UP Crime News : मामा के इश्क में भांजी ने कराई पति की हत्या

UP Crime News : पवन निशा और अजय के रास्ते की बाधा नहीं था. न ही उस ने कभी टोकाटाकी की थी. लेकिन मामाभांजी के रिश्ते से बेपरवाह वे दोनों खुल कर खेलना चाहते थे. इसी के चलते दोनों ने पवन को…

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे जनपद बाराबंकी के थाना सुबेहा क्षेत्र में एक गांव है ताला रुकनुद्दीनपुर. पवन सिंह इसी गांव में रहता था. 14 सितंबर, 2020 की शाम पवन सिंह अचानक गायब हो गया. उस के घर वाले परेशान होने लगे कि बिना बताए अचानक कहां चला गया. किसी अनहोनी की आशंका से उन के दिल धड़कने लगे. समय के साथ धड़कनें और बढ़ने लगीं. पवन का कोई पता नहीं चल पा रहा था. पवन की तलाश अगले दिन 15 सितंबर को भी की गई. लेकिन पूरा दिन निकल गया, पवन का कोई पता नहीं लगा. 16 सितंबर को पवन के भाई लवलेश बहादुर को उस के मोबाइल पर सोशल मीडिया के माध्यम से एक लाश की फोटो मिली.

फोटो लवलेश के एक परिचित युवक ने भेजी थी. लाश की फोटो देखी तो लवलेश फफक कर रो पड़ा. फोटो पवन की लाश की थी. दरअसल, पवन की लाश पीपा पुल के पास बेहटा घाट पर मिली थी. लवलेश के उस परिचित ने लाश देखी तो उस की फोटो खींच कर लवलेश को भेज दी. जानकारी होते ही लवलेश घर वालों और गांव के कुछ लोगों के साथ बेहटा घाट पहुंच गया. लाश पवन की ही थी. पीपा पुल गोमती नदी पर बना था. गोमती के एक किनारे पर गांव ताला रुकनुद्दीनपुर था तो दूसरे किनारे पर बेहटा घाट. लेकिन बेहटा घाट थाना सुबेहा में नहीं थाना असंद्रा में आता था. लवलेश ने 112 नंबर पर काल कर के घटना की सूचना पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में एसपी यमुना प्रसाद और 3 थानों असंद्रा, हैदरगढ़ और सुबेहा की पुलिस टीमें मौके पर पहुंच गईं.

पवन के शरीर पर किसी प्रकार के निशान नहीं थे और लाश फूली हुई थी. एसपी यमुना प्रसाद ने लवलेश से आवश्यक पूछताछ की तो पता चला कि वह अपनी हीरो पैशन बाइक से घर से निकला था. बाइक पुल व आसपास कहीं नहीं मिली. पवन वहां खुद आता तो बाइक भी वहीं होती, इस का मतलब था कि वह खुद अपनी मरजी से नहीं आया था. जाहिर था कि उस की हत्या कर के लाश वहां फेंकी गई थी. पवन की बाइक की तलाश की गई तो बाइक कुछ दूरी पर टीकाराम बाबा घाट पर खड़ी मिली. यह क्षेत्र हैदरगढ़ थाना क्षेत्र में आता था. वारदात की पहल वहीं से हुई थी, इसलिए एसपी यमुना प्रसाद ने घटना की जांच का जिम्मा हैदरगढ़ पुलिस को दे दिया.

हैदरगढ़ थाने के इंसपेक्टर धर्मेंद्र सिंह रघुवंशी ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. फिर लवलेश को साथ ले कर थाने आ गए. इंसपेक्टर रघुवंशी ने लवलेश की लिखित तहरीर पर अज्ञात के विरुद्ध भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु की सही वजह पता नहीं चल पाई. इंसपेक्टर रघुवंशी के सामने एक बड़ी चुनौती थी. क्योंकि कोई भी सुराग हाथ नहीं लगा था. उन्होंने पवन की पत्नी शिम्मी उर्फ निशा और भाई लवलेश से कई बार पूछताछ की, लेकिन कोई भी अहम जानकारी नहीं मिल पाई. पवन के विवाह के बाद ही उस की मां ने घर का बंटवारा कर दिया था. पवन अपनी पत्नी निशा के साथ अलग रहता था. इसलिए घर के अन्य लोगों को ज्यादा कुछ जानकारी नहीं थी.

स्वार्थ की शादी समय गुजरता जा रहा था, लेकिन केस का खुलासा नहीं हो पा रहा था. जब कहीं से कुछ हाथ नहीं लगा तो इंसपेक्टर रघुवंशी ने अपनी जांच पवन की पत्नी पर टिका दी. वह उस की गतिविधियों की निगरानी कराने लगे. घर आनेजाने वालों पर नजर रखी जाने लगी तो एक युवक उन की नजरों में चढ़ गया. वह पवन के गांव का ही अजय सिंह उर्फ बबलू था. अजय का पवन के घर काफी आनाजाना था. वह घर में काफी देर तक रुकता था. अजय के बारे में और पता किया गया तो पता चला कि अजय ने ही पवन से निशा की शादी कराई थी. निशा अजय की बहन की जेठानी की लड़की थी. यानी रिश्ते में वह अजय की भांजी लगती थी. पहले तो उन को यही लगा कि अजय अपना फर्ज निभा रहा है लेकिन जैसेजैसे जांच आगे बढ़ी तो उन्हें दोनों के संबंधों पर संदेह होने लगा.

इंसपेक्टर रघुवंशी ने उन दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला, दोनों के बीच हर रोज काफी देर तक बातें होती थीं. दोनों के बीच जो रिश्ता था, उस में इतनी ज्यादा बात होना दाल में काला होना नहीं, पूरी दाल ही काली होना साबित हो रही थी. 7 फरवरी, 2021 को इंसपेक्टर धर्मेंद्र रघुवंशी ने अजय को टीकाराम मंदिर के पास से और निशा को गांव अलमापुर में उस की मौसी के घर से गिरफ्तार कर लिया. जिला बाराबंकी के सुबेहा थाना क्षेत्र के गांव ताला रुकनुद्दीनपुर में अजय सिंह उर्फ बबलू रहता था. अजय के पिता का नाम मान सिंह था और वह पेशे से किसान थे. अजय 3 बहनों में सब से छोटा था. इंटर तक पढ़ाई करने के बाद अजय अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करने लगा था.

निशा उर्फ शिम्मी अजय की बड़ी बहन अनीता (परिवर्तित नाम) की जेठानी की लड़की थी. शिम्मी के पिता चंद्रशेखर सिंह कोतवाली नगर क्षेत्र के भिखरा गांव में रहते थे, वह दिव्यांग थे, किसी तरह खेती कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. निशा की एक बड़ी बहन और 2 बड़े भाई बबलू और मोनू थे. बबलू पंजाब में फल की दुकान लगाता था. मोनू सऊदी अरब काम करने चला गया था. निशा अलमापुर में रहने वाली अपनी मौसी के यहां रहती थी. हमउम्र अजय और निशा रिश्ते में मामाभांजी लगते थे. जहां निशा हसीन थी, वहीं अजय भी खूबसूरत नौजवान था. निशा ने 11वीं तक तो अजय ने इंटर तक पढ़ाई की थी.

दोनों जब भी मिलते, एकदूसरे के मोहपाश में बंध जाते. दोनों मन ही मन एकदूसरे को चाहने लगे थे. लेकिन रिश्ता ऐसा था कि वे अपनी चाहत को जता भी नहीं सकते थे. लेकिन चाहत किसी भी उम्र और रिश्ते को कहां मानती है, वह तो सिर्फ अपना ही एक नया रिश्ता बनाती है, जिस में सिर्फ प्यार होता है. ऐसा प्यार जिस में वह कोई भी बंधन तोड़ सकती है. दोनों बैठ कर खूब बातें करते. बातें जुबां पर कुछ और होतीं लेकिन दिल में कुछ और. आंखों के जरिए दिल का हाल दोनों ही जान रहे थे लेकिन पहल दोनों में से कोई नहीं कर रहा था. दोनों की चाहत उन्हें बेचैन किए रहती थीं. दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए थे कि एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते थे. लेकिन प्यार के इजहार की नौबत अभी तक नहीं आई थी.

आखिरकार अजय ने सोच लिया कि वह अपने दिल की बात निशा से कर के रहेगा. संभव है, निशा किसी वजह से कह न पा रही हो. अगली मुलाकात में जब दोनों बैठे तो अजय निशा के काफी नजदीक बैठा. निशा के दाहिने हाथ को वह अपने दोनों हाथों के बीच रख कर बोला, ‘‘निशा, काफी दिनों की तड़प और बेचैनी का दर्द सहने के बाद आज मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’ कह कर अजय चुप हो गया. निशा अजय के अंदाज से ही जान गई कि वह आज तय कर के आया है कि अपने दिल की बात जुबां पर ला कर रहेगा. इसलिए निशा ने उस के सामने अंजान बनते हुए पूछ लिया, ‘‘ऐसी कौन सी बात है जो तुम बेचैन रहे और तड़पते रहे, मुझ से कहने में हिचकते रहे.’’

अजय ने एक गहरी सांस ली और हिम्मत कर के बोला, ‘‘मेरा दिल तुम्हारे प्यार का मारा है. तुम्हें बेहद चाहता है, दिनरात मुझे चैन नहीं लेने देता. इस के चक्कर में मेरी आंखें भी पथरा गई हैं, आंखों में नींद कभी अपना बसेरा नहीं बना पाती. अजीब सा हाल हो गया है मेरा. मेरी इस हालत को तुम ही ठीक कर सकती हो मेरा प्यार स्वीकार कर के… बोलो, करोगी मेरा प्यार स्वीकार?’’

‘‘मेरे दिल की जमीन पर तुम्हारे प्यार के फूल तो कब के खिल चुके थे, लेकिन रिश्ते की वजह से और नारी सुलभ लज्जा के कारण मैं तुम से कह नहीं पा रही थी. इसलिए सोच रही थी कि तुम ही प्यार का इजहार कर दो तो बात बन जाए. तुम भी शायद रिश्ते की वजह से हिचक रहे थे, तभी इजहार करने में इतना समय लगा दिया.’’

‘‘निशा, यह जान कर मुझे बेहद खुशी हुई कि तुम भी मुझे चाहती हो और तुम ने मेरा प्यार स्वीकार कर लिया. नाम का यह रिश्ता तो दुनिया का बनाया हुआ है, उसे हम ने तो नहीं बनाया. हमारी जिंदगी है और हम अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेंगे न कि दूसरे लोग. रिश्ता हम दोनों के बीच वही रहेगा जो हम दोनों बना रहे हैं, प्यार का रिश्ता.’’

निशा अजय के सीने से लग गई, अजय ने भी उसे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया. दोनों ने एकदूसरे का साथ पा लिया था, इसलिए उन के चेहरे खिले हुए थे. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी कायम हो गया. समय के साथ दोनों का रिश्ता और प्रगाढ़ होता चला गया. दोनों जानते थे कि वे विवाह के बंधन में नहीं बंध पाएंगे, फिर भी अपने रिश्ते को बनाए रखे थे. निशा का विवाह उस के घर वाले कहीं और करें और निशा उस से दूर हो जाए, उस से पहले अजय ने निशा का विवाह अपने ही गांव में किसी युवक से कराने की ठान ली. जिस से निशा हमेशा उस के पास रह सके.

पवन सिंह अजय के गांव ताला रुकनुद्दीनपुर में ही रहता था. पवन के पिता दानवीर सिंह चौहान की 2008 में मत्यु हो चुकी थी. परिवार में मां शांति देवी उर्फ कमला और 3 बड़ी बहनें और 3 बड़े भाई थे. मनमर्जी की शादी अजय ने निशा का विवाह पवन से कराने का निश्चय कर लिया. अजय ने इस के लिए अपनी ओर से कोशिशें करनी शुरू कर दीं. इस में उसे सफलता भी मिल गई. 2012 में दोनों परिवारों की आपसी सहमति के बाद निशा का विवाह पवन से हो गया. निशा मौसी के घर से अपने पति पवन के घर आ गई. विवाह के बाद पवन की मां ने बंटवारा कर दिया. पवन निशा के साथ अलग रहने लगा. इस के बाद पवन की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. पवन पिकअप चलाने लगा.

लेकिन अधिक आमदनी हो नहीं पाती थी. जो होती थी, वह उसे दारू की भेंट चढ़ा देता था. कालांतर में निशा ने एक बेटी शिवांशी (7 वर्ष) और एक बेटे अंश (5 वर्ष) को जन्म दिया. अजय ने भी निशा के विवाह के एक साल बाद फैजाबाद की एक युवती जया से विवाह कर लिया था. जया से उसे एक बेटा था. लेकिन निशा और अजय के संबंध बदस्तूर जारी थे. पवन शराब का इतना लती था कि उस के लिए कुछ भी कर सकता था. एक बार शराब पीने के लिए पैसे नहीं थे तो पवन निशा के जेवरात गिरवी रख आया. मिले पैसों से वह शराब पी गया. वह जेवरात निशा को अजय ने दिए थे.

पवन की हरकतों से निशा और अजय बहुत परेशान थे. अपनी परेशानी दूर करने का तरीका भी उन्होंने खोज लिया. दोनों ने पवन को दुबई भेजने की योजना बना ली. इस से पवन से आसानी से छुटकारा मिल जाता. उस के चले जाने से उस की हरकतों से तो छुटकारा मिलता ही, साथ ही दोनों बेरोकटोक आसानी से मिलते भी रहते. निशा और अजय ने मिल कर अयोध्या जिले के भेलसर निवासी कलीम को 70 हजार रुपए दे कर पवन को दुबई भेजने की तैयारी की. लेकिन दोनों की किस्मत दगा दे गई. लौकडाउन लगने के कारण पवन का पासपोर्ट और वीजा नहीं बन पाया. पवन को दुबई भेजने में असफल रहने पर उस से छुटकारा पाने का दोनों ने दूसरा तरीका जो निकाला, वह था पवन की मौत. अजय ने निशा के साथ मिल कर पवन की हत्या की योजना बनाई.

13 सितंबर को अजय ने पवन से कहा कि वह बहुत अच्छी शराब लाया है, उसे कल पिलाएगा. अच्छी शराब मिलने के नाम से पवन की लार टपकने लगी. अगले दिन 14 सितंबर की रात 9 बजे पवन अपनी बाइक से अजय के घर पहुंच गया. वहां से अजय उसे टीकाराम बाबा के पास वाले तिराहे पर ले गया. अजय ने वहां उसे 2 बोतल देशी शराब पिलाई. पिलाने के बाद वह उसे पीपा पुल पर ले गया. वहां पहुंचतेपहुंचते पवन बिलकुल अचेत हो गया. अजय ने उसे उठा कर गोमती नदी में फेंक दिया. उस के बाद वह घर लौट गया. लेकिन अजय और निशा की होशियारी धरी की धरी रह गई और दोनों पकड़े गए. आवश्यक कागजी खानापूर्ति करने के बाद इंसपेक्टर धर्मेंद्र रघुवंशी ने दोनों को न्यायालय में पेश कर दिया, वहां से दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

Love Story In Hindi : फिजियोथेरेपिस्ट का लालची लव

Love Story In Hindi : रीना सिंधु से लव मैरिज करने के बाद रविंद्र कुमार ने मुरादाबाद में एक आलीशान कोठी बनवाई, जिस की कीमत लगभग 3 करोड़ रुपए है. इसी कोठी के ग्राउंड फ्लोर पर रीना ने फिजियोथेरैपी सेंटर खोल लिया था. उस का काम बहुत अच्छा चलने लगा. एक दिन रीना ने पारितोष नाम के युवक के साथ मिल कर न सिर्फ पति रविंद्र की हत्या की, बल्कि उस की लाश कोटद्वार (उत्तराखंड) में ले जा कर ठिकाने लगा दी. कौन था पारितोष? और क्यों की रीना ने पति की हत्या? जानने के लिए पढ़ें यह सस्पेंस कहानी.

कई दिनों से रीना के चेहरे के हावभाव बदलेबदले नजर आ रहे थे. हर वक्त फूल सा खिलने वाला चेहरा आज ज्यादा ही उदास नजर आ रहा था. रीना ने अपने घर के नीचे ही फिजियोथेरैपी का सेंटर खोल रखा था, जहां हर रोज कई पेशेंट फिजियोथेरैपी कराने आते थे. जिस मकान में रीना सिंधु का फिजियोथेरैपी सेंटर था, वह मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के थाना सिविल लाइंस के रामगंगा विहार में मौजूद था. उस 3 मंजिला मकान की कीमत इस वक्त लगभग 3 करोड़ रुपए है. उसी मकान की बदौलत उस क्षेत्र के लोग रीना का काफी सम्मान करते थे. उस का काम भी ठीकठाक ही चल रहा था.

 

सुबह का वक्त था. रीना अभी थोड़ी देर पहले ही तैयार हो कर अपने फिजियोथेरैपी सेंटर में आ कर बैठी थी. सेंटर पर बैठते ही उस ने आदतन सब से पहले अपना वाट्सऐप चैक किया. सब से पहले उस की नजर पारितोष के मैसेज पर पड़ी.

”गुड मौर्निंग भाभी, कैसी हो?’’

”मैं ठीक हूं, आप कैसे हो पारितोष?’’ रीना ने पारितोष का मैसेज देखते ही जबाव दिया.

”भाभी मैं बिलकुल ठीक हूं, आप सुनाइए.’’ पारितोष जैसे उस के मैसेज के उत्तर का ही इंतजार कर रहा था.

तभी रीना ने पारितोष को मैसेज भेजा, ”पारितोष, आज तुम आ कर मुझ से मिलो, मुझे तुम से कुछ जरूरी काम है.’’

”ओके भाभीजी, मैं 12 बजे तक आप के पास पहुंच जाऊंगा.’’

जिस वक्त पारितोष रीना के सेंटर पर पहुंचा, उस वक्त तक रीना अपने रेगुलर पेशेंट से निपट चुकी थी. रीना को अकेला पा कर पारितोष के चेहरे पर मुसकान उभर आई थी. लेकिन उसे देख कर रीना के चेहरे पर कोई खास बदलाव नहीं आया था. बल्कि पारितोष को देखते ही रीना की आंखों में आंसू भर आए थे.

”क्या बात है भाभी, आप इस तरह से परेशान क्यों हो? आज कोई नई बात हो गई क्या?’’ पारितोष ने रीना से पूछा.

”तुम्हें क्या बताऊं पारितोष, इस इंसान ने मेरा जीना हराम कर रखा है. इस मकान को बेचने के पीछे पड़ा हुआ है. मैं हर तरह से इसे समझासमझा कर हार चुकी हूं. लेकिन यह मेरी एक भी सुनने को तैयार नहीं. पारितोष, तुम अच्छी तरह से जानते हो कि रविंद्र ने अगर इस मकान को बेच दिया तो हम लोग सड़क पर आ जाएंगे. हमारी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. हम दोनों की भलाई इसी में है कि इस से पहले कि रविंद्र इस मकान को बेचे, उसे ही ठिकाने लगाना होगा. पारितोष, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती. रविंद्र के खत्म होने के बाद हम दोनों के बीच की दूरियां पूरी तरह से खत्म हो जाएंगी.’’

रीना सिंधु की बातों ने पारितोष को उलझन में डाल दिया था. वह बोला, ”भाभीजी, मैं आप की परेशानी अच्छी तरह से जानता हूं, रविंद्र आप के और मेरे बीच कांटा बन कर खड़ा है, जिसे अपने बीच से हटाना बेहद ही जरूरी है. लेकिन सवाल इस बात का है कि रविंद्र को किस तरह से ठिकाने लगाया जाए. आप तो देख ही रही हो कि आज दुनिया में ऐसे कितने केस हो रहे हैं. लेकिन पुलिस किसी न किसी तरह से अपराधी तक पहुंच ही जाती है. उस के बाद जेल जाने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता ही नहीं बचता.’’

”पारितोष, तुम्हें इतना बड़ा रिस्क लेने की जरूरत नहीं. तुम इस काम के लिए किसी सुपारी किलर से बात करो. जो भी खर्च आएगा, उस का इंतजाम मैं करूंगी.’’

”भाभीजी, आज सुपारी किलर से भी मर्डर कराना इतना सेफ नहीं है. भेद किसी न किसी तरह से खुल ही जाता है. इस से बेहतर तो यही है कि हम दोनों ही किसी तरह से रविंद्र को मौत के घाट उतार दें.’’

”ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी वैसा ही करो. लेकिन इस काम के बदले में तुम्हें 10 लाख रुपए दे दूंगी. उस के बाद मैं भी तुम्हारी और यह मकान भी तुम्हारा. फिर हम दोनों की जिंदगी में बहार ही बहार होगी.’’ खुश होते हुए रीना बोली.

पारितोष ने रीना के सामने उस के पति रविंद्र को खत्म करने की हामी तो भर ली थी, लेकिन इस काम को किस तरह से अंजाम देना है, इस की रूपरेखा बननी बाकी थी. उस के लिए दोनों को प्लानिंग कुछ इस तरह से करनी थी कि रविंद्र की हत्या भी हो जाए और कोई उन पर किसी तरह का शक भी न कर सके. योजना के तहत दोनों को ही रविंद्र कुमार की हत्या गुप्तरूप से करनी थी. जिस के बाद रविंद्र की हत्या का राज राज ही बन कर रह जाए. रविंद्र कुमार की मौत का चिट्ठा तैयार कर पारितोष अपने घर चला गया था.

पहाड़ों की खाई में मिली रविंद्र की लाश

5 जून, 2025 बृहस्पतिवार को उत्तराखंड के जिला पौड़ी कोटद्वार दुगड्डा रेंज के वनकर्मी सुबह के समय पांचवें मील के समीप जंगल में गश्त कर रहे थे, उसी दौरान ढाबे वाले ने वनकर्मियों को बताया कि नीचे से किसी चीज के सडऩे की बदबू आ रही है. इस सूचना पर वनकर्मी उस ढाबे से 15-20 मीटर नीचे उतरे तो वहां पर एक युवक का शव पड़ हुआ था. वनकर्मियों ने तुरंत इस की सूचना दुगड्ïडा पुलिस चौकी को दी. इस सूचना के बाद पुलिस और एसडीआरएफ की टीमें घटनास्थल पर पहुंच गईं.

घटना की जानकारी मिलते ही पौड़ी के एसएसपी लोकेश्वर सिंह व एएसपी चंद्रमोहन सिंह, सीओ (कोटद्वार) निहारिका सेमवाल भी घटनास्थल पर पहुंचीं. पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचते ही बारीकी से जांचपड़ताल की. मृतक का शव औंधे मुंह पड़ा हुआ था, जिसे देख कर लग रहा था कि उस का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ होगा, लेकिन शव के आसपास दूरदूर तक कोई भी वाहन पड़ा हुआ नहीं मिला था. मृतक की लाश बुरी तरह से सड़ चुकी थी, जिसे देख कर लग रहा था कि लाश कई दिनों से वहां पर पड़ी हुई थी. पुलिस ने मृतक की डैडबौडी को बाहर निकाल कर उस की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं सका.

पुलिस ने मृतक के फोटोग्राफ कराने के बाद उस की लाश को कोटद्वार के बेस अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया था. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान शव के नीचे एक परची पड़ी मिली थी. मृतक के फोटो और परची को आधार मान कर पुलिस ने उस की शिनाख्त के लिए सूचना अखबारों में छपवाई. इस के बाद उस की शिनाख्त मुरादाबाद निवासी रविंद्र कुमार के रूप में हुई. मृतक की पहचान होने के बाद उस की लाश को अपनाने के लिए एक नहीं, बल्कि 2-2 औरतें रोतेबिलखते कोटद्वार थाने पहुंचीं. रविंद्र कुमार की लाश पर अपना हक जमाने वाली पहली पत्नी थी आशा देवी.

आशा देवी थाना बसंत कुंज, नई दिल्ली ने पुलिस को बताया कि रविंद्र कुमार उस का पति था, जो इस वक्त मुरादाबाद में रह रहा था. रविंद्र कुमार की डैडबौडी पर अपना अधिकार जमाने वाली दूसरी पत्नी थी मुरादाबाद निवासी रीना सिंधु. दोनों ही उस की लाश को अपने कब्जे में करने की पुलिस से गुहार लगा रही थीं. इस दौरान पुलिस के सामने ही दोनों के बीच काफी गरमागरमी भी हुई. पुलिस ने जैसेतैसे दोनों की आपबीती सुनने के बाद दोनों का आपस में समझौता कराया. फिर लाश का पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस ने उस का दाहसंस्कार भी कोटद्वार के मुक्तिधाम में ही अपने सामने करा दिया.

रविंद्र कुमार केस को ले कर पुलिस अनुमान लगा रही थी कि या तो उस का किसी गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया या फिर उस ने ही किसी कारण के चलते सुसाइड किया होगा. इसी शंका के चलते पुलिस ने मृतक की दोनों पत्नियों के साथसाथ उस के अन्य रिश्तेदारों से अधिक से अधिक जानकारी जुटाने की कोशिश की. इसी जांच के दौरान एक अहम जानकारी सामने निकल कर आई कि इस वक्त रविंद्र कुमार काफी कर्ज में दबा हुआ था. कई लोगों का उस पर काफी रुपया था. कई लोगों को उस ने पोस्टडेटेड चैक भी दे रखे थे, जिस के चलते उस पर चैक बाउंस का मुकदमा भी चला था.

उस के बाद रविंद्र पर एक एफआईआर भी दर्ज हो चुकी थी. जिस के कारण वह 6 महीने से फरारी काट रहा था. पुलिस को पूरा शक था कि शायद उस ने इन्हीं सब परेशानियों से तंग आ कर सुसाइड कर लिया होगा.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से बदली जांच की दिशा

लेकिन जब पुलिस को रविंद्र कुमार की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो यह मामला उलझ गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक रविंद्र कुमार का न तो एक्सीडेंट हुआ था और न ही उस ने सुसाइड किया था. उस की हत्या की गई थी. उस की हत्या भी कहीं अन्य स्थान पर की गई थी. फिर उस की लाश घटनास्थल पर ला कर डाली गई. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने सब से पहले मुरादाबाद निवासी रीना सिंधु से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रविंद्र काम के सिलसिले में अधिकांश बाहर ही रहते थे. घर पर कईकई दिनों बाद ही आते थे. रीना ने बताया कि उस ने 31 मई, 2025 को रविंद्र को फोन किया था. उस वक्त रविंद्र ने आने का वादा भी किया था, लेकिन वह किसी काम के चलते उस दिन भी घर नहीं आ पाए थे.

यह सब जानकारी जुटाने के बाद कोटद्वार पुलिस ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की तो एक कार पहली जून को कोटद्वार की तरफ आतीजाती दिखाई दी, जिस में ड्राइवर के पास वाली सीट पर एक महिला बैठी नजर आ रही थी. यह फुटेज पुलिस ने मृतक रविंद्र कुमार के भाई रमेश कुमार को दिखाई तो उस ने बताया कि यह कार उस के भाई की है और उस कार में बैठी महिला उस की पत्नी रीना है. इस सबूत के मिलते ही कोटद्वार कोतवाल रमेश तनवार ने अपनी टीम के साथ रीना सिंधु को नगीना से हिरासत में लिया. पुलिस ने सब से पहले उस का मोबाइल अपने कब्जे में किया. उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि पारितोष नाम का युवक काफी समय से रीना सिंधु के संपर्क में था.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने रीना सिंधु से सवाल किया, ”पारितोष से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

”पारितोष मेरा मुंहबोला भाई है.’’ रीना सिंधु ने जबाव दिया.

”अगर पारितोष तुम्हारा मुंहबोला भाई है तो उस ने तुम्हारे पति की हत्या क्यों की?’’

”नहीं, पारितोष ऐसा नहीं कर सकता.’’ रीना ने पारितोष का बचाव करने की कोशिश की.

”रीनाजी, अब इस बात से कोई लाभ नहीं. पारितोष इस वक्त हमारे कब्जे में है. वह हमें सब कुछ साफसाफ बता चुका है कि उस ने ही आप के कहने पर रविंद्र की हत्या की है.’’ पुलिस के ऐसा कहते ही रीना का चेहरा फीका पड़ गया. पुलिस ने रीना के सामने जो पासा फेंका था, वह ठीक काम कर गया.

पुलिस के इस वाक्य ने रीना के मुंह पर ताला लगा दिया था. इस के बाद रीना ने पुलिस के सामने स्वीकार कर लिया कि पारितोष के साथ मिल कर उस ने ही रविंद्र की हत्या को अंजाम दिया. उस ने सब कुछ साफसाफ उगल दिया. उस ने पुलिस के सामने कुबूल किया कि मेरा पति रविंद्र इस वक्त पूरी तरह से कर्ज में डूबा था. उस कर्ज को चुकाने के लिए वह मुरादाबाद स्थित मकान 3 करोड़ में बेचना चाहता था. इस मकान के बिकते ही मैं सड़क पर आ जाती. इसी कारण मैं किसी भी कीमत पर उस मकान को बिकने नहीं देना चाहती थी.

इस बारेे में मैं ने पारितोष से बात की. पारितोष काफी समय से मुझे प्यार करता था. मैं ने उसे उस के साथ शादी करने के साथ ही 10 लाख रुपए देने का लालच दिया तो वह रविंद्र की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. उस के बाद हम दोनों ने रविंद्र की हत्या कर दी. इस जानकारी के बाद पुलिस ने पारितोष के मोबाइल पर फोन मिलाया तो उस ने फोन नहीं उठाया. फिर पुलिस ने उस की लोकेशन के आधार पर उसे भी नगीना से गिरफ्तार कर लिया था. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस ने उन से अलगअलग पूछताछ की. उस से की गई पूछताछ के बाद रविंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, चौंकाने वाली निकली—

20 साल पहले हुआ था रीना से प्यार

रविंद्र कुमार मूलरूप से पश्चिमी दिल्ली के राजौरी गार्डन का निवासी था. वह दिल्ली में रह कर ही प्रौपर्टी का कारोबार करता था. प्रौपर्टी के काम से रविंद्र कुमार ने काफी पैसा कमाया था. उस की शादी कई साल पहले आशा देवी के साथ हुई थी. शादी के कुछ समय बाद तक तो मियांबीवी के विचार मिलते रहे, लेकिन कुछ ही समय के बाद दोनों के संबंधों में खटास आनी शुरू हो गई थी. समय के साथ आशा देवी एक बेटे की मां बनी.

अब से लगभग 20 साल पहले रविंद्र की जानपहचान मुरादाबाद निवासी रीना सिंधु से हुई थी. उस वक्त रीना दिल्ली में फिजियोथेरैपी की पढ़ाई कर रही थी. दिल्ली के जिस मकान में उस ने कमरा ले रखा था, वह रविंद्र के घर के पास ही था. उसी दौरान एक दिन रविंद्र की जानपहचान रीना सिंधु से हुई थी. जानपहचान के बाद जल्दी ही बात दोस्ती तक जा पहुंची थी. हालांकि उस वक्त दोनों की उम्र में लगभग 20 साल का अंतर था. रविंद्र उस वक्त शादीशुदा और एक बच्चे का बाप भी था. लेकिन प्रेम की राह में किसी इंसान का शादीशुदा या बच्चे का बाप होना कोई मायने नहीं रखता. यही कारण रहा कि रविंद्र के रहनसहन को देख कर रीना सिंधु उस की प्रेम दीवानी हो गई.

रीना सिंधु के साथ प्रेम प्रसंग चालू होने के बाद रविंद्र कुमार ने अपनी पत्नी आशा की ओर से मुंह मोडऩा शुरू कर दिया था, जिस के कारण पतिपत्नी के संबंधों में दूरियां बनती गईं. उस वक्त तक रविंद्र कुमार पैसे में खेल रहा था. इस बात की जानकारी धीरेधीरे रविंद्र की पत्नी आशा को भी हो गई थी, जिस के कारण बसीबसाई गृहस्थी में एक तूफान आ खड़ा हुआ था. रीना के प्यार में पागल हो रविंद्र ने दिल्ली छोड़ दी और फिर वह अपनी पे्रमिका रीना सिंधु को साथ ले कर देहरादून जा कर रहने लगा. देहरादून जाते ही रविंद्र ने एक फ्लैट किराए पर ले लिया और रीना के साथ ही लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगा.

देहरादून आते ही रविंद्र कुमार ने अपना पैसा प्रौपर्टी में लगाना शुरू किया. प्रौपर्टी के बिजनैस का वह पुराना खिलाड़ी था. यही कारण रहा कि उस के देहरादून में प्रौपर्टी में पैसा लगाते ही उस का कामधंधा ठीक से चलने लगा. देहरादून में रह कर उस ने खूब पैसा कमाया. उस के बाद तो वह दिल्ली में रह रहे अपने परिवार को भूल गया और बाद में उस ने रीना के साथ ही शादी कर ली. चूंकि रीना पहले से ही मुरादाबाद में रहती थी, इसी कारण उस ने रविंद्र को मुरादाबाद का रास्ता दिखाया और उस का पैसा मुरादाबाद में भी प्रौपर्टी में लगवा दिया.

उसी दौरान रविंद्र ने दिल्ली के राजौरी गार्डन स्थित अपनी पुश्तैनी जमीन भी बेच दी थी. मुरादाबाद में पैसा लगाने पर उस का काम ठीकठाक चल निकला. उसी समय सन 2011 में रविंद्र ने मुरादाबाद के पौश एरिया रामगंगा विहार में एक तिमंजिला मकान बनवाया. इस मकान की रजिस्ट्री भी रीना ने रविंद्र कुमार के साथ संयुक्त रूप से कराई थी. इस मकान के बनते ही रीना ने उसी मकान के भूतल पर अपना फिजियोथेरैपी का सेंटर खोल लिया था. उस के साथ ही रीना ने उस मकान का अधिकांश हिस्सा किराए पर उठा दिया था, जिस से हर महीने हजारों रुपए का किराया आता था.

उसी वक्त यूपी सरकार की ओर से आवासीय कालोनियों की खरीदफरोख्त पर शिकंजा कसा तो प्रौपर्टी डीलिंग के बिजनैस में अचानक मंदी आ गई, जिस के कारण रविंद्र कुमार को काफी नुकसान उठाना पड़ा. प्रौपर्टी न बिकने के कारण रविंद्र कुमार कर्ज के बोझ तले दबने लगा. रविंद्र कुमार ने कई लोगों से प्रौपर्टी के नाम पर पैसा ले रखा था. उस का काम कम हुआ तो लोगों का उस पर पैसा लौटाने के लिए दबाव बढऩे लगा. रविंद्र कुमार ने कई लोगों को पोस्टडेटेड चैक भी दिए, लेकिन वे बाउंस होने लगे. जिस के बाद उस के ऊपर कई लोगों ने एफआईआर भी दर्ज कराई.

जब रविंद्र सब तरह से फंसने लगा तो उस ने मुरादाबाद का मकान बेचने का प्लान बना लिया. इस बारे में उस ने एक दिन रीना सिंधु से बात की. मकान बेचने की बात सुनते ही रीना का पारा सातवें आसपान पर चढ़ गया. उस ने साफ शब्दों में कहा कि तुम्हारे पास इस के अलावा और भी कई प्रोपर्टी हैं, उन्हीं को बेच कर अपना कर्च चुका लो. यह मकान मेरे नाम है, इस मकान को कभी भूल से भी बेचने की मत सोचना.रविंद्र ने बारबार रीना को समझाया कि इस वक्त हम लोग परेशानियों में आ घिरे हैं. इस मकान को बेच कर हम अपना सारा कर्ज चुका सकते हैं. उस के बाद कोई प्लौट ले कर वैसा ही मकान फिर से बना सकते हैं. लेकिन रीना रविंद्र की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं थी.

भले ही रविंद्र कुमार कर्ज के बोझ के नीचे दबा था, लेकिन उस वक्त भी रीना एक लग्जरी लाइफ जी रही थी. क्षेत्र में उस का रुतबा था. सभी उस का सम्मान करते थे. रविंद्र कुमार उस मकान में कभीकभार ही आता था. अगर रीना उस मकान को बेचने देती तो क्षेत्र में उस की इज्जत तारतार हो जाती. यही सोच कर उस ने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर वह उस मकान को बेचने नहीं देगी, चाहे उस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े. यह बात रीना ने पारितोष के सामने भी रखी.

पारितोष से उस के काफी पुराने संबंध थे. पारितोष की जानपहचान कई साल पहले फिजियोथेरैपी कराने के दौरान ही हुई थी. पारितोष बिजनौर के नगीना का रहने वाला था. कई साल पहले वह रीना के फिजियोथेरैपी सेंटर पर आया था. फिजियोथेरैपी कराने के दौरान ही दोनों के बीच जानपहचान हुई. पारितोष उम्र में रीना से छोटा था. पहली ही मुलाकात में वह रीना के दिल पर छा गया. उसी दौरान दोनों ने अपने मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान भी किया था. जिस के बाद दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. जल्दी ही दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई. उस के बाद दोनों के बीच प्यार का रिश्ता गहरा होता गया. जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए थे.

पारितोष के संपर्क में आने के बाद रीना सिंधु रविंद्र से कुछ कटीकटी सी रहने लगी थी. उस के बाद रविंद्र के साथ उस का अनचाहा रिश्ता ही रह गया था, जिस को निभाना उस की मजबूरी थी. अब उस की निगाहें केवल रविंद्र कुमार की प्रौपर्टी और पारितोष पर ही जम कर रह गई थीं. जब रविंद्र कुमार मकान को बेचने के लिए उस के पीछे पड़ गया तो उस ने इस बारे में पारितोष से बात की. लेकिन पारितोष इस में कुछ नहीं कर सकता था. फिर भी रीना ने एक दिन पारितोष के साथ बैठ कर उसे समझाने की कोशिश की.

न चाहते हुए भी करनी पड़ी रविंद्र की हत्या

”पारितोष तुम जानते हो, जिस मकान के नीचे तुम बैठे हो उस की कीमत क्या है? इस मकान की कीमत इस वक्त करीब 3 करोड़ रुपए है. सोचो, अगर इस मकान का मालिक तुम्हें बना दिया जाए तो तुम्हें कैसा लगेगा. यह मैं तुम्हें कोई सपना नहीं दिखा रही, बल्कि अगर तुम चाहो तो यह हकीकत भी बन सकता है. लेकिन इस के लिए तुम्हें मेरा साथ देना होगा. इस मकान की रजिस्ट्री में मेरा भी नाम है.’’

”भाभी, इस में मैं आप की क्या सहायता कर सकता हूंï?’’ पारितोष ने रीना के सामने ही प्रश्न खड़ा कर दिया था.

तब रीना ने पारितोष को समझाने की कोशिश की, ”देखो पारितोष, रविंद्र बहुत समय से इस मकान को बेचने के पीछे पड़ा हुआ है. मैं इस मकान को किसी भी कीमत पर बिकने नहीं दूंगी. अगर तुम चाहो तो यह मकान बिकने से रुक सकता है.’’

”लेकिन वह कैसे?’’ रीना की बात सुनते ही पारितोष चौंका.

तब रीना ने कहा, ”हमारे और तुम्हारे बीच में रविंद्र कुमार जो कांटा बना हुआ है, उसे किसी तरह से तुम्हें हटाना होगा. रविंद्र के खत्म होते ही मेरे और इस मकान के मालिक तुम हो जाओगे.’’

रीना की बात सुनते ही पारितोष कुछ सहम सा गया, ”नहीं भाभीजी, यह काम मुझ से नहीं होगा. मैं किसी का खून नहीं कर सकता.’’ पारितोष ने पूरी तरह से हाथ खड़े कर दिए.

”अरे, मैं तो तुम्हें बड़ा दिलेर समझती थी. लेकिन तुम तो बिल्कुल गीदड़ निकले. अब तो मुझे लगने लगा कि तुम जो मेरे साथ प्यार का नाटक करते हो, वह मात्र दिखावा था. लगता है कि तुम्हें मात्र मेरे जिस्म से प्यार है. अगर तुम अपना प्यार पाने के लिए कुछ नहीं कर सकते तो आज के बाद मुझ से मिलने की कोशिश भी मत करना.’’ रीना ने पारितोष से साफ शब्दों में कहा.

रीना की बात सुन कर पारितोष का चेहरा उतर गया. उस ने फिर भी रीना को समझाने की कोशिश की, ”भाभीजी, रविंद्र भाईसाहब बहुत ही नेकदिल इंसान हैं. उन के बारे में ऐसा मत सोचो.’’

”मुझे जो सोचना था, सोच चुकी हूं. अगर तुम इस काम में मेरी सहायता नहीं कर सकते तो आज के बाद मेरी जिंदगी में दखल देने की जरूरत नहीं है.’’ इतना कहते ही रीना सिंधु अपने केबिन से निकल कर आराम करने अपने रूम की तरफ बढ़ गई थी.

काफी समय तक पारितोष वहीं पर बैठा उस का इंतजार करता रहा. जब काफी देर तक रीना नहीं आई तो वह वहां से चला गया. उस के बाद कई बार पारितोष ने मोबाइल पर उस से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उस ने उस की काल रिसीव नहीं की. फिर पारितोष ने रीना के मोबाइल पर एक मैसेज भेजा, ‘सौरी भाभीजी, मुझे माफ करना. मैं ने आप के दिल को ठेस पहुंचाई. मैं आप के बिना एक पल भी नहीं रह सकता. आप जैसा चाहें, मैं वैसा करने को तैयार हूं.’’

पारितोष का मैसेज पढ़ते ही रीना का चेहरा खिल उठा. फिर रीना ने पारितोष को मैसेज कर के अपने घर बुलाया. जहां पर बैठ कर दोनों ने रविंद्र कुमार की हत्या की साजिश रची. उसी साजिश के तहत 31 मई, 2025 को रीना ने रविंद्र को फोन कर पार्टी के बहाने बिजनौर के नगीना में सराय पुरैनी गांव में पारितोष के घर बुला लिया. रविंद्र के पारितोष के घर पहुंचते ही उस का ठीक प्रकार से आदरसम्मान किया गया. उस रात पारितोष ने रविंद्र को अच्छी ब्रांड की शराब पिलाई. उस के बाद जब रविंद्र नशे में झूमने लगा तो उसे सुलाने के बहाने एक कमरे में ले जा कर पारितोष और रीना ने फावड़े से उस के सिर और गरदन पर ताबड़तोड़ वार करते हुए मौत की नींद सुला दिया.

रविंद्र की हत्या करने के बाद उस की लाश को घर के ही एक हिस्से में छिपा दिया. अगले दिन 2 जून की रात को उन्होंने रविंद्र की लाश को उसी की कार में डाली और फिर उसे ठिकाने लगाने के लिए निकल पड़े. पहले इन दोनों ने उस की लाश को रामनगर की तरफ जाने वाली रोड के किनारे पर फेंकने की कोशिश की, लेकिन वहां पर सफल नहीं हो पाए. उस के बाद इन दोनों ने रविंद्र की लाश उत्तराखंड के कोटद्वार में दुगड्डा के पास जंगल में फेंक दी. रविंद्र की लाश को ठिकाने लगाने के बाद उस की कार को नोएडा में जा कर सड़क किनारे खड़ी कर दी. फिर आरोपी वहां से फरार हो गए.

इस मामले में मृतक रविंद्र के भाई रमेश कुमार की तरफ से रीना सिंधु और पारितोष के खिलाफ भाई की हत्या का केस दर्ज कराया गया था, जिस को कोटद्वार थाने में बीएनएस की धारा 103(1), 238 के तहत दर्ज किया गया था. इस केस के खुल जाने के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. इस हत्याकांड को अंजाम देने से पहले पारितोष ने रीना को काफी समझाया, लेकिन उस ने उस की एक न सुनी. रीना की शुरू से ही सोच थी कि अपने पति को खत्म कर पूरी तरह से बच जाएगी. उस के बाद वह पारितोष के साथ शादी कर उस 3 करोड़ के मकान में मजे से रहेगी. लेकिन लव, लालच और लग्जरी लाइफ जीने की चाहत में उस ने अपनी जिंदगी के साथसाथ अपनी मासूम बेटी की जिंदगी भी डिस्टर्ब कर डाली. Love Story In Hindi

 

 

UP Crime News : बीमा क्लेम के करोड़ों हड़पने वाला गैंग

UP Crime News : यूपी के जिला संभल की पुलिस ने बीमा क्लेम हड़पने वाले गैंग के 30 लोगों को गिरफ्तार कर बड़ी सफलता हासिल की है. यह गैंग मरे हुए लोगों का भी मोटी धनराशि का जीवन बीमा करा कर बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से क्लेम ले लेता था. पिछले 8 सालों से देश के विभिन्न राज्यों में गैंग धड़ल्ले से काम कर रहा था. आप भी जानें कि गैंग किस तरह से अपने शिकार तलाशता था?

ओंकारेश्वर मिश्रा बीमा पौलिसी का सर्वे करने वाली फस्र्ट सोल्यूशन सर्विस कंपनी में बतौर जांच अधिकारी के रूप में काम करता था. करीब 8 वर्ष पहले की बात है. वह एक जीवन बीमा क्लेम से संबंधित जांच करने गया था.

जांच में पता चला कि जिस व्यक्ति का इंश्योरेंस क्लेम लेने के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया है, उस की बीमा पौलिसी मृत्यु से 3 महीने पहले ही कराई गई थी. ओंकारेश्वर मिश्रा ने और गहनता से जांच की तब पता चला कि वह व्यक्ति कई महीनों से कैंसर से पीडि़त था. उस की जो इंश्योरेंस पौलिसी की गई थी, वह नियम के अनुसार नहीं थी.

मृतक के फेमिली वालों ने मिश्राजी से सांठगांठ की. कुछ लेनदेन की बात चली. कुल मिला कर क्लेम की धनराशि के आधेआधे पर फैसला हो गया. नौमिनी को पौलिसी की राशि का भुगतान हो गया. इस तरह मिश्राजी को इस सांठगांठ से इतनी रकम हासिल हो गई, जितनी उस की एक महीने की सैलरी भी नहीं थी.

इस के बाद ओंकारेश्वर मिश्रा की बुद्धि में चेतना जागी. उस ने इस तरह के घोटाले को अपना धंधा बनाने के विचार पर मंथन शुरू कर दिया. इस के लिए उस ने अपने एक साथी अमित कुमार से विचारविमर्श किया. अमित भी इसी लाइन से जुड़ा था. दोनों ने मिल कर योजना तैयार की. वह किसी ऐसे बीमार व्यक्ति की तलाश में लग गए, जिस की मृत्यु निकट दिनों में ही संभव हो. कई दिनों के प्रयास के बाद भी ऐसा कोई मरणासन्न बीमार उन दोनों के हत्थे नहीं चढ़ा.

ओंकारेश्वर मिश्रा उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के कस्बा फुलवारिया का रहने वाला था. इधरउधर हाथपैर मारने के बाद ओंकारेश्वर और अमित को सफलता नहीं मिली. कई दिनों से थकेहारे दोनों के चेहरे पर एक दिन चमक जाग उठी. दोनों ने तय किया कि ग्रामीण क्षेत्र की किसी आशा दीदी से कांटेक्ट किया जाए.

अमित की जानकारी में एक आशा दीदी थी. दोनों ने उस महिला से संपर्क किया. वह एक सक्रिय आशा थी. उसे अपने पूरे गांव की जानकारी थी. आशा ने इन दोनों को बताया कि गांव की एक महिला कैंसर से पीडि़त है और इस समय वह मरणासन्न स्थिति में है.

गांव के ही झोलाछाप डाक्टर से दवाई ले कर उस की जिंदगी के दिन पूरे कर रहे थे. महिला 50 प्लस की उम्र में पहुंच चुकी थी.

ओंकारेश्वर और अमित ने उस के परिवार वालों से बातचीत की उन्हें समझाया कि यदि इन का बीमा कर दिया जाए तो काफी रकम उन की मृत्यु के बाद परिजनों को मिल सकती है. परिवार के लोगों ने कहा कि बीमा कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. मिश्राजी इसी जुमले का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा कि पैसा हम लगाएंगे, कागज सब तैयार हम करेंगे, लेकिन आप को बीमा की आधी रकम हमें देनी पड़ेगी.

फेमिली के लोग उस की बात पर बिना किसी नानुकुर के तैयार हो गए. पूरा खाका तैयार कर लिया गया. जुगाड़ बाजी करके महिला का बीमा करा दिया गया. इन दोनों ने मिलकर बता दिया कि 5 लाख रुपए का बीमा कराया गया है.

बीमा की 2 किस्तें इन दोनों ने अपनी जेब से भर दीं. इत्तेफाक कहिए या इन लोगों का मुकद्दर, 2 महीने बाद ही महिला की मृत्यु हो गई. इन्होंने क्लेम कर के बीमा राशि निकाल ली और शर्त के अनुसार रकम आधीआधी बांट ली. वृद्धा की फेमिली भी खुश और मिश्राजी भी खुश. इस कामयाबी के बाद ये लोग इसी धंधे में लग गए.

इस के बाद ये लोग किसी बीमार मरणासन्न व्यक्ति की तलाश करते. उस का बीमा करवाते उस की मृत्यु के बाद बीमा राशि क्लेम कर के निकलवा लेते और उस का बंदरबांट कर लेते. इस तरह इन के इस धंधे में और भी लोग जुड़ते रहे और एक गैंग तैयार हो गया. सभी सदस्य भरपूर कमाई कर रहे थे. भरपूर आमदनी हो रही थी. फिर एक दिन अचानक गैंग पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. देखते ही देखते एक आलीशान मजबूत किला रूपी गैंग रेत के घरौंदे की तरह बिखर गया.

बात 17 जनवरी, 2025 की है. रात का समय था. ठंड पड़ रही थी. इस दौरान उत्तर प्रदेश के जिला संभल की एडिशनल एएसपी अनुकृति शर्मा अपनी गाड़ी से थाना रजपुरा पुलिस की रात्रि गस्त की निगरानी कर रही थीं. तभी रास्ते में एक काले रंग की स्कौर्पियो ने उन की गाड़ी को ओवरटेक किया. गाड़ी की स्पीड और ओवरटेक करने का ढंग देख एएसपी अनुकृति शर्मा को शक हुआ. उन्होंने अपने ड्राइवर को निर्देश दिया कि इस स्कौर्पियो को रोका जाए.

पुलिस ने उस स्कौर्पियो का पीछा किया. स्कौर्पियो ने स्पीड और तेज कर दी. एएसपी अनुकृति शर्मा ने भी अपने ड्राइवर को कार का पीछा करने के निर्देश दिए. पुलिस की 2 गाडिय़ां पीछे आते देख कर स्कौर्पियो का ड्राइवर घबरा गया. जैसे ही मौका लगा, एएसपी अनुकृति शर्मा के ड्राइवर ने ओवरटेक कर के स्कौर्पियो रुकवाई. उस में ओंकारेश्वर मिश्रा और अमित कुमार नाम के 2 शख्स बैठे थे.

अमित कार ड्राइव कर रहा था. उन से सामान्य नागरिक की तरह ही कुछ जानकारी पुलिस ने करनी शुरू कर दी. पहले तो वो पुलिस के सवालों को टालते रहे. इस पर एएसपी ने उन की गाड़ी की तलाशी लेने के निर्देश दिए. तलाशी में उन के पास से 16 डेबिट कार्ड, कई बीमा कंपनियों से जुड़े कागजात और 11 लाख से अधिक रुपए नकद मिले. यह सब बरामद होने पर एएसपी को मामला संदिग्ध लगा तो वह उन दोनों को कार सहित थाने ले गई.

संभल रजपुरा थाने में उन से पूछताछ का सिलसिला व्यापक होता गया. बातबात में बात बढ़ती गई. जब आगे जांच हुई तो पता चला कि यह कोई सामान्य लोग नहीं थे, बल्कि ये अंतरराज्यीय बीमा घोटाले के सरगना निकले.

पुलिस ने जब ओंकारेश्वर मिश्रा से पूछताछ की तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं. यह गैंग फरजी बीमा पौलिसी से जुड़ा था. ओंकारेश्वर ने कुबूला कि हम बीमा पौलिसी का सर्वे करने वाली कंपनी में बतौर इन्वेस्टिगेटर काम करते हैं.

मिश्रा और अमित ने दिल्ली स्थित 2 बीमा जांच कंपनियों, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ और ‘फस्र्ट साल्यूशंस एजेंसी’ के लिए काम किया था, जो कई बीमा कंपनियों के दावों को वेरिफाई करने का काम किया करती थीं. उन का काम पौलिसीधारक की मृत्यु के बाद नौमिनी के क्लेम की जांच करना था, लेकिन वे उल्टा काम कर रहे थे.

थाना रजपुरा पुलिस द्वारा इन दोनों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद जेल भेज दिया गया और इन से बरामद कागजात व अन्य सामग्री के आधार पर जांच चलती रही.

इन के द्वारा बताए गए अन्य साथियों पर भी पुलिस की निगरानी बढ़ गई. जगहजगह छापे मारे गए. जहां से जो आरोपी हाथ लगा उसे गिरफ्तार किया जाता रहा. यह सिलसिला कई महीने तक चलता रहा. पुलिस ने बीमा घोटाले में शामिल रहे 30 आरोपियों को 15 अप्रैल, 2025 तक गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया.

शुरू के दिनों में गिरोह के लोग बीमार व्यक्ति के फेमिली वालों से संपर्क करते थे. उन्हें सरकारी मदद का झांसा देते थे और आधार कार्ड और पैन कार्ड ले लेते थे. मरीज के इलाज की फाइल के साथ सिग्नेचर या फिर अंगूठे का इंप्रेशन ले लेते थे. गांव में कौन व्यक्ति बीमार है, किस को कैंसर हुआ है. कौन मरने वाला है, उन्हें तलाश कर उन की जीवन बीमा पौलिसी करा दिया करते थे. यह लोग गरीब और अशिक्षित लोगों को ही अपना टारगेट किया करते थे.

यह लोग अब तो किसी मरणासन्न व्यक्ति का ही नहीं अपितु मृत्यु के बाद भी मृतक व्यक्ति का बीमा कराने में कामयाब होने लगे. अब गैंग ने पूरी रकम हड़पने की योजना तैयार कर ली. ऐसा ही एक मामला संभल पुलिस की जांच में देश की राजधानी दिल्ली का सामने आया.

उत्तरी दिल्ली के शक्तिनगर निवासी त्रिलोक कुमार बीते वर्ष 19 जून को बीमारी से मौत हो गई. 25 सितंबर को उन्हें जिंदा दर्शा कर बीमा घोटाला गैंग ने बीमा की 2 पौलिसी करा दी. त्रिलोक कुमार कैंसर से पीडि़त थे. 15 जून, 2024 को वह दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट में भरती हुए. 19 जून, 2024 को उन की मौत हो गई थी.

20 जून को दिल्ली के निगम बोध घाट पर उन का अंतिम संस्कार हो गया. फेमिली वालों के पास एमसीडी दिल्ली की श्मशान घाट की रसीद मौजूद थी, जिस पर मौत का कारण कैंसर लिखा था. इस के अलावा राजीव गांधी हौस्पिटल के डाक्यूमेंट्स भी थे. त्रिलोक कुमार के नाम पर कुल 2 जीवन बीमा पौलिसी एलआईसी से कराई गईं. इस में दूसरी वाली पौलिसी 20.48 लाख रुपए की थी. गिरोह ने इन की बीमा धनराशि हड़प ली.

ऐसा ही एक मामला बुलंदशहर जिले के डिबाई थाना क्षेत्र में भीमपुर गांव का सामने आया. पुलिस को सुनीता ने बताया कि उस के पति सुभाष की मौत बीमारी की वजह से पिछले साल हुई. मरने से कुछ दिनों पहले ही गांव की आशा दीदी नीलम उन के पास आई. उस ने कहा कि वह सरकार से कुछ मदद दिला सकती है.

वह सारे कागजात ले गई और वो उस ने इंश्योरेंस गिरोह को सौंप दिए. घोटाले का मामला सोशल मीडिया पर चर्चा में होने के बाद सुनीता को भी उस के पति के बीमे के कागज चैक कराने की याद आई. बाद में पता चला कि उस के पति के नाम पर लाखों रुपए की बीमा राशि निकाली जा चुकी है.

इसी तरह गाजियाबाद में लोनी थाना क्षेत्र की पूजा कालोनी में रहने वाले सौराज की 9 नवंबर, 2022 को मौत हो गई. उसी दिन पूजा कालोनी के श्मशान घाट में उस का अंतिम संस्कार हो गया. फेमिली वालों के पास इस श्मशान घाट की रसीद भी मौजूद है. इस में अंतिम संस्कार 9 नवंबर, 2022 को दोपहर साढ़े 3 बजे होना लिखा है. सौराज की मौत के बाद फरजी बीमा पौलिसी गैंग ऐक्टिव हुआ और उस के घर पहुंच गया.

मर चुके लोगों का भी गैंग ने कराया बीमा

इस गैंग ने सौराज के मृत्यु प्रमाणपत्र अन्य कागजात में हेराफेरी कर के उस की 2 जीवन बीमा पौलिसी करा दीं. एक पौलिसी मौत के 20 दिन बाद 29 नवंबर, 2022 को हुई. यह साढ़े 8 लाख रुपए की थी. दूसरी पौलिसी अन्य बीमा कंपनी से 7 दिसंबर, 2022 को हुई. यह 19 लाख 91 हजार 970 रुपए की थी.

मामला उत्तर प्रदेश के ही जिला बदायूं के गांव सिठौली का सामने आया. यहीं के रहने वाले सुरजीत सिंह की मौत एक लंबी बीमारी के बाद हो गई थी. गैंग ने उन के 2 बीमे करा दिए. सुरजीत सिंह को इसकी भनक भी नहीं लगी. गैंग ने बीमा कंपनी से क्लेम कर के फरजी तरीके से बीमा राशि हड़प ली. इस फरजीवाड़े में बैंककर्मियों की मिलीभगत की संभावना व्यक्त की गई.

घोटाले के एक अन्य मामले में सर्वेश के पति मुकेश कुमार की मृत्यु किडनी फेल होने से हुई थी. उन के नाम पर 20 लाख रुपए का बीमा था. गैंग के लोगों ने सभी दस्तावेज लेकर सर्वेश से उस पर हस्ताक्षर भी कर दिए थे. इस के बावजूद बीमे की धनराशि सर्वेश के खाते में नहीं आई. 2 जनवरी, 2025 को गिरोह ने सर्वेश के नाम पर खोले गए फरजी खाते से सेल्फ चैक के जरिए से 9 लाख 90 हजार रुपए निकाल लिए.

चौंकाने वाली बात यह रही कि सर्वेश ने दावा किया कि उन्होंने ऐसा कोई खाता नहीं खुलवाया और न ही बैंक जा कर कोई चैक साइन किया. उन का एकमात्र बैंक खाता रजपुरा में था, जबकि नोएडा के सूरजपुर स्थित यस बैंक में उन के नाम से नया खाता खोल दिया गया था.

घोटाले का मामला हाईलाइट हो जाने पर बीमा राशि हड़पने की एक शिकायत जनपद संभल के थाना कुडफ़तेहगढ़ और एक थाना बनियाठेर में दर्ज हुई.

यह मामला अप्रैल 2025 का है. थाना कुडफ़तेहगढ़ क्षेत्र के गांव स्योडारा निवासी मीरावती के पति सुदामा, जो कैंसर से पीडि़त थे. इन की 2020 में मृत्यु हुई थी. इन के नाम की भी एक पौलिसी एलआईसी से कराई गई थी. इन के भी फरजी दस्तावेज तैयार किए गए. बीमा का पैसा मीरावती के खाते में

आया था.

आरोपियों ने प्रथमा ग्रामीण बैंक स्योडारा में मीरावती का खाता खुलवाया था . बैंक से चेक बुक ले कर मीरावती से खाली चेक पर अंगूठा लगवा लिया. मीरावती के खाते से कई लाख रुपए आराम सिंह नाम के व्यक्ति ने अपने बेटे पंकज सिंह के खाते में ट्रांसफर करा लिए.

हर विभाग में कर रखी थी सैटिंग

दूसरे मामले में बनियाढेर क्षेत्र के निवासी सत्यवीर सिंह की पत्नी मृतका सुकरवती को काला पीलिया था. जनवरी 2020 को उन की मृत्यु हो गई. जनवरी 2021 में उन्हें जीवित दिखा कर बीमा कराया गया.

मार्च में मृत्यु दिखा कर दूसरा मृत्यु सर्टिफिकेट ब्लौक बिलारी से ही बनवाया गया. बीमा कंपनियों में क्लेम कर के बीमा राशि प्राप्त कर ली और हेराफेरी कर के नौमिनी के खाते से निकाल ली. इन दोनों फरजीवाड़े के मामलों में नामजद आराम सिंह को नामजद किया गया.

पुलिस द्वारा आराम सिंह निवासी अल्लापुर, बिलारी को गिरफ्तार किया गया. आराम सिंह अंतरराज्यीय बीमा गिरोह का एक सदस्य निकला.

मुख्य आरोपी आराम सिंह ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए. उस ने बताया कि ओंकारेश्वर मिश्रा, सचिन शर्मा उर्फ मोनू आदि के साथ मिल कर यह धोखाधड़ी की जाती थी. यह गिरोह पिछले 8 सालों से सक्रिय था. संभल, धनारी, बबराला, बिलारी और मुरादाबाद समेत कई क्षेत्रों में इन का नेटवर्क फैला हुआ था. गिरोह ने 12 राज्यों के सैकड़ों लोगों के साथ इस तरह की धोखाधड़ी करनी स्वीकार की.

एडिशनल एसपी अनुकृति शर्मा की निगरानी में संभल पुलिस को जांच में एक व्यक्ति पंचम सिंह के 2 आधार कार्ड बरामद हुए. एक में उन की जन्मतिथि जनवरी 1955 और एक दूसरे आधार कार्ड में जुलाई 1976 दर्ज थी. दोनों आधार कार्ड का नंबर सेम था.

पंचम सिंह के बेटे विनोद कुमार को 2 आधार कार्ड इस्तेमाल करने के जुर्म में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया. क्योंकि बीमा घोटाला गैंग ने पंचम सिंह की मृत्यु के बाद उन की बीमा राशि हड़प ली थी. पुलिस ने दोनों आधार कार्ड यूआईडीआई का डेटाबेस से चेक कराए.

डुप्लीकेट आधार कार्ड में पंचम सिंह की आयु 21 वर्ष काम कराई गई थी. क्योंकि पीएम जेजेवाई (प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना) का लाभ के लिए उम्र 50 साल से कम की उम्र होनी चाहिए, जबकि पंचम सिंह 70 साल के थे. इसलिए आधार में आयु कम कराई गई थी.

पुलिस के लिए चिंता की बात यह थी कि यह सब हुआ कैसे? पंचम सिंह के बेटे विनोद ने आधार कार्ड में जन्मतिथि की हेराफेरी करने की जानकारी दी.

हैरान करने वाली बात यह थी कि आम नागरिक को अगर अपना एड्रेस चेंज कराना हो या मोबाइल नंबर दर्ज करना हो या बदलवाना हो तो लोगों को व्यक्तिगत रूप से आधार के अधिकृत सेंटर पर उपस्थित होना होता है, लेकिन पंचम सिंह ने यह कैसे करा लिया? यह सब कैसे हो गया?

पुलिस की तहकीकात में इल्लीगल तरीके से इन लोगों ने एकदम लुक लाइक पोर्टल बनाया था, जोकि आधार की तरह दिखता था. ये लोग वेब डिजाइनिंग व कोडिंग में बहुत माहिर थे.

पुलिस ने बदायूं और अमरोहा जिले से 4 लोगों को गिरफ्तार किया. जिन के पास से लैपटाप और कंप्यूटर सिस्टम के अलावा बायोमैट्रिक डाटा लेने वाले कई उपकरण बरामद किए गए, जिस में रबड़ के फरजी फिंगरप्रिंट, आइरिस कापी, फरजी पासपोर्ट, कई राज्यों के फरजी जन्म प्रमाणपत्र, मोडिफाई फिंगरप्रिंट स्कैनिंग मशीन, मोबाइल फोन, पैन कार्ड प्रपत्र, फिंगर अपडेशन, आवेदन प्रपत्र 400 से अधिक आधार संशोधन के लिए एनरोलमेंट आवेदन, 8 पासपोर्ट फोटो आदि बरामद किए गए. बीमा घोटाला गैंग की यह टीम आधार कार्ड में संशोधन करने की जिम्मेदारी खुद निभाती थी.

हिरासत में लिए गए लोगों की सूचना पर 6 लोगों को और गिरफ्तार किया गया. इस गिरोह के अन्य सदस्यों के पास से पुलिस ने 81 पासबुक, 35 चेकबुक के अलावा 31 मृत्यु प्रमाण पत्र, कई बैंकों की मोहरें, लैपटाप भी बरामद किए.

गिरफ्तार किए गए आरोपियों में प्रेमपाल और प्रेम सिंह फरजी तरीके से सिम देने का काम करते थे. दोनों ही युवक एक मोबाइल कंपनी के एजेंट थे. जिन के पास से भी पुलिस ने फरजी दस्तावेज बरामद किए.

इन से मोबाइल फोन और 7 भिन्नभिन्न कंपनियों के सिम बरामद किए गए. बरामद डाक्यूमेंट्स राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल के रहने वाले व्यक्तियों से संबंधित हैं जो या तो खुद जीवन बीमा की पौलिसी धारक हैं या फिर मृतक के नौमिनी हैं.

ऐसा ही एक और मामला पुलिस की जांच में सामने आया. बुलंदशहर जिले के पहासू थाना क्षेत्र के मोहल्ला चमारान कला अशोकनगर की रुखसार के पति असलम का बीमा क्लेम गिरोह ने ठग लिया. असलम गंभीर रूप से बीमार थे. गिरोह को जब यह जानकारी हुई तब गैंग के सदस्यों ने असलम का जीवन बीमा करा दिया.

रुखसार को उस का नौमिनी बनाया गया. जब उस के पति की मृत्यु हुई, रुखसार के नाम से एक फरजी खाता खोला गया और उस में बीमा की रकम डाल कर गैंग के सदस्यों द्वारा निकाल ली गई. बैंक में दिए गए मोबाइल नंबर भी गलत थे, जिस से रुखसार को कोई जानकारी नहीं मिली.

रुखसार ने बीमा कंपनी से संपर्क किया तो उसे पता चला कि उस के पति का बीमे का क्लेम पहले ही हो चुका है. रुखसार के बैंक खाते में क्लेम की रकम नहीं आई.

कई राज्यों में फैला हुआ था जालसाजी का नेटवर्क

इस मामले की जांच में सामने आया कि बुलंदशहर जिले के कस्बा अनूपशहर स्थित यस बैंक के 2 डिप्टी मैनेजरों ने फरजी दस्तावेजों पर गिरोह के सदस्य का खाता खोला था. रुखसार के क्लेम की रकम गिरोह के खाते में आई और वह निकाल कर ले गए.

जब पुलिस ने जांच की तो बैंकिंग प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का पता चला. बैंककर्मियों ने खाताधारक की उपस्थिति के बिना ही खाते खोल दिए, जिस से ठगी की योजना को अंजाम दिया गया. उक्त बैंक के दोनों डिप्टी मैनेजरों को पुलिस ने जेल भेज दिया.

एएसपी अनुकृति शर्मा के निर्देश पर गैंग का खुलासा करने के बाद सभी 10 बीमा कंपनियों को एक लेटर लिखा. उन से 2 साल का डेटा मांगा. इस में सिर्फ उन पौलिसी की डिटेल्स मांगी गईं, जिन में बीमा होने और मरने में सिर्फ एक साल का अंतर रहा हो.

डेटा एनालिसिस करने के बाद एसबीआई लाइफ की 7.27 करोड़, पीएनबी मेटलाइफ की 2 करोड़ रुपए से ज्यादा, कैनरा एचएसबीसी की 7.44 करोड़ रुपए, इंडिया फस्र्ट की 10.33 करोड़ रुपए, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ की 4. कुछ ही कंपनियों द्वारा भेजे गए डेटा में 50 करोड़ रुपए की बीमा पौलिसी सस्पेक्टेड पाई गईं. बाकी बीमा कंपनियों ने कथा संकलन तक डेटा नहीं दिया था.

इन में करीब 70 फीसदी लोगों की मौत का कारण हार्टअटैक बताया है. इस से स्पष्ट होता है कि गैंग ने डाक्टरी रिपोर्ट और मृत्यु प्रमाण पत्र सब स्वयं के द्वारा तैयार किए गए होंगे. बीमा कंपनियों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार बीमा पौलिसी उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, हरियाणा, गुजरात, झारखंड, दिल्ली, बिहार, असम, वेस्ट बंगाल, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में हुई थीं.

यानी इन का नेटवर्क पूरे देश में फैला था. चूंकि यह गैंग पिछले 8 सालों से काम कर रहा था और अभी पुलिस को सिर्फ 2 साल का डेटा मिला है, इसलिए अनुमान है कि फरजी पौलिसी की रकम 100 करोड़ रुपए से भी पार पहुंच सकती है. पुलिस अप्रैल 2025 तक गैंग के 30 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थी.

गिरफ्तार किए गए आरोपियों में मुख्य रूप से अमित ड्राइवर, ओंकारेश्वर मिश्रा के अतिरिक्त धनारी थाना क्षेत्र के गांव भैयापुर का शाहरुख खान, संजू, अरुण किशोर, हीरेंद्र कुमार, प्रेमपाल, प्रेम सिंह, बुलंदशहर जिले की थाना डिबाई क्षेत्र के गांव बाधौर की नीलम थी.

नीलम आशा कार्यकर्ता है, अन्य मुख्य अभियुक्त अमित पुत्र हीरालाल निवासी मसजिद मोहल्ला बबराला, हाल निवासी अलीपुर चोपला, थाना गजरौला, नितिन चौधरी (डिप्टी मैनेजर, यस बैंक, अनूप शहर ब्रांच) निवासी देवीपुरा मोहल्ला, बुलंदशहर, अभिनेश राघव (डिप्टी मैनेजर, यस बैंक, बुलंदशहर ब्रांच), ईस्ट इंडिया इनवेस्टिगेशन कंपनी के मालिक शैलेंद्र कुमार, नरेश कुमार तथा नरेश का बेटा आकाश यादव निवासी मोहल्ला बाजार कस्बा बिलारी जिला मुरादाबाद है. कुछ लोग अभी फरार हैं, जिन के खिलाफ अदालत में काररवाई की जा रही है.

संभल में हुए बीमा घोटाले में कई थानों की पुलिस ने काररवाई की. इस घोटाले में रजपुरा और गुन्नौर थाना पुलिस ने मुख्य रूप से अंतरराज्यीय गिरोह के सदस्यों को गिरफ्तार किया.

बीमा घोटाला गैंग के खिलाफ प्रभावी काररवाई एसएचओ (थाना रजपुरा) हरीश कुमार, एसएचओ (गुन्नौर) अखिलेश कुमार, दीपक कुमार (सीओ गुन्नौर), एडिशनल एसपी अनुकृति शर्मा और एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई के नेतृत्व में हुई.

कथा लिखने तक जांच जारी थी. घोटाला कहां तक पहुंचेगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.

50 लाख के क्लेम के लिए विकलांग को कुचला

पहली अगस्त, 2024 को संभल जिले के बिसौली थाना क्षेत्र के ढीलवारी गांव निवासी राजेंद्र ने अपने भाई दरियाब जाटव की मौत के संबंध में एफआईआर दर्ज कराई थी. दरियाब 21 जुलाई, 2024 को बाजार जाने की बात कह कर घर से निकला था, लेकिन वह देर शाम तक भी घर वापस नहीं आया. संभावित स्थानों पर तलाश भी किया गया, दरियाब का पता नहीं चला.

सैनिक चौराहे से चंदौसी के आटा गांव जाने वाली सड़क पर करीब डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर रात 10 बजे दरियाब का शव मिला सूचना मिलने पर राजेंद्र भी मौके पर पहुंचा. घटनास्थल देख कर ऐसा लग रहा था कि दरियाब की मौत सड़क दुर्घटना में हुई है.

राजेंद्र के कहने पर और लोगों ने भी अज्ञात वाहन की टक्कर से उसकी मृत्यु होना स्वीकार कर लिया. पुलिस को सूचना दी गई. मौका मुआयना करने के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सिर में चोट और पूरे शरीर पर छिलने जैसे निशान बताए गए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक्सीडेंट मामले की ओर इशारा कर रही थी. 2 अगस्त 2024 को राजेंद्र की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात वाहन द्वारा टक्कर मार देने से हुई मृत्यु का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मामले को सड़क हादसा दिखाते हुए फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी.

बीमा कंपनी टाटा एआईए को इस मामले में शक हुआ. दरियाब के नाम की एक साल पहले बीमा पौलिसी की गई थी. बीमा कंपनी ने पुलिस को सूचना दी. संभल जिले में बीमा घोटाला माफिया गिरोह पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था. उस की जांच भी चल रही थी. इस घोटाले की जांच का नेतृत्व एएसपी अनुकृति शर्मा कर रही थीं. इसलिए बीमा कंपनी की शिकायत संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने एएसपी अनुकृति शर्मा को जांच हेतु सौंप दी. 9 महीने पहले दिव्यांग दरियाब की सड़क दुर्घटना की फाइल बंद चुकी थी.

बीमा कंपनी की शिकायत पर फिर से फाइल ओपन की गई. जांच में पता चला कि सड़क दुर्घटना में मौत का शिकार हुए व्यक्ति की 5 बीमा पौलिसी कराई गई थीं. एक सवाल था कि दिव्यांग दरियाब कोई काम नहीं करता था. 5 पौलिसी की किस्तें जमा करने के लिए उस के पास पैसा कहां से आता था.

जांच में सामने आया कि दरियाब दिव्यांग होने के कारण ट्राई साइकिल पर चलता था. उस का एक्सीडेंट उस के घर से करीब 27 किलोमीटर दूर हुआ था. अब सवाल यही उठ रहा था कि वह आखिर 27 किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर कैसे पहुंच गया. क्योंकि घटनास्थल पर दिव्यांग की ट्राई साइकिल बरामद नहीं हुई थी.

इस के बाद पुलिस ने आगे की जांच की तो पता चला एक्सिस बैंक के एडवाइजर पंकज राघव ने दरियाब की पौलिसी की थी. पुलिस ने उस की काल डिटेल्स खंगाली. काल डिटेल्स में पंकज, हरिओम और विनोद की बात सामने आई. पुलिस ने तीनों से पूछताछ की तो पूरा मामला खुल गया.

दरअसल, हरिओम और विनोद नामक 2 सगे भाई एक्सिस बैंक में लोन लेने के लिए गए थे. वहां उन का सिविल खराब होने के कारण लोन देने से मना कर दिया. यहां उन की मुलाकात एक्सिस बैंक के इंश्योरेंस पौलिसी एडवाइजर पंकज राघव से हुई. लोन न मिलने पाने की स्थिति में तीनों की बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा तो शातिर दिमाग पंकज राघव ने पौलिसी हड़पने का घटिया प्लान तैयार किया.

दोनों भाइयों ने मिल कर गरीब दिव्यांग का प्लानिंग के अनुसार दरियाब का 50.68 लाख रुपए का 5 अलगअलग बीमा कंपनियों से एक्सीडेंटल बीमा करवाया. दरियाब के भाई राजेंद्र को विश्वास में लिया. पंकज ने खुद को बचाते हुए बीमा में नौमिनी तो राजेंद्र को बनाया, लेकिन मोबाइल नंबर अपना डलवा दिया, ताकि भविष्य में मैसेज उसी को मिलें. खाते खुलवाए गए आधार कार्ड आदि सभी कागजात राजेंद्र से अपने कब्जे में ले लिए.

क्लेम के कागज तैयार कर के उस पर राजेंद्र के अंगूठे, हस्ताक्षर भी ले लिए. बीमा की किस्तें भी एक साल तक लगातार जमा करते रहे. 31 जुलाई को प्रताप, हरिओम और विनोद दरियाब को कार में बैठा कर चंदौसी लाए.

दरियाब को शराब पिलाई गई और फिर आटा गांव रोड के पास सुनसान जगह पर कार से बाहर निकल कर नशे में बेहोश दरियाब को सड़क पर डाल दिया. उस के ऊपर कार चढ़ा दी गई. कार से कुचलने के बाद भी उस की मौत नहीं हुई तो हथौड़े से उस के सिर पर वार किए गए. जिस से उस की मौत हो गई.

दरियाब की मौत के बाद 50.68 लाख रुपए के कुल बीमे में से इन लोगों ने 15.68 लाख रुपए पुलिस की गिरफ्त में आने से पहले ही हड़प लिए थे. बाकी राशि उन को नहीं मिल पाई थी. दिलचस्प बात यह है कि राजेंद्र के हाथ एक पैसा नहीं लगा. राजेंद्र को प्लानिंग की कोई जानकारी भी नहीं दी गई.

इस खुलासे को अंजाम देने वाली टीम को विभाग की तरफ से 25 हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा की गई. गिरोह के 4 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. सड़क दुर्घटना के 9 महीने बाद 30 अप्रैल, 2025 को पूरे मामले का खुलासा संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने प्रैस कौन्फ्रैंस में किया.  UP Crime News

 

 

UP News : यूनिवर्सिटी में फरजी डिगरी चेयरमैन निकला 5 लाख का इनामी

UP News : हापुड़ में स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी फरजी मार्कशीट और डिग्रियां बेचने का अड्डा बनी हुई थी. देश भर में तैनात दलाल 5 हजार रुपए से ले कर 5 लाख रुपए में यह गोरखधंधा कर रहे थे. चौंकाने वाली बात तो यह है कि इस यूनिवर्सिटी का चेयरमैन और अघोषित चांसलर विजेंद्र सिंह हुड्डा 15 हजार करोड़ रुपए के फ्रौड का आरोपी है, जिस पर 5 लाख का इनाम भी घोषित था. आखिर कैसे चल रहा था यह गोरखधंधा?

लोग अकसर उन लोगों से सवाल पूछते हैं, जो अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाई करने भेजते हैं कि हमारे देश में भी तो अच्छे कालेज और यूनिवर्सिटी हैं, बच्चों को देश में क्यों नहीं पढ़ाते? कुछ लोग अकसर ऐसे भी सवाल उठाते हैं कि विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग में भारत के शिक्षण संस्थान क्यों नहीं शामिल हैं?

ऐसे तमाम सवालों का एक ही जवाब है कि भारत में शिक्षण संस्थानों ने शिक्षा को धंधा बना लिया है. वे न तो शिक्षण संस्थानों के संचालन के लिए बनी नियमावली का पालन करते हैं, न ही सरकार उन की निगरानी और नियमों का पालन नहीं करने पर कड़ी काररवाई करती है. इसलिए कुकुरमुत्तों की तरह खुले स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी स्टूडेंट को बिना कोई हुनर दिए मोटी रकम ले कर प्रसाद की तरह डिग्रियां बांट रहे हैं.

कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, दिल्ली से केवल 50 किलोमीटर की दूरी पर हापुड़ जिले में एक ऐसी यूनिवर्सिटी का खुलासा हुआ है, जहां बिना पढ़ाई और परीक्षा के मोटा पैसा ले कर छात्रों को डिग्रियां बांटी जा रही थीं. इस का संचालक एक ऐसा शख्स था, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीति की दुनिया का जानामाना नाम था. लोगों से ठगी और जालसाजी करने का उस का पुराना अतीत भी रहा है.

शिक्षा को धंधा बनाने वाले इस मामले की कहानी जान कर आप भी दांतों तले अंगुली दबा लेंगे. बीते दिनों यूपी एसटीएफ चीफ को एक लिखित शिकायत मिली थी. दरअसल, हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में नौकरी पाए शख्स किशनपाल सिंह ने पीएचडी की फरजी डिग्री लगा दी और वहां असिस्टेंट प्रोफेसर बन गया. नौकरी देने के बाद यूनिविर्सिटी ने किशनपाल सिंह के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जांचपड़ताल कराई. सारे प्रमाणपत्रों का तो सत्यापन हो गया, लेकिन पीएचडी की डिग्री किसी भी औनलाइन डाटाबेस में नहीं मिली. पीएचडी की ये डिग्री हापुड़ में पिलखुआ रोड पर बनी मोनाड यूनिवर्सिटी से जारी की गई थी.

ऐसे में हरियाणा की यूनिवर्सिटी ने किशनपाल के खिलाफ कानूनी काररवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग को एक पत्र लिखा, जिस में मोनाड यूनिवर्सिटी की फरजी पीएचडी डिग्री का जिक्र कर जांच करने के लिए कहा गया था. किशनपाल सिंह की नियुक्ति तो रद्द हो गई और उस के खिलाफ शिकायत की पुलिस में जांच शुरू हो गई. इधर जब यूपी सरकार को हरियाणा की यूनिवर्सिटी से मोनाड यूनिवर्सिटी की फरजी डिग्री के बारे में लेटर मिला तो शिक्षा विभाग ने यूपी एसटीएफ के चीफ अमिताभ यश से यूनिवर्सिटी की जांच कराने का आदेश दिया.

इस शिकायत की जांच का काम एसटीएफ लखनऊ में तैनात डीएसपी संजीव दीक्षित को सौंपा गया. एसटीएफ मुख्यालय ने मामले की जांच मेरठ टीम को इसलिए नहीं दी, क्योंकि मेरठ की लोकल टीम के इनवौल्व होने पर मास्टरमाइंड विजेंद्र हुड्डा को भनक लग सकती थी और वह छापेमारी की काररवाई से पहले ही चौकन्ना हो सकता था. दरअसल, इस यूनिविर्सिटी का संचालक विजेंद्र सिंह हुड्डा मेरठ का ही रहने वाला है और राजनीति में बड़ा रसूखदार आदमी है.

डीएसपी संजीव दीक्षित ने अपनी टीम के सब से तेजतर्रार इंसपेक्टर ओमशंकर शुक्ला और उन की टीम को इस केस की जांच के काम पर लगा दिया. साथ ही यह भी कहा गया कि जांच का काम बेहद गुप्त तरीके से हो ताकि किसी को भनक न लगे. एसटीएफ ने जांचपड़ताल शुरू कर दी.

मोनाड यूनिवर्सिटी की स्थापना से ले कर उस के संचालन और कामकाज की जानकारी के साथ कि वहां पढऩे वाले करीब 7 हजार स्टूडेंट के बीच से मुखबिरों के जरिए जानकारी जुटाई जाने लगी. इस यूनिवर्सिटी की छवि के बारे में भी पता किया गया तो पता चला कि पिछले काफी लंबे समय से मोनाड यूनिवर्सिटी के खिलाफ फरजी डिग्री बनाने की चर्चा है. यूं कहें तो गलत नहीं होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मोनाड यूनिवर्सिटी की छवि बहुत अच्छी नहीं थी.

पुलिस ने यूनिविर्सिटी में अहम पदों पर काम करने वाले अफसरों के साथ इस के चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा की निगरानी शुरू कर दी. जिस के बाद सामने आया कि पलवल का रहने वाला संदीप सेहरावत, जो फरजी डिग्री मामले में पहले पकड़ा जा चुका है, वह विजेंद्र सिंह का बेहद खास है. संदीप अकसर या तो खुद आता है या विजेंद्र सिंह का कोई खास आदमी उस से मिलता है. उन के बीच कुछ सर्टिफिकेट के पैकेट का आदानप्रदान होता है.

पुलिस टीम ने सब से पहले संदीप सहरावत को टारगेट पर लिया. कई दिन की निगरानी के बाद संदीप को 16 मई, 2025 की रात हिरासत में लिया गया. संयोग से जब उसे पकड़ा गया तो उस के पास पीएचडी और ला की कुछ छपी हुई फरजी डिग्रियां भी थीं. उसे हिरासत में ले कर जब पूछताछ की गई तो एसटीएफ को बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. इस पूरे घोटाले का परदाफाश होता चला गया. बस अब घेराबंदी कर के इस पूरे गोरखधंधे में शामिल गैंग को पकडऩा था.

एसटीएफ ने जब सारी तैयारियां कर लीं तो 17 मई की सुबह हापुड़ पुलिस के एसपी राजेश कुमार से बात कर के स्थानीय पिलखुआ पुलिस की टीम को साथ ले कर छापेमारी की काररवाई शुरू की गई. यूनिवर्सिटी के सभी एंट्री व एग्जिट गेट बंद कर वहां पुलिस तैनात कर दी गई. यूनिवर्सिटी के चांसलर विजेंद्र सिंह हुड्डा समेत करीब 10 ऐसे लोग जांच में जिन की भूमिका संदिग्ध दिखी, उन्हें हिरासत में ले लिया गया. सभी के मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए. करीब 5 घंटे तक मोनाड यूनिवर्सिटी में एसटीएफ की जांच और तलाशी का काम चला. इस दौरान करीब 1,372 फरजी डिग्री  मार्कशीट और डिग्रियां रिकवर हुईं.

बरामद हुईं सैकड़ों फरजी डिग्रियां और मार्कशीट

एसटीएफ ने इस पूरी काररवाई में 1,372 फरजी मार्कशीट, डिग्रियां, 262 फरजी प्रोविजनल और माइग्रेशन सर्टिफिकेट, 14 मोबाइल फोन, एक आईपैड, 7 लैपटाप, 26 इलेक्ट्रौनिक डिवाइसेस (सर्वर) और 6,54,800 रुपए और एक सफारी कार व 35 लग्जरी गाडिय़ों की चाबियां बरामद की गईं. बरामद फरजी मार्कशीट का डेटा यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर नहीं मिला तो पता चला कि ये सर्वर रूम के रिकौर्ड में दर्ज हैं, इसलिए एसटीएफ ने पूरे सर्वर रूम को ही सील कर दिया. इसे जांच के लिए लखनऊ में फोरैंसिक जांच के लिए भेजा जाएगा.

इस घोटाले में विश्वविद्यालय के चेयरमैन चौधरी विजेंद्र सिंह उर्फ विजेंद्र हुड्डा, प्रो. चांसलर नितिन कुमार सिंह, वाइस चांसलर, एडमिशन डायरेक्टर इमरान, वेरिफिकेशन हेड गौरव शर्मा सहित कुल 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह सालों से छात्रों से लाखों रुपए वसूल कर फरजी डिग्रियां और मार्कशीट बेच रहा था.

उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख देने वाला एक बड़ा घोटाला सामने आने के बाद गाजियाबाद से ले कर लखनऊ तक हडकंप मच गया. क्योंकि हापुड़ स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी में फरजी डिग्री रैकेट का यह गोरखधंधा कई साल से चल रहा था. एसटीएफ की इस काररवाई ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिस में शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को कुछ लोगों ने मुनाफे का धंधा बना रखा था. यूनिवर्सिटी के नाम पर फरजी डिग्रियां तैयार की जा रही थीं, जो न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली को बदनाम करने वाली साजिश भी.

बरामद किए गए इन सबूतों से साफ था कि यह कोई सामान्य गलती नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध था. मौके पर की गई पूछताछ में पता चला कि यूनिवर्सिटी के अधिकारी मोटी रकम ले कर छात्रों को बिना परीक्षा दिए डिग्रियां जारी करते थे. बीए, बीकौम, बीएससी, एमबीए, बीटेक, एलएलबी, बीफार्मा, डीफार्मा समेत कई अन्य कोर्सेस की फरजी डिग्रियां व तकनीकी और प्रोफेशनल डिग्रियां 5 हजार रुपए से ले कर 5 लाख रुपए तक में बेची जाती थीं. इस गोरखधंधे में यूनिवर्सिटी प्रशासन के कई उच्च अधिकारी, एजेंट और बाहरी दलाल भी शामिल थे.

इस घोटाले में शामिल यूनिवर्सिटी के चेयरमैन वीरेंद्र सिंह पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड है. इस गिरोह का नेटवर्क दिल्ली, मेरठ, नोएडा, हापुड़ और हरियाणा तक फैला हुआ था. सभी आरोपी बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का फायदा उठा कर उन्हें असली डिग्री का झांसा देते थे, जिस से हजारों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. वैसे यह पहला मामला नहीं है. पिछले 15 सालों से चल रही मोनाड यूनिवर्सिटी पहले भी कई बार विवादों में रही है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  ने 2022 में इस के कई पाठ्यक्रमों पर सवाल उठाए थे और नियमानुसार प्रमाणन की मांग की थी. इस के बावजूद विश्वविद्यालय में यह फरजीवाड़ा बेरोकटोक चल रहा था.

एसटीएफ की टीम सभी आरोपियों तथा बरामद किए सामान को ले कर पिलखुआ कोतवाली पहुंची, जहां एसटीएफ की तरफ से दी गई शिकायत के बाद आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने जालसाजी कर फरजी दस्तावेज तैयार करने व संगठित अपराध करने पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 338, 340 (1), 340(2), 111 और 336(3) के तहत मुकदमा दर्ज कर 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान संदीप सहरावत निवासी गांव चिरवाड़ी, जिला पलवल, हरियाणा, विजेंद्र सिंह हुड्डा निवासी कंकरखेड़ा मेरठ, मुकेश ठाकुर निवासी कटवारिया सराय, नई दिल्ली, अनिल बत्रा सेक्टर 47 नोएडा,  नितिन सिंह, आनंदलोक रुड़की रोड मेरठ,  गौरव शर्मा निवासी रोशनपुर डार्ली रुड़की रोड हापुड़, सन्नी कश्यप निवासी अर्जुन नगर हापुड़, इमरान निवासी हापुड़,  कुलदीप कुमार सिंह निवासी गांव बलवंतनगर जिला बुलंदशहर,  विपुल ताल्या निवासी स्वर्ग आश्रम रोड हापुड़ के रूप में हुई हैं.

एकएक कर सभी आरोपियों से इस पूरे फरजीवाड़े को ले कर पूछताछ हुई तो पता चला कि इस का मास्टरमाइंड और जाली डिग्री रैकेट का सरगना 46 साल का विजेंद्र सिंह हुड्डा है, जो मेरठ के मवाना के एक गांव का रहने वाला है. विजेंद्र सिंह के पिता एक जमाने में मवाना स्थित एक भट्ठे पर मुनीम का काम करते थे. 10वीं तक की पढ़ाई करने के बाद विजेंद्र सिंह भी उसी ईंट के भट्ठे पर नौकरी करने लगा. बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी और बड़ा आदमी बनने का सपना देखने वाला विजेंद्र सिंह दिलेर और बातचीत का धनी इंसान था. उस में लोगों को प्रभावित करने और उन से संबंध बना लेने की अद्भुत कला थी.

यही कारण रहा कि कुछ ही सालों में उस ने सामाजिक और राजनीतिक रसूखदारों से संबध बना लिए और धीरेधीरे तिकड़मबाजी कर पैसा भी बना लिया. इसी का नतीजा है कि आज मेरठ में शिवलोकपुरी तथा गंगानगर क्षेत्र की पौश डिफेंस कालोनी में उस के आलीशान मकान हैं, जहां मेरठ के सांसद अरुण गोविल समेत तमाम वीआईपी रहते हैं.

बताते हैं कि विजेंद्र सिंह ने 2005 के बाद कुछ समय तक चीन में लैपटाप और टैबलेट बेच कर करोड़ों रुपए कमाए. वर्ष 2010 में उस ने चीन से लौट कर भारत में यह कारोबार शुरू किया और यहां भी उस ने करोड़ों रुपए कमाए. इस के बाद उस ने देश के नामी पत्रकारों के साथ मिल कर एक न्यूज चैनल शुरू किया. इस के जरिए उस ने यूपी के बड़े नौकरशाहों के साथ ही देश के तमाम चर्चित नेताओं से अपने संपर्क बनाए. वर्ष 2018 में उस ने अपने न्यूज चैनल को बेच दिया और दूसरे कारोबार करने में जुट गया. परंतु उसे सफलता नहीं मिली.

बाद में वह ग्रेटर नोएडा के ग्राम चीती में रहने वाले संजय भाटी, जिस ने साल 2010 में गर्वित इनोवेटिव प्रमोटर्स लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई थी, उस के संपर्क में आया. 2018 में संजय भाटी ने बाइक बोट स्कीम लांच करते हुए बाइक टैक्सी की शुरुआत की. इस के तहत एक निवेशक से एक बाइक की कीमत करीब 62 हजार रुपए ली गई. उन्हें हर महीने 9 हजार 765 रुपए लौटाने का वादा किया गया. एक साल बाद कंपनी ने रुपए लौटाने बंद कर दिए.

बाइक बोट से बटोरे 15 हजार करोड़ रुपए

नेटवर्किंग कंपनी अपने निवेशकों के हजारों करोड़ रुपए ले कर भाग गई. इस के बाद धड़ाधड़ मुकदमे दर्ज होने शुरू हुए. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा सहित कई राज्यों में कई सौ मुकदमे दर्ज हुए. 118 मुकदमों की जांच यूपी पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा  ने की थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुए 118 मुकदमों में ईओडब्लू मेरठ चार्जशीट लगा चुकी है. नोएडा की अदालत में ईओडब्लू ने जिन 31 लोगों को आरोपी बनाया गया है, उस में विजेंद्र सिंह हुड्डा भी है. बाइक बोट कंपनी के घोटाले मे विजेंद्र भी संजय भाटी के साथ शामिल था और आरोपी भी था, लेकिन वह इतना शातिर था कि कहीं भी सीधे तौर पर नहीं जुडा था.

जब संजय भाटी कई हजार करोड़ का घपला कर के भागा और विजेंद्र हुड्डा के पीछे पुलिस लगी तो सालभर से ज्यादा समय तक विजेंद्र हुड्डा अपनी एक महिला सहयोगी मित्र दीप्ति बहल को ले कर लंदन भाग गया, जहां एक साल तक फरारी बिताई. जांच एजेंसियों को उस के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करना पड़ा था. इस दौरान उस पर 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित हुआ. बाद में अपने राजनीतिक प्रभाव तथा पैसे के बल पर गोटियां फिट कर के वह भारत लौटा और नोएडा कोर्ट में पेश हो कर उसे जमानत करानी पड़ी. कोर्ट से राहत मिलने के बाद विजेंद्र हुड्डा ने पौलिटिक्स में हाथ आजमाने का फैसला किया.

2020 में बाइक बोट घोटाले में जमानत पर छूटने के बाद कोविड महामारी का प्रकोप शुरू हुआ तो उस वक्त लोग जिंदगी बचाने को मारेमारे फिर रहे थे, लेकिन उस वक्त विजेंद्र सिंह का कारोबार विकास कर रहा था. उसी दौर में उस ने 2022 में हापुड़ के पिलखुआ में मोनाड यूनिवर्सिटी को खरीद लिया. तेजी से पैसा कमाने के लिए उस ने बड़े स्तर पर फरजी डिग्रियां व सर्टिफिकेट बेचने का धंधा शुरू कर दिया. गलत काम करने वाले को हमेशा राजनीतिक संरक्षण की तलाश रहती है. विजेंद्र सिंह हर कला में माहिर था. वह राजनीतिक संरक्षण के लिए भाजपा में शामिल होना चाहता था, लेकिन बाइक बोट घोटाले में नाम आने के बाद उस को वहां एंट्री नहीं मिल सकी.

इस के बाद 2022 में उस ने सुनील सिंह के साथ लोकदल में बड़ा पद हासिल कर लिया. नाम और शोहरत पाने के लिए उस ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने व किसानों के मुद्ïदों को ले कर कई रैलियां और प्रदर्शन किए. उसे शोहरत तो मिली, लेकिन इतना सब खर्च करने के बावजूद जब मजबूत मुकाम नहीं मिल सका तो उस ने चुनाव से ठीक पहले लोकदल से इस्तीफा दे कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया. वह बसपा के टिकट पर बिजनौर से 2024 में लोकसभा का चुनाव लड़ा, हालांकि चुनाव में उसे पराजय हाथ लगी. लेकिन इस के कारण उस के सामने दूसरे दलों में प्रवेश के लिए राजनीतिक दरवाजे जरूर खुल गए.

उस के बाद उस ने फिर से भाजपा में प्रवेश करने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय जाट व ठाकुर नेताओं के विरोध के चलते कामयाब नहीं हो सका. चुनाव के कुछ समय बाद ही विजेंद्र ने बसपा को अलविदा कह दिया और राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता ले ली. क्योंकि रालोद के भाजपा के साथ आने से उस को नई उम्मीद दिखने लगी थी. वह रालोद के साथ जुड़ कर सत्ता पक्ष का करीबी बनना चाहता था. मोनाड यूनिवर्सिटी का चेयरमैन बन चुके चौधरी विजेंद्र सिंह हुड्डा के पास अब अकूत संपत्ति भी थी और वह वेस्ट यूपी का प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ व सामाजिक कार्यकर्ता भी था.

यह उस का समाज में दिखावे के जीवन का औरा था. लेकिन इस कथित छवि को बचाने के लिए 5 साल से राजनीतिक संरक्षण पाने की जो मारामारी वह कर रहा था, उस में अभी तक सफलता नहीं मिली थी. विजेंद्र हुड्डा जो काम कर रहा था, उस के लिए उसे सत्ता का आश्रय चाहिए था. जिस से वह कभी फंसे तो किसी बड़ी काररवाई से बच सके. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी से उस की बातचीत चल रही थी ताकि वह उसे पार्टी में कोई बडा पद दे सकें और वह यूपी सरकार की भागीदार पार्टी का लाभ उठा सके. लेकिन वह इस में कामयाब होता, इस से पहले ही एसटीएफ ने उस के बड़े फरजीवाड़े का परदाफाश कर दिया.

विजेंद्र सिंह कितना शातिर है, इस का पता इसी बात से चलता है कि वह मोनाड यूनिवर्सिटी का चांसलर है. लेकिन यूनिवर्सिटी की वेबसाइट में उस का कहीं कोई जिक्र नहीं है. हुड्डा के कई और भी कालेज हैं. अब वह मेरठ में एक नया कालेज खोलने की भी तैयारी कर रहा था. उस के काले धंधों की भनक मेरठ के ज्यादातर मीडिया वालों को थी, लेकिन करीबी संबंधों और उन के बीच पैसा बांटने के कारण कभी किसी ने उस के कारनामों को उजागर करने की कोशिश नहीं की.

विजेंद्र सिंह ने 2024 के लोकसभा चुनाव में दिए गए अपने शपथपत्र में जानकारी दी थी कि 2024 में उस के पास 28 करोड़ की संपत्ति थी, जबकि 230 करोड़ की देनदारी थी. उस की 2022-23 में वार्षिक आय मात्र 15 लाख रुपए ही थी.

इस मामले की अब ईडी भी करेगी जांच

मोनाड विश्वविद्यालय की फरजी मार्कशीट मामले में एसटीएफ और पिलखुवा पुलिस ने 19 मई को अगले दिन फरीदाबाद के हाई स्ट्रीट 81 माल से एक अन्य आरोपी राजेश को भी गिरफ्तार किया, जो मुकेश कालोनी बल्लभगढ़, फरीदाबाद का रहने वाला है. राजेश की निशानदेही पर पुलिस ने बड़ी मात्रा में फरजी दस्तावेज बरामद किए. इन में मोनाड विश्वविद्यालय की 957 खाली मार्कशीट, 223 खाली सर्टिफिकेट और 575 खाली प्रोविजनल सर्टिफिकेट शामिल थे. इस के अलावा 2 प्रिंटर, कारट्रेज, मोनोग्राम सील का एक बंडल, एक कंप्यूटर और 49 तैयार की गई फरजी मार्कशीट भी मिली थीं.

राजेश सब से पहले पकड़े गए आरोपी संदीप सहरावत के साथ विजेंद्र सिंह का बेहद करीबी साथी था. संदीप व राजेश दोनों मिल कर फरजी मार्कशीट छापने का काम करते थे. संदीप के पकड़े जाने के बाद राजेश फरार हो गया था. राजेश ही वह शख्स है, जो फरजी डिग्री छापने के बाद उन की डिलीवरी करने के लिए ज्यादातर मोनाड यूनिवर्सिटी ले कर जाता था. बताया जा रहा है कि एसटीएफ की इस रिपोर्ट के आधार पर ईडी के अधिकारी विजेंद्र सिंह हुड्डा के चंद सालों में खड़े किए गए विशाल साम्राज्य की जांच कर सकते हैं. यह भी पता लगाएंगे कि 15 हजार करोड़ रुपए के बाइक बोट घोटाले में नाम आने के बाद 5 लाख रुपए का इनामी विजेंद्र सिंह कैसे विदेश भागा और फिर वहां से वापस आने के बाद उस की जमानत कैसे हो गई.

फिर वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर कैसे बिजनौर से बीता लोकसभा का चुनाव लड़ा और उस के बाद कैसे वह मोनाड यूनिवर्सिटी की फरजी मार्कशीट बेचने का घंधा करने लगा. फिलहाल एसटीएफ के अधिकारियों को मोनाड यूनिवर्सिटी से पकड़े गए संदीप कुमार उर्फ संदीप सहरावत, जो हरियाणा का रहने वाला है, ने यह बताया है कि वह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा के कहने पर फरजी मार्कशीट व डिग्री छापता था और विजेंद्र सिंह का खास राजेश इस काम में उस की मदद करता था.

उस ने बताया कि वह बीते 3 सालों से यह धंधा कर रहा था. यह सब भी तब हो रहा था जबकि इस रैकेट का मास्टरमाइंड विजेंद्र सिंह बाइक बोट घोटाले का आरोपी है तथा ईओडब्ल्यू के साथ ईडी बाइक बोट घोटाले की जांच कर रही है. ऐसे में अब विजेंद्र सिंह हुड्डा की गिरफ्तारी के बाद मोनाड यूनिवर्सिटी पर ईडी का भी शिकंजा कसना तय है, क्योंकि आशंका जताई जा रही है कि बाइक बोट घोटाले से जुटाई गई रकम विजेंद्र सिंह हुड्डा ने मोनाड यूनिवर्सिटी में निवेश किया है. एसटीएफ की अब तक जांच में पता चला है कि पलवल में रहने वाला संदीप सहरावत इस रैकेट का दूसरा मास्टरमाइंड है, जो महज 12वीं तक पढ़ा हुआ है.

उस ने 15 साल पहले हथीन में एक कंप्यूटर सेंटर से शुरुआत की थी और बाद में नकली मार्कशीट बनवाने का अवैध धंधा शुरू कर दिया. धीरेधीरे इस गोरखधंधे से उस ने करोड़ों की संपत्ति बना ली. पलवल के चिरावड़ी गांव में उस की अलीशान कोठी, फुल बौडी स्कैनर, हाईसिक्योरिटी कैमरे और लग्जरी गाडिय़ां उस की गैरकानूनी कमाई की गवाही देते हैं. संदीप 3 साल पहले विजेंद्र हुड्डा के संपर्क में आया था. जब विजेंद्र को संदीप के हुनर की जानकारी मिली तो दोनों ने हाथ मिला लिया. संदीप की फरजी मार्कशीट को हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी मान्यता देने लगी और इन्हें छात्रों को 50 हजार से ले कर 4 लाख रुपए तक में बेचा जाने लगा.

संदीप को प्रति मार्कशीट 5 हजार रुपए मिलते थे. गिरोह के सदस्य यूनिवर्सिटी तक मार्कशीट पहुंचाते और वेरिफिकेशन दिखाने में सहयोग करते थे. गोरखधंधे की कमाई बनी संदीप की आलीशान कोठी इतनी भव्य है कि हरियाणवी डांसर सपना चौधरी ने भी यहां अपने गाने की शूटिंग की थी. वह खुद को बिजनेसमैन बताता था और आमतौर पर फाच्र्यूनर जैसी लग्जरी गाडिय़ों में चलता था. कोठी में उस की पत्नी और 2 बच्चे रहते हैं. पुलिस ने अभी तक गिरफ्तार सभी 12 आरोपियों को हापुड़ कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया है और उन से बरामद किए गए दस्तावेजों की जांच की जा रही है.

सवालों के घेरे में प्राइवेट यूनिवर्सिटी मौडल

हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी में हुआ फरजी डिग्री व मार्कशीट का घोटाला प्राइवेट यूनिवर्सिटी मौडल की निगरानी और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है. अकसर देखा गया है कि कुछ निजी विश्वविद्यालय केवल मुनाफा कमाने के उद्ïदेश्य से खोले जाते हैं और वहां शिक्षा की गुणवत्ता या पारदर्शिता का अभाव होता है. मोनाड यूनिवर्सिटी का मामला इसी चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है. आशंका है कि यह गिरोह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. बरामद किए गए दस्तावेजों और डिजिटल डेटा से यह संकेत मिल रहे हैं कि इस रैकेट का नेटवर्क अन्य राज्यों और संभवत: विदेशों तक फैला हो सकता है.

जांच एजेंसियां अब उन डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की सूची तैयार कर रही हैं, जो इस यूनिवर्सिटी से जारी किए गए थे, ताकि उन के धारकों की वैधता की जांच की जा सके. इस घोटाले के सामने आने के बाद शिक्षा मंत्रालय की निगरानी प्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं. आखिर कैसे इतनी बड़ी संख्या में फरजी डिग्रियां बिना किसी सरकारी जांच या शिकायत के जारी होती रहीं. यह दर्शाता है कि निगरानी प्रणाली में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं, जिन का सुधार तत्काल जरूरी है.

फरजी डिग्रीधारक यदि सरकारी या निजी संस्थानों में नौकरी पा जाते हैं तो इस से योग्य उम्मीदवारों का नुकसान होता है और संस्थानों की कार्यक्षमता पर भी असर पड़ता है. यह न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर अन्याय है, बल्कि देश की प्रगति के रास्ते में एक बड़ी बाधा भी. इस मामले की जांच को और गहराई से करने की जरूरत है. डिजिटल सबूतों को साइबर फोरैंसिक लैब में भेजा जा रहा है. इस के साथ ही जिन एजेंटों और दलालों के नाम सामने आ रहे हैं, उन की भी तलाश की जा रही है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं.

इस घटना के बाद आम नागरिकों, खासकर छात्रों और अभिभावकों को भी अधिक सतर्क रहने की जरूरत है. किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उस की मान्यता, रिकौर्ड और विश्वसनीयता की पूरी जांच करना जरूरी है. मोनाड यूनिवर्सिटी फरजी डिग्री घोटाले ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है. यह समय है जब सरकार, शिक्षा विभाग और न्यायिक संस्थाएं मिल कर ऐसी गतिविधियों पर सख्त से सख्त काररवाई करें, ताकि शिक्षा का पवित्र स्वरूप बचा रह सके. इस काररवाई से यूनिवर्सिटी समेत इस गोरखधंधे में संलिप्त लोगों में हड़कंप मचा हुआ है. UP News

 

 

Parivarik Kahani Hindi : जीजा ने की जिद साली पर कहर

Parivarik Kahani Hindi : नौकरीपेशा बेटी वर्तिका की जिद के आगे सविनय सक्सेना को झुकना पड़ा और उन्होंने उस की शादी उस के प्रेमी अंशुल शर्मा से कर दी. बेरोजगार अंशुल इतने पर ही संतुष्ट नहीं हुआ, वह वर्तिका की उच्चशिक्षित छोटी बहन कोमल सक्सेना की शादी अपने नाकारा भाई छोटू के साथ कराने का प्रेशर ससुरालियों पर डालने लगा. इस जिद ने घर में ऐसा कोहराम मचा दिया कि…

उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के लाला तेली बजरिया मोहल्ले में आईटीआई कालोनी है. सुरेशबाबू सक्सेना आईटीआई में प्राध्यापक के रूप में नौकरी करते थे, इसलिए इसी कालोनी में परिवार के साथ रहते थे. उन की पत्नी का नाम सविनय सक्सेना था. इन के बच्चों में 3 बेटियां और एक बेटा था. सब से बड़ी बेटी का विवाह इन्होंने अपनी ही जाति के कुलदीप के साथ धूमधाम से किया था.

डायबिटीज के रोगी होते हुए भी सुरेशबाबू अपना मिठाई का शौक छोडऩे को तैयार नहीं थे. सलोनी के विवाह के बाद डायबिटीज काबू में न रहने के कारण सुरेशबाबू की मौत हो गई थी. नौकरी कार्यकाल में ही उन की मौत हुई थी, इसलिए मृतक आश्रित के रूप में उन के बेटे अंकुर सक्सेना को आईटीआई में नौकरी मिल गई थी. ससुर की मौत के बाद घर में सब से बड़ा दामाद होने के कारण कुलदीप इस परिवार की हर काम में मदद करता था. अपना घर तो था ही, परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत थी.

सलोनी से छोटी बेटी वर्तिका पढऩे में ठीकठाक तो थी ही, आजाद स्वभाव की भी थी. अपनी पढ़ाई की बदौलत उस ने आईटीआई में क्लर्क की नौकरी पा ली थी. एक दिन सलोनी और कुलदीप अपनी ससुराल खाने पर आए थे. खाने के बाद सभी हंसीखुशी से बातें कर रहे थे. उसी बातचीत के दौरान सलोनी और कुलदीप ने अपनी जाति के 2 लड़कों का बायोडाटा और फोटो दिखाते हुए सास सविनय सक्सेना से कहा कि इन में से जो ज्यादा उचित लगे, उस से वर्तिका के ब्याह की बात चलाई जा सकती है.

जीजा कुलदीप की बात सुन कर वर्तिका तमक कर बोली, ”मेरे विवाह की चिंता करने की किसी को जरूरत नहीं है और न मेरे लिए कोई लड़का बताने की जरूरत है. मैं अंशुल शर्मा से प्यार करती हूं और हम दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया है.’’

”अंशुल शर्मा?’’ कुलदीप ने हैरानी से कहा, ”वह कोई कामधंधा तो करता नहीं है. उस के बाप की पेंट की दुकान है. वहां दोपहर को जा कर उन के साथ बैठ कर टाइम पास करता है. दुकान की कमाई से उन के घर का खर्च मुश्किल से पूरा होता है. उस का खंडहर जैसा तो घर है, जिस की मरम्मत कराने की भी उन की औकात नहीं है. तुम्हारी सैलरी पर उस की नजर है, इसीलिए तुम्हें फंसाया है. मेरी बात मानो, उस नकारा लड़के के साथ विवाह करने का विचार तुम छोड़ दो.’’

”कुलदीप सही कह रहे हैं.’’ सविनय ने भी बेटी वर्तिका को समझाया, ”बिना नौकरीधंधे वाला वह ब्राह्मण है और हम कायस्थ हैं. तुम उस का विचार छोड़ दो, अपनी जाति में भी तमाम लड़के हैं.’’

”तुम लोगों को सलाह देने की जरूरत नहीं है. मुझे जो उचित लगा है, मैं ने उसी के अनुसार निर्णय लिया है. और अब मैं उस में कोई बदलाव करने वाली नहीं हूं.’’ बहन, बहनोई और मां की ओर देखते हुए वर्तिका ने मजबूती से कहा, ”अब इस बारे में मैं कोई बात नहीं करना चाहती. मैं मर जाऊंगी, पर अंशुल के अलावा किसी और से विवाह नहीं करूंगी.’’

वर्तिका का जवाब सुन कर सलोनी और कुलदीप उठे और अपने घर चले गए. इस पूरी बातचीत के दौरान छोटा भाई अंकुर और छोटी बहन कोमल चुप बैठे सभी की बातें सुनते रहे. उन दोनों को भी वर्तिका का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा था. एक मां होने के नाते अगले दिन से सविनय ने वर्तिका को समझाना शुरू किया कि अच्छी नौकरी करने वाले किसी युवक के बजाय इस तरह बेरोजगार युवक के साथ वह विवाह न करे. हम कायस्थ हैं और वह ब्राह्मण है. बाद में पछताने के बजाय वह अभी संबंध तोड़ ले. परंतु वर्तिका नहीं मानी तो नहीं मानी. इस वजह से अब घर का माहौल तनावपूर्ण रहने लगा था.

अंकुर और छोटी बहन कोमल ने भी वर्तिका से बातचीत करनी कम कर दी थी. बगल के मोहल्ले में रहने वाले एक कायस्थ परिवार ने घर आ कर अपनी बेटी का अंकुर के साथ रिश्ता तय कर दिया. अपमान का घूंट पी कर वर्तिका का हित सोचते हुए सलोनी और कुलदीप ने सविनय को अन्य 3 लड़कों के बारे में जानकारी दी. सभी के लाख समझाने के बावजूद वर्तिका ने अपनी जिद नहीं छोड़ी. आखिर कुंवारी बेटी को कब तक घर में बैठाए रहतीं. इसलिए विधवा मां ने अपना मन मार कर बेटी की जिद के आगे हार स्वीकार कर ली और वर्तिका के विवाह की तैयारी शुरू कर दी.

दिसंबर, 2021 में वर्तिका का विवाह अंशुल शर्मा के साथ हो गया. पर इस विवाह में सलोनी और कुलदीप ने आने से इनकार कर दिया. जब सविनय ने बहुत मनाया तो सलोनी और कुलदीप थोड़ी देर के लिए शादी में आए तो पर बिना खाना खाए ही चले गए थे. विवाह के 2 महीने बाद वर्तिका और अंशुल सविनय के पास आए. दोनों ने मकान की मरम्मत कराने के लिए सविनय से 7 लाख रुपए उधार मांगे. अंकुर और कोमल को यह जरा भी अच्छा नहीं लगा, पर सविनय ने अंशुल को 7 लाख रुपए दे दिए.

अंकुर की भी शादी 6 महीने बाद पड़ोस के मोहल्ले में रहने वाली लड़की के साथ हो गई. कोमल पढ़ाई में अच्छी थी. बीएससी फस्र्ट क्लास पास करने के बाद उस ने बीएड किया और फिर टीचर बनने के लिए यूपी टेट की परीक्षा भी पास कर ली थी. सेंट्रल स्कूल में नौकरी के लिए वह सीटेट परीक्षा की तैयारी कर रही थी. मम्मी या भाई से पैसा मांगने के बजाय वह अपने खर्च के लिए एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथसाथ हाईस्कूल और इंटरमीडिएट कक्षा के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी.

इस दौरान वर्तिका और अंशुल उन 7 लाख रुपयों को भूल से गए, जो घर की मरम्मत के लिए सविनय से लिए थे. क्योंकि वे लौटाने की बात ही नहीं  कर रहे थे. सविनय ने 2-3 बार अंशुल से पैसे मांगे भी, पर अंशुल ने ‘आप को अभी पैसों की क्या जरूरत है’, कह कर उन की बात को हवा में उड़ा दिया. इसीलिए उन के संबंध इस परिवार से लगभग बिगड़ गए थे. वे दोनों यहां आते भी नहीं थे.

अंकुर की पत्नी को कुछ खरीदने के लिए पैसा चाहिए था. उस ने अंकुर से रुपए मांगे तो अंकुर ने कहा कि अभी रुपए नहीं हैं, बाद में ले लेना. यह सुन कर वह बिफर उठी, ”अपनी बहन को देने के लिए आप लोगों के पास 7 लाख रुपए थे और मैं 20 हजार रुपए मांग रही हूं तो कह रहे हो कि नहीं हैं. इस घर में मेरी कोई कीमत नहीं है.’’

यह विवाद इतना बढ़ा कि अंकुर की पत्नी नाराज हो कर मायके चली गई. मायके पहुंची तो अपने मम्मीपापा के सिखाने में आ कर उस ने थाने जा कर दहेज उत्पीडऩ का केस दर्ज करा दिया. इस परिस्थिति में सविनय को अपनी छोटी बेटी कोमल की चिंता सताने लगी थी. 24 साल की पढ़ीलिखी कोमल के लिए ठीकठाक लड़का देख कर वह उस का ब्याह कर देना चाहती थीं, लेकिन उस के ब्याह के लिए उन्हें पैसों की जरूरत पडऩी थी. संबंधों में कड़वाहट तो थी, पर बेटी के विवाह के लिए पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने वर्तिका और अंशुल से रुपए मांगने शुरू किए, पर अंशुल बहाने बनाता रहा.

भाईदूज को वर्तिका पति अंशुल के साथ मायके आई तो सभी को सुखद आश्चर्य लगा कि शायद इन के बीच समझौता हो गया है. सविनय ने अंशुल से कहा कि उन्हें जल्दी ही कोमल की शादी करनी है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, उन के 7 लाख रुपए लौटा दें.

”आप की यही चिंता दूर करने के लिए ही हम इतने समय बाद आप के घर आए हैं.’’ अंशुल ने कहा, ”आप अपनी कोमल का विवाह मेरे छोटे भाई छोटू के साथ कर दीजिए. आप को लड़का भी नहीं ढंूढना पड़ेगा और समझ लीजिएगा कि आप ने 7 लाख रुपए कोमल के विवाह में दहेज दे दिए. इस तरह हमारा और आप का हिसाब बराबर हो जाएगा.’’ फिर उस ने हंसते हुए आगे कहा, ”एक ही घर में 2 बहनें रहेंगी तो एकदूसरे का सहारा रहेंगी.’’

”जीजाजी, आई एम वेरी सौरी.’’ भयानक गुस्से में कोमल ने कहा, ”हाईस्कूल फेल अपने नाकारा भाई के लिए आप कोई दूसरी लड़की खोज लीजिए. मैं कुंवारी रह कर मर जाना पसंद करूंगी, पर तुम्हारे उस नाकारा भाई छोटू के साथ कभी भी विवाह नहीं करूंगी. आप अपनी इस धारणा को भूल जाइए और कहीं और ट्राई कीजिए.’’

कोमल का यह जवाब सुन कर भी बेवकूफ गरजवान की तरह अंशुल उसे समझाने की कोशिश करता रहा. पर कोमल साफ मना करते हुए उठी और दूसरे कमरे में चली गई. इस के बाद अंशुल और वर्तिका ने मम्मी को समझाना शुरू किया. आखिर सविनय ने भी ऊब कर कहा, ”दामादजी, मेरी कोमल बीएससी, बीएड है. उस ने टेट की परीक्षा भी पास पर ली है. इसलिए वह जल्दी ही टीचर की नौकरी पा लेगी. तुम्हारा भाई छोटू हाईस्कूल फेल है और कोई नौकरीधंधा भी नहीं करता, इसलिए उन दोनों का बिलकुल मेल नहीं खाता. मेहरबानी कर के तुम यह बात भूल जाओ और जितनी जल्दी हो सके, मेरे 7 लाख रुपए लौटा दो.’’

साली और सास की बातों से चिढ़ कर अंशुल उठ कर खड़ा हो गया और वर्तिका का भी हाथ पकड़ कर खींच कर खड़ा किया. इस के बाद दनदनाता हुआ वहां से चला गया. अंशुल ने 2 दिन बाद कोमल को फोन कर के फिर से समझाने का प्रयास किया. तब कोमल ने सख्त शब्दों में स्पष्ट कह दिया कि छोटू के साथ विवाह करने की बात वह सपने में भी नहीं सोच सकती. अगर उन्होंने फिर कभी इस बारे में बात की तो वह उस का नंबर ब्लौक कर देगी. इस पर अंशुल ने कोमल को धमकाते हुए कहा, ”कोमल, यह तुम जो कह रही हो, इस का परिणाम अच्छा नहीं होगा. एक बार फिर सोच लो.’’

अंशुल की इस धमकी से चिढ़ कर कोमल ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. अंशुल ने बारबार फोन कर के सास को मनाने की कोशिश की, परंतु सविनय उसे स्पष्ट मना करती रही.

कोमल सुबह 8 बजे ट्यूशन पढ़ाने जाती थी और 11 बजे वापस आती थी. अंशुल को इस बात की जानकारी थी. 18 दिसंबर, 2024 दिन बुधवार को पौने 11 बजे कोमल की नजर न पड़े, इस तरह अंशुल आ कर गली के नाके पर बैठ गया. कोमल को आते देख कर उस ने अपना इरादा पक्का कर लिया. कोमल जैसे ही घर में घुसी, उसी समय सविनय सब्जी लेने के लिए घर से बाहर निकलीं. कोमल घर में अकेली ही है, यह विश्वास होते ही अंशुल आगे बढ़ा.

बैडरूम में पलंग पर बैठ कर कोमल किताबें पलट रही थी, उसी समय अंशुल सीधे उस के पास पहुंचा. जैकेट में संभाल कर रखी छुरी निकाल कर उस ने कोमल के गले पर रख कर कहा, ”छोटू के साथ विवाह करने से तू क्यों मना कर रही है? बड़ा घमंड है तुझे खुद पर न, आज मैं तेरा वह घमंड चूर करने के लिए ही आया हूं. अभी तेरा खेल खत्म किए देता हूं.’’

अंशुल के यह तेवर देख कर कोमल ने भागना चाहा, परंतु अंशुल की ताकत के आगे उस की एक न चली. अंशुल ने पूरी ताकत से उस की गरदन पर वार किया. खून से लथपथ हो कर कोमल गिर पड़ी. फिर अंशुल ने दनादन वार करने शुरू कर दिए. वह तब तक कोमल पर छुरी के वार करता रहा, जब तक उसे विश्वास नहीं हो गया कि कोमल मर गई है. खून लगी छुरी लिए अंशुल घर से बाहर निकल रहा था, उसी समय सविनय घर में घुसी. दामाद के हाथ में खून लगी छुरी देख कर वह चौंकी. वह कुछ पूछती, उस के पहले ही अंशुल ने उन्हें खत्म करने के इरादे से उन का हाथ पकड़ कर अंदर खींचा.

पूरी ताकत लगा कर सविनय ने अपना हाथ छुड़ाया और चिल्लाते हुए भागीं. सविनय की चीख सुन कर पड़ोसी घर से बाहर निकल आए तो छुरी फेंक अंशुल भाग गया. कोमल की हालत देख कर सविनय बेहोश हो गईं. पड़ोसियों ने उन्हें संभाला. पड़ोसियों ने पुलिस, अंकुर और सलोनी को फोन किया. बहन की लाश देख कर अंकुर और सलोनी चौंक गए थे. कुलदीप ने उन दोनों को संभाला. वर्तिका को इस सब की बिलकुल खबर नहीं थी. रोज की तरह उस ने औफिस से मायके और ससुराल फोन किया, पर दोनों जगहों के फोन बंद थे. इसलिए वह अपने घर गई. वहां ताला लगा देख कर वह मायके आई तो यहां घर के सामने भीड़ लगी देख कर वह दौड़ कर घर में आई.

घर में उस ने जो देखा, वह हैरान रह गई. उसे देख कर सविनय को गुस्सा आ गया. वह उस पर चिल्लाईं, ”तू अब इस घर में कदम मत रखना. यह जो भी हुआ है, सब तुम्हारी वजह से ही हुआ है. तू निकल जा मेरे घर से.’’

वेदना से बिलबिलाती मम्मी रोरो कर आक्रोश व्यक्त कर रही थी. घटना और मम्मी के गुस्से से स्तब्ध वर्तिका को पड़ोसी बाहर ले आए और जो हुआ था, उन्होंने वर्तिका को बताया. सच्चाई जान कर पश्चाताप करते हुए वर्तिका दोनों हाथ सिर पर रख कर वहीं बैठ गई. सूचना मिलते ही एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह घटनास्थल पर आ पहुंचे. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) संजय कुमार, सीओ (सिटी) प्रियांक जैन भी आ पहुंचे थे. पुलिस अधिकारियों ने जांच में पाया कि कमरे में खून फैला था.

फोरैंसिक टीम बुला कर छुरी तथा कोमल की टूटी हुई चूडिय़ां भी कब्जे में ले लीं. 2 घंटे में ही पुलिस ने अंशुल को पकड़ लिया. अपने बचाव में उस ने पुलिस से कहा कि मेरे साले अंकुर का उस की पत्नी से झगड़ा चल रहा है, इसलिए अंकुर की ससुराल वालों ने घर में घुस कर कोमल की हत्या कर दी है. पुलिस ने उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दरअसल, अंशुल को पता ही था कि अंकुर की पत्नी मायके चली गई है और दोनों में विवाद चल रहा है.

सविनय के पास काफी संपत्ति है. इसलिए वह कोमल का विवाह अपने भाई से करा कर उन की संपत्ति पर कब्जा करना चाहता था. लेकिन लगभग दरजन भर गवाहों और छुरी पर अंगुलियों के निशान के कारण अंशुल को सजा मिल सकती है. पर जीजा और मम्मी की उचित सलाह न मान कर वर्तिका ने एक आवारा युवक से विवाह कर के जो मूर्खता की, उस की सजा उसे तो भोगनी ही होगी, उसी की इस मूर्खता की सजा एक बेकुसूर व होनहार लड़की को भी अपना जीवन गंवा कर भोगनी पड़ी. Parivarik Kahani Hindi

 

Agra News : लवर गई सूखे कुएं में

Agra News : आगरा में 40 फीट गहरे कुएं में 65 दिन से लापता फिजा की लाश दफन थी. कौन थी फिजा और उस की हत्या किस ने और क्यों की? आइए, जानते हैं इस कहानी में…

मथुरा के राया क्षेत्र के चौड़ी गांव निवासी  सिदारी खान ने 4 फरवरी, 2025 को कई बार आगरा में रहने वाली बेटी फिजा का मोबाइल नंबर लगाया, लेकिन वह बंद जा रहा था. जबकि एक दिन पहले यानी 3 फरवरी को फिजा का फोन आने पर पता चला कि सुहान खान द्वारा उस के साथ मारपीट की गई थी. कुछ समय से पतिपत्नी में विवाद चल रहा था. वह फिजा की हत्या की धमकी दे रहा था. 3 फरवरी को उस ने जब फिजा की पिटाई की थी, तब फिजा के 112 नंबर पर काल करने पर पुलिस आई थी.

अगले दिन फिजा पति की शिकायत करने आगरा के थाना ताजगंज की एकता चौकी गई थी. इस के बाद से उस का मोबाइल फोन बंद आ रहा था. सिदारी खान ने करीब 15 साल पहले बेटी यबुना उर्फ फिजा की शादी आगरा के पचगई खेड़ा निवासी सुहान खान उर्फ सेठी के साथ की थी. वह 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. बेटी का फोन न मिलने पर सिदारी ने दामाद सेठी से पूछताछ की. सेठी ने बताया कि वह काम के सिलसिले में गया हुआ था, उस के पीछे ही फिजा उसे बिना बताए अपने दोनों बच्चों बेटी व बेटे को घर पर ही छोड़ कर चली गई थी. वह दूसरे दिन भी लौट कर नहीं आई तो उस ने सोचा मायके गई होगी.

2 दिन से बेटी का मोबाइल बंद होने से फिजा के मायके वाले घबरा गए थे. इस के अलावा सेठी की बात से भी वे संतुष्ट नहीं हुए थे. उन्हें लग रहा था कि दाल में जरूर कुछ काला है. 5 फरवरी को सिदारी खान जब बेटी की ससुराल आगरा पहुंचे तो पता चला कि सेठी घर बंद कर बच्चों को ले कर जा चुका है. सिदारी खान ने बेटी फिजा को सेठी की रिश्तेदारियों व अन्य परिचितों के यहां तलाश किया, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी.crime थकहार कर उन्होंने आगरा के थाना ताजगंज में 8 फरवरी, 2025 को बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने दामाद सुहान खान सेठी पर दहेज के लिए बेटी का उत्पीडऩ करने और 4 फरवरी को उसे गायब कर देने का आरोप लगाया. सिदारी का कहना था कि उन की बेटी कई दिनों से लापता है. उन्हें दामाद पर शक है कि उस ने उस के साथ कुछ अनहोनी कर दी है. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की छानबीन शुरू कर दी. फिजा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. इस में पुलिस को एक मोबाइल नंबर ऐसा मिला, जिस पर फिजा की ज्यादा बातें होती थीं.

जांच करने पर वह मोबाइल नंबर ताजगंज के ही नौबरी निवासी भीमसेन यादव का निकला. पुलिस ने बिना देर किए भीमसेन यादव को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. लेकिन, भीमसेन ने बताया कि उस का फिजा से प्रेम प्रसंग तो चल रहा है, लेकिन उस के लापता होने के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. पुलिस को भीमसेन से क्लू मिलने की काफी उम्मीद थी, लेकिन उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. तब पुलिस को सेठी पर गहरा शक हुआ. सिदारी ने भी दामाद पर ही बेटी को गायब करने का आरोप लगाया था.

पुलिस मामले की छानबीन कई एंगल से कर ही रही थी कि अचानक 8 अप्रैल, 2025 को लापता फिजा का मोबाइल औन हो गया. पुलिस के लिए तो यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाना साबित हुआ. पुलिस ने  सर्विलांस के जरिए जब पड़ताल की तो फिजा के मोबाइल की लोकेशन संभल (उत्तर प्रदेश) की मिली. पुलिस ने बिना देर किए संभल जा कर एक व्यक्ति को दबोच लिया. जब उस से फिजा के बारे में पूछताछ की तो उस ने कहा कि वह फिजा को नहीं जानता. मोबाइल उस के पास कैसे आया?

 

इस पर उस व्यक्ति ने बताया कि नोएडा वह काम करने गया था. वहीं एक व्यक्ति ने उसे 300 रुपए में यह मोबाइल बेच दिया था. पुलिस समझ गई कि नोएडा में फिजा का पति सेठी काम करता है, उस ने ही पत्नी का मोबाइल इस व्यक्ति को बेचा होगा. उस व्यक्ति को पुलिस ने भीमसेन, सेठी व अन्य के फोटो दिखाए. इस पर उस व्यक्ति ने भीमसेन का फोटो पहचानते हुए कहा, ”हां साहब, इसी व्यक्ति से उस ने मोबाइल खरीदा था.’’

पुलिस ने तब भीमसेन को हिरासत में लिया. इस के बाद भी भीमसेन पुुलिस को घुमाता रहा और कहता रहा कि उस व्यक्ति को मोबाइल मैं ने नहीं, सेठी ने बेचा होगा. सेठी और वह व्यक्ति मिले हुए हैं. लेकिन जब पुलिस ने भीमसेन का आमनासामना संभल वाले उस व्यक्ति से कराया तो उसे सच बोलने पर मजबूर होना पड़ा. भीमसेन ने अपना जुर्म  कुबूल करते हुए पुलिस को जो बताया, उसे सुन कर पुलिस भी दंग रह गई. भीमसेन यादव ने बताया कि नोएडा में काम के दौरान उस का फिजा के पति सेठी से परिचय हो गया था. उसे बातों ही बातों में पता चला कि सेठी भी आगरा का रहने वाला है. कभीकभी वह सेठी के घर आ जाता था.

इस बीच फिजा और भीमसेन यादव की आंखें चार हो गईं. भीमसेन को भी कसे बदन की फिजा अच्छी लगने लगी. धीरेधीरे दोनों के पे्रमसंबंध हो गए. समाज से नजरें चुरा कर दोनों काफी समय से मिल रहे थे और प्यार की पींगें बढ़ा रहे थे. भीमसेन फिजा को चाहता था और फिजा भी उसे बहुुत प्यार करती थी. एक दिन सेठी को उन दोनों के बीच के प्रेमसंबंधों की जानकारी हो गई. हुआ यह कि  जब  फिजा और भीमसेन अंतरंग क्षणों में खेाए हुए थे, फिजा के बच्चों ने दोनों को देख लिया. बच्चों ने अब्बू सेठी को इस बारे में बता दिया. इस से सेठी पत्नी से नाराज हो गया और अब घर में कलह रहने लगी.

3 फरवरी, 2025 को फिजा के साथ इसी बात को ले कर पतिपत्नी में विवाद हो गया. सेठी ने फिजा के साथ मारपीट कर दी और 4 फरवरी को फिजा के घर से जाने के बाद वह अपने दोनों बच्चों को ले कर काम करने नोएडा चला गया. मारपीट की घटना के बाद 4 फरवरी को फिजा अपने प्रेमी भीमसेन के पास पहुंची. उस ने पति द्वारा उस के साथ मारपीट करने की बात बताई और भीमसेन के साथ रहने की जिद की तो वह फिजा को दिल्ली ले गया. वहां कुछ दिन रहने के बाद जब वे लोग 15 मार्च को घर लौट रहे थे, नौबरी जाने वाले रास्ते पर एक कोठरी में रात को रुके.

मौजमस्ती के दौरान फिजा उस से शादी की जिद करने लगी. तब भीमसेन का फिजा से विवाद हो गया. भीमसेन ने फिजा का उसी के दुपट्टे से गला घोंट दिया. इस से कुछ देर तड़पने के बाद फिजा ने दम तोड़ दिया. उस समय रात गहरा गई थी. भीमसेन ने फिजा की लाश अपने कंधे पर उठाई और पास के एक सूखे कुएं में डाल दी. यह कुआं लगभग 40 फीट गहरा था. लाश के ऊपर उस ने मिट्टी भी डाल दी. प्रेमी भीमसेन ने प्रेमिका फिजा की हत्या करने के बाद लाश के पास बैठ कर अपने मोबाइल पर ‘दृश्यम’ फिल्म भी देखी. इस फिल्म में लाश को आरोपी पुलिस स्टेशन के निर्माणाधीन हिस्से में छिपाता है.

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ऐसा इसलिए करता है कि क्योंकि आरोपी को लगता है कि पुलिस वहां कभी भी लाश की जांच नहीं करेगी. भीमसेन ने पुलिस से बचने के लिए इसी आइडिया के चलते लाश को कुएं में छिपाया था. फिजा की लाश को कुएं में डालने के बाद भीमसेन को यह डर सताने लगा कि बदबू आने पर लोगों को फिजा की हत्या का पता चल जाएगा. इसलिए हत्या के बाद वह 4-5 दिन तक कुएं में लाश के ऊपर मिट्टी डालने आता रहा. जब शव पूरी तरह मिट्टी से ढक दिया, तब उस ने मरे हुए पशुओं के शवों को कुएं में डाल दिया, ताकि ऊपर से देखने पर लोगों को लगे कि जानवरों के कुएं में गिर कर मरने से बदबू आ रही है. इतना सब करने के बाद उस ने वहां आना बंद कर दिया. भीमसेन पूरी तरह निश्चिंत हो गया था कि अब फिजा की लाश का किसी को पता नहीं चलेगा.

पुलिस ने भीमसेन की निशानदेही पर आगरा के ताजगंज के एकता चौकी क्षेत्र में स्थित नौबरी गांव के उस सूखे कुएं से फिजा  का शव सड़ीगली अवस्था में 9 अप्रैल को बरामद कर लिया, जिस की शिनाख्त भी फेमिली के सदस्यों के द्वारा कर ली गई. फिर भी पुलिस अवशेष का डीएनए टेस्ट कराएगी. आरोपी भीमसेन की अपनी पत्नी से भी नहीं बन रही थी. भीमसेन ने बताया कि फिजा चाहती थी कि पति सेठी उन दोनों के बीच से हट जाए ताकि वह प्रेमी के साथ रह सके. सेठी के साथ विवाद होने से पहले ही फिजा प्रेमी भीमसेन पर अपने पति सेठी की हत्या करने के लिए दबाव डाल रही थी.

वह कहती थी अपने प्यार के कांटे को वह निकाल दे. उस की हत्या करने के बाद हम दोनों शादी कर लेंगे और आराम से जीवन गुजारेंगे. भीमसेन फिजा से प्यार तो बहुत करता था, लेकिन उस के पति की हत्या कर फिजा के साथ शादी नहीं करना चाहता था, क्योंकि दोनों शादीशुदा थे. वहीं फिजा के 2 और भीमसेन के 3 बच्चे थे. उस ने फिजा को बहुत समझाया, लेकिन फिजा ने उस की बात नहीं मानी. वह अपनी जिद पर अड़ी रही. मरता क्या न करता. प्रेमिका की खातिर भीमसेन ने सेठी की हत्या की योजना बनाई और नोएडा जा पहुंचा. वहां जा कर उस ने सेठी की हत्या का कई बार प्रयास किया, लेकिन वह उस की हत्या करने में सफल नहीं हो सका. थकहार कर वह वापस आगरा आ गया.

एसीपी (सुरक्षा) सैय्यद अबिर अहमद ने बताया कि फिजा की काल डिटेल्स में उस की बातचीत ताजगंज के नौबरी निवासी भीमसेन यादव से मिली थी. मगर उस ने फिजा को जानने से इंकार किया. जांच के दौरान पता चला कि फिजा और भीमसेन के बीच पिछले एक साल से संबंध थे, जिस के कारण फिजा के घर में लगातार विवाद हो रहा था. लाश बरामदगी से एक सप्ताह पहले फिजा का मोबाइल चालू हुआ तो लोकेशन संभल की मिली. इस से पहले फिजा का मोबाइल बंद था. इस के बाद कड़ी से कड़ी मिला कर फिजा के लापता होने के 65 दिन बाद इस घटना का पुलिस ने परदाफाश करते हुए फिजा के कातिल उस के प्रेमी भीमसेन को गिरफ्तार कर लिया.

उस के कब्जे से फिजा का मोबाइल भी बरामद कर लिया गया, जो उस ने फिजा की हत्या के बाद संभल के एक युवक को बेच दिया था. डीसीपी (सिटी) सोनम कुमार ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह पता चलेगा कि फिजा की हत्या उस के प्रेमी द्वारा कब की गई थी. हालांकि फिजा के अब्बू सिदारी पुलिस के इस खुलासे से संतुष्ट नहीं हैं. उन का आरोप है कि बेटी की हत्या में पति सेठी भी शामिल है. पुलिस महिला के पति की भूमिका की भी गहनता से जांच कर रही है. पुलिस ने फिजा के हत्यारोपी उस के प्रेमी भीमसेन को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

जिस मोहब्बत पर फिजा ने विश्वास किया और जिस प्यार की खातिर अपना घरपरिवार तक छोड़ दिया, उसी प्यार ने उसे दुनिया से विदा कर दिया. Agra News

 

 

Bijnor News : चाची के इश्क में भतीजे ने उतारा चाचा को मौत के घाट

Bijnor News :  2 बच्चों की मां सुशीला की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. उस का पति वीर सिंह उस का हर तरह से खयाल रखता था. इस के बावजूद भी उस के पैर अपने भतीजे सोमपाल की तरफ बहक गए. इन बहके कदमों का जो अंजाम हुआ, वो…

शाम के 5 बज रहे थे. सुशीला ने घड़ी देखी तो वह खाना बनाने की तैयारी करने लगी. उस का पति वीर सिंह 6 बजे तक काम से लौट आता था. यह रोज की दिनचर्या थी. उस ने सब्जी काटी और उसे पकाने के लिए गैस चूल्हा जलाना चाहा तो माचिस ही नहीं मिली. उसे याद आया कि माचिस तो आज सुबह ही खत्म हो गई थी. वह घर के मेनगेट पर जा कर खड़ी हो गई. उस ने सोचा कि वह किसी को बुला कर  दुकान से माचिस मंगवा लेगी. तभी उसे सोमपाल दिखा. सोमपाल उस के पति का भतीजा था. इस नाते वह उस का भी भतीजा हुआ. वह भी उसी गांव में रहता था.

सुशीला ने उसे आवाज दे कर पुकारा, ‘‘सोम, जरा इधर आओ.’’

सोमपाल फौरन उस के पास आ गया, ‘‘हां चाची, बोलो मुझे क्यों पुकार रही थीं?’’

‘‘सोम, जरा जल्दी जा कर दुकान से एक माचिस खरीद कर ले आओ. तुम्हारे चाचा आते होंगे, उन के लिए खाना बनाना है.’’

‘‘चाची, माचिस तो मैं ला दूंगा, पर इस के बदले में तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा.’’

‘‘कर दूंगी,’’ सुशीला ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया, सोचा चाय पीने को मांगेगा, बना कर दे देगी. इसीलिए वह लापरवाही से बोली, ‘‘लेकिन पहले जा कर माचिस ले आओ, नहीं तो देर हो जाएगी.’’

‘‘चाची, मेरे रहते हुए तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, माचिस ले कर अभी आया.’’ कह कर सोमपाल तेजी से वहां से चला गया. 5 मिनट में ही उस ने माचिस ला कर सुशीला के हाथ पर रख दी. सुशीला का पूरा ध्यान खाना बनाने पर था, इसलिए माचिस ले कर वह किचन में चली गई. किचन में सुशीला ने चूल्हा जला कर उस पर कड़ाही रख दी. उस के बाद तेल का डिब्बा उठाने के लिए घूमी तो उस ने अपने पीछे सोमपाल को खड़े पाया. सुशीला को आश्चर्य हुआ, ‘‘अरे, तुम यहां क्या कर रहे हो, जा कर कमरे में बैठो.’’

‘‘चाची, माचिस लाने लाने से पहले मैं ने तुम से कुछ कहा था…’’ सोमपाल ने सुशीला को गौर से देखा.

सुशीला की भी नजरें सोमपाल के चेहरे पर जम गईं, ‘‘मुझ से ऐसा कौन सा काम है तुम्हें?’’

‘‘मैं वही तो बताने जा रहा हूं.’’ सोमपाल ने फिर सुशीला की आंखोें में आंखें डाल दीं, ‘‘मैं ने इस शर्त पर माचिस ला कर दी थी कि तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा. अपने वादे से मुकरो मत. मैं ने तुम्हारा काम कर दिया, अब तुम मेरा काम करो.’’

सोमपाल अकसर सुशीला से चाय की फरमाइश करता था. लिहाजा सुशीला के मन में यही बात थी कि वह चाय के लिए कहेगा. सुशीला खाना पकाने की जल्दी में थी, इसलिए वह सोमपाल के कुछ बोलने से पहले ही वह बोल पड़ी, ‘‘तुम्हारा काम मैं अच्छी तरह जानती हूं, लेकिन मुझे अभी खाना पकाना है, इसलिए तुम्हें चाय बना कर नहीं दे सकती. खाना बन जाए तो मैं खुद तुम्हें बुला कर चाय पिला दूंगी.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘चाची, चाय के अलावा दूसरा काम भी तो हो सकता है.’’

‘‘तुम देख रहे हो न,’’ डिब्बे से कड़ाही में तेल उड़ेलते हुए सुशीला बोली, ‘‘मैं बिजी हूं, जो बात करनी हो, बाद में कर लेना.’’

‘‘मेरी बात तुम सब्जी पकाते हुए भी तो सुन सकती हो!’’ सोमपाल ने कहा.

‘‘अच्छा जल्दी बोलो, क्या बात है?’’ वह बोली.

सोमपाल अर्थपूर्ण अंदाज से मुसकराते हुए बोला, ‘‘चाची तुम अकसर कहती हो न कि सोमपाल तुम बड़े हो गए हो.’’

सुशीला ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उस की तरफ देखा, ‘‘हां, कह देती हूं तो?’’

‘‘चाची, तुम्हारी बातों से मुझे भी लग रहा है कि मैं अब बच्चा नहीं रहा, वास्तव में बड़ा हो गया हूं.’’

सुशीला हंसने लगी, ‘‘यही तुम्हारा वह जरूरी काम था.’’

‘‘नहीं, यह तो उस की भूमिका थी, असली बात तो बाकी है.’’

कड़ाही में गरम होते तेल पर नजरें जमाए हुए सुशीला बोली, ‘‘हां, चलो अच्छा हुआ कि तुम ने भी मान लिया कि तुम बड़े हो गए हो.’’

‘‘इसीलिए मैं ने सोचा कि बड़ा हो गया हूं तो बड़ों वाले काम भी करने चाहिए.’’

सुशीला को उस की बातों में रस आने लगा, ‘‘अब यह तो बता दो कि बड़ों वाला कौन सा काम करने जा रहे हो?’’

सोमपाल ने नजरें झुका लीं, मानो शरमा रहा हो.

सुशीला ने उस का हौसला बढ़ाया, ‘‘शरमाओ मत, बता दो.’’

‘‘चाची, डांटोगी तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल नहीं डांटूंगी, बोलो.’’

‘‘किसी से मेरी शिकायत भी नहीं करोगी?’’ वह झिझकते हुए बोला.

‘‘नहीं करूंगी बाबा,’’ सुशीला के होंठों पर गहरी मुसकान पसर गई, ‘‘काम बताओ, समय बरबाद मत करो.’’

‘‘अच्छा तो सुनो,’’ सोमपाल सुशीला के और नजदीक आ गया. उस के बाद अपने लहजे को रहस्यमय बना कर बोला, ‘‘मुझे प्यार हो गया है.’’

‘‘वाह क्या बात है.’’ सुशीला की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘यानी कि तुम इतने बड़े हो गए हो कि खुद को प्यार के लायक समझने लगे.’’

‘‘और नहीं तो क्या, अब मैं बच्चा थोड़े ही हूं, 22 साल का जवान हो गया हूं. इस उम्र में तो गांव के आम लड़के 2 बच्चों के बाप बन जाते हैं. मेरे भी कुछ दोस्त 2 बच्चों के बाप बन गए हैं. इस उम्र के लोग जब बाप बन जाते हैं तो मैं तो केवल प्यार करने की बात कर रहा हूं.’’ सोमपाल ने एक ही सांस में अपनी बात कह दी. सुशीला दिलचस्पी से उस की आंखों में देखने लगी, ‘‘किस से दिल लगा बैठे हो, जरा मुझे भी तो बताओ.’’

‘‘बता दूंगा, फिलहाल राज को राज रहने दो.’’

‘‘अच्छा सोम, यह बताओ, जिस से तुम प्यार करते हो, वह भी तुम्हें चाहती है न?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘यह क्या बात हुई,’’ कड़ाही में कटी हुई सब्जी डालते हुए  सुशीला बोली, ‘‘दिल लगा बैठे और यह तक पता नहीं कि उस के दिल में तुम्हारे लिए प्यार है या नहीं.’’

‘‘मैं कहूंगा, तब तो उसे पता चल जाएगा और तभी वह अपने दिल की बात मुझ तक पहुंचा देगी.’’

‘‘तो कह दो न.’’

‘‘चाची, कहने की हिम्मत नहीं है,’’ सोमपाल ने बेचैनी से पहलू बदला, ‘‘इसलिए अपनी बात कहने के लिए यह प्रेम पत्र लिखा है.’’

सोमपाल ने जेब से एक पत्र निकाल कर सुशीला की ओर बढ़ाया, ‘‘लो, खुद ही पढ़ लो.’’

सुशीला ने तह किया हुआ पत्र खोल कर पढ़ा. बिना किसी को संबोधित करते हुए उस में लिखा था—

प्रिय प्राणेश्वरी,  मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिन हो या रात, तुम्हारे ही खयालों में खोया रहता हूं. मुश्किल से नींद आती है तो तुम्हारे ही सपने देखता रहता हूं. सपने में तुम आती हो तो मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता और तुम्हारे साथ अंतरंग क्षणों में खो जाता हूं. उस समय का प्यार मुझे भूले नहीं भूलता. इस पत्र के जरिए अपने दिल की हालत तो मैं ने बयान कर दी. कह दो न कि तुम भी मुझे प्यार करती हो. —तुम्हारा सोम

पत्र पढ़ कर सुशीला मुसकराई, ‘‘सोम, प्यार का इजहार करने के साथसाथ तुम ने अंतरंग क्षणों का जिक्र कर दिया.’’

‘‘चाची, जो सच है, मैं ने वही लिखा है. सच यह है कि मैं उस के साथ अंतरंग क्षणों का दीवाना हूं.’’

सुशीला का विवाह हुए केवल 12 साल हुए थे और वह 2 बच्चों की मां थी. वह जानती  थी कि अंतरंग क्षणों में इंसान कैसे पेश आता है. इस पर सुशीला उस की हिम्मत बढ़ाने के उद्देश्य से बोली, ‘‘हिचको मत, जिस के लिए पत्र लिखा है उसे दे आओ.’’

सोमपाल मुसकराया, ‘‘मेरी बात उस के दिल पर असर तो करेगी?’’

‘‘जरूर असर करेगी.’’

‘‘वह प्यार का जबाव प्यार से देगी न, सिर पर जूते पड़ने की नौबत तो नहीं आएगी?’’

‘‘इस बारे में तुम बेहतर बता सकते हो कि प्यार मिलेगा या फटकार!’’

‘‘चाची, तुम बताओ क्या मिलेगा?’’

‘‘सोम, तुम दिमाग बहुत चाट चुके, अब तुम जाओ, मुझे खाना पकाना है. तुम्हारे चाचा आते ही होंगे, आते ही वह खाना मांगेंगे.’’

‘‘चला जाऊंगा, बस तुम एक सवाल का जबाव दे दो…’’ सोमपाल उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘मुझे प्यार ही मिलेगा न?’’

सुशीला ने पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘हां, प्यार ही मिलेगा.’’

‘‘तो प्यार दो न चाची!’’ सोमपाल फंसी हुई सी आवाज में बोला, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है और यह पत्र मैं ने तुम्हारे लिए ही लिखा था.’’

पलक झपकते ही सुशीला सन्नाटे से घिर गई. ऐसा सन्नाटा जिस में वह अपना अस्तित्व शून्य जैसा महसूस कर रही थी. जनपद बिजनौर के थाना रेहड़ के अंतर्गत ग्राम फाजलपुर निवासी वीर सिंह से सुशीला का विवाह 12 साल पहले हुआ था. कालांतर में सुशीला ने एक बेटी सोनम (7 वर्ष) और एक बेटा मनीष (5 वर्ष) को जन्म दिया. वीर सिंह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. फाजलपुर गांव में ही सोमपाल रहता था. वह भी चाचा वीर सिंह की तरह पशुओं के पैरों में नाल लगाने का काम करता था. सोमपाल की उम्र 22 साल थी और वह अविवाहित था. उस के 2 बहन और एक भाई था. वह तीनों से छोटा था. उम्र के जिस पड़ाव पर सोमपाल था, वह सपने देखने और उन में नित नएनए रंग भरने की होती है.

सोमपाल का मन भी रंगीन कल्पना किया करता था और आंखें तन को रोमांचित करने वाले सपने देखा करती थीं. सोमपाल सुशीला से उम्र में 11 साल छोटा था. गोरे रंग की सुशीला का बदन उम्र बढ़ने के साथ ही और खिलता जा रहा था. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस के यौवन में कोई कमी नहीं आई थी. सुशीला का बिंदास बोलना और उठनाबैठना सोमपाल के दिल में घर कर गया. सुशीला कब उस के सपनों की शहजादी बन गई, स्वयं उसे भी पता नहीं चला. सोमपाल के मन में सुशीला एक बार बसी तो वह चाह कर भी उसे दिल से निकाल नहीं सका. सुशीला को वह चाची कहता था, इस के बावजूद वह उस के सपनों की रानी बनी हुई थी.

मन ही मन सोमपाल उसे चाहता ही नहीं था, बल्कि उस से शादी करने के सपने भी देखा करता था. बहुत दिनों से सोमपाल इस जुगत में था कि सुशीला को वह अपने मन की बात बता सके. लेकिन उसे कभी मौका नहीं मिलता तो कभी उस की हिम्मत उस का साथ नहीं देती थी. लिहाजा उस ने एक प्रेमपत्र लिख कर यह सोच कर अपनी जेब में रख लिया था कि मौका मिलते ही चाची को दे देगा. उस दिन मौका मिला तो सोमपाल ने प्रेमपत्र देने के बाद अपने मन की बात भी उसे बता दी, ‘‘सुशीला चाची, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

सोमपाल का प्रेम निवेदन सुन कर सुशीला सन्नाटे में आ गई. उस की तंद्रा तब टूटी, जब कड़ाही की तली में सब्जी जलने की बदबू आई. सुशीला तुरंत सब्जी चलाने लगी. सोमपाल के प्रेम निवेदन से सुशीला को गुस्सा नहीं आया, अपितु उस की सोच को नई दिशा मिल गई. दरअसल वीर सिंह के साथ वह खुश तो थी लेकिन वह उस के सपनों का राजकुमार नहीं था. विवाह से पहले सुशीला ने कल्पना की तूलिका से अपने मन में अपने जीवनसाथी की जो छवि बनाई थी, वह वीर सिंह जैसी नहीं, बल्कि सोमपाल जैसी थी. सुशीला भी उसे बहुत पसंद करती थी. पहली बार सोमपाल को उस ने देखा था तो मन में यही खयाल आया था, ‘सोमपाल इस दुनिया में पहले क्यों नहीं आया.

यदि पहले आ जाता तो सोमपाल से मेरी शादी हो जाती, कसम से मजा आ जाता. जीवन में फिर कोई तमन्ना नहीं रह जाती.’

अब सोमपाल ने अपने प्रेम का इजहार किया तो वह सोचने लगी, ‘शायद नियति ने मेरे मन की बात सुन ली है और वह इसे पूरी करना भी चाहता है. इसलिए उस ने सोमपाल का दिल मेरी चाहत से रोशन कर दिया है. देर से ही सही, लेकिन सोमपाल से इश्क लड़ा कर देखा जाए कि मोहब्बत कैसा मजा देती है.’

उस दिन सुशीला का मन किसी काम में नहीं लगा. उस का दिमाग बस सोमपाल के बारे में सोचता रहा. उस का दिया प्रेम पत्र उस ने कई बार पढ़ा और फिर मुसकरा कर चूम लिया. कोई उस के चरित्र पर अंगुली उठाए, ऐसा सुबूत वह अपने पास रखना नहीं चाहती थी, इसलिए सोमपाल का वह प्रेम पत्र चूल्हे की आग में जला दिया. वीर सिंह के घर आने के बाद उस ने उसे खाना परोसा. वीर सिंह ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में डाला, उस के बाद उस ने सुशीला को अजीब नजरों से देखा और बोला, ‘‘सुशीला, आज तुम ने खाना पकाया है या मजाक किया है. सब्जी में नमक नहीं है और जलने की गंध आ रही है. रोटी भी कहीं कच्ची है तो कहीं जली है. खाना पकाते समय ध्यान कहां था तुम्हारा.’’

सुशीला कैसे बताती कि वह सोमपाल के खयालों में खोई रही थी, इसलिए उस ने बेमन से खाना पकाया था. अपनी बात संभालने के लिए उस ने सिर भारी होने और चक्कर आने का बहाना किया और उस के सामने से थाली खींचने लगी, ‘‘तबियत ठीक न होने की वजह से खाना खराब हो गया. आधा घंटा लगेगा, अभी दूसरी रोटीसब्जी पका लाती हूं.’’

‘‘रहने दो. जैसा है, भोजन है और भोजन का अपमान नहीं करना चाहिए. रोज अच्छा खाता था, आज थोड़ा खराब खा लूंगा. बस थोड़ा नमक दे दो.’’ इस पर सुशीला ने उसे नमक दे दिया. सब्जी में नमक मिला कर वीर सिंह ने वही खाना खा लिया. रात को सभी लोग सो गए लेकिन सुशीला सोमपाल के खयालों में ही खोई रही. सोमपाल और अपने बारे में सोचतेसोचते सुशीला ने अंतत: निर्णय कर लिया कि वह सोमपाल के प्यार का जबाव प्यार से देगी. बस, उस के मन का तनाव जाता रहा और वह चैन से सो गई. दूसरी तरफ कहने को सोमपाल सो रहा था, जबकि वह जाग रहा था और इसी सोच में था कि सुशीला उस के प्यार को स्वीकार करेगी कि नहीं.

अगले दिन सुबह वीर सिंह काम पर चला गया. सोमपाल काम पर नहीं गया, अपने घर पर ही रहा. असल में वह सहमा भी था कि कहीं सुशीला चाची का जबाव उस के मन के विपरीत हुआ तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा. जब वह सुशीला के सामने पहुंचा तो सुशीला ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘कल मैं खाना पकाने की उलझन में थी, इसलिए तुम्हारी बातों पर तवज्जो नहीं दे पाई. अब बोलो, कल क्या कह रहे थे?’’

सोमपाल के भीतर के भय ने और भी लंबे पांव पसार लिए. नजरें झुका कर वह धीरे से बोला, ‘‘मुझे जो कहना था, कल ही कह दिया था.’’

‘‘क्या यह सच है कि तुम्हें मुझ से प्यार हो गया है?’’ वह बोली.

सोमपाल ने नजरें झुकाए हुए ही धीरे से सिर हिला दिया, ‘‘हां.’’

‘‘प्यार भी करते हो और डरते भी हो,’’ सुशीला ने अपनी बांहें उस के गले में डाल दी, ‘‘बुद्धू, प्यार करने वाले डरा नहीं करते.’’

सोमपाल हैरान रह गया. सुशीला प्यार का जबाव इस शिद्दत से देगी, यह उस की सोच से परे बात थी.

‘‘विश्वास नहीं हो रहा है!’’ सुशीला मुसकराई, ‘‘अच्छा, मैं तुम्हारा मुंह मीठा करा देती हूं, तब यकीन होगा कि यह सुशीला भी तुम्हें चाहती है.’’

इस के बाद वह अपना मुंह सोमपाल के मुंह के पास ले गई. इतने पास कि सांसें सांसों से टकराने लगीं. सोमपाल ने उस के होंठों से अपने होंठों का मिलाप करा कर उस के होंठों को चूम लिया.

कुछ देर चूमने के बाद सुशीला ने अपना मुंह हटा लिया और उस की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘हुआ मुंह मीठा?’’

सोमपाल ने होंठों पर अपनी जीभ फेरी, उस के बाद सुशीला की कमर को अपनी बांहों में समेट लिया, मुसकरा कर बोला, ‘‘मुंह भी मीठा हुआ और यकीन भी हो गया. जिस तरह मुंह मीठा किया है, उसी तरह पूरा बदन मीठा कर दो तो मजा आ जाए.’’

सुशीला ने बांकी चितवन से उसे देखा, ‘‘सब कुछ आज ही कर गुजरने का इरादा है क्या?’’

‘‘प्यार में जो होना है, वह फौरन हो जाना चाहिए.’’ कह कर सोमपाल ने सुशीला के होंठों को चूम लिया.

सुशीला के मन में अनार की आतिशबाजी सी होने लगी. उस का मन भी सोमपाल के जोश और जवानी को परखने का हो गया, मुसकरा कर बोली, ‘‘सोम, तुम भी क्या याद करोगे. प्यार के इजहार के बाद पहली मुलाकात में ही तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा, जोकि आम प्रेमियों को महीनों बाद मिलता है और कइयों को तो मिलता ही नहीं है.’’

सोमपाल ने बांहों का घेरा और तंग कर लिया, ‘‘थैंक यू चाची.’’

‘‘चाची, दूसरों के सामने बोलना, अकेले में मुझे मेरे नाम से पुकारा करो,’’ सुशीला इठला कर बोली, ‘‘अब कमर छोड़ो, तो मैं दरवाजा बंद कर आऊं.’’

सोमपाल ने सुशीला की कमर को बांहों की गिरफ्त से आजाद कर दिया. सुशीला ने झट से दरवाजा बंद कर दिया और सोमपाल की बांहों में समा गई. फिर उन के जिस्म मर्यादाओं की दीवार तोड़ कर एक हो गए. कुछ देर बाद दोनों अलग हुए तो दोनों ही आनंद से अभिभूत थे. सोमपाल को पहली बार नारी देह का सुख मिला था, यह सर्वथा अनूठा और आनंददायक अनुभव था. सुशीला इसलिए आनंद के महासागर में डुबकियां लगा रही थी क्योंकि उस का पति वीर सिंह उसे ऐसा कभी सुख नहीं दे पाया था. बस, उस दिन से दोनों एकदूसरे के पूरक बन गए. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह अपनी बाइक से सुआवाला बाजार गया लेकिन देर शाम तक वह वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने उस की तलाश की लेकिन कहीं पता नहीं चला.

इस पर वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल सिंह ने रेहड़ थाने में वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुबह वीर सिंह के घर वालों और गांव के लोगों ने फिर से वीर सिंह की तलाश शुरू की तो सुआवाला और मच्छमार मार्ग के बीच हरहरपुर गांव के पास वीर सिंह की लाश पड़ी मिली. लाश मिलते ही वीर सिंह के घर वाले रोनेचिल्लाने लगे. घटनास्थल अफजलगढ़ थाना क्षेत्र में आता था, इसलिए घटना की सूचना अफजलगढ़ थाने को दे दी गई. सूचना पा कर इंसपेक्टर नरेश कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक वीर सिंह के सिर पर घाव के निशान थे, जिस से अंदाजा यह लगाया गया कि किसी ठोस वस्तु से सिर पर प्रहार कर के वीर सिंह को मौत के घाट उतारा गया है.

इंसपेक्टर नरेश कुमार ने लाश का निरीक्षण करने के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया, लेकिन घटना से संबंधित कोई सुबूत हाथ नहीं लगा. उस के घर वालों से पूछताछ की तो वीर सिंह के छोटे भाई रामगोपाल ने थानाप्रभारी को बताया कि 2 जनवरी को वीर सिंह का गांव के ही अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हुआ था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर कुमार ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. थाने आ कर इंसपेक्टर कुमार ने रामगोपाल की तरफ से अंकुश, रवि, शकील और ब्रह्मपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 304 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू हुई तो नामजद आरोपियों की लोकेशन घटनास्थल पर या उस के आसपास नहीं मिली. सभी आरोपी अपनेअपने घरों में ही मौजूद थे.

वह सवालों के जवाब भी बेखटक दे रहे थे. किसी तरह का शक न होने पर इंसपेक्टर कुमार ने अपनी जांच की दिशा को मोड़ा. उन की समझ में आ गया था कि घटना में नामजदगी गलत है, घटना किसी और ने अंजाम दी है. सर्विलांस टीम का सहारा लिया गया. घटना वाली शाम घटनास्थल पर मौजूद नंबरों की जांचपड़ताल की गई, तो उस में से 3 नंबर संदिग्ध लगे. एक नंबर सोमपाल का था. सोमपाल के बारे में इंसपेक्टर कुमार ने पता किया तो वह मृतक का भतीजा निकला. सोमपाल के साथ 2 फोन नंबर और भी एक्टिव थे. उन नंबरों की लोकेशन भी काफी समय तक एक साथ रही थी. वह नंबर ऊधमसिंह नगर के जसपुर थाना क्षेत्र के रायपुर गांव के 2 युवकों के थे. उन की लोकेशन घटना वाली शाम घटनास्थल से रायपुर तक रही थी.

इस के बाद इंसपेक्टर कुमार ने 16 जनवरी की रात सोमपाल और उस के साथियों लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने वीर सिंह की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. थाने में उन से पूछताछ के बाद 17 जनवरी को उन्होंने सुशीला को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिसिया पूछताछ के बाद हत्या की जो वजह निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

सोमपाल और सुशीला के संबंध बने महीनों बीत गए. इस दौरान सुशीला और सोमपाल का प्यार बेहद बढ़ गया था. अलग होने की कल्पना से ही दोनों का कलेजा मुंह को आने लगता था. सोमपाल शादी करने की बात करता तो सुशीला उस की हां में हां मिलाने लगती थी. असल में सुशीला ने पति वीर सिंह को दिल से निकाल दिया था और मन से सोमपाल को अपना पति मान चुकी थी. वह उस के साथ ही अपना जीवन बिताने की इच्छुक थी. लेकिन घटना से करीब 2 महीने पहले उन के इस नाजायज रिश्ते का भेद खुल गया. एक दिन रात में सोते समय वीर सिंह की आंखें खुलीं तो वह लघुशंका के लिए उठा तो उस ने सुशीला को अपने बिस्तर से गायब पाया.

वह कमरे से बाहर निकला तो रसोई से उसे कुछ आवाजें आती सुनाई दीं,वह उस तरफ बढ़ गया. जैसे ही वह रसोई के अंदर पहुंचा तो अंदर का दृश्य देख कर उस की आंखें हैरत से फट गईं. सुशीला भतीजे सोमपाल के साथ आपत्तिजनक हालत में थी. उसे एकबारगी तो विश्वास नहीं हुआ, पर अगले ही पल वह चिल्लाया, ‘‘सुशीला…’’

वीर सिंह की आवाज सुन कर दोनों हड़बड़ा कर अलग हो गए और मुजरिम की भांति नजरें झुका कर खड़े हो गए. वीर सिंह ने दोनों को काफी लताड़ा और सुशीला के साथ मारपीट की. लेकिन तब तक सोमपाल वहां से खिसक लिया था. सुशीला को वीर सिंह ने हिदायत दी कि आगे से ऐसी हरकत न करे, नहीं तो अच्छा नहीं होगा. लेकिन कहते हैं कि ये ऐसी चाहत है, जिस का नशा इंसान के सिर चढ़ कर बोलता है, तमाम पाबंदियों के बावजूद इंसान बेचैन हो कर फिर उसी नशे की तरफ भागता है. ऐसा ही सोमपाल और सुशीला के साथ हुआ. वह भी इस चाहत के नशे के आदी हो गए थे.

जब पाबंदी लगी तो बरदाश्त नहीं कर सके और बेचैन हो कर फिर दोनों एकदूसरे के नशे की चाहत में डूबने लगे. लेकिन बंदिशों के कारण खुल कर न मिल पाने की कसक दोनों को सालती थी. वैसे भी दोनों एक साथ रहने का मन बना चुके थे, इसलिए वीर सिंह को अपने रास्ते से हटाने की सोचने लगे, उस को हटाए बिना दोनों एक नहीं हो सकते थे. इसलिए सोमपाल ने अपने 2 साथियों ऊधमसिंह नगर के थाना जसपुर के रायपुर गांव निवासी लवकुश और सलीम (परिवर्तित नाम) से हत्या में साथ देने के लिए बात की. दोनों सोमपाल का साथ देने को तैयार हो गए. लवकुश तो बालिग था, उस की उम्र 22 साल थी, लेकिन सलीम नाबालिग था उस की उम्र 16 वर्ष थी.

वीर सिंह की हत्या की योजना बनी, योजना से सुशीला को भी अवगत कराया गया. 13 जनवरी, 2021 को वीर सिंह सुआवाला बाजार जाने के लिए बाइक से निकला. उस के निकलने से पहले ही सुशीला ने फोन कर के सोमपाल को बता दिया था. सोमपाल लवकुश और सलीम के साथ सुआवाला मच्छमार मार्ग के रास्ते में जा कर खड़ा हो गया. जैसे ही वीर सिंह बाइक पर बैठ कर उधर आया, तो उस ने डंडा मार कर उसे बाइक से गिरा दिया. वीर सिंह के गिरते ही तीनों ने उसे दबोच लिया और सिर पर डंडा मारमार कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद नहर के दोनों तरफ बनी पक्की दीवारों के बीच में लाश डाल दी. डंडे को एक गन्ने के खेत में छिपा दिया तथा वीर सिंह का मोबाइल मय सिम तालाब में फेंक दिया.

इस के बाद वीर सिंह की बाइक से सोमपाल लवकुश और सलीम को रायपुर तक छोड़ने गया. वहां से वापस आ कर एक जगह बाइक छिपा दी और घर चला गया. लेकिन गुनाह कभी किसी का छिपता नहीं तो इन का कैसे छिप जाता. चारों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ गए. इंसपेक्टर कुमार ने आईपीसी की धारा 304 को धारा 302/120बी में तरमीम कर दिया. फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चारों आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP News : पिता ने तकिए से दबाया बेटे का मुंह, कहा मार नहीं रहा, मुक्ति दे रहा हूं

UP News : इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

सी सामऊ थानाप्रभारी के कक्ष में एक युवकयुवती बैठे थे. युवक का नाम अलंकार था जबकि युवती का नामसारिका. रिश्ते में दोनों पतिपत्नी थे. उन की आंखों से आंसू टपक रहे थे. सारिका की आंखों में बेटा खोने के आंसू थे, जबकि अलंकार की आंखों में पश्चाताप के. अलंकार ने सुबह 8 बजे थाने आ कर अपने 7 वर्षीय मासूम बेटे रुशांक उर्फ तारुष की हत्या का जुर्म कबूला था. कक्ष में वह थानाप्रभारी के आने का इंतजार कर रहा था. सारिका की नजरें जबजब पति से मिलतीं तो वह सिहर उठती. मानो पति से पूछ रही हो, ‘‘तारुष के पापा, कोई वजह नहीं… कोई नाराजगी नहीं, तो आखिर यह क्या था? तुम तो अपने इकलौते बेटे को अथाह प्यार करते थे. उसे जरा सी चोट लग जाती तो तड़प उठते थे.

‘‘बेटे के आंसू कभी बरदाश्त नहीं हुए. उसे कोई छू भी ले तो कलेजा फट जाता था. उसे अपने हाथों से खिलानापिलाना और हमेशा अपने पास सुलाना. आखिर ऐसा क्या रहस्य है कि तुम ने बेटे का गला घोंट दिया. मौत से पहले बच्चे की तड़प तुम ने कैसे देखी होगी. रुशांक छटपटाया होगा तो प्यारदुलार करने वाले हाथ कैसे ढीले नहीं पड़े? आखिर क्यों तुम ने बेटे की हत्या कर डाली?’’

सुबह लगभग 9 बजे इंसपेक्टर महेश वीर सिंह थाने पहुंचे. वहां कक्ष में मौजूद युवकयुवती उन्हें देख कर खड़े हो गए. युवक हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सर, मेरा नाम अलंकार श्रीवास्तव है और यह मेरी पत्नी सारिका है. हम गांधीनगर मोहल्ले में रहते हैं. मैं ने अपने 7 साल के बेटे रुशांक को गला दबा कर मार डाला.’’

यह सुन कर महेश वीर सिंह विचलित हो उठे. उन्होंने अलंकार के ऊपर नजर डाली और एक कांस्टेबल को बुला कर उसे हिरासत में लेने के आदेश दिए. उसे तुरंत हिरासत में ले लिया गया. हत्या की वजह जानने के लिए उन्होंने सारिका से पूछताछ की तो वह फफक पड़ी, ‘‘सर, बीती शाम तक घर में सब कुछ सामान्य था. रात 10 बजे पति ने घर के सभी सदस्यों को दूध पीने कोे दिया. दूध पीने के बाद उसे तथा उस की बेटियों को नींद आ गई. शायद दूध में नींद की गोलियां घोली गई थीं. सुबह 5 बजे पति ने उसे जगाया और बोले, ‘‘अब सब ठीक हो गया है. अब कोई बेटे को परेशान नहीं कर पाएगा. बेटा चैन की नींद सो रहा है.’’

पति की अटपटी बातें सुन कर वह घबरा गई. वह बाहर वाले कमरे में गई तो देखा सोफे पर रुशांक का शव पड़ा है. उस के मुंह से चीख निकली तो दोनों बेटियां तूलिका व गीतिका आ गईं. घर में रोनापीटना शुरू हुआ तो पड़ोसी आ गए. फिर तो पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ जमा हो गई. इसी बीच अलंकार उसे साथ ले कर थाने आ गए और समर्पण कर दिया. सर, पति कुछ महीने से तनावग्रस्त थे. इसी तनाव में उन्होंने बेटे को मार डाला. थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने पिता द्वारा मासूम बेटे की हत्या करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. फिर सारिका के साथ उस के गांधीनगर स्थित घर पहुंच गए. उस समय घर के बाहर भीड़ जमा थी.

सभी के मन में यही प्रश्न था कि आखिर अलंकार ने अपने एकलौते बेटे की हत्या क्यों की? घर के अंदर सोफे पर मासूम बालक रुशांक का शव पड़ा था. शव के पास ही उस की बहनें रो रही थीं. नानी, मामी, मौसी सभी सिसक रही थीं. इंसपेक्टर महेश वीर सिंह ने उन सब को सांत्वना देते हुए उन्हें शव से दूर किया. उस के बाद निरीक्षण शुरू किया. रुशांक की हत्या संभवत: मुंह व गला दबा कर की गई थी. उस की नाक से खून रिस रहा था. पास में पड़े तकिए पर भी खून के निशान थे. तकिए को उन्होंने सबूत के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतक की उम्र 7 वर्ष के लगभग थी.

थानाप्रभारी अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार तथा डीएसपी श्वेता सिंह वहां आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा घर वालों से घटना के संबंध में पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने भी निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए. कई जगह से फिंगरप्रिंट भी लिए. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक रुशांक के शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद एसपी(पश्चिम) डा. अनिल कुमार थाना सीसामऊ पहुंचे. वहां उन्होंने हत्यारे पिता अलंकार से दिन भर पूछताछ की, जिस में वह चकरा कर रह गए.

कभी नरमी से तो कभी सख्ती से सवाल पूछे गए, लेकिन अलंकार पर कोई असर नहीं पड़ा. इस बीच कभी वह सामान्य दिखा तो कभी फूटफूट कर रोया. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने रुशांक को क्यों मारा?’’

‘‘सर, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो उसे वो मार देता. फिर हम बचा नहीं पाते सर.’’ अलंकार बोला.

‘‘कौन उसे मारने वाला था?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मैं नहीं बताऊंगा वरना वह मुझे भी मारने की कोशिश करेगा.’’ अलंकार घबराते हुए बोला.

‘‘आखिर कौन हैं वो? हमें बताओ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

थानाप्रभारी की बात सुन अलंकार उन की तरफ देख कर हंसने लगा. उस की हरकतें देख कर थानाप्रभारी समझ गए कि जरूर यह मानसिक रोगी है. फिर उन्होंने पूछा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि तुम ने रुशांक को कैसे मारा?’’

‘‘कैसे बताऊं? उन्हें कोई नहीं देख पाएगा. लेकिन वे मेरे परिवार को मार डालेंगे.’’ माथे पर हाथ रख कर वह बैठ गया. आंखें भर आईं, फिर बोला, ‘‘सर, हम ने उसे मारा नहीं बल्कि हम ने तो उसे बचा लिया. अब वह पूरी तरह सेफ है.’’

‘‘कैसे सेफ है? तुम ने तो उसे मार डाला.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘मैं ने उसे सेफ कर दिया. अब वह उसे नहीं मार पाएगा.’’ अलंकार बोला.

‘‘उस वक्त कौनकौन था वहां?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘हम थे, रुशांक था. सब सो गए थे. हम जाग रहे थे.’’

‘‘बच्चे का गला कसते हुए तुम्हारे हाथ नहीं कांपे?’’ थानाप्रभारी ने पूछा तो अलंकार फफकफफक कर रोने लगा.

पूछताछ में अलंकार ने जिस तरह हर सवाल का अटपटा जवाब दिया, उस से एसपी डा. अनिल कुमार को भी लगा कि अलंकार श्रीवास्तव मानसिक रोगी है या फिर किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त है. उन्होंने इसी दिशा में अपनी जांच आगे बढ़ाई और आरोपी अलंकार श्रीवास्तव की पत्नी सारिका से विस्तृत पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज कराया. उन्होंने सारिका से रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा तो वह आनाकानी करते हुए बोली, ‘‘सर, बेटा तो चला ही गया. अब पति जेल चले गए तो सब खत्म हो जाएगा. बेटे के बाद पति के बिना हम कैसे जिएंगे?’’

काफी समझाने के बाद सारिका ने तहरीर दी. उस के बाद थानाप्रभारी महेश वीर सिंह ने सारिका की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत अलंकार श्रीवास्तव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक ऐसे इंसान की कहानी प्रकाश में आई, जिस के जीवन में पश्चाताप के अलावा कुछ भी नहीं बचा. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर का एक घनी आबादी वाला मोहल्ला है-गांधीनगर. यह सीसामऊ थाने के अंतर्गत आता है. अलंकार श्रीवास्तव इसी मोहल्ले के मकान नंबर 106/92 में सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी सारिका के अलावा 2 बेटियां तथा एक बेटा रुशांक उर्फ तारुष था.

अलंकार श्रीवास्तव का अपना पुश्तैनी मकान था. मकान का आधा भाग उस ने किराए पर उठा रखा था और आधे भाग में वह स्वयं रहता था. अलंकार श्रीवास्तव के 2 अन्य भाई आलोक व अभिषेक श्रीवास्तव थे. आलोक मध्य प्रदेश में तथा अभिषेक मुंबई में परिवार सहित बस गए थे. मातापिता की मौत के बाद उन का कानपुर आनाजाना बहुत कम हो गया था. अलंकार के परिवार से उन का लगाव न के बराबर था. अलंकार श्रीवास्तव शेयर बाजार में ब्रोकर था. स्टाक मार्केट से वह अपनी फर्म के कई ग्राहकों को लाखों रुपए की कमाई कराता था और स्वयं भी कमाता था. उस की पत्नी सारिका पढ़ीलिखी थी. वह शिक्षिका थी. वह कन्नौज जिले के नदौरा गांव स्थित प्राथमिक पाठशाला में सरकारी टीचर थी.

उसे भी 30-35 हजार रुपया प्रतिमाह वेतन मिलता था. कुल मिला कर अलंकार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी और परिवार खुशहाल था. चूंकि सारिका स्वयं पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह अपने बच्चों को भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहती थी. उस की 16 वर्षीया बड़ी बेटी वेस्ट कौट स्कूल में कक्षा 10 में पढ़ रही थी, जबकि 10 वर्षीया छोटी बेटी इसी स्कूल में कक्षा 4 की छात्रा थी. सब से छोटा 7 वर्षीय रुशांक उर्फ तारुष अशोक नगर के किड्स प्री स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ रहा था. अलंकार श्रीवास्तव अपने इकलौते बेटे रुशांक उर्फ तारुष से बहुत प्यार करता था. वह उसे अपने हाथ से खाना खिलाता, दूध पिलाता और अपने साथ ही सुलाता था.

तारुष की शैतानी पर बेटियां उसे डांट देतीं तो अलंकार तारुष का पक्ष ले कर बेटियों को ही डांटता. एक बार स्कूल टीचर ने तारुष को किसी बात पर थप्पड़ मार दिया तो जानकारी मिलने पर अलंकार ने स्कूल जा कर हंगामा खड़ा कर दिया. आखिर में स्कूल टीचर को माफी मांगनी पड़ी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. लेकिन मार्च 2020 में महामारी के चलते जब देश में लौकडाउन हुआ तो अलंकार का भी काम ठप्प हो गया और उस की नौकरी भी चली गई. नौकरी जाने से अलंकार परेशान रहने लगा. उसे अपने बेटे व बेटियों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. लौकडाउन के पहले उस ने अपनी फर्म के जिन ग्राहकों को लाखों रुपए कमवाए, जरूरत पड़ने पर उस की मदद को कोई खड़ा नहीं हुआ. इस बात को ले कर भी वह बहुत टेंशन में रहता था.

धीरेधीरे अलंकार इस कदर मानसिक बीमार हो गया कि वह आत्महत्या की बात करने लगा. वह इतना चिंतित रहने लगा कि सोते से अचानक जाग उठता और कहता, ‘‘वो मुझे मार डालेगा. मेरे बेटे को मार डालेगा.’’

वह चिड़चिड़ा हो गया. उस का ब्लडप्रैशर बढ़ गया और पड़ोसियों से भी झगड़ा करने लगा. वह कभी गुमसुम रहता तो कभी हंसतामुसकराता और कभी रोने भी लगता. कभी परिवार को सतर्क करते हुए कहता, ‘‘वो मार डालेगा.’’

पति की इन अजीबोगरीब हरकतों से सारिका की चिंता बढ़ने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि अलंकार के दिमाग में आखिर चल क्या रहा है. कई बार उस ने इलाज कराने की बात कही, लेकिन अलंकार तैयार नहीं हुआ. बोला, ‘‘मुझे कोई बीमारी नहीं है. थोड़ा ब्लडप्रैशर बढ़ा है. होम्योपैथी दवा ले रहा हूं.’’

27 नवंबर, 2020 की रात 8 बजे सारिका की बड़ी बेटी ने मटर पनीर की सब्जी बनाई फिर रोटियां सेंकी. इस के बाद सभी ने बैठ कर खाना खाया. सोने के पहले सभी एकएक गिलास दूध पीते थे. उस रात भी सारिका दूध ले कर आई तो अलंकार बोला, ‘‘कोरोना बढ़ रहा है. दूध में हल्दी व अश्वगंधा मिला कर पीना चाहिए.’’

अलंकार ने सारिका से दूध भरे गिलास ले लिए और रसोई में चला गया. वहां उस ने दूध में हल्दी के साथ नशीली गोलियां घोल दीं और सब को दूध पिला दिया. तारुष को यह कह कर दूध नहीं दिया कि उस के पेट में दर्द है. दूध पीने के कुछ देर बाद सारिका व उस की बेटियां गहरी नींद में सो गईं. अलंकार ने तारुष को अपने साथ सोफे पर लिटा लिया. वह डिप्रेशन में था. उसे नींद नहीं आ रही थी. आधी रात के बाद वह उठा और तकिए से बेटे का मुंह दबाने लगा. तारुष छटपटा कर बोला, ‘‘पापा, मुझे मत मारो. मैं तो आप का दुलारा बेटा हूं.’’

‘‘बेटा, मैं तुझे मार नहीं रहा हूं. मुक्ति दिला रहा हूं. अगर मैं ने ऐसा नहीं किया तो वह मार डालेगा.’’

‘‘ कौन पापा?’’ तारुष ने पूछा.

‘‘तुम उसे नहीं जानते. वह बहुत खतरनाक है. वह मुझे भी मारना चाहता है.’’ कहते हुए अलंकार ने तारुष का तकिए से मुंह नाक दबाया फिर गला घोंट दिया. हत्या करने के बाद उस ने तारुष के शव को कंबल से ढंक दिया और वहीं बैठा रहा. सुबह 5 बजे अलंकार अपनी पत्नी सारिका के कमरे में पहुंचा और उसे जगा कर बोला, ‘‘सारिका, अब सब ठीक हो गया. अब कोई तारुष को परेशान नहीं कर पाएगा. वह चैन की नींद सो रहा है.’’

यह सुन कर सारिका का माथा ठनका. वह बदहवास कमरे के बाहर आई तो सोफे पर तारुष का शव पड़ा देखा. वह चीख पड़ी तो चीख सुन कर तूलिका व गीतिका आ गईं. भाई का शव देख कर वे दोनों भी सुबकने लगीं. दोनों ने पास खड़े पिता पर नजर डाली. मानो पूछ रही हों, ‘पापा, यह तुम ने क्या किया. भाई को मार डाला. अब मैं राखी किस को बांधूंगी. किस के माथे पर टीका करूंगी.’

सूर्य की पौ फटते ही पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई और लोग अलंकार के दरवाजे पर जुटने लगे. लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अलंकार ने अपने एकलौते बेटे को मार डाला है. इसी बीच अलंकार पत्नी सारिका को ले कर थाना सीसामऊ पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया. 29 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अलंकार श्रीवास्तव को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. जेल प्रशासन उस पर निगरानी रखे हुए है और उस का उचित इलाज हो रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

 

Uttar Pradesh Crime : बेटी ने मां के साथ मिलकर क्यों किया प्रेमी का कत्ल, वजह चौंकाने वाली

Uttar Pradesh Crime : सेजल मिश्रा और हिमांशु एकदूसरे को इतना चाहते थे कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. इसी दौरान सेजल की मां प्रतिभा उपाध्याय ने सेजल के ऐसे कान भरे कि वह प्रेमी की जान लेने को आमादा हो गई. इस के बाद जो हुआ..

21 वर्षीय हिमांशु सिंह सुलतानपुर पीडब्लूडी कालोनी में अपनी मां प्रतिमा सिंह और बड़े भाई शिवेंद्र के साथ रहता था. 3 दिसंबर, 2020 की शाम साढ़े 6 बजे किसी का फोन आया तो वह घर से निकल गया. देर रात तक जब वह नहीं लौटा तो शिवेंद्र ने उस का फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. हर बार फोन बंद ही मिला तो वह परेशान हो गया. मां प्रतिमा सिंह भी चिंतित हो गईं कि पता नहीं वह कहां है जो उस का फोन भी नहीं लग रहा. अगले दिन भी हिमांशु की तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता न चला. मोबाइल भी लगातार बंद आ रहा था. जब कुछ पता न चला तो 5 दिसंबर को शिवेंद्र अपने मामा विवेक सिंह के साथ शहर कोतवाली पहुंचा.

कोतवाली में मौजूद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को उन्होंने हिमांशु के लापता होने की बात बताई. पूरी  बात जानने के बाद इंसपेक्टर सिंह ने हिमांशु की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से हिमांशु को खोजने लगी. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को जानकारी मिली कि बाराबंकी के लोनी कटरा थाना पुलिस ने 4 दिसंबर को अखैयापुर गांव के पास नाले से एक युवक की नग्न लाश बरामद की थी. जिस की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. इंसपेक्टर सिंह ने कटरा थाने से लाश के फोटो मंगवा कर हिमांशु के भाई व मामा को दिखाए तो उन्होंने लाश की शिनाख्त हिमांशु के रूप में कर दी.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने हिमांशु के भाई शिवेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हिमांशु की किसी से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन उस के प्रेम संबंध 18 वर्षीय सेजल मिश्रा नाम की युवती से थे. वह डा. प्रदीप मिश्रा और प्रतिभा उपाध्याय की बेटी है और शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती है. प्रतिभा का तलाक हो चुका है. इसलिए वह पति से अलग रह रही है. इस से हिमांशु की हत्या का शक सेजल के परिजनों पर गया. लिहाजा पुलिस ने प्रतिभा के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस से पता चला कि डा. प्रदीप घटना के दिन शाम 6 बजे से ले कर रात साढे़ 8 बजे तक प्रतिभा के घर पर थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उसी समय के बीच हत्या किए जाने की पुष्टि हुई थी. हिमांशु के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन की जांच की गई तो शक और पुख्ता हो गया. हिमांशु की आखिरी लोकेशन प्रतिभा के घर की थी. असरोगा टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में घटना की रात 12:05 बजे महाराष्ट्र नंबर की एक स्कोडा कार जाते हुए दिखी. पुलिस ने हिमांशु के दोस्तों से पूछताछ की तो पता चला कि हिमांशु अपने एक दोस्त के साथ घटना की शाम प्रतिभा के घर गया था. हिमांशु दोस्त को बाहर छोड़ कर अंदर चला गया था. हिमांशु काफी समय तक वापस नहीं लौटा तो दोस्त उस के मोबाइल पर मैसेज भेज कर वापस आ गया. हिमांशु 6:40 बजे प्रतिभा के घर में घुसा था. 8:22 बजे वह प्रतिभा के घर से निकलते देखा गया.

हिमांशु के परिजनों ने भी उस के हिमांशु के आने की पुष्टि कर दी. अब यह बात समझ नहीं आ रही थी कि जब हिमांशु प्रतिभा के घर से निकल आया तो गया कहां. लेकिन शक की गुंजाइश अभी थी कि फोटो में निकलते समय हिमांशु का चेहरा नहीं दिख रहा था. हिमांशु के साथ  गए दोस्त और अन्य दोस्तों को युवक का फोटो दिखाया गया तो उन्होंने फोटो में दिख रहे युवक की पहचान हिमांशु के रूप में नहीं की. वह युवक कपड़े जरूर हिमांशु के पहने था, लेकिन चालढाल उस की अलग थी. इस का मतलब यह था कि किसी और को हिमांशु के कपड़े पहना कर गुमराह करने के लिए घर से निकाला गया था. तमाम सुबूत प्रदीप मिश्रा और उन की तलाकशुदा पत्नी प्रतिभा की ओर इशारा कर रहे थे.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने 14 दिसंबर को डा. प्रदीप मिश्रा को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती में ही वह टूट गए और उन्होंने घटना के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी. हिमांशु की हत्या करने में प्रदीप के अलावा प्रतिभा, उस की बेटी सेजल और उन का नौकर सद्दाम शामिल थे. हत्या के लिए बाकायदा एक प्रौपर्टी डीलर गुफरान अख्तर के जरिए 50 हजार रुपए की सुपारी दी गई थी. गुफरान ने अपने हिस्ट्रीशीटर दोस्त वाहिद खान को हत्या के लिए तैयार किया था. वाहिद ने सब के सामने घटना को अंजाम दिया था. पूछताछ के बाद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने शिवेंद्र सिंह की तरफ से प्रदीप मिश्रा, प्रतिभा उपाध्याय, सेजल मिश्रा, गुफरान अख्तर, वाहिद खान और सद्दाम के खिलाफ भादंवि की धारा 364/302/201/34/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

आरोपियों से पूछताछ के बाद हिमांशु की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर की शहर कोतवाली के शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती थी प्रतिभा उपाध्याय. प्रतिभा का विवाह 19 साल पहले बडि़यावीर में रहने वाले प्रदीप मिश्रा से हुआ था. प्रदीप मिश्रा होम्योपैथी के डाक्टर थे. विवाह के साल भर बाद ही प्रतिभा ने एक खूबसूरत बेटी सेजल को जन्म दिया. समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया. सन 2007 में प्रतिभा ने प्रदीप से किसी बात से खफा हो कर तलाक ले लिया और बेटी सेजल के साथ शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहने लगी. प्रतिभा ब्याज पर पैसे देने का काम करती थी. इस पर उसे अच्छी कमाई होती थी. मांबेटी का रहनसहन काफी अच्छा था. प्रतिभा हाई सोसायटी की महिलाओं की तरह ही जींस टीशर्ट पहनती थी, हाथ में महंगा मोबाइल होता था.

रहनसहन और काम के चलते प्रतिभा का हर तरह के लोगों से संपर्क रहता था. वह किसी के दबाव में नहीं आती थी. समय के साथ सेजल जवान हो गई. उस ने इंटर तक पढ़ाई कर ली थी और आगे पढ़ने की तैयारी कर रही थी. गोरे रंग की सेजल बेहद खूबसूरत थी. गलीमोहल्ले का हर युवक उस से नजदीकी बढ़ाने को बेकरार रहता था. पिता के बिना मां के साथ रहते हुए सेजल भी काफी खुले मिजाज की हो गई थी. मां के तौरतरीके और रंगढंग देख कर वह भी उसी रंग में ढल गई थी. उस के जो मन में आता, करती. वह अपने सपनों के राजकुमार के इंतजार में पलकें बिछाए बैठी थी. हिमांशु सिंह बाराबंकी के गांव जंगरा बसावनपुर का रहने वाला था.

उस का एक बड़ा भाई था शिवेंद्र. हिमांशु के पिता का नाम प्रदीप सिंह और मां का नाम प्रतिभा सिंह था. प्रदीप खेतीकिसानी का काम करते थे. लेकिन किसी वजह से उन की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही. भाई बना सहारा पति की मानसिक स्थिति ठीक न होने पर प्रतिभा सिंह अपने दोनों बेटों को साथ ले कर सुलतानपुर अपने भाई विवेक सिंह के पास आ गई. विवेक सिंह सरकारी नौकरी करते थे और गोलाघाट क्षेत्र में रहते थे. उन्होंने अपनी बहन और भांजों को सहारा दिया. उन की परवरिश में मदद की. शिवेंद्र ने मुरादाबाद स्थित एक इंस्टीट्यूट से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था. वह काफी स्मार्ट था. खूबसूरत युवतियों में उस का काफी लगाव था.

जब हिमांशु और उस का भाई शिवेंद्र अपने दम पर कुछ करने के काबिल हुए तो विवेक सिंह ने उन्हें पीडब्लूडी कालोनी में एक मकान रहने के लिए दिला दिया. उन का सारा खर्चा विवेक सिंह ही उठा रहे थे. हिमांशु की सेजल से मुलाकात मार्केट में शौपिंग करते समय हुई थी. पहली ही नजर में सेजल उसे दिल दे बैठी. उधर हिमांशु भी उसे देखते ही उस पर फिदा हो गया था. उस पहली मुलाकात में दोनों के बीच कोई संवाद शुरू नहीं हो सका. मगर सेजल मार्केट से घर लौट कर भी हिमांशु को भुला नहीं पाई. उस रात वह हिमांशु के बारे में ही सोचती रही. हिमांशु से हुई उस पहली मुलाकात के बाद सेजल खोईखोई सी रहने लगी थी. अब उसे बेसब्री से इंतजार था हिमांशु से अपनी मुलाकात होने का, ताकि वह अपना हाले दिल बयां कर सके.

पहली मुलाकात के 2 हफ्ते बाद एक दिन उसी मार्केट में उसे हिमांशु दिखाई दे गया. हिमांशु को देखते ही उस के दिल के तार झनझना उठे, चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. अब तक हिमांशु की निगाह भी उस पर पड़ चुकी थी. वह धड़कते दिल से बस सेजल को ही घूरे जा रहा था. कुछ पलों तक यह घूरने का सिलसिला चलता रहा. फिर हिमांशु सेजल के पास आया और बेहद मीठे लहजे में झिझकते हुए बोला, ‘‘माफ कीजिए, क्या मैं आप से कुछ बातें कर सकता हूं?’’

‘‘जी हां कीजिए, क्या बात करना चाहते हैं?’’

‘‘सामने रेस्टोरेंट में चल कर एकएक कप चाय पीते हैं, वहीं बातें भी हो जाएंगी.’’

‘‘अच्छा आइडिया है, चलिए.’’ सेजल ने उतावले मन से कहा.

दोनों कुछ कदमों की दूरी पर स्थित रेस्टोरेंट में दाखिल हो गए. उस दिन दोनों ने एकदूसरे के बारे में बहुत कुछ जान लिया. दोस्ती हुई तो फोन पर बात करने का सिलसिला शुरू हो गया. सेजल के मोबाइल पर हिमांशु के फोन काल्स आने लगे. दोनों कईकई घंटे बात करते, मगर फिर भी दिल नहीं भरता. अब हिमांशु प्रतिभा की गैरमौजूदगी में सेजल के घर भी आनेजाने लगा. एक दिन जब हिमांशु सेजल के घर आया तो हिमांशु ने सेजल को बांहों में भर कर उस के होंठोें को चूम लिया, ‘‘अब ये दूरियां बरदाश्त नहीं होतीं, तुम से एक पल भी अलग होने को दिल नहीं करता.’’

‘‘तो फिर मुझ से शादी क्यों नहीं कर

लेते हो?’’

‘‘वह तो मैं करूंगा ही यार, मगर शादी के बाद रोमांस का मजा किरकिरा हो जाता है. इसलिए सोचता हूं कि पहले जी भर कर सैरसपाटा और मस्ती कर ली जाए. फिर शादी की बात सोचेंगे.’’

प्रेमी हिमांशु के मनोभावों को जान कर सेजल प्रसन्नता से खिल उठी. उसे हिमांशु दुनिया का सब से अच्छा इंसान नजर आने लगा. कुछ दिनों बाद सेजल का जन्मदिन था. उस दिन सेजल ने हिमांशु के सिवाय किसी को इनवाइट नहीं किया. यहां तक कि अपनी खास सहेली हिमानी को भी नहीं बुलाया. मिल गए हिमांशु और सेजल तन्हा कमरे में दो जवां दिल, कोई रोकनेटोकने वाला भी नहीं था, ऐसे में मन भटकते कितनी देर लगती है. फिर हिमांशु ने सेजल को बांहों में भींच कर प्यार करना शुरू कर दिया. लेकिन सेजल ने किसी तरह खुद पर काबू किया और हिमांशु को भी बेकाबू होने से रोक लिया.

दोनों ही सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते थे. सोशल मीडिया ऐप ‘इंस्टाग्राम’ पर सेजल ने हिमांशु के साथ अपनी रिलेशनशिप को ले कर एक पोस्ट डाली, जिस में वह हिमांशु के साथ एक सेल्फी में  दिख रही थी. उस में उस ने हिमांशु से अपने प्यार का इजहार किया था और अपने रिलेशनशिप के 2 साल 7 महीने पूरे होने पर खुशी जताई थी. ये पोस्ट सेजल के मित्रों के अलावा और अन्य लोगों ने भी देखी. यह बात सेजल की मां प्रतिभा तक भी पहुंच गई. प्रतिभा ने सेजल से बात की और उसे गुस्से में डांटा भी. लेकिन कुछ सोचने के बाद प्रतिभा ने सेजल को समझाया,

‘‘मानती हूं कि तू उम्र के उस दौर से गुजर रही है, जहां किसी भी लड़के के प्रति आकर्षित हो सकती है. लेकिन एक सच यह भी है कि उम्र के इस दौर में दिमाग से ज्यादा दिल से काम लिया जाता है. जैसे तूने सिर्फ अपने दिल की सुनी, दिमाग की नहीं. दिमाग की सुनती तो तू उसे अपने लिए नहीं चुनती.’’

‘‘मौम, हिमांशु में क्या खराबी है. गुड लुकिंग है, हैंडसम है, मेरी उस की जोड़ी बहुत अच्छी लगती है.’’ सेजल ने खुश होते हुए अपने दिल की बात बता दी.

‘‘बेटा, केवल खूबसूरती और प्यार से जिंदगी में काम नहीं चलता. अच्छी तरह से जिंदगी गुजारने के लिए आमदनी का अच्छा जरिया होना चाहिए, जो उस के पास नहीं है. न नौकरी न कामधंधा और न ही रहने का खुद का कोई ठिकाना. ऐसे में वह तुझे क्या खुश रखेगा.’’

पहले नहीं सोचा था मां की बात सुन कर सेजल सोच में पड़ गई. वह सोचने लगी कि उस की मां कह तो सही रही हैं. प्यार के रंग और जोश में वह यह कुछ सोच ही न सकी कि आगे कैसे उस के साथ जिंदगी कटेगी. ऐसे में उस ने हिमांशु से दूर होने का फैसला कर लिया. अब वह हिमांशु से कटने लगी. जबकि हिमांशु उस से शादी करने का दबाव बना रहा था. सेजल उस से दूर होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हिमांशु उस का पीछा छोड़ने को ही तैयार न था. तब प्रतिभा एक दिन हिमांशु के घर पहुंच गई. उस ने हिमांशु की मां को न सिर्फ अपने बेटे को समझाने की हिदायत दी बल्कि काफी भलाबुरा भी कहा. इसी दिन हिमांशु के घर वालों को उस के प्रेम संबंधों का पता चला.

मां ने हिमांशु को समझाया भी कि वह सेजल से दूर रहे. लेकिन प्यार में आकंठ डूबा हिमांशु सेजल से दूर होने की सपने में भी नहीं सोच सकता था. हिमांशु के पीछा न छोड़ने पर मांबेटी उस से छुटकारा पाने का उपाय सोचने को मजबूर हो गईं. डा. प्रदीप ने प्रतिभा से तलाक के बाद दूसरी शादी कर ली थी, एक बेटा भी था. लेकिन इधर कुछ समय से वह फिर से प्रतिभा से मिलने उस के घर आने लगा था. रोजाना एकडेढ़ घंटे वह प्रतिभा के घर रुकता था. प्रदीप को भी हिमांशु के बारे में पता था, वह भी उस से काफी गुस्सा था. प्रदीप और प्रतिभा का एक प्रौपर्टी डीलर काफी करीबी था. उस का नाम गुफरान अख्तर था और शहर कोतवाली के चौक मोहल्ले में रहता था.

दोनों ने गुफरान से बात की और उस से हिमांशु को ठिकाने लगाने में मदद मांगी. गुफरान का एक साथी था वाहिद खान. वाहिद चांदा थाने के अंतर्गत कोथरा गांव में रहता था. वह चांदा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. गुफरान ने वाहिद से बात की और उसे प्रदीप और प्रतिभा से मिला कर पूरी डील फाइनल करा दी. हत्या की सुपारी की रकम 50 हजार रुपए तय हुई जो काम होने के बाद दी जानी थी. हिमांशु की हत्या करने का पूरा तानाबाना बुना गया. इस में प्रतिभा ने अपने नौकर सद्दाम को भी शामिल कर लिया. 3 दिसंबर, 2020 की शाम सेजल ने फोन कर के हिमांशु को अपने घर बुलाया कि उस के मम्मीपापा उस से बात करना चाहते हैं. हिमांशु अपने दोस्त के साथ प्रतिभा के घर पहुंचा.

करीब पौने 7 बजे वह दोस्त को बाहर खड़ा कर के अंदर चला गया. वहां प्रदीप, प्रतिभा, सेजल, नौकर सद्दाम के साथ गुफरान और वाहिद मौजूद थे. बातचीत शुरू हुई. बातचीत के दौरान ही वाहिद ने पीछे से लोहे के पाइप से हिमांशु के सिर पर प्रहार किया. प्रहार इतना तेज था कि हिमांशु के मुंह से चीख भी न निकल सकी. फिर ताबड़तोड़ सिर व शरीर पर कई प्रहार कर के वाहिद ने हिमांशु की हत्या कर दी. बाकी सभी उस की हत्या अपनी आंखों के सामने होते देखते रहे. हिमांशु को मारने के बाद उस के कपड़े उतार कर सद्दाम को पहनाए गए. हिमांशु की तरह ही वेशभूषा बना कर उस की ही तरह सद्दाम रात 8:22 बजे घर से निकला, जिस से लगे कि हिमांशु घर से निकला है.

सभी को पता था कि बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. उन में हिमांशु की घर में आते हुए फोटो कैद हुई होगी. ऐसे में उन पर ही पुलिस का शक जाएगा. इस से बचने के लिए ही यह रास्ता अपनाया गया. देर रात वाहिद ने अपनी स्कोडा कार में हिमांशु की नग्न लाश डाली. फिर गुफरान के साथ कार से बाराबंकी के लोनी कटरा थाना क्षेत्र के अखैयापुर गांव के पास एक नाले में हिमांशु की लाश फेंक दी और वापस आ गए. वाहिद को मिल गई रकम अगले दिन वाहिद को अपनी तय सुपारी की रकम भी मिल गई. लेकिन तमाम होशियारी के बाद भी उन सब का गुनाह कानून की नजर में आ ही गया. आवश्यक पूछताछ के बाद पुलिस ने डा. प्रदीप को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

19 दिसंबर को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने गुफरान अख्तर और वाहिद खान को नगर कोतवाली के पयागीपुर चौराहे से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों स्कोडा कार से कहीं भागने की फिराक में थे. उन के पास से हत्या में प्रयुक्त लोहे का पाइप और स्कोडा कार बरामद हो गई. उन दोनों ने हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. आवश्यक पूछताछ के बाद गुफरान और वाहिद को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिभा, सेजल और नौकर सद्दाम पुलिस की पकड़ से दूर थे. पुलिस सरगर्मी से उन की तलाश कर रही थी. उन तीनों पर पुलिस ने ईंनाम भी घोषित कर दिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP Crime News : कैंची से कत्ल – दूसरे प्रेमी से करवाया पहले का मर्डर

UP Crime News : सोनू जानती थी कि अमीन के पद पर कार्यरत आशीष शुक्ला शादीशुदा ही नहीं बल्कि 2 बच्चों का पिता है. इस के बावजूद लालची सोनू ने उसे अपने प्यार के जाल में फांस लिया. इसी दौरान महत्त्वाकांक्षी सोनू ने ऐसी चाल चली कि…

नवंबर 2020 माह की 28 तारीख थी. जनपद अंबेडकरनगर के मालीपुर थाना क्षेत्र में मझुई नदी के नेमपुर घाट पर किसी अज्ञात व्यक्ति की लाश पड़ी हुई थी. सुबहसवेरे घाट पर पहुंचे लोगों ने लाश देखी तो कुछ देर में वहां देखने वालों का तांता लग गया. उसी दौरान किसी ने इस की सूचना मालीपुर थाने में फोन कर के दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी विवेक वर्मा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. लाश पौलिथिन में लिपटी हुई थी. मृतक की उम्र लगभग 43-44 साल थी. उस के गले पर किसी तेज धारदार हथियार से वार किए जाने के निशान मौजूद थे. आसपास का निरीक्षण करने पर कोई सुबूत हाथ नहीं लगा. अनुमान लगाया गया कि हत्या कहीं और कर के लाश वहां फेंकी गई है.

वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी वर्मा ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी. यह बात 28 नवंबर, 2020 की है. थाने आ कर थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने जिले के समस्त थानों में दर्ज गुमशुदगी के बारे में पता किया तो अकबरपुर थाने में 45 वर्षीय आशीष शुक्ला नाम के व्यक्ति की गुमशुदगी दर्ज होने की बात पता चली. गुमशुदगी आशीष के साथ लिवइन में रहने वाली सोनू नाम की युवती ने दर्ज कराई थी. सोनू को बुला कर लाश की शिनाख्त कराई गई तो उस ने उस की शिनाख्त आशीष के रूप में की. सोनू ने पूछताछ में बताया कि एक दिन पहले देर रात किसी का फोन आया था, जिस के बाद आशीष घर से चले गए थे. आज उन की लाश मिली.

पता चला कि आशीष लखीमपुर जिले की कोतवाली सदर अंतर्गत कनौजिया कालोनी में रहता था. आशीष अंबेडकरनगर में अमीन पद पर कार्यरत था और कोतवाली शहर के मुरादाबाद मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था. उस के साथ उस की कथित पत्नी सोनू शुक्ला रहती थी. लखीमपुर में आशीष की पत्नी राखी और बच्चे रहते थे. राखी को पति की लाश मिलने की सूचना मिली तो वह तुरंत अंबेडकरनगर पहुंच गई. मालीपुर थाने में उस ने दी तहरीर में पति की हत्या का आरोप सोनू शुक्ला और उस के 3 साथियों विवेक, विकास पर लगाया. राखी की तहरीर के आधार पर थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने सोनू और उस के साथियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

30 नवंबर को थानाप्रभारी ने सोनू को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती करने पर वह टूट गई और आशीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि आशीष की हत्या में उस के प्रेमी आनंद तिवारी, उस के साथी मूलसजीवन पांडेय और राजीव कुमार तिवारी उर्फ राजू ने साथ दिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन आनंद और मूल सजीवन को गिरफ्तार कर लिया गया.  उन सभी से पूछताछ के बाद आशीष की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

आशीष शुक्ला लखीमपुर खीरी क्षेत्र में एलआरपी रोड पर स्थित कनौजिया कालोनी में रहते थे. 18 वर्ष पहले उन का विवाह राखी से हुआ था. राखी काफी सरल स्वभाव की थी. उस ने आते ही आशीष की जिंदगी को महका दिया था. आशीष भी सरल स्वभाव की राखी को हमसफर के रूप में पा कर काफी खुश हुआ. कालांतर में राखी ने एक बेटे आयुष (17 वर्ष) और बेटी अर्चिता (12 वर्ष) को जन्म दे दिया. आयुष के जन्म के बाद 2006 में आशीष की नौकरी अमीन के पद पर लग गई. वह अंबेडकरनगर में ही कोतवाली शहर के मुरादाबाद मोहल्ले में किराए पर कमरा ले कर रह रहा था. जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, कभीकभी तभी अचानक से जिंदगी में ऐसा खतरनाक मोड़ आ जाता है कि इंसान न संभले तो सब कुछ तहसनहस हो जाता है.

आशीष की जिंदगी में भी सब कुछ अच्छा चल रहा था कि जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया कि उस की जिंदगी दूसरे रास्ते पर चल पड़ी. वह रास्ता उस के और उस के परिवार के लिए कितना खतरनाक होने वाला था, आशीष को इस का बिलकुल आभास नहीं था. अंबेडकरनगर में काम के दौरान उस की मुलाकात सोनू नाम की युवती से हुई. 27 वर्षीय सोनू इब्राहिमपुर थाना क्षेत्र के बड़ा गांव की रहने वाली थी. उस के पिता विजय कुमार तिवारी की मृत्यु हो चुकी थी. सोनू 2 भाई व 3 बहनें थीं. सोनू काफी महत्त्वाकांक्षी थी. पिता के न रहने पर उस के विवाह होने में भी अड़चन आ रही थी. इसलिए उस ने अपने लिए खुद ही अच्छा हमसफर तलाश करने की ठान ली. इसी तलाश ने उसे आशीष शुक्ला तक पहुंचा दिया. आशीष एक तो सरकारी नौकरी करता था, साथ ही काफी स्मार्ट भी था.

सोनू ने उस की तरफ अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. सोनू ने आशीष के बारे में पूरी जानकारी जुटा ली. उसे यह भी पता था कि आशीष शादीशुदा है और 2 बच्चों का पिता है. लेकिन सोनू के लिए अच्छी बात यह थी कि उस की पत्नी और बच्चे लखीमपुर में रहते थे. आशीष को सोनू ने अपने रूपजाल में फांसना शुरू कर दिया. आशीष के साथ वह अधिक से अधिक समय बिताने लगी. उस के लिए खाना बना देती. घर में बना उस के हाथ का खाना खा कर आशीष को बड़ा अच्छा लगता था. वैसे आशीष कभी खुद खाना बना लेता था या होटल पर खा लेता था. सोनू अच्छी तरह जानती थी कि किसी भी मर्द के दिल तक पहुंचने का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. भरपेट मनपसंद खाना मिलता तो आशीष सोनू की जम कर तारीफ करता. समय के साथ दोनों काफी नजदीक आने लगे.

आशीष अपनी पत्नी राखी को धोखा नहीं देना चाहता था, लेकिन सोनू का साथ पा कर वह दिल के हाथों ऐसा मजबूर हुआ कि वह अपने आप को रोक नहीं पाया और अपनी जिंदगी को दूसरे रास्ते पर ले गया. उस रास्ते पर सोनू बांहें फैलाए उस का इंतजार कर रही थी. अब सोनू हर दूसरेतीसरे दिन आशीष के कमरे पर ही रुकने लगी. रुकती तो खाना बनाने के साथ ही बाकी काम भी वह कर देती थी. सोनू उस के साथ ऐसा व्यवहार करती जैसे उस की पत्नी हो. आशीष को यह सब काफी अच्छा लगता. एक रात जब दोनों बैठे बातें कर रहे थे तो आशीष ने उस से कह दिया, ‘‘सोनू तुम मेरा बहुत खयाल रखती हो. इतना खयाल तो सिर्फ पत्नी ही रख सकती है. तुम मेरी पत्नी न होते हुए भी पत्नी जैसा खयाल रख रही हो.’’

‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया जनाब. आप को इस बात का पता तो चला कि मैं आप का कितना खयाल रखती हूं. मैं तो अभी तक यही सोचती थी कि न जाने कब आप को पता चलेगा और कब मैं अपने दिल का हाल बयां कर पाऊंगी.’’ कह कर सोनू ने अपनी नजरें झुका लीं.

‘‘क्या मतलब…’’ आशीष ने उस के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ‘‘कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘अब इतने भी अंजान नहीं हो तुम कि इस का क्या मतलब ही न जानते हो. जो मैं तुम्हारा हर समय हरदम खयाल रखती हूं, वह भी एक पत्नी की तरह, तो क्यों रखती हूं.’’

‘‘तो तुम ही खुल कर बता दो कि तुम्हें मेरा इतना खयाल क्यों है.’’ उस ने पूछा.

‘‘मैं तुम को पसंद करती हूं तुम से प्यार करती हूं, इसीलिए मुझे तुम्हारा इतना खयाल रहता है. मुझे तुम्हारा साथ पसंद है इसीलिए हमेशा तुम्हारे पास ही बनी रहती हूं, लेकिन तुम हो कि मेरे जज्बातों की फिक्र ही नहीं है.’’ सोनू ने यह कह कर एक बार फिर अपनी नजरें झुका लीं और मायूसी का लबादा ओढ़ लिया. आशीष उस की बात पर मंदमंद मुसकराते हुए बोला, ‘‘मैं जानता था लेकिन जानबूझ कर अंजान बना था. तुम्हारे इतना सब करने पर कोई मूर्ख व्यक्ति भी समझ जाएगा कि तुम्हारे दिल में क्या है तो मैं तो पढ़ालिखा हूं. तुम्हारी जुबां से सुनना चाहता था, इसलिए अंजान बनने का नाटक कर रहा था.’’

यह सुनते ही सोनू की खुशी का पारावार न रहा, ‘‘मतलब मुझे इतने दिनों से बना रहे थे कि कुछ नहीं जानते हो. मुझे बता तो देते मैं तो वैसे भी तुम पर वारी जा रही थी.’’ कह कर सोनू आशीष के सीने से लग गई. उस की आंखों में अपनी जीत की खुशी चमक रही थी.

‘‘तुम पत्नी जैसे सब काम कर रही थीं लेकिन एक काम छोड़ कर…’’ शरारती अंदाज में तिरछी नजरों से आशीष ने सोनू को देख कर कहा. सोनू ने एक पल के लिए दिमाग पर जोर दे कर सोचा, फिर अगले ही पल आशीष की बात का मतलब समझते ही वह शरमा गई और उस के सीने में अपना मुंह छिपा लिया. उस के बाद उन के बीच शारीरिक रिश्ता भी कायम हो गया. आशीष और सोनू के बीच उम्र में 18 साल का अंतर था. सोनू 27 साल की थी तो आशीष 45 वर्ष का. सोनू आशीष के साथ उस की पत्नी बन कर रहने लगी. अपने नाम के आगे शुक्ला लगाने लगी. जिस से भी मिलती, बातें करती तो अपने आप को आशीष की पत्नी ही बताती. समय के साथ ब्याहता राखी को पता चल गया कि उस का पति आशीष सोनू नाम की किसी महिला के साथ रह रहा है.

पति आशीष से राखी ने बात की तो उस ने कह दिया कि जैसा वह सोच रही है वैसा कुछ नहीं है. काम के सिलसिले में वह उस के पास रह रही है. आशीष के साथ रहते सोनू उसे अपने वश में करने की पूरी कोशिश करती थी. मसलन किसी भी कागज/दस्तावेज में पत्नी के नाम की जगह आशीष उस का ही नाम डाले. कोई संपत्ति खरीदे तो उस के नाम से ही खरीदे. इस के लिए वह आशीष पर दबाव बनाती थी. आशीष उस की बात को नजरअंदाज कर देता था. सोनू के कहने पर ऐसा वह कर भी नहीं सकता था. लेकिन आशीष को अपनी बात न मानते देख कर सोनू नाराज हो जाती थी. अब उन दोनों में अकसर विवाद होने लगा. सोनू अपने भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगी. आशीष से उस ने जिस वजह से रिश्ता बनाया, वह वजह उसे पूरी होती नहीं दिख रही थी.

आशीष का एक दोस्त था 23 वर्षीय आनंद तिवारी. आनंद अकबरपुर थाना क्षेत्र के सिंहमई कारीरात गांव में रहता था. उस के पिता रमेश तिवारी किसान थे. 3 भाइयों में वह सब से बड़ा था और अविवाहित था. आनंद तिवारी आशीष से मिलने उस के कमरे पर आता रहता था. आनंद भी काफी स्मार्ट और जवान था. सोनू से 4 साल छोटा था. आशीष तो दोनों से उम्र में काफी बड़ा था. आनंद से कुछ छिपा नहीं था, वह जानता था कि सोनू आशीष की पत्नी नहीं है, उसे केवल अपने पास रखे हुए है. उस से अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है. ऐसे में वह भी सोनू के नजदीक आने की जुगत में लग गया.

सोनू आशीष के द्वारा बात न मानने पर तनाव में रहती थी. ऐसे में आनंद उस के पास आता, उस से बातें करता, बातों के दौरान ही हलकाफुलका मजाक भी कर देता तो सोनू का मन बहल जाता. कुछ समय के लिए वह अपना सारा तनाव भूल जाती थी. सोनू भी उस से घुलनेमिलने लगी. दोनों एकदूसरे की चाहत को अपने प्रति समझ रहे थे. चाहत दिल में पैदा हुई तो अधिक समय साथ बिताने लगे. एक दिन आनंद आया तो सोनू चाय बनाने लगी. आनंद को शरारत सूझी तो वह चुपके से सोनू के पीछे पहुंच गया और अचानक चिल्ला दिया. सोनू हड़बड़ा गई. हड़बड़ाहट में वह पीछे मुड़ी तो आनंद को खडे़ पाया, वह मुसकरा रहा था.

सोनू उस की शरारत समझ गई. वह उसे मारने दौड़ी तो वह वापस हुआ तो आगे पलंग था. वह उस से टकराने से बचने के लिए रुका तो पीछे भागी सोनू उस से टकरा गई. दोनों आपस में टकराए तो एक साथ पलंग पर गिर गए. दोनों की सांसें एकदूसरे के चेहरे से टकरा रही थी तो दिल भी आपस में मिल गए. उस समय दोनों के दिल की धड़कनें काफी तेज थीं. तन सटे होने के कारण एकदूसरे के दिल की तेज धड़कनों को दोनों ही महसूस कर रहे थे. दोनों जुबां से तो कुछ नहीं कह रहे थे लेकिन आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. आनंद सोनू को इतने नजदीक पा कर खुशी से भर उठा और बेसाख्ता बोला, ‘‘आई लव यू…आई लव यू, सोनू.’’

आनंद के इन मीठे बोलों ने सोनू के कानों को सुखद अनुभूति कराई. उस ने आंखें बंद कीं तो होंठ थिरक उठे, ‘‘आई लव यू टू आनंद.’’

इस के बाद उन के बीच शारीरिक रिश्ता कायम हो गया. सोनू को आनंद के साथ आनंद का सुखद एहसास हुआ. उस दिन के बाद उन के बीच संबंधों का सिलसिला अनवरत चलने लगा. अब सोनू आनंद के साथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगी थी. क्योंकि आशीष से अब उसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं रह गई थी. लेकिन आशीष की सरकारी नौकरी और संपत्ति का लालच उसे जरूर था. आनंद के साथ जिंदगी बिताने के लिए उसे आशीष की नौकरी और संपत्ति की जरूरत थी. वैसे भी इन चीजों को पाने के लिए सोनू ने काफी प्रयास किया था और समय भी बर्बाद किया था. वह ऐसे आसानी से सब छोड़ नहीं छोड़ सकती थी.

इसलिए उस ने आनंद से बात की तो आनंद के मन में भी लालच पैदा हो गया. सरकारी नौकरी और संपत्ति तभी हाथ लग सकती थी, जब आशीष जिंदा न रहे. इसलिए दोनों ने आशीष की हत्या करने का फैसला कर लिया. आशीष की हत्या में साथ देने के लिए आनंद तिवारी ने अपने 2 साथियों मूलसजीवन पांडेय निवासी गांव गंगापुर भुलिया जिला सुलतानपुर और राजीव कुमार तिवारी उर्फ राजू निवासी गांव भारीडीहा अंबेडकरनगर को तैयार कर लिया. मूलसजीवन और राजू दोनों ही अकबरपुर के आरडी लौज में काम करते थे और इस समय वहीं रह रहे थे.  27 नवंबर की रात 11 बजे के करीब सोनू और आशीष का विवाद हुआ. विवाद के बाद आशीष सो गया. सोनू ने आनंद को उस के साथियों के साथ बुला लिया.

आनंद अपनी बजाज पल्सर बाइक से दोनों साथियों को ले कर आशीष के कमरे पर पहुंचा. उन लोगों को आया देख कर सोनू ने धीरे से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सोते समय आशीष के गले पर तेज धारदार चाकू व कैंची से कई प्रहार किए गए. आशीष चीख भी न सका और उस की सांसों की डोर टूट गई. आशीष को मारने के बाद उन्होंने उस की लाश एक पौलिथिन में लपेट कर उस की ही हुंडई इयान इरा कार में डाल दी और उसे मालीपुर थाना क्षेत्र में मझुई नदी के नेमपुर घाट पर फेंक आए. आने के बाद कार सुलतानपुर के दोस्तपुर थाना क्षेत्र में लावारिस हालत में छोड़ दी. अगले दिन सोनू ने अकबरपुर थाने जा कर आशीष की गुमशुदगी लिखाई.

लेकिन चारों का गुनाह छिप न सका. गिरफ्तार तीनों अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, कैंची, 5 मोबाइल फोन, पल्सर बाइक और आशीष की इयान कार बरामद कर ली. कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तीनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक 23 दिसंबर को थानाप्रभारी विवेक वर्मा ने चौथे अभियुक्त राजीव तिवारी उर्फ राजू को भी गिरफ्तार कर लिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित