाश मिली थी. देर रात पूछताछ के दौरान जब विजय पर पुलिस के सवालों का दबाव और सख्ती बढ़ी तो आखिरकार वह टूट गया और उस ने पूरे मामले की कहानी पुलिस को साफसाफ बता दी. विजय की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उस के घर और आसपास तलाशी ली. उस के कपड़ों पर खून के निशान मिले, जिन्हें उस ने छिपाने की कोशिश की थी. घटना में इस्तेमाल किया गया चापर भी बरामद हुआ. पेट्रोल डालने वाली बोतल और अन्य सामग्रियां भी पुलिस ने जब्त कीं.

फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से मिले अवशेषों और आरोपी के कपड़ों का मिलान किया, जिस से पूरे घटनाक्रम की पुष्टि हो गई. पुलिस पूछताछ में विजय ने स्वीकार किया कि नहर के पास मिली अधजली लाश सुपेला की रहने वाली उर्मिला निषाद की थी, जिस का कई वर्षों से उस के साथ प्रेम प्रसंग था. उर्मिला उस के ऊपर शादी के लिए दबाव बना रही थी, जिस से परेशान हो कर उस ने हत्या की योजना बनाई.

24 साल का विजय बांधे छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के करगाडीह गांव का रहने वाला था और कैटरिंग का काम करता था. 30 साल की उर्मिला निषाद भी पिछले कुछ सालों से उस के साथ काम कर रही थी. कैटरिंग के काम में अकसर रातरात भर दूसरे गांव कस्बों में जाना पड़ता था. साथ काम करतेकरते दोनों करीब आ गए और उन का रिश्ता भावनात्मक होतेहोते प्रेम संबंधों तक पहुंच गया. विजय शादीशुदा था और उस की पत्नी गर्भवती थी. इस के बावजूद उर्मिला उस पर विवाह का प्रेशर बना रही थी. इसी मुद्ïदे पर दोनों के बीच कई बार लड़ाईझगड़े हो चुके थे.

”विजय, आखिर तुम कब तक मेरी भावनाओं से खेलते रहोगे, मैं इस तरह अपनी जिंदगी बरबाद नहीं होने दूंगी.’’ एक दिन उर्मिला ने उलाहना देते हुए कहा.

”देखो उर्मिला, तुम समझती क्यों नहीं. तुम्हें तो पहले ही मैं ने बता दिया था कि मैं शादीशुदा हूं, फिर भी तुम जिद कर रही हो.’’ विजय ने सफाई दी.

”तो क्या मैं जीवन भर तुम्हारी रखैल बन कर रहूंगी, तुम्हें मुझ से शादी करनी ही होगी.’’ उर्मिला गुस्से में तमतमा कर बोली.

”उर्मिला मैं ने तुम्हें धोखे में नहीं रखा, पत्नी के रहते तुम से मैं कैसे शादी कर सकता हूं. और मैं तुम्हारी जरूरतों का तो ध्यान रख रहा हूं.’’ विजय ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा.

”तुम्हें तो मेरे जिस्म से ही मतलब है, अगर तुम मुझे दिल से चाहते तो ऐसी बात कभी नहीं करते.’’ उर्मिला ने आंसू बहाते हुए कहा.

”देखो उर्मिला, मेरी बीवी अभी प्रैग्नेंट है और मैं उसे किसी भी सूरत में छोड़ नहीं सकता. मुझे सोचने के लिए कुछ वक्त दो.’’ विजय ने मामले को शांत करने के लिहाज से कहा.

कैटरिंग के पैसों को ले कर भी विवाद खड़ा हो गया था. इसलिए धीरेधीरे उन के बीच का रिश्ता एकतरफा दबाव और आपसी मनमुटाव की भेंट चढऩे लगा था. कुछ समय से उर्मिला उसे सार्वजनिक रूप से लगातार अपमानित कर रही थी. इस बात को ले कर विजय के मन में इतना तनाव बढ़ गया था कि उस की स्थिति सांपछछूंदर जैसी हो गई थी. उर्मिला द्वारा की जा रही बारबार की बेइज्जती, गुस्से और शादी करने के दबाव से परेशान हो कर ही विजय के द्वारा उर्मिला को रास्ते से हटाने की साजिश रची जा रही थी. विजय को अपनी गलती का अहसास भी हो रहा था कि शादीशुदा होने के बावजूद उसे उर्मिला की बातों में नहीं आना था.

उर्मिला सुपेला गांव की रहने वाली थी. उस का विवाह करीब 10 साल पहले हो चुका था, पहले पति से उस का 8 साल का एक बेटा भी है. पति शराबी था, शराब पी कर उर्मिला के साथ मारपीट करता था. जब बेटा 3 साल का था, तभी उस ने पति को छोड़ दिया और अपनी सास और बेटे के साथ अलग रहने लगी. उर्मिला ने इस के बाद दूसरी शादी कर ली, लेकिन दूसरे पति के साथ भी वह ज्यादा दिनों तक रिश्ता नहीं निभा सकी. इस के बाद वह कैटरिंग का काम करने वाले विजय बांधे के संपर्क में आ गई.

उर्मिला ने शादी तो 2 बार कर ली, मगर उस के दिल पर राज करने वाला उसे कोई नहीं मिला. उस के दोनों पति न तो उस की जिस्मानी जरूरतों को पूरा कर सके और न ही उस के सपनों को साकार कर सके. यही वजह रही कि उर्मिला अपने से कम उम्र के विजय पर फिदा हो गई. विजय ने उर्मिला की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उस से नजदीकियां बढ़ाईं और उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा. विजय उतई थान के अंतर्गत करगाडीह गांव का रहने वाला था. करगाडीह और सुपेला गांव के बीच की दूरी 15 किलोमीटर थी. कैटरिंग के काम के दौरान दोनों के बीच जिस ढंग से नजदीकियां बढ़ रही थीं, दोनों के बीच प्रेम की डोर मजबूत हो रही थी.

अकसर ही विजय उर्मिला को घुमाने ले जाता था और उस से कई बार शारीरिक संबंध भी बना चुका था. उर्मिला विजय पर दबाव बना रही थी कि वह भी सुपेला में उस के साथ रहे, मगर विजय शादीशुदा था और अपनी प्रैग्नेंट पत्नी की वजह से उर्मिला के साथ रहने को तैयार नहीं था. इसी बात पर दोनों के बीच मनमुटाव बढऩे लगा था और विवाद की स्थिति बनने लगी थी. उर्मिला निषाद की हत्या की घटना युवतियों को सचेत करती है कि प्रेम संबंध बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि कोई पुरुष उन से केवल जिस्मानी संबंध बनाने के लिए तो प्रेम का नाटक नहीं कर रहा.

किसी शादीशुदा पुरुष से प्रेम करने की भूल से उन्हें जीवन भर का पछतावा ही मिल सकता है. यदि किसी मजबूरी के चलते ऐसे पुरुषों से प्रेम संबंध कायम भी हो जाएं तो इस बात का खयाल रखें कि उन पर शादी करने का दबाव कदापि न बनाएं, अन्यथा उन का हश्र भी उर्मिला निषाद की तरह होगा. Chhattisgarh Crime

 

 

UP Crime: मेरठ कांड – किडनेप के बाद का कहर

UP Crime: खेत पर जाते समय दिनदहाड़े कुछ युवकों ने सुनीता के सामने उस की बेटी मनीषा को किडनैप करने की कोशिश की तो सुनीता के विरोध करने पर युवकों ने सुनीता की हत्या कर दी और मनीषा को किडनैप कर ले गए. इस कांड के बाद गांव में तनाव व्याप्त हो गया और प्रदेश सरकार की भी नींद उड़ गई. कौन थे किडनैपर और क्यों किया गया मनीषा का किडनैप?

कहते हैं कि बालक उम्र का प्यार न तो जातपात व ऊंचनीच देखता है और न अमीरीगरीबी. इस आयुवर्ग के प्यार में एक ऐसा आकर्षण होता है, जिस के पाश में फंसे किशोर न तो समाज की बंदिशों को मानते हैं, न ही समाज की वर्जनाओं को. जाहिर है ऐसे प्यार का अंजाम भी खतरनाक होता है. पारस सोम और मनीषा का प्यार भी शायद समाज में ऊंचनीच के भेदभाव के बीच पनपा एक ऐसा ही प्यार था, जिस ने दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव को जातीय भेदभाव की आग में झुलसने पर मजबूर कर दिया.

सुनीता की आंखों के सामने ही उस की बेटी को कुछ युवकों द्वारा ले जाने की कोशिश हुई तो उस ने विरोध किया फलस्वरूप उस पर जानलेवा हमला हुआ, जिस में उसकी जान चली गई

हालात ऐसे बने कि कपसाड़ गांव बवाल की आग में जलतेजलते बचा. गांव की गली से ले कर चट्टीचौराहे तक पुलिस छावनी बन गए. इस गांव में न कोई आ सकता था, न जा सकता था. किसी को अगर आनाजाना भी होता तो उसे पुलिस को पहले संतुष्ट करना पड़ता कि वह किसी गलत इरादे से गांव में नहीं जा रहा है. कपसाड़ गांव मेरठ महानगर की सीमा से सटा होने के कारण संपन्न और घनी आबादी वाला है. राजपूत और जाटव बिरादरी बहुल इस गांव में कुछ वैश्य, ब्राह्मण और अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं. राजूपत जाति के लोग संपन्न और बड़े खेतिहर किसान हैं.

जबकि जाटव जाति के लोग या तो छोटे किसान हैं या राजूपतों के खेतों में मजदूरी कर गुजरबसर करते हैं अथवा शहर जा कर फैक्ट्री और दुकानों में नौकरी करते हैं.  इसी गांव में रहता है सतेंद्र कुमार जाटव का परिवार. उस के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 5 बच्चे थे. परिवार में सब से बड़ा बेटा है नरसी, उस से छोटे 2 बेटे मनदीप और शुभम हैं. जबकि 2 बेटियों में मनीषा बड़ी है.

परिवार में नरसी सब से बड़ा है, जबकि मनीषा दूसरे नंबर की है. पढ़ाई के नाम पर वैसे तो सभी बच्चे पढ़ेलिखे हैं, लेकिन मनीषा समेत सभी ने इंटरमीडिएट से ज्यादा की पढ़ाई नहीं की है. मनीषा ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. गुजरबसर के लिए सतेंद्र व उन का परिवार या तो गांव के तरुण राजपूत के खेतों में मजदूरी का काम करते या शहर सरधना कस्बे व मेरठ शहर में नौकरी कर गुजरबसर करते थे.

इन दिनों गन्ने की पैदावार तैयार थी, इसलिए सतेंद्र की पत्नी सुनीता व बेटी मनीषा तरुण राजपूत के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए सुबह ही खेतों में काम करने चली जाती थीं. मनीषा की सहारनपुर में शादी तय हो चुकी थी. फरवरी महीने में उस की शादी थी, इसलिए सतेंद्र का पूरा परिवार इस समय उस की शादी को ले कर पैसे जुटाने व दूसरी तैयारियां करने में व्यस्त था.

अचानक 8 जनवरी, 2026 की सुबह सतेंद्र जाटव के परिवार पर कयामत बन कर टूट पड़ी. सुबह करीब 8 बजे सुनीता बेटी मनीषा के साथ तरुण के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए जा रही थी. जब ये दोनों रजवाहे के नए पुल के पास पहुंचीं, तभी गांव के एक राजूपत योगेश सोम का बेटा पारस सोम व उस का हमजाति दोस्त सुनील तथा उन के कुछ अज्ञात साथियों ने सुनीता व मनीषा का रास्ता रोक लिया.

पारस व उस के साथी मनीषा को पकड़ कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे. जब सुनीता ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने सुनीता के साथ गालीगलौज शुरू कर दी. उन्हें जातिसूचक शब्द कहते हुए हाथापाई शुरू कर दी. लेकिन सुनीता बेटी को उन के चंगुल से बचाने के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर चुकी थी. इसी दौरान पारस व उस के साथियों ने सुनीता के सिर पर फरसे का प्रहार किया, जिस से वह जमीन पर गिर कर वहीं बेहोश हो गई.

पारस व उस के साथियों का उद्देश्य शायद मनीषा को वहां से ले कर जाने का था, इसीलिए सुनीता के खून से लथपथ होने के बाद जमीन पर गिरते ही वे सभी मनीषा को वहां से ले कर नौ दो ग्यारह हो गए. चूंकि उस वक्त बहुत सारे लोग उस रजवाहे पर खेतों में काम करने के लिए आजा रहे थे. सुनीता की बिरादरी की 2 लड़कियां भी उस वक्त वहीं से गुजर रही थीं, जिन्होंने इस मंजर को अपनी आंखों से देखा था. उन्होंने तुरंत शोर मचा कर लोगों की भीड़ इकट्ठी कर ली और सब को वह माजरा बता दिया, जो कुछ देर पहले घटित हुआ था.

लोगों की भीड़ में से किसी ने गांव में जा कर सतेंद्र व उस के परिवार को इस घटना की खबर कर दी तो सतेंद्र का परिवार और बिरादरी के दूसरे लोग भी वहां पहुंच गए, जहां सुनीता खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. सुनीता को उपचार देना पहली प्राथमिकता थी, इसलिए फेमिली वालों ने सब से पहले सुनीता को बेहोशी की हालत में एसडीएस ग्लोबल हौस्पिटल, मोदीपुरम, मेरठ में भरती कराया, जहां डौक्टरों ने उस का इलाज तो शुरू कर दिया, लेकिन इस बात से भी आगाह कर दिया कि सुनीता के सिर में काफी गंभीर चोट है तथा खून भी काफी बह चुका था, इसलिए उस के बचने की उम्मीद कम ही है.

बहरहाल, डौक्टर अपना प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन के परिवार ने अपना दूसरा काम यह किया कि मनीषा को तलाशने के लिए पुलिस की शरण ली. सतेंद्र के बेटे नरसी ने कुछ रिश्तेदारों के साथ जा कर सरधना थाने में इस बात की शिकायत दर्ज करा दी. उस ने पुलिस को बताया कि 2 किशोरियां इस बात की गवाह हैं कि पारस सोम अपने दोस्त सुनील व अन्य अज्ञात लोगों के साथ सुनीता पर फरसे से हमला कर के मनीषा का अपहरण कर के ले गया है.

सरधना थाने के एसएचओ इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने नरसी जाटव की शिकायत पर तत्काल एक टीम ग्लोबल अस्पताल व कपसाड़ गांव भेज दी, ताकि शिकायत की सच्चाई का पता लगाया जा सके. गांव में इस बात की पुष्टि हो गई कि यह घटना सच है, जबकि अस्पताल के डौक्टरों ने भी सुनीता के मरणासन्न हालत में होने की बात बता दी.

गांव में हुआ तनाव

लिहाजा अपने सीओ आशुतोष कुमार व एसएसपी विपिन ताड़ा को सारे हालात बता कर इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने मुकदमा दर्ज कर लिया. गलत तरीके से रोकने के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), शांति भंग करने के इरादे से जानबूझ कर अपमान करने व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया, क्योंकि तब तक सुनीता जिंदा थी.

चूंकि जिस लड़की मनीषा का अपहरण हुआ था और उस की घायल मां दोनों जाटव बिरादरी के थे और जिन लोगों पर आरोप था, वे सभी राजपूत बिरादरी के थे, इसलिए मामला बड़ा जातीय रूप न ले ले, इसीलिए आशंका को समझते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में अतिरिक्त पुलिस बन तैनात करवा दिया. साथ ही पुलिस की एक टीम कपसाड़ गांव में ही रहने वाले योगेश व उस के परिजनों को पूछताछ के लिए सरधना थाने ले आई. पुलिस को पारस सोम व उस के दूसरे साथी अपने घर पर नहीं मिले.

लेकिन इसी बीच 8 जनवरी की देर शाम तक अस्पताल में गंभीर रूप से इलाज करा रही सुनीता ने दम तोड़ दिया. बस, सुनीता की मौत के बाद ही हालात एकदम गंभीर हो गए. कपसाड़ गांव में जाटव बिरादरी के लोगों का एक होना शुरू हो गया. इस हत्या का आरोप व मनीषा के किडनैप का आरोप चूंकि एक राजपूत युवक और उस के हमबिरादरी साथियों पर लगा था, इसलिए मामला पूरी तरह जातीय हो गया. बढ़ते तनाव को देखते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

मनीषा का भाई नरसी

सुनीता की मौत के बाद रात को ही उस का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अगली सुबह शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया. चूंकि सुनीता की मौत होने के बाद मामला अब हत्या में तब्दील हो चुका था और फेमिली वालों के आरोप के बाद इस में एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गई थीं. लिहाजा एसएसपी के आदेश पर इस की जांच सरधना के सीओ आशुतोष कुमार को सौंप दी गई.

सुनीता की मौत से गुस्साए फेमिली वालों और गांव वालों ने शव के गांव में आते ही उस एंबुलेंस में तोडफ़ोड़ कर दी, जिस में शव को लाया गया था. शव को ले कर फेमिली वाले धरने पर बैठ गए. डीएम के साथ मौके पर पहुंचे एसएसपी विपिन ताड़ा ने परिजनों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन परिजन और ग्रामीण मनीषा की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर अड़े रहे. उन का साफ कहना था कि जब तक अपहृत मनीषा बरामद नहीं होती और आरोपी पकड़े नहीं जाते, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

मनीषा के किडनेप और उस की मम्मी की मौत के गम में डूबी घर की महिलाएं

शुरुआत में पीडि़त परिवार मृतका सुनीता का अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं था, लेकिन सरधना से भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम की मध्यस्थता के बाद सरकार की ओर से 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा के बाद परिवार मान गया और 9 जनवरी की रात को सुनीता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हालांकि फेमिली वालों की तरफ से 50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता व परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की मांग की गई थी, लेकिन बाकी मांगें कुछ समय में पूरी करने के वादे पर फिलहाल 10 लाख का चैक मिलने से मामला थोड़ा शांत हो गया था.

होटल में मिले दोनों

उस रात को अंतिम संस्कार होने के बाद पुलिस के ऊपर आरोपी की गिरफ्तारी और मनीषा की बरामदगी का दबाव आ गया. पुलिस पारस के फेमिली वालों के साथ सख्ती से पूछताछ करने के अलावा अपने इंटैलीजेंस सिस्टम से यह पता लगाने में जुट गई कि पारस मनीषा को ले कर कहां छिपा है? जहां से भी जानकारी मिल रही थी, पुलिस की टीमें वहां दबिशें डाल रही थीं, लेकिन पुलिस को सफलता मिली अगले दिन यानी 10 जनवरी की शाम को. रुड़की के एक होटल में आरोपी पारस सोम व पीडि़ता मनीषा के ठहरने की सूचना मिली थी.

इंसपेक्टर प्रताप सिंह व स्पैशल स्टाफ की एक टीम तत्काल रुड़की के उस होटल में पहुंची और पुलिस ने वहां मनीषा को आरोपी पारस सोम के साथ बरामद कर लिया. दोनों को ले कर पुलिस टीम पहले रात को मेरठ पहुंची. मनीषा के बरामद होने के बाद एसएसपी व महिला पुलिस ने उस से काफी लंबी पूछताछ की, जिस के बाद उसे आशा ज्योति केंद्र भेज दिया गया.

मनीषा के किडनेप का आरोपी पारस सोम

अगले दिन पहले प्यारे लाल अस्पताल में मनीषा का मैडिकल चैकअप कराया गया. उस के बाद पुलिस ने एसीजेएम नम्रता सिंह की अदालत में मनीषा के दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के इकबालिया बयान दर्ज कराए. बाद में अदालत के आदेश पर मनीषा को पुलिस की अभिरक्षा में उस के फेमिली वालों के साथ भेज दिया गया. दूसरी तरफ पारस से खुद एसएसपी विपिन ताड़ा ने कई घंटे तक गहन पूछताछ की, जिस के बाद पारस सोम को स्पैशल सीजेएम न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पुलिस को दिए बयान में पारस सोम ने बताया कि गांव से मनीषा को ले कर निकलने के बाद वह उसे ले कर अपनी रिश्तेदारी खतौली गया था. शाम को सुनीता की मौत की खबर मिलने पर दोनों दिल्ली चले गए, वहां एक होटल में रात गुजारी. उस के बाद वहां से अपने दोस्त के पास गुरुग्राम चले गए. मीडिया के जरिए गांव के माहौल पर पारस सोम नजर रखे हुए था.

गांव का माहौल बिगडऩे पर मनीषा को गुरुग्राम से साथ ले कर ट्रेन से सहारनपुर पहुंच गया. सहारनपुर के टपरी गांव में पारस की बहन रहती है. उन के घर पर शुक्रवार की रात बिताई. शनिवार को रुड़की के लिए ट्रेन में सवार हो गया. पारस सोम ने अपने परिवार के बारे में गांव के ही झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र, जो उस का दोस्त भी था, उस से लगातार गांव की जानकारी ले रहा था. राजेंद्र ने उसे बताया कि मनीषा की मम्मी की मौत के बाद मामला काफी तूल पकड़ चुका है और पुलिस उसे चारों तरफ तलाश कर रही है तो वह समझ नहीं पाया कि क्या करे. चूंकि मनीषा और पारस के मोबाइल को पुलिस लगातार ट्रैक कर रही थी, जिस से उस की रियल टाइम लोकेशन का पता चल गया.

उस वक्त वह रुड़की रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरा था और मनीषा उस के साथ ही थी. पुलिस की टीम वहीं पहुंच गई और 10 जनवरी, 2026 की शाम को पारस को हिरासत में ले कर मनीषा को पुलिस ने अपने संरक्षण में ले लिया और मेरठ ले आई.

हालांकि प्रेम संबंध के इस तरह के मामलों में यूं तो मामला लड़की के बरामद होने और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन यहां यह सब होने के बाद पूरा मामला कानूनी दांवपेंच में फंस गया. हालांकि मनीषा के फेमिली वाले तो पहले से ही उस की उम्र 17 साल बता रहे थे, लेकिन पारस के जेल जाने के बाद पारस के अधिवक्ता बलराम राणा व संजीव उर्फ संजू राणा ने अदालत में हाईस्कूल की मार्कशीट पेश कर उस के नाबालिग होने का दावा कर दिया. जबकि उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस मनीषा को उस का परिवार नाबालिग यानी 17 साल की बता रहा है, उस की उम्र 21 साल है.

उम्र बनी सिरदर्द

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती पारस और मनीषा की सही उम्र का पता लगाना था. मामला कानूनी दांवपेंच में फंसने के बाद पुलिस के सामने चुनौती आ गई कि पीडि़ता व आरोपी दोनों की सही उम्र का पता करें ताकि सच्चाई सामने आ सके. पारस और मनीषा दोनों ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में पढ़ाई की थी. लिहाजा पुलिस ने कालेज की प्रधानाचार्य मंजू देवी से संपर्क किया और दोनों की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की मार्कशीट हासिल कर ली.

जिस के बाद पता चला कि मनीषा ने 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. उस का जन्म का साल 2005 था यानी वह 21वें साल में चल रही थी. पारस के अधिवक्ता ने मनीषा को बालिग और पारस को नाबालिग साबित करने के लिए सबूत पेश किए, लेकिन यह कैसे तय हो कि कौन बालिग है और कौन नाबालिग. उम्र के इन दावों की जटिलता को देखते हुए पुलिस अधिकारी कानून विशेषज्ञों से विधिक राय ले रहे हैं. एसएसपी डा. विपिन ताड़ा ने एक मैडिकल बोर्ड से दोनों के बोन टेस्ट कराने पर भी विचार कर रही है.

वैसे इस तरह के मामले बाल किशोर बोर्ड के अधीन आयु निर्धारण केंद्रों में मामले भेजे जाते हैं. आयु का निर्धारण करने के लिए मैडिकल बोर्ड का गठन भी किया जा सकता है. हालांकि मनीषा की हाईस्कूल की मार्कशीट के मुताबिक वह बालिग है, लेकिन कई बार गफलत में गांव के स्कूल में जन्मतिथि गलत भी लिखवा दी जाती है. इसी तरह पीडि़त की उम्र भी नाबालिग या बालिग हो सकती है, इसीलिए पुलिस अब कानूनी दांवपेंच में फंसे उम्र के दांवपेंच को बाल किशोर बोर्ड की मदद से सुलझाने का काम करेगी.

सुनीता की हत्या व मनीषा के किडनैप केस की जांच करने वाले सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार को शक है कि पारस ने पकड़े जाने से पहले अपने झोलाछाप दोस्त को फोन कर गांव के माहौल की जानकारी ली थी. इसी जानकारी के आधार पर पुलिस ने पारस को सर्विलांस पर ले कर गिरफ्तार भी किया था. जांच अधिकारी अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि गांव का झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र इस पूरी साजिश का हिस्सा तो नहीं था.

अपने बयान में मनीषा ने स्पष्ट कहा है कि पारस ने अपने साथियों के साथ उस का किडनैप किया और फरसे का वार कर उस की मम्मी सुनीता की हत्या की. मनीषा ने अपने बयान में यह भी कहा कि पारस के पास एक तमंचा था, जिसे दिखा कर उसे डराया गया, जिस से वह उस का विरोध नहीं कर सकी और वह मनमानी करता रहा. हालांकि उस के बयानों का विरोधाभास इसी बात से साबित होता है कि पुलिस ने उन्हें रुड़की के जिस होटल से पकड़ा, वहां मनीषा आरोपी पारस के साथ आराम से रह रही थी. साथ ही जांच में यह बात भी सामने आई कि उस ने कहीं भी आरोपी के साथ जाते हुए उस का विरोध नहीं किया.

अब चूंकि पीडि़त परिवार अनुसूचित जाति से है. इस कारण वारदात ने इलाके में तनाव फैला दिया था. चूंकि सभी राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों की हमदर्दी बटोरना चाह रहे थे, इसलिए विपक्षी दलों ने मामले को पूरी तरह गरमा दिया. हर सियासी दल का नेता खुद को पीडि़त परिवार का हमदर्द साबित करना चाहता था, इसलिए सब की दौड़ कपसाड़ गांव की तरफ शुरू हो गई.

पुलिस को पहले से ही इस बात की आशंका थी कि इस मामले में सियासत होगी. लिहाजा आसपास के कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी व रैपिड ऐक्शन फोर्स की टीमें गांव में तैनात कर दी गईं. कोई भी बाहरी व्यक्ति गांव में घुस न सके, इसलिए गांव के बाहर टोल प्लाजा के पास मेनरोड पर बैरिकेड लगा कर रास्तों को बंद कर दिया. जिस राजनीतिक दल के नेता ने कपसाड़ गांव में जाने की कोशिश की, उसे या तो वहीं से वापस लौटा दिया गया अथवा हिरासत में ले लिया गया. एक तरह से मामला पूरी तरह राजपूत बनाम अनुसूचित जाति का हो गया था.

मनीषा और पारस की इस उलझी हुई प्रेम कहानी में एक पक्ष गांव के लोगों का भी है. एक तरफ जहां पीडि़त परिवार जो आरोप लगा रहा है, उसे गांव के लोग गलत बता रहे हैं. गांव के लोगों का कहना है कि लड़की का लड़के के साथ पिछले ढाई 3 साल से अफेयर था. लड़की ने ही लड़के को फोन कर के बुलाया था. लड़की ने ही अपनी मम्मी के ऊपर हमला करवाने में लड़के का साथ दिया और उस के साथ भाग गई.

गांव वालों का कहना है कि करीब 3 साल पहले जब मनीषा के सब से बड़े भाई नरसी की शादी हुई थी, तब पारस व मनीषा पहली बार एकदूसरे से मिले थे. वहीं से दोनों में एकदूसरे के प्रति प्यार व आकर्षण हुआ. चूंकि दोनों एक ही कालेज में पढते भी थे, इसलिए गांव से बाहर दोनों की एकदूसरे से मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों ही इस बात से अंजान थे कि उन का वास्ता ऐसी जातियों से था, जहां उन के प्रेम संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाएगा.

छिप सकी आशिकी

किशोर उम्र के प्यार में ऐसा जुनून और मस्तीभरी होती है, जो किसी से छिपती नहीं है. पारस व मनीषा का प्यार भी किसी से छिपा नहीं रह सका. दोनों के इश्क की कहानियां गांव के लोगों के बीच जब किस्से बन कर तैरने लगी तो जल्द ही दोनों के फेमिली वालों को भी इस की भनक लग गई. ऐसे मामलों में जो होता है, वैसा ही पारस और मनीषा के साथ भी हुआ. दोनों के ऊपर पहले परिवार की बंदिशें लगीं, लेकिन आशिकी का जुनून दोनों को जब मिलने से नहीं रोक सका तो एक दिन ऐसा भी आया कि मनीषा के परिवार वालों ने पारस के परिवार पर मनीषा को बरगलाने का आरोप लगाते हुए झगड़ा किया.

बात बढ़ती, इस से पहले ही राजपूत व जाटव बिरादरी के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव किया और इस के बाद गांव में दोनों पक्षों की एक पंचायत बुलाई गई. ये अप्रैल, 2024 की बात है. इस पंचायत में फैसला लिया गया कि मनीषा और पारस उस दिन के बाद एकदूसरे से नहीं मिलेंगे. गांव के कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि मनीषा के पिता ने अनुसूचित जाति का होने के कारण पारस के परिवार के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने का मन बनाया था, इसलिए पारस के फेमिली वालों ने खुद इस समझौते के तहत मनीषा के पापा को एक बड़ी रकम दी थी और कहा था कि वे जल्द से जल्द अपनी बिरादरी में एक लड़का ढूंढ कर उस की शादी करा दें, ताकि यह समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाए.

गांव वालों का कहना है कि इसी के बाद मनीषा के फेमिली वालों ने भागदौड़ शुरू की और उस के लिए सहारनपुर में अपनी बिरादरी का एक अच्छा लड़का देख कर उस की शादी तय कर दी. यह शादी 10 फरवरी, 2026 को होनी थी. गांव वालों का यह भी कहना है कि मनीषा पारस को भुला नहीं पा रही थी, इसीलिए गुपचुप तरीके से उस का पारस से मिलनाजुलना जारी रहा और उस ने अपनी शादी से कुछ दिन पहले पारस के साथ मिल कर खुद को भगाने की यह साजिश रची.

हालांकि मनीषा के फेमिली वाले कहते हैं कि पारस मनीषा पर अपने साथ भागने का दबाव बना रहा था, लेकिन मनीषा ने जब साफ मना कर दिया तो 8 जनवरी की सुबह उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा कि दोनों का प्यार कितना सच्चा या झूठा था. प्यार की इस नासमझी में न सिर्फ पारस की जिंदगी अंधेरे में पड़ गई, वहीं मनीषा के दामन पर भी बदनामी का दाग लग गया और उस की मम्मी की जान गई सो अलग.

इस घटना के बाद सियासी रंग ले कर बवाल को टालने के लिए फिलहाल यूपी सरकार ने परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे कर और व स्थानीय पूर्व विधायक और बीजेपी नेता संगीत सोम ने 2 लाख नकद आर्थिक मदद दे कर पीडि़त परिवार की मदद से मामले को ठंडा करने की कोशिशें तो की हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी ने 5 लाख व सपा के सरधना विधायक अतुल प्रधान ने एक लाख के चैक से परिवार को आर्थिक मदद दे कर इस घटना को सियासी रंग में रंगने का काम कर दिया है.

मुख्य आरोपी पारस सोम को कोर्ट में पेश करने ले जाती पुलिस

अब इस प्रकरण में जांच अधिकारी सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार ने सुनीता की हत्या और बेटी मनीषा के किडनैप के मामले में पुलिस की जांच तेज कर दी है. आरोपी पारस सोम को अदालत के आदेश से रिमांड पर ले कर सुनीता की हत्या में प्रयुक्त फरसा (आलाएकत्ल) बरामद कर लिया गया है, जो केस के लिए अहम सबूत है. साथ ही पुलिस ने इस मामले में 2 नाबालिग चश्मदीद लड़कियों के बयान कोर्ट के दर्ज कराए, जिस से पारस सोम के खिलाफ केस और मजबूत होगा.

जांच अधिकारी आशुतोष कुमार ने मनीषा के परिजनों में उस के पापा सतेंद्र कुमार और भाइयों नरसी, मनदीप व शुभम से भी पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए.

(कथा पुलिस की जांच, पीडि़त व आरोपी पक्ष के बयान और ग्रामीणों द्वारा बताए गए तथ्यों पर आधारित है. कथा में मनीषा परिवर्तित नाम है)

 

Love Crime: प्रेम प्रसंग में टुकड़े – टुकड़े किया पति

Love Crime: चंदौसी शहर के जूता कारोबारी राहुल ने रूबी से लव मैरिज करने के बाद उसे हर तरह की सुखसुविधाएं दीं. लेकिन 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रूबी पति की आंखों में धूल झोंक कर 2-2 प्रेमियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी. प्यार में अंधी हो चुकी रूबी के इरादे एक दिन इतने खौफनाक हो गए कि….

रूबी की जिंदगी एक त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में फंस गई थी. वह प्रेमी अभिषेक व दूसरे प्रेमी गौरव और पति राहुल के बीच फंसी हुई थी. रूबी के लिए यह त्रिकोण नहीं, बल्कि 3 दिशाओं में बिखरा हुआ मन था. पति राहुल स्थिरता और परिवार में समन्वय  बनाए रखने के भ्रम के साथ परिवार को खुशहाल बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ था. इसी तरह उस की शादी के 15 साल बीत चुके थे. दूसरी तरफ अभिषेक, जो उस के पति और समाज में रूबी को बहन बता कर दिन में भैया रात में सैंया की कहावत को चरितार्थ कर रहा था. अपनी धनदौलत के सहारे रूबी की मस्त जवानी का इस्तेमाल कर रहा था. अभिषेक के साथ रूबी 15 साल पहले जैसे यौन आनंद लिए जाने में मस्त थी. अभिषेक बहुत समझदार था.

तीसरा आशिक गौरव ने कुछ महीने पहले इस कहानी में एंट्री की थी. वह जवानी के जुनून में इस तरह अंधा हो गया था, जैसे कि सांप केंचुली आने पर हो जाता है. रूबी से उस का संपर्क हुआ. इसी दौरान अभिषेक से भी मुलाकात हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. अभिषेक की तरह गौरव भी रूबी को बहन कहने लगा था और उस के बच्चे भी अभिषेक की तरह गौरव को भी मामा कहते थे. यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला संभल की सब से उन्नतशील तहसील चंदौसी का है. संभल के जिला बनने से पहले चंदौसी को ही जिला बनाने की मांग उठती रही थी. जिला होने के सभी मानक भी चंदौसी पूरे करती थी, लेकिन राजनीतिक खेल की वजह से संभल को जिला घोषित कर दिया गया था, लेकिन मुख्यालय काफी दूर बहजोई में बनाया गया.

चंदौसी की घनी आबादी के चुन्नी मोहल्ला में राहुल नाम का जूते का व्यापारी रहता था. वैसे यह इलाका जूतों के निर्माण के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसी चुन्नी मोहल्ले में 40 वर्षीय राहुल कुमार अपनी पत्नी रूबी (39 साल) 12 साल की बेटी और 10 साल के बेटे के साथ रह रहा था. राहुल एक मेहनती जूता व्यापारी था, सुबह से शाम तक कारीगरों से जूते बनवाता था. जूतों को राहुल थोक दुकानदारों को सप्लाई करता था. भागतेदौड़ते हुए भी वह जब भी घर लौटता, रूबी और दोनों बच्चों का चेहरा देख कर सारे दिन की थकान भूल जाता था. उस के चेहरे पर हमेशा संतोष की मुसकान रहती. रूबी, उस की पत्नी, घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. कभीकभी वह राहुल के बिजनैस में भी मदद कर दिया करती थी.

प्रेमिका के साथ मिलकर उसके पति की जान लेने वाला आरोपी

रूबी की आंखों में एक खालीपन था, एक ऐसी तन्हाई जो शादी के बंधन में भी उसे घेर लेती थी. राहुल का प्यार सच्चा था, लेकिन उस का जीवन बिजनैस की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि रूबी की भावनाओं को छूने का समय ही नहीं मिलता.

रूबी से हुआ प्यार

राहुल मूलरूप से संभल जिले के ही रजपुरा थाना क्षेत्र के गंवा कस्बे के रहने वाले जसवंत का इकलौता बेटा था. जसवंत के 4 बच्चे हुए, जिस में एक बेटा राहुल और 3 बेटियां हैं. राहुल के चाचा, ताऊ और बाकी रिश्तेदार वहीं रहते हैं. गवां कस्बे में रहने वाले राहुल के चाचा नेकराम बताते हैं कि राहुल जब केवल 15 साल का था, तभी उस के मम्मीपापा का बीमारी के चलते कुछ ही अंतराल में निधन हो गया.

घर संभालने के लिए राहुल ने राजमिस्त्री का काम शुरू कर दिया. पहले राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था. फिर धीरेधीरे काम सीख कर राजमस्त्री बन गया. बाद में इस ने टाइल्स लगाने का भी काम सीखा. राहुल ने मेहनत कर के परिवार को आगे बढ़ाया. बहनों की शादी की. काम के चलते इसे अलगअलग जगहों पर जाना पड़ता था. उसी बीच इस की मुलाकात चुन्नी मोहल्ले की रहने वाली रूबी से हुई.

चंदौसी के चुन्नी मोहल्ले में उस सुबह धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी थी. गली के कोने पर बन रहे नए मकान में राजमिस्त्री राहुल अपने औजार संभालते हुए काम पर लग चुका था. सिर पर गमछा बंधा था. हाथों में सीमेंट की महक आ रही थी. आंखों में अपने भविष्य के छोटेछोटे सपने थे. राहुल रोज की तरह ईमानदारी से काम कर रहा था. एक दिन मकान के आंगन से अचानक चूडिय़ों की हलकी सी खनक सुनाई दी. राहुल ने नजर उठाई. सामने खड़ी थी मकान मालिक की बेटी. सादे सूट में, खुले बालों और शांत आंखों वाली रूबी किसी सुबह की तरह ताजा लग रही थी. वह पानी का गिलास ले कर आई थी और संकोच से बोली, ”मिस्त्री साहब, पानी पी लीजिए.’’

राहुल ने पहली बार उसे देखा. जवान रूबी की सुंदरता ऐसी थी, जैसे किसी हलकी सुबह की पहली किरण जो धीरेधीरे पूरे आकाश को रंग दे देती हो. उस का चमकदार लाल कुरता, भरे गांव की पृष्ठभूमि में खिला कोई ताजा फूल सा सुंदर लग रहा था. गले के पास की खूबसूरत कढ़ाई उस के व्यक्तित्त्व की कोमलता को और उभार दे रही थी.

उस के कंधों तक बिखरे हलके घुंघराले बाल हवा के हर झोंके के साथ नाच उठते, जैसे बचपन की शरारतें अब भी उस के साथ खेल रही हों. उस की चाल में न तो शहर की बनावट थी, न ही किसी संकोच की दीवार. बस, आत्मविश्वास और सहजता की हलकी सी मुसकान थी, जो अनजाने में देखने वालों के मन में जगह बना लेती.

देखने में वह किसी फिल्मी दृश्य की हीरोइन लग रही थी. जवान रूबी के सपने उस की आंखों से झलक रहे थे, जैसे हर कदम के साथ वह भविष्य की नई कहानी बुन रही हो. रूबी ने फिर कहा, ”लो मिस्त्री साहब, पानी पी लो.’’

उस पल सब कुछ ठहर सा गया. उस ने मुसकरा कर पानी लिया. बस उसी एक पल में दोनों के दिल में जैसे कोई हलकी सी 2 दिलों को जोडऩे वाली प्रेम रेखा खिंच गई. दिन बीतते गए. राहुल ईंटों की दीवारें खड़ी करता और रूबी  कभीकभी उसे काम करते देखती. कभी चाय ले कर आ जाती, कभी घर के किसी काम का बहाना बन जाता. बातों का सिलसिला छोटा होता, पर आंखों में कहानियां लंबी होने लगीं.

धीरेधीरे रोज की मुलाकात छोटी बातों में बदलने लगी. पानी देना, चाय लाना या बस मुसकराना. राहुल को महसूस हुआ कि उस के भीतर का दिल रूबी पर आ गया है. राहुल को अपनी हैसियत का पूरा एहसास था. वह एक राजमिस्त्री था, रोज की मजदूरी पर जीने वाला. वहीं रूबी एक अच्छे घर की पढ़ीलिखी लड़की थी. फिर भी दिल ने बारबार दिमाग को चुप करा दिया. रूबी को राहुल की सादगी, उस का सम्मानपूर्ण व्यवहार और मेहनत भरी ईमानदारी अच्छी लगने लगी. उसे लगा कि यह आदमी दीवारें ही नहीं, भरोसा भी मजबूती से खड़ा करता है.

एक शाम जब काम खत्म हो चुका था और आसमान हलका गुलाबी हो चला था, रूबी ने हिम्मत कर के कहा, ”राहुल, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

राहुल कुछ पल चुप रहा. फिर बोला, ”रूबी, मैं बहुत साधारण हूं, पर दिल सच्चा है.’’

बस वही सच था, जिस ने दोनों को और करीब ला दिया.

यह प्यार चुपचाप पनपा. बिना शोर, बिना दिखावे के ईंट, सीमेंट और धूल के बीच 2 दिलों ने एकदूसरे के लिए जगह बना ली. मकान बन कर तैयार हो गया, लेकिन राहुल और रूबी के दिलों में जो निर्माण हुआ था, वह कहीं ज्यादा मजबूत था. चुन्नी मोहल्ले की उस गली में आज भी लोग उस मकान को देखते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उस की नींव में कहीं न कहीं रूबी की प्रेम कहानी भी गड़ी हुई है. दोनों का इश्क परवान चढ़ा. 2025 के हिसाब से देखें तो 15 साल पहले यानी कि 2010 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया.

इस चुन्नी मोहल्ले में रूबी का जहां मायका है, इसी गली में थोड़ा आगे कुछ घर छोड़ कर रूबी के राहुल ने भी यहां एक प्लौट खरीद कर मकान बना लिया. राहुल के घर और रूबी के मायके के बीच की गली मात्र 4 फीट चौड़ी है. गांव छोड़ कर कुछ सालों बाद ये लोग इस संकरी गली में बने मकान में रहने लगे.

दिल में बसा गौरव

एक दिन बारिश की झमाझम में रूबी बाजार से सब्जियां ले कर लौट रही थी. उस की साड़ी हलकी सी भीग चुकी थी और वह जल्दीजल्दी घर की ओर बढ़ रही थी, तभी मोहल्ले का युवक गौरव उसे देख कर रुक गया. उस ने अपनी छतरी रूबी की ओर बढ़ाई और मुसकराते हुए कहा, ”भाभीजी, भीग जाएंगी. लीजिए, मेरी छतरी ले लीजिए. मैं तो घर के पास ही हूं.’’

रूबी ने हिचकिचाते हुए छतरी ली, लेकिन उस की आंखों में गौरव की उस छोटी सी मदद ने एक अनजानी चिंगारी जला दी. अगले दिन रूबी ने छतरी लौटाने के बहाने गौरव के घर पर जाना तय किया. छतरी ले कर जा ही रही थी कि रास्ते में उसे गौरव मिल गया. वह बोला, ”अरे भाभीजी, आप ने क्यों कष्ट किया. छतरी लेने मैं ही घर आ जाता. इस बहाने से एक कप चाय भी मिल जाती.’’

रूबी ने कहा, ”अब तो यह अपनी छतरी संभालो. चाय के लिए फिर किसी दिन आ जाना, मेरा दरवाजा आप के लिए हमेशा खुला मिलेगा.’’

यह बस 2-3 मिनट की औपचारिक बातचीत थी, मगर रूबी को चलतेचलते लगा जैसे किसी ने लंबे सूखे दिन के बाद जरा सा पानी छिड़क दिया हो. एक दिन गौरव उस के घर पहुंच गया. रूबी घर में बिलकुल अकेली थी, उसी समय अचानक अभिषेक भी वहां आ गया. दोनों उस समय चाय पी रहे थे. रूबी ने गौरव से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा मुंह बोला भाई अभिषेक है. फिर गौरव की तरफ इशारा करते हुए रूबी ने कहा कि यह गौरव है. ये मोहल्ले में ही रहता है. मुझे बहन मानता है.

दोनों की यह पहली मुलाकात थी. उस के बाद अकसर रूबी के घर या बाहर भी कभीकभी कहींकहीं दोनों मिल जाया करते थे. औपचारिक बातचीत के साथसाथ उन दोनों में दोस्ती भी हो गई. रूबी की कोशिश रहती कि एक बार में उस के घर एक ही व्यक्ति से मुलाकात हो. दोनों एकदूसरे पर भरोसा भी करते थे. दिलचस्प बात यह कि इन दोनों के मन में कहीं न कहीं शक भी पनप रहा था कि भाई है या मेरी तरह आशिक. कुछ ही मुलाकातों में गौरव और रूबी एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

राहुल को गौरव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक दिन राहुल बाजार से घर पर आया. उस समय रूबी के साथ गौरव बैठा चाय पी रहा था. स्थिति बहुत आपत्तिजनक  तो नहीं थी, लेकिन शक पनप जाने के लायक काफी थी.

यह नजारा देख कर राहुल का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. इस से पहले कि वह कोई सवाल करता, गौरव ही बोल पड़ा, ”दीदी, चाय में तो मजा आ गया.’’

यह सुन कर राहुल सामान्य हो गया. 2-4 बातें गौरव से भी हुईं. फिर गौरव रुबी दीदी राहुल जीजा को नमस्ते कर के चला गया. चाय की इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात में रूबी ने गौरव से कहा कि उस दिन तुम्हारा स्टेप शानदार रहा, जिस से राहुल का गुस्सा शांत हो गया. नहीं तो यह हमारे बीच का प्यार परवान नहीं चढ़ पाता.

धीरेधीरे गौरव उस की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा, वह पूछता, ”भैया की दुकानदारी कैसी चल रही है? सीजन में तो जूते की अच्छी मांग होगी?’’

रूबी को यह अच्छा लगता कि कोई तो है जो उस के पति के बिजनैस के बारे में इतनी तल्लीनता से पूछ रहा है. बस धीरेधीरे दोनों की बातें, दोनों की आदतें और दोनों की बेचैनियां एकदूसरे में घुलने लगीं. राहुल मेहनती था, पर बिजनैस की चिंता, कर्ज की किस्तें और बढ़ता हुआ खर्च उस के स्वभाव को चिड़चिड़ा बना रहे थे. घर पर उस की बातचीत ज्यादातर पैसों, बिलों और थके हुए तानों के बीच उलझ जातीं. रूबी के दिल में कहीं यह बात बैठ गई कि उस की मुसकराहट अब पति के लिए जरूरी नहीं रही.

रूबी और गौरव दोनों को समझ में आ गया कि जो रिश्ता उन के बीच बन चुका है, वह नाम के बंधन से परे, दिल की गहराई में जड़ें जमा चुका है. एक दिन मौका पाते ही 2 जिस्म एक जान हो गए. फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा.

दोनों पकड़े गए रंगेहाथ

जब कभी राहुल बिजनैस के काम से बाजार चला जाता, गौरव घर आ जाता. बच्चे स्कूल में होते. दोनों मौजमस्ती करते. अभिषेक से भी ज्यादा आनंद वह गौरव के साथ महसूस कर रही थी. शाम का वक्त था. राहुल ने अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दबाजी में कहा, ‘मैं बाजार जा रहा हूं, कल शाम तक लौटूंगा’, इतना कह कर वह निकल गया. बच्चे सो चुके थे. घर में अब सिर्फ रूबी थी. उस ने तुरंत फोन कर के गौरव से घर आने को कहा.

मौके का फायदा उठाने के लिए गौरव रूबी के घर पहुंच गया.

”कितनी देर लगाई आज?’’ रूबी ने हलके से ठहाका लगाते हुए कहा.

पति की हत्यारोपी रूबी को पुलिस में ले जाते हुए 

”बाजार गया था, वहां ट्रैफिक में फंस गया था,’’ गौरव ने आतेआते अपनी शर्ट का एक बटन खोल दिया और उस के पास पहुंच कर उस की कमर में हाथ डाल दिया.

”अब सजा सुनाओ, कितना इंतजार करवाया?’’ रूबी ने भी उस के गले में बांहें डाल दीं.

”सजा तो बहुत कुछ बाकी है. पहले तो यह सजा पूरी करो.’’ गौरव ने उसे दीवार से सटा दिया.

रूबी की सांसें तेज हो गईं. उस ने गौरव के होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया. एक ऐसी भूख के साथ, जो सालों से दबी हुई थी. 15 साल पहले राहुल के साथ भी ऐसे ही पल आते थे, पर वो जल्दी खत्म हो जाते. अब कमरे में सिर्फ सांसों की आवाज थी. दोनों एकदूसरे में खोए हुए थे. ऐसे जैसे दुनिया में सिर्फ यही 2 लोग बचे हों. जल्दबाजी में वे दरवाजा बंद करना भी भूल गए थे. तभी अचानक राहुल आ गया.

राहुल हुआ लापता

दरअसल, राहुल को पूरा शक हो गया था कि उस की पत्नी गौरव के साथ रंगरलियां मनाती है, इसलिए वह जाने का बहाना कर के घर में ही अपने गोदाम में छिप गया था. यही घटना राहुल की हत्या का सबब बन गई. रूबी ने अपने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर अपने पति राहुल की हत्या की ऐसी योजना बनाई कि एक महीने तक पता ही नहीं चल सका कि राहुल कहां चला गया. उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

शायद कभी पता चलता भी नहीं, लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक हो, कोई न कोई ऐसा क्लू पुलिस के हाथ लग ही जाता है. फिर जमीन की तह से भी पुलिस अपराधी को खोज लेती है. राहुल ने राजमिस्त्री के काम से हट कर जूतों के कारोबार में कदम रखा था. घर से ही यह काम शुरू किया. वह अलगअलग जगहों पर जूते सप्लाई करता था. उस ने देहरादून में भी एक किराए की जगह ले रखी है. वहां भी बिजनैस को बढ़ा रहा था. देहरादून एक पर्यटक स्थल है.

कभीकभी वहां सैलानी बहुत बड़ी संख्या में आ जाते हैं, जिस के कारण होटल में ठहरने को जगह भी नहीं मिल पाती थी. इसलिए राहुल ने किराए पर एक कमरा ले लिया था. बिजनैस के सिलसिले में उस का हमेशा घर से बाहर आनाजाना लगा रहता. अभी कुछ दिन पहले राहुल की बुआ की बेटी की शादी थी. राहुल को शादी की तैयारी के लिए जाना था. इस के अलावा उसे कुछ खरीदारी भी करनी थी. 18 नवंबर, 2025 को उस ने अपनी पत्नी रूबी से कहा, ”मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं, कल तक लौट आऊंगा.’’

18 नवंबर का पूरा दिन बीत गया. 19 नवंबर आया, पर राहुल घर नहीं लौटा. पत्नी और बच्चे इंतजार कर रहे थे. हालांकि वो काम की वजह से कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. यह नौरमल बात थी, इसलिए बच्चों को उतनी चिंता नहीं थी. 20 नवंबर आया. बेटा और बेटी भी मम्मी से पापा के बारे में पूछ रहे थे. बेटी के अनुसार पापाजी का मोबाइल फोन कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था. कभी औन रहता तो कभी स्विच्ड औफ हो जाता.

शायद बैटरी खराब हो गई होगी. बच्चों के जिद करने पर रूबी ने जब पति को कौल किया तो उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कुछकुछ देर बाद और ट्राई किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ ही मिला. बेटी ने बताया कि पापा अपने फूफा के घर भी जाने वाले थे. हो सकता है कि काम पूरा करने के बाद वहीं चले गए हों. शादी के सामान की खरीदारी करवानी थी.

अब फूफा को कौल किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल तो यहां पर आया ही नहीं. बारीबारी से पत्नी कभी बच्चे बाकी रिश्तेदारियों में कौल करते रहे, लेकिन राहुल का कहीं कुछ पता नहीं चला. इसी तरह एक दिन और बीत जाता है. अब रूबी ने फैसला किया कि राहुल जहां भी काम के सिलसिले में जाते थे, वहां जा कर पता करेगी. इस के बाद रूबी बच्चों के खुद पति की खोज में निकल गई. 22 नवंबर, 2025 को यह देहरादून के उस किराए वाले मकान में भी पहुंच गई, जहां राहुल का अकसर आनाजाना होता था.

रूबी ने मकान मालिक से बात की. अभी तक 4 दिन बीत चुके थे. मकान मालिक ने कहा कि राहुल तो यहां पर कई दिनों से नहीं आए. समझ नहीं आ रहा था कि राहुल कहां चला गया. अंत में थकहार कर रूबी ने 24 नवंबर, 2025 को कोतवाली चंदौसी में पति के लापता होने की सूचना दर्ज कराई. पुलिस ने उस की हर एक डिटेल ली. राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस की जानकारी आसपास के दूसरे थानों में भी भिजवा दी.

ऐसे ही इस का भाई जुगनू है. उस के खिलाफ चंदौसी कोतवाली में कई मामले दर्ज हैं. जो चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के मामले बताए गए हैं. वह वर्तमान में मुरादाबाद जेल में बंद है. भाई के कारनामों में बहन रूबी का भी दखल रहता था. बताते हैं कि जब पुलिस जुगनू को पकडऩे के लिए जाती तो रूबी पुलिस से उलझ जाती थी. आसपास के लोग भी रूबी से दूरी बना कर रखते, इस डर से कि कब किस पर झूठा केस कर दे. रूबी कोई आम सुंदरी नहीं थी.

रूबी एक हेकड़ और दबंग महिला थी. बताते हैं कि साल 2016 में राहुल का अपने गांव में जमीन को ले कर विवाद हो गया था. उस समय रूबी अपने पति के साथ गांव के ही मकान में रहती थी. तब रूबी ने मोर्चा संभाला और विरोधियों को धूल चटाई थी. रूबी ने गांव के 3 लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए रजपुरा थाने में केस दर्ज करवाया था. इस में एक पिता, बेटा और भतीजे को नामजद कराया गया था. वह झगड़ा तो शांत हुआ. गांव के लोगों ने फैसला करा दिया था. नामजद लोगों को इस के लिए भरी पंचायत में माफी मांगनी पड़ी थी. ऊपर से रूबी ने उन तीनों से केस वापस लेने के लिए भारीभरकम रकम भी वसूल की थी.

घटना से करीब डेढ़ महीने पहले चंदौसी के सैनिक चौराहे के पास एक जमीन खाली कराने के लिए रूबी अपने प्रेमी अभिषेक के लिए मैदानेजंग में उतर आई थी. रूबी की हिम्मत, हौसला और तेवर देख कर विरोधी घबरा गए और उन्हें जमीन छोड़ कर भागना पड़ा था. रूबी के कारण ही प्रेमी अभिषेक को मोटी रकम का फायदा हुआ था.

बदले में रूबी को खुश करने के लिए अभिषेक ने भी अच्छीखासी रकम रूबी को दी थी. ऐसे ही विवाद का एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस में रूबी ने अभिषेक और गौरव के साथ मिल कर हंगामा किया था. उस समय उस का पति राहुल भी साथ था. इस की एक तसवीर भी वायरल हो रही है, जिस में रूबी को अपने दोनों प्रेमी और  पति के साथ कहीं पर हंगामा करते हुए देखा जा सकता है.

इसी तरह के कई अन्य विवादों में रूबी चंदौसी, रजपुरा, बनियाठेर थानों में लगभग 6-7 केस दर्ज करवा चुकी है. कुछ महीने पहले अभिषेक, रूबी और गौरव नैनीताल घूमने गए थे. वहां एक होटल में इन्होंने रात्रि विश्राम किया था. दोनों का टारगेट यह था कि इन में से कोई एक भी किसी काम से बाहर चला जाए तो दूसरा रूबी के साथ अपने प्रेम का टारगेट पूरा कर ले. शक तो दोनों को एकदूसरे पर हो ही गया था. यह सब आजमाने के लिए अभिषेक होटल से कोई बहाना कर के बाहर गया.

गौरव समझा 1-2 घंटे में तो घूम कर वापस आएगा, लेकिन अभिषेक कुछ ही मिनट बाद जैसे ही होटल के कमरे में घुसा, उस ने रूबी और गौरव को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उस समय उस ने गौरव से तो कुछ नहीं कहा, ऐसा बन गया जैसे उस ने कुछ देखा ही न हो. उस दिन के बाद से वह धीरेधीरे उन दोनों से किनारा करने लगा.

लाश के मिले टुकड़े

रूबी अब गौरव पर पूरी तरह से फिदा थी. इसलिए अभिषेक रूबी की प्रेम कहानी से बाहर हो गया और उस का संपर्क रूबी और गौरव दोनों से ही टूट गया. धीरेधीरे समय बीत रहा था. लेकिन राहुल का कुछ अतापता नहीं था. सभी लोग काफी चिंतित थे. अब दिन हफ्तों में बदलने लगे. 3 हफ्ते गुजर गए. सब की उम्मीद भी अब दम तोड़ चुकी थी. 27 दिन बाद यानी 15 दिसंबर, 2025 को राहुल के घर से करीब 800 मीटर दूर पतरौआ रोड है. यहीं पर एक ईदगाह स्थित है. इसी के पास रोड के साइड से एक नाला गुजरता है.

यह इलाका काफी सुनसान रहता है. आसपास खेतखलिहान है. कोई सीसीटीवी कैमरा भी दूरदूर तक नहीं है. सुबह के करीब 9 बजे के आसपास कुछ लोग इसी रास्ते से गुजर रहे थे. उन्होंने देखा कि नाले के पास काफी सारे कुत्ते इकट्ठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं. एकदूसरे पर भौंक रहे हैं और किसी चीज को ले कर छीनाझपटी भी कर रहे हैं. उन के पास एक बड़ा सा पौलीथिन बैग पड़ा था, जिस में कुछ भारीभरकम चीज रखी हो.

उस में से काफी तेज गंध भी आ रही थी. मामला संदिग्ध लगा तो एक व्यक्ति ने पुलिस कंट्रोल रूम का 112 नंबर डायल कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना चंदौसी कोतवाली में दे दी गई. सूचना मिलते ही कोतवाल अनुज तोमर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह 15 दिसंबर, 2025 की बात है. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां 2 टूरिस्ट बैग नाले में पड़े थे. एक को कुत्तों ने फाड़ दिया था, जिस में से मानव बौडी के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. जब खोला गया तो उस में से किसी आदमी का धड़ वाला भाग निकला. इस का हाथ, पैर, सिर सब कुछ गायब था.

पुलिस को दूसरे बैग के अंदर कुछ और भी सामान और एक पौलीथिन मिली. सामानों में ब्लैक और ग्रीन कलर की एक टीशर्ट थी. इस पर खून के धब्बे भी थे. एक अंडरवियर भी मिला और पौलीथिन में बायां हाथ अच्छे से सील पैक था, जिस वजह से नाले में पड़े रहने के बावजूद भी उस में पानी प्रवेश नहीं कर सका. शायद इस की बदबू बाहर न आ जाए, इस वजह से पैक किया हो. दिखने में लाश के ये अंग कई हफ्ते पुराने लग रहे थे. फोरैंसिक टीम को सूचित कर दिया गया.

फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य इकट्ठा करने शुरू कर दिए. इतनी देर में आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी जुटने लगे. पुलिस ने यहीं आसपास और भी छानबीन की. शायद और भी शरीर का हिस्सा भी मिल जाए. काफी तलाश के बाद भी सिर और शरीर के बाकी अंग कहीं नहीं मिले. घटनास्थल के फोटोग्राफ लिए गए और वीडियो भी बनाई गई. पुलिस द्वारा बरामद शरीर और बरामद कपड़ों को दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की गई.

कटर से काटी लाश

फोरैंसिक जांच के दौरान पुलिस को बहुत सारी चीजें पता चलीं. ऐसा लगा जैसे आराम से घटना अंजाम दी गई है. पूरी सफाई के साथ शरीर के टुकड़े किए गए. शरीर को काटने में तेजधार हथियार नहीं, बल्कि किसी मशीन का इस्तेमाल किया गया. 16 और 17 दिसंबर, 2025 तक यानी 2 दिन लगातार पुलिस की टीमें बौडी के विभिन्न अंगों को तलाश करती रहीं. पुलिस की कोशिश थी कि किसी तरह से सिर बरामद हो जाए तो मृतक की पहचान हो सके.

कोतवाल अनुज कुमार तोमर लगातार केस की जांच कर रहे थे. घटनास्थल पर बैग में जो हाथ मिला था, पुलिस द्वारा उस का ध्यान से निरीक्षण किया तो उस पर एक टैटू नजर आया. हाथ के बीच में ‘राहुल’ नाम लिखा हुआ था. अब राहुल कौन हो सकता है? राहुल या तो इस का ही नाम होगा या फिर इस के किसी करीबी का. उधर पुलिस की टीमें थाने में ऐसी पुरानी फाइल्स खंगाल रही थीं, जिन की गुमशुदगी लिखाई गई हो. चंदौसी थाने में ही एक केस फाइल मिला जूता कारोबारी राहुल कुमार का. 18 नवंबर, 2025 से गायब था. उस की गुमशुदगी उस की पत्नी रूबी द्वारा लिखाई गई थी.

पुलिस ने रूबी को बुला कर बरामद कपड़े व लाश के टुकड़े दिखाए. रूबी ने सब कुछ देख कर अपने पति के अवशेष होना स्वीकार नहीं किया. साफ इनकार कर दिया. थकहार कर पुलिस ने 18 दिसंबर, 2025 को लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस का सब से पहला काम था मृतक की पहचान पता करना. पुलिस के पास तो कोई ऐसी निशानी भी नहीं थी. अब पुलिस को शक हो चला था कि यह लाश राहुल की ही हो सकती है. क्योंकि एक तरफ तो राहुल गुमशुदा था और दूसरी तरफ लाश की बांह पर भी ‘राहुल’ के नाम का टैटू बना हुआ था.

जनपद संभल के थाना चंदौसी क्षेत्र में 24 नवंबर, 2025 को रूबी नाम की एक महिला ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद रूबी ने कभी पुलिस से कोई कौंटेक्ट नहीं किया, न ही उच्च अधिकारियों से शिकायत की कि पुलिस उस के पति को ढूंढने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए पुलिस का शक अब यकीन में बदलता जा रहा था, लेकिन कोई सबूत हाथ में आने से पहले वह रूबी पर हाथ डालना नहीं चाहती थी.

पुलिस ने लापता राहुल के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. पता चला कि राहुल का मोबाइल फोन घर पर ही 18 नवंबर, 2025 से ही स्विच औफ दिख रहा था. 19 दिसंबर, 2025 को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. पुलिस को राहुल की पत्नी रूबी पर शक हो रहा था. 20 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने रूबी से फिर पूछताछ की. उस के बात करने का तरीका अजीब था. जैसे कि वह जानबूझ कर दुखी होने का नाटक कर रही हो. जांच के दौरान पुलिस ने रूबी से उस का मोबाइल फोन मांगा, लेकिन वह मोबाइल  देने से इंकार कर रही थी.

पुलिस को मना करने की वजह भी नहीं बता रही थी. डांटडपट कर पुलिस ने मोबाइल लिया और इस की जांच की. सारे फोटोज, कौल डिटेल्स, चैटिंग सब कुछ चैक किया गया. इसी में ही रूबी के पति राहुल के साथ अलगअलग समय में लिए गए अनेक फोटो मिले. उसी दौरान पुलिस को 2 फोटो ऐसे मिले, जिन्होंने इस केस की परतें प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी. एक फोटो में राहुल वही टीशर्ट पहने दिखा, जो नाले के पास बैग में मिली थी.

जब पुलिस ने बरामद टीशर्ट रूबी को दिखाई थी तो उस ने उसे पहचानने से क्यों इंकार किया? मान लें कि वह कोई दूसरा टीशर्ट हो, किसी और का हो, फिर भी यह बोल सकती थी कि राहुल के पास ऐसा ही टीशर्ट है. पर उस ने बिलकुल ही पहचानने से मना कर दिया था.

पत्नी निकली कातिल

पुलिस ने थोड़ा ध्यान से देखा तो फोटो में राहुल के हाथ पर उस के नाम का टैटू गुदा था. इस से पुलिस को विश्वास कि नाले से बरामद लाश के टुकड़े राहुल के ही थे. इस से साफ हो गया कि रूबी अपने पति राहुल की गुमशुदगी और मौत को ले कर झूठ बोल रही है. अब पुलिस ने रूबी से अपने अंदाज में पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में रूबी सच बोलने के लिए मजबूर हो गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने पति राहुल की हत्या कराई थी. उस ने इस हत्याकांड की एक हृदयविदारक स्टोरी सुनाई.

18 नवंबर की रात को जब राहुल घर पर नहीं था. रूबी ने गौरव को अपने घर बुला लिया. रूबी को पता नहीं था कि वह कहीं गया नहीं है, घर में ही छिपा है. राहुल को मौके का इंतजार था. प्यार के नाम पर वासना का खेल शुरू होते ही राहुल अंदर आया. दरवाजा खुला था. क्योंकि दोनों इतने खोए हुए थे कि चिटकनी लगाना भी भूल गए थे. राहुल को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया.

एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई

उस की आंखें पहले रूबी पर टिकीं, जो अब तक चादर से जिस्म ढकने की कोशिश में सीने से लगाए बैठी थी. बाल बिखरे, होंठ कांपते हुए. फिर गौरव पर, जो बिस्तर के किनारे खड़ा था, हाथ में चादर का कोना पकड़े, लेकिन शरीर अभी भी नंगा था. राहुल का चेहरा पहले सफेद पड़ गया, फिर लाल. उस की आंखों में कुछ ऐसा था नफरत, सदमा, धोखा और शायद एक पल के लिए दया भी. वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था.

सन्नाटा तोड़ते हुए आवाज आई, ”राहुल…’’ यह कांपती आवाज रूबी की थी, ”तुम… तुम इतनी जल्दी?’’

राहुल ने जवाब नहीं दिया. उस ने बस एक बार फिर दोनों को देखा, जैसे कोई तसवीर देख रहा हो, जो कभी भूलना नहीं चाहता. फिर बिना एक शब्द बोले, वह मुड़ा. उस के कदम भारी थे. दरवाजे तक पहुंच कर वह रुका. पीठ फेर कर बोला, कपड़े पहन ले. वह आक्रोश से बुरी तरह तमतमा रहा था. फिर उस ने रूबी को बुरी तरह पीटा और सरेबाजार उस का जुलूस निकालने की धमकी दी.

कोतवाल अनुज तोमर

बस इसी से पगलाई रूबी ने गौरव को इशारा किया. गौरव ने लोहे की रौड उठा कर राहुल के सिर में मार दिया. वह वहीं गिर गया. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. रूबी भी पति पर हमला करने की पोजीशन ले चुकी थी. उस ने हथौड़ा ले कर उस के सिर पर मारमार कर सिर कुचल दिया. इस तरह दोनों ने मिल कर राहुल का  कत्ल कर दिया और अगले दिन बाजार से इलैक्ट्रिक कटर मशीन ला कर घर में ही अपने पति की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर डाले.

पुलिस ने रूबी और गौरव की निशानदेही पर कत्ल और सबूत मिटाने में इस्तेमाल किए गए कटर मशीन, हथौड़ा, मोबाइल फोन और लोहे की रौड जैसी चीजों को भी अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने धड़ का हिस्सा और एक बांह तो बरामद कर ली थी, लेकिन राहुल का सिर और उस के बाकी के हाथपांव बरामद नहीं हुए. रूबी और गौरव ने उस की लाश के अन्य हिस्सों को एक कार में ले कर बहजोई बबराला होते हुए राजघाट पहुंचे. वहां से गुजर रही गंगा नदी में राहुल के शरीर के बाकी टुकड़ों को फेंक दिया, जो अब बह कर दूर जा चुके हैं. शायद नष्ट भी हो चुके हों.

इस पूरे हत्याकांड की भनक उन्होंने बच्चों तक को नहीं लगने दी. राहुल की बेटी पापा के मर्डर में मम्मी और गौरव के अलावा अभिषेक को भी आरोपी मान रही है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि अभिषेक के रूबी से संबंध विच्छेद हो चुके थे. वह इस कहानी से अलग था. इस का इस घटना में कोई रोल नहीं है. चंदौसी शहर के लिए इतनी निर्मम हत्या का यह पहला मामला बताया जा रहा है.

गौरव ने जिस दुकान से बैग खरीदे थे, उस दुकानदार का नाम विनोद अरोड़ा है. उसे भी यह जान कर बहुत दुख हुआ कि उस के बैग का इस्तेमाल एक निर्मम हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर के फेंकने के लिए किया गया. गौरव को कटर देने वाला व्यक्ति जितेंद्र उर्फ जीतू तो उस समय बिलखबिलख कर रोने लगा, जब पत्रकारों ने उस से कहा कि तुम ने कटर गौरव को क्यों दिया था. उसे इस बात का बहुत दुख हुआ कि लोहे का सरिया काटने वाला कटर मानव शरीर को काटने में इस्तेमाल किया गया.

एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने 22 दिसंबर, 2025 को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में घटनाक्रम का खुलासा किया. पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव व रूबी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Love Crime

 

 

Love Story: ये आदत आप के प्रेमी की तो नहीं

Love Story: 20 वर्षीय आकांक्षा उर्फ माही 25 वर्षीय प्रेमी सूरज उत्तम को अपना सब कुछ मान बैठी थी. तभी तो वह उस के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी, लेकिन सूरज कई अन्य लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था. प्रेमी की यह आदत प्रेमिका पर इतनी भारी पड़ी कि…

आकांक्षा उर्फ माही की रोजरोज की किचकिच से सूरज उत्तम परेशान था. वह उस पर शादी करने का दबाव डाल रही थी. शादी न करने पर माही ने उसे रेप के मामले में फंसाने की धमकी भी दे दी थी. सूरज की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस प्रौब्लम से बाहर कैसे निकले?

21 जुलाई, 2025 की सुबह 8 बजे 20 वर्षीय आकांक्षा कान्हा रेस्टोरेंट जाने को घर से निकली तो सूरज फोन पर बात कर रहा था. आकांक्षा को शक हुआ कि वह अपनी किसी गर्लफ्रेंड से बतिया रहा है. उस ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दोपहर को फोन कर सूरज को कान्हा रेस्टोरेंट बुला लिया.

सूरज ने अपना मोबाइल फोन टेबल पर रखा. फिर आमनेसामने बैठ कर दोनों बातें करने लगे. इसी समय सूरज की खास गर्लफ्रेंड का वीडियो कौल आया. इस कौल को आकांक्षा उर्फ माही ने देखा तो वह सूरज से झगडऩे लगी. माही को शक हुआ कि सुबह भी सूरज इसी से बात कर रहा था. वीडियो कौल को ले कर दोनों कुछ देर झगड़ते रहे, फिर सूरज वहां से चला गया.

रात 10 बजे सूरज कमरे पर आया तो गर्लफ्रेंड को ले कर दोनों के बीच फिर झगड़ा शुरू हो गया. आकांक्षा धमकी भरे लहजे में बोली, ”सूरज, एक बात कान खोल कर सुन लो. यदि तुम ने मुझे धोखा दिया और शादी नहीं की तो मैं रेप का केस दर्ज करा कर तुम्हें जेल भिजवा दूंगी. फिर ताउम्र जेल में ही रहोगे.’’

आकांक्षा का गुस्सा शांत करने के लिहाज से सूरज बोला, ”माही, मैं तुम्हारे सिवाय किसी और से प्यार नहीं करता. तुम बिना वजह मुझ पर शक कर रही हो.’’

”झूठ, सफेद झूठ. सच्चाई यह है कि तुम खेलते मेरे शरीर से हो और प्यार कहीं और लुटाते हो.’’ माही का गुस्सा और बढ़ गया.

”ऐसा नहीं है माही, मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं.’’ कहते हुए सूरज माही से प्यार जताने आगे बढ़ा.

तभी माही ने एक जोरदार तमाचा सूरज के गाल पर जड़ दिया और बोली, ”खबरदार! जो मेरे शरीर को छूने की जुर्रत की.’’

गाल पर तमाचा लगते ही सूरज तिलमिला उठा. उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह आपा खो बैठा और आकांक्षा पर लातघूंसे चलाने लगा. माही चीखी तो सूरज के हाथ उस की गरदन पर पहुंच गए. वह उस का गला कसने लगा. चंद मिनट बाद ही आकांक्षा उर्फ माही की सांसें थम गईं. प्रेमिका माही की हत्या के बाद सूरज घबरा गया. उस ने कानपुर के नौबस्ता में रह रहे अपने दोस्त आशीष को फोन कर सारी बात बताई और मदद मांगी. रात 11 बजे आशीष बाइक से सूरज के कमरे में आ गया.

दोनों ने आकांक्षा उर्फ माही का शव उस के काले रंग के ट्रौली बैग में पैक किया. इस के बाद बंद ट्रौली बैग को बाइक पर रखा और दोनों निकल पड़े. सूरज बाइक चला रहा था, जबकि आशीष पीछे की सीट पर ट्रौली बैग पकड़ कर बैठा. सूरज और आशीष रात के अंधेरे में कानपुर से बिंदकी, फतेहपुर होते हुए लगभग 132 किलोमीटर की दूरी तय कर रात 3 बजे बांदा के चिल्ला घाट यमुना पुल पर पहुंचे. फिर ट्रौली बैग को जिस में माही का शव था, उफनती यमुना नदी में फेंक दिया. उस के बाद दोनों वापस कानपुर आ गए.

आकांक्षा उर्फ माही का मोबाइल फोन सूरज के पास ही था. हत्या के बाद भी उस ने उस का मोबाइल फोन बंद नहीं किया था. विजयश्री अपनी बेटी माही के लिए बेहद परेशान थी. वह उसे बारबार कौल कर रही थी, लेकिन माही उस का कौल रिसीव ही नहीं कर रही थी. जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था, वैसेवैसे उस की चिंता भी बढ़ती जा रही थी.

22 जुलाई, 2025 की शाम विजयश्री की बात बड़ी बेटी प्रतीक्षा से तो हो गई थी, लेकिन छोटी बेटी आकांक्षा उर्फ माही से नहीं हो पा रही थी. उस के मोबाइल फोन की रिंग तो जा रही थी, लेकिन वह जवाब नहीं दे रही थी. देर रात विजयश्री ने अपनी चिंता से प्रतीक्षा को अवगत कराया तो उस ने बताया कि माही के फोन पर रिंग जा रही है, लेकिन वह फोन उठा नहीं रही है. यह पहला अवसर था, जब माही मांबहन में से किसी का फोन रिसीव नहीं कर रही थी, अत: विजयश्री घबरा उठी. किसी अनहोनी की आशंका से उस का दिल कांप उठा. जैसेतैसे करवट बदल कर उस ने वह रात बिताई, फिर सवेरा होते ही उस ने ट्रेन पकड़ी और कानपुर पहुंच गई.

प्रतीक्षा कानपुर के बर्रा क्षेत्र में किराए पर रहती थी. विजयश्री उस के रूम पर पहुंची. प्रतीक्षा ने मम्मी के सामने ही माही को कौल लगाई, लेकिन कौल रिसीव नहीं हुई.

तब प्रतीक्षा ने माही के फोन पर मैसेज भेजा, ‘माही, मम्मी रो रही हैं. तुम उन से बात क्यों नहीं कर रही हो.’

कुछ देर बाद माही के फोन से मैसेज आया, ‘बाद में बात करूंगी, अभी मैं ड्यूटी पर हूं.’

प्रतीक्षा ने फिर से मैसेज किया, ‘मम्मी ने पुलिस में शिकायत कर दी है. सूरज का नाम लिखा दिया है.’

इस का माही के फोन से तुरंत मैसेज आया, ‘सूरज का नाम क्यों लिखा दिया. मैं अपनी मरजी से अलग हुई हूं.’

आकांक्षा उर्फ माही नौबस्ता गल्ला मंडी स्थित ‘कान्हा रेस्टोरेंट’ में काम करती थी, अत: विजयश्री प्रतीक्षा के साथ माही का पता लगाने कान्हा रेस्टोरेंट पहुंची. रेस्टोरेंट मालिक ने बताया कि आकांक्षा से उस की फोन पर तो बात नहीं हुई, लेकिन उस ने मैसेज भेजा है कि उसे लखनऊ में जौब मिल गई है, इसलिए अब रेस्टोरेंट में काम नहीं कर पाएगी. मैसेज पढ़ कर मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया.

आकांक्षा उर्फ माही की एक खास दोस्त मंजू हंसपुरम में रहती थी. विजयश्री उस के घर पहुंची. मंजू ने बताया कि आकांक्षा ने उसे मैसेज भेजा था कि सूरज से ब्रेकअप कर वह लखनऊ आ गई है. मंजू ने कहा कि मैसेज पढऩे के बाद उस ने आकांक्षा से फोन पर बात करने का प्रयास किया था, लेकिन बात नहीं हो पाई. पता नहीं वह किन हालात से गुजर रही होगी. थकहार कर मांबेटी वापस आ गईं. देर रात विजयश्री ने अपने मोबाइल फोन से बेटी को मैसेज किया, ‘माही मुझ से बात करो. बहुत घबराहट हो रही है.’

इस का जवाबी मैसेज आया, ‘भैया, मैं बाद में बात करूंगी.’

इस मैसेज को पढ़ कर विजयश्री का माथा ठनका. वह जान गईं कि माही का फोन कोई दूसरा व्यक्ति चला रहा है. माही खतरे में है. दरअसल, विजयश्री जिस मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रही थी, उसे उस के बड़े बेटे ने खरीद कर दिया था.

माही ने मम्मी के मोबाइल फोन नंबर को अपने मोबाइल फोन में ‘भैया’ के नाम से सेव कर रखा था. माही अगर मैसेज भेजती तो भैया की जगह मम्मी के नाम मैसेज आता. इसी से उसे संदेह हो गया.

आकांक्षा उर्फ माही का प्रेमी था सूरज उत्तम. वह उसी के साथ लिवइन रिलेशन में रहती थी. प्रतीक्षा व उस की मम्मी ने सूरज उत्तम से फोन पर बात की और माही के बारे में पूछा. इस पर उस ने माही के बारे में कोई जानकारी होने से इंकार किया. उस के बाद सूरज उत्तम भी विजयश्री के साथ हो लिया और माही की तलाश में जुटा रहा. प्रतीक्षा और उस की मम्मी माही की तलाश करतेकरते थक गईं तो गुमशुदगी दर्ज कराने थाना नौबस्ता पहुंचीं, लेकिन वहां उन्हें यह कह कर टरका दिया गया कि उन की बेटी जिस कान्हा रेस्टोरेंट में काम करती थी, वह थाना हनुमंत विहार के अंतर्गत आता है.

यह जानकारी पा कर विजयश्री थाना हनुमंत विहार पहुंची. वहां उस ने एसएचओ राजीव सिंह को सारी बात बताई और बेटी की गुमशुदगी दर्ज करने की गुहार लगाई. इस पर उन्होंने कहा कि लड़की कुंवारी है. इज्जत का सवाल है. कुछ रोज और इंतजार कर लो. शायद वापस आ जाए. निराश हो कर तब विजयश्री वापस आ गई. धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया, लेकिन न तो माही का कुछ पता चला और न ही गुमशुदगी दर्ज हो पाई. इस के बाद विजयश्री पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार से मिली और गुमशुदा बेटी माही का पता लगाने की गुहार लगाई.

सीपी अखिल कुमार ने विजयश्री को आश्वासन दिया कि रिपोर्ट दर्ज कर उन की बेटी की खोज की जाएगी, लेकिन आश्वासन के बाद भी काररवाई नहीं हुई. इस के बाद विजयश्री ने महिला हेल्पलाइन नंबर 1090 पर कौल लगाई और मदद मांगी. इस पर विजयश्री फिर से थाना हनुमंत विहार पहुंची और एसएचओ राजीव सिंह से मिली. अब तक थाने पर फरमान आ चुका था, अत: बिना किसी हीलाहवाली के माही की गुमशुदगी की सूचना 8 अगस्त, 2025 को दर्ज कर ली गई. मामले की जांच एसआई सुशील कुमार को सौंपी गई.

लेकिन एसआई सुशील कुमार ने माही को खोजने का कोई प्रयास नहीं किया. विजयश्री जब भी दारोगा सुशील कुमार से माही के बारे में पूछती तो वह झल्ला कर कहता, ”तुम्हारी बेटी अपने किसी प्रेमी के साथ घूमने गई होगी. जल्द ही वापस आ जाएगी.’’

दारोगा का जवाब विजयश्री के मन में कांटे की तरह चुभता. परंतु वह मन मसोस कर लौट आती. पुलिस भले ही सुस्त थी, लेकिन विजयश्री बेटी की खोज में जुटी रही. वह जानकारी जुटाने उस मकान पर पहुंची, जहां उस की बेटी अपने प्रेमी सूरज के साथ रहती थी. मकान में कई किराएदार थे. विजयश्री ने किराएदारों से बेटी माही के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि माही को 21 जुलाई के बाद उन्होंने नहीं देखा. उस के साथ रहने वाला सूरज भी कमरा खाली कर माही का सारा सामान ले गया.

विजयश्री ने पूछा, ”क्या सूरज सामान ट्रौली बैग में भर कर ले गया?’’

इस पर किराएदारों ने बताया कि आकांक्षा जब आई थी, तब ट्रौली बैग था, लेकिन जब सूरज ने कमरा खाली किया, तब ट्रौली बैग नहीं था. सूरज द्वारा कमरा खाली करना और ट्रौली बैग न होने से विजयश्री का माथा ठनका. वह कमरे में पहुंची तो वहां अलमारी पर एक दीपक जल रहा था. दीपक जलता देख विजयश्री को शक हो गया कि उन की बेटी माही के साथ सूरज ने कोई अनहोनी कर दी है. वह जान गई कि माही के गायब होने का राज सूरज के पेट में ही छिपा है.

पुलिस की निष्क्रियता से परेशान विजयश्री ने तब मुख्यमंत्री हेल्पलाइन नंबर 1076 पर अपनी शिकायत दर्ज कराई. वहां से सख्ती बरती गई तब थाना हनुमंत विहार पुलिस सक्रिय हुई. यह मामला डीसीपी (साउथ) दीपेंद्र नाथ चौधरी के संज्ञान में आया तो उन्होंने एसएचओ राजीव सिंह को फटकार लगाई और जल्द से जल्द माही प्रकरण को सुलझाने का आदेश दिया. आदेश पाते ही राजीव सिंह जांच में जुट गए. उन्होंने कौल कर विजयश्री को थाने बुलाया और उन का बयान दर्ज किया. विजयश्री ने बयान में कहा कि सूरज के साथ उन की बेटी माही लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

उस की गुमशुदगी का राज उस के दिल में ही छिपा है. यदि उस से सख्ती से पूछताछ की जाए तो माही का पता चल सकता है. विजयश्री ने सूरज का मोबाइल फोन नंबर भी पुलिस को मुहैया करा दिया. इंसपेक्टर राजीव सिंह ने सूरज के फोन नंबर की कौल डिटेल्स तथा लोकेशन निकलवाई तो चौंकाने वाली जानकारी निकली. पता चला कि सूरज और माही के बीच हर रोज बात होती थी. 21 जुलाई, 2025 की दोपहर माही ने आखिरी बार सूरज से बात की थी.

सूरज की लोकेशन 21 जुलाई की रात को कानपुर से बिंदकी होते हुए बांदा की तरफ जाते दिखाई दे रही थी. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि माही के मोबाइल फोन की लोकेशन भी इस दरम्यान बांदा तक गई थी. 3 दिनों बाद उस का फोन बंद हो गया था. 15 सितंबर, 2025 की सुबह 10 बजे एसएचओ राजीव सिंह ने शक के आधार पर सूरज को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से 4 घंटे तक आकांक्षा उर्फ माही के बारे में पूछताछ की गई.

लेकिन सूरज लगातार यही बताता रहा कि किसी दूसरी गर्लफ्रेंड से बात करने को ले कर उस का माही से मामूली विवाद हुआ था. फिर वह घर से चली गई. उस के बाद उस की बात नहीं हुई. वह कहां है? किस के साथ है? उसे कुछ भी पता नहीं है. सूरज ने मुंह नहीं खोला तो एसएचओ राजीव सिंह उसे डीसीपी (साउथ) के औफिस ले गए. यहां डीसीपी दीपेंद्र नाथ चौधरी ने उस से पूछताछ की. तब उस ने साफ कह दिया कि उसे माही की कोई जानकारी नही है.

लेकिन जब उन्होंने सूरज के सामने उस के फोन की डिटेल्स रखते हुए सख्ती से पूछा तो वह घबरा गया और बोला, ”साहब, आकांक्षा उर्फ माही अब इस दुनिया में नहीं है. मैं ने उसे मार डाला है.’’

”क्याऽऽ तूने उसे मार डाला?’’ डीसीपी चौंक पड़े. फिर पूछा, ”लाश कहां है?’’

”साहब, माही की लाश को उसी के ट्रौलीबैग में भर कर कानपुर से 132 किलोमीटर दूर बांदा के चिल्लाघाट पुल से यमुना नदी में फेंक दी थी. लाश ठिकाने लगाने में मेरे दोस्त आशीष ने भी मदद की थी.’’

”तुम ने अपनी गर्लफ्रेंड माही की हत्या क्यों की?’’ डीसीपी चौधरी ने पूछा.

इस के बाद सूरज ने अपनी लिवइन पार्टनर की हत्या से ले कर उस की लाश ठिकाने लगाने तक की पूरी कहानी पुलिस को बता दी.

इस के बाद पुलिस ने सूरज की निशानदेही पर दबिश दे कर आशीष को भी उस के नौबस्ता स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने सहज ही जुर्म कुबूल कर लिया, लेकिन शव को ठिकाने लगाने में प्रयुक्त आशीष की बाइक को पुलिस बरामद नहीं कर पाई. दूसरे रोज पुलिस सूरज व आशीष को साथ ले कर बांदा के चिल्ला घाट यमुना पुल पर पहुंची. फिर 2 दिन तक माही के शव को बरामद करने के लिए सर्च औपरेशन चलाया, लेकिन यमुना उफान पर थी इसलिए शव बरामद नहीं हो पाया.

20 सितंबर, 2025 को डीसीपी (साउथ) दीपेंद्र नाथ चौधरी ने प्रैसवार्ता की और मीडिया के सामने आकांक्षा उर्फ माही की लव क्राइम स्टोरी का खुलासा किया. इस सनसनीखेज मामले का खुलासा करने में पुलिस को लगभग 2 महीने का समय लग गया. चूंकि दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: एसएचओ राजीव सिंह ने मृतका की मम्मी विजयश्री की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) के तहत सूरज तथा आशीष के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा दोनों को बाकायदा गिरफ्तार कर लिया.

आकांक्षा उर्फ माही कौन थी? वह सूरज के संपर्क में कैसे आई? सूरज ने उस की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए माही के अतीत की ओर चलते हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक चर्चित कस्बा है-रूरा. व्यापारिक कस्बा होने से यहां हर रोज चहलपहल रहती है. रूरा उत्तर रेलवे का बड़ा स्टेशन भी है. इसी रूरा कस्बे से 5 किलोमीटर दूर डेरापुर रोड पर एक गांव है-सुजनीपुर. इसी गांव में सुरेश उर्फ बच्चन लाल वर्मा रहता था. उस के परिवार में पत्नी विजयश्री के अलावा 2 बेटे सूरज व आदर्श तथा 2 बेटियां प्रतीक्षा व आकांक्षा थी.

सुरेश वर्मा के पास थोड़ी सी खेती की जमीन थी. वह मेहनतमजदूरी कर परिवार का भरणपोषण करता था. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण विजयश्री अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा न दिला सकी. बड़ा बेटा सूरज इंटरमीडिएट पास करने के बाद रूरा कस्बे में एक कपड़े की दुकान पर काम करने लगा. बात फरवरी 2022 की है. मियादी बुखार व पीलिया से सुरेश उर्फ बच्चन लाल की मौत हो गई. पति की मौत के बाद परिवार में आर्थिक प्रौब्लम आ गई. विजयश्री की बेटियां जवानी की दहलीज पर थीं. उसे उन के ब्याह की भी चिंता सताने लगी थी, लेकिन घर की माली हालत ऐसी थी कि वह उन के ब्याह के बारे में सोच भी नहीं सकती थी.

 

मम्मी की व्यथा को बड़ा बेटा सूरज भलीभांति समझता था. अत: वह दिल्ली चला गया. वहां वह किसी फैक्ट्री में काम करने लगा. कमाई का पैसा सूरज घर भेजने लगा तो विजयश्री को कुछ राहत मिलने लगी. कर्ज का पैसा भी चुकता करने लगी. एक परिचित के माध्यम से विजयश्री की दोनों बेटियों प्रतीक्षा व आकांक्षा की 20 जून, 2024 को कानपुर में बर्रा बाईपास पर स्थित ‘गुड फूड रेस्टोरेंट’ में नौकरी लग गई.

नौकरी लगने के बाद प्रतीक्षा ने बर्रा में राजेश गुप्ता के मकान में एक कमरा किराए पर ले लिया. इस कमरे में प्रतीक्षा छोटी बहन आकांक्षा उर्फ माही के साथ रहने लगी. दोनों बहनें साथ जातीं और साथ आतीं. मेहनत और लगन से काम करने से दोनों ने रेस्टोरेंट में पैठ बना ली.

प्रतीक्षा व आकांक्षा को सैलरी मिली तो दोनों ने मोबाइल फोन किस्तों में खरीद लिया. उधर सूरज जब दिल्ली से घर आया तो उस ने मम्मी को वह फोन दे दिया, ताकि वह सब से बात कर सके. सूरज ने दूसरा फोन खरीद लिया. आकांक्षा ने मम्मी के फोन नंबर को अपने फोन में भैया के नाम से सेव कर लिया. विजयश्री अब अकसर देर शाम बेटियों से बात करती और फिर निश्चिंत हो कर सो जाती.

इसी दौरान इंस्टाग्राम के माध्यम से आकांक्षा की दोस्ती सूरज उत्तम से हुई. दोस्ती प्यार में बदली और फिर उन के बीच चैटिंग होने लगी. चैटिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर शेयर किए, फिर उन के बीच मोबाइल फोन के जरिए भी खूब बातें होने लगीं. एक रोज आकांक्षा ने फोन कर सूरज को अपने गुड फूड रेस्टोरेंट बुलाया. सूरज कुछ देर बाद ही रेस्टोरेंट पहुंच गया. वहां पहली बार दोनों ने एकदूसरे को देखा.

20 वर्षीया खूबसूरत आकांक्षा उर्फ माही को देख कर सूरज उस का दीवाना बन गया. वहीं 25 वर्षीय सूरज को देख कर आकांक्षा को लगा कि यही उस के सपनों का राजकुमार है. वह भी उस की दीवानी बन गई. इस के बाद दोनों का प्रेम प्रसंग परवान चढऩे लगा. दोनों के बीच की दूरियां सिमटने लगीं. फिर एक रोज दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. आकांक्षा उर्फ माही सूरज के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी. सूरज उस पर पैसा खर्च करने लगा.

एक रोज बातचीत के दौरान माही ने सूरज से उस के घरद्वार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह फतेहपुर जिले के गांव हरीखेड़ा का रहने वाला है. पापा महानंद उत्तम किसान हैं. उस के 2 अन्य भाई कल्लू व अमन हैं, जो कैटरिंग का काम करते हैं. वह इलैक्ट्रिशियन है और हंसपुरम में रहता है. सूरज के बारे में जानने के बाद माही ने अपने बारे में सूरज को बताया. कुछ समय बाद सूरज आकांक्षा से मिलने उस के किराए वाले रूम पर आने लगा.

एक दिन प्रतीक्षा ने दोनों को मिलन करते देख लिया तो उस ने माही को फटकार लगाई. तब माही ने बताया कि वह और सूरज एकदूसरे से प्रेम करते हैं. उन की दोस्ती इंस्टाग्राम के जरिए हुई थी. वह सूरज से शादी कर उसे अपना जीवनसाथी बनाना चाहती है. माही के लव अफेयर की बात सुन कर प्रतीक्षा के होश उड़ गए. उस ने माही की प्रेम कहानी मम्मी विजयश्री को बताई तो वह परेशान हो गई. विजयश्री ने बेटी को बहुत समझाया, ऊंचनीच का पाठ पढ़ाया, लेकिन माही टस से मस नहीं हुई. उस ने दोटूक शब्दो में मम्मी से कह दिया कि वह सूरज से प्रेम करती है और उसी से ब्याह रचाएगी.

इधर सूरज उत्तम का माही के रूम में आनाजाना बढ़ा तो अन्य किराएदारों की शिकायत पर मकान मालिक राजेश गुप्ता ने सूरज के आने का विरोध किया. आकांक्षा ने सारी बात प्रेमी सूरज को बताई तो उस ने नौबस्ता की धोबिन पुलिया के पास प्रमोद तिवारी के मकान में कमरा किराए पर ले लिया. 11 जुलाई, 2025 को माही ने अपना सारा सामान ट्रौली बैग में भरा और सूरज द्वारा लिए गए किराए के कमरे में आ कर रहने लगी. सूरज भी उस के साथ रहने लगा. इस तरह दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

यही नहीं, सूरज उत्तम ने माही की नौकरी भी छुड़वा दी और नौबस्ता गल्ला मंडी स्थित कान्हा रेस्टोरेंट में नौकरी दिलवा दी. इस रेस्टोरेंट में सूरज इलैक्ट्रिशियन था. उस की मालिक से खूब पटती थी. साथ रहते आकांक्षा को चंद दिन ही बीते थे कि उसे पता चला कि सूरज के कई अन्य लड़कियों से भी प्रेम संबंध हैं. उन से वह छिप कर बातें करता है. उस ने ऐतराज जताया तो दोनों में कहासुनी होने लगी. माही सूरज पर जल्द शादी करने का दबाव भी बनाने लगी.

एक रोज आकांक्षा ने रोते हुए बड़ी बहन प्रतीक्षा को सूरज की अन्य लड़कियों से दोस्ती के बारे में बताया. तब प्रतीक्षा ने सूरज को फटकार लगाई. इस पर सूरज ने माफी मांग ली. लेकिन माफी मांगने के बावजूद उस ने अन्य लड़कियों से बतियाना बंद नहीं किया. 21 जुलाई, 2025 को भी माही और सूरज के बीच इसी बात को ले कर झगड़ा इतना बढ़ गया कि सूरज ने गला घोंट कर आकांक्षा उर्फ माही की हत्या कर दोस्त आशीष के सहयोग से उस की लाश ठिकाने लगा दी.

दूसरे दिन जब माही के मोबाइल फोन पर कौल आने लगी तो उस ने कौल रिसीव नहीं की. मैसेज आने पर मैसेज करता रहा, ताकि उस के जानने वालों को लगे कि वह जिंदा है. इस तरह 3 दिन तक वह माही के जानने वालों को गुमराह करता रहा. 25 जुलाई को वह कानपुर सेेंट्रल स्टेशन पहुंचा और मुंबई जाने वाली ट्रेन में आकांक्षा का फोन बंद कर रख दिया. ऐसा उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए किया.

21 सितंबर, 2025 को पुलिस ने आरोपी सूरज उत्तम और आशीष को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक पुलिस की 5 टीमें आकांक्षा उर्फ माही का शव बरामद करने के लिए सर्च औपरेशन में जुटी थीं, लेकिन शव बरामद नहीं हुआ था. Love Story

 

 

Love Story: प्रेमी को समर्पण में जल्दबाजी नहीं

Love Story: पति मनमुताबिक न निकला तो 37 वर्षीय आंगनवाड़ी सुपरवाइजर मुकेश कुमारी जाट ने उसे तलाक दे दिया था. फिर वह पत्नी से परेशान रहने वाले 38 वर्षीय शादीशुदा सरकारी टीचर मानाराम के संपर्क में आई और दोनों के बीच नजदीकी संबंध बन गए. वह उस पर शादी का दबाव बनाने लगी, लेकिन मानाराम पत्नी से तलाक के बाद शादी करने को कहता. यह विवाद एक दिन इतना खतरनाक हो गया कि…

आंगनवाड़ी सुपरवाइजर प्रेमिका मुकेश कुमारी की लगातार शादी करने की जिद से सरकारी टीचर मानाराम परेशान हो गया. उस ने प्रेमिका को लाख समझाया कि वह पत्नी को तलाक देने के बाद उस से शादी अवश्य करेगा, लेकिन वह उस की बात किसी भी कीमत पर मानने को तैयार नहीं थी. उस की जिद से परेशान हो कर मानाराम प्रेमिका से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. उस रोज 10 सितंबर, 2025 का दिन था. टीचर मानाराम ड्यूटी से बाड़मेर स्थित शिवनगर अपने घर लौट आया था. वह आराम कर रहा था. तभी कालबेल बजी.

मानाराम ने सोचा कि कोई पड़ोसी होगा. उस ने मुख्य गेट खोला तो सामने मुकेश कुमारी को देख वह आश्चर्यचकित रह गया. उसे घूरते देख मुकेश कुमारी बोली, ”आठवां अजूबा तो हूं नहीं, जो मुझे घूरघूर कर देख रहे हो. अंदर आने को नहीं कहोगे.’’

तब मानाराम साइड में हो गया और बोला, ”बगैर कोई जानकारी दिए आ गई, मानना पड़ेगा. आओ, अंदर आओ.’’

दोनों घर में आ गए. मानाराम चाय बना कर ले आया. दोनों चाय पीते हुए बतियाने लगे. मुकेश कुमारी ताना मारते हुए बोली, ”मुझ से मन भर गया है क्या, जो मेरे नंबर भी ब्लौक कर रखे हैं. मगर मैं भी पीछा छोडऩे वाली नहीं हूं. मैं ने तुम पर विश्वास कर तनमन तुम्हें समर्पित किया. तुम ने शादी करने का वादा किया था, अब तुम मुकर रहे हो. बहाने कर रहे हो. मगर बहाने बनाने से काम नहीं चलेगा, जितनी जल्द हो मुझ से शादी करो.’’

”मैं ने शादी करने से मना थोड़ी किया है. मेरा तो यह कहना है कि मेरा अपनी पत्नी से तलाक का केस कोर्ट में चल रहा है. उस से तलाक मिलते ही मैं तुम से शादी कर लूंगा. जब तक पत्नी से तलाक नहीं हो जाता, तब तक मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ अपना पक्ष रखते हुए मानाराम ने कहा.

इस पर गर्लफ्रेंड मुकेश कुमारी तुनकते हुए बोली, ”तुम्हारा पत्नी से तलाक 10 साल तक नहीं होगा. कोर्ट में केस चलता रहेगा तो ऐसे में मैं इंतजार थोड़े करूंगी. तुम्हारी बातों में आ कर अपना तन भी तुम्हें सौंप चुकी. अब मैं किसी अन्य व्यक्ति से शादी भी तो नहीं कर सकती. तुम अपने फेमिली वालों से मिलाओ मुझे. मैं उन्हें सारी बात बता कर शादी के लिए राजी कर लूंगी.’’

”मैं शादी के लिए मना नहीं कर रहा, जो तुम्हें मेरे परिवार से मिलना पड़े. वकील ने कहा है कि थोड़े दिनों में तलाक हो जाएगा. तब तक तुम्हें सब्र रखना होगा. पत्नी से तलाक मिलते ही मैं तुम से शादी कर लूंगा. तुम पढ़ीलिखी समझदार हो, फिर भी बेवजह शादी के लिए बहस कर कर रही हो. ठंडे दिमाग से सोचो, तब समझ में आ जाएगा कि मैं सही कह रहा हूं.’’ मानाराम ने उसे समझाया.

मुकेश कुमारी भी जानती थी कि जब तक मानाराम का पत्नी के साथ तलाक नहीं होगा, तब तक उन की शादी मान्य नहीं होगी. फिर भी वह उस पर शादी का दबाव डाल रही थी, ताकि वह उसे भूले नहीं. मुकेश कुमारी जिला झुंझुनंू की सूरजगढ़ पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाले गांव काशनी की रहने वाली थी. वह आंगनवाड़ी में सुपरवाइजर के पद पर खड़ेला, जिला सीकर में कार्यरत थी. मुकेश कुमारी तलाकशुदा थी. उस ने 2019 में पति से तलाक ले लिया था. तलाक के बाद खड़ेला में रह कर अपनी नौकरी कर रही थी. मुकेश कुमारी की शादी उस की इच्छा से नहीं हुई थी. इस कारण वह पति को पसंद नहीं करती थी. बस, इसी कारण उस ने पति से तलाक ले लिया था.

मुकेश कुमारी 2019 से 2024 तक अकेली रही तो उसे जीवनसाथी की जरूरत महसूस हुई. तब उस ने अगस्त 2024 में अखबार में विज्ञापन दिया कि तलाकशुदा हूं और आंगनवाड़ी में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत हूं. तलाकशुदा सरकारी नौकरी वाले से शादी करना चाहती हूं. वैवाहिक विज्ञापन में मुकेश कुमारी ने अपने मोबाइल नंबर दे रखे थे. बाड़मेर जिले के चवा गांव निवासी मानाराम जो पेशे से सरकारी टीचर है, उस ने अखबार में विज्ञापन देख कर मुकेश कुमारी से संपर्क साधा.

उस ने मुकेश कुमारी से अक्तूबर, 2024 में मुलाकात की. दोनों ने एकदूसरे से बात की. मानाराम भी पहले से शादीशुदा था, उस के 2 बेटियां थीं, मगर पत्नी टीपू देवी से बनती नहीं थी. पत्नी उसे छोड़ कर मायके शिवकर जा कर रह रही थी. ऐसे में मानाराम ने पत्नी से तलाक का कोर्ट में मामला दाखिल कर दिया था. दोनों ही तलाक लेना चाहते थे. मानाराम अपनी पत्नी से 2013 से ही अलग रह रहा था. वह भी चाहता था कि उस की किसी तलाकशुदा हमउम्र महिला से शादी हो जाए तो उस की दोबारा गृहस्थी बस जाए.

ऐसे में मुकेश कुमारी का वैवाहिक विज्ञापन अखबार में देखा तो वह अपने को रोक नहीं पाया और मुकेश कुमारी से संपर्क साध कर उस से जा मिला. मानाराम जहां 38 साल का था, वहीं मुकेश कुमारी उस से एक साल छोटी थी. दोनों सरकारी नौकरी में थे. वह देखने में खूबसूरत थी. मुकेश कुमारी को मानाराम पसंद आ गया. मानाराम ने उसी समय बता दिया था कि पत्नी से तलाक के बाद ही वह उस से शादी करेगा. उस की बात से वह भी सहमत थी. दोनों ने एकदूसरे के फोन नंबर लिए और बातचीत करने लगे. सोशल मीडिया पर चैट करने लगे. आंगनवाड़ी में छुट्टी होती, तब मुकेश कुमारी खड़ेला से बाड़मेर चली जाती थी. मानाराम के परिवार के लोग चवा गांव में रहते थे.

मानाराम बाड़मेर शहर स्थित शिवनगर कालोनी में अपने घर में अकेला रहता था. वह बाड़मेर शहर से 10 किलोमीटर दूर जसाई गांव के स्कूल में टीचर था. वह बाड़मेर से जसाई गांव रोजाना आनाजाना किया करता था. मुकेश कुमारी जब भी बाड़मेर मानाराम से मिलने आती थी, वह शिवनगर स्थित उस के घर पर उस के साथ में ही रुकती थी. दोनों एकदूसरे को पसंद करते थे और शादी करने वाले थे. ऐसे में उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे. कभी मानाराम बाड़मेर से 600 किलोमीटर दूर खड़ेला, सीकर प्रेमिका से मिलने चला जाता तो कभीकभार मुकेश कुमारी बाड़मेर चली जाती थी.

दोनों के बीच बिना शादी किए संबंध बन गए तो थोड़े वक्त बाद वे खुल कर मिलने लगे और मौजमस्ती करने लगे. उन के लव अफेयर को 6 माह ही बीते थे कि मानाराम को प्रेमिका बासी लगने लगी. उस का मन भर गया. इस के बावजूद भी वह ‘शादी करूंगा’, कह कर मुकेश कुमारी के जिस्म से खेलता रहा. करीब 4 महीने पहले मुकेश कुमारी ने जब मानाराम पर शादी का दबाव डाला तो उस ने वही राग अलापा कि पत्नी से तलाक के बाद ही शादी करेगा. ऐसे में मुकेश कुमारी उस पर बिफर गई. उस ने धमकी दी कि अगर उस ने उस से शादी नहीं की तो अंजाम ठीक नहीं होगा.

मानाराम जानता था कि अगर मुकेश कुमारी ने उस पर रेप या यौन शोषण का केस कर दिया तो उस की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं नौकरी चली जाएगी. तब उस ने उस से किनारा करना शुरू कर दिया. मगर मुकेश कुमारी उस का पीछा छोडऩे वाली नहीं थी. मानाराम ने उस के फोन नंबर ब्लौक कर दिए तो वह दूसरे नंबर से फोन कर उसे धमकाती थी. उस का कहना था कि उस ने उस पर विश्वास कर के उसे जिस्म सौंपा था. मेरे तन को भोग कर तुम मुझे छोड़ दो, यह मैं होने नहीं दूंगी. लिहाजा दोनों के बीच दूरियां बढऩे लगी थीं.

इस के बावजूद मुकेश कुमारी उस के पीछे पड़ी थी. उस ने एक ही रट लगा रखी थी कि मुझ से शादी करो. मानाराम तलाक होने के बाद शादी करने की बात कहता था. मानाराम के रूखे व्यवहार से मुकेश कुमारी को लगने लगा था कि वह शादी को जानबूझ कर टाल रहा है. उसे लग रहा था कि वह उस से शादी नहीं करेगा. मगर मुकेश कुमारी ने भी ठान लिया था कि वह मानाराम से शादी कर के ही दम लेगी. मानाराम की मजबूरी यह थी कि वह पत्नी से तलाक लिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता था.

मुकेश कुमारी की जिद से मानाराम परेशान हो गया था. बस, इसी कारण उस ने कन्नी काटनी शुरू की थी. यह मुकेश कुमारी को अखर रहा था. उस ने इस बार निश्चय किया कि वह मानाराम के फेमिली वालों से मिल कर अपने और मानाराम के संबंधों के बारे में बता कर शादी की बात पक्की कर के ही लौटेगी. 10 सितंबर को मुकेश कुमारी खंडेला, सीकर से बाड़मेर पहुंची और प्रेमी मानाराम से मिली. उस से शादी की बात की. वह 4 दिन बाड़मेर में प्रेमी के साथ रही. दोनों में संबंध भी बने.

14 सितंबर, 2025 की शाम को मुकेश कुमारी अपनी आल्टो कार ले कर बाड़मेर से मानाराम के गांव चवा पहुंच गई. उस ने मानाराम से कहा कि वह उसे अपने फेमिली वालों से मिलाए, उन से उसे शादी की बात पक्की करनी है. मानाराम ने फेमिली वालों से मिलाने से मना कर दिया तो मुकेश कुमारी गुस्से में लालपीली पुलिस चौकी चवा पहुंची. उस ने गांव चवा के रहने वाले प्रेमी टीचर मानाराम निवासी पर आरोप लगाया कि उस ने उसे शादी का झांसा दिया है. अब अपने परिवार से मुझे मिला नहीं रहा है. इस पर चौकी इंचार्ज ने फोन कर मानाराम को पुलिस चौकी बुलाया.

मानाराम पुलिस चौकी पहुंचा. उस ने पुलिस से कहा, ”मेरा तलाक का प्रोसेस चल रहा है. अभी परिवार से नहीं मिला सकता हूं. पत्नी से तलाक के बाद मैं मुकेश कुमारी से शादी कर लूंगा.’’

चौकी इंचार्ज एवं अन्य ने भी मानाराम की बात को सही ठहराया. ऐसे में मुकेश कुमारी बिना कोई परिवाद या शिकायत दर्ज करवाए पुलिस चौकी से मानाराम के साथ निकल गई. दोनों गांव चवा से शिवनगर, बाड़मेर मानाराम के घर पर आ गए. मुकेश कुमारी बिना बताए मानाराम के गांव चवा भी गई थी. वह पुलिस चौकी भी शादी का दबाव डलवाने पहुंच गई थी. इस बात से मानाराम खफा था. उस ने उसे घर पर ला कर समझाया, मगर मुकेश कुमारी इस बात से नाराज थी कि उस ने अपने फेमिली वालों से क्यों नहीं मिलाया. उस की सोच थी कि मानाराम उस से शादी नहीं करना चाहता.

इस पर मानाराम ने कहा, ”तुम मुझे बिना बताए मेरे गांव चवा क्यों गई थी? मैं शादी से मना करता तो गांव जा कर फेमिली वालों से मिलती, मगर तुम पर तो जैसे भूत सवार है. पढ़ीलिखी हो कर भी मेरी मजबूरी नहीं समझ रही. कैसी महिला हो?’’

”मैं सब समझती हूं, मगर फेमिली वालों से क्यों नहीं मिलने दिया. तुम्हारे दिल में जरूर कोई खोट है.’’ प्रेमिका ने जवाब में कहा.

तब मानाराम ने उसे समझाबुझा कर शांत किया. रात साथ में बिताई. अगले रोज 15 सितंबर, 2025 को अलसुबह मानाराम का मुकेश कुमारी से फिर शादी को ले कर झगड़ा हुआ. झगड़ा इतना बढ़ गया कि मानाराम ने घर में रखा लोहे का मोटा सरिया उठा कर मुकेश कुमारी के सिर पर दनादन कई वार कर दिए. मुकेश कुमारी के सिर से खून का फव्वारा बह निकला. थोड़ी देर तड़प कर वह मर गई. मुकेश कुमारी की लाश देख कर वह डर गया.

उसे जेल की सींखचे नजर आने लगीं. उस ने प्लान बनाया कि अब शव को ठिकाने लगा दूं, ताकि जेल जाने से बच जाए. उस ने प्रेमिका मुकेश कुमारी का शव उठा कर घर के बाहर खड़ी मृतका की आल्टो कार में ड्राइविंग सीट पर रखा और गाड़ी का दरवाजा बंद कर गाड़ी को धक्का मार कर सड़क से नीचे उतार दी. मानाराम को कार चलानी नहीं आती थी, इस कारण वह शव को दूर नहीं ले जा सका. गाड़ी को सड़क से उतार कर वह वापस घर पर आया. उस का शरीर डर के मारे थरथर कांप रहा था. उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था. तब उसे खयाल आया कि वकील से सलाह लूं.

सुबह पौने 7 बजे वकील को मानाराम ने कौल कर कहा, ”वकील साहब, मेरे हाथ एक महिला का मर्डर हो गया है. अब आप ही राय दें कि क्या करूं.’’

सुन कर वकील ने कहा, ”पुलिस के सामने सरेंडर कर दो. मैं पुलिस को घटना की खबर देता हूं.’’

कहने के साथ वकील ने सोमवार, 15 सितंबर की सुबह साढ़े 7 बजे फोन द्वारा थाना रीको बाड़मेर में अपने परिचय के साथ घटना की खबर देते हुए कहा, ”सर, शिवनगर कालोनी में मुकेश कुमारी नामक महिला का मर्डर हुआ है. मृतका का शव आल्टो कार में पड़ा है. यह हत्या सरकारी टीचर मानाराम जाट ने की है. आप जल्दी घटनास्थल पर पहुंच जाइए.’’

सुबहसवेरे महिला की हत्या की खबर पा कर एसएचओ मनोज कुमार सामरिया पुलिस बल के साथ 15 मिनट में घटनास्थल पर जा पहुंचे. सड़क पर आल्टो कार में ड्राइवर की सीट पर एक महिला का खून सना शव पड़ा था. घटनास्थल पर मृतका का मोबाइल भी था. एसएचओ मनोज कुमार सामरिया ने घटना की खबर उच्चाधिकारियों को दी. खबर पा कर सीओ (सिटी) रमेश कुमार, एएसपी जसाराम बोस, एसपी नरेंद्र सिंह मीणा थोड़ी देर में घटनास्थल पर पहुंचे. एफएसएल एवं एमओबी टीमें भी घटनास्थल पर पहुंचीं और सुबूत इकट्ठा किए. पुलिस ने घटनास्थल का मौकामुआयना किया.

शव देख कर लग रहा था कि हत्या कहीं और कर के शव को ड्राइवर की सीट पर रखा गया था. पुलिस को गाड़ी के पास खून के धब्बे मिले. तब पुलिस पास में मानाराम के घर गई. घर में भी खून दिखाई दिया. पुलिस को समझते देर न लगी कि हत्या घर में की गई थी, बाद में शव को गाड़ी में ले जा कर रखा गया था. गाड़ी को सड़क से नीचे उतारा गया था, ताकि मामला एक्सीडेंट का लगे. पुलिस ने मौके की काररवाई निबटा कर शव बाड़मेर जिला अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया.

मृतका के बारे में सामने आया कि उस का नाम मुकेश कुमारी था. वह झुंझुनंू जिले के थाना सूरजगढ़ के अंतर्गत आने वाले गांव काशनी की रहने वाली थी. वह तलाकशुदा थी और खड़ेला जिला सीकर में आंगनवाड़ी में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत थी. वह अपने प्रेमी टीचर मानाराम से मिलने बाड़मेर 10 सितंबर को आल्टो कार ले कर आई थी. पता चला कि वह प्रेमी टीचर पर शादी का दबाव बना रही थी. पुलिस ने झुंझुनंू एसपी औफिस में संपर्क कर घटना की खबर मृतका के परिजनों को दी.

मुकेश कुमारी की हत्या की खबर मिलते ही काशनी गांव में मातम छा गया. मृतका के घर में रुदन शुरू हो गया. मृतका के भाई अन्य परिजनों के साथ बाड़मेर के लिए रवाना हो गए. 600 किलोमीटर दूर बाड़मेर था तो उन्हें आने में समय लगना था. रीको थाना पुलिस ने आरोपी टीचर मानाराम को 15 सितंबर, 2025 को डिटेन कर लिया था. उस ने पुलिस पूछताछ में गर्लफ्रेंड मुकेश कुमारी की हत्या करने का गुनाह कुबूल कर लिया था.

16 सितंबर, 2025 को मृतका के फेमिली वाले बाड़मेर पहुंचे और एसएचओ मनोज कुमार से मिले. एसएचओ उन्हें घटनास्थल पर ले गए और मौका दिखाया. मृतका का शव मोर्चरी में देख कर उस के भाई धर्मपाल एवं सुरेंद्र रो पड़े. 16 सितंबर, 2025 को धर्मपाल निवासी गांव काशनी, थाना सूरजगढ़, जिला झुंझुनू ने अपनी छोटी बहन मुकेश कुमारी जाट की हत्या की रिपोर्ट टीचर मानाराम जाट निवासी चवा के खिलाफ दर्ज कराई. रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने आरोपी मानाराम को गिरफ्तार कर लिया. मृतका के शव का मैडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाया गया. पोस्टमार्टम के बाद शव उस के फेमिली वालों को सौंप दिया गया. वह उसे गांव काशनी ले गए और वहां अंतिम संस्कार कर दिया.

आरोपी टीचर मानाराम को 17 सितंबर को न्यायिक मजिस्ट्रैट बाड़मेर के समक्ष पेश कर पुलिस रिमांड पर मांगा. मजिस्ट्रैट ने आरोपी को 2 दिन के रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया. रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने आरोपी से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में इस हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर एक गांव चवा आता है. सदर थाना बाड़मेर के अंतर्गत आने वाले इस गांव में किरताराम जाट अपने परिवार के साथ रहते हैं. खेतीकिसानी कर के किरताराम ने अपने बेटे मानाराम को खूब पढ़ाया. इसी का परिणाम था कि पढ़लिख कर वह टीचर बन गया. सरकारी टीचर की नौकरी मिली तो शादी के लिए रिश्ते आने लगे. 2008 में मानाराम की शादी बाड़मेर जिले के शिवकर गांव की टीकू देवी के साथ कर दी गई. शादी के बाद सुहागरात पर मानाराम ने नई दुलहन टीकू को देखा तो उसे गहरा आघात लगा. जैसी सुंदर पत्नी उसे चाहिए थी, वैसी टीकू नहीं थी.

मानाराम मन मसोस कर रह गया. टीकू से वह शादी तो कर चुका था, ऐसे में उसे निभाना तो था ही. मानाराम को टीकू से 2 बेटियां हुईं, जो इस समय 16 साल एवं 14 साल की हैं. बेटियों के जन्म के बाद पतिपत्नी में मनमुटाव बढ़ गया. मानाराम अपनी पत्नी को ज्यादा महत्त्व नहीं देता था. वह बातबात पर उसे ताने मारता था. उस के रंगरूप को ले कर तंज कसता था. दोनों में मनमुटाव इतना बढ़ा कि 2013 में टीकू अपने मायके शिवकर गांव जा बैठी. मानाराम ने पत्नी की तरफ मुड़ कर नहीं देखा. टीकू भी पति को मन से निकाल चुकी थी. सामाजिक पंचायत भी हुई, मगर दोनों के दिल नहीं मिले. दोनों ने अलग रहना ठीक समझा.

टीकू मायके में रह रही थी. मानाराम की इच्छा थी कि वह दोबारा शादी कर ले. मगर पहली पत्नी टीकू से जब तक तलाक नहीं होता, तब तक शादी करना संभव नहीं था. मानाराम ने फेमिली कोर्ट में टीकू से तलाक का केस दायर कर दिया. तलाक का मामला कोर्ट में विचाराधीन है. मानाराम की ड्यूटी बाड़मेर शहर से 10 किलोमीटर दूर जसाई गांव के स्कूल में थी. वह बाड़मेर से जसाई आनाजाना करता था.

झुंझुनूं जिले के थाना सूरजगढ़ के अंतर्गत एक गांव काशनी आता है. काशनी गांव में लिखमाराम जाट अपने परिवार के साथ रहता था. वह सेना से रिटायर थे, उन के 8 बच्चे थे. मुकेश कुमारी 8 भाईबहनों में सातवें नंबर की थी. सभी भाईबहनों मे मुकेश कुमारी होशियार थी. काशनी गांव से उस ने आठवीं तक पढ़ाई की. इस के बाद उसे पढऩे के लिए शहर भेज दिया. पढ़ाई के दौरान ही मुकेश कुमारी का चयन राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल पद पर हो गया. बेटी की नौकरी लगने से पेरेंट्स बहुत खुश थे. उन्होंने उस के योग्य घरवर की खोज शुरू की.

मुकेश कुमारी की 9 जुलाई, 2011 को पिलानी थाना क्षेत्र के लिखवा गांव निवासी विकास जाट से शादी कर दी गई. शादी के बाद मुकेश कुमारी ससुराल गई तो उसे ससुराल पसंद नहीं आई. उसे पति विकास भी पसंद नहीं आया. बेटी की शादी के 3 साल बाद 2014 में हार्ट अटैक से लिखमाराम की मौत हो गई. जैसा जीवनसाथी मुकेश को चाहिए था, वैसा विकास नहीं था. मुकेश कुमारी अपनी ड्यूटी पर रहती थी. वह ससुराल नहीं जाती थी. विकास शादी कर के भी कुंवारा था. वह पत्नी को घर ले जाना चाहता था, मगर वह राजी नहीं थी.

एक दिन मुकेश ने पति विकास से कहा, ”मैं ने परिवार वालों का मन रखने के लिए तुम से शादी की थी. मगर अब मैं तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती.’’

विकास ने उसे समझाया. मगर वह नहीं मानी. मुकेश कुमारी का पुलिस की नौकरी से मन भर गया था. उस ने आंगनवाड़ी में सुपरवाइजर पद के लिए आवेदन किया. वहां उस का चयन हो गया, तब उस ने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और खड़ेला, जिला सीकर में आंगनवाड़ी में सुपरवाइजर की नौकरी करने लगी. मुकेश कुमारी ने पति विकास से 2019 में तलाक ले लिया. अब वह खड़ेला में रहने लगी. पति से तलाक के बाद मुकेश कुमारी को एक अच्छे जीवनसाथी की जरूरत महसूस होने लगी थी. ऐसे में वर्ष 2024 के अगस्त महीने में उस ने अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराया कि तलाकशुदा महिला को तलाकशुदा सरकारी नौकरी करने वाला हमउम्र जीवनसाथी चाहिए.

इस वैवाहिक विज्ञापन को टीचर मानाराम जाट ने देखा. उस ने दिए गए फोन नंबर पर मुकेश कुमारी से संपर्क किया. मुकेश कुमारी के पास कई लोगों के फोन आए थे, मगर उसे पसंद आया मानाराम. वह सरकारी टीचर था. दोनों की उम्र भी बराबर थी. इस तरह दोनों बेहद करीब आ गए. मानाराम ने गत 3-4 महीने से मुकेश कुमारी को साइड में करना शुरू कर दिया था. मगर मुकेश कुमारी उसे किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं चाहती थी. 15 सितंबर, 2025 की अलसुबह दोनों में शादी की बात पर फिर से झगड़ा हुआ. मानाराम को प्रेमिका पर इतना गुस्सा आया कि उस ने प्रेमिका मुकेश कुमारी पर मोटे सरिए से कई वार कर हत्या कर दी.

रिमांड अवधि पूरी होने पर 19 सितंबर, 2025 को पुलिस ने आरोपी मानाराम को फिर से कोर्ट में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया और थाने ला कर पूछताछ की. आरोपी की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त लोहे का सरिया बरामद कर लिया. आरोपी की निशानदेही पर पर खून से सनी निवार एवं बिस्तर के जले टुकड़े भी बरामद किए. पुलिस ने 20 सितंबर, 2025 को उसे न्यायिक मजिस्ट्रैट बाड़मेर के समक्ष पेश किया, जहां से उसे बाड़मेर जेल भेजने का आदेश दिया गया. Love Story

 

 

Agra Crime: मोहब्बत पर पहरा कहां तक वाजिब

Agra Crime: अंशू और अनुराग एकदूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन अंशू के पापा रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह यादव गांव के नाते से अनुराग से भतीजे का रिश्ता जोड़ बैठा था. उस ने शादी की इजाजत नहीं दी. बल्कि अपनी झूठी शान की खातिर ऐसा अपराध कर बैठा कि…

प्यार का रंग हलका हो या गाढ़ा, यह एक बार जिस पर चढ़ जाता है, अपना असर आसानी से नहीं छोड़ता. आगरा के थाना मलपुरा की विनायक गार्डन कालोनी में रहने वाली 34 वर्षीय अंशू अपने गांव के 32 वर्षीय अनुराग यादव से प्यार करती थी. फेमिली वालों के ज्यादा अंकुश लगाने का नतीजा यह हुआ कि प्रेमी युगल पर प्यार का ऐसा खुमार चढ़ा कि उन्होंने जान की बाजी लगा कर हर हालत में शादी करने का फैसला ले लिया. अंशू के फेमिली वालों ने उसे काफी समझाया और प्रेमी अनुराग से मिलने और मोबाइल पर बात न करने की कड़ी हिदायत दी. ऐसा न करने पर उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई.

फेमिली वाले चाहते थे कि अंशू अपने दिल से अनुराग को पूरी तरह भुला दे, ताकि वह उस की शादी किसी दूसरी जगह कर दें. फेमिली वालों का मानना था कि गांव के रिश्ते के भतीजे से शादी करने से उन की गांव व समाज में बहुत बदनामी होगी. इस के साथ ही अन्य बेटेबेटियों की शादी में अड़चन आएगी. फेमिली वालों के लाख समझाने के बाद भी अंशू ने उन से साफ कह दिया कि वे लोग बचपन से ही एकदूसरे से प्यार करते हैं और वह अनुराग के साथ ही शादी करेगी. बेटी की जिद के आगे परिजनों की एक न चली. जबकि दोनों ही सजातीय थे.

अंशू के पापा रनवीर सिंह यादव (रिटायर्ड दरोगा) गांव के नाते बेवजह अनुराग से भतीजे का रिश्ता जोड़े बैठे थे. भतीजे से प्रेम सबंधों से वह बेटी से बेहद नाराज थे. दोनों के लव अफेयर के चलते रनवीर सिंह यादव से विवाद भी हुआ. इस के बाद अंशू को अपने ही फेमिली वालों से अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा. इसलिए अंशू ने 24 अक्तूबर, 2025 की रात सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर अपने प्यार का सार्वजनिक रूप से इजहार कर दिया. इस की जानकारी प्रेमी अनुराग को भी मोबाइल पर दे दी.

एक ही गांव व जाति के होने के कारण अंशू यादव के फेमिली वाले अनुराग यादव को रिश्ते का भतीजा मानते थे, जबकि उन का दूरदूर तक का संबंध नहीं था. अनुराग से प्रेम प्रसंग और उस से शादी करने की बात सार्वजनिक होने से पिता रनवीर सिंह व उन के फेमिली वालों को बेटी की यह करतूत नागवार गुजरी. इस बात ने आग में घी का काम किया. अब बदनामी से बचने का उन्हें एक ही उपाय सूझा कि बेटी अंशू की हत्या कर दी जाए. रनवीर सिंह यादव ने बेटी अंशू की हत्या की प्लानिंग पत्नी सुधा, बेटे गौरव व अन्य परिजनों व रिश्तेदारों के साथ मिल कर बनाई.

25 अक्तूबर, 2025 की सुबह अंशू अपने कमरे में थी. कुछ देर पहले ही उस की गुपचुप तरीके से प्रेमी अनुराग से मोबाइल पर बात हुई थी. अंशू अपने बिस्तर से उठती, इस से पहले ही उस के कमरे में पापा रनवीर सिंह घुस आए. उन्होंने फुरती से बिस्तर पर लेटी बेटी अंशू को दबोच लिया, जबकि मम्मी सुधा ने बेटी के पैर पकड़ लिए. रनवीर सिंह ने उसी के दुपट्टे से उस का गला कस दिया. इस बीच अंशू की चीख सुन कर छोटा भाई लकी कमरे में आया तो उसे रनवीर सिह ने डांट कर भगा दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद अंशू की मौत हो गई.

अंशू की हत्या करने के बाद रनवीर सिंह ने टूंडला में रहने वाले अपने बड़े बेटे गौरव यादव, जो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता है, को फोन कर बताया कि हम ने अपना काम कर दिया है. अब लाश को ठिकाने लगाने का काम तुम्हें करना है. जानकारी मिलते ही गौरव आगरा की विनायक गार्डन कालोनी आ गया और दोपहर के समय अपनी कार की डिक्की में अंशू की डैडबौडी को डाल कर मम्मीपापा के साथ लाश को ठिकाने लगा आया. अंशू यादव का हत्यारा पिता रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह यादव मूलरूप से फिरोजाबाद जिले के थाना जसराना के नगला अवाजी का रहने वाला है. कांस्टेबल के पद पर उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती होने के बाद रनवीर सिंह की तैनाती कई सालों से आगरा जिले में थी.

देहात क्षेत्रों के थानों में कई सालों तक रहा. हैडकांस्टेबल के रूप में खेरागढ़ थाने में कई वर्ष गुजारे और वहीं उसे दारोगा पद पर प्रमोशन मिला. रिटायर्ड होने के बाद वह आगरा में ही ग्वालियर रोड रोहता स्थित विनायक गार्डन कालोनी में रहने लगा. उस के 5 बच्चे हैं. इन में 3 बेटियां और 2 बेटे थे. अंशू यादव दूसरे नंबर की थी. रनवीर सिंह यादव ने बेटी की हत्या करने व उस की लाश को ठिकाने के बाद पुलिसिया तौरतरीकों का भरपूर इस्तेमाल किया.

अंशू की हत्या करने और लाश को ठिकाने लगाने के 37 दिन बाद पुलिस को गुमराह करने व स्वयं को बचाने के लिए आगरा के थाना मलपुरा में 30 नवंबर, 2025 को बेटी अंशू की गुमशुदगी दर्ज करा दी, जिस में कहा गया था कि 30 अक्तूबर की शाम 5 बजे उन की बेटी अंशू बिना बताए घर से कहीं चली गई है. अंशू की गुमशुदगी की सूचना दर्ज होने के बाद पुलिस उस की तलाश में जुट गई. यहां तक कि उस के पैंफ्लेट भी चस्पा करा दिए. अंशू को मौत के घाट उतारने के बाद दारोगा और उस की पत्नी सुधा सहित फेमिली के अन्य सदस्य सामान्य दिख रहे थे. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद घर के सभी लोग पड़ोसियों के सामने परेशान दिखने का नाटक करते रहे.

आरोपी इतने शातिर थे कि हत्या के बाद मृतका अंशू का भाई गौरव मोहल्ले मेें लगे सीसीटीवी के बारे में जानकारी जुटाने लगा. उस ने पड़ोस में लगे सीसीटीवी की फुटेज के बारे में पता किया कि डेटा कितने दिन स्टोर रहता है, ताकि थाने में अगर गुमशुदगी दर्ज कराएं तो सबूत न मिल सके.

उधर अंशू का प्रेमी अनुराग 25 अक्तूबर, 2025 की सुबह से ही परेशान था. बात यह थी कि 25 अक्तूबर को सुबह उस की अंशू से मोबाइल पर बात हुई थी. अंशू ने अनुराग को बताया था कि कुछ गड़बड़ है. फेमिली वाले मेरी हत्या करना चाहते हैं. तुम मुझे बचा सको तो बचा लो. इस के बाद अंशू का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया. परेशान अनुराग ने अंशू की छोटी बहन अनीता को फोन किया, लेकिन उस ने कौल रिसीव नहीं की.

तब उस ने अपने गांव के रिश्तेदारों के माध्यम से अंशू से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. अनुराग समझ गया कि अंशू की परिजनों ने मिल कर हत्या कर दी है. आखिर में कुछ दिन बाद ही अनुराग को रिश्तेदारों की मदद से अंशू के बारे में जानकारी हुई. मध्यस्थों के माध्यम से लगातार मामले को शांत करने का दबाव बनाने पर अनुराग को शक हो गया. अनुराग को पता था कि यदि वह पुलिस के पास जाएगा तो फंस जाएगा. इसलिए स्वयं ही उस ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैवियस कार्पस) दायर कर दी. सबूत के तौर पर अंशू के 24 अक्तूबर के वीडियो को प्रस्तुत किया.

6 दिसंबर, 2025 को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के मामले में जांच थाना आगरा के मलपुरा को मिली, जिस में फिरोजाबाद जनपद के थाना जसराना के नगला अवाजी निवासी अनुराग यादव ने अंशू यादव के पापा रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह यादव व उस के फेमिली द्वारा अंशू यादव को घर में कैद कर के रखे जाने के बारे में बताया. उस ने अंशू को उस के फेमिली वालों से मुक्त करा कर उस की सुपुर्दगी में देने की गुहार हाईकोर्ट में लगाई.

इस पर पुलिस को शक हुआ. 13 दिसबंर, 2025 को पुलिस ने रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह यादव और उस के फेमिली वालों से जब लापता अंशू के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि अंशू अपने मामा के यहां इटावा गई हुई है. जबकि इस से पहले रनवीर सिंह यादव थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा चुका था. इस पर पुलिस ने रनवीर सिंह व उस की पत्नी सुधा से सख्ती से पूछताछ करने के साथ ही अंशू का वीडियो भी दिखाया. लेकिन दोनों ने इंकार कर दिया. उन का कहना था कि अंशू कहीं चली गई है, उस की तलाश की जाए. पतिपत्नी पुलिस को गुमराह करते रहे, लेकिन भाई टूट गया. उस ने बताया कि बहन अंशू की 25 अक्तूबर को हत्या कर दी गई है.

फिर क्या था, पुलिस ने मृतका अंशू के शव को बरामद कराने के लिए रनवीर सिंह और उस के बेटे गौरव को हिरासत में ले लिया. दोनों से कड़ाई से पूछताछ की तो उन्होंने अपना जुर्म कुबूल करते हुए पुलिस को बताया कि अंशू की हत्या 25 अक्तूबर को करने के बाद उसी दिन लाश को उन्होंने इटावा मेंं यमुना नदी में फेंक दिया था. इस पर पुलिस लाश बरामद करने के लिए 13 दिसंबर, 2025 को आरोपियों को इटावा ले गई. पूछताछ में पता चला कि हत्या के बाद अपनी कार की डिक्की में अंशू की डैडबौडी  को डाल कर पिता रनवीर सिंह यादव के साथ गौरव यादव अपने मामा के घर गांव पीपरीपुरा, इटावा ले गए थे.

वहां पहुंच कर रनवीर सिंह ने अपने साले रक्षपाल के बेटे सतीश व सतीश की पत्नी किरन देवी को लाश ठिकाने लगाने के लिए साथ ले लिया. सभी लोग कार से इटावा के आगे भिंड बाइपास गांव सुनवारा यमुना पुल पर जा पहुंचे और कार की डिक्की में छिपाई अंशू की लाश निकाल कर यमुना नदी में फेंक दी. इस के बाद सभी लोग वहां से चले गए. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने मृतका अंशू की लाश की तलाश शुरू कर दी. लाश की तलाश में इटावा के 3 थानों की पुलिस, एसडीआरएफ और आगरा पुलिस द्वारा संयुक्त औपरेशन चलाया गया.

यमुना के किनारे झाडिय़ों से एक कंकाल और हड्डियों के अवशेष व एक बांह के कपड़े मिले, जिसे पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. इस के साथ ही फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए, जो डीएनए के लिए भेजे गए. थाना मलपुरा के एसएचओ विवेक कुमार मिश्रा ने बताया कि रनवीर सिंह यादव की बेटी अंशू की लाश उस की हत्या के लगभग डेढ़ माह बाद कंकाल के रूप में मिली थी. अंशू यादव की पहचान पुलिस ने कपड़ों से की. उस की एक बांह का कपड़े का टुकड़ा मिला. पुलिस को जो वीडियो मिला था, उस में वह वही कपड़े पहने थी, जो घटनास्थल पर मिले.

उन्होंने बताया, आरोपियों द्वारा पुल से नदी में लाश फेंकने पर वह पानी में बहती हुई आगे झाडिय़ों में अटक गई, जिसे जंगली जानवर खाते रहे. आरोपी यह समझते रहे कि लाश पानी में बह गई है और वे बेखौफ हो कर वहां से चले गए.  अंशू हत्याकांड की उस के प्रेमी अनुराग यादव ने थाना मलपुरा में रिपोर्ट दर्ज करा दी है. रिपोर्ट में 9 लोगों को आरोपी बनाया गया है. आरोप लगाया गया है कि उस की दोस्ती अपने गांव की अंशू यादव से बचपन से चली आ रही थी. दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन इस बात से अंशू यादव के फेमिली वाले सहमत नहीं थे.

अनुराग ने रिपोर्ट में लिखवाया कि अंशू ने अपने घर से 24 अक्तूबर, 2025 को मुझे एक 29 सेकेंड का वीडियो बना कर मेरे वाट्सऐप पर भेजा, जिस में वह कह रही है, ‘मेरे प्यार को उस के परिवार वाले नहीं मान रहे हैं. मम्मीपापा, बड़ा भाई गौरव व छोटी बहन अनीता व गांव का रामनरेश और फूफा मुरारी व उस की पत्नी बीना मुझे मारना चाहते हैं. जब अंशू से मैं ने संपर्क करना चाहा तो उस से संपर्क नहीं हो पाया. इस के बाद न्यायालय का सहारा लिया और उक्त लोगों के खिलाफ हैवियस कार्पस याचिका दायर की. अब जानकारी हुई है कि अपने मकान पर सभी ने मिल कर अंशू की हत्या कर लाश को कार सेे इटावा ले जा कर लाश को यमुना में फेंक दिया है.

इस पर थाना मलपुरा में रिटायर्ड दरोगा रनवीर सिंह, उस की पत्नी सुधा, सतीश, किरन देवी, गौरव, अनीता, रामनरेश, फूफा मुरारी, बुआ बीना के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), साक्ष्य मिटाने की धारा 238 तथा आपराधिक षडयंत्रों में शामिल होने की धारा 61(2) के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. प्रेमिका अंशू को जब 24 अक्तूबर, 2025 को यह अंदेशा हो गया कि फेमिली वाले उस की हत्या की योजना बना रहे हैं तो उस ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाला.

अनुराग के अनुसार गांव में अंशू और उस के मकान 100 फीट से अधिक दूरी पर स्थित हैं. बचपन में हम दोनों गांव के एक ही स्कूल में पढ़ते थे. सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान वह अपने पापा के पास उत्तराखंड चला गया, जबकि अंशू अपने पिता का ट्रांसफर मथुरा होने पर वहां चली गई. बचपन से ही हम दोनों में दोस्ती थी. हाईस्कूल हम दोनों ने शिकोहाबाद से ही किया. अंशू और अनुराग दोनों ही जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे. इस उम्र में लड़कियों का लड़कों के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक बात है. अंशू के साथ भी यही हुआ, फिर अनुराग तो उस का बचपन का दोस्त था.

धीरेधीरे अंशू को अनुराग और अनुुराग को अंशू अच्छी लगने लगी. दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे. इस बीच अंशू के पापा रनवीर सिंह यादव का ट्रांंसफर मथुरा हो गया. इस के बाद आगरा, रकाबगंज, खैरागढ़ में वह तैनात रहे. इस बीच दोनों की फोन पर बात होती रहती थी. वर्ष 2018 में अंशू और अनुराग दोनों ने डीएलएड साथसाथ किया. कहने को इस बीच अनुराग का पीएसी और पुुलिस में चयन भी हुआ, लेकिन दोनों ने निर्णय लिया था कि वे शादी करने के साथ ही साथसाथ टीचिंग करेंगे. अनुराग ने पीएसी और पुलिस की नौकरी नहींं की.

रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह ने पुलिस से पूछताछ में बताया कि अनुराग गांव के रिश्ते से अंशू का भाई लगता था. उस का तथा अनुराग का गोत्र एक ही था. रिश्तेदार अनुराग के साथ शादी पर बेटी अड़ी थी. इस से हमारी बदनामी होती. अन्य बच्चों की शादी में भी परेशानी होती. समझाने पर बारबार कह रही थी, मार दो मुझे. बस, मुझे गुस्सा आ गया. मेरी पत्नी ने उस के पैर पकड़े और मैं ने उसी के दुपट्टे से उस का गला दबा दिया. गुस्से में मैं दुपट्टा कसता चला गया. बेटी जमीन पर गिर गई, इस के बाद भी वह नहीं रुका और आखिर में उस की सांसें थम गईं.

अनुराग ने बताया कि उस की मम्मी रिश्ता ले कर अंशू के घर गई थी, वहां अंशू की मम्मी ने सहमति जताई थी. उन्होंने मुझ से भी कसम ली थी कि दोनों कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगे, जिस से समाज में बदनामी हो. वह सही समय पर दोनों की शादी कर देंगे. मैं ने भी कसम दी थी. इस के बाद हम दोनों का मिलनाजुलना और बातचीत होती थी. अनुराग के अनुसार, कुछ समय पहले अंशू के फेमिली वालों के तेवर बदल गए. वे लोग अंशू से बात नहीं करने देते थे. उस के साथ मारपीट करते थे. उस का मोबाइल भी छीन लिया था. तब अंशू ने अपनी आईडी से चोरीछिपे सिम ली थी. वह घर में पड़े पुराने मोबाइल में सिम डाल कर मुझ से बात कर लेती थी.

24 अक्तूबर को अंशू ने मेरे मोबाइल पर एक वीडियो भेजा. इस के बाद 25 अक्तूबर की सुबह अंशू ने अपनी मम्मी के मोबाइल से फोन किया. उस ने कहा कि ये लोग मुझे मार रहे हैं. मुझे बचा सकते हो तो बचा लो. इस के बाद उस का फोन कट गया. अनुराग ने थोड़ी देर बाद कौल बैक किया तो किसी ने फोन नहीं उठाया. इस के बाद मोबाइल स्विच औफ हो गया. अंशू की बुआ से बात करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया, मुझे अनहोनी की आशंका हुई. तब अंशू की छोटी बहन अनीता का नंबर ले कर उस से बात की. कहा कि अंशू से बात कराओ, लेकिन उस ने नहीं कराई.

इतना ही नहीं, अंशू की हत्या के बाद रनवीर सिंह यादव ने मध्यस्थों के माध्यम से मुझ पर चुप रहने का दबाव भी बनाया. इस पर अनुराग को शक हो गया. इस के बाद ही मैं ने हाईकोर्ट की शरण ली. बेटी के प्रेम संबंधों की परिजनों को जानकारी थी. इस पर रनवीर सिंह यादव व अन्य ने अंशू को धमकाना शुरू कर दिया, लेकिन वह किसी भी कीमत पर मानने को तैयार नहीं हो रही थी. फेमिली वालों ने अनुराग से मोबाइल पर बातचीत करने पर भी पाबंदी लगा दी.

 

डीसीपी (पश्चिमी जोन) अतुल शर्मा ने इस पूरे हत्याकांड का परदाफाश करते हुए बताया कि वर्तमान में रिटायर्ड दारोगा रनवीर सिंह यादव थाना मलपुरा की विनायक गार्डन कालोनी मे परिवार सहित रहता है. वह वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त हुआ था. उस की बेटी अंशू यादव डीएलएड कर रही थी और शिक्षक भरती की तैयारी कर रही थी. रिपोर्ट में 9 लोगों को नामजद किया गया है. इन में से 3 आरोपियों पिता रनवीर सिंह यादव, बेटा गौरव यादव व रनवीर के साले के बेटे सतीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर 14 दिसंबर को जेल भेज दिया गया है. शेष नामजद परिवार वालों की भूमिका की जांच की जा रही है. Agra Crime

 

 

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद