Crime Story in Hindi : योगा ट्रैनर मर्डर में किसे बचा रही है पुलिस

Crime Story in Hindi : अवैध संबंधों का आरोप लगाते हुए नैनीताल पुलिस ने 35 वर्षीय योगा ट्रैनर ज्योति मेर की हत्या के आरोपी 24 वर्षीय अभय यदुवंशी को गिरफ्तार कर के अपनी पीठ खुद थपथपा ली है. मृतका के फेमिली वालों का आरोप है कि इस हत्याकांड में अन्य कई रसूखदार लोग भी शामिल हैं. आखिर पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक क्यों नहीं पहुंच रहे?

योगा ट्रैनर ज्योति मेर ने हल्द्वानी में स्थित अजय योगा ऐंड फिटनैस सेंटर में आकर्षक वेतन पर महिला योग ट्रैनर के रूप में अपनी नौकरी शुरू की थी. नौकरी जौइन करते ही ज्योति के फेमिली वालों ने उसे जे.के. पुरम छोटी मुखानी में आशा पांडे के घर में किराए पर रूम दिला दिया था. वह वहां रह कर नौकरी कर रही थी. वैसे ज्योति शादीशुदा थी. मूलरूप से हल्दूचौड़, लालकुआं की निवासी ज्योति का विवाह जोधपुर, राजस्थान निवासी कमल सबलानी से हुआ था.

जब से 35 वर्षीय ज्योति मेर ने अजय योगा सेंटर में काम करना शुरू किया था, तभी से उसे अपने मायके की बचपन की एक फ्रेंड नीरा (परिवर्तित नाम) से भी परिचय हो गया था. एक दिन शाम के समय ज्योति को नीरा मिल गई. वह बाजार से सब्जी खरीद रही थी. इस के बाद जब इतने सालों के बाद दोनों एक बार फिर मिले तो दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए थे. इन का एकदूसरे के घर आनाजाना भी हो गया था.

ज्योति तो योगा सेंटर में जौब के कारण बिजी होने की वजह से नीरा के घर पर कम ही जा पाती थी, लेकिन नीरा हर तीसरे या चौथे दिन ज्योति से मिलने उस के कमरे पर चली जाया करती थी. उस के बाद वे दोनों सहेलियां बचपन की बातें करतेकरते अपने बचपन की दुनिया में जा पहुंचते थे. इस के अलावा नीरा हर रोज सुबह और शाम को ज्योति के साथ फोन पर बात कर के उस के हालसमाचार लेती रहती थी.

31 जुलाई, 2025 की सुबह 9 बजे नीरा ने रोज की तरह ज्योति को फोन किया. ज्योति के मोबाइल फोन पर घंटी तो जा रही थी, मगर वह फोन रिसीव नहीं कर रही थी. नीरा ने सोचा कि शायद ज्योति बाथरूम में होगी तो इसलिए फोन नहीं उठा रही होगी. उस के बाद नीरा ने हर 5 मिनट बाद ज्योति को कौल करनी शुरू की, मगर ज्योति ने फोन नहीं उठाया.

यह पहली बार था, जब ज्योति इतनी बार कौल करने के बाद भी उस का फोन नहीं उठा रही थी. नीरा ने अपने घर का काम जल्दी से किया और उस के बाद सीधे अपनी सहेली ज्योति मेर के कमरे पर जा पहुंची. जैसे ही नीरा ज्योति के कमरे में पहुंची तो वह फर्श पर बेदम और बेसुध पड़ी हुई थी. नीरा ने तुरंत ज्योति की मम्मी को इस घटना की सूचना दी और मकान मालिक व पड़ोसियों के सहयोग से थाना मुखानी में फोन कर इस घटना की सूचना दी.

शोर सुन कर अब तक घटनास्थल पर पासपड़ोस के काफी लोग भी पहुंच गए थे. थोड़ी ही देर बाद मुखानी थाने के एसएचओ दिनेश जोशी भी कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. एसएचओ दिनेश जोशी ने ज्योति मेर को तुरंत अस्पताल पहुंचाया, जहां पर डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उस के बाद तो ज्योति मेर के फेमिली वाले भी पहुंच चुके थे. वहां पर लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे.

पुलिस क्यों मान रही थी आत्महत्या

शुरुआती जांच में पुलिस इसे आत्महत्या का केस मान कर चल रही थी, मगर ज्योति के फेमिली वालों का आरोप था कि ज्योति के गले व शरीर के अन्य भागों पर चोट और किसी चीज द्वारा गला दबाए जाने के निशान थे, जिस से वह इसे हत्या का केस मान रहे थे. इस घटना के बारे में पुलिस का यह भी कहना था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत की असली वजह सामने आ पाएगी.

3 अगस्त, 2025 को मृतका ज्योति मेर की मम्मी दीपा मेर निवासी हल्दुचौड़, तुलारामपुर थाना, लालकुआं नैनीताल ने थाना सुखानी में आ कर एक लिखित तहरीर दी, जिस में उन्होंने बेटी ज्योति मेर की हत्या का शक योगा सेंटर के मालिक अजय यदुवंशी और उस के छोटे भाई अभय यदुवंशी उर्फ राजा पर लगाया. तहरीर के आधार पर एसएचओ दिनेश जोशी ने बीएनएस की धारा 103(1)/3(5) के तहत नामजद आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका ज्योति मेर के शव को डा. सुशीला तिवारी अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

घटना और केस की गंभीरता को देखते हुए नैनीताल के एसएसपी प्रह्लाद नारायण मीणा द्वारा घटना के खुलासे के लिए एक टीम गठित कर दी गई. टीम में अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों को डा. जगदीश चंद्र एसपी (क्राइम), ट्रैफिक नैनीताल व प्रकाश चंद्र एसपी (सिटी) हल्द्वानी नितिन लोहनी (सीओ हल्द्वानी) एसएचओ मुखानी दिनेश चंद्र जोशी आदि को शामिल किया गया.

इस के अलावा इस विशेष पुलिस टीम में थाना मुखानी के एसआई वीरेंद्र चंद्र, वीरेंद्र सिंह बिष्ट, नरेंद्र कुमार, हरजीत सिंह, कांस्टेबल सुनील आगरी, रोहित कुमार, सुरेश देवड़ी, रविंद्र खाती, बलवंत सिंह, धीरज सुगड़ा, शंकर सिंह, अनूप तिवारी, प्रवीण सिंह, महिला कांस्टेबल गंगा मठपाल एवं एसओजी के कांस्टेबल राजेश व अरविंद को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

11 अगस्त, 2025 को योगा ट्रेनर ज्योति मेर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो गया कि ज्योति की मौत दम घुटने और सिर पर गंभीर चोट लगने के कारण हुई थी. इस के अलावा उस के सीने में भी चोट के निशान पाए गए, जिस से यह आशंका व्यक्त की गई कि ज्योति की हत्या सुनियोजित तरीके से गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद विभिन्न सामाजिक एवं महिला संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया और एक बड़े जुलूस के रूप में एसडीएम कोर्ट पहुंच कर इस जघन्य हत्याकांड के जल्द खुलासे की मांग की.

महिलाओं ने आरोप लगाया कि हल्द्वानी की कानूनव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है. उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक योगा ट्रैनर ज्योति मेर की हत्या के आरोपी गिरफ्तार नहीं होते, आंदोलन और तेज किया जाएगा.

मीडिया से बातचीत करते हुए मृतका की मम्मी दीपा मेर ने कहा, ”मेरी बेटी को बेरहमी से मार डाला गया. अब तक भी आरोपी पकड़े नहीं गए हैं. क्या हमें इंसाफ नहीं मिलेगा?’’

लगातार हल्द्वानी में हो रहे अपराधों और हत्याओं के बीच अब नैनीताल पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे थे. लोगों का कहना था कि हल्द्वानी में महिलाएं और बच्चे अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि पुलिस सख्त से सख्त त्वरित कारवाई करे और जनता का विश्वास बहाल करे. 21 दिन बाद भी जब ज्योति मेर हत्याकांड का खुलासा नहीं हुआ तो धरने के बीच पुलिस कार्यप्रणाली से क्षुब्ध युवक ने विरोधस्वरूप मुंडन करवा लिया.

इधर दिन गुजरते जा रहे थे, लेकिन पुलिस ज्योति मेर के हत्यारों को पकडऩे में कामयाब नहीं हो पा रही थी. पुलिस ने हत्या में नामजद आरोपी अजय यदुवंशी को गिरफ्तार भी कर लिया था, लेकिन पुलिस को उस का इस हत्या में कहीं से कहीं तक लिंक ही नजर नहीं आ रहा था, जबकि अजय का छोटा भाई अभय यदुवंशी फरार हो गया था, जिस का पता पुलिस नहीं लगा पा रही थी. योगा टै्रनर ज्योति मेर हत्याकांड का खुलासा न होने पर हल्द्वानी शहर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का आक्रोश दिनप्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था. लोगों का कहना था कि घटना के 21 दिन बाद भी हत्याकांड का खुलासा पुलिस द्वारा नहीं कर पाना पुलिस की सुस्त कार्यप्रणाली को दर्शा रहा है.

19 अगस्त, 2025 को हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में एसएसपी को बरखास्त करने की मांग को ले कर लगातार पांचवें दिन लोगों का धरनाप्रदर्शन जारी रहा. धरने में मौजूद वक्ताओं ने मीडिया को बताया कि पुलिस पहले दिन से ही उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड की तर्ज पर इस मामले को दबाना चाहती है और ढीली काररवाई कर रही है. इस से यह आशंका यहां पर भी प्रदर्शित हो रहा है कि अपराधी को किसी वीआईपी का संरक्षण प्राप्त है.

आखिरकार 20 अगस्त, 2025 को नैनीताल पुलिस ने 22 दिन पहले हुए योगा ट्रैनर हत्याकांड का खुलासा कर हत्या के मुख्य आरोपी को पकड़ लिया. पुलिस की विशेष टीम ने जांच के दौरान घटनास्थल और आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगालने शुरू किए और इस की स्कैनिंग के दौरान एक संदिग्ध युवक कैमरे में ज्योति के कमरे की दिशा से निकलता दिखाई दिया था.

जिस कलाई पर बांधी राखी उसी ने घोंटा गला

उस संदिग्ध युवक के हावभाव और स्थानीय इनपुट के आधार पर उस की पहचान अभय कुमार यदुवंशी उर्फ राजा निवासी गोल, चौक, वाल्मिकी नगर, पश्चिमी चंपारण, बिहार के तौर पर हुई, जो वर्तमान में अजय योगा ऐंड फिटनैस सेंटर, हल्द्वानी परिसर में रहता था. मामले के तूल पकडऩे से पहले अभय यदुवंशी फरार हो गया और लंबे समय तक नेपाल में ही छिपा रहा. इधर दूसरी तरफ नैनीताल पुलिस की टीम उस की तलाश में लगातार दबिश देती रही और अंतत: 20 अगस्त, 2025 को मुख्य अभियुक्त अभय यदुवंशी को ऊधमसिंह नगर नगला तिराहे से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस पूछताछ में हत्या के मुख्य आरोपी अभय यदुवंशी उर्फ राजा ने बताया कि हल्द्वानी के चंदन डायग्नोसिस के टौप फ्लोर पर उस के बड़े भाई अजय यदुवंशी की अजय फिटनैस ऐंड योगा सेंटर के नाम से एकेडमी है. जिसे काफी सालों से दोनों भाई मिल कर चला रहे थे. अपने इस योगा सेंटर में मैनेजमेंट के सारे काम शुरू से ही अभय देख रहा था. वर्ष 2023 में ज्योति मेर उन के योगा सेंटर में काम करने आई.

कुछ समय के बाद ज्योति मेर और अजय के बीच में अवैध संबंध स्थापित हो गए, जिसे कई बार अभय ने खुद अपनी आंखों से देख लिया था. आरोपी अभय ने यह भी बताया कि उस के बड़े भाई अजय यदुवंशी की गर्लफ्रेंड माधवी (परिवर्तित नाम) भी उन के योगा सेंटर में काम करती थी. ज्योति और अजय की नजदीकियों की बात माधवी को पता चल चुकी थी और यह बात अभय ने भी अपनी भाभी माधवी को बताई थी, जिस बात से नाखुश हो कर माधवी ने सन 2023 में जहर खा लिया था. उस के बाद ही वर्ष 2024 में अजय ने माधवी से शादी कर ली, लेकिन अजय की नजदीकियां ज्योति मेर से फिर भी कम नहीं हुई थीं.

उस के बाद जब यह बात अजय को पता चली कि उस के छोटे भाई अभय ने उस के और ज्योति के अवैध संबंधों की बात उस की पत्नी माधवी को बता दी है तो अजय ने गुस्सा हो कर योगा सेंटर के मैनेजमेंट के सारे काम छोटे भाई अभय से छीन कर ज्योति मेर के हाथों में सौंप दिए थे. इसी बीच अभय को अपने किसी काम के लिए 10 लाख रुपए की जरूरत पड़ी तो उस ने अपने बड़े भाई अजय से रुपयों की मांग की, लेकिन अजय ने अभय को रुपए देने से साफसाफ मना कर दिया. इस के साथ ही अजय ने अभय को अपने घर से भी निकाल दिया, जिस के बाद अभय को पीजी में रहना पड़ रहा था.

अभय इन सब के पीछे ज्योति मेर को ही जिम्मेदार मानता था. इसलिए उस ने अब मन ही मन ज्योति को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का प्लान बना लिया. अपने प्लान के मुताबिक आरोपी अभय यदुवंशी 30 जुलाई, 2025 की रात को ज्योति के कमरे में गया. थोड़ा बातचीत के बाद ज्योति रसोई से अभय के लिए नींबू पानी बना कर ले आई.

अभय ने ऐसे दिया हत्या को अंजाम

ज्योति तभी रसोई में सब्जी की कड़ाही की गैस बंद करने जैसे ही घुसी, तभी मौका पा कर अभय ने पीछे से जा कर फुरती से ज्योति को दबोच लिया और गले में पड़ी उसी की चुन्नी से उस का गला घोंट दिया.

इस से पहले अभय उस रात गुस्से से हैवान बन चुका था. उस की यह हैवानियत ज्योति मेर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी बयां की थी. ज्योति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ज्योति के सिर के बाएं हिस्से पर गहरा घाव, दाहिने हाथ की कोहनी के पास घाव, पैरों के निचले हिस्से पर घाव और पीठ की ऊपरी हिस्से की उस की त्वचा बुरी तरह से फटी हुई थी, जबकि अंदरूनी चोटों की बात करें तो ज्योति की खोपड़ी में फ्रैक्चर था. मस्तिष्क में खून भर चुका था. पसलियों में चोट व अंदर खून जमा था, जबकि पेट के अंदर के अंगों (जैसे लीवर आदि) में चोट और रक्तस्राव हुआ था.

अभय ज्योति के पर तब तक वार करता रहा, जब तक वह बेदम हो कर जमीन पर नहीं गिर गई. उस के बाद ज्योति को हिलाडुला कर जब उसे यकीन हो गया कि ज्योति अब मर चुकी है तो उस ने इत्मीनान से ज्योति का शव जमीन पर रखा और फिर वहां से आननफानन में नैनीताल चला गया. रात को नैनीताल में रुका और दूसरे दिन कुछ समय तक नैनीताल में अकेला घूमता रहा. फिर उसी दिन उस ने टैक्सी बुक की और बनबसा होते हुए सीधे नेपाल भाग गया.

योगा ट्रैनर ज्योति मेर को मौत के घाट उतारने का प्लान अभय यदुवंशी काफी पहले ही बना चुका था. वह रोज कुछ न कुछ प्लान बनाता और फिर आखिर में उस प्लान को कैंसिल कर देता था. 30 जुलाई, 2025 को ज्योति की हत्या के दिन भी उस ने काफी ऐहतियात से काम लिया था. उस ने अपने चेहरे और सिर को ढक लिया था, ताकि अगर वह कहीं सीसीटीवी पर नजर भी आए तो उस की पहचान न हो सके. हालांकि वह यहां पर एक बड़ी भूल यह कर गया कि वह अपनी चालढाल को बदलना ही भूल गया और पुलिस की नजरों में आ गया.

पुलिस ने आरोपी अभय यदुवंशी की फोटो नेपाल से ले कर बिहार तक के थानों में पहुंचा दी थी, लेकिन अभय यदुवंशी जानता था कि पुलिस उस के पीछे जरूर पड़ सकती है. इसलिए उस ने पुलिस को चकमा देने के लिए अपना सिर भी मुंडवा लिया था, ताकि पुलिस उस की पहचान न कर सके. लेकिन कहते हैं कि अपराधी चाहे कितना ही शातिर क्यों न हो, वह एक न एक गलती अवश्य कर देता है. इसलिए बुधवार 20 अगस्त, 2025 को जब वह हल्द्वानी में अपनी पहचान छिपाए अपने वकील से मिलने आ रहा था तो वह ऊधमसिंह नगर में पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया.

वर्ष 2023 में ज्योति मेर योगा ट्रैनर के तौर पर अजय योगा सेंटर में आई थी, तभी से उस की हत्यारोपी अभय यदुवंशी से अच्छी पहचान थी. ज्योति ने अभय को अपना भाई मान लिया था. वर्ष 2024 में उस ने अभय को राखी भी बांधी थी, ज्योति को क्या पता था कि जिस हाथ में वह राखी बांध रही है, उन्हीं हाथों से वह बेदर्दी से तड़पातड़पा कर, गला दबा कर उस की जान ले लेगा.

हल्द्वानी पुलिस की विशेष टीम ने अभियुक्त अभय कुमार यदुवंशी उर्फ राजा (24 वर्ष) को गिरफ्तार कर उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयोग किया गया दुपट्टा भी बरामद कर लिया है. पुलिस की इस विशेष टीम के उत्साहवर्धन हेतु उसे ढाई हजार रुपए के ईनाम से भी पुरस्कृत किया गया है. नैनीताल पुलिस ने योगा ट्रैनर ज्योति मेर हत्याकांड का खुलासा भले ही कर दिया है, मगर इस खुलासे से मृतका के फेमिली वाले बिलकुल भी संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने और सामाजिक संगठन पहाड़ी आर्मी ने इस हत्याकांड को कठघरे में ला कर खड़ा कर दिया है.

इस खुलासे को मृतका के फेमिली वालों ने एक नाटकीय एपिसोड करार दिया और कहा कि उन की बेटी के चरित्र पर लांछन लगा कर पुलिस हमारा और जनता का आक्रोश कम करना चाहती है. इस मामले में मृतका की मम्मी दीपा मेर ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि इस खुलासे से वह बिलकुल भी संतुष्ट नहीं हैं. मेरी बेटी के चरित्र पर लांछन लगाया गया है. जबकि इस प्रकरण में शामिल अभय यदुवंशी के अलावा अजय यदुवंशी, शालिनी यदुवंशी और गुरमीत नाम के व्यक्तियों पर पुलिस ने कुछ भी कारवाई नहीं की. पुलिस इन लोगों को क्यों बचाना चाहती है. इन तीनों को भी जेल की सलाखों के पीछे डालना होगा. दीपा मेर ने पुलिस के खुलासे पर मुख्य रूप से 7 सवाल पूछे हैं.

पहला, यदि हत्यारा अभय यदुवंशी उर्फ राजा का अपने बड़े भाई से लड़ाईझगड़ा हुआ और उस ने अभय को कारोबार से निकाल कर उस का खानाखर्चा बंद किया तो उस को इस बात पर अपने भाई अजय से नाराजगी होनी चाहिए थी न कि ज्योति से. दूसरा कि यदि अजय यदुवंशी और ज्योति मेर के बीच अवैध संबंध थे तो अजय यदुवंशी की पत्नी माधवी ने चुप्पी क्यों साध रखी थी? इसलिए क्या इस मर्डर केस में वह अपने पति और देवर के साथ शामिल नहीं होगी? तीसरा सवाल यह है कि यदि अजय अपने छोटे भाई अभय को खर्चा नहीं दे रहा था तो इस में ज्योति को मारने का क्या लौजिक है?

चौथा सवाल पुलिस से यह है कि यदि ज्योति मेर की मृत्यु पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस के सिर के अंदर रक्तस्राव से हुई थी, जबकि नैनीताल पुलिस ने अपने खुलासे में सिर्फ दुपट्टे से गला दबाने की बात कही है. आखिर इस चोट को मारने के लिए आरोपी ने किस हथियार से उस के सिर पर वार किया था, वह कौन सा हथियार था? वह पुलिस द्वारा क्यों बरामद नहीं किया गया?

दीपा मेर ने पांचवां सवाल यह पूछा कि यदि मुख्य आरोपी अभय यदुवंशी पूरे 22 दिनों तक फरार रहा तो आखिर इस समय उस की मदद कौन कर रहा था? जबकि पैसों के मामले में अभय यदुवंशी काफी लंबे समय से पैदल चल रहा था? छठां सवाल दीपा मेर ने पुलिस से यह पूछा कि यदि अभय यदुवंशी नेपाल भाग गया था तो वह नेपाल से वापस ऊधमसिंह नगर क्यों और कैसे आ गया? पुलिस ने कहा कि वह अपने वकील से मिलने आ रहा था तो इस मुफलिसी में उस की आर्थिक मदद कौन कर रहा था?

सातवां सवाल मृतका की की मम्मी दीपा मेर ने जो पूछा है वह बहुत गंभीर और दिल झकझोर देने वाला है. दीपा मेर ने पुलिस से यह पूछा है कि क्या उत्तराखंड पुलिस सिर्फ एक लड़की के चरित्र पर अंगुली उठा कर अपना काम पूरा करने का श्रेय ले कर जनता और मृतका के फेमिली वालों के आक्रोश को दबाना चाहती है और अन्य केसों की तरह इस में भी लीपापोती कर केस को ढीला और कमजोर करना चाहती है?

इन 7 सवालों और आरोपों के साथ मृतका ज्योति मेर की मम्मी दीपा मेर ने इस जघन्य हत्याकांड के सही खुलासे के लिए उत्तराखंड की धामी सरकार से एसआईटी जांच की मांग की है. उन का कहना है कि एसआईटी जांच से इन सारे पहलुओं पर जब दोबारा से जांच होगी तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. पुलिस के इस खुलासे को ले कर सामाजिक संगठन पहाड़ी आर्मी के अध्यक्ष हरीश रावत और सुराज सेवा दल कुमाऊं मंडल अध्यक्ष विशाल शर्मा का कहना है कि जिस प्रकार से नैनीताल पुलिस द्वारा सिर्फ एक या 2 पौइंट पर फोकस कर के निर्मम हत्याकांड का उत्तराखंड पुलिस द्वारा खुलासा किया गया है, वह वास्तव में अचंभित करने वाला और दिल को झकझोर देने वाला है.

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि यदि इस जघन्य और निर्मम हत्याकांड की सूक्ष्मता और गहराई से जांच की जाए तो इस में कई सफेदपोश और रसूखदारों के शामिल होने की तो पूरीपूरी आशंका है. इस के लिए कई सामाजिक संगठनों ने कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर धामी से एसआईटी जांच की मांग की है. उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इस प्रकरण पर उचित काररवाई नहीं करेगी तो उन्हें फिर से आंदोलन करने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. Crime Story in Hindi

 

 

 

Crime Kahani : क्यों मारी गई जीत कौर

Crime Kahani : रंगेहाथों पकड़ी जाने पर अमन कौर ने प्रेमी डाक्टर के साथ मिल कर सास जीत कौर की हत्या कुछ इस तरह से की थी कि किसी को जरा भी संदेह नहीं हुआ. लेकिन उस की अलमारी से मिली फाइल ने उस की पोल खोल दी. इस में कोई 2 राय नहीं कि अवैधसंबंध हमेशा बरबादी ही लाते हैं. न जाने कितने परिवार अवैधसंबंधों की बलि चढ़ गए हैं, इस के बावजूद न अवैधसंबंधों में कोई कमी आ रही है और न इस से होने वाले अपराधों में. मजे की बात यह है कि इस के दुष्परिणाम को जानते हुए लोग जानबूझ कर इस आफत को न्यौता देते हैं.

समाज में ऐसे ढेरों किस्से हैं, जो रहस्य के गर्भ में दफन हो कर रह गए हैं. लेकिन यह भी सत्य है कि जिस तरह पानी में गंदगी छिपी नहीं रह सकती है, उसी तरह समाज की इस गंदगी की भी पोल कभी न कभी खुल ही जाती है. यह भी ऐसा ही मामला है. बीबी जीत कौर की हत्या का मामला भी शायद रहस्यों की अंधेरी परतों में दबा रह जाता, अगर उन की रहस्यमयी मौत से उठे चंद सवालों ने उस के बेटे लवप्रीत को यह सोचने के लिए विवश न कर दिया होता कि उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं, सोचीसमझी साजिश के तहत की गई हत्या है.

सरदार जगमोहन सिंह का परिवार पटियाला के घग्गा गांव में रहता था. गांव में उन के पिता हाकम सिंह की काफी उपजाऊ जमीन थी, जिस पर वह भाई के साथ मिल कर खेती करते थे. 32 साल पहले जगमोहन की पंजाब नहर एवं सिंचाई विभाग में नौकरी लग गई तो वह पटियाला आ कर रहने लगे. नौकरी लगने के बाद पिता ने उन की शादी जिला पातड़ा की जीत कौर से कर दी थी. शादी के लगभग 2 सालों बाद जगमोहन सिंह के घर बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम उन्होंने लवप्रीत सिंह रखा. लवप्रीत के पैदा होने के 2 सालों बाद ही जगमोहन सिंह के पिता हाकम सिंह की मौत हो गई तो दोनों भाइयों ने जमीन का बंटवारा कर लिया.

बंटवारे में मिली अपने हिस्से की जमीन बेच कर जगमोहन सिंह ने पटियाला के बाहरी क्षेत्र में विकसित हो रही नई कालोनी त्रिपुड़ी में प्लौट खरीद कर शानदार कोठी बनवाई और उसी में पत्नी जीत कौर और बेटे लवप्रीत सिंह के साथ रहने लगे. लगभग 10 साल पहले सन 2004 में एक सड़क दुर्घटना में जगमोहन सिंह की मौत हो गई. जीत कौर के लिए यह तोड़ देने वाला दुख था. लेकिन वह खुद टूट जातीं तो बेटे का क्या होता. उन्होंने खुद को संभाला और बेटे लवप्रीत का लालनपालन करने लगीं. उन्होंने उसे उच्च शिक्षा दिलाई, जिस की बदौलत उसे गुड़गांव की एक मल्टीनैशनल कंपनी में सहायक मैनेजर की नौकरी मिल गई.

नौकरी की वजह से लवप्रीत सिंह गुड़गांव आ गया तो जीत कौर अकेली पड़ गईं. लवप्रीत महीने, 2 महीने में 1-2 दिनों के लिए पटियाला मां से मिलने जाया करता था. ऐसे में अपना समय काटने के लिए जीत कौर कुछ दिनों के लिए देवर के यहां चली जातीं तो कभी अपने मायके पातड़ा. वैसे वह अपना ज्यादातर समय गुरुद्वारों में जा कर भजनकीर्तन में गुजारती थीं. लवप्रीत सिंह के अलावा उन के रिश्तेदारों को भी जीत कौर के अकेली रहने की चिंता सताती थी. इसलिए रिश्तेदार उन पर लवप्रीत की शादी के लिए दबाव बनाने लगे. उन लोगों का कहना था कि घर में बहू आ जाएगी तो उन का अकेलापन भी दूर हो जाएगा, साथ ही उन की सेवासत्कार भी ठीक से होने लगेगी.

लवप्रीत 27-28 साल का गबरू जवान था. उस की उम्र शादी लायक हो गई थी. ठीकठाक नौकरी भी थी, इसलिए उस के लिए लड़कियों की कमी नहीं थी. घर में पहले से ही किसी चीज की कमी नहीं थी. उन का काफी संपन्न परिवार था. लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें दौलत से नहीं खरीदा जा सकता, खासकर सुख या खुशी. जीत कौर की उम्र 60 साल से ज्यादा हो चुकी थी. अपनी उम्र और हालत को देखते हुए वह बेटे की शादी के लिए राजी हो गईं. उन के हामी भरते ही लड़की वालों की लाइन लग गई. काफी देखसुन कर उन्होंने चंडीगढ़ निवासी गुरमेल सिंह की बेटी अमन कौर को लवप्रीत के लिए पसंद कर लिया. बातचीत के बाद शीघ्र ही अमन कौर से लवप्रीत की शादी कर दी. यह शादी मई, 2010 में हुई थी.

अमन कौर नाम के अनुरूप जितनी शांत और सुशील थी, उस से कहीं ज्यादा सुंदर थी. वह पढ़ीलिखी भी काफी थी. इस तरह की सुंदरसुशील और पढ़ीलिखी पत्नी पा कर जहां लवप्रीत खुश था, वहीं बहू के व्यवहार और अपनेपन से जीत कौर भी निहाल थीं.अमन कौर ने अपने व्यवहार और सेवाभाव से पति और सास का दिल जीत लिया था. शादी पर ली गई छुट्टियां खत्म हो गईं तो लवप्रीत अपनी नौकरी पर गुड़गांव चला गया. जाते समय उस ने अमन कौर से कहा था कि उसे मां का अपनी जान से भी ज्यादा खयाल रखना है. लवप्रीत पहले जहां महीने, 2 महीने में घर आता था, नईनई शादी के बाद वह महीने में कम से कम 2 बार घर आने लगा. घर आने पर जब उसे मां से पता चलता कि उस की सोच से भी कहीं अधिक अमन कौर उस का खयाल रखती है तो उस की नजरों में पत्नी की इज्जत और ज्यादा बढ़ गई.

बहरहाल, अमन कौर के आ जाने से लवप्रीत की चिंता खत्म हो गई थी. वह मां की ओर से पूरी तरह निश्चिंत हो गया था. मां भी खुश थी. बेटे के सामने जीत कौर बहू की तारीफें करते नहीं थकती थीं. एक सुबह जीत कौर उठीं और दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो कर पूजा के कमरे की ओर जाने लगीं तो अचानक फिसल कर गिर गईं. उन की चीख सुन कर अमन कौर दौड़ी आई और सास को सहारा दे कर सोफे पर बिठाया. जीत कौर के पैर में काफी तेज दर्द था, इसलिए उस ने तुरंत फोन कर के डाक्टर को बुलाया. पैर देख कर डाक्टर ने संदेह व्यक्त किया कि शायद पैर में फैक्चर हो गया है, इसलिए इन्हें अस्पताल ले जाना पड़ेगा.

अस्पताल जाने पर पता चला कि सचमुच पैर टूट गया है. उस पर प्लास्टर चढ़ा दिया गया. इस के बाद डाक्टर ने उन्हें डेढ़ महीने तक बैड से न उतरने की सलाह दी. अमन कौर सास की खूब सेवा कर रही थी. सूचना पा कर लवप्रीत भी घर आया और अमन कौर द्वारा की जा रही मां की सेवासुश्रुषा से संतुष्ट हो कर लौट गया. वैसे तो जीत कौर को अपने खर्च भर के लिए पैंशन मिलती ही थी, लेकिन इस के अलावा भी मां को खर्च के लिए उन के बैंक एकाउंट में लवप्रीत भी समयसमय पर रुपए डालता रहता था. जरूरत पड़ने पर जीत कौर एटीएम कार्ड से रुपए निकाल लाती थीं. पैर टूटने से जीत कौर घर के बाहर जाने लायक नहीं रह गईं तो उन्होंने एटीएम कार्ड अमन कौर को दे दिया, ताकि जरूरत पड़ने पर वह रुपए निकाल लाए.

जीत कौर के बिस्तर पर पड़ने के बाद अमन कौर लगभग आजाद सी हो गई थी. वह जीत कौर को दर्द निवारक के नाम पर इस तरह की दवाएं देती थी, जिसे खा कर वह इस तरह सो जाती थीं कि उन्हें होश ही नहीं रहता था. उन के सोने के बाद घर में क्या होता है, उन्हे पता नहीं चलता था. जब भी उन की आंखें खुलतीं, अमन कौर घर से गायब होती थी. अक्सर वह रात के 8 बजे के बाद ही आती थी. कभीकभी रात के 9, साढ़े नौ भी बज जाते थे. ऐसे में जीत कौर देर से आने की वजह पूछतीं तो वह कोई न कोई बहाना बना देती. कभी दवा का तो कभी डाक्टर से मिलने का तो कभी किसी सहेली के घर जाने की बात कह कर उन्हें संतुष्ट कर देती.

एकाध दिन की बात होती तो इस तरह की बहानेबाजी चल जाती है, लेकिन अगर ऐसा रोज होने लगे तो संदेह होने लगता है. ऐसा ही कुछ जीत कौर के मामले में हुआ. जीत कौर अनुभवी और सुलझी हुई महिला थीं. अब तक उन्होंने बहुत कुछ देखा, झेला और कठिनाइयों का सामना किया था. बहू की बातों और हरकतों से उन्हें साफ लगने लगा था कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है, जिसे अमन कौर बताना नहीं चाहती थी. उन के संदेह को तब बल मिल गया, जब उन के पारिवारिक डाक्टर खन्ना खुद उन के यहां उन्हें देखने आ गए. हुआ यह कि जब कई दिनों से अमन कौर उन के यहां जीत कौर की दवा लेने नहीं गई और न ही पिछले महीने के इलाज एंव दवाओं के पैसे दिए तो डा. खन्ना ने सोचा कि वह खुद जा कर जीत कौर का हालचाल ले लें, साथ ही पैसों के बारे में भी कह दें. जिस समय वह जीत कौर के घर पहुंचे, अमन कौर घर में नहीं थी.

डा. खन्ना ने जब जीत कौर का हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘डा. साहब, पैर तो अब काफी ठीक है, सूजन भी लगभग खत्म हो गई है, दर्द में भी काफी आराम है. लेकिन इन दिनों आप जो दवाएं दे रहे हैं, उसे खाने के बाद नींद बहुत आती है. मैं ऐसा सोती हूं कि होश ही नहीं रहता.’’

‘‘आप यह क्या कह रही हैं बीजी. मैं ने तो ऐसी कोई दवा नहीं दी है. हमारे खयाल से लगभग 20 दिनों से अमन मेरे यहां नहीं आई है. तब दवा…?’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ जीत कौर ने हैरानी से कहा, ‘‘वह तो मुझे रोज बता कर जाती है कि आप के क्लिनिक पर दवा लेने जा रही है और आप कह रहे हैं कि..?’’

‘‘मैं ठीक कह रहा हूं बीजी. उस ने तो अभी पिछले महीने की दवा के पैसे भी नहीं दिए हैं.’’ दवाओं का बिल देते हुए डा. खन्ना ने कहा.

जीत कौर ने देखा, 26 हजार 470 रुपए डा. खन्ना के बाकी थे. उन का माथा ठनका. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है. अमन तो एटीएम से रुपए निकाल कर ले आई है, फिर रुपए कहां गए? वह इसी विषय पर सोच रही थीं कि अमन कौर आ गई. डा. खन्ना पर नजर पड़ते ही उस का चेहरा सफेद पड़ गया. शायद उसे इस बात का अहसास हो गया था कि उस की चोरी पकड़ी गई है. इस के बावजूद उस ने खुद को संभाल कर डा. खन्ना को सतश्रीअकाल कहा.

जीत कौर ने इधरउधर की बातें करने के बजाय सीधे पूछा, ‘‘अमन, डा. साहब के इतने पैसे क्यों बाकी हैं?’’

‘‘बीजी, मैं आप को बताना भूल गई थी कि मेरी एक सहेली की मां की हार्ट सर्जरी होनी थी. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. उस ने पैसे मांगे तो मैं ने रुपए निकाल कर उसे दे दिए. 2-4 दिनों में वह रुपए लौटा देगी तो मैं डाक्टर साहब के रुपए दे दूंगी.’’ अमन ने कहा.

जीत कौर जानती थीं कि अमन झूठ बोल रही है. इस के बावजूद उन्होंने डाक्टर के सामने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, तुम्हारी सहेली के कहीं भाग तो नहीं जा रही. तुम ऐसा करो, बैंक से पैसे निकाल कर डा. साहब के पैसे दे दो. वह आगेपीछे पैसे देती रहेगी.’’

डा. खन्ना के चले जाने के बाद अमन कौर घर के काम में लग गई. जीत कौर अपने कमरे में उसी तरह लेटी रहीं. वह अच्छी तरह समझ गई थीं कि कहीं न कहीं कोई गड़बड़ जरूर है. अमन जरूर कुछ उलटासीधा कर रही है. डा. खन्ना से बातचीत के बाद उन की समझ में आ गया था कि उन्हें दी जाने वाली दवा ठीक नहीं है. इसलिए अगले दिन सुबह जब अमन कौर ने उन्हें दवा खाने के लिए दी तो उन्होंने वह दवा खाई नहीं और इस तरह लेट गईं, जैसे गहरी नींद में सो रही हों. कुछ देर बाद अमन कौर ने उन के कमरे में आ कर पुकारा, ‘‘मांजी.’’

जब जीत कौर ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह समझ गई कि मांजी सो गई हैं यानी उस की दवा काम कर गई है. वह घर से निकल पड़ी. उस के घर से जाते ही जीत कौर उठीं और उस के कमरे में जा कर उस की अलमारी खोल कर देखने लगीं. अलमारी में महंगी सौंदर्य प्रसाधन सामग्री भरी पड़ी थी. उसी के साथ महंगी विदेशी शराब की 2 बोतलें भी रखी थीं. जीत कौर ने अलमारी का लौकर खोला तो उस में करीब 50 हजार रुपए रखे थे. यह सब देख कर जीत कौर हैरान रह गईं. वह सोच में पड़ गईं कि अमन कौर ऐसा कर के कौन सा खेल खेल रही है. उन की नजरों में अमन कौर की जो आदर्श बहू वाली तस्वीर बनी हुई थी, यह सब देख कर धुंधलाने लगी.

अमन कौर के घर लौटने के बाद जीत कौर ने उस से कुछ नहीं पूछा. वह इस तरह बनी रहीं, जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं है. अब तक वह चलनेफिरने लगी थीं. इसलिए अगले दिन जब अमन कौर घर से बाहर निकली तो उन्होंने उस का पीछा किया. अमन कौर जा कर एक मकान में घुस गई तो लगभग 2 घंटे बाद निकली. जीत कौर ने लगातार 3 दिनों तक उस का पीछा किया. तीनों दिन अमन कौर उसी तरह घर से निकली और अलगअलग मकानों में गई, जहां 2-3 घंटे रह कर वापस आ गई. इस के बाद जीत कौर ने उन मकानों में रहने वालों के बारे में पता किया तो पता चला कि उन मकानों में परिवार से अलग रहने वाले वे लड़के रहते हैं, जो यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं या फिर अकेले रह कर नौकरी करते हैं.

अनुभवी जीत कौर ने बहू की सच्चाई जान ली. एक जवान औरत ऐसे लड़कों के पास क्यों जाएगी? मतलब स्पष्ट था. वह समझ गईं, अमन कौर पति की कमाई दोनों हाथों से यारों पर लुटा रही थी. बहू की सच्चाई जान कर जीत कौर परेशान हो उठीं. बहू की शिकायत बेटे से करने से पहले वह उस से बात कर लेना चाहती थीं. क्योंकि कभीकभी आंखों से दिखाई कुछ और देता है, जबकि उस की सच्चाई कुछ और होती है. जीत कौर ने जब अलमारी से मिले रुपए और शराब की बोतल से ले कर अलगअलग मकानों में जाने की बात अमन कौर को बता कर सच्चाई पूछी तो अमन कौर ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि उन मकानों में रहने वाले कुछ लड़के उस के कालेज के समय के दोस्त हैं. वह उन्हीं से मिलने जाती है. लेकिन जैसा वह सोच रही हैं, वैसा कुछ भी नहीं है.

जीत कौर को अपने अनुभवों से पता था कि अवैधसंबंधों को जब तक आंखों से न देखा जाए, अमन कौर तो क्या कोई भी स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए उन्होंने इस बात पर जोर दे कर बहू को समझाया, ‘‘देखो अमन, अब तक जो भी हुआ, उसे भूल जाओ. तुम एक अच्छे खानदान की बेटी तो हो ही, अब एक अच्छे खानदान की बहू भी हो, यह सब करना तुम्हें शोभा नहीं देता.’’

‘‘बीजी, मैं वादा करती हूं कि आगे से ऐसी कोई गलती नहीं होगी.’’

अमन कौर के माफी मांग लेने के बाद जीत कौर ने बात यहीं खत्म कर दी. खाना आदि खा कर सासबहू अपनेअपने कमरों में जा कर सो गईं. अगले दिन सुबह अमन कौर चाय बना कर सास को उन के कमरे में देने गईं तो यह देख कर हैरान रह गई कि उतनी देर तक सास के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. अमन कौर ने 2-4 बार आवाज दी, दरवाजा खटखटाया. लेकिन जब भीतर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो अमन कौर जोरजोर से दरवाजा पीटने के साथ चिल्लाने लगी. दरवाजा भड़भड़ाने और अमन कौर के चीखने की आवाजें सुन कर पड़ोस के लोग आ गए.

अमन कौर काफी परेशान और घबराई हुई थी. पड़ोसियों के पूछने पर उस ने कहा कि मांजी न दरवाजा खोल रही हैं और न कोई जवाब दे रही हैं. पड़ोसियों ने कोशिश कर के दरवाजा तोड़ा तो अंदर बैड पर जीत कौर चित पड़ी थीं. देखने से ही लग रहा था कि उन की मौत हो चुकी है. सास को इस हालत में पा कर अमन जोरजोर से रोने लगी. रोरो कर उस का बुरा हाल हो रहा था. पड़ोसी औरतों ने किसी तरह उसे संभाला और इस घटना की सूचना तुरंत जीत कौर के बेटे लवप्रीत सिंह को दे दी गई. दोपहर तक लवप्रीत घर पहुंच गया. अपनी मां की इस तरह अचानक हुई मौत से वह बहुत दुखी भी था और हैरान भी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मां की मौत इस तरह कैसे हो गई कि किसी को पता ही नहीं चला.

वह गंभीर रूप से बीमार भी नहीं थी. शाम को उस की मां से बात भी हुई थी. तब वह पूरी तरह ठीक थीं. बहरहाल, होनी को स्वीकार कर के वह मां के अंतिम संस्कार की तैयारियां करने लगा. जब सभी रिश्तेदार आ गए तो उस ने मां का अंतिम संस्कार कर दिया. इस के बाद मां की आत्मा की शांति के लिए पाठ वगैरह करवाया. सभी क्रियाकर्म से छुट्टी पा कर लगभग दस दिनों बाद लवप्रीत गुड़गांव जाने की तैयारी कर रहा था कि तभी अलमारी में कुछ ढूंढ़ते समय कपड़ों के बीच से उसे एक फाइल मिली, जिस पर बीबी जीत कौर का नाम लिखा था.

लवप्रीत ने फाइल खोल कर देखी तो उस में जीत कौर की दवाओं की पर्चियों के साथ कई टेस्टों की रिपोर्टें थीं. न जाने क्या सोच कर लवप्रीत ने वह फाइल अपने बैग में रख ली और दोपहर को उसे ले कर अपने फैमिली डाक्टर खन्ना के यहां जा पहुंचा. फाइल देख कर डा. खन्ना ने कहा, ‘‘यह फाइल मेरी बनाई हुई नहीं है. इस में जो दवाएं लिखी हैं, उन्हें भी मैं ने बीजी के लिए नहीं लिखी हैं.’’

‘‘पर डा. साहब, इस फाइल की रिपोर्ट के अनुसार…’’

‘‘ये सारी रिपोर्टें गलत हैं. मेरे नाम से ये गलत रिपोर्टें न जाने किस ने और क्यों बनवाई हैं?’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हैं डा. साहब?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं लवप्रीत. मैं ने बीजी के सारे टैस्ट कराए थे, जिन में वह एकदम ठीकठाक थीं. उन्हें  कोई बीमारी नहीं थी. पैर में हलका सा फै्रक्चर होना कोई बीमारी नहीं है. उस के लिए मैं ने पेन किलर दिए थे, जिन्हें तेज दर्द होने पर खाना था. फाइल में रखे पर्चे के अनुसार बीजी को जो दवाएं दी जा रही थीं, वे नशे की थीं. ये दवाएं अमन कौर कहां से लेती थी, यह मुझे नहीं पता. अभी तो बीजी के इलाज के मेरे 22-23 हजार रुपए बाकी हैं. अमन ने कहा था कि तुम्हारे आने पर मेरे रुपए दे देगी.’’

‘‘डा. साहब पिछले महीने 3 बार में मैं ने एक लाख रुपए भेजे थे, फिर भी अमन ने आप के रुपए नहीं दिए.’’ लवप्रीत ने हैरान हो कर कहा.

इस के बाद कुछ देर के लिए खामोशी छा गई. कुछ देर में खामोशी तोड़ते हुए डा. खन्ना ने कहा, ‘‘लवप्रीत, कुछ भी हो, मुझे इस सारे मामले में कोई बड़ी साजिश लग रही है.’’

‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं डा. साहब. मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है.’’ कह कर लवप्रीत घर लौट आया.

उसी दिन लवप्रीत गुड़गांव जाने के लिए घर से निकल पड़ा, लेकिन गुड़गांव गया नहीं. घर छोड़ कर वह शहर के एक होस्टल में कमरा ले कर ठहर गया. इस के बाद वह थाना त्रिपुड़ी आ कर मुझ से (इंसपेक्टर दर्शन सिंह) मिला. पूरा घटनाक्रम बता कर उस ने संदेह व्यक्त किया कि उस की मां जीत कौर की मौत स्वाभाविक नहीं है, बल्कि सोचीसमझी साजिश के तहत उन की हत्या की गई है. उस ने व्यक्तिगत तौर पर निवेदन किया कि इस रहस्य से परदा उठाने में मैं उस की मदद करूं.

इस के बाद मैं ने लवप्रीत सिंह से एक प्रार्थनापत्र ले कर हत्या का मामला अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज करा दिया. मैं ने उस से जीत कौर का बैंक एकाउंट नंबर ले कर उसी दिन से अपना काम शुरू कर दिया. मैं ने लवप्रीत को कुछ दिशानिर्देश दे कर अमन कौर की गतिविधियों पर नजर रखने को कहा. कुछ ही दिनों की जांचपड़ताल से स्पष्ट हो गया कि जीत कौर की मौत के पीछे निश्चित रूप से अमन कौर की साजिश थी. दरअसल, जब मैं ने जीत कौर की बैंक स्टेटमैंट निकलवाई तो पता चला कि उन के खाते से लगातार मोटीमोटी रकमें निकाली गईं थीं. ये सारे पैसे एक ही एटीएम से निकाले गए थे. मैं ने उस एटीएम की सीसीटीवी फुटेज निकलवा कर देखी तो अमन कौर जबजब वहां रुपए निकालने आई थी, उस के साथ कोई न कोई लड़का जरूर था.

एटीएम से रुपए निकाल कर अमन कौर अपने साथ आए लड़के को भी रुपए देती थी. दूसरी ओर लवप्रीत ने लगातार अमन कौर का पीछा किया तो पता चला कि सुबह 10-11 बजे अमन कौर घर से निकल कर अपने किसी दोस्त के यहां जाती थी. 3-4 घंटे वहां रुक कर वहां से किसी दूसरे मित्र युवक के यहां चली जाती थी. यह क्रम देर रात तक चलता था. सुबह की निकली अमन कौर रात 10-11 बजे तक घर लौटती थी. इन सब बातों से साफ हो गया था कि जीत कौर की मौत के पीछे अमन कौर का हाथ था. लवप्रीत के प्रार्थनापत्र पर मैं जीत कौर की हत्या का मुकदमा दर्ज ही करा चुका था. अब मुझे अमन कौर के खिलाफ सुबूत जुटा कर यानी उसे रंगेहाथों पकड़ कर गिरफ्तार करना था. इस के लिए मैं ने अपने कुछ होशियार पुलिस वालों को अमन कौर के मकान के पास निगरानी पर लगा दिया.

चूंकि जीत कौर की मौत हो चुकी थी और अमन कौर की जानकारी में लवप्रीत गुड़गांव चला गया था. इसलिए उसे किसी का डर नहीं रह गया था. सो अब वह अपने दोस्तों को घर भी बुलाने लगी थी. इन में उस का एक दोस्त ऐसा था, जिसे वह रात में बुलाती थी, जो पूरी रात उस के साथ रहता था. उस दिन अमन कौर के घर की निगरानी कर रहे एएसआई कुलदीप सिंह ने देखा कि 2 लड़के आए और उस के घर की बैल बजाई. अमन कौर ने दरवाजा खोला तो दोनों लड़के अंदर चलग गए. कुछ देर बाद एक अन्य लड़के ने आ कर बैल बजाई तो इस बार भी अमन कौर ने ही दरवाजा खोला. तीसरा लड़का भी अंदर चला गया.

कुछ देर बाद अमन कौर के घर से तेजतेज आवाजें आने लगीं. ऐसा लग रहा था, जैसे किसी बात को ले कर अंदर झगड़ा हो रहा था. कुलदीप सिंह ने समय बरबाद न करते हुए इस बात की जानकारी मुझे दी तो मैं 4 सिपाहियों को ले कर वहां पहुंच गया. मैं ने अमन कौर के घर का दरवाजा खुलवाया तो सामने पुलिस वालों को देख कर अमन कौर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. मैं ने घर की तलाशी ली तो अंदर वाले कमरे में 3 लड़के छिपे मिले. तीनों लड़कों की उम्र 19 से 22 साल के बीच थी. ये अलगअलग प्रदेशों के थे, जो यहां पटियाला विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे.

मैं अमन कौर और तीनों लड़कों को थाने ले आया. तीनों लड़कों से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला कि वे अमन कौर के प्रेमी थे. लेकिन जीत कौर की हत्या से उन का कोई संबंध नहीं था. इस के बाद अमन कौर से पूछताछ की गई तो उस ने जीत कौर की मौत के रहस्य से परदा उठाते हुए उन की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह पश्चिमी सभ्यता के आकर्षण में बंधी संस्कारविहीन बिगड़ी संतानों के कारनामों का लेखाजोखा निकली. अमन कौर शुरू से ही आजाद खयालों वाली जिद्दी लड़की थी. घर की एकलौती बेटी होने की वजह से वह सब की लाडली थी. अधिक लाडप्यार ने उसे कुछ ज्यादा स्वच्छंद बना दिया था. धनदौलत की कमी न होने की वजह से वह अपनी जिंदगी अपने ढंग से जी रही थी.

स्कूल के दिनों से ही छोटीछोटी बातों पर सहपाठियों से शरतें लगा कर जीतना और पार्टी करना उस की आदत बन गया था. जवान हो कर  कालेज पहुंचतेपहुंचते वह पश्चिमी सभ्यता में इस कदर ढल गई कि क्लबों, डिस्कोथैकों में जाना, बीयरव्हिस्की पीना, पुरुष मित्रों की बांहों में नाचना, उस के लिए आम बात हो गई थी. अपनी बिगड़ी आदतों की वजह से कभी वह किसी एक मित्र से संतुष्ट नहीं होती थी, इसलिए नएनए दोस्त बनाती रहती थी. जब तक वह बेटी रही, तब तक यह सब चलता रहा, लेकिन जब वह बहू बन गई तो उस की आजादी पर रोक लग गई. अब तक वह जो कुछ करती आई थी, ससुराल आने के बाद नहीं कर पा रही थी.

आखिर अमन ने अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने का रास्ता खोज निकाला. अपनी योजना के तहत उस ने अपनी सेवा से पति लवप्रीत और सास जीत कौर का दिल जीत लिया. पति बाहर रहता था, घर में केवल सास थी, इसलिए अमन कौर ने उसे पूरी तरह से वश में कर लिया. बीयर या व्हिस्की ला कर उस ने अपनी अलमारी में रख लिया था. मौका निकाल कर 1-2 पैग ले लिया करती थी. इस बीच अमन कौर ने कुछ ऐसे लड़कों से दोस्ती कर ली थी, जो दूसरे प्रदेशों से वहां पढ़ने आए थे. ऐसे लड़कों को हमेशा पैसों की जरूरत रहती है, यह अमन कौर अच्छी तरह जानती थी. इन लड़कों की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उस ने इन्हें अपने जाल में फांस लिया. उन की जरूरतें पूरी कर के वह उन के साथ अय्याशी करने लगी.

अमन कौर लड़कों के कमरों पर पार्टी करती और उन्हें खर्च के लिए रुपए देती. इस तरह दोनों हाथों से वह रुपए लुटाने लगी तो उसे अपने खर्च के लिए रुपए कम पड़ने लगे. 2-3 बार वह अपने मायके से रुपए मांग कर लाई, लेकिन मायके से हमेशा तो रुपए मांगे नहीं जा सकते थे. उसी बीच जीत कौर ने महसूस किया कि बहू का बाजार आनाजाना कुछ ज्यादा हो गया है तो उन्होंने टोकना शुरू किया. तब अमन कौर ने सास को काबू में करने के लिए एक योजना बनाई और उसी योजना के तहत एक दिन उस ने पूजा के कमरे में जाने वाले रास्ते में फर्श पर औयल गिरा दिया. सुबह स्नान के बाद जीत कौर पूजा के कमरे में जाने लगीं तो फर्श पर पड़े औयल की वजह से फिसल कर गिर पड़ीं, जिस से उन के पैर में फैक्चर हो गया.

उस समय अमन कौर ने जीत कौर के फैमिली डा. खन्ना को न बुला कर पहले डा. रंजीत को बुलाया. डा. रंजीत खूबसूरत भी था और युवा भी. उस की शादी भी नहीं हुई थी. दरअसल, महीने भर पहले एक डिपार्टमैंटल स्टोर पर अमन कौर की मुलाकात डा. रंजीत से हुई थी. उसी पहली मुलाकात में वह उस पर मोहित हो गई थी. जीत कौर के इलाज के लिए डा. रंजीत को बुला कर अमन कौर ने एक तीर से 2 निशाने साधे थे. एक तो डा. रंजीत को उस ने अपने रूपजाल में फांस लिया, दूसरे जीत कौर को लंगड़ी बना कर बिस्तर पर बिठा दिया.

बाद में सास के कहने पर फैमिली डा. खन्ना के यहां ले जा कर प्लास्टर चढ़वाया लेकिन दवाएं डा. रंजीत की ही चलती रहीं. जीत कौर उस के किसी मामले में रोकटोक न कर सके, इस के लिए वह उन्हें नींद की दवाएं देती रही. कुछ दिनों तक सब कुछ अमन कौर के मुताबिक चलता रहा. लेकिन यह भी सच है कि पाप का घड़ा एक न एक दिन भरता ही है. घटना वाली रात लगभग 8 बजे अमन कौर ने जीत कौर को खाना खिला कर नींद की दवा दे कर सुला दिया. लगभग साढ़े 8 बजे उस का प्रेमी डा. रंजीत आया तो वह उसे अपने कमरे में ले कर चली गई.

डा. खन्ना से बातचीत के बाद जीत कौर ने अमन कौर द्वारा दी जाने वाली दवा खानी बंद कर दी थी, इसलिए अमन को भले ही लगा कि जीत कौर सो गई हैं, लेकिन वह जाग रही थीं. इसलिए अमन डा. रंजीत के साथ अपने कमरे में हंसीठिठोली करने लगी तो उस की आवाज जीत कौर तक पहुंच गई. हंसीठिठोली की आवाजें सुन कर जीत कौर अमन कौर के कमरे की ओर गईं तो कमरे में जो हो रहा था, उसे देख कर वह हैरान रह गईं. दूसरी ओर अमन कौर तथा डा. रंजीत भी जीत कौर को सामने देख कर बैड से उछल पडे़ और अपनेअपने कपड़े ठीक करने लगे. जीत कौर ने अमन कौर को बुराभला कहते हुए धमकी दी कि वह अभी बेटे को फोन कर के सारी बातें बताएंगी.

जीत कौर की इस धमकी से अमन कौर डर गई. उस ने लपक कर जीत कौर के पैर पकड़ लिए और माफी मांगने लगी. रंजीत भी सफाई देने लगा. लेकिन जीत कौर ने तय कर लिया था कि अब वह हर हाल में सारी बातें बेटे को बता कर रहेंगी. वैसे भी रंगेहाथों पकड़े जाने के बाद अमन कौर के पास कहनेसुनने को कुछ नहीं बचा था. अमन कौर ने देखा कि जीत कौर अब किसी भी सूरत में उस की बातों पर विश्वास करने को तैयार नहीं है तो उस ने धक्का दे कर उन्हें बैड पर गिरा दिया और बैड पर रखा तकिया उन के मुंह पर रख कर दबा दिया. जीत कौर ने हाथपैर चलाए तो रंजीत ने उन्हें पकड़ लिए. कुछ ही पलों में जीत कौर के प्राणपखेरू उड़ गए.

सास को मौत के घाट उतार कर अमन कौर घबरा गई. उस ने सवालिया नजरों से डा. रंजीत की ओर देखा तो उस ने सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘घबराने की जरूरत नहीं है. जो होना था सो हो गया. इस हत्या को हम मैडिकली मौत साबित कर देंगे.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘भई सीधी सी बात है. तुम्हारी सास बीमार रहती थीं, यह बात तुम्हारे पति के अलावा पड़ोसी भी जानते हैं. बीमार सास रात को खाना खा कर सोईं और कब मर गईं, किसी को पता नहीं चला.’’ डा. रंजीत ने कहा.

‘‘क्या यह सब इतना असान है?’’

‘‘तुम इस की बिलकुल चिंता मत करो. बस मैं जैसा कहता हूं, तुम करती जाओ.’’ डा. रंजीत ने कहा.

दोनों ने जीत कौर को इस तरह बैड पर लिटा दिया, जैसे वह सो रही हैं. इस के बाद डा. रंजीत ने अमन कौर को कमरे से निकाल कर खुद अंदर से बंद कर लिया और खिड़की से कमरे से बाहर आ गया. कमरे से बाहर आ कर डा. रंजीत ने कहा, ‘‘सुबह उठ कर तुम्हें शोर मचा कर पड़ोसियों को इकट्ठा करना है कि मांजी दरवाजा नहीं खोल रही हैं. पड़ोसी आ कर दरवाजा तोड़ेंगे और समझेंगे कि बीमार जीत कौर सोतेसोते मर गईं. किसी को जरा सा भी शक नहीं होगा कि उन की हत्या की गई है.’’

और सचमुच किसी को शक नहीं हुआ. सब ने वही समझा, जैसा डा. रंजीत और अमन कौर ने सोचा था. लेकिन अमन कौर की अलमारी में रखी फाइल ने सारा भेद खोल दिया. अगर डा. खन्ना न बताते कि अमन कौर ने इलाज के पैसे नहीं दिए हैं और फाइल के पर्चों में जो दवाएं लिखी हैं, उन्हें उन्होंने नहीं लिखी तो शायद लवप्रीत को कभी संदेह न होता और डा. रंजीत और अमन कौर साफ बच जाते. अमन कौर ने अपराध स्वीकार कर लिया तो मैं ने डा. रंजीत के घर छापा मार कर उसे भी गिरफ्तार कर लिया. अमन कौर के घर पकड़े गए तीनों छात्र निर्दोष थे, इसलिए उन्हें गवाह बना कर छोड़ दिया.

इस के बाद मैं ने जीत कौर की हत्या के आरोप में अमन कौर और डा. रंजीत को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. यह स्वच्छंदता का ही नतीजा था कि एक पढ़ीलिखी और अच्छे खानदान की बेटी और बहू आज जेल में है. उस के प्रेमजाल में फंस कर एक डाक्टर भी जेल पहुंच गया है. सच है, अवैध संबंध हमेशा बरबादी ही लाता है. यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है. Crime Kahani

Love Story in Hindi : गुनाह प्यार, सजा मौत

Love Story in Hindi : आरती का गुनाह यही था कि उस ने नेतराम से प्यार किया और घर वालों के मना करने के बावजूद उस से कोर्टमैरिज कर ली. घर के अन्य लोगों ने इसे एक दुर्घटना माना और सोच लिया कि आरती मर गई. लेकिन राकेश इस बात को भुला नहीं सका और 7 सालों बाद उसे मौत के घाट उतार दिया.

आरती आगरा की डिफेंस कालोनी के रहने वाले लौहरे सिंह चाहर की बेटी थी. उस के अलावा उन की 3 संतानें और थीं, जिन में 2 बेटे प्रवीण, राकेश और एक बेटी बीना थी. लौहरे सिंह सेना से सूबेदार से रिटायर हुए थे. उन का बड़ा बेटा प्रवीण भी पढ़लिख कर सेना में भर्ती हो गया था. नौकरी लगते ही लौहरे सिंह ने उस का विवाह कर दिया था. इस के बाद उस से छोटी बेटी बीना का भी विवाह लौहरे सिंह ने सेना में सिपाही की नौकरी करने वाले कमल सिंह सोलंकी के साथ किया था. वह चाहते थे कि उन का छोटा बेटा भी सेना में जाए. वह अपनी छोटी बेटी आरती की भी शादी सेना में नौकरी करने वाले से करना चाहते थे, लेकिन न तो उन का छोटा बेटा सेना में गया और न ही वह छोटी बेटी आरती की शादी सेना में नौकरी वाले लड़के से कर पाए.

दरअसल, लौहरे सिंह का छोटा बेटा राकेश लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. पढ़नेलिखने के बजाय यारदोस्तों की सोहबत उसे कुछ ज्यादा अच्छी लगती थी. दोस्तों के साथ वह जो उलटेसीधे काम करता था, उस की शिकायतें घर आती रहती थीं, जिस से लौहरे सिंह परेशान रहते थे. उन्होंने बड़े बेटे प्रवीण के साथ मिल कर उसे सुधारने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की इस कोशिश का कोई लाभ नहीं हुआ. राकेश को न सुधरना था, न सुधरा. बेटे की वजह से लौहरे सिंह की काफी बदनामी हो रही थी. बेटे को इज्जत की धज्जियां उड़ाते देख उन्होंने सोचा कि उसे किसी रोजगार से लगा दिया जाए तो दोस्तों का साथ अपनेआप छूट जाएगा.

इस के लिए उन्होंने बगल वाले मोहल्ले चावली में आटा चक्की लगवा कर उस पर उसे बैठा दिया. उस की मदद के 15 साल के मुकेश को नौकर रख दिया. मुकेश था तो नौकर, लेकिन राकेश से उस की खूब पटती थी. जबकि मुकेश की उम्र राकेश से काफी काम थी. चक्की पर अकसर आने वाली एक लड़की पर मुकेश का दिल आ गया. मुकेश ने उसे अपने प्रेमजाल में फंसाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लड़की ने उसे भाव नहीं दिया. चूंकि राकेश मुकेश से दोस्त जैसा व्यवहार करता था, इसलिए उस ने लड़की वाली बात राकेश को भी बता दी थी. जब लड़की ने मुकेश को भाव नहीं दिया तो राकेश ने कहा, ‘‘अगर किसी तरह तू उस लड़की से शारीरिक संबंध बना ले तो वह अपनेआप तेरी मुरीद हो जाएगी.’’

इस के बाद मुकेश उस लड़की से शारीरिक संबंध बनाने का मौका ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका तो मिल गया, लेकिन उस में उसे राकेश को भी साझा करना पड़ा. हुआ यह कि लड़की चक्की पर आटा लेने आई तो किसी बहाने से मुकेश उसे चक्की के पीछे बने कमरे में ले गया और उस के साथ जबरदस्ती कर डाली. उस समय राकेश भी वहां मौजूद था, इसलिए इस काम में उसे साझा करना पड़ा. राकेश ने सोचा था कि इज्जत के डर से लड़की कुछ नहीं बोलेगी. लेकिन जब उस ने कहा कि वह उन की करतूत घर वालों से बताएगी तो दोनों डर के मारे उसे चक्की के अंदर बंद कर के भाग गए. बाद में लड़की ने रोते हुए शोर मचाया तो मोहल्ले वालों ने उसे बाहर निकाला.

इस के बाद पीडि़त लड़की के घर वालों ने मुकेश और राकेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. चूंकि पीडि़त लड़की नाबालिग थी, इसलिए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने रातदिन एक कर के राकेश और मुकेश को पकड़ कर अदालत में पेश किया, जहां से राकेश को जेल भेज दिया गया तो नाबालिग होने की वजह से मुकेश को बाल सुधार गृह. मुकेश नाबालिग था, इसलिए करीब साढ़े 3 महीने बाद उसे जमानत मिल गई, लेकिन बालिग होने की वजह से राकेश की जमानत की अर्जियां एक के बाद एक खारिज होती गईं, जिस की वजह वह जेल से बाहर नहीं आ सका. यह सन 2006 की बात थी.

बेटे के जेल जाने से लौहरे सिंह की बदनामी तो हुई ही, परेशानी भी बढ़ गई थी. बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए वह काफी भागदौड़ कर रहे थे. इस में उन का समय भी बरबाद हो रहा था और पैसा भी. राकेश की वजह से वह छोटी बेटी आरती पर ध्यान नहीं दे पाए और उस ने भी जो किया, उस से एक बार फिर उन्हें बदनामी का दंश झेलना पड़ा. जिन दिनों राकेश ने यह कारनामा किया था, उन दिनों आरती कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. ग्रेजुएशन उस ने कर ही रखा था, इसलिए कंप्यूटर का कोर्स पूरा होते ही उसे एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर पर कंप्यूटर सिखाने की नौकरी मिल गई. इस नौकरी में वेतन तो ठीकठाक मिल ही रहा था, इज्जत भी मिल रही थी.

आरती ने जो चाहा था, वह उसे मिल गया था. मांबाप की लाडली होने की वजह वह वैसे भी जिद्दी थी, अब ठीकठाक नौकरी मिल गई तो घर में दबंगई दिखाने लगी. आरती जो चाहती थी, वही होता था. कमाऊ बेटी थी, इसलिए मांबाप भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे. जिस कंप्यूटर सेंटर पर आरती नौकरी कर रही थी, उसी में आगरा के थाना तेहरा (सैया) के गांव बेहरा छरई का रहने वाला नेतराम कुशवाह भी नौकरी करता था. वह चंदन सिंह की 9 संतानों में चौथे नंबर पर था. एमए करने के बाद उस ने कंप्यूटर कोर्स किया और उसी कंप्यूटर सेंटर पर शिक्षक की नौकरी करने लगा, जहां आरती नौकरी कर रही थी.

आरती और नेतराम हमउम्र और हमपेशा थे, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. इस के बाद दोनों साथसाथ बैठ कर चाय भी पीने लगे और लंच भी करने लगे. नेतराम को जब पता चला कि आरती डिफेंस कालोनी में रहती है और उस के पिता लौहरे सिंह चहार सेना से रिटायर सूबेदार हैं. उस का बड़ा भाई ही नहीं, बड़ी बहन का पति भी सेना में है तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘आरती, तब तो तुम्हारी शादी भी किसी फौजी से ही होगी.’’

‘‘हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती. मैं शादी उसी से करूंगी, जो मुझे अच्छा लगेगा. आप को बता दूं, यह जरूरी नहीं कि वह मेरी जाति का ही हो. वह किसी अन्य जाति से भी हो सकता है. तुम भी हो सकते हो.’’

आरती की इस बात से नेतराम हैरान रह गया. चूंकि वह कुंवारा था और आरती उसे पसंद थी. वह उस से शादी भी करना चाहता था, लेकिन जाति अलग होने की वजह से यह बात कहने की वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. जबकि लड़की हो कर आरती ने यह बात कह दी थी. लगातार मिलते रहने और साथसाथ खानापीना होने से आरती और नेतराम का आपसी सामंजस्य बैठता गया और फिर उन की दोस्ती सचमुच प्यार में बदल गई. इस के बाद नेतराम आरती के घर भी आनेजाने लगा. घर वाले उसे आरती का दोस्त मानते थे, इसलिए कभी किसी ने न तो उस के घर आने पर ऐतराज जताया, न उस से मिलनेजुलने पर.

इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि एक तो वह कमाऊ बेटी थी, दूसरे उन्हें विश्वास था कि उन की बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना करना पड़े. धीरेधीरे आरती और नेतराम का आपसी लगाव बढ़ता गया. उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे अलगअलग जाति से हैं. समय के साथ उन के प्यार की गांठ मजबूत होती गई और वे आपस में शादी के बारे में सोचने लगे. जब इस बात की जानकारी चाहर परिवार को हुई तो घर में हंगामा मच गया. एक तो जाट परिवार, दूसरे फौजी, हंगामा तो मचना ही था. लौहरे सिंह और प्रवीण ने आरती पर बंदिशें लगानी चाहीं तो वह बगावत पर उतर आई.

उस ने साफ कह दिया कि यह जिंदगी उस की अपनी है, वह जैसे चाहे जिए. अगर उसे परेशान किया गया या बंदिश लगाई गई तो वह उन की इज्जत का भी खयाल नहीं करेगी. इस के बाद आरती ने नेतराम से कहा कि जो भी करना है, जल्द कर लिया जाए. क्योंकि जितना समय बीतेगा, तनाव बढ़ता ही जाएगा. आरती का बड़ा भाई प्रवीण नौकरी की वजह से ज्यादातर बाहर ही रहता था. छोटा भाई जेल में था. घर में मातापिता थे, वे भी बूढ़े हो चुके थे. बेटे की वजह से वे वैसे ही परेशान थे, इसलिए आरती के बारे में वे वैसे भी ज्यादा नहीं सोच पाते थे.

नेतराम के भी इरादे मजबूत थे. वह जानता था कि पढ़ीलिखी, समझदार आरती के साथ उस की जिंदगी मजे से कटेगी. आरती उस के प्यार में इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उस का पीछे लौटना मुश्किल था. जबकि वह जानती थी कि अलग जाति होने की वजह से नेतराम से शादी करना उस के परिवार पर भारी पड़ सकता है. पूरी बिरादरी हायतौबा मचाएगी, लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी. उसे अपना भविष्य नेतराम में ही दिखाई दे रहा था. यही वजह थी कि न चाहते हुए भी उस ने 12 दिसंबर, 2007 में नेतराम के साथ कोर्टमैरिज कर ली. उस दिन सुबह आरती नौकरी के लिए घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. मां ने फोन किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है.

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, इसलिए लौहरे सिंह को समझते देर नहीं लगी कि आरती कहां गई होगी. अगले दिन आरती ने फोन कर के अपनी शादी के बारे में बड़ी बहन बीना को बताया तो उन्होंने इस बात की जानकारी मांबाप को दे दी. आखिर वही हुआ, जिस का चाहर परिवार को डर था. बेटी की इस करतूत से घर वालों को गहरा आघात लगा. एक बेटा दुष्कर्म के आरोप में जेल में था, बेटी ने गैर जाति के लड़के से शादी कर ली थी. बदनामी के डर से भले ही उन्होंने कोई काररवाई नहीं की, लेकिन वे उस के इस अपराध को माफ नहीं कर सकते थे. बेटी बालिग थी, वह उस का कुछ कर भी नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने यह सोच कर संतोष कर लिया कि वह उन के लिए मर गई. घर के अन्य लोगों ने तो खुद को संभाल लिया, पर आरती की मां खुद को नहीं संभाल पाई और बेटी के इस निर्णय की वजह से उस की मौत हो गई.

आरती ने नेतराम से शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली थी. वह उस के साथ खुश थी. पतिपत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे थे. इस के अलावा नेतराम घर से भी संपन्न था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई कभी नहीं थी. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद आरती ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम हर्षित रखा गया. आरती के घर वालों ने शादी के बाद कभी आरती के बारे में कुछ जानने की कोशिश नहीं की तो उस ने भी कभी कुछ नहीं बताया. नेतराम और आरती, दोनों ही पढ़ेलिखे और महत्वाकांक्षी थे. दोनों ठीकठाक कमाते भी थे, इस के अलावा वह घर से भी संपन्न था, इसलिए मजे से जिंदगी कट रही थी.

सन 2009 में नेतराम की मां सुमित्रा देवी का निधन हो गया था. तब तक आरती चाहर ने बीएड भी कर लिया था, इसलिए उस ने नेतराम से अपना एक स्कूल खोलने को कहा. नेतराम के पास पैसे भी थे और जमीन भी, उस ने अपने करीबी कस्बे तेहरा में मां के नाम सुमित्रा देवी कन्या इंटरकालेज खोल दिया. नेतराम खुद स्कूल का मैनेजर बन गया और पत्नी आरती को स्कूल का प्रिंसिपल बना दिया. उन का यह स्कूल जल्दी ही बढि़या चलने लगा, जिस से कमाई भी बढि़या होने लगी. इस के बाद नेतराम ने आगरा की नई विकसित हो रही कालोनी रचना पैलेस में एक प्लाट ले कर उस में 10 कमरों का बढि़या 2 मंजिला मकान बनवा लिया. इस मकान का नंबर था 93. मकान तैयार हो गया तो नेतराम पत्नी और बच्चों के साथ उसी में रहने लगा. अब तक आरती एक और बेटे की मां बन चुकी थी, जिस का नाम युवराज रखा गया था.

सन 2007 से सन 2014 तक के 7 साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला. नेतराम तरक्की के नित नए आयाम स्थापित करते चले गए. अब वह एक टैक्निकल कालेज खोलना चाहते थे. वह अपनी एक संस्था भी चला रहे थे, जिस के अंतर्गत गरीब और असहाय बच्चों को कंप्यूटर सिखाया जाता था. राष्ट्रीय कंप्यूटर शिक्षा मिशन के अंतर्गत चल रही इस संस्था की कई जिलों में शाखाएं खुल गई थीं. इन सभी शाखाओं का कोऔर्डिनेशन नेतराम खुद कर रहे थे. नेतराम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे थे. उन्हें अब किसी चीज की कमी नहीं थी. भरपूरा परिवार तो था ही, समाज में अच्छीखासी शोहरत और इज्जत मिलने के साथ पैसे भी खूब आ रहे थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक 20 नवंबर, 2014 को आरती की हत्या हो गई.

हुआ यह कि दिन के डेढ़ बजे नेतराम ने आरती को फोन किया तो फोन नहीं उठा. कई बार फोन करने के बाद जब आरती की ओर से फोन रिसीव नहीं किया गया तो उन्हें हैरानी हुई. इस के बाद उन्होंने ऊपर की मंजिल  में रहने वाले अपने किराएदार को फोन कर के आरती से बात कराने का अनुरोध किया. किराएदार अपना मोबाइल फोन ले कर नीचे आया और ‘भाभीजी… भाभीजी…’ आवाज लगाते हुए घर के अंदर पहुंचा तो बैडरूम का नजारा देख कर उस के होश उड़ गए. उस ने शोर मचा कर पूरी कालोनी तो इकट्ठा कर ही ली, नेतराम से भी तुरंत घर आने को कहा.

5-7 मिनट में ही नेतराम घर आ गए. मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह तेजी से घर के अंदर पहुंचे. उन के साथ कालोनी के कई लोग अंदर आ गए थे. घर के अंदर की स्थिति बड़ी ही खौफनाक थी. आरती की लाश बैड पर एक किनारे पड़ी थी, उस का सिर नीचे की ओर लटका हुआ था. गरदन से बह रहा खून फर्श पर फैल रहा था. आरती की बगल में बैठा युवराज रो रहा था. वह मर चुकी मां को उठाने के चक्कर में खून से सन चुका था. पत्नी की हालत देख कर नेतराम फफकफफक कर रोने लगे. रोते हुए ही उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े युवराज को उठाया और किराएदार को थमा कर उसे नहला कर कपड़े बदल देने का अनुरोध किया.

अब तक उन का बड़ा बेटा हर्षित भी स्कूल से आ चुका था. मां की हालत देख कर वह भी रोने लगा. पड़ोस की औरतों ने उसे संभाला. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पुलिस अधिकारियों की आधा दर्जन गाडि़यां रचना पैलेस में आ कर खड़ी हो गईं. एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, सीओ (सदर) असीम चौधरी थाना ताजगंज के थानाप्रभारी मधुर मिश्रा घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. डौग स्क्वायड, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और फोटोग्राफर को भी बुला लिया गया था. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से मकान और उस कमरे का निरीक्षण किया, जिस में आरती की लाश पड़ी थी. इस मामले में डौग स्क्वायड कोई खास मदद नहीं कर सका. उस ने बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक 3-4 चक्कर लगाए और मकान से बाहर आ कर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास रुक गया.

पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्यारे बैडरूम और ड्राइंगरूम के बीच चहलकदमी करते रहे होंगे. उस के बाद मकान से निकल कर बगल वाले मकान चारदीवारी के पास आए होंगे, जहां उन की मोटरसाइकिल या स्कूटर खड़ी रही होगी. मकान के निरीक्षण में पुलिस ने देखा कि हत्या के बाद हत्यारों ने बैडरूम के बगल में लगे वाशबेसिन में खून सने हाथ धोए थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स ने ड्राइंगरूम में रखे चाय के 2 कपों से फिंगरप्रिंट उठाए. चाय के कप और ट्रे में रखी नमकीन, मिठाई देख कर पुलिस अधिकारी समझ गए कि जिस ने भी यह कत्ल किया है, वह कोई खास परिचित रहा होगा.

अब पुलिस को यह पता करना था कि खास लोगों में ऐसा कौन हो सकता है, जो हत्या कर सकता है. पुलिस ने जब इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि मृतका आरती चाहर ने घर वालों के खिलाफ जा कर अन्य जाति के नेतराम कुशवाह से करीब 7 साल पहले प्रेमविवाह किया था. तब उस के घर वालों ने इस बात को अपना अपमान मान कर खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी. पुलिस को जांच आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिल गया था, लेकिन फिलहाल तो उन्हें घटनास्थल की काररवाई निपटानी थी. आवश्यक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने आरती की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उसी 7 साल पुरानी धमकी के आधार पर नेतराम ने आरती के भाई राकेश चाहर के खिलाफ आरती की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

चूंकि राकेश का एक साथी लोकेश भी अकसर नेतराम के घर आता रहता था, इसलिए नेतराम को शक था कि हत्या के समय वह भी साथ रहा होगा, इसलिए मुकदमे में उस का नाम भी शामिल करा दिया था. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए राकेश और लोकेश के फोन नंबर ले लिए. इस के बाद उन नंबरों पर फोन किए गए तो वे नंबर बंद पाए गए. हत्या के बाद नंबर बंद होने से पुलिस का संदेह बढ़ गया. इस मामले की जांच थाना ताजगंज का उसी दिन चार्ज संभालने वाले थानाप्रभारी मधुर मिश्रा को सौंपी गई.

उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक टीम बनाई, जिस में एसएसआई प्रमोद कुमार यादव, नरेंद्र कुमार, सिपाही रामन और आशीष कुमार को शामिल किया. चूंकि एक स्कूल प्रिंसिपल की दिनदहाड़े हत्या का मामला था, इसलिए सीओ सिटी असीम चौधरी भी इस मामले पर नजर रखे हुए थे. पुलिस को राकेश की तलाश थी. इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो घर में मौजूद उस का बड़ा भाई प्रवीण सिंह फौजी वर्दी की धौंस दिखाते हुए पुलिस से उलझ गया. नाराज पुलिस टीम उसे हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में उस से पूछताछ चल रही थी कि मुखबिर से पुलिस टीम को राकेश के साथी लोकेश के बारे में पता चल गया.

पुलिस लोकेश को पकड़ कर थाने ले आई. शुरुआती पूछताछ में तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. उस ने एक पान वाले से भी कहलवाया कि उस दोपहर को वह उस की दुकान पर बैठ कर अखबार पढ़ रहा था. पुलिस पान वाले को भी ले आई. इस के बाद जब पुलिस ने अपने ढंग से पूछताछ की तो पान वाले ने बक दिया कि उस ने लोकेश के कहने पर झूठ बोला था. इस के बाद पुलिस ने लोकेश से सच्चाई उगलवा ली. लोकेश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो उस की निशानदेही पर पुलिस ने थाना एत्माद्दौला की ट्रांस यमुना कालोनी के बी ब्लाक के मकान नंबर 3/5 से राकेश को गिरफ्तार कर लिया. सीओ असीम चौधरी दोनों को अपने औफिस ले आए, जहां की गई लगभग एक घंटे की पूछताछ में राकेश ने आरती की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

जिन दिनों आरती ने प्रेमविवाह किया था, उन दिनों राकेश जेल में था. दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत से उसे 10 साल के कैद की सजा हुई थी. घर वालों के खिलाफ आरती की छोटीमोटी बगावतें वह पहले से ही सुनता आ रहा था, लेकिन जब बड़े भाई प्रवीण ने उसे नेतराम से विवाह की खबर सुनाई तो उस का खून खौल उठा. नेतराम कुशवाह से उसे कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि अगर उस की बहन आरती न चाहती तो भला उस की क्या मजाल थी कि वह आरती से जबरदस्ती कोर्टमैरिज कर लेता. उस की नजरों में इस के लिए दोषी उस की बड़ी बहन आरती थी.

राकेश ने अपने घर वालों की इज्जत बचाने के लिए आरती को खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने जेल से ही आरती को धमकी दी कि उस ने जो किया है, इस के लिए वह उसे सबक जरूर सिखाएगा. उसी बीच आरती की वजह से मां की मौत हो गई तो राकेश को आरती से नफरत हो गई. उस ने कसम खा ली कि कुछ भी हो, वह आरती को जीवित नहीं छोड़ेगा. राकेश जेल की जिस बैरक में सजा काट रहा था, उसी में लोकेश नाम का एक लड़का आया. वह पड़ोस के ही मोहल्ले का रहने वाला था, इसलिए राकेश से उस की दोस्ती हो गई. जल्दी ही दोनों के संबंध इतने मधुर हो गए कि वे एक ही थाली में खाना खाने लगे. उन्होंने जीवन भर इस संबंध को निभाने की कसमें भी खाईं.

राकेश और लोकेश हमउम्र थे. दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे, इसलिए राकेश ने अपनी बहन आरती के प्रेमविवाह के बारे में बता कर पूछा कि इस मामले में क्या किया जाना चाहिए? समझदारी दिखाते हुए लोकेश ने सलाह दी कि इस मामले में अभी इंतजार करना चाहिए. आरती को उस के किए की सजा इस तरह दी जाए कि पुलिस भी पता न कर सके कि ऐसा किस ने किया होगा. आरती ने जो किया था, उस से घर के सभी लोग नाराज थे. इसलिए जब कभी कोई जेल में राकेश से मिलने आता तो उस का जिक्र जरूर छिड़ता. राकेश के लिए परेशानी यह थी कि उस के मुकदमे की कोई ठीक से पैरवी करने वाला नहीं था. मां मर चुकी थी, बाप बूढ़ा था, बड़ा भाई और बहनोई फौज में थे. जिस की वजह से वे ज्यादातर बाहर रहते थे. एक बहन थी बीना, वही कभीकभी मिलने आ जाती थी.

राकेश चाहता था कि किसी तरह हाईकोर्ट से उस की जमानत हो जाए. बूढ़े होने की वजह से पिता भागदौड़ नहीं कर पा रहे थे. इसलिए राकेश ने बीना से कहा कि वह आरती से बात कर के उस की जमानत करवा दे. बीना ने आरती को फोन कर के कहा भी कि वह जेल जा कर राकेश से मिल ले और उस की जमानत करा दे. लेकिन आरती न तो राकेश से मिलने जेल गई और न ही उस की जमानत कराई. जबकि राकेश के पिता लौहरे सिंह ने आरती को उस की जमानत कराने के लिए एक लाख रुपए नकद और इतने के गहने भी दिए थे. रुपए और गहने ले कर भी आरती ने राकेश की जमानत के प्रति ध्यान नहीं दिया.

राकेश जेल से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था. आरती न तो उस से मिलने गई थी और न उस की जमानत कराई थी. इस से उसे लगा कि बहन उस के बारे में जरा भी नहीं सोच रही है. लगभग 6 महीने पहले हाईकोर्ट से उस की जमानत हुई. राकेश घर आ गया. बहन के व्यवहार से उस के मन में एक टीस सी उठती थी. लेकिन अभी वह जमानत पर जेल से आया था, इसलिए कोई अपराध नहीं करना चाहता था. इस के बावजूद वह बहन को उस के किए की सजा देना चाहता था. लेकिन वह यह काम इस तरह करना चाहता था कि उस पर आरोप लगने की बात तो दूर, कोई शक भी न कर सके. इस के लिए उस ने आरती से मधुर संबंध बनाने शुरू किए. जल्दी ही उस ने इस तरह संबंध बना लिए, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है.

राकेश के बदले व्यवहार से आरती भी उसे मानने लगी थी. वह जब भी आता था, आरती उसे खूब खिलातीपिलाती थी, जाते समय कुछ न कुछ बांध भी देती थी. जरूरत पड़ने पर रुपएपैसे से भी उस की मदद करती थी. इस के अलावा अगर वह पति और बच्चों के साथ कहीं बाहर घूमने जाती थी तो उसे भी साथ ले जाती. उसी बीच लोकेश भी जेल से बाहर आ गया तो दोनों साथसाथ दिखाई देने लगे. आरती के ठाठबाट और सुखी जीवन से राकेश को ईर्ष्या हो रही थी. वह सोचता था कि अगर आरती चाहती तो बहुत पहले ही वह जेल से बाहर आ जाता. लेकिन उस ने उस की परेशानी को बिलकुल नहीं समझा. आरती भले ही राकेश का खूब खयाल रखती थी, लेकिन सही बात यह थी कि आरती बिलकुल नहीं चाहती कि राकेश उस के घर आए.

इस बात को राकेश समझ गया था, इसलिए वह खुद को अपमानित महसूस करता था. इन सब बातों से उसे लगता था कि इस तरह की बहन को सुख से जीने का कोई अधिकार नहीं है. राकेश के मन में क्या है, शायद आरती ने ताड़ लिया था. इसलिए वह उस की ओर से निश्चिंत नहीं थी. वह नेतराम से कहती भी रहती थी कि उसे राकेश से डर लगता है. जबकि नेतराम का कहना था कि राकेश तो वैसे ही कानून के शिकंजे में है, इसलिए अब वह कोई गैरकानूनी काम कर के अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करेगा. एक दिन राकेश लोकेश को साथ ले कर आरती के घर पहुंचा. जब आरती को पता चला कि लोकेश भी जेल से छूट कर आया है तो उसे झटका सा लगा. उस ने राकेश से कहा भी, ‘‘उसे ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहिए.’’

राकेश को बहन की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘‘यह मेरा देस्त है. दोस्त कैसा भी हो, दोस्त ही होता है.’’

इस के बाद राकेश आरती के घर से बाहर आया तो लोकेश से बोला, ‘‘दोस्त, मैं अपनी इस बहन को सहन नहीं कर पा रहा हूं. मेरे घर वालों के मुंह पर कालिख पोत कर देखो यह किस तरह सुख और चैन से जी रही है.’’

‘‘उस कालिख को तो इस के खून से ही धोया जा सकता है.’’ लोकेश ने कहा. राकेश भी यही सोच रहा था. साथी मिल गया तो उस का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि परिवार की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली बहन को कैसे सबक सिखाया जाए. आरती को भले ही राकेश पर विश्वास नहीं था, लेकिन राकेश बहन और बहनोई का विश्वास जीतने कोशिश कर रहा था. हफ्ते में 2-3 बार वह बहनबहनोई और भांजों से मिलने उन के घर आता था. उस के साथ लोकेश भी होता था. आरती के पास किसी चीज की कमी नहीं थी, इसलिए अच्छाअच्छा खिलानेपिलाने के साथ वह छोटे भाई राकेश को पौकेट मनी भी देती थी. इस की वजह यह थी कि आरती और नेतराम राकेश से अपने संबंध मधुर बना लेना चाहते थे.

26 नवंबर, 2014 को वैष्णो देवी जाने के लिए नेतराम ने पूरे परिवार का टिकट कराया था. नेतराम ने साथ ले जाने के लिए राकेश की भी टिकट करा रखी थी. जबकि राकेश बहन को सबक सिखाने का मौका तलाश रहा था. 18 नवंबर को राकेश और लोकेश आरती के यहां बैठे बातें कर रहे थे, तभी बातोंबातों में नेतराम ने कहा कि 20 नवंबर को उसे सजावट का सामान (झूमर झाड़फानूस) लेने फिरोजाबाद जाना है. यह सुन कर राकेश की आंखों में चमक आ गई. थोड़ी देर बाद राकेश लोकेश के साथ बाहर आ गया. इस के बाद उस ने लोकेश के साथ मिल कर आरती की हत्या की योजना बना डाली.

18 नवंबर की बातचीत के अनुसार, 20 नवंबर की सुबह के करीब 11 बजे नेतराम को फिरोजाबाद जाने के लिए घर से निकलना था. लेकिन इस बीच उस का प्रोग्राम बदल गया. उस ने डिजाइन पसंद करने के लिए आरती को भी साथ चलने के लिए तैयार कर लिया था. इस नए प्रोग्राम के अनुसार उसे 2 बजे के आसपास घर से निकलना था. नेतराम का बड़ा बेटा हर्षित स्कूल गया था, जिसे डेढ़ बजे तक घर आना था. आरती चाहती थी कि वह अपने हाथों से उसे खाना खिला कर फिरोजाबाद जाए.

नेतराम के फिरोजाबाद जाने के प्रोग्राम में बदलाव हो चुका है, यह राकेश और लोकेश को पता नहीं था. 20 नवंबर, 2014 दोपहर के बाद नेतराम और आरती को फिरोजाबाद जाना था, इसलिए नेतराम अपने कंप्यूटर सेंटर के काम से 2-3 घंटे में आने के लिए कह कर सेवला स्थित एक साइबर कैफे पर चला गया. आरती घर के कामों में लग गई. नेतराम के जाते ही साढ़े 10 बजे के आसपास राकेश मोटरसाइकिल से लोकेश को साथ ले कर आरती के घर के लिए चल पड़ा. आरती को सबक सिखाने की योजना राकेश ने 18 नवंबर को ही बना डाली थी, इसलिए 19 नवंबर की शाम को उस ने चाकू खरीद लिया था. हत्या करने में किसी तरह की झिझक न हो, इसलिए एकएक क्वार्टर शराब खरीद कर पी लिया.

सवा 11 बजे जब राकेश और लोकेश मोटरसाइकिल से रचना पैलेस कालोनी की ओर जा रहे थे तो उन्हें नेतराम जाता दिखाई दिया. उन्हें लगा कि वह फिरोजाबाद जा रहा है. इस के बाद दोनों एक पान के खोखे के पास खड़े हो गए. आधेपौने घंटे बाद जब उन्हें लगा कि नेतराम शहर से बाहर निकल गया होगा तो दोनों आरती के घर की ओर चल पड़े. योजनानुसार राकेश ने मोटरसाइकिल आरती के घर से कुछ दूरी पर बगल वाले मकान की चारदीवारी के पास खड़ी कर दी और इधरउधर देख कर लोकेश के साथ बहन के घर जा पहुंचा. भाई और उस के दोस्त के आने पर आरती ने फटाफट चाय बनाई और नमकीन एवं मिठाई के साथ उन्हें पीने को दी. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘राकेश, तुम दोनों चाय पियो, तब तक मैं युवराज को नहला देती हूं.’’

यह कह कर आरती युवराज को गोद में ले कर कपड़े उतारने लगी तो राकेश ने कहा, ‘‘दीदी, आप ने कुछ देने को कहा था. लाइए उसे दे दीजिए.’’

आरती ने युवराज को लोकेश को थमाया और खुद किचन में गई. अब तक चाय खत्म हो चुकी थी. इसलिए किचन में जा कर जैसे ही आरती ने फ्रिज खोलना चाहा, पीछे से राकेश पहुंच गया. उस ने आरती के गले में पड़े दुपट्टे की लपेट कर पकड़ लिया और घसीटते हुए बैडरूम ले गया. हक्काबक्का आरती कुछ कहती, युवराज को लोकेश की गोद में देख कर डर गई कि उस के चिल्लाने पर वह उस के बेटे का अनिष्ट न कर दे. इस के बाद राकेश ने आरती को बैड पर गिरा कर चाकू से हमला कर दिया. गला रेत कर उस की हत्या करने के बाद गले की चेन और कान के कुंडल उतार लिए. इस के बाद अलमारी वगैरह खोल कर उस में रखा कीमती सामान ले कर इधरउधर फैला दिया, जिस से लगे कि यह हत्या लूट के लिए की गई है.

आरती की हत्या करने के बाद दोनों घर से निकले और मोटरसाइकिल से आराम से चले गए. लोकेश अपने घर चला गया, जबकि राकेश अपने एक दोस्त के घर जा कर लोकल न्यूज चैनल पर समाचार देखने लगा कि पुलिस की जांच किस दिशा में जा रही है. राकेश पुलिस जांच का पता लगा पाता, पुलिस ने पहले लोकेश को और फिर उस की मदद से उसे पकड़ लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू, गहने, मोटरसाइकिल और कपड़े बरामद कर के दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

राकेश ने बहन को मौत के घाट उतार कर उस के मासूम बच्चों को अनाथ कर दिया है. लेकिन उसे न तो बहन की हत्या का कोई दुख है, न उस के बच्चों के अनाथ होने का. उस का कहना है कि बहन ने परिवार पर बदनामी का जो दाग लगाया था, उस के खून से उस ने वह दाग धो दिया है. अब उसे चाहे जो भी सजा मिले, उसे उस का कोई दुख नहीं है. Love Story in Hindi

 

Family Dispute : ऐसी राहों पर खैर नहीं

Family Dispute : अशोक ने भाई ज्योति कुमार और उस के दोस्त नवल के साथ मिल कर अपनी पत्नी और 2 मासूम बेटियों की हत्या करा दी थी. तब उस ने सोचा कि पीछा छूटा. लेकिन कानून उसे और उस के सहयोगी हत्यारों को उन के अंजाम तक ले ही गया.  25 अप्रैल, 2014 को लुधियाना के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद की अदालत में अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन हत्या के एक महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था. मुकदमा चूंकि दिल दहला देने वाला था, इसलिए अन्य वकील भी बहस सुनने के लिए अदालत में मौजूद थे.

इस मामले में अभियुक्तों ने एक महिला सिमरन कौर उर्फ पिंकी और उस की 8 साल तथा 5 साल की 2 मासूम बेटियों दिव्या और पूजा की बेरहमी से हत्या कर दी थी. बचाव पक्ष के वकील रछपाल सिंह मंड अपने सहायकों के साथ अदालत में मौजूद थे. अभियोजन पक्ष के वकील गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल भी पूरी तैयारी के साथ आए थे. 11 बजे जज साहब के आने पर मकुदमे की काररवाही शुरू हुई. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद ने फाइल पर नजर डाल कर बचाव पक्ष के वकील आर.एस. मंड से कहा, ‘‘मंड साहब, आप को इस मामले में कुछ कहना है?’’

‘‘जी सर,’’ एडवोकेट मंड ने आगे आ कर कहा, ‘‘जैसा कि मैं पहले ही अदालत को बता चुका हूं कि हत्या के इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. पूरा मुकदमा हालात पर निर्भर है. अभियोजन पक्ष को एक भी ऐसा गवाह नहीं मिला, जो इस जघन्य हत्याकांड पर रोशनी डालता. हम सिर्फ यही मान कर चल रहे हैं कि ऐसा हुआ था, वैसा हुआ होगा?’’

जज साहब एडवोकेट मंड की इन बातों पर कोई टिप्पणी करते, उस से पहले ही अभियोजन पक्ष के वकील गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल ने कहा, ‘‘सर, रात में उस सुनसान जगह पर बैठ कर कोई आदमी यह इंतजार तो करेगा नहीं कि वहां हत्याएं होने वाली हैं और उसे उन हत्याओं का चश्मदीद गवाह बनना है. मौकाए वारदात पर अभियुक्तों के जूतों के निशान, चाकू पर मिले अंगुलियों के निशान और मृतका सिमरन की मुट्ठी में मिले आरोपियों के सिर के बाल ही उन्हें दोषी ठहराने के लिए काफी हैं. इन से भी बड़ा सुबूत है, इन हत्याओं के पीछे अभियुक्तों का मकसद, जो पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है. इसलिए मैं एक बार पुन: अदालत से दरख्वास्त करूंगा कि इन हत्याओं के लिए अभियुक्तों को फांसी दी जानी चाहिए.’’

‘‘मैं मानता हूं कि हालात मेरे मुवक्किलों के पक्ष में नहीं हैं,’’ एडवोकेट मंड ने जज साहब को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘इस के बावजूद मैं अदालत से निवेदन करूंगा कि मेरे मुवक्किलों के साथ नरमी बरती जाए और इन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाए.’’

‘‘सर, संदेह का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. 5 चाकुओं पर अंगुलियों के निशान, मृतका की मुट्ठी से बरामद बाल, हत्या का उद्देश्य और गवाहों के बयान से संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. शीशे की तरह साफ है कि हत्याएं इन्हीं लोगों ने की थीं.’’ एडवोकेट गुरप्रीत सिंह ग्रेवाल ने कहा.

‘‘बिना चश्मदीद गवाह के किसी को सजा देना उस के साथ न्याय नहीं होगा.’’ एडवोकेट मंड ने अपना आखिरी दांव चलाया.

बहस पूरी हुई तो अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.पी. सूद फैसला सुनाने की तैयारी करने लगे. अदालती फैसले से पहले आइए इस हत्याकांड की कहानी जान लें, जिस से फैसले को समझने में आसानी रहे. 28 दिसंबर, 2009 की सुबह लुधियाना पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली थी कि हैबोवाल क्षेत्र में सिविल सिटी स्थित संधुनगर से गुजरने वाली रेलवे लाइन के पास खेतों में एक महिला और 2 बच्चियों की लाशें पड़ी हैं. कंट्रोल रूम ने इस की सूचना संबंधित थाना सलेम टाबरी को दे दी थी. सूचना पा कर थाना सलेम टाबरी पुलिस घटनास्थल पर तो पहुंच गई, लेकिन कोई भी काररवाई करने से मना कर दिया. उस का कहना था कि घटनास्थल थाना जीआरपी के अंतर्गत है.

इस पर थाना जीआरपी को सूचना दी गई. जीआरपी पुलिस ने आ कर कहा कि यह इलाका उन के अंडर में नहीं है. उन का कहना था कि यह क्षेत्र थाना हैबोवाल में आता है. सूचना पा कर थाना हैबोवाल पुलिस घटनास्थल पर आई. लेकिन उस ने भी काररवाई करने से मना कर दिया. इस तरह कई घंटों तक सीमा विवाद को ले कर काररवाई अटकी रही. चूंकि हत्याओं का मामला था, इसलिए यह बात काफी तेजी से शहर में फैल गई थी. मीडियाकर्मी और पुलिस अधिकारी भी आ गए थे. अंत में एसीपी हर्ष बंसल के हस्तक्षेप पर थाना हैबोवाल पुलिस को काररवाई करनी पड़ी.

थाना हैबोवाल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने अपराध संख्या 271/09 पर भादंवि की धारा 302/34 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर के जांच का कार्यभार अतिरिक्त थानाप्रभारी सबइंसपेक्टर अजायब सिंह को सौंप दिया. घटनास्थल पर लगी भीड़ में मृतका सिमरन के घर वाले भी मौजूद थे, इसलिए लाश की शिनाख्त में कोई परेशानी नहीं हुई. लाशों के निरीक्षण में मृतका सिमरन उर्फ पिंकी की मुट्ठी से कुछ बाल बरामद हुए थे, इस का मतलब था कि मृतका और हत्यारे के बीच संघर्ष हुआ था. घटनास्थल से पुलिस को मृत बच्चियों के पास से चिप्स के खाली पैकेट भी मिले थे. मृतका सिमरन और 5 वर्षीया बच्ची पूजा की लाश रेलवे लाइन के बिलकुल पास मिली थी.

जबकि 8 वर्षीया दिव्या की लाश वहां से थोड़ी दूर पर डिप्टी सिंह के खेत से मिली थी. खेत की सिंचाई की गई थी, जिस से उस में कीचड़ था. अंदाजा लगाया गया कि जान बचाने के लिए दिव्या भागी होगी, लेकिन कीचड़ होने की वजह से वह ज्यादा भाग नहीं पाई. रेलवे लाइन से करीब 200 मीटर की दूरी पर मृतका सिमरन का शौल पड़ा था. सबइंसपेक्टर अजायब सिंह ने क्राइम टीम बुला कर घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य एकत्र कराए. उस के बाद घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

स्वरूपनगर निवासी मृतका के पिता विजय ने पुलिस को बताया था कि सिमरन उर्फ पिंकी सहित उन की 4 संताने हैं. सिमरन उर्फ पिंकी की शादी उन्होंने सन 2000 में करनाल, हरियाणा के कुराली निवासी अशोक के साथ की थी. उस की 2 बेटियां थीं, 8 वर्षीया दिव्या और 5 वर्षीया पूजा. शादी के बाद 6-7 सालों तक तो सब ठीकठाक रहा, पर पिछले कुछ समय से पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर झगड़ा होने लगा था. यह बात तलाक तक पहुंच गई थी, लेकिन पंचायत के बीच में आ जाने से तलाक होने से बच गया. विजय ने सबइंसपेक्टर अजायब सिंह को जो बताया था, उस के अनुसार 26 दिसंबर, 2008 को सिमरन अपनी दोनों बेटियों दिव्या, पूजा और पति अशोक के साथ अपने देवर की शादी के कार्ड देने लुधियाना आई थी.

कुछ कार्ड उस ने उसी दिन पहुंचा दिए थे और कुछ कार्ड अगले दिन यानी 27 तारीख को जा कर दिए थे. 27 तारीख की शाम को सिमरन और उस के पति अशोक में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ. लेकिन थोड़ी ही देर में दोनों में समझौता हो गया. उस के बाद अशोक कहीं चला गया. उस के जाने के थोड़ी देर बाद सिमरन दोनों बेटियों को ले कर बाजार घुमाने गई तो लौट कर नहीं आई. अगले दिन उन की लाशें मिलीं. सिमरन और उस की बेटियों की तलाश में वे लोग रात भर भटकते रहे थे.

सबइंसपेक्टर अजायब सिंह ने मृतका के पति अशोक से पूछताछ की, उस ने भी वही सब बताया, जो उस के ससुर ने बताया था. अजायब सिंह की समझ में यह नहीं आ रहा था कि सिमरन बेटियों को ले कर बाजार गई थी तो वह रेलवे लाइनों के पास सुनसान में कैसे पहुंच गई? जरूर वह वहां किसी परिचित के साथ गई होगी, पर किस के साथ? पोस्टमार्टम के बाद तीनों लाशें घर वालों को सौंप दी गईं. पोस्टमार्टम के अनुसार, दोनों लड़कियों की हत्या गला रेत कर की गई थी. सिमरन के शरीर पर चाकू के तमाम घाव थे. इस के अलावा उस के एक पैर की नस भी काटी गई थी. तीनों की मौत शरीर का खून बह जाने की वजह से हुई थी.

पुलिस का मानना था कि इन हत्याओं में किसी परिचित का हाथ था. इसलिए पुलिस का शक बारबार मृतका के पति अशोक पर जा रहा था. इस के बाद पुलिस ने मुखबिरों से जो जानकारी जुटाई, उस के अनुसार अशोक अपनी पत्नी सिमरन उर्फ पिंकी पर संदेह करता था. उसे संदेह था कि किसी के साथ उस के अवैध संबंध हैं. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा होता था और बात तलाक तक पहुंच गई थी. अशोक की करनाल रेलवे स्टेशन रोड पर साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. उस की आमदनी सीमित थी, जबकि सिमरन के खर्च शाही थे. वह एक महत्वाकांक्षी और आजाद खयालों वाली महिला थी. जबकि अशोक का परिवार पुराने खयालों वाला था.

शक के आधार पर अजायब सिंह ने अशोक के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि अशोक ने हत्याओं से कुछ घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक अपने भाई ज्योति से कई बार बात की थी. इस के बाद ज्योति के फोन की लोकेशन पता की गई तो उस की लोकेशन पहले करनाल की और उस के बाद लुधियाना की मिली. घटना वाले समय उस की लोकेशन घटनास्थल की पाई गई थी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. इस के बाद पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो अशोक ने अपनी पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि उस ने तीनों हत्याएं छोटे भाई ज्योति कुमार और उस के दोस्त नवल के साथ मिल कर की थीं. इस काम के लिए उस ने नवल को 20 हजार रुपए देने का वादा किया था.

अशोक पकड़ा जा चुका था. ज्योति और नवल को गिरफ्तार करने के लिए सबइंसपेक्टर अजायब सिंह करनाल गए और पूछताछ के बहाने ज्योति और उस के दोस्त नवल को लुधियाना ले आए. पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में अशोक, ज्योति कुमार और नवल से की गई पूछताछ में सिमरन, दिव्या और पूजा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह बहुत ही शर्मनाक थी. अशोक और सिमरन की शादी सन 2000 में हुई थी. शुरूशुरू में दोनों का वैवाहिक जीवन काफी खुशहाल रहा. अशोक की साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी. वह मेहनती और दूर की सोच रखने वाला था, जबकि सिमरन इस से बिलकुल उलटी थी. वह आजाद पंछी की तरह जीवन गुजारने वाली महिला थी. आजाद खयाल की होने के साथसाथ, वह महत्वाकांक्षी भी थी.

बनठन कर रहना और खुले हाथों खर्च करना सिमरन की आदत में शुमार था. अशोक को यह सब बिलकुल अच्छा नहीं लगता था, लेकिन किसी तरह वह निर्वाह कर रहा था. सिमरन 2 बेटियों की मां बन गई, इस के बावजूद उस की स्वछंदता में कोई सुधार नहीं हुआ. उसी बीच मिसरन की मुलाकात अपने एक पुराने परिचित से हुई. वह लुधियाना में उस के पड़ोस में रहता था. उन दिनों वह करनाल की किसी कंपनी में नौकरी कर रहा था. सिमरन अपने उस परिचित युवक से मिलनेजुलने लगी. उन की मुलाकातें दिनोंदिन बढ़ती गईं. वह उसे अपने घर भी बुलाने लगी. जब इस बात का पता अशोक को चला तो उस ने सिमरन को डांटा. उस ने सिमरन को उस युवक से संबंध तोड़ने और उसे घर पर न बुलाने के लिए कहा, पर सिमरन उस से संबंध विच्छेद करने को तैयार नहीं थी.

इसी बात को ले कर आए दिन दोनों में झगड़ा होने लगा. अशोक ने जब अपने सूत्रों से सिमरन के बारे में पता किया तो उसे जानकारी मिली कि सिमरन के दोस्ताना संबंध उसी एक युवक से नहीं, बल्कि और भी कई युवकों से हैं. अशोक के लिए यह बात बरदाश्त से बाहर थी, जबकि सिमरन को इस की जरा भी परवाह नहीं थी. परिणामस्वरूप अच्छीखासी चल रही गृहस्थी टूटने के कगार पर आ गई. अशोक ने अपनी गृहस्थी को बचाने के लिए सिमरन को काफी समझाने की कोशिश की, ससुराल वालों से भी शिकायतें कीं. जब कोई नतीजा नहीं निकला तो अशोक उसे तलाक देने के बारे में सोचने लगा.

लेकिन जब तलाक देने की नीयत से अशोक वकील के पास सलाह लेने पहुंचा तो वकील ने जो बताया, उस से उस का मन बदल गया. वकील ने बताया था कि बालिग होने तक बेटियां मां के साथ रहेंगी, लेकिन उन का खर्च उसे देना पड़ेगा. एक तो अशोक की इतनी कमाई नहीं थी कि वह दूसरी शादी कर के बेटियों का खर्च उठाता, दूसरे उसे इस बात का भी डर सता रहा था कि मां के साथ रह कर उस की बेटियां भी चरित्रहीन हो जाएंगी. इस के अलावा उसे यह भी लगता था कि तलाक के बाद अगर बेटियां उस के साथ आ गईं तो वह उन का क्या करेगा.

उस ने इन बातों पर गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि इन सब से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि सब की हत्या कर दी जाए. इस के बाद उस ने सब की हत्या की योजना बना डाली, लेकिन समस्या यह थी कि यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था. अशोक ने घरपरिवार की इज्जत का हवाला दे कर अपने भाई ज्योति कुमार को अपनी योजना में शामिल कर लिया. ज्योति के हामी भरने पर 2 लोग हो गए. लेकिन हत्या उन्हें 3 लोगों की करनी थी, इसलिए उस ने ज्योति से कहा, ‘‘एक आदमी और होता तो काम करने में आसानी रहती.’’

इस पर ज्योति ने अपने दोस्त नवल को 20 हजार रुपए देने का वादा कर के हत्याओं में शामिल होने के लिए तैयार कर लिया. नवल करनाल में टैक्सी चलाता था. वह पैसों की वजह से नहीं, ज्योति की दोस्ती की वजह से हत्या जैसा अपराध करने को तैयार हुआ था. अशोक की बुआ के बेटे राजेश की 7 जनवरी को शादी थी. योजना के अनुसार, राजेश की शादी के कार्ड बांटने के लिए अशोक पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों को ले कर अपनी ससुराल लुधियाना आ गया. यह 26 दिसंबर की बात थी. कुछ कार्ड उन्होंने उसी दिन बांट दिए. इस बीच अशोक फोन से लगातार ज्योति से संपर्क बनाए रहा.

27 दिसंबर, रविवार को योजनानुसार ज्योति अपने दोस्त नवल के साथ सुबह साढ़े 9 बजे की ट्रेन पकड़ कर दोपहर को लुधियाना पहुंच गया. अपने पहुंचने की सूचना उस ने फोन द्वारा अशोक को दे दी. दोपहर को अशोक उन से जालंधर बाईपास चौक पर मिला. वहां से तीनों रेलवे लाइन के किनारेकिनारे पैदल चलते हुए सिविल सिटी संधुनगर काली मंदिर के पास पहुंचे. यही वह स्थान था, जहां उन्हें तीनों हत्याएं करनी थीं. वहां उन्होंने सलाह की कि कैसे और किस तरह तीनों को मारना है. पूरी योजना समझा कर अशोक अपनी ससुराल चला गया.

ससुराल में अशोक सिमरन और दोनों बेटियों के साथ बैठा हंसीमजाक करता रहा. दामाद और बेटी को हंसतेबोलते देख ससुराल वाले भी खुश थे. योजनानुसार कुछ ही देर में अशोक ने सिमरन से झगड़ा कर लिया, लेकिन जल्दी ही उसे मना भी लिया. शाम 7 बजे के आसपास अशोक ने सिमरन को अपने पास बुला कर कहा, ‘‘सिमरन, अभीअभी ज्योति का फोन आया था कि उस ने नई कार खरीदी है और माथा टेकने के लिए वह माता चिंतपूर्णी के दरबार जा रहा है. उस ने कहा है कि जब तक हम लोग साथ नहीं चलेंगे, वह नहीं जाएगा. अब तुम्हीं बताओ हमें क्या करना चाहिए.’’

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है कि देवरजी ने कार खरीद ली है. हम जरूर साथ जाएंगे. इसी बहाने देवी के दर्शन हो जाएंगे.’’ सिमरन ने खुशी प्रकट करते हुए कहा.

इस के बाद अशोक कुछ नहीं बोला तो सिमरन ने कहा, ‘‘तुम कुछ सोच रहे हो क्या?’’

‘‘तुम जैसा सोच रही हो, वैसा नहीं हो सकता.’’

‘‘क्यों?’’ सिमरन ने पूछा.

‘‘क्योंकि तुम्हारे घर वाले हमें जाने नहीं देंगे. हमारे आने की खुशी में आज उन्होंने खानेपीने का इंतजाम किया है.’’ अशोक ने कहा, ‘‘मैं ने दादीजी से पूछा था, उन्होंने डांट कर कहा कि खबरदार जो कहीं गए.’’

‘‘तब क्या किया जाए?’’ सिमरन ने पूछा तो अशोक ने कहा, ‘‘एक तरीका है. तुम दिव्या और पूजा को बाजार घुमाने के बहाने ले कर रेलवे लाइन के उस पार पहुंचो. मैं तुम्हें वहीं मिलता हूं. फोन कर के ज्योति को भी वहीं बुला लेता हूं. वहीं से हम सभी मंदिर चलेंगे. वापसी में ज्योति हमें यहीं छोड़ देगा.’’

सिमरन अशोक की बातों में आ गई.  वैसे तो सिमरन बहुत चालाक थी, लेकिन जब मौत आती है तो चालाकी काम नहीं देती. सिमरन को मना कर अशोक 7 बजे घर से निकल गया. उस के 10 मिनट बाद सिमरन भी दोनों बेटियों को बाजार घुमाने के बहाने ले कर घर से निकल पड़ी. कुछ देर में वह अशोक द्वारा बताई जगह पर पहुंच गई. अशोक भी पीछे से वहां पहुंच गया.

सिमरन ने पूछा, ‘‘ज्योति कहां है?’’

‘‘वह रेलवे लाइन के उस पार आ रहा है. तुम बच्चों को ले कर उस पार चलो. मैं अभी आ रहा हूं.’’

सिमरन दोनों बेटियों दिव्या और पूजा को ले कर लाइन के उस पार जाने लगी तो अशोक ने वहीं छिपे ज्योति और उस के दोस्त नवल को इशारा कर दिया और खुद ससुराल लौट आया, जिस से किसी को उस पर संदेह न हो. अशोक के कहने पर सिमरन दोनों बेटियों को ले कर रेलवे लाइन के उस पार जाने के लिए आगे तो बढ़ी, लेकिन उसे डर लगा, क्योंकि अंधेरा होने के साथ वहां सन्नाटा था. बहरहाल, उस ने जैसे ही रेलवे लाइन पार की, किसी चीते की तरह नवल हाथ में चाकू लिए उस पर झपटा. ज्योति ने दिव्या पर वार करना चाहा. अचानक हुए हमले से घबरा कर सिमरन ने शोर मचा दिया और दोनों बेटियों को ले कर खेत की ओर भागी. लेकिन ज्योति ने दौड़ कर पीछे से उन्हें दबोच लिया.

हाथ में लिए चाकू से ज्योति ने सिमरन की गर्दन पर पूरी ताकत से वार किया. लेकिन चाकू सिमरन की गर्दन की हड्डी में लगा, जिस से वह हत्थे के पास से टूट कर नीचे गिर गया. इस के बाद नवल ने अपने चाकू से उस की हत्या कर दी. मरने से पहले सिमरन ने जान बचाने के लिए ज्योति और नवल से खूब संघर्ष किया था. इसी संघर्ष में नवल के सिर के बाल उस की मुट्ठी में आ गए थे, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया था. सिमरन की हत्या करने के बाद नवल और ज्योति दिव्या और पूजा के पीछे दौड़े. मां की हत्या होते देख दोनों लड़कियां जान बचाने के लिए भागीं तो, लेकिन खेत में कीचड़ होने की वजह से भाग नहीं पाई. वैसे भी पूजा तो अभी छोटी ही थी. ज्योति ने पूजा की और नवल ने दिव्या की गला रेत कर हत्या कर दी.

मांबेटियों को मौत के घाट उतारने के बाद उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी अशोक को दे दी. इस काम में उन्हें 20-25 मिनट लगे थे. तीनों की हत्या और अशोक को सूचना देने के बाद दोनों बस से करनाल के लिए रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने राजपुरा के पास चलती बस से अपनी जैकेट उतार कर फेंक दीं, क्योंकि उस पर खून के छीटें पड़ गए थे. रिमांड के दौरान जांच अधिकारी अजायब सिंह ने चाकू और जैकेट बरामद कर लिए थे. सिमरन की हत्या करने के बाद ज्योति ने कान में पहनीं उस की सोने की बालियां उतार ली थीं. अजायब सिंह ने उन्हें भी बरामद कर लिया था. दूसरी ओर जब काफी देर तक सिमरन बाजार से लौट कर नहीं आई तो योजनानुसार अशोक ने चिंता व्यक्त करते हुए अपने ससुराल में हंगामा खड़ा कर दिया.

वह रिश्तेदारों के साथ खुद भी रात भर सिमरन और बेटियों की तलाश करता रहा. सुबह वह अपने रिश्तेदारों और ससुर विजय को सिमरन की तलाश में जानबूझ कर उस ओर ले गया, जहां मांबेटियों की लाशें पड़ी थीं. इस मामले में अभियोजन पक्ष ने अपनी ओर से कुल 19 गवाह पेश किए थे, जिन में घटनास्थल के फोटो खींचने वाला फोटोग्राफर, क्राइमटीम, पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर और कुछ पुलिसकर्मियों के अलावा मुख्य गवाह था मृतका का पिता विजय. तीनों आरोपियों के इकबालिया बयान भी थे, जिन्हें अदालत ने सच माना था. अपने बयान में तीनों अभियुक्तों ने सिमरन और उस की दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा की हत्या की बात स्वीकार की थी. अदालत ने 23 अप्रैल, 2014 को तीनों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए फैसले की तारीख 25 अप्रैल, 2014 तय की थी.

25 अप्रैल, 2014 को एडिशनल सेशन जज श्री एस.पी. सूद ने इस तिहरे हत्याकांड का फैसला सुनाया. उन्होंने कहा, ‘‘गवाहों के बयान, पुलिस तफ्तीश, घटनास्थल से प्राप्त सुबूतों एवं अभियुक्तों के बयानों से यह सिद्ध हो गया है कि 27-28 दिसंबर, 2009 की रात अभियुक्त अशोक, जो मृतका सिमरन का पति है, ने अपनी पत्नी सिमरन और दोनों बेटियों, दिव्या एवं पूजा को एक सुनसान जगह पर ले गया और अपने भाई ज्योति कुमार तथा भाई के दोस्त नवल से तीनों की बेरहमी से हत्या करा दी.

‘‘घटनास्थल और मृतका की गर्दन से बरामद चाकुओं पर मिले फिंगरप्रिंट व फोरेंसिक जांच रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया है कि फिंगर प्रिंट, जूतों के निशान, डीएनए रिपोर्ट और मृतका की मुट्ठी से बरामद अभियुक्त के सिर के बाल अभियुक्तों के ही हैं.

‘‘इस बात में कोई संदेह नहीं कि तीनों अभियुक्तों ने सिमरन और उस की दोनों बेटियों का बेरहमी से कत्ल किया है. इसलिए ये किसी भी तरह से रहम या माफी के काबिल नहीं हैं. अभियुक्त अशोक कुमार, अभियुक्त ज्योति कुमार और अभियुक्त नवल किशोर को सिमरन, पूजा और दिव्या की हत्या का दोषी मानते हुए जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा दी जाती है.’’

इस तरह अशोक व उस के भाई ज्योति और उस के दोस्त नवल को अपने किए की सजा मिल गई. जज के सजा सुनाते ही पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को अपनी कस्टडी में ले लिया. Family Dispute

 

UP Crime News : बहन के प्यार का साइड इफेक्ट

UP Crime News : गगन उर्फ गौतम नहीं चाहता था कि उस की सौतेली बहन नंदिनी मोहल्ले के दूसरी बिरादरी के युवक से प्यार करे. लेकिन नंदिनी भी जिद्दी थी. अपनी जिद पूरी करने के लिए उस ने भाई गगन की पूर्व प्रेमिका ममता के साथ मिल कर भाई के खिलाफ ऐसी खूनी साजिश रची कि…

घर में सभी लोगों की लाडली नंदिनी की शादी को ले कर उस के पिता ओमप्रकाश चिंतित रहते थे. उस की शादी की उम्र हो चुकी थी. वह जितनी चंचल, उतनी ही हिम्मती और बातबात पर अड़ जाने वाली थी. जिद्दी इतनी कि एक बार जो मन में ठान लिया, उसे पूरा कर के ही छोड़ती थी. मुरादाबाद की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाले ओमप्रकाश के खातेपीते सुखीसंपन्न परिवार में पत्नी ओमवती के अलावा बेटी नंदिनी और बेटा गगन था.

मुरादाबाद की लालबाग रामगंगा कालोनी में रहने वाले इस परिवार के सभी सदस्य सौतेलेपन की कुंठा से ग्रसित थे. वहीं सौतेलापन नंदिनी को भी भीतर ही भीतर कुछ ज्यादा ही कुरेदता रहता था. उस की बड़ी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी. वह अपने घर में खुश थी, लेकिन नंदिनी को पड़ोस में रहने वाले प्रदीप नाम के युवक से प्यार हो गया. लेकिन वह उस की बिरादरी का नहीं था. इस के अलावा वह बेरोजगार भी था. इसी बात को ले कर गगन उस के प्रेम में रोड़ा बन बैठा था. नंदिनी गगन की भले ही सौतेली बहन थी, लेकिन वह नहीं चाहता था कि नंदिनी प्रदीप से प्यार करे. गगन अपने मातापिता को इस बारे में उकसाता भी रहता था. पिता भी गगन का ही पक्ष लेते थे. सौतेली मां कलावती का निधन भी बीते साल कैंसर से हो चुका था.

घर में नंदिनी की एकमात्र हमदर्द गगन की पत्नी राधा बन सकती थी, लेकिन उस की घर में जरा भी नहीं चलती थी. गगन नंदिनी के साथसाथ उसे भी काफी डांटडपट कर रखता था. कई बार इस वजह से नंदिनी काफी दुखी हो जाती थी और गगन के विरोधी तेवर को अपने दिल पर लेती हुई बिफर भी पड़ती थी. उस के मुंह से निकल पड़ता था, ‘‘गगन उस का दुश्मन है, क्योंकि वह सौतेला भाई जो है, अपना होता तो…’’

अब नंदिनी को यह समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने दिल की बात कहे तो किस से? अपनी समस्या का समाधान निकाले भी तो किस की मदद ले? यही सोच कर वह हमेशा तनाव में रहती थी. प्रेमी प्रदीप के साथ वह ज्यादा समय तक मिलबैठ भी नहीं सकती थी. क्योंकि गगन उस पर हमेशा पहरेदार की तरह तना रहता था. हर बात में मिर्चमसाला लगा कर पिता को बताता था और घर में बात का बतंगड़ बना डालता था. और तो और, उस के प्रेमी को नाकारा निकम्मा कहता हुआ घर में सभी के सामने उसे काफी जलील करता था. इस बात को ले कर नंदिनी परेशान रहने लगी थी. उस के मन में तरहतरह के खयाल आतेजाते रहते थे.

अपनी समस्याओं को ले कर उधेड़बुन में एक बार नंदिनी बाजार से गुजर रही थी. तभी अचानक उस की मुलाकात ममता से हो गई. उसी ने टोका, ‘‘अरे नंदिनी तुम! काफी परेशान दिख रही हो? क्या बात है?’’

‘‘अरे ममता! तुम तो पहचानने में ही नहीं आ रही हो. तुम्हारी शादी होने वाली है क्या? बहुत दिनों बाद मिली… कैसी हो तुम?’’ नंदिनी ने चौंकते हुए उसी की तरह एक साथ कई सवाल दाग दिए.

‘‘मैं तो बस अपने दिल को बहला रही हूं. खुद को दिलासा दे रही हूं. तुम्हारे भाई ने जब से मुझे धोखा दिया है, उस के बाद समझो आज ही मूड फ्रैश करने के लिए थोड़ा बनठन कर निकली हूं… अच्छी लग रही हूं न?’’ ममता ने भी नंदिनी के अंदाज में जवाब दिया.

‘‘बहुत ही अच्छी, ग्लैमरस. तुम्हारी सुंदरता का कोई जवाब नहीं. तुम कुछ भी पहन लो हीरोइन दिखती हो…’’ नंदिनी बोली.

‘‘बसबस, किसी की अधिक तारीफ नहीं करते. उस से उस की मुराद पूरी होने में अड़चन आ जाती है.’’ ममता बोली.

‘‘तुम्हारी मुराद क्या है?’’ नंदिनी तपाक से पूछ बैठी.

‘‘बदला,’’ नंदिनी के लहजे में ममता बोली.

‘‘एेंऽऽ बदला… यह कोई मुराद हुई? मगर किस से?’’ चौंकती हुई नंदिनी ने पूछा.

‘‘तुम्हारे उसी भाई से, जो मेरी जिंदगी उजाड़ कर तुम्हारी जिंदगी भी बरबाद करने पर तुला है.’’ ममता गुस्से में बोली.

‘‘कह तो तुम बिलकुल सही रही हो, मगर क्या कर सकती हूं, समझ नहीं पा रही हूं.’’ नंदिनी ने कहा.

वह मायूसी के साथ आगे कहने लगी, ‘‘गगन सौतेला भाई है न, इसलिए अपना सौतेलापन खुल कर दिखा रहा है. प्रदीप को मेरा और पूरे परिवार का दुश्मन बताता है. पापा को उस के खिलाफ काफी भड़का दिया है. पापा से बोलता है कि उन की जायदाद पर प्रदीप की नजर है. तुम तो जानती हो उसे, वह ऐसा बिलकुल ही नहीं है. वह मुझे बहुत प्यार करता है. मैं भी उसे बहुत चाहती हूं.’’

‘‘देखो, नंदिनी तुम्हारे चाहने और नहीं चाहने से क्या होता है. गगन कभी नहीं चाहता है कि तुम्हारी प्रदीप के साथ शादी हो. इस के पीछे छिपा हुआ उस का मकसद समझो. वह जानता है कि तुम्हारी प्रदीप से शादी होने पर तुम इसी मोहल्ले में रहने लगोगी… और फिर अपने पिता की संपत्ति पर हक जताने लगोगी. इसलिए वह तुम्हारी शादी कहीं दूर करवाना चाहता है.’’ ममता ने समझाया.

इसी के साथ उस ने यह भी कह दिया कि उन दोनों का एक ही दुश्मन है गगन. गगन की प्रेमिका थी ममता यह बात नंदिनी के दिमाग में घर कर गई. उस वक्त तो ममता और नंदिनी अपनीअपनी उलझनों का बोझ एकदूसरे पर उतार कर विदा हो लिए, लेकन दोनों के दिमाग में गगन के विरोध की ज्वाला धधकने लगी. ऐसा होना भी स्वाभाविक था. नंदिनी को गगन हमेशा कहता रहता था कि प्रदीप उस का हितैषी नहीं दुश्मन है, वह उस के साथ प्रेम का नाटक कर रहा है और उस की मंशा जमीनजायदाद हथियाने की है. एक समय में लालबाग रामगंगा कालोनी निवासी रमेश कुमार की बेटी ममता गगन की प्रेमिका हुआ करती थी. गगन उस पर जान छिड़कता था. गगन भी ममता से बेइंतहा मोहब्बत करता था. उस का दीवाना था.

वह बेहद सुंदर और मांसलता के दैहिक आकर्षण से भरी हुई थी, अपनी खूबसूरती को आधुनिक पहनावे और स्टाइल से और भी ग्लैमर बना देती थी. बौडी लैंग्वेज से ले कर बोलचाल तक से किसी को भी पलक झपकते ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी. उस के स्वच्छंद विचार और आधुनिक पहनावे से निखरे रूपरंग का कई लोग गलत अर्थ भी निकालते थे. दबी जुबान में उसे बदचलन तक कह देते थे. ऐसी धारणा रखने वालों में गगन के पिता ओमप्रकाश भी थे. उन्होंने ममता को ले कर गगन को एक बार खूब डांटा था. उस से दूर रहने की चेतावनी दी. यहां तक कि उन्होंने भी उसे बदचलन करार दे दिया था. दुर्भाग्य से 2018 में गगन की मां कलावती का कैंसर से निधन हो गया.

करीब 25 साल पहले ही ओमप्रकाश ने अमरोहा निवासी विवाहिता कलावती से दूसरा विवाह तब किया था, जब उन की पहली पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. विवाह के वक्त कलावती की गोद में 3 साल का गगन भी था. नंदिनी का बचपन उसी सौतेले भाई के साथ गुजरा, जो अब 28 साल का हो चुका था. ओमप्रकाश की पहली पत्नी से उन के 2 बच्चे पूजा और नंदिनी थी. वे पूजा की शादी कर चुके थे और नंदिनी की शादी के प्रयास में थे. कलावती के निधन के बाद ओमप्रकाश घर को संभालने के लिए गगन की शादी की योजना बनाने लगे थे. इसी सिलसिले में ममता के साथ उस के प्रेम संबंध का मामला सामने आ गया था. उन्होंने ममता से शादी करना सिरे से मना कर दिया था.

इस पर गगन न तो पिता का विरोध कर पाया, और न ही ममता की भावनाओं की कद्र. और फिर गगन की शादी 6 जुलाई 2018 को मुरादाबाद में ही बलदेवपुरी थाना कटघर निवासी कुंदन कुमार की बेटी राधा से हो गई. गगन का राधा के साथ शादी होना ममता को अच्छा नहीं लगा. वह खुल कर विरोध नहीं कर पाई, लेकिन भीतर ही भीतर नफरत की आग में जल उठी. इस का जिक्र उस ने कई बार अपने दूसरे दोस्तों से भी किया, वह अकसर महीने-2 महीने के लिए दूसरे शहर चली जाया करती थी और लोगों को कभी बरेली तो कभी लखनऊ में नौकरी लगने की बातें बताती रहती थी.

यहां तक कि वह अपने मातापिता से अलग किराए का कमरा ले कर रहने लगी थी. वह जिगर कालोनी में स्थित एक्सपोर्ट फर्म में काम करती थी. वह प्रदीप को भी ताने मारती थी, जो उस के दूर का रिश्तेदार था. ममता ने प्रदीप को एक बार तो साफसाफ कह दिया था कि जब तक गगन रहेगा तब तक उस की नंदिनी से शादी नहीं हो पाएगी.

यही बात वह नंदिनी को भी ताना देते हुए अकसर कहती थी कि गगन उसे उस के प्रेमी प्रदीप से कभी मिलने नहीं देगा. गगन भले ही उस का सौतेला भाई है, लेकिन उस की पिता की संपत्ति का वारिस वही बनेगा. उस दिन बाजार में ममता ने नंदिनी को एक बार फिर उस के हरे जख्म को कुरेद दिया था. ममता से बात कर के नंदिनी विचलित हो गई थी. गगन चाहता था कि उस की बहन की शादी किसी रोजगारशुदा व्यक्ति से ही हो. इस में उसे सौतेले पिता का भी समर्थन मिला हुआ था. नंदिनी के पिता हमेशा गगन का पक्ष ले कर नंदिनी को समझाते थे कि प्रदीप न तो बिरादरी का है, और न ही बराबरी का. जबकि इस की नंदिनी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी. वह मस्ती में रहती हुई अपनी जिद पर अड़ी थी.

कबाड़ी का कारोबार करने वाले गगन का यही सोचना था कि प्रदीप की निगाह उस के पिता की प्रौपर्टी पर टिकी है. ओमप्रकाश एक्सपोर्ट फर्म में काम करते थे. उन के लाड़प्यार में पली नंदिनी ही घर की देखभाल और खर्च की पूरी जिम्मेदारी संभाले हुई थी. बाजार और बैंक आदि का हिसाबकिताब नंदिनी के जिम्मे था. फिर भी घर में गगन की ही मनमानी चलती थी. वह पत्नी राधा को इस से दूर रखता था. नंदिनी नहीं चाहती थी कि उस की शादी किसी दूसरे शहर में हो. वह हमेशा पिता के मकान में ही रहना चाहती थी. प्रदीप को ले कर गगन के साथ नंदिनी का हमेशा झगड़ा होता रहता था.

बात जून 2021 की है. जब एक दिन नंदिनी के साथ गगन का झगड़ा काफी बढ़ गया था. इस कारण गगन अपनी ससुराल जा कर रहने लगा था. तब उस की पत्नी राधा भी अपने मायके में ही थी. एक तरफ नंदिनी थी, और दूसरी तरफ ममता. दोनों के दिल में गगन को ले कर विरोध की सुलगती चिंगारी जबतब भड़क उठती थी. नंदिनी अपने प्रेमी से शादी में आई बाधा को ले कर परेशान थी तो ममता को गगन से शादी नहीं हो पाने का मलाल था. कारण ममता ने गगन के साथ कई साल साथ गुजारे थे और विवाह होने के कसमेवादे किए थे. उन पलों को याद करके हुए ममता भावुक हो जाती थी. ममता ने प्रण कर लिया था कि वह गगन को जरूर सबक सिखाएगी. ममता को बस समय का इंतजार था.

नंदिनी से मिलने के बाद ममता ने अपने दिल की भड़ास निकाल दी थी. तभी ममता को मालूम हुआ था कि गगन 2 महीने से अपनी ससुराल बलदेवपुरी में रह रहा है. नंदिनी से मुलाकात से कुछ दिन पहले ही ममता की मुलाकात प्रदीप से भी हुई थी. उस ने नंदिनी की परेशानी के बारे में उसे जानकारी दे दी थी. उस ने भी बदले की आग में जलती ममता और नंदिनी की पीड़ा गहराई से महसूस की. जल्द ही तीनों ने गगन को लक्ष्य बना कर एक मीटिंग की. विशेषकर नंदिनी और ममता ने प्रदीप को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

योजना के मुताबिक प्रदीप ने अपने एक दोस्त वीरू उर्फ हरीश को भी साथ ले लिया. वीरू मुरादाबाद में थाना मझोला के गांव जयंतीपुर का रहने वाला एक बदमाश किस्म का युवक था. तीनों ने वीरू से गगन को ठिकाने लगाने की बात कही. उन्होंने बदले में उसे 50 हजार रुपए दिए. दरअसल, नंदिनी और ममता ने मिल कर प्रदीप के माध्यम से गगन को रास्ते से हमेशा के लिए हटाने की योजना बनाई थी.

योजना के अनुसार नंदिनी ने ममता को गगन का मोबाइल नंबर दिया. ममता ने अपने पूर्व प्रेमी गगन को काल की, ‘‘हैलो गगन.’’

‘‘हां, कौन?’’ गगन ने पूछा

‘‘अरे मुझे पहचाना नहीं, मैं तुम्हारी ममता बोल रही हूं.’’

ममता ने उलझाया मीठी बातों में गगन अचानक ममता की आवाज सुन कर एकदम से भौचक्का रह गया. भले ही ममता से उस की शादी नहीं हुई थी, किंतु उस के दिल में ममता अभी भी बसी हुई थी. न चाहते हुए भी अचरज से बोला, ‘‘चलो, तुम्हें मेरी याद तो आई.’’

‘‘मुझ से मिलोगे नहीं? तुम्हें तो पता ही होगा कि अब मेरा घर वालों से कोई वास्ता नहीं रहा. मैं बंगला गांव में रह रही हूं किराए पर. पास ही जिगर कालोनी में जौब करती हूं, फोन में तुम्हारा नंबर अचानक दिख गया तो तुम्हारी याद आ गई. फिर मैं ने फोन कर लिया.’’ ममता बोली.

गगन अभी कुछ बोलता इस से पहले ही ममता बोली, ‘‘मैं हर्बल पार्क घूमने आई थी. पार्क की सुंदरता देख कर तुम्हारे साथ यहां गुजारे पुराने दिन याद आ गए. आ जाओ यहीं पार्क के रेस्तरां में एक बार फिर मिलते हैं. साथ बैठते हैं…’’

बीते दिनों की कई पुरानी बातें बता कर ममता ने गगन को काफी भावुक कर दिया था. वह ममता की बातें सुन कर पुराने दिनों के हसीन लम्हों में खो गया. ममता गगन का पहला प्यार थी. गगन को ममता के साथ बिताए पल अचानक झिलमिलाने लगे थे. वह ममता से बोला,‘‘तुम बुलाओ और हम न आएं, ऐसा नहीं हो सकता.’’

थोड़ी देर में ही गगन हर्बल पार्क पहुंच गया. ममता जींस टौप पहने बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. गगन ने आते ही ममता को बाहों में भर लिया. ममता उस से छूटते ही बोली, ‘‘तुम अभी भी वही पुराने वाले गगन, जरा भी नहीं बदले…लेकिन अब तुम शादीशुदा हो आगे से ध्यान रखना हां. …अच्छा चलो पार्क के बाहर झाडि़यों की ओर चलते हैं. वहीं बैठ कर कुछ बातें करेंगे, आराम से.’’

गगन को झाडि़यों में ले गई ममता गगन ने महसूस किया कि ममता में कोई बदलाव नहीं आया है, वही पहले की तरह चंचल अदाएं, कसक और अपनापन….

‘‘ थोड़ा रुको यार, बहुत दिनों बाद मिले हो तुम्हारे लिए कोल्ड ड्रिंक्स और नमकीन लाती हूं. वहीं पार्क में बैठ कर साथसाथ पीएंगे.’’

ममता के बोलने पर गगन बोला, ‘‘हांहां क्यों नहीं.’’

‘‘ बस मैं कैंटीन गई और अभी आई.’’ बोलती हुई ममता कैंटीन की ओर जाने लगी.

तभी गगन हाथ खींचते हुआ बोला, ‘‘यह काम तुम्हारा नहीं मेरा है.’’

‘‘देखो मैं ने तुम्हें बुलाया है. समझो कि आज तुम हमारे मेहमान हो.’’ ममता कहती हुई गगन से हाथ छुड़ा कर तेजी से कैंटीन की ओर दौड़ी चली गई. गगन उसे देखता रह गया.

ममता यह सब योजना के मुताबिक कर रही थी. ममता की जिद के आगे गगन कुछ नहीं कर पाया. वह केवल ममता के साथ गुजारे पुराने लम्हों को ही याद करता रह गया.

‘‘ आओ चलें…’’ ममता बोली.

गगन एक बार फिर सपनों की दुनिया से बाहर आया. ममता के हाथ से कोल्ड ड्रिंक अपने हाथ में ले ली. ममता डिसपोजल गिलास और नमकीन का पैकेट संभालती हुई झाडि़यों की ओर बढ़ गई. कुछ पल में ही दोनों पार्क के मुख्य मार्ग से नजर नहीं आने वाली झाडि़यों के पीछे थे. गगन टायलेट का इशारा करते हुए उस ओर चला गया. ममता के लिए इस से अच्छा मौका और क्या हो सकता था. उस ने तुरंत दोनों डिसपोजल गिलास निकाले. उन में दोतिहाई कोल्ड ड्रिंक भरा और अपने साथ लाई नशीले पदार्थ की पुडि़या एक गिलास में डाल दी. गगन के आते ही उस ने अपने बाएं हाथ का गिलास उस की ओर बढ़ा दिया.

‘‘नहींनहीं, इस हाथ से नहीं दाएं हाथ वाला दो. तुम्हारी बाएं हाथ से किसी को सामन देने की आदत अभी तक गई नहीं है.’’ गगन बोला.

‘‘क्या करूं गगन, मेरा दायां हाथ चलता ही नहीं है. तुम्हारे साथ शादी हो जाती तब  शायद यह आदत छूट जाती. अच्छा लो इसे पकड़ो.’’ कहती हुई ममता ने अपने दाएं हाथ का कोल्ड ड्रिंक भरा गिलास आगे कर दिया. गगन ने गिलास हाथ में ले लिया. उस से एक घूंट पीने के बाद ममता मंदमंद मुसकराई. उस की मुसकान में कुटिलता छिपी थी, कारण वह अपनी योजना में कामयाब हो रही थी. नशीला पदार्थ मिला कोल्ड ड्रिंक का गिलास गगन के हाथ में था और वह नमकीन के साथसाथ घूंटघूंट कर चुस्की लेने लगा था.

कुछ समय में ही गगन बोला. ‘‘ममता… म… ममता,  मुझे तुम्हारा चेहरा साफ क्यों नहीं दिख रहा.’’ गगन की आवाज में लड़खड़ाहट थी. ममता समझ गई कि उस पर नशा हावी हो रहा है. ममता ने प्रेम भरी हमदर्दी दर्शाते हुए उस का सिर अपनी गोद में ले लिया. उस के बालों में अंगुलियां घुमाने लगी. कुछ पल में ही गगन पूरी तरह से बेहोश हो चुका था. ममता ने तुरंत थोड़ी दूर दूसरी झाड़ी के पीछे छिपे वीरू को इशारा किया. इशारा पाते ही ताक में बैठा वीरू ममता के पास आ गया. ममता वहां से उठती हुई बोली, ‘‘शिकार को संभालो, मैं ने अपना काम कर दिया, आगे का काम तुम्हारा.’’

उस के बाद नंदिनी और प्रदीप को भी इस की जानकारी दे दी कि उस का काम पूरा हो चुका है. हालांकि तब तक गगन के मुंह से केवल एक ही बड़बड़ाने की आवाज निकल रही थी, ‘‘ममता क्या हुआ है मुझे…’’

‘‘कुछ नहीं तुम्हें थोड़ा चक्कर आ गया है, अभी तुम्हें डाक्टर के यहां ले जाने का इंतजाम करवाती हूं.’’ ममता बोली. ममता उसे सहारा देते हुए वीरू के साथ उस की मोटरसाइकिल तक ले गई. वहां प्रदीप पहले से मौजूद था.

गगन को प्रदीप और वीरू ने पकड़ कर मोटरसाइकिल पर बिठा दिया. वीरू मोटरसाइकिल चलाने के लिए बैठ गया, जबकि प्रदीप गगन को गिरने से थामे हुए था. वीरू और प्रदीप गगन को जयंतीपुर ले गए. वहां एक खाली प्लौट में उन दोनों ने गगन को जबरदस्ती शराब पिलाई. फिर गगन के गले में पड़े गमछे से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उन्होंने उस के पैर गमछे से बांध दिए. फिर वीरू जयंतीपुर स्थित अपने घर से एक कंबल ले आया. उस कंबल में उन्होंने गगन की लाश लपेट दी. कंबल में उन्होंने कुछ ईंटें भी रख दी थीं. वह लाश को पास में बह रहे गहरे नाले में डुबोना चाहते थे, इसलिए 2 कट्टों में उन्होंने ईंटें भर कर वे कट्टे कंबल से बांधने के बाद लाश नाले में डाल दी. ईंटों की वजह से लाश नाले में डूब गई. यह बात 13 जुलाई, 2021 की है.

लाश ठिकाने लगाने के बाद वीरू ने रात करीब 10 बजे नंदिनी को फोन कर के गगन की लाश ठिकाने लगाने की जानकारी दी. उस समय गगन की पत्नी राधा तो अपने मायके गई हुई थी. पहली अगस्त को वह अपनी ससुराल  गई. उसे अपने मायके में होने वाले एक कार्यक्रम का निमंत्रण देना था. वहां पति नहीं दिखा तो राधा ने नंदिनी से पूछा. नंदिनी ने उसे बताया कि जब से गगन तुम्हारे घर पर रह रहा था. तब से यहां आया ही नहीं है. राधा ने पति को फोन मिलाया तो उस का फोन भी बंद मिला. उस ने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर के पति के बारे में पूछा. लेकिन पता चला कि गगन किसी रिश्तेदारी में गया ही नहीं था.

जब कहीं से जानकारी नहीं मिली तो नंदिनी भी राधा के साथ गगन को ढूंढने का नाटक करती रही. जब गगन कहीं नहीं मिला तो पिता ओमप्रकाश ने मुरादाबाद शहर के थाना मुगलपुरा में गगन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी अमित कुमार ने गगन के लापता होने की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मुरादाबाद का मुसलिम बाहुल्य लालबाग क्षेत्र बहुत संवेदनशील है. क्षेत्र में लापता युवक को ले कर वहां अशांति न हो जाए, इसलिए एसएसपी पवन कुमार ने एएसपी अनिल यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में मुगलपुरा के थानाप्रभारी अमित कुमार, एसआई नितेश सहरावत, ताजवर सिंह, जगजीत सिंह, राजवंदर कौर, कांस्टेबल संगम कसाना, नीरज कुमार, समीर आदि को शामिल किया.

टीम अपने स्तर से केस की छानबीन में जुट गई. इस के अलावा लालबाग क्षेत्र में भारी मात्रा में पुलिस फोर्स भी तैयार कर दी. पुलिस टीम ने सब से पहले गगन के घर वालों से पूछताछ करने के बाद गगन के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि 13 जुलाई को शाम 5 बजे गगन की एक फोन नंबर पर बात हुई थी. जांच में वह नंबर बंगला गांव मोहल्ले की रहने वाली ममता का निकला. पुलिस ममता के घर पहुंची तो उस का कमरा बंद मिला. पुलिस को पता चला कि ममता जिगर कालोनी स्थित एक एक्सपोर्ट फर्म में नौकरी करती है. पुलिस उस फर्म में पहुंची तो ममता वहां मिल गई. पूछताछ के लिए पुलिस उसे मुगलपुरा थाने ले आई.

पुलिस ने ममता से पूछताछ की तो वह खुद को बेकुसूर बताती रही. उस ने कहा कि गगन से उस के प्रेम संबंध जरूर थे लेकिन जब से गगन की शादी हुई है, वह संबंध खत्म हो गए.

‘‘जब तुम्हारे संबंध खत्म हो गए तो तुम ने 1 जुलाई को गगन को फोन क्यों किया?’’ थानाप्रभारी अमित कुमार ने उस से पूछा.

‘‘सर, उस का नंबर मेरे फोन में सेव था, जो गलती से लग गया.’’ ममता ने बताया.

थानाप्रभारी को लग रहा था कि ममता कुछ छिपा रही है, इसलिए उन्होंने पास में बैठी एसआई राजवेंदर कौर को इशारा किया. राजवेंदर कौन ने ममता से पूछताछ करते हुए एक थप्पड़ उस के गाल पर जड़ा. थप्पड़ लगते ही ममता हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘मुझे मत मारो, मैं सब कुछ बताती हूं.’’

इस के बाद ममता ने गगन से उस का प्यार होने से ले कर अब तक की सारी कहानी बताते हुए कहा कि गगन ने उस की सारी जिंदगी खराब कर दी. उसी का बदला लेने के लिए उस की सौतेली बहन नंदिनी और दीपक के साथ मिल कर उस की हत्या करनी पड़ी. उस ने बताया कि दीपक उस का रिश्तेदार है. अब पुलिस को लाश बरामद करनी थी लिहाजा पुलिस ने 5 घंटे तक गगन की लाश नाले में तलाश कराई, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. इसी दौरान पुलिस ने हरीश उर्फ वीरू को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरू ने बताया कि उस की लाश के साथ ईंटें बंधी थीं. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 3 अगस्त, 2021 को नाले से गगन की सड़ीगली लाश बरामद कर ली. उधर पुलिस ने नंदिनी और प्रदीप को तलाशा तो दोनों फरार मिले. उन के फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उन्हें नोएडा से गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने बताया कि उन्होंने 3 अगस्त को ही नोएडा के मंदिर में शादी कर ली थी. उन से भी पूछताछ की गई तो उन्होंने भी अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पुलिस ने हत्यारोपी हरीश उर्फ वीरू, प्रदीप, नंदिनी और ममता को गिरफ्तार कर मुरादाबाद की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अमित कुमार कर रहे थे. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Story : नौकरी के चक्कर में बीवी को न भूलें

Hindi Story : मुजफ्फरपुर की सबा फिरदौस अपने जीजा के भाई मुमताज अहमद को 16 साल की उम्र में दिल दे बैठी थी. न चाहते हुए भी फेमिली वालों को दोनों की शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा. शादी के कई साल बाद फिरदौस ने गूगल सर्च कर पंचायत औफीसर पति मुमताज की हत्या की फुलप्रूफ प्लानिंग कर मौत के घाट उतार दिया. जिस मुमताज से शादी करने के लिए सबा फिरदौस ने फेमिली वालों से बगावत की, आखिर उसे चाकू से क्यों गोद डाला?

घटना 7 जुलाई, 2025 की है. वक्त था सुबह के कोई 4 बजे का. बिजली गुल हो जाने के बाद बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के गांव माड़ीपुर की रहने वाली सबा फिरदौस की आंखें खुलीं तो उस ने अपने पति के कमरे में जा कर देखा. पति को देखते ही उस की जोरदार चीख निकल गई. उस का पति मुमताज अहमद औंधे मुंह फर्श पर पड़ा हुआ था. उस के आसपास का फर्श खून से लाल था. उस का सारा कमरा अस्तव्यस्त था. कहीं पर कपड़े पड़े हुए थे तो कहीं पर कुछ और सामान.

कमरे का हाल देख कर वह बदहवास सी हो कर जोरजोर से चीखने लगी. ‘बचाओ …बचाओ’ किसी ने मेरे पति का खून कर दिया. सुबहसुबह सबा फिरदौस के रोनेचीखने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी इकट्ठा हो गए थे. घर में शोरशराबे की आवाज सुन कर उस के तीनों बच्चे भी उठ कर अपने अब्बू को देख कर रोने लगे थे. पति के कमरे की हालत देखते ही सबा ने रोते हुए ही पति के बड़े भाई मुश्ताक अहमद को फोन कर सूचना दी. सूचना पाते ही मुश्ताक मुमताज के घर पहुंचा. उस के बाद मुश्ताक ने अपने अन्य फेमिली वालों को इस की जानकारी देने के बाद पुलिस को भी सूचना दे दी.

सुबहसुबह हत्या की सूचना पाते ही काजी मोहम्मदपुर थाने के एसएचओ जयप्रकाश सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. मुमताज अपने कमरे में पेट के बल पड़ा हुआ था. उस का शरीर पूरी तरह से लहूलुहान था. इस घटना की जानकारी जुटाने के बाद एसएचओ ने इस मामले की सूचना मुजफ्फरपुर जिले के एसपी (सिटी) कोटा किरण कुमार, डीएसपी (टाउन) सीमा देवी को भी दे दी थी. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

जांचपड़ताल के दौरान पता चला कि हत्यारे पड़ोसी की छत के सहारे मकान के फस्र्ट फ्लोर के दरवाजे की जाली और ताला काट कर कमरे में अंदर घुसे और फिर लूटमार करने के बाद मुमताज की हत्या कर फरार हो गए थे. मौके पर पहुंची एसपी (सिटी) कोटा किरण ने तुरंत ही एफएसएल की टीम को जांच के लिए बुला लिया था. एफएसएल की टीम के 5 वैज्ञानिकों ने करीब 2 घंटे तक कमरे व फस्र्ट फ्लोर पर कटी जाली और ताले से साक्ष्य जुटाए. साथ ही टीम ने मृतक के बैड पर पड़े चाकू पर लगे ब्लड के सैंपल और फिंगरप्रिंट भी लिए.

घटनास्थल पर डौग स्क्वायड को भी बुला लिया. इस दौरान खोजी कुत्ता कई बार मृतक के पास से होता हुआ उस की पत्नी के पास भी जा कर रुका, लेकिन पुलिस का मुमताज की पत्नी पर हत्या का शक करने का सवाल ही नहीं उठता था. क्योंकि सब से पहले उस की हत्या के बाद सबा फिरदौस ही उस के पास पहुंची थी. फिर वैसे भी वह उस की पत्नी थी. उस के बाद खोजी कुत्ता मृतक के कमरे से नीचे उतर कर बगल की गली से होता हुआ झाड़ी के रास्ते से रेलवे ट्रैक तक पहुंचा और वहीं पर रुक गया.

मामला गंभीर था, इसीलिए पुलिस प्रशासन ने घटनास्थल से सभी साक्ष्य जुटाने के बाद जांच की काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. उसी दौरान पुलिस को पता चला कि मृतक के पास 2 मोबाइल फोन थे, दोनों ही गायब थे. उस के घर ज्वैलरी और नकदी भी गायब थी. मृतक मुमताज के घर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे, लेकिन उन की रिकौर्डिंग (डीवीआर) भी गायब थी. शायद अपराधी राज खुलने के डर से अपने साथ ही ले गए थे.

इस दौरान मृतक की बीवी सबा फिरदौस का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान वह कई बार बेहोश भी हो गई, जिसे बड़ी मुश्किल से संभाला गया था. सबा फिरदौस ने रोतेरोते बताया कि पति कई महीनों से नौकरी को ले कर परेशान थे. वह अकसर यही कहा करते थे कि उन की नौकरी खतरे में है. नौकरी कभी भी उन के हाथों से जा सकती है. उस के अलावा मुमताज ने आसपास के कई लोगों को पैसा दे रखा था, जो मिल नहीं पा रहा था. पता नहीं कौन लोग उस के दुश्मन बन कर आए और उन की हत्या कर गए.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि मुमताज का किसी धारदार हथियार से 3 बार गला काटा गया था. उसी हथियार से उस की दोनों आंखों में भी वार किए गए थे. साथ ही उस के शरीर पर अलगअलग 5-6 गहरे घाव पाए गए थे. इस मामले में तुरंत ऐक्शन लेते हुए पुलिस ने उस के घर के आसपास लगे कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की. जिस रास्ते से खोजी कुत्ता बारबार जा रहा था, पुलिस ने उसी रास्ते पर मुमताज के घर के पीेछे लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकाली तो पता चला कि रात के 3 बजे उस रास्ते से एक काली रंग की नए मौडल की स्कौर्पियो आतीजाती दिखाई दी, जिस से पुलिस को पूरा शक हो गया कि अपराधी इसी स्कौर्पियो से घटना को अंजाम देने के लिए आए होंगे.

इसी आशंका के चलते पुलिस ने रामराज की ओर जाने वाले रास्ते पर लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जुटा ली. उस के साथ ही पुलिस ने डीआईयू व सर्विलांस टीम को मृतक के दोनों मोबाइल नंबर दे दिए, जो सर्विलांस पर लगा दिए गए, लेकिन अफसोस, कहीं से भी पुलिस को इस घटना से संबधित कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई. जब पुलिस को इस हत्याकांड के सिलसिले में कहीं से भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला तो पुलिस ने फिर से उस के फेमिली वालों के साथसाथ पड़ोसियों से पूछताछ की, जिस के दौरान पुलिस को एक अहम जानकारी मिली.

पड़ोसियों ने बताया कि मुमताज की गैरमौजूदगी में उस के घर पर कभीकभी एक युवक आता था. वह युवक कौन था, उस की उन्हें कोई जानकारी नहीं. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने फिर से मृतक मुमताज अहमद की पत्नी फिरदौस से पूछताछ की, लेकिन फिरदौस अपने पहले बयान से कुछ हटती नजर आई. इस बार उस ने पुलिस को बताया कि जिस वक्त वह पति के कमरे की तरफ गई तो वहां पर कुछ लोग उन्हें बुरी तरह से मारपीट रहे थे. उस ने उन का विरोध किया तो उन्होंने उसे चाकू दिखा कर अपने कब्जे में ले लिया.

बाद में उस के सामने ही उन लोगों ने पति की चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी. उस के बाद उन लोगों ने उस से ही अलमारी खुलवा कर उस में रखा हुआ सारा सामान लूट लिया और फरार हो गए. हालांकि उस ने अपने किसी खास व्यक्ति को बचाने के लिए यह बयान बदला था, लेकिन पुलिस की नजरों में वह बुरी तरह से फंस चुकी थी. उस के इस बयान से पुलिस पूरी तरह से समझ चुकी थी कि उस के पति की हत्या में उसी का हाथ था. इस के बाद भी पुलिस ने जल्दबाजी करना उचित नहीं समझा.

उस के बाद डीएसपी ने स्वयं सबा फिरदौस को बुला कर उस से पूछताछ की. लेकिन वह बारबार बदमाशों द्वारा उस के पति की हत्या करने वाली बात दोहराती रही. लेकिन पुलिस को उस के फेमिली वालों ने एक और जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मुमताज के साथ उस का छोटा भाई भी रहता था, जिस को सबा फिरदौस ने एक दिन पहले ही अपनी रिश्तेदारी में भेज दिया था. उस के बाद उस ने अपने देवर से कहा था कि वह रात में वहीं पर रुके. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने इस बारे में उस के देवर से पूछा तो उस ने पुलिस को बताया कि भाभी ने ही उसे यह कह कर भेजा था कि आज रात तुम वहीं पर रुक जाना. लेकिन पुलिस के लिए यह जानकारी भी अधूरी ही थी. फिर भी पुलिस का उस पर शक पूरी तरह से गहरा गया था.

उस के बाद पुलिस ने उस के मोबाइल को जब्त कर लिया. सबा फिरदौस का मोबाइल अपने कब्जे में लेते ही पुलिस ने सब से पहले उस के गूगल सर्च पर क्लिक किया. क्लिक करते ही उस की सारी जानकारी सामने आ गई. कुछ दिन पहले ही सबा फिरदौस ने गूगल पर सर्च किया था कि ‘हत्या कैसे करनी चाहिए.’ उस से सब कुछ साफ हो गया था कि सबा फिरदौस ने अपने पति को मौत की नींद सुलाने का तरीका गूगल पर ही सर्च किया था. जब पुलिस ने सबा फिरदौस के खिलाफ कई सबूत जुटा लिए तो उस से सख्ती से पूछताछ की. पुलिस की सख्ती के आगे सबा फिरदौस ज्यादा वक्त तक टिक न सकी. फिर उस ने पुलिस को सब कुछ साफसाफ बता दिया था.

पुलिस पूछताछ में सबा फिरदौस ने बताया कि उस ने पढ़लिख कर जीवन में अफसर बनने का सपना देखा था. उस ने मुमताज अहमद से इसीलिए निकाह किया था कि उस के साथ शादी करने के बाद उस के सारे सपने पूरे हो जाएंगे, लेकिन शादी के बाद पता चला कि मुमताज का किसी दूसरी महिला के साथ अफेयर चल रहा है. मुमताज शादी के बाद उस से पहले जैसा प्यार भी नहीं करता था. उसे डर था कि कहीं मुमताज उस महिला के चक्कर में आ कर उस की हत्या न कर डाले. इसी डर की वजह से उस ने उस की हत्या करने का प्लान बनाया.

उस के लिए उस ने गूगल और यूट्यूब पर हत्या करने के नएनए तरीके सीखे. फिर एक दिन योजना के तहत उस की हत्या कर दी. हालांकि पुलिस पूछताछ के दौरान सबा फिरदौस ने अपना जुर्म कुबूल करते हुए पति की हत्या करने वाली बात स्वीकार कर ली थी. लेकिन पुलिस क्या, कोई भी इंसान उस की बात से सहमत नहीं हो पा रहा था. उस का कारण था कि मुमताज अहमद एक हट्ïटाकट्टा युवक था, वह अकेली उस की हत्या कैसे कर सकती है?

जबकि सबा फिरदौस ने पुलिस को बताया कि उस ने पति के गहरी नींद में सोते ही तकिए से उस का मुंह दबा कर हत्या कर दी. दूसरे मुमताज के मकान के ऊपर लगे दरवाजे पर जाली और उस का ताला कटा हुआ मिला था. सबा फिरदौस का मोबाइल तो पुलिस को मिल गया था. लेकिन मुमताज के 2 मोबाइल फोन कहां गायब हो गए थे. मुमताज की गैरमौजूदगी में उस के घर जो शख्स आताजाता था, वह कौन था और उस से सबा फिरदौस का क्या रिश्ता था? यह सब जानकारी पुलिस के गले की हड्डी बनी हुई थी.

पुलिस पूछताछ और मुमताज के फेमिली वालों की जानकारी के अनुसार इस हत्याकांड का जो खुलासा हुआ, वह इस प्रकार था. बिहार के जिला वैशाली के पातेपुर थाने के डढुआ गांव में रहता था मुमताज अहमद का परिवार. सबा फिरदौस मुमताज की रिश्ते में साली लगती थी. सबा फिरदौस की बहन की शादी उस के बड़े भाई मुश्ताक अहमद के साथ हुई थी. उसी कारण उस का अपनी बहन के पास आनाजाना लगा रहता था. उसी आनेजाने के दौरान दोनों के बीच प्रेम प्रसंग शुरू हो गया. उन के बीच चक्कर चला तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए थे. उस वक्त सबा फिरदौस केवल 16 साल की ही थी.

धीरेधीरे दोनों के लव अफेयर की जानकारी सबा फिरदौस के फेमिली वालों को भी हो गई थी. बाद में उस के फेमिली वालों ने सबा फिरदौस की बड़ी बहन की ससुराल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन मुमताज अहमद अपने भाई की ससुराल जाने से बाज नहीं आ रहा था, जहां पर वह सबा फिरदौस के साथ आंखमिचौली खेलते हुए प्यार का खेल खेलने लगा था. उस के बाद वह अपने फेमिली वालों से भी सबा फिरदौस के साथ शादी करने की जिद करने लगा था, लेकिन मुमताज अहमद के घर वाले किसी भी सूरत में उस के साथ उस की शादी करने को तैयार नहीं थे. इस के बाद भी मुमताज अपनी जिद पर अड़ा रहा. जबकि फिरदौस के फेमिली वाले उस की कम उम्र होने के कारण उस की शादी करने को राजी नहीं थे.

लेकिन सबा फिरदौस और मुमताज अहमद एक साथ जीनेमरने की कसम खा चुके थे. फेमिली वाले उन की शादी के बीच आड़े आए तो एक दिन सबा फिरदौस प्रेमी मुमताज अहमद के साथ घर से भाग गई. घर से भागते ही दोनों के घर वालों को समाज के सामने नीचा देखना पड़ा. दोनों एक ही बिरादरी और खास रिश्तेदारी से बंधे हुए थे. इसी कारण दोनों परिवारों ने एक साथ बैठ कर बातचीत की. रिश्तेदारी का कनेक्शन होने के कारण दोनों परिवारों में जल्दी ही सहमति बनी और फिर सन 2012 में उन की शादी कर दी. उस वक्त तक मुमताज अहमद बेरोजगार था, लेकिन उस ने सरकारी नौकरी के लिए कई जगह अप्लाई कर रखा था.

सबा फिरदौस भी पढ़ाई में तेज थी. मुमताज के साथ शादी करने के बाद भी उस ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उसी दौरान 2014 में मुमताज अहमद की नौकरी पंचायत रोजगार सेवक के पद पर लग गई. मुमताज की पहली पोस्टिंग वैशाली के ही भगवानपुर प्रखंड में हुई थी. नौकरी लगने के बाद मुमताज ने अपना गांव छोड़ दिया. उस के बाद वह अपनी पत्नी सबा फिरदौस को साथ ले कर जिला मुजफ्फरपुर के गांव माड़ीपुर स्थित रामराजी रोड पर मसजिद के नजदीक अपना मकान बना कर रहने लगा था. मुमताज की नौकरी लगने के बाद सबा फिरदौस भी सरकारी नौकरी के लिए हाथपांव मारने लगी थी. दिल में एक बड़ा अफसर बनने की चाहत लिए उस ने शादी के बाद भी कड़ी मेहनत की.

उस दौरान उस ने एक बार बीपीएससी और 2 बार यूपीएससी का एग्जाम भी दिया था. समय के साथसाथ सबा फिरदौस ने 2 बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया. हालांकि उस की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी, लेकिन उस के अंदर एक अफसर बनने का जज्बा अभी भी हार मानने को तैयार न था. शादी के कई साल बाद तक दोनों के बीच सब कुछ ठीक प्रकार चलता रहा. लेकिन 2022 आतेआते उन के संबंधों में खटास पैदा होने लगी थी. उस का मुख्य कारण था मुमताज की व्यस्तता. मुमताज अहमद करीब ढाई साल से वैशाली जिले के भगवानपुर प्रखंड में पंचायत रोजगार सेवक के पद पर कार्यरत था.

उस के बाद मुमताज को रतनपुरा और असोई पंचायत में पंचायत रोजगार का सेवक बनाया गया था, जिस के कारण उस का घर से ही पंचायत और प्रखंड में आनाजाना लगा रहता था. काम अधिक होने के कारण वह अपनी बीवी और बच्चों को भी ठीक से टाइम नहीं दे पाता था. यही कारण रहा कि सबा फिरदौस को मुमताज पर किसी अन्य महिला के साथ संबंध होने का शक पैदा हो गया था. उसी शक के चलते दोनों के बीच मनमुटाव पैदा हो गया. दोनों के बीच शक ही दरार ने उन के रिश्तों में कड़वाहट घोल दी थी. सबा फिरदौस को पूरा विश्वास था कि पति का वैशाली के भगवानपुर प्रखंड में काम करने वाली एक महिला के साथ अवैध संबंध हैं.

मुमताज अपने लौकर की चाबी हमेशा अपने पास ही रखता था. कई बार सबा फिरदौस ने उस से चाबी मांगी, लेकिन उस ने चाबी देने से मना कर दिया था, जिस के कारण सबा फिरदौस को पति पर शक हो गया था कि उस ने उस के जेवर उस महिला को दे दिए हैं, जिस से वह प्यार करता था. सबा फिरदौस पढ़ीलिखी थी. उस ने कई बार पति मुमताज को चोरीछिपे मोबाइल पर बात करते देखा था. उसे पूरा शक था कि पति जरूर किसी अन्य महिला के प्यार के चक्कर में पड़ गया है. उस की सच्चाई जानने के लिए उस के दिमाग में एक आइडिया आया.

उस ने अपने मोबाइल में मोबाइल ट्रैकर ऐप इंस्टाल कर लिया, ताकि वह घर बैठे ही पति की दिनचर्या पर पूरा ध्यान रख सके. मुमताज अहमद का काम ही कुछ ऐसा था, जहां पर रहते उसे दिन में तरहतरह के लोगों से मिलना होता था. उस में स्त्रीपुरुष दोनों ही होते थे. उस के बाद भी सबा फिरदौस पति के घर आते ही उस से तरहतरह के सवाल करने लगी थी. उस की उसी बात से मुमताज को उस पर झुंझलाहट पैदा होने लगी थी, जिस के कारण दोनों के बीच मतभेद और बढ़ गए. इस के बाद सबा फिरदौस अपने एक रिश्तेदार के संपर्क में आ गई, जिस से वह अपना मन बहलाने के लिए मोबाइल पर बात करने लगी थी.

फिर वह धीरेधीरे पति की गैरमौजूदगी में उस के घर भी आने लगा था. रिश्तेदार के साथ अफेयर चालू होते ही उस का पति के प्रति व्यवहार भी बदल गया था. वह हर वक्त उस से खफाखफा सी रहती थी, जिस के कारण मुमताज अहमद को भी उस पर शक होने लगा था. इस दौरान मुमताज ने कई बार उस से उस का मोबाइल मांगा, लेकिन फिरदौस ने उसे अपना मोबाइल दिखाने से साफ मना कर दिया था. वह अपने मोबाइल में लौक लगा कर रखती थी. इसी कारण मुमताज को पत्नी पर शक हो गया कि वह उस की गैरमौजूदगी में जरूर किसी से मिलती है.

इस बात की पुख्ता जानकारी के लिए मुमताज अहमद ने अपने बच्चों को माध्यम बनाया. उस ने अपने बच्चों से पूछा तो बच्चों ने साफसाफ बता दिया कि आप के पीछे हमारे घर एक अंकल आते हैं. इस जानकारी के मिलते ही मुमताज का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, लेकिन उस ने उस वक्त पत्नी से इस बारे में कोई बात नहीं की. वह किसी भी तरह से गुप्तरूप से उस की हकीकत जानना चाहता था. वह कौन है और कहां रहता है? उस सच्चाई को जानने के लिए मुमताज ने अपने घर में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए, ताकि वह पत्नी की हर दिन की दिनचर्या देख सके. घर में सीसीटीवी लगते ही सबा फिरदौस भी सचेत हो गई थी. उस ने फोन कर अपने रिश्तेदार को उस सब की जानकारी दे दी, जिस के बाद वह उस के घर नहीं आया था.

लेकिन मुमताज फिर भी मानने को तैयार न था. उस के बाद भी उस ने कई बार उस से जानने की कोशिश की कि उस के पीछे घर पर कौन आता है. सबा फिरदौस अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच में इतना मनमुटाव हो गया कि मुमताज ने कई बार उस की पिटाई तक कर दी. मुमताज अपनी प्रेम कहानी उस से छिपाए हुए था, लेकिन बारबार सबा फिरदौस पर शक करते हुए उस की सच्चाई जानने के लिए व्याकुल था. उस की इस बात से सबा फिरदौस पूरी तरह से पति से नफरत करने लगी थी. उस ने तभी सोच लिया था कि किसी भी तरह से पति से पीछा छुड़ाना होगा.

उसे अपने पर विश्वास था कि एक न एक दिन उस की सरकारी नौकरी लग ही जानी है. उस के खत्म होने के बाद वह अपने बच्चों को खुद ही पाल लेगी. उसी दौरान उस ने एक दिन एक चार्ट पर स्लोगन लिखा, ‘हारना मंजूर है मुझे, पर खेल तो बड़ा ही खेलूंगी.’’

मुमताज अहमद ने वह स्लोगन कई बार पढ़ा भी, लेकिन उस ने सोचा कि बच्चों के लिए लिखा होगा. उस ने उस बारे में कभी भी गहराई से नहीं सोचा था. उस के साथ ही फिरदौस ने पति की हत्या की प्लानिंग करनी शुरू कर दी. फिर वह क्राइम पेट्रोल, सस्पेंस व थ्रिलर वाली फिल्में देखने लगी, ताकि वह बिना किसी रिस्क के पति की हत्या कर सके. इस के साथ ही वह अपने मोबाइल से गूगल व यूट्यूब पर हत्या करने के तरीके भी खोजने लगी थी. उस दौरान उस ने गूगल और यूट्यूब से कई तरह के तरीके नोट भी कर लिए थे, जिस से वह जल्दी से पति से आजाद हो सके.

मुमताज अहमद सारे दिन भागदौड़ की ड्यूटी निभाने के बाद शाम को जब घर पहुंचता तो उस की बीवी उस से सीधे मुंह बात नहीं करती थी. पत्नी के बदले व्यवहार से तंग आ कर उस ने शराब पीनी भी शुरू कर दी थी. वह अपनी ड्यूटी से घर वापस आता और फिर खाना खा कर सो जाता था. उस दौरान तक वह पति की हत्या करने का पूरा प्लान बना चुकी थी. मुमताज हमेशा ही घर देर से पहुंचता था. सबा फिरदौस एक थ्रिलर फिल्म की भांति उस की हत्या की स्क्रिप्ट लिख चुकी थी. उस ने पति की हत्या से पहले ही ताले की चाबी खो जाने वाली बात कहते हुए किसी से कटर द्वारा उसे कटवा लिया था, ताकि वह मुमताज की हत्या के बाद अपनी योजनानुसार उस को बदमाशों द्वारा काटना दिखा सके.

पति की हत्या की पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने के बाद फिरदौस ने 7 जुलाई, 2025 को उस की हत्या का दिन फिक्स कर दिया था. 7 जुलाई की रात को देर रात मुमताज अहमद अपने घर पहुंचा. आते ही उस ने सब से पहले शराब का पैग लिया. उसी दौरान किसी का फोन आया तो वह अपने फोन पर बात करतेकरते ऊपर की मंजिल पर चला गया. वह काफी देर तक फोन पर बात करता रहा. जब वह नीचे आया तो सबा फिरदौस ने उस से पूछा, ”किस का फोन था, जिस से इतनी देर से बात कर रहे थे?’’

”तुम अपने काम से काम रखो, तुम्हें यह जानने की कोई जरूरत नहीं कि मैं किस से क्या बात कर रहा हूं.’’ मुमताज बोला. उस के बाद सबा फिरदौस उस का मोबाइल देखने की जिद करने लगी, लेकिन मुमताज ने उसे अपना मोबाइल देखने के लिए नहीं दिया. उसी बात को ले कर उस की सबा फिरदौस से झड़प हो गई. उसी झड़प के दौरान सबा फिरदौस की जिद के आगे मुमताज ने उसे लौकर की चाबी दे दी. लौकर की चाबी मिलते ही उस ने लौकर खोल कर देखा तो उस में से उस के सारे जेवर गायब थे. जेवरों को गायब देखते ही सबा फिरदौस का माथा ठनक गया. उस ने पति से जेवरों के बारे में पूछा तो उस ने साफ शब्दों में कहा कि उसे उस के जेवरों से क्या लेनादेना, अपने जेवर अपने आप देखो, तुम ने कहां रखे हैं.

सबा फिरदौस को पूरा शक हो गया था कि उस ने उस के जेवर जरूर उसी महिला को दे दिए होंगे, जिस से चक्कर चल रहा है. इस बात का शक पैदा होते ही सबा फिरदौस ने उसी समय मुमताज की हत्या करने का पूरा मन बना लिया था. उस के बाद भी दोनों ने बच्चों के साथ खाना खाया और फिर मुमताज अहमद अपने कमरे में सोने चला गया. सबा फिरदौस भी बच्चों को साथ ले कर दूसरे कमरे में चली गई. कुछ देर बाद ही उस के तीनों बच्चे तो सो गए, लेकिन उस रात सबा फिरदौस की आंखों से नींद कहीं दूर जा चुकी थी. वह बारबार कमरे से उठती और पति के कमरे की तरफ ही ताड़ती रही. उस रात उस का टाइम काटे कट नहीं रहा था. वह बारबार घड़ी की तरफ देखती रही.

जब काफी रात गुजर गई और चारों ओर सन्नाटा छा गया तो वह अपने कमरे से दबेपांव निकली. उस वक्त तक सारे दिन की भागदौड़ और शराब के नशे में मुमताज बेसुध हो कर सो चुका था. रात के 1 बज कर 20 मिनट पर मौका पाते ही सबा फिरदौस ने सीसीटीवी कैमरों का रिकौर्डिंग बौक्स निकाल दिया. उस के बाद वह फिर से अपने बच्चों के पास आ कर बैठ गई. फिर वह लाइट गुल होने का इंतजार करने लगी. रात के कोई ढाई बजे लाइट गुल हो गई. इस के बाद वह अपने कमरे में रखा हथौड़ा और चाकू ले कर पति के कमरे में पहुंची. उस वक्त भी मुमताज अहमद गहरी नींद में सोया हुआ था. उसे गहरी नींद में सोते देख उस के मन का शैतान जाग उठा.

मौका देखते ही उस ने अपने एक हाथ से तकिए द्वारा उस का मुंह दबाया और दूसरे हाथ से हथौड़े से उस के सिर पर लगातार कई वार कर डाले, जिस के बाद मुमताज अहमद की चीख तकिए से दब कर रह गई. मुमताज अहमद शरीर से तगड़ा था. उस के बाद भी वह जैसेतैसे कर बैड से उठा, फिर वह सबा फिरदौस की ओर बढऩे लगा. जब सबा फिरदौस को पति से खतरा नजर आने लगा तो उस ने अपने हाथ में चाकू उठाया और पति मुमताज अहमद पर ताबड़तोड़ वार कर डाले. उस के बाद जिंदगी मौत से जूझता मुमताज अहमद फर्श पर गिर गया. उस के नीचे गिरते ही सबा फिरदौस ने चाकू से उस का गला काट दिया. उस के साथ ही उस ने पति की आंखों पर चाकू के कई वार कर डाले. कुछ देर तड़पने के बाद मुमताज ने दम तोड़ दिया.

पति को मौत की नींद सुलाने के बाद फिरदौस ने अपने बच्चों को जा कर देखा तो तीनों गहरी नींद में सोए पड़े थे. उस के बाद उस ने पति के दोनों फोन और डीवीआर उठाया और मकान की छत पर पहुंची. उस ने रात का फायदा उठाते हुए पड़ोसियों की छत पर जा कर मुमताज के मोबाइल और डीवीआर को जंगल में फेंक दिया. फिर उस ने अपने मकान की मुमटी पर लगे लोहे के दरवाजे की चाकू से जाली काटी और उस में पहले से कटा हुआ ताला लगा दिया, ताकि वह इस हत्याकांड को लूटमार की शक्ल देने में कामयाब हो जाए.

इस पूरी घटना को अंजाम देने के बाद सबा फिरदौस ने अपने पहने कपड़े चेंज किए, अलमारी का सामान उस ने कमरे में इधरउधर बिखेर दिया. उस के बाद वह अपने बच्चों के पास जा कर सो गई. जब उसे लगने लगा कि सुबह होने वाली है, तब उस ने अपने बच्चों को उठाया और फिर उस ने पड़ोसियों के साथ ही अपने फेमिली वालों को घर में लूटपाट और पति की हत्या होने की जानकारी दे दी. हत्या की सूचना पाते ही सब से पहले उस के परिवार वाले उस के पास पहुंचे और फिर पुलिस भी पहुंच गई थी. पुलिस और परिवार वालों के मकान पर पहुंचते ही सबा फिरदौस ने अपने रोनेधोने का नाटक शुरू कर दिया था.

इस हत्याकांड के खुलते ही पुलिस ने आरोपी पत्नी सबा फिरदौस की निशानदेही पर मोबाइल और डीवीआर भी बरामद कर ली थी. इस घटना के बाद मृतक मुमताज अहमद के बड़े भाई मुश्ताक अहमद ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिस में कहा गया था कि डकैत उस के भाई मुमताज की हत्या करने के बाद सबा फिरदौस से चाकू की नोंक पर 9 लाख रुपयों की ज्वैलरी व 2 लाख रुपए कैश लूट कर फरार हो गए थे. सबा फिरदौस ने पति की हत्या करने से पहले ही चाकू पर अपने पति का ही रूमाल लपेट दिया था, ताकि पुलिस काररवाई के दौरान उस के अंगुलियों के निशान उस चाकू पर न आने पाएं.

सबा फिरदौस ने पति की हत्या स्वयं ही करना स्वीकार की थी, लेकिन यह बात किसी के भी गले नहीं उतर पा रही थी. सभी का मानना था कि इस हत्याकांड में उस की सहायता करने वाला जरूर कोई रहा होगा. सबा मुमताज के घर पति की अनुपस्थिति में उस से कौन मिलने आता था? वह भी रहस्यमय बना हुआ था, जिस का राज सबा फिरदौस ने अपने दिल में छिपाए रखा था. जिस को वह पूरी तरह से बचाना चाहती थी. इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी सबा फिरदौस को कोर्ट में पेश कर उसे जेल भेज दिया, लेकिन उस ने पति पर शक कर और अपनी प्रेम कहानी के चलते अपने साथ ही बच्चों का भविष्य भी अंधकारमय बना डाला. Hindi Story

 

 

UP News : छलिया प्रेमी को पहचानना जरूरी

UP News : ज्यादातर महिलाएं प्यार की कद्रदान होती हैं. जब वह एक बार किसी पुरुष को अपने दिल में बसा लेती हैं तो उस का साथ ताउम्र चाहने की लालसा रखती हैं, लेकिन पुरुष उस के साथ दगा करने से नहीं चूकता. जब कभी उस महिला का दिल टूटता है तो वह कुछ भी करने से नहीं झिझकती. पढ़ें, हवस में अंधे पुरुषों से धोखा खाई महिलाओं की यह दिलचस्प कहानी…

उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना गुरबख्शगंज के एसएचओ प्रवीण गौतम ने गीता को समझाते हुए कहा, ”अगर तुम्हारे साथ कुछ गलत हुआ है तो मुझे बताओ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मुझ से जितना हो सकेगा, मैं तुम्हारी मदद करूंगा.’’

एसएचओ का इतना कहना था कि गीता फफकफफक कर रोने लगी. रोते हुए ही उस ने कहा, ”क्या करती साहब, जवान बेटी की इज्जत का सवाल था. अगर मैं उसे मार न डालती तो वह मेरी बेटी की जिंदगी को नरक बना देता. मजबूर हो कर मुझे उस की हत्या करनी पड़ी.’’

एसएचओ ने गिलास का पानी गीता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ”यह लो पहले पानी पियो. मन को थोड़ा शांत करो, उस के बाद बताओ कि मेड़ीलाल ने तुम्हारे साथ या तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा क्या किया कि तुम्हें उस की हत्या करनी पड़ी?’’

एसएचओ के हाथ से पानी का गिलास ले कर गीता ने थोड़ा पानी पिया. खाली गिलास सिपाही को पकड़ा कर साड़ी के पल्लू से मुंह और आंखें पोंछ कर सिसकते हुए गीता अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगी. गीता ने एसएचओ को अपनी जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. हरियाणा की रहने वाली गीता की शादी दयाशंकर से हुई थी. दयाशंकर ठीक आदमी नहीं था. इसलिए गीता पति से परेशान रहती थी, लेकिन कोई ढंग का सहारा न मिलने की वजह से वह किसी तरह उस से निभा रही थी. दूसरों के घर काम कर के वह किसी तरह जीवन काट रही थी. उसी बीच उसे एक बेटी हो गई, जिस का नाम उस ने रोशनी रखा.

उसे लगा कि रोशनी के आने के बाद शायद उस के जीवन में रोशनी आ जाए, पर उस के जीवन में वैसा ही अंधेरा बना रहा. धीरेधीरे रोशनी बड़ी होने लगी, पर गीता के जीवन में वैसा ही अंधेरा बना रहा. अचानक एक दिन उस के जीवन में उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना गुरबख्शगंज के गांव दाउदपुर रामनगर का रहने वाला मेड़ीलाल आया. रोजीरोटी की तलाश में मेड़ीलाल हरियाणा गया था. जबकि उस का परिवार गांव में ही रहता था. गीता ने जब अपनी दुखभरी कहानी मेड़ीलाल को सुनाई तो उसे गीता से सहानुभूति हो गई और वह गीता की हर तरह से मदद करने लगा.

मेड़ीलाल पत्नी और बच्चों से दूर अकेला रहता था. गीता से मुलाकात होने के बाद मेड़ीलाल जब काम से घर आता तो गीता उसे एक गिलास पानी ही नहीं चाय भी बना कर देने लगी. मेड़ीलाल भी हर तरह से गीता का खयाल रखने लगा था. गीता जहां पति के प्यार से वंचित थी, वहीं मेड़ीलाल भी पत्नी से दूर था. दोनों को प्यार की नहीं, शरीर की भूख सताती थी. इसलिए उन्हें नजदीक आने में देर नहीं लगी. नजदीकी बढ़ी तो दोनों एक साथ रहने लगे, जिसे आज लिवइन कहा जाता है. मेड़ीलाल गीता की बेटी का भी खयाल रखता था. उस की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथसाथ उस की हर जरूरत पूरी करता था. गीता की बेटी तब यही कोई 14 साल की थी.

सब कुछ बढिय़ा चल रहा था. गीता का साथ पाने के बाद मेड़ीलाल घर और परिवार को लगभग भूल सा गया था. शायद वह गांव लौट कर आता भी न. पर जब देश में कोरोना फैला तो बहुत लोगों के रोजगार चले गए. उन्हीं में एक मेड़ीलाल भी था. कोरोना की वजह से काम बंद हुआ तो मेड़ीलाल ने गांव लौटने का विचार किया. जब वह गांव जाने के लिए तैयार हुआ तो गीता ने कहा, ”तुम गांव चले जाओगे तो मेरा क्या होगा? मैं अकेली पड़ जाऊंगी. इतने दिन साथ रहने के बाद अब में तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊंगी.’’

मेड़ीलाल जहां 55 साल का था, वहीं गीता 35 साल की थी. उस की पत्नी भी बूढ़ी हो चुकी थी. इस के अलावा गीता उस की पत्नी से सुंदर भी थी. यही सब सोच कर उस ने गीता से कहा, ”तुम ने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें छोड़ कर अकेला गांव जाऊंगा. अब तो जहां मैं रहूंगा, वहीं तुम्हें भी रखूंगा.’’

इस के बाद परिणाम की चिंता किए बगैर मेड़ीलाल गीता और उस की बेटी रोशनी को साथ ले कर गांव आ गया. मेड़ीलाल गीता के साथ घर पहुंचा तो घर में बवाल हो गया. फेमिली वालों ने गीता और रोशनी को घर में रखने से साफ मना कर दिया. मेड़ीलाल का गांव के बाहर थोड़ा खेत था, उसी में उस ने गीता के लिए झोपड़ी डाल दी. गीता के रहने की व्यवस्था हो गई. खर्च भी मेड़ीलाल ही उठाता था. वह कभी घर में रहता तो कभी गीता के साथ. इसी तरह समय बीतता रहा.

रोशनी का दाखिला यहां भी गीता ने एक स्कूल में करा दिया था. गीता अब तक 12वीं पास कर चुकी थी. उस की उम्र भी 19 साल हो गई थी. देखा जाए तो अब वह जवान हो गई थी. ऐसे में ही किसी दिन मेड़ीलाल की नजर उस पर पड़ी तो उस की नीयत बदल गई. फिर क्या था, वह बेटी की तो क्या पोती की उम्र की रोशनी के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. मेड़ीलाल को लगता था कि वही उसे खिलातापिलाता है तो वह जो चाहेगा, उस के साथ कर लेगा. लेकिन रोशनी ने उसे छूने नहीं दिया. एक दिन तो उस ने हद ही कर दी. उस दिन उस ने उस के नाजुक अंगों पर हाथ लगा दिया.

मेड़ीलाल की इस हरकत पर रोशनी को गुस्सा आ गया. उस ने कह भी दिया, ”आज के बाद इस तरह की हरकत की तो ठीक नहीं होगा.’’

मेड़ीलाल को इस के बाद पीछे हट जाना चाहिए था. पर उस की मम्मी गीता को उस ने रखैल बना रखा था, इसलिए उसे लगता था कि बेटी भी वैसी ही होगी. आज नखरे कर रही है, पर कभी न कभी समर्पित ही हो जाएगी. पर ऐसा हुआ नहीं. उस ने उसी दिन मेड़ीलाल की शिकायत मम्मी से कर दी. प्रेमी की इस हरकत पर गीता सोच में पड़ गई. बेटी की जिंदगी का सवाल था. उसी का प्रेमी उस की बेटी की जिंदगी नरक बनाने पर तुला था. गीता जानती थी कि मेड़ीलाल समझाने से नहीं मानेगा. क्योंकि अब तक वह उस के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हो चुकी थी. इसलिए उस ने बेटी से सलाह कर के उसे खत्म करने का निर्णय ले लिया.

यह निर्णय लेने के बाद गीता मेड़ीलाल से मिली और उसे लालच दिया कि शाम को वह उस के घर आ जाए. रात में पार्टी करेंगे. उस के बाद रोशनी को समझाबुझा कर वह उस के पास भेज देगी. मेड़ीलाल तो यही चाहता था. रात होते ही वह शराब की बोतल ले कर गीता के घर पहुंच गया. गीता और रोशनी ने मेड़ीलाल को जम कर शराब पिलाई. जब वह विरोध करने की स्थिति में नहीं रहा तो गीता और रोशनी ने पहले तो लाठीडंडे से मेड़ीलाल की खूब पिटाई की. ज्यादा डंडे उस के सीने पर ही मारे, जिस से उस की पसलियां टूट गईं. उस के गुप्तांग पर भी डंडों से मारा. मार खातेखाते जब मेड़ीलाल बेहोश हो गया तो गीता और रोशनी ने चुन्नी से उस का गला घोंट दिया.

मेड़ीलाल का खेल खत्म कर गीता और रोशनी ने उस की लाश एक चादर में लपेटी और अपने घर से करीब 100 मीटर दूर ले जा कर झाडिय़ों में फेंक दी. इस के बाद अपने घर आ कर मांबेटी सो गईं. सवेरा होने पर देर तक मेड़ीलाल घर नहीं आया तो उस की खोज शुरू हुई. गांव में इधरउधर तलाशा गया, गीता के घर भी जा पर पूछा गया, लेकिन मेड़ीलाल का कुछ पता नहीं चला. दोपहर के करीब किसी व्यक्ति ने झाडिय़ों के बीच लाश देखी तो उस ने शोर मचाया तो गांव वालों ने उस लाश की शिनाख्त मेड़ीलाल के रूप में की. मेड़ीलाल के बेटे सुशील कुमार ने थाना गुरबख्शगंज जा कर पिता की हत्या की सूचना पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही एसएचओ प्रवीण गौतम, सीओ (लालगंज) पुलिस बल एवं फोरैंसिक टीम के साथ गांव दाउदपुर रामनगर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर परिवार के लोगों तथा गांव वालों से पूछताछ शुरू की. जब उस के चरित्र के बारे में पूछा तो गीता का नाम पुलिस के सामने आया. तब पुलिस गीता से पूछताछ करने लगी. पहले तो गीता पुलिस को इधरउधर की कहानियां सुनाती रही, पर उस की बौडी लैंग्वेज और बारबार झूठ बोलने पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ने उसे विश्वास में लेने की कोशिश की. उस से कहा गया कि अगर वह सब कुछ सचसच बता देगी तो जितना हो सकेगा, पुलिस उस की मदद करेगी. इस के बाद गीता ने रोते हुए मेड़ीलाल की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए उस की हत्या की सारी कहानी सुना दी.

मेड़ीलाल की हत्या की सच्चाई जान कर पुलिस का मन भी द्रवित हो उठा, लेकिन अपराध तो अपराध है. गीता ने अपराध किया था, इसीलिए पुलिस ने उस के साथ उस की 19 साल की बेटी रोशनी को भी गिरफ्तार कर लिया. इसी के साथ वह चुन्नी भी बरामद कर ली, जिस से मेड़ीलाल का गला घोंटा गया था. उन डंडों को पुलिस ने बरामद कर लिया, जिन से मेड़ीलाल की पिटाई की गई थी. सारे सबूत जुटाने के बाद एसपी आलोक प्रियदर्शी ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पत्रकारों को मेड़ीलाल की हत्या का खुलासा करते हुए आरोपियों के गिरफ्तार करने की सूचना दी. अगले दिन मांबेटी को रायबरेली की अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

यह ऐसी सत्य घटना थी, जिस में एक मां गीता ने अपनी बेटी की इज्जत बचाने के लिए अपने प्रेमी और पालनहार की जान ले ली. लेकिन दूसरी जो घटना गोरखपुर की है, उस में अपनी हवस मिटाने के लिए एक सुनीता ने बेटी को फंदे से लटकाने वाले प्रेमी को बचाने की कोशिश की. गोरखपुर का एक थाना है कैंपियरगंज. इसी थाने के अंतर्गत एक परिवार रहता था, जिस के मुखिया मुंबई में रहते थे. पत्नी सुनीता और 15 साल की बेटी रजनी गांव में ही रहती थी. बेटी 9वीं क्लास में पढ़ती थी. पति के बाहर होने की वजह से घर और बाहर के सारे काम सुनीता ही देखती थी. इन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिस का दूध बेच कर कुछ पैसे कमा लेती थीं. इस के अलावा पति कुछ पैसे भेज देता था, जिस से मांबेटी का गुजारा आराम से हो जाता था.

गाय के लिए भूसे की जरूरत पड़ती थी. भूसा थाना पीपीगंज के अंतर्गत आने वाले गांव जंगल अगही के रहने वाले सुनील गौड़ से खरीदती थीं. जब भी इन्हें भूसे की जरूरत पड़ती, वह सुनील गौड़ को फोन कर देतीं, सुनील भूसा पहुंचा देता था. अगर पैसे होते तो उसी समय दे देतीं, न होते सुनील को बाद में ले जाने के लिए कह दिया जाता. सुनील को भी ऐतराज नहीं होता, क्योंकि वह हमेशा उसी से भूसा लेती थीं. सुनीता अभी जवान थी. पति परदेश में रहता था. साल, डेढ़ साल में महीने, 2 महीने के लिए आता था और फिर वापस चला जाता था. इतने दिनों में उस की पति के साथ रहने की हसरतें अधूरी ही रह जाती थीं. जबकि सुनीता चाहती थी कि उस का पति हमेशा उस के साथ रहे.

प्यार की भूखी सुनीता के घर जब सुनील का आनाजाना बढ़ा तो वह उस में पति वाला प्यार ढूंढने लगी. सुनील जवान और कुंवारा था, इसलिए वह किसी भी औरत के प्यार की तलाश में रहता था. सुनील को सुनीता की आंखों में अपने लिए प्यार दिखाई दिया तो उसे उस के करीब आते देर नहीं लगी. क्योंकि आग दोनों ओर लगी थी. सुनीता और सुनील के बीच संबंध बने तो जब देखो, तब सुनील सुनीता के घर आनेजाने लगा. घर में कोई मर्द तो था नहीं कि रोकटोक होती, इसलिए सुनील कभीकभी रात को भी सुनीता के घर रुक जाता.

सुनीता की बेटी रजनी नाबालिग जरूर थी, पर इतनी भी छोटी नहीं थी कि उसे यह न पता चलता कि उस की मम्मी और सुनील के बीच क्या चल रहा है. कुछ दिनों तो वह चुप रही, लेकिन जब बात हद से ज्यादा बढ़ी तो वह मम्मी के इस संबंध का विरोध करने लगी. वह सुनील को अपने घर आने से रोकने लगी. इस से सुनील को भी परेशानी होने लगी और सुनीता को भी. क्योंकि न तो सुनीता सुनील को छोडऩा चाहती थी और न ही सुनील सुनीता को. जब इस मामले पर सुनीता और सुनील ने सलाह की तो उन्होंने इस का एक ही हल निकाला कि रजनी को भी इस की लत लगा दी जाए. उस के बाद न तो वह किसी से इस बात की शिकायत कर सकेगी और न ही विरोध कर सकेगी.

फिर क्या था, सुनील तो चाहता ही यही था. रजनी अभी कुंवारी थी. हर मर्द ऐसी लड़कियों को पाना चाहता है. सुनील गौड़ प्रेमिका सुनीता की बेटी रजनी पर भी डोरे डालने लगा. सुनीता की ओर से उसे पूरी छूट थी, इसलिए वह उस से शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगा. इस तरह जल्दी ही रजनी सुनील के जाल में फंस गई और अपना सब कुछ सुनील को दे बैठी. फिर तो सुनील की चांदी हो गई. वह मांबेटी से संबंध बनाता. यह सब इसी तरह चलता रहा. सुनीता के सुनील से संबंध केवल शारीरिक भूख मिटाने के लिए थे. पर रजनी को तो सुनील से प्यार हो गया था. जबकि उसे पता था कि सुनील के उस की मम्मी से भी संबंध हैं.

इस के बावजूद वह सुनील को इस कदर चाहने लगी कि उसे लगने लगा कि वह सुनील के बगैर नहीं रह सकती. इसलिए वह सुनील पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. जबकि सुनील ने केवल मौजमजे के लिए मांबेटी से संबंध बनाए थे. रजनी पहले तो सुनील से ऐसे ही विवाह के लिए कहती रही. पर जब देखा कि सुनील गंभीर नहीं है तो वह उस के पीछे पड़ गई. जब सुनील के लिए रजनी गले की हड्डी बनने लगी तो वह परेशान रहने लगा. उस ने यह बात अपने ही टोले के रहने वाले अपने दोस्त दुर्गेश यादव को बताई तो उस ने साफ कहा, ”अगर प्रेमिका गले की हड्डी बन रही है तो निकाल फेंको, वरना तुम्हारी ही जान ले लेगी.’’

इस के बाद सुनील रजनी को रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर एक दिन उसे मौका मिल गया. सुनीता के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. पति बाहर था, इसलिए संवेदना व्यक्त करने उसे ही जाना पड़ा. बेटी को घर में अकेली छोड़ कर वह रिश्तेदार के यहां संवेदना व्यक्त करने चली गई. शाम को सुनीता लौट कर आई तो उसे बेटी रजनी की साड़ी से लटकी लाश मिली. रोते हुए उस ने यह बात पड़ोसियों को बताई तो मोहल्ले की तमाम महिलाएं व पुरुष संवेदना व्यक्त करने पहुंच गए. उसी दौरान किसी पड़ोसी ने यह जानकारी थाना कैंपियरगंज पुलिस को दे दी.

पहली नजर में पुलिस को लगा कि यह सुसाइड का मामला है, लेकिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि यह सुसाइड का मामला नहीं, बल्कि रजनी की गला दबा कर हत्या की गई थी. यही नहीं, हत्या से पहले उस के साथ शारीरिक संबंध भी बनाया गया था. पुलिस चौंकी, क्योंकि रजनी अभी नाबालिग थी. पुलिस को शुरुआती जांच में घर में जोरजबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले थे. मां सुनीता से भी पूछताछ की गई कि लड़की का किसी से प्रेमसंबंध तो नहीं था?

सुनीता ने भी मना कर दिया. तब पुलिस ने घर के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स से पता चला कि इस नंबर से एक नंबर पर रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर थाना पीपीगंज के गांव जंगल अगही के टोला भरवल के रहने वाले सुनील गौड़ का निकला. पुलिस ने सुनील को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की तो हर अपराधी की तरह उस ने भी पहले इधरउधर की कहानियां सुनाईं. लेकिन जब पुलिस अपनी पर आई तो उस ने सारी सच्चाई उगल दी. उस ने रजनी की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया और रजनी से शारीरिक संबंध बनाने से ले कर हत्या तक की पूरी कहानी सुना दी.

रजनी सुनील पर विवाह के लिए दबाव डाल रही थी, इसलिए सुनील अब उस से पीछा छुड़ाना चाहता था. 26 सितंबर को जब सुनील को पता चला कि रजनी घर में अकेली है तो वह अपने दोस्त दुर्गेश यादव के साथ उस के घर पहुंच गया. पहले तो उस ने रजनी के साथ शारीरिक संबंध बनाए. इस के बाद जब रजनी ने विवाह की बात की तो उस ने विवाह करने से साफ मना कर दिया. फिर तो रजनी बिफर उठी और सुनील से उलझ गई. पीछा छुड़ाने के लिए सुनील ने रजनी की गला दबा कर हत्या कर दी.

इस बीच दुर्गेश घर के बाहर बैठा निगरानी करता रहा. हत्या करने के बाद सुनील ने दुर्गेश को अंदर बुलाया और उस की मदद से आंगन में फैली सुनीता की साड़ी में फंदा बना कर रजनी की लाश को लटका दिया, ताकि लगे कि रजनी ने आत्महत्या की है. अपना काम कर के दोनों अपनेअपने घर चले गए. रजनी की मम्मी सुनीता को पता था कि यह काम कौन कर सकता है, पर अपना पाप छिपाने के चक्कर में उस ने यह बात पुलिस को नहीं बताई थी.

सुनील गौड़ के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने दुर्गेश यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद एसएसपी गोरखपुर डा. गौरव ग्रोवर ने पुलिस लाइन में पत्रकार वार्ता कर के इस बात की जानकारी दी और थाना कैंपियरगंज में आरोपियों के खिलाफ हत्या और पोक्सो ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. यह तीसरी घटना है गुजरात के जिला भुज की. भुज का एक थाना है मुंद्रा मरीन. इसी थाने के अंतर्गत आने वाले गांव हमीरमोरा के रहने वालों ने समुद्र के किनारे एक लाश पड़ी देखी. यह जानकारी उन्होंने थाना मुंद्रा मरीन पुलिस को दी तो थाना पुलिस तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गई.

लाश की स्थिति काफी खराब थी. इस से साफ लग रहा था कि हत्या कई दिनों पहले की गई थी. पुलिस ने लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, पर पता चला कि यह महिला वहां की रहने वाली नहीं है. पुलिस ने लाश के फोटो करवा कर वह पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और थाने आ कर उस की शिनाख्त की कोशिश करने लगी. काफी कोशिश के बाद भी जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने फोटो से महिला का स्केच बनवा कर उस के पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर लगवाए, लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ.

पुलिस ने उस स्थान का मोबाइल का डंप डाटा निकलवाया, जहां वह लाश मिली थी. जब इस डंप डाटा की स्क्रीनिंग की गई तो उस में 2 नंबर ऐसे मिले, जो वहां के रहने वालों के नहीं थे. जब इस बारे में पुलिस ने गांव वालों से पूछताछ की तो गांव के एक आदमी ने बताया, ”जी साहब, कुछ दिनों पहले 3 लोग यहां दिखाई दिए थे, जो यहां के रहने वाले नहीं थे. उन लोगों ने यहां पार्टी वगैरह की थी. उस के बाद चले गए थे.’’

पुलिस को डंप डाटा से बाहर के 2 नंबर मिले थे. इस से पुलिस को लगा कि वे दोनों नंबर उन्हीं लोगों के हो सकते हैं, जो बाहर से आए थे.

इस के बाद पुलिस ने उन लोगों के बारे में पता कराया तो जानकारी मिली कि ये नंबर नवावास के रहने वाले योगेश और नारण के थे. इस के बाद पुलिस ने घटना के लगभग एक महीने बाद लोकेशन के आधार पर योगेश और नारण को उठा लिया. थाने में योगेश और नारण से पूछताछ की तो पहले तो दोनों पुलिस को घुमाने की कोशिश करते रहे. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तो उन्होंने लक्ष्मी की हत्या की बात स्वीकारते हुए असली कहानी सुनानी शुरू कर दी. पुलिस ने दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. फिर जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस तरह थी.

इस कहानी को जानने के लिए 9 साल पीछे जाना होगा. मूलरूप से जूनागढ़ के रहने वाले जितेंद्र भट्ट को 9 साल पहले लक्ष्मी बेकरिया से प्यार हो गया. लक्ष्मी शादीशुदा ही नहीं, 3 बच्चों की मां थी, लेकिन पति से न पटने के कारण उस का झुकाव जितेंद्र की ओर हो गया तो वह पति को छोड़ कर जितेंद्र के साथ रहने लगी थी. उस ने एक बेटे को तो पति के पास छोड़ दिया था, जबकि एक बेटी और एक बेटे चेतन को साथ रख लिया था. बाद में उस ने पति से तलाक ले कर जितेंद्र से विवाह भी कर लिया था.

जब तक बच्चे छोटे थे, तब तक तो जितेंद्र की कमाई से घर का खर्च चलता रहा, लेकिन जब बच्चे बड़े हो गए तो घर का खर्च भी बढ़ गया. अब तक लक्ष्मी भी बच्चों की देखभाल से फुरसत पा गई थी. इस के बाद आमदनी बढ़ाने के लिए वह भी काम की तलाश में बाहर निकली. उसे कोई और काम नहीं मिला तो वह रंगरोगन का काम करने लगी. क्योंकि यह काम उसे आता था. इसी रंगरोगन का काम करने के दौरान उस की मुलाकात योगेश जोतियाना से हुई तो वह उसे दिल दे बैठी. इस के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो योगेश लक्ष्मी के घर भी आनेजाने लगा.

जितेंद्र को पता चल गया कि उस की पत्नी का संबंध योगेश से हो गया है, लेकिन योगेश थोड़ा अपराधी प्रवृत्ति का था, इसलिए जितेंद्र उस से कुछ कहने या उसे रोकने से घबराता था. दूसरी ओर लक्ष्मी भी पति का कहना नहीं मानती थी. ऐसे में योगेश का जब मन होता, लक्ष्मी के घर आ धमकता. लक्ष्मी के घर आनेजाने में योगेश की नजर लक्ष्मी की नाबालिग बेटी पर पड़ी तो वह अधेड़ लक्ष्मी के सहारे उसे पाने के रास्ता खोजने लगा. वह लक्ष्मी की बेटी पर भी डोरे डालने लगा. जिस घर में अनैतिक काम हो रहा हो, उस घर के बच्चों को बहकते देर नहीं लगती. लक्ष्मी की बेटी भी जल्दी ही योगेश के झांसे में आ गई और उसे अपना सब कुछ सौंप बैठी.

जल्दी ही बेटी और योगेश के संबंधों की जानकारी लक्ष्मी को तो हो ही गई, जितेंद्र को भी हो गई. तब जितेंद्र ने पत्नी को ताना मारा, ”देख लिया न अपनी अय्याशी का नतीजा. तुम्हारी ही वजह से आज नाबालिग बेटी की जिंदगी बरबाद हो रही है.’’

बेटी भले ही लक्ष्मी के पहले पति की थी, लेकिन जितेंद्र का अपना कोई बच्चा न होने की वजह से वह लक्ष्मी के पहले पति के बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानता था. इसलिए बेटी के गलत रास्ते पर जाने की वजह से वह परेशान तो था ही, इस की वजह भी पत्नी लक्ष्मी को मानता था. योगेश और बेटी के संबंधों के बारे में जान कर लक्ष्मी भी परेशान थी. उस ने बेटी को समझाया. पर बेटी नहीं मानी तो उस ने योगेश को घर आने से रोक दिया, लेकिन अब तक बेटी शारीरिक संबंधों की आदी हो चुकी थी और योगेश का भी वही हाल था. अब दोनों के बीच में लक्ष्मी कांटा बन रही थी, इसलिए दोनों ने सलाह की कि लक्ष्मी नाम के इस कांटे को ही निकाल फेंका जाए.

योगेश ने अपने एक दोस्त नारण से बात की तो वह योगेश का साथ देने को तैयार हो गया. 10 जुलाई, 2023 को योगेश ने लक्ष्मी को फोन कर के कहा, ”चलो, कहीं घूम कर आते हैं.’’

पहले तो लक्ष्मी ने मना किया, पर जब योगेश ने मिन्नतें की तो लक्ष्मी साथ चलने को तैयार हो गई. नारण के पास अपनी कार थी. योगेश नारण की कार में लक्ष्मी को बैठा कर थाना मुंद्रा मरीन के अंतर्गत आने वाले गांव हमीरमोरा पहुंचा. पहले तो तीनों ने शराब पी. उस के बाद योगेश ने लक्ष्मी के साथ संबंध बनाए और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. लक्ष्मी की हत्या कर उस की लाश को वहीं समुद्र किनारे बालू में दबा कर योगेश और नारण नवावास लौट आए.

समुद्र की लहरों की वजह से लाश के ऊपर की बालू हट गई तो गांव वालों की नजर उस पर पड़ गई और बात पुलिस तक जा पहुंची. इस के बाद काफी प्रयास कर महीनों बाद पुलिस ने लाश की शिनाख्त कर आरोपियों को पकड़ा. पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि मां की हत्या में नाबालिग बेटी का कितना हाथ है. पुलिस ने जब लक्ष्मी के पति जितेंद्र से पूछा कि उस ने पत्नी की गुमशुदगी क्यों नहीं दर्ज कराई तो जितेंद्र ने कहा, ”साहब, जब मैं ने पहले इसे योगेश से मिलनेजुलने से रोका था, तब इस ने मुझ से कहा था कि उसे मेरे साथ रहना हो तो रहे, वरना चला जाए. उस का जहां मन होगा जाएगी. साहब, इसीलिए मुझे लगा कि वह योगेश के साथ कहीं गई होगी. जब उस का मन भर जाएगा तो वापस आ जाएगी.’’

जितेंद्र के इस बयान में जो दर्द था, उसे सुनने वाले हर व्यक्ति ने महसूस किया. पुलिस ने पूछताछ के बाद योगेश और नारण को जेल भिजवा दिया है. UP News

—कथा में कुछ पात्रों के नाम परिवर्तित हैं

 

 

MP Crime News : बेदर्दी न समझा कोमल दिल की बात

MP Crime News : सैक्स की चाहत के लिए किया गया प्रेम न केवल अनैतिक और विरोध का तानाबाना बुन लेता है, बल्कि प्रेमी युगल को नाजायज और नापाक राह पर ले जाता है. ऐसा ही कुछ 21 वर्षीय रानू मेहर और रामनिवास सोलंकी के साथ हुआ, जिस के बाद…

रामनिवास सोलंकी अपने घर की छत पर अकेला बैठा था. शाम का अंधेरा घिरने में अभी वक्त था. एकदम तन्हाई में डूबा हुआ था. सामने दूर तक गांव का नजारा वहां से दिख रहा था. उस की पतली पगडंडियों पर गाहेबगाहे उस की नजर ठहर जाती थी. वहां इक्कादुक्का लोगों का आनाजाना हो रहा था. उन में अधिकतर गांव की ओर आने वाले ही थे.

अचानक उस की निगाह कंधे से बैग लटकाए एक युवती पर ठहर गई. वह उस की जानीपहचानी थी और गांव से बाहर जाती दिख रही थी. वह उस के बारे में सोचने लगा, ‘रानू मायके कब आई थी? अब कहां जा रही है?…शायद ससुराल?…आई थी तब उस ने मुझे कौल क्यों नहीं की?…पता लगाना होगा कि क्या बात है?’

रामनिवास चाहता तो वहीं से उसे आवाज दे सकता था, लेकिन उस ने अपने मोबाइल से उसे कौल कर दिया. कुछ सेकेंड तक रिंग जाने के बाद कौल डिसकनेक्ट हो गई. उस ने सोचा कि शायद उस का मोबाइल बैग में होगा. उस का अनुमान सही था. देखा युवती कुछ सेकेंड में ही अपने बैग से मोबाइल निकाल चुकी थी.

अगले पल रामनिवास के फोन पर रिंग बजने लगी थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली.

”हां जानू! तुम कब आई…बताया नहीं… मिले बगैर जा रही हो!’’

”आज ही दिन में आई थी…जल्दी लौटना है…फिर आऊंगी.’’ जवाब देने वाली युवती रानू मेहर रामनिवास के गांव की ही थी. तालाब के दूसरी छोर पर उस का मायका था. उन की पुरानी और गहरी जानपहचान थी. उन के बीच सालों से प्रेम संबंध में ताजगी बनी हुई थी, जबकि युवती पास के ही गांव में ब्याही थी. शादीशुदा हो कर भी उस का दिल और दिमाग रामनिवास के दिल में ही अटका हुआ था.

”तो फिर मिली क्यों नहीं?’’ रामनिवास ने मायूसी से शिकायत की.

”क्या करती मिल कर, तुम मेरी बात मानते ही नहीं.’’

”कैसे मान लूं, तुम अब दूसरे की हो!’’

”चलो, अब फोन काटो,’’ बोलते हुए रानू ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रानू का अचानक फोन कट जाने पर रामनिवास दुखी महसूस करने लगा. सोचने लगा कि आखिर वह उस से चाहती क्या है? मई की तपिश का महीना था. उस की इच्छा हुई कि तालाब के ठंडे पानी में नहा लिया जाए. इसी के साथ उस के मन में कई तरह के खयाल आते रहे. उन में बारबार रानू का चेहरा भी घूमता रहा. उस के साथ गुजारे गए हसीन लम्हों को याद करने लगा. तालाब में तैरते वक्त उसे याद आया कि कैसे उस ने इसी तालाब में रानू को तैरना सिखाने की पहल की थी.

बात 4 साल पहले की है. बरसात का मौसम था. रामनिवास सोलंकी गांव के तालाब में तैराकी कर रहा था. कुछ देर बाद जब वह तालाब से बाहर निकला, तब उस ने देखा कि उसे गांव की ही लड़की रानू मेहर निहार रही है. वह झेंप गया, लेकिन लड़की बोल पड़ी, ”तुम तो बहुत अच्छा तैरना जानते हो… मुझे भी तैरने का बहुत शौक है.’’

”तो सीख लो, किस ने रोका है.’’

”कैसे सीखूं…कोई लड़की तुम्हारी तरह अच्छी तैराक नहीं है.’’

”मैं सिखा दूं?’’

”हां, तुम सिखा दोगे मुझे तैरना!’’ रानू बोली.

”फीस लगेगी.’’ रामनिवास गमछे से अपना अधनंगा बदन पोंछता हुआ बोला.

”क्या फीस लोगे?’’

”तैराकी सिखाने के बाद बताऊंगा.’’

”बाद में मेरी जान मांग ली तो!’’

”तुम जैसी सुंदर लड़की की भला जान कौन मांगेगा?’’

”तो क्या मांगोगे?’’

”दिल?’’

”चल हट… बड़ा आया दिल लेने वाला!’’ रानू बोलती हुई शरमा गई थी.

”तैरना सीखना है तो बोलो, अभी से ही ट्रेनिंग शुरू कर देता हूं.’’

”हांहां सीखना है न, लेकिन डर लगता है…बाबू को मालूम हो गया तो वह मेरा गला घोंट देगा!’’ रानू आशंका जताती हुई बोली.

”बाबू को मालूम होगा तब न! दोपहर में सिखाऊंगा जब बाबू खेतों पर गए होंगे. चलो आ जाओ… पानी में उतरो.’’

”दूसरे कपड़े ले कर आती हूं.’’ रानू बोल कर अपने घर की ओर दौड़ पड़ी.

कुछ मिनटों में ही रानू पौलीथिन बैग में कपड़े ले कर तालाब के किनारे लौट आई थी. चंचल रानू को संभालता हुआ रामनिवास कमर तक पानी में उतर गया था. उस ने उस के दोनों हाथों को पकड़ कर एक झटके में डुबकी लगाई, जिस के लिए रानू शायद पहले से तैयार नहीं थी. जिस से उस के नाकमुंह में पानी घुस गया था. अपना हाथ छुड़ाती हुई दोनों हथेलियों से नाकमुंह में घुस आए पानी को साफ किया. चेहरा पोंछती हुई बोली, ”ऐसे तो तुम मुझे मार ही डालोगे…सांस नहीं ले पा रही थी.’’

”इतने में घबरा गई…यह तुम्हारा पहला सबक था. उस में पास हो गई…अब अगले स्टेप के लिए तैयार हो जाओ!’’ रामनिवास प्यार से बोला.

”लेकिन अचानक से पानी में डुबो दिया था!’’ रानू बोली. उस का कोई जवाब दिए बगैर रामनिवास ने उस की कमर में हाथ डाला और उसे अपनी दोनों हथेलियों पर उठा लिया. अब उस का चेहरा आसमान की ओर था.

”अपना सिर पानी में डूबने से बचाना है और दोनों पैरों को पानी पर पटकना है…’’

रानू इस निर्देश का पालन करने लगी. कुछ देर बाद रामनिवास ने उसे अचानक छोड़ दिया. तब तक वह और गहरे पानी तक चली गई थी. सीने तक पानी में गिर पड़ी. किसी तरह उस ने खुद को संभाला और रामनिवास से लिपट गई. उसे अजीब सी अनुभूति हुई. किसी मर्द की बाहों में आना 17 साल की रानू का पहला अनुभव था. रामनिवास के लिए भी गीले बदन में रानू को पकड़े रहने का पहला अनुभव था. दोनों कुछ कम पानी में आ गए थे. रामनिवास उस की कमर और पीठ को सहला रहा था, किंतु जल्द ही रानू उस से अलग हो कर पानी से बाहर आ गई. अपने कपड़ों की थैली उठाई और पास की झाड़ी के पीछे चली गई. ओट में जा कर अपने कपड़े बदले और जाने लगी.

कपड़े बदल कर जब वह निकली तो रामनिवास बोला, ”अब और नहीं सीखना है?’’

”आज नहीं.’’ कहती हुई रानू चली गई. उस के जाने के काफी देर बाद तक रानू के शरीर स्पर्श को वह याद करता रहा.

इसी के साथ एक सच यह भी था कि रानू और रामनिवास के दिलों की धड़कनें एकदूसरे के लिए धड़कने लगी थीं.

उस के बाद दोनों का दोपहर में घंटे दो घंटे तक तालाब के पानी में तैरना सीखनेसिखाने का सिलसिला चल पड़ा. वह समय उन के लिए एकदूसरे के साथ पानी में रोमांस करने का भी था. रानू कुछ हफ्ते में ही तैरना सीख चुकी थी. वह रामनिवास की ऐहसानमंद थी कि बगैर कोई फीस दिए उस ने उस से तैरना सीख लिया है. उस के प्रति प्रेम की कोमलता के एहसास से भर गई थी. रामनिवास का भी कमोबेश यही हाल था, लेकिन उस के दिल में प्यार का मतलब रानू की कमसिन देह भर से था. वह उस मौके की ताक में रहने लगा था कि कब रानू उसे अपना सर्वस्व समर्पित कर दे.

जल्द ही उसे वह मौका भी मिल गया. एक दफा जब दोनों एकांत में एकदूसरे की तारीफ करते हुए रोमांस की बातों में मशगूल थे, तब रामनिवास ने अपनी वासना की प्यास बुझाने के लिए रानू को राजी कर लिया था. उस रोज दोनों ने साथ जिएंगे साथ मरेंगे की कसमें भी खाईं. रामनिवास ने रानू के सिर पर हाथ रख कर परिवार और गांव के समाज के विरोध का सामना कर शादी रचाने की सौंगंध ली. उन के बीच महीने 2 महीने नहीं, बल्कि 4 साल तक प्रेम संबंध कायम रहे. हालांकि उन के बारे में गांव में चर्चा भी होने लगी थी, लेकिन कोई खुल कर उन का विरोध नहीं जताता था.

इस दौरान जब भी रानू रामनिवास से मिलती, तब छूटते ही शादी की बात छेड़ देती थी…और फिर उन के बीच एक खटास की भावना भर जाती थी. हालांकि रामनिवास प्रेमिका रानू को शादी का आश्वासन दे कर नई उम्मीद से भर देता था.

इसी बीच दोनों के प्रेम संबंध की सूचना रानू के परिवार तक जा पहुंची. उस के मम्मीपापा रानू के इस व्यवहार से खफा हो गए और वे जल्द से जल्द उस की शादी रचाने की कोशिश में लग गए. पापा ने उस के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी थी. उन का प्रयास सफल हुआ और रानू की शादी पास के गांव गरोठ में रहने वाले एक युवक से कर दी गई. शादी के बाद भी विवाहिता रानू मेहर का दिल रामनिवास सोलंकी में लगा रहा.  वह चाहती थी कि वही उस का जीवनसाथी बने. जबकि रामनिवास गांव और परिवार में अपनी इज्जत बनाए रखना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस के प्यारमोहब्बत के चलते 2 परिवारों के बीच तनाव का महौल कायम हो जाए.

रानू मेहर के मायके में सभी इस बात से निश्चिंत हो गए थे कि रानू का घर बस गया है. उस ने कुंवारेपन में जो गलतियां कीं, अब उस के गांव के रामनिवास से मिलने में किसी को कोई आपत्ति नहीं थी. वह बेरोकटोक रामनिवास के घर चली जाती, उस की फेमिली वालों के साथ हंसीमजाक करती. इसी तरह रामनिवास भी रानू के मायके आने के बाद उस के घर जा कर एक बार जरूर मिल आता या फिर वे अपने पुराने प्रेम को ताजा करने के लिए तालाब के किनारे घंटों समय गुजार लते थे.

दूसरी तरफ रानू मेहर इसी उम्मीद में रहती थी कि एक न एक दिन रामनिवास सोलंकी जरूर उस के साथ शादी रचाएगा. इस उम्मीद के साथ वह अपने गांव आती रहती थी और रामनिवास से शादी करने का दबाव बनाती थी. जबकि वह कई बार उस से कन्नी काट चुका था. उस के रानू से बचने का कारण भी था. बातोंबातों में वह कई बार धमकी भी दे चुकी थी. वह बोल चुकी थी कि अगर उस ने शादी नहीं की, तब पुलिस के पास चली जाएगी. रेप का मुकदमा कर देगी. हालांकि उस ने बात को संभाल लिया और बोली कि वह मजाक कर रही है. ऐसा वह उस के साथ हरगिज नहीं करेगी.

उस रोज तो बात आईगई हो गई थी, लेकिन रामनिवास के दिमाग में रेप में फंसाए जाने की आशंका के कीड़े ने काटना शुरू कर दिया था. यही कारण था कि वह उस से दूरी बनाए रखना चाहता था. वह रानू को भूलने की कोशिश तो कर रहा था, लेकिन जब वह मायके आती थी, तब उस के उस साथ गुजारे हसीन रोमांस की यादें ताजा हो जाती थीं. उस रोज भी वैसा ही कुछ हुआ था, जब रामनिवास छत पर तन्हा बैठा था और उस से मिले बगैर रानू चली गई थी. वह मन मसोस कर रह गया था. उस के ठीक एक हफ्ते बाद ही 25 मई को रानू फिर मायके आई थी. आते ही सीधे रामनिवास को फोन किया. उसे तुरंत मिलने के लिए बुलाया.

उस वक्त रामनिवास गांव से बाहर गया हुआ था. उस ने 2 घंटे बाद आने को कहा, लेकिन रानू ने मिलने की बेसब्री दिखाई और कहा कि घर से बाहर किसी एकांत जगत पर मिलना चाहती है. इस पर रामनिवास ने तालाब के किनारे रात होने पर मिलने को कहा. उस ने समय तय कर लिया और छिप कर आने को कहा.

रानू ने ऐसा ही किया. वह गांव वालों की नजरों से बचती हुई 25 मई, 2025 की रात करीब 10 बजे तालाब के किनारे ओट ले कर बैठ गई. जल्द ही रामनिवास भी वहां पहुंच गया. आते ही मजाक किया, ”जानू! तैरने चलें!’’

”मजाक मत करो, आज में बहुत सीरियस मूड में हूं.’’

”क्यों, क्या बात हुई, पति से झगड़ कर आई हो?’’ रामनिवास बोला.

पति से तो नहीं, लेकिन तुम से जरूर झगडऩे आई हूं.’’ रानू बोली.

उस के बोलने के अंदाज से रामनिवास को लगा कि उस की मजाक का उस ने गंभीरता से जवाब दिया है. वह कुछ पल के सन्न सा रह गया.

”क्यों तुम से नहीं झगड़ सकती? मैं तुम से बहुत नाराज हूं. तुम से बहुत शिकायत है…’’ रानू बिफरती हुई बोली.

”शिकायत? किस बात की?…मेरी बीवी हो जो तुम्हारी शिकायतों को दूर करूं?’’ रामनिवास भी उसी के लहजे में बोला.

”तुम्हारी यही बात मुझे पसंद नहीं आती…मैं तुम्हारी प्रेमिका हूं…पहली प्रेमिका…मैं ने तुम्हें अपना सब कुछ सुपुर्द कर दिया…और तुम कहते हो मैं क्यों तुम्हारी शिकायत सुनूं?’’ रानू बोली.

”यही कहने के लिए बुलाया था?’’

”किस से कहूं अपने दिल की बात?’’

”पति से?’’

”उसे पसंद नहीं करती! तुम को मेरा पति बनना होगा, वरना मैं तूफान मचा दूंगी….अब और बहाना नहीं चलेगा? बहुत हो गया तुम्हारा आश्वासन!’’ रानू मेहर बोले जा रही थी.

”इस तरह से बात करने की जरूरत नहीं है. मेरी भी मजबूरी है. अभी तुम से शादी नहीं कर सकता. मेरा कोई ठोस काम नहीं है. मुझे गांव में ही रहना है. खेती से आमदनी करनी है. अगर कहीं दूसरे शहर में कामधंधा मिल जाए, तब शादी की बात सोची जा सकती है.’’

”आज तुम अपने वादे से भी मुकर गए.’’

”ऐसा ही समझो…इसी में हम दोनों की भलाई है. हम लोग एक ही गांव के हैं. हम लोगों का घर 10-12 घरों  के अंतर पर है. शादी कर हम लोग इसी गांव में कैसे रह पाएंगे? तुम अब शादीशुदा हो. मैं किसी ब्याहता को कैसे अपनी पत्नी बना सकता हूं. तुम्हारे मायके और ससुराल वाले हम पर मुकदमा ठोक देंगे, तब क्या होगा… कोर्टकचहरी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहता.’’ रामनिवास ने अपने मन की बात कह दी. उस ने एक तरह से अपना फैसला ही सुना दिया कि वह अब उस के साथ शादी नहीं कर सकता.

”कोर्टकचहरी के चक्कर में तो ऐसे भी आ जाओगे…उस रोज मजाक में बोली थी, आज वैसा नहीं है…तुम पर रेप का मुकदमा कर दूंगी. सीधे जेल जाओगे.’’ रानू गुस्से में आ गई थी और वहां से जाने के लिए उठ खड़ी हुई थी.

उस की तल्ख बातें सुन कर रामनिवास का दिमाग भन्ना गया था. दिलोदिमाग में तेजाबी तूफान उमडऩे लगा था. उस ने महसूस किया कि उस के हाथपैर बेकाबू हो गए हैं. अगले ही पल रामनिवास के दोनों हाथ रानू मेहर की गरदन को दबोच चुके थे. अचानक इस हमले के लिए रानू तैयार नहीं थी. अपने दोनों हाथों से रामनिवास की पकड़ से मुक्त होने की कोशिश करने लगी, लेकिन उस की बलिष्ठ भुजाओं की मजबूती के आगे असफल रही.

कुछ सेकेंड में ही उस की गरदन झूल गई. उस की मिमियाती आवाज भी बंद हो गई. रामनिवास के हाथों की पकड़ ढीली हुई, तब रानू जमीन पर धड़ाम से गिर पड़ी. सामने गिरी रानू की लाश को रामनिवास ने 2 बार ठोकरें मारी और भुनभुनाया, ”बड़ा आई थी मुझे जेल भेजने…’’

अगले रोज रानू के अचानक लापता हो जाने पर उस के मायके वाले परेशान हो गए. उस के बारे में पता लगाना शुरू किया. उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह कभी भी इस तरह घर से बिना कहे कहीं नहीं जाती थी. गांव वालों से पूछताछ की गई. किसी ने उस के बारे में कुछ नहीं बताया. उस के पापा को बहुत चिंता हुई. उन्होंने रानू की ससुराल वालों से उस की तहकीकात की. उन्होंने उस के ससुराल में नहीं होने की पुष्टि की. उस के पति ने गरोठ थाने पर रानू मेहर की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी. जिस के बाद फेमिली वाले और पुलिस उस की तलाश में जुट गए. रानू के घर से लापता होने के 4 दिन बाद भी कहीं पता नहीं चला.

अचानक 29 मई, 2025 को गांधी सागर जलाशय के बैकवाटर से एक अज्ञात महिला की लाश मिली. पुलिस को शक हुआ कि लाश मृतका रानू मेहर की हो सकती है. लाश की पहचान के लिए पुलिस ने मृतका के घर वालों को बुलाया, लेकिन शव की स्थिति इतनी खराब थी कि वे उसे नहीं पहचान पा रहे थे. इसलिए पुलिस ने फेमिली वालों के डीएनए से मृतका के डीएनए की जांच करवाई. रिपोर्ट आने के बाद मृतका की पहचान हो पाई. पहचान होते ही मृतका के पापा ने गांव के ही रामनिवास सोलंकी पर हत्या की आशंका जताई, क्योंकि रानू के गायब होने के बाद से वह भी गांव से गायब था. पुलिस ने जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार कर उस से सख्ती से पूछताछ की, जिस पर आरोपी ने मृतका की हत्या करना कबूल किया.

आरोपी रामनिवास सोलंकी ने बताया कि रानू मेहर शादीशुदा होते हुए भी उस से शादी कर साथ रहने को कहती थी. जबकि वह अविवाहित था, लेकिन सामाजिक बंधन के चलते उस का रानू से शादी करना संभव नहीं था. इसलिए रानू की जिद से परेशान हो कर उस ने उस की हत्या कर दी. इस के बाद शव को पानी में फेंक दिया था. पुलिस ने आरोपी रामविलास सोलंकी पर हत्या की धाराओं में मामला दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. इस मामले की जांच गरोठ थाने के एसएचओ हरीश मालवीय कर रहे थे. MP Crime News

 

 

Agra Crime News : बंद बोरे का खुला राज

Agra Crime News : अवैध संबंध अकसर अपराध को जन्म देते हैं. इतना सब जानते हुए भी सुनीता उर्फ सुषमा ने पति के रहते हुए मान सिंह से नाजायज संबंध बना लिए. इस के बाद जो हुआ, वह..

8 जून, 2021 की बात है. आगरा के थाना सदर के सेवला में रात के 11 बजे एक आदमी कंधे पर बोरा ले कर जा रहा था. अचानक बोरे के वजन के कारण उस का पैर फिसला और वह बोरे सहित  गिर पड़ा. इस पर वहां से निकल रहे लोगों की नजरें उस आदमी की तरफ गईं. वह किसी तरह उठा और बोरे को उठाने का प्रयास करने लगा. उसी समय बोरा खुल गया और उस में से एक हाथ बाहर निकल आया. यह देखते ही लोग उस की ओर दौड़े और उसे पकड़ लिया. बोरे को खुलवा कर देखा तो उस में एक युवक का शव था जिसे देख कर सभी के होश उड़ गए. बोरे में युवक की लाश मिलने से वहां सनसनी फैल गई. इस घटना की सूचना तुरंत पुलिस को दे दी गई.

सूचना मिलते ही थाना सदर के थानाप्रभारी अजय कौशल अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां लोग एक व्यक्ति को पकड़े हुए थे. यह माजरा देखते ही उन्होंने वहां मौजूद लोगों से जानकारी ली. लोगों ने बताया कि यही व्यक्ति कंधे पर बोरे में किसी की लाश ले कर जा रहा था. वजन के कारण वह बोरे सहित गिर गया. बोरा खुलने से लाश के बारे में पता चला. पुलिस ने देखा बोरे में एक युवक की लाश थी. शव की पहचान 40 वर्षीय जूता कारीगर संजय के रूप में हुई. पुलिस ने शव की पहचान होने के बाद उस के घरवालों को सूचना दी. जानकारी होते ही परिवार में कोहराम मच गया.

इस बीच घटना की जानकारी थानाप्रभारी द्वारा अपने उच्च अधिकारियों को दी गई. सूचना मिलते ही एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे वहां पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. युवक के गले  पर चोट के निशान दिखाई दे रहे थे. मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस ने शव को मोर्चरी भिजवा दिया. प्रेमी हुआ गिरफ्तार पुलिस पकड़े गए युवक मान सिंह को हिरासत में ले कर थाने लाई. थाने पर उस से पूछताछ की गई. जानकारी देने पर पुलिस ने रात में ही मृतक संजय के घर पहुंच कर उस की 35 वर्षीय पत्नी सुनीता उर्फ सुषमा से पूछताछ की.

सुनीता ने बताया कि वह दवा लेने गई हुई थी. जब लौट कर आई तो पति संजय घर पर नहीं मिले. उस ने सोचा कि कहीं गए होंगे. जब देर हो गई तो उस ने पति की तलाश शुरू की. बाद में पता चला कि उस के जाने के बाद पति की किसी ने हत्या कर दी थी. उधर हिरासत में लिए गए युवक ने बिना कुछ छिपाए पुलिस को सच्चाई बता दी. उस ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने बताया कि मृतक संजय की पत्नी से उस के प्रेम संबंध हैं. पति विरोध करता था.  हम दोनों के प्यार के बीच संजय रोड़ा बना हुआ था. वह अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता था. मुझे भी घर आने से मना करता था. इसलिए हम दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी.

वह शव को बोरे में बंद कर ठिकाने लगाने ले जा रहा था. लेकिन बोरे के गिर जाने से भेद खुल गया. पुलिस समझ गई कि मृतक की पत्नी सुनीता इस हत्याकांड में शामिल होने के बावजूद अपने को निर्दोष बता रही है. जबकि उस के प्रेमी मान सिंह ने पुलिस को सारी हकीकत बता दी थी. पुलिस ने सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया और फोरैंसिक टीम को बुला लिया. टीम ने मृतक के घर से कई साक्ष्य जुटाए. 9 जून, 2021 को प्रैस कौन्फ्रैंस में एसएसपी मुनिराज जी. ने इस हत्याकांड का खुलासा करते हुए हत्या में शामिल मृतक की पत्नी सुनीता उर्फ सुषमा व उस के 38 वर्षीय प्रेमी मान सिंह की गिरफ्तारी की जानकारी दी. संजय की हत्या के पीछे जो कहानी निकल कर आई वह 4 प्रेमियों के प्यार के बीच कांटा बनने की इस प्रकार निकली—

मृतक संजय आगरा की एक जूता फैक्ट्री में कारीगर था. वह मूलरूप से निबोहरा के मूसे का पुरा का रहने वाला है. देवरी रोड पर मकान ले कर वह परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुनीता सुषमा के अलावा 3 बच्चे भी हैं. कुछ समय पहले संजय ने अपना मकान बेच दिया. मकान बेचने के बाद वह सेवला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. संजय शराब पीने का शौकीन था. वह शराब पी कर अकसर सुनीता से झगड़ा करता और उस के साथ मारपीट करता था. सुनीता की दोस्ती थाना सदर के ही टुंडपुरा के रहने वाले मान सिंह से थी. दोनों की मुलाकात कुछ महीने पहले हुई थी. दोस्ती गहरी हो गई. एकदूसरे को पसंद करने लगे.

धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. सुनीता मान सिंह के साथ कई बार पति की गैरमौजूदगी में घूमने जा चुकी थी. संजय को यह जानकारी हो गई. वह पत्नी को भलाबुरा कहता था. उस के पास कोई सबूत नहीं था. इसलिए वह मौके की तलाश में रहता था. जब संजय पत्नी के साथ मारपीट करता तो मानसिंह बीच में पड़ कर मामला शांत करा देता. कई बार उस ने सुनीता को बचाया भी था. संजय शराब पी कर सुनीता से अभद्रता करता था. मान सिंह ने इसी बात का फायदा उठाया. सुनीता के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लिया.

पति संजय को पत्नी की मान सिंह से दोस्ती पसंद नहीं थी. वह इस का विरोध करता था. जबकि मान सिंह व सुनीता के बीच प्रेम संबंध दिनप्रतिदिन पुख्ता होते जा रहे थे. दोनों एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. पति की आदतों से अब सुनीता को वह अपना दुश्मन दिखाई देता था. प्रेमी संग पकड़ी गई सुनीता सुनीता और मान सिंह को जब भी मौका मिलता दोनों तनमन की प्यास बुझा लेते थे. संजय को दोनों पर शक हो गया. एक दिन संजय ने दोनों को घर में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. इस से मान सिंह तिलमिला कर रह गया. लेकिन वक्त की नजाकत को देखते हुए मान सिंह बिना कुछ बोले उस दिन वहां से चला गया. मान सिंह के जाने के बाद संजय ने सुनीता की पिटाई कर दी.

वह दोनों के संबंधों का विरोध करने लगा. सुनीता खून का घूंट पी कर रह गई थी. रंगेहाथों पकड़े जाने से वह विरोध की स्थिति में भी नहीं थी. संजय ने सुनीता को चेतावनी दी कि यदि मान सिंह से उस ने बात करते भी देख लिया तो दोनों को जान से मार देगा. सुनीता ने दूसरे दिन प्रेमी मान सिंह से पति द्वारा की गई पिटाई और धमकी के बारे में मोबाइल पर बताया. यह सुन कर मान सिंह का खून खौलने लगा. तब एक दिन सुनीता और मान सिंह ने अपने प्यार की राह के रोड़े को हटाने की योजना बनाई. सुनीता ने प्रेमी का प्यार पाने के लिए पति की हत्या की साजिश रची.

घटना वाले दिन सोमवार की शाम प्रेमी मान सिंह सुनीता से मिलने उस के घर गया. उस समय संजय भी घर पर मौजूद था. मान सिंह को देखते ही उस ने कहा, ‘‘जब मना कर दिया था फिर भी तू आ गया?’’

इस पर मानसिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की चीज लाया हूं.’’ यह कहते हुए उस ने साथ लाई शराब की बोतल उसे दिखाई. मान सिंह जानता था कि संजय की कमजोरी शराब है. इसलिए वह बेधड़क घर आ गया था. मान सिंह और सुनीता ने  संजय को जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में बेसुध हो गया तब दोनों ने उस के गले में दुपट्टा डाल कर कस दिया. दोनों ने गला घोट कर उस की हत्या कर दी. इस से पहले सुनीता ने बच्चों को खाना खिलाया और उन्हें कमरे में टीवी चला कर बैठा दिया. कमरे की बाहर से कुंडी लगा दी थी. हत्या के बाद दोनों ने शव को बोरे में बंद कर दिया. सुनीता ने प्रेमी मान सिंह से पति की लाश इलाके से दूर ले जा कर किसी तालाब में फेंकने को कहा. ताकि लोगों को लगे कि पानी में डूबने से उस की मौत हुई है.

तब मान सिंह शव को बोरे में भर कर कंधे पर रख उसे फेंकने के लिए रात में ही चल पड़ा. जब वह शव को ठिकाने लगाने जा रहा था तभी रास्ते में पैर फिसलने से बोरा गिर गया और हत्या का भेद खुल गया. प्रेमी मान सिंह द्वारा लाश फेंकने से पहले ही लोगों ने उसे रंगेहाथों दबोच लिया. आशिकी में पत्नी ने पति की हत्या करा दी थी. सुनीता को अपने पति की हत्या का कोई अफसोस नहीं था. अपने प्यार की खातिर प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या करने वाली सुनीता के चेहरे पर गिरफ्तारी के बाद भी पछतावे के भाव नहीं दिखाई दिए.

इतना ही नहीं, पति की हत्या के मामले में पकड़े जाने पर बच्चों का क्या होगा? उस ने इस बारे में भी नहीं सोचा. मगर जब उसे पता चला कि अब उस की और प्रेमी दोनों की बाकी जिंदगी जेल में कटेगी तो वह रोने लगी. सुनीता की शादी को 10 साल से अधिक हो गए थे. 3 बच्चों में सब से बड़ा बेटा 9 साल का है. लोगों की सतर्कता के चलते पुलिस ने एक हत्या का परदाफाश घटना के कुछ घंटे बाद ही कर दिया था. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से फंदा लगाने वाला दुपट्टा, मृतक का मोबाइल फोन और आधार कार्ड बरामद कर दोनों को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Agra Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

UP Crime News : बेवफा बीवी बरदास्त नहीं

UP Crime News : दीक्षा की खूबसूरती पर फिदा हो कर ही हरेंद्र ने उस से विवाह किया था. लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही हरेंद्र को शक हो गया कि पत्नी के अन्य कई लोगों के साथ संबंध हैं. इस की पुष्टि उसे पत्नी के फोन के काल रिकौर्डर की बातों से हो गई. फिर क्या था, उस ने बेवफा पत्नी को बीच सड़क पर ऐसी सजा दी कि…

हरेंद्र और दीक्षा की शादी के 2 साल हो चुके थे, मगर उन के बीच अटूट रिश्ता नहीं बन पाया था. वे पतिपत्नी जरूर थे, लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे एकदूसरे को बेइंतहा मोहब्बत करते थे. कारण हरेंद्र की कई आदतें दीक्षा को पसंद नहीं थीं और हरेंद्र को भी दीक्षा का बारबार मायके जाने की जिद करना अच्छा नहीं लगता था. एक तरफ दीक्षा की 17-18 साल की कच्ची उम्र थी तो वहीं दूसरी तरफ कामधंधे से बेफिक्र हरेंद्र को अपनी पुश्तैनी धनसंपत्ति पर बहुत ही गुमान था. रक्षाबंधन के एक सप्ताह पहले से ही दीक्षा मायके जाने की जिद करने लगी थी, जबकि हरेंद्र उस की बात को टालने लगा था. वह दीक्षा के मायके जाने का कारण जान गया था. उस के मोबाइल फोन में रिकौर्ड बातों से उस का संदेह और भी गहरा हो गया था.

‘‘मुझे मायके जाना है तो जाना है… मैं और कोई बहाना नहीं सुनूंगी.’’ दीक्षा अपनी बात पर अड़ती हुई बोली.

‘‘पिछले महीने ही तो तुम मायके गई थी…’’ हरेंद्र ने कहा.

‘‘गई थी, लेकिन 4 दिन बाद रक्षाबंधन है…राखी पर घर जाना है…सभी जाते हैं,’’ दीक्षा विफरती हुई बोली.

‘‘सभी जाते हैं तो क्या हुआ? आनेजाने में खर्च भी तो होगा.’’ हरेंद्र ने कहा.

‘‘तो मैं क्या करूं? कोई काम क्यों नहीं करते हो? कमातेधमाते क्यों नहीं हो?’’ दीक्षा बोली.

‘‘नहीं कमाता हूं तो क्या तुम्हें भूखा रखता हूं? खानेपहनने के लिए नहीं देता हूं? 2 महीने पहले ही तुम्हें 10 हजार रुपए का स्मार्टफोन खरीद कर दिया है.’’

‘‘वो तो तुम्हारा फर्ज बनता है पत्नी को खुश रखना और उस की अच्छी देखभाल करना,’’ दीक्षा बोली.

‘‘तुम हो तो पांचवीं फेल, पर बातें पढ़़ेलिखों जैसी करती हो. मुझे ही अधिकार और फर्ज का पाठ पढ़ा रही हो. तुम्हारा क्या कर्तव्य है, कभी समझा है?’’ हरेंद्र ने जवाबी हमला बोलते हुए ताना मारा.

‘‘तुम ने भी हमारी बात कभी नहीं मानी, जब देखो तब शराब के नशे में धुत रहते हो. बापदादा की कमाई पर गुजारा कर रहे हो, आवारा दोस्तों के साथ घूमतेफिरते रहते हो और कितने ऐब गिनवाऊं, बताओ…’’ दीक्षा लगातार बोलती जा रही थी. उस की एकएक बात हरेंद्र को चुभ रही थी. गुस्से में उस ने हाथ उठाया और एक थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया. थप्पड़ खा कर दीक्षा तिलमिला गई. तन कर बोलने लगी, ‘‘ऐंऽऽ तुम ने मुझे थप्पड़ मारा. अब तो मैं यहां एक पल भी रुकने वाली नहीं हूं. अभी के अभी मायके जाऊंगी. देखती हूं कि तुम कैसे रोकते हो मुझे.’’ यह कहती हुई दीक्षा अपने कमरे से बाहर जा कर सूखने के लिए फैले कपड़े समेटने लगी.

हरेंद्र भी गुस्से से कमरे से बाहर निकल आया. बाइक स्टार्ट की और कहीं चला गया. कहां गया, इस की जानकारी केवल उस के यारों को ही थी. 2 घंटे बाद घर लौटा तो देखा, दीक्षा मायके जाने के लिए अपने सामान के साथ तैयार बैठी थी. हरेंद्र के हाथ में एक थैला था. उस का गुस्सा शांत हो चुका था. उस ने थैला उसे देते हुए सौरी बोला. फिर कहा, ‘‘इस में तुम्हारी छोटी बहन शीतल और तुम्हारे लिए सलवारसूट के कपड़े हैं, मायके में सिलवा लेना.’’

इसी के साथ उस के चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ कर अगले दिन सुबहसुबह मायके छोड़ आने का वादा किया. सलवारसूट का कपड़ा देख कर दीक्षा पति का थप्पड़ भूल गई. खुश हो कर बोली, ‘‘बहुत सुंदर है, तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं.’’

दीक्षा चली गई मायके अगले रोज वह अपने मायके चली गई. दीक्षा का मायका मुरादाबाद जिले की तहसील बिलारी के गांव मुडि़या राजा का था. वह अरविंद कुमार की बेटी थी. अरविंद कुमार के 2 बेटियों दीक्षा व शीतल के अलावा 2 बेटे अभिषेक व आयुष थे. दीक्षा बड़ी बेटी थी. उन्होंने दीक्षा का विवाह 28 नवंबर, 2019 को पास के ही गांव ढकिया नरू निवासी भागीरथ के बेटे हरेंद्र के साथ किया था. बात 18 अगस्त, 2021 की है. रात के समय करीब साढ़े 9 बजे थे. अरविंद  कुमार के पिता अतर सिंह अपनी पोतियों शीतल और दीक्षा के साथ घर पर थे.

उन दिनों उन का बड़ा बेटा अपने परिवार के साथ हिमाचल के सोलन में रह रहा था. उस की रोजीरोटी वहीं से चलती थी. और छोटा बेटा राजकुमार अपनी रिश्तेदारी में गया हुआ था और रक्षाबंधन की वजह से उस की पत्नी अपने मायके गई हुई थी. इस तरह से उस समय घर में केवल दीक्षा और उस की छोटी बहन शीतल ही थी. रात को दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर अतर सिंह ने अपनी पोती को आवाज दी, ‘‘शीतल बेटा, देखो तो इस वक्त कौन आया है?’’

शीतल दादा की आवाज सुन कर नीचे गई. दरवाजा खोला. देखा उस के जीजा हरेंद्र थे. शीतल वहीं से बोली, ‘‘दादाजी, जीजाजी आए हैं.’’

हरेंद्र सीढि़यां चढ़ता हुआ सीधे अतर सिंह के कमरे में जा पहुंचा. बोला, ‘‘रामराम बाबा, कैसे हैं?’’

‘‘रामराम बेटा, आओ बैठो. अच्छा हुआ तुम आ गए मैं घर में अकेला बैठा ऊब रहा था.’’ कहते हुए उन्होंने फिर शीतल को आवाज लगाई, ‘‘बेटा शीतल, दीक्षा को बोलो हरेंद्र के लिए पानी और कुछ खाने को ले कर आए.’’

‘‘अरे नहीं बाबाजी, मैं तो बस समझिए आप का हालचाल लेने आया हूं. कल रक्षाबंधन है. सुबहसुबह चला जाऊंगा.’’

अतर सिंह ने हरेंद्र को सम्मान के साथ बैठाया. वैसे भी दीक्षा रक्षाबंधन के त्यौहार की वजह से आई हुई थी. किसी तरह की कोई शिकायत नहीं थी.

‘‘बाइक से आए हो?’’ अतर सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं कार से आया हूं.’’ थोड़ी देर में ही हरेंद्र ने अंग्रेजी शराब का एक अद्धा अपनी जेब से निकालते हुए बोला, ‘‘बाबाजी, गिलास मंगाओ. आज आप के साथ हो जाए एकएक पैग.’’

अतर सिंह हरेंद्र के इस व्यवहार को देख कर हतप्रभ रह गए.

फिर भी शांति से कहा, ‘‘बेटा तुम्हारी शादी को करीब 2 साल होने जा रहे हैं, आज तक तो तुम ने मेरे सामने कभी शराब नहीं पी. तो फिर आज तुम ऐसा कैसे कह रहे हो?’’

‘‘बाबाजी, यूं ही मूड हो आया. सोचा कि अपने दोस्तों के साथ तो पीता ही रहता हूं, क्यों न आप के साथ पी कर कुछ गिलेशिकवे दूर कर लिए जाएं.’’ हरेंद्र बोला.

‘‘लेकिन बेटा मेरी तबीयत ठीक नहीं है. ये देखो मेरी दवाई.’’ अतर सिंह ने जेब से दवाई निकाल कर दिखाते हुए कहा, ‘‘मैं शराब नहीं पीऊंगा.’’

उसी वक्त दीक्षा भी कमरे में पानी का गिलास और खाने की थाली ले कर आ गई. सामने शराब देख कर गुस्से भरी नजरों से हरेंद्र को घूरा. बोली कुछ नहीं. खाने की थाली सामने रखी और गिलास को रख कर तेजी से जाने लगी. गिलास का पानी छलक कर वहीं छोटे से स्टूल पर फैल गया.

‘‘दिखता नहीं है, यहीं मोबाइल रखा हुआ है, गीला हो गया तो..?’’ हरेंद्र की बात पूरी भी नहीं हुई कि उस के मोबाइल की रिंगटोन बजने लगी. उस ने काल रिसीव की, ‘‘हैलो…’’

उधर से जो आवाज आई, उसे सुन कर दीक्षा को आवाज लगाई, ‘‘…ये लो सुनो, तुम्हारा ही फोन है, मेरे जीजाजी हैं, तुम से ही बात करना चाहते हैं.’’

ननदोई की उस के लिए आई काल जान कर दीक्षा ने तुरंत हरेंद्र के हाथों से फोन ले लिया और नीचे सीढि़यों से उतरने लगी. हरेंद्र भी उस के पीछेपीछे आया और चुपके से दीक्षा और अपने बहनोई के बीच फोन पर हो रही बातों का अनुमान लगाने लगा. हरेंद्र ने दीक्षा को यह कहते हुए सुना, ‘‘मैं ने पहले मना किया है हरेंद्र के फोन पर मेरे लिए फोन नहीं   करें, क्योंकि उसे हम पर अब शक है.’’

वास्तव में हरेंद्र अपनी पत्नी को हमेशा ही शक की निगाह से देखता था. यहां तक कि उस ने दीक्षा को जो मोबाइल दिया था, उस में आटोमैटिक वायस रिकौर्डिंग का ऐप डाउनलोड कर दिया था. दीक्षा की गैरमौजूदगी में वह उस के सभी काल की रिकौर्डिंग सुनता था. उसी से उसे इस बात का पता चल गया था कि उस के कई चाहने वाले हैं. उन्हीं में एक उस का बहनोई भी था. उस की लच्छेदार बातों से हरेंद्र को अनुमान हो गया था कि दीक्षा उस के साथ बेवफाई कर रही है. यही नहीं हरेंद्र को यह भी शक था कि उस के मायके में भी कई प्रेमी हैं. ऐसा होना भी स्वाभाविक था. क्योंकि दीक्षा बला की खूबसूरत थी, उसे देख कर कोई भी उस पर मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था. हरेंद्र भी उस की खूबसूरती को देख कर ही शादी करने के लिए राजी हुआ था.

दूसरी बात दीक्षा के बातें करने का लहजा और मजाक का जवाब मजाक में देने का अंदाज किसी को भी पसंद आ जाता था. वीडियो कालिंग की दीवानी थी. उस के कई वीडियो कालिंग की क्लिपिंग्स हरेंद्र भी देख चुका था. उसे देखते हुए हरेंद्र के सीने पर सांप लोटने लगते थे कि दीक्षा उस के साथ प्रेम से क्यों नहीं पेश आती है? वह उस से हमेशा रूखी बातें क्यों करती है. जबकि दूसरों के साथ वह दिल की बातें उड़ेल कर रख देती  थी. वीडियो कालिंग, फ्लाइंग किस तो ऐसे देती थी जैसै वह प्रेमी नहीं पति हो. यह सब बातें हरेंद्र को भीतर से खाए जा रही थीं. उस के वैवाहिक संबंध में मधुरता कम कड़वाहट अधिक भर गई थी.

ऊपर से दीक्षा द्वारा बारबार शराबीकबाबी कहना, नाकारा, नालायक मर्द कहते हुए ताने मारना हरेंद्र को काफी दुखी कर देता था. बातबात पर उस की दीक्षा से बहस हो जाती थी. ऐसी बहस रक्षाबंधन के कुछ रोज पहले भी हो गई थी. दीक्षा को मारी गोली कुछ समय बाद दीक्षा हरेंद्र के कमरे में आ कर उस का मोबाइल लौटाने आई. खाना स्टूल पर पड़ा देख कर बोली, ‘‘आप ने कुछ खाया नहीं?’’

‘‘अरे बेटी, इसे अपने कमरे में ले जा, वहीं तुम दोनों खाना खा लेना. और हां, शीतल को एक गिलास गर्म दूध ले कर भेज देना. सोने से पहले वाली दवाई खानी है.’’ अतर सिंह बोले.

उस के बाद दीक्षा और हरेंद्र नीचे के अपने कमरे में आ गए. अगले दिन अतर सिंह को जो सूचना मिली उस से पूरा परिवार सदमे में आ गया. बात ही कुछ ऐसी हुई कि अतर सिंह के परिवार से ले कर भागीरथ के परिवार में खलबली मच गई. हरेंद्र भागीरथ का सब से छोटा बेटा था. उन का पुश्तैनी मकान बिलारी से सिरसी जाने वाले मार्ग के किनारे ग्राम ढकिया नरू में है. भागीरथ का परिवार वहीं सालों से रहते आए हैं. सिरसी मार्ग पर सड़क के किनारे उन की अच्छी खेतीबाड़ी भी है. अतर सिंह की नींद सुबह देर से तब खुली, जब नीचे घर में कोई हलचल सुनाई दी. शीतल से कुछ लोग तेज आवाज में बातें कर रहे थे. आवाज सुन कर अतर सिंह भी नीचे गए. घर पर आए एक सिपाही को देख कर वह अचंभित हो गए.

जल्द ही उन्हें मालूम हो गया कि दीक्षा को गोली लगी है. वह मुरादाबाद अस्पताल में है. अतर सिंह अभी पूरा मामला समझ पाते इस से पहले ही सिपाही ने बताया कि दीक्षा की मौत हो चुकी है. वह बेहद घायलावस्था में थाना कुंदरकी क्षेत्र के बाईपास के किनारे पैट्रोलिंग पुलिस को मिली थी. वह खून से लथपथ तड़प रही थी. पुलिस ने इस की सूचना थानाप्रभारी संदीप कुमार को देने के बाद उसे निकट के अस्पताल पहुंचा दिया था. डाक्टर ने उस के सिर में गोली लगने की जानकारी दी और प्राथमिक उपचार के बाद जिला मुख्यालय रेफर कर दिया, परंतु उस ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

थाना कुंदरकी पुलिस मृतका की शिनाख्त में जुट गई. अभी वह इस केस की कागजी काररवाई कर ही रहे थे. तभी उन्हें कोतवाली बिलारी से सूचना मिली कि कुंदरकी बाईपास के किनारे घायलावस्था में जो युवती मिली थी, उस के हमलावर ने कोतवाली में सरेंडर कर दिया है. वह हमलावर कोई और नहीं बल्कि दीक्षा का पति हरेंद्र ही था. हरेंद्र ने ही अपनी पत्नी दीक्षा की हत्या की सूचना कोतवाली बिलारी को दे दी थी. बिलारी कोतवाली के प्रभारी आर.पी. सिंह  ने हरेंद्र से मामले की पूछताछ की. हरेंद्र ने अपना अपराध स्वीकारते हुए बताया कि उस का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था. विवाह के 2 महीने बाद ही उसे मालूम हो गया था कि उस की पत्नी के और भी प्रेमी हैं. इस कारण वह हमेशा मायके जाती रहती थी.

हरेंद्र ने अपनी मृतक बीवी पर यह भी आरोप लगाया कि वह किसी की चिकनीचुपड़ी बातों में तुरंत आ जाती थी और पति को छोड़ कर उस के ही प्रेम इजहार को महत्त्व देती थी. हरेंद्र का कहना था कि दीक्षा ही प्रेमी को फंसा कर रखती थी. इस कारण वह हमेशा पत्नी से नाराज रहता था. इस की वजह से घर में कलह काफी बढ़ गई थी. घटना के दिन भी रात को उस की ननदोई से फोन पर हुई बात को ले कर काफी बहस हो गई थी. उस रात बात इतनी बिगड़ गई कि जबरन रात को ही घर से बाहर उसे ले कर निकल पड़ा. उसे अपनी गाड़ी में बिठाया और बाईपास पर नीचे उतार कर उस के सिर में गोली मार दी.

उस के बाद कुछ दूर जा कर सोच में पड़ गया कि उसे अब क्या करना चाहिए. हालांकि गोली लगने से दीक्षा तड़पती हुई गिर पड़ी थी. पुलिस के आने तक उस की सांसें चल रही थीं. हरेंद्र के बयानों के आधार पर उस से पूछताछ थाना कुंदरकी में भी हुई. वहां उस ने पुलिस को घटनास्थल पर ले जा कर हत्या में इस्तेमाल तमंचा बरामद करा दिया, जो उस ने जंगल में फेंक दिया था. उस की बताई हुई जगह पर तलाशी के बाद एक बाइक भी कब्जे में ली गई. पुलिस ने दीक्षा के पिता अरविंद कुमार की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर ली. हरेंद्र से पूछताछ के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

पुलिस का कहना है कि घटनास्थल पर मोटरसाइकिल बरामद हुई है. यह सवाल बना रहा कि जब हरेंद्र अपनी ससुराल कार से आया था तब मोटरसाइकिल कहां से आ गई? क्या हत्या में हरेंद्र के साथ कोई और भी शामिल था? इस बारे में पुलिस कोई जवाब नहीं दे सकी थी. बहरहाल, थानाप्रभारी संदीप कुमार चार्जशीट तैयार करने से पहले इस बात की जांच कर रहे हैं कि मृतका के पति हरेंद्र ने पत्नी पर जो आरोप लगाए थे, उन में कितनी सच्चाई है? UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित